गीता सार - अध्याय 1
गीता 1.20–1.30 · 76 मिनट
अपनों के सामने हिम्मत क्यों टूटती है
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २० ॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ २१ ॥
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥
पिछली बार हम वहाँ रुके थे जहाँ शंख बज रहे थे। ऐसे शंख, कि सञ्जय ने अन्धे राजा से कहा था, उनकी गूँज ने आपके पुत्रों के हृदय चीर दिए। आज वो गूँज थम चुकी है। और जो सामने है, वो उस शोर से कहीं ज़्यादा भारी है। एक धनुर्धर, अपने ही रथ पर खड़ा, अपने ही परिवार को देख रहा है।
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। ये गीता ज्ञान का दूसरा सत्संग है। पहले सत्संग में हमने गीता के पहले उन्नीस श्लोक सुने थे: एक अन्धे पिता का सवाल, एक डरे हुए दुर्योधन की गिनती, और अंत में वो शंख, जिनके आगे कौरवों का सारा शोर खो गया। अगर आपने वो नहीं सुना, तो भी चिंता की कोई बात नहीं। गीता की खूबी यही है कि आप जिस श्लोक पर खड़े हों, वहीं से आगे चल सकते हैं। पर जिन्होंने सुना है, उन्हें याद होगा कि पिछली बार हमने डर को बाहर से देखा था, दुर्योधन के डर को, धृतराष्ट्र के डर को। आज हम डर को भीतर से देखेंगे। और ये डर वैसा नहीं है जैसा आप सोच रहे हैं।
आज के ग्यारह श्लोक एक ही सवाल के इर्द-गिर्द घूमते हैं, और मुझे लगता है कि ये सवाल हममें से बहुत से लोगों के अपने जीवन का सवाल है: अपनों के सामने हिम्मत क्यों टूट जाती है? सोचिए। दफ़्तर में किसी अनजान आदमी से कड़ी बात कह देना हमें आ जाता है। बाज़ार में किसी से बहस कर लेना भी आ जाता है। पर पिता से एक सीधी बात कहनी हो, बड़े भाई से हिसाब माँगना हो, या बरसों पुराने दोस्त से कहना हो कि अब ये रिश्ता ऐसे नहीं चलेगा, तो गला सूख जाता है, हाथ ठंडे पड़ जाते हैं, और जो बात रात भर दिमाग में तैयार थी, वो सामने जाते ही कहीं खो जाती है। ये दृश्य हमारी अपनी ज़िंदगी से हैं, गीता के नहीं। पर गीता का अर्जुन ठीक इसी जगह खड़ा है, बस उसके हाथ में धनुष है और उसके सामने दो सेनाएँ।
और एक बात मैं शुरू में ही कह दूँ, ताकि आप पूरे सत्संग में इसे याद रखें। अर्जुन यहाँ डरपोक नहीं है। जो आदमी आज कुछ ही देर में काँपने वाला है, वो इस पृथ्वी का सबसे निडर योद्धा है। और इसी वजह से ये कहानी हमारे काम की है। क्योंकि अगर टूटने वाला कोई कमज़ोर आदमी होता, तो हम कहकर छुट्टी पा लेते कि हम तो उस जैसे नहीं हैं। पर जब सबसे मज़बूत आदमी टूटता है, तब पता चलता है कि टूटना कमज़ोरी की निशानी नहीं, किसी और चीज़ की निशानी है। वो चीज़ क्या है, यही आज हम ढूँढेंगे। हम तीन बातें देखेंगे, इसी क्रम में। पहले ये कि अर्जुन इस पल से ठीक पहले कैसा था। फिर ये कि उसने क्या देखा। और फिर ये कि उसका शरीर उसे क्या कहने लगा। पहले की बात न समझें, तो बाद की बात नहीं समझ आती।
तो शुरू करते हैं बीसवें श्लोक से। "अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।" तब, जब शस्त्र चलने का समय आ गया था, धृतराष्ट्र के पुत्रों को डटे हुए देखकर, जिसकी ध्वजा पर हनुमान् हैं, उन पाण्डुपुत्र अर्जुन ने धनुष उठाया।
देखिए इसमें कितनी बातें एक साथ हैं। पहली बात, "धनुरुद्यम्य", धनुष उठाया। यानी अर्जुन का हाथ अभी धनुष पर है, और बहुत मज़बूती से है। दूसरी बात, "प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते", शस्त्र चलने का समय। यानी पहला बाण छूटने में कुछ ही पल बाकी हैं। और तीसरी बात, जो इस श्लोक की सबसे सुन्दर बात है, वो एक शब्द में है: "कपिध्वजः"। जिसकी ध्वजा पर वानर है।
ये ध्वजा कौन-सी है, और उस पर वानर कैसे आया? महाभारत हमें ये बताता है। आदि पर्व में खाण्डव वन की कथा है, जहाँ अग्नि देव अर्जुन और श्रीकृष्ण से सहायता माँगते हैं। उसी कथा में अग्नि के कहने पर वरुण देव एक अद्भुत धनुष देते हैं, जिसका नाम गाण्डीव है, दो ऐसे तरकश जिनके बाण कभी खत्म नहीं होते, और एक रथ, जिसकी ध्वजा पर एक दिव्य वानर बैठा है। पाठ ये भी बताता है कि उस वानर का नाम हनुमान् था, कि वो बहुत तेजस्वी था और अपनी इच्छा से कोई भी रूप ले सकता था, और कि उसकी गर्जना से शत्रु-सेनाएँ अपनी सुध-बुध खो बैठती थीं। और जब अर्जुन ने उस धनुष को पहली बार पकड़कर उसकी डोरी चढ़ाई, तो पाठ कहता है कि जिन्होंने उसकी टंकार सुनी, उनके मन काँप उठे।
इसी बात को आगे चलकर वन पर्व में एक और रूप में कहा गया है। जब भीमसेन गन्धमादन पर्वत पर अपने भाई हनुमान् से मिलते हैं, तो दोनों ही वायु देव के पुत्र हैं, और हनुमान् भीम से कहते हैं, "भाई होने के कारण और प्रेम से मैं तुम्हारा प्रिय कार्य करूँगा। विजय के, यानी अर्जुन के, ध्वज पर बैठकर मैं ऐसे भयानक नाद करूँगा जो शत्रुओं के प्राण हर लेंगे।" यानी जब अर्जुन के रथ पर वो ध्वजा लहरा रही थी, तब उसमें सिर्फ़ एक चिह्न नहीं था, एक वचन भी था। रामायण का वो वानर, जिसने समुद्र लाँघा था और लंका जलाई थी, अर्जुन के ऊपर बैठा था।
अब इसके साथ दूसरी बात जोड़िए। अर्जुन का सारथि कौन है? श्रीकृष्ण। और ये भी संयोग से नहीं हुआ। उद्योग पर्व में कथा है कि युद्ध से पहले दुर्योधन और अर्जुन दोनों द्वारका गए थे, श्रीकृष्ण की सहायता माँगने। श्रीकृष्ण ने कहा कि एक ओर मेरी नारायणी नाम की दस करोड़ वीर ग्वालों की सेना है, और दूसरी ओर अकेला मैं, जो युद्ध नहीं करूँगा और हथियार नहीं उठाऊँगा। पहले चुनने का हक छोटे को था, यानी अर्जुन को। और अर्जुन ने बिना हिचक के निहत्थे श्रीकृष्ण को चुन लिया। दुर्योधन पूरी सेना पाकर बहुत खुश हुआ। फिर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा, "मैं तो लड़ूँगा नहीं, फिर तुमने मुझे किस सोच से चुना?" और अर्जुन का उत्तर बड़ा प्यारा है। उसने कहा, "मेरी बहुत दिनों से यह इच्छा रही है कि आप मेरे सारथि बनें।" और श्रीकृष्ण ने कहा, "मैं तुम्हारा सारथि बनूँगा; तुम्हारी इच्छा पूरी हो।"
तो ज़रा तस्वीर देखिए। धनुष गाण्डीव। ध्वजा पर हनुमान्। रथ की लगाम श्रीकृष्ण के हाथ में। और धृतराष्ट्र खुद, आदि पर्व में, अपना दुख गिनाते हुए कहते हैं कि जब मैंने सुना कि वासुदेव और अर्जुन, और वो अतुलनीय गाण्डीव, ये तीनों प्रचण्ड शक्तियाँ एक साथ मिल गईं, तब हे सञ्जय, मुझे विजय की आशा नहीं रही। यानी अर्जुन के पास जो कुछ हो सकता था, वो सब था। बल, अस्त्र, ध्वजा, सारथि, और सबसे ऊपर, वरदान। फिर भी, अगले ही श्लोकों में, वो टूट जाएगा। इसलिए हमें ये समझना ज़रूरी है कि वो किसी चीज़ की कमी से नहीं टूटा।
