म्लेच्छ तंत्र से गृहस्थ की रक्षा — चौखट, पितरों का जल पात्र और महाभैरव
म्लेच्छ तंत्र प्रयोग का सामना करने के लिए गृहस्थ के नियम।
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दृश्य में महाभैरव का वह स्वरूप है जिसके मुख से ज्वाला निकलती है, जैसा उनके ध्यान मंत्र में वर्णित है
महाभैरव का वह स्वरूप जिसके मुख से ज्वाला निकलती है
वक्ता कहते हैं कि जो वीडियो देखा जा रहा है वह महाभैरव के उस स्वरूप से जुड़ा है जिसके मुख से अग्नि की ज्वाला निकलती है, और यह विषय उस स्वरूप के ध्यान मंत्र में आता है।
दिन का विषय शुरू करने से पहले वक्ता सत्र के साथ चल रहे दृश्य की ओर ध्यान दिलाते हैं। वे कहते हैं कि यह महाभैरव के एक विशेष स्वरूप से जुड़ा है, जिसके मुख से अग्नि की ज्वाला निकलती है — और यही वर्णन उस स्वरूप के ध्यान मंत्र में आता है।
प्रयोग समूह में किया जाता है और पीछे से वार करता है — क्षुद्र तंत्र का सबसे निचला स्तर
समूह में किया गया प्रयोग, और क्षुद्र तंत्र का सबसे निचला स्तर
वक्ता कहते हैं कि जब ये लोग तंत्र क्षेत्र में प्रयोग करते हैं, तो उनका तांत्रिक प्रयोग भी उन्हीं के स्वभाव का होता है — समूह में किया गया, समूह में चलने वाला, पीछे से वार करने वाला — और क्षुद्र तंत्र में यह सबसे घटिया और निकम्मा प्रकार है।
तंत्र के क्षेत्र की बात करते हुए वक्ता कहते हैं कि ऐसे लोग जब भी कोई प्रयोग करते हैं, तो उस प्रयोग में करने वालों का ही स्वभाव होता है। वे ऐसे लोग हैं जो समूह में चलते हैं, समूह में रहते हैं और कहीं पीछे से वार करते हैं; और उनका तांत्रिक प्रयोग भी, वे कहते हैं, ठीक उसी स्तर और उसी प्रकार का होता है — क्षुद्र विद्या में सबसे घटिया और निकम्मा। वे श्रोताओं को पहले ही चेता देते हैं कि जो वे कहने जा रहे हैं वह बहुतों को बुरा लगेगा, और इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
शक्ति किसी सनातनी गुरु से मित्रता करके, उनकी सेवा करके और उनसे दीक्षा लेकर पाई जाती है
सनातनी गुरु से ली गई दीक्षा, और दो महाशक्तियाँ
वक्ता कहते हैं कि ये लोग शक्ति और सामर्थ्य वाले किसी शुद्ध सनातनी गुरु से मित्रता करते हैं, उनकी सेवा करते हैं, उनसे दीक्षा लेते हैं और साधनाएँ करवाई जाती हैं — और उस स्तर के साधकों ने सदा दो महाशक्तियों की साधना की है: पहली भगवती तारा और दूसरी भगवती श्मशान काली।
वक्ता श्रोताओं को पीर-पैगंबर विषय पर अपने पुराने वीडियो देखने को कहते हैं और कहते हैं कि वही बात यहाँ भी लागू होती है। ऐसा व्यक्ति, वे कहते हैं, शक्ति और सामर्थ्य वाले किसी शुद्ध सनातनी गुरु से संबंध बनाता है, उनकी सेवा करता है, उनसे दीक्षित होता है, और उसे दीक्षा देकर साधनाएँ करवाई जाती हैं। वे कहते हैं कि उस स्तर तक पहुँचने वाले साधकों ने आरंभ से सदा दो महाशक्तियों की साधना की है: पहली भगवती तारा, और दूसरी भगवती श्मशान काली। इन दोनों में वे गहरे उपासक और साधक बन जाते हैं।
मोहल्ले के ऐसे साधक का उदाहरण जो श्रीकुल या कालीकुल में, कादि या हादि में दीक्षित है
श्रीकुल या कालीकुल में, कादि या हादि में दीक्षित मोहल्ले का साधक
वक्ता कहते हैं, मान लीजिए आपके ही क्षेत्र या मोहल्ले में कोई साधक है जो श्रीविद्या कुल या काली कुल में, कादि या हादि में दीक्षित है — उसे श्रीकुल में, कादि में दीक्षित मान लीजिए।
सिद्धि की बात को सरल और समझने योग्य बनाने के लिए वक्ता एक उदाहरण रखते हैं। मान लीजिए आपके अपने क्षेत्र या मोहल्ले में कोई साधक है। वह कुल शक्ति की परंपरा में दीक्षित है — श्रीविद्या कुल या काली कुल में, कादि में या हादि में, जो भी हो। उदाहरण के लिए उसे श्रीकुल में, कादि में दीक्षित मान लीजिए।
ऐसा साधक अपनी नित्य संध्या में बृहद् न्यास की विधि में जाता है
कुल परंपरा की नित्य संध्या में बृहद् न्यास
वक्ता कहते हैं कि वह अपने कुल की परंपरा के अनुसार नित्य संध्या करता है, और ऐसा करते हुए बृहद् न्यास की विधि में जाता है।
वक्ता कहते हैं कि ऐसा साधक रोज़ अपनी नित्य संध्या कर रहा होगा, जैसा उसके कुल की परंपरा बताती है। और जब वह कुल परंपरा के अनुसार संध्या करेगा, तो वह बृहद् न्यास की विधि में जाएगा।
बृहद् न्यास करने वाला साधक देव विग्रह को क्यों नहीं छूता?
शरीर स्वयं देवता का स्वरूप बन जाता है
वक्ता कहते हैं कि उस पद्धति को करने वाले के लिए आदेश है कि वह किसी देव विग्रह को नहीं छूता। इसके लिए नियमों का पूरा एक खंड है — उस क्षेत्र में, उस तरह करने पर वह विग्रह को प्रणाम नहीं करेगा, क्योंकि बृहद् न्यास अपनाने पर उसका शरीर स्वयं देवता का स्वरूप बन जाता है, और देवता अपने ही विग्रह को प्रणाम नहीं कर सकता।
वक्ता कहते हैं कि जब साधक बृहद् न्यास की विधि में जाता है, तो उस पद्धति को करने वाले के लिए आदेश है कि वह किसी देव विग्रह आदि को नहीं छूता। इसके लिए नियमों का पूरा एक खंड है: हाँ, इस क्षेत्र में, जब इस तरह किया जाता है, तब वह विग्रह को वैसा प्रणाम नहीं करेगा। क्यों? क्योंकि जब वह उस प्रकार की बृहद् न्यास पद्धति अपनाता है, तो उसका शरीर साक्षात देवता का स्वरूप बन जाता है, और देवता कभी अपने ही विग्रह को उस तरह प्रणाम नहीं कर सकता।
श्रीराम लीला में भी हनुमान को प्रणाम करें तो हनुमान लज्जित होंगे
श्रीराम के प्रणाम से हनुमान लज्जित होंगे
वक्ता कहते हैं, मान लीजिए हनुमान भगवान श्रीराम के सेवक रूप में खड़े हैं। हनुमान कभी नहीं चाहेंगे कि श्रीराम लीला में भी उन्हें प्रणाम करें — उन्हें लज्जा आएगी कि प्रभु ने उन्हें प्रणाम किया।
वक्ता एक जाना-पहचाना उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए हनुमान जी भगवान श्रीराम जी के सेवक रूप में खड़े हैं। तो हनुमान जी कभी नहीं चाहेंगे कि भगवान श्रीराम — लीला के रूप में भी — उन्हें प्रणाम करें। उन्हें इससे लज्जा होगी; थोड़ी लज्जा आएगी कि प्रभु ने हमें प्रणाम किया। ठीक इसी तरह, वे कहते हैं, यदि किसी ने ऐसी तंत्रात्मक न्यास क्रिया से स्वयं को न्यास-सिद्ध कर लिया है, तो यदि वह विग्रह को प्रणाम करे तो दोष उसी को लगता है, और देवता विग्रह छोड़कर चले जाएँगे।
विग्रह प्रतिष्ठा में न्यास की पद्धति पहले से होती है, इसलिए देवता प्रत्यक्ष उपस्थित रहते हैं
विग्रह प्रतिष्ठा में न्यास पहले ही हो चुका होता है
वक्ता कहते हैं कि विग्रह का न्यास पहले ही हो चुका होता है। तकनीकी रूप से समझें तो विग्रह प्रतिष्ठा की पूरी प्रक्रिया में न्यास की पद्धति पहले से होती है; देवता उसमें प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित रहते हैं, और वह देव विग्रह बन चुका होता है। यहाँ नियम हैं, और इसी कारण यह वर्जित है — ऐसे साधक फिर विग्रह को प्रणाम नहीं करते और न उसके दर्शन को जाते हैं।
वक्ता श्रोता से पूरी बात तकनीकी रूप से समझने को कहते हैं। विग्रह की प्रतिष्ठा में न्यास की पद्धति पहले ही की जा चुकी होती है। देवता उसमें प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित होते हैं, और वह देव विग्रह बन चुका होता है। तो यहाँ कुछ नियम हैं, और विस्तार में जाएँ तो और नियम व पद्धतियाँ भी हैं; इसी कारण यह वर्जित है, और ऐसे साधक फिर विग्रह को प्रणाम नहीं करते, न उसके दर्शन करने जाते हैं। वे जोड़ते हैं कि यह सामर्थ्य वाले साधकों के लिए है।
करुणा ही वह द्वार है जिसका वे लाभ उठाते हैं, जैसे पृथ्वीराज चौहान की बार-बार की दया का उठाया गया
द्वार के रूप में करुणा, और पृथ्वीराज चौहान का उदाहरण
वक्ता कहते हैं कि करुणा केवल सनातनियों के हृदय में ही हो सकती है, और ये लोग ठीक उसी करुणा का लाभ उठाते हैं। वे पृथ्वीराज चौहान का प्रसंग देते हैं, जिन्होंने अपने शत्रु को बार-बार छोड़ा — उनके अनुसार अठारह या उन्नीस बार — और कहते हैं कि ऐसी विपत्तियाँ करुणा और दया दिखाने के चक्कर में ही होती हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब इन लोगों के सरदार किसी सिद्ध सनातनी के पास जाते हैं, तो उस सिद्ध के हृदय में करुणा होती है — और उनके अनुसार करुणा केवल सनातनियों के हृदय में ही हो सकती है। वे कहते हैं कि जिसके रक्त में अशुद्धि है, वह हिंदू घर में जन्म लेकर भी कभी हृदय में करुणा या दया नहीं रखेगा। वे पृथ्वीराज चौहान के साथ जो हुआ उसकी वह कथा बताते हैं जो सबने सुनी है: उन्होंने कितनी बार अपने शत्रु को छोड़ा, और मोहम्मद गोरी बार-बार लौटकर आया — अठारह या उन्नीस बार। वे कहते हैं कि करुणा और दया दिखाने के चक्कर में ही ऐसी विपत्तियाँ होती हैं। वे श्रोताओं से यह भी कहते हैं कि उन पर कभी भरोसा न करने के बारे में गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज का कथन खोजकर पढ़ें।
शरीर को देवी-स्वरूप बनाकर शक्तियाँ वश में की जाती हैं, पर स्वयं देवी की पूजा कभी नहीं होती
शरीर देवी-स्वरूप बना, और देवी की पूजा कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि करुणावश तांत्रिक सिद्धियों का ज्ञान दिए जाने के बाद यही लोग वे सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं, अपने शरीर को देवी स्वरूप बनाते हैं और उन शक्तियों को अपने वश में कर लेते हैं — और एक बार यह सामर्थ्य उनके हाथ आ जाए, तो वे कभी देवी की पूजा नहीं करवाएँगे।
जड़ तक जाते हुए वक्ता कहते हैं कि तांत्रिक सिद्धियों का ज्ञान ऐसे लोगों को करुणा दिखाते हुए सौंप दिया जाता है। बाद में यही लोग वे सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं, अपने शरीर को देवी स्वरूप बनाते हैं, और उन शक्तियों को अपने नियंत्रण और अपने वश में कर लेते हैं। और जब भी वह सामर्थ्य उनके हाथ आता है, वे कभी देवी की पूजा नहीं करवाएँगे।
असुरों ने ब्रह्मा, शिव, विष्णु और भगवती से वर लिए, फिर यज्ञ का भाग छीन लिया
ब्रह्मा, शिव, विष्णु और भगवती से वर, और यज्ञ भाग का हरण
वक्ता पूछते हैं कि असुरों और राक्षसों को सामर्थ्य कहाँ से मिला: उन्होंने ब्रह्मा से, शिव से, विष्णु से, भगवती से वर लिए — और फिर अपनी राक्षस संस्कृति और अपने कुल में क्या उन्होंने किसी और की पूजा करवाई, या केवल अपनी? वे ऋषियों के यज्ञ अनुष्ठानों की ओर संकेत करते हैं, जिनका भाग वे स्वयं लेने लगे, देवताओं को हटाकर दसों दिक्पालों का भाग छीनने लगे।
सिद्धि प्राप्त हुई, वचन मिला, और फिर वह शक्ति अपना धर्म चलाने में लगा दी गई
सिद्धि प्राप्त, फिर शक्ति अपना धर्म चलाने में
वक्ता कहते हैं, सिद्धियाँ प्राप्त करो, शरीर की क्षमता और सामर्थ्य उस सीमा तक ले जाओ, अपना वर्चस्व स्थापित करो; देवी की सिद्धि और कृपा मिल गई, वचन मिल गया — और फिर वही लोग स्वयं उलेमा और मौलवी बन जाते हैं, उनके शागिर्द उन्हें पूजते हैं, और उसी बल पर उनके अपने धार्मिक काम चलते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ भी यही होता है। सिद्धियाँ प्राप्त करो; शरीर की क्षमता और सामर्थ्य उस हद तक, उस अवस्था तक ले जाओ; अपना वर्चस्व स्थापित करो। देवी की सिद्धि और कृपा मिल गई, वचन मिल गया। और फिर ये लोग स्वयं उलेमा और मौलवी बन जाते हैं, उनके शागिर्द उन्हें पूजते हैं, और वे इसी बल से अपने धार्मिक काम चलाते हैं।
शाबर मंत्रों के बल पर हिंदू एक मिली-जुली पूजा को ऐसे दोहराते हैं जैसे वही सही हो
मिली-जुली पूजा जिसे हिंदू सही मानकर दोहराते हैं
वक्ता कहते हैं कि कुछ सनातनी हिंदू इस मिली-जुली पूजा को ऐसे दोहराते हैं जैसे यह बिल्कुल सही हो — "तुम्हें कुछ पता नहीं, काली जी के साथ फलाने साहब चलते हैं, यह शाबर मंत्र देखो, वह देखो" — और सबर मंत्र के पूरे विषय को गड़बड़ कर दिया गया है।
वक्ता कहते हैं कि यही मिली-जुली पूजा कुछ सनातनी हिंदू पूरे आत्मविश्वास से बताते हैं: तुम्हें कुछ पता नहीं, काली जी के साथ फलाने साहब चलते हैं, यह शाबर मंत्र देखो, वह शाबर मंत्र देखो। वे कहते हैं कि शाबर मंत्र के विषय को गड़बड़ बना दिया गया है। इसीलिए, वे जोड़ते हैं, वे बार-बार परंपरागत मंत्रों की ओर जाने को कहते हैं — जो लोग पचा नहीं पाते, और देखते ही भाग जाते हैं कि यह कैसी चीज़ लिखी है।
बड़े प्रकाशक की सौ पन्नों की शाबर मंत्र पुस्तक में पचानवे पन्ने इस्लामी मंत्रों के
सौ में से पचानवे पन्ने इस्लामी मंत्रों से भरे
वक्ता कहते हैं कि नामी लेखकों और बड़े प्रकाशकों की शाबर मंत्र की पुस्तकों में, अगर पुस्तक सौ पन्नों की है तो मान लीजिए उनमें से पचानवे इस्लामी मंत्रों से भरे हैं — हनुमान जी के, जिनमें सुलेमान आदि चल रहे हैं; भैरव जी के भी; और नरसिंह जी और काली जी की तो बात ही छोड़ दीजिए।
वक्ता तथाकथित बड़े लेखकों और बड़े प्रकाशन घरानों के लेखकों की पुस्तकों की ओर संकेत करते हैं। वे कहते हैं कि शाबर मंत्रों की पुस्तकों में ऐसा लिखा है: अगर पुस्तक सौ पन्नों की है, तो तय मान लीजिए कि उनमें से पचानवे इस्लामी मंत्रों से भरे हैं। हनुमान जी के, और उनमें भी सुलेमान आदि चल रहे हैं; भैरव जी के, और उनमें भी तरह-तरह के चल रहे हैं — सारी इस्लामी सामग्री घुसा दी गई है। नरसिंह जी और काली जी की तो, वे कहते हैं, बात ही छोड़ दीजिए। और सीधे-सीधे भी यही चल रहा है: फलाना चलेगा, ढिमकाना चलेगा। वे कहते हैं कि यही वे लोग हैं जो आपकी सनातन संस्कृति में घुसपैठ करवाने का काम करते हैं।
आपत्ति शाबर मंत्र के शब्द पर नहीं, बल्कि उसके साथ चल रहे देवता पर है
शब्द नहीं, साथ चल रहा देवता
वक्ता कहते हैं कि वे शब्द की नहीं बल्कि देवता की बात कर रहे हैं। शब्द का विषय अलग है — शाबर में ऐसे शब्द हो सकते हैं — पर अगर साथ में कोई देवता भी चल रहा है, तो वह सोचने की बात बन जाती है।
वक्ता कहते हैं कि वे कोई मंत्र करने को देंगे और कहेंगे कि इसे करो। वे अपनी आपत्ति स्पष्ट करते हैं: हम शब्द की बात नहीं कर रहे, हम देवता की बात कर रहे हैं। शब्द का विषय अलग है — शाबर में ऐसा शब्द हो सकता है। पर अगर उसके साथ कोई देवता भी चल रहा है, तो यहाँ यह सोचने की बात बन जाती है।
सबसे बड़ी घटनाओं में प्रयोग और उसका प्रभाव निश्चित रूप से मौजूद होता है
यह दावा कि बड़ी घटनाओं में प्रयोग और प्रभाव होता है
सबसे बड़ी घटनाओं के बारे में क्या सोचा जाए, इस पर वक्ता कहते हैं कि इन सब बातों का प्रयोग और प्रभाव उनमें बिल्कुल मौजूद होता है — वे ऐसा बिल्कुल करते हैं।
वक्ता चौथी बात रखते हैं: जब बच्चों को शुरू से ऐसी बातों के बारे में जागृति नहीं दी जाती, तो बड़े होकर वे ऐश्वर्य तक को नहीं मानेंगे, जब तक स्वयं भुगत न लें। जिस विशेष तांत्रिक प्रयोग का प्रभाव महसूस होता है, उसके बारे में वे पूछते हैं कि जो सबसे बड़ी घटनाएँ होती हैं, उनके बारे में श्रोता क्या सोचते हैं — क्या इन सब बातों का प्रयोग और प्रभाव उनमें नहीं होता। वे कहते हैं, बिल्कुल होता है। वे यह बिल्कुल करते हैं।
जो जितना डरता है उतना टोटका करता है, और यह वह पंथ है जिसमें टोटका सबसे अधिक होता है
जितना डर, उतना टोटका — और गोपनीयता का अनुशासन
वक्ता कहते हैं, यह याद रखिए: जो ज़्यादा डरता है, वह ज़्यादा टोटका करता है। डरे हुए लोग सबसे ज़्यादा टोटके करते हैं, और बात-बात पर करने की आदत रखते हैं। वे इसे ऐसा पंथ बताते हैं जिसमें टोटका सबसे ज़्यादा होता है — जितना कहीं और नहीं दिखेगा — पर कहते हैं कि वे गोपनीयता बहुत बड़ी निष्ठा से निभाते हैं।
वक्ता कहते हैं, यह ध्यान रखिए: जो ज़्यादा डरता है, वह ज़्यादा टोटका करता है। डरे हुए लोग सबसे ज़्यादा टोटके करते हैं, और छोटी-छोटी बात पर करने की आदत रखते हैं। और यह, वे कहते हैं, ऐसा पंथ है जिसमें टोटका सबसे ज़्यादा होता है। जितना ये लोग करते हैं, उतना आपको कहीं और नहीं दिखेगा। पर एक बात वे बड़ी निष्ठा से, बहुत ईमानदारी से निभाते हैं — गुप्तता, यानी गोपनीयता।
ऑर्कुट के दिनों, लगभग 2008 से 2010 की एक घटना, जब बातें आज जितनी चरम पर नहीं थीं
लगभग 2008 से 2010 की घटना, जब बातें आज जितनी चरम पर नहीं थीं
वक्ता एक घटना सुनाते हैं जिसे वे लगभग 2009 या 2010 की बताते हैं — 2008, 2009 या 2010 में से किसी वर्ष की, 2011 की नहीं — सोशल मीडिया साइट ऑर्कुट के दिनों की, फेसबुक से पहले की, जब ये बातें आज जितनी चरम पर नहीं पहुँची थीं।
वक्ता कहते हैं कि वे एक सच्ची घटना बताएँगे, लगभग 2009 या 2010 की — यह 2008, 2009 या 2010 में से किसी वर्ष की होगी, 2011 की नहीं। उस समय ये बातें आज जितनी चरम पर नहीं थीं। पुराने श्रोताओं को याद होगा कि फेसबुक से पहले ऑर्कुट नाम का एक सोशल मीडिया था; तब लोग ऑर्कुटिंग करते थे, और जो नए-नए कंप्यूटर सीखते थे उन्हें ईमेल बनाना आदि का एक कोर्स सिखाया जाता था। जहाँ शाम को सब बच्चे खेलने जाते थे, वहाँ उन सबसे काफी बड़ा एक लड़का भी आया करता था।
उस लड़के में ऐसा आकर्षण था जो न उसकी उम्र का था, न उस समय का
ऐसी उम्र में अकारण आकर्षण जब किसी में नहीं होता था
वक्ता कहते हैं कि वह देखने में इतना आकर्षक था कि अलग ही दिखता था। उस उम्र में, वे कहते हैं, खेलने वाले बच्चे कोई खास फिट नहीं होते, और पहले ज़माने में ऐसी फिटनेस होती भी नहीं थी; पर यह लड़का इतना आकर्षक दिखता था कि यही अपने आप में आकर्षण की बात थी।
वक्ता कहते हैं कि उसकी दूसरी बात यह थी कि वह देखने में बहुत आकर्षक था। सामान्यतः उस उम्र के खेलने वाले बच्चों की क्या हालत होती है? वे कोई खास फिट नहीं होते; पहले ज़माने में इतना कुछ होता ही नहीं था। पर वह लड़का हर तरह से ऐसा दिखता था मानो उसके रूप में कुछ विशेष हो — और यही, वक्ता कहते हैं, अपने आप में आकर्षण की बात थी। जैसे-जैसे उससे मित्रता हुई, धीरे-धीरे बातें पता चलने लगीं; वह उस समय भी इन विषयों पर बहस कर सकता था।
वह दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ता था पर नहाता केवल जुम्मे के दिन था
दिन में पाँच नमाज़, पर स्नान केवल जुम्मे को
वक्ता कहते हैं कि वह दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ता था, पर नहाता केवल एक दिन था — जुम्मे के दिन। बाकी दिनों में वह नहीं नहाता था, फिर भी पाँचों बार जाता था। जब पूछा गया कि भगवान के पास इतनी बार जाते हो तो नहाते क्यों नहीं, तो उसने कहा कि ऐसी कोई बात लागू नहीं होती, उनमें ऐसा ही होता है, और इसमें कोई दिक्कत नहीं।
वक्ता कहते हैं कि उस समय वह युवक दिन में पाँच बार पढ़ने जाता था — पाँच बार नमाज़ पढ़ता था। पर नहाता केवल एक दिन था: जुम्मे के दिन। बाकी दिनों में वह नहीं नहाता था, और फिर भी पाँचों बार पढ़ने जाता था। जब उन्होंने उससे कहा कि तुम नहाते क्यों नहीं, भगवान के पास इतनी बार जाते हो, नहा-धोकर जाया करो — तो उसने जवाब दिया कि ऐसी कोई बात लागू नहीं होती, हमारे यहाँ ऐसा ही है, और इस तरह की सफ़ाई देता था कि इसमें कोई दिक्कत नहीं, हम ऐसे कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि वह ऐसा क्यों कर सकता था यह वे बाद में समझाएँगे, और उसका नाम बताने से मना करते हैं।
वह फील्डिंग में एक तय जगह लेता था, एक ही घर के सामने, न गेंदबाज़ी करता था न बल्लेबाज़ी की परवाह
एक खास घर के सामने तय फील्डिंग की जगह
वक्ता कहते हैं कि वह बहुत कम करता था: फील्डिंग में एक तय जगह लेता, गेंदबाज़ी नहीं करता, और बल्लेबाज़ी मिले या न मिले इसकी परवाह नहीं करता — एक औसत क्रिकेट खिलाड़ी, पर वह ठीक एक तय जगह खड़ा होता था, जहाँ से एक परिवार का घर ठीक सामने दिखता था, जिसकी बड़ी बेटी ने अभी-अभी कॉलेज में प्रवेश लिया था।
वक्ता यह ढर्रा बताते हैं। वह युवक ज़्यादा कुछ नहीं करता था: क्रिकेट में फील्डिंग करते हुए एक तय जगह लेता, गेंदबाज़ी नहीं करता, और बल्लेबाज़ी की परवाह नहीं करता। हर तरह से औसत खिलाड़ी — सिवाय इसके कि वह ठीक एक तय जगह पर खड़ा होता था। उस जगह से एक परिवार का घर ठीक सामने दिखता था। उस परिवार की बड़ी बेटी बहुत सुंदर थी, जिसने उस समय शायद नया-नया कॉलेज में प्रवेश लिया था। और यह रोज़ केवल पाँच-दस मिनट चलता था, क्योंकि शाम को ही लड़कियाँ समूह में घूमने निकलती थीं।
वह देखते ही पढ़कर फूँकता था, जिसे बाकी लड़के टोने का मज़ाक समझते थे
पढ़ना और फूँकना, और उसके बाद जो हुआ
वक्ता कहते हैं कि उस समय लड़के उसे छेड़ते थे, मज़ाक करते थे कि कोई टोना या टोटका कर रहा है — पर सच में उसे ऐसा कुछ सिखाया गया था। वह देखते ही पढ़ना शुरू कर देता: पढ़ता और फूँकता, पढ़ता और फूँकता, पूरे पाँच मिनट। बाद में वह लड़की उसी से शादी करने पर पूरी तरह अड़ गई और घर छोड़कर चली गई।
वक्ता कहते हैं कि कई बार उन्होंने उसे टोका कि जब लड़कियाँ निकलती हैं तब तुम क्या बोलते हो, और आपस में मज़ाक करते थे कि कोई टोना कर रहा है, कोई टोटका कर रहा है। पर सच में जानिए, वे कहते हैं: उस समय उसे ऐसा कुछ सिखाया गया था — इस बात पर वे आगे चर्चा करेंगे। वह देखते ही पढ़ना शुरू कर देता। पढ़ता और फूँकता, पढ़ता और फूँकता, जितने भी पाँच मिनट चलता। लड़के कहते, इसका शुरू हो गया; पूछने पर कि क्या शुरू हो गया, वह बस हँस देता और कुछ नहीं कहता। यह बाद में ही पता चला, जब वह लड़की सौ प्रतिशत तय कर चुकी थी कि वह उसी से शादी करेगी, और घर से भाग गई।
झगड़े के बाद वह कॉलेज के गेट पर जाने लगा, और लड़की उससे मिलने लगी
झगड़ा, कॉलेज के वर्ष, और परिवार को निपटाया गया
वक्ता कहते हैं कि बच्चों ने जाकर घर पर बता दिया कि वह ऐसा-ऐसा करता है; झगड़ा हुआ और खेलना बंद हो गया। बाद में उसने कॉलेज के गेट पर वही किया, और धीरे-धीरे लड़की किसी को पता चले बिना उससे मिलने लगी। बाद में, वक्ता कहते हैं, जब पूरी बात सामने आई तो उस आदमी के पूरे परिवार को निपटाया गया — अच्छी तरह।
वक्ता कहते हैं कि बच्चों ने जाकर बता दिया था — कि वह यह करता है, इसे देखो — और झगड़ा हुआ और साथ खेलना बंद हो गया। बाद में वह युवक कॉलेज गया और वहाँ गेट पर यही करने लगा; धीरे-धीरे बात इतनी बढ़ी कि लड़की भी किसी को बताए बिना उससे मिलने लगी। बहुत कुछ हुआ। फिर समय आया। जब पूरा मामला हो गया, तो बदला तो लिया ही जाना था; और अगर किसी में सचमुच क्षत्रिय रक्त है, वे कहते हैं, तो वह बदला लेता है और छोड़ता नहीं। फिर जो किया गया वह पूरा नहीं बताएँगे, पर कहते हैं कि नुकसान पूरी तरह हो चुका था — वह बची नहीं। जब परिवार को समझ आया कि क्या चल रहा था, तो उस आदमी के पूरे कुनबे को निपटाया गया, और अच्छी तरह।
उद्देश्य समाज में परिवार की प्रतिष्ठा तोड़ना था ताकि उनका मनोबल भी टूट जाए
परिवार की प्रतिष्ठा तोड़ना ताकि दूसरों का मनोबल भी टूटे
वक्ता कहते हैं कि उद्देश्य समाज में उनकी इज़्ज़त पूरी तरह खत्म करना था ताकि उनका मनोबल टूटे — ताकि लोग उन पर हँसें, वे घर से निकलना बंद कर दें, और फिर बहुत कुछ किया जा सके। और जब वह परिवार चोट खाता है, तो उनके साथ खड़े लोगों का मनोबल अपने आप टूट जाता है, और दूसरों का वर्चस्व धीरे-धीरे बढ़ता है।
वक्ता कहते हैं कि उस युवक के पीछे बहुत से लोग खड़े थे, और जिस परिवार को निशाना बनाया गया वे भी प्रतिष्ठित लोग थे। उद्देश्य समाज में उनकी इज़्ज़त पूरी तरह खत्म करना था, ताकि उनका मनोबल टूटे — ताकि वे पूरी तरह बिखर जाएँ, लोग उन पर हँसें, वे घर से निकलना बंद कर दें, और फिर बहुत कुछ किया जा सके। यह पहली चोट थी। और जब ऐसा परिवार चोट खाता है, तो उसके साथ और पीछे खड़े लोगों का मनोबल अपने आप टूट जाता है, और दूसरों का वर्चस्व धीरे-धीरे बढ़ता है। उन्हें यह नहीं पता था, वे कहते हैं, कि जब क्षत्रिय शेर का खून दहाड़ता है, तो वह छोड़ता नहीं।
उसे सिखाई गई क्रिया के लिए ज़रूरी था कि वह न नहाए
एक खास क्रिया जिसके लिए न नहाना ज़रूरी था
वक्ता कहते हैं कि जब बात खुली तो पता चला कि वह इसलिए नहीं नहाता था क्योंकि उसे एक विशेष प्रकार की क्रिया सिखाई गई थी, जिसे वह वहाँ बैठकर करता था — और नहाने से वह काम नहीं करती। वे कहते हैं कि वह क्रिया इतनी क्षुद्र थी कि खाते हुए कोई सुन ले तो उसके बाद खा न सके, और वे उसका वर्णन नहीं करते।
वक्ता कहते हैं कि जब बात पूरी तरह खुली, तो पता चला कि यही कारण था कि वह युवक नहीं नहाता था: उसे एक विशेष प्रकार की क्रिया सिखाई गई थी, जिसे वह वहाँ बैठकर करता था, और नहाने से वह काम भी नहीं करती। वे कहते हैं कि इसीलिए ऐसे लोग नहीं नहाते। और वह क्रिया इतनी क्षुद्र प्रकार की थी कि अगर श्रोता अभी खाना बनाते या खाते हुए उसे सुन लें, तो उनका अन्न-जल रुक जाएगा, क्योंकि वह उन्हें वापस आ जाएगा। इसलिए वे उसका वर्णन नहीं करते। वे कहते हैं कि यह उस स्तर की पहली घटना थी जो उन्होंने देखी थी — ऐसे लोग किस हद तक जाते हैं, इसकी उस स्तर की पहली चीज़ जो उन्होंने देखी।
इंद्रियाँ जड़ हो जाती हैं और विवेक नष्ट हो जाता है, कि दुर्गंध तक महसूस नहीं होती
इंद्रियाँ जड़ और विवेक नष्ट
वक्ता कहते हैं कि इसका प्रभाव ऐसा होता है कि व्यक्ति की इंद्रियाँ जड़ हो जाती हैं। वरना दुर्गंध देने वाले शरीर से कोई प्रेम कैसे कर सकता है? पर वहाँ दिमाग काम नहीं करता; होश काम नहीं कर रहा, इसलिए व्यक्ति पूरी तरह वशीकृत होता है। सोचने-समझने का विवेक खत्म हो जाता है, निर्णय नहीं लिए जा सकते, और व्यक्ति प्रयोग करने या करवाने वाले के अनुकूल हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि जब इस तंत्र का प्रभाव किसी के मन पर पूरी तरह पड़ता है, तो परिणाम इस स्तर का होता है: सामने वाले व्यक्ति की इंद्रियाँ, एक तरह से, जड़ हो जाती हैं। वरना जिस शरीर से दुर्गंध आती हो उससे किसी को प्रेम कैसे हो सकता है? पर वहाँ दिमाग बिल्कुल काम नहीं करता। जब होश काम नहीं कर रहा, तो व्यक्ति पूरी तरह वशीकरण में होता है। लोग कहेंगे कि ऐसा नहीं होता, वे कहते हैं; पर जिस पर यह पड़ता है, जो इसे झेलता है, जिस पर यह पूरी तरह करवाया जाता है, उसे तब समझ आता है कि यह किस स्तर का प्रयोग और कैसा प्रभाव है। सोचने-समझने का विवेक खत्म हो जाता है। व्यक्ति सोच नहीं पाता, निर्णय नहीं ले पाता, और प्रयोग करने या करवाने वाले व्यक्ति के अनुकूल हो जाता है।
लड़की केवल रास्ता है; निशाना उसके पीछे का पूरा प्रतिष्ठित परिवार है
निशाना पूरा परिवार, उसके ज़रिए
वक्ता कहते हैं, नहीं — उद्देश्य केवल लड़की को ले जाना नहीं, बल्कि उसके ज़रिए पूरे समर्थ और प्रतिष्ठित परिवार को तोड़ना है। उसके ज़रिए उस घर के खाने में चीज़ें मिलाने का कार्यक्रम पहले ही पूरा हो चुका था, और उसका प्रभाव घर पर पड़ चुका था।
वक्ता कहते हैं कि प्रभाव उस एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, क्योंकि उद्देश्य केवल यह नहीं कि यह लड़की ले जाई जाए और ऐसा-ऐसा किया जाए। उद्देश्य यह है कि इस लड़की के ज़रिए पूरा का पूरा परिवार — एक मज़बूत परिवार, समाज में प्रतिष्ठित — तोड़ा जाए। तो उसके ज़रिए उस घर के खाने में चीज़ें मिलाने का पूरा कार्यक्रम पहले ही हो चुका था, और उसका प्रभाव घर पर पड़ चुका था। उनके लिए बस एक बात गलत हुई, वे कहते हैं, कि मामला बीच में ही बिगड़ गया — हालाँकि जो नुकसान होना था वह ठीक से हो चुका था।
लड़की ठीक उसी लहजे और ढंग में बोलने लगती है जिस ढंग में उस पर काम करने वाला बोलता है
बोलने का लहजा और ढंग हूबहू नकल
वक्ता कहते हैं कि ऐसे बहुत से मामले सीधे देखे-सुने जा सकते हैं जिनमें लड़की को बिल्कुल पता नहीं होता कि उसके साथ क्या हो रहा है या वह क्या करने वाली है — और वह ठीक उसी ढंग से बोलती है जैसे वह लड़का बोलता है। लहजा, ढंग, समझाने का तरीका, बोलने का तरीका: हूबहू वही, नकल। यही, वे कहते हैं, उनका प्रभाव है।
वक्ता कहते हैं कि ऐसे मामले आपको सीधे देखने-सुनने को मिलेंगे, जिनमें ये लोग बात को इस तरह आगे बढ़ाते हैं। सामने वाली लड़की को बिल्कुल पता नहीं होता कि उसके साथ क्या किया जा रहा है, और वह क्या करने वाली है। वह जिस ढंग से बोलता है, वह ठीक उसी ढंग से बोलेगी। लहजा, तरीका, समझाने का ढंग, बोलने का ढंग — हूबहू वही चीज़, नकल। यही, वे कहते हैं, उनका प्रभाव है।
पहला कदम आपके ही गुरुओं से मंत्र सीखना है, फिर अपने मंत्र रचना
आपके गुरुओं से मंत्र सीखना, फिर अपने मंत्र रचना
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला काम आपके ही गुरुओं से मंत्र सीखना, दीक्षा लेना, उन्हें सिद्ध करना, देवी-देवताओं की कृपा पाना और वर पाना है। और जब उस स्तर का सामर्थ्य मिल जाए — कि स्वयं मंत्र रच सकें और उनमें शक्ति डाल सकें — तो अगला काम समाज में अपने शागिर्द बढ़ाना है।
वक्ता श्रोता से समझने को कहते हैं कि इन लोगों ने आपको कितने तरीकों से नुकसान पहुँचाने का काम किया। सबसे पहला काम था आपके ही गुरुओं से मंत्र सीखना, दीक्षा लेना, उन्हें सिद्ध करना, देवी-देवताओं की कृपा पाना, वर पाना — यह सब। और जब उस स्तर का सामर्थ्य मिल जाए जिसमें अपने मंत्र रचे जा सकें और उनमें शक्ति डाली जा सके, तो अगला काम समाज में अपने शागिर्द बढ़ाना है।
हिंदुओं को इसलिए जोड़ा जाता है क्योंकि उनके कुल देवता बलवान और शुद्ध होते हैं, तो सिद्धियाँ जल्दी मिलती हैं
क्योंकि हिंदू के घर के देवता बलवान और शुद्ध होते हैं
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि उनके घरों के देवी-देवता बलवान होते हैं, शुद्ध और पवित्र होने के कारण — तो ऐसी क्रियाओं और ऐसे मंत्रों का उन पर प्रभाव सबसे अधिक होगा, और सिद्धियाँ जल्दी मिलेंगी। और हिंदू, वे कहते हैं, बस जीभ लटकाए सिद्धि चाहता है, यह जाने बिना कि वह किस चीज़ में जा रहा है।
वक्ता कहते हैं कि उस दायरे में वे जिन्हें दोमुँहे हिंदू कहते हैं, उनकी संख्या सबसे ज़्यादा रखी जाती है, क्योंकि आखिर वे हिंदू हैं। उनके घरों के देवी-देवता बलवान होते हैं, क्योंकि वे शुद्ध और पवित्र हैं। तो इस प्रकार की क्रियाओं का उन पर प्रभाव सबसे अधिक होगा, और इन मंत्रों का प्रभाव सबसे अधिक होगा; सिद्धियाँ जल्दी मिलेंगी। और हिंदू, वे कहते हैं, बस सिद्धि चाहता है, जीभ लटकाए — सिद्धि हो जाए, मैं अपना सामर्थ्य दिखाऊँ, फलाने को मारना है, ऐसा-ऐसा करना है, उसने हमें गाली दी तो उसे फाड़ देंगे। उसे पता नहीं कि यह क्या है।
ऐसी दीक्षा आपको जीवन भर का बंदी बना देती है और आपकी पूरी परंपरा बाँध देती है
जीवन भर का बंधन, और पूरी परंपरा बंधी
वक्ता कहते हैं कि एक बार वैसी दीक्षा मिल गई, तो आप जीवन भर उस व्यक्ति के बंदी हो जाते हैं और आपकी पूरी परंपरा वहीं बंध जाती है। सबसे पहला काम यह किया जाएगा कि आपसे कहा जाएगा कि अपने घर के देवी-देवताओं की पूजा मत करो — यह करो, शिव जी की पूजा करो — और आपको करने नहीं दिया जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि अगर किसी दूसरे मत के गुरु से एक बार वैसी दीक्षा मिल गई, तो आप जीवन भर उसके बंदी हो गए, और आपकी पूरी परंपरा वहीं बंध गई। ऐसा व्यक्ति पहला काम यह करेगा: वह कहेगा कि अपने घर के देवी-देवताओं की पूजा मत करो — यह करो, शिव जी की पूजा करो — और वह आपको करने नहीं देगा। आज आप पंचाक्षरी कर रहे हैं, वे कहते हैं, और जहाँ ऐसे लोगों से दीक्षा ली जाती है और घर में आना-जाना होता है, वहाँ बहुत से मामले आते हैं जिनमें ऐसे दीक्षा गुरु आए, इस तरह बोले, और इस्लामी मंत्र दे दिए।
दया स्वयंभू महागुरु पर नहीं, बल्कि उसके पीछे चलने वालों के विवेक पर आती है
दया गुरु पर नहीं, अनुयायियों के विवेक पर
वक्ता कहते हैं कि वे उन पर नहीं हँसते जो YouTube और Facebook पर खुद को स्वयंसिद्ध महागुरु कहकर, हिंदू होते हुए इस्लामी मंत्रों का प्रचार करते हैं — वह तो अपना सही काम कर रहा है। उन्हें दया उन लोगों के विवेक पर आती है जो "गुरुजी, गुरुजी" लिखकर प्रणाम करते हैं; उनका दिमाग काम नहीं कर रहा और वे देख नहीं पा रहे कि उनके साथ कितना बड़ा खेल खेला जा रहा है।
वक्ता इसे अद्भुत बात बताते हैं: ऐसे लोग जो आज भी YouTube और Facebook पर खुद को स्वयंसिद्ध महागुरु बताते हैं और फिर हिंदू होते हुए इस्लामी मंत्रों का प्रचार करते हैं — और कमेंट में लोग गुरुजी, गुरुजी कहते हैं और प्रणाम करते हैं। वे कहते हैं कि उन गुरुजियों पर उन्हें बिल्कुल हँसी नहीं आती: वह अपना सही काम कर रहा है, उससे उनका क्या लेना-देना। पर जो लोग गुरुजी, गुरुजी कह रहे हैं, उनके विवेक पर उन्हें दया आती है — कि वे किस गिरे हुए स्तर पर हैं। उनका दिमाग बिल्कुल काम नहीं कर रहा; वे समझ नहीं पा रहे कि उनके साथ कितना बड़ा खेल खेला जा रहा है।
मज़ार या ऐसी जगह की पूजा एक आसान निशाना है जिसका असर तुरंत जीवन में आता है
आसान निशाना, और जीवन में तुरंत परिणाम
वक्ता कहते हैं कि ये लोग बहुत आसान निशाना बनाते हैं: वे आपसे किसी बाबा, किसी मज़ार और ऐसी चीज़ों की पूजा करवाएँगे, और उसका असर तुरंत आपके जीवन में आएगा। फिर वे समझाते हैं कि असर क्यों आता है।
वक्ता कहते हैं कि जैसे ही ऐसी शक्तियों की पूजा शुरू होती है, ये लोग आपको बहुत आसान निशाना बना लेते हैं। वे आपसे किसी बाबा की, किसी मज़ार की, ऐसी चीज़ों की पूजा करवाएँगे — और उसका असर जल्दी आपके जीवन में आएगा। क्यों आएगा? इसका उत्तर देने के लिए वे सनातन संस्कृति की एक बात पर आते हैं जिसे वे वैश्विक बताते हैं।
सातवीं पीढ़ी के जन्म पर बंधा हुआ पूर्वज अपने आप मुक्त हो जाता है
सातवीं पीढ़ी के जन्म पर पूर्वज अपने आप मुक्त
वक्ता कहते हैं कि जब सातवीं पीढ़ी जन्म लेती है — मान लीजिए आपके दादा के दादा के पिता — तो आपके जन्म लेते ही उनकी मुक्ति अपने आप हो जाती है; वे बंधे नहीं रहेंगे। जब तक आपने उन्हें कोई स्थान देकर पूजा न की हो, जो अलग बात है, तब तक उनके लिए कोई क्रिया-कर्म न भी हुआ हो, तो भी वे उस योनि से आगे बढ़ जाएँगे और वहाँ अटके नहीं रहेंगे।
वक्ता कहते हैं कि सनातन संस्कृति में एक बात है, और वह वैश्विक है। जब सातवीं पीढ़ी जन्म लेती है — मान लीजिए आपके दादा के दादा के पिता — तो जैसे ही आपका जन्म हुआ, उनकी मुक्ति अपने आप हो जाएगी। वे बंधे नहीं रहेंगे। जब तक आपने उन्हें कोई स्थान देकर उनकी पूजा न की हो, जो अलग विषय है। वरना उनके लिए कोई क्रिया-कर्म न भी हुआ हो, तो भी उस योनि से उनकी गति होगी; वे वहाँ अटके नहीं रहेंगे। सातवीं पीढ़ी पर, सातवें जन्म पर, वे चले जाएँगे; उनकी अपनी गति हो गई, और वे जहाँ भी हों आगे जाकर अपना भोग भोगेंगे। आपको केवल सात तक देखना है — केवल सात कुरियाँ गिनी जाती हैं।
शुद्धि और अशुद्धि कितनी पीढ़ियों तक गिनी जाती है?
