नवरात्र और तंत्र प्रयोग — बिना सीखे षट्कर्म मंत्र चलाना आत्मघात क्यों है
नवरात्र से पहले प्रायोगिक मंत्रों के दुरुपयोग की चेतावनी।
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पूरी विधि जाने बिना तांत्रिक विधान करने से क्या होता है?
एक दोष जो आगे चलकर जीवन में दिखता है
वक्ता कहते हैं कि जब हम जीवन में कोई विधान अपनाते हैं — ख़ासकर तंत्र से जुड़ा कोई पौराणिक या तंत्रोक्त मंत्र — और उसका विधि विधान ठीक से नहीं जानते, या उसे बहुत अधिक मात्रा में करते हैं और कोई लाभ नहीं होता, तो उसमें कोई त्रुटि रह जाने पर आगे चलकर हमारे जीवन में किसी न किसी तरह का दोष दिखने लगता है।
वक्ता शुरुआत में कहते हैं कि आज का विषय ज़रूरी है, क्योंकि इस चैनल से जुड़ा हर व्यक्ति या तो ऐसी जानकारी खोज रहा है या किसी न किसी तरह ऐसी बातों से पीड़ित है। पहली बात, वे कहते हैं, यह है: जब हम जीवन में कोई विधान अपना रहे हैं — विशेषकर तंत्र से जुड़ा कोई पौराणिक या तंत्रोक्त मंत्र — और या तो उसका विधि विधान ठीक से नहीं जानते, या उसे बहुत अधिक मात्रा में कर रहे हैं और कोई लाभ नहीं मिल रहा, तो उसमें कोई त्रुटि रह जाए तो आने वाले समय में हमारे जीवन में किसी तरह का दोष दिखने लगता है। वे साफ़ करते हैं कि वे उन विषयों की बात कर रहे हैं जो सीधे षट्कर्म से जुड़े प्रायोगिक मंत्र हैं।
षट्कर्म वाले प्रायोगिक मंत्र कौन से हैं?
कवच के भीतर छिपे षट्कर्म बीज
देवी-देवताओं के बीज मंत्रों के अलावा षट्कर्म के भी बीज मंत्र होते हैं। वक्ता पंचमुखी हनुमान कवच का उदाहरण देते हैं: उसमें एक स्वतंत्र मंत्र आता है जिसका अलग से भी जाप होता है, और कवच के भीतर ही एक मंत्र है जिसमें शत्रु पर मारण प्रयोग के लिए खें खें जैसे बीज लगे हैं, और स्तंभन के लिए स्तंभ स्तंभ के बाद ठः ठः।
बीज मंत्रों को लीजिए, वक्ता कहते हैं। देवी-देवताओं के बीज मंत्रों के अलावा षट्कर्म से जुड़े मंत्र और बीज मंत्र भी होते हैं। हनुमान जी का अपना मंत्र लिखकर देखिए, वे कहते हैं — पंचमुखी हनुमान का मंत्र देखिए। उनका पंचमुखी कवच पढ़ेंगे तो उसमें एक स्वतंत्र मंत्र आएगा, जिसका अलग से भी जाप होता है। कवच के बीच में भी एक मंत्र है जिसमें किसी को मारने के लिए, शत्रु पर मारण प्रयोग आदि के लिए खें खें जैसे बीज लगाए गए हैं। इसी तरह किसी को स्तंभित करने के लिए स्तंभ स्तंभ के बाद ठः ठः लगाया गया है।
ऐसे मंत्र आम लोगों तक कैसे पहुँचते हैं?
बने-बनाए वशीकरण और स्तंभन के नुस्ख़े
महादेव के भूतेश्वर जैसे अनेक तांत्रिक रूपों के ज़रिए, जिनके मंत्र लोग अलग से इस्तेमाल करते हैं। कोई इसे यों फैलाता है: वशीकरण के लिए यह प्रयोग करो, शत्रु बहुत परेशान कर रहे हैं तो यह करो; यह रहा मंत्र, इसमें ये बीज हैं; रात ग्यारह-बारह बजे काली हकीक की माला पर इतना जाप करो और शत्रु स्तंभित हो जाएगा। और व्यक्ति आगे कुछ जाने-सुने बिना उसे कर डालता है।
इसी तरह, वक्ता कहते हैं, महादेव के अनेक तांत्रिक रूपों — भूतेश्वर आदि — के कुछ मंत्र हैं। उन रूपों से जुड़े मंत्र लोग स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल करते हैं। वशीकरण के लिए इस तरह का प्रयोग करो; शत्रु बहुत परेशान कर रहे हैं तो इस तरह का प्रयोग करो। यह मंत्र है, और इसके भीतर इस तरह के बीज मंत्र दिए हैं। और व्यक्ति कुछ जाने-सुने बिना देखता है कि लिखा है काली हकीक माला पर करना है — या किसी ने बता दिया कि काली हकीक की माला पर रात ग्यारह-बारह बजे इतना जाप करो तो शत्रु स्तंभित हो जाएगा — और हम जाकर वह प्रयोग कर देते हैं।
ऐसा प्रयोग करने के दो संभावित परिणाम क्या हैं?
या तो कुछ नहीं, या ऐसी सफलता जो विनाश का अध्याय खोल दे
प्रयोग करने के बाद दो परिणाम होते हैं। या तो हफ़्ते, ग्यारह दिन या जितने दिन की विधि है, उसमें वह सच में पूरा असर दिखा देता है, आपका काम हो जाता है और आप हैरान रह जाते हैं कि मंत्र ने कैसे काम किया। वक्ता कहते हैं, यहाँ आप हैरान तो हुए और यह बहुत अच्छी बात है — पर यहीं से आपके जीवन का दूसरा अध्याय शुरू होता है, जिसमें आगे केवल विनाश लिखा है।
प्रयोग करने के बाद दो परिणाम होते हैं, वक्ता कहते हैं। या तो सात दिन, ग्यारह दिन या विधि में जितने दिन चाहिए, उसमें वह सच में अपना पूरा असर दे देता है, और आप हैरान रह जाते हैं कि मंत्र ने कैसे फल दिया; आपका काम बन गया और आप बहुत खुश हुए। अगर यहाँ मंत्र ने काम किया और आपका शत्रु सच में स्तंभित हो गया, तो आप हैरान हुए — बहुत अच्छी बात। पर यहीं से आपके जीवन का दूसरा अध्याय शुरू होता है, जिसमें आगे केवल और केवल विनाश लिखा है। किसी पूरे विधि विधान को जाने बिना, किसी देवता की पूरी पूजन विधि किए बिना, आपने उनका प्रायोगिक मंत्र सीधे शत्रु पर चला दिया।
यह एके-47 लिए स्वयंभू फ़ौजी है — न चयन, न प्रशिक्षण, न मैदान का अनुभव
एके-47 लिए स्वयंभू फ़ौजी
मतलब न हमारा सेना में चयन हुआ, न हमने तैयारी की, न परीक्षा दी, न प्रशिक्षण मिला, न कोई घोषणा हुई, न मैदान का कोई अनुभव है — बस बंदूक हाथ में आ गई, हमने चलाई, गोली आतंकवादी को लगी और वह मर गया। अब एके-47 हाथ में है और हमें लगता है कि जब भी चलाएँगे, सामने जो आतंकवादी आएगा वह मर जाएगा। आप नहीं जानते कि आप एक अनाड़ी, बिना प्रशिक्षण के, स्वयंभू फ़ौजी बन गए हैं।
वक्ता इसे खोलकर समझाते हैं: न हमारा सेना में चयन हुआ, न हमने उसकी तैयारी की, न कोई परीक्षा दी, न प्रशिक्षण हुआ, न हमारे बारे में कोई घोषणा हुई, न हमें मैदान का कोई अनुभव है। बस बंदूक हाथ में आ गई, हमने चलाई, और गोली सीधे एक आतंकवादी को लगी और वह मर गया। अब एके-47 हमारे हाथ में है और हमें लगता है कि जब भी चलाएँगे, सामने जो आतंकवादी आएगा वह मर जाएगा। आप यह नहीं जानते कि यहाँ आप कहीं न कहीं अनाड़ी, बिना किसी प्रशिक्षण के, स्वयंभू फ़ौजी बन गए हैं। पर दूसरी ओर का आतंकवादी अपनी बहुत सारी तकनीकों और बहुत सारे प्रशिक्षण के साथ आया है। जिस दिन आमना-सामना होगा, या जिस दिन सामने वाला भारी पड़ेगा, आप बंदूक लोड करते रहेंगे, चलाते रहेंगे और वह आपको लिटाकर चला जाएगा। यही होता है, वे कहते हैं — यह एक सटीक उदाहरण आपके सामने रखा है।
ऐसे मंत्र से किसी और की सफलता आपके लिए प्रमाण क्यों नहीं है?
