दीपावली के पाँच दिन — गोवत्स द्वादशी से भाई दूज तक, और काली चौदस पर नित्याओं सहित काली
पहले से साधना कर रहे साधकों के लिए दीपावली के अनुष्ठानों पर वार्ता।
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क्या इस दीपावली मैं नई साधना शुरू करूं?
कुछ नया शुरू करने से पहले एक बार सोचें — जो साधना चल रही है, उसे ही दोहराएं
वक्ता कहते हैं कि कोई भी नई साधना शुरू करने से पहले एक बार सोचिए। जो प्रयोग आपने पिछले वर्ष किया, जो अनुष्ठान आप पिछले वर्ष से करते आ रहे हैं — जैसे जो लोग कालिका योगिनी कर रहे हैं — उनका आग्रह है कि उसी साधना को फिर से दोहराएं।
वक्ता कहते हैं कि वे फिर एक बात बोलेंगे। जो प्रयोग आपने पिछले वर्ष किया, जिस प्रयोग और अनुष्ठान को आप पिछले वर्ष से करते आ रहे हैं — जैसे जो लोग कालिका योगिनी साधना कर रहे हैं — कोई भी नई साधना शुरू करने से पहले एक बार सोचिएगा। वे कहते हैं कि आप सभी से मेरा यही आग्रह रहेगा कि उसी साधना को आप सभी फिर से दोहराएं।
पहले से शुरू की गई साधना क्यों नहीं बदलनी चाहिए?
नए लोग आते रहते हैं, और हर किसी की श्रद्धा अलग शक्ति में होती है
क्योंकि चैनल पर नए लोग आते रहते हैं और सबकी श्रद्धा अलग-अलग शक्तियों में होती है, इसलिए उनके लिए अलग-अलग विषय स्पष्ट रूप से रखे जाते हैं। पर अगर आपने पहले से कोई साधना उठाई है, तो उसी को बृहत रूप से कीजिए। वक्ता कहते हैं कि उनसे चर्चा न भी हो रही हो और आप स्वयं कर रहे हों, तो भी उसे करते रहिए।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहली बात यह है: जिन्होंने पिछले वर्ष कोई साधना की थी और अब भी उसे बार-बार दोहरा रहे हैं, वे कृपया अपनी साधना न बदलें। वे इसका कारण बताते हैं कि इस चैनल पर नए लोग आएंगे, कहीं भी नए लोग आएंगे; और सबकी श्रद्धा अलग-अलग शक्तियों में होती है। उसी के अनुसार अलग-अलग बातें और विषय साफ तरीके से सुनने वालों के सामने रखे जाते हैं। लेकिन अगर आपने पहले से कोई साधना उठाई है, तो उसी को बृहत रूप से करें। अगर उनसे चर्चा नहीं हो रही और आप स्वयं कर रहे हैं, तो उसे करते रहें। वे कहते हैं कि यह पहला काम ध्यान में रखिएगा।
अगर मैं कालिका योगिनी कर रहा हूं, तो पांच दिनों में क्या करूं?
कालिका योगिनी प्रमुख रहेगी; साथ में धनतेरस का पूजन होगा
वक्ता कहते हैं कि अगर आप कालिका योगिनी कर रहे हैं, तो प्रमुख रूप से उसी को करेंगे, पर साथ में धनतेरस का पूजन करना है। पांच दिन का अनुष्ठान — कम से कम त्रयोदशी से दूज तक, या द्वादशी से प्रतिपदा तक — भगवती कालिका का ही करना है।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप कालिका योगिनी कर रहे हैं, तो प्रमुख रूप से उसी को, उन्हीं को करेंगे — पर उनके साथ आपको धनतेरस का पूजन करना है, जिसकी चर्चा वे अभी करेंगे। अगर द्वादशी आदि का पूजन होता है, तो उसमें कुछ विशिष्ट प्रयोग हैं, जो वे बताएंगे, और वे आप करिएगा। लेकिन जो अनुष्ठान आपको करना है, कम से कम पांच दिन का — त्रयोदशी से लेकर दूज तक, या द्वादशी से लेकर प्रतिपदा तक — वह आप भगवती कालिका का ही करेंगे।
प्रमुख साधना आपकी अपनी रहती है, और साथ में दीपावली का पूर्ण पूजन चलता है
प्रमुख साधना आपकी ही रहती है; दीपावली का पूजन फिर भी पूरा होता है
वक्ता कहते हैं कि जो लोग महाभैरव कर रहे हैं, वे प्रमुख साधना महाभैरव की ही करेंगे, पर साथ में दीपावली का पूर्ण पूजन होगा — धनतेरस, और दीपावली की रात महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, लक्ष्मी-गणेश, कुबेर और यमदीप दान, सब होगा। केवल प्रमुख साधना उन्हीं की रहती है।
वक्ता कहते हैं कि जो लोग अभी तक महाभैरव की साधना कर रहे हैं, वे प्रमुख साधना महाभैरव की ही करेंगे, लेकिन उसके साथ दीपावली का पूर्ण पूजन होगा। धनतेरस; और दीपावली की रात में महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, लक्ष्मी-गणेश, कुबेर जी, यमदीप दान — सब होगा। पर जो प्रमुख साधना होगी, वह आपके उन्हीं देवताओं की होगी। वे कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि पूजन की मनाही है — ऐसा नहीं कि आप नहीं कर सकते।
दूसरे देवताओं का पूजन असल में किनके लिए मना है?
जो मंडल में बैठे हैं — संकल्प के साथ 41 दिन का आवरण पूजन
वक्ता कहते हैं कि यह उनके लिए मना है जो मंडल में आवरण पूजन कर रहे हों। मंडल का अर्थ है 41 दिन का संकल्प लेना कि किसी विशेष देवी-देवता या शक्ति का पूर्ण मंडल पूजन और आवरण पूजन करेंगे। उनके लिए गुरु आज्ञा से, या बहुत जगह, यह मनाही होती है, क्योंकि उस मंडल में सभी की शक्तियों का पूजन पहले से हो रहा होता है, इसलिए बाहर पूजन की आवश्यकता नहीं होती।
वक्ता पूछते हैं कि मनाही किनके लिए होती है। अगर कोई मंडल में आवरण पूजन कर रहा हो। यहां मंडल का अर्थ है: किसी ने 41 दिन का संकल्प लिया है कि वह 41 दिन तक किसी विशेष देवी-देवता या विशेष शक्ति का पूर्ण मंडल पूजन और आवरण पूजन करेगा। उनके लिए गुरु आज्ञा से यह मनाही होती है — या बहुत सारी जगह यह मनाही होती है — कि आप प्रमुख रूप से केवल उन्हीं का पूजन करेंगे, क्योंकि उस मंडल में सभी की शक्तियों का पूजन हो रहा होता है, इसलिए आपको बाहर पूजन करने की आवश्यकता नहीं होती। और वहां संबंधित मंत्र का जाप भी होता है। विशेष करके अगर उस मंत्र से जुड़ा यंत्र हो — जैसे दुर्गा जी का अष्टाक्षरी मंत्र, जिसका एक यंत्र है जो उस मंत्र का उप-स्वरूप है — तो ये दोनों एक-दूसरे के साथ सामंजस्य में रहते हैं। अगर ऐसा कोई दीक्षित व्यक्ति हो, या कोई स्वयं से ऐसा कर रहा हो, तो उसके लिए अन्य शक्तियों का पूजन मना रहता है — अगर वह मंडल में संकल्पित है। वहां कोई बोलेगा। पर ऐसे नहीं।
अगर मेरा अनुष्ठान दत्तात्रेय या सप्तश्लोकी का है तो?
जो आप दोहराते आए हैं, वही अनुष्ठान रहेगा, और हवन उसी के मंत्रों से
वक्ता कहते हैं कि अगर आप भगवान दत्तात्रेय के माला मंत्र का अनुष्ठान बार-बार कर रहे हैं और उनमें श्रद्धा है, तो प्रमुख उन्हीं का करेंगे, पर पूजन सबका होगा। अगर आप भगवती की सप्तश्लोकी कर रहे थे, तो फिर से सप्तश्लोकी का ही अनुष्ठान करेंगे। हवन भी इन्हीं के मंत्रों से करेंगे — पर इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरे देवताओं को आहुति नहीं मिलेगी।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप भगवान दत्तात्रेय के माला मंत्र का अनुष्ठान बार-बार कर रहे हैं, उनमें आपकी श्रद्धा है और अब तक आपने किया है, तो प्रमुख उन्हीं का करेंगे — पर पूजन सबका होगा। अगर आप भगवती की सप्तश्लोकी कर रहे थे, तो फिर से भगवती की सप्तश्लोकी का ही अनुष्ठान करेंगे। पूजन सबका होगा, पर अनुष्ठान भगवती की सप्तश्लोकी का होगा, और हवन आदि भी आप इन्हीं मंत्रों से करेंगे। वे कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि इनके मंत्र से हवन होगा तो आप दुर्गा जी, काली जी या लक्ष्मी जी को आहुति नहीं देंगे। हवन में तो सबकी आहुति पड़ेगी। प्रमुख रूप से भगवती का होगा; स्वरूप थोड़ा बदलेगा, पर प्रमुख रूप से इन्हीं का रहेगा।
यह बात पहले इसलिए साफ की जाती है ताकि नई साधना सुनकर कोई पुरानी साधना न छोड़े
ताकि नई साधना का वर्णन सुनकर कोई पुरानी साधना न छोड़े
वक्ता कहते हैं कि ताकि कोई भ्रम न रहे — ताकि जब वे आगे बाकी बातों की चर्चा करें, तो सुनने वाले यह न समझें कि पुरानी साधना छोड़कर नई उठा लेनी है। वे कहते हैं कि यह बहुत जरूरी बात है, और वे YouTube को ऐसा माध्यम नहीं बनाना चाहते जहां केवल प्रभावित करना मायने रखे, नई-नई साधनाएं डाली जाएं और पुराने लोगों का कोई फॉलो-अप न हो।
वक्ता कहते हैं कि ये पहली बातें पहले इसीलिए साफ की जा रही हैं ताकि आपको कोई भ्रम न हो — ताकि जब वे आगे की चर्चा करें, तो इसका अर्थ यह न निकले कि आप अपनी पुरानी साधना छोड़कर नई उठा लें। यह चीज बहुत जरूरी है। वे कहते हैं कि YouTube के इस माध्यम को हमें ऐसा नहीं बनाना है — जहां मुझे कोई मतलब न हो, केवल सबको प्रभावित करना हो, नई-नई साधनाएं डालते जाओ और पुराने वालों का कोई फॉलो-अप न हो। वे कहते हैं कि जो पुराने लोग हैं, उन्हें पकड़कर रखना है। बात हो या न हो, आप सब सामान्य रूप से इस विषय को सदा अच्छे से याद रखिए और स्मरण रखिए।
दीपावली का क्रम किस तिथि से शुरू होता है?
दोष व्यापिनी द्वादशी और शाम की तिथि का नियम
वक्ता कहते हैं कि यह द्वादशी से शुरू होता है, और सबसे पहले दोष व्यापिनी द्वादशी का महत्व है। दीपावली के पांचों पर्वों में प्रमुख पूजन वैसे तो स्थिर लग्न आदि देखकर होता है, पर माना गया है कि पूजन का फल सही से तभी मिलता है जब शाम के समय की तिथि के अनुसार पूजन हो।
वक्ता कहते हैं कि अब विषय यह है कि दीपावली में हम प्रमुख रूप से क्या-क्या कार्य करें, और वे द्वादशी पर आते हैं। सबसे पहले दोष व्यापिनी द्वादशी का महत्व है। इस दीपावली के पांचों पर्वों में जितना भी प्रमुख पूजन होता है, वह वैसे तो स्थिर लग्न आदि देखकर होता है; फिर भी माना गया है कि शाम के समय जो तिथि है, उसी के अनुसार पूजन का फल सही से मिलता है। कहीं पहले दिन पड़ती है, कहीं दूसरे दिन — यानी अगर दो तिथियों में मिल रही हो, तो किसी गणना में पहले दिन की तिथि ली जाती है और किसी में दूसरे दिन की।
दो तिथियां दी हों तो मैं किस दिन को मानूं?
अपने क्षेत्र में जो मान्यता है, उसे मानें
वक्ता का सामान्य आग्रह है कि आपके क्षेत्र में जिस दिन जिस तिथि की मान्यता हो, आप उसी को मानें। फिर भी सामान्यतः 9 नवंबर को शाम में द्वादशी मिल रही है — यह गोवत्स द्वादशी है।
वक्ता कहते हैं कि इस पर सबसे उनकी सामान्य बात यह है कि आपके क्षेत्र में जिस दिन जिस तिथि की मान्यता हो, आप उसी को फॉलो कीजिए। फिर भी सामान्यतः 9 नवंबर को शाम में द्वादशी मिल रही है। यह गोवत्स द्वादशी है। वे कहते हैं कि इस दिन का सबसे प्रमुख विषय यह है कि इस दिन अपने आसपास जितनी हो सके, गौ सेवा कीजिए।
गोवत्स द्वादशी पर विशेष रूप से किसे कुछ करना चाहिए?
धन की परेशानी, पितृ दोष, नकारात्मक आवेश, या कुल देवताओं की अप्रसन्नता
वक्ता कहते हैं कि जिसे धन संबंधी समस्या हो, पितृ दोष हो, शरीर पर किसी नकारात्मक शक्ति का आवेश हो, या कुल के देवी-देवताओं से जुड़ा कोई दोष या उनकी अप्रसन्नता हो। वैसे तो सब हर दिन गौ सेवा करते हैं, पर उस दिन जरूर करनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि वैसे तो आप सब हर दिन गौ सेवा करते ही होंगे, फिर भी उस दिन गौ सेवा जरूर करनी चाहिए। और साथ ही, गौ गोवत्स द्वादशी के दिन विशेष करके, अगर किसी को धन संबंधी समस्या है, पितृ दोष है, शरीर पर किसी भी नकारात्मक शक्ति का आवेश है, या कुल के देवी-देवताओं से जुड़ा कोई दोष है, या उनकी अप्रसन्नता है — तो इस दिन आप सबको यह ध्यान रखना चाहिए।
गोवत्स द्वादशी पर बारह दीपकों का प्रयोग क्या है?
गोधूलि वेला में गौशाला में घी के बारह दीपक
वक्ता कहते हैं कि जिस दिन शाम के समय द्वादशी हो, उस दिन शाम को गोधूलि वेला में गौशाला में घी से बने कम से कम बारह दीपक जरूर जलाने चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि एक यह प्रयोग है: जिस दिन शाम के समय द्वादशी रहती है, उस दिन गोधूलि वेला में, शाम के समय, गौशाला में कम से कम बारह — बारह — घी से बने दीपक जरूर जलाने चाहिए। और उस जगह पर, जहां गौ को बांधा जाता है।
जिस खूंटे से गाय बंधती है, उसका क्या करना है?
बांस का खूंटा और उसकी पूजा
वक्ता कहते हैं कि जहां बांस का खूंटा हो, उस दिन उसकी पूजा जरूर करनी चाहिए — उसे गंगाजल से स्नान कराना, उस पर पूरा हल्दी का लेपन करना, फिर रोली से तिलक करना, और उसके सामने पान के पत्ते पर भोग लगाना, वहां घी का एक दीपक रहेगा; बाकी ग्यारह दीपक गौशाला में अलग-अलग जगह सजा देने हैं। वे कहते हैं कि जिनके घर गौ हैं, उनसे वे हमेशा कहते हैं कि बांस का खूंटा हो, आजकल बन रहे लोहे के खूंटे नहीं।
जिस जगह गौ को बांधा जाता है, वहां जिसे हम खूंटा कहते हैं — आजकल लोग लोहे के खूंटे बना रहे हैं, एक कड़ी जैसी चीज, जिसमें गाय को बांध देते हैं। वक्ता कहते हैं कि जब भी वे किसी ऐसे व्यक्ति से बात करते हैं जिसके घर में गौ है, और यह विषय चलता है, तो वे हमेशा कहते हैं कि बांस का खूंटा जरूर होना चाहिए, जिसमें गाय को बांधा जाए। तो अगर वहां बांस का खूंटा है, तो उस दिन उस खूंटे की पूजा जरूर करनी चाहिए: उसे गंगाजल से स्नान कराएं, उस पर पूरा हल्दी का लेपन करें, फिर रोली से तिलक करें, और उसके ठीक सामने पान के पत्ते पर भोग लगाएं — और घी का एक दीपक वहां रहेगा, बाकी ग्यारह दीपक आप गौशाला में अलग-अलग जगह सजा देंगे।
अगर मेरे आसपास कोई गौशाला या गाय न हो तो?
कामधेनु, नंदिनी और समस्त गोवंश के नाम से मानसिक पूजन
वक्ता कहते हैं कि तब आप घर में ही कामधेनु माता के नाम से, नंदिनी माता के नाम से, समस्त गोवंश के नाम से मानसिक रूप से यह पूजन करेंगे; दीपक जलाकर घर में अलग-अलग जगह सजा दीजिए। पर कीजिए — जरूर कीजिए।
अगर आपके आसपास गौशाला नहीं है, आप जा नहीं सकते, या आप ऐसी जगह रहते हैं जहां गाय मिलना मुश्किल है, तो आप अपने घर में ही मानसिक रूप से यह पूजन करेंगे — कामधेनु माता के नाम से, नंदिनी माता के नाम से, समस्त गोवंश के नाम से। दीपक जलाइए और उन दीपकों को घर में ही अलग-अलग जगह सजा दीजिए। पर वक्ता कहते हैं कि कीजिएगा जरूर।
गौ सेवा से क्या दूर होता है?
अनंत पितृ दोष, पाप, यम का भय, अकाल मृत्यु और श्राप
वक्ता कहते हैं कि गौ में समस्त देवताओं का वास है। हमारे अनंत पितृ दोष और कई पाप गौ सेवा से कट जाते हैं; यम के पास से मुक्ति मिलती है। अगर अकाल मृत्यु का योग हो, या कोई श्राप लगा हो जिससे शरीर में विक्षोभ हो रहा हो, या कोई रोग पकड़ ले, तो उससे शांति होती है।
वक्ता कहते हैं कि गौ में समस्त देवताओं का वास है। हमारे अनंत पितृ दोष और कई सारे पाप गौ सेवा से कट जाते हैं। यम के पास से मुक्ति मिल जाती है। अगर अकाल मृत्यु का योग हो, किसी प्रकार का श्राप लग गया हो जिसके कारण शरीर में कोई विक्षोभ हो रहा हो, कोई रोग पकड़ ले — तो उससे शांति होती है।
क्या इसके लिए देसी गाय ही होनी चाहिए?
जो गाय उपस्थित है, जीव सेवा के भाव से उसकी सेवा करें
वक्ता कहते हैं कि यह सच है कि वेद लक्षणा गौ, देसी गाय चाहिए — पर आज के समय में वे हर जगह नहीं मिलेंगी। इसलिए जो उपस्थित हो, उसकी पूजा कीजिए। वे कहते हैं कि यह भाव निकाल दीजिए: जीव सेवा के भाव से और गौ के स्वरूप के भाव से कीजिए। ऐसा नहीं कि फल नहीं मिलेगा, और ऐसा भी नहीं कि इससे आपकी कोई हानि होगी।
वक्ता कहते हैं कि यह सच है कि इसमें वेद लक्षणा गौ, देसी गाय होनी चाहिए — पर अब आज के समय में वे हर जगह तो मिलेंगी नहीं। तो जो उपस्थित हो, उसकी पूजा कीजिए। यह भाव निकाल दीजिए: जीव सेवा के भाव से, और गौ के स्वरूप के भाव से कीजिए। कोई आपसे कहेगा कि कोई फल नहीं मिलेगा, कोई फल नहीं मिलेगा। ठीक है — आपकी अपनी मजबूरी है। आप कहां से खोजकर लाएंगे? सबके पास यह सामर्थ्य नहीं कि दो-चार लाख की गाय खरीदकर रखें और सेवा करें; न जगह है, न ऐसा सामर्थ्य। तो निश्चिंत होकर, जो उपस्थित हैं, उनकी सेवा जरूर कीजिए। ऐसा नहीं कि इससे आपको कोई हानि होने वाली है।
यह प्रयोग करने से पहले कौन-से लक्षण देखूं?
दरिद्रता, शरीर या मुंह से दुर्गंध, और पितृ दोष के लक्षण
वक्ता कहते हैं कि ये अच्छे से देख लीजिए: दरिद्रता बहुत है; शरीर से बहुत अधिक दुर्गंध आती रहती है; मुंह से बहुत अधिक दुर्गंध आती है; घर में पितृ दोष के लक्षण हैं। वे बताते हैं कि पितृ दोष के लक्षण क्या हैं और उसमें क्या परेशानियां होती हैं, इस पर पूरा एक अलग वीडियो है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी चीज एक बड़ी विशेष है, उन लोगों के लिए जो गांव में रहते हैं और गौ पालन करते हैं — या आप नहीं भी करते, तो भी गांव में आसपास किसी न किसी के यहां गौ पालन होता ही होगा। अच्छे से देख लीजिए कि क्या-क्या दोष हैं: दरिद्रता बहुत है; शरीर से बहुत अधिक दुर्गंध आदि आती रहती है; मुंह से बहुत अधिक दुर्गंध आती है; घर में पितृ दोष के लक्षण हैं। वे कहते हैं कि पितृ दोष के लक्षणों पर पूरा एक अलग वीडियो है, कि उसमें क्या होता है, क्या दोष, क्या परेशानियां होती हैं।
बार-बार गाड़ी की दुर्घटना हो तो?
सबसे बड़ा लक्षण है गाड़ी से बार-बार एक्सीडेंट
वक्ता कहते हैं कि अगर आपको वाहन से जुड़ी परेशानी है — गाड़ी से बार-बार एक्सीडेंट हो रहा है, कहीं भी जाएं तो गाड़ी का एक्सीडेंट हो जाता है — तो यह सबसे बड़ा लक्षण है।
वक्ता कहते हैं कि सबसे ज्यादा, अगर आपका वाहन — अगर आपको वाहन से जुड़ी परेशानी है, बार-बार गाड़ी से एक्सीडेंट हो रहा है, कहीं भी जा रहे हैं तो गाड़ी से एक्सीडेंट हो रहा है — तो यह सबसे बड़ा लक्षण है।
अगर घर में ब्रह्म दोष हो तो?
ब्रह्म राक्षस, ब्रह्म पिशाच या ब्रह्म देव — यह गांठ बांध लीजिए
वक्ता कहते हैं कि तब यह गांठ बांध लीजिए। अगर आपके घर में ब्रह्म दोष है — यानी ब्रह्म राक्षस, ब्रह्म पिशाच या ब्रह्म देव, और इनसे जुड़ा कोई कोप या दोष है, या किसी पर आवेश आता है, या आपको जानकारी है कि हां, घर में ऐसा दोष है — तो ध्यान रखिए कि यह काम जरूर करना चाहिए। वे कहते हैं कि यह कोई टोटका या उपाय नहीं, बल्कि भगवती गौ का आशीर्वाद है, और इसे गोवत्स द्वादशी पर करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि और खास करके, अगर आपके घर में ब्रह्म दोष है, तो यह एकदम गांठ बांध लीजिए। अगर आपके घर में ब्रह्म दोष है — यानी ब्रह्मराक्षस, ब्रह्म पिशाच या ब्रह्म देव — और इनसे जुड़ा कोई कोप है, कोई दोष है, किसी के ऊपर आवेश आता है, या आपको जानकारी है कि हां, घर में इस प्रकार का दोष है, तो ध्यान रखिए कि यह काम आपको जरूर करना चाहिए। वे कहते हैं कि यह कोई टोटका, कोई उपाय नहीं है। बल्कि इसे भगवती गौ का आशीर्वाद ही मान लीजिए। यह काम आपको गोवत्स द्वादशी के दिन करना चाहिए। इसमें क्या करना है? जिसके पास में गौशाला हो, जिसके घर में गौ बांधी जाती हो — अगर आपके अपने घर में हो, तो वहां भी कर सकते हैं; अगर बाहर कहीं है, तो उन्हें बोलकर यह काम करना है। वे कहते हैं कि पहला भाग उसी दिन सुबह किया जाता है।
सुबह खूंटे पर क्या किया जाता है?
अक्षत, हल्दी, जल और धूप — एक दिन पहले दिया गया निमंत्रण
वक्ता कहते हैं कि सुबह, जहां गौ माता बंधी हों, उस खूंटे पर थोड़ा हल्दी में रंगा अक्षत, जल, और धूप — विशेष करके बजरंगबली की पूजा में जलाया जाने वाला धूप — लेकर जाइए। वहां धूप अच्छे से जलाइए, धूप-दीप जलाकर रखिए, जल ढारिए, और भगवती कामधेनु और मां नंदिनी, जो भगवती के स्वरूप और गौ माता के स्वरूप हैं, तथा भगवान पशुपतिनाथ महादेव का ध्यान करते हुए वहां प्रार्थना कीजिए।
इसमें सबसे पहले क्या करना है: सुबह के समय, जहां भी गौ माता बांधी जाती हैं, उस खूंटे पर थोड़ा-सा हल्दी में रंगा अक्षत, साथ में जल, और वह धूप जो जलाया जाता है — विशेष करके बजरंगबली की पूजा में जो धूप जलाया जाता है — लेकर जाइए। वक्ता कहते हैं कि उस जगह अच्छे से जलाकर धूप-दीप जलाकर रख देंगे, जल ढार देंगे, और भगवती कामधेनु और मां नंदिनी, जो भगवती के स्वरूप हैं, गौ माता के स्वरूप हैं, उनका ध्यान करते हुए, और भगवान पशुपतिनाथ महादेव का ध्यान करते हुए, वहां विशेष रूप से प्रार्थना करेंगे: कि मुझे इस-इस प्रकार का दोष है, संकट है, कष्ट है। हे प्रभु, कृपा करके इसे दूर करें।
सुबह खूंटे पर ठीक-ठीक क्या वचन देना है?
शाम को खुर की धूल लेने लौटने की बात, निमंत्रण के रूप में
वक्ता कहते हैं कि आप कहेंगे कि शाम के समय, प्रदोष पूजन के समय, हम आपके इस स्थान पर आकर भगवती गौ माता के खुर की धूल, या उनके चरणों की धूल लेकर जाएंगे; और उससे जुड़ा जो भी प्रयोग करें, उसमें हमें सफलता दीजिए। वे समझाते हैं कि कोई चीज लानी हो तो एक दिन पहले निमंत्रण दिया जाता है — और क्योंकि यह प्रदोष काल में होना है, इसलिए उसी दिन सुबह निमंत्रण दे देंगे।
वक्ता कहते हैं कि आप कहेंगे: शाम के समय, प्रदोष पूजन के समय, हम आपके इस स्थान पर आकर भगवती गौ माता के खुर की धूल, या भगवती गौ माता के चरणों की धूल लेकर जाएंगे। और उससे जुड़ा हम जो भी प्रयोग करें, आप उसमें हमें सफलता दीजिए। यह बात आप बोलेंगे। जब सुबह के समय कोई चीज लाई जाती है, तो एक दिन पहले निमंत्रण देते हैं। क्योंकि यह प्रदोष काल में होना है, इसलिए आप उसी दिन सुबह निमंत्रण देंगे, और यह काम करेंगे।
अगर गौशाला मेरी अपनी हो तो?
सुबह वाला भाग फिर भी करें, और गुड़ वाली रोटी खिलाएं
वक्ता कहते हैं कि अगर आपकी अपनी गौशाला है, तो भी यह सुबह करना है। अगर गौ माता वहां खूंटे पर बंधी हों, तो ध्यान से कीजिए ताकि उन्हें कोई कष्ट न हो और कोई दोष न लगे। और अगर गौ माता बंधी रहती हैं, तो गुड़ वाली रोटी साथ ले जाइए और उसी समय उन्हें खिला दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद आप अपने घर आ जाएंगे, और फिर शाम के समय जाएंगे। अगर आपकी अपनी गौशाला है, तो भी आपको यह सुबह करना है। अगर गौ माता वहां खूंटे पर बंधी हों, तो भी आपको अच्छे से करना है, ताकि उन्हें कोई कष्ट न हो और कोई दोष न लगे। और अगर गौ माता वहां बंधी रहती हैं, तो गुड़ वाली रोटी साथ ले जाइए और उसी समय उन्हें खिला दीजिए।
शाम को मैं साथ में क्या लेकर जाऊं?
पीला वस्त्र और गौ ग्रास — कम से कम पांच मीठी रोटी
वक्ता कहते हैं कि शाम को पीला वस्त्र लेकर जाना है, और गौ माता के लिए गौ ग्रास — यानी घर की बनी मीठी रोटी, कम से कम पांच। अगर एक से अधिक गौ माता हों, या अधिक गोवंश हो, तो उसी अनुपात में पांच या दस रोटी बनाइए। पहले प्रणाम कीजिए, और गौशाला में जाने से पहले चप्पल उतार दीजिए — हो सके तो घर से ही खाली पैर जाइए।
वक्ता कहते हैं कि शाम को आपको वहां जाना है, और उस समय पीला वस्त्र साथ लेकर जाएंगे। गौ माता के लिए कुछ गौ ग्रास ले जाइए — यानी मीठी रोटी, घर की बनी; कम से कम पांच रोटी जरूर ले जानी चाहिए। अगर वहां एक से अधिक गौ माताएं हैं, अधिक गोवंश है, तो उसी अनुपात में — पांच हों, दस हों — पांच या दस रोटी ले जाएंगे। सबसे पहले प्रणाम करेंगे, और गौशाला में खाली पैर जाने से पहले चप्पल उतार देनी है। संभव हो तो यह काम करने के लिए घर से ही खाली पैर जाएंगे। वे कहते हैं कि यह बड़ी विशेष बात है; इसका फल मिलता है।
ग्रामीण भगतवाल, जो पूछा-बूझा देते हैं, अपनी विद्याएं इसी पर चलाते हैं
ग्रामीण भगतवाल और इस पर चलने वाली विद्याएं
वक्ता कहते हैं कि गांव के भगतवाल, जो लोग पूछा-बूझा देते हैं, इस प्रकार की सिद्धियां जरूर करते हैं, और इससे बहुत सारी शांति करवाई जाती है। वे कहते हैं कि ब्रह्म की शांति भी इसी पर होती है। ऐसी विद्याएं भी हैं जिनसे इन सबके माध्यम से चोर पकड़ा जाता है, भूत-प्रेत का बंधन होता है, और देवी-देवताओं को बुलाकर बांधा जाता है।
वक्ता कहते हैं कि आपको पता है कि गांवों में भगतवाल, जो लोग पूछा-बूझा देते हैं, वे इस प्रकार की सिद्धियां जरूर करते हैं। और इससे बहुत सारी शांति करवाई जाती है। वे बार-बार कहते हैं कि ब्रह्म की शांति भी इसी पर होती है और इसी पर की जाती है — गांव के लोग जानते होंगे। ऐसी विद्याएं भी हैं कि इन सबके माध्यम से चोर को पकड़ना, भूत-प्रेत का बंधन करना, देवी-देवताओं को बुलाना और उन्हें बांधना — ये सारी चीजें होती हैं। तो इसका महत्व बहुत अधिक है।
शाम की विधि का क्रम क्या है?
प्रणाम, रोटी खिलाना, और पीले वस्त्र से धूल बटोरना
वक्ता कहते हैं कि खाली पैर जाइए; पहले गौ माता को प्रणाम कीजिए, फिर भगवान पशुपतिनाथ महादेव को प्रणाम कीजिए। उसके बाद वहां उपस्थित सभी गौ माता और गोवंश को मीठी रोटी खिलाइए, और उसी पीले वस्त्र से वहां जो सूखी धूल मिले, उसे हल्के से बटोरकर उसी पीले वस्त्र में लपेट लीजिए। वे कहते हैं कि बहुत थोड़ी धूल चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि आपको शाम के समय जाना है, और सबसे पहले खाली पैर जाना है। आप गौ माता को प्रणाम करेंगे। आप भगवान पशुपतिनाथ महादेव को प्रणाम करेंगे। उसके बाद वहां उपस्थित सभी गौ माता को, सभी गोवंश को मीठी रोटी खिलाएंगे; और उसी पीले कपड़े से वहां जो भी धूल मिले — सूखी धूल — उसे हल्के से बटोरना है और उसी पीले कपड़े में लपेट लेना है। बहुत ज्यादा धूल की जरूरत नहीं है; थोड़ी-सी धूल ही चाहिए।
ठीक-ठीक कौन-सी धूल लेनी चाहिए?
खूंटे के पास की धूल, और सबसे अच्छी पिछले खुर के नीचे की
वक्ता कहते हैं कि धूल खूंटे के पास की होनी चाहिए। गौ माता के पिछले पैर की और अगले पैर की धूल — अगर पिछले पैर की धूल लें, तो वह सबसे श्रेष्ठ है। उसे उठाइए, और अगर खुर के नीचे की धूल मिल जाए, जहां खुर का छाप पड़ा हो, तो जब वे पैर हटाएं, तब उसे उठा लीजिए।
वक्ता कहते हैं कि पर वह धूल खूंटे के पास की होनी चाहिए। गौ माता के पिछले पैर की धूल और अगले पैर की धूल। अगर पिछले पैर की धूल उठाते हैं, तो वह सबसे श्रेष्ठ है। उसे उठाइए, और अगर खुर के नीचे की धूल मिल जाए — जहां उनका छाप पड़ा हो, जैसे वे पैर रखेंगी तो खुर का छाप पड़ जाएगा — तो जब वे अपना पैर हटाएं, उसे उठा लेना है।
उस धूल को कैसे तैयार और अभिमंत्रित करें?
केसर और अष्टगंध, और पंचाक्षरी से अभिमंत्रण
वक्ता कहते हैं कि उसे घर लाइए, और इसी मिट्टी में केसर, अष्टगंध आदि मिलाइए; फिर भगवान पशुपतिनाथ महादेव का नाम लेकर, या उनके नाम से अभिमंत्रित करके, या उसी रात पंचाक्षरी की 11 माला या 108 माला जप करके, उसे अभिमंत्रित करके रख दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि आप उसे घर ले आएंगे, और इसी मिट्टी में केसर, अष्टगंध आदि मिलाएंगे। फिर भगवान पशुपतिनाथ महादेव का नाम लेकर, या उनके नाम से अभिमंत्रित करके — या उसी दिन रात के समय पंचाक्षरी की 11 माला, 108 माला जप करके — लोग उसे अभिमंत्रित करके रख देते हैं।
अभिमंत्रित धूल का उपयोग कैसे होता है?
पीतल या चांदी के खोल में पहनना, या सिंदूर में मिलाना
वक्ता कहते हैं कि पूरी सामग्री को पीतल या चांदी के खोल में भरकर बाजू में या गले में पहनते हैं, जिससे भूत-पिशाच से जुड़े ज्वर, प्रेत-पिशाच के आवेश से आने वाले ज्वर, बार-बार बुखार, या पेट में बहुत जलन जैसे दोषों की शांति होती है — वे कहते हैं कि ब्रह्म की उपस्थिति पेट में आग लगा देती है। महिलाएं, विशेष करके विवाहित जिन्हें कोई दोष हो, इसे थोड़ा-सा अपने सिंदूर में मिलाकर मांग में भरें।
वक्ता कहते हैं कि या उस पूरी सामग्री को पीतल के खोल में या चांदी के खोल में भरकर बाजू में या गले में पहनते हैं; इससे इस प्रकार के दोषों की शांति होती है। इनमें: जिसे भूत-पिशाच से जुड़ा ज्वर आता हो; प्रेत-पिशाच के आवेश से ज्वर आता हो, या बार-बार बुखार होता हो; या पेट में बहुत अधिक जलन होती हो। जब ब्रह्म की उपस्थिति होती है, तो वह पेट में आग लगा देती है — लगता है जैसे अंदर किसी ने आग जलाकर रख दी हो। महिलाएं, और विशेष करके जिन्हें किसी प्रकार का दोष है और जो विवाहित हैं, वे इसे थोड़ा-सा अपने सिंदूर में मिलाकर मांग में सिंदूर भरें। इस तरीके से करना चाहिए।
क्या मसान दोष वाले छोटे बच्चे के लिए इसका उपयोग हो सकता है?
सूखा रोग में गाय के घी में इस मिट्टी का लेपन
वक्ता कहते हैं कि अगर छोटे बच्चे को ऐसा दोष हो गया है — मसान से जुड़ा सूखा रोग, जिसमें मसान शरीर का पूरा खून चूस लेता है — तो इसी मिट्टी को घी में मिलाकर शरीर पर लेपन करना चाहिए। गाय का घी, और अगर एकदम शुद्ध देसी गाय का घी मिल जाए तो उसमें मिलाकर विशेष करके बच्चे की छाती पर और पीठ पर ऊपर से नीचे की ओर लगाइए। वे कहते हैं कि इससे बहुत जल्दी राहत मिलती है, और अगर आप इसे अभिमंत्रित कर लें तो सोने पे सुहागा।
अगर छोटे बच्चों को इस प्रकार का कोई दोष हो गया है — मसान से जुड़ा सूखा, जिसे सूखा रोग कहते हैं, जिसमें मसान शरीर का पूरा खून ही चूस लेता है — अगर ऐसा दोष हो गया है, तो इसी मिट्टी को घी में मिलाकर शरीर पर लेपन करना चाहिए। गाय का घी। और अगर एकदम शुद्ध देसी गाय का घी मिल जाए, तो उसमें मिलाकर इसका लेपन विशेष करके बच्चे की छाती पर, और पीठ पर, ऊपर से नीचे की ओर उतारते हुए करना चाहिए। इससे बहुत जल्दी राहत मिलती है। और अगर आप इसे अभिमंत्रित कर लेते हैं, तब तो सोने पे सुहागा।
यह तेरह वर्ष से कम के बच्चों के लिए, बताई गई तिथियों पर किया जाता है, और ऐसे पीड़ित किसी को भी बताना चाहिए
तेरह वर्ष की सीमा, और वे तिथियां जिन पर यह किया जाता है
वक्ता कहते हैं कि जिन्हें आप सलाह देते हैं, उनमें किसी को ऐसा कष्ट हो, तो उन्हें यह बात जरूर बताइए, और गौ माता की सेवा करने को भी जरूर कहिए। और यह काम 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए करना चाहिए। यह विशेष करके द्वादशी के समय होता है, और कुछ अन्य तिथियां भी हैं।
वक्ता कहते हैं कि आपसे जुड़ा कोई भी व्यक्ति, जिससे आप बात करते हैं और जिसे सलाह देते हैं, अगर उसे इस प्रकार का कष्ट है, तो उसे यह बात जरूर बताइए, और गौ माता की सेवा करने को भी जरूर कहिए। साथ ही, अगर छोटे बच्चों को ऐसी परेशानी है, तो उनके लिए यह विषय अच्छे से समझाइए। और एक और विषय है: यह काम 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए करना चाहिए। यह विशेष करके द्वादशी के समय होता है, और कुछ अन्य तिथियां भी हैं, जो उन्हें देखकर बतानी पड़ेंगी; वे एक पुराने लाइव का जिक्र करते हैं जो गौ माता से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने इनकी चर्चा की थी।
अगर 13 वर्ष से कम आयु के बच्चे पर अभिचार हुआ हो तो क्या करें?
चौदस के दिन निमंत्रण देकर लाई गई काली हल्दी
वक्ता कहते हैं कि अगर 13 वर्ष से कम आयु के बच्चे पर अभिचार प्रयोग हुआ हो — किसी भी प्रकार का अभिचार — और उसे बहुत कष्ट और परेशानी हो, उसकी बुद्धि भ्रमित हो रही हो, वह एकदम गंभीर हो गया हो और कुछ भी न बोलता हो, या बच्ची बहुत डिस्टर्ब रहती हो: तो गौ के खुर की यह धूल काली हल्दी के साथ लीजिए। काली हल्दी चौदस के दिन लानी होती है, और उसे भी निमंत्रण देकर लाना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर बच्चा 13 वर्ष से कम आयु का है और उस पर अभिचार प्रयोग आदि हो गया है — किसी भी प्रकार का अभिचार — अगर उसे बहुत कष्ट और परेशानी है, उसकी बुद्धि भ्रमित हो रही है, वह एकदम धीर-गंभीर हो गया है और कुछ भी नहीं बोलता, या बच्ची है और बहुत अधिक डिस्टर्ब रहती है। तो ऐसे समय में गौ के खुर की यह धूल, काली हल्दी के साथ — काली हल्दी चौदस के दिन लानी होती है। काली हल्दी को भी निमंत्रण देकर लाना चाहिए। अगर कहीं उपलब्ध हो, तो बहुत बढ़िया।
वह मिश्रण कैसे बनाकर बच्चे को लगाया जाता है?
काली हल्दी, धूल और गाय का घी, अभिमंत्रित करके नाभि पर
वक्ता कहते हैं कि काली हल्दी को इस धूल के साथ घिसिए, गाय के घी में मिलाइए — ये तीनों सामग्रियां एक साथ — और भगवती के मंत्रों से, भगवती काली के मंत्रों से, जयंती मंगला काली मंत्र से अभिमंत्रित कीजिए। फिर हर रात बच्चे के सोने से पहले, या सो जाने के बाद, रात 8-9 बजे के आसपास, पूरी सामग्री में से थोड़ी-सी उसकी नाभि पर लगाकर छोड़ दीजिए। यह लगातार करना शुरू कर दीजिए।
क्या तेरह वर्ष से बड़े बच्चे के लिए यह किया जा सकता है?
तेरह वर्ष से बड़े लड़के के लिए हाँ, लड़की के लिए नहीं
तेरह वर्ष से अधिक आयु का लड़का हो तो यह कर सकते हैं; लड़की का नहीं करना चाहिए। वे आगे स्पष्ट करते हैं कि यदि बच्ची रजस्वला होना आरंभ हो गई है, तो उस समय उसके लिए यह उपाय इस तरीके से नहीं करना चाहिए — उनके लिए अलग उपाय हैं। तो यह बाकी लोगों के लिए है।
वक्ता कहते हैं कि तेरह वर्ष से अधिक आयु का लड़का हो तो कर सकते हैं; लड़की का नहीं करना चाहिए। वे थोड़ा स्पष्ट करते हैं: यदि बच्ची भी रजस्वला होना आरंभ हो गई है, तो उस समय उसके लिए यह उपाय इस तरीके से नहीं करना चाहिए — उनके लिए फिर अलग उपाय हैं। तो यह उनके लिए है; बाकी लोगों के लिए यह उपाय है। वे कहते हैं कि यह चीज करनी चाहिए; इससे बहुत जल्दी राहत मिलती है।
यदि अभिमंत्रण के लिए कोई मंत्र न आता हो तो क्या करें?
