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सत्संग ४

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गीता सार - अध्याय 2

गीता 2.1–2.10 · 78 मिनट

उलझन में किससे पूछें; "मैं नहीं जानता" कहना शुरुआत क्यों है

सञ्जय उवाच तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥
गीता 2.1 — अर्थ पढ़ें ›
श्रीभगवानुवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥
गीता 2.2 — अर्थ पढ़ें ›

कभी ऐसा हुआ है कि आपके सामने एक सवाल खड़ा हो, और आपने अपनी पूरी समझ उसमें लगा दी? सारे पक्ष तौल लिए, सारी दलीलें सुन लीं, घर के सब लोगों की राय भी ले ली, और फिर भी भीतर से कोई जवाब नहीं आया। ऐसा नहीं कि आप नासमझ हैं। आपने उतना सोच लिया है जितना सोचा जा सकता है। समझ अपनी आख़िरी सीढ़ी तक पहुँच गई है, और उसके आगे अब सीढ़ी ही नहीं है।

तब आदमी किससे पूछे? और उससे भी बड़ा सवाल, तब आदमी ये तीन शब्द कहना कैसे सीखे: "मैं नहीं जानता"? आज का सत्संग इन्हीं दो सवालों पर है। जब समझ जवाब दे दे, तब क्या होता है।

जय श्री कृष्ण।

आइए, आराम से बैठिए। आज गीता ज्ञान का चौथा सत्संग है। पिछली बार हमने पहले अध्याय का आख़िरी हिस्सा सुना था, जहाँ अर्जुन ने अपनी सारी दलीलें एक-एक करके रख दीं: कि अपनों को मारकर कैसा सुख, कि कुल के नाश से जो टूटेगा वो कभी जुड़ नहीं पाएगा, कि पितरों की भी चिन्ता है। और जब दलीलें ख़त्म हो गईं, तब उसने धनुष-बाण नीचे रख दिए और रथ के पिछले भाग में बैठ गया, शोक से भरे मन के साथ। पहला अध्याय वहीं रुका था।

आज से दूसरा अध्याय शुरू होता है। इसका नाम है सांख्ययोग। और हमारी अपनी टीका इस अध्याय के बारे में एक बहुत बड़ी बात कहती है: ये अध्याय छोटे रूप में पूरी गीता है। जो कुछ आगे अठारह अध्यायों में फैलने वाला है, उसके बीज यहीं हैं। और इस अध्याय के पहले दस श्लोक, जो आज हमारे सामने हैं, उसकी भूमिका हैं। इनमें कोई उपदेश नहीं है। इनमें एक आदमी है जो अपनी समझ की आख़िरी हद तक पहुँच चुका है, और एक दूसरा आदमी है जो चुपचाप, बिना जल्दी किए, उसके उस हद तक पहुँचने का इंतज़ार करता है।

और एक बात, जो इस अध्याय को ख़ास बनाती है। इस अध्याय में पहली बार श्रीकृष्ण गुरु की तरह बोलना शुरू करते हैं। पहले अध्याय में उन्होंने बस एक पंक्ति कही थी, जब रथ भीष्म और द्रोण के ठीक सामने खड़ा हुआ था: "पार्थ, इन इकट्ठे हुए कौरवों को देख लो।" बस इतना। एक सारथि का वाक्य। और अब, उन्हीं भीष्म और द्रोण के सामने, जब अर्जुन ने देख लिया और टूट गया, तब पहली बार "श्रीभगवानुवाच" आता है, यानी भगवान बोले। देखने को कहा था, और अब देखने के बाद जो हुआ, उस पर बोलेंगे।

पर इससे पहले कि हम श्रीकृष्ण की बात सुनें, मैं आपको धृतराष्ट्र के पास एक बार ले चलना चाहता हूँ। क्योंकि पहले सत्संग में हमने जो देखा था, वो धागा अभी टूटा नहीं है।

आपको याद होगा, ये पूरी गीता सञ्जय धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं, उस समय जब भीष्म बाणों की शय्या पर लेट चुके हैं। धृतराष्ट्र अन्धे राजा हैं, और अब हर श्लोक पर वो एक पिता की तरह कान लगाकर सुन रहे हैं। और यहाँ टीकाकार एक बहुत सुंदर बात पकड़ते हैं। नीलकण्ठ और मधुसूदन सरस्वती, दोनों कहते हैं कि अर्जुन ने पिछले श्लोक में धनुष छोड़ दिया, तो धृतराष्ट्र के मन में आशा जगी होगी। सोचिए उनकी जगह खुद को रखकर। अगर अर्जुन लड़ने से मना कर दे, तो सबसे बड़ा धनुर्धर मैदान से हट गया, और फिर मेरे बेटों को निष्कण्टक राज्य मिल जाएगा। मधुसूदन सरस्वती लिखते हैं कि अर्जुन के युद्ध से मुँह मोड़ने की बात सुनकर धृतराष्ट्र का हृदय हर्ष से भर गया होगा, और वो उत्सुकता से पूछ रहे होंगे: "फिर क्या हुआ?" और तब सञ्जय अगला श्लोक कहते हैं। यही हमारा पहला श्लोक है।

और एक बात बताऊँ, जो पहले सत्संग में हमने सुनी थी। महाभारत के आदि पर्व की शुरुआत में, जब धृतराष्ट्र अपनी हार की सूची गिनाते हैं, उसमें एक पंक्ति गीता के बारे में है। वो कहते हैं: "जब मैंने सुना कि अर्जुन मोह से घिरकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए, और तब कृष्ण ने उन्हें अपने शरीर में सब लोक दिखाए, तब हे सञ्जय, मुझे विजय की आशा नहीं रही।" ये बात ध्यान से सुनिए। "मोह से घिरकर", ये शब्द मूल में "कश्मलेन" है। और यही शब्द, कश्मल, आज दूसरे श्लोक में श्रीकृष्ण के मुँह से निकलने वाला है। धृतराष्ट्र ने जिस बीमारी का नाम बाद में याद किया, श्रीकृष्ण ने उसका नाम सबसे पहले लिया था।

तो अब आइए, पहले श्लोक पर। "तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः।"

उस अर्जुन से, जो करुणा से भरा हुआ है, जिसकी आँखें आँसुओं से भरी हैं और धुँधली हो गई हैं, जो विषाद में डूबा है, मधुसूदन ने ये वचन कहे।

इस एक श्लोक में तीन शब्द हैं जिन्हें मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ। कृपा, आँसू और विषाद। और यहाँ मधुसूदन सरस्वती, गीता के बड़े टीकाकार, एक ऐसी बारीकी की ओर इशारा करते हैं जो मुझे बहुत गहरी लगती है। वो कहते हैं, देखिए, श्लोक में अर्जुन को "आविष्ट" कहा गया है। यानी करुणा अर्जुन के भीतर से नहीं निकली, करुणा उस पर आ पड़ी है, जैसे कोई चीज़ किसी पर छा जाती है। व्याकरण में भी अर्जुन वो है जिस पर कुछ किया गया, और करने वाली करुणा है। और इसी तरह विषाद भी। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि ये दोनों अर्जुन का अपना स्वभाव नहीं हैं। ये आए हुए मेहमान हैं। इन्होंने अर्जुन को घेर लिया है, पर ये अर्जुन नहीं हैं।

मुझे ये बात बहुत सहारा देती है। क्योंकि जब हम टूटते हैं, तब हमें ऐसा लगता है कि हम ही टूट गए, कि हमारी असली बनावट यही थी जो अब दिख रही है। पर श्लोक कहता है कि नहीं, ये उस पर छाया हुआ है, उसका होना नहीं है। आँसू भी, घबराहट भी, ये आते हैं और ये जाते हैं।

और एक बात और, जो नीलकण्ठ कहते हैं, जिन्होंने पूरे महाभारत पर टीका लिखी है। वो कहते हैं कि यहाँ "कृपा" का मतलब दूसरों का दुख मिटाने की इच्छा वाली दया नहीं है। यहाँ कृपा का मतलब स्नेह है, अपनों के प्रति लगाव। और वो इसका प्रमाण भी देते हैं, अर्जुन के अपने शब्दों से। आगे अर्जुन खुद कहेगा, "जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहेंगे, वही सामने खड़े हैं।" मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं: ये करुणा "ये मेरे हैं" वाले भाव से उपजी है। सारा अन्तर इसी में है। जो दया दूसरे के दुख को देखकर उठती है, वो पहले उसे सँभालती है। जो करुणा "मेरे" के भाव से उठती है, वो पहले हमें ही डुबोती है।

आप इसे अपने जीवन में पहचान सकते हैं। एक माँ को अपने बच्चे को टीका लगवाने ले जाना है। बच्चा रोएगा, और माँ का दिल पसीजेगा। अब वो दया, जो माँ को टीका टालने को कहे, और वो दया, जो माँ को बच्चे को गोद में लेकर डॉक्टर के पास डटे रहने की ताकत दे, ये दोनों अलग हैं। पहली "मेरा" की दया है, दूसरी बच्चे के भले की। और सच ये भी है कि बाहर से दोनों एक जैसी दिखती हैं। आँखें दोनों में नम होती हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण को इसका नाम लेना पड़ेगा।

अब दूसरा श्लोक। "श्रीभगवानुवाच। कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।"

श्रीकृष्ण का पहला शब्द है "कुतः"। कहाँ से। ध्यान दीजिए, उन्होंने दिलासा नहीं दिया। उन्होंने "बेटा, मत रो" नहीं कहा। उन्होंने डाँटा भी नहीं। उन्होंने एक सवाल पूछा: "अर्जुन, ये धुँधलापन तुम्हें कहाँ से आ गया, और वो भी इस कठिन घड़ी में?"