उसका मंत्र चलने के तीन-चार और कारण
क्योंकि उस पहले व्यक्ति के साथ तीन-चार कारण हो सकते हैं जिनसे उसका मंत्र सफल हुआ। मान लीजिए हमारे शत्रु ने हम पर कोई तंत्र प्रयोग किया ही नहीं, पर सामाजिक या निजी रूप से सता रहा है — समाज में उसकी हैसियत है, या कार्यस्थल पर बड़ा प्रभाव है। हो सकता है वह नास्तिक हो जो तंत्र का कोई अभिचार प्रयोग नहीं करता, और उसके अपने जीवन में बुरा समय आ गया हो; आपने तभी प्रयोग किया और सफल हो गए। अँधेरे में चलाया तीर जो निशाने पर लग गया।
अगर कोई आपको बड़े मोटे तौर पर बता रहा है कि उसने एक बार प्रयोग किया और हो गया, और आप उससे प्रेरित होकर ख़ुद करने लगते हैं, तो वक्ता कहते हैं — देखिए, उस पहले व्यक्ति के साथ तीन-चार कारण हो सकते हैं जिनसे उसका मंत्र सफल हुआ। जैसे, मान लीजिए हमारे शत्रु ने हम पर किसी तरह का तंत्र प्रयोग नहीं किया, पर सामाजिक या निजी रूप से वह हमें सता रहा है। समाज में उसकी हैसियत है, या कार्यस्थल पर उसका बहुत प्रभाव है, इसलिए वह हमें परेशान कर पाता है। और हो सकता है वह नास्तिक हो जो तंत्र का कोई अभिचार प्रयोग करता ही नहीं, और उस पर भी बुरा समय आया हुआ था; आपने यहाँ प्रयोग किया और वहाँ सफल हो गए। अँधेरे में चलाया तीर जो निशाने पर लग गया।
अगर सामने वाला सच में अभिचार कर रहा हो तो?
हताशा, और उसमें उठाए गए उग्र बीज
तब आपने षट्कर्म से जुड़े उग्र बीजों वाले मंत्र — स्फ्रें स्फ्रें, ख्रें ख्रें आदि, और ख़ासकर हनुमान जी के, भूतेश्वर महादेव के और भैरव जी के तरह-तरह के तंत्रोक्त मंत्र — बस पढ़कर इस्तेमाल कर लिए। वक्ता कहते हैं आज लोग बहुत हताश हैं; कमेंट इससे भरे पड़े हैं। काम नहीं हो रहा, काम नहीं हो रहा; कोई काम नहीं करेगा, सब धोखेबाज़ और पाखंडी हैं, तो हम ख़ुद करेंगे और सबसे बदला लेंगे।
पर अगर सच में सामने वाला अभिचार प्रयोग कर रहा है, और आपकी ओर से आपने इस तरह के मंत्र इस्तेमाल किए हैं — षट्कर्म के उग्र बीजों वाले, स्फ्रें स्फ्रें, ख्रें ख्रें और ऐसे सब — तो बात अलग है। ख़ासकर, वक्ता कहते हैं, हनुमान जी के मंत्र, भूतेश्वर महादेव के मंत्र, भैरव जी के तरह-तरह के तंत्रोक्त मंत्र, सीधे उठाकर पढ़ डाले। आज लोग बहुत हताश हैं, वे कहते हैं; देखिए कमेंट कैसे आते हैं, लोग हताशा से भरे हैं। काम नहीं हो रहा, काम नहीं हो रहा। कोई काम नहीं करेगा, सब ढोंगी और पाखंडी हैं, तो अब हम ख़ुद करेंगे — सबका बदला लेंगे — और ख़ुद करने बैठ जाते हैं।
बिना लाइसेंस बंदूक उठाना और सीख ठुकराना आत्मघात है
बिना लाइसेंस बंदूक उठाना आत्मघात है
दिक़्क़त सीधी है, वे कहते हैं: हम सीधे एके-47 चलाना चाहते हैं, पर अगर कोई बताए कि बंदूक ऐसे पकड़ो, वैसे नहीं वरना झटके से हाथ-पैर टूट जाएँगे, गोली ऐसे भरी जाती है, थोड़ा अभ्यास करो, प्रशिक्षण लो, विधि विधान मानो और चयनित हो जाओ — तो जवाब में गाली: तुमसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं, तुम पहले दर्जे के ढोंगी, पाखंडी, बेवकूफ़ हो। उसे गाली दो और बंदूक उठा लो। वक्ता कहते हैं बिना लाइसेंस और बिना प्रशिक्षण के बंदूक उठाना आत्मघात के बराबर है, आत्महत्या के बराबर है।
दिक़्क़त कहाँ है, वे पूछते हैं। बस यह कि हम सीधे एके-47 चलाना चाहते हैं। पर अगर कोई कहे, भाई, बंदूक ऐसे पकड़ो, वैसे नहीं वरना झटका लगेगा और हाथ-पैर टूट जाएँगे; देखो, गोली ऐसे भरी जाती है, थोड़ा अभ्यास करो, कुछ प्रशिक्षण लो, ये विधि विधान और तरीक़े हैं, इसमें चयनित हो जाओ — तो: तुमसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं, तुम नंबर एक के ढोंगी, पाखंडी, बेवकूफ़ हो। उसे गाली दो और सीधे बंदूक उठा लो। बहुत बढ़िया काम। इस तरह बंदूक उठाना, बिना लाइसेंस और बिना प्रशिक्षण के, वे कहते हैं, आत्मघात के बराबर है, आत्महत्या के बराबर है। आप अपना ही काम तमाम कर रहे हैं।
जब आपका मंत्र आप पर वार करने वाले को घायल कर दे, उसके बाद क्या होता है?
उसके बाद आने वाला जवाबी प्रयोग
जिसने आप पर अभिचार किया, वह कमज़ोर पड़ गया और आपके मंत्र चार, पाँच, दस या सौ माला में चल गए, तो वह बस घायल हुआ और कुछ समय परेशान रहा। वह उसके पास जाएगा जिससे सीख रहा है या काम करवा रहा है, और बताएगा क्या हुआ; वह तुरंत देख लेगा कि मंत्र चलाया जा रहा है। आप एक बार जीते हैं और इससे बहुत प्रेरित हैं — पर जब उस ओर से उसी हिसाब से प्रयोग शुरू होगा, वक्ता पूछते हैं, तब आपको कौन बचाएगा?
सामने वाला, जिसने आप पर अभिचार किया, अगर कमज़ोर पड़ गया और आपके मंत्र चल गए — दो, चार, पाँच, दस माला में, सौ माला में — तो वह बस घायल हुआ; कुछ समय उसे परेशानी रही। वह उसके पास जाएगा जिससे सीख रहा है, या जिसके ज़रिए काम करवा रहा है, और बताएगा कि क्या हुआ। वह देखेगा और समझ जाएगा: यह आदमी मंत्र चला रहा है। आप एक बार जीत गए और बहुत ज़्यादा प्रेरित हैं, सोचते हैं, वाह, हमने यह कर लिया। पर जब उस ओर से हिसाब लगाकर प्रयोग शुरू होगा, तब आपको कौन बचाएगा? यह सब सुनना बुरा लगता है, वक्ता मानते हैं, और जब वे ऐसे शब्द बोलते हैं तो लोग कहते हैं कि यह उन्हें शोभा नहीं देता। वे जवाब देते हैं कि वे आपके भले के लिए बोल रहे हैं — उन्हें शोभा दे या न दे, छोड़िए; एक दिन आपको शोभा देगा।
नवरात्र और होली के समय क्या करना चाहिए?
अतिरिक्त सावधानी, सुरक्षा, धनागमन और प्रेरणा
वक्ता कहते हैं कि वे बार-बार दोहराते हैं कि नवरात्र और होली के समय ज़रूरत से ज़्यादा सावधान रहना है; अपनी सुरक्षा के लिए विधि करनी है, धनागमन के लिए भी विधि विधान करना है, और साथ में प्रेरित भी रहना है।
जन्म कुंडली का दूसरा भाव किसका है?
वाणी का भाव, और उससे पैदा होने वाले दोष
वक्ता कहते हैं कि जो जन्म कुंडली हम बनाते हैं उसमें बारह भाव होते हैं, और दूसरा भाव वाणी का भाव है। जान लीजिए, वे कहते हैं, कि हमारी वाणी के कारण कई तरह के दोष पैदा होते हैं। अगर दूसरे भाव में राहु हो, दूसरे भाव में कोई स्थिर ग्रह न हो, द्विस्वभाव ग्रह हों, तो कहा जाता है कि यहाँ कठिन स्थिति बनती है।
थोड़ा जन्म कुंडली को देखिए, वक्ता कहते हैं। जब हम जन्म कुंडली बनाते हैं तो उसमें बारह भाव होते हैं, और दूसरा भाव वाणी का भाव है। और जान लीजिए कि हमारी वाणी के कारण कई तरह के दोष पैदा होते हैं। अगर दूसरे भाव में राहु हो; अगर दूसरे भाव में कोई स्थिर ग्रह न हो; अगर द्विस्वभाव ग्रह हों — इनके बारे में भी कहा जाता है कि यहाँ कुछ कठिन स्थिति बनती है। तो इसे कुंडली से, ज्योतिष से समझिए: अगर आप जो मन में आए बोलकर दूसरे भाव को सक्रिय कर रहे हैं।
दूसरा भाव नकारात्मक रूप से कैसे सक्रिय होता है?
