दुर्गा सप्तशती के मंत्रों का स्वतंत्र प्रयोग — कवच, अर्गला, कीलक और हर अध्याय का काम

दुर्गा सप्तशती साधना के छोटे उपाय, प्रश्नोत्तर सहित।

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Questions this answers

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01

क्या दुर्गा सप्तशती के अलग-अलग मंत्रों का स्वतंत्र जप किया जा सकता है?

इस सत्र का मुख्य प्रश्न

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:15–01:51 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह प्रश्न और यह जिज्ञासा बहुत बार उठती है — क्या श्री दुर्गा सप्तशती के हर मंत्र का स्वतंत्र जप किया जा सकता है, और यदि हाँ, तो उसका विधि-विधान क्या है; और क्या किसी अध्याय के कुछ अंश लेकर जप किया जा सकता है।

02

सप्तशती मंत्रों के स्वतंत्र प्रयोग को सीखने से सबसे अधिक लाभ किसे होता है

नवरात्रि में प्रत्यक्षीकरण के लिए लगे साधक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:52–02:48

विशेषकर उन लोगों को जो इसलिए साधनाएँ करते हैं कि कोई सिद्धि प्रत्यक्ष हो जाए; वे कहते हैं कि नवरात्रि में बहुत-से नए और पुराने साधक प्रत्यक्षीकरण के लिए लगे रहते हैं, और उन सबको इस विषय से अत्यंत लाभ मिलेगा।

03

जो पूरी दुर्गा सप्तशती का पाठ न कर सके, उसे क्या करना चाहिए?

न्यूनतम के रूप में श्री दुर्गा सप्तश्लोकी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:49–03:31 · Also a question

उन्हें श्री दुर्गा सप्तश्लोकी का सामान्य पाठ करना चाहिए — एक पाठ, या 27, या नौ; कम से कम नौ पाठ। जो व्यक्ति कभी कलश स्थापना नहीं करता, उपवास नहीं रखता और व्रत नहीं करता, उसे भी पूरी चैत्र नवरात्रि में कम से कम एक बार सप्तश्लोकी के नौ पाठ अवश्य करने चाहिए।

04

दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र की फलश्रुति को समझाने की आवश्यकता क्यों है

फलश्रुति से उठने वाले प्रश्न

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:32–04:05

क्योंकि गीता प्रेस संस्करण में दिए अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र की फलश्रुति पढ़कर लोग उसमें लिखी बातों के बारे में अवश्य पूछते हैं — कि वहाँ ऐसा लिखा है, यह कैसे होगा, किस प्रकार सिद्ध होगा। वे कहते हैं कि इन पर अवश्य ध्यान देना चाहिए।

05

दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम की फलश्रुति क्या वचन देती है?

तीनों लोकों में कुछ भी अप्राप्य नहीं, और शाश्वत मुक्ति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:06–04:29 · Also a question

कि जो इसका पाठ करता है उसके लिए तीनों लोकों में कुछ भी ऐसा नहीं जो प्राप्त न हो — धन-धान्य, पुत्र-संतान, चारों पुरुषार्थ, और अंत में भगवती मुक्ति देती हैं, शाश्वत मुक्ति, कि देवी लोक जाकर लौटना न पड़े। वे बताते हैं कि यह केवल भगवती के 108 नामों के पाठ का फल है, और उन नामों को कहने वाले स्वयं ईश्वर हैं।

06

अष्टोत्तर शतनाम की फलश्रुति इसके पाठ के साथ कौन-सी शर्त जोड़ती है?

ध्यान और पाठ से पहले कुमारी पूजन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:30–04:55 · Also a question

कि जो कुमारी का पूजन करके और भगवती का ध्यान करते हुए इसका पाठ करता है, उसे ये सब चीज़ें मिलती हैं। वे कहते हैं कि कुमारी पूजन को सामान्यतः वही कुमारी कन्या पूजन समझा जा सकता है जो हम करते हैं; पूरे विधि-विधान के साथ करने पर फल मिलता है। इसे अपने व्रत के भीतर भी किया जा सकता है।

07

भगवती के किसी भी अनुष्ठान में कुमारी पूजन कितना महत्वपूर्ण है?

कुमारी पूजन के बिना भगवती का कोई अनुष्ठान सफल नहीं होता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:56–05:26 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि कुमारी पूजन का अपना महत्व है: कुमारी के पूजन के बिना न नवरात्रि में सफलता मिलती है, न भगवती के किसी भी प्रकार के अनुष्ठान में। भगवती के हर स्वरूप में यह काम हमें करना ही पड़ता है।

08

शतभिषा नक्षत्र वाली मंगलवार की अमावस्या के बारे में अष्टोत्तर शतनाम की फलश्रुति क्या कहती है?

उस योग में यंत्र बनाना और धारण करना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:27–05:46 · Also a question

कि मंगलवार को पड़ने वाली और शतभिषा नक्षत्र से युक्त अमावस्या पर यदि हम इस पूरे पाठ का यंत्र बनाएँ, पाठ करें और फिर उसे धारण करें, तो उससे एक विशेष प्रकार की संपदा मिलती है। वे कहते हैं कि लोगों का भ्रम इस पर है कि कौन-सा यंत्र अभिप्रेत है।

09

षट्कर्म यंत्र और देवता के महायंत्र में क्या अंतर है?

आवरण पूजन और महाशक्तियों के महायंत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:47–06:16 · Also a question

षट्कर्म से जुड़े यंत्रों के अलावा देवताओं का यंत्र होता है, महाशक्तियों का यंत्र, जिसमें हम बार-बार आवरण पूजन की बात करते हैं — उस यंत्र में हम प्रधान देवता से लेकर उनके परिवार के हर सदस्य, हर अंग, और उनके सभी अस्त्र-आयुध का पूजन करते हैं। वे महायंत्र हैं, चाहे जिस देवी या देवता के हों।

10

किसी स्तोत्र के पुरश्चरण में एक से अधिक चरण क्यों होते हैं?

कालिका योगिनी और जगन्मंगल कवच के अनेक चरण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:17–06:42 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि कालिका योगिनी साधना करने वालों के आरंभ में बहुत-से चरण होते हैं, और जगन्मंगल कवच का पुरश्चरण करने वालों के भी अनेक चरण होते हैं। जब हम किसी भी स्तोत्र का पुरश्चरण करते हैं, तो वह एक ही चरण नहीं होता।

वक्ता कहते हैं कि जो कालिका योगिनी साधना कर रहे हैं, उनके आरंभ में बहुत-से चरण होते हैं। जो जगन्मंगल कवच का पुरश्चरण कर रहा है, उसमें भी अनेक चरण होते हैं। जब भी हम किसी भी स्तोत्र का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। कर रहे होते हैं, उसमें केवल एक चरण नहीं होता।

11

इस वर्ष की मंगलवारी अमावस्या अष्टोत्तर यंत्र बनाने का सही दिन क्यों नहीं है

इस वर्ष योग अधूरा है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:43–06:59

वक्ता कहते हैं कि इस बार भी अमावस्या मंगलवार को पड़ रही है, पर इस बार चंद्रमा शतभिषा नक्षत्र में नहीं है। यंत्र तब बनाना है जब शतभिषा नक्षत्र हो, मंगलवार हो, और अमावस्या तिथि हो।

12

दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम के लिए कौन-सा यंत्र प्रयोग होता है?

सप्तशती महायंत्र और अष्टोत्तर यंत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:00–07:29 · Also a question

भगवती का एक यंत्र है जिसमें उनके 108 नाम स्थापित होते हैं। भगवती दुर्गा का सप्तशती यंत्र है, एक महायंत्र जिसमें पूरा आवरण, पूरा विधि-विधान और सभी शक्तियाँ शामिल हैं; और उससे जुड़ा एक और यंत्र है जिसे अष्टोत्तर यंत्र कहते हैं — जैसे दुर्गा जी के बीसा यंत्र के बारे में सुनते हैं, वैसे ही एक अष्टोत्तर यंत्र है।

13

शतभिषा वाली मंगलवारी अमावस्या पर दुर्गा के दो यंत्रों में से कौन-सा बनाकर धारण किया जाता है

दोनों में से एक, उसी समय बनाकर पूजित

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:30–07:58

वक्ता कहते हैं कि यहाँ उसी यंत्र का निर्माण करवाया जाता है। जहाँ तक उन्हें याद है, वे दो यंत्र हैं, और दोनों में से कोई एक उसी समय विधिपूर्वक बनाया जाता है, पूजा जाता है और फिर धारण किया जाता है। वे जोड़ते हैं कि हम जो भी यंत्र बनाते हैं उसका विधि-विधान स्तोत्र में ही सांकेतिक रूप में कहा होता है।

14

किसी सहस्रनाम की फलश्रुति यंत्र-विधि का संकेत कैसे देती है?

फलश्रुति में बताए यंत्र पर तर्पण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:59–08:18 · Also a question

दक्षिण कालिका सहस्रनाम का उदाहरण लेकर वे कहते हैं कि उसकी फलश्रुति में सुनने को मिलता है — और कहीं-कहीं पढ़ने को — कि यदि इन मंत्रों से यंत्र पर तर्पण किया जाए, तो अमुक-अमुक कार्य सिद्ध होंगे। इतना आपको सांकेतिक रूप में बता दिया गया है।

15

प्रत्यंगिरा पाठ में प्रयोग होने वाला गोलक यंत्र क्या है?

गोलक यंत्र पर पिंड दान और बलि

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:19–08:47 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि बहुत-से लोग प्रत्यंगिरा पाठ करते हैं, और उसमें गोलक यंत्र का वर्णन आता है — कि यदि गोलक यंत्र में हम पिंड आदि दें और बलि दें, तो शत्रु का नाश होता है, पूर्ण विनाश होता है, मारण आदि क्रियाएँ तुरंत सिद्ध होती हैं, और महाकृत्याएँ प्रसन्न होकर तुरंत शत्रु को मार गिराती हैं।

16

क्या सभी यंत्रों के निर्माण में एक-सा समय लगता है?

कुछ एक दिन में पूरे, कुछ जितने आवरण उतने नक्षत्रों तक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:48–09:14 · Also a question

नहीं। अपने आराध्य के हर विशेष यंत्र की अपनी विशेष तिथियाँ होती हैं। उस दिन से आरंभ करके कुछ यंत्र एक ही दिन में पूरे होते हैं; कुछ वास्तव में नक्षत्रों पर निर्भर करते हैं — जितने आवरण हैं, उतने नक्षत्र उनके निर्माण के पूरा होने में लगते हैं। गुरु परंपरा के अनुसार भी बहुत कुछ अलग होता है।

17

क्या मूर्ति की तरह यंत्र की भी प्राण प्रतिष्ठा होती है?

यंत्र में अग्नि उत्तारण और अंग-अंग की प्रतिष्ठा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:15–09:41 · Also a question

हाँ। उस विधि-विधान से यंत्र बनाकर, जैसे मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा विधि में हम अग्नि उत्तारण विधि और सब कुछ करते हैं और एक-एक अंग में प्राण स्थापित करते हैं — हाथ, पैर, आँखें, मुख, भीतर के प्राण, जिह्वा — वैसे ही यंत्र में भी प्रतिष्ठा की जाती है।

18

यंत्र की पूर्ण तंत्रोक्त प्रतिष्ठा मूर्ति की प्रतिष्ठा से कितनी बड़ी होती है?

हर आवरण में एक देवता, और संदर्भ के रूप में दुर्गार्चन पद्धति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:42–10:06 · Also a question

वे कहते हैं कि पूर्ण तंत्रोक्त विधान यह है कि हर एक आवरण में एक देवता होता है, और यह पूरी प्रतिष्ठा विधि उतनी ही विस्तृत होगी — मूर्ति में हम इसे एक बार करते हैं, इसमें पूरा का पूरा। प्रमाण के लिए वे आचार्य शिवदत्त मिश्र शास्त्री की दुर्गार्चन पद्धति की ओर संकेत करते हैं।

19

जब मूर्ति यंत्र पर रखी जाती है, तो मूर्ति और यंत्र के आवरण आपस में कैसे जुड़ते हैं?

मूर्ति पर नौ आवरण, और मूर्ति यंत्र के ऊपर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:07–10:30 · Also a question

भगवती की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा विधि में नौ आवरणों का वर्णन है, जिनका पूजन मूर्ति पर ही होता है। भगवती की मूर्ति को यंत्र के ऊपर रखने का निर्देश भी है; जब किसी देवता के यंत्र पर मूर्ति रखी जाती है, तो यंत्र आवरण और मूर्ति आवरण का पूजन साथ-साथ होता है। यदि यंत्र न हो, तो पूरा आवरण पूजन मूर्ति पर ही होता है।

20

क्या हर मंत्र का अपना अलग यंत्र होता है?

संपुट या प्रणव से यंत्र बदल जाता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:31–10:58 · Also a question

हाँ। किसी भी एक मंत्र का यंत्र होता है — पंचाक्षरी मंत्र का अपना यंत्र है। यदि हम उसमें प्रणव लगाएँ, तो यंत्र बदल जाता है; यदि आप आगे-पीछे प्रणव लगाएँ, या देवी प्रणव से संपुट करें, तो उसका यंत्र बदल जाता है। हर मंत्र का यंत्र अलग है, और हर देवता के अनेक प्रकार के यंत्र हैं।

21

किसी मंत्र या साधना के विशेष यंत्रों की वास्तव में किसे आवश्यकता होती है?

जगन्मंगल कवच और कालिका योगिनी साधना में दूर तक जाने वाले

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:59–11:22 · Also a question

जो जगन्मंगल कवच साधना और कालिका योगिनी साधना कर रहे हैं, उन्हें आगे चलकर इस प्रकार के विशेष यंत्रों की आवश्यकता होगी, जिनसे वे संपुट के कार्य और षट्कर्म से जुड़ी क्रियाएँ करेंगे और जाग्रत करेंगे। जो उतनी दूर जाएगा उसे इनकी आवश्यकता होगी; नहीं तो सामान्य पूजन किया जा सकता है।

22

कुंडली में किस-किस प्रकार के शाप और दोष बताए जाते हैं?

देव शाप, पितृ शाप, पितृ दोष, प्रेत-पिशाच और राक्षस दोष

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:23–11:46 · Also a question

पाठ विधि की ओर बढ़ते हुए वे कीलक और शाप विमोचन पर आते हैं। जब हम पर किसी भी प्रकार का शाप लगता है — जिसे कुंडली में देव शाप, पितृ शाप, पितृ दोष, देव दोष, प्रेत और पिशाच का दोष, राक्षस दोष आदि कहते हैं — तो ज्योतिषी बहुत बार कुंडली से यह बताते हैं।

23

परिवार के बड़ों के शाप, और उनके लिए सप्तशती के शाप अनुग्रह मंत्रों के जप की अनुमति

बड़ों, माता-पिता और भाई-बहनों के शाप, और अनुग्रह मंत्रों के जप की अनुमति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:47–12:17

यह सामान्यतः व्यक्ति की अपनी ओर से भी पता होता है — कि आपने कोई ऐसा कर्म किया, और आपके बड़ों ने, माता-पिता ने, भाई-बहनों ने, किसी छोटे या बड़े ने दिल से आपको शाप दिया, और आप यह जानते हैं। ऐसी स्थिति में भी उन शापों से मुक्ति के लिए हमें इन शाप मंत्रों, शाप अनुग्रह मंत्रों के जप की अनुमति है।

24

क्या सप्तशती के शाप अनुग्रह मंत्रों के जप के लिए दीक्षा आवश्यक है?

दीक्षा, और उनके जप के बारे में गुरु का निर्देश

· Reviewed Sep 14, 2026 · 12:18–12:33 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इसके लिए दीक्षित होना आवश्यक है। यदि हमने शाक्त परंपरा आदि में दीक्षा ली है, तो वहाँ गुरु निर्देश देते हैं कि ये मंत्र हमें कैसे जपने हैं।

वक्ता कहते हैं कि इसके लिए दीक्षित होना आवश्यक है। यदि हमने शाक्त परंपरा आदि में दीक्षा ली है, तो वहाँ गुरु निर्देश देते हैं कि ये मंत्र हमें किस प्रकार जपने हैं।

25

स्त्री दोष क्या है: जिसने पिछले जन्म में पत्नी को सताया, वह इस जन्म में पत्नी के कारण कष्ट पाता है

पिछले जन्म से आया स्त्री दोष

· Reviewed Sep 14, 2026 · 12:34–13:04

वे एक ऐसे व्यक्ति की कल्पना करते हैं जिसे स्त्री दोष है — जिसने पिछले जन्म में अपनी विवाहित पत्नी को बहुत सताया, जिसके कारण इस जन्म में उसे स्त्री दोष मिला, और इस जन्म में वह पत्नी से सताया जा रहा है, या उसके कारण उसे मानसिक, शारीरिक या आर्थिक हानि हो रही है।

26

स्त्री दोष कैसे दूर होता है: चंडिका शाप अनुग्रह मंत्र की दीक्षा और उसकी जप संख्या

चंडिका शाप अनुग्रह मंत्र और उसकी जप संख्या

· Reviewed Sep 14, 2026 · 13:05–13:47

दीक्षा देने वाले गुरु यह जानकर आदेश देते हैं कि स्त्री दोष से मुक्ति के लिए इसका अनुष्ठान करो। भगवती चंडिका के शाप अनुग्रह मंत्र से वे आपको उस मंत्र की दीक्षा देते हैं, पुष्टीकरण करते हैं, और फिर जप का निर्देश देते हैं — या कम से कम सौ सप्तशती पाठ कर चुका कोई ब्राह्मण साधक इन अनुग्रह मंत्रों का 27,000 जप करता है, या भावों के अनुसार, क्योंकि बारह भाव हैं, कम से कम 12,000, जैसा गुरु या कुंडली बताए।

27

शाप विमोचन का कुंभ (जल पात्र) कैसे बनाया जाता है?

कुम्हार, विशेष नक्षत्र, और पात्र का माप

· Reviewed Sep 14, 2026 · 13:48–14:15 · Also a question

कुंभ कुम्हार के पास जाकर बनवाया जाता है, और उसके लिए एक नक्षत्र होता है। वे माप की तुलना उससे करते हैं जो उन्होंने कलश के बारे में कहा है — कि वह अष्ट-अंगुष्ठ प्रमाण का हो, आठ अंगुल का कलश, घट को उसकी गर्दन से नीचे तक मापकर।

28

शाप विमोचन कुंभ का आकार कैसे तय होता है और कुम्हार उसे कब बनाता है?

शरीर की लंबाई का दसवाँ भाग, और महर्षि अगस्त्य का नक्षत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 14:16–14:49 · Also a question

इसी प्रकार हमारे शरीर की लंबाई — उसका दसवाँ भाग माप माना गया है: उस माप का घट, उस माप का कुंभ बनेगा। कुम्हार को दिन और वह समय बताया जाता है जिसके बीच उसे बनाना है, और संबंधित नक्षत्र बहुत बार महर्षि अगस्त्य से जुड़ा होता है।

29

शाप से मुक्ति के लिए कुंभ स्नान कैसे किया जाता है?

सत्ताईस कुओं का जल, अभिमंत्रण, और स्नान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 14:50–15:15 · Also a question

कुंभ उस नक्षत्र में बनता है, और उसके बाद उसे 27 अलग-अलग कुओं के जल से भरा जाता है; फिर वह ब्राह्मण — या आप स्वयं, यदि मंत्र जप आपने स्वयं किया — कुंभ को अभिमंत्रित करेंगे, और आप शाप से मुक्ति के लिए उससे स्नान करेंगे।

30

शाप विमोचन कुंभ स्नान के बाद कौन-सा संकल्प होता है, और उत्कीलन मंत्र क्या है?

किसी स्त्री को कष्ट न देने का संकल्प, और बंधन खोलने वाले मंत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 15:16–15:47 · Also a question

स्नान के बाद यह संकल्प होता है कि हम मन, वचन या कर्म से किसी भी स्त्री को किसी प्रकार का कष्ट नहीं देंगे। ये सब क्रियाएँ करने से शाप से मुक्ति होती है। फिर वे शाप उत्कीलन मंत्र पर आते हैं, जिसका प्रयोग विशेषकर वे साधक करते हैं जिनके गुरुओं ने उनके मंत्रों पर बंधन लगा दिया है।

31

उत्कीलन (बंधन खोलने वाले) मंत्रों के प्रयोग में क्या कठिनाई है?

यह बाँधने वाले और खोलने वाले दोनों पर निर्भर है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 15:48–16:26 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यहाँ थोड़ी कठिन बात है। इसकी विधि है, पर यह दोनों पक्षों पर निर्भर है — करवाने वाले पर भी और करने वाले पर भी। अपना ही उदाहरण लेकर: यदि उनके गुरु ने नाराज़ होकर उनके मंत्रों को, या उन शक्तियों को जिनसे उनका परिचय हुआ था, कील दिया, तो फिर वे कुछ भी करने में सक्षम नहीं रहते।

32

जब कीलन करने वाले गुरु उग्र स्वभाव के हों, तो उसे खोलने में क्या जोखिम है?

घात, और साधक की अपनी ऊर्जा में असंतुलन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 16:27–17:05 · Also a question

यदि गुरु उग्र स्वभाव के हों, श्मशानी और मसानी क्रियाएँ करने वाले, या क्षमा से रहित, तो उन्हें लगेगा कि इसने इतनी क्षमता पा ली है कि मेरा किया हुआ खोलने का प्रयास कर रहा है। वक्ता कहते हैं कि यह उनका निजी स्वभाव हो सकता है, और इसमें कुछ नहीं किया जा सकता — घात की संभावना रहती है।

33

उत्कीलन (बंधन खोलने का) जप किसके साथ करना चाहिए?

किसी बहुत अच्छे साधक के सान्निध्य में, या अपने गुरु के साथ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 17:06–17:29 · Also a question

वे कहते हैं कि इसी कारण किसी भी विद्या के उत्कीलन के लिए इस प्रकार के मंत्रों का जप किसी बहुत अच्छे साधक के साथ रहकर, या फिर अपने गुरु के साथ करना चाहिए। गुरु भी उसे यूँ ही नहीं खोलेंगे — वे भी इन्हीं मंत्रों का प्रयोग करेंगे, यदि वे कोई बंधन करते हैं।

34

जब कोई कहे कि कुलदेवी या कुल शक्ति बँध गई है, तो क्या करना चाहिए?

