भाद्रपद अमावस्या — कुशोत्पाटिनी, तारा चतुर्दशी और अर्गला हवन
कुशोत्पाटिनी, तारा चतुर्दशी और कौशिकी अमावस्या पर।
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गुरु-शिष्य परंपरा के भीतर के लोगों के पास यह ज्ञान था, और गोपनीयता की अपनी कीमत थी
गुरु-शिष्य परंपरा, और गोपनीयता की कीमत
वक्ता कहते हैं कि जो लोग गुरु-शिष्य परंपरा में साधना करते थे और तंत्र पीठों, तंत्रोक्त स्थानों, सिद्ध पीठों और महाविद्या पीठों पर जाते थे, उन्हीं के पास इन अति गोपनीय विषयों का ज्ञान था। वे जोड़ते हैं कि गोपनीय रखने की परंपरा से हमारी बहुत हानि भी हुई है, क्योंकि जो सच में इसके योग्य होते हैं उन्हें कभी-कभी यह मिलता ही नहीं, और जिन्हें देना चाहिए उन्हें दिया नहीं जाता।
वक्ता कहते हैं कि जैसा हम सब जानते हैं, यूट्यूब और फेसबुक से जानकारी मिलने से पहले, गुरु-शिष्य परंपरा में साधना करने वाले लोग — जो तंत्र पीठों, तंत्रोक्त स्थानों, सिद्ध पीठों और महाविद्याओं के पीठों पर जाते थे — उन्हीं के पास इन अति गोपनीय विषयों का ज्ञान था। वे कहते हैं कि एक बात यह भी है कि गोपनीय रखने की परंपरा से हमारी बहुत हानि भी हुई है। क्योंकि जो सच में इसके योग्य होते हैं, उन्हें गोपनीयता के कारण कभी-कभी यह नहीं मिल पाता। जिन्हें यह दिया जाना चाहिए, उन्हें हम दे नहीं पाते। तो कहीं न कहीं हमारा नुकसान भी हुआ — पर फिर एक समय आया जब यूट्यूब और फेसबुक के माध्यम से इन सब बातों का प्रचार शुरू हुआ।
गृहस्थों ने जाना कि नवरात्र उन दो से अधिक हैं जिन्हें वे जानते थे
कि नवरात्र आम तौर पर ज्ञात दो से अधिक हैं
पहले गृहस्थ केवल शारदीय नवरात्र और एक अन्य नवरात्र जानते थे — इनके अलावा कोई नवरात्र उन्हें विशेष रूप से ज्ञात नहीं था। जो लोग साधना के क्षेत्र में गए, एक-आध प्रतिशत लोग, उन्हें उनके गुरुओं ने बताया और विशेष साधनाएँ करवाईं। फिर यूट्यूब और फेसबुक के माध्यम से बहुत से लोगों को पता चला कि दो गुप्त नवरात्र भी होते हैं।
क्या गुप्त नवरात्र केवल साधकों के लिए है, गृहस्थों के लिए नहीं?
यह दावा, और वक्ता द्वारा इसका खंडन
बहुत से लोग कहने लगे कि गुप्त नवरात्र है तो यह केवल और केवल साधना और साधकों के लिए है, गृहस्थों के लिए नहीं। वक्ता कहते हैं कि इसे पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता — ऐसा नहीं हो सकता कि यह किसी भी गृहस्थ के लिए न हो। गृहस्थ आश्रम से ही बाकी तीनों आश्रम चलते हैं।
गृहस्थ को गुप्त नवरात्र में कैसा आचरण करना चाहिए?
कुछ विशेष नियम, या सामान्य पूजन-पाठ
वक्ता कहते हैं कि इतना तो निश्चित है: जब आप गृहस्थ जीवन में रहते हुए साधना करना चाहें या उसमें जाना चाहें, तो गुप्त नवरात्र के समय कुछ विशेष नियमों का पालन करते हुए साधना करनी चाहिए — नहीं तो सामान्य पूजन-पाठ ही करना चाहिए।
वक्ता मानते हैं कि इतना तो निश्चित रूप से सही है: जब गृहस्थ जीवन में रहते हुए आप साधना करना चाहें या उस ओर जाना चाहें, तो गुप्त नवरात्र के समय कुछ विशेष नियमों का पालन करते हुए साधना करनी चाहिए। नहीं तो सामान्य पूजन-पाठ ही करना चाहिए।
और कौन-से नवरात्र हैं, और क्या गृहस्थ को उन्हें पूरी तरह मनाना ज़रूरी है?
शाकंभरी और अघोर नवरात्र — और अखंड दीप की कोई बाध्यता नहीं
वक्ता कहते हैं कि इनके अलावा शाकंभरी नवरात्र, अघोर नवरात्र और सच कहें तो ऐसे और भी बहुत से विषय हैं, जिनका पालन किसी गुरु परंपरा के साधक बहुत अच्छी तरह करते हैं। पर यदि आप पूरी तरह गृहस्थ हैं, तो बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि इन नवरात्रों में भी आप नौ दिन का अखंड दीप जलाएँ और विशेष पूजन विधि-विधान करें; सामान्य पूजन ही करें।
भाद्रपद अमावस्या को कुशोत्पाटिनी क्यों कहते हैं?
वह दिन जब साल भर की कुशा उखाड़ी जाती है
वक्ता कहते हैं कि हर अमावस्या तिथि का अपना विशेष महत्व रहा है, और भाद्रपद अमावस्या सबसे अधिक पूजन-पाठ करने वाले कर्मकांडी ब्राह्मणों के लिए विशेष रही है: यह कुशोत्पाटिनी अमावस्या है। उस दिन कुशा उखाड़कर पूरे साल के लिए रखी जाती है — वही कुशा फिर आपके पितृ पक्ष में, और साल भर पवित्री बनाने में और जो भी कर्मकांड हो उसमें, विशेषकर तर्पण के लिए काम आती है, चाहे देव कर्म हो या पितृ कर्म।
वक्ता कहते हैं कि इसी क्रम में आगे, हर अमावस्या तिथि का अपना विशेष महत्व रहा है। भाद्रपद अमावस्या के विषय में, ब्राह्मण समाज में — जो ब्राह्मण पूजन-पाठ करते हैं, कर्मकांडी — उनके लिए यह पहले के समय में विशेष रूप से खास रही है: कि यह कुशोत्पाटिनी अमावस्या है। उस दिन कुशा उखाड़कर पूरे साल के लिए रखी जाती है। वही कुशा फिर आपके पितृ पक्ष में काम आती है, और साल भर उससे पवित्री आदि बनाई जाती है, और जो भी कर्मकांड हो उसमें, विशेषकर तर्पण आदि में उसका उपयोग होता है — चाहे देव कर्म हो या पितृ कर्म।
क्या उस दिन कुशा लाने जाने वाले साधक के लिए कोई नियम है?
कुशा मूल लाने से जुड़ा नियम
वैदिक कर्मकांड और सामान्य नित्य नियम पूजन-पाठ के साथ-साथ, कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन विशेष रूप से वे साधक, जिन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया है कि सिद्धि पाकर उसे लोगों के कल्याण में लगाएँगे — जब वे कुशा लेने जाते हैं, जब कुशा मूल लाते हैं, तो उसमें एक नियम होता है।
वक्ता कहते हैं कि यह वैदिक कर्मकांड और सामान्य नित्य नियम पूजन-पाठ है। इनके साथ, विशेषकर कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन, वे साधक हैं जिन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य यह रखा है कि सिद्धि प्राप्त करने के बाद वे उसे जन कल्याण में लगाएँगे। जब वे लोग कुशा लेने जाते हैं, जब कुशा मूल लाते हैं, तो उसमें एक नियम होता है।
कुशा को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
स्थान की शुद्धि, और जो स्वीकृत नहीं उसे हटाना
वक्ता कहते हैं कि जिसने भी श्रीमद्भागवत आदि की कथाएँ सुनी हैं, वह जानता होगा कि कुशा का कितना महत्व है। कुशा के जल से — कुशा का जल छिड़ककर — हम स्थान को शुद्ध करते हैं। और जब भी कोई ऐसी नकारात्मक शक्ति हो जिसे बिल्कुल स्वीकृति न मिली हो, तो उसे कुशा के माध्यम से ही हटाया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि आप सबने श्रीमद्भागवत आदि की कोई कथा सुनी होगी, तो पता होगा कि कुशा का कितना महत्व है। कुशा के जल से — कुशा का जल छिड़ककर — हम स्थान को शुद्ध करते हैं। और जब भी कोई ऐसी नकारात्मक शक्ति हो जिसे बिल्कुल स्वीकृति न मिली हो, तो उसे कुशा के माध्यम से ही हटाया जाता है।
हनुमान जी को चढ़ाया जाने वाला मूँज का यज्ञोपवीत क्या है?
काँधे मूँज जनेऊ साजै, और उसे बनाने का विधान
वक्ता कहते हैं कि मूँज कुशा से जुड़ा एक पौधा है, और ब्रह्मचारी उसका जनेऊ बनाकर हनुमान जी को पहनाते हैं — जिसे हम हनुमान चालीसा में "काँधे मूँज जनेऊ साजै" पढ़ते हैं। यदि कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन मूँज का पौधा विधि-विधान से लाया जाए और उससे पूरे विधान के साथ, नौ तंतुओं का पूरा पूजन और गायत्री आदि का जप करके जनेऊ बनाया जाए और हनुमान जी को पहनाया जाए, तो विशेष कृपा प्राप्त होती है।
वक्ता कहते हैं कि मूँज, यानी कुशा से जुड़ा एक पौधा है, और इसी से ब्रह्मचारी यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। बनाकर हनुमान जी को पहनाते हैं। जो हम हनुमान चालीसा में पढ़ते हैं — काँधे मूँज जनेऊ साजै। तो कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन यदि मूँज का पौधा विधि-विधान से लाया जाए, और मूँज से बनने वाला जनेऊ पूरे विधि-विधान से बनाया जाए, नौ तंतुओं का पूरा पूजन करके और गायत्री आदि का जप करके, और फिर उसे हनुमान जी को पहनाया जाए, तो विशेष कृपा प्राप्त होती है।
भाद्रपद अमावस्या पर कौल और शाक्त साधक मूँज के जनेऊ से क्या करते हैं?
इस अमावस्या पर अंग-विद्या सिद्धियों का त्याग या हस्तांतरण
वक्ता कहते हैं कि जैसे हलषष्ठी पर ग्रामीण भगतवाले अपने शिष्यों को उपदेश से मिलने वाली सारी चीज़ें देते हैं, वैसे ही भाद्रपद अमावस्या के दिन विशेषकर कौल परंपरा या शाक्त परंपरा के वे साधक जो अब चाहें — उनके पास अंग विद्याओं से जुड़ी जो भी सिद्धियाँ हों, या उपदेशात्मक सिद्धियाँ — वे या तो इसी मूँज के जनेऊ के माध्यम से उनका त्याग करते हैं, या उन्हें अपने किसी योग्य शिष्य को प्रदान करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि उसी मूँज के जनेऊ की तरह, और जैसे उन्होंने हलषष्ठी पर समझाया था कि ग्रामीण भगतवाले अपने शिष्य को उपदेशात्मक प्रकृति की सारी चीज़ें देते हैं — उसी तरह भाद्रपद अमावस्या के दिन। विशेषकर किसी कौल परंपरा या शाक्त परंपरा के वे साधक, जो अब चाहते हैं कि उनके पास अंग विद्याओं से जुड़ी जो भी सिद्धियाँ हैं, या उपदेशात्मक सिद्धियाँ, उनका निपटारा हो — वे इन्हीं जनेऊ के माध्यम से, यानी मूँज के जनेऊ के माध्यम से, विशेषकर इन्हीं से, या तो उनका त्याग करते हैं, या उन्हें अपने किसी योग्य शिष्य को प्रदान करते हैं। वे कहते हैं कि वे इसका संक्षिप्त विधान केवल जानकारी के लिए दे रहे हैं। यह वही भाद्रपद अमावस्या है जिसे आगे वे कर्मकांडियों के लिए कुशोत्पाटिनी, और बंगाल में तारा चतुर्दशी, अघोर चतुर्दशी और अघोर अमावस्या बताते हैं।
श्मशान की चौकी, और उसमें आने वाली सात देवियाँ
श्मशान की चौकी, और उसमें आने वाली सात देवियाँ
वक्ता कहते हैं कि मान लीजिए तंत्र क्षेत्र में लोगों ने कुछ क्षुद्र शक्तियाँ सिद्ध की हैं — जैसे श्मशान में बहुत सी देवियाँ पूजी जाती हैं। जब चौकी सिद्ध की जाती है, यानी किसी शक्ति का पूरा समूह एक साथ सिद्ध किया जाता है, तो उसमें सात देवियाँ आती हैं। क्षेत्र के अनुसार ये अलग-अलग देवियाँ होती हैं: कहीं उनमें मसानी मुख्य होती हैं, कहीं कालिका, कहीं शीतला माँ से जुड़ी शक्तियाँ।
वक्ता कहते हैं कि मान लीजिए लोगों ने तंत्र क्षेत्र में भी कुछ क्षुद्र शक्तियाँ सिद्ध की हैं — जैसे श्मशान में बहुत सी देवियाँ पूजी जाती हैं। उनमें जब चौकी सिद्ध की जाती है — जब किसी शक्ति का पूरा समूह एक साथ सिद्ध होता है — तो उसमें सात देवियाँ आती हैं। क्षेत्र के अनुसार ये अलग-अलग देवियाँ होती हैं। कहीं उनमें मसान मुख्य होती हैं, कहीं कालिका मुख्य होती हैं, कहीं उनमें शीतला माँ से जुड़ी कुछ शक्तियाँ होती हैं। तो यह क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो जाता है।
क्या इन शक्तियों को योगिनी कहा जाता है?
दिया गया नाम, और वे वास्तव में क्या हैं
वक्ता कहते हैं कि उन्हें इस तरह का नाम दिया गया है, और वे योगिनी स्वरूप हैं — हालाँकि योगिनी तो बहुत ऊँचे स्तर की हो गई है। ये मसान की उस तरह की शक्तियाँ हैं।
वक्ता कहते हैं कि तो उसमें जब इस तरह की शक्तियाँ — हालाँकि उन्हें इस तरह का नाम दिया गया है, वे योगिनी स्वरूप हैं; या फिर योगिनी तो बहुत ही ऊँचे स्तर की हो गई है। ये मसान की उस तरह की शक्तियाँ हैं।
कोई साधक ऐसी शक्तियों को क्यों छोड़ना चाहेगा?
शरीर अब साथ नहीं देता, और उग्र शक्तियाँ चुप नहीं बैठतीं
वक्ता कहते हैं कि जब कोई ऐसी शक्तियों से वचन में बँधा हो और उसे उनका त्याग करना हो — अब शरीर उसका साथ नहीं दे रहा। जो भी इस तरह की शक्तियाँ सिद्ध करके रखता है, उसे उन्हें भोग देना पड़ता है और हमेशा कहीं न कहीं किसी काम में लगाए रखना पड़ता है, क्योंकि उग्र शक्तियाँ आपके घर में कभी चुप और सौम्य होकर नहीं बैठेंगी। इसलिए वह जीते जी चाहता है कि प्रेम से, विधि-विधान से और सम्मान के साथ उनका विसर्जन कर दे।
वक्ता कहते हैं कि तो जब उन शक्तियों को किसी वचन में लिया गया हो और व्यक्ति को उनका त्याग करना हो — अब उसका वह शरीर उसका साथ नहीं दे रहा। क्योंकि जो भी इस तरह की शक्तियाँ सिद्ध करके रखेगा, उसे उन्हें भोग देना होगा, उन्हें हमेशा कहीं न कहीं किसी काम में लगाए रखना होगा। क्योंकि वे उग्र शक्तियाँ हैं; वे आपके घर में कभी चुप और सौम्य होकर नहीं बैठेंगी। इसलिए वह जीते जी चाहता है कि हम उनका विसर्जन अच्छे से, प्रेम से, विधि-विधान से और सम्मान के साथ करें।
ऐसे साधक के सामने कौन-से दो रास्ते होते हैं?
किसी सक्षम व्यक्ति को देना, या तीन गाँव दूर विसर्जन
वक्ता कहते हैं कि या तो कोई योग्य व्यक्ति उन्हें लेना चाहे, और उसमें सच में क्षमता हो और वह कभी उनका दुरुपयोग न करे — तो उन्हें उसे दे दिया जाएगा। या फिर विसर्जन होता है। विसर्जन के लिए कहा गया है कि जिस स्थान पर वे रह रही हों और जहाँ उसने साधना की हो, वहाँ से तीन गाँव छोड़कर चौथे गाँव में जाएँ — हालाँकि वे कहते हैं कि शहरी क्षेत्र में सीमा-क्षेत्र कैसे बदलेगा, यह एक प्रश्न है।
वक्ता कहते हैं कि या तो कोई उन्हें लेना चाहे, और उसके भीतर सच में क्षमता हो, और वह कभी उनका दुरुपयोग न करे — तो उन्हें उसे दे दिया जाएगा। या दूसरा है उनका विसर्जन। विसर्जन करने के लिए होता यह है कि जिस स्थान में वे रह रही हों, जहाँ उसने अपनी साधना की हो, वहाँ से कहा गया है: तीन गाँव छोड़कर। अब शहरी क्षेत्र में तीन गाँव को कैसे देखेंगे, सीमा-क्षेत्र कैसे बदलेगा — यह एक प्रश्न है। पर तीन गाँव छोड़कर चौथे गाँव में जाया जाता है।
नौ तंतुओं का तीन लड़ वाला जनेऊ वहीं बनाया जाता है
नौ तंतुओं का तीन लड़ वाला जनेऊ, वहीं बनाया गया
वक्ता कहते हैं कि वहाँ तीन लड़ का जनेऊ — तीन तंतुओं का जनेऊ — बनाया जाता है; पूरा नौ तंतुओं वाला जनेऊ पूरी तरह तीन-तीन धागों से बनेगा। इसे उसी स्थान पर बनाया जाता है: इसे वहीं लाकर, उसी सीमा-क्षेत्र के भीतर, पूरे विधि-विधान के साथ, वहीं रहकर बनाना होता है।
वक्ता कहते हैं कि वहाँ से तीन लड़ का जनेऊ — यानी तीन तंतुओं का जनेऊ; पूरा नौ तंतुओं वाला जनेऊ पूरी तरह तीन-तीन धागों से बनेगा। वे उसे वहीं बनाएँगे। उसे उसी स्थान में, उसी सीमा-क्षेत्र में लाकर वहीं बनाना होता है, पूरा विधि-विधान करके और वहीं रहते हुए।
श्मशान क्षेत्र में सात पिंड बनाए जाते हैं, और उसके बाद प्रायश्चित्त होता है
सात पिंड, श्मशान, और बाद में प्रायश्चित्त
वक्ता कहते हैं कि बनाने के बाद, यदि उनका त्याग करना हो, तो वहाँ सात पिंड बनाए जाएँगे। उस क्षेत्र के श्मशान क्षेत्र में — क्योंकि चीज़ें श्मशानिक हैं — उसी जनेऊ के माध्यम से वे एक-एक चीज़ का त्याग करेंगे। कुशा के जनेऊ के त्याग के बाद प्रायश्चित्त विधान आदि किया जाता है, और फिर से कच्चे सूत का सामान्य जनेऊ पहना जाता है।
वक्ता कहते हैं कि और बनाने के बाद, यदि उनका त्याग करना हो, तो वहीं सात पिंड बनाए जाएँगे। अब उस क्षेत्र का जो भी श्मशान क्षेत्र होगा — क्योंकि चीज़ें श्मशानिक हैं — उसी क्षेत्र में, उसी जनेऊ के माध्यम से, वे एक-एक चीज़ का त्याग करेंगे। तो जब कुशा के जनेऊ का त्याग हो जाता है, तो उसके बाद प्रायश्चित्त विधान आदि करके वे फिर से सामान्य जनेऊ, कच्चे सूत वाला, पहन लेते हैं।
इसमें मूँज और कुशा का इतना महत्व क्यों है?
नारायण से उत्पत्ति, और शांतिपूर्ण विदाई
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि इसे परम पवित्र माना गया है — इसकी उत्पत्ति नारायण के श्रीकंठ अंग से मानी गई है। इसी कारण जब वे इसे अपने शरीर से त्यागते हैं, जब इसे छोड़ते हैं, तो जो भी चीज़ें हैं वे शांति से चली जाती हैं। ऐसा नहीं होता कि जिस विधि से उन्हें हटाया जाता है उसमें उन्हें, यानी हटाई जा रही शक्तियों को, कोई कष्ट हो।
वक्ता पूछते हैं कि तो इस मूँज में, इस कुशा में इतना महत्व क्यों है। क्योंकि इसे परम पवित्र माना गया है। इसकी उत्पत्ति नारायण के श्रीकंठ अंग से मानी गई है। इसी कारण जब वे इसे अपने शरीर से त्यागते हैं, जब इसे छोड़ते हैं, तो जितनी भी चीज़ें हैं वे शांति से चली जाती हैं। ऐसा नहीं होता कि उन्हें — यानी जिन्होंने उन्हें सिद्ध कर रखा है उनके द्वारा हटाई जा रही शक्तियों को — उस विधि में कोई कष्ट हो जिससे हटाया जाता है।
देने के लिए पाँच गाँव पीछे छोड़े जाते हैं और क्रिया छठे गाँव में होती है
पाँच गाँव छोड़कर, छठे में प्रवेश, और सात पिंड
वक्ता कहते हैं कि देने के लिए कहा गया है कि पाँच गाँव छोड़कर छठे गाँव में जाया जाता है, और वहाँ यह किया जाता है। वहाँ क्रिया करके, जिसे देना है उस पर इन्हीं सात पिंडों के माध्यम से पूरी चीज़ का त्याग किया जाता है; और वहाँ शिष्य फिर वह पहनेगा जो उतारा गया है।
वक्ता कहते हैं कि तो उसी तरह वे वहाँ विसर्जन करके लौट आते हैं। और जब देना हो, तो कहा गया है कि पाँच गाँव छोड़कर, छठे गाँव में जाकर यह किया जाता है। वहाँ यह क्रिया करके, जिन्हें देना है उन पर वे इन्हीं सात पिंडों के माध्यम से यह पूरी चीज़ त्याग देंगे; और जो शिष्य वहाँ है वह फिर वह चीज़ पहनेगा जो उतारी गई है।
यह शिष्य की क्षमता पर निर्भर है — पहनाने से पहले इसे घटाना पड़ सकता है
घटाकर पहनाना, और आगे क्या होता है इसका वक्ता का अपना अनुभव
वक्ता कहते हैं कि यह उसकी अपनी क्षमता पर निर्भर है — हो सकता है कि पहनाने से पहले इसे काट-छाँटकर घटाना पड़े, या वह इसे पूरा पहनेगा। पर इसमें भी बहुत सी बातें हैं। वक्ता के अपने अनुभव में, बहुत बार जो इसे पहनते हैं वे इसे सँभाल नहीं पाते, क्योंकि एक व्यक्ति ने ऐसी सिद्धि के साथ पंद्रह-बीस साल काम करके वह क्षमता पाई होती है, जबकि नया व्यक्ति ज़िद करके सीधे उसी स्तर से इसे ले लेता है।
वक्ता कहते हैं कि पहनने के लिए उसकी अपनी क्षमता है; हो सकता है कि पहनाने से पहले इसे काट-छाँटकर घटाना पड़े, या वह इसे पूरा पहनेगा। पर तब भी बहुत सी बातें जुड़ी होती हैं। बहुत बार, और यह उनका अपना अनुभव रहा है, जो इसे पहनते हैं वे इसे उतना सँभाल नहीं पाते। क्योंकि एक व्यक्ति ने ऐसी सिद्धि के साथ पंद्रह साल, बीस साल काम किया होता है, और अब उसकी क्षमता वैसी बनी है; और कोई नया व्यक्ति ज़िद करके सीधे उसी स्तर से इसे ले रहा होता है। या बोलचाल की भाषा में कहें तो चापलूसी से — गुरु जी, हम तो बस यही माँगते हैं कि आप दे दीजिए। और गुरु जी भी खुश होकर कहते हैं हाँ बेटा, ले लो, ले लो: मेरा बोझ भी उतरता है, मैं भी छूटता हूँ, तुम लोग चलाओ, कोई दिक्कत नहीं।
जब ऐसी चीज़ गलत कारणों से दी जाती है तो क्या गड़बड़ होती है?
पैसे का लालच, या अपनी सुरक्षा — और उसके बाद की परेशानी
वक्ता कहते हैं कि ऐसा बहुत होता है। जब पैसे के लालच में, या अपनी सुरक्षा के लिए, इन सब बातों को एक तरफ रखकर ऐसा काम किया जाता है, तो सामने वाला शुरुआत में छह महीने या एक साल तक इसे खुशी-खुशी ढोएगा। बाद में बहुत कठिनाई होती है, क्योंकि यदि इतनी चीज़ें सँभालने के लिए ज़रूरी बौद्धिक स्तर न हो, तो बड़ी कठिनाई आती है।
वक्ता कहते हैं कि तो यहाँ बात थोड़ी वैसी हो जाती है जैसी होती है, और ऐसा बहुत ही होता है। पैसे का लालच, या अपनी सुरक्षा — जब इन सब बातों को एक तरफ रखकर ऐसा काम किया जाता है, तो सामने वाला शुरुआत में छह महीने, एक साल तक इसे खुशी-खुशी ढोएगा। बाद में बहुत कठिनाई होती है। क्योंकि इतनी चीज़ें ढो पाना — यदि उस स्तर की बौद्धिकता न हो, तो बहुत बड़ी कठिनाई होती है। फिर होता यह है कि ऐसे लोग अपने ही घर-परिवार में किसी न किसी को परेशान करने लगते हैं, और ये सब बातें चलती रहती हैं।
जानकार व्यक्ति से बहुत ज़्यादा पूछताछ न करने को क्यों कहा जाता है?
आपके साथ क्या भेजा जा सकता है, एक अगरबत्ती से शुरू करके
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण कहा जाता है कि ऐसे लोगों के यहाँ बहुत ज़्यादा सुखैती-उजैती नहीं करवानी चाहिए। सामने वाला जानकार है और एक बार में सब बता देता है — पर इन्हीं सब बातों के कारण वह आपके साथ कौन-सी चीज़ भेज देगा। वह आपको बताएगा नहीं; कहेगा कि यह भगवती का ऐसा रूप है, इनके नाम की अगरबत्ती जलाओ। पहले वह अगरबत्ती जलवाएगा, भोग लगवाएगा, और तीन या छह महीने बाद पता चलता है कि वह चीज़ अब आपके घर में आ गई है।
वक्ता कहते हैं कि और इसी कारण कहा जाता है कि ऐसे लोगों के यहाँ बहुत ज़्यादा सुखैती-उजैती नहीं करवानी चाहिए। सामने वाला जानकार है, यह बहुत अच्छी बात है, वह एक बार में सब बता देता है। आप जा रहे हैं; अब इन्हीं सब बातों के कारण वह आपके साथ कौन-सी चीज़ भेज देगा — भाई, तुम इसकी पूजा करो। क्या वह आपको बताएगा? वह कहेगा: हाँ, यह भगवती का ऐसा स्वरूप है, इनके नाम की अगरबत्ती जलाओ। पहले वह अगरबत्ती जलवाएगा, भोग लगवाएगा; बाद में पता चलता है कि तीन महीने, छह महीने बाद वह चीज़ अब आपके घर में आ गई है।
किसका भला अधिक होता है — त्याग करने वाले का या पाने वाले का?
शक्ति का मद, और भूला हुआ संतुलन
वक्ता कहते हैं कि त्याग करने वालों में से अधिकतर का बहुत अच्छा होता है। पर जिन्हें दिया जाता है उनमें से अधिकतर वहाँ फलते-फूलते नहीं, क्योंकि नया व्यक्ति उस स्तर की चीज़ें लेकर खुद को भगवान समझने लगता है — कि मुझमें इतनी क्षमता है, हम जो चाहें करेंगे। ये चीज़ें सच में बहुत शक्तिशाली हैं, और शक्ति के मद में लोग अहंकार में आकर अपना नियंत्रण और जो संतुलन होना चाहिए उसे भूल जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि चीज़ें इस तरह होती हैं। इसमें जो छोड़ते हैं, त्याग करते हैं, उनमें से अधिकतर का, एक तरह से, बहुत अच्छा होता है। पर जिन्हें दिया जाता है, उनमें अधिकतर यह होता है कि वहाँ यह फलता-फूलता नहीं। क्योंकि जब कोई नया व्यक्ति उस स्तर की चीज़ें लेता है, तो वह खुद को भगवान ही समझने लगता है — कि मुझमें इतनी क्षमता है, हम जो चाहें करेंगे। और सच में ये चीज़ें बहुत शक्तिशाली हैं, और शक्ति के मद में लोग अहंकार में आकर अपना नियंत्रण, जो संतुलन होना चाहिए, उसे भूल जाते हैं।
पूरे वर्ष में ये काम केवल इसी एक अमावस्या पर होते हैं, जिसे तारापीठ मुख्य मानता है
केवल इसी एक अमावस्या पर, और उस पर तारापीठ का दावा
वक्ता कहते हैं कि इस तरह के काम इस अमावस्या का महत्व हैं: पूरे वर्ष में ये केवल और केवल इसी अमावस्या पर होते हैं। वे बताते हैं कि पिछले वर्ष की इस अमावस्या का एक वीडियो टेलीग्राम ग्रुप में डाला गया था, और तारापीठ में इस अमावस्या का महत्व मुख्य माना गया है।
वक्ता कहते हैं कि तो इस तरह के कामों के लिए इस अमावस्या का इतना महत्व है। पूरे वर्ष में यह केवल और केवल इसी अमावस्या पर होता है। इस अमावस्या का, पिछले वर्ष का, एक वीडियो टेलीग्राम ग्रुप में डाला गया था। उसमें तारापीठ में इस अमावस्या का महत्व मुख्य प्रकार का माना गया है।
बंगाल में यह अमावस्या किन नामों से जानी जाती है?
तारा चतुर्दशी, अघोर अमावस्या, अघोर चतुर्दशी
वक्ता कहते हैं कि पूरा बंगाल और बांग्लादेश क्षेत्र इसे तारा चतुर्दशी, अघोर अमावस्या, अघोर चतुर्दशी आदि नामों से जानता है। और यह पक्का मान लीजिए कि जैसे दीवाली की रात पूरे बंगाल क्षेत्र में भगवती कालिका का पूजन होता है, वैसे ही भाद्रपद अमावस्या और चतुर्दशी की रात भगवती तारा से जुड़ा जो भी पूजन-पाठ है, वह इसी रात होता है।
वक्ता कहते हैं कि पूरा बंगाल और बांग्लादेश क्षेत्र इसे तारा चतुर्दशी, अघोर अमावस्या, अघोर चतुर्दशी आदि नामों से जानता है। और इस दिन, यह पक्का मान लीजिए: जिस तरह दीपावली की रात पूरे बंगाल क्षेत्र में भगवती कालिका का पूजन होता है, उसी तरह भाद्रपद की अमावस्या और चतुर्दशी की रात भगवती तारा से जुड़ा जो भी पूजन-पाठ है, वह इसी रात होता है।
वर्ष में भगवती तारा की दो मुख्य रातें कौन-सी हैं?