वही मुँह जो पाठ करता है, और जो निंदा करता है
मुँह से मंत्र बोला जाता है; उसी मुँह से उस मंत्र के देवता की निंदा होती है; उसी मुँह से आप अपने गुरु और मार्गदर्शक की निंदा करते हैं; उसी मुँह से पौराणिक और तंत्रोक्त ग्रंथों की निंदा करते हैं। सब कुछ मुँह से हो रहा है। किसका भला करें या बुरा, किसे वरदान दें या श्राप, जो भी मंत्र साधना करें, सब इसी जिह्वा और इसी मुँह से होगा — और यह दूसरा भाव आपको अच्छा और बुरा दोनों असर दे सकता है।
मुँह से मंत्र भी बोलना है; उसी मुँह से उस मंत्र के देवता की निंदा होती है; उसी मुँह से आप अपने गुरु और मार्गदर्शक की निंदा करते हैं; उसी मुँह से पौराणिक और तंत्रोक्त ग्रंथों की भी निंदा करते हैं। सब कुछ मुँह से हो रहा है, वक्ता कहते हैं। जिसका भला करें, जिसका बुरा करें, किसे वरदान दें और किसे श्राप, जो भी मंत्र साधना करें — सब इसी जिह्वा से, इसी मुँह से होगा। और यह वाणी, यह मुँह, यह दूसरा भाव आपको अच्छा और बुरा दोनों असर दे सकता है।
जब महीनों के जाप से कोई फल न मिले तो लोग क्या करते हैं?
मंत्र, देवता और मंत्र देने वाले की निंदा
वक्ता यह ढर्रा बताते हैं: आपने किसी देवता के मंत्र की ग्यारह माला कीं, महीना, दो महीने, छह महीने किया, और समय इतना बुरा है कि आप पर कोई असर पड़ ही नहीं रहा। फिर आप बैठकर मंत्र के बारे में, देवता के बारे में, मंत्र बताने वाले के बारे में ग़लत बोलने लगते हैं। हम अपने भीतर झाँकने की कोशिश नहीं करते।
जब आप किसी देवता का मंत्र जाप करते हैं, वक्ता कहते हैं — ग्यारह माला कीं, फिर दिन भर बैठे रहे; महीना, दो महीने, छह महीने किया, और समय बहुत बुरा है, इतना बुरा कि किसी असर से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। और उसके बाद आप क्या करते हैं? कर्म ख़राब होंगे, मेरा सब ख़राब होगा — पर फिर मंत्र का असर क्या है? आप बैठकर मंत्र के बारे में, देवता के बारे में, मंत्र बताने वाले के बारे में ग़लत बोलने लगते हैं। हम अपने भीतर देखने की कोशिश नहीं करते। और भीतर देखकर करेंगे भी क्या? आपका बँधा-बँधाया जवाब यही है: भीतर देख लिया, हम ठीक हैं, हममें कोई कमी नहीं। अगर कमी नहीं, वे पूछते हैं, तो दुख क्यों है? कभी न कभी कमी रही होगी — और अब आप उसे सुधार रहे हैं।
वर्तमान कर्म का आगे के प्रारब्ध से क्या संबंध है?
गर्भ जो जीवन भर की कमी दे जाता है
वक्ता एक गर्भवती स्त्री का उदाहरण लेते हैं जो ठीक से भोजन नहीं करती और अपने गर्भ का ध्यान नहीं रखती: अगर फिर पैदा हुए बच्चे में कोई कमी आ जाए, तो उसे पूरा करने में आपका पूरा जीवन चला जाएगा, और वह कमी बच्चे में जीवन भर रहेगी। इसी तरह, वे कहते हैं, हमारा वर्तमान कर्म इस समय भविष्य का गर्भ बना रहा है — हमारा प्रारब्ध बना रहा है।
अगर कोई गर्भवती स्त्री ठीक से भोजन न करे, खान-पान में लापरवाही करे — जैसे भागवत माहात्म्य के चौथे अध्याय में धुंधली, जिसे वे सुन रहे थे, जिसने कहा कि गर्भ में खाऊँगी तो बच्चे को सँभालना पड़ेगा और मेरा शरीर बिगड़ जाएगा — अगर ऐसी स्त्री खाना-पीना कम करने लगे, अगर कोई स्त्री अपने गर्भ का ठीक से ध्यान न रखे, तो बाद में पैदा हुए बच्चे में कोई कमी आ जाए तो उसे पूरा करने में आपका पूरा जीवन चला जाएगा। वह कमी बच्चे में जीवन भर रहेगी। तो हमारा कर्म भी, वक्ता कहते हैं, कहीं न कहीं भविष्य का गर्भ बना रहा है। हमारा वर्तमान कर्म इस समय भविष्य का गर्भ बना रहा है — हमारा प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। बना रहा है। और जब वह समय आएगा, तो आप उसे दो मिनट वाली मैगी की तरह तुरंत चाहेंगे। वे जोड़ते हैं कि उन्होंने भगवद् गीता के दूसरे अध्याय को पढ़ा और उस पर विचार किया था, और तीसरा और चौथा और भी ज़बरदस्त हैं; दो दिन की भारी बारिश के कारण वे पिछले दिन लाइव नहीं आ पाए थे।
क्या बुरे समय में की गई पूजा व्यर्थ जाती है?
आगे के समय के लिए जमा होता पुण्य
नहीं। वक्ता कहते हैं कि आपका समय जितना संघर्ष से भरा चल रहा है और आप जितनी मेहनत कर रहे हैं, वह उतना ही कभी ख़राब या व्यर्थ नहीं जाएगा। अगर आप सोचते हैं कि जो पूजन-पाठ कर रहे हैं वह बेकार जा रहा है, तो आपसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं: वह अभी जमा हो रहा है, और एक समय आएगा जब बिना कुछ किए आपको लगातार सब मिलेगा। जिस उद्देश्य से संकल्प लेकर आप पूजन, पाठ, जाप और अनुष्ठान कर रहे हैं, वह भी फल देगा।
वक्ता कहते हैं ये बातें उनके लिए हैं जिन्हें बार-बार बताया जाता है: जो लोग लंबे समय से बहुत कुछ कर रहे हैं और जिनका अच्छा समय अब आने वाला है, वे थोड़ा करते हैं और सब ठीक हो जाता है, और मान लेते हैं कि यह अभी किए गए काम से हुआ। आपका समय जितना संघर्ष से भरा चल रहा है, और उसमें आप जितनी मेहनत कर रहे हैं, उतना ही पक्का है कि वह कभी ख़राब नहीं होगा और कभी व्यर्थ नहीं जाएगा। अगर आप सोच रहे हैं कि जो पूजन-पाठ कर रहे हैं वह बेकार जा रहा है, तो आपसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं। वह अभी जमा हो रहा है। एक समय आएगा जब आप कुछ नहीं करेंगे और फिर भी सब आता रहेगा। और जिस उद्देश्य से आपने संकल्प लिया और पूजन-पाठ, मंत्र, जप और अनुष्ठान कर रहे हैं — वह भी फल देगा। पर यहीं आप ग़लत बोलने लगते हैं।
शंखचूड़ की अपनी शक्ति उसके किए अपमान से कुंठित हो गई
शंखचूड़, जिसकी शक्ति अपमान से कुंठित हुई
वे शंखचूड़ को याद करते हैं, जिसने देवराज इंद्र, विष्णु जी और सबका अपमान किया; उस अपमान के कारण उसकी शक्ति ही कुंठित हो गई, और इंद्र के वज्र की एक चोट से वह मूर्छित हो गया। निंदा करते ही उसकी सारी शक्तियाँ और तुलसी जी का पतिव्रत धर्म धरे के धरे रह गए। ठीक इसी तरह, जब आप कहने लगते हैं कि दुर्गा जी की इतनी पूजा की और कुछ नहीं हो रहा, तो परेशानी शुरू होती है और हमारा पुण्य क्षीण होने लगता है। इसलिए निंदा नहीं करनी चाहिए।
उनकी पौराणिक कथाएँ बहुत कम लोग सुनते हैं, वक्ता कहते हैं — हज़ार लोग दो-तीन सौ रह जाते हैं और बात ख़त्म — फिर भी उनमें हम कितना सीखते हैं। पौराणिक कथा में ही हमने सुना, वे कहते हैं, कि जब शंखचूड़ ने देवराज इंद्र, विष्णु जी और सबका अपमान किया, तो उस अपमान के कारण उसकी शक्ति कुंठित हो गई। इंद्र के वज्र की एक चोट से वह मूर्छित हो गया। निंदा करते ही उसकी सारी शक्तियाँ और तुलसी जी का पतिव्रत धर्म जहाँ थे वहीं बेकार पड़े रहे। ठीक इसी तरह, जब आप कहने लगते हैं कि दुर्गा जी की इतनी पूजा की और कुछ नहीं हो रहा, इनकी इतनी पूजा की और कुछ नहीं हो रहा, इतना मंत्र जाप करते हैं और कुछ नहीं हो रहा — यहीं से परेशानी शुरू होती है। हमारा पुण्य क्षीण होने लगता है, और इसीलिए निंदा नहीं करनी चाहिए।
दूसरा भाव नकारात्मक रूप से अच्छी तरह ऊर्जित हो जाए तो क्या होता है?
