गीता सार - अध्याय 1
गीता 1.31–1.47 · 79 मिनट
अच्छे लगने वाले तर्क जो असल में मोह हैं
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥
कभी आपने ध्यान दिया है कि जब मन पहले ही कोई फ़ैसला कर चुका होता है, तब तर्क उसके पीछे-पीछे आते हैं, और बड़े अच्छे कपड़े पहनकर आते हैं? आज का सत्संग इसी के बारे में है। एक ऐसे फ़ैसले के बारे में, जो इतना भला, इतना सच्चा और इतना शास्त्रीय सुनाई देता है कि उसे चुनौती देने का मन ही नहीं करता।
जय श्री कृष्ण।
ये गीता ज्ञान का तीसरा सत्संग है, और आज हम पहला अध्याय पूरा करेंगे। पिछली बार हम उस रथ पर थे जो दोनों सेनाओं के बीच जाकर खड़ा हुआ। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा था कि रथ को वहाँ ले चलिए जहाँ से मैं देख सकूँ कि मुझे किनसे लड़ना है। और जब उसने देखा, तो उसे दोनों ओर अपने ही दिखे: पिता की पीढ़ी के लोग, पितामह, गुरु, मामा, भाई, बेटे और मित्र। और उसके बाद जो हुआ, वो किसी योद्धा का नहीं, किसी भी घबराए हुए इंसान का हाल था। अंग ढीले पड़ गए, मुँह सूख गया, शरीर काँपने लगा, और जो गाण्डीव धनुष कभी उसके हाथ से नहीं छूटा था, वो हाथ से सरकने लगा।
आज उसी अर्जुन की बारी है कि वो बोले। अब तक वो देख रहा था और काँप रहा था। आज वो अपनी बात रखेगा, पूरी की पूरी, एक के बाद एक तर्क के साथ। और मेरा आपसे बस एक निवेदन है। आज के तर्कों को कमज़ोर समझकर मत सुनिए। इनमें से लगभग हर बात ऐसी है जो आपके अपने मन ने भी, किसी मुश्किल घड़ी में, आपसे कही होगी। गीता यहाँ यही सिखाती है कि जो बात इतनी जानी-पहचानी लगे, उसे पहचानना सीखा जाए।
एक बात पहले ही कह दूँ, ताकि आप रास्ते में खो न जाएँ। मधुसूदन सरस्वती, गीता के बड़े टीकाकारों में से एक, इस जगह बहुत सुंदर ढंग से जोड़ते हैं। वो कहते हैं कि इससे ठीक पहले अर्जुन के शोक की बात थी, यानी उसका काँपना और टूटना। और शोक की एक पुरानी आदत है कि वो उस समझ का रास्ता रोक देता है जो आदमी को सही काम की ओर ले जाती। अब वही शोक एक नई चीज़ को जन्म देता है, जिसे मधुसूदन "विपरीत बुद्धि" कहते हैं, यानी उलटी चलने वाली समझ। तो आज हम असल में किसे सुन रहे हैं? एक उलटी चलती हुई बुद्धि को, जो शास्त्र की भाषा बोल रही है।
अब पहला श्लोक। "निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।" हे केशव, मुझे उलटे शकुन दिखाई दे रहे हैं।
आप कह सकते हैं कि ये तो शकुन-अपशकुन की बात है, अंधविश्वास जैसी। पर ज़रा रुकिए। नीलकण्ठ, जिन्होंने पूरे महाभारत पर टीका लिखी, यहाँ बस इतना कहते हैं कि ये वो निमित्त हैं जो लोगों का नाश करने वाले होते हैं, जैसे भूकम्प और ऐसी ही बातें। और खुद महाभारत भी यही दिखाता है। भीष्म पर्व में, युद्ध शुरू होने से पहले, भगवान व्यास धृतराष्ट्र के पास बैठकर एक-एक अपशकुन गिनाते हैं। बाज, गिद्ध और कौए ध्वजाओं की चोटी पर आकर बैठ रहे हैं। दोपहर में बगुले दक्षिण की ओर चीख रहे हैं। सूर्य के चारों ओर बिना सिर के धड़ दिखाई देते हैं। देवताओं की मूर्तियाँ काँप रही हैं, और धरती बार-बार हिल रही है। और अंत में व्यास कहते हैं कि ऐसे बुरे लक्षण धरती पर भी हैं, आकाश में भी, और बीच के अन्तरिक्ष में भी, राजाओं के नाश के लिए।
तो अर्जुन झूठ नहीं बोल रहा। शकुन सचमुच बुरे थे, और धृतराष्ट्र को उनकी खबर पहले ही दी जा चुकी थी। पर देखिए कि एक ही शकुन को दो जगहों से कैसे पढ़ा जाता है। व्यास ने वही बातें उस राजा के सामने रखीं जिसके हाथ में युद्ध को रोकना था, और कहा कि ये समय की चाल है, पर तुम अपने हिस्से का काम करो। और अर्जुन उन्हीं को देखकर एक बिल्कुल अलग नतीजे पर पहुँचता है। शकुन एक ही हैं, पर उनसे जो अर्थ निकलता है, वो उस मन का होता है जो उन्हें पढ़ रहा है।
अब श्लोक का दूसरा हिस्सा। "न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।" और अपने लोगों को युद्ध में मारकर मुझे कोई कल्याण नहीं दिखता।
यहाँ मधुसूदन एक बारीक बात पकड़ते हैं। वो कहते हैं कि अर्जुन ने "कल्याण नहीं दिखता" कहा, यानी कोई पुण्य, कोई फल, इस लोक का या परलोक का, कुछ नहीं, और वो भी बहुत सोचने के बाद। फिर वो समझाते हैं कि अर्जुन ने "अपने लोग" और "युद्ध में", ये दोनों शब्द क्यों जोड़े। शास्त्र कहता है कि जो योद्धा सामने मुँह करके युद्ध में मारा जाए, उसे ऊँचे लोक मिलते हैं। पर मारने वाले के नाम कोई ख़ास पुण्य नहीं लिखा जाता। और जब किसी भी मारने वाले को कुछ नहीं मिलता, तो अपनों को मारने वाले को तो और भी नहीं। देखा आपने? ये केवल भावुकता नहीं है। ये एक पूरा हिसाब है, जो अर्जुन अपने भीतर पहले ही लगा चुका है।
और एक बात जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। मधुसूदन लिखते हैं कि "केशव" शब्द में एक पुकार भी छिपी है। श्रीकृष्ण ने केशी नाम के दुष्ट दैत्य को मारा था, और वो अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। तो अर्जुन "केशव" कहकर मानो कह रहा है कि जैसे आपने सबकी रक्षा की है, वैसे मेरे इस शोक से भी मेरी रक्षा कीजिए। एक ही साँस में तर्क भी दिया जा रहा है, और भीतर से पुकार भी लगाई जा रही है।
अब बत्तीसवाँ श्लोक। "न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।" मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य, न सुख। और फिर, "किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा।" हे गोविन्द, हमें राज्य से, भोगों से, या जीने से भी क्या लाभ?