अपने वर्णाश्रम धर्म के अनुसार पंचाक्षरी मंत्र
यदि आपको मंत्र नहीं आता, तो जैसा पहले चर्चा हुई, अपने वर्णाश्रम धर्म के अनुसार पंचाक्षरी मंत्र का प्रयोग करें। यज्ञोपवीत आदि को ध्यान में रखें, अतिक्रमण न करें। उसी अनुसार इसे अभिमंत्रित करें, या जयंती मंगला मंत्र से अभिमंत्रित करके प्रयोग करें — उससे भी लाभ मिलेगा।
वक्ता कहते हैं कि यदि आपको मंत्र आदि नहीं आता, तो जैसा पहले चर्चा हुई है, पंचाक्षरी मंत्र अपने वर्णाश्रम धर्म के अनुसार लें। यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। आदि को ध्यान में रखें — अतिक्रमण नहीं करना है। उसी अनुसार इसे अभिमंत्रित करें, या जयंती मंगला मंत्र से अभिमंत्रित करके तब प्रयोग करें; उससे भी लाभ मिलेगा। वे कहते हैं, यह ध्यान रखिए। तो गोवत्स द्वादशी के अनुसार आप यह हर साल कर सकते हैं। अधिक मात्रा में लेकर रख सकते हैं, और पूरे साल भर प्रयोग कर सकते हैं।
क्या सामान्य लोग भी गौ रज का प्रयोग कर सकते हैं?
मस्तक पर धारण करना, और वे देव वशीकरण के विषयों से क्यों बचते हैं
सामान्य जन भी भगवती गौ माता के रज को मस्तक पर बिल्कुल धारण कर सकते हैं — केसर, अष्टगंध आदि में मिलाकर नित्य मस्तक पर लगाएँ; हर प्रकार के देवी-देवता प्रसन्न होते हैं। वे जोड़ते हैं कि बहुत लोग देव वशीकरण मंत्र सिद्धि जैसी चीजों का आरएनडी करते हैं, पर वे ऐसे विषयों की चर्चा नहीं करते, क्योंकि ये बहुत अट्रैक्टिव टॉपिक्स हैं और सामान्य व्यक्ति शायद न समझे — मान लीजिए वह देव वशीकरण साधना कर रहा है और गड़बड़ होने से कोई दैत्य शक्ति ही वशीकृत हो जाए, क्योंकि उसमें रक्षा विधान है।
वक्ता कहते हैं कि सामान्य जन भी भगवती गौ माता के रज को मस्तक पर बिल्कुल धारण कर सकते हैं — केसर, अष्टगंध आदि में मिलाकर नित्य अपने मस्तक पर धारण करें; हर प्रकार के देवी-देवता प्रसन्न होते हैं। यदि आप देव वशीकरण मंत्र आदि की सिद्धि करते हैं — और बहुत सारे लोग हैं जो इस प्रकार की चीजों का आरएनडी करते हैं और प्रयोग भी करते हैं — तो वे कहते हैं कि वे इन सब विषयों की चर्चा नहीं करते, क्योंकि ये बहुत ज्यादा अट्रैक्टिव टॉपिक्स होते हैं। सामान्य व्यक्ति को समझ आएगा या नहीं। मान लीजिए वह देव वशीकरण साधना कर रहा है और गड़बड़ होने से कोई दैत्य शक्ति ही वशीकृत हो जाए; मान लीजिए उसके साथ पहले से कोई गलत चीज हो और वही वशीकृत हो जाए — क्योंकि उसमें रक्षा विधान आदि है।
साधक इस धूल का प्रयोग कैसे करे?
तिलक में — देवता प्रसन्न होते हैं, प्रेत शांति और पितृ कोप का शमन होता है
यदि आप साधक हैं और इस प्रकार की क्रिया करते हैं, तो इसका प्रयोग कीजिए: गोवत्स द्वादशी के दिन भगवती गौ माता के पीछे के पैर के खुर के नीचे की धूल लेकर अपने तिलक आदि में मिलाकर प्रयोग करें। आपको जरूर लाभ मिलेगा — देवताओं की कृपा अवश्य मिलती है, हर प्रकार के देवी-देवता इससे प्रसन्न होते हैं, प्रेत-पिशाच की भी शांति होती है और पितृ कोप का भी शमन होता है। वे कहते हैं, यह सभी के लिए कॉमन है।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप साधक हैं और इस प्रकार की क्रिया करते हैं, तो इसका प्रयोग कीजिए। गोवत्स द्वादशी के दिन भगवती गौ माता के पीछे के पैर के खुर के नीचे की जो धूल है — उसे भी अपने तिलक आदि में मिलाकर प्रयोग कीजिए। आपको जरूर लाभ मिलेगा। देवताओं की कृपा अवश्य प्राप्त होती है। हर प्रकार के देवी-देवता इससे प्रसन्न हो जाते हैं। प्रेत-पिशाच आदि की भी शांति होती है, और पितृ कोप का भी शमन होता है। वे कहते हैं, तो यह सभी के लिए कॉमन है — याद रखिए।
कुबेर जी को लेकर क्या भ्रांतियाँ हैं?
साल में एक बार पूजा, बाकी तीन सौ चौंसठ दिन भुला दिए जाते हैं
वक्ता कहते हैं कि भैरव जी के बाद कुबेर जी को लेकर भी बहुत सारी भ्रांतियाँ हैं। उनका पूजन साल में केवल एक बार होता है, और लोग उन पर एहसान कर देते हैं — हाँ कुबेर बाबा, कुबेरनाथ बाबा, कृपा कीजिए, धन-धान्य दीजिए। बाकी तीन सौ चौंसठ दिन कुबेर जी को भी लगता होगा कि कोई मेरा नाम ले, पर कोई नहीं लेता।
वक्ता कहते हैं, अब धनतेरस का दिन। धनतेरस के दिन का पूरा विषय अलग-अलग वीडियो में बहुत बार स्पष्ट किया गया है। उन्हें लगता है कि भैरव जी के बाद कुबेर जी को लेकर भी बहुत सारी भ्रांतियाँ हैं। साल में केवल एक बार उनका पूजन होता है, और लोग उन पर एहसान कर देते हैं: हाँ कुबेर बाबा, कुबेरनाथ बाबा, कृपा कीजिए, धन-धान्य दीजिए। बाकी तीन सौ चौंसठ दिन कुबेर जी कौन हैं — उन्हें भी लगता होगा कि कोई मेरा नाम ले ले, पर कोई नहीं लेता। शिव मंदिर जाकर भी, अगर उनका विग्रह हो, तो उन्हें नहला दिया जाता है — पर लोग उन्हें नित्य स्मरण में नहीं रखते।
कुबेर जी को अनदेखा क्यों नहीं करना चाहिए?
उत्तर दिशा के रक्षक, दस दिगपालों में एक, और तेरह प्रमुख यक्ष
क्योंकि वे स्वयं उत्तर दिशा के रक्षक देवता हैं, और दस दिगपालों में एक हैं — यह याद रखना चाहिए, वे कहते हैं; इसलिए कुबेर जी का पूजन कभी अनदेखा न करें। वे चैनल पर प्राण प्रतिष्ठा के उस वीडियो की ओर इशारा करते हैं जिसमें कुबेर जी की प्रतिष्ठा करके दिखाई गई है; कुबेर जी साक्षात शिव जी के मित्र कहे जाते हैं और हमारे धन के रक्षक हैं। कुबेर जी महाराज के साथ विशेष रूप से तेरह प्रमुख यक्षों की पूजा होती है।
वक्ता कहते हैं कि जबकि उत्तर दिशा के रक्षक देवता वही हैं — यह आपको याद रखना चाहिए। दस दिगपालों में एक हैं कुबेर। इसलिए कुबेर जी का पूजन कभी अनदेखा मत कीजिए। वे कहते हैं कि उन्होंने चैनल पर उनका प्राण प्रतिष्ठा का वीडियो डाला हुआ है, कि मूर्ति प्रतिष्ठा कैसे करते हैं, जिसमें कुबेर जी की प्रतिष्ठा करके दिखाई गई है: देखिए, ये यहाँ हैं, ये साक्षात शिव जी के मित्र कहे जाते हैं, और यही हमारे धन के रक्षक हैं। कुबेर जी महाराज के साथ विशेष रूप से तेरह प्रमुख यक्षों की पूजा होती है। उनका विशेष विधि-विधान इस बार आपको वीडियो में मिलेगा; अभी जो अनुष्ठान होगा उसमें वे करके दिखाएँगे कि बृहद रूप से कैसे किया जाता है, और आप सामान्य रूप से भी कर सकते हैं। तो कुबेर जी महाराज के लिए धनतेरस के दिन शाम के समय पहला पूजन होगा।
यम दीपदान कब करना चाहिए — शाम को या भोजन के बाद?
बड़ों ने जैसा किया वैसा करें, पर पाँचों दिन शाम को
वे साफ कहते हैं: जैसे आपके माता-पिता या घर के बड़े-बुजुर्ग करते आए हैं, उसी प्रकार कीजिए। फिर भी धनतेरस से द्वितीया तिथि तक शाम के समय लगातार यम दीपदान करना चाहिए — पाँचों दिन करना चाहिए।
वक्ता बताते हैं कि यम दीपदान की विधि को लेकर कुछ प्रश्न हैं: कुछ कहते हैं शाम के समय करना है; कहीं लोग खाने-पीने के बाद रात को निकालते हैं। तो सही विधि क्या है, कैसे करना है? इस पर वे स्पष्ट कहेंगे: जैसे आपके माता-पिता या घर के बड़े-बुजुर्ग करते आए हैं, उसी प्रकार कीजिए। फिर भी धनतेरस से लेकर द्वितीया तिथि तक शाम के समय लगातार यम दीपदान करना चाहिए। पाँचों दिन करना चाहिए। और यदि आप द्वादशी से कर रहे हैं — उनके अनुसार, या आपका जो कार्तिक का महीना है, वह दीपदान के लिए सर्वोत्तम समय है।
कुबेर जी का पिछला जन्म क्या था?
गुणनिधि, फटा गमछा और शिव मंदिर की बाती
कुबेर जी का पुराना नाम गुणनिधि था। जैसा शिव महापुराण में चर्चा हुई थी, उन्होंने अपना गमछा फाड़कर दीपक की बाती बनाई और शिव मंदिर में उसकी रोशनी बढ़ा दी, ताकि वे चोरी कर सकें — पर उसी के प्रताप से अगले जन्म में वे राजा बने, और उसके अगले जन्म में साक्षात कुबेर पद को प्राप्त हुए।
वक्ता कहते हैं, जैसे कुबेर जी — आपको कुबेर जी का पिछला जन्म पता है ना: गुणनिधि उनका पुराना नाम था। शिव पुराण में उन्होंने चर्चा की थी कि उन्होंने अपना गमछा फाड़कर दीपक की बाती बनाई, और शिव मंदिर में उसकी रोशनी बढ़ा दी, ताकि वे चोरी कर सकें। पर उसी के प्रताप से अगले जन्म में वे राजा बने। और उसके अगले जन्म में वे साक्षात कुबेर पद को प्राप्त हुए। कार्तिक में दीपदान का महत्व बहुत अधिक है, और इसीलिए वे बार-बार इतना जोर देते हैं और सुनने वालों से दीपदान करवाते हैं।
शास्त्र क्या कहता है
Guṇanidhi, having died while relighting a guttering lamp before a Śiva-liṅga with a strip torn from his own cloth (originally meaning only to steal the temple's food offering), was released from Yama's messengers by that unwitting merit, went to Śivaloka, was reborn a king (Dama of Kaliṅga), and after that life became Kubera, lord of Alakā.
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श्रुत्वा तथा स वृत्तान्तं प्राक्तनं स्वं विनिन्द्य च । कांचिद्दिशं समालोक्य निर्ययौ दीक्षितांगजः ॥
"उन वृत्तान्तों को सुनकर वह दीक्षितपुत्र अपने भाग्य की निन्दा करके किसी दिशा को देखकर अपने घर से चल पड़ा।
कियच्चिरं ततो गत्वा यज्ञदत्तात्मजः स हि । दुष्टो गुणनिधिस्तस्थौ गतोत्साहो विसर्जितः ॥
कुछ काल तक चलने के पश्चात् वह यज्ञदत्तपुत्र दुष्ट गुणनिधि थक जाने के कारण उत्साहहीन होकर वहीं रुक गया।
चिंतामवाप महतीं क्व यामि करवाणि किम् । नाहमभ्यस्तविद्योऽस्मि न चैवातिधनोऽस्म्यहम् ॥
वह बहुत बड़ी चिन्ता में पड़ गया कि अब मैं कहाँ जाऊँ, क्या करूँ? मैंने विद्या का अभ्यास भी नहीं किया और न तो मेरे पास अत्यधिक धन ही है।
देशांतरे यस्य धनं स सद्यः सुखमेधते । भयमस्ति धने चौरात्स विघ्नः सर्वतो भवः ॥
दूसरे देश में तत्काल सुख तो उसी को प्राप्त होता है, जिसके पास धन रहता है। यद्यपि धन रहने पर चोर से भय होता है, किंतु यह विघ्न सर्वत्र उत्पन्न हो सकता है।
याजकस्य कुले जन्म कथं मे व्यसनं महत् । अहो बलीयान्हि विधिर्भावि कर्मानुसंधयेत् ॥
अरे! याजक के कुल में जन्म होने पर भी मुझमें इतना बड़ा दुर्व्यसन कैसे आ गया! यह आश्चर्य है, किंतु भाग्य बड़ा बलवान् है, वही मनुष्य के भावी कर्म का अनुसंधान करता है।
भिक्षितुं नाधिगच्छामि न मे परिचितः क्वचित् । न च पार्श्वे धनं किंचित्किमत्र शरणं भवेत् ॥
मैं भिक्षा माँगने के लिये नहीं जाता हूँ। मेरा यहाँ कोई परिचित भी नहीं है और न मेरे पास कुछ धन ही है। मेरे लिये कोई शरण तो होनी ही चाहिये।
सदानभ्युदिते भानौ प्रसूर्मे मिष्टभोजनम् । दद्यादद्यात्र कं याचे न चेह जननी मम ॥
सदैव सूर्योदय होने के पूर्व ही मेरी माता मुझे मधुर भोजन देती थीं। आज मैं यहाँ किससे माँगूँ। मेरी माता भी तो यहाँ नहीं हैं।'
इति चिंतयतस्तस्य बहुशस्तत्र नारद । अतिदीनं तरोर्मूले भानुरस्ताचलं गतः ॥
हे नारद! इस प्रकार बहुत-सी चिन्ता करते हुए वृक्ष के नीचे बैठे-बैठे वह अत्यधिक दीन-हीन हो उठा; इतने में सूर्य अस्ताचल को चला गया।
एतस्मिन्नेव समये कश्चिन्माहेश्वरो नरः । सहोपहारानादाय नगराद् बहिरभ्यगात् ॥
इसी समय कोई शिवभक्त मनुष्य अनेक प्रकार की परम दिव्य पूजा-सामग्रियाँ लेकर शिवरात्रि के दिन उपवासपूर्वक महेश्वर की पूजा करने के लिये अपने परिवारजनों के साथ नगर से बाहर निकला।
नानाविधान्महादिव्यान्स्वजनैः परिवारितः । समभ्यर्चितुमीशानं शिवरात्रावुपोषितः ॥
उसने अनेक प्रकार की परम दिव्य पूजा-सामग्रियाँ अपने परिवारजनों के साथ लीं और शिवरात्रि के दिन उपवास रखकर महेश्वर की पूजा करने चल पड़ा।
शिवालयं प्रविश्याथ स भक्तः शिवसक्तधीः । यथोचितं सुचित्तेन पूजयामास शंकरम् ॥
शिव जी में रत चित्तवाले उस भक्त ने शिवालय में प्रवेश करके सावधान मन से यथोचित रूप से शंकर की पूजा की।
पक्वान्नगंधमाघ्राय यज्ञदत्तात्मजो द्विजः । पितृत्यक्तो मातृहीनः क्षुधितः स तमन्वगात् ॥
पक्वान्नों की गन्ध को सूँघकर पिता के द्वारा परित्यक्त, मातृहीन तथा भूख से व्याकुल यज्ञदत्त का पुत्र वह ब्राह्मण गुणनिधि उसके पास पहुँचा।
इदमन्नं मया ग्राह्यं शिवायोपकृतं निशि । सुप्ते शैवजने दैवात्सर्वस्मिन्विविधं महत् ॥
उसने सोचा कि ये सभी शिवभक्त जब रात्रि में सो जायँगे, तब मैं शिवपर चढ़ाये गये इस विविध नैवेद्य को भाग्यवश प्राप्त करूँगा।
इत्याशामवलम्ब्याथ द्वारि शम्भोरुपाविशत् । ददर्श च महापूजां तेन भक्तेन निर्मिताम् ॥
ऐसी आशा करके वह भगवान् शंकर के द्वारपर बैठ गया और उस भक्त के द्वारा की गयी महापूजा को देखने लगा।
विधाय नृत्यगीतादि भक्ताः सुप्ताः क्षणे यदा । नैवेद्यं स तदादातुं भर्गागारं विवेश ह ॥
भक्तलोग जिस समय नृत्य-गीत आदि करके सो गये, उसी समय वह नैवेद्य को लेने के लिये भगवान् शिव के मन्दिर में घुस गया।
दीपं मन्दप्रभं दृष्ट्वा पक्वान्नवीक्षणाय सः । निजचैलांचलाद्वर्तिं कृत्वा दीपं प्रकाश्य च ॥
वहाँ जल रहे दीपक के प्रकाश को मन्द देखकर पक्वान्नों को देखने के लिये अपने उत्तरीय वस्त्र को फाड़ करके बत्ती बनाकर दीपक को प्रकाशितकर
यज्ञदत्तात्मजः सोऽथ शिवनैवेद्यमादरात् । जग्राह सहसा प्रीत्या पक्वान्नं बहुशस्ततः ॥
यज्ञदत्त के उस पुत्र ने आदरपूर्वक शिव के लिये लगाये गये बहुत-से पक्वान्नों के नैवेद्य को एकाएक सहर्ष उठा लिया।
ततः पक्वान्नमादाय त्वरितं गच्छतो बहिः । तस्य पादतलाघातात्प्रसुप्तः कोऽप्यबुध्यत ॥
इसके बाद उस पक्वान्न को लेकर शीघ्र ही बाहर जाते हुए उसके पैर के आघात से कोई सोया हुआ व्यक्ति जग उठा।
कोऽयं कोऽयं त्वरापन्नो गृह्यतां गृह्यतामसौ । इति चुक्रोश स जनो गिरा भयमहोच्चया ॥
शीघ्रता करनेवाला यह कौन है, कौन है? इसे पकड़ो — इस प्रकार भययुक्त ऊँची वाणी में वह व्यक्ति चिल्लाने लगा।
यावद्भयात्समागत्य तावत्स पुररक्षकैः । पलायमानो निहतः क्षणादन्धत्वमागतः ॥
भयवश वह ब्राह्मण जब भाग रहा था, उसी समय वहाँ पुररक्षकों ने पहुँचकर उसे मारा, जिससे वह अन्धा होकर तत्काल मर गया।
अभक्षयच्च नैवेद्यं यज्ञदत्तात्मजो मुने । शिवानुग्रहतो नूनं भाविपुण्यबलान्न सः ॥
हे मुने! यज्ञदत्त के उस पुत्र ने निश्चित शिव की ही कृपा से नैवेद्य को खा लिया था, न कि अपने भावी पुण्यफल के प्रभाव से।
मृतो बद्धः समागत्य पाशमुद्गरपाणिभिः । निनीषुभिः संयमनीं याम्यैः स विकटैर्भटैः ॥
इसके पश्चात् उस मरे हुए ब्राह्मण को यमलोक ले जाने के लिये पाश, मुद्गर हाथ में लिये हुए यमके भयंकर दूत वहाँ आकर उसे बाँधने लगे।
तावत्पारिषदाः प्राप्ताः किंकिणीजालमालिनः । दिव्यं विमानमादाय तं नेतुं शूलपाणयः ॥
इतने में छोटी-छोटी घण्टियों से युक्त आभूषण धारण किये हुए और हाथ में त्रिशूल से युक्त हो शिव के पार्षद दिव्य विमान लेकर उसे ले जाने के लिये आ गये।
मुञ्चतैनं द्विजं याम्या गणाः परमधार्मिकम् । दण्डयोग्यो न विप्रोऽसौ दग्धः सर्वाघसंचयः ॥
हे यमराज के गणो! इस परम धार्मिक ब्राह्मण को छोड़ दो। यह ब्राह्मण दण्ड के योग्य नहीं है। इसके समस्त पाप भस्म हो चुके हैं।
इत्याकर्ण्यवचस्ते हि यमराजगणास्ततः । महादेवगणानाहुर्बभूवुश्चकिता भृशम् ॥
इसके अनन्तर शिवपार्षदों के वचन सुनकर यमराज के गण आश्चर्यचकित हो गये और महादेव जी के गणों से कहने लगे।
शंभोर्गणानथालोक्य भीतैस्तैर्यमकिंकरैः । अवादि प्रणतैरित्थं दुर्वृत्तोऽयं गणा द्विज ॥
शम्भु के गणों को देखकर डरे हुए तथा प्रणाम करते हुए यमराज के दूतों ने इस प्रकार कहा कि हे गणो! यह ब्राह्मण तो दुराचारी था।
कुलाचारं प्रतीर्ष्यैष पित्रोर्वाक्यपराङ्मुखः । सत्यशौचपरिभ्रष्टः सन्ध्यास्नानविवर्जितः ॥
कुल की मर्यादा का उल्लंघन करके यह माता-पिता की आज्ञा से पराङ्मुख, सत्य-शौच से परिभ्रष्ट और सन्ध्या तथा स्नान से रहित था।
आस्तां दूरेऽस्य कर्माणि शिवनिर्माल्यलंघकः । प्रत्यक्षतोऽत्र वीक्षध्वमस्पृश्योऽयं भवादृशाम् ॥
यदि इसके अन्य कर्मों को छोड़ भी दिया जाय, तो भी इसने शिव के निर्माल्य चढ़ाये गये नैवेद्य का लंघन किया है, अर्थात् चोरी की है। इस हेय कर्म को आप सब स्वयं देख लें, आप-जैसे लोगों के लिये यह स्पर्श के योग्य भी नहीं है।
शिवनिर्माल्यभोक्तारः शिवनिर्माल्यलंघकाः । शिवनिर्माल्यदातारः स्पर्शस्तेषां ह्यपुण्यकृत् ॥
जो शिव-निर्माल्य को खानेवाले, शिवनिर्माल्य की चोरी करनेवाले और शिवनिर्माल्य को देनेवाले हैं, उनका स्पर्श अवश्य ही पापकारक होता है।
विषमालोक्य वा पेयं श्रेयो वा स्पर्शनं परम् । सेवितव्यं शिवस्वं न प्राणैः कण्ठगतैरपि ॥
विष को जान-बूझकर पी लेना श्रेयस्कर है और अछूत का स्पर्श कर लेना भी अति उत्तम है, किंतु कण्ठगत प्राण होने पर भी शिवनिर्माल्य का सेवन उचित नहीं है।
यूयं प्रमाणं धर्मेषु यथा न च तथा वयम् । अस्ति चेद्धर्मलेशोऽस्य गणास्तं शृणुमो वयम् ॥
धर्म के विषय में आप सब जिस प्रकार प्रमाण हैं, वैसे हमलोग नहीं हैं। हे शिवगण! सुनिये। यदि इसमें धर्म का लेशमात्र भी हो, तो हम सब उसे सुनना चाहते हैं।
इत्थं तद्वाक्यमाकर्ण्य याम्यानां शिवकिंकराः । स्मृत्वा शिवपदाम्भोजं प्रोचुः पारिषदास्तु तान् ॥
यमके दूतों की इस बात को सुनकर शिवके पार्षद भगवान् शिव के चरणकमल का स्मरण करके कहने लगे —
किंकराः शिवधर्मा ये सूक्ष्मास्ते तु भवादृशैः । स्थूललक्ष्यैः कथं लक्ष्या लक्ष्या ये सूक्ष्मदृष्टिभिः ॥
हे यमकिंकरो! जो सूक्ष्म शिवधर्म हैं, जिन्हें सूक्ष्म दृष्टिवाले ही जान सकते हैं, उन्हें आप-सदृश स्थूल दृष्टिवाले कैसे जान सकते हैं?
अनेनानेनसा कर्म यत्कृतं शृणुतेह तत् । यज्ञदत्तात्मजेनाथ सावधानतया गणाः ॥
हे यमदूतो! पापरहित इस यज्ञदत्तपुत्र ने यहाँपर जो पुण्य कर्म किया है, उसे सावधान होकर सुनो —
पतन्ती लिंगशिरसि दीपच्छाया निवारिता । स्वचैलाञ्चलतोऽनेन दत्त्वा दीपदशां निशि ॥
इसने शिवलिंग के शिखर पर पड़ रही दीपक की छाया को दूर किया और अपने उत्तरीय वस्त्र को फाड़कर उससे दीपक की वर्तिका बनायी और फिर उससे दीपक को पुनः जलाकर उस रात्रि में शिव के लिये प्रकाश किया।
अपरोऽपि परो धर्मो जातस्तत्रास्य किंकराः । शृण्वतः शिवनामानि प्रसंगादपि गृह्यताम् ॥
हे किंकरो! इसने उस कर्म के अतिरिक्त अन्य भी पुण्यकर्म किया है। शिवपूजा के प्रसंग में इसने शिव के नामों का श्रवण किया और स्वयं उनके नामों का उच्चारण भी किया है।
भक्तेन विधिना पूजा क्रियमाणा निरीक्षिता । उपोषितेन भूतायामनेन स्थिरचेतसा ॥
भक्त के द्वारा विधिवत् की जा रही पूजा को इसने उपवास रखकर बड़े ही मनोयोग से देखा है।
शिवलोकमयं ह्याद्य गंतास्माभिः सहैव तु । कंचित्कालं महाभोगान्करिष्यति शिवानुगः ॥
अतः इन पुण्यों के प्रभाव से यह आज ही हमलोगों के साथ शिवलोक को जायगा। वहाँ शिवका अनुगामी बनकर यह कुछ समय तक उत्तम भोगों का उपभोग करेगा।
कलिंगराजो भविता ततो निर्धूतकल्मषः । एष द्विजवरो नूनं शिवप्रियतरो यतः ॥
तत्पश्चात् अपने पापरूपी मैल को धोकर यह कलिंग देश का राजा बनेगा; क्योंकि यह श्रेष्ठ ब्राह्मण निश्चित ही शिव का प्रिय हो गया है।
अन्यत्किंचिन्न वक्तव्यं यूयं यात यथागतम् । यमदूताः स्वलोकं तु सुप्रसन्नेन चेतसा ॥
हे यमदूतो! अब इसके विषय में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। तुमलोग जैसे आये हो, वैसे ही अतिप्रसन्न मनसे अपने लोक को चले जाओ।'
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां यमदूता मुनीश्वर । यथागतं ययुः सर्वे यमलोकं पराङ्मुखाः ॥
हे मुने! उनके वाक्य को सुनकर पराङ्मुख हुए समस्त यमदूत अपने लोक को लौट गये।
सर्वं निवेदयामासुः शमनाय गणा मुने । तद्वृत्तमादितः प्रोक्तं शंभुदूतैश्च धर्मतः ॥
गणों ने यमराज से गुणनिधि के उस सम्पूर्ण वृत्तान्त का निवेदन किया और शिवदूतों ने उनसे जो कहा था, वह समाचार आरम्भ से उन्हें सुना दिया।
सर्वे शृणुत मद्वाक्यं सावधानतया गणाः । तदेव प्रीत्या कुरुत मच्छासनपुरःसरम् ॥
हे गणो! तुम सब सावधान होकर मेरे इस वाक्य को सुनो। जैसा आदेश दे रहा हूँ, वैसा ही प्रेमपूर्वक तुमलोग करो।
ये त्रिपुण्ड्रधरा लोके विभूत्या सितया गणाः । ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥
हे गणो! इस संसार में जो श्वेत भस्म से त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं, उन सभी को छोड़ देना और यहाँपर कभी मत लाना।
उद्धूलनकरा ये हि विभूत्या सितया गणाः । ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥
हे गणो! जो श्वेत भस्म से शरीर में उद्धूलन करते हैं, उन सबको तुमलोग छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना।
शिववेशतया लोके येन केनापि हेतुना । ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥
इस संसार में जिस किसी भी कारण से जो शिव का वेष धारण करनेवाले हैं, उन सभी लोगों को भी छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना।
ये रुद्राक्षधरा लोके जटाधारिण एव ये । ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥
इस जगत् में जो रुद्राक्ष धारण करनेवाले हैं या सिरपर जटा धारण करते हैं, उन सबको तुमलोग छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना।
उपजीवनहेतोश्च शिववेशधरा हि ये । ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥
जिन लोगों ने जीविका के निमित्त ही शिव का वेष धारण किया है, उन सबको भी छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना।
दम्भेनापि छलेनापि शिववेशधरा हि ये । ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥
जिन्होंने दम्भ या छल-प्रपंच के कारण ही शिव का वेष धारण किया है, उन सबको भी तुमलोग छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना।'
एवमाज्ञापयामास स यमो निजकिंकरान् । मत्वा तथेति ते सर्वे तूष्णीमासञ्छुचिस्मिताः ॥
इस प्रकार उन यमराज ने अपने सेवकों को आज्ञा दी, जिसको सुनकर उन लोगों ने कहा कि जैसी आपकी आज्ञा है, वैसा ही होगा — ऐसा कहकर वे मन्द-मन्द हँसते हुए चुप हो गये।
पार्षदैर्यमदूतेभ्यो मोचितस्त्विति स द्विजः । शिवलोकं जगामाशु तैर्गणैः शुचिमानसः ॥
इस प्रकार शिवपार्षदों ने यमदूतों से उस ब्राह्मण को छुड़ाया और वह पवित्र मनसे युक्त होकर शीघ्र ही उन शिवगणों के साथ शिवलोक को चला गया।
तत्र भुक्त्वाखिलान्भोगान्संसेव्य च शिवाशिवौ । अरिंदमस्य तनयः कलिंगाधिपतेरभूत् ॥
वहाँपर सभी सुखभोगों का उपभोग करके तथा भगवान् सदाशिव एवं पार्वती की सेवा करके वह दूसरे जन्म में कलिंगदेश के राजा अरिंदम का पुत्र हुआ।
दम इत्यभिधानोऽभूच्छिवसेवापरायणः । बालोऽपि शिशुभिः साकं शिवभक्तिं चकार सः ॥
उस शिवसेवापरायण बालक का नाम दम हुआ। बालक होते हुए भी वह अन्य शिशुओं के साथ शिव की भक्ति करने लगा।
क्रमाद्राज्यमवापाथ पितर्युपरते युवा । प्रीत्या प्रवर्तयामास शिवधर्मांश्च सर्वशः ॥
क्रमशः उसने युवावस्था प्राप्त की और पिता के परलोकगमन के पश्चात् उसे राज्य भी प्राप्त हुआ। उसने प्रेमपूर्वक अनेक शिवधर्मों को प्रारम्भ किया।
नान्यं धर्मं स जानाति दुर्दमो भूपतिर्दमः । शिवालयेषु सर्वेषु दीपदानादृते द्विज ॥
हे ब्रह्मन्! दुष्टों का दमन करनेवाला वह राजा दम शिवालयों में दीपदान के अतिरिक्त अन्य कोई धर्म नहीं मानता था।
ग्रामाधीशान्समाहूय सर्वान्स विषयस्थितान् । इत्थमाज्ञापयामास दीपा देयाः शिवालये ॥
उसने सभी ग्राम और जनपद-प्रमुखों को बुला करके यह आदेश दिया कि तुमलोगों को शिवालयों में दीप-प्रज्वालन की व्यवस्था करनी है।
अन्यथा सत्यमेवेदं स मे दण्ड्यो भविष्यति । दीपदानाच्छिवस्तुष्टो भवतीति श्रुतीरितम् ॥
यदि किसीके क्षेत्र में ऐसा नहीं हुआ, तो यह सत्य है कि उस क्षेत्र का वह प्रधान निश्चित ही मेरे द्वारा दण्ड पायेगा। दीपदान से भगवान् शिव सन्तुष्ट होते हैं — ऐसा श्रुतियों में कहा गया है।
यस्य यस्याभितो ग्रामं यावन्तश्च शिवालयाः । तत्र तत्र सदा दीपो द्योतनीयोऽविचारितम् ॥
जिसके-जिसके गाँव के चारों ओर जितने भी शिवालय हों, वहाँ-वहाँ सदैव बिना कोई विचार किये ही दीपक जलाना चाहिये।
ममाज्ञाभंगदोषेण शिरश्छेत्स्याम्यसंशयम् । इति तद्भयतो दीपा दीप्ताः प्रतिशिवालयम् ॥
अपनी आज्ञा के उल्लंघन के दोषपर मैं निश्चित ही अपराधी का सिर काट लूँगा। इस प्रकार उस राजा के भयसे प्रत्येक शिवमन्दिर में दीपक जलाये जाने लगे।
अनेनैव स धर्मेण यावज्जीवं दमो नृपः । धर्मर्द्धिं महतीं प्राप्य कालधर्मवशं गतः ॥
इस प्रकार जीवनपर्यन्त इसी धर्माचरण के पालन से राजा दम धर्म की महान् समृद्धि प्राप्त करके अन्त में कालधर्म की गति को प्राप्त हुआ।
स दीपवासनायोगाद् बहून्दीपान्प्रदीप्य वै । अलकायाः पतिरभूद्रत्नदीपशिखाश्रयः ॥
अपनी इस दीपवासना के कारण शिवालयों में बहुत-से दीपक प्रज्वलित करके वह राजा दूसरे जन्म में रत्नमय दीपकों की शिखाओं को आश्रय देनेवाली अलकापुरी का राजा कुबेर हुआ।
एवं फलति कालेन शिवेऽल्पमपि यत्कृतम् । इति ज्ञात्वा शिवे कार्यं भजनं सुसुखार्थिभिः ॥
इस प्रकार भगवान् शंकर के लिये अल्पमात्र भी किया गया धार्मिक कृत्य समय आनेपर फल प्रदान करता है। यह जानकर उत्तम सुख चाहनेवाले लोगों को शिव का भजन करना चाहिये।
क्व स दीक्षितदायादः सर्वधर्मारतिः सदा । शिवालये दैवयोगाद्यातश्चोरयितुं वसु । स्वार्थदीपदशोद्योतलिंगमौलितमोहरः ॥
कहाँ सभी धर्मों से सदा ही दूर रहनेवाला दीक्षित का पुत्र और कहाँ दैवयोग से धन चुरानेके लिये शिवमन्दिर में उसका प्रवेश एवं स्वार्थवश दीपक की वर्तिका को जलाकर शिवलिंग के मस्तकपर छाये हुए अन्धकार को दूर करनेके लिये किया गया उसका पुण्य।
कलिंगविषये राज्यं प्राप्तो धर्मरतिं सदा । शिवालये समुद्दीप्य दीपान्प्राग्वासनोदयात् ॥
जिसके प्रभाव से उसने कलिंगदेश का राज्य प्राप्त किया और सदैव धर्म में अनुरक्त रहने लगा। पूर्वजन्म के संस्कार के उदय होने के कारण ही शिवालय में सम्यक् रूपसे मात्र दीपक को जलाकर
क्वैषा दिक्पालपदवी मुनीश्वर विलोकय । मनुष्यधर्मिणानेन सांप्रतं येह भुज्यते ॥
उसने यह दिक्पाल कुबेर की महान् पदवी प्राप्त कर ली। हे मुनीश्वर! देखिये यह मनुष्यधर्मा इस समय इस लोक में रहकर इसका भोग कर रहा है।
इति प्रोक्तं गुणनिधेर्यज्ञदत्तात्मजस्य हि । चरितं शिवसंतोषं शृण्वतां सर्वकामदम् ॥
इस प्रकार यज्ञदत्त के पुत्र गुणनिधि के चरित्र का वर्णन कर दिया, जो शिव को प्रसन्न करनेवाला है और जिसको सुननेवाले की सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
सर्वदेवशिवेनासौ सखित्वं च यथेयिवान् । तदप्येकमना भूत्वा शृणु तात ब्रवीमि ते ॥
गुणनिधि ने सर्वदेवमय भगवान् सदाशिव से जिस प्रकार मित्रता प्राप्त की, अब मैं उसका वर्णन आपसे कर रहा हूँ। हे तात! एकाग्रचित्त होकर आप सुनें।
कुबेर बनने से पहले वाले जन्म में राजा के रूप में कुबेर जी महाराज ने क्या किया?
घोषणा कि जो दीपदान नहीं करेगा उसका सिर काट दिया जाएगा
जब कुबेर जी महाराज को राजा का जन्म मिला था, तो उन्होंने पूरे नगर में घोषणा करवा दी थी कि जो दीपदान नहीं करेगा — विशेष करके शिव जी के मंदिर में — उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। वक्ता कहते हैं कि वे यह सब लोगों के कल्याण के लिए ही कर रहे थे; उन्होंने नियम बनाए थे। और उसी की कृपा से भगवान ने उन्हें कुबेर पद पर बैठा दिया।
क्योंकि जब कुबेर जी महाराज को राजा का जन्म मिला था, तो उन्होंने नगर में घोषणा करवा दी थी कि जो दीपदान नहीं करेगा — विशेष करके शिव जी के मंदिर में — उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। वक्ता कहते हैं कि वे इतना सब लोगों के कल्याण के लिए ही तो कर रहे थे; उन्होंने नियम बनाए थे। और उसकी कृपा से भगवान ने उन्हें कुबेर पद पर बैठा दिया।
धनतेरस पर पहला कार्य क्या है?
यक्षराज कुबेर के लिए पूजन स्थान और शिव मंदिर में तेरह दीपक
धनतेरस के दिन पहला कार्य है: शाम को अपने पूजन स्थान में, जब हम पूजन करते हैं, यक्षराज कुबेर जी महाराज के निमित्त तेरह दीपक जलाना। तेरह — तेरह दीपक। शिव मंदिर में भी तेरह दीपक जलाने हैं। यदि घी का सामर्थ्य हो, तो घी की बाती प्रयोग करें।
वक्ता कहते हैं कि धनतेरस के दिन पहला कार्य है: शाम के समय अपने पूजन स्थान में, जब हम पूजन करते हैं, तब यक्षराज कुबेर जी महाराज के निमित्त तेरह दीपक जलाना। तेरह — तेरह दीपक। शिव मंदिर में भी तेरह दीपक जलाने हैं। यदि हमारे पास घी का सामर्थ्य है, तो घी की बाती प्रयोग करें। शुद्ध मिले तो शुद्ध तिल का तेल प्रयोग कर सकते हैं, या सरसों के तेल का प्रयोग करें।
क्या सरसों के तेल का दीपक प्रेतों को खींचता है?
वे इसे आजकल की मनगढ़ंत बात कहते हैं
वे कहते हैं, यह शंका मन में मत लाइए कि सरसों के तेल का दीपक जलाने से प्रेत-पिशाच आकृष्ट होते हैं। ये मनगढ़ंत बातें हैं जो आजकल चल रही हैं। रक्षा के लिए हमेशा सरसों का ही प्रयोग होता है, सरसों के तेल का प्रयोग होता है।
वक्ता कहते हैं, यह शंका मन में मत लाइए कि जब हम सरसों के तेल का दीपक जलाते हैं, तो उससे प्रेत-पिशाच आकृष्ट होते हैं। ये मनगढ़ंत बातें हैं जो आजकल चल रही हैं। रक्षा के लिए हमेशा सरसों का ही प्रयोग होता है, सरसों के तेल का प्रयोग होता है।
अच्छा घी न खरीद सकूँ तो क्या दीपकों के लिए सस्ता घी ले लूँ?
दो-तीन सौ रुपये वाला घी चर्बी से निकाला तेल होता है
यदि सामर्थ्य नहीं है, तो दो सौ-तीन सौ रुपये किलो वाले घी का दीपक मत जलाइए — वे कहते हैं, उससे दोष लगेगा। वह चर्बी से निकाला हुआ तेल रहता है, और वही "घी" रहता है। यह गलती मत कीजिए। आपको इन शंकाओं में नहीं पड़ना है; पूरी तरह निश्चिंत होकर तेरह दीपक जलाइए।
वक्ता कहते हैं, यदि आपका सामर्थ्य नहीं है, तो क्या आप दो सौ, तीन सौ रुपये किलो वाले घी का दीपक जलाएँगे? उससे दोष लगेगा। वह चर्बी से निकाला हुआ तेल रहता है, और वही घी रहता है। वह गलती मत कीजिए। आपको इन शंकाओं में नहीं पड़ना है। एकदम निश्चिंत होकर सबसे पहले आप तेरह दीपक जलाएँगे।
तेरह दीपक कहाँ-कहाँ रखे जाते हैं?
पूजन स्थान, कुलदेवता, चौखट, पानी, तुलसी और पितर
वे तेरह दीपक घर में अलग-अलग स्थानों पर रखे जाते हैं। एक पूजन स्थान में रखें; जहाँ कुलदेवी-देवता का थान है, वहाँ एक रखें; चौखट पर एक जरूर रखना है। घर में जहाँ कहीं पीने का पानी रखने का स्थान है, वहाँ पितरों के निमित्त एक रखना है। एक तुलसी जी के पास, और जो भी देव वृक्ष हो — तुलसी जी, अपराजिता — उनके पास रखना है। और यदि आपने पितरों के लिए कहीं स्थान बनाया है या उनकी फोटो रखते हैं, तो वहाँ भी जगह देकर दीपक रखेंगे।
वक्ता कहते हैं कि वे तेरह दीपक घर में अलग-अलग स्थानों पर रखे जाते हैं। एक पूजन स्थान में रखेंगे। जहाँ कुलदेवी-देवता का थान है, वहाँ एक रखेंगे। चौखट पर एक जरूर रखना है। घर में कहीं भी पीने का पानी रखने का स्थान है, तो वहाँ पितरों के निमित्त एक रखना है। एक तुलसी जी के पास रखना है, और जो भी देव वृक्ष हो — तुलसी जी, अपराजिता — उनके पास एक रखना है। यदि पितरों के निमित्त आपने कहीं स्थान बना रखा है, या उनकी फोटो रखते हैं, तो वहाँ भी जगह देकर अच्छे से दीपक रखेंगे। इस तरीके से घर में अलग-अलग जगहों पर आप तेरह दीपक सजा देंगे।
चौखट पर स्वयं क्या किया जाता है?