पूजन जो हिल नहीं पाता
आप दूसरे भाव को नकारात्मक ढंग से सक्रिय कर रहे हैं, और एक बार वह नकारात्मक रूप से अच्छी तरह ऊर्जित हो गया, तो वक्ता कहते हैं — जितना चाहे पूजन-पाठ कर लीजिए, कुछ नहीं होगा।
आप दूसरे भाव को नकारात्मक रूप से सक्रिय कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं। और एक बार वह पूरी तरह नकारात्मक रूप में ऊर्जित हो गया, तो जितना चाहे पूजन-पाठ कर लीजिए: कुछ नहीं होगा। और आजकल, वे जोड़ते हैं, डिजिटल युग है — यह डिजिटल सत्संग यूट्यूब पर हो रहा है, तो यह विषय यहाँ भी समझिए।
क्या आध्यात्मिक प्रवचन में सिखाई हर बात किसी शास्त्र से निकलती है?
हर विधि के नीचे कोई सनातन ग्रंथ
वक्ता कहते हैं कि संसार में जितनी भी बातें कही जा रही हैं, उनकी जड़ कहीं न कहीं कोई शास्त्र है। अनुभव से व्यवस्था थोड़ी बदल सकती है, कथन बदल सकते हैं, तरीक़े बदल सकते हैं, समझाने का ढंग अनुभव के आधार पर अलग हो सकता है — पर सबकी जड़ कोई न कोई सनातन ग्रंथ है। अपनी बात के बारे में वे कहते हैं कि उसकी जड़ भगवती के अष्टादशाक्षरी मंत्र का बड़ा पुरश्चरण है जो उन्होंने किया, जिससे सब घटता है, अनुभव होते हैं, और तंत्र में जो होता है वह होता है।
संसार में जितनी भी बातें कही जा रही हैं, वक्ता कहते हैं, उनकी जड़ कहीं न कहीं कोई शास्त्र है। अनुभव के अनुसार व्यवस्था थोड़ी बदल सकती है, कथन बदल सकते हैं, तरीक़े बदल सकते हैं, और समझाने का ढंग अनुभव के आधार पर अलग हो सकता है। पर सबकी जड़ कोई न कोई सनातन ग्रंथ है। अभी जो बातचीत हो रही है उसकी भी कहीं जड़ है। अगर वे कहते हैं कि उन्होंने भगवती के अष्टादशाक्षरी मंत्र का बहुत पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। किया है, तो उसी मंत्र से ये सब बातें घट रही हैं, उन्हीं मंत्रों से अनुभव हो रहे हैं, उन्हीं मंत्रों से किसी को कुछ बताया जा रहा है, उन्हीं मंत्रों से तंत्र में जो हो रहा है वह होता है। जड़ वही है। उसके भीतर हज़ार अनुभव, हज़ार तरीक़े, हज़ार बातें हो सकती हैं।
अंधभक्त समर्थक अपना क्या नुक़सान करते हैं?
उनकी ओर से किसी दूसरे चैनल की निंदा करने जाना
वक्ता किसी और के बजाय अपना उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए उन्हें क़रीब से मानने वाले किसी श्रोता को बताया जाए कि फलाँ चैनल उनका विरोधी है, या बस प्रतिद्वंद्वी है, और उसे उनके लाइव पर ग़लत बोलने भेजा जाए — या वह ख़ुद तय कर ले कि जो भी रुद्रांश भैया के ख़िलाफ़, या उनके विषयों के समानांतर भी बोलेगा, उसे ग़लत साबित करेंगे। जो भी हो, वह श्रोता अपने दूसरे भाव को नकारात्मक प्रभाव में ले जाएगा, और नुक़सान उसी का होगा।
किसी और को लेने के बजाय, वक्ता कहते हैं, वे अपना ही उदाहरण देंगे। मान लीजिए कोई श्रोता उनका बहुत भक्त है, उन्हें क़रीब से मानता है, कई लाइव में उसका नाम आया है। ऐसा व्यक्ति उनका अंधभक्त समर्थक है। अब मान लीजिए वे उस श्रोता से कहें कि फलाँ चैनल के लोग उनके विरोधी हैं, उनके बारे में ग़लत बोलते हैं, या ख़िलाफ़ भी नहीं बोलते पर प्रतिद्वंद्वी हैं — जब वे लाइव आएँ तो जाकर उनके लाइव में ग़लत बोलो। या श्रोता का अपना मन तय कर ले: अगर कोई रुद्रांश भैया के ख़िलाफ़ बोला तो छोड़ेंगे नहीं; अगर कोई उनके विषयों के उलट, या उनके विषयों के समानांतर भी बोला, तो उसे ग़लत साबित करेंगे। और भक्त जाकर ग़लत बोलने लगता है। अब जब वह ग़लत बोलता है, तो जो भी हो, जितना भी हो, वह कहीं न कहीं अपने दूसरे भाव को नकारात्मक प्रभाव में ले जाएगा। नुक़सान उसी का होगा।
जो भक्त अपने गुरु की ओर से दूसरे चैनलों से झगड़ता है, उसका क्या होता है?
गुरु बेअसर आगे बढ़ जाते हैं; कर्म का फल भक्त अकेला भोगता है
वक्ता कहते हैं इससे उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता: वे एक लाइव ख़त्म करके दूसरा शुरू कर देंगे, और मंजीरा बजाते त्रिकोण परिक्रमा पर निकल जाएँगे, कहेंगे विंध्यवासिनी देख लेंगी। पर जो उनकी ओर से लड़ा, उसका क्या होगा? कोई लक्ष्मण जी एक दिन उतरेंगे और अस्त्र छोड़ेंगे, और उससे मेघनाद ही जुड़ेगा।
रुद्रांश भैया को इससे क्या, वक्ता पूछते हैं। वे यहाँ एक लाइव ख़त्म करेंगे और दूसरा शुरू करेंगे; मंजीरा बजाते त्रिकोण परिक्रमा पर निकल जाएँगे; कहेंगे विंध्यवासिनी जो समझें सो समझें। पर मेघनाद भैया का क्या होगा? कोई लक्ष्मण जी एक दिन उतरेंगे और अस्त्र छोड़ेंगे, और उससे मेघनाद जुड़ जाएगा।
गीता के प्रचार के बारे में भगवान कृष्ण क्या कहते हैं?