और हमारी टीका इसे बहुत सीधे ढंग से खोलती है। वो कहती है कि श्रीकृष्ण अभी अर्जुन के तर्कों का खण्डन नहीं करते। पहले वो उनके पीछे की दशा का नाम लेते हैं। कश्मल यानी मन का धुँधलापन, और श्रीकृष्ण उसे उसके असली नाम से पुकारते हैं। सोचिए, ये कितनी बड़ी बात है। अर्जुन ने पूरे पहले अध्याय में तर्क दिए थे: कुल का नाश, पितरों की चिन्ता, पाप का डर। और श्रीकृष्ण उनमें से एक का भी जवाब अभी नहीं देते। वो कहते हैं, इन सब दलीलों के नीचे जो चीज़ पड़ी है, पहले उसे देखो। वो चीज़ दलील नहीं है, धुँधलापन है।

अब इस श्लोक के पीछे का एक और तह। मधुसूदन सरस्वती पहले बताते हैं कि "श्रीभगवान" कहने का क्या मतलब है। वो एक पुराना श्लोक देते हैं कि भग छह चीज़ों को कहते हैं: पूरा ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, वैराग्य और ज्ञान। जिसमें ये छहों सदा बिना रुकावट के रहें, वो भगवान। और जो प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश, उनका आना और जाना जानता हो, वो भी भगवान। यानी जो इस घड़ी अर्जुन से बोल रहे हैं, वो उसकी हर चाल, हर आने वाली घड़ी जानते हैं। फिर भी उनका पहला शब्द एक सवाल है।

फिर वो तीन विशेषण आते हैं: अनार्यजुष्टम्, अस्वर्ग्यम्, अकीर्तिकरम्। जो श्रेष्ठ पुरुषों का आचरण नहीं, जो स्वर्ग नहीं दिलाएगा, जो यश नहीं देगा। और मधुसूदन सरस्वती इन तीनों में कुछ बहुत सुंदर पढ़ते हैं। वो कहते हैं कि श्रीकृष्ण का सवाल दरअसल एक तिहरा सवाल है। "कुतः?" यानी किस इच्छा से ये धुँधलापन तुम्हें चढ़ा? क्या मोक्ष की इच्छा से? तो मोक्ष चाहने वाले श्रेष्ठ लोग, जिन्हें आर्य कहते हैं, अपना कर्तव्य छोड़कर भागते नहीं। क्या स्वर्ग की इच्छा से? तो ये स्वर्ग नहीं दिलाता। क्या यश की इच्छा से? तो ये अपयश दिलाता है। यानी हर वो कारण जिससे इंसान ऐसा करता है, उसे श्रीकृष्ण एक-एक करके छू लेते हैं और दिखा देते हैं कि इनमें से कोई भी कारण यहाँ टिकता नहीं है।

नीलकण्ठ इसी में एक बारीक शब्द पर ध्यान दिलाते हैं। "अनार्य" यानी जो आर्य नहीं, जो श्रेष्ठ नहीं। वो कहते हैं कि यहाँ अनार्य का अर्थ है डरपोक लोग, और श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि ये चीज़ तुम जैसे शूरवीर के पास आती ही नहीं। और "अर्जुन" शब्द को वो "स्वच्छ स्वभाव वाला" के अर्थ में पढ़ते हैं, यानी साफ़ मन का आदमी, जिसे ये मैल शोभा नहीं देता।

संत ज्ञानेश्वर इसी जगह ज्ञानेश्वरी में श्रीकृष्ण की ओर से कुछ बहुत सुंदर उपमाएँ देते हैं। वो कहते हैं, श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं, अर्जुन, ज़रा सोचो, क्या अँधेरा सूरज को निगल सकता है? क्या हवा बादल से डरती है? क्या अमृत को भी मौत आ सकती है? क्या सिंह पर कोई सियार झपट पड़ता है? और फिर वो कहते हैं, ऐसा कभी होता नहीं, पर आज तुमने इसे होते हुए दिखा दिया। ये डाँट नहीं है। ये एक प्रेम करने वाले की हैरानी है। जैसे कोई माँ अपने बेटे से कहे, "तू? तू ये कैसे कह रहा है? ये तेरी बात नहीं है।"

और यहाँ एक बात जो आज के पूरे सत्संग का धागा है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को नाम से पुकारा, "अर्जुन।" और जैसा नीलकण्ठ पढ़ते हैं, उस नाम में ही साफ़, उजले स्वभाव की याद है। किसी ने आपसे कभी कहा है, "तुम ऐसे नहीं हो"? जब कोई आपको आपकी सबसे कमज़ोर घड़ी में ये याद दिलाए कि आप कौन हैं, तो वो आपको नीचा नहीं दिखाता। वो आपको वो आईना देता है जो आप भूल चुके थे।

तो ये दो श्लोक हमें क्या दे गए? पहला, कि जब टूटने की घड़ी आती है, तो पहले उसका नाम लीजिए। वो निर्णय की कमी नहीं, वो धुँधलापन है। नाम लेने से ही आधा बोझ हट जाता है। दूसरा, कि जो सच्चा गुरु होता है, वो पहले आपके तर्कों से नहीं लड़ता। वो आपको देखता है। और तीसरा, जो अभी सामने नहीं आया है, मगर आने वाला है: श्रीकृष्ण ने सवाल पूछा है, और जवाब देने के लिए अर्जुन को अभी रुकना होगा।

पर अभी एक बात बाकी है। श्रीकृष्ण का अगला श्लोक पहले से कहीं तीखा है। उसमें एक ऐसा शब्द आता है जो सुनने में ही कठोर लगता है। क्या वो डाँट है? क्या श्रीकृष्ण अपने सबसे प्रिय मित्र को, उसके सबसे दुर्बल क्षण में, इस तरह कह सकते हैं? सुनिए, अगला श्लोक क्या कहता है।

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥ ३ ॥
गीता 2.3 — अर्थ पढ़ें ›
अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥ ४ ॥
गीता 2.4 — अर्थ पढ़ें ›

इन श्लोकों में उतरने से पहले आपसे एक छोटी-सी बात कहना चाहता हूँ। हम आज दूसरे अध्याय के बिल्कुल पहले पड़ाव पर हैं, और ये वो जगह है जहाँ बहुत-से लोग गीता को सुनते-सुनते सोचते हैं कि अर्जुन ही तो रो रहा है, श्रीकृष्ण डाँट रहे हैं, इसमें हमारे लिए क्या है। पर आधा सुना हुआ सच भ्रम बन जाता है। जो आदमी यहीं उठ जाएगा, वो ये जाने बिना चला जाएगा कि इस सत्संग के आख़िर में एक ऐसा श्लोक है जिसे गीता का असली दरवाज़ा कहा जाता है, और जो हम सबके काम का है, उन दिनों में भी जब हमारे पास कोई जवाब न बचा हो। तो अगर आप ये सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि ये यात्रा बीच में न टूटे। और आज का हिस्सा आख़िर तक सुनिए।

अब आइए, तीसरे श्लोक पर। "क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।"

यहाँ श्रीकृष्ण का पहला सीधा आदेश आता है, और वो एक ही शब्द में है: "उत्तिष्ठ", उठो। पहले अध्याय में उन्होंने कहा था, देख लो। अब, देख लेने के बाद, कहते हैं: उठो।

श्लोक का अर्थ बहुत सीधा है। हे पार्थ, कायरता को मत प्राप्त हो, ये तुम्हें शोभा नहीं देती। हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को छोड़कर उठो, हे परन्तप, हे शत्रुओं को तपाने वाले। "क्लैब्य" शब्द कठोर है। इसका मतलब वो अवस्था जिसमें ओज और तेज और धैर्य टूट गया हो। और पहली बार सुनने पर आपको भी लग सकता है कि श्रीकृष्ण यहाँ कड़वे हैं। पर रुकिए, देखिए कि वो किस नाम से बुला रहे हैं।

पहला नाम, "पार्थ।" पृथा का पुत्र। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि पृथा, यानी कुन्ती, ने देवताओं की कृपा से पुत्र पाए थे, और इस नाम में ही वीरता की याद है। यानी श्रीकृष्ण कहते हैं, तुम उस माँ के बेटे हो, जिसके बेटों के लिए कायरता बनी ही नहीं। और फिर दूसरा नाम: "परन्तप।" शत्रुओं को तपाने वाले। वो उसी आदमी को ये कह रहे हैं जो अभी रथ में आँसू भरकर बैठा है। एक आदमी को उसके सबसे कमज़ोर क्षण में उसके सबसे बड़े नाम से पुकारना, ये डाँट की भाषा नहीं है। ये याद दिलाने की भाषा है।