बँधी हुई कुल शक्ति को खोलने से पहले अधिकार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 17:30–18:00 · Also a question

लोग बार-बार पूछते हैं कि कुलदेवी बँध जाए, कुल शक्ति बँध जाए, घर के देवता या किसी की सवारी बँध जाए तो क्या करें। वक्ता कहते हैं कि यह ऐसे नहीं होता कि कोई भी मुँह उठाए, यह मंत्र पढ़े और फूँक दे। आपको अधिकारी होना चाहिए — आप पहले से श्री दुर्गा सप्तशती का अनुष्ठान और नवरात्र व्रत करते हों, और पहले आपको गुरु के मुख से उपदेश लेना होगा।

35

उत्कीलन मंत्रों का उपदेश कौन दे सकता है: त्रिकाल गायत्री करने वाला ब्राह्मण, तंत्रोक्त ब्राह्मण या कोई साधक

त्रिकाल गायत्री करने वाला ब्राह्मण, तंत्रोक्त ब्राह्मण, या कोई साधक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 18:01–18:24

या किसी ऐसे ब्राह्मण से जो त्रिकाल गायत्री आदि करता हो, या तंत्रोक्त मार्ग में भगवती का भक्त हो। वैदिक ब्राह्मण, तंत्रोक्त ब्राह्मण, या कोई साधक भी चलेगा; यह आवश्यक नहीं कि वह जन्म से ब्राह्मण हो — वे कहते हैं कि ब्राह्मण वही है जिसने मंत्र पुरश्चरण, अनुष्ठान आदि किए हैं।

36

कीलन से मुक्त होने के बाद कोई भूल हो जाए तो क्या होता है?

अपनी ही गलती से दूसरा कीलन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 18:25–18:52 · Also a question

जो कीलित है उसे निष्कीलित भी किया जा सकता है। पर निष्कीलन के बाद यदि आप कोई भूल करें — कोई दैहिक दोष लग जाए, मुँह से ऐसा शब्द निकल जाए कि किसी शक्ति का अपमान हो — और फिर आपके दोष से, आपकी गलती से कीलन या बंधन हो, तो वह बहुत कठिन बात हो जाती है।

37

उत्कीलन (बंधन खोलने वाले) मंत्रों का प्रयोग कितनी बार किया जा सकता है?

एक-दो बार, जब तक कोई शत्रु बार-बार न बाँधे

· Reviewed Sep 14, 2026 · 18:53–19:12 · Also a question

जो गुरु सक्षम हों वे पचास बार भी कर सकते हैं — वह अलग विषय है — पर उन पर भी दोष लगेगा। इन बातों में क्षमा बार-बार नहीं मिलती। इसलिए इन मंत्रों का इस प्रकार प्रयोग एक-दो बार किया जा सकता है। पर यदि कोई शत्रु किसी विद्या का प्रयोग करके आपको बार-बार बाँध रहा है, तो इन मंत्रों को जाग्रत करके बार-बार प्रयोग करके बंधन खोला जा सकता है।

38

सामान्य लोगों को मृत संजीवनी का विधान पूरी तरह क्यों छोड़ देना चाहिए

पूरा विधान छोड़ दें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 19:13–19:45

वक्ता कहते हैं कि मृत संजीवनी का पूरा विधान पूरी तरह छोड़ दें, क्योंकि उसमें जिस प्रकार की चीज़ें प्रयोग होती हैं और जिस प्रकार के बीज मंत्र हैं — कोई भी सामान्य व्यक्ति इसका प्रयोग बिल्कुल न करे। केवल वही जो वैदिक और तंत्रोक्त दोनों क्रियाएँ जानते हैं, जो रक्षा की प्रक्रिया भी जानते हैं, और जो किसी पर मारण आदि लगा रहे हों तो उस प्रयोग को रोकना भी जानते हैं।

39

मृत संजीवनी जैसी विद्या का स्वतंत्र प्रयोग करने का अधिकार किसे है?

केवल उसे जो प्रतिलोम करने में सक्षम हो

· Reviewed Sep 14, 2026 · 19:46–20:11 · Also a question

इस प्रकार की विद्या का स्वतंत्र प्रयोग वही करता है जिसमें प्रतिलोम करने की क्षमता हो — और वे कहते हैं कि यह उचित भी है। इसमें जिस प्रकार की विद्या प्रयोग होती है, जो विद्या आवाहित होती है और जो शक्ति इसमें आती है, उसके कारण इसका प्रयोग वही लोग कर सकते हैं जो उपसंहार की क्रिया जानते हैं। सबको इसका अधिकार भी नहीं है।

40

रुद्रयामल तंत्र का चंडी शाप विमोचन मंत्र क्या है?

शाप से मुक्ति के लिए स्वतंत्र रूप से प्रयोग होने वाला दुर्गा कल्प का मंत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 20:12–20:33 · Also a question

वे कहते हैं कि उसके बाद चंडी शाप विमोचन मंत्र है जो रुद्रयामल तंत्र के दुर्गा कल्प में है — इससे भी हम यह कर सकते हैं। यदि किसी योग्य आचार्य से इसका उपदेश मिल जाए, तो उपदेश लेकर हम अपने जीवन में लगे जिस भी प्रकार के शाप से मुक्ति के लिए एक स्वतंत्र, अलग पाठ कर सकते हैं।

41

चंडी शाप विमोचन मंत्र किन-किन प्रकार के बंधन खोलता है?

लक्ष्मी बंधन, कुलदेवी बंधन, किसी तांत्रिक का बंधन, परिवार का कोई वचन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 20:34–20:54 · Also a question

आप उसे जो भी नाम दें — लक्ष्मी बंधन, कुलदेवी या कुलदेवता का बंधन, किसी तांत्रिक ने बाँधा हो, या आपके अपने परिवार के लोगों ने कोई वचन या क्रिया करवाई हो, जिससे सवारी खुलकर नहीं आती। पर सब कुछ धर्मयुक्त हो, गलत नहीं; मान-सम्मान हो। तब, वे कहते हैं, प्रयोग करने पर आपको तुरंत लाभ मिलेगा।

42

चंडी शाप विमोचन पाठ की विधि क्या है?

चतुर्दशी और कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रात में, मंदिर में

· Reviewed Sep 14, 2026 · 20:55–21:33 · Also a question

इसमें जप चतुर्दशी तिथि पर और कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर, रात के समय किया जाता है; और यदि भगवती के मंदिर में किया जाए तो अत्यंत अच्छा है। संकल्प पूरी तरह स्पष्ट रूप में लिया जाता है — कि हमारी विद्या इस प्रकार बँधी है, वह शाप से मुक्त हो, बंधन से मुक्त हो, और इसी के लिए हम यह प्रक्रिया कर रहे हैं।

43

बलि देकर किए गए बंधन को खोलने के लिए कौन-सी क्षमता चाहिए?

भोग का उतारा, और शक्ति पीठ पर बलिदान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 21:34–22:00 · Also a question

आपकी विद्या काम करेगी, पर आप मुश्किल में पड़ेंगे और फँस जाएँगे, क्योंकि इसके लिए भोग आदि के उतारे की क्षमता चाहिए — जिसे भगतवाल में दोहरी बलि कहते हैं। कम से कम इतना तो जानना चाहिए; और यदि इतना ज्ञान न हो, तो स्वयं उत्कीलन करते समय — वे विशेषकर साधक वर्ग से कह रहे हैं — किसी शक्ति पीठ पर बलिदान की प्रक्रिया करवानी चाहिए।

44

क्या बंधन खोलते (उत्कीलन) समय प्रतीकात्मक बलि पर्याप्त है?

उनका मत कि यहाँ प्रतीकात्मक बलि काम नहीं करेगी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 22:01–22:37 · Also a question

उनके अपने मत में, नहीं — इसमें प्रतीकात्मक बलि नहीं दी जा सकती। यदि आप प्रतीकात्मक बलि दें और आपके शत्रु ने बड़ी बलि दी हो और वह भयानक तांत्रिक हो, तो आप पर घात की संभावना बनी रहेगी।

45

चंडी कवच सभी कवचों में श्रेष्ठ क्यों है?

ब्रह्मा, विष्णु और महेश इसके ऋषि, और चामुंडा इसकी देवता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 22:38–23:20 · Also a question

क्योंकि, वे कहते हैं, संसार के सभी कवचों में भगवती चंडी का कवच श्रेष्ठ है, क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु और महेश — तीनों इसके ऋषि हैं। विनियोग में हम ब्रह्मा को ऋषि पढ़ते हैं, पर यह तीनों द्वारा रचित है। इसकी देवता चामुंडा हैं, और यहाँ चामुंडा का अर्थ साक्षात भगवती महाकाली है।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 1.viniyoga

The Caṇḍī Kavaca's viniyoga names Brahmā as its seer and Cāmuṇḍā as its deity.

The viniyoga names Brahmā alone; the three seers Brahmā, Viṣṇu and Rudra belong to the three episodes of the Saptaśatī (pūrvāṅga 8, viniyoga), not to the kavaca. That it is the greatest kavaca is the speaker's view.

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viniyoga

ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः । ॐ नमश्चण्डिकायै ॥

ॐ। इस श्रीचण्डी कवच के ऋषि ब्रह्मा हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता चामुण्डा हैं। अङ्गन्यास में कही गई मातृकाएँ इसका बीज हैं और दिशाओं की रक्षा करने वाले देवता इसका तत्त्व। जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए सप्तशती पाठ के अंग के रूप में इसका जप में विनियोग है। ॐ, चण्डिका को नमस्कार।

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46

ज्योतिष और तंत्र के विद्यार्थियों को दुर्गा कवच का कौन-सा मंत्र जपना चाहिए?

कवच में आया नवदुर्गा मंत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 23:21–23:57 · Also a question

कवच के हर मंत्र का स्वतंत्र पाठ भी किया जा सकता है, और इसी कवच से हम नवदुर्गा मंत्र बोलते हैं। जो ज्योतिष सीख रहे हैं, वास्तु सीख रहे हैं, तंत्र में निपुणता चाहते हैं, तंत्र की शक्तियों का त्रिवाचा लेना चाहते हैं, या त्रिनेत्र की सिद्धि में लगे हैं, वे कवच में वर्णित नवदुर्गा मंत्र का निरंतर जप करें — "प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी" से "नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः" तक।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 1.3–5

The Devī Kavaca names the nine Durgās, from Śailaputrī to Siddhidātrī.

Japa of the passage for jyotiṣa, vāstu or tantra is the speaker's advice, not the text's.

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3

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी । तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥ ३ ॥

पहली शैलपुत्री हैं, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघण्टा कहलाती हैं और चौथी कूष्माण्डा।

4

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च । सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥ ४ ॥

पाँचवीं स्कन्दमाता कहलाती हैं, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि और आठवीं महागौरी।

5

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः । उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥ ५ ॥

और नौवीं सिद्धिदात्री हैं। ये नौ दुर्गाएँ कहलाती हैं। ये नाम स्वयं महात्मा ब्रह्मा ने कहे हैं।

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47

दुर्गा कवच कैसे आरंभ होता है?

दिशाओं की रक्षा से पहले की आरंभिक पंक्तियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 23:58–24:23 · Also a question

वे कहते हैं कि नवदुर्गा की कृपा से सिद्धि जल्दी आती है, और फिर आरंभ पढ़ते हैं: "नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे, महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि। त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।" वहाँ से, वे कहते हैं, कवच वास्तव में आरंभ होता है: "प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता।"

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 1.16–17

The kavaca's protection opens with a salute to the very fierce Goddess and then asks Aindrī to guard the east and the fire goddess the south-east.

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16

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे । महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥ १६ ॥

हे अत्यन्त रौद्र रूप वाली, घोर पराक्रम वाली, महान् बल और महान् उत्साह वाली, महान् भय का नाश करने वाली, तुम्हें नमस्कार है।

17

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि । प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ॥ १७ ॥

हे देवी, तुम्हें देखना भी कठिन है; तुम शत्रुओं का भय बढ़ाती हो; मेरी रक्षा करो। पूर्व में ऐन्द्री मेरी रक्षा करें और अग्निकोण में अग्निदेवता।

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48

क्या दुर्गा कवच का प्रयोग दिग्बंधन और आसन बंधन के लिए किया जा सकता है?

केवल दिशाओं वाले मंत्र ही दिग्बंधन का काम करते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 24:24–25:02 · Also a question

हाँ। एक ही कवच के भीतर दिशाओं की रक्षा के लिए जिन शक्तियों के नाम लिए गए हैं — आप केवल उतने मंत्रों से दिग्बंधन कर सकते हैं। जो कहते हैं कि साधना में बैठने से पहले आसन बंधन और दिग्बंधन करना चाहते हैं, उनके लिए यह कवच पाठ में अपने आप हो जाएगा।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 1.17–19

The kavaca assigns a guarding goddess to each of the ten directions.

Using these lines for dig-bandhana is the speaker's practice; the viniyoga does call the direction-binding deities the kavaca's tattva.

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17

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि । प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ॥ १७ ॥

हे देवी, तुम्हें देखना भी कठिन है; तुम शत्रुओं का भय बढ़ाती हो; मेरी रक्षा करो। पूर्व में ऐन्द्री मेरी रक्षा करें और अग्निकोण में अग्निदेवता।

18

दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी । प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी ॥ १८ ॥

दक्षिण में वाराही मेरी रक्षा करें और नैर्ऋत्यकोण में खड्ग धारण करने वाली। पश्चिम में वारुणी रक्षा करें और वायव्यकोण में मृग पर सवार देवी।

19

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी । ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा ॥ १९ ॥

उत्तर में कौमारी रक्षा करें और ईशानकोण में शूल धारण करने वाली। हे ब्रह्माणी, ऊपर से मेरी रक्षा करो, और नीचे से वैष्णवी रक्षा करें।

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49

रोग में दुर्गा कवच के अंग-देवताओं का प्रयोग कैसे होता है?

रोगी अंग के लिए बताई गई देवी का पूजन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 25:03–25:34 · Also a question

कवच में जिन अंगों के लिए जिन देवियों का वर्णन है — यदि आपको किसी अंग में समस्या है, तो उस अंग की समस्या के लिए उसी देवी को खोजकर विशेष रूप से उनकी सेवा-पूजा करनी चाहिए। यदि कुछ न मिले, तो नाम मंत्र से उस देवी का केवल षोडशोपचार पूजन करें। उनका पहला उदाहरण: जिह्वा की रक्षा के लिए भगवती सरस्वती का नाम है।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 1.24

The kavaca assigns a goddess to each body part, Sarasvatī to the tongue among them.

Worshipping a limb's goddess to treat illness in that limb is the speaker's application.

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24

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका । अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ॥ २४ ॥

नाक में सुगन्धा और ऊपर के ओठ में चर्चिका रक्षा करें। नीचे के ओठ में अमृतकला और जीभ में सरस्वती रक्षा करें।

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50

दुर्गा कवच में दाँतों के लिए और हृदय के लिए कौन-सी देवी बताई गई हैं?

दाँतों के लिए कौमारी, हृदय के लिए ललिता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 25:35–26:10 · Also a question

दाँतों की रक्षा के लिए भगवती कौमारी — तो कौमारिका का विशेष पूजन। हृदय की परेशानी के लिए, जिसे हार्ट अटैक से जुड़ी समस्याएँ हैं, जो विशेषकर अधिक उम्र के बाद शुरू होती हैं पर अब कम उम्र में भी होने लगी हैं — उसके लिए भगवती ललिता की विशेष पूजा करनी चाहिए, क्योंकि हृदय की रक्षा के लिए भगवती ललिता देवी का नाम लिया गया है।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 1.25

The kavaca asks Kaumārī to guard the teeth.

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25

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका । घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥ २५ ॥

कौमारी दाँतों की और चण्डिका कण्ठ की रक्षा करें। चित्रघण्टा गले की घाँटी की और महामाया तालु की रक्षा करें।

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ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 1.29

The kavaca asks Lalitā Devī to guard the heart.

The text says "hṛdaya"; heart disease is the speaker's reading.

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29

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी । हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ॥ २९ ॥

महादेवी स्तनों की और शोक का नाश करने वाली शोकविनाशिनी मन की रक्षा करें। देवी ललिता हृदय में और शूलधारिणी उदर में रक्षा करें।

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51

दुर्गा कवच में आयु की रक्षा के लिए कौन-सी देवी बताई गई हैं?

वाराही, मारकेश दशा और बार-बार की दुर्घटनाओं के लिए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 26:11–26:42 · Also a question

आयु की रक्षा के लिए वाराही का नाम है। यदि जन्म कुंडली में मारकेश आदि की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो और अपघात की कोई समस्या बन गई हो — बार-बार दुर्घटनाएँ हो रही हों, चोटें लग रही हों, लगे कि कोई ऐसी दुर्घटना हो सकती है — तो ऐसी स्थिति में अपनी आयु की रक्षा के लिए भगवती वाराही का विशेष पूजन करना चाहिए।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 1.39

The kavaca asks Vārāhī to guard the lifespan.

Its use against accidents in a māraka daśā is the speaker's application.

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39

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी । यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ॥ ३९ ॥

वाराही आयु की और वैष्णवी धर्म की रक्षा करें। चक्र धारण करने वाली चक्रिणी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन और विद्या की रक्षा करें।

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52

कवच की देवी के विशेष पूजन का अर्थ, और मुकदमों के लिए महालक्ष्मी का उल्लेख

पूरा मंडल और आवरण पूजन, या सोलह उपचार; और मुकदमों में विजय

· Reviewed Sep 14, 2026 · 26:43–27:09

विशेष पूजन का अर्थ है उस देवता का पूरा मंडल पूजन, पूरा आवरण पूजन। यदि इतना विधि-विधान उपलब्ध न हो, तो उनके नाम से नाम मंत्र आदि के साथ षोडशोपचार पूजन करें। राजद्वार पर महालक्ष्मी पूजन के उल्लेख के बारे में — राजद्वार का अर्थ है कोर्ट-कचहरी के मामले जिनमें व्यक्ति फँसा हो; महालक्ष्मी के पूजन से उनमें विजय मिलती है।

53

क्या अर्गला स्तोत्र के हर मंत्र का स्वतंत्र प्रयोग किया जा सकता है?

बिना दीक्षा और बिना गुरु वाले के लिए अर्गला का पहला मंत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 27:10–27:38 · Also a question

हाँ — अर्गला का हर मंत्र अपने आप में स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया जा सकता है। पहले मंत्र के बारे में वे कहते हैं कि उन्होंने यह कई बार बताया है: यदि जीवन में आपने कोई मंत्र दीक्षा नहीं ली, कोई गुरु नहीं मिला, और कोई अलग विशेष विधि भी नहीं करना चाहते, तो अर्गला के पहले मंत्र को आँख बंद करके अपने जीवन में ले लें।

54

क्या अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र के पाठ पर कोई प्रतिबंध है?

स्त्री या बिना यज्ञोपवीत वाला प्रणव न बोले

· Reviewed Sep 14, 2026 · 27:39–27:58 · Also a question

हाँ। यदि यज्ञोपवीत आदि नहीं हुआ है, और यदि आप स्त्री हैं, तो केवल उसमें प्रणव न बोलें। बाकी देवी के ग्यारह नाम — जयंती मंगला काली — बोलकर आप नित्य स्मरण और जप कर सकते हैं। वे कहते हैं कि इन्हीं मंत्रों से आप होम और हवन भी कर सकते हैं।

वक्ता कहते हैं, हाँ: यदि यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। आदि नहीं हुआ है, और यदि आप स्त्री हैं, तो उसमें केवल प्रणव न बोलें। बाकी देवी के ग्यारह नाम — जयंती मंगला काली — बोलकर आप नित्य स्मरण, जप आदि कर सकते हैं। वे जोड़ते हैं कि इन्हीं मंत्रों से आप होम, हवन आदि भी कर सकते हैं।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 2.1

The Argalā's first verse begins with Om and salutes the Goddess by eleven names, from Jayantī to Svadhā.

The rule that women and those without the sacred thread drop the Om is the speaker's; the verse itself is printed with Om.

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1

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥

ॐ। जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा, तुम्हें नमस्कार है।

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55

अर्गला स्तोत्र के कौन-से मंत्र सौभाग्य और कल्याण के लिए हैं?

सौभाग्य, रूप और कल्याण के मंत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 27:59–28:30 · Also a question

सौभाग्य की प्राप्ति के लिए "वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि" मंत्र का एक-एक करके स्वतंत्र पाठ किया जा सकता है — जैसे नवरात्र में सुबह एक माला और शाम एक माला। रूप, कल्याण की प्राप्ति के लिए, और जहाँ अशुभ बातें हो रही हों, वहाँ "विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्" मंत्र है।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 2.7

The Argalā asks the Goddess, whose feet are worshipped, as the giver of all good fortune.

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7

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ७ ॥

हे देवी, सब तुम्हारे चरणों की वन्दना करते हैं; तुम सब सौभाग्य देती हो। रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

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ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 2.14

The Argalā asks her to bring welfare and the highest prosperity.

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14

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १४ ॥

हे देवी, मेरा कल्याण करो और मुझे उत्तम सम्पत्ति दो। रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।

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56

अर्गला स्तोत्र के कौन-से मंत्र जीवनसाथी और स्वास्थ्य के लिए हैं?

"पत्नीं मनोरमां देहि" और "देहि सौभाग्यमारोग्यं"

· Reviewed Sep 14, 2026 · 28:31–29:01 · Also a question

पत्नी की प्राप्ति के लिए वहीं दिया है — "पत्नीं मनोरमां देहि"। जो अच्छा जीवनसाथी चाहते हैं वे इन मंत्रों का स्वतंत्र जप कर सकते हैं। और "देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्" मंत्र है — जिनके शरीर में बहुत रोग हैं, या जिनका भाग्य साथ नहीं दे रहा, वे इस मंत्र का भी स्वतंत्र जप कर सकते हैं।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 2.24

The Argalā asks for a pleasing wife who follows one's mind.

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24

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् । तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ॥ २४ ॥

मुझे मनोहर पत्नी दो, जो मेरे मन के अनुसार चले, अच्छे कुल में जन्मी हो और दुर्गम संसार-सागर से पार उतारने वाली हो।

यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 2.12

The Argalā asks for good fortune, health and the highest happiness.

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12

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १२ ॥

मुझे सौभाग्य और आरोग्य दो, परम सुख दो। रूप दो, जय दो, यश दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो।

यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।

57

क्या तंत्रोक्त दुर्गा सप्तशती के हर मंत्र के लिए न्यास करना चाहिए?