कृष्ण से निकटता, और उसमें बाधा
वक्ता बताते हैं कि भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि जो गीता को घर-घर ले जाएगा, जो गीता का अधिक पाठ करेगा — यानी आज की भाषा में उसका प्रचार करेगा — वह उनके उतना ही निकट होगा, और वे उसके उतने ही निकट होंगे। तो, वे पूछते हैं, ईश्वर से यह सबसे निकट का संबंध, जिसमें हमें कृष्णमय होना है: आप उसके बीच में बाधा डाल रहे हैं, आज भी और कल भी। कृष्ण ने शिशुपाल को सौ बार क्षमा किया; जब आप एक झटके में सौ कर देंगे तो उनका सुदर्शन चक्र चलेगा।
यही होता है, वक्ता कहते हैं, उन लोगों के साथ जो कहीं भी जाते हैं — किसी सत्संग में, या जहाँ भी सनातन के उत्थान से जुड़े विषयों पर विचार हो रहा हो — और ग़लत बोलते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने कहा है, वे याद करते हैं, कि जो गीता को घर-घर ले जाएगा, जो गीता का अधिक पाठ करेगा — यानी आज की सीधी भाषा में उसका प्रचार करेगा — वह उनके उतना ही निकट होगा; और वे उसके उतने ही निकट होंगे। तो बताइए, वे कहते हैं: ईश्वर से जो सबसे निकट का संबंध बनने वाला है, जिसमें हमें कृष्णमय होना है — आप उसके बीच में बाधा डाल रहे हैं। आज भी कर रहे हैं, कल भी कर रहे हैं। कृष्ण जी ने शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा किए। जब आप एक झटके में सौ कर देंगे, तो उनका सुदर्शन चक्र चलेगा। कुछ होगा, और फिर भी आप बैठकर रोएँगे कि हमारा अपराध क्या था — हम तो रुद्रांश भैया के समर्थन में खड़े थे। उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता; टाँग तो आपकी टूटी।
एक सीमा के बाद सही तर्क भी करने वाले का नुक़सान करता है
एक सीमा जिसके बाद सही तर्क भी आपको नुक़सान देता है
यह हमारी अपनी मूर्खता है, वक्ता कहते हैं, कि किसी की निंदा करने जाएँ, या जहाँ ज्ञान यज्ञ या अनुष्ठान हो रहा हो वहाँ बार-बार निंदा करें। जो निंदा या शास्त्रार्थ करते हैं वे आज तर्क भी नहीं करते — यह कुतर्क है। एक सीमा तक बोलिए, और फिर भी ग़लत लगे तो छोड़कर हट जाइए; ज़्यादा मत कीजिए। यह उनका मत है। ज़्यादा करेंगे तो नुक़सान आपका है।
तो यह हमारी अपनी मूर्खता है, वे कहते हैं: कि हम जाकर किसी की निंदा करें, या जहाँ किसी का ज्ञान यज्ञ हो रहा हो या कोई अनुष्ठान चल रहा हो, वहाँ बार-बार निंदा करें। जो निंदा या शास्त्रार्थ करते हैं वे आज तर्क भी नहीं करते — आज यह कुतर्क है। एक सीमा तक बोलिए, और अगर कहीं लगे कि कोई बात ग़लत है, तो उसे छोड़ देना चाहिए; हट जाना चाहिए, और बहुत ज़्यादा नहीं करना चाहिए। यह, वे कहते हैं, उनके अनुसार है। और अगर आप बहुत ज़्यादा करेंगे, तो भी नुक़सान आपका ही है।
नवरात्र और दूसरे पर्व काल में सुरक्षा के लिए क्या करना चाहिए?
अपनी और परिवार की रक्षा करें; जो शुरू किया उसे न छोड़ें
जब नवरात्र हो, शिवरात्रि हो, या कोई भी पर्व काल आए — ख़ासकर तंत्र काल से जुड़े — तो हमें अपनी रक्षा करनी है और परिवार की भी। साथ में, पहले से चल रहे अनुष्ठान जारी रखने चाहिए: जो साल भर कालिका योगिनी साधना करते आए हैं, वे कालिका योगिनी ही करते रहें और अब उसे न छोड़ें।
जो दुर्गा बत्तीस नामावली करते आए हैं, वे अब क्या करें?
वही अनुष्ठान दोहराएँ, इस नवरात्र में ग्यारह हज़ार
अगर आप आज तक दुर्गा जी की बत्तीस नामावली करते आए हैं, तो उसी पर भरोसा रखिए और बत्तीस नामावली करना मत छोड़िए। अगर वह शत्रु नाश, विरोधी विचारों के नाश, या अपनी रक्षा के लिए है, तो उसी का अनुष्ठान कीजिए — और इस बार नवरात्र में फिर से ग्यारह हज़ार का अनुष्ठान कीजिए।
अगर आप आज तक दुर्गा जी की बत्तीस नामावली करते आए हैं, वक्ता कहते हैं, तो उसी पर भरोसा रखिए। बत्तीस नामावली करना मत छोड़िए। अगर वह शत्रु नाश के लिए, विरोधी विचारों के नाश के लिए, अपनी रक्षा के लिए है, तो उसी का अनुष्ठान कीजिए। इस बार नवरात्र में एक बार फिर ग्यारह हज़ार का अनुष्ठान कीजिए।
अष्टोत्तर शतनाम में क्या वचन दिया गया है, और अर्गला का क्या?
उसी विधान में वही उद्देश्य जारी रखें
अगर आप भगवती दुर्गा से जुड़ी धन संबंधी साधना कर रहे हैं — जैसे अष्टोत्तर शतनाम — तो वक्ता याद दिलाते हैं कि उसमें भगवान शिव ने कहा है कि जो जिस भी उद्देश्य से इसे करेगा उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष मिलेंगे, वह धन-धान्य से भर जाएगा और पुत्र-पौत्र पाएगा। अगर आपने इसे उठाया था, तो अब भी कीजिए और मत छोड़िए। अगर आप अर्गला के मंत्रों का भरपूर जाप करते हैं और उसका हवन करते आए हैं, तो इस नवरात्र में भी वही करना है।
अगर आप भगवती दुर्गा से जुड़ी धन प्राप्ति की कोई साधना कर रहे हैं — मान लीजिए आप अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। कर रहे हैं — तो अष्टोत्तर शतनाम में भगवान शिव ने कहा है, वक्ता याद करते हैं, कि जो जिस भी उद्देश्य से इसे करेगा उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष मिलेंगे; वह धन-धान्य से भर जाएगा, पुत्र-पौत्र पाएगा, सब होगा। अगर आपने इसे उठाया था, तो कीजिए; अब भी मत छोड़िए। अगर आप अर्गला के मंत्रों का भरपूर जाप करते हैं और उसका हवन करते आए हैं, तो इस नवरात्र में भी वही करना है। और अगर आपकी समस्या हल हो गई — आप पर दस लाख का क़र्ज़ था और वह उतर गया, और अब आप भगवती की सेवा करना चाहते हैं और अपनी इच्छा से किसी विधान से अनुष्ठान करना चाहते हैं — तो कर सकते हैं। अगर आप किसी एक ख़ास उद्देश्य से कर रहे थे, तो वही दोहराइए।
जो सप्तश्लोकी सिद्ध करते हैं, उन्हें उसका लाभ क्यों नहीं मिलता?
निरंतरता के बिना प्रेरणा
वक्ता कहते हैं कि जिन्होंने सप्तश्लोकी सिद्ध की और उसकी साधना की, वे प्रेरित होते हैं, साधना करते हैं, और फिर उसे जारी नहीं रख पाते। निरंतरता नहीं रहती: नौ दिन हुए, और दसवें से शुरू हो जाता है 'प्रयोग करो भाई, कुछ नहीं हुआ, कुछ नहीं हुआ'। और जैसे ही हम कहने लगते हैं कुछ नहीं हुआ, तो जहाँ कुछ होने वाला था वहाँ भी शुरू हो जाता है — कुछ नहीं होगा, कुछ नहीं होगा, इसमें आस्था ही नहीं, यह करना ही नहीं चाहता, छोड़ो, हटाओ।
जिन लोगों ने सप्तश्लोकी सिद्ध की और उसकी साधना की, वक्ता कहते हैं — बात यह है कि लोग प्रेरित होकर साधना करते हैं, पर उसे जारी नहीं रख पाते। निरंतरता नहीं रहती। नौ दिन हुए, और दसवें दिन से हो जाता है: प्रयोग करो भाई, कुछ नहीं हुआ, कुछ नहीं हुआ, कुछ नहीं हुआ, कुछ नहीं हो रहा। और जैसे ही हम कहने लगते हैं कुछ नहीं हुआ, तो जहाँ कुछ होने वाला था वहाँ भी शुरू हो जाता है — कुछ नहीं होगा, कुछ नहीं होगा, इसमें आस्था ही नहीं है, यह करना ही नहीं चाहता, छोड़ो, हटाओ।
भारत और विदेश के श्रोताओं से पता चला कि दीपक और भोग के बर्तन कभी धोए ही नहीं जाते
दीपक और भोग के बर्तन जो कभी धोए नहीं गए
वक्ता कहते हैं कि यूट्यूब के ज़रिए भारत के हर कोने और विदेश के लोगों से मिलने पर साफ़ होता है कि ग़लतियाँ कहाँ हो रही हैं, और जैसे ही कोई ग़लती पकड़ में आती है वे उसे सार्वजनिक कर देते हैं ताकि लोग वह न करें। उदाहरण के लिए: बहुत से लोग दीपक कभी धोते ही नहीं थे, पूरा साल बिना धोए इस्तेमाल करते थे, और भोग लगाने का बर्तन नहीं धो रहे थे। वे कहते हैं उन्हें पता ही नहीं था कि ऐसा भी होता है, क्योंकि उनके घर में ये रोज़ सुबह-शाम धुलते हैं, और उन्होंने मान लिया था कि सब धोते होंगे।
जब व्यक्ति समाज में निकलता है, वक्ता कहते हैं — और अब यूट्यूब के ज़रिए वे अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों से मिल रहे हैं, भारत के हर कोने से लोग जुड़े हैं, देश और विदेश से बातचीत होती है — तब साफ़ होता है कि ग़लतियाँ कहाँ हो रही हैं। और जैसे ही कोई ग़लती पकड़ में आती है, वे उसे सार्वजनिक कर देते हैं, कहते हैं कि अगर आप यह ग़लती कर रहे हैं तो मत कीजिए। जैसे, कितने ही लोग थे जो दीपक कभी धोते ही नहीं थे, पूरा साल बिना धोए इस्तेमाल करते थे, और जिस बर्तन में भोग लगता है उसे नहीं धो रहे थे। हमें कैसे पता होता कि ऐसा भी होता है, वे कहते हैं — हमारे घर में तो ये रोज़ सुबह-शाम धुलते हैं, तो हमने मान लिया कि सब धोते होंगे।
जैन तांत्रिक ग्रंथ वैदिक के बजाय तांत्रिक प्रणव क्यों इस्तेमाल करते हैं?