शुद्धि और अशुद्धि के लिए सात पीढ़ियाँ
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए शुद्धि और अशुद्धि का विषय भी केवल सात पीढ़ियों तक गिना जाता है। सात बीतें तभी शुद्ध; सात बीतें तभी अशुद्ध — यह बात श्रोताओं ने संतों के प्रवचनों में सुनी होगी।
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण अशौचपरिवार में जन्म या मृत्यु जैसे अवसरों पर उत्पन्न अशुद्धि की स्थिति, जिसके दौरान कुछ अनुष्ठान व पाठ वर्जित रहते हैं। का विषय — शुद्धि और अशुद्धि — भी केवल सात पीढ़ियों तक गिना जाता है। सात बीतें तभी शुद्ध; सात बीतें तभी अशुद्ध — यह पूरा विषय, वे कहते हैं, श्रोता जानते होंगे और संतों के प्रवचनों में सुना होगा।
दाह संस्कार के बाद कोई अवशेष नहीं बचता जिस पर तंत्र काम करे, क्योंकि अग्नि का स्पर्श ही शुद्ध कर देता है
कोई अवशेष नहीं बचता, और कुछ समय बाद गति
वक्ता कहते हैं कि सनातन में जब कोई मरता है तो उसके शरीर का कोई अवशेष नहीं बचता: उसे भगवान अग्निदेव को सौंप दिया जाता है, और जिन्हें अग्नि छू ले वे उसी से शुद्ध हो जाते हैं। अस्थियाँ गंगा जी में या पास की किसी ऐसी दिव्य नदी में विसर्जित की जाती हैं। अपने कर्म के कारण वह भूत या प्रेत बनकर भटक सकता है, पर उसका कोई अवशेष नहीं बचता, और कुछ समय बाद उसकी गति होगी।
वक्ता कहते हैं कि सनातन में जब कोई मृत्यु को प्राप्त होता है, तो कम से कम उसके शरीर का कोई अवशेष नहीं बच पाता। उसे भगवान अग्निदेव के लिए सौंप दिया गया — भगवान अग्निदेव आएँ — और जिन्हें अग्नि छू लेती है वे उसी से शुद्ध हो जाते हैं। शरीर का कोई अवशेष नहीं बचता। उसकी अस्थियाँ गंगा जी ले जाकर विसर्जित की जाती हैं, या पास की किसी ऐसी दिव्य नदी में विसर्जन कर दिया गया। कर्म के कारण वह भूत या प्रेत बनकर भटक भी सकता है, पर उसका कोई अवशेष नहीं बचता, और एक निश्चित समय के बाद उसकी गति होगी।
नब्बे प्रतिशत मामलों में उन मंत्रों की जड़ तारा और भगवती श्मशान काली हैं
तारा और भगवती श्मशान काली, अधिकतम नब्बे प्रतिशत मामलों में
वक्ता कहते हैं कि वहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी दस, बीस और न जाने कब के मरे हुए जीवित बने रहते हैं — उन्हीं लोगों द्वारा मंत्र बल से ऐसे रखे जाते हैं; और उस मंत्र की जड़ अधिकतम नब्बे प्रतिशत मामलों में तारा और भगवती श्मशान काली होंगी। वे कहते हैं कि वे यह हनुमान जी के साथ कभी नहीं कर सकते; वे यह केवल माँ के साथ करेंगे, और माँ के इन्हीं तंत्रात्मक स्वरूपों का वे म्लेच्छ तंत्र में अधिकार से उपयोग करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि वहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी दस, बीस और न जाने कब के मरे हुए जीवित बने रहते हैं। यही लोग मंत्र के बल से ऐसा रखते हैं; और उस मंत्र की जड़ अधिकतम नब्बे प्रतिशत मामलों में तारा और भगवती श्मशान काली होंगी। ये लोग यह हनुमान जी के साथ कभी नहीं कर सकते, वे कहते हैं। वे यह केवल माँ के साथ करेंगे। माँ के ठीक ऐसे ही तंत्रात्मक स्वरूपों का वे म्लेच्छ तंत्र में अधिकार से उपयोग करते हैं।
उनमें से एक प्रतिशत सफल होता है, और वही एक पूरे सौ को बना देता है
एक प्रतिशत सफल, और वही सौ को बनाता है
वक्ता कहते हैं कि सौ में से एक प्रतिशत को सफलता मिलेगी — पर जो एक प्रतिशत सफल होता है वह पूरे सौ को पूरी तरह बना देता है। जबकि यहाँ, वे कहते हैं, अगर एक आदमी को सिद्धि मिल जाए तो वह सबको बिगाड़ने में लग जाता है: तुझे मुझसे ज़्यादा कैसे पता, उसे गिराओ, उसे मारो — और हिंदू इसी में उलझे रहते हैं।
वक्ता कहते हैं, इसमें एक बात और जानिए। सौ में से एक प्रतिशत को सफलता मिलेगी। पर जो एक प्रतिशत सफल होता है, वह उन सौ को पूरी तरह बना देता है। यहाँ इसके उलट, एक बार किसी एक आदमी को सिद्धि मिल जाए तो वह बाकी सबको बर्बाद करने में लग जाता है — तुझे मुझसे ज़्यादा कैसे पता, इसे गिराओ, उसे मारो — और हिंदू इसी में फँसे रहते हैं।
पहली चीज़ जो होती है वह यह कि कुल की मंगलकारी शक्तियाँ अशुद्ध हो जाती हैं
कुल की मंगलकारी शक्तियाँ सबसे पहले अशुद्ध
वक्ता कहते हैं कि जब कोई हिंदू उनकी सीमा में आता है और उसे ये चीज़ें दी जाती हैं, तो सबसे पहली बात यह होती है कि उसके कुल में जो भी मंगलकारी शक्तियाँ पूजी जाती हैं, वे अशुद्ध हो जाती हैं। इसे ऐसे समझिए, वे कहते हैं, कि आपकी पूरी आध्यात्मिक संपत्ति उसी तरह ज़ब्त हो गई जैसे भौतिक संपत्ति ज़ब्त होती है — और कहानी वहीं खत्म। फिर आपकी मजबूरी यह है कि निकलें कैसे।
वक्ता कहते हैं कि जब कोई भी हिंदू उनकी सीमा में आता है और वे उसे यह चीज़ देते हैं, तो सोचिए सबसे पहले क्या होता है। सबसे पहली बात यह कि उसके कुल में जो भी मंगलकारी शक्तियाँ पूजी जाती हैं, वे अशुद्ध हो जाती हैं। इसे ऐसे समझिए: जैसे आपकी भौतिक संपत्ति पर कब्ज़ा होता है, वैसे ही आपकी पूरी आध्यात्मिक संपत्ति पर कब्ज़ा हो जाता है। कहानी वहीं खत्म। अब आपकी मजबूरी यह है: यहाँ से निकलेंगे कैसे?
कोई छोड़ता नहीं क्योंकि शुरुआत में अच्छा लगता है, और कोई अपना मामला बताता नहीं
क्योंकि शुरुआत में अच्छा लगता है
वक्ता कहते हैं कि शुरुआत में जब काम बनने लगते हैं तो बहुत आनंद आता है — और इसी कारण लोग कभी निकलना नहीं चाहते। कोई अपने मामले की कोई नकारात्मक बात नहीं बताएगा; वे बस कहेंगे बाबा ऐसे हैं, बाबा वैसे हैं, मेरे बाबा, मेरे बाबा कहने में आनंद लेते हुए।
वक्ता कहते हैं कि शुरुआत में जब चीज़ें बनने लगती हैं, तो बहुत आनंद आता है। ठीक इसी कारण लोग कभी बाहर नहीं आना चाहते। न ही कोई आपको अपने मामले की कोई नकारात्मक बात बताएगा। वे बस कहेंगे बाबा ऐसे हैं, बाबा वैसे हैं, मेरे बाबा, मेरे बाबा कहने में आनंद लेते हुए। और सब जानते हैं कि फिर वहाँ किस तरह का आनंद मिलता है।
कुल शक्तियाँ आने वाली शक्ति का विरोध करती हैं, पर उन्हें पहले कभी माना ही नहीं गया
वे विरोध करती हैं, पर आपने उन्हें पहले माना ही नहीं
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि जब ये बाहरी शक्तियाँ किसी कुल और परिवार में घुसती हैं तो वहाँ पहले से मौजूद कुल शक्ति कोई विरोध नहीं करती या उन्हें रोकने का प्रयास नहीं करती। वह बिल्कुल करेगी। पर चूँकि उन्होंने आपके प्रारब्ध में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं किया और आपको कोई चमत्कार नहीं दिखाया, इसलिए आप पहले से ही यह नहीं मान रहे थे कि उनकी कोई हैसियत या कोई सामर्थ्य है।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ ऐसा नहीं है कि जब ये बाहरी शक्तियाँ किसी कुल या परिवार में घुसती हैं, तो वहाँ पहले से मौजूद कुल शक्ति उनका विरोध नहीं करेगी, या उन्हें रोकने का प्रयास नहीं करेगी। यह बिल्कुल होगा। पर चूँकि उन्होंने आपके प्रारब्ध में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं किया, और कोई चमत्कार नहीं दिखाया, इसलिए आप शुरू से यह मान ही नहीं रहे थे कि उनकी कोई हैसियत है, कोई सामर्थ्य है।
सनातन परंपराएँ प्रारब्ध को कभी काटती नहीं; उसे जल्दी भुगतवाकर नष्ट करती हैं
प्रारब्ध काटा नहीं जाता, जल्दी भुगतवाकर नष्ट किया जाता है
वक्ता कहते हैं कि सनातन परंपराएँ प्रारब्ध को उस तरह कभी नहीं काटतीं। वे उसे आपसे जल्दी भुगतवाकर पूरी तरह नष्ट कर देती हैं, ताकि आपको उसे फिर से न भोगना पड़े। वे उसे टालती नहीं — यह नहीं कहतीं कि ठीक है, अभी इसे सुख दे दो, दो महीने बाद फिर आएगा, हमने दिया था, इसे अपना मामला समझो।
वक्ता कहते हैं कि सनातन संस्कृतियाँ प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। को उस तरह कभी नहीं काटतीं। वे उसे जल्दी भुगतवाकर पूरी तरह नष्ट कर देती हैं, ताकि व्यक्ति को दूसरी बार उससे कष्ट न हो। वे उसे टालती नहीं — यह कहकर कि ठीक है, अभी इसे थोड़ा सुख दे दो, दो महीने बाद फिर होगा, हमने दिया था, तुम इसे अपना समझो। वास्तव में, वे कहते हैं, यहाँ यही बात है।
ऐसी जगह पर शुद्ध हिंदू की पूजा उसका पुण्य सीधे वहाँ बैठी चीज़ को दे देती है
शुद्ध हिंदू की पूजा उसका पुण्य उन्हें दे देती है
वक्ता कहते हैं कि इनकी ये पुरानी चीज़ें मंत्र बल से उन सब जगहों पर बैठाई गई हैं, और बाद में जब कोई सनातनी, शुद्ध रक्त का शुद्ध हिंदू वहाँ पूजन करता है, तो वे तुरंत पुष्ट और तुरंत प्रसन्न होते हैं। जब शुद्ध हिंदू गंगा नहाकर ऐसी जगहों पर जाता है, तो उसका सारा पुण्य उन्हें अर्पित हो जाता है — तो वे पुष्ट होंगे ही। अगर आज वे पुष्ट हो रहे हैं, वे कहते हैं, तो इसके पीछे कारण स्वयं हिंदू हैं।
वक्ता कहते हैं कि इनकी ये सब चीज़ें कितनी भी पुरानी हों, वे मंत्र के बल से उन सब जगहों पर बैठाई गई हैं। और बाद में जब कोई सनातनी, शुद्ध रक्त का शुद्ध हिंदू, वहाँ पूजन करता है, तो वे तुरंत पुष्ट होंगे और तुरंत प्रसन्न होंगे। अपने से पूछिए, वे कहते हैं, जब शुद्ध हिंदू गंगा नहाकर ऐसी जगह जाएगा तो क्या होगा। अपने सारे पाप नष्ट करके और बहुत से पुण्य पाकर, वह फिर राक्षसों और म्लेच्छों की पूजा करने जाता है — तो उसका सारा पुण्य उन्हें अर्पित होगा, और वे पुष्ट होंगे। अगर आज के समय में वे पुष्ट हो रहे हैं, वे कहते हैं, तो उसके पीछे कारण स्वयं हिंदू है। इन्हीं के द्वारा उन्हें बलवान बनाया गया है।
यह दावा कि दक्ष के श्राप के कारण शिव को घर में नहीं रखा जा सकता, पूरी तरह खारिज
यह दावा कि दक्ष के श्राप के कारण शिव को घर में नहीं रख सकते
वक्ता हर की पौड़ी के एक बाबा का ज़िक्र करते हैं, जिसका वीडियो उन्होंने शेयर किया था, जो दोहरा रहा था कि दक्ष प्रजापति ने शिव को श्राप दिया था कि उनकी पूजा किसी के घर में नहीं होगी, इसीलिए उनकी पूजा केवल श्मशान में होती है, शिव जी श्मशानवासी हैं, और इसलिए उनकी पूजा घर में न करें और उन्हें स्थान न दें। वे इसे वह खोपड़ी बताते हैं जो शिव जी को आपके घर से बाहर करवा देगी।
वक्ता कहते हैं कि वे कोई सिद्ध संत नहीं हैं और उनके मुँह से गाली निकल जाती है, क्योंकि ऐसे कुकर्म देखकर उनसे सहा नहीं जाता। वे बताते हैं कि वह बाबा फिर से कह रहा था कि दक्ष प्रजापति ने शिव जी को श्राप दिया कि तुम्हारी पूजा किसी के घर में नहीं होगी; इसीलिए उनकी पूजा केवल श्मशान में होती है; शिव जी श्मशानवासी हैं; और इसलिए उनकी पूजा घर में नहीं करनी चाहिए और उन्हें स्थान नहीं देना चाहिए। आज के समय में भी, वे कहते हैं, उस आदमी में इतना सामर्थ्य है कि ऐसी बात सबके सामने रख दे। यही, वे कहते हैं, वह खोपड़ी है जो शिव जी को आपके घर से बाहर करवा देगी।
शास्त्र क्या कहता है
Dakṣa's curse against Rudra bars him from a share in the sacrifice and reviles him as outside the four social orders — it says nothing about barring his worship from any house.
Dakṣa's curse denies Rudra a share of the yajña and reviles him as low-born; "śmaśānavāsī" (cremation-ground dweller) is flung at him as an existing insult, not imposed as a new restriction on domestic worship. No such restriction appears anywhere in this chapter or its surrounding narrative (chs. 26-27).
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
रुद्रो ह्ययं यज्ञबहिष्कृतो मे वर्णेष्वतीतोऽथ विवर्णरूपः। देवैर्न भागं लभतां सहैव श्मशानवासी कुलजन्महीनः॥
"दक्ष बोले — मैं इस रुद्र को यज्ञ से बहिष्कृत करता हूँ। यह चारों वर्णों से बाहर, श्मशान में निवास करनेवाला तथा उत्तम कुल और जन्म से हीन है। इसलिये यह देवताओं के साथ यज्ञ में भाग न पाये।"
यह शिक्षा कि पूजा करने से देवता नाराज़ होते हैं, उसी तरह खारिज
कि पूजा करने से देवता नाराज़ होते हैं
वक्ता कहते हैं कि सोशल मीडिया के इस समय में भी, जब यह जागृति फैलाई जा रही है कि सेवा-पूजा करनी चाहिए और सही ढंग से करनी चाहिए, अब भी ऐसे लोग हैं जो कह रहे हैं कि पूजा-पाठ करने से देवता नाराज़ हो जाते हैं — और वह वीडियो भी उन्होंने शेयर किया था।
आज भी लोगों में यह सामर्थ्य है, वे कहते हैं। सोचिए कि सोशल मीडिया के इस समय में, जब लोगों में जागृति फैलाई जा रही है कि सेवा-पूजा करनी चाहिए और सही ढंग से करनी चाहिए — वहाँ भी ऐसे लोग हैं, अब भी, जो कह रहे हैं कि पूजा-पाठ करने से देवता नाराज़ हो जाते हैं। वे कहते हैं कि वह वीडियो भी उन्होंने शेयर किया था।
क्या शिव, विष्णु या भगवती को कोई श्राप छू भी सकता है?
कोई श्राप नहीं लगता; वे उसे केवल लीला के लिए स्वीकारते हैं
वक्ता कहते हैं, नहीं। भगवान शिव स्वयं कहते हैं कि उनका श्राप या वरदान से कोई लेना-देना नहीं और उन्हें कोई श्राप नहीं लग सकता; भगवान श्री हरि नारायण को कोई श्राप नहीं लग सकता, और भगवती को कोई श्राप नहीं लग सकता। वे उसे केवल लीला के लिए स्वीकार करते और ओढ़ लेते हैं।
अब बताइए, वक्ता कहते हैं: भगवान शिव, जो स्वयं इस विषय में कहते हैं कि मेरा श्राप और वरदान से कोई लेना-देना नहीं, मुझे कोई श्राप नहीं लग सकता। भगवान श्री हरि नारायण को कोई शाप नहीं लग सकता; भगवती को कोई श्राप नहीं लग सकता। वे उसे केवल लीला के लिए स्वीकार करते हैं, और अपने ऊपर ले लेते हैं।
शुक्र की माता के आश्रम में छिपे दैत्यों का अंत सुदर्शन चक्र करता है
शुक्र की माता के आश्रम में दैत्य और सुदर्शन चक्र
वक्ता शुक्राचार्य पर शेयर किए अपने एक वीडियो का प्रसंग बताते हैं: जब दैत्य शुक्रदेव की माता के आश्रम में जाते हैं, तो भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र आता है और उससे उन सबका अंत होता है। अंत से पहले शुक्राचार्य की माता भगवती — जिनका नाम, वे कहते हैं, याद नहीं आ रहा — सुदर्शन चक्र के सामने खड़ी हो जाती हैं कि तुम नहीं जा सकते।
वक्ता शुक्राचार्य जी पर बनाए और ग्रुप में शेयर किए एक वीडियो का ज़िक्र करते हैं, जो वे कहते हैं पहले जगन भैया उपलब्ध कराते थे। जब दैत्य शुक्रदेव की माता के आश्रम में जाते हैं, तो भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र वहाँ आता है, और सुदर्शन चक्र से उन सबका अंत किया जाता है। पर अंत से पहले शुक्राचार्य की माता भगवती — और यहाँ वे कहते हैं कि उनका नाम याद नहीं आ रहा — वहाँ सुदर्शन चक्र के सामने खड़ी हो जाती हैं, कि नहीं, तुम नहीं जा सकते।
नारायण प्रकट होते हैं और वे बदला नहीं, उनके निज धाम में स्थान माँगती हैं
नारायण प्रकट, वे उनके धाम में स्थान माँगती हैं
वक्ता कहते हैं कि उसी समय भगवान श्री हरि नारायण प्रकट होते हैं और समझाते हैं कि वे इसे न रोकें; तब वे दिव्य धाम की प्राप्ति की प्रार्थना करती हैं, कि वे उन्हें अपने निज धाम में स्थान दें और उसके बाद जो चाहें करें। उन्हें मुक्ति देने के बाद उन राक्षसों का वध होता है।
वक्ता कहते हैं कि उसी क्षण भगवान श्री हरि नारायण प्रकट होते हैं और उन्हें समझाते हैं कि उन्हें इसे नहीं रोकना चाहिए। तब वे दिव्य धाम की प्राप्ति की प्रार्थना करती हैं — कि आप मुझे अपने निज धाम में स्थान दीजिए, और उसके बाद आप जो चाहें कीजिए। उन्हें मुक्ति देने के बाद ही उन राक्षसों का वध होता है।
शुक्राचार्य के श्राप को समझाने के लिए यह प्रसंग ऐसे सुनाया जाता है मानो उनकी माता को बस मार दिया गया
ऐसे प्रस्तुत किया जाता है मानो माता को बस मार दिया गया
वक्ता कहते हैं कि इसे तोड़-मरोड़कर ऐसे प्रस्तुत किया जाता है मानो वहाँ उनकी माता को मार दिया गया — और इसी कारण शुक्राचार्य क्रोधित होकर भगवान विष्णु से शत्रुता रखने लगे और उसी क्षण उन्हें श्राप दे दिया।
अब इसे तोड़-मरोड़कर, वक्ता कहते हैं, अलग तरह से प्रस्तुत किया जाता है: कि यहाँ उनकी माता को मार दिया गया। और इसलिए शुक्राचार्य क्रोधित होकर भगवान विष्णु से द्वेष रखने लगे, और उसी समय श्राप दे दिया। वीडियो में, वे कहते हैं, बहुत अच्छे से दिखाया गया है कि भगवान विष्णु ने कहा: तुम्हारा मान रखने के लिए मैं तुम्हारे सामने निहत्था प्रकट हुआ हूँ, देखो, खाली हाथ — पर मुझे किसी प्रकार का श्राप नहीं लग सकता।
भगवान को श्राप देने से शुक्राचार्य का क्या गया?
उनका अपना तपोबल शून्य हो गया
वक्ता कहते हैं कि श्राप देने के कारण, जब वे भगवान को श्राप देते हैं, तो उनका अपना तपोबल वहीं शून्य हो जाता है — शुक्राचार्य का अपना।
और श्राप देने के कारण, वक्ता कहते हैं — जब वे भगवान को श्राप देते हैं — उसी कारण उनका अपना तपोबल वहीं शून्य हो जाता है। शुक्राचार्य का अपना।
उनके मात्र स्मरण से करोड़ों जन्मों के श्राप भस्म हो जाते हैं, तो कोई श्राप नहीं लग सकता
जिनके मात्र स्मरण से करोड़ों जन्मों के श्राप जलते हैं
वक्ता कहते हैं कि जिनके नाम के मात्र स्मरण से अनेक करोड़ जन्मों के श्राप पल भर में भस्म हो जाते हैं — क्या उन्हें कोई श्राप लग सकता है? जिनके मात्र स्मरण से श्राप चलते हैं और जिनके मात्र स्मरण से वरदान फलते हैं; और फिर भी लोगों ने उन्हें श्रापित करवा दिया, कहकर कि श्राप लग गया और इसलिए उनकी पूजा नहीं होगी।
पर यह आप नहीं जान रहे, वक्ता कहते हैं: श्राप लगा नहीं; उन्हें लग ही नहीं सकता। जिनके नाम के मात्र स्मरण से अनेक करोड़ जन्मों के श्राप पल भर में भस्म हो जाते हैं — क्या उन्हें कोई श्राप लग सकता है? इतनी बुद्धि नहीं है, वे कहते हैं। जिनके मात्र स्मरण से श्राप चलते हैं, जिनके मात्र स्मरण से वरदान फलते हैं — और आपने उन्हें श्रापित करवा दिया, कहकर कि हाँ, श्राप लग गया, और इसलिए उनकी पूजा नहीं होगी।
घर में शिव को मना करने वाला बाबा खुद अपनी उँगली में शिव की अंगूठी पहनता है
घर में शिव को मना करते हुए उँगली में शिव की अंगूठी
वक्ता बताते हैं कि यह कहने वाला बाबा खुद अपनी उँगली में शिव जी की अंगूठी पहने है — तो वे पूछते हैं, घर में घुसते समय वह क्या करता है: अपनी उँगली काटकर बाहर छोड़ देता है, और लौटकर गोंद से चिपका लेता है, क्योंकि उसकी अंगूठी पर शिवलिंग घर में घुस रहा है?
वक्ता कहते हैं कि यह कहने वाले बाबा जी — जिनका वीडियो उन्होंने Facebook पर शेयर किया — खुद अपनी उँगली में शिव जी की अंगूठी पहने हैं। तो वे पूछते हैं, जब वह अपने घर में जाता होगा तो क्या करता होगा? अपनी उँगली काटकर बाहर छोड़ देता होगा, और लौटकर पाँच रुपये के गोंद से चिपका लेता होगा? क्योंकि शिवलिंग घर में घुस रहा है — वह उसकी अंगूठी में जड़ा है। ऐसी खोपड़ियों को पहचानिए, वे कहते हैं।
घर की आधी से ज़्यादा समस्याओं का समाधान चौखट में छिपा है
चौखट में हर प्रकार के तंत्र को रोकने का सामर्थ्य है
वक्ता कहते हैं, याद रखिए कि आपका घर सुरक्षित रहेगा: आपकी आधी से ज़्यादा समस्याओं का समाधान उस चौखट में छिपा है। हर प्रकार के तंत्र को रोकने का सामर्थ्य चौखट में है।
आपका घर सुरक्षित रहेगा — यह याद रखिए, वक्ता कहते हैं। आपकी आधी से ज़्यादा समस्याओं का समाधान उस चौखट में छिपा है। हर प्रकार के तंत्र को रोकने का सामर्थ्य चौखट में है।
घर के एक भटके हुए सदस्य का उदाहरण जिसकी अकाल मृत्यु हुई
घर का भटका हुआ सदस्य और उसकी अकाल मृत्यु
वक्ता कहते हैं, मान लीजिए आपके घर में कोई साधक था, या कोई भटका हुआ लड़का जो सब कुछ खाता-पीता था — चिकन, मछली, शराब — और मान लीजिए भगवती की कृपा से उसकी अकाल मृत्यु हुई, चाहे तंत्र के वार से या किसी भी कारण से।
वक्ता एक और बात रखते हैं। मान लीजिए आपके घर में कोई साधक था, या कोई भटका हुआ लड़का जो यह सब खाता-पीता था — चिकन, मछली, शराब। पर भगवती की कृपा से, मान लीजिए उसकी अकाल मृत्यु हुई — तंत्र के वार से मृत्यु, या किसी भी कारण से मृत्यु। वे पहले ही चेताते हैं कि यह बहुत लोगों के गले नहीं उतरेगी, और वे इसे गले उतारने के लिए नहीं कह रहे; कि सच बोलने से वे कड़वे लगते हैं, और उनमें मीठा बोलने का सामर्थ्य नहीं है।
होली, दिवाली या पूर्णिमा पर हुई मृत्यु से उसकी गति बदल जाती है
होली, दिवाली या पूर्णिमा पर मृत्यु
वक्ता कहते हैं कि बात यह है: अगर ऐसे लड़के की अकाल मृत्यु हो, पर संयोग से उसकी मृत्यु किसी विशेष पर्व काल में हुई हो — होली, दिवाली, मान लीजिए पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा आदि — और आप साधक हैं।
तो बात यह है, वक्ता कहते हैं। मान लीजिए ऐसा कोई लड़का था, और मान लीजिए उसकी अकाल मृत्यु होती है — पर संयोग से उसकी मृत्यु किसी विशेष पर्व काल में हुई। होली ले लीजिए, दीपावली ले लीजिए; मान लीजिए पूर्णिमा थी, कार्तिक पूर्णिमा आदि, और तब उसकी मृत्यु हुई। और आप साधक हैं।
अकाल मृत्यु वाले के लिए नारायण बलि, त्रिपिंडी और पिंडीकरण किए जाते हैं
नारायण बलि, त्रिपिंडी और पिंडीकरण
वक्ता कहते हैं कि तंत्र में जो मरते हैं वही भूत और प्रेत बनते हैं। मृत्यु को प्राप्त इस व्यक्ति के लिए अकाल मृत्यु के कारण आपने नारायण बलि करवाई, त्रिपिंडी श्राद्ध करवाई, जप और पिंडीकरण आदि करवाए — ताकि वह अपने प्रारब्ध के अनुसार पितृ कुल में जाए; और आप जहाँ भी गए, जिस भी तीर्थ धाम में, जब आप वहाँ यह प्रक्रिया करवाते हैं, तो वह पितृ कुल में आकर खड़ा हो जाता है, पर देव कुल में नहीं जाएगा।
यह तंत्र की बात है, वक्ता कहते हैं: मरने के बाद यही लोग भूत और प्रेत बनते हैं — जो किसी कारण से मरते हैं वे भूत और प्रेत बनते हैं। अब मृत्यु को प्राप्त इस व्यक्ति के लिए, अकाल मृत्यु के कारण आपने नारायण बलि करवाई, त्रिपिंडी करवाई, जप और पिंडीकरण आदि करवाए। ताकि, हाँ, वह अपने प्रारब्ध के अनुसार पितृ कुल में जाए — और जिस भी क्षेत्र में, जिस भी तीर्थ धाम में आप गए, जब आप वहाँ यह प्रक्रिया करवाते हैं, तो उसके कारण वह पितरों के कुल में आकर उपस्थित हो जाता है। पर वह देव कुल में नहीं जाएगा।
उपदेवता श्रेणी का पितर दिव्य लोकों तक नहीं पहुँच सकता, इसलिए उसका स्थान चौखट है
इसी लोक में गति वाला समर्थ पितर चौखट पर स्थान लेता है
वक्ता कहते हैं कि अगर वह केवल उपदेवता श्रेणी का प्रेत रह गया, तो समर्थ पितर बन जाने पर भी उसकी गति इसी लोक में है और वह दिव्य लोकों में नहीं जा सकता। तो उसका स्थान उसी चौखट में होगा, और वह आपके घर के लिए उस चौखट में उग्र देवता के रूप में उपस्थित रहेगा।
अगर वह केवल उपदेवता श्रेणी का प्रेत रह गया, वक्ता कहते हैं, तो वह समर्थ पितर भी बन गया — पर ऐसा जिसकी गति इसी लोक में है। वह दिव्य लोकों में नहीं जा सकता। तो उसका स्थान उसी चौखट में मिलेगा, और उस चौखट में वह आपके घर के लिए इस प्रकार के उग्र देवता के रूप में उपस्थित रहेगा।
घर पर किए गए किसी भी म्लेच्छ तंत्र प्रयोग को खा जाने का सामर्थ्य उसमें होता है
म्लेच्छ तंत्र को खा जाने का सामर्थ्य, बिना अलग पूजा के
वक्ता कहते हैं कि जब किसी भी प्रकार का म्लेच्छ तंत्र का प्रयोग होगा, तो उसमें उस म्लेच्छ तंत्र को खा जाने का सामर्थ्य होगा। और इसके लिए आपको कोई अलग पूजा-पाठ, भोग, प्रसादी या चढ़ावा नहीं करना — भगत वाला यह धंधा नहीं कि यह दो, वह दो, एक बलि की दो हो गईं, दो मुर्गे कटे और तीन कौवे कटे। यहाँ इसमें से कुछ नहीं करना।
जब भी किसी प्रकार का म्लेच्छ तंत्र का प्रयोग होगा, वक्ता कहते हैं, तो उसमें उस म्लेच्छ तंत्र को खा जाने का सामर्थ्य होगा। और इसके लिए आपको कोई अलग पूजा-पाठ, धूप, भोग-प्रसादी और चढ़ावा नहीं करना। वे भगतवाल वाले तरीके को नकारते हैं — कि बात-बात पर यह दो, वह दो, और उसी में सीमित रहो; कि एक बलि दी तो दो दीं, दो मुर्गे कटे, तीन कौवे कटे। यहाँ, वे कहते हैं, इसमें से कुछ नहीं करना।
देवी गंगा की कृपा से वह कुल पितरों के साथ चौखट पर जागृत खड़ा रहता है और अपनी गति कमाता है
भगवती देवी गंगा की कृपा से, कुल पितरों के साथ खड़ा
वक्ता कहते हैं कि वह अपने आप उस स्थान पर जागृत रहेगा — भगवती देवी गंगा की कृपा से वह आपके कुल पितरों के साथ वहाँ खड़ा रहेगा, और उसी काम से वह अपनी गति पाएगा।
अपने आप, वक्ता कहते हैं, वह उस स्थान पर जागृत रहेगा। भगवती देवी गंगा की कृपा से वह आपके कुल पितृ के साथ वहाँ खड़ा रहेगा। और उसी काम से वह अपनी गति पाएगा।
उसे रोज़ की पंचबलि से पोषण मिलता है — चींटियों को अन्न, बिखेरी हुई शक्कर, कुत्तों को भोजन
रोज़ की पंचबलि से — चींटियों को अन्न, शक्कर, कुत्तों को भोजन
वक्ता कहते हैं कि आप जो रोज़ पंचबलि करते हैं उसके ज़रिए: जब आप चींटियों को अन्न डालते हैं, जब भोजन निकालते हैं, जो शक्कर का बूरा बिखेरते हैं, जो कुत्तों को खिलाते हैं। इन्हीं से उसे उस योनि में शरीर का पोषण मिलता है, और पोषित होकर वह वहाँ आपके परिवार की रक्षा के लिए तैयार खड़ा रहता है।
और आप रोज़ जो पंचबलि करते हैं, वक्ता कहते हैं — जब आप चींटियों को अन्न डालते हैं, जब भोजन निकालते हैं, जो शक्कर का बूरा बिखेरते हैं, जो कुत्तों को खिलाते हैं — इन्हीं से उसे उसी योनि में शरीर में अन्न का पोषण मिलता है। और पोषित होकर वह वहाँ आपके इस परिवार की रक्षा के लिए तैयार रहता है।
न पंचबलि, न चौखट, न गौ सेवा और बड़ों का अनादर — ऐसे में यह रक्षा संभव ही नहीं
न पंचबलि, न चौखट, न गौ सेवा, और वर्णों का अनादर
वक्ता कहते हैं कि अगर आपने जीवन में कभी पंचबलि नहीं की, चौखट है ही नहीं, कभी गौ सेवा नहीं करते, गर्मी में पौधों को पानी नहीं देते, पत्नी या पति से बुरा बोलते हैं, सास-ससुर को गाली देते हैं, बड़े या छोटे भाई का सम्मान नहीं करते, विद्वानों का आदर नहीं, ब्राह्मणों को गाली देते हैं, क्षत्रियों को नपुंसक, वैश्यों को लुटेरा कहते हैं, और शूद्रों के लिए SC-ST वाली भाषा बोलते हैं — अगर दुनिया में आपके लिए कोई सही नहीं और केवल आप ही महान हैं — तो ऐसी सत्ता आपकी कभी सहायता नहीं करेगी।
वक्ता वह आचरण गिनाते हैं जो यह रास्ता बंद कर देता है। अगर आपने जीवन में कभी पंचबलि नहीं की; अगर चौखट है ही नहीं; अगर आप कभी गौ सेवा नहीं करते; अगर गर्मी में कभी पौधों को पानी नहीं देते; अगर पत्नी से, या पति से, आपकी बोली और व्यवहार हमेशा टेढ़ा रहता है; अगर आप सास-ससुर को लगातार गाली देते हैं, चाहे स्त्री हों या पुरुष; अगर आप बड़े भाई या छोटे भाई का सम्मान नहीं करते और उनके लिए कभी कुछ नहीं सोचते; अगर विद्वानों का आदर नहीं; अगर आप ब्राह्मणों को गाली देते हैं — अगर आप क्षत्रियों को नपुंसक कहते हैं, वैश्यों को लुटेरा कहते हैं, और शूद्रों के लिए जो मन आए SC-ST वाली भाषा बोलते हैं, जो चाहें कहते हैं; अगर आप यह सब करने वाले हैं, और दुनिया में आपके लिए कोई सही नहीं और केवल आप ही महान हैं — तो आप चाहें भी कि ऐसी कोई चीज़ आपके साथ खड़ी हो, तो वह कभी नहीं होगी।
इतने बुरे आचरण पर वह पहरा देने के बजाय मृत्यु के बाद आपके गले का खून पिएगा
मृत्यु के बाद आपके गले का खून पिएगा
वक्ता कहते हैं कि आपके साथ खड़े होने के बजाय, मृत्यु के बाद वह फिर आपके गले का खून पिएगा। यह सब तभी संभव है जब घर में कम से कम एक व्यक्ति धर्म के मार्ग पर चलने वाला और धर्मनिष्ठ हो, और आपके घर में ऐसी जगह हो जहाँ ऐसी सत्ता को स्थान दिया जा सके।
आपकी सहायता करना तो दूर, वक्ता कहते हैं, मृत्यु के बाद वह फिर आपके गले का खून पिएगा। यह तभी संभव है जब घर में कम से कम एक व्यक्ति ऐसा हो — जो धर्म के मार्ग पर चलता हो, जो धर्मनिष्ठ हो, और जो यह करता हो। और जब आपके घर में वह स्थान हो जहाँ ऐसे को जगह दी जा सके। वे पूछते हैं, बेचारे कब तक हवा में लटके रहें? स्थान दीजिए।
अलग पूजा, धूप या दीप की ज़रूरत नहीं — यह व्यवस्था पहले से बना हुआ तंत्र का एक तंत्र है
पहले से बना हुआ तंत्र का एक तंत्र
वक्ता कहते हैं, नहीं — उनके लिए कोई अलग पूजा-पाठ, धूप, दीप या बत्ती नहीं करनी और कुछ अतिरिक्त नहीं चाहिए — यह पहले से बना हुआ तंत्र का एक तंत्र है।
और उनके लिए कोई अलग पूजा-पाठ नहीं करना, वक्ता कहते हैं; न धूप, न दीप, न बत्ती; कुछ भी अतिरिक्त नहीं। यह, वे कहते हैं, पहले से बनाया हुआ तंत्र का एक तंत्र है।
नरसिंह ने उसी चौखट पर बैठकर हिरण्यकशिपु को फाड़ा
नरसिंह ने उसी चौखट पर बैठकर हिरण्यकशिपु को फाड़ा
वक्ता उस दिन की ओर संकेत करते हैं जब भगवान नरसिंह ने उसी चौखट पर बैठकर हिरण्यकशिपु की छाती फाड़ी, आँतें निकालकर माला की तरह पहनीं — और श्रोताओं को सहस्रबाहु नरसिंह स्तोत्र पढ़ने को कहते हैं, जो उनके अनुसार YouTube पर सहस्रबाहु चैनल पर मिल सकता है, उस पूरे तांडव के लिए और यह जानने के लिए कि वे उसे करने कहाँ बैठे।
जिस दिन भगवान नरसिंह ने उस चौखट पर बैठकर हिरण्यकशिपु की छाती फाड़-चीर दी और आँतें निकालकर माला की तरह पहनीं, गर्जना करते हुए — पढ़िए, वक्ता कहते हैं, पूरा सहस्रबाहु नरसिंह स्तोत्र। उन्हें लगता है कि सहस्रबाहु चैनल YouTube पर मिल सकता है। पढ़िए, वे कहते हैं: भगवान नरसिंह का पूरा तांडव उसमें है — उन्होंने वह तांडव किस तरह किया, और उसे करने कहाँ बैठे। उन्होंने वह उसी चौखट पर बैठकर किया।
घर या मंदिर की चौखट किसका स्थान है?