न्यास केवल दीक्षितों के लिए; स्त्रियाँ न करें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 29:02–29:30 · Also a question

तंत्रोक्त दुर्गा सप्तशती में हर मंत्र के लिए विनियोग और न्यास की प्रक्रिया है, पर उनका अपना मत है कि पूरी न्यास और विनियोग प्रक्रिया केवल तभी करें जब आप दीक्षित हों या बहुत अधिक कर रहे हों। नहीं तो केवल सामान्य जप करें। वे कहते हैं कि स्त्रियाँ हर मंत्र का न्यास बिल्कुल न करें — इसीलिए वे सामान्यतः कहते हैं कि न्यास प्रक्रिया को थोड़ा छोड़ दें और केवल विनियोग करके जप करें।

58

कीलक स्तोत्र क्या देता है, और क्या इसके मंत्रों से हवन किया जा सकता है?

पहले मंत्र से ज्ञान; कवच, अर्गला, कीलक या अस्त्र मंत्रों की आहुति नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 29:31–30:01 · Also a question

कीलक के पहले ही मंत्र से ज्ञान की प्राप्ति होती है, और इसके सभी मंत्रों का अलग-अलग इच्छाओं के लिए अलग से स्वतंत्र जप किया जा सकता है। पर इनसे हवन आदि की प्रक्रिया नहीं की जा सकती: कवच, अर्गला और कीलक के सभी मंत्रों का हवन नहीं होता, और जो अस्त्र मंत्र हैं उनका हवन नहीं होता।

59

तंत्रोक्त रात्रि सूक्त का प्रयोग किसके लिए होता है?

अनिद्रा, स्वप्न दोष और रात के समय की आभिचारिक परेशानी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 30:02–30:30 · Also a question

वेदोक्त रात्रि सूक्त उनके लिए है जो उच्चारण जानते हैं; दूसरे इसे नहीं करेंगे। तंत्रोक्त रात्रि सूक्त विशेषकर उनके लिए है जिन्हें अनिद्रा से जुड़ी समस्याएँ हैं, रात में सोने में परेशानी है; उन लड़कों के लिए जिनकी स्वप्न दोष की समस्या आवश्यकता से अधिक है; जहाँ आप जानते हैं कि आभिचारिक गतिविधि चल रही है और रात में स्वप्न में गलत क्रियाएँ होती हैं, चाहे स्त्री के साथ या पुरुष के साथ; या जहाँ सोते समय कोई गला दबाता है।

60

क्या तंत्रोक्त रात्रि सूक्त देव दोष में उपयोगी है?

जहाँ किसी देवता का अपमान हुआ हो, वहाँ इसका विशेष फल

· Reviewed Sep 14, 2026 · 30:31–31:01 · Also a question

वे कहते हैं कि इसके अलावा देव दोष भी लगता है — और देव दोष में यह पाठ बहुत विशेष फल देने वाला है। वे इसे किसी के भेजे एक संदेश से समझाते हैं, जो भगवती के वस्त्रों के लिए खरीदे गए एक बक्से के बारे में था।

61

देव दोष का एक उदाहरण: भगवती के वस्त्रों के बक्से का बार-बार आने वाला स्वप्न, और उसका अर्थ

भाव का उत्तर भाव से — भगवती की लीला

· Reviewed Sep 14, 2026 · 31:02–31:38

कुछ समय बाद उसे बार-बार स्वप्न आने लगा कि तुमने मेरा बक्सा रख लिया, उसमें मेरे वस्त्र रखे जाने थे — बहुत नाराज़ और क्रोधित। उसके मन में संदेह हुआ कि अनेक ब्रह्मांडों की रानी भगवती को एक छोटे-से बक्से से क्या लेना? वक्ता उत्तर देते हैं कि वह भाव से लाया था और वे भाव से नाराज़गी दिखा रही हैं — आप प्रेम दिखाते हैं और वे भी प्रेम दिखा रही हैं: जो मेरे लिए लाए थे वह अपने लिए रख लिया, मुझे दे दो। यह उनकी लीला है।

62

नाराज़ होने में लोक शक्तियों और महाशक्तियों में क्या अंतर है?

महाशक्तियाँ लीला करती हैं; लोक शक्तियाँ बहुत क्रोधित होती हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 31:39–32:07 · Also a question

जब भूल होने से, अपराध होने से ऐसा दोष लगता है, तब लोक शक्तियाँ बहुत अधिक क्रोधित होती हैं। महाशक्तियाँ लीला करती हैं, पर लोक शक्तियाँ क्रोधित होती हैं। ऐसी स्थिति में दो-तीन मंत्र हैं: पहला "क्षमारोपण संस्तुता" का मंत्र — "या देवी सर्वभूतेषु क्षमारोपण संस्तुता" — जिसका अधिक से अधिक जप करें और भगवती को समर्पित करें, कि माँ, मुझे क्षमा कर दीजिए।

63

दोष के बाद शरीर में पीड़ा हो तो तंत्रोक्त देवी सूक्त का प्रयोग कैसे होता है

रात में तंत्रोक्त देवी सूक्त, सात से पंद्रह दिन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 32:08–32:41

दूसरा यह कि यदि शरीर में कोई पीड़ा शुरू हो गई हो — कमर में दर्द, घुटने में दर्द शुरू हो रहा हो — और आप समझें कि दोष लगा है, और आपका कोलेस्ट्रॉल ठीक है, ब्लड प्रेशर सही है, कैल्शियम और विटामिन सब ठीक हैं पर फिर भी परेशानी हो रही है, तो तुरंत तंत्रोक्त देवी सूक्त का पाठ शुरू करें, विशेषकर रात में, कम से कम 9 बजे के बाद, हर दिन, क्षमा माँगते हुए। सात दिन से पंद्रह दिन में — जैसे-जैसे एक पक्ष होता है — भगवती क्षमा कर देती हैं।

64

निशाचर शक्तियों के रात के समय में भय लगे तो क्या उपाय बताया गया है?

तंत्रोक्त रात्रि सूक्त से अभिमंत्रित धूप

· Reviewed Sep 14, 2026 · 32:42–33:10 · Also a question

विशेषकर रात 12 बजे से सुबह लगभग 2 या 2:30 बजे तक के ढाई घंटे, जो हर प्रकार से निशाचर शक्तियों के बताए गए हैं। यदि आप जहाँ भी रहते हों वहाँ इस समय भय व्याप्त हो, या परेशानी हो, तो जो गीली धूप आती है, या बिना डंडी वाली गीली अगरबत्ती, उसे इसी तंत्रोक्त रात्रि सूक्त से अभिमंत्रित करके रखें, और रात में सोते समय जलाएँ।

65

देवी अथर्वशीर्ष क्या है और इसका पाठ कौन कर सकता है

यह प्राण है, और अधिकारी इसे ठीक से करें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 33:11–33:36

वे कहते हैं कि इसकी सुगंध कमरे में फैली रहनी चाहिए और इससे आपको बहुत लाभ होगा, और आप आराम से सो सकेंगे — और इस पर अधिक जप हो तो और अच्छा। अथर्वशीर्ष के बारे में वे कहते हैं कि यह तो प्राण है: जो अधिकारी हैं, जिन्हें सभी पाठ करने का अधिकार है, वे इसे ठीक से करें। सामान्यतः यदि आपको पूरी पाठ विधि नहीं पता, तो इसे हिंदी में पढ़ें, क्योंकि अथर्वशीर्ष में क्या दिया है यह जानना चाहिए।

66

नवार्ण मंत्र को तंत्र की सबसे विस्फोटक शक्ति क्यों कहा जाता है और इससे कभी छेड़छाड़ क्यों नहीं करनी चाहिए

तंत्र की सबसे विस्फोटक शक्ति, और इससे कोई छेड़छाड़ नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 33:37–34:10

वे कहते हैं कि वे बिना ज्ञान वालों को नवार्ण मंत्र के लिए हमेशा मना करते हैं: इसे इस संसार की सबसे विस्फोटक शक्ति समझिए — तंत्र में यह नवार्ण है। वैदिक मंत्रों में गायत्री है, और तंत्र में नवार्ण; ये दो मंत्र हैं जिनसे सब कुछ संभव है। इससे खेलना नहीं चाहिए, इसके साथ बकवास नहीं करनी चाहिए।

67

बिना दीक्षा वाले व्यक्ति के लिए नवार्ण मंत्र के साथ क्या वर्जित है?

मन में नौ उच्चारण भी नहीं, और इसे गाना नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 34:11–34:37 · Also a question

नवार्ण मंत्र से कभी भी, भूल से भी, कोई छेड़छाड़ नहीं। यदि आपने दीक्षा ली है, तो करें। नहीं तो सामान्यतः इसे बोलकर मन में नौ उच्चारण भी नहीं करने चाहिए। इसे गाना नहीं है, इसे टेप रिकॉर्डर के गाने की तरह YouTube पर नहीं चलाना है।

68

सप्तशती न्यास किसके लिए है?

जो एक ही दिन में तेरहों अध्याय करते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 34:38–34:56 · Also a question

सप्तशती न्यास, और सभी न्यास, विशेषकर उनके लिए हैं जो एक ही दिन में पूरे तेरह अध्यायों का पाठ करेंगे। वे कहते हैं कि स्त्रियों को भी इसमें विशेषकर न्यास आदि की आवश्यकता नहीं: सामान्यतः वे केवल पाठ करें, न्यास करने की आवश्यकता नहीं।

69

सप्तशती न्यास के लिए कौन-से मंत्र प्रयोग होते हैं, और उनसे कभी हवन क्यों नहीं करना चाहिए?

चौथे अध्याय के रक्षा मंत्र, और उनकी आहुति न देने का नियम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 34:57–35:22 · Also a question

न्यास विधि रक्षा मंत्रों से बताई गई है: "खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा…" (प्रथम अध्याय) और साथ में चौथे अध्याय के "शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके…" तथा "प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे…"। और हमेशा ध्यान रखें: सप्तशती में जिस मंत्र से हम न्यास कर रहे हैं, उसकी आहुति नहीं देंगे। ये अस्त्र मंत्र भी हैं, और इनकी आहुति नहीं होनी चाहिए।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 8.kara-nyasa-1

The Saptaśatī's kara-nyāsa places खड्गिनी शूलिनी घोरा… on the thumbs as the first of its finger placements.

The nyāsa line runs from the second half of 1.80 into the first half of 1.81.

मूल पाठ पढ़ें →
kara-nyasa-1

ॐ खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा । शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा ॥ अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।

ॐ। तुम भयंकर हो; तुम खड्ग, त्रिशूल, गदा, चक्र, शंख और धनुष धारण करती हो, और बाण, भुशुण्डी और परिघ तुम्हारे अस्त्र हैं। अँगूठों को नमस्कार।

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ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 8.kara-nyasa-2

शूलेन पाहि नो देवि… (4.24) is placed on the forefingers in the same nyāsa.

मूल पाठ पढ़ें →
kara-nyasa-2

ॐ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके । घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥ तर्जनीभ्यां नमः ।

ॐ। हे देवी, शूल से हमारी रक्षा करो। हे अम्बिका, खड्ग से, घण्टे की ध्वनि से और धनुष की डोरी की टंकार से हमारी रक्षा करो। तर्जनियों को नमस्कार।

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ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 8.kara-nyasa-3

प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च… (4.25) is placed on the middle fingers in the same nyāsa.

मूल पाठ पढ़ें →
kara-nyasa-3

ॐ प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे । भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि ॥ मध्यमाभ्यां नमः ।

ॐ। हे चण्डिका, पूर्व और पश्चिम में रक्षा करो, दक्षिण में रक्षा करो, और हे ईश्वरी, अपना शूल घुमाकर उत्तर में भी रक्षा करो। मध्यमाओं को नमस्कार।

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लोकप्रचलित — ग्रंथ में ऐसा नहीं कहा गया श्रीदुर्गासप्तशती · तेरह अध्याय 4.24

Verses used for the Saptaśatī nyāsa are never to be offered as āhuti in havan.

Neither the nyāsa rite (pūrvāṅga 8) nor the verses themselves (1.80, 4.24–25) forbid an āhuti; the rule is the speaker's own tradition.

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24

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके । घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥ २४ ॥

हे देवी! शूल से हमारी रक्षा करें। हे अम्बिके! खड्ग से हमारी रक्षा करें। घण्टे की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमारी रक्षा करें।

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70

सप्तशती के पहले अध्याय के वैश्य उवाच मंत्रों का स्वतंत्र प्रयोग क्या है?

पहले अध्याय के मंत्र 21 और 22

· Reviewed Sep 14, 2026 · 35:23–36:02 · Also a question

अब पूरे पाठ पर आते हुए, और उसमें से कितना कहाँ स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है, वे कहते हैं कि पहले अध्याय में हर मंत्र का अपना अलग प्रभाव है। उदाहरण के रूप में वे पहले अध्याय के वैश्य उवाच मंत्र लेते हैं — वैश्य उवाच के बाद 21वाँ और 22वाँ मंत्र: "समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले" 21वाँ है।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · तेरह अध्याय 1.21

After "the merchant said", verse 21 has him introduce himself as Samādhi, born in a wealthy family.

Using the line for separate japa is the speaker's practice; the text only tells the story.

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21

समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले ॥ २१ ॥

"मैं समाधि नाम का वैश्य हूँ। मेरा जन्म धनियों के कुल में हुआ है।

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71

अत्यंत वैराग्य के लिए सप्तशती का कौन-सा मंत्र प्रयोग होता है?

पहले अध्याय का 22वाँ मंत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 36:03–36:30 · Also a question

22वाँ मंत्र, जिसका अर्थ है कि पुत्र और पत्नी ने धन के लोभ में उसे घर से निकाल दिया है। वे कहते हैं कि जो चाहते हैं कि अत्यंत वैराग्य आए, उनके लिए उदाहरण के रूप में कहा जा सकता है कि आप इसका अलग से जप और पाठ कर सकते हैं।

वक्ता कहते हैं कि और 22वाँ मंत्र वह है जिसका अर्थ है कि पुत्र और पत्नी ने धन के लोभ में उसे घर से निकाल दिया है। वैराग्य के लिए — उन लोगों के लिए जो चाहते हैं कि उन पर अत्यंत वैराग्य आए — वे कहते हैं कि एक उदाहरण के रूप में, आप इसका अलग से जप और पाठ कर सकते हैं।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · तेरह अध्याय 1.22

Verse 22 says his sons and wife, greedy for his wealth, drove him out and took his money.

That japa of this verse brings vairāgya is the speaker's use; the text does not say so.

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22

पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः । विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम् ॥ २२ ॥

मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रों ने धन के लोभ में मुझे निकाल दिया है। उन्होंने मेरा धन ले लिया और मुझे खाली हाथ कर दिया।

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72

सप्तशती में तंत्रोक्त रात्रि सूक्त कहाँ आता है?

मधु-कैटभ आख्यान में ब्रह्मा द्वारा योगनिद्रा की स्तुति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 36:31–37:00 · Also a question

जब हम उसी पहले अध्याय में आगे जाते हैं, जहाँ मधु और कैटभ का आख्यान आरंभ हुआ है, वहाँ भगवान ब्रह्मा जी द्वारा भगवती योगनिद्रा की स्तुति की गई है — और वही स्वतंत्र रूप से तंत्रोक्त रात्रि सूक्त के रूप में प्रसिद्ध है। वे पहले ही बता चुके हैं कि किन स्थानों पर हम इसका प्रयोग कर सकते हैं।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · तेरह अध्याय 1.73–87

In the first chapter, during the Madhu–Kaiṭabha episode, Brahmā praises Yoganidrā, the sleep of Viṣṇu, to wake him.

The text gives the hymn as Brahmā's praise; the name "Tantrokta Rātri Sūkta" is the tradition's.

मूल पाठ पढ़ें →
73

त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका ॥ ७३ ॥

"तुम्हीं स्वाहा हो, तुम्हीं स्वधा हो, तुम्हीं वषट्कार हो। वेद के स्वर भी तुम्हारा ही रूप हैं।

74

सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता । अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः ॥ ७४ ॥

तुम जीवन देने वाली सुधा हो। नित्य अक्षर ॐ में तुम तीन मात्राओं के रूप में रहती हो। तुम उसकी नित्य अर्धमात्रा भी हो, जिसका अलग से उच्चारण नहीं हो सकता।

75

त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा । त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत् ॥ ७५ ॥

तुम्हीं सन्ध्या और सावित्री हो। हे देवि, तुम्हीं परम जननी हो। तुम्हीं इस विश्व को धारण करती हो और तुम्हीं इस जगत् को रचती हो।

76

त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा । विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ॥ ७६ ॥

हे देवि, तुम्हीं इसका पालन करती हो और अन्त में सदा तुम्हीं इसे खा जाती हो। रचना के समय तुम सृष्टि-रूपा हो और पालन के समय स्थिति-रूपा।

77

तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये । महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ॥ ७७ ॥

और हे जगन्मयी, इस जगत् के अन्त में तुम संहार-रूपा हो। तुम महाविद्या, महामाया, महामेधा और महास्मृति हो।

78

महामोहा च भवती महादेवी महासुरी । प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ॥ ७८ ॥

तुम महामोहा, महादेवी और महासुरी हो। तुम सबकी प्रकृति हो और तीनों गुणों को प्रकट करती हो।

79

कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा । त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ॥ ७९ ॥

तुम भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि हो। तुम श्री हो, ईश्वरी हो, ह्री (लज्जा) हो, और बोध-स्वरूप बुद्धि हो।

80

लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च । खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ॥ ८० ॥

तुम्हीं लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा हो। तुम घोर रूप वाली हो और तलवार, त्रिशूल, गदा और चक्र धारण करती हो,

81

शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा । सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ॥ ८१ ॥

शंख और धनुष लिए हो, और बाण, भुशुण्डी और परिघ तुम्हारे अस्त्र हैं। फिर भी तुम सौम्य हो, बहुत सौम्य हो, और सब सौम्य वस्तुओं से कहीं अधिक सुन्दर हो।

82

परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी । यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ॥ ८२ ॥

तुम पर और अपर, सबसे परे परमेश्वरी हो। हे सर्वस्वरूपे, कहीं भी जो कुछ वस्तु है, सत् हो या असत्,

83

तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा । यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् ॥ ८३ ॥

उस सबकी जो शक्ति है, वह तुम हो। तब तुम्हारी स्तुति कैसे हो? जो जगत् को रचते, पालते और खा जाते हैं, उन्हें भी तुमने

84

सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः । विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ॥ ८४ ॥

निद्रा के वश में कर दिया है। यहाँ कौन तुम्हारी स्तुति करने में समर्थ है? विष्णु, मैं और शंकर भी

85

कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् । सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ॥ ८५ ॥

तुम्हारे कारण ही शरीर धारण करते हैं। इसलिए तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें हो सकती है? हे देवि, तुम्हारे अपने उदार प्रभाव ही तुम्हारी स्तुति हैं।

86

मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ । प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ॥ ८६ ॥

इन दोनों दुर्जेय असुरों, मधु और कैटभ, को मोह में डाल दो। और जगत् के स्वामी अच्युत को शीघ्र जगा दो।

87

बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥ ८७ ॥

और इनके मन में इन दोनों महान् असुरों को मारने की बुद्धि जगा दो।"

यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।

73

साधक और ज्योतिषी कुलदेवी और कुलदेवता के बारे में पूछे बिना लोगों को सलाह देकर गलती क्यों करते हैं

कुलदेवी और कुलदेवता के बारे में कभी न पूछना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 37:01–37:45

उस दिन महाराष्ट्र से आए एक फ़ोन की बात करते हुए वे साफ़ कहते हैं कि यदि आप साधक हैं और लोग जन कल्याण के लिए आपको सुनते-देखते हैं, तो किसी से बात करते समय आप उनकी कुलदेवी और कुलदेवता के बारे में क्यों नहीं पूछते? यह आपका पहला कर्तव्य है, जब सामने वाला कहना शुरू करे कि घर में पैसे की समस्या है, वंश नहीं बढ़ रहा, शरीर में ऐसी पीड़ाएँ हैं, कोई काम नहीं बन रहा, हम कर्ज़ में दबे हैं — और फिर भी आप कभी नहीं पूछते कि उनके कुल के देवी-देवता कौन हैं।

75

जब कुल शक्ति नाराज़ हो, तो कौन-सा अनुष्ठान बताया गया है?

एक पक्ष का तंत्रोक्त रात्रि सूक्त अनुष्ठान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 38:21–38:51 · Also a question

जिसकी कुल शक्ति नाराज़ है, जिसकी कुल शक्ति साथ नहीं दे रही, जिसने किसी भी कारण से जाने-अनजाने उनका अपमान किया या उन्हें बिना पूजे छोड़ दिया, उसे तंत्रोक्त रात्रि सूक्त का अनुष्ठान करना चाहिए — कम से कम एक पक्ष का, या अष्टमी से चतुर्दशी तक। इसका मुख्य अनुष्ठान रात के समय है, पर सुबह भी एक पाठ और रात को एक पाठ हो, कम से कम 21 या 27 पाठ, समर्पण के साथ।

76

किशमिश और शहद से हवन कुल शक्ति के प्रति हुए अपराध को कैसे दूर करता है

किशमिश और शहद की आहुति; अपराध का निवारण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 38:52–39:25

यदि आप हवन की विधि जानते हैं — सामान्य सूक्ष्म हवन, सरल हवन — तो इन मंत्रों से किशमिश, किशमिश और मधु से आहुति दें। इससे वे प्रसन्न होंगी, पुष्ट होंगी, और फिर कल्याण करेंगी। वे इसकी तुलना शिव के लिए प्रयोग होने वाले रुद्राष्टकम से करते हैं: यदि कोई देव दोष लगा हो या जाने-अनजाने अपराध हुआ हो, तो उससे हमें मुक्ति मिलती है; इसी प्रकार तंत्रोक्त रात्रि सूक्त हमारा अपराध और हमारा दोष दूर करता है, यदि हम इसे सही तरीके से करें।

77

क्या सप्तशती के मध्यम चरित्र का अकेले रोज़ पाठ किया जा सकता है?

मध्यम चरित्र का अकेले रोज़ पाठ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 39:26–40:00 · Also a question

दूसरे अध्याय के बारे में वे कहते हैं कि जिनके पास समय नहीं है, यदि वे हर दिन पूरी तरह स्वतंत्र रूप से मध्यम चरित्र का पाठ करें, तो भी यह माना जाएगा कि आपने पूरा पाठ किया है। इससे यह प्रश्न उठता है कि कवच, अर्गला और कीलक करने हैं या नहीं, और छह अंगों का पाठ होगा या नहीं।

78

यह मत कि मध्यम चरित्र के पाठ में कीलक छोड़ दिया जाए, केवल कवच और अर्गला रखे जाएँ

कवच और अर्गला रखें, कीलक छोड़ें, फिर तीनों रहस्य

· Reviewed Sep 14, 2026 · 40:01–40:25

कुछ लोग कहते हैं कि कवच, अर्गला और कीलक में से कीलक नहीं करना चाहिए — कि यदि आप केवल मध्यम चरित्र कर रहे हैं, तो कवच और अर्गला करें, फिर दूसरा अध्याय, मध्यम चरित्र करें, और मध्यम चरित्र पूरा होने पर तीनों रहस्यों का पाठ करें। छह में से एक अंग क्यों हटाया जाता है, इस पर वे कहते हैं कि उनके पास कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है इसलिए नहीं बता सकते, पर यह लोक में प्रचलित है और बार-बार कहा जाता है।

79

कीलक को सप्तशती के उत्तर चरित्र से क्यों जोड़ा जा सकता है?