कुलदेवी और कुल भैरव के लिए रंगोली और दोनों तरफ दीपक
चौखट का विशेष ध्यान रखना है। पहले जहाँ चौखट, घर की दहलीज, को कुछ समझा ही नहीं जाता था, अब लोग चौखट सजाते हैं: सुंदर रंगोली बनाते हैं और दोनों तरफ कुलदेवी के नाम से, कुल भैरव के नाम से, या केवल भैरव जी के नाम से दीपक जलाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि एक बात का विशेष ध्यान रखना है: चौखट। पहले के समय में जहाँ चौखट, घर की दहलीज, को कुछ समझा ही नहीं जाता था, आज बहुत सारे लोग इसे लेकर सजग हो गए हैं। सुंदर सी रंगोली बनाई जाती है, और दोनों तरफ कुलदेवी के नाम से, कुल भैरव के नाम से, या केवल भैरव जी के नाम से दीपक जलाए जाते हैं। इससे आपके कुलदेवी-देवता जरूर प्रसन्न होंगे। सनातन का हर व्यक्ति यदि यह करने लगे, तो आधी परेशानी वहीं दूर हो जाएगी — क्योंकि चौखट पर ही तो सब है।
सब कुछ चौखट पर ही क्यों होता है?
चौखट लंघन — चौखट लाँघने से तंत्र चलता है और कटता है
वे कहते हैं, पूरा खेल चौखट का ही है; चौखट लाँघने से ही सब होता है। कहीं भी देखिए: चौखट लंघन होता है, और चौखट के उल्लंघन से तंत्र चलता है, तंत्र कटता है, अच्छी चीज होती है, बुरी चीज होती है। इसलिए सभी को चौखट पर दीपदान करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं, उसी का पूरा खेल है। चौखट लाँघने से ही सब होता है। कहीं भी देखिए: चौखट लंघन होता है; चौखट के उल्लंघन से तंत्र चलता है, तंत्र कटता है, अच्छी चीज होती है, बुरी चीज होती है। तो चौखट पर दीपदान सभी करें। यह बहुत अच्छी बात है कि बहुत सारे लोग अब जाग रहे हैं और इन विषयों को समझ रहे हैं। जो समझते हैं, वे करते हैं — यह उनकी नियति भी है। जिन्हें ये सब चीजें फालतू बकवास लगती हैं, वे न करें; वे चौखट ही हटा देते हैं और कहते हैं, चौखट का मामला ही खत्म करो। तो फिर देख लो कितने सुखी हो। पहले का कर्म है जिससे अभी सुखी हो; अभी कुछ नहीं बना रहे हो, सेविंग अकाउंट खाली होगा, और फिर रोकने के लिए आपके पास कुछ नहीं रहेगा। तो धनतेरस के दिन चौखट से लेकर हर स्थान पर, शुभ स्थानों आदि पर, आप दीपदान करेंगे। इसके बाद शाम के समय यक्षराज कुबेर जी का पूजन और भगवती महालक्ष्मी का पूजन करके, यमराज के निमित्त दीपदान आता है।
यमराज का दीपक कैसे बनाया जाता है?
सरसों या तिल के तेल का चार मुँह वाला दीपक, पलाश के पत्तल पर अनाज के ऊपर
यमराज के निमित्त दीपदान के लिए चार मुँह वाला दीपक होना चाहिए। सरसों का तेल या तिल का तेल, दोनों में से कोई भी प्रयोग करें — उनके अनुसार सरसों का तेल प्रयोग करना चाहिए, यमराज के लिए वही सर्वश्रेष्ठ है। उसके बाद कोई अनाज, जैसे गेहूँ या साबुत अनाज; शादी-ब्याह में खिलाने के लिए जो पलाश के पत्तों वाला पत्तल होता है, उस पर अनाज की ढेरी रखें, और उसके ऊपर यमराज के नाम से चार मुँह वाला दीपक रखें।
वक्ता कहते हैं कि यमराज के निमित्त दीपदान करने के लिए चार मुँह वाला दीपक होना चाहिए। सरसों का तेल या तिल का तेल — दोनों में से कोई भी प्रयोग करें; उनके अनुसार सरसों का तेल प्रयोग करना चाहिए, यमराज के निमित्त वही सबसे सर्वश्रेष्ठ है। और उसके बाद कोई अनाज, जैसे गेहूँ या साबुत अनाज। आपकी तरफ जैसा होता हो, वैसा कर सकते हैं; बाकी जो लोग नहीं जानते और नहीं करते, वे ऐसे किया करें। पलाश के पत्तों वाला पत्तल — वह थाली जो शादी-ब्याह में खिलाने के लिए प्रयोग होती है — उस पर अनाज की ढेरी रखिए, और उसके ऊपर यमराज के नाम से चार मुँह वाला दीपक रखिए। उसे धूप, दीप, तिलक आदि कर सकते हैं।
यमराज के दीपक के साथ क्या रखा जाता है?
थोड़ी दक्षिणा और मिठाई, क्षेत्रपाल निकारी की तरह
या केवल अष्टगंध से तिलक करें, और वहाँ उस दीपक के लिए थोड़ी सी दक्षिणा रखें — जैसे हम क्षेत्रपाल निकारी करते हैं; यह लगभग उसी का प्रतिरूप है। वहाँ थोड़ी सी मिठाई रखेंगे। उसके बाद उस दीपक को हाथ में लें।
वक्ता कहते हैं, या उस दीपक को केवल अष्टगंध से तिलक करके वहाँ थोड़ी सी दक्षिणा रखिए — थोड़ी सी, जैसे हम क्षेत्रपाल निकारी करते हैं; यह लगभग उसी का प्रतिरूप है। वहाँ थोड़ी सी मिठाई रखेंगे। उसके बाद उस दीपक को हाथ में लेकर — मंत्र आदि हैं, और यमराज दीपदान आदि के लिए संकल्प है।
यम दीपक हाथ में लेकर कौन सी प्रार्थना की जाती है?
धर्मराज से प्रार्थना कि परिवार में किसी की अपमृत्यु न हो
हाथ में लेकर आप यमराज के निमित्त प्रार्थना करेंगे: हे धर्मराज, हे यमराज, हम सभी पर कृपा करें; इस घर-परिवार में किसी की अपमृत्यु न हो; हम धर्म पथ पर चलें, धर्म से धन का अर्जन करें, और प्राणी मात्र की सेवा करते हुए, धर्म पथ पर चलते हुए, अंत में उच्च लोक की प्राप्ति करें।
वे बताते हैं कि यदि पूरा विधि-विधान और मंत्रों का वर्णन करने लगें, तो फिर कोई कर नहीं पाएगा, और उनके अनुसार यह उचित भी नहीं है — इसलिए कम से कम सामान्य रूप तो कीजिए। जिन्हें मंत्र और विधि-विधान चाहिए, उन्हें कर्मकांड से जुड़े ग्रंथों में मिल जाएँगे, या यदि आप करते आ रहे हैं, तो बहुत अच्छी बात है। वक्ता कहते हैं, तो उसे हाथ में लेकर आप यमराज के निमित्त प्रार्थना करेंगे: हे धर्मराज, हे यमराज, हम सभी पर कृपा करें। इस घर-परिवार में किसी की अपमृत्यु न हो। हम धर्म पथ पर चलें, धर्म से धन का अर्जन करें, और प्राणी मात्र की सेवा करते हुए, धर्म पथ पर चलते हुए, अंत में उच्च लोक की प्राप्ति करें। कहा जाता है कि यही दीपदान करने से मृत्यु के बाद यमराज का कोप नहीं सहना पड़ता; यमराज का भय नहीं होता। उसके स्थान पर धर्मराज देव स्वरूप हैं, और यमराज पितृ स्वरूप हैं।
कौन-कौन से अनाज रखे जा सकते हैं, और अंत में दीपक कहाँ रखा जाता है?
गेहूँ, साबुत उड़द, काला और सफेद तिल; फिर घुमाकर दक्षिण की ओर रखना
अनाज में गेहूँ, साबुत उड़द, काला तिल और सफेद तिल भी रख सकते हैं। इन सबको थाली में साथ रखें, ऊपर दीपक रखें, फिर उसे पूरे घर में घुमाएँ; यमराज के निमित्त प्रणाम करें, और फिर घर से बाहर ले जाकर दक्षिण दिशा की ओर रखें। जहाँ आसपास दक्षिण दिशा नहीं है — घर लाइन से बने हैं — वहाँ घर के सामने ही थोड़ा साइड में रख दें।
वक्ता पूछते हैं, अनाज में हम और क्या-क्या रख सकते हैं? गेहूँ रख सकते हैं, साबुत उड़द रख सकते हैं, काला तिल रख सकते हैं, और सफेद तिल भी रख सकते हैं। इन सबको साथ में उस थाली में रखिए, ऊपर दीपक रखिए, और फिर उसे पूरे घर में घुमाइए। यमराज के निमित्त प्रणाम करेंगे, और फिर घर से निकालकर दक्षिण दिशा की ओर रखा जाता है। अब बहुत से घर ऐसे हैं जिनके आसपास दक्षिण दिशा ही नहीं है — पूरा घर लाइन से है। तो दक्षिण दिशा कहाँ रखेंगे? तब घर के सामने ही थोड़ा साइड में इसे रख दीजिए। इस तरीके से पहले दिन, धनतेरस का, यमराज का दीपदान हुआ।
पाँच दिन का अनुष्ठान करते समय क्या खाना चाहिए?
सात्विक भोजन, लहसुन-प्याज नहीं, और ब्रह्मचर्य
वे कहते हैं, इसमें कोई टेंशन नहीं है। सात्विक खाना खाइए। पाँच दिन लहसुन-प्याज मत खाइए। ब्रह्मचर्य पालन शुरू कीजिए — और कार्तिक में जितना ब्रह्मचर्य रखेंगे, उतना बढ़िया। इसके सिवाय सुबह जितना हो सके सात्विक या कम खाना खाइए, और यदि ऑफिस या जो भी काम है उससे थोड़ा समय मिले, तो थोड़ा सो भी लीजिए, ताकि नींद पूरी हो जाए, क्योंकि रात को जाप करना है।
अब जो लोग अनुष्ठान आरंभ करने वाले हैं, उनके सामने यह प्रश्न आता है: भैया, खाना कैसे खाया जाए? हमें रात में अनुष्ठान करना है, तो क्या दिन भर भूखे रहें, उपवास करें, क्या करें? वक्ता कहते हैं, नहीं भैया, ऐसा कोई टेंशन नहीं है। सात्विक खाना खाइए। पाँच दिन के लिए लहसुन-प्याज मत खाइए। ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन शुरू कर दीजिए — वैसे भी कार्तिक में ब्रह्मचर्य जितना पालेंगे, उतना बढ़िया है। इसके सिवाय सुबह जितना हो सके सात्विक खाना या कम खाना खाइए। यदि थोड़ा समय मिले — ऑफिस या जो भी काम है, उसके अनुसार जितना समय मिल जाए — तो थोड़ा सो भी लीजिए, ताकि आपकी नींद पूरी हो जाए, क्योंकि रात को जाप करना है।
क्या यह सच है कि साधक को दिन में नहीं सोना चाहिए?
केवल तभी, जब आप स्थूल शरीर पर विजय पा चुके हों
वे कहते हैं, एक विषय है कि साधक को दिन में नहीं सोना चाहिए — पर यह शरीर के सामर्थ्य तक ही है: यदि आपने प्राणायाम और योग से शरीर को जागृत कर लिया है और स्थूल शरीर पर विजय पा ली है, तो आप निद्रा पर नियंत्रण पा सकते हैं। नहीं तो यह मत सोचिए कि न दिन में सोएँगे, न रात में, बस रात ढाई बजे से दो-तीन घंटे सोएँगे। सबका शरीर साथ नहीं देगा।
वक्ता कहते हैं, एक विषय है कि साधक को दिन के समय नहीं सोना चाहिए। भैया, शरीर में उतना ही सामर्थ्य है: जितना आपने प्राणायाम और योग से शरीर को जागृत कर लिया है, जितनी स्थूल शरीर पर विजय पा ली है, उतना आप निद्रा पर नियंत्रण पा सकते हैं। अब आप सोचें कि दिन में भी नहीं सोएँगे, रात को जप करेंगे, रात ढाई बजे से दो-तीन घंटे सो जाएँगे और मेरी नींद पूरी हो जाएगी — तो सबका शरीर साथ नहीं देगा। वे कहते हैं, अपने लिए बीमारी मत पैदा कीजिए। हाई ब्लड प्रेशर हो जाएगा। उसके चलते पचास प्रॉब्लम होने लगेंगी। मस्तिष्क की नसों में दिक्कत होने लगेगी। नींद पूरी न होने से कई सारी प्रॉब्लम शुरू हो जाती हैं। साधना के चक्कर में यह सब निमंत्रण मत दीजिए। यह तब करना चाहिए जब शरीर समर्थ हो।
क्या शरीर रात वाली दिनचर्या में ढल नहीं जाएगा?
ढल जाता है — जैसे नवरात्रि में, दो-तीन दिन बाद
वे कहते हैं, ढल जाता है, और नवरात्रि का उदाहरण देते हैं: शुरू के दो-तीन दिन हालत खराब रहती है, और शरीर को एडजस्ट होने में दो-तीन दिन लगते हैं; उसके बाद वह उसी अनुरूप में पूरा हो जाता है — कब सोना है, कब जागना है, कब क्या करना है। नवरात्रि पूरी होने पर फिर नॉर्मल होने में दो-तीन दिन लगते हैं; नींद ही नहीं आती। ठीक उसी प्रकार, जब आप नियम बनाकर साधना शुरू करेंगे, तो आपका शरीर एडजस्ट कर लेगा।
वक्ता कहते हैं, दूसरे लोग कहेंगे कि तुम्हें सिद्धि इस-उस कारण से नहीं मिल रही — यह तो वे भी कहते हैं — पर इसका मतलब यह नहीं कि जान दे देंगे। जान नहीं देनी है। शरीर के सामर्थ्य के अनुसार कीजिए। बाद में साधना करते-करते जब आप परिपक्व होने लगते हैं, मैच्योरिटी आने लगती है, तो शरीर भी उसी अनुरूप ढल जाता है। वे कहते हैं, आप खुद देखिए। आप नवरात्रि की साधना करते हैं; वे भी कहते हैं कि शुरू के दो-तीन दिन हालत खराब रहती है। शरीर को एडजस्ट करने में दो-तीन दिन लगते हैं। उसके बाद वह उसी अनुरूप में पूरा हो जाता है: कब सोना है, कब जागना है, कब कैसे क्या करना है। हम रात भर जागते हैं, दिन में दो-तीन घंटे सोते हैं, भोर में थोड़ा सोते हैं, ढाई बजे सोकर पाँच बजे तक उठ जाते हैं, फिर पूरा दिन चलता है, दोपहर में फिर एक-दो घंटे सो लेते हैं, फिर रात भर जागना है, शाम को सब कुछ करना है। तो शरीर एडजस्ट कर लेता है। नवरात्रि जब पूरी होती है, उसके बाद फिर नॉर्मल होने में भी दो-तीन दिन लग जाते हैं — नींद ही नहीं आती। ठीक उसी प्रकार, जब आप एक नियम बनाकर साधना शुरू करेंगे, तो आपका शरीर एडजस्ट कर लेगा; फिर उसी अनुसार दिन में मत सोइए, या कम सोइए, या रात को कम सोइए। वह हो जाएगा। पर एकाएक जान नहीं दे देनी है।
अनुष्ठान के दिनों में भोजन कब करना चाहिए?
रात की साधना पूरी होने के बाद, पहले नहीं
रात को साधना पूरी कर लेने के बाद फिर से खाना खाकर सो जाइए। साधना से पहले खाना खाएँगे तो नींद आएगी। इसलिए साधना पूरी करने के बाद खाइए — आप जो भी साधना कर रहे हों, चाहे वह कालिका योगिनी हो, महाभैरव हो या अन्य।
वक्ता कहते हैं, तो पहली चीज तय हो गई। धनतेरस को लेकर आप इस प्रकार पूजन करेंगे, और खाने-पीने का यह ध्यान आपको रखना है। रात को जब आप साधना पूरी कर लेते हैं, उसके बाद फिर से अपना खाना खाकर सो जाइए। साधना से पहले खाना खाएँगे तो नींद आएगी। इसलिए साधना पूरी करने के बाद खाइए — आप जो भी साधना कर रहे हों, चाहे वह कालिका योगिनी हो, महाभैरव हो या अन्य।
शाबरी विद्या से जुड़ी साधनाओं के लिए गौ पूजन और भी ज्यादा आवश्यक है
शाबरी विद्या के लिए गौ पूजन और भी ज्यादा आवश्यक है
शाबर मंत्र की साधना करने वालों से वे कहते हैं कि विशेष ध्यान रखें: शाबरी विद्या से जुड़ी साधनाओं के लिए गौ पूजन और भी ज्यादा आवश्यक है, क्योंकि गौ माता से जुड़े अनेकों प्रयोग होते हैं। विशेषकर जो लोग शाबर मंत्र की साधनाएँ करने वाले हैं, वे गोवत्स द्वादशी का बताया गया प्रयोग जरूर करें।
वक्ता कहते हैं, जो लोग शाबर मंत्र की साधना कर रहे हैं — शाबर मंत्र की साधना; सिद्ध शाबरी विद्या चैनल पर इतने सारे विधि-विधान दिए गए हैं। यदि आप मन से उसमें आगे बढ़ रहे हैं, यदि शाबर विद्या से जुड़ी कोई साधना कर रहे हैं, तो विशेष ध्यान रखिए कि शाबरी विद्या से जुड़ी साधनाओं के लिए गौ पूजन और भी ज्यादा आवश्यक है — क्योंकि गौ माता से जुड़े अनेकों-अनेक प्रयोग होते हैं। वे कहते हैं, गोवत्स द्वादशी का जो प्रयोग बताया गया है, उसे जरूर कर लीजिए — विशेषकर वे लोग जो शाबर मंत्र की साधनाएँ करने वाले हैं।
नारियल वाला दीपदान क्या है और कितने दिन करना चाहिए?
गड़ी वाला नारियल काटकर उसमें एक सौ आठ बातियाँ
नारियल से जुड़ा दीपदान — गड़ी वाले नारियल को काटकर उसमें एक सौ आठ बातियाँ डालकर, कुलदेव, कुलदेवी, कुलदेवता और कुलभैरव के निमित्त, और लक्ष्मी जी के निमित्त — वह विधि आप पाँच दिन विशेष रूप से करें। यदि आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, तो वे कहते हैं कि एक गड़ी लगभग पचास रुपये का मिलता है, तो एक दिन का खर्च लगभग ढाई सौ रुपये होगा।
वक्ता कहते हैं, अब नारियल से जुड़ा दीपदान: गड़ी वाले नारियल को काटकर, उसमें एक सौ आठ बातियाँ डालकर, कुलदेव, कुलदेवी, कुलदेवता, कुलभैरव के निमित्त, और लक्ष्मी जी के निमित्त — इन सबके दीपदान की जो विधि बताई गई है। वह आप पाँच दिन विशेष रूप से करें। यदि आप आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं — हालाँकि उन्हें लगता है कि एक गड़ी पचास रुपये का मिलता है, तो एक दिन का खर्च ढाई सौ रुपये होगा। फिर भी मान लेते हैं कि तेल और बाकी सब लेकर खर्च ज्यादा हो रहा है, और आपकी इतनी इनकम नहीं है कि पाँच दिन में दो-ढाई हजार या तीन हजार रुपये खर्च कर पाएँ। तो मत कीजिए; कम से कम एक दीपक तो जरूर जलाइए, धनतेरस को भी। और उसी में सबका नाम ले लीजिए: कि हम यह दीपदान समस्त देवी-देवताओं के लिए कर रहे हैं। कुल की शक्तियों, कुल के देवी-देवताओं, भैरव जी, सबका स्मरण कर लीजिए। उसी में धूप, दीपदान, अष्टगंध तिलक आदि करके, सबका नाम स्मरण करके, धनतेरस को अपने पूजन स्थान पर जला दीजिए।
नारियल वाला दीपदान किन दिनों जरूरी है, और यम तर्पण क्या है?
चौदस और अमावस्या का दीपदान, और यमराज का तर्पण
चौदस को और अमावस्या को — कम से कम ये दो दिन — पाँच-पाँच गड़ी का दीपदान अच्छे से कीजिए; यानी ढाई-ढाई नारियल, तो पाँच नारियल में दो दिन हो जाएँगे। ये दो दिन जरूर करने हैं; दीपदान जरूर-जरूर होना चाहिए। फिर यम तर्पण की विधि भी है, जिसमें यमराज का तर्पण किया जाता है।
वक्ता कहते हैं, पर चौदस को और अमावस्या को, कम से कम ये दो दिन, पाँच-पाँच गड़ी का दीपदान अच्छे से कीजिए। यानी ढाई-ढाई नारियल लगेंगे; पाँच नारियल में ये दो दिन हो जाएँगे। तो ये दो दिन तो जरूर करने हैं। दीपदान जरूर-जरूर होना चाहिए। अब यम तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। की विधि भी है। यमराज का तर्पण किया जाता है। वे कहते हैं, आजकल वे एक और चीज देख रहे हैं: कि तर्पण को लेकर लोगों ने इसे बहुत सरल कर दिया है — कि तर्पण सभी करें, कि जिनका यज्ञोपवीत नहीं है वे भी तर्पण कर सकते हैं, और यह सब विषय चल रहा है। तो इसमें उनका अपना मानना है कि यदि आप यज्ञोपवीत नहीं पहनते, तो तर्पण का ऐसा कोई नियम है ही नहीं। अब आप न मानें, या प्रमाण दे दें कि नहीं, ऐसा तो कहीं वर्णन ही नहीं है — वह आपकी इच्छा।
यम तर्पण कैसे और किन दिनों किया जाता है?
यमराज के बारह नाम, दक्षिण की ओर मुख, शाम के समय
यदि आप यज्ञोपवीत पहनते हैं, जनेऊ हुआ है, तो यम तर्पण कीजिए। विधि आती हो तो अच्छा है; नहीं तो यमराज के बारह नामों से तर्पण होता है। सफेद तिल और काला तिल डालकर, जनेऊ को गले में कंठी जैसा बनाकर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, पवित्री आदि और सफेद वस्त्र धारण करके, शाम के समय तर्पण किया जाता है। यह पाँचों दिन होता है, पर धनतेरस, चौदस और अमावस्या को जरूर करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं, यदि आप यज्ञोपवीत पहनते हैं, जनेऊ हुआ है — तो यम तर्पण कीजिए। आपको विधि आती होगी, तो बढ़िया है; नहीं तो यमराज के बारह नामों से तर्पण होता है। सफेद तिल और काला तिल डालकर, अपने जनेऊ को गले में कंठी जैसा बनाकर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, पवित्री आदि धारण करके, और एक सफेद वस्त्र पहनकर — उसके बाद शाम के समय तर्पण होता है। हालाँकि यह पाँचों दिन किया जाता है, पर धनतेरस के दिन और चौदस के दिन, ये दो दिन जरूर करना चाहिए; धनतेरस, चौदस और अमावस्या, ये तीन दिन जरूर करना चाहिए। सामान्य रूप से यह पाँच दिन का होता है, तेरस से लेकर द्वितीया तिथि तक, भाई दूज तक। तो जो अधिकृत हैं, वे करें। बाकी लोगों का यमराज के निमित्त दीपदान तो हो ही रहा है, तो भगवान उससे भी प्रसन्न होंगे।
चतुर्दशी पर पहला पूजन किसका है?
हनुमान जी — दक्षिण की मान्यता में यह उनकी जयंती है
चतुर्दशी तीसरा दिन है; प्रदोष व्यापिनी चतुर्दशी 11 नवंबर को है, और चौदस का पूजन उसी दिन करना है। चौदस के पूजन में शाम का सबसे पहला पूजन हनुमान जी का है। दक्षिण के मंत्र के अनुसार और कल्प भेद के अनुसार इस दिन हनुमान जयंती मानी जाती है — दक्षिण में हनुमान जी की जयंती चैत्र पूर्णिमा को न मानकर कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को मानते हैं। इसलिए उस दिन सभी जरूर हनुमान जी का पूजन करें।
वक्ता कहते हैं, चतुर्दशी का दिन — यह तीसरा दिन है। प्रदोष व्यापिनी चतुर्दशी 11 नवंबर को है, तो चौदस का जो पूजन होने वाला है, वह इसी दिन करना है। चौदस के पूजन में सबसे पहला पूजन, जो शाम का है, वह हनुमान जी का है। दक्षिण के मंत्र के अनुसार और कल्प भेद के अनुसार इस दिन हनुमान जयंती मानी जाती है। दक्षिण की ओर हनुमान जी की जयंती चैत्र पूर्णिमा को न मानकर कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को मानते हैं। तो इस दिन सभी जरूर हनुमान जी का पूजन करें। वे कहते हैं, यह बात याद रखिए।
हनुमान जी का पूजन कैसे किया जाता है?
मंदिर में चोला — और स्त्रियाँ स्वयं नहीं चढ़ातीं
इसके लिए कोई बहुत विशेष विधि-विधान नहीं है। चतुर्दशी के दिन शाम को या सुबह, नहा-धोकर सबसे पहले हनुमान जी के मंदिर जाइए। संकल्प करके चोला चढ़वाइए, या यदि स्वयं चढ़ाने की व्यवस्था हो, तो स्वयं चढ़ा दीजिए। स्त्रियाँ स्वयं चोला नहीं चढ़ाएँगी — वे पंडित जी से संकल्प करवाकर चढ़वा देंगी।
वक्ता पूछते हैं, अब हनुमान जी का पूजन किस प्रकार करना है? हनुमान जी का पूजन करने के लिए कोई बहुत विशेष विधि-विधान नहीं है। चतुर्दशी के दिन शाम के समय या सुबह के समय, नहा-धोकर, सबसे पहले हनुमान जी के मंदिर जरूर जाइए। संकल्प करके चोला चढ़वा दीजिए, या यदि वहाँ स्वयं चढ़ाने की व्यवस्था हो, तो स्वयं चढ़ा दीजिए। स्त्रियाँ स्वयं चोला नहीं चढ़ाएँगी। वे पंडित जी को बोलकर, संकल्प करवाकर, चढ़वा देंगी। और उसके बाद पीपल का पत्ता, या पान का पत्ता, जो उनके अनुसार सर्वश्रेष्ठ है।
धनतेरस पर कुबेर को पान पत्ते के साथ क्या चढ़ाया जाता है?
पान के तेरह बीड़े — यक्षों को तांबूल बहुत पसंद है
वे एक भूली हुई बात याद करते हैं: यक्षराज कुबेर के पूजन में पान पत्ते का प्रयोग जरूर करें — यक्षों को तांबूल, पान, बहुत पसंद है। तो बीड़ा चढ़ा सकते हैं: पान के तेरह बीड़े, या पान पत्ते पर लौंग, इलायची, सुपारी और कुछ मीठा भोग प्रसाद रखकर, धनतेरस के दिन यक्षराज कुबेर के निमित्त तेरह जगह भोग लगाएँ। बाद में सारे बीड़ों का विसर्जन करना है — खुद मत खाने लगिए, हालाँकि लौंग और इलायची प्रयोग कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं, हाँ — यक्षराज कुबेर के पूजन में पान पत्ते का प्रयोग जरूर कीजिए; यह बोलना वे भूल गए थे। यक्षों को तांबूल, पान, बहुत पसंद है। तो आप बीड़ा चढ़ा सकते हैं: पान के तेरह बीड़े, या पान पत्ते पर लौंग, इलायची, सुपारी और कुछ मीठा भोग प्रसाद रखकर, धनतेरस के दिन तेरह जगह यक्षराज कुबेर के निमित्त भोग लगाइए। और बाद में उसका क्या करेंगे? सारे बीड़ों का विसर्जन करना है। खुद मत खाने लगिए। लोग बीड़ा प्रसाद में खा लेते हैं — वे कहते हैं, देखिए, वह डिपेंड करता है। पर लौंग और इलायची आप यूज कर सकते हैं। सुपारी को काटकर पान में डालकर नहीं खाना है, न पान पत्ता खाना है — ध्यान रखिए। इन दोनों चीजों का विसर्जन कर देना चाहिए; लौंग और इलायची आप खा सकते हैं।
हनुमान जी के लिए पान पत्तों पर क्या लिखा जाता है?
नारंगी सिंदूर से राम लिखे ग्यारह पान पत्ते
हनुमान जी के लिए ग्यारह पान पत्ते होते हैं, जिन पर — जैसा हम बार-बार कहते हैं — राम लिखना है। नारंगी सिंदूर को चमेली के तेल में, या देसी घी में मिलाकर, जिस उंगली से हम तिलक करते हैं — कनिष्ठिका के बगल वाली छोटी उंगली, जिसमें लोग सगाई की अंगूठी पहनते हैं — उससे हर पान पत्ते पर राम लिखिए: र में आकार और ऊपर बिंदु।
वक्ता कहते हैं, हनुमान जी के लिए पान पत्ता ही — ग्यारह पान पत्ते, जिन पर हम बार-बार कहते हैं कि राम लिखना है। चमेली के तेल में ऑरेंज वाला, नारंगी सिंदूर मिलाइए, या देसी घी में मिलाइए; और जिस उंगली से हम तिलक करते हैं — कनिष्ठिका के बगल वाली छोटी उंगली, जिसमें लोग सगाई की अंगूठी पहनते हैं — उसी उंगली से उस पर राम लिखिए। राम कैसे लिखना है? र में आकार और ऊपर बिंदु। राम ऐसे लिखना है। सभी पान पत्तों पर; और लाल कलावे से बाँधकर माला बनाएँगे — जैसे हम तोरण बनाते हैं, वैसी गोल, बढ़िया, सुंदर सी माला — और उस दिन हनुमान जी को चढ़ाई जाएगी।
हनुमान जी को कौन से दीपक और भोग चढ़ाए जाते हैं?
पांच लड्डू, पांच तुलसी पत्ते और आटे के पांच एक मुंह वाले दीपक
कम से कम पांच लड्डू, पांच तुलसी पत्ते, और जो दीपक जलाया जाता है वह पांच अनाज या सात अनाज का होता है। अगर यह न कर सकें तो आटे का दीपक जलाइए। आटे के पांच दीपक बनाइए, एक ही मुंह वाले। हनुमान जी के लिए पांच मुंह या चार मुंह वाला नहीं बनाना है। इन्हें हनुमान जी के मंदिर ले जाइए। सरसों तेल या देसी घी, किसी से भी जला सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि कम से कम पांच लड्डू, पांच तुलसी पत्ते, और जो दीपक जलाया जाता है वह पांच अनाज या सात अनाज का होता है। अगर आप यह न कर सकें तो आटे का दीपक जलाइए। आटे के पांच दीपक बनाइए, एक ही मुंह वाले। हनुमान जी के लिए पांच मुंह या चार मुंह वाला दीपक नहीं बनाना है। एक मुंह वाले ही पांच दीपक बनाकर हनुमान जी के मंदिर ले जाइए। सरसों तेल या देसी घी, किसी से भी जला सकते हैं। हनुमान जी के निमित्त दीप दान कर सकते हैं। दीपक कभी भूमि पर नहीं रखना है। फूल की पंखुड़ियां फैलाकर उस पर रख सकते हैं। या आटा, हल्दी, रोली ले जाइए, उससे छोटी सी रंगोली बनाइए, और उस पर रखकर दीप जलाइए। तो हनुमान जी का पहला पूजन आप मंदिर में करेंगे। चाहें तो रामनामी वस्त्र, जो भी वस्त्र हनुमान जी को चढ़ता है, वह चढ़ा सकते हैं। और धोती भी चढ़ा सकते हैं।
उस दिन हनुमान जी के कौन से अनुष्ठान दोहराए जा सकते हैं?
हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान साठिका, बड़वानल और साबर रूप
हनुमान जी के निमित्त अब तक जो भी अनुष्ठान आपने किया है — हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान साठिका, बड़वानल, या कोई और साबर मंत्र, जंजीरा या उनका पंजर, जो सब दिए गए हैं — अगर आपने ये किए हैं, तो चाहें तो उस दिन उसका जाप और पुरश्चरण कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि विशेष करके, हनुमान जी के निमित्त अब तक जो भी अनुष्ठान आपने किया है — चाहे हनुमान चालीसा का, बजरंग बाण का, हनुमान साठिका का, या बड़वानल का, या और साबर मंत्र आदि, जंजीरा, या उनका पंजर, जो सब दिए गए हैं — अगर आपने ये सब किए हैं। तो चाहें तो उस दिन उसका जाप और पुरश्चरण कर सकते हैं।
शत्रु और अभिचार से परेशान व्यक्ति क्या शुरू करे?
चतुर्दशी से भैरव जयंती तक — हनुमान जी का पंजर
जिनकी समस्या शत्रु और अभिचार से जुड़ी है, और जो अभी कोई साधना नहीं कर रहे, वे चतुर्दशी के दिन से — 11 नवंबर, शनिवार को पड़ने वाली चौदस से — शुरू करके कम से कम 5 दिसंबर, भैरव जयंती तक करें। अगर बिल्कुल नई साधना, खासकर साबर से जुड़ी विशेष साधना शुरू करनी है, तो सिद्ध साबरी विद्या चैनल पर दिया गया हनुमान जी का पंजर है। वे कहते हैं कि इसका लिंक इस चैनल पर और ग्रुप में शेयर करेंगे। यह अभिचार नाश के लिए, शत्रुओं के अभिचार और षड्यंत्र से रक्षा के लिए, और शत्रु नाश के लिए भी अति तीव्र प्रभावी है।
वक्ता कहते हैं कि जिन लोगों की समस्या शत्रु और अभिचार से जुड़ी है, वे चतुर्दशी के दिन से — 11 नवंबर को पड़ने वाली चौदस, उस शनिवार से — शुरू करें, और कम से कम 5 दिसंबर, भैरव जयंती तक करें, अगर अभी तक कोई साधना नहीं कर रहे हैं। वे फिर कहते हैं कि अगर पहले से कोई साधना कर रहे हैं, तो वही करते रहिए। लेकिन अगर बिल्कुल नई साधना शुरू करनी है, और खासकर साबर से जुड़ी विशेष साधना करनी है, तो हनुमान जी का यह पंजर, जो सिद्ध साबरी विद्या चैनल पर दिया गया है — वे कहते हैं कि इसका लिंक इस चैनल पर और ग्रुप में भी शेयर करेंगे — चाहें तो इसका अनुष्ठान उठा सकते हैं। यह अभिचार आदि के नाश के लिए, शत्रुओं के अभिचार और षड्यंत्र से रक्षा के लिए, और शत्रु नाश के लिए भी अति तीव्र प्रभावी है। तो इस दिन से शुरू करके आप यह अनुष्ठान कर सकते हैं।
पहले से शुरू की हुई साधना दोहराएं; नई साधना गुरु-गणपति की बुनियादी साधना के बाद ही
जो शुरू किया है वही दोहराएं — नई साधना गुरु-गणपति की बुनियादी साधना के बाद ही
वे फिर कहते हैं कि अगर पहले से कोई साधना कर रहे हैं, तो उसी को दोहराइए। रक्षात्मक साधना अगर नहीं की है, तो कर सकते हैं। बहुत लोग गणपति जी की साधना करते आए हैं, संकट नाशन किया है, दत्तात्रेय महाराज का एकाक्षरी जाप किया है। जब गुरु और गणपति की उनकी बुनियादी, आरंभिक साधना पूरी हो जाए, तब भैरव जी या हनुमान जी की साधना करनी है। दोनों में से कोई भी द्वादशी से या चतुर्दशी से शुरू कर सकते हैं। उनके अनुसार अभी हनुमान जी का पंजर करना चाहिए, जो सबसे तीव्र है। चाहें तो बड़वानल भी कर सकते हैं।
वक्ता दोहराते हैं कि हम फिर कहेंगे: अगर आप पहले से कोई साधना कर रहे हैं, तो उसी को दोहराइए। रक्षात्मक साधना अगर नहीं की है, तो कर सकते हैं। जैसे बहुत लोग गणपति जी की साधना करते आए हैं, अभी संकट नाशन किया है, दत्तात्रेय महाराज का एकाक्षरी जाप आदि किया है। तो उनकी बुनियादी साधना, गुरु और गणपति की आरंभिक साधना पूरी हो गई। अब इसके बाद भैरव जी की साधना करनी है, या हनुमान जी की साधना करनी है। तो अगर भैरव जी की साधना करने की इच्छा है, तो शुरू कर दीजिए। द्वादशी से कर सकते हैं, चतुर्दशी से कर सकते हैं। या अगर आप चाहते हैं कि नहीं, हम हनुमान जी की साधना करेंगे, तो उनकी साधना भी इसी दिन से शुरू कर सकते हैं। उनके अनुसार अभी आपको हनुमान जी का पंजर करना चाहिए, जो सबसे तीव्र है। चाहें तो बड़वानल भी कर सकते हैं।
चतुर्दशी की शाम को घर पर क्या किया जाता है?
घर पर हनुमान पूजन, हवन और चौदह दीपक
मंदिर के बाद शाम को घर पर हनुमान जी का पूजन करें। हवन आदि करने की इच्छा हो तो उपवास रखकर शाम को हवन करें, और हवन के बाद खा सकते हैं। ऐसा उपवास पूरी तरह ज़रूरी नहीं है। अगर आप उपवास नहीं रखते आए हैं, तो इस साल पहली बार मत रखिए, क्योंकि अगले दिन दीपावली के पूजन में उपवास रखना पड़ेगा। घर में हनुमान जी के सामने घी के पांच दीपकों का दीप दान अलग से ज़रूर करें। और चतुर्दशी के दिन चौदह दीपक एक साथ जलाकर घर में अलग-अलग जगह सजाने चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि चतुर्दशी के दिन, चौदस के दिन, 11 नवंबर को, सबसे पहले हनुमान जी का पूजन होता है। उसके बाद शाम के समय घर में हनुमान जी का पूजन करें। हवन आदि करने की इच्छा हो, तो उपवास रखकर शाम को हवन करें। हवन के बाद आप खा सकते हैं। ऐसा उपवास रखना पूरी तरह ज़रूरी नहीं है। चाहें तो रख सकते हैं, क्योंकि अगले दिन दीपावली के पूजन में उपवास रखना पड़ेगा। तो अगर आप उपवास नहीं रखते, नहीं रखते आए हैं, और इस साल पहली बार कर रहे हैं, तो उपवास मत रखिए। शाम के पूजन के बाद खाना खा लीजिए। तो शाम को घर में हनुमान जी का पूजन, और हनुमान जी के सामने पांच दीपकों का, घी के दीपकों का दीप दान घर में ज़रूर करें, अलग से हनुमान जी के लिए। आपकी बाकी पूजा और साधना जो चल रही है, वह साथ में चलती रहेगी। और चतुर्दशी के दिन चौदह दीपक एक साथ जलाकर घर में अलग-अलग जगह सजाने चाहिए। हनुमान जी के पांच दीपक इनमें शामिल मत कीजिए। पर वे कहते हैं कि अगर आर्थिक क्षमता नहीं है, तो कोई दिक्कत नहीं, वे पांच भी शामिल कर लीजिए। वे पांच दीपक पूजा स्थान में हनुमान जी के पास ही रहने दीजिए, और बाकी नौ दीपकों से घर में अलग-अलग जगह सजा दीजिए — सब देवी-देवताओं के पास, देव स्थान आदि पर।
चतुर्दशी की रात को क्या किया जाता है?
फिर से यमराज का दीप दान, और काली चौदस पर काली जी का जाप
उसके बाद यमराज का दीप दान है — फिर से आप यमराज का दीप दान करेंगे। और चतुर्दशी की रात को, जो भी अनुष्ठान आप पहले से कर रहे हैं या शुरू कर रहे हैं — मान लीजिए आप काली जी का पूजन करते हैं, काली जी की साधना और अनुष्ठान कर रहे हैं — तो चतुर्दशी की रात उनका जाप ज़रूर करें। काली चौदस है, तो उस दिन उनका जाप ज़रूर होगा।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद यमराज का दीप दान है — आप फिर से यमराज का दीप दान करेंगे। चतुर्दशी की रात को, जो भी अनुष्ठान आप पहले से कर रहे हैं, या शुरू कर रहे हैं — मान लीजिए आप काली जी का पूजन करते हैं, काली जी की साधना और अनुष्ठान कर रहे हैं — तो चतुर्दशी की रात उनका जाप ज़रूर करें। काली चौदस है, तो उस दिन उनका जाप ज़रूर होगा।
अगर मैं कोई साधना नहीं कर रहा और उलझन में हूं तो क्या करूं?
धनतेरस या काली चौदस से भाई दूज तक एक बहुत छोटा सा अभ्यास
अगर आप कोई साधना नहीं कर रहे, कर पाने में सक्षम नहीं हैं, बैठने का उतना सामर्थ्य नहीं है, या अभी बहुत कंफ्यूज हैं — कंफ्यूजन ज़रूरत से ज़्यादा है और इच्छा ही नहीं होती — तो वे एक बहुत छोटा सा काम बताते हैं। धनतेरस के दिन से, नहीं तो काली चौदस से शुरू करके कम से कम भाई दूज तक कीजिए। तीन दिन करना चाहें, तो चौदस, अमावस्या और प्रतिपदा — इतना कर लीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप कोई साधना नहीं कर रहे, कोई साधना करने में सक्षम नहीं हैं, बैठने का उतना सामर्थ्य नहीं है, या अभी बहुत कंफ्यूज हैं, इच्छा ही नहीं होती, कंफ्यूजन ज़रूरत से ज़्यादा है — तो सामान्य साधना के लिए वे आपको एक बहुत छोटा सा काम बता रहे हैं, वह कर लीजिए। धनतेरस के दिन से, नहीं तो काली चौदस से शुरू करके कम से कम भाई दूज तक कीजिए। कम से कम इतने दिन कर लीजिए। तीन दिन करना चाहें, तो चौदस, अमावस्या और प्रतिपदा — इतना कर लीजिए।
उस छोटे अभ्यास में खाने और समय के क्या नियम हैं?