देहरी, देहली और चौखट नरसिंह की
वक्ता पूछते हैं कि देहरी, देहली, चौखट किसका स्थान है — चाहे किसी भी देवता का मंदिर हो या किसी का भी घर? चौखट पर बैठने वाला देव एक ही होगा, सबसे बड़ा देवता: वहाँ केवल एक देवता का अधिकार सबसे बड़ा है, भगवान नरसिंह का। वहाँ बाल गोपाल माखन-मिश्री खाते नहीं बैठते; वहाँ नरसिंह ऐसी विधर्मी शक्तियों के हृदय फाड़ते, आँतों की माला पहनते और रक्त पीते बैठते हैं।
तो देहरी, देहली, चौखट किसका स्थान है, वक्ता पूछते हैं — चाहे किसी भी देवता का मंदिर हो, चाहे किसी का भी घर। चौखट पर बैठने वाले देव एक ही होंगे, देवताओं में सबसे बड़े। वहाँ केवल एक देवता का अधिकार सबसे बड़ा है: भगवान नरसिंह का। वहाँ बाल गोपाल जी माखन और मिश्री खाते नहीं बैठते। वहाँ नरसिंह बैठकर ऐसी विधर्मी शक्तियों के हृदय फाड़ते हैं, आँतों की माला पहनते हैं, और रक्त पीते हैं।
तीर्थ पर सद्गति पाया भटका हुआ संबंधी वहाँ एक तय अवधि के लिए नरसिंह का सान्निध्य पाता है
एक तय अवधि के लिए चौखट पर नरसिंह का सान्निध्य
वक्ता कहते हैं कि आपके घर की जो भी शक्ति हो — चाहे अकाल मृत्यु वाली और दुष्ट स्वभाव की ही क्यों न हो — अगर आपने संयोग से गंगा जी पर या किसी तीर्थ क्षेत्र में उसकी सद्गति करवाई, तो उसकी पूरी मुक्ति न भी हो पाई हो, तो भी उसी स्थान पर भगवान नरसिंह की कृपा-दृष्टि से उनका सान्निध्य पाकर वह आपके घर की रक्षा के लिए तब तक तैयार खड़ा रहेगा जब तक उसे उस योनि में रहकर रक्षा करने का समय दिया गया है।
आपके घर की जो भी शक्ति हो — चाहे अकाल मृत्यु उसी की हुई हो, चाहे वह दुष्ट स्वभाव का रहा हो — वक्ता कहते हैं: अगर संयोग से आप गंगा जी गए और उसकी सद्गति करवाई, या किसी तीर्थ क्षेत्र में उसकी सद्गति करवाई, और उसकी पूरी मुक्ति न भी हो पाई हो, तो उसी स्थान पर भगवान नरसिंह की कृपा-दृष्टि से उनका सान्निध्य पाकर वह आपके घर की रक्षा के लिए तैयार खड़ा रहेगा — जब तक उसे समय दिया गया है, कि हाँ, तुम इतने समय इस योनि में रहो और इस घर की रक्षा और पालना करो। यह याद रखिए, वे कहते हैं।
लिखित प्रमाण की माँग वे लोग करते हैं जो लिखे हुए का पालन वैसे भी नहीं करते
आप लिखे हुए का पालन भी नहीं करते
पूछे जाने पर कि कहाँ लिखा है, वक्ता कहते हैं कि वे लिखे हुए को वैसे भी नहीं मानते। लिखा है कि सूर्योदय से पहले उठें और तारे दिखते रहें तब तक संध्या पूरी करें — क्या आप करते हैं? लिखा है कि दस हज़ार कमाएँ तो उसमें से तीन हज़ार पितरों, गौ माता और पंचबलि की सेवा में लगाएँ — क्या आप करते हैं?
पढ़ाई-लिखाई तो हो गई, वक्ता प्रश्न की नकल करते हुए कहते हैं: गुरुजी, कहाँ लिखा है? क्या आप लिखे हुए को मान रहे हैं, वे उलटा पूछते हैं। लिखा है कि सूर्योदय से पहले उठना चाहिए, और जब तक तारे दिखें तब तक संध्या पूरी हो जानी चाहिए। क्या आप करते हैं? शायद नहीं करते। लिखा है कि अगर आप दस हज़ार कमाते हैं, तो उसमें से तीन हज़ार रुपये आपको अपने पितरों, गौ माता और पंचबलि आदि की सेवा में लगाने चाहिए। क्या आप करते हैं? आप कहेंगे कि इतने में तो हमारा ही पूरा नहीं पड़ेगा।
जो हिस्सा आप रोक लेते हैं वह बीमारी बनकर लौटता है और आपको खाता है
बीमारी बनकर लौटता है — उनका हिस्सा देना ही होगा
वक्ता कहते हैं कि जो आप खा जाते हैं, वह फिर बीमारी बनकर लौटता है और आपको खाता है। वे लोग अपना हिस्सा हर हाल में लेंगे; कट देना ही पड़ेगा। यह अनिवार्य है, क्योंकि आप मनुष्य हैं, उनका रक्त आपके भीतर है, और आप उन्हीं के कारण जन्मे: यह एक ऋण है। उस ऋण से मुक्ति चाहिए तो तीर्थ यात्राएँ कीजिए और विधि के अनुसार जीवन जिएँ।
नीति और नियम में रहिए तो पितर सौ की जगह हज़ार देते हैं
सौ की जगह हज़ार
वक्ता कहते हैं, जितना चाहे रो लीजिए: उन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, वे बंधे हैं और चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते। वे कब करेंगे? जब आप नीति और नियम में रहेंगे — तब वे आपको सौ की जगह हज़ार देंगे।
यह मत सोचिए कि हम रोए तो वे हमें छोड़ देंगे, वक्ता कहते हैं। जितना रोना है रो लीजिए। उन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा; वे बंधे पड़े हैं। चाहकर भी वे कुछ नहीं कर सकते। वे कब करेंगे? जब आप नीति और नियम में रहेंगे — तब सौ की जगह वे आपको हज़ार देंगे। यह भी याद रखिए।
चौखट पर खड़े पितर-रक्षक को क्या कोई थान, मूर्ति या मंदिर चाहिए?
चौखट के पितर-रक्षक को घर में चौखट चाहिए, थान या मूर्ति नहीं
वक्ता कहते हैं, नहीं। अगर चौखट ही नहीं है, तो वे पूछते हैं, वह कहाँ से आएगा और किस जगह खड़ा होकर आपकी रक्षा करेगा? वह कह रहा है: मैं यहाँ खड़ा हूँ, देखो, जब तक जीवित था भगवती की सेवा-पूजा करता था, और जगदंबा की कृपा से मुझमें यह सामर्थ्य है — मुझे स्थान दो। आप फिर उसका थान बनवाएँगे और मूर्ति स्थापित करेंगे; मूर्ति, थान या मंदिर की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। उसे घर में चौखट चाहिए।
अगर चौखट ही नहीं है, वक्ता पूछते हैं, तो वह कहाँ से आएगा, और किस जगह आकर आपको रक्षा देगा? वह कह रहा है: मैं यहाँ खड़ा हूँ; देखो, जब तक जीवित था भगवती की सेवा-पूजा करता था, और जगदंबा की कृपा से मुझमें यह सामर्थ्य है — बस मुझे स्थान दो। तो आप उसका थान बनवाएँगे और उसकी मूर्ति स्थापित करेंगे। मूर्ति की, थान की, मंदिर की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। उसे घर में चौखट चाहिए।
रसोई में पितरों के लिए जल का पात्र बारहों महीने रहना चाहिए
रसोई में पितरों के लिए जल का पात्र, बारहों महीने
वक्ता कहते हैं: जल का पात्र। वे याद दिलाते हैं कि इस महीने की संक्रांति पर उन्होंने कहा था कि अपने पितरों के लिए घड़े में जल ज़रूर रखें। बारहों महीने आपकी रसोई में जल का पात्र ज़रूर होना चाहिए — वह पितरों का स्थान है, और वहाँ रहने वाले पितर रोगों से मुक्ति दिलाते हैं।
घर में दूसरा काम, वक्ता कहते हैं, इस महीने की संक्रांति को याद करते हुए, जब उन्होंने कहा था कि अपने पितरों के लिए घड़े में जल ज़रूर रखना चाहिए और बाकी सब करना चाहिए। आप नहीं रखते, वे कहते हैं। बारहों महीने आपकी रसोई में जल का पात्र ज़रूर होना चाहिए। वह पितरों का स्थान है। वहाँ रहने वाले पितर आपको रोगों से मुक्ति दिलाते हैं। पितर, वे कहते हैं, गृहस्थ के पहले देवता हैं।
भगवती का पितरों से क्या संबंध है?
भगवती मेना के द्वारा हिमालय की पुत्री, इसलिए पितरों की नातिन
वक्ता पूछते हैं: भगवती किसकी पुत्री हैं? हिमालय की। उनकी माता कौन हैं? भगवती मेना। भगवती मेना के पिता कौन हैं? इस हिसाब से, वे कहते हैं, ऐसे देखें तो भगवती इन पितरों की नातिन हैं — उन्हें पितरों की पुत्री कहा गया है।
पितर गृहस्थ के पहले देवता हैं, वक्ता कहते हैं। और भगवती, अगर इन पितरों को इस तरह देखें, तो उनकी नातिन हैं। भगवती किसकी पुत्री हैं? हिमालय की। उनकी माता कौन हैं? भगवती मेना। भगवती मेना के पिता कौन हैं? तो उन्हें पितरों की पुत्री कहा गया है।
किसी भी बड़े आयोजन में सबसे पहले पूजा किसकी होती है?
नांदीमुख श्राद्ध — पहले पितर, फिर गणपति, फिर बाकी
वक्ता कहते हैं कि आप जगदंबा की पूजा पहले नहीं कर सकते। जब भी कोई बड़ा आयोजन होता है, अगर विधि-विधान मानने वाले पंडित जी या ब्राह्मण जी आए हैं, तो वे सबसे पहले नांदी श्राद्ध करवाएँगे — नांदीमुख श्राद्ध, जो खुशी के समय किया जाने वाला श्राद्ध है। वहाँ स्थान पहले पितरों का है, अधिकार पहले पितरों का है। उसके बाद गणपति जी का, और तभी बाकी देवी-देवताओं का।
आप जगदंबा की पूजा पहले नहीं कर सकते, वक्ता कहते हैं। जब भी कोई बड़ा कार्यक्रम होता है, देखिए: अगर विधि-विधान से ठीक से संपन्न पंडित जी या ब्राह्मण जी आए हैं, तो वे सबसे पहले नांदी श्राद्ध करवाएँगे — नांदीमुख श्राद्ध, वह श्राद्ध जो खुशी के समय किया जाता है। वहाँ स्थान पहले पितरों का है; अधिकार पहले पितरों का है। उसके बाद गणपति जी का, और तभी बाकी देवी-देवताओं का।
पात्र ईशान कोण में, और उसके पास कुश पर शाम को घी का दीपक
ईशान कोण, और कुश पर शाम का घी का दीपक
वक्ता कहते हैं कि जल का पात्र ईशान कोण में रखिए, या चाहें तो कोण की बात छोड़ दीजिए — लोग कोण और वास्तु की चर्चा शुरू करते ही थक जाते हैं कि कितने नियम हैं। अगर आप एक अच्छा पात्र रखें जिसे रोज़ धोकर जल भरें, और शाम को उस स्थान पर कुश पर घी का दीपक जलाएँ, तो आप रोगों से बहुत बचेंगे।
जल का पात्र जिसका स्थान आप रखते हैं — अगर आपने उसे ईशान कोण में रखा है, वक्ता कहते हैं, या आप कोण की बात छोड़ भी सकते हैं। लोग कोण और वास्तु और बाकी सबकी चर्चा शुरू करते हैं, और तुरंत थक जाते हैं: कितने नीति-नियम। वे कहते हैं कि नीति-नियम से भागने वाले लोग ही आज के समय में बेइज़्ज़त हो रहे हैं। अगर आप एक अच्छा पात्र रखें जिसे रोज़ धोकर जल भरें, और उस स्थान पर शाम को कुश आसन घास पर घी का दीपक जलाएँ, तो आप रोगों से बहुत ज़्यादा बचेंगे।
पितरों का रोग पर क्या प्रभाव होता है?
सौ प्रतिशत रोग घिसकर नष्ट होने तक
वक्ता कहते हैं कि आपके शरीर में आने वाले रोग का कारण जो भी हो — कोई दोष, कुंडली का दोष, प्रारब्ध — पितर उसके सौ प्रतिशत को उस स्तर तक ले आते हैं कि कुछ समय बाद वह नष्ट हो जाता है। वह जैसा था वैसा नहीं रहता: जीवन भर का रोग पाँच-दस साल में खत्म होगा, और पाँच-दस साल का रोग साल भर में। उस स्थान पर यही उनका सामर्थ्य है।
पितर, वक्ता कहते हैं — किसी भी कारण से, किसी भी दोष से, कुंडली के दोष से, प्रारब्ध के कारण, आपके शरीर में कोई रोग आने वाला हो — उस रोग को, उसके सौ प्रतिशत को, उस स्तर तक ले आते हैं कि कुछ समय बाद वह नष्ट हो जाता है। वह जैसा था वैसा नहीं रहता। जो रोग जीवन भर चलता, वह पाँच-दस साल में खत्म होगा; पाँच-दस साल का रोग साल भर में खत्म होगा। यही, वे कहते हैं, उस स्थान पर उनका सामर्थ्य है।
घर में RO और हर फैशन की चीज़ रखी जाएगी पर मिट्टी का एक घड़ा नहीं
घर में RO पर मिट्टी का घड़ा नहीं
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि आप वह स्थान नहीं देंगे। आप RO रखेंगे और आजकल जो भी फैशन में है वह रखेंगे, पर मिट्टी का एक घड़ा, या पीने के पानी का कोई अच्छा सुंदर पात्र, और उनके लिए एक स्थान नहीं रख सकते — जैसा पहले होता था। यही कारण है, वे कहते हैं, कि पहले के लोग बहुत स्वस्थ और रोगमुक्त रहते थे।
आप वह स्थान नहीं देंगे, वक्ता कहते हैं। आप RO रखेंगे, और आजकल जो भी फैशन में आया है वह रखेंगे — पर मिट्टी का एक घड़ा, न पीने के पानी का कोई अच्छा सुंदर पात्र, न उनके लिए एक स्थान रख सकते हैं। पहले के समय में यह होता था। इसीलिए पहले के लोग बहुत बढ़िया और रोगमुक्त रहते थे। इसमें एक कारण है।
मुख्य द्वार पर प्रतीकात्मक धारदार शस्त्र तीसरी व्यवस्था है, कुल भैरव के लिए
कुल भैरव के लिए मुख्य द्वार पर प्रतीकात्मक धारदार शस्त्र
वक्ता कहते हैं: घर के मुख्य द्वार पर कुल भैरव के लिए प्रतीकात्मक अस्त्र-शस्त्र की उपस्थिति। पहले, वे कहते हैं, हर किसी के घर के सामने मुख्य द्वार के पास किसी प्रकार के धारदार शस्त्र रखे जाते थे — छोटे या बड़े, प्रतीकात्मक — और उन्हीं पर कुल के भैरव की पूजा होती थी।
तीसरी चीज़, वक्ता कहते हैं, घर के मुख्य द्वार पर कुल भैरव के लिए प्रतीकात्मक अस्त्र-शस्त्र की उपस्थिति है। पहले हर किसी के घर के सामने, मुख्य द्वार के पास, किसी प्रकार के धारदार शस्त्र — अस्त्र — रखे जाते थे। छोटे या बड़े, प्रतीकात्मक; और उन्हीं पर कुल के भैरव की पूजा होती थी। आज के समय में, वे कहते हैं, अगर आधुनिक लोग ऐसी चीज़ रखें तो उनका अंधविश्वासी कहकर मज़ाक उड़ेगा, और इसी कारण वे रखते ही नहीं। जब आप स्थान ही नहीं देंगे, वे पूछते हैं, तो बचेंगे कैसे?
कुल वधुएँ देहरी केवल सिर ढककर ही पार करें
कुल वधुएँ सिर ढककर देहरी पार करें
वक्ता कहते हैं कि जब आपने घर के द्वार पर देहली या देहरी लगाई है, तो उस देहरी की मर्यादा के अनुसार घर की कुल वधुएँ उसे हमेशा सिर पर दुपट्टा रखकर ही पार करें। वे कहते हैं कि यह कहने पर उनके खिलाफ वुमन कार्ड खेला जाएगा कि वे पुरानी सोच के हैं, और जवाब देते हैं कि यही उनके विनाश का कारण है, बताना उनका कर्तव्य है और वे बताएँगे।
जब आप अपने घर के द्वार पर देहली लगाते हैं, या जहाँ देहरी है, वक्ता कहते हैं, तो उस देहरी की मर्यादा के अनुसार घर की कुल वधुएँ उसे हमेशा सिर पर दुपट्टा रखकर ही जाकर पार करें। अगर इस पर कुछ कहो, वे कहते हैं, तो अलग से वुमन कार्ड खेला जाएगा — कि आप पुरानी सोच के हैं। अपना विनाश देखिए, वे कहते हैं; यही विनाश का कारण है। मत मानिए, भुगतिए; हमें क्या। बताना हमारा कर्तव्य है, और हम बताएँगे।
चौखट पितरों की है — उसे लाँघा जाता है, कभी उस पर पैर नहीं रखा जाता, न पालतू जानवर बैठाए जाते हैं
उस पर पैर नहीं रखना, और कुत्ते-बिल्ली नहीं बैठाना
वक्ता कहते हैं कि वहाँ पैर बिल्कुल नहीं रखना चाहिए — वह स्थान पितरों का है, इसलिए उसे लाँघकर आइए-जाइए। जब आप उस पर कुत्ते-बिल्ली और खरगोश बैठाकर उन्हें दुलारते हैं, तो बाद में वे आपके जीवन में वही दुलार करते हैं, और फिर आप जितना चाहें रोएँ और कोसें, भुगतना पड़ेगा।
जब बिल्ली जैसे जीव इस दहलीज़ को पार करके अंदर आते हैं, वक्ता कहते हैं, तो फिर यही पितर हैं — क्योंकि वह स्थान उनका है। वहाँ पैर बिल्कुल नहीं रखना चाहिए। उसे लाँघकर आइए-जाइए। तो जब आप उस पर कुत्ते-बिल्ली बैठाते हैं, खरगोश बैठाते हैं, और उन्हें दुलारते-पुचकारते हैं, तो बाद में वे आपके जीवन में वही दुलार करते हैं। उसके बाद जितना चाहें रोइए और जितना चाहें कोसिए; और ऐसे विषयों पर बोलने वालों को जितनी चाहें गालियाँ दीजिए — पर आपको भुगतना पड़ेगा, और अच्छी तरह भुगतना पड़ेगा।
व्यक्ति नीति-नियम का मज़ाक तभी तक उड़ा सकता है जब तक उसके पास धन बल है
केवल तब तक जब तक धन का बल है
वक्ता कहते हैं कि व्यक्ति नीति-नियम का मज़ाक तभी तक उड़ा सकता है जब तक उसके पास धन बल है। जब वह रोग से घिरता है और रोग उसे कष्ट देने लगते हैं और उनसे छुटकारा नहीं मिलता, जब उसकी आँखों के सामने उसके बच्चे बर्बाद होने लगते हैं और वह रोते हुए जगह-जगह दिखाने-बताने लगता है — उस समय नीति, नियम और मर्यादा की यह सारी धज्जियाँ उड़ाना किसी काम नहीं आता।
आप करोड़पति हो सकते हैं, और निस्संदेह हैं, वक्ता कहते हैं — यह आपका प्रारब्ध है कि अभी आप करोड़ों में हैं। पर अगर आप इस तरह की गलतियाँ कर रहे हैं, तो एक दिन आप भीख माँगने लायक हो जाएँगे, और शायद भीख माँगने लायक भी नहीं रहेंगे। व्यक्ति नीति-नियम का मज़ाक तभी तक उड़ा सकता है जब तक उसके पास धन का बल है। जब रोग से घिरकर रोग उसे कष्ट देने लगते हैं और उन रोगों से छुटकारा नहीं मिलता; जब उसकी आँखों के सामने उसके बच्चे बर्बाद होने लगते हैं और वह रोते हुए जगह-जगह दिखाने-बताने लगता है — उस समय नीति, नियम और मर्यादा की यह सारी धज्जियाँ उड़ाना उसके काम नहीं आता। या तो हम अभी जोगी रखेंगे, वे कहते हैं, या बाद में खुद जोगी बन जाएँगे।
क्या पितर सीधे सहायता कर सकते हैं?
शुद्ध रखे और सेवा किए जाने पर उनमें प्रत्यक्ष सहायता का सामर्थ्य
वक्ता कहते हैं कि जब आप अपने पितरों को शुद्ध अवस्था में रखते हैं और उचित ढंग से उनकी सेवा करते हैं, तो उनमें प्रत्यक्ष रूप से सहायता करने का सामर्थ्य होता है। वे इसे अपने जीवन का अनुभव बताते हैं, और कहते हैं कि वे आमतौर पर अपने अनुभव नहीं बताते क्योंकि वे पचेंगे नहीं — जो आपकी पहुँच से बाहर है वह काल्पनिक लगता है, जैसे न देखा हो तो ब्रह्मलोक, या न देखी हो तो हवा।
वक्ता एक और बात बताते हैं। जब आप अपने पितरों को शुद्ध स्थिति में रखते हैं और सही ढंग से उनकी सेवा करते हैं, तो उनमें प्रत्यक्ष रूप से आपकी सहायता करने का सामर्थ्य होता है। वे कहते हैं कि यह उनके अपने जीवन का अनुभव है; पर वे आमतौर पर अपने अनुभव नहीं बताते, क्योंकि वे पचेंगे नहीं और लोग इसे काल्पनिक बात समझेंगे। जो भी आपकी पहुँच से बाहर है, वे कहते हैं, वह काल्पनिक लगता है। अगर आपने ब्रह्मलोक नहीं देखा तो वह काल्पनिक लगेगा — इसका अर्थ यह नहीं कि वह है नहीं। अगर आपने हवा न देखी होती, तो उसे भी काल्पनिक मानते।
किसी उग्र रात्रि को आठ-नौ बजे खुले अँधेरे खेत में लेटकर स्वयं देखिए
उग्र रात्रि को आठ-नौ बजे खुले अँधेरे खेत में लेटना
वक्ता कहते हैं कि गाँवों में, खेतों की ओर जहाँ रोशनी नहीं होती, किसी विशेष तिथि पर — होली के समय, दिवाली के समय, या ऐसे किसी पर्व काल में, किसी विशेष उग्र रात्रि को जब तांत्रिक प्रयोग की संभावना हो — रात को लगभग आठ-नौ बजे ऐसी खुली जगह थोड़ी देर लेटिए जहाँ बिजली की व्यवस्था न हो और आसमान साफ दिखे। तब, वे कहते हैं, आपको बहुत सी चीज़ें उड़ती दिखेंगी। आप सीधे देखेंगे; कोई सिद्धि नहीं चाहिए।
गाँवों में, जहाँ रोशनी नहीं होती, खेतों और खलिहानों की ओर — यह विषय, वक्ता कहते हैं, वे कई बार बता चुके हैं — किसी विशेष तिथि पर, होली के समय, दीपावली के समय, या ऐसे किसी पर्व काल में, किसी विशेष उग्र रात्रि को जब तांत्रिक प्रयोग आदि की संभावना हो, रात को आठ-नौ बजे वहाँ ऐसी खुली जगह थोड़ी देर लेटिए जहाँ बिजली की कोई व्यवस्था न हो और आसमान साफ दिखता हो। फिर देखिए, वे कहते हैं: आपको बहुत सी चीज़ें उड़ती दिखेंगी। आप इसे सीधे देख पाएँगे। इसके लिए कोई सिद्धि नहीं चाहिए।
असली परीक्षा चाहिए तो उसे गाली देकर बुलाइए — और शब्दों के लिए वक्ता स्वयं प्रायश्चित्त करते हैं
गाली देकर बुलाना — और प्रयुक्त शब्दों के लिए उनका अपना प्रायश्चित्त
वक्ता कहते हैं कि अगर आपको सचमुच जोखिम उठाने और यह देखने की इच्छा है कि कुछ होता है या नहीं, तो जब कोई चीज़ उड़ती या बैठी दिखे, उसे गाली देकर बुलाइए — ज़ोर से चिल्लाकर बुलाइए कि इधर आ, सामर्थ्य है तो दिखा तू कौन है। वे माताओं-बहनों से कान बंद करने को कहते हैं, शब्दों के लिए क्षमा माँगते हैं, और कहते हैं कि वे निशा काल में, चौथे प्रहर की पूजा में जाकर प्रायश्चित्त करेंगे।
अगर आपको पंगा लेने की बहुत इच्छा है, वक्ता कहते हैं — पिछवाड़े में तीर खाने का शौक है, यह देखने का कि कुछ होता है या नहीं — तो उसे गाली देकर बुलाइए। वे माताओं-बहनों से कान बंद करने को कहते हैं, कि वे गाली देने वाले हैं, और उनसे क्षमा माँगते हैं: वे यह स्थिति सहन नहीं कर पा रहे और बात गले तक आ गई है, इसलिए देनी पड़ेगी। फिर, वे कहते हैं, वे रात को निशा काल में जाकर प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। करेंगे; चौथे प्रहर की पूजा में, उस संध्या में, इसके लिए अलग से प्रायश्चित्त करेंगे। जब कोई चीज़ उड़ती या बैठी दिखे, उसे गाली देकर बुलाइए। ज़ोर से चिल्लाकर बुलाइए: अगर सामर्थ्य है तो आकर दिखा तू कौन है। और उसके बाद, वे कहते हैं, जो मज़ा आए वह लीजिए।
पटाखे फोड़ने वाले आदमी की तरह, आप यह कहने की हालत में नहीं रहेंगे कि कुछ नहीं हुआ
पटाखे की उपमा — आप कहने की हालत में नहीं रहेंगे
वक्ता इसकी तुलना एक प्रसिद्ध वायरल वीडियो से करते हैं जिसमें एक आदमी मुँह में पटाखा फोड़ता है, फिर हाथ में फोड़ता है और हाथ गायब हो जाता है और कहता है कुछ नहीं होता, फिर सिलेंडर पर बैठकर उसमें आग लगाता है। यही होगा, वे कहते हैं — कुछ नहीं होगा, पर आप यह कह नहीं पाएँगे, क्योंकि ये चीज़ें आपको बोलने लायक हालत में नहीं छोड़ेंगी।
वक्ता आशीष चंचलानी का पटाखे फोड़ने वाला बहुत शेयर हुआ वीडियो याद करते हैं, जो उनके अनुसार सबने देखा होगा। मुँह में पटाखा फोड़ा जाता है; हाथ में पकड़कर पटाखा फोड़ा जाता है और हाथ गायब हो जाता है — कुछ नहीं होता यार, हाथ गया। फिर वह सिलेंडर पर बैठकर उसमें आग लगाता है, कहते हुए कि सिलेंडर पर कुछ नहीं होता; यह दिखाया नहीं गया, पर बहुत अच्छे से दिखाया गया कि बाद में उसकी फोटो पर माला टँगी थी। ठीक यही होगा, वे कहते हैं — कुछ नहीं होगा। पर आप यह कह नहीं पाएँगे। ये चीज़ें आपको बोलने लायक हालत में नहीं छोड़ेंगी। अगर आपको व्यावहारिक शोध की बहुत इच्छा है, वे कहते हैं, तो शोध करके देख लीजिए।
क्या घर में कुत्ते-बिल्ली रखने चाहिए?
चरित्र पाले गए जानवर जैसा हो जाता है
वक्ता कहते हैं कि वे बताएँगे लोग चरित्रहीन कैसे होते हैं: उन्हें देखिए जो घर में कुत्ते-बिल्ली रखते हैं। जिनकी चौखट कुत्ते-बिल्ली पार करने लगें, जो उन्हें गोद में लेकर घूमें, और जहाँ कुत्ता या बिल्ली खाने की एक ही थाली में खाने लगे — समय के साथ उनका चरित्र भी कुत्ते या बिल्ली जैसा हो जाता है। वे कहते हैं कि यह उनका अपना अनुभव है और वे व्यक्तिगत रूप से किसी का नाम नहीं ले रहे।
एक और बात, वक्ता कहते हैं, कि लोग चरित्रहीन कैसे हो जाते हैं: उन्हें देखिए जो घर में कुत्ते-बिल्ली रखते हैं। जो ऐसी स्थिति में हैं वे स्वयं अपना विश्लेषण करें, क्योंकि वे व्यक्तिगत रूप से किसी के बारे में नहीं कह सकते और किसी की परिस्थिति नहीं जानते — पर यह उनका अपना अनुभव है और वे इसे बता रहे हैं। इसे साफ समझिए, वे कहते हैं: जिनकी चौखट कुत्ते-बिल्ली पार करने लगें, जो कुत्ते-बिल्ली को गोद में लेकर घूमें, जहाँ कुत्ता-बिल्ली खाने की एक ही थाली में खाने लगें — समय के साथ उनका चरित्र भी कुत्ते-बिल्ली जैसा हो जाता है। विश्वास न हो, वे कहते हैं, तो देखते रहिए।
भैरव या दत्त जैसा जीना चाहते हैं तो घर-परिवार छोड़िए, केवल उनके प्रतीक मत रखिए
तो उनका जीवन अपनाइए और गृहस्थी छोड़िए
वक्ता कहते हैं कि अगर आपको भैरव बनने की बहुत इच्छा है, भैरव साधक बनने की बहुत इच्छा है, भगवान दत्त जैसा बनने की बहुत इच्छा है, तो उनके जैसा जीवन अपनाइए — घर-परिवार छोड़िए, और उसके बाद जो चाहें रखिए।
आपको भैरव बनने की बहुत इच्छा है, वक्ता कहते हैं; भैरव साधक बनने की बहुत इच्छा है; भगवान दत्तात्रेय जैसा बनने की बहुत इच्छा है। तो उनके जैसा जीवन अपनाइए। गृहस्थी और परिवार छोड़िए। उसके बाद जो मन आए रखिए और घूमिए।
अगर युधिष्ठिर वाला तर्क सही है, तो आपका वाहन भी उनकी तरह धरती से ऊपर चलना चाहिए
अगर आप युधिष्ठिर हैं, तो आपका वाहन धरती से ऊपर चले
उन चार-पाँच लोगों को जो तर्क देते हैं कि जब युधिष्ठिर गए तो धर्मराज के रूप में कुत्ता उनके साथ गया, वक्ता जवाब देते हैं: क्या आप इसे नकारेंगे? तो क्या आप युधिष्ठिर जितने सत्यवादी हैं? वे कहते हैं कि महाभारत में पढ़ा है कि युधिष्ठिर के रथ का पहिया धरती से ऊपर, हवा में रहता था, क्योंकि वे इतने बड़े धर्मज्ञ थे और सत्य से जीते थे — तो उनका उदाहरण देने वालों की Ducati और Range Rover भी हवा में उड़नी चाहिए।
चार-पाँच लोग जवाबी तर्क देते हैं, वक्ता कहते हैं, कि जब युधिष्ठिर गए, तो धर्मराज के रूप में कुत्ता उनके साथ गया और उनके साथ था — क्या आप इसे नकारेंगे? तो क्या आप युधिष्ठिर जितने सत्यवादी हैं, वे पूछते हैं। हमने महाभारत में पढ़ा है कि धर्म से युक्त होने के कारण युधिष्ठिर के रथ का पहिया ऊपर, हवा में रहता था। वे इतने बड़े धर्मज्ञ थे, इतने सत्य से जीते थे। तो जो लोग युधिष्ठिर जी का उदाहरण देते हैं — उनका वाहन भी हवा में रहना चाहिए; उन्हें धरती पर नहीं चलना चाहिए। उनकी Ducati और Range Rover हवा में उड़नी चाहिए, क्योंकि वे युधिष्ठिर हैं। अगर ऐसा है, वे कहते हैं, तो बहुत अच्छी बात है; फिर कुत्ते को गोद में और सिर पर लेकर घूमिए, हम क्यों मना करेंगे?
भगवान दत्त ने गणिका पिंगला के घर नगाड़ा बजाया
गणिका के घर बजाया गया नगाड़ा और सोने की वर्षा
वक्ता एक कथा सुनाते हैं जो उनके अनुसार किसी सज्जन के पिंगला पर बने अच्छे वीडियो में आई थी, जिन्हें भगवान दत्त ने गुरु माना: वह एक गणिका, नगरवधू थी, जिसके घर लोग कतार में खड़े रहते थे, और वहाँ एक नगाड़ा रखा था जिसे बजाने के लिए इतनी स्वर्ण मुद्राएँ देनी पड़ती थीं, तब वह एक बार बाहर आकर दिखती थी। भगवान दत्त अवधूत अवस्था में वहाँ गए और बार-बार नगाड़ा बजाने लगे।
भगवान दत्त के सामर्थ्य के बारे में, वक्ता कहते हैं, हाल में किसी सज्जन का बहुत अच्छा वीडियो आया था, पिंगला के बारे में, जिन्हें दत्त ने गुरु माना। बहुत अच्छा वर्णन था: वह ऐसी गणिका, ऐसी नगरवधू थी कि लोग उसके घर जाने के लिए कतार में खड़े रहते थे। उसमें बहुत चर्चा है कि कौन कहाँ खड़ा था, और एक झलक पाने के लिए खड़े रहना। और वहाँ एक नगाड़ा रखा गया था, जिसे एक बार बजाने के लिए इतनी स्वर्ण मुद्राएँ देनी पड़ती थीं, और तभी वह एक बार आकर दिखती थी। भगवान दत्त अवधूत अवस्था में उस स्थान पर गए, और वहाँ जाकर बार-बार नगाड़ा बजाने लगे।
सोने की वर्षा हुई, और पिंगला उनकी शिष्या बन गई
सोने की वर्षा, और वह उनकी शिष्या बनी
वक्ता कहते हैं कि वह घबराकर बाहर आई, सोचती हुई कि कौन सा धनी या चक्रवर्ती इतनी बार नगाड़ा बजाने आया है, और एक फ़क़ीर को देखा; हँसते हुए बोली, इतना कहाँ से दोगे — पर बताओ मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ। उन्होंने सोना बरसा दिया: भगवान तो भगवान हैं, वे कहते हैं, उनके रोम-रोम में सिद्धियाँ हैं, और सब सिद्धियों के स्वामी साक्षात भगवान दत्त ही हैं। सोने की वर्षा होने पर वह उनकी शिष्या बन गई, और उन्होंने उससे जो सीखा उसके लिए उसे गुरु माना।
वह बहुत घबराकर बाहर आई, वक्ता कहते हैं, सोचती हुई कि इतना धनी कौन आया है, कौन महाराज चक्रवर्ती आए हैं, कि इतनी बार नगाड़ा बजाया गया — उसके पास कितना धन है? और उसने एक फ़क़ीर को देखा। उसे बहुत हँसी आई। बोली, इतना कहाँ से दोगे? पर बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ? पर भगवान तो भगवान हैं, वक्ता कहते हैं: उनके रोम-रोम में सिद्धियाँ हैं, और सामर्थ्य की सभी सिद्धियों के स्वामी साक्षात भगवान दत्त ही हैं। उन्होंने सोना बरसवा दिया। जब सोने की वर्षा हुई, तो वह उनकी शिष्या बन गई; और उन्होंने उससे जो सीखा, उसके लिए उसे गुरु रूप में स्वीकार किया।
दत्त कुत्ते के साथ गाय के साथ भी चलते थे, पर उदाहरण केवल कुत्ते का दिया जाता है
आपको दत्त का कुत्ता दिखता है, उनकी गाय नहीं
वक्ता कहते हैं कि अगर आपमें भगवान दत्त जितना सामर्थ्य है कि सोने की वर्षा करवा सकें, तो कुत्ता रखिए और कुत्ते के साथ घूमिए। पर भगवान दत्त गाय के साथ चलते थे — आप लोग वह गाय क्यों नहीं रखते? आपको दत्त का कुत्ता दिखता है और उनकी गाय नहीं। गाय भी रखिए।
तो अगर आपमें भगवान दत्त जैसा सामर्थ्य है, कि सोने की वर्षा करवा सकें, तो कुत्ता रखिए और कुत्ते के साथ घूमिए, वक्ता कहते हैं। और भगवान दत्त गाय के साथ चलते थे। आप लोग वह गाय क्यों नहीं रखते? आपको दत्त का कुत्ता दिखता है और उनकी गाय नहीं दिखती। गाय भी रखिए।
सामर्थ्य मंत्र में नहीं — आचरण और अनुशासन में है
मंत्र में नहीं, आचरण और अनुशासन में
वक्ता कहते हैं कि अगर आप यह नहीं कर सकते, तो देवताओं, पितरों, मंत्रों और विद्वानों को दोष देना बंद कीजिए। सामर्थ्य मंत्र में नहीं है — सामर्थ्य आपके आचरण और आपके अनुशासन में है। क्या आपके जीवन में कोई नीति-नियम है? जब नहीं है, तो किसी और को कुछ क्यों कह रहे हैं?
और अगर आप इसे निभा नहीं सकते और कर नहीं सकते, वक्ता कहते हैं, तो देवताओं में, पितरों में, मंत्रों में, विद्वानों में दोष निकालना बंद कीजिए। सामर्थ्य मंत्र में नहीं है। सामर्थ्य आपके आचरण में, आपके अनुशासन में है। क्या आपके जीवन का कोई नीति-नियम है? जब कोई नहीं है, तो आप किसी और को कुछ क्यों कह रहे हैं?
घर तभी सुरक्षित है जब रक्षक देवताओं के मंत्र, स्तोत्र, कवच और माला मंत्र सिद्ध हों
रक्षक देवताओं के मंत्र, स्तोत्र, कवच और माला मंत्र सिद्ध करना
वक्ता कहते हैं कि जब तक आप रक्षक देवताओं के मंत्र, स्तोत्र, कवच और माला मंत्र सिद्ध करके समर्थ नहीं बनते, तब तक आप असुरक्षित रहेंगे।
एक बात जानिए, वक्ता कहते हैं: अब आपको अपना घर पूरी तरह सुरक्षित कैसे रखना चाहिए। जब तक आप रक्षक देवताओं के मंत्र, स्तोत्र, कवच और माला मंत्र सिद्ध नहीं करते, और सामर्थ्यवान नहीं बनते — तब तक आप असुरक्षित रहेंगे।
क्या केवल भाव से देवता आ जाते हैं?
