लालटेन लेकर गुरु खोजना — गुरु क्यों चाहिए, गुरु बनने योग्य कौन है, और भौतिक गुरु कब सच में जरूरी है
सिद्धि पाने के लिए गुरु खोजना क्यों भटकाव है।
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पहला प्रश्न यही उठता है कि क्या बिना गुरु के मंत्र सिद्ध होता है
आपके गुरु हैं या नहीं, और क्या बिना गुरु का मंत्र सिद्ध होगा
वक्ता कहते हैं कि जिस दिन कोई व्यक्ति दीपक जलाकर कोई मंत्र पढ़ना शुरू करता है, उसी दिन मन में पहला प्रश्न उठता है कि आपके गुरु हैं या नहीं, और क्या बिना गुरु का मंत्र सिद्ध होगा। किसी से भी बात कीजिए, किसी को भी बताइए कि आप फलाने मंत्र का जप करते हैं, तो वह सबसे पहले यही पूछेगा कि आप दीक्षित हैं या नहीं।
वे कहते हैं कि यह प्रश्न उसी दिन आ जाता है जिस दिन हम एक दीपक जलाकर कोई मंत्र पढ़ना शुरू करते हैं: आपके गुरु हैं? क्या बिना गुरु का मंत्र सिद्ध होगा? सबसे पहले यही प्रश्न आता है। किसी से भी बात कीजिए, किसी से भी पूछिए, बताइए कि आप फलाने मंत्र का जप करते हैं, तो वह सबसे पहले पूछेगा: आप दीक्षित हैं? आपने दीक्षा ली है? वे जोड़ते हैं कि वे भी यही पूछते हैं — आप दीक्षित हैं, आपने दीक्षा ली है।
क्या तंत्र, पूजा, गायत्री और वेदांत के लिए अलग-अलग गुरु चाहिए?
एक गुरु या अनेक गुरु का प्रश्न
वक्ता दूसरा प्रश्न बताते हैं: हम तंत्र मार्ग में भी हैं, अध्यात्म मार्ग में भी हैं और सामान्य पूजन-पाठ में भी — तो क्या तंत्र मार्ग के लिए अलग गुरु, पूजा-पाठ के लिए अलग, गायत्री के लिए अलग, अध्यात्म के लिए अलग और वेद-वेदांत के लिए अलग गुरु चाहिए, या एक ही गुरु काफी है? वे कहते हैं कि ऐसे बहुत से प्रश्न आते हैं।
वे कहते हैं कि दूसरी बात यह आती है: हम तंत्र मार्ग में हैं, अध्यात्म मार्ग में भी हैं, और सामान्य पूजन-पाठ में भी हैं जो लोग करते हैं। तो क्या तंत्र मार्ग के लिए अलग गुरु चाहिए? पूजा-पाठ के लिए अलग? गायत्री के लिए अलग? अध्यात्म के लिए अलग? वेद-वेदांत के लिए अलग? क्या इन सबके लिए अलग-अलग गुरु चाहिए, या एक गुरु काफी है? इस तरह के बहुत सारे प्रश्न आते हैं।
आज लोग या तो अति-उत्साहित हैं या बहुत कम उत्साहित, और बीच में उलझन है
अति-उत्साह, कम उत्साह और बीच की उलझन
वक्ता कहते हैं कि आज के समय में दो बातें साफ हैं। या तो लोग इतने ज्यादा उत्साहित हो जाते हैं कि कुछ भी कर डालते हैं, या उत्साह इतना कम होता है कि दीपक जलाने से भी डरते हैं। बीच की अवस्था उलझन की है — भले लोग बस उलझे रहते हैं कि करें या न करें, और साल बीतते जाते हैं; चार नवरात्रि निकल गईं, इतने अच्छे समय निकल गए, फिर भी वे निर्णय नहीं ले पाए।
वे कहते हैं कि आज के समय में दो बातें साफ हैं। या तो लोग, एक तरह से कहें तो, अति-उत्साहित हो जाते हैं — उत्साह इतना बढ़ जाता है कि कुछ भी कर डालते हैं; कैसे करते हैं, यह वे आगे बताएँगे। या उत्साह इतना कम होता है कि दीपक जलाने से भी डरते हैं। ये दो अवस्थाएँ हैं। बीच की अवस्था उलझन की अवस्था है। लोग उलझे रहते हैं। अच्छे-भले लोग बस उलझे रहते हैं कि करें या न करें, और साल पर साल बीत रहे हैं। चार नवरात्रि निकल गईं, इतने अच्छे अवसर निकल गए, और बेचारे अब तक निर्णय नहीं ले पाए कि क्या करें।
गुरु खोजने से पहले पहला प्रश्न क्या पूछना चाहिए?
आपको गुरु क्यों चाहिए — व्हाई-व्हाई एनालिसिस
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला प्रश्न यह है कि आप गुरु खोज ही क्यों रहे हैं। "क्यों" का पता लगाइए। जब तक आपका "क्यों" साफ नहीं होगा, कुछ भी साफ नहीं होगा। वे उद्योगों में चलने वाले व्हाई-व्हाई एनालिसिस की बात करते हैं: ऑडिट में जब कोई गड़बड़ी होती है, तो व्हाई-व्हाई एनालिसिस नाम की प्रणाली लगाई जाती है, और हर बात को बार-बार देखा जाता है — ऐसा क्यों हुआ, इसका कारण क्या था, उसका कारण क्या था — ताकि जड़ के कारण तक पहुँचा जाए। वही चीज यहाँ लगाइए।
हर किसी को सबसे पहले अपने आप से पूछना चाहिए कि उसे गुरु क्यों चाहिए। वे कहते हैं, "क्यों" का पता लगाइए। जब तक आपका "क्यों" साफ नहीं है, कुछ भी साफ नहीं है। व्हाई-व्हाई एनालिसिस नाम की एक चीज होती है। यदि आप किसी उद्योग में काम करते हैं, तो वहाँ ऑडिट की प्रक्रिया होती है। कोई गड़बड़ी हो जाए, तो एक प्रणाली आती है जिसे व्हाई-व्हाई एनालिसिस कहते हैं। जड़ के कारण तक पहुँचने के लिए हर एक बात को बार-बार देखा जाता है — ऐसा क्यों हुआ, इसका कारण क्या था, उसका कारण क्या था। इस तरह रूट एनालिसिस करते-करते बिल्कुल तल तक पहुँचा जाता है। यह औद्योगिक प्रबंधन की एक प्रणाली है। वही चीज यहाँ लगाइए: आपको गुरु क्यों चाहिए? आपको क्या उत्तर मिलेगा?
सबसे कम उम्र के साधक असल में गुरु किसलिए चाहते हैं?
सत्रह से पच्चीस वर्ष वालों में जड़ का कारण वशीकरण
वक्ता कहते हैं कि सत्रह-अठारह से पच्चीस साल तक के लड़कों का पहला उत्तर होगा: वशीकरण के लिए। गर्लफ्रेंड कहीं और सेट हो गई है। वे कहते हैं कि यदि वे इंस्टाग्राम खोलें और पच्चीस मैसेज हों, तो उनमें कम से कम पंद्रह लड़कियों के होंगे, सब इस बात से परेशान कि फलानी कहानी हो गई। एक समय था जब लड़के ऐसा करते थे; आजकल लड़कियों के साथ भी ऐसा हो रहा है।
सत्रह-अठारह साल से पच्चीस साल तक के लड़कों का पहला उत्तर होगा: वशीकरण के लिए। भाई, गर्लफ्रेंड कहीं और सेट हो गई है। वे कहते हैं कि यदि वे अभी इंस्टाग्राम खोलें और पच्चीस मैसेज हों, तो उनमें से कम से कम पंद्रह — आप विश्वास नहीं करेंगे — लड़कियों के मैसेज होंगे, सब इस बात से परेशान कि फलानी कहानी हो गई है। उन्हें इस पर बहुत हँसी आती है। एक समय था जब लड़के ऐसा करते थे; आजकल लड़कियों के साथ भी ऐसा हो रहा है। अजीब स्थिति है। लड़कों में भी शुरू में ज्यादातर लोगों का मैसेज यही होता है कि साधना करनी है और साधना में बहुत जल्दी उपलब्धि चाहिए। पर थोड़ा कारण पूछिए तो बात कहीं और जाएगी — कि मेरी गर्लफ्रेंड ने मेरे साथ ऐसा किया। तो इस आयु वर्ग का जड़ का कारण वहीं जाता है।
बहुत कम लोग ऐसी साधना माँगते हैं जिससे पढ़ाई में मन लगे या जीवन का उद्देश्य दिखे
पढ़ाई, सफलता और जीवन के उद्देश्य के दुर्लभ प्रश्न
वक्ता कहते हैं कि बहुत कम लोग ऐसी साधना माँगते हैं जिससे पढ़ाई में मन लगे, या जीवन में सफलता मिले। बहुत कम लोग कहते हैं कि वे बहुत भटके हुए हैं, समझ नहीं आता कि जीवन में क्या करें, और ऐसी साधना माँगते हैं जिससे उद्देश्य ही मिल जाए — साधना क्यों करें, हम जी क्यों रहे हैं।
वे कहते हैं कि बहुत कम लोग यह प्रश्न रखते हैं: भाई, कोई ऐसी साधना बताइए कि पढ़ाई में मन लगे, कि हम अपने जीवन में सफल हों। बहुत कम लोग पूछते हैं: भाई, मैं बहुत भटका हुआ हूँ, समझ नहीं आता कि जीवन में क्या करना है; कोई ऐसी साधना बताइए जिससे उद्देश्य ही मिल जाए, ताकि पता चले कि जीवन में क्या करना है। आखिर साधना क्यों करें, हम जी क्यों रहे हैं? कुछ ऐसा बताइए। बहुत कम लोग हैं जो यह पूछते हैं, जो कहते हैं: सब कुछ पाने का कोई विधान बताइए, ताकि हर चीज के लिए अलग-अलग कुछ न करना पड़े।
लोग गुरु के पास कौन-कौन सी बिखरी हुई समस्याएँ लेकर आते हैं?
परिवार पर तंत्र, व्यापार, बात न मानने वाले बच्चे
वक्ता कहते हैं कि प्रश्न बिखरे हुए आते हैं: हम पर कोई तंत्र प्रयोग है तो उसके लिए बताइए; काम-धंधा चौपट हो गया, उसके लिए बताइए; बेटा या बेटी बात नहीं मान रहे, उसके लिए अलग कुछ बताइए। किसी का उद्देश्य साफ नहीं रहता कि गुरु आखिर चाहिए क्यों।
प्रश्न आता है: यदि हम पर तंत्र का कोई प्रयोग है, तो उसके लिए भी बताइए। काम-धंधा चौपट हो गया है, उसके लिए बताइए। बेटा या बेटी हमारी बात नहीं मान रहे, उसके लिए अलग कुछ बताइए। वे कहते हैं कि इस तरह प्रश्न बिखरे रहते हैं, और इसलिए किसी का उद्देश्य साफ नहीं रहता कि गुरु क्यों चाहिए।
सच्चा उत्तर यह है कि गुरु पैसे, शत्रु और कर्ज की वजह से चाहिए
गुरु इसलिए चाहिए क्योंकि कोई समस्या है
वे कहते हैं कि जो उत्तर निकलता है वह यह है कि हमें गुरु इसलिए चाहिए क्योंकि हमारे जीवन में कोई समस्या है। बस इतना ही। और समस्याएँ पैसे, शत्रु और कर्ज से जुड़ी हैं। इसीलिए आप गुरु खोज रहे हैं; आपका व्हाई-व्हाई एनालिसिस यही निकालेगा। परेशानी है, इसलिए गुरु खोजा जा रहा है; परेशानी न हो तो कोई गुरु नहीं खोजेगा।
अब इसका उत्तर क्या मिलता है? कि हमें गुरु इसलिए चाहिए क्योंकि हमारे जीवन में कोई समस्या है। केवल इसी कारण गुरु चाहिए। और समस्या किससे जुड़ी है? पैसे से जुड़ी समस्या है। शत्रुओं से जुड़ी समस्या है, कर्ज से जुड़ी समस्या है। इसीलिए आप गुरु खोज रहे हैं। आपके व्हाई-व्हाई एनालिसिस में यही निकलेगा। "क्यों" का पता लगाइए तो यह निकलेगा: परेशानी है, इसलिए गुरु खोजा जा रहा है। परेशानी न हो तो गुरु नहीं खोजा जाएगा। यह पहली बात है।
कुछ लोगों को कोई समस्या नहीं, पर वे जीवन के उद्देश्य के लिए मार्गदर्शक चाहते हैं
समस्या नहीं, पर पाने को एक उद्देश्य है
वक्ता कहते हैं कि दूसरे प्रकार के व्यक्ति को कोई समस्या नहीं है, पर वह जीवन का उद्देश्य पाना चाहता है — और इसके लिए एक अच्छा गुरु, सच्चा गुरु, अच्छा मार्गदर्शक चाहता है जो हाथ पकड़कर उसे जीवन के उद्देश्य की ओर ले चले।
वे कहते हैं कि दूसरे को कोई परेशानी नहीं है। पर जीवन में हम चाहते हैं कि जीवन का कोई उद्देश्य हो, और हम उसे पाएँ। इसके लिए हमें एक अच्छा गुरु, सच्चा गुरु, अच्छा मार्गदर्शक चाहिए जो हमारा हाथ पकड़कर जीवन के उद्देश्य की ओर ले चले। यह दूसरा प्रकार है।
कुछ लोग सीधे सिद्धि चाहते हैं — महाविद्या से शुरू करके, न मिलने पर नीचे उतरते जाते हैं
सिद्धि, और उतरती सीढ़ी कि बदले में क्या चलेगा
वे कहते हैं कि तीसरे प्रकार के लोग सीधी-सी बात, सिद्धि चाहते हैं। और आजकल बात महाविद्या से नीचे शुरू ही नहीं होती। जब वह न हो पाए तो माँग सीढ़ी दर सीढ़ी नीचे आती है: यक्षिणी करवा दीजिए; यक्षिणी नहीं तो अप्सरा; छोड़िए महाराज, बस एक छोटी सी चुड़ैल करवा दीजिए; फिर प्रेत; वह भी छोड़िए — कच्चा कलवा करवा देंगे क्या, और कितना लेंगे?
तीसरा प्रकार यह है कि हमें सिद्धि चाहिए। सीधी-सी बात: सिद्धि चाहिए। किसकी सिद्धि चाहिए? वे कहते हैं कि आजकल बात महाविद्या से नीचे होती ही नहीं। महाविद्याओं की सिद्धि चाहिए। ठीक है — महाविद्या नहीं करवा पाएँगे, तो यक्षिणी करवा दीजिए। यक्षिणी भी नहीं होगी, तो अप्सरा करवा दीजिए। छोड़िए महाराज, मुझे बस एक छोटी सी चुड़ैल करवा दीजिए। फिर प्रेत; वह भी छोड़िए। कच्चा कलवा करवा देंगे क्या? कितना लेंगे? वे कहते हैं कि ऐसे मैसेज सीधे आते हैं। वे स्क्रीनशॉट टेलीग्राम ग्रुप में डालेंगे ताकि लोग देखें। महाराज जी, आप प्रेत साधना करवाते हैं क्या? दक्षिणा कितनी है? महाराज, चुड़ैल ट्रांसफर करवाते हैं क्या? मैसेज पढ़कर उन्हें खुद हँसी आती है, और वे पूछते हैं: भाई, चुड़ैल क्यों चाहिए? आप उसके लिए गुरु खोज रहे हैं। ऐसे प्रश्न आते हैं: महाराज जी, आप हमारे गुरु बनेंगे? मैं आपका गुरु क्यों बनूँ? क्योंकि सिद्धि चाहिए। कैसी सिद्धि? कोई भी करवा दीजिए। तो गुरु इसलिए चाहिए क्योंकि सिद्धि चाहिए। सिद्धि के लिए गुरु — और बात वहीं खत्म।
कुछ लोग सच में अभिचार से पीड़ित हैं और पहले ही ऐसे मंत्रों पर पैसा दे चुके हैं जिनसे कुछ नहीं हुआ
सच में अभिचार से पीड़ित लोग जो मंत्रों के लिए पैसा दे चुके हैं
वक्ता कहते हैं कि चौथे प्रकार के लोग सच में कहीं न कहीं अभिचार से पीड़ित हैं। वे सब दुख में हैं, बहुत परेशान हैं, अपने हाथ-पैर मारकर देख चुके हैं, खुद साधना कर चुके हैं — सच्चे लोग हैं। कुछ लोग पैसा देकर भी साधना करते हैं और मंत्र लेते हैं, यह सोचकर कि किसी सिद्ध पुरुष के मुख से लिया मंत्र ठीक से सिद्धि देगा। वहाँ भी काम नहीं बनता, तो किसी और के पास जाते हैं; समस्याएँ उलझी हुई हैं और कोई रास्ता नहीं निकलता।
अब एक प्रकार ऐसा आता है जो सच में, कहीं न कहीं, अभिचार से पीड़ित है। वे सब कष्ट में हैं, बहुत परेशान हैं; अपने हाथ-पैर मारकर देख चुके हैं, खुद साधना कर चुके हैं — वे सच्चे लोग हैं। जो कहीं पैसा देकर भी साधना करते हैं और मंत्र लेते हैं, यह सोचकर कि हाँ, शायद — जैसा कहा जाता है कि सिद्ध पुरुष के मुख से मंत्र लो तो सिद्धि अच्छे से आएगी — यही सोचकर वे उनसे मंत्र लेते हैं। वहाँ भी काम नहीं बनता, तो फिर किसी और के पास जाते हैं। समस्याएँ उलझी हुई हैं, कोई रास्ता नहीं निकल रहा, और वे बार-बार परेशान होते हैं।
कुछ लोग सामान्य जीवन के साथ अध्यात्म और तंत्र मार्ग पर चलना चाहते हैं — अपनी श्रेणी पहचानिए
अध्यात्म और तंत्र मार्ग पर चलने वाले, और अपनी श्रेणी पहचानना
वे कहते हैं कि अंतिम प्रकार के लोग समझते हैं कि मनुष्य जीवन है तो समस्याएँ हैं, पर साथ ही वे आध्यात्मिक बनना चाहते हैं, अध्यात्म मार्ग पर चलना चाहते हैं और तंत्र से जुड़ी कुछ चीजें सीखना चाहते हैं, और इसके लिए एक सक्षम गुरु चाहते हैं जो उन्हें सिखा सके। कुल मिलाकर, वे कहते हैं, इतने सारे "क्यों" निकलेंगे; देखिए आप किस श्रेणी में आते हैं और उसी हिसाब से गुरु खोजिए। चुड़ैल ट्रांसफर वाला गुरु चाहिए तो वैसा खोजिए; मसान और कच्चे कलवे चाहिए तो वह भी खोजिए।
वे कहते हैं कि इन सबके बाद वे लोग आते हैं जो समझते हैं कि मनुष्य जीवन है इसलिए समस्याएँ हैं, पर साथ ही आध्यात्मिक भी बनना है, अध्यात्म मार्ग पर भी चलना है, और तंत्र से जुड़ी कुछ चीजें भी सीखनी हैं। इसके लिए एक सक्षम गुरु चाहिए जो उन्हें सिखा सके। तो कुल मिलाकर इतने सारे "क्यों" निकलेंगे कि आपको गुरु क्यों चाहिए। देखिए कि आप किस श्रेणी में आते हैं, और उसी हिसाब से गुरु खोजिए। चुड़ैल ट्रांसफर वाला गुरु चाहिए तो वैसा खोजिए। मसान और कच्चे कलवे चाहिए तो वह भी खोजिए। अध्यात्म से जुड़ा गुरु चाहिए, अध्यात्म में आगे बढ़ना है और केवल आध्यात्मिक बनना है, तो उसमें जाइए।
अध्यात्म का अर्थ स्वच्छंदता हो गया है — नियम और अनुशासन से मुक्ति, आध्यात्मिकता के नाम पर
आध्यात्मिकता के वेश में स्वच्छंदता
वक्ता कहते हैं कि अध्यात्म अब खुद एक जगह नहीं रहा। आजकल अध्यात्म की परिभाषा स्वच्छंदता हो गई है। यानी हमारे सनातन धर्म से जुड़े नियमों और अनुशासन से मुक्त हो जाओ। आज लोगों ने उन्मुक्तता को आध्यात्मिकता से जोड़ दिया है।
वे कहते हैं कि जब हम अध्यात्म की चर्चा करते हैं, तो अध्यात्म भी अब एक जगह पर नहीं है। आजकल अध्यात्म की परिभाषा स्वच्छंदता हो गई है। यानी हमारे सनातन धर्म के जो नियम हैं, जो अनुशासन है, उससे मुक्त हो जाओ। आजकल लोगों ने उन्मुक्तता को आध्यात्मिकता से जोड़ दिया है।
सबसे बड़े चैनलों पर कोई नकारात्मक टिप्पणी टिकती नहीं, और किसी से कोई मेहनत नहीं करवाई जाती
वायरल गुरु, नकारात्मक टिप्पणी नहीं, और मेहनत न करना चाहने वाले लोग
वे कहते हैं कि बहुत बड़े-बड़े गुरु हैं जिनके चैनल वे देखते हैं; उनके वीडियो वायरल होकर बहुत बड़े हो गए हैं, सजेशन में आते हैं, और उनके अनुयायियों में एक भी नकारात्मक टिप्पणी नहीं दिखती — इतनी मजबूती से वे जमे हैं। वे कहते हैं कि इसका कारण यह है कि लोग मेहनत नहीं करना चाहते। वे लिखकर देते हैं: यदि उनकी बातें मानी गईं, तो जो व्यक्ति यह मानकर उन्हें मानता है कि वह वेदांत-मार्गी है, उपनिषदों में जा रहा है, वेदों की ओर जा रहा है और वेदों को मान रहा है, वह वेदों को मान ही नहीं रहा — वह वेदों को छोड़ रहा है और ऐसा नुकसान कर रहा है कि जो उसे मिलना था वह भी अब नहीं मिलेगा।
वे कहते हैं कि बहुत बड़े-बड़े गुरु हैं, और वे उनके चैनल देखते हैं; काफी वीडियो वायरल हुए हैं और वे काफी बड़े हो गए हैं। उनका चैनल सजेशन में आता है, और उनके अनुयायियों में एक भी नकारात्मक टिप्पणी नहीं दिखती, इतनी मजबूती से वे जमे हुए हैं। कारण क्या है? कि लोग मेहनत नहीं करना चाहते। वे कहते हैं कि उनके वीडियो और उनके विषय ऐसे हैं कि वे लिखकर देते हैं: आने वाले समय में यदि उनकी बातें मानी गईं, तो जो उन्हें सामने दिख रहा है उसके अनुसार, जो व्यक्ति ऐसे लोगों की बातें यह मानकर मानता है कि वह वेदांत-मार्गी है, उपनिषदों में जा रहा है, वेदों की ओर जा रहा है और वेदों का सम्मान कर रहा है — भाई, आप वेद का सम्मान नहीं कर रहे। आप वेद को किनारे छोड़कर काम का ऐसा कबाड़ा कर रहे हैं कि बेचारे सामने वाले का जो होना था, वह भी अब नहीं हो पाएगा।
आपका उत्साह जहाँ जागता है, वही तय करता है कि आप किस मार्ग पर चलेंगे
उत्साह तय करता है कि आप किस मार्ग पर चलेंगे
वक्ता कहते हैं कि आपका उत्साह जहाँ जागता है, वही आपका जीवन तय करता है — याद रखिए। यदि आप उनकी बातों से प्रेरित होते हैं, उनकी कोई बात आपको लग जाती है, तो आप उसी मार्ग पर जाएँगे जो वे दिखा रहे हैं। यदि आप किसी और को सुनते हैं और उसकी बातें आपको अच्छी लगती हैं और आप उनसे प्रेरित होते हैं, तो आप उसके मार्ग पर जाएँगे, बिना यह सोचे कि वह सही है या गलत।
वे कहते हैं कि आपका उत्साह जहाँ जागता है, वही आपका जीवन तय करता है; यह याद रखिए। यदि आप उनकी बातों से प्रेरित होते हैं, उनकी कोई बात आपको लग जाती है, तो आप उसी मार्ग पर जाएँगे जो वे आपको दिखा रहे हैं। यदि आप किसी और की बातें सुनते हैं और वे आपको अच्छी लगती हैं और उसके बाद आप उनसे प्रेरित होते हैं, तो आप उसके मार्ग पर जाएँगे — बिना यह सोचे कि वह सही है या गलत।
क्या किसी के भी पीछे आँख बंद करके चलना चाहिए?
अपनी बुद्धि का प्रयोग, और उन्हें मिलने वाली नकारात्मक टिप्पणियाँ
वे कहते हैं कि आपके भीतर कुछ बुद्धि है। भगवान ने वह थोड़ी सी बुद्धि दी है, और आपके जिए हुए जीवन का पूरा संकलन उसमें है, इसलिए आप सोचेंगे कि क्या गलत है और क्या सही, और सोचकर निर्णय लेंगे — आँख बंद करके नहीं।
वे कहते हैं कि आपके भीतर कुछ बुद्धि होगी। भगवान ने उतनी बुद्धि दी है, थोड़ी ही सही, और आपके बिताए जीवन का पूरा संकलन उसमें है, इसलिए आप वहाँ कुछ सोचेंगे कि क्या गलत है और क्या सही। और आप सोचकर निर्णय लेंगे, आँख बंद करके नहीं। जिनके मन में सच में ऐसा प्रश्न होता है, वे उन तक पहुँचकर पूछते हैं, और वे अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास करते हैं। यदि वे संतुष्ट हुए, उन्हें सही लगा, तो वे आगे बढ़ते हैं और साथ चलते हैं। जिन्हें लगता है कि यह उनके स्तर का नहीं है, उनका अपना स्तर इससे कहीं अच्छा है, वे किसी अच्छे गुरु के पास जाते हैं या ऐसा व्यक्ति खोजते हैं। वे जोड़ते हैं कि वे तो खुद को गुरु भी नहीं कहते — इसलिए, वे कहते हैं, जाइए।
"क्यों" साफ हो जाने के बाद भी प्रश्न बचता है कि गुरु बनाने योग्य कौन है
गुरु बनाने योग्य कौन है, यह प्रश्न
बात की जड़ पर आते हुए वे पूछते हैं: जब आपका "क्यों" साफ हो गया, तो क्या आप किसी को भी अपना गुरु बना लेंगे? वे अपनी ओर इशारा करते हैं — वे काफी आध्यात्मिक हैं, और आप सब उन्हें गुरु जैसा मानते हैं और गुरु कहते हैं, तो क्या उन्हें गुरु बन जाना चाहिए? कभी स्कूल के मास्टरों को भी गुरु जी कहा जाता था।
वे कहते हैं कि अब हम मूल बात पर आते हैं। जो गुरु हम खोज रहे हैं वह तय हो गया, हमारा "क्यों" साफ हो गया, तो उसके बाद क्या हम किसी को भी गुरु बना लेंगे? वे कहते हैं कि वे खुद काफी आध्यात्मिक हैं। आप सब उन्हें गुरु जैसा मानते हैं और गुरु कहते हैं, तो क्या उन्हें गुरु बन जाना चाहिए? पहले स्कूल में मास्टरों को भी गुरु जी कहा जाता था। अब लोग नहीं कहते।
आज बच्चों को शिक्षकों के बारे में क्या सिखाया जाता है?
पलटकर जवाब, आहत अहंकार, और क्या ऐसे शिक्षक गुरु हैं
वे कहते हैं कि आज के समय में लोग बच्चों को यह बुद्धि दे रहे हैं कि टीचर ऐसा करे तो तुम्हें ऐसे जवाब देना है। अहंकार आहत होता है। बिल्कुल अलग तरीका चल रहा है। वे कहते हैं कि वे शिक्षक भी गुरु थे; उन्हें भी गुरु माना जाता है, हम भी उन्हें गुरु जी कहते थे, और उनके विचार से सरस्वती शिशु विद्या मंदिरों में आज भी गुरु जी कहा जाता है।
वे कहते हैं कि आज के समय में लोग बच्चों को यह बुद्धि दे रहे हैं: भाई, टीचर ऐसा कुछ करे तो तुम्हें उसे इस तरह जवाब देना है। अहंकार आहत हो रहा है। बिल्कुल अलग तरीका चल रहा है। वे भी गुरु थे। उन्हें भी गुरु माना जाता है। हम भी उन्हें गुरु जी कहते थे। सरस्वती शिशु विद्या मंदिर जैसी जगहों में, जहाँ तक उन्हें पता है, शायद आज भी गुरु जी कहा जाता है।
क्या घर पर पूजा करवाने आने वाले ब्राह्मण गुरु बनाने योग्य हैं?
सीधा-सादा पुरोहित जो संतुष्ट करता है पर जिसे आप स्वीकार नहीं करेंगे
वक्ता पूछते हैं: जो गुरु आप चाहते हैं — जिसकी बातों से आप प्रेरित हुए और जिसकी बातें आप लेकर चलते हैं, जो आपको पढ़ाता है, क्या वह आध्यात्मिक रूप से आपका गुरु बनने योग्य है? घर पर सामान्य पूजन-पाठ करवाने आने वाले ब्राह्मणों में कई बहुत अच्छी प्रेरणा देते हैं, हर बात समझाते हैं और आपको संतुष्ट करते हैं; अपना स्तर काफी सामान्य होते हुए भी वे पूरे मन से कथा और पूजा करवाते हैं, और आप अपनी इच्छा से जो दें उसमें संतुष्ट रहते हैं। तो क्या वे गुरु बनाने योग्य हैं? क्या आप उन्हें अपना गुरु बनाएँगे?
वे कहते हैं कि जो गुरु आप चाहते हैं — वे भी गुरु हैं। किसकी बातों से आप प्रेरित हुए? किसकी बातें आप लेकर चलते हैं? तो जो आपको पढ़ाता है, क्या आप उसे अपना गुरु बनाएँगे? क्या वह आध्यात्मिक रूप से आपका गुरु बनने योग्य है? घर पर सामान्य पूजन-पाठ करवाने आने वाले ब्राह्मणों में कई बहुत अच्छी प्रेरणा देते हैं, एक-एक बात समझाते हैं, बातें बताते हैं। उनकी बातों से भी आपको संतुष्टि मिलती है। जो कथा और पूजा करवाते हैं, वे अच्छे से मन लगाकर करवाते हैं, भले उनका स्तर काफी सामान्य हो। पर जो वे कर रहे हैं, बहुत अच्छे से करवाते हैं, और आप अपनी इच्छा से जो दें उसमें संतुष्ट रहते हैं। वे कहते हैं कि देना या न देना आपकी इच्छा है, और वे उस विषय में नहीं जा रहे। तो क्या वे गुरु बनने योग्य हैं? क्या आप उन्हें गुरु बनाएँगे?
लोग किसी सीधे-सादे व्यक्ति को अपना गुरु क्यों नहीं बनाते?
हमें जो सुंदर दिखे वही अच्छा लगता है, और हम नियम हटवाना चाहते हैं
वे पूछते हैं, जानते हैं आप किसी सामान्य, सीधे-सादे व्यक्ति को अपना गुरु क्यों नहीं बनाते? क्योंकि आज के समय में हमें वही अच्छा लगता है जो देखने में सुंदर हो। यदि हम अध्यात्म में जा रहे हैं और आध्यात्मिक गुरु चाहते हैं, तो हमें ऐसे लोग चाहिए जो आध्यात्मिकता के नाम पर ऐसी चीजें परोसें जो हमारा जीवन आसानी से चलाती रहें, जिनमें कोई नियम और कोई नियंत्रण न हो। आध्यात्मिकता में हमें स्वच्छंदता चाहिए — वे कहते हैं कि वे सीधी बात कह रहे हैं।
वे पूछते हैं, जानते हैं आप किसी सामान्य, सीधे-सादे व्यक्ति को गुरु क्यों नहीं बनाते? क्योंकि आज के समय में हमें वही चीज अच्छी लगती है जो देखने में सुंदर हो। यदि हम अध्यात्म में जा रहे हैं, आध्यात्मिकता की ओर जाना चाहते हैं और आध्यात्मिक गुरु चाहते हैं, तो हमें ऐसे लोग चाहिए जो ऐसी बातें करें कि आध्यात्मिकता के नाम पर ऐसी चीजें परोसें जो हमारा जीवन आसानी से चलाती रहें, जिनमें न कोई नियम हो, न कोई नियंत्रण। आध्यात्मिकता में हमें यही चाहिए: स्वच्छंदता। वे कहते हैं कि वे सीधी बात कह रहे हैं।
सख्त शिक्षक जल्दी पसंद नहीं आता, इसीलिए ढीला गुरु पसंद किया जाता है
ढीला गुरु क्यों पसंद आता है और सीधा गुरु क्यों नहीं पचता
वे कहते हैं कि स्कूल-कॉलेज में जो शिक्षक सख्त होता था, वह जल्दी पसंद नहीं आता था। पढ़ने वाले बच्चे उसे पसंद करते थे क्योंकि वे पढ़ाई में तेज थे; कामचोर तब भी सख्त शिक्षकों को गालियाँ देते थे। इसी तरह आध्यात्मिकता में जो लोग आपको स्वच्छंद बनाएँगे, जो कहेंगे कि सुबह चार बजे उठने की क्या जरूरत है — चार बजे उठने से बुद्धि बड़ी होती तो भैंस का पड्डा भी सुबह उठता है — ऐसे लोग आपके अच्छे आध्यात्मिक गुरु बनेंगे और आपको अच्छे लगेंगे। पर यदि कोई आध्यात्मिक व्यक्ति सीधा-सादा है और आपको ठीक-ठीक बताता है कि आध्यात्मिकता क्या है और उसे कैसे निभाना है, तो वह आपको नहीं पचेगा।
वे कहते हैं कि स्कूल-कॉलेज में जो शिक्षक सख्त होता था, वह जल्दी पसंद नहीं आता था। पढ़ने वाले बच्चे उसे पसंद करते थे, क्योंकि वे पढ़ाई में तेज थे। जो कामचोर होते थे, वे तब भी सख्त शिक्षकों को गालियाँ देते थे। आध्यात्मिकता में भी, जो लोग आपको स्वच्छंद बनाएँगे, जो आपसे कहेंगे: सुबह चार बजे उठने की क्या जरूरत है? आध्यात्मिकता में वे ठीक यही कहेंगे — सुबह उठने की क्या जरूरत है? चार बजे उठने से बुद्धि बहुत बड़ी हो जाती है, तो भैंस का पड्डा भी सुबह उठता है। वे आपको ऐसे तर्क देंगे, और इस तरह की युक्तियाँ सामने रखेंगे। तो आपके लिए वे आध्यात्मिकता की ओर अच्छे आध्यात्मिक गुरु बनेंगे, और आपको अच्छे लगेंगे। पर यदि कोई आध्यात्मिक व्यक्ति सीधा-सादा है और आपको सही तरीके से बातें बताता है — हाँ, आध्यात्मिकता क्या है, उसे कैसे निभाना है — तो वह आपको नहीं पचेगा।
यदि किसी भी आयु में आपके भीतर तंत्र की जिज्ञासा जागे, तो उसका क्या अर्थ है?
किसी जन्म की अधूरी यात्रा
वक्ता कहते हैं कि तंत्र के जिज्ञासु और गुरु चाहने वालों के लिए यही मुख्य बात है। यदि जीवन की किसी भी आयु में आपके भीतर तंत्र से जुड़ी जिज्ञासा जाग रही है और आप किसी एक मार्ग पर जाना चाहते हैं, तो माना जाता है कि किसी समय, किसी जन्म में आपकी यात्रा अधूरी रह गई है।
वे कहते हैं, तंत्र मार्ग में जाइए। तंत्र मार्ग में जाने के बाद जब आप गुरु खोजते हैं — यहाँ मुख्य बात है, और यह उन तंत्र से जुड़े जिज्ञासुओं के लिए है जो गुरु चाहते हैं। सच में, तंत्र मार्ग में जो गुरु बनते हैं या जो गुरु हैं, उनके बारे में: यदि आपके जीवन की किसी भी आयु में तंत्र से जुड़ी जिज्ञासा जाग रही है, और आप किसी एक मार्ग पर जाना चाहते हैं, तो माना जाता है कि किसी समय, किसी जन्म में आपकी यात्रा अधूरी रह गई है।
तंत्र की गुरु परंपरा दीक्षा लेने के बारे में असल में क्या कहती है?
खुद को योग्य बनाइए ताकि आपके अपने गुरु आपको अपनी परंपरा में ले लें
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण तंत्र मार्ग की गुरु परंपरा की पारंपरिक बातों में कहा जाता है कि आपको किसी से दीक्षा लेने की जरूरत नहीं — बल्कि आपको खुद को इतना योग्य बनाना है कि जो गुरु किसी समय आपके रहे हैं, वे आपको अपनी गुरु परंपरा में ले चलें। वे कहते हैं कि यही वास्तविकता है, न कि यह कि हम तंत्र में जाना चाहते हैं तो किसी को भी गुरु बना लें।
वे कहते हैं कि इसीलिए तंत्र मार्ग की गुरु परंपरा की पारंपरिक बातों में कहा जाता है कि आपको किसी से दीक्षा लेने की जरूरत नहीं है। बल्कि आपको खुद को उस हद तक योग्य बनाना है, कि जो गुरु किसी समय आपके रहे हैं, वे आपको अपनी गुरु परंपरा में साथ ले लें। वे कहते हैं कि यही वास्तविकता है — यह नहीं कि हम तंत्र में जाना चाहते हैं तो किसी को भी गुरु बना लें। यह पहली बात है।
लोग उसी के पास क्यों जाते हैं जो सबसे ज्यादा तांत्रिक जैसा दिखता है?
मुंडमाला, कड़े और श्मशान हवन एक वेशभूषा के रूप में
वे कहते हैं कि यहाँ होता यह है कि जो अपनी बाहरी वेशभूषा तांत्रिक जैसी बना ले — मुंडमाला पहने, तरह-तरह के कड़े पहने, जिनके बहुत सारे प्रकार होते हैं — और जो अपना जितना ज्यादा दिखावा करे, श्मशान में हवन करे, मसानिक क्रियाएँ करे, वह आपको उतना ही असली तांत्रिक लगेगा। वे सौ साधनाओं की बातें करेंगे, और फिर आप उनके पास जाकर दीक्षित होंगे, या उनसे दीक्षा लेना चाहेंगे।
पर यहाँ होता यह है, वे कहते हैं, कि हमें ऐसे लोग चाहिए जो अपनी बाहरी वेशभूषा तांत्रिक जैसी बना लें। मुंडमाला पहनना। तरह-तरह के कड़े पहनना — कड़ों के बहुत सारे प्रकार होते हैं — वे पहनना। वे जितना अपना दिखावा करेंगे, श्मशान में हवन करेंगे, मसानिक क्रियाएँ करेंगे, उतने ही वे आपको असली तांत्रिक लगेंगे। और वे सौ साधनाओं वगैरह की बातें करेंगे, और फिर आप उनके पास जाकर दीक्षित हो जाएँगे, या उनसे दीक्षा लेना चाहेंगे। वे किसी पंथ या संप्रदाय के हैं, यह अलग बात है — कौल, शाक्त, अघोर, शैव, वह अलग है। हम यह जानना ही नहीं चाहते कि हमें खुद क्या चाहिए। ये सारी बातें वहीं खत्म हो जाती हैं।
भक्ति मार्ग के वैष्णव यह पूछे बिना नाम दीक्षा चाहते हैं कि उन्हें असल में क्या चाहिए
केवल नाम दीक्षा चाहने वाले वैष्णव
वे कहते हैं कि भक्ति मार्ग पर जाने वाले, वैष्णव संप्रदाय के वैष्णव लोग भी यह नहीं देखते कि उन्हें क्या चाहिए। उन्हें बस नाम लेना है, नाम दीक्षा लेनी है। उन्हें बस दीक्षित होना है; गुरु कौन है, इससे कोई मतलब नहीं।
वे कहते हैं कि जो भक्ति के मार्ग पर जाते हैं, वैष्णव संप्रदाय के वैष्णव लोग — उनमें भी हम यह नहीं देखते कि हमें क्या चाहिए। हमें बस नाम लेना है, नाम दीक्षा लेनी है। हमें बस दीक्षित होना है; गुरु कौन है, इससे हमें कोई मतलब नहीं।
यदि व्यक्ति नहीं, तो गुरु क्या है?
गुरु मंडल और तत्व के रूप में गुरु
वक्ता कहते हैं कि यह वास्तविकता जान लीजिए: जो है वह गुरु मंडल है, और गुरु एक तत्व है — कोई एक सामान्य मनुष्य या एक सामान्य भौतिक शरीर नहीं। इसलिए यदि आप सच में गुरु खोज रहे हैं, और गुरु को लेकर गंभीर हैं, तो सबसे पहले गुरु खोजना बंद कीजिए। गुरु खोजा नहीं जाता।
वे कहते हैं कि यहाँ यह वास्तविकता जान लीजिए कि जो है वह गुरु मंडल है; गुरु एक तत्व है। ऐसा नहीं कि गुरु कोई सामान्य मनुष्य या सामान्य भौतिक शरीर है। यदि आप सच में गुरु खोज रहे हैं, तो सबसे पहले, यदि आप गुरु को लेकर गंभीर हैं, तो गुरु खोजना बंद कीजिए। गुरु खोजा नहीं जाता।
क्या कभी किसी से अपना गुरु बनने को कहना चाहिए?
न खोजिए, न माँगिए — बस योग्यता लाइए
वे कहते हैं, याद रखिए, गुरु कभी खोजा नहीं जाता, और कभी किसी के सामने जाकर यह नहीं कहना चाहिए कि मेरे गुरु बन जाइए। पहले अपने भीतर उतनी योग्यता लाइए। जो गुरु आपके रहे होंगे — आप नहीं जानते कि यह आपका पहला जन्म है या नहीं, न कोई और जानता है, पर आपके गुरु जान रहे हैं कि यह कौन सा जन्म है। जब आप गुरु के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाएँगे, तब गुरु खुद आपको आकर्षित करेंगे, और यह सब कहने-करने की जरूरत नहीं पड़ेगी; सब अपने आप होगा।
वे कहते हैं, याद रखिए, गुरु कभी खोजा नहीं जाता, न ही कभी किसी के सामने जाकर यह कहना है कि आप मेरे गुरु बन जाइए। सबसे पहले अपने भीतर उतनी योग्यता लाइए। जो गुरु आपके रहे होंगे — यह आपका पहला जन्म है, यह आप नहीं जानते। न कोई और जानता है, पर आपके गुरु जान रहे हैं कि यह कौन सा जन्म है। वह परम पुरुष जो बैठा है, वह जान रहा है कि बात क्या है। जब आप गुरु के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाएँगे, तब गुरु खुद आपको आकर्षित करेंगे, और यह सब कहने की, यह सब करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सब कुछ अपने आप होगा।
यदि आप सच में गुरु चाहते हैं तो क्या करना चाहिए?
गुरु से जुड़ी साधनाएँ कीजिए और सिद्धों को गुरु मानिए
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए वे बार-बार कहते हैं: यदि आपको गुरु चाहिए, सच में गुरु चाहिए, तो पहले गुरु से जुड़ी सारी साधनाएँ कीजिए। जो दिव्य पुरुष, सिद्ध पुरुष, सिद्ध महाशक्तियाँ, महात्मा और दिव्य संत हुए हैं, उन्हें अपना गुरु मानकर कीजिए। वे कृपा दृष्टि डालेंगे — कि हाँ, यह बच्चा इस परंपरा का है, इसे यहाँ जाना चाहिए।
बंगाल के व्यक्ति को किसे गुरु मानना चाहिए?
श्री रामकृष्ण परमहंस और माँ शारदा
वक्ता कहते हैं कि यदि आप बंगाल क्षेत्र के हैं, तो श्री रामकृष्ण परमहंस और माँ शारदा को गुरु माँ और गुरु पिता, गुरु जी मानकर उनकी पूजा-सेवा कीजिए। आपको कोई कष्ट नहीं आएगा और मंत्र से जुड़ा कोई दोष नहीं लगेगा। उनके नाम का जप कीजिए — इतना काफी है। यदि आप तंत्र क्षेत्र में हैं, तो भी कीजिए; तंत्र क्षेत्र से जुड़ी साधनाएँ करनी हों, तब भी आरंभिक पूजा इन्हीं की कीजिए।
वे कहते हैं कि यदि आप बंगाल क्षेत्र के हैं, तो श्री रामकृष्ण परमहंस और माँ शारदा को गुरु माँ और गुरु पिता, गुरु जी मानकर उनकी पूजा और सेवा कीजिए। आपको कोई कष्ट नहीं आएगा। मंत्र से जुड़ा कोई दोष नहीं लगेगा। उनके नाम का जप कीजिए; इतना काफी है। यदि आप तंत्र क्षेत्र में हैं, तो भी कीजिए। यदि आपको तंत्र क्षेत्र से संबंधित साधनाएँ करनी हैं, तब भी आरंभिक पूजा इन्हीं की कीजिए।
यदि आप वाम पद्धति में जाना चाहते हैं और कुछ नहीं जानते, तो क्या करें?
गुरु स्वरूप में वामाखेपा की उपासना
वे कहते हैं कि यदि आप वाम पद्धति में आगे जाना चाहते हैं और कुछ नहीं जानते, तो कुछ करना नहीं है: पूरे भारत में आप कहीं भी हों, वामाखेपा की पूजा कीजिए। बहुत ज्यादा कुछ नहीं करना — गुरु रूप में उनका ध्यान कीजिए, उनकी पूजा कीजिए, उनसे प्रार्थना कीजिए। वे सावधानी से जोड़ते हैं कि वे यह नहीं कह रहे कि आपको भगवती महाविद्या तारा की दीक्षा मिल जाएगी और आप उस परंपरा में दीक्षित हो जाएँगे। नहीं।
वे कहते हैं कि यदि आप वाम पद्धति में आगे जाना चाहते हैं और आप कुछ भी नहीं जानते, तो कुछ करना नहीं है। पूरे भारत में आप कहीं भी हों, वामाखेपा की पूजा कीजिए। बहुत ज्यादा कुछ नहीं करना है। गुरु स्वरूप में उनका ध्यान कीजिए, उनकी पूजा कीजिए, उनसे प्रार्थना कीजिए। यह जरूरी नहीं — जब आप उनकी सेवा-पूजा करेंगे या रोज उनका स्मरण करेंगे, तो वे यह नहीं कह रहे कि ऐसा होगा कि आपको भगवती महाविद्या तारा की दीक्षा मिल जाएगी और आप उसी परंपरा में दीक्षित हो जाएँगे। नहीं। जब आप वामाखेपा की साधना-पूजा करेंगे या गुरु स्वरूप में उनका स्मरण करेंगे, गुरु मंत्र से और जितने भी गुरु श्लोक हैं उन सबसे स्मरण करते हुए, तो उनका वह तत्व आपकी ओर आकर्षित होगा, आप पर कृपा करेगा, और मार्ग दिखाएगा — कि हाँ, इस बच्चे को कहाँ ले जाना है; इसका गुरु कौन है; वहाँ वे मार्ग दिखाएँगे, और मार्ग बनेगा।
महाराष्ट्र के व्यक्ति को किसे गुरु मानना चाहिए?
दत्तात्रेय, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश समाए हैं
वक्ता कहते हैं कि यदि आप महाराष्ट्र क्षेत्र या उसके आसपास के हैं, तो देखिए — वहाँ घर-घर में गुरु दत्तात्रेय पूजे जाते हैं। उनकी पूजा कीजिए। वे वही दोहराते हैं जो अक्सर कहते हैं: ब्रह्मा, विष्णु और महेश, सारे तत्व उनमें समाए हैं। उनकी सेवा-पूजा कीजिए और उनकी कृपा से आपको भौतिक गुरु प्राप्त होगा।
वे कहते हैं कि यदि आप महाराष्ट्र क्षेत्र के हैं या उस ओर के हैं, तो वहाँ देखिए — घर-घर में गुरु दत्तात्रेय पूजे जाते हैं। उनकी पूजा कीजिए। वे बार-बार कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश, सारे तत्व उनमें समाए हुए हैं। उनकी सेवा-पूजा कीजिए; उनकी कृपा से आपको भौतिक गुरु प्राप्त होगा।
दत्तात्रेय माला मंत्र से लोगों ने कौन से परिणाम बताए हैं?
बीस-बाईस लोगों को स्वप्न में गुरु स्वरूप के दर्शन
वक्ता कहते हैं कि चैनल पर दी गई दत्तात्रेय माला मंत्र की गुरु साधना अब तक जितने लोगों ने की है, उनमें से किसी को भौतिक गुरु नहीं मिला — पर लोग संतुष्ट हैं, और यही कहीं न कहीं उनकी कृपा है। टेलीग्राम, इंस्टाग्राम और फेसबुक मिलाकर लगभग बीस-बाईस लोगों ने बताया है कि वे दिसंबर से लगातार, अब तक लगभग एक महीने से, दत्तात्रेय माला मंत्र की साधना कर रहे हैं और उन्हें स्वप्न में किसी गुरु स्वरूप के दर्शन हो रहे हैं। वह गुरु कौन हैं, यह उन्हें नहीं पता।
चैनल पर जो गुरु साधना दी गई है, दत्तात्रेय माला मंत्र — वे कहते हैं कि अब तक जितने लोगों ने साधना की है, उनमें से किसी को भौतिक गुरु नहीं मिला, पर लोग संतुष्ट हैं। यही कहीं न कहीं उनकी कृपा है। लगभग सात-आठ — सात-आठ भी नहीं; टेलीग्राम और इंस्टाग्राम मिला लें और फेसबुक मिला लें, तो लगभग बीस-बाईस लोग उस संख्या में आएँगे जिन्होंने बस इतना ही कहा है: कि वे दत्तात्रेय माला मंत्र की साधना लगातार कर रहे हैं, यानी दिसंबर से अब तक, अब तक लगभग एक महीना हो गया होगा। उन्हें स्वप्न में किसी गुरु स्वरूप के दर्शन हो रहे हैं। वह गुरु कौन हैं, यह उन्हें नहीं पता। किसी ने पहचानकर मैसेज किया है कि गुरु जी, मुझे इनके दर्शन होते हैं, मुझे नहीं पता ये कौन हैं पर ये अब मेरे सामने आए हैं और ऐसे दिखते हैं। कुछ लोगों के मैसेज आए हैं, पर उन बाईस में से बहुत से लोग यह भी मैसेज करते हैं कि उन्हें वे दिख रहे हैं, कि स्वप्न में उन्हें पता चल रहा है।
लोग लालटेन लेकर ऐसा गुरु खोजने निकलते हैं जो उन्हें कोई सिद्धि करवा दे
सिद्धि करवाने वाले गुरु को लालटेन लेकर खोजना
वे कहते हैं कि आज उन्होंने यह विषय रखा है कि लोग लालटेन लेकर गुरु खोजते हैं — आओ मित्र, लालटेन लेकर ऐसा गुरु खोजें जो हमें सिद्धि करवा दे। उन्होंने यह विषय ठीक इसीलिए रखा है: बताए गए तरीके से गुरु खोजिए, और उसी माध्यम से खोजिए, ताकि आपको सच में गुरु मिले। इसके लिए बिल्कुल भटकिए मत। वे कहते हैं, गुरु मत खोजिए — गुरु आपको खोजेंगे; पर गुरु खोजने के लिए इन्हें अपना गुरु बनाइए।
वे कहते हैं कि वे साक्षात सामने बैठे हुए नहीं हैं; उस हद तक वे सिद्ध नहीं हुए। पर वे देख रहे हैं कि हाँ, कहीं न कहीं वह गुरु तत्व उनकी ओर आकर्षित हो रहा है, क्योंकि उन्होंने ठीक यही संकल्प लिया था — कि गुरु प्राप्त हो। गुरु मत खोजिए; गुरु आपको खोजेंगे। पर गुरु खोजने के लिए इन्हें अपना गुरु बनाइए। आज का विषय यह रखा गया है कि लोग लालटेन लेकर गुरु खोजने जाते हैं — आओ मित्र, लालटेन लेकर ऐसा गुरु खोजें जो हमें सिद्धि करवा दे। उन्होंने यह विषय ठीक इसीलिए रखा है: गुरु को उसी तरीके से खोजिए, और उसी माध्यम से खोजिए, ताकि आपको सच में गुरु मिले। और यदि आपको गुरु चाहिए, तो इसके लिए बिल्कुल भटकिए मत।
अभिचार से पीड़ित व्यक्ति गुरु पाने के लिए क्या करे?
दत्तात्रेय की शरण लीजिए, या क्षेत्र के सद्गुरु के समाधि स्थल जाइए
वे कहते हैं कि यदि आप कोई मंत्र साधना करना चाहते हैं, या किसी तरह के अभिचार या बाधा से ग्रस्त हैं, और ऐसा गुरु खोज रहे हैं जो आपको मंत्र दे और अपनी गुरु परंपरा में शामिल करे, तब भी वे यही कहेंगे: सबसे पहले भगवान दत्तात्रेय की शरण लीजिए। या अपनी क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार देखिए कि वहाँ सद्गुरु स्वरूप में कौन से गुरु सबसे प्रसिद्ध हैं और मान्यता रखते हैं, और उन्हें गुरु मानकर उनके समाधि स्थल जाइए, उनका जो भी सिद्ध पीठ हो वहाँ जाइए, और वहाँ बार-बार जाकर प्रार्थना कीजिए। वे कृपा करेंगे, परोक्ष रूप से; वे आपके सामने भी आ जाएँगे और आपको पता भी नहीं चलेगा।
वे कहते हैं कि दूसरी बात यह आती है कि आप कोई मंत्र साधना करना चाहते हैं, या किसी तरह के अभिचार या बाधा से पीड़ित हैं, और इसके लिए आप कोई ऐसा गुरु खोज रहे हैं जो आपको कोई मंत्र दे और अपनी गुरु परंपरा में शामिल करे। तब भी वे कहेंगे कि सबसे पहले भगवान दत्तात्रेय की शरण लीजिए। या अपनी क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार देखिए कि वहाँ सद्गुरु स्वरूप में कौन से गुरु सबसे प्रसिद्ध हैं, जिनकी मान्यता है। और उन्हें गुरु मानकर उनके समाधि स्थल जाइए। उनका जो भी सिद्ध पीठ हो, वहाँ जाइए, और वहाँ बार-बार जाकर प्रार्थना कीजिए। वे कृपा करेंगे; परोक्ष रूप से कृपा करेंगे। वे आपके सामने भी आ जाएँगे और आपको पता नहीं चलेगा। ऐसा बहुत से लोगों के जीवन में होता है; लोग अनुभव साझा करते हैं और बताते हैं कि इस तरह का अनुभव हुआ।
भौतिक गुरु पर ही क्यों नहीं अटकना चाहिए?
गुरु तत्व पंच तत्वों से ऊपर है
वे कहते हैं कि आप भौतिक रूप से पाँच तत्वों से बना शरीर चाहते हैं — पर जान लीजिए कि गुरु तत्व उससे ऊपर है। वह पंच तत्व से ऊपर है, और पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। गुरुत्व के बिना हम चल भी नहीं सकते; चलने के लिए भी वह चाहिए। तो इसी माध्यम से आपको गुरु खोजना है, और तब आपको गुरु मिलेंगे।
वे कहते हैं कि भौतिक रूप से आप पाँच तत्वों से बना शरीर चाहते हैं। जान लीजिए कि गुरु तत्व उससे ऊपर है। वह गुरु तत्व पंच तत्व से ऊपर है, और पूरे ब्रह्मांड में फैला है। गुरुत्व के बिना आप और हम हिल भी नहीं सकते। चलने के लिए वह चाहिए। तो आपको करना यह है कि इसी माध्यम से गुरु खोजिए। तब आपको गुरु मिलेंगे।
जब तक गुरु न मिलें, तब तक किसे गुरु मानना चाहिए?
दत्तात्रेय, नवनाथ, चौरासी सिद्ध, और क्षेत्रीय सिद्ध
वक्ता कहते हैं कि जब तक गुरु प्राप्त न हों, आपको गुरु रूप में किसी एक स्वरूप को पकड़कर चलना है। भगवान दत्तात्रेय को लेकर चलिए; या नवनाथों में से किसी एक को लीजिए; या चौरासी सिद्धों को लीजिए। अपने क्षेत्र के अनुसार जो आपको सबसे ज्यादा आकर्षित करे, जो सिद्ध पुरुष लगे, उसे लीजिए। यदि आप उत्तर प्रदेश के हैं, तो देवरहा बाबा को पकड़िए — उनसे अधिक सक्षम सिद्ध योगी, वे कहते हैं, कोई नहीं होगा — या गुरु गोरखनाथ जी को, जिनके मंत्र भी चैनल पर दिए गए हैं। गुरु परंपरा में तैलंग स्वामी को लेकर चलिए, या लाहिड़ी महाशय को, या बाबा नीम करौली को।
वे कहते हैं कि जब तक गुरु प्राप्त न हों, आपको बस गुरु रूप में किसी एक स्वरूप को पकड़कर चलना है। कौन सा स्वरूप? चाहे भगवान दत्तात्रेय को लेकर चलिए, या नवनाथों में से किसी एक नाथ को लीजिए, या चौरासी सिद्धों को लीजिए। अपने क्षेत्र के अनुसार जो आपको बहुत आकर्षक लगे, जो सिद्ध पुरुष लगे, उसे लीजिए। यदि आप उत्तर प्रदेश के हैं, तो देवरहा बाबा — उनसे अधिक सक्षम सिद्ध योगी कोई नहीं होगा — उन्हें पकड़िए, या गुरु गोरखनाथ जी को पकड़कर चलिए। उन्हें लेकर चलिए; उनके मंत्र भी चैनल पर दिए गए हैं। गुरु परंपरा में तैलंग स्वामी को लेकर चलिए, कि हाँ, वे आपके गुरु हैं, जब तक कोई मिल न जाए। लाहिड़ी महाशय को लेकर चलिए। बाबा नीम करौली हैं, उन्हें लेकर चलिए। किसी एक ऐसे सिद्ध पुरुष को गुरु मानिए। यदि इन्हें मानने में कठिनाई हो, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश को मानिए। पर ऐसी महाशक्ति को मानिए जो आपको आपके भौतिक गुरु से मिला दे।
क्या किसी से कहना चाहिए कि मुझे शिष्य बना लीजिए?
क्या नहीं करना है, और साथ चलने वालों से वे क्या कहते हैं
वे कहते हैं कि गुरु इसी तरह खोजा जाता है, न कि किसी के पास जाकर यह कहकर कि मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। यह बिल्कुल नहीं करना चाहिए। जो सच में होना है, वह फिर अपने आप होगा। और यदि किसी की बातें सुनकर आपको लगे कि उनके साथ चलना चाहिए — जैसे बहुत से लोग उनसे कहते हैं कि वे उनके साथ चलना चाहते हैं — तो इस चिंता से मुक्त रहिए कि यहाँ दीक्षा लेने पर ही आप आगे बढ़ पाएँगे। यहाँ जो मार्ग दिखाया जाएगा, वह ऐसा होगा जिससे आपका कल्याण हो; नुकसान करने वाली बातें यहाँ बताई ही नहीं जातीं।
वे कहते हैं कि गुरु इसी तरह खोजा जाता है, न कि किसी के पास जाकर यह कहकर कि मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। यह बिल्कुल नहीं करना चाहिए। जो सच में होना है, वह फिर अपने आप होगा। और यदि किसी की बातें सुनकर आपको लगे कि हाँ, इनके साथ चलना चाहिए — जैसे बहुत से लोग उनसे कहते हैं कि वे उनके साथ चलना चाहते हैं — तो इस बात पर निश्चिंत रहिए कि ऐसा नहीं है कि यहाँ दीक्षा लेकर ही आप आगे बढ़ पाएँगे। यहाँ जो मार्ग दिखाया जाता है, वह ऐसा मार्ग होगा जिससे आपका कल्याण हो। नुकसान करने वाली बातें यहाँ बताई ही नहीं जातीं। तो निश्चिंत होकर आगे बढ़िए। जीवन में जब समय आएगा, भौतिक गुरु भी आएँगे — क्योंकि लोग भौतिक गुरु पर बुरी तरह अटके हुए हैं। वे बार-बार कहते हैं कि भौतिकता तभी तक है जब तक पाँच तत्वों का शरीर है; उससे थोड़ा आगे सोचने का प्रयास कीजिए।
वे कहते हैं कि दीक्षा किस चीज में बदल गई है?
व्यापार बनी दीक्षा, और लाखों दीक्षित जिनका कुछ नहीं हुआ
वक्ता कहते हैं कि आज के समय में कहीं न कहीं यह एक जगह पहुँचकर व्यापार बन गया है: दीक्षा लो, नहीं तो नहीं होगा। वे कहते हैं, भाई, लाखों लोग दीक्षा लेकर पड़े हुए हैं। किसी के जीवन में कुछ नहीं हो रहा।
हम जिस समय में हैं, उसमें कहीं न कहीं यह एक जगह जाकर व्यापार बन गया है: दीक्षा लो, नहीं तो नहीं होगा। वे कहते हैं, भाई, लाखों लोग दीक्षा लेकर मरे पड़े हैं। किसी के जीवन में कुछ नहीं हो रहा।
आपको गुरु की असल में जरूरत कब पड़ेगी?
जब आप खुद आभिचारिक और तांत्रिक क्रिया करने जाएँ
वे पूछते हैं, जानते हैं आपको गुरु की जरूरत कब पड़ेगी? जब आप खुद आभिचारिक चीजें, तंत्र से जुड़ी कोई क्रिया करने जा रहे हों — वहाँ आपको गुरु चाहिए। वे उदाहरण देते हैं: आप महाशक्ति की साधना नहीं कर रहे, आप चैनल पर सिखाए अनुसार भैरव जी की पूजा नहीं कर रहे, जहाँ हृदय पाठ और हर चीज के साथ पाँच-सात साधनाएँ समझाई गई हैं। आप भैरव जी की तामसिक साधना करना चाहते हैं, भैरव जी के आठ वीरों की पूजा करके — हालाँकि, वे बताते हैं, वीर आठ नहीं, चौंसठ हैं।
वे पूछते हैं, जानते हैं आपको गुरु की जरूरत कब पड़ेगी? जब आप खुद आभिचारिक चीजें, तंत्र से जुड़ी कोई क्रिया करने जा रहे हों — वहाँ आपको गुरु चाहिए। जैसे, आप महाशक्ति की साधना नहीं कर रहे; आप भैरव जी की वह पूजा नहीं कर रहे जिसकी पाँच-सात साधनाएँ, हर चीज, हृदय पाठ और सब कुछ यहाँ समझाया गया है, एक-एक चीज दी गई है कि कैसे और क्या करना है। आपको वह सब नहीं करना। आप भैरव जी की तामसिक साधना करना चाहते हैं। आप भैरव जी के आठ वीरों की, अष्ट वीरों की पूजा करना चाहते हैं, जहाँ आठों वीर पूजे जाते हैं। आपको वह प्रक्रिया कहीं से पता चली, कहीं सुनी, किसी से सीखी — हालाँकि वीर आठ नहीं, चौंसठ वीर हैं — पर आपने कहीं सुना और मन में उस विधि से पूजा करने की इच्छा जागी। फिर यदि आप वे सारी बातें किसी किताब से, हर महीने छपने वाली तंत्र पत्रिकाओं से पढ़कर करेंगे, तो आप फँस जाएँगे। फिर वहाँ आप कठिनाई में पड़ जाएँगे।
आठ वीरों की पूजा किताब से करना असंभव क्यों है?
हर वीर की तीन मुद्राएँ, पहले सीखनी हैं चौबीस मुद्राएँ
वे कहते हैं कि इसका विधि-विधान ऐसा है कि कम से कम — यदि आठ वीर हैं और आप तंत्र की पद्धति से चलें — तो हर एक वीर के लिए कम से कम तीन मुद्राएँ लगेंगी, यानी चौबीस मुद्राएँ। वे चौबीस मुद्राएँ आपको पहले सीखनी होंगी: किस मुद्रा से किसका आवाहन होता है। हो सकता है दो वीरों की मुद्रा एक हो, हो सकता है हर एक की अलग हो। इसीलिए वहाँ आपको गुरु की जरूरत पड़ेगी।
वे कहते हैं कि इसका विधि-विधान ऐसा है कि कम से कम, यदि आठ वीर हैं और आप तंत्र की पद्धति से चलें, तो एक वीर के लिए कम से कम तीन मुद्राएँ होंगी। तो आपको पहले चौबीस मुद्राएँ सीखनी होंगी — किस मुद्रा से किसका आवाहन होता है। हो सकता है दो वीरों की मुद्रा एक हो, हो सकता है हर एक की अलग हो। ठीक इसीलिए वहाँ आपको गुरु की जरूरत पड़ेगी।
शक्ति के साथ खेलने और उनके गणों के साथ खेलने में क्या अंतर है?
महामाया जगदंबा कभी हानि नहीं करतीं; उनके गण और वीर अलग बात हैं
वे कहते हैं कि जब आप शक्ति के साथ खेलते हैं, महाशक्ति के साथ नहीं — महाशक्ति, महामाया जगदंबा आपको कभी हानि नहीं पहुँचाएँगी — पर यदि आप उनके गण के साथ खेल रहे हैं, किसी वीर के साथ खेल रहे हैं, यदि आपको ये सब करना है और इन सबमें जाना है, तो गुरु खोजिए। तब आपको ऐसा भौतिक गुरु चाहिए, और उसके लिए भी इन्हीं चीजों का प्रयोग कीजिए, ताकि आपको सही मार्गदर्शक मिले।
वे कहते हैं कि जब आप शक्ति के साथ खेलते हैं — महाशक्ति नहीं। महाशक्ति, महामाया जगदंबा आपको कभी हानि नहीं पहुँचाएँगी। पर यदि आप उनके गण के साथ खेल रहे हैं, किसी वीर के साथ खेल रहे हैं, यदि यह सब आपको करना है, यदि आपको इन सब चीजों में जाना है, तो गुरु खोजिए। तब आपको ऐसा भौतिक गुरु चाहिए — और उसके लिए भी इन्हीं चीजों का प्रयोग कीजिए, ताकि आपको कोई सही मार्गदर्शक मिले।
गुरु वह नहीं जो दीक्षा के पंद्रह या पचास हजार ले और माला थमा दे
दीक्षा के पंद्रह या पचास हजार और थमाई हुई माला
वे कहते हैं कि बात सही मार्गदर्शक पाने की है, न कि यह कि किसी ने बस बोल बम करवाया, दीक्षा के पंद्रह हजार या पचास हजार लिए, कहानी बनाई और हो गया। माला दे दी, जप करते रहो, हो गया — नहीं।
वे कहते हैं, ताकि आपको सही मार्गदर्शक मिले, न कि उन्होंने बस बोल बम करवाया, दीक्षा के पंद्रह हजार, पचास हजार लिए, उसकी कहानी बनाई और खत्म। माला थमा दी, जप करते रहो, हो गया। नहीं। जब आप क्रियाएँ करने जाते हैं, जब किसी क्रिया से जुड़ी शक्ति जगाई जाती है — तंत्र जैसा असल में इस तरह किया जाता है, जहाँ एक-एक शक्ति जगाकर देखी जाती है, उन लोगों द्वारा जो इसे व्यावहारिक रूप से करते हैं और ये सब करते हैं — अब आपको वह सब करना है, तो आपको गुरु चाहिए, और तब कीजिए।
मोक्ष का लक्ष्य रखने वाले गृहस्थ को किसे प्रधान रखना चाहिए?
गृहस्थ के लिए भाव प्रधान, तंत्र में क्रिया प्रधान
वक्ता कहते हैं कि यदि आप गृहस्थ हैं और आपने जीवन का उद्देश्य रखा है कि मोक्ष की ओर, मुक्ति की ओर जाना है, तो यहाँ भाव को प्रधान रखिए; यहाँ क्रिया प्रधान नहीं होगी। वे बार-बार कहते हैं कि तंत्र में क्रिया प्रधान है — भाव प्रधान नहीं, भक्ति प्रधान नहीं — और वहाँ कुछ भी गलत हुआ तो तुरंत परेशानी आती है।
पर यदि गृहस्थ रहते हुए आपने जीवन का उद्देश्य रखा है कि मोक्ष की ओर, मुक्ति की ओर जाना है, तो यहाँ भाव को प्रधान रखिए; यहाँ क्रिया प्रधान नहीं होगी। वे बार-बार कहते हैं कि तंत्र में क्रिया प्रधान है। भाव प्रधान नहीं, भक्ति प्रधान नहीं। वहाँ कुछ गलत हुआ, तो तुरंत परेशानी होगी।
क्या कपाल से जुड़ी क्रिया खुद कर सकते हैं या श्मशान की मिट्टी घर ला सकते हैं?
यूट्यूब, फेसबुक और पत्रिकाएँ आपको वहाँ तक क्यों नहीं ले जाएँगी
वे कहते हैं कि तंत्र प्रक्रिया से की जाने वाली कपाल से जुड़ी क्रिया के लिए, जिस तरह वह सब करना होता है और जो प्राप्त करना होता है, आपको किसी की जरूरत जरूर पड़ेगी। यदि बिना जाने आप श्मशान की मिट्टी उठाकर घर ले आएँ और करें, तो परेशानी होगी; इसके लिए कोई चाहिए जो आपको सारी क्रियाएँ समझाए। यूट्यूब, फेसबुक और पत्रिकाएँ पढ़कर आप यह नहीं कर पाएँगे, इसलिए वहाँ गुरु चाहिए। पर इतनी दूर जाने की जरूरत नहीं।
वे कहते हैं कि अब कपाल से जुड़ी जो क्रिया आप तंत्र प्रक्रिया से करने जा रहे हैं — जिस तरह वह सब करना होता है और जो प्राप्त करना होता है — उसके लिए आपको किसी की जरूरत जरूर पड़ेगी। यदि बिना जाने आप श्मशान की मिट्टी उठाकर घर ले आएँ और करें, तो परेशानी होगी न? इसके लिए कोई चाहिए जो आपको सारी क्रियाएँ समझाए। तो यूट्यूब, फेसबुक और पत्रिकाएँ पढ़कर आप यह नहीं कर पाएँगे; वहाँ आपको गुरु चाहिए। पर इतनी दूर जाने की जरूरत नहीं। यदि आप शुरुआत कर रहे हैं, तो यूट्यूब से इतनी दूर मत जाइए। आरंभिक क्रियाओं को ठीक से समझकर कीजिए; जब गुरु मंडल की कृपा आती है, तो सब कुछ मिल जाता है।
क्या हर संप्रदाय में गुरु मंडल की परंपरा है?
आवरण पूजा, नौ आवरण, और महा सिद्ध पीठ में चौंसठ
वे कहते हैं, एक बात समझिए: चाहे शाक्त हो, कौल हो, शैव हो या नाथ परंपरा, जितने भी अलग-अलग पंथ और संप्रदाय बने और बँटे हैं, उन सबमें गुरु मंडल की परंपरा है। गुरु मंडल की पूजा होती है। कहीं आवरण पूजन में गुरु मंडल के नौ आवरण होते हैं; कहीं चौंसठ आवरण तक होते हैं। मूल पीठ होता है, सिद्ध पीठ होता है और महा सिद्ध पीठ होता है; महा सिद्ध पीठ में चौंसठ आवरणों की पूजा होती है और उसमें आठ घंटे लगते हैं। जो सब कुछ पूरी तरह जान चुके हैं, वे करते हैं।
वे कहते हैं, अब एक बात समझिए। चाहे शाक्त हो, कौल हो, शैव हो, या नाथ परंपरा — जितने भी अलग-अलग पंथ बने हैं, जो संप्रदाय अलग तरह से बँट गए हैं — उन सबमें गुरु मंडल की एक परंपरा है। गुरु मंडल की पूजा होती है। कहीं गुरु मंडल के आवरण पूजन में नौ आवरण होते हैं। कहीं चौंसठ आवरण तक होते हैं। एक होता है महा सिद्ध पीठ — मूल पीठ होता है, सिद्ध पीठ होता है, महा सिद्ध पीठ होता है। महा सिद्ध पीठ में चौंसठ आवरणों की पूजा की जाती है; उस पूजन में आठ घंटे लगते हैं। जो सारी बातें बहुत पूरी तरह जान चुके हैं, वे इसे करते हैं।
तोड़ना यह भ्रम है कि कान में फूँका गया मंत्र ही सब कुछ है
यह भ्रम तोड़ना कि कान में फूँका मंत्र ही सब कुछ है
वे कहते हैं कि ये सारी बातें वे सामान्य रूप से इसलिए बता रहे हैं ताकि लोगों के मन से यह भ्रम निकल जाए कि बस एक भौतिक गुरु होंगे, जो एक मंत्र देंगे, कान में फूँकेंगे, और फिर काम हो जाएगा। कृपया इस भ्रम से बाहर आइए कि बात बस इतनी ही है। वास्तव में बातें बिल्कुल अलग हैं, और वे ठीक यही बताने का प्रयास कर रहे हैं: कृपया केवल गुरु, गुरु, गुरु पर मत अटकिए, एक ऐसे भौतिक गुरु पर जिसकी दो आँखें, एक नाक और दो कान हैं।
वे कहते हैं कि ये सारी बातें वे सामान्य रूप से इसलिए बता रहे हैं ताकि लोगों के मन से यह भ्रम निकल जाए: कि बस एक भौतिक गुरु होंगे, और वे एक मंत्र देंगे, कान में फूँकेंगे, और फिर काम हो जाएगा। कृपया इस भ्रम से बाहर आइए कि बात बस इतनी ही है। वास्तव में बातें बिल्कुल अलग हैं, और वे ठीक यही बताने का प्रयास कर रहे हैं: कृपया केवल गुरु, गुरु, गुरु पर मत अटकिए, एक ऐसे भौतिक गुरु पर जिसकी दो आँखें, एक नाक और दो कान हैं। बल्कि गुरु मंडल के उन तत्वों को अपनी ओर आकर्षित कीजिए जो इस पूरे ब्रह्मांड में जगह-जगह बिखरे हुए हैं।
क्या चैनल पर दी गई साधनाओं के लिए गुरु चाहिए?
एक-दो को छोड़कर किसी में भौतिक गुरु या कान में दिया मंत्र जरूरी नहीं
वे कहते हैं कि आप सबके सामने जो आरंभिक साधनाएँ दी गई हैं, उन्हें कीजिए। चैनल पर दी गई सारी साधनाओं में, एक-दो को छोड़कर, कहीं भी आपके लिए गुरु की जरूरत नहीं है। न भौतिक गुरु की जरूरत है, न किसी की जो आपके कान में मंत्र डाले। उन मंत्रों के लिए गुरु चाहिए।
आप सबके सामने जो साधनाएँ दी गई हैं — वे सब कीजिए, आरंभिक साधना कीजिए। चैनल पर जितनी साधनाएँ दी गई हैं, उनमें से एक-दो साधनाओं को छोड़ दें, तो कहीं भी आपके लिए गुरु की जरूरत नहीं है। न भौतिक गुरु की जरूरत है, न ही कान में मंत्र डालने वाले की जरूरत है। उन मंत्रों के लिए गुरु चाहिए।
गुरु ठीक-ठीक किसलिए चाहिए?
बीज का स्पष्ट उच्चारण, और संदेह दूर करना जैसे नवार्ण से पहले ॐ
वे पूछते हैं कि गुरु की जरूरत क्या है: कि वह उच्चारण स्पष्ट करे — उच्चारण में कोई बीज है तो उस बीज में उच्चारण कैसे होता है। इसके लिए गुरु जरूरी है। और यदि आपके मन में कोई शंका या संशय है, तो उसके लिए गुरु जरूरी है — जैसे लोगों के मन में रहने वाला यह संदेह कि नवार्ण में ॐ लगाएँ या नहीं; उसके लिए गुरु है। यहाँ गुरु का अर्थ हो जाता है: जो आपकी शंका और संशय दूर करे।
गुरु की जरूरत क्या है? कि वह उच्चारण स्पष्ट करे — कि यहाँ उच्चारण में एक बीज है, तो बीज में उच्चारण कैसे करना है। इसके लिए वहाँ गुरु जरूरी है। वहाँ आपके लिए गुरु जरूरी है। यदि आपके मन में कोई शंका है, कोई संशय है, इसीलिए गुरु जरूरी है। जैसे, आपके मन में इस तरह का संदेह रहता है कि नवार्ण में ॐ लगाएँ या नहीं — उसके लिए गुरु है। यहाँ गुरु का अर्थ हो जाता है: जो आपकी शंका और संशय दूर करे।
संदेह से मुक्ति कैसे मिलती है?
ज्ञान से, जिसका एकमात्र स्रोत भौतिक गुरु नहीं
वे कहते हैं कि आप संदेह से मुक्त होकर साधना कर सकें, इसलिए वहाँ गुरु जरूरी है। और आप संदेह से मुक्त कैसे होंगे? ज्ञान से। ज्ञान कौन देगा? केवल पाँच तत्वों से बने भौतिक गुरु ही उसे नहीं दे सकते। आपके पास दूसरे क्षेत्र भी उपलब्ध हैं।
वे कहते हैं कि इसीलिए वहाँ यह जरूरी है, और वहाँ वे ऐसे हो जाते हैं। ताकि आप संदेह से मुक्त होकर साधना कर सकें — और आप संदेह से मुक्त कैसे होंगे? ज्ञान से। ज्ञान कौन देगा? केवल पाँच तत्वों से बने भौतिक गुरु ही उसे नहीं दे सकते। आपके पास दूसरे क्षेत्र भी हैं।
तंत्र ग्रंथ से मंत्र उठाने के बारे में किताबें क्या कहती हैं?
पचास तरह के दंड और दोष लिखे हुए
वे कहते हैं कि यहाँ एक बात उठती है कि यदि कोई व्यक्ति किताब से, किसी तंत्र ग्रंथ से उठाए गए मंत्र का जप करता है, तो इसके बारे में बहुत सी बातें लिखी हैं — कि आपको दंड मिलेगा, कष्ट मिलेगा, आपको इस तरह दोष लगेगा। पचास तरह की बातें बताई गई हैं।
वे कहते हैं कि अब यहाँ एक बात उठती है: यदि कोई व्यक्ति किसी किताब से उठाए, किसी तंत्र ग्रंथ से उठाए किसी मंत्र का जप करता है, तो उसके बारे में बहुत सी बातें लिखी हैं। कि आपको दंड मिलेगा, कि आपको कष्ट मिलेगा, कि आपको इस तरह दोष लगेगा। पचास तरह की बातें बताई गई हैं।
किसी से मंत्र लेने पर कौन सा ऋण बनता है?
विधान देने वाले और लेने वाले के बीच ऋणानुबंध
वे कहते हैं कि इस पर वे अलग वीडियो जरूर डालेंगे, पर आज साफ कहना चाहते हैं: ऋण दोष से, जमा होने वाले ऋण से मुक्त होना बहुत जरूरी है। हम जहाँ से भी मंत्र लेते हैं, जिसके भी मार्गदर्शन में जो भी विधि-विधान करते हैं, हम दोनों के बीच एक ऋण बनता है — जिसे ऋणानुबंध कहते हैं। स्कूल-कॉलेज में पढ़कर ज्ञान लेते हैं तो वहाँ फीस देते हैं। यहाँ ज्ञान के बदले कोई फीस का लेन-देन नहीं हो रहा, पर चूँकि हम इस परंपरा में, इस प्रक्रिया में जा रहे हैं, इसकी कीमत चुकाई जानी चाहिए।
वे बताते हैं कि वे खुद चैनल पर साधनाएँ देते रहते हैं और लोग उन्हें कर रहे हैं, और यद्यपि इस पर वे अलग वीडियो जरूर डालेंगे, आज वे साफ कहना चाहते हैं: ऋण दोष से, जो ऋण चढ़ जाता है उससे मुक्त होना बहुत जरूरी है। हम जहाँ से भी मंत्र उठाते हैं, जिसके भी मार्गदर्शन में, जो भी विधि-विधान करते हैं, हम दोनों के बीच एक ऋण बनता है — जिसे ऋणानुबंध कहते हैं। जब आप स्कूल-कॉलेज में पढ़कर ज्ञान लेते हैं, तो वहाँ हम फीस देते हैं। यहाँ हम ज्ञान के बदले फीस का कोई लेन-देन नहीं कर रहे, पर चूँकि हम इस परंपरा में जा रहे हैं, इस प्रक्रिया में जा रहे हैं, इसकी कीमत दी जानी चाहिए। तो आप क्या कीमत देंगे?
किसी से ली गई साधना का ऋण दोष कैसे मिटता है?
शिव मंदिर में घी के पाँच दीपक और जीवों को सवा किलो अनाज
वक्ता कहते हैं कि आप जब भी, जहाँ से भी कोई साधना करें, केवल इसी चैनल से नहीं, तो जिस व्यक्ति से साधना ली उसके नाम से साधना के पहले दिन और अंतिम दिन शिव मंदिर में कम से कम पाँच घी के दीपक जलाइए, ताकि ऋण दोष न हो। दूसरी बात: उस व्यक्ति के नाम से कम से कम सवा किलो अनाज, या खाने-पीने की कोई भी चीज, जीवों को खिलाइए — कुत्ते, बिल्ली, गाय को खिलाइए; भेड़ या बकरी को खिलाइए; किसी मनुष्य को खिलाइए। इतना करना चाहिए, और इससे उस व्यक्ति पर या आप पर कभी ऋण दोष नहीं पड़ेगा।
आप जब भी, जहाँ से भी कोई साधना करें — केवल इस चैनल से नहीं, कहीं से भी — तो जिस व्यक्ति से आपने साधना ली है और कर रहे हैं, उसके नाम से साधना के पहले दिन और अंतिम दिन शिव जी के मंदिर में कम से कम पाँच घी के दीपक जलाइए, ताकि ऋण दोष न हो। दूसरा काम: उस व्यक्ति के नाम से कम से कम सवा किलो अनाज, या खाने-पीने की कोई भी चीज, जीवों को खिलाइए। चाहे कुत्ते, बिल्ली, गाय को खिलाइए; चाहे भेड़ या बकरी को खिलाइए; चाहे किसी मनुष्य को खिलाइए। इतना करना चाहिए। इससे यह होगा कि उस व्यक्ति पर या आप पर कभी ऋण दोष नहीं आएगा।
वे रोज प्रयास करते हैं कि अपने मुँह से पहले किसी जीव के मुँह में भोजन जाए
अपने से पहले जीव के मुँह में भोजन, और पूरा फल
वे कहते हैं कि वे रोज प्रयास करते हैं कि उनके मुँह में जाने से पहले किसी जीव के मुँह में भोजन जाए, क्योंकि उन्हें भी नहीं पता कि चैनल के बहुत से वीडियो कितने लोग कर रहे हैं, इसलिए ऋण दोष उन्हें भी लग रहा है। वे कहते हैं कि यह हम दोनों के बीच है: मैं कर रहा हूँ, आप भी कीजिए। हो यह सकता है कि जो फल सौ प्रतिशत मिलना था, वह इसी कारण न मिले; जब हम यह काम करते हैं, तो वह फल पूरा मिलेगा। सबको ऋण दोष से मुक्त होते हुए चलना चाहिए।
वे कहते हैं कि वे रोज प्रयास करते हैं कि उनके अपने मुँह में भोजन जाने से पहले किसी जीव के मुँह में भोजन जाए — क्योंकि उन्हें भी नहीं पता कि चैनल पर जो बहुत से वीडियो हैं उन्हें कितने लोग कर रहे हैं, इसलिए ऋण दोष उन्हें भी लग रहा है। तो यह हम दोनों के बीच है: वे कर रहे हैं, और आप भी कीजिए। इससे यह होता है कि हो सकता है जो फल सौ प्रतिशत मिलना था, वह इसी कारण न मिले; और जब हम यह काम करते हैं, तो वह फल पूरा मिलेगा। सबको ऋण दोष से मुक्त करते हुए चलना चाहिए, और आगे बढ़ना चाहिए।
गुप्त नवरात्रि में नवार्ण मंत्र का अनुष्ठान अच्छा है या सप्तशती पाठ?
नवार्ण के संपुट के साथ सप्तशती, और महाविद्या क्रम
यह पूछे जाने पर कि गुप्त नवरात्रि में नवार्ण मंत्र का जप अनुष्ठान अच्छा रहेगा या सप्तशती पाठ, वक्ता उत्तर देते हैं कि जब सप्तशती पाठ करें, तो नवार्ण मंत्र का संपुट लगाकर करें। सप्तशती पाठ का पूरा विधान, किस तरह किया जाता है, इसी चैनल पर एक लाइव में सप्तशती का पूरा ग्रंथ दिखाकर समझाया गया है — यह इस चैनल पर "सप्तशती सर्वस्वम्" नाम से लाइव है। जो एक दिन में तेरह अध्याय नहीं कर सकते, वे महाविद्या क्रम में सप्तशती पाठ करें, जिसका पूरा विधान भी दिया गया है।
क्या दुर्गा सप्तशती का पाठ हिंदी में कर सकते हैं?
कवच, अर्गला, कीलक, तेरह अध्याय और तीनों रहस्य हिंदी में
वे उत्तर देते हैं कि कोई कठिनाई नहीं है। यदि आप एक दिन में तेरह अध्यायों का पाठ हिंदी में करना चाहें, तो कर सकते हैं; वही विधि रहेगी, सब कुछ हिंदी में कीजिए। कवच, अर्गला और कीलक भी हिंदी में पढ़िए, फिर तेरह अध्याय हिंदी में, और तीनों रहस्य भी हिंदी में। यदि महाविद्या क्रम में करें, यानी सात दिन में तेरह अध्याय, तो उसी तरह हिंदी में कीजिए, और जिस दिन दो अध्याय बताए गए हैं उस दिन ठीक वैसे ही पढ़िए। पूरा विधि-विधान "नवरात्रि 2022" नाम की प्लेलिस्ट में है।
वे कहते हैं कि एक प्रश्न था कि यदि हम हिंदी में पाठ करें तो क्या होगा, कि वहाँ कठिनाई आती है। कोई कठिनाई नहीं है। यदि आप एक दिन में तेरह अध्यायों का पाठ हिंदी में करना चाहें, तो वह भी कर सकते हैं; उसमें वही विधि रहेगी, सारी चीजें हिंदी में कीजिए। कवच, अर्गला और कीलक भी हिंदी में पढ़िए; फिर तेरह अध्याय हिंदी में पढ़िए; तीनों रहस्य भी हिंदी में पढ़िए। यदि आप महाविद्या क्रम में करें, यानी सात दिन में तेरह अध्यायों का पाठ करें, तो उसमें भी इसी तरह हिंदी में पढ़िए, और जिस दिन जैसे दो अध्याय बताए गए हैं, उस दिन वैसे ही पढ़िए। पूरा विधि-विधान उनकी बनाई "नवरात्रि 2022" नाम की प्लेलिस्ट में है, जिसमें एक-एक चीज दी गई है।
यदि पाठ हिंदी में किया हो, तो हवन कैसे करें?
मूल मंत्र से हवन, और कुछ न जानने वालों के लिए अर्गला का पहला मंत्र
वे कहते हैं कि हवन मंत्र से कीजिए, जो मूल मंत्र दिया गया है उससे। वे वही दोहराते हैं जो अक्सर कहते हैं: यदि आप कुछ भी नहीं जानते, कोई मंत्र नहीं आता, तो अर्गला का पहला मंत्र अपने जीवन में ले आइए — "ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा"। उसे अपने जीवन में उतारिए, उसी से हवन कीजिए और उसी का जप कीजिए।
वे कहते हैं कि अब प्रश्न आता है कि हमने पाठ हिंदी में किया है, तो हवन कैसे करें? हवन मंत्र से कीजिए, जो मूल मंत्र दिया गया है उससे। यदि आपको कुछ नहीं आता, कोई भी मंत्र नहीं आता — वे बार-बार कहते हैं — तो अर्गला का पहला मंत्र अपने जीवन में ले आइए। यदि कुछ भी नहीं हो रहा, तो उसे अपने जीवन में उतारिए। मंत्र है: ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा। इसे अपने जीवन में उतारिए, और उसी से हवन और उसी से जप कीजिए।
शास्त्र क्या कहता है
The verse the speaker prescribes for havan and japa is the first verse of the Argalā Stotra, जयन्ती मङ्गला काली.
Using it as the havan mantra when no other is known is the speaker's instruction, not the text's.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥
ॐ। जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा, तुम्हें नमस्कार है।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
क्या बीज मंत्र का जप चलते-फिरते किया जा सकता है?
नाम मंत्र हाँ, बीज मंत्र कभी नहीं
वे कहते हैं कि ग्रुप में एक प्रश्न बार-बार आ रहा था: यदि किसी कारण हम पूजा-पाठ न कर सकें और कहीं जा रहे हों, तो क्या जो मंत्र हम करते हैं — बीज मंत्र आदि, नवार्ण मंत्र — उसका जप चलते-फिरते कर सकते हैं? उनका उत्तर है कि जप नाम मंत्र का करना चाहिए। पूरे विधि-विधान के साथ एक अलग वीडियो बना है जो जल्द अपलोड होगा, पर बीज मंत्रों का जप कभी चलते-फिरते नहीं होता। जिन मंत्रों में न्यास आदि की प्रक्रिया बताई गई है, जिनका विधि-विधान से विनियोग है, जिनका जप माला से और निर्धारित दिशा में करना है — ऐसे मंत्र का चलते-फिरते जप कभी न करें।
वे कहते हैं कि ग्रुप में एक प्रश्न बार-बार आ रहा था: यदि किसी कारण हम पूजा-पाठ न कर सकें और कहीं जा रहे हों, तो मंत्र जप कैसे करें? जो मंत्र हम करते हैं — बीज मंत्र आदि, नवार्ण मंत्र — क्या उनका जप चलते-फिरते कर सकते हैं? जप नाम मंत्र का करना चाहिए। इसके लिए भी एक अलग वीडियो बना है कि कैसे और क्या-क्या करना है, और वह जल्द डाला जाएगा; पर बीज मंत्रों का जप कभी चलते-फिरते नहीं होता। जिन मंत्रों में न्यास आदि की प्रक्रिया बताई गई है, जिनका विधि-विधान से विनियोग है, जिनका जप माला से और निर्धारित दिशा आदि के साथ करना है — ऐसे मंत्र का चलते-फिरते जप कभी भी न करें।
चलते-फिरते किस मंत्र का जप किया जा सकता है?
अर्गला का पहला मंत्र, ॐ के साथ या बिना
वे कहते हैं कि जप नाम मंत्र का होता है। यदि दुर्गा जी आपकी इष्ट हैं, तो आप दुर्गा जी के नाम का, अर्गला के पहले मंत्र का जप कर सकते हैं। ॐ लगाने की जरूरत नहीं, और लगाएँ तो भी कोई कठिनाई नहीं; इसमें इतना उलझने की जरूरत नहीं — आराम से कीजिए। जब वह मंत्र मन में बैठ जाएगा, तो चलते-फिरते चलता रहेगा। आप इसे कर सकते हैं क्योंकि यह अधिक से अधिक एक नाम मंत्र है: इसमें भगवती के ग्यारह नाम हैं। इसका अभ्यास कीजिए, और दो-तीन महीने में ऐसा अभ्यास हो जाएगा कि मंत्र स्वप्न में भी चलेगा।
वे कहते हैं कि जप नाम मंत्र का होता है। यदि दुर्गा जी आपकी इष्ट हैं, तो आप दुर्गा जी के नाम का, अर्गला के पहले मंत्र का जप कर सकते हैं। ॐ लगाने की जरूरत नहीं; लगाएँ तो भी कोई कठिनाई नहीं। इसमें इतना उलझने की जरूरत नहीं — आराम से कीजिए। जब वह मंत्र मन में बैठ जाएगा, तो चलते-फिरते चलता रहेगा। आप उसे कर सकते हैं, क्योंकि अधिक से अधिक वह नाम मंत्र है: उसमें भगवती के ग्यारह नाम हैं। उसका चलते-फिरते जप कीजिए; उसे जीवन में उतारिए। उसका अभ्यास कीजिए, और दो-तीन महीने में ऐसा अभ्यास हो जाएगा कि मंत्र आपके स्वप्न में भी चलेगा।
शास्त्र क्या कहता है
The first Argalā verse is a string of eleven names of the Goddess, from Jayantī to Svadhā, ending in a salutation.
Permission to do its japa while walking is the speaker's own ruling.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥
ॐ। जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा, तुम्हें नमस्कार है।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
तुलसी और शमी पर रोज दीपक जलाने से क्या होता है?
शत्रु-नाशक शमी और नारायण से जुड़ा स्वरूप
वे कहते हैं कि घर-घर में तुलसी जी पूजी जाती हैं, और शमी शत्रु-नाशक है। इन्हें केवल शनि भगवान का नहीं मानना चाहिए — कि शमी वृक्ष केवल शनि भगवान की प्रसन्नता के लिए पूजा जाता है। नारायण का स्वरूप शमी वृक्ष से जुड़ा है। जब भी शनि से जुड़ा कोई कष्ट हो और हवन आदि किया जाए, चाहे काले तिल की आहुति दें या शनि भगवान को दीपदान करें, यदि सूखी शमी की लकड़ी डालकर जलाएँ, तो उसका बहुत बड़ा प्रभाव होता है। इसलिए घर में तुलसी जी के साथ शमी का पेड़, अपराजिता की बेल, कनेर का पेड़ और गुड़हल के फूल का पेड़ लगाना चाहिए।
वे कहते हैं कि घर-घर में तुलसी जी पूजी जाती हैं, और शमी शत्रु का नाश करने वाली हैं। इन्हें केवल शनि भगवान का नहीं समझना चाहिए — कि शमी वृक्ष केवल शनि भगवान की प्रसन्नता के लिए पूजा जाता है। नारायण का स्वरूप शमी वृक्ष से जुड़ा है। जब भी शनि से जुड़ा कोई कष्ट हो, और हवन आदि किया जाए, चाहे आप काले तिल की आहुति दें या शनि भगवान को दीपदान करें, तो यदि सूखी शमी की लकड़ी डालकर जलाएँ, तो उसका बहुत बड़ा प्रभाव होता है। इसलिए घर में तुलसी जी के साथ शमी का पेड़, अपराजिता की बेल, कनेर का पेड़ और गुड़हल के फूल का पेड़ — ये सब लगाने चाहिए।
जिसका काम बन ही नहीं रहा, उसे क्या करना चाहिए?
एक साधना पकड़िए, और अर्गला के पहले मंत्र का विधान
अभिषेक जी से, जिनका काम नहीं बन रहा, और यह समस्या रखने वाले सब लोगों से वे निवेदन करते हैं: कोई एक साधना पकड़िए। आप कौन सा स्वरूप चाहते हैं, किस स्वरूप में आपका मन लगता है? वे कहते हैं कि उसी दिन रात नौ से दस के बीच किसी तरह एक वीडियो डालने का प्रयास करेंगे, और अर्गला के पहले मंत्र पर एक वीडियो पहले से है, जिससे कुलदेवी और योगिनियों सहित ग्यारह शक्तियाँ सिद्ध होती हैं। इन दोनों साधनाओं को जीवन में लाइए। जो आभिचारिक समस्या कट नहीं रही, वह कितनी भी बड़ी हो — उससे बहुत परेशान मत होइए, पैसा बर्बाद मत कीजिए, समय बर्बाद मत कीजिए, बल्कि इन साधनाओं को जीवन में उतारिए।
जिनका काम नहीं बन रहा, उनसे वे निवेदन करते हैं: कोई एक साधना पकड़िए। आप कौन सा स्वरूप चाहते हैं? किस स्वरूप में आपका मन लग रहा है? उसी दिन वे रात नौ से दस के बीच किसी तरह एक वीडियो डालने का प्रयास करेंगे; और एक वीडियो पहले से है जो अर्गला के पहले मंत्र के बारे में है, जिससे कुलदेवी और योगिनियों सहित ग्यारह शक्तियाँ सिद्ध होती हैं। कृपया इन दोनों साधनाओं को अपने जीवन में लाइए। किसी के जीवन में जो भी आभिचारिक समस्या है, कितनी भी बड़ी आभिचारिक समस्या कट नहीं रही — उसके बारे में बहुत परेशान मत होइए। पैसा बर्बाद मत कीजिए, समय बर्बाद मत कीजिए; बल्कि इन साधनाओं को अपने जीवन में लाइए।
किसी का नाम बार-बार लेने से काम क्यों बनता है?
दिन भर किसी श्रोता का नाम पुकारने का उदाहरण
वे अभिषेक जी के ही नाम से उदाहरण देते हैं। मान लीजिए हम दिन भर उनके सामने उनका नाम लेते हैं — अभिषेक, अभिषेक, अभिषेक। मेरा ध्यान उनकी ओर न भी हो, तो भी जब भी अभिषेक जी गुजरते हैं, उन्हें सुनाई देता है कि यहाँ बैठा यह रुद्रांश सुबह-शाम बार-बार अभिषेक, अभिषेक बोल रहा है। वे एक दिन नहीं सुनेंगे, दो दिन नहीं, छह महीने नहीं; पर किसी समय उनके मन में आएगा कि यह व्यक्ति मेरा नाम इतना ले रहा है। वह क्षण, जब आप इन दो-तीन मंत्रों की साधना कर रहे हों और बार-बार उनका नाम ले रहे हों, और एक बार वे कृपा दृष्टि डाल दें — तब, वे कहते हैं, सबसे बड़े तांत्रिक के मुँह से क्या निकलेगा, आप कल्पना भी नहीं कर सकते।
वे पूछते हैं, समझ रहे हैं क्यों? दिन भर, जैसे अभिषेक जी का प्रश्न है, मान लेते हैं कि हम दिन भर उनके सामने उनका नाम ले रहे हैं। बार-बार हम अभिषेक, अभिषेक, अभिषेक बोल रहे हैं। मेरा ध्यान भले उनकी ओर न हो, पर जब भी अभिषेक जी गुजरते हैं, उन्हें सुनाई देता है कि हाँ, यह रुद्रांश जो यहाँ बैठा है, बार-बार अभिषेक, अभिषेक, अभिषेक बोल रहा है — सुबह-शाम अभिषेक, अभिषेक कर रहा है। वे एक दिन नहीं सुनेंगे, दो दिन नहीं सुनेंगे, छह महीने नहीं सुनेंगे। किसी समय उनके मन में आएगा: यह तो मेरा नाम इतना ले रहा है। और वह क्षण, जब आप इन दो-तीन मंत्रों की साधना कर रहे हों, जब आप दो-तीन तरह की साधना करें और बार-बार उनका नाम लें, और एक बार वे कृपा दृष्टि डाल दें — तब वहाँ शत्रु कुछ खास नहीं कर पाता, तंत्र-मंत्र और भूत-प्रेत कुछ खास नहीं कर पाते; एक बार कृपा दृष्टि पड़ जाए, तो सबसे बड़े तांत्रिक के मुँह से क्या निकलेगा, आप कल्पना भी नहीं कर सकते।
यदि आप अभी अपने सारे शत्रुओं से नहीं लड़ सकते, तो क्या करें?
उन पर भरोसा रखिए, उस क्षण की प्रतीक्षा कीजिए, घबराइए मत
वे कहते हैं, तो कृपया उन पर भरोसा रखिए, और उस समय की प्रतीक्षा कीजिए। जब आपमें सबसे युद्ध करने की क्षमता नहीं है, तो घबराइए मत।
वे कहते हैं, तो कृपया उन पर भरोसा रखिए, और उस समय की प्रतीक्षा कीजिए। घबराइए मत। जब आपमें सबसे लड़ने की क्षमता नहीं है, तो जल्दबाजी मत कीजिए।
हनुमान जी या भगवती की पूजा करने पर भी कष्ट क्यों नहीं रुकता?
अभिचार की समय-सीमा, बारह दिन से बारह वर्ष तक
एक भाई ने उन्हें निजी मैसेज किया था कि शत्रु तांत्रिक बार-बार उनकी हर चीज का अंत कर देते हैं, पर वे खुद जो भी प्रक्रिया करते हैं, चाहे हनुमान जी की हो या भगवती की, उससे उन्हें कष्ट ही मिलता है, और जल्दी राहत नहीं मिलती। वे कहते हैं कि कठिनाई यह है कि जब शत्रु ने अभिचार किया है, तो उसकी एक समय-सीमा होती है। वह समय-सीमा आप पहले ही पार कर चुके हैं। अक्सर वह बारह दिन की होती है; बारह दिन से बारह वर्ष तक चलती है। आपको देर से पता चलता है। जब तक उस समय-बद्ध तंत्र की क्रिया नहीं टूटती, कुछ नहीं होगा और आप उसका अंत नहीं कर पाएँगे।
वे कहते हैं कि एक भाई ने बहुत अच्छा मैसेज भेजा था, निजी मैसेज: कि तांत्रिक, जो भी शत्रु हैं, हमारी सारी चीजों का अंत कर देते हैं और बार-बार करते रहते हैं; पर हम जो भी प्रक्रिया करते हैं, चाहे हनुमान जी की या भगवती की, हमें कष्ट ही मिलता है। हमें इससे जल्दी छुटकारा नहीं मिल रहा, तो ऐसी स्थिति में क्या करें, क्योंकि परेशानी बहुत बढ़ रही है। वे पूछते हैं, जानते हैं यहाँ कठिनाई क्या है? क्योंकि जब शत्रु ने अभिचार किया है, तो उसकी एक समय-सीमा होती है। वह समय-सीमा आप पहले ही पार कर चुके हैं। अक्सर वह बारह दिन की होती है; बारह दिन से बारह वर्ष तक चलती है। आपको देर से पता चलता है। तो तंत्र की क्रिया के क्षेत्र में एक समय-बंधन होता है, और जब तक वह क्रिया नहीं टूटती, तब तक नहीं होगा, और आप उसका अंत नहीं कर पाएँगे।
आभिचारिक तांत्रिक जिस पर हमला करता है, उससे ज्यादा देर तक क्यों टिकता है?
वे सक्रिय और संगठित रहते हैं, आप तीन दिन में छोड़ देते हैं
वे कहते हैं कि जैसे ही आप उसका अंत करने जाते हैं, आभिचारिक तांत्रिक बहुत सक्रिय होते हैं — आप उतने सक्रिय नहीं होते। आप एक दिन, दो दिन, तीन दिन पूजा-पाठ करेंगे; परिणाम नहीं आएगा और आप छोड़ देंगे। वह कभी नहीं छोड़ता। गलत काम करने वाले ये लोग तुरंत पूरी तरह सक्रिय रहते हैं, देखते रहते हैं कि कौन कहाँ से क्या कर रहा है। वे भूत-प्रेत की पूरी चौकी बैठाकर रखते हैं, यह पूजा, वह पूजा, उनका पूरा समूह आपस में बँधा रहता है। वे कहते हैं कि बहुत गलत लोग समूह बहुत अच्छे से बनाते हैं; अच्छे लोग नहीं बना पाते।
जैसे ही आप उसका अंत करने जाते हैं और जैसे ही आपको अंत मिलता है — वे पहले के दो-तीन वीडियो सुनने को कहते हैं — आभिचारिक तांत्रिक बहुत सक्रिय होते हैं। आप उतने सक्रिय नहीं होते। आप एक दिन, दो दिन, तीन दिन पूजा-पाठ करेंगे; परिणाम नहीं आएगा और आप छोड़ देंगे। वह कभी नहीं छोड़ता। गलत काम करने वाले ये लोग तुरंत पूरी तरह सक्रिय रहते हैं, पूरी तरह देखते रहते हैं कि कौन कहाँ से क्या कर रहा है, बातें कैसे चल रही हैं। वे भूत-प्रेत की चौकी पर चौकी बैठाकर रखते हैं — यह पूजा, वह पूजा; उनका पूरा समूह आपस में बँधा रहता है। वे कहते हैं कि बहुत गलत लोग समूह बहुत अच्छे से बनाते हैं; अच्छे लोग नहीं बना पाते।
सक्रिय शत्रु के विरुद्ध हनुमान पूजा शुरू करने पर क्या होता है?
पहले दिन राहत, फिर हमला परिवार की ओर मुड़ जाता है
हनुमान जी की चौकी बैठी है; आप तय करते हैं कि हनुमान जी की पूजा करेंगे। आपने पहले दिन पूजा की, उन्हें पता चल गया, और वहाँ आपको थोड़ी राहत महसूस होगी। उनकी ओर से वे ऐसे चार-पाँच काम करेंगे — सीधे आप पर नहीं, क्योंकि आप कर रहे हैं, तो वे आपके परिवार में किसी और पर कुछ करेंगे। आपके घर में चौकी बैठी है, आप घर में हनुमान जी की पूजा कर रहे हैं, पर किसी समय आप बाहर जाएँगे; कुछ ऐसा होगा कि थोड़ी देर के लिए भी शरीर अशुद्ध या अपवित्र हो जाए।
जैसे ही आप यहाँ से कुछ करते हैं — हनुमान जी की चौकी बैठी है, ठीक है, अब हम हनुमान जी की पूजा करेंगे। आपने पहले दिन पूजा की; उन्हें पता चल गया कि हाँ, ठीक है। वहाँ आपको थोड़ी राहत महसूस होगी। इस ओर से वे ऐसे चार-पाँच काम करेंगे। वे सीधे आप पर नहीं करेंगे, क्योंकि आप कर रहे हैं, तो वे आपके परिवार में किसी और पर कुछ करेंगे। आपके घर में चौकी बैठी है, आप घर में हनुमान जी की पूजा कर रहे हैं। पर किसी समय आप बाहर जाएँगे; कुछ ऐसा होगा कि थोड़ी देर के लिए भी शरीर अशुद्ध हो जाए, अपवित्र हो जाए — कुछ न कुछ होगा।
शक्ति की कृपा बनने में कितना समय लगता है?
डेढ़ से तीन वर्ष का लगातार अभ्यास
वे कहते हैं कि कलियुग है, शरीर भी वैसा ही है, और अभी नया होने के कारण आपकी ऊर्जा क्षमता इतनी नहीं बनी कि शत्रु जो भी प्रयोग करे उसे सह सकें। वह अवस्था बाद में आती है। डेढ़ साल, दो साल, तीन साल लगातार पूरी श्रद्धा और विश्वास से लगता है; तब शक्ति की कृपा वैसी होती है।
वे कहते हैं कि कलियुग है। शरीर भी वैसा ही है, और अभी इसमें नए होने के कारण आपकी ऊर्जा क्षमता ऐसी नहीं बनी कि शत्रु जो भी प्रयोग करे, उसे आप सह सकें। वह अवस्था बाद में आती है। डेढ़ साल, दो साल, तीन, तीन साल लगातार पूरी श्रद्धा और विश्वास से लगता है; तभी शक्ति की कृपा वैसी होती है।
वे कौन सी छोटी साधना कहते हैं जो हर किसी को करके रखनी चाहिए?
रुद्रगण साधना और शिव व नारायण की कृपा
वे कहते हैं कि कुछ छोटी साधनाएँ हैं — वे बार-बार दोहराते हैं कि हर एक व्यक्ति को रुद्रगण साधना करके रखनी चाहिए। भगवान शिव और नारायण, दोनों की कृपा इस तरह मिलती है कि आपको पता नहीं चलेगा कि जीवन में कब और कहाँ इसकी जरूरत पड़ जाए।
वे कहते हैं कि कुछ क्षणिक साधनाएँ, जैसे रुद्रगण साधना, वे बार-बार बताते हैं: हर किसी को रुद्रगण साधना करके रखनी चाहिए। भगवान शिव और नारायण, दोनों की कृपा इस तरह मिलती है। आपको पता नहीं चलेगा कि जीवन में कब और कहाँ इसकी जरूरत पड़ जाए।
हमला करने वाले मनोवैज्ञानिक रूप से कैसे काम करते हैं?
परिवार का कोई बीमार पड़ता है, आप पूजा छोड़ देते हैं और नकारात्मक हो जाते हैं
वे कहते हैं कि जब शत्रु करता है, तो आपका शरीर उस क्षमता तक नहीं पहुँचा होने से आप हिल जाएँगे। अब आपके परिवार का कोई और सदस्य बीमार पड़ गया, और फिर आप पूजा-पाठ छोड़ देंगे। आप उतनी दूर तक नहीं पहुँच पाएँगे और नकारात्मक होते जाएँगे। वे कहते हैं कि एक तरह से वे ये सारे खेल मनोवैज्ञानिक रूप से खेलते हैं; वे काफी मजबूत हैं, वे आप जैसे नहीं हैं, और इतनी जल्दी हार नहीं मानेंगे।
तो जब शत्रु करता है, तो आपका शरीर उस क्षमता तक नहीं पहुँचा होने से आप हिल जाएँगे। अब आपके परिवार का कोई और सदस्य बीमार पड़ गया, और फिर आप पूजा-पाठ छोड़ देंगे। आप उतनी दूर तक नहीं पहुँच पाएँगे, और नकारात्मक होते जाएँगे। तो एक तरह से वे ये सारे खेल मनोवैज्ञानिक रूप से खेलते हैं। वे काफी मजबूत हैं। वे आप जैसे नहीं हैं; वे इतनी जल्दी हार नहीं मानेंगे। आप एक बार उनकी चौकी तोड़ भी दें, सब कुछ करके खत्म भी कर दें, तो भी इस तरह के स्वभाव वाले तांत्रिक शत्रु तब तक करते रहेंगे जब तक वे मर न जाएँ, या उन पर कोई कांड न हो जाए।
जब बाँस जलाना मना है, तो क्या मंदिरों में अगरबत्ती जलाना धर्म की हानि नहीं?
अगरबत्ती का प्रश्न, पहले से बने वीडियो की ओर इशारा करके उत्तर
आदित्य राज जी पूछते हैं कि बाँस जलाना वर्जित है, और आजकल सभी छोटे-बड़े हिंदू मंदिरों में अगरबत्ती है — क्या इससे धर्म की हानि नहीं हो रही? वक्ता उत्तर देते हैं कि इसी चैनल पर इस विषय से जुड़ा एक वीडियो है जिसमें काफी छोटी-छोटी बातें समझाई गई हैं, और उनसे उसे एक बार सुनने को कहते हैं।
आदित्य राज जी का प्रश्न है कि बाँस जलाना वर्जित किया गया है, और आजकल सभी छोटे-बड़े हिंदू मंदिरों में अगरबत्ती है — क्या इससे धर्म की हानि नहीं है? वे उत्तर देते हैं कि इसी चैनल पर इस विषय से जुड़ा एक वीडियो है। उसमें काफी छोटी-छोटी बातें समझाई गई हैं; कृपया उसे एक बार सुन लीजिए।
जब आप बहुत नीचे गिरें, तो क्या गुरु आपको सँभाल सकते हैं?
गुरु मंडल की कृपा, और आध्यात्मिक व्यक्ति कभी क्यों नहीं हारता
जीने के लिए मार्गदर्शन और ऐसे गुरु की चाह वाली टिप्पणी पर, जो बहुत नीचे गिरने पर आपको थाम ले, वे कहते हैं कि जब गुरु की — और सच कहें तो, वे कहते हैं, गुरु मंडल की — कृपा आती है, तो ये सब बातें नगण्य हो जाती हैं। आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली व्यक्ति इनमें से किसी चीज से कभी नहीं हारता। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, वह रोएगा, जरूर रोएगा; पर उसका रोना केवल उसके गुरु देखते हैं, और वही पार लगाते हैं।
वे कहते हैं कि जब गुरु की कृपा आती है — और सच में, यदि उन्हें कहना हो, तो गुरु मंडल की कृपा — तो ये सब बातें नगण्य हो जाती हैं। जो व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली है, वह इनमें से किसी चीज से कभी नहीं हारता। परिस्थितियाँ कुछ भी हो जाएँ; वह रोएगा, जरूर रोएगा। उसका रोना केवल उसके गुरु देखते हैं, और वही पार लगाते हैं।
भौतिक गुरु असल में कितनी मदद कर सकते हैं?
वे आपके लिए एक पूजा कर देंगे और एक दिन ऊब जाएँगे
वे कहते हैं कि भौतिक गुरु आपकी उस स्तर तक कभी मदद नहीं कर पाएँगे — आप देखेंगे। वे आपकी कितनी मदद करेंगे? आपको परेशानी है और आप उन्हें बताएँगे; वे क्या मदद करेंगे? वे आपके लिए कोई पूजा-पाठ कर देंगे, कुछ बता देंगे। एक समय वे ऊब जाएँगे।
वे कहते हैं कि भौतिक गुरु आपकी उस स्तर तक कभी मदद नहीं कर पाएँगे; आप यह देखेंगे। वे आपकी कितनी मदद करेंगे? आपको कोई परेशानी है, आप उन्हें बताएँगे, और वे क्या मदद करेंगे? वे आपके लिए कोई पूजा-पाठ कर देंगे, कुछ बता देंगे। एक समय वे ऊब जाएँगे।
जो दीक्षित लोग कभी अपने गुरु को देख ही नहीं पाते, उनके बारे में वे क्या कहते हैं?
दीक्षा ली, गुरु का मुँह कभी नहीं देखा, मिलने के लिए अपॉइंटमेंट
वे कहते हैं कि सुनने वालों में बहुत से दीक्षित होंगे — और उनमें कितने ऐसे होंगे जो दीक्षा लेने के बाद अपने गुरु जी का मुँह भी नहीं देख पाए। ऐसा भी होता है। दीक्षा ले ली और गुरु जी मिलते ही नहीं; उनसे मिलने के लिए भी अपॉइंटमेंट चाहिए। तो दीक्षा से क्या मिला? लोग दीक्षा लेकर गली-गली भटक रहे हैं। ऐसी दीक्षा का क्या लाभ? हम उनके पास जाएँगे जो बुलाते ही आ जाएँ, और इसके लिए गुरु मंडल की कृपा ही चाहिए।
वे कहते हैं कि सुनने वालों में बहुत से दीक्षित होंगे। कितने ऐसे होंगे जो दीक्षा लेने के बाद अपने गुरु जी का मुँह भी नहीं देख पाए। ऐसा भी होता है। दीक्षा ले ली और गुरु जी मिलते ही नहीं। मिलने के लिए भी अपॉइंटमेंट चाहिए। तो दीक्षा हो गई — उससे क्या? लोग दीक्षा लेकर गली-गली घूम रहे हैं। ऐसी दीक्षा का क्या लाभ? हम उनके पास जाएँगे जिन्हें हम जिस भी क्षण बुलाएँ, वे आ जाएँ। और इसके लिए गुरु मंडल की कृपा ही चाहिए, जो उन्होंने शुरुआत में आप सबको बताई। वे कहते हैं, उसी विधान से चलिए — कि क्षण-क्षण गुरु सहारा देते हैं; न कि हर एक चीज के लिए वे बस यही कहें कि यह विधान करो, वह विधान करो, और इतना पैसा दो फिर आगे का विधान बताया जाएगा।
तांत्रिक बंधन क्या है और कैसे किया जाता है?
प्रसाद के जरिए बंधन, और आभामंडल का दूषित होना
एक श्रोता ने बताया कि एक सोखा ने उसे दिखाया था कि उसके शरीर का बंधन कर दिया गया है, और पूछा कि यह कैसे खुलेगा। वक्ता समझाते हैं कि किसी भी तांत्रिक बंधन के तरीके ऐसे होते हैं कि पास आकर करना जरूरी नहीं। जब व्यक्ति शुरू में ये सब बातें नहीं जानता, तो लोग प्रसाद देकर भी बंधन कर देते हैं। बंधन का अर्थ है कि हमारा आभामंडल एक तरह से दूषित हो जाता है। शुभ शक्तियाँ अपना प्रभाव नहीं दे पातीं — और दें भी कैसे? हमारे षट्चक्रों में से किसी एक में मात्रा बढ़ा दी गई होगी, जिससे शरीर में कहीं असंतुलन हो जाता है, और हमें वह प्रभाव ठीक से नहीं मिल पाता।
वे कहते हैं, तंत्र में किसी भी तरह का बंधन देखिए। बंधन के तरीके ऐसे होते हैं कि बंधन आपके पास आकर ही किया जाए, यह जरूरी नहीं। जब शुरू में व्यक्ति ये सब बातें नहीं जानता, तो लोग प्रसाद देकर भी बंधन कर देते हैं। बंधन का अर्थ क्या है? कि हमारा आभामंडल एक तरह से दूषित हो जाता है। शुभ शक्तियाँ अपना प्रभाव नहीं दे पातीं। और सच में शुभ शक्तियाँ अपना प्रभाव दें भी कैसे? हमारे षट्चक्रों में से किसी एक में मात्रा बढ़ा दी गई होगी, जिससे कहीं न कहीं, एक तरह से कहें तो, शरीर में असंतुलन हो जाएगा, और हमें वह प्रभाव ठीक से नहीं मिलेगा।
नाड़ी से कैसे पता चले कि बंधन किया गया है?
सुषुम्ना का बहुत कम चलना
वे कहते हैं कि स्वप्न विद्या पर डाले गए वीडियो में उन्होंने समझाया है कि नाड़ी कैसे देखी जाती है और नाड़ी से बात कैसे समझी जाती है। वही चीज यहाँ भी प्रयोग की जा सकती है। जिस व्यक्ति पर बंधन किया गया है, उसकी सुषुम्ना नाड़ी बहुत कम चलेगी; कितना भी प्रयास करे, वह जल्दी नहीं चलेगी। कठिनाइयाँ शुरू हो जाएँगी।
वे कहते हैं कि स्वप्न विद्या से जुड़े जो वीडियो डाले गए हैं, उनमें उन्होंने समझाया है कि नाड़ी कैसे देखनी है और नाड़ी से विषय कैसे समझना है। वही चीज यहाँ भी प्रयोग की जा सकती है। जिस व्यक्ति पर बंधन किया गया है, उसकी सुषुम्ना नाड़ी बहुत कम चलेगी। कितना भी प्रयास किया जाए, वह जल्दी नहीं चलेगी। कठिनाइयाँ शुरू हो जाएँगी।
बंधन वाला व्यक्ति मंदिर में क्यों बेचैन हो जाता है?
मंदिर की सकारात्मकता का दूषित आभामंडल से टकराना
वक्ता कहते हैं कि जब भी ऐसा बंधन लगा हुआ व्यक्ति शुभ शक्तियों के संपर्क में आएगा, तो वह बहुत बेचैन होगा। मंदिर जाएगा तो वहाँ छटपटाएगा, उसे वहाँ कठिनाई होगी। क्यों? क्योंकि मंदिर में जाने के बाद उसके शरीर का आभामंडल और मंदिर की सकारात्मकता — वह सकारात्मकता उस चीज को हटाने का प्रयास करेगी, और उसके शरीर में कष्ट होगा।
और जब भी बंधन वाला व्यक्ति, जिस पर भी इस तरह का बंधन लगा है, शुभ शक्तियों के संपर्क में आएगा, तो वह बहुत बेचैन होगा। मंदिर में जाएगा तो वहाँ छटपटाएगा; उसे वहाँ कठिनाई होगी। उसे कठिनाई क्यों होगी? क्योंकि मंदिर में जाने के बाद उसके शरीर का आभामंडल और मंदिर की सकारात्मकता — वह सकारात्मकता उस चीज को हटाने का प्रयास करेगी, और उसके शरीर में कष्ट होगा।
किसी भी तांत्रिक बंधन के दो सबसे अच्छे उपाय क्या हैं?
दत्त माला मंत्र या तंत्रोक्त बजरंग बाण, जीवन भर के लिए
वे कहते हैं कि बंधन से मुक्ति के लिए, आपके शरीर में किसी भी तरह के तांत्रिक बंधन के लिए, दो सबसे अच्छे उपाय हैं। पहला, दत्त माला मंत्र को पकड़कर जीवन में लाइए। दूसरा, तंत्रोक्त बजरंग बाण, पूरा बजरंग बाण, जो चैनल पर दिया गया है। इन दोनों में से कोई एक अनुष्ठान जीवन भर के लिए अपने जीवन में उतार लीजिए, तो कोई तांत्रिक कुछ नहीं कर पाएगा। एक बार ऊर्जा बन जाए और बंधन एक बार टूट जाए, तो आप वह अनुष्ठान बार-बार करते रहेंगे, और फिर चीजें आपके पक्ष में होने लगेंगी।
वे कहते हैं कि बंधन से मुक्ति के लिए, सबसे सामान्य बात — आपके शरीर में किसी भी तरह के तांत्रिक बंधन के लिए — दो सबसे अच्छे उपाय हैं। पहला यह कि आप दत्त माला मंत्र को पकड़कर अपने जीवन में लाइए। दूसरा तंत्रोक्त बजरंग बाण, पूरा बजरंग बाण, जो चैनल पर दिया गया है। इन दोनों में से कोई एक अनुष्ठान जीवन भर के लिए अपने जीवन में उतार लीजिए। कोई तांत्रिक कुछ नहीं कर पाएगा। एक बार ऊर्जा बन जाए, एक बार बंधन टूट जाए, तो आप वह अनुष्ठान बार-बार करते रहेंगे; फिर चीजें आपके पक्ष में होने लगेंगी।
किसी ने घर में तंत्र क्रिया कर दी है — सबसे पहले क्या देखना चाहिए?
यह घर पर है, किसी एक सदस्य पर, या पूरे परिवार पर
इंडिया विकास जी से, जो कहते हैं कि उनके घर में तंत्र क्रिया की गई है, वे कहते हैं कि बहुत सारे उपाय बताए गए हैं और कम से कम एक बार चैनल देखिए, फिर समझ न आए तो जरूर पूछिए। जब भी घर में तंत्र क्रिया की गई हो, तो पहली बात यह है कि वह केवल घर पर की गई है या सदस्यों पर है — किसी एक सदस्य पर है या पूरे घर में परेशानी है।
इंडिया विकास जी से, जिनके घर में तंत्र क्रिया की गई है, वे कहते हैं कि बहुत सारे उपाय बताए गए हैं; कृपया एक बार चैनल देखिए। उसके बाद भी समझ न आए, तो जरूर पूछिए कि कैसे करना है। जब भी किसी घर में तंत्र क्रिया की गई हो, तो पहला प्रश्न यह है कि वह केवल घर पर की गई है या सदस्यों पर है। क्या वह किसी एक सदस्य पर है, या पूरे घर में परेशानी है?
किसी पर तंत्र होने पर वे कौन से दो तरह के मामले देखते हैं?
खुद कुछ कर सकने वाला व्यक्ति, और दूसरों से करवा-करवा कर थका व्यक्ति
वे कहते हैं कि जब किसी पर तंत्र विचार आता है, तो आप दो तरह के मामले देखेंगे। एक, व्यक्ति खुद कुछ करने में सक्षम है। दूसरा, व्यक्ति करवा-करवा कर थक चुका है — कितने ओझा, सोखा, गुनी, तांत्रिक और पंडित जी घर आए, अनुष्ठान करके चले गए, और कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा।
वे कहते हैं, जानते हैं, जब किसी पर तंत्र विचार होता है, तो आप दो तरह के मामले देखेंगे। एक यह कि व्यक्ति खुद कुछ करने में सक्षम है। दूसरा यह कि व्यक्ति करवा-करवा कर थक चुका है। कितने ओझा, सोखा, गुनी, तांत्रिक, पंडित जी घर आए, अनुष्ठान करके चले गए, और कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा।
ऐसे व्यक्ति के लिए उपाय बार-बार असफल क्यों होते हैं?
प्रारब्ध पहले से बना, समय निकल चुका, शत्रु पूरी तरह सक्रिय
वे कहते हैं कि जिन्हें इस तरह की समस्या आती है, उनका प्रारब्ध उसी तरह बन चुका होता है। एक तो, समय पहले ही निकल चुका है। और दूसरी और सबसे बड़ी बात, जो वे बार-बार कहते हैं, यह है कि उनका शत्रु पक्ष पूरी तरह सक्रिय है। शत्रु जितना सक्रिय रहेगा, आपको उतना कष्ट होगा; और यदि आप उस सक्रियता तक नहीं पहुँचे, तो कष्ट आप पर पड़ेगा।
वे कहते हैं कि जिनके साथ इस तरह की समस्या होती है, उनका प्रारब्ध पहले से इसी तरह बन चुका होता है। एक तो, समय निकल चुका है। और दूसरी, सबसे बड़ी बात, जो वे बार-बार कहते हैं, यह है कि उनका शत्रु पक्ष पूरी तरह से सक्रिय है। शत्रु जितना सक्रिय रहेगा, आपको उतना कष्ट होगा; और यदि आप उस सक्रियता तक नहीं पहुँचे, तो कष्ट आप पर आ पड़ेगा।
सच्चे साधक को बहुत जल्दी छोड़ देने पर क्या होता है?
तुरंत परिणाम चाहना और विश्वास छोड़ देना
वे कहते हैं कि वास्तविकता यह है कि यदि आप सच में किसी सही व्यक्ति तक पहुँचे हैं और वह आपके लिए कोई प्रक्रिया कर रहा है, काट-छाँट कर रहा है, आपके लिए तंत्रोक्त क्रियाएँ कर रहा है, और आपको परिणाम नहीं मिलता जबकि आपको तुरंत परिणाम चाहिए — हो सकता है दो-चार दिन में और कुछ परिणाम आ जाता, या अगली बार आ जाता, पर आप विश्वास छोड़कर उसे छोड़ देते हैं। और वहीं परेशानी फिर शुरू हो जाती है। कुछ दिन समस्या से छुटकारा मिलता है, फिर वही होता है, क्योंकि सक्रिय तंत्र का अर्थ है कि शत्रु जितना अपना तंत्र जगाए रखेगा, आपको उतना कष्ट होगा।
वे कहते हैं कि वास्तविकता यह है कि यदि आप सच में किसी सही व्यक्ति तक पहुँचे हैं और वह व्यक्ति आपके लिए कोई प्रक्रिया कर रहा है, काट-छाँट कर रहा है, आपके लिए तंत्रोक्त क्रियाएँ कर रहा है, और आपको परिणाम नहीं मिलता जबकि आपको तुरंत परिणाम चाहिए। हो सकता है दो-चार दिन में और कुछ परिणाम आ जाता, या अगली बार आ जाता; पर आप विश्वास छोड़कर उसे छोड़ देते हैं। और वहीं परेशानी फिर शुरू हो जाती है। कुछ दिन आपको समस्या से छुटकारा मिलता है, फिर वही होता है। क्योंकि सक्रिय तंत्र का अर्थ है कि शत्रु जितना अपना तंत्र जगाए रखेगा, आपको उतना कष्ट होगा।
उच्चाटन क्रिया मन पर क्या करती है?
मन कहीं नहीं लगता, और किसी पर भरोसा नहीं होता
वे कहते हैं कि सबसे बड़ी बात यह है कि यदि उच्चाटन क्रिया की गई है, तो आपका मन किसी भी हाल में कहीं नहीं लगेगा। आप किसी पर भरोसा नहीं कर पाएँगे। यदि आप किसी को धूप-दीप जलाने के लिए सौ रुपये भी दें, तो मन में यह आएगा — हटाओ, उसके पास तो जाना ही नहीं चाहिए, वह मन खराब करता है, ऐसी-ऐसी चीजें करने को कहता है। तो यदि उच्चाटन क्रिया है, तो कठिनाई होगी, और इन सब चीजों से छुटकारा तभी मिलेगा जब आप कुछ करेंगे। और मन उचाट रहे तो आप कुछ भी नहीं कर पाएँगे।
वे कहते हैं कि सबसे बड़ी बात यह है कि यदि उच्चाटन की क्रिया की गई है, तो आपका मन किसी भी हाल में कहीं नहीं लगेगा। आप किसी पर भरोसा नहीं कर पाएँगे। यदि आप किसी को कुछ धूप-दीप जलाने के लिए सौ रुपये भी दें, तो मन में यह आएगा: हटाओ, उसके पास तो जाना ही नहीं चाहिए, वह मन खराब करता है, ऐसी-ऐसी चीजें करने को कहता है। तो यदि उच्चाटन क्रिया है, तो कठिनाई होगी। और इन सब चीजों से छुटकारा तभी मिलेगा जब आप कुछ करेंगे। मन उचाट रहे, तो आप कुछ भी नहीं कर पाएँगे।
जब पक्का हो जाए कि अभिचार हुआ है, तब क्या करना चाहिए?
मनोवैज्ञानिक रूप से विचलित होने के बजाय स्वीकार करके लड़िए
वे कहते हैं कि इसलिए जब भी घर में अभिचार हो, जब यह बात समझ में आ जाए कि आभिचारिक चीजें हो चुकी हैं, तो मनोवैज्ञानिक रूप से विचलित मत होइए, बल्कि यदि बातें सच में वैसी हैं तो स्वीकार करके लड़िए। अपने भीतर इतनी क्षमता रखिए कि युद्ध कर सकें। वह कहाँ से आएगी? जब आप चीजों को समझेंगे और जानेंगे। उनके विचार से इस चैनल के तंत्र से जुड़े बहुत से वीडियो सुनकर हर चीज समझ आएगी और सब कुछ साफ हो जाएगा; उसके बाद लड़िए। सब कुछ दिया गया है।
इसलिए जब भी घर में अभिचार हो, जब यह बात आपकी बुद्धि में आ जाए कि आभिचारिक चीजें हो चुकी हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से विचलित मत होइए; बल्कि यदि वास्तव में ये बातें इसी तरह की हैं, तो स्वीकार कीजिए और लड़िए। अपने भीतर इतनी क्षमता रखिए कि आप युद्ध करें। वह कहाँ से आएगी? जब आप चीजों को समझेंगे, जब उन्हें जानेंगे। उनके विचार से इस चैनल के तंत्र से जुड़े बहुत से वीडियो सुनकर आप हर चीज समझ पाएँगे, और पूरी बात साफ हो जाएगी। उसके बाद लड़िए। सब कुछ दिया गया है।
हनुमान जी ने केवल राम नाम से बड़े-बड़े काम किए, फिर भी लोग उन पर भरोसा नहीं करते
हनुमान जी ने राम नाम से बड़े काम किए, फिर भी लोग उन पर भरोसा नहीं करते
वे कहते हैं कि हनुमान जी केवल राम जी का नाम लेकर इतने बड़े-बड़े काम कर सकते हैं, और फिर भी आप सबको उन्हीं हनुमान जी पर भरोसा ही नहीं है।
वे कहते हैं कि हनुमान जी केवल राम जी का नाम लेकर इतने बड़े काम कर सकते हैं। पर उन्हीं हनुमान जी पर आप सबको भरोसा ही नहीं है।
पूछने पर कि क्या किया है, लोग अब सीधे बगलामुखी या प्रत्यंगिरा से शुरू करते हैं
सीधे बगलामुखी या प्रत्यंगिरा से शुरुआत
वे कहते हैं कि आजकल यदि हम पूछें कि आपने कौन सी साधना की है, तो सबसे पहले यही आता है कि वे भगवती बगलामुखी की साधना कर चुके हैं, या प्रत्यंगिरा साधना कर चुके हैं। वे इतनी बड़ी साधनाएँ सीधे शुरू कर देते हैं — और वे कहते हैं कि ठीक यहीं से कठिनाइयाँ भी पैदा होती हैं।
वे कहते हैं कि आजकल यदि हम किसी से पूछें कि उसने कौन सी साधना की है, तो सबसे पहले यही आता है कि या तो वह भगवती बगलामुखी की साधना कर चुका है या प्रत्यंगिरा साधना कर चुका है। वे इतनी बड़ी साधनाएँ सीधे शुरू कर देते हैं। ठीक यहीं से कठिनाइयाँ भी आती हैं।
सिद्धि के प्रति इतना आकर्षण क्यों है?
अपने अहंकार को संतुष्ट करना और मोटा करना
वे कहते हैं कि सिद्धि का आकर्षण इसलिए है क्योंकि वास्तव में हम सिद्धि इसलिए चाहते हैं कि लोगों में यह बात पहुँचे कि इस व्यक्ति के पास सिद्धि है — अपने मन की संतुष्टि के लिए। ताकि अपना अहंकार संतुष्ट हो और मोटा हो, और लोग हमारे बारे में कहें कि हाँ, इसके पास सिद्धि है।
वे कहते हैं कि सिद्धि का आकर्षण इसलिए है क्योंकि सच में हम सिद्धि इसलिए चाहते हैं कि लोगों में यह बात पहुँचे कि इस व्यक्ति के पास सिद्धि है — अपने मन की संतुष्टि के लिए। ताकि अपना अहंकार संतुष्ट हो, मजबूत हो। कि लोग हमारे बारे में कहें: हाँ, इसके पास सिद्धि है।
क्या खेचरी विद्या बोलकर सिखाई जा सकती है?
योग क्रियाओं के लिए योग में सिद्ध सनातनी गुरु चाहिए
खेचरी विद्या के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि योग की क्रियाएँ बोलकर नहीं बताई जा सकतीं — यह ध्यान रखिए। चाहे खेचरी विद्या हो या कोई और विद्या, खेचरी बिना मुद्रा के केवल विद्या के रूप में सिद्ध नहीं होती। और ये सब करने के लिए आपको योग में सिद्ध किसी सनातनी गुरु के पास जाना होगा; किसी पश्चिमी गुरु के पास इनमें से कुछ नहीं मिलेगा।
खेचरी विद्या के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि योग की क्रियाएँ बोलकर नहीं बताई जा सकतीं; यह ध्यान रखिए। चाहे खेचरी विद्या हो या कोई और विद्या, खेचरी बिना मुद्रा के केवल विद्या के रूप में सिद्ध नहीं होती। और ये सब करने के लिए योग में सिद्ध किसी सनातनी गुरु के पास जाना होगा। किसी पश्चिमी गुरु के पास इनमें से कोई चीज नहीं मिलेगी।
क्या अपने ही परिवार के दुष्ट लोगों के विरुद्ध कुछ करने में दोष है?
धर्म के मार्ग में दुष्टता करने वाले पर किसी भी क्रिया में दोष नहीं
यह पूछे जाने पर कि धर्म के मार्ग में बाधा डालने वाले अपने ही कुल के गलत लोगों का उपचार करने में क्या कोई दोष है, वक्ता उत्तर देते हैं कि जो भी धर्म के मार्ग में दुष्टता करता है — किसी भी तरह से करे, चाहे तंत्र से या किसी और तरह से — उस पर किसी भी तरह की क्रिया करने से किसी भी तरह का दोष नहीं लगता। वे एक व्यक्ति का मैसेज याद करते हैं जिसने पूछा था कि किसी दुष्ट व्यक्ति पर मारण जैसा कर्म करने से दोष लगता है या नहीं। यदि कोई आपकी स्त्री छीन ले, आपका धन हड़प ले, उस तरह की क्रियाएँ करे, आपके मान-सम्मान को कष्ट पहुँचाए, तो वहाँ, वे कहते हैं, तंत्र की निकृष्ट से निकृष्ट प्रक्रिया करने से भी कोई दोष नहीं लगता, क्योंकि कहीं न कहीं आप अपना धर्म निभा रहे हैं।
यह पूछे जाने पर कि धर्म के मार्ग में बाधक बनने वाले अपने ही कुल के गलत लोगों का उपचार करने में क्या कोई दोष है, वे उत्तर देते हैं: जो भी धर्म के मार्ग में कोई दुष्टता करता है, चाहे किसी भी तरह से करे, चाहे तंत्र से करे या किसी और तरह से, उस पर किसी भी तरह की क्रिया करने से किसी भी तरह का दोष नहीं लगता। वे कहते हैं कि एक व्यक्ति ने मैसेज करके ऐसा प्रश्न पूछा था: यदि किसी दुष्ट व्यक्ति पर मारण जैसा कर्म किया जाए, तो उससे कोई दोष लगता है या नहीं? यदि कोई व्यक्ति आपकी स्त्री छीन ले, आपका धन हड़प ले, इस तरह की क्रियाएँ करे, आपके मान-सम्मान को कष्ट पहुँचाए — तो वहाँ तंत्र की निकृष्ट से निकृष्ट प्रक्रिया करने में भी किसी भी तरह का दोष नहीं लगता। क्योंकि कहीं न कहीं आप अपना धर्म निभा रहे हैं।
क्या दत्त माला मंत्र का जप एक ही बैठक में बारह सौ या बारह हजार बार करना जरूरी है?
रोज एक सौ आठ, और ग्यारह दिन का संकल्प
वे उत्तर देते हैं, नहीं, यह जरूरी नहीं, पर करें तो ठीक है। रोज एक सौ आठ का जप कीजिए। कम से कम पाँच से सात दिन के संकल्प के साथ चलिए; ग्यारह दिन लें तो बेहतर, और ग्यारह दिन में ग्यारह सौ पूरे हो जाएँगे। फिर कुछ दिन रुकिए, फिर ग्यारह सौ कीजिए, फिर रुकिए, फिर दोबारा कीजिए। यदि आप जारी रख सकें और इसे आदत बना सकें — एक बार में न कर पाएँ और आपका समय ऐसा हो कि सुबह-शाम कर सकें, तो सुबह चौवन और शाम चौवन कीजिए, या रात में कीजिए। पर इसे जीवन में लाइए।
यह पूछे जाने पर कि क्या गुरु दत्त माला मंत्र का बारह सौ या बारह हजार जप एक ही बैठक में जरूरी है, वे कहते हैं नहीं, जरूरी नहीं, पर करें तो अच्छा है। रोज एक सौ आठ का जप कीजिए। और कम से कम पाँच से सात दिन के संकल्प के साथ चलिए; ग्यारह दिन लें तो बेहतर। ग्यारह दिन में ग्यारह सौ पूरे हो जाएँगे। फिर कुछ दिन रुकिए, फिर ग्यारह सौ कीजिए, फिर रुकिए, फिर दोबारा कीजिए। यदि आप इसे जारी रख सकें, इसे आदत बना लें — एक बार में नहीं कर पाएँगे; यदि आपका समय ऐसा है कि सुबह-शाम कर सकें, तो सुबह चौवन और शाम चौवन कीजिए, या रात में कीजिए। पर इसे अपने जीवन में लाइए।
किसी व्यक्ति को शराब और दूसरे नशों से कैसे छुड़ाएँ?
सामान्य लत बनाम पीने के पीछे की आभिचारिक क्रिया
वे कहते हैं कि यहाँ दो तरह की बातें होती हैं। एक, व्यक्ति को सामान्य तरीके से लत लग गई है; वहाँ विषय अलग हो जाता है। दूसरी, जहाँ आभिचारिक क्रिया जुड़ी है। आभिचारिक क्रिया में यदि आप उसे झटके से छुड़वाएँ, तो उसके सिर को कष्ट होता है; और यदि आप उसे काटते जाएँ, तो जड़ में इतना बुरा तंत्र जुड़ा होता है कि जब व्यक्ति शराब छोड़ेगा, तो उसके शरीर में कोई गंभीर बीमारी जरूर आएगी, क्योंकि उसके साथ पहले से इस तरह की चीजें की जा चुकी हैं। वे कहते हैं कि इसीलिए जब लोग उनसे इस तंत्र की काट पूछते हैं तो वे इसे स्पष्ट नहीं करते — बता भी दें तो वे करेंगे कैसे? ये मलिन तरह के तंत्र हैं।
वे कहते हैं, जानते हैं, आज के समय में यदि आप किसी को शराब से छुड़ाना चाहें, तो सबसे बड़ी बात यह हो जाती है कि यहाँ दो तरह की बातें हैं। एक यह कि किसी व्यक्ति को सामान्य तरीके से लत लगी है; वहाँ विषय अलग हो जाता है। दूसरी वह जहाँ आभिचारिक क्रिया है। आभिचारिक क्रिया में यदि आप उसे झटके से छुड़वाएँ, तो भी उसके सिर में कठिनाई है; और यदि आप उसे काटते जाएँ, तो जान लीजिए कि जड़ में इतना बुरा तंत्र जुड़ा है कि जब व्यक्ति शराब छोड़ेगा, तो उसके कारण उसके शरीर में कोई गंभीर बीमारी जरूर आएगी, क्योंकि उसके साथ पहले से इस तरह की चीजें की जा चुकी हैं। इसीलिए जब लोग उनसे इस तंत्र की काट पूछते हैं, तो वे इस बात को स्पष्ट नहीं करते — क्योंकि बता भी दें तो वे करेंगे कैसे? वे बातें बिल्कुल अलग हो जाती हैं। और सच कहें तो ये मलिन तरह के तंत्र हैं।
परेशान व्यक्ति को छुड़ाने के लिए दत्त माला मंत्र का प्रयोग अभिमंत्रित प्रसाद और किसी वस्तु के उच्चाटन से कैसे करें?
अभिमंत्रित प्रसाद, और व्यक्ति के बजाय वस्तु का उच्चाटन
वे कहते हैं कि सबसे अच्छा यह है कि यदि परेशानी है और आप दत्त माला मंत्र का ग्यारह हजार जप कर चुके हैं, तो उसी मंत्र से प्रसाद अभिमंत्रित करके उन्हें खिलाइए। उच्चाटन किसी वस्तु का भी होता है: तंत्र की प्रक्रिया किसी भी चीज पर काम करती है — यह महातंत्र है। तो इस दत्त माला मंत्र से वह वस्तु लीजिए जो संबंधित व्यक्ति को पसंद हो; खाना तो वह खाता ही होगा।
वे कहते हैं कि सबसे अच्छी बात यह है कि यदि अब परेशानी है — जैसे, यदि आपने दत्त माला मंत्र का ग्यारह हजार जप किया है — तो उसी मंत्र से प्रसाद आदि अभिमंत्रित करके उन्हें खिलाइए। उच्चाटन के लिए, वस्तु का भी उच्चाटन होता है। तंत्र की प्रक्रिया किसी भी चीज पर काम करती है। यह महातंत्र है। तो इस मंत्र से, दत्त माला मंत्र से, वह वस्तु लीजिए जो उस व्यक्ति को पसंद है; मान लेते हैं कि वह खाना तो खाता ही होगा।
सेंधा नमक प्रयोग क्या है?
एक सौ आठ बार अभिमंत्रित सेंधा नमक, ग्यारह दिन भोजन में मिलाया हुआ
वे कहते हैं कि सेंधा नमक होता है: दत्त माला मंत्र से एक सौ आठ करके सेंधा नमक अभिमंत्रित कीजिए। पूरे ग्यारह दिनों के लिए कम से कम सवा सौ ग्राम नमक लाकर रखिए और उसे अभिमंत्रित कीजिए। फिर घर में जो भी स्त्री हो, उससे कहिए कि जब उसे भोजन दिया जाए, तो यह नमक दाल या सब्जी में मिलाकर दिया जाए। पर मंत्र आपने पहले से सिद्ध किया हुआ होना चाहिए, कम से कम तीन से छह महीने अच्छे से जपा हुआ।
वे कहते हैं कि सेंधा नमक होता है। दत्त माला मंत्र से एक सौ आठ करके सेंधा नमक अभिमंत्रित कीजिए। उन पूरे ग्यारह दिनों के लिए कम से कम सवा सौ ग्राम नमक लाकर रख लीजिए, उसे अभिमंत्रित कीजिए। और घर में जो भी स्त्री हो, उससे कहिए कि जब उसे भोजन देना हो, तो यह नमक दाल या सब्जी में मिलाकर देना है। पर मंत्र ऐसा होना चाहिए जिसे आप पहले से सिद्ध कर चुके हों, कम से कम तीन से छह महीने अच्छे से जप चुके हों।
नमक पर की जाने वाली प्रार्थना भगवान दत्तात्रेय से उस व्यक्ति का उस चीज से उच्चाटन माँगती है
भगवान दत्तात्रेय से प्रार्थना और नमक का खत्म होना
वे कहते हैं, यह प्रक्रिया करके देखिए। वहाँ बस इतना कहना है: हे भगवान दत्तात्रेय, ऐसी कृपा कीजिए कि इस व्यक्ति का इस चीज से उच्चाटन हो जाए। आप यह धर्म के मार्ग पर कर रहे हैं। जब आप करके देखेंगे, तो वह नमक खत्म होते-होते व्यक्ति उच्चाटित हो जाएगा। इस तरह घर में जो भी गलत मार्ग पर जा रहा हो, यदि आप साधक हैं तो इन चीजों का ऐसे प्रयोग कर सकते हैं; आपको किसी और के पास जाने की जरूरत नहीं। वे कहते हैं, खुद सक्षम बनिए।
वे कहते हैं, यह प्रक्रिया करके देखिए। वहाँ बस इतना कहना है: हे भगवान दत्तात्रेय, ऐसी कृपा कीजिए कि इस व्यक्ति का इस चीज से उच्चाटन हो जाए। आप यह काम धर्म के मार्ग पर कर रहे हैं। जब आप करके देखेंगे, तो जैसे-जैसे वह नमक खत्म होगा, व्यक्ति उच्चाटित हो जाएगा। इस तरह, आप सब जो सुन रहे हैं — घर में जो भी गलत मार्ग पर जा रहा हो, यदि आप साधक हैं तो इन चीजों का इस तरह प्रयोग कर सकते हैं। आपको किसी और के पास जाने की जरूरत नहीं; खुद सक्षम बनिए और इसका इस तरह प्रयोग कीजिए।
अभिमंत्रण और यंत्र की प्रक्रियाएँ इसलिए नहीं बताई जातीं क्योंकि सक्षम लोग उनके लिए यूट्यूब पर नहीं आते
सक्षम लोग इन्हें खोजने यूट्यूब पर नहीं आएँगे
वे कहते हैं कि अभिमंत्रण करने की प्रक्रिया, और यंत्र आदि का प्रयोग, वे इसलिए नहीं बताते कि उस हद तक सक्षम लोग इसे खोजने शायद ही यूट्यूब पर आएँगे, और सीख भी लें तो शायद ही करेंगे। वे बस सुनकर आगे बढ़ जाएँगे। जिन्हें करना होता है, वे सच में पूछते हैं, और करते भी हैं।
वे कहते हैं कि अभिमंत्रण करने की प्रक्रिया, यंत्र आदि का जो प्रयोग है, वह वे इसलिए नहीं बताते कि उस हद तक सक्षम लोग इसे खोजते हुए शायद ही यूट्यूब पर आएँगे। और सीख भी लें, तो क्या करेंगे? वे बस सुनकर आगे बढ़ जाएँगे। जिन्हें करना होता है, वे सच में पूछते हैं, और करते भी हैं।
हिंदी सप्तशती पाठ का क्रम संस्कृत जैसा ही है, चाहे एक दिन में हो या सात में
संस्कृत जैसा ही क्रम, एक दिन या सात
श्रेयस कापरी जी को वे उत्तर दोहराते हैं: हिंदी में सप्तशती पाठ उसी तरह करना है जैसी संस्कृत में करने की विधि है। एक दिन में करें, तो कवच, अर्गला, कीलक, तेरह अध्याय, और फिर तीनों रहस्य। यदि एक दिन में न कर सकें और सात दिन में करना हो, तो महाविद्या क्रम पाठ की विधि अपनाइए — पहले दिन पहला अध्याय, दूसरे दिन दूसरा और तीसरा अध्याय, और इसी तरह।
श्रेयस कापरी जी से, जिनका प्रश्न हिंदी में सप्तशती पाठ करने की विधि के बारे में था, वे कहते हैं कि उन्होंने उत्तर दिया है और उसे दोहराते हैं। हिंदी में सप्तशती पाठ उसी तरह करना है जैसी संस्कृत में करने की विधि है। यदि एक दिन में किया जाए, तो कवच, अर्गला, कीलक, तेरहवाँ अध्याय और फिर तीनों रहस्य। यदि आप एक दिन में नहीं कर सकते और सात दिन में करना है, तो महाविद्या क्रम पाठ की विधि यह है कि पहले दिन पहले अध्याय का पाठ, दूसरे दिन दूसरे और तीसरे अध्याय का, और इसी तरह होगा।
क्या हिंदी पाठ में शाप उद्धार और उत्कीलन जरूरी है?
ये संस्कृत पाठ के हैं; हिंदी में भाव प्रधान है
वे कहते हैं कि यह प्रश्न भी था: जब हम हिंदी में पाठ करते हैं, तो क्या शाप उद्धार और उत्कीलन की विधि करना जरूरी है? वे उत्तर देते हैं कि वह संस्कृत का पाठ है, और यह जरूरी नहीं, क्योंकि यहाँ भाव पाठ हो रहा है। हिंदी में पढ़ेंगे तो वह मंत्रोक्त पाठ नहीं होगा। इसलिए आपको यह बिल्कुल करने की जरूरत नहीं। निश्चिंत होकर कीजिए; तब भी भगवती पूजा स्वीकार करेंगी, क्योंकि यहाँ मंत्र से ज्यादा भाव प्रधान होगा।
वे कहते हैं कि यह प्रश्न भी था: जब हम हिंदी में पाठ करते हैं, तो क्या शाप उद्धार और उत्कीलन की विधि करना जरूरी है? वह संस्कृत का पाठ है और यह जरूरी नहीं, क्योंकि यहाँ भाव पाठ हो रहा है। जब आप हिंदी में पढ़ेंगे, तो वह मंत्रोक्त पाठ नहीं होगा। तो आपको इसे करने की बिल्कुल जरूरत नहीं। निश्चिंत होकर, ऐसे करेंगे तो भी भगवती पूजा स्वीकार करेंगी, क्योंकि यहाँ आपके लिए मंत्र से ज्यादा भाव प्रधान होगा।
संस्कृत और हिंदी पाठ के भाव में क्या अंतर है?
रोंगटे खड़े होना, और भगवती का रक्त पीना
वे कहते हैं कि संस्कृत उच्चारण से जो भाव आता है, वह अलग तरह से आता है; चीजें मंत्रोक्त होती हैं, और शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। पर वही चीज जब आप हिंदी में करते हैं, तो वह भी भाव प्रधान है। जब आप वह अंश पढ़ते हैं जिसमें भगवती ने मधु पीते हुए कहा — क्षण भर गरज ले, उसके बाद मैं तेरा रक्त पिऊँगी — तो कहते समय आपके भीतर जो भाव आता है, जब रोम-रोम खड़ा हो जाता है, उस भाव से भगवती प्रसन्न होकर कृपा करती हैं। इसलिए इस भ्रम में मत रहिए कि हिंदी में पढ़ेंगे तो कोई फल नहीं मिलेगा; जगदंबा उतनी ही कृपा करेंगी।
वे कहते हैं कि संस्कृत में उच्चारण करने से जो भाव आता है, वह अलग तरह से आता है। चीजें मंत्रोक्त होती हैं; शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। और वही चीज जब आप हिंदी में भी करते हैं, तो वह होती है — क्योंकि वहाँ भाव प्रधान है। जब आप वह अंश पढ़ते हैं जिसमें भगवती ने मधु पीते हुए कहा कि तू क्षण भर गरज ले, उसके बाद मैं तेरा रक्त पिऊँगी — तो कहते हुए आपके भीतर जो भाव उठता है, जब रोम-रोम खड़ा हो जाता है, उस भाव से भगवती प्रसन्न होकर कृपा करती हैं। इसलिए इस भ्रम में मत रहिए कि हिंदी में पढ़ेंगे तो कोई फल नहीं मिलेगा। जगदंबा उतनी ही कृपा करेंगी, और उनकी कृपा से ही आप संस्कृत में भी पढ़ने योग्य हो जाएँगे। जब वे भगवती विद्या दात्री आपको एक तिनके भर भी कृपा देंगी, तो संस्कृत का उच्चारण स्पष्ट आने लगेगा।
शास्त्र क्या कहता है
The Goddess, drinking wine, tells Mahiṣa to roar a moment longer, for once she kills him the gods will soon roar.
The speaker paraphrases it as "I shall drink your blood"; the verse speaks of wine and of the gods' roar.
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गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम् । मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥ ३८ ॥
“अरे मूढ़! जब तक मैं मधु पीती हूँ, तब तक क्षणभर गरज ले, गरज ले। मेरे हाथों यहीं तेरे मारे जाने पर शीघ्र ही देवता गरजेंगे।”
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समय के साथ सप्तशती के साधक के साथ क्या हो सकता है?
सात सौ मंत्र कंठस्थ, और नींद में माथे पर दिखता मंत्र
वे कहते हैं कि साधक के जीवन में एक समय ऐसा भी आता है जब सप्तशती के सात सौ मंत्र भी याद हो जाते हैं, और वह बिना देखे पढ़ने लगता है। यहाँ भी बहुत से साधक होंगे जो कभी-कभी अपने जीवन में देखते हैं कि जब वे एक मंत्र बार-बार पढ़ते हैं, तो सोते समय वह मंत्र उनके माथे पर दिखाई देता है। ऐसा भी होता है। ये बातें तब होती हैं जब वे शक्तियाँ कृपा करती हैं, जब वह मंत्र आपके तन-मन में घुल जाता है।
वे कहते हैं कि साधक के जीवन में एक समय ऐसा भी आता है जब सप्तशती के सात सौ मंत्र भी कंठस्थ हो जाते हैं। वह बिना देखे पढ़ने लगता है। यहाँ भी बहुत से साधक होंगे जो कभी-कभी अपने जीवन में देखते हैं कि जब वे एक मंत्र बार-बार पढ़ते हैं, तो सोते समय वह मंत्र उनके माथे पर दिखता है। ऐसा भी होता है। तो ये बातें कब होती हैं? जब वे शक्तियाँ कृपा करती हैं, जब वह मंत्र आपके तन-मन में घुल जाता है। इसलिए निश्चिंत होकर यह प्रक्रिया कीजिए।
नरसिंह का सबसे शक्तिशाली मंत्र कौन सा है?
शताक्षरी, जो चैनल पर दिया गया है
अनुभव तिवारी जी के पूछने पर कि नरसिंह का शक्तिशाली मंत्र कौन सा है, वे उत्तर देते हैं: शताक्षरी। यह इसी चैनल पर दिया गया है; चैनल पर नरसिंह शताक्षरी मंत्र खोजिए, वह दिया गया है। आप सब इसे कर सकते हैं।
यह पूछे जाने पर कि नरसिंह का शक्तिशाली मंत्र कौन सा है, वे उत्तर देते हैं: शताक्षरी। यह इसी चैनल पर दिया गया है। अनुभव तिवारी जी चैनल पर नरसिंह शताक्षरी मंत्र खोजें, वह दिया गया है। आप सब इसे कर सकते हैं।
क्या गुरु गोरखनाथ जी को गुरु मानकर पूजा की जा सकती है?
हाँ में एक छोटा उत्तर
यह पूछे जाने पर कि क्या गुरु गोरखनाथ जी को गुरु मानकर पूजा की जा सकती है, वे उत्तर देते हैं कि बिल्कुल की जा सकती है।
यह पूछे जाने पर कि क्या गुरु गोरखनाथ जी को गुरु मानकर पूजा की जा सकती है, वे उत्तर देते हैं कि बिल्कुल की जा सकती है।
सवा लाख नवार्ण अनुष्ठान में क्या नवग्रह और षोडश मातृका मंडल जरूरी हैं?
अखंड दीपक, और हर पूजन घट पर ही
राजू आचार्य जी पूछते हैं कि नवरात्रि में नवार्ण मंत्र के सवा लाख जप के लिए क्या घट स्थापना के साथ नवग्रह मंडल और षोडश मातृका मंडल स्थापित करने जरूरी हैं, और क्या इनकी रोज पूजा करनी है। वे उत्तर देते हैं कि यदि आप सवा लाख का अनुष्ठान करने जा रहे हैं, तो कम से कम, और कुछ नहीं तो, अखंड दीपक जरूर जलाइए। मंडलों के बारे में: यदि आप घट स्थापना करते हैं, तो सारी पूजा उसी घट पर कीजिए। अलग मंडल बनाने की जरूरत नहीं — षोडश मातृका पूजन घट पर कीजिए, नवग्रह पूजन घट पर कीजिए, और रोज की पूजा भी उसी पर कीजिए, केवल नाम से, "नवग्रहेभ्यो नमः यथा उपलब्ध उपचारम् समर्पयामि" कहकर एक फूल चढ़ाइए; पर नाम से जरूर चढ़ाइए।
एक बार घट स्थापना कर लें, तो क्या उसे दोहराना बाध्य हो जाता है?
पाँच वर्ष तक उसी नवरात्रि में भगवती को फिर बुलाना
वे कहते हैं कि वे बार-बार कहते हैं — अब तक मिली सारी शिक्षा-दीक्षा और जो भी गुरु कृपा है, उससे उन्होंने यह जाना है: यदि आप किसी नवरात्रि में घट स्थापना करते हैं, तो अगले साल वह नवरात्रि फिर आने पर उसमें भी घट स्थापना करनी पड़ेगी, और यह पाँच वर्ष तक करनी चाहिए। नियम यह माना जाता है कि पाँच वर्ष तक आप उस नवरात्रि में भगवती को बार-बार बुलाएँगे, और घर की शक्तियाँ वहाँ जागृत रहती हैं। इसलिए यदि आप गुप्त नवरात्रि में घट स्थापना करते हैं, तो हर साल उसी गुप्त नवरात्रि में बार-बार घट स्थापना करनी चाहिए। यदि नहीं करते, तो अखंड दीप जलाइए।
यदि आप घट स्थापना करना चाहते हैं, यदि गुप्त नवरात्रि में करते हैं, तो वे बार-बार कहते हैं: अब तक जिन लोगों के साथ वे रहे, उनसे जो भी शिक्षा-दीक्षा मिली, जो भी गुरु कृपा प्राप्त हुई, उससे उन्होंने यह जाना है। यदि आप किसी भी नवरात्रि में घट स्थापना करते हैं, तो फिर अगले साल जब वह नवरात्रि आएगी, उसमें भी घट स्थापना करनी पड़ेगी, और यह पाँच वर्ष तक करनी चाहिए। यह कौन सा नियम माना जाता है? कि पाँच वर्ष तक आप उस नवरात्र में भगवती को बार-बार बुलाएँगे। घर की शक्तियाँ वहाँ जागृत रहती हैं। इसलिए यदि आप गुप्त नवरात्रि में घट स्थापना करते हैं, तो हर साल उसी गुप्त नवरात्रि में आपको बार-बार घट स्थापना करनी चाहिए। यदि आप नहीं करते, तो अखंड दीप जलाइए।
क्या गृहस्थ पूजा में शंख रख सकता है, या केवल पंडित?
हर घर में शंख और ठीक-ठाक घंटी, और स्त्रियों के लिए नियम
वे उत्तर देते हैं कि हर घर में शंख होना चाहिए, और एक-एक घर में शंख और घंटी होनी चाहिए। और छोटी टुनटुनाने वाली घंटी मत रखिए — अच्छी घंटी रखिए जिसे पूरा पकड़कर अच्छे से बजा सकें, जो मुट्ठी भर जाए। शंख भी ऐसा रखिए जिसे आप अच्छे से बजाना जानते हों; सबको शंख बजाना चाहिए। स्त्रियों के लिए अलग-अलग समय पर निषेध है, क्योंकि अलग-अलग समय पर शरीर पर प्रभाव अलग होता है; पुरुष हमेशा बजा सकते हैं।
वे कहते हैं कि हर घर में शंख होना चाहिए। एक-एक घर में शंख और घंटी होनी चाहिए। और छोटी टुनटुनाने वाली घंटी मत रखिए; अच्छी घंटी रखिए जिसे पूरा पकड़कर अच्छे से बजाएँ, जो पूरी मुट्ठी से पकड़ने लायक हो। अच्छी घंटी रखिए, और शंख भी ऐसा रखिए कि आप उसे अच्छे से बजाना जानते हों; सबको शंख बजाना चाहिए। स्त्रियों के लिए अलग-अलग समय पर निषेध है, क्योंकि शरीर पर अलग प्रभाव पड़ता है; पुरुष हमेशा बजा सकते हैं।
कई स्तोत्र सिद्ध हो जाएँ, तो क्या सबका रोज पाठ जरूरी है?
हर एक के लिए सप्ताह का एक दिन, और वार्षिक हवन
मोहित जी को वे एक उदाहरण से उत्तर देते हैं: मान लीजिए किसी ने अर्गला कवच का पाठ सिद्ध किया, दत्तात्रेय माला मंत्र सिद्ध किया, हनुमान जी का कोई स्तोत्र सिद्ध किया, काली जी का हृदय कवच सिद्ध किया, बटुक भैरव का हृदय कवच सिद्ध किया — तो अब चार-पाँच स्तोत्र सिद्ध हैं। यदि रोज समय न मिले, तो जिन-जिन देवी-देवताओं का कवच या स्तोत्र सिद्ध किया है, उन सबका नाम लीजिए, और सप्ताह में किसी एक दिन हर एक का पाठ जरूर कीजिए। भैरव जी का करना है तो रविवार को; दत्तात्रेय माला मंत्र गुरुवार को। सप्ताह में एक बार होना चाहिए, और किसी समय वार्षिक हवन जरूर होना चाहिए।
वे कहते हैं कि आप जितने स्तोत्र सिद्ध करें — मान लीजिए किसी व्यक्ति ने अर्गला कवच आदि का पाठ सिद्ध किया, दत्तात्रेय माला मंत्र सिद्ध किया, हनुमान जी का कोई स्तोत्र सिद्ध किया, काली जी का हृदय कवच सिद्ध किया, बटुक भैरव का हृदय कवच सिद्ध किया। तो अब चार-पाँच स्तोत्र सिद्ध हो गए। यदि आपको रोज समय नहीं मिलता, तो जिस-जिस देवी-देवता का कवच या स्तोत्र आपने सिद्ध किया है, हर एक का नाम लीजिए, और सप्ताह में किसी एक दिन उनका पाठ जरूर कीजिए। भैरव जी का करना है तो रविवार को कीजिए, सप्ताह में एक दिन का पाठ। गुरु जी का दत्तात्रेय माला मंत्र गुरुवार को कीजिए। सप्ताह में एक बार होना चाहिए; और फिर किसी न किसी समय वार्षिक हवन जरूर होना चाहिए।
किसी देवी या देवता को अपना गुरु कैसे बनाएँ?
गुरु मंडल को गुरु बनाना सबसे आसान
राकेश दुबे जी, जो पूछते हैं कि देवी या देवता को गुरु कैसे बनाएँ, उन्हें वे उत्तर देते हैं कि यह वे पहले स्पष्ट कर चुके हैं: आप जिसे भी गुरु बनाएँ, गुरु मंडल को गुरु बनाना सबसे आसान है। क्योंकि कहीं न कहीं हमारे देवी-देवताओं ने वह शक्ति-सिद्धि या वह तत्व ऐसे दिया है कि गुरु स्वरूप में वे इस पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं, और उसी वातावरण में व्याप्त हैं जिसमें हम जी रहे हैं। इसलिए उन्हें अपना गुरु बनाइए; सबसे अच्छा होगा किसी एक शुद्ध पुरुष को अपना गुरु बनाना। वे कहते हैं कि यदि लोग चाहें तो इन सबके नामों पर एक-एक करके पूरे मंत्र विधान के साथ अलग वीडियो बनाएँगे। वे उनसे कहते हैं, भौतिक गुरु के लिए भटकिए मत।
देवी-देवता को गुरु कैसे बनाएँ, इस प्रश्न पर वे कहते हैं कि यह विषय वे पहले स्पष्ट कर चुके हैं: आप जिसे भी गुरु बनाएँ, गुरु मंडल को गुरु बनाना सबसे आसान है। क्योंकि कहीं न कहीं हमारे देवी-देवताओं द्वारा ही वह शक्ति-सिद्धि या वह तत्व दिया गया है, कि गुरु स्वरूप में वे इस पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं, और उस वातावरण में व्याप्त हैं जिसमें हम जी रहे हैं। इसलिए उन्हें अपना गुरु बनाइए; सबसे अच्छा होगा किसी एक शुद्ध पुरुष को अपना गुरु बनाना। वे कहते हैं कि यदि लोग चाहें, तो इन सब गुरुओं के नामों पर एक-एक करके पूरे मंत्र विधान के साथ अलग वीडियो बनाएँगे। भौतिक गुरु के लिए भटकिए मत।
माँ की कृपा से गद्दी आई है पर नियम नहीं पता — क्या करना चाहिए?
त्रिवाचा, दरबार लगाने से पहले सवा साल, और बाधा बनता दरबार
नीलम जी से वे कहते हैं कि सबसे पहले यह देखिए कि जो गद्दी आई है, वह गुरु परंपरा की पारंपरिक गद्दी है या नहीं। यदि आपकी माँ ने दी है, तो वही विधि-विधान चलाइए जो पहले से चल रहा होगा। दूसरे, यदि आप इसे आगे बढ़ाना और दरबार लगाना चाहती हैं और बिल्कुल स्थापित नहीं हैं, तो पहले कुछ समय साधना आदि करनी चाहिए। त्रिवाचा लेने के बाद भी कम से कम सवा साल दरबार नहीं लगाना चाहिए; बल्कि अपनी सिद्धियाँ बढ़ानी चाहिए। और उनका अपना अनुभव, वे कहते हैं, यह है कि दरबार लगाना कहीं न कहीं साधक की प्रगति में बहुत बड़ी बाधा बन जाता है। यदि आप बस यह चाहती हैं कि गद्दी से किसी पर कृपा पहुँचे और उसका कल्याण हो, तो साथ में ऐसी साधनाएँ करनी चाहिए, या ऐसा विधि-विधान रखना चाहिए, कि आपकी अपनी प्रगति में किसी भी तरह की बाधा न बने।
वे नीलम जी से कहते हैं, एक बात ध्यान रखिए: सबसे पहले, यदि गद्दी आई है, तो क्या वह गुरु परंपरा की पारंपरिक गद्दी है? यदि आपकी माँ ने आपको दी है, तो विधि-विधान पहले से चल रहा होगा, और आप वही चलाएँगी। दूसरे, यदि आप इसे आगे बढ़ाना चाहती हैं, दरबार आदि लगाना चाहती हैं, और आप बिल्कुल स्थापित नहीं हैं, तो पहले कुछ समय साधना आदि करनी चाहिए। त्रिवाचा लेने के बाद भी कम से कम सवा साल दरबार नहीं लगाना चाहिए; बल्कि अपनी सिद्धियाँ बढ़ानी चाहिए। दूसरी बात यह है कि उनके अनुसार, या जैसा उनका अनुभव कहता है, दरबार लगाना एक ऐसा विषय है जो कहीं न कहीं साधक की प्रगति में बहुत बड़ी बाधा बन जाता है। यदि आप बस यह चाहती हैं कि गद्दी से किसी पर कृपा आए और उसका कल्याण हो, तो उसके साथ ऐसी साधनाएँ करनी चाहिए, या ऐसा विधि-विधान रखना चाहिए, कि आपकी प्रगति में किसी भी तरह की बाधा न बने। उसे इसी तरह चलाइए।
काली जी और भैरव जी की साथ पूजा हो, तो कौन सा भोग लगाना चाहिए?
मीठा भोग, शनिवार को दही बड़ा, और रोज लौंग-इलायची
केशव मिश्रा जी को वे उत्तर देते हैं कि आप कोई भी मीठी चीज भोग में लगा सकते हैं — ऐसा क्या है जो वे भोग में स्वीकार न करें? काली जी और भैरव जी को मीठा भोग लगाइए। यदि घर में पूजा करते हैं, तो शनिवार को उड़द के बड़े बनाकर भैरव जी को दही बड़े का भोग लगा सकते हैं, और भगवती को लड्डू जैसी कोई भी मीठी चीज का भोग दे सकते हैं। रोज किशमिश, काजू या जो भी आप कर सकें — बताशे — और रोज लौंग और इलायची जरूर चढ़ानी चाहिए।
वे कहते हैं कि कोई भी मीठी चीज भोग में लगाई जा सकती है। ऐसा क्या है जो वे भोग में स्वीकार न करें? काली जी और भैरव जी को मीठा भोग लगाइए। यदि आप घर में पूजा करते हैं, तो शनिवार को उड़द के बड़े बनाकर भैरव जी को दही बड़े का भोग लगा सकते हैं, और भगवती को कोई भी मीठी चीज, लड्डू आदि का भोग दे सकते हैं। रोज किशमिश, काजू या जो भी आप कर सकें, बताशे; और रोज लौंग और इलायची जरूर चढ़ानी चाहिए।
तामसिक साधना क्या है?
साधना में मांस और मदिरा, और श्मशानिक हवन
वे उत्तर देते हैं कि तामसिक साधना का अर्थ है वह साधना जिसमें हम मांस, मदिरा आदि का प्रयोग करते हैं। जैसे भैरव जी की साधना, या भगवती बगला की साधना, जहाँ आहुति मद्य से, यानी मदिरा से होती है। बहुत सी श्मशानिक साधनाएँ हैं जिनमें कलेजी से, मांस से, इन सब चीजों से हवन होता है। वह तामसिक प्रकृति की साधना हो जाती है। तामसिक भोग के बारे में, वे कहते हैं, यदि आप बंगाल की ओर जाएँ, तो वहाँ लक्ष्मी जी को भी मछली का भोग लगता है।
वे कहते हैं कि तामसिक साधना का अर्थ है वह जिसमें हम मांस, मदिरा आदि का प्रयोग करते हैं। जैसे भैरव जी की साधना होती है, या जैसे भगवती बगला की साधना में आहुति मद्य से, यानी मदिरा से होती है। बहुत सी श्मशानिक साधनाएँ हैं जिनमें कलेजी से, इन सब चीजों से, मांस आदि से हवन होता है। वह तामसिक प्रकृति की साधना हो गई। तामसिक भोग के बारे में, यदि आप बंगाल की ओर जाएँ, तो वहाँ लक्ष्मी जी को भी मछली का भोग लगाया जाता है।
मकर संक्रांति पर छूटी दत्तात्रेय साधना गुप्त नवरात्र की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक की जा सकती है
गुप्त नवरात्र की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक
अनिल सोनारा जी, जो कोविड के कारण मकर संक्रांति पर दत्तात्रेय साधना शुरू नहीं कर पाए, पूछते हैं कि क्या इसे प्रतिपदा से शुरू कर सकते हैं। वे उत्तर देते हैं, हाँ, बिल्कुल — गुप्त नवरात्र से पूर्णिमा तक कीजिए; प्रतिपदा से पूर्णिमा तक साधना कीजिए।
अनिल सोनारा जी, जो कोविड के कारण मकर संक्रांति पर दत्तात्रेय साधना शुरू नहीं कर पाए, पूछते हैं कि क्या इसे प्रतिपदा से शुरू कर सकते हैं; वे उत्तर देते हैं, बिल्कुल। गुप्त नवरात्र से पूर्णिमा तक कीजिए। प्रतिपदा से पूर्णिमा तक साधना कीजिए।
गाँवों के देवी-देवताओं को सिद्ध करने से क्या होता है?
लौकिक देवता, भगताई का क्षेत्र, और क्या शक्ति बंधन फिर भी संभव है
यह पूछे जाने पर कि लोग गाँवों में जो देवी-देवता सिद्ध करते हैं उनसे क्या होता है, और क्या तब शक्ति बंधन संभव नहीं होगा, वे कहते हैं कि गाँवों में सिद्ध किए जाने वाले देवी-देवता लौकिक देवी-देवता हैं। शक्ति बंधन संभव होगा या नहीं, यह निर्भर करता है। जो केवल देवता सिद्ध करते हैं, उनका भगतवाल अलग तरह से चलता है, भगताई का क्षेत्र चलता है, और वह बहुत सी चीजों पर निर्भर करता है; विषय बिल्कुल अलग हो जाता है। वे कहते हैं कि बंधन तो होगा ही — ऐसा नहीं कि बंधन संभव नहीं होगा।
वे कहते हैं कि लोग गाँवों में जो देवी-देवता सिद्ध करते हैं, वे लौकिक देवी-देवता हैं। शक्ति बंधन संभव होगा या नहीं, यह निर्भर करता है। जो केवल देवता सिद्ध करते हैं, उनका भगतवाल अलग तरह से चलता है, भगताई का क्षेत्र चलता है, और वे बहुत सी चीजों पर निर्भर करते हैं। वह विषय बिल्कुल अलग हो जाता है; पूरा विषय स्पष्ट होने पर वे बता सकते हैं। वे कहते हैं कि बंधन तो होगा ही — ऐसा नहीं कि बंधन संभव नहीं होगा।
लंबे और स्वस्थ जीवन के लिए वे कौन सा उपाय बताते हैं?
योग मार्ग, और प्राणायाम विधि से इष्ट मंत्र
सुरसेन सुधांशु जी, जो लंबे और स्वस्थ जीवन के लिए कोई आजमाया हुआ उपाय या साधना माँगते हैं, उन्हें वे उत्तर देते हैं: योग मार्ग अपनाइए। योग के मार्ग पर चलते हुए योग की क्रियाओं के साथ की जाने वाली मंत्र-संबंधी साधनाएँ लाइए। यदि वह भी न कर सकें, तो जो भी आपका मूल मंत्र, गुरु मंत्र या इष्ट मंत्र है, उसे प्राणायाम विधि से करना सीखिए। न केवल प्राणायाम करना है, न केवल मंत्र जप; दोनों को तालमेल में रखकर चलेंगे तो होगा। यौगिक क्रिया के साथ साधना कीजिए — यह सबसे अच्छा है, दोनों चीजें साथ होती हैं, आपका मंत्र जप बढ़ता है, तपोबल बढ़ता है, और शरीर पर भी प्रभाव पड़ता है।
सुरसेन सुधांशु जी से, जो लंबी आयु चाहते हैं और स्वस्थ रहना चाहते हैं, वे कहते हैं: योग मार्ग अपनाइए। योग मार्ग पर चलते हुए योग की क्रियाओं के साथ की जाने वाली मंत्र-संबंधी साधनाएँ लाइए। यदि वह भी न कर सकें, तो जो भी आपका मूल मंत्र, गुरु मंत्र या इष्ट मंत्र है, उसे प्राणायाम विधि से करना सीखिए। न केवल प्राणायाम करना है, न ही केवल मंत्र जप करना है; दोनों को तालमेल में लाकर चलेंगे, तब होगा। यौगिक क्रिया के साथ साधना कीजिए; यह सबसे अच्छा है। दोनों चीजें साथ होती हैं — आपका मंत्र जप बढ़ता है, तपोबल बढ़ता है, और शरीर पर भी प्रभाव पड़ता है।
यदि शरीर में कुछ खेलता हो और जप-पूजा न करने दे, तो क्या करें?
सहायता लीजिए, मंदिर में कीजिए, और हनुमान प्रयोग
वे कहते हैं कि जब शरीर में कुछ खेल रहा हो और पूजा न करने दे, तो पहले किसी की सहायता लेनी चाहिए; वहाँ आप खुद नहीं सँभाल पाएँगे। जब शरीर पर कोई जाग्रत चीज आती है, तो आप बहुत कुछ नहीं कर पाएँगे, और करें भी तो घर में नहीं, मंदिर में कीजिए। इसमें हनुमान जी का प्रयोग सबसे अच्छा है; विधान चैनल पर दिया गया है। यदि कोई उपलब्ध न हो, तो उन प्रयोगों को करके आप इससे मुक्त हो सकते हैं। पर यदि बहुत बड़ी चीज है और आप यह जानते हैं, तो खुद करने के बजाय किसी और से करवाइए।
वे कहते हैं कि जब शरीर में खेल रहा हो और पूजा न करने दे, तो सबसे पहले किसी न किसी की सहायता लेनी चाहिए। वहाँ आप अपने से नहीं कर पाएँगे। जब शरीर पर कोई जाग्रत चीज आती है, तो आप ज्यादा कुछ नहीं कर पाएँगे, और करें भी, तो घर में नहीं, मंदिर में कीजिए। इसमें हनुमान जी का प्रयोग सबसे अच्छा है। उसका विधान उन्होंने चैनल पर दिया है। यदि आपको कोई नहीं मिल रहा, तो उन प्रयोगों को करके आप इससे छुटकारा पा सकते हैं। पर यदि बहुत बड़ी चीज है और आप यह जानते हैं, तो खुद करने के बजाय किसी और व्यक्ति से करवाइए।
यदि परिवार का ही कोई सदस्य अभिचार कर रहा हो, तो क्या?
अभिचार करने वाले के साथ एक ही घर में रहना
एक श्रोता कहता है कि घर वालों ने ही ऐसा कुछ कर दिया है कि कोई काम नहीं बनता, लोग घर छोड़ रहे हैं, और गरीबी बनी हुई है — यानी घर का ही कोई व्यक्ति शरीर पर तांत्रिक प्रक्रिया या आभिचारिक कर्म कर रहा है। वे उत्तर देते हैं कि यदि परिवार का ही कोई व्यक्ति अभिचार कर्म करता है, तो स्थिति बिल्कुल अलग हो जाती है। यदि आप अभिचार क्रिया करने वाले के साथ परिवार में रह रहे हैं, तो यह बहुत ही कठिन हो जाता है; तब आप कुछ भी नहीं कर पाएँगे। वे पूछते हैं, आप करेंगे कैसे?
वे कहते हैं कि सबसे बड़ी बात यह है कि यदि परिवार का ही कोई व्यक्ति अभिचार कर्म करता है, तो स्थिति बिल्कुल अलग हो जाती है। यदि आप अभिचार क्रिया करने वाले के साथ परिवार में रह रहे हैं, तो वहाँ बहुत कठिन हो जाएगा। तब आप कुछ भी नहीं कर पाएँगे। आप करेंगे कैसे?
यदि कोई मृत व्यक्ति परेशान करे, तो क्या करना चाहिए?
तंत्रोक्त बजरंग बाण पाँच बार, और गीता का ग्यारहवाँ अध्याय
वे उत्तर देते हैं कि रोज रात सरसों के तेल का दीपक जलाकर सामान्य विधान से तंत्रोक्त बजरंग बाण का पाँच बार पाठ कीजिए। और मृत व्यक्ति परेशान क्यों कर रहा है? कहीं न कहीं उसकी सद्गति नहीं हुई। इसके लिए भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करना चाहिए, और यदि विधि-विधान से उसका पिंड दान भी करें तो सबसे अच्छा होगा। वे कहते हैं, उसकी गति करवाइए।
वे कहते हैं कि तंत्रोक्त बजरंग बाण कीजिए, रोज रात सरसों के तेल का दीपक जलाकर, सामान्य विधान से पाँच बार। और मृत व्यक्ति परेशान क्यों कर रहा है? कहीं न कहीं उसकी सद्गति नहीं हुई। तो इसके लिए भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करना चाहिए, और यदि विधि-विधान से उसका पिंड दान आदि करें, तो सबसे अच्छा होगा। उसकी गति करवाइए।
क्या गुप्त नवरात्रि में कामाख्या और कुलदेवी दोनों की पूजा हो सकती है?
किसी एक पर ही टिकने की जरूरत नहीं
वे कहते हैं कि गुप्त नवरात्रि में आप भगवती कामाख्या की साधना भी बिल्कुल कर सकते हैं, और कुलदेवी महाकाली की भी कर सकते हैं। जरूरी नहीं कि इनमें से केवल एक ही करें।
वे कहते हैं कि गुप्त नवरात्रि में आप भगवती कामाख्या की साधना बिल्कुल कर सकते हैं। कुलदेवी महाकाली की भी कर सकते हैं। जरूरी नहीं कि आप इनमें से केवल कोई एक ही करें।
क्या कवच, अर्गला और कीलक संस्कृत में और अध्याय हिंदी में पढ़ सकते हैं?
एक ही पाठ में दोनों भाषाओं का मेल
वे उत्तर देते हैं, हाँ, हो सकता है, कोई कठिनाई नहीं। यदि हम कवच, अर्गला और कीलक संस्कृत में करें क्योंकि वे हमें आते हैं, और बाकी हिंदी में करना चाहें, तो वह भी हो सकता है। और तीनों रहस्य चाहें तो संस्कृत में कीजिए, चाहें तो हिंदी में। संस्कृत और हिंदी में कोई कठिनाई और कोई दोष नहीं; मन से संदेह निकाल दीजिए। संस्कृत अच्छी आती है तो कीजिए; नहीं आती, तो हिंदी में कीजिए।
वे कहते हैं, हाँ, हो सकता है, कोई कठिनाई नहीं। यदि हम कवच, अर्गला और कीलक संस्कृत में करें क्योंकि वे हमें आते हैं, और बाकी हिंदी में करना चाहें, तो वह भी हो सकता है। और फिर तीनों रहस्य जो आपके पास हैं — वे चाहें तो संस्कृत में कीजिए, चाहें तो हिंदी में। संस्कृत में और हिंदी में कोई कठिनाई और कोई दोष नहीं है। मन से संदेह निकाल दीजिए। संस्कृत आपको अच्छी आती है तो कीजिए; नहीं आती, तो हिंदी में कीजिए।
क्या शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा पर वीडियो संभव है?
आसान नहीं, और घर में प्राण प्रतिष्ठा की जरूरत नहीं
मेहर जी को वे उत्तर देते हैं कि शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा इतनी आसान नहीं, और वह इस तरह नहीं होती। यदि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा करनी है, तो पूरा विधि-विधान करवाना चाहिए; और वीडियो तभी संभव है जब कहीं प्राण प्रतिष्ठा हो रही हो और उसे शूट करके डाला जाए। यदि आप घर के लिए पूछ रहे हैं, तो बात अलग है — घर में प्राण प्रतिष्ठा की बिल्कुल जरूरत नहीं।
वे कहते हैं कि शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा इतनी आसान नहीं, और वह ऐसे नहीं होती। यदि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा करनी है, तो पूरा विधि-विधान करवाना चाहिए। फिर यह तभी संभव है जब कहीं प्राण प्रतिष्ठा हो रही हो और वीडियो शूट करके डाला जाए। यदि आप घर के लिए पूछ रहे हैं, तो वह अलग बात है। घर में प्राण प्रतिष्ठा की बिल्कुल जरूरत नहीं है। शुभम जी से, जिन्हें उनके घर का ही कोई मृत सदस्य परेशान कर रहा है, वे कहते हैं कि उसका अंतिम संस्कार आदि विधि-विधान से नहीं हुआ होगा; कृपया वे सारे विधि-विधान ठीक से करवाइए।
पिशाचिनी को काबू में कैसे करें?
उनका इनकार, और भूत पिसाच निकट नहिं आवै
सचिन कुमार भोपचे जी से वे पूछते हैं कि पिशाचिनी को काबू में करना ही क्यों है — कोई कठिनाई है, या आप चीजें सिद्ध करने के चक्कर में पड़ गए हैं? वे कहते हैं, इनमें से किसी चीज में मत पड़िए; इनसे मुक्त होइए। "भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥" — आप लोग कहाँ पड़ रहे हैं? वे यह भी बताते हैं कि गायत्री मंत्र पर वीडियो बन गया है और अपलोड होगा।
पिशाचिनी को काबू में कैसे करें, इस प्रश्न पर वे सचिन कुमार भोपचे जी से पूछते हैं कि पिशाचिनी को काबू में क्यों करना है। कोई कठिनाई है, या आप चीजें सिद्ध करने के चक्कर में पड़ गए हैं? इनमें से किसी चीज में मत पड़िए। इनसे मुक्त होइए। भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥ — आप सब कहाँ पड़ रहे हैं?
ब्रह्म शक्ति के विरुद्ध कौन सी गायत्री काम करती है?
उनका सीधा कथन कि वहाँ गायत्री कभी काम नहीं करती
प्रशांत द्विवेदी जी से वे साफ कहते हैं कि ब्रह्म शक्ति के विरुद्ध गायत्री कभी भी काम नहीं करती। वे कहते हैं कि यह तंत्र का विषय है, वैदिक विषय नहीं। आज के समय में किसी के पास इतना समय नहीं कि गायत्री का संपुट पाठ करे, या बीजात्मक गायत्रियों का विधि-विधान से पाठ करे, क्योंकि सबको अपना काम-धंधा करना है और उसके ऊपर ये सब चीजें। इसलिए यदि आप यह अपेक्षा करते हैं कि मूल गायत्रियों की प्रक्रिया से ब्रह्म शांत हो जाए, तो आज के समय में उनका अपना अनुभव बिल्कुल अलग रहा है, और लोग किताबों में जो पढ़ते-सुनते हैं उससे भी बिल्कुल अलग।
वे कहते हैं, साफ कह दें: ब्रह्म शक्ति के विरुद्ध गायत्री कभी भी काम नहीं करती। यह तंत्र का विषय है; यह वैदिक विषय नहीं है। जहाँ तक सामान्य गायत्री का प्रश्न है — आज के समय में किसी के पास इतना समय नहीं कि वह गायत्री का संपुट पाठ आदि करे, या बीजात्मक गायत्रियों का विधि-विधान से पाठ करे, क्योंकि सबको अपना काम-धंधा करना है और उसके बाद ये सब चीजें करनी हैं। तो यदि आप गायत्री की प्रक्रिया से, मूल गायत्रियों से, चाहते हैं कि ब्रह्म शांत हो जाए, तो आज के समय में उनका अपना अनुभव बिल्कुल अलग रहा है, और किताबों में जो लिखा है, जिसे आप सब पढ़ते या सुनते हैं, उससे भी बिल्कुल अलग।
grihasthatantra.com पर "ब्रह्म पिशाच प्रपंच" इस विषय को समझाता है
grihasthatantra.com पर ब्रह्म पिशाच प्रपंच
वे कहते हैं, एक बार "ब्रह्म पिशाच प्रपंच" पढ़िए, और यह विषय समझ आ जाएगा। grihasthatantra.com पर जाकर पढ़िए; गूगल में सीधे "ब्रह्म पिशाच प्रपंच" लिखिए तो आ जाएगा। उसमें दस सच्ची घटनाएँ हैं, दस भागों में लिखी, दस अलग-अलग। उसके हिसाब से कीजिए और पढ़िए, तो काफी कुछ समझ आएगा।
वे कहते हैं, इस विषय पर एक बार "ब्रह्म पिशाच प्रपंच" पढ़िए, तो समझ आ जाएगा। grihasthatantra.com पर जाकर "ब्रह्म पिशाच प्रपंच" पढ़िए। गूगल में सीधे लिखिए, तो आ जाएगा। वे दस सच्ची घटनाएँ हैं, दस भागों में लिखी, दस अलग-अलग। उसके हिसाब से कीजिए, पढ़िए, तो काफी कुछ समझ आएगा।
कैसे पता चलेगा कि गुरु मंडल की कृपा आ गई है?
ब्रह्म मुहूर्त में स्वप्न, एक ही पुरुष बार-बार दिखना
रजनीश जी से वे कहते हैं कि पहली बात यह है कि कृपा का पता आपको स्वप्न से चलेगा। ब्रह्म मुहूर्त के समय स्वप्न में आपको उस तरह के किसी स्वरूप के दर्शन होंगे, जो गुरु से जुड़ा हो। आप एक ही पुरुष को बार-बार देखेंगे; खुद को बार-बार किसी एक मंदिर में देखेंगे; किसी से कुछ सुनेंगे; कोई व्यक्ति आपको निर्देश देगा। इससे आप समझेंगे कि गुरु मंडल आप पर कृपा कर रहा है। परोक्ष रूप से वे बहुत कृपा करते हैं; प्रत्यक्ष तो सामान्य साधक के लिए अलग बात है।
वे कहते हैं कि जब गुरु मंडल की कृपा आने लगती है, वे सारे विषय उन्होंने स्पष्ट किए हैं। पहली बात यह है कि कृपा का पता आपको सबसे पहले स्वप्न से चलेगा। ब्रह्म मुहूर्त के समय स्वप्न में आपको उस तरह के किसी स्वरूप के दर्शन होंगे जो गुरु से जुड़ा हो। बार-बार आप एक ही पुरुष को देखेंगे; बार-बार खुद को किसी एक मंदिर में देखेंगे; किसी से कुछ सुनेंगे। कोई व्यक्ति आपको निर्देश देगा। इससे आप समझ जाएँगे कि गुरु मंडल आप पर कृपा कर रहा है। परोक्ष रूप से वे बहुत कृपा करते हैं; प्रत्यक्ष तो सामान्य साधक के लिए एक अलग बात है।
क्या कलियुग में कोई है जिसे भगवती के दर्शन हुए हों?
हाँ, जीवित — और मदद करने वालों से ज्यादा बाँधने वाले क्यों हैं
यह पूछे जाने पर कि क्या कलियुग में कोई है जिसे माँ भगवती ने दर्शन दिए हों, वे उत्तर देते हैं: बिल्कुल, जीवित। इस टिप्पणी पर कि आपकी सिद्धि करवाने वाला शायद ही मिलेगा, जबकि सिद्धि बढ़ाने वाले हजार मिलेंगे और बाँधने वाले हजार, वे सहमत होते हैं — यह सही है, क्योंकि ईर्ष्या ज्यादा है।
यह पूछे जाने पर कि क्या कलियुग में कोई होगा जिसे माँ भगवती ने दर्शन दिए हों, जीवित, वे उत्तर देते हैं: बिल्कुल, हैं। इस टिप्पणी पर कि सिद्धि करवाने वाला शायद ही मिलेगा, कि सिद्धि बढ़ाने वाले हजार मिलेंगे और बाँधने वाले हजार, वे कहते हैं कि बिल्कुल सही है। क्योंकि ईर्ष्या ज्यादा है।
क्या कोई भी अघोर मंत्र कर सकता है?
शिव के पाँच मुखों के पाँच मंत्र
हरिता मिश्रा जी को वे उत्तर देते हैं कि हाँ, शिव जी का अघोर मंत्र करने में ऐसी कोई कठिनाई नहीं; इसके लिए निश्चिंत रहिए। शिव जी के पंचानन मंत्र में, उनके पाँच मुखों के पाँच मंत्रों में, आपको किसी भी तरह का कुछ सोचने की जरूरत नहीं — ईशान मंत्र कीजिए, वामदेव मंत्र कीजिए, तत्पुरुष कीजिए, अघोर कीजिए। जो चाहें कीजिए।
वे कहते हैं, हाँ, शिव जी का अघोर मंत्र करने में ऐसी कोई कठिनाई नहीं है। इसके लिए निश्चिंत रहिए। शिव जी के पंचानन मंत्र में, जो उनके पाँच मुखों के पाँच मंत्र हैं, आपको किसी भी तरह का कुछ सोचने की जरूरत नहीं। चाहे ईशान मंत्र करें, वामदेव मंत्र, तत्पुरुष, या अघोर — जो चाहें कीजिए।
जब पिशाचिनी बहुत परेशान करे, तो क्या किया जा सकता है?
बजरंग बाण, काली कवच, भैरव हृदय, और नरसिंह शताक्षरी
वे कहते हैं कि आप तंत्रोक्त बजरंग बाण का अनुष्ठान कर सकते हैं; काली कवच कर सकते हैं; भैरव हृदय कर सकते हैं। इसी चैनल पर नरसिंह शताक्षरी पर पूरा वीडियो है — यदि पिशाचिनी बहुत परेशान कर रही हो, तो नरसिंह शताक्षरी का जबरदस्त प्रयोग दिया गया है, और उसे विधि-विधान से करना चाहिए। यदि आपको लगे कि वह किसी व्यक्ति के शरीर पर बहुत हावी है, तो नरसिंह शताक्षरी और दत्त माला मंत्र का एक साथ प्रयोग कीजिए।
वे कहते हैं कि आप तंत्रोक्त बजरंग बाण का अनुष्ठान कर सकते हैं; काली कवच कर सकते हैं; भैरव हृदय कर सकते हैं। इसी चैनल पर नरसिंह शताक्षरी पर पूरा वीडियो है। यदि पिशाचिनी बहुत परेशान कर रही हो, तो नरसिंह शताक्षरी का जबरदस्त प्रयोग दिया गया है; उसे विधि-विधान से कीजिए। और यदि आपको लगे कि वह किसी व्यक्ति के शरीर पर बहुत हावी है, तो नरसिंह शताक्षरी और दत्त माला मंत्र का एक साथ प्रयोग कीजिए।
रुद्रगण साधना कब करनी चाहिए?
ऐसे ग्रहण में जिसका प्रभाव आपके क्षेत्र में न हो
रुद्रगण साधना तब करनी चाहिए जब ग्रहण हो और फिर भी ग्रहण न हो — यानी जब पृथ्वी पर ग्रहण पड़ रहा हो पर उसका प्रभाव आपके क्षेत्र में न हो। केवल तभी रुद्रगण साधना करनी चाहिए। किसी ने अभी मैसेज किया था कि अप्रैल के महीने में ग्रहण पड़ रहा है, और पूछा कि क्या उस ग्रहण में कर सकते हैं; वे कहते हैं कि वे देखकर जल्दी अपडेट करेंगे।
वे कहते हैं कि जब ग्रहण हो और फिर भी आपके लिए ग्रहण न हो — यानी पृथ्वी पर ग्रहण पड़ रहा हो पर उसका प्रभाव आपके क्षेत्र में न हो — केवल तभी रुद्रगण साधना करनी चाहिए। किसी ने अभी मैसेज किया था कि अप्रैल के महीने में ग्रहण पड़ रहा है, और पूछा कि क्या उस ग्रहण में कर सकते हैं। वे कहते हैं कि वे देखकर जल्दी अपडेट करेंगे।
हनुमान जी और राम जी के उपासक को कौन सी महाविद्या करनी चाहिए?
सात्विक रूप से तारा, या कमला
वे उत्तर देते हैं कि आप किसी भी महाविद्या से जुड़ी पूजा कर सकते हैं; ऐसा नहीं कि आप केवल एक ही चुनेंगे। यदि आप इस तरह पूछ रहे हैं, तो भगवती महाविद्या तारा की सात्विक रूप से कर सकते हैं, उनका अष्टाक्षरी आदि पढ़ सकते हैं, या भगवती कमला की कर सकते हैं। सामान्य तरीके से, यदि महाविद्या चाहिए, तो भगवती कमला या भगवती महाविद्या तारा कर सकते हैं; पर वैसे आप इनमें से कोई भी कर सकते हैं।
वे कहते हैं कि आप किसी भी महाविद्या से जुड़ी पूजा कर सकते हैं; ऐसा नहीं कि आप उनमें से केवल कोई एक ही चुनेंगे। यदि आप इस तरह पूछ रहे हैं, तो भगवती महाविद्या तारा की सात्विक रूप से कर सकते हैं, और उनका अष्टाक्षरी आदि पढ़ सकते हैं; या भगवती कमला की कीजिए। यदि महाविद्याओं में चाहिए, तो सामान्य तरीके से आप भगवती कमला या भगवती महाविद्या तारा कर सकते हैं। वैसे, आप इनमें से कोई भी कर सकते हैं।
क्या महाविद्या साधना के लिए पात्रता चाहिए या नहीं?
दो कथन जो दोनों प्रचलित हैं, और अब कुल क्यों देखना पड़ता है
वक्ता बताते हैं कि महाविद्या साधना के बारे में दो बातें कही जाती हैं: एक, कि इसके लिए किसी भी तरह की पात्रता नहीं चाहिए; और दो, कि बहुत बड़ी पात्रता चाहिए। जब आप बंधन में हों और करने जाएँ, तब आपको सब कुछ देखना पड़ता है — आपके कुल की परंपरा क्या है। वे कहते हैं कि यह देखना पड़ता है क्योंकि आज के समय में इसकी जरूरत पड़ेगी। जब ग्रंथ लिखे गए, तब ये सब बातें देखी गईं या नहीं, या ऐसे लोगों ने वर्णन किया या नहीं, पता नहीं; पर आज के समय में परेशानी शुरू हो जाती है।
महाविद्या साधना के बारे में जो कहा जाता है, उसमें दो कथन आते हैं। एक यह कि महाविद्या साधना के लिए किसी भी तरह की पात्रता नहीं चाहिए। और दूसरा यह कि बहुत बड़ी पात्रता चाहिए। जब आप किसी बंधन में बँधे हों, उस समय जब आप करने जाएँ, तब आपको सब कुछ देखना पड़ता है — आपके कुल की परंपरा क्या है। यह इसलिए देखना पड़ता है क्योंकि आज के समय में इसकी जरूरत पड़ेगी। जब ग्रंथ लिखे गए, तब ये सब बातें देखी गईं या नहीं, या किस तरह के लोगों ने इसका वर्णन किया, पता नहीं। पर आज के समय में परेशानी होने लगती है।
उग्र साधना से पहले कुल शक्ति क्यों देखनी चाहिए?
कुल देवता के रूप में पूजा जाने वाला भूत-प्रेत आपको बाँध देगा
वे कहते हैं कि क्योंकि जब घर के लोगों ने किसी भूत-प्रेत को बैठाकर कुल देवता के रूप में पूजा हो, और उसके बाद आप महाविद्या साधना करने जाएँ, तो महाविद्या आपको बाँध देंगी न — और परेशानी होगी। इसलिए किसी भी महाविद्या साधना, किसी भी अस्त्र मंत्र साधना, किसी भी उग्र मंत्र साधना से पहले, और खास तौर पर किसी महाशक्ति या शक्ति से जुड़ी किसी चीज से पहले, या यदि आप योगिनी, यक्षिणी या भैरवी की साधना करने जा रहे हैं, तो पहले अपनी कुल शक्ति देखिए, भाई — कुल की शक्ति कौन है। नहीं तो आपका जीना नरक हो जाएगा: यदि कोई भूत, प्रेत, पिशाच या ब्रह्म बैठाकर कुल शक्ति के रूप में पूजा जा रहा है और आप महाविद्या बगलामुखी साधना करने जाते हैं, तो वही ब्रह्म आपको पटकेगा और साधना भी नहीं करने देगा — और फिर आप कहेंगे कि बगलामुखी साधना की और हमारे साथ अनिष्ट हो गया।
वे कहते हैं कि क्योंकि घर में जो लोग किसी भूत-प्रेत को बैठाकर कुल देवता के रूप में पूजते हैं — उसके बाद यदि आप महाविद्या साधना करने जाएँ, तो महाविद्या आपको बाँध देंगी न। तो परेशानी होगी। इसीलिए आज के समय में यह देखना चाहिए। कोई भी महाविद्या साधना, कोई भी अस्त्र मंत्र साधना, कोई भी उग्र मंत्र साधना करने से पहले, और खास तौर पर किसी महाशक्ति या शक्ति से जुड़ी किसी चीज से पहले, या यदि आप योगिनी, यक्षिणी या भैरवी की साधना करने जा रहे हैं, तो पहले अपने कुल की शक्ति देखिए, भाई — कुल की शक्ति कौन है। नहीं तो आपका जीना नरक बना दिया जाएगा। यदि कुल शक्ति कोई भूत, प्रेत, पिशाच या ब्रह्म है जिसे बैठाकर पूजा गया है, और आप महाविद्या बगलामुखी साधना करने जाते हैं, तो परेशानी होगी। वही ब्रह्म आपको पटकेगा और साधना भी नहीं करने देगा। फिर आप कहेंगे कि बगलामुखी साधना की और हमारे साथ अनिष्ट हो गया।
क्या सिद्ध गुरु पाने की कोई साधना है?
एक सौ आठ दिन तक रात में दत्त माला मंत्र एक सौ आठ बार
वे उत्तर देते हैं, बिल्कुल: दत्त माला मंत्र की सेवा कीजिए। दत्त माला मंत्र लगातार, रोज रात एक सौ आठ बार, एक सौ आठ दिन तक कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या सिद्ध गुरु की प्राप्ति के लिए कोई साधना है, वे कहते हैं, बिल्कुल: दत्त माला मंत्र की सेवा कीजिए। दत्त माला मंत्र लगातार कीजिए — एक सौ आठ दिन, रोज एक सौ आठ बार। इसे रात में कीजिए।
कैसे पता चलेगा कि आपके पास कौन सी सिद्धि है?
सिद्धि प्रत्यक्ष होती है, उसे खोजना नहीं पड़ता
राहुल जी को वे उत्तर देते हैं कि जब सिद्धि होगी, तो आपको खुद पता चल जाएगा। सिद्धि होगी तो आप जानेंगे न? आप पर किसी सिद्धि की कृपा है या नहीं, यह अलग विषय है; पर यदि आप सिद्धि कह रहे हैं, तो सीधी बात, सिद्धि का अर्थ क्या है? सिद्धि खोजनी नहीं पड़ती। सिद्धि प्रत्यक्ष रहती है।
वे कहते हैं कि जब सिद्धि होगी, तो वह खुद पता चल जाएगी। यदि सिद्धि है, तो आपको पता चल जाएगा। आप पर किसी सिद्धि की कृपा है या नहीं, यह अलग विषय है। पर यदि आप सिद्धि कह रहे हैं, तो सीधी बात — सिद्धि का अर्थ क्या है? सिद्धि खोजनी नहीं पड़ती। सिद्धि प्रत्यक्ष रहती है। वे यह भी कहते हैं कि हाँ, साधनाएँ करने के लिए दी जाती हैं, देखने के लिए नहीं।
श्री कृष्ण की मूल शक्ति कौन हैं?
विश्वरूप के पीछे तारा, विंध्यवासिनी की कृपा, और नंदजा
वे कहते हैं कि नरेंद्र मीना जी ने बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है, और बताते हैं कि एक वीडियो में उन्होंने कहा था कि श्री राम की मूल शक्ति माँ तारा हैं। वे उत्तर देते हैं कि आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भगवान श्री कृष्ण ने जो विश्व स्वरूप दर्शन दिया, उसमें कहीं न कहीं भगवती महाविद्या तारा की कृपा रही है; भगवान के विराट रूप दर्शन के पीछे की मूल यौगिक शक्ति भगवती महाविद्या तारा हैं। और माना जाता है कि आजीवन भगवती विंध्यवासिनी की कृपा से श्री कृष्ण अपने अवतार में माया रचने में सबसे अधिक सक्षम रहे।
वे कहते हैं कि नरेंद्र मीना जी ने बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है, और बताते हैं कि एक वीडियो में उन्होंने कहा था कि श्री राम की मूल शक्ति माँ तारा हैं। वे कहते हैं, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भगवान श्री कृष्ण ने जो विश्व स्वरूप दर्शन दिया, उसमें कहीं न कहीं भगवती महाविद्या तारा की ही कृपा रही है। भगवान के विराट रूप दर्शन के पीछे की मूल यौगिक शक्ति भगवती महाविद्या तारा हैं। और माना जाता है कि आजीवन भगवती विंध्यवासिनी की कृपा से श्री कृष्ण अपने अवतार में माया रचने में सबसे अधिक सक्षम रहे।
नंदजा कौन हैं?
कृष्ण की बहन, विंध्य में गुप्त शक्ति पीठ, और मूर्ति रहस्य का मंत्र
वे कहते हैं कि योगमाया स्वरूप में नंदजा — जिन्हें भगवान कृष्ण की बहन कहा जाता है — विंध्य क्षेत्र में गुप्त शक्ति पीठ के रूप में विराजमान हैं। उनके बारे में आपको शायद ही कहीं जानने-सुनने को मिले। केवल जब हम मूर्ति रहस्य में पढ़ते हैं, तब वहाँ आता है, और पहला मंत्र यह है: जो नंदा शक्ति की आजीवन उपासना करता है, वे तीनों लोकों को साधक के वश में कर देती हैं। वह नंदजा शक्ति नारायण के जन्म से पहले आईं और आजीवन उनकी रक्षा की।
योगमाया स्वरूप में नंदजा, जिन्हें कृष्ण भगवान की बहन कहा जाता है, विंध्य क्षेत्र में गुप्त शक्ति पीठ के रूप में विराजमान हैं। उनके बारे में आपको शायद ही कहीं कुछ जानने-सुनने को मिले। केवल जब हम मूर्ति रहस्य में पढ़ते हैं, तब वहाँ आता है; यह मंत्र, पहला मंत्र, यह है कि जो नंदा शक्ति की आजीवन उपासना करता है, वे तीनों लोकों को साधक के वश में कर देती हैं। वह नंदजा शक्ति नारायण के जन्म से पहले आईं और आजीवन उनकी रक्षा की।
शास्त्र क्या कहता है
The Mūrti Rahasya opens with Nandā, to be born of Nanda, who when praised and worshipped with devotion brings the three worlds under control.
Identifying her with a hidden Vindhya pīṭha and with Kṛṣṇa's sister is the speaker's, not in this verse.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
अथ मूर्तिरहस्यम् ऋषिरुवाच ॐ नन्दा भगवती नाम या भविष्यति नन्दजा । स्तुता सा पूजिता भक्त्या वशीकुर्याज्जगत्त्रयम् ॥ १ ॥
अब मूर्तियों का रहस्य। ऋषि ने कहा: ॐ। नन्दा नाम की जो भगवती नन्द से उत्पन्न होंगी, भक्ति से उनकी स्तुति और पूजा करने पर वे तीनों लोकों को उपासक के वश में कर देती हैं।
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पूरे शरीर में सुइयाँ चुभती लगती हैं और मेडिकल रिपोर्ट सामान्य है — क्या यह तंत्र है?
शरीर से उतारे कपड़े, और लगातार व रुक-रुक कर होने का अंतर
हरीश जी को वे उत्तर देते हैं कि यदि मेडिकल रिपोर्ट ठीक है और ये चीजें हो रही हैं, तो साफ है कि कहीं न कहीं आपके शरीर से उतारे गए कपड़ों का तंत्र में प्रयोग हुआ है, और जब गणंत प्रयोग किया जाता है तो ये चीजें लगातार होती हैं। यदि कभी-कभी होता है, तो यह जाग्रत तंत्र है जो किसी खास तिथि पर होता है — यानी तंत्र करके छोड़ दिया गया। इसे हटाने के लिए, यदि सामान्य तरीके से करना चाहें, तो संकल्प लेकर दत्त माला मंत्र का जप कीजिए, और साथ में नरसिंह शताक्षरी का भी प्रयोग कीजिए। इसमें किसी तरह की कठिनाई नहीं; कुछ सोचना नहीं — सीधे उठाइए और करना शुरू कीजिए। रात में करें तो बेहतर। वे चेताते हैं कि पहले कष्ट बढ़ेगा, क्योंकि जब शरीर में कुछ जकड़ा हो और आप उसे हटाने जाएँ, तो कष्ट होगा। और यदि आप खुद न कर सकें, तो कोई दूसरा व्यक्ति संकल्प लेकर आपके लिए करे।
वे कहते हैं कि यदि मेडिकल रिपोर्ट ठीक है और ये चीजें हो रही हैं, तो साफ है कि कहीं न कहीं आपके शरीर से उतारे गए कपड़ों का तंत्र में प्रयोग हुआ है; और जब गणंत प्रयोग किया जाता है, तो ये चीजें लगातार होती हैं। यदि कभी-कभी हो रहा है, तो यह जाग्रत तंत्र है, जो किसी खास तिथि पर होता है — यानी तंत्र करके छोड़ दिया गया। इसे हटाने के लिए, यदि आप सामान्य तरीके से करना चाहें, तो संकल्प लेकर दत्त माला मंत्र का जप कीजिए, और उसके साथ नरसिंह शताक्षरी का भी प्रयोग कीजिए। इसमें आपके लिए किसी तरह की कठिनाई नहीं; कुछ सोचना नहीं — सीधे उठाइए और करना शुरू कीजिए। रात में करें तो बेहतर है। वे कहते हैं कि यह भी बता रहे हैं कि पहले कष्ट बढ़ेगा, क्योंकि शरीर में कुछ जकड़ा हुआ है और जब आप उसे हटाने जाएँगे, तो कष्ट होगा। यदि आप खुद नहीं कर सकते, तो कोई दूसरा व्यक्ति संकल्प लेकर आपके लिए करे।
मंत्र जप के समय शरीर बहुत काँपता है — क्या करना चाहिए?
मूलाधार का बिगड़ना, स्थान दोष, और मंदिर में जप
डीके सिद्धार्थ जी, जो कहते हैं कि जब भी वे मंत्र जप करते हैं तो शरीर में बहुत कंपन होता है और वह हिलने लगता है, और वे कर्ज में पड़ गए हैं और बहुत परेशान हैं — उन्हें वे उत्तर देते हैं कि मंत्र जप से इतना कंपन होने का अर्थ है कि मूलाधार पहले ही बिगड़ चुका है। इसलिए सबसे पहले मंत्र जप मत कीजिए; सीधे मंत्र जप से शुरुआत नहीं करनी चाहिए। यदि माला आदि पर कर रहे हैं, तो मत कीजिए; और आपको जानना चाहिए कि कहीं न कहीं स्थान दोष का प्रभाव है।
वे कहते हैं कि मंत्र जप करने से बहुत कंपन हो रहा है — इसका अर्थ है कि मूलाधार पहले ही बिगड़ चुका है। तो डीके सिद्धार्थ जी, सबसे पहले यह एक काम कीजिए: मंत्र जप मत कीजिए; सीधे मंत्र जप से शुरुआत नहीं करनी चाहिए। यदि आप माला आदि पर मंत्र जप कर रहे हैं, तो मत कीजिए; और कहीं न कहीं स्थान दोष का प्रभाव है, जो आपको जानना चाहिए।
यदि घर में अकेले मंत्र जप सुरक्षित रूप से न हो सके, तो इसके बजाय क्या और कहाँ करें?
शिव मंदिर में शिव रक्षा, हनुमान जी के यहाँ बजरंग बाण, विष्णु जी के यहाँ दत्त माला
वे कहते हैं, मंदिर में जाइए: शिव मंदिर हो तो बताया गया शिव रक्षा प्रयोग कीजिए, और प्रयोग न कर सकें तो पाठ कीजिए। हनुमान जी का मंदिर हो और आप हनुमान जी की सेवा-पूजा करते हों, तो तंत्रोक्त बजरंग बाण, इस चैनल पर दिया पूरा बजरंग बाण, कीजिए। विष्णु जी का मंदिर हो, तो दत्त माला मंत्र की साधना कर सकते हैं। मंदिर में जाकर कुछ समय कीजिए — ग्यारह-ग्यारह दिन की साधना, चार-पाँच बार।
वे कहते हैं, मंदिर में जाकर, यदि शिव जी का मंदिर है, तो वहाँ बताया गया शिव रक्षा प्रयोग कीजिए; और यदि प्रयोग न कर सकें, तो पाठ कीजिए। यदि हनुमान जी के मंदिर में जाना है, यदि आप हनुमान जी की सेवा-पूजा करते हैं, तो तंत्रोक्त बजरंग बाण, इस चैनल पर दिया पूरा बजरंग बाण, कीजिए। यदि विष्णु जी का मंदिर है, तो चाहें तो दत्त माला मंत्र की साधना कीजिए। मंदिर में जाकर कुछ समय कीजिए — ग्यारह-ग्यारह दिन की साधना, कम से कम चार-पाँच बार।
पूजा शुरू करने पर कुछ लोगों का शरीर क्यों झूमने लगता है?
शुभ शक्तियों के साथ जुड़ी नकारात्मक शक्ति
वे कहते हैं कि वे ऐसे साधकों से मिले हैं, जो बताते हैं कि जब उन्होंने पहली बार पूजा-पाठ शुरू किया और सुबह-शाम दीया-बाती की, तो उनका शरीर झूमने लगता था, खेलने लगता था, और वे कुछ कह नहीं पाते थे, समझ नहीं पाते थे — बस झूमते थे। बाद में जब वे संपर्क में आए, तो उन्होंने उनसे दत्त माला मंत्र, दुर्गा कवच, और दुर्गा जी की बत्तीस नामावली के साथ साधना करने को कहा। अब वे कहते हैं कि बहुत आनंद है और पूजा-पाठ की बहुत इच्छा है, और वे करते हैं, पर शरीर अब नहीं झूमता। तो कहीं न कहीं ऐसी नकारात्मक शक्ति होती है जो शुभ शक्तियों के साथ जुड़ जाती है; यह तंत्र की अलग तरह की क्रिया है।
वे कहते हैं कि जब शरीर में किसी नकारात्मक चीज का प्रभाव होता है — वे ऐसे साधकों से मिले हैं जो कहते हैं कि बिल्कुल शुरू में, जब उन्होंने पूजा-पाठ शुरू किया और सुबह-शाम दीया-बाती की, तो उनका शरीर झूमने लगता था, खेलने लगता था; पर वे कुछ कह नहीं पाते थे और समझ नहीं पाते थे — बस झूमते थे। बाद में जब वे संपर्क में आए और उनसे पूछा, तो उन्होंने कहा: ठीक है, दत्त माला मंत्र कीजिए, दुर्गा कवच कीजिए, दुर्गा जी की बत्तीस नामावली के साथ साधना कीजिए। अब वे कहते हैं कि बहुत आनंद है और करने की बहुत इच्छा है, और वे पूजा-पाठ कर रहे हैं, पर शरीर अब नहीं झूमता। तो कहीं न कहीं ऐसी नकारात्मक शक्ति होती है जो शुभ शक्तियों के साथ जुड़ जाती है। यह तंत्र की अलग तरह की क्रिया है — वह भीतर कितनी दूर तक गई है, वह भी एक प्रकार है। हर एक बात स्पष्ट नहीं है।
तंत्र सीख चुका व्यक्ति नई-नई चीजें कैसे बनाता है?
खाना बनाने का उदाहरण, और अशुभ शक्ति को शुभ के साथ मिलाना
वे कहते हैं कि जब आप खाना बनाना सीख लेते हैं, तो सब कुछ बनाना आ जाने पर अपने तरीके से नई रेसिपी भी बना सकते हैं। उसी तरह तंत्र सीखने वाला व्यक्ति — इस विषय पर उन्होंने दो दिन पहले एक वीडियो डाला था, कि जिनके पिता-दादा तांत्रिक थे वे अब कष्ट क्यों भोग रहे हैं — नए मिश्रण करता है। वह कोई और शक्ति जगाए रखेगा, तंत्र सीखेगा, उसके गुरु ने कुछ और सिखाया होगा, और उसकी सहायता से कुछ और जगाएगा। इस तरह वह शुभ के साथ अशुभ शक्ति डाल देगा, और उस समय आपके लिए कठिनाई शुरू हो जाती है।
वे कहते हैं कि जब आप खाना बनाना सीखते हैं, तो जब सब कुछ आ जाता है, आप अपने तरीके से नई रेसिपी भी बना सकते हैं। तो तंत्र सीखने वाला व्यक्ति — इस विषय पर उन्होंने एक वीडियो डाला है, दो दिन पहले वाला, कि जिनके पिता-दादा तांत्रिक थे वे अब कष्ट क्यों भोग रहे हैं, और ऐसा क्यों होता है — उसमें यह विषय बताया गया है कि कोई नए मिश्रण कैसे करता है। वह कोई और शक्ति जगाए रखेगा, तंत्र सीखेगा; उसके गुरु ने उसे कुछ और सिखाया होगा, और उसकी सहायता से वह कुछ और जगाएगा। इसी तरह वह शुभ में अशुभ शक्ति डाल देगा। और उस समय होता यह है कि आपके लिए कठिनाई शुरू हो जाती है।
नशा छुड़ाने के लिए क्रिया मंत्र के बजाय भक्ति वाला मंत्र क्यों?
षट्कर्म मंत्र लक्ष्य का नाम लेता है; देवता से प्रार्थना नहीं
गुटखा, सिगरेट और शराब छुड़ाने के लिए वे नमक का प्रयोग करने को कहते हैं; नमक का विधान और साबरी मंत्र अलग से डाले जाएँगे। पर वे अंतर साफ बताते हैं: क्रिया मंत्र, जैसे षट्कर्म के मंत्र, व्यक्ति का नाम लेते हैं — यदि किसी को मारना है, तो हम ऐसा मंत्र प्रयोग करते हैं जिसमें व्यक्ति का नाम डाला जाता है, इसे मारो, इसे मारो, और मंत्र से यही अर्थ निकलता है। वह सीधा हमला है। जबकि जब आप देवी मंत्र में किसी देवी या देवता से प्रार्थना करते हैं कि शत्रु से छुटकारा मिले, शत्रु से बचाव हो, शत्रु से रक्षा हो, और वह शक्ति उसे मृत्यु दे दे, तो परोक्ष रूप से आप वहाँ कारण बने, पर भगवती ने कृपा की और उस ओर आपके शत्रु का कल्याण किया। इसलिए आपको कोई दोष नहीं लगेगा और काम भी ठीक से होगा।
वे कहते हैं कि बिल्कुल, गुटखा छुड़ाने, सिगरेट छुड़ाने, शराब छुड़ाने के लिए नमक का प्रयोग कीजिए; नमक का विधान भी वे अलग से डालेंगे। साबरी मंत्र भी डालेंगे। पर वे साफ कहना चाहते हैं: क्रिया मंत्र, जैसे षट्कर्म — षट्कर्म का मंत्र, यदि किसी को मारना है, ऐसा होता है जिसमें हम व्यक्ति का नाम देते हैं, कि हाँ, इसे मारो, इसे मारो; मंत्र से यही अर्थ निकलता है। तो वह सीधा, प्रत्यक्ष हमला है। पर जब आप किसी देवी या देवता से प्रार्थना करते हैं, जब देवी मंत्र में प्रार्थना करते हैं कि शत्रु से छुटकारा मिले, शत्रु से बचाव हो, शत्रु से रक्षा हो, और वह शक्ति उसे मृत्यु दे दे — तो परोक्ष रूप से आप वहाँ कारण बने, पर भगवती ने कृपा की और उस ओर आपके शत्रु का कल्याण किया। तो आपको कोई दोष भी नहीं लगेगा, और काम भी सही तरीके से होगा।
दत्तात्रेय प्रयोग और साबर प्रयोग के प्रभाव में क्या अंतर है?
संतुलित प्रभाव बनाम व्यक्ति के पागल हो जाने का खतरा
वे कहते हैं कि ठीक इसी तरह, यदि आप शराब, गुटखा या तंबाकू छुड़ाने के लिए तंत्र विधि का प्रयोग करें — दत्तात्रेय माला मंत्र या किसी सिद्ध मंत्र का प्रयोग करें, संकल्प लें, नमक सिद्ध करें या शक्कर सिद्ध करें, और किसी को खिलाएँ या दें, तो उसका प्रभाव अलग तरह का होगा: संतुलित होगा। पर यदि आप साबर आदि का प्रयोग करें, और सामने वाले पर आभिचारिक प्रयोग पड़ जाए, तो वह पागल भी हो सकता है। वे कहते हैं कि इसीलिए क्रियात्मक मंत्र देने के बजाय वे आप सबको यही मंत्र करने को कहते हैं।
ठीक इसी तरह, शराब, गुटखा और तंबाकू छुड़वाने के लिए यदि आप तंत्र विधि का प्रयोग करें — यदि दत्तात्रेय माला मंत्र या किसी सिद्ध मंत्र का प्रयोग करके उसमें संकल्प लें, नमक सिद्ध करें, शक्कर सिद्ध करें और किसी को खिलाएँ या दें — तो उसका प्रभाव अलग तरह से होगा; वह संतुलित होगा। पर यदि आप साबर आदि का प्रयोग करें, और सामने वाले आदमी पर आभिचारिक प्रयोग पड़ जाए, तो वह पागल भी हो सकता है। इसीलिए, वे कहते हैं, क्रियात्मक मंत्र देने के बजाय वे आप सबको यही मंत्र करने को कहते हैं।
किसी व्यक्ति को जो खिलाया गया है, उसे कैसे निकाला जाता है?
पाटा ओझा, नाभि से निकालना, और जड़ी से जड़ी काटना
वे कहते हैं कि तंत्र वर्ग के ज्यादातर लोग — सब नहीं, पर ज्यादातर — एक ही मंत्र से तरह-तरह की क्रियाएँ करते हैं। उस मंत्र से जो खिलाया गया है उसे निकाला जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम दिए गए हैं: उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे पाटा ओझा कहते हैं, और वे लोग उन विद्याओं को अलग तरीके से शुद्ध करते हैं। बहुत से लोग इसे शरीर से, नाभि से चूसकर निकालते हैं; यह असली चीज है, इसमें पाखंड या धोखा कुछ नहीं। दूसरा तरीका है जड़ी से जड़ी मारना: यदि पता चल गया कि सामने वाले ने आपको क्या खिलाया और उसका प्रभाव क्या है, तो किसी खास नक्षत्र में उस तरह की जड़ी लाकर, पीसकर, मंत्र से अभिमंत्रित करके खिलाई जाती है, और उससे या तो उसका प्रभाव नष्ट होता है या उसे शरीर से बाहर निकालने की क्रिया की जाती है।
वे कहते हैं, आप सबको बता दें: तंत्र वर्ग के जितने भी लोग हैं — वे सबकी बात नहीं कर रहे, पर ज्यादातर लोग — ज्यादातर एक ही मंत्र से तरह-तरह की क्रियाएँ करते हैं। होता यह है कि उस मंत्र से काट की जाती है; जो खिलाया गया है उसे निकाला जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम दिए गए हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे पाटा ओझा कहा जाता है; वे लोग उन विद्याओं को अलग तरीके से शुद्ध करते हैं। बहुत से लोग इसे शरीर से, नाभि से चूसकर निकालते हैं — जो असली चीज है; इसमें पाखंड या धोखे जैसा कुछ नहीं। इस तरह भी निकाला जाता है। एक तरीका है जड़ी से जड़ी मारना: मान लीजिए पता चल गया कि सामने वाले ने आपको क्या खिलाया और उसका प्रभाव क्या है; तो किसी खास नक्षत्र में उस तरह की जड़ी लाकर, पीसकर, मंत्र से अभिमंत्रित करके, खिलाई जाती है, और उसके बाद या तो उसका प्रभाव नष्ट होता है या उसे शरीर से बाहर खींचने की क्रिया की जाती है।
जहाँ चीज बाहर न निकाली जा सके, वहाँ भी अकेली साधना उसका प्रभाव खत्म कर देती है
बाहर न भी निकले, तो भी उसका प्रभाव खत्म होता है
वे कहते हैं कि साधना के प्रभाव से भी, साधना करने वालों के लिए, चीजें खत्म होती हैं — ऐसा नहीं कि साधना करेंगे तो चीजें नहीं होंगी। भले वह बाहर न निकल पाए, पर अपना प्रभाव जरूर नष्ट और खत्म कर देगी। पर थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है।
वे कहते हैं कि साधना के प्रभाव से भी, साधना करने वालों के लिए, चीजें खत्म होती हैं। ऐसा नहीं कि साधना करेंगे तो चीजें नहीं होंगी। भले वह बाहर न निकल पाए, पर उसका प्रभाव जरूर नष्ट और खत्म कर देगी। पर थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है।
जो संस्कृत का संधि विच्छेद न सँभाल सके, वह क्या पढ़े?
गीता प्रेस की सरल दुर्गा सप्तशती, एक साल या अधिक हिंदी के बाद
वे कहते हैं कि जो संस्कृत में पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए गीता प्रेस से छपी सरल दुर्गा सप्तशती है — वह लीजिए। पर फिर भी वे कहेंगे कि जो सप्तशती पाठ में बिल्कुल नए हैं, वे कम से कम एक साल हिंदी में करें। यदि आप चारों नवरात्र कर रहे हैं, या दो-तीन साल तक, तो हिंदी में कीजिए; उसके बाद गीता प्रेस से छपी सरल दुर्गा सप्तशती से पाठ कीजिए। संधि विच्छेद किया होने से उच्चारण बहुत स्पष्ट आएगा; धीरे-धीरे सीखिए।
वे कहते हैं कि सुनने वाले सभी जो संस्कृत में पढ़ना चाहते हैं, वे गीता प्रेस से छपी सरल दुर्गा सप्तशती लें। पर फिर भी वे कहेंगे कि जो सप्तशती पाठ में बिल्कुल नए हैं, वे कम से कम एक साल हिंदी में करें। यदि आप चारों नवरात्र कर रहे हैं, या दो-तीन साल तक, तो हिंदी में कीजिए; उसके बाद गीता प्रेस से छपी सरल दुर्गा सप्तशती से पाठ कीजिए। संधि विच्छेद किया होने से उच्चारण बहुत स्पष्ट आएगा; धीरे-धीरे सीखिए।
क्या शुंभ और निशुंभ का वध माँ काली से जुड़ा था?
शुंभ-निशुंभ के लिए कौशिकी, चंड और मुंड के लिए काली
श्रेयस जी को वे उत्तर देते हैं कि वास्तव में यह भगवती कौशिकी से जुड़ा था। वे कहते हैं कि चंड और मुंड का वध काली जी से जुड़ा है; आप सब कहाँ अटक रहे हैं।
श्रेयस जी के इस प्रश्न पर कि क्या शुंभ-निशुंभ वध माँ काली से जुड़ा था, वे उत्तर देते हैं कि वास्तव में यह भगवती कौशिकी से जुड़ा था। चंड और मुंड का वध काली जी से जुड़ा है। वे पूछते हैं, आप सब कहाँ अटक रहे हैं?
शास्त्र क्या कहता है
Because she brought back Caṇḍa and Muṇḍa, the Goddess is to be known as Cāmuṇḍā.
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यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता । चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि ॥ ॐ ॥ २७ ॥
"देवि! तुम चण्ड और मुण्ड को लेकर मेरे पास आई हो, इसलिए संसार में तुम चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध होगी।" ॐ।
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Ambikā, who came out of the sheath of Pārvatī's body, is sung as Kauśikī, the form that faces Śumbha and Niśumbha.
This verse only names Kauśikī; her part in the Śumbha–Niśumbha episode comes from the chapters that follow.
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शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका । कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते ॥ ८७ ॥
क्योंकि अम्बिका पार्वती के शरीर-कोश से निकली थीं, इसलिए सब लोकों में वे कौशिकी नाम से गाई जाती हैं।
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क्या किसी भी मंत्र में ॐ के बाद श्रीं बीज जोड़ सकते हैं?
अपनी ओर से बीज मंत्रों से छेड़छाड़ नहीं
यह पूछे जाने पर कि क्या किसी मंत्र में ॐ से पहले श्रीं बीज लगाकर जप कर सकते हैं, वे उत्तर देते हैं कि बीज मंत्र में अपनी ओर से हेरा-फेरी नहीं करनी चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या किसी मंत्र में ॐ से पहले श्रीं बीज लगाकर जप किया जा सकता है, वे सीधा उत्तर देते हैं। बीज मंत्र में अपनी ओर से हेरा-फेरी नहीं करनी चाहिए।
यदि आप गुरुदत्त को गुरु मानकर रोज हवन करते हैं, तो क्या तंत्र फिर भी आप पर सफल हो सकता है?
ब्रह्मास्त्र और हनुमान जी, और तंत्र प्रयोग का मान रखना
आदि चिंतन जी से वे कहते हैं कि यदि गुरु की कृपा, गुरु मंडल की कृपा आ जाए, तो कोई तंत्र करना ही नहीं चाहेगा — कर भी कैसे पाएगा? और वे एक समानता बताते हैं: ब्रह्मास्त्र का हनुमान जी पर कोई प्रभाव नहीं होने वाला था, पर ब्रह्मास्त्र का मान रखने के लिए वे बँध गए; उनके लिए वह कुछ नहीं था। उसी तरह, यदि आप भगवान दत्तात्रेय की साधना कर रहे हैं और कोई आप पर तंत्र प्रयोग करता है, तो उस तंत्र का मान रखने के लिए आपको हानि हो सकती है। पर वह बहुत बड़ी नहीं होगी; कुछ समय के लिए होगी। यदि वह बहुत बड़ा तंत्र प्रयोग करे, तो हो सकता है कि यदि उसने मारण किया हो तो आपकी एक उँगली टूट जाए, कट जाए, कुछ हो जाए। प्रभाव होगा; आप एक-दो दिन परेशान होंगे, एक हफ्ता परेशान होंगे — पर उसके बाद उसे बचाने वाला कोई नहीं बचेगा। शक्तियाँ शक्तियों का मान रखती हैं।
वे कहते हैं कि यदि गुरु की कृपा हो जाए, गुरु मंडल की कृपा हो जाए, तो कोई तंत्र करना ही नहीं चाहेगा। कर भी कैसे पाएगा? और देखिए, वे कहते हैं: ब्रह्मास्त्र का हनुमान जी पर कोई प्रभाव नहीं होने वाला था। यह ध्यान रखिए — पर ब्रह्मास्त्र का मान रखने के लिए वे बँध गए। उनके लिए वह कुछ नहीं था। उसी तरह, यदि आप भगवान दत्तात्रेय की साधना कर रहे हैं और कोई आप पर तंत्र प्रयोग करता है, तो उस तंत्र का मान रखने के लिए आपको हानि हो सकती है। पर वह बहुत ज्यादा नहीं होगी; थोड़े समय के लिए होगी। यदि वह बहुत बड़ा तंत्र प्रयोग करे, तो हो सकता है कि यदि उसने मारण किया हो, तो आपकी एक उँगली टूट जाए, कट जाए, कुछ हो जाए। प्रभाव होगा; आप एक-दो दिन परेशान होंगे, एक हफ्ता परेशान होंगे। पर उसके बाद उसे बचाने वाला कोई नहीं बचेगा। यह जान लीजिए। तंत्र का मान — शक्तियाँ शक्तियों का मान रखती हैं। ऐसा ही होता है।
क्या स्त्रियाँ पुरुष साधकों की ऊर्जा चुरा सकती हैं?
उनका सीधा उत्तर कि ऐसा होता है, और बहुत अच्छे से होता है
शिवांश जी के पूछने पर कि क्या स्त्रियाँ पुरुष साधकों की ऊर्जा चुरा सकती हैं, वे उत्तर देते हैं कि बहुत अच्छे से चुराई जाती है। वे कहते हैं कि इतनी जबरदस्त चुराई जाती है कि बाद में पुरुष किसी काम के नहीं रहते; काफी अच्छे साधक चित हो जाते हैं।
यह पूछे जाने पर कि क्या स्त्रियाँ पुरुष साधकों की ऊर्जा चुरा सकती हैं, वे उत्तर देते हैं कि बहुत अच्छे से चुराई जाती है, शिवांश जी। इतनी जबरदस्त चुराई जाती है कि बाद में पुरुष किसी काम के नहीं रहते। काफी अच्छे साधक चित हो जाते हैं।
क्या अपराजिता स्तोत्र का रोज पाठ किया जा सकता है?
केवल तब जब उसकी जरूरत हो
वे उत्तर देते हैं कि जरूरत हो तभी कीजिए। आजकल आदमी बस ऐसे ही करने को कह देता है। यदि आप आभिचारिक क्रियाओं से ग्रस्त हैं, या उस तरह की समस्या है, या आप ऐसे क्षेत्र में काम करते हैं जहाँ बार-बार लोगों से मिलना और किसी को मनाना पड़ता है — जैसे मार्केटिंग के क्षेत्र में हों — तो कीजिए।
वे कहते हैं कि इसकी जरूरत हो तभी कीजिए। आजकल आदमी बस करने को कह देता है। यदि आप आभिचारिक क्रियाओं से ग्रस्त हैं, तो कीजिए; या आपको उस तरह की समस्या है। या आप किसी तरह उस प्रकार के क्षेत्र में काम करते हैं — जैसे आप मार्केटिंग के क्षेत्र में हों, जहाँ लोगों से मिलना पड़ता है, बार-बार किसी को मनाना पड़ता है — तो कीजिए।
हांडी प्रयोग से कैसे बचें?
अब यह दुर्लभ है, और आपके अपने इष्ट इसे सँभाल लेंगे
वे कहते हैं कि आज के समय में यदि कहीं सच में हांडी प्रयोग किया जाता है, तो लोग इसे सीधे बहुत कम करते हैं। और इससे बचने के लिए आपको अलग से कुछ करने की जरूरत ही नहीं। अपने इष्ट की सेवा-पूजा करते रहिए; जब इस तरह का प्रयोग होगा, तो आपको अलग से कोई मंत्र जप करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आपके अपने इष्ट इतने मजबूत होंगे कि वे सब कुछ कर देंगे।
वे कहते हैं कि आज के समय में यदि कहीं सच में हांडी प्रयोग किया जाता है, तो बहुत कम लोग इसे सीधे करते हैं। और इससे बचने के लिए आपको अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं। अपने इष्ट की सेवा-पूजा करते रहिए। जब इस तरह का प्रयोग होगा, तो आपको अलग से कोई मंत्र जप करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आपके अपने इष्ट इतने मजबूत होंगे कि वे पूरा काम कर देंगे।
क्या ध्यान से की गई पाँच माला और एक सौ एक माला में अंतर है?
समय और आपकी अपनी इच्छा पर एक छोटा उत्तर
यह पूछे जाने पर कि क्या बहुत ध्यान से पाँच माला करना एक सौ एक माला करने से अलग है, वे कहते हैं कि उन्हें ठीक से समझ नहीं आया; हो सकता है श्रोता समय की बात कर रहे हों। वे कहते हैं कि यह आपकी अपनी इच्छा है — जितना आप बैठ पाएँ, जितना आप कर पाएँ।
यह पूछे जाने पर कि क्या बहुत ध्यान से पाँच माला करना और एक सौ एक माला करना अलग है, वे कहते हैं कि उन्हें समझ नहीं आया; हो सकता है श्रोता समय की बात कर रहे हों। यह आपकी अपनी इच्छा है — जितना आप बैठ पाएँ, जितना आप कर पाएँ।
माँ काली कैसे बोलती हैं?
जिसे दर्शन हुए, वह कभी क्यों नहीं बताएगा
नेहा राजपूत जी से वे कहते हैं कि उनके पास कोई उत्तर नहीं — ऐसे प्रश्न आते हैं कि वे भी चुप रह जाते हैं। एक बात वे सबको बताना चाहते हैं: जिसे भी जगदंबा के किसी स्वरूप के दर्शन होते हैं, या जिस पर वे कृपा करती हैं, वह कितना भी सांसारिक तरीके से जिए और कुछ भी करे, वह इसका ढिंढोरा कभी नहीं पीट सकता। यह ध्यान रखिए। कोई कभी नहीं कहेगा कि यह इस तरह होता है। योगिनियों का बताया जा सकता है, महा योगिनियों का भी नहीं — सामान्य वालों का बताया जा सकता है; पर खास तौर पर कोई नहीं बताएगा। वह अवस्था ही नहीं आएगी कि आदमी उसके बारे में बोले।
वे कहते हैं, अब वे क्या बताएँ। ऐसे प्रश्न आते हैं कि उनके पास भी कोई उत्तर नहीं रहता। एक बात उन्हें आप सबको बतानी है: जिसे भी जगदंबा के किसी स्वरूप के दर्शन होते हैं — होते हैं, या वे कृपा करती हैं — तो वह कितना भी सांसारिक तरीके से जिए, कुछ भी करे, वह इसका ढिंढोरा कभी नहीं पीट सकता। यह ध्यान रखिए। कोई कभी नहीं कहेगा कि यह इस तरह होता है। योगिनियों का बताया जा सकता है — महा योगिनियों का भी नहीं; सामान्य वालों का बताया जा सकता है, पर खास तौर पर कोई नहीं बताएगा। वह अवस्था ही नहीं आएगी कि आदमी उसके बारे में बोले।
स्वप्न में खुद को झाड़ू लगाते और चावल बटोरते देखने का क्या अर्थ है?
कुलदेवी के रूप में शीतला माता, या लक्ष्मी की सेवा
मीनाक्षी जी से वे कहते हैं: लक्ष्मी जी की पूजा कीजिए। यदि आप खुद को झाड़ू लगाते या चावल बटोरते देख रही हैं, तो दो तरह की बात है — या तो, यदि आपकी कुलदेवी शीतला माता हैं, तो उनकी अच्छे से पूजा कीजिए; भगवती की कृपा कहीं न कहीं है और उन्हें जो भोग लगता है, चावल का भोग, अष्टमी को लगाना चाहिए। हर महीने शुक्ल पक्ष की अष्टमी को दुर्गा अष्टमी और सप्तमी को शीतला सप्तमी कहते हैं; आपके यहाँ जो तिथि मानी जाती है, वह करनी चाहिए। नहीं तो भगवती लक्ष्मी की अच्छे से सेवा करनी चाहिए।
वे मीनाक्षी जी से कहते हैं, लक्ष्मी जी की पूजा कीजिए। यदि आप खुद को झाड़ू लगाते, या चावल बटोरते देख रही हैं, तो दो तरह की बात है: या तो, यदि आपकी कुलदेवी शीतला माता हैं, तो उनकी अच्छे से पूजा कीजिए। भगवती की कृपा कहीं न कहीं है; उन्हें जो भोग लगता है, चावल का भोग, वह अष्टमी को लगाना चाहिए। हर महीने शुक्ल पक्ष की अष्टमी को दुर्गा अष्टमी और सप्तमी को शीतला सप्तमी कहा जाता है। तो आपके यहाँ जो भी तिथि मानी जाती है, वह करनी चाहिए; और नहीं तो भगवती लक्ष्मी की अच्छे से सेवा करनी चाहिए।
मेरे साथ रहने वाली एक अदृश्य शक्ति चली गई है — वह कैसे लौटेगी?
आपने पहले कुछ अच्छा किया होगा, और फिर कुछ गड़बड़ हुई
नरेश जी से वे कहते हैं कि यदि सच में ऐसी बात है, तो आपने पहले जरूर कुछ अच्छा किया होगा, इसीलिए वह आपके साथ थी। वह थी, और अब या तो कुछ गड़बड़ हो गई है या आपने सेवा-पूजा नहीं की, इसीलिए आपके साथ कठिनाई है। और आप यह कैसे कह सकते हैं कि वह पहले थी और अब नहीं है — वे कहते हैं, कुछ न कुछ होगा।
वे कहते हैं कि यदि सच में इस तरह की बात है, तो आपने पहले जरूर कुछ अच्छा किया होगा, इसीलिए वह आपके साथ थी। वह थी, और अब या तो कुछ गड़बड़ हो गई है, या आपने सेवा-पूजा नहीं की, इसीलिए आपको कठिनाई हो रही होगी। और आप यह कैसे कह सकते हैं कि वह पहले थी और नहीं थी — कुछ न कुछ होगा।
क्या सिद्ध किए गए मंत्र का अनुष्ठान दोबारा किया जा सकता है?
यह बार-बार करना चाहिए
वे कहते हैं कि सिद्ध किए गए मंत्र का अनुष्ठान दोबारा किया जा सकता है — यह बार-बार करना चाहिए। यह पूछे जाने पर कि कैसे पता चले कि मंत्र सिद्ध हुआ है, वे सैंडी जी से कहते हैं कि इस विषय पर एक वीडियो है, उसे एक बार देखिए।
वे कहते हैं कि सिद्ध किए गए मंत्र पर अनुष्ठान दोबारा किया जा सकता है; यह बार-बार करना चाहिए। यह पूछे जाने पर कि कैसे पता चले कि मंत्र सिद्ध हुआ है या नहीं, वे कहते हैं कि इस विषय पर एक वीडियो है। कृपया उसे एक बार देखिए, सैंडी जी।
यदि हम माता को मानते हैं और फिर भी इतना दुख है, तो वे सुनती क्यों नहीं?
कभी मत कहिए कि वे नहीं सुनतीं; हम नहीं देख सकते कि वे किस रूप में सुन रही हैं
नेहा जी से वे कहते हैं कि यह प्रश्न अलग तरह का हो जाता है। जगदंबा की सेवा करने वाले हम सबको कभी नहीं कहना चाहिए कि वे नहीं सुनतीं। वे यह बार-बार कहते हैं: जब भी आपने जगदंबा के नाम पर एक भी अगरबत्ती जलाई, एक भी नारियल या एक भी भोग चढ़ाया, वे उसे स्वीकार करती हैं — वे महामाया हैं। वे पूरी सृष्टि की अधिष्ठात्री हैं; ऐसा हो ही नहीं सकता कि वे न सुनें। आप और हम नहीं समझ सकते कि वे किस रूप में सुन रही हैं। आप जो सीधे चाहते हैं, वह नहीं होता। और कभी नहीं कहना चाहिए: हमने आपकी पूजा की, सेवा की, इतना दुख क्यों है, आप सुन क्यों नहीं रहीं। वे समझते हैं कि यह कष्ट के कारण मुँह से निकल जाता है, पर बाद में मान लेना चाहिए कि जो भी हो रहा है, जगदंबा अच्छा ही कर रही हैं।
वे कहते हैं कि नेहा जी, यह प्रश्न बिल्कुल अलग तरह का हो जाता है। जगदंबा की सेवा करने वाले हम सबको कभी नहीं कहना चाहिए कि वे नहीं सुनतीं। यह वे बार-बार कहते हैं: जब भी आपने जगदंबा के नाम पर एक भी अगरबत्ती जलाई, एक नारियल या एक भोग चढ़ाया, वे उसे स्वीकार करती हैं। वे महामाया हैं। वे पूरी सृष्टि की अधिष्ठात्री हैं। ऐसा हो ही नहीं सकता कि वे न सुनें। आप और हम नहीं समझ सकते कि वे किस रूप में सुन रही हैं। आप जो सीधे चाहते हैं, वह नहीं होता। और कभी नहीं कहना चाहिए: हमने आपकी पूजा की, आपकी सेवा की, इतना दुख क्यों है, आप सुन क्यों नहीं रहीं? वे समझते हैं कि यह कष्ट के कारण मुँह से निकल जाता है, पर बाद में मान लेना चाहिए कि जो भी हो रहा है, जगदंबा अच्छा ही कर रही हैं।
यदि स्वप्न में काली माता दिखें, तो क्या करना चाहिए?
यह कृपा है, पर इसे सबके सामने मत बताइए
एक श्रोता, जो कहता है कि एक दिन स्वप्न में काली माता दिखीं, उससे वे कहते हैं कि यह बहुत अच्छा है; पर यदि भगवती दर्शन दे रही हैं, तो — और यह वे बार-बार कहते हैं — भले आपने यहाँ गलत नाम लिखा है, इसे सार्वजनिक रूप से मत बताइए। जब कोई शक्ति दर्शन देती है, उस पर भी एक अलग वीडियो है जो जल्द डाला जाएगा; सब तैयार है, बस अपलोड करना बाकी है। जब देवता दर्शन दें तो क्या करना चाहिए, जब मंत्र मिले तब — वह पहले ही डाल दिया गया है। जब स्वप्न में भविष्य पता चलने लगे, जब आप खुद को कहीं जाते पाएँ और उसका अर्थ क्या है, जब आप बार-बार किसी सिद्ध पीठ जा रहे हों, तब क्या करना चाहिए।
उस श्रोता से, जो कहता है कि एक दिन स्वप्न में काली माता दिखीं, वे कहते हैं कि यह बहुत अच्छा है। पर यदि भगवती दर्शन दे रही हैं, तो — और यह वे बार-बार कहते हैं — भले आपने यहाँ गलत नाम लिखा है, इसे सार्वजनिक रूप से मत बताइए। जब कोई शक्ति दर्शन देती है, इस पर भी एक अलग वीडियो है जो जल्द डाला जाएगा। सब बना हुआ है; बस अपलोड करना है, और आपको सुनना चाहिए। जब देवता दर्शन दें, तो क्या करना चाहिए? जब मंत्र मिले — वह वे पहले ही डाल चुके हैं। जब स्वप्न में आपको भविष्य पता चलने लगे, तो क्या करना चाहिए? जब आप उसमें कहीं घूमने निकल जाएँ, तो उसका क्या अर्थ है, और क्या करना चाहिए? जब आप बार-बार किसी सिद्ध पीठ जा रहे हों, तो क्या करना चाहिए?
भगवती काली को कैसे प्रसन्न करें?
रोज सेवा, रंगे चावल और एक सौ आठ नामों से अर्चन
वे कहते हैं कि भगवती काली को प्रसन्न करने के लिए जगदंबा की रोज सेवा कीजिए। यदि अर्चन कर सकें, तो कीजिए — चावल से कीजिए, चावल को लाल रोली से रंगकर, और एक सौ आठ नामों के साथ भगवती को चढ़ाइए। नहीं तो अपनी क्षमता के अनुसार जितना हो सके, अर्गला के पहले मंत्र "ॐ जयन्ती मङ्गला काली" का जप कीजिए। नेहा जी, यदि आपके पास कोई और मंत्र नहीं, तो खुद को जगदंबा को समर्पित करके बस इतना ही कीजिए।
वे कहते हैं कि भगवती काली को प्रसन्न करने के लिए जगदंबा की रोज सेवा कीजिए। यदि आप अर्चन कर सकें, तो कीजिए — चाहे चावल से करें, चावल को लाल रोली से रंगकर, और एक सौ आठ नामों के साथ भगवती को चढ़ाइए। और नहीं तो अपनी क्षमता के अनुसार जितना हो सके, अर्गला के पहले मंत्र ॐ जयन्ती मङ्गला काली का जप कीजिए। नेहा जी, यदि आपके पास कोई और मंत्र नहीं है, तो जगदंबा को समर्पित होकर बस इतना ही कीजिए।
शास्त्र क्या कहता है
The mantra the speaker gives, ॐ जयन्ती मङ्गला काली, is the opening of the Argalā Stotra's first verse.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥
ॐ। जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा, तुम्हें नमस्कार है।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
क्या भौतिक जीवन में दुख कभी खत्म होगा?
पैसा, फिर स्वास्थ्य, फिर बच्चे, फिर पति
वे कहते हैं कि वे बार-बार कहते हैं कि भौतिक जीवन में हम सबने जन्म लिया है और मनुष्य का शरीर है। जब तक शरीर है और मृत्यु नहीं होती, दुख आते रहेंगे। आज दुख का कारण पैसा हो सकता है; कल पैसा होगा तो स्वास्थ्य का दुख होगा। यदि पैसा और स्वास्थ्य दोनों आ जाएँ, तो शायद बच्चे आपकी बात न मानें, पति बात न माने। इसी तरह कोई न कोई दुख आता रहेगा।
वे कहते हैं कि वे बार-बार कहते हैं कि भौतिक जीवन में हम सबने जन्म लिया है और मनुष्य का शरीर है। जब तक हमारे पास शरीर है और मृत्यु नहीं होती, दुख मिलते रहेंगे। आज दुख का कारण पैसा हो सकता है; कल पैसा आ जाएगा और स्वास्थ्य का दुख खड़ा हो जाएगा। यदि पैसा और स्वास्थ्य दोनों हो जाएँ, तो शायद बच्चे आपकी बात न मानें; आपके पति बात न मानें। इसी तरह कोई न कोई दुख आता रहेगा।
यदि आप सोचें कि सिद्धि से दुनिया मुट्ठी में कर लेंगे, तो?
ऐसे कर्म दूसरे जन्म में भोगने पड़ते हैं
जो सोचते हैं कि हम भगवती की सेवा-पूजा कर रहे हैं, या कोई सिद्धि मिल जाएगी, और फिर पूरी दुनिया मुट्ठी में कर लेंगे और सब हमारी इच्छा से होगा — उनसे वे कहते हैं, यह जान लीजिए: यदि आप इस तरह का काम करते भी हैं, तो ये सब दोबारा जन्म लेकर भोगना पड़ेगा। इसलिए सक्षम हो भी जाएँ, चीजें सिद्ध कर भी लें, तो कभी इसका अपने लिए इस तरह प्रयोग नहीं करना चाहिए। सीमा में रहना चाहिए, और कभी प्रयोग करने के बजाय उन्हें समर्पित कर देना चाहिए: जगदंबा, जैसी आपकी इच्छा। दुख देना चाहें तो दीजिए — पर उस दुख को सहने की क्षमता भी दीजिए। बस इतना ही करना चाहिए।
और जो सोचते हैं कि हम भगवती की सेवा-पूजा कर रहे हैं, या कोई सिद्धि मिल जाएगी और फिर हम पूरी दुनिया मुट्ठी में कर लेंगे और सब हमारी इच्छा से होगा। तो यह बात जान लीजिए कि यदि आप इस तरह का काम करते हैं, तो ये सब दोबारा जन्म लेकर भोगना पड़ेगा। इसलिए सक्षम हो भी जाएँ, चीजें सिद्ध कर भी लें, तो कभी इसका अपने लिए इस तरह प्रयोग नहीं करना चाहिए। सीमा में रहना चाहिए, और कभी प्रयोग न करते हुए उन्हें समर्पित कर देना चाहिए: जगदंबा, जैसी आपकी इच्छा। दुख देना चाहें तो दीजिए, पर उस दुख को सहने की क्षमता भी दीजिए। बस इतना ही करना चाहिए।
गुरु गोरखनाथ जी के मंत्र का विधान कहाँ है?
सिद्ध साबरी विद्या चैनल और सुमेरु साबर
वे कहते हैं कि सिद्ध साबरी विद्या चैनल खोजिए, या लिंक इस चैनल के डिस्क्रिप्शन में है — हर वीडियो के डिस्क्रिप्शन में लिंक है। उसमें जाइए, और सबसे पहले गुरु गोरखनाथ जी का सुमेरु साबर कीजिए। नवनाथों को जगाने का एक विधान है जो आप कर सकते हैं। भगवान गोरखनाथ के दो मंत्र हैं और दो अलग विधान; शुरुआत के लिए उन दोनों में से कोई एक कीजिए।
वे पहले बताते हैं कि इतने सारे साधना विधान उपलब्ध होने पर, यदि ठीक बात है तो वे साधनाएँ कीजिए — सुनवाई जरूर होती है, भले कुछ समय लगे; किसी की जल्दी होती है और किसी की देर से। गुरु गोरखनाथ जी की सिद्ध साबरी विद्या के लिए चैनल खोजिए, या लिंक इस चैनल के डिस्क्रिप्शन में है; हर वीडियो के डिस्क्रिप्शन में लिंक है। उसमें जाइए, और सबसे पहले गुरु गोरखनाथ जी का सुमेरु साबर कीजिए। नवनाथों को जगाने का एक विधान है जो आप कर सकते हैं। भगवान गोरखनाथ के दो मंत्र हैं और दो अलग विधान हैं; शुरुआत के लिए उन दोनों में से कोई एक कीजिए।
स्वप्न में मिले मंत्र का क्या करना चाहिए?
उसे गूगल मत कीजिए, और उसमें कुछ मत जोड़िए
वे कहते हैं कि एक अलग वीडियो है जिसमें पूरी तरह समझाया गया है: यदि मंत्र मिले, तो कैसे जानें कि मंत्र सही है या गलत, कहीं कोई भूत-प्रेत आकर अपना काम तो नहीं करवाना चाहता; वह किस समय मिला, उसे किस तरह जानें, और बाद में उस मंत्र का क्या करें। वे कहते हैं, इसे गूगल पर मत खोजिए, क्योंकि स्वप्न में मिला मंत्र गूगल में नहीं मिलेगा। लोग तुरंत मंत्र गूगल करने लगते हैं और फिर उन्हें मैसेज करते हैं कि गुरु जी, स्वप्न में मंत्र मिला और गूगल में नहीं मिल रहा। वे कहते हैं, भाई, जो शक्ति स्वप्न में दे रही है वह महाशक्ति है; वह कहाँ से और कब प्रसन्न होकर आपको दे रही है, और आप गूगल में खोज रहे हैं — सब कुछ गूगल में नहीं मिलेगा।
वे कहते हैं कि एक अलग वीडियो है जिसमें पूरे विस्तार से समझाया गया है: यदि मंत्र मिले, तो कैसे जानें कि मंत्र सही है या गलत, कहीं कोई भूत-प्रेत आकर अपना काम तो नहीं करवाना चाहता; वह किस समय मिला, उसे किस तरह जानें, और फिर उस मंत्र का क्या करें। इसे गूगल पर मत खोजिए, क्योंकि स्वप्न में मिला मंत्र गूगल में नहीं मिलेगा। जो तुरंत मंत्र गूगल करने लगते हैं, वे फिर मैसेज भी करते हैं: गुरु जी, स्वप्न में मंत्र मिला और गूगल में नहीं मिल रहा। भाई, जो शक्ति स्वप्न में दे रही है वह महाशक्ति है; वह कहाँ से और कब प्रसन्न होकर आपको दे रही है — और आप गूगल में खोज रहे हैं। सब कुछ गूगल में नहीं मिलेगा।
यदि बाद में मिले मंत्र में स्वप्न वाले से ज्यादा अक्षर हों, तो क्या करें?
स्वप्न में जो आया वही कीजिए, न जोड़ना न घटाना
वे कहते हैं कि स्वप्न में जैसा मंत्र मिला, उसमें अपनी ओर से कुछ मत जोड़िए। यदि स्वप्न में मंत्र मिला और वह आपको याद है — हो सकता है आपको आठ अक्षर का मंत्र मिला हो, और बाद में कहीं खोजने पर वह नौ अक्षर का निकले — तो आपको ठीक वही करना है जो स्वप्न में मिला, न कि अपनी ओर से कुछ जोड़ना; इसमें कोई जोड़-घटाना, गुणा-भाग नहीं करना। हालाँकि, वे जोड़ते हैं, यदि वही असली मंत्र मिल जाए जिसे आप करते हैं या करना चाहते हैं, तो उसे विधि-विधान से कीजिए।
वे कहते हैं कि स्वप्न में जो ठीक-ठीक मंत्र मिलता है, उसमें अपनी ओर से कुछ मत जोड़िए। यदि आपको स्वप्न में मंत्र मिला और वह आपको याद है — हो सकता है आपको आठ अक्षर का मंत्र मिला हो और बाद में आप कहीं खोजें और वह नौ अक्षर का निकले — तो आपको ठीक वही करना है जो स्वप्न में मिला। न कि उसमें अपनी ओर से कुछ जोड़ना है; इसमें कोई जोड़-घटाना, गुणा-भाग नहीं करना। हालाँकि, यदि जो असली मंत्र मिला वह वही है जिसे आप करते हैं या करना चाहते हैं, तो उसे विधि-विधान से कीजिए।
यदि बैठ न सकें, तो क्या खड़े होकर जप कर सकते हैं?
पूजा स्थान से थोड़ी दूर कुर्सी, और गृहस्थ के लिए कोई दोष नहीं
वे पूछते हैं, खड़े होकर जप क्यों करें? जिसे बैठने में समस्या है, कि हम जमीन पर नहीं बैठ सकते — भगवान का पूजा स्थान बदलने की भी जरूरत नहीं। ऐसा कीजिए: वहाँ पूजा-पाठ, धूप, दीप और अगरबत्ती जलाइए, थोड़ा हटकर एक आरामदायक कुर्सी लगवाइए जहाँ बैठ सकें, और वहाँ आराम से बैठकर जप कीजिए। वे कहते हैं, विश्वास कीजिए, गृहस्थी में यदि आपका शरीर सक्षम नहीं है तो कोई दोष नहीं लगता। इस भ्रम में मत रहिए कि आसन पर नहीं बैठेंगे तो जप का फल नहीं मिलेगा। कुर्सी पर आराम से बैठकर जप कीजिए; कोई कठिनाई नहीं। क्या जगदंबा नहीं देख रहीं कि उनका बेटा या बेटी कितने कष्ट में है — क्या बैठेंगे तभी होगा?
यह पूछे जाने पर कि यदि बैठ न सकें तो क्या खड़े होकर जप कर सकते हैं, वे पूछते हैं कि खड़े होकर जप क्यों करें। जिसे बैठने में समस्या है, कि हम जमीन पर नहीं बैठ सकते — भगवान का पूजा स्थान बदलने की भी जरूरत नहीं। ऐसे कीजिए: वहाँ पूजा-पाठ, धूप, दीप और अगरबत्ती जलाइए; थोड़ा हटकर एक आरामदायक कुर्सी लगवाइए जहाँ बैठ सकें, और वहाँ आराम से बैठकर जप कीजिए। विश्वास कीजिए, गृहस्थी में यदि आपका शरीर सक्षम नहीं है, तो कोई दोष नहीं लगता। इस भ्रम में मत रहिए कि आसन पर नहीं बैठेंगे तो जप का फल नहीं मिलेगा। कुर्सी पर आराम से बैठकर जप कीजिए; कोई कठिनाई नहीं है। क्या जगदंबा नहीं देख रहीं कि उनका बेटा या बेटी कितने कष्ट में है — कि बैठेंगे तभी होगा?
पूजा स्थान ऊँचा कीजिए या बदलिए, और खड़े होकर करें तो पैरों के नीचे आसन रखिए
पूजा स्थान की ऊँचाई बदलिए, और पैरों के नीचे आसन रखिए
वे कहते हैं कि इस हिसाब से या तो पूजन का स्थान बदल दीजिए या उसे थोड़ा ऊँचा कर दीजिए, या अपनी कुर्सी वैसी व्यवस्थित कर लीजिए, और फिर कुर्सी पर बैठकर जप कीजिए। और यदि आप खड़े होकर कर सकते हैं, तो वह भी कीजिए; कोई कठिनाई नहीं। बस पैरों के नीचे आसन जरूर होना चाहिए।
वे कहते हैं कि इस हिसाब से या तो पूजन का स्थान बदल दीजिए या उसे थोड़ा ऊँचा कर दीजिए, या अपनी कुर्सी वैसी बना लीजिए, और फिर कुर्सी पर बैठकर जप कीजिए। और यदि आप खड़े होकर कर सकते हैं, तो वैसे भी कीजिए; कोई कठिनाई नहीं। बस पैरों के नीचे आसन जरूर होना चाहिए।
यदि मंत्र याद न हो, तो क्या किताब से देखकर पढ़ सकते हैं?
एक-दो महीने पढ़िए, और वह बैठ जाएगा
वे उत्तर देते हैं, बिल्कुल। जो भी हो — शताक्षरी मंत्र, दत्त माला मंत्र, या भगवती का जयंती मंत्र — यदि याद नहीं है तो देखकर करना है। एक-दो महीने देखकर कीजिए, फिर वह ऐसे कंठस्थ हो जाएगा कि मंत्र स्वप्न में भी चलेगा। आप किसी से बात करते रहेंगे और पीछे मन में वह मंत्र चलता रहेगा।
उस श्रोता से, जो कहता है कि एक दिन स्वप्न में काली माता को देखने का अर्थ है कि भगवती की कृपा आप पर है, वे पुष्टि करते हैं कि इसका यही अर्थ है, और भगवती की सेवा-पूजा करने को कहते हैं। यह पूछे जाने पर कि याद न हो तो क्या किताब से पढ़ सकते हैं, वे उत्तर देते हैं, बिल्कुल: जो भी हो, शताक्षरी मंत्र, दत्त माला मंत्र, या भगवती का जयंती मंत्र, यदि याद नहीं है तो देखकर करना है। एक-दो महीने देखकर कीजिए, फिर वह ऐसे याद हो जाएगा कि मंत्र स्वप्न में भी चलेगा। आप किसी से बात करते रहेंगे और पीछे मन में वह मंत्र चलता रहेगा।
सोखा को दिखाने के बाद माता की सवारी आना बंद हो गई — क्या करें?
चौखट पर हवन, जो कभी खाली नहीं जाता
राकेश दुबे जी, जिन पर तंत्र हुआ था और जो कहते हैं कि जिस सोखा को दिखाया उसने ठीक नहीं किया, और उसे दिखाने के बाद से माता की सवारी नहीं आती — उनसे वे कहते हैं कि ऐसी चीजें कैसे होती हैं, यह उन्होंने स्पष्ट किया है। आपको यह करना चाहिए: यदि आप पर कुलदेवी या किसी शक्ति की सवारी आती थी, तो हवन की एक प्रक्रिया बताई गई है — चौखट पर हवन करने की विधि। वह कीजिए; उससे देवी आकर्षित होती हैं। वे कहते हैं कि चौखट पर और चौराहे पर जो किया जाता है, वह कभी खाली नहीं जाता।
वे राकेश दुबे जी से कहते हैं कि यह विषय उन्होंने स्पष्ट किया है — कि पूरी चीज कैसे की जाती है। आपको यह करना चाहिए: यदि आप पर कुलदेवी की सवारी आती थी, या किसी भी शक्ति की, तो हवन की एक प्रक्रिया बताई गई है, चौखट पर हवन करने की विधि। वह कीजिए; उससे देवी आकर्षित होती हैं। चौखट पर जो किया जाता है, चौराहे पर जो किया जाता है, वह कभी खाली नहीं जाता।
सूतक के समय घर के शिवलिंग का क्या नियम है?
छूना नहीं, पर रोज स्नान, न श्रृंगार न फूल
भजन जी से वे कहते हैं: घर में नर्मदेश्वर हो या कोई भी शिवलिंग, उसे छूना नहीं है, पर रोज एक लोटा जल ऐसे पात्र में रखना है कि उन्हें रोज स्नान कराया जा सके। केवल स्नान कराना है; शिवलिंग को छूने की जरूरत नहीं। सूतक काल में भी शिवलिंग घर में रहेगा, और उस पर सूतक का नियम लागू होता है: कोई श्रृंगार नहीं करना, कोई फूल या कुछ नहीं चढ़ाना, पर शिवलिंग पर चाँदी का बिल्व पत्र आदि रखना चाहिए, और कम से कम रोज उन पर गंगाजल डालना चाहिए — भले पाँच बूँद ही डालें। उनका रोज स्नान जरूर होना चाहिए।
वे कहते हैं कि घर में नर्मदेश्वर हो या कोई भी शिवलिंग, उसे छूना नहीं है; पर रोज एक लोटा जल ऐसे पात्र में रखना है कि उन्हें रोज स्नान कराया जा सके। केवल स्नान कराना है, पर शिवलिंग को छूने की जरूरत नहीं है। सूतक काल में भी शिवलिंग घर में रहेगा, और उसमें उस पर सूतक का नियम लागू होता है: उनका कोई श्रृंगार नहीं करना, कोई फूल या कुछ नहीं चढ़ाना। पर शिवलिंग पर चाँदी का बिल्व पत्र आदि रखना चाहिए, और कम से कम रोज उन पर गंगाजल डालना चाहिए, भले आप पाँच बूँद ही डालें। उनका रोज स्नान जरूर होना चाहिए।
गोरखनाथ को गुरु मानकर साधना कैसे की जाती है?
फिर से सिद्ध साबरी विद्या चैनल
एसटीबी न्यूज़ हिंदी जी, जो पूछते हैं कि उन्हें गुरु मानकर साधना कैसे करें, उन्हें वे उत्तर देते हैं कि सिद्ध साबरी विद्या चैनल का लिंक वहाँ रहता है; यूट्यूब पर खोजिए, उसमें पूरा विधान पूरी तरह समझाया गया है कि गुरु गोरखनाथ की साधना कैसे करनी है।
उन्हें गुरु मानकर साधना कैसे करें, इस प्रश्न पर वे कहते हैं कि सिद्ध साबरी विद्या चैनल का लिंक वहाँ रहता है। यूट्यूब पर खोजिए; उसमें उन्होंने पूरा विधान पूरी तरह समझाया है कि गुरु गोरखनाथ की साधना कैसे करनी है।
बार-बार उड़ने के स्वप्न आने का क्या अर्थ है?
पहले वात की समस्या जाँचिए
वे कहते हैं कि सबसे पहले, आपको वात की समस्या हो सकती है — यानी पेट में गैस आदि बनती होगी। पहले वह देखिए। यदि ऐसा होता है, या इस तरह की समस्या है, तो उसे देखिए; वह आपका पहला काम है, और उस चीज को सुलझाने का प्रयास कीजिए। वे कहते हैं कि स्वप्न में खुद को उड़ते देखने का सबसे बड़ा कारण वात की समस्या है।
वे पहले दोहराते हैं कि जो मंत्र सिद्ध किया जाए, उसका अनुष्ठान दोबारा करना चाहिए। यह पूछे जाने पर कि उड़ने के बहुत से स्वप्न आने का क्या संकेत है, वे कहते हैं कि सबसे पहले आपको वात की समस्या हो सकती है — यानी पेट में गैस आदि बनती होगी। सबसे पहले वह देखिए। यदि ऐसा है, या इस तरह की समस्या है, तो उसे देखिए। वह आपका पहला काम है, और उस चीज को सुलझाने का प्रयास कीजिए। स्वप्न में खुद को उड़ते देखने का सबसे बड़ा कारण वात की समस्या है।
कुल देवता की सिद्धि कैसे की जाती है?
यह इस पर निर्भर है कि आपके कुल देवता कौन हैं; और झाड़-फूँक करने वालों का तपोबल
यह पूछे जाने पर कि कुल देवता की सिद्धि कैसे होती है, वे उत्तर देते हैं कि आपके कुल देवता कौन हैं, उसके अनुसार उस विधि-विधान से बताया जाएगा। शिवानंदन स्वरूप जी से वे कहते हैं कि तपोबल बढ़ाइए — जो झाड़-फूँक आदि करते हैं, उनका तपोबल हमेशा मजबूत होना चाहिए; इस विषय को वे अलग से समझाएँगे।
यह पूछे जाने पर कि कुल देवता की सिद्धि कैसे की जाती है, वे कहते हैं कि आपके कुल देवता कौन हैं, उसके अनुसार उस विधि-विधान से बताया जाएगा। शिवानंदन स्वरूप जी से वे कहते हैं: तपोबल बढ़ाइए। जो झाड़-फूँक आदि करते हैं, उनका तपोबल हमेशा मजबूत होना चाहिए। इस विषय को वे अलग से समझाएँगे।
क्या केवल भूत-प्रेत और घर के पूर्वज ही लोगों को परेशान करते हैं?
भूत-प्रेत से आगे बढ़िए; दत्तात्रेय, गणपति अथर्वशीर्ष और अर्गला का पहला मंत्र
वे उत्तर देते हैं, अब आपसे क्या कहें। यदि आप भूत-प्रेत में अटके रहेंगे, तो भूत-प्रेत आपको परेशान करेंगे; इससे आगे बढ़िए। चाहे आपके पितृ और पूर्वज हों, भूत-प्रेत हों, देव दोष हो या मंत्र दोष, भगवान दत्तात्रेय इसीलिए हैं कि वे बार-बार उन्हें करने को कहते हैं — उनसे किसी भी तरह के दोष का शमन होता है। दत्तात्रेय माला मंत्र की साधना कीजिए, और साथ में गणपति अथर्वशीर्ष और अर्गला का पहला मंत्र। ये तीनों ऐसी चीजें हैं कि हर तरह का दोष शांत हो जाएगा; और जब दोष शांत होगा, चाहे मंत्र दोष हो, देवी दोष हो या पितरों का दोष, सब इससे दूर हो जाएँगे। वे कहते हैं, आप लोग केवल भूत-प्रेत को लेकर परेशान रहते हैं — कि भूत है तो भूत काट लेगा; आजकल आप लोगों का बहुत नाटक है।
वे कहते हैं, अब आपसे क्या कहें। यदि आप भूत-प्रेत में अटके रहेंगे, तो भूत-प्रेत आपको परेशान करेंगे; उससे आगे बढ़िए। चाहे आपके पितृ और पूर्वज हों, चाहे भूत-प्रेत, चाहे देव दोष, चाहे मंत्र दोष — भगवान दत्तात्रेय ही वह कारण हैं जिसके लिए वे बार-बार उन्हें करने को कहते हैं। उनसे किसी भी तरह के दोष का शमन होता है। दत्तात्रेय माला मंत्र की साधना कीजिए, और उसके साथ गणपति अथर्वशीर्ष और अर्गला का पहला मंत्र। ये तीनों ऐसी चीजें हैं कि हर तरह का दोष शांत हो जाएगा। जब दोष शांत होगा, चाहे मंत्र दोष हो, देवी दोष हो या पितरों का दोष, सब इससे दूर हो जाएँगे। वे कहते हैं, आप लोग केवल भूत-प्रेत को लेकर परेशान रहते हैं — कि भूत है तो भूत काट लेगा। आजकल आप लोगों का बहुत नाटक है।
कर्म कीजिए और फल की चिंता मत कीजिए
कर्म कीजिए और फल की चिंता मत कीजिए
इस टिप्पणी पर कि यह अपने काम और कर्म पर निर्भर है, वे कहते हैं कि तब सोचने को क्या है — कर्म कीजिए। फल की चिंता मत कीजिए।
इस टिप्पणी पर कि यह अपने काम और कर्म पर निर्भर है, वे कहते हैं: तो फिर सोचने को क्या है? कर्म कीजिए। फल की चिंता मत कीजिए।
स्वप्न में आया कि सोशल मीडिया से डाउनलोड की गई चालीसा गलत है — क्या ऐसा होता है?
इंटरनेट से डाउनलोड किए पाठों में गलतियाँ
एके पात्रो जी, जिन्होंने सोशल मीडिया से माँ भद्रकाली चालीसा डाउनलोड करके पढ़ना शुरू किया और बीच में स्वप्न आया कि चालीसा गलत है और इसे नहीं पढ़ना चाहिए, उन्हें वे उत्तर देते हैं कि ऐसा होता है। वे कहते हैं कि किसी ने वैष्णो देवी चालीसा भेजी थी, जिसमें पोषण की जगह शोषण लिखा था। नेट से डाउनलोड करने में ठीक यही कठिनाई है। वे यह भी कहते हैं कि सिद्ध किया गया मंत्र बिल्कुल दोबारा करना चाहिए।
एके पात्रो जी से, जिन्होंने सोशल मीडिया से डाउनलोड की गई माँ भद्रकाली चालीसा पढ़नी शुरू की थी और बीच में स्वप्न आया कि चालीसा गलत है और इसे नहीं पढ़ना चाहिए, वे कहते हैं कि ऐसा होता है। किसी ने वैष्णो देवी चालीसा भेजी थी, और उसमें भी पोषण की जगह शोषण लिखा था। नेट से डाउनलोड करने में ठीक यही कठिनाई है। यह भी पूछे जाने पर कि सिद्ध किया गया मंत्र दोबारा क्यों नहीं किया जा सकता, वे कहते हैं कि बिल्कुल करना चाहिए।
क्या नवनाथ साधना दोहराने पर नया अनाज और नए बर्तन चाहिए?
इसे ठीक उसी तरह दोहराइए
यह पूछे जाने पर कि नवनाथ साधना दोबारा करने के लिए क्या फिर से अनाज और नए बर्तन चाहिए, वे उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल, इसे ठीक उसी तरह करना चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि नवनाथ साधना दूसरी बार करने के लिए क्या फिर से अनाज और नए बर्तन चाहिए, वे उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल। इसे ठीक उसी तरह करना चाहिए।
कुलदेवी बाला सुंदरी की कृपा कैसे प्राप्त होती है?
श्री कुल में दीक्षा, या तब तक ललिता सहस्रनाम
वे उत्तर देते हैं कि यदि आपकी कुलदेवी बाला सुंदरी हैं, तो सबसे अच्छा होगा कि आप श्री कुल में दीक्षित हों। और जब तक दीक्षित न हों, तब तक भगवती के सहस्रनाम से, ललिता सहस्रनाम से, उनका पूजन और पाठ कीजिए; वह सबसे अच्छा होगा।
वे कहते हैं कि यदि वे बाला सुंदरी हैं, तो श्री कुल में दीक्षित होइए; वह सबसे अच्छा होगा। और जब तक आप दीक्षित न हों, तब तक भगवती के सहस्रनाम से, ललिता सहस्रनाम से, उनका पूजन और पाठ कीजिए। वह सबसे अच्छा होगा।
क्या काली चालीसा पढ़कर अपनी इष्ट देवी को अर्पित कर सकते हैं?
घर में भद्रकाली तभी, जब वे कुलदेवी हों
वे उत्तर देते हैं, हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं। यदि भद्रकाली आपकी इष्ट और अधिष्ठात्री शक्ति हैं, तो काली चालीसा जरूर पढ़िए, और काली कवच भी पढ़ सकते हैं। सामान्य गृहस्थी में भद्रकाली की पूजा तभी होती है जब वे आपकी कुलदेवी हों; नहीं तो सामान्य रूप से घर में भद्रकाली की पूजा नहीं होती। पर यदि वे आपकी कुलदेवी हैं, तो जरूर कीजिए — और यदि आप करते आ रहे हैं, तो अब कीजिए, छोड़ना नहीं चाहिए।
वे कहते हैं, हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं। यदि भद्रकाली आपकी इष्ट हैं, आपकी अधिष्ठात्री शक्ति हैं, तो आप काली चालीसा का पाठ जरूर कर सकते हैं; और काली कवच का पाठ भी कर सकते हैं। सामान्य गृहस्थी में भद्रकाली की पूजा तभी होगी जब वे आपकी कुलदेवी हों; नहीं तो सामान्य रूप से घर में भद्रकाली की पूजा नहीं होती। पर यदि वे आपकी कुलदेवी हैं, तो जरूर कीजिए। और यदि आप करते आ रहे हैं, तो कीजिए; अब इसे छोड़ना नहीं चाहिए।
यदि घर की माँ दुखी हों, तो क्या करना चाहिए?
भगवती मातंगी की सेवा, पर उच्छिष्ट चांडालिनी रूप में नहीं
वे कहते हैं कि यदि घर की माँ दुख में हैं, तो भगवती मातंगी की सेवा कीजिए; वह सबसे अच्छा है। सामान्य रूप से उच्छिष्ट चांडालिनी स्वरूप में सेवा मत कीजिए।
वे कहते हैं कि यदि घर में माँ दुख में हैं, तो भगवती मातंगी की सेवा कीजिए; वह सबसे अच्छा रहता है। सामान्य रूप से उच्छिष्ट चांडालिनी स्वरूप में सेवा मत कीजिए। महाकाली के प्रति आकर्षण के साथ डर भी लगने, और क्या चार भुजाओं वाला, सिंह पर सवार रूप उपयुक्त है, इस प्रश्न पर वे कहते हैं कि वे प्रश्नकर्ता से बात करेंगे। यह पूछे जाने पर कि क्या इसे हनुमान जी के मंदिर में किया जा सकता है, वे कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है।
पहले दी गई महाभैरव साधना इस गुप्त नवरात्रि में दोहरानी है
इस गुप्त नवरात्रि में महाभैरव साधना दोहराना
डेडिकेटेड ग्रुप के एक साधक ने नवरात्रि के लिए पहले से साधनात्मक मार्गदर्शन माँगा, तो वे कहते हैं कि जो महाभैरव साधना दी गई है, जिसे तीन बार करना था — उन्हें लगता है कि सबने इसे केवल एक बार किया है — उसे इस गुप्त नवरात्रि में फिर से करना चाहिए।
नवरात्रि के लिए पहले से साधनात्मक मार्गदर्शन माँगने वाले डेडिकेटेड ग्रुप के एक साधक को वे अपनी दी हुई महाभैरव साधना के बारे में उत्तर देते हैं। इसे तीन बार करना था; उन्हें लगता है कि सबने इसे केवल एक बार किया है। इसलिए इस गुप्त नवरात्रि में इसे फिर से करना है।
नाग देवता की सिद्धि कैसे की जाती है?
कुल नाग से शुरुआत, और क्षेत्रीय अंतर
यह पूछे जाने पर कि नाग देवता की सिद्धि कैसे होती है, वे कहते हैं कि यह अच्छा विषय है और वे कुल नाग से शुरू करेंगे और यह भी बताएँगे — पर इसे क्षेत्रीय दृष्टि से बताना होगा।
यह पूछे जाने पर कि नाग देवता की सिद्धि कैसे की जाती है, वे कहते हैं कि यह अच्छा विषय बताया गया है। कुल नाग से शुरू करते हैं; वे यह भी बताएँगे। पर इसे क्षेत्रीय दृष्टि से बताना होगा।
क्या दत्त माला मंत्र नवरात्रि में शुरू किया जा सकता है?
हाँ में एक छोटा उत्तर, और उन्हें गुरु कैसे बनाएँ
नीलम जी के पूछने पर कि वे उन्हें अपना गुरु कैसे बना सकती हैं, वे कहते हैं कि पूरा विधान बताया गया है और गुरु की बिल्कुल जरूरत नहीं; फिर भी यदि वे जोर दें, तो संपर्क करें और विधि-विधान से गुरु साधना करें। यह पूछे जाने पर कि क्या दत्त माला मंत्र नवरात्रि में शुरू किया जा सकता है, वे उत्तर देते हैं: बिल्कुल किया जा सकता है।
क्या कोई देवी या देवता है जो उग्र न हो?
हर किसी ने किसी दुष्ट का अंत किया है; कोई केवल सौम्य नहीं
यह पूछे जाने पर कि किसने कहा कि देवी का सुमिरन नहीं करना चाहिए क्योंकि माता उग्र रूप हैं, वे अमृत जी से बस अर्गला के पहले मंत्र का पाठ करने को कहते हैं; ऐसी कोई बात नहीं। वे पूछते हैं, कौन से देवी-देवता सामान्य हैं — कौन सा देवी-देवता उग्र नहीं? किसने किसी दुष्ट का अंत नहीं किया? हमारी सनातन संस्कृति में ऐसा कौन सा स्वरूप है? हनुमान जी वैष्णव हैं, और उन्होंने बंदर बनकर इतने राक्षस मारे। सब उग्र हैं; एक भी सौम्य नहीं। और क्या नारायण ने नहीं मारा? उन्होंने कितने लोगों का अंत किया, दुष्टों का अंत किया। तो उनका नाम ही मत लीजिए। अब राम-राम कीजिए — राम ने रावण को मारा, जो इतना बड़ा दुष्ट था; राम जी ने उसे मारा, उसका वध किया। तो अब राम जी का नाम ही न लें, क्योंकि राम जी उग्र हो गए।
वे बीच में बताते हैं कि सिद्ध कुंजिका मंत्र की महिमा बहुत बड़ी है, बल्कि अनंत है, और राकेश जी के आके वीर वाले प्रश्न का उत्तर वे नहीं दे सकते क्योंकि वे वहाँ तक नहीं पहुँचे हैं। इस प्रश्न पर कि किसने कहा कि देवी का सुमिरन मत करो क्योंकि माता उग्र रूप हैं, वे अमृत जी से केवल अर्गला के पहले मंत्र का पाठ करने को कहते हैं। ऐसी कोई बात नहीं है। कौन से देवी-देवता सामान्य हैं? कौन सा देवी-देवता उग्र नहीं है? किसने किसी दुष्ट का अंत नहीं किया? हमारी सनातन संस्कृति में ऐसा कौन सा स्वरूप है? हनुमान जी वैष्णव हैं, और उन्होंने बार-बार बंदर बनकर इतने राक्षसों को मारा। सब उग्र हैं; कोई सौम्य नहीं। और क्या नारायण ने नहीं मारा? उन्होंने कितने लोगों का अंत किया, दुष्टों का अंत किया — तो उनका नाम ही मत लीजिए। अब राम-राम कीजिए; राम ने रावण को मारा, जो इतना बड़ा दुष्ट था, उसका वध किया। तो अब राम जी का नाम भी न लें, क्योंकि राम जी उग्र हो गए। वे कहते हैं, बिल्कुल सुमिरन कीजिए। जगदंबा का, या जो भी आपके इष्ट हों उनका, रोज सुमिरन कीजिए। मूर्खों के चक्कर में मत पड़िए।
रोज दुर्गा चालीसा और हनुमान चालीसा पढ़ने से क्या होता है?
एक छोटा उत्तर कि यह बहुत अच्छा है
यह पूछे जाने पर कि दुर्गा चालीसा और हनुमान चालीसा पढ़ने से क्या होता है, और रोज पढ़ने से क्या-क्या होता है, वे कहते हैं कि जीवन में बहुत अच्छा होता है — बिल्कुल कीजिए। क्या होगा, वह आप खुद समझ जाएँगे।
यह पूछे जाने पर कि दुर्गा चालीसा और हनुमान चालीसा पढ़ने से क्या होता है, और रोज पढ़ने से क्या-क्या होता है, वे कहते हैं कि जीवन में बहुत अच्छी चीजें होती हैं। बिल्कुल कीजिए। क्या-क्या होगा, वह आप खुद समझ जाएँगे।
क्या साधना के दौरान बाल और नाखून काटने चाहिए?
एक छोटा निषेध
एके जी की इस बात को कि जब भी साधना चल रही हो, बाल और नाखून नहीं काटने चाहिए, वे ऐसे ही रहने देते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या दत्त माला मंत्र पंचमुखी हनुमान जी के मंदिर में किया जा सकता है, वे उत्तर देते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है।
इस कथन को कि जब भी कोई साधना कर रहा हो, बाल और नाखून नहीं काटने चाहिए, वे ऐसे ही रहने देते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या दत्त माला मंत्र पंचमुखी हनुमान जी के मंदिर में किया जा सकता है, वे कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। विशाल जी, देवेंद्र सिंह, विशाल प्रजापति — वे कर सकते हैं।
जप के समय धीरे-धीरे आगे-पीछे झूलने का क्या अर्थ है?
शरीर का असंतुलित होना; यह आदत छोड़िए
वे उत्तर देते हैं कि झूलना नहीं चाहिए। शरीर असंतुलित हो जाता है। इसे आदत से हटाइए; मंत्र जप करते समय झूलना नहीं है।
यह पूछे जाने पर कि मंत्र जप करते समय धीरे-धीरे आगे-पीछे झूलना क्या है, वे कहते हैं कि झूलना नहीं चाहिए। शरीर असंतुलित हो जाता है। इसे आदत से हटाइए। मंत्र जप करते समय झूलना नहीं है।
एक ब्रह्म राक्षस पूजा-पाठ नहीं करने देता — क्या उपाय है?
उपाय काम नहीं करेंगे; सदाशिव की उपासना और कच्चे दूध से अभिषेक
राकेश दुबे जी, जो कहते हैं कि एक ब्रह्म राक्षस पूजा-पाठ नहीं करने देता और ऐसा लगता है जैसे वहाँ पहाड़ रख दिया गया हो, उन्हें वे उत्तर देते हैं कि यहाँ कोई उपाय काम नहीं करेगा। वे कहते हैं कि वे घर के ब्रह्म होंगे — आजकल ब्राह्मणों के घरों में ब्रह्म घुस गए हैं। यदि वे घर के हैं, तो देखिए कि सही विधि-विधान क्या है; बस कुछ भी मत कर डालिए। और सामान्य तरीके से भगवान सदाशिव की उपासना कीजिए; वहाँ आपको ज्यादा कठिनाई नहीं होगी। उपासना से उनका अर्थ है: भगवान सदाशिव के मंदिर में जाकर कच्चे दूध से अभिषेक कीजिए — इससे उनकी उग्रता शांत होगी। और इसे ठीक से सुलझवाइए। उपायों के चक्कर में पड़कर अपना जीवन खराब मत कीजिए।
वे कहते हैं, राकेश दुबे जी, इसमें कोई उपाय काम नहीं करेगा। वे घर के ब्रह्म होंगे। आजकल ब्राह्मणों के घरों में ब्रह्म घुस गए हैं। यदि वे घर के हैं, तो जो भी विधि-विधान है, उसे ठीक से देखिए; बस कुछ भी ऐसे ही मत कर डालिए। और सामान्य तरीके से भगवान सदाशिव की उपासना कीजिए; वहाँ आपको ज्यादा कठिनाई नहीं होगी। यहाँ उपासना का अर्थ है: भगवान सदाशिव के मंदिर में जाकर कच्चे दूध से अभिषेक कीजिए; इससे उनकी उग्रता शांत होगी। और इसे ठीक से सुलझवाइए। उपायों के चक्कर में पड़कर अपना जीवन खराब मत कीजिए।
सर्वोच्च शक्ति कौन है?
जिसे आप मानें, और पत्नी और परिवार का उदाहरण
अनुज जी को वे उत्तर देते हैं कि जिसे आप मानें, वही है। सर्वोच्च शक्ति कौन है, इस पर द्वैत और अद्वैत में मत अटकिए; यह प्रश्न ही बेकार और मूर्खता से भरा है। जिसके बारे में आप पढ़ें, वही सर्वोच्च है। जो आपके इष्ट हैं, वही सर्वोच्च हैं। जैसे पत्नी के लिए उसका पति सर्वोच्च है, पर परिवार के बाकी लोग छोटे नहीं — उनका भी अपना मान-सम्मान है और वह सबको साथ लेकर चलती है; उसी तरह आपके लिए आपके इष्ट सर्वोच्च होंगे, और बाकी सब आजीवन सम्मानित रहेंगे।
वे अनुज जी से कहते हैं, जिसे आप मानें, वही है। सर्वोच्च शक्ति कौन है, इस पर द्वैत और अद्वैत में मत अटकिए। यह प्रश्न ही बेकार और मूर्खता से भरा है — कि सर्वोच्च कौन है। जिसके बारे में आप पढ़ें, वही सर्वोच्च है। जो आपके इष्ट हैं, वही सर्वोच्च हैं। जैसे एक पत्नी के लिए उसका पति सर्वोच्च है, पर परिवार के बाकी लोग छोटे नहीं; उनका भी अपना मान-सम्मान है, और वह सबको साथ लेकर चलती है। उसी तरह आपके लिए आपके इष्ट सर्वोच्च होंगे, और बाकी सब भी आजीवन सम्मानित रहेंगे।
लोग केवल सिद्धियाँ ही क्यों माँगते हैं?
भगवान के दर्शन का विधान कोई नहीं चाहता
इस टिप्पणी पर कि लोग केवल सिद्धियाँ क्यों माँगते हैं, और मंत्र जप व नाम जप करके देव दर्शन की कामना करनी चाहिए, वे कहते हैं कि अभी-अभी किसी ने ऐसा किया था: एक व्यक्ति को भगवान के दर्शन पाने का विधि-विधान बताया गया, उसने नहीं किया, और आज वह उसे दूसरे को देना चाहता है। वे इसे टेलीग्राम ग्रुप में डालेंगे और लोग थोड़ी देर में देख सकते हैं। वे कहते हैं कि आज के समय में कोई ये चीजें नहीं चाहता।
इस टिप्पणी पर कि लोग केवल सिद्धियाँ ही क्यों माँग रहे हैं, और मंत्र जप व नाम जप करके देव दर्शन की कामना करनी चाहिए, वे कहते हैं कि अभी-अभी किसी ने ऐसा किया था। एक व्यक्ति को भगवान के दर्शन पाने का विधि-विधान बताया गया था; उसने नहीं किया, और आज वह उसे दूसरे को देना चाहता है। वे इसे टेलीग्राम ग्रुप में डालेंगे; थोड़ी देर में देख लीजिए। आज के समय में कोई ये चीजें नहीं चाहता।
नरसिंह शताक्षरी कितनी बार करनी चाहिए?
जब तक परेशानी है तब तक रोज; दिन मत गिनिए
वे कहते हैं कि यह चैनल पर है — डाउनलोड कीजिए, इसी चैनल पर है। जब तक परेशानी है, रोज कीजिए। दिन मत गिनिए। शुरू में ग्यारह दिन का संकल्प लेकर कीजिए, और उसके बाद अपनी क्षमता के अनुसार रोज, हर रात कीजिए।
वे कहते हैं कि नरसिंह शताक्षरी चैनल पर है; डाउनलोड कीजिए, इसी चैनल पर है। जब तक परेशानी है, रोज कीजिए। दिन मत गिनिए। शुरू में ग्यारह दिन का संकल्प लेकर कीजिए; उसके बाद आपकी जो भी क्षमता हो उसके अनुसार रोज, हर रात कीजिए। वे एक टिप्पणी से भी सहमत होते हैं कि हाँ, यह सच है कि सिद्धि उलटी पड़ जाती है।
क्या सप्तशती सच में कहती है कि नंदा देवी तीनों लोक साधक के वश में कर देती हैं?
मंत्र के अर्थ पर उनका स्पष्टीकरण
एक श्रोता कहता है कि उन्होंने दावा किया कि दुर्गा सप्तशती में नंदा देवी तीनों लोक साधक के वश में कर देती हैं, और किसी साधक में इतनी क्षमता नहीं। वे स्पष्ट करते हैं कि वहाँ जो कहा गया है वह उस मंत्र का अर्थ है जो उन्होंने समझाया: कि जो उनकी उपासना करता है, वे तीनों लोक उसके वश में कर देती हैं। इसका विधि-विधान सप्तशती में दिया गया है — उसे देखिए; गीता प्रेस वाली में भी दिया है कि कैसे और क्या करना है।
उस श्रोता से, जो कहता है कि दुर्गा सप्तशती में उन्होंने कहा था कि नंदा देवी चीजें साधक के वश में कर देती हैं, और किसी साधक में इतनी क्षमता नहीं, वे उत्तर देते हैं कि वहाँ जो कहा गया है वह उस मंत्र का अर्थ है जो उन्होंने समझाया। यानी जो भी उनकी पूजा करता है, वे तीनों लोक उसके वश में कर देती हैं। इसका विधि-विधान सप्तशती में दिया गया है; उसे देखिए। गीता प्रेस वाली में भी दिया है कि कैसे और क्या करना है।
शास्त्र क्या कहता है
Worshipping Nandā with devotion brings the three worlds under the worshipper's control (वशीकुर्याज्जगत्त्रयम्).
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
अथ मूर्तिरहस्यम् ऋषिरुवाच ॐ नन्दा भगवती नाम या भविष्यति नन्दजा । स्तुता सा पूजिता भक्त्या वशीकुर्याज्जगत्त्रयम् ॥ १ ॥
अब मूर्तियों का रहस्य। ऋषि ने कहा: ॐ। नन्दा नाम की जो भगवती नन्द से उत्पन्न होंगी, भक्ति से उनकी स्तुति और पूजा करने पर वे तीनों लोकों को उपासक के वश में कर देती हैं।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
पूजा के समय शरीर ठंडा क्यों हो जाता है?
स्त्री में नाड़ी का बिगड़ना, और प्राणायाम
शिव कुमारी को वे उत्तर देते हैं कि यदि शरीर ठंडा हो रहा है, तो यदि आप स्त्री हैं, इसका अर्थ है कि जप या पूजा के समय, जब आप कर रही हैं, आपकी नाड़ी बिगड़ रही है। इसलिए आपको थोड़ा प्राणायाम करना चाहिए।
वे कहते हैं कि यदि शरीर ठंडा हो रहा है, तो इसका अर्थ यह है — यदि आप स्त्री हैं, जैसा लिखा नाम बताता है। तो जप के समय या पूजा के समय, जब आप कर रही हैं, आपकी नाड़ी बिगड़ रही है। इसलिए आपको थोड़ा प्राणायाम करना चाहिए।
यदि कलश न रखा जाए, तो क्या पूजा सफल होगी?
हाँ, और कलश किसे रखना चाहिए
वे उत्तर देते हैं कि बिल्कुल सफल होगी। ऐसी कोई बात नहीं कि कलश नहीं रखेंगे तो पूजा सफल नहीं होगी। गृहस्थों को केवल चैत्र और शारदीय नवरात्रि में कलश रखना चाहिए — या इन दोनों में से जिसमें भी आप रखते और करते हैं। बाकी, यदि आप साधक हैं, तो बात अलग है।
वे एक टिप्पणी का उल्लेख करते हैं कि महामृत्युंजय स्वयंसिद्ध कवच है और फिर भी ग्यारह सौ जप अनिवार्य हैं। यह पूछे जाने पर कि कलश न रखा हो तो क्या पूजा सफल होगी, वे उत्तर देते हैं कि बिल्कुल सफल होगी। ऐसी कोई बात नहीं कि कलश नहीं रखेंगे तो पूजा सफल नहीं होगी। गृहस्थों को केवल चैत्र और शारदीय नवरात्रि में कलश रखना चाहिए, या इन दोनों में से जिसमें भी आप रखते और करते हैं। बाकी, यदि आप साधक हैं, तो बात अलग है।
किसी ने मेरे मन पर उच्चाटन करवाया है — उसका प्रभाव कैसे खत्म होगा?
सहायता लेनी पड़ेगी, या किसी एक शक्ति की शरणागति
वे उत्तर देते हैं कि सहायता लेनी पड़ेगी। यदि बहुत विशेष क्रिया नहीं है, तो यह अपने आप भी खत्म हो सकता है — किसी एक शक्ति की शरणागति स्वीकार करके साधना करने से; तभी कुछ होगा।
वे कहते हैं कि सहायता लेनी पड़ेगी। यदि बहुत विशेष क्रिया नहीं है, तो यह आपसे भी खत्म हो सकता है। किसी एक शक्ति की शरणागति स्वीकार करके साधना करने से — तब कुछ होगा।
यदि सप्तशती के साधक पर बगलामुखी मंत्र का प्रयोग हो, तो क्या होगा?
ऐसा करना ही क्यों
यह पूछे जाने पर कि यदि दुर्गा सप्तशती के साधक पर बगलामुखी मंत्र का प्रयोग किया जाए तो क्या होगा, वे पूछते हैं कि ऐसा करना ही क्यों है। जो सही है, उसके साथ सही होगा; जो गलत है, उसके साथ गलत होगा।
यह पूछे जाने पर कि यदि दुर्गा सप्तशती के साधक पर बगलामुखी मंत्र का प्रयोग किया जाए तो क्या होगा, वे पूछते हैं: यह करना ही क्यों है? जो सही है, उसके साथ सही होगा। जो गलत है, उसके साथ गलत होगा।
माँ काली और दुर्गा की मूर्ति की स्थापना कैसे करनी चाहिए?
अचल मूर्ति, और इसे दिखाने के लिए क्या चाहिए
यह पूछे जाने पर कि माँ काली और दुर्गा की प्रतिमा कैसे स्थापित करें, वे कहते हैं कि यह अचल मूर्ति है; इसे दिखाना तभी संभव है जब कहीं स्थापना हो रही हो, और करते समय वीडियो रिकॉर्ड करके डाला जाए। एक दूसरे श्रोता से, जो कहता है कि वह माँ दुर्गा काली की प्रतिमा स्थापित करने जा रहा है ताकि माता उसमें जागृत होकर वास करें, वे कहते हैं: आप खुद करेंगे। यदि विधि-विधान से करना है, तो सब कुछ व्यवस्थित रखकर करना होगा — अकेले आप पूरा विधि-विधान नहीं कर पाएँगे।
यह पूछे जाने पर कि माँ काली और दुर्गा की प्रतिमा कैसे स्थापित करें, वे कहते हैं कि यह अचल मूर्ति है। फिर यह तभी संभव होगा जब कहीं स्थापना हो रही हो, और करते समय वीडियो रिकॉर्ड करके डाला जाए। उस श्रोता से, जो माँ दुर्गा काली की प्रतिमा स्थापित करने जा रहा है और चाहता है कि माता उसमें जागृत होकर वास करें, वे कहते हैं: आप खुद करेंगे। यदि आप विधि-विधान से करें, तो सब कुछ व्यवस्थित रखकर करना होगा; अकेले आप पूरा विधि-विधान नहीं कर पाएँगे।
शुंभ और निशुंभ के वध के बाद जगदंबा क्यों कहती हैं कि वे विंध्यवासिनी के रूप में करेंगी?
कल्प का भेद
प्रश्नकर्ता पूछते हैं कि शुंभ और निशुंभ का वध नौवें — दसवें — अध्याय में हुआ, तो ग्यारहवें अध्याय में जगदंबा ने क्यों कहा कि वे विंध्यवासिनी स्वरूप में करेंगी। वक्ता कहते हैं कि उत्तर कल्प के अनुसार है, या कल्प भेद है: एक कल्प में वे एक रूप में रहीं, अगले कल्प में दूसरे रूप में। जैसे भगवती ने अलग-अलग कल्पों में अलग-अलग स्वरूप धारण करके महिषासुर का वध किया — कभी वे अष्टभुजा थीं, कभी दशभुजा, कभी अठारह भुजा वाली। वे कहते हैं कि यही कल्प भेद है।
प्रश्नकर्ता स्पष्ट करते हैं कि उनका प्रश्न सप्तशती पाठ से नहीं जुड़ा था, बल्कि शुंभ और निशुंभ के वध के बाद विंध्यवासिनी के स्वरूप के बारे में था। तो आपका प्रश्न यह है, वे कहते हैं: कि शुंभ और निशुंभ का वध नौवें अध्याय में — दसवें अध्याय में — हुआ, और ग्यारहवें अध्याय में जगदंबा ने कहा कि वे विंध्यवासिनी स्वरूप में करेंगी; क्यों? यह कल्प के अनुसार है, या कल्प भेद है। एक कल्प में वे एक रूप में रहीं, अगले कल्प में दूसरे रूप में। जैसे भगवती ने अलग-अलग कल्पों में अलग-अलग स्वरूप धारण करके महिषासुर का वध किया: कभी वे अष्टभुजा थीं, कभी दशभुजा, कभी अठारह भुजा वाली। यही कल्प भेद है।
शास्त्र क्या कहता है
The Goddess foretells that she will be born of Yaśodā in Nanda's house and, dwelling on the Vindhya, destroy the two demons.
The kalpa-bheda explanation is the speaker's own.
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नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा । ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी ॥ ४२ ॥
तब मैं नन्द गोप के घर में यशोदा के गर्भ से जन्म लूँगी। विन्ध्याचल में रहकर मैं उन दोनों का नाश करूँगी।
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यदि सप्तशती में नहीं है, तो शिव पर पैर रखे माँ काली का रूप क्यों पूजा जाता है?
एक प्रश्न जिसे वे दूसरी दिशा में जाता बताकर टाल देते हैं
यह पूछे जाने पर कि शिव जी पर पैर रखे माँ काली का स्वरूप क्यों पूजा जाता है जब वह सप्तशती में नहीं है, वे कहते हैं कि यह एक अलग विषय की ओर जा रहा है।
यह पूछे जाने पर कि शिव जी पर पैर रखती माँ काली का स्वरूप क्यों पूजा जाता है जब वह सप्तशती में नहीं है, वे कहते हैं कि यहाँ आप दूसरे विषय की ओर जा रहे हैं।
ॐ नमो भगवते रुद्राय और ॐ नमः शिवाय में क्या अंतर है?
षडक्षरी और दशाक्षरी, और संकल्प के अनुसार फल
अमेज जी के पूछने पर कि "ॐ नमो भगवते रुद्राय" और "ॐ नमः शिवाय" के जप से अलग-अलग क्या फल मिलते हैं, और क्या पहले का सवा लाख अनुष्ठान किया जा सकता है, वे अक्षरों की गिनती पर उत्तर देते हैं: एक षडक्षरी हो जाता है, और ॐ लगा दें तो दशाक्षरी हो जाता है। जहाँ तक फल का प्रश्न है, चूँकि वहाँ स्वरूप एक ही है, इसलिए फल आपकी इच्छा के अनुसार, आपके लिए गए संकल्प के अनुसार मिलेगा। अनुष्ठान आप कर सकते हैं; और पूरे विधि-विधान से करें तो बेहतर है।
वे कहते हैं, देखिए: अक्षर — एक षडक्षरी हो जाता है, और ॐ लगा दें तो दशाक्षरी हो जाता है। जहाँ तक फल का प्रश्न है, चूँकि वहाँ स्वरूप एक ही है, इसलिए फल आपको आपकी इच्छा के अनुसार, आपके लिए गए संकल्प के अनुसार मिलेगा। अनुष्ठान आप कर सकते हैं। पूरे विधि-विधान से करें, तो बेहतर है।
क्या तंत्र में दुर्गा माता श्मशानी शक्ति को हटा सकती हैं?
हाँ में एक छोटा उत्तर
यह पूछे जाने पर कि तंत्र में दुर्गा माता श्मशानी शक्ति को हटा सकती हैं या नहीं, वे उत्तर देते हैं कि बिल्कुल हटा सकती हैं। मायपाल जी से वे कहते हैं कि उन्होंने जो मंत्र लिखा है उसका पूरा विधि-विधान इसी चैनल पर है, और उसी से करें।
यह पूछे जाने पर कि तंत्र में दुर्गा माता श्मशानी शक्ति को हटा सकती हैं या नहीं, वे कहते हैं कि बिल्कुल हटा सकती हैं। मायपाल जी से वे कहते हैं कि उन्होंने जो मंत्र लिखा है, उसका पूरा विधि-विधान इसी चैनल पर है। ठीक है, उसी से कीजिए।
यदि बुरे स्वप्न आते रहें, तो सोने से पहले क्या पढ़ना चाहिए?
तंत्रोक्त रात्रि सूक्त, पाँच बार, कंठस्थ करके
वे कहते हैं कि यदि बहुत ज्यादा कठिनाई है और गलत स्वप्न आ रहे हैं, तो तंत्रोक्त रात्रि सूक्त पढ़कर सोइए। तंत्रोक्त रात्रि सूक्त कंठस्थ कर लीजिए और सोने से पहले कम से कम पाँच बार पढ़िए।
वे पहले एक श्रोता को उत्तर देते हैं कि यदि आप खुद करें, और विधि-विधान से करें, तो सब कुछ व्यवस्थित रखना होगा। यदि बहुत ज्यादा कठिनाई है, यदि गलत स्वप्न आ रहे हैं, तो तंत्रोक्त रात्रि सूक्त पढ़कर सोइए। तंत्रोक्त रात्रि सूक्त कंठस्थ कर लीजिए, और सोने से पहले कम से कम पाँच बार पढ़िए।
माता स्वयं मुझ पर आई हैं और गद्दी भेजी है — पहले क्या करना चाहिए?
तब भी पहले मंत्र साधना
एक श्रोता, जो कहती हैं कि माता स्वयं उन पर आई हैं और गद्दी भेजी है, उनसे वे कहते हैं कि तब भी सबसे पहले मंत्र आदि की साधना करनी चाहिए, भले वे आ रही हों — और भले योगिनी भाव आ रहा हो।
उस श्रोता से, जो कहती हैं कि माता स्वयं उन पर आई हैं और गद्दी भेजी है, वे कहते हैं कि तब भी सबसे पहले मंत्रों आदि की साधना करनी चाहिए। भले वे आ रही हों, कीजिए। भले योगिनी भाव आ रहा हो, कीजिए।
कवच से हवन करने में क्या हानि है?
अस्त्र मंत्र का तिर्यक प्रभाव और वंश की हानि
यह पूछे जाने पर कि वर्षों पहले कवच से किए हवन के तिर्यक प्रभाव का क्या करें, वे उत्तर देते हैं कि यदि आप कवच से हवन करते, तो इतने समय बचते ही नहीं; यदि उसका तिर्यक प्रभाव पड़ना होता, तो — और कवच और अस्त्र मंत्र का तिर्यक प्रभाव बहुत जल्दी पड़ता है। यदि आज आप तलवार चलाएँ, तो एक-दो साल बाद हाथ नहीं कटेगा; तुरंत कटेगा। सबसे पहले वंश की हानि होती है। वे प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि आप अविवाहित हैं, इसलिए चिंता मत कीजिए।
वे कहते हैं, देखिए: यदि आप कवच से हवन करते, तो इतने दिन बचते ही नहीं। यदि उसका तिर्यक प्रभाव पड़ना होता, तो — और कवच का, अस्त्र मंत्र का तिर्यक प्रभाव बहुत जल्दी पड़ता है। यदि आज आप तलवार चलाएँ, तो एक-दो साल बाद आपका हाथ नहीं कटेगा; तुरंत कटेगा। सबसे पहले वंश की हानि होती है। तो आप अविवाहित हैं, वे कहते हैं, इसलिए चिंता मत कीजिए।
यदि अनजाने में कवच से हवन हो गया हो, तो क्या उपाय है?
देवता का दुग्ध अभिषेक, शिव की शरण, और नाम मंत्र से खीर का हवन
वे कहते हैं कि यदि अनजाने में हो गया है, तो सबसे पहले जिनके कवच से आपने हवन किया, जिनके शस्त्र मंत्र से हवन किया, उनका दूध से अभिषेक कीजिए। वे सीधी बात समझाते हैं: कवच से हवन करने का अर्थ क्या है? आप देवता का नाम ले रहे हैं और साथ में उनका अस्त्र भी; और जब आप स्वाहा देवी को आहुति देते हैं, देवता को भोजन देते हैं, तो उनके मुख में अस्त्र भी डाल रहे हैं। जैसे मनुष्य को कष्ट पहुँचता है, समझिए कि एक तरह से उन्हें भी कष्ट पहुँचता है। कोई आपके हाथ, पैर या मुँह में अस्त्र डाले तो कैसा लगेगा — कष्ट होगा। इसलिए उस तरह का दोष लगेगा; इसलिए पहले उनकी प्रतिमा का, श्री विग्रह का दूध से अभिषेक करना चाहिए। और शिव जी की शरण लेनी चाहिए, उनका भी अभिषेक करना चाहिए, और फिर उनके नाम मंत्र से खीर से हवन करना चाहिए।
वे कहते हैं कि यदि अनजाने में हो गया है, तो सबसे पहले — जिनके कवच से आपने हवन किया, जिनके शस्त्र मंत्र से हवन किया — उनका दूध से अभिषेक कीजिए। वे सीधा अर्थ समझाते हैं: कवच से हवन करने का अर्थ क्या है? आप देवता का नाम ले रहे हैं और उसके साथ उनका अस्त्र भी; और जब आप स्वाहा देवी को आहुति दे रहे हैं, देवता को भोजन दे रहे हैं, तो आप उनके मुख में अस्त्र भी डाल रहे हैं। तो जैसे मनुष्य को कष्ट पहुँचता है, एक तरह से समझिए कि उन्हें भी इसी तरह कष्ट पहुँचता है। यदि कोई आपके हाथ, पैर या मुँह में अस्त्र डाले, तो कैसा लगेगा? कष्ट होगा। तो उस तरह का दोष लगेगा। इसलिए सबसे पहले उनकी प्रतिमा का, श्री विग्रह का दूध से अभिषेक करना चाहिए। और शिव जी की शरण लेनी चाहिए; शिव जी का भी अभिषेक कीजिए, और फिर उनके नाम मंत्र से खीर से हवन कीजिए।
फूलों की आहुति कैसे देनी चाहिए?
घी में डुबोकर, कभी सूखे नहीं
वे कहते हैं कि यदि आप एक सौ आठ फूलों की आहुति देने जा रहे हैं, तो सूखे फूल से मत दीजिए; फूल घी में डुबोकर फिर आहुति देनी चाहिए।
वे कहते हैं कि यदि आप एक सौ आठ फूलों की आहुति देने जा रहे हैं, तो खाली फूल से मत दीजिए। फूल घी में डुबोया होना चाहिए। फिर आहुति देनी चाहिए।
साधना आगे बढ़ने पर देवी के बारे में गलत विचार क्यों आते हैं?
केवल मंत्र जप मूलाधार जगाता है; स्तोत्र, आरती और पुराण भाव बदलते हैं
अजय पालीवाल जी, जो पूछते हैं कि साधना में आगे बढ़ने पर देवी के बारे में गलत विचार क्यों आते हैं, उनसे वे कहते हैं कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण केवल मंत्र जप करना है। केवल मंत्र जप करेंगे तो मूलाधार जागेगा और कठिनाई होगी। इसीलिए, वे कहते हैं, वे बार-बार कहते हैं कि जिस भी देवी या देवता की साधना-उपासना करें, उनके स्तोत्रों का पठन-पाठन जरूर कीजिए और भाव से गाइए। आरती करनी चाहिए। ये सब करेंगे तो भाव बदल जाएगा। और उनसे जुड़े ग्रंथ और पुराण पढ़ने चाहिए — सप्ताह में एक दिन ही सही, एक घंटा ही सही।
वे कहते हैं कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण केवल मंत्र जप है। आप मंत्र जप करेंगे, मूलाधार जागेगा, और कठिनाई होगी। इसीलिए वे बार-बार कहते हैं कि जिस भी देवी या देवता की साधना-उपासना करें, उनके स्तोत्रों का पठन-पाठन जरूर कीजिए, भाव से गाते हुए। आरती करनी चाहिए। ये सब करेंगे, तो भाव बदल जाएगा। और उनसे जुड़े ग्रंथों और पुराणों का पाठ करना चाहिए — कम से कम सप्ताह में एक दिन, भले एक घंटा ही।
यदि बर्तनों के लिए जगह न हो, तो नवनाथ साधना में क्या करें?
बर्तनों के बिना, नवनाथ और दत्तात्रेय की फोटो के साथ कीजिए
वे कहते हैं कि यदि जगह की समस्या है और आप बर्तन नहीं रख पा रहे, तो नवनाथ साधना बिना बर्तनों के कीजिए — पर नवनाथ और भगवान दत्तात्रेय की फोटो के साथ कीजिए।
वे कहते हैं कि यदि जगह की समस्या है और आप बर्तन नहीं रख पा रहे, तो नवनाथ साधना में बिना बर्तनों के कीजिए। पर नवनाथ की फोटो के साथ कीजिए। और भगवान दत्तात्रेय की फोटो के साथ।
वह शक्ति शीतला माता से जुड़ा एक बहुत उग्र स्वरूप है, और गुप्त रखी जाती है
शीतला माता से जुड़ा बहुत उग्र स्वरूप, गुप्त रखा हुआ
शिव कुमारी जी, जिन्होंने एक शक्ति का नाम लिखा है, उनसे वे कहते हैं कि हर चीज लोगों के सामने नहीं रखी जा सकती। वे भी भगवती का एक स्वरूप हैं, और बहुत उग्र स्वरूप। कुछ जगहों पर उन्हें शीतला माता के साथ चलने वाले स्वरूपों में से एक माना जाता है। उनका नियंत्रण बिल्कुल अलग तरह का है। भगतवाल और भगवती के क्षेत्र में वे काफी प्रसिद्ध हैं, और बहुत गुप्त रहती हैं; इसलिए वह विषय वे यहाँ नहीं बताना चाहेंगे।
जिनका नाम शिव कुमारी जी ने लिखा है, उनके बारे में वे कहते हैं: देखिए, हर चीज लोगों के सामने नहीं रखी जा सकती। वे भी भगवती का एक स्वरूप हैं, और बहुत उग्र स्वरूप। कुछ जगहों पर उन्हें शीतला माता के साथ के स्वरूपों में से एक माना जाता है। उनका नियंत्रण बिल्कुल अलग तरह का है। भगतवाल और भगवती के क्षेत्र में वे काफी प्रसिद्ध रहती हैं, और बहुत गुप्त रहती हैं। इसलिए वह विषय वे यहाँ नहीं बताना चाहेंगे।
यदि नौकरी की परीक्षा में बार-बार एक-दो अंक से रह जाएँ, तो क्या करें?
कोई उपाय नहीं — परीक्षा या इंटरव्यू से पहले माता-पिता का आशीर्वाद लीजिए
शिवानी जी से वे कहते हैं कि यदि आप एक-दो अंक से नौकरी से रह जा रही हैं, तो इसके लिए कोई उपाय नहीं करना। बस इतना कीजिए: नौकरी के समय, जब भी आपकी परीक्षा हो, परीक्षा देने या इंटरव्यू में जाएँ, तो माता-पिता का आशीर्वाद लेकर जाइए। थोड़ी परेशानी हो, तो इससे सूर्य और चंद्रमा मजबूत होते हैं; और जब सूर्य मजबूत होता है, तो आपकी यह छोटी कठिनाई दूर हो जाएगी। इसीलिए माता-पिता का आशीर्वाद बहुत जरूरी हो जाता है। कठिनाई छोटी हो तो यह; बहुत विशेष हो, तो बातें जाननी पड़ेंगी।
वे शिवानी जी से कहते हैं कि यदि आप एक-दो अंक से नौकरी से रह जा रही हैं, तो इसमें कोई उपाय नहीं करना। बस इतना कीजिए: नौकरी के समय, जब भी आपकी परीक्षा हो, यदि आप परीक्षा देती हैं या इंटरव्यू में जाती हैं, तो अपनी माता और पिता का आशीर्वाद लेकर जाइए। थोड़ी परेशानी हो, तो इससे सूर्य और चंद्रमा मजबूत होते हैं। जब सूर्य मजबूत होगा, तो आपकी यह छोटी कठिनाई दूर हो जाएगी। इसीलिए माता-पिता का आशीर्वाद बहुत जरूरी हो जाता है। थोड़ी कठिनाई हो, तो यह; बहुत विशेष हो, तो बातें जाननी पड़ेंगी।
क्या हर विद्या की पलट होती है, और वह कितने दिन में आती है?
यदि सामने वाला जानकार है, तो वह जरूर पलटेगी
यह पूछे जाने पर कि क्या हर विद्या की पलट होती है और पलट कितने दिन में आती है, वे उत्तर देते हैं कि यदि कोई किसी पर विद्या चलाता है और सामने वाला आदमी जानकार है, तो वह जरूर पलटेगी। कुलदेवी के रोने का कारण पूछे जाने पर वे प्रश्नकर्ता से पूछते हैं कि उनकी कुलदेवी रो कहाँ रही हैं।
कुलदेवी के रोने का कारण पूछे जाने पर, वे पूछते हैं कि वे रो कहाँ रही हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या हर विद्या की पलट होती है और पलट कितने दिन में आती है, वे उत्तर देते हैं कि यदि वह किसी पर विद्या चलाता है और सामने वाला आदमी जानकार है, तो वह जरूर पलटेगी।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।