और मधुसूदन सरस्वती और नीलकण्ठ, दोनों यहाँ एक बात कहते हैं जो मुझे बहुत ठोस लगती है। वो कहते हैं कि "नैतत्त्वय्युपपद्यते", यानी "ये तुममें शोभा नहीं देता", इसके पीछे एक कारण है। अर्जुन वो है जिसने साक्षात् महेश्वर, यानी शिव से भी युद्ध किया। नीलकण्ठ उन्हें "महादेव के प्रतिद्वन्द्वी" कहते हैं। और ये कोई कवि की उपमा नहीं है। महाभारत के वन पर्व में ये कथा आती है। अर्जुन तपस्या कर रहे थे। शिव एक किरात का, यानी पहाड़ के शिकारी का रूप लेकर आए, साथ में देवी उमा और बहुत सारे गण। एक राक्षस सूअर बनकर अर्जुन को मारने आया, और अर्जुन और किरात दोनों के बाण एक ही पल उसे लगे। फिर शिकार पर झगड़ा हुआ। किरात पर उसके बाणों से कोई घाव नहीं हुआ, उसके अक्षय तरकश खाली हो गए, धनुष छिन गया, तलवार किरात के सिर पर टूट गई। अर्जुन पेड़ों, पत्थरों और मुक्कों से लड़ते रहे, जब तक कि किरात ने उन्हें अपनी पकड़ में कसकर बेहोश नहीं कर दिया। होश आने पर अर्जुन ने मिट्टी की वेदी पर शिव की पूजा की, और देखा कि वही माला उस किरात के गले में है। तब शिव प्रसन्न हुए, और अर्जुन को गाण्डीव और अक्षय तरकश वापस दिए। और उन्होंने कहा, "मनुष्यों में तुम्हारे बराबर कोई नहीं।"

सोचिए। जिस आदमी ने महादेव के सामने भी टिककर लड़ना सीखा, वो आज रथ पर बैठकर कह रहा है, मेरे हाथ काँप रहे हैं। तो श्रीकृष्ण की बात ये नहीं है कि तुम कमज़ोर हो। उनकी बात ये है कि तुम्हारी असली ताकत और इस घड़ी की कमज़ोरी में कोई मेल नहीं है, इसलिए मैं तुम्हें ये कहते हुए चकित हूँ।

अब दूसरा हिस्सा। "क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यम्।" हृदय की तुच्छ दुर्बलता। यहाँ नीलकण्ठ एक बहुत काम की बात पकड़ते हैं। वो कहते हैं कि ये दुर्बलता "हृदय से बनी हुई" है, शक्ति की कमी या साथियों की कमी से नहीं। यानी बल कम नहीं हुआ, सेना कम नहीं हुई, साथी कम नहीं हुए। अर्जुन के हाथ में गाण्डीव है, सारथि श्रीकृष्ण हैं, भाई साथ हैं। कमी कहीं बाहर नहीं है। जो कमी है, वो भीतर है, हृदय में। और इसी वजह से मधुसूदन सरस्वती इसे "क्षुद्र" यानी छोटी, तुच्छ कहते हैं। और छोटी इसलिए, वो कहते हैं, कि ये आसानी से हटाई जा सकती है, अगर विवेक से देखा जाए। छोटी कमज़ोरी वो है जो बाहर के हालात से नहीं आई। जो भीतर से आई है, वो भीतर से ही जाएगी।

और अब देखिए, श्रीकृष्ण ने क्या नहीं कहा। उन्होंने नहीं कहा कि तुम्हें दुख नहीं होना चाहिए। उन्होंने नहीं कहा कि अपनों के लिए मन पसीजना बुरा है। उन्होंने कहा "मा स्म गमः", यानी इसमें मत जाओ, इसे अपना घर मत बनाओ। आप जानते हैं, भावना का आना हमारे हाथ में नहीं है। डर आएगा, आँसू आएँगे, हाथ काँपेंगे। पहले श्लोक में हमने यही सुना था कि ये आए हुए मेहमान हैं। पर मेहमान को कहाँ तक बैठाना है, ये हमारे हाथ में है। श्रीकृष्ण वही कहते हैं: आने दो, पर इसके साथ चल मत पड़ो।

मैं अपना ख़याल कहता हूँ, गीता का नहीं। ऑपरेशन के बाद पहली बार बिस्तर से उठते आदमी के हाथ में नर्स चुपचाप हाथ थामकर बस कहती है, "उठिए, मैं यहीं हूँ।" "उत्तिष्ठ" ऐसा ही शब्द है। इसमें दलील नहीं, भरोसा है कि उठना तुम्हारे बस में है।

अब चौथा श्लोक। और यहाँ अर्जुन पहली बार श्रीकृष्ण को जवाब देता है। "कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।"

हे मधुसूदन, मैं युद्ध में भीष्म और द्रोण से बाणों से कैसे लड़ूँगा? हे अरिसूदन, वे तो पूजा के योग्य हैं।

एक बारीकी पकड़िए। श्रीकृष्ण ने पूछा था: "कुतः?" कहाँ से? यानी ये धुँधलापन आया कहाँ से, कारण क्या है। और अर्जुन उत्तर देता है: "कथम्?" कैसे? श्रीकृष्ण ने पूछा कारण, अर्जुन ने रखी समस्या। उसने कारण बताया ही नहीं। उसने सवाल बदल दिया।

और टीकाकार यहाँ एक बहुत सच्ची बात देखते हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि अर्जुन यहाँ ये जताना चाहता है कि मैं कायरता की वजह से युद्ध से नहीं हट रहा, बल्कि इसलिए कि ये युद्ध ही अन्यायपूर्ण है। और मधुसूदन सरस्वती भी यही पकड़ते हैं: अर्जुन ये मानने को तैयार नहीं कि ये शोक और मोह की वजह से अपने कर्तव्य का त्याग है। वो कहता है, नहीं, मैं ये धर्म की वजह से छोड़ रहा हूँ। ये हम सब करते हैं। जब हमारे भीतर डर होता है, हम उसे डर नहीं कहते, हम उसे "सिद्धान्त" का नाम देते हैं। "मैं इसलिए नहीं जा रहा कि मुझे घबराहट है, मैं इसलिए नहीं जा रहा कि वहाँ जाना ठीक नहीं।" "मैं इसलिए बात नहीं कर रहा कि मुझे चोट लगी है, मैं इसलिए नहीं कर रहा कि मेरा स्वाभिमान भी कोई चीज़ है।" और ये बातें झूठी नहीं होतीं, उनमें सच का एक अंश होता है। इसी वजह से इन्हें पहचानना मुश्किल है।

अब इस श्लोक के नामों पर चलिए: भीष्म और द्रोण। और यहाँ मैं आपको महाभारत के तीन दृश्य सुनाना चाहता हूँ, ताकि आप जान लें कि अर्जुन किसके सामने खड़ा है।

पहला, भीष्म। भीष्म पर्व में ही, युद्ध के नौवें दिन की रात, जब पाण्डवों की सेना भीष्म से टूट चुकी है, अर्जुन श्रीकृष्ण और भाइयों के साथ उनके डेरे में जाते हैं। और वहाँ से लौटते हुए, दुख से जलते हुए और लज्जा से भरे हुए, वो श्रीकृष्ण से कहते हैं: "माधव, मैं अपने पितामह से युद्ध में कैसे लड़ूँगा? बचपन में खेलते-खेलते अपने धूल से सने शरीर से मैं उनकी गोद को भी मैला कर देता था। मैं उनकी गोद में चढ़कर उन्हें 'पिताजी' कहता था। और बचपन में उन्होंने मुझसे कहा था, 'भारत, मैं तुम्हारा पिता नहीं, तुम्हारे पिता का पिता हूँ।'" और अर्जुन फिर कहता है, "मैं उन्हें कैसे मारूँ? चाहे मेरी सेना मारी जाए, मैं उनसे नहीं लड़ूँगा।" ये सब उसी नौवें दिन की रात की बात है। यानी आज का ये श्लोक, "कथं भीष्मम्", अर्जुन के भीतर नौ दिन बाद भी जीवित है। और उसी दृश्य में युधिष्ठिर भी कहते हैं कि भीष्म ने ही हमें पाला-पोसा, जब हम बच्चे थे और पिता नहीं रहे थे।

दूसरा दृश्य, द्रोण। आदि पर्व में जब द्रोण हस्तिनापुर आए, तो खुद भीष्म ने अपने पोतों को उन्हें शिष्य बनाकर सौंपा। और अर्जुन ने उस दिन द्रोण को वचन दिया कि गुरु जो काम आगे माँगेंगे, वो उसे पूरा करेंगे। तब द्रोण ने उसके सिर को बार-बार चूमा, उसे गले लगाया और खुशी के आँसू बहाए। अर्जुन ने उनके चरण पकड़कर कहा, "मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी कृपा से जीता हूँ।" और फिर वो दिन जब द्रोण ने उसे ब्रह्मशिर नाम का अस्त्र दिया और कहा कि इस संसार में तुम्हारे बराबर कोई धनुर्धर नहीं होगा।

और तीसरा दृश्य मुझे सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला लगता है। वही वन पर्व, जिसमें शिव से युद्ध की कथा है। जब शिव प्रसन्न हुए, तब उन्होंने अर्जुन से वर माँगने को कहा। और अर्जुन ने पाशुपत अस्त्र माँगा। क्यों माँगा, उसके अपने शब्द सुनिए: "क्योंकि कर्ण, भीष्म, कृप और द्रोण के साथ एक भारी युद्ध होने वाला है। हे महादेव, मुझे ये अस्त्र दीजिए, ताकि आपकी कृपा से मैं उन्हें युद्ध में जीत सकूँ।" यानी बरसों पहले, एक पर्वत पर, अर्जुन खुद भगवान शिव से यही माँग रहा था कि मुझे भीष्म और द्रोण से लड़ने की शक्ति दीजिए। और आज, उसी युद्ध के सामने, वही अर्जुन पूछ रहा है: "कैसे?"