एक बात देखिए। अर्जुन ने कारण अभी गिनाए ही नहीं हैं, और नतीजा सुना दिया है। विजय नहीं चाहिए। राज्य नहीं चाहिए। जीना भी क्यों। यानी फ़ैसला पहले आ गया है, और कारण बाद में ढूँढे जाएँगे। यही वो बात है जो मैं आपको आज बार-बार दिखाना चाहता हूँ, और इसे अर्जुन पर रखने से पहले अपने ऊपर रखकर देखिएगा।
मधुसूदन यहाँ अर्जुन की ओर से बाकायदा वकालत करते हैं, और अच्छी करते हैं। वो कहते हैं कि कोई भी आदमी किसी काम में तभी लगता है जब उसके फल की चाह हो। जिसे भूख ही न हो, वो रसोई में क्यों जाएगा? जब मुझे फल की चाह ही नहीं, तो उसके साधन यानी इस युद्ध में मेरा लगना बनता ही नहीं। और वो जोड़ते हैं कि राज्य और भोग के बिना अगर हम जंगल में भी रहें, तो भी हमारा जीवन संसार में सराहा जाएगा।
और ये बात खोखली नहीं है, क्योंकि पाण्डव जंगल का जीवन जी चुके हैं। महाभारत में, उद्योग पर्व में, युधिष्ठिर खुद सञ्जय से कहते हैं कि तुम लोगों ने हमें मृगचर्म पहनाकर वन में भेजा, और हमने वो पीड़ा सह ली, ताकि हम कौरवों को न मारें। यानी अर्जुन जब कहता है कि जंगल में भी जिया जा सकता है, तो वो किसी किताब से नहीं बोल रहा। वो अपनी जी हुई ज़िंदगी से बोल रहा है।
और अब तैंतीसवाँ श्लोक, जो मुझे इस पूरे हिस्से में सबसे गहरा लगता है। "येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।" जिनके लिए हमने राज्य, भोग और सुख चाहे थे, "त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च", वे ही यहाँ प्राण और धन की आशा छोड़कर युद्ध में खड़े हैं।
ये वही बात है जो हमने पहले सत्संग में दुर्योधन के मुँह से सुनी थी। याद कीजिए, दुर्योधन ने कहा था "मदर्थे", यानी ये लोग मेरे लिए जीवन देने को तैयार हैं। वही मैदान है, वही लोग हैं, वही जान देने की तैयारी है। पर देखिए कि दो मन उसे कैसे देखते हैं। दुर्योधन कहता है कि ये सब मेरे काम आएँगे। अर्जुन कहता है कि जिनके काम आने के लिए मैंने सब कुछ चाहा था, वे ही मेरे सामने मरने को खड़े हैं। एक के लिए लोग साधन हैं। दूसरे के लिए लोग ही मंज़िल हैं।
मधुसूदन इसमें एक और छोटी बात देखते हैं। अर्जुन ने "प्राण" भी कहा और "धन" भी। दोनों क्यों? क्योंकि आदमी अपनी जान की आशा छोड़ देने के बाद भी चाह सकता है कि उसके अपनों को धन मिले। तो अर्जुन दोनों गिनाता है। ये लोग न जीने की आशा रखते हैं, न धन की। जो भी यहाँ खड़ा है, वो सब कुछ छोड़कर खड़ा है, और यही बात अर्जुन को और तोड़ रही है।
संत ज्ञानेश्वर इसे अपने ढंग से कहते हैं। वो अर्जुन के मुँह से कहलवाते हैं कि इन सबको मारकर जो भोग भोगे जाएँगे, वो सारे जल जाएँ, और मेरा मन तो ऐसा काम सपने में भी नहीं कर सकता। अब मैं आपसे एक सवाल पूछ लूँ। जब आपने आख़िरी बार किसी बात के लिए कहा था कि "मुझे ये चाहिए ही नहीं", तब आपने कारण पहले सोचे थे, या चाहना पहले ख़त्म हुई थी? ऐसा सबके साथ होता है। कोई बड़े ऑपरेशन से पहले कहता है कि "अब रहने दो, मुझे इलाज नहीं चाहिए", और उसके बाद परिवार को, डॉक्टर को, ख़ुद को, कारण समझाए जाते हैं। पहले थकान आती है, तर्क उसके बाद। इसका मतलब ये नहीं कि वो फ़ैसला गलत है। पर इतना ज़रूर है कि जो तर्क बाद में आए हैं, उनकी जाँच ख़ुद करनी होती है, क्योंकि वो हमें तसल्ली देने के लिए भी खड़े किए जा सकते हैं।
अब अगले तीन श्लोकों में अर्जुन अपने सामने खड़े लोगों के नाम गिनाएगा, एक-एक रिश्ता, और फिर एक ऐसा शब्द उठाएगा जिसे सुनकर आपको लगेगा कि अब तो उसके पास कोई रास्ता ही नहीं बचा। पर अभी एक बात बाकी है। वो उस शब्द को मान भी लेगा, और फिर भी नतीजा उलटा निकालेगा। चलिए, सुनते हैं।
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥ ३४ ॥
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ ३५ ॥
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥ ३६ ॥
चौंतीसवें श्लोक में अर्जुन कोई तर्क नहीं देता। वो सिर्फ़ नाम गिनाता है, रिश्तों के नाम। "आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः। मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा।" गुरु, पिता, पुत्र, दादा, मामा, ससुर, पौत्र, साले, और दूसरे सम्बन्धी।
पहले सत्संग में हमने दुर्योधन को अपनी सेना के नाम गिनाते सुना था: भीष्म, द्रोण, कृप, और बाकी। वही लोग अब अर्जुन की सूची में हैं, पर दूसरे शब्दों में। दुर्योधन की सूची में वो "महारथी" हैं, यानी हथियार और कौशल। अर्जुन की सूची में वो "पितामह" हैं और "आचार्य"। एक ही आदमी, दो सूचियाँ। और आप जिस शब्द से किसी को पुकारते हैं, उसी से तय होता है कि आपका हाथ उसकी ओर क्या करेगा। संत ज्ञानेश्वर अर्जुन के मुँह से यही कहलवाते हैं कि ये सब इतने पास के सोयरे हैं कि इन्हें मारने की बात मुँह से बोलना भी दोष है।
अब पैंतीसवाँ श्लोक। "एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।" मैं इन्हें मारना नहीं चाहता, चाहे ये मुझे मार ही डालें। "अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते।" तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं, फिर इस पृथ्वी के लिए तो बात ही क्या।
श्रीधर स्वामी यहाँ बड़ी साफ़ बात पकड़ते हैं। वो कहते हैं कि कोई अर्जुन से पूछ सकता था: चलो, दया के कारण तुम इन्हें नहीं मारते, पर ये तो राज्य के लोभ में तुम्हें मारेंगे ही। तो फिर तुम्हीं इन्हें मारकर राज्य क्यों न भोगो? और अर्जुन उसी सवाल का उत्तर पहले से दे रहा है कि भले ये मुझे मारें, मैं इन्हें नहीं मारूँगा। मधुसूदन इसमें जोड़ते हैं कि अर्जुन तो कहता है कि मैं इनके मारने की इच्छा भी नहीं करूँगा, मारने की तो बात दूर है।
और "मधुसूदन" संबोधन पर हमारी अपनी टीका एक बहुत सुंदर बात कहती है। मधुसूदन यानी मधु नाम के दैत्य को मारने वाले। अर्जुन मानो श्रीकृष्ण से कह रहा है कि आप दुष्टों को मारते हैं, पर ये तो मेरे अपने हैं।
अब छत्तीसवाँ श्लोक। यहाँ अर्जुन का तर्क सबसे पैना हो जाता है। "निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।" धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? और फिर वो शब्द आता है जिसका मैंने कहा था: "पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः।" इन आततायियों को मारकर भी हमें पाप ही लगेगा।
"आततायी।" शास्त्र में आततायी के छह रूप गिनाए गए हैं: जो घर में आग लगाए, जो विष दे, जो हाथ में हथियार लेकर मारने आए, जो धन छीन ले, जो भूमि छीन ले, और जो किसी की स्त्री का हरण करे। और शास्त्र ऐसे आदमी को मार डालने की इजाज़त देता है। श्रीधर स्वामी और नीलकण्ठ दोनों इस नियम को पूरा बताते हैं, कि आततायी को आते देखकर बिना सोचे मार देना चाहिए, और उसे मारने वाले को कोई पाप नहीं लगता।
तो अर्जुन यहाँ क्या कर रहा है? वो इस नियम को जानता है, और उसे मान भी रहा है। वो कह रहा है कि हाँ, ये आततायी हैं। फिर भी पाप लगेगा। श्रीधर, मधुसूदन और नीलकण्ठ, तीनों इसे खोलते हैं, और बड़े ध्यान से। वो कहते हैं कि आततायी को मारने की छूट अर्थशास्त्र की है, यानी राज-नीति के शास्त्र की। और दूसरी ओर धर्मशास्त्र कहता है कि किसी प्राणी की हिंसा मत करो। जब दो शास्त्र टकराएँ, तो याज्ञवल्क्य का नियम है कि धर्मशास्त्र अर्थशास्त्र से ज़्यादा बलवान है। यानी अर्जुन भावुक होकर शास्त्र से भाग नहीं रहा। वो शास्त्र के भीतर से एक शास्त्र को दूसरे से बड़ा ठहरा रहा है। ये बहुत पढ़े-लिखे आदमी का तर्क है।
और इसी श्लोक के दो अर्थ भी किए गए हैं। एक वो जो हम सबने सुना: इन्हें मारकर हमें पाप लगेगा। और दूसरा, जो मधुसूदन और नीलकण्ठ दोनों लिखते हैं: कि पाप तो उन आततायियों को ही लगेगा, अगर वो हमें मार डालें, हम उनके मारने से नष्ट नहीं होंगे। वो ही अपने पाप में डूबें, हम क्यों डूबें।
और "जनार्दन" शब्द पर भी मधुसूदन एक बात नोट करते हैं। वो लिखते हैं कि इस संबोधन में एक हल्का-सा इशारा है। श्रीकृष्ण प्रलय में सब जीवों का संहार करते हैं, फिर भी किसी पाप से छुए नहीं जाते। तो अर्जुन मानो कह रहा है कि अगर इनका मरना ज़रूरी ही है, तो आप ही कर दीजिए, आप पर कोई पाप नहीं लगता। आप ध्यान दीजिए, कि जिम्मेदारी किसकी है, इस बात पर भी तर्क धीरे से सरक रहा है।