दोनों की अधिष्ठात्री महासरस्वती — और उस तर्क को उनका अस्वीकार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 40:26–40:53 · Also a question

क्योंकि, वे कहते हैं, कीलक का संबंध उत्तर चरित्र से है: कीलक की अधिष्ठात्री शक्ति माँ महासरस्वती हैं और उत्तर चरित्र की अधिष्ठात्री शक्ति महासरस्वती हैं। शायद हम उसे छोड़ देते हैं और पाठ नहीं करते, इसलिए उसे छोड़ने को कहा जाता है। पर वे कहते हैं कि इस तर्क से तो प्रथम चरित्र भी छोड़ना पड़ेगा, क्योंकि उसमें महाकाली नहीं हैं — और फिर कवच भी न करें; पर रक्षा के लिए कवच आवश्यक है।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 3.viniyoga

The Kīlaka's viniyoga names Mahāsarasvatī as its deity, the same deity the Saptaśatī's viniyoga gives the last episode.

मूल पाठ पढ़ें →
viniyoga

ॐ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य शिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहासरस्वती देवता, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः । ॐ नमश्चण्डिकायै ॥

ॐ। इस कीलक मन्त्र के ऋषि शिव हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता श्रीमहासरस्वती हैं। जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए सप्तशती पाठ के अंग के रूप में इसका जप में विनियोग है। ॐ, चण्डिका को नमस्कार।

यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।

80

मारण, उच्चाटन और सम्मोहन में सप्तशती के कौन-से मंत्र प्रयोग होते हैं?

युद्ध वाले अंश, स्वतंत्र रूप से और संपुट के रूप में

· Reviewed Sep 14, 2026 · 40:54–41:20 · Also a question

वे कहते हैं कि इसमें बहुत-से मंत्र हैं जिनका प्रयोग मारण आदि में, उच्चाटन, सम्मोहन आदि में स्वतंत्र रूप से किया जाता है, और जो संपुट के लिए भी प्रयोग होते हैं। शत्रु के नाश के लिए इसमें युद्ध का सारा वर्णन है — जैसे दूसरे अध्याय में महिषासुर की सेना का वध।

81

शत्रुओं के समूह के विरुद्ध सप्तशती के दूसरे अध्याय का प्रयोग कैसे होता है?

जहाँ शत्रु मिलकर काम करें वहाँ स्वतंत्र पाठ — और सटीक सीमा पर उनकी सावधानी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 41:21–41:54 · Also a question

दूसरे अध्याय का वह अंश जिससे महिषासुर की सेना का वध हुआ, शत्रुओं के समूह के नाश के लिए स्वतंत्र रूप से पढ़ा जाता है — जब बहुत-से शत्रु मिलकर किसी एक के विरुद्ध काम करें। पर वे सावधान करते हैं कि उन्हें नहीं पता कि यह किसी शास्त्र में अलग से स्पष्ट लिखा हो कि यहाँ से वहाँ तक करना है; इस पर बहुत मतभेद मिलता है।

82

सप्तशती का कौन-सा अंश उस तेज का वर्णन करता है जिससे भगवती बनीं, और उसका प्रयोग कैसे होता है?

हर देवता का तेज और भगवती को क्या मिला

· Reviewed Sep 14, 2026 · 41:55–42:17 · Also a question

दूसरे अध्याय में, जहाँ भगवती प्रकट हो रही हैं, बताया गया है कि किस देवी या देवता के शरीर से कौन-सा तेज निकला और भगवती को क्या मिला। वे कहते हैं कि इस वर्णन का भी स्वतंत्र पाठ होता है — जैसे कुलदेवी से जुड़ी क्रियाओं में।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · तेरह अध्याय 2.10–19

The second chapter tells which god's tejas formed each part of the Goddess's body.

Its separate use in kuladevī rites is the speaker's practice.

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10

ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः । निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शंकरस्य च ॥ १० ॥

तब क्रोध से भरे चक्रधारी विष्णु के मुख से एक बड़ा तेज निकला। वैसा ही तेज ब्रह्मा और शंकर से भी निकला।

11

अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः । निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ॥ ११ ॥

इन्द्र आदि दूसरे देवताओं के शरीरों से भी बहुत बड़ा तेज निकला। वह सब मिलकर एक हो गया।

12

अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् । ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ॥ १२ ॥

देवताओं ने वहाँ तेज का वह पुंज देखा, जो जलते हुए पर्वत जैसा था। उसकी ज्वालाएँ सब दिशाओं में फैली थीं।

13

अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम् । एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥ १३ ॥

सब देवताओं के शरीर से उपजा वह अनुपम तेज एक जगह इकट्ठा होकर एक नारी बन गया। उसकी चमक तीनों लोकों में फैल गई।

14

यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम् । याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥ १४ ॥

शिव के तेज से उसका मुख बना। यम के तेज से उसके बाल बने और विष्णु के तेज से भुजाएँ।

15

सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत् । वारुणेन च जङ्घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः ॥ १५ ॥

चन्द्रमा के तेज से दोनों स्तन बने और इन्द्र के तेज से कमर। वरुण के तेज से पिंडलियाँ और जाँघें बनीं, और पृथ्वी के तेज से नितम्ब।

16

ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा । वसूनां च कराङ्गुल्यः कौबेरेण च नासिका ॥ १६ ॥

ब्रह्मा के तेज से पैर बने और सूर्य के तेज से पैरों की उँगलियाँ। वसुओं के तेज से हाथों की उँगलियाँ बनीं और कुबेर के तेज से नाक।

17

तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा । नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ॥ १७ ॥

प्रजापति के तेज से उसके दाँत बने। वैसे ही अग्नि के तेज से उसके तीनों नेत्र बने।

18

भ्रुवौ च संध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च । अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥ १८ ॥

उसकी भौंहें दोनों संध्याओं का तेज थीं और कान वायु का तेज। इसी तरह दूसरे देवताओं के तेज से भी कल्याणमयी देवी प्रकट हुईं।

19

ततः समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम् । तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिताः ॥ १९ ॥

महिष से सताए देवताओं ने सब देवताओं के तेज-पुंज से प्रकट हुई उस देवी को देखा, और वे बहुत प्रसन्न हुए।

यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।

83

कुलदेवी आवाहनी खंड में पिंड स्थापना के लिए सप्तशती के तेज वाले अंश का प्रयोग कहाँ होता है?

तंत्रोक्त विधि से सरस्वती कुलदेवी की पिंड स्थापना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 42:18–42:48 · Also a question

वे बताते हैं कि कुलदेवी आवाहनी खंड, जिसका कुछ भाग उन्होंने अपने चैनल पर प्रकाशित किया है और जिससे श्रोता लाभ लेते हैं, उसमें यह वर्णन है। भगवान शिव, ब्रह्मा जी, विष्णु जी, देवराज इंद्र और अन्य देवताओं के शरीर से जो तेज निकला और एक होकर भगवती का रूप बना — जब सरस्वती कुलदेवी की पिंड स्थापना होती है, तब तंत्रोक्त विधि से यही मंत्र बोले जाते हैं।

84

घर में कुलदेवी की पहली पिंड स्थापना कौन करता है?

पति-पत्नी साथ, मुख्य रूप से पति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 42:49–43:20 · Also a question

वे कहते हैं कि यह शिक्षा दी गई है, और कुलदेवी आवाहनी में विधि बताई गई है: कि जब घर में पहली बार कुलदेवी की स्थापना हो रही हो, विशेषकर उन घरों में जहाँ पिंड की स्थापना होती है, तब साधक और ब्राह्मण लगातार यही मंत्र बोलते रहते हैं, और जिस घर की वह कुलदेवी है उसके पति-पत्नी मिलकर पिंड आदि करते हैं — पर विशेषकर पति करता है, और पत्नी केवल हाथ लगाती है।

85

सप्तशती के दूसरे अध्याय में युद्ध वाला अंश कहाँ से आरंभ होता है?

भगवती के रूप धारण करने के बाद सेना चलती है और युद्ध शुरू होता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 43:21–43:55 · Also a question

उसी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि जब भगवती प्रकट हो गईं और उन्हें सब कुछ मिल गया और उन्होंने अपना साक्षात स्वरूप धारण कर लिया, तब उसके बाद अस्त्र-शस्त्र से सजी सेना भगवती की ओर बढ़ी और युद्ध आरंभ हुआ। वे इसे लगभग 40वें श्लोक के आसपास बताते हैं।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · तेरह अध्याय 2.40

The battle with Mahiṣa's army is under way at verse 40, with weapons lighting up the quarters and Cikṣura leading the asuras.

The speaker guessed "around the 40th shloka"; the print agrees.

मूल पाठ पढ़ें →
40

शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् । महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः ॥ ४० ॥

तरह-तरह के छोड़े गए अस्त्र-शस्त्रों से सब दिशाएँ चमक उठीं। महिषासुर का सेनापति चिक्षुर नाम का महान् असुर था।

यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।

86

सप्तशती का विद्वेषण वाला अंश कहाँ तक चलता है, और यह क्या करता है?

"शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैः" से सेना के वध के अंत तक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 43:56–44:24 · Also a question

"शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम्, महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः" से आगे, उस स्थान तक जहाँ महिषासुर के सभी दैत्य और सारी सेनाएँ मारी जाती हैं — लगभग अंतिम श्लोक तक — वे कहते हैं कि इसे विशेषकर शत्रु समूह के नाश के लिए स्वतंत्र रूप से पढ़ते हैं। पर शत्रु समूह पूरी तरह नष्ट नहीं होगा; बल्कि उनमें आपस में विद्वेषण होगा। इसमें विशेषकर विद्वेषण से जुड़े प्रयोग होते हैं।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · तेरह अध्याय 2.40–69

From शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैः to the end of the chapter the Goddess destroys Mahiṣa's army.

The text tells a battle; its use for vidveṣaṇa among enemies is the speaker's tradition, not stated.

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40

शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् । महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः ॥ ४० ॥

तरह-तरह के छोड़े गए अस्त्र-शस्त्रों से सब दिशाएँ चमक उठीं। महिषासुर का सेनापति चिक्षुर नाम का महान् असुर था।

41

युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरङ्गबलान्वितः । रथानामयुतैः षड्भिरुदग्राख्यो महासुरः ॥ ४१ ॥

वह देवी से लड़ा, और चामर भी दूसरे असुरों और चतुरंगिणी सेना के साथ लड़ने लगा। उदग्र नाम का महान् असुर साठ हज़ार रथ लेकर आया।

42

अयुध्यतायुतानां च सहस्रेण महाहनुः । पञ्चाशद्भिश्च नियुतैरसिलोमा महासुरः ॥ ४२ ॥

महाहनु हज़ार अयुत, यानी एक करोड़ रथों के साथ लड़ा। महान् असुर असिलोमा पचास नियुत रथ लेकर आया।

43

अयुतानां शतैः षड्भिर्बाष्कलो युयुधे रणे । गजवाजिसहस्रौघैरनेकैः परिवारितः ॥ ४३ ॥

बाष्कल उस रण में छह सौ अयुत, यानी साठ लाख रथों के साथ लड़ा। परिवारित हज़ारों हाथियों और घोड़ों के अनेक दलों के साथ,

44

वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत । बिडालाख्योऽयुतानां च पञ्चाशद्भिरथायुतैः ॥ ४४ ॥

और एक करोड़ रथों से घिरा उस युद्ध में लड़ा। बिडाल नाम का असुर पचास अयुत-अयुत रथों के साथ लड़ा।

45

युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः । अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः ॥ ४५ ॥

वह रथों से घिरा वहाँ लड़ा। दूसरे असुर भी हज़ारों-हज़ार की संख्या में रथों, हाथियों और घोड़ों के साथ वहाँ लड़े।

46

युयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः । कोटिकोटिसहस्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा ॥ ४६ ॥

महान् असुर वहाँ देवी से लड़े। स्वयं महिषासुर कोटि-कोटि सहस्र रथों, हाथियों

47

हयानां च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः । तोमरैर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा ॥ ४७ ॥

और घोड़ों से घिरा युद्ध में खड़ा था। तोमर, भिन्दिपाल, शक्ति और मूसल,

48

युयुधुः संयुगे देव्या खड्गैः परशुपट्टिशैः । केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित्पाशांस्तथापरे ॥ ४८ ॥

तलवार, फरसे और पट्टिश लेकर वे देवी से लड़े। कुछ ने उन पर शक्तियाँ फेंकीं और कुछ ने पाश।

49

देवीं खड्गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः । सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका ॥ ४९ ॥

कुछ तलवार के वार करके देवी को मारने चले। तब चण्डिका देवी ने

50

लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी । अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः ॥ ५० ॥

खेल-खेल में ही अपने अस्त्र-शस्त्र बरसाकर उन सब अस्त्र-शस्त्रों को काट डाला। उनके मुख पर थकान का कोई चिह्न न था, और देवता तथा ऋषि उनकी स्तुति कर रहे थे।

51

मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्वरी । सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेसरी ॥ ५१ ॥

परमेश्वरी ने असुरों के शरीरों पर अस्त्र-शस्त्र बरसाए। देवी का वाहन सिंह भी क्रोध में अपनी अयाल हिलाने लगा।

52

चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः । निःश्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका ॥ ५२ ॥

वह असुरों की सेनाओं में ऐसे घूमा जैसे वन में आग फैलती है। और लड़ते हुए अम्बिका ने जो साँसें छोड़ीं,

53

त एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्रशः । युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः ॥ ५३ ॥

वे तुरन्त लाखों गण बन गईं। वे गण फरसे, भिन्दिपाल, तलवार और पट्टिश लेकर लड़े।

54

नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्त्युपबृंहिताः । अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्खांस्तथापरे ॥ ५४ ॥

देवी की शक्ति से बढ़े हुए वे असुरों के दलों का नाश करने लगे। कुछ गणों ने नगाड़े बजाए और कुछ ने शंख।

55

मृदङ्गांश्च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे । ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तिवृष्टिभिः ॥ ५५ ॥

दूसरे उस युद्ध-महोत्सव में मृदंग बजाने लगे। तब देवी ने त्रिशूल, गदा, शक्तियों की वर्षा,

56

खड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान् । पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान् ॥ ५६ ॥

तलवार आदि से सैकड़ों महादैत्यों को मार डाला। दूसरों को उन्होंने घण्टे की ध्वनि से बेहोश करके गिरा दिया।

57

असुरान् भुवि पाशेन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत् । केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खड्गपातैस्तथापरे ॥ ५७ ॥

उन्होंने दूसरे असुरों को पाश से बाँधकर धरती पर घसीटा। कितने ही असुर तलवार के तीखे वारों से दो टुकड़े हो गए।

58

विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते । वेमुश्च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हताः ॥ ५८ ॥

कितने ही गदा की चोट से कुचलकर धरती पर पड़े रह गए। कितने ही मूसल की कड़ी मार खाकर रक्त उगलने लगे।

59

केचिन्निपतिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि । निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे ॥ ५९ ॥

कुछ की छाती शूल से फट गई और वे धरती पर गिर पड़े। रणभूमि में कुछ बाणों की बौछार से छलनी हो गए।

60

श्येनानुकारिणः प्राणान् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः । केषांचिद् बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे ॥ ६० ॥

बाज की तरह झपटने वाले, देवताओं को सताने वाले असुर प्राण छोड़ने लगे। कुछ की भुजाएँ कट गईं और कुछ की गर्दनें।

61

शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः । विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः ॥ ६१ ॥

दूसरों के सिर कटकर गिरे। कुछ बीच से फाड़ दिए गए। और कितने ही महादैत्य जाँघें कट जाने से धरती पर गिर पड़े।

62

एकबाह्वक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः । छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः ॥ ६२ ॥

कुछ को देवी ने दो टुकड़े कर दिया, जिससे हर टुकड़े में एक भुजा, एक आँख और एक पैर रह गया। कुछ सिर कटने पर गिरे और फिर उठ खड़े हुए।

63

कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः । ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः ॥ ६३ ॥

बिना सिर के धड़ अच्छे-अच्छे हथियार लेकर देवी से लड़े। दूसरे धड़ वहाँ युद्ध के बाजों की लय पर नाचने लगे।

64

कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः । तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः ॥ ६४ ॥

दूसरे महादैत्य, जिनके सिर कट चुके थे, हाथों में तलवार, शक्ति और ऋष्टि लिए देवी से कह रहे थे, “ठहरो! ठहरो!”

65

पातितै रथनागाश्वैरसुरैश्च वसुन्धरा । अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत्स महारणः ॥ ६५ ॥

जहाँ वह महायुद्ध हुआ, वहाँ की धरती गिराए हुए रथों, हाथियों, घोड़ों और असुरों से ऐसी पट गई कि वहाँ चलना असम्भव हो गया।

66

शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवुः । मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम् ॥ ६६ ॥

असुर-सेना के बीच वहाँ तुरन्त हाथियों, असुरों और घोड़ों के रक्त की बड़ी-बड़ी नदियाँ बहने लगीं।

67

क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका । निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम् ॥ ६७ ॥

अम्बिका ने असुरों की उस विशाल सेना को क्षणभर में नष्ट कर दिया, जैसे आग घास और लकड़ी के बड़े ढेर को जला देती है।

68

स च सिंहो महानादमुत्सृजन्धुतकेसरः । शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति ॥ ६८ ॥

और वह सिंह भी अयाल हिलाता हुआ बड़ी गर्जना कर रहा था, मानो देवताओं के शत्रुओं के शरीरों से उनके प्राण चुन रहा हो।

69

देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं महासुरैः । यथैषां तुतुषुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि ॥ ॐ ॥ ६९ ॥

देवी के गणों ने वहाँ महादैत्यों से ऐसा युद्ध किया कि आकाश में देवता उन पर प्रसन्न होकर फूल बरसाने लगे। ॐ।

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87

विद्वेषण प्रयोग कहाँ कभी नहीं करना चाहिए?

अपने निवास पर कभी नहीं, और गृहस्थ द्वारा कभी नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 44:25–44:40 · Also a question

वे कहते हैं कि जो इसका स्वतंत्र प्रयोग करते हैं वे इसे कभी अपने निवास स्थान पर नहीं करते। और कोई भी गृहस्थ व्यक्ति इसे नहीं करवाता — यह भी जान लें।

वक्ता कहते हैं कि जो इसका स्वतंत्र प्रयोग करते हैं, वे इसे कभी अपने निवास स्थान पर नहीं करते। फिर वे कहते हैं कि वे सबको बताएँगे कि इसका प्रयोग कहाँ होता है। वे कहते हैं कि कोई भी गृहस्थ व्यक्ति यह प्रयोग नहीं करवाता। यह भी जान लें।

88

विद्वेषण प्रयोग मुख्य रूप से कहाँ होता है: राजनीति में, और पैसा तारापीठ पहुँचता है

राजनीति, और तारापीठ पहुँचने वाला पैसा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 44:41–45:16

वे कहते हैं कि राजनीति में यह सब बहुत प्रयोग होता है। राजनीतिक क्षेत्र वाले विरोधी दल को तोड़ने के लिए इस प्रकार के प्रयोग विशेष रूप से करते हैं — जो हम समाज में देखते हैं कि आज यह नेता एक दल में था और कल दूसरे में चला गया। तंत्रोक्त दृष्टि से देखें तो इसमें कहीं न कहीं इस प्रकार की क्रियाएँ करवाई जाती हैं। लोग टिप्पणी करते हैं कि अमुक नेता कोई पूजा नहीं करवाता, पर पीठ पीछे बहुत कुछ होता है, और बहुत पैसा जाता है: वे कहते हैं कि पश्चिम बंगाल और झारखंड का आधा पैसा तारापीठ जाता है।

89

सप्तशती के तीसरे अध्याय का स्वतंत्र प्रयोग किसलिए होता है?

घर में स्थापित नकारात्मक शक्तियों को हटाना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 45:17–45:48 · Also a question

तीसरा अध्याय पूरी तरह महिष के वध का है; इसलिए जब भी कोई नकारात्मक शक्ति किसी घर में जाकर स्थापित हो जाती है, तब इन मंत्रों का प्रयोग करके उन शक्तियों को हटाया जाता है।

वे बताते हैं कि तारापीठ में श्मशान और मसान में हवन होते रहते हैं। तो वे कहते हैं, यह विषय जान लीजिए; ऐसा होता है। तीसरे अध्याय में पूरी तरह महिष का वध है। इसलिए जब भी कोई नकारात्मक शक्ति घर में जाकर स्थापित हो जाती है, तब वहाँ इन मंत्रों का प्रयोग करके उन शक्तियों को हटाया जाता है।

90

सप्तशती का चौथा अध्याय (शक्रादि स्तुति) किसलिए प्रयोग होता है?

लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए शक्रादि स्तुति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 45:49–46:30 · Also a question

चौथा अध्याय लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए है। शक्रादि स्तुति का स्वतंत्र पाठ, स्तुति और हवन होता है; इंद्र और देवगण द्वारा की गई स्तुति से विशेषकर पुष्टिकारक हवन किया जाता है। यह पहले श्लोक से 23वें श्लोक तक चलती है, जो "शूलेन पाहि नो देवि" से ऊपर है — चौथे अध्याय की यह स्तुति भगवती की प्रसन्नता और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए है, और धन से जुड़ी परेशानी कितनी भी बड़ी हो, उसके लिए इसका स्वतंत्र पाठ किया जा सकता है।

91

शक्रादि स्तुति से हवन में कौन-सी आहुतियाँ दी जाती हैं?