चैत्र नवमी की रात, और भाद्रपद की चतुर्दशी व अमावस्या
वक्ता कहते हैं कि एक है राम नवमी की रात: जिस दिन चैत्र मास की नवमी हो, आधी रात को भगवान श्रीराम का जन्म है, और उस रात के समय को तारा जयंती, तारा नवमी माना गया है। और उसके बाद भगवती तारा की दूसरी मुख्य रात भाद्रपद की चतुर्दशी और अमावस्या मानी गई है। इन दो दिनों में इन क्षेत्रों में भगवती तारा से जुड़ी विशेष साधनाएँ की जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि एक है राम नवमी की रात। जिस भी दिन चैत्र मास की नवमी पड़े, आधी रात को भगवान श्रीराम का जन्म है, और उस रात के समय को तारा जयंती माना गया है, तारा नवमी माना गया है। और उसके बाद भगवती तारा की दूसरी मुख्य रात भाद्रपद की चतुर्दशी और अमावस्या मानी गई है। इन दो दिनों में, इन क्षेत्रों में, भगवती तारा से जुड़ी विशेष साधनाएँ की जाती हैं।
इन दिनों तारापीठ में कैसा जमावड़ा होता है?
तारापीठ में तीन दिन, जैसे अंबुबाची पर कामाख्या में तांत्रिक जुटते हैं
वक्ता कहते हैं कि कहा जाता है कि जैसे अंबुबाची पर्व में कामाख्या में तांत्रिकों का पूरा महा-जमावड़ा होता है, जहाँ लोग जाकर चार दिन रहते हैं, वैसे ही कम से कम तीन दिन बंगाल के बीरभूम ज़िले के तारापीठ में जमावड़ा होता है — जहाँ प्रसिद्ध वामाचारी तांत्रिक वामाखेपा की तपस्थली थी, जहाँ पंचमुंडी आसन है, और जहाँ कहा जाता है कि भगवान श्रीराम के कुल गुरु महर्षि वशिष्ठ ने वाम मार्ग, यानी तंत्र मार्ग से भगवती तारा की सिद्धि पाई थी।
वक्ता बताते हैं कि कहा जाता है कि जिस तरह अम्बुबाची पर्व पर कामाख्या में तांत्रिकों का पूरा महा-जमावड़ा होता है — लोग जाते हैं, चार दिन रहते हैं। उसी तरह कम से कम तीन दिन, बंगाल के बीरभूम ज़िले में तारापीठ है, जहाँ प्रसिद्ध वामाचारी तांत्रिक वामाखेपा की तपस्थली थी, जहाँ पञ्चमुण्डी आसन मौजूद है। और जहाँ कहा गया है कि महर्षि वशिष्ठ, जो भगवान श्रीराम के कुल गुरु थे, उन्होंने वाम मार्ग से — यानी तंत्र मार्ग से — भगवती तारा की सिद्धि प्राप्त की।
तारा की सिद्धि में शाप विमोचन किसके नाम से होता है?
मुख्य रूप से महर्षि वशिष्ठ
वक्ता कहते हैं कि जब भी आप भगवती तारा की सिद्धि करते हैं, तो जब भी उसमें शाप विमोचन का प्रयोग होता है, वह मुख्य रूप से भगवान वशिष्ठ से ही — महर्षि वशिष्ठ से ही — होता है।
वक्ता कहते हैं कि जब भी आप भगवती तारा की सिद्धि करेंगे, तो जब भी उसमें शाप विमोचन का प्रयोग होगा — उसमें वह मुख्य रूप से भगवान वशिष्ठ से ही, महर्षि वशिष्ठ से ही होता है।
क्या "अघोर" शब्द जुड़ा होने के कारण गृहस्थ को दूर रहना चाहिए?
अघोर शब्द, और इस रात पर गृहस्थ का अपना अधिकार
वक्ता कहते हैं कि यह भगवती तारा के लिए बहुत महत्वपूर्ण रात है — और हम गृहस्थों को कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि इस अमावस्या से अघोर शब्द जुड़ गया है, इसलिए यह गृहस्थों के लिए नहीं है। हमारे लिए भी इसका अपना बहुत बड़ा महत्व है।
वक्ता कहते हैं कि तो भगवती तारा के लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण रात है। और हम लोग जो गृहस्थ हैं — इस अमावस्या को कभी इस तरह नहीं समझना चाहिए कि इस अमावस्या से अघोर शब्द जुड़ गया है, इसलिए यह गृहस्थों के लिए नहीं है। इसका अपना महत्व भी बहुत बड़ा है।
भगवती तारा के स्वरूप की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
स्तन पर बालक महादेव, और उनके कंठ में स्तंभित हलाहल
वक्ता कहते हैं कि भगवती के लिए हर स्वरूप की अपनी महिमा है, और किसी को कभी बड़ा या छोटा नहीं कहा जा सकता। इस स्वरूप की सबसे बड़ी महिमा यह है कि जब भगवान महादेव ने विष पिया और असंतुलित होने लगे, तो भगवती ने तारा का स्वरूप लिया और महादेव को बालक रूप में लेकर अपने स्तन से दूध पिलाया। यहाँ वे महादेव की माँ-स्वरूप बनीं, और इसी कारण हलाहल विष उनके कंठ में स्थित हो गया — उन्होंने ही उसे कंठ में स्तंभित किया।
वक्ता कहते हैं कि देखिए, भगवती तारा का स्वरूप सबसे बड़ी बातों में से एक है। भगवती ने जो भी स्वरूप लिया, हर एक की अपनी महिमा है; हम किसी को कभी कम या ज़्यादा नहीं कह सकते। इस स्वरूप की सबसे बड़ी महिमा, जैसा आप सब जानते होंगे, यह है कि जब भगवान महादेव ने विष पिया, तो पीने के कारण वे असंतुलित होने लगे। उस असंतुलन की अवस्था में भगवती ने तारा का स्वरूप लिया, और महादेव को बालक के स्वरूप में लेकर अपने स्तन से दुग्ध-पान कराया। तो यहाँ वे महादेव की माँ-स्वरूप बनीं, और उसी कारण जो विष उनके कंठ में था, वह हलाहल विष, कंठ में स्थित हो गया। उन्होंने ही उसे कंठ में स्तंभित किया।
उनके भैरव अक्षोभ्य शिव हैं, जिन्हें कभी क्षुब्ध नहीं किया जा सकता — और कुंद बुद्धि इसे नहीं समझ सकती
अक्षोभ्य शिव, जिन्हें कभी क्षुब्ध नहीं किया जा सकता
वक्ता कहते हैं कि इस स्वरूप में भगवती तारा एक तरह से महादेव की भी मातृ-स्वरूप हैं; जिनकी बुद्धि कुंद है वे इन विषयों को नहीं समझ पाएँगे, और इसी कारण इसे गोपनीय रखा जाता है। वंग भूमि में इन बातों का बहुत महत्व है। यहाँ भगवान अक्षोभ्य शिव, अक्षोभ्य भैरव के रूप में भैरव बने हैं — जिन्हें कभी क्षुब्ध नहीं किया जा सकता, जिन्हें कभी क्षोभ नहीं दिया जा सकता, जिन तक दुःख और कष्ट कभी नहीं आ सकते।
वक्ता कहते हैं कि तो इस स्वरूप में भगवती तारा यहाँ एक तरह से महादेव की भी मातृ-स्वरूप हैं। जिनकी बुद्धि कुंद होगी वे इन विषयों को नहीं समझ पाएँगे; इसी कारण, केवल इसी कारण, इसे गोपनीय रखा जाता है। वंग भूमि में, वंग क्षेत्र में, इन बातों का बहुत बड़ा महत्व है। तो भगवान यहाँ अक्षोभ्य भैरव के स्वरूप में भैरव बने हैं — अक्षोभ्य शिव के रूप में, अक्षोभ्य भैरव के रूप में, जिन्हें कभी क्षुब्ध नहीं किया जा सकता, जिन्हें कभी क्षोभ नहीं दिया जा सकता, जिन तक दुःख और कष्ट कभी नहीं आ सकते।
तारा तंत्र में शाप विमोचन सामान्य विधि से कैसे अलग है?
ब्रह्मा-वशिष्ठ-विश्वामित्र के बजाय केवल वशिष्ठ
वक्ता कहते हैं कि सामान्यतः जब हम शाप विमोचन करते हैं, तो ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र करते हैं। पर जब तारा तंत्र में जाते हैं — जब पाठ भगवती तारा के मूल बीज मंत्रों आदि से संपुटित हो, विशेषकर पूरा तंत्रोक्त पाठ — तो उसमें ब्रह्मा, वशिष्ठ, विश्वामित्र कहने के बजाय विशेष रूप से केवल वशिष्ठ जी के संबंध में शाप विमोचन का प्रयोग किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि और महर्षि वशिष्ठ, जो यहाँ आए — जो भी मंत्र हैं उनमें से किसी का भी जब शाप विमोचन होता है, तो सबसे पहले महर्षि वशिष्ठ से होता है। जैसे जब हम शाप विमोचन करते हैं, तो ब्रह्मा, वशिष्ठ, विश्वामित्र करते हैं। पर जब तारा तंत्र में जाते हैं, जब कभी भगवती तारा के मूल बीज मंत्रों आदि से संपुटित पाठ किया जाता है, विशेषकर पूरा तंत्रोक्त पाठ — उसमें भी विधि-विधान है। तो उसमें, जब भी होता है, तो ब्रह्मा, वशिष्ठ, विश्वामित्र कहने के बजाय विशेष रूप से केवल वशिष्ठ जी के संबंध में शाप विमोचन का प्रयोग किया जाता है।
लोगों के पास घूमने वाला प्रसिद्ध शाप विमोचन कौन-सा है?
रुद्रयामल तंत्र से, भगवती त्रिपुरसुंदरी का
वक्ता कहते हैं कि एक बहुत प्रसिद्ध है भगवती त्रिपुरसुंदरी का शाप विमोचन, जिसे थोड़ा जानने वाले और इन बातों को खोजने वाले लोग अपने साथ रखते और दिखाते हैं — कहते हैं, गुरु जी यह देखिए, महाराज जी, यह भगवती त्रिपुरसुंदरी से जुड़ा है। भगवान शिव ने रुद्रयामल तंत्र में शाप विमोचन का प्रयोग बताया है, और इसलिए यह लोक में प्रचलित हो गया है।
वक्ता कहते हैं कि एक प्रचलित की तरह — वे लोग जो जानकार हैं, जो इन बातों को थोड़ा सुनते हैं, जो इन बातों को खोजते हैं। आपकी भगवती त्रिपुरसुंदरी का शाप विमोचन बहुत प्रसिद्ध है। लोगों के पास वह चीज़ रहती है। वे दिखाते हैं: गुरु जी, यह देखिए; महाराज जी, यह देखिए, यह भगवती त्रिपुरसुंदरी से जुड़ा है। शाप विमोचन का प्रयोग भगवान शिव ने रुद्रयामल तंत्र में बताया है। तो वह लोक में प्रचलित हो गया है।
कौन-सी शक्तियाँ भगवती तारा के नियंत्रण में रहती हैं?
वे जो और कहीं किसी नियंत्रण में नहीं
वक्ता कहते हैं कि ठीक उसी तरह, अक्षोभ्य शिव से जुड़ा और महर्षि वशिष्ठ से जुड़ा, भगवती तारा से संबंधित एक तंत्र है — जिसमें विशेष रूप से वे शक्तियाँ, जो और कहीं नियंत्रण में नहीं हैं, भगवती तारा के नियंत्रण में हैं।
वक्ता कहते हैं कि ठीक उसी तरह, अक्षोभ्य शिव से जुड़ा, महर्षि वशिष्ठ से जुड़ा एक तंत्र है, जो भगवती तारा से संबंधित है। जिसमें विशेष रूप से ऐसी शक्तियाँ, जो कहीं भी नियंत्रण में नहीं हैं, भगवती तारा के नियंत्रण में हैं।
श्रीकृष्ण और महाविद्या तारा के बारे में क्या कहा जाता है?
तारा की कृपा से दिखाया गया विश्वरूप
वक्ता बताते हैं कि कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण महाविद्या तारा की कृपा से ही विश्व स्वरूप का दर्शन कराने में समर्थ हुए। अब यदि आप वैष्णव हैं तो जैसा समझें — पर शाक्त संप्रदाय में इन सब बातों का बहुत बड़ा महत्व है, और किसी को कभी दूसरे से अलग नहीं माना जा सकता।
वक्ता बताते हैं कि कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण महाविद्या तारा की कृपा से ही विश्व स्वरूप का दर्शन कराने में सक्षम हुए, समर्थ हुए। अब आप वैष्णव हैं — तो जो समझें सो समझें। पर शाक्त संप्रदाय में इन सब बातों का बहुत बड़ा महत्व है। किसी को कभी अलग नहीं माना जा सकता। तो ये बातें इस तरह की हैं, और आप सबको यह सब जानना चाहिए।
यदि लंबे समय से किया जा रहा मंत्र असर न दे, तो उस रात क्या करें?
तारा का रूप स्थापित करने की ज़रूरत नहीं — दुर्गा में दसों महाविद्याएँ हैं
वक्ता कहते हैं कि यदि आप बहुत लंबे समय से किसी मंत्र की सिद्धि कर रहे हैं — सिद्धि का अर्थ कि आप उसका असर चाहते हैं और असर नहीं आ रहा — तो इस दिन आपको भगवती दुर्गा के सामने भगवती तारा का स्वरूप स्थापित करने की कोई ज़रूरत नहीं। भगवती दुर्गा में दसों महाविद्याएँ स्थापित हैं; भगवती पार्वती में सारी शक्तियाँ स्थापित हैं; सब उन्हीं के स्वरूप हैं।
वक्ता कहते हैं कि उस दिन, यदि आप बहुत लंबे समय से किसी भी मंत्र की सिद्धि कर रहे हैं — सिद्धि का अर्थ यह कि आप चाहते हैं उसका असर मिले, और उसका असर नहीं मिल रहा — तो इस दिन आपको भगवती दुर्गा के सामने ही भगवती तारा के स्वरूप की स्थापना करने की कोई ज़रूरत नहीं। भगवती दुर्गा में दसों महाविद्या स्थापित हैं। भगवती पार्वती में सारी शक्तियाँ स्थापित हैं। सब उन्हीं के स्वरूप हैं।
मंत्र को अपने हाथ से लिखें, अर्पित करें, और फिर से जप या पाठ करें
मंत्र हाथ से लिखकर अर्पित करना, फिर से जप या पाठ
वक्ता कहते हैं कि जगदंबा पार्वती के सामने या भगवती दुर्गा के सामने बैठकर, चतुर्दशी-व्यापिनी या अमावस्या-व्यापिनी की एक रात में, जिस मंत्र का आप पुरश्चरण अनुष्ठान कर रहे हैं और वह जाग नहीं रहा, कोई असर नहीं दे रहा — या जिस स्तोत्र को आप शुद्ध कर रहे हैं — उसे पूरा अपने हाथों से लिखें, भगवती को अर्पित करें, और फिर अपनी शक्ति के अनुसार बार-बार उसका जप या पाठ करें।
वक्ता कहते हैं कि तो जगदंबा पार्वती के सामने, या भगवती दुर्गा के सामने बैठकर, चतुर्दशी-व्यापिनी रात या अमावस्या-व्यापिनी रात में, उस एक रात में — जिस भी मंत्र का आप पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। अनुष्ठान कर रहे हैं, और वह जाग नहीं रहा, असर नहीं दे रहा — उस दिन एक बार, वह मंत्र, या जो स्तोत्र आदि आप शुद्ध कर रहे हैं, उसे पूरा अपने हाथों से लिखें, भगवती को अर्पित करें, और फिर अपनी शक्ति के अनुसार बार-बार उसका जप या पाठ करना चाहिए।
सामर्थ्य हो तो हवन; व्रत या उपवास की ज़रूरत नहीं
जहाँ तक हो सके हवन, और उपवास की ज़रूरत नहीं
वक्ता कहते हैं कि जहाँ तक संभव हो, यदि आपके पास साधन हों, तो हवन करना चाहिए। व्रत या उपवास की कोई ज़रूरत नहीं। यदि बहुत इच्छा हो तो फलाहार पर रहें, या पहाड़ी नमक, यानी सेंधा नमक, वाला भोजन लेकर रहें। इतना करने से वह मंत्र जाग जाएगा और फिर उसका अच्छा असर भी मिलेगा।
वक्ता कहते हैं कि जहाँ तक संभव हो, यदि आपकी सामर्थ्य हो, तो हवन करना चाहिए। व्रत, उपवास आदि की कोई ज़रूरत नहीं। यदि बहुत इच्छा हो, तो फलाहार पर रहें; या फिर पहाड़ी नमक, जिसे सेंधा नमक कहते हैं, वाला भोजन करें, और ऐसे रह सकते हैं। इतना करने से वह मंत्र जाग जाएगा, और उसके बाद उसका अच्छा असर भी आपको मिलेगा।
इन रातों में बहुत बड़े कष्ट में पड़े व्यक्ति को कम से कम क्या करना चाहिए?
तीन रातें, सरसों के तेल के जोड़ा दीपक, और दुर्गा सहस्रनाम
वक्ता कहते हैं कि विशेषकर वे लोग जिनके जीवन में बहुत विशेष प्रकार की विपत्ति है, बहुत बड़ा कष्ट है, जहाँ स्थिति बिल्कुल असहनीय लगती है — इन दो-तीन दिनों में, त्रयोदशी, चतुर्दशी और अमावस्या मानकर, यदि वे और कुछ न कर सकें, तो रात नौ बजे के बाद भगवती तारा और अक्षोभ्य शिव दोनों का नाम याद करके, लाल रंग की बत्ती वाला सरसों के तेल का एक या दो दीपक, जोड़ा दीपक, जलाकर, भगवती का स्मरण करते हुए केवल दुर्गा सहस्रनाम का पाठ करें।
वक्ता कहते हैं कि विशेषकर वे लोग, जिनके जीवन में बहुत विशेष प्रकार की विपत्तियाँ हैं, जिनमें बहुत बड़ा कष्ट है, जहाँ बिल्कुल ऐसा लगता है कि क्या होगा क्या नहीं — जहाँ स्थिति बिल्कुल सहन करने लायक नहीं है। वे लोग इन दो-तीन दिनों में — त्रयोदशी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथि मान लीजिए — यदि इन तीन दिनों में और कुछ भी न कर सकें, तो रात नौ बजे के बाद भगवती तारा और अक्षोभ्य शिव दोनों का नाम याद करके, लाल रंग की बत्ती वाला सरसों के तेल का एक या दो दीपक, जोड़ा दीपक, जलाकर, और भगवती का स्मरण करते हुए, केवल दुर्गा सहस्रनाम का पाठ करें।
एक समस्या के संकल्प पर दुर्गा सहस्रनाम का एक पाठ, और हो सके तो शिव सहस्रनाम
एक पाठ, हो सके तो शिव सहस्रनाम, और एक ही समस्या
वक्ता कहते हैं कि केवल एक पाठ करें — पर दुर्गा सहस्रनाम का पाठ, और हो सके तो शिव सहस्रनाम का पाठ, इन तीन दिनों में। केवल किसी एक समस्या का संकल्प लें: कि हाँ, यह समस्या है और हल नहीं हो रही; हे भगवती, कृपा करो। और इसे रात में करें।
वक्ता कहते हैं कि एक पाठ करें — पर दुर्गा सहस्रनाम का पाठ, और यदि संभव हो तो शिव सहस्रनाम का पाठ — इन तीन दिनों में करके देखें। केवल किसी एक समस्या का संकल्प लें: कि हाँ, यह समस्या है, यह हल नहीं हो रही। हे भगवती, कृपा करो। और इसे रात के समय करें।
एक घंटा, नए व्यक्ति को डेढ़ घंटा — और इस तिथि पर शक्तियाँ पूरी तरह जाग्रत रहती हैं
एक घंटा, नए को डेढ़ घंटा — और पूरी तरह जाग्रत शक्तियाँ
वक्ता कहते हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा आपको एक घंटा लगेगा; यदि आप नए हैं तो डेढ़ घंटा लगेगा। पर तीन दिन कीजिए और भगवती ने थोड़ी कृपा की — यदि उन्होंने दृष्टि डाल दी। क्योंकि इस समय इनसे जुड़ी जो भी शक्तियाँ हैं वे पूरी तरह जाग्रत और व्याप्त रहती हैं; इसलिए यदि आप उनका आवाहन करेंगे तो वे अवश्य, अवश्य कृपा करेंगी। यह विशेष तिथि है, और यह सबको इस रात करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि ज़्यादा लगेगा तो आपको एक घंटा लगेगा; यदि आप नए हैं, तो डेढ़ घंटा चाहिए। पर तीन दिन करते हैं, और भगवती ने थोड़ी कृपा की — यदि उन्होंने दृष्टि डाल दी। क्योंकि इस समय उनसे जुड़ी जो भी शक्तियाँ हैं, वे पूरी तरह जाग्रत रहती हैं और व्याप्त रहती हैं। तो यदि आप उनका आवाहन करेंगे, तो वे अवश्य, अवश्य कृपा करेंगी। यह विशेष तिथि है। तो सबको इस रात यह करना चाहिए।
चतुर्दशी से शुरू करके हर रात कालिका कवच के पाँच पाठ
कालिका कवच, चतुर्दशी से हर रात पाँच पाठ
वक्ता कहते हैं कि इस अमावस्या तिथि से शुरू करके, चैनल पर दिए गए कालिका कवच की पीडीएफ़ डाउनलोड करें और चतुर्दशी से शुरू करें — उस दिन से जिस दिन इस भाद्रपद अमावस्या की रात के समय चतुर्दशी तिथि हो — और रोज़ कम से कम पाँच पाठ करें, यह संकल्प लेकर कि हे भगवती, प्रसन्न होइए और सोते हुए भी और जागते हुए भी हर तरह से मेरी रक्षा कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अब आपको इस अमावस्या तिथि से शुरू करना चाहिए। भगवती कालिका का कवच चैनल पर दिया गया है। उसकी पीडीएफ़ है; उसे डाउनलोड करें, और चतुर्दशी से शुरू करें — उस दिन से जिस दिन इस भाद्रपद अमावस्या की रात के समय चतुर्दशी तिथि व्याप्त हो। उस दिन से शुरू करें, और रोज़ कम से कम पाँच पाठ करें। यह संकल्प लेकर: हे भगवती, आप प्रसन्न हों और हर तरह से मेरी रक्षा करें — सोती अवस्था में भी, यानी सोते समय, और जाग्रत अवस्था में भी, हर तरह से।
स्त्री के छूटने वाले दिनों से कोई हानि नहीं, और रात के समय तंत्रोक्त रात्रि सूक्त जोड़ा जाता है
छूटे दिन, रात का समय, और तंत्रोक्त रात्रि सूक्त
वक्ता कहते हैं कि आप स्त्री हैं, और बीच में दो, तीन या चार दिन छूट जाएँगे — उसमें कोई दिक्कत नहीं; फिर से शुद्ध-पवित्र होकर, स्नान-ध्यान के बाद, आप फिर से इसका पाठ करेंगी। पाठ केवल रात के समय, नौ बजे के बाद करें। और हो सके तो साथ में तंत्रोक्त रात्रि सूक्त का पाठ भी करें। इतना जारी रखें और एक पक्ष पूरा होते-होते आपको अंतर दिखने लगेगा।
वक्ता कहते हैं कि आप स्त्री हैं; बीच में दो, तीन या चार दिन छूट जाएँगे। उसमें कोई दिक्कत नहीं। फिर से शुद्ध और पवित्र होकर, स्नान-ध्यान आदि करके, आप फिर से इसका पाठ करेंगी। पाठ केवल रात के समय, नौ बजे के बाद करें। और यदि संभव हो, तो साथ में तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम् का पाठ भी करें। इतना जारी रखें। एक पक्ष पूरा होते-होते आपको अंतर दिखने लगेगा। आगे जब यह चीज़ थोड़ा अंतर दिखाने लगेगी और सुरक्षा मिलेगी, तो घर के लोग तंत्र आदि में जो कर रहे हैं, उसमें क्या हो रहा है और क्या नहीं हो रहा — वह भी आपको दिखने और समझ आने लगेगा।
अपने घर का बंधन कैसे करना चाहिए?
अर्गला से जुड़ा मंत्र, जिसे वे गृहस्थों के लिए सबसे अच्छा कहते हैं
स्वयं घर का बंधन कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह चैनल पर समझाया गया है। गृहस्थों के लिए सबसे अच्छा है अर्गला से जुड़े मंत्र से घर का बंधन; उसकी जानकारी वहाँ पूरी दी गई है।
एक श्रोता पूछते हैं कि स्वयं घर का बंधन कैसे करना चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह चैनल पर बताया गया है। गृहस्थों के लिए सबसे अच्छा है अर्गला स्तोत्र से जुड़े मंत्र से घर का गृह बंधन। उसकी जानकारी वहाँ पूरी बताई गई है।
क्या देवताओं से प्रार्थना की जा सकती है कि कोई हमारे घर में न झाँक सके?
यह उस स्तर का साधक होने पर निर्भर है
यह पूछे जाने पर कि यदि हम देवी-देवताओं से प्रार्थना करें कि कोई हमारे घर में न देख सके तो क्या ऐसा होगा, वक्ता कहते हैं कि यह निर्भर करेगा — आपको उस स्तर का साधक होना पड़ेगा, तभी आप जो बात कह रहे हैं वह संभव होगी।
एक श्रोता पूछते हैं कि यदि हम देवी-देवताओं से प्रार्थना करें कि कोई हमारे घर में न देख सके, तो क्या ऐसा होगा। वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, यह निर्भर करेगा। आप उस स्तर के साधक होंगे — तभी यह बात जो आप कह रहे हैं, संभव होगी।
घर पर मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कैसे करनी चाहिए?
सबको अधिकार नहीं — किसी ब्राह्मण से करवाएँ
भानु प्रताप जी को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा का अधिकार सबके लिए नहीं है। सामान्य विधि-विधान पर एक वीडियो डाला जाएगा, पर हो सके तो किसी ब्राह्मण से करवाएँ, चाहे वह केवल चल प्रतिष्ठा हो। क्योंकि प्राण प्रतिष्ठा में वैदिक मंत्रों का उच्चारण होता है, और वैदिक मंत्र पढ़ने का अधिकार या विधान पौराणिक मंत्रों जैसा नहीं है — वे सामवेद से गायन पद्धति से होते हैं; वेद में उन्हें गाया जाता है। इसलिए यदि आपने सीखा नहीं है तो आप वह नहीं कर पाएँगे।
एक श्रोता पूछते हैं कि घर पर मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कैसे करनी चाहिए; कृपया इस पर भी वीडियो बनाइए। वक्ता उत्तर देते हैं कि भानु प्रताप जी, देखिए: प्राण प्रतिष्ठा का अधिकार सबके लिए नहीं है। सामान्य विधि-विधान से जुड़ा वीडियो हम ज़रूर डालेंगे, पर यदि संभव हो, तो किसी ब्राह्मण से करवाएँ, चाहे वह केवल चल प्रतिष्ठा हो। यदि आप उनसे करवाएँ — क्योंकि प्राण प्रतिष्ठा में वैदिक मंत्रों का उच्चारण होता है, और वैदिक मंत्र पढ़ने का अधिकार, उन्हें पढ़ने का विधान, पौराणिक मंत्रों की तरह नहीं है। वह सामवेद से गायन पद्धति से होता है; वेद में उन्हें गाया जाता है। इसलिए यदि आपने सीखा नहीं है तो आप वह नहीं कर पाएँगे। इसलिए किसी योग्य ब्राह्मण से करवाएँ।
सामान्य विधि दी जाएगी, फिर भी किसी अच्छे ब्राह्मण से करवाना चाहिए — यह एक दिन की बात है
एक दिन की बात — किसी अच्छे ब्राह्मण से करवाएँ
वक्ता कहते हैं कि यद्यपि सामान्य विधि डाली जा सकती है और डाली जाएगी, फिर भी सबसे उनका अनुरोध यही रहेगा कि यदि आप ये सब चीज़ें विधि-विधान से करवाना चाहते हैं, तो यह केवल एक दिन की बात है — किसी अच्छे ब्राह्मण से करवाएँ।
वक्ता कहते हैं कि यद्यपि सामान्य विधि डाली जा सकती है, और डाली जाएगी — पर फिर भी आप सबसे उनका अनुरोध रहेगा: यदि आप ये सब चीज़ें विधि-विधान से करवाना चाहते हैं, तो यह केवल एक दिन की बात है; किसी अच्छे ब्राह्मण से करवाएँ।
क्या घर पर रोज़ रुद्राभिषेक किया जा सकता है, और उसका क्या लाभ है?
कौन-सा रुद्राभिषेक — रुद्राष्टाध्यायी, नमक-चमक, या सामान्य अभिषेक
आयुष पांडे जी को उत्तर देते हुए वक्ता पहले पूछते हैं कि वे रुद्राभिषेक किसे कह रहे हैं — रुद्राष्टाध्यायी के पूरे आठ अध्याय पढ़ना, या नमक-चमक पढ़ना, या सामान्य अभिषेक। यदि आप सामान्य अभिषेक आदि करना चाहते हैं, तो कर सकते हैं। और आयुष जी, यदि आप इतने सक्षम हैं कि रोज़ रुद्राष्टाध्यायी पढ़कर उससे अभिषेक करते हैं, और भगवान ने आपको इतना पूरा सक्षम बनाया है, तो वह भी कर सकते हैं; कोई दिक्कत नहीं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या घर पर रोज़ रुद्राभिषेक किया जा सकता है, और उससे क्या लाभ है। वक्ता उत्तर देते हैं कि आयुष पांडे जी, आप रुद्राभिषेक किसे कह रहे हैं? रुद्राष्टाध्यायी से पूरे आठ अध्याय पढ़ना, या नमक-चमक पढ़ना, या सामान्य अभिषेक? यदि आप सामान्य अभिषेक आदि करना चाहते हैं, तो वह भी कर सकते हैं। और आयुष जी, यदि आप इतने सक्षम हैं कि रोज़ रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करके उससे अभिषेक करते हैं — भगवान ने आपको इतना पूरा सक्षम बनाया है — तो वह भी कर सकते हैं; कोई दिक्कत नहीं।
शिववास कब देखना ज़रूरी है?
कभी-कभार अष्टाध्यायी पाठ में हाँ, नित्य अभिषेक में नहीं
वक्ता कहते हैं कि यदि आप इसे कभी-कभी करते हैं, कभी-कभार अष्टाध्यायी आदि पढ़कर, तो शिववास देखने की ज़रूरत है। और नित्य पूजन में जो अभिषेक हम करते हैं, उसके लिए कभी शिववास देखने की ज़रूरत नहीं। इसे ध्यान में रखें।
वक्ता कहते हैं कि पर यदि आप इसे कभी-कभी करते हैं — अष्टाध्यायी आदि पढ़कर, कभी-कभार करते हैं — तो शिववास देखने की ज़रूरत है। और नित्य पूजन में जो अभिषेक हम करते हैं, उसके लिए कभी भी शिववास देखने की ज़रूरत नहीं। इस बात को ध्यान में रखें।
अघोर अमावस्या पर कौन-सा एक दिन का अनुष्ठान किया जा सकता है?
जिस मंत्र का सबसे अधिक जप किया है, भगवती के सामने
वक्ता कहते हैं कि जिस मंत्र का आपने सबसे अधिक जप किया है और जिसका असर आप चाहते हैं, उसी का अनुष्ठान उस रात भगवती के सामने करना चाहिए — किसी भी देवता का मंत्र हो। साथ में भगवती का पूजन हो, और उनसे प्रार्थना: हे जगदंबा, इस मंत्र को सबसे तीव्र बनाइए। वे कहते हैं कि यह वे भौतिक विषयों के संबंध में बता रहे हैं; आध्यात्मिक लाभ के लिए आप विधि के अनुसार जैसा चाहें करें।
एक श्रोता पूछते हैं कि अघोर अमावस्या पर कौन-सा एक दिन का अनुष्ठान किया जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि जिस भी मंत्र का आपने सबसे अधिक जप किया है, और जिसका असर आप चाहते हैं, उसी का अनुष्ठान उस रात भगवती के सामने करना चाहिए। किसी भी देवता का मंत्र हो। साथ में भगवती का पूजन हो, और उनसे प्रार्थना हो: हे जगदंबा, इस मंत्र को सबसे तीव्र बनाइए। यह हम भौतिकता के संबंध में बता रहे हैं। बाकी यदि आप आध्यात्मिक लाभ करना चाहते हैं, तो विधि के अनुसार जैसा चाहें कर सकते हैं।
क्या अघोर अमावस्या पर किसी चालीसा की सिद्धि के लिए एक दिन का अनुष्ठान किया जा सकता है?