और एक बात और। मधुसूदन सरस्वती इस बीसवें श्लोक के बारे में कहते हैं कि पिछले श्लोकों में सञ्जय ने कौरवों का डर दिखाया था, और अब वे पाण्डवों की उलटी तस्वीर दिखा रहे हैं। जब डर पैदा हो चुका था, तब भी कौरव अपनी जगह डटे रहे। और उनके सामने कपिध्वज अर्जुन, मधुसूदन के शब्दों में, सब तरह से भय से खाली होकर, युद्ध के लिए गाण्डीव उठाता है। नीलकण्ठ भी यही कहते हैं कि "कपिध्वज" और "पाण्डव" इन दो नामों से सञ्जय एक डरावनी ध्वजा और एक शूरवीर की तस्वीर दिखाते हैं। ज्ञानेश्वर महाराज इसे और सरल ढंग से कहते हैं। वो लिखते हैं कि अर्जुन ने उधर देखा, तो मन में संतोष हुआ, और फिर खेल-खेल में, जैसे कोई लीला हो, उसने अपना धनुष उठा लिया। खेल-खेल में। यानी इस क्षण तक अर्जुन के लिए ये युद्ध कोई बड़ी उलझन नहीं, एक अपना काम है, जिसे वो पूरे मन से करने आया है।
अब इक्कीसवाँ श्लोक। "हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।" हे राजन्, तब अर्जुन ने हृषीकेश से ये वचन कहा। ध्यान दीजिए, सञ्जय यहाँ धृतराष्ट्र को "महीपते" कहकर पुकारते हैं, पृथ्वी के स्वामी। और मधुसूदन सरस्वती इसमें भी एक हल्की चुभन पकड़ते हैं। वो कहते हैं कि इस संबोधन में सञ्जय राजा को याद दिला रहे हैं कि जिस राज्य पर आप बैठे हैं, वो बिना विचार किए लिया गया है, और जहाँ नीति और धर्म न हों, वहाँ जीत नहीं टिकती।
और अर्जुन क्या कहता है? "सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।" हे अच्युत, मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए।
"स्थापय।" खड़ा कीजिए। ये आज्ञा की भाषा है। अर्जुन सारथि को आदेश दे रहा है, और सारथि कौन है? वही जो सारे संसार का स्वामी है। हमारी टीका इस पर एक छोटी, पर बहुत सुन्दर बात कहती है। "अच्युत" का अर्थ है जो कभी नहीं गिरता। अर्जुन श्रीकृष्ण को सारथी की तरह आदेश देते हैं, और श्रीकृष्ण मानते हैं। और जो यहाँ सेवा कर रहे हैं, वही आगे उपदेश देंगे। मधुसूदन सरस्वती इसे और खोलते हैं। वो कहते हैं, भक्तों के लिए क्या असंभव है, जब भगवान भी उनकी आज्ञा का पालन करते हैं? इसलिए पाण्डवों की विजय निश्चित है। और "अच्युत" शब्द में वो एक छोटा-सा उत्तर देखते हैं। मान लीजिए श्रीकृष्ण को ये चिंता हो कि रथ को बीच में खड़ा करूँगा तो ये शत्रु कहीं मुझे हटा न दें। तो "अच्युत" कहकर अर्जुन जैसे कह देता है कि आपको, किसी भी जगह, किसी भी समय, कौन अपनी जगह से हटा सकता है?
और यहाँ एक बात पर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ। गीता का सबसे बड़ा उपदेशक, जो आने वाले अध्यायों में ऐसे वचन कहेगा जिन पर हज़ारों साल से टीकाएँ लिखी जा रही हैं, वो इस पल एक ऐसे आदमी की आज्ञा मान रहा है जो उसका सखा है, और जो अभी उसका शिष्य नहीं बना है। श्रीकृष्ण उपदेश तब नहीं देते जब अर्जुन उन्हें रथ चलाने को कहता है। वो उपदेश तब देते हैं जब अर्जुन खुद कहेगा, "मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे सिखाइए।" और उन दोनों बातों के बीच एक पूरा टूटना है, जो हम इसी सत्संग में सुनेंगे। तब तक श्रीकृष्ण सिर्फ़ रथ चलाते हैं, और सुनते हैं।
अब बाईसवाँ श्लोक, जो पूरे अध्याय की चाबी है। "यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्। कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे।" जिससे मैं इन युद्ध की इच्छा से खड़े लोगों को देख लूँ, कि इस युद्ध की तैयारी में मुझे किनके साथ लड़ना है।
श्रीधर स्वामी यहाँ एक सीधा सवाल उठाते हैं, जो शायद आपके मन में भी आया होगा। वो कहते हैं, अर्जुन, तू तो योद्धा है, तू कोई तमाशा देखने वाला दर्शक नहीं है। तो फिर तू इन्हें देखना क्यों चाहता है? और उसका उत्तर इसी श्लोक में है: "कैर्मया सह", मुझे किनके साथ लड़ना है। मधुसूदन सरस्वती इसमें तीन बातें पकड़ते हैं। पहली, "योद्धुकामान्", यानी ये लोग युद्ध की इच्छा से आए हैं, हमसे सुलह करने की इच्छा से नहीं। दूसरी, "अवस्थितान्", यानी वे डटे हुए हैं, डर के मारे हिल नहीं गए हैं। और तीसरी, "कैर्मया सह", इसमें वे एक अजीब-सा कौतूहल सुनते हैं। भाइयों के बीच ही आपस में लड़ने की तैयारी है, और ये जानना कि मुझे किन-किन से भिड़ना है, यही रथ को बीच में खड़ा करने का कारण है।
नीलकण्ठ इस पंक्ति के दो अर्थ बताते हैं, और दोनों अच्छे हैं। एक अर्थ, मुझे किनके साथ लड़ना है। दूसरा अर्थ, कौन मुझे हराने की कोशिश कर रहा है। यानी अर्जुन देखना चाहता है कि कौन मेरा प्रतिद्वंद्वी है, और मैं किसे जीतने वाला हूँ। ये एक सजग योद्धा की सोच है, एक ऐसे आदमी की जो काम शुरू करने से पहले मैदान पढ़ लेना चाहता है।
और ये आदत अच्छी है, इसमें कोई शक नहीं। दुनिया का हर समझदार आदमी बड़ा फ़ैसला करने से पहले सामने वाले को देखना चाहता है। मकान का सौदा करने से पहले जगह देखता है। बड़ी बैठक में जाने से पहले जानना चाहता है कि कमरे में कौन-कौन बैठेगा। पर यहाँ एक बहुत बारीक बात है, जिसे हम आगे के श्लोकों में खुलते हुए देखेंगे। देखने की ये इच्छा बहुत सीधी लगती है, पर देखना हमेशा सिर्फ़ देखना नहीं होता। कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें एक बार देख लो तो फिर पहले जैसे नहीं रहा जाता। जिसने अपने पिता को एक बार बूढ़ा होते देख लिया, वो फिर पहले की तरह बहस नहीं कर पाता। जिसने किसी अपने की आँखों में डर देख लिया, वो फिर पहले की तरह कड़ा नहीं बोल पाता। अर्जुन भी कुछ ऐसा ही देखने जा रहा है।
पर अभी एक बात बाकी है। अर्जुन को ये जानने की जल्दी थी कि सामने कौन खड़ा है, और उसका सारथि, जो उसके मन का हर कोना जानता है, चुपचाप उसकी बात मानकर रथ चलाने जा रहा है। क्या श्रीकृष्ण जानते थे कि रथ रुकने पर क्या होगा? और रथ कहाँ रुकेगा? इसका उत्तर अगले श्लोकों में है, जहाँ सञ्जय खुद अपनी आवाज़ में बोलते हैं, और जहाँ पहली बार इस अध्याय में एक बड़ा ठहराव आता है।
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥
सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥
अब तेईसवाँ श्लोक। "योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः। धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः।" दुष्टबुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा से जो ये यहाँ इकट्ठे हुए हैं, उन लड़ने वालों को मैं देख लूँ।
दो शब्द ध्यान से सुनिए: "दुर्बुद्धेः" और "प्रियचिकीर्षवः"। दुर्योधन दुर्बुद्धि है, और जो लोग यहाँ खड़े हैं, वे उसका "प्रिय करने की इच्छा" से खड़े हैं। यानी, अर्जुन के मन में इस घड़ी में साफ़ बात ये है कि ये लोग यहाँ धर्म के लिए नहीं, दुर्योधन को खुश करने के लिए आए हैं। हमारी टीका इस श्लोक के बारे में एक छोटी पर बहुत ज़रूरी बात कहती है: इस समय तक अर्जुन आत्मविश्वासी योद्धा है। वो शत्रु को परखना चाहता है, युद्ध पर प्रश्न नहीं उठा रहा। इसे याद रखिए, क्योंकि पाँच-छह श्लोक बाद वही आदमी बिलकुल अलग बात कहेगा।