द्रौपदी में भाव था, पर उन्होंने उस स्तर का तप भी किया था
वक्ता कहते हैं, नहीं। केवल भाव, भाव कहने से — कि भाव हो तो देवी-देवता आ जाएँगे — ऐसा नहीं होगा। भाव के साथ योग्य भी होना पड़ेगा। भगवती द्रौपदी में वह भाव था जिससे श्रीकृष्ण एक पुकार पर आते थे, पर उन्होंने उस स्तर का तप भी किया था। जितनी भी महान स्त्रियाँ और महान पुरुष हुए जिनके एक वचन पर भगवान आते थे, उन्होंने पहले उस स्तर का तप किया था और फिर वह भाव जी रहे थे — वे कथावाचकों की कहानियाँ सुनकर मीठा बना झूठा भाव प्रस्तुत नहीं कर रहे थे।
इसे ऐसे समझिए, वक्ता कहते हैं। केवल भाव, भाव कहने से — कि भाव होगा तो देवी-देवता आ जाएँगे — ऐसा नहीं होगा। भाव के साथ योग्य भी बनना पड़ेगा। भगवती द्रौपदी के भीतर वह भाव था जिससे भगवान श्रीकृष्ण एक पुकार पर आते थे; पर उन्होंने उस स्तर का तप भी किया था। जितनी भी महान स्त्रियाँ या महान पुरुष हुए, जिनके एक वचन पर भगवान आते थे — उन्होंने पहले उस स्तर का तप किया था, और फिर वह भाव जी रहे थे। वे कथावाचकों की कहानियाँ सुनकर मीठा बना यह नकली भाव प्रस्तुत नहीं कर रहे थे। यह हमेशा ध्यान रखिए, वे कहते हैं।
पहले दो काम हैं घर पर चौखट और रसोई में घड़े में पीने का पानी
चौखट बनाइए, और रसोई में घड़े में पीने का पानी रखिए
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला काम यह कीजिए: अपने घर पर चौखट बनाइए; और अपनी रसोई में पीने का पानी रखने की व्यवस्था हो — टंकियों में नहीं, बल्कि घड़े में या किसी ऐसे पात्र में। ये दो चीज़ें ज़रूर होनी चाहिए।
सबसे पहला काम आपको यह करना चाहिए, वक्ता कहते हैं। अपने घर पर चौखट बनाइए। और अपनी रसोई में पीने का पानी रखने की व्यवस्था हो — टंकियों में नहीं, बल्कि घड़े में या किसी ऐसे पात्र में। ये दो चीज़ें ज़रूर होनी चाहिए।
मुख्य द्वार पर अभिमंत्रित लोहे का त्रिशूल होना चाहिए, भले छोटा हो
अभिमंत्रित लोहे का त्रिशूल, भले छोटा हो
वक्ता कहते हैं कि तीसरा, आपके घर के मुख्य द्वार के पास त्रिशूल ज़रूर होना चाहिए — चाहे प्रतीकात्मक, चाहे छोटा, पर लोहे का त्रिशूल, जो पूरी तरह अभिमंत्रण किया गया हो। वे कहते हैं कि इसकी पूरी विधि दो-तीन साल पहले ही चैनल पर बताई जा चुकी है।
तीसरा, वक्ता कहते हैं, आपके घर के मुख्य द्वार के पास — चाहे प्रतीकात्मक, चाहे छोटा — वहाँ त्रिशूल ज़रूर होना चाहिए। वह लोहे का त्रिशूल हो, जो पूरी तरह अभिमंत्रित किया गया हो। यह पूरी विधि, वे कहते हैं, दो-तीन साल पहले ही चैनल पर बताई जा चुकी है। यह सब कीजिए और ऐसे रखिए।
परिवार के हर सदस्य को साधना में लाना होगा, और यह साधक की ज़िम्मेदारी है
परिवार के हर सदस्य से साधना करवानी होगी
वक्ता कहते हैं कि चौथी चीज़ आपके परिवार का हर सदस्य है: अगर आप साधक हैं तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है। अकेले आपके करने से काम नहीं चलेगा। धीरे-धीरे सबसे साधनाएँ करवाइए, भले आधा घंटा — और अगर चौबीस घंटे में आधा घंटा भी नहीं निकाल सकते, तो धिक्कार है आपके जीवन पर, और आप यहाँ गलती से आ गए हैं।
चौथी चीज़, वक्ता कहते हैं, आपके परिवार का हर सदस्य है। अगर आप साधक हैं तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है। अकेले आपके करने से काम नहीं चलेगा। धीरे-धीरे सबसे साधनाएँ करवाइए — भले केवल आधा घंटा करवाइए। अगर चौबीस घंटे में आप आधा घंटा भी नहीं निकाल सकते, वे कहते हैं, तो धिक्कार है आपके जीवन पर; आप यहाँ गलती से आ गए हैं।
सनातनी घर में जन्म केवल साधना के लिए हुआ है
ऐसे घर में जन्म साधना के लिए है
वक्ता पूछते हैं कि आपका जन्म हिंदू के घर में, सनातनी के रूप में क्यों हुआ? आपकी हालत कितनी भी विपत्तिपूर्ण हो, आप कितने भी दरिद्र हों, आपका जन्म केवल साधना के लिए हुआ है। अगर यह उद्देश्य न होता तो आपको विदेश में, या ऐसे ही दूसरों में जन्म दिया जाता। इसके पीछे कुछ अच्छे कर्म थे, कि भले जन्म सबसे निचले परिवार में हुआ, आपको एक रास्ता दिया गया है — क्योंकि जो आप यहाँ पा सकते हैं वह कहीं और नहीं मिलेगा।
आपका जन्म सनातनी के रूप में, हिंदू के घर में क्यों हुआ, वक्ता पूछते हैं? अगर आपका जन्म हिंदू के घर में हुआ है, तो आपकी हालत कितनी भी विपत्तिपूर्ण हो, आप कितने भी दरिद्र हों, आपका जन्म केवल साधना के लिए हुआ है। यह याद रखिए। अगर यह न करना होता, वे कहते हैं, तो आपको विदेश में, या ऐसे ही किसी दूसरे मत वालों में जन्म दिया जाता। कुछ अच्छे कर्म थे, कि आपका जन्म कितने भी निचले परिवार में हुआ हो, आपको एक रास्ता दिया गया है — क्योंकि जो चीज़ आप यहाँ पा सकते हैं वह कहीं भी नहीं मिलेगी।
शुरुआत के लिए कौन से मंत्र सबके लिए खुले हैं?
पंचाक्षरी, बत्तीस नामावली और जयंती मंगला
वक्ता कहते हैं कि अपने कुल के देवी-देवताओं से शुरुआत कीजिए। जो आपके लिए अधिकृत है उसमें: पंचाक्षरी सब कर सकते हैं, बत्तीस नामावली सब कर सकते हैं, जयंती मंगला सब कर सकते हैं।
आप पहले कैसे करवाएँगे, वक्ता पूछते हैं। अपने कुल के देवी-देवताओं का करवाइए। जो भी आपके लिए अधिकृत है उसमें: पंचाक्षरी सब कर सकते हैं; दुर्गा बत्तीस नामावली सब कर सकते हैं; जयंती मंगला काली सब कर सकते हैं।
न्यास कब सीखना चाहिए?
पाँच-दस हज़ार के बाद न्यास सीखिए, और दो-तीन हज़ार पर मत रुकिए
वक्ता कहते हैं कि जब आप पाँच या दस हज़ार कर लें, तो उसका न्यास करना भी सीखिए। और इस विचार पर मत अटकिए कि हमें केवल दो-तीन हज़ार जप करना है, केवल चार-पाँच हज़ार, ज़्यादा जप नहीं करना, इतने से हमारा काम हो गया — यही कहकर, वे कहते हैं, लोगों को ठगा जाता है और किसी की ओर खींचा जाता है: मेहनत मत करो।
जब आप पाँच या दस हज़ार कर लें, वक्ता कहते हैं, तब उसका न्यास करना भी सीखिए। और एक बात: मूर्खों की बात सुनकर इस विषय पर मत अटकिए — कि नहीं, हमें केवल दो-तीन हज़ार जप करना है, केवल चार-पाँच हज़ार जप करना है, ज़्यादा जप नहीं करना, इतने से हमारा काम हो गया। इसी से लोग भागते हैं, वे कहते हैं; और ठीक यही कहकर किसी को ठगा जाता है और बोलने वाले की ओर खींचा जाता है: मेहनत मत करो। और जो व्यक्ति आपको यह सुविधा देता है कि हाँ, बिना मेहनत के सिद्धि मिल जाएगी — उस वाक्पटुता के जाल में फँसकर आप ठीक भेड़ की तरह ऐसे लोगों के पीछे चलने लगते हैं।
पाँच-दस हज़ार जप पर अनुभव शुरू होते हैं, पर केवल उतने से कुछ सिद्ध नहीं होता
अनुभव शुरू होते हैं, पर केवल उतने से कुछ सिद्ध नहीं
वक्ता कहते हैं कि पाँच-दस हज़ार से कुछ नहीं होने वाला: पाँच-दस हज़ार तक ले जाइए तो भी बहुत कुछ अनुभव होने लगेगा, पर उतने से कुछ सिद्ध नहीं होने वाला। देखिए जिनसे आपको सीधे निपटना है उन्होंने किस स्तर की तैयारी की है — आपके भीतर का सामर्थ्य भी उस स्तर का होना चाहिए, तभी काम होगा।
सामर्थ्यवान बनिए, वक्ता कहते हैं; पौरुष से युक्त बनिए; अपने भीतर के सामर्थ्य को पहचानिए। पाँच-दस हज़ार से कुछ नहीं होने वाला। पाँच-दस हज़ार तक ले जाइए तो भी बहुत कुछ अनुभव होने लगेगा — पर उतने से कुछ सिद्ध नहीं होने वाला। देखिए जिनसे आपको सीधे निपटना है उन्होंने किस स्तर की तैयारी की है। वीडियो वायरल होते रहते हैं। आपके भीतर का सामर्थ्य भी उस स्तर का होना चाहिए। तभी काम होगा।
श्राप और गाली से बात-बात पर तपोबल घटता है, और उसका प्रायश्चित्त करना होता है
बात-बात पर तपोबल खर्च करना बंद कीजिए — और उसका उनका अपना हिसाब
वक्ता कहते हैं कि बात-बात पर तपोबल की हानि बंद कीजिए — श्राप देना, गाली देना जैसे वे देते हैं। वे कहते हैं कि वे कोटा लेकर बैठते हैं, कि इतना बोलेंगे और इतनी गाली देंगे और फिर उसका प्रायश्चित्त करेंगे; कि अगर वे दिन भर में दस हज़ार नाम जप कर रहे हैं, तो उन दस हज़ार के सामने दो-चार गालियाँ कुछ नहीं, और यह मजबूरी है क्योंकि बिना गाली दिए आप समझेंगे नहीं। उनकी गाली के पीछे कारण है, और अच्छा कारण है; आपकी गाली का कोई अच्छा कारण नहीं होगा और वह द्वेष से दी जाएगी — इसलिए मत दीजिए, क्योंकि यह तपोबल की हानि है।
और बात-बात पर तपोबल की हानि बंद कीजिए, वक्ता कहते हैं — श्राप देना, गाली देना जैसे वे स्वयं देते हैं। वे कहते हैं कि वे कोटा लेकर बैठते हैं: इतना बोलूँगा, इतनी गाली दूँगा, और फिर उसका प्रायश्चित्त करूँगा। आप देखने तो आ नहीं रहे, वे कहते हैं; आपको कैसे पता कि जब मैं बैठकर गाली देता हूँ तो बाद में वैसे ही रह जाता हूँ? अगर दिन भर में वे दस हज़ार नाम जप पूरा कर रहे हैं, तो उन दस हज़ार में से दो-चार गालियाँ देना उसके सामने कुछ नहीं — और यह मजबूरी है, क्योंकि बिना गाली दिए आप समझेंगे नहीं। देनी पड़ती है। मेरी गाली के पीछे कारण है, वे कहते हैं; वह अच्छा कारण है, इसलिए मैं देता हूँ। आपके पास कोई अच्छा कारण नहीं होगा; आप द्वेष से देंगे। मत दीजिए। यह तपोबल की हानि है, और नहीं देनी चाहिए।
किस साधना से शुरुआत करनी चाहिए?
पहले कुल देवता, वरना इनमें से कोई भी मंत्र
वक्ता कहते हैं कि अब साधना शुरू कीजिए — सबसे पहले अपने कुल के देवी-देवता की; वरना इन सब मंत्रों में से जो चाहें चुनिए और फिर जप आदि कीजिए। अगर आप नीति, नियम और मर्यादा के अनुसार करेंगे, तो बहुत लाभ होगा।
अब साधना शुरू कीजिए, वक्ता कहते हैं। सबसे पहले अपने कुल के देवी-देवता की। वरना इन सब मंत्रों में से जो चाहें चुनिए, और उसके बाद जप आदि कीजिए। अगर आप नीति, नियम और मर्यादा के अनुसार करेंगे, तो आपको बहुत बड़ा लाभ मिलेगा।
कौन से बाहरी नियम अनिवार्य हैं?
कड़ा, मुद्रिका, कंठी, कमर का धागा, पैर का कड़ा और शिखा
वक्ता कहते हैं कि सनातन संस्कृति में — तंत्र मार्ग, नाथ मार्ग और वैदिक मार्ग सबमें — यज्ञोपवीत अलग विषय है, पर उसके बाद भी: हाथ में कड़ा, उँगलियों में मुद्रिका, गले में कंठी या माला, कमर में कमर का धागा ताकि कमर बँधी रहे और खुली न छूटे, पैर में कड़ा, और सिर पर शिखा। ये, वे कहते हैं, निश्चित रूप से अनिवार्य हैं।
एक और संबंधित बात, वक्ता कहते हैं। आप जानते होंगे कि सनातन संस्कृति में, या तंत्र मार्ग में, नाथ मार्ग में, वैदिक मार्ग में, सबमें — यज्ञोपवीत आदि अलग विषय है। पर उसके बाद भी: हाथ में कड़ा पहनना; उँगलियों में मुद्रिका पहनना; गले में कंठी, या माला; कमर में करधनी का धागा, कि कमर बँधी रहे और खुली न छूटे; पैर में कड़ा; और सिर पर शिखा। ये, वे कहते हैं, निश्चित रूप से अनिवार्य हैं।
एक-दो साल बाल बढ़ाइए, कैंची न लगने दें, विशेषकर पुरुष
एक-दो साल बिना कैंची के बाल बढ़ाना, विशेषकर पुरुष
वक्ता कहते हैं कि एक बार बाल बढ़ाकर देखिए। अगर कोई मजबूरी नहीं, ऐसी नौकरी में नहीं जहाँ बाल छोटे रखने पड़ें, तो बढ़ाइए: कैंची न चलने दें, एक-दो साल बाल बढ़ाइए, और बाद में चाहें तो कटवा लीजिए। वे यह विशेषकर पुरुषों से कहते हैं, और उनसे जिन्हें कोई सिद्धि नहीं मिल रही, कोई अनुभव नहीं हो रहा, जिनकी हालत दरिद्र और हीन हो गई है, जो हमेशा रोते रहते हैं — वे लोग बाल बढ़ाएँ। यह किसी मन्नत की बात नहीं: सँवारकर रखिए, एक-दो साल करके देखिए, सवा साल में समझ आ जाएगा, और ज़मीन-आसमान का अंतर होगा।
एक बार बाल बढ़ाकर देखिए, वक्ता कहते हैं। सब बाल छोटे रखते हैं; अगर आप पर ऐसी कोई मजबूरी नहीं, ऐसी नौकरी में नहीं जिसमें बाल छोटे रखने पड़ें, तो एक बार बाल बढ़ाकर देखिए। बिना कारण बाल बढ़ाने की कोई बात नहीं। बाल बढ़ाइए; कैंची चलाए बिना एक-दो साल अपने बाल बढ़ाइए, और बाद में कटवा सकते हैं। पर देखिए, वे कहते हैं: जिसे कोई सिद्धि नहीं मिल रही, जिसे कोई अनुभव नहीं हो रहा, जो दरिद्र और रूखा हो गया है, जो हमेशा रोता रहता है — वे लोग बाल बढ़ाएँ। वे कहते हैं कि यह विशेषकर पुरुषों से कह रहे हैं। बालों में कैंची बिल्कुल न चले। यहाँ कोई मन्नत की बात नहीं। सँवारकर रखिए; एक-दो साल करके देखिए। सवा साल में समझ आ जाएगा; ज़मीन-आसमान का अंतर होगा। जहाँ आप रोते थे कि कुछ नहीं होने वाला, वहाँ बहुत कुछ होगा — और यह केवल बाल बढ़ाने की बात नहीं, वे कहते हैं, बल्कि साधना करते हुए ऐसा करने की बात है। इन हर चीज़ के पीछे कोई न कोई कारण रहा है।
आरंभिक साधनाओं के बाद महाभैरव की साधना करनी चाहिए, आज उनके स्तोत्र में वह सामर्थ्य है
महाभैरव, जिनके स्तोत्र में आज वह सामर्थ्य है
वक्ता कहते हैं कि आरंभिक साधनाओं के बाद महाभैरव ज़रूर कीजिए। आज के समय में उनके स्तोत्र में उस प्रकार का सामर्थ्य है; बहुत कुछ हो सकता है।
आरंभिक साधनाओं के बाद, वक्ता कहते हैं, महाभैरव ज़रूर कीजिए। आज के समय में उनके स्तोत्र में उस प्रकार का सामर्थ्य है। बहुत कुछ हो सकता है।
साधना में आमतौर पर गड़बड़ कहाँ होती है?
चार या चालीस दिन में फल चाहना, और देवता, बाबा और धाम बदलते रहना
वक्ता कहते हैं कि दिक्कत तब आती है जब आप पहले ही गड्ढे में धँसे हैं और उस समय चाहते हैं कि काम चार दिन या चालीस दिन में हो जाए — तब आप अटक जाते हैं, और नहीं होता। होगा, पर छह-सात महीने लगेंगे, और आपके भीतर धैर्य नहीं है। तो आप देवता बदलते रहते हैं, बाबा बदलते रहते हैं, धाम बदलते रहते हैं; कुछ नहीं होता, और दो साल बाद भी आप वहीं खड़े हैं और और गहरे धँस गए हैं।
दिक्कत कहाँ आती है, वक्ता पूछते हैं। जब आप पहले ही पूरी तरह गड्ढे में धँस चुके हैं, और उस समय चाहते हैं कि काम चार दिन में या चालीस दिन में हो जाए — तब आप अटक जाते हैं, और उसके बाद नहीं होता। होगा; छह महीने, सात महीने का समय लगेगा। पर आपके भीतर धैर्य नहीं है। तो आप देवता बदलते रहते हैं, बाबा बदलते रहते हैं, धाम बदलते रहते हैं। कुछ नहीं होता, और दो साल बाद भी आप वहीं खड़े हैं, और खाई में भी धँस गए हैं। दस जगह भटकते हैं और दस और मालाएँ उठा लाते हैं।
जब पहले से कठिनाई में हों तो सबसे अच्छा तरीका क्या है?
सुरक्षित होने तक केवल एक व्यक्ति से सहायता, फिर अपना सामर्थ्य बढ़ाइए
वक्ता कहते हैं कि कठिनाई में सबसे अच्छा है सहायता लेना — पर एक ही व्यक्ति से। सहायता केवल इतनी हो कि हम सुरक्षित रहें। उसके बाद, जब आप थोड़ा सुरक्षित हो जाएँ और थोड़ी स्थिरता मिल जाए, तो अपना सामर्थ्य बढ़ाइए।
वे पहले चेताते हैं कि जगह-जगह भटकने में कोई उलझन खड़ी हो सकती है — आपकी पत्नी सुंदर है, आपकी बहन सुंदर है, और अगर वहाँ कुछ टेढ़ा हो गया तो आप एक अलग मुसीबत में फँस जाएँगे। सबसे अच्छा रास्ता, वक्ता कहते हैं, जब आप कठिनाई में हों: ठीक है, सहायता लीजिए — पर एक व्यक्ति से लीजिए। सहायता केवल इतनी हो कि हम सुरक्षित रहें। उसके बाद, जब आप थोड़ा सुरक्षित हो जाएँ और थोड़ी स्थिरता पा लें, तो अपना सामर्थ्य बढ़ाइए।
गृहस्थ को जप की कौन सी दैनिक समय-सारणी रखनी चाहिए, और किस क्रम में?
तय आधा घंटा, स्नान, आसन, धूप-दीप, गुरु-गणपति स्मरण, फिर पुरश्चरण
वक्ता कहते हैं कि समय निकालिए और आधे घंटे के जप की भी समय-सारणी बनाइए। अगर आपका समय तय नहीं, तो चौबीस घंटे में जब भी समय मिले: अगर खाना खा लिया है तो स्नान कीजिए, कपड़े बदलिए, आसन पर बैठिए, धूप-दीप जलाइए, गुरु और गणपति का पाँच मिनट का आरंभिक स्मरण कीजिए, और फिर जो मुख्य पुरश्चरण करना है उस पर आइए।
समय निकालिए, वक्ता कहते हैं, और आधे घंटे के जप की भी समय-सारणी बनाइए — कि हम कम से कम आधा घंटा जप करेंगे। अगर आपका समय तय नहीं, तो चौबीस घंटे में जब भी समय मिले: अगर खाना खा लिया है, तो स्नान कीजिए, कपड़े बदलिए, आसन पर बैठिए, धूप-दीप जलाइए। गुरु और गणपति का पाँच मिनट का आरंभिक स्मरण आदि कीजिए। उसके बाद जो मुख्य पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करना है उस पर आइए।
कम से कम पंचाक्षरी का पाँच लाख का अनुष्ठान — सौ माला यानी दस हज़ार जप
पाँच लाख, सौ माला यानी दस हज़ार जप
वक्ता कहते हैं कि अगर और कुछ नहीं कर सकते, तो कम से कम पंचाक्षरी का पाँच लाख का अनुष्ठान कीजिए। अगर आप सौ माला करते हैं, तो सौ माला यानी दस हज़ार जप।
और अगर आप कुछ भी नहीं कर सकते, वक्ता कहते हैं, तो कम से कम पंचाक्षरी का पाँच लाख का अनुष्ठान कीजिए। अगर आप सौ माला करते हैं — सौ माला यानी कितना? दस हज़ार जप।
गिनती तीस लाख पंचाक्षरी तक जाती है, उसके बाद संपुट के साथ महाभैरव किया जाता है
तीस लाख पंचाक्षरी, फिर संपुट के साथ महाभैरव, और बयालीसवाँ दिन
वक्ता कहते हैं कि अभ्यास हो जाएगा, और आप घंटे भर में आराम से पंचाक्षरी की सौ माला कर लेंगे। जब आप पंचाक्षरी का पाँच लाख, फिर दस लाख, फिर बीस लाख कर लें, और बढ़ते-बढ़ते जिस दिन तीस लाख तक ले जाएँ — तब जब आप महाभैरव करने बैठेंगे, तो इकतालीस दिन के बाद बयालीसवाँ दिन खाली नहीं रह पाएगा। इसी पंचाक्षरी से बार-बार संपुट करते हुए आप महाभैरव को जागृत रखेंगे।
अभ्यास हो जाएगा, वक्ता कहते हैं, और आप घंटे भर में आराम से पंचाक्षरी की सौ माला जप कर पाएँगे। जब आप पंचाक्षरी का पाँच लाख करें, फिर दस लाख, फिर बीस लाख, और बढ़ते-बढ़ते तीस लाख तक ले जाएँ — उसके बाद जब आप महाभैरव करने बैठेंगे, तो इकतालीस दिन के बाद बयालीसवें दिन महाभैरव खाली नहीं रह पाएँगे। इसी पंचाक्षरी से बार-बार संपुट करते हुए आप महाभैरव को जागृत रखेंगे।
ऐसे साधक को पीड़ित व्यक्ति को छूने की भी ज़रूरत नहीं
पीड़ित व्यक्ति को छूने की भी ज़रूरत नहीं
वक्ता कहते हैं कि जहाँ भी ज़रूरत पड़े — अगर आपको लगे कि आपकी बेटी, बहनों, पत्नी या माँ पर, या किसी पर भी किसी मलिन क्षुद्र तंत्र का प्रयोग और प्रभाव पड़ा है — तो आपको अपने तपोबल के कारण उस व्यक्ति को छूने की भी ज़रूरत नहीं होगी।
जहाँ आप पर ज़रूरत पड़े, वक्ता कहते हैं — जहाँ आपको लगे कि यहाँ किसी मलिन क्षुद्र तंत्र का प्रयोग और प्रभाव हुआ है, हमारी बेटी पर, हमारी बहनों पर, हमारी पत्नी या माँ पर, या किसी पर भी — आपको उस व्यक्ति को छूने की भी ज़रूरत नहीं होगी। आपके तपोबल के कारण।
आप बैठकर स्मरण करते हैं, और उलटे प्रयोग की विधि बुद्धि में अपने आप आ जाती है
आप बैठकर स्मरण करते हैं, और विधि अपने आप आती है
वक्ता कहते हैं कि आप बस बैठकर स्मरण करेंगे, और आपकी बुद्धि इतनी दृढ़ हो जाएगी कि ये सब बातें अपने आप आपके मन में आएँगी — प्रयोग कैसे करना है, क्या प्रयोग करना है। मानसिक बल से आप उस पूरी चीज़ को पकड़कर पलटने में समर्थ हो जाएँगे।
आप केवल बैठकर स्मरण करेंगे, वक्ता कहते हैं, और आपकी बुद्धि इतनी दृढ़ हो जाएगी — मैं अभी बता रहा हूँ, पर ये सब बातें अपने आप आपके मन में आएँगी। प्रयोग कैसे करना है, क्या प्रयोग करना है। मानसिक सबलता से आप इन चीज़ों को पूरी तरह पकड़कर पलटने में समर्थ हो जाएँगे।
पीछे तीस-चालीस लाख पंचाक्षरी हो तो दीक्षा से विकास तेज़ होता है
पीछे तीस-चालीस लाख पंचाक्षरी हो तो दीक्षा इसे तेज़ बनाती है
वक्ता कहते हैं कि अगर संयोग से आपकी दीक्षा हो गई है, तो आपको ज़बरदस्त बनने में देर नहीं लगेगी — बशर्ते आपने तीस-चालीस लाख पंचाक्षरी जप किया हो। प्रारब्ध अपनी जगह है, कष्ट अपनी जगह है, और मंत्रों का सामर्थ्य अपनी जगह है।
और अगर संयोग से आपकी दीक्षा हो गई है, वक्ता कहते हैं, तो आपको ज़बरदस्त और दुर्जेय बनने में कोई समय नहीं लगेगा — अगर आपने तीस-चालीस लाख पंचाक्षरी जप कर रखा है। प्रारब्ध अपनी जगह है; कष्ट अपनी जगह है; और मंत्रों का सामर्थ्य अपनी जगह है।
क्रम दीक्षा में प्रत्यंगिरा तक पहुँच जाने पर उनके मंत्र सिद्धि के लिए थोड़ा ही प्रयास बचता है
उतना आगे जाने पर उनकी मंत्र सिद्धि के लिए थोड़ा प्रयास
वक्ता कहते हैं कि अगर क्रम विद्या दीक्षा में आप महाप्रत्यंगिरा तक गए हैं, तो भगवती प्रत्यंगिरा की सिद्धि के लिए, उनके मंत्रों की सिद्धि के लिए, आपको बहुत प्रयास नहीं करना पड़ेगा। और अगर उनकी कृपा हो गई और आपने मंत्रों का पुरश्चरण कर लिया, तो जब यह सब आपके सामने पड़ेगा, तो उसे पल भर में तोड़ने का सामर्थ्य आपके भीतर होगा।
और अगर क्रम दीक्षा में आप प्रत्यंगिरा तक गए हैं, वक्ता कहते हैं, तो भगवती प्रत्यंगिरा आदि की सिद्धि के लिए आपको बहुत प्रयास नहीं करना पड़ेगा — उनके मंत्रों की सिद्धि के लिए। और अगर उनकी कृपा हो गई है और आपने मंत्रों का पुरश्चरण कर लिया है, तो जब यह सब आपके सामने आएगा, तो उसे पल भर में, पल भर में तोड़ने का सामर्थ्य आपके भीतर पैदा होगा।
लोग कभी तैयार नहीं होते क्योंकि वे मंत्रों के बीच भटकते रहते हैं और किसी एक देवता को पकड़ते नहीं
मंत्रों के बीच भटकना और किसी देवता को न पकड़ना
वक्ता कहते हैं कि वे भटकते रहते हैं, पूछते हुए कि कौन सा मंत्र करें — वे देवता को पकड़ ही नहीं पाते। वे अपना उदाहरण देते हैं: वे विंध्य क्षेत्र में सेवा-पूजा करते हैं; अगर कल वे पाटन देवी जाएँ तो वहाँ भगवती के दर्शन करेंगे, पर पाटन देवी के किसी मंत्र का जप नहीं करेंगे — वहाँ भी अपनी विंध्यवासिनी के मंत्र का जप करेंगे, उनका कवच पढ़ेंगे, उनका माला मंत्र पढ़ेंगे, उनका सहस्रनाम पढ़ेंगे।
पर जब आपके भीतर कोई तैयारी है ही नहीं — लोग तैयार क्यों नहीं हो पाते, वक्ता पूछते हैं। वे भटकते रहते हैं: कौन सा मंत्र करें? वे देवता को पकड़ ही नहीं पाते। अगर आज हम विंध्य क्षेत्र में सेवा-पूजा कर रहे हैं, वे कहते हैं, और कल जाएँ — हम अभी पाटन देवी जा रहे हैं — तो पाटन देवी में हम भगवती के दर्शन तो करेंगे, पर वहाँ हम पाटन देवी के किसी मंत्र का जप नहीं करने वाले। वहाँ जाकर भी हम अपनी विंध्यवासिनी के ही मंत्र का जप करेंगे; उनका ही कवच पढ़ेंगे, उनका ही माला मंत्र पढ़ेंगे, उनका सहस्रनाम पढ़ेंगे, उनका ही करेंगे। आपको भी ठीक यही करना है, वे कहते हैं।
तीर्थ या कुंड पर किसका मंत्र करना चाहिए?
केवल अपने इष्ट का, दसों कुंडों में
वक्ता कहते हैं कि अगर कल आप कामाख्या जी जाएँ, तो वहाँ भगवती कामाख्या के निमित्त वीडियो में जो लिखा है वह कीजिए — पर हर जगह जप किसका करेंगे? कुंड में जप किसका करना है? तीर्थों में जाकर सिद्धि के निमित्त कौन सा? केवल अपने इष्ट-आराध्य का। हर जगह अलग नहीं — कि पीतांबरा माई के पास गए तो बगलामुखी जप, वहाँ "दुष्टम वाचम मुखम"; धूमावती के पास गए तो वहाँ "मां धूमावती धूम धूम धूमा"। ऐसा नहीं। दसों कुंडों में उनका ही जप चलेगा, क्योंकि जड़ वही है।
अगर कल आप कामाख्या जी भी जाएँ, वक्ता कहते हैं, तो वहाँ भगवती कामाख्या के निमित्त वीडियो में जो लिखा है वह सब कीजिए। पर हर जगह जप किसका करेंगे? कुंड में जप किसका करना है? तीर्थों में जाकर सिद्धि के निमित्त कौन सा? केवल अपने इष्ट-आराध्य का। हर जगह अलग-अलग नहीं — कि पीतांबरा माई के पास गए तो वहाँ बगलामुखी जप करें, "दुष्टम वाचम मुखम"; धूमावती के पास गए तो वहाँ "मां धूमावती धूम धूम धूमा"। धूमावती में नहीं। दसों कुंडों में हर जगह उनका ही जप चलेगा — क्योंकि जड़ वही एक है। तो आपको केवल एक ही चीज़ करनी है।
दत्त के देव दीक्षा विधान, चौखट, जल स्थान और रोज़ की पंचबलि से शुरू करें, फिर जीव और पौधों की सेवा
दत्त का देव दीक्षा विधान, चौखट, जल स्थान और रोज़ पंचबलि, फिर जीव सेवा और पौधों की सेवा
वक्ता कहते हैं कि शुरुआत घर से होती है। तो सबसे पहले भगवान दत्त का आपका देव दीक्षा विधान; आपके घर की चौखट; पीने के पानी का स्थान; पंचबलि — यह सब रोज़ हो। उसके बाद जीव सेवा आती है, और उसके बाद पेड़-पौधों की सेवा: किसी एक पेड़ या पौधे की सेवा शुरू कीजिए।
आरंभ, शुरुआत, आप घर से करेंगे, वक्ता कहते हैं। तो सबसे पहले भगवान दत्तात्रेय का आपका देव दीक्षा विधान; आपके घर की चौखट; पीने का पानी रखने का स्थान; पंचबलि — यह सब रोज़ हो। उसके बाद जीव सेवा आती है। जीव सेवा के बाद पेड़-पौधों की सेवा आती है: किसी एक पेड़ या पौधे की सेवा शुरू कीजिए।
तपोबल बढ़ता है और मलिन पितर शुभ्र, समर्थ और आपकी रक्षा में लगे हो जाते हैं
तपोबल बढ़ता है और मलिन पितर शुद्ध और रक्षक बनते हैं
वक्ता कहते हैं कि आपका तपोबल बढ़ने लगेगा। पितर शुभ्र वर्ण के होने लगेंगे; उप-पितर और मलिन पितर समर्थ और शुद्ध होकर आपकी रक्षा में लग जाएँगे, हर कदम पर आपके साथ खड़े रहने वाले बन जाएँगे।
आपका तपोबल बढ़ने लगेगा, वक्ता कहते हैं। पितर शुभ्र, श्वेत वर्ण के होने लगेंगे। जो उप-पितर हैं, जो मलिन पितर हैं, वे सामर्थ्य से युक्त होकर और शुद्ध होकर आपकी रक्षा में लग जाएँगे — हर कदम पर आपके साथ चलने वाले बन जाएँगे।
अपने आराध्य का गीता पाठ किस तिथि पर करना चाहिए?
पाक्षिक गीता पाठ — एकादशी, या देवता की अपनी तिथि
वक्ता कहते हैं कि तीन से छह महीने यह करने के बाद आपका अगला काम — और बीच-बीच में समय-समय पर — एकादशी को अपने आराध्य का गीता पाठ करना है, या जो भी आपके आराध्य की तिथि हो उस पर। महीने में एक बार या पक्ष में एक बार कीजिए; पाक्षिक पाठ कीजिए। भगवती का करें तो अष्टमी, नवमी या चतुर्दशी को कीजिए; पूर्णिमा या अमावस्या को कीजिए। गणपति जी का करें तो चतुर्थी को, चतुर्दशी को कीजिए। संक्रांति को सबका किया जा सकता है।
तीन से छह महीने यह करने के बाद, वक्ता कहते हैं, आपका अगला काम होगा — और बीच-बीच में समय-समय पर, ज़रूरत के अनुसार — एकादशी को अपने आराध्य का गीता पाठ करना चाहिए, या जो भी आपके आराध्य की तिथि हो उसका। महीने में एक बार, या पक्ष में एक बार कीजिए; पाक्षिक पाठ कीजिए। भगवती का करें तो अष्टमी, नवमी या चतुर्दशी को कीजिए; पूर्णिमा या अमावस्या को कीजिए। गणपति जी का करें तो चतुर्थी को कीजिए, चतुर्दशी को कीजिए। संक्रांति को सबका किया जा सकता है।
भगवान शिव का गीता पाठ किन तिथियों पर किया जाता है?
पंचमी, त्रयोदशी, द्वादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा — एक चुनिए
वक्ता कहते हैं कि अगर भगवान शिव का गीता पाठ करना है, तो पंचमी को कीजिए, त्रयोदशी को कीजिए, द्वादशी को कीजिए, चतुर्दशी को कीजिए, अमावस्या या पूर्णिमा को कीजिए। एक तिथि चुनिए और करना शुरू कीजिए।
तीर्थ जाने से पहले मंत्र कहाँ सिद्ध करना चाहिए?
