गीता सार - अध्याय 2
गीता 2.11–2.25 · 79 मिनट
अपनों की मृत्यु का दुःख और अपनी मृत्यु का डर
श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ११ ॥
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥
एक सवाल है जो हर घर में, किसी न किसी दिन, बिना बुलाए आकर बैठ जाता है। जिस दिन घर से कोई चला जाता है, उस दिन के बाद कोई कमरा वैसा नहीं रहता। उनकी चप्पलें दरवाज़े के पास पड़ी रह जाती हैं, उनकी दवाइयों की डिब्बी मेज़ पर रखी रह जाती है, और मन बार-बार एक ही बात पूछता है कि वो कहाँ गए, और क्या सचमुच वो अब कहीं नहीं हैं। फिर उसी के नीचे एक और सवाल चुपचाप उठता है, जिसे हम ज़ोर से नहीं पूछते: जब मेरी बारी आएगी, तब क्या होगा, और जो चला जाएगा वो कौन है?
आज का सत्संग इसी एक सवाल पर है। मरता कौन है? और मैं आपसे एक वादा करता हूँ, कि इस सवाल का जवाब आज हम किसी की राय से नहीं, गीता के उन पन्द्रह श्लोकों से सुनेंगे जिनमें श्रीकृष्ण आत्मा के बारे में अपनी सबसे सीधी बात कहते हैं।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का पाँचवाँ सत्संग है। पिछली बार हमने दूसरे अध्याय के पहले दस श्लोक सुने थे। वहाँ अर्जुन अपनी समझ की आख़िरी सीढ़ी तक पहुँचकर बोले थे, "मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आए मुझको शिक्षा दीजिए", और फिर "मैं नहीं लड़ूँगा" कहकर चुप हो गए थे। और तब श्रीकृष्ण ने, दोनों सेनाओं के बीच, मानो मुस्कुराते हुए, उस चुप रथ की ओर देखा था। हमने कहा था कि वो मुस्कान उपहास की नहीं थी, वो उस भूल पर थी जो अर्जुन के शोक के नीचे दबी थी और जिसे दूर किया जा सकता था। आज वही मुस्कान बोलना शुरू करती है। और जो पहला वाक्य निकलता है, वो अर्जुन की पूरी स्थिति को एक ही साँस में खोलकर रख देता है।
पर इससे पहले, एक बार फिर धृतराष्ट्र के पास चलिए। आपको याद होगा, पूरी गीता सञ्जय सुना रहे हैं, उस समय जब युद्ध का दसवाँ दिन बीत चुका है। महाभारत के भीष्म पर्व के तेरहवें अध्याय में लिखा है कि सञ्जय युद्धभूमि से लौटकर आए और दुखी होकर, जल्दी से, चिन्ता में डूबे बैठे धृतराष्ट्र को ख़बर दी कि भरतवंश के पितामह भीष्म मारे गए हैं। उसी अध्याय में सञ्जय कहते हैं कि वो अब हवा से टूटे हुए पेड़ की तरह गिरकर धरती पर पड़े हैं। और अगले अध्याय में धृतराष्ट्र पूछते हैं: मेरे पिता, इन्द्र जैसे भीष्म, रथ से कैसे गिरे? और साथ में ये भी कह देते हैं कि तुम मुझे बताते जाते हो कि वो वीर मारे गए, और मेरा मन गहरी पीड़ा में डूबता जाता है।
इस बातचीत के क्रम में ही गीता आती है। यानी जिस आदमी का मन अभी-अभी एक मृत्यु की ख़बर से डूबा है, वो अब सुन रहा है कि श्रीकृष्ण मृत्यु के बारे में क्या कहते हैं। उस समय उनके भीतर क्या चल रहा होगा, ये हम नहीं जानते। पर इतना जानते हैं कि सुनने वाला कोई सैद्धान्तिक आदमी नहीं है, वो एक ऐसा आदमी है जिसके घर की सबसे बड़ी छाया अभी-अभी गिरी है। और जब हम ख़ुद किसी अपने को खोकर बैठे हों, तब हमारे कान भी ऐसे ही सुनते हैं। उनमें दर्शन के लिए नहीं, सहारे के लिए जगह होती है।
और एक बात। युद्ध से पहले ही, भीष्म पर्व के दूसरे अध्याय में, व्यास धृतराष्ट्र से कह चुके थे कि जब तुम्हारे पुत्र और ये राजा काल के वश में होकर नष्ट हों, तब इसे समय का उलटफेर समझो और मन को शोक में मत लगाओ। जो बात व्यास ने आदेश की तरह कही थी, श्रीकृष्ण अब उसे समझाकर कहने जा रहे हैं। आदेश से शोक रुकता नहीं, समझ से रुकता है।
तो अब आइए, ग्यारहवें श्लोक पर। "श्रीभगवानुवाच। अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।"
श्रीभगवान बोले: तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक के लायक नहीं हैं, और बातें ज्ञानियों जैसी कर रहे हो। पंडित, यानी जो आत्मा को जानते हैं, वो न उनके लिए शोक करते हैं जिनके प्राण चले गए, न उनके लिए जिनके प्राण अभी हैं।
मैं चाहता हूँ कि आप इस श्लोक को एक बार उसकी कोमलता के साथ सुनें। क्योंकि पहली बार पढ़ने पर ये कठोर लगता है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि तुम्हारी बातें समझदारों जैसी हैं, पर तुम्हारा शोक समझदारों जैसा नहीं है। आचार्य शंकर इसे बहुत सीधे ढंग से कहते हैं कि अर्जुन, तुम अपने भीतर एक साथ मूढ़ता और पाण्डित्य दिखा रहे हो, ऐसे जैसे कोई उन्माद में हो। पहले अध्याय में अर्जुन ने सचमुच गहरी बातें कही थीं, कुल के धर्म की, पितरों की, कुल के नाश की। रामानुजाचार्य ठीक यहीं उस पंक्ति की ओर इशारा करते हैं जहाँ अर्जुन कहते हैं कि पिण्ड और जल की क्रिया रुकने से पितर गिर जाते हैं, और कहते हैं कि ये बातें ज्ञानियों की भाषा में हैं, पर शरीर और आत्मा को एक मानने के भ्रम पर खड़ी हैं।
अब इस श्लोक के दूसरे हिस्से पर ध्यान दीजिए। "गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।" जिनके प्राण जा चुके हैं और जिनके प्राण नहीं गए। श्रीधर स्वामी इसमें एक बारीक बात पकड़ते हैं। वो कहते हैं कि ज्ञानी उनके लिए शोक नहीं करते जो चले गए, और उनके लिए भी नहीं जो अभी हैं, यानी वो ये सोचकर भी नहीं डूबते कि इनके बिना ये जीवित लोग कैसे जिएँगे। ये दूसरा शोक हम में से बहुत लोगों का होता है। हम जाने वाले के लिए कम रोते हैं, पीछे रह गए माँ-बाप के लिए, पीछे रह गए बच्चों के लिए, पीछे रह गई अपनी हालत के लिए ज़्यादा रोते हैं। और श्रीकृष्ण कहते हैं कि समझदार इसमें भी नहीं डूबता। क्यों? इसका उत्तर आज के पूरे सत्संग में फैला है।
मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक ईमानदार आपत्ति उठाते हैं: अपनों के बिछड़ने पर शोक अनुचित कैसे, जब वसिष्ठ जैसे महान लोगों ने भी किया? और उत्तर देते हैं कि उनका वैसा करना प्रारब्ध का फल था, सबके लिए अनुकरण का नियम नहीं। इसका अर्थ ये है कि गीता शोक करने वाले को दोषी नहीं ठहराती। वो शोक के नीचे की ग़लतफ़हमी को दिखाती है। और ग़लतफ़हमी हटते ही शोक अपने आप हल्का होने लगता है।
नीलकण्ठ, जिन्होंने पूरे महाभारत की टीका लिखी है, यहाँ एक ऐसी बात कहते हैं जो रोज़ के जीवन से जुड़ी है। वो कहते हैं, देखो, जिसके प्राण अभी हैं, उसे कोई अपमानित कर दे तो लोग कहते हैं कि तूने अपने पिता को मार डाला। पर जिसके प्राण जा चुके हैं, उसकी देह को जो उठाकर जलाता है, उसे कोई पितृहन्ता नहीं कहता। यानी हमारा पूरा समाज भीतर से जानता है कि प्राण के जाने के बाद वो देह पिता नहीं है। इसीलिए हम बेटे के हाथ में अग्नि देने का कर्तव्य रखते हैं और उसे अपराध नहीं मानते। जो था, वो देह में नहीं था। देह में रहा। नीलकण्ठ यही अनुमान देकर आगे बढ़ते हैं कि देह के नष्ट होने से आत्मा के नष्ट होने की बात सोचने वाला मूढ़ ही है।
अब बारहवाँ श्लोक। "न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः। न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्।"