खीर, मधु, पौष्टिक सामग्री और कृष्ण द्राक्षा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 46:31–47:00 · Also a question

इन्हीं मंत्रों से खीर की आहुति, मधु की आहुति, पौष्टिक बनाने वाली सामग्री की आहुति, और कृष्ण द्राक्षा — यानी काली किशमिश — उसकी आहुति, मधु में डुबोकर अर्पित करके। इससे पूरा पौष्टिक हवन और पूजन किया जा सकता है, यदि हमारे घर में किसी भी प्रकार की दरिद्रता हो।

92

"शूलेन पाहि नो देवि" सबसे प्रसिद्ध रक्षा मंत्र क्यों है, और बिना प्रशिक्षण इसके प्रयोग पर सावधानी

सबसे प्रसिद्ध रक्षा मंत्र, और बिना प्रशिक्षण प्रयोग पर उनकी सावधानी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 47:01–47:23

उसके बाद "शूलेन पाहि नो देवि" सबसे प्रसिद्ध मंत्र है; कहा जाता है कि इस मंत्र से संपुट करके रक्षा के लिए पाठ किया जाता है, और इससे भगवती बहुत प्रसन्न होती हैं। पर उनके अनुसार यह सब दीक्षा के बाद करना अच्छा है, यदि प्रारंभिक साधना हो चुकी हो — आज सुनकर, प्रेरित होकर, इन मंत्रों का प्रयोग शुरू नहीं कर देना चाहिए; ये अत्यंत उग्र मंत्र हैं।

93

क्या सप्तशती पाठ किए बिना केवल चार रक्षा मंत्रों का प्रयोग करना उचित है?

रक्षा मंत्र पाठ के साथ हों, उसकी जगह नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 47:24–47:46 · Also a question

रक्षा के लिए ये चार मंत्र बहुत-सी जगहों पर अलग से भी प्रयोग होते हैं, और लोग रक्षा के लिए इन मंत्रों का प्रयोग करते हैं। पर यदि आप कभी सप्तशती पाठ करें ही नहीं और केवल इन मंत्रों का प्रयोग करते रहें, तो वह भी उचित नहीं। यदि आप सप्तशती पाठ करें और उसके साथ इन मंत्रों का प्रयोग करें, तो बहुत अच्छा है।

94

सप्तशती का पाँचवाँ अध्याय (तंत्रोक्त देवी सूक्त) किसलिए प्रयोग होता है?

तंत्रोक्त देवी सूक्त से देवी का आवाहन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 47:47–48:07 · Also a question

पाँचवाँ अध्याय देवी के आवाहन के लिए है। इसमें तंत्रोक्त देवी सूक्त स्वतंत्र रूप से है, "नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः" से लेकर "या देवी सर्वभूतेषु" वाले सभी मंत्रों तक।

वक्ता कहते हैं कि पाँचवाँ अध्याय देवी के आवाहन के लिए है। पाँचवें अध्याय में तंत्रोक्त देवी सूक्त स्वतंत्र रूप से है — नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः से, या देवी सर्वभूतेषु वाले सभी मंत्रों तक। इन मंत्रों से जब भी स्तवन होता है, तो उसे एक विशेष ढंग से कहने का कारण है।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · तेरह अध्याय 5.9

The gods' hymn in the fifth chapter begins नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः.

Its use for āvāhana is the speaker's practice.

मूल पाठ पढ़ें →
9

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥ ९ ॥

देवी को नमस्कार, महादेवी को नमस्कार। कल्याणमयी शिवा को सदा नमस्कार। प्रकृति और भद्रा को नमस्कार। हम नियम से उन जगदम्बा को प्रणाम करते हैं।

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95

तंत्र संप्रदाय के लोग तंत्रोक्त देवी सूक्त के साथ बलि पर ज़ोर क्यों देते हैं?

इससे जगदंबा आवाहित होती हैं और अवश्य आती हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 48:08–48:38 · Also a question

तंत्र संप्रदाय के बहुत-से लोग कहते हैं कि यदि आप तंत्रोक्त देवी सूक्त का पाठ करें तो प्रतीकात्मक बलि अवश्य दें — कम से कम कुष्मांडी बलि, कदली फलम यानी केले की बलि, खीरे की बलि, नींबू की बलि, पर प्रतीकात्मक। कारण यह है कि पाँचवें अध्याय की स्तुति में माना जाता है कि इन मंत्रों से भगवती जगदंबा का आवाहन हुआ है, और वे अवश्य आती हैं; इन मंत्रों से उनके तत्व उपस्थित होते हैं। और सप्तशती अपने आप में एक अत्यंत विशेष, उग्र शाक्त तंत्र ग्रंथ है, इसलिए ऐसा नहीं हो सकता कि वे न आएँ।

96

यदि फल की प्रतीकात्मक बलि न दी जाए, तो देवी सूक्त के साथ न्यूनतम बलि क्या है?

कपूर पर लौंग अग्नि बलि के रूप में, कटा जायफल शस्त्र बलि के रूप में

· Reviewed Sep 14, 2026 · 48:39–49:02 · Also a question

कम से कम लौंग और कपूर अवश्य जलाने चाहिए। कपूर पर लौंग जलाने का अर्थ है लौंग और कपूर की बलि। जायफल को काटकर भी बलि दी जाती है, और जायफल को कपूर पर जलाया भी जाता है। इन दोनों को बलि माना गया है — एक अग्नि बलि बनती है और दूसरी शस्त्र बलि। इन साधनों से भी बलि देकर हम आवाहित शक्ति को तृप्त करते हैं।

97

कोई शक्ति बलि से तृप्त ही क्यों होती है?

यह उसकी प्रकृति है — आप खाते हैं और तृप्ति पाते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 49:03–49:30 · Also a question

वे कहते हैं कि शक्ति बलि से तृप्त होती है; यह उसकी अपनी प्रकृति है। इसमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि क्यों — ऐसा क्यों हो, वह क्यों तृप्त हो रही है, उसे बलि से ही क्यों तृप्त होना है। आप भोजन करते हैं, और खाकर आपको तृप्ति मिलती है; वह बलि से तृप्त हो रही है। यह सीधी-सी बात है।

98

तंत्रोक्त देवी सूक्त के मंत्र किन देवताओं के यंत्रों के लिए प्रयोग होते हैं, और किनके लिए नहीं?

धूमावती को छोड़कर जगदंबा से जुड़ा हर यंत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 49:31–49:59 · Also a question

जब भी भगवती का कोई यंत्र बनाया जाए — किसी भी प्रकार का यंत्र, जगदंबा से जुड़ा, चाहे महाकाली का, महालक्ष्मी का, महासरस्वती का, माँ भगवती दुर्गा का, या दस महाविद्याओं में से किसी का — धूमावती को छोड़कर, क्योंकि धूमावती में ये पूरे मंत्र प्रयोग नहीं होंगे; धूमावती में कुछ लक्ष्मी से जुड़े मंत्र होते हैं।

99

तंत्रोक्त देवी सूक्त में तीन बार "नमस्तस्यै" किसका संकेत है?

तीन महाशक्तियाँ, पूजित देवता के क्रम से

· Reviewed Sep 14, 2026 · 50:00–50:38 · Also a question

पहले वह स्थान लें जहाँ नमस्तस्यै मंत्र आरंभ होता है — "या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः"। इसमें तीन नमस्तस्यै तीन महाशक्तियों का संकेत हैं। फिर यह इस पर निर्भर है कि आप किस क्रम में और किस देवी के लिए कर रहे हैं: यदि महाकाली के लिए, तो नमस्तस्यै के बाद महाकाली जुड़ेगा।

100

देवी यंत्र के हर आवरण में कम से कम क्या करना आवश्यक है?

हर विधि के नाम से कम से कम अक्षत अर्पित करना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 50:39–51:12 · Also a question

जैसे मूर्ति में हम पूरा अधिवास और सारी विधि और न्यास करवाते हैं, ठीक वैसे ही यंत्र के हर एक आवरण में कम से कम एक बार यह अवश्य करना चाहिए। "सप्तमावरण... सर्व देवी देवताभ्यो" और उसके बाद सभी विधियाँ — उनमें से हर एक के नाम से कम से कम इतना अक्षत देना चाहिए, उन साधक भाइयों द्वारा जो ऐसी क्रियाएँ करते हैं और जानते हैं।

101

महाकाली यंत्र के तर्पण में कौन-सी सामग्री प्रयोग होती है?

मधु मिला काले तिल का जल, त्रिदल बेलपत्र से उठाकर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 51:13–51:45 · Also a question

जब यंत्र की प्रक्रिया पूरी हो जाए, तब, यदि यह महाकाली के लिए हो रहा है, तो हम पहले इससे उनका अर्चन और तर्पण करेंगे — यंत्र की तर्पण विधि बाद में आती है। महाकाली के लिए काले तिल का जल होगा, काले तिल होंगे; काले तिल में मधु होगा, और उसे मिलाकर, त्रिदल बेलपत्र से, या चाँदी के बेलपत्र से उठाकर, इन्हीं मंत्रों से यंत्र पर जल डालना शुरू करेंगे।

102

देवी सूक्त के किस श्लोक से महाकाली का तर्पण आरंभ होता है?

"या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता" से

· Reviewed Sep 14, 2026 · 51:46–52:18 · Also a question

13वें श्लोक तक, "विष्णुमायेति शब्दिता" से पहले के श्लोकों तक, यह आपके लिए सामान्य है। पर जैसे ही आप "या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता" पर आते हैं, यहाँ से नमस्तस्यै "महाकाल्यै" बन जाता है — यहाँ से महाकाली आरंभ होती हैं। क्योंकि हम महाकाली के यंत्र के लिए कर रहे हैं, सबसे पहले "महाकाल्यै तर्पयामि नमः"; फिर नमस्तस्यै पर "महालक्ष्म्यै तर्पयामि नमः"; फिर नमस्तस्यै नमो नमः पर "महासरस्वत्यै तर्पयामि नमः" — यह तीन बार होगा।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · तेरह अध्याय 5.14

The first या देवी सर्वभूतेषु verse, naming her as Viṣṇumāyā, is verse 14.

The speaker says "up to the 13th shloka" before it; the print agrees. The tarpaṇa names are his tradition.

मूल पाठ पढ़ें →
14

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता । नमस्तस्यै ॥ १४ ॥

जो देवी सब प्राणियों में विष्णुमाया नाम से कही जाती हैं, उनको नमस्कार।

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103

क्या देवी सूक्त के तर्पण में तीनों महाशक्तियों का क्रम बदलता है?

जिस देवता का नाम है वह पहले, और हवन भी इसी क्रम में

· Reviewed Sep 14, 2026 · 52:19–52:48 · Also a question

हाँ। वे कहते हैं कि इन्हें अकेले "नमस्तस्यै तर्पयामि नमः" आदि के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता — सामान्य लोग जो ऐसे करते हैं वह अलग बात है, पर विशेष विधि में तीनों के नाम लिए जाते हैं। यदि महालक्ष्मी पहले हो रही हैं, तो पहले नमस्तस्यै में महालक्ष्मी, बीच में महासरस्वती और बाद में महाकाली; जब महासरस्वती पहले हों, तो महासरस्वती, महालक्ष्मी, महाकाली। हवन भी इसी प्रकार होता है: "नमस्तस्यै महाकाल्यै स्वाहा", "नमस्तस्यै महालक्ष्म्यै स्वाहा", "नमस्तस्यै नमो नमः महासरस्वत्यै स्वाहा"।

104

कैसे पता चले कि देवी सूक्त के हर श्लोक में तीन आहुतियाँ हैं?

13वें के बाद श्लोक संख्या 14, 15, 16 चलती है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 52:49–53:20 · Also a question

वे कहते हैं कि नाम न भी लें, तो सामान्य रूप से तंत्रोक्त देवी सूक्त पढ़ने पर आपको एक श्लोक दिखता है, पर उसमें तीन आहुतियाँ हैं। यह वहाँ दिया है: आज के ग्रंथों में, और निःसंदेह पहले के ग्रंथों में भी, श्लोक संख्या बढ़ती है — नमस्तस्यै के बाद 14, अगले नमस्तस्यै के बाद 15, और नमस्तस्यै नमो नमः के बाद 16, 13वें श्लोक के बाद से गिनते हुए।

105

सप्तशती का छठा अध्याय किसलिए प्रयोग होता है, और ऐसे पाठ कहाँ करने चाहिए?

धूम्रलोचन वध, और स्वतंत्र पाठ मंदिर में

· Reviewed Sep 14, 2026 · 53:21–53:56 · Also a question

छठा अध्याय, जिसमें धूम्रलोचन का वध हुआ है — जहाँ जीवन में बहुत धुंध हो, वहाँ धूम्रलोचन वध का स्वतंत्र पाठ किया जा सकता है। पर जो सभी पाठ स्वतंत्र रूप से किए जाते हैं वे मंदिर में करना अच्छा है, क्योंकि स्वतंत्र पाठ करने पर बहुत-सी शक्तियाँ उग्र हो सकती हैं; इसलिए इसे घर से बाहर करना चाहिए।

106

इस वार्ता में सप्तशती के हर मंत्र की व्याख्या संक्षिप्त क्यों रखी गई है

कि साधक को हाथ में ग्रंथ की शक्ति का अनुभव हो

· Reviewed Sep 14, 2026 · 53:57–54:30

क्योंकि, वे कहते हैं, यदि हर मंत्र को एक-एक करके पूरा प्रवचन दिया जाए तो यह बहुत लंबा हो जाएगा। इसलिए वे संक्षेप में इतना बता रहे हैं — कि जब आप कल सप्तशती करें, जब ग्रंथ आपके हाथ में आए और आप सप्तशती को छुएँ, तो आप इस बात से स्पंदित हो उठें कि इसमें कितनी सामर्थ्य है।

107

सप्तशती का सातवाँ अध्याय (चंड-मुंड वध) किसलिए प्रयोग होता है?

मारण सामग्री के रूप में चंड-मुंड वध

· Reviewed Sep 14, 2026 · 54:31–55:00 · Also a question

शत्रु के नाश के लिए यह सबसे खतरनाक है। सातवाँ अध्याय अपने आप में अत्यंत तीखा है: चंड और मुंड के वध की कथा — वे कहते हैं कि इन श्लोकों में शत्रु पर मारण प्रयोग के लिए इतने खतरनाक मंत्र हैं कि वे मुश्किल से कह पाते हैं कि क्या बताएँ। यदि लोग इस पर संपुट लगाकर मारण आदि प्रयोग करें, तो यह अवश्य होता है; पर साधक में इतनी क्षमता होनी चाहिए, और दोष अलग बात है — मारण आदि में प्रयोग बहुत प्रचंड होता है।

108

सप्तशती का सातवाँ अध्याय अष्टमी-नवमी के संधि काल के बारे में क्या कहता है?

उसी संधि पर चामुंडा प्रकट हुईं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 55:01–55:36 · Also a question

वे कहते हैं कि इसी अध्याय में वर्णन है कि अष्टमी तिथि और नवमी तिथि के संधि काल में भगवती चामुंडा प्रकट हुईं — जिन्होंने चंड और मुंड का वध किया वे चामुंडा नाम से प्रसिद्ध हुईं। और इसी कारण अष्टमी और नवमी के संधि काल के समय हमें भगवती का पूजन अवश्य करना चाहिए।

शास्त्र क्या कहता है

लोकप्रचलित — ग्रंथ में ऐसा नहीं कहा गया श्रीदुर्गासप्तशती · तेरह अध्याय 7.27

The Goddess should be worshipped at the meeting of the eighth and ninth tithis because Cāmuṇḍā appeared then.

7.27 gives only the name: because she brought Caṇḍa and Muṇḍa, she will be known as Cāmuṇḍā. The chapter does not mention the Aṣṭamī–Navamī juncture.

मूल पाठ पढ़ें →
27

यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता । चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि ॥ ॐ ॥ २७ ॥

"देवि! तुम चण्ड और मुण्ड को लेकर मेरे पास आई हो, इसलिए संसार में तुम चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध होगी।" ॐ।

यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।

109

सप्तशती के ग्यारहवें और बारहवें अध्याय किसलिए प्रयोग होते हैं?

ग्यारहवाँ भगवती की प्रसन्नता के लिए, बारहवाँ अपनी इच्छाओं के लिए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 55:37–56:10 · Also a question

वे कहते हैं कि ग्यारहवाँ अध्याय, ग्यारहवें अध्याय तक का पूरा पाठ, भगवती की प्रसन्नता के लिए है, और बारहवाँ अध्याय अपनी इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिए स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है।

वक्ता कहते हैं कि इस प्रकार सप्तशती के जितने भी मंत्र हैं, उन सबसे हम तरह-तरह के प्रयोग कर सकते हैं। ग्यारहवाँ अध्याय — उसका पाठ, ग्यारहवें अध्याय तक का पूरा पाठ, भगवती की प्रसन्नता के लिए है। और बारहवें अध्याय से, अपनी कामना और इच्छा की पूर्ति के लिए, इसे स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है।

110

वैष्णो देवी (कटरा) का रोज़ सुबह का पाठ, ग्यारहवें और बारहवें अध्याय के पाठ के उदाहरण के रूप में

कटरा का रोज़ सुबह का पाठ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 56:11–56:51

जो वैष्णो देवी से लाइव देखते हैं, वे देखते हैं कि हर दिन सुबह-सुबह पाठ होता है: कवच, अर्गला और कीलक का पाठ, और उसके बाद ग्यारहवें अध्याय का पाठ और बारहवें अध्याय का पाठ। तो आप भी यह कर सकते हैं — कहीं कोई निषेध नहीं है।

वक्ता कहते हैं कि जो वैष्णो देवी से लाइव देखते हैं, वे देखते हैं कि हर दिन सुबह-सुबह पाठ होता है। कवच, अर्गला और कीलक का पाठ, और उसके बाद ग्यारहवें अध्याय का पाठ और बारहवें अध्याय का पाठ। तो आप भी यह कर सकते हैं। कहीं कोई निषेध नहीं है।

111

सप्तशती के तीनों रहस्यों का पाठ कब करना चाहिए?

केवल सप्तशती पाठ के साथ, किसी कामना के लिए नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 56:52–57:30 · Also a question

रहस्यों का पाठ केवल तभी करना चाहिए जब आप दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हों। अलग से, स्वतंत्र रूप से आप इसे अध्ययन और अभ्यास के लिए कर सकते हैं, पर किसी कामना के लिए इसे उस प्रकार नहीं करना चाहिए।

112

घर में परेशानी हो तो कौन-सा अनुष्ठान करवाना चाहिए?

सप्तशती, या संपुट के साथ नौ दिन का नवचंडी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 58:16–58:36 · Also a question

एक श्रोता, जिसके घर में परेशानी है, पूछता है कि क्या किसी पंडित जी से कोई विशेष अनुष्ठान करवाना चाहिए; वे कहते हैं कि अवश्य करवाइए — अभी सप्तशती करवाइए। नवचंडी करवाइए; नौ दिन, और सबसे अच्छा संपुट के साथ।

एक श्रोता लिखता है कि घर में परेशानी है और पूछता है कि क्या पंडित जी से कोई विशेष अनुष्ठान करवाना चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि अवश्य करवाइए; अभी सप्तशती करवाइए। नवचंडी अनुष्ठान करवाइए — नौ दिन, और सबसे अच्छा संपुट के साथ।

113

हनुमान जी का अर्चन कैसे किया जाता है?

उनके नामों के साथ विग्रह पर लाल अक्षत और लाल फूल

· Reviewed Sep 14, 2026 · 58:37–58:57 · Also a question

हनुमान जी के श्री विग्रह पर, उनके 108 या 1008 नामों से, लाल अक्षत — यानी चावल को फ़ूड कलर से, अच्छे फ़ूड कलर से रँगें — और रक्त पुष्प, लाल फूल; इन्हें मिलाकर उससे अर्चन करें।

हनुमान जी का अर्चन कैसे होता है, इस प्रश्न पर वक्ता उत्तर देते हैं: हनुमान जी के श्री विग्रह पर, उनके 108 या 1008 नामों से — लाल अक्षत से, यानी चावल को फ़ूड कलर से, किसी अच्छे फ़ूड कलर से रँगें, और रक्त पुष्प, लाल फूल लें — इन्हें मिलाकर उससे अर्चन करें।

114

क्या नित्य पूजन में अर्गला का पहला मंत्र और पंचाक्षरी साथ किए जा सकते हैं?

वैद्यनाथ और जय दुर्गा के लिए सुबह-शाम का जप

· Reviewed Sep 14, 2026 · 58:58–59:25 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या नित्य पूजन में सुबह अर्गला का पहला मंत्र और पंचाक्षरी, और शाम को बाबा वैद्यनाथ और माता जय दुर्गा के लिए जप किया जा सकता है, वे कहते हैं हाँ, बिल्कुल किया जा सकता है। हिंदी में बटुक भैरव हृदय स्तोत्र के बारे में पूछने पर वे कहते हैं अवश्य करें। पंचमुखी हनुमान कवच के बारे में वे कहते हैं कि उसकी संस्कृत बहुत कठिन है और हर कोई नहीं कर सकता।

115

यदि किसी कवच का उच्चारण बहुत कठिन हो तो क्या करना चाहिए?

अभ्यास करें, फिर भी न आए तो छोड़ दें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 59:26–1:00:00 · Also a question

यदि कठिन लगे और करने को लेकर मन में संदेह उठे, यदि उच्चारण नहीं आ रहा, तो एक-दो बार पाठ करें, अभ्यास करें, सीखें; और फिर भी न हो, तो छोड़ दें — करने के लिए बहुत-से दूसरे विधान हैं। वे चैनल पर दी गई पूरी हनुमान चालीसा और पूरे बजरंग बाण की ओर, और हनुमान जंजीरा की ओर संकेत करते हैं।

116

तंत्र से परेशान व्यक्ति को नवरात्रि में क्या करना चाहिए?

सुबह सप्तशती, शाम को हनुमान चालीसा और कवच

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:00:01–1:00:25 · Also a question

यदि कोई तंत्र से परेशान है, तो सुबह दुर्गा सप्तशती और शाम को हनुमान चालीसा और हनुमान कवच — बिल्कुल किया जा सकता है। यह पूछे जाने पर कि क्या नवरात्रि के नौ दिनों में किसी स्तोत्र का 1100 की संख्या का अनुष्ठान करके नवमी की रात हवन किया जा सकता है, वे कहते हैं हाँ, बिल्कुल।

117

नवरात्रि अनुष्ठान कैसे पूरा करना चाहिए, और यदि कोई माला बची रह जाए तो?

नवमी को हवन और कन्या भोज; छूटी माला बाद में पूरी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:00:26–1:01:00 · Also a question

इसे आठ दिनों में पूरा करें, और नवमी को हवन और कन्या भोज आदि करके समाप्त करें। एक श्रोता, जिसका पूजा-पाठ मंगलवार से टूटा है क्योंकि पैर नीचे रखते ही रक्त बहने लगता है, और जिसकी माला बची है, पूछता है कि क्या नवरात्रि के बाद पूरी की जा सकती है; वे कहते हैं हाँ, बिल्कुल की जा सकती है।

118

जो रोज़ पूरी सप्तशती नहीं कर सकते, उनके लिए क्या दिया गया है?

महाविद्या क्रम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:01:01–1:01:14 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि जो रोज़ अधिक से अधिक अंग पूजन के साथ पूरी सप्तशती करना चाहते हैं वे कैसे करें, वे कहते हैं कि वे इस सत्र में पहले ही सब बता चुके हैं; और जो पूरा नहीं कर सकते, उनके लिए वे पहले ही महाविद्या क्रम दे चुके हैं।

एक श्रोता के यह पूछने पर कि जो रोज़ अधिक से अधिक अंग पूजन के साथ पूरी सप्तशती करना चाहते हैं, वे क्या और कैसे करें, वक्ता उत्तर देते हैं कि वे यह सब पहले ही बता चुके हैं। और वे कहते हैं कि जो पूरा नहीं कर सकते, उनके लिए वे पहले ही महाविद्या क्रम दे चुके हैं।

119

जब घर की मूर्ति अभिषेक के योग्य न हो, तो अभिषेक कैसे करें?

उनके सामने रखे फूल पर अभिषेक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:01:15–1:01:52 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि जब घर में माँ की मूर्ति अभिषेक के योग्य न हो तो प्रतीकात्मक रूप से अभिषेक कैसे करें, और साप्ताहिक या मासिक, वे कहते हैं कि आप उनके सामने एक फूल रखकर उस पर अभिषेक कर सकते हैं। इसे साप्ताहिक भी किया जा सकता है।

एक श्रोता पूछता है कि उसके घर में माँ की मूर्ति अभिषेक के योग्य नहीं है, तो प्रतीकात्मक रूप से अभिषेक कैसे किया जाए, और साप्ताहिक या मासिक। वक्ता उत्तर देते हैं कि आप उनके सामने एक फूल रखकर उस पर अभिषेक कर सकते हैं। आप इसे साप्ताहिक भी कर सकते हैं।

120

जब कोई संत बाकी सभी देवताओं को अपने इष्ट के चरणों की धूल कहे, तो इसे कैसे लें

भावावेश, कलियुग, और अपने इष्ट में आस्था

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:02:02–1:02:40

एक निजी संदेश में कहा गया कि जब कोई बड़े संत अपने पूजित देवता को सबसे बड़ा कहते हैं और बाकी सभी देव शक्तियों को उनके चरणों की धूल कहते हैं, तो दूसरी देवी शक्तियों की उपासना करने वालों का मनोबल टूटता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि संत भी भावावेश में बोल रहे हैं; वे भी कहीं न कहीं भगवती की माया के भीतर हैं, बाहर नहीं; यह कलियुग है और इतना हमें भी समझना चाहिए — और पूछते हैं: आपकी अपने इष्ट आराध्य में आस्था है न?

121

चंडी चरित्र क्या है और इसका पाठ कहाँ होता है?

पंजाब में सबसे अधिक पढ़ा जाता है, गुरु गोविंद सिंह द्वारा रचित कहा जाता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:02:41–1:03:20 · Also a question

चंडी चरित्र का पाठ कैसे होता है और इसकी महिमा के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि इसका सबसे अधिक पाठ विशेषकर पंजाब आदि क्षेत्र में होता है, और कहा जाता है कि इसकी रचना गुरु गोविंद सिंह जी ने की है।

122

रोज़ चंडी चरित्र के पाठ का वक्ता का अपना अनुभव

वीर भाव में भगवती की स्तुति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:03:21–1:04:00

वे कहते हैं कि वे भी पहले इसे बहुत करते थे; अब लगभग भूल गए हैं। लगभग दस-बारह साल पहले वे चंडी चरित्र का नित्य पाठ करते थे। पढ़ने में अच्छा लगता था; यह भगवती की स्तुति है और वीर भाव में है, और इसे करने में आनंद आता है।

123

क्या बीसा यंत्र स्वयं बनाना चाहिए?

इसे किसी साधक से बनवाएँ, स्वयं नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:04:16–1:04:47 · Also a question

बीसा यंत्र बनाने और उसके पूजा विधान के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि इसे किसी ऐसे व्यक्ति से बनवाएँ जो साधक हो। स्वयं बनाने से आपको उतना प्रभाव नहीं मिलेगा। जो सामान्य रूप से स्वयं किया जाता है, उसके बारे में केवल इतना कहा जा सकता है कि आप उसमें अपना मन लगा सकते हैं, बस इतना ही।

बीसा यंत्र बनाने और पूजा विधान आदि के बारे में पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: इसे किसी ऐसे व्यक्ति से बनवाएँ जो साधक हो। स्वयं बनाने से आपको उतना प्रभाव नहीं मिलेगा। जो सामान्य रूप से स्वयं किया जाता है, उसके बारे में केवल इतना कहा जा सकता है कि आप उसमें अपना मन लगा सकते हैं, बस इतना ही।

124

क्या हर पूजा में केवल सिंदूर ही चढ़ाना चाहिए, जैसा बंगाल में होता है?

वहाँ भी रोली, कुमकुम और अबीर चढ़ाए जाते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:04:48–1:05:25 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या सिंदूर, कुमकुम और रोली में अंतर है, क्योंकि बंगाल में हर पूजा में सिंदूर चढ़ता है, और जहाँ भी कोई पूजा हो वहाँ क्या चढ़ाना उचित है, वे कहते हैं कि वे बंगाल में काफ़ी समय रहे हैं और कभी नहीं देखा कि केवल सिंदूर चढ़ाया जाता हो — जब विश्वकर्मा भवन पूजा होती है, तो रोली और कुमकुम भी चढ़ते हैं, और अबीर भी चढ़ता है। ऐसा नहीं है।

125

यदि घर के मंदिर में हवन न हो सके, तो हवन कहाँ किया जा सकता है?

पूर्व या उत्तर दिशा, और भीड़-भाड़ वाली जगह से बचें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:05:47–1:06:20 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि यदि किसी कारण घर के मंदिर में हवन न हो सके तो किस कमरे और किस दिशा में किया जा सकता है, वे कहते हैं पूर्व कोने में करें, पूर्व से जुड़ी दिशा में, या उत्तर से जुड़ी दिशा में। ड्रॉइंग रूम हो तो वहाँ करें; छत पर करें; बाहर आँगन हो तो वहाँ करें। केवल बहुत तंग जगह में न करें — तंग जगह में करने से परेशानी होगी, यदि लंबा हवन करना हो।

126

यदि विग्रह ऊँचाई पर रखा हो, तो क्या आरंभिक पूजन खड़े होकर किया जा सकता है?

खड़े या बैठकर, और नवरात्र में उन्हें पीढ़े पर नीचे लाना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:06:30–1:06:52 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि पूजा कक्ष में माँ का विग्रह ऊँचाई पर रखा है, तो क्या गुरु, गणेश और कुलदेवी का पूरा आरंभिक पूजन खड़े होकर किया जा सकता है, वे कहते हैं हाँ, किया जा सकता है; बैठकर भी करें। यदि ऐसी स्थिति संभव न हो, तो नीचे भी किया जा सकता है। नवरात्र आदि के समय उन्हें किसी पीढ़े या बाजोट पर स्थान दें, और बाद में फिर ऊपर रख दें।

127

यदि 32 नामावली साधना से धारण किए धागे पर सूतक लग जाए तो?

धागा बदलकर फिर बनाएँ, या बस फिर से पाठ करें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:07:42–1:08:12 · Also a question

जिन्होंने पहले भगवती की 32 नामावली आदि की साधना की है: यदि कोई सूतक या पातक लग गया हो, तो धागा बदलकर फिर से बनाएँ। या फिर आप दोबारा पाठ कर सकते हैं; उस पर समर्पण करने की आवश्यकता नहीं। एक बार शरीर पर धारण हो जाए, तो जब हम जप करेंगे उसकी ऊर्जा अपने आप हमें मिलती रहेगी; उस पर अलग से समर्पण करवाने की आवश्यकता नहीं।

128

महाभैरव मंत्र जप में माला के साथ कैसे व्यवहार किया जाता है?

उतारकर जप में प्रयोग, फिर से धारण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:08:13–1:08:36 · Also a question

वे कहते हैं कि जैसी माला हम महाभैरव मंत्र के जप में प्रयोग करते हैं, उसकी प्रक्रिया अलग है: उसमें उसे उतारकर जप करना चाहिए, और फिर धारण करना चाहिए। काल सर्प दोष या अमावस्या पर जन्म के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि भगवान शिव जी की थोड़ी सेवा करनी चाहिए; और यदि आप माँ का श्रृंगार नहीं कर सकते, तो मंदिर में करवाएँ।

129

दुर्गा उपासना किसी बिगड़ी हुई साधना के दोष से कैसे मुक्त करती है?

आज का पूरा सत्र इसी का उत्तर था

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:08:37–1:09:07 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि जब किसी साधना के दोष का प्रभाव हो, या किसी मंत्र जप का पूरी तरह उल्टा प्रभाव मिल रहा हो, तो माँ दुर्गा की उपासना से पूरी मुक्ति कैसे मिल सकती है, वे कहते हैं कि आज उन्होंने इस विषय पर पूरे विस्तार से चर्चा की है — कि मुक्ति कैसे मिल सकती है, एक-एक बात बताते हुए, एक-एक मंत्र लेकर।

130

मांत्रिक मसान शक्तियों को क्यों जगाते हैं, और भय उन्हें व्यक्ति पर हावी क्यों होने देता है?

जहाँ तंत्र है वहाँ मसान आवश्यक-सा लगता है, और भय उन्हें प्रवेश देता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:10:26–1:11:00 · Also a question

जो मांत्रिक और तांत्रिक लोग मसानी और क्षुद्र क्रिया करते हैं, वे इन्हीं शक्तियों को जगाते हैं और जगाकर फिर लोगों को इस प्रकार परेशान करते हैं। वे कहते हैं कि यह आम बात है: आज जहाँ भी तंत्र है, चाहे बड़ा तंत्र हो या छोटा तंत्र, मसान हर जगह आवश्यक-सा हो गया लगता है। और आप मानसिक रूप से स्वयं को जितना कमज़ोर मानते हैं, जो भय आपको घेरता है — उसी भय के कारण ये चीज़ें शरीर पर हावी होती हैं।

131

अपनी देव शक्तियों पर संदेह करने से मसान शक्तियाँ कैसे पकड़ बना लेती हैं?

आभा कमज़ोर होती है और मन मलिन होता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:11:01–1:11:26 · Also a question

वे कहते हैं कि जहाँ हम अपनी देव शक्तियों को कमज़ोर मानने लगते हैं, वहाँ — वे लोग थोड़ा-सा भी भेजें तो — ये शक्तियाँ तुरंत हावी हो जाती हैं। जिस क्षण हमारा मन कमज़ोर होता है, वे हमारे मन पर सवार हो जाएँगी। ठीक वहीं परेशानी होती है: आभा कमज़ोर होने लगती है, मन मलिन होने लगता है, और ये तुरंत शरीर पर खेलने लगती हैं।

132

कवच या हनुमान चालीसा वीर भाव में क्यों पढ़नी चाहिए?

आत्मबल मज़बूत होता है और ये शक्तियाँ डर जाती हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:11:27–1:12:00 · Also a question

क्योंकि धीरे-धीरे पढ़ने से उतना प्रभाव नहीं होगा, पर यदि आप उग्र भाव में, वीर भाव में करें, तो भीतर से आत्मबल मज़बूत होता है, और फिर ये शक्तियाँ डरकर पीछे हट जाती हैं। पर यह आप तभी समझेंगे जब इसे स्वीकार करेंगे। वे कहते हैं कि यदि आप अच्छे से, वीर भाव में हनुमान चालीसा करने लगें, तो किसी भी नकारात्मक शक्ति की आप पर सवार होने की हैसियत नहीं रहती।

133

वाल्मीकि तंत्र की काट क्या है, और क्या सावधानियाँ हैं?

भगतवाल का कोई साधक, या समर्पण के साथ उग्रतम विधान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:12:50–1:13:21 · Also a question

वाल्मीकि तंत्र की काट और सावधानियों के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि या तो काट उन्हीं से करवाएँ जो वाल्मीकि के, भगतवाल के साधक हैं — केवल उन्हीं से करवाएँ; या फिर समर्पण के साथ बिल्कुल उग्रतम विधान करें, तब होगा। वे कहते हैं कि भगतवाल में सारा काम भोग देना, अक्षत देना, अक्षत और भोग पर चढ़ाना, मिठाई पर चढ़ाना, किसी मीठी चीज़ पर चढ़ाना, बलि पर चढ़ाना है — और उसका उतारा भी उसी प्रकार।

134

क्या एक मज़बूत साधक वाल्मीकि तंत्र के प्रयोग से अवश्य हार जाता है?

भय ही व्यक्ति को बर्बाद करने वाली चीज़

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:13:22–1:14:00 · Also a question

वे कहते हैं कि सामान्यतः यदि आप प्रबल साधक हैं, यदि आप उग्रतम ढंग से साधना कर रहे हैं, तो ऐसा नहीं कि यह आप पर यूँ ही हावी हो जाएगा और कटेगा नहीं। ऐसा भी नहीं है। पर इन सब चीज़ों का प्रचार-प्रसार इतना बढ़ गया है कि कुछ चीज़ों को लेकर ऐसी मानसिक स्थिति बन गई है कि सामने वाला केवल भय से ही बर्बाद हो जाता है।

135

नवरात्रि में संपुट के साथ सप्तश्लोकी कितनी करनी चाहिए?

संख्या बढ़ाएँ — कम से कम नौ, या 21 या 27

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:14:01–1:14:30 · Also a question

एक श्रोता, जो उनके बताने के बाद से संपुट के साथ सप्तश्लोकी करती है, पूछती है कि क्या अब पाठ के समय संपुट रखे या नवरात्रि के बाद करे। वे उत्तर देते हैं, नवरात्रि में करें, सारा संपुट करें, और अधिक मात्रा में: यदि सामान्य दिनों में एक बार, तीन बार, पाँच बार कर रहे थे, तो अब कम से कम नौ बार करें; समय मिले और अभ्यास हो, तो 21 या 27 बार करें; और एक बैठक में न कर सकें, तो सुबह-शाम दोनों समय करें।

136

क्या माँ काली को "मम्मी" कहने में कोई दोष है?

इसमें कोई दोष नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:14:31–1:14:50 · Also a question

एक श्रोता, जो बार-बार माँ काली को "मम्मी" कहता है, के पूछने पर वे कहते हैं कि दोष क्यों लगेगा — इसमें कोई दोष नहीं है।

एक श्रोता कहता है कि वह बार-बार माँ काली को मम्मी कहता है। वक्ता उत्तर देते हैं, इसके लिए दोष क्यों लगेगा। इसमें बिल्कुल भी दोष नहीं है।

137

बलि के लिए नींबू माँगते लड़के के स्वप्न का क्या अर्थ है?

जिस पूजा में बलि चाहिए, वह बिना बलि के हो रही है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:14:51–1:15:30 · Also a question

एक श्रोता ने स्वप्न देखा कि 17-18 साल का एक लड़का, जो घर के पूजा कक्ष में ही था, बलि के लिए नींबू माँग रहा था; न मिलने पर उसने गुस्से में आँवला उठाकर "जय माँ कामाख्या, जय बगला" कहते हुए उसके मुँह में डाल दिया, और वह उसके गले में अटक गया। वे इसे बहुत खतरनाक स्वप्न कहते हैं, और इसका अर्थ यह बताते हैं कि या तो यह बात उसे पहले से सांकेतिक रूप में दिखाई गई, या वह कोई ऐसी पूजा या अनुष्ठान कर रही है जिसमें बलि आवश्यक है, अनिवार्य है, और वह नहीं दे रही — तो कोई गुस्से में देता है।

138

क्या लड़कियों को बलि देने की अनुमति है?

सामान्यतः वर्जित, कुलदेवी के स्वरूप पर निर्भर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:15:31–1:16:04 · Also a question

वे कहते हैं कि बलि आदि की प्रक्रिया उसे करनी चाहिए। पर लड़कियों के लिए सामान्यतः बलि वर्जित है — यह कुलदेवी और कुलदेवता के स्वरूप पर निर्भर है। इसलिए यदि आपका कोई भाई है, या घर का कोई और पुरुष, तो आप उनके द्वारा भी करवा सकती हैं।

वक्ता कहते हैं कि पर आपको बलि आदि की प्रक्रिया करनी चाहिए। पर लड़कियों के लिए सामान्यतः बलि वर्जित है; यह कुलदेवी और कुलदेवता के स्वरूप पर निर्भर है। इसलिए यदि आपका कोई भाई है, या घर का कोई और पुरुष, तो आप उनके द्वारा भी करवा सकती हैं।

139

पच्चीस लाख पंचाक्षरी जप और ब्राह्मणत्व के बारे में शिव महापुराण क्या कहता है?

ब्राह्मणत्व, और यज्ञोपवीत का प्रश्न

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:16:05–1:16:38 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या शूद्र यज्ञोपवीत पहन सकता है, और क्या तब भी उसे शिव महापुराण के अनुसार 25 लाख पंचाक्षरी करनी होगी ताकि बाद में ब्राह्मण बने, वे कहते हैं कि शिव महापुराण में पुराण के कथन के अनुसार यह है: कि जब आप 25 लाख का जप पूरा करते हैं, तो आपको ब्राह्मणत्व प्राप्त होता है — और ब्राह्मणत्व प्राप्त होने का अर्थ क्या है, यह भी समझना चाहिए। यज्ञोपवीत पहनने के बारे में, उन्हें नहीं लगता कि कहीं कहा गया है कि उसे पहनना चाहिए।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 17.127–128

A Śūdra who repeats the five-syllable mantra ending in namaḥ two and a half million times becomes a Brahmin by the mantra.

The verses say nothing about the sacred thread, which matches the speaker's answer.

मूल पाठ पढ़ें →
127

पुनश्च पञ्चलक्षेण मन्त्रब्राह्मण उच्यते। शूद्रश्चैव नमोऽन्तेन पञ्चविंशतिलक्षतः॥ १२७

फिर पाँच लाख जपसे वह मन्त्र-ब्राह्मण कहलाता है। शूद्र भी 'नमः'से अन्त होनेवाले मन्त्रका पचीस लाख जप करके,

128

मन्त्रविप्रत्वमापद्य पश्चाच्छुद्धो भवेद् द्विजः। नारी वाथ नरो वाथ ब्राह्मणो वान्य एव वा॥ १२८

मन्त्र-ब्राह्मण बन जाता है, और फिर शुद्ध होकर द्विज हो जाता है। स्त्री हो या पुरुष, ब्राह्मण हो या कोई और,

140

जिसके पास अधिकार नहीं है, वह पंचाक्षरी मंत्र कैसे करे?

चतुर्थी विभक्ति के साथ, नमः बाद में रखकर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:16:39–1:17:10 · Also a question

यदि आपके पास इसका अधिकार नहीं है, तो उसे पहने बिना ही जो भी अधिकार है उसके अनुसार पंचाक्षरी करें — चतुर्थी विभक्ति लगाकर, यानी "नमः" बाद में रखकर, और उसी अनुसार इतना करें। वे कहते हैं कि आगे का मार्गदर्शन उसे ईश्वर की कृपा से स्वयं मिल सकता है; यह आवश्यक भी नहीं है। हम इसी स्थान पर रहकर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध कर सकते हैं, और जो हमें मिलना चाहिए वह मिलेगा।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 17.129

Anyone, man or woman, may repeat the five syllables with namaḥ at the end or at the start, and the teacher shows women the order.

17.33 gives the form: Śiva's name in the dative with namaḥ.

मूल पाठ पढ़ें →
129

नमोऽन्तं वा नमः पूर्वमातुरः सर्वदा जपेत्। तत्र स्त्रीणां तथैवोह्य गुरुर्निर्देशयेत्क्रमात्॥ १२९

जिसे आवश्यकता हो, वह 'नमः' अन्तमें या 'नमः' आरम्भमें लगाकर सदा जप करे। स्त्रियोंके लिये भी गुरु इसी प्रकार सोचकर क्रमसे मार्ग बताये।

141

108 चंडी पाठ का अनुष्ठान कैसे व्यवस्थित करना चाहिए?

महाविद्या या समाधि क्रम, अष्टमी से चतुर्दशी, बलि के साथ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:17:11–1:17:45 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या 108 चंडी पाठ का अनुष्ठान महाविद्या क्रम से करना चाहिए और कब से कब तक, वे कहते हैं: यदि आप समाधि क्रम से चंडी पाठ अनुष्ठान करना चाहते हैं तो कर सकते हैं; इसे अष्टमी से चतुर्दशी तक पूरा करें। और जब भी सौ पाठ पूरे हों, या चाहें तो, यदि महीने में केवल एक बार कर रहे हैं, तो अंतिम दिन, चतुर्दशी को बलि की प्रक्रिया करें। यदि कोई तिथि क्षय हो, तो उसी अनुसार पाठ बढ़ा दें।

142

जिसे बीज मंत्र दिया गया है पर दीक्षा नहीं है, उसे क्या करना चाहिए?

उसकी जगह जयंती मंगला मंत्र करें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:17:46–1:18:20 · Also a question

माँ जय दुर्गा के लिए दिए गए बीज मंत्र का कितना जप करें, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं कि यदि अभी दीक्षा नहीं हुई है, तो बीज मंत्र का जप न करें — जयंती मंगला मंत्र करें। यदि दीक्षा हुई है, तो किया जा सकता है। महालक्ष्मी अष्टक के बारे में वे कहते हैं कि रोज़ 108 पाठ स्वतंत्र रूप से करें, नवरात्रि में 1100 पाठ पूरे करते हुए।

143

महालक्ष्मी अष्टक को सिद्ध कैसे किया जाता है?

शहद में डुबोई खीर या किशमिश से पौष्टिक हवन, हर मंत्र पर ग्यारह आहुतियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:18:21–1:18:35 · Also a question

फिर पौष्टिक बनाने वाला हवन, जो विशेषकर लक्ष्मी जी के लिए होता है, खीर से, या मधु में डुबोई काली किशमिश या सामान्य किशमिश से भी — उससे आहुति देते हुए, अष्टक के हर एक मंत्र से ग्यारह आहुतियाँ, और इस प्रकार इसे सिद्ध करना। फिर इसके रोज़ आठ पाठ शुरू करें।

वक्ता कहते हैं कि और फिर पौष्टिक बनाने वाला हवन जो विशेषकर लक्ष्मी जी के लिए किया जाता है: खीर से, या फिर मधु में डुबोई काली किशमिश से, या सामान्य किशमिश से भी। उससे आहुति देते हुए, अष्टक के हर एक मंत्र से ग्यारह आहुतियाँ, इसे सिद्ध करें। फिर इसके रोज़ आठ पाठ शुरू करें।

144

क्या नवरात्रि में सूर्यास्त के बाद हवन किया जा सकता है?

