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सत्संग ६

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गीता सार - अध्याय 2

गीता 2.26–2.38 · 76 मिनट

अनिवार्य का शोक, और डर के आगे अपना कर्तव्य

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥
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जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७ ॥
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अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २८ ॥
गीता 2.28 — अर्थ पढ़ें ›

एक बात हम सब बचपन से जानते हैं, और शायद हम में से बहुत कम लोगों ने उसे कभी सचमुच माना है: जो आया है, वह जाएगा। हम इसे सुनते हैं, सिर हिलाते हैं, और फिर किसी दिन अस्पताल के गलियारे में खड़े होकर पता चलता है कि जानना एक चीज़ है और मानना बिल्कुल दूसरी।

और इसके साथ एक दूसरा सवाल भी चलता है, जो उतना ही पुराना है। जब सामने कोई कठिन काम खड़ा हो, जो हमारा अपना काम है, हमारी अपनी ज़िम्मेदारी, तब डर हमें बड़े सुंदर तर्क देता है कि इसे छोड़ दीजिए, ये आपके बस का नहीं, या ये ठीक नहीं होगा। आज का सत्संग इन्हीं दोनों सवालों पर है: जो टल नहीं सकता, उसका शोक कितना, और जो टाला जा सकता है, उसे डर के कारण क्यों टालें।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का छठा सत्संग है। पिछली बार हम दूसरे अध्याय के बीच के उस हिस्से में थे, जहाँ श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पहली बार वह बात सुनाई, जिसके बिना बाक़ी पूरी गीता अधूरी रहती: कि मरता कौन है। याद कीजिए, उन्होंने कहा था कि तुम बातें तो ज्ञानियों जैसी कर रहे हो, पर शोक उनका कर रहे हो जिनके लिए शोक करने की ज़रूरत ही नहीं है। फिर उन्होंने बताया कि इस शरीर में रहने वाला न कभी जन्मता है, न कभी मरता है। जैसे मनुष्य पुराने कपड़े छोड़कर नए कपड़े पहन लेता है, वैसे ही वह पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर लेता है। न शस्त्र उसे काट सकते हैं, न आग जला सकती है, न पानी भिगो सकता है, न हवा सुखा सकती है। और पिछला सत्संग इस पर रुका था कि यह अव्यक्त है, अचिन्त्य है, विकार से परे है, इसलिए इसे ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। जाते-जाते मैंने कहा था कि अगली बात पहले से भी ज़्यादा चौंकाने वाली है। आज वही बात।

यानी अब तक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से एक ही बात कही: कि जो मरता दिखता है, वह असल में मरता नहीं। पर अब आप एक पल अर्जुन की जगह खड़े होकर सोचिए। इतनी ऊँची बात एक बार में किसके भीतर उतर जाती है? हो सकता है अर्जुन कहे कि कृष्ण, आप कहते हैं तो मान लेता हूँ, पर मेरी आँखों के सामने तो जो गया वह गया। या शायद वह कहे कि मैं इस आत्मा-वात्मा को मानता ही नहीं, मेरे लिए तो आदमी बस यह शरीर है, जो जन्मा और जो एक दिन चला जाएगा।

और यहीं गीता की एक बहुत सुंदर बात दिखती है, जिसे मैं आज के पूरे सत्संग का दरवाज़ा कहूँगा। श्रीकृष्ण अपनी बात मनवाने के लिए अर्जुन को हराते नहीं। वे कहते हैं: अच्छा, तुम मेरी यह बात न मानो, तब भी, तुम जो कुछ मानते हो, उसी के भीतर रहकर भी, शोक का कोई कारण नहीं बनता। इसे कहते हैं सामने वाले की ज़मीन पर आकर बात करना। आज के पहले तीन श्लोक यही हैं।

और एक बात और याद दिला दूँ। यह सारी गीता सञ्जय सुना रहे हैं धृतराष्ट्र को, उस समय जब भीष्म बाणों की शय्या पर लेट चुके हैं। महाभारत के भीष्म पर्व में सञ्जय उसी दिन, दौड़े हुए आकर, राजा से यही कहते हैं कि शन्तनु के पुत्र, भरतवंश के पितामह भीष्म मारे गए। और पाँचवें सत्संग में हमने सुना था कि उससे भी पहले, युद्ध शुरू होने से पहले, व्यास राजा से कह चुके हैं कि इसे समय का उलटफेर समझो और मन को शोक में मत लगाओ। यानी आज जब सञ्जय ये श्लोक सुनाएँगे, तो धृतराष्ट्र के कानों में यह पहली बार नहीं पड़ रहा होगा। एक बार पिता व्यास ने कहा था, आज श्रीकृष्ण के शब्दों में वही बात लौटकर आती है।

तो अब पहले श्लोक पर आइए। "अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि।"

और यदि तुम इसे सदा जन्मने वाला और सदा मरने वाला मानो, तो भी, हे महाबाहो, तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए।

पहला शब्द देखिए: "अथ च"। इसका मतलब है, और अगर। हमारी टीका इसे ठीक पकड़ती है: यहाँ श्रीकृष्ण दूसरे पक्ष से तर्क करते हैं। जो अमर आत्मा को न माने, उसके लिए भी शोक व्यर्थ है। मधुसूदन सरस्वती, जो गीता के बड़े टीकाकार हैं, यहाँ वे मत गिनाते हैं जिनकी बात इस श्लोक में छिपी है। कोई कहता है कि देह ही आत्मा है और वह पल-पल बदलती रहती है। कोई कहता है कि जो कुछ है, वह हर क्षण जन्मता और नष्ट होता है। और नीलकण्ठ, जिन्होंने पूरे महाभारत पर टीका लिखी है, कहते हैं कि यहाँ श्रीकृष्ण अब तक की तत्त्व की दृष्टि छोड़कर साधारण लोगों की दृष्टि से बात कर रहे हैं। पहले उन्होंने कहा कि सच्ची नज़र से शोक ठीक नहीं; अब वे कहते हैं कि आम नज़र से भी ठीक नहीं।

मुझे इस श्लोक में "महाबाहो" शब्द भी बहुत अच्छा लगता है। मधुसूदन सरस्वती इसके बारे में कहते हैं कि इसमें या तो एक हल्का उलाहना है, या करुणा। और नीलकण्ठ कहते हैं कि यह सम्बोधन अर्जुन को युद्ध के लिए उत्साह देने वाला है। सोचिए, बड़ी भुजाओं वाले, जिसे आप सबसे बलवान जानते हैं, उसे आप ऐसे पुकारते हैं जब आप चाहते हैं कि वह अपने बल को याद करे, अपने आँसू को नहीं।

अब दूसरा श्लोक, जो इस सत्संग का नाम भी है। "जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।"

क्योंकि जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इसलिए जिसे टाला नहीं जा सकता, उसके विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

ध्रुव। यह शब्द ध्यान से पकड़िए। ध्रुव तारा वही है जो अपनी जगह से हिलता नहीं। श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि मृत्यु उसी तरह अपनी जगह पर टिकी है जैसे ध्रुव तारा, जिसे कोई हिला नहीं सकता, चाहे कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो। और "तस्मादपरिहार्येऽर्थे" में अपरिहार्य का मतलब है, जिसका परिहार, यानी जिसे हटाना, सम्भव ही नहीं। शंकराचार्य अपनी टीका में इसे बहुत सीधा रखते हैं: जिसने जन्म लिया है, उसका नाश भी होना ही है, और जिसका नाश हुआ है, उसका जन्म भी, और ये दोनों बातें अवश्य होने वाली हैं। श्रीधर स्वामी इसमें कर्म की बात जोड़ते हैं: जिस कर्म से यह शरीर मिला था, जब वह चुक जाता है तो मृत्यु आती है, और अगला जन्म अगले शरीर के कर्मों से।

रामानुजाचार्य की एक बात मुझे बहुत पसंद आती है, क्योंकि वह रोज़ की चीज़ से समझाती है। वे कहते हैं कि जैसे मिट्टी कभी डली के रूप में होती है, कभी घड़े के रूप में, कभी ठीकरों के रूप में और कभी चूर्ण के रूप में, वैसे ही हर चीज़ अपनी अवस्थाएँ बदलती रहती है। एक अवस्था का जाना ही दूसरी का आना है। आप कुम्हार के चाक के पास खड़े होकर देखिए: मिट्टी वही है, रूप बदलते रहते हैं, और किसी रूप के जाने पर कुम्हार छाती नहीं पीटता।