मुझे इसमें कुछ बहुत मानवीय लगता है। जंगल में बैठकर योजना बनाना एक बात है। और जब वो सामने आ खड़े हों जिनके साथ आपका बचपन गुज़रा है, तब वही योजना दूसरी बात बन जाती है। आप भी जानते होंगे। कोई नौकरी में अपने उस बड़े के सामने बैठा है जिसने उसे सिखाया, और अब उसे उसी के ख़िलाफ़ एक रिपोर्ट देनी है। कोई बेटी अपने पिता के सामने खड़ी है जिसे उनके ही किसी फ़ैसले को ना कहना है। काग़ज़ पर सब साफ़ होता है। चेहरा सामने आते ही सब धुँधला हो जाता है। अर्जुन के लिए रथ वहीं खड़ा है जहाँ श्रीकृष्ण ने उसे खड़ा किया था: भीष्म और द्रोण के ठीक सामने। उन्होंने ख़ुद कहा था, "देख लो।" और उसने देखा।

अब "पूजार्हौ", पूजा के योग्य। यहाँ श्रीधर स्वामी बड़ी सीधी बात कहते हैं कि जिनसे बात से भी लड़ना ठीक नहीं, उनसे बाणों से कैसे लड़ें। और मधुसूदन सरस्वती इसे और आगे ले जाते हैं: जो पूजा के योग्य हों, उनके साथ खेल-खेल में भी, हँसी में भी, लड़ाई करना अनुचित है, तो फिर युद्ध की भूमि में बाणों से प्राण ले लेना कैसे हो! और दो नाम देखिए। अर्जुन ने श्रीकृष्ण को पुकारा, "मधुसूदन" और "अरिसूदन", यानी दुष्टों को और शत्रुओं को मारने वाले। मधुसूदन सरस्वती इस पर कहते हैं कि दोनों संबोधन एक ही अर्थ के हैं, पर शोक में व्याकुल आदमी बात दोहराता है, इसलिए ये दोहराव कोई दोष नहीं। और नीलकण्ठ इसमें एक सुंदर बात निकालते हैं। वो कहते हैं, अर्जुन के कहने का भाव ये है कि आप तो दुष्टों और शत्रुओं को ही मारते हैं। और भीष्म और द्रोण दुष्ट नहीं, पूजनीय हैं। ऐसे में आप ही मुझसे उन्हें मारने को कैसे कहेंगे?

मैं इन दोनों श्लोकों को ऐसे सुनता हूँ। श्रीकृष्ण ने उसे उसकी असली ताकत याद दिलाई। अर्जुन ने अपनी असली उलझन बताई। और ध्यान दीजिए, दोनों ने एक-दूसरे का अनादर नहीं किया। एक ने कहा तुम बड़े हो, और दूसरे ने कहा मेरे बड़े मुझसे बड़े हैं। और यही बात आगे बढ़ेगी, क्योंकि अर्जुन यहीं नहीं रुकता। अगला श्लोक उसकी सबसे तीखी दलील है।

पर अभी एक बात बाकी है। अर्जुन कहने जा रहा है कि इन गुरुओं को मारकर राज्य पाने से तो भीख माँगकर जीना अच्छा। और उस श्लोक के नीचे दो बड़े टीकाकार एक ऐसा वाक्य उतारते हैं जो खुद भीष्म ने कहा था, और जिसे सुनकर शायद आप चौंक जाएँ। वो वाक्य क्या था, और भीष्म ने किससे कहा था, ये हम अगले श्लोकों में सुनेंगे।

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ५ ॥
गीता 2.5 — अर्थ पढ़ें ›
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥
गीता 2.6 — अर्थ पढ़ें ›

"गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।" इन महान गुरुजनों को न मारकर इस संसार में भीख का अन्न खाना भी अच्छा है। "हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्।" और अगर मैं इन गुरुओं को मारूँ, तो यहाँ जो भी भोग भोगूँगा, वो रक्त से सने होंगे।

ये अर्जुन का सबसे तीखा वाक्य है, और इसमें एक शब्द है जिस पर रुकना चाहिए: "अर्थकामान्"। हमारी टीका बताती है कि इसके दो अर्थ पढ़े जाते हैं। एक, कि ये गुरुजन दुर्योधन की सेवा में बैठे हैं, इसलिए "धन चाहने वाले" हैं। और दूसरा, कि ये "हित चाहने वाले" हैं। दोनों तरह अर्जुन का आशय एक ही है: उनकी मृत्यु से मिला कुछ भी भोगने योग्य नहीं होगा।

अब यहाँ टीकाकारों की एक बातचीत सुनिए, जो मुझे बहुत दिलचस्प लगती है। नीलकण्ठ इस श्लोक के नीचे एक आपत्ति उठाते हैं, जैसे कोई श्रोता पूछ रहा हो: "अर्जुन, अगर गुरुओं को छोड़कर सिर्फ़ दुर्योधन जैसे दुष्टों को मारो तो?" और वो ही उत्तर देते हैं: "धन की इच्छा रखने वाले ये गुरु दुर्योधन की सहायता तो ज़रूर करेंगे, इसलिए इनका वध तो फिर भी हो ही जाएगा।" यानी अर्जुन कह रहा है कि मैं चाहूँ या न चाहूँ, ये लोग मेरे सामने खड़े रहेंगे, क्योंकि इन्होंने दुर्योधन का नमक खाया है।

और श्रीधर स्वामी इसी बात के सहारे एक वाक्य उतारते हैं, जो खुद भीष्म ने कहा था। वो लिखते हैं कि भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा था: "मनुष्य धन का दास है, धन किसी का दास नहीं। हे महाराज, यही सच है। कौरवों ने मुझे धन से बाँध रखा है।" और मधुसूदन सरस्वती भी यही वाक्य उतारते हैं। सोचिए, दो-दो बड़े टीकाकार अर्जुन के श्लोक को समझाने के लिए भीष्म का वो वाक्य याद करते हैं। तो ज़रूर वो कुछ बड़ा रहा होगा। चलिए, उसे हम महाभारत में ही देखें।

ये दृश्य भीष्म पर्व में ही है, और गीता के ठीक बाद का है। दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं, युद्ध अब छिड़ने ही वाला है। और तभी युधिष्ठिर अपना कवच उतार देते हैं, शस्त्र रख देते हैं, रथ से उतरते हैं, और हाथ जोड़े, चुपचाप, पैदल शत्रु की सेना की ओर चल पड़ते हैं। अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव, सब चिन्ता से पूछते हैं कि आप कहाँ जा रहे हैं। तब श्रीकृष्ण, मानो मुस्कुराते हुए, कहते हैं कि मैं इनका इरादा समझ गया: राजा अपने बड़ों से, भीष्म, द्रोण, कृप और शल्य से, अनुमति लेने जा रहे हैं। शास्त्र कहता है कि जो बड़ों की अनुमति लेकर लड़ता है, उसकी जीत निश्चित है। उधर कौरव सेना के सैनिक युधिष्ठिर को देखकर हँसते हैं, उन्हें कुल का कलङ्क कहते हैं, कहते हैं ये डरकर भीष्म की शरण माँगने आया है। और वो खुशी में अपने वस्त्र लहराते हैं।

युधिष्ठिर भीष्म के चरण पकड़ते हैं और कहते हैं, "हे अजेय, मैं आपसे अनुमति माँगता हूँ। हम आपके साथ युद्ध करेंगे। तात, मुझे अनुमति दीजिए और आशीर्वाद दीजिए।" भीष्म कहते हैं, "यदि तुम युद्ध से पहले इस तरह मेरे पास न आते, तो मैं तुम्हें हार का शाप दे देता। पुत्र, मैं प्रसन्न हूँ। युद्ध करो और विजय पाओ।" और फिर वही वाक्य: "मनुष्य धन का दास है, धन किसी का दास नहीं। कौरवों ने मुझे धन से बाँध रखा है। इसलिए मैं तुमसे कमज़ोर की तरह बात करता हूँ। युद्ध के सिवा तुम और क्या चाहते हो?"