जैन तंत्र और तीर्थंकरों के यक्ष
एक श्रोता ने पूछा था कि जैन तांत्रिक प्रणव का उच्चारण क्यों करते हैं। वक्ता जवाब देते हैं कि वे वैदिक प्रणव का उच्चारण बहुत कम करते हैं और वैदिक मंत्र भी बहुत कम पढ़ते हैं। जैनों के तंत्र में, वे कहते हैं, सबसे ज़्यादा और सबसे प्रमुख रूप से यक्षों का प्रयोग होता है: उनके सब तीर्थंकरों के अपने यक्ष हैं, किसी के चौबीस, किसी के कुछ और। वे कहते हैं उनके पास बहुत जानकारी नहीं है और थोड़ा ही पढ़ा है, पर जहाँ तक जड़ की बात है, हर एक का कोई न कोई यक्ष है।
प्रणव को लेकर हालत इतनी ख़राब है, वक्ता कहते हैं, कि एक व्यक्ति ने कमेंट करके पूछा कि जैन तांत्रिक प्रणव का उच्चारण क्यों करते हैं। वे वैदिक प्रणव का उच्चारण बहुत कम ही करते हैं, वे जवाब देते हैं, और वैदिक मंत्र भी बहुत कम पढ़ते हैं। जैनों का तंत्र देखिए: उसमें सबसे ज़्यादा और सबसे ऊपर यक्षों का प्रयोग होता है। उनके सब तीर्थंकरों के अपने यक्ष हैं — किसी के चौबीस, किसी के कुछ और। जितने भी हों, हर एक का अपना प्रमुख यक्ष है। वे जोड़ते हैं कि इस पर उनके पास बहुत जानकारी नहीं है और उन्होंने थोड़ा ही पढ़ा है, पर जड़ में जो देखा, हर एक का कोई न कोई यक्ष है।
जैन मंत्रों में वैदिक प्रणव नहीं, तंत्रोक्त और देवी प्रणव होता है
वैदिक प्रणव की जगह तंत्रोक्त और देवी प्रणव
वे कहते हैं कि उस कमेंट के बाद उनके मंत्र ध्यान से पढ़ने पर पाया कि जो लिखा है उसमें वैदिक प्रणव है ही नहीं; वहाँ भी ख़ासकर तंत्रोक्त प्रणव है, और प्रमुख मंत्रों में देवी प्रणव आदि हैं। ऐसी शक्तियों के मंत्र हैं जिनका बस नाम अलग है: उनका ध्यान, उनके माला मंत्र और उनके मुख्य काम के मंत्र पढ़िए तो साफ़ होता है कि ये यहीं से जुड़े हैं। बस थोड़ा बदलाव हुआ है, रूप का थोड़ा अंतर; सब सनातन से जुड़ा है और बहुत अलग नहीं है।
क्या ऐसे जैन साधक हैं जो भगवती विंध्यवासिनी की उपासना करते हैं?
माई के जैन सेवक, और महायक्षिणी नाम
वक्ता कहते हैं कि बहुत से जैन साधक हैं जो मुख्य रूप से भगवती विंध्यवासिनी की सेवा करते हैं और इसी रूप में माई की बहुत सेवा करते हैं। वे बताते हैं कि उन्होंने एक वीडियो डाला था जिसमें उन्होंने माई को महायक्षिणी लिखा था — वे उन्हें महायक्षिणी कहते हैं — पर वे और ज़्यादा नहीं कहेंगे, क्योंकि यह अलग विषय है।
बहुत से जैन साधक हैं, वक्ता कहते हैं, जो मुख्य रूप से भगवती विंध्यवासिनी की सेवा करते हैं, जो इसी रूप में माई की बहुत सेवा करते हैं। और उन्होंने एक वीडियो डाला था जिसमें उन्होंने माई को महायक्षिणी लिखा था — वे महायक्षिणी कहते हैं। वे इससे आगे नहीं बोलते, कहते हैं कि ज़्यादा नहीं बोलेंगे क्योंकि यह अलग विषय है। फिर भी, वे पूछते हैं, इससे आपको या हमें क्या परेशानी? वे इस विषय को मानते हैं, और शायद इसीलिए आए हैं।
भैरव की घर में पूजा नहीं करनी चाहिए — इस दावे का जवाब देने में वीडियो पर वीडियो लगे
यह दावा कि भैरव की पूजा घर में नहीं करनी चाहिए
वक्ता कहते हैं कि सनातन संस्कृति में इतना ब्रेनवॉश हुआ है कि उन्हें एक ही विषय पर वीडियो पर वीडियो और लाइव पर लाइव करने पड़े — यह ब्रेनवॉश वाला विषय कि भैरव जी की पूजा घर में नहीं करनी चाहिए। वे बताते हैं कि लाइव में कितने लोगों ने उन वीडियो के कारण पहली बार घर में भैरव जी की पूजा की होगी, उनका पूजन-पाठ शुरू किया होगा, और बटुक भैरव जी की पूजा की होगी।
हमारी सनातन संस्कृति में, वक्ता कहते हैं, इतना ब्रेनवॉश हुआ है। इस चैनल को देखिए कि उन्होंने एक ही विषय पर कितनी बार कितने वीडियो बनाए हैं — यह ब्रेनवॉश वाला विषय कि भैरव जी की पूजा घर में नहीं करनी चाहिए। इस पर उन्होंने कितने लाइव किए? कितने वीडियो डाले? अभी इस लाइव से जुड़े कितने लोगों ने, वे पूछते हैं, पहली बार घर में भैरव जी की पूजा की होगी, भैरव जी का पूजन-पाठ शुरू किया होगा, बटुक भैरव जी की पूजा की होगी।
भैरव नाम का असल अर्थ क्या है?
भय हरने वाले को भय देने वाला बना दिया
वक्ता कहते हैं कि भैरव जी से इतना डर है — जबकि भैरव नाम का अर्थ है जो भय हरता है और जो संसार का भरण-पोषण करता है; इसीलिए उन्हें भैरव कहते हैं। यहाँ भैरव का अर्थ भय देने वाला बना दिया गया है: भैरव के नाम से ही डर फैल जाता है। भैरव — अरे, कोई तांत्रिक होगा जो दारू और टोना करता है। और धारावाहिक भी ठीक यही दिखाते हैं कि जय काल भैरव कहने वाला तांत्रिक दूसरों की जान लेता है।
सोचिए भैरव जी से कितना डर है, वक्ता कहते हैं। भैरव नाम का अर्थ है: जो भय हरता है, जो संसार का भरण-पोषण करता है — ऐसे को भैरव कहते हैं। यहाँ भैरव का अर्थ भय देने वाला हो गया है। भैरव के नाम से ही डर फैल जाता है। भैरव — अरे, कोई तांत्रिक होगा, दारू और टोना करने वाला। और धारावाहिकों ने, वे कहते हैं, ठीक ऐसा ही दिखाया है: जो जय काल भैरव कह रहा है वह तांत्रिक है जो दूसरों की जान लेता है।
लोकप्रिय चित्रण में नवार्ण मंत्र के साथ क्या किया गया है?
तंत्र का सबसे बड़ा मंत्र मारण मंत्र बना दिया
वक्ता कहते हैं ये लोग नवार्ण मंत्र का इतना इस्तेमाल करते हैं: कोई तांत्रिक किसी पर मारण प्रयोग करता है, बस मारण मंत्र पढ़ देता है, और सामने वाला वहीं ख़त्म। जबकि जिस मंत्र से पूरी सृष्टि की हर चीज़ पाई जा सकती है — जिसे तंत्र का सबसे बड़ा मंत्र कहा गया है, जिसके बारे में कहते हैं कि वेदों में गायत्री और तंत्र में नवार्ण — उसे इन लोगों ने मारण का यंत्र बना दिया। काल भैरव, जो काल के भय को भी हरने वाले, काल के भी काल बनाए गए, उन्हीं से हमें डराया गया है।
जब सनातनी मीडिया भैरव और नवार्ण मंत्र को डरावना दिखाता है, तो नुक़सान किसका होता है?