सामान्य खाना खाएं, गर्म पानी से नहाएं, और रात करीब नौ बजे बैठें
इसमें आपको रात के समय काम करना है। खाने-पीने की कोई चिंता नहीं करनी है — बिल्कुल खाना खाइए। बस थोड़ी ठंड लगे, तो शाम को नहाने से पहले पानी गर्म करके नहा लीजिए। चतुर्दशी की शाम या रात करीब नौ बजे, या अगर घर में गार्जियन से अनुमति है और आपस में लड़ाई-झगड़े जैसी कोई समस्या नहीं है, तो देर रात भी यह काम कर सकते हैं — चौदस के निश्चित व्यापम में, महानिश्चित व्यापम में, महानिशीथ काल में।
वक्ता कहते हैं कि इसमें आपको क्या करना है: यह काम रात के समय करना है। इसमें खाने-पीने की कोई चिंता नहीं करनी है — कि हम खाना खाएं या नहीं। बिल्कुल खाना खाइए। बस अगर थोड़ी ठंड लग रही हो, तो शाम को नहाने से पहले पानी गर्म करके अच्छे से नहा लीजिए। और चतुर्दशी की शाम या रात करीब नौ बजे — बहुत देर रात भी, अगर घर में गार्जियन से अनुमति है और आपस में लड़ाई-झगड़े जैसी कोई समस्या नहीं है, तो रात को भी यह काम कर सकते हैं। चौदस के निश्चित व्यापम में, महानिश्चित व्यापम में, महानिशीथ काल में।
क्या इसके लिए काली जी की छवि ज़रूरी है?
छोटा सा छाया चित्र या श्री विग्रह चलेगा, पर ज़रूरी नहीं
इसमें आपको भगवती काली जी का पूजन करना है। काली जी का कोई छोटा सा छाया चित्र या उनका श्री विग्रह आदि हो तो भी चलेगा, और न हो तो भी कोई दिक्कत नहीं। चाहें तो नया इंतज़ाम करके रख सकते हैं — रखकर करेंगे तो बढ़िया है, अच्छा है, आपके भाव ज़्यादा बनेंगे; पर उसके बिना भी चलेगा।
वक्ता कहते हैं कि इसमें आपको भगवती काली जी का पूजन करना है। काली जी का कोई छोटा सा छाया चित्र, या उनका श्री विग्रह आदि हो, तो भी चलेगा। और न हो, तो भी कोई दिक्कत नहीं है। चाहें तो नया इंतज़ाम करके रख सकते हैं, नहीं तो आपको ऐसी कोई ज़रूरत नहीं है। रखकर करेंगे तो बढ़िया है, अच्छा है, आपके भाव ज़्यादा बनेंगे। नहीं तो भी चलेगा।
काली चौदस की रात का अभ्यास क्या है?
काली चालीसा का पाठ और भगवती काली के लिए सोलह दीपक
इसमें काली चालीसा का पाठ करना है। वे कहते हैं कि इसकी पूरी बृहद विधि, पूरा विधि विधान अलग बात है — वह काली जी की नित्याओं के साथ का पूजन है। पर सोलह दीपक जलाने होते हैं, भगवती काली के निमित्त। काली जी की सोलह नित्याएं हैं, और सोलह के सिवाय भी अन्य नित्याएं हैं जो महानित्याओं में आती हैं। उतना न करके आपको केवल इतना करना है।
वक्ता कहते हैं कि इसमें करना यह है कि काली चालीसा का पाठ करना है। वैसे इसकी पूरी बृहद विधि, पूरा विधि विधान अलग है — वह काली जी की नित्याओं के साथ का पूजन है। लेकिन सोलह दीपक जलाने होते हैं, भगवती काली के निमित्त। अब काली जी की सोलह नित्याएं हैं, और भी बहुत सी हैं — यानी सोलह नित्याओं के सिवाय भी अन्य नित्याएं हैं, जो महानित्याओं में आती हैं। तो उतना न करके, आपको केवल इतना करना है: चतुर्दशी के दिन शाम के समय किसी भी काली मंदिर में जाएंगे और वहां सामान्य पूजन करेंगे। या यह काम सुबह भी कर सकते हैं।
काली मंदिर में क्या लेकर जाऊं?
सत्ताईस नींबू की माला, मिठाई, और घर से अक्षत
कम से कम सत्ताईस नींबू की माला ज़रूर बनाइए। नींबू और फूल मिलाकर भी बना सकते हैं। नहा-धोकर माला बनाइए, थोड़ी मिठाई लीजिए, और ऐसे पूजन के लिए मंदिर जाते समय घर से अक्षत ज़रूर ले जाइए। अक्षत यानी अखंडित चावल, पीले रंग में रंगे, पीले कपड़े में या किसी कटोरी या बर्तन में। पहले उसे अपने पूजा स्थान पर रखिए, प्रणाम कीजिए, और भगवती के मंदिर ले जाइए।
वक्ता कहते हैं कि कम से कम सत्ताईस नींबू की माला ज़रूर बना लीजिए। नींबू और फूल मिलाकर भी बना सकते हैं। नहा-धोकर माला बनाइए, और थोड़ी मिठाई लीजिए। जब इस तरह के पूजन के लिए मंदिर जा रहे हों, तो घर से अक्षत ज़रूर ले जाना चाहिए। अक्षत मतलब क्या? अखंडित चावल, पीले रंग से रंगे हुए, पीले कपड़े में या किसी कटोरी या किसी बर्तन में। पहले उसे अपने पूजा स्थान पर रखेंगे, प्रणाम करेंगे, और भगवती के मंदिर ले जाएंगे।
मंदिर में क्या किया जाता है?
दो दीपक, और नाम-गोत्र बताकर माला व अक्षत पुजारी को देना
सबसे पहले वहां दीप दान करें — मंदिर में कम से कम दो दीपक जलाने हैं। फिर भगवती काली के जो भी पुजारी वहां हों, उन्हें अपना नाम और गोत्र बताकर दीजिए, कि मेरे नाम-गोत्र से भगवती का पूजन कर दीजिए और यह अक्षत भगवती के श्री चरणों में समर्पित कर दीजिए। वे भगवती को माला पहनाएंगे, अक्षत चढ़ाएंगे, भोग लगाएंगे। पुजारी जी जो भी प्रसाद और उसमें रखे फूल लौटाएं — फूल, बेलपत्र, जो भी भगवती के श्री चरणों से मिले — उसे लाकर अपने पूजा स्थान पर रखना है।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले वहां दीप दान करेंगे। मंदिर में कम से कम दो दीपक जलाने हैं। फिर भगवती काली के जो भी पुजारी वहां हों, उन्हें दे देना है, और अपना नाम-गोत्र बता देना है: कि मेरे नाम-गोत्र से भगवती का पूजन कर दीजिए, और यह अक्षत भगवती के श्री चरणों में समर्पित कर दीजिए। तो वे भगवती को माला पहना देंगे, अक्षत चढ़ा देंगे, भोग आदि लगा देंगे। और पुजारी जी जो भी प्रसाद, और प्रसाद में कुछ फूल आदि रखकर वापस देंगे, वह आपको साथ लाना है। फूल, बेलपत्र, जो भी भगवती के श्री चरणों से मिले, उसे अपने पूजा स्थान पर रख दीजिए।
रात में सोलह दीपक कैसे सजाए जाते हैं?
रोली की ढेरियां, मिट्टी के दीपक, डबल बाती, सरसों तेल और पांच काली मिर्च
रात में सोलह दीपक जलाने हैं। रोली लीजिए — ढाई सौ ग्राम या दो सौ ग्राम का पैकेट, क्योंकि तीनों दिन रोली अच्छी मात्रा में लगेगी। पूजा स्थान पर नीचे रोली की सोलह ढेरियां बनाइए, और हर ढेरी पर एक-एक दीपक सजाइए। मिट्टी के दीपक ले सकते हैं; मिट्टी के हों तो हर दिन नया दीपक लीजिए। एक बार में पांच दर्जन तक ले लीजिए, दीपावली में तो ज़रूरत पड़ेगी ही। हर एक में रुई की बाती डालिए — सब में डबल बाती, सब में सरसों का तेल, और हर एक में पांच काली मिर्च ज़रूर। लौंग या इलायची नहीं डालनी है, केवल काली मिर्च।
वक्ता पूछते हैं कि दीपक कैसे जलाएंगे? रोली लीजिए — ढाई सौ ग्राम वाला, दो सौ ग्राम वाला, थोड़ा बड़ा पैकेट, क्योंकि तीनों दिन आपको रोली अच्छी मात्रा में लगेगी। पूजा स्थान पर सोलह जगह पहले नीचे रोली की ढेरियां बनानी हैं, और हर ढेरी पर एक-एक दीपक सजाना है। मिट्टी का दीपक भी सजा सकते हैं। मिट्टी का दीपक हो, तो हर दिन नया दीपक लेंगे। और पीतल के इतने दीपक, सोलह दीपक, एक बार में नहीं खरीद सकते। तो मिट्टी के दीपक ही एक बार में पांच दर्जन तक ले लीजिए। दीपावली में तो ज़रूरत पड़ेगी ही, और इस पूजन में भी काम आ जाएंगे। तो पहले उन सोलह ढेरियों पर सोलह दीपक सजाएंगे, और रुई की बाती डालेंगे। सब में डबल बाती रहेगी। सब में सरसों का ही तेल डालेंगे। और सब में पांच-पांच काली मिर्च ज़रूर डालेंगे। लौंग, इलायची आदि नहीं डालनी है — काली मिर्च डालनी है।
यह सोलह दीपकों की विधि किसलिए है?
रक्षण, शत्रु नाश, और तंत्र व प्रेत से रक्षा
यह रक्षण के लिए है, शत्रु नाश के लिए है, तंत्र विचार के नाश के लिए है, और प्रेत-पिशाच विचार आदि से रक्षा के लिए है — यह विधि विशेष रूप से। अगर बार-बार धन हानि हो रही है, बार-बार एक्सीडेंट हो रहे हैं, तो यह पूजन कर सकते हैं। और जो लोग दूसरी साधनाएं कर रहे हैं, वे भी चाहें तो दीप दान के निमित्त केवल यह कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह रक्षण के लिए है। यह शत्रु नाश के लिए है। यह तंत्र विचार के नाश के लिए है। यह प्रेत-पिशाच विचार आदि से रक्षा के लिए है — यह विधि विशेष रूप से। अगर बार-बार धन हानि हो रही है, बार-बार एक्सीडेंट हो रहा है, तो यह पूजन कर सकते हैं। बाकी लोग जो दूसरी साधनाएं कर रहे हैं, वे भी चाहें तो दीप दान के निमित्त केवल यह कर सकते हैं।
दीपकों के साथ और क्या रखा जाता है, और चालीसा कैसे पढ़ी जाती है?
हर दीपक के पीछे एक फूल, लाल आसन, और लौंग पर सोलह पाठ
उन सोलह दीपकों के पीछे — मुंह भगवती की ओर होते हैं — एक-एक फूल रखना चाहिए। लाल फूल मिल जाएं तो सबसे अच्छा। एक जगह भोग लगाइए, कोई भी मिठाई या किशमिश। भगवती का श्री विग्रह या फोटो हो, तो उन्हें फूलों से सजाइए। लाल वस्त्र पहनकर लाल आसन पर बैठिए, और काली चालीसा का सोलह बार पाठ कीजिए, लौंग पर गिनकर: एक लौंग हाथ में ली, एक बार काली चालीसा का पाठ किया, भगवती के सामने समर्पित कर दी। वे कहते हैं कि काली चालीसा की पीडीएफ चैनल पर उपलब्ध है, और लोग उसका अनुभव भी पहले से डाल चुके हैं।
वक्ता कहते हैं कि उन सोलह दीपकों के पीछे — जैसे मुंह भगवती की ओर है, तो उसके पीछे — एक-एक फूल रखना चाहिए। लाल फूल हों, तो वे रखना सबसे अच्छा है। एक जगह भोग लगाइए। कोई भी मिठाई का भोग लगाइए, या किशमिश जैसा जो भी भोग लगा सकें। भगवती का श्री विग्रह या फोटो हो, तो उन्हें फूलों आदि से सजाइए। और लाल आसन पर बैठकर, लाल वस्त्र आदि पहनकर सारा काम करना है। काली चालीसा का सोलह बार पाठ कीजिए। काली चालीसा की पीडीएफ चैनल पर उपलब्ध है, और लोग उसका अनुभव भी पहले से डाल चुके हैं। सोलह बार का पाठ लौंग पर करेंगे — यानी एक लौंग हाथ में ली, एक बार काली चालीसा का पाठ किया, और भगवती के सामने समर्पित कर दी।
भगवती काली कैसे प्रकट हुईं?
भद्रकाली, चामुंडा और कालिका — और एक का प्राकट्य काली चौदस पर
वे कहते हैं कि जैसे ग्रहण में जाप का कई गुना फल मिलता है, वैसे ही काली चौदस का भी बड़ा महत्व है। भगवती काली कैसे प्रकट हुईं: भद्रकाली, जो भगवान शिव की जटा से प्रकट हुईं; जो भगवती कौशिकी के मस्तक से प्रकट हुईं; भगवती चामुंडा, जो भगवती काली का स्वरूप हैं, भद्रकाली का अंश भी मानी गई हैं, और सबसे अधिक पूजित हैं; और कालिका, जो भगवती पार्वती के शरीर से कौशिकी के अलग होने पर भगवती कालिका के रूप में रहीं। इन तीन प्रमुख स्वरूपों में से एक का प्राकट्य काली चौदस को माना जाता है।
वक्ता कहते हैं कि जान लीजिए, जैसे ग्रहण में जाप का कई गुना फल मिलता है, वैसे ही काली चौदस का भी बड़ा महत्व है। भगवती काली कैसे प्रकट हुईं? भद्रकाली, जो भगवान शिव की जटा से प्रकट हुईं। जो भगवती कौशिकी के मस्तक से प्रकट हुईं। भगवती चामुंडा, जो भगवती काली का स्वरूप हैं, जिन्हें भद्रकाली का अंश भी माना गया है, और जो सबसे अधिक पूजित हैं। और एक हैं कालिका, जो भगवती पार्वती के शरीर से कौशिकी के अलग होने पर भगवती कालिका के रूप में रहीं। तो इन तीन प्रमुख स्वरूपों में से एक स्वरूप का प्राकट्य काली चौदस को माना जाता है। इस दिन, काली चौदस की रात को, भगवती का पूजन ज़रूर करना चाहिए।
महिषासुर और शिव जी के बारे में वे क्या कहते हैं?
रंभ का पुत्र महिषासुर, शिव जी के आशीर्वाद से प्राप्त
वे कहते हैं कि कल्प भेद के अनुसार चलें, तो ऐसे बहुत से कठिन विषय हैं जिन्हें सामान्य और नए लोग स्वीकार ही नहीं कर पाएंगे। विषय यहां तक है कि रंभ का पुत्र महिषासुर शिव जी के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ, और एक समय में शिव जी का ही स्वरूप माना गया — कि भगवान शिव ने ही उसे बचाया, और उनके जैसा त्याग कोई नहीं कर सकता। लोगों के लिए इसे स्वीकार करना संभव नहीं, पर कालिका पुराण का अध्ययन करेंगे तो बहुत से विषय स्पष्ट हो जाएंगे।
वक्ता कहते हैं कि कल्प भेद के अनुसार चलें, तो ऐसे बहुत से कठिन विषय हैं जिन्हें सामान्य और नए लोग स्वीकार ही नहीं कर पाएंगे — कि यह सब भी ऐसा हो सकता है। विषय बहुत जटिल आएंगे। विषय यहां तक है कि रंभ का पुत्र महिषासुर शिव जी के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ। वह एक समय में शिव जी का ही स्वरूप माना गया है — कि भगवान शिव ने ही उसे बचाया, और उनके जैसा त्याग कोई कर ही नहीं सकता। तो लोगों के लिए इसे स्वीकार करना संभव नहीं है। लेकिन कालिका पुराण का अध्ययन करेंगे, तो उसमें बहुत से विषय आपको स्पष्ट हो जाएंगे।
भगवती का सिंह वाहन कौन है?
महासिंह, जिन्हें सोमनंदी जी महाराज कहते हैं, स्वयं महाविष्णु हैं
वे कहते हैं कि यह बात आप सबको पता होनी चाहिए: भगवती के वाहन सिंह साक्षात महाविष्णु हैं। भगवती के वाहन महासिंह, जिन्हें हम सोमनंदी जी महाराज कहते हैं — और भगवती के स्वरूप के अनुसार सिंह का स्वरूप भी बदलता है — और भगवान विष्णु ही सिंह के रूप में भगवती जगदंबा के वाहन हैं। यानी जब हम जगदंबा की पूजा कर रहे होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह बात आप सबको पता होनी चाहिए: भगवती के वाहन, सिंह, साक्षात महाविष्णु हैं। भगवती के वाहन जो महासिंह हैं, जिन्हें हम सोमनंदी जी महाराज कहते हैं — और भगवती के स्वरूप के अनुसार सिंह का स्वरूप भी बदलता है — और भगवान विष्णु ही भगवती जगदंबा के वाहन हैं। सिंह के रूप में, यानी जब हम जगदंबा की पूजा कर रहे होते हैं।
साकार से निराकार की ओर बढ़ने पर सब चीज़ें एक जगह आकर इकट्ठी हो जाती हैं
साकार से निराकार की ओर — सब चीज़ें एक जगह आकर इकट्ठी हो जाती हैं
वे कहते हैं कि यह द्वैत और अद्वैत की बात है। जब आप आगे बढ़ने लगेंगे, तो सब चीज़ें एक जगह आकर इकट्ठी हो जाएंगी। फिर ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई अलगाव नहीं रहता। यह सत्य विषय है, जिसे हम पुराणों में केवल पढ़ लेते हैं — कि यहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश सब एक हैं, सब भगवती से प्रकट हैं। असल में जब आप द्वैत से अद्वैत की ओर, यानी साकार से निराकार की ओर जाते हैं, जब हमारी भक्ति फलने लगती है, तब ये चीज़ें सच में प्रकट होने लगती हैं, और तब ये सारी बातें सार्थक लगती हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह द्वैत और अद्वैत की बात है। जब आप आगे बढ़ना शुरू करेंगे — हम बार-बार कहते हैं — तो सब चीज़ें एक जगह आकर इकट्ठी हो जाएंगी। फिर ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई अलगाव नहीं रहता। यह सत्य विषय है, जिसे हम पुराणों में केवल पढ़ लेते हैं — कि यहां ब्रह्मा, विष्णु-स्वरूप और महेश, तीनों एक ही हैं; कि सब भगवती से प्रकट हैं, या इस तरह की बात। असल में जब आप इस द्वैत से अद्वैत की ओर, यानी साकार से निराकार की ओर जाते हैं — जब हम अपने आप आगे बढ़ने लगते हैं, जब हमारी भक्ति फलने लगती है — तब ये सारी चीज़ें सच में प्रकट होने लगती हैं। तब ध्यान मंत्रों में जो हम पढ़ते हैं, वे सारी बातें सार्थक लगती हैं: कि यह तो वास्तव में वही है। पर अभी यह ध्यान में नहीं रहता। अभी तो हम माया से भी मोहित हैं।
दुर्गा जी के नीचे बैठा सिंह कहेगा कि हम भी तो नारायण हैं
दुर्गा जी के नीचे का सिंह कहेगा — हम भी तो नारायण हैं
वे कहते हैं, सोचिए: वाहन के रूप में हम नारायण की ही पूजा कर रहे हैं। जो लोग सोचते हैं कि हम तो शाक्त हैं, भगवान नारायण का नाम भी नहीं लेंगे, उनकी पूजा नहीं करेंगे — तो दुर्गा जी जिस सिंह पर बैठी हैं, वह नीचे से अपनी मूंछ पर ताव देकर कहेगा: अच्छा बबुआ, मत करो पूजा, हम भी तो नारायण हैं। तो जगदंबा भगवान नारायण के ऊपर बैठी हैं।
वक्ता कहते हैं, सोचिए: वाहन के रूप में हम नारायण की ही पूजा कर रहे हैं। जो लोग सोचते हैं कि हम तो शाक्त हैं, हम भगवान नारायण का नाम भी नहीं लेंगे, उनकी पूजा नहीं करेंगे — तो दुर्गा जी जिस सिंह पर बैठी हैं, वह नीचे से अपनी मूंछ पर ताव देकर कहेगा: अच्छा बबुआ, मत करो पूजा, हम भी तो नारायण हैं। तो जगदंबा भगवान नारायण के ऊपर बैठी हैं।
इस कल्प में भगवती को दूसरे आधार की ज़रूरत क्यों है?
कालिका पुराण में ब्रह्मा जी, और उग्रचंडा कल्प
कालिका पुराण में ब्रह्मा जी कह रहे हैं कि कल्प भेद के अनुसार भगवती का भार बढ़ रहा है, और इस कल्प में भगवान नारायण अकेले उनका भार नहीं उठा पाएंगे, तो अब वह समय आ गया है। यह उग्रचंडा कल्प के अनुसार है: इसमें यह चर्चा है कि भगवती के दोनों चरण दो अलग-अलग देवताओं पर रहें — एक विष्णु जी, और दूसरे, भगवान रुद्र भी अवतार लें, ताकि वे भगवती का भार उठा सकें।
वक्ता कहते हैं कि कालिका पुराण में ब्रह्मा जी कह रहे हैं कि कल्प भेद के अनुसार भगवती का भार बढ़ रहा है, और इस कल्प में भगवान नारायण अकेले उनका भार नहीं उठा पाएंगे। तो अब वह समय आ गया है। यह उग्रचंडा कल्प के अनुसार है। जब आप आगे अध्ययन करेंगे, या इस मार्ग पर जाएंगे, तो पता चलेगा: उग्रचंडा कल्प भेद के अनुसार यह आता है, या यह विषय चर्चा में है, कि भगवती के दोनों चरण दो अलग-अलग देवताओं पर रहें। एक विष्णु जी, और दूसरे, भगवान रुद्र को भी अवतार लेना चाहिए, ताकि वे भगवती का भार उठा सकें।
क्या सायुज्य पूजन का आशीर्वाद केवल महिषासुर को मिला?
मूर्ति रहस्य, आवरण का क्रम, और भगवती के दो चरण
वे पूछते हैं: क्या आपको लगता है कि भगवती दुर्गा के साथ पूजे जाने का आशीर्वाद केवल महिषासुर को मिला, या किसी और असुर को भी सायुज्य रूप में मिला है? जब आप दुर्गा सप्तशती का मूर्ति रहस्य पढ़ते हैं, तो पढ़ते हैं कि महिष का भी सायुज्य पूजन होना चाहिए। देवी के आवरण में, प्रथम आवरण में ब्रह्मा, विष्णु, महेश और उनकी प्रमुख महाशक्तियां आती हैं; बिंदु में जगदंबा का पराशक्ति रूप; और उसके बाद उसी प्रथम आवरण में, या कम से कम द्वितीय या तीसरे आवरण तक, हम देवी के वाहन सिंह का, और उसके बाद महिष का पूजन करते हैं।
वक्ता पूछते हैं कि आपको क्या लगता है: भगवती दुर्गा जी के साथ पूजन का आशीर्वाद केवल महिषासुर को ही मिला था? क्या किसी और असुर को यह उनके साथ सायुज्य रूप में मिला है? यह सायुज्य रूप में पूजन की प्राप्ति है। जब आप दुर्गा सप्तशती का मूर्ति रहस्य पढ़ते हैं, तो उसमें पढ़ते हैं कि महिष का भी सायुज्य पूजन होना चाहिए। जो लोग जगदंबा के दुर्गा स्वरूप का पूजन करते हैं, किसी भी कल्प में, किसी भी कल्प के अनुसार। वे कहते हैं कि आप जो पूजन करते हैं, देखते होंगे कि देवी के आवरण में, किसी भी स्वरूप का पूजन करें, प्रथम आवरण में ब्रह्मा, विष्णु, महेश और उनकी प्रमुख महाशक्तियों का पूजन होता है। बिंदु में जगदंबा के पराशक्ति रूप का पूजन होता है। लेकिन उसके बाद, या तो उसी प्रथम आवरण में, या कम से कम द्वितीय आवरण में, या तीसरे आवरण तक आते-आते, तीसरे आवरण में हम देवी के वाहन सिंह का, और उसके बाद महिष का पूजन करते हैं। और अब, जितने लोगों ने बत्तीस नामावली की साधना की है — उसका प्रारूप, गीता प्रेस गोरखपुर वाला भी, अगर आप पढ़ें, तो उसमें भी यह दिया गया है। तो ऐसा क्यों है कि जब अभी भगवती का पूजन विशेष रूप से दस भुजा रूप में, या अष्टादश भुजा रूप में, या सोलह भुजा रूप में होता है, तो इन सभी स्वरूपों में जगदंबा का स्वरूप ऐसा है कि एक पैर सिंह के ऊपर है, और दूसरा पैर महिष के ऊपर? और महिष को भी सायुज्य पूजन का अधिकार मिला है। भगवती ने उसे आशीर्वाद दिया, वरदान दिया: कि मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा होगी।
महिषासुर के पूजन को कैसे समझें?
महादेव हर ऊर्जा का स्रोत — इतना ऊपर जाकर कुछ भी सकारात्मक या नकारात्मक नहीं रहता
वे कहते हैं कि महिषासुर का पूजन तो हो ही रहा है। हम इसे नकारात्मक रूप में लें, वह अलग विषय है; तंत्र का स्वरूप अलग विषय है, भैंसासुर की सिद्धि सब अलग विषय है — वह छोड़िए। सबको उत्पन्न करने वाले महादेव ही हैं; तंत्र ही हर ऊर्जा का स्रोत है, महादेव ही हर ऊर्जा का स्रोत हैं, और हर ऊर्जा के नाभिकीय मंडल में भगवती ही उपस्थित हैं। जब हम इतना ऊपर तक चले जाएंगे, तो हमारे लिए कुछ भी सकारात्मक या नकारात्मक नहीं रहेगा।
वक्ता कहते हैं कि अब महिषासुर का पूजन तो हो ही रहा है ना। अब हम इसे नकारात्मक रूप में लें, वह अलग विषय है। तंत्र का स्वरूप अलग विषय है; भैंसासुर की सिद्धि सब अलग विषय है — वह छोड़िए। सबको उत्पन्न करने वाले महादेव ही हैं; यह तंत्र का विषय है। तो तंत्र ही हर ऊर्जा का स्रोत है। महादेव ही हर ऊर्जा का स्रोत हैं। हर ऊर्जा के नाभिकीय मंडल में भगवती ही उपस्थित रहती हैं। तो वे हैं, और सब कोई वही हैं। वे कहते हैं कि यही अभी बोल रहे थे — द्वैत और अद्वैत की जो बात आ रही थी। जब हम इतना ऊपर तक चले जाएंगे, तब हमारे लिए कुछ भी सकारात्मक और नकारात्मक नहीं रहेगा। अभी यह विषय थोड़ा लगेगा कि क्या बात हो रही है; पर शांत दिमाग से सोचिए, और जब इस मार्ग पर आगे बढ़ेंगे, तो यह समझ में आएगा। और वे इसका प्रमाण भी बताते हैं: कालिका पुराण के अनुसार कौशिकी का, शारदीय नवरात्र का जो महात्म्य है, उसमें भी आपको यह वर्णन मिल जाएगा। और तंत्र के साथ इसका सायुज्य बैठा लीजिए। मूर्ति रहस्य में पढ़ लीजिए, उग्रचंडा कल्प पढ़िए, प्रचंडा कल्प पढ़िए, स्वाध्याय कीजिए।
कौन सा कल्प कहां माना जाता है?
कामाख्या में प्रचंडा, विंध्य क्षेत्र में उग्रचंडा, बंगाल में कौशिकी
कामरूप कामाख्या जाइए, तो वहां विशेष पूजन, प्रमुख पूजन प्रचंडा कल्प के अनुसार होता है। विंध्य क्षेत्र में जो भी पूजन होता है, वह ज़्यादातर जगह उग्रचंडा कल्प के अनुसार होता है, खासकर जहां काली से जुड़े स्वरूपों का पूजन होता है। और हम खुद जो करते हैं, वह कौशिकी कल्प के अनुसार हो रहा है — यानी पश्चिम बंगाल का क्षेत्र, जहां ज़्यादातर जगह प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना आदि होती है, और षष्ठी के दिन प्रबोधन आदि।
वक्ता कहते हैं कि वे यह भी बताते हैं कि किस जगह कौन सा पूजन होता है। कामरूप कामाख्या जाइए, तो वहां विशेष पूजन, प्रमुख पूजन प्रचंडा कल्प के अनुसार होता है। विंध्य क्षेत्र में जितना भी पूजन होता है, वह ज़्यादातर जगह उग्रचंडा कल्प के अनुसार होता है — खासकर जहां काली से जुड़े स्वरूपों का पूजन होता है, वहां यही होता है। और हम खुद जो कर रहे होते हैं, वह कौशिकी कल्प के अनुसार होता है: यानी पश्चिम बंगाल का क्षेत्र, जहां ज़्यादातर जगह प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना आदि होती है, और षष्ठी के दिन प्रबोधन आदि। तो इन सब चीज़ों को देखिए — अनुभव से आने वाली बातें, और जो आप इन तंत्र ग्रंथों के अनुसार देखते हैं, और हमारे विद्वान जन, जिनसे हम इन सबकी चर्चा करते हैं, जो हमें यह सब ज्ञान देते हैं। इन सबको मिलाकर देखिए, कोई भेद नहीं आता। यह बात सत्य है।
सोलह दीपक भगवती कालिका और उनकी सोलह नित्याओं के नाम से जलाए जाते हैं
भगवती कालिका और उनकी सोलह नित्याओं के नाम से जलाए जाते हैं
शुरू से जो चर्चा चल रही थी, वह यह थी: जब आप पूजन करते हैं, तो इस तरह की शक्तियों का पूजन भी होता है, और भगवती ने खुद आशीर्वाद दिया है कि यह पूजन होगा। तो जब हम दीपावली की चतुर्दशी की रात सोलह दीपक जलाते हैं, वे भगवती कालिका के नाम से, उनकी सोलह नित्याओं के नाम से होते हैं। और अगर नित्याओं के नाम भी नहीं पता, तो सामान्य रूप से इतने जला दीजिए, और काली चालीसा का सोलह बार पाठ कीजिए, एक लौंग पर एक पाठ करके उन्हें समर्पित कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि यहां शुरू से जो चर्चा चल रही थी, वह यह थी: जब आप पूजन करेंगे, तो इस तरह की शक्तियों का पूजन भी होता है — भगवती ने खुद आशीर्वाद दिया है कि यह पूजन होगा। तो जब हम सोलह दीपक जलाएंगे, दीपावली की चतुर्दशी की रात को, भगवती कालिका के नाम से। उनकी सोलह नित्याओं के नाम से। या अगर नित्याओं के नाम भी नहीं पता, तो सामान्य रूप से इतने जला दीजिए, और हमने काली चालीसा का सोलह बार पाठ किया, एक लौंग पर एक पाठ करके उन्हें समर्पित कर दिया। इतना आप चतुर्दशी, अमावस्या और प्रतिपदा के दिन कर सकते हैं।
क्या कालिका योगिनी के साधक और आवरण पूजन जानने वाले और कुछ कर सकते हैं?
नित्याओं और अष्ट मातृकाओं के नाम से दीप दान
बाकी जो लोग कालिका योगिनी की साधना या काली जी से जुड़ी दूसरी साधनाएं कर रहे हैं, वे भी चाहें तो दीप दान कर सकते हैं; इसमें कोई दोष नहीं। और जिन्होंने आवरण पूजन सीख लिया है — अब तक कुछ ने भगवती कालिका के तीन-चार सीख लिए हैं — जो कर रहे हैं, पुराने साधक, जिन्हें नित्याओं की, अष्ट मातृकाओं की और अष्ट तांत्रिक मातृकाओं की जानकारी है: वे चाहें तो उनके नाम से दीप दान कर सकते हैं, क्योंकि उनकी साधना तो पहले से चल रही है।
वक्ता कहते हैं कि बाकी जो लोग कालिका योगिनी की साधना कर रहे हैं, या काली जी से जुड़ी दूसरी साधनाएं कर रहे हैं — अगर वे भी चाहें, तो दीप दान आदि कर सकते हैं। इसमें कोई दोष नहीं है। और जिन्होंने आवरण पूजा आदि सीख लिया है — अब तक कुछ लोग भगवती कालिका के लगभग तीन-चार सीख ही चुके हैं — जो कर रहे हैं, पुराने साधक। आप लोगों को नित्याओं की जानकारी है, अष्ट मातृकाओं की और अष्ट तांत्रिक मातृकाओं की जानकारी है। अगर इच्छा हो, तो आप उनके नाम से दीप दान कर सकते हैं। क्योंकि आपकी साधना तो पहले से चल रही है, तो चाहें तो आप भी चतुर्दशी की रात दीप दान कर सकते हैं।
अमावस्या को किसका पूजन होता है?
लक्ष्मी-गणेश, यमराज, कुबेर, चित्रगुप्त और कुल देवता
अमावस्या के पूजन के लिए, स्थिर लग्न आदि देखकर, वे कहते हैं कि कब है यह अलग से कम्युनिटी पोस्ट में डाल देंगे। या अपने क्षेत्र के अनुसार जब चाहें, लक्ष्मी-गणेश जी का, यमराज का, कुबेर जी का, चित्रगुप्त जी महाराज का, और साथ में अपने कुल के देवी-देवताओं का, और महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती का पूजन कीजिए — पंचोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार। सबसे पहले गणपति जी का होगा, फिर लक्ष्मी जी का, फिर कुल के देवी-देवताओं का, और उनके साथ यक्षराज कुबेर जी का।
वक्ता कहते हैं कि अमावस्या के पूजन के बारे में, स्थिर लग्न आदि देखकर, उस समय वे अलग से कम्युनिटी पोस्ट में डाल देंगे कि कब है। या अपने क्षेत्र के अनुसार जब चाहें, उस हिसाब से कीजिए। लक्ष्मी गणेश जी का, यमराज का, कुबेर जी का, चित्रगुप्त जी महाराज का पूजन। और साथ में आपके कुल के देवी-देवता — उनका पूजन तो पहले होगा ही। कुल के देवी-देवताओं का, और इन सबका पूजन आप करेंगे। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन करेंगे। पंचोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार पूजन। सबसे पहले गणपति जी का होगा, फिर लक्ष्मी जी का, फिर कुल के देवी-देवताओं का करेंगे, और कुल के देवी-देवताओं के साथ यक्षराज कुबेर जी का करेंगे। बाकी अपने पूजा स्थान पर जिनका चाहें, उनका पंचोपचार पूजन।
एक-एक करके आवाहन और स्नान कैसे किया जाता है?
जैसे घर के चार-पांच बच्चों को एक-एक करके नहलाना
जैसे घर में चार-पांच बच्चे हों, तो एक को पकड़ो, नहलाओ, रख दो, फिर दूसरे को — वैसे ही यहां प्रमुख शक्तियों या प्रमुख विग्रहों के साथ: चाहें तो एक-एक करके, पूरे भक्ति भाव से सबका आवाहन कीजिए — पहले एक देवता का, गजाननं भूतगणादि सेवितं — अगर मंत्र आता हो। नहीं तो उनके सामने सामान्य अक्षत और फूल रखिए। फिर दूध आदि से, पंचामृत से स्नान कराइए, शुद्ध जल से स्नान कराइए, अच्छे से पोंछिए, और वस्त्र आदि पहनाकर विराजमान कर दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि उसी तरह यहां भी, देवताओं में जो प्रमुख शक्तियां हैं, या प्रमुख विग्रह आदि हैं — चाहें तो एक-एक करके, पूरे भक्ति भाव से सबका आवाहन कीजिए। गजाननं भूतगणादि सेवितं — पहले एक देवता का आवाहन किया, अगर मंत्र आता हो। नहीं तो उनके सामने सामान्य अक्षत और फूल रखिए। फिर दूध आदि से, पंचामृत से स्नान कराइए, शुद्ध जल से स्नान कराइए, फिर अच्छे से पोंछ लीजिए, और वस्त्र आदि पहनाकर विराजमान कर दीजिए। फिर किसी तरह लक्ष्मी जी का कर दिया। फिर आपके घर के जो प्रमुख देवता हों, उन्हें स्नान करा दिया। कुबेर जी के निमित्त स्नान करा दिया। ऐसे करके सबका पूजन कीजिए, भोग आदि लगाइए, और दीप दान कीजिए। उसके बाद अपनी साधना कीजिए।
क्या दीपावली की रात हवन ज़रूरी है?
अमावस्या की रात हवन, और इस साल कोई नया उपवास नहीं
इस दिन हवन आपको ज़रूर करना है — अमावस्या की रात हवन ज़रूर कर लेना चाहिए। और दीपावली के दिन, अगर आप पहले से उपवास रखते आए हैं, तो रखिए; नहीं रखते आए हैं, तो रात के पूजन के बाद खाना ज़रूर खा लीजिए। वे फिर कहते हैं कि इस साल नया उपवास शुरू नहीं करना है — इस संवत में नहीं; अगले चैत्र नवरात्रि के बाद से शुरू कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि इस दिन हवन आपको ज़रूर करना है। अमावस्या की रात हवन ज़रूर कर लेना चाहिए। और दीपावली के दिन, अगर आप पहले से उपवास रखते आए हैं, तो रखिए। नहीं रखते आए हैं, तो रात के पूजन के बाद खाना ज़रूर खा लीजिए, भोजन कर लीजिए। इस साल नया उपवास शुरू नहीं करना है — हम बार-बार कह रहे हैं। इस संवत में नहीं करना है; अगले चैत्र नवरात्रि के बाद से करना है। यह आपके अमावस्या तक के पूजन का हो गया। अब सवाल यह है कि हमने तो दीपावली को ही हवन कर लिया, तर्पण और मार्जन कर लिया — तो प्रतिपदा और द्वितीया के दिन जो जप करेंगे, उसका हवन करने की ज़रूरत है या नहीं? यह आपकी इच्छा है; चाहें तो कर सकते हैं, नहीं करेंगे तो कोई दिक्कत नहीं। लेकिन दीपावली के दिन सब देवी-देवताओं का आहुति पूजन ज़रूर कर लीजिए।
देहली का पूजन क्या है?
अमावस्या को दहलीज, यानी चौखट, का पूजन
इसके बाद देहली का पूजन है — अमावस्या के दिन ही देहली का पूजन। देहली मतलब दहलीज, हमारा चौखट। जब घर के देवी-देवताओं का पूजन हो जाए, तो स्वास्तिक आदि मुख्य रूप से घर की कुल वधुओं, माताओं-बहनों, जो भी हों, उनके हाथ से बनवाना चाहिए; इससे मंगल होता है।
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद देहली का पूजन है। अमावस्या के दिन ही देहली का पूजन। देहली मतलब यही दहलीज, अपना चौखट। जब घर के देवी-देवताओं का पूजन हो जाए, तो स्वास्तिक आदि मुख्य रूप से घर की कुल वधुओं, माताओं-बहनों, जो भी हों, उनके हाथ से बनवाना चाहिए। इससे मंगल होता है।
क्या दहलीज पर यंत्र बनाने चाहिए?
उनके अनुसार यह उचित नहीं — स्वास्तिक, शुभ-लाभ, रिद्धि-सिद्धि लिखिए
उनके अनुसार यह चीज़ उचित नहीं है। अगर आप बनवाते हैं या बनाते हैं, तो यह आपका अपना निजी विषय है, आपकी श्रद्धा है — कि हम बनाते हैं तो धन आता है, आकर्षण आदि के लिए। पर इसका एक नियम होता है, बनाने का तरीका होता है। अभी उसका वर्णन करना मुश्किल है; वे एक बार करके दिखाएंगे। फिर भी सामान्य रूप से बेहतर है कि आप स्वास्तिक बनाइए, शुभ लाभ लिखिए, रिद्धि-सिद्धि लिखिए — यह चलेगा।
वक्ता कहते हैं कि एक बात है: उनके अनुसार यह चीज़ उचित नहीं है। अगर आप बनवाते हैं, बनाते हैं, तो यह अब आपका अपना निजी विषय है, आपकी श्रद्धा है — कि भैया, हम बनाते हैं तो धन आता है; आकर्षण के लिए, इसके तरह-तरह के प्रकार। लेकिन इसका एक नियम होता है, बनाने का तरीका होता है। अभी उतना वर्णन करना मुश्किल है। वे एक बार करके दिखाएंगे, तब आप ज़्यादा अच्छे से समझेंगे। फिर भी सामान्य रूप से ऐसे नहीं। उससे अच्छा है कि आप स्वास्तिक बनाइए, शुभ लाभ लिखिए, रिद्धि-सिद्धि लिखिए — यह चलेगा। लेकिन हर यंत्र को — अब आप देखते हैं कि हां, यह यंत्र है, बीसा यंत्र है, बीसा यंत्र की बहुत महिमा है — और अब आप उसे जगह-जगह बना देते हैं। एक-आध जगह, तिजोरी पर बन गया, वह चलेगा। पर घर के सामने, ऑफिस के पास, ऑफिस के सामने बना देना — ऐसा नहीं होना चाहिए।
चौखट का तिलक कैसे किया जाता है?
कुल देवताओं के पांच दीपकों के घी के साथ नारंगी सिंदूर
वक्ता कहते हैं कि उत्तर प्रदेश-बिहार में इसे चौखट को टिकना कहते हैं; चौखट का तिलक किया जाता है। दीपावली की शाम को जब पूजन होता है, उसी समय एक कटोरे में नारंगी सिंदूर रखा जाता है और उसमें घी आदि मिलाया जाता है — पूजन के बाद, या फिर प्रमुख देवी-देवताओं और कुल के देवी-देवताओं के नाम से जलने वाले पांच घी के दीपकों में से घी निकालकर इसमें मिलाया जाता है। इसी से प्रमुख चौखट पर पांच बार तिलक होता है, फिर घर की हर चौखट और हर दरवाजे का तिलक किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि चौखट को टिकना हम लोग उत्तर प्रदेश-बिहार में बोलते हैं; चौखट का तिलक किया जाता है। तिलक कैसे करते हैं? दीपावली की शाम को जब पूजन होगा, उसी समय एक कटोरे में ऑरेंज वाला सिंदूर, नारंगी सिंदूर रखा जाता है, और उसमें घी आदि मिला दिया जाता है। पूजन के बाद; या फिर प्रमुख देवी-देवताओं और कुल के देवी-देवताओं के नाम से जो पांच घी के दीपक जलते हैं, उन्हीं में से घी निकालकर इसमें मिलाया जाता है। और इसी से प्रमुख चौखट पर पांच बार तिलक होता है, फिर घर में जितनी भी चौखटें हैं, जितने दरवाजे हैं, सभी का तिलक किया जाता है।
चौखट का तिलक न करने से क्या होता है?