ध्यान दीजिए, इसमें कितना कुछ है। भीष्म खुद कह रहे हैं कि मैं बँधा हुआ हूँ, मैं उनकी तरफ़ से लड़ूँगा, मैं आज़ाद नहीं हूँ। पर इसी साँस में वो कह रहे हैं, पुत्र, मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारी जीत हो। और जब युधिष्ठिर उनसे कहते हैं कि आपको जीतने का उपाय क्या है, तो भीष्म कहते हैं, "मैं ऐसा कोई पुरुष नहीं देखता जो युद्ध में लड़ते हुए मुझे जीत सके, स्वयं इन्द्र भी नहीं। और अभी मेरी मृत्यु का समय भी नहीं आया। फिर कभी आना।"

फिर द्रोण के पास वही दृश्य, वही चरण-वंदना, वही शाप की बात। और द्रोण भी वही वाक्य दोहराते हैं: "मनुष्य धन का दास है, धन किसी का दास नहीं। कौरवों ने मुझे धन से बाँध रखा है।" और फिर जोड़ते हैं, "मैं कौरव के लिए युद्ध करूँगा, पर तुम्हारी विजय की कामना करूँगा। हे राजन्, तुम्हारी विजय निश्चित है, क्योंकि हरि तुम्हारे मन्त्री हैं। जहाँ धर्म है, वहाँ कृष्ण हैं। जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ विजय है।" फिर कृप के पास, फिर शल्य के पास। और कृप भी वही पंक्ति कहते हैं, और शल्य भी।

अब आप इसे अर्जुन के श्लोक के पास रखकर देखिए। अर्जुन कहता है "अर्थकामान् गुरून्", ये गुरुजन धन से बँधे हैं। और स्वयं भीष्म, द्रोण, कृप और शल्य, चारों, अपने मुँह से यही कहते हैं। अर्जुन ने कोई भ्रम नहीं पाला था, कोई आरोप नहीं लगाया था। जो बात वो कह रहा था, वो इन गुरुओं की अपनी स्वीकारोक्ति थी। और फिर भी, यही बात देखिए, अर्जुन के लिए ये तर्क बन जाता है कि मुझे मारने पड़ेंगे, और यही बात गुरुओं के लिए ये बनती है कि मैं उसे आशीर्वाद दे सकता हूँ जिसके सामने मुझे लड़ना है। एक ही तथ्य, दो मन, दो परिणाम।

अब ये जीवन में कैसे उतरता है। मान लीजिए आप किसी ऐसे पद पर आए हैं जो आपके पुराने गुरु या मालिक की जगह लेकर मिला है। या कोई ऐसी जीत है जो किसी ऐसे को पीछे धकेलकर मिलती है जिसने आपको उँगली पकड़कर चलना सिखाया। वो जीत बाहर से बहुत चमकदार हो सकती है। पर अर्जुन के शब्दों में, उसके भोग "रक्त से सने" हैं। और मधुसूदन सरस्वती इसमें एक सुंदर बात जोड़ते हैं: वो कहते हैं कि अर्जुन का मतलब ये है कि जब इस लोक में ही ये भोग अपयश से लिपटे होंगे, तो अगले लोक के दुख की तो बात ही क्या। कुछ जीतें ऐसी होती हैं जिन्हें हासिल करने के बाद हम उन्हें सँभाल नहीं पाते।

और अब छठा श्लोक। और यहाँ मैं आपसे एक बहुत ज़रूरी बात कहना चाहता हूँ। "न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः। यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः।"

हम ये भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या अच्छा है: हम जीतें, या वे हमें जीतें। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहेंगे, वही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने खड़े हैं।

"न चैतद्विद्मः।" हम ये भी नहीं जानते। आप ध्यान दीजिए। अर्जुन ने पूरे पहले अध्याय में कितनी बार कहा था, "मैं देखता हूँ", "ये अनुचित है", "मुझे कोई कल्याण नहीं दिखता", "कुल का नाश होगा"। उसकी भाषा में दृढ़ता थी, फ़ैसला था। और अब एक वाक्य आता है जो साफ़ मानता है कि जानकारी कम पड़ गई: "हम नहीं जानते।" ये वाक्य ज़्यादा ध्यान नहीं खींचता, क्योंकि ये दलील की शक्ल में आता है। पर इसमें एक चीज़ बदल गई है। इससे पहले अर्जुन समझा रहा था। अब वो कबूल कर रहा है।

और ये एक ही श्लोक में तीन उलझनें हैं। श्रीधर स्वामी और मधुसूदन सरस्वती इन्हें खोलते हैं। पहली: दोनों में से कौन बेहतर है, भिक्षा या युद्ध? भिक्षा में हिंसा नहीं, पर क्षत्रिय के लिए भिक्षा विहित नहीं। युद्ध क्षत्रिय का स्वधर्म है, पर उसमें अपनों का वध है। दूसरी: अगर युद्ध करें भी तो जीतेंगे या हारेंगे, ये भी नहीं पता। और तीसरी, सबसे गहरी: जीत भी जाएँ तो वो जीत नहीं रहेगी, क्योंकि जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहेंगे, वही सामने खड़े हैं। श्रीधर स्वामी कहते हैं कि इस तरह जीत भी फल में हार ही है।

और यहाँ तिलक, जिन्होंने गीता-रहस्य लिखा, एक बारीक बात देखते हैं। वो कहते हैं कि "गरीयः" शब्द, यानी "अधिक भारी, अधिक अच्छा", से पता चलता है कि अर्जुन के मन में कर्म और अकर्म की तुलना करने का एक पैमाना था: जिसमें अधिक लोगों का अधिक भला हो। पर वो उस पैमाने से ये तय नहीं कर पा रहा था कि इस हालत में किसकी जीत में भलाई है। यानी अर्जुन के पास पैमाना है, पर वो अपनी हद तक पहुँच चुका है। उसका नाप-तौल का औज़ार इस घड़ी बेकार है।

और सुनिए, मधुसूदन सरस्वती इस पूरे हिस्से पर क्या कहते हैं। वो कहते हैं कि पहले अध्याय में अर्जुन ने जो कुछ कहा, वो ऊपर से भले ही उलझन दिखे, पर उसमें चुपचाप उस इंसान के लक्षण गिनाए जा रहे थे जो सीखने के लिए तैयार हो। उसे इस लोक में विजय और राज्य की कोई चाह नहीं बची। परलोक के फल की भी नहीं। लोभ नहीं बचा, और सब सह लेने की तैयारी है। मैं इसे ऐसे सुनता हूँ कि जब तक इंसान को अपनी पूरी समझ पर भरोसा होता है, वो किसी से पूछता नहीं। पूछना तभी आता है जब वो अपनी समझ की सीमा तक पहुँच जाए, और ईमानदारी से कहे: हम ये भी नहीं जानते।

और आज की हमारी ज़िंदगी में ये कितना कम सुनाई देता है। दफ़्तर में कोई सवाल पूछे, और हम जवाब न जानते हुए भी कुछ बोल देते हैं। घर में बच्चा पूछे, और हम कुछ भी कह देते हैं। अस्पताल के बाहर जब परिवार वाले डॉक्टर से पूछते हैं, "क्या आप निश्चित हैं?", तो सबसे अच्छा डॉक्टर वही होता है जो कहता है, "मैं पक्का नहीं कह सकता, पर ये रास्ता हमारे पास है।" "मैं नहीं जानता" कहना कमज़ोरी नहीं है। ये वो पहली ईंट है जिस पर आगे सब कुछ टिकता है। और अर्जुन के लिए ये ईंट इसी श्लोक में रखी गई।

पर आप ये न समझ लीजिए कि वो इस ईंट पर टिका है। नहीं। इसी श्लोक में वो फिर वही बात दोहरा रहा है: "जिन्हें मारकर हम जीना नहीं चाहेंगे, वही सामने खड़े हैं।" धृतराष्ट्र के कान में ये शब्द "धार्तराष्ट्राः" कैसे गिरे होंगे, सोचिए। अपने ही बेटों का नाम, अर्जुन के मुँह से, इस तरह कि "इन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहेंगे।" एक पिता के लिए इसमें आशा भी है और चुभन भी। मधुसूदन सरस्वती इसी "धार्तराष्ट्र" शब्द में भीष्म, द्रोण और बाकी सबको गिनते हैं, जो धृतराष्ट्र से जुड़े हैं। यानी अर्जुन को अपने सामने सिर्फ़ दुर्योधन के भाई नहीं दिखते। उसे वो पूरी पीढ़ी दिखती है।

और यही वो जगह है जहाँ से गीता का असली दरवाज़ा खुलता है। अर्जुन अगले श्लोक में कुछ ऐसा कहने वाला है जो उसने पूरे अध्याय में अब तक नहीं कहा था।

पर अभी एक बात बाकी है। उस श्लोक के कुछ शब्द पूरी गीता का रुख़ बदल देंगे। एक शब्द जो गीता में अर्जुन ने अब तक अपने लिए नहीं कहा था, एक रिश्ता जिसे उसने अब तक नाम नहीं दिया था। वो क्या है, सुनिए।

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७ ॥
गीता 2.7 — अर्थ पढ़ें ›
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥
गीता 2.8 — अर्थ पढ़ें ›

यही वो श्लोक है। अगर आप इस पूरे सत्संग में से बस एक श्लोक अपने साथ ले जाएँ, तो ये। इसे हम धीरे-धीरे, एक-एक पंक्ति करके सुनेंगे।

"कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः।" दीनता के दोष ने मेरे स्वभाव को दबा दिया है।