पहले मंदिर में — महाभैरव शिव मंदिर में, भले एक माला
वक्ता कहते हैं कि पाँच-छह महीने में बड़ा अंतर आ जाएगा, और तभी आपको तीर्थ जाकर मंत्र सिद्ध करने चाहिए। उससे पहले मंत्र मंदिर में सिद्ध कीजिए: अगर महाभैरव मंत्र है, तो उसे केवल शिव मंदिर में सिद्ध कीजिए। केवल एक माला जप कीजिए — वे कहते हैं कि वे यह नहीं कह रहे कि महाभैरव की सौ माला करनी है; पर पंचाक्षरी पाँच लाख के बाद।
पाँच-छह महीने में बहुत बड़ा अंतर आ जाएगा, वक्ता कहते हैं। तभी आपको तीर्थ जाकर मंत्रों की सिद्धि करनी चाहिए। उससे पहले मंत्रों की सिद्धि मंदिर में कीजिए। उदाहरण के लिए, अगर महाभैरव मंत्र है, तो उसे केवल शिव मंदिर में सिद्ध कीजिए। एक माला जप कीजिए। वे कहते हैं कि वे यह नहीं कह रहे कि महाभैरव की सौ माला करनी है — पर पंचाक्षरी, पाँच लाख के बाद।
जिसका कोई गुरु नहीं, वह साल भर में दत्त के देव दीक्षा विधान के एकाक्षरी का चार लाख जप करे
दत्त के देव दीक्षा विधान के एकाक्षरी का कम से कम चार लाख, साल भर में
वक्ता कहते हैं कि यह मानते हुए कि आपका कोई गुरु नहीं, तो भगवान दत्तात्रेय का देव दीक्षा विधान लीजिए: अगर आपने एकाक्षरी का एक लाख जप भी किया, चार लाख जप, तो बहुत कुछ होगा। एकाक्षरी का कम से कम चार लाख जप कीजिए। समय लगेगा — एक साल लीजिए — पर एक साल बाद आज की और तब की आपकी हालत में ज़मीन-आसमान का अंतर होगा।
आपने पंचाक्षरी का पाँच लाख कर लिया, वक्ता कहते हैं। अगर दीक्षा विधान है — भगवान दत्तात्रेय का देव दीक्षा विधान — और आपका कोई गुरु नहीं, जो वे मानकर चल रहे हैं, तो अगर आपने देव दीक्षा विधान के एकाक्षरी का एक लाख जप भी किया, चार लाख जप, तो बहुत कुछ होगा। एकाक्षरी का कम से कम चार लाख जप कीजिए। समय लगेगा; इसमें एक साल लीजिए। पर एक साल बाद आपकी आज की हालत और तब की हालत में ज़मीन-आसमान का अंतर होगा।
एक विज्ञापित कोर्स Zoom पर दसों महाविद्याओं की सिद्धि बेचता है
Zoom पर दसों महाविद्याओं की सिद्धि बेचता एक युवक
वक्ता Facebook पर बार-बार आने वाले एक विज्ञापन का वर्णन करते हैं जिसमें एक आदमी दस महाविद्या के बारे में बोलता है, दावा करता है कि उसने कई हज़ार — पाँच हज़ार — लोगों का जीवन बदला, जबकि किसी भी कोण से वह अपना जीवन बदलने लायक भी नहीं दिखता। वे कहते हैं कि वह दस महाविद्याओं की सिद्धि के लिए Zoom पर क्लास की घोषणा करता है, कि वह मुश्किल से बाईस-तेईस साल का दिखता है, और श्रोता से सोचने को कहते हैं कि वह क्या करने वाला है।
Facebook पर बार-बार एक विज्ञापन आता है, वक्ता कहते हैं, जिसमें एक व्यक्ति दस महाविद्याओं के बारे में बोल रहा है, और जिसका वीडियो उन्होंने भी शेयर किया था। वह कहता है कि उसने कई हज़ार — पाँच हज़ार — लोगों का जीवन बदल दिया है। पर किसी भी कोण से ऐसा नहीं लगता कि वह अपना जीवन भी बदलने की हालत में है। साफ दिखता है, वे कहते हैं, कि यह चीज़ पूरी तरह नकली है। और वह कहता है कि दस महाविद्याओं की सिद्धि के लिए Zoom पर क्लास होगी। सोचिए, वे कहते हैं: एक नहीं, वह दस महाविद्याओं की सिद्धि करवा रहा है। देखने में वह मुश्किल से बाईस-तेईस साल का लगता है, और उसने दस महाविद्याओं की सिद्धि पहले ही कर ली है। आप कहेंगे उम्र मत देखिए — हम उम्र नहीं देख रहे, वे कहते हैं; हम यह देख रहे हैं कि वह क्या करने वाला है।
दोहराने से झूठ सच लगने लगता है, इसीलिए शास्त्रों का संदर्भ लेना चाहिए
दोहराने से झूठ सच लगता है — इसलिए स्वाध्याय कीजिए
वक्ता कहते हैं कि जब आप कोई नकारात्मक चीज़ बार-बार देखते हैं, तो वह आदमी कितना भी झूठ बोल रहा हो, बार-बार सुनकर वह आपको सच लगने लगता है। इसीलिए कहा जाता है: शास्त्रों का संदर्भ लीजिए। कौन जाने, वे कहते हैं, शायद हम भी बैठकर झूठ बोल रहे हों — इसलिए शास्त्र पढ़िए, पुराण पढ़िए; स्वाध्याय कीजिए। मुझे मत मानिए, पर मेरी बात सुनिए और उसे मानिए।
लोग अब उस विज्ञापन पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देने लगे हैं, वक्ता कहते हैं। तो जब आप कोई नकारात्मक चीज़ बार-बार देखते हैं — वह कितना भी झूठ बोल रहा हो — बार-बार सुनकर वह आपको सच लगने लगता है: कि वह सच बोल रहा है। इसीलिए कहा जाता है: शास्त्रों का संदर्भ लीजिए। कौन जाने, शायद हम भी बैठकर झूठ बोल रहे हों। तो शास्त्र पढ़िए, पुराण पढ़िए। वे कहते हैं कि वे लोगों से बार-बार स्वाध्याय करने को कहते हैं। मुझे मत मानिए, पर मेरी बातें सुनिए और उन्हें मानिए। मुझसे द्वेष रखिए, मुझसे अहंकार रखिए, मुझ पर हँसिए, मेरा बुरा सोचिए — कोई दिक्कत नहीं, वे कहते हैं। आप हिंदू हैं, सनातनी हैं। अपने कल्याण के लिए, अपनी बहन-बेटियों के सम्मान और रक्षा के लिए, साधना कीजिए और सामर्थ्यवान बनिए। और ऐसा बनकर, बैठकर मुझे जितनी चाहें गालियाँ दीजिए।
परिणाम भगवती देखेंगी, और जो सामर्थ्य आप पाते हैं वह हर हाल में आपका रहता है
भगवती देखेंगी; पाया हुआ सामर्थ्य आपका रहता है
वक्ता कहते हैं कि भगवती देखेंगी: जो भी दंड या परिणाम हो, अच्छा या बुरा, वह आपके और हमारे बीच रहेगा। पर जो सामर्थ्य आप पाएँगे — कोई नहीं कह सकता कि उससे आप अपने परिवार का किस स्तर तक भला करने में समर्थ हो जाएँगे।
भगवती देखेंगी, वक्ता कहते हैं। उसका जो भी दंड, या जो भी परिणाम, अच्छा या बुरा, वह आपके और हमारे बीच रहेगा। पर जो सामर्थ्य आप पाएँगे, उससे कोई नहीं कह सकता कि आप अपने परिवार का किस स्तर तक कल्याण करने में समर्थ हो जाएँ। यह याद रखिए, वे कहते हैं।
घर सुरक्षित करने के बाद अगला चरण पास के मंदिर में जप है
अपने घर के पास के मंदिर में जप
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद एक और बात: पहले आपने घर सुरक्षित किया, घर में जप-तप किया, जिस पर पूरी चर्चा हुई। उसके बाद आने वाला दूसरा विषय मंदिर में जप है — आपके घर के पास जो भी मंदिर हो।
इसके बाद एक और बात, वक्ता कहते हैं। पहले आपने अपना घर सुरक्षित किया; घर में जप और तप किया — वह पूरा विषय जिस पर सबकी यह चर्चा हुई। उसके बाद दूसरा विषय आता है: मंदिर में जप। आपके घर के पास जो भी मंदिर हो। वे बताते हैं कि बहुत से लोग जिनके वीडियो वायरल होते हैं बार-बार कहते हैं: मंदिर जाओ, आपका एक समूह होना चाहिए, सबको एक समय मंदिर आना चाहिए। वे कहते हैं कि लोग ऐसा कभी नहीं करेंगे।
मंगलवार को हनुमान के भक्त मंदिर भर देते हैं, पर वहाँ होने वाली भक्ति देखिए
हनुमान के भक्त आते हैं, पर देखिए कैसी भक्ति होती है
वक्ता कहते हैं कि मंगलवार को हनुमान जी के भक्त ज़रूर जाएँगे — पर मंदिरों की हालत देखिए। हनुमान जी के भक्त ज़रूर जाएँगे, पर वहाँ किस तरह की भक्ति होती है यह आप अच्छी तरह समझ जाएँगे।
मंगलवार को, वक्ता कहते हैं, हनुमान जी के भक्त ज़रूर जाएँगे — पर मंदिरों की हालत ज़रूर देखिए। हनुमान जी के भक्त ज़रूर जाएँगे। पर वहाँ किस-किस तरह की भक्ति होती है, यह आप अच्छी तरह समझ जाएँगे।
एक नए शिव मंदिर में जौनपुर की चर्चा चलते हुए शिवलिंग पर घी चढ़ाया गया
जौनपुर की चर्चा के बीच शिवलिंग पर घी
वक्ता बताते हैं कि वे बाबा का अच्छा शृंगार करने एक नए बने मंदिर गए, और वहाँ महिलाएँ पहले से थीं: कहाँ गई थीं, अरे मैं गाँव में जौनपुर में थी, कब आईं, अभी आई — यह सब तब जब शिव जी को नहलाया जा रहा है और घी से पूरा अभिषेक हो रहा है। शिव जी, वे कहते हैं, जौनपुर की कहानी सुन रहे हैं; मेरी बहू पेट से है, आदि।
वहाँ एक नया मंदिर बना था, वक्ता कहते हैं, और वे यह कहकर गए कि आज बाबा का नया मंदिर है और हम अच्छा शृंगार करेंगे; और वे सब सामान लेकर पहुँचे। माताएँ उनसे पहले ही वहाँ पहुँच चुकी थीं। कहाँ गई थीं? अरे, मैं गाँव में रह रही थी, जौनपुर में। कब आईं? अभी आई — और इसी बीच वे उन्हें नहला रही हैं। शिव जी का घी से पूरा अभिषेक चल रहा है। शिव जी जौनपुर की कहानी सुन रहे हैं। जौनपुर गई थीं, हाँ। मेरी बहू पेट से है। यह सब करते हुए वे शिव जी को नहलाती जाती हैं — यही मंत्र आप पढ़ रहे हैं, वे कहते हैं; यही पूजा आप मंदिर जाकर कर रहे हैं।
पूजा से पहले, बीच में और बाद में गपशप चलती है, और फिर शिकायत कि शिव कृपा नहीं करते
पहले, बीच में और बाद में गपशप, फिर शिकायत कि शिव कृपा नहीं करते
वक्ता कहते हैं कि और वे कहती हैं हम रोज़ आते हैं — और रोज़ यही होता होगा। फिर बाद में कहती हैं शिव जी कृपा नहीं कर रहे, हमने जीवन भर शिव जी की पूजा की। मृत्यु के समय, वे कहते हैं, जौनपुर के देवता उन्हें लेने आएँगे। जिस स्थान पर गए हैं उसकी चर्चा कीजिए; जिसके लिए गए हैं उसकी सेवा-पूजा कीजिए। इसके बजाय पूजा से पहले, पूजा के बाद और पूजा के दौरान, तीनों में, एक-दूसरे की चुगली चल रही है।
हम रोज़ आते हैं, वे कहती हैं; और रोज़ यही होता होगा, वक्ता कहते हैं। बाद में वे कहेंगी कि शिव जी कृपा नहीं कर रहे — हमने जीवन भर शिव जी की पूजा की। मृत्यु के समय, वे कहते हैं, जौनपुर के देवता उन्हें लेने आएँगे। जिस स्थान पर गए हैं उसकी चर्चा कीजिए; जिसके कारण गए हैं उसकी सेवा-पूजा कीजिए; उसके लिए कुछ कीजिए। वह आपसे होगा नहीं। आप जौनपुर की, मिर्ज़ापुर की, इसकी-उसकी बात करेंगे। यही आपकी पूजा है: पूजा से पहले, पूजा के बाद और पूजा के दौरान, तीनों में, एक-दूसरे की चुगली चल रही है। देवता आप पर कृपा कहाँ से करेंगे, वे पूछते हैं।
उस माहौल में जप के बीच वे पूरा रुद्राष्टकम भूल गए
पूरा रुद्राष्टकम भूल गए
वक्ता कहते हैं कि वे रुद्राष्टकम् का सामान्य जप कर रहे थे और भूल गए — पूरा रुद्राष्टकम भूल गए। उन्होंने खुद से पूछा, यह क्या चल रहा है; हम कहाँ फँस गए, किस जगह आ गए, क्या हो रहा है। जो खुद को विचलित करते हैं, वे कहते हैं, वे दूसरों को भी विचलित करेंगे।
और जो लोग कुछ भी नहीं कर रहे, वे उस ओर मुस्कुराते बैठे हैं, वक्ता कहते हैं। वे रुद्राष्टकम का सामान्य जप कर रहे थे। भूल गए। पूरा रुद्राष्टकम भूल गए। उन्होंने कहा, यहाँ क्या चल रहा है? हम कहाँ फँस गए? किस जगह आ गए? क्या हो रहा है? देखिए, वे कहते हैं: वे खुद को विचलित करेंगे और दूसरों को भी विचलित करेंगे। वे कहते हैं कि वे इस बारे में ग्रुप में लिख रहे थे और फिर छोड़ने का निश्चय किया, क्योंकि लोग कहेंगे कि उन्हें हर जगह केवल नकारात्मक दिखता है — पर व्यक्ति नकारात्मक का शिकार बन जाता है।
बसहा बाबा नंदी बाबा हैं, और जब उन्हें पुकारा गया तो मंदिर में सब अपनी जगह भूल गए
बसहा बाबा यानी नंदी बाबा, और मंदिर में सब सब कुछ भूल गए
वक्ता कहते हैं कि एक बाबा जी आए, शायद किसी दुकान के दुकानदार, और सबसे पहले जय बसहा बाबा, जय बसहा बाबा से शुरू हो गए। बसहा बाबा, वे समझाते हैं, नंदी बाबा को कहते हैं; बसहा यानी बैल। तो उन्होंने पहले बसहा बाबा के रूप में नंदी बाबा को मनाया — और उनका मंत्र सुनकर वहाँ बैठे सब सब कुछ भूल गए।
उसी बीच, वक्ता कहते हैं, एक और बाबा जी आए — शायद किसी दुकान के दुकानदार। वे आए और सबसे पहले शुरू हो गए: जय बसहा बाबा, जय बसहा बाबा। बसहा बाबा नंदी बाबा को कहते हैं; बसहा बैल को कहते हैं। तो उन्होंने आकर सबसे पहले बसहा बाबा के रूप में नंदी बाबा को मनाया। उनका मंत्र सुनकर वहाँ बैठे सब लोग सब कुछ भूल गए थे। इतनी ज़ोर से वे बाबा को पुकार रहे थे: आओ बसहा बाबा, कैलाश से शिव जी को ले आओ। न कोई मंत्र था, न कोई गीत; वे सीधे-सीधे कह रहे थे।
मंदिर में जप, तप और पूजा में बैठे लोगों को विचलित नहीं करना चाहिए
मंदिर में जप करने वालों को विचलित न करें
वक्ता कहते हैं कि इन लोगों को कोई नहीं सिखाता कि अगर मंदिर में दस लोग जप, तप और पूजा कर रहे हैं, तो उन्हें विचलित नहीं करना। अगर हमें भी करना है, और भाव से करना है, तो चुपचाप करें — जानबूझकर आकर घंटी बजाना शुरू न करें, और यह सब ज़बरदस्ती और टेढ़ा काम न करें। खुद को बड़ा भक्त दिखाने के चक्कर में मंदिर में ऐसी अनुशासनहीनता मत कीजिए; इससे अच्छा, वे कहते हैं, कि आप जाएँ ही नहीं और घर पर बसहा बाबा को बुलाएँ।
यह कहाँ से आता है, वक्ता पूछते हैं; यह अनुशासनहीनता कहाँ से आती है? आप कहेंगे कि यह भक्त का भाव है। इसी एक तरह के प्रसंग सुनकर, वे कहते हैं, ऐसे लोग वहाँ जाकर ज़ोर-ज़ोर से व्यवहार करते हैं। उन्हें कोई नहीं सिखाता कि अगर वहाँ मंदिर में दस लोग बैठकर जप, तप और पूजा कर रहे हैं, तो उन्हें विचलित नहीं करना। अगर हमें भी करना है, और भाव से करना है, तो चुपचाप करें — और जानबूझकर आकर घंटी बजाना शुरू न करें, और बाकी सारा ज़बरदस्ती और टेढ़ा काम: हे बसहा बाबा, जल्दी बाबा को लाओ, मानो शिव जी आकर चले जाने वाले हैं। और, वे जोड़ते हैं, जिन नाग देवता को वे बुला रहे थे, अगर वे सचमुच प्रकट हो जाते, तो उन्हें बेहोश होने में देर नहीं लगती। खुद को बड़ा भक्त दिखाने के प्रयास में मंदिर में ऐसे अनुशासनहीन कुकर्म मत कीजिए। इससे अच्छा, वे कहते हैं, कि आप जाएँ ही नहीं — घर पर रहिए और वहीं बसहा बाबा को बुलाइए।
घर और मंदिर के बाद तीर्थ धाम आता है, कुल पितरों के लिए किया जाने वाला
तीर्थ धाम की ओर बढ़ना, और कुल पितरों के लिए सोचना
वक्ता कहते हैं कि तो घर हो गया और घर के बाहर का मंदिर हो गया; इन दोनों के बाद तीर्थ धाम की ओर बढ़िए। कुल पितरों के लिए सोचिए। अगर आप मंत्रों का सामर्थ्य और जागृति पूरी तरह चाहते हैं, तो अपने जीवन में आपने जिन्हें नष्ट किया है — अपने कुल और अपने पूर्वजों को — उन सबको फिर से सँवारने की ज़िम्मेदारी इस पीढ़ी की है।
तो घर एक चीज़ थी, और घर के बाहर का मंदिर दूसरी, वक्ता कहते हैं। इन दोनों के बाद तीर्थ धाम की ओर बढ़िए। कुल पितरों के लिए सोचिए। अगर आप मंत्रों का सामर्थ्य और जागृति पूरी तरह चाहते हैं, तो आपने अपने जीवन में जो भी विनाश किया है — अपना कुल, अपने पूर्वज — उन सबको फिर से सँवारने की ज़िम्मेदारी इस पीढ़ी की है। यह याद रखिए।
इस पीढ़ी ने पुराने तौर-तरीके देखे हैं और त्रासदियाँ झेली हैं, और भविष्य इसी पर टिका है
पुराने तौर-तरीके देख चुकी और भविष्य थामे पीढ़ी
वक्ता कहते हैं कि आप ऐसी पीढ़ी हैं जिसने पहले के समय की सब चीज़ें देखी हैं और बड़ी त्रासदियाँ झेली हैं, और भविष्य आप पर टिका है। अगर आप इन चीज़ों को अंधविश्वास कहकर गाली देते हुए चले गए, तो जब आपकी अगली पीढ़ी भुगतेगी तो वह आपको गाली देगी; और अगर आज आप उसे तैयार करेंगे, तो वही पीढ़ी कल आपको धन्यवाद देगी और कहेगी मेरे परदादा।
आप ऐसी पीढ़ी हैं, वक्ता कहते हैं, जिसने पहले के समय की सब चीज़ें पहले ही देख ली हैं। आपने बड़ी त्रासदियाँ झेली हैं, और जो नया भविष्य है वह आप पर टिका है। अगर आप इन चीज़ों को पुराना अंधविश्वास कहकर गाली देते हुए चले गए, तो जब आपकी अगली पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा, वह आपको गाली देगी। और अगर आप आज उसे तैयार करेंगे, तो यही पीढ़ी कल आपको बहुत धन्यवाद देगी। वह आपको कहेगी मेरे परदादा — हमारे परदादा कितने महान थे, हमारी माँ, हमारी दादी कितनी महान थीं। पर आपको फुर्सत नहीं, वे कहते हैं: हमारी भाभी खराब है, हमारा पति खराब है, हमारा पड़ोसी खराब है; हमारे पास विदेशी गाड़ी है, हमारे पास यह है।
संकल्प यह लेना है कि भगवती घर के गलत बुद्धि वाले सदस्य को सद्बुद्धि दें
गलत बुद्धि वाले परिवार सदस्य के लिए संकल्प, कि भगवती उसे सद्बुद्धि दें
वक्ता स्पष्ट करते हैं कि वे यह नहीं कह रहे कि आप संकल्प लें कि भगवती आपके सामने प्रकट हों। संकल्प लीजिए: अगर आपके घर में कोई गलत समझ वाला है, तो उसके लिए संकल्प लेकर पूजा कीजिए — कि भगवती, इसे सद्बुद्धि दीजिए। परिवार में एकता आएगी, और तभी आप उनसे लड़ पाएँगे जो आपका विनाश चाहते हैं।
इन सब भौतिक चीज़ों से परे यह भी सोचिए, वक्ता कहते हैं: जब आप इस मार्ग पर चलना शुरू करें, तो ठीक इसी का संकल्प लीजिए। हम कहाँ कह रहे हैं, वे पूछते हैं, कि आप सीधे संकल्प लें कि भगवती आपके सामने प्रकट हों? संकल्प लीजिए। अगर आपके घर में कोई गलत समझ वाला व्यक्ति है, तो उसके लिए संकल्प लेकर पूजा कीजिए: भगवती, इसे सद्बुद्धि दीजिए। परिवार में एकता आएगी, और तभी आप उनसे लड़ पाएँगे जो आपका विनाश चाहते हैं। आपके परिवार में एकता नहीं है; देवरानी-जेठानी एक-दूसरे का बुरा सोचती हैं; भाई-भतीजे आपस में झगड़ों में कटे हैं। कुछ नहीं होने वाला, वे कहते हैं। पहले खुद को और अपने परिवार को बचाइए, फिर देश और समाज को बचाने आइए।
समाज कभी राम, लक्ष्मण और भरत के चरित्र को पारिवारिक आचरण के आदर्श के रूप में रखता था
राम और लक्ष्मण, और भरत जैसा भाई
वक्ता कहते हैं कि देव कृपा के बिना परिवार भी नहीं बचेगा। पहले भगवान श्री रामचंद्र जी महाराज का चरित्र दिखाया जाता था, और लक्ष्मण जी का चरित्र, और लोग समाज में वह उदाहरण देते थे — ये दोनों भाई राम-लक्ष्मण जैसे हैं; छोटा बड़े की बात कभी नहीं टालता; यह राम है तो वह लक्ष्मण, और वह साक्षात भरत है, जो बड़े भाई से कभी आँख मिलाकर बात नहीं करता। आज, वे कहते हैं, स्पाइडरमैन और हल्क है; मार्वल की दुनिया चल रही है।
जन्माष्टमी पर बाल मुकुंद बनाया गया बच्चा 25 दिसंबर को जोकर बना दिया जाता है
वही बच्चा कृष्ण बना, फिर 25 दिसंबर को जोकर
वक्ता कहते हैं कि कृष्ण और बलराम की चर्चा ही नहीं होती। जब जन्माष्टमी आती है तो सब लड़कों को बाल मुकुंद और लड़कियों को राधा जी बना दिया जाता है, और बस। फिर 25 दिसंबर आता है, और उस दिन वही बच्चा जिसे कृष्ण बनाया गया था सांता अंकल, एक जोकर बन जाता है। क्या कृष्ण कभी जोकर बन सकते हैं, वे पूछते हैं — जिस बच्चे को आप भगवान श्रीकृष्ण बनाते हैं उसी को फिर जोकर बना देते हैं।
कहीं भी कृष्ण और बलराम की चर्चा ही नहीं है, वक्ता कहते हैं। और कृष्ण-बलराम की चर्चा आएगी कहाँ से? जब जन्माष्टमी आती है, तो सब लड़के बाल मुकुंद बन जाते हैं; लड़कियों को राधा जी बना दिया जाता है; और बस इतना ही। फिर 25 दिसंबर आता है। उस दिन वही बच्चा जिसे कृष्ण बनाया गया था, हो-हो-हा-हा वाला सांता अंकल, एक जोकर बन जाता है। क्या कृष्ण कभी जोकर बन सकते हैं, वे पूछते हैं। जिस बच्चे को आप भगवान श्रीकृष्ण बना रहे हैं, उसी को फिर जोकर बना देते हैं। थोड़ा सोचिए, वे कहते हैं।
भगवती सती ने श्रीराम की परीक्षा लेने के लिए सीता का रूप लिया, और इसके लिए शिव ने उनका त्याग किया
श्रीराम की परीक्षा के लिए सती का सीता रूप लेना, और शिव का उनका त्याग
वक्ता कहते हैं कि अगर आपने पुराण सुने होते, तो जानते कि भगवान शिव ने भगवती सती का — सती का, पार्वती जी का नहीं — त्याग क्यों किया, जब उन्होंने भगवती सीता का रूप धरकर राम जी की परीक्षा लेने उनके सामने गईं। वे कहते हैं कि यह पूरा विषय कल्प भेद के अनुसार है, पर कम से कम इतना जानना चाहिए: भगवती सीता का रूप लेने के कारण भगवान शिव ने उनका त्याग किया, कहते हुए कि आप तो माँ के ही रूप में चली गई थीं।
अगर आपने पुराण सुने होते, वक्ता कहते हैं, तो आप जानते कि जब भगवती सती ने — हालाँकि यह एक लीला थी — सीता जी का रूप धरा और परीक्षा लेने राम जी के सामने गईं। आप यह प्रसंग जानते हैं: भगवान शिव ने सती जी का त्याग क्यों किया? किस समय किया? क्या किया? यह सारा विषय कल्प भेद के अनुसार है, वे कहते हैं, पर इतना ज़रूर जानना चाहिए: कि जब भगवती सती ने — सती ने, पार्वती जी ने नहीं — भगवती सीता का रूप ले लिया था, इसी कारण भगवान शिव ने उनका त्याग किया, कहते हुए कि आप तो माँ के ही रूप में चली गई थीं। भगवान शिव भगवती सीता को केवल माँ के रूप में देखते हैं।
शास्त्र क्या कहता है
While roaming the world with Śiva, Satī doubted that the grieving man she saw searching for his abducted wife in Daṇḍakāraṇya was truly an avatāra of Viṣṇu, and — at Śiva's own instruction — tested him by assuming the form of Sītā herself.
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ब्रह्मन् विधे प्रजानाथ महाप्राज्ञ कृपाकर। श्रावितं शंकरयशः सतीशंकरयोः शुभम्॥
"हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे प्रजानाथ! हे महाप्राज्ञ! हे कृपाकर! आपने मुझे शंकर जी के मंगलकारी यश का, सती और शंकर दोनों के यश का श्रवण कराया है।
इदानीं ब्रूहि सत्प्रीत्या परं तद्यश उत्तमम्। किमकार्ष्टां हि तत्स्थौ वै चरितं दंपती शिवौ॥
अब मुझे पुनः सत्प्रेम से उनका वह उत्तम यश कहिये। वहाँ रहकर उन दम्पती शिव और सती ने क्या चरित्र किया?"
सतीशिवचरित्रं च शृणु मे प्रेमतो मुने। लौकिकीं गतिमाश्रित्य चिक्रीडाते सदान्वहम्॥
"हे मुने! आप मुझसे प्रेमपूर्वक सती और शिव के चरित्र को सुनिये। वे दोनों लौकिक गति का आश्रय लेकर नित्य-निरन्तर क्रीड़ा करते थे।
ततः सती महादेवी वियोगमलभन्मुने। स्वपतः शंकरस्येति वदन्त्येके सुबुद्धयः॥
हे मुने! तदनन्तर महादेवी सती को अपने पति शंकर का वियोग प्राप्त हुआ — ऐसा कुछ श्रेष्ठ बुद्धिवाले विद्वानों का कथन है।
वागर्थाविव संपृक्तौ शक्तीशौ सर्वदा चितौ। कथं घटेत च तयोर्वियोगस्तत्त्वतो मुने॥
परंतु हे मुने! वास्तव में उन दोनों शक्ति और शक्तिमान् का परस्पर वियोग कैसे हो सकता है, क्योंकि चिन्मय वे दोनों वाणी और अर्थ के समान एक-दूसरे से सदा मिले-जुले हैं।
लीलारुचित्वादथवा संघटेताखिलं च तत्। कुरुते यद्यदीशौ च सतीशौ भवरीतिगौ॥
फिर भी सर्वसमर्थ सती एवं शिव लीलाप्रिय होने के कारण लोक-व्यवहार का अनुसरण करते हुए जो कुछ भी करते हैं, वह सब समीचीन ही है।
सा त्यक्ता दक्षजा दृष्ट्वा पतिना जनकाध्वरे। शंभोरनादरात्तत्र देहं तत्याज सङ्गता॥
दक्षकन्या सती ने जब देखा कि मेरे पति ने मुझे त्याग दिया है, तब वे अपने पिता दक्ष के यज्ञ में गयीं और वहाँ भगवान् शंकर का अनादर देखकर उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।
पुनर्हिमालये सैवाविर्भूता नामतः सती। पार्वतीति शिवं प्राप तप्त्वा भूरि विवाहतः॥
वे ही सती पुनः हिमालय के घर पार्वती के नाम से प्रकट हुईं और कठोर तपस्या करके उन्होंने विवाह के द्वारा पुनः भगवान् शिव को प्राप्त कर लिया।
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य ब्रह्मणः स तु नारदः। पप्रच्छ च विधातारं शिवाशिवमहद्यशः॥
ब्रह्मा जी की इस बात को सुनकर नारद जी ब्रह्मा जी से शिवा और शिव के महान् यश के विषय में इस प्रकार पूछने लगे —
विष्णुशिष्य महाभाग विधे मे वद विस्तरात्। शिवाशिवचरित्रं तद्भवाचारपरानुगम्॥
"हे विष्णुशिष्य! हे महाभाग! हे विधे! आप मुझे शिवा-शिव के लोक-आचार से सम्बन्ध रखनेवाले उनके चरित्र को विस्तारपूर्वक बताइये।
किमर्थ शंकरो जायां तत्याज प्राणतः प्रियाम्। तस्मादाचक्ष्व मे तात विचित्रमिति मन्महे॥
भगवान् शंकर जी ने प्राणों से भी प्यारी अपनी धर्मपत्नी सती का किसलिये त्याग किया? यह घटना बड़ी विचित्र जान पड़ती है, अतः हे तात! इसे आप अवश्य कहिये।
कुतोऽध्वरेऽजः पुत्रस्यानादरोऽभूच्छिवस्य ते। कथं तत्याज सा देहं गत्वा तत्र पितुः क्रतौ॥
आपके पुत्र दक्ष प्रजापति ने यज्ञ में भगवान् शंकर का अनादर क्यों किया, और वहाँ अपने पिता के यज्ञ में जाकर सती ने अपने शरीर का त्याग क्यों किया?
ततः किमभवत्तत्र किमकार्षीन्महेश्वरः। तत्सर्वं मे समाचक्ष्व श्रद्धायुक् तच्छ्रुतावहम्॥
पुनः उसके बाद क्या हुआ? महेश्वर ने क्या किया? ये सब बातें मुझसे कहिये। मैं इस वृत्तान्त को श्रद्धायुक्त होकर सुनना चाहता हूँ।"
शृणु तात परप्रीत्या मुनिभिः सह नारद। सुतवर्य महाप्राज्ञ चरितं शशिमौलिनः॥
"मेरे पुत्रों में श्रेष्ठ हे महाप्राज्ञ! हे तात! हे नारद! आप महर्षियों के साथ बड़े प्रेम से भगवान् चन्द्रमौलि का चरित्र सुनिये।
नमस्कृत्य महेशानं हर्यादिसुरसेवितम्। परब्रह्म प्रवक्ष्यामि तच्चरित्रं महाद्भुतम्॥
श्रीविष्णु आदि देवताओं से सेवित परब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार करके मैं उनके महान् अद्भुत चरित्र का वर्णन करता हूँ।
सर्वेयं शिवलीला हि बहुलीलाकरः प्रभुः। स्वतंत्रो निर्विकारी च सती सापि हि तद्विधा॥
हे मुने! यह सब शिव की लीला है। वे प्रभु अनेक प्रकार की लीला करनेवाले, स्वतन्त्र और निर्विकार हैं। देवी सती भी वैसी ही हैं।
अन्यथा कः समर्थो हि तत्कर्मकरणे मुने। परमात्मा परब्रह्म स एव परमेश्वरः॥
अन्यथा वैसा कर्म करने में कौन समर्थ हो सकता है। परमेश्वर शिव ही परब्रह्म परमात्मा हैं।
यं सदा भजते श्रीशोऽहं चापि सकलाः सुराः। मुनयश्च महात्मानः सिद्धाश्च सनकादयः॥
जिनका भजन सदा श्रीपति विष्णु, मैं ब्रह्मा, समस्त देवतागण, महात्मा, मुनि, सिद्ध तथा सनकादि सदैव करते रहते हैं।
शेषः सदा यशो यस्य मुदा गायति नित्यशः। पारं न लभते तात स प्रभुः शंकरः शिवः॥
शेष जी प्रसन्नतापूर्वक जिनके यश का निरन्तर गान करते रहते हैं, किंतु कभी भी उनका पार नहीं पाते हैं, वे ही शंकर सबके प्रभु तथा ईश्वर हैं।
तस्यैव लीलया सर्वोऽयमिति तत्त्वविभ्रमः। तत्र दोषो न कस्यापि सर्वव्यापी स प्रेरकः॥
यह सब तत्त्वविभ्रम उन्हीं की लीला से हो रहा है। इसमें किसी का दोष नहीं है, क्योंकि वे सर्वव्यापी ही प्रेरक हैं।
एकस्मिन्समये रुद्रः सत्या त्रिभवगो भवः। वृषमारुह्य पर्यटद्रसां लीलाविशारदः॥
एक समय की बात है, तीनों लोकों में विचरण करनेवाले, लीलाविशारद भगवान् रुद्र सती के साथ वृषभ पर आरूढ़ हो पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे।
आगत्य दण्डकारण्यं पर्यटन् सागराम्बराम्। दर्शयन् तत्रगां शोभां सत्यै सत्यपणः प्रभुः॥
सागर और आकाश में घूमते-घूमते दण्डकारण्य में आकर सत्य प्रतिज्ञावाले वे प्रभु सती को वहाँ की शोभा दिखाने लगे।
तत्र रामं ददर्शासौ लक्ष्मणेनान्वितं हरः। अन्विष्यन्तं प्रियां सीतां रावणेन हृतां छलात्॥
वहाँ उन्होंने लक्ष्मण सहित श्रीराम को देखा, जो रावण द्वारा छल से हरी गयी अपनी प्रिया सीता की खोज कर रहे थे।
हा सीतेति प्रोच्चरन्तं विरहाविष्टमानसम्। यतस्ततश्च पश्यन्तं रुदन्तं हि मुहुर्मुहुः॥
वे 'हा सीते!' इस प्रकार उच्च स्वर से पुकार रहे थे, जहाँ-तहाँ देख रहे थे और बार-बार रो रहे थे, उनके मन में विरह का आवेश छा गया था।
समिच्छन्तं च तत्प्राप्तिं पृच्छन्तं तद्गतिं हृदा। कुजादिभ्यो नष्टधियमत्रपं शोकविह्वलम्॥
वे उनकी प्राप्ति की इच्छा कर रहे थे, मन में उनकी दशा का विचार कर रहे थे, वृक्ष आदि से उनके विषय में पूछ रहे थे, उनकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी, वे लज्जा से रहित हो गये थे और शोक से विह्वल थे।
सूर्यवंशोद्भवं वीरं भूपं दशरथात्मजम्। भरताग्रजमानंदरहितं विगतप्रभम्॥
वे सूर्यवंश में उत्पन्न, वीर, भूपाल, दशरथनन्दन, भरताग्रज थे। आनन्दरहित होने के कारण उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी।
पूर्णकामो वराधीनं प्राणमत्स्म मुदा हरः। रामं भ्रमन्तं विपिने सलक्ष्मणमुदारधीः॥
उस समय उदारचेता, पूर्णकाम भगवान् शंकर ने माता कैकेयी के वरों के अधीन, लक्ष्मण के साथ वन में घूमते हुए उन रामको बड़ी प्रसन्नता के साथ प्रणाम किया।
जयेत्युक्त्वान्यतोऽगच्छन्नदात्तस्मै स्वदर्शनम्। रामाय विपिने तस्मिन् शंकरो भक्तवत्सलः॥
और जय-जयकार करके वे दूसरी ओर चल दिये। उन भक्तवत्सल शंकर ने उस वन में श्रीराम को पुनः दर्शन नहीं दिया।
इतीदृशीं सती दृष्ट्वा शिवलीलां विमोहनीम्। सुविस्मिता शिवं प्राह शिवमायाविमोहिता॥
मोह में डालनेवाली भगवान् शिव की ऐसी लीला को देखकर सती को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे उनकी माया से मोहित हो उनसे इस प्रकार कहने लगीं —
देवदेव परब्रह्म सर्वेश परमेश्वर। सेवन्ते त्वां सदा सर्वे हरिब्रह्मादयः सुराः॥
"हे देवदेव! हे परब्रह्म! हे सर्वेश! हे परमेश्वर! ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवता आपकी ही सेवा सदा करते रहते हैं।
त्वं प्रणम्यो हि सर्वेषां सेव्यो ध्येयश्च सर्वदा। वेदांतवेद्यो यत्नेन निर्विकारी परप्रभुः॥
आप ही सबके द्वारा प्रणाम करने योग्य हैं। सबको आपका ही सर्वदा सेवन और ध्यान करना चाहिये। वेदान्तशास्त्र के द्वारा यत्नपूर्वक जानने-योग्य निर्विकार तथा परमप्रभु आप ही हैं।
काविमौ पुरुषौ नाथ विरहव्याकुलाकृती। विचरन्तौ वने क्लिष्टौ दीनौ वीरौ धनुर्धरौ॥
हे नाथ! ये दोनों पुरुष कौन हैं, इनकी आकृति विरह-व्यथा से व्याकुल दिखायी पड़ रही है। ये दोनों धनुर्धर वीर वन में विचरण करते हुए दुःख के भागी और दीन हो रहे हैं।
तयोर्ज्येष्ठं कञ्जश्यामं दृष्ट्वा वै केन हेतुना। मुदितः सुप्रसन्नात्माभवो भक्त इवाधुना॥
उन दोनों में नीलकमल के समान ज्येष्ठ पुरुष को देखकर किस कारण से आप आनन्दविभोर हो उठे और भक्त की भाँति अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गये?
इति मे संशयं स्वामिन् शंकर छेत्तुमर्हसि। सेव्यस्य सेवके नैव घटते प्रणतिः प्रभो॥
हे स्वामिन्! हे शंकर! आप मेरे इस संशय को दूर कीजिये। हे प्रभो! सेव्य अपने सेवक को प्रणाम करे — यह उचित नहीं जान पड़ता।"
आदिशक्तिः सती देवी शिवा सा परमेश्वरी। शिवमायावशी भूत्वा पप्रच्छेत्थं शिवं प्रभुम्॥
कल्याणमयी परमेश्वरी आदिशक्ति सती देवी ने शिव की माया के वशीभूत होकर जब भगवान् शिव से इस प्रकार पूछा,
तदाकर्ण्य वचः सत्याः शंकरः परमेश्वरः। तदा विहस्य स प्राह सतीं लीलाविशारदः॥
तब सती की यह बात सुनकर लीला करने में प्रवीण परमेश्वर शंकर जी हँसकर सतीसे कहने लगे —
शृणु देवि सति प्रीत्या यथार्थं वच्मि नच्छलम्। वरदानप्रभावात्तु प्रणामं चैवमादरात्॥
"हे देवि! हे सति! सुनो, मैं प्रसन्नतापूर्वक सत्य बात कह रहा हूँ। इसमें किसी प्रकार का छल नहीं है। वरदान के प्रभाव से ही मैंने इन्हें आदरपूर्वक प्रणाम किया है।
रामलक्ष्मणनामानौ भ्रातरौ वीरसम्मतौ। सूर्यवंशोद्भवौ देवि प्राज्ञौ दशरथात्मजौ॥
हे देवि! ये दोनों भाई वीरों द्वारा सम्मानित हैं, इनके नाम श्रीराम और लक्ष्मण हैं, ये सूर्यवंश में उत्पन्न हुए हैं, परम बुद्धिमान् हैं और राजा दशरथ के पुत्र हैं।
गौरवर्णो लघुर्बन्धुः शेषेशो लक्ष्मणाभिधः। ज्येष्ठो रामाभिधो विष्णुः पूर्णांशो निरुपद्रवः॥
इनमें जो गौरवर्ण के छोटे भाई हैं, वे शेष के अंश हैं, उनका नाम लक्ष्मण है। इनमें ज्येष्ठ भाई का नाम श्रीराम है। ये भगवान् विष्णु के पूर्ण अंश तथा उपद्रवरहित हैं।
अवतीर्णः क्षितौ साधुरक्षणाय भवाय नः। इत्युक्त्वा विररामासौ शंभुः सूतिकरः प्रभुः॥
ये साधुपुरुषों की रक्षा और हमलोगों के कल्याण के लिये इस पृथिवी पर अवतरित हुए हैं।" इतना कहकर सृष्टि करनेवाले भगवान् शम्भु चुप हो गये।
श्रुत्वापीत्थं वचः शम्भोर्न विशश्वास तन्मनः। शिवमाया बलवती सैव त्रैलोक्यमोहिनी॥
इस प्रकार शिव का वचन सुनकर भी उनके मन को विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि शिव की माया बलवती है, वही तीनों लोकों को मोहित किये रहती है।
अविश्वस्तं मनो ज्ञात्वा तस्याः शंभुः सनातनः। अवोचद्वचनं चेति प्रभुर्लीलाविशारदः॥
सती के मन में मेरी बात पर विश्वास नहीं हुआ है, ऐसा जानकर लीलाविशारद सनातन प्रभु शम्भु यह वचन कहने लगे —
शृणु मद्वचनं देवि न विश्वसिति चेन्मनः। स्वयं रामपरीक्षां हि कुरु तत्र स्वया धिया॥
"हे देवि! मेरी बात सुनो, यदि तुम्हारे मन को मेरे कथन पर विश्वास नहीं होता है, तो तुम वहाँ अपनी ही बुद्धि से श्रीराम की परीक्षा स्वयं कर लो।
विनश्यति यथा मोहस्तत्कुरु त्वं सति प्रिये। गत्वा तत्र स्थितस्तावद् वटे भव परीक्षिका॥
हे सति! हे प्रिये! जिस प्रकार तुम्हारा भ्रम दूर हो, वैसा ही तुम करो। तुम वहाँ जाकर परीक्षा करो, तब तक मैं इस वटवृक्ष के नीचे बैठा हूँ।"
शिवाज्ञया सती तत्र गत्वाचिन्तयदीश्वरी। कुर्यां परीक्षां च कथं रामस्य वनचारिणः॥
भगवान् शिव की आज्ञा से ईश्वरी सती वहाँ जाकर सोचने लगीं कि मैं वनचारी राम की कैसे परीक्षा करूँ।
सीतारूपमहं धृत्वा गच्छेयं रामसन्निधौ। यदि रामो हरिः सर्वं विज्ञास्यति न चान्यथा॥
मैं सीता का रूप धारण करके राम के पास चलूँ। यदि राम विष्णु हैं, तो सब कुछ जान लेंगे, अन्यथा वे मुझे नहीं पहचानेंगे।
इत्थं विचार्य सीता सा भूत्वा रामसमीपतः। अगमत्तत्परीक्षार्थं सती मोहपरायणा॥
इस प्रकार विचार करके मोह में पड़ी हुई वे सती सीता का रूप धारण कर श्रीराम के पास उनकी परीक्षा लेने के लिये गयीं।
सीतारूपां सतीं दृष्ट्वा जपन्नाम शिवेति च। विहस्य तत्प्रविज्ञाय नत्वावोचद् रघूद्वहः॥
सती को सीता के रूप में देखकर शिव-नाम का जप करते हुए रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम सब कुछ जानकर उन्हें प्रणाम करके हँसकर कहने लगे —
प्रेमतस्त्वं सति ब्रूहि क्व शंभुस्ते नमो गतः। एकाकी विपिने कस्मादागता पतिना विना॥
"हे सति! आपको नमस्कार है, आप प्रेमपूर्वक बताइये कि शिव जी कहाँ गये हैं, आप पति के बिना अकेली ही इस वन में क्यों आयी हैं?