लोगों को चोट लगती है — किदवंती मानिए, पर कीजिए
वे कहते हैं कि बहुत बार यह भी देखने को मिलता है: तिलक आदि न करने से उस दिन पैर में चोट लगनी शुरू हो जाती है; लोगों को चोट लगती भी है। किदवंती ही मानिए, पर यह करना चाहिए। विश्वास करेंगे तो विश्वास है; नहीं तो अंधविश्वास, किदवंती, कुछ भी मानिए और जहां इच्छा हो चले जाइए, यूरोप-अमेरिका, कोई दिक्कत नहीं। पर करना चाहिए। सभी को अमावस्या की रात देहली विनायक पूजन के रूप में दहलीज का, अपनी चौखट का पूजन जरूर करना चाहिए। और अगर दुर्भाग्य से घर में कोई स्त्री नहीं है, तो स्वयं ही यह पूजन कर लेना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि बहुत बार यह भी आपको देखने को मिलेगा: तिलक आदि न करने से उस दिन पैर में चोट लगनी शुरू हो जाती है; लोगों को चोट लगती भी है। किदवंती ही मानिए, लेकिन फिर भी यह करना चाहिए। विश्वास करेंगे तो विश्वास है; नहीं तो अंधविश्वास, किदवंती, कुछ भी मानिए, और फिर जहां इच्छा हो चले जाइए, यूरोप-अमेरिका — कोई दिक्कत नहीं। लेकिन करना चाहिए। तो सभी को देहली विनायक पूजन के रूप में, दहलीज का पूजन, अपनी चौखट का पूजन, अमावस्या की रात जरूर कर लेना चाहिए। अगर दुर्भाग्य से घर में कोई स्त्री नहीं है, तो स्वयं ही यह पूजन कर लेना चाहिए। वे कहते हैं, यह जरूरी है। इस तरह दीपावली के प्रमुख पर्व काल के पूजन हो गए; बाकी क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार प्रतिपदा के दिन गोवर्धन पूजन, और भाई दूज के दिन जो भी पूजन आपका होता है, वह आप अपना करेंगे। इसे यम द्वितीया कहा जाता है, तो यमराज के निमित्त द्वितीया तिथि तक सभी को दीपदान कर लेना चाहिए।
पांचों दिन कौन सा दान करना चाहिए?
पंचबली — गाय, कुत्ता, चींटियां, कौवा और मनुष्य
इन पांच दिनों में दान-पुण्य के लिए पंचबली कीजिए: गाय को भोजन जरूर कराइए, कुत्ते को, चींटियों को; कौवे को भोजन जरूर कराइए; और किसी भी मनुष्य के निमित्त — मांगने लोग आते हैं — उनके लिए भोजन का अन्न रख दीजिए, कोई आए तो उसे दीजिए; पकाया हुआ भी दे सकते हैं, या इच्छा हो कि धन देंगे, तो धन भी दे सकते हैं। वे कहते हैं कि इन पांच दिनों में विशेष रूप से दान करना चाहिए, और गौ माता की अलग से सेवा भी कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि अब इन पांच दिनों में दान-पुण्य करने के लिए, ये पांचों दिन पंचबली के हैं। यानी: गाय को भोजन जरूर कराइए; कुत्ते को; चींटियों को भोजन जरूर कराइए; कौवे को भोजन जरूर कराइए। और किसी भी मनुष्य के निमित्त — मांगने के लिए लोग आते हैं — उनके निमित्त भोजन का अन्न रख दीजिए, और कोई आए तो उसे दीजिए। पकाया हुआ भी दे सकते हैं; या अगर वह इच्छा नहीं है, इच्छा है कि हम धन ही देंगे, तो उन्हें धन आदि भी दे सकते हैं। तो इन पांच दिनों में विशेष रूप से दान आदि करना चाहिए। और गौ माता के लिए आप अलग से सेवा भी कर सकते हैं।
भैरव साधकों को अमावस्या की रात क्या करना चाहिए?
घर पर, महानिशा काल में 108 वाला दीपदान
जिन्होंने अब तक का जीवन भैरव जी के निमित्त समर्पित कर दिया है, जो बार-बार भैरव जी का अनुष्ठान करते हैं, वे अमावस्या की रात — यानी इस बार रविवार की रात, 12 नवंबर को — 108 वाला दीपदान जरूर करें। उस दिन पूजन आदि के बाद महानिशा काल में कर सकते हैं; यह घर पर ही करना है, बाहर जाकर करने की आवश्यकता नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि इसके सिवाय महालक्ष्मी के कलश स्थापना की, कालिका पूजन की और दीपदान की अलग-अलग विधियों का जो विधि-विधान बताया गया है; और भैरव जी का दीपदान। जिन्होंने अब तक का अपना जीवन भैरव जी के निमित्त समर्पित कर दिया है, जो बार-बार भैरव जी का अनुष्ठान कर रहे हैं — वे अमावस्या की रात, यानी इस बार रविवार की रात, 12 नवंबर को — 108 वाला दीपदान जरूर करें। उस दिन पूजन आदि के बाद महानिशीथ काल में कर सकते हैं; दीपदान आदि घर में ही कीजिए। बाहर जाकर करने की आवश्यकता नहीं है।
जुआ खेलने वाले दीपक से कौन सा टोटका करते हैं?
घूरा पर की दीपावली और अमीर आदमी का दीया चुराना
वे कहते हैं कि यह प्रश्न आया था, इसलिए इस पर चर्चा करेंगे। उत्तर प्रदेश-बिहार के गांवों में छोटी दीपावली, विशेषकर चतुर्दशी के दिन, जहां कचड़ा फेंका जाता है वहां दीप जलाया जाता है; लोग इसे घूरा पर की दीपावली कहते हैं। जब व्यक्ति दीपक निकालकर घर के सामने या कहीं भी रखता है, तो जुआ खेलने वाले अमीर आदमी के घर का दीपक चुरा लेते हैं — और अमीर लोग बैठकर अपने दीये की रखवाली भी करते हैं कि कोई चुरा न ले, क्योंकि कहते हैं कि वह दीया चोरी हुआ तो उनके घर की लक्ष्मी चोरी हो जाएगी। फिर अगर लोग वह दीपक ले जाकर जुआ खेलेंगे, तो वे जीतेंगे।
वक्ता कहते हैं कि एक और टोटका है जिसे लोग बहुत प्रचलित करते हैं — जुआ खेलने वाले लोग। यह प्रश्न आया था, तो उन्होंने कहा कि ठीक है, लाइव में जरूर चर्चा करेंगे। क्या टोटका है? उत्तर प्रदेश-बिहार के लोग, अगर आप गांव में रहे हैं और सुन रहे हैं: जो छोटी दीपावली आती है, विशेषकर चतुर्दशी के दिन, जिस जगह कचड़ा फेंका जाता है, उस जगह दीप जलाया जाता है। लोग उसे घूरा पर की दीपावली कहते हैं। गांव में हम उसे घूरा पर की दिवाली कहते हैं। तो जब व्यक्ति दीपक निकालकर घर के सामने या कहीं भी रखता है, तो जुआ खेलने वाले लोग अमीर आदमी के घर का दीपक चुरा लेते हैं। और ऐसा भी है कि अमीर लोग बैठकर अपने दीये की रखवाली करते हैं कि कोई चोरी न कर ले — कहते हैं कि अगर वह दीया चोरी हो गया तो उनके घर की लक्ष्मी चोरी हो जाएगी। और उसके बाद अगर लोग उस दीपक को ले जाकर जुआ खेलेंगे, तो उससे वे जीतेंगे।
ऐसी जगहों पर बहुत उतारा छोड़ा जाता है, और दीया उसे घर ले आता है
क्योंकि ऐसी जगहों पर बहुत उतारा किया जाता है
वे कहते हैं कि इस तरह के टोटके करने से बचिए; इसमें बड़ी चालाकी है। गड़बड़ यह होती है कि घूरा पर की दिवाली में लक्ष्मी जी आईं या न आईं, कोई उतारा करके रखकर चला गया हो — और आप वही दीया उठा ले गए। जुआरी जीतेगा या नहीं, पता नहीं, पर उस व्यक्ति के घर की सारी अलाय-बलाय आपके साथ चली जाएगी। वे कहते हैं कि इस चक्कर में मत पड़िए, और यह भी मत सोचिए कि पिछले साल किया था और जीत गए थे, तो इस साल भी कर लेते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस प्रकार के टोटके करने से बचिए। इसमें बड़ी चालाकी होती है। इसमें गड़बड़ क्या होती है: पता चला कि घूरा पर की दिवाली में लक्ष्मी जी आईं या न आईं, कोई उतारा करके रखकर चला गया हो, और आप वही दीया उठाकर ले गए। जुआरी जीतेगा कि नहीं जीतेगा, पता नहीं — लेकिन उस आदमी के घर की सारी अलाय-बलाय आपके साथ चली जाएगी। वे कहते हैं कि इस सब चक्कर में मत पड़िए: कि एक दिन में हम कौन बनेगा करोड़पति बन जाएंगे, चलो खेलते हैं, आज जुए में सबको हराएंगे। यह टोटका मत कीजिए, और यह भी मत कीजिए कि पिछले साल किया था तो जीत गए थे, तो इस साल भी कर लेते हैं। अगर कहीं धोखा हो गया — क्योंकि इन सब में उतारा भी बहुत होता है।
घर से दरिद्रता कैसे निकाली जाती है?
चतुर्दशी या प्रतिपदा को सूप बजाकर अलक्ष्मी को निकालना
अपने घर की दरिद्रता निकालने के दो-तीन तरीके हैं। कहीं यह चतुर्दशी को ही करते हैं; कहीं प्रतिपदा के दिन किया जाता है — जिसमें सूप बजाकर दरिद्रता को, अलक्ष्मी को घर से निकाला जाता है। गांवों में तो विशेष रूप से सब करते हैं; शहरों में अब होता है या नहीं, उन्हें पता नहीं। इन सबके साथ बहुत सारे टोटके भी किए जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि अपने घर की दरिद्रता को निकालने के दो-तीन तरीके हैं। कहीं ऐसा है कि चतुर्दशी को ही करते हैं; कहीं प्रतिपदा के दिन किया जाता है — जिसमें सूप बजाकर दरिद्रता को, अलक्ष्मी को घर से निकाला जाता है। गांवों में तो विशेष करके सब करते हैं; शहरों में अब होता है कि नहीं, उन्हें पता नहीं। तो इन सब विषयों के साथ बहुत सारे टोटके भी किए जाते हैं।
दरिद्रता वाला दीया जुए के लिए लेने में क्या बुराई है?
घूरा पर की दिवाली में पुराना दीया जलता है, नया कभी नहीं
पता चला कि दरिद्रता वाला वही दीया दोबारा जलाया गया है — क्योंकि घूरा पर की दिवाली में पुराना दीया जलाया जाता है; वहां नया दीया कभी नहीं जलता, वे कहते हैं, यह भी याद रखिए। अगर वही दीया जलाकर वहां रखा गया है, दरिद्रता का दीया वहां रखा गया है, और आप उसे जुआ जीतने के लिए ले आए हैं — तो जीवन में वह आपको क्या-क्या जिताएगा, आप समझ नहीं पाएंगे। जैसे होलिका के समय राख लाने वाले टोटके से लोग बर्बाद होते हैं, और दिवाली में दीये चुराना, पीपल के नीचे से दीया लाना — भैया, ये गड़बड़ काम मत कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अब पता चला कि दरिद्रता वाला वही दीया है जिसमें दोबारा जलाया गया है — क्योंकि पुराना दीया जलाया जाता है; घूरा पर की दिवाली में नया दीया कभी नहीं जलता, यह भी याद रखिए। अगर वही दीया जलाकर वहां रख दिया गया है, दरिद्रता का दीया वहां रखा गया है, और आप उसे जुआ जीतने के लिए ले आए हैं — तो जीवन में वह आपको क्या-क्या जिताएगा, आप समझ नहीं पाएंगे। यह छोटा सा टोटका, जैसे होलिका के समय राख लाने वाला टोटका, जिससे लोग बर्बाद होते हैं; और दिवाली में दीयों की चोरा-चमटी, कि इसका दीया चुरा लो, उसका दीया चुरा लो, पीपल के नीचे से दीया ले आओ — भैया, ये गड़बड़ काम मत कीजिए। हो सकता है कि दस आदमियों में एक आदमी का काम बन गया और उसने इसका पूरा हल्ला कर दिया — लेकिन यह गलत है। क्योंकि इन सभी समयों में लोग बहुत उतारा करते हैं। पता ही नहीं चलता कि कब क्या हो जाए। ओवर कॉन्फिडेंस में इस प्रकार की गलतियां नहीं करनी चाहिए; यह बात ध्यान रखिए।
स्वर्णाकर्षण पादालिक भैरव का अनुष्ठान, और अलग से कालरात्रि और महाकालिका
स्वर्णाकर्षण पादालिक भैरव, और अलग से कालरात्रि और महाकालिका
भगवान स्वर्णाकर्षण पादालिक भैरव, जो प्रमुख भैरव हैं, उनसे संबंधित अनुष्ठान — इसलिए चुना गया क्योंकि धन से संबंधित समस्या सभी की है, सभी को धन आदि की आवश्यकता है, और धन से ही धर्म हो सकता है। वे उद्धृत करते हैं: तुम बिन यज्ञ ना होए वस्त्र ना कोई पाता। पर केवल इतना ही नहीं: दो प्रमुख आचार्य अलग-अलग अनुष्ठान करेंगे — स्वर्णाकर्षण भैरव का पूरा मंडल पूजन उत्सव एक आचार्य का, और भगवती कालरात्रि और महाकालिका का पूजन अलग।
वक्ता कहते हैं कि इसके सिवाय इस बार जो अनुष्ठान हो रहा है, जो वे पहले ही बता चुके हैं: भगवान स्वर्णाकर्षण पादालिक भैरव, जो प्रमुख भैरव हैं, उनसे संबंधित अनुष्ठान। कारण वे यह बताते हैं कि धन से संबंधित समस्या सभी की है — सभी को धन आदि की आवश्यकता है; और धन से ही धर्म हो सकता है। वे उद्धृत करते हैं: तुम बिन यज्ञ ना होए वस्त्र ना कोई पाता। इसलिए इस बार प्रमुख रूप से उनका अनुष्ठान। लेकिन केवल वही नहीं: दो प्रमुख आचार्य अलग-अलग अनुष्ठान करेंगे। स्वर्णाकर्षण भैरव का पूरा मंडल पूजन उत्सव एक आचार्य का है; और बाकी, भगवती कालरात्रि और महाकालिका का जो पूजन होगा, वह अलग है। तो इसमें सारा अनुष्ठान होगा।
जाप 10 तारीख की शाम, धनतेरस की रात्रि से, खरीदारी के मुहूर्त में आरंभ कर सकते हैं
10 तारीख की शाम से, और धनतेरस पर खरीदारी का मुहूर्त
इस दीपावली में साधना और मंत्र जाप कब से चालू करें, यह पूछने पर वे कहते हैं कि आप 10 तारीख की शाम से, धनतेरस की रात्रि से जाप आदि आरंभ कर सकते हैं। शुक्रवार को दोपहर 12:30 से, या 12:35 से, 1:15 तक का समय मुहूर्त शास्त्र के जानकारों ने मध्यान्ह व्यापिनी समय बताया है, जो धनतेरस पर खरीदारी के लिए सबसे उत्तम समय है, और उस समय शुक्र की होरा भी रहेगी।
इस दीपावली में साधना और मंत्र जाप कब से चालू करें, यह पूछने पर वक्ता कहते हैं: इस दीपावली में आप 10 तारीख की शाम से, धनतेरस की रात्रि से जाप आदि आरंभ कर सकते हैं। शुक्रवार को दोपहर 12:30 से, या 12:35 से, 1:15 तक का समय ज्ञानियों ने, जो मुहूर्त शास्त्र आदि का अध्ययन करते हैं, उन्होंने बताया है कि मध्यान्ह व्यापिनी का यह समय धनतेरस पर खरीदारी के लिए सबसे उत्तम समय है; और शुक्र की होरा के अनुसार भी, उस समय शुक्र की होरा रहेगी। तो आप में से जो भी धनतेरस के निमित्त खरीदारी करते हैं — चाहे झाड़ू खरीदें, जो उचित है, और जिसके लिए उन्होंने पहले ही पूरी पोस्ट डाली थी कि झाड़ू जरूर खरीदनी चाहिए — इस प्रकार की चीजें। ये सब लक्ष्मी तत्व से जुड़ी चीजें हैं जो हम खरीदते हैं, चाहे सोना हो या चांदी या कोई और चीज जिससे हमारे घर में श्री की वृद्धि हो। धनतेरस, धन त्रयोदशी — कारण ही यही है कि इस दिन हम जो खरीदें, उसमें वृद्धि होती रहे। 13 प्रकार के रत्न आदि। तो आप इसी समय में खरीदिए।
साबरी कवच के लिए हवन कैसे करें?
वे कहते हैं कि यह करके दिखाना पड़ेगा, और वैसे हवन की जरूरत नहीं
दीपशिखा जी के पूछने पर कि साबरी कवच के लिए हवन कैसे करें, वे कहते हैं कि उन्हें यह बताना पड़ेगा — यह करके दिखाने से ही हो पाएगा। वैसे इसमें हवन की आवश्यकता नहीं है, वे कहते हैं, पर ठीक है, कभी बता देंगे।
साबरी कवच के लिए हवन कैसे करें, यह पूछने पर वक्ता दीपशिखा जी को उत्तर देते हैं कि साबरी कवच का हवन विधान उन्हें बताना पड़ेगा। वे कहते हैं कि यह करके दिखाने पर ही हो पाएगा। वैसे इसमें हवन की आवश्यकता नहीं है। लेकिन ठीक है, कभी बता देंगे।
क्या मैं दसों हाथों में शस्त्र वाली महाकाली की पूजा कर सकता हूं?
घर के विग्रह में कम से कम एक हाथ आशीर्वाद मुद्रा में हो
राहुल राणा जी को उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि यह विषय पहले लाइव में स्पष्ट किया है और अलग से वीडियो भी है: घर पर ऐसे श्री विग्रह का पूजन उचित है जिसमें भगवती का कम से कम एक हाथ आशीर्वाद मुद्रा में हो, भगवती के सौम्य रूप में, क्योंकि अपना भाव भी वैसा ही बनता है। और अगर वह दस मुख वाली भगवती हैं, तो वे दस महाविद्या स्वरूपा हैं — उनकी फोटो रखकर सेवा-पूजा कर सकते हैं, चलेगा; उनके पास खप्पर है तो खप्पर में मधु रखिए, और एक हाथ आशीर्वाद मुद्रा में हो, यह उचित है।
वक्ता कहते हैं: राहुल जी, देखिए, यह विषय उन्होंने पहले स्पष्ट किया है, लाइव में भी, और अलग से वीडियो भी है। घर पर ऐसे श्री विग्रह का पूजन करना उचित रहता है जिसमें भगवती का कम से कम एक हाथ आशीर्वाद मुद्रा में हो, भगवती के सौम्य रूप में — क्योंकि अपना भाव भी वैसा ही बनता है। और अगर आपके पास वह दस मुख वाली भगवती हैं, तो वे दस महाविद्या स्वरूपा हैं। ठीक है — आप उनकी फोटो रखकर सेवा-पूजा कीजिए, चलेगा। उनके पास खप्पर है तो खप्पर में मधु रखिए; और एक हाथ आशीर्वाद मुद्रा में हो, तो उचित है।
क्या दीपावली की एक रात में लक्ष्मी अष्टक सिद्ध हो सकता है?
कीजिए — एक रात में 108 पाठ ही हो सकते हैं
वे कहते हैं, बिल्कुल कर लीजिए। एक रात में करना चाहते हैं, तो एक रात में — इसमें और क्या विधान बताएं? एक रात में 108 पाठ ही किए जा सकते हैं; उससे ज्यादा क्या करेंगे?
दिवाली में एक रात में लक्ष्मी अष्टक सिद्ध हो जाता है क्या और उसका क्या विधान है, यह पूछने पर वक्ता कहते हैं: बिल्कुल कर लीजिए। आप एक रात में करना चाहते हैं, तो एक रात में। अब इसमें विधान क्या ही बताएं। एक रात में 108 पाठ ही किए जा सकते हैं; उससे ज्यादा क्या करेंगे।
क्या कमरे में अकेले बिना धूप-दीप के जाप किया जा सकता है?
कम से कम एक कर्म साक्षी दीपक; बहुत विकट स्थिति में चंद्र-सूर्य साक्षी
यह पूछने पर कि क्या रात में कमरे में एकांत में आसन पर बैठकर, बिना धूप-दीप के, बगला माई का अष्टोत्तर नाम जाप किया जा सकता है, वे कहते हैं कि साक्षी दीपक कम से कम एक होना चाहिए — कर्म साक्षी दीपक; कम से कम एक की व्यवस्था करके जाप कीजिए, और कुछ हो चाहे न हो। बहुत विकट परिस्थिति में चंद्र और सूर्य को साक्षी बनाया जाता है, अगर ऐसी कोई अवस्था हो।
वक्ता कहते हैं: देखिए, साक्षी दीपक तो होना चाहिए। कर्म साक्षी दीपक: कम से कम एक की व्यवस्था कीजिए, और जाप कीजिए। और कुछ हो चाहे न हो। बहुत विकट परिस्थिति में चंद्र और सूर्य को साक्षी बनाया जाता है, अगर ऐसी कोई अवस्था है तो।
क्या मुझे महाभैरव छोड़कर कालिका योगिनी करनी चाहिए?
भागिए मत — साथ में काली पूजन कीजिए
आशीष जी को उत्तर देते हुए वे कहते हैं: महाभैरव को मत छोड़िए। उनका कीजिए। साथ में भगवती काली का पूजन कीजिए। अगर आप कालिका योगिनी करना चाहते हैं, तो वे अभी आपको मना करेंगे — रुकिए; आपने इतने दिन मेहनत की है, भागिए मत। रुकिए।
वक्ता कहते हैं: कालिका योगिनी साधना, आशीष जी — आशीष जी, महाभैरव। उनको मत छोड़िए। उनका कीजिए। साथ में भगवती काली का पूजन कर लीजिए। अगर आप कालिका योगिनी करना चाहते हैं, तो वे आपको अभी मना करेंगे। रुकिए। आपने इतने दिन मेहनत की है; भागिए मत। रुकिए।
क्या मैं दुर्गा 32 नामावली का पांच दिन का अनुष्ठान कर सकता हूं?
हां, चक्र विधि से — दिन में एक या अधिक चक्र
वे कहते हैं, बिल्कुल कर लीजिए — चक्र विधि से कीजिए। पांच दिन हैं, तो चक्र विधि से पांच बार कीजिए; यानी आप दिन में एक चक्र विधि की बात कर रहे हैं, वह भी कर सकते हैं, और एक से ज्यादा भी कर सकते हैं। सप्त श्लोकी दुर्गा, पुनरावृत्ति, या कालिका योगिनी की प्रथम साधना के बारे में अलग से पूछने पर, वे अनिल जी से कहते हैं कि सप्त श्लोकी कीजिए, क्योंकि इस बार उन्होंने सप्त श्लोकी की थी।
इस बार दिवाली में दुर्गा मां की 32 नामावली का पांच दिन का अनुष्ठान करने के बारे में पूछने पर वक्ता कहते हैं: बिल्कुल कर लीजिए, चक्र विधि से कर लीजिए। पांच दिन हैं, तो चक्र विधि से पांच बार, पांच बार भी कर लीजिए। यानी आप एक दिन में एक चक्र विधि की बात कर रहे हैं, वह भी कर सकते हैं; एक से ज्यादा भी कर सकते हैं। फिर सप्त श्लोकी दुर्गा, या पुनरावृत्ति, या कालिका योगिनी की प्रथम साधना के बारे में पूछने पर वे कहते हैं: सप्त श्लोकी कर लीजिए। अगर कालिका योगिनी की इच्छा है, और आप प्रमुख रूप से भगवती काली का पूजन करते हैं, तो उनकी भी कर सकते हैं। और वैसे भी अनिल जी, इस बार आपने सप्त श्लोकी की थी, तो उनका भी कर लीजिए — तो और भी अच्छा है। आपके लिए कोई दिक्कत नहीं है।
धनतेरस पर तंत्रोक्त लक्ष्मी कलश के साथ क्या करना है?
खोलिए, कच्ची सामग्री बदलिए, बाकी साफ करके फिर से भरिए
जिन सबके पास पहले से लक्ष्मी तंत्रोक्त कलश स्थापित है, स्वयं किया है या करवाया है, उन्हें धनतेरस के दिन — सुबह ही, या शाम के समय भी — कलश खोलकर सारी सामग्री निकालनी है। उसमें जो भी अनाज रखा है, उसे बदलना है। बाकी सारी सामग्री पर फिर से गंगाजल छिड़ककर, साफ वस्त्र से पोंछकर, तिलक करके, धूप-दीप दिखाकर, फिर कलश में रखकर बांधना है और सुगंधित करके रखना है। फिर उसका पूजन-पाठ करना है, और पांचों दिन पूजा स्थान पर रखना है।
वक्ता कहते हैं कि जिन सबके पास पहले से अपना लक्ष्मी तंत्रोक्त कलश स्थापित है, या उन्होंने स्थापित करवाया है: धनतेरस के दिन सुबह ही, या शाम के समय भी, कलश खोलकर उसमें से सारी सामग्री निकालनी है। उसमें अगर कोई अनाज रखा है, तो अनाज को बदल लेना है। बाकी सारी सामग्री पर फिर से गंगाजल छिड़ककर, साफ वस्त्र से पोंछकर, तिलक आदि करके, धूप-दीप दिखाकर, फिर कलश में रखकर, बांधकर, सुगंधित करके फिर रखना है। फिर उसका पूजन-पाठ करना है। पांचों दिन उसे पूजा स्थान पर ही रखिए।
कलश की कौन सी सामग्री बदली जा सकती है, और क्या कलश ही बदल सकते हैं?
केवल कच्ची सामग्री; पक्की वस्तुएं और कलश कभी नहीं
वे कहते हैं कि कलश नहीं बदलना है — ऐसा नहीं कि इस बार कलश अच्छा नहीं लग रहा, या थोड़ा बढ़िया कर लें, या अपने मन से कुछ एडिशनल जोड़ दें। वह सब नहीं करना है। केवल कच्ची सामग्री बदली जा सकती है: उसमें की लाल गुंजा खराब हो गई हो, कमल गट्टा खराब हो गया हो, तो बदल लीजिए; काली हल्दी खराब हो गई हो तो काली हल्दी ला सकते हैं। पर पक्की वस्तुएं — शंख, कौड़ी, कील आदि, सिक्के, रत्न — इनमें से कुछ नहीं बदलना है। और कलश कभी नहीं बदलेंगे; जितना पुराना होगा, उतना श्रेष्ठ होता जाएगा, क्योंकि आपकी सारी ऊर्जा उसमें सन्निहित रहती है।
वक्ता कहते हैं कि कलश नहीं बदलना है। यह ध्यान रखिए — ऐसा नहीं कि भैया, इस बार हमें कलश अच्छा नहीं लग रहा, या जैसा आप कहते हैं, कुछ बढ़िया कर लेते हैं, या अपने मन से कुछ एडिशनल जोड़ देते हैं। वह सब नहीं करना है। जो सामग्री कच्ची होती है, उसी को बदला जा सकता है। अगर उसमें की लाल गुंजा खराब हो गई है, कमल गट्टा खराब हो गया है, तो बदल लीजिए। काली हल्दी है और खराब हो गई है, तो काली हल्दी ला सकते हैं। लेकिन पक्की वस्तुएं — शंख, कौड़ी, कील आदि, सिक्के, ये सब चीजें — नहीं बदलनी हैं। रत्न आदि नहीं बदलने हैं। जो कच्ची चीजें हैं, कच्ची सामग्री, वह आप नई रख सकते हैं। और अगर नई नहीं मिल रही और पुरानी ठीक है, तो उसी को रहने दीजिए। कभी होता है कि नमी लग गई, उसमें पानी जम गया, और कच्ची चीजें खराब हो गईं — उन्हीं को बदलना है। कलश आदि कभी नहीं बदलेंगे; नया कलश फिर से नहीं बनाना है। जितना पुराना होगा, उतना श्रेष्ठ होता जाएगा। आपकी सारी ऊर्जा उसमें सन्निहित रहती है। तो कलश अब दोबारा न बनाना है, न बनवाना है। पुराने कलश का ही पूजन होगा। उसी कलश का बार-बार पूजन होगा।
क्या हर दिवाली नई लक्ष्मी-गणेश मूर्ति खरीदनी चाहिए?
हर साल मिट्टी और चीनी मिट्टी की मूर्तियां लाना बंद कीजिए
वे कहते हैं, हर दिवाली लक्ष्मी गणेश जी की मूर्ति लाना बंद कीजिए। लोग मिट्टी की मूर्ति, चीनी मिट्टी की मूर्ति लाते हैं और साल भर पूजते हैं; दुकानदार तो विशेष रूप से — हर दुकान में चीनी मिट्टी की लक्ष्मी गणेश मूर्ति, रंगीन कलश के साथ रहती है। अगले साल नई मूर्ति आती है, पंडित जी भी नई पर पूजा करवा देते हैं; पुरानी ले जाकर पीपल के नीचे रख दी जाती है, या पानी में फेंक दी जाती है, या घर में कहीं टूटी-फूटी मिलती है। साल भर पूजा करते हैं और फिर यही श्राप आपको लगता है। वे कहते हैं, यह अपराध करना बंद कीजिए।
वक्ता कहते हैं, हर दिवाली लक्ष्मी गणेश जी की मूर्ति लाना बंद कीजिए। लोग मिट्टी की मूर्ति, चीनी मिट्टी की मूर्ति लाते हैं, और इस साल भर उसकी पूजा करते हैं — दुकानदार तो विशेष करके। हर दुकान में लक्ष्मी गणेश जी की चीनी मिट्टी की मूर्ति, वह रंगीन मूर्ति और कलश रहता है। और अगले साल नई मूर्ति आती है; पंडित जी लोग भी नई पर पूजा करवा देते हैं। पुरानी को ले जाकर पीपल के नीचे रख देंगे, या पानी में फेंक देंगे, या घर में कहीं टूटी-फूटी मिल जाएगी। साल भर पूजा करते हैं, और फिर यही श्राप आपको लगता है। यह अपराध, यह पाप करना बंद कीजिए।
इसके बदले क्या लाना चाहिए, और प्रतिष्ठा कब करें?
धनतेरस पर प्राण प्रतिष्ठा के साथ धातु का श्री विग्रह
जो भी धातु आपके सामर्थ्य में हो — पीतल का सामर्थ्य हो तो पीतल, चांदी का सामर्थ्य हो तो चांदी। एक बार श्री विग्रह लाइए और किसी जानकार पंडित जी या आचार्य से विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठा करवाइए; नहीं तो धनतेरस के दिन स्वयं कीजिए। पुरानी को अभी मत हटाइए — पुरानी का विसर्जन दूज के बाद होगा; दूज तक उसे अलग स्थान पर रखिए। पर धनतेरस के दिन समय निकालकर पूरे विधि-विधान से कीजिए। आप करोड़पति हों, करोड़ों कमाते हों, फिर भी मूर्तियों को ले जाकर फेंकने का, हर साल की मूर्ति हटाने का जो अपराध आप कर रहे हैं, वह एक दिन आपको सड़क पर ले आएगा।
वक्ता कहते हैं कि जो भी धातु, जो आपका सामर्थ्य हो — पीतल का सामर्थ्य हो तो पीतल; चांदी का सामर्थ्य हो तो चांदी। एक बार श्री विग्रह लाइए, और किसी पंडित जी से, जिस आचार्य को जानकारी हो, उनसे विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठा करवा लीजिए। नहीं तो धनतेरस के दिन स्वयं कीजिए। पुरानी को अभी मत हटाइए। पुरानी का विसर्जन दूज के बाद होगा। दूज तक उसे अलग स्थान में रखना है; पर धनतेरस के दिन समय निकालकर पूरे विधि-विधान से कीजिए। आप करोड़पति भी हों, करोड़ों कमाते हों — यह जो अपराध आप कर रहे हैं, मूर्तियों को बार-बार ले जाकर फेंकना, हर साल की मूर्ति हटाना — आप एक दिन सड़क पर आ जाएंगे। यह अपराध मत किया कीजिए।
लोग घर में लक्ष्मी-गणेश की प्रतिष्ठा से क्यों डरते हैं?
वे इस डर को षड्यंत्र कहते हैं, और वास्तु वाली बात का उत्तर देते हैं
श्री विग्रह लाइए, बढ़िया ठोस — लक्ष्मी गणेश जी का विग्रह खोखला नहीं होना चाहिए। इनका कभी विसर्जन नहीं होता, इन्हें कभी विदाई नहीं दी जाती। इसमें चल प्रतिष्ठा होती है, अचल नहीं, इसलिए घर में प्रतिष्ठा कैसे होगी, इसकी चिंता नहीं करनी। वे कहते हैं कि सब कुछ एक में लपेट दिया गया है: वे कहेंगे कि घर में धूमावती की साधना नहीं करनी, उनका विग्रह नहीं रखना, और बगलामुखी का विग्रह रखें तो नियम हैं — पर लोगों ने उसे भी सबके सामने रखने लायक समझा दिया है, जबकि लक्ष्मी गणेश जी की प्रतिष्ठा कराने में लोगों की हिम्मत टूट जाती है। और जो कहते हैं कि वास्तु शास्त्र कहता है घर में मंदिर नहीं होना चाहिए, उनके बारे में वे कहते हैं कि उन्हें चप्पल खोलकर मारना चाहिए।
वक्ता कहते हैं, श्री विग्रह लाइए, बढ़िया ठोस — लक्ष्मी गणेश जी का विग्रह खोखला नहीं होना चाहिए। इनका कभी विसर्जन नहीं होता; इन्हें कभी विदाई नहीं दी जाती। वे कहते हैं कि इतने दिनों से यह बता रहे हैं। इन्हें रखिए, पूरी प्रतिष्ठा कीजिए। विधि-विधान चैनल पर भी है; आप देख-देखकर समझकर वैसे भी कर सकते हैं; पीडीएफ डाउनलोड करके स्वयं भी कर सकते हैं, या किसी योग्य आचार्य को बुलाकर करवा लीजिए। इसमें चल प्रतिष्ठा होती है, अचल नहीं — इसलिए परेशान होने की जरूरत नहीं कि घर में प्रतिष्ठा कैसे होगी। यह पूरी मानसिकता बदलिए। वे कहते हैं कि इन विषयों में हर चीज को एक ही में लपेट दिया गया है। वे कहेंगे कि घर में दस महाविद्याओं में से धूमावती की साधना नहीं करनी, उनका विग्रह नहीं रखना; बगलामुखी का विग्रह रखें तो नियम हैं। और लोगों ने उसे भी सबके सामने ऐसे समझा दिया है कि रख सकते हैं — जबकि लक्ष्मी गणेश जी की प्रतिष्ठा कराने में लोगों की हिम्मत टूट जाती है: नहीं भैया, इन्हें रखेंगे तो नियम हो जाएगा। वे पूछते हैं, करोगे क्या बाबू? और जो लोग कहते हैं कि घर में मंदिर नहीं बना सकते, वास्तु शास्त्र का नियम कहता है कि घर में मंदिर नहीं होना चाहिए — ऐसे लोगों को चप्पल खोलकर मारना चाहिए।
विग्रह किस आकार का हो, और खड़ी लक्ष्मी वाला नियम सही है क्या?
छह इंच तक, ठोस — और खड़ी लक्ष्मी वाले टोटके में कोई लॉजिक नहीं
घर में धातु के श्री विग्रह लाइए, ठोस हों, खोखले नहीं, सामर्थ्य के अनुसार — कम से कम जितना छोटा आपको ठीक लगे, और बड़े में छह इंच तक की मूर्ति। व्यापारिक प्रतिष्ठान हो तो वहां भी मूर्ति ठोस होनी चाहिए। जो टोटका चल रहा है कि व्यापारिक प्रतिष्ठान पर खड़ी लक्ष्मी जी की फोटो या विग्रह हो और घर में बैठी हुई, क्योंकि वहां ग्राहक आते-जाते हैं और घर में लक्ष्मी जी बैठें — वे पूछते हैं, क्या इन सब चीजों का कोई लॉजिक है? कोई लॉजिक नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि तो घर में धातु के श्री विग्रह लाइए; ठोस हों, खोखले नहीं, सामर्थ्य के अनुसार छोटे-बड़े — कम से कम जितना छोटा आपको ठीक दिखे, और बड़े में छह इंच तक की मूर्ति। और अगर आपका व्यापारिक प्रतिष्ठान है, तो वहां भी मूर्ति ठोस ही होनी चाहिए। खड़े गणेश जी आएंगे या खड़ी लक्ष्मी जी — यह सब जो टोटका चल रहा है, कि व्यापारिक प्रतिष्ठान पर, दुकान पर खड़ी लक्ष्मी जी की फोटो हो, खड़ी लक्ष्मी जी का श्री विग्रह हो, और घर में बैठी हुई लक्ष्मी जी, क्योंकि वहां ग्राहक आते-जाते हैं और घर में लक्ष्मी जी बैठें। वे पूछते हैं, इन सब चीजों का कोई लॉजिक है, बाबू? कोई लॉजिक नहीं है। ठीक है — आपका मन, आपकी इच्छा; वे इसमें बहुत ज्यादा नहीं बोलेंगे।
वे विग्रह का कौन सा रूप सुझाते हैं?
कमल या सिंहासन पर विराजमान, घर और दुकान दोनों के लिए, सदा के लिए
उनके अनुसार: कमल के आसन पर विराजमान भगवती लक्ष्मी, कमल के आसन पर विराजमान भगवान गणेश; या अच्छे आसन पर बैठे लक्ष्मी जी और गणेश जी; गज पर बैठी भगवती लक्ष्मी, या मूषक पर बैठे गणपति जी — हालांकि मूषक वाले मिलना मुश्किल है। पर सिंहासन पर बैठे भगवान गणपति, और सिंहासन या कमल आसन पर बैठी भगवती लक्ष्मी — ऐसा सुंदर श्री विग्रह व्यापारिक प्रतिष्ठान और घर, दोनों में सदा के लिए प्रतिष्ठित कीजिए।
फिर भी उनके अपने अनुसार: कमल के आसन पर विराजमान भगवती लक्ष्मी; कमल के आसन पर विराजमान भगवान गणेश; या फिर अच्छे आसन पर बैठे लक्ष्मी जी और गणेश जी; गज पर बैठी भगवती लक्ष्मी; या मूषक पर बैठे गणपति जी, जो आप ला रहे हैं — वक्ता कहते हैं, मूषक वाले तो मिलना ही मुश्किल है, वैसे नहीं मिलेंगे। लेकिन सिंहासन पर बैठे भगवान गणपति, और सिंहासन पर या कमल आसन पर बैठी भगवती लक्ष्मी — ऐसा सुंदर श्री विग्रह व्यापारिक प्रतिष्ठान में भी और घर में भी सदा के लिए प्रतिष्ठित कीजिए।
क्या पुरानी मूर्ति ज्यादा ऊर्जावान होती है?
कभी न हटाइए; हर साल स्नान कराइए और नए वस्त्र पहनाइए
वे कहते हैं कि यह मूर्ति जितनी पुरानी होगी, उतनी ऊर्जावान होगी। ऐसा नहीं कि बाप-दादा की स्थापित की हुई मूर्ति को अब हटाना है। पर हर साल मूर्ति हटाकर नई मूर्ति रख लेना आपकी बहुत बड़ी बेवकूफी है। ऐसे सुंदर श्री विग्रह घर में सदा के लिए स्थापित कीजिए — बस; उन्हें कभी मत हटाइए। हर वर्ष उन्हें स्नान कराएंगे और नए वस्त्र पहनाएंगे; और बीच में जो पर्व काल, ग्रहण आदि पड़ते हैं, उनमें उनके वस्त्र और जनेऊ, उपवीत बदलकर पूजन करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि यह मूर्ति जितनी पुरानी होगी, उतनी ऊर्जावान होगी। ऐसा नहीं है कि बाप-दादा की स्थापित की हुई मूर्ति को अब हटाना है। लेकिन हर साल मूर्ति हटा देना और नई मूर्ति रख लेना आपकी बहुत बड़ी बेवकूफी है। ये सब गलतियां मत कीजिए। ऐसे सुंदर-सुंदर श्री विग्रह घर में सदा के लिए स्थापित कर लीजिए, बस। उन्हें कभी मत हटाइए। हर वर्ष उन्हें स्नान कराएंगे, नए वस्त्र पहनाएंगे। और बीच में जो पर्व काल पड़ता है, ग्रहण आदि पड़ता है, उसमें उनके वस्त्र और जनेऊ, उपवीत आदि बदलकर पूजन करेंगे।
ग्रहण के जाप के बाद भागते बछड़े के सपने का क्या अर्थ है?
पितरों से जुड़ा विषय, और दीपावली की अमावस्या पर दान
अभिषेक जी ने चंद्र ग्रहण के समय अघोर बगलामुखी का जाप किया था और उस दिन सपने में एक घर में भागता हुआ गाय का बछड़ा देखा, जिसे कोई पकड़ने की कोशिश कर रहा था, साथ में छोटे कीड़े भी। उन्हें उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि कोई दिक्कत नहीं है, और एक रात के जाप के बारे में इतना नहीं सोचना चाहिए। फिर भी जो आप देख रहे हैं, वह पितरों से संबंधित विषय है। पितरों के निमित्त अमावस्या के दिन — दीपावली के दिन पड़ने वाली अमावस्या को — सभी यथाशक्ति संकल्प करके दान दें।
वक्ता कहते हैं: अभिषेक जी, कोई दिक्कत नहीं है, ठीक है। एक रात के जाप के बारे में इतना ज्यादा नहीं सोचना है। फिर भी जो आप देख रहे हैं, वह पितरों से संबंधित विषय है। पितरों के निमित्त अमावस्या के दिन — दीपावली के दिन जो अमावस्या पड़ रही है — सभी यथाशक्ति संकल्प करके दान आदि कर दीजिए।
पितरों के निमित्त दान किसे देना चाहिए?
ब्राह्मण को दान, और यह आपत्ति कि इससे ब्राह्मण अमीर बनते हैं
वे कहते हैं, ब्राह्मण को दान आदि दीजिए — उसे अमीर बना दीजिए, किसी ब्राह्मण के नाम प्रॉपर्टी कर दीजिए। क्योंकि लोगों के मन में आता है कि इससे ब्राह्मण अमीर बन रहे हैं। अगर आप ऐसी भावना रखते हैं, तो ये विषय मत सुनिए; नहीं तो कीजिए, जिससे आपका अपना भला हो। हम अपनी सारी अलाय-बलाय ही देकर आते हैं — संकल्प करके जो आप ब्राह्मण को देते हैं, उसका सारा भार ब्राह्मणों पर पड़ता है। वह संभालेगा; वह आपका विषय नहीं है। तो पितरों के निमित्त अमावस्या के दिन दान जरूर कीजिए।
वक्ता कहते हैं, ब्राह्मण को दान आदि दीजिए — उसे अमीर बना दीजिए। कर दीजिए, किसी ब्राह्मण के नाम प्रॉपर्टी। यही है ना — क्योंकि लोगों के मन में आ जाता है कि इससे ब्राह्मण अमीर बन रहे हैं। अगर आप ये सब भावनाएं रखते हैं, तो इन विषयों को मत सुना कीजिए। नहीं तो कीजिए, जिससे आपका अपना हो। हम अपनी सारी अलाय-बलाय ही देकर आते हैं ना। संकल्प करके जो आप ब्राह्मण को देते हैं, उसका सारा भार ब्राह्मणों पर पड़ता है। वह समझेगा; वह आपका विषय नहीं है। तो पितरों के निमित्त अमावस्या के दिन दान जरूर कर दीजिए। अगर घर में उनका स्थान रखा है, तो अमावस्या के दिन, हां।
ऊत, मिसकैरेज या मसान दोष वालों को क्या करना चाहिए?
उपाय मंदिर में ही करना है, घर में कभी नहीं
जो लोग ऊत से संबंधित उपाय करते हैं, या जिनका मिसकैरेज आदि हुआ है और वे बच्चे सपने में दिखते हैं; जो स्त्रियां स्वयं को गर्भवती देखती हैं; जो अविवाहित लड़कियां स्वयं को गर्भवती या बच्चे के साथ देखती हैं; जिन्हें मसान दोष आदि है, या कलवे का दोष है — वे अमावस्या के दिन भगवती काली जी के मंदिर जाएं, जहां पीपल का वृक्ष हो, और वहां बताया गया उपाय जरूर करें। घर के ऊत के लिए, घर के उन बच्चों के लिए जिनकी मृत्यु वैसे हुई, जो भी पूजन विधि बताई गई है, वह मंदिर में ही करनी है। यह पूजन घर में नहीं करना है — वे कहते हैं कि उन्होंने यह बार-बार स्पष्ट किया है।
वक्ता कहते हैं कि जो लोग ऊत से संबंधित उपाय करते हैं; या जिनका मिसकैरेज आदि हुआ है और वे बच्चे सपने में दिखते हैं; जो स्त्रियां स्वयं को गर्भवती देखती हैं; जो अविवाहित लड़कियां अपने आप को गर्भवती या बच्चे के साथ देखती हैं; जिन्हें मसान दोषादि है, कलवे का दोष है। वे लोग अमावस्या के दिन भगवती काली जी के मंदिर जाकर, जहां पीपल का वृक्ष उपस्थित हो, वहां जो उपाय बताया गया है, वह जरूर करें। अगर घर का ऊत आदि है, घर के बच्चे हैं जिनकी मृत्यु वैसे हुई है, तो उनके निमित्त जो भी पूजन की विधि बताई गई है, वह मंदिर में ही करनी है। यह सब पूजन घर में नहीं करना है — यह उन्होंने बार-बार स्पष्ट किया है।
घर के बाहर से आने वाले अटपटे सपनों का क्या करें?
अमावस्या या चतुर्दशी पर भैरव पूजन, और बटुक भैरव का साबर जाप
अगर मसान दोष आदि है, उटपटांग सपने देख रहे हैं, और घर का कुछ वैसा नहीं बल्कि बाहर का कुछ है, तो अमावस्या या चतुर्दशी के दिन भैरव मंदिर में, या घर पर भी, भैरव जी का पूजन कर सकते हैं। बटुक भैरव जी के जाप का मंत्र साबर पर दिया गया है; वह जाप आप उठा सकते हैं — स्त्री भी और पुरुष भी कर सकते हैं। और पितरों के निमित्त जरूर करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि अगर मसान दोषादि है, अगर उटपटांग सपने देख रहे हैं, घर का कुछ वैसा नहीं है पर बाहर का कुछ है, तो अमावस्या के दिन या चतुर्दशी के दिन भैरव जी का पूजन भैरव मंदिर में या घर पर भी कर सकते हैं। बटुक भैरव जी के जाप का मंत्र साबर पर दिया गया है; वह जाप आप उठा सकते हैं। स्त्री भी और पुरुष भी कर सकते हैं। और पितरों के निमित्त जरूर करेंगे। अलग से यह पूछने पर कि क्या मिट्टी की धूपदानी रोज नई रखनी चाहिए, वे विमल जी से कहते हैं: नहीं, नहीं — मिट्टी की धूपदानी एक ही रहेगी, और जब फूटेगी तब नई लानी है; और उसे धोने की आवश्यकता नहीं है। उसकी सामग्री गिराइए और फिर से उपयोग कीजिए।
पांच दिन के अष्टोत्तर शतनाम अनुष्ठान का हवन किस दिन करना चाहिए?
दीपावली की रात जरूर, और अंतिम दिन तो और भी अच्छा
दीपावली की रात अनुष्ठान है, तो हवन जरूर कीजिए; बाकी अंतिम दिन भी कर सकते हैं। दीपावली की रात महानिशा काल में हवन का कारण यह है कि उस दिन घर में भगवती लक्ष्मी का और घर की सभी प्रमुख देव शक्तियों का आगमन अवश्य होता है; इसलिए उस दिन पूजन और हवन जितना अच्छे से हो सके, करना चाहिए। और अगर अनुष्ठान चल रहा है और पांच दिन का है, तो अंतिम दिन भी कीजिए — वह और भी अच्छा है।
वक्ता कहते हैं: देखिए, दीपावली की रात अनुष्ठान है, तो हवन जरूर कीजिए। बाकी आप अंतिम दिन भी कर सकते हैं। दीपावली की रात महानिशीथ काल में हवन का कारण यह है कि उस दिन घर में भगवती लक्ष्मी का, और घर की सभी प्रमुख देव शक्तियों का आगमन अवश्य होता है। इसलिए उस दिन हवन-पूजन जितना अच्छे से हो सके, सब करना है। और अगर अनुष्ठान चल रहा है, और पांच दिन का है, तो अंतिम दिन भी कर लीजिए — तो और भी अच्छा है।
जिसने अब तक कुछ नहीं किया, वह कहां से आरंभ करे?
गणपति या दत्तात्रेय, और देव दीक्षा के दिन
जिन्होंने अब तक कुछ नहीं किया, वे अपनी साधना भगवान गणपति से आरंभ करें — लक्ष्मी गणपति जी से आरंभ कर सकते हैं — या भगवान दत्तात्रेय से; दत्तात्रेय माला मंत्र आदि कर सकते हैं। देव दीक्षा विधान धनतेरस के दिन, अमावस्या काल रात्रि के दिन, दूज के दिन, और आने वाली अक्षय नवमी को कर सकते हैं; और भगवान दत्तात्रेय का गुरु वरण करके उनकी साधना कर सकते हैं। या अगर आप नए साधक हैं, तो गणपति जी की संकट नाशन साधना आरंभ कर सकते हैं — पहले तो गणपति गुरु साधना जरूर करनी चाहिए; नहीं तो भैरव जी की साधना कीजिए, अगर आप आरंभिक साधना कर रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि जिन्होंने अभी तक कुछ भी नहीं किया, वे अपनी साधना भगवान गणपति से आरंभ करें — आप लक्ष्मी गणपति जी से आरंभ कर सकते हैं, या भगवान दत्तात्रेय से आरंभ कर सकते हैं; दत्तात्रेय माला मंत्र आदि कर सकते हैं। धनतेरस के दिन आप देव दीक्षा विधान कर सकते हैं। अमावस्या काल रात्रि के दिन आप देव दीक्षा विधान कर सकते हैं। दूज के दिन आप देव दीक्षा विधान कर सकते हैं। अक्षय नवमी आ रही है; उस दिन आप देव दीक्षा विधान कर सकते हैं। और भगवान दत्तात्रेय का गुरु वरण करके आप उनकी साधना कर सकते हैं। या आप चाहें तो गणपति जी की साधना, संकट नाशन, आरंभ कर सकते हैं, अगर आप नए साधक हैं। पहले तो आपको गणपति गुरु साधना करनी ही चाहिए। नहीं तो भैरव जी की साधना भी कीजिए, अगर आप आरंभिक साधना कर रहे हैं।
शिव पंचाक्षर मंत्र का पुरश्चरण कैसे होता है?
27 लाख — शिव महापुराण का लाइव सुनिए
वे कहते हैं, 27 लाख — शिव महापुराण का लाइव सुनिए। उसमें पंचाक्षर का पूरा विस्तार से वर्णन है; प्लेलिस्ट बनी हुई है। वे मेघनाथ जी से लाइव सुनने को कहते हैं, जहां प्रमाण के साथ बताया गया है: कृष्ण पक्ष चतुर्दशी से आरंभ करके शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तक आपको 5 लाख मंत्र जाप करना है; फिर आपके साथ बैठे ब्राह्मण कितनी आहुतियां देंगे और उसका क्या विधान है; और उसके बाद शिव पूजन और रुद्र पूजन कैसे होगा। सारा विधान लाइव में शिव महापुराण के साथ, प्रमाणित करके बताया गया है।
शिव पंचाक्षर मंत्र का पुरश्चरण सही से कैसे होता है? वक्ता कहते हैं, 27 लाख — शिव महापुराण का लाइव सुनिए। उसमें पंचाक्षर का पूरा विस्तार से वर्णन है। उसकी प्लेलिस्ट बनी हुई है, मेघनाथ जी; लाइव सुनिए, सप्रमाण, जिसमें उन्होंने सब बताया है: कि कृष्ण पक्ष चतुर्दशी से आरंभ करके शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तक आपको 5 लाख मंत्र जाप करना है; फिर ब्राह्मणों के साथ बैठकर वे कितनी आहुतियां देंगे, और उसका क्या विधान है; और उसके बाद शिव पूजन, रुद्र पूजन कैसे होगा। सारा विधान उन्होंने लाइव में शिव पुराण के साथ, प्रमाणित करके बताया है। कृपया उसे सुनिए। यह पूछने पर कि क्या भैरव धूपदानी में पीतल के दीपक का उपयोग कर सकते हैं, वे उत्तर देते हैं: हां, बिल्कुल, और फिर उन्हें धोकर दोबारा उपयोग कर सकते हैं। रामू काका, जो कहते हैं कि वे तंत्रोक्त लक्ष्मी कलश बनाने में असमर्थ हैं, उनके द्वारा इसके बदले कोई लक्ष्मी अष्टकम या कोई साधना पूछने पर वे कहते हैं कि माता लक्ष्मी की कृपा के लिए इतना सारा बताया गया है — चैनल पर इतने सारे विधि-विधान हैं, कृपया उन्हें देखिए तो सही।
कालिका योगिनी साधना से क्या घर का तंत्र कटेगा, और वार्षिकी का क्या?
हाँ, कटेगा — पर महाभैरव मत छोड़िए; और बरसी तक सेवा नहीं
पूछा गया कि कालिका योगिनी साधना करने से क्या घर का तंत्र विचार कटेगा। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कटेगा, लेकिन महाभैरव करना मत छोड़िए। अलग से पूछा गया कि क्या हनुमान जी की साधना नहीं होती। वे कहते हैं कि होती है, क्यों नहीं होगी। और मोनिका जी से वे कहते हैं कि वार्षिक पूजन हो गया हो तभी आप कीजिए। अगर वार्षिकी नहीं हुई है, बरसी नहीं हुई है, तो अभी सेवा-पूजा मत कीजिए और किसी अनुष्ठान में भाग मत लीजिए।
पूछा गया कि क्या हनुमान जी की साधना नहीं होती। वक्ता कहते हैं कि होती है, क्यों नहीं होगी। पूछा गया कि कालिका योगिनी साधना करने से क्या घर का तंत्र विचार कटेगा। वे कहते हैं कि बिल्कुल कटेगा, लेकिन महाभैरव करना मत छोड़िए। मोनिका जी से वे कहते हैं कि वार्षिक पूजन हो गया हो तभी आप कीजिए। अगर वार्षिकी नहीं हुई है, बरसी नहीं हुई है, तो अभी सेवा-पूजा मत कीजिए और किसी अनुष्ठान में भाग मत लीजिए। शिव-पार्वती जी की प्रसन्नता के लिए जो पहले बताया अनुष्ठान है, उसी को बार-बार कीजिए, मेघनाथ जी।
क्या पार्वती योगिनी साधना होती है?
नहीं — और जया-विजया की साधना उग्रतम साधनाओं में आती है
वक्ता कहते हैं कि पार्वती योगिनी साधना नहीं है, मेघनाथ जी — हम उसे कैसे उपलब्ध कराएँगे? जो चीज मर्यादा में रखकर बताई जा सके, हम वही बता सकते हैं। भगवती पार्वती की योगिनियों से जुड़ी कोई चीज नहीं है। अगर जया और विजया की साधना है, तो वह उग्रतम साधनाओं में, प्रमुख साधनाओं में आती है — वह हम नहीं दे सकते।
वक्ता कहते हैं कि पार्वती योगिनी साधना नहीं है, मेघनाथ जी; हम उसे कैसे उपलब्ध कराएँगे। जो चीज मर्यादा में रखकर बताई जा सके, हम वही बता सकते हैं। भगवती पार्वती की योगिनियों से जुड़ी कोई चीज नहीं है। अगर जया और विजया की साधना है, तो वह उग्रतम साधनाओं में, प्रमुख साधनाओं में आती है — वह हम नहीं दे सकते।
हवन में अपामार्ग के साथ कौन-सी लकड़ियाँ ले सकते हैं?
नवग्रह लकड़ी, गाय के गोबर के उपले, और कवच व शाबर आहुति में खास तौर पर शमी
महाभैरव स्तोत्र से हवन के प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि अपामार्ग की लकड़ी जल्दी जल जाती है। अपामार्ग के साथ आप नवग्रह लकड़ी ले सकते हैं, और गाय के गोबर के उपले ले सकते हैं। नवग्रह लकड़ियों में से कोई भी अलग लकड़ी लीजिए; और आपकी तरफ, राजस्थान की ओर, शमी जी की लकड़ी बहुत मिलती है, तो वे लकड़ियाँ ज़्यादा मात्रा में ले सकते हैं। जब आप कवच आदि वाले देवी-देवताओं के मंत्रों से आहुति दे रहे हों, या शाबर मंत्रों की आहुति में, तो शमी जी की लकड़ी लेना बहुत बढ़िया है।
वक्ता कहते हैं कि अपामार्ग की लकड़ी जल्दी जल जाती है — ठीक है। राज मेहता जी, यानी बलराम जी: अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी के साथ आप नवग्रह लकड़ी ले सकते हैं, और गाय के गोबर के उपले ले सकते हैं। नवग्रह लकड़ियों में से कोई भी अलग लकड़ी लीजिए; या आपकी तरफ, राजस्थान की ओर, शमी जी की लकड़ी बहुत मिलती है, तो वे लकड़ियाँ ज़्यादा मात्रा में ले सकते हैं। जब हम कवच आदि वाले देवी-देवताओं के मंत्रों से आहुति दे रहे हों, या शाबर मंत्रों की आहुति में, तो शमी जी की लकड़ी लें तो बहुत बढ़िया है।
लोक देवता गोगा जाहरवीर के किसी खास पूजन-क्रम की जानकारी उनके पास नहीं, और वे यह साफ कहते हैं
वे साफ कहते हैं कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है
भरत प्रजापति जी को उत्तर देते हुए वक्ता साफ कहते हैं कि लोक देवता गोगा जाहरवीर के बारे में उनकी तरफ कोई खास पूजन-क्रम नहीं है, क्योंकि वे लोक देवता हैं; इसलिए वे क्षमा माँगते हैं — उन्हें उनकी पूरी जानकारी नहीं है। उनके अपने साथ के ऐसे साधक हैं जिन्हें बहुत जानकारी है, जिनके वे इष्ट आराध्य हैं, जिनके घर में उनका स्थान बड़े सामर्थ्य से विराजमान है — पर उन्हें न इच्छा हुई, न उतनी जानकारी ली; इसलिए वे कहते हैं कि इस मामले में उन्हें जानकारी है ही नहीं, और वे आधी-अधूरी बात नहीं बता सकते। अगर आप उनसे जुड़ी, अपनी तरफ प्रचलित साधनाएँ करते आ रहे हैं, तो आप उन्हें बिल्कुल कर सकते हैं।
वक्ता साफ कहते हैं, भरत प्रजापति जी: लोक देवता गोगा जाहरवीर के बारे में, क्योंकि वे लोक देवता हैं, हमारी तरफ उनका कोई खास पूजन-क्रम नहीं है। इसलिए हम क्षमा माँगते हैं: मुझे उनके बारे में पूरी जानकारी नहीं है। हमारे अपने साथ के ऐसे साधक हैं जिन्हें बहुत जानकारी है, जिनके वे इष्ट आराध्य हैं, जिनके घर में उनका स्थान भी बड़े सामर्थ्य से विराजमान है — ऐसे साधक हैं। पर हमें न इच्छा हुई, न हमने उतनी जानकारी ली; इसलिए अब हम कहेंगे कि इस मामले में मुझे जानकारी है ही नहीं। हम आपको आधी-अधूरी बात नहीं बता सकते। हाँ, अगर आप उनसे जुड़ी साधनाएँ, अपनी तरफ प्रचलित साधनाएँ, करते आ रहे हैं, तो आप उन्हें बिल्कुल कर सकते हैं। जो हमें पता नहीं, उसकी हम आपको आधी-अधूरी जानकारी भी नहीं दे सकते।
क्या धनतेरस पर महाकाली की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हो सकती है?
धनतेरस पर किसी भी देव शक्ति की प्रतिष्ठा हो सकती है — सबकी एक ही दिन
वक्ता कहते हैं कि धनतेरस के दिन आप किसी भी देव शक्ति की प्राण प्रतिष्ठा कर सकते हैं। आराम से कीजिए; दोपहर के समय कीजिए, अभिजीत मुहूर्त में, या दोपहर में आराम से। उस दिन बटुक भैरव जी की भी कर सकते हैं। धनतेरस के दिन ही सबकी कर लीजिए — कुबेर जी की भी, बटुक भैरव जी की भी, भगवती काली की भी। सबकी एक साथ उसी दिन कीजिए। और अगर आप खुद न करें, किसी आचार्य जी को बुलाकर करवाएँ, तो और भी अच्छा है; और अगर वीडियो देखकर कर रहे हैं, तो उसे अच्छे से देखकर दोहराइए, हर विधान समझिए, सामग्री लाइए, तभी कीजिए।
महाकाली माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के बारे में वक्ता कहते हैं — देखिए, धनतेरस के दिन आप किसी भी देव शक्ति की प्राण प्रतिष्ठा कर सकते हैं। आराम से कीजिए। दोपहर के समय कीजिए; अभिजीत मुहूर्त में कर सकते हैं, या दोपहर में आराम से। उस दिन बटुक भैरव जी की भी कर सकते हैं। धनतेरस के दिन ही सबकी कर लीजिए: कुबेर जी की भी, बटुक भैरव जी की भी, भगवती काली की भी। राज मेहता जी, सबकी एक साथ उसी दिन कर लीजिए। और अगर आप खुद न करें, किसी आचार्य जी को बुलाकर करवाएँ, तो और भी अच्छा है। और अगर वीडियो देखकर कर रहे हैं, तो उसे अच्छे से देखिए, बार-बार दोहराइए, हर विधान समझिए, सामग्री लाइए, तब कीजिए।
वे तमिल नहीं पढ़ सकते, और श्री विद्या वीडियो का विषय नहीं है
वे तमिल नहीं पढ़ सकते, और श्री विद्या वीडियो के लिए नहीं है
मंदिर के एक यंत्र के बारे में, जिस पर तमिल में लिखा है, पूछा गया कि वह किन देवी-देवता का है। वक्ता मीना जी से कहते हैं कि उन्हें ऐसी कोई खास सिद्धि नहीं मिली जिससे वे तमिल भाषा पढ़ सकें — तमिल इल्ले। पूछा गया कि क्या वे देवी त्रिपुर सुंदरी के साधना मार्ग पर वीडियो बना सकते हैं। वे कहते हैं कि श्री विद्या सबसे विशिष्ट विद्याओं में है, और उनके अनुसार ऐसी साधनाओं पर वीडियो में चर्चा करना उचित नहीं है; फिर भी सिर्फ जानकारी के लिए एक छोटा वीडियो बन सकता है।
वक्ता कहते हैं, मीना जी, हमें ऐसी कोई खास सिद्धि नहीं मिली जिससे हम तमिल भाषा पढ़ सकें। तमिल इल्ले। पूछा गया कि क्या वे देवी त्रिपुर सुंदरी के साधना मार्ग पर वीडियो बना सकते हैं। वे कहते हैं: श्री विद्या — ये सबसे विशिष्ट विद्याएँ हैं, और इन सब साधनाओं पर वीडियो में चर्चा करना उनके अनुसार उचित नहीं है। फिर भी सिर्फ जानकारी के लिए एक छोटा वीडियो बन सकता है।
एक ही जगह एक व्यक्ति तंत्रोक्त और दूसरा वेदोक्त अनुष्ठान करे, तो क्या हानि है?
कोई हानि नहीं — समय अलग हैं, बस कुंड का ध्यान रखें
वक्ता कहते हैं कि ऐसी कोई हानि नहीं है। वेदोक्त व्यक्ति की पूरी साधना दिन के समय होगी, हवन आदि भी दिन में होंगे; तंत्रोक्त वाले की रात के समय होगी। अगर आप एक ही कुंड रखते हैं, तो उसे थोड़ा देख लीजिए। और कोई बात नहीं है। राजसिक-तामसिक नहीं होना चाहिए।
पूछा गया कि एक ही जगह एक व्यक्ति तंत्रोक्त और दूसरा वेदोक्त अनुष्ठान करे, तो क्या हानि है। वक्ता कहते हैं: नहीं, ऐसी कोई हानि नहीं है। वेदोक्त व्यक्ति की पूरी साधना दिन के समय होगी; हवन आदि भी दिन में होंगे। तंत्रोक्त वाले की रात के समय होगी। अगर आप एक ही कुंड रखते हैं, तो उसे थोड़ा देख लीजिए। और कोई बात नहीं है। राजसिक-तामसिक नहीं होना चाहिए।
कुल में किसी की मृत्यु हुई हो तो क्या अनुष्ठान हो सकता है?
तभी, जब आप सूतक से मुक्त हों और वार्षिकी से आपका लेना-देना न हो
वक्ता स्नेहल जी से कहते हैं कि पहले देखिए, कुल में जिनकी मृत्यु हुई वे आपके क्या लगते हैं, उनकी बरसी हुई या नहीं, और आपके कुल में क्या मानने की प्रथा है। अगर आप लोग सूतक से मुक्त हो चुके हैं और उनके वार्षिक आदि से आपका कोई लेना-देना नहीं है, तभी अनुष्ठान कीजिए या करवाइए। नहीं तो, अगर अभी आपको साल भर का सूतक मानना है, या वार्षिकी नहीं हुई है, तो यह बिल्कुल मत करवाइए।
वक्ता कहते हैं, स्नेहल जी, पहले यह देखिए: कुल में जिनकी मृत्यु हुई है वे आपके क्या लगते हैं; उनकी बरसी हुई है या नहीं; और आपके कुल में क्या मानने की प्रथा है। अगर आप लोग सूतक से मुक्त हो चुके हैं, और उनके वार्षिक आदि से आपका कोई लेना-देना नहीं है, तभी अनुष्ठान कीजिए या करवाइए। नहीं तो, अगर अभी आपको साल भर का सूतक मानना है, या वार्षिकी नहीं हुई है, तो यह बिल्कुल मत करवाइए।
क्या नील सरस्वती साधना सात्विक विधि से हो सकती है?
सिर्फ स्तोत्र और कवच — पूरी साधना के लिए दीक्षा चाहिए
जय सिंह जी को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि साधना के सिर्फ स्तोत्र, कवच आदि ही किए जा सकते हैं; पूरी साधना दीक्षित होकर ही की जा सकती है — ये महाविद्याएँ हैं।
सात्विक विधि से नील सरस्वती साधना, एक विद्यार्थी के लिए — वक्ता कहते हैं, जय सिंह जी। साधना के सिर्फ स्तोत्र, कवच आदि ही किए जा सकते हैं। पूरी साधना दीक्षित होकर ही की जा सकती है। ये महाविद्याएँ हैं। वे सुभाष चंद्र जी से कहते हैं कि यहाँ मैसेज करके यह विषय समझाना मुश्किल है, इसलिए एक बार मैसेज या वॉइस मैसेज भेजिए, वे जवाब दे देंगे।
बहुत बड़े संयुक्त परिवार में सूतक कैसे लगता है?
मुख्य घर वालों के लिए दस दिन, बाकी के लिए तीन, तीन पीढ़ी तक
एक श्रोता का परिवार बहुत बड़ा है — लगभग पचास लोग; सात पीढ़ी के भीतर किसी न किसी के घर बच्चा होता रहता है, तो मुख्य घर वाले दस दिन का सूतक मानते हैं और बाकी सब तीन दिन का। वक्ता कहते हैं कि हाँ, ऐसा ही होता है। सात पीढ़ी वाले में तीन पीढ़ी तक का ही माना जाता है: यानी अगर आप हैं, तो आप अपने दादाजी के भाई तक का मानेंगे; परदादाजी से आगे तीन दिन वाला नियम हो जाता है।
श्रोता कहते हैं कि हमारा परिवार बहुत बड़ा है, लगभग पचास — सात पीढ़ी के भीतर किसी न किसी के घर बच्चा होता रहता है; तो मुख्य घर वाले दस दिन का सूतक मानते हैं और बाकी सब तीन दिन का। वक्ता कहते हैं कि हाँ, ठीक है, ऐसा ही होता है। सात पीढ़ी वाले में तीन पीढ़ी तक का ही माना जाता है — यानी अगर आप हैं, तो आप अपने दादाजी के भाई तक का मानेंगे; परदादाजी से आगे तीन दिन वाला नियम हो जाता है।
प्रतियोगी परीक्षा में बच्चे के लिए कौन-सा अनुष्ठान अच्छा है?
भगवान सूर्यनारायण की साधना, जो बच्चा खुद करे
वक्ता कहते हैं कि कंपटीशन के लिए, अगर सरकारी नौकरी की पूरी बात चल रही है, तो वे बार-बार कहते हैं कि भगवान सूर्यनारायण की साधना बहुत ज़रूरी है। उनसे जुड़ी साधना अपने बच्चे को करने के लिए कहिए। आप खुद करेंगे तो आपके किए का उसे कितना मिलेगा? छठा हिस्सा मिलता है। इसलिए उसे थोड़ा समय निकालने को कहिए — कम से कम सुबह उठकर सूर्यनारायण को अर्घ्य दे दे। और देखिए कि उसके पंचम भाव में क्या स्थिति बन रही है; उसी के अनुसार उसके निमित्त साधना कीजिए, करवाइए, या खुद संकल्प लेकर कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि कंपटीशन के लिए — अगर सरकारी नौकरी की पूरी बात चल रही है, तो हम बार-बार कहते हैं कि भगवान सूर्यनारायण की साधना बहुत ज़रूरी है। यह उनमें से एक है। और उनसे जुड़ी साधना अपने बच्चे को करने के लिए कहिए। आप खुद करेंगे तो आपके किए का उसे कितना मिलेगा? छठा हिस्सा मिलता है। उसे थोड़ा समय निकालने को कहिए। कम से कम सुबह उठकर सूर्यनारायण को अर्घ्य दे दे। और उसके पंचम भाव में क्या स्थिति बन रही है — उसी के अनुसार आपको उसके निमित्त साधना करनी, करवानी, या खुद संकल्प लेकर करनी चाहिए। यह देख लेना चाहिए; अगर आप ठीक वही चाहते हैं तो ज़्यादा अच्छा रहेगा।
लक्ष्मी कलश के साल भर के नियम क्या हैं?
पंचमी और पूर्णिमा को विशेष अर्चन, रोज़ धूप-दीप, साल में एक बार बदलना
वक्ता कहते हैं कि साल भर उनकी पूजा नहीं होगी। पंचमी और पूर्णिमा के दिन आप विशेष अर्चन कर सकते हैं — जैसे महालक्ष्मी के 108 नामों से गुलाब की पंखुड़ियों से अर्चन होता है, वह कर सकते हैं। रोज़ उन्हें धूप-दीप दिखाना चाहिए। और साल में एक बार, धनतेरस के दिन, पूरी सामग्री बाहर निकालिए, कच्ची सामग्री का विसर्जन करके नई सामग्री डालिए, पुरानी सामग्री पर उसी तरह गंगाजल छिड़ककर, धूप, दीप, तिलक आदि सब करके फिर से रखिए और उनका पूजन कीजिए। इतना ही नियम है। अशुद्ध अवस्था में उन्हें छूना नहीं है; और सूतक-पातक पड़े तो अंदर कुछ नहीं बदलेगा — सूतक-पातक में कुछ नहीं बदलना है, यह साल में एक ही बार बदलता है।
वक्ता कहते हैं कि साल भर उनकी पूजा नहीं होगी। पंचमी और पूर्णिमा के दिन आप विशेष अर्चन कर सकते हैं — जैसे महालक्ष्मी के 108 नामों से गुलाब की पंखुड़ियों से अर्चन होता है, वह आप कर सकते हैं। रोज़ उन्हें धूप-दीप दिखाना चाहिए। और साल में एक बार, धनतेरस के दिन, पूरी सामग्री बाहर निकालिए, जो कच्ची सामग्री होगी उसका विसर्जन करके नई सामग्री डालिए; पुरानी सामग्री पर उसी तरह गंगाजल छिड़ककर, धूप, दीप, तिलक आदि सब करके फिर से रखिए और उनका पूजन कीजिए। इतना ही नियम है। अशुद्ध अवस्था में उन्हें छूना नहीं है। और अगर सूतक-पातक पड़े, तो अंदर कुछ भी नहीं बदलेगा। सूतक-पातक में कुछ नहीं बदलना है; यह साल में एक ही बार बदलेगा।
शिव मंदिर में कुबेर का दीपक कहाँ जलाएँ?
उत्तर दिशा की ओर; और काली व भवानी के लिए दीपदान हो सकता है
वक्ता कहते हैं कि उत्तर दिशा की ओर जलाइए। पूछा गया कि क्या माँ काली के लिए, माँ भवानी के लिए कोई दीपदान कर सकते हैं। वे कहते हैं: बिल्कुल कर सकते हैं। वे बताते हैं कि यम के दीये के बारे में वे पहले ही बता चुके हैं। सुभाष चंद्र जी, जिनका श्री काल भैरव अष्टक का अनुष्ठान 7 नवंबर 2023 को पूरा हुआ, उनसे वे कहते हैं कि कोई बात नहीं, जल्दी ही बात होगी।
पूछा गया कि शिव मंदिर में कुबेर महाराज के दीपक कहाँ जलाएँ। वक्ता कहते हैं: उत्तर दिशा की ओर जलाइए। पूछा गया कि क्या माँ काली के लिए, माँ भवानी के लिए कोई दीपदान कर सकते हैं। वे कहते हैं: बिल्कुल कर सकते हैं। वे बताते हैं कि यम के दीये के बारे में वे बता चुके हैं। और सुभाष चंद्र जी, जिनका श्री काल भैरव अष्टक का अनुष्ठान 7 नवंबर 2023 को पूरा हुआ और जो पूछते हैं कि आगे क्या, उनसे वे कहते हैं: कोई बात नहीं, सुभाष चंद्र जी, हो जाएगा; जल्दी ही बात होगी।
नरसिंह माला मंत्र के लिए कौन-सी माला लें?
तुलसी की माला या दस मुखी रुद्राक्ष की माला
एक श्रोता कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से पाँच दिन के गणपति अनुष्ठान के बाद एक नवमी से अगली नवमी तक नरसिंह माला मंत्र करना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं: तुलसी की माला लीजिए, या फिर दस मुखी रुद्राक्ष की माला लीजिए।
पूछा गया कि नरसिंह माला मंत्र के लिए कौन-सी माला लें। वक्ता कहते हैं: तुलसी की माला लीजिए, या फिर दस मुखी रुद्राक्ष की माला लीजिए। देवी-देवताओं का पूजन कीजिए, और कार्तिक में अपने सामर्थ्य के अनुसार खूब दीपदान कीजिए।
क्या दीपदान के लिए कर्ज़ लेना चाहिए?
दीपदान सिर्फ सामर्थ्य भर — कर्ज़ पर कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि कर्ज़ा लेकर दीपदान नहीं करना है। जितना सामर्थ्य है, उतना दीपदान कीजिए; हमें कुबेर बनाने में मदद कीजिए। यहाँ का कुबेर नहीं — ऊपर का कुबेर बनना है। इसी बहाने आप लोग करेंगे, तो आपका कल्याण होगा, और साथ में मेरा भी पूरा कल्याण हो जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि कर्ज़ा लेकर दीपदान नहीं करना है। जितना सामर्थ्य है, उतना दीपदान कीजिए। हमें कुबेर बनाने में मदद कीजिए। यहाँ का कुबेर नहीं — ऊपर का कुबेर बनना है। इसी बहाने आप लोग करेंगे, तो आपका कल्याण होगा; और साथ में मेरा भी पूरा कल्याण हो जाएगा। पूरे परिवार के साथ होने वाले वार्षिक लक्ष्मी पूजन के बारे में, और उसमें कुबेर महाराज और महालक्ष्मी कलश का पूजन कैसे करें, इस पर वे कहते हैं कि यह बता दिया है — इसी विधि से होगा। फिर पूछा गया कि क्या तुलसी की माला ले सकते हैं; वे कहते हैं कि बता दिया है।
जिसे भाई दूज तक मृत्यु सूतक है, वह क्या करे?
सिर्फ भगवद् गीता का पाठ और मानसिक नाम जप
एक श्रोता के कुटुंब में भाई दूज तक मृत्यु सूतक है, और वे पूछते हैं कि नरक चतुर्दशी पर क्या करें। वक्ता कहते हैं: अभी केवल और केवल श्रीमद् भगवद् गीता का, या अपने इष्ट आराध्य की गीता का पाठ कीजिए। मन ही मन भगवान का नाम जप कीजिए। सूतक में अभी बस इतना ही कीजिए, और कुछ नहीं।
एक श्रोता पूछते हैं: भैया, हमारे कुटुंब में भाई दूज तक मृत्यु सूतक लगा है; नरक चतुर्दशी के साथ मैं क्या करूँ? वक्ता कहते हैं: अभी केवल और केवल श्रीमद् भगवद् गीता का पाठ कीजिए — या अपने इष्ट आराध्य की गीता का। मन ही मन भगवान का नाम जप कीजिए। सूतक में अभी बस इतना ही कीजिए, और कुछ नहीं करना चाहिए।
क्या बाद में यम दीप तिजोरी में रखना चाहिए?
वे कहते हैं कि यह उन्होंने कभी नहीं सुना और यह उचित नहीं
एक लड्डू गोपाल सेवक के प्रमाण के साथ बताई गई प्रथा पर — कि यम दीप शांत होने के बाद उसे घर की तिजोरी में रखते हैं — वक्ता कहते हैं: यम दीप आटे से बनता है, यह हम मानते हैं; चित्रपाल में भी हम ऐसे ही करते हैं; दोनों की पद्धति लगभग एक जैसी है, इतना वे मानते हैं। पर दीपक शांत होने के बाद उसे घर की तिजोरी में रखना, यह वे पहली बार सुन रहे हैं। जितने क्षेत्रों में वे रहे, जितने साधकों से मिले, कहीं किसी ने न ऐसी चर्चा की, न बताया, न उन्होंने सुना। उनके अनुसार यह बिल्कुल भी उचित नहीं है।
वक्ता कहते हैं, देखिए, यम दीप आटे से बनता है, यह हम मानते हैं। चित्रपाल में भी हम इसी तरह करते हैं; दोनों की पद्धति लगभग एक जैसी है — इतना हम मानते हैं। पर दीपक शांत होने के बाद उसे घर की तिजोरी में रखना, यह हम पहली बार सुन रहे हैं। आज तक इतने क्षेत्रों में रहे, इतने साधकों से मिले, कहीं किसी ने न ऐसी चर्चा की, न बताया, न हमने सुना। और उनके अनुसार यह बिल्कुल भी उचित नहीं है।
यम की भेंट कभी घर वापस क्यों नहीं लाई जाती?
वह घर के दुर्भाग्य और अकाल मृत्यु को ले जाती है
वक्ता कहते हैं कि अगर चतुर्दशी की रात घर में पकौड़ी बनती है, या कहीं-कहीं चावल-कढ़ी, तो यह सब थाली में सजाया जाता है; अगर यह सब नहीं बना, पूरी आदि बनी है, तो वह; और अगर वह भी नहीं है, तो अनाज पर दीपक रखकर मिठाई आदि सजाई जाती है, और फिर भोग सहित निकारी होती है। उसे वापस नहीं लाया जाता। आप बताइए — यमराज से हम कहते हैं कि हमारे जितने दुर्भाग्य हैं, अकाल मृत्यु आदि, दोष की निवृत्ति के लिए हम ये आपको दे रहे हैं। अब वह काल का दीपक है — और उसे तिजोरी में रखना। अगर यह टोटका कहीं रूप ले रहा है, तो यह उचित नहीं; उन्होंने ऐसा कभी नहीं सुना, और उनके अनुसार यह सही नहीं है। बाकी निर्णय आपका।
वक्ता कहते हैं, देखिए — अगर चतुर्दशी की रात घर में पकौड़ी बनती है, कहीं-कहीं चावल-कढ़ी बनती है, तो यह सब थाली में सजाया जाता है। और अगर यह सब नहीं बना, पूरी आदि बनी है, तो वह चीज; और अगर वह भी नहीं है, तो अनाज पर दीपक रखकर मिठाई आदि सजाई जाती है, और फिर भोग सहित निकारी होती है। उसे वापस नहीं लाया जाता। आप बताइए — यमराज से हम कहते हैं कि हमारे जितने दुर्भाग्य हैं, अकाल मृत्यु आदि, दोष की निवृत्ति के लिए हम ये आपको दे रहे हैं। अब वह काल का दीपक है, और उसे तिजोरी में रखना। अगर यह टोटका कहीं रूप ले रहा है, तो यह उचित नहीं है; हमने ऐसा कभी नहीं सुना। हमारे अनुसार यह सही नहीं है। बाकी निर्णय आपका।
क्या परिवार से प्रेत नेगेटिविटी हटाने के लिए वीर साधना की जा सकती है?
महाभैरव साधना — पर पहले किसी योग्य व्यक्ति को दिखा लें
सुरक्षा के लिए, घर वालों के शरीर से प्रेत नेगेटिविटी स्थायी रूप से दूर करने के लिए, और शरीर सुडौल बनाने के लिए वीर साधना के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: महाभैरव साधना। पर वे जोड़ते हैं कि अगर प्रेत साधना, प्रेत और इस तरह की उपस्थिति है, तो पहले किसी योग्य व्यक्ति को दिखा लीजिए। पूछा गया कि क्या पाँच दिन की साधना संकल्प में करनी है; वे कहते हैं: हाँ, हर दिन का संकल्प लीजिए।
एक श्रोता पूछते हैं: सुरक्षा के लिए, घर वालों के शरीर से प्रेत नेगेटिविटी स्थायी रूप से दूर करने के लिए, और शरीर सुडौल बनाने के लिए वीर साधना। वक्ता कहते हैं: महाभैरव साधना। पर हम कहेंगे, वे जोड़ते हैं: अगर प्रेत साधना, प्रेत, और इस तरह की उपस्थिति है, तो पहले किसी योग्य व्यक्ति को दिखा लीजिए। पूछा गया कि क्या पाँच दिन की साधना संकल्प में करनी है। वे कहते हैं: हाँ, हर दिन का संकल्प लीजिए।
अगर मुझे गायत्री से अर्घ्य देने को कहा गया हो पर मैं उसका अधिकारी न होऊँ, तो क्या करूँ?
अर्घ्य कुंडली से तय नहीं होता; बस माणिक्य वाला नियम लागू है
वक्ता कहते हैं कि पहली बात, यह धनु लग्न की कुंडली है और बृहस्पति आपके प्रमुख ग्रह हैं — पर ऐसा नहीं है कि लग्न कुंडली के अनुसार अर्घ्य दिया जाता है। वे हमेशा एक ही शर्त बताते हैं: अगर शरीर पर माणिक्य पहना है, तो अर्घ्य नहीं देना है, या अर्घ्य देते समय उसे उतारकर तब देना है, बस। बाकी हर व्यक्ति सूर्यनारायण की पूजा कर सकता है, और सबको उन्हें अर्घ्य देना ही चाहिए। सूर्य और तुलसी जी को सबको रोज़ अर्घ्य देना चाहिए — बस तुलसी जी को एकादशी और रविवार, इन दो दिनों जल नहीं देना है।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले, यह धनु लग्न की कुंडली ठीक है; बृहस्पति आपके प्रमुख ग्रह हुए — पर ऐसा नहीं है कि लग्न कुंडली के अनुसार अर्घ्य दिया जाता है। हम हमेशा एक ही शर्त बताते हैं: अगर शरीर पर माणिक्य पहना है, तो अर्घ्य नहीं देना है; या अर्घ्य देते समय उसे उतारकर तब देना है, बस। बाकी हर व्यक्ति सूर्यनारायण की पूजा कर सकता है, और सबको उन्हें अर्घ्य देना ही चाहिए। सूर्य और तुलसी जी को सबको रोज़ अर्घ्य देना चाहिए। बस तुलसी जी को एकादशी और रविवार, इन दो दिनों जल नहीं देना है — यह बात आपको ध्यान रखनी है। और तोड़ने में संक्रांति, द्वादशी, एकादशी और अमावस्या, इन सबका ध्यान रखना है; रविवार, बृहस्पतिवार — बस इतना ही।
गायत्री की जगह अर्घ्य के लिए कौन-सा मंत्र लें?
आदित्य अथर्वशीर्ष, घृणि मंत्र, या सूर्य का तांत्रिक मंत्र
वक्ता कहते हैं कि तब भगवान सूर्य का गायत्री मंत्र न बोलकर आप उनके नाम मंत्र से भी जल दे सकते हैं — ऐसा ज़रूरी नहीं कि जल सिर्फ उनकी गायत्री से ही दिया जाए। आदित्य अथर्वशीर्ष पढ़िए; उसका हिंदी अनुवाद भी पढ़ लेंगे तो आपका विषय साफ हो जाएगा। उसमें भगवान सूर्यनारायण का एक मंत्र है — घृणि वाला, घृणि सूर्याय नमः — उस मंत्र से दे सकते हैं। या उनके अनुसार आपको सूर्यनारायण का तांत्रिक मंत्र लेना चाहिए; अगर आप अधिकारी नहीं हैं, तो उससे अर्घ्य दीजिए। ऐसा नहीं कि सूर्यनारायण अर्घ्य नहीं लेंगे।
वक्ता कहते हैं, अब अगर गायत्री के साथ अधिकारी नहीं हैं, तो क्या करें। तब भगवान सूर्य का गायत्री मंत्र न बोलकर आप उनके नाम मंत्र से भी जल दे सकते हैं। ऐसा ज़रूरी नहीं कि वे सिर्फ अपनी गायत्री से ही जल लेंगे। आदित्य अथर्वशीर्ष पढ़िए। उसका हिंदी अनुवाद भी पढ़ लेंगे तो आपका विषय साफ हो जाएगा — यह प्रश्न कि गायत्री का अधिकारी न हो तो क्या करें। उसमें भगवान सूर्यनारायण का एक मंत्र है: घृणि वाला, घृणि सूर्याय नमः मंत्र — उस मंत्र से दे सकते हैं। या उनके अनुसार आपको सूर्यनारायण का तांत्रिक मंत्र लेना चाहिए। अगर आप अधिकारी नहीं हैं, तो उससे अर्घ्य दीजिए। ऐसा नहीं कि सूर्यनारायण अर्घ्य नहीं लेंगे। ऐसा नहीं है।
प्रेडिक्शन वाले ज्योतिषियों में क्या गलत है?
वे अनधिकारी को गायत्री और ॐ वाले मंत्र दे देते हैं
वक्ता कहते हैं कि जितने भी प्रेडिक्शन और कुंडली वाले लोग हैं, जो कुछ चल रहा है — वे सीधे-सीधे कहते हैं: वे गलत कर रहे हैं। जो बार-बार अनधिकारी व्यक्ति को गायत्री, और ॐ के साथ सारे मंत्र देकर करवाते हैं, वे उन्हें बर्बाद कर रहे हैं। यह अलग बात है कि मंत्र का अपना सामर्थ्य है, वह हमारी लाज रखता है, हमारे काम बनाता-बिगाड़ता है — पर कहीं न कहीं नुकसान भी करता है। वे कहते हैं कि यह वे अपने जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव से कह रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि यही मुश्किल है। जितने भी प्रेडिक्शन और कुंडली वाले लोग हैं, जितना कुछ चल रहा है — उस सबके बारे में हम सीधे-सीधे कहते हैं: वे गलत कर रहे हैं। जो बार-बार अनधिकारी व्यक्ति को गायत्री देते हैं, ॐ के साथ सारे मंत्र देकर करवाते हैं, वे उन्हें बर्बाद कर रहे हैं। यह अलग बात है कि मंत्र का अपना सामर्थ्य है, कि वे हमारी लाज रखते हैं, हमारे काम बनाते-बिगाड़ते हैं — पर कहीं न कहीं नुकसान भी करते हैं। यह हम अपने जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव से कह रहे हैं। इसलिए अब हम हर बात ऐसे ही मानते चलते हैं; पर ऐसा नियति करवाती है। अगर नियति में लिखा है कि यह गलत नहीं होगा, कि हम गलत मंत्र का जप करेंगे, तो नीति वैसी ही हो जाती है।
थर्ड आई की बातें, ऑरा चेकिंग, और अधिकार की बात किए बिना बाँटे गए मंत्र
थर्ड आई, ऑरा चेकिंग, और बिना अधिकार की चर्चा के दिए गए मंत्र
वक्ता कहते हैं कि कम से कम उनके अनुसार, लोग इस मार्ग पर आते हैं और परम सिद्ध बन जाते हैं, पर उनकी बातें सुनकर सिद्धि का दिखावा सामने आ जाता है। वे ऐसे ही एक व्यक्ति को सुन रहे थे — एक परम सिद्ध साधु, जिनके हर वीडियो में थर्ड आई है: थर्ड आई, ऑरा चेकिंग, यह सिद्धि वह सिद्धि, और भाई के वीडियो वायरल होते हैं। उन्होंने सोचा कि इतना हो रहा है तो वे भी सीखें। वहाँ पूरी बात बस यही है कि थर्ड आई विज़न कैसे खुलेगा, आपके ऑरा में चीज़ें कैसे आएँगी, यह मंत्र वह मंत्र — किसके अधिकार की, इसकी कोई चर्चा नहीं, कोई बात ही नहीं।
वक्ता कहते हैं कि इसलिए, कम से कम उनके अनुसार, लोग इस मार्ग पर आते हैं और परम सिद्ध बन जाते हैं — पर उनकी बातें सुनकर हमें सिद्धि का दिखावा दिख जाता है। अभी हम एक व्यक्ति को सुन रहे थे। वे भाई भी परम सिद्ध साधु हैं; उनके जितने वीडियो आते हैं, सबमें थर्ड आई है। थर्ड आई, ऑरा चेकिंग, ऑरा में यह-वह, यह सिद्धि वह सिद्धि — भाई का वीडियो गज़ब वायरल होता है। तो हमने कहा, भाई, इतना हो रहा है तो हम भी सीखें कि ऐसी क्या चीज़ चल रही है। हम, भाई, सौ प्रतिशत सीधा बोलते हैं और उसके लिए चार गालियाँ सुनते हैं; वहाँ तालियाँ बजती हैं। तो तालियों के लिए हमने सुना, कि भाई, हम भी थोड़ी तालियाँ कमा लें। वहाँ पूरी बात यही है: बस थर्ड आई विज़न कैसे खुलेगा, आपके ऑरा में चीज़ें कैसे आएँगी, वह मंत्र यह मंत्र — किसके अधिकार की, इसकी कोई चर्चा नहीं, कोई बात ही नहीं।
पंच पल्लव नहीं तो दरिद्रता, और पूर्ण पात्र नहीं तो आयु की हानि
पंच पल्लव न हो तो दरिद्रता; पूर्ण पात्र न हो तो आयु की हानि
वक्ता बताते हैं कि कलश पर उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि खड़ा कलश रखिए और पत्तों की कोई ज़रूरत नहीं — इस पर उन्होंने कहा, रहने दीजिए। अगर कलश पर कभी पंच पल्लव न रखे जाएँ, पत्ते न रखे जाएँ, तो यह दरिद्रता का सूचक बन जाता है; दरिद्रता आती है। कम से कम पान का पत्ता ज़रूर रखना चाहिए। अगर हम पूर्ण पात्र नहीं रखते, तो आयु का नाश होता है। और वे जोड़ते हैं कि गलत राह दिखाने का भी अपना भार है: अगर आपके दीपदान करने से हमें पुण्य आना है, तो अगर हम आपको गलत बात बताएँगे तो हम पाप के भी भागी होंगे — वह दोष हमें ज़रूर लगेगा।
वक्ता बताते हैं: भाई, कलश पर उन्होंने यहाँ तक कह दिया — खड़ा कलश रखिए, पत्तों की कोई ज़रूरत नहीं। हमने कहा, रहने दीजिए। देखिए, इसीलिए कहा गया है कि इस मार्ग पर बहुत बड़ी विपत्ति है। अगर हम आपको गलत दिशा दें — जैसे हम कह रहे हैं कि आप दीपदान कीजिए और हम कुबेर बनेंगे — तो अगर आपके दीपदान करने से हमें पुण्य आना है, तो अगर हम आपको गलत बात बताएँगे तो हम पाप के भी भागी होंगे। वह दोष हमें ज़रूर, ज़रूर लगेगा। यह बात लोग नहीं समझते। अगर कलश पर कभी पंच पल्लव न रखे जाएँ, पत्ते न रखे जाएँ, तो यह दरिद्रता का सूचक बन जाता है; दरिद्रता आती है। कम से कम पान का पत्ता ज़रूर रखना चाहिए। अगर हम पूर्ण पात्र नहीं रखते, तो आयु का नाश होता है।
बिना पूर्ण पात्र के खड़ा नारियल कब रखा जा सकता है?
सिर्फ चंडिका, प्रचंड चंडिका, या जानी हुई कुलदेवी त्रिनेत्रा के लिए
वक्ता कहते हैं कि अगर चंडिका का पूजन हो रहा है, प्रचंड चंडिका का पूजन हो रहा है, या त्रिनेत्रा आपकी कुलदेवी हैं और आप यह सौ प्रतिशत जानते हैं — तभी बिना पूर्ण पात्र के खड़ा कलश रखना है। नहीं तो अपने मन और इच्छा से कलश सजाना — खड़ा कलश रखो, बिना पूर्ण पात्र के खड़ा नारियल रखो — यह सब नाश की ओर ले जाता है। वंश की हानि होती है; आगे कुल में ऐसा होता है कि लोगों के विवाह तक नहीं होते, और शरीर की हड्डियाँ घिसने लगती हैं। ये इसके दुष्प्रभाव हैं।
वक्ता कहते हैं, और खड़ा नारियल — हमने बार-बार कहा है: अगर चंडिका का पूजन हो रहा है, अगर प्रचंड चंडिका का पूजन हो रहा है, या त्रिनेत्रा आपकी कुलदेवी हैं और आपको सौ प्रतिशत जानकारी है। तभी उनका बिना पूर्ण पात्र के खड़ा कलश रखना है। नहीं तो अपने मन और इच्छा से कलश सजाना — बिना पूर्ण पात्र के खड़ा कलश रखो, खड़ा नारियल रखो — ये सब बातें नाश की ओर ले जाती हैं। वंश की हानि होती है। आगे कुल में ऐसा होता है कि लोगों के विवाह तक नहीं होते। शरीर की हड्डियाँ घिसने लगती हैं। ये सब इसके दुष्प्रभाव हैं। वे कहते हैं कि इसका प्रमाण भी है — पर भाई, हम उतने पढ़े-लिखे नहीं हैं, हमें पूरा श्लोक याद नहीं; वरना वह भी याद होता तो बोल देते। उस श्लोक के अनुसार, हमें हिंदी में याद है और वही आपको बताया है। इसीलिए जो हमें पता नहीं, वह हम नहीं बताते — जैसे अभी किसी ने गोगा जाहरवीर महाराज के बारे में पूछा और हमने कहा, बाबू, हमें पूरी जानकारी नहीं है, कैसे बताएँ। तो जो हमें पता नहीं, वह नहीं बताएँगे; पर जो पता है, वह डंके की चोट पर कहेंगे कि आप गलत कर रहे हैं।
घंटाकर्ण तेरह अक्षर वाली साधना में शामिल हैं, पर खुले में लिखे नहीं गए
तेरह अक्षर वाली साधना में शामिल, पर खुले में लिखे नहीं गए
घंटाकर्ण के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि इस बार जो स्वर्णाकर्षण भैरव अनुष्ठान हो रहा है, उसमें उन्होंने घंटाकर्ण साधना भी शामिल की थी; बाद में उसे लिखे हुए रूप से हटा दिया। वे फिर भी रहेंगे, क्योंकि तेरह अक्षर वाली साधना में घंटाकर्ण महावीर का भी स्थान रहेगा — पर वहाँ उन्हें साफ-साफ लिखा नहीं गया। कारण यह है कि ये सब नाम देने से लोग उनसे जुड़ी चीज़ें माँगने लगते हैं — यह बताइए, वह बताइए; और यह वे नहीं चाहते। इसलिए वे इसे नहीं डालते।
घंटा महावीर कर्ण के बारे में बताने को कहा गया। वक्ता कहते हैं: इस बार जो स्वर्णाकर्षण भैरव अनुष्ठान हो रहा है, उसमें हमने घंटाकर्ण साधना भी शामिल की थी। फिर बाद में हमने उसे लिखे हुए रूप से हटा दिया। हालाँकि वे रहेंगे, क्योंकि तेरह अक्षरों वाली साधना में उनका भी, घंटाकर्ण महावीर का भी, स्थान रहेगा — पर वहाँ साफ-साफ हमने लिखा नहीं है। कारण क्या है? ये सब नाम देने से लोग उनसे जुड़ी चीज़ें माँगने लगते हैं: यह बताइए, वह बताइए। यह हम नहीं चाहते। इसलिए हम इसे नहीं डालते।
श्री सूक्त और पुरुष सूक्त का पाठ कौन कर सकता है?
सिर्फ यज्ञोपवीतधारी; बाकी लोग पौराणिक स्तोत्र करें
दीपावली के पाँच दिनों में विष्णु नारायण का कौन-सा अनुष्ठान करें, इस पर वक्ता कहते हैं कि वे वह कल अलग से डालेंगे। अभिषेक श्रीवास्तव जी से वे कहते हैं: श्री सूक्त, लक्ष्मी सूक्त, पुरुष सूक्त — ये सब उच्चारण सीखकर करने चाहिए, और सिर्फ यज्ञोपवीतधारी ही करें। बाकी लोग पौराणिक स्तोत्र करें — लक्ष्मी अष्टक कीजिए, महालक्ष्मी अष्टक कीजिए। सूक्त का पाठ वेदोक्त है, तो वेदोक्त लोग करें। वे कहते हैं कि यह उनके अनुसार नहीं, शास्त्र के अनुसार है; वे बस जानकारी दे रहे हैं, निर्णय लेने को आप स्वतंत्र हैं। सच जानकर भी गलत करें, तो आपकी मर्ज़ी।
पूछा गया कि दीपावली के पाँच दिनों में विष्णु नारायण जी का कौन-सा अनुष्ठान करें, कौन-सा मंत्र शोध करें, और विधान बताइए। वक्ता कहते हैं: ठीक है, वे उनका भी कल अलग से डाल देंगे। अभिषेक श्रीवास्तव जी: चाहे श्री सूक्त हो, लक्ष्मी सूक्त हो या पुरुष सूक्त, ये सब उच्चारण सीखकर करने चाहिए, और सिर्फ यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करने वाले ही करें। बाकी लोग पौराणिक स्तोत्र करें। लक्ष्मी अष्टक कीजिए, महालक्ष्मी अष्टक कीजिए। सूक्त का पाठ वेदोक्त है। तो वेदोक्त लोग करें। वे कहते हैं कि यह उनके अनुसार नहीं, शास्त्र के अनुसार है। वे बस आपको यह जानकारी दे रहे हैं; बाकी निर्णय लेने को आप स्वतंत्र हैं। सच जानकर भी गलत करें, तो आपकी मर्ज़ी।
दरिद्रता नाश के लिए श्री सूक्त का प्रयोग क्या है?
सोलह दिन सोलह पाठ, दरिद्र दहन मंत्र से संपुटित
वक्ता कहते हैं कि अगर आप यज्ञोपवीत धारण करते हैं, तो श्री सूक्त ज़रूर कीजिए — धन प्राप्ति का इससे आसान उपाय नहीं है। कहा जाता है कि अगर श्री सूक्त और पुरुष सूक्त के सोलह-सोलह पाठ रोज़, लगातार सोलह दिन, और खास तौर पर कार्तिक मास में किए जाएँ, तो जन्म-जन्मांतर की दरिद्रता खत्म हो जाती है। और अगर श्री सूक्त का संपुटित पाठ किया जाए — दरिद्र दहन मंत्र से संपुटित, जो दुर्गा सप्तशती का मंत्र है — सोलह दिन सोलह पाठ, तो सैकड़ों-सैकड़ों जन्मों की दरिद्रता दूर होती है। पर आपको अधिकारी होना चाहिए।
वक्ता कहते हैं, हाँ, अगर आप यज्ञोपवीत धारण करते हैं, तो श्री सूक्त ज़रूर कीजिए। धन प्राप्ति का इससे बड़ा आसान उपाय है ही नहीं। कहा जाता है कि अगर श्री सूक्त और पुरुष सूक्त के सोलह-सोलह पाठ रोज़, लगातार सोलह दिन, और खास तौर पर कार्तिक मास में किए जाएँ, तो जन्म-जन्मांतर की दरिद्रता खत्म हो जाती है। अगर श्री सूक्त का संपुटित पाठ किया जाए — दरिद्र दहन मंत्र से संपुटित, जो दुर्गा सप्तशती का मंत्र है — सोलह दिन सोलह पाठ, तो सैकड़ों-सैकड़ों जन्मों की दरिद्रता दूर होती है। पर आपको अधिकारी होना चाहिए।
श्री सूक्त के उस प्रयोग के बाद कौन-सा हवन होता है?
अंतिम दिन खीर और मधु, और महालक्ष्मी कल्प
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद खीर और मधु से हवन भी होता है: अंतिम दिन, श्री सूक्त के मंत्रों से सोलह पाठ, और आपका जो भी संपुट मंत्र हो, सोलह दिनों के अनुसार कम से कम एक हज़ार आठ आहुतियाँ, या फिर कम से कम एक सौ आठ आहुतियाँ। इस तरह करें तो भगवती लक्ष्मी की अतुलनीय कृपा मिलती है। वे कहते हैं कि यह महालक्ष्मी कल्प के अनुसार है — वे कोई गढ़ी हुई बात नहीं बता रहे; महालक्ष्मी कल्प, यानी मध्यम चरित्र की, अठारह भुजा वाले पूजन की भगवती दुर्गा जो भगवती महालक्ष्मी हैं, उनके स्वरूप के अनुसार। उसमें इसका वर्णन है।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद उसका हवन भी होता है, खीर और मधु से: अंतिम दिन, श्री सूक्त के मंत्रों से सोलह पाठ, और आपका जो भी संपुट मंत्र होगा, सोलह दिनों के अनुसार कम से कम एक हज़ार आठ आहुतियाँ, या फिर कम से कम एक सौ आठ आहुतियाँ। इस तरह करें तो भगवती लक्ष्मी की अतुलनीय कृपा मिलती है। यह महालक्ष्मी कल्प के अनुसार है; हम कोई गढ़ी हुई बात नहीं बता रहे। महालक्ष्मी कल्प, यानी मध्यम चरित्र के अनुसार भगवती महालक्ष्मी का स्वरूप, जो अठारह भुजा वाले पूजन की भगवती दुर्गा हैं — उसके अनुसार हमने आपको यह बताया है। उसमें इसका वर्णन है।
चोला चढ़ाना क्या है, और सूर्य अर्घ्य के लिए कोई भी कौन-सा मंत्र ले सकता है?
हनुमान जी पर सिंदूर का लेप, और जपाकुसुम श्लोक
चोला चढ़ाना यानी हनुमान जी पर जो सिंदूर का लेपन होता है — वही चोला चढ़ाना है, सिंदूर का चोला। पूछा गया कि क्या जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महा… से शुरू होने वाले मंत्र से सूर्य को अर्घ्य दे सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल, सब दे सकते हैं; यह पौराणिक मंत्र है और इसे सब बोल सकते हैं — स्त्रियाँ, पुरुष, यज्ञोपवीतधारी और जो धारण नहीं करते, कोई भी यह मंत्र बोल सकता है। वे जोड़ते हैं कि नवग्रह स्तोत्र का पाठ हर व्यक्ति रोज़ कर सकता है; कोई दोष नहीं है, स्त्री, पुरुष, बच्चे सब कर सकते हैं।
चोला चढ़ाना क्या है? वक्ता कहते हैं कि चोला चढ़ाना यानी सिंदूर — उसका लेपन जो हनुमान जी पर होता है। वही चोला चढ़ाना है, सिंदूर का चोला। पूछा गया कि क्या जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महा… से शुरू होने वाले मंत्र से सूर्य को अर्घ्य दे सकते हैं। वे कहते हैं: बिल्कुल दे सकते हैं। सब दे सकते हैं; यह पौराणिक मंत्र है, और इसे सब बोल सकते हैं — स्त्रियाँ, पुरुष, यज्ञोपवीतधारी, जो धारण नहीं करते, हर एक व्यक्ति यह मंत्र बोल सकता है। नवग्रह स्तोत्र का पाठ हर व्यक्ति रोज़ कर सकता है। कोई दोष नहीं है; स्त्री, पुरुष, बच्चे, सब कर सकते हैं।
क्या स्त्रियाँ तर्पण कर सकती हैं या घी की आहुति दे सकती हैं?
दोनों पर उनका उत्तर है नहीं — तर्पण पुरुष करें
बताया गया कि स्त्रियाँ भी तर्पण कर सकती हैं। वक्ता कहते हैं: नहीं, नहीं — आप लोग मत कीजिए, पुरुषों को करने दीजिए। और अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र पर, जिसकी आहुति घी और शहद मिलाकर देनी है, वे कहते हैं कि सब ध्यान दें: स्त्रियों को घी की आहुति नहीं देनी है। यह वे बार-बार कहते हैं।
एक श्रोता कहती हैं कि तर्पण स्त्रियाँ भी कर सकती हैं। वक्ता कहते हैं: नहीं, नहीं — आप लोग मत कीजिए; पुरुषों को करने दीजिए। अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र पर, जिसकी आहुति घी और शहद मिलाकर देनी है, वे कहते हैं: सब ध्यान दें। स्त्रियों को घी की आहुति नहीं देनी है। यह हम बार-बार कहते हैं। जहाँ भी हवन की चर्चा आती है, हम हमेशा बताते हैं: जब पौष्टिक हवन हो रहा हो, तो हवन की पूरी सामग्री — चैनल पर वीडियो है कि उसमें कौन-कौन सी सामग्री मिलानी चाहिए। वे सब सामग्रियाँ इकट्ठी करके उससे आहुति दीजिए; या चाहें तो किशमिश और मधु मिलाकर कीजिए। या अगर गुग्गुल और घी से कर रहे हैं, तो गुग्गुल की मात्रा ज़्यादा रखिए और घी की कम, बहुत थोड़ी — बस इतनी कि वह डूब भर जाए, नाम मात्र। अकेले घृत की आहुति इस तरह अग्नि कुंड में नहीं देनी चाहिए। यह ध्यान रखिए, रागिनी जी।
अगर इस मंगलवार क्षेत्रपाल निकारी की, तो क्या अगले मंगलवार भी करनी होगी?
हाँ — कम से कम पाँच मंगलवार
वक्ता कहते हैं, हाँ, बिल्कुल करनी है। कम से कम पाँच मंगलवार करनी है।
पूछा गया कि इस मंगलवार क्षेत्रपाल निकारी की है, तो क्या आने वाले मंगलवार को भी करनी होगी। वक्ता कहते हैं: हाँ, बिल्कुल करनी है। कम से कम पाँच मंगलवार करनी है। वे कहते हैं कि क्षेत्रपाल निकारी के बारे में वे पहले ही बता चुके हैं।
काली पंचबाण या काली रक्षा साधना — कौन-सी करनी चाहिए?
काली चौदस पर काली पंचबाण, नौकरी और धन दोनों के लिए
वक्ता कहते हैं, पंचबाण कर लीजिए — काली चौदस, दीपावली को। वे कहते हैं कि ये सब साधनाएँ चैनल पर हैं, लोग देखते ही नहीं। हर समस्या का समाधान पूरा, साफ़ और विस्तार से बताया गया है। काली पंचबाण कीजिए: जिन्हें नौकरी आदि या धन आदि के लिए प्रयोग करना है, और जो काली जी को ही इष्ट मानते हैं, वे लक्ष्मी जी के लिए अलग साधना न करें, काली पंचबाण का ही प्रयोग करें।
एक श्रोता पूछते हैं, काली पंचबाण या काली रक्षा साधना, कौन-सी करनी चाहिए। वक्ता कहते हैं — काली चौदस, दीपावली को पंचबाण कर लीजिए। और ये सब साधनाएँ तो चैनल पर हैं; आप लोग देखते ही नहीं। हर समस्या का समाधान पूरा, एकदम साफ़ और विस्तार से बताया गया है। काली पंचबाण कर लीजिए: जिन्हें नौकरी आदि के लिए प्रयोग करना है, धन आदि के लिए प्रयोग करना है, और जो काली जी को ही इष्ट मानते हैं — वे लक्ष्मी जी के लिए अलग साधना न करके काली पंचबाण का ही प्रयोग करें। द्वादशी की पूजा के बारे में पूछने पर वे कहते हैं कि वह पूरी बता दी है; शाम के समय कर लीजिए। और अनिल सोनारा जी से: अगर पंद्रह मंत्रों के नाम हैं, तो सोलहवाँ आपको नहीं दिया जा सकता। यह भी समझिए। सोलह आपको नहीं दिए जा सकते। श्री विद्या में भी सोलह हैं, पर सोलहवाँ सीधे कभी कोई नहीं देगा; सब पंद्रह ही देंगे।
सालों से छोटे अनुष्ठान किए और मंत्र कंठस्थ हो गया — अब क्या करें?
यह सब कभी व्यर्थ नहीं जाता; पीतांबरा की साधना आगे कीजिए
वक्ता कहते हैं, बिल्कुल — ये सब चीज़ें आपसे कभी नहीं जाने वाली। अगर आप भगवती पीतांबरा की आरंभिक साधना करते हैं, तो वही कीजिए; अगर दीक्षित हैं, तो उसी अनुसार कीजिए। स्तोत्र और सतनामावली कर सकते हैं। अघोर साबर है, वह कर सकते हैं। एक कवच है, रुद्रयामल का बगलामुखी तंत्र कवच — वह कर सकते हैं।
श्री राज शोध कई साल से जप कर रहे थे, उनकी सलाह के अनुसार छोटे-छोटे अनुष्ठान किए थे, और अब मंत्र अपने आप कंठस्थ हो गया, स्मरण में आ गया — सफलता के बारे में पूछने पर वक्ता कहते हैं: बिल्कुल, ये सब चीज़ें आपसे ऐसे कभी नहीं जाने वाली। भगवती पीतांबरा की जो आरंभिक साधना है, अगर आप वह करते हैं, तो वही करेंगे। अगर दीक्षित हैं, तो उसी अनुसार कीजिए। स्तोत्र और सतनामावली कर सकते हैं। अघोर साबर है — वह कर सकते हैं। एक कवच है, रुद्रयामल का बगलामुखी तंत्र कवच — वह कर सकते हैं।
हनुमान चालीसा किस दिन सिद्ध करें, और पाँच दिन का लघु अनुष्ठान किस समय करें?
चतुर्दशी, शनिवार — और रोज़ की बैठक के लिए शाम बेहतर
वक्ता कहते हैं, चतुर्दशी के दिन, शनिवार के दिन कीजिए। पाँच दिन की लघु अनुष्ठान साधना रोज़ किस समय करना ठीक होगा, यह पूछने पर वे कहते हैं कि समय की कोई दिक्कत नहीं, पर शाम बहुत अच्छी है; बाकी अपने काम के अनुसार, ऑफिस के अनुसार कर लीजिए।
एक श्रोता पूछते हैं, दीपावली पर हनुमान चालीसा किस दिन सिद्ध करनी चाहिए। वक्ता कहते हैं: चतुर्दशी के दिन कीजिए, शनिवार के दिन। पाँच दिन की लघु अनुष्ठान साधना रोज़ किस समय करना ठीक होगा, यह पूछने पर वे कहते हैं: समय की कोई दिक्कत नहीं, पर शाम बहुत अच्छी है; बाकी अपने काम के अनुसार, ऑफिस के अनुसार कर लीजिए। पूछा गया कि अगर पाँच दिन का अनुष्ठान घर के मुखिया के नाम से हो, तो क्या परिवार वालों को अलग-अलग करना होगा। वे कहते हैं: घर के मुखिया के नाम से सबका हो जाएगा — संकल्प में केवल मुखिया का नाम देंगे, पर संकल्प सपरिवार होगा। पूछा गया कि माता काली को सोलह लौंग चढ़ाने के बाद उनका क्या करें। वे कहते हैं कि उनका विसर्जन नहीं करना है — उन्हें खाना है; बाद में प्रसाद के रूप में खा सकते हैं। लौंग और इलायची खाई जा सकती है। पूछा गया कि पाँच दिन की कुबेर स्थापना विधि में क्या हल्दी रोज़ बदलनी है। वे कहते हैं: नहीं, बिल्कुल नहीं, वही रहेगी।
क्या धनतेरस पर धर्मराज के लिए एक मुख वाला दीपक जलाना चाहिए?
वे कहते हैं कि वे पाँचों दिन चार मुखी ही निकालते आए हैं
सेवक लड्डू गोपाल जी के प्रमाण के साथ बताया गया कि धनतेरस को धर्मराज के निमित्त एक मुखी और चौदस को यमराज के निमित्त चार मुखी दीपदान करना चाहिए। वक्ता कहते हैं: देखिए, पाँचों दिन हम चार मुखी ही करते और देखते आए हैं। बाकी अगर प्रमाण है और आप उसी अनुसार करना चाहते हैं, आप सीधे देख रहे हैं, तो कर सकते हैं; हम आपको कभी मना नहीं करेंगे। पर आज तक इतने क्षेत्रों में रहते हुए, पाँच दिन में पाँचों दिन हम चार मुखी ही निकालते हैं; एक मुख वाला नहीं निकालते। हाँ — अगर आप धर्मराज के निमित्त, धर्मराज स्वरूप की बात कर रहे हैं, तो हम मान सकते हैं; पर मुख हम यमराज रूप में ही निकालते हैं, यम दीपदान कहकर।
वक्ता कहते हैं, देखिए, पाँचों दिन हम चार मुखी ही करते और देखते आए हैं। बाकी अगर प्रमाण है और आप उसी अनुसार करना चाहते हैं, आप सीधे देख रहे हैं, तो कर सकते हैं। हम उस पर आपको कभी मना नहीं करेंगे। पर आज तक, इतने क्षेत्रों में रहते हुए, पाँच दिन वाले में पाँचों दिन हम चार मुखी ही निकालते हैं। एक मुख वाला नहीं निकालते। हाँ — अगर आप धर्मराज के निमित्त बोल रहे हैं, धर्मराज स्वरूप की बात कर रहे हैं, तो हम मान सकते हैं; पर मुख हम यमराज रूप में ही निकालते हैं। यमराज के निमित्त, यम कहकर, यम दीपदान ही निकालते हैं। और दीपदान की दूसरी विधियाँ भी हैं, जैसे मशाल बनाकर किया जाने वाला — पर वह हर जगह संभव नहीं। इस तरह बहुत सारे विधान हो जाते हैं।
अभ्यंग तेल लगाकर स्नान कब करना चाहिए?
अपामार्ग की लकड़ी और तिल के तेल से प्रोक्षण पर छोटा वीडियो आएगा
अभ्यंग तेल लगाकर स्नान कब करें, यह पूछने पर वक्ता कहते हैं कि वे कल एक छोटा वीडियो बनाएँगे — अपामार्ग की लकड़ी कैसे लानी है, और शरीर पर तिल का तेल लगाकर शरीर से कैसे प्रोक्षण करना है और फिर उसे फेंकना है। वे कहते हैं, इससे बड़े से बड़ा अभिचार, तंत्र का काट होता है, और ग्रहों की शांति होती है। वे कहते हैं कि वे इसे लिख रहे हैं और कल डाल देंगे; कल दो-तीन वीडियो आएँगे, जिनमें यह ज़रूरी है।
वक्ता कहते हैं, देखिए — अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी लाकर, इसका हम एक छोटा वीडियो बनाकर कल डालेंगे। अपामार्ग की लकड़ी कैसे लानी है, और शरीर पर तिल का तेल लगाकर शरीर से कैसे प्रोक्षण करना है और फिर उसे फेंकना है। इससे बड़े से बड़ा अभिचार, तंत्र का काट होता है; ग्रहों की शांति होती है। वे कहते हैं कि वे इसे लिख रहे हैं और कल डाल देंगे। कल दो-तीन वीडियो आएँगे, जिनमें यह ज़रूरी है।
चौखट पूजन घर के अंदर से करें या बाहर से?
दोनों तरह — क्योंकि हर चौखट का तिलक करना है
पूछा गया कि चौखट पूजन घर के अंदर से करना है या बाहर खड़े होकर, क्योंकि कई वीडियो में बाहर से करते दिखाया है, पर अगर चौखट पर लक्ष्मी जी के पाँव के निशान चाहिए तो। वक्ता कहते हैं कि चौखट पूजन आप बाहर से भी कर सकते हैं और अंदर से भी। आप जिसकी बात कर रहे हैं, चौखट का टिकना, वह आप अपने तरीके से कर सकते हैं, क्योंकि हर चौखट का तिलक करना है। तो बाहर और अंदर, अपने तरीके से कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं, चौखट पूजन आप बाहर से भी कर सकते हैं और अंदर से भी। यह जो आप कह रही हैं — अगर चौखट के टिकने की बात करनी है, तो आप अपने तरीके से कर सकते हैं, क्योंकि हर चौखट का तिलक करना है। तो बाहर और अंदर, अपने तरीके से आप कर सकते हैं।
क्या धनतेरस के दिन बैंक से लोन लेना सही है?
कर्ज़ आमदनी नहीं है — और उस दिन जो लेते हैं वह बढ़ता है
वक्ता कहते हैं, आदित्य जी, अगर आप बैंक से लोन ले रहे हैं, तो यह हमारी आमदनी नहीं — यह तो हम कर्ज़ ले रहे हैं। तो उनके अनुसार धनतेरस के दिन कर्ज़ लेना ठीक नहीं होगा; क्योंकि इस दिन हमें लक्ष्मी की प्राप्ति चाहिए, कुछ स्थायी चीज़, जबकि हम कर्ज़ ले रहे हैं जिसे फिर चुकाना है, वह भी ब्याज सहित। धनतेरस के दिन जो लेते हैं वह बढ़ता है, तो यह कर्ज़ है, और कर्ज़ बढ़ जाएगा। उनके अनुसार धनतेरस के दिन नहीं लेना चाहिए: या तो पहले ले लीजिए, या दीपावली के पाँच दिन के पर्व के बाद — या अगर कुछ ऐसा मामला हो कि बाद में कैंसिल होने की संभावना है, तब वे ऐसा नहीं कहेंगे।
वक्ता कहते हैं, आदित्य जी, अगर आप बैंक से लोन ले रहे हैं, तो यह हमारी आमदनी नहीं है; यह तो हम कर्ज़ ले रहे हैं। तो उनके अनुसार धनतेरस के दिन कर्ज़ लेना ठीक नहीं होगा। क्योंकि इस दिन हमें लक्ष्मी की प्राप्ति चाहिए, कुछ ऐसा जो स्थायी हो — जबकि हम कर्ज़ ले रहे हैं, जिसे फिर चुकाना है, वह भी ब्याज सहित। धनतेरस के दिन जो लेंगे उसमें बढ़ोतरी होगी ना; तो यह तो कर्ज़ ले रहे हैं, और कर्ज़ बढ़ जाएगा। इसलिए उनके अनुसार धनतेरस के दिन आपको नहीं लेना चाहिए। या तो पहले ले लीजिए, या दीपावली के पाँच दिन के पर्व के बाद लीजिए। या अगर कुछ ऐसा मामला हो कि बाद में कैंसिल होने की संभावना है, तब हम ऐसा नहीं कहेंगे। पर फिर भी अगर आपका प्रश्न यह है कि सही होगा या नहीं, तो उनके अनुसार ठीक नहीं होगा।
श्री यंत्र का मंडल पूजन कभी ऑनलाइन नहीं दिया जाता, और वहाँ "अमुक" शत्रु का नाम है, अपना नहीं
कभी ऑनलाइन नहीं — और वहाँ "अमुक" शत्रु का नाम है, आपका नहीं
श्री यंत्र के मंडल पूजन की विधि और उसकी साधना के विधान पर वक्ता सिविल मित्र जी से कहते हैं कि यह कभी संभव नहीं होगा — ऑनलाइन और वीडियो पर, चैनल पर, यह कभी संभव ही नहीं होगा। पूछा गया कि क्या महाभैरव में "साधक" शब्द की जगह अपना नाम लेना है। वे कहते हैं: महाभैरव में ज़्यादातर जगह वह शत्रु का नाम है; वहाँ शत्रु के नाम का उच्चारण करना होता है। अगर सिद्धि कर रहे हैं, तो वहाँ किसी का नाम न लें; और जितनी जगह नाम का उच्चारण होता है वह "अमुक" है — ज़्यादातर जगह "अमुक को मारो" है, तो अपना नाम कैसे लेंगे? अपना नाम लेने का मतलब है महाभैरव का प्रयोग अपने ही ऊपर कर देना। यह गलती न करें; अभी "अमुक" से ही सिद्धि कीजिए, और जब प्रयोग किया जाता है, तब अमुक की जगह शत्रु का नाम लेते हैं।
वक्ता कहते हैं, श्री यंत्र के मंडल पूजन की विधि और उसकी साधना का विधान, सिविल मित्र जी, कभी संभव नहीं होगा — ऑनलाइन और वीडियो पर, चैनल पर, यह कभी संभव ही नहीं होगा। पूछा गया कि क्या हनुमान चालीसा का विधान चौदस को करना चाहिए। वे कहते हैं: चौदस को कीजिए। पूछा गया कि पंचामृत तर्पण करते समय क्या भोग के लिए विग्रह के सामने मधु रखना ज़रूरी है: अगर विग्रह खप्पर वाला है, तो भोग तो आपको रखना ही है। वह अलग विषय है; तर्पण का विषय अलग है — तर्पण में आप सब शक्तियों के लिए कर रहे हैं, और भोग भगवती के निमित्त रहेगा। साधक शब्द की जगह अपना नाम लेने पर, महाभैरव में: ज़्यादातर जगह वह शत्रु का नाम है। वहाँ शत्रु के नाम का उच्चारण करना होता है। अगर सिद्धि कर रहे हैं, तो वहाँ किसी का नाम न लें; और जितनी जगह नाम का उच्चारण होता है, वह अमुक है — ज़्यादातर जगह "अमुक को मारो" है, तो अपना नाम कैसे लेंगे? अपना नाम लेने का मतलब है महाभैरव का प्रयोग अपने ही ऊपर कर देना। तो यह गलती नहीं करनी है। अभी अमुक से ही सिद्धि कीजिए; जब प्रयोग किया जाता है, तब अमुक की जगह शत्रु का नाम लेते हैं।
धन्वंतरि और अश्विनी कुमारों का पूजन कब होता है?
धनतेरस की कलश स्थापना में घट में आवाहन, आरोग्य के लिए
पूछा गया कि भगवान धन्वंतरि और अश्विनी कुमारों का पूजन दीपावली के दिन होगा या रोज़ करना होगा। वक्ता कहते हैं: धन्वंतरि जी का पूजन वैसे त्रयोदशी से चलता है, जब हम उन्हें स्थान देते हैं — जो लोग कलश स्थापना करते हैं, धनतेरस के दिन कलश स्थापना करके पूजन करते हैं, उनका आवाहन घट में हो जाता है, तो उनका पूजन रोज़ होता है। पर धनतेरस के दिन अश्विनी कुमारों और भगवान धन्वंतरि का पूजन करना चाहिए, आरोग्य के निमित्त।
हाँ — भगवान धन्वंतरि और अश्विनी कुमारों का पूजन दीपावली के दिन होगा या रोज़ करना होगा, एक श्रोता पूछते हैं। वक्ता कहते हैं कि दीपेंद्र जी एक बार वह मैसेज देख लें जो उन्होंने ग्रुप में डाल दिया है, कि उन्हें कौन-सा करवाना है; और अनुष्ठान एक ही है, ग्यारह सौ का। अगर सामग्री या तंत्र वस्तुएँ चाहिए, जैसे महालक्ष्मी कलश या यक्षराज कुबेर का, तो वह अलग विषय है। धन्वंतरि जी का पूजन वैसे त्रयोदशी से चलता है, जब हम उन्हें स्थान देते हैं — जो लोग कलश स्थापना करते हैं, धनतेरस के दिन कलश स्थापना करके पूजन करते हैं, उनका आवाहन घट में हो जाता है। तो उनका पूजन रोज़ होता है। पर धनतेरस के दिन अश्विनी कुमारों और भगवान धन्वंतरि का पूजन करना चाहिए। आरोग्य के निमित्त।
क्या गर्भवती महिला को विंध्यवासिनी के दरबार ले जा सकते हैं?
नहीं, अगर गर्भ ज़्यादा महीनों का है और दूरी ज़्यादा है
पूछा गया कि क्या गर्भवती महिला को विंध्यवासिनी के दरबार ले जा सकते हैं, क्योंकि लोग कहते हैं कि इस अवस्था में घर में रहना चाहिए। वक्ता नवीन दुबे जी से कहते हैं: अगर गर्भ ज़्यादा महीनों का हो गया है, तो यात्रा करना और कहीं भी आना-जाना ठीक नहीं। हम भी नहीं कहेंगे कि ऐसी अवस्था में उन्हें साथ ले जाइए; घर से इतनी दूर जाना ठीक नहीं, अगर दूर है। वे महाकाली यंत्र पर दुर्गा जी का मंत्र समर्पित करने के बारे में भी कहते हैं — बिल्कुल समर्पित कीजिए; शिवलिंग पर भी कर सकते हैं, दोनों पर कर सकते हैं।
पूछा गया कि क्या दुर्गा जी का मंत्र महाकाली यंत्र पर समर्पित कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं: बिल्कुल समर्पित कीजिए। शिवलिंग पर भी कर सकते हैं। दोनों पर कर सकते हैं। पूछा गया कि क्या गर्भवती महिला को विंध्यवासिनी के दरबार ले जा सकते हैं, क्योंकि लोग कहते हैं कि इस अवस्था में घर में रहना चाहिए। वे कहते हैं: अगर गर्भ ज़्यादा महीनों का हो गया है, तो यात्रा करना और कहीं भी आना-जाना ठीक नहीं। हम भी नहीं कहेंगे कि ऐसी अवस्था में उन्हें साथ ले जाइए। घर से इतनी दूर जाना ठीक नहीं, अगर दूर है, नवीन दुबे जी।
महाभैरव स्तोत्र की हवन सामग्री क्या है?