ऐसा कोई समय नहीं था जब मैं नहीं था, या तुम नहीं थे, या ये राजा नहीं थे। और न ऐसा होगा कि इसके बाद हम सब नहीं रहेंगे।
यहाँ श्रीकृष्ण पहली बार कुछ ऐसा कहते हैं जिसे सुनकर दिल एक पल को रुक जाता है: मैं नहीं था, तुम नहीं थे, ये सामने खड़े राजा नहीं थे, ऐसा कभी नहीं हुआ, और आगे भी नहीं होगा। आचार्य शंकर इसे एक चित्र से समझाते हैं। जैसे घड़े बनते हैं और टूटते हैं, पर आकाश तब भी था, अब भी है और बाद में भी रहेगा। वैसे ही देह बनती और टूटती है, और जो इन सबके भीतर है, वो न पहले कभी नहीं था, न बाद में कभी नहीं होगा।
श्रीधर स्वामी कहते हैं कि श्रीकृष्ण अपना उदाहरण पहले देते हैं: वो अपने रूप के प्रकट होने और छिपने में भी कभी "नहीं" नहीं हुए, और तुम और ये राजा भी जन्म-मरण से परे हो। रामानुजाचार्य "मैं, तुम और ये सब" कहने में भेद को भी नित्य देखते हैं, और तिलक कहते हैं कि यहाँ बात केवल सबके नित्य होने की है। इन आचार्यों में आपस में बहस है, और हम किसी का पक्ष लेने नहीं बैठे हैं। हम उस बात को देख रहे हैं जिस पर सब एक हैं: कि तुम नहीं थे, ऐसा कभी नहीं हुआ। और ज़रा सोचिए कि अर्जुन ने ये वाक्य किस घड़ी में सुना। सामने पितामह खड़े हैं, गुरु खड़े हैं, और अर्जुन के मन में बस एक चित्र है कि कल ये नहीं रहेंगे। श्रीकृष्ण उस चित्र को एक बड़े चित्र में रख देते हैं, जिसमें कोई "कल" ऐसा है ही नहीं जब ये न हों। जब हम किसी अपने की बीमारी की रिपोर्ट हाथ में लिए बैठे होते हैं, तब हमारा मन भी ऐसे ही एक तारीख़ पर अटक जाता है। ये श्लोक उस तारीख़ को मिटाता नहीं, पर उसे पूरी कहानी बनने नहीं देता।
संत ज्ञानेश्वर इसी जगह एक ऐसी उपमा देते हैं कि सुनकर साँस में कुछ ठहर जाता है। वो कहते हैं, देखो, हवा ने पानी को हिलाया और लहर बन गई। तब तुम क्या कहोगे कि लहर कहाँ जन्मी? और जब हवा रुक गई और पानी अपने आप समतल हो गया, तब क्या कहोगे कि कुछ मर गया? सोचिए, कितनी सरल बात है। लहर जो थी वो पानी ही था। उठी तब भी पानी, बैठी तब भी पानी। हम जिसे जन्म और मृत्यु कहते हैं, वो शायद उसी के आकार का उठना और बैठना है।
अब तेरहवाँ श्लोक। "देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।"
जैसे देहधारी इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापे से गुज़रता है, वैसे ही उसे दूसरा शरीर मिलता है। धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता।
हमारी अपनी टीका इस श्लोक को एक वाक्य में कहती है। बचपन के जवानी में बदलने पर कोई शोक नहीं करता, क्योंकि व्यक्ति वही रहता है। मृत्यु भी इसी तरह का, बस बड़ा, परिवर्तन है। कभी आपने सोचा है कि आपके बचपन का वो बच्चा, जो आपके घर के किसी पुराने फ़ोटो में खड़ा है, आज कहाँ है? उसका शरीर तो अब आपके पास नहीं है। उसकी आवाज़ भी नहीं। उसकी पसन्द-नापसन्द बदल गई, उसके डर बदल गए। और फिर भी आप कहते हैं, ये मैं हूँ। उस फ़ोटो में जो खड़ा है, वो मैं हूँ। किसी ने आपसे नहीं कहा कि वो बच्चा मर गया है और आप उसकी जगह कोई और हैं। बीच में जो एक बात नहीं बदली, उसी को आप "मैं" कहते हैं।
मधुसूदन सरस्वती इसे और खोलते हैं। वो कहते हैं कि हर कोई कहता है: जो मैं बचपन में अपने माता-पिता को अनुभव करता था, वही मैं बुढ़ापे में अपने पोतों को अनुभव कर रहा हूँ। यानी बीच के सारे बदलाव के बीच एक "मैं" है जो पहचान लेता है। और श्रीधर स्वामी एक और प्रमाण देते हैं। वो कहते हैं, तुरन्त जन्मा बच्चा किसी को सिखाए बिना माँ के स्तन की ओर क्यों बढ़ता है? क्योंकि कुछ पहले का अनुभव उसके साथ आया है।
आपको याद होगा, चौथे सत्संग में हमने सुना था कि युद्ध की नौवीं रात अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा, बचपन में मैं पितामह की गोद में चढ़कर उन्हें "पिताजी" कहता था। उस अर्जुन के पास अब वो धूल से सना बालक वाला बदन नहीं है, फिर भी वो कहता है, "मैं उनकी गोद में चढ़ता था।" तेरहवाँ श्लोक कहता है कि यही "मैं" ही वो चीज़ है जो हर बार देह बदलने पर भी बदलती नहीं।
और एक बात, जो मैं चाहता हूँ आप साथ लेकर चलें। श्लोक के अन्त में शब्द है "धीरस्तत्र न मुह्यति", यानी धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता। धीर का मतलब ये नहीं कि वो रोता नहीं। धीर का मतलब ये कि रोने के भीतर भी उसकी पकड़ में एक बात बनी रहती है, कि जो गया वो मिटा नहीं। जिस घर में कोई गया है, वहाँ धीर वो नहीं जो आँसू रोक ले। धीर वो है जो रोते हुए भी बच्चों को खाना खिला दे, आए हुए लोगों को पानी पूछ ले, और रात को माँ के पास बैठ जाए।
तो इन तीन श्लोकों ने हमें क्या दिया? कि शोक के नीचे एक ग़लतफ़हमी है; कि कोई समय ऐसा नहीं जब हम नहीं थे; और कि मृत्यु उसी तरह का बदलाव है जैसा हम बचपन से बुढ़ापे तक हर दिन जी रहे हैं।
पर अभी एक बात बाकी है। अगर आत्मा नहीं बदलती और देह बदलती है, तो देह के बदलने की जो चोट है, वो तो होती है। ठण्ड लगती है, आँखें भरती हैं, दिल बैठता है, ये सब तो सच है। श्रीकृष्ण इसे झुठलाते नहीं। अगला श्लोक सीधे उसी चोट की बात करता है, और एक ऐसा सूत्र देता है जिसे अगर हम अपने रोज़ के दुःख में उतार लें, तो बहुत कुछ बदल सकता है। आइए, सुनते हैं।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥
चौदहवाँ श्लोक। "मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।"
हे कौन्तेय, इन्द्रियों और विषयों के संयोग सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देते हैं। वे आते-जाते रहते हैं और अनित्य हैं। उन्हें सहन करो।
ये वो श्लोक है जिसे मैं उन दिनों के लिए सबसे अपना मानता हूँ जब किसी की बहुत याद आती है। पिछले तीन श्लोक आत्मा की बात कर रहे थे, और मन में एक सीधा सवाल उठ रहा था कि ठीक है, आत्मा नहीं मरती, पर जो चोट लगती है उसका क्या। श्रीकृष्ण उस चोट को छिपाते नहीं। वो उसे नाम देते हैं, और उसके स्वभाव के बारे में एक बात बताते हैं।
आचार्य शंकर बताते हैं कि "मात्रा" का अर्थ है वो इन्द्रियाँ जिनसे शब्द आदि विषय नापे जाते हैं, यानी कान, त्वचा, आँख और बाकी। और "स्पर्श" का अर्थ है उन विषयों से उनका मिलना। इन्हीं मिलनों से सर्दी, गर्मी, सुख और दुःख मिलते हैं। एक बड़ी सुन्दर बारीकी वो ये बताते हैं कि सर्दी और गर्मी हमेशा एक-सी नहीं रहतीं। वही सर्दी किसी समय सुख देती है और किसी समय दुःख। सुख और दुःख का स्वरूप तो बँधा हुआ है, पर शीत और उष्ण का नहीं। इसीलिए श्लोक में दोनों को अलग-अलग गिना गया है। और फिर वो सीधे कहते हैं कि इन सबके आने-जाने का स्वभाव ही इनके अनित्य होने का प्रमाण है, इसलिए इन्हें सहो, और इनके कारण न बहुत हर्ष करो, न बहुत विषाद।