एक बात देखिए। तीन श्लोक पहले, चौथे श्लोक में, अर्जुन ने अपनी हालत को "सिद्धान्त" का नाम दिया था: मैं इसलिए नहीं लड़ूँगा कि ये धर्म नहीं है। और अब वही अर्जुन अपनी हालत को एक ऐसा नाम दे रहा है जो उसे अच्छा नहीं लगता: "दोष"। "कार्पण्यदोष", यानी दीनता की ख़राबी। श्रीकृष्ण ने दूसरे श्लोक में इसे "कश्मल" कहा था। और अब अर्जुन खुद इसे "दोष" कह रहा है। जो बात किसी दूसरे के कहने से बुरी लगती है, वही बात जब हम खुद अपने बारे में कहते हैं, तब वो इलाज की शुरुआत होती है।

और "कार्पण्य" शब्द में मधुसूदन सरस्वती एक बहुत गहरी परत खोलते हैं। वो कहते हैं, दुनिया में कृपण उसे कहते हैं जो थोड़े से धन की हानि भी सहन नहीं कर सकता। और उपनिषद में लिखा है कि जो इस अविनाशी को जाने बिना इस लोक से चला जाता है, वही कृपण है। यानी जो खुद को नहीं जानता, वो चाहे कितना ही बड़ा राजा हो, कृपण है, क्योंकि वो हर चीज़ को पकड़कर बैठा है। और यहाँ वो पकड़, वो कार्पण्य, अर्जुन के लिए क्या है? मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, ये भाव: "ये सब मेरे हैं, इनके मर जाने पर जीने का क्या फ़ायदा"। यही ममता है, और इसी ने अर्जुन के क्षत्रिय-स्वभाव को, उसके युद्ध के उत्साह को, दबा लिया है। श्रीधर स्वामी इसे ऐसे कहते हैं कि अपने कुल के नाश के भय और दीनता ने अर्जुन का वीर स्वभाव ढक दिया।

अगली पंक्ति: "पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।" मैं आपसे पूछता हूँ, मेरा चित्त धर्म के विषय में मोहित है।

"पृच्छामि।" मैं पूछता हूँ। अब तक अर्जुन समझा रहा था, तर्क दे रहा था, फ़ैसले सुना रहा था। और अब वो कहता है, मैं पूछता हूँ। और "धर्मसम्मूढचेताः", धर्म के बारे में जिसका चित्त मूढ़ हो गया है। मधुसूदन सरस्वती इसे खोलते हैं कि अर्जुन के मन में कई सवाल एक साथ चल रहे हैं। क्या इनका वध धर्म है? या इनकी रक्षा धर्म है? क्या धरती का पालन धर्म है, या जंगल में रहना ही धर्म है? श्रीधर स्वामी भी यही पकड़ते हैं कि अर्जुन को शक है कि युद्ध छोड़कर भीख माँगना क्षत्रिय का धर्म है या अधर्म।

और अब तीसरी पंक्ति, जो मुझे सबसे ज़्यादा काम की लगती है: "यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे।" जो निश्चित रूप से मेरे लिए कल्याणकारी हो, वो मुझे बताइए।

"निश्चितम्।" ज़रा सोचिए, अर्जुन ने ये नहीं कहा, "दोनों में से कौन-सा बेहतर है, बता दीजिए।" वो पहले यही पूछ रहा था: भीख या युद्ध, जीत या हार। अब उसने सवाल ही बदल दिया। वो कह रहा है: जो निश्चित रूप से श्रेय हो, वो बताइए। और यहाँ मधुसूदन सरस्वती "निश्चित" के दो अर्थ खोलते हैं, जो मैं चाहता हूँ कि आप सुनें। वो कहते हैं: निश्चित का मतलब है ऐकान्तिक, यानी जो साधन करने के बाद ज़रूर मिले। और आत्यन्तिक, यानी जो एक बार मिले तो फिर खोए नहीं। वो उदाहरण भी देते हैं। जैसे दवा लेने पर कभी रोग न भी मिटे, या मिटकर फिर लौट आए, तो वो ऐकान्तिक और आत्यन्तिक इलाज नहीं हुआ। वैसे ही यज्ञ करने पर स्वर्ग न भी मिले, और मिल भी जाए तो पुण्य चुकते ही छिन जाता है। यानी अर्जुन कह रहा है: मुझे वो बताइए जो लौटकर न जाए। मुझे वो कल्याण चाहिए जो हार-जीत से परे है।

आप सोचिए, हम अपनी ज़िंदगी में कितनी बार ये सवाल पूछ पाते हैं। हम पूछते हैं, "इन दो नौकरियों में कौन-सी बेहतर है?" और बहुत कम पूछते हैं, "मेरे लिए सचमुच क्या भला है?" पहला सवाल दो विकल्पों के बीच उलझा रहता है। दूसरा सवाल पूरी बिसात को ही बदल देता है।

और फिर वो पंक्ति, जिसके बारे में मैंने पहले कहा था: "शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।" मैं आपका शिष्य हूँ। आपकी शरण में आए मुझको शिक्षा दीजिए।

ये रिश्ता नया है। सोचिए, अर्जुन और श्रीकृष्ण का साथ कितना पुराना है। खाण्डव वन के बाद जब इन्द्र वर दे रहे थे, तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन के साथ सदा की मित्रता ही माँगी थी। और महाभारत के उद्योग पर्व में एक दृश्य है: दुर्योधन और अर्जुन दोनों द्वारका पहुँचते हैं। श्रीकृष्ण सोए हुए हैं। और जब वो जागते हैं, तब कहते हैं कि एक ओर मैं अकेला हूँ, बिना शस्त्र उठाए, और दूसरी ओर दस करोड़ ग्वालों की मेरी सेना, जो नारायण कहलाती है। और फिर कहते हैं, "या तो सहायता के लिए उन्हें चुनो, या सलाहकार के रूप में मुझे।" और अर्जुन ने चुना: उन्हीं को, शस्त्र-रहित श्रीकृष्ण को, सलाहकार के रूप में। सोचिए। अर्जुन ने सलाहकार चुना था। और आज, वही सलाहकार रथ पर उसके पास बैठा है, और अर्जुन उसे पहली बार वो काम देता है जिसके लिए उसे चुना गया था: सलाह।

और मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक बहुत सुंदर आपत्ति उठाते हैं, और उसका उत्तर भी देते हैं। आपत्ति ये: "अर्जुन, तुम तो श्रीकृष्ण के मित्र हो, शिष्य कब से हो गए?" और उत्तर: "शिष्यस्तेऽहम्", मैं आपका शिष्य हूँ, मित्र नहीं, क्योंकि आपके अनुशासन में रहने की योग्यता तभी है जब मेरा ज्ञान कम हो। इसलिए मैं आपका शिष्य ही हूँ, सखा नहीं। और "शाधि", शिक्षा दीजिए, करुणा से, ये सोचकर कि अर्जुन शिष्य नहीं है, ऐसा मानकर मुझे अनदेखा मत कीजिए। यानी अर्जुन अपना रिश्ता बदल रहा है। वो अब बराबरी की जगह से नहीं बोल रहा। वो झुककर पूछ रहा है।

और ये परंपरा पुरानी है, मधुसूदन सरस्वती इसके लिए उपनिषद का वाक्य देते हैं: उसे जानने के लिए वो हाथ में समिधा लेकर, श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास ही जाए। और भृगु के बारे में कहते हैं कि वो अपने पिता वरुण के पास गए और बोले, "भगवन्, मुझे ब्रह्म का उपदेश दीजिए।" यहाँ भी वही रचना है: जो पूछता है वो झुककर पूछता है, और जिससे पूछा जाता है वो उसके पास पहले से सब नहीं बाँट देता, वो पूछे जाने का इंतज़ार करता है।

और यही बात हमारी अपनी टीका बहुत सुंदरता से कहती है। मैं इसे आपके सामने पढ़ता हूँ, क्योंकि ये पूरे सत्संग की चाबी है। "यह मोड़ है। अब तक अर्जुन बराबरी से तर्क कर रहे थे। अब वे अपना मोह स्वीकार करके शिक्षा माँगते हैं। बिना माँगे दिया उपदेश जड़ नहीं पकड़ता, इसलिए असली गीता इसी शरणागति के बाद आरम्भ होती है।" सोचिए, कितनी बड़ी बात है। श्रीकृष्ण के पास सारा ज्ञान पहले से था। वो पहले श्लोक में ही उपदेश शुरू कर सकते थे। पर उन्होंने इंतज़ार किया। क्योंकि वो जानते थे कि जो बात बिना माँगे दी जाती है, वो सुनने वाले के भीतर टिकती नहीं। उसके लिए ज़मीन तैयार चाहिए, और वो ज़मीन "मैं नहीं जानता" से तैयार होती है।

एक बात और, जो मुझे यहाँ बहुत मानवीय लगती है। जब हम किसी उलझन में होते हैं, तो हम किसी एक से नहीं पूछते। हम दस लोगों की राय इकट्ठा करते हैं। रात को दो बजे फ़ोन उठाते हैं, किसी का नंबर देखते हैं, फिर रख देते हैं। इंटरनेट पर पढ़ते हैं। दोस्तों से पूछते हैं। और हर राय के साथ हमारी उलझन और बड़ी हो जाती है, क्योंकि राय माँगना एक बात है, और अपने को किसी को सौंपकर पूछना दूसरी। अर्जुन ने यहाँ राय नहीं माँगी। उसने कहा, "मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे शिक्षा दीजिए।" और ध्यान दीजिए, उसने उससे पूछा जो उलझन के बाहर खड़ा था। भीष्म और द्रोण उलझन के भीतर थे, क्योंकि वो उसकी उलझन का हिस्सा थे। श्रीकृष्ण रथ में उसके साथ बैठे थे, पर उस उलझन के बाहर।