त्यक्त्वा स्वरूपं कस्मात्ते धृतं रूपमिदं सति। ब्रूहि तत्कारणं देवि कृपां कृत्वा ममोपरि॥
हे सति! आपने अपना रूप त्यागकर किसलिये यह रूप धारण किया है? हे देवि! मुझपर कृपा करके इसका कारण बताइये?"
इति रामवचः श्रुत्वा चकितासीत्सती तदा। स्मृत्वा शिवोक्तं मत्वा चावितथं लज्जिता भृशम्॥
रामजी की यह बात सुनकर सती उस समय आश्चर्यचकित हो गयीं। वे शिव जी की कही हुई बात का स्मरण करके और उसे सत्य समझकर बहुत लज्जित हुईं।
रामं विज्ञाय विष्णुं तं स्वरूपं संविधाय च। स्मृत्वा शिवपदं चित्ते सत्युवाच प्रसन्नधीः॥
श्रीराम को साक्षात् विष्णु जानकर अपना रूप धारण करके मन-ही-मन शिव के चरणों का चिन्तन कर प्रसन्नचित्त हुई सती ने उनसे इस प्रकार कहा —
शिवो मया गणैश्चैव पर्यटन् वसुधां प्रभुः। इहागच्छच्च विपिने स्वतंत्रः परमेश्वरः॥
स्वतन्त्र परमेश्वर प्रभु शिव मेरे तथा अपने पार्षदों के साथ पृथिवी पर भ्रमण करते हुए इस वन में आये हुए हैं।
अपश्यदत्र स त्वां हि सीतान्वेषणतत्परम्। सलक्ष्मणं विरहिणं सीतया क्लिष्टमानसम्॥
यहाँ उन्होंने सीता की खोज में लगे हुए, उनके विरह से युक्त और दुखी चित्तवाले आपको लक्ष्मण सहित देखा।
नत्वा त्वां स गतो मूले वटस्य स्थित एव हि। प्रशंसन् महिमानं ते वैष्णवं परमं मुदा॥
वे आपको प्रणाम करके चले गये और आपकी वैष्णवी महिमा की प्रशंसा करते हुए अत्यन्त आनन्द के साथ वटवृक्ष के नीचे बैठे हैं।
चतुर्भुजं हरि त्वां नो दृष्ट्वैव मुदितोऽभवत्। यथेदं रूपममलं पश्यन्नानंदमाप्तवान्॥
वे आपके चतुर्भुज विष्णुरूप को देखे बिना ही आनन्दविभोर हो गये। इस निर्मल रूप को देखते हुए उन्हें बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ।
तच्छ्रुत्वा वचनं शंभोर्भ्रममानीय चेतसि। तदाज्ञया परीक्षां ते कृतवत्यस्मि राघव॥
शम्भु के वचन को सुनकर मेरे मन में भ्रान्ति उत्पन्न हो गयी। अतः हे राघव! मैंने उनकी आज्ञा लेकर आपकी परीक्षा की है।
ज्ञातं मे राम विष्णुस्त्वं दृष्टा ते प्रभुताखिला। निःसंशया तदापि तच्छृणु त्वं च महामते॥
हे श्रीराम! अब मुझे ज्ञात हो गया कि आप विष्णु हैं। मैंने आपकी सम्पूर्ण प्रभुता देख ली है। अब मेरा संशय दूर हो गया है, तो भी महामते! आप मेरी बात सुनें।
कथं प्रणम्यस्त्वं तस्य सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः। कुरु निःसंशयां त्वं मां शमलं प्राप्नुहि द्रुतम्॥
मेरे सामने यह सच-सच बतायें कि आप उन शिव के वन्दनीय कैसे हो गये? आप मुझे संशयरहित कीजिये और शीघ्र ही मुझे शान्ति प्रदान कीजिये।"
इत्याकर्ण्य वचस्तस्या रामश्चोत्फुल्ललोचनः। अस्मरत्स्वं प्रभुं शंभुं प्रेमाभूद् हृदि चाधिकम्॥
उनकी यह बात सुनकर श्रीराम के नेत्र प्रफुल्लित हो उठे। उन्होंने अपने प्रभु शिव का स्मरण किया। इससे उनके हृदय में अत्यधिक प्रेम उत्पन्न हो गया।
सत्या विनाज्ञया शंभुसमीपं नागमन्मुने। संवर्ण्य महिमानं च प्रावोचद्राघवः सतीम्॥
हे मुने! शिव की आज्ञा के बिना वे राघव सती के साथ भगवान् शिव के समीप नहीं गये तथा मन-ही-मन उनकी महिमा का वर्णन करके सतीसे कहने लगे।
Because Satī disobeyed Śiva and tested Rāma by taking on Sītā's form, Śiva perceived the truth despite her denial, recalled an old vow, and renounced her in his mind alone — this is Satī being renounced, not Pārvatī.
Chapter 25 stresses that Śiva does not break his vow outright or announce a formal separation; the renunciation is qualified and mental only.
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एकदा हि पुरा देवि शंभुः परमसूतिकृत्। विश्वकर्माणमाहूय स्वलोके परतः परे॥
"हे देवि! प्राचीन काल में एक समय परम स्रष्टा भगवान् शम्भु ने अपने परम धाम में विश्वकर्मा को बुलाकर,
तेन स्वधेनुशालायां कारयामास विस्तृतं। रम्यं च भवनं सम्यक् तत्र सिंहासनं वरम्॥
उनके द्वारा अपनी गोशाला में एक विस्तृत तथा रमणीय भवन बनवाया और उसमें एक श्रेष्ठ सिंहासन का भी निर्माण कराया।
तत्र च्छत्रं महादिव्यं सर्वदाद्भुतमुत्तमम्। कारयामास विघ्नार्थं शंकरो विश्वकर्मणा॥
उस सिंहासन पर भगवान् शंकर ने विघ्ननिवारण के लिये विश्वकर्मा द्वारा एक छत्र बनवाया, जो बहुत ही दिव्य, सदा के लिये अद्भुत और परम उत्तम था।
शक्रादीनां जुहावाशु समस्तान् देवतागणान्। सिद्धगंधर्वनागादीनुपदेवांश्च कृत्स्नशः॥
उसके बाद उन्होंने इन्द्र आदि देवगणों, सिद्ध, गन्धर्वों, नागों तथा सम्पूर्ण उपदेवों को भी शीघ्र वहाँ बुलवाया।
वेदान् सर्वानागमांश्च विधिपुत्रान् मुनीनपि। देवीः सर्वा अप्सरोभिर्नानावस्तुसमन्विताः॥
समस्त वेदों, आगमों, ब्रह्मा जी के पुत्रों, मुनियों तथा अप्सराओं सहित अनेक प्रकार की वस्तुओं से युक्त समस्त देवियों को भी आमन्त्रित किया।
देवानां च तथर्षीणां सिद्धानां फणिनामपि। आनयन् मङ्गलकराः कन्याः षोडश षोडश॥
इनके अतिरिक्त देवताओं, ऋषियों, सिद्धों और नागों की मंगलकारिणी सोलह-सोलह कन्याओं को भी बुलवाया।
वीणामृदङ्गप्रमुखवाद्यान्नानाविधान् मुने। उत्सवं कारयामास वादयित्वा सुगायनैः॥
हे मुने! उन्होंने वीणा, मृदंग आदि नाना प्रकार के वाद्यों को बजवाकर सुन्दर गीतों द्वारा महान् उत्सव कराया।
राजाभिषेकयोग्यानि द्रव्याणि सकलौषधैः। प्रत्यक्षतीर्थपाथोभिः पञ्चकुंभांश्च पूरितान्॥
सम्पूर्ण औषधियों के साथ राज्याभिषेक के योग्य द्रव्य, प्रत्यक्ष तीर्थों के जलों से भरे हुए पाँच कलश,
तथान्याः संविधा दिव्या आनयत्स्वगणैस्तदा। ब्रह्मघोषं महारावं कारयामास शंकरः॥
तथा बहुत-सी दिव्य सामग्रियों को भगवान् शंकर ने अपने पार्षदों द्वारा मँगवाया और वहाँ उच्च स्वर से वेदमन्त्रों का घोष करवाया।
अथो हरिं समाहूय वैकुंठात्प्रीतमानसः। तद्भक्त्या पूर्णया देवि मोदति स्म महेश्वरः॥
हे देवि! भगवान् विष्णु की पूर्ण भक्ति से महेश्वरदेव सदा प्रसन्न रहते हैं। इसलिये प्रसन्नचित्त होकर वैकुण्ठधाम से श्रीहरि को बुलाकर,
सुमुहूर्ते महादेवस्तत्र सिंहासने वरे। उपवेश्य हरिं प्रीत्या भूषयामास सर्वशः॥
शुभ मुहूर्त में उन्हें श्रेष्ठ सिंहासन पर बैठाकर महादेव जी ने स्वयं ही प्रेमपूर्वक उन्हें सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित किया।
आबद्धरम्यमुकुटं कृतकौतुकमङ्गलम्। अभ्यषिञ्चन्महेशस्तु स्वयं ब्रह्मांडमंडपे॥
उनके मस्तक पर मनोहर मुकुट बाँधकर और उत्सव-मंगलाचार करके महेश्वर ने स्वयं ब्रह्माण्डमण्डप में श्रीहरि का अभिषेक किया,
दत्तवान्निखिलैश्वर्यं यन्नैजं नान्यगामि यत्। ततस्तुष्टाव तं शंभुः स्वतन्त्रो भक्तवत्सलः॥
और उन्हें अपना वह सारा ऐश्वर्य प्रदान किया, जो वे दूसरों को नहीं देते थे। तदनन्तर भक्तवत्सल स्वतन्त्र शम्भु ने श्रीहरि का स्तवन किया।
ब्रह्माणं लोककर्तारमवोचद्वचनं त्विदम्। व्यापयन्स्वं वराधीनं स्वतन्त्रं भक्तवत्सलः॥
तत्पश्चात् अपनी पराधीनता को सर्वत्र प्रसिद्ध करते हुए लोककर्ता ब्रह्मा जी से कहा —
अतःप्रभृति लोकेश मन्निदेशादयं हरिः। मम वंद्यः स्वयं विष्णुर्जातः सर्वः शृणोति हि॥
"हे लोकेश! आज से मेरी आज्ञा के अनुसार ये विष्णु हरि स्वयं मेरे वन्दनीय हो गये, यह बात सभी सुन लें।
सर्वैर्देवादिभिस्तात प्रणम त्वममुं हरिम्। वर्णयन्तु हरिं वेदा ममैते मामिवाज्ञया॥
हे तात! आप सम्पूर्ण देवता आदि के साथ इन श्रीहरि को प्रणाम कीजिये और ये वेद मेरी आज्ञा से मेरी ही तरह इन श्रीहरि का वर्णन करें।"
इत्युक्त्वाथ स्वयं रुद्रोऽनमद्वै गरुडध्वजम्। विष्णुभक्तिप्रसन्नात्मा वरदो भक्तवत्सलः॥
"इस प्रकार कहकर प्रसन्नचित्त हुए वरदायक भक्तवत्सल रुद्रदेव ने स्वयं ही गरुडध्वज श्रीहरि को प्रणाम किया।
ततो ब्रह्मादिभिर्देवैः सर्वरूपसुरैस्तथा। मुनिसिद्धादिभिश्चैव वंदितोऽभूद्धरिस्तदा॥
तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओं, अन्य सभी देवों, मुनियों और सिद्धों आदि ने भी उस समय श्रीहरि की वन्दना की।
ततो महेशो हरयेऽशंसद्विबुधां पुरः। महावरान् सुप्रसन्नो दत्तवान् भक्तवत्सलः॥
इसके बाद अत्यन्त प्रसन्न हुए भक्तवत्सल महेश्वर ने देवताओं के समक्ष श्रीहरि को महान् वर प्रदान किये।
त्वं कर्ता सर्वलोकानां भर्ता हर्ता मदाज्ञया। दाता धर्मार्थकामानां शास्ता दुर्णयकारिणाम्॥
" आप मेरी आज्ञा से सम्पूर्ण लोकों के कर्ता, पालक, संहारक, धर्म-अर्थ-काम के दाता तथा अन्याय करनेवालों को दण्ड देनेवाले होंगे।
जगदीशो जगत्पूज्यो महाबलपराक्रमः। अजेयस्त्वं रणे क्वापि ममापि हि भविष्यसि॥
आप महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न, जगत्पूज्य, जगदीश्वर होंगे और कहीं-कहीं मुझसे भी अजेय होंगे।
शक्तित्रयं गृहाण त्वमिच्छादि प्रापितं मया। नानालीलाप्रभावत्वं स्वतन्त्रत्वं भवत्रये॥
आप मुझसे मेरी दी हुई तीन प्रकार की ये शक्तियाँ ग्रहण करें — इच्छा आदि की सिद्धि, अनेक प्रकार की लीलाओं को प्रकट करने की शक्ति और तीनों लोकों में नित्य स्वतन्त्र रहने की शक्ति।
त्वद्द्वेष्टारो हरे नूनं मया शास्याः प्रयत्नतः। त्वद्भक्तानां मया विष्णो देयं निर्वाणमुत्तमम्॥
हे हरे! आपसे द्वेष करनेवाले निश्चय ही मेरे द्वारा प्रयत्नपूर्वक दण्डनीय होंगे। हे विष्णो! मैं आपके भक्तों को उत्तम मोक्ष प्रदान करूँगा।
मायां चापि गृहाणेमां दुःप्रणोद्यां सुरादिभिः। यया संमोहितं विश्वमचिद्रूपं भविष्यति॥
आप इस माया को भी ग्रहण करें, जिसका निवारण करना देवता आदि के लिये भी कठिन है और जिससे मोहित होने पर यह विश्व जड़रूप हो जायगा।
मम बाहुर्मदीयस्त्वं दक्षिणोऽसौ विधिहरे। अस्यापि हि विधेः पाता जनितापि भविष्यसि॥
हरे! आप मेरी बायीं भुजा हैं और विधाता दाहिनी भुजा हैं। आप इन विधाता के भी उत्पादक और पालक होंगे।
हृदयं मम यो रुद्रः स एवाहं न संशयः। पूज्यस्तव सदा सोऽपि ब्रह्मादीनामपि ध्रुवम्॥
मेरे हृदयरूप जो रुद्र हैं, वही मैं हूँ, इसमें संशय नहीं है। वे रुद्र आपके और ब्रह्मा आदि देवताओं के भी निश्चय ही पूज्य हैं।
अत्र स्थित्वा जगत्सर्वं पालय त्वं विशेषतः। नानावतारभेदैश्च सदा नानोतिकर्तृभिः॥
आप यहाँ रहकर अनेक प्रकार की लीलाएँ करनेवाले अपने विभिन्न अवतारों द्वारा विशेषरूप से सम्पूर्ण जगत् का पालन करें।
मम लोके तवेदं वै स्थानं च परमर्द्धिमत्। गोलोक इति विख्यातं भविष्यति महोज्ज्वलम्॥
मेरे लोक में आपका यह परम वैभवशाली और अत्यन्त उज्ज्वल स्थान गोलोक नाम से विख्यात होगा।
भविष्यंति हरे ये तेऽवतारा भुवि रक्षकाः। मद्भक्तास्तान् ध्रुवं द्रक्ष्ये प्रीतानथ निजाद् वरात्॥
हे हरे! भूतल पर जो आपके अवतार होंगे, वे सबके रक्षक और मेरे भक्त होंगे। मैं उनका दर्शन करूँगा। वे मेरे वर से सदा प्रसन्न रहेंगे।"
अखंडैश्वर्यमासाद्य हरेरित्थं हरः स्वयम्। कैलासे स्वगणैस्तस्मिन् स्वैरं क्रीडत्युमापतिः॥
"इस प्रकार श्रीहरि को अखण्ड ऐश्वर्य प्रदान कर उमापति भगवान् हर स्वयं कैलासपर्वत पर रहते हुए अपने पार्षदों के साथ स्वच्छन्द क्रीड़ा करने लगे।
तदाप्रभृति लक्ष्मीशो गोपवेषोऽभवत्तथा। अयासीत्तत्र सुप्रीत्या गोपगोपीगवां पतिः॥
तभी से भगवान् लक्ष्मीपति ने गोपवेश धारण कर लिया और वे गोप-गोपी तथा गौओं के अधिपति होकर बड़ी प्रसन्नता के साथ वहाँ रहने लगे।
सोऽपि विष्णुः प्रसन्नात्मा जुगोप निखिलं जगत्। नानावतारसंधर्ता वनकर्ता शिवाज्ञया॥
वे विष्णु भी प्रसन्नचित्त होकर समस्त जगत् की रक्षा करने लगे। वे शिव जी की आज्ञा से नाना प्रकार के अवतार धारण करके जगत् का पालन करने लगे।
इदानीं स चतुर्द्धात्रावातरच्छंकराज्ञया। रामोऽहं तत्र भरतो लक्ष्मणः शत्रुहेति च॥
इस समय वे श्रीहरि भगवान् शंकर की आज्ञा से चार रूपों में अवतीर्ण हुए हैं। उनमें एक मैं राम हूँ और भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हैं।
अथ पित्राज्ञया देवि ससीतालक्ष्मणः सति। आगतोऽहं वने चाद्य दुःखितो दैवतोऽभवम्॥
हे देवि! हे सति! मैं पिता की आज्ञा से सीता और लक्ष्मण के साथ वन में आया हूँ और भाग्यवश इस समय मैं दुखी हूँ।
निशाचरेण मे जाया हृता सीतेति केनचित्। अन्वेष्यामि प्रियां चात्र विरही बंधुना वने॥
यहाँ किसी निशाचर ने मेरी पत्नी का हरण कर लिया है और मैं विरही होकर भाई के साथ वन में अपनी प्रिया की खोज कर रहा हूँ।
दर्शनं ते यदि प्राप्तं सर्वथा कुशलं मम। भविष्यति न संदेहो मातस्ते कृपया सति॥
हे सति! हे मातः! जब आपका दर्शन प्राप्त हो गया, तब आपकी कृपा से सर्वथा मेरा कुशल ही होगा, इसमें सन्देह नहीं है।
सीताप्राप्तिवरं देवि भविष्यति न संशयः। तं हत्वा दुःखदं पापं राक्षसं त्वदनुग्रहात्॥
आपका दर्शन मेरे लिये सीता-प्राप्ति का वर-स्वरूप होगा, आपकी कृपा से उस दुःख देनेवाले पापी राक्षस को मारकर मैं सीता को प्राप्त कर लूँगा, इसमें सन्देह नहीं है।
महद्भाग्यं ममाद्यैव यद्यकार्ष्टां कृपां युवाम्। यस्मिन् सकरुणौ स्यातां स धन्यः पुरुषो वरः॥
आज मेरा महान् सौभाग्य है, जो आप दोनों ने मुझ पर कृपा की। जिस पर आप दोनों दयार्द्र हो जायँ, वह पुरुष धन्य और श्रेष्ठ है।"
इत्थमाभाष्य बहुधा सुप्रणम्य सतीं शिवाम्। तदाज्ञया वने तस्मिन् विचचार रघूद्वहः॥
इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर कल्याणमयी सती देवी को प्रणाम करके रघुकुलशिरोमणि श्रीराम उनकी आज्ञा से उस वनमें विचरने लगे।
अथाकर्ण्य सती वाक्यं रामस्य प्रयतात्मनः। हृष्टाभूत्सा प्रशंसन्तं शिवभक्तिरतं हृदि॥
पवित्र हृदयवाले रामकी शिव-भक्तिपरायण तथा शिवप्रशंसापरक बात सुनकर सती मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं।
स्मृत्वा स्वकर्म मनसाकार्षीच्छोकं सुविस्तरम्। प्रत्यागच्छदुदासीना विवर्णा शिवसन्निधौ॥
तदनन्तर अपने कर्म को याद करके उनके मन में बड़ा शोक हुआ। उनकी अंगकान्ति फीकी पड़ गयी और वे उदास होकर शिव जी के पास लौट आयीं।
पथि साचिन्तयद् देवी सञ्चलंती पुनः पुनः। नाङ्गीकृतं शिवोक्तं मे रामं प्रति कुधीः कृता॥
मार्ग में जाती हुई देवी सती बारम्बार चिन्ता करने लगीं कि मैंने भगवान् शिव की बात नहीं मानी और श्रीराम के प्रति कुत्सित बुद्धि कर ली।
किमुत्तरमहं दास्ये गत्वा शंकरसन्निधौ। इति संचिन्त्य बहुधा पश्चात्तापोऽभवत्तदा॥
अब शंकरजी के पास जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगी, इस प्रकार के विचार करने पर उन्हें बहुत पश्चात्ताप हुआ।
गत्वा शंभुसमीपं च प्रणनाम शिवं हृदा। विषण्णवदना शोकव्याकुला विगतप्रभा॥
शिव जी के पास जाकर उन सती ने उन्हें हृदय से प्रणाम किया। उनके मुख पर विषाद छा गया। वे शोक से व्याकुल और निस्तेज हो गयी थीं।
अथ तां दुःखितां दृष्ट्वा पप्रच्छ कुशलं हरः। प्रोवाच वचनं प्रीत्या तत्परीक्षा कृता कथम्॥
सती को दुखी देखकर भगवान् हर ने उनका कुशल-क्षेम पूछा और प्रेमपूर्वक कहा — तुमने किस प्रकार उनकी परीक्षा ली?
श्रुत्वा शिववचो नाहं किमपि प्रणतानना। सती शोकविषण्णा सा तस्थौ तत्र समीपतः॥
शिव जी की यह बात सुनकर मैंने कोई परीक्षा नहीं ली — ऐसा कहकर वे सती सिर झुकाये शोकाकुल होकर उनके पास खड़ी हो गयीं।
अथ ध्यात्वा महेशस्तु बुबोध चरितं हृदा। दक्षजाया महायोगी नानालीलाविशारदः॥
इसके बाद महायोगी तथा अनेकविध लीला करने में प्रवीण भगवान् महेश्वर ने मन में ध्यान लगाकर दक्षपुत्री सती का सारा चरित्र जान लिया।
सस्मार स्वपणं पूर्वं यत्कृतं हरिकोपतः। तत्प्रार्थितोऽथ रुद्रोऽसौ मर्यादाप्रतिपालकः॥
उन्हें अपनी उस प्रतिज्ञा का स्मरण हो आया, जिसे हरि के विशेष आग्रह करने पर मर्यादाप्रतिपालक उन रुद्र ने विवाह के लिये देवताओं के द्वारा निवेदन किये जाने पर पूर्व में किया था।
विषादोऽभूत्प्रभोस्तत्र मनस्येवमुवाच ह। धर्मवक्ता धर्मकर्ता धर्मावनकरः सदा॥
उन महाप्रभु के मन में विषाद उत्पन्न हो गया। तब धर्मवक्ता, धर्मकर्ता तथा धर्मरक्षक प्रभु ने अपने मन में कहा —
कुर्यां चेदक्षजायां हि स्नेहं पूर्वं यथा महान्। नश्येन्मम पणः शुद्धो लोकलीलानुसारिणः॥
"यदि मैं सती से अब पूर्ववत् स्नेह करूँ, तो लोकलीला का अनुसरण करनेवाले मुझ शिव की महान् प्रतिज्ञा ही नष्ट हो जायगी।"
इत्थं विचार्य बहुधा हृदा तामत्यजत्सतीम्। पणं न नाशयामास वेदधर्मप्रपालकः॥
इस प्रकार मन में अनेक तरहसे विचार कर वेद और धर्म के प्रतिपालक शंकरजी ने हृदयसे सती का त्याग कर दिया, किंतु अपनी प्रतिज्ञा को नष्ट नहीं किया।
ततो विहाय मनसा सतीं तां परमेश्वरः। जगाम स्वगिरिं भेदं जगावद्धा स हि प्रभुः॥
तत्पश्चात् परमेश्वर शिव जी मन से सती को त्यागकर अपने कैलासपर्वत की ओर चल दिये। उन प्रभुने अपने निश्चय को किसी के सामने प्रकट नहीं किया।
चलन्तं पथि तं व्योमवाण्युवाच महेश्वरम्। सर्वान् संश्रावयंस्तत्र दक्षजां च विशेषतः॥
मार्ग में जाते हुए महेश्वर को, अन्य सबको तथा विशेषकर सतीको सुनाते हुए आकाशवाणी हुई।
धन्यस्त्वं परमेशान त्वत्समोऽद्य तथा पणः। न कोऽप्यन्यस्त्रिलोकेऽस्मिन् महायोगी महाप्रभुः॥
"हे परमेश्वर! आप धन्य हैं, इस त्रिलोकी में आपके समान कोई भी नहीं है, जिसने आजतक ऐसी प्रतिज्ञा की हो, आप महायोगी तथा महाप्रभु हैं।"
श्रुत्वा व्योमवचो देवी शिवं पप्रच्छ विप्रभा। कं पणं कृतवान्नाथ ब्रूहि मे परमेश्वर॥
"यह आकाशवाणी सुनकर कान्तिसे हीन देवी सती ने शिव से पूछा — हे नाथ! आपने कौन-सी प्रतिज्ञा की है? हे परमेश्वर! मुझे बताइये।
इति पृष्टोऽपि गिरिशः सत्या हितकरः प्रभुः। नोद्वाहं स्वं पणं तस्यै यत् हर्यग्रेऽकरोत्पुरा॥
सती के इस प्रकार पूछनेपर भी सबका हित करनेवाले प्रभुने पहले अपने विवाह के विषय में भगवान् विष्णु के सामने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे नहीं बताया।
तदा सती शिवं ध्यात्वा स्वपतिं प्राणवल्लभम्। सर्वं बुबोध हेतुं तं प्रियत्यागमयं मुने॥
हे मुने! उस समय सती अपने प्राणवल्लभ पति भगवान् शिव का ध्यान करके प्रियतम के द्वारा अपने त्याग-सम्बन्धी समस्त कारणको जान गयीं।
ततोऽतीव शुशोचाशु बुध्वा सा त्यागमात्मनः। शंभुना दक्षजा तस्मान्निःश्वसंती मुहुर्मुहुः॥
शम्भुने मेरा त्याग किया है — इस बातको जानकर दक्षकन्या सती बार-बार श्वास भरती हुईं शीघ्र ही अत्यन्त शोकमें डूब गयीं, बारम्बार सिसकने लगीं।
शिवस्तस्याः समाज्ञाय गुप्तं चक्रे मनोभवम्। सत्यै पणं स्वकीयं हि कथा बह्वीर्वदन् प्रभुः॥
सती के मनोभावको जानकर प्रभु शिवने उनके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसे गुप्त ही रखा और वे दूसरी बहुत-सी कथाएँ कहने लगे।
सत्या प्राप स कैलासं कथयन् विविधाः कथाः। वरे स्थित्वा निजं रूपं दधौ योगी समाधिभृत्॥
इस प्रकार नाना प्रकार की कथाएँ कहते हुए वे सती के साथ कैलास पर जा पहुँचे और श्रेष्ठ आसन पर स्थित हो समाधि लगाकर अपने स्वरूप का ध्यान करने लगे।
तत्र तस्थौ सती धाम्नि महाव्याकुलमानसा। न बुबोध चरित्रं तत्कश्चिच्च शिवयोर्मुने॥
सती अत्यन्त व्याकुलचित्त होकर अपने धाममें रहने लगीं। हे मुने! शिवा और शिवके उस चरित्रको किसीने नहीं जाना।
महान्कालो व्यतीयाय तयोरित्थं महामुने। स्वोपात्तदेहयोः प्रभ्वोर्लोकलीलानुसारिणोः॥
हे महामुने! इस प्रकार स्वेच्छासे शरीर धारण करके लोकलीलाका अनुसरण करनेवाले उन दोनों प्रभुओंका बहुत काल व्यतीत हो गया।
ध्यानं तत्याज गिरिशस्ततः स परमोतिकृत्। तज्ज्ञात्वा जगदंबा हि सती तत्राजगाम सा॥
तत्पश्चात् उत्तम लीला करनेवाले महादेव जी ने ध्यान तोड़ा — यह जानकर जगदम्बा सती वहाँ आयीं
ननामाथ शिवं देवी हृदयेन विदूयता। आसनं दत्तवान् शंभुः स्वसम्मुख उदारधीः॥
और उन्होंने व्यथित हृदयसे शिवको प्रणाम किया। उदार चित्तवाले शम्भुने उन्हें अपने सामने बैठनेके लिये आसन दिया
कथयामास सुप्रीत्या कथा बह्वीर्मनोरमाः। निःशोकां कृतवान् सद्यो लीलां कृत्वा च तादृशीम्॥
औरवे बडे प्रेमसे बहुत-सी मनोरम कथाएँ कहनेलगे। उन्होंने वैसी ही लीला करकेसतीके शोकको तत्काल दूर कर दिया।
पूर्ववत्सा सुखं लेभे तत्याज स्वपणं न सः। नेत्याश्चर्यं शिवे तात मन्तव्यं परमेश्वरे॥
वे पूर्ववत् सुखी हो गयीं, फिर भी शिव जी ने अपनी प्रतिज्ञा को नहीं तोड़ा। हे तात! परमेश्वर शिव जी के विषयमें यह कोई आश्चर्य की बात नहीं समझनी चाहिये।
इत्थं शिवाशिवकथां वदन्ति मुनयो मुने। किल केचिदविद्वांसो वियोगश्च कथं तयोः॥
हे मुने! मुनि लोग शिव और शिवाकी ऐसी ही कथा कहते हैं। कुछ मूर्खलोग उन दोनोंमें वियोग मानते हैं, परंतु उनमें वियोग कैसे सम्भव है!
शिवाशिवचरित्रं को जानाति परमार्थतः। स्वेच्छया क्रीडतस्तौ हि चरितं कुरुतः सदा॥
शिवा और शिव के वास्तविक चरित्र को कौन जान सकता है? वे दोनों सदा अपनी इच्छासे क्रीड़ा करते और भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करते हैं।
वागर्थाविव संपृक्तौ सदा खलु सतीशिवौ। तयोर्वियोगोऽसंभाव्यः संभवेदिच्छया तयोः॥
सती और शिव वाणी और अर्थकी भाँति एक-दूसरेसे नित्य संयुक्त हैं। उन दोनोंमें वियोग होना असम्भव है, उनकी इच्छासे ही लीलामें वियोग हो सकता है।
राम और सीता हनुमान को अपना पहला पुत्र मानते हैं, इसीलिए वे अयोध्या के राजा हैं
हनुमान राम और सीता के पहले पुत्र माने जाते हैं
वक्ता कहते हैं कि भगवान हनुमान जी के रूप में भी माँ ही हैं: भगवान श्री रामचंद्र जी महाराज और भगवती मैया सीता हनुमान जी को अपना पहला पुत्र मानते हैं। इसी कारण हनुमान जी आज अयोध्या के राजा हैं — राजपाट उन्हें दिया गया, और हनुमानगढ़ी में बैठकर वे राज कर रहे हैं।
भगवान हनुमान जी के रूप में भी तो माँ ही हैं, वक्ता कहते हैं। भगवान श्री रामचंद्र जी महाराज और भगवती मैया सीता हनुमान जी को अपना पहला पुत्र मानते हैं। इसीलिए हनुमान जी आज अयोध्या के राजा हैं। राजपाट उन्हीं को दिया गया है, और हनुमानगढ़ी में बैठकर वे राज कर रहे हैं। तो जब उन्होंने परीक्षा लेने के लिए वह वेश बनाया, तो उन्होंने उनका त्याग कर दिया — और यहाँ आप अपने बच्चे को कृष्ण बनाते हैं और फिर जोकर बना देते हैं, फिर जंगल का कोई पात्र बना देते हैं। खुद तय कीजिए, वे कहते हैं।
कथावाचकों ने पौरुष के स्थान पर रास लीला और रसिया कृष्ण सिखाया
पौरुष के स्थान पर रास लीला और रसिया कृष्ण
वक्ता कहते हैं कि अगर आप यह प्रसंग जानते और इसे गंभीरता से लेते — केवल मनोरंजन की काल्पनिक कहानियों की तरह नहीं — और कथावाचकों ने यह विषय आपको समझाया होता, तो यह विनाश नहीं होता। अगर उन्हें रास लीला दिखाने से, भगवान श्रीकृष्ण को रसिया बनाकर रसिक, रसिक करते रहने से फुर्सत होती, और उन्होंने समाज में उस तरह का संदेश दिया होता, तो आज आपने भी अपने बच्चे को पौरुष से युक्त बनाया होता।
अगर यह प्रसंग जाना गया होता, और आपने इसे गंभीरता से लिया होता, वक्ता कहते हैं — केवल काल्पनिक कहानियों की तरह, मनोरंजन के लिए नहीं — अगर आपने इसे गंभीरता से लिया होता, और इन कथावाचकों ने यह विषय आपको समझाया होता, तो यह विनाश नहीं होता। यह विनाश नहीं होता। अगर लोगों को रास लीला दिखाने से फुर्सत होती; अगर उन्हें भगवान श्रीकृष्ण को रसिया बनाने से, रसिक, रसिक करते रहने से फुर्सत होती; अगर उन्हें समय मिला होता और उन्होंने समाज में उस तरह का संदेश दिया होता — तो आज आपने अपने बच्चे को भी पौरुष से युक्त बनाया होता: कि एक बार कृष्ण बन गए हो, तो अब से कृष्ण के मार्ग पर चलो।
कृष्ण बनाए गए बच्चे से गीता के अठारह श्लोक सुनवाने चाहिए
गीता के अठारह श्लोक, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे से आरंभ
वक्ता कहते हैं कि कृष्ण जी को पूरी श्रीमद्भगवद्गीता के अठारह अध्याय याद थे — तो हमें अठारह श्लोक सुनाओ; अब बैठो। धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे सुनाओ, पहला श्लोक; बैठ जाओ। बैठक में बच्चे को श्लोक याद करवाइए: तुम कृष्ण बने थे, तो अब श्लोक याद करने पड़ेंगे, और साथ में आप भी जान जाएँगे। और जहाँ भगवद् गीता याद की गई है, वहाँ कल्याण होना ही है — लौकिक गति हो या न हो, पारलौकिक गति ज़रूर होगी, क्योंकि गीता माहात्म्य में इतने विषय हैं।
कृष्ण जी को भगवद् गीता के पूरे अठारह अध्याय याद थे, वक्ता कहते हैं। तो हमें अठारह श्लोक सुनाओ; चलो, अब बैठो। धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे सुनाओ — पहला श्लोक; तुम बैठ जाओ। बैठक में बच्चे को श्लोक याद करवाइए। तुम कृष्ण बने थे, तो अब तुम्हें श्लोक याद करने पड़ेंगे — और उसके साथ आप भी उन्हें जान जाएँगे। और जहाँ भगवद् गीता याद की गई है, वहाँ कल्याण होना ही है। लौकिक गति हो या न हो, पारलौकिक गति ज़रूर होगी — गीता माहात्म्य में इतने विषय हैं। आप यह क्यों नहीं करते, वे पूछते हैं।
केवल स्वांग रचना आता है, तो आपका अपना जीवन ही स्वांग बन जाता है
आपको केवल वेश धरना आता है, और जीवन वेश बन जाता है
वक्ता कहते हैं कि आपको केवल स्वांग रचना आता है — और इसी कारण आपका जीवन स्वांग बन जाता है, और फिर आप रोते रह जाते हैं कि भगवान नहीं आते। भगवान आते हैं, वे कहते हैं; बस आप भगवान को पहचानते नहीं।
आपको केवल स्वांग, एक वेश, रचना आता है, वक्ता कहते हैं। और ठीक इसी कारण आपका जीवन स्वांग बन जाता है, और फिर आप रोते रह जाते हैं कि भगवान नहीं आते। भगवान आते हैं। आप भगवान को पहचानते ही नहीं।
परिवार और मंदिरों को बचाने के बाद अगला कर्तव्य है कि सब मंत्र सिद्ध बनें
सबको मंत्र सिद्ध बनना चाहिए
वक्ता कहते हैं कि तो पहले खुद को, अपने बच्चों और अपने परिवार को बचाइए; फिर अपने पास के मंदिरों को बचाइए। और उसके बाद अगला कर्तव्य है कि सब मंत्र सिद्ध बनें। मंत्र के सामर्थ्य से देवताओं का आवाहन होता है, देवताओं के तत्व उपस्थित होते हैं, और उन्हीं के कारण आप ऐसी विपत्ति में खुद को ठीक से सुरक्षित रख पाएँगे।
तो पहले खुद को, अपने बच्चों और अपने परिवार को बचाइए, वक्ता कहते हैं; फिर अपने आसपास के मंदिरों को बचाइए। और उसके बाद अगला कर्तव्य है: सब मंत्र सिद्ध बनें। मंत्र के सामर्थ्य से देवताओं का आवाहन होता है। देवताओं के तत्व उपस्थित होते हैं। और उन्हीं के कारण आप ऐसी विपत्ति में खुद को ठीक से सुरक्षित रख पाएँगे।
जप और पुरश्चरण बुद्धि पर क्या असर करते हैं?
बुद्धि की प्रखरता और योजनाबद्ध नैरेटिव को पढ़ने की क्षमता
वक्ता कहते हैं कि जब आप मंत्रों का जप और पुरश्चरण करते हैं, तो बुद्धि में प्रखरता आती है। आप चीज़ों को भाँप पाएँगे और समझ पाएँगे कि इन सब पूर्व-नियोजित बातों में कैसे और क्या हो रहा है। वे पूछते हैं कि आँखों के सामने देखते हुए भी आप यह आकलन क्यों नहीं कर पाते, और उत्तर देते हैं: क्योंकि आपके पास मंत्रों का सामर्थ्य नहीं है और आप मंदबुद्धि हैं।
जब आप मंत्रों का जप और पुरश्चरण करेंगे, वक्ता कहते हैं, तो बुद्धि में प्रखरता आएगी। आपमें भाँपने की क्षमता आएगी: ये सब जो पूर्व-नियोजित चीज़ें चल रही हैं — आप समझ पाएँगे कि कैसे और क्या हो रहा है। आपकी बुद्धि बैताल की तरह घास चरने क्यों गई है, वे पूछते हैं? सामने देखते हुए भी आप यह आकलन क्यों नहीं कर पाते? आपका स्तर इतना मंद और इतना बिखरा हुआ क्यों है कि जो नैरेटिव दिखाया जा रहा है उसे भी आप पहचान नहीं पाते? क्यों? क्योंकि आपके पास मंत्रों का सामर्थ्य है ही नहीं; आप मंदबुद्धि हैं। भैंस का दूध पीकर और टेढ़ा-मेढ़ा मांस खाकर, वे कहते हैं, आपकी बुद्धि पूरी तरह भ्रष्ट हो गई है — और लोग आपके सामने बैठकर आपको मूर्ख बनाते हैं, और आप बने रहते हैं।
तीर्थ जाना कब शुरू करना चाहिए, और कितनी बार?
छह महीने से एक साल पुरश्चरण के बाद, हर छह महीने या साल में
वक्ता कहते हैं कि जब आप एक साल, या छह महीने, जितना हो सके ठीक से और क्रम से मंत्रों का पुरश्चरण कर लें, तो अपने पास के तीर्थ क्षेत्रों में आना-जाना शुरू कीजिए — कोई शक्ति पीठ, बारह ज्योतिर्लिंग के जो भी क्षेत्र हों। हर छह महीने, हर साल जाइए।
जितने भी लोग हैं, वक्ता कहते हैं: जब एक साल, या छह महीने, आप जितना हो सके ठीक से और क्रम से मंत्रों का पुरश्चरण पूरा कर लें — उसके बाद अपने पास के तीर्थ क्षेत्रों में, किसी शक्तिपीठ में, बारह ज्योतिर्लिंगों के जो भी क्षेत्र हों, वहाँ आना-जाना शुरू कीजिए। हर छह महीने, हर साल जाइए।
जैसे धन माँगते हैं, वैसे ही उनके धाम बुलाए जाने की माँग कीजिए
उनके धाम बुलाए जाने की माँग, जैसे धन माँगते हैं
वक्ता कहते हैं कि वही आपको सामर्थ्य देंगे, और आपको माँगना पड़ेगा। जैसे आप हमेशा धन-संपत्ति और बाकी सब माँगते हैं, वैसे ही उनसे यह भी कहिए कि आपको अपने धाम बुलाएँ।
वही आपको सामर्थ्य देंगे, वक्ता कहते हैं; आपको कहना पड़ेगा। जैसे आप हमेशा धन-संपत्ति और बाकी सब माँगते रहते हैं — वैसे ही उनसे यह भी कहिए कि आपको अपने धाम बुलाएँ।
धाम में कैसा आचरण करना चाहिए?
धाम गुप्त रहे; रील और फोटो केवल अपने लिए
वक्ता कहते हैं कि जब आप उनके धाम जाएँ, तो केवल घूमने मत जाइए — गए, घूमे और लौट आए, गए, रील बनाई और लौट आए। सबसे पहले, धाम गुप्त रहना चाहिए। रील और फोटो केवल अपने लिए हों, कि हाँ, हम गए थे; दिखाने के लिए नहीं।
और जब आप उनके धाम जाएँ, वक्ता कहते हैं, तो केवल घूमने मत जाइए। गए, घूमे, लौट आए। गए, रील बनाई, लौट आए। सबसे पहले, धाम को गुप्त रखना चाहिए। रील और फोटो केवल अपने लिए हों — कि हाँ, हम गए थे। वे दूसरों को दिखाने के लिए नहीं होने चाहिए।
धाम में कौन सा जप करना चाहिए, और कितना?
सवा लाख जप, जो रोज़ सौ माला के अभ्यास से ही संभव है
वक्ता कहते हैं कि दूसरा, जब आप वहाँ जाएँ तो मंत्र का पुरश्चरण ज़रूर कीजिए — और अभ्यास हो तभी आप पुरश्चरण कर पाएँगे। अगर आप रोज़ सौ माला जप करते हैं, तो धाम जाकर आप सवा लाख का जप पूरा करके लौट पाएँगे।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, यह है कि जब आप वहाँ जाएँ, तो मंत्र का पुरश्चरण ज़रूर कीजिए। अभ्यास हो तभी आप पुरश्चरण कर पाएँगे। अगर आप रोज़ सौ माला जप करते हैं, तो जब धाम जाएँगे तो वहाँ सवा लाख का जप करके लौट पाएँगे।
तीर्थ में जप के लिए कहाँ बैठ सकते हैं?
पूरा तीर्थ क्षेत्र उपयुक्त है; गर्भगृह उपलब्ध नहीं
वक्ता कहते हैं कि वहाँ आपको न हवन करने को मिलेगा, न दर्शन — शिखर दर्शन मिलेगा; जप के लिए जगह खोजिए और कहीं भी जप कीजिए। गर्भगृह में बैठकर जप करने को नहीं मिलेगा। तीर्थ क्षेत्र में तीर्थ की जो भी जगह है वह आपके लिए उपयुक्त है। आप बाहर से आए हैं; आप वहाँ के निवासी नहीं हैं।
वहाँ आपको हवन करने को नहीं मिला, दर्शन नहीं मिले, कुछ नहीं मिला — शिखर दर्शन मिलेगा, वक्ता कहते हैं। जप के लिए जगह खोजिए और कहीं भी जप कीजिए। गर्भगृह में बैठकर जप करने को नहीं मिलेगा। तीर्थ क्षेत्र में तीर्थ की जो भी जगह है, वह आपके लिए उपयुक्त है। आप बाहर से आए हैं; आप उस जगह के निवासी नहीं हैं। निवासियों के बारे में, वे कहते हैं, उनकी दृष्टि में यह उनका दुर्भाग्य है: वे माया से इतने मोहित हैं कि उन्हें अपने धाम से कोई मतलब ही नहीं। विंध्य क्षेत्र में वे ऐसे लोग देखते हैं जो विंध्याचल के निवासी होकर इस बाबा, उस बाबा के पीछे जगह-जगह दौड़ने में फँसे हैं। यही, वे कहते हैं, महामाया है।
देवी भागवत, उशनस पुराण और दुर्गा कल्पद्रुम का हवाला दिया जाता है पर पालन कभी नहीं होता
देवी भागवत महापुराण, उशनस पुराण, दुर्गा कल्पद्रुम और अन्य तंत्र
वक्ता कहते हैं कि विषय जो भी हो — चाहे श्रीमद्देवीभागवतम् का विषय हो, उशनस पुराण का विषय हो, या कल्पद्रुम और दुर्गा कल्पद्रुम तंत्र जैसे अन्य तंत्रों का विषय हो — ये लोग इन सबका लिखित संदर्भ देने में सबसे आगे रहेंगे, पर उस बात को मानेंगे नहीं। यही, वे कहते हैं, विडंबना है; यह भगवती की माया है।
पूरा विषय जो भी हो, वक्ता कहते हैं — चाहे देवी भागवत महापुराण का विषय हो, उशनस पुराण का विषय हो, या अन्य तंत्रों का, कल्पद्रुम और दुर्गा कल्पद्रुम आदि का — ये लोग इन सबका लिखित संदर्भ देने में सबसे आगे रहेंगे, पर उस बात को मानेंगे नहीं। यही विडंबना है। यह भगवती की माया है; इसे याद रखिए, वे कहते हैं। आप बाहर से जा रहे हैं: जाइए और अपने मंत्रों का पुरश्चरण कीजिए। मंत्रों को जागृत कीजिए; जब जाएँ तो सामर्थ्य बढ़ाइए।
क्या अनुशासनहीन रहते हुए पुरश्चरण किया जा सकता है?
शुरुआत हमेशा अनुशासन से, गृहस्थ धर्म की मर्यादा में
वक्ता कहते हैं कि नियम और अनुशासन से रहिए। अगर आप बहुत चाहते हैं कि अनुशासनहीन और स्वच्छंद होकर, हर तरह की छूट के साथ, जैसे-तैसे रहते हुए मंत्र पुरश्चरण करें, तो पहले उतना सामर्थ्य आपके भीतर आना चाहिए — तभी आप वैसे बनेंगे। शुरुआत हमेशा अनुशासन से ही होगी, और हमेशा आप जिस गृहस्थ धर्म में हैं उसकी मर्यादा के अनुसार।
नियम और अनुशासन से रहिए, वक्ता कहते हैं। अगर आप बहुत चाहते हैं कि अनुशासनहीनता और स्वच्छंदता में, हर तरह की छूट के साथ रहें, और जैसे-तैसे रहते हुए मंत्र पुरश्चरण करें, तो पहले उतना सामर्थ्य आपके भीतर आना चाहिए — तभी आप वैसे बनेंगे। शुरुआत हमेशा अनुशासन से ही होगी। वह हमेशा आप जिस गृहस्थ धर्म में हैं उसकी मर्यादा के अनुसार होगी। जब आप उस स्तर पर पहुँचेंगे, तो उस प्रकार के गुरु आपके जीवन में प्रकट होंगे; उनका आदेश होगा; और तभी आप उस प्रकार की क्रिया और प्रक्रिया करेंगे।
उस स्तर का उपदेश केवल योग्य व्यक्तियों के सामने, वरना मूल तत्व छूट जाता है
केवल योग्य व्यक्तियों के सामने, वरना मूल तत्व छूटता है
वक्ता कहते हैं कि इस स्तर का उपदेश भी इसी कारण योग्य व्यक्तियों के सामने दिया जाना चाहिए। अयोग्य के सामने शुद्ध स्तर का उपदेश देने पर, अगर उनके मन में ऐसी धारणा बन गई, तो वे मूल तत्व नहीं समझेंगे — बोलने वाले ने किस स्तर से कहा, पहले क्या करना है और बाद में क्या। वे बस कहेंगे हाँ, अनुशासन, जैसे कुछ संत पूरे विषय पर फैसला सुना देते हैं।
इस स्तर का उपदेश भी, वक्ता कहते हैं, ठीक इसी कारण योग्य व्यक्तियों के सामने दिया जाना चाहिए। जब अयोग्य के सामने शुद्ध स्तर का उपदेश दिया जाता है, और उनके मन में ऐसी धारणा बन जाती है, तो वे मूल तत्व नहीं समझेंगे — कि सामने वाले ने किस स्तर से कहा है, कि हाँ, पहले यह करना है और फिर वह। वे सीधे कहेंगे, हाँ, अनुशासन — जैसे कुछ संत पूरे विषय पर फैसला सुना देते हैं।
एक वायरल संत का दावा कि वृंदावन में सूअर का स्पर्श गंगा जितना पुण्य देता है
यह दावा कि वहाँ सूअर का स्पर्श गंगा जितना पुण्य है
वक्ता एक संत के वायरल वीडियो का वर्णन करते हैं जिनसे पूछा गया कि वृंदावन परिक्रमा में सूअर छू जाते हैं, जिससे ग्लानि होती है और अशुद्ध लगता है, और उन्होंने उत्तर दिया कि वृंदावन के सूअर भी छू जाएँ तो वे गंगा जितने पुण्यदायी हैं। यह, वे साफ कहते हैं, मर्यादा नहीं है।
वे किसी संत का एक वीडियो याद करते हैं जो वायरल हुआ था, जिसमें कुत्ते-बिल्ली वाला विषय आया था। संत से कहा गया: जब हम वृंदावन में परिक्रमा करते हैं, तो ये सूअर हमें छू जाते हैं, और इससे ग्लानि होने लगती है — लगता है कि हम अशुद्ध हो गए। और उन्होंने कहा कि नहीं, वृंदावन के सूअर भी आपको छू जाएँ, तो वे गंगा जितने पुण्य से भरे हैं। यह मर्यादा नहीं है भाई, वक्ता कहते हैं। सीधी सी बात है।
तो ऐसा कहने वाले सूअर को सिर पर रखें जैसे शिव जटा में गंगा रखते हैं
तो सूअर को सिर पर रखिए जैसे शिव जटा में गंगा रखते हैं
वक्ता कहते हैं कि अगर ऐसा है, तो उनके हिसाब से ऐसे बयान देने वाले सबको हाथ में सूअर लेकर घूमना चाहिए, क्योंकि उसकी तुलना गंगा से की गई है — और कहना चाहिए कि हम गंगा लेकर घूम रहे हैं। गंगा शिव जी की जटा में हैं; बाबा जी भी सिर पर सूअर रखें और कहें कि हमारी जटा में भी गंगा हैं, क्योंकि जब तुलना कर ही रहे हैं तो यह साक्षात गंगा है।
अगर ऐसा है, वक्ता कहते हैं, तो उनके अनुसार जिन लोगों ने ऐसे बयान दिए हैं उन सबको हाथ में सूअर लेकर घूमना चाहिए, क्योंकि उसकी तुलना गंगा से की गई है। अगर तीर्थ के सूअरों और कुत्तों की तुलना गंगा जी से की जा रही है — अगर गंगा जी की महिमा इतनी घटा दी गई है — तो आपको उन्हें लेकर घूमना चाहिए और कहना चाहिए कि हम गंगा लेकर घूम रहे हैं। गंगा शिव जी की जटा में हैं; यहाँ बाबा जी भी अपने सिर पर सूअर रखें और कहें कि हमारी जटा में भी गंगा हैं, क्योंकि जब आप तुलना कर रहे हैं तो यह साक्षात गंगा है। और लोगों की मूर्खता देखिए, वे कहते हैं: वे लिखते हैं कि बाबा जी की बात में तत्व है, उन्हें किसी जीव में भेद नहीं दिखता — वाह बाबा जी, वाह बाबा जी, कमेंट चल रहे हैं।
शुद्धि-अशुद्धि जैसे विषयों पर उपदेश कैसे और किसे दिया जाना चाहिए?
ऐसा उपदेश एकांतिक हो — केवल उस एक योग्य व्यक्ति को, आम वर्ग को कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने यह बहुत सोच-विचार कर कहा है और यह गाली की बात नहीं: अगर ऐसा उपदेश देना ही है, और सामने वाला योग्य है, तो वह एकांतिक उपदेश होना चाहिए — केवल उसी के लिए। यह आम वर्ग के लिए बिल्कुल नहीं है।
कीजिए, वे कहते हैं; ऐसी चीज़ें करते हुए मज़े कीजिए। विनाश अपने आप में एक विषय है, पर विनाश की पराकाष्ठा के लिए हर दिशा में एक नया ही मानक बनाया जा रहा है — और इसीलिए, वे कहते हैं, उन्होंने दो शब्द कहे हैं। यह गाली की बात नहीं; उन्होंने बहुत सोच-विचार कर कहा है। अगर इस प्रकार का उपदेश देना है, और सामने वाला योग्य है, तो वह एकांतिक उपदेश होना चाहिए, ताकि वह केवल उसी के लिए हो। यह आम वर्ग के लिए बिल्कुल नहीं है।
किसके लिए यह सच है कि कुत्ते, सूअर और गंगा में कोई भेद नहीं?
जिसने अवधूत और दिव्य अवस्था पा ली हो
वक्ता कहते हैं कि अगर उसने अवधूत अवस्था पा ली है, दिव्य अवस्था पा ली है, तो उसे कुत्ते, सूअर और गंगा जी में कोई भेद नहीं दिखेगा। पर आपको अभी अनुशासन में रहना है; आपने अभी उस स्तर की निवृत्ति नहीं पाई। अगर अब आप हाथ में सूअर लेकर घूमेंगे, तो ढोंग करेंगे — कहते हुए कि बाबा जी ने कहा इसलिए कर रहे हैं। यह, वे कहते हैं, मूर्खता है, महामूर्खता।
अगर उसने अवधूत की अवस्था पा ली है, वक्ता कहते हैं, अगर उसने दिव्य अवस्था पा ली है, तो उसे कुत्ते, सूअर और गंगा जी में कोई भेद नहीं दिखेगा। पर आपको अभी अनुशासन में रहना है। आपने अभी उस स्तर का निवृत्ति मार्ग नहीं पाया है। अगर अब आप हाथ में सूअर लेकर घूमेंगे, तो ढोंग करेंगे — कहते हुए कि बाबा जी ने कहा, इसलिए हम कर रहे हैं। यह मूर्खता है, वे कहते हैं। महामूर्खता।
श्रोता ने न अपना पिंडदान किया है, न पितरों का, न वानप्रस्थ में गया है
आपने न अपना पिंडदान किया, न वानप्रस्थ में गए
वक्ता कहते हैं कि आपने अभी न अपना पिंड दान किया है, न अपने पितरों का पिंड दिया है; न वानप्रस्थ में गए हैं; न सब कुछ त्यागा है। आप अभी नए और युवा हैं, आपका विवाह होना बाकी है — और आप कह रहे हैं कि सूअर छूने से आपकी सद्गति होगी। आपकी हैसियत क्या है, वे पूछते हैं; आपके सामने उस स्तर का उपदेश कभी दिया ही नहीं जाना चाहिए।
आपने अभी अपना पिंडदान नहीं किया है, वक्ता कहते हैं। आपने अपने पितरों का पिंड नहीं दिया है। आप अभी वानप्रस्थ में नहीं गए हैं। आपने सब कुछ त्यागा नहीं है। आप अभी नए हैं, अभी युवा हैं; आपका विवाह अभी होना है — और आप कह रहे हैं कि सूअर के स्पर्श से आपकी सद्गति होने वाली है। आपकी क्या हैसियत रह गई? आपके सामने, वे कहते हैं, उस स्तर का उपदेश कभी दिया ही नहीं जाना चाहिए।
यह शिक्षा कि परिवार केवल इस जन्म का ऋण है, गृहस्थ को बर्बाद करने के लिए है
यह शिक्षा कि परिवार केवल इस जन्म का ऋण है
वक्ता कहते हैं कि ये स्वच्छंद उपदेश, जिनमें परिवार छोड़ने की, माता-पिता का अपमान करने की बात है — कि हम एक जीवात्मा हैं, मेरे शरीर और तुम्हारे शरीर के बीच केवल इस जन्म का ऋण है, इसलिए हम तुम्हारे पुत्र हैं पर तुम हमारे कुछ नहीं — यह सब, अगर आप इससे प्रेरित हो रहे हैं, तो केवल और केवल आपको बर्बाद करने के लिए है। आपकी हालत, वे कहते हैं, ऐसी है ही नहीं कि आप ये चीज़ें अपनाएँ।
ये स्वच्छंद उपदेश, वक्ता कहते हैं — जिनमें परिवार छोड़ने की बात है, माता-पिता का अपमान करने की बात है; कि हम एक जीवात्मा हैं, हमारे शरीर और तुम्हारे शरीर के बीच केवल इस जन्म का ऋण है, और इसलिए हम तुम्हारे पुत्र हैं पर तुम हमारे कुछ नहीं — यह सब जो चल रहा है, वे कहते हैं, केवल और केवल आपको बर्बाद करने के लिए है, अगर आप इससे प्रेरित हो रहे हैं। आपकी हालत ऐसी है ही नहीं कि आप ये चीज़ें अपनाएँ। और जो अपनाते हैं उनकी हालत भी देख लीजिए।
तैलंग स्वामी में ऐसी वाणी का सामर्थ्य था — रामकृष्ण परमहंस उनसे दीक्षा लेने गए थे
तैलंग स्वामी सामर्थ्यवान थे — रामकृष्ण परमहंस उनसे दीक्षा लेने गए
वक्ता कहते हैं कि तैलंग स्वामी सामर्थ्यवान थे: रामकृष्ण परमहंस भी उनसे दीक्षा लेने गए थे; उनमें सामर्थ्य था। कहने पर बुरा लगेगा, वे जोड़ते हैं — ये लोग कितने करोड़ की गाड़ियों में चलते हैं, कौन सा रथ, आगे-पीछे कौन सा परिकर रखते हैं। वे कहते हैं कि वे YouTube और Facebook से इसलिए बोलते हैं क्योंकि वे डरपोक व्यक्ति हैं और उनमें सामने आकर कहने का सामर्थ्य नहीं; अगर आपमें उस स्तर का सामर्थ्य है, तो आकर उस स्तर की बात कहिए।
तैलंग स्वामी सामर्थ्य से युक्त थे, वक्ता कहते हैं। रामकृष्ण परमहंस भी उनसे दीक्षा लेने गए थे। उनमें सामर्थ्य था। कहें तो बुरा लगेगा — ये कितने करोड़ की गाड़ियों में चलते हैं, कौन सा रथ, और आगे-पीछे कौन सा परिकर रखते हैं। उनमें सामर्थ्य था। सामर्थ्यवान बनिए, और फिर बोलिए, वे कहते हैं। लोग ठीक ही कहते हैं कि हम डरपोक व्यक्ति हैं और हमारे भीतर आपके सामने आकर बोलने का सामर्थ्य नहीं; इसलिए हम नहीं आते, और YouTube और Facebook से बोलते हैं। अगर आपके भीतर उस स्तर का सामर्थ्य है, तो आकर उस स्तर की बात कहिए। वरना लोगों को इस तरह क्यों भटका रहे हैं?
अंतिम हानि यह है कि संध्या कर्म छूट जाता है और शुद्धि का भेद मिट जाता है
संध्या कर्म छूटा और शुद्धि का भेद मिटा
वक्ता कहते हैं कि हानि अंततः सनातन धर्म की है; लोगों को भुगतना पड़ेगा। वे इन्हें खोपड़ियाँ कहते हैं, और कहते हैं कि इनकी कार्यवाही आपको किसी न किसी तरह बर्बाद करेगी: ये आपसे संध्या कर्म छुड़वा देंगे, और शुद्ध-अशुद्ध का कोई भेद नहीं रखेंगे — जबकि शुचिता और अशुचिता, शुद्धि और अशुद्धि पर बार-बार चर्चा हुई है, कि शुद्धि कैसे हो, और आपको अशुद्धि में नहीं रहना। और वहाँ आपसे कहा जा रहा है कि सूअर छू जाए तो कोई दिक्कत नहीं, वह भी गंगा जी जितना पवित्र है।
हानि अंततः सनातन धर्म की हो रही है, वक्ता कहते हैं। आपको लगता है कि कोई हानि नहीं, पर हानि हो रही है, और लोगों को भुगतना पड़ेगा। हिसाब चुकाने कहाँ जाएँगे? उनका सीधा उत्तर यह है कि ये खोपड़ियाँ हैं, और इनकी कार्यवाही आपको किसी न किसी तरह बर्बाद करेगी। ये आपसे संध्या कर्म छुड़वा देंगे। ये शुद्ध-अशुद्ध का कोई भेद नहीं रखेंगे — जबकि शुचिता और अशुचिता, शुद्धि और अशुद्धि पर बार-बार चर्चा हुई है: शुद्धि कैसे की जाए, और आपको अशुद्धि में नहीं रहना। और वहाँ आपसे कहा जाता है कि सूअर छू जाए तो कोई दिक्कत ही नहीं, वह भी गंगा जी जितना पवित्र है।
तीर्थवासी दिव्य होते हैं — इस कथन का सही अर्थ क्या है?
सिद्धांत में सच, पर वहाँ नहीं जहाँ वे गलत करें या अशुचिता में रहें
वक्ता मानते हैं कि तीर्थों के मनुष्यों के बारे में एक विषय है — कि तीर्थ के मनुष्य उस प्रकार के होते हैं, साक्षात ये हैं, वो हैं; यह सब ठीक है। पर अगर वे गलत काम करने लगें, या अशुचिता में पड़कर मदिरा पी रहे हों, तो वे कहते हैं कि वर्तमान समय में वे अपने साथ उतना नहीं रख रहे।
तीर्थों के मनुष्यों के बारे में एक विषय है, वक्ता मानते हैं — ठीक है, कि तीर्थ के मनुष्य इस प्रकार के होते हैं, कि वे साक्षात ये हैं, कि वे वो हैं; यह सब ठीक है। पर अगर वे गलत काम करने लगें, या अगर वे अशुचिता में पड़े हैं और मदिरा पी रहे हैं — तो वर्तमान समय में वे अपने साथ उतना नहीं रख रहे, वे कहते हैं।
भारी पुरश्चरण कर चुके व्यक्ति की अवस्था क्या होती है?
मंत्रों के नशे में, हर जगह जगदंबा को देखना
वक्ता कहते हैं, हाँ, अगर आप पहले ही बहुत अधिक मंत्र पुरश्चरण कर चुके हैं, तो आप अपनी सीमा में नहीं रहते: मंत्रों के पुरश्चरण के कारण आप एक नशे में चले गए हैं, किसी मदिरा को पीकर नहीं। जगदंबा की कृपा आप पर आ गई है। ऐसी अवस्था में अगर कोई पीने वाला या कोई गणिका आपसे टकरा जाए, तो आपको बिल्कुल होश नहीं रहेगा कि सामने कौन है — आपको हर जगह जगदंबा दिखेंगी।
हाँ, वक्ता कहते हैं, अगर आप पहले ही मंत्रों का बहुत अधिक पुरश्चरण कर चुके हैं, तो आप अपनी सीमा में नहीं रहते। मंत्रों के पुरश्चरण के कारण आप एक नशे में चले गए हैं — किसी मदिरा के पीने से नहीं। जगदंबा की कृपा आप पर पहले ही आ चुकी है। ऐसी अवस्था में अगर कोई पिया हुआ व्यक्ति आपसे टकरा जाए, या कोई गणिका आपसे टकरा जाए, तो उस समय आपको बिल्कुल होश नहीं रहेगा कि सामने कौन है। तब आपको हर जगह जगदंबा दिखेंगी।
हर चीज़ में ज़बरदस्ती भगवान देखना जो चाहे वह करने की छूट दे देता है
हर चीज़ में ज़बरदस्ती भगवान देखना, और उसका परिणाम
वक्ता कहते हैं कि पर यह ज़बरदस्ती का दिखावा — कि इसमें भगवान है, उसमें भगवान है, इसलिए हम जो भी करें — श्रोता सोचें कि वे अपने ऊपर किस स्तर का विनाश ला रहे हैं। वे कहते हैं कि अखबार में बीच-बीच में पढ़ने को मिलता है कि कोई व्यक्ति किसी जगह गया और उसकी किडनी काटकर निकाल ली गई, उसका कुछ गायब हो गया; यह कैसे होता है? ठीक इन्हीं चीज़ों से, वे कहते हैं, और आप समझते नहीं।
पर यह ज़बरदस्ती का प्रदर्शन — कि इसमें भगवान है, उसमें भगवान है, और इसलिए हम जो भी करें — सोचिए, वक्ता कहते हैं, आप अपने ऊपर किस स्तर का विनाश ला रहे हैं। अखबार में समय-समय पर पढ़ने को मिलता है: एक आदमी किसी जगह गया, और वहाँ सामने वाले को चीरकर उसके भीतर से किडनी निकाल ली गई; किसी का कुछ गायब हो गया। यह कैसे होता है? ठीक इन्हीं चीज़ों से होता है। आप समझ नहीं पा रहे, वे कहते हैं। खुद को बचाइए; जागिए। उन सब जगहों को खुली आँखों से देखिए जहाँ से आपका विनाश आ सकता है। और अगर आपको लगता है कि वे ऐसे बड़े लोगों से द्वेष रख रहे हैं — इससे उन्हें क्या भला हो सकता है, वे पूछते हैं, उनका क्या प्रचार बढ़ सकता है, वे कितना बड़ा आश्रम और मठ बना सकते हैं। उनका इससे कोई लेना-देना नहीं।
महाभैरव मंत्रों का जप कब शुरू करना चाहिए?
पाँच लाख पंचाक्षरी के बाद, फिर रोज़ संपुट के साथ
वक्ता कहते हैं कि महाभैरव मंत्रों का जप कम से कम तब शुरू करना चाहिए जब पंचाक्षरी का पाँच लाख जप पूरा हो जाए; उसके बाद संपुट लगाकर रोज़ उसका जप शुरू करना चाहिए।
महाभैरव के मंत्रों का जप, वक्ता कहते हैं, आपको कम से कम तब शुरू करना चाहिए जब पंचाक्षरी का पाँच लाख जप पूरा हो जाए। उसके बाद संपुट लगाकर रोज़ उसका जप शुरू करना चाहिए।
प्रयोग तब किया जाता है जब लगे कि ऐसा तंत्र आप पर या परिवार के किसी सदस्य पर काम कर रहा है
जब लगे कि ऐसा तंत्र आप पर या परिवार के सदस्य पर काम कर रहा है
वक्ता कहते हैं कि जब भी आपको लगे कि आप पर या आपके परिवार के किसी सदस्य पर उस प्रकार के तंत्र का प्रयोग हो रहा है — उस समय आपको इसका उपयोग करना चाहिए।
इसका उपयोग कैसे करना है, वक्ता पूछते हैं। जब भी आपको लगे कि आप पर, या आपके परिवार के किसी सदस्य पर, इस प्रकार के तंत्र आदि का प्रयोग हो रहा है — उस समय आपको इसका उपयोग करना चाहिए।
इसके लिए घर की दहलीज़ और चौखट सबसे उत्तम स्थान है
घर की दहलीज़ और चौखट
वक्ता कहते हैं कि प्रयोग करने के लिए सबसे उत्तम स्थान घर की दहलीज़, चौखट है। उसी स्थान पर, चाहे आप उतारा करें या किसी भी प्रकार की बलि दें — नींबू की, नारियल की, उतारे के रूप में जो भी दिया जाता है — वह वहीं किया जाता है।
प्रयोग करने के लिए सबसे उत्तम स्थान, वक्ता कहते हैं, घर की दहलीज़, चौखट है। उसी स्थान पर, चाहे आप उतारा करें, या किसी भी प्रकार की बलि दें — नींबू या नारियल की बलि, उतारा करने के रूप में जो भी दिया जाता है — वह उसी स्थान पर किया जाता है।
जल, छाक और हर लाग उसी चौखट पर चढ़ाए जाते हैं
जल, छाक और लाग सब चौखट पर
वक्ता कहते हैं कि उसी स्थान पर आपको जल चढ़ाना है; उसी स्थान पर छाक चढ़ानी है; और जो भी लाग आप चढ़ाते हैं, वह सब वहीं चढ़ाना पड़ेगा।
उसी स्थान पर आपको जल चढ़ाना है। उसी स्थान पर आपको छाक चढ़ानी है। और जो भी लाग आप चढ़ाते हैं — वह सब वहीं चढ़ाना पड़ेगा, वक्ता कहते हैं।
उलटी की गई तांत्रिक क्रिया चौखट पर रुक जाती है और आप तक कभी नहीं पहुँचती
उलटी तांत्रिक क्रिया वहीं रुकती है — अगर चौखट मज़बूत हो
वक्ता कहते हैं कि वह स्थान ऐसा है कि उसका प्रभाव आप पर नहीं पड़ेगा। अगर किसी तांत्रिक क्रिया में कुछ उलटा किया गया है, तो वह वहीं रुक जाएगा। पर इसके लिए, वे कहते हैं, आपकी चौखट मज़बूत होनी चाहिए।
वह स्थान इस प्रकार का है, वक्ता कहते हैं, कि उसका प्रभाव आप पर नहीं पड़ेगा। अगर किसी तांत्रिक क्रिया में कुछ उलटा किया गया है, तो वह वहीं रुक जाएगा। पर इसके लिए आपकी चौखट मज़बूत होनी चाहिए।
चौखट मज़बूत रखने का अर्थ है उसे शुद्ध रखना, उस पर कभी पैर न रखना, और धूप-दीप जलाना
उसकी सेवा चलती रहे — शुद्ध, कभी पैर न रखना, धूप-दीप जलते रहें
वक्ता कहते हैं कि यानी चौखट की सेवा होती रहनी चाहिए। उसे हमेशा शुद्ध और पवित्र रखिए; उस पर कभी पैर मत रखिए; वहाँ धूप-दीप जलते रहें। तब सामर्थ्य वाली आधी से ज़्यादा चीज़ें आपकी रक्षा के लिए वहाँ उपस्थित रहेंगी।
यानी चौखट की सेवा होती रहनी चाहिए, वक्ता कहते हैं। वहाँ उसे हमेशा शुद्ध और पवित्र रखिए; उस पर कभी पैर मत रखिए। वहाँ धूप-दीप जलते रहें। तभी सामर्थ्य से युक्त आधी से ज़्यादा चीज़ें आपकी रक्षा के लिए वहाँ उपस्थित रहेंगी।
बार-बार ऐसी चीज़ें खाने, उल्टी करने, गलत जगहों के सपने बताते हैं कि क्या खिलाया गया है
बार-बार ऐसी चीज़ें खाने, उल्टी, गलत जगहों के सपने
वक्ता कहते हैं कि अगर किसी कारण से आपको लगे कि म्लेच्छ तंत्र के प्रयोग से किसी को कुछ खिलाया गया है, तो ऐसी अवस्था में दो-तीन चीज़ें आपके साथ ज़रूर होंगी, अगर आप साधक या साधिका हैं। पहली यह कि सपनों आदि में आप बार-बार म्लेच्छ से जुड़ी चीज़ें देखेंगे — उन्हें खाना, उल्टी करना, उनका गलत जगहों से निकलना; ऐसे विषय आपको हमेशा दिखेंगे।
दूसरा, वक्ता कहते हैं, अगर किसी कारण से आपको लगे कि म्लेच्छ तंत्र का प्रयोग करके किसी को कुछ खिला दिया गया है — ऐसी अवस्था में दो-तीन चीज़ें आपके साथ ज़रूर होंगी, अगर आप साधक या साधिका हैं। पहली बात यह कि सपनों आदि में आप बार-बार म्लेच्छ से जुड़ी चीज़ें देखेंगे: उन्हें खाना, उन्हें उल्टी करना, उनका गलत जगहों से निकलना। इस प्रकार के विषय आपको हमेशा दिखेंगे।
उपाय है तीर्थ के प्रधान विग्रह के स्नान का जल, सीधे पिया जाए
तीर्थ के प्रधान विग्रह के स्नान का जल, सीधे पिया जाए
वक्ता कहते हैं: कामरूप कामाख्या, विंध्याचल धाम, कोई भी तीर्थ स्थान — वहाँ के प्रमुख देवता के श्री विग्रह के स्नान आदि से जुड़ा ऐसा जल। उस जल को सीधे पीने की व्यवस्था कीजिए।
कामरूप कामाख्या, विंध्याचल धाम, कोई भी तीर्थ स्थान, वक्ता कहते हैं। उस स्थान का ऐसा जल जो वहाँ के प्रधान देवता के श्री विग्रह के स्नान आदि से जुड़ा हो — उस जल को सीधे पीने की व्यवस्था कीजिए।
इसे कम से कम एक पक्ष तक रोज़ खाली पेट दिया जाता है
रोज़ खाली पेट, कम से कम एक पक्ष
वक्ता कहते हैं कि व्यवस्था करके उस जल को अपने जीवन में उपस्थित कीजिए, और जिस व्यक्ति को ऐसी परेशानी है उसे रोज़ खाली पेट दीजिए। कम से कम एक पक्ष तक खाली पेट ज़रूर देना चाहिए।
उस जल की उपस्थिति अपने जीवन में कीजिए, वक्ता कहते हैं; व्यवस्था करवाइए। और जिस व्यक्ति को ऐसी परेशानी है उसे रोज़ खाली पेट दीजिए। कम से कम एक पक्ष तक खाली पेट ज़रूर देना चाहिए।
उतारा, अपने आराध्य की सेवा-पूजा और भारी कवच जप इसके साथ चलते हैं
उतारा, अपने आराध्य की सेवा-पूजा और भारी कवच जप
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ उतारा, अपने आराध्य की सेवा-पूजा, जप-तप और कवच का अधिक से अधिक जप करते रहिए। यह चीज़ जड़ से खत्म हो जाएगी — और केवल खत्म नहीं होगी: ऐसा करने वाले को उसका उचित दंड भी मिलेगा, क्योंकि ये सब बातें माहात्म्य में आती हैं।
और इसके साथ, वक्ता कहते हैं, उतारा करते रहिए, और अपने आराध्य की जो सेवा-पूजा करनी है वह, और जप-तप आदि, और कवच का अधिक से अधिक जप। यह चीज़ जड़ से ही खत्म हो जाएगी। यह केवल खत्म ही नहीं होगी: ऐसा करने वाले को उसका उचित दंड भी मिलेगा — क्योंकि ये सब बातें माहात्म्य में आती हैं।
क्या स्वयं अभिमंत्रित किया जल तीर्थ कुंड के जल जैसा ही है?
दोनों में बहुत बड़ा अंतर
वक्ता कहते हैं, नहीं। जल को स्वयं अभिमंत्रण करके करने का प्रभाव, और तीर्थों के कुंडों का जल सीधे उपयोग करने का प्रभाव — इनके बीच बहुत बड़ा प्रभाव और बहुत बड़ा अंतर है।
अगर आप जल को स्वयं अभिमंत्रित करके करते हैं, तो उसका अपना प्रभाव है, वक्ता कहते हैं। और अगर आप तीर्थों के कुंडों का जल सीधे उपयोग करते हैं — तो इनके बीच बहुत अधिक प्रभाव है, और बहुत बड़ा अंतर है।
वर्तमान स्थिति माँगती है कि लोग जागृत हों और मंत्र बल से युक्त हों
जागृत रहिए, और मंत्र बल से युक्त रहिए
वक्ता कहते हैं कि वर्तमान स्थिति को देखते हुए ज़रूरी है कि लोग जितना हो सके जागृत रहें। और अगर आप मंत्र बल से युक्त नहीं हैं, तो कुछ नहीं कर पाएँगे। मंत्र के सामर्थ्य से ही बुद्धि और विवेक उस स्तर पर काम करते हैं कि आप सूक्ष्मता से अपनी तैयारी कर सकें — जिसके, वे कहते हैं, इतिहास में बहुत उदाहरण मिलते हैं।
वे कहते हैं कि वे फिर लाइव आएँगे और दूसरे विषयों पर चर्चा करेंगे। अभी, जिस स्थिति में चीज़ें हैं, ज़रूरी है कि आप सब जितना हो सके जागृत हों। और अगर आप मंत्र बल से युक्त नहीं हैं, तो कुछ नहीं कर पाएँगे। मंत्र के सामर्थ्य के कारण ही बुद्धि और विवेक उस स्तर पर काम करते हैं कि आप सूक्ष्मता से अपनी तैयारी कर पाएँगे। इसके बहुत उदाहरण, वे कहते हैं, इतिहास में मिलते हैं।
बौद्धिक वर्ग पूछता है कि आक्रमणों के समय सिद्ध और तांत्रिक कहाँ थे
अंग्रेज़ों और आक्रांताओं को लेकर बौद्धिक वर्ग की आपत्ति
वक्ता कहते हैं कि लाइव खत्म करने से पहले एक बात और: बहुत जगह बौद्धिक वर्ग के लोग कहते मिलेंगे कि अगर देवी-देवता हैं, या कोई सिद्ध और समर्थ व्यक्ति होते थे, तो अंग्रेज़ों के समय और जब आक्रांताओं ने हमला किया तब ये तांत्रिक लोग कहाँ थे — और आज की घटनाओं के बारे में भी, ये लोग कहाँ थे, आकर बचाया क्यों नहीं, रक्षा क्यों नहीं की।
एक विषय और, और वे लाइव खत्म करेंगे, वक्ता कहते हैं। बहुत जगह आपको बौद्धिक वर्ग के लोग यह कहते मिलेंगे: कि अगर देवी-देवता हैं, या कोई सिद्ध और समर्थ व्यक्ति होते थे, तो अंग्रेज़ों के समय में, और जब आक्रांताओं ने हमले किए, तब ये तांत्रिक लोग कहाँ थे? और आज के समय में होने वाली चीज़ों के बारे में भी वे कहते मिलते हैं: ये लोग कहाँ थे, आकर बचाया क्यों नहीं, रक्षा क्यों नहीं की? पूरी त्रासदी को समझिए, वे कहते हैं।
इतिहास में कभी सीधा आक्रमण नहीं हुआ; करुणा का शुरू से लाभ उठाया गया
कभी सीधा आक्रमण नहीं; करुणा का शुरू से लाभ उठाया गया
वक्ता कहते हैं कि पूरी समयरेखा कभी ऐसी नहीं थी कि सीधे आक्रमण हुआ और तांत्रिक अपना प्रयोग नहीं कर पाए — बिल्कुल नहीं। जैसा उन्होंने शुरू में कहा था, हिंदुओं के भीतर करुणा और दया नाम की चीज़ है, और शुरू से ठीक इसी का पूरा लाभ उठाया गया है।
जो पूरी समयरेखा रही है, वक्ता कहते हैं, वह कभी ऐसी नहीं थी कि सीधे-सीधे आक्रमण हुआ और तांत्रिक अपना प्रयोग नहीं कर पाए। बिल्कुल नहीं। जैसा हमने शुरू में ही कहा, वे कहते हैं, हिंदुओं के भीतर करुणा और दया नाम की चीज़ है। शुरू से ठीक इसी चीज़ का पूरा लाभ उठाया गया है।
वीराचारी साधकों और उस समय के राजाओं ने अपनी सिद्धियों के बल पर आक्रमणों को तोड़ा
वीराचारी साधकों और राजाओं ने अपनी सिद्धियों से तोड़ा
वक्ता कहते हैं कि पहले आक्रमण कभी सीधे नहीं थे: इतिहास पढ़िए, जब आक्रमण हुआ, तो उस समय के वीराचार साधकों और राजा-महाराजाओं ने, जिस प्रकार की सिद्धियाँ उन्होंने पाई थीं उनके बल पर, इन लोगों की कमर तोड़ दी।
आक्रमण आदि का विषय शुरुआत में कभी सीधा नहीं था, वक्ता कहते हैं। देखिए, इतिहास में पढ़िए: जब आक्रमण हुआ, तो उस समय जो वीराचारी साधक थे, जो राजा-महाराजा थे — जिस प्रकार की सिद्धियाँ उन्होंने पाई थीं उनके बल पर, उन्होंने इन लोगों की कमर तोड़कर उन्हें बिछा दिया।
ऐसी हारों के बाद उन्होंने सीखने के लिए अपने विद्वान भेजे, और यहाँ के गद्दारों ने उनकी मदद की
उन्होंने सीखने के लिए अपने विद्वान भेजे, और यहाँ के गद्दारों ने मदद की
वक्ता कहते हैं कि जब उन्हें ऐसी हार मिलती, तो ये लोग विश्लेषण करते: यह क्या चीज़ है? और पता चलता कि वहाँ सिद्ध हैं, इस प्रकार के लोग हैं, इस प्रकार की सिद्धियाँ हैं। फिर वही त्रासदी होती: पहले वे हाथ जोड़कर अपने विद्वानों को, अपने में से वैसे लोगों को भेजते; वे लोग सब चीज़ें सीखते; सीखकर वहाँ जाकर तैयार करते। और यहाँ के गद्दार, यहाँ के उस प्रकार के दुष्ट लोग, फिर उधर जाकर उनका साथ देते।
जब जीवन में उन्हें इस प्रकार की हार मिलती, वक्ता कहते हैं, तो ये लोग उस चीज़ का विश्लेषण करते: यह क्या है? और पता चलता कि हाँ, वहाँ सिद्ध हैं, इस प्रकार के लोग हैं, इस प्रकार की सिद्धियाँ हैं। फिर वही त्रासदी होती। पहले वे हाथ जोड़कर अपनी ओर के विद्वानों को, अपने में से वैसे लोगों को भेजते; और वे लोग सब चीज़ें सीखते। सीखकर वे वहाँ जाकर उसे तैयार करते। और यहाँ के गद्दार — यहाँ के उस प्रकार के दुष्ट लोग — फिर उधर जाकर उनका साथ देते। ये चीज़ें होती थीं, और तभी यह सब हुआ। हर बार ऐसे ही नहीं हो गया।
विनाश में रक्षा से अधिक ऊर्जा क्यों लगती है?