श्रीधर स्वामी इसे एक चित्र देते हैं जो मुझे अपने रोज़ के जीवन से जुड़ा लगता है। वो कहते हैं, देखो, जैसे पानी और धूप का संपर्क अपने-अपने समय के अनुसार ठण्ड या गर्मी देता है, वैसे ही प्रिय के साथ मिलना और प्रिय का बिछुड़ना सुख और दुःख देता है। और ये दोनों टिकते नहीं। इसीलिए धीर पुरुष के लिए इन्हें सहना उचित है, पर उनके कारण हर्ष और विषाद के वश में हो जाना उचित नहीं। ध्यान दीजिए, श्रीधर स्वामी "सहना" कह रहे हैं, "महसूस न करना" नहीं कह रहे। सहने में महसूस करना शामिल है। जिसे कुछ महसूस ही न हो, उसे सहना क्या पड़ेगा।
"तितिक्षस्व", यानी सहो। गीता के अपने शब्दों में ये छोटा-सा शब्द पूरे सत्संग का आधार है। मधुसूदन सरस्वती इस जगह एक बहुत गहरी बात कहते हैं। वो कहते हैं कि ये सुख-दुःख उस अन्तःकरण में उठते हैं जो उत्पन्न होता और नष्ट होता है। वो उस नित्य आत्मा के गुण नहीं हैं, क्योंकि जो नित्य है, उसके साथ अनित्य बातें चिपककर ठहर नहीं सकतीं। मैं इसे इस तरह सुनता हूँ कि दुःख मेरे भीतर आया है, पर मैं वो दुःख नहीं हूँ जिसमें वो आया है। जैसे आसमान में बादल आता है, गरजता है, और चला जाता है, पर आसमान बादल नहीं बन जाता।
रामानुजाचार्य एक और बात जोड़ते हैं, जो अर्जुन की उस घड़ी में सीधे लागू होती है। वो कहते हैं कि इन्हें धैर्य से सहो, जब तक शास्त्र के अनुसार अपना कर्तव्य पूरा न हो जाए। और यहाँ मुझे पाण्डवों का पूरा जीवन याद आता है। जुए के खेल के समय वनवास की जो शर्त रखी गई थी, कि बारह वर्ष वन में रहना और तेरहवाँ वर्ष इस तरह बिताना कि किसी के पहचान में न आएँ, वो सभा पर्व के अठानवे अध्याय में पूरी तरह लिखी है। और बाद में उद्योग पर्व के पहले अध्याय में श्रीकृष्ण स्वयं सबके सामने कहते हैं कि पाण्डु के ये पुत्र बल से धरती जीत सकते थे, फिर भी सत्य पर टिके रहकर इन्होंने वह कठिन व्रत निभाया, तेरहवाँ वर्ष भी बिना पहचाने बिताया, और तरह-तरह के असहनीय कष्ट सहे। जो अर्जुन आज रथ में बैठकर कह रहे हैं कि मुझसे नहीं होगा, वो उन्हीं लोगों में से हैं जिन्होंने तेरह बरस का सहना सहा है। श्रीकृष्ण इसीलिए "तितिक्षस्व" कह सकते हैं। वो जानते हैं कि अर्जुन सह सकते हैं, क्योंकि सहकर आए हैं।
अब मैं आपसे एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ। हम आज पन्द्रह श्लोकों के सफ़र में हैं, और अब तक हमने लगभग एक तिहाई रास्ता तय किया है। यही वो जगह है जहाँ बहुत-से लोग सोचते हैं कि बात तो समझ में आ गई, अब आगे सुनने की क्या ज़रूरत। पर आधा सुना हुआ सत्य भ्रम बन जाता है। इस सत्संग के आगे के हिस्से में वो श्लोक आने वाले हैं जिनमें गीता आत्मा के बारे में अपनी सबसे सीधी बात कहती है, और वो हमने अभी सुने ही नहीं। तो अगर आप ये सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि ये यात्रा बीच में न टूटे। और आज का हिस्सा आख़िर तक सुनिए।
पन्द्रहवाँ श्लोक। "यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।"
हे पुरुषश्रेष्ठ, जिस धीर पुरुष को ये व्याकुल नहीं करते, जो दुःख और सुख में समान रहता है, वह अमृतत्व, यानी मोक्ष, के योग्य होता है।
यहाँ दो बातें हैं। पहली, "यं हि न व्यथयन्त्येते", जिसे ये व्यथित नहीं कर पाते। और दूसरी, "सोऽमृतत्वाय कल्पते", वही अमृतत्व के लायक बनता है। आचार्य शंकर कहते हैं कि जिसकी दृष्टि नित्य आत्मा पर टिकी है, वह द्वन्द्वों को सहने वाला बनकर मोक्ष के लिए समर्थ हो जाता है। और श्रीधर स्वामी कहते हैं कि सहने का फल केवल दुःख का कम होना नहीं, उससे कहीं बड़ा है।
मधुसूदन सरस्वती "पुरुष" शब्द को एक नई रोशनी में दिखाते हैं। वो कहते हैं कि पुरुष वो है जो इस शरीर रूपी पुर में, यानी नगर में, बसा हुआ है, जो स्वयं प्रकाश है। और उसके लिए सुख और दुःख दोनों समान हैं, क्योंकि वो उन्हें देखता है, वो उनका रूप नहीं है, जैसे दीपक कमरे की हर चीज़ को रोशन करता है पर कमरे की किसी चीज़ में नहीं बदल जाता।
एक बात स्पष्ट कर दूँ। "समदुःखसुखं" का मतलब पत्थर बन जाना नहीं है। रामानुजाचार्य इसे बहुत व्यवहारिक ढंग से कहते हैं। वो कहते हैं कि जो धैर्य वाला पुरुष, जिसका दुःख टाला नहीं जा सकता, उसे अपने मार्ग का हिस्सा मानकर सहता है, और अपना काम फल की इच्छा के बिना करता रहता है, उसे युद्ध की चोटें भी विचलित नहीं करतीं, और वही अमृतत्व साधता है। तो समान होना जड़ होना नहीं है। समान होना वो स्थिरता है जिसमें चोट लगती है, और आदमी फिर भी अपनी जगह पर रहता है। सोचिए उस बेटे को, जिसके पिता का अभी-अभी देहान्त हुआ है, और जो फिर भी तेरह दिन तक घर का हर काम सँभालता है, हर आने वाले से बात करता है, और रात को अकेले में रो लेता है। सुख और दुःख उसके लिए बराबर नहीं हो गए। पर दुःख ने उसके हाथ से घर नहीं छीना।
अब सोलहवाँ श्लोक, जो पूरे अध्याय की एक नींव है। "नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।"
इसे थोड़ा सावधानी से समझना होगा, क्योंकि हमारी अपनी टीका इसे इस तरह खोलती है: जो बदलता है, जैसे शरीर और सुख-दुःख, वह इस अर्थ में "असत्" है कि टिकता नहीं। और जो कभी नहीं बदलता, वह "सत्" है। आत्मा इसी अर्थ में सत् है, इसलिए उसके नाश का भय व्यर्थ है। यानी जो है ही नहीं, उसका होना ठहर नहीं सकता। और जो है, उसका न होना ठहर नहीं सकता। तत्त्व को देखने वालों ने दोनों का निर्णय इसी तरह देखा है।
आचार्य शंकर इसे बहुत सुन्दर तरीक़े से समझाते हैं। वो कहते हैं कि हर वस्तु के अनुभव में हमें दो बातें मिलती हैं। हम कहते हैं, "घड़ा है", "कपड़ा है", "हाथी है"। इनमें घड़ा बदलता है, कपड़ा बदलता है, हाथी बदलता है। पर "है", जो हर वाक्य में आता है, वो एक ही रहता है। घड़ा टूट जाए तो हम कहते हैं, "घड़ा नहीं है"। पर क्या "है" चला गया? जिस वस्तु में हमारी समझ भटकती है, उसे वो असत् कहते हैं, और जिसमें नहीं भटकती उसे सत्। शंकराचार्य के इस उदाहरण को अपने जीवन पर रखिए। हमारे प्रिय की हर पहचान, उनका नाम, उनका रूप, उनकी आवाज़, एक घड़े की तरह थी जो टूट गया। पर जिस "है" ने उन्हें "है" बनाया था, वो उस घड़े के साथ नहीं टूटा।
ज्ञानेश्वर महाराज इसे चार उपमाओं से कहते हैं। जैसे दूध और पानी मिले हों तो भी राजहंस उन्हें अलग कर लेता है; जैसे आग में डालने पर सोने का मैल अलग हो जाता है; जैसे दही मथने पर मक्खन ऊपर आ जाता है; और जैसे फटकने पर भूसा उड़ जाता है और दाना ठहर जाता है। तो जब सोचा जाता है, तब जो झूठा है, वो अपने आप छँट जाता है, और जो असल है, वो ज्ञानियों के पास रह जाता है।
तिलक बताते हैं कि यहाँ "अन्त" का अर्थ है निर्णय। जिन्होंने तत्त्व को देखा, उन्होंने दोनों का निर्णय देख लिया है: क्या टिकता है, क्या नहीं।
तो ये तीन श्लोक हमें क्या दे गए? पहला, कि सुख-दुःख इन्द्रियों के संयोग से आते हैं और आने-जाने वाले हैं, इन्हें सहना है, और सहना महसूस करने के साथ ही होता है। दूसरा, कि जिसे ये बाँध नहीं पाते, वह स्थिर है। तीसरा, कि बदलने वाली चीज़ें और न बदलने वाला सत्य, दोनों को अलग-अलग पहचानना ही देखने की असली कला है।