और ये भी याद रखिए कि शिष्य बनने का मतलब चुप हो जाना नहीं है। आगे गीता में अर्जुन बार-बार सवाल पूछेगा: स्थितप्रज्ञ कौन है, कर्म से बड़ी बुद्धि क्यों कही, और भी बहुत। शरण में आने वाला शिष्य सवाल पूछना नहीं छोड़ता। वो बस सवाल इस भरोसे से पूछता है कि जिससे पूछ रहा है, वो उसका भला चाहता है।

और जो आप एक बार और देखना चाहें, वन पर्व में यही शब्द अर्जुन के मुँह से पहले भी निकल चुका है। जब वो शिव से लड़ चुका, और उसे समझ आया कि वो किसके सामने खड़ा है, तब वो उनके चरणों पर गिरकर कहता है: "मैंने ये युद्ध अनजाने में किया। मैं आपकी शरण में आया हूँ। हे शंकर, क्षमा कीजिए।" और शिव क्या करते हैं? मूल पाठ कहता है कि वो हँसते हुए, "प्रहसन्", उसकी बाँह पकड़कर कहते हैं, "क्षमा किया।" ये पहली बार नहीं कि अर्जुन किसी की शरण में गया हो। और जैसा हम बस थोड़ी देर में दसवें श्लोक में देखेंगे, इस बार भी जो उसे मिलेगा, वो एक हँसी में लिपटा हुआ मिलेगा।

अब आठवाँ श्लोक। "न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्।"

मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखता जो इन्द्रियों को सुखा देने वाले मेरे इस शोक को दूर कर सके, चाहे पृथ्वी पर बिना किसी शत्रु वाला समृद्ध राज्य मिल जाए, या देवताओं का स्वामित्व भी।

"इन्द्रियाणाम् उच्छोषणम्", इन्द्रियों को सुखा देने वाला। ये शब्द ध्यान से सुनिए। शोक सिर्फ़ मन में नहीं होता। वो शरीर में उतर आता है। भूख मर जाती है, स्वाद चला जाता है, नींद नहीं आती, आँखें सूख जाती हैं। जिसने कभी ऐसा दुख सहा है, वो जानता है कि ये शब्द कितना सच्चा है।

और यहाँ अर्जुन एक अजीब बात कहता है। वो कहता है कि पृथ्वी पर निष्कण्टक राज्य, यहाँ तक कि स्वर्ग का राज्य भी मिल जाए, तब भी मेरा ये शोक नहीं जाएगा। मधुसूदन सरस्वती इसकी बड़ी सुंदर व्याख्या करते हैं। वो कहते हैं कि जो भी कर्म से कमाया जाता है, वो नश्वर है, और यही बात उपनिषद भी कहती है। जैसे यहाँ कर्म से जीता हुआ लोक क्षीण हो जाता है, वैसे ही पुण्य से जीता हुआ अगला लोक भी क्षीण हो जाता है। और इस लोक के भोग, जब तक वो होते हैं तब तक पराधीन करते हैं, और जब वो छूटते हैं, तब बिछोह का शोक देते हैं। इसलिए अर्जुन कहता है: इन चीज़ों से मेरा शोक नहीं मिटेगा।

और वो आगे जोड़ते हैं कि अर्जुन के इन्हीं शब्दों में उपनिषद की वही पुकार है जो नारद ने सनत्कुमार से की थी: "भगवन्, मैं शोक करता हूँ। आप मुझे शोक के पार ले जाइए।" हज़ारों साल पहले का एक ऋषि, और रथ पर बैठा एक योद्धा, दोनों एक ही बात कह रहे हैं।

और संत ज्ञानेश्वर यहाँ एक ऐसी उपमा देते हैं जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। वो कहते हैं कि जैसे बीज जल गए हों, तो अच्छी से अच्छी ज़मीन में बोने पर भी नहीं उगते। या जैसे आयु पूरी हो गई हो, तब दवाएँ कुछ नहीं कर पातीं, और केवल अमृत काम आता है। वैसे ही राज्य और भोग की समृद्धि इस जले हुए मन को फिर से हरा नहीं कर सकती। और आगे वो श्रीकृष्ण को एक बादल के रूप में देखते हैं: साँवला, कृपा के जल से भरा हुआ, सुदर्शन चक्र की चमक बिजली जैसी, गहरी आवाज़ गर्जन जैसी। और अर्जुन, गर्मी में जला हुआ पर्वत। वो कहते हैं, अब ये बादल बरसेगा, और उस पर्वत पर नई हरियाली फूटेगी।

आपने कभी वो चीज़ पाई है जो बरसों से चाही थी? और पहली रात, आराम से लेटकर, मन में एक आवाज़ उठी हो: पर वो जो भीतर की चुभन थी, वो तो अब भी वहीं है? अर्जुन यही कह रहा है, बहुत ईमानदारी से। वो कह रहा है कि मैंने सारी चीज़ें गिन ली हैं, जो कुछ मुझे मिल सकता है, और उनमें से किसी से भी मेरी ये चुभन नहीं मिटेगी। ये निराशा नहीं है। ये एक तरह की पहचान है। जब कोई इंसान ये पहचान लेता है कि बाहर की कोई चीज़ इस दुख को नहीं भर सकती, तब वो पहली बार भीतर देखने के लिए तैयार होता है।

जब समझ जवाब दे दे, तो एक ही रास्ता बचता है: किसी ऐसे के पास जाना, जो उस समझ से परे देख सके।

पर अभी एक बात बाकी है। अर्जुन ने सब कुछ कह दिया, और फिर वो जो करता है, वो अब तक का सबसे चौंकाने वाला काम है। वो एक वाक्य कहता है, "मैं नहीं लड़ूँगा", और फिर चुप हो जाता है। और उस चुप्पी में गीता का सबसे बड़ा रहस्य छुपा है। सुनिए।

सञ्जय उवाच एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप । न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥
गीता 2.9 — अर्थ पढ़ें ›
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ १० ॥
गीता 2.10 — अर्थ पढ़ें ›

"एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप। न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।" यहाँ सञ्जय बोल रहे हैं, धृतराष्ट्र से। कृष्ण से ऐसा कहकर, "मैं नहीं लड़ूँगा", अर्जुन चुप हो गए।

अर्जुन को यहाँ "गुडाकेश" कहा गया है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं, इसका अर्थ है जिसने आलस्य और नींद को जीत लिया हो। और हमारी टीका इसमें एक सुंदर बात जोड़ती है: निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अब मोह की गहरी नींद में हैं। जिसने रातें जीत ली थीं, वो अब दिन के उजाले में सोया हुआ है। और श्रीकृष्ण के लिए सञ्जय "हृषीकेश" और "गोविन्द" कहते हैं, जो सब इन्द्रियों को चलाने वाले हैं, जो सब वाणी को जानने वाले हैं। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि इन नामों में ही संकेत है कि जिसके सामने ये उलझन रखी गई है, उसके लिए इसे मिटाना कठिन नहीं।

फिर वो आता है: "न योत्स्ये।" मैं नहीं लड़ूँगा। और उसके बाद: "तूष्णीं बभूव ह।" चुप हो गया। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि अर्जुन की बाहरी इन्द्रियों का वो व्यापार, जो युद्ध के लिए पहले चल रहा था, रुक गया। वो निर्व्यापार हो गया।

सोचिए धृतराष्ट्र के कान। उन्होंने अभी सुना है: सबसे बड़ा धनुर्धर कह रहा है, मैं नहीं लड़ूँगा। जैसा नीलकण्ठ और मधुसूदन सरस्वती दोनों कहते हैं, उनका मन आशा से भर रहा होगा। पर हम एक चीज़ अर्जुन की ओर से देखें। ये चुप्पी हार की चुप्पी नहीं है। जब आदमी बहुत बोल चुका हो, तर्क दे चुका हो, पूछ चुका हो, तब जो चुप्पी आती है, वो उस बर्तन की चुप्पी है जो खाली हो चुका है। उसमें अब कुछ और भरा जा सकता है। जब तक शिष्य भीतर से भरा रहता है, अपने तर्कों से, अपनी जानकारी से, तब तक गुरु का एक भी शब्द उसमें नहीं समाता।

अब दसवाँ श्लोक। "तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत। सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः।" उससे, दोनों सेनाओं के बीच, विषाद में डूबे अर्जुन से, हृषीकेश ने मानो हँसते हुए ये वचन कहे।