अपनी ही जड़ का कमज़ोर होना
वक्ता कहते हैं नुक़सान कहीं न कहीं हमारा अपना है। अगर हमारे सनातनी लोग कमज़ोर हो रहे हैं, सनातनी परिवार में फूट पड़ रही है, लोग कम हो रहे हैं और आबादी घट रही है — तो, वे कहते हैं, आप भी फूट डाल रहे हैं, और एक दिन आप घिर जाएँगे; यह आपका अपना किया होगा। जो करना चाहिए उसे मना करना और जो नहीं करना चाहिए उसे थोपना: नुक़सान अपना ही है।
हम बार-बार कहते हैं, वक्ता कहते हैं, कि इसका नुक़सान कहीं न कहीं हमारा अपना है। अगर हमारे सनातनी लोग कमज़ोर हो रहे हैं, अगर सनातनी परिवार में फूट डाली जा रही है, अगर लोग कम हो रहे हैं और आबादी घट रही है — तो आप भी फूट डाल रहे हैं, और एक दिन आप ख़ुद को घिरा पाएँगे, और यह आपका अपना किया होगा। फूट डालने वाले आप हैं, कहते हैं मत करो, यह ग़लत है, यह मत करो। और जो करना चाहिए वही मना किया जाता है; जो नहीं करना चाहिए वही थोपा जाता है। नुक़सान अपना ही है।
यह ऐसा है जैसे लाल रंग पसंद होने से बुख़ार में पेट की गोली खाना
लाल रंग पसंद है, इसलिए बुख़ार में पेट की गोली
आपको बुख़ार है पर आप पेट दर्द की दवा खाना चाहते हैं; सिर दर्द है पर हड्डी के दर्द की दवा खाना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि आपको लाल रंग पसंद है, और यह गोली लाल है, तो यही खाएँगे। मना करो तो जवाब: तुम बड़े विशेषज्ञ बन गए हो। ऐसा करके, वक्ता कहते हैं, आप कहीं न कहीं अपनी ही जड़ कमज़ोर कर रहे हैं।
अब आपको बुख़ार है, वक्ता कहते हैं, पर आप पेट दर्द की दवा खाना चाहते हैं। सिर दुख रहा है, पर आप हड्डियों के दर्द की दवा खाना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि मुझे लाल रंग पसंद है, और यह गोली लाल है, तो यही खाऊँगा। मना करो, तो जवाब आता है: भाई, तुमने ख़ुद को बड़ा विशेषज्ञ बना लिया है। तो आप जो कर रहे हैं, वे कहते हैं, उसमें कहीं न कहीं अपनी ही जड़ कमज़ोर कर रहे हैं। और ये बनी-बनाई बातें नहीं हैं — वे कहते हैं कि वे सच में और काफ़ी बार यूट्यूब पर ऐसे मंत्र बँटते देखते हैं।
लोग काम करने के बजाय दूसरों के घरों में झाँकते और पूछते रहते हैं
काम करने के बजाय दूसरों के घरों में झाँकना
ऐसे मंत्र बँटने के बाद, वक्ता कहते हैं, लोग इधर-उधर पूछने लगते हैं — यह मंत्र करना है या नहीं, करना है या नहीं, और उन्होंने ख़ुद किया है या नहीं। दूसरों के घरों में झाँकने की इतनी जल्दी और इतनी व्यस्तता है कि व्यक्ति ख़ुद कुछ नहीं कर पाता। इस बीच जो करते हैं वे कर रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं।
उसके बाद, सच कहें तो, लोग इधर-उधर पूछने लगते हैं, वक्ता कहते हैं — क्योंकि, वे जोड़ते हैं, वे भी हर जगह मौजूद हैं और उन्हें भी ताक-झाँक का समय मिल जाता है। अरे, यह मंत्र दिया गया है, करना है या नहीं, करना है या नहीं, और उन्होंने ख़ुद किया है या नहीं। दूसरों के घरों में झाँकने की इतनी जल्दी है, और उसमें इतनी व्यस्तता, कि व्यक्ति ख़ुद कुछ नहीं कर पाता। यही हालत बनी रहती है। और जो लोग करते हैं वे कर रहे हैं और आगे भी बढ़ रहे हैं। पर कुछ लोग बस देखने-सुनने में ही रह जाते हैं — और ऐसे लोगों के कारण ही, वे कहते हैं, कल दूसरों का नुक़सान होता है, और ज़्यादा लोग ऐसे लोगों के प्रभाव में आते हैं। आप जितना अच्छा समझाएँ, जितना सही समझाएँ, लोगों को किसी विधि पर लाने की जितनी कोशिश करें, आप उतने ही बुरे बनते हैं।
बंगाल और तारापीठ का हवाला देकर पीने की छूट — यही लोगों को खींचती है
पीने की छूट, और बंगाल व तारापीठ का हवाला
जितनी आज़ादी दो और लोगों को जितना बेलगाम करो, वक्ता कहते हैं, उतना अच्छा चलता है। कहो कि दारू पीकर मंत्र जाप कर सकते हो, कोई दिक़्क़त नहीं, भैरव जी को तो चढ़ता ही है तो चढ़ता है — तो प्रसादी है, लो और चलो। देखो, वे तारापीठ गए थे और भोग भगवती को ही लगता है। बंगाल की, मिथिलांचल की दुर्गा पूजा देखी है? सब खाया जाता है; बलि दिए बिना कुछ नहीं होता। सब खाओ, सब पियो। माँ रोकती है क्या? माँ कुछ भी मना नहीं करती — वह माँ है।
जितनी आज़ादी दो, लोगों को जितना बेलगाम करो, वक्ता कहते हैं, उतना अच्छा चलता है। कहो कि दारू पीकर मंत्र जाप कर सकते हो, इसमें कोई दिक़्क़त नहीं, भैरव जी के कारण चढ़ता है — हाँ, तो प्रसादी है, लो और चलो। देखो, वे तारापीठ गए थे, भोग भगवती को ही लगता है। बंगाल की दुर्गा पूजा देखी है? मिथिलांचल की दुर्गा पूजा देखी है? वहाँ सब खाया जाता है, सब खाकर होता है, और बलि दिए बिना कुछ होता ही नहीं। सब खाओ, सब पियो। माँ रोकती है क्या? माँ कुछ भी मना नहीं करती। वह माँ है। इस तरह के संवादों से, वे कहते हैं, आपका प्यार से ब्रेनवॉश किया जाता है — पूरे प्यार से आपको चढ़ाया जाता है। यही लोग आपकी बलि दे रहे हैं। और जो आपको बचाने आएगा, ये लोग उसकी भी बलि दिलवा देंगे। आप जाकर समझाएँ, तो वे किसी को आपके ख़िलाफ़ खड़ा कर देंगे: निपट लो, आओ।
सिद्धों के रचे मंत्र उठाने से पहले कौन सी शर्तें लागू होती हैं?
पहले आरंभिक साधनाएँ करें, और घर के भीतर नहीं
किसी से कहो कि ये मंत्र नहीं करने चाहिए, वक्ता बताते हैं, तो जवाब में झगड़ा। उनका मत है कि पहले बहुत कुछ करना है: कम से कम आरंभिक साधनाएँ करो, नवनाथ की साधना करो, गुरु गोरखनाथ जी की साधना करो, और करना ही है तो घर के बाहर करो — और बहुत दिक़्क़त हो तो शिव मंदिर में करो, घर में बंद होकर नहीं। पलटकर आपत्ति आती है: क्या ये मंत्र सिद्धों ने नहीं रचे? वे जवाब देते हैं कि हाँ, सिद्धों ने रचे — तो क्या इसका मतलब है कि हम इन्हें यहाँ घर के भीतर करेंगे?
किसी से कहो, भाई, वे मंत्र मत करो, वक्ता बताते हैं, तो जवाब में लड़ाई। उनका अपना मत: उन मंत्रों को करने के लिए बहुत कुछ करना होता है, और वह पहले करना चाहिए। कम से कम इतना काम करो — आरंभिक साधनाएँ पूरी करो, नवनाथ की साधना करो, गुरु गोरखनाथ जी की साधना करो। और करना ही है, तो घर के बाहर करो। बहुत ज़्यादा दिक़्क़त हो, तो शिव मंदिर में करो। घर में बंद होकर नहीं। क्यों भाई? क्या ये मंत्र सिद्धों ने नहीं रचे? हाँ भाई, सिद्धों ने रचे — तो क्या इसका मतलब है कि हम इन्हें यहाँ घर में करेंगे?
घर में श्मशान काली की पूजा को सही ठहराने के लिए क्या तर्क दिया जाता है?
'सब शक्तियाँ पार्वती हैं, तो घर में क्यों नहीं'
वक्ता वह तर्क बताते हैं जो उन्हें लौटाया गया: आप ख़ुद कहते हैं कि भगवती की सब शक्तियों का मूल रूप माँ पार्वती हैं। तो श्मशान काली पार्वती जी का ही एक रूप है — घर में करें तो क्या दिक़्क़त होगी? घर में भद्रकाली की पूजा करें तो क्या होगा? और खा-पीकर ये सब करें तो क्या दिक़्क़त होगी?