पर अभी एक बात बाकी है। अगर वो "है" इतना ही अटल है, तो वो कितना बड़ा है, कहाँ तक फैला है, और क्या कोई उसे नष्ट कर सकता है? अगला श्लोक कहता है कि जिससे ये सब कुछ व्याप्त है, उसका नाश करने की ताक़त किसी में नहीं। और उसके बाद श्रीकृष्ण अर्जुन से वो बात कहेंगे जो उसके सबसे गहरे डर को सीधा छुएगी: कि मारने वाला कौन है और मरने वाला कौन। सुनिए।
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८ ॥
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥
सत्रहवाँ श्लोक। "अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति।"
जिससे यह सब व्याप्त है, उसे तो तुम अविनाशी ही जानो। इस अव्यय का विनाश कोई नहीं कर सकता।
पिछले श्लोक ने "सत्" की बात छेड़ी थी, कि जो नहीं बदलता वही सच है। अब यह श्लोक उसे एक पता देता है। वो कहीं दूर का, कहीं अलग रखा हुआ कुछ नहीं है। जिससे यह सब, यहाँ जो कुछ है, फैला हुआ है, वही। आचार्य शंकर इसे बहुत सरल चित्र से कहते हैं: जैसे घड़े आकाश से भरे होते हैं, वैसे ही यह सब उस "सत्" से भरा है। घड़े में आकाश घुसा नहीं, वो पहले से वहाँ था। घड़ा टूटे तो आकाश नहीं टूटता, क्योंकि आकाश घड़े का हिस्सा नहीं था, घड़ा उसका एक आकार भर था।
फिर शंकर अव्यय शब्द की बात करते हैं। वो कहते हैं कि जैसे देवदत्त धन के नाश से घटता है, वैसे यह नहीं घटता। इसका कुछ कम या ज़्यादा नहीं होता। और इसलिए, वो कहते हैं, इसे कोई नष्ट नहीं कर सकता, ईश्वर भी नहीं, क्योंकि जो अपना ही स्वरूप है, उस पर अपना ही प्रहार संभव नहीं। रोज़ के जीवन में इसका मतलब इतना है कि जिसे आप खोने से डरते हैं, उसका सबसे असली हिस्सा किसी बाहर की चीज़ के हाथ में नहीं है। न बीमारी के, न दुर्घटना के, न बुढ़ापे के। ये सब घड़े तक पहुँचते हैं, आकाश तक नहीं।
रामानुजाचार्य इसे एक सूक्ष्म तर्क से कहते हैं, और वो तर्क मुझे बहुत ठोस लगता है। वो कहते हैं कि शस्त्र, जल, अग्नि, हवा, ये सब किसी चीज़ को तभी नष्ट करते हैं जब वे उसमें फैलकर उसे ढीला कर पाएँ। पर आत्मा तो इतनी सूक्ष्म है कि सबमें समाई है, और वो इन सबसे सूक्ष्म है। जो चीज़ किसी में फैलने के लायक ही नहीं, उसे ये ढीला कैसे करेंगे? यही बात आगे के श्लोकों में सीधे शब्दों में आने वाली है, और हम उसे आज ही सुनेंगे।
नीलकण्ठ इसे मिट्टी के घड़े और सकोरे के उदाहरण से समझाते हैं। हम कहते हैं, "घड़ा है", "सकोरा है", और दोनों में हम एक ही मिट्टी को पहचानते हैं। वैसे ही हर वस्तु के साथ "है" लगा है, और वो "है" उस सत् की बात करता है जिससे सब भरा है। और ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं कि यह तीनों लोकों का आकार उसी का फैलाव है, उसमें नाम, वर्ण, आकार, कोई चिह्न नहीं, और उसका घात कभी नहीं होता।
अब अठारहवाँ श्लोक। "अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।"
देह तो नाशवान् है ही, और इस देह को धारण करने वाली शरीरधारी आत्मा अजर, अमर और तुम्हारे शस्त्रों की पहुँच से परे है। इसलिए हे भारत, युद्ध करो।
मैं चाहता हूँ कि आप इस श्लोक के आख़िरी शब्द पर रुकें, क्योंकि उसे ग़लत सुन लेना बहुत आसान है। "तस्माद्युध्यस्व भारत।" इसलिए युद्ध करो। हमारी अपनी टीका इस पर सीधी बात कहती है: इसका अर्थ केवल मारने का आदेश नहीं है। यह न लड़ने के झूठे कारण को हटाता है। अर्जुन का कर्तव्य बना रहता है, और शरीर के लिए शोक उसे छोड़ने का आधार नहीं है। यानी श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि आत्मा नहीं मरती इसलिए किसी को मारना कोई बात नहीं। वो कह रहे हैं कि अर्जुन ने जो कारण दिया था, कि मैं अपनों का नाश नहीं देख सकता, वो कारण उस जगह से नहीं आता जहाँ से अर्जुन समझ रहे थे।
श्रीधर स्वामी का सार भी यही है कि जब आत्मा का नाश नहीं होता और उसका सुख-दुःख से कोई संबंध नहीं, तो मोह से उपजा शोक छोड़ो, और अपना धर्म मत छोड़ो। आचार्य शंकर देह के अन्त को एक उदाहरण से कहते हैं: जैसे मृगतृष्णा में पानी की बुद्धि तब तक रहती है जब तक हम ध्यान से जाँचते नहीं, और जाँचने पर वह बुद्धि टूट जाती है। वैसे ही ये देह अन्तवान् हैं, सपने की देह की तरह। नीलकण्ठ यहाँ एक बहुत ईमानदार बात कहते हैं। वो कहते हैं कि परम सत्य की दृष्टि से तो देह का भी काल में कभी "होना" नहीं है, पर जो उस दृष्टि को अभी नहीं पकड़ पाया, जो नरक आदि के भय से घिरा है, उसके लिए व्यवहार की भाषा में ही कहा गया है कि देह अन्तवान् हैं। यानी गीता सुनने वाले को वहीं मिलती है जहाँ वो खड़ा है, और फिर वहाँ से हाथ पकड़कर ऊपर लाती है।
रामानुजाचार्य "अनाशिनोऽप्रमेयस्य" में अप्रमेय शब्द को बहुत सुन्दर ढंग से खोलते हैं। वो कहते हैं कि आत्मा किसी चीज़ की तरह जानी जाने वाली नहीं है, वो जानने वाली है। हम चीज़ों को नाप-जोखकर जानते हैं। पर नापने वाले को हम उसी तरह नहीं नाप सकते जैसे किसी चीज़ को। जैसे आँख सब कुछ देखती है, पर अपने को नहीं देखती, फिर भी किसी को इसमें शक नहीं होता कि आँख है।
इस "इसलिए" को महाभारत के भीतर एक और रोशनी मिलती है, और उसमें चौथे सत्संग की नौवीं रात फिर लौटती है। आपको याद होगा, उसी रात अर्जुन ने कहा था कि मैं पितामह से कैसे लड़ूँगा। पर उसी रात, भीष्म पर्व के एक सौ सातवें अध्याय में, एक बात और हुई थी जो हमने तब नहीं कही: भीष्म ने स्वयं पाण्डवों से कहा कि मेरे जीते जी तुम्हारी जीत नहीं हो सकती, इसलिए जल्दी मुझ पर प्रहार करो, मैं तुम्हें अनुमति देता हूँ कि जैसे चाहो मुझ पर प्रहार करो। अर्जुन का वह इनकार भावना की जगह से आता है, समझ की जगह से नहीं। और जिस पितामह के लिए वो रो रहे हैं, उन्होंने तो ख़ुद अपने लिए रास्ता बता दिया है।
उन्नीसवाँ श्लोक। "य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।"
जो इसे मारने वाला मानता है और जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों नहीं जानते। यह न मारता है, न मारा जाता है।
यह श्लोक दो तरफ़ से काटता है। एक तरफ़ वो जो सोचता है, मैं मारने वाला हूँ। दूसरी तरफ़ वो जो सोचता है, वो मर गया। श्रीकृष्ण कहते हैं कि दोनों ने एक ही चीज़ नहीं देखी। आचार्य शंकर कहते हैं कि जो इस आत्मा को "मैं" वाली पहचान में मारने वाला मानता है, और जो अपने ऊपर "मैं मारा गया" की पहचान चिपका लेता है, देह के मारे जाने से, दोनों आत्मा के स्वरूप को नहीं जानते। और ज्ञानेश्वर महाराज इसी बात को ऐसे कहते हैं कि तू देह का अभिमान पकड़कर, आँख इस शरीर पर रखकर कहता है, मैं मारने वाला हूँ और यह मरने वाला है। पर यदि तू सचमुच विचारे तो न तू मारने वाला है, न ये मारे जाने वाले।
श्रीधर स्वामी इस श्लोक में एक बात पकड़ते हैं जो मुझे बहुत मानवीय लगती है। वो कहते हैं कि पिछले श्लोकों ने भीष्म और बाकी के मरने से पैदा हुआ शोक दूर किया था। पर अर्जुन का एक और दुःख था, कि मैं इन्हें मारूँगा, यानी अपने हाथ से करने वाला बनूँगा। यह श्लोक उसे भी उसी तरह कारणहीन कर देता है। मुझे लगता है कि इसमें बहुतों के लिए एक छोटी-सी राहत है। हम में से कितने लोगों के भीतर एक ऐसा ही बोझ पड़ा रहता है कि काश मैंने उस दिन फ़ोन उठाया होता, काश मैं समय पर पहुँचा होता, काश मैंने ऐसा कहा होता। श्लोक जिस बात को छूता है, वो यही बोझ है, कि "मैंने खोया" की भावना में हम ख़ुद को उस चीज़ का कर्ता मान लेते हैं जो हमारे हाथ की नहीं थी।
मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक आपत्ति भी उठाते हैं कि शोक तो दूर हो गया, पर मारने का पाप? ये सवाल अलग है, और गीता उसे छोड़ती नहीं, अगले सत्संग में श्रीकृष्ण उसी पर आएँगे। तिलक बताते हैं कि यह श्लोक और अगला कठोपनिषद् में भी आते हैं। यानी गीता कोई नई बात नहीं खोज रही। वो उपनिषद् की उसी पुरानी धारा को अर्जुन के रथ पर उतार रही है।
तो इन तीन श्लोकों ने हमें क्या दिया? पहला, कि जिससे यह सब भरा है, उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता। दूसरा, कि शरीर नाशवान है, पर उसके लिए शोक अपना कर्तव्य छोड़ने का कारण नहीं। तीसरा, कि "मैं मारने वाला" और "वो मर गया", दोनों में एक ही चूक है।
पर अभी एक बात बाकी है। अब तक श्रीकृष्ण ने आत्मा के बारे में बहुत कुछ कहा है, मगर एक ही श्लोक में सब कुछ नहीं कहा। अब अगला श्लोक इस पूरे सत्संग का केन्द्र है। इसमें जन्म और मृत्यु दोनों को एक साथ आत्मा से हटा दिया गया है। आइए, सुनते हैं।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥
बीसवाँ श्लोक। इसे धीरे से सुनिए। "न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।"
यह न कभी जन्मता है, न मरता है। यह होकर फिर होने वाला नहीं है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
मैं चाहता हूँ कि हम इस श्लोक को शब्द-शब्द सुनें, क्योंकि हर शब्द कुछ हटाता है। हमारी अपनी टीका कहती है कि यह श्लोक आत्मा में शरीर के हर विकार का निषेध करता है: जन्म, आरम्भ होने वाला अस्तित्व, बढ़ना, घटना और मरना। मधुसूदन सरस्वती निरुक्त में वार्ष्यायणि के नाम से कहे गए छह भाव-विकार गिनाते हैं, और श्रीधर स्वामी भी इसी छह की बात करते हैं, कि जो कुछ भी देह की तरह होता है, उसमें छह बातें होती हैं: वह पैदा होता है, वह रहता है, वह बढ़ता है, वह बदलता है, वह घटता है, और वह नष्ट होता है। और यह श्लोक एक-एक करके इन छहों के आगे "नहीं" रख देता है।
"न जायते म्रियते वा", यह न पैदा होता है, न मरता है। आचार्य शंकर एक बड़ी सरल बात कहते हैं, जिसे मैं बार-बार दोहराता हूँ। वो कहते हैं, दुनिया में किसे मरा हुआ कहते हैं? उसे, जो पहले था और अब आगे नहीं होगा। और किसे जन्मा कहते हैं? उसे, जो पहले नहीं था और अब हो गया। आत्मा के बारे में यह दोनों बातें नहीं कही जा सकतीं। वो पहले नहीं था, ऐसा कभी नहीं हुआ। और आगे नहीं होगा, ऐसा भी नहीं। इसलिए जिस अर्थ में हम देह को "मरा" कहते हैं, उस अर्थ में यह कभी मरा ही नहीं।
श्रीधर स्वामी बाकी चार शब्दों को भी इसी तरह खोलते हैं। "नित्य" यानी जो सदा एक-सा रहे, इसलिए बढ़ता नहीं। "शाश्वत" यानी जो सदा से है, इसलिए घटता नहीं। और "पुराण" यानी जो पुराना होकर भी नया ही है, किसी बदलाव से रूप बदलकर नया नहीं हुआ। मुझे यह आख़िरी शब्द बहुत प्यारा लगता है। पुराना भी, और सदा नया भी। जैसे सुबह की धूप जो आज की भी है और उतनी ही पुरानी है जितना सूरज।
फिर वह चौथी पंक्ति, जो इस पूरे श्लोक का दिल है: "न हन्यते हन्यमाने शरीरे।" शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता। शरीर के साथ जो होता है, चाहे चोट हो, चाहे बीमारी हो, चाहे अन्त हो, वह होता रहता है। और उस होने के भीतर भी जो है, वह उसी तरह है। यह वह बात है जो रामानुजाचार्य कहते हैं, कि सब शरीरों में जिन जन्म और मरण का हम अनुभव करते हैं, वे कभी आत्मा को छूते ही नहीं।
अब ज्ञानेश्वर महाराज की चार उपमाएँ सुनिए, जो इन्हीं दो श्लोकों के साथ आती हैं। वो कहते हैं, जैसे सपने में कुछ दिखता है, और वह सपने में सच्चा लगता है, पर जागकर देखो तो कुछ भी नहीं। जैसे कोई छाया पर शस्त्र चलाए, तो उसके शरीर पर कोई घाव नहीं होता। जैसे पानी से भरा घड़ा उलट जाए, तो उसमें दिखता सूर्य का प्रतिबिम्ब बिखर जाता है, पर सूर्य नहीं मिटता। और जैसे मठ के भीतर का आकाश मठ का आकार ले लेता है, और मठ टूट जाए तो आकाश वैसे का वैसा रह जाता है। और वह निचोड़ में कहते हैं: इसी तरह देह के लोप होने पर स्वरूप में कहीं भी नाश नहीं है, इसलिए हे भाई, यह भ्रम मत पालो।
मेरे लिए इनमें सबसे घर जैसी उपमा घड़े वाली है। हम जिनसे प्रेम करते हैं, उनमें हमें एक प्रतिबिम्ब मिलता है: उनकी हँसी, उनके बोलने का ढंग, उनका होना। घड़ा टूटता है, और वह प्रतिबिम्ब आँखों के सामने बिखर जाता है। उस घड़ी में यह देख पाना कि सूरज आसमान में अब भी वहीं है, सबसे कठिन काम होता है। श्लोक यह नहीं कहता कि यह आसान है। वह इतना कहता है कि सूरज वहीं है।
अब इसी जगह मैं आपको महाभारत का वह दृश्य याद दिलाना चाहता हूँ जो इस श्लोक को बिल्कुल जीवित कर देता है। धृतराष्ट्र के सामने अभी सञ्जय ने एक नाम रखा है: भीष्म, जो रथ से गिरकर धरती पर पड़े हैं। भीष्म पर्व के एक सौ उन्नीसवें अध्याय में सञ्जय आगे वही दृश्य सुनाते हैं। भीष्म रथ से गिरते हुए सूर्य को दक्षिण मार्ग में देखते हैं, और आकाश में दिव्य वाणियाँ पूछती हैं कि दक्षिणायन में ये महात्मा मृत्यु को कैसे अपनाएँगे। और भीष्म उत्तर देते हैं: मैं ठहरा हुआ हूँ, धरती पर गिरकर भी मैं अपने प्राणों को रोके रखूँगा, उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हुए। फिर गङ्गा के भेजे, हंसों के रूप में आए ऋषियों से भी वे यही कहते हैं, कि प्राणों को छोड़ने का सामर्थ्य निश्चित ही मेरा है। इसका कारण भी वहीं लिखा है: उनके पिता शान्तनु ने उन्हें वर दिया था कि तुम पर मृत्यु तभी प्रभाव डालेगी जब तुम अनुमति दोगे। यह आदि पर्व के एक सौ सातवें अध्याय में है।
मैं यह नहीं कह रहा कि सबको यह वर मिला है। यह वर एक पिता ने एक पुत्र को उसके एक बड़े त्याग पर दिया था। पर इस दृश्य में एक छोटी बात है जिस पर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ। देह गिर चुकी है, बाणों की शय्या पर पड़ी है। और फिर भी वह देह के भीतर से बोलने वाला खड़ा है। वह सुन रहा है, उत्तर दे रहा है, तय कर रहा है। सञ्जय ने जो ख़बर दी थी, कि भीष्म गिरे, उसी ख़बर के भीतर यह भी लिखा है कि गिरने के बाद भी बोलने वाला कौन है। देह गिरी, और भीतर का "मैं" उसी घड़ी तय कर रहा था कि कब जाना है। "न हन्यते हन्यमाने शरीरे" का इससे सच्चा चित्र मुझे महाभारत में दूसरा नहीं मिलता।
और अब इक्कीसवाँ श्लोक। "वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्। कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्।"
हे पार्थ, जो पुरुष इसे अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह कैसे किसी को मरवाता है और कैसे किसी को मारता है?