काले तिल, पीली सरसों, काली मिर्च और नीम के पत्ते, सरसों तेल में सने हुए
महाभैरव स्तोत्र की हवन सामग्री में खास तौर पर पीली सरसों है: काले तिल, पीली सरसों, काली मिर्च, नीम के पत्ते — ये सब चीज़ें सरसों के तेल में सानकर फिर मुख्य रूप से इनसे आहुति दी जाती है, विचार तंत्र के नाश के लिए और महाभैरव की प्रसन्नता के लिए। वक्ता कहते हैं, आरंभिक आहुति घी से ही होगी, या सरसों के तेल से भी दे सकते हैं।
वक्ता कहते हैं, महाभैरव स्तोत्र की हवन सामग्री — वैसे खास तौर पर पीली सरसों है। काले तिल, पीली सरसों, काली मिर्च, नीम के पत्ते: ये सब चीज़ें सरसों के तेल में सानकर, फिर मुख्य रूप से इनसे आहुति दी जाती है। विचार तंत्र के नाश के लिए, और महाभैरव की प्रसन्नता के लिए। आरंभिक आहुति घी से ही होगी, लेकिन — या सरसों के तेल से भी दे सकते हैं। जिनके पास केवल चाँदी के गणेश जी हैं, वे पूछते हैं कि क्या अकेले उन्हीं का कर लें। वे कहते हैं: लक्ष्मी जी को भी लाइए; लक्ष्मी गणेश जी दोनों कहा गया होगा। पूछा गया कि क्या भगवान के श्री विग्रह की जगह यंत्र पर जाप समर्पित कर सकते हैं। वे कहते हैं: हाँ, कर सकते हैं; हाथ में जल लेकर यंत्र पर समर्पण कीजिए।
जिस पुराने लक्ष्मी यंत्र की रोज़ पूजा नहीं होती, क्या उसका पूजन कर सकते हैं?
अगर ठीक है और भाव है, तो बिल्कुल पूजन कीजिए
चार साल पुराने लक्ष्मी जी के यंत्र के बारे में बताया गया, जिसमें लक्ष्मी जी कमल पर विराजमान हैं और जिसका नित्य पूजन नहीं होता। वक्ता कहते हैं: अगर यंत्र ठीक है, टूटा-फूटा नहीं है, और उनके प्रति भाव है, तो बिल्कुल पूजन कीजिए। पूछा गया कि क्या पाँच दिन बटुक भैरव का पूजन-अनुष्ठान कर सकते हैं; वे अभिषेक जी से कहते हैं: बिल्कुल कर सकते हैं।
एक श्रोता कहते हैं, लक्ष्मी जी का चार साल पुराना यंत्र है; लक्ष्मी जी कमल पर विराजमान हैं; नित्य पूजन नहीं होता। वक्ता कहते हैं, अगर यंत्र ठीक है, टूटा-फूटा नहीं है, और उनके प्रति भाव है, तो बिल्कुल पूजन कीजिए। पूछा गया कि क्या पाँच दिन बटुक भैरव का पूजन-अनुष्ठान कर सकते हैं: बिल्कुल कर सकते हैं, अभिषेक जी। देखिए — पूजन आप किसी भी देवी-देवता का कर सकते हैं, साधना किसी की भी कर सकते हैं; पर जो पूजन होगा, जैसा हमने बताया, गोबर द्वादशी के दिन भगवती अपनी गौ माता का — वह कीजिए। और त्रयोदशी के दिन यक्षराज कुबेर जी का पूजन, भगवान धन्वंतरि का पूजन, अश्विनी कुमारों का पूजन, भगवती अष्टलक्ष्मी का पूजन — ये सब, जैसा बताया, उसी तरह और क्रम से, इतना कीजिए।
महालक्ष्मी कलश की स्थापना खुद करूँ या करवाऊँ?
खुद करने से आत्मविश्वास और भाव बनता है
वक्ता कहते हैं, अगर आप महालक्ष्मी कलश की स्थापना खुद करना चाहते हैं, तो कर लीजिए; अगर करवाना चाहते हैं, तो बता दीजिए। खुद कीजिए — हमने विधान बता दिए हैं। अगर आप चाहें और सारी सामग्री मिल जाए, तो खुद ही कीजिए; वह अच्छा रहेगा। आखिरी विकल्प यह है कि अगर आपके पास नहीं है, या आप चाहते हैं कि पूर्ण विधान से, नियम से हो, तो हमें बताइए। खुद करेंगे तो आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा कि हाँ, हमने किया — आपका भाव ही अलग रहेगा। यहाँ हम जो करेंगे वह आप नहीं देखेंगे, हम कैसे कर रहे हैं, कितना कर रहे हैं; हम यहाँ दस घंटे जाप कर लें, पर जब आप वहाँ करेंगे तो एक अलग भाव रहेगा, और साल भर आप उसे उसी भाव में प्रबलता के साथ देखेंगे और करेंगे।
वक्ता कहते हैं, अगर आप महालक्ष्मी कलश की स्थापना खुद करना चाहते हैं, तो कर लीजिए; अगर करवाना चाहते हैं, तो हमें बता दीजिए। आप खुद कीजिए — हमने वे विधान बता दिए हैं। अगर आप चाहें और सारी सामग्री मिल जाए, तो खुद ही कीजिए। अच्छा रहेगा। आखिरी विकल्प यह है कि अगर आपके पास नहीं है, या आप चाहते हैं कि पूर्ण विधान से, नियम से हो जाए, तो हमें बताइए। आप खुद करेंगे तो इसमें आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा — कि हाँ, हमने किया। आपका भाव ही अलग रहेगा। यहाँ हम जो करेंगे वह आप नहीं देखेंगे: हम कैसे कर रहे हैं, कितना कर रहे हैं। हम यहाँ दस घंटे जाप कर लें। पर जब आप वहाँ करेंगे, तो एक अलग भाव रहेगा — कि हाँ, साल भर आप उसे उसी भाव में देखेंगे और प्रबलता से करेंगे।
अगर पूरी विधि मुझसे न हो पाए तो?
ज़बरदस्ती या आधा-अधूरा न करें — कम से कम सामान्य रूप से प्रयास करें
वक्ता कहते हैं, पर अगर आपसे नहीं हो पा रहा है, तो ज़बरदस्ती नहीं करना है, और आधा-अधूरा भी नहीं। वह नहीं करना है; वह भी हम नहीं कहेंगे। पर प्रयास कीजिए, कम से कम — वह नहीं तो कम से कम सामान्य रूप से प्रयास कीजिए। उसमें भी भाव बनता है। बाकी हमारे माध्यम से जो होता है वह आप वीडियो में देखते हैं: जब केवल आपको दिखाने के लिए हमने इतने विस्तार से वीडियो बनाए, तो आप सोच सकते हैं कि असल में जब वे सब चीज़ें होती हैं, तो कैसे होती हैं — उसमें कितना विधि-विधान रहता है, किन-किन तरीकों से किया जाता है।
वक्ता कहते हैं, पर अगर आपसे नहीं हो पा रहा है, तो ज़बरदस्ती नहीं करना है; और आधा-अधूरा भी नहीं। वह भी नहीं करना है। वह भी हम नहीं कहेंगे। पर प्रयास कीजिए, कम से कम — वह नहीं तो कम से कम सामान्य रूप से प्रयास कीजिए। उसमें भी भाव बनता है। बाकी हमारे माध्यम से जो होता है, वह सब आप वीडियो में देखते हैं: किस तरह, अब जब केवल आपको दिखाने के लिए हमने इतने विस्तार से वीडियो बनाए हैं, तो असल में जब वे सब चीज़ें होती हैं, कैसे होती हैं — आप सोच सकते हैं। उसमें कितना विधि-विधान रहता है, किन-किन तरीकों से किया जाता है। प्रतिष्ठा में और विधि-विधान में कोई कमी नहीं। जितना विधि-विधान लाइव दिखाया गया है — चाहे मूर्ति प्रतिष्ठा की विधि हो, चाहे महालक्ष्मी कलश की, या कालिका योगिनी साधना से जुड़ा विषय। अब निर्णय आपको लेना है; या हवन से जुड़ा — कि जो चीज़ आपको दी जा रही है, आपके सामने रखी जा रही है, उसमें मेरी आत्मा कितनी लगती है, कि हाँ, हमारे सनातनी भाइयों का कल्याण हो, सनातनी माताओं-बहनों का उत्थान हो। यह मेरा भाव है। अब आप उसे किस स्तर पर लेते हैं, वह आपकी इच्छा है, आपके भीतर की ऊर्जा है।
अमृत कलश की कथा क्या दिखाती है?
अपनी ही नकारात्मकता, और ब्रह्मा जी की तीन बेटियाँ
वक्ता कहते हैं, आप कितने सकारात्मक या नकारात्मक हैं, वह आपके भीतर है। अब आपके सामने अमृत कलश ही रखा जाए, और आप कहें कि क्या पता इस अमृत कलश के ऊपर विष लगा हो, हम नहीं पिएँगे — तो वह आपकी इच्छा है; आपके भीतर की नकारात्मकता आपसे ऐसा करवा सकती है। वे ब्रह्मा जी की तीन बेटियों की कथा याद करते हैं, जिन्होंने तपस्या की, और जब वे प्रकट हुए, तो एक-दूसरे के खिलाफ़ गलत वरदान माँगे — कि यह काली हो जाए ताकि हम धनी हो जाएँ, ऐसा हो जाए। ब्रह्मा जी सब वरदान देकर चले गए। यहाँ भी यही स्थिति होती है: अगर भगवान प्रकट हों, तो कोई अपना उत्थान नहीं माँगेगा, बल्कि दूसरे का बुरा माँगेगा।
वक्ता कहते हैं, आप कितने सकारात्मक या नकारात्मक हैं, वह आपके भीतर है। अब आपके सामने अमृत कलश ही रखा जाए, और आप कहें कि क्या पता इस अमृत कलश पर विष लगा हो, हम नहीं पिएँगे — तो वह आपकी इच्छा है ना; आपके भीतर की नकारात्मकता ऐसा करवा सकती है। एक कथा हम सुनते हैं कि ब्रह्मा जी की तीन बेटियाँ थीं, जिन्होंने तपस्या की, और जब वे प्रकट हुए तो उन्होंने एक-दूसरे के लिए गलत वरदान माँगे — कि यह काली हो जाए ताकि हम उससे ज़्यादा धनी हो जाएँ, ऐसा हो जाए। ब्रह्मा जी सब वरदान देकर चले गए। तो यही स्थिति यहाँ होती है। यहाँ अगर भगवान प्रकट हों, तो कोई अपना उत्थान नहीं माँगेगा; वह दूसरे का बुरा माँगेगा, कि उसका यह हो जाए।
क्या बिना नहाए साधना हो सकती है, और क्या कुशा की जगह तांबे की अंगूठी चल सकती है?
पानी गर्म करके नहाइए; और तांबा या सोना प्रयोग कर सकते हैं
पूछा गया कि दिन में काम के बाद शाम को बिना नहाए, केवल हाथ-मुँह धोकर साधना कर सकते हैं क्या। वक्ता कहते हैं: पानी गर्म करके नहा लीजिए। ज़्यादा से ज़्यादा बाल मत धोइए, अगर ठंड लगने की संभावना है। पूछा गया कि क्या कुशा की जगह तांबे की अंगूठी प्रयोग कर सकते हैं; वे कहते हैं कि कर सकते हैं — तांबे की अंगूठी प्रयोग कर सकते हैं, और सोने की भी।
पूछा गया कि क्या दिन में काम करके शाम को बिना नहाए, केवल हाथ-मुँह धोकर साधना कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं: पानी गर्म करके नहा लीजिए। ज़्यादा से ज़्यादा बाल मत धोइए, अगर ठंड लगने की संभावना है। पूछा गया कि क्या कुशा की जगह तांबे की अंगूठी प्रयोग कर सकते हैं। वे कहते हैं: कर सकते हैं; तांबे की अंगूठी प्रयोग कर सकते हैं। सोने की भी प्रयोग कर सकते हैं।
क्या घर में कबूतर के मल की धूप देनी चाहिए?
वे इसे बेवकूफ़ी कहते हैं — विष्ठा तंत्र खाली घरों के लिए है
एक ज्योतिषी एक बहन को घर में कबूतर के मल की धूप देने को कहता है, और वह गुग्गल और कपूर के साथ देती है — यह सुनकर वक्ता अनिल जी से कहते हैं, बुरा मत मानिए: आप इतनी साधना-पूजा करते हैं, और उस साधना-पूजा पर लीपापोती करने का काम यही कबूतर का मल कर रहा है। अगर तंत्र की बात है, तो गृहस्थ के लिए वे साफ़ समझाते हैं: इस तरह का विष्ठा तंत्र उस घर के लिए प्रयोग होता है जो मनुष्यों से खाली हो — जहाँ लोग दो, चार, पाँच साल के लिए छोड़कर चले गए हों, जहाँ साल में एक बार भी धूप-दीप न हो, जहाँ दीपावली-होली में भी घर बंद रहे, ताकि जब वे दोबारा आएँ, उस खाली घर में प्रेत-पिशाचों की उपस्थिति बन गई हो। ऐसी जगहें खाली कराने के लिए यह प्रयोग होता है, और सूकर विष्ठा, मूषक विष्ठा और बिडाल विष्ठा का प्रयोग होता है। उस घर में नहीं जहाँ गृहस्थ पहले से रह रहे हैं और देवी-देवता पहले से उपस्थित हैं।
वक्ता कहते हैं, देखिए, ऐसे ही — अनिल जी, बुरा मत मानिए, पर आप इतनी साधना-पूजा करते हैं। और उस साधना-पूजा पर लीपापोती करने का काम यही चीज़, कबूतर का मल, कर रहा है। सामने देख लीजिए। वे पूछते हैं, क्या ज़रूरत है? आप भगवती के ऐसे स्वरूप की पूजा करते हैं; आपके घर में सबकी उपस्थिति पहले से है और आपको भी पता है। उनका अभी-अभी अच्छे, व्यवस्थित तरीके से पूजन शुरू हुआ है; दो-तीन महीने हुए होंगे। उसमें भी समय लगेगा — इतनी पुरानी-पुरानी चीज़ें हैं। पर यह सब क्या है? यह टोटका करना। मल से धूप देना। वहाँ कौन-सा प्रेत-पिशाच है, कि यह करने की ज़रूरत पड़ रही है? वे कहते हैं, अगर तंत्र करते हैं, तो गृहस्थ के मामले में हम आपको और साफ़ बताते हैं: जो घर मनुष्यों से खाली हो, जिसमें मनुष्य की उपस्थिति न हो — लोग दो, चार, पाँच साल के लिए घर छोड़कर चले जाते हैं; वहाँ धूप-दीप नहीं होता, साल में एक बार भी नहीं; दीपावली-होली में भी घर बंद है, कोई पूजन-पाठ नहीं। उस जगह, जब वे दोबारा आएँगे, तो उस खाली घर में प्रेत-पिशाचों की उपस्थिति बन जाती है। ऐसी जगहें खाली कराने के लिए इस तरह के विष्ठा तंत्र का प्रयोग होता है, जैसे कबूतर का मल। दरिद्रता के नाश के लिए वहाँ उस तरह का प्रयोग होगा, ताकि वह हटे। सूकर विष्ठा का प्रयोग होता है, मूषक विष्ठा का प्रयोग होता है; फिर बिडाल विष्ठा का प्रयोग होता है। तो बाबू, ये सब चीज़ें उस जगह होती हैं। यहाँ, जहाँ गृहस्थ पहले से रह रहे हैं, जहाँ देवी-देवता पहले से उपस्थित हैं, जहाँ इतना अच्छा पूजन-हवन सब होता है — उस जगह आप कबूतर के मल की धूप दे रहे हैं। इससे बड़ी बेवकूफ़ी और क्या होगी? मतलब, देवी-देवता अब गुग्गल से प्रसन्न नहीं होंगे, कबूतर के मल से प्रसन्न हो रहे हैं।
लाल किताब के ज्योतिषी पूरी ज़िंदगी बिगाड़ देते हैं, और दोष सलाह देने वाले का है
वे ज़िंदगियाँ बिगाड़ते हैं, और दोष सलाह देने वाले का है
वक्ता कहते हैं, ये लाल किताब के ज्योतिषी और ऐसे ही ज्योतिषी किसी की पूरी ज़िंदगी तहस-नहस कर देते हैं — खड़ा नारियल रखवाएँगे, यह-वह करवाएँगे, गायत्री दे देंगे, कुछ भी कर देंगे। और फिर दूसरों से कहना है: बाबू, आप गलत करते हो, या आप ऐसे नहीं समझा रहे। वे पूछते हैं, आप किसे दोष देने जाएँगे? अगर आपकी श्रद्धा हमारे माध्यम से, गृहस्थ तंत्र के माध्यम से जुड़ी है, तो आप यहाँ की बात मानेंगे; उनकी श्रद्धा वहाँ से जुड़ी है। अब यह तो उस व्यक्ति का दोष है — उसे गलत बातें नहीं बतानी चाहिए।
वक्ता कहते हैं, ये लाल किताब के ज्योतिषी और ऐसे ही ज्योतिषी किसी की पूरी ज़िंदगी तहस-नहस कर देते हैं। खड़ा नारियल रखवाएँगे, यह-वह करवाएँगे, गायत्री दे देंगे, कुछ भी कर देंगे। और फिर दूसरों से कहना है: बाबू, आप गलत करते हो, या आप ऐसे नहीं समझा रहे। यही हालत है। वे पूछते हैं, आप किसे दोष देने जाएँगे? अगर आपकी श्रद्धा हमारे माध्यम से, गृहस्थ तंत्र के माध्यम से जुड़ी है, तो आप यहाँ जो बताया जाए वह मानेंगे; उनकी श्रद्धा वहाँ से जुड़ी है। अब यह तो उस व्यक्ति का दोष है ना — उसे ये गलत बातें नहीं बतानी चाहिए। इन सब चीज़ों की ज़रूरत कहाँ है?
क्या केवल क्षेत्रपाल निकारी की जा सकती है?
हाँ — और हवन के बाद भी करनी चाहिए
उमाशंकर जी कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से आरंभिक विधि से शुरू करके पूर्णाहुति और क्षेत्रपाल निकारी भी करना चाहते हैं, और पूछते हैं कि केवल क्षेत्रपाल निकारी कैसे करें। वक्ता कहते हैं: केवल क्षेत्रपाल निकारी आप बिल्कुल कर सकते हैं। हवन के बाद भी करनी चाहिए। केवल क्षेत्रपाल निकारी का विषय बिल्कुल ऐसे ही किया जा सकता है; उस पर वे अलग वीडियो डाल रहे हैं।
वक्ता कहते हैं, उमाशंकर जी, केवल क्षेत्रपाल निकारी आप बिल्कुल कर सकते हैं। हवन के बाद भी करनी चाहिए। केवल क्षेत्रपाल निकारी का विषय बिल्कुल ऐसे ही किया जा सकता है। उस पर हम अलग वीडियो डाल रहे हैं।
देवघर में रहने वाला गुरु कहाँ खोजे?
सावर क्षेत्र में, और काली व बगलामुखी के मंदिरों में जाइए
देवघर में रहने वाले एक व्यक्ति पूछते हैं कि क्या आसपास कोई गुरु हैं। वक्ता कहते हैं: सावर क्षेत्र में चले जाइए; मंदिरों में, काली जी और बगला माई के मंदिर में, एक से एक साधक बैठे हैं। देखकर, जान-पहचान करके, पूछकर, फिर दीक्षा लीजिए। अगर आपको ठीक लगे, तो जान-परखकर लीजिए।
एक श्रोता पूछते हैं, आप देवघर में रहते हैं; क्या आसपास कोई गुरु हैं। वक्ता कहते हैं, सावर क्षेत्र में चले जाइए। मंदिरों में — काली जी और बगला माई के मंदिर में — एक से एक साधक बैठे हैं। देखकर, जान-पहचान करके, पूछकर, फिर दीक्षा लीजिए। अगर आपको ठीक लगे, तो जान-परखकर लीजिए।
क्या देवघर का शक्तिपीठ जागृत है?
बैजनाथ धाम, हृदय पीठ, और शिवरात्रि का गठबंधन
वक्ता अभिषेक तोमर जी को तीखा जवाब देते हैं: आप कहते हैं कि देवघर में रहते हैं और आपको यह भी नहीं पता कि वह जागृत है या नहीं — इसमें हम क्या कहें। वह भगवती का हृदय पीठ कहा जाता है: माई के हृदय का स्पंदन, हृदय की मुख्य धमनियाँ, वहाँ गिरीं। अंबाजी में हृदय, और यहाँ हृदय की धमनियाँ — जिसके कारण भगवान को अपना आत्मलिंग स्थापित करना पड़ा। यही बैजनाथ धाम है, जहाँ शिवरात्रि के महाकाल में इन दोनों का गठबंधन पहले करवाया गया, जिसके कारण पूरा जगत मानता है कि शिवरात्रि को शिव और पार्वती जी का विवाह हुआ — जबकि सच यह है कि उस दिन कोई विवाह नहीं हुआ; उस दिन बैजनाथ महादेव और भगवती जय दुर्गा का गठबंधन करवाया गया था। यह उस समय का प्रतीक है जब सती ने अपना शरीर त्यागा।
एक श्रोता पूछते हैं, भैया, देवघर में जो शक्तिपीठ है, क्या वह जागृत शक्तिपीठ है। वक्ता जवाब देते हैं, बताइए — आप कह रहे हैं कि हम देवघर में रहते हैं, अभिषेक तोमर जी, और आपको यह भी नहीं पता कि वह जागृत है या नहीं। अब इसमें हम क्या कहें। भगवती का एक हृदय पीठ है; कहा जाता है कि माई के हृदय का स्पंदन, हृदय की मुख्य धमनियाँ, वहाँ गिरीं। अंबाजी में हृदय, और यहाँ हृदय की धमनियाँ — जिसके कारण भगवान को अपना आत्मलिंग ही स्थापित करना पड़ा। यही बैजनाथ धाम है, जहाँ शिवरात्रि के महाकाल में इन दोनों का गठबंधन पहले करवाया गया, जिसके कारण पूरे जगत में लोग शिवरात्रि के दिन मान लेते हैं कि शिव और पार्वती जी का विवाह हुआ — जबकि सच यह है कि उस दिन कोई विवाह नहीं हुआ। उस दिन बैजनाथ महादेव और भगवती जय दुर्गा का गठबंधन करवाया गया था। जब जगदंबा ने सती के रूप में अपना शरीर त्यागा, यह उसका प्रतीक है। तो वहाँ उपस्थिति है, और आप ऐसे स्थान के बारे में कह रहे हैं कि जागृत है या नहीं; ज्योतिर्लिंग क्षेत्र है, और आप यह पूछ रहे हैं। बताइए। यह हालत है, तो आपकी मर्ज़ी। क्या ऐसा हो सकता है कि वह जागृत न हो?
तंत्र में जय दुर्गा का क्या स्थान है?
बैजनाथ धाम की शक्ति, और एक कल्प में नौ दुर्गाओं में से एक
वक्ता कहते हैं कि यह हमारे सनातन की पराकाष्ठा है — ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में रहने वाला व्यक्ति पूछ रहा है कि वह जागृत है या नहीं। जाइए बाबू, दर्शन कीजिए। वहाँ लक्ष्मी और दुर्गा जी के रूप में: तंत्र के क्षेत्र में भगवती जय दुर्गा का बहुत प्रमुख स्थान है। वे चैनल और वेबसाइट पर डाली गई ब्रह्म पिशाच प्रपंच सत्य तंत्र घटना की ओर इशारा करते हैं, जिसमें जय दुर्गा का वर्णन है, उनके मंत्रों का वर्णन है, और उनका प्रयोग कैसे हुआ — वह बहुत प्रचंड है। दक्षिण भारत में होने वाले नौ दुर्गा पूजन में, अलग-अलग कल्पों के अनुसार, एक कल्प में नौ दुर्गाओं में एक दुर्गा जय दुर्गा हैं, और उनका प्रमुख शक्तिपीठ यही बैजनाथ धाम माना गया है — शक्ति जय दुर्गा और उनके भैरव बैजनाथ।
वक्ता कहते हैं, यह हमारे सनातन की पराकाष्ठा है: ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में रहने वाला व्यक्ति पूछ रहा है कि वह जागृत है या नहीं। जाइए बाबू, दर्शन कीजिए। वहाँ लक्ष्मी और दुर्गा जी के रूप में — आपको पता है कि तंत्र के क्षेत्र में भगवती जय दुर्गा का बहुत प्रमुख स्थान है। ब्रह्म पिशाच प्रपंच, एक सत्य तंत्र घटना, उन्होंने चैनल पर और वेबसाइट पर डाली है; उसे पढ़िए। उसमें जय दुर्गा का वर्णन है, उनके मंत्रों का वर्णन है, उनका प्रयोग कैसे किया गया था। वह बहुत प्रचंड है। दक्षिण भारत में नौ दुर्गा का जो पूजन होता है: अलग-अलग कल्पों के अनुसार — कौन-सा कल्प, यह उन्हें अभी याद नहीं — पर उसमें, एक कल्प में, नौ दुर्गाओं में एक दुर्गा जय दुर्गा हैं। वहाँ, जहाँ उनका विशेष पूजन करते हैं, उनका प्रमुख शक्तिपीठ यही माना गया है। जय दुर्गा को ही ऐसा माना गया है, बैजनाथ धाम में। शक्ति जय दुर्गा, और उनके भैरव बैजनाथ।
भगवान के पुराने वस्त्रों का क्या करें?
प्रवाह ही उपाय है
एक श्रोता पूछते हैं, जब भगवान के वस्त्र पुराने हो जाते हैं, तो उनका क्या करना चाहिए। वक्ता कहते हैं, हम उनका प्रवाह कर देते हैं — प्रवाह ही एकमात्र उपाय है; वह पानी में गल भी जाता है। वे अभिषेक तोमर जी से भी कहते हैं कि वे बहुत परेशान लगते हैं और दीपावली के बाद मैसेज करें ताकि सब बात हो सके, और सुमन जी से कहते हैं कि केवल एक अनुष्ठान करें — संकट नाशन या चालीसा, दोनों में से कोई एक।
एक श्रोता पूछते हैं, जब भगवान के वस्त्र पुराने हो जाते हैं, तो उनका क्या करना चाहिए। वक्ता कहते हैं, हम उनका प्रवाह कर देते हैं। प्रवाह ही एकमात्र उपाय है; वह पानी में गल भी जाता है। वे कार्तिक प्रासर जी से पूछते हैं कि वे कौन-सी पूजा कर रहे हैं जिसमें मंत्र नहीं है; अभिषेक तोमर जी से कहते हैं कि वे बहुत परेशान लगते हैं और दीपावली के बाद मैसेज करें, तब सब बात कर लेंगे; सुमन जी से कहते हैं कि केवल एक अनुष्ठान करें, संकट नाशन या चालीसा, दोनों में से कोई एक; और बताते हैं कि गणपति जी का हवन द्वारेश नाम से कर सकते हैं।
साधना में लहसुन-प्याज क्या नुकसान करते हैं?
गर्मी, तामसिक वृत्ति, स्वप्न दोष और मूलाधार पर स्पंदन
वक्ता कहते हैं, ये गर्मी बढ़ाते हैं: कमर में दर्द होगा, पेट में दर्द होगा, लीवर में दर्द होगा — वे कहते हैं कि उन्होंने लीवर पेन कहा, लेबर पेन नहीं। तो दिक्कत होती है। और लहसुन-प्याज से सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि तामसिक वृत्ति ज़रूर बढ़ती है। पुरुषों में स्वप्न दोष की स्थिति बहुत बढ़ जाती है। जितनी गर्मी, उतनी दिक्कत; मूलाधार के ऊपर स्पंदन की प्रक्रिया ऐसे होने लगती है कि आदमी समझ नहीं पाता। तो लहसुन-प्याज नुकसान करते हैं; लहसुन-प्याज छोड़ देने चाहिए।
एक श्रोता पूछते हैं, साधना में लहसुन-प्याज क्या नुकसान करते हैं। वक्ता कहते हैं, ये गर्मी बढ़ाते हैं। कमर में दर्द होगा, पेट में दर्द होगा, लीवर में दर्द होगा — वे जोड़ते हैं कि उन्होंने लीवर पेन कहा है, लेबर पेन नहीं, साधक ज्ञान जी। तो दिक्कत होती है; और लहसुन-प्याज से अगर एक सबसे बड़ी दिक्कत है, तो वह यह कि तामसिक वृत्ति ज़रूर, ज़रूर बढ़ती है। पुरुषों में स्वप्न दोष की स्थिति बहुत बढ़ जाती है। जितनी गर्मी, उतनी दिक्कत। मूलाधार के ऊपर स्पंदन की प्रक्रिया ऐसे होने लगती है कि आदमी समझ नहीं पाता। तो लहसुन-प्याज नुकसान करते हैं। लहसुन-प्याज छोड़ ही देने चाहिए। और अब कौल, शाक्त, यह सब मत कहने लगिए, वे जोड़ते हैं — कि कौल है तो सब खाएँगे; यही बात है ना: कौल है तो दारू पिएँगे, शाक्त हैं तो मांस खाएँगे, यह सब करेंगे। ऐसे लतखोर लोगों के लिए उनके पास कोई जवाब ही नहीं; ऐसे लोगों को हम दूर से प्रणाम करते हैं। सच क्या है? अपनी जीभ के लालच के लिए कुछ भी खाएँगे-पिएँगे, और कौल और शाक्त का नाम बिगाड़ेंगे। शोधन वगैरह भूल जाइए; वे विषय बिल्कुल अलग हैं।
क्या बहन के घर बच्चा होने पर सूतक लगता है?
नहीं — कन्यादान और पाणिग्रहण से वह चली गई, बस एक स्थिति को छोड़कर
वक्ता कहते हैं, नहीं, अमित जी: उसका कन्यादान हो गया, पाणिग्रहण संस्कार हुआ; वह उनके घर की लक्ष्मी बन चुकी है, आपके घर से जा चुकी है। तो जब उसका बच्चा होगा, या उनके घर किसी की मृत्यु होगी, उसका सूतक आपके यहाँ नहीं लगता। पर एक स्थिति ज़रूर माननी चाहिए, और ऐसा होता भी है: अगर कोई युवती अपने माता-पिता की एकमात्र संतान है, उसका विवाह हो गया है और वह ससुराल में है, तो उसकी पूरी ज़िम्मेदारी उसके पति की है, और अपने सास-ससुर की भी — तब वह पूरा नियम ससुराल वालों को भी मानना पड़ेगा; सारा नियम यहाँ भी लागू होता है। इसके अलावा, अगर उसके भाई वगैरह हैं, तो यह नियम यहाँ लागू नहीं होता।
एक श्रोता पूछते हैं, जब बहन के घर बच्चा होता है, तब क्या हमें भी सूतक लगता है। वक्ता कहते हैं, नहीं, अमित जी। उसका कन्यादान हो गया ना; पाणिग्रहण संस्कार हुआ। वह उनके घर की लक्ष्मी बन चुकी है। आपके घर से वह जा चुकी है। तो जब उसका बच्चा होगा, या उनके घर किसी की मृत्यु होगी, उसका सूतक आपके यहाँ नहीं लगता। हाँ — एक स्थिति ज़रूर माननी चाहिए, और ऐसा होता भी है। अगर कोई युवती अपने माता-पिता की एकमात्र संतान है, उसका विवाह हो गया है, और वह ससुराल में है, तो उसकी पूरी ज़िम्मेदारी उसके पति की है, और अपने सास-ससुर की भी। तब वह पूरा नियम यहाँ भी सारे ससुराल वालों को मानना पड़ेगा; सारा नियम यहाँ भी लागू होता है। यह एक स्थिति है। इसके अलावा, अगर उसके भाई वगैरह हैं, तो यह नियम यहाँ लागू नहीं होता। यह बात ध्यान रखिए। पूछा गया कि क्या लक्ष्मी कलश बगलामुखी सतनाम से कर सकते हैं। वे कहते हैं: महालक्ष्मी अष्टक से कीजिए। और जाप के समय अपान वायु के बारे में — वे कहते हैं, यह लहसुन-प्याज का नतीजा है; यही तो हम कह रहे थे। ऐसा नहीं कि आज लहसुन-प्याज खाएँ तो कल उसका असर नहीं होगा। लहसुन-प्याज की वृत्ति ऐसी है; खून में जाने वाला उसका तत्व अपान वायु ज़रूर बढ़ाएगा। गैस की समस्या ज़रूर होगी। और अगर अपान वायु ज़्यादा समय पेट में रहा, तो नसें पकड़ लेती हैं, जकड़ लेती हैं, और लगता है जैसे हार्ट अटैक आ गया। या बाईं तरफ़ लीवर के पास दर्द शुरू हो जाएगा। कमर की नस तन जाएगी। ये सब इसके साइड इफेक्ट हैं। इसीलिए इसे मना किया गया है — पर इसके लिए लोग पचास तर्क-कुतर्क कर देते हैं।
क्या सौ रुपये वाले नवरत्न असली होते हैं?
इसके बजाय सुनार के पास जाइए, या उपरत्न लीजिए
वक्ता कहते हैं, सौ रुपये में जो नवरत्न आते हैं, वे वह भी नहीं होते — यह भी पता नहीं चलता कि प्लास्टिक के हैं या नहीं। उससे अच्छा है सुनार की दुकान पर जाइए; उन्हें बताइए, वे आपको बता देंगे। अगर एक रत्ती का, या सवा रत्ती का भी मिल जाए, तो कम से कम वह चल जाएगा; या उपरत्न ले लीजिए, जो कम में मिल जाएगा। पर सौ रुपये में आने वाली यह छोटी बिंदु जैसी चीज़, जिसे नवरत्न कहते हैं — उसमें क्या आएगा? कौन देगा? इतना छोटा हीरा भी खरीदने जाइए, तो पता चल जाएगा। वे इसे केवल प्रतीक के रूप में देते हैं; इसमें कुछ नहीं होता।
परिवार में मृत्यु हुई हो तो क्या दीपावली मनाएँ?
देवताओं का पूजन न रोकें, पर पर्व न मनाएँ
मामा के लड़के की मृत्यु के बारे में बताया गया, जिसके कारण परिवार दीपावली नहीं मना रहा, पर्व नहीं मना रहा। वक्ता कहते हैं: तो छोड़ दीजिए, इस बार अनुष्ठान में भाग मत लीजिए। ऐसे तो मामा के लड़के के लिए भी पूजन हो रहा है, तो दीपावली में देवताओं का पूजन मत रोकिए; पर्व मत मनाइए। कम से कम दीपोत्सव सामान्य रूप से कीजिए — मुख्य स्थानों पर देवताओं के निमित्त दीप जलाइए। पटाखे मत फोड़िए, घर मत सजाइए, अगर आपके लिए यह बहुत पर्व वाली बात है; पर पूजन नहीं छोड़ना चाहिए, दीपावली का पूजन भी। दीपावली का पूजन कर लीजिए। अनुष्ठान आप अपने घर में कर सकते हैं। उनकी अपनी राय है कि इस बार आप लोग छोड़ ही दें, अगर इतना नियम मान रहे हैं।
वक्ता कहते हैं, गुरु गेमिंग जी, नहीं — मामा के लड़के की मृत्यु। उस मृत्यु के कारण आप दीपावली नहीं मना रहे, पर्व नहीं मना रहे — तो छोड़ दीजिए, इस बार अनुष्ठान में भाग मत लीजिए। ऐसे तो मामा के लड़के के लिए भी पूजन हो रहा है। तो दीपावली में देवताओं का पूजन मत रोकिए; पर्व मत मनाइए। कम से कम दीपोत्सव सामान्य रूप से कीजिए। मुख्य स्थानों पर देवताओं के निमित्त दीप जलाइए। पटाखे मत फोड़िए; घर मत सजाइए, अगर आपके लिए यह बहुत पर्व वाली बात है — वह मत मनाइए। पर पूजन नहीं छोड़ना चाहिए, दीपावली का भी। दीपावली का पूजन कर लीजिए। अनुष्ठान आप अपने घर में कर सकते हैं। उनका निर्णय क्या है — उनके अनुसार इस बार आप लोगों को छोड़ ही देना चाहिए, अगर इतना नियम मान रहे हैं।
क्या बराबर मात्रा में घी और शहद विष का काम करते हैं?
इसे पिया नहीं जा रहा — और मात्रा का नियम हर कोई नहीं निभा सकता
बताया गया कि आयुर्वेद ग्रंथों में लिखा है कि बराबर मात्रा में मिलाए गए घी और शहद विष का काम करते हैं। वक्ता कहते हैं: पर घी और शहद पिलाया नहीं जा रहा, न पिया जा रहा है। अगर मात्रा को लेकर चलें, तो मात्रा का नियम निभा पाना हर किसी के लिए संभव ही नहीं।
एक श्रोता कहते हैं, आयुर्वेद ग्रंथों में लिखा है कि घी और शहद बराबर मात्रा में मिलाने से वे विष का काम करते हैं। वक्ता जवाब देते हैं, पर घी और शहद पिलाया नहीं जा रहा, न पिया जा रहा है। अगर मात्रा को लेकर चलें, तो मात्रा का नियम निभा पाना हर किसी के लिए संभव ही नहीं।
क्या घर की चींटियों को चीनी देनी चाहिए, और क्या जंगली चूहा पाल सकते हैं?
मीठा घर से दूर दिया जाता है; और चूहे पाले नहीं जाते
वक्ता कहते हैं, घर में चींटियों को मिश्री, चीनी, यह सब नहीं देना है — यह घर से दूर दिया जाता है। अगर घर में बहुत चींटियाँ निकलती हैं, तो वहाँ आटा डाल दिया जाता है, और वे खाकर चली जाती हैं; बस इतना ही है। पर अगर अब आप उन्हें मीठा देंगे, तो वे शायद ही जाएँगी। घर में जंगली चूहा पालने के बारे में वे पूछते हैं कि चूहा पालने की बात कहाँ सुनी है — क्या किसी ने कहीं सुना है कि चूहा पाला गया, हमारे पौराणिक खलनायकों को छोड़कर, राक्षसों को छोड़कर? पालने के लिए हमने गौ पालन सुना है; भैंसों का, महिष का, महिषी का पालन आपने सुना-पढ़ा होगा। ये किसी न किसी तरह हमारे काम आने वाले जीव हैं, जिनके कारण पूरा समाज टिका है। श्वान पाला नहीं जाता; उसका पोषण होता है, घर के द्वार के बाहर। पर चूहा पालने की बात उन्होंने कहीं नहीं सुनी।
वक्ता कहते हैं, घर में चींटियों को मिश्री, चीनी, यह सब नहीं देना है। यह घर से दूर दिया जाता है। अगर घर में बहुत चींटियाँ निकलती हैं, तो वहाँ आटा डाल दिया जाता है और वे खाकर चली जाती हैं; बस इतना ही है। पर अब अगर आप उन्हें मीठा देंगे, तो क्या वे कभी जाएँगी? घर में खड़े बालों वाला जंगली चूहा पालने के बारे में पूछने पर वे पूछते हैं: बताइए, चूहा पालने की बात किस जगह सुनी है? क्या किसी ने कहीं सुना है कि चूहा पाला गया? हमारे पौराणिक खलनायकों को छोड़कर, राक्षसों को छोड़कर। पालने के लिए हमने गौ पालन सुना है। भैंसों का, महिष का, महिषी का पालन — वह आपने सुना-पढ़ा होगा। ये किसी न किसी तरह हमारे काम आने वाले जीव हैं, जिनके कारण पूरा समाज टिका है। श्वान पाला नहीं जाता; उसका पोषण होता है, घर के द्वार के बाहर। पर चूहा पालने की बात हमने कहीं नहीं सुनी।
नित्य हवन में पहले कौन-सी आहुतियाँ दें, और घर की चींटियों का क्या?
अग्नि, नवग्रह और पंचदेव — और जीव हत्या का दोष
नित्य हवन में सबसे पहले अग्नि देवता की आहुति, और नवग्रहों की आहुति — ये ज़रूरी हैं। और पंचदेव, मुख्य रूप से, उनकी आहुति देनी चाहिए। और अगर गायत्री से करते हैं, तो गायत्री की आहुति शुरू में ही, मौन रहकर हो जाएगी। अरविंद कुमार यादव जी से, बावली के लिए क्या करें इस पर, वक्ता कहते हैं कि यह गोवत्स द्वादशी के दिन करना है, और पूरी विधि-विधान उन्होंने इसी लाइव की शुरुआत में बता दी है — शुरू से सुनिए।
वक्ता कहते हैं, नित्य हवन में सबसे पहले अग्नि देवता की आहुति, और नवग्रहों की आहुति; ये ज़रूरी हैं। और जो पंचदेव हैं, मुख्य रूप से, उनकी आहुति देनी चाहिए। और अगर गायत्री से करते हैं, तो गायत्री की आहुति शुरू में ही, मौन रहकर हो जाएगी। अरविंद कुमार यादव जी से, बावली के बारे में क्या करें इस प्रश्न पर: यह गोवत्स द्वादशी के दिन ही करना है, और क्या करना है, पूरी विधि-विधान, हमने इसी लाइव में शुरुआत में बता दी है; शुरू से सुन लीजिए। चींटियों के बारे में वे कहते हैं: चींटियों का रहना बुरे या अच्छे की बात नहीं है। अब घर में इसके बारे में बहुत कुछ माना जाता है। पर काली चींटी या लाल चींटी का होना, घर में या कहीं भी — एक सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उसके भीतर भी जीवात्मा है, और वह कब पैर के नीचे आकर मर जाए। तो हमें अप्रत्यक्ष रूप से दोष लगता है; हालाँकि इसे दोष नहीं गिना जाएगा, फिर भी जीव हत्या तो हो रही है। इसलिए प्रयास करना चाहिए कि उनकी उपस्थिति न हो; उन्हें हटाने का प्रयास ठीक है, ताकि ऐसा न हो।
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