अब मैं आपको वो बात बताता हूँ जो इस श्लोक को और भारी बना देती है। आततायी के ये छह रूप हमने अभी गिने। इनमें से कई महाभारत में सीधे इन्हीं कौरवों के नाम के आगे लिखे हैं। आग: आदि पर्व में लिखा है कि शकुनि, कर्ण और दुर्योधन ने कुन्ती को पुत्रों सहित जला डालने का मन बनाया था। दुर्योधन ने अपने मंत्री पुरोचन को अलग ले जाकर कहा कि लाख का एक ऐसा घर बनवाओ जिसे पाण्डव गौर से देखकर भी न समझ पाएँ कि वो जलने के लिए बना है, और जब सब सो जाएँ, तो दरवाज़े पर आग लगा दो। विष: आदि पर्व में ही दुर्योधन भीम को सोते में बाँधकर गंगा में फेंकता है, फिर साँपों से कटवाता है, और फिर उसके भोजन में कालकूट विष मिलवाता है। धन और राज्य: जुए में पाण्डवों का राज्य और धन गया, और उसके बाद उसे लौटाया नहीं गया। और स्त्री का अपमान: द्रौपदी को भरी सभा में घसीटकर लाया गया। युधिष्ठिर खुद उद्योग पर्व में कहते हैं कि दुःशासन ने द्रौपदी को बालों से खींचा, और हमने वो भी सह लिया।
और एक बात और। युधिष्ठिर उसी अध्याय में शान्ति माँगते हैं। वो कहते हैं कि हमें सिर्फ़ पाँच गाँव दे दो, अविस्थल, वृकस्थल, माकन्दी, वारणावत, और कोई एक और, ताकि पाँचों भाई जी सकें। पर दुर्योधन अपने पिता से साफ़ कह देता है कि पाण्डवों को हम सुई की नोक भर ज़मीन भी नहीं देंगे। और धृतराष्ट्र ने खुद आगे चलकर माना कि श्रीकृष्ण शान्ति माँगने कौरवों के पास आए थे, और अपना उद्देश्य पूरा किए बिना लौट गए। यानी जब अर्जुन कहता है कि वो आततायी हैं, तो वो गलत नहीं कह रहा। हर बात तथ्य है, और शान्ति की हर कोशिश पहले हो चुकी है।
अब यहाँ से कहानी का असली सवाल बनता है, और वो ये है कि जब हक भी है, शास्त्र की छूट भी है, और शान्ति के रास्ते भी बंद हो चुके हैं, तब अर्जुन का रुक जाना क्या है? हो सकता है ये करुणा हो। हो सकता है ये क्षमा हो। और इन दोनों से ऊँची चीज़ें कम हैं। पर ऊपर से देखने पर क्षमा और डर एक जैसे दिखते हैं। आपने भी ऐसा कभी देखा होगा। कोई कहता है "जाने दो, रिश्ते हैं", और सुनने वाले को लगता है कितना बड़ा दिल है। पर उसी आदमी के भीतर शायद वो डर बैठा है कि अगर मैंने हिसाब माँगा तो घर टूट जाएगा। बाहर से दोनों एक-से दिखते हैं। बस भीतर से वो पहचाना जाता है, और उसे पहचानने वाला भी वही आदमी होता है।
तो छत्तीसवें श्लोक तक अर्जुन ने रिश्ते गिनाए, लोभ का हिसाब लगाया, और शास्त्र के भीतर से शास्त्र चुना। और अभी एक बात बाकी है। अगला श्लोक "तस्मात्" शब्द से शुरू होगा, यानी "इसलिए"। और जब कोई "इसलिए" कहे, तो समझिए कि अब वो आपसे सहमति माँग रहा है। चलिए सुनते हैं कि अर्जुन किस बात पर आपकी सहमति माँगता है।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ ३७ ॥
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३९ ॥
इससे पहले कि हम इन श्लोकों में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहनी है। गीता की ये यात्रा लंबी है, और आज का हिस्सा उसके सबसे बारीक हिस्सों में से एक है, क्योंकि यहाँ अर्जुन के सबसे मज़बूत तर्क हैं। जो आदमी आज यहीं उठ जाए, वो अर्जुन को केवल कमज़ोर समझकर चला जाएगा, और गीता की सबसे गहरी बात से चूक जाएगा, जो इसी अध्याय के आखिर में आने वाली है। तो अगर आप ये सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की ये यात्रा बीच में न छूटे। और आज का सत्संग आखिर तक सुनिए।
अब सैंतीसवाँ श्लोक। "तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।" इसलिए अपने ही बन्धु, धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना हमारे लिए उचित नहीं। "स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव।" हे माधव, अपने ही लोगों को मारकर हम सुखी कैसे होंगे?
एक शब्द पर ध्यान दीजिए। "तस्मात्।" इसलिए। अर्जुन ने पिछले कुछ श्लोकों में बातें रखीं, और अब वो नतीजे पर पहुँच रहा है, जैसे गणित में लिखा जाता है, "इसलिए सिद्ध हुआ।" और जब कोई "इसलिए" कहे, तो हमारा मन अपने आप सिर हिला देता है।
"माधव" शब्द पर मधुसूदन सरस्वती एक बात कहते हैं। माधव यानी लक्ष्मी के पति, मंगल के स्वामी। अर्जुन मानो कह रहा है कि आप तो मंगल के स्वामी हैं, आप मुझे ऐसे काम में कैसे लगाएँगे जिसका फल अमंगल हो। और अगर आप पीछे लौटकर देखें, तो इन श्लोकों में अर्जुन हर बार श्रीकृष्ण को एक नए नाम से पुकारता है: केशव, गोविन्द, मधुसूदन, जनार्दन, और अब माधव। टीकाकार इन नामों पर बार-बार रुकते हैं, क्योंकि हर नाम में उन्हें एक छोटी-सी पुकार या एक छोटा-सा तर्क दिखता है। अर्जुन केवल अपनी बात नहीं कह रहा। वो उन्हीं के नाम उठाकर उन्हीं के सामने रख रहा है।
अब अड़तीसवें और उनतालीसवें श्लोक। यहाँ मुझे लगता है कि अर्जुन का तर्क अपनी चोटी पर पहुँचता है। "यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः। कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्।" यद्यपि लोभ से जिनकी बुद्धि मारी गई है, वे ये दोष नहीं देखते, कि कुल के नाश से क्या होता है और मित्रों से द्रोह करने का कितना बड़ा पाप है। "कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।" तो हम, जो ये दोष साफ़ देख रहे हैं, इस पाप से हटने की बात क्यों न सोचें?
श्रीधर स्वामी यहाँ इसे सवाल-जवाब की तरह खोलते हैं। कोई अर्जुन से कह सकता था: कौरव भी तो जानते हैं कि अपनों को मारना पाप है, फिर भी लड़ने को तैयार हैं। तुम भी वैसे ही लड़ लो, ये विषाद किसलिए? और अर्जुन का उत्तर है: उन्होंने राज्य के लोभ में अपना विवेक खो दिया है, इसलिए उन्हें दोष दिखता नहीं। हम तो देख रहे हैं। जो देखकर भी उसी गड्ढे में उतर जाए, वो उनसे भी बड़ा अपराधी है।
मधुसूदन एक और आपत्ति उठाते हैं, जो मुझे बहुत ज़ोरदार लगती है। वो कहते हैं कि कोई कह सकता है: भीष्म और द्रोण जैसे श्रेष्ठ लोग भी तो इसी युद्ध में खड़े हैं। उनका आचरण तो प्रमाण होना चाहिए। उत्तर यह है कि जहाँ लोभ जैसा कारण साफ़ दिखाई दे रहा हो, वहाँ किसी का आचरण शास्त्र का आधार नहीं माना जाता। और दूसरी आपत्ति: क्षत्रिय के लिए तो कहा गया है कि बुलाए जाने पर वो जुए से भी पीछे नहीं हटता और युद्ध से भी नहीं, और कौरवों ने तुम्हें बुलाया है। मधुसूदन और नीलकण्ठ दोनों इसका उत्तर यह देते हैं कि जिस कर्म का नतीजा अनर्थ में निकले, उसे सिर्फ़ शास्त्र की आज्ञा होने से धर्म नहीं माना जाता। जैसे शत्रु को मारने के लिए बताया गया श्येन यज्ञ। वो विधान होकर भी अनर्थ लाता है, और अगर विधान होने भर से कोई कर्म धर्म बन जाता, तो उसे भी धर्म मानना पड़ता। मैं सोचता हूँ कि अगर अर्जुन आज किसी बड़ी अदालत में खड़ा होता, तो उसके सामने बहस करने वाले वकील को तीन-तीन शास्त्रों की किताबें खोलकर आना पड़ता।
संत ज्ञानेश्वर इसी बात को घर की भाषा में कहते हैं। वो अर्जुन के मुँह से कहलवाते हैं कि जानते-बूझते कालकूट विष कौन पिए? रास्ते में अचानक सिंह सामने आ जाए तो उससे बचकर निकलने में लाभ ही है। उजाला होते हुए कोई अँधेरे कुएँ में क्यों उतरे? आप देखिए, इनमें से एक भी उदाहरण गलत नहीं है। इन्हें सुनकर कोई भी सिर हिला देगा।
तिलक महाराज अपने गीता-रहस्य में ठीक इसी जगह एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात लिखते हैं। वो कहते हैं कि अर्जुन यहाँ जो युक्तियाँ दे रहा है, ये साधारण युक्तियाँ हैं: कि लोभी बिगड़ जाए तो हम भी बिगड़ क्यों जाएँ, कि दुष्ट के जाल में फँसकर दुष्ट क्यों बनें। और असली सवाल यह है कि ऐसे बड़े संकट में, जब एक ही देश और धर्म के लोग आपस में कट मरने को खड़े हों, इन साधारण बातों का कितना उपयोग किया जा सकता है। वो लिखते हैं कि गीता का आगे का सारा विवेचन अर्जुन की इन्हीं शंकाओं को दूर करने के लिए है।
तो अब हम एक सवाल के सामने खड़े हैं। अर्जुन के तर्क शास्त्र के भी हैं, लोक के भी हैं, और तथ्य पर भी टिके हैं। फिर भी मधुसूदन उसी श्लोक से पहले कह चुके हैं कि यह शोक से जन्मी उलटी समझ है। ये दोनों बातें एक साथ कैसे सच हो सकती हैं? शायद ऐसे कि तर्क की चतुराई से मोह का पता नहीं चलता। चतुर तर्क भी मोह के हो सकते हैं, और भोले तर्क भी विवेक के। पता तो इससे चलता है कि वो तर्क आ कहाँ से रहा है, और किस काम में आ रहा है।
और यहाँ महाभारत एक बात ऐसी दिखाता है जो मुझे अर्जुन के इन श्लोकों के बारे में सोचने पर मजबूर करती है। जब भगवान व्यास धृतराष्ट्र को युद्ध से पहले समझा रहे थे, तब धृतराष्ट्र ने उत्तर में कहा, "मैं भी जानता हूँ, जैसे आप जानते हैं। चीज़ें कैसे टिकती हैं और कैसे नष्ट होती हैं, ये मुझे ठीक वैसा ही मालूम है। पर संसार अपने हित की जगह पर मोहित हो जाता है, पिताजी। मुझे भी वैसा ही समझिए।" ये बात भीष्म पर्व के तीसरे अध्याय में है। देखिए, अर्जुन कहता है कि कौरव दोष नहीं देखते, पर उनके अपने पिता कहते हैं कि वो देखते हैं, बस मोह उन्हें रुकने नहीं देता। यानी देखने और जानने से ही काम नहीं चलता। और यही सवाल अब हमारे सामने अर्जुन के लिए भी खड़ा है। उसने सब देख लिया है। सब जान लिया है। तो फिर वो मोह कहाँ बैठा है?