विनाश में रक्षा से कई गुना ऊर्जा
वक्ता कहते हैं कि सृजन और रक्षा करने वाला चेतना के जिस भी स्तर पर जीता हो, विनाश करने वाले का सामर्थ्य कई गुना अधिक होता है — सामर्थ्य यानी वह बुद्धि के साथ चलता है। रक्षा के लिए आप जिस स्तर तक सोच सकते हैं, वह विनाश के लिए उससे कई गुना अधिक सोचता है। किसी चीज़ के विनाश में उसकी रक्षा से कई गुना ऊर्जा लगती है। विनाश करने वाला यह सोचे बिना अपनी चीज़ें चलाता है कि हम करेंगे तो इतना ही नुकसान होगा; जबकि रक्षक को सोचना पड़ता है कि मेरा सामर्थ्य इतना ही है, हम इतना ही कर पाएँगे — इससे अधिक कैसे करें?
अपने सामने के उन लोगों को देखिए जो रक्षक हैं, जो इस प्रकार के तंत्र से जुड़े हैं, वक्ता कहते हैं। क्योंकि सृजन करने वाला और रक्षा करने वाला चेतना के जिस भी स्तर पर जीता है, विनाश करने वाले का सामर्थ्य कई गुना अधिक होता है — सामर्थ्य यानी वह बुद्धि के साथ चलता है। रक्षा के लिए आप जिस स्तर तक सोच सकते हैं, वह विनाश के लिए उससे कई गुना अधिक सोचता है। किसी चीज़ की रक्षा के लिए जितनी ऊर्जा चाहिए, विनाश के लिए उससे कई गुना अधिक चाहिए। विनाश करने वाला जब अपनी चीज़ें चलाता है, तो यह नहीं सोचता कि हम करेंगे तो इतना ही नुकसान होगा। पर जो रक्षा और पालना कर रहा है उसे सोचना पड़ता है कि मेरा सामर्थ्य इतना ही है, और हम इतना ही कर पाएँगे — इससे अधिक कैसे करें?
रोज़ पाँच या दस माला परिवार को कितनी सुरक्षा देती है?
एक साधक की दस माला पाँच-सात के घर को नहीं ढक सकती
वक्ता कहते हैं कि जब आप यह सब विश्लेषण करेंगे, तो समझेंगे कि आपके साथ कैसे धोखा होता रहा है। आज भी वही है: अगर आपके परिवार में एक व्यक्ति साधना कर रहा है, रोज़ दस या पाँच माला का जप, और परिवार में सात सदस्य हैं, या पाँच — तो जब तांत्रिक प्रयोग होगा, उनमें से पाँच-छह का टूटना तय है। दस माला का जप कितने लोगों की रक्षा करेगा, वे पूछते हैं।
जब आप इन सब चीज़ों का विश्लेषण करेंगे, वक्ता कहते हैं, तब समझेंगे कि आपके साथ कैसे धोखा होता रहा है। आज भी वही है। आपके परिवार में एक व्यक्ति साधना कर रहा है, रोज़ दस माला या पाँच माला का जप। और आपके परिवार में कुल सात सदस्य हैं, या पाँच। अब जब कोई तांत्रिक प्रयोग होगा, तो उनमें से पाँच-छह का टूटना तय है। दस माला का जप कितने लोगों की रक्षा करेगा?
जब परिवार का अकेला साधक कहीं और व्यस्त हो जाता है, तो तांत्रिक को मौका मिल जाता है
तांत्रिक को मौका मिल जाता है
वक्ता कहते हैं कि और उसी बीच साधक का विवाह हो जाता है और साधक अपनी पत्नी के साथ एक अलग साधना में लग जाता है। कहानी वहीं खत्म। तांत्रिक को मौका मिल गया और वह अपनी साधना करेगा। अगर आप अपनी पत्नी के साथ नहीं करेंगे, तो वह आपके परिवार के साथ करेगा — और उसके बाद आप रोते रहिए।
और उसी बीच, वक्ता कहते हैं, साधक का विवाह हो गया, और वह साधक अब अपनी पत्नी के साथ एक अलग साधना में लगा है। हो गया; कहानी खत्म। तांत्रिक को मौका मिल गया है, और वह अपनी साधना करेगा। अगर आप अपनी पत्नी के साथ नहीं करेंगे, वे कहते हैं, तो वह आपके परिवार के साथ करेगा — और उसके बाद आप रोते रहिए।
तपोबल और प्रभाव का क्या संबंध है?
जितना कम तपोबल, उतना कम प्रभाव
वक्ता बार-बार कहते हैं कि हज़ार-दो हज़ार से कुछ नहीं होगा। जिस भी बात में आप प्रोत्साहित हों, जितना कम तपोबल बचेगा, उसका प्रभाव उतना ही कम होगा।
अगर आप खुद को प्रोत्साहित करते रहें, तो हज़ार-दो हज़ार से कुछ नहीं होगा, वक्ता कहते हैं — वे बार-बार कह रहे हैं। जिस भी बात में आप प्रोत्साहित होते हैं, जितना कम तपोबल बचता है, उसका प्रभाव उतना ही कम होगा।
हमेशा आराम खोजते रहे तो आराम एक दिन वही चीज़ें छीन लेगा जो आराम देती हैं
आराम एक दिन आराम देने वाली चीज़ें छीन लेगा
वक्ता कहते हैं कि आलस्य और आराम छोड़कर साधना के मार्ग पर बने रहिए; अधिक से अधिक कीजिए, और चीज़ों का प्रभाव मिलेगा। अगर आप हमेशा कम्फर्ट ज़ोन खोजते रहेंगे, तो कम्फर्ट ज़ोन एक दिन आपको ऐसा आराम देगा कि जिन चीज़ों से आपको आराम मिलता है वही आपके पास नहीं रहेंगी।
आलस्य और आराम पीछे छोड़कर, वक्ता कहते हैं, साधना के मार्ग पर बने रहिए; अधिक से अधिक कीजिए, और आपको चीज़ों का प्रभाव मिलेगा। अगर आप कम्फर्ट ज़ोन ही खोजते रहेंगे, तो कम्फर्ट ज़ोन एक दिन आपको ऐसा आराम देगा कि जिन चीज़ों से आपको आराम मिलता है, वही आपके पास नहीं रहेंगी।
संदेश आते हैं कि हज़ार जप के बल पर प्रयोग कैसे करें
हज़ार जप के बाद प्रयोग माँगते संदेश
वक्ता कहते हैं, याद रखिए उन लोगों को जो हज़ार-दो हज़ार में सिद्धि कर रहे हैं। लोग संदेश भेजते हैं कि हमने हज़ार जप किया है, प्रयोग कैसे करें — उन्हीं से वे कह रहे हैं। वे जोड़ते हैं कि बहुत सोच-समझकर बोलना पड़ता है, वरना लोग तुरंत किसी से जोड़ देंगे कि इसे कहा, उसे कहा; अपनी बुद्धि और विवेक से काम लीजिए।
याद रखिए, वक्ता कहते हैं, उन लोगों के बारे में जो हज़ार-दो हज़ार में सिद्धि कर रहे हैं। वे संदेश भेजते हैं कि भैया, हमने हज़ार जप किया है, प्रयोग कैसे होगा? उन्हीं से वे कह रहे हैं। बहुत सोच-समझकर बोलना पड़ता है, वे कहते हैं, वरना लोग तुरंत किसी से जोड़ देंगे — कि इसे कहा, उसे कहा। हमें इसे-उसे कहने की क्या ज़रूरत? आप खुद समझदार हैं, वे कहते हैं; अपनी बुद्धि और विवेक से सोचिए।
जब जप करने वाला अकेला सदस्य कहीं और व्यस्त हो जाए, तो परिवार के लिए कोई ऊर्जा नहीं बचती
जप करने वाला कहीं और उलझ जाए तो कुछ नहीं बचता
वक्ता कहते हैं कि जब परिवार के भीतर के सदस्य तैयार ही नहीं हैं, और जो एक सदस्य जप-तप करता था वह किसी कारण से अब कहीं और उलझ गया है — तो आपकी रक्षा के लिए, परिवार के लिए वहाँ कौन सी ऊर्जा बची? रक्षा कहाँ से आएगी?
तो जब परिवार के भीतर के सदस्य तैयार ही नहीं हैं, वक्ता कहते हैं, और जो एक सदस्य जप और तप करता था, वह अब किसी भी कारण से कहीं और उलझ गया है — तो आपकी रक्षा के लिए, परिवार के लिए, वहाँ कौन सी ऊर्जा बची है? रक्षा और सुरक्षा कहाँ से आएगी?
मेरे खाने से तुम्हारा पेट नहीं भरता — शिकायत करने वाले सदस्य को खुद माला उठानी होगी
मेरे खाने से तुम्हारा पेट नहीं भरता — खुद माला उठाओ
वक्ता कहते हैं कि अपने साथ अपने परिवार को भी खड़ा करना सीखिए। परिवार के सदस्यों पर चोट पड़ती है तो वे रोने लगते हैं कि मेरे साथ यह हो गया, और जब सब ठीक चलता है तो उन्हें देवी-देवताओं से कोई मतलब नहीं। जब ऐसे लोग कहें कि हम इतनी पूजा करते थे, हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ — तो, वे कहते हैं, उन्हें दो थप्पड़ लगाइए और कहिए: हम खाना खाते हैं; तुम खाना बंद करो, और देखो मेरे खाने से तुम्हें कितनी ताकत मिलती है। अपनी रक्षा चाहिए तो खुद माला लेकर बैठो और करो।
अपने साथ अपने परिवार को खड़ा करना सीखिए, वक्ता कहते हैं। परिवार के लोगों पर जब चोट पड़ती है, तो वे रोने लगते हैं कि मेरे साथ यह हो गया; और जब उनका सब ठीक चल रहा होता है तो उन्हें देवी-देवताओं से कोई मतलब नहीं। जब ऐसे लोग कहें कि हम इतनी पूजा करते थे, हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ — तो उन्हें दो थप्पड़ लगाइए और कहिए: खाना हम खाते हैं; तुम अपना खाना बंद करो, और देखो मेरे खाने से तुम्हें कितनी ताकत मिलती है। अगर अपनी रक्षा चाहिए, तो खुद माला लेकर बैठो और करो। तुम्हें पीने से फुर्सत नहीं, लड़कियों के पीछे भागने से फुर्सत नहीं।
जो पुरुष माँ-बहनों से अपने कपड़े धुलवाते हैं, वे अंत में लक्ष्मीहीन होते हैं, अभी कितने भी धनी हों
ऐसे पुरुष अंत में लक्ष्मीहीन, अभी कितने भी धनी हों
वक्ता कहते हैं कि वे बहुतों को इस हालत में देखते हैं, बहनों से कपड़े धुलवाते हुए जबकि माताएँ कपड़े धोती हैं; और कुछ इतने नीच स्वभाव के हैं कि अपने अंतःवस्त्र तक बहनों से धुलवाते हैं। ऐसे कुकर्म करने वाले लोग, वे कहते हैं, म्लेच्छों जैसे हैं, और एक दिन वे लक्ष्मी से रहित रह जाते हैं, अभी कितने भी धनी हों।
वे अमीर साहब बन गए हैं, वक्ता कहते हैं; वे बहुत से ऐसे लोग देखते हैं जिनकी हालत यह है कि वे अपनी बहनों से कपड़े धुलवाते हैं, और माताएँ कपड़े धोती हैं। जब वे यह सुनते-देखते हैं, वे कहते हैं, तो उनका मन करता है कि उन्हें इतना पीटें कि शरीर का रंग उतर जाए — गोरे से काला और काले से फिर गोरा होने तक पीटें; जो भी रंग हो, दो थप्पड़ ज़रूर खिलाए जाएँ। उनका मन इतना खराब हो जाता है। कुछ लोग इतने नीच स्वभाव के हैं कि अपने अंतःवस्त्र तक अपनी बहनों से धुलवाते हैं। ऐसे कुकर्म करने वाले लोग म्लेच्छों जैसे हैं, वे कहते हैं, और एक दिन वे लक्ष्मी से रहित रह जाते हैं — अभी वे कितने भी धनी हों।
बच्चे को किस उम्र से अपने कपड़े खुद धोने चाहिए?
आठ-नौ साल से, और यह केवल लड़की का कर्तव्य नहीं
वक्ता कहते हैं कि जब बच्चा आठ-नौ साल का हो जाए, तो उसे अपने कपड़े खुद धोना पूरी तरह सिखाइए। यह केवल लड़कियों का कर्तव्य नहीं कि लड़की है तो सब धोएगी, बहन धोएगी — भाई धोएगा, भाई अपने धोएगा, और बहन अपने करेगी।
जब बच्चा आठ साल का, नौ साल का हो जाए, तो उसे अपने कपड़े खुद धोना पूरी तरह सिखाइए, वक्ता कहते हैं। यह केवल लड़कियों का कर्तव्य नहीं — कि लड़की है इसलिए सब धोएगी, कि बहन धोएगी। भाई धोएगा; भाई अपने धोएगा; और बहन अपने करेगी।
किसी को दूसरे के अंतःवस्त्र नहीं धोने चाहिए, मशीन हो या न हो
कोई दूसरे के न धोए, मशीन हो या न हो
वक्ता मानते हैं कि अगर आप अपने कपड़े खुद नहीं धोते और आपकी माँ धो रही है — वॉशिंग मशीन अलग बात है — पर हाथ से जो धुलता है, और वॉशिंग मशीन में भी, किसी को दूसरे के अंतःवस्त्र नहीं धोने चाहिए। हर कोई अपने हाथ से अपने धोए और अपनी चीज़ें रखे।
अगर आप अपने कपड़े खुद नहीं धोते, और आपकी माँ उन्हें धो रही है — जहाँ वॉशिंग मशीन है, वक्ता कहते हैं, वह अलग बात है, ठीक है। पर हाथ से धोने की बात — और वॉशिंग मशीन में भी, किसी को दूसरे के अंतःवस्त्र नहीं धोने चाहिए। हर कोई अपने हाथ से अपने धोए, और अपनी चीज़ें रखे। ये ऐसी चीज़ें हैं, वे कहते हैं, जिनसे आपका विनाश तय होता है।
जिस माँ की सेवा करनी चाहिए उससे सेवा लेने पर दोष लगता है जिसे भारी रूप से भुगतना पड़ता है
जिस माँ की सेवा करनी चाहिए उससे सेवा लेना
वक्ता कहते हैं कि ऐसा दोष लगता है: कभी समझिए कि आप क्या कर रहे हैं, बहन से करवाकर किस स्तर का नीच काम कर रहे हैं। इसे भारी रूप से भुगतना पड़ता है। आप माँ से अपने कपड़े धुलवा रहे हैं — जहाँ आपको उनकी सेवा करनी चाहिए, उसकी जगह आप उनसे सेवा ले रहे हैं। क्या कभी शर्म नहीं आती? और आप आशा रखते हैं कि हमारा कल्याण हो: कल्याण कहाँ से होगा?
ऐसा दोष लगता है, वक्ता कहते हैं। कभी तो समझिए कि आप क्या कर रहे हैं, किस स्तर का इतना नीच काम कर रहे हैं, और अपनी बहन से करवा रहे हैं। इसे भारी रूप से भुगतना पड़ता है। आप अपनी माँ से अपने कपड़े धुलवा रहे हैं। जहाँ आपको उनकी सेवा करनी चाहिए, उसकी जगह आप उनसे सेवा ले रहे हैं। क्या कभी शर्म नहीं आती? और आप आशा रखते हैं कि हमारा कल्याण हो। कल्याण कहाँ से होगा? आपको कुत्ते-बिल्ली को शौच कराने ले जाने की फुर्सत है, पर अपने कपड़े धोने की फुर्सत नहीं — इससे बड़ी विडंबना क्या होगी, वे पूछते हैं। तो आपका भुगतना बिल्कुल ठीक है; भुगतते रहिए।
सुधार की आशा से पहले क्या होना चाहिए?
पहले अपना जीवन सुधारिए
वक्ता कहते हैं कि पहले अपने जीवन में सुधार कीजिए। तभी उन चीज़ों के सचमुच होने की कुछ संभावना बनेगी जिनकी आप अपने जीवन में आशा करते हैं — कि यह अच्छा हो जाए, वह अच्छा हो जाए।
पहले अपने जीवन में सुधार कीजिए, वक्ता कहते हैं। तभी उसके होने की कुछ संभावना बनने लगेगी जिसकी आप अपने जीवन में आशा करते हैं: कि यह अच्छा हो जाए, वह अच्छा हो जाए। धन में या दरिद्रता में आप जितना बिगाड़ते हैं, उतनी ही चोट खाते हैं; और फिर दया की गुहार लगाते हैं — और उस रोने का किसी पर कोई असर नहीं होगा।
वे आपके अच्छे समय में पुकार रहे थे, और तब आपने इसे कोई महत्व नहीं दिया
वे तब पुकार रहे थे, और आपने उन्हें नहीं देखा
वक्ता कहते हैं: क्यों? क्योंकि जब समय अच्छा था, जब आप धन-धान्य से भरे थे, जब आपकी कुल परंपरा और परिवार में सब ठीक चल रहा था — ठीक उसी समय आपने इन चीज़ों को कोई महत्व नहीं दिया। उस समय ये लोग पुकार रहे थे: हमारी भी सुध लो, हम भी भूखे-प्यासे हैं, तुम्हारा कर्तव्य हमारे प्रति भी है। उस समय आपको दिखा नहीं। जब आपका वह कर्म पूरा हुआ और वह दौर बीता, अब आप भुगत रहे हैं।
क्यों, वक्ता पूछते हैं। क्योंकि जब समय अच्छा था, जब आप धन-धान्य से भरे थे, जब आपकी कुल परंपरा में और आपके परिवार में, आपके साथ, सब ठीक रहा होगा — ठीक उसी समय आपने इन चीज़ों को कोई महत्व नहीं दिया। उस समय ये लोग पुकार रहे थे: हमारी भी सुध लो, हम भी भूखे-प्यासे हैं, तुम्हारा कर्तव्य हमारे प्रति भी है। उस समय आपको दिखा नहीं। जब आपका वह कर्म पूरा हुआ और वह दौर गया, अब आप भुगत रहे हैं।
कोई व्यक्ति अभी तुरंत अपने पितरों की सहायता करने में समर्थ क्यों नहीं बन सकता?
पूजा पितरों तक ठीक से पहुँचने से पहले सूक्ष्म शरीर शुभ्र होना चाहिए
वक्ता कहते हैं कि पहली बात यह कि यह संभव ही नहीं होगा — क्योंकि जब तक आपका सूक्ष्म शरीर पूरी तरह शुभ्र नहीं होता, आपकी की हुई पूजा उन तक ठीक से पहुँचेगी ही नहीं। उसके शुभ्र होने के लिए आपका प्रारब्ध कटना चाहिए। प्रारब्ध कटेगा तो तपोबल बढ़ेगा, सूक्ष्म शरीर शुभ्र होगा, आप समर्थ बनेंगे; फिर जब आप न्यास पद्धति और प्रक्रिया करेंगे तो देव-स्वरूप बनेंगे, और तब वे पुष्ट होने लगेंगे और आपका कल्याण करने लगेंगे।
अभी समर्थ बनकर भी, आप कहाँ से समर्थ होंगे, वक्ता पूछते हैं। पहली बात यह कि यह संभव ही नहीं होगा। क्योंकि जब तक आपका सूक्ष्म शरीर पूरी तरह शुभ्र नहीं होता, आपकी की हुई पूजा उन तक ठीक से पहुँचेगी ही नहीं। और उसके शुभ्र होने के लिए आपके प्रारब्ध का कटना ज़रूरी है। जब प्रारब्ध कटेगा, तो तपोबल बढ़ेगा; सूक्ष्म शरीर शुभ्र होगा; आप सामर्थ्य से युक्त बनेंगे। फिर जब आप न्यास पद्धति और प्रक्रिया करेंगे, तो आप देव-स्वरूप बनेंगे; तब वे पुष्ट होने लगेंगे, और तब वे आपका कल्याण करने लगेंगे। पर इतने के लिए समय किसके पास है, वे पूछते हैं — अब तो एक रात में माचिस जलाते ही दस महाविद्याएँ प्रकट हो जाती हैं, और दस महाविद्याओं ने कल्याण कर दिया, जय हो।
जिसने सच में पूजा की है वह तृप्त रहता है और कभी नहीं कह सकता कि कुछ नहीं मिला
जिसने सच में पूजा की वह तृप्त रहता है और ऐसा नहीं कह सकता
वक्ता कहते हैं कि जो कोई कहता है कि हमने इतने साल पूजा की और हमारा कुछ नहीं हुआ — सच में जानिए कि उसने कभी पूजा की ही नहीं। जिसने पूजा की है वह तृप्त रहेगा। वह कभी नहीं कह सकता कि हमने पाँच साल या दस साल सेवा-पूजा की और कुछ नहीं पाया। आप अभी जो कर रहे हैं उसमें भौतिक धन से परे एक संतोष है: आपके किए दीपदान में, आपके किए हवन में।
जो भी व्यक्ति यह बात कहता है — कि हमने इतने साल पूजा की और हमारा कुछ नहीं हुआ — तो वास्तव में जानिए, वक्ता कहते हैं, कि उसने पूजा की ही नहीं। जिस व्यक्ति ने सचमुच पूजा की है, वह तृप्त रहेगा। वह कभी नहीं कह सकता कि हमने पाँच साल, दस साल सेवा-पूजा की और कुछ नहीं पाया। आप लोग अभी जो कर रहे हैं उसमें भौतिक धन से परे एक तृप्ति है — आप लोग जो दीपदान करते हैं उसमें, आप लोग जो हवन करते हैं उसमें।
घंटी हिलाना और अगरबत्ती जलाकर हनुमान चालीसा पढ़ना ही पूजा कहलाता है
घंटी बजाना और अगरबत्ती के साथ हनुमान चालीसा पढ़ना
वक्ता पूछते हैं कि उन्होंने कैसी पूजा की होगी — घंटी हिलाने की पूजा; अगरबत्ती जलाकर हनुमान चालीसा पढ़ने की पूजा। इसी को ये लोग पूजा का नाम देते हैं: हनुमान चालीसा पढ़कर और घंटी बजाकर बहुत बड़ा एहसान करते हैं, और कहते हैं कि हमने दस साल हनुमान चालीसा पढ़ी और हमारा कुछ नहीं हुआ।
उन्होंने किस तरह की पूजा की होगी, वक्ता पूछते हैं — पता है? छोटी सी घंटी हिलाने की पूजा। अगरबत्ती जलाकर हनुमान चालीसा पढ़ने की पूजा। इसी को ये लोग पूजा का नाम देते हैं। हनुमान चालीसा पढ़कर और घंटी बजाकर वे बहुत बड़ा एहसान करते हैं, और कहते हैं: हमने दस साल हनुमान चालीसा पढ़ी और हमारा कुछ नहीं हुआ। और रात को, वे जोड़ते हैं, लाइट बंद करके दूसरी चीज़ें देखते हैं; उसके बारे में नहीं बोलेंगे। कहाँ से होगा, वे पूछते हैं।
जहाँ सचमुच पूजा और दीपदान हुआ है, वहाँ मन में गलत इरादे उठ ही नहीं सकते
मन में गलत इरादे नहीं उठ सकते
वक्ता कहते हैं कि अगर आपने सचमुच पूजा और सेवा की है, और दीपदान किया है, तो आपके मन में दुर्भावना आएगी ही नहीं। गलत विचार उठ ही नहीं पाएँगे — यहाँ सबसे पहले यही होगा। पर दीपदान का पैसा कहीं और जाना है, इसलिए दीपदान नहीं होगा।
अगर आपने सचमुच पूजा और सेवा की है, और अगर आपने दीपदान किया है, वक्ता कहते हैं, तो आपके मन में दुर्भावना आएगी ही नहीं। गलत विचार आ ही नहीं पाएँगे। यहाँ सबसे पहले यही होगा। पर जो पैसा दीपदान में जाता, वह कहीं और जाना है, इसलिए दीपदान नहीं होगा।
रोज़ दस माला के एक हफ़्ते बाद, आठवें दिन तक मंत्र हर पल भीतर चलने लगता है
आठवें दिन तक मंत्र हर पल भीतर चलता है
वक्ता कहते हैं कि अगर आप एक हफ़्ता भी रोज़ दस माला मंत्रों का जप करें, तो आठवें दिन आपकी हालत ऐसी हो जाएगी कि आपका वह मंत्र हर पल आपके भीतर चलने लगेगा। वह आपको पूर्ण शांति में आनंद देने लगेगा। कोई गलत विचार आने से पहले आपके ध्यान में आ जाएगा कि हमने मंत्र का जप किया है, और यह मंत्र चल रहा है।
अगर आप मंत्रों का जप करें — अगर एक हफ़्ता भी आपने रोज़ दस माला जप किया है — तो आठवें दिन आपकी हालत ऐसी हो जाएगी कि आपका वह मंत्र हर पल आपके भीतर चलने लगेगा, वक्ता कहते हैं। वह आपको पूर्ण शांति में आनंद देने लगेगा। कोई भी गलत विचार आने से पहले ही आपके ध्यान में आ जाएगा कि हमने मंत्र का जप किया है, और यह मंत्र चल रहा है।
भीतर बैठी एक शक्ति, जगदंबा का एक रूप, हर विचार को बनते हुए देख रही है
भीतर बैठी शक्ति, जगदंबा का एक रूप, देख रही है
वक्ता कहते हैं कि आप कहीं न कहीं देखेंगे कि यह देख रही है। हमारे अपने मन के भीतर एक और शक्ति भी बैठी है; यह जगदंबा का एक रूप है, और यहाँ हम ऐसा विचार करने वाले हैं — यह नहीं करना चाहिए। वह जागरूकता रहेगी।
कहीं न कहीं आप देखेंगे, वक्ता कहते हैं, कि यह देख रही है। हमारे अपने मन के भीतर एक और शक्ति भी बैठी है; यह जगदंबा का एक रूप है, और यहाँ हम ऐसा विचार करने वाले हैं — यह नहीं करना चाहिए। वह जागरूकता रहेगी।
जो भी आए, उसमें कौन संतुष्ट रहता है?
जो पुरश्चरण, हवन, तर्पण, मार्जन और सेवा करता है
वक्ता कहते हैं कि जो बार-बार मंत्रों का पुरश्चरण करते हैं, हवन, तर्पण और मार्जन करते हैं, पंचबलि में गौ सेवा करते हैं, माता-पिता की सेवा करते हैं, पौधों की सेवा करते हैं — उनका हृदय और आत्मा दोनों तृप्त रहेंगे। उन्हें कुछ मिले या न मिले, कोई चार बार गाली देकर चला जाए तो भी वे संतोष में रहेंगे; उनके मन, हृदय या आँखों में कोई बेचैनी नहीं होगी, और मंत्र के सामर्थ्य से वे शांत हो जाएँगे।
पर जहाँ किसी ने कुछ किया ही नहीं, और नकली पूजा करके उसे एहसान की तरह दिखाता है — हमने इतना किया था, यह हुआ, ऐसा क्यों हुआ — ऐसे ही लोग ऐसा बोलेंगे, वक्ता कहते हैं। जो हवन करके तृप्त करता है; जो बार-बार मंत्रों का पुरश्चरण करता है, जो हवन, तर्पण और मार्जन करता है; जो पंचबलि में गौ सेवा करता है, जो माता-पिता की सेवा करता है, जो पौधों की सेवा करता है — उसका हृदय और उसकी आत्मा दोनों तृप्त रहेंगे। उसे कुछ मिले या न मिले, कोई चार बार गाली देकर चला जाए तो भी वह तृप्ति में रहेगा। उसके मन में, उसके हृदय में या उसकी आँखों में कोई बेचैनी नहीं होगी; मंत्र के सामर्थ्य से वह शांत हो जाएगा।
यहाँ शांत का अर्थ है भीतर लावा और बाहर स्थिरता, कायरता या मीठापन नहीं
कायर या मीठा नहीं — भीतर लावा, बाहर शांत
वक्ता कहते हैं कि शांत का अर्थ यह नहीं कि वह कायर बन जाएगा और मीठा हो जाएगा। सामर्थ्यवान शांत रहेगा: उसके भीतर उथल-पुथल है, पर वह शांत है; ज़रूरत पड़ने पर ज्वाला फूटने को तैयार है। भीतर आग है, पूरा लावा है। यही, वे कहते हैं, मंत्रों का सामर्थ्य और क्षमता है।
शांत का अर्थ यह नहीं कि वह कायर बन जाएगा और मीठा बन जाएगा, वक्ता कहते हैं। सामर्थ्य से युक्त व्यक्ति शांत रहेगा। उसके भीतर उथल-पुथल है, पर वह शांत है। ज़रूरत पड़ने पर ज्वाला बाहर फूटने को तैयार है। भीतर आग है, पूरा का पूरा लावा है। यही मंत्रों का सामर्थ्य और क्षमता है।
दस साल बिना भौतिक लाभ के भी ऐसा साधक जानता है कि उसके भीतर किस स्तर की उपलब्धि है
उस सामर्थ्य का साधक भौतिक लाभ के बिना भी अपने भीतर की उपलब्धि का स्तर जानता है
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी कारण, दस साल बाद भी उसे कोई भौतिक उपलब्धि न मिले, तो भी वह जानता है कि उसके भीतर किस स्तर की उपलब्धि है।
और ठीक इसी कारण, वक्ता कहते हैं, दस साल बाद भी उसे कोई भौतिक उपलब्धि न मिले, तो भी वह जानता है कि उसके भीतर किस स्तर की उपलब्धि है।
बहुत से साधक अपना तपोबल कभी खर्च नहीं करते, संकल्प लेकर उसे खर्च करने से मना करते हैं
वे संकल्प लेकर उसे खर्च करने से मना करते हैं
वक्ता कहते हैं कि कई बार लोग अपना तपोबल खर्च ही नहीं करते — इस क्षेत्र में जाने पर आपको ऐसे बहुत उदाहरण मिलेंगे। वे चाहते तो अपने तपोबल से बहुत कुछ कर सकते थे, पर वे संकल्प लेकर तपोबल खर्च ही नहीं करते। वे कहते हैं: वे दें या न दें, उनकी इच्छा; हम तो बस यही करेंगे।
कई बार लोग अपना तपोबल खर्च ही नहीं करते, वक्ता कहते हैं। इस क्षेत्र में प्रवेश करने पर आपको ऐसे बहुत उदाहरण मिलेंगे। वे चाहते तो अपने तपोबल से बहुत कुछ कर सकते थे — पर वे संकल्प लेकर तपोबल खर्च ही नहीं करते। वे कहते हैं: वे दें या न दें, यह उनकी इच्छा है; हम तो बस यही करेंगे। वे आशा करते हैं कि विषय अच्छे से समझा जाएगा और आगे बढ़ाया जाएगा।
अच्छी पत्नी के लिए साधना पूरी तरह उचित है, और देवी प्रणव लगाना सही है
अच्छी पत्नी के लिए करना, और देवी प्रणव जोड़ना
एक श्रोता का कमेंट पढ़ते हुए वक्ता कहते हैं: बिल्कुल कीजिए भाई, अच्छी पत्नी के लिए — इसमें कोई दिक्कत नहीं। और दूसरे से कहते हैं कि देवी प्रणव लगाना सही है जैसा उन्होंने कहा; वैसे किया जा सकता है।
कमेंट का जवाब देते हुए वक्ता एक श्रोता को अच्छी पत्नी के लिए यह करने के बारे में कहते हैं: बिल्कुल कीजिए भाई, अच्छी पत्नी के लिए। इसमें कोई दिक्कत नहीं। और देवी प्रणव के बारे में वे श्रोता से कहते हैं कि उसे लगाने में वे सही कह रहे हैं — वैसे किया जा सकता है।
जब चंडी चलती हैं, तो उनके वेग के सामने कुछ टिक नहीं पाता
जब चंडी चलती हैं, उनके वेग के सामने कुछ नहीं टिकता
वक्ता कहते हैं कि जब चंडी चलती हैं, तो फिर उनके वेग के सामने कोई टिक नहीं पाता। वह लाइए; वह वेग लाइए। यह नाटकीय खेल खेलने से कुछ नहीं होगा — जो दरबार लगाकर वह सारा नाटक करना चाहते हैं वे यह चैनल छोड़ दें; वे उनसे बात नहीं करेंगे।
जब चंडी चलती हैं, वक्ता कहते हैं, तो उनके वेग के सामने कोई नहीं टिक पाता। वह लाइए। वह वेग लाइए। आपके इस नाटकीय खेल से कुछ नहीं होगा। जो दरबार लगाकर वह सारा नाटक करना चाहते हैं — वे यह चैनल छोड़ दें, वे कहते हैं; हम उनसे बात नहीं करेंगे।
अपने भीतर चंडी को वास्तव में कैसे बुलाया जाता है?
अधिक जप, दीक्षा, न्यास विधि — या अधिकृत मंत्र
वक्ता कहते हैं कि अगर आप सचमुच अपने भीतर चंडी को बुलाना चाहते हैं, तो मंत्रों का सामर्थ्य समझिए: अधिक से अधिक जप कीजिए, दीक्षित होइए, न्यास विधि सीखकर कीजिए। और अगर कोई गुरु न मिले, तो अधिकृत मंत्रों — जयंती मंगला आदि, सप्ताक्षरी, पंचाक्षरी — को बार-बार करके अपने शरीर को पूरी तरह देवमय बनाइए।
अगर वास्तव में आप अपने भीतर चंडी को बुलाना चाहते हैं, वक्ता कहते हैं, तो मंत्रों का सामर्थ्य समझिए। अधिक से अधिक जप कीजिए; दीक्षित होइए; न्यास विधि आदि सीखिए, और कीजिए। और अगर कोई गुरु न मिले, तो अधिकृत मंत्र लीजिए — जयंती मंगला आदि, सप्ताक्षरी, पंचाक्षरी — और उन्हें बार-बार करके अपने शरीर को पूरी तरह देवमय बनाइए।
शरीर देवमय बनाया जाता है ताकि ज़रूरत के दिन जो भी देवता पास हों वे आकर उपस्थित हो सकें
ज़रूरत के दिन पास के कोई भी देवता आकर उपस्थित हो सकें
वक्ता कहते हैं कि ताकि जिस दिन ज़रूरत पड़े, पास में जो भी देवता उपस्थित हों वे आ सकें। अगर भैरव को आपके शरीर में उपस्थित होना है, तो हो; अगर नरसिंह को आपके शरीर में आना है, तो वे आएँ और ऐसे विधर्मियों को फाड़ें। वह सामर्थ्य, वे कहते हैं, केवल मंत्र की ऊर्जा ही आपमें बनाएगी।
बचना आपको नहीं चाहिए — भीतर का सामर्थ्य इसे अनावश्यक बना दे
बचने वाले आप नहीं होने चाहिए
एक कमेंट पढ़ते हुए कि म्लेच्छों से बचने के लिए हमें कवच करने की ज़रूरत नहीं, वक्ता कहते हैं: आज से एक बात याद रखिए। बचना किससे? आपके भीतर का सामर्थ्य ऐसा होना चाहिए कि उन्हें आपसे बचना पड़े।
हमारे पंडित जी कहते हैं कि म्लेच्छों से बचने के लिए हमें कवच नहीं करना है, वक्ता पढ़कर सुनाते हैं। एक बात और, और आज से सब इसे याद रखिए, वे कहते हैं। बचना किससे? आपके भीतर का सामर्थ्य इतना होना चाहिए कि उन्हें आपसे बचना पड़े।
कामाख्या कवच का कितना पुरश्चरण बताया गया है?
जब तक शरीर में दस महाविद्याओं की उपस्थिति पूर्ण न हो
वक्ता कहते हैं कि उस समय चंडिका आपके भीतर प्रकट हों। कामाख्या कवच का इतना पुरश्चरण कीजिए, इतना पुरश्चरण, कि आपके शरीर में सूक्ष्म रूप में जो दस महाविद्याओं की उपस्थिति है वह पूर्ण हो जाए। जिस दिन कोई म्लेच्छ आपको नुकसान पहुँचाने की नीयत से खड़ा हो, उसी क्षण चंडिका आपके भीतर प्रकट हों — वह आपको देखकर काँपे, आपको देखकर स्तंभित हो जाए।
उस समय चंडिका आपके भीतर प्रकट हों, वक्ता कहते हैं। कामाख्या कवच का इतना पुरश्चरण कीजिए, इतना पुरश्चरण, कि आपके शरीर में सूक्ष्म रूप में जो दस महाविद्याओं की उपस्थिति है, वह पूरी तरह हो जाए। जिस दिन कोई म्लेच्छ इस नीयत से खड़ा हो कि इसका नुकसान करना है, उसी क्षण चंडिका आपके भीतर प्रकट हों। वह आपको देखकर काँपे। वह आपको देखकर स्तंभित हो जाए।
बगला प्रत्यंगिरा के पाठ में लिखा है कि वह वायु तक को स्तंभित करने का सामर्थ्य देता है
पाठ करने वाला वायु तक को स्तंभित करने का सामर्थ्य पाता है
वक्ता कहते हैं कि बगला प्रत्यंगिरा में लिखा है कि जो इसका पाठ करता है वह वायु को भी स्तंभित करने का सामर्थ्य पा लेता है। पर अगर आप सीधे करने लगे तो दिक्कत होगी — इसीलिए, वे कहते हैं, वे लोगों से कहते हैं कि पहले उस स्तर के योग्य बनिए, फिर देवी-देवता स्वयं रास्ता बनाएँगे।
बगला महाप्रत्यंगिरा में लिखा है, वक्ता कहते हैं, कि जो इसका पाठ करता है वह वायु को भी स्तंभित करने का सामर्थ्य पा लेता है। पर अगर आप सीधे करने लगें, तो दिक्कत होगी। इसीलिए वे कहते हैं: पहले उस स्तर के योग्य बनिए, और फिर देवी-देवता स्वयं रास्ता बनाएँगे।
इस बीच पंचाक्षरी जप चलता रहे, उसकी पूरी विधि एक अलग वीडियो में है
पंचाक्षरी करते रहिए — पूरी विधि अलग वीडियो में
वक्ता कहते हैं कि पंचाक्षरी का जप करते रहिए। आपको कुछ नहीं मिल रहा — पंचाक्षरी कीजिए। पंचाक्षरी का पूरा विधिवत विषय चैनल पर कई बार बताया जा चुका है; उसका अलग वीडियो है, छोटा वीडियो और पूरा वीडियो, सब कुछ। कीजिए।
पंचाक्षरी का जप करते रहिए, वक्ता कहते हैं। आपको कुछ नहीं मिल रहा — पंचाक्षरी कीजिए। विधि के अनुसार पंचाक्षरी की पूरी बात चैनल पर कई बार बताई जा चुकी है; उसके लिए अलग वीडियो है। उसका छोटा वीडियो, उसका पूरा वीडियो, सब कुछ है। कीजिए।
प्रयोगात्मक पक्ष और महाविद्या स्वरूप कब अपनाए जा सकते हैं?
योग्य बनने के बाद, जब भगवती रास्ता दें, और दीक्षा के बाद
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद, जब आप योग्य बन जाएँ और भगवती आपको रास्ता दें, तो अगर आप वह भी करते रहें तो बहुत कुछ होगा। फिर दीक्षित होकर प्रयोगात्मक चीज़ें और महाविद्या के स्वरूप कीजिए। होगा; ज़रूर होगा; सब कुछ होगा — इसे मानिए, वे कहते हैं।
और उसके बाद, जब आप योग्य बन जाएँ, जब भगवती आपको रास्ता दें — अगर आप वह भी करते रहें, तो बहुत कुछ होगा, वक्ता कहते हैं। फिर दीक्षित होकर प्रयोगात्मक चीज़ें, महाविद्याओं के स्वरूप कीजिए। होगा; ज़रूर होगा; सब कुछ होगा। इसे मानिए, वे कहते हैं।
बचने की ज़रूरत उसे पड़ेगी, आपको नहीं
आपको बचने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी
वक्ता कहते हैं कि ज़रूरत आपको नहीं पड़ेगी: जब आप इस प्रकार की साधना करेंगे, तो बचने की ज़रूरत उसे पड़ेगी — इसे तय मानिए। आपको नहीं बचना; आपने यह कैसे कह दिया कि आपको बचना है? आपके भीतर का सामर्थ्य ऐसा होगा कि आपको देखकर उसकी पैंट गीली हो जाएगी। फिर वे यह कहकर समाप्त करते हैं कि फिर मिलेंगे।
ज़रूरत आपको नहीं पड़ेगी, वक्ता कहते हैं: जब आप इस प्रकार की साधना करेंगे, तो बचने की ज़रूरत उसे पड़ेगी — इसे तय मानिए। आपको नहीं बचना। आपने यह कैसे कह दिया कि आपको बचना है? आपके भीतर का सामर्थ्य ऐसा होगा कि आपको देखकर उसकी पैंट गीली हो जाएगी। ठीक है, वे कहते हैं — आप सबसे फिर मिलेंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।