मधुसूदन सरस्वती इस श्लोक में एक आपत्ति पहले से उठाकर उसका उत्तर देते हैं। आपत्ति ये हो सकती है कि सामने तो सब अपने ही लोग हैं, वे आपस में सुलह करा देंगे, फिर युद्ध क्यों? और मधुसूदन का उत्तर है कि भीष्म, द्रोण जैसे लोग दुर्योधन का "प्रिय" करने के लिए युद्ध में आए हैं, उसकी बुद्धि का दोष मिटाने के लिए नहीं। इसलिए अर्जुन उन्हें "योत्स्यमान" कहता है, लड़ने वाले, "सन्धिकाम" नहीं, यानी सुलह चाहने वाले नहीं। नीलकण्ठ एक कदम और आगे जाते हैं। वो कहते हैं कि जब ये लोग दुर्बुद्धि का प्रिय करना चाहते हैं, तो इससे संकेत मिलता है कि वे भी उसी जैसे हो गए हैं।
और ज्ञानेश्वर महाराज ज्ञानेश्वरी में इसी बात को अपने ढंग से कहते हैं, और मुझे उनका ढंग बहुत अच्छा लगता है। वो लिखते हैं कि अर्जुन सोच रहे हैं, ये सब आए तो हैं, पर मुझे ये देखना ही पड़ेगा कि किससे लड़ना है। ये कौरव बहुत बेचैन और बिगड़े स्वभाव के हैं, और बिना किसी रास्ते के, बिना किसी वजह के, लड़ने की हवस बाँधे बैठे हैं। लड़ाई की चाह तो इनमें है, पर रणभूमि में सच्चे वीर ये नहीं हैं।
आगे बढ़ने से पहले आपसे एक छोटी-सी बात कहनी है। हम इस अध्याय के सबसे नाज़ुक मोड़ के पास आ रहे हैं। और आज की बात का सबसे ज़रूरी हिस्सा आख़िर में आएगा, जहाँ हम देखेंगे कि अपनों के सामने टूटने वाले इस आदमी को उसी मैदान पर थोड़ी देर बाद एक दूसरा रास्ता भी दिखता है। तो अगर आप ये सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता का ये सिलसिला बीच में न टूटे। और आज का सत्संग आख़िर तक सुनिए।
अब मैं आपको महाभारत के कुछ ऐसे पन्नों में ले चलता हूँ जो इस "योत्स्यमान" शब्द की कहानी कहते हैं। क्योंकि पाण्डव ये युद्ध चाहते नहीं थे। उद्योग पर्व में युधिष्ठिर, सञ्जय के हाथ राजा धृतराष्ट्र को सन्देश भेजते हैं, और उस सन्देश का सार ये है कि हे सुयोधन, पाँच भाइयों को पाँच गाँव दे दो, हमारे और सम्बन्धियों के बीच शान्ति रहे। पूरा राज्य नहीं, पूरा इन्द्रप्रस्थ नहीं। पाँच भाइयों के लिए पाँच गाँव। और जब श्रीकृष्ण शान्ति-दूत बनकर कौरवों की सभा में जाने लगे, तब भी युधिष्ठिर ने उनसे यही कहा कि हमने तो केवल पाँच गाँव माँगे थे। और जब सभा में दुर्योधन ने उत्तर दिया, तो उसके शब्द ये थे: "हे केशव, जब तक मैं जीवित हूँ, तब तक एक तेज़ सुई की नोक जितनी धरती भी पाण्डवों को नहीं दी जाएगी।" आदि पर्व में धृतराष्ट्र ने जब अपना शोक गिनाया, तब भी उन्होंने ये बात स्वीकार की: "मैंने सुना कि श्रीकृष्ण संसार के हित के लिए शान्ति चाहते हुए कौरवों के पास आए, शान्ति का प्रयास किया, और बिना सफल हुए लौट गए।"
और एक बात बहुत मार्मिक है। उद्योग पर्व में दुर्योधन का दूत उलूक जब पाण्डवों के पास आता है, तो लौटते समय युधिष्ठिर उसी के हाथ दुर्योधन को अपनी बात कहलवाते हैं, "मैं तो कीड़े और चींटी का भी बुरा नहीं चाहता। फिर अपने सम्बन्धियों का वध मैं कैसे चाह सकता हूँ? इसी लिए मैंने पहले केवल पाँच गाँव माँगे थे, ताकि मुझे तुम्हारा बड़ा विनाश न देखना पड़े।" यानी, जिस युद्ध के मैदान में अर्जुन अब रथ खड़ा करवा रहा है, उसे टालने की हर कोशिश पाण्डवों ने की थी। और इसीलिए अर्जुन का "योत्स्यमान" शब्द ठंडे हिसाब का नहीं, एक थके हुए आदमी का शब्द है, जिसने सुलह के दरवाज़े पर बहुत बार दस्तक दी है।
पर एक सवाल अब भी बचता है। भीष्म और द्रोण जैसे बड़े लोग, जो धर्म जानते हैं, जो दोनों पक्षों को अपना मानते हैं, वे इस पक्ष में क्यों खड़े हैं? इसका उत्तर महाभारत में दो जगह मिलता है, और दोनों बहुत कड़वे हैं। पहली जगह वो है जहाँ सारा बिगाड़ शुरू हुआ था, यानी जुए की सभा, जहाँ द्रौपदी को घसीटकर लाया गया। द्रौपदी वहाँ रोते हुए कहती हैं, "वह सभा नहीं जहाँ बड़े-बूढ़े न हों। वे बड़े-बूढ़े नहीं जो धर्म की बात न कहें।" और भीष्म, जो उस समय भी वहीं बैठे थे, खुद कहते हैं कि धर्म बहुत सूक्ष्म है, मैं तुम्हारे प्रश्न का ठीक-ठीक निर्णय नहीं कर सकता। और वो ये भी मानते हैं कि द्रोण जैसे बड़े-बूढ़े सिर झुकाए, मानो प्राणहीन होकर बैठे हैं। यानी उन बड़ों को भी पता था कि कुछ गलत हो रहा है, और वे चुप थे।
दूसरी जगह, जहाँ भीष्म की अपनी बात है, वो अभी आने वाली है। थोड़ी ही देर में, इसी मैदान पर, युधिष्ठिर पैदल चलकर भीष्म के पास जाएँगे, और तब भीष्म कहेंगे कि मनुष्य धन का दास है, धन किसी का दास नहीं, और कौरवों ने मुझे धन से बाँध रखा है। मैं उस दृश्य को आज के सत्संग के अंत के लिए रख रहा हूँ। अभी बस इतना याद रखिए कि इन बड़ों का वहाँ खड़ा होना उनकी इच्छा से भी ज़्यादा उनकी बँधी हुई स्थिति की बात है। और ये बात अर्जुन को भी आगे चलकर दिखेगी।
अब इसे अपने जीवन से जोड़िए। मधुसूदन सरस्वती ने जो भेद पकड़ा है, "योत्स्यमान" और "सन्धिकाम" का, वो एक बहुत व्यावहारिक भेद है। जब कोई अपना हमारे सामने खड़ा होता है, चाहे वो जायदाद के झगड़े में हो, या कारोबार के बँटवारे में, या किसी पुराने मनमुटाव में, तो हम अक्सर उसे एक ही रंग में देखते हैं, या तो पूरा दुश्मन, या पूरा अपना। पर सच ये है कि सामने खड़े हर आदमी की अपनी वजह होती है। कोई सचमुच लड़ना चाहता है। कोई बस किसी और की ख़ातिर वहाँ खड़ा है। कोई चाहता तो सुलह है, पर उसकी ज़ुबान साथ नहीं देती। अर्जुन इसी भेद को देखने के लिए रथ को बीच में चाहता है। ये समझदारी है, और बहुत से लोग यही नहीं करते। हम दूर से तय कर लेते हैं कि सामने वाला क्या चाहता है, और फिर उसी तय की हुई तस्वीर से लड़ते रहते हैं।
और अब चौबीसवाँ श्लोक, जहाँ पहली बार सञ्जय अपनी आवाज़ में लौटते हैं। "एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत। सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्।" गुडाकेश अर्जुन के ऐसा कहने पर हृषीकेश ने उस उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कर दिया।
यहाँ "गुडाकेश" शब्द है। हमारी टीका कहती है कि गुडाका का अर्थ निद्रा या आलस्य है, और गुडाकेश वो है जिसने उसे जीत लिया हो। यानी अर्जुन ऐसा आदमी है जो कभी असावधान नहीं होता। और सञ्जय "भारत" कहकर धृतराष्ट्र को पुकारते हैं। हमारी टीका के अनुसार यहाँ "भारत" का अर्थ धृतराष्ट्र है। श्रीधर स्वामी इस श्लोक में कोई बड़ी बात नहीं कहते, बस इतना कि निद्रा को जीतने वाले अर्जुन के इस प्रकार कहने पर हृषीकेश ने श्रेष्ठ रथ को सेनाओं के बीच खड़ा किया। पर मधुसूदन सरस्वती इसमें एक बहुत गहरी बात देखते हैं।
वो कहते हैं कि सञ्जय ने ये श्लोक एक विशेष कारण से कहा है। धृतराष्ट्र के मन में एक आशा थी, कि अर्जुन की बात मानकर भगवान, अहिंसा के धर्म का सहारा लेकर, शायद अर्जुन को युद्ध से ही रोक देंगे। और सञ्जय ये आशा मिटाना चाहते थे। इसलिए वो ज़ोर देकर बताते हैं कि भगवान ने न कुछ कहा, न रोका, बल्कि अर्जुन के कहे अनुसार रथ को ठीक बीच में खड़ा कर दिया। और "भारत" कहकर सञ्जय एक और संकेत देते हैं। मधुसूदन के शब्दों में, भरतवंश की मर्यादा याद करके अपने ही कुटुम्बियों से द्रोह छोड़ दो। एक नाम, और उसके पीछे इतनी बात।
और मधुसूदन एक बात और कहते हैं जो मुझे बहुत भाती है। वो कहते हैं कि भगवान ने ये नहीं सोचा, "मेरा ही सेवक मुझे ही सारथि बना रहा है", और इस बात से नाराज़ भी नहीं हुए। वो चुपचाप रथ लेकर चल दिए। ज्ञानेश्वर महाराज भी यही दृश्य अपने शब्दों में खींचते हैं: अर्जुन ने इतना कहा, और कृष्ण ने रथ आगे बढ़ा दिया, और दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कर दिया। ये रथ का रुकना एक ऐसी जगह था जहाँ से पूरी धरती के राजा, एक ओर से भी और दूसरी ओर से भी, अर्जुन को देख सकते थे, और अर्जुन उन्हें।
एक बात और, जो मैं आपसे चाहता हूँ कि आप सुनें। ये रथ मधुसूदन के शब्दों में "रथोत्तम" है, यानी रथों में सबसे उत्तम। पर इसकी उत्तमता किसी सोने-चाँदी में नहीं। मधुसूदन कहते हैं, ये वही दिव्य रथ है जो अग्नि का दिया हुआ है, और जिसे स्वयं भगवान सारथि बनकर चला रहे हैं, इसीलिए ये सबसे उत्तम है। जिस रथ का सारथि ठीक हो, वो रथ ही उत्तम है। यही बात हमारे जीवन के रथ पर भी लागू होती है।
पर अभी एक बात बाकी है। रथ तो रुक गया, ठीक बीच में, दोनों सेनाओं के सामने। अब अर्जुन को देखना है। पर श्रीकृष्ण कहाँ रथ खड़ा करते हैं, और क्या कहते हैं, इसमें इस पूरे अध्याय का सबसे चतुर और सबसे कोमल रहस्य छिपा है। इस पूरे अध्याय में श्रीकृष्ण के मुँह से सिर्फ़ एक वाक्य निकलेगा। और वो वाक्य क्या है, ये अगले श्लोकों में है।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥ २५ ॥
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥ २६ ॥
रथ रुक गया है। घोड़े शान्त हैं। हवा में हज़ारों रथों, हाथियों और घोड़ों की साँसें हैं। और बीच में एक अकेला रथ, जिस पर एक धनुर्धर और एक सारथि हैं। अब वो पल आता है जिसके लिए अर्जुन ने रथ को यहाँ बुलवाया था: देखना।
पच्चीसवाँ श्लोक। "भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्। उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति।" भीष्म और द्रोण के ठीक सामने, और सब राजाओं के सामने, श्रीकृष्ण ने कहा, "हे पार्थ, इन इकट्ठे हुए कुरुओं को देख लो।"
हमारी टीका इस श्लोक के लिए एक बहुत सुन्दर बात कहती है। पूरे पहले अध्याय में श्रीकृष्ण के मुँह से बस यही शब्द निकलते हैं। पूरे अध्याय में बस यही एक वाक्य। और ज़रा देखिए कि इस वाक्य में क्या-क्या छिपा है। रथ को अर्जुन के पितामह और गुरु के ठीक सामने खड़ा किया गया है। और जिन्हें सामने खड़ा देखना है, उन्हें श्रीकृष्ण "कौरव" नहीं कहते, "कुरु" कहते हैं। कुरु, यानी वही वंश-नाम जो अर्जुन का भी अपना नाम है। टीका के शब्दों में, रथ का स्थान और ये शब्द, भीतर छिपे मोह को ऊपर ले आते हैं।
यानी, श्रीकृष्ण ने ये सब जान-बूझकर किया। वो जानते थे कि क्या होने वाला है। मधुसूदन सरस्वती लिखते हैं कि सबके भीतर का इरादा जानने वाले हृषीकेश ने समझ लिया कि अर्जुन के मन में शोक और मोह आ खड़े हुए हैं, और तब उन्होंने हल्के-से मुस्कुराकर, थोड़ी छेड़ के साथ, अर्जुन से ये शब्द कहे। और ज़रा देखिए कि वो अर्जुन को किस नाम से पुकारते हैं। "पार्थ।" पृथा का बेटा। मधुसूदन कहते हैं कि पृथा, यानी कुन्ती, श्रीकृष्ण के पिता की बहन थीं। यानी इस एक नाम में श्रीकृष्ण अपना रिश्ता याद दिला रहे हैं, कि तुम मेरी बुआ के बेटे हो, मैं तुम्हारा अपना हूँ। मधुसूदन इस पूरे वाक्य का भाव यों बताते हैं: तुम मेरे सारथ्य पर निश्चिन्त होकर, बिना किसी शंका के, इन सबको देखो। मैं सारथ्य में पूरी तरह सावधान हूँ, और तुम्हें तो अभी-अभी रथ से लड़ना है, फिर शत्रु की सेना देखने में डर कैसा?
और रामानुजाचार्य इसे सञ्जय की एक चुभती टिप्पणी की तरह पढ़ते हैं। वो कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन के कहे अनुसार, भीष्म, द्रोण और सब राजाओं के देखते-देखते रथ को वहाँ खड़ा कर दिया, और सञ्जय ने धृतराष्ट्र से कहा, राजन्, ऐसी है आपके पक्ष की विजय की स्थिति। यानी रथ वहाँ खड़ा है जहाँ पूरी धरती के राजा उसे देख सकते हैं, और जो बात बाद में खुलेगी, वो अभी चुपचाप तैयार हो रही है।
ज्ञानेश्वर महाराज इस क्षण का वर्णन ऐसे करते हैं कि मुझे हर बार अच्छा लगता है। वो लिखते हैं कि अर्जुन ने रथ से सारी सेना को देखा, और जब उसने गुरुओं, पितामहों और सब गोत्रवालों को देखा, तो वो कृष्ण से कहने लगा, देखो, देखो, ये सब तो अपने ही हैं। और ज्ञानेश्वर कहते हैं कि तब श्रीकृष्ण मन में क्षणभर के लिए चकित-से हुए। पर जो हर हृदय में बैठा है, उसे आगे का सब पता था, इसलिए वे चुपचाप, शान्त बैठे रहे। श्रीकृष्ण चुप हैं। वो कोई उपदेश नहीं दे रहे, कोई समझाइश नहीं। वो बस इंतज़ार कर रहे हैं कि जो भीतर है वो बाहर आ जाए।
अब छब्बीसवाँ श्लोक। "तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान्। आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।" वहाँ अर्जुन ने दोनों सेनाओं में खड़े पिताओं, पितामहों, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों और मित्रों को देखा।
एक-एक शब्द पर रुकिए। "अपश्यत्", उसने देखा। वो शब्द जिसकी उसने माँग की थी। और उसने क्या देखा? पिता। पितामह। गुरु। मामा। भाई। पुत्र। पौत्र। मित्र। ये सूची किसी शत्रु-सेना की सूची नहीं है। ये एक परिवार की तस्वीर है, एक पूरे कुल की वंशावली। हमारी टीका बताती है कि यहाँ "पिता" में पिता की पीढ़ी के बड़े भी आते हैं, जैसे भूरिश्रवा, और "पुत्र" और "पौत्र" में कुटुम्ब के बच्चे भी आते हैं, जैसे दुर्योधन का पुत्र लक्ष्मण। मधुसूदन सरस्वती और बलदेव विद्याभूषण इसे नाम ले-लेकर खोलते हैं: पितामह, यानी भीष्म और सोमदत्त। आचार्य, यानी द्रोण और कृप। मामा, यानी शल्य और शकुनि। भाई, यानी दुर्योधन और उसके भाई। पुत्र, यानी लक्ष्मण जैसे वीर। मित्र, यानी अश्वत्थामा जैसे साथी। और वे कहते हैं, यही बात अपनी सेना पर भी लागू करके समझ लेनी चाहिए।
अब ज़रा देखिए कि इन नामों के पीछे महाभारत क्या कहता है, क्योंकि यही हमें समझाता है कि इस तस्वीर का वज़न कितना था।
पितामह भीष्म। इन्हें लेकर अर्जुन की सबसे सुन्दर और सबसे मार्मिक बात महाभारत में आगे चलकर आती है, भीष्म पर्व में, नौवें दिन की रात को, जब भीष्म ने खुद पाण्डवों को बता दिया था कि उन्हें कैसे गिराया जा सकता है। तब दुःख से जलते हुए अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं, "माधव, मैं अपने पितामह से युद्ध में कैसे लड़ूँगा? वे मेरे गुरु हैं, कुरुओं के बड़े-बूढ़े हैं। बचपन में खेलते हुए मैं अपने धूल से सने शरीर से उन्हें मैला कर देता था। बचपन में मैं उनकी गोद में चढ़कर उन्हें 'पिताजी' कहता था। और उन्होंने मुझसे कहा था, 'मैं तुम्हारा पिता नहीं, तुम्हारे पिता का पिता हूँ।' मैं उन्हें कैसे मारूँ?" यानी जो अर्जुन आज रथ पर खड़ा काँपने वाला है, वो इस भीष्म के लिए बचपन में गोद का बच्चा था। ये बात उसके भीतर बैठी थी। रथ के रुकने से पहले भी। मैं चाहता हूँ कि आप इस बात को पकड़ लें। मन में दबी कोई याद, कई दिन, कई साल तक, बाहर नहीं आती, जब तक उसके सामने खड़े होने का समय न आ जाए।
आचार्य द्रोण। आदि पर्व में कथा है कि जब द्रोण ने कुरु राजकुमारों को अपना शिष्य बनाया, तो एकान्त में उन्होंने सबसे पूछा कि मेरे मन में एक चाहा हुआ काम है, तुम अस्त्र सीखकर उसे पूरा करोगे? सब बच्चे चुप रहे। सिर्फ़ अर्जुन ने कहा कि मैं सब कुछ करूँगा। तब द्रोण ने अर्जुन का सिर बार-बार चूमा, उसे गले लगाया, और आनन्द से रो पड़े। और अर्जुन ने उनके चरण पकड़कर कहा, "हे द्विजश्रेष्ठ, मैं आपका शिष्य हूँ और आपकी कृपा से जीता हूँ।" और बाद में जब गुरु ने गुरुदक्षिणा में द्रुपद को पकड़ लाने को कहा, तो अर्जुन ही वो था जिसने द्रुपद के रथ पर कूदकर उसे पकड़ा। और उसी युद्ध में, जब राजकुमार द्रुपद का नगर रौंदने लगे, तो अर्जुन ने भीम को रोका और कहा कि द्रुपद कुरु वीरों का सम्बन्धी है, उसकी सेना को मत नष्ट करो। ध्यान दीजिए, ये वही अर्जुन है जो इस पल से बहुत पहले अपने सम्बन्धियों को बचाने के लिए अपने ही भाई को रोक चुका है। उसका मन हमेशा से ऐसा रहा है।
मातुल शल्य। उद्योग पर्व की कथा सुनिए। शल्य, जो नकुल और सहदेव के सगे मामा थे, अपनी विशाल सेना लेकर पाण्डवों की ओर चले। रास्ते में दुर्योधन ने गुप्त रूप से उनके लिए सुन्दर सभा-भवन बनवाए, उनका ऐसा सत्कार किया कि वे प्रसन्न होकर वचन दे बैठे। और दुर्योधन ने वो वचन माँगा, कि आप मेरी सारी सेना के नायक बन जाइए। शल्य ने कहा, हो गया। फिर वे पाण्डवों के पास पहुँचे, तो पाठ कहता है कि बहुत दिनों बाद अपने मामा को देखकर युधिष्ठिर सहित सब अपने आसनों से उठ खड़े हुए, और उनकी बहन के पुत्र, दोनों जुड़वाँ भाई भी। और फिर शल्य ने पाण्डवों से अपने दिए हुए वचन की बात कही। सोचिए। जिसके स्वागत में पाण्डव उठ खड़े हुए थे, वही अब रथ के सामने कौरवों की सेना में खड़ा है।
मित्र। यहाँ मधुसूदन की सूची में भगदत्त भी है। सभा पर्व में एक जगह श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि भगदत्त आपके पिता के पुराने मित्र हैं। और उद्योग पर्व में हम पढ़ते हैं कि वही भगदत्त एक अक्षौहिणी सेना लेकर दुर्योधन के पक्ष में आ गए। और अश्वत्थामा के लिए आदि पर्व में द्रोण स्वयं उसे बुलाकर कहते हैं कि पार्थ को अपना मित्र जानो, मैं उसे तुम्हें देता हूँ, उसे अपना लो। और कृतवर्मा, जो कौरवों की सेना के एक पूरे हिस्से की रक्षा करते हैं, उनके साथ वृष्णि और भोज वंश के महारथी हैं। वृष्णि, यानी श्रीकृष्ण का अपना कुल। आप देख रहे हैं? अर्जुन का कोई भी रिश्ता, किसी एक ओर नहीं है। हर रिश्ता दोनों सेनाओं में बँटा हुआ है।
और एक बात, जो मुझे सबसे अधिक सोचने पर मजबूर करती है। ये बात अर्जुन के लिए नई नहीं थी। वन पर्व में, जब अर्जुन हिमालय में तपस्या करने गया था, तो लोकपाल यम ने उससे कहा था कि पितामह भीष्म को तुम्हें युद्ध में जीतना है, और भारद्वाज, यानी द्रोण, की रक्षा में खड़े क्षत्रिय-समूह को भी। यानी अर्जुन को बरसों पहले से पता था। और उद्योग पर्व में कुन्ती ने भी इसी बात पर आँसू बहाए थे। वो सोचती हैं, "धिक्कार है उस धन को जिसके लिए बन्धुओं का यह बड़ा विनाश होगा। आचार्य द्रोण अपने शिष्यों से अपनी इच्छा से कभी नहीं लड़ेंगे, और पितामह पाण्डवों से स्नेह कैसे न करेंगे?" तो सबको पता था। फिर भी अर्जुन आज टूटता है। क्यों?
क्योंकि जानना और देखना दो अलग बातें हैं। मैं ये बात आपसे बहुत ज़ोर से कहना चाहता हूँ। जानना दिमाग में रहता है। देखना हृदय तक पहुँचता है। आप जानते हैं कि एक दिन आपको अपने बूढ़े पिता से बात करनी होगी, और जानते हैं कि वो बात कठिन होगी। पर जिस दिन आप सामने बैठकर उनके चेहरे को देखते हैं, उसी दिन वो बात सच में कठिन हो जाती है। किसी मुक़दमे में सामने वाले का नाम सिर्फ़ काग़ज़ पर होता है। हम उससे लड़ लेते हैं, वकील को पैसे दे देते हैं, पेशियाँ भुगतते हैं। पर जिस दिन अदालत के गलियारे में वही चाचा, जिनकी गोद में हम बचपन में बैठे थे, लाठी टेकते हुए धीरे-धीरे चलते दिख जाते हैं, उस दिन काग़ज़ का वो नाम एक चेहरा बन जाता है। और चेहरे से कोई नहीं लड़ पाता।
श्रीकृष्ण इस बात को जानते थे। इसलिए उन्होंने अर्जुन को देखने दिया। क्यों? क्योंकि उपदेश दवा है, और दवा तब असर करती है जब बीमारी सामने आ जाए। जो बीमारी भीतर छिपी रहे, उसे दवा नहीं मिल सकती। अगर अर्जुन लड़ाई में उतर जाता, और बाद में भीष्म के सामने ये मोह उमड़ता, तो वो क्षण पहले से कहीं भयानक होता। श्रीकृष्ण ने उसे यहीं, इसी क्षण, सामने आने दिया। और ये हमारे लिए भी एक सीख है। जब कोई कठिन रिश्ता सामने आए, तो उसके असर को उस वक़्त उभरने दीजिए जब समय हो, उसके बाद नहीं जब कोई फ़ैसला हो चुका हो।
पर अभी एक बात बाकी है। अर्जुन ने देखा, और जो देखा वो पिता, पितामह, गुरु, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र थे। पर सञ्जय की सूची अभी पूरी नहीं हुई। अगले श्लोक में दो और नाम आते हैं, जो इस सूची को बिल्कुल घर के भीतर तक ले आते हैं। और उसके ठीक बाद वो दो शब्द आते हैं, जिनके बाद अर्जुन का स्वर बदल जाता है: "कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।"
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥
अर्जुन ने पिता देखे, पितामह देखे, गुरु देखे, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र देखे। और सञ्जय अब उस सूची को एक कदम और घर के भीतर ले आते हैं।
सताईसवाँ श्लोक। "श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि। तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्।" ससुरों को और हितैषियों को भी, दोनों सेनाओं में, और खड़े हुए उन सब बन्धुओं को देखकर वे कुन्तीपुत्र,
"श्वशुर", यानी ससुर। मधुसूदन सरस्वती इसका अर्थ खोलते हैं: पत्नियों के पिता। और "सुहृद" में वो ऐसे सब लोग गिनाते हैं जिन्होंने कभी उपकार किया हो, जैसे नाना-नानी की ओर के लोग। यानी इस सूची में अब सिर्फ़ खून के रिश्ते नहीं रहे। इसमें वे लोग भी हैं जिनसे अर्जुन के घर का रिश्ता विवाह से जुड़ा है, और वे भी जिनका अर्जुन पर कभी कोई उपकार रहा है। और "सेनयोरुभयोरपि", दोनों सेनाओं में। महाभारत इसका भी उदाहरण देता है। अर्जुन की अपनी ओर द्रुपद खड़े हैं, जिनकी बेटी द्रौपदी पाँचों पाण्डवों की पत्नी हैं। और विराट खड़े हैं, जिन्होंने अपनी बेटी उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से किया था। यानी ये ससुर और समधी पाण्डव सेना में भी हैं, और उस ओर भी ऐसे ही रिश्ते फैले हैं। रिश्तों की ये जाल इस मैदान में दोनों तरफ़ बिछी है।
ध्यान दीजिए कि सञ्जय अब अर्जुन को "कौन्तेय" कहते हैं, यानी कुन्ती का पुत्र। पिछले श्लोक में "पार्थ" था, आज "कौन्तेय"। मधुसूदन सरस्वती कहते हैं कि माँ के नाम से पुकारा जाना यहाँ एक संकेत है। सञ्जय जैसे इशारा कर रहे हैं कि इस घड़ी में अर्जुन के भीतर कुछ भोला-सा, कुछ उलझा हुआ उठ आया है, जो उसके योद्धा रूप से मेल नहीं खाता। और वो "कृपया परयाविष्टो" पर भी एक बारीक बात कहते हैं। कृपा, यानी करुणा, अर्जुन में किसी बाहरी चीज़ से नहीं आ गई। वो उसमें पहले से थी, उसके स्वभाव में। और "परया" के साथ वो एक दूसरा पाठ भी सुझाते हैं, "अपरया", यानी एक और करुणा। मतलब, अपनी सेना के लिए करुणा तो अर्जुन के मन में पहले से थी ही। पर आज इस घड़ी में कौरवों की सेना के लिए भी एक दूसरी करुणा जाग उठी।
और रामानुजाचार्य इस पूरे दृश्य को बहुत प्यार से देखते हैं। वो कहते हैं कि अर्जुन महामना हैं, यानी विशाल हृदय के। परम करुणा से भरे हुए, अपने बन्धुओं के प्रति गहरे जुड़े हुए, और परम धार्मिक। और फिर वो एक बात जोड़ते हैं जो मुझे भीतर तक छू गई: कि ये वही अर्जुन हैं जिन्हें, भाइयों सहित, आपके पुत्रों ने बार-बार भयंकर तरीकों से मारने की कोशिश की थी, जैसे लाक्षागृह में। और जिनके पास स्वयं परमपुरुष का सहारा था। फिर भी, इन्हीं मारने की कोशिश करने वालों को मरते हुए देखने की कल्पना से, भाईचारे के स्नेह से, करुणा से, और धर्म-अधर्म के भय से, अर्जुन का सारा शरीर पसीने में भीग गया।
लाक्षागृह की कथा आप जानते हैं। आदि पर्व में लिखा है कि लाख, घी और चर्बी से बना एक घर बनवाया गया था, ताकि पाण्डव उसमें सोएँ और उसमें आग लगा दी जाए। युधिष्ठिर ने उस घर को ध्यान से देखकर पहचान लिया था कि उसमें चर्बी की गन्ध है, और लाख में मिले घी की। और उससे भी पहले, बचपन में, दुर्योधन ने सोते हुए भीम को बेलों से बाँधकर गङ्गा में फेंक दिया था, साँपों से डँसवाया था, और खाने में कालकूट विष मिलाया था। रामानुज यही कहना चाहते हैं कि इतना कुछ झेलने के बाद भी अर्जुन के भीतर घृणा नहीं जागी। जागी तो पीड़ा। इसी बात को वो अर्जुन की महानता मानते हैं।
अब अठाईसवाँ श्लोक, जो इस सत्संग का केन्द्र है। "कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्। दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।" अत्यन्त करुणा से भरकर, विषाद करते हुए उन्होंने ये कहा: हे कृष्ण, युद्ध की इच्छा से सामने खड़े इन अपने लोगों को देखकर।
ये वो श्लोक है जहाँ अर्जुन पहली बार अपने मन की बात कहता है। इसके पहले उसने सिर्फ़ आदेश दिए थे। "रथ खड़ा कीजिए।" अब वो कह रहा है कि मैं टूट रहा हूँ। और ज़रा इस वाक्य को ध्यान से सुनिए। "दृष्ट्वेमं स्वजनं", इन अपने लोगों को देखकर। "युयुत्सुं", जो युद्ध करना चाहते हैं। पीड़ा यहाँ है। अर्जुन उन लोगों के लिए करुणा से भरा है जो उसे मारने के लिए तैयार खड़े हैं। उसके सामने शत्रु नहीं हैं। उसके सामने ऐसे अपने हैं जो उसके विरुद्ध खड़े हैं।
अब यहाँ एक बहुत बारीक बात आती है, जिसे हमारी टीका सीधे और साफ़ कहती है। यहाँ करुणा के लिए "कृपा" शब्द है। पर टीका के अनुसार ये मोह वाली करुणा है, सच्ची दया नहीं। ये "ये मेरे हैं" से उपजती है। और विवेक को साफ़ करने के बजाय उसे ढक देती है। मधुसूदन सरस्वती इसी बात को अपने शब्दों में कहते हैं: अर्जुन अपने और पराए देह में "मैं" और "मेरा" का भाव रखता है। इसी "मेरा" के भाव से, यानी ममकार से, उसके चित्त में विकलता आ गई, और उसका विवेक दब गया। और नीलकण्ठ, बहुत संक्षेप में, कहते हैं कि "कृपा" का अर्थ यहाँ स्नेह है, और "स्वजन" शब्द उसके कारण को दिखा देता है।
ये भेद बहुत महत्त्व का है, और मैं चाहता हूँ कि हम इसे आराम से समझें। दो तरह की दया होती है। एक दया वो, जो सामने वाले के भले को देखती है। और एक दया वो, जो अपने दुःख को देखती है। आप कभी किसी अस्पताल के गलियारे में गए होंगे। अक्सर ये देखा जाता है कि जो डॉक्टर बहुत कुशल है, वो भी अपने ही बच्चे का ऑपरेशन खुद नहीं करता। किसी और को सौंप देता है। क्यों? इसलिए नहीं कि वो अपने बच्चे से कम प्यार करता है। बल्कि इसलिए कि प्यार जितना गहरा हो, हाथ उतना काँपता है, और काँपते हाथ से चाकू चलाने का नतीजा बुरा हो सकता है। प्यार उसके पास है, पर प्यार में विवेक नहीं बचता।
या किसी माँ को देखिए, जिसका बेटा ग़लत राह पर है, और जो उसे रोकना चाहती है। पर जब बेटा आँखों में आँसू भरकर कहता है, "माँ, बस इस बार", तो वो हर बार पिघल जाती है। उसका प्यार झूठा नहीं, पर वो प्यार उस समय उसके विवेक पर परदा डाल देता है। या किसी दफ़्तर में वो मैनेजर, जिसे अपने पुराने साथी की नौकरी ख़त्म करने का निर्णय लेना है, जिसने उसके साथ बीस साल काम किया। वो बार-बार टालता है, और हर बार कहता है, "बेचारा", और इसी "बेचारा" में पूरी टीम का नुकसान होता जाता है। मैं इसमें किसी की निन्दा नहीं कर रहा। ये सब बहुत मानवीय है। मैं बस ये दिखाना चाहता हूँ कि करुणा के नाम पर कभी-कभी हम "ममकार" को जी रहे होते हैं, यानी "ये मेरा है" को।
और ज्ञानेश्वर महाराज इसे इतने सुन्दर ढंग से कहते हैं कि वो मुझे हमेशा याद रहता है। वो कहते हैं, जैसे कोई मन्त्र जानने वाला व्यक्ति भी, जब उस पर कोई आवेश आ जाए, तो बड़बड़ाने लगता है, वैसे ही वो धनुर्धर महामोह से घिर गया। और फिर वो एक उपमा देते हैं: जैसे चन्द्रमा की किरणें पड़ने पर चन्द्रकान्त मणि पसीजने लगती है। चन्द्रकान्त मणि पत्थर है, कठोर है। पर चाँदनी पड़ते ही उसमें से पानी रिसने लगता है। अर्जुन का हृदय भी वैसा ही कठोर था, वीर का हृदय, पर स्नेह की चाँदनी उस पर पड़ी, और वो पसीज गया। ज्ञानेश्वर कहते हैं कि इसी से अर्जुन का धैर्य चला गया, हृदय में पिघलाव आया, और वो अत्यन्त स्नेह से मोहित होकर दुःख के साथ अच्युत से बोलने लगा।
और एक और बात है, जो मधुसूदन सरस्वती इसी श्लोक में पकड़ते हैं, और जो मुझे बहुत मार्मिक लगती है। श्लोक में है "विषीदन्निदमब्रवीत्", विषाद करते हुए उसने ये कहा। मधुसूदन कहते हैं कि यहाँ बोलना और विषाद एक ही समय हो रहे हैं। यानी अर्जुन ये बात सोच-समझकर, ठंडे दिमाग से नहीं कह रहा। वो बोल भी रहा है और उसी पल टूट भी रहा है। गला भरा हुआ है, आँखों से आँसू बह रहे हैं। ये एक योद्धा का "भाषण" नहीं है। ये एक आदमी की आवाज़ है जो अपने रिश्तों के बीच खड़ा, टूट रहा है।
पर अभी एक बात बाकी है। अर्जुन ने कहा कि वो विषाद में है। पर कहना आसान है। अब देखिए कि जब सच में कुछ टूटता है, तो पहले क्या होता है। शब्द नहीं, शरीर बोलता है। और अगले दो श्लोकों में अर्जुन अपने शरीर का हाल ऐसे सुनाता है जैसे कोई डॉक्टर के सामने बैठा मरीज़ हो। और उसी में हम देखेंगे कि सबसे बड़े योद्धा का सबसे प्रिय धनुष उसके हाथ से कैसे फिसलता है।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥
अर्जुन ने अपने मन की बात कह दी: विषाद। पर देखिए कि अब वो क्या करता है। वो अपना हाल गिनाने लगता है, ऐसे जैसे कोई मरीज़ डॉक्टर के सामने बैठकर अपने लक्षण बताए।
उनतीसवाँ श्लोक। "सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।" मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुँह सूख रहा है। मेरे शरीर में कम्पन हो रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं।
और तीसवाँ। "गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः।" गाण्डीव धनुष हाथ से फिसल रहा है और त्वचा भी जल रही है। मैं खड़ा नहीं रह पा रहा, और मेरा मन चकरा-सा रहा है।
इन दो श्लोकों को धीरे-धीरे सुनिए, क्योंकि यही वो जगह है जहाँ आप शायद खुद को सबसे साफ़ पहचानेंगे। आठ लक्षण हैं, एक के बाद एक, जैसे शरीर एक-एक करके जवाब दे रहा हो। श्रीधर स्वामी हर लक्षण को उसके साधारण अर्थ में समझाते हैं। हाथ-पैर आदि अंग शिथिल हो रहे हैं, ढीले पड़ रहे हैं। मुँह सब तरफ़ से सूख रहा है। वेपथु यानी कम्पन। रोमहर्ष यानी रोमांच। और त्वचा चारों ओर से तप रही है। नीलकण्ठ "सीदन्ति" का अर्थ बताते हैं कि अंग निश्चेष्ट हो गए, यानी उनमें अब कोई चेष्टा नहीं बची।
मधुसूदन सरस्वती इसमें कई बारीक बातें देखते हैं। पहली, कि "मुँह सूख रहा है" में "परि" उपसर्ग है, जो "चारों ओर से, पूरी तरह" का भाव देता है। वो कहते हैं कि यह सूखना किसी थकान से होने वाले सूखने से कहीं ज़्यादा है। दूसरी बात, गाण्डीव का हाथ से फिसलना। उनके अनुसार यह धैर्य के अभाव का लक्षण है, एक दुर्बलता का। और त्वचा के जलने से भीतर का सन्ताप दिखता है। और तीसरी, "खड़ा नहीं रहा जाता" यह मूर्छा की ओर इशारा करता है, और "मन घूमता-सा लगता है" यह मूर्छा की पहली अवस्था है, उसके ठीक पहले की।
पर हमारी टीका इन श्लोकों के बारे में एक बहुत अलग और बहुत ज़रूरी बात कहती है। वो कहती है: श्लोक उनतीस और तीस, शरीर में शोक के लक्षण हैं, भय के नहीं। ज़रा रुककर इसे समझिए। शोक और भय के लक्षण बाहर से देखने में एक जैसे लगते हैं। दोनों में मुँह सूखता है, दोनों में पसीना आता है, दोनों में हाथ काँपते हैं। पर उनके पीछे की वजह एकदम अलग है। भय में आदमी अपने को बचाना चाहता है। शोक में आदमी किसी और को खोने से घबराता है। और यहाँ अर्जुन का काँपना अपने लिए नहीं है। उसे अपनी जान की चिंता नहीं। वो तो उन्हीं लोगों के लिए काँप रहा है जो उसे मारने खड़े हैं।
अब सोचिए कि ये किस आदमी की बात हो रही है। वन पर्व में अर्जुन ने हिमालय में तपस्या की थी। एक किरात का रूप धरे साक्षात् शंकर ने उसे रोका, और अर्जुन ने उस किरात पर बाणों की वर्षा कर दी। शंकर ने प्रसन्न होकर उसके बाण झेल लिए और उसे अपना पाशुपत अस्त्र दिया। वही अर्जुन निवातकवच नाम के दानवों से लड़ने निकला था, जो समुद्र के गर्भ में एक दुर्ग में रहते थे। आदि पर्व में गाण्डीव का वर्णन है कि वह अकेला एक लाख धनुषों के बराबर था। और जब अर्जुन ने उसकी डोरी चढ़ाई, तो जिन्होंने उसकी टंकार सुनी, उनके मन काँप उठे। और यही गाण्डीव, उस दिन जिसकी टंकार से दूसरों के मन काँपे थे, आज अर्जुन के अपने हाथ से फिसल रहा है।
ज्ञानेश्वर महाराज इसे बहुत कोमल ढंग से कहते हैं। वो लिखते हैं कि अर्जुन ने कहा, हे देव, मैंने ये सारा मेल देखा, पूरा गोत्र-वर्ग देखा। ये सब इस युद्ध के लिए तैयार हैं, पर मेरे लिए क्या उचित होगा? इस नाम से ही, यानी इन रिश्तों के नाम से ही, मुझे नहीं पता कि मुझे क्या हो गया, मेरी आत्मा तक मुझमें नहीं बची, मन और बुद्धि स्थिर नहीं रहतीं। देखिए, देह काँप रही है, मुँह सूख रहा है, अंगों में निर्बलता आ रही है। सारे शरीर को उकताहट हो गई है, बहुत सन्ताप उठा है, और उसका हाथ गाण्डीव पर गया। पर वो उसे पकड़ ही न सका। वो हाथ से गिर गया, और अर्जुन को पता ही न चला। हृदय पर इस मोह का ऐसा कब्ज़ा हो गया था।
और फिर ज्ञानेश्वर वो बात कहते हैं जो मुझे सबसे अच्छी लगती है। वो कहते हैं कि यह स्नेह वज्र से भी कठोर और असह्य चीज़ से भी अधिक विचित्र है। जिस अर्जुन ने युद्ध में शंकर को जीता, और निवातकवचों का ठिकाना मिटा दिया, उसी अर्जुन को स्नेह ने क्षण भर में जकड़ लिया। और एक उपमा देते हैं: जैसे भौंरा, जो कितनी भी सूखी, कठोर लकड़ी को छेद देता है, पर जब वो कमल की एक कोमल कली में फँस जाता है, तो उसकी पंखुड़ी को नहीं छेद पाता। प्राण दे देता है, पर कमल के दल को चीर नहीं सकता। ज्ञानेश्वर कहते हैं, स्नेह कठोर होकर भी कोमल है, इसी का नाम स्नेह है। और अर्जुन उसी कली में फँसा भौंरा है।
अब एक बात मैं आपसे कहूँ, जो शायद आपको इन श्लोकों में अपनी भी तस्वीर दिखा दे। मैं ये दावा नहीं करता कि मेरे हाथ कभी नहीं काँपे। हम सबके जीवन में ऐसे पल आते हैं। अस्पताल के गलियारे में, जब डॉक्टर कहता है, "आप बैठ जाइए, मुझे कुछ बताना है।" आधी रात को बजती फ़ोन की घंटी, जब दूसरी ओर से आवाज़ रुक-रुककर आती है, "आप जल्दी आ जाइए।" पिता के सामने खड़े होकर, पहली बार, अपनी राह की बात कहना। और उस घड़ी में हमारा शरीर वही करता है जो अर्जुन का कर रहा है। गला सूखता है, हाथ ठंडे पड़ते हैं, पैर साथ नहीं देते, और मन चकराता है।
हम इसे अक्सर अपनी कमज़ोरी समझ लेते हैं। हमें शर्म आती है कि हम इतने ढीले क्यों पड़ गए। पर अर्जुन हमें कुछ और दिखाता है। इस पृथ्वी का सबसे निडर धनुर्धर भी, जब अपनों के सामने खड़ा होता है, तो उसका शरीर यही करता है। इसलिए ये कमज़ोरी नहीं है। ये उस रिश्ते का सबूत है जो हमारे भीतर इतना गहरा है कि हमारा शरीर उसे अपने से अलग नहीं कर पाता। जिसके हाथ अपनों के सामने नहीं काँपते, उसने या तो बहुत साधना की है, या उसके भीतर स्नेह बहुत कम है।
पर गीता यहीं नहीं रुकती, और मैं भी नहीं रुकूँगा। क्योंकि इस काँपते हाथ का एक दूसरा पहलू है। जब शरीर काँप रहा हो, मन घूम रहा हो, तब कोई बड़ा फ़ैसला नहीं करना चाहिए। अर्जुन अगले ही श्लोकों में बहुत बड़े-बड़े निर्णय सुनाने लगेगा: कि मुझे विजय नहीं चाहिए, कि इस राज्य से हमें क्या मिलेगा, कि मैं नहीं लड़ूँगा। और वे सारे निर्णय इसी काँपते शरीर से निकले हैं। वो सब सच्चे दुःख से उपजे हैं, पर शायद सच्ची समझ से नहीं। और यही गीता का पूरा रास्ता है। श्रीकृष्ण अर्जुन के दुःख को झूठा नहीं कहेंगे। वो उसे ग़लत नहीं ठहराएँगे। वो बस उसे एक नए प्रकाश में देखना सिखाएँगे।
और अर्जुन ने एक बहुत ज़रूरी काम किया, जो हम में से बहुत से लोग नहीं करते। उसने छिपाया नहीं। उसने श्रीकृष्ण को साफ़ बताया कि मेरा मुँह सूख रहा है, मेरा धनुष गिर रहा है, मैं खड़ा नहीं हो पा रहा। अपनी टूटन की रिपोर्ट उसने उस आदमी को दी जो उसके रथ में उसके पास बैठा था। मधुसूदन सरस्वती अर्जुन के इन्हीं वाक्यों में आने वाले नामों पर कहते हैं कि "कृष्ण" शब्द से अर्जुन जैसे कह रहा है: मैं आत्मा को न जानने से दुःखी हूँ, और आप सदा आनन्दस्वरूप हैं, शोक आपको छूता नहीं। इसलिए मुझे भी शोक से मुक्त कर दीजिए। ध्यान दीजिए, एक टूटा हुआ आदमी भी पुकारता है तो नाम लेकर, और जिसे पुकार रहा है उसी से माँग रहा है। यही गीता का जन्म है। अगर अर्जुन चुप रहता, या बहादुरी का नाटक करता, तो आज हमारे पास गीता न होती।
और अब वो दृश्य, जिसे मैंने आज के सत्संग के अंत के लिए रखा था। क्योंकि ये बताता है कि अपनों के सामने खड़े होने का एक और रास्ता भी है।
भीष्म पर्व में, गीता के ठीक बाद, जब दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए तैयार खड़ी हैं और लड़ाई शुरू होने ही वाली है, तब युधिष्ठिर कवच उतार देते हैं, उत्तम शस्त्र रख देते हैं, रथ से उतरते हैं, और हाथ जोड़कर पैदल ही शत्रु की सेना की ओर चल पड़ते हैं। किसी से कुछ नहीं कहते। उनके भाई घबरा जाते हैं और पूछते हैं कि आप कहाँ जा रहे हैं। वे मौन रहते हैं। और जब अर्जुन उन्हें जाते देखते हैं, तो वो भी रथ से जल्दी उतरकर भाइयों सहित उनके पीछे चलने लगते हैं। श्रीकृष्ण भी पीछे-पीछे चलते हैं। श्रीकृष्ण मुस्कुराकर कहते हैं, "मैंने इनका इरादा समझ लिया है। राजा पहले भीष्म, द्रोण, कृप और शल्य, इन सब गुरुजनों से अनुमति लेंगे, फिर शत्रुओं से युद्ध करेंगे। प्राचीन शास्त्रों में सुना जाता है कि जो गुरुजनों से अनुमति लिए बिना युद्ध करता है, उसे बड़े लोग मन ही मन कोसते हैं। और जो अनुमति लेकर लड़ता है, उसकी जीत निश्चित होती है।"
और उधर कौरवों की सेना में हाहाकार मच जाता है। सैनिक कहने लगते हैं, "यह तो अपने कुल का कलंक है। यह डर गया है। यह भीष्म की शरण माँगने आ रहा है।" वे कपड़े लहराकर प्रसन्न होते हैं, और युधिष्ठिर की निन्दा करते हैं। ध्यान दीजिए। बाहर से देखने वालों को वही चीज़ डर लगी, जो असल में सबसे बड़ी हिम्मत थी। झुककर, हाथ जोड़कर, अपनों के सामने खड़े होना।
युधिष्ठिर भीष्म के चरण पकड़कर कहते हैं, "मैं आपसे अनुमति माँगता हूँ। हम आपके साथ युद्ध करेंगे। मुझे अनुमति दीजिए और आशीर्वाद दीजिए।" और भीष्म, जो दुर्योधन की सेना के सेनापति हैं, कहते हैं, "यदि तुम युद्ध से पहले इस तरह मेरे पास न आते, तो मैं तुम्हें हार का शाप दे देता। पुत्र, मैं प्रसन्न हूँ। युद्ध करो और विजय पाओ।" और फिर वो बात, जिसका मैंने पहले संकेत किया था: "मनुष्य धन का दास है, धन किसी का दास नहीं। कौरवों ने मुझे धन से बाँध रखा है।" द्रोण के पास जाते हैं तो वे भी अनुमति देते हैं, और कहते हैं कि तुम्हारी विजय निश्चित है, क्योंकि हरि तुम्हारे मन्त्री हैं, और जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ विजय है।
देखिए कितना बड़ा अन्तर है। अर्जुन अपनों को देखकर काँपा, और उसका धनुष गिर गया। युधिष्ठिर अपनों के सामने गया, और उसने धनुष खुद उतारकर रख दिया। दोनों के भीतर स्नेह वही था। एक के हाथ में वो उलझन बनकर काँपा, दूसरे ने उसे विनय में बदल लिया। और इसी में गीता का पूरा रास्ता छिपा है। अपनों के सामने हिम्मत टूटती इसलिए है कि वहाँ हमारे भीतर दो सच्ची चीज़ें एक साथ खड़ी हो जाती हैं: कर्तव्य और स्नेह। और उन दोनों के बीच "ये मेरे हैं" का भाव ऐसे खिंचता है कि मन कोई एक राह नहीं चुन पाता। गीता हमें इस उलझन से निकालेगी, और युधिष्ठिर का वह दृश्य दिखाता है कि निकलने के बाद का आदमी कैसा दिखता है: विनम्र, पर दृढ़। नतमस्तक, पर अडिग।
आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। अपनों के सामने काँपना कमज़ोरी नहीं है। वो रिश्ते का सबूत है। इसके लिए खुद को कोसना बन्द कीजिए। पर साथ-साथ, काँपते हाथों से कोई बड़ा फ़ैसला मत कीजिए। पहले शरीर को स्थिर होने दीजिए, फिर सोचिए।
दूसरी बात। देखने से पहले जानना और देखने के बाद जानना, दो अलग चीज़ें हैं। जब आपको अपनों से कोई कठिन बात कहनी हो, तो पहले से तैयारी कीजिए कि जिस दिन आप उनका चेहरा देखेंगे, उस दिन आपका मन क्या करेगा। और ये भी पहचानने की कोशिश कीजिए कि आपके सामने कौन सचमुच लड़ना चाहता है, और कौन बस किसी मजबूरी में खड़ा है।
तीसरी बात, जो सबसे ज़रूरी है। जब आपके भीतर कुछ टूटे, तो अर्जुन की तरह उसे छिपाइए मत। जो आपके रथ में आपके पास बैठा है, चाहे वो कोई अपना हो, कोई गुरु हो, या सिर्फ़ ईश्वर, उसे साफ़-साफ़ बताइए कि मेरा मुँह सूख रहा है, मेरे हाथ काँप रहे हैं, मैं खड़ा नहीं हो पा रहा। गीता का पहला कदम यही था।
अगली बार हम इस अध्याय के आगे के श्लोकों पर लौटेंगे, जहाँ अर्जुन का काँपता हृदय शब्दों में बदल जाएगा। वो कहेगा, "हे कृष्ण, मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य, न सुख।" और हम देखेंगे कि उन शब्दों के पीछे कौन-सा तर्क है, और कहाँ वो तर्क उसे धोखा दे रहा है।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आपके जीवन में वो कौन है जिसके सामने आपकी हिम्मत टूट जाती है? और क्या आपने कभी उसके सामने युधिष्ठिर की तरह हाथ जोड़कर, पर सीधे खड़े होकर, अपनी बात कही है? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्री कृष्ण।
गीता का पहला उत्तर उस आदमी ने पाया, जिसने सबसे पहले अपनी टूटन को नाम लेकर पुकारा। वही उत्तर, आज भी, हम सबके लिए है।
आख़िर में वही अट्ठाईसवाँ श्लोक एक बार फिर सुनिए। इस बार उसके बीच के एक शब्द पर ध्यान दीजिए, "कृष्ण"। टूटता हुआ आदमी भी पुकारता है, तो नाम लेकर।
जय श्री कृष्ण।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥
तीन बातें
- अपनों के सामने काँपना कमज़ोरी नहीं है। वो रिश्ते का सबूत है। इसके लिए खुद को कोसना बन्द कीजिए। पर साथ-साथ, काँपते हाथों से कोई बड़ा फ़ैसला मत कीजिए। पहले शरीर को स्थिर होने दीजिए, फिर सोचिए।
- देखने से पहले जानना और देखने के बाद जानना, दो अलग चीज़ें हैं। जब आपको अपनों से कोई कठिन बात कहनी हो, तो पहले से तैयारी कीजिए कि जिस दिन आप उनका चेहरा देखेंगे, उस दिन आपका मन क्या करेगा। और ये भी पहचानने की कोशिश कीजिए कि आपके सामने कौन सचमुच लड़ना चाहता है, और कौन बस किसी मजबूरी में खड़ा है।
- जो सबसे ज़रूरी है। जब आपके भीतर कुछ टूटे, तो अर्जुन की तरह उसे छिपाइए मत। जो आपके रथ में आपके पास बैठा है, चाहे वो कोई अपना हो, कोई गुरु हो, या सिर्फ़ ईश्वर, उसे साफ़-साफ़ बताइए कि मेरा मुँह सूख रहा है, मेरे हाथ काँप रहे हैं, मैं खड़ा नहीं हो पा रहा। गीता का पहला कदम यही था।