इसका जवाब अभी नहीं मिलेगा। पर अगले श्लोकों में एक बात ज़रूर दिखेगी। अब अर्जुन उन बातों पर आएगा जिन्हें वो सबसे ज़्यादा सच्चा मानता है: कुल के नाश से क्या होता है, स्त्रियों का, संतानों का, पितरों का क्या होता है। और मैं आपसे एक वादा करता हूँ कि ये सब मैं वैसा ही सुनाऊँगा जैसा कहा गया है, न एक शब्द कम, न एक शब्द ज़्यादा। पर अभी एक बात बाकी है, वो भी सुन लीजिए। आज के कानों को ये शब्द अटपटे लगेंगे, पर यही शब्द उस समय की सबसे गहरी चिंता थे। चलिए, सुनते हैं।
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ ४० ॥
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥ ४१ ॥
अब हम वो हिस्सा सुनने जा रहे हैं जहाँ आज के कान सबसे पहले ठिठकते हैं। मैंने कहा था कि मैं इसे वैसा ही सुनाऊँगा जैसा कहा गया है, तो वैसे ही सुनिए। मैं इसमें आज की कोई कसौटी नहीं जोड़ रहा, और इसमें से कुछ घटा भी नहीं रहा। हमारा सवाल सिर्फ़ एक है: अर्जुन की ये बात बनी कैसे है, और ये किस तरह सुनने वाले को सच्ची लगती है।
चालीसवाँ श्लोक। "कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।" कुल का नाश होने पर सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं। "धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत।" और जब धर्म नष्ट हो जाता है, तब अधर्म पूरे कुल को दबा लेता है।
"कुलधर्म" क्या है? हमारी टीका इसे बड़ी सीधी भाषा में बताती है। ये किसी कुल की परंपरा से चली आई जीवन-रीति है: उसके संस्कार, उसके कर्तव्य, उसके रीति-रिवाज, जिन्हें घर के बड़े-बूढ़े आगे बढ़ाते हैं। और जब युद्ध में बड़े ही मारे जाएँ, तो उसे आगे चलाने वाला कोई नहीं रहता। मधुसूदन और नीलकण्ठ दोनों यही बात ज़रा खोलकर कहते हैं। कुलधर्म इसलिए नष्ट होते हैं क्योंकि उन्हें निभाने वाले, यानी अग्निहोत्र जैसे कर्म करने वाले बड़े पुरुष, नहीं रहते। और जो बचते हैं, वो छोटे बच्चे और ऐसे ही लोग हैं, जिन्हें कोई सिखाने वाला नहीं रहा, और जिन पर अधर्म हावी हो जाता है।
ये चिंता बहुत सच्ची है, और इसे समझने के लिए आपको किसी शास्त्र की ज़रूरत नहीं। आज भी बहुत से घरों में कोई एक दादी, कोई एक बुज़ुर्ग होते हैं, जिनके दम से पूरे परिवार की रीत चलती है। कौन सा व्रत किस तिथि को, कौन सी कथा किस मौसम में, कौन सा रिश्ता किस तरह निभाना है। और जब वो नहीं रहते, तो घर के जवान लोग फ़ोन खोलकर पूछते हैं कि इसे कैसे करते हैं। अर्जुन की पहली चिंता यही है। बड़े मरेंगे, तो रीत भी मर जाएगी। संत ज्ञानेश्वर इसे लकड़ी की उपमा से कहते हैं कि जैसे दो लकड़ियाँ आपस में रगड़ी जाएँ तो उनमें से एक आग निकलती है, और उसी आग से सारा जंगल जल जाता है, वैसे ही जब कुल के लोग आपस में मारकाट करें, तो उस दोष की आग से पूरा कुल जल उठता है।
और यहाँ महाभारत खुद एक बात ऐसी कहता है जिसे मैं आपसे छिपाना नहीं चाहता। ये वही बात है जो अर्जुन कह रहा है, और वो भी भगवान व्यास के मुँह से। भीष्म पर्व के तीसरे अध्याय में, युद्ध शुरू होने से पहले, व्यास धृतराष्ट्र से कहते हैं कि अपने ही बन्धुओं को मारना नीच कर्म कहा गया है। वो कहते हैं कि वेद में हिंसा की प्रशंसा नहीं की गई, वो किसी भी तरह अच्छी बात नहीं है। और फिर वो एक बहुत भारी वाक्य कहते हैं: जो अपने कुल के धर्म को मारता है, जो उसका अपना शरीर ही है, वो धर्म उसे मार देता है। और अंत में वो कहते हैं कि पाण्डवों को राज्य मिल जाए, और कौरव शान्ति कर लें।
तो सोचिए। अर्जुन के श्लोक कोई मनगढ़ंत बात नहीं हैं। वो महाभारत की अपनी आवाज़ से मेल खाते हैं। पर एक फ़र्क है, और वो फ़र्क बहुत बड़ा है। व्यास ये बात उस राजा से कह रहे थे जिसके हाथ में युद्ध को रोकना था, उस समय जब युद्ध अभी शुरू नहीं हुआ था। और अर्जुन ये बात तब कह रहा है जब शंख बज चुके हैं, दोनों सेनाएँ आमने-सामने हैं, शान्ति की हर कोशिश हो चुकी है, और उसका अपना शरीर काँप रहा है। बात एक ही है। कहने वाली जगह अलग है। और वो जगह सब कुछ बदल देती है।
अब इकतालीसवाँ श्लोक। "अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।" अधर्म के बढ़ने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं। "स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः।" और स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
मैं यहाँ बहुत सँभलकर आगे बढ़ूँगा, क्योंकि ये शब्द भारी हैं। हमारी टीका कहती है कि "वर्णसंकर" का अर्थ है विवाह की मर्यादा से बाहर जन्मी संतान, जो अपनी वंश-परंपरा को नहीं जानती, और इसीलिए उसके संस्कार नहीं निभा पाती। और ये भी कहती है कि अर्जुन यहाँ अपने समय के धर्मशास्त्र के आधार पर तर्क दे रहा है। नीलकण्ठ "दुष्टा" शब्द को इस तरह खोलते हैं कि ये उन स्त्रियों की बात है जो संतान के लिए किसी दूसरे वर्ण का सहारा लें। यानी चिंता का केंद्र ये है कि संतान किसकी होगी, और उसे परंपरा कौन सिखाएगा।
और मधुसूदन सरस्वती एक बात और जोड़ते हैं जो मुझे इस श्लोक की सबसे बारीक बात लगी। वो पूछते हैं कि स्त्रियाँ बिगड़ती क्यों हैं? और खुद दो कारण बताते हैं। पहला, कुतर्क से। वो कहते हैं कि वो स्त्रियाँ ऐसा सोच सकती हैं कि जब हमारे पतियों ने ही धर्म तोड़कर कुल का नाश किया है, तो हमारे थोड़ा बहक जाने में दोष ही क्या है। और दूसरा, कुल का नाश करने वाले पतित पतियों के साथ संबंध के कारण। ध्यान दीजिए कि मधुसूदन कारण स्त्रियों के स्वभाव में नहीं ढूँढ रहे, घर में पुरुषों के किए हुए में ढूँढ रहे हैं। और जब भरोसा हिलता है, तो एक तर्क ही सहारा बन जाता है, जिसे वो नाम देते हैं, "कुतर्क"।
एक और बात देखिए। श्रीधर स्वामी इन दो श्लोकों के दोषों को दो खानों में रखते हैं। चालीसवें श्लोक में "अधर्म दबा लेता है", इसे वो मन का दोष कहते हैं। इकतालीसवें में "स्त्रियाँ बिगड़ती हैं", इसे वो शरीर का दोष कहते हैं। यानी अर्जुन की बात मन से शरीर की ओर उतर रही है।
अब मैं आपको वो दिखाता हूँ जो मुझे इस पूरे हिस्से में सबसे ज़रूरी लगता है। इन दो श्लोकों में एक सीढ़ी है, जो ऊपर से नीचे उतरती जाती है। बड़े मरेंगे। फिर कुलधर्म रुक जाएगा। फिर अधर्म हावी होगा। फिर स्त्रियाँ बिगड़ेंगी। फिर वर्णसंकर होगा। और अगले श्लोकों में आप देखेंगे कि वो सीढ़ी पितरों तक और नरक तक पहुँचती है। हर पायदान अपनी पिछली पायदान को पक्का मानकर बनी है। और पहली पायदान बस यही है कि अगर मैं लड़ा, तो ये सब होगा। आपने कभी अपने मन में ऐसी सीढ़ी बनाई है? कोई नौकरी छोड़ने से डरता है तो कहता है, छोड़ दी तो पैसे जाएँगे, फिर किस्त रुकेगी, फिर घर का क्या होगा, फिर लोग क्या कहेंगे, फिर बच्चों की पढ़ाई का क्या होगा। सीढ़ी की हर पायदान पर "अगर" लिखा है। पर नीचे पहुँचते-पहुँचते वो "अगर" "ज़रूर" बन चुका होता है। और सबसे अजीब बात ये कि जो सीढ़ी "करने" के नतीजे के लिए इतनी लंबी बनी है, वैसी ही सीढ़ी "न करने" के नतीजे के लिए कभी बनाई नहीं जाती।
अर्जुन ने भी अभी तक बस एक ही दिशा की सीढ़ी बनाई है। अगर मैं लड़ूँगा, तो क्या होगा। वो अभी ये नहीं पूछ रहा कि अगर मैं नहीं लड़ूँगा, तो क्या होगा। जिन्होंने लाख के घर में आग लगाने की योजना बनाई थी, उन्हें अगर कोई नहीं रोकेगा, तो उस अधर्म का क्या होगा। ये सवाल कहीं नहीं आता। और इसी में उन श्लोकों की असली बात छिपी है। ये गलत तर्क नहीं हैं। ये एकतरफ़ा हैं, और उनके पीछे एक डर है।
पर अभी एक बात बाकी है। सीढ़ी का सबसे नीचे का हिस्सा अभी सुनना है, और वो सबसे भारी है। उसमें अर्जुन उन्हें भी याद करता है जो अब हैं ही नहीं, पूर्वजों को। और उस चिंता को समझने के लिए हमें महाभारत की ही एक बहुत पुरानी कथा के पास जाना होगा, जिसमें एक ऋषि अपने पितरों को एक गड्ढे में उलटा लटका हुआ देखते हैं।
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ ४२ ॥
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥
बयालीसवाँ श्लोक सीढ़ी के सबसे नीचे का हिस्सा है। "सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।" ये संकर कुल का नाश करने वालों को और कुल को नरक में ही ले जाता है। "पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः।" और पिण्ड और जल के दान से वंचित होकर इनके पितर भी गिर जाते हैं।
पिण्ड और उदक क्या हैं? हमारी टीका बताती है कि श्राद्ध में पितरों को चावल के पिण्ड और जल दिए जाते हैं, और मान्यता थी कि इनके बिना पितर पितृलोक में अपना स्थान खो देते हैं। मधुसूदन सरस्वती इसे अर्जुन के तर्क की अगली कड़ी की तरह पढ़ते हैं। वो कहते हैं कि नरक में जाना केवल कुल का नाश करने वालों तक सीमित नहीं है। उनके पितर भी गिरते हैं, क्योंकि जो बेटे और वंशज ये क्रियाएँ करते, वे ही नहीं बचे।
यहाँ आज का मन तुरंत कहना चाहेगा कि ये तो मान्यता की बात है। मैं आपको रोकना चाहता हूँ। क्योंकि ये मान्यता अर्जुन ने अपनी सुविधा के लिए नहीं बनाई थी। महाभारत में ही, आदि पर्व के तेरहवें अध्याय में, एक कथा है जो इसी बात को बहुत गहराई से सामने रखती है।
जरत्कारु नाम के एक ऋषि थे। बहुत कठोर तपस्वी। हवा पीकर रहने वाले, सोने से भी दूर, और जिन्होंने तय कर रखा था कि विवाह नहीं करना है। एक दिन वो पृथ्वी पर घूमते हुए एक बहुत बड़े गड्ढे में अपने ही पितरों को उलटा लटका हुआ देखते हैं। पैर ऊपर, सिर नीचे। और वे जिस घास की जड़ को पकड़े लटके हैं, उसे एक चूहा चारों ओर से कुतर रहा है। ऋषि पूछते हैं कि आप कौन हैं और इस हाल में क्यों हैं? और पितर उत्तर देते हैं कि हमारा वंश समाप्त होने जा रहा है, इसलिए हम धरती में धँस रहे हैं। हमारी एक ही संतान बची है, और वो है जरत्कारु, जो तप करता है, और विवाह नहीं करना चाहता। वो कहते हैं कि जिनके पीछे इस लोक में संतान नहीं होती, उन्हें अच्छे कर्म करने पर भी स्वर्ग में ठौर नहीं मिलता। वो ये भी कहते हैं कि न धर्म के फल से, न तप से, वो गति मिलती है जो पुत्रवानों को मिलती है।
और तब जरत्कारु क्या करते हैं? वो कहते हैं कि मैं अपने जीवन के लिए तो कभी विवाह न करता, पर आपके हित के लिए करूँगा। ज़रा देखिए। जो ऋषि हर बंधन से मुक्त हो चुका था, वो भी पितरों की पुकार पर रुक गया। यानी अर्जुन का डर किसी क्षत्रिय की छोटी-सी चिंता नहीं है। ये वो चिंता है जिसके आगे एक तपस्वी ने भी अपना संकल्प बदल दिया।
मैं इसे न तो कथा कहकर हल्का करना चाहता हूँ, और न इसे अर्जुन के पक्ष की मोहर बनाना चाहता हूँ। मैं बस इतना दिखाना चाहता हूँ कि अर्जुन का डर कितना गहरा है, कितना पवित्र है, और कितना निजी है। वो उन लोगों के लिए रो रहा है जो अब उसके सामने नहीं हैं, और जो पलटकर जवाब भी नहीं दे सकते।
और नीलकण्ठ इस श्लोक पर सिर्फ़ टीका नहीं लिखते, बहस भी करते हैं। वो खुद पूछते हैं कि अगर ऐसा है तो परशुराम के समय जब क्षत्रिय मारे गए थे, तब उनकी स्त्रियों ने ब्राह्मणों से पुत्र कैसे पाए, और खुद इसी वंश के लोगों के जन्म को कैसे समझा जाए। फिर वो उत्तर भी पुराने शास्त्र के भीतर से देते हैं। मैं इस बहस में नहीं जाऊँगा, क्योंकि वो बहुत बारीक है और हमारे सत्संग का विषय नहीं है। पर एक बात आपको बताने के लिए रुका हूँ: पुराने लोग अर्जुन की इस बात को हल्का नहीं मानते थे। वो इसकी जड़ तक सवाल करते थे, और जवाब ढूँढते थे।
अब तैंतालीसवाँ श्लोक। "दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः। उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः।" कुल का नाश करने वालों के इन दोषों से, जो वर्णसंकर पैदा करते हैं, सनातन जाति-धर्म और कुल-धर्म उजड़ जाते हैं।
मधुसूदन बताते हैं कि जाति-धर्म वो हैं जो क्षत्रिय होने जैसी पहचान से जुड़े होते हैं, और कुल-धर्म वो जो एक कुल के अपने होते हैं। और दोनों यहाँ "शाश्वत" कहे गए हैं, यानी सनातन, बहुत पुराने, चले आए हुए। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं कि जैसे साँप का दंश नाखून की नोक पर लगे, तो उसका ज़हर तेज़ी से चोटी तक चढ़ जाता है, वैसे ही एक दोष पूरे कुल में ऊपर तक फैल जाता है, ब्रह्मा तक।
एक बात पर ध्यान दीजिए। अर्जुन की शुरुआत थी, "मैं इन्हें मारना नहीं चाहता।" वो एक छोटा-सा फ़ैसला था। और अब तैंतालीसवें श्लोक तक पहुँचते-पहुँचते वो फ़ैसला "सनातन धर्मों का उजड़ जाना" बन चुका है। डर ऐसा ही करता है। वो दाँव को बढ़ाता जाता है। पहले एक युद्ध, फिर पूरा कुल, फिर पितर, फिर सनातन धर्म। और जितना दाँव बड़ा होता जाता है, उतना ही मन कहता है कि अब तो पीछे हटना ही एकमात्र सही रास्ता है, क्योंकि इतना बड़ा नुकसान कौन उठाएगा।
आप खुद सोचिए। कई बार हम किसी फ़ैसले से इसलिए रुक जाते हैं कि "पिताजी होते तो क्या कहते", या "दादी को ये अच्छा न लगता।" और ये मरे हुए आदमी की राय हमारी सबसे मज़बूत दलील बन जाती है, क्योंकि वो पलटकर जवाब नहीं दे सकता। कई बार वो राय सचमुच उन्हीं की होती है, और हमें उसका आदर करना चाहिए। और कई बार हम उनके नाम पर अपना ही डर बोल रहे होते हैं। दोनों में बाहर से कोई फ़र्क नहीं दिखता। ये वही बात है जो हमने क्षमा और डर के बारे में कही थी। दोनों एक-से दिखते हैं।
और यहाँ मैं एक बात और कहूँगा जो हमारे आज के विषय की जड़ है। अर्जुन ये सब प्रेम से कह रहा है। उसका प्रेम सच्चा है। उसका डर पितरों के लिए है, बड़ों के लिए है, आने वाली पीढ़ियों के लिए है। रामानुजाचार्य जब अर्जुन की इस पूरी दशा का सार लिखते हैं, तो उसे "परम करुणावान" और "परम धार्मिक" कहते हैं। तो मोह का सबसे कठिन रूप वो है जो प्रेम की भाषा बोले। जो तर्क ठंडे दिल से आए, उसे पहचानना आसान है। जो तर्क प्रेम का रूप लेकर आए, उसे पहचानना सबसे कठिन है। इसीलिए आज का सत्संग इतना ज़रूरी है।
पर अभी एक बात बाकी है। अगले दो श्लोकों में अर्जुन वो वाक्य कहेगा जो पूरे अध्याय का सबसे अनोखा मोड़ है। वो अपने ही विरुद्ध फ़ैसला सुनाएगा। चलिए, सुनते हैं।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ४४ ॥
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ ४५ ॥
चौवालीसवें श्लोक में अर्जुन अपना सबसे भारी नतीजा सुनाता है। "उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन। नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम।" हे जनार्दन, जिन मनुष्यों के कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उनका लंबे समय तक नरक में वास होता है, ऐसा हमने सुना है।
आखिरी शब्द सुनिए। "अनुशुश्रुम।" हमने सुना है। अर्जुन ने इससे पहले जो कुछ कहा, वो कहीं न कहीं देखे हुए तथ्य पर टिका था। रिश्तेदार सामने खड़े हैं, ये उसने देखा। कौरव आततायी हैं, ये सबको मालूम है। कुल के बड़े मरेंगे, ये भी दिख रहा है। पर नरक किसी ने देखा नहीं। इस आखिरी कड़ी के लिए अर्जुन के पास अपना देखा हुआ कुछ नहीं है। उसके पास बस इतना है कि हमने सुना है।
और यहाँ मधुसूदन सरस्वती एक बहुत ईमानदार बात लिखते हैं। वो कहते हैं कि "अनुशुश्रुम" का अर्थ है कि हमने आचार्यों के मुँह से ऐसा सुना है, हम इसे अपनी कल्पना से नहीं गढ़ रहे। श्रीधर स्वामी भी इस श्लोक को ऐसे ही पुराने वचनों से जोड़ते हैं, कि जो लोग पाप करते हैं और उसका प्रायश्चित्त भी नहीं करते और पछताते भी नहीं, उन्हें कठोर नरक मिलते हैं। मैं ये सब आपके सामने इसलिए रख रहा हूँ कि आप देखें अर्जुन ने कितनी सावधानी से अपनी बात रखी है। उसने कोई चीज़ अपनी तरफ़ से जोड़ी नहीं। हर कड़ी के पीछे परंपरा खड़ी है, और आखिरी कड़ी के पीछे गुरुओं की सुनी हुई वाणी।
फिर भी एक बात है जो मुझे बहुत सोचने पर मजबूर करती है। जब मन डर रहा हो, तो वो अपने सबसे बड़े तर्क के लिए वहीं पहुँचता है जिसे जाँचा नहीं जा सकता। "लोग कहते हैं", "बड़े बताते आए हैं", "शास्त्र में लिखा है।" इनमें से हर वाक्य कभी सच होता है और कभी सिर्फ़ ढाल। फ़र्क इससे नहीं पड़ता कि वाक्य क्या है। फ़र्क इससे पड़ता है कि उसे कौन, किस घड़ी में, किस काम के लिए उठा रहा है। जो आदमी शान्त मन से पूछता है कि शास्त्र क्या कहता है, और जो आदमी काँपते हाथों से शास्त्र को ढाल बनाकर खड़ा होता है, वे दोनों एक ही श्लोक उठा सकते हैं, पर वे एक ही काम नहीं कर रहे।
अब पैंतालीसवाँ श्लोक। यहाँ अर्जुन का स्वर बदल जाता है। "अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्। यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः।" हाय! कितने खेद की बात है कि हम इतना बड़ा पाप करने को तैयार हो गए हैं, कि राज्य और सुख के लोभ से अपने ही लोगों को मारने को उद्यत हैं।
श्रीधर स्वामी इस श्लोक को ऐसे खोलते हैं: "अहो बत" यानी हाय, कितना कष्ट है। हम ने बड़े पाप का निश्चय कर लिया था। और मधुसूदन इसमें एक और बात देखते हैं। कोई कह सकता है कि अगर तुम्हारी बुद्धि अब ऐसी है, तो इतने उत्साह से युद्ध के लिए आए ही क्यों थे? मधुसूदन उत्तर देते हैं कि अर्जुन ने बिना सोचे-समझे, एक उद्दण्डता में ऐसा किया था। यानी अर्जुन अपने ऊपर बैठकर अपना ही मुकदमा सुन रहा है।
संत ज्ञानेश्वर इसमें एक बहुत मार्मिक पंक्ति डालते हैं। वो अर्जुन के मुँह से कहलवाते हैं कि प्रभु, ये सब मैं कानों से सुनता हूँ, और फिर भी मुझे अभी तक त्रास नहीं हुआ। मेरा हृदय क्या वज्र का है? और जिस राज्य-सुख के लिए ये सब हो रहा है, वो क्षणिक है, ये जानते हुए भी मैं उसे ठुकरा नहीं पा रहा। ये आत्मग्लानि है।
अब मैं आपको एक बारीक बात दिखाता हूँ। अड़तीसवें श्लोक में "लोभ" शब्द आया था, और वो दूसरों के लिए था। "यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः", लोभ से जिनकी बुद्धि मारी गई है। कौरवों का लोभ। और पैंतालीसवें श्लोक में वही शब्द अर्जुन अपने ऊपर रखता है। "राज्यसुखलोभेन", राज्य और सुख के लोभ से। लेकिन ज़रा पीछे चलिए। तैंतीसवें श्लोक में अर्जुन ने क्या कहा था? कि जिनके लिए हमने राज्य, भोग और सुख चाहे थे, वे ही यहाँ खड़े हैं। यानी तब वो चाह "उनके लिए" थी। अब वही चाह "लोभ" कहलाने लगी है। फ़ैसला पहले हो चुका था, और अब तर्क पीछे मुड़कर उसके अतीत को भी नया रंग दे रहे हैं।
आपने भी कभी ऐसा किया होगा। कोई बड़ा काम छोड़ने से पहले हम अपने बीते साल को ही नई नज़र से पढ़ने लगते हैं। "मैंने तो वो दुकान सिर्फ़ पैसे के लालच में खोली थी।" "मैंने तो वो पद केवल नाम के लिए चाहा था।" और ये बातें बिल्कुल झूठ नहीं होतीं, उनमें कुछ सच भी होता है। पर जब ये सारी आत्मग्लानि एक ही दिशा में ले जाए, और वो दिशा हमेशा पीछे हटने की हो, तो रुककर पूछना चाहिए कि ये ईमानदारी बोल रही है या थकान।
और यहाँ भी महाभारत एक उदाहरण देता है, जो मुझे सोचने पर मजबूर करता है। जब व्यास ने धृतराष्ट्र को युद्ध के शकुन गिनाए, और समझाया, तब धृतराष्ट्र ने उसी बातचीत में पहले क्या कहा था? उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि ये बहुत पहले से तय था। मनुष्यों का संहार तो होगा ही। और अगर राजा लोग क्षत्रिय का धर्म निभाते हुए युद्ध में मारे जाएँ, तो वे वीरों के लोक को जाएँगे और शुद्ध सुख पाएँगे।" ये भीष्म पर्व के तीसरे अध्याय में है।
देखा आपने? वही राजा, वही युद्ध, वही शास्त्र, पर तर्क उलटी दिशा में। धृतराष्ट्र ने "क्षत्रिय के धर्म से मरने वाले को स्वर्ग मिलता है" वाला शास्त्र उठाया और उसी से अपने मन को समझाया। अर्जुन ने "अपनों को मारने से नरक मिलता है" वाला शास्त्र उठाया और अपनी पीछे हटने की इच्छा को सही ठहराया। दोनों शास्त्र सच्चे हैं। दोनों वचन पुराने हैं। पर दोनों बार उसे उठाने वाला हाथ पहले से कुछ और चाह चुका था। शास्त्र वही दे देता है जो हम उससे लेने आए हैं।