सबका अपना है — आप ख़ुद ही तो कहते हैं, वक्ता आपत्ति बताते हैं, कि भगवती की सब शक्तियों का मूल रूप माँ पार्वती हैं। तो श्मशान काली पार्वती जी का एक रूप है: घर में करें तो क्या दिक़्क़त होगी? घर में भद्रकाली की पूजा करें तो क्या होगा? और ये सब काम करें तो क्या दिक़्क़त होगी? खा-पीकर करें तो कोई दिक़्क़त नहीं होगी।
लाभ मिले तो लीजिए, पर बाद में उन देवताओं की निंदा मत कीजिए
लाभ लीजिए, पर बाद में उन देवताओं की निंदा नहीं
तो ये सब बातें आप करते हैं, वक्ता कहते हैं, और अगर आपको लगता है कि लाभ आ रहा है, तो वह लाभ लीजिए — कोई दिक़्क़त नहीं। पर बाद में बैठकर उन देवी-देवताओं के बारे में ग़लत मत बोलिए। और ज़रूरी नहीं, वे जोड़ते हैं, कि उसका हर तिर्यक प्रभाव आपको तुरंत मिल जाए।
तो ये सब बातें आप करते हैं, वक्ता कहते हैं — और अगर आपको लगता है कि लाभ मिल रहा है, तो वह लाभ लीजिए; कोई दिक़्क़त नहीं। पर फिर बाद में बैठकर उन देवी-देवताओं के बारे में ग़लत मत बोलिए। और ज़रूरी नहीं कि उसका हर तिर्यक् प्रभाव आप तक तुरंत पहुँचे। मंत्र का असर, वे कहते हैं, लंबे समय में आता है; उनके पास ऐसे फ़ोन आते हैं कि वे यह समझते हैं।
शीतला मसानी के एक बड़े मंदिर के पास रहने वाले पंजाब के एक साधक ने यह बताया
शीतला मसानी मंदिर के पास पंजाब के एक साधक
वक्ता पंजाब के वर्मा जी का नाम लेते हैं, जिन्हें वे बहुत बड़ा साधक कहते हैं। वे पंजाब के किसी क्षेत्र में रहते हैं जहाँ शीतला मसानी का बहुत बड़ा मंदिर है; वहाँ के सेवकों और साधकों ने सब कुछ श्मशान के ठीक पास बनवाया है। वक्ता कहते हैं कि वे उस व्यक्ति का अपना अनुभव, जो उन्हें बताया गया, लाइव में सुना रहे हैं — जैसा बताया गया वैसा कह रहे हैं, उसे अपने साथ हुई बात नहीं बता रहे।
वर्मा जी, अगर आप सुन रहे हैं, वक्ता कहते हैं — वे बहुत बड़े साधक हैं, पंजाब के साधक। वे पंजाब के किसी क्षेत्र में रहते हैं जहाँ शीतला माता मसानी का बहुत बड़ा मंदिर है; वहाँ के सेवकों और साधकों ने सब कुछ श्मशान के ठीक बगल में बनवाया है। वे बहुत बड़े व्यक्ति हैं। वे अपना अनुभव बताते हैं, वक्ता कहते हैं, और वे उसे यहाँ लाइव में सुना रहे हैं। वे बताते हैं कि आजकल यह भी तनाव की बात हो गई है — किसी का प्रसंग सुनाओ तो लोग कमेंट करने लगते हैं कि इसका बता दिया, उसका बता दिया। वे जवाब देते हैं कि वे इसे कही हुई बात के रूप में सुना रहे हैं; वे यह नहीं कह रहे कि यह उनकी अपनी बात है।
उस परिवार की एक स्त्री ने बहुत गायत्री जाप किया और उसकी अंतिम दशा बहुत बुरी हुई
बहुत बुरी अंतिम दशा
उन्हें बताया गया कि उस परिवार में एक स्त्री थी जो गायत्री की बहुत उपासना करती थी और गायत्री जाप करती थी, और जिसकी अंतिम दशा बहुत बुरी हुई। वक्ता तुरंत कहते हैं कि आम आदमी बस इतना सुनकर गायत्री के बारे में नकारात्मक हो जाएगा और मान लेगा कि गायत्री नहीं करनी चाहिए — वह पूरा विषय नहीं समझेगा।
उन्होंने बताया, वक्ता कहते हैं, कि उनके परिवार में एक स्त्री थी जो गायत्री मंत्र की बहुत उपासना करती थी, गायत्री का जाप करती थी। उसकी अंतिम दशा बहुत बुरी हुई। अब आम आदमी जो बस इतना सुनेगा वह गायत्री के बारे में नकारात्मक हो जाएगा, मान लेगा कि गायत्री नहीं करनी चाहिए। वे पूरा विषय नहीं समझेंगे।
स्त्रियों के गायत्री जाप पर उनका क्या मत है?
मेनोपॉज़ के बाद कोई दिक़्क़त नहीं
वक्ता अपना मत बताते हैं: जब स्त्री का मेनोपॉज़ हो जाए, तो उसके बाद वह गायत्री करे तो भी कोई दिक़्क़त नहीं। यह, वे कहते हैं, उन्होंने वेद के जानकार विद्वानों से सुना है। अब जो पच्चीस-तीस की उम्र से गायत्री कर रहा है, वह इस बात पर अड़ा है कि यह कहीं लिखा नहीं और कहीं मना नहीं — और ऐसे हज़ारों वीडियो मिल जाएँगे।
अब हम एक बात कहते हैं, वक्ता कहते हैं: जब स्त्रियों का मेनोपॉज़ हो गया हो, तो उसके बाद वे गायत्री करें तो भी कोई दिक़्क़त नहीं। यह हमने विद्वानों से सुना है, वे कहते हैं, जो वेद के जानकार हैं। अब कोई पच्चीस-तीस की उम्र से गायत्री कर रहा है और इस पर अड़ा है: यह कहीं लिखा नहीं, कहीं मना नहीं। ऐसे हज़ारों वीडियो मिल जाएँगे।
वेदोक्त उच्चारण की मनाही कहाँ लिखी है?
शिव महापुराण और विश्वसार संहिता
जब लोग पूछते हैं कि कहाँ लिखा है, तो वक्ता जवाब देते हैं: तो पढ़ो। शिव महापुराण पढ़ो — उसमें वेदोक्त के बारे में लिखा है कि इन मंत्रों का उच्चारण इस-इस तरह नहीं करना चाहिए। विश्वसार संहिता पढ़ो, जिसका वे कई बार ज़िक्र कर चुके हैं। आप मानते नहीं, कर डालते हैं, और दिक़्क़त होती है।
और वे कहते हैं, कहाँ लिखा है? तो पढ़ो भाई, वक्ता जवाब देते हैं। शिव पुराण पढ़ो। उसमें वेदोक्त के बारे में लिखा है कि इन मंत्रों का उच्चारण इस-इस तरह नहीं करना चाहिए। विश्वसार संहिता पढ़ो — वे कहते हैं कि यह कई बार कह चुके हैं। आप मानते नहीं, जाकर कर डालते हैं, और दिक़्क़त होती है।
वह बिस्तर पर पड़ी रही, और सेवा करने वाले भी पास नहीं जा पाते थे
बिस्तर पर पड़ी, सेवा करने वालों की पहुँच से बाहर
उन्हें बताया गया कि हालत इतनी बिगड़ गई कि वह बिस्तर पर पड़ी रही, और उसके शरीर की निवृत्ति भी ऐसी थी कि लोग पास जाकर करवा नहीं पाते थे। वक्ता कहते हैं कि यह यहाँ कर्ण पिशाचिनी वाली दशा हो गई थी।
उन्होंने बताया, वक्ता कहते हैं, कि हालत इतनी बिगड़ गई कि वह बिस्तर पर पड़ी रही, और उसके शरीर की निवृत्ति भी ऐसी थी कि लोग पास जाकर करवा नहीं पाते थे। यह यहाँ कर्ण पिशाचिनी जैसी दशा हो गई थी, वे कहते हैं।
ज्योतिष में नए आए लोग ऐसे लोगों को आदर्श मान लेते हैं
नए लोग ऐसे लोगों को आदर्श मानते हैं
क्योंकि अगर आप लोगों को ग़लती करते देख रहे हैं, तो सोचिए कितने नए लोग होंगे जो ज्योतिष पढ़ने या समझने आए, और ऐसे लोगों को आदर्श मान लिया जाता है। ज्योतिष शास्त्र को वेदों की आँख कहा जाता है: जो इसे पढ़ता है और इससे रोज़ी कमाता है — या ज्योतिष को बस बड़े शