गीता सार - अध्याय 1
गीता 1.1–1.19 · 93 मिनट
"मेरे बेटे और पांडु के बेटे": पक्षपात और डर से भरा मन
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १ ॥
सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥ ३ ॥
गीता का पहला श्लोक कोई उपदेश नहीं है। वो एक सवाल है। और वो सवाल किसी ऋषि ने नहीं, किसी योगी ने नहीं, एक डरे हुए पिता ने पूछा था।
"सञ्जय, बताओ… वहाँ कुरुक्षेत्र में, मेरे बेटों ने और पाण्डु के बेटों ने क्या किया?"
जय श्री कृष्ण।
आइए, आराम से बैठिए। आज से हम एक लंबी यात्रा शुरू कर रहे हैं, और लंबी यात्रा की पहली शर्त यही है कि जल्दी न हो। हम श्रीमद्भगवद्गीता को शुरू से आखिर तक, श्लोक दर श्लोक, साथ बैठकर सुनेंगे और समझेंगे। हर श्लोक पहले गाया जाएगा, संस्कृत में, फिर हम उस पर आराम से बात करेंगे: उसमें लिखा क्या है, और आज की हमारी ज़िंदगी से उसका क्या लेना-देना है। सात सौ से ज़्यादा श्लोक हैं, तो ये एक-दो दिन का काम नहीं है। ये पैदल तीर्थ जैसा है: बीच में थकान भी आएगी, पर जो पहुँचता है, वो फिर पहले जैसा नहीं रहता। और इस यात्रा में हम अकेले नहीं चलेंगे। गीता को सदियों से बड़े-बड़े आचार्यों ने पढ़ा और समझाया है: श्रीधर स्वामी, मधुसूदन सरस्वती, संत ज्ञानेश्वर, और नीलकण्ठ, जिन्होंने पूरे महाभारत पर टीका लिखी। जहाँ उनकी कोई बात रास्ता रोशन करेगी, मैं उसे आपके सामने रखूँगा।
आज हम पहले अध्याय के पहले उन्नीस श्लोकों के साथ बैठेंगे। और मैं आपको पहले ही बता दूँ कि लोग अक्सर गीता का पहला अध्याय छोड़ देते हैं। कहते हैं, इसमें तो योद्धाओं के नाम हैं, शंखों के नाम हैं, असली गीता तो दूसरे अध्याय से शुरू होती है। पर ये बड़ी भूल है। क्योंकि दवा तभी समझ में आती है जब बीमारी समझ में आए। दूसरे अध्याय से श्रीकृष्ण जो कुछ कहते हैं, वो किसी खाली कमरे में दिया हुआ भाषण नहीं है। वो एक घबराए हुए, टूटे हुए आदमी को दिया हुआ उत्तर है। और वो आदमी कैसे टूटा, किस माहौल में टूटा, उसके चारों ओर कौन था, क्या चल रहा था, ये सब पहला अध्याय बताता है। जो बीमारी को ध्यान से देख लेता है, उसे दवा का एक-एक घूँट समझ में आता है।
तो चलिए, शुरू करते हैं उस सवाल से।
एक पल के लिए सोचिए। आप किसी अस्पताल के बाहर बैठे हैं। अंदर आपका कोई अपना है। ऑपरेशन चल रहा है। आप बाहर बेंच पर बैठे हैं, और हर बार जब दरवाज़ा खुलता है, जब कोई नर्स या कोई वार्ड बॉय बाहर आता है, आप उठकर उसके पास जाते हैं और पूछते हैं, "क्या हुआ? अंदर क्या चल रहा है?" आप खुद अंदर नहीं जा सकते। आप देख नहीं सकते। आप बस सुन सकते हैं, और जो सुनते हैं, उसी पर आपका सारा मन टिका होता है।
धृतराष्ट्र की हालत ठीक वैसी ही है। वो राजा हैं, हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठे हैं, पर देख नहीं सकते। जन्म से अन्धे हैं। और कुरुक्षेत्र में, जहाँ उनके सौ बेटे अपने ही चचेरे भाइयों से लड़ने को खड़े हैं, वहाँ क्या हो रहा है, ये वो सिर्फ़ सुन सकते हैं।
और अब मैं आपको एक बात बताता हूँ जो बहुत कम लोग जानते हैं, और जिसे जानने के बाद गीता का ये पहला श्लोक आपको कभी पहले जैसा नहीं लगेगा।
महाभारत में गीता भीष्म पर्व के भीतर आती है। और भीष्म पर्व में गीता शुरू होने से पहले एक दृश्य है। सञ्जय, यानी वही सञ्जय जिनसे धृतराष्ट्र ये सवाल पूछ रहे हैं, युद्धभूमि से दौड़ते हुए लौटते हैं। बहुत दुखी हैं। राजा चिन्ता में डूबे बैठे हैं। और सञ्जय आकर कहते हैं, "महाराज, मैं सञ्जय हूँ, आपको प्रणाम। शन्तनु के पुत्र, भरतवंश के पितामह भीष्म मारे गए।" वो कहते हैं, जो सब योद्धाओं के मुकुट थे, आज वो बाणों की शय्या पर पड़े हैं। दस दिन तक उन्होंने आपकी सेना की रक्षा की, और फिर जैसे सूरज डूबता है, वैसे वो अस्त हो गए।
समझ रहे हैं आप क्या हुआ? युद्ध को दस दिन बीत चुके हैं। भीष्म गिर चुके हैं। और इस खबर के बाद धृतराष्ट्र कहते हैं, "सञ्जय, मुझे सब कुछ शुरू से बताओ। वहाँ जो कुछ हुआ, सब।" और तब सञ्जय उन्हें पहले दिन की सुबह से सुनाना शुरू करते हैं, दोनों सेनाओं का खड़ा होना, शंखों का बजना, और फिर, उसी सुबह, रथ पर श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच जो बात हुई, वो पूरी गीता।
यानी जब धृतराष्ट्र पूछते हैं, "मेरे बेटों ने क्या किया?", तब उन्हें पहले से पता है कि उनकी सबसे बड़ी आशा, भीष्म, गिर चुके हैं। ये सवाल किसी उत्सुक दर्शक का सवाल नहीं है। ये उस आदमी का सवाल है जो बुरी खबर सुन चुका है, और अब ये जानना चाहता है कि ये सब हुआ कैसे। जैसे अस्पताल में डॉक्टर बाहर आकर बता दे कि हालत गंभीर है, और फिर आप पूछें, "पर शुरू से बताइए, हुआ क्या था?"
अब एक और बात, जो इसी भीष्म पर्व में है, युद्ध शुरू होने से पहले की। भगवान व्यास, जो धृतराष्ट्र के पिता भी हैं और जो भूत, वर्तमान और भविष्य सब देखते हैं, एकान्त में बैठे, शोक में डूबे धृतराष्ट्र के पास आते हैं। और कहते हैं, "राजन्, अगर तुम ये युद्ध देखना चाहते हो, तो मैं तुम्हें आँखें देता हूँ। ये युद्ध अपनी आँखों से देखो।"
सोचिए। जन्म से अन्धे आदमी को आँखें मिल रही हैं। कोई भी सोचेगा कि वो तुरंत हाँ कहेगा। पर धृतराष्ट्र कहते हैं, "हे ब्रह्मर्षि, मैं अपने कुटुम्बियों का वध देखना नहीं चाहता। पर आपकी कृपा से मैं ये युद्ध पूरा का पूरा सुनना चाहूँगा।"
तब व्यास सञ्जय को दिव्य दृष्टि देते हैं, और कहते हैं कि सञ्जय से इस युद्ध में कुछ छिपा नहीं रहेगा। जो खुले में हो या छिपकर, दिन में हो या रात में, यहाँ तक कि जो किसी ने मन में सोचा हो, वो भी सञ्जय जान लेंगे। शस्त्र उन्हें छू नहीं पाएँगे, थकान उन्हें सताएगी नहीं।
और यहाँ मुझे एक बात बहुत सुंदर लगती है। गीता हम तक इसी रास्ते से आई है। एक ने देखा, एक ने सुना। देखने वाला सञ्जय, सुनने वाला धृतराष्ट्र। और आज, हज़ारों साल बाद, आप और मैं भी उसी जगह बैठे हैं जहाँ धृतराष्ट्र बैठे थे। हम भी कुरुक्षेत्र नहीं देख सकते। हम भी बस सुन सकते हैं। फ़र्क बस इतना है कि धृतराष्ट्र सब सुनकर भी नहीं बदले। हम चाहें तो बदल सकते हैं।
अब आइए, श्लोक पर। "धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे।" गीता का पहला शब्द है "धर्म"। ये संयोग नहीं लगता। कुरुक्षेत्र पहले से ही पवित्र भूमि के रूप में प्रसिद्ध था, यज्ञ की भूमि, धर्म की भूमि। महाभारत खुद, वन पर्व की तीर्थ-यात्रा में, कहता है: "कृतयुग में सब कुछ पवित्र है; त्रेता में पुष्कर पवित्र माना गया है; द्वापर में कुरुक्षेत्र; और कलियुग में गंगा।" यानी जिस युग में ये युद्ध हो रहा है, उस युग का सबसे पवित्र स्थान यही है।
और इसका नाम "कुरुक्षेत्र" कैसे पड़ा, इसकी कथा महाभारत के शल्य पर्व में है, जहाँ ऋषि बलराम जी को सुनाते हैं। बहुत पहले राजर्षि कुरु इस भूमि को बरसों तक हल से जोतते रहे। इन्द्र आए, पूछा, "ये इतनी मेहनत किसलिए?" कुरु ने कहा, "जो यहाँ जन्म लें, वो पुण्य के लोकों को जाएँ।" इन्द्र हँसकर चले गए। बार-बार आए, बार-बार हँसी उड़ाई, पर राजर्षि जोतते रहे। आखिर देवताओं के कहने पर इन्द्र ने वर दिया: "जो यहाँ निराहार रहकर शरीर छोड़ें, या युद्ध में धर्म से लड़ते हुए मारे जाएँ, वो स्वर्ग के भागी होंगे।" और उसी जगह इन्द्र की गाई एक गाथा भी है: "कुरुक्षेत्र की धूल भी, जो हवा से उड़कर आए, पापी को भी परम गति तक पहुँचा देती है।"
तो सोचिए, जिस खेत को एक राजर्षि ने दूसरों के कल्याण के लिए अपने हाथों से जोता था, आज उसी के वंशज उसी खेत में एक-दूसरे के खून के प्यासे खड़े हैं। और उसी धर्म की भूमि पर आज भाई-भाई के खून के प्यासे खड़े हैं। जो जगह सबसे पवित्र है, वहीं सबसे बड़ा संघर्ष हो रहा है। और सच कहूँ तो हमारी ज़िंदगी में भी अक्सर ऐसा ही होता है। सबसे बड़े झगड़े बाज़ार में नहीं, घर में होते हैं। जो रिश्ते सबसे पवित्र होने चाहिए, उन्हीं में सबसे गहरी चोट लगती है।
फिर दूसरा पद: "मामकाः पाण्डवाश्चैव।" मेरे लोग, और पाण्डु के लोग।
ये दो शब्द सुनिए ध्यान से। धृतराष्ट्र और पाण्डु सगे भाई थे। पाण्डु के जाने के बाद पाण्डव बचपन से उन्हीं के महल में पले हैं। वो भी उनके भतीजे हैं, उनके परिवार हैं। पर धृतराष्ट्र के मुँह से निकलता है, "मामकाः", मेरे वाले, और "पाण्डवाः", पाण्डु वाले। वो "हमारे बच्चे" नहीं कहते। वो "मेरे बच्चे और उसके बच्चे" कहते हैं।
नीलकण्ठ, जिन्होंने पूरे महाभारत पर टीका लिखी, यहाँ एक छोटी-सी बात पकड़ते हैं। वो कहते हैं, पाण्डवों का नाम अलग से लेना ये दिखाता है कि उनके प्रति धृतराष्ट्र के मन में "ममता", यानी "ये मेरे हैं" वाला भाव, था ही नहीं। एक शब्द में, अपनापन किसके लिए है और किसके लिए नहीं, सब लिखा है।
हमारी टीका में एक बात लिखी है जो मुझे बहुत गहरी लगती है। "मेरे" और "उनके" का यही भेद इस युद्ध की जड़ है, और आगे अर्जुन के शोक की भी जड़ यही है। सोचिए। एक ही परिवार। एक ही दादा। पर एक पिता के मन में एक लकीर खिंच गई है, मेरे और तेरे की। और वो लकीर धीरे-धीरे इतनी गहरी हुई कि एक दिन धरती के सारे राजा उसके दोनों ओर खड़े हो गए।
अब मैं आपसे कुछ पूछूँ? बुरा मत मानिएगा। क्या आपके घर में भी ये लकीर कहीं है? मेरा बेटा और देवरानी का बेटा? मेरी बहू और उसकी बहू? मेरी टीम और उसकी टीम? ये लकीर बहुत चुपचाप खिंचती है। कोई ऐलान नहीं करता। बस एक दिन शादी में किसी को पहली पंक्ति में बिठा दिया, किसी को पीछे। एक दिन जायदाद के कागज़ में एक नाम पहले लिख दिया। एक दिन किसी के बच्चे के अच्छे नंबर पर मिठाई बँटी, किसी के बच्चे के अच्छे नंबर पर बस "अच्छा है" कहा गया। और फिर बरसों बाद, जब कोई बड़ा झगड़ा होता है, हम सोचते हैं कि ये अचानक कैसे हो गया। अचानक कुछ नहीं होता। कुरुक्षेत्र भी अचानक नहीं हुआ था। वो "मामकाः" शब्द से शुरू हुआ था।
और मधुसूदन सरस्वती, गीता के एक बड़े टीकाकार, अपनी टीका की शुरुआत में एक बात कहते हैं जो पूरी गीता की कुंजी है। वो कहते हैं, अर्जुन जैसा महान वीर भी इसलिए टूटा, क्योंकि राज्य, गुरु, पुत्र, मित्र, सबके बारे में उसके मन में ये भाव था: "मैं इनका हूँ, ये मेरे हैं।" उसी "मेरे" से स्नेह जागा, स्नेह से शोक और मोह, और उन्होंने उसका विवेक ढक दिया। यानी जो बीमारी पहले श्लोक में धृतराष्ट्र के मुँह से निकली, "मामकाः", वही बीमारी आगे अर्जुन को भी पकड़ेगी। फ़र्क बस इतना है कि अर्जुन के पास श्रीकृष्ण होंगे।
और श्लोक का आखिरी पद: "किमकुर्वत सञ्जय।" उन्होंने क्या किया, सञ्जय? यहाँ भी एक बारीक बात है। पूछ रहे हैं "क्या किया", जैसे कोई चमत्कार की आशा हो। धर्म की भूमि पर पहुँचकर शायद बेटों का मन बदल गया हो? शायद युद्ध टल गया हो? पर वो जानते हैं कि ऐसा नहीं हुआ। भीष्म गिर चुके हैं। फिर भी पूछते हैं। क्योंकि इंसान का मन ऐसा ही है। जिस बात का जवाब हमें पता होता है, उसे भी हम बार-बार पूछते हैं, इस उम्मीद में कि शायद इस बार जवाब कुछ और हो।
अब दूसरा श्लोक, सञ्जय का उत्तर। और देखिए, सञ्जय सबसे पहले किसकी बात करते हैं। "पाण्डवों की सेना को व्यूह में खड़ी देखकर राजा दुर्योधन आचार्य के पास गया और ये वचन बोला।"
आचार्य कौन? द्रोण। वो गुरु जिन्होंने कौरव और पाण्डव, दोनों राजकुमारों को शस्त्र-विद्या सिखाई थी। अब ज़रा सोचिए। सेना का प्रधान सेनापति कौन है? भीष्म। तो युद्ध शुरू होने से पहले राजा को सबसे पहले किसके पास जाना चाहिए? सेनापति के पास। पर दुर्योधन भीष्म के पास नहीं जाता। वो सबसे पहले द्रोण के पास जाता है। हमारी टीका कहती है कि ये उसकी घबराहट दिखाता है। शत्रु की सेना देखकर उसका मन डगमगा गया है।
मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक और बारीकी देखते हैं। दुर्योधन राजा है। चाहता तो द्रोण को अपने पास बुला लेता। पर वो खुद चलकर उनके पास जाता है। ये डर है। पर वो उस डर को गुरु के आदर का रूप दे देता है, ताकि किसी को डर दिखे नहीं। मधुसूदन कहते हैं, ये राजनीति की चतुराई है: भीतर से घबराहट, बाहर से विनय।
और तीसरा श्लोक, जो दुर्योधन कहता है। "हे आचार्य, पाण्डु के पुत्रों की इस बड़ी सेना को देखिए, जिसका व्यूह द्रुपद के पुत्र ने रचा है, आपके बुद्धिमान शिष्य ने।"
ये श्लोक ऊपर से तो एक साधारण वाक्य लगता है। पर इसके भीतर एक तीर छिपा है। और उस तीर को समझने के लिए आपको एक कहानी जाननी होगी, जो महाभारत के आदि पर्व में है।
बहुत पहले, द्रोण और पाञ्चाल के राजा द्रुपद के बीच दुश्मनी हो गई थी। द्रुपद ने द्रोण को हराने वाला पुत्र पाने के लिए एक महायज्ञ करवाया। याज नाम के ब्राह्मण ने, पाठ के शब्दों में, "द्रोण के विनाश के लिए" वो यज्ञ करवाया। और उस यज्ञ की आग से एक कुमार प्रकट हुआ। तब आकाश में एक अदृश्य वाणी गूँजी: "ये राजा का शोक दूर करने के लिए, और द्रोण के वध के लिए ही जन्मा है।" उसका नाम रखा गया धृष्टद्युम्न। और उसी यज्ञ से एक कन्या भी प्रकट हुई, साँवले रंग की, जिसका नाम पड़ा कृष्णा। जिसे आप और हम द्रौपदी के नाम से जानते हैं।
अब इसके आगे जो होता है, वो सुनिए। आदि पर्व कहता है कि भरद्वाज के पुत्र, यानी द्रोण, उस पाञ्चाल राजकुमार धृष्टद्युम्न को अपने घर ले आए, और उसे अस्त्र सिखाने के लिए अपना शिष्य बना लिया। क्यों? पाठ कहता है, क्योंकि बुद्धिमान द्रोण जानते थे कि होनी से कोई नहीं बच सकता। और अपनी कीर्ति की रक्षा के लिए उन्होंने ऐसा किया।
सोचिए ज़रा। जो लड़का आपको मारने के लिए पैदा हुआ है, जिसके बारे में आकाशवाणी हुई है, उसे आप अपने घर लाते हैं, अपने हाथ से धनुष पकड़ना सिखाते हैं, अपनी सारी विद्या उसे देते हैं। एक गुरु की ये मर्यादा थी। विद्या माँगने वाले को मना नहीं करना है, चाहे वो कोई भी हो। और जो होना है, वो तो होगा ही, तो कम से कम मैं अपने धर्म से न गिरूँ।
और अब दुर्योधन उसी बात को ताना बनाकर द्रोण के सामने रखता है। "देखिए आचार्य, पाण्डवों की सेना का व्यूह किसने रचा है? द्रुपद के बेटे ने। आपके शिष्य ने। आपके बुद्धिमान शिष्य ने।" हमारी टीका यही कहती है कि दुर्योधन के शब्दों में व्यंग्य है: जिसे आपने सिखाया, वही आज आपके विरुद्ध सेना का नायक है।
पुराने टीकाकार इसमें दो बातें और देखते हैं। नीलकण्ठ और मधुसूदन, दोनों कहते हैं कि दुर्योधन धृष्टद्युम्न का नाम नहीं लेता, उसे "द्रुपद का पुत्र" कहता है, ताकि द्रोण को द्रुपद से अपनी पुरानी दुश्मनी याद आए और उनका क्रोध भड़के। और मधुसूदन एक और चुभती बात पकड़ते हैं: "पाण्डुपुत्राणाम् आचार्य", पाण्डवों के आचार्य। यानी, "आप उनके गुरु हैं, मेरे नहीं।" दुर्योधन को डर है कि अपने प्यारे शिष्यों को सामने देखकर द्रोण का मन पिघल जाएगा, वो लड़ेंगे ही नहीं। इसलिए वो एक ही साँस में उन्हें उकसा भी रहा है, और परख भी रहा है।
ये बात मुझे बहुत चुभती है। एक आदमी ने अपने जीवन का सबसे बड़ा त्याग किया, अपनी मृत्यु को खुद अपनी विद्या दी, सिर्फ़ इसलिए कि गुरु का धर्म न टूटे। और उसके उसी त्याग को कोई उसके मुँह पर ताना बनाकर मार रहा है।
आपने भी कभी ऐसा देखा होगा। किसी ने किसी की मदद की, बिना शर्त, दिल से, और बाद में उसी मदद को उसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया गया। "तुमने ही तो उसे आगे बढ़ाया था, अब भुगतो।" "तुमने ही तो उसे नौकरी दिलवाई थी।" जो छोटा मन होता है, वो दूसरों की अच्छाई को भी हथियार बना लेता है। और जो बड़ा मन होता है, वो जानते हुए भी अपनी अच्छाई नहीं छोड़ता।
तो पहले तीन श्लोकों में ही हमने तीन मन देख लिए। एक अन्धा पिता, जो "मेरे" और "उसके" में बँटा है। एक घबराया हुआ बेटा, जो डर में भी ताने मार रहा है। और एक गुरु, जो चुप है, पर जिसकी चुप्पी के पीछे एक पूरा जीवन है। और अभी तो युद्ध शुरू भी नहीं हुआ।
पर अभी एक बात बाकी है। दुर्योधन अब पाण्डवों की सेना के योद्धाओं को एक-एक करके गिनने वाला है। और जिस तरह वो गिनता है, उसमें उसका सबसे बड़ा डर छिपा है। आइए, पहले वो श्लोक सुनते हैं।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ ४ ॥
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥ ५ ॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ ६ ॥
ये तीन श्लोक सुनने में नामों की एक सूची लगते हैं। युयुधान, विराट, द्रुपद, धृष्टकेतु, चेकितान, काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज, शैब्य, युधामन्यु, उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र, द्रौपदी के पुत्र। और बहुत से लोग यहाँ आकर सोचते हैं कि चलो, ये तो नाम हैं, इन्हें छोड़ दो, आगे चलो।
पर ज़रा रुकिए। ये सूची कौन पढ़ रहा है? दुर्योधन। और किसे सुना रहा है? अपने गुरु को। और किस हालत में सुना रहा है? घबराहट में। तो ये सूची सिर्फ़ नामों की सूची नहीं है। ये एक डरे हुए मन की गिनती है।
जब हम डरते हैं, तो हम गिनने लगते हैं: कर्ज़, किस्तें, कौन साथ है, कौन नहीं। गिनती डर की भाषा है। और देखिए दुर्योधन किस पैमाने से गिन रहा है। "अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।" यहाँ बड़े धनुर्धर शूरवीर हैं, जो युद्ध में भीम और अर्जुन के समान हैं। भीम और अर्जुन के समान। यानी दुर्योधन हर योद्धा को दो नामों से नाप रहा है। उसके मन में दो चेहरे बैठे हैं, जिनसे वो सबसे ज़्यादा डरता है। एक भीम, जिससे बचपन से उसकी ठनी रही। और एक अर्जुन, जो उसके अपने गुरु द्रोण का सबसे प्यारा शिष्य रहा। और जब डर दिल में बैठ जाता है, तो दुनिया की हर चीज़ उसी डर के पैमाने से नपने लगती है। हर नया योद्धा, "भीम जैसा"। हर नया संकट, "पिछली बार जैसा"।
गीता के आगे के अध्यायों में श्रीकृष्ण बार-बार सिखाएँगे कि मन को इन पुराने डरों के पैमानों से कैसे आज़ाद किया जाए। अब इस सूची में एक शब्द बार-बार आता है: महारथी। "द्रुपदश्च महारथः।" और छठे श्लोक के अंत में, "सर्व एव महारथाः", ये सभी महारथी हैं। श्रीधर स्वामी और नीलकण्ठ, दोनों एक पुराना श्लोक देते हैं: महारथी वो जो अकेला दस हज़ार धनुर्धरों से लड़ सके, और शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण हो। जो अनगिनत से लड़े, वो अतिरथी। जो एक से लड़े, वो रथी। और उससे कम, अर्धरथी। अब आप सोचिए, एक आदमी, दस हज़ार के बराबर। और दुर्योधन ऐसे एक-दो नहीं, एक के बाद एक नाम गिनाए जा रहा है, और हर नाम के साथ उसका अपना दिल थोड़ा और बैठता जा रहा है।
इस सूची में कुछ नाम ऐसे हैं जिनके पीछे पूरी-पूरी कहानियाँ हैं। विराट, जिनके नगर में पाण्डवों ने अपने वनवास का आखिरी वर्ष, अपनी पहचान छिपाकर बिताया था। द्रुपद, द्रौपदी के पिता, जिनकी कहानी अभी हमने द्रोण के साथ सुनी। और फिर छठे श्लोक में दो नाम ऐसे आते हैं जिन पर मैं चाहता हूँ कि आप एक पल रुकें।
"सौभद्रो द्रौपदेयाश्च।" सुभद्रा का पुत्र, और द्रौपदी के पुत्र।
सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु है, अर्जुन का बेटा। और द्रौपदी के पुत्र वे पाँच हैं जो उसे पाँचों पाण्डवों से हुए। ये इस सूची के सबसे छोटे नाम हैं। उम्र में भी। ये वो पीढ़ी है जिसका जुए के उस दिन में कोई हाथ नहीं था, सभा में हुए उस अपमान में कोई हाथ नहीं था, लाक्षागृह की आग में कोई हाथ नहीं था। ये बड़ों के झगड़े में खड़े बच्चे हैं।
युद्ध शुरू होने से पहले भगवान व्यास ने धृतराष्ट्र से एक बात कही थी, जो भीष्म पर्व में लिखी है। उन्होंने कहा, "राजन्, तुम्हारे पुत्रों और दूसरे राजाओं का समय पूरा हो गया है। वे युद्ध में भिड़कर एक-दूसरे को नष्ट कर देंगे।" और आप जानते हैं, युद्ध कभी सिर्फ़ उन्हीं को नहीं खाता जिन्होंने उसे शुरू किया। वो सबसे पहले उन्हें खाता है जिनका उसमें कोई दोष नहीं।
ये बात मैं आपको डराने के लिए नहीं कह रहा। ये बात इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि हमारे घरों में भी यही होता है। बड़ों के झगड़े, बड़ों की ज़िद, बड़ों का "मामकाः", और उसकी कीमत चुकाते हैं बच्चे। जो दो भाई बरसों से बात नहीं करते, उनके बच्चे एक-दूसरे को पहचानते तक नहीं। जो पति-पत्नी रोज़ लड़ते हैं, उनके बच्चे दरवाज़े के पीछे खड़े होकर सब सुनते हैं। अभिमन्यु और द्रौपदी के पुत्र गीता के पहले अध्याय में बस एक पंक्ति में आते हैं। पर वो पंक्ति हमें याद दिलाती है कि हर कुरुक्षेत्र में कुछ ऐसे लोग भी खड़े होते हैं जिन्होंने युद्ध माँगा नहीं था।
अब एक और बात पर ध्यान दीजिए, जो इन तीन श्लोकों में नहीं है। दुर्योधन ने पाण्डवों की ओर के इतने नाम गिनाए। भीम, अर्जुन, युयुधान, विराट, द्रुपद, और भी कितने। पर एक नाम उसने नहीं गिनाया।
श्रीकृष्ण का।
क्यों? क्योंकि श्रीकृष्ण इस युद्ध में योद्धा हैं ही नहीं। उन्होंने हथियार न उठाने का वचन दिया है। वो सिर्फ़ अर्जुन के सारथी हैं, घोड़ों की लगाम पकड़ने वाले। और दुर्योधन की गिनती में सिर्फ़ वो आते हैं जिनके हाथ में धनुष है। जिसके हाथ में सिर्फ़ लगाम है, वो उसकी गिनती में आता ही नहीं।
और यहीं हम सबसे बड़ी भूल करते हैं। हम भी अपनी ज़िंदगी की गिनती ऐसे ही करते हैं। कितना पैसा है, कितने लोग साथ हैं, कितनी डिग्रियाँ हैं, कितनी जान-पहचान है। पर जो सबसे बड़ी ताकत हमारे जीवन का रथ चला रही है, वो हमारी गिनती में आती ही नहीं, क्योंकि उसके हाथ में कोई दिखने वाला हथियार नहीं है। वो बस चुपचाप लगाम पकड़े बैठी है।
श्रीकृष्ण इस युद्ध में आए कैसे, और अर्जुन ने उन्हें कैसे चुना, ये कहानी मैं आपको थोड़ी देर में सुनाऊँगा, जब गीता में पहली बार उनका नाम आएगा। पर अभी, दुर्योधन की गिनती आगे बढ़ती है। अब वो अपनी ओर के योद्धाओं को गिनाएगा। और सुनिए कि वो किसका नाम सबसे पहले लेता है, और क्यों।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥
इससे पहले कि हम इन श्लोकों में उतरें, एक छोटी-सी बात आपसे कहना चाहता हूँ। हम अभी गीता के बिल्कुल दरवाज़े पर खड़े हैं। और ये वो जगह है जहाँ बहुत से लोग लौट जाते हैं, ये सोचकर कि यहाँ तो बस युद्ध की तैयारी है, असली बात कहीं आगे होगी। पर आधा सुना हुआ सच, सच नहीं रहता, वो भ्रम बन जाता है। जो आदमी सिर्फ़ इतना सुनकर उठ जाए कि दुर्योधन डरा हुआ था, वो गीता की सबसे गहरी बात से चूक जाएगा, जो आज के इसी हिस्से के आखिर में आने वाली है। तो अगर आप ये सत्संग पॉडकास्ट पर सुन रहे हैं, तो इसे फ़ॉलो कर लीजिए, ताकि गीता की ये यात्रा बीच में न छूटे। और आज का ये सत्संग आखिर तक सुनिए।
अब आइए, दुर्योधन की दूसरी गिनती पर।
"अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।" हे द्विजश्रेष्ठ, अब हमारे पक्ष के जो प्रमुख हैं, उन्हें भी जान लीजिए।
"द्विजोत्तम।" द्विजों में श्रेष्ठ। दुर्योधन द्रोण को इस नाम से पुकारता है। ऊपर से ये आदर है। द्रोण ब्राह्मण हैं, तो उन्हें द्विजश्रेष्ठ कहना ठीक ही है। पर हमारी टीका एक बारीक बात की ओर इशारा करती है। इसमें ये संकेत भी हो सकता है कि ब्राह्मण अपने शिष्यों से लड़ने में ढीला पड़ सकता है। यानी, "आप तो ब्राह्मण हैं, गुरु हैं, आपके मन में कहीं उनके लिए नरमी न आ जाए, ये याद रखिएगा।" एक ही शब्द, आदर भी, और चेतावनी भी।
मधुसूदन सरस्वती इससे भी आगे जाते हैं। वो कहते हैं, एक अर्थ में ये स्तुति है, गुरु को अपने काम के लिए प्रसन्न करने को। पर दूसरे अर्थ में इसमें दुर्योधन की दुष्टता छिपी है: "आप तो ब्राह्मण हैं, युद्ध आपका असली काम नहीं। आप मुँह भी फेर लें, तो भी भीष्म जैसे बड़े क्षत्रिय हमारे पास हैं।" और "संज्ञार्थम्", यानी "आपकी जानकारी के लिए", इस पर वो कहते हैं: दुर्योधन का भाव है कि अपने प्यारे शिष्यों की सेना देखकर कहीं आप खुशी में अपने ही वीरों को न भूल जाएँ।
फिर आठवाँ श्लोक, और यहाँ बात और साफ़ होती है। "भवान्भीष्मश्च कर्णश्च।" आप, भीष्म, और कर्ण। सबसे पहले "भवान्"। आप।
सोचिए। कौरवों की सेना के सेनापति भीष्म हैं। कुरुवंश के सबसे बड़े, सबसे पूज्य। पर दुर्योधन अपनी सूची भीष्म से शुरू नहीं करता। वो शुरू करता है "आप" से, यानी द्रोण से। हमारी टीका सीधे कहती है कि दुर्योधन उन्हें प्रसन्न करने के लिए सबसे पहले द्रोण का नाम लेता है।
और एक बात ध्यान दीजिए। जिस द्रोण को अभी एक श्लोक पहले दुर्योधन ताना मार रहा था, "आपका शिष्य, आपका बुद्धिमान शिष्य", उन्हीं को अब वो सबसे पहले गिना रहा है, सबसे ऊपर। ताना और तारीफ़, दोनों एक ही साँस में। ये घबराए हुए मन की पहचान है। उसे खुद नहीं पता कि वो सामने वाले को डराना चाहता है या मनाना।
फिर बाकी नाम। भीष्म। कर्ण। कृप, जिन्हें "समितिञ्जय" कहा गया, युद्ध में जीतने वाले। अश्वत्थामा, जो द्रोण के अपने पुत्र हैं। विकर्ण, जो धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में चार प्रमुख पुत्रों में से एक थे। और "सौमदत्ति", सोमदत्त का पुत्र, जिसे भूरिश्रवा के नाम से जानते हैं।
और इस सूची में भी कुछ अजीब है। देखिए, अश्वत्थामा का नाम आता है, द्रोण के बेटे का, उसी सूची में जिसे दुर्योधन द्रोण को सुना रहा है। यानी जैसे कह रहा हो, "आचार्य, आपका अपना बेटा भी हमारी ओर खड़ा है।" एक पिता को याद दिलाया जा रहा है कि उसका बेटा किस ओर है। दुर्योधन जानता है कि आदमी का मन कहाँ बँधा होता है। वो हर उस धागे को खींच रहा है जो उसे मिल सकता है।
और अब नौवाँ श्लोक। "अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।"
और भी बहुत से शूरवीर हैं, जो मेरे लिए अपना जीवन त्याग सकते हैं।
"मदर्थे।" मेरे लिए।
ये एक शब्द दुर्योधन का पूरा मन खोलकर रख देता है। उसके लिए ये युद्ध किसी धर्म के लिए नहीं है, किसी प्रजा के लिए नहीं है, किसी सिद्धांत के लिए नहीं है। ये "मेरे लिए" है। और जो लोग इसमें मरेंगे, वो "मेरे लिए" मरेंगे। इतने बड़े युद्ध में, जहाँ लाखों लोग खड़े हैं, उसके मन में केंद्र में बस एक ही आदमी है। वो खुद।
और अब मैं आपको आगे की एक झलक देता हूँ, ताकि आप समझें कि गीता कितनी सोच-समझकर बुनी गई है। कुछ ही श्लोकों बाद, इसी पहले अध्याय में, अर्जुन भी लगभग यही बात कहेगा। पर बिल्कुल उलटी दिशा से। अर्जुन कहेगा, "जिनके लिए हमने राज्य, भोग और सुख चाहे थे, वे ही यहाँ प्राण और धन की आशा छोड़कर युद्ध में खड़े हैं।"
सुना आपने? दुर्योधन कहता है, "ये लोग मेरे लिए जान देने को तैयार हैं।" और अर्जुन कहता है, "जिनके लिए मैं सब कुछ चाहता था, वही यहाँ जान देने को खड़े हैं।" एक के लिए लोग साधन हैं, उसके सुख के लिए। दूसरे के लिए लोग ही सुख का कारण हैं, उनके बिना राज्य का कोई अर्थ नहीं। एक ही दृश्य, एक ही मैदान, एक ही बात, "जीवन त्याग देना", पर दो बिल्कुल अलग दिल।
और यहीं से हम अपने लिए एक सवाल निकाल सकते हैं, बिना किसी को दोष दिए। हमारे जीवन में जो लोग हैं, परिवार, दोस्त, साथ काम करने वाले, वो हमारे लिए क्या हैं? हमारे सपनों तक पहुँचने के साधन? या वो ही हमारे सपनों का कारण हैं? जब हम कहते हैं, "मैं इतनी मेहनत किसके लिए कर रहा हूँ", तो उस वाक्य का जवाब क्या है? "मेरे लिए"? या "इनके लिए"? ये सवाल मैं आपसे इसलिए पूछ रहा हूँ क्योंकि मैं खुद से भी पूछता हूँ। और ईमानदारी से कहूँ तो जवाब हर दिन एक-सा नहीं होता।
फिर श्लोक का आखिरी हिस्सा: "नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः।" अनेक प्रकार के शस्त्र चलाने वाले, सब के सब युद्ध में कुशल। दुर्योधन अपनी सेना की तारीफ़ कर रहा है, हथियारों की, कौशल की। और ये सब सच है। उसकी सेना सचमुच बड़े-बड़े योद्धाओं से भरी है। भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृप, अश्वत्थामा, ये कोई छोटे नाम नहीं हैं।
पर जितना वो गिनाता जाता है, उतना ही एक बात साफ़ होती जाती है। उसकी गिनती में हर चीज़ है, हथियार, कौशल, योद्धा, संख्या। बस एक चीज़ नहीं है, और वो है ये भरोसा कि वो सही ओर खड़ा है।
और जिस मन को ये भरोसा नहीं होता, उसे कितनी भी बड़ी सेना मिल जाए, वो अंदर से खाली ही रहता है। इसीलिए अगले श्लोक में दुर्योधन के मुँह से एक ऐसा वाक्य निकलेगा जिसके दो अर्थ होते हैं, और उसके दोनों अर्थ पुराने समय से किए जाते आए हैं: कि वो डींग मार रहा था, या कि वो डर रहा था। शायद दोनों। चलिए सुनते हैं।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥
"अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्।"
इस श्लोक में दो शब्द हैं जो पूरे श्लोक का रंग तय करते हैं: "अपर्याप्त" और "पर्याप्त"। और संस्कृत की सुंदरता देखिए, इन दोनों शब्दों के दो-दो अर्थ हो सकते हैं।
पहला अर्थ: अपर्याप्त यानी "जिसे नापा न जा सके", असीमित। और पर्याप्त यानी "सीमित", जिसकी हद है। इस अर्थ में दुर्योधन कह रहा है, "भीष्म की रक्षा में हमारी सेना असीमित है, और भीम की रक्षा में इनकी सेना सीमित है।" यानी डींग। "हम कहीं ज़्यादा हैं, ये तो थोड़े हैं।"
दूसरा अर्थ: अपर्याप्त यानी "जो पूरा न पड़े", और पर्याप्त यानी "जो पूरा पड़ जाए"। इस अर्थ में वही वाक्य बिल्कुल उलट जाता है। "भीष्म की रक्षा में हमारी सेना पूरी नहीं पड़ रही, और भीम की रक्षा में इनकी सेना पूरी है।" यानी डर।
हमारी टीका कहती है कि दोनों अर्थ पुराने हैं, और दुर्योधन की मिली-जुली मनोदशा दोनों से मेल खाती है। और मुझे लगता है कि यही इस श्लोक की सबसे सच्ची बात है। दुर्योधन एक ही वाक्य में डींग भी मार रहा है और डर भी रहा है। और उसे खुद नहीं पता कि वो क्या कह रहा है।
और श्रीधर स्वामी एक ऐसी बात कहते हैं जो इस श्लोक को और गहरा कर देती है। वो दूसरा अर्थ लेते हैं, कि हमारी सेना पूरी नहीं पड़ रही। और कारण बताते हैं: भीष्म दोनों पक्षों से प्रेम करते हैं, और भीम केवल एक पक्ष के हैं। सोचिए। दुर्योधन को पता है कि उसके सेनापति का दिल पूरा उसके साथ नहीं है। भीष्म इस ओर खड़े हैं, पर पाण्डव भी उनके पोते हैं। और उस ओर का रक्षक भीम है, जिसका दिल सिर्फ़ एक ओर है। जिस सेना के सेनापति का मन बँटा हो, उसे कितने भी सैनिक पूरे नहीं पड़ते।
सेनाओं की गिनती भी महाभारत खुद बताता है। भीष्म पर्व में धृतराष्ट्र पूछते हैं कि ग्यारह अक्षौहिणी सेना को व्यूह में सजा देखकर युधिष्ठिर ने अपनी छोटी सेना से कैसा व्यूह रचा। और युधिष्ठिर अर्जुन से कहते हैं, "हमारी सेना शत्रु से बहुत छोटी है।" तब अर्जुन वज्र नाम का व्यूह रचता है, जिसे कहते हैं इन्द्र ने रचा था, और जिसके आगे भीम लड़ेंगे। नीलकण्ठ और मधुसूदन, दोनों पहला अर्थ भी लेते हैं: हमारी ग्यारह अक्षौहिणी, उनकी सात। गिनती में दुर्योधन सचमुच बड़ा था। पर मन में?
अब ग्यारहवाँ श्लोक। "इसलिए आप सभी अपनी-अपनी जगह, सब मोर्चों पर डटे रहकर, भीष्म की ही रक्षा करें।"
ज़रा सोचिए, ये कितनी अजीब बात है। भीष्म इस सेना के सबसे बड़े योद्धा हैं। सेनापति हैं। और दुर्योधन सारी सेना से कह रहा है, "भीष्म की रक्षा करो।" जिसे सबकी रक्षा करनी है, उसकी रक्षा के लिए सब लगे हैं।
इसकी वजह समझने के लिए हमें फिर पीछे जाना होगा, आदि पर्व में, जहाँ भीष्म की प्रतिज्ञा की कहानी है। भीष्म का असली नाम देवव्रत था। उनके पिता राजा शन्तनु एक कन्या से विवाह करना चाहते थे, और कन्या के पिता की शर्त थी कि राज्य उसी कन्या के बेटे को मिले। तब देवव्रत ने अपने पिता की खुशी के लिए प्रतिज्ञा की, कि वो कभी राजा नहीं बनेंगे, और कभी विवाह नहीं करेंगे, ताकि उनकी कोई संतान भी राज्य पर दावा न करे। इसी भयंकर प्रतिज्ञा के कारण वो "भीष्म" कहलाए।
और पाठ कहता है कि प्रसन्न होकर शन्तनु ने अपने उस महात्मा पुत्र को इच्छा-मृत्यु का वर दिया: "जब तक तुम जीना चाहोगे, मृत्यु तुम पर प्रभाव नहीं डालेगी।"
तो जिसे मृत्यु छू नहीं सकती जब तक वो खुद न चाहे, उसकी रक्षा क्यों? हमारी टीका कहती है: सेना की सारी आशा उन्हीं पर टिकी थी। उन्हें घिरने से बचाना था।
और इसकी एक और वजह है, जो भीष्म पर्व में दुर्योधन खुद बताता है। ठीक इसी सुबह, जब सेनाएँ व्यूह में सज चुकी हैं, वो अपने भाई दुःशासन से कहता है, "दुःशासन, भीष्म की रक्षा करने वाले रथ जल्दी जोते जाएँ। इस युद्ध में भीष्म की रक्षा से ज़्यादा ज़रूरी कुछ नहीं।" और फिर कारण बताता है: "शुद्ध मन वाले भीष्म ने कहा है, 'मैं शिखण्डी को नहीं मारूँगा। सुना जाता है कि वह पहले स्त्री था। इसलिए युद्ध में मुझे उसे छोड़ देना है।'"
यानी पितामह ने अपने लिए एक नियम बना रखा है, जिसे वो किसी भी हालत में नहीं तोड़ेंगे। उद्योग पर्व में भी वो दुर्योधन से साफ़ कहते हैं, "शिखण्डी को मैं नहीं मारूँगा, भले ही उसे युद्ध में बाण उठाए मुझसे लड़ते हुए देखूँ।" और दुर्योधन जानता है कि यही नियम उसकी सेना की सबसे कमज़ोर जगह है। इसलिए वो कहता है, "मेरे सब लोग शिखण्डी के वध में लगे रहें। बिना रक्षा के तो महाबली सिंह को भेड़िया भी मार सकता है। हम अपने सिंह को शिखण्डी के हाथों न मरवाएँ, जैसे कोई सियार से मरवाए।"
और ध्यान दीजिए, इस आदेश में भी वही शब्द है: "मामकाः"। मेरे सब लोग। पिता ने पहले श्लोक में कहा था "मेरे वाले", और बेटा युद्ध की पहली सुबह कह रहा है "मेरे वाले"। वो शब्द घर से निकलकर अब पूरी सेना का आदेश बन चुका है।
और अब इसमें छिपी पीड़ा देखिए। एक ओर भीष्म का नियम, जो उनके धर्म का हिस्सा है, और जिसे वो प्राण जाने पर भी नहीं छोड़ेंगे। दूसरी ओर, वही नियम उनके शत्रु के हाथ का सबसे बड़ा हथियार बनने वाला है। और आपको याद होगा, सञ्जय की खबर क्या थी: भीष्म शिखण्डी के हाथों गिरे। यानी जिस बात से बचाने के लिए आज इतने रथ जोते जा रहे हैं, दस दिन बाद वही होकर रहेगी। और भीष्म पर्व में सञ्जय एक और बात कहते हैं, जो मुझे बहुत चुभती है। जब वो भीष्म के गिरने की खबर देते हैं, तो कहते हैं, "जिनके बल के भरोसे आपके पुत्र ने जुआ खेला था, वे भीष्म आज युद्ध में पड़े हैं।"
जिनके भरोसे जुआ खेला था। यानी दुर्योधन ने अपना सारा दाँव, शुरू से, एक आदमी की ताकत पर लगाया था। पासों के उस खेल से लेकर इस युद्ध तक, उसका सारा भरोसा एक बूढ़े योद्धा की भुजाओं पर टिका था।
हम सब भी कहीं न कहीं किसी एक सहारे पर पूरा दाँव लगा देते हैं। कोई एक नौकरी, कोई एक आदमी, कोई एक रिश्ता, कोई एक बैंक खाता। "बस ये बना रहे, तो सब ठीक है।" और फिर सारी ज़िंदगी उस सहारे की रक्षा में निकल जाती है। सारी ताकत, सारी चिंता, सारी नींद, उसी एक चीज़ को बचाने में। भीष्ममेवाभिरक्षन्तु। बस भीष्म को बचाओ। और कोई ये नहीं पूछता कि जिस सहारे को हम इतना पकड़े हुए हैं, क्या वो सच में हमें बचा सकता है? या हम ही उसे बचाते-बचाते थक रहे हैं?
गीता आगे चलकर हमें एक ऐसा सहारा दिखाएगी जिसे बचाना नहीं पड़ता, जो खुद हमें बचाता है। पर अभी, पहले अध्याय में, दुर्योधन अपने सहारे को बचाने में लगा है।
और अब बारहवाँ श्लोक। और ये पहला श्लोक है जिसमें दुर्योधन की बात का कोई उत्तर आता है। उत्तर द्रोण नहीं देते। द्रोण तो पूरे समय चुप हैं। उत्तर देते हैं भीष्म।
"तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः। सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्।"
दुर्योधन का मन खुश करने के लिए, कुरुवंश के बूढ़े पितामह, प्रतापी भीष्म ने शेर की तरह ऊँची गर्जना की, और शंख बजाया।
हमारी टीका कहती है: भीष्म दुर्योधन को शब्दों से उत्तर नहीं देते। वो शंख से उत्तर देते हैं, जो युद्ध के आरम्भ का संकेत है।
इस श्लोक पर मैं थोड़ी देर रुकना चाहता हूँ, क्योंकि इसमें एक पूरा जीवन छिपा है। सोचिए। एक बहुत बूढ़ा आदमी। उसने अपने पिता की खुशी के लिए राजगद्दी छोड़ दी, विवाह छोड़ दिया। फिर पीढ़ी दर पीढ़ी वो हस्तिनापुर के राजाओं के पीछे खड़ा रहा, उनकी रक्षा करता रहा, उनके बच्चों को बड़ा होते देखता रहा। और आज, उस बुढ़ापे में, उसका एक पोता घबराया हुआ है, डरा हुआ है, अपने गुरु को ताने मार रहा है, और अपनी ही सेना से कह रहा है, "बस भीष्म को बचाओ।"
और वो बूढ़ा आदमी कुछ नहीं कहता। कोई भाषण नहीं देता। "देखो बेटा, मैंने तुम्हें पहले ही कहा था…" ऐसा कुछ नहीं। वो बस शेर की तरह गरजता है, और शंख उठाकर बजा देता है। "तस्य सञ्जनयन्हर्षम्।" ताकि उस घबराए हुए बच्चे के चेहरे पर थोड़ी-सी खुशी आ जाए।
मधुसूदन सरस्वती यहाँ एक बात पकड़ते हैं जो आसानी से छूट जाती है। दुर्योधन ने इतनी देर द्रोण से बात की। ताने मारे, तारीफ़ की, उकसाया। और द्रोण ने एक शब्द तक उत्तर नहीं दिया। मधुसूदन कहते हैं, गुरु ने उसे अनदेखा कर दिया, क्योंकि वो समझ गए थे कि ये डर से, छल से उनकी शरण में आया है। पर भीष्म पितामह हैं। एक दादा अपने पोते को अनदेखा नहीं कर सकता। और मधुसूदन भीष्म के मन की बात यूँ कहते हैं: "ये मेरी तारीफ़ करे या निन्दा, ये शरीर तो इसी काम में गिरेगा।"
और नीलकण्ठ एक और कारण बताते हैं। भीष्म ने पाण्डवों का पराक्रम पहले अपनी आँखों से देखा था, विराट के नगर में। इसलिए उन्होंने शंख बजाया, ताकि राजा के मन में डर न बैठे। उस कहानी पर हम थोड़ी देर में लौटेंगे।
ये प्रेम है। गलत ओर खड़ा हुआ प्रेम, पर प्रेम है।
और भीष्म पर्व में सञ्जय भीष्म के बारे में धृतराष्ट्र से जो कहते हैं, वो सुनिए। "हे राजन्, आपकी बुरी सलाह से उन्हें ऐसी दशा मिली, जिसके वे योग्य नहीं थे।" और धृतराष्ट्र खुद भी मानते हैं, "वे ऐसे अन्त के योग्य नहीं थे।"
हमारे घरों में भी ऐसे भीष्म होते हैं। कोई दादा, कोई बड़े चाचा, कोई माँ, जो जानते हैं कि घर में कोई गलत रास्ते पर है, पर फिर भी उसके साथ खड़े रहते हैं, क्योंकि वो उसे छोड़ नहीं सकते। और हम उन्हें दोष भी नहीं दे पाते, और पूरी तरह सही भी नहीं कह पाते। भीष्म का जीवन हमें यही सिखाता है कि प्रेम और धर्म हमेशा एक ही ओर खड़े हों, ये ज़रूरी नहीं। और जब वो अलग-अलग ओर खड़े हों, तब मनुष्य की सबसे बड़ी परीक्षा होती है।
पर अभी एक बात बाकी है। भीष्म का ये शंख, जो एक बूढ़े ने एक बच्चे का मन रखने के लिए बजाया था, वो इस मैदान का पहला शंख है। और जैसे ही वो बजता है, पूरे कुरुक्षेत्र में बाजे बज उठते हैं। और उन बाजों के बीच, पहली बार, गीता में उनका नाम आता है जिनके लिए हम यहाँ बैठे हैं।
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३ ॥
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥
तेरहवाँ श्लोक एक शोर है। शंख, भेरी, ढोल, मृदंग, नरसिंघे, सब एक साथ बज उठे, "सहसैव", अचानक, और उनका शब्द "तुमुल" हुआ, बड़ा भयंकर। आप उस पल की कल्पना कीजिए। सुबह की ठंडी हवा, लाखों लोग साँस रोके खड़े, और फिर एक साथ हज़ारों बाजे। धरती काँप उठी होगी। घोड़े बिदक गए होंगे। और ये सारा शोर कौरवों की ओर से उठा है, एक बूढ़े पितामह के शंख के पीछे-पीछे।
और फिर चौदहवें श्लोक में, उस सारे शोर के बीच, सञ्जय की नज़र दूसरी ओर जाती है।
"ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ। माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः।"
तब सफ़ेद घोड़ों से जुते एक बड़े रथ में बैठे माधव और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपने दिव्य शंख बजाए।
माधव। गीता में श्रीकृष्ण का पहला नाम। चौदह श्लोक बीत गए, इतने योद्धा गिनाए गए, इतने शंख बजे, और अब जाकर, पहली बार, वो आते हैं। और कैसे आते हैं? कोई मुकुट नहीं, कोई सिंहासन नहीं, कोई सेना नहीं। एक रथ पर, सारथी बनकर, अपने मित्र के साथ।
हमारी टीका बताती है कि माधव का अर्थ है "मा", यानी लक्ष्मी, के पति। या मधु के वंश में जन्मे। जो सारे जगत की लक्ष्मी के स्वामी हैं, वो आज एक रथ की लगाम पकड़े बैठे हैं।
अब मैंने आपसे कहा था कि मैं आपको बताऊँगा कि श्रीकृष्ण इस युद्ध में आए कैसे, और अर्जुन के सारथी कैसे बने। तो सुनिए। ये कहानी महाभारत के उद्योग पर्व में है, और ये उन कहानियों में से है जो लोग सुनते तो हैं, पर उसका पूरा अर्थ कम ही लोग देखते हैं।
युद्ध तय हो चुका है। दोनों पक्ष राजाओं के पास दूत भेज रहे हैं, सहायता माँग रहे हैं। श्रीकृष्ण द्वारका लौट चुके हैं। दुर्योधन को अपने गुप्तचरों से खबर मिलती है कि अर्जुन द्वारका जा रहा है। तो वो भी तेज़ घोड़ों पर, छोटी-सी सेना लेकर, द्वारका के लिए निकल पड़ता है। और उसी दिन अर्जुन भी वहाँ पहुँचता है।
दोनों श्रीकृष्ण के कक्ष में जाते हैं। श्रीकृष्ण लेटे हुए सो रहे हैं। अब देखिए, दोनों क्या करते हैं। पाठ कहता है, दुर्योधन पहले पहुँचा, और श्रीकृष्ण के सिरहाने, एक अच्छे आसन पर बैठ गया। फिर अर्जुन भीतर आया। और पाठ कहता है, वो श्रीकृष्ण के पैरों की ओर, हाथ जोड़कर, विनम्रता से झुका हुआ खड़ा रहा।
एक सिरहाने बैठा है। एक पैरों के पास खड़ा है। दोनों एक ही आदमी से मदद माँगने आए हैं। पर एक बराबरी से माँगने आया है, और एक शरण में।
श्रीकृष्ण जागते हैं। और पाठ कहता है, जागने पर उन्होंने पहले अर्जुन को देखा, सामने खड़े। फिर मुड़कर, सिंहासन पर बैठे दुर्योधन को देखा। अब ये तो सीधी-सी बात है। जो पैरों की ओर खड़ा होगा, वही आँख खुलते ही सामने दिखेगा। पर इसमें एक बड़ी बात भी है। भगवान की नज़र सबसे पहले उस पर पड़ती है जो झुककर खड़ा होता है।
दुर्योधन मुस्कराते हुए कहता है, "इस युद्ध में आपको मेरी सहायता करनी चाहिए। आपकी मित्रता मुझसे और अर्जुन से बराबर है, रिश्ता भी बराबर है। और मैं पहले आया हूँ। भले लोग पहले आने वाले का साथ देते हैं।"
श्रीकृष्ण कहते हैं, "आप पहले आए, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं। पर मैंने पहले अर्जुन को देखा। इसलिए मैं दोनों की सहायता करूँगा। और परम्परा कहती है कि पहला चुनाव छोटे को दिया जाए, तो पहला चुनाव अर्जुन का है।"
और फिर वो दोनों के सामने दो चीज़ें रखते हैं। "एक ओर मेरे जैसे बलवान ग्वालों की दस करोड़ की बड़ी सेना है, जो नारायण के नाम से प्रसिद्ध है, सब युद्ध में लड़ने वाले। और दूसरी ओर अकेला मैं। जो युद्ध में लड़ूँगा नहीं। हथियार रख दूँगा।" "पार्थ, इन दोनों में से जो तुम्हें प्रिय लगे, चुन लो। बार-बार सोच लो।"
अब आप अर्जुन की जगह होते तो क्या चुनते? सामने युद्ध है। दुनिया की सबसे बड़ी लड़ाई। आपके सामने एक ओर दस करोड़ सैनिक, और दूसरी ओर एक आदमी जो कहता है कि मैं हथियार भी नहीं उठाऊँगा।
पाठ कहता है, कृष्ण के ऐसा कहने पर कुन्ती के पुत्र धनञ्जय ने युद्ध में न लड़ने वाले केशव को चुना। बिना देर किए।
और दुर्योधन? पाठ कहता है, उसने पूरी सेना ले ली, हज़ारों-हज़ार योद्धा। और कृष्ण उसके हाथ से निकल गए, ये जानकर भी, वो बहुत खुश हुआ।
बहुत खुश हुआ। उसे लगा उसने सौदा जीत लिया। दस करोड़ सैनिक, बदले में एक निहत्था आदमी। कौन मूर्ख ये सौदा नहीं करेगा?
और फिर, जब दुर्योधन चला गया, श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा, "मैं तो लड़ूँगा भी नहीं। फिर किस सोच से तुमने मुझे चुना?" और अर्जुन का उत्तर सुनिए। वो कहता है, "मेरी सदा से ये इच्छा रही है कि आप मेरे सारथी बनें। बहुत समय से चाही हुई इस इच्छा को आप पूरा कीजिए।"
और श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं तुम्हारा सारथी बनूँगा। तुम्हारी इच्छा पूरी हो।"
तो आज जब सञ्जय कहते हैं, "सफ़ेद घोड़ों से जुते बड़े रथ में माधव और पाण्डव", तो ये रथ उसी दिन की कहानी का फल है। जिस दिन एक आदमी ने सेना छोड़कर भगवान को चुना था।
और अब एक और बात, जो बहुत कम लोग जानते हैं। ये दोस्ती अचानक नहीं बनी थी। आदि पर्व में खाण्डव वन की कथा के अंत में, जब इन्द्र प्रसन्न होकर वरदान देते हैं, तो अर्जुन को दिव्य अस्त्रों का वचन मिलता है। और पाठ कहता है, वासुदेव ने भी एक वर माँगा। पार्थ के साथ सदा रहने वाली मित्रता। और देवताओं के स्वामी ने कृष्ण को वो वर दे दिया।
सोचिए। जिनके पास माँगने को सब कुछ था, जो खुद सब कुछ देने वाले हैं, उन्होंने वरदान में बस इतना माँगा, कि ये दोस्ती कभी न टूटे।
और उसी खाण्डव वन के बाद अग्निदेव ने अर्जुन से कहा, "दिव्य धनुष गाण्डिव, कभी खाली न होने वाले दो बड़े तरकश, और वानर की ध्वजा वाला ये रथ तुम्हें दिए गए हैं। इसी धनुष और इसी रथ से तुम युद्ध में अपने शत्रुओं को जीतोगे।"
वानर की ध्वजा। और उस ध्वजा पर कौन बैठेगा, इसकी कहानी वन पर्व में है। जब भीम वन में हनुमान से मिलते हैं, दोनों भाई, क्योंकि दोनों पवन के पुत्र हैं, तो हनुमान भीम को वरदान देते हैं। वो कहते हैं, "भाई होने के कारण और प्रेम से मैं तुम्हारा प्रिय करूँगा। और विजय, यानी अर्जुन, की ध्वजा पर बैठकर मैं ऐसे भयानक नाद करूँगा जो शत्रुओं के प्राण हर लेंगे।"
तो अब इस रथ को फिर से देखिए। सफ़ेद घोड़े। आगे लगाम थामे श्रीकृष्ण, जिन्होंने वरदान में अर्जुन की दोस्ती माँगी थी। ऊपर ध्वजा पर हनुमान, जिन्होंने भाई के प्रेम में वचन दिया था। और बीच में अर्जुन, जिसने सेना छोड़कर भगवान को चुना था। जिस रथ में इतना प्रेम सवार हो, उसका शंख कैसा बजता होगा?
संत ज्ञानेश्वर इस रथ पर आकर जैसे रुक जाते हैं। वो कहते हैं, इस रथ का घोड़े हाँकने वाला कोई और नहीं, खुद वैकुण्ठ का राजा है। और फिर, जैसे हाथ जोड़कर, कहते हैं: देखो उस प्रभु का अचरज, और भक्तों पर उनका अद्भुत प्रेम, कि वो पार्थ का सारथ्य कर रहे हैं। उन्होंने अपने सेवक को पीछे बिठा लिया है, और खुद आगे बैठे हैं।
सेवक पीछे, स्वामी आगे। आम तौर पर तो उलटा होता है। पर जिसे भगवान ने अपना लिया हो, उसके आगे वो खुद बैठते हैं, ताकि जो भी आए, पहले उनसे टकराए।
और पंद्रहवाँ श्लोक उन शंखों के नाम बताता है। "पाञ्चजन्यं हृषीकेशो।" हृषीकेश ने पाञ्चजन्य बजाया। हमारी टीका बताती है, हृषीकेश का अर्थ है "इन्द्रियों के स्वामी"। और मधुसूदन कहते हैं, ये नाम यहाँ ये बताने के लिए है कि जो सबकी इन्द्रियों को भीतर से चलाता है, सबका अन्तर्यामी, वही पाण्डवों का सहायक है। और ये नाम यहाँ संयोग से नहीं आया लगता। अभी जो युद्ध शुरू होने वाला है, उसमें सबसे बड़ी लड़ाई बाहर की नहीं, अर्जुन के मन के भीतर की होगी। और उस लड़ाई में जो सारथी चाहिए, वो वही है जो इन्द्रियों का स्वामी है।
फिर, "देवदत्तं धनञ्जयः।" धनञ्जय, यानी धन जीतने वाले अर्जुन, ने देवदत्त बजाया। इस नाम का अर्थ ही है, देवताओं का दिया हुआ। और फिर, "पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः।" भयानक कर्म करने वाले वृकोदर ने पौण्ड्र नाम का महाशंख बजाया।
वृकोदर। भेड़िये जैसे पेट वाला। हमारी टीका कहती है, भीम अपनी भारी भूख और बल के लिए प्रसिद्ध थे। अब सोचिए, दुनिया के सबसे गंभीर ग्रंथ में, सबसे गंभीर पल में, एक महावीर का परिचय उसकी भूख से दिया जा रहा है। मुझे ये बहुत अपनापन देता है। हमारे शास्त्र अपने नायकों को पत्थर की मूर्ति नहीं बनाते। वो उन्हें इंसान रहने देते हैं, भूख के साथ, गुस्से के साथ, कमज़ोरी के साथ। और शायद इसीलिए हम उनमें खुद को देख पाते हैं।
और एक बात ध्यान दीजिए। हमारी टीका कहती है कि बड़े शस्त्रों की तरह हर शंख का अपना नाम है। कौरवों की ओर से भीष्म का शंख बजा, फिर बाकी बाजे, पर किसी का नाम नहीं आया, बस एक शोर, "तुमुल"। और पाण्डवों की ओर, हर शंख का नाम है, हर बजाने वाले का नाम है। पाञ्चजन्य, देवदत्त, पौण्ड्र। जैसे सञ्जय, जो सब देख रहे हैं, एक ओर से बस शोर सुन रहे हों, और दूसरी ओर से एक-एक आवाज़ को पहचान रहे हों। मधुसूदन सरस्वती भी यही कहते हैं: उनकी सेना में इतने शंख अपने-अपने नाम से प्रसिद्ध हैं, और आपकी सेना में एक भी नहीं।
और संत ज्ञानेश्वर इस पल का एक चित्र देते हैं जो मैं भूल नहीं पाता। वो कहते हैं, जैसे ही पाञ्चजन्य गूँजा, कौरवों की ओर का सारा शोर कहाँ खो गया, पता ही नहीं चला। जैसे सूरज उगते ही तारे छिप जाते हैं।
पर अभी एक बात बाकी है। पाण्डवों की ओर के अगले शंख का नाम है "अनन्तविजय", अनंत विजय। और वो शंख उस आदमी के हाथ में है जो, युद्ध शुरू होने से कुछ ही पहले, इतना निराश हो गया था कि उसने कहा था, "हम इनसे कैसे लड़ेंगे?" सुनिए, फिर बताता हूँ।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥
"अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।" कुन्ती के पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नाम का शंख बजाया।
अनन्तविजय। जिसकी विजय का कोई अंत नहीं। कितना सुंदर नाम है। और कितना भारी।
अब मैं आपको भीष्म पर्व का एक दृश्य सुनाता हूँ, जो गीता शुरू होने से ठीक पहले का है, और जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। दोनों सेनाएँ मैदान में आ चुकी हैं। भीष्म ने अपनी सेना का व्यूह रचा है। और युधिष्ठिर उस व्यूह को देखते हैं।
पाठ कहता है, धृतराष्ट्र के पुत्र की विशाल सेना को युद्ध को तैयार देखकर, कुन्ती के पुत्र राजा युधिष्ठिर निराशा में पड़ गए। भीष्म का रचा व्यूह उन्हें अभेद्य-सा लगा। उनका चेहरा पीला पड़ गया। और वो अर्जुन से बोले, "धनञ्जय, जिनकी ओर से खुद पितामह लड़ रहे हैं, उनसे हम युद्ध में कैसे लड़ पाएँगे? ये व्यूह न डिगाया जा सकता है, न तोड़ा जा सकता है। हम अपनी सेना समेत संकट में पड़ गए हैं। इससे हम उबरेंगे कैसे?"
सुना आपने? ये वही युधिष्ठिर हैं जो थोड़ी देर में "अनन्तविजय" बजाएँगे। अनंत विजय का शंख उस आदमी के हाथ में है जो कुछ ही देर पहले कह रहा था, "हम कैसे जीतेंगे?"
और मुझे ये बात बहुत सच्ची लगती है। क्योंकि हम सबके हाथ में भी कोई न कोई अनन्तविजय होता है। घर के बड़े हैं तो सब हमारी ओर देखते हैं। ऑफ़िस में ज़िम्मेदारी है तो टीम हमारी ओर देखती है। बच्चों के सामने हमें मज़बूत दिखना होता है। और कोई नहीं जानता कि उस शंख को उठाने से पहले, किसी कोने में, हम भी कह चुके होते हैं, "पता नहीं, ये कैसे होगा।"
अब सुनिए, युधिष्ठिर को जवाब कौन देता है। अर्जुन। और अर्जुन कहता है, "राजन्, मैं आपको इसका कारण बताता हूँ कि थोड़े लोग भी बहुत-से वीरों को कैसे जीत लेते हैं।" फिर वो एक पुरानी बात सुनाता है, जो उसने कहा कि नारद जानते हैं, भीष्म और द्रोण भी जानते हैं। कि पहले देवों और असुरों के युद्ध में ब्रह्मा ने देवताओं से कहा था:
"विजय चाहने वाले बल और पराक्रम से उतना नहीं जीतते, जितना सत्य और दया से, धर्म से और उद्यम से जीतते हैं। इसलिए अधर्म छोड़ो, उत्तम धर्म अपनाओ, अहंकार छोड़कर युद्ध करो।" और फिर वो वाक्य, जो इस पूरे महायुद्ध का सार बन गया: "यतो धर्मस्ततो जयः।" जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है।
पर अर्जुन यहीं नहीं रुकता। वो कहता है, "राजन्, जान लीजिए कि युद्ध में हमारी विजय निश्चित है। क्योंकि जैसा नारद ने कहा है, यतः कृष्णस्ततो जयः। जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ विजय है।"
और फिर वो एक ऐसी बात कहता है जो मुझे बहुत प्यारी लगती है। "विजय कृष्ण में सेवक बनकर रहती है, और माधव के पीछे-पीछे चलती है। विजय उनका एक गुण है, और विनम्रता दूसरा।"
सोचिए। विजय, जिसके लिए दुनिया भर के राजा लड़ते हैं, वो श्रीकृष्ण के पीछे-पीछे ऐसे चलती है जैसे कोई सेवक। और उनके पास विजय के साथ एक और गुण है, विनम्रता। जो सारी विजय का स्वामी है, वो विनम्र है। और इसीलिए वो सारथी बनकर बैठ सकता है, बिना किसी अपमान के।
अब एक पल रुकिए, और देखिए यहाँ क्या हो रहा है। युधिष्ठिर डर रहे हैं, और अर्जुन उन्हें समझा रहा है। अर्जुन, जो इस समय पूरे विश्वास से भरा है, जो कह रहा है कि जहाँ कृष्ण हैं वहाँ विजय है, हमें कोई चिंता नहीं। और अब आप जानते हैं कि आगे क्या होने वाला है। कुछ ही श्लोकों बाद, यही अर्जुन, जब अपने रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर अपने पितामह और गुरुओं को सामने देखेगा, तो उसका धनुष हाथ से फिसल जाएगा। उसका शरीर काँपने लगेगा। और वही अर्जुन, जिसने अभी अपने बड़े भाई को ढाढ़स बँधाया था, रथ में बैठ जाएगा, और कहेगा, "मैं नहीं लड़ूँगा।"
दूसरे को समझाना आसान है; अपने संकट में वही ज्ञान याद ही नहीं आता। अर्जुन के साथ भी यही होने वाला है। और इसीलिए उसे गीता की ज़रूरत पड़ेगी। अर्जुन मूर्ख नहीं था, कमज़ोर नहीं था, अज्ञानी नहीं था। वो धर्म जानता था, वो जानता था कि जहाँ कृष्ण हैं वहाँ विजय है। पर जानना एक बात है, और जब अपने सामने अपने ही खड़े हों, तब उस जानने पर टिके रहना दूसरी बात। गीता उसी दूसरी बात के लिए है।
अब आगे देखिए। "नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।" नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नाम के शंख बजाए। सुघोष, यानी सुंदर ध्वनि वाला। मणिपुष्पक, यानी मणि और फूल जैसा। पाँचों भाई, पाँच शंख, पाँच नाम। और मधुसूदन "युधिष्ठिर" नाम का अर्थ भी याद दिलाते हैं: "युधि स्थिरः", जो युद्ध में स्थिर रहे। अभी जो काँप रहे थे, उनका नाम ही स्थिरता है।
फिर सत्रहवाँ श्लोक। "काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः। धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।"
श्रेष्ठ धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट, और अजेय सात्यकि।
इस सूची में एक नाम पर मैं आपका ध्यान खींचना चाहता हूँ। शिखण्डी। याद है, गीता की शुरुआत में ही मैंने आपको बताया था कि धृतराष्ट्र ये सब कब सुन रहे हैं? जब सञ्जय उन्हें बता चुके हैं कि भीष्म गिर गए। और सञ्जय ने उस खबर में क्या कहा था? "जिनके बल के भरोसे आपके पुत्र ने जुआ खेला था, वे भीष्म युद्ध में शिखण्डी के हाथों मारे जाकर पड़े हैं।" और धृतराष्ट्र ने पूछा था, "वो अतिरथी भीष्म, जिनका सामना देवताओं के लिए भी कठिन था, उस पाञ्चाल शिखण्डी के द्वारा युद्ध में कैसे मारे गए?"
तो जब सञ्जय यहाँ, पहले दिन की सुबह का वर्णन करते हुए, बड़े सहज ढंग से कहते हैं, "शिखण्डी च महारथः", तो वो और धृतराष्ट्र, दोनों जानते हैं कि ये वही नाम है। वही आदमी, जो दस दिन बाद पितामह को गिराएगा। आज वो बस एक शंख बजा रहा है।
और उसके ठीक बाद, धृष्टद्युम्न। वही, जो यज्ञ की आग से द्रोण के वध के लिए जन्मा था, और जिसे द्रोण ने अपने हाथों से विद्या दी थी। भीष्म की ओर शिखण्डी। द्रोण की ओर धृष्टद्युम्न। इस एक श्लोक में कौरवों की दो सबसे बड़ी आशाओं की नियति खड़ी है, शंख बजाती हुई। और जिनकी आशाएँ हैं, वो अभी इसे देख नहीं पा रहे।
और आखिर में, "सात्यकिश्चापराजितः।" सात्यकि, जो कभी हारा नहीं। पाण्डवों की इस सूची में आखिरी विशेषण "अपराजित" है। कौरवों की सूची "मदर्थे त्यक्तजीविताः" पर खत्म हुई थी, "मेरे लिए जान देने वाले"। और पाण्डवों की सूची "अपराजित" पर रुकती है, "जो हारा नहीं।"
पर अभी एक बात बाकी है। अब सारे शंख बज चुके हैं। और अगले दो श्लोकों में सञ्जय बताएँगे कि उस आवाज़ ने कौरवों के साथ क्या किया। और वहीं, आज की इस यात्रा की सबसे गहरी बात छिपी है।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥ १८ ॥
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् ॥ १९ ॥
अठारहवें श्लोक में एक छोटा-सा शब्द है, जिसे लोग अक्सर बिना सुने आगे बढ़ जाते हैं। "पृथिवीपते।" हे पृथ्वी के स्वामी।
सञ्जय ये किससे कह रहे हैं? धृतराष्ट्र से। उस राजा से जो हस्तिनापुर के महल में बैठा है, जो देख नहीं सकता, जिसका सबसे बड़ा योद्धा गिर चुका है, और जिसके बेटे उस मैदान में खड़े हैं जहाँ से बहुत कम लौटेंगे। और सञ्जय उसे कहते हैं, "हे पृथ्वीपति।"
ये सञ्जय का आदर है। वो अपने राजा का मान नहीं गिराते, चाहे खबर कितनी भी कड़वी हो। पर इस एक शब्द में एक गहरी उदासी भी है। जो सारी पृथ्वी का स्वामी कहलाता है, वो अपने ही घर को नहीं सँभाल सका।
फिर सञ्जय बताते हैं कि द्रुपद ने, द्रौपदी के पुत्रों ने, और बड़ी भुजाओं वाले सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु ने, सबने अलग-अलग अपने-अपने शंख बजाए। वही नाम, जो दुर्योधन ने छठे श्लोक में गिनाए थे, अब सञ्जय के मुँह से दोबारा आते हैं। पर अब वो डर की सूची नहीं हैं। अब वो शंख बजाते हुए लोग हैं।
और अब, उन्नीसवाँ श्लोक। "स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्। नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन्।"
आकाश और पृथ्वी को गुँजाते हुए उस भयंकर घोष ने धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय चीर डाले।
अब ध्यान दीजिए। पीछे तेरहवें श्लोक में कौरवों की ओर से भी शंख बजे थे, नगाड़े, ढोल, मृदंग, सब। और वो शब्द भी "तुमुल" था, भयंकर। हमारी टीका यही बात पकड़ती है। कौरवों के शंखों से भी बड़ा शब्द हुआ, पर डर केवल पाण्डवों के शंखों से फैला।
क्यों? शोर तो दोनों ओर था। आवाज़ दोनों ओर से उठी। फिर कौरवों का दिल ही क्यों फटा? पाण्डवों का क्यों नहीं?