तंत्रोक्त हवन किसी भी समय, रात में भी किया जा सकता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:18:36–1:19:10 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या नवरात्रि में सूर्यास्त के बाद हवन हो सकता है और उसका समय क्या हो, वे कहते हैं कि उनके अनुसार नवरात्रि में तंत्रोक्त हवन किसी भी समय किया जा सकता है। यह वैदिक विधि नहीं, तंत्रोक्त है, इसलिए रात में भी किया जा सकता है। शक्ति पीठ पर तो समय देखा ही नहीं जाता, और नवरात्रि में जब करना हो तब करें। वैदिक लोग बहुत-से नियम और निषेध बताते हैं, पर शक्ति पीठ पर कोई निषेध नहीं; यदि बहुत इच्छा हो, तो चौघड़िया देख लें।

146

अर्गला मंत्र "देहि सौभाग्यमारोग्यं" के कितने पाठ करने चाहिए?

जितने चाहें, स्वतंत्र रूप से

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:20:35–1:20:46 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि "देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्" मंत्र का कितना पाठ करना चाहिए, वे कहते हैं कि आप जितना चाहें उतना इसका स्वतंत्र रूप से अनुष्ठान कर सकते हैं।

यह पूछे जाने पर कि देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् मंत्र का कितना पाठ करना चाहिए — वक्ता उत्तर देते हैं कि आप जितना चाहें उतना, स्वतंत्र रूप से अनुष्ठान कर सकते हैं।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 2.12

देहि सौभाग्यमारोग्यं asks the Goddess for good fortune, health and the highest happiness.

The text sets no count; the open-ended anuṣṭhāna is the speaker's advice.

मूल पाठ पढ़ें →
12

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १२ ॥

मुझे सौभाग्य और आरोग्य दो, परम सुख दो। रूप दो, जय दो, यश दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो।

यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।

147

रोली, कुमकुम और सिंदूर में क्या अंतर है?

दो प्रकार का कुमकुम, और चूना-हल्दी वाली रोली

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:20:47–1:21:43 · Also a question

कुमकुम भी दो प्रकार का होता है। दक्षिण के लोग जो कुमकुम लगाते हैं वह अलग है — वह पतला होता है। रोली थोड़ी गाढ़ी होती है; उसमें चूने और हल्दी का अनुपात होता है। कुमकुम कुछ कत्थई रंग का होता है; वह अलग चीज़ है। और हनुमान जी का वह नारंगी सिंदूर जिसे लोग कुमकुम कहते हैं — उसे कुमकुम कैसे कहा जा सकता है, वह सिंदूर है।

148

पारद या नर्मदेश्वर शिवलिंग पर क्या लगाया जा सकता है?

भस्म, अष्टगंध और कुमकुम — पर सिंदूर कभी नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:21:44–1:22:14 · Also a question

लाल सिंदूर तो सिंदूर ही है। लिखे हुए "कुमकुम चंदन लेपित लिंगम्" के बारे में वे कहते हैं कि उन्होंने शिवरात्रि के समय पहले बताया है: यदि पारे का शिवलिंग हो, पारद शिवलिंग, तो उसमें सिंदूर आदि का लेपन नहीं करेंगे। यदि नर्मदेश्वर हो, तो उसमें भस्म, अष्टगंध और उसके ऊपर कुमकुम का लेपन कर सकते हैं। सिंदूर का लेपन नहीं करना है — नारंगी सिंदूर नहीं लगाना है। सिंदूर अरघी पर लगाया जाता है, जिसे पार्वती जी का स्वरूप माना जाता है; शिवलिंग पर नहीं लगाया जाता।

149

किन देवताओं को सिंदूर चढ़ता है?

गणपति, हनुमान और सिंदूरी भैरव मूर्तियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:22:15–1:22:50 · Also a question

गणपति जी को लाल सिंदूर चढ़ता है; उनका तिलक लाल सिंदूर से होता है, और रोली-कुमकुम से भी। हनुमान जी को नारंगी सिंदूर से, और उनके पूरे शरीर पर उसका लेपन होता है। भैरव जी की भी — बटुक भैरव जी और काल भैरव जी की — सिंदूरी मूर्तियों पर सिंदूर चढ़ता है। विष्णु जी को रोली और अक्षत, रोली का तिलक।

150

किन देवताओं को कभी सिंदूर नहीं चढ़ाना चाहिए?

इंद्र, वरुण, यम और कुबेर को केवल रोली का तिलक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:22:51–1:23:20 · Also a question

सभी देवगण — इंद्र, वरुण, यम, कुबेर — इन सबका तिलक रोली से होता है। उन्हें सिंदूर नहीं चढ़ता। वे इसे स्वयं देवराज इंद्र की बात के रूप में रखते हैं: तुम मुझे भी सिंदूर चढ़ा रहे हो; लो भाई, तुमने मुझे सिंदूर चढ़ा दिया, मैं सिंदूर का क्या करूँ। उन्हें नहीं चढ़ाना है।

151

पूरी सप्तशती के पाठ का क्रम क्या है?

पहले शाप विमोचन, फिर छह अंग; स्त्रियाँ केवल विनियोग करें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:23:21–1:23:50 · Also a question

पूरी सप्तशती के पाठ के लिए सप्तशती के छह अंग हैं — कवच, अर्गला, कीलक। आरंभ में आप शाप विमोचन आदि की प्रक्रिया करेंगे, फिर कवच, अर्गला, कीलक करेंगे। उसके बाद यदि आप स्त्री हैं तो केवल सप्तशती का विनियोग करेंगी और न्यास नहीं करेंगी। न्यास तभी करना है जब संतान मिल गई हो और वह तेरह वर्ष से अधिक की हो, या जब आपकी रजोनिवृत्ति — मेनोपॉज़ — स्थायी रूप से हो गई हो।

152

पूरी सप्तशती के पाठ में तेरह अध्यायों से पहले क्या आता है?

नवार्ण जप की एक माला, फिर न्यास और विनियोग

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:23:51–1:24:20 · Also a question

उससे पहले नवार्ण जप की एक माला। उसमें भी यही नियम लागू होगा। फिर न्यास, और सप्तशती विनियोग, और उसके बाद तेरह अध्यायों का पाठ, ठीक वैसे ही जैसे दिया गया है।

वक्ता कहते हैं कि उसके बाद — उससे पहले — नवार्ण मंत्र जप की एक माला। उसमें भी यही विधि लागू होगी। फिर न्यास, और सप्तशती विनियोग, और उसके बाद तेरह अध्यायों का पाठ, ठीक उसी प्रकार जैसे दिया गया है।

153

क्या वैष्णो देवी और भगवती दुर्गा अलग हैं?

एक ही शक्ति, और यह भ्रम कहाँ दूर होता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:24:21–1:25:05 · Also a question

एक श्रोता इस बात से भ्रमित है कि वैष्णो देवी और माँ दुर्गा दोनों सिंह पर हैं; वे कहते हैं कि कल उन्होंने इसका उत्तर दिया था: दोनों एक ही हैं, और इसकी कोई चिंता नहीं करनी चाहिए। वे उद्धृत करते हैं: "एकैव शक्तिः परमेश्वरस्य भिन्ना चतुर्धा व्यवहारकाले, पुरुषेषु विष्णुर्भोगेषु भवानी समरे च दुर्गा प्रलये च काली।" इतना भेद नहीं करना है। सप्तशती पढ़िए — सातवाँ और आठवाँ अध्याय — और यह सारा भ्रम दूर हो जाएगा; सातवाँ, आठवाँ, नौवाँ और दसवाँ अध्याय हिंदी में अच्छे से पढ़िए।

154

वर्क फ्रॉम होम नौकरी पाने के लिए सप्तशती का कौन-सा संपुट बताया गया है?

एक ही संकल्प के साथ "यं यं चिन्तयते कामं"

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:25:06–1:25:50 · Also a question

वर्क फ्रॉम होम नौकरी पाने के लिए क्या उपाय करें, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं: जो भी इच्छा हो, इस बार "यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्" मंत्र से संपुट करके सप्तशती करें, रात में; और संकल्प में केवल एक ही इच्छा रखें, वर्क फ्रॉम होम वाली। अंतिम दिन संपुट मंत्र के अलावा एक स्वाहा आहुति, और सप्तशती में या तो तंत्रोक्त देवी सूक्त की आहुति या ग्यारहवें अध्याय की आहुति, घी और खीर मिलाकर।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 1.44

The kavaca's fruit-verse says whatever wish one thinks of, one surely obtains.

Using यं यं चिन्तयते कामं as a samput for a particular wish is the speaker's practice.

मूल पाठ पढ़ें →
44

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः । यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् । परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ॥ ४४ ॥

वहाँ-वहाँ उसे धन मिलता है और ऐसी विजय मिलती है जो सब कामनाएँ पूरी करती है। वह जिस-जिस कामना को सोचता है, उसे निश्चय ही पाता है। वह मनुष्य पृथ्वी पर अतुलनीय ऐश्वर्य पाता है।

यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।

155

क्या शिव सहस्रनाम सुनने में कोई समस्या है?

इसे सुनने में कोई कठिनाई नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:25:51–1:26:16 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या शिव सहस्रनाम सुना जा सकता है, वे कहते हैं कि बिल्कुल कोई कठिनाई नहीं — यदि कोई शिव सहस्रनाम सुने, तो वह अच्छा ही है।

यह पूछे जाने पर कि क्या शिव सहस्रनाम सुना जा सकता है और क्या इसमें कोई कठिनाई है, वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल कोई परेशानी नहीं है। यदि कोई शिव सहस्रनाम सुने, तो वह अच्छी बात ही है।

156

घर में दस महाविद्याओं की तस्वीरें रखना क्यों वर्जित है?

छिन्नमस्तिका, खप्पर वाली तारा, और धूमावती एक साथ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:26:17–1:26:55 · Also a question

एक श्रोता कहता है कि घर में माँ कालिका के साथ दस महाविद्याओं की तस्वीर है। यदि दस महाविद्याएँ अलग-अलग हैं — छिन्नमस्तिका माँ, खप्पर वाली तारा माँ, और फिर भगवती धूमावती — तो वे कहते हैं कि ठीक इसी कारण दस महाविद्याओं की तस्वीर रखना वर्जित किया गया है।

एक श्रोता लिखता है कि घर में माँ कालिका के साथ दस महाविद्याओं की तस्वीर है। यदि दस महाविद्या की तस्वीरें अलग-अलग हैं — छिन्नमस्तिका माँ, खप्पर लिए तारा माँ, और फिर भगवती धूमावती — तो ठीक इसी कारण दस महाविद्याओं की तस्वीर रखना वर्जित किया गया है।

157

दुकानों और दफ़्तरों में सोने की परत वाले यंत्रों के संग्रह बर्बादी क्यों बुलाते हैं और उनका विसर्जन क्यों करना चाहिए

ये बर्बादी का निमंत्रण हैं, और इनका विसर्जन करना चाहिए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:26:56–1:27:30

वे याद करते हैं कि उन्होंने किसी को एक परेशान व्यक्ति को सलाह देते देखा कि गायत्री यंत्र, महामृत्युंजय यंत्र, दस महाविद्या यंत्र, हनुमान जी का यंत्र, दुर्गा सप्तशती यंत्र रखो — उस आदमी को दुनिया का हर यंत्र भर दिया। और 24 कैरेट सोने की परत वाले यंत्र का फ़ैशन है, हरा, नीला, पीला, जिसमें हर प्रकार का यंत्र है: सप्तशती, दस महाविद्या, बगलामुखी, नवग्रह, कार्य सिद्धि, वशीकरण। लोग चार-पाँच फ्रेम करवाकर दुकानों, व्यापार स्थलों और दफ़्तरों में लगाते हैं। वे कहते हैं, यदि आप ऐसे काम करते हैं, तो आप अपनी ही बर्बादी टाँग रहे हैं — चुपचाप इन सब चीज़ों का विसर्जन कर दीजिए।

158

अपने इष्ट के यंत्र से ठीक प्रकार से शुरुआत कैसे करनी चाहिए?

आवरण पूजन सीखने से पहले एक साल अर्चन और अभिषेक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:27:31–1:27:59 · Also a question

अपने इष्ट आराध्य से जुड़ा एक यंत्र पूजा स्थान पर रखें और उसे विधिपूर्वक सीखें। सबसे पहले छह महीने से एक साल तक, आवरण से पहले, केवल उनका अर्चन और पूजन करें — केवल शतनाम और सहस्रनाम से उनका अर्चन, और अभिषेक: दुग्धाभिषेक हो, पंचामृत अभिषेक हो, अर्चन हो। एक साल इतना करें, और फिर उसका आवरण पूजन सीखें।

159

क्या तंत्र कारीगरी या यंत्र बनाने का विषय है?

तंत्र में कोई कारीगरी नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:28:00–1:28:21 · Also a question

वे कहते हैं कि यह चित्र बनाने वाली कारीगरी मत कीजिए। तंत्र में कोई कारीगरी नहीं है; कोई चित्रकारी नहीं है।

वक्ता कहते हैं कि यह चित्र बनाने वाली कारीगरी मत कीजिए। तंत्र में कोई कारीगरी नहीं है; कोई चित्रकारी नहीं है।

160

प्रत्यंगिरा मंदिर में रक्षा मंत्रों की आहुति क्यों दी जाती है?

सामान्य आहुति और अस्त्र मंत्रों के लिए आवाहित अग्नि का रूप

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:28:22–1:29:00 · Also a question

एक श्रोता बताता है कि प्रत्यंगिरा मंदिर में दुर्गा और सरस्वती के रक्षा मंत्रों की आहुति दी जाती है। वे कहते हैं कि मंदिर की बात अलग है, और यह निर्भर करता है: एक बात यह है कि हम हाथ जोड़कर भगवती से कुछ माँगते हैं; दूसरी यह कि हम ज़बरदस्ती किसी को परेशान करते हैं। आहुतियाँ क्या हैं — अग्नि देवता वे माने गए हैं जिनमें भगवती स्वाहा के रूप में विराजमान हैं; और जिस प्रकार की अग्नि उसमें आवाहित होती है, वे अग्नि देवता सात वर्ष के बालक के रूप में माने गए हैं। जहाँ हम अस्त्र मंत्र देते हैं, वहाँ अग्नि देवता का रूप अलग होगा।

161

यदि मंदिर में नहीं, तो अस्त्र मंत्रों की अधिक उग्र आहुतियाँ कहाँ दी जाती हैं?

नदी तट, समुद्र तट और पर्वतीय क्षेत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:29:01–1:29:35 · Also a question

वे कहते हैं कि सप्ताग्नि — कौन-सी अग्नि कहाँ और कैसे — पर कभी विस्तार से चर्चा होगी, और यह कि अस्त्र मंत्र की आहुति देनी हो तो कौन-सी अग्नि आवाहित होगी। नहीं तो, यदि आप सात वर्ष के बालक के मुँह में त्रिशूल, गदा, तोमर जैसी भयानक चीज़ें डालें, तो दोष अवश्य लगेगा। ऐसा उग्र रूप मंदिर में उपस्थित नहीं होने वाला; वे चीज़ें नदी तटों, समुद्र तटों और पर्वतीय क्षेत्रों में होती हैं।

162

क्या नवरात्रि में मर्कट हनुमान कवच और सरस्वती साधना दोनों किए जा सकते हैं?

दोनों किए जा सकते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:30:05–1:30:16 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या नवरात्रि में मर्कट हनुमान जी कवच और सरस्वती दोनों किए जा सकते हैं, वे कहते हैं बिल्कुल, किए जा सकते हैं।

एक श्रोता पूछता है कि क्या नवरात्रि में मर्कट हनुमान जी कवच और सरस्वती दोनों किए जा सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं, बिल्कुल किए जा सकते हैं।

163

बारहवीं कक्षा के बाद पढ़ाई की दिशा कैसे चुननी चाहिए?

रुचि के अनुसार चलें, और कुंडली का विश्लेषण करवाएँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:30:17–1:30:50 · Also a question

जिस क्षेत्र में आपकी रुचि बहुत अधिक है उससे जुड़ी बातें देखें; कुंडली का विश्लेषण करवाएँ, कि वह क्या लाभ करती है, आपकी रुचि कहाँ है, आपका मन किसमें जाने को बहुत लगा है — और फिर उसे चुनें।

164

रुद्रयामल तंत्र सप्तशती के हर चरित्र के पाठ के समय के बारे में क्या कहता है?

शुभ कार्य के लिए मध्यम चरित्र, शाम को प्रथम और उत्तम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:31:08–1:31:50 · Also a question

एक श्रोता बताता है कि रुद्रयामल तंत्र में कहा गया है कि मध्यम चरित्र शुभ कार्य के लिए है, और प्रथम और उत्तम चरित्र शाम को करने चाहिए, जैसा त्रिपाठी जी की हिंदी टीका में कहा गया है। वे उत्तर देते हैं: करें, आप कर सकते हैं — यदि आप इसे एक ही दिन में पूरा कर रहे हैं, तो कर सकते हैं।

एक श्रोता कहता है कि रुद्रयामल तंत्र में कहा गया है कि मध्यम चरित्र शुभ कार्य के लिए है, और प्रथम और उत्तम चरित्र शाम को करने चाहिए, जैसा त्रिपाठी जी की हिंदी टीका में कहा गया है। वक्ता उत्तर देते हैं, करें, आप कर सकते हैं। यदि आप इसे एक ही दिन में पूरा कर रहे हैं, तो कर सकते हैं।

165

नवरात्रि की नवमी और दशमी को क्या करना चाहिए?

नवमी को हवन और कन्या भोजन; दशमी को शमी और अपराजिता पूजन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:32:37–1:33:10 · Also a question

अष्टमी तक हमने पूरा पाठ और जप, जो भी करना था, पूरा कर लिया। नवमी को हम हवन और कन्या भोजन आदि करवाते हैं। और दशमी तिथि को सुबह शमी जी का पूजन और अपराजिता पूजन। यदि उस दिन पाठ करना चाहें, तो कवच का पाठ करें, तंत्रोक्त देवी सूक्त का पाठ करें, सहस्रनाम आदि का पाठ करें, और उसके बाद आयुध पूजन।

166

राम नवमी पर आयुध पूजन कब किया जाता है?

राम नवमी पर शस्त्र पूजन और उसका समय

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:33:11–1:33:40 · Also a question

राम नवमी होने के कारण शस्त्र पूजन अवश्य होगा। आयुध पूजन की विधि उन्होंने चैनल पर सामान्य रूप से दी है। यह पारण से पहले, राम नवमी के दोपहर को किया जाता है; दशमी की सुबह भी किया जा सकता है, पर राम नवमी होने के कारण आयुध पूजन राम नवमी को दोपहर में करना चाहिए — कन्या पूजन आदि के बाद, दोपहर लगभग दो-तीन बजे।

167

दशमी को आयुध पूजन के बाद क्या होता है?

गृह बंधन और फिर विसर्जन विधि

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:33:41–1:34:20 · Also a question

यह पारण से पहले किया जाता है; दशमी को भी सुबह किया जा सकता है, पर राम नवमी होने के कारण राम नवमी को दोपहर में करना चाहिए। जब कन्या पूजन आदि हो जाए, तो शाम को, लगभग दो-तीन बजे करें। और दशमी को यह विधि करने के बाद, यदि घर का बंधन करना हो तो हम गृह बंधन करेंगे, और उसके बाद विसर्जन विधि आदि करके विसर्जन करेंगे।

168

भगवती ब्रह्माणी की नवदुर्गा योगिनी साधना कैसे करनी चाहिए?

रोज़ सत्ताईस माला, अंतिम दिन हवन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:35:51–1:36:18 · Also a question

नवरात्रि में नवदुर्गा योगिनी साधना में भगवती ब्रह्माणी के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि उनकी साधना से जुड़े मंत्र बताए गए हैं; उस मंत्र का अनुष्ठान करें, हर दिन कम से कम 27 माला जप करते हुए, और अंतिम दिन हवन आदि की प्रक्रिया पूरी करें।

वक्ता कहते हैं कि नवरात्रि में भगवती ब्रह्माणी के लिए, नवदुर्गा योगिनी साधना में भगवती ब्रह्माणी की साधना से जुड़े मंत्र आदि बताए गए हैं। उस मंत्र का अनुष्ठान करें। हर दिन कम से कम 27 माला जप करते हुए, अंतिम दिन हवन आदि की प्रक्रिया पूरी करें।

169

क्या रोज़ घर से निकलने से पहले सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करना ठीक है?

स्वीकृति, और माँ के रूप में नर्मदेश्वर अरघी का अभिषेक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:36:19–1:36:48 · Also a question

एक श्रोता कहती है कि वह रोज़ माँ सिद्ध कुंजिका स्तोत्र किए बिना घर से नहीं निकलती। वे कहते हैं, करें। यह पूछे जाने पर कि क्या नर्मदेश्वर शिवलिंग की अरघी का माँ के रूप में अभिषेक किया जा सकता है, वे कहते हैं बिल्कुल, किया जा सकता है।

एक श्रोता लिखती है कि वह रोज़ माँ सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् किए बिना घर से बाहर कदम नहीं रखती। वक्ता उत्तर देते हैं, करें। यह पूछे जाने पर कि क्या नर्मदेश्वर शिवलिंगम् शिवलिंग की अरघी का माँ के रूप में अभिषेक किया जा सकता है, वे कहते हैं बिल्कुल, किया जा सकता है।

170

जिसकी साधना बार-बार विफल हो रही हो, उसे क्या करना चाहिए?

विघ्नहर्ता गणपति की प्रथम पूजा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:36:49–1:37:20 · Also a question

एक श्रोता कहता है कि वह साधना नहीं कर पा रहा और तीन बार प्रयास कर चुका है। वे उत्तर देते हैं, यदि साधना नहीं हो रही, तो गणपति जी की प्रथम पूजा करें — बार-बार विघ्न आ रहा है, और जब तक विघ्नहर्ता की सेवा-पूजा नहीं होगी, सफल नहीं होगी। अलग से यह पूछे जाने पर कि बिना दीक्षा के सप्तशती के कौन-से पाठ उचित हैं, वे कहते हैं कि वे पहले ही बता चुके हैं: महाविद्या क्रम से करें, और हिंदी में कर सकते हैं।

172

भूल से कोई अभक्ष्य (वर्जित) चीज़ खा लेने का प्रायश्चित्त क्या है?