यह श्लोक एक सवाल है, और आचार्य शंकर इसे ग़ौर से देखते हैं। वो कहते हैं कि यह सवाल जवाब चाहने वाला सवाल नहीं, यह एक आक्षेप है। यानी जो इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह किसी को मारता नहीं, और किसी से मरवाता भी नहीं। और अपनी परम्परा के अनुसार शंकर यह भी जोड़ते हैं कि इस प्रसंग का उद्देश्य ज्ञानी के सब कर्मों का निषेध है।
श्रीधर स्वामी इसमें एक बहुत मीठी बात देखते हैं। वो कहते हैं कि इससे श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यह भी कह दिया कि मुझमें भी, कि मैं ही तुम्हें प्रेरित कर रहा हूँ, कोई दोष मत देखना। देखिए, गुरु का अपना भाव कितना सहज है। वह जानते हैं कि सबसे छिपा हुआ सवाल अर्जुन के मन में यह भी हो सकता है कि इसे करवा तो आप ही रहे हैं। और वह उस सवाल का नाम पहले ही ले लेते हैं।
मधुसूदन सरस्वती इसी श्लोक में आत्मा की अविनाशिता के दो कारण गिनाते हैं। वो कहते हैं कि जिसका विनाश होता है, वह या तो अपने अंग खोकर नष्ट होता है, या अपने गुण खोकर। आत्मा के न अंग हैं, न गुण घटते हैं, इसलिए वह अव्यय है। और जो जन्मा हुआ नहीं, वह आरम्भ के विकार से मुक्त है, इसलिए वह अज है। और रामानुजाचार्य कहते हैं कि "मैं इन्हें मार रहा हूँ" वाला शोक आत्मा के असली स्वरूप को न जानने से उपजता है। अपने जीवन में यह श्लोक तब काम आता है जब हम किसी अपने के इलाज के बारे में कोई कठिन फ़ैसला लेते हैं, और बाद में मन कहता है कि उनका जाना मेरे फ़ैसले से हुआ। जो जानता है कि भीतर वाला न मारा जाता है, न मरवाया जाता है, वो अपने फ़ैसले की ज़िम्मेदारी तो लेता है, पर उस बोझ को अपने कंधे पर नहीं रखता जो कभी उसका था ही नहीं।
तो इन दो श्लोकों में हमने क्या सुना? पहला, कि आत्मा में जन्म नहीं, मृत्यु नहीं, बढ़ना नहीं, घटना नहीं, बदलना नहीं, और शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मारा जाता। दूसरा, कि जो इसे इस तरह जान ले, वह कैसे किसी को मारेगा या मरवाएगा।
यह बीसवाँ श्लोक वह है जिस पर हम आज का सत्संग बन्द करेंगे, क्योंकि यह इस पूरे सत्संग का केन्द्र है। अगर आप आज केवल एक श्लोक घर ले जाएँ, तो यही ले जाइए।
पर अभी एक बात बाकी है। एक सवाल अब भी रह गया है, जो सबसे ईमानदार है। अगर आत्मा नहीं मरती, तो जब कोई जाता है, तब वह जाता कहाँ है? और उसका क्या होता है, जिसे हम देखते हैं और जिसे हम खो देते हैं? अगला श्लोक वह उपमा देता है जिससे हम सब हर रोज़ गुज़रते हैं, पर कभी इस तरह सोचते नहीं। सुनिए।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥
बाईसवाँ श्लोक। "वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।"
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर दूसरे नए वस्त्र पहन लेता है, वैसे ही देहधारी पुराने शरीर छोड़कर दूसरे नए शरीर प्राप्त करता है।
यह उपमा इतनी जानी-पहचानी है कि हम इसे सुनते-सुनते भूल जाते हैं कि इसमें कितनी बात है। एक सीधा-सा दृश्य सोचिए। कोई आदमी बरसों एक वर्दी पहनकर काम पर गया, और एक दिन रिटायर हुआ। वह घर आकर वर्दी उतारकर खूँटी पर टाँग देता है। वर्दी वहीं रहती है, उसकी तहें, उसके बटन, उसकी घिसी हुई कॉलर। पर आदमी वहीं बैठा है, चाय पी रहा है, और अगली सुबह किसी दूसरे काम के लिए उठेगा। वर्दी के रहने से आदमी का रहना तय नहीं होता, और वर्दी के उतरने से आदमी का जाना तय नहीं होता।
आचार्य शंकर बस इतना कहते हैं कि जैसे पुरुष, जो वस्त्र बदलता है, वैसा का वैसा रहता है, वैसे ही देही आत्मा बदलने वाले शरीर के बीच भी अविकारी है। श्रीधर स्वामी यह जोड़ते हैं कि अपने-अपने कर्म के कारण देहों का होना अवश्यम्भावी है, इसलिए जीर्ण देह के नाश पर शोक का कोई स्थान नहीं।
रामानुजाचार्य यहाँ अपनी दृष्टि से एक बड़ी बात कहते हैं। वो कहते हैं कि शास्त्र से जाना जाता है कि धर्म के युद्ध में शरीर त्यागने वालों को छोड़े हुए शरीर से अधिक कल्याणकारी शरीर मिलता है। इसलिए वहाँ पुराने वस्त्र छोड़कर नए कल्याणकारी वस्त्र पहनने वालों की तरह हर्ष का ही कारण दिखता है, शोक का नहीं। मधुसूदन सरस्वती भी इसी दिशा में पढ़ते हैं, कि उम्र और तप से कृश हुए भीष्म आदि ये शरीर छोड़कर और श्रेष्ठ शरीर पाएँगे। ये दोनों आचार्य अपनी-अपनी परम्परा से बोल रहे हैं। जिसे इनसे सहारा मिले, उसे मिले, और जो इतनी दूर न जाए, वह भी श्लोक का मुख्य सन्देश तो पकड़ ही लेता है: कि पहनने वाला वही है।
नीलकण्ठ इसे एक सटीक तर्क से कहते हैं। वो कहते हैं कि वस्त्र और देवदत्त का सम्बन्ध वैसा ही है जैसा जड़ और चेतन का, यानी देह और आत्मा का। जो आदमी वस्त्र के नष्ट होने पर देवदत्त का नष्ट होना मान ले, उसकी मूढ़ता साफ़ दिखती है। और तुम, अर्जुन, देह के नाश से आत्मा का नाश मानते हुए बिल्कुल वैसे ही हो। यहाँ भी वह बात कठोर लगती है, पर नीलकण्ठ का अर्थ अर्जुन को चोट देना नहीं है। वह एक सीधी बात सामने रख रहे हैं। जिस दिन घर में किसी के कपड़े बाँटे जाते हैं, उस दिन यह श्लोक सबसे पास होता है। हाथ में उनकी कमीज़ होती है, उसमें उनकी गन्ध होती है, और फिर भी मन जानता है कि वो इस कमीज़ में नहीं हैं।
अब मैं आपको एक बात बताता हूँ जो मुझे खुद चौंका गई जब मैंने इसे पढ़ा। यही उपमा, लगभग इन्हीं शब्दों में, महाभारत में धृतराष्ट्र को भी सुनाई गई है। युद्ध के बाद, जब उनके सौ पुत्र मारे जा चुके हैं, और जैसा स्त्री पर्व के पहले अध्याय में लिखा है, वे आँधी से टूटे वृक्ष की तरह भूमि पर गिर पड़ते हैं, तब विदुर उन्हें समझाते हैं। स्त्री पर्व के तीसरे अध्याय में विदुर कहते हैं कि विद्वान मनुष्यों की देहों को घर कहते हैं, और काल उन्हें बाँटता है, केवल भीतर का सत्त्व ही शुभ है। और अगले ही श्लोक में: जैसे मनुष्य पुराना या नया वस्त्र छोड़कर दूसरा पसन्द कर लेता है, वैसे ही देहधारियों की देहें हैं।
आप सोचिए, वही धृतराष्ट्र जो आज सञ्जय के मुँह से यह श्लोक सुन रहे हैं, आगे चलकर, युद्ध के बाद, इसी उपमा को दोबारा सुनेंगे, इस बार अपने ही बेटों के बाद। और स्त्री पर्व के दूसरे अध्याय में विदुर एक और वाक्य कहते हैं जो मुझे बहुत सच्चा लगता है: शोक करने से कोई मरे हुए के पीछे नहीं जाता और शोक करने से कोई मरता नहीं। यानी महाभारत स्वयं मानता है कि शोक आता है, और उसे वह तिरस्कार से नहीं, एक ठहरी हुई बात से जवाब देता है।
तेईसवाँ श्लोक। "नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।"