"प्रहसन्निव।" मानो हँसते हुए। और "इव", ये छोटा-सा शब्द, बहुत कुछ कहता है। हमारी टीका कहती है: ये मुस्कान कोमल है, उपहास नहीं। गुरु देखते हैं कि शिष्य का शोक एक भूल पर टिका है, और वो भूल दूर की जा सकती है। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि इस मुस्कान का काम अर्जुन को उसके अनुचित आचरण का आभास कराना है, मानो थोड़ी लाज दिलाना, ताकि भीतर विवेक जगे। इसीलिए श्लोक में "इव" लगा है: हँसी जैसा कुछ, पर असली मक़सद लाज देना नहीं, विवेक जगाना है। और वो ये भी जोड़ते हैं कि अगर अर्जुन घर पर बैठे-बैठे युद्ध से मुँह मोड़ता, तो उतनी भूल न होती। पर दोनों सेनाओं के बीच आकर ऐसा करना, इसीलिए श्लोक कहता है "सेनयोरुभयोर्मध्ये"।

नीलकण्ठ एक और सुंदर बात कहते हैं: ये मूढ़ आदमी, जो मूढ़ होकर भी ज्ञानी की तरह बोल रहा है, उस पर प्रहसन, यानी हल्की हँसी। और रामानुज कहते हैं कि गीता में श्रीकृष्ण जो उपदेश अठारहवें अध्याय के आखिर तक देंगे, वो सब इसी मुस्कुराहट से, मानो परिहास करते हुए, शुरू हुआ। मधुसूदन सरस्वती ये भी बताते हैं कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अनदेखा नहीं किया, और इसी तरह धृतराष्ट्र की झूठी आशा भी यहीं टूट गई।

ज्ञानेश्वर महाराज ने इस हँसी का रूप बहुत प्यारी उपमाओं से बाँधा है। वो कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने सोचा, अर्जुन तो बिल्कुल नहीं जानता कि अब क्या करे। जैसे वैद्य असाध्य रोग देखकर अमृत जैसी औषधि खोजता है, वैसे ही वो सोच रहे थे कि अर्जुन का भ्रम कैसे छूटे। और फिर बोलना शुरू किया, ऐसे जैसे माँ ग़ुस्से में बोलती है, जिसके भीतर स्नेह रहता है। या जैसे दवा की कड़वाहट में अमृत छिपा हो। बाहर से रूखी, भीतर से अत्यन्त मीठी। श्रीकृष्ण के अगले वचन ऐसे ही होंगे।

और एक बात। भीष्म पर्व के उस दृश्य में, जब युधिष्ठिर चुपचाप बड़ों के पास चले थे, श्रीकृष्ण ने भी "मानो मुस्कुराते हुए" कहा था। मूल में दोनों जगह एक ही शब्द है: "प्रहसन्निव"। जो बड़ों के सामने झुकने जाता है, और जो शिष्य बनकर पूछता है, दोनों के लिए उनकी मुस्कान एक जैसी है।

अब वो बात जो मैंने कही थी कि आचार्य शंकर की व्याख्या यहीं से शुरू होती है। और उनकी भूमिका बहुत गहरी है। मैं आपको उसका सार अपने शब्दों में बताता हूँ। वो कहते हैं कि पहले अध्याय के दूसरे श्लोक से लेकर यहाँ तक का सारा हिस्सा हमें यह दिखाने के लिए है कि प्राणियों में शोक और मोह कहाँ से पैदा होते हैं। और वो इन्हें संसार का बीज कहते हैं। अर्जुन ने राज्य, गुरु, मित्र, संबंधियों में "ये मेरे हैं, मैं इनका हूँ" का भाव लगाया, और उससे जुड़े स्नेह के टूटने के डर से उसके भीतर शोक और मोह पैदा हुए। और जिसकी विवेक-बुद्धि शोक और मोह से ढक जाती है, वो अपने कर्तव्य को छोड़ बैठता है, या जो नहीं करना चाहिए वो करने लगता है। अर्जुन ने भी युद्ध छोड़कर भिक्षा के जीवन की बात की। और जब वही आदमी कर्तव्य में लगता भी है, तब फल की इच्छा और अहंकार के साथ करता है। इसलिए संसार का चक्र चलता रहता है। शोक और मोह का अन्त, शंकर कहते हैं, आत्मा के ज्ञान के बिना किसी और तरह नहीं होता।

और फिर वो एक वाक्य कहते हैं जो मुझे बहुत छूता है। वो कहते हैं कि अर्जुन को शोक के इस विशाल सागर में डूबता देख, और आत्मज्ञान के सिवा उसे बाहर निकालने का कोई उपाय न पाकर, भगवान वासुदेव ने करुणा से अर्जुन को निमित्त बनाकर सारे जगत पर कृपा के लिए ये उपदेश शुरू किया। "अर्जुन को निमित्त बनाकर।" यानी ये गीता सिर्फ़ अर्जुन के लिए नहीं बोली गई। अर्जुन तो बहाना है। उसके सहारे हम सब को ये सीख दी जा रही है।

तो आज हमने क्या सुना? दस श्लोक। पहले में आँसू। दूसरे में सवाल: ये धुँधलापन कहाँ से? तीसरे में उठने का आदेश। चौथे और पाँचवें में बड़ों के सामने खड़े होने की पीड़ा। छठे में पहली ईमानदार स्वीकारोक्ति। सातवें में वो पुकार जिससे गीता खुलती है। आठवें में बाहर की किसी चीज़ से शोक न मिटने की पहचान। नौवें में चुप्पी। दसवें में मुस्कान।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली बात। जब मन धुँधला हो, तो पहले उसका नाम लीजिए। श्रीकृष्ण ने तर्कों का खण्डन नहीं किया, उन्होंने उस धुँधलेपन का नाम लिया। और अर्जुन ने सातवें श्लोक में खुद इसे "दोष" कहा। जिस दिन हम अपने डर को सिद्धान्त का नाम देना छोड़ दें, उसी दिन से इलाज शुरू होता है।

दूसरी बात। "मैं नहीं जानता" कहना कमज़ोरी नहीं, पहली ईंट है। अर्जुन ने छठे श्लोक में कहा, "हम ये भी नहीं जानते।" और अगले ही श्लोक में वो शिष्य बन गया। जब तक समझ भरी रहती है, गुरु की बात उसमें नहीं समाती। और जब पूछें, तो उससे पूछिए जो आपकी उलझन के बाहर खड़ा है, और दस लोगों से राय माँगने की जगह एक से कहिए: मुझे सिखाइए।

तीसरी बात। जिससे आप पूछते हैं, उसकी मुस्कान को पहचानिए। सच्चा गुरु आपकी उलझन पर हँसता नहीं। वो मुस्कुराता है उस भूल पर जो उलझन के नीचे दबी है और जो दूर की जा सकती है। आपकी कमज़ोरी से उसका विश्वास हिलता नहीं। और याद रखिए, अर्जुन के रथ पर वो बैठे हैं जिन्होंने कभी शस्त्र न उठाने का वचन दिया था, और जिन्हें अर्जुन ने सलाहकार के रूप में चुना था। आपके रथ में भी कोई बैठा है।

अगली बार हम वहीं लौटेंगे जहाँ आज रुके हैं। श्रीकृष्ण पहली बार अपना उपदेश शुरू करेंगे, और पहला वाक्य होगा: "अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।" ज्ञानियों जैसी बातें तो कह रहे हो, पर उनके लिए शोक कर रहे हो जो इसके लायक नहीं हैं। और उसके बाद जो कहा जाएगा, वो मृत्यु, आत्मा और जीवन की हमारी पूरी समझ बदल देगा।

आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में वो कौन-सा सवाल है जिस पर आपकी समझ जवाब दे चुकी है? और वो कौन है जिससे आप बिना तर्क के, बिना बचाव के, कह सकें, "मुझे सिखाइए"? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्री कृष्ण।

जब समझ जवाब दे दे, तब भी रास्ता बंद नहीं होता। वहीं से एक नया रास्ता शुरू होता है।

जय श्री कृष्ण।

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७ ॥
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तीन बातें

  1. जब मन धुँधला हो, तो पहले उसका नाम लीजिए। श्रीकृष्ण ने तर्कों का खण्डन नहीं किया, उन्होंने उस धुँधलेपन का नाम लिया। और अर्जुन ने सातवें श्लोक में खुद इसे "दोष" कहा। जिस दिन हम अपने डर को सिद्धान्त का नाम देना छोड़ दें, उसी दिन से इलाज शुरू होता है।
  2. "मैं नहीं जानता" कहना कमज़ोरी नहीं, पहली ईंट है। अर्जुन ने छठे श्लोक में कहा, "हम ये भी नहीं जानते।" और अगले ही श्लोक में वो शिष्य बन गया। जब तक समझ भरी रहती है, गुरु की बात उसमें नहीं समाती। और जब पूछें, तो उससे पूछिए जो आपकी उलझन के बाहर खड़ा है, और दस लोगों से राय माँगने की जगह एक से कहिए: मुझे सिखाइए।
  3. जिससे आप पूछते हैं, उसकी मुस्कान को पहचानिए। सच्चा गुरु आपकी उलझन पर हँसता नहीं। वो मुस्कुराता है उस भूल पर जो उलझन के नीचे दबी है और जो दूर की जा सकती है। आपकी कमज़ोरी से उसका विश्वास हिलता नहीं। और याद रखिए, अर्जुन के रथ पर वो बैठे हैं जिन्होंने कभी शस्त्र न उठाने का वचन दिया था, और जिन्हें अर्जुन ने सलाहकार के रूप में चुना था। आपके रथ में भी कोई बैठा है।