पर अभी एक बात बाकी है। अर्जुन ने अब सब कह दिया। अब बस दो श्लोक बचे हैं। एक वो जिसमें वो अपनी आखिरी इच्छा बताता है, जो शायद पूरे अध्याय का सबसे हैरान कर देने वाला वाक्य है। और दूसरा वो जिसमें सञ्जय, जो इतनी देर से अर्जुन को बोलने दे रहे थे, खुद फिर बोलते हैं। चलिए, सुनते हैं।
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ ४७ ॥
छियालीसवाँ श्लोक अर्जुन की आखिरी इच्छा है। "यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः। धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्।" अगर हाथ में शस्त्र लिए धृतराष्ट्र के पुत्र युद्ध में मुझ निहत्थे को, जो सामना भी न करे, मार डालें, तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।
ज़रा ठहरकर देखिए कि अर्जुन कहाँ से चला था, और कहाँ पहुँचा। पहले श्लोकों में वो कह रहा था कि मैं उन्हें नहीं मारूँगा। और अब वो कह रहा है कि वे मुझे मार डालें तो भी अच्छा है। तर्क जब एक बार अपनी दिशा पकड़ लेता है, तो वो पहली मंज़िल पर रुकता नहीं, वो आगे चलता जाता है। "मैं युद्ध नहीं चाहता" से "मैं मिट जाऊँ तो ठीक है" तक पहुँचने में बस पन्द्रह श्लोक लगे।
मैं यहाँ एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहूँगा। जब कभी आपका अपना मन थकान में इस तरह की भाषा बोलने लगे, कि मैं हट जाऊँ, मैं न रहूँ तो बेहतर, तो उसे अकेले मत सुलझाइए। किसी अपने के पास बैठिए और कह दीजिए। अर्जुन के पास भी बैठने के लिए कोई था। और वो बैठा भी, जैसा हम अभी देखेंगे।
मधुसूदन सरस्वती इस श्लोक को अर्जुन के अपने ढंग से खोलते हैं। वो कहते हैं कि अर्जुन की सोच ये है कि प्राणियों की अहिंसा प्राण से भी बड़ा धर्म है। इसलिए जीने की अपेक्षा मरना ही मेरे लिए ज़्यादा हितकर है। और "अप्रतीकार" के वो दो अर्थ करते हैं। एक, कि मैं अपने प्राण बचाने के लिए कुछ करूँगा ही नहीं। और दूसरा, कि बिना किसी और प्रायश्चित्त के, मृत्यु ही मेरे लिए प्रायश्चित्त हो जाएगी। संत ज्ञानेश्वर कहते हैं कि अर्जुन अपने सारे कुल को देखकर यहाँ पहुँचा कि ऐसा राज्य तो केवल नरक का भोग है।
अब मैं आपको उसी सुबह की एक और घटना सुनाता हूँ, जो महाभारत में गीता के ठीक बाद आती है, भीष्म पर्व के तैंतालीसवें अध्याय में। गीता खत्म हो चुकी है। अर्जुन ने फिर गाण्डीव उठा लिया है और बाण हाथ में हैं। सेनाएँ आमने-सामने हैं। और तब युधिष्ठिर कुछ ऐसा करते हैं जो पूरी सेना को चौंका देता है। वो अपना कवच उतारते हैं, अपने हथियार रख देते हैं, रथ से उतर जाते हैं, और हाथ जोड़कर पैदल, चुपचाप, शत्रु की सेना की ओर चल पड़ते हैं। अर्जुन तुरंत रथ से उतरकर उनके पीछे चल देता है। भीम पूछते हैं कि आप कहाँ जा रहे हैं, हथियार छोड़कर, शत्रुओं की ओर? नकुल पूछते हैं, सहदेव पूछते हैं। और युधिष्ठिर किसी को उत्तर नहीं देते।
श्रीकृष्ण मुस्कुराकर कहते हैं कि मैं समझ गया, वे क्या करने जा रहे हैं। वे अपने बड़ों से, भीष्म, द्रोण, कृप और शल्य से, लड़ने की अनुमति लेने जा रहे हैं। और श्रीकृष्ण कहते हैं कि पुरानी बातें कहती हैं कि जो अपने बड़ों से अनुमति लिए बिना लड़ता है, उसे उन बड़ों का शाप लगता है। पर जो शास्त्र के अनुसार अनुमति लेकर उनसे लड़ता है, उसकी जीत पक्की है। उधर कौरवों की सेना में लोग हँसने लगते हैं कि ये युधिष्ठिर तो अपने कुल का कलंक है, डर गया है, भीष्म की शरण माँगने आ रहा है।
युधिष्ठिर भीष्म के चरण पकड़ते हैं और कहते हैं, "हे अजेय, मैं आपसे अनुमति माँगता हूँ। हम आपसे लड़ेंगे। मुझे अनुमति और आशीर्वाद दीजिए।" और भीष्म कहते हैं, "अगर तुम इस तरह मेरे पास न आते, तो मैं तुम्हें हार का शाप दे देता। मैं प्रसन्न हूँ। लड़ो, और विजय पाओ।" फिर भीष्म एक बात कहते हैं जो मुझे बहुत भीतर तक छूती है। वो कहते हैं, "मनुष्य धन का दास है, धन किसी का दास नहीं। कौरवों ने मुझे धन से बाँध रखा है।" द्रोण भी यही बात कहते हैं, और ये भी कि मैं कौरवों की ओर से लड़ूँगा, पर तुम्हारी जीत की कामना करूँगा।
ज़रा सोचिए। यहाँ भी वही लोग हैं जिनके सामने अर्जुन ने अपना धनुष गिरा दिया था। वही भीष्म, वही द्रोण। और यहाँ भी वही दृश्य है, एक निहत्था पाण्डव शत्रु की सेना के सामने। पर ये दृश्य अर्जुन वाले दृश्य से उलटा है। अर्जुन ने बैठकर कहा था कि वे मुझे मार डालें। युधिष्ठिर ने झुककर कहा, मुझे अनुमति दीजिए, मैं लड़ूँगा। मैं इसे अर्जुन के तर्कों का जवाब नहीं कहूँगा। ये जवाब नहीं है। ये एक दूसरा रास्ता है, जिसमें बड़ों का आदर भी है, और अपना कर्तव्य भी, और दोनों के बीच कोई तर्क नहीं, बस एक झुका हुआ सिर और एक सीधी पीठ। और इसी रास्ते पर गीता के बाद अर्जुन खुद चलता है, रथ से उतरकर, उनके पीछे।
अब सैंतालीसवाँ श्लोक, जो इस अध्याय का आखिरी श्लोक है। और देखिए, इसमें एक नाम फिर लौट आया है: सञ्जय। इतनी देर से अर्जुन बोल रहा था, और अब सुनाने वाला खुद बोलता है।
"एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः।" युद्धभूमि में ऐसा कहकर, शोक से व्याकुल मन वाले अर्जुन बाणसहित धनुष छोड़कर रथ के पिछले भाग में बैठ गए।
याद कीजिए कि सञ्जय ये सब किसे सुना रहे हैं। उसी अन्धे राजा को, हस्तिनापुर के महल में, जो इस पूरे समय चुपचाप सुन रहा है। और महाभारत के आदि पर्व में, जहाँ धृतराष्ट्र अपनी हार के कारण गिनाते हैं, वहाँ एक पंक्ति है जो हमने पहले सत्संग में सुनी थी। वो कहते हैं, "जब मैंने सुना कि अर्जुन रथ के पिछले भाग में निराश होकर बैठ गए, और तब श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने शरीर में सारे लोक दिखाए, तब हे सञ्जय, मुझे विजय की आशा नहीं रही।" आज आपने वही क्षण सुना, जिसकी खबर धृतराष्ट्र को हार की तरह मिली थी। और अब आप जानते हैं कि उस बैठ जाने के पीछे कितनी लंबी सीढ़ी थी।
तिलक महाराज इस श्लोक पर एक छोटी-सी बात लिखते हैं। वो कहते हैं कि उस समय रथ में खड़े होकर लड़ने का नियम था, तो "रथ में बैठ गया" कहने का मतलब यही होता है कि अब लड़ने की इच्छा नहीं रही। और मधुसूदन सरस्वती "उपाविशत्" शब्द के "उप" पर रुकते हैं। उप यानी समीप। वो इसे इस तरह भी पढ़ते हैं कि शोक से व्याकुल अर्जुन धनुष-बाण छोड़कर भगवान के समीप जा बैठे, भक्ति और ज्ञान पाने के लिए। ज़रा सोचिए। जिस घड़ी में अर्जुन को लग रहा है कि सब कुछ टूट गया, उसी घड़ी में उसकी जगह श्रीकृष्ण के बगल में है।