न शस्त्र इसे काट सकते हैं, न आग इसे जला सकती है, न जल इसे भिगो सकता है, न वायु इसे सुखा सकती है।
यह श्लोक सुनकर सबसे पहले मन में चार चित्र आते हैं: तलवार, अग्नि, जल और हवा। और ये चारों वही हैं जो हर चीज़ को नष्ट करते हैं। आचार्य शंकर इसे बहुत सीधे ढंग से कहते हैं। वो कहते हैं कि शस्त्र किसी चीज़ को उसके हिस्सों में बाँटकर काटते हैं, पर आत्मा के हिस्से नहीं हैं। पानी किसी चीज़ को भिगोता है उसके हिस्सों को ढीला करके, पर आत्मा में ढीला होने को कुछ नहीं। हवा चीज़ को उसकी नमी सोखकर सुखाती है, पर आत्मा में वैसी कोई नमी नहीं।
मधुसूदन सरस्वती एक ऐसी बारीकी देखते हैं जो इस जगह की है। वो कहते हैं कि यहाँ श्लोक में शस्त्र पहले इसलिए आए हैं कि अभी युद्ध का समय है। वरना जो नाश करने वाले माने गए हैं, वे तो पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु ही हैं। यानी श्रीकृष्ण अर्जुन की उसी घड़ी की भाषा में बोल रहे हैं, कि तुम्हारे धनुष-बाण, तुम्हारी तलवारें, ये उसे छू भी नहीं सकते।
नीलकण्ठ चारों बातों को चार कारणों से जोड़ते हैं, और वह जोड़ मुझे बहुत सुन्दर लगता है। शस्त्र इसे नहीं काटते क्योंकि यह स्थूल नहीं है। अग्नि इसे नहीं जलाती क्योंकि यह अणु जैसी सीमित वस्तु नहीं है। जल इसे नहीं भिगोता क्योंकि इसे छुआ नहीं जा सकता। और वायु इसे नहीं सुखाती क्योंकि इसमें कोई गीलापन नहीं है। वो इसे उपनिषद् के उस वर्णन से मिलाते हैं जहाँ कहा गया है कि यह न लम्बा है, न स्थूल, न अणु।
ज्ञानेश्वर महाराज इस श्लोक में एक चित्र जोड़ते हैं: यह न प्रलय के जल में डूबता है, इसे अग्नि जला नहीं सकती, और महाप्रलय की वायु का प्रबल सोखना भी इस पर असर नहीं डालता। यानी जब सब कुछ घुल जाता है, तब भी यह वही है।
आप में से बहुतों ने किसी अपने की चिता के पास खड़े होकर वो आग देखी होगी। आज के पहले हिस्से में नीलकण्ठ की बात आई थी, कि प्राण जाने के बाद बेटा देह को अग्नि देता है और कोई उसे दोषी नहीं कहता। उस घड़ी में "नैनं दहति पावकः" सबसे सच्चा लगता है। आग वही जला रही है जो जल सकता है। जिसे आप सचमुच प्यार करते थे, वो उस आग की पहुँच में कभी था ही नहीं।
और यहाँ मैं आपको भीष्म पर्व की एक पंक्ति पर रोकना चाहता हूँ, जो इस श्लोक के सामने बहुत छोटी दिखेगी, पर जिसमें एक सुन्दर प्रतिध्वनि है। दूसरे अध्याय में, जब व्यास सञ्जय को दिव्य दृष्टि देते हैं, तब वे कहते हैं कि शस्त्र इसे भेदेंगे नहीं, और थकान इसे सताएगी नहीं, और गवल्गण का यह पुत्र इस युद्ध से जीवित निकल आएगा। यानी जो यह गीता सुना रहे हैं, उनके अपने शरीर को शस्त्र नहीं भेदेंगे, यह एक वरदान है। पर वह वरदान एक शरीर के लिए है, एक आदमी के लिए, एक युद्ध के लिए। गीता का यह श्लोक वही बात, बिना किसी वरदान के, उसके बारे में कहता है जो हर शरीर के भीतर है।
तो इन दो श्लोकों में क्या कहा गया? पहला, कि मृत्यु वस्त्र बदलने की तरह है, पहनने वाला वही रहता है। दूसरा, कि चारों नष्ट करने वाली शक्तियों में से कोई भी उस तक पहुँचती नहीं।
पर अभी एक बात बाकी है। हमने आत्मा के बारे में इतना सुन लिया कि वह नित्य है, अचल है, कोई उसे छू नहीं सकता। पर वह है क्या? उसे देखा क्यों नहीं जाता? क्यों सोचा भी नहीं जाता? और जब हम उसे देख नहीं सकते, तो श्रीकृष्ण हमसे यह कैसे कह सकते हैं कि इसे जानकर शोक मत करो? अगले दो श्लोकों में ये सारे सवाल एक साथ खुलते हैं, और उसी के साथ आज का हमारा सफ़र पूरा होगा।
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥
चौबीसवाँ श्लोक। "अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः।"
यह काटा नहीं जा सकता, जलाया नहीं जा सकता, गीला नहीं किया जा सकता और सुखाया नहीं जा सकता। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।
आप में से कुछ लोग सोच रहे होंगे कि यह तो वही बात है जो तेईसवें श्लोक में आ चुकी, बस उल्टे ढंग से कही गई। वहाँ कहा गया कि शस्त्र इसे नहीं काटते। यहाँ कहा गया कि यह काटा नहीं जा सकता। आचार्य शंकर इस दोहराव पर पहले ही बोल देते हैं। वो कहते हैं कि इन श्लोकों में दोहराव का दोष मत देखिए, क्योंकि आत्मा का समझना कठिन है, इसलिए बात को बार-बार, अलग-अलग ओर से कहना ज़रूरी हो जाता है। मुझे यह बहुत अपना लगता है। जब हम किसी ऐसी चीज़ को समझाते हैं जो हमारी पकड़ में नहीं आती, तो हम उसे एक बार नहीं कहते। हम उसके चारों ओर घूमकर उसे चार बार कहते हैं।
फिर शंकर इसे एक कड़ी की तरह खोलते हैं। क्योंकि इसे कोई नष्ट नहीं कर सकता, इसलिए यह नित्य है। क्योंकि यह नित्य है, इसलिए सर्वव्यापी है। क्योंकि सर्वव्यापी है, इसलिए खम्भे की तरह स्थिर है। क्योंकि स्थिर है, इसलिए अचल है। और इसीलिए सनातन है, यानी किसी कारण से अभी-अभी बना हुआ नहीं।
और यहाँ एक शब्द है "स्थाणु", जिसका अर्थ है खम्भा या ठूँठ, जो अपनी जगह पर है। मधुसूदन सरस्वती इन विशेषणों का कारण यह बताते हैं कि यह आदि और अन्त से रहित है, इसलिए इसे उत्पन्न करने या नष्ट करने की बात ही नहीं उठती। और ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं: यह अनादि काल से नित्य सिद्ध है, उपाधि से रहित है, शुद्ध है, इसीलिए शस्त्र आदि से इसका छेद नहीं हो पाता। बाढ़ में जब सब कुछ बहने लगता है, तब लोग किसी गड़े हुए खम्भे को पकड़ लेते हैं। जो भीतर के इस स्थाणु को पहचान ले, उसके पास शोक की बाढ़ में भी पकड़ने को कुछ रहता है।
और अब पच्चीसवाँ श्लोक, जिस पर आज का हमारा सफ़र पूरा होता है। "अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि।"
यह अव्यक्त, अचिन्त्य और विकाररहित कहा जाता है। इसलिए इसे ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
तीन शब्द हैं: अव्यक्त, अचिन्त्य, अविकार्य। जो आँखों से प्रकट नहीं होता, जो मन के चिन्तन में नहीं समाता, और जिसमें कोई बदलाव डाला नहीं जा सकता। आचार्य शंकर इन तीनों को क्रम से खोलते हैं। जो चीज़ किसी भी इन्द्रिय का विषय नहीं बनती, वह अव्यक्त है। जो इन्द्रियों के सामने आती है, उसी के बारे में हम सोच पाते हैं, इसलिए जो इन्द्रियों के सामने आती ही नहीं, वह अचिन्त्य है। और जैसे दूध खटाई डालने पर दही बन जाता है, वैसा बदलाव इसमें नहीं आता, क्योंकि इसके हिस्से नहीं, इसलिए यह अविकार्य है।
यहाँ एक बहुत ईमानदार सवाल उठता है, और मैं नहीं चाहता कि हम उससे बचें। अगर इसे देखा नहीं जा सकता, सोचा नहीं जा सकता, तो श्रीकृष्ण हमसे यह कैसे कह सकते हैं कि इसे जानकर शोक मत करो? इसके लिए रामानुजाचार्य का अप्रमेय वाला उत्तर याद कीजिए, जो हमने अठारहवें श्लोक पर सुना था, और आँख वाली बात भी। यह जानना वैसा नहीं है जैसे हम किसी मेज़ को देखकर जानते हैं। यह वह जानना है जिसमें जानने वाला ख़ुद को जानता है। मधुसूदन सरस्वती इसमें दो दरवाज़े बन्द करते हैं। वो कहते हैं, कोई चीज़ आँख से दिखे तो वह प्रत्यक्ष हो गई, और हम उस पर बात कर सकते हैं। नहीं दिखे, तो हम अनुमान से जान लेते हैं, जैसे धुएँ से आग। पर इस आत्मा के लिए दोनों रास्ते काम नहीं आते। इसलिए यह कटने, जलने, भीगने या सूखने का विषय बन ही नहीं सकता।
श्रीधर स्वामी एक बहुत छोटा, पर महत्त्वपूर्ण शब्द पकड़ते हैं: "उच्यते", यानी "कहा जाता है"। वो कहते हैं कि इसमें श्रीकृष्ण उन ज्ञानियों की बात का प्रमाण देते हैं जो इसे जान चुके हैं। यानी गीता यहाँ अपनी नई खोज नहीं बता रही। वह उन सबकी गवाही बता रही है जिन्होंने इसे देखा।
नीलकण्ठ इन तीन शब्दों को तीन शरीरों से जोड़ते हैं: जो प्रकट है वह स्थूल शरीर, जो सोच का विषय है वह सूक्ष्म शरीर, यानी मन और इन्द्रियाँ, और जो बदलाव के लायक है वह कारण शरीर। आत्मा इन तीनों से अलग है, इसलिए इनके बदलने पर उस पर फ़र्क़ नहीं पड़ता।
और ज्ञानेश्वर महाराज इस श्लोक के लिए जो शब्द चुनते हैं, उनके साथ मैं आज का यह हिस्सा पूरा करना चाहता हूँ। वो कहते हैं, यह तर्क की दृष्टि का विषय नहीं, ध्यान इसके मिलन की आतुरता से भरा रहता है; यह मन के लिए सदा दुर्लभ है, असीम है, पुरुषोत्तम है। और फिर वह कहते हैं: अर्जुन, इसे ऐसा जानना चाहिए, इसे सबका आत्मा देखना चाहिए। तब तुम्हारा सारा शोक सहज ही मिट जाएगा। ध्यान दीजिए, वे यह नहीं कहते कि शोक मना है। वे कहते हैं कि वह सहज ही चला जाएगा।
आइए अब पीछे मुड़कर देखें। पन्द्रह श्लोकों में श्रीकृष्ण ने शोक के नीचे की ग़लतफ़हमी दिखाई, सहने का रास्ता दिखाया, टिकने वाले और न टिकने वाले का भेद दिखाया, और बीसवें श्लोक में कुंजी दी: वह न जन्मता है, न मरता है। बाकी सब उसी कुंजी के चारों ओर घूमकर कहा गया।
और अब मैं एक बात आपसे ईमानदारी से कहना चाहता हूँ, जो इस पूरे सत्संग के लिए ज़रूरी है। गीता का अर्जुन, जिसने यह सब अपने कानों से सुना, बाद में अपने बेटे अभिमन्यु के लिए रोया। द्रोण पर्व के बहत्तरवें अध्याय का नाम ही है "अभिमन्यु के लिए अर्जुन का विलाप", और वहाँ अर्जुन कहते हैं कि उसे न देखूँ तो मेरे हृदय को कैसी शान्ति, और हाय मेरे बेटे, काल तुम्हें मुझसे कैसे ज़बरदस्ती ले जा रहा है। यह सब सञ्जय ही धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। और उससे पहले, उसी द्रोण पर्व में, युधिष्ठिर भी अभिमन्यु के लिए विलाप करते हैं, और बावनवें अध्याय में व्यास के सामने एक सवाल रखते हैं जो हमारे आज के शीर्षक का ही सवाल है: कि "मृत" यह नाम कहाँ से आया, मृत्यु किसकी है, मृत्यु कहाँ से आती है, और किस कारण इन प्राणियों को ले जाती है। यानी महाभारत स्वयं बताता है कि गीता के बाद भी आँसू आए, और सवाल भी आए। गीता उन्हें रोकने नहीं आई थी। वह उन आँसुओं के नीचे ज़मीन देने आई थी।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। जिसे आपने खोया, उसकी देह बदली, उसका "होना" नहीं मिटा। तेरहवें श्लोक के बचपन और बुढ़ापे की तरह, देह के बीच जो एक "मैं" चलता है, वही बीसवें श्लोक में कहा गया है कि न जन्मता है, न मरता है। उसे देह के साथ मरा मान लेना, श्रीकृष्ण कहते हैं, वही चूक है जिस पर वे मुस्कुराए थे।
दूसरी बात। शोक आएगा, और चौदहवाँ श्लोक उसे सहने को कहता है, महसूस करने के साथ, बिना दबाए और बिना उसमें डूबे। और उन्नीसवाँ श्लोक उस दूसरे बोझ को उतारता है जो हम अपने सिर ले लेते हैं, कि मैंने उन्हें खो दिया, जैसे वह हमारे हाथ की बात रही हो। सहना है, पर ख़ुद को कर्ता बनाकर नहीं।
तीसरी बात। गीता ने जो आत्मा बताई, उसे आँख से देखा नहीं जाता, मन से सोचा नहीं जाता। फिर भी श्रीकृष्ण उसके बारे में इतना निश्चित होकर कहते हैं, क्योंकि जानना दो तरह का होता है। एक वह, जिसमें हम किसी चीज़ को देखते हैं। दूसरा वह, जिसमें हम ख़ुद को जानते हैं। पहला हर रोज़ बदलता है, दूसरा नहीं। जन्म देह का होता है, इसलिए मरती भी देह है। और जो कभी जन्मा ही नहीं, वह कैसे मरेगा।
अगली बार हम इसी सवाल को एक और ओर से देखेंगे, और वह पहले से भी ज़्यादा चौंकाने वाला है। श्रीकृष्ण कहेंगे: "अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।" यानी, अगर तुम आत्मा के नित्य होने की बात न भी मानो, और उसे सदा जन्मने वाला और सदा मरने वाला ही मानो, तब भी, हे महाबाहो, तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए। और उसके बाद वह श्लोक आएगा जो कहता है कि जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है, इसलिए जिसे टाला नहीं जा सकता, उसके विषय में शोक नहीं करना चाहिए।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में वह कौन-सा नाम है जिसके बारे में आपने अब तक यह पूछना टाल रखा है कि वह कहाँ है? और अगर आज उनकी याद आ रही है, तो उसे बिना किसी तर्क के, बिना किसी बचाव के, नीचे लिख दीजिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्री कृष्ण।
देह जाती है। वह नहीं जाता, जो देह में रहता था।
जय श्री कृष्ण।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥
तीन बातें
- जिसे आपने खोया, उसकी देह बदली, उसका "होना" नहीं मिटा। तेरहवें श्लोक के बचपन और बुढ़ापे की तरह, देह के बीच जो एक "मैं" चलता है, वही बीसवें श्लोक में कहा गया है कि न जन्मता है, न मरता है। उसे देह के साथ मरा मान लेना, श्रीकृष्ण कहते हैं, वही चूक है जिस पर वे मुस्कुराए थे।
- शोक आएगा, और चौदहवाँ श्लोक उसे सहने को कहता है, महसूस करने के साथ, बिना दबाए और बिना उसमें डूबे। और उन्नीसवाँ श्लोक उस दूसरे बोझ को उतारता है जो हम अपने सिर ले लेते हैं, कि मैंने उन्हें खो दिया, जैसे वह हमारे हाथ की बात रही हो। सहना है, पर ख़ुद को कर्ता बनाकर नहीं।
- गीता ने जो आत्मा बताई, उसे आँख से देखा नहीं जाता, मन से सोचा नहीं जाता। फिर भी श्रीकृष्ण उसके बारे में इतना निश्चित होकर कहते हैं, क्योंकि जानना दो तरह का होता है। एक वह, जिसमें हम किसी चीज़ को देखते हैं। दूसरा वह, जिसमें हम ख़ुद को जानते हैं। पहला हर रोज़ बदलता है, दूसरा नहीं। जन्म देह का होता है, इसलिए मरती भी देह है। और जो कभी जन्मा ही नहीं, वह कैसे मरेगा।