उपवास और गंगा तट की रेत खाना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:37:46–1:38:20 · Also a question

भूल से अभक्ष्य चीज़ खा ली जाए तो प्रायश्चित्त विधान और शुद्धि की विधि पर वीडियो बनाने को कहे जाने पर वे इसे बहुत खतरनाक प्रश्न कहते हैं और बताते हैं: हमारी गुरु परंपरा में, यदि इस प्रकार का दोष हो, तो प्रायश्चित्त के रूप में विधि-विधान है उपवास रखना और गंगा जी के तट की रेत खाना।

173

सप्तशती में कवच, अर्गला और कीलक वाले श्लोक कहाँ हैं?

मंत्र की प्रकृति बताती है कि वह किसलिए है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:38:21–1:39:00 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि सप्तशती के किन श्लोकों में कवच, अर्गला और कीलक हैं, और जिस क्रम में चौथे अध्याय के चार श्लोक कवच माने जाते हैं उसी क्रम में अर्गला और कीलक कहाँ हैं, वे कहते हैं कि यह हर मंत्र को देखकर बताना होगा। "शूलेन पाहि" के अलावा और भी रक्षा मंत्र हैं। जहाँ से भी उस प्रकार की प्रकृति प्रयोग हुई है, वहाँ से आप समझ सकते हैं कि कीलक कहाँ है, शाप विमोचन कहाँ है, बंधन कहाँ है और मारण कहाँ है।

174

हनुमान चालीसा को सिद्ध करने की विधि कहाँ दी गई है?

सिद्ध साबरी विद्या चैनल पर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:39:01–1:39:21 · Also a question

हनुमान चालीसा को कैसे सिद्ध करें, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं कि इसकी पूरी विधि सिद्ध साबरी विद्या चैनल पर पूरे विस्तार से, एक-एक बात बताते हुए दी गई है — "हनुमान चालीसा सिद्ध साबरी विद्या" खोजें और वीडियो आ जाएगा। वे जोड़ते हैं कि जो अपनी कुलदेवी नहीं जानते उनकी विधि चैनल पर दी गई है, और दोनों चैनलों पर उपलब्ध है, इसलिए जो विधि आसान लगे उससे शुरू करें।

175

कीलकम् क्या है, और सप्तशती का निष्कीलन क्यों करना चाहिए?

महादेव ने सप्तशती के मंत्रों को कील दिया

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:39:22–1:40:02 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या अष्टमी या चतुर्दशी को माँ के प्रति पूर्ण समर्पण को ही कीलकम् कहते हैं, वे कहते हैं कि वह निष्कीलन की विधि है — सप्तशती का उत्कीलन, निष्कीलन उसे कहते हैं। लोग बार-बार पूछते हैं कि सप्तशती का उत्कीलन कैसे होगा: यदि बिना निष्कीलन के सप्तशती पाठ किया जाए, तो फल नहीं मिलता। मंत्र कीलित है — शिव जी ने इसे कील दिया है — और जो कीलक पाठ हम करते हैं, उसमें यही बात वर्णित है कि महादेव ने सप्तशती का प्रभाव देखकर इन मंत्रों को कील दिया।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 3.7–8

The Kīlaka says that on the dark fourteenth or eighth one gives and takes back, and that in this way Mahādeva pinned the hymn.

मूल पाठ पढ़ें →
7

सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशयः । कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ॥ ७ ॥

दूसरे मन्त्रों का जप करने वाला भी यदि इस स्तोत्र का पाठ करे, तो पूरा कल्याण पाता है; इसमें सन्देह नहीं। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी या अष्टमी को एकाग्र होकर,

8

ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति । इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥ ८ ॥

वह अपना सब कुछ देवी को अर्पण करता है और फिर उसे उनका प्रसाद मानकर ग्रहण करता है। तभी ये प्रसन्न होती हैं, अन्यथा नहीं। ऐसी ही कील से महादेव ने इस स्तोत्र को कील दिया है।

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ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 3.9

Whoever unpins it and recites it clearly every day becomes a siddha.

मूल पाठ पढ़ें →
9

यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम् । स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः ॥ ९ ॥

जो इस प्रकार कील खोलकर प्रतिदिन इसका स्पष्ट उच्चारण से पाठ करता है, वह मनुष्य सिद्ध हो जाता है। वह देवी का पार्षद होता है और गन्धर्व भी।

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176

सप्तशती के निष्कीलन की विधि क्या है?

दास्य भाव में अपना सब कुछ भगवती के चरणों में अर्पित करना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:40:03–1:40:42 · Also a question

इसमें एक विधि यह है: कृष्ण पक्ष की अष्टमी या चतुर्दशी को, भौतिक रूप में आपकी जो भी संपत्ति है — घर, वाहन, आभूषण, गहने, निवास, आपके बच्चे — ये सब चीज़ें मन से संकल्प करके भगवती के चरणों में अर्पित करनी हैं। यानी यह भाव लाना है कि माँ, आप महारानी हैं, आप रानी हैं, आप स्वामी हैं, हम सेवक और कर्मचारी हैं; हम ये चीज़ें आपके द्वारा स्वीकार करते हैं और इन वस्तुओं का एक सेवक की तरह प्रयोग करेंगे।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीदुर्गासप्तशती · पाठ से पहले 3.7–8

The Kīlaka ties the unpinning to giving and taking back on the dark fourteenth or eighth.

The verse does not list what is given; offering house, goods and children in a servant's spirit is the speaker's reading.

मूल पाठ पढ़ें →
7

सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशयः । कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ॥ ७ ॥

दूसरे मन्त्रों का जप करने वाला भी यदि इस स्तोत्र का पाठ करे, तो पूरा कल्याण पाता है; इसमें सन्देह नहीं। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी या अष्टमी को एकाग्र होकर,

8

ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति । इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥ ८ ॥

वह अपना सब कुछ देवी को अर्पण करता है और फिर उसे उनका प्रसाद मानकर ग्रहण करता है। तभी ये प्रसन्न होती हैं, अन्यथा नहीं। ऐसी ही कील से महादेव ने इस स्तोत्र को कील दिया है।

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177

सप्तशती का निष्कीलन काम करने लगे, उसके बाद भी समर्पण का भाव क्यों बना रहना चाहिए

काम करने लगे तो फिर मनमानी पर न लौटें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:40:43–1:41:00

वे कहते हैं कि यह भाव हमेशा बना रहना चाहिए — ऐसा नहीं कि एक बार निष्कीलित होकर प्रभाव देने लगे, तो हम फिर मनमानी करने लगें। यही तरीका है; और यह भी सप्तशती निष्कीलन का एक तरीका है।

वक्ता कहते हैं कि यह भाव हमेशा बना रहना चाहिए। ऐसा नहीं कि एक बार निष्कीलित होकर प्रभाव देने लगे, तो हम फिर मनमानी करने लगें। यही तरीका है। यह भी सप्तशती निष्कीलन का एक तरीका है।

178

शेयर मार्केट ट्रेडिंग में सफलता के लिए किस देवता की पूजा करनी चाहिए?

शिव, और नवम, एकादश और पंचम भाव का विश्लेषण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:41:01–1:41:30 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि शेयर मार्केट में ट्रेडिंग में सफलता के लिए किस भगवान की पूजा करनी चाहिए, वे कहते हैं शिव जी की पूजा करें; और आज अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाएँ — नवम भाव, एकादश भाव और पंचम भाव, ये तीन — और उसके अनुसार कुछ विशेष विधियाँ भी करें।

यह पूछे जाने पर कि शेयर मार्केट में ट्रेडिंग में सफलता के लिए किस भगवान की पूजा करनी चाहिए, वक्ता उत्तर देते हैं: शिव जी की पूजा करें। और आज अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाकर — नवम भाव, एकादश भाव और पंचम भाव, इन तीनों का — उसके अनुसार भी कुछ विशेष विधियाँ करें।

179

जिसने अखंड ज्योत जलवाई हो, उसे कौन-से नियम पालने चाहिए?

लहसुन-प्याज़ नहीं, भारी तामसिक भोजन नहीं, सेंधा नमक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:41:31–1:42:00 · Also a question

अखंड दीप के बारे में विस्तार और किन नियमों का पालन करना है, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं कि केवल उतना ही करना होगा जितना उसमें लिखा है। आश्रम में भगवती का नौ दिन का अनुष्ठान चल रहा है जहाँ अखंड प्रज्वलन बताया गया है, और जो करवाना चाहे उसके लिए व्यवस्था है; नौ दिन तक दिए गए नामों पर, पूरे परिवार सहित, अखंड ज्योति जलेगी। अखंड ज्योत जलवाने वालों के लिए: लहसुन-प्याज़ आदि नहीं खाना है, भारी तामसिक भोजन नहीं खाना है, और हो सके तो सेंधा नमक वाला भोजन लें।

180

क्या अखंड ज्योत रखने वाले को समुद्री नमक से बचना और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए?

समुद्री नमक से बचना, और ब्रह्मचर्य आवश्यक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:42:01–1:42:21 · Also a question

समुद्री नमक वाला भोजन नहीं लेना चाहिए। वे कहते हैं कि बताया गया पूरा नियम इतना ही है। ब्रह्मचर्य पालन आदि आवश्यक है — वह अवश्य करना चाहिए।

वक्ता कहते हैं कि समुद्री नमक वाला भोजन नहीं लेना चाहिए। इतना बताया गया है; पूरा नियम इतना ही है। ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। आदि के पालन के बारे में, वह आवश्यक है — वह अवश्य करना चाहिए।

181

जो नवरात्रि में केवल काली की पूजा करता है, क्या उसे दुर्गा की ओर जाना चाहिए?

जिनकी स्थापना की है उन्हीं की पूजा करें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:42:22–1:42:37 · Also a question

एक श्रोता, जो नवरात्रों में केवल माँ काली की पूजा करता है, पूछता है कि क्या नवरात्रों में माँ दुर्गा और माँ चंडिका की पूजा करे, या स्थापित माँ काली की; वे कहते हैं कोई एक करें। आपने भगवती की स्थापना की है न — तो माँ काली की ही पूजा करें। उन्हीं के भीतर सब कुछ है।

182

पर्व काल में लगे दोष से कैसे बचें?

सत्र में पहले बताई गई क्षमा याचना की विधियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:42:38–1:43:04 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि यदि किसी पर्व काल में कोई पूजा की और फिर अगले साल उसी पर्व काल में कोई गलत काम हो गया, तो दोष से कैसे बचें, और क्या माफ़ी माँगने से क्षमा मिलती है, वे कहते हैं कि लगे हुए देव दोष से मुक्ति के लिए क्षमा याचना की विधि आज के लाइव के आरंभ में बताई गई थी; यदि आपने नहीं सुनी, तो एक बार सुन लें, और उन विधियों को करके आप क्षमा पा सकते हैं — पर गलती दोहराएँ नहीं।

183

क्या नित्य सप्तशती पाठ में बलि आवश्यक है?

रोज़ आवश्यक नहीं; प्रतीकात्मक नींबू, या लौंग और कपूर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:43:05–1:43:35 · Also a question

सप्तशती के नित्य पाठ में बलि देने की आवश्यकता नहीं है। यदि ऐसी इच्छा हो तो दी जा सकती है; और हाँ, अपने घर में आप इस प्रकार कर सकते हैं — प्रतीकात्मक रूप से नींबू की बलि, या फिर लौंग और कपूर जलाकर आप बलि अवश्य दे सकते हैं।

184

क्या नवरात्रि में पूजन, आरती, पाठ, हवन और फिर आरती का क्रम सही है?

हवन के बाद दूसरी आरती मोटे तौर पर आवश्यक नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:43:36–1:44:10 · Also a question

एक श्रोता, जो नवरात्रि में पहले भगवती का पूजन और आरती करता है, फिर पाठ और जप, फिर हवन, और फिर दोबारा आरती करता है, पूछता है कि क्या नित्य पूजा का यह क्रम सही है; वे कहते हैं हाँ, सही है। हवन के बाद दोबारा आरती करने की कोई बड़ी आवश्यकता नहीं; यदि भाव से करें और समय हो, तो करें — नहीं तो कपूर से आरती करें, पाँच बार या नौ बार दिखाकर।

185

नवरात्रि में मंदिर में रोज़ दुर्गा चालीसा के कितने पाठ करने चाहिए?

चौबीस से अधिक — कम से कम सत्ताईस

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:45:30–1:45:49 · Also a question

एक श्रोता, जो नवरात्रि में उनके द्वारा अखंड ज्योत जलवाना और मंदिर में रोज़ दुर्गा चालीसा का पाठ करना चाहती है, पूछती है कि क्या यह ठीक है; वे कहते हैं हाँ, करें। कितने पाठ — नियम से चौबीस — यह पूछे जाने पर वे कहते हैं अधिक करें; कम से कम सत्ताईस करें।

186

क्या सप्तशती पाठ के साथ शिव की पूजा नहीं करनी चाहिए?

शिव के पूजन के बिना कोई पूजन फल नहीं देता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:45:50–1:46:32 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि क्या सप्तशती पाठ के साथ शिव जी की पूजा नहीं करनी चाहिए, वे इसे सीधे नकारते हैं: क्यों नहीं करनी चाहिए, यह वर्णन कहाँ मिला, ऐसा ज्ञान किसने दिया, क्या किसी ने आपको जड़ से हटाने के लिए कहा है? शिव जी के पूजन के बिना सप्तशती का फल बिल्कुल नहीं मिलेगा। सप्तशती करें या कोई भी पूजन, श्रीमद्भागवत करें — और यदि शिव जी की पूजा नहीं करते, तो फल कभी नहीं मिलेगा। शिव जी की पूजा बिल्कुल आवश्यक है।

187

जिसका व्यापार बीस साल से नहीं चल रहा, उसे क्या करना चाहिए?

पहले अपने कुल की शक्ति को खोजें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:47:24–1:47:50 · Also a question

एक श्रोता, जो पिछले बीस साल से परेशान है और जिसका व्यापार नहीं चल रहा, पूछता है कि क्या करे; वे कहते हैं: पहले अपने कुल की शक्ति को खोजें, देखें कि वे कौन हैं, क्या हैं; और यदि पता न हो, तो उनसे बात करें और वे अपनी शक्ति और समझ के अनुसार सहायता का प्रयास करेंगे।

एक श्रोता कहता है कि वह पिछले बीस साल से परेशान है और उसके घर का व्यापार भी नहीं चल रहा, और पूछता है कि क्या करे। वक्ता उत्तर देते हैं, पहले अपनी कुल शक्ति को खोजें; देखें कि वे कौन हैं, क्या हैं। यदि आपको पता न हो, तो उनसे बात करें; वे अपनी शक्ति और समझ के अनुसार सहायता का प्रयास करेंगे।

188

स्वप्न में देवता जो कहते हैं उसे कैसे याद रखें?

जागते ही तुरंत लिख लें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:47:51–1:48:30 · Also a question

एक श्रोता, जिसे स्वप्न में देवी-देवता बोलकर कोई पूजा या मंत्र बताते हैं पर जागने पर आधा याद नहीं रहता, पूछता है कि क्या याद रखने का कोई तरीका है; वे आधे मज़ाक में कहते हैं कि स्वप्न में ही रिकॉर्ड कर लें, या स्वप्न में कॉपी-पेन लेकर बैठें और लिख लें। फिर गंभीरता से: यह मन है, और यह सामान्य बात है कि स्वप्न में जो देखते हैं वह सुबह तक वैसा ही याद नहीं रहता, क्योंकि सुबह तक हम दो-चार नए स्वप्न और देख चुके होते हैं।

189

स्वप्न में देवताओं से निर्देश पाने का वक्ता का अपना अनुभव

यात्रा और अर्चन से शुरू होने वाले प्रबल अनुभव

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:48:31–1:49:10

वे अपना अनुभव बताते हैं: जब उनके साथ यह बात शुरू हुई, तो अत्यंत प्रबल अनुभव होते थे, और यह विशेषकर तब शुरू होता है जब यात्रा शुरू होती है, जब किसी स्थान पर जाकर कोई अर्चन-पूजन किया हो। स्वाभाविक है कि यदि मन में पचास बातें चल रही हों, तो कैसे याद रहेंगी — आधी याद रहेंगी और आधी भूल जाएँगी। कुछ ही दिन पहले उन्हें इतना प्रबल अनुभव हुआ कि उनके सामने सब कुछ दिखाया और बताया गया, यंत्र और कुछ विशेष विधियाँ दिखाई गईं; जागने के बाद आधा याद रहा और आधा वे अब भी याद करने का प्रयास कर रहे हैं।

190

कुल शक्ति की पहचान हो जाने के बाद क्या करना चाहिए?

उनकी अपनी विधि का पालन करें और उन्हें पकड़े रहें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:49:11–1:49:50 · Also a question

जिस श्रोता की कुल शक्ति की पहचान हो गई है, उससे वे कहते हैं: उनका जो भी विधि-विधान और नियम है, उन्हें पकड़कर चलते रहें। उनके पूजन का जो भी ढंग है, उससे अपनी शक्ति के अनुसार नवरात्रि आदि में, भगवती के साथ या जो भी उचित हो, उनका पूजन करें — क्योंकि वे स्वयं नहीं जानते कि उनका ढंग क्या है। यदि उनका कोई पारायण, नौ दिन का कोई पाठ, कोई विधि है, तो करें, और आपको जल्दी मार्ग मिलेगा।

191

नवदुर्गा योगिनी और नौ ग्रहों की माताएँ कहीं और क्यों नहीं मिलतीं

नौ दुर्गाएँ और नौ ग्रहों की माताएँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:50:40–1:51:10

वे कहते हैं कि पूरा YouTube छान लीजिए, नौ दुर्गा योगिनी कहीं नहीं मिलेंगी; नौ ग्रह, नौ ग्रहों की माताएँ, और नवदुर्गा कहीं नहीं मिलेंगी। और यदि मिलें, तो उनके अपने चैनल का प्रकाशित वीडियो देखें और देखें कि उसके बाद क्या आता है। जब उन्होंने ग्यारह देवियों के लिए इस प्रकार कुलदेवी का जयंती मंगला मंत्र दिया, तो वीडियो वायरल होने के बाद बहुत-से चैनलों ने बनाया, और उनका उनसे अधिक वायरल हुआ — प्रकाशन की तारीखें देखें तो पता चल जाएगा।

192

माँ दुर्गा की मूर्ति का दशमी को विसर्जन कैसे किया जाता है?

शालू वस्त्र, स्नान, श्रृंगार, नारियल और खोइंछा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:52:43–1:53:17 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि खुले मुँह वाले सिंह वाली माँ दुर्गा की मूर्ति का विसर्जन नवरात्र से पहले करें या दशमी को, वे कहते हैं दशमी को करें, पहले विसर्जन न करें। नवमी तक उनका पूजन चलेगा; दशमी को उचित विधि से लाल कपड़ा — शालू वस्त्र, कम से कम सवा मीटर — लाएँ और माँ को उस पर रखें। उस दिन पहले उन्हें फिर से स्नान कराएँ, और स्नान कराकर अच्छे से श्रृंगार करके उस पर बिठाएँ, उनके सामने नारियल आदि की भेंट रखें, और विदाई के समय आँचल में जो दिया जाता है उसकी पूरी विधि करें — जिसे हम खोइंछा भरना कहते हैं।

193

माँ दुर्गा की मूर्ति का विसर्जन स्वयं कैसे किया जाता है?

उसी कपड़े में लपेटकर, बहती नदी में

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:53:18–1:53:52 · Also a question

खोइंछा भरकर और उनका सब कुछ पूरा करके, फिर हाथ जोड़कर, विधिपूर्वक उनका विसर्जन करें। उन्हें उसी कपड़े में अच्छे से लपेटें और फिर बहती नदी में विसर्जन करें।

वक्ता कहते हैं कि खोइंछा भरकर और उनका सब कुछ पूरा करके, फिर हाथ जोड़कर, विधिपूर्वक उनका विसर्जन करें। उन्हें उसी कपड़े में अच्छे से लपेटकर, फिर उसी प्रकार बहती नदी में विसर्जन करें।

194

क्या शिव की पूजा नवरात्रि उपासना का आवश्यक अंग है?

उनका सुधार, और शिव के अभिषेक पर उनका आग्रह

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:53:53–1:54:23 · Also a question

उसी श्रोता के याद दिलाने पर वे कहते हैं: बिल्कुल, शिव जी की पूजा करनी चाहिए — यह आवश्यक अंग है, और शिव जी का अभिषेक अवश्य करना चाहिए। वे श्रोता से क्षमा माँगते हैं, कहते हुए कि उन्हें लगा था कि श्रोता कह रहे हैं कि किसी ने इसे मना किया है।

195

कुट्टू का आटा क्या है और कब खाया जाता है?

नवरात्र और एकादशी का व्रत वाला आटा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:54:24–1:54:48 · Also a question

जो नहीं जानते उनके लिए समझाते हुए वे कहते हैं कि नवरात्र में व्रत का सारा भोजन कुट्टू के आटे से बनता है — उससे चीज़ें बनाकर खाई जाती हैं, और व्रत रखने वाले इसे खाते हैं; इसे कुट्टू कहते हैं। वे बताते हैं कि किसी ने, जो इसे नहीं जानता था, इसे कुत्ते का आटा समझ लिया। कुट्टू एक आटा है जो व्रत में, एकादशी के व्रत में खाया जाता है।

196

एक परिवार की माँ विंध्यवासिनी की हर तीन साल की कड़ाही पूजा, और सवारी के माध्यम से उसकी स्वीकृति

अगली पीढ़ी को सौंपी गई हर तीन साल की कड़ाही पूजा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:54:49–1:55:39

एक श्रोता कहता है कि उसके घर के बड़े हर तीन साल माँ विंध्यवासिनी की एक पूजा चढ़ाते थे, अब वह पूजा उसके द्वारा चढ़ाई जाती है, और माँ सवारी के माध्यम से पूजा स्वीकार करती हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह बहुत अच्छी बात है, और इसे कड़ाही पूजा बताते हैं।

एक श्रोता कहता है कि उसके घर के बड़े हर तीन साल माँ विंध्यवासिनी की एक पूजा चढ़ाते थे; कि अब वह पूजा उसके द्वारा चढ़ाई जाती है; और कि माँ सवारी के माध्यम से पूजा स्वीकार करती हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह बहुत अच्छी बात है। वे कहते हैं, यह कड़ाही पूजा है न।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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