शायद इसलिए कि डर बाहर की आवाज़ से नहीं आता। डर भीतर की आवाज़ से आता है। जिस आदमी को भीतर से पता हो कि वो गलत ओर खड़ा है, उसे बाहर का हर शंख अपना फ़ैसला सुनाता हुआ लगता है। और जिसे भीतर से भरोसा हो, उसे बाहर का शोर बस शोर लगता है।
और महाभारत खुद एक कारण देता है कि कौरवों का दिल इस आवाज़ से ही क्यों काँपा। ठीक एक साल पहले, जब पाण्डव अपनी पहचान छिपाकर विराट के नगर में रह रहे थे, कौरव विराट की गायें लेने आए थे। और वहाँ, अकेले अर्जुन ने उनका सामना किया। विराट पर्व कहता है, अर्जुन ने अपना शंख देवदत्त उठाया और पूरी शक्ति से बजाया, मानो तीनों लोक हिला रहे हों। और उस आवाज़ को सुनते ही द्रोण ने दुर्योधन से कहा था, "रथ की जो गड़गड़ाहट है, जिस तरह शंख बज रहा है, जिस तरह धरती काँप रही है, ये सव्यसाची के सिवा कोई और नहीं।" और उस दिन अर्जुन ने कर्ण को हराया, द्रोण को, अश्वत्थामा को, कृप को, भीष्म को भी हराया, और दुर्योधन मैदान छोड़कर भागा।
तो जब आज कुरुक्षेत्र में देवदत्त फिर बजा, तो कौरवों ने वो आवाज़ पहली बार नहीं सुनी थी। वो उसे पहचानते थे। और पहचान ही डर बन गई। मधुसूदन कहते हैं, उस घोष ने आपके सब लोगों के हृदय चीर दिए, भीष्म और द्रोण के भी। और ज्ञानेश्वर कहते हैं, जैसे सिंह हाथियों के झुंड को चीरता है, वैसे वो आवाज़ कौरवों के हृदयों को चीरती चली गई।
हमारी टीका एक और बात कहती है। सञ्जय अन्धे राजा को ये अनुभव कराते हैं कि शकुन किस ओर हैं। यानी सञ्जय सिर्फ़ खबर नहीं दे रहे। वो धृतराष्ट्र को, जो देख नहीं सकते, धीरे-धीरे वो दिखा रहे हैं जो वो देखना नहीं चाहते।
और अब मैं आपको वो बात बताता हूँ जो मैंने शुरू में कहा था कि आज के आखिर में आएगी।
धृतराष्ट्र को ये सब पहली बार नहीं बताया जा रहा था। युद्ध शुरू होने से पहले, जब भगवान व्यास उनके पास आए थे, आँखें देने, तो उन्होंने जाते-जाते धृतराष्ट्र से कहा था, "हे नरश्रेष्ठ, ये भाग्य का लिखा है। तुम्हें इस पर शोक नहीं करना चाहिए। इसे रोका नहीं जा सकता।" और फिर, "यतो धर्मस्ततो जयः।" जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है।
वही वाक्य। वही, जो अर्जुन ने युधिष्ठिर से कहा था। धृतराष्ट्र ने भी सुना था। उनके अपने पिता ने उनसे कहा था। और उन्होंने सुना। और कुछ नहीं बदला।
और ये भी सुनिए। महाभारत के बिल्कुल शुरू में, आदि पर्व के पहले ही अध्याय में, धृतराष्ट्र सञ्जय से एक लंबी बात कहते हैं। और उसमें वो कहते हैं, "मैंने अपने पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों में कोई भेद नहीं किया।"
याद है गीता का पहला श्लोक? "मामकाः पाण्डवाश्चैव।" मेरे वाले, और पाण्डु वाले। जो आदमी कहता है कि मैंने कोई भेद नहीं किया, उसी के मुँह से, सबसे संकट के पल में, सबसे पहले भेद ही निकलता है।
और फिर उसी जगह, वो अपने बारे में एक बहुत सच्ची बात भी कहते हैं। "मैं अन्धा हूँ, और कमज़ोरी तथा पुत्र-प्रेम के कारण ये सह लेता हूँ। जब मूर्ख दुर्योधन भटकता है, तो मैं भी उसके साथ भटक जाता हूँ।"
ये एक पिता का कबूलनामा है। वो जानते थे। सब जानते थे। और फिर भी, प्रेम में, कमज़ोरी में, वो उसी रास्ते पर चलते गए जिस पर उनका बेटा चल रहा था।
तो धृतराष्ट्र की असली अन्धता क्या थी? आँखों की नहीं। आँखें तो व्यास दे रहे थे, उन्होंने मना कर दिया। उनकी असली अन्धता "मामकाः" थी। मेरा। मेरा बेटा। मेरा राज्य। मेरी आशा। और जिस मन में "मेरा" इतना बड़ा हो जाए, उसे कोई आँख, कोई सलाह, कोई व्यास, कोई कृष्ण भी कुछ नहीं दिखा सकता।
और अब, आदि पर्व के उसी अध्याय में धृतराष्ट्र की एक और पंक्ति है, जिसके साथ मैं आज की बात समेटना चाहता हूँ। वो बार-बार एक ही बात दोहराते हैं, "जब मैंने ये सुना, तब हे सञ्जय, मुझे विजय की आशा नहीं रही।" और एक जगह वो कहते हैं, "जब मैंने सुना कि अर्जुन मोह से घिरकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए, और तब कृष्ण ने उन्हें अपने शरीर में सब लोक दिखाए, तब हे सञ्जय, मुझे विजय की आशा नहीं रही।"
यानी धृतराष्ट्र ने गीता के बारे में भी सुना था। अर्जुन के मोह के बारे में, कृष्ण के उत्तर के बारे में। और उन्होंने उसे अपनी हार की खबर की तरह सुना।
और हम? हम वही गीता सुनने बैठे हैं। वही मोह, वही रथ, वही कृष्ण। फ़र्क बस इतना है कि हम इसे किसी की हार की खबर की तरह नहीं सुनेंगे। हम इसे अपनी मुक्ति के रास्ते की तरह सुनेंगे। श्रीधर स्वामी अपनी टीका गीता के बारे में इसी बात से शुरू करते हैं: परम करुणा वाले भगवान ने अर्जुन को, जो शोक और मोह के सागर में डूब रहा था, उपदेश की नाव पर बिठाकर पार उतारा। धृतराष्ट्र के लिए गीता डर थी। हमारे लिए गीता भरोसा हो सकती है। सुनने वाला दिल बदल जाए, तो वही आवाज़ हृदय चीरती नहीं, हृदय जोड़ती है।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली बात। "मामकाः" से सावधान रहिए। मेरे और तेरे की लकीर बहुत चुपचाप खिंचती है, किसी शादी की पहली पंक्ति में, किसी कागज़ के पहले नाम में, किसी बच्चे की तारीफ़ में। कुरुक्षेत्र एक शब्द से शुरू हुआ था। अपने घर में उस शब्द को पहचानिए, इससे पहले कि वो बड़ा हो जाए।
दूसरी बात। गिनती डर की भाषा है। जब आप अपनी ज़िंदगी में पैसे, लोग, सहारे गिनने लगें, तो याद रखिए कि दुर्योधन ने भी गिना था, और उसकी गिनती में सिर्फ़ एक नाम नहीं था। वो, जो हथियार लिए बिना, चुपचाप लगाम पकड़े बैठा था। अर्जुन ने दस करोड़ सैनिक छोड़कर उसी को चुना था। अपने जीवन के रथ में देखिए, लगाम किसके हाथ में है।
तीसरी बात। दूसरों को समझाना आसान है, अपने संकट में टिके रहना कठिन। अर्जुन ने अभी युधिष्ठिर से कहा था, "जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ विजय है।" और कुछ ही देर में वो खुद काँपने वाला है। इसमें कोई शर्म की बात नहीं। सबसे बड़ा धनुर्धर भी टूटता है। बस इतना याद रखिए कि जब आप टूटें, तो रथ में आपके साथ कोई बैठा है। अर्जुन टूटा, तभी गीता मिली।
अगली बार हम उसी रथ पर लौटेंगे। अर्जुन श्रीकृष्ण से कहेगा, "हे अच्युत, मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए, जिससे मैं देख लूँ कि इस युद्ध में मुझे किनके साथ लड़ना है।" और जो वो देखेगा, वो उसकी ज़िंदगी बदल देगा।
आज आपसे एक सवाल पूछकर जाऊँगा। आप अपने जीवन में किन लोगों को "मामकाः" कहते हैं, "मेरे वाले"? और क्या कोई ऐसा है जिसे आपने कभी "उसके वाले" कहकर दूर कर दिया? नीचे अपने मन की बात लिखिए। और अगर कुछ लिखने का मन न हो, तो बस इतना लिख दीजिए, जय श्री कृष्ण।
गीता का पहला सवाल एक डरे हुए पिता ने पूछा था। उसका उत्तर, आज भी, हम सबके लिए है।
जय श्री कृष्ण।
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥
तीन बातें
- "मामकाः" से सावधान रहिए। मेरे और तेरे की लकीर बहुत चुपचाप खिंचती है, किसी शादी की पहली पंक्ति में, किसी कागज़ के पहले नाम में, किसी बच्चे की तारीफ़ में। कुरुक्षेत्र एक शब्द से शुरू हुआ था। अपने घर में उस शब्द को पहचानिए, इससे पहले कि वो बड़ा हो जाए।
- गिनती डर की भाषा है। जब आप अपनी ज़िंदगी में पैसे, लोग, सहारे गिनने लगें, तो याद रखिए कि दुर्योधन ने भी गिना था, और उसकी गिनती में सिर्फ़ एक नाम नहीं था। वो, जो हथियार लिए बिना, चुपचाप लगाम पकड़े बैठा था। अर्जुन ने दस करोड़ सैनिक छोड़कर उसी को चुना था। अपने जीवन के रथ में देखिए, लगाम किसके हाथ में है।
- दूसरों को समझाना आसान है, अपने संकट में टिके रहना कठिन। अर्जुन ने अभी युधिष्ठिर से कहा था, "जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ विजय है।" और कुछ ही देर में वो खुद काँपने वाला है। इसमें कोई शर्म की बात नहीं। सबसे बड़ा धनुर्धर भी टूटता है। बस इतना याद रखिए कि जब आप टूटें, तो रथ में आपके साथ कोई बैठा है। अर्जुन टूटा, तभी गीता मिली।