अब इस पूरे अध्याय का सार। रामानुजाचार्य एक ही वाक्य में अर्जुन की पूरी दशा को बाँध देते हैं। वो कहते हैं कि ये अर्जुन उदार मन वाला है, अत्यन्त करुणावान, बन्धुओं से गहरा स्नेह रखने वाला, परम धार्मिक। इसे कौरवों ने बार-बार घातक उपायों से ठगा, लाख के घर जैसे उपायों से। परमपुरुष इसके साथ हैं, फिर भी अपने लोगों को मरने वाला देखकर, बन्धुओं के स्नेह से, परम करुणा से, और धर्म-अधर्म के भय से, इसके सारे अंग पसीने से भीग गए। और तब इसने कहा कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, और बन्धुओं के बिछोह के शोक से अधीर होकर धनुष-बाण छोड़कर रथ में बैठ गया। ध्यान दीजिए कि इस एक वाक्य में धर्म का भय और भीगे हुए अंग साथ-साथ हैं। जिस मन से अर्जुन के शास्त्र निकले, उसी मन के अंग काँप रहे थे।
और अब वो बात जो मैंने आपसे शुरू में कही थी, कि इस अध्याय के आखिर में आएगी। शंकराचार्य की श्लोक-वार टीका दूसरे अध्याय के दसवें श्लोक से शुरू होती है। उससे पहले के श्लोकों पर उनकी अलग टीका नहीं है। पर दसवें श्लोक पर पहुँचकर वो पीछे मुड़कर पूरे पहले अध्याय को एक नज़र में देखते हैं। वो कहते हैं कि "दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं" से लेकर अर्जुन के चुप हो जाने तक, ये पूरा हिस्सा इसलिए है कि प्राणियों के शोक और मोह की जड़ दिखाई जा सके, जो संसार के बीज हैं। और वो जड़ क्या है? वो कहते हैं कि अर्जुन ने राज्य, गुरु, पुत्र, मित्र, सुहृद, स्वजन, सम्बन्धी और बान्धवों के बारे में "मैं इनका हूँ, ये मेरे हैं" ऐसा भाव रखा। उसी भाव से जो स्नेह बँधा, और उस स्नेह के टूटने से जो अलगाव आने वाला था, उसी से अर्जुन के भीतर शोक और मोह उठे।
मैं चाहता हूँ कि आप इस वाक्य को पकड़ लें, क्योंकि यही आज की पूरी बात खोलता है। शंकराचार्य की इस सूची को देखिए: राज्य, गुरु, पुत्र, मित्र, सुहृद, स्वजन, सम्बन्धी। ये सूची चौंतीसवें श्लोक की उस सूची से बहुत मिलती है जो अर्जुन ने गिनाई थी। यानी अर्जुन के हर तर्क के नीचे, कुल, पितर, वर्ण, आततायी, सब के नीचे, एक ही बात बैठी थी: "मेरे"। मधुसूदन ने यही बात पहले सत्संग में, गीता के पहले ही श्लोक पर कही थी। शंकराचार्य इसे साफ़ शब्दों में जड़ कह देते हैं। और जब शोक से भरी बुद्धि के हाथ में तर्क आते हैं, तो वे उस "मेरे" की रक्षा में सबसे अच्छे वकील बन जाते हैं। यही मोह है।
हमारी अपनी टीका इस अध्याय का अंत इस वाक्य से करती है: अर्जुन का तर्क हर बात में गलत नहीं है, पर उसकी नींव गलत है। वे शरीर को ही व्यक्ति मान रहे हैं और अपने कुटुम्बियों को "मेरे"। इसी से उनका शोक उन्हें कर्तव्य छोड़ने तक ले जाता है। और शेष गीता इसी नींव को हटाने से आरम्भ होती है। मुझे यही बात इस अध्याय की सबसे सुंदर बात लगती है। श्रीकृष्ण अर्जुन के एक-एक तर्क का खण्डन नहीं करने जा रहे। वो तर्कों से नहीं, नींव से बात करेंगे।
मधुसूदन सरस्वती अपने पहले अध्याय का अंत एक सवाल से करते हैं, जो शायद आपके मन में भी आया होगा। वो कहते हैं कि कोई पूछ सकता है, अर्जुन तो अब शिष्य बन ही चुका है, उपदेश अगले अध्याय के पहले ही श्लोकों से शुरू हो जाता है, तो इस पहले अध्याय का क्या प्रयोजन? और खुद उत्तर देते हैं कि इसका प्रयोजन करुणा के उमड़ आने को समझाना है। और वो पद्म पुराण के गीता-माहात्म्य का एक श्लोक भी देते हैं कि जो इस पहले अध्याय को पढ़ता या स्मरण करता है, उसके लिए संसार का भवसागर, जो पार करने में बहुत कठिन है, कठिन नहीं रहता। तो पहला अध्याय व्यर्थ नहीं है। जिस दिन हम उसे ठीक से सुन लेते हैं, उस दिन हमारे अपने भीतर की सीढ़ी हमें दिखने लगती है।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। अपने तर्कों का क्रम देखिए। जब कोई बड़ी बात आपके मन में उठे, तो रुककर पूछिए कि फ़ैसला पहले आया था या कारण पहले? अर्जुन के बत्तीसवें श्लोक में फ़ैसला पहले आया, और तैंतीसवें से कारण आने शुरू हुए। इसका मतलब ये नहीं कि फ़ैसला गलत है। इसका मतलब बस इतना है कि जो कारण बाद में आए हैं, उनकी जाँच आपको ख़ुद करनी है।
दूसरी बात। हर तर्क के नीचे देखिए कि "मेरे" कहाँ बैठा है। जब आपके सारे कारण किसी एक ही चीज़ की रक्षा में खड़े हों, कोई रिश्ता, कोई पद, कोई पहचान, तो वही आपकी असली बात है, और बाकी सब उसके वकील। और याद रखिए कि सबसे कठिन मोह वो है जो प्रेम की भाषा में बोले, क्योंकि उस पर शक करना भी हमें बुरा लगता है।
तीसरी बात। बैठ जाने में कोई शर्म नहीं। दुनिया का सबसे बड़ा धनुर्धर भी रथ में बैठ गया, अपने तीर नीचे रखकर। पर ध्यान दीजिए कि वो कहाँ बैठा। उसी रथ में, श्रीकृष्ण के बगल में। जिस दिन आप टूटें, उस दिन भी रथ वही रहता है, और लगाम पकड़ने वाला वही रहता है। अर्जुन टूटा, तभी गीता मिली।
अगली बार हम दूसरे अध्याय में उसी रथ पर लौटेंगे। श्रीकृष्ण, जो अब तक बहुत कम बोले हैं, पहली बार लंबी बात कहेंगे। और वो अर्जुन के किसी तर्क पर नहीं बोलेंगे। वो पहले उस हालत का नाम लेंगे जिसमें अर्जुन बैठा है। "कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।" अर्जुन, यह मोह, यह मन का धुंधलापन, तुम्हें इस कठिन समय में कहाँ से आ गया? दूसरा अध्याय इसी जगह से शुरू होता है, जहाँ पहला अध्याय खत्म हुआ। अर्जुन के विषाद से। क्योंकि दवा वहीं से शुरू होती है जहाँ बीमारी को पहचान लिया जाता है।
जय श्री कृष्ण।
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ ४७ ॥
तीन बातें
- अपने तर्कों का क्रम देखिए। जब कोई बड़ी बात आपके मन में उठे, तो रुककर पूछिए कि फ़ैसला पहले आया था या कारण पहले? अर्जुन के बत्तीसवें श्लोक में फ़ैसला पहले आया, और तैंतीसवें से कारण आने शुरू हुए। इसका मतलब ये नहीं कि फ़ैसला गलत है। इसका मतलब बस इतना है कि जो कारण बाद में आए हैं, उनकी जाँच आपको ख़ुद करनी है।
- हर तर्क के नीचे देखिए कि "मेरे" कहाँ बैठा है। जब आपके सारे कारण किसी एक ही चीज़ की रक्षा में खड़े हों, कोई रिश्ता, कोई पद, कोई पहचान, तो वही आपकी असली बात है, और बाकी सब उसके वकील। और याद रखिए कि सबसे कठिन मोह वो है जो प्रेम की भाषा में बोले, क्योंकि उस पर शक करना भी हमें बुरा लगता है।
- बैठ जाने में कोई शर्म नहीं। दुनिया का सबसे बड़ा धनुर्धर भी रथ में बैठ गया, अपने तीर नीचे रखकर। पर ध्यान दीजिए कि वो कहाँ बैठा। उसी रथ में, श्रीकृष्ण के बगल में। जिस दिन आप टूटें, उस दिन भी रथ वही रहता है, और लगाम पकड़ने वाला वही रहता है। अर्जुन टूटा, तभी गीता मिली।