चक्र विधि, जिसमें इकतालीस पाठ होते हैं
वक्ता कहते हैं कि हाँ, अवश्य किया जा सकता है। अघोर अमावस्या पर चक्र विधि से बताए गए विधान में इकतालीस पाठ करने होते हैं। जो चक्र विधि दी गई है — किसी भी चालीसा को चक्र विधि से कैसे सिद्ध करें — वह आप उस रात कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या अमावस्या पर, अघोर अमावस्या पर, किसी चालीसा की सिद्धि के लिए एक दिन का अनुष्ठान किया जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, अवश्य किया जा सकता है। अघोर अमावस्या पर, चक्र विधि से जो विधान बताया गया है, उसमें इकतालीस पाठ करने होते हैं। जो चक्र विधि दी गई है — किसी भी चालीसा की सिद्धि चक्र विधि से कैसे करें — वह आप उस रात कर सकते हैं।
काली चालीसा को हाल में लिखे जाने के कारण नकारना नहीं चाहिए
हाल में लिखी होने के कारण काली चालीसा को न नकारें
वक्ता इसे बहुत अच्छा प्रश्न कहते हैं और कहते हैं कि माखन जी के माध्यम से वे सबको यह संदेश देना चाहते हैं: जो लोग कुछ भी नहीं कर रहे, वे अपने इष्ट से या भगवती से जुड़ा कुछ अपनाएँ। यदि आपको काली जी से प्रेम है, तो काली चालीसा लें — इसे इस तरह न देखें कि काली चालीसा तो अभी हाल में लिखी गई है, इसका क्या असर होगा। यह बात छोड़ दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि माखन जी, यह बहुत अच्छा प्रश्न था, और आपके माध्यम से हम सबको यह संदेश देना चाहते हैं: वे लोग जो कुछ भी नहीं कर रहे — वे लोग अपने इष्ट से जुड़ा, या भगवती से जुड़ा कुछ अपनाएँ। आपको काली जी से प्रेम है। काली चालीसा — इसे इस तरह न देखें कि काली चालीसा तो अभी किसी ने लिखी है, इसका क्या असर होगा। यह बात छोड़ दीजिए।
यह उस सामान्य गृहस्थ के लिए है जो संस्कृत नहीं पढ़ सकता
सामान्य गृहस्थ जो संस्कृत नहीं पढ़ सकता
वक्ता कहते हैं कि यदि आप सामान्य गृहस्थ हैं, संस्कृत पढ़ना नहीं जानते, और कोई बहुत विशेष विधि-विधान नहीं जानते — या किसी और देवी या देवता के लिए करना चाहते हैं — तो अघोर अमावस्या, यानी भाद्रपद की अमावस्या पर, जिस दिन वह रात में हो, उसी दिन आपको यह करना है। उनके विचार से यह छब्बीस या सत्ताईस को पड़ेगी; उन्होंने देखा नहीं है, तारीख बाद में ग्रुप में डाल देंगे।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप सामान्य गृहस्थ हैं, यदि आप संस्कृत पढ़ना नहीं जानते, यदि आप बहुत विशेष विधि-विधान नहीं जानते — या यदि आप किसी और देवी या देवता के लिए भी करना चाहते हैं — तो अघोर अमावस्या, यानी भाद्रपद की अमावस्या पर, जिस भी दिन वह रात में हो, उसी दिन आपको यह करना है। उनके विचार से यह छब्बीस या सत्ताईस को पड़ेगी; उन्होंने देखा नहीं है। तारीख वे बाद में ग्रुप में डाल देंगे।
दिन में सात्विक भोजन, फिर रात में तारा और अक्षोभ्य शिव के लिए एक-एक दीपक
दिन में सात्विक भोजन, फिर रात में तारा और अक्षोभ्य शिव के दीपक
वक्ता कहते हैं कि उस दिन दिन में जो खाना-पीना हो वह खाएँ — पर केवल सामान्य सात्विक भोजन। रात में स्नान के बाद भगवती तारा के लिए और उनके भैरव, जो अक्षोभ्य शिव हैं, उनके लिए एक-एक दीपक जलाएँ, उनके सामने बैठें, और चक्र विधि से चालीसा पाठ करें।
वक्ता कहते हैं कि तो उस दिन, रात के समय — दिन भर जो भी खाना-पीना हो, केवल सामान्य सात्विक भोजन ही खाएँ-पिएँ। रात के समय, नहा-धोकर, भगवती तारा के नाम से और उनके भैरव जो अक्षोभ्य शिव हैं उनके नाम से, एक-एक दीपक जलाएँ। और उनके सामने बैठकर, फिर चक्र विधि से चालीसा पाठ करें।
हवन की ज़रूरत नहीं, और चक्र विधि पिछले महीने पूरी दी गई थी
हवन ज़रूरी नहीं, और पिछले महीने का वीडियो
वक्ता कहते हैं कि हवन आदि की कोई ज़रूरत नहीं; कर सकें तो बहुत अच्छा, नहीं तो बिल्कुल आवश्यकता नहीं। चक्र विधि का अर्थ क्या है, इसका पूरा विधान चैनल पर बताया गया है — उसे एक बार देखें, और न मिले तो ग्रुप में संदेश करें, लिंक फिर से डाल दिया जाएगा। विषय था कि किसी भी देवी या देवता की चालीसा को कैसे सिद्ध करें, और उनके विचार से वीडियो पिछले महीने डाला गया था।
वक्ता कहते हैं कि हवन आदि की कोई ज़रूरत नहीं; कर सकें तो बहुत अच्छा; नहीं तो बिल्कुल ज़रूरत नहीं। चक्र विधि का अर्थ — इसका पूरा विधान चैनल पर बताया गया है; कृपया उसे एक बार देखें। और यदि वह न मिले, तो ग्रुप में संदेश करें और हम उसका लिंक फिर से डाल देंगे। चालीसा को कैसे सिद्ध करें, किसी भी देवी या देवता की चालीसा को कैसे सिद्ध करें — यह विषय था। उनके विचार से यह पिछले महीने डाला गया वीडियो है।
यहाँ की एक रात का असर दस सामान्य रातों के बराबर है
यहाँ की एक रात, दस सामान्य रातों के बराबर
वक्ता कहते हैं कि सबको एक चालीसा सिद्ध करनी चाहिए — भले आप कुछ भी न करें, एक चालीसा सिद्ध करके रखें। एक रात में उसका असर अधिक मिलेगा: सामान्य रातों में कम से कम दस रातें करके जो आपको मिलता, वह इसी एक रात में मिल जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि सब एक चालीसा सिद्ध करें। यदि आप कुछ भी न करें, तब भी एक चालीसा सिद्ध करके रखें। हाँ — एक रात में उसका असर अधिक मिलेगा। सामान्य रातों में जो आप करते हैं: कम से कम दस रातें करें, और वह आपको इसी एक रात में मिल जाएगा।
ब्रह्मराक्षस की एक बड़ी विशेषता है: वह कभी खुलकर सामने नहीं आता
ब्रह्मराक्षस वास्तव में कैसा व्यवहार करता है
रवि नेमा जी को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि ब्रह्मराक्षस जब भी हो, और यदि वह किसी विचार में आ गया हो, तो उसकी एक बड़ी विशेषता है: वह कभी इतनी आसानी से पकड़ में नहीं आता। कोई जानकार हो तो उसे एक बार में पकड़ लेगा; नहीं तो वह वैसा नहीं होगा जैसा आप बता रहे हैं। कभी वह एक रूप में हो सकता है, कभी दूसरे में; यह भी हो सकता है कि पूरा एक महीना आपका बहुत अच्छा जाने लगे और वह कहे कि हम ही देवी हैं, या हम फलाँ देवता हैं, केवल मेरी पूजा करो। इसके द्वारा विचार में बहुत धोखा होता है।
एक श्रोता लिखते हैं कि बार-बार कोई नकारात्मक ऊर्जा मुझ पर या मेरे पिता पर हमला करती है और कोई काम नहीं होने देती; कोई इसे अघोर विद्या कहता है, कोई मैली श्मशानी विद्या, और कोई ब्रह्मराक्षस। वक्ता उत्तर देते हैं कि रवि नेमा जी, देखिए: जब भी कोई ब्रह्मराक्षस होता है, और यदि वह किसी विचार में चला गया हो, तो उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह कभी इतनी आसानी से पकड़ में नहीं आता। यदि कोई अच्छा जानकार हो तो वह उसे एक बार में पकड़ लेगा; नहीं तो वह उस तरह नहीं होगा जैसा आप बता रहे हैं। कभी वह एक स्वरूप में हो सकता है, कभी दूसरे में; हो सकता है कि पूरा एक महीना आपका बहुत अच्छा जाने लगे, और वह कहे कि हम ही देवी हैं, या हम फलाँ देवता हैं, केवल मेरी पूजा करो। इसके द्वारा विचार में बहुत बड़ा धोखा होता है। तो इस बात को सही ढंग से देखिए।
ऐसा व्यक्ति अपने लिए क्या कर सकता है?
नरसिंह कवच, और इकतालीस दिन का अनुष्ठान
वक्ता कहते हैं कि यदि आप कर सकें, और स्वयं करना चाहें, और परेशानी बहुत बड़ी हो, तो इस चैनल पर भगवान नरसिंह से जुड़ा एक वीडियो है — नरसिंह कवच का उपयोग कैसे करें, उससे अपनी और घर की रक्षा कैसे करें। उसका इकतालीस दिन का अनुष्ठान करके देखें। बीच में न छोड़ें; पूरा विधि-विधान बताया गया है, तो मन लगाकर अच्छे से करें।
वक्ता कहते हैं कि उसके साथ, यदि आप कर सकें, यदि आप स्वयं करना चाहें, यदि आपकी परेशानी बहुत बड़ी है, तो इस चैनल पर भगवान नरसिंह से जुड़ा एक वीडियो है। नरसिंह कवच का उपयोग कैसे करें, उससे अपनी और अपने घर की रक्षा कैसे करें — इस तरह की चीज़ों का इकतालीस दिन का अनुष्ठान करके देखें। यदि आप स्वयं करना चाहें। बीच में न छोड़ें। विधि-विधान सब बताया गया है; मन लगाकर अच्छे से करें।
मूँज की रस्सी से बुनी खटिया कई तंत्र विधियों में काम आती है, क्षेत्र के अनुसार काम अलग होता है
अलग-अलग स्थानों और क्षेत्रों में अलग काम
एक श्रोता कहते हैं कि उनकी गुरु परंपरा में मूँज से रस्सी बनाकर उससे खटिया बुनी जाती है, जो बाद में कई तंत्र विधियों में काम आती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, स्थान और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग तरह के काम होते हैं। मूँज का बहुत बड़ा महत्व है।
एक श्रोता कहते हैं कि हमारी गुरु परंपरा में मूँज से रस्सी बनाकर उससे खटिया बुनी जाती है, जो बाद में कई तंत्र विधियों में काम आती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, स्थान और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग तरह के काम होते हैं। मूँज का बहुत बड़ा महत्व है।
प्रत्यक्ष सिद्धि पाने के बाद क्या होता है?
आप नियम में बँध जाते हैं, और वे आपको अनुशासन में रखते हैं
वक्ता कहते हैं कि यदि आप प्रत्यक्ष सिद्धि लेंगे, तो नियम में बँध जाएँगे। और प्रत्यक्ष सिद्धि इतनी आसानी से मिलती भी नहीं; उसके लिए योग्य मार्गदर्शक और गुरु चाहिए। प्रत्यक्ष सिद्धि लेकर आप नियम में इसलिए बँधेंगे क्योंकि आप सोचेंगे कि कुछ सिद्ध करके हम उसे अपने हिसाब से चलाएँगे — पर सच यह है कि जिन्हें आप सिद्ध करते हैं, वे आपको अनुशासन में रखने का काम करते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष सिद्धि पाता है — उसके बाद उसके क्या लाभ हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, यदि आप प्रत्यक्ष सिद्धि लेंगे, तो आप नियम में बँध जाएँगे। और प्रत्यक्ष सिद्धि इतनी आसानी से मिलती भी नहीं; उसके लिए योग्य मार्गदर्शक और गुरु चाहिए। प्रत्यक्ष सिद्धि लेकर आप नियम में इसलिए बँध जाएँगे: कि आप सोचेंगे हम कुछ सिद्ध करेंगे और उसे अपने हिसाब से चलाएँगे। पर सच यह है कि जिन्हें आप सिद्ध करते हैं, वे आपको अनुशासन में रखने का काम करते हैं।
जिसकी बात थी वह वासुदेवानंद सरस्वती का मंत्रात्मक मारुति स्तोत्र है
वासुदेवानंद सरस्वती का मंत्रात्मक मारुति स्तोत्र
आकाश जी कहते हैं कि उन्हें गीता प्रेस के हनुमान अंक में श्री वासुदेवानंद सरस्वती का मंत्रात्मकम् श्री मारुति स्तोत्र मिला है, और पूछते हैं कि क्या वक्ता का आशय इसी से था। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, आकाश जी, उसी से करें; और एक बार उन्हें टेलीग्राम पर भेज दें, वे भी देख लेंगे।
आकाश जी पूछते हैं कि आपने मारुति स्तोत्र की सलाह दी थी; गीता प्रेस के हनुमान अंक में मुझे श्री वासुदेवानंद सरस्वती का मंत्रात्मकम् श्री मारुति स्तोत्र मिला है — क्या आपने इसी के लिए कहा था। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, आकाश जी, उसी से करें। एक बार उन्हें टेलीग्राम पर भेज दें, वे भी देख लेंगे।
नीलकंठ स्तोत्र को कैसे सिद्ध करें?
सामान्य पाठ हाँ — नीलकंठ अघोरास्त्र बाद में
सूर्य पटेल जी पूछते हैं कि नीलकंठ स्तोत्र की साधना सिद्धि कैसे करें। वक्ता कहते हैं कि यदि आप सामान्य नीलकंठ स्तोत्र की बात कर रहे हैं, तो उसे पाठ आदि के लिए कर सकते हैं। यदि आप नीलकंठ अघोरास्त्र आदि की बात कर रहे हैं, तो उसके लिए वे कहेंगे: पहले सामान्य साधनाएँ पूरी करें, और उसके बाद करें।
वक्ता कहते हैं कि आशा पटेल जी, प्रणाम। सूर्य पटेल जी ने कहा है: बताइए कि नीलकंठ स्तोत्र की साधना सिद्ध कैसे करें। देखिए, यदि आप सामान्य नीलकंठ स्तोत्र की बात कर रहे हैं, तो उसे पाठ आदि के लिए कर सकते हैं। यदि आप नीलकंठ अघोरास्त्र आदि की बात कर रहे हैं, तो उसके लिए वे कहेंगे कि आप पहले सामान्य साधनाएँ पूरी करें, और उसके बाद करें।
माया बीज और लक्ष्मी बीज में अनुस्वार मकार है या नाद वाला?
गृहस्थ के लिए मकार
यह पूछे जाने पर कि माया बीज और लक्ष्मी बीज में अनुस्वार का उच्चारण मकार के रूप में सही है या नाद वाला, वक्ता कहते हैं: देखिए, यदि आप मकार लेकर चलें, और आप गृहस्थ हैं, तो यह अति उत्तम है।
एक श्रोता पूछते हैं कि माया बीज और लक्ष्मी बीज में अनुस्वार का उच्चारण मकार के रूप में सही है, या नाद वाला सही है। वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, यदि आप मकार लेकर चलेंगे, और आप गृहस्थ हैं, तो यह अति उत्तम है।
एक स्त्री कहती हैं कि उनके पति बहुत शराब पीते हैं और उन्हें बाधा का संदेह है — वक्ता क्या उत्तर देते हैं?
बिना देखे कुछ नहीं कहा जा सकता
वे लिखती हैं कि उनके पति बहुत पीते हैं, उन्हें लगता है कोई बड़ी बाधा है, समस्या अब बहुत बढ़ गई है, और पूछती हैं कि यदि यह बाहर से है तो क्या किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि शायद उन्होंने टेलीग्राम पर संदेश किया है; ऐसी स्थिति में बिना देखे कुछ भी कहना सही नहीं होगा।
एक श्रोता लिखती हैं कि मेरे पति बहुत पीते हैं; मुझे लगता है कोई बड़ी बाधा है; समस्या अब बहुत बढ़ गई है; यदि यह बाहर से है, तो क्या किया जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, उनके विचार से शायद उन्होंने टेलीग्राम पर संदेश किया है। बिना देखे — ऐसी स्थिति में बिना देखे कुछ भी कहना सही नहीं होगा।
इसके पीछे तंत्र विचार होना ज़रूरी नहीं — सामान्य कारण भी उतना ही संभव है
ज़रूरी नहीं — सामान्य बात भी संभव है
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि एक प्रकार सामान्य होता है जिसमें किसी तरह का तंत्र विचार नहीं होता। ज़रूरी नहीं कि यदि कोई व्यक्ति गलत रास्ते पर चला गया है, या इस तरह की बातें हो रही हैं, तो उसमें तंत्र विचार है। इसलिए यह कहना सही और उचित नहीं होगा कि उनकी हालत में सच में कोई विचार है, कि किसी ने कुछ खिलाया या दिया है इसलिए वे पीते हैं। यह सामान्य बात भी हो सकती है, और इसे एक बार देखना होगा।
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि एक चीज़ सामान्य प्रकार की होती है, जिसमें किसी भी तरह के तंत्र का कोई विचार नहीं होता। बिना विचार के — ज़रूरी नहीं कि यदि कोई व्यक्ति गलत रास्ते पर चला गया है, या इस तरह की बातें हो रही हैं, तो उसमें तंत्र विचार है। इसलिए इस तरह कहना सही और उचित नहीं होगा कि उनकी हालत में सच में कोई विचार है, कि किसी ने खिलाया-पिलाया किया है और तभी वे पी रहे हैं। यह सामान्य बात भी हो सकती है। इसलिए इसे एक बार देखना होगा।
कौल मार्ग में, काली कुल में दीक्षा कैसे लेनी चाहिए?
किसी अच्छे साधक के संपर्क में रहें, और दोनों तरफ से मेल परखें
विशाल भारती जी कौल मार्ग में जाना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं कि तब शाक्त संप्रदाय से जुड़े किसी अच्छे साधक के संपर्क में, या जो भी शक्ति पीठ हैं वहाँ, रहें, विधि-विधान सीखें, परखें और देखें कि वे आपके साथ कितनी दूर चल सकते हैं, या आप उनके अनुकूल हैं और वे आपके — यह सब देखकर तब करें।
एक श्रोता लिखते हैं कि कृपया कौल मार्ग में, काली कुल में दीक्षा के लिए मेरा मार्गदर्शन करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि विशाल भारती जी, आप कौल मार्ग में जाना चाहते हैं। तो शाक्त संप्रदाय से जुड़े किसी अच्छे साधक के, या जितने भी शक्ति पीठ हैं उनके, संपर्क में रहकर, विधि-विधान जानकर, परखकर और देखकर कि वे आपके साथ कितनी दूर चल सकते हैं, या आप उनके अनुकूल हैं और वे आपके अनुकूल हैं — यह सब देखकर, तब करें।
क्या बिना प्राण प्रतिष्ठा के धातु की मूर्ति घर में रखी जा सकती है?
दो मत, और व्यावहारिक नियम — ठोस, खोखली नहीं
वक्ता कहते हैं कि हरीश कुमार जी, दो तरह के मत मिलते हैं: कुछ जगह कहा जाता है कि यदि आप प्राण प्रतिष्ठा न करके उसे घर में रखें, तो पूरा फल नहीं मिलेगा, इसलिए प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए। आज के लोकाचार नियमों में, देश, काल और परिस्थिति के अनुसार, वे केवल इतना कहेंगे: मूर्ति धातु की रखें, और ठोस रखें। खोखली मूर्ति न रखें।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या बिना प्राण प्रतिष्ठा के धातु की मूर्ति घर में रखी जा सकती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि हरीश कुमार जी, दो तरह के मत मिलते हैं। कुछ जगह कहा जाता है कि यदि आप प्राण प्रतिष्ठा न करके उसे घर में रखें, तो पूरा फल नहीं मिलेगा; इसलिए प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए। अभी जो लोकाचार नियम हैं, देश, काल और परिस्थिति के अनुसार जो चल रहा है, उसमें हम केवल इतना कहेंगे: देखिए, मूर्ति धातु की रखें, ठोस रखें। खोखली मूर्ति न रखें।
यदि प्राण प्रतिष्ठा करवाई जाए, तो किस प्रकार की होनी चाहिए?
चल प्रतिष्ठा, अचल नहीं — और मूर्ति घर लाने पर अभिषेक
वक्ता कहते हैं कि यदि आप प्राण प्रतिष्ठा करवाना चाहें, तो बहुत अच्छा — चल प्रतिष्ठा करवाएँ, अचल नहीं; यानी घर में वही करवाना चाहिए जिससे आप उसे कहीं और भी ले जा सकें। और यदि आप प्रतिष्ठा न भी करवाएँ, तो जब भी मूर्ति घर लाई जाए, यदि आप पंचामृत आदि से उसका अभिषेक करें और उसके बाद, चाहें तो, एक सौ आठ नामों से या एक हज़ार आठ नामों से दूध से अभिषेक करें, तो यह अति उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि यदि आप प्राण प्रतिष्ठा करवाना चाहते हैं, तो बहुत अच्छा है — चल प्रतिष्ठा करवाएँ, चल प्रतिष्ठा करवाएँ, अचल न करवाएँ। यानी जिसे आप कहीं और भी ले जा सकें — घर में वही करवाना चाहिए। दूसरी बात यह है कि यदि आप प्रतिष्ठा न भी करवाएँ, तो जब भी मूर्ति घर लाई जाए, तो पंचामृत आदि से उनका अभिषेक, और उसके बाद, यदि आप चाहें, तो उनके अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। से या एक हज़ार आठ नामों से दूध से अभिषेक — यदि आप करें, तो यह अति उत्तम है।
घर पर मूर्ति में भगवती का आवाहन किन मंत्रों से करना चाहिए?
वही मंत्र जिनसे सप्तशती में देवताओं ने उनका आवाहन किया
वक्ता कहते हैं कि भगवती की किसी भी मूर्ति के लिए: देखिए, सप्तशती में देवताओं ने जब भी भगवती का आवाहन किया है, जिन मंत्रों से किया है — आपको भी उन्हीं मंत्रों से आवाहन करना है। जैसे उन्होंने तंत्रोक्त देवी सूक्त पढ़ा, जैसे ग्यारहवें अध्याय में उनकी स्तुति हुई, जैसे चौथे अध्याय में उनकी स्तुति हुई; तंत्रोक्त रात्रि सूक्त से स्वयं ब्रह्मा जी ने उनका आवाहन किया।
वक्ता कहते हैं कि यदि भगवती की कोई मूर्ति है, तो आप — देखिए, दुर्गा सप्तशती में देवताओं ने जिन मंत्रों से भगवती का आवाहन किया है, जब भी किया है — जब देवताओं ने आवाहन किया, उन मंत्रों से आपको भी आवाहन करना है। वहाँ देवताओं ने किन मंत्रों से भगवती का आवाहन किया: जैसे उन्होंने तांत्रोक्त देवीसूक्तम् पढ़ा, जैसे ग्यारहवें अध्याय में उनकी स्तुति की गई; चौथे अध्याय में उनकी स्तुति की गई; तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम् से स्वयं ब्रह्मा जी ने उनका आवाहन किया।
शास्त्र क्या कहता है
After the demon king is slain, the gods led by Agni praise Kātyāyanī and beg her to be kind and protect the universe.
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देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम् । कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद् विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः ॥ २ ॥
जब देवी ने वहाँ उस महादैत्यराज को मार दिया, तब इन्द्र सहित देवता अग्नि को आगे करके कात्यायनी की स्तुति करने लगे। उनकी मनचाही बात पूरी हो गई थी। उनके मुख कमल जैसे खिल उठे और उनसे सब दिशाएँ चमक उठीं।
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य । प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥ ३ ॥
हे देवी, तुम शरण में आए लोगों का दुःख हरती हो। प्रसन्न होओ। सारे जगत् की माता, प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरी, प्रसन्न होओ और विश्व की रक्षा करो। देवी, तुम चर और अचर सबकी स्वामिनी हो।
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After Mahiṣa is slain, Indra and the gods bow and praise the Goddess, whose form is the gathered power of all the gods.
Using these praises to install a mūrti at home is the speaker's prescription.
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शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या । तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्गमचारुदेहाः ॥ २ ॥
जब देवी ने उस अत्यन्त पराक्रमी दुरात्मा महिषासुर और उसकी दैत्य-सेना को मार दिया, तब इन्द्र आदि देवताओं ने गर्दन और कन्धे झुकाकर प्रणाम किया। हर्ष से उनके शरीर रोमांचित हो उठे, और वे इन वचनों से देवी की स्तुति करने लगे।
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या । तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ॥ ३ ॥
जिन देवी ने अपनी शक्ति से यह सारा जगत् व्याप्त कर रखा है, सब देवताओं की शक्ति का समूह ही जिनका रूप है, जिन्हें सब देवता और महर्षि पूजते हैं, उन अम्बिका को हम भक्ति से प्रणाम करते हैं। वे हमारा कल्याण करें।
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अक्षत लेकर संकल्प करें, एक, ग्यारह या सत्ताईस पाठ करें, फिर उसे मूर्ति पर छोड़ दें
अक्षत से संकल्प, एक या ग्यारह या सत्ताईस पाठ, फिर मूर्ति पर छोड़ना
वक्ता कहते हैं कि जब आप उन्हीं मंत्रों को इस संकल्प के साथ पढ़ें कि हे भगवती, इस स्वरूप में, इस धातु की मूर्ति में स्थापित होइए — यह कहकर और हाथ में अक्षत आदि लेकर संकल्प करें। फिर उसका पूरा पाठ करते हुए, चाहें तो एक बार पढ़ें, या ग्यारह पाठ करें, या सत्ताईस पाठ करें, और उसे मूर्ति पर छोड़ दें। इतना भी करें तो आपके लिए पर्याप्त है। वे कहते हैं कि किसी दिन वे इस विधि को और अच्छे से बनाकर दिखाएँगे, ताकि लोग घर पर स्वयं कर सकें, बिना कोई दोष लगे और बिना मंत्र उच्चारण पर कोई प्रश्न उठे।
वक्ता कहते हैं कि तो जब आप उन्हीं मंत्रों को इस संकल्प के साथ पढ़ेंगे — कि हे भगवती, इस स्वरूप में, इस धातु की मूर्ति में स्थापित होइए — यह कहकर और हाथ में अक्षत आदि लेकर संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करें। और उसका पूरा पाठ करते हुए — चाहें तो एक बार पढ़ें, या इच्छा हो तो ग्यारह पाठ करें, सत्ताईस पाठ करें — और उसे मूर्ति पर छोड़ दें। इतना भी करें तो आपके लिए पर्याप्त है। इस विधि से आप कर सकते हैं। इस विधि को हम किसी दिन और अच्छे से बनाकर दिखाएँगे, ताकि आप लोग इस विधान से घर पर स्वयं कर सकें: इसमें किसी तरह का दोष नहीं लगेगा, न मंत्रों के उच्चारण को लेकर कोई कारण उठेगा, और आप आराम से कर सकें।
अथर्वशीर्ष वेद से जुड़ा है, इसलिए पहले उसका उच्चारण सीखना होगा
यह वेद से जुड़ा है, इसलिए उच्चारण सीखना होगा
वक्ता कहते हैं कि अथर्वशीर्ष वेद से जुड़ा है, इसलिए यदि आप स्वयं करना चाहें, तो आपको थोड़ा उच्चारण सीखना होगा।
एक श्रोता पूछते हैं कि देवताओं की मूर्ति के लिए अथर्वशीर्ष का पाठ। वक्ता कहते हैं कि तो अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है।, क्योंकि वेद से जुड़ा है, इसके लिए आप लोगों को थोड़ा उच्चारण सीखना होगा — यदि आप स्वयं करना चाहें।
सपने में काली ने एक श्रोता को चंदन तिलक और चावल के साथ बिल्वपत्र चढ़ाने को कहा — क्या कोई तांत्रिक उन्हें भ्रमित कर रहा है?
काली की चौकी, और बिल्वपत्र की सलाह नकारात्मक क्यों नहीं
अर्जुन जी लिखते हैं कि सपने में काली ने उनसे कहा कि यदि वे तीन बिल्वपत्र पर चंदन का तिलक करके चावल चढ़ाएँ, तो उन्हें काली की चौकी से मुक्ति मिलेगी, और पूछते हैं कि क्या कोई तांत्रिक उन्हें भ्रमित कर रहा है। वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि वे अभिचार की बात कर रहे हैं — कि काली की चौकी चलाई गई है — तो वह क्या है, इस पर चैनल पर एक अलग वीडियो है; उसे देखें तो समझ आ जाएगा।
एक श्रोता लिखते हैं कि गुरुदेव, सपने में काली ने मुझसे कहा कि यदि मैं बिल्वपत्र के तीन पत्तों पर चंदन का तिलक करके चावल चढ़ाऊँ, तो मुझे काली की चौकी से मुक्ति मिलेगी; अब मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ — क्या कोई तांत्रिक मुझे भ्रमित कर रहा है। वक्ता उत्तर देते हैं कि अर्जुन जी, यदि आप अभिचार आदि के संदर्भ में बात कर रहे हैं — कि काली की चौकी चलाई गई है — तो वह क्या है, कृपया चैनल पर एक अलग वीडियो एक बार देखें, आपको समझ आ जाएगा।
भगवती बिल्वपत्र से संतुष्ट होती हैं, और उससे उग्र चीज़ भी शांत हो जाती है
भगवती बिल्वपत्र से संतुष्ट होती हैं, और उग्र चीज़ भी शांत होगी
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात, बिल्वपत्र चढ़ाने के बारे में जो कहा गया — इसमें उन्हें किसी तरह का नकारात्मक विषय नहीं दिखता। कारण यह है कि भगवती बिल्वपत्र से संतुष्ट और प्रसन्न होती हैं, और यदि चीज़ नकारात्मक होती, या सच में कोई उग्र चीज़ उस तरह हुई होती, तो वह भी शांत हो जाती। इसलिए आप भगवती के नाम से यह कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात, बिल्वपत्र चढ़ाने के बारे में जो बात कही गई है — इसमें उन्हें किसी भी तरह का नकारात्मक विषय नहीं दिखता। कारण यह है कि भगवती बिल्वपत्र से संतुष्ट और प्रसन्न होती हैं; और यदि वह नकारात्मक चीज़ भी होती, या सच में कोई उग्र चीज़ उस तरह हुई होती, तो वह भी शांत हो जाती। इसलिए आप यह बात भगवती के नाम से कर सकते हैं।
अनुष्ठान के बीच यात्रा करनी पड़े, तो क्या वहाँ जप किया जा सकता है?
इसे करने के दो तरीके, और शास्त्र वास्तव में क्या कहता है
वक्ता कहते हैं कि सच यह है कि आज की स्थिति में अनुष्ठान दो तरह से किया जा सकता है — हालाँकि यह शास्त्रोक्त नहीं है। पहली, शास्त्रोक्त बात यह है कि आप एक ही स्थान पर रहकर अनुष्ठान करेंगे; अनुष्ठान का सही विधि-विधान यही है। पर आज के समय में, क्योंकि नौकरी ऐसी है और लोगों को एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ता है, संकल्प उसी तरह लें: संकल्प लेते समय ही जिस देवी या देवता के लिए कर रहे हैं उनसे साफ कह दें कि हम जहाँ भी रहें, मंत्र की इतनी माला करते रहेंगे और इतने दिनों में पूरा करना है — और वह मान्य हो जाएगा।
एक श्रोता पूछते हैं कि जय माँ विंध्यवासिनी — यदि किसी अनुष्ठान के संकल्प के बाद काम से यात्रा पर जाना पड़े, तो क्या वहाँ जप किया जा सकता है, या लौटकर करना चाहिए; कृपया मार्गदर्शन करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, सच बस यही है: आज जैसी स्थिति है, अनुष्ठान हमेशा दो तरह से किया जा सकता है। यह शास्त्रोक्त नहीं है। एक यह कि पहली बात, शास्त्रोक्त बात, यह है कि आप एक ही स्थान पर रहकर अनुष्ठान करेंगे; अनुष्ठान का सही विधि-विधान यही है। पर आज के समय में, क्योंकि नौकरी ऐसी है कि लोगों को एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ता है, या कोई ऐसी स्थिति है — तो संकल्प ही उस तरह लें। जिस समय आप संकल्प ले रहे हैं, उसी समय जिस देवी या देवता के लिए कर रहे हैं उनसे साफ कह दें: हम जहाँ भी रहें, मंत्र की इतनी माला करते रहेंगे, और इतने दिनों में इसे पूरा करना है, हम किसी भी स्थान पर हों। तब वह मान्य हो जाएगा।
अनुष्ठान कब खंडित होता है, और यात्रा में उसे क्या बचाता है?
हो सके तो एक माला, नहीं तो रोज़ कम से कम पाँच या ग्यारह बार
वक्ता कहते हैं कि जब करना हो तब यदि आप छोड़ दें, तो अनुष्ठान खंडित माना जाएगा। पर इसके लिए एक बात और बताई गई है: मान लीजिए आप रोज़ ग्यारह माला जप कर रहे थे और यात्रा पर गए हैं — तो वहाँ स्नान के बाद, किसी पवित्र स्थान पर बैठकर, हो सके तो एक माला, और न हो सके तो कम से कम पाँच बार, या ग्यारह बार, उसी मंत्र का जप ठीक से करते रहें। यदि यात्रा की पूरी अवधि में लौटने तक रोज़ यह संभव हो, तो अनुष्ठान खंडित भी नहीं माना जाता।
वक्ता कहते हैं कि अब जब करना हो तब यदि आप छोड़ देंगे, तो अनुष्ठान खण्डित माना जाएगा। पर उसके लिए एक बात और बताई गई है: मान लीजिए आप रोज़ ग्यारह माला जप कर रहे थे और यात्रा आदि पर गए हैं। तो वहाँ नहा-धोकर, किसी पवित्र स्थान पर बैठकर, हो सके तो एक माला; न हो सके, तो कम से कम पाँच बार, ग्यारह बार, उसी मंत्र का जप अच्छे से करते रहें। यात्रा की पूरी अवधि में, जब तक आप लौट नहीं रहे, रोज़ — यदि यह संभव हो, तो अनुष्ठान भी खंडित नहीं माना जाता।
यह छूट बहुत ऊँचे स्तर के साधकों के लिए है; गृहस्थ को सात्विकता रखनी चाहिए
ऊँचे स्तर के साधक — और गृहस्थ को जो सात्विकता रखनी है
वक्ता के अनुसार यह उन साधकों के लिए है जो बहुत ऊँचे स्तर के हैं। बाकी सामान्य लोगों का मानसिक स्तर ऐसा नहीं होता कि एक झटके में ग्यारह माला से ग्यारह बार पर आ जाएँ और वैसी अवस्था बन जाए। जब आप बाहर जाते हैं, तो खान-पान की शुद्धता प्रभावित होगी। यदि आप अनुष्ठान करें, तो गृहस्थों को केवल सात्विकता के साथ करना चाहिए — मांस-मछली खाकर नहीं करेंगे। बाहर जाते समय जहाँ तक संभव हो इसे निभाएँ, यदि वहाँ वैसा खान-पान मिल सके।
वक्ता कहते हैं कि हालाँकि उनके अनुसार यह उन साधकों के लिए है जो बहुत ऊँचे स्तर के हैं। बाकी सामान्य लोगों का मानसिक स्तर ऐसा नहीं होता कि एक झटके में आप ग्यारह माला से ग्यारह बार पर आ जाएँ और वैसी अवस्था बन सके। जब आप बाहर जाते हैं, तो खान-पान की शुद्धता प्रभावित होगी। अनुष्ठान यदि आप करते हैं, तो गृहस्थों को केवल सात्विकता के साथ करना चाहिए। मांस-मछली खाकर आप नहीं करेंगे। अब बाहर जाने पर, जहाँ तक संभव हो इसे निभाएँ — यदि उस स्थान पर वैसा खान-पान मिल सके।
जब बाहर खाने-पीने वाले मेहमान घर आते हैं तो क्या जप की ऊर्जा घटती है?
ऐसे व्यक्ति को पूजन स्थान से बाहर रखें
एक श्रोता पूछते हैं: हम शुद्ध सात्विक भोजन करते हैं, पर जब दूसरे लोग हमारे घर आते हैं, तो क्या हमारी पूजा और जप की ऊर्जा घटती है या नहीं — यानी यदि खाने-पीने वाले लोग आपके घर आएँ। वक्ता कहते हैं कि देखिए, यदि बाहर से कोई व्यक्ति खा-पीकर आए, या आपका कोई रिश्तेदार खा-पीकर आए, तो ध्यान रखें कि वह व्यक्ति आपके पूजन स्थान में न जाए।
एक श्रोता पूछते हैं कि हम शुद्ध सात्विक भोजन करते हैं, पर जब दूसरे लोग हमारे घर आते हैं, तो क्या हमारी पूजा और जप की ऊर्जा कम होती है या नहीं — यानी यदि खाने-पीने वाले लोग आपके घर आएँ। वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, यदि कोई व्यक्ति बाहर से खा-पीकर आता है, या आपका कोई रिश्तेदार खा-पीकर आता है, तो ध्यान में रखें कि वह व्यक्ति आपके पूजन स्थान में न जाए।
मेहमान को खुश करने के लिए क्या नहीं करना चाहिए, और मेहमान को क्या करना चाहिए?
दामाद के लिए मांस-मछली नहीं, और मेहमान का अपना नियम
वक्ता कहते हैं कि जब वह उस घर में स्नान करके शुद्ध रूप में रहे — पर उसे खुश करने के लिए, यह कहकर कि दामाद आए हैं, उसे छप्पन प्रकार का मांस-मछली परोसना, यह किसी के लिए भी नहीं करना चाहिए, चाहे वह कितना भी प्रिय हो। और जो भी किसी के घर मेहमान बनकर जाए, उसका भी यह नियम होना चाहिए, जो शास्त्र के अनुसार है: जिस घर में हम जा रहे हैं वहाँ सात्विकता की जो परंपरा है, हमें उसी के अनुसार रहना चाहिए; जैसा दिया जाए वैसा खाना है, और जब भी वहाँ पूजन-पाठ हो, हमें भी हाथ जोड़कर देवताओं को प्रणाम करना है।
वक्ता कहते हैं कि जब वह उस घर में नहा-धोकर, शुद्ध रूप में रहे — पर उसे खुश करने के लिए, कि भाई, दामाद आए हैं, इसलिए उन्हें छप्पन प्रकार का मांस-मछली खिलाया: यह किसी के लिए भी नहीं करना चाहिए। चाहे वह आपका कितना भी प्रिय हो। और जो भी किसी के घर मेहमान बनकर जाता है — उसका नियम भी यह होना चाहिए, जो शास्त्र के अनुसार है: कि जिस भी घर में हम जा रहे हैं, वहाँ जो भी परंपरा है, सात्विकता के ढंग से, हमें उसी के अनुसार रहना चाहिए। जैसा हमें खाने को दिया जाए वैसा खाना है; और जब भी वहाँ पूजन-पाठ आदि हो, उस समय हमें भी हाथ जोड़कर देवताओं को प्रणाम करना है।
स्पर्श दोष क्या है, और यह जप की ऊर्जा को कैसे प्रभावित करता है?
स्पर्श दोष हो तो थोड़ा असर — इसलिए स्पर्श से बचें
वक्ता कहते हैं कि उससे, यदि स्पर्श आदि का दोष हो, तो आपकी जप ऊर्जा आदि कुछ उस हालत में होगी। बस ध्यान रखें कि स्पर्श आदि का दोष न लगे। स्पर्श का अर्थ है: अभी आपका अनुष्ठान चल रहा है, और उस समय आपका कोई रिश्तेदार आया है, वह पीकर आया है, मांस-मछली आदि खाकर आया है, और यदि वह आपको प्रणाम करने वाला है — इसी के लिए कहा गया है कि अनुष्ठान में कभी किसी से प्रणाम न करवाएँ, न आशीर्वाद दें।
वक्ता कहते हैं कि और उससे आपकी जप ऊर्जा आदि का कम होना — यदि स्पर्श आदि का दोष हो, तो थोड़ी यह स्थिति होगी। बस यह ध्यान रखें कि स्पर्श आदि का दोष न लगे। स्पर्श का अर्थ यह है: कि अभी आपका अनुष्ठान चल रहा है; उस समय आपका कोई रिश्तेदार आया, वह पीकर आया है, अब वह कुछ मांस-मछली आदि खाकर आया है, और यदि वह आपको प्रणाम करने वाला है — इसी के लिए कहा गया है कि अनुष्ठान में आपको कभी किसी से प्रणाम नहीं करवाना चाहिए, न आशीर्वाद देना चाहिए।
अच्छे से मना करें — बल्कि कहें कि आप ही उन्हें प्रणाम करते हैं
अच्छे से मना करें — कहें कि मैं ही आपको प्रणाम करता हूँ
वक्ता कहते हैं कि आपको बोलना भी नहीं है; उन्हें मना करें, और अच्छे से मना करें — नहीं, नहीं, बाबू, प्रणाम मत करो; आप भी प्रणाम करें, यह कहते हुए कि मैं ही आपको प्रणाम करता हूँ।
वक्ता कहते हैं कि आपको बोलना भी नहीं है; उन्हें मना करें, और अच्छे से मना करें। कि नहीं, नहीं, बाबू, प्रणाम मत करो। आप भी प्रणाम करें, यह कहते हुए कि मैं ही आपको प्रणाम करता हूँ।
विस्तृत परिवार में मृत्यु हुई है — क्या घर की पूजा रुकनी चाहिए?
सूतक-पातक के नियम का पालन करें
मोटिवेशन विद भक्ति जी लिखती हैं कि उनकी दादी के देवर का निधन हो गया है, इसलिए घर में पूजा-पाठ बंद है, और उन्होंने सूर्य देव को जल देने का नियम बनाया था पर घर के लोग मना कर रहे हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि सूतक-पातक का जो नियम है उसका पालन करें; आपके घर में सूतक-पातक का नियम चलना चाहिए।
एक श्रोता लिखती हैं कि मेरी दादी के देवर का निधन हो गया है, इसलिए घर में पूजा-पाठ बंद है; मैंने सूर्य देव को जल देने का नियम बनाया था, और घर के लोग मना कर रहे हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि मोटिवेशन विद भक्ति जी, जो सूतक-पातक का नियम है, उसका पालन करें। आपके घर में सूतक-पातक का नियम चलना चाहिए।
क्या सूतक में सूर्य देव को अर्घ्य देना रोकना चाहिए?
वे सही हैं — और मानसिक प्रणाम जो बचा रहता है
वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि आपको सूर्य देव को जल देने से मना किया जा रहा है, तो वे सही कह रहे हैं। आप गायत्री से जल देंगी — तो अब कहाँ से जल देंगी, या किस मंत्र से जल देंगी? और पितरों के लिए भी: यदि आपके घर-परिवार के लोग कहें कि अब पितरों को भी जल नहीं दिया जा सकता, तो आपको बिल्कुल नहीं देना चाहिए। सूर्य देव को रोज़ मानसिक रूप से प्रणाम करें।
वक्ता कहते हैं कि आपके घर में सूतक-पातक का नियम ही चलना चाहिए। यदि आपको सूर्य देव को जल देने से मना किया जा रहा है, तो वे सही कह रहे हैं। आप गायत्री मंत्र से जल देंगी न — तो अब कहाँ से जल देंगी, या किस मंत्र से जल देंगी? अब पितरों के लिए — यदि यह भी, आपके अनुसार: यदि आपके घर-परिवार के लोग कहें कि अब पितरों को भी जल नहीं दिया जा सकता, तो आपको नहीं देना चाहिए। सूर्य देव को रोज़ मानसिक रूप से प्रणाम करें।
महाविद्या क्रम पाठ में क्या उत्कीलन और शाप उद्धार ज़रूरी हैं?
केवल पहले दिन, और इस क्रम में ज़रूरी नहीं
नवीन कुमार जी को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि उन्होंने इसे एक लाइव वीडियो में विस्तार से समझाया है, और फिर से बताते हैं: जब भी हम महाविद्या क्रम में पाठ करते हैं, तो उत्कीलन और शाप उद्धार केवल पहले दिन करने हैं। क्योंकि हम पूरा पाठ एक दिन में नहीं कर रहे, इसलिए इसे रोज़ नहीं करना है। और ज़रूरी है या नहीं — महाविद्या क्रम में ज़रूरी नहीं, क्योंकि हम सप्तशती का जप पूरा नहीं कर रहे; हम अलग-अलग दिन अलग-अलग अध्यायों का पाठ कर रहे हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि महाविद्या क्रम पाठ में क्या उत्कीलन और शाप उद्धार ज़रूरी हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि नवीन कुमार जी, जो लाइव वीडियो किया गया था उसमें यह बात साफ बताई गई है, और विस्तार से बताई गई है। आज फिर से हम बताते हैं: जब भी हम महाविद्या क्रम में पाठ करते हैं, तो उत्कीलन और शाप उद्धार केवल पहले दिन करने हैं। क्योंकि हम पूरा पाठ एक दिन में नहीं कर रहे, इसलिए इसे रोज़ नहीं करना है। और ज़रूरी है या नहीं — महाविद्या क्रम में ज़रूरी नहीं। क्योंकि हम दुर्गा सप्तशती का जप पूरा नहीं कर रहे; हम उसका पाठ कर रहे हैं, अलग-अलग दिन अलग-अलग अध्यायों का।
शाप उद्धार विशेष रूप से कब ज़रूरी है?
एक बैठक में तेरह अध्याय — और विद्वानों के अलग-अलग मत
वक्ता कहते हैं कि जब हम सप्तशती के तेरह अध्यायों का जप एक दिन में, एक बैठक में, एक समय पर करते हैं, तब शाप उद्धार आदि की विशेष ज़रूरत होती है। यदि आप महाविद्या क्रम में कर रहे हैं, या केवल मध्यम अध्याय, मध्यम चरित्र पढ़ रहे हैं, तो शाप उद्धार आदि का कोई विशेष कारण नहीं रहता। पर इसमें विद्वानों के मत अलग हो सकते हैं, क्योंकि सप्तशती अपने आप में बहुत विस्तृत और अलग प्रकार का विषय है।
वक्ता कहते हैं कि जब हम सप्तशती के तेरह अध्यायों का जप एक दिन में, एक बैठक में, एक समय पर करते हैं, तब शाप उद्धार आदि की ज़रूरत विशेष रूप से होती है। यदि आप महाविद्या क्रम में कर रहे हैं, या केवल मध्यम अध्याय, मध्यम चरित्र पढ़ रहे हैं, तो उस समय शाप उद्धार आदि का कोई विशेष कारण नहीं रहता। पर इसमें विद्वानों के मत अलग हो सकते हैं, क्योंकि सप्तशती अपने आप में बहुत विस्तृत और अलग प्रकार का विषय हो जाती है। उनके अनुसार जब आप महाविद्या क्रम में करते हैं तो इसका कोई औचित्य नहीं रहता; पर इस कारण असर में कोई खालीपन नहीं आता।
कीलन तब लागू होता है जब पूरा पाठ एक साथ पूरा किया जाए
यह तब लागू होता है जब पूरा एक साथ किया जाए
वक्ता कहते हैं कि अब इसकी गहराई में मत जाइए — भाई, पर सप्तशती तो कीलित है, और ये सब बातें। यह तब है जब आप इसे सब एक साथ पूरा कर रहे हों। जब आप इसे इस क्रम में करते हैं — महाविद्या क्रम की सबसे बड़ी विशेषता यही है: इसे रोज़ इसी तरह करें ताकि आपको इसका पूरा फल मिले।
वक्ता कहते हैं कि अब आप इसमें, इसकी गहराई में जाएँगे — भाई, पर सप्तशती तो कीलित है, या ये सब बातें। यह तब है जब आप इसे सब एक साथ पूरा कर रहे हों। जब आप इसे इस क्रम में करते हैं — महाविद्या क्रम की सबसे बड़ी विशेषता यही बात है: कि आप इसे रोज़ इसी तरह करें, ताकि आपको इसका पूरा फल मिले।
बाईस साल का एक युवक, जिसके इष्ट शिव हैं, उनमें लीन होना चाहता है — उसे कौन-सी साधना दी जाती है?
पूरा शिव महापुराण घर लाएँ और रोज़ एक अध्याय पढ़ें
एक श्रोता कहते हैं कि वे बाईस साल के हैं, शिव जी उनके इष्ट हैं, वे केवल उन्हीं में लीन होना चाहते हैं, और साधना पूछते हैं। वक्ता इसे बहुत अच्छी बात कहते हैं कि इस उम्र में वे भगवान सदाशिव को समर्पित होना चाहते हैं, और पहला काम देते हैं: शिव महापुराण घर लाएँ — पूरा, संक्षिप्त नहीं — और रोज़ केवल एक अध्याय पढ़ें। यही सबसे पहला काम है।
एक श्रोता लिखते हैं कि मैं अभी बाईस साल का हूँ; शिव जी मेरे इष्ट हैं; मैं केवल उन्हीं में लीन होना चाहता हूँ; कोई साधना बताइए। वक्ता उत्तर देते हैं कि बहुत अच्छा, सूर्य पटेल जी — यह बहुत अच्छी बात है कि इस उम्र में आप भगवान सदाशिव को अपना समर्पण करना चाहते हैं। यदि आप विशेष विधि-विधान से भगवान शिव से जुड़ी साधना करना चाहते हैं, तो सबसे पहले यह एक काम करें। शिव पुराण, पूरा, संक्षिप्त नहीं। पूरा शिव महापुराण घर लाएँ। रोज़ केवल एक अध्याय पढ़ें। यही सबसे पहला काम है।
पूरा पढ़ने से पता चलता है कि कौन-सी संहिता कौन-सी कामना पूरी करती है
कौन-सी संहिता कौन-सी कामना पूरी करती है, यह जानना
वक्ता पूछते हैं कि पहले अध्याय से — जीवन में आप कितनी बार शिव महापुराण बार-बार पढ़ पाएँगे? उसी क्रम में आपको पता चलेगा कि शिव महापुराण में कितनी संहिताएँ दी गई हैं, और किस संहिता को पढ़ने से किन कामनाओं की पूर्ति होती है। उसी के अनुसार आपको फिर उन अध्यायों का रोज़ पाठ करते रहना चाहिए; वही आपके लिए सबसे अच्छा है।
वक्ता पूछते हैं कि पहले अध्याय से — जीवन में आप शिव महापुराण कितनी बार, बार-बार पढ़ पाएँगे। उसी क्रम में आपको पता चलेगा कि शिव महापुराण में कितनी संहिताएँ दी गई हैं। उनमें किस संहिता को पढ़ने से किन कामनाओं की क्या पूर्ति होती है। और उसी के अनुसार आपको फिर रोज़ उन अध्यायों का पाठ करते रहना चाहिए। वही आपके लिए सबसे अच्छा है।
दीक्षा मिलने पर गुरु से शिव मंत्र माँगें और पंचांग सेवन करें
गुरु से शिव मंत्र माँगें और पंचांग सेवन करें
वक्ता कहते हैं कि आगे, यदि आप दीक्षित हों, या जब आपको कोई योग्य गुरु मिलें और उनसे दीक्षा मिले, तो उनसे प्रार्थना करें कि वे आपको शिव जी से जुड़ा मंत्र प्रदान करें, और उसका बार-बार प्रवचन और अनुष्ठान करते हुए, पंचांग सेवन करते हुए जीवन में आगे बढ़ें। अभी के लिए, शिव महापुराण का अनुष्ठान अच्छे से करें।
वक्ता कहते हैं कि आगे, यदि आप दीक्षित हों, या जब आपको कोई योग्य गुरु मिलें और उनसे दीक्षा मिले, तो उनसे प्रार्थना करें कि वे आपको शिव जी से ही जुड़ा मंत्र प्रदान करें। और उसका बार-बार प्रवचन और अनुष्ठान करते हुए, पंचांग सेवन करते हुए, जीवन में आगे बढ़ें। अभी के लिए, शिव महापुराण का अनुष्ठान अच्छे से करें।
क्या अविवाहित व्यक्ति तारा दीक्षा ले सकता है, और क्या अविवाहित तारापीठ जा सकते हैं?
तारापीठ के लिए हाँ — और तारा की उपासना वास्तव में क्या है
एक श्रोता पूछते हैं कि अविवाहित होकर क्या वे तारा दीक्षा ले सकते हैं, क्या काली ही माता तारा हैं, और क्या अविवाहित तारापीठ जा सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि आप क्यों नहीं जा सकते — अवश्य जाइए। और अविवाहित होने की बात, तो कल आप विवाह करेंगे। फिर वे साफ कहते हैं कि भगवती तारा का पूजन पूरी तरह तंत्रोक्त विधि-विधान से होता है, उनकी पूजा वामाचार पद्धति से होती है, और उन्हें वेद से ऊपर कहा गया है।
एक श्रोता पूछते हैं कि जय माँ विंध्यवासिनी — हम अविवाहित हैं; क्या हम तारा की दीक्षा ले सकते हैं; क्या काली ही माता तारा हैं; क्या अविवाहित तारापीठ जा सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि आप क्यों नहीं जा सकते। अवश्य जाइए। और आपके अविवाहित होने की बात — कल आप विवाह करेंगे न। और एक बात हम साफ बताते हैं: भगवती तारा का पूजन पूरी तरह तंत्रोक्त विधि-विधान से होता है। उनकी पूजा वामाचार पद्धति से होती है। उनके बारे में कहा गया है कि वे वेद से ऊपर हैं।
जब वशिष्ठ ने वैदिक मार्ग से उन्हें सिद्ध करने का प्रयास किया तो क्या हुआ?
सिद्धि बिल्कुल नहीं हुई — फिर कामरूप कामाख्या और चीन
वक्ता कहते हैं कि जब महर्षि वशिष्ठ ने वैदिक मार्ग से उन्हें सिद्ध करने का प्रयास किया, तो वह सिद्धि हुई ही नहीं। फिर वे भी कामरूप कामाख्या के क्षेत्र में गए, और उसके बाद चीन में स्थित तारा पीठ में — जो आज की स्थिति में चीन में, तिब्बत में चला गया है। इसलिए यह पूरी तरह तंत्र विद्या है; इसमें सोच-समझकर दीक्षित हों।
वक्ता कहते हैं कि सही — जब वैदिक मार्ग से महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें सिद्ध करने का प्रयास किया था, तो उन्हें वह सिद्धि हुई ही नहीं। फिर वे भी कामरूप कामाख्या के क्षेत्र में गए, और उसके बाद चीन में जो तारा पीठ है वहाँ; आज की स्थिति में वह क्षेत्र चीन में, तिब्बत में चला गया है। तो यह पूरी तरह तंत्र विद्या है। इसमें सोच-समझकर दीक्षित हों।
क्या बंगाली लोग करते हैं, इसलिए यह आप पर भी लागू होता है?
नियम व्यक्ति के अपने क्षेत्र के अनुसार लागू होते हैं
वक्ता कहते हैं कि आपको आगे विवाह करना है, इसलिए अभी यह मत भूलिए कि बंगाल के लोग ऐसा करते हैं। वे बार-बार कहते हैं कि क्षेत्र के अनुसार, उस क्षेत्र के लोगों पर नियम उसी हिसाब से लागू होते हैं। यदि आप वहाँ के नहीं हैं, तो बात अलग हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि आगे आपको विवाह आदि करना है, इसलिए अभी यह मत भूलिए कि बंगाल के लोग ऐसा करते हैं। वे बार-बार कहते हैं: क्षेत्र के अनुसार, जो लोग उस क्षेत्र के हैं, उन पर नियम उसी हिसाब से लागू होता है। यदि आप वहाँ के नहीं हैं, तो बात अलग हो जाती है।
साधना किस क्रम में शुरू करनी चाहिए?
गुरु, गणपति, भैरव, फिर मुख्य साधना — कुल देवताओं के साथ
वक्ता कहते हैं कि साधना की शुरुआत गुरु साधना से करनी चाहिए। फिर गणपति, फिर भैरव जी, फिर मुख्य साधना। और इनके बीच में अपने कुल के देवी-देवता हैं, जो सबसे विशिष्ट हैं। फिर कुंडली के पाँचवें और नौवें भाव की और लग्नेश की साधना भी। आप गुरु साधना से शुरुआत कर सकते हैं।
नया घर बना है पर हवन और गृह प्रवेश नहीं हुआ — कीलन और रक्षा कैसे करें?
किसी सक्षम साधक से करवाएँ, या स्वयं अर्गला अनुष्ठान करें
वक्ता कहते हैं कि सुमंत शर्मा जी, यदि आप किसी सक्षम साधक से अपने घर का कीलन करवाएँ तो अति उत्तम है। यदि स्वयं करना चाहें, तो जहाँ अभी रहते हैं वहाँ आपको बताए गए अर्गला के विधान का अनुष्ठान करें, और — जो विधान बताया गया है कि त्रिशूल आदि को कैसे अभिमंत्रित करें — उस विधान से अभिमंत्रण करके आप अपने घर का कीलन कर सकते हैं।
एक श्रोता लिखते हैं कि हमारा नया घर बना है; हवन और गृह प्रवेश अभी नहीं हुआ है; कृपया कीलन और रक्षा के बारे में बताइए। वक्ता उत्तर देते हैं कि सुमंत शर्मा जी, यदि आप किसी सक्षम साधक से अपने घर का उत्कीलन करवाएँ, तो अति उत्तम है। यदि आप स्वयं करना चाहें, तो जहाँ अभी रहते हैं वहीं, आपको बताए गए अर्गला स्तोत्र के विधान का अनुष्ठान करते हुए — जो विधान बताया गया है, कि त्रिशूल आदि को कैसे अभिमंत्रित करें — उस विधान से अभिमंत्रण करके, आप अपने घर का कीलन कर सकते हैं।
क्या केवल सामान्य भक्ति से भगवती की कृपा मिल सकती है?
हाँ — पर सामान्य बन पाने की क्षमता ही चाहिए
वक्ता कहते हैं कि अवश्य मिल सकती है — पर सामान्य भक्ति के लिए भी आपके भीतर सामान्य बनने की उतनी क्षमता होनी चाहिए। आजकल किसी में सामान्य बनने की क्षमता नहीं है। यहाँ एक सौ एक लोग मुझे सुन रहे हैं; उन एक सौ एक में शायद दस ऐसे हों जो मेरी कुछ बातें सुनकर कहें: ये बहुत ज्ञान दे रहे हैं। जब आप भगवती के पास जाकर, स्वयं को समर्पित करके, सामान्य बनकर, सरल बनकर उनकी सेवा-पूजा करते हैं और कभी अपने पर गर्व नहीं करते, तब भगवती उस तरह प्रसन्न होती हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या केवल सामान्य भक्ति से देवी माँ भगवती की कृपा मिल सकती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि अवश्य मिल सकती है — पर सामान्य भक्ति के लिए भी आपके भीतर सामान्य बनने की उतनी क्षमता होनी चाहिए। आजकल सामान्य बनने की क्षमता किसी में नहीं है। यहीं हम बोल रहे हैं, एक सौ एक लोग मुझे सुन रहे हैं। उनमें, एक सौ एक में से, शायद दस ऐसे लोग हों जो मेरी कुछ बातें सुनकर कह रहे होंगे: ये बहुत ज्ञान दे रहे हैं। बात यही है। तो जब आप भगवती के पास जाते हैं, जब स्वयं को समर्पित करके, सामान्य बनकर, सरल बनकर, उनकी सेवा-पूजा करते हैं और कभी अपने पर गर्व नहीं करते, तब भगवती उस तरह प्रसन्न होती हैं।
बच्चे के रोते ही माँ सब कुछ छोड़ देती है
वह माँ जो बच्चे के रोने पर सब छोड़ देती है
वक्ता कहते हैं कि किसी ऐसी स्त्री को देखिए जो अभी-अभी माँ बनी है — उसका एक-दो साल का बच्चा है। यदि उसका बच्चा दूसरी जगह है और वह रसोई आदि में काम कर रही है, तो बच्चे के रोते ही वह सारा काम छोड़कर दौड़ती है। कहाँ उसका आटा गिरा, कहाँ बेलन गिरा, कहाँ चौकी गिरी — वह नहीं देखती। चीज़ें तोड़ते-गिराते, सब छोड़कर वह अपने बच्चे के पास दौड़ेगी। उस स्तर की भक्ति तभी आती है जब आप अपने आराध्य से जुड़े ग्रंथ पढ़ते हैं और उनकी महिमा जानते हैं।
वक्ता कहते हैं कि उदाहरण के लिए, मुझे नहीं पता एस के सिंह जी, आपकी उम्र क्या है या क्या। पर किसी ऐसे व्यक्ति को देखिए, किसी ऐसी स्त्री को देखिए जो अभी माँ बनी है। यदि उसका एक-दो साल का बच्चा है, तो यदि उसका बच्चा दूसरी जगह है और वह कहीं, रसोई आदि में काम कर रही है, तो बच्चे के रोते ही वह सारा काम छोड़कर दौड़ते हुए भागती है। कहाँ उसका आटा गिरा, कहाँ बेलन गिरा, कहाँ चौकी गिरी — वह यह नहीं देखती। चीज़ें तोड़ते-पटकते, सब छोड़कर, वे अपने बच्चे के पास दौड़ेंगी। तो बच्चे के भीतर उस तरह का भाव था, और तभी वह दौड़ते हुए गई। उस स्तर की भक्ति तभी आती है जब आप अपने आराध्य से जुड़े ग्रंथ पढ़ते हैं, जब आप उनकी महिमा जानते हैं।
अपने आराध्य के पुराण पढ़ें, और उनमें जो मिले उसे नकारने के बजाय पूछें
आराध्य के पुराण, और नकारने के बजाय पूछना
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए वे बार-बार कहते हैं: अपने आराध्य और इष्ट से जुड़े पुराण पढ़ें। नकारात्मक बातें छोड़ दें — कि भाषा टीका में ऐसी बात कही गई, और आपको लगता है कि हाँ, ऐसी बात क्यों है। यदि लगे कि आप इसका समाधान पा सकते हैं, तो एक बार उनसे पूछें, वे बताएँगे; यदि वे नहीं जानते, तो उनसे बड़े कई प्रसिद्ध विद्वान हैं, वे उनसे पूछकर वहाँ से बताएँगे। पर करें अवश्य।
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण मैं बार-बार कहता हूँ: जो आपके आराध्य और इष्ट हैं, उनसे जुड़े पुराण पढ़ें। नकारात्मक बातें छोड़ दें — कि भाषा टीका में ऐसी बात कही गई है, वह बात जो आपको लगती है: हाँ, इस तरह की बात क्यों है। यदि आपको लगे कि हाँ, मैं इसका समाधान पा सकता हूँ, तो एक बार उनसे पूछें, वे बताएँगे। वे कहते हैं कि यदि वे नहीं जानते, तो उनसे बड़े बहुत से लोग हैं जो प्रसिद्ध और विद्वान हैं; वे उनसे पूछेंगे, भाई, यह बात बताइए, और वहाँ से बताएँगे। पर करें अवश्य।
अघोर अमावस्या के दिन कौन-सी सावधानियाँ रखनी चाहिए?
तांत्रिकों के लिए अमावस्या एक अलग तरह का दिन
यह पूछे जाने पर कि अघोर अमावस्या के दिन कौन-सी सावधानियाँ रखें और किन तंत्र क्रियाओं से बचें, वक्ता इसे बहुत उचित प्रश्न कहते हैं, क्योंकि अमावस्या अपने आप में तांत्रिकों के लिए अलग तरह का दिन है। उस दिन बचने के बारे में वे कहते हैं कि सामान्यतः किसी भी अमावस्या तिथि के दिन, गृहस्थों के लिए —
एक श्रोता पूछती हैं कि संजना जी, प्रणाम। अघोर अमावस्या के दिन कौन-सी सावधानियाँ रखनी चाहिए; उस दिन किन तंत्र क्रियाओं से बचना चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, यह भी आपने बहुत उचित बात कही है। क्योंकि अमावस्या अपने आप में तांत्रिकों के लिए एक अलग तरह का दिन है। उस दिन बचने की बात — सामान्यतः किसी भी अमावस्या तिथि के दिन, गृहस्थों के लिए।
अमावस्या की सुबह क्या करना चाहिए, और उसके बाद कौन-सा हवन?
गीता का ग्यारहवाँ अध्याय, और अर्गला के पहले मंत्र से हवन
वक्ता कहते हैं कि यदि आप वैष्णव हैं, या भगवान नारायण में श्रद्धा रखते हैं — हालाँकि यहाँ परंपरा पंचदेव की है — तो उस दिन सुबह श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करना चाहिए; उसी से आपका दिन बन जाता है। उसके बाद, हो सके तो, उसी दिन सुबह या रात में, जब भी समय मिले, जब भी उचित हो, अर्गला के पहले मंत्र से हवन करना चाहिए। और वे कहते हैं कि यह हर अमावस्या पर करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप वैष्णव हैं, या यदि आप भगवान नारायण में श्रद्धा रखते हैं — हालाँकि यहाँ परंपरा पंचदेव की है — उस दिन ग्यारहवाँ अध्याय, श्रीमद् श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ सुबह करना चाहिए। एक तो, केवल उसी से आपका दिन बन जाता है। उसके बाद, यदि संभव हो, उसी दिन, सुबह या रात में, जब भी समय मिले, जब भी उचित हो, अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र से हवन करना चाहिए। तो अमावस्या के दिन इतना करें। यह हर अमावस्या पर करना चाहिए।
शास्त्र क्या कहता है
The mantra for the Amāvasyā havan is the first Argalā verse, saluting Jayantī, Maṅgalā, Kālī and the rest.
The verse is the text's; the rule of offering it in havan every Amāvasyā is not.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥
ॐ। जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा, तुम्हें नमस्कार है।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
विशेष रूप से अर्गला का पहला मंत्र ही क्यों जोड़ा जाता है?
दीक्षा की ज़रूरत नहीं, ग्यारह देवियाँ तृप्त, और स्वधा रूप में भगवती
वक्ता कहते हैं कि वे अर्गला का पहला मंत्र इसलिए जोड़ते हैं क्योंकि उसके लिए किसी तरह की दीक्षा की ज़रूरत नहीं। उसमें आपके घर के देवी-देवता, और जितनी भी शक्तियाँ हैं — ग्यारह देवियाँ जो मुख्य हैं — सब तृप्त होती हैं। और एक और लाभ है: उसमें भगवती स्वधा रूप में विराजमान हैं, जो पितरों की तृप्ति का कारण बनती हैं। इसलिए पितर भी तृप्त होंगे; जब आहुति पड़ेगी, तो भगवती स्वधा, स्वधा शक्ति, उन्हें भी तृप्त करेगी।
वक्ता कहते हैं कि मैं अर्गला का पहला मंत्र इस कारण जोड़ता हूँ: कि उसके लिए आपको किसी भी तरह की दीक्षा की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। और उसमें आपके घर के देवी-देवता, और जितनी भी शक्तियाँ हैं — ग्यारह देवियाँ जो मुख्य हैं — उन सबकी तृप्ति होती है। और उसके साथ एक और लाभ है: कि उसमें भगवती स्वधा के रूप में विराजमान हैं, जो पितृ की तृप्ति का कारण बनती हैं। तो पितर भी तृप्त होंगे। जब वह आहुति पड़ेगी, तो भगवती स्वधा, स्वधा शक्ति, उन्हें भी तृप्त करेगी।
शास्त्र क्या कहता है
The first Argalā verse salutes the Goddess by eleven names, the last of them Svadhā.
Tying Svadhā to the ancestors' satisfaction, and saying the verse needs no dīkṣā, are the speaker's own.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥
ॐ। जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा, तुम्हें नमस्कार है।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
जहाँ आत्महत्या के विचार आने लगें, स्थिति खतरनाक है — तुरंत मदद लें, खोजबीन न करें
बहुत खतरनाक स्थिति — खोजबीन नहीं, तुरंत मदद
डाकिनी से रक्षा का मंत्र पूछे जाने पर, जहाँ व्यक्ति परेशान है और बार-बार विचार आता है कि वह अपनी जान ले ले, वक्ता स्थिति को बहुत खतरनाक कहते हैं। वे मोटिवेशन विद भक्ति जी से कहते हैं कि इसमें स्वयं बहुत रिसर्च एंड डेवलपमेंट न करें — तुरंत किसी जानकार व्यक्ति से मदद लें। बताई गई मानसिक स्थिति को देखते हुए वे साफ और मनोवैज्ञानिक रूप से कहते हैं: यदि आपके मित्र की ऐसी इच्छा है और वे इस तरह पीड़ित हैं, तो सीधे किसी सही व्यक्ति के संपर्क में जाइए।
एक श्रोता लिखती हैं कि डाकिनी से रक्षा का कोई मंत्र बताइए; एक डाकिनी किसी को परेशान कर रही है, और बार-बार उसके मन में विचार आता है कि वह अपनी जान ले ले। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह बहुत खतरनाक स्थिति है। मोटिवेशन विद भक्ति जी, आप जो बता रही हैं — इसमें स्वयं बहुत रिसर्च एंड डेवलपमेंट न करें; तुरंत किसी जानकार व्यक्ति से मदद लें। आपने जो मानसिक स्थिति बताई है — मनोवैज्ञानिक रूप से, यदि आपके मित्र की ऐसी इच्छा है और वे उस तरह पीड़ित हैं, तो भाई, हम सीधे और बिल्कुल साफ कहेंगे: किसी सही व्यक्ति के संपर्क में जाइए।
पहले उतारा या निकारी करवाएँ, और साथ में क्षेत्रपाल पूजन
उतारा या निकारी, और क्षेत्रपाल पूजन
वक्ता कहते हैं कि पहले उनका उतारा या निकारी करवाएँ, और क्षेत्रपाल पूजन करवाएँ — क्षेत्रपाल यानी भगवान भैरव का क्षेत्रपाल स्वरूप, यक्ष स्वरूप, क्षेत्रपाल स्वरूप। जो जानकार हैं वे इसे करेंगे, और उस रूप में उनका बंधन करेंगे। तब स्थिति तुरंत नियंत्रण में आ जाएगी; नहीं तो कल बहुत परेशानी होगी।
वक्ता कहते हैं कि पहले उनका उतारा या निकारी करवाएँ; क्षेत्रपाल पूजन करवाएँ — और क्षेत्रपाल, जो भगवान भैरव का क्षेत्रपाल स्वरूप हैं। यक्ष स्वरूप, क्षेत्रपाल स्वरूप — जो जानकार व्यक्ति हैं वे इसे करेंगे; उस रूप में वे उनका बंधन करेंगे। यह स्थिति तुरंत नियंत्रण में आ जाएगी। कल बहुत बड़ी परेशानी होगी।
जब ऐसी चीज़ें शरीर पर हावी हो जाती हैं, तो मन काम नहीं करता और नियंत्रण शक्ति के हाथ चला जाता है
जब ये चीज़ें शरीर पर हावी हों, तो मन काम नहीं करता
वक्ता कहते हैं कि देखिए, जब ये सब चीज़ें जो होती हैं शरीर पर हावी हो जाती हैं, तो मन काम नहीं करता। जब विचारों पर इस तरह की शक्तियों का नियंत्रण हो जाता है, तो वे केवल गलत ही करवाएँगी।
वक्ता कहते हैं कि देखिए, ये सब चीज़ें जो होती हैं — जब ये शरीर पर हावी हो जाती हैं, तो मन काम नहीं करता। जब विचारों पर नियंत्रण आ जाता है, इस तरह की शक्तियों का नियंत्रण, तो वे केवल गलत ही करेंगी।
जहाँ कोई न मिले, वहाँ क्षेत्रपाल भैरव का तांडव स्तोत्र और वटुक भैरव के एक सौ आठ नाम
क्षेत्रपाल भैरव का तांडव स्तोत्र, और वटुक भैरव के एक सौ आठ नाम
वक्ता कहते हैं कि यदि आप स्वयं इस पर नियंत्रण पाना चाहते हैं और सच में कोई नहीं मिल रहा, तो क्षेत्रपाल भैरव का तांडव स्तोत्र — "यम यम यम यक्ष रूपम", यह पूरा स्तोत्र — इंटरनेट से पीडीएफ़ में डाउनलोड करें, इसे गाना सीखें, और उस व्यक्ति के सामने इसका पाठ करवाएँ, साथ में वटुक भैरव के एक सौ आठ नामों वाला अष्टोत्तर स्तोत्र भी; इन दोनों का पाठ करवाएँ।
वक्ता कहते हैं कि और यदि आप स्वयं इस पर नियंत्रण पाना चाहते हैं, यदि सच में कोई नहीं मिल रहा — तो क्षेत्रपाल भैरव का तांडव स्तोत्र: यम यम यम यक्ष रूपम — यह पूरा स्तोत्र; इसे इंटरनेट से पीडीएफ़ में डाउनलोड करें। इसे गाना सीखें, और उस व्यक्ति के सामने — और बटुक भैरव के एक सौ आठ नामों वाला अष्टोत्तर स्तोत्र — इन दोनों का पाठ करवाएँ।
यह पर्याप्त नहीं होगा — पहले समाधान करवाएँ, फिर रोज़ पाठ रखें
पर्याप्त नहीं — पहले समाधान, फिर रोज़ पाठ
वक्ता कहते हैं कि जो स्थिति बताई जा रही है, उसमें अब जान लीजिए कि स्वयं करने से भी नहीं होगा। चाहें तो आप स्वयं कर सकते हैं — पर उनका सुझाव यह होगा कि पहले किसी व्यक्ति से मिलकर समाधान करवाएँ। उसके बाद रोज़ इनका पाठ करवाएँ ताकि रक्षा मिले।
वक्ता कहते हैं कि स्वयं करने से भी नहीं होगा — अब जान लीजिए, आप जो स्थिति बता रहे हैं उसमें। यदि आप चाहें, तो स्वयं कर सकते हैं। पर हम आपको यही सुझाव देंगे: कि आप पहले किसी व्यक्ति से मिलें और समाधान करवाएँ। उसके बाद, इन्हें नित्य पाठ आदि के रूप में करवाएँ, ताकि रक्षा मिले।
क्या दत्तात्रेय की साधना माला मंत्र के बजाय स्तोत्र से की जा सकती है?
हाँ — सिद्ध साबर विद्या पर काम शुरू होने पर बताया जाएगा
यह पूछे जाने पर कि माला मंत्र के अलावा क्या किसी स्तोत्र से दत्तात्रेय जी की साधना हो सकती है, वक्ता कहते हैं कि हाँ, हो सकती है, और यह बताया जाएगा — जब वे सिद्ध साबर विद्या पर थोड़ा काम शुरू करेंगे, तब बताया जाएगा कि क्या किया जा सकता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि दत्तात्रेय जी की साधना के लिए, माला मंत्र के अलावा, क्या किसी स्तोत्र से साधना की जा सकती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, की जा सकती है; यह बताया जाएगा। जब हम सिद्ध सबर मंत्र विद्या पर थोड़ा काम शुरू करेंगे, तब बताया जाएगा कि क्या किया जा सकता है।
क्या बिना पंचांग देखे हर सोमवार रुद्राभिषेक, और नारियल तेल से हवन किया जा सकता है?
वक्ता का उल्टा प्रश्न — नारियल तेल क्यों?
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या बिना पंचांग देखे हर सोमवार रुद्राभिषेक किया जा सकता है, और क्या शिव सहस्रनाम से नारियल तेल से हवन किया जा सकता है। वक्ता पूछते हैं कि भाई, क्यों — आप नारियल तेल से क्यों करना चाहते हैं? क्या आप लक्ष्मी की प्राप्ति चाहते हैं? क्या आप आकर्षण करना चाहते हैं, या क्या कारण है कि आप नारियल तेल से करना चाहते हैं?
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या बिना पंचांग देखे हर सोमवार रुद्राभिषेक किया जा सकता है, और क्या शिव सहस्रनाम से नारियल तेल से हवन किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि आप शिव सहस्रनाम से नारियल तेल से हवन करना चाहते हैं। भाई, क्यों? नारियल तेल से क्यों — क्या आप लक्ष्मी प्राप्त करना चाहते हैं? क्या आप आकर्षण करना चाहते हैं, या क्या कारण है कि आप नारियल तेल से करना चाहते हैं?
नारियल तेल का उपयोग आखिर कब करना चाहिए?
केवल तब जब घी न मिले
वक्ता कहते हैं कि नारियल तेल का उपयोग तब करना चाहिए जब घी उपलब्ध न हो। इसलिए घी से करने का प्रयास करें; और यदि कोई विशेष कारण है, तो वे यूँ ही सुझाव नहीं दे सकते। रुद्राभिषेक किया जा सकता है या नहीं, इस पर वे फिर पूछते हैं कि रुद्राभिषेक किस तरह करने वाले हैं — यह उसी पर निर्भर करेगा।
वक्ता कहते हैं कि नारियल तेल का उपयोग तब करना चाहिए जब घी उपलब्ध न हो, उस तरह। इसलिए घी से करने का प्रयास करें। और यदि कोई विशेष कारण है, तो वे यूँ ही सुझाव नहीं दे सकते। और रुद्राभिषेक किया जा सकता है या नहीं, इस बात पर — वे कहते हैं कि वे फिर पूछेंगे: आप रुद्राभिषेक किस तरह करने वाले हैं? यह उसी पर निर्भर करेगा।
जो भाव देवी पूजा में आता था, अब कृष्ण रूप में आता है — क्या कारण है?
देवी भागवत के अनुसार कृष्ण ही काली हैं और काली ही कृष्ण
वक्ता उत्तर देते हैं कि पार्थ व्योम जी, कोई विशेष कारण नहीं; यदि भगवती चाहती हैं कि आप उनके कृष्ण स्वरूप की ओर खिंचें, तो ऐसा ही हो। वे पहले के लाइव सत्रों का उल्लेख करते हैं — शायद पिछले लाइव में ही बताया गया था कि देवी भागवत के अनुसार, उसी के प्रमाण से, कृष्ण ही काली हैं और काली ही कृष्ण हैं। इसलिए यदि आप उस स्वरूप में भी जाते हैं तो कोई दिक्कत नहीं; आराम से उस स्वरूप की ओर आकर्षण होने दें, और स्वयं को उन्हें समर्पित करें।
एक श्रोता पूछते हैं कि पहले देवी की पूजा से भाव आता था, अब नहीं आता; अब कृष्ण के रूप में अधिक आता है — क्या सही है और क्या कारण है। वक्ता उत्तर देते हैं कि पार्थ व्योम जी, कोई विशेष कारण नहीं; यदि भगवती चाहती हैं कि आप उनके कृष्ण स्वरूप की ओर आकर्षित हों, तो — वे कहते हैं: इससे पहले के लाइव सत्र सुनिए। शायद पिछले लाइव में ही बताया गया था कि श्रीमद्देवीभागवतम् के अनुसार, उसी के प्रमाण से, कृष्ण ही काली हैं और काली ही कृष्ण हैं। तो यदि आप उस स्वरूप में भी जाते हैं, तो कोई दिक्कत नहीं। आराम से उनके स्वरूप की ओर आकर्षण होने दें, और स्वयं को उन्हें समर्पित करें।
विंध्यवासिनी कवच का अनुरोध अस्वीकार — रहस्य को रहस्य ही रहने दें
रहस्य को रहस्य ही रहने दें
विंध्यवासिनी कवच की महिमा और रक्षा व उनकी कृपा पाने पर वीडियो बनाने को कहे जाने पर वक्ता मना करते हैं: गुप्त रहस्य को गुप्त ही रहने दें। जो बाकी स्वरूप पूजनीय हैं उनकी भक्ति करें। आपको विंध्यवासिनी माई के मुख्य स्वरूप की ओर खिंचने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं; उन्हें छोड़कर बाकी स्वरूपों की ओर आकर्षित हों।
एक श्रोता कहती हैं कि विंध्यवासिनी कवच की महिमा पर और रक्षा व उनकी कृपा की प्राप्ति पर वीडियो बनाइए। वक्ता उत्तर देते हैं कि मोटिवेशनल भक्ति जी, गुप्त रहस्य को गुप्त ही रहने दें; बाकी जितने भी स्वरूप पूजनीय हैं, उनकी भक्ति करें। आपको विंध्यवासिनी माई के मुख्य स्वरूप की ओर आकर्षित होने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। उन्हें छोड़कर, बाकी स्वरूपों के आकर्षण की ओर बढ़ें।
हर रहस्य क्यों नहीं खोला जाता?
हर छिपी बात हर किसी के लिए नहीं
वक्ता कहते हैं कि हर छिपी बात हर किसी के लिए नहीं होती। कुछ गोपनीयता हमारे लिए भी है, कुछ आपके लिए भी, और चीज़ें किसी कारण से ही गुप्त रखी गई हैं। इसलिए हर ऐसी बात पर ज़िद न करें।
वक्ता कहते हैं कि हर छिपी बात हर किसी के लिए नहीं होती। कुछ गोपनीयता हमारे लिए भी है; कुछ गोपनीयता आपके लिए भी है; और किसी कारण से ही चीज़ें गुप्त रखी गई हैं। इसलिए हर एक ऐसी बात के लिए ज़िद न करें।
सिंह लग्न के लिए आदित्य हृदय स्तोत्र की साधना कैसी रहेगी?
बहुत अच्छी — पूरे ब्रह्मचर्य और स्त्रियों के प्रति पूरे सम्मान के साथ
आकाश जी लिखते हैं कि उनका लग्न सिंह है और पूछते हैं कि आत्मविश्वास और बल के लिए आदित्य हृदय स्तोत्र की साधना कैसी रहेगी, और किसी और स्तोत्र का सुझाव भी माँगते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि आदित्य हृदय स्तोत्र बहुत ही अच्छा रहेगा। जो आदित्य हृदय स्तोत्र करते हैं उन्हें पूरा ब्रह्मचर्य रखना चाहिए, स्त्रियों को पूरे सम्मान से देखना चाहिए, और मानसिक रूप से भी पूरे ब्रह्मचर्य में रहना चाहिए।
आकाश जी ने लिखा है: मेरा लग्न सिंह है; आत्मविश्वास और बल के लिए आदित्य हृदय स्तोत्रम् की साधना कैसी रहेगी; कोई और स्तोत्र भी सुझाइए। वक्ता उत्तर देते हैं कि आदित्य हृदय स्तोत्र बहुत ही अच्छा रहेगा। जो आदित्य हृदय स्तोत्र करते हैं उन्हें पूरा ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। रखना चाहिए; स्त्रियों को पूरे सम्मान से देखना चाहिए। मानसिक रूप से भी पूरे ब्रह्मचर्य में रहें।
बारह महीने, साथ में शिव यंत्र या रुद्राक्ष धारण करके
बारह महीने, शिव यंत्र या रुद्राक्ष धारण करके
वक्ता कहते हैं कि यदि आप यह बारह महीने करें, और साथ में, हो सके तो, भगवान शिव से जुड़ा कोई यंत्र या रुद्राक्ष — जो भी सही हो और आपको उचित लगे — धारण करके चलें, तो सूर्य की कृपा से बहुत कुछ प्राप्त होता है।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप यह बारह महीने करें, और साथ में, यदि संभव हो, भगवान शिव से जुड़ा जो भी यंत्र, जो भी रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । आदि — जो भी सही हो, जो भी आपको उचित लगे — यदि आप वह धारण करके चलें, तो सूर्य की कृपा से बहुत कुछ प्राप्त होता है।
जहाँ तक हो सके ब्रह्मचर्य की रक्षा कैसे की जाए?
नियंत्रण सच में कठिन है — पर प्रयास करना चाहिए
एक श्रोता कहते हैं कि वे मन को नियंत्रित करने की बहुत कोशिश करते हैं पर यह कुछ ही दिन चलता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि नियंत्रण सच में कठिन है, पर जितना हो सके उतना करने का प्रयास करना चाहिए, यदि आप साधना के क्षेत्र में हैं और साधना करना चाहते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि जहाँ तक हो सके ब्रह्मचर्य की रक्षा कैसे की जा सकती है; हम मन को नियंत्रित करने की बहुत कोशिश करते हैं पर यह कुछ ही दिन होता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि नियंत्रण करना सच में कठिन है। पर जितना हो सके उतना करने का प्रयास करना चाहिए, यदि आप साधना के क्षेत्र में हैं और साधना करना चाहते हैं।
सूर्य को जल, सूर्य नमस्कार और प्राणायाम, और खान-पान में सुधार
सूर्य को जल, सूर्य नमस्कार, प्राणायाम — और खान-पान
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि भगवान सूर्य को जल देना, सूर्य नमस्कार करना और प्राणायाम करना — यदि आप इन बातों को जीवन में उतारें, तो यह रक्षा जितने अधिक दिन हो सके चलती है। यदि आप रात को दूध पीकर सोते हैं और पेट में वात बनता है — जब पेट में गैस होती है, तो ब्रह्मचर्य रखने की क्षमता कहीं न कहीं नष्ट हो जाती है। इसलिए आपको अपना खान-पान उसी के अनुसार बदलना होगा।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि भगवान सूर्य से जुड़ी बातें — सूर्य भगवान को जल देना, सूर्य नमस्कार करना और प्राणायाम करना। यदि आप इन बातों को अपने जीवन में उतारें, तो यह रक्षा जितने अधिक दिन हो सके चलती रहती है। यदि आप रात को दूध पीकर सोते हैं और आपके पेट में वात बनता है — देखिए, जब पेट में गैस होती है, तो ब्रह्मचर्य के पालन की क्षमता कहीं न कहीं नष्ट हो जाती है। इसलिए आपको उसी के अनुसार अपना खान-पान बदलते चलना होगा। यदि आप अनुष्ठान और साधना करना चाहते हैं, यदि साधना के क्षेत्र में जाना चाहते हैं, तो यह तभी होगा जब आप इन सब बातों का पालन करें। क्योंकि जैसा अन्न हम खाते हैं, वैसा ही हमारा मन बनेगा।
एक श्रोता सपने में वह मंदिर देखते हैं जहाँ जाना उन्होंने छोड़ दिया, और जगह टूटी दिखती है — इसका क्या अर्थ है?
तुरंत जाना शुरू करें
श्रोता कहते हैं कि वे एक मंदिर जाते थे और अब नहीं जाते; सपने में वे वही मंदिर, बारिश का समय, देवी की मूर्ति और कोई उत्सव भी देखते हैं, पर जगह टूटी दिखती है, जबकि असल में ऐसा नहीं है। वक्ता उत्तर देते हैं कि पार्थ जी, तुरंत जाना शुरू करें। हो सके तो — यदि आप रोज़ जाते थे — तो रोज़ के बजाय हफ्ते में एक बार जाएँ, या महीने में एक बार जाएँ, पर वहाँ जाएँ।
एक श्रोता पूछते हैं कि पहले मैं एक मंदिर जाता था, अब नहीं जाता; सपने में मैं वही मंदिर देखता हूँ, बारिश का समय, देवी की मूर्ति, कोई उत्सव भी दिखता है, पर जगह टूटी दिखती है, जबकि असल में ऐसा नहीं है — इसका क्या अर्थ है। वक्ता उत्तर देते हैं कि पार्थ जी, तुरंत जाना शुरू करें। यदि संभव हो — यदि आप रोज़ जाते थे, तो रोज़ के बजाय हफ्ते में एक बार जाएँ, या महीने में एक बार जाएँ; पर वहाँ जाएँ।
बारह साल से पुराने मंदिर में नियमित साप्ताहिक जाने से देव शक्तियाँ आपसे जुड़ जाती हैं
नियमित साप्ताहिक जाना, और देव शक्तियों का आपसे जुड़ना
वक्ता इसे अपने जीवन का अनुभव बताते हैं। सामान्यतः मान लीजिए कि कोई मंदिर बारह साल से अधिक पुराना हो गया है — शिव जी का मंदिर, हनुमान जी का मंदिर, प्राण प्रतिष्ठा को बारह साल पूरे — और आप उस मंदिर में नियमित जाते हैं। रोज़ का अर्थ हर एक दिन नहीं; आपने इसे साप्ताहिक बना लिया हो, कि हर सोमवार शिव जी के मंदिर जाएँगे, हर शनिवार भगवती के मंदिर, मंगलवार हनुमान जी के मंदिर। जब आप वहाँ आना-जाना शुरू करते हैं, तो देव शक्तियाँ बहुत विशेष रूप से कृपा करती हैं और आपसे जुड़ जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि देखिए वहाँ — जब भी, वे आपको सबसे अच्छी बात बता रहे हैं, अपने जीवन का अनुभव। सामान्यतः यह पक्का मान लीजिए कि कम से कम कोई मंदिर बारह साल से अधिक पुराना हो गया है — चाहे शिव जी का मंदिर हो, चाहे हनुमान जी का मंदिर हो; प्राण प्रतिष्ठा को बारह साल पूरे हो गए हैं — और आप उस मंदिर में रोज़ जा रहे हैं। हालाँकि रोज़ का अर्थ हर एक दिन नहीं; पर आपने इसे साप्ताहिक बना लिया है, कि भाई, हम हर सोमवार शिव जी के मंदिर जाएँगे। हर शनिवार भगवती के मंदिर, मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर। आप कोई एक दिन नियमित रूप से निभा रहे हैं। जब आप वहाँ आना-जाना शुरू करते हैं, तो कहीं न कहीं वहाँ जो देव शक्तियाँ हैं वे बहुत विशेष रूप से कृपा करती हैं, और आपसे जुड़ जाती हैं।
अंग देवता, क्षेत्रपाल और दिक्पाल भी आने वाले की प्रतीक्षा करते हैं
अंग देवता, क्षेत्रपाल और दिक्पाल
वक्ता कहते हैं कि और उन्हें भी यह आशा रहती है कि मेरा बेटा आज आएगा। उस स्थान के जितने भी अंग देवता हैं, क्षेत्रपाल, दिक्पाल — चाहे आप वहाँ केवल दीपक जलाएँ — वे इस आशा में रहते हैं कि बेटा आज आएगा। इसलिए आपको जाना चाहिए; यह उनका अपना अनुभव है। जिन्हें दिव्य दृष्टि मिली है और जो तंत्र क्षेत्र में हैं, वे भी ये सब बातें विशेष रूप से जानते होंगे, क्योंकि जब वे कहीं जाते हैं तो उन्हें भी वहाँ की चीज़ों का आभास और अनुभव होता है।
वक्ता कहते हैं कि और उन्हें भी यह आशा रहती है: कि मेरा बेटा आज आएगा। उस स्थान के जितने भी अंग देवता हैं, क्षेत्रपाल और दिग्पाल — चाहे आप वहाँ जाकर केवल दीपक जलाएँ — वे उसी आशा में रहते हैं: कि बेटा आज आएगा। इसलिए आपको जाना चाहिए; यह उनका अपना अनुभव है। जिन लोगों को दिव्यदृष्टि आदि मिली है, जो तंत्र क्षेत्र में हैं, वे भी ये सब बातें विशेष रूप से जानते होंगे, क्योंकि जब वे कहीं जाते हैं, तो उन्हें भी चीज़ों का आभास और अनुभव होता है।
एक हफ्ते या महीने के अंतराल के बाद फिर से उस स्थान तक पहुँचने का प्रयास करें
फिर से उस स्थान तक पहुँचने का प्रयास
वक्ता कहते हैं कि तो आप जहाँ भी जाएँ, जिस भी मंदिर में जाएँ — चाहे किसी कारण से एक-दो हफ्ते, या महीने भर न जा पाएँ — आपको फिर से उस स्थान तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि तो आप जहाँ भी जाएँ, जिस भी मंदिर में जाएँ। चाहे किसी कारण से कभी आप न जा पाएँ, एक हफ्ता या दो हफ्ते, या महीने भर। पर आपको फिर से उस स्थान तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए।
साधक और गॉड-गिफ्टेड भगत में क्या अंतर है?
एक अपनी मेहनत और बार-बार गिरकर ऊपर चढ़ता है
वक्ता कहते हैं कि साधक अपनी मेहनत से, साधनाओं में से कोई चीज़ सीखता और करता है, और फिर कितनी ही बार गिरकर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। वह कई कारणों से गिरता है — कभी अपनी मानसिकता के कारण, कभी अपने अहंकार के कारण, कभी जब चीज़ें मिलने वाली थीं और बहुत पास आकर अपने भाग्य के कारण, अनगिनत कारणों से।
एक श्रोता पूछते हैं कि साधक और गॉड-गिफ्टेड भगत या सेवड़ा में क्या अंतर है। वक्ता उत्तर देते हैं कि साधक अपनी मेहनत से, साधनाओं में से कोई चीज़ सीखता है, करता है, और फिर कितनी ही बार गिरकर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। वह कई कारणों से गिरता है — कभी अपनी मानसिकता के कारण, कभी अपने अहंकार के कारण, कभी जब चीज़ें मिलने वाली थीं पर बिल्कुल पास आकर, अपने भाग्य के कारण; अनगिनत कारणों से।
गॉड-गिफ्टेड भगत ऐसे कुल में जन्म लेता है जहाँ भगती पहले से चलती थी — जिसे वक्ता भाई-भतीजावाद कहते हैं
ऐसे परिवार में जन्म जहाँ भगती उतरती आई है — जिसे वक्ता भाई-भतीजावाद कहते हैं
वक्ता कहते हैं कि गॉड-गिफ्टेड भगत का अर्थ सीधे यही है: कि आपने ऐसे कुल में जन्म लिया जहाँ भगती उतरती आ रही थी, और वह मिल गई। वे इस पर पहले भी बोल चुके हैं। जो गद्दी थी वह मिल गई; आपमें योग्यता है या नहीं, इससे कोई लेना-देना नहीं — जिसे भाई-भतीजावाद कहते हैं। तो यहाँ भी भाई-भतीजावाद होता है। वे कहते हैं कि यह हर क्षेत्र में होता है, और यहाँ भी, बेटा योग्य हो या अयोग्य; वे एक राजनीतिक परिवार का उदाहरण देते हैं जिसमें इस्तीफ़ा दिया जाता है और स्वीकार नहीं होता, और वारिस बस चलता रहता है।
वक्ता कहते हैं कि और गॉड-गिफ्टेड भगत का, जो आप कह रहे हैं, अर्थ सीधे बस यही है: कि आपने ऐसे कुल में जन्म लिया जहाँ भगती उतरती आ रही थी, और वह मिल गई। इस विषय पर हम पहले भी बता चुके हैं। जो गद्दी थी वह मिल गई। आपके भीतर योग्यता है या नहीं, इससे कोई लेना-देना नहीं — जिसे भाई-भतीजावाद कहते हैं। तो यहाँ भी भाई-भतीजावाद होता है। यह हर क्षेत्र में है; यहाँ भी है। बेटा योग्य हो या न हो — वे उदाहरण के रूप में एक राजनीतिक परिवार लेते हैं जिसमें वारिस अपना इस्तीफ़ा देता है, परिवार का मुखिया कहता है हम तुम्हारा इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं करेंगे, तुम ही युवराज रहोगे, और ऐसे ही चलता रहता है। उसी तरह यहाँ।
बिना मेहनत के शक्ति मिलने पर क्या गड़बड़ होती है?
दुरुपयोग — जैसे मुफ्त में मिले दस लाख रुपये
वक्ता कहते हैं कि उसमें एक बात यह है: शक्तियों का दुरुपयोग, और बाद में कठिनाइयाँ बढ़ती हैं; दुरुपयोग बहुत अधिक होता है। देखिए, यदि आपको बिना मेहनत के दस लाख रुपये मिल जाएँ, तो उन्हें खर्च करने में आपको कोई खास दुःख नहीं होगा; आप आराम से खर्च करेंगे और जो मन करे वह लेंगे। पर जब आप मेहनत करके एक-एक रुपया जोड़कर दस लाख इकट्ठा करते हैं, तो उसमें लगे एक, दो, चार या पाँच सालों में आप उसकी कीमत जानते हैं — कि खर्च करने से पहले हज़ार बार सोचना पड़ता है।
वक्ता कहते हैं कि उसमें एक बात यह है: शक्तियों का दुरुपयोग, और बाद में कठिनाइयाँ बढ़ती हैं। दुरुपयोग बहुत ही अधिक होता है। देखिए — जब बिना मेहनत किए आपको दस लाख रुपये मिलते हैं, तो उन्हें खर्च करने में आपको ज़्यादा दुःख नहीं होगा। आप आराम से खर्च करेंगे; जो मन करेगा, वह लेंगे। पर जब आप मेहनत करके एक-एक रुपया जोड़कर दस लाख रुपये इकट्ठा करते हैं, तो उसमें आपको जो एक साल, दो साल, चार साल, पाँच साल लगेंगे, उनमें आप उसकी कीमत जान रहे होते हैं: कि खर्च करने से पहले आपको हज़ार बार सोचना पड़ता है — करें या न करें। बस यही होता है।
घर में कलह है और पैसा नहीं टिकता — क्या करना चाहिए?
शिव का अभिषेक, और चैनल पर कलह वाले वीडियो
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले शिव जी का अभिषेक; और चैनल पर कलह से जुड़े दो-तीन वीडियो हैं। क्या आपके घर में वैसी स्थिति है? इसी चैनल पर एक बार खोजें, या प्लेलिस्ट में देखें, या चैनल के वीडियो देखें — घर के कलह से जुड़े वीडियो हैं; तीन वीडियो होंगे। पहले तीनों सुनें। उन्हें लगता है कि उन्हीं में आपको पता चल जाएगा और आप मूल कारण तक पहुँचेंगे; और जब जड़ तक पहुँचेंगे तो समस्या स्वयं हल कर लेंगे।
एक श्रोता पूछते हैं कि घर में कलह है, पैसा भी नहीं टिकता, हम क्या करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि सबसे पहले शिव जी का अभिषेक, और चैनल पर कलह से जुड़े दो-तीन वीडियो हैं। क्या आपके घर में वह स्थिति है? इसी चैनल पर एक बार खोजें। आप इसे प्लेलिस्ट में भी देख सकते हैं, या चैनल के वीडियो देखें: घर में होने वाले कलह से जुड़े वीडियो हैं; तीन वीडियो होंगे। पहले तीनों सुनें। उन्हें लगता है कि उसी में आपको पता चल जाएगा, कि आप मूल कारण तक पहुँच जाएँगे। जब आप जड़ तक पहुँचेंगे, तो समस्या स्वयं भी हल कर लेंगे।
राजा अपने राज्य तक नहीं पहुँच सका तो विंध्यवासिनी की एक योगिनी बीच रास्ते में स्थापित हुई
विंध्यवासिनी माँ की एक योगिनी, बीच रास्ते में स्थापित
वक्ता कहते हैं कि हाँ, जिन्हें विंध्य पर्वत से गया की ओर ले जाया जा रहा था — राजा अपने राज्य तक नहीं पहुँच सका; उनकी स्थापना बीच रास्ते में ही हो गई। वे छत्तीसगढ़ तक नहीं पहुँची थीं, और वे विंध्यवासिनी माँ की एक योगिनी थीं; पूर्ण विंध्यवासिनी कभी कहीं जा ही नहीं सकतीं।
वक्ता कहते हैं कि हाँ: जिन्हें विंध्य पर्वत से आगे गया ले जाया जा रहा था — राजा अपने राज्य तक नहीं पहुँच सका; उनकी स्थापना बीच में ही हो गई। वे छत्तीसगढ़ तक नहीं पहुँची थीं, और वे विंध्यवासिनी माँ की एक योगिनी थीं। पूर्ण विंध्यवासिनी कभी जा ही नहीं सकतीं।
यदि जन्म कुंडली नहीं है और परिवार को भी पता नहीं, तो क्या कुंडली बनाई जा सकती है?
यह संभव नहीं — पर पढ़ने के दूसरे साधन हैं
वक्ता कहते हैं कि भाई, यह संभव नहीं; इसमें हम आपसे कोई झूठ नहीं कह पाएँगे कि जन्म कुंडली बन जाएगी। जन्म कुंडली संभव नहीं होगी। फिर किसी ऐसे व्यक्ति से, जिसे हस्तरेखा का ज्ञान हो, जो प्रश्न कुंडली से उत्तर दे सके, जो सिद्धियों से उत्तर दे सके, जो माथा पढ़ना जानता हो, जो पैरों की रेखाएँ पढ़ना जानता हो — ऐसे जानकार लोग इन साधनों से आपको अपने बारे में सटीक जानकारी देंगे।
एक श्रोता पूछते हैं कि मेरे पास जन्म कुंडली नहीं है, घर वालों को पता नहीं; किस साधन से बनाई जा सकती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि भाई, यह संभव नहीं; इसमें हम आपसे कोई झूठ नहीं कह पाएँगे कि जन्म कुंडली बन जाएगी। जन्म कुंडली संभव नहीं होगी। फिर किसी ऐसे व्यक्ति से, जिसे हस्तरेखा का ज्ञान हो, जो प्रश्न कुंडली से उत्तर दे सके, जो सिद्धि से उत्तर दे सके, जो माथा पढ़ना जानता हो, जो पैरों की रेखाएँ पढ़ना जानता हो — ऐसे जानकार लोग इन साधनों से आपको आपके विषय में सटीक जानकारी देंगे।
घर में बाबा और मैया पार्वती की पूजा कैसे करें, और उनका पंचायतन कैसे बनाएँ?
शिव पंचायतन बनाएँ
वक्ता उत्तर देते हैं कि शिव पंचायतन बनाएँ, और शिव पंचायतन के अनुसार स्थापना करें।
एक श्रोता पूछते हैं कि घर में बाबा और मैया पार्वती की पूजा कैसे करें; उनका पंचायतन कैसे बनाएँ। वक्ता उत्तर देते हैं कि शिव पंचायतन बनाएँ। शिव पंचायतन के अनुसार स्थापना करें।
क्या दुर्गा सहस्रनाम के बजाय अर्गला के पहले मंत्र का जप किया जा सकता है?
हाँ — इस अघोर अमावस्या की रात एक हज़ार आठ बार
वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, अवश्य किया जा सकता है। हो सके तो इसे एक हज़ार आठ बार करें, इस अघोर अमावस्या की रात।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या दुर्गा सहस्रनाम की जगह अर्गला के पहले मंत्र का जप किया जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, अवश्य किया जा सकता है। यदि संभव हो, तो एक हज़ार आठ बार करें। इस अघोर अमावस्या की रात।
पूजा स्थान में लाल चींटियाँ आने का क्या कारण है?
मीठा भोग छोड़ देना, और मौसम
वक्ता कहते हैं कि आप मीठा भोग लगाकर वहीं छोड़ देते होंगे; लाल चींटियाँ आती हैं। दूसरी बात यह है कि गर्मी के दिनों में लाल चींटियाँ थोड़ा परेशान करती हैं, और बारिश के समय काली चींटियाँ। इसलिए यह मत सोचिए कि वहाँ कोई नकारात्मक ऊर्जा है।
एक श्रोता पूछते हैं कि पूजा स्थान में लाल चींटियाँ आने का क्या कारण है। वक्ता उत्तर देते हैं कि आप मीठा भोग लगाकर वहीं छोड़ देते होंगे। लाल चींटियाँ आती हैं। दूसरी बात यह है कि गर्मी के दिनों में लाल चींटियाँ थोड़ा परेशान करती हैं; बारिश के समय काली चींटियाँ परेशान करती हैं। ठीक — तो इस तरह का कुछ मत सोचिए कि वहाँ कोई नकारात्मक ऊर्जा है।
फूल में बत्ती बनना वायरल करने के लिए बनाई गई सामग्री है, शकुन नहीं
फूल में बत्ती बनना, और वायरल सामग्री बनाना
वक्ता कहते हैं कि ये सब बातें वीडियो वायरल करने के लिए होती हैं, जिन्हें लोग बनाकर दिखाते हैं — कि यदि फूल में बत्ती बन गई तो आपकी पूजा देवता तक पहुँच गई, और बत्ती नहीं बन रही तो नहीं पहुँच रही। लोग एक ही वीडियो दस बार डालते हैं; वायरल होना भी खतरनाक है, और उसके बाद लोग सबसे पूछते फिरते हैं। स्थिति जो भी हो, वे उसी से अपना अनुमान लगा लेंगे: यही कारण है। इसलिए ये बातें कहने भर की हैं; चिंता मुक्त रहें।
वक्ता कहते हैं कि ये सब बातें वीडियो वायरल करने के लिए होती हैं, जिन्हें लोग बनाकर दिखाते हैं। कि यदि फूल में बत्ती बन गई तो आपकी पूजा देवता तक पहुँच गई; यदि बत्ती नहीं बन रही तो देवता तक नहीं पहुँच रही। लोग एक ही वीडियो दस बार डालते हैं। वायरल होना भी खतरनाक है; उसके बाद लोग सबसे पूछते फिरते हैं। स्थिति जो भी हो, वे उसी से अपना अनुमान लगा लेंगे — यही कारण है। इसलिए ये बातें कहने भर की हैं। चिंता मुक्त रहें।
चींटियों और भोग के बारे में वास्तव में क्या करना चाहिए?
सुगंधित छिड़काव, और पूजन के बाद भोग उठाना
वक्ता कहते हैं कि हाँ, उस स्थान पर किसी सुगंधित चीज़ का छिड़काव करें — जैसे अगरु, या इत्र आदि; उसी से वे हट जाएँगी। और यदि आप मीठा भोग लगाएँ, तो लगाकर वहीं न छोड़ें। पूजन के बाद भोग आदि उठा लें; जल रहने दे सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि हाँ, उस स्थान पर थोड़ा किसी सुगंधित चीज़ का छिड़काव करें — जैसे अगरु, या इत्र आदि। उसी से वे हट जाएँगी। और मीठा भोग लगाएँ — पर भोग लगाकर वहीं न छोड़ें। पूजन के बाद भोग आदि उठा लें; चाहें तो जल रहने दें।
क्या पैसे से जुड़ी समस्या के लिए कोई प्रयोग है?
अपनी उसी कठिनाई का संकल्प लें
वक्ता उत्तर देते हैं कि अवश्य किया जा सकता है। भगवती के सामने अपनी उसी बात का संकल्प लें जो आपकी कठिनाई है, और पाठ करें।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या पैसे से जुड़ी समस्या के लिए माता का कोई प्रयोग है। वक्ता उत्तर देते हैं कि अवश्य किया जा सकता है। भगवती के सामने उसी बात का संकल्प लें जो आपकी कठिनाई है, और पाठ करें।
वर्षों के मंत्र जप और स्तोत्र पाठ से ऊर्जा, क्रोध और सिर में गर्मी बनती है — इसे कैसे नियंत्रित करें?
केवल जप पर्याप्त नहीं
वक्ता कहते हैं कि हम एक ही बात का नाम बार-बार लेते हैं — हम हमेशा बताते हैं। आप जिस भी देवी या देवता की सेवा-पूजा-पाठ कर रहे हैं, केवल मंत्र जप करना, केवल स्तोत्र या कवच का बार-बार जप करना और अनुष्ठान से उसे जाग्रत करना पर्याप्त नहीं है।
एक श्रोता पूछते हैं कि गुरु जी, वर्षों के मंत्र जप और स्तोत्र पढ़ने से ऊर्जा बनती है; उससे क्रोध आता है, सिर में गर्मी; इसे कैसे नियंत्रित करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि तारकासुर जी, बार-बार हम एक ही बात का नाम लेते हैं, हम हमेशा बताते हैं। आप जिस भी देवी या देवता की सेवा, पूजा और पाठ कर रहे हैं — केवल मंत्र जप करना, केवल स्तोत्र या कवच का बार-बार जप करना और अनुष्ठान से उसे जाग्रत करना पर्याप्त नहीं है।
जप के साथ तंत्रोक्त यंत्रों पर अर्चन और तर्पण जोड़ना ज़रूरी है
तंत्रोक्त यंत्रों पर अर्चन और तर्पण
वक्ता कहते हैं कि जिस भी देवी या देवता का आप वर्षों से जप कर रहे हैं, उनके तंत्रोक्त यंत्र प्राप्त करके उनका अर्चन और तर्पण दोनों करना चाहिए। तर्पण केवल पितरों का नहीं होता। जब आप देवी-देवताओं के यंत्रों पर उनके सहस्रनाम से तर्पण करते हैं, तो वे तृप्त होंगे — और जब तर्पण और अर्चन होता है तो अनंत कृपा होती है।
वक्ता कहते हैं कि जिस भी देवी या देवता का आप वर्षों से जप कर रहे हैं, तो उनके तंत्रोक्त यंत्र प्राप्त करके, आपको उनका अर्चन और तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। दोनों करना चाहिए। तर्पण केवल पितरों का नहीं होता। जब आप देवी-देवताओं के यंत्रों पर उनके सहस्रनाम से तर्पण करते हैं, तो वे तृप्त होंगे — क्या कहना? जब तर्पण और अर्चन होता है तो वे अनंत कृपा करते हैं। इसलिए यदि आप अच्छे साधक हैं, तो आपको केवल यही नहीं करना चाहिए; अर्चन और तर्पण भी करना चाहिए।
हवन वास्तव में क्या करता है?
अग्नि के मुख से देवताओं को भोजन, फिर तर्पण और मार्जन
वक्ता कहते हैं कि जब आप हवन करते हैं, तो आप क्या करते हैं — अग्नि देवता के मुख से आप बाकी सभी देवी-देवताओं को उनका भोजन पहुँचाते हैं। जिस मंत्र का आप जप कर रहे थे, उसके देवता तक आपने भोग पहुँचाया। उसके बाद तर्पण और मार्जन होता है: उन्हें जल दिया गया, वे तृप्त हुए।
तर्पण और मार्जन न करने पर क्या होता है?
शरीर में ऊर्जा बढ़ती है और असंतुलित रहती है
वक्ता कहते हैं कि यदि आप रोज़ तर्पण और मार्जन नहीं कर रहे, या केवल बहुत अधिक जप कर रहे हैं, तो आपके शरीर में ऊर्जा बढ़ेगी और फिर वहाँ नियंत्रित नहीं रहेगी; असंतुलित रहेगी। असंतुलन की अवस्था न बने, इसीलिए कहा गया है कि समय-समय पर जिस देवी या देवता की आप पूजा कर रहे हैं, उनके सहस्रनाम से यंत्र आदि पर तर्पण करना चाहिए, और उसी तर्पण जल से अपने शरीर पर मार्जन करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप रोज़ तर्पण और मार्जन नहीं कर रहे, या यदि आप केवल बहुत अधिक जप कर रहे हैं, तो आपके शरीर में ऊर्जा बढ़ेगी, और वहाँ फिर नियंत्रित नहीं रहेगी; असंतुलित रहेगी। असंतुलन की स्थिति न आए, इसीलिए कहा गया है: बीच-बीच में, यंत्र आदि पर, आप जिस भी देवता या देवी की पूजा कर रहे हैं, उनके सहस्रनाम आदि से तर्पण करना चाहिए। और उसी तर्पण जल से अपने शरीर पर मार्जन करना चाहिए।
क्या काली यंत्र पर काली के सभी स्वरूपों और काली कुल की देवियों की पूजा हो सकती है?
अंग विद्या में वहाँ पूजी जाने वाली सोलह नित्याएँ
यह पूछे जाने पर कि क्या भगवती काली के यंत्र पर माँ काली के सभी स्वरूपों की साधना और पूजा हो सकती है, और क्या उनके अलावा काली कुल की सभी देवियों का पूजन भी वहाँ हो सकता है, वक्ता कहते हैं: जब हम किसी एक शक्ति को लेकर चलते हैं, तो अवश्य, भगवती काली से जुड़ी उनकी सोलह नित्याओं का पूजन आप वहाँ अंग विद्या में कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या भगवती काली के यंत्र पर माँ काली के सभी स्वरूपों की साधना और पूजा की जा सकती है, और क्या माँ काली के यंत्र पर उनके अलावा काली कुल की सभी देवियों का पूजन भी हो सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि जब हम किसी एक शक्ति को लेकर चलते हैं, तो अवश्य, भगवती काली से जुड़ी, उनकी सोलह नित्याओं का पूजन आप वहाँ अंग विद्या में कर सकते हैं।
कृपा जिस स्वरूप में चाहे आती है, जैसे शिव रक्षा स्तोत्र से बताए गए दर्शन
कृपा जिस स्वरूप में चाहे आती है
अभिषेक शर्मा जी लिखते हैं कि शिव रक्षा स्तोत्र की साधना से महादेव की बहुत बड़ी कृपा मिली और उनके एक अलग स्वरूप के दर्शन हुए, और उन्होंने बाद में दान भी किया। वक्ता इसे बहुत अच्छी बात कहते हैं, सुन रहे एक सौ नौ लोगों से वह टिप्पणी पढ़ने को कहते हैं, और कहते हैं: जब आप लंबे समय तक कोई एक साधना करते हैं, तो भगवान किस स्वरूप में और कब कृपा करेंगे, यह कहना या सोचना हमारे हाथ में नहीं है।
अभिषेक शर्मा जी लिखते हैं कि शिव रक्षा स्तोत्र की साधना से हमें महादेव की बहुत बड़ी कृपा मिली; हमें उनके एक अलग स्वरूप के दर्शन हुए; उसके बाद हमने दान भी किया था। वक्ता उत्तर देते हैं कि अभिषेक शर्मा जी, आपने बहुत अच्छी बात कही है। एक सौ नौ लोग सुन रहे हैं — कृपया अभिषेक शर्मा जी की यह टिप्पणी अवश्य पढ़ें। जब भी आप लंबे समय तक कोई एक साधना करते हैं, तो भगवान किस स्वरूप में और कब कृपा करेंगे — यह कहना, यह सोचना, हम लोगों के बस में नहीं है।
काली यंत्र का अर्चन-तर्पण करने वाले एक साधक को आज्ञा चक्र पर सौम्य रूप के दर्शन हुए
आज्ञा चक्र पर सौम्य रूप के दर्शन
वक्ता कहते हैं कि एक और साधक हैं, विकास जी, जिन्होंने बताया कि वे भगवती काली के यंत्र का अर्चन और तर्पण कर रहे थे — वे काफी समय से अच्छे साधक हैं और लंबी अवधि तक साधना करते हैं — और कहा कि अचानक, जैसे ही उन्होंने तर्पण पूरा किया, उन्हें कुछ क्षणों के लिए आज्ञा चक्र पर भगवती के सौम्य रूप के दर्शन हुए। वह बहुत ही सौम्य था, और उससे उन्हें शांति मिली।
वक्ता कहते हैं कि एक और साधक हैं, विकास जी। उन्होंने बताया कि वे भगवती काली के यंत्र का अर्चन और तर्पण कर रहे थे — वे काफी लंबे समय से अच्छे साधक हैं, लंबी अवधि तक साधना करते हैं। उन्होंने कहा कि अचानक, जैसे ही उन्होंने तर्पण आदि पूरा किया, उन्हें कुछ क्षणों के लिए आज्ञा चक्र पर भगवती के सौम्य रूप के दर्शन हुए। वह बहुत ही सौम्य था, और उससे उन्हें शांति मिली।
छोटे अनुभव प्रेरणा देते हैं, फिर बेहतर अभ्यास, फिर पूर्ति, फिर विरक्ति
प्रेरणा, फिर बेहतर अभ्यास, फिर पूर्ति, फिर विरक्ति
वक्ता कहते हैं कि ऐसी बातें होती हैं। यंत्र में आप भगवती का स्वरूप नहीं देख रहे, पर जब आप उनका अभिषेक और अर्चन करते हैं तो वे प्रसन्न होती हैं और अवश्य कृपा करती हैं। इन छोटे अनुभवों से आपको प्रेरणा मिलेगी; प्रेरणा आएगी तो आप और अच्छे से करेंगे; अच्छे से करेंगे तो आपकी इच्छाओं की पूर्ति होगी; इच्छाएँ पूरी होंगी तभी आप विरक्त होंगे; और विरक्त होंगे तभी आपकी आगे की प्रगति होगी।
वक्ता कहते हैं कि ऐसी बातें होती हैं। यंत्र में आप भगवती का स्वरूप नहीं देख रहे — पर जब आप उनका अभिषेक आदि करते हैं, जब अर्चन करते हैं, तो वे प्रसन्न होती हैं, और अवश्य कृपा करती हैं। इन छोटे अनुभवों से आपको प्रेरणा मिलेगी। जब प्रेरणा आएगी, तो आप और अच्छे से करेंगे। जब आप और अच्छे से करेंगे, तो आपकी इच्छाओं की पूर्ति होगी। जब कामनाएँ पूरी होंगी, तभी आप विरक्त होंगे; और जब विरक्त होंगे, तभी आपकी आगे की प्रगति होगी।
मैली विद्या क्या है?
क्षुद्र विद्या — भूत, प्रेत और पिशाच से जुड़ी चीज़ों का प्रयोग
मैली विद्या क्या है, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: क्षुद्र विद्या, मैली विद्या, भूत, प्रेत और पिशाच से जुड़ी चीज़ों का प्रयोग। एक श्रोता जो पूछते हैं कि उनका काम होते-होते रुक जाता है, उनसे वे कहते हैं कि कुछ बताने के लिए पूरी बात लिखनी होगी।
एक श्रोता लिखते हैं कि मेरा काम होते-होते रुक जाता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि तो पूरी बात लिखिए, तभी हम बता सकते हैं कि क्या है। दूसरे श्रोता पूछते हैं कि मैली विद्या क्या है। वे उत्तर देते हैं कि क्षुद्र विद्या, मैली विद्या — भूत, प्रेत और पिशाच से जुड़ी चीज़ों का प्रयोग।
उन तीन दिनों में केवल गुरु मंत्र पूरा किया जा सकता है
हाँ — और एक श्रोता से तीन दिन के छोटे अनुष्ठान का वादा
वक्ता उत्तर देते हैं कि अजय जी, हाँ, अवश्य — आपको गुरु मंत्र ही पूरा करना चाहिए; बहुत अच्छा रहेगा। और वे कहते हैं कि आप मुझे पहले ही बता चुके हैं: जिनका यह स्वरूप है उनका मंत्र आपको पहले से मिला है; उन्होंने समय-समय पर आप पर ऐसी कृपा की है। इसलिए एक बार टेलीग्राम पर संदेश करें, हम देखेंगे और आपके लिए कुछ विशेष करवाएँगे। उनसे जुड़ा तीन दिन का छोटा अनुष्ठान करें; आप इतनी अच्छी जगह पर भी हैं, और हर व्यवस्था पहले से आपके पास है।
अजय जी पूछते हैं कि क्या मैं इन तीन दिनों में केवल गुरु मंत्र करूँ। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, अवश्य, आपको गुरु मंत्र ही पूरा करना चाहिए; बहुत अच्छा रहेगा। और आप मुझे पहले ही बता चुके हैं: जिनका यह स्वरूप है, उनका मंत्र आपको पहले से मिला हुआ है; उन्होंने समय-समय पर आप पर ऐसी कृपा की है। तो एक बार टेलीग्राम पर संदेश करें। हम देखेंगे, और आपके लिए कुछ विशेष करवाएँगे। उनसे जुड़ा तीन दिन का एक छोटा अनुष्ठान करें। आप इतनी अच्छी जगह पर भी हैं; और सबसे बड़ी बात यह है कि हर व्यवस्था पहले से आपके पास है। तो इस बार हम आपके लिए करेंगे।
पुत्र के लिए अमावस्या पर माँ काली की पूजा किस समय करनी चाहिए?
सुबह, लगभग आठ या नौ बजे
यह पूछे जाने पर कि पुत्र के लिए माँ भगवती काली की पूजा अमावस्या के दिन सुबह करें या शाम, वक्ता कहते हैं: अनिल उपाध्याय जी, सुबह के समय ही करें, लगभग आठ या नौ बजे। सुबह का समय ही उचित रहेगा, क्योंकि फिर इसमें उन्हें मुहूर्त आदि देखने की ज़रूरत नहीं।
एक श्रोता पूछते हैं कि पुत्र के लिए, अमावस्या के दिन माँ भगवती काली की पूजा किस समय करनी चाहिए — सुबह या शाम। वक्ता उत्तर देते हैं कि सुबह के समय ही करें। लगभग आठ या नौ बजे करें। अनिल उपाध्याय जी। ठीक — सुबह का समय ही उचित रहेगा। क्योंकि फिर इसमें उन्हें चौघड़िया आदि देखने की ज़रूरत नहीं।
मृत्यु के बाद के लिए सनातन क्या बताता है?
सायुज्य और सालोक्य, और छह प्रकार की मुक्ति
वक्ता कहते हैं कि सनातन संस्कृति आपको बताती है कि जीवित अवस्था में शराब पीने से भी कितने पाप लगते हैं, और आपको पचास बातें बताई जाती हैं और अच्छा रहने को कहा जाता है। वे कहते हैं कि हमारे यहाँ मृत्यु के बाद कहीं भोग नहीं दिया जाता: सायुज्य और सालोक्य की प्राप्ति का विधान है, और छह प्रकार की मुक्ति बताई गई है। वे चीज़ें अपने पुण्य के अनुसार मिलती हैं, और इच्छाओं के अनुसार ऐसी योनियाँ भी मिलती हैं जहाँ आपको भोग मिलता है। वे कहते हैं कि जानकारी की कमी है, इसलिए लोग समझ नहीं पाते।
सनातन संस्कृति कहती है कि भाई, जीवित अवस्था में भी यदि आप शराब पीते हैं, तो आपको कितने पाप लगेंगे। आपको पचास बातें बताई जाती हैं, और अच्छा रहने को कहा जाता है। वक्ता कहते हैं कि हमारे यहाँ मृत्यु के बाद कहीं भोग नहीं दिया जाता। सायुज्य और सालोक्य की प्राप्ति का विधान है। छह प्रकार की मुक्ति बताई गई है। अपने पुण्य के अनुसार वे चीज़ें मिलती हैं; और कामनाओं के अनुसार ऐसी योनियाँ भी मिलती हैं, जहाँ आपको भोग मिलता है। जानकारी की कमी है; इसीलिए लोग समझ नहीं पाते।
कृपा मिलने के लिए किसी देव की साधना कितने समय तक करनी चाहिए?
चतुर्थी से चतुर्थी, इकतालीस दिन, या एक सौ आठ दिन
यह पूछे जाने पर कि देव कृपा पाने के लिए गणेश सहस्रनाम के पाठ जैसी साधना कितने समय तक करनी चाहिए, वक्ता कहते हैं: उनके अनुसार इसे बार-बार करना है; और यदि समय हो, तो चतुर्थी से चतुर्थी, एक महीना — कम से कम इतना। यदि आप मंडल में जाना चाहें तो इकतालीस दिन, और तीन महीने करना चाहें तो और भी अच्छा, या लगातार एक सौ आठ दिन करें तो बहुत ही अच्छा रहेगा।
एक श्रोता पूछते हैं कि यदि हम किसी देव की साधना कर रहे हैं, तो देव कृपा पाने के लिए वह साधना कितने समय तक करनी चाहिए — जैसे गणेश सहस्रनाम का पाठ करते हुए। वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, मेरे अनुसार इसे बार-बार करना है; और यदि आपके पास समय हो, तो चतुर्थी से चतुर्थी, एक महीना करें। कम से कम इतना। यदि आप मंडल में जाना चाहें, तो इकतालीस दिन; यदि तीन महीने करना चाहें, तो और भी अच्छा; या यदि लगातार एक सौ आठ दिन करें, तो बहुत ही अच्छा रहेगा।
नहीं तो हर महीने दस दिन, चतुर्थी से चतुर्दशी तक
हर महीने चतुर्थी से चतुर्दशी तक दस दिन
वक्ता कहते हैं कि नहीं तो हर महीने दस दिन करें, चतुर्थी से चतुर्दशी तक। चतुर्थी तिथि से संकल्प लेकर शुरू करें और चतुर्दशी तिथि पर पूरा करें; फिर से चतुर्थी से चतुर्दशी, और बीच में दो-तीन दिन का अंतर मिल जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि और यदि नहीं, तो हर महीने दस दिन करें, चतुर्थी से चतुर्दशी तक। चतुर्थी तिथि से संकल्प लेकर शुरू करें, और चतुर्दशी तिथि पर पूरा करें। फिर से चतुर्थी से चतुर्दशी; बीच में दो-तीन दिन का अंतर मिल जाएगा।
यदि साधक को बुरा कहने वाले को दंड मिले, तो क्या साधक को दोष लगता है?
दंड देने वाले आप नहीं हैं
माँ अपराजिता के एक साधक पूछते हैं कि यदि कोई उन्हें बुरा कहे और फिर उस व्यक्ति के साथ बुरा हो या उसे दंड मिले, तो क्या कोई दोष लगता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, इसमें दोष लगने का कोई प्रश्न नहीं। आप भगवती की, या किसी भी देवी-देवता की सेवा-पूजा कर रहे हैं; कोई आपको बुरा कह रहा है, और उसे उसका दंड भी मिल रहा है। दंड देने वाले आप नहीं हैं — तो आपको दोष क्यों लगे?
एक श्रोता पूछते हैं कि यदि कोई माँ अप्राजिता के साधक को कुछ बुरा कहता है, और उसके साथ बुरा होता है या उसे दंड मिलता है, तो क्या इसमें कोई दोष लगता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, इसमें दोष लगने जैसी कोई बात नहीं। आप भगवती की सेवा-पूजा कर रहे हैं, या किसी भी देवी या देवता की सेवा-पूजा कर रहे हैं। कोई आपको बुरा कह रहा है, और उसे उसका दंड भी मिल रहा है। दंड आप नहीं देने जा रहे — तो आपको दोष क्यों लगे?
बच्चे को गाली देने वाले को थप्पड़ पिता ने मारा, बच्चे ने नहीं
बच्चे को गाली देने वाले को थप्पड़ मारने वाला पिता
वक्ता कहते हैं कि भगवती हैं। आपके माता-पिता आपके साथ हैं; यदि कोई आपको गाली दे और आपके पिता उसे दो थप्पड़ मार दें — तो पिता ने मारे, आपने नहीं, और उन्होंने इसलिए मारे क्योंकि उन्हें बुरा लगा। कोई आपको बुरा क्यों कहे? आपको बिल्कुल चिंता करने की ज़रूरत नहीं।
वक्ता कहते हैं कि भगवती हैं। आपके माता-पिता आपके साथ हैं। यदि कोई आपको गाली दे रहा है और आपके पिता ने खींचकर उसे दो थप्पड़ मार दिए — तो पिता ने मारे न; आपने नहीं मारे, और पिता को बुरा लगा इसीलिए उन्होंने मारे। कोई आपको बुरा क्यों, क्यों कहे? आपको बिल्कुल चिंता करने की ज़रूरत नहीं।
नींबू बलि के बाद नींबू का क्या करना है?
नदी में, देव वृक्ष के नीचे, या गाड़कर विसर्जन
वक्ता कहते हैं कि इसका विसर्जन नदी में किया जाता है, या किसी देव वृक्ष के नीचे, या अपने ही घर में किसी ऐसी जगह ज़मीन खोदकर, या किसी गमले में रखकर उस तरह ऊपर से मिट्टी डालकर।
एक श्रोता पूछते हैं कि नींबू बलि देने के बाद नींबू का क्या करना है। वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, इसका विसर्जन इस तरह किया जाता है: नदी में, या किसी देव वृक्ष के नीचे। या ज़मीन खोदकर, अपने ही घर में किसी ऐसी जगह, या किसी गमले में डालकर उस तरह ऊपर मिट्टी डालकर।
तारा चतुर्दशी से फिर ग्यारह दिन, फिर नवरात्र में सवा लाख
इस तारा चतुर्दशी से फिर ग्यारह दिन, फिर नवरात्र में सवा लाख
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने वक्ता की विधि से माँ भवानी की ग्यारह दिन की साधना की है और रोज़ एक माला कर रहे हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह करें: चतुर्दशी से, इस तारा चतुर्दशी से शुरू करके, फिर से कम से कम ग्यारह दिन की साधना करें। नवरात्र में नौ दिनों में सवा लाख जप करें। फिर शारदीय पूर्णिमा से, जिस दिन वह पड़े, फिर से उसका सवा लाख जप करें। दीवाली में, जब आपका कार्तिक मास आए, फिर से सवा लाख करें। इतना करें और आपको बहुत आनंद मिलेगा।
एक श्रोता लिखते हैं कि मैंने आपकी विधि से माँ भवानी की ग्यारह दिन की साधना की है; मैं रोज़ एक माला कर रहा हूँ। वक्ता उत्तर देते हैं कि आगे यह काम करें: चतुर्दशी से, इस तारा चतुर्दशी से शुरू करके, फिर से कम से कम ग्यारह दिन की साधना करें। नवरात्र में नौ दिनों में सवा लाख जप करें। फिर शारदीय पूर्णिमा से — जिस भी दिन वह पड़े — उस दिन से फिर से उसका सवा लाख जप करें। दीवाली में, जब आपका कार्तिक मास आए, उसमें फिर से सवा लाख करें। इतना करें और आपको बहुत आनंद मिलेगा।
साधना मार्ग पर चलने वाला काम वासना को कैसे नियंत्रित करे?
केवल जप, हवन और पुरश्चरण से यह कभी नियंत्रित नहीं होगी
वक्ता यह बात दोहराते हैं: आप साधना मार्ग पर हैं, आप केवल मंत्र जप करते हैं, केवल हवन करते हैं, केवल मंत्रों का पुरश्चरण करते हैं — आप कभी नियंत्रण नहीं पाएँगे। याद रखिए, अंधकासुर जी, नियंत्रण संभव ही नहीं होगा, क्योंकि हमारी उत्पत्ति ही काम से है। उस पर नियंत्रण पाना इतना आसान नहीं। जिससे हमारा शरीर बना है, क्या उस पर संभव है? उस पर विजय महादेव की कृपा से मिलती है।
एक श्रोता पूछते हैं कि एक विचार है: हम साधना मार्ग पर आगे तो बढ़ रहे हैं, पर काम वासना पर नियंत्रण कैसे पाएँ। वक्ता उत्तर देते हैं कि मैं यह बात फिर से कहता हूँ। आप साधना मार्ग पर हैं; आप केवल मंत्र जप करते हैं, आप केवल हवन करते हैं, आप केवल मंत्रों का पुरश्चरण कर रहे हैं — आप कभी नियंत्रण नहीं पाएँगे। याद रखिए, अंधकासुर जी, नियंत्रण संभव ही नहीं होगा। क्योंकि हमारी उत्पत्ति ही काम से हुई है। उस पर नियंत्रण पाना इतना आसान नहीं। जिससे हमारा शरीर बना है, उस पर — क्या यह संभव है? उस पर विजय महादेव की कृपा से मिलती है।
मंत्र अनुष्ठान के शरीर पर असर के बारे में गुरु गीता क्या कहती है?
ऊर्जा की दिशा, ऊपर या नीचे
वक्ता कहते हैं कि दक्षिणामूर्ति स्वरूप में भगवान, जिन्हें विश्व गुरु स्वरूप, पूरे ब्रह्मांड का परम गुरु कहा गया है — उन्होंने कहा है, और जब भी आप गुरु गीता पढ़ेंगे तो जानेंगे, कि जब भी हम किसी देवी या देवता का मंत्र अनुष्ठान करते हैं, तो उस समय हमारे शरीर पर जो भी असर पड़ रहा है, जो भी हो रहा है, उस सबमें बदलाव आएगा। आपने ऊर्जा की दिशा मोड़कर उसे एकाग्र किया है; वह ऊर्जा बिखरी हुई थी, और जब आप मंत्र जप करते हैं तो वह एक जगह इकट्ठी होकर आप पर चलने लगी।
वक्ता पूछते हैं कि और महादेव क्या कह रहे हैं। दक्षिणामूर्ति स्वरूप में भगवान, जब वे गुरु जो विश्व गुरु स्वरूप हैं, जिन्हें पूरे ब्रह्मांड का परम गुरु कहा गया है — उन्होंने क्या कहा है: कि जब भी हम गुरु गीता पढ़ते हैं, तो उसमें आपको पता चलेगा कि जब भी हम किसी देवी या देवता का मंत्र अनुष्ठान आदि कर रहे होते हैं, तो उस समय हमारे शरीर पर जो भी असर पड़ रहा है, जो भी चीज़ हो रही है — उन सबमें बदलाव आएगा। आपने ऊर्जा की दिशा मोड़कर उसे एकाग्र कर दिया है। वह ऊर्जा बिखरी हुई थी; जब आप मंत्र जप करते हैं तो वह एक जगह इकट्ठी हो गई और आप पर चलने लगी।
यह गति मोक्ष के लिए ऊपर चलती है, और कौल-शाक्त मत नीचे की गति को भी लेता है
मोक्ष के लिए ऊपर, और नीचे की गति पर कौल-शाक्त मत
वक्ता कहते हैं कि दो प्रकार की गति मानी गई है: ऊपर की ओर और नीचे की ओर। जब वह ऊपर जाती है, तो हमारे मोक्ष का मार्ग बनता है। कौल, शाक्त आदि में नीचे की गति से भी मोक्ष माना गया है; भोग को मोक्ष से ऊपर दिखाया गया है। पर जब कोई गृहस्थ है और इस तरह के साधना मार्ग पर चल रहा है, तो उसके लिए कहा गया है कि ये सब बातें शरीर के भीतर, हमारे मस्तिष्क में बन रहे रसायनों, हो रहे रासायनिक बदलावों, बन रहे हार्मोन के कारण ही होती हैं।
वक्ता कहते हैं कि दो प्रकार की गति मानी गई है: ऊपर की ओर, नीचे की ओर। जब वह ऊपर की ओर जाती है, तो हमारे मोक्ष का मार्ग बनता है। कौल, शाक्त आदि में माना गया है कि नीचे की ओर से भी मोक्ष आएगा; भोग को मोक्ष से ऊपर दिखाया गया है। पर जब कोई गृहस्थ है, और जब आप इस तरह के साधना मार्ग पर चल रहे हैं, तो उसके लिए कहा गया है: शरीर के भीतर, हमारे मस्तिष्क में जो भी रसायन बन रहे हैं, जो भी रासायनिक बदलाव हो रहे हैं, जो भी हार्मोन बन रहे हैं — उन्हीं के कारण सारी बातें होती हैं। तो हार्मोन पर नियंत्रण एक बहुत अच्छा विषय है।
कैंसर में रामकृष्ण परमहंस, और वैष्णवों का भाव-प्रदर्शन
रामकृष्ण परमहंस, और वैष्णवों का भाव-प्रदर्शन
वक्ता रामकृष्ण परमहंस की बात करते हैं, जिन्हें जब कैंसर हुआ, तो कैंसर की उस अवस्था में वे भगवती को अत्यधिक समर्पित थे — जैसे, वे कहते हैं, अब हम यूट्यूब पर कुछ भक्तों को देखते हैं, विशेषकर कृष्ण जी के भक्त, वैष्णव लोग, जो ऐसी बातें बहुत दिखाते हैं: भाव में पूरी तरह डूबकर, भजन-कीर्तन करते हुए बेहोश हो जाना, गाना, और पूरा वीडियो वायरल होना। वे इस तरह की भक्ति करते हैं, कि वे कृष्ण चेतना में हैं, कि वे भगवती राधा के बड़े सेवक हैं, और इस तरह अपना भाव इतना दिखाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि रामकृष्ण परमहंस — जब उन्हें कैंसर हुआ था, कैंसर की अवस्था में, क्योंकि वे भगवती को अत्यधिक समर्पित थे। जैसे अब हम यूट्यूब पर कुछ भक्तों को देखते हैं, विशेषकर कृष्ण जी के भक्त, वैष्णव लोग, जो इस तरह की चीज़ें अधिक दिखाते हैं — कि भाव में पूरी तरह डूबकर, भजन-कीर्तन करते हुए वे बेहोश हो रहे हैं, वे गा रहे हैं, और उसका पूरा वीडियो वायरल हो रहा है। वे इस तरह की भक्ति करते हैं, कि वे कृष्ण चेतना में हैं, कि वे भगवती राधा के बहुत बड़े सेवक हैं, और इस तरह वे अपना भाव इतना दिखा रहे हैं।
ऐसा भाव मस्तिष्क में ऐसे रासायनिक बदलाव लाता है जो काम भाव को नष्ट कर देते हैं
रासायनिक बदलाव जो काम भाव को नष्ट करते हैं
वक्ता कहते हैं कि यदि इसे वास्तविक रूप में देखा जाए, तो जब शरीर में इस तरह के भाव आते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में ऐसे रासायनिक बदलाव आते हैं कि काम भाव पूरी तरह नष्ट हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि यदि इसे वास्तविकता के रूप में देखा जाए, तो जब शरीर में इस तरह के भाव आते हैं — तो हमारे मस्तिष्क में उस तरह की चीज़ें, उस तरह के रासायनिक बदलाव आते हैं, जिनके कारण काम भाव पूरी तरह नष्ट हो जाता है।
स्तुति करना सीखें, और उसे गाना सीखें
स्तुति करना सीखें, स्तुति गाना सीखें
वक्ता कहते हैं कि अब आप साधक हैं, तो इस तरह का भाव कैसे लाएँगे — इसके लिए वे बार-बार कहते हैं, स्तुति करना सीखें, स्तुति गाना सीखें। यदि आप शिव जी की साधना करते हैं तो पंडित हीरामेठ जी की स्तुतियाँ सुनें; स्तुति गाना सीखें। यदि भगवती की करते हैं, तो भगवती की स्तुति गाना सीखें, जिस भाव में आपको अच्छा लगे, जिस लय में, जिस सुर और ताल में अच्छा लगे। यदि वीर भाव आपको पसंद है, तो महिषासुर मर्दिनी वीर भाव में करें; यदि सौम्य भाव में करना चाहें, तो उसी अनुसार करें।
वक्ता कहते हैं कि अब आप साधक हैं, तो इस तरह का भाव कैसे लाएँगे — इसके लिए मैं बार-बार कहता हूँ: स्तुति करना सीखें। स्तुति गाना सीखें। अंधिकासुर जी, यदि आप शिव जी की साधना करते हैं, तो पंडित हीरामेठ जी की स्तुतियाँ सुनें। स्तुति गाना सीखें। यदि आप भगवती की करते हैं, तो भगवती की स्तुति गाना सीखें — जिस भाव में आपको अच्छा लगे, जिस लय में अच्छा लगे, जिस सुर और ताल में अच्छा लगे; उसी अनुसार करना सीखें। यदि वीर भाव आपको पसंद है, तो महिषासुरमर्दिनी वीर भाव में करें। यदि सौम्य भाव में करना चाहें, तो उसी अनुसार करें।
स्तुति के साथ अपने इष्ट के पुराण का एक अध्याय
अपने इष्ट के पुराण का एक अध्याय
वक्ता कहते हैं कि जब आप वह करें, और साथ में — वे बार-बार कहते हैं — अपने इष्ट के पुराण का एक अध्याय। आपके इष्ट जो भी हों: यदि भगवती हैं, तो श्रीमद्देवीभागवत लाएँ, स्कंद पुराण लाएँ, एक-एक अध्याय पढ़ें। उसमें आपको ऐसी बातें पढ़ने को मिलेंगी कि आपका मन इस दिशा में जाएगा ही नहीं।
वक्ता कहते हैं कि जब आप वह करेंगे, और उसके साथ, मैं बार-बार कह रहा हूँ: अपने इष्ट के पुराण का एक अध्याय। आपके इष्ट जो भी हों — यदि भगवती हैं, तो श्रीमद्देवीभागवतम् लाएँ, स्कंद पुराण लाएँ; एक-एक अध्याय पढ़ें। उसमें आपको ऐसी बातें पढ़ने को मिलेंगी कि आपका मन इस दिशा में जाएगा ही नहीं।
नींद में भी दर्शन होते हैं, और मन को भटकने का समय नहीं मिलता
नींद में दर्शन, और मन को भटकने का समय नहीं
वक्ता कहते हैं कि सोते समय भी ऐसी अवस्था बनेगी कि सोते हुए भी आपको भगवती के दर्शन होंगे; उनके स्थानों की दिव्यता का अनुभव आपको होने लगेगा। आपको समय ही नहीं मिलेगा; एक समय आएगा जब स्त्रियों को देखकर आप स्वयं कहेंगे कि एक समय था जब ऐसा होता था, और अब ऐसा है। पर यदि आप केवल मंत्र जप करेंगे, तो इसे नियंत्रित नहीं कर पाएँगे। इसलिए ये दो बातें जीवन में उतारें — स्तुति, और अपने आराध्य से जुड़े पुराणों का पाठ; और यदि रोज़ न कर सकें, तो हफ्ते में कम से कम एक-दो बार करें, पर करें।
वक्ता कहते हैं कि सोते समय भी ऐसी अवस्था बन जाएगी कि सोते हुए भी आपको भगवती के दर्शन होंगे। उनके स्थानों की दिव्यता का अनुभव आपको होने लगेगा। आपको समय ही नहीं मिलेगा; एक समय ऐसी अवस्था आएगी कि स्त्रियों को देखकर आप स्वयं कहेंगे: अरे, एक समय था जब ऐसा होता था, और अब ऐसा है। पर यदि आप केवल मंत्र जप करेंगे, तो आप इसे नियंत्रित नहीं कर पाएँगे। इसलिए ये दो बातें अपने जीवन में उतारें: स्तुति, और अपने आराध्य से जुड़े पुराणों का पाठ। यदि रोज़ न कर सकें, तो हफ्ते में कम से कम एक-दो बार करें — पर करें।
माँ भुवनेश्वरी जयंती की सरल पूजा विधि क्या है?
लाइव में केवल सहस्रनाम की बात हो सकती है
वक्ता कहते हैं कि लाइव में, इस तरह की सरल पूजन विधि में वे केवल सहस्रनाम की बात कर सकते हैं। बाकी पंचांग सेवन अलग से बताना होगा, उनके भैरव और गणपति से जुड़ी हर चीज़ लेकर। एक ऐसी चालीसा के बारे में पूछे जाने पर जिसमें चौपाइयों के साथ दोहे भी हैं और संख्या चालीस से अधिक हो जाती है, वे कहते हैं कि ठीक है, कोई दिक्कत नहीं; चौपाइयों पर चक्र विधि लगाएँ, और दोहों पर भी लगा सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि माँ भुवनेश्वरी जयंती की सरल पूजा विधि बताइए। वक्ता उत्तर देते हैं कि अभी, लाइव में, इस तरह की सरल पूजन विधि में वे केवल सहस्रनाम की बात कर सकते हैं। बाकी पंचांग सेवन अलग से बताना होगा, उनके भैरव से जुड़ी और गणपति से जुड़ी हर चीज़ लेकर। दूसरे श्रोता पूछते हैं कि एक चालीसा में चौपाई के साथ कुछ दोहे भी हैं, इसलिए संख्या चालीस से आगे जाती है। वे उत्तर देते हैं कि ठीक है, आप कर सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं; चौपाइयों में चक्र विधि लगाएँ, और दोहों में भी लगा सकते हैं।
यदि नवार्ण मंत्र रोज़ किया जाए, तो क्या रोज़ संकल्प लेना ज़रूरी है?
बिना दीक्षा के नवार्ण करना उचित नहीं
वक्ता उत्तर देते हैं कि विपुल गौड़ जी, यदि आप दीक्षित हैं, तो अपने गुरु से उसकी शर्त जानकर विधि-विधान से नवार्ण मंत्र करें। यदि आप दीक्षित नहीं हैं और सामान्य रूप से एक-आध माला करना चाहते हैं, तो संकल्प की वैसे ज़रूरत नहीं — मानसिक संकल्प; फिर भी कुछ विशेष हो तो ले सकते हैं। पर बिना दीक्षा के नवार्ण करना बिल्कुल उचित नहीं।
क्या आत्मरक्षा के लिए भगवान दत्तात्रेय का वज्र कवच पढ़ा जा सकता है?
हाँ — वज्र पंजर कवच आदि
वक्ता कहते हैं कि अवश्य — वज्र पंजर कवच, वज्र कवच, दत्तात्रेय वज्र: इन सबका पाठ किया जा सकता है। पुरश्चरण आदि का विधान उन्हें अलग से बताना होगा; या आप फलश्रुति में देखकर उसी अनुसार कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं: तारकासुर जी — गुरु जी, क्या आत्मरक्षा के लिए भगवान दत्तात्रेय के वज्र कवच का पाठ किया जा सकता है; विधान क्या होगा। वक्ता उत्तर देते हैं कि अवश्य — वज्र पंजर कवच, वज्र कवचम्, दत्तात्रेय वज्र: इन सबका पाठ किया जा सकता है। पुरश्चरण आदि का विधान उन्हें अलग से बताना होगा। या आप फलश्रुति में देखकर उसी अनुसार भी कर सकते हैं।
क्या माँ तारा के अष्टोत्तर शतनाम का सहस्र जप पुरश्चरण घर पर किया जा सकता है?
हाँ, भगवती के उसी रूप के सामने जो आप पहले से रखते हैं
वक्ता कहते हैं कि हाँ, किया जा सकता है, कोई दिक्कत नहीं। इसे भगवती के सामने करें; उनका स्वरूप स्थापित करने की ज़रूरत नहीं — भगवती का जो स्वरूप आपने रखा है, उसी के सामने अनुष्ठान कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या माँ तारा के अष्टोत्तर शतनाम का सहस्र जप पुरश्चरण घर पर किया जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, किया जा सकता है, कोई दिक्कत नहीं। इसे भगवती के सामने करें; उनके स्वरूप की स्थापना करने की ज़रूरत नहीं। भगवती का जो स्वरूप आपने रखा है, उसी के सामने आप अनुष्ठान कर सकते हैं।
आंशिक ग्रहण में घर का मंदिर बंद हो, तो रुद्रगण साधना कहाँ करें?
मंडप के बाहर पर मंदिर क्षेत्र के भीतर
आकाश जी पूछते हैं कि आंशिक ग्रहण के समय जब घर का पूजा स्थान या मंदिर बंद हो, तो रुद्रगण साधना कैसे करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि इसे मंदिर के बाहर करना है; ज़रूरी नहीं कि हम मंदिर में ही करें। मंदिर का कुछ क्षेत्र होगा — बरामदा आदि; वहाँ करें। मंडप से दूर।
आकाश जी ने लिखा है: रुद्रगण साधना के लिए, आंशिक ग्रहण के समय, यदि घर का पूजन स्थान या मंदिर बंद हो, तो कैसे करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि इसे मंदिर के बाहर करना है; ज़रूरी नहीं कि हम मंदिर में ही करेंगे। मंदिर का कुछ क्षेत्र होगा — बरामदा आदि; वहाँ करें। मंडप से दूर।
लौंग और पान के पत्तों का विसर्जन कहाँ करना चाहिए?
नदी में, या देव वृक्ष के नीचे विसर्जन
यह पूछे जाने पर कि लौंग और पान के पत्ते आदि का विसर्जन नदी में करें या देव वृक्ष के नीचे, वक्ता कहते हैं: नदी में, या देव वृक्ष के नीचे।
एक श्रोता पूछते हैं कि लौंग, पान का पत्ता और यह सब — विसर्जन नदी में करें या देव वृक्ष के नीचे। वक्ता उत्तर देते हैं कि नदी में, या देव वृक्ष के नीचे।
किसी भगत ने किसी के ऊत पितरों को बाँध दिया है और छोड़ नहीं रहा — क्या करना चाहिए?
ऊतों पर गणपति का शासन है, इसलिए उनका पूजन पहले
वक्ता कहते हैं कि माही ब्लॉग जी, दो काम करने होंगे। यदि वे ऊत हैं, तो ऊत पर भगवान श्री गणेश का शासन चलता है — यह जानकारी आप सबको होनी चाहिए। क्योंकि बाल गणेश के रूप में भगवान गणपति, और बटुक भैरव, दोनों — मुख्य रूप से गणपति की पूजा से ऊतों को क्षमता और शक्ति मिलती है। क्योंकि भगवान गणपति के साथ कुछ तंत्रोक्त बातें हैं: बस इतने से समझिए कि भगवान श्री गणपति का सिर काटा गया था। बाकी रहस्य पुराणों में हर बात के लिए लिखकर नहीं बताया गया है।
एक श्रोता लिखते हैं कि एक भगत ने ऊत पितरों का बंधन कर दिया है; वे उन्हें बंधन से छुड़ा नहीं पा रहे; भगत चौकी लगाता है, और किसी शक्ति की उपासना करनी है — कृपया मार्गदर्शन करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि माही ब्लॉग जी, दो काम करने होंगे। यदि वे ऊत हैं, तो ऊत पर भगवान श्री गणेश का शासन चलता है — यह जानकारी आप सबको होनी चाहिए। क्योंकि बाल गणेश के रूप में भगवान गणपति, और बटुक भैरव — मुख्य रूप से गणपति की पूजा से ऊतों को क्षमता और शक्ति मिलती है। क्योंकि भगवान गणपति के साथ बातें थोड़ी तंत्रोक्त हो जाती हैं — जैसे जब भगवान श्री गणपति का सिर काटा गया: बस इतने से समझिए। बाकी पूरा रहस्य पुराणों में हर बात के लिए लिखकर नहीं बताया गया है।
गणपति का पूजन घर के ऊतों के लिए क्या करता है?
वे प्रसन्न होते हैं और उन्हें क्षमता मिलती है
वक्ता कहते हैं कि और टीकाकार ऐसी टीका करते हैं कि मन बिगड़ जाता है। इसलिए ऐसी बहुत सी बातें हैं जो गुरु परंपरा में मिलती हैं, और उसी के अनुसार वे आपको बता रहे हैं: जब आप भगवान श्री गणपति का पूजन करते हैं, तो उससे घर के ऊत — जो आपके घर के हों — बहुत प्रसन्न होते हैं, और गणपति कृपा करके उन्हें क्षमता देते हैं; घर के लिए उनकी स्थिति ठीक हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि और जो टीकाकार हैं वे ऐसी टीका करते हैं कि फिर मन बिगड़ जाता है। इसलिए ऐसी बहुत सी बातें हैं जो गुरु परंपरा में मिलती हैं; उसी के अनुसार हम आपको बता रहे हैं। जब आप भगवान श्री गणपति का पूजन करेंगे, तो उससे घर के ऊत बहुत प्रसन्न होते हैं — जो आपके घर के हों — और गणपति कृपा करके उन्हें क्षमता देते हैं; घर के लिए उनकी स्थिति ठीक हो जाती है।
पृथ्वी पर भगवती का मणिद्वीप कहाँ माना गया है?
काशी और प्रयाग के बीच का क्षेत्र — विंध्याचल क्षेत्र
वक्ता कहते हैं कि बड़े रूप में देखें तो भगवती का लोक मणिद्वीप है। पृथ्वी पर — वे दूसरों के बारे में नहीं जानते, पर देवी भागवत महापुराण के अनुसार — जो क्षेत्र बनता है वह काशी और प्रयाग के बीच का क्षेत्र है। प्रयागराज को सब तीर्थों का राजा कहा गया है, और सात पुरियों को उनकी रानियाँ कहा गया है; और काशी विश्वनाथ का क्षेत्र — इन दोनों क्षेत्रों के बीच मणिद्वीप का क्षेत्र बनता है, जो विंध्याचल क्षेत्र है।
वक्ता कहते हैं कि जब भगवती का जो स्वरूप स्थापित है, या कुल की देवी — आइए, इसे बड़े रूप में देखें — भगवती का लोक मणिद्वीप है। इसे पृथ्वी पर माना गया है। वे दूसरे लोगों के बारे में नहीं जानते, पर देवी भागवत महापुराण के अनुसार जो क्षेत्र बनता है वह काशी और प्रयाग के बीच का क्षेत्र है। प्रयागराज को सब तीर्थों का राजा कहा गया है; सात पुरियों को उनकी रानियाँ कहा गया है। और काशी विश्वनाथ का क्षेत्र — इन दोनों क्षेत्रों के बीच मणिद्वीप का क्षेत्र बनता है, जो विंध्याचल क्षेत्र है।
आज के शक्ति पीठों के बारे में क्या जानना चाहिए?
वे केवल छाया तीर्थ हैं; मुख्य गुप्त है
वक्ता कहते हैं कि चाहे विंध्य क्षेत्र हो या आज की स्थिति में कोई भी शक्ति पीठ क्षेत्र, सबको यह जानकारी होनी चाहिए: कि यह केवल छाया है, केवल छाया। छाया का अर्थ होगा कि यह केवल छाया तीर्थ है; मुख्य रूप से यह वह नहीं है — मुख्य गुप्त है।
वक्ता कहते हैं कि और चाहे विंध्य क्षेत्र हो, या आज की स्थिति में किसी भी शक्ति पीठ का क्षेत्र हो, सबको यह जानकारी होनी चाहिए: कि यह केवल छाया है, केवल छाया। छाया का अर्थ होगा कि यह केवल छाया तीर्थ है। मुख्य रूप से यह वह नहीं है। मुख्य गुप्त है।
वहाँ भगवती के चारों ओर गणपति और बटुक भैरव कैसे स्थित हैं?
बाल स्वरूप में, अलग-अलग द्वारों पर
वक्ता कहते हैं कि वहाँ, भगवती का जो स्वरूप है उसमें, वहाँ के बटुक भैरव और वहाँ के गणपति दोनों अपने बाल स्वरूप में हैं, और बाल स्वरूप में वे भगवती के पूर्व की रक्षा के रूप में अलग-अलग द्वारों पर स्थापित हैं। तो एक द्वार के एक ओर गणपति, दूसरी ओर भैरव; फिर दूसरी ओर एक और गणपति, एक और भैरव — बहुत से गण गणपति और बहुत से भैरव वहाँ स्थापित हैं, या उन्हें वह स्थान दिया गया है।
वक्ता कहते हैं कि तो वहाँ, जब भगवती का स्वरूप है, उसमें जो बटुक भैरव हैं और जो गणपति हैं — वे दोनों अपने बाल स्वरूप में हैं। और बाल स्वरूप में वे भगवती के पूर्व की रक्षा के रूप में, अलग-अलग द्वारों पर स्थापित हैं। तो द्वार के एक ओर गणपति, दूसरी ओर भैरव; फिर दूसरी ओर एक और गणपति, एक और भैरव — इस तरह बहुत से गण गणपति और बहुत से भैरव वहाँ स्थापित हैं, या उन्हें वह स्थान दिया गया है।
देवी भागवत महापुराण से साफ होता है कि कितने गणपति हो सकते हैं
देवी भागवत पढ़ें तो समझ आ जाएगा
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए वे कहते हैं: जब आप देवी भागवत महापुराण पढ़ेंगे तो समझ आएगा कि कितने गणपति हो सकते हैं। हम लोग केवल एक गजानन जानते हैं, एक गणपति जानते हैं — बहुत, बहुत से गणपति हैं; बहुत और बहुत से भैरव हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए कहा जाता है: जब आप देवी भागवत महापुराण पढ़ेंगे, तो समझ आएगा कि कितने गणपति हो सकते हैं। हम लोग केवल एक गजानन जान रहे हैं, एक गणपति जान रहे हैं। बहुत, बहुत से गणपति हैं; बहुत और बहुत से भैरव हैं।
ऊत पितर बँधे हों तो फिर उपाय क्या है?
धूप और दूर्वा से गणपति का सहस्रार्चन, फिर अर्गला हवन
वक्ता कहते हैं कि जब भी ऊत पितर बंधन में हों, तो सबसे पहले गणपति का पूजन करें; धूप और दूर्वा से उनका सहस्रार्चन करें। दूसरा, अर्गला के पहले मंत्र से हवन करें — घर का जो पहला पुरुष है, यानी सबसे बड़ा बेटा, वह करे, यदि उसके लिए संभव हो; या यदि स्वयं करना न आता हो तो किसी योग्य ब्राह्मण से करवाएँ।
वक्ता कहते हैं कि तो जब भी ऊत पितर बंधन में हों, तो सबसे पहले गणपति का पूजन करें; धूप और दूर्वा से उनका सहस्रार्चन करें। दूसरा, अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र से हवन करें। घर का जो पहला पुरुष है, यानी सबसे बड़ा बेटा, वह करे, यदि उसके लिए संभव हो। या किसी योग्य ब्राह्मण से करवाएँ, यदि आपको स्वयं करना नहीं आता।
पाँच माला आहुति, गणपति के लिए एक सौ आठ, तीन महीने तक
पाँच माला आहुति, गणपति के लिए एक सौ आठ, तीन महीने
वक्ता कहते हैं कि लगाया जा रहा बंधन कितना भी बड़ा हो, यदि आप सब लगातार करना शुरू करें — इसे अमावस्या के दिन ही करना है; ठीक से करें। हो सके तो कम से कम पाँच माला आहुति दें, और भगवान श्री गणपति के लिए एक सौ आठ आहुतियाँ दिलवाएँ। इतना करना शुरू करें; कम से कम तीन महीने, और तीन अमावस्याओं के बाद आपको बातें समझ आने लगेंगी।
वक्ता कहते हैं कि जो बंधन लगाया जा रहा है वह कितना भी बड़ा हो, यदि आप सब लगातार करना शुरू करें — इसे अमावस्या के दिन ही करना है; ठीक से करें। यदि संभव हो, तो कम से कम पाँच माला आहुति दें। और भगवान श्री गणपति के लिए एक सौ आठ आहुतियाँ दिलवाएँ। इतना करना शुरू करें; कम से कम तीन महीने — तीन अमावस्याओं के बाद आपको बातें समझ आने लगेंगी।
क्या उग्र देवता वाले इष्ट की साधना से धन मिल सकता है?
ऐसा कोई स्वरूप नहीं जो धन देने में असमर्थ हो
वक्ता कहते हैं कि ऐसा कोई स्वरूप है ही नहीं जो धन देने में समर्थ न हो। एक ऐसे देवी या देवता का नाम बताइए जिनके हाथ में अस्त्र न हो, या जिन्होंने आभूषण-गहने आदि न पहने हों। हर देवी और देवता के तीन स्वरूप होते हैं, चाहे वे कितने भी उग्र हों। स्वयं भगवती महाकाली सिर से पैर तक सोने-चाँदी से लदी रहती हैं; वे भी सोलह श्रृंगार करती हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि यदि इष्ट कोई उग्र देवी या देवता हैं, तो इष्ट की साधना से ही पैसे की समस्या कैसे हल हो सकती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि ऐसा कोई स्वरूप है ही नहीं जिसमें वे धन देने में समर्थ न हों। एक ऐसे देवी या देवता का नाम बताइए जिनके हाथ में अस्त्र न हो, या जिन्होंने गहने-आभूषण आदि न पहने हों। हर देवी और देवता के तीन स्वरूप होते हैं, चाहे वे कितने भी उग्र हों। स्वयं भगवती महाकाली ऊपर से नीचे तक सोने-चाँदी से लदी रहती हैं। वे भी सोलह श्रृंगार करती हैं।
केवल संकल्प बदलें, जिस स्वरूप की सेवा करते हैं उसे कभी नहीं
केवल संकल्प बदलें
वक्ता कहते हैं कि इसलिए यह उचित बात नहीं कि धन पाने के लिए आपका आकर्षण किसी दूसरे रूप की ओर हो। उनके उसी स्वरूप की सेवा करें; केवल संकल्प बदलें। संकल्प अपना रखें।
वक्ता कहते हैं कि इसलिए यह उचित बात नहीं कि धन पाने के लिए आपका आकर्षण किसी दूसरे रूप की ओर हो। उनके उसी स्वरूप की सेवा करें। केवल संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। बदलें। संकल्प अपना रखें।
स्वप्न दोष और उससे जुड़े अपराध-बोध के बारे में वक्ता क्या कहते हैं?
थका हुआ शरीर, और एक ही आसन में लंबे समय तक बैठना
एक श्रोता कहते हैं कि यह सच है कि स्वप्न दोष को लेकर अपराध-बोध होता है और अलग वीडियो माँगते हैं। वक्ता कहते हैं कि तारकासुर जी, एक बार सुनिए। दूसरी बात वही है जो उन्होंने कही: केवल सोचने से यह नहीं होगा। और ज़रूरी नहीं — जब शरीर थका रहता है, तो इस तरह की परेशानी होती है, विशेषकर साधकों के साथ, जब आप बहुत अधिक मंत्र जप करते हैं और पैर लंबे समय तक, तीन घंटे, चार घंटे एक ही आसन में रहते हैं। शरीर में थकान आ ही जाती है। मंत्र की ऊर्जा अलग बात है। यदि आप प्राणायाम नहीं कर रहे, सूर्य नमस्कार आदि नहीं कर रहे, तो परेशानी होगी।
एक श्रोता लिखते हैं कि यह सच है कि स्वप्न दोष को लेकर अपराध-बोध होता है; इस बात पर अलग वीडियो डालिए। वक्ता कहते हैं कि तारकासुर जी, एक बार सुनिए। दूसरी बात वह है जो हमने कही: कि केवल सोचने से यह बात नहीं होगी। और ज़रूरी नहीं — जब शरीर थका रहता है, तो इस तरह की परेशानी होती है, विशेषकर साधकों के साथ: जब आप अधिक मंत्र जप करते हैं, पैर लंबे समय तक, तीन घंटे, चार घंटे, एक ही आसन में रहते हैं। शरीर में थकान आ ही जाती है। मंत्र की ऊर्जा अलग बात है। यदि आप प्राणायाम नहीं कर रहे, यदि आप सूर्य नमस्कार आदि नहीं कर रहे, तो कठिनाई होगी।
इसे पहले शारीरिक रूप से रोका जाता है — प्राणायाम को जीवन में लाएँ
पहले शारीरिक रूप से — प्राणायाम को जीवन में लाएँ
वक्ता कहते हैं कि इसे रोकने के लिए, पहले शारीरिक रूप से — क्योंकि यह बात शारीरिक रूप से हो रही है। कहीं न कहीं श्रेणी के कारण शरीर में उस तरह की बातें हो रही हैं, और इस कारण उस तरह की गतिविधि होती है। वे जोड़ते हैं कि आप निश्चित रूप से कुछ भी नहीं सोच रहे होंगे, पर यह अपने आप होता है। इसलिए इस बात के लिए अपने जीवन में प्राणायाम आदि करें; उसे उतारें। करने में पंद्रह मिनट लगेंगे।
वक्ता कहते हैं कि तो इसे रोकने के लिए, पहले शारीरिक रूप से — क्योंकि यह बात शारीरिक रूप से हो रही है न। कहीं न कहीं श्रेणी के कारण शरीर में उस तरह की बातें हो रही हैं। इस कारण उस तरह की गतिविधि। वे कह रहे हैं कि यह ज़रूरी है — आप निश्चित रूप से कुछ भी नहीं सोच रहे होंगे, पर यह अपने आप होता है। यह आप समझ रहे हैं। इसलिए इस बात के लिए आपको अपने जीवन में प्राणायाम आदि करना चाहिए। उसे उतारें। करने में पंद्रह मिनट लगेंगे।
क्या कोई व्यक्ति अपने इष्ट की कृपा से किसी भी युग में जाकर पूरी कथा अपनी आँखों से देख सकता है?
सिद्धों के लिए संभव — और वे गुप्त क्षेत्र जहाँ वे रहते हैं
वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, सिद्धों के लिए यह संभव है। आप और हम इतने सक्षम नहीं बन सकते; और यदि हम इतने सक्षम बन जाते, तो उनके पास यूट्यूब पर आकर आपसे बात करने का इतना समय नहीं होता। इसलिए यह संभव है; यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि संभव नहीं। आज भी हिमालय क्षेत्र में ऐसे सिद्ध हैं। हिमालय क्षेत्र अपने आप में महा-गुप्त क्षेत्र है; विंध्य क्षेत्र भी अपने भीतर ऐसे बहुत से रहस्य समेटे हुए है। इन क्षेत्रों में ऐसे लोग हैं, पर वे दूसरों के सामने आना नहीं चाहते, न कोई ऐसा करता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि आज के समय में क्या कोई व्यक्ति अपने इष्ट की भक्ति से और उनकी कृपा से किसी भी युग में जाकर पूरी कथा अपनी आँखों से देख सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, सिद्धों के लिए यह संभव है। आप और हम इतने सक्षम नहीं बन सकते; और यदि हम इतने सक्षम बन जाते, तो उनके पास इतना समय नहीं होता कि हम यूट्यूब पर आकर आपसे बात करें। ठीक — तो यह संभव है; यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि यह संभव नहीं। आज भी हिमालय क्षेत्र में ऐसे सिद्ध हैं। हिमालय क्षेत्र अपने आप में महा-गुप्त क्षेत्र है। विंध्य क्षेत्र ने भी अपने भीतर ऐसे बहुत से रहस्य समेट रखे हैं। इन क्षेत्रों में ऐसे लोग हैं, पर वे दूसरों के सामने आना नहीं चाहते, न कोई ऐसा कुछ करता है।
क्या विशेष मंत्र विधान से ली गई विशेष औषधियाँ विशेष सिद्धियाँ देती हैं?
हाँ — पर केवल उनके लिए जो इन चीज़ों पर नियंत्रण चाहते हैं
वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, होता है; अवश्य होता है — एक ही रात में होता है। पर यह केवल ऐसे लोगों के लिए है जो इन सब चीज़ों पर नियंत्रण पाना चाहते हैं, या जो किसी विशेष कारण से इन्हें लेते हैं। जैसे, वे कहते हैं, भारतीय सेना को ऐसी चीज़ें दी जाती हैं जो विशेष परिस्थिति में खाने पर तीन-चार दिन भूख नहीं लगने देतीं और शरीर में किसी चीज़ की कमी नहीं होने देतीं। पर यदि आप और हम उसे किसी तरह पाकर खाने की कोशिश करें, तो केस दर्ज हो जाएगा।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या विशेष मंत्र विधान से विशेष औषधियों का सेवन करने से विशेष सिद्धियाँ आती हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, आती हैं। अवश्य आती हैं। यह एक ही रात में होता है। पर यह केवल ऐसे लोगों के लिए है जो इन सब चीज़ों पर नियंत्रण पाना चाहते हैं, या जो किसी विशेष कारण से इनका सेवन करते हैं। जैसे भारतीय सेना को ऐसी चीज़ें दी जाती हैं, जो विशेष परिस्थिति में खाने पर तीन-चार दिन भूख नहीं लगने देतीं और शरीर में किसी चीज़ की कमी नहीं आने देतीं। पर यदि आप और हम उसे किसी भी तरह पाकर खाने का प्रयास करें, तो केस दर्ज हो जाएगा।
घर से ब्रह्मराक्षस को कैसे भगाया जा सकता है?
वह आपको भगा देगा — और गीता का ग्यारहवाँ अध्याय ग्यारह बार
वक्ता उत्तर देते हैं कि भाई, वह आपको भगा देगा — आप उसे कहाँ से भगा पाएँगे। यदि आप उसे भगाने जाएँगे, तो हो गया। ऐसा नहीं है कि कोई बंदर निकल आया है और आप पूछ रहे हैं कि डंडे से कैसे भगाएँ। फिर भी, मनु पुजारी जी, वे कहते हैं: एकादशी से शुरू करके, जितने लंबे समय तक हो सके बिना रुके, रोज़ सुबह गीता के ग्यारहवें अध्याय का ग्यारह बार पाठ करें, और शाम को फिर ग्यारह बार; फिर थोड़ा देखें कि क्या होता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि घर से ब्रह्मराक्षस को कैसे भगाया जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि भाई, वह आपको भगा देगा — आप उसे कहाँ से भगा पाएँगे। यदि आप उसे भगाने जाएँगे, तो हो गया। ऐसा नहीं है कि कोई बंदर निकल आया है और आप पूछ रहे हैं कि डंडे से कैसे भगाएँ। फिर भी, मनु पुजारी जी: रोज़ सुबह श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का ग्यारह बार पाठ करें, और शाम को फिर ग्यारह बार; एकादशी से शुरू करके, जितने लंबे समय तक हो सके लगातार करते रहें। फिर थोड़ा अनुभव देखें कि क्या होता है।
क्या बाबा कीनाराम का जन्म अघोर चतुर्दशी को हुआ था?
हाँ — यह सही है
एक श्रोता कहते हैं कि बाबा कीनाराम का प्राकट्य अघोर चतुर्दशी के दिन ही हुआ था। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह सही है — बाबा कीनाराम, अघोरी।
एक श्रोता लिखते हैं कि भाई, बाबा कीनाराम का प्राकट्य अघोर चतुर्दशी के दिन ही हुआ था। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह सही बात है। बाबा कीनाराम, अघोर वाले।
सबसे बड़ी तंत्र क्रियाओं को काटने के लिए क्या करना चाहिए?
बहुत से विधान हैं — पर सब कुछ प्रारब्ध से जुड़ा है
वक्ता कहते हैं कि बहुत से विधान हैं और बताए भी गए हैं। पर एक बात हमेशा याद रखें: चाहे आप पर तंत्र विचार किया जा रहा हो, चाहे पिशाच या प्रेत का दोष लग रहा हो, चाहे देव दोष लग रहा हो, ये सब हमारे प्रारब्ध से जुड़े हैं। और हमारा सामान्य अनुष्ठान उसी अनुपात में हो — तभी उसका कटना होता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि सबसे बड़ी तंत्र क्रियाओं को काटने के लिए क्या करना चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि बहुत से विधान हैं, और बताए भी गए हैं। पर एक बात हमेशा याद रखें: चाहे आप पर तंत्र विचार किया जा रहा हो, चाहे पिशाच या प्रेत का दोष लग रहा हो, चाहे देव दोष लग रहा हो — ये सब हमारे प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। से जुड़े हैं। और हमारा सामान्य अनुष्ठान उसी अनुपात में हो; तभी उसका कटना होता है।
चौबीस लाख जप का गायत्री महापुरश्चरण ज़रूरी बल का माप है
चौबीस लाख का गायत्री महापुरश्चरण
वक्ता कहते हैं कि उदाहरण के लिए मान लीजिए कि हमने गायत्री का महापुरश्चरण, यानी चौबीस लाख जप, किया है। तो भगवती की कृपा से ऐसे साधक को ऐसी क्षमता मिलती है कि यदि कोई अविचार से पीड़ित व्यक्ति उसके सामने बैठे और वह संकल्प करके उसे गायत्री से अभिमंत्रित जल आदि पिलाए, तो प्रारब्ध कितना भी बड़ा हो, उसे राहत मिलेगी।
वक्ता कहते हैं कि जैसे, मान लीजिए — हम उदाहरण के लिए गायत्री मंत्र की बात कर रहे हैं — मान लीजिए कि हमने गायत्री का महापुरश्चरण, यानी चौबीस लाख जप, किया है। तो भगवती की कृपा से ऐसे साधक को ऐसी क्षमता मिलती है कि यदि कोई अविचार से पीड़ित व्यक्ति उसके सामने बैठे, और वह संकल्प करके उसे गायत्री से अभिमंत्रित जल आदि पिलाए — तो प्रारब्ध कितना भी बड़ा हो, किसी भी प्रकार का हो, उसमें उन्हें राहत मिलेगी।
पीछे छोटा अनुष्ठान हो तो असर कम होता है, या पड़ता ही नहीं
असर कम होगा, या पड़ेगा ही नहीं
वक्ता कहते हैं कि पर यदि किसी ने छोटा अनुष्ठान किया है और वह यह करे — जैसे किसी ने केवल सवा लाख जप किया है, और वह जप करे — तो उसका असर कम पड़ेगा, या पड़ेगा ही नहीं। इसलिए यह इस पर निर्भर है कि आपके पास जप और तप का कितना बल है, और सामने वाले पीड़ित व्यक्ति को उसके प्रारब्ध के अनुसार अभी कितना कष्ट पाना बाकी है। यह इन दोनों बातों पर निर्भर है।
वक्ता कहते हैं कि पर यदि किसी ने छोटा अनुष्ठान किया है और वह यह करे — जैसे किसी ने केवल सवा लाख जप किया है, और वह जप करेगा — तो उसका असर कम पड़ेगा, या पड़ेगा ही नहीं। इसलिए यह इस पर निर्भर है कि आपके पास जप और तप का कितना बल है। और सामने वाले व्यक्ति के लिए, जिसे यह पीड़ा है, उसके प्रारब्ध के अनुसार अभी उसे कितना कष्ट और पाना बाकी है। यह इन दोनों बातों पर निर्भर है।
तारा स्तोत्र को कैसे सिद्ध करें?
वक्ता मना करते हैं — और घर पर इसकी सीमा बताते हैं
माता तारा स्तोत्र को सिद्ध करने की विधि पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: भाई, तारा स्तोत्र की हम नहीं बता सकते। ये सब चीज़ें घर पर बहुत ज़्यादा न करें। एक सीमा तक करें, जितना बताया गया है।
एक श्रोता पूछते हैं कि माता तारा स्तोत्र को सिद्ध करने की विधि बताइए। वक्ता उत्तर देते हैं कि भाई, तारा स्तोत्र की हम नहीं बता सकते। ये सब चीज़ें घर पर बहुत ज़्यादा न करें। एक सीमा तक करें — जितना बताया गया है।
"कंचन थाल विराजत" में कंचन क्या है?
कंचन यानी सोना — सोने का थाल
विपिन कुमार सिंह जी पूछते हैं कि "कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती" में कंचन क्या है। वक्ता कहते हैं: कनक, कंचन — वह दोहा याद करते हुए जिसमें कनक में सौ गुना अधिक नशा बताया गया है, कि उसे खाने वाला भी बौरा जाता है और पाने वाला भी, जो आपने कहीं सुना या पढ़ा होगा। तो कंचन थाल का अर्थ है सोने का थाल; कंचन का अर्थ है सोना, स्वर्ण। सोने के थाल में कपूर और बाती से भगवती की आरती हो रही है।
विपिन कुमार सिंह जी ने पूछा है: कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती — इसमें कंचन क्या है; कंचन किसे कहते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि कनक, कंचन। कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। वा खाये बौराय जग, या पाये बौराय॥ — आपने सुना होगा, कहीं पढ़ा है। तो कंचन थाल का अर्थ हो गया सोने का थाल। कंचन का अर्थ हो गया सोना, स्वर्ण। सोने के थाल में, यदि भगवती की आरती कपूर और बाती से हो रही है।
नील सरस्वती की सरल सेवा क्या है?
भगवती तारा ही माँ नील सरस्वती हैं
वक्ता कहते हैं कि भगवती तारा ही माँ नील सरस्वती हैं; पूरा समय उन्हीं का है — अघोर अमावस्या, अघोर चतुर्दशी। सीधे कहें तो, आनंद भास्कर जी, वे केवल इतना कहते हैं: सरल विधि-विधान में आप उनके स्तोत्र आदि का सामान्य पाठ कर सकते हैं। यदि आप विशेष विधि-विधान से उनकी सेवा चाहते हैं, तो सामान्य तरीके से, चाहे जितना करें, यह संभव ही नहीं होगा, क्योंकि फिर चीज़ें उनके अनुसार रखनी होंगी।
एक श्रोता पूछते हैं कि नील सरस्वती की कोई सरल सेवा बताइए, जो आसानी से की जा सके। वक्ता उत्तर देते हैं कि भगवती तारा ही माँ नीलसरस्वती हैं; पूरा समय उन्हीं का है। अघोर अमावस्या, अघोर चतुर्दशी — और सीधे कहें तो, आनंद भास्कर जी, हम केवल इतना कहेंगे: सरल विधि-विधान में आप उनके स्तोत्र आदि का सामान्य पाठ कर सकते हैं। यदि आप विशेष विधि-विधान से उनकी सेवा चाहते हैं, तो सामान्य तरीके से, चाहे जितना करें, यह संभव ही नहीं होगा। क्योंकि फिर चीज़ें उनके अनुसार रखनी होंगी।
ऐसी सेवा कितने दिन तक रखी जा सकती है?
सात या ग्यारह दिन — नित्य संभव नहीं
वक्ता कहते हैं कि यह पक्का मान लीजिए कि आप सात दिन या ग्यारह दिन की कर सकते हैं। यदि आप रोज़ करना चाहें, तो यह संभव नहीं; यह बात वे पहले भी कह चुके हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह पक्का मान लीजिए कि आप सात दिन की, ग्यारह दिन की कर सकते हैं। यदि आप रोज़ करना चाहें, तो यह संभव नहीं। यह बात हम पहले ही कह चुके हैं।
पति के बैठने पर दुकान चलती है पर पत्नी के बैठने पर क्यों नहीं?
उनकी गद्दी का उपयोग न करें — बगल में अपनी गद्दी पर बैठें
एक श्रोता पूछते हैं कि बुरे और डरावने सपने क्यों आते हैं, जिस पर वक्ता कहते हैं कि इसके बहुत से कारण हो सकते हैं। दूसरी श्रोता कहती हैं कि जब उनके पति दुकान में बैठते हैं तो दुकान चलती है, पर जब वे बैठती हैं तो एक रुपया भी नहीं आता, और पूछती हैं कि क्या उन पर कोई क्रिया की गई है। वक्ता केवल इतना कहते हैं: मत बैठिए। आपके पति बैठते हैं, उन्हें बैठने दें। या यह दूसरा काम करें: यदि आपके पति सामान खरीदने गए हैं और उस समय आपको दुकान चलानी है, तो उनकी गद्दी पर न बैठें। उनकी गद्दी का कभी उपयोग न करें। दुकान में जिस गद्दी पर आपके पति बैठते हैं उसे वैसी ही रहने दें। उनकी गद्दी पर न बैठें; उनकी गद्दी के बगल में अपनी गद्दी बिछाकर बैठें।
एक श्रोता पूछते हैं कि मुझे बुरे और गंदे, डरावने सपने क्यों आते हैं; क्या कारण है। वक्ता उत्तर देते हैं कि कोई न कोई, बहुत से कारण हो सकते हैं। दूसरी श्रोता पूछती हैं कि जब मेरे पति दुकान में बैठते हैं तो दुकान चलती है, पर जब भी मैं बैठती हूँ, एक रुपया भी नहीं बनता; क्या मुझ पर कोई क्रिया की गई है। वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, इस बात पर हम केवल इतना कहेंगे: मत बैठिए। आपके पति बैठते हैं; उन्हें बैठने दें। या यह दूसरा काम करके देखें। यदि आपके पति सामान खरीदने गए हैं, माल लेने गए हैं, और उस समय आपको दुकान चलानी है, तो उनकी गद्दी पर न बैठें। उनकी गद्दी का कभी उपयोग न करें। दुकान में जिस गद्दी पर आपके पति बैठते हैं उसे वैसी ही रहने दें। आप उनकी गद्दी पर नहीं बैठेंगी; उनकी गद्दी के बगल में अपनी गद्दी बिछाकर बैठें।
मंत्र का हवन बोलकर करना चाहिए या मन में?
हवन ठीक वैसे ही करें जैसे जप करते हैं
वक्ता इसे बहुत अच्छा प्रश्न कहते हैं। विपिन जी, जिस मंत्र का आप जप करते हैं — जैसे जप करते हैं, वैसे ही हवन करना चाहिए। यदि आप बोलकर जप करते हैं, तो बोलकर हवन करें। यदि मन में करते हैं, तो मन में। केवल स्वाहा ज़ोर से बोलना है।
एक श्रोता पूछते हैं कि जिस मंत्र का जप करते हैं — उसका हवन बोलकर करना चाहिए, या मन में बोलते हुए स्वाहा ज़ोर से कहना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि यह बहुत अच्छा प्रश्न है। विपिन जी, जिस मंत्र का आप जप करते हैं — जैसे आप जप करते हैं, वैसे ही हवन करना चाहिए। यदि आप बोलकर जप करते हैं, तो बोलकर हवन करें। यदि मन में करते हैं, तो मन में। केवल स्वाहा ज़ोर से बोलना है।
ऐसी विधि है, पर पहले वह करें जो पहले से दिया गया है
टाल दिया — पहले वह करें जो दिया जा चुका है
वक्ता कहते हैं कि हाँ, ऐसी विधि है — पर आप अभी इन सब बातों में क्यों पड़ना चाहते हैं? आपको पाँचवाँ और नौवाँ बताया गया था; हम पहले ही बता चुके हैं कि क्या और कैसे करना है; इतना करें। शुरू करें, और तभी पूछें; केवल पूछने से कैसे होगा? भगवती की साधना शुरू करें, भगवान गणेश की साधना शुरू करें। आपको पूरा विधि-विधान बताया गया है।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या हमारे कुल और कुलाचार से जुड़े वर्ग में कोई विधि है, जिससे पितर तृप्त हों और पूरा आशीर्वाद मिले। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, है न। पर आप अभी इन सब बातों में क्यों पड़ना चाहते हैं? आपको पाँचवाँ और नौवाँ बताया गया था; हम पहले ही बता चुके हैं कि क्या और कैसे करना है — इतना करें। शुरू करें, और तभी पूछें; केवल पूछने से कैसे होगा? भगवती की साधना शुरू करें; भगवान गणेश की साधना शुरू करें। आपको पूरा विधि-विधान बताया गया है।
चलाई गई हाँडी से अपनी रक्षा कैसे करें?
हाँडी का असर तुरंत होता है — टिकता नहीं
वक्ता कहते हैं कि हाँडी का असर हमेशा नहीं रहता। यदि हाँडी चलाई गई है, तो उसे जो करना होता है वह करके खत्म हो जाती है। हाँ, यदि उसका असर आप पर पड़ा है, तो चलने वाली ये सब चीज़ें तुरंत असर करती हैं — यदि मारना है तो तुरंत मारेगी; फिर यदि मार दिया तो असर रहेगा, और यदि नहीं मार पाई तो असर खत्म हो जाएगा। वे कहते हैं कि यह तोप है; इसमें जो करना हो वह तुरंत करें।
एक श्रोता लिखते हैं कि चार में चलाई गई हाँडी से अपनी रक्षा कैसे करें। वे उत्तर देते हैं कि अरे, हाँडी का असर हमेशा नहीं रहता। यदि हाँडी चलाई गई है, तो उसे जो करना होता है वह करके खत्म हो जाती है। हाँ, यदि उसका असर आप पर पड़ा है — चलने वाली ये सब चीज़ें तुरंत असर करती हैं। यदि मारना है, तो तुरंत मारेगी; फिर उसका असर रहेगा, यदि उसने मार दिया। यदि नहीं मार पाई, तो असर खत्म हो जाएगा। यह तोप है। इसमें जो करना हो वह तुरंत करें।
जहाँ असर रह गया हो, वहाँ तंत्रोक्त बजरंग बाण का अनुष्ठान करें
तंत्रोक्त बजरंग बाण का अनुष्ठान
वक्ता कहते हैं कि हाँ, यदि वह चार में चली और उसका असर रह गया है, तो इस चैनल पर दिए गए पूरे तंत्रोक्त बजरंग बाण का अनुष्ठान करें। यह अवश्य संभव है। हनुमान जी की कृपा से, सतपाल जी, भूलकर भी यह फिर न पूछें कि क्या बजरंग बाण से संभव है। यह पूरी तरह संभव है। यदि आप बजरंग बाण का अनुष्ठान सही ढंग से करें, तो क्या संभव नहीं?
वक्ता कहते हैं कि हाँ, यदि वह चार में चली और उसका असर रह गया है, तो तंत्रोक्त बजरंग बाण, पूरा वाला जो इस चैनल पर दिया गया है — उसका अनुष्ठान करें। यह अवश्य संभव है। हनुमान जी की कृपा से, सतपाल जी, भूलकर भी यह बात फिर न पूछें: कि क्या बजरंग बाण से संभव है। यह पूरी तरह संभव है। यदि आप बजरंग बाण का अनुष्ठान सही ढंग से करें, तो क्या संभव नहीं?
क्या कृष्ण का कोई मंत्र है जिससे तंत्र काटा जा सके?
उनके अस्त्रों के मंत्र, या सहस्रनाम
वक्ता उत्तर देते हैं कि भगवान कृष्ण से जुड़े अस्त्रों का मंत्र; या और कुछ नहीं तो सहस्रनाम आदि का पाठ करें, उससे भी हो जाएगा।
एक श्रोता पूछते हैं कि कृष्ण का कोई मंत्र जिससे तंत्र काटा जा सके। वक्ता उत्तर देते हैं कि भगवान कृष्ण से जुड़े अस्त्रों का मंत्र; या और कुछ नहीं, तो यदि आप सहस्रनाम आदि का पाठ करें, तब भी हो जाएगा।
यदि शिव और दुर्गा दोनों इष्ट हों, तो पंचायतन कैसे बनाएँ?
शिव-शक्ति को बीच में रखें, और शिव के अनुसार स्थापना करें
वक्ता कहते हैं कि देखिए, यदि आप शिव जी का पंचायतन भी स्थापित करेंगे, तो वहाँ दुर्गा जी की स्थापना होगी। शिव-शक्ति को बीच में रखें; कोई दिक्कत नहीं। आराम से शिव-शक्ति को बीच में रखें और शिव जी के अनुसार पंचायतन स्थापना करें। या, यदि आप चाहें — क्योंकि आप उन्हें युगल स्वरूप में रखेंगे, यानी शिवलिंग नहीं बल्कि उनका श्री विग्रह रखेंगे — तो कोई दिक्कत नहीं; उसके अनुसार भी कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि यदि आप दोनों की पूजा कर रहे हैं और दोनों इष्ट हैं, तो पंचायतन कैसा होगा। वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, यदि आप शिव जी का पंचायतन भी स्थापित करेंगे, तो वहाँ दुर्गा जी की स्थापना होगी। शिव-शक्ति को बीच में रखें; कोई दिक्कत नहीं। ठीक — आराम से शिव-शक्ति को बीच में रखें, और शिव जी के अनुसार पंचायतन स्थापना करें। या, यदि आप चाहें — क्योंकि आप उन्हें युगल स्वरूप में रखेंगे, यानी आपने शिवलिंग नहीं रखा होगा, आपने उनका श्री विग्रह रखा होगा — तो कोई दिक्कत नहीं; आप उसके अनुसार भी कर सकते हैं।
अप्सरा तो पहले से घर में है, और सिद्धि की कीमत उसके लाभ से अधिक है
अप्सरा पहले से घर में है; और सिद्धि की असली कीमत
वक्ता कहते हैं कि आकाश विश्वकर्मा जी, हम बंद करने ही वाले थे और सबसे आखिर में आपका संदेश देखा। जब आपका विवाह हो चुका है, तो आप किसी और को क्यों बुलाना चाहते हैं? पहले इसका उत्तर दीजिए। जब विवाह हो चुका है, तो अप्सरा बुलाने की बात — अप्सरा तो घर में है न; उन्हें प्रसन्न और सिद्ध कीजिए। यदि आप विशेष कृपा पाना चाहते हैं, तो वे साफ कहेंगे: कुछ सिद्ध करना अपने आप में बहुत बड़ी बात है, छोटी बात नहीं।
वक्ता कहते हैं कि आकाश विश्वकर्मा जी, हम बंद करने ही वाले थे और बिल्कुल आखिर में हमने आपका संदेश देखा। जब आपका विवाह हो चुका है, तो आप किसी और को क्यों बुलाना चाहते हैं? पहले इसका उत्तर दीजिए। जब आपका विवाह हो चुका है, तो अप्सरा साधना से बुलाने की बात — अप्सरा तो घर में है न; उन्हें प्रसन्न और सिद्ध कीजिए। यदि आप विशेष कृपा पाना चाहते हैं, तो देखिए, हम आपसे साफ यह कहना चाहेंगे: कि यदि आप कुछ सिद्ध करना चाहते हैं, तो कुछ सिद्ध करना अपने आप में बहुत बड़ी बात है; यह छोटी बात नहीं।
विश्वामित्र में इतनी क्षमता थी, और प्रत्यक्ष होने के बाद कुछ पहले जैसा नहीं रहता
विश्वामित्र में इतनी क्षमता थी; और प्रत्यक्ष के बाद कुछ पहले जैसा नहीं रहता
वक्ता कहते हैं कि कृपा और आशीर्वाद पाना अलग बात है। स्वयं विश्वामित्र में इतनी क्षमता थी, तभी उन्हें अप्सरा मिली। आपके और मेरे भीतर — बोलने के लिए, यूट्यूब पर प्रसिद्ध होने के लिए, हम भी यह बात कह सकते हैं कि वे प्रत्यक्ष होती हैं; वे प्रत्यक्ष होती ही नहीं। और प्रत्यक्ष होने के बाद आपकी और मेरी हालत ऐसी नहीं रहेगी कि उनकी कृपा होने के बाद हम इस तरह बोलते रह सकें।
वक्ता कहते हैं कि कृपा, आशीर्वाद पाना अलग बात है। स्वयं विश्वामित्र में इतनी क्षमता थी, और तभी उन्हें अप्सरा मिली। आपके और मेरे भीतर — बोलने के लिए, यूट्यूब पर प्रसिद्ध होने के लिए, हम भी यह बात कह सकते हैं कि वे प्रत्यक्ष होती हैं। वे प्रत्यक्ष होती ही नहीं। और प्रत्यक्ष होने के बाद आपकी और मेरी हालत ऐसी नहीं रहेगी कि उनकी कृपा मिलने के बाद हम लोग इस तरह बोल सकें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।