और अब वह टीका सुनिए जो मुझे सबसे व्यावहारिक लगती है। मधुसूदन सरस्वती इस श्लोक की व्याख्या में एक सीधी बात कहते हैं: अर्जुन, अगर तुम्हारे युद्ध न करने से ये सब लोग जीते ही रहते, तब तो तुम्हारा शोक करना समझ में आता। पर ये तो अपने कर्मों के चुक जाने पर स्वयं ही जाने वाले हैं, और जिसे तुम रोक नहीं सकते, उसके लिए शोक का कोई अर्थ नहीं बनता। नीलकण्ठ भी यही कहते हैं: तुम्हारे प्रयास के बिना भी जो होने वाला है, उसी मरण पर शोक मत करो। और वे आगे का एक वाक्य ज्यों का त्यों उठाकर रख देते हैं, जो ग्यारहवें अध्याय में आएगा, जहाँ श्रीकृष्ण कहेंगे कि ये सब तो पहले ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं, तुम केवल निमित्त बनो। हम उस पर उसी दिन आएँगे।

अब मैं इस श्लोक को अपने जीवन में उतारकर रखता हूँ। मान लीजिए आपके घर में कोई बहुत बूढ़े हैं, और डॉक्टर ने कहा है कि अब दवाइयाँ सिर्फ़ आराम देने के लिए हैं। इस घड़ी में दो तरह के लोग होते हैं। एक वे जो हर बात में लड़ते हैं, डॉक्टर से, भगवान से, खुद से। दूसरे वे जो जानते हैं कि इस रास्ते का अन्त क्या है, और इसलिए जितने दिन बचे हैं, उन्हें प्यार से, पास बैठकर, बिना हड़बड़ी के बिताते हैं। दोनों को दुःख है। फ़र्क यह है कि पहले का दुःख उस चीज़ से टकराकर चूर हो रहा है जो हटने वाली नहीं, और दूसरे का दुःख उस चीज़ को जगह दे रहा है जो आ ही गई है।

इसका मतलब यह नहीं कि रोना मना है। गीता कहीं नहीं कहती कि आँसू गिरना पाप है। श्रीकृष्ण ने आँसुओं को पाप नहीं कहा था, उन्होंने उस धुँधलेपन का नाम लिया था जो आँसुओं के पीछे था। यहाँ जो चीज़ छोड़ने को कही जा रही है, वह है अपरिहार्य से लड़ाई।

और महाभारत खुद इसका सबसे बड़ा उदाहरण दिखाता है। भीष्म को ही याद कीजिए। पिछले सत्संग में हमने सुना था कि पिता शन्तनु के वर से मृत्यु उन पर तभी प्रभाव डालती थी जब वे स्वयं अनुमति दें, और बाणों की शय्या पर पड़कर भी उन्होंने उत्तरायण की प्रतीक्षा में प्राण रोके रखे। जिसके पास मृत्यु का समय चुनने का वरदान था, वह भी यह नहीं कह सका कि मृत्यु नहीं आएगी। वर ने उसे समय दिया, छूट नहीं दी। यह श्लोक सबके लिए है, भीष्म के लिए भी।

अब तीसरा श्लोक, जिसमें श्रीकृष्ण एक कदम और पीछे हटकर पूरी तस्वीर दिखाते हैं। "अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।"

हे भारत, प्राणी आरम्भ में अव्यक्त होते हैं, बीच में व्यक्त, और अन्त में फिर अव्यक्त। उसमें शोक की क्या बात है?

अव्यक्त का मतलब है, जो दिखाई न दे। श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि हम जिनसे प्रेम करते हैं, वे जन्म से पहले हमारी आँखों के सामने नहीं थे, बीच के कुछ बरस दिखे, और जाने के बाद फिर नहीं दिखते। शंकराचार्य इसकी व्याख्या में एक पुराना श्लोक उद्धृत करते हैं, जिसका भाव यह है: वह अदृश्य से आया और फिर अदृश्य में चला गया; वह न तुम्हारा है, न तुम उसके; तब यह व्यर्थ विलाप कैसा? और मैं आपको एक बात बताता हूँ। महाभारत में यही बात विदुर के मुँह से भी सुनाई देती है, वही विदुर जिन्हें हमने पिछले सत्संग में वस्त्र की उपमा कहते सुना था। उसी स्त्री पर्व में, जब धृतराष्ट्र पुत्रों के शोक में भूमि पर पड़े हैं, विदुर उनसे लगभग इसी श्लोक के शब्दों में कहते हैं: प्राणी अभाव से आरम्भ होते हैं, बीच में रहते हैं, और अभाव में ही अन्त पाते हैं; इसमें विलाप कैसा? और थोड़ा आगे वही पुरानी पंक्ति भी: ये अदृश्य से आए और फिर अदृश्य में चले गए; ये न आपके हैं, न आप इनके। तो धृतराष्ट्र के लिए यह बात तीन बार आती है: पहले व्यास से, फिर आज सञ्जय की सुनाई गीता में, फिर विदुर से। और हम सोचते रहते हैं कि हमें किसी ने समझाया नहीं।

श्रीधर स्वामी इस श्लोक में एक बड़ी कोमल उपमा लाते हैं: जो नींद से जागा है, वह सपने में देखी चीज़ों के लिए शोक नहीं करता। मधुसूदन सरस्वती इसी को आगे बढ़ाते हैं: सपने में आपने किसी को पाया, किसी को खोया, और जागते ही उसका बिछोड़ आपको नहीं सताता। और नीलकण्ठ रस्सी में दिखे साँप का उदाहरण देते हैं: अँधेरे में साँप दिखता है तो डर लगता है, रोशनी आई तो रस्सी दिखी और डर गया। सब कहने का एक ही ढंग है: कि जो अभी तुम्हें इतना पक्का, इतना भारी लग रहा है, उसका एक सिरा पीछे अदृश्य में है और दूसरा आगे अदृश्य में।

संत ज्ञानेश्वर ने इसे गंगा की धारा से समझाया है। वे कहते हैं कि गंगा की धारा बिना रुके बहती रहती है, उसका आदि और अन्त एक ही अटूट प्रवाह में समाए हैं, और हमारी आँखों के सामने बस बीच का बहता हुआ टुकड़ा रहता है। जैसे कोई दर्शक मंच के सामने बैठा हो। अभिनेता मंच के पीछे से आता है, कुछ देर हमारे सामने रहता है, और फिर मंच के पीछे चला जाता है। उसके आने से पहले हम उसके लिए नहीं रोते थे। जाने के बाद जब रोते हैं, तो असल में हम उस बीच के टुकड़े को पकड़कर रोक लेना चाहते हैं, जो कभी हमारे बस में था ही नहीं।

तो इन तीन श्लोकों में श्रीकृष्ण ने क्या किया? उन्होंने अर्जुन को आत्मा पर यक़ीन करने को नहीं कहा। उन्होंने कहा: मान लो आत्मा नहीं है, मान लो आदमी बस शरीर है। तब भी जन्म की बात मृत्यु पर और मृत्यु की बात जन्म पर रुकी है, और दोनों के आगे-पीछे वही अदृश्य है। जो हम बदल ही नहीं सकते, उससे लड़ते रहने में हमारा सबसे ज़्यादा बल जाता है।

एक पंक्ति ले जाइए अपने साथ। जिसे आप बदल नहीं सकते, उसके साथ लड़ना छोड़ दीजिए, तब जो बदला जा सकता है, उसके लिए आपके पास हाथ बचेंगे।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने आत्मा को इतनी बार समझाया है, फिर भी अगले श्लोक में वे खुद मान लेते हैं कि यह बात किसी के लिए भी आसान नहीं। वे कहते हैं कि कोई इसे आश्चर्य की तरह देखता है, कोई आश्चर्य की तरह कहता है, कोई आश्चर्य की तरह सुनता है, और सुनकर भी कोई इसे सचमुच नहीं जानता। तो क्या इसका मतलब यह है कि गीता सुनना बेकार जाएगा? सुनिए, अगला श्लोक क्या कहता है।

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ २९ ॥
गीता 2.29 — अर्थ पढ़ें ›
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥
गीता 2.30 — अर्थ पढ़ें ›

चौथा श्लोक, यानी वह श्लोक जिस पर हम पिछले खंड के अंत में रुके थे, गीता के सबसे ईमानदार श्लोकों में से एक है। "आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः। आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।"

कोई इसे आश्चर्य की तरह देखता है, कोई दूसरा इसके विषय में आश्चर्य की तरह कहता है, और कोई दूसरा इसे आश्चर्य की तरह सुनता है। सुनकर भी कोई इसे ठीक से नहीं जानता।

ज़रा रुककर सोचिए। श्रीकृष्ण अपनी ही शिक्षा के बारे में बोल रहे हैं, और कह रहे हैं कि यह चीज़ इतनी अनोखी है कि जो इसे देखता है, वह चकित रह जाता है; जो इसका वर्णन करता है, वह चकित स्वर में करता है; जो सुनता है, वह चकित होकर सुनता है; और फिर भी, सुन लेने के बाद भी, बहुत कम लोग इसे सचमुच जान पाते हैं। किसी गुरु के लिए यह कहना आसान नहीं होता कि मेरी बात को पूरा समझना कठिन है। पर इसी में एक ईमानदारी है, और मुझे लगता है कि इसी ईमानदारी के कारण शिष्य का भरोसा बढ़ता है, घटता नहीं।

श्रीधर स्वामी इस श्लोक की भूमिका में एक सवाल उठाते हैं जो शायद आपके मन में भी आया होगा: कि अगर यह इतना साफ़ सच है, तो फिर पढ़े-लिखे, समझदार लोग भी इतना शोक क्यों करते हैं? और जवाब यही देते हैं कि आत्मा का ज्ञान कठिन है। वे कहते हैं कि यह आत्मा सब जगह है, सदा ज्ञान और आनन्द के स्वभाव की है, और अलौकिक होने के कारण साधारण समझ में सहज नहीं बैठती। इसीलिए कोई इसे देखता है तो जादू के खेल जैसा विस्मय होता है, मानो ऐसी चीज़ दिख रही हो जो हो ही नहीं सकती। और कोई दूसरा उल्टे विचारों से इतना भरा है कि सुनकर भी नहीं जानता।

मधुसूदन सरस्वती इस पर एक बहुत अच्छी बात जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि अर्जुन यह तर्क दे सकता था कि बहुत-से विद्वान भी शोक करते हैं, तो आप मुझे ही बार-बार क्यों कहते हैं? और श्रीकृष्ण का उत्तर इसी श्लोक में है: मैं सिर्फ़ तुम्हें नहीं कह रहा, यह कठिनाई सबकी है। इसलिए वे इस श्लोक में तीन आश्चर्य गिनाते हैं: स्वयं आत्मा, उसका ज्ञान, और उसे जानने वाला। तीनों इतने दुर्लभ हैं कि तीनों आश्चर्य हैं। और तिलक महाराज कहते हैं कि इसीलिए इतने लोग मृत्यु के विषय में शोक किया करते हैं, और इसीलिए श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम सोच-समझकर आत्मा को यथार्थ रूप से जान लो और शोक छोड़ दो। वे यह भी लिखते हैं कि कठोपनिषद में आत्मा का वर्णन इसी ढंग का है।

मैं इस श्लोक को अपनी रोज़ की ज़िंदगी में इस तरह देखता हूँ। "सुनना" और "जानना" दो अलग चीज़ें हैं। आप कितनी बार सुन चुके हैं कि ज़्यादा चिन्ता से कुछ हल नहीं होता। हर बार सिर हिलाया है। और अगली सुबह, फ़ोन में कोई संदेश आता है और वही पुरानी घबराहट लौट आती है। कभी-कभी खुद पर थोड़ा मुस्कुरा लेना ठीक रहता है। सुनी हुई बात ने हमारे कान छुए थे, मन तक अभी पहुँची नहीं थी। और मन तक पहुँचने में कई बार बरसों लगते हैं, क्योंकि वहाँ तक ले जाने वाला रास्ता केवल एक है: उसे अपने ऊपर बार-बार गुज़रते देखना।

इसी जगह मैं आपसे एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ। हम दूसरे अध्याय के बीच में हैं, और यह वह जगह है जहाँ बहुत-से लोग सोचते हैं कि आत्मा की बात तो हो चुकी, अब तो बस लड़ाई-झगड़े की बात बची है, इसमें हमारे लिए क्या। पर जो आदमी इन आत्मा वाले श्लोकों के बाद ही उठ जाए, वह यह सोचकर चला जाएगा कि गीता बस अमरता की बात करती है, और यह जाने बिना कि इसी सत्संग के आख़िर में वह श्लोक आता है जो इस सारे ज्ञान को रोज़ के काम से जोड़ देता है। तो अगर आप यह सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि यह यात्रा बीच में न टूटे। और आज का हिस्सा आख़िर तक सुनिए।

और यहाँ धृतराष्ट्र को याद कीजिए। पहले सत्संग में हमने उनकी अपनी स्वीकारोक्ति सुनी थी, कि मैं अन्धा हूँ, और जब दुर्योधन भटकता है तो पुत्र-प्रेम के कारण मैं भी उसके साथ भटक जाता हूँ। और पिछले सत्संगों में हमने यह भी सुना कि गीता की ख़बर को उन्होंने अपनी हार की ख़बर की तरह सुना, कहा कि तब मुझे विजय की आशा नहीं रही। "श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्" इन पर कितनी सही बैठती है। बात की ताकत उन्होंने पहचानी, पर सुनना और बदल जाना एक चीज़ नहीं है।

और सञ्जय के बारे में गीता के आख़िर में एक बात आएगी, जिसे मैं आज ही बता देना चाहता हूँ, क्योंकि इस श्लोक का दूसरा पहलू वही है। अठारहवें अध्याय में सञ्जय खुद कहेंगे कि मैंने वासुदेव और महात्मा पार्थ का यह अद्भुत और रोमांचकारी संवाद सुना, और केशव और अर्जुन के इस पवित्र संवाद को बार-बार याद करके मैं बार-बार हर्षित होता हूँ। यानी एक ही संवाद है, एक ही श्लोक, और कोई सुनकर भी पूरा नहीं पहुँच पाता, कोई बार-बार याद करके हर्षित होता है। श्लोक कहता है कि दोनों सम्भव हैं। और इसी में हमारे लिए आशा है: कि सुनना बेकार नहीं जाता, वह धीरे-धीरे रंग लाता है।

अब पाँचवाँ श्लोक, जो इस आत्मा वाले तर्क का समापन है। "देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत। तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।"

हे भारत! सबके शरीर में रहने वाला यह देहधारी सदा अवध्य है। इसलिए तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।

इस श्लोक में दो शब्द मुझे बार-बार रोकते हैं। एक है "सर्वस्य", यानी सबके। और दूसरा "सर्वाणि भूतानि", यानी सब प्राणी। श्रीकृष्ण अब तक अर्जुन के अपनों की बात कर रहे थे, भीष्म की, द्रोण की। अब वे यह कह रहे हैं कि जो नियम इन पर लागू होता है, वही उन पर भी, जिन्हें तुम जानते ही नहीं। जिस तरह तुम्हारे गुरु के भीतर जो है वह अवध्य है, उसी तरह उस सैनिक के भीतर भी, जिसका नाम तुम कभी नहीं जानोगे। नीलकण्ठ इस "सर्वाणि भूतानि" का मतलब खोलकर रखते हैं, और उसमें अर्जुन का पूरा शोक दिखता है: कि ये बेचारे कम बल वाले लोग मुझ जैसे बलवान के हाथों कैसे मारे जाएँगे; इनके बेटे-बेटियाँ इनके बिना कैसे जिएँगे; और मैं खुद भीष्म जैसे गुरुओं के बिना कैसे जिऊँगा। श्रीकृष्ण कहते हैं, इन सब पर भी शोक मत करो।

संत ज्ञानेश्वर कहते हैं कि जिस चैतन्य को सब शरीरों में रहने वाला जानो, वही एक है; उसे कोई कितना भी घात करे, उसका घात होता नहीं। और वे अर्जुन से एक सीधा सवाल पूछते हैं: जब यह सारा आना-जाना अपने स्वभाव से हो ही रहा है, तो बताओ, तुम किस बात पर शोक करो?

और अब वह बात, जो मुझे इस सत्संग में आपसे जरूर कहनी है, ताकि इस श्लोक को ग़लत न समझा जाए। तिलक महाराज यहाँ बहुत सावधानी से एक भेद दिखाते हैं। वे कहते हैं कि अब तक यह सिद्ध किया गया कि आत्मा अमर है और देह स्वभाव से ही अनित्य है, इसलिए कोई मरे या मारा जाए, इस पर शोक की आवश्यकता नहीं। परन्तु कोई इससे यह अनुमान कर ले कि तब किसी को मारने में भी पाप नहीं, तो वे इसे भयंकर भूल कहते हैं। मरना या मारना, ये दो शब्द अलग हैं, और मरने या मारने के शोक का निपटारा इस ज्ञान से होता है, पर मारने के पाप का सवाल इससे हल नहीं होता। वे लिखते हैं कि बिना योग्य कारण के किसी दूसरे को मार डालना शास्त्र के अनुसार घोर पातक है। इसीलिए गीता यहाँ रुकती नहीं, और इसीलिए इसके बाद श्रीकृष्ण कर्तव्य के धर्म का तर्क लाने वाले हैं। मैं इसे इस तरह कहूँगा: आत्मा की बात हमारा शोक हल्का करती है, हमें किसी के हाथ में हथियार नहीं देती। कर्म का सवाल एक अलग सवाल है, और वह अगले श्लोकों में उठेगा।

तो इन दो श्लोकों से हम क्या ले जाएँ? पहली बात: जो बात बार-बार सुनी हो और फिर भी जीवन में न उतरी हो, उसके लिए खुद को कोसना नहीं है। श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि सुनकर भी कोई इसे ठीक से नहीं जानता। यह थकाने वाली बात नहीं, यह सहारा देने वाली बात है। दूसरी बात: जिसके लिए आप शोक कर रहे हैं, उसके भीतर कुछ ऐसा है जिसे कोई छू नहीं सका था। यह जानकर शोक कम नहीं हो जाता, पर उसमें एक ठहराव आ जाता है, जैसे तूफ़ान में किसी ने आपके कंधे पर हाथ रख दिया हो।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक श्रीकृष्ण आत्मा, मृत्यु और जन्म की ऊँची बातें करते रहे। पर अर्जुन की असली उलझन कहीं और भी थी: कि वह क्षत्रिय है, और उसके सामने उसका अपना कर्तव्य खड़ा है, जिसे वह छोड़ देना चाहता है। अगला श्लोक बिना किसी भूमिका के अचानक धरती पर उतर आता है, और अर्जुन के सामने एक ही शब्द रख देता है: "स्वधर्म"। वह शब्द क्या कहता है? सुनिए।

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥
गीता 2.31 — अर्थ पढ़ें ›
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥
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यहाँ गीता एक मोड़ लेती है, और यह मोड़ इतना हल्का है कि बहुत-से लोग इसे सुनते-सुनते निकल जाते हैं। अब तक श्रीकृष्ण परम सत्य की दृष्टि से बोल रहे थे: आत्मा, जन्म, मृत्यु, अव्यक्त। हमारी टीका इसे ठीक पकड़ती है: परम सत्य की दृष्टि से कहने के बाद श्रीकृष्ण अब व्यवहार के धर्म की दृष्टि से कहते हैं। ऊपर की बात से नीचे उतरकर, उसी ज़मीन पर, जहाँ अर्जुन खड़ा है, रथ पर, धनुष-बाण के बीच।

"स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।"

अपने धर्म को देखकर भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए। क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कल्याणकारी दूसरा कुछ नहीं है।

एक शब्द पर पहले ठहरिए: "न विकम्पितुमर्हसि"। कम्प यानी काँपना। याद कीजिए, पहले अध्याय में अर्जुन ने क्या कहा था: कि मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुँह सूख रहा है, मेरे शरीर में कम्पन हो रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं, गाण्डीव हाथ से फिसल रहा है। श्रीधर स्वामी इस श्लोक का सम्बन्ध ठीक इसी से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि अर्जुन ने जो कहा था कि मेरे शरीर में कम्पन हो रहा है, वह भी ठीक नहीं; और इसीलिए श्रीकृष्ण कहते हैं: कम्पित होना तुम्हें शोभा नहीं देता। यानी श्रीकृष्ण अर्जुन के हाथ का काँपना देख रहे हैं, और उसी शब्द से उत्तर दे रहे हैं।

अब "स्वधर्म" और "धर्म्य", ये दो शब्द इस श्लोक की धुरी हैं। मधुसूदन सरस्वती इसे बड़े साफ़ ढंग से खोलते हैं। वे कहते हैं कि अर्जुन ने अब तक जो कहा कि युद्ध से पाप लगेगा, गुरु की हत्या होगी, वह सब इसलिए कहा कि उसने धर्मशास्त्र को ठीक से देखा नहीं। क्षत्रिय के लिए युद्ध वह साधन है जिससे पृथ्वी जीतकर प्रजा की रक्षा, ब्राह्मणों की सेवा और अपना राजधर्म निभता है। और वे धर्मशास्त्र से कुछ वचन भी रखते हैं, जिनका भाव यह है कि राजा, जब उसे चुनौती दी जाए, तब संग्राम से पीछे नहीं हटता, और संग्राम से न लौटना और प्रजा का पालन करना राजा के लिए सबसे बड़ा कल्याणकारी कर्म है। नीलकण्ठ इसे बहुत छोटे में कहते हैं: अर्जुन का एक मोह पहले दूर हुआ था, जब उसे देह में आत्मा की बुद्धि थी। अब दूसरा मोह दूर किया जा रहा है, जो अपने धर्म में, यानी युद्ध में, अधर्म की बुद्धि है।

पर "धर्म्य" शब्द पर ध्यान दीजिए। श्रीकृष्ण ने यह नहीं कहा कि कोई भी युद्ध अच्छा होता है। उन्होंने कहा "धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते", यानी धर्म से युक्त युद्ध। इसका क्या मतलब है, यह महाभारत ही बताता है। भीष्म पर्व के बिल्कुल आरम्भ में, जब दोनों सेनाएँ कुरुक्षेत्र में खड़ी होती हैं, तब कुरु, पाण्डव और सोमक मिलकर लड़ाई के नियम तय करते हैं। उसमें कहा जाता है: जो शब्दों से लड़ाई में लगे हों, उन्हें शब्दों से ही जवाब दिया जाए; जो सेना के बीच से निकल गए हों, उन्हें कभी न मारा जाए; रथी से रथी ही लड़े, घुड़सवार से घुड़सवार और पैदल से पैदल; भरोसा किए हुए पर या घबराए हुए पर वार न किया जाए; जिसके शस्त्र खत्म हो गए हों और जो बिना कवच का हो, उसे कभी न मारा जाए; सारथियों पर, शस्त्र पहुँचाने वालों पर और नगाड़े और शंख बजाने वालों पर किसी भी तरह वार न किया जाए। तो जिस "धर्म्य" युद्ध की बात श्रीकृष्ण कर रहे हैं, वह कोई बेलगाम खूनी तमाशा नहीं है। वह एक ऐसा युद्ध है जिसमें दोनों पक्षों ने पहले से बैठकर कहा है कि हम इस हद के भीतर लड़ेंगे।

और यह युद्ध पहली पसंद भी नहीं था। आपको याद होगा, दूसरे और तीसरे सत्संग में हमने सुना था कि युधिष्ठिर ने सञ्जय के हाथ केवल पाँच गाँव माँगे थे, और दुर्योधन ने सुई की नोक भर भूमि भी देने से मना कर दिया था। और दूसरे सत्संग में हमने धृतराष्ट्र का अपना स्वीकार भी सुना था, कि कृष्ण शान्ति का प्रयास करके बिना सफल हुए लौट गए।

यह बात इसलिए ज़रूरी है कि मधुसूदन सरस्वती खुद आगे के श्लोकों में एक आपत्ति उठाते हैं: कि शान्ति पर्व तो कहता है कि साम, दान और भेद से पहले शत्रु को जीतने का प्रयत्न करो, युद्ध कभी नहीं, जब तक कोई उपाय बचा हो। और वे यह भी लिखते हैं कि उन तीनों उपायों के असम्भव होने पर ही युद्ध करना है। यानी "धर्म्य" का एक अर्थ यह भी है: कि पहले वह सब कर लिया गया, जो करना चाहिए था। पाँच गाँव माँगना, कृष्ण का शान्ति-दूत बनना, इन सबके बाद ही यह रथ यहाँ खड़ा है।

और एक बात और। अर्जुन ने जो भिक्षा के जीवन की बात की थी, उसका उत्तर कुन्ती पहले ही दे चुकी थीं। उद्योग पर्व में, जब श्रीकृष्ण कौरवों की सभा से लौटकर उनसे विदा लेते हैं और पूछते हैं कि मैं पाण्डवों से आपकी ओर से क्या कहूँ, तब कुन्ती युधिष्ठिर के लिए सन्देश देती हैं। वे कहती हैं: तुम्हारे लिए भिक्षा मना है, और खेती भी तुम्हें शोभा नहीं देती; तुम क्षत्रिय हो, चोट से बचाने वाले और भुजाओं के बल से जीने वाले; राजधर्म के अनुसार लड़ो, अपने पुरखों को मत डुबाओ। ध्यान दीजिए कि यह सन्देश श्रीकृष्ण ने खुद सुना है। जो बात वे आज रथ पर कह रहे हैं, उसे पहले एक माँ ने कहा था।

अब इस श्लोक को आज के जीवन में लाइए। "स्वधर्म" को केवल "कर्तव्य" का बोझ मत समझिए। वह एक ऐसा काम है जो आपके हिस्से में आया, आपके हाथ के लिए बना, और जिसे कोई दूसरा आपकी जगह नहीं कर सकता। एक नर्स को रात की पाली में उस मरीज़ की पट्टी बदलनी है जो रो रहा है। उसका मन पसीजता है। वह कह सकती है कि आज रहने दूँ, इसे कष्ट होगा। पर उसका धर्म उस पल में पट्टी बदलना है। एक पिता को बेटे से वह बात कहनी है जो बेटे को चुभेगी। एक अधिकारी को वह फ़ाइल रोकनी है जिस पर उसके दोस्त का नाम है। इन सबके भीतर कम्पन है, और वह कम्पन बुरा नहीं है। पर श्रीकृष्ण यहाँ यह कह रहे हैं कि कम्पन को फ़ैसला मत बनने दो।

संत ज्ञानेश्वर इसके लिए एक बड़ी सुन्दर उपमा देते हैं। वे कहते हैं कि गाय का दूध अच्छा है, पथ्य के लिए उसे कौन मना करेगा, पर वही दूध नए-नए बुखार वाले रोगी को दो तो विष बन जाता है। अर्जुन, तुम्हारा चित्त करुणा से पिघल गया है, यह अच्छी बात है, पर युद्ध के समय यह अनुचित है। और फिर वे कहते हैं कि अपना निजधर्म वह है जिसके पालन से कभी कोई बाधा नहीं आती, जैसे रास्ते पर चलते हुए कोई ठोकर नहीं खाता, या दीपक के सहारे चलते हुए कोई अँधेरे में नहीं गिरता। मुझे यह उपमा बहुत पसंद है। स्वधर्म बोझ नहीं, वह वह दीपक है जो तब भी जलता रहता है जब आपके पैर काँप रहे हों।

अब अगला श्लोक। "यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्। सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्।"

हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुआ और स्वर्ग के खुले द्वार जैसा ऐसा युद्ध भाग्यशाली क्षत्रियों को ही मिलता है।

"यदृच्छया", यानी बिना माँगे, अपने आप आ पड़ा। "स्वर्गद्वारमपावृतम्", यानी स्वर्ग का खुला हुआ द्वार। "सुखिनः" यानी भाग्यशाली। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि जब इतना बड़ा कल्याण अपने आप चलकर पास आ गया है, तो तुम काँप क्यों रहे हो? और वे यह भी जोड़ते हैं कि इससे अर्जुन का वह पुराना कथन भी कट जाता है कि अपने लोगों को मारकर हम सुखी कैसे होंगे। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि भीष्म और द्रोण जैसे वीरों के सामने बिना माँगे आया यह युद्ध, जीत जाओ तो यश और राज्य सहज में, और हार जाओ तो स्वर्ग बिना देर किए। यज्ञ जैसे साधनों में स्वर्ग देर से मिलता है, इसमें तुरन्त।

संत ज्ञानेश्वर यहाँ और भी कोमल होकर कहते हैं कि अर्जुन, यह तो ऐसा है जैसे रास्ते चलते चिन्तामणि से ठोकर लग जाए, या जम्हाई लेते हुए खुले मुँह में अनायास अमृत टपक पड़े। यहाँ एक बात साफ़ कर दूँ। यह श्लोक आज के किसी लड़ाई-झगड़े का आमन्त्रण नहीं है। यह उस क्षत्रिय से कहा गया है जिसके सामने उसका अपना धर्म खड़ा है, जिसे उसने खोजा नहीं, जो उस पर आ पड़ा। और इसमें जो आज हमारे काम की बात है, वह यह है: कई बार जीवन में सबसे बड़ा काम वही होता है जो बिना माँगे आता है। माँ-बाप की बीमारी, किसी का सहारा बनने की घड़ी, किसी सच को कहने का दिन। उस वक़्त हम कहते हैं, यह मेरे ही हिस्से क्यों आया। और श्रीकृष्ण कहते हैं, देखो तो सही, यह तुम्हारे सामने खुला दरवाज़ा है।

इस खंड की बात एक पंक्ति में कहूँ तो यह: जो काम आपके हिस्से में आया है, वह आपका दुश्मन नहीं है, वह आपके सामने खुला हुआ रास्ता है, जिसे डर ने दीवार जैसा दिखा दिया है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने अब तक अर्जुन को ऊँची बात बताई, फिर कर्तव्य की बात बताई। पर वे अर्जुन को जानते हैं। जानते हैं कि इन सबके बाद भी उसका मन किस चीज़ से सबसे ज़्यादा डरेगा। अगले श्लोक में वे वह डर सीधे उसके सामने रख देते हैं: कि अगर तुम यह धर्म्य युद्ध नहीं करोगे, तो अपना धर्म और कीर्ति दोनों खोकर पाप के भागी बनोगे। और उसके बाद जो आएगा, वह किसी भी मान वाले आदमी के लिए मृत्यु से भारी है। सुनिए।

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥
गीता 2.33 — अर्थ पढ़ें ›
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ ३४ ॥
गीता 2.34 — अर्थ पढ़ें ›

अब श्रीकृष्ण वह बात कहते हैं जिसे सुनना आसान नहीं है, और जिसे कहना भी आसान नहीं रहा होगा। "अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि। ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि।"

किन्तु यदि तुम यह धर्मयुक्त युद्ध नहीं करोगे, तो अपने धर्म और कीर्ति को खोकर पाप के भागी बनोगे।

ध्यान दीजिए कि श्रीकृष्ण ने धमकी नहीं दी। उन्होंने हिसाब रखा है। अर्जुन ने पहले अध्याय में कहा था कि हे कृष्ण, मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य, न सुख; हमें राज्य से, भोगों से, जीने से भी क्या लाभ। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि यह श्लोक अर्जुन की उसी बात का उत्तर है: अर्जुन ने कहा था कि मुझे विजय नहीं चाहिए, तो फिर मैं लड़ूँ क्यों? और श्रीकृष्ण कहते हैं कि फल न चाहना एक बात है, पर न लड़ने का दोष फिर भी रहता है। तुम्हारे पास खोने को बहुत कुछ है: दो चीज़ें गँवाओगे और एक चीज़ कमाओगे। स्वधर्म और कीर्ति जाएँगी, और पाप आएगा। नीलकण्ठ इसे छोटे में कहते हैं: युद्ध छोड़ने में इष्ट का नाश है और अनिष्ट की प्राप्ति है।

एक बात और, जो महाभारत ही बताता है। आपको याद होगा, चौथे सत्संग में हमने वन पर्व की वह घड़ी सुनी थी जब शिव प्रसन्न होकर अर्जुन को वर देना चाहते हैं, और अर्जुन ने पाशुपत अस्त्र माँगा था, यह कहकर कि कर्ण, भीष्म, कृप और द्रोण के साथ बड़ा युद्ध होना है। यानी इसी दिन के लिए अर्जुन ने बरसों पहले तैयारी की थी। उसी जगह शिव ने उनसे यह भी कहा था कि योद्धाओं में तुम सबसे आगे हो। मधुसूदन सरस्वती जब इस श्लोक में कहते हैं कि अर्जुन की कीर्ति महादेव से मिलने के कारण भी बनी है, तो वे इसी कथा की ओर इशारा करते हैं।

संत ज्ञानेश्वर अर्जुन की उस स्थिति को सीधे शब्दों में रखते हैं: कि अगर आज तुमने शस्त्र छोड़ दिया, तो पूर्वजों ने जो कमाया, उसे तुम अपने ही हाथ से लौटा दोगे; जो कीर्ति है, वह चली जाएगी, और जगत शाप देगा। यह कठोर लगता है, पर इसके नीचे एक बात है जो हम सबके काम आती है: कि जिसे हम "बस इस बार छोड़ देना" कहते हैं, वह कभी-कभी सिर्फ़ एक दिन की बात नहीं रहती; वह हमारे अपने बारे में हमारी ही राय बन जाती है।

अब दूसरा श्लोक। "अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्। सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।"

लोग सदा तुम्हारी अपकीर्ति की बात भी करेंगे। सम्मानित व्यक्ति के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी बढ़कर है।

"तेऽव्ययाम्" में अव्यय का मतलब है, जो कभी घटे नहीं, जो टिकी रहे। श्रीधर स्वामी इसे "शाश्वती" समझाते हैं। और "सम्भावित" उसे कहते हैं जिसका बहुत मान हो। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि यहाँ "भूतानि" का अर्थ केवल इंसान नहीं है, देवता, ऋषि और मनुष्य सब हैं, जो बातचीत में एक-दूसरे से कहेंगे कि यह धर्मात्मा नहीं निकला, यह शूर नहीं निकला। और वे एक आपत्ति भी उठाते हैं, जो शायद आपके मन में भी हो: कि जान बचाने के लिए तो अपकीर्ति सह ली जाती है, तो मरने के डर से अपकीर्ति सहने में क्या बुराई? और उसका उत्तर वे इसी श्लोक में देखते हैं: जिसके पास गुणों से कमाया हुआ ऐसा मान हो जो किसी और को नहीं मिला, उसके लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी भारी है।

तिलक महाराज यहाँ एक रोचक बात कहते हैं। वे लिखते हैं कि यह वाक्य "सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते" लोगों में कहावत की तरह चलने लगा, और यही सिद्धान्त श्रीकृष्ण ने उद्योग पर्व में युधिष्ठिर से भी कहा है। महाभारत में वह जगह मिलती है। वहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं: कुलीन के लिए या तो निन्दा है या मृत्यु; मृत्यु कहीं अच्छी है, निन्दा तो बुरा जीवन है। यह उसी बातचीत में है जहाँ श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि क्षत्रिय भिक्षा से नहीं जी सकता। यानी गीता का यह श्लोक किसी एक क्षण का उबाल नहीं है, यही दृष्टि श्रीकृष्ण के शब्दों में पहले भी आ चुकी है।

और अर्जुन की कीर्ति कितनी बड़ी थी, यह उनके विरोधियों के मुँह से सुनिए। विराट नगर में जब भागते हुए उत्तर के पीछे दौड़ते अर्जुन को कौरव पहचान नहीं पा रहे थे, तब द्रोण ने कहा: जैसे देवताओं में देवराज इन्द्र हैं, वैसे मनुष्यों में धनञ्जय हैं; संसार में धनञ्जय के सिवा दूसरा कौन अकेला हमारे विरुद्ध आएगा? और दूसरे सत्संग में हमने स्वयं धृतराष्ट्र को कहते सुना था कि वासुदेव, अर्जुन और गाण्डीव, इन तीनों के एक साथ मिलने की ख़बर से ही उनकी विजय की आशा टूट गई थी। जिसका नाम शत्रु के घर में ऐसे लिया जाता है, उसके लिए "डरपोक" शब्द कितना भारी होगा, यही श्रीकृष्ण समझा रहे हैं।

मैं इसे आज के जीवन से जोड़ता हूँ। हर आदमी ने अपने भीतर या बाहर एक "नाम" कमाया होता है। कोई अपने काम में भरोसेमंद, कोई घर में वह जिस पर सब टिकते हैं, कोई वह जो बुरे वक़्त में खड़ा रहता है। और कोई घड़ी आती है जब वह नाम दाँव पर लगता है, और छोड़ देने का मन करता है, क्योंकि छोड़ना आसान दिखता है। श्रीकृष्ण यहाँ यह नहीं कह रहे कि दुनिया की राय तुम्हारा भगवान है। वे यह कह रहे हैं कि तुमने जो बनाया है, उसे एक पल के डर में गँवा मत देना। और याद रखिए कि यह गीता की आख़िरी बात नहीं है। यह उस सीढ़ी का एक पायदान है जिस पर अर्जुन इस समय खड़ा है। आगे श्रीकृष्ण स्वयं कहेंगे कि सफलता और असफलता में समान रहो। पर पहले, जो जहाँ खड़ा है, उसे वहीं से हाथ पकड़कर ऊपर ले जाया जाता है।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि लोग अपकीर्ति की बात करेंगे। पर कौन लोग, और क्या कहेंगे? अगले दो श्लोक यह भी नहीं छोड़ते। वे नाम लेते हैं, और बताते हैं कि सबसे ज़्यादा चोट उन्हीं से पहुँचेगी जिनकी आँखों में अर्जुन आज बहुत ऊँचा है। सुनिए।

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५ ॥
गीता 2.35 — अर्थ पढ़ें ›
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ३६ ॥
गीता 2.36 — अर्थ पढ़ें ›

अब श्रीकृष्ण बताते हैं कि अपकीर्ति सुनने में कैसी लगेगी, और किसके मुँह से लगेगी। "भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः। येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्।"

महारथी मानेंगे कि तुम डर के कारण युद्ध से हट गए। जिनकी दृष्टि में तुम बहुत सम्मानित थे, उनकी दृष्टि में तुम छोटे हो जाओगे।

मधुसूदन सरस्वती यहाँ फिर वही सवाल उठाते हैं जो अर्जुन के मन में रहा होगा: अरे, जो उदासीन लोग हैं वे मेरी निन्दा कर लें, पर भीष्म और द्रोण तो महारथी हैं, वे तो मेरी करुणा देखकर मेरी प्रशंसा ही करेंगे। और उनका उत्तर यह है कि नहीं: वे यही सोचेंगे कि अर्जुन कर्ण आदि के भय से हटा है, करुणा से नहीं। श्रीधर स्वामी इसे और सीधा कहते हैं: जिन्होंने तुम्हें गुणों के कारण पहले सम्मान दिया, वही कहेंगे कि भय से भाग गया, और तब तुम्हारा सम्मान हल्का हो जाएगा। नीलकण्ठ "लाघव" शब्द को यों खोलते हैं: उन्हीं के सामने तुम में कायरता नाम का छोटापन आ जाएगा, जिनके सामने तुम इतने ऊँचे थे।

और अब वह बात जो मुझे इन श्लोकों में सबसे अद्भुत लगती है। महाभारत में ठीक यही दृश्य, इसी सुबह, गीता के ठीक बाद घट जाता है, और उसमें अर्जुन नहीं, युधिष्ठिर हैं। आपको याद होगा, चौथे सत्संग में हमने सुना था कि युधिष्ठिर कवच उतारकर, हाथ जोड़े, पैदल शत्रु की सेना की ओर चल पड़े थे, बड़ों से अनुमति लेने। और तब हमने यह भी सुना था कि कौरवों के सैनिकों ने उन्हें देखकर कहा था कि यह कुल का कलङ्क है, डरकर भीष्म की शरण माँगने आया है। यह वही है जो श्रीकृष्ण अभी अर्जुन से कह रहे थे: "भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते", वे मानेंगे कि डरकर हट गया। और ध्यान दीजिए कि उन्होंने क्या मान लिया। एक आदमी जो बड़ों के चरणों में जा रहा है, उसे उन्होंने डरपोक मान लिया। और जिस बात पर वहाँ सेना हँसी थी, वही बात भीष्म के लिए आदर बनकर निकली।

मैं इसे बहुत ध्यान से कहना चाहता हूँ। इसका मतलब यह नहीं कि लोगों की राय का कोई मोल नहीं। इसका मतलब यह है कि लोग बहुत बार हमारे काम का वह अर्थ निकाल लेते हैं जो हमारे मन में था ही नहीं। आप किसी की बात बिना बहस के सुन लें, तो कुछ लोग उसे डर कहेंगे। आप किसी बहस में चुप रहें, तो कुछ उसे हार कहेंगे। जो आप जानते हैं कि आपने क्यों किया, वह बात उस राय से अलग है।

पर श्रीकृष्ण यहाँ युधिष्ठिर की तरह की चुप्पी की बात नहीं कर रहे। वे अर्जुन के उस हटने की बात कर रहे हैं, जो वास्तव में डर से आया है, और जिसे अर्जुन खुद करुणा का नाम दे रहा है। और अर्जुन के लिए इसका उदाहरण भी महाभारत ही दे देता है, और वह अर्जुन के अपने अनुभव का है। विराट नगर में उत्तर, राजा का पुत्र, कौरवों की सेना देखकर काँप उठता है और रथ लौटाने को कहता है। तब अर्जुन उसे वही बात कहते हैं जो आज श्रीकृष्ण उनसे कह रहे हैं: कि तुमने स्त्रियों और पुरुषों के सामने प्रतिज्ञा की थी, और यदि तुम गायें जीते बिना नगर लौटोगे, तो सब इकट्ठे होकर तुम पर हँसेंगे। उत्तर कहता है: हँसें, स्त्रियाँ मुझ पर हँसें और पुरुष भी, मुझे युद्ध से कोई काम नहीं। और वह रथ से कूदकर भाग निकलता है। तब अर्जुन उसके पीछे दौड़ते हैं और कहते हैं: वीरों ने कभी भागने को क्षत्रिय का धर्म नहीं माना; युद्ध में मरना अच्छा है, डरकर भागना नहीं। कुछ ही समय पहले जो वाक्य अर्जुन ने उत्तर को कहे थे, आज वही वाक्य श्रीकृष्ण अर्जुन को लौटा रहे हैं। हम सब ऐसे ही हैं: दूसरों को समझाना हमें आता है, अपने ऊपर वही बात उतरते ही उसे भूल जाते हैं।

अब दूसरा श्लोक। "अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः। निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्।"

तुम्हारे शत्रु तुम्हारी सामर्थ्य की निन्दा करते हुए बहुत-सी न कहने योग्य बातें कहेंगे। उससे अधिक दुःखदायी भला क्या होगा?

"अवाच्यवाद", यानी वे बातें जो कही ही नहीं जानी चाहिए। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि शत्रु, दुर्योधन आदि, तुम्हारी उस सामर्थ्य की निन्दा करेंगे जो सारे संसार में प्रसिद्ध है, और ऐसे शब्द कहेंगे जो कहे जाने योग्य ही नहीं। और नीलकण्ठ उदाहरण भी देते हैं कि वे कहेंगे "षण्ढतिलोऽर्जुन", यानी अर्जुन तो नपुंसक है, किसी काम का नहीं, और "धिक्कार है इसकी शूरता को, जो भीष्म आदि के डर से भाग गया"। और वे लिखते हैं कि यह वचन मरण से भी अधिक दुःख देने वाला है। यहाँ श्रीकृष्ण सबसे चुभने वाली बात बिना किसी नरमी के कहते हैं। वे अर्जुन को बचाने के लिए उसके अहंकार से नहीं, उसके स्वाभिमान से बात कर रहे हैं।

संत ज्ञानेश्वर इस पर बहुत लम्बी, बड़ी सुन्दर उपमाएँ देते हैं। वे कहते हैं कि लोग बड़े कष्ट सहकर, अपना जीवन लगाकर कीर्ति बढ़ाते हैं, और तुम्हें वह अनायास, आकाश की तरह फैली मिल गई है। दिशाओं के राजा भाट बनकर तुम्हारा बखान करते हैं, और उसे सुनकर यमराज तक चौंकते हैं। जैसे सिंह की दहाड़ से मदमस्त हाथी भागते हैं, वैसे ही कौरवों को तुम्हारा भय है; जैसे पर्वत वज्र से और साँप गरुड़ से डरते हैं, वैसे ही वे तुम्हें सदा मानते आए हैं। और अगर तुम बिना लड़े लौटे, तो वही गहराई चली जाएगी, तुम्हारे ऊपर ओछापन आ जाएगा। यह सुनकर लगता है कि संत ज्ञानेश्वर अर्जुन के साथ खड़े होकर कह रहे हैं: देखो, तुम क्या हो, और क्या बनने जा रहे हो।

और यहाँ महाभारत एक चुटीली-सी विडम्बना और दिखा देता है, जिसे मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ, क्योंकि "षण्ढ" वाला वह शब्द अर्जुन के लिए नया नहीं था। विराट नगर में जब अर्जुन उत्तर के पीछे दौड़ रहे थे, तब कुछ सैनिक उन्हें स्त्री के वेश में देखकर हँस पड़े, यह जाने बिना कि वे अर्जुन हैं। द्रोण ने उन्हें पहचान लिया और कहा कि इसने नपुंसक का रूप धारण किया है, पर यह धनञ्जय के सिवा कोई दूसरा नहीं। और कर्ण ने विराट के पुत्र के बारे में कहा कि वह एक नपुंसक को सारथि बनाकर निकला है। और उसके थोड़े ही बाद अर्जुन उत्तर को बताते हैं कि मैं नपुंसक नहीं हूँ; अपने बड़े भाई की आज्ञा से मैं एक वर्ष तक इस व्रत का पालन कर रहा हूँ; यह रूप उर्वशी के शाप से मुझ पर आया है, और इन्द्र ने कहा था कि यह अज्ञातवास में तुम्हारे काम आएगा। एक पूरा वर्ष अर्जुन ने वह नाम, वह रूप, वह हँसी उठाई। और उसे कुछ नहीं हुआ, क्योंकि वह जानता था कि वह क्या है।

आज वही शब्द उसे काँपा रहे हैं, इसलिए नहीं कि शब्द बदल गए। इसलिए कि तब वह नाम ओढ़ा हुआ था और आज कमाया जाने वाला है। जो बात आप जानते हैं कि झूठी है, वह चुभती नहीं। जो सच बनने लगे, वह चुभती है। यही इस श्लोक की गहरी सीख है, और यही मैं आज के जीवन में आपके लिए रखना चाहता हूँ: जब कोई बात आपको बहुत चुभे, तो एक पल रुककर पूछिए कि वह इसलिए चुभ रही है कि वह झूठ है और अन्यायपूर्ण है, या इसलिए कि उसमें कहीं सच का कण है। पहली बात में आप बात को छोड़ दीजिए। दूसरी में उसे सुनिए।

पर अभी एक बात बाकी है। अब तक श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सामने उसका कर्तव्य रखा, उसकी कीर्ति रखी, उसका अपमान रखा। पर अर्जुन का सबसे पहला सवाल अभी बाकी है, जो दूसरे अध्याय में उसने खुद पूछा था: "न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।" हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या अच्छा है: हम जीतें या वे हमें जीतें। अगला श्लोक उसी सवाल का सीधा उत्तर है, और उसके बाद वह श्लोक आता है जो इस सारे सत्संग का सबसे ऊँचा मोड़ है। सुनिए।

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३७ ॥
गीता 2.37 — अर्थ पढ़ें ›
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ ३८ ॥
गीता 2.38 — अर्थ पढ़ें ›

अब अर्जुन के उस पहले सवाल का उत्तर आता है, जिस पर पिछला खंड रुका था। "हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः।"

मारे गए तो स्वर्ग पाओगे, जीत गए तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए हे कौन्तेय, युद्ध का निश्चय करके उठो।

अर्जुन ने पूछा था कि हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या अच्छा है: हम जीतें या वे हमें जीतें। श्रीधर स्वामी इस श्लोक को ठीक उसी सवाल का उत्तर बताते हैं: दोनों पक्षों में तुम्हारा लाभ ही है। नीलकण्ठ यही कहते हैं, और मधुसूदन सरस्वती जोड़ते हैं कि जब दोनों ओर लाभ पक्का है, तो "जीतूँगा या मरूँगा", यह निश्चय करके खड़े हो जाओ, क्योंकि चाहे परिणाम में संदेह हो, कर्तव्य में कोई संदेह नहीं। "तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय", यानी इसलिए उठो, हे कौन्तेय। यह वही शब्द है जिसे आगे ग्यारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण फिर कहेंगे। और यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि "कृतनिश्चयः" का अर्थ यह नहीं कि जीत पक्की है; इसका अर्थ है कि निश्चय पक्का है।

और यह वाक्य भी अर्जुन के लिए नया नहीं है, क्योंकि महाभारत में अर्जुन खुद इसे पहले बोल चुके हैं। विराट नगर में, उसी उत्तर से, जो डर से काँप रहा था। वे कहते हैं: कौरवों से लड़ो, तुम जीतोगे, यश पाओगे और इस सारी पृथ्वी का भोग करोगे, या मारे जाकर स्वर्ग पाओगे; भागने में तुम्हारा कोई भला नहीं। जिस घबराए हुए राजकुमार को अर्जुन ने उस दिन ढाढ़स बँधाकर अपना सारथि बना लिया था, आज उसी की जगह अर्जुन खुद बैठे हैं, और उनके सारथि वही वाक्य उन्हें सुना रहे हैं।

महाभारत में यही बात युद्ध के बाद विदुर ने भी धृतराष्ट्र से कही, वही विदुर जिन्हें हमने आज के पहले खंड में सुना था: मारा गया स्वर्ग पाता है और जीतने वाला यश पाता है; हमारे लिए दोनों बड़े लाभ के हैं; रण में कुछ भी निष्फल नहीं। यानी यह कोई एक श्लोक की ज़िद नहीं, महाभारत की अपनी देखने की रीति है।

मैं इसे आपके जीवन में इस तरह रखता हूँ। कितनी बार हम किसी काम से इसलिए रुक जाते हैं कि पता नहीं क्या होगा। परीक्षा, कोई कठिन बातचीत, कोई मुक़दमा, कोई नई शुरुआत। हम दोनों नतीजों को तौलते हैं और जो नुक़सान वाला है, उसी को भारी कर देते हैं। श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि नुक़सान नहीं होगा। वे कहते हैं कि जो खड़ा हुआ, उसके पास दोनों तरफ़ कुछ बचता है: जीता तो फल, हारा तो भी वह जो उसने इस दिन में बनाया। और जो नहीं उठा, उसके पास जीत भी नहीं, हार की गरिमा भी नहीं। यह कोई गारंटी नहीं है, यह एक दृष्टि है।

अब वह श्लोक, जिसे मैं इस पूरे सत्संग का सबसे ऊँचा मोड़ कहूँगा। "सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।"

सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर फिर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। इस प्रकार तुम्हें पाप नहीं लगेगा।

हमारी टीका इसके बारे में एक बहुत सुन्दर वाक्य कहती है: यह श्लोक योग के उपदेश का पुल है। यहाँ तक श्रीकृष्ण ने आत्मा की बात कही, फिर धर्म की, फिर कीर्ति की, फिर परिणाम की। और अब वे वह चीज़ देते हैं जिसके बिना ये सब बातें बोझ बन जाती हैं: कि पाप उस कर्म को लगता है जो निजी लाभ के लिए किया जाए; समबुद्धि से, कर्तव्य मानकर किया हुआ कर्म नहीं बाँधता।

श्रीधर स्वामी कहते हैं कि यहाँ सुख-दुःख ही नहीं, उनके कारण, यानी लाभ और हानि, और उनके भी कारण, यानी जय और पराजय, सबको समान करना है, और समान इसलिए कि हर्ष और विषाद न रहे। मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ इसे और साफ़ करते हैं: यानी सुख में और उसके कारणों में राग न रखना, दुःख में और उसके कारणों में द्वेष न रखना; और केवल यह मानकर कि यह मेरा स्वधर्म है, युद्ध में लग जाना। जो फल की कामना से हिंसा करता है, उसे पाप लगता है; और जो कर्तव्य से मुँह मोड़ता है, उसे भी, क्योंकि उसने नित्य कर्तव्य छोड़ा। इसीलिए फल की कामना बिना किया हुआ कर्म दोनों तरह के पाप से मुक्त है।

और एक सुन्दर उदाहरण, जो इन दोनों टीकाकारों ने आपस्तम्ब ऋषि से लिया है। वे कहते हैं कि जब कोई आम का पेड़ फल के लिए लगाता है, तो उसकी छाया और सुगन्ध अपने आप साथ आ जाती हैं। उसी तरह धर्म का पालन करते हुए बाक़ी सब फल साथ-साथ चले आते हैं, और यदि न आएँ, तो भी धर्म की कोई हानि नहीं होती। तो पिछले श्लोक में स्वर्ग और राज्य की जो बात थी, वह मुख्य फल नहीं थी, वह आम की छाया थी। असली बात इस श्लोक में है: कि काम इसलिए करो कि वह तुम्हारा काम है।

संत ज्ञानेश्वर इसे बड़ी सहजता से कहते हैं: सुख मिले तो संतोष न मानो, दुःख मिले तो विषाद न पालो, लाभ और हानि मन में रखकर मत चलो। विजय होगी या देह जाएगी, यह पहले से सोचकर मत बैठो। अपने उचित स्वधर्म में लगे हुए जो मिले, उसे चुपचाप सह जाओ। ऐसा मन हो जाए, तो दोष अपने आप नहीं लगता।

आप किसी सर्जन को ऑपरेशन करते देखिए। उसके हाथ नहीं काँपते। इसलिए नहीं कि उसे दर्द की परवाह नहीं, बल्कि इसलिए कि उस घड़ी में उसकी पूरी परवाह मरीज़ के काम पर है, अपनी कीर्ति पर नहीं, इस पर नहीं कि कल अख़बार क्या कहेगा। उसके भीतर सुख-दुःख, जय-पराजय एक किनारे रखे जा चुके हैं, और उसका हाथ स्थिर है। श्रीकृष्ण अर्जुन से यही माँग रहे हैं। इसे ही आगे समत्व कहेंगे।

और तिलक महाराज यहाँ एक ईमानदार बात कहते हैं, जिसे मैं छिपाऊँगा नहीं। वे कहते हैं कि अब तक का पूरा तर्क सांख्य का था। पर अर्जुन का मूल सवाल यह नहीं था कि शोक करूँ या न करूँ। उसका सवाल यह था कि जब संसार छोड़कर संन्यास ही अन्त की सीढ़ी है, तो मैं अभी क्यों न छोड़ दूँ, अपना कर्म क्यों करूँ? इस सवाल का उत्तर सांख्य का ज्ञान नहीं देता। इसीलिए श्रीकृष्ण अगला श्लोक यों शुरू करने वाले हैं: "एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।" यह बुद्धि तुम्हें सांख्य के विषय में कही गई, अब इसे योग के विषय में सुनो।

तो आज हमने क्या सुना? तेरह श्लोक। पहले तीन में अनिवार्य: जो आया है, वह जाएगा। फिर यह कि इस बात को सुनना और जानना दो चीज़ें हैं। फिर स्वधर्म और खुला दरवाज़ा। फिर कीर्ति का डर और लोग क्या कहेंगे। फिर यह कि जो खड़ा हुआ उसके पास दोनों तरफ़ कुछ बचता है। और अन्त में समता, जो इन सबको बोझ से हल्का कर देती है।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। जो टल नहीं सकता, उससे लड़ाई छोड़ दीजिए। "तस्मादपरिहार्येऽर्थे", यानी जिसे टाला नहीं जा सकता। रोना मना नहीं है, पर उस चीज़ से टकराना बंद कीजिए, जो हटने वाली नहीं। और उसके बाद जो आपके हाथ में बचता है, उसके लिए अपनी ताकत बचाइए। महाभारत में विदुर यही कहते हैं: यदि पराक्रम से कुछ हो सके, तो बिना शोक किए उपाय करे; दुःख की औषधि यही है कि उसे बार-बार न सोचे।

दूसरी बात। काँपते हाथ को फ़ैसला मत बनने दीजिए। "न विकम्पितुमर्हसि", काँपना तुम्हें शोभा नहीं देता। हाथ का काँपना बुरा नहीं, वह इस बात का संकेत है कि हम जिस चीज़ को कर रहे हैं, वह हमारे लिए मायने रखती है। पर कँपकँपी को निर्णय का नाम मत दीजिए। और जो काम बिना माँगे आपके सामने आया है, उसे दरवाज़े की तरह देखिए, दीवार की तरह नहीं। और जब लोग कहें कि यह डर है, तो याद कीजिए कि युधिष्ठिर के साथ उसी सुबह क्या हुआ: जिसे सेना ने डर कहा, वही बड़ों के सामने आदर निकला।

तीसरी बात। परिणाम को दो किनारों की तरह देखिए, पर फल को मालिक मत बनाइए। जीत और हार, सुख और दुःख, इन सबको समान रखकर अपना काम कीजिए, क्योंकि जो कर्तव्य समबुद्धि से किया जाए, वह बाँधता नहीं। और आम के पेड़ की तरह: छाया और सुगन्ध साथ आ जाएगी, पर पेड़ उसके लिए नहीं लगाया जाता, वह लगाया जाता है क्योंकि वह लगाने योग्य है।

अगली बार हम वहीं लौटेंगे जहाँ आज रुके हैं। आज के आख़िरी श्लोक में, जय और पराजय को समान मानने में, एक बीज रखा गया है। अगली बार श्रीकृष्ण "योग" की बुद्धि शुरू करेंगे, और वही बीज बढ़ेगा, और उसमें वह श्लोक आएगा जो शायद पूरी गीता का सबसे जाना हुआ श्लोक है: "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।" तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने का है, उसके फलों का नहीं। ये वाक्य हम सबने सुना है। उस दिन हम पूछेंगे कि इसे किया कैसे जाए, और देखेंगे कि नतीजे की चिन्ता से काम कैसे बिगड़ता है, और उससे बचने का रास्ता कौन-सा है।

आज आपसे दो सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में वह कौन-सी बात है जिसे आप बदल नहीं सकते, पर जिससे अब भी लड़ रहे हैं? और वह कौन-सा काम है जो आपके हिस्से का है, जिसके सामने आपके हाथ काँप रहे हैं? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्री कृष्ण।

जो आया है, वह जाएगा। पर जो आपके हिस्से का काम है, वह अभी आपका इंतज़ार कर रहा है।

जय श्री कृष्ण।

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७ ॥
गीता 2.27 — अर्थ पढ़ें ›

तीन बातें

  1. जो टल नहीं सकता, उससे लड़ाई छोड़ दीजिए। "तस्मादपरिहार्येऽर्थे", यानी जिसे टाला नहीं जा सकता। रोना मना नहीं है, पर उस चीज़ से टकराना बंद कीजिए, जो हटने वाली नहीं। और उसके बाद जो आपके हाथ में बचता है, उसके लिए अपनी ताकत बचाइए। महाभारत में विदुर यही कहते हैं: यदि पराक्रम से कुछ हो सके, तो बिना शोक किए उपाय करे; दुःख की औषधि यही है कि उसे बार-बार न सोचे।
  2. काँपते हाथ को फ़ैसला मत बनने दीजिए। "न विकम्पितुमर्हसि", काँपना तुम्हें शोभा नहीं देता। हाथ का काँपना बुरा नहीं, वह इस बात का संकेत है कि हम जिस चीज़ को कर रहे हैं, वह हमारे लिए मायने रखती है। पर कँपकँपी को निर्णय का नाम मत दीजिए। और जो काम बिना माँगे आपके सामने आया है, उसे दरवाज़े की तरह देखिए, दीवार की तरह नहीं। और जब लोग कहें कि यह डर है, तो याद कीजिए कि युधिष्ठिर के साथ उसी सुबह क्या हुआ: जिसे सेना ने डर कहा, वही बड़ों के सामने आदर निकला।
  3. परिणाम को दो किनारों की तरह देखिए, पर फल को मालिक मत बनाइए। जीत और हार, सुख और दुःख, इन सबको समान रखकर अपना काम कीजिए, क्योंकि जो कर्तव्य समबुद्धि से किया जाए, वह बाँधता नहीं। और आम के पेड़ की तरह: छाया और सुगन्ध साथ आ जाएगी, पर पेड़ उसके लिए नहीं लगाया जाता, वह लगाया जाता है क्योंकि वह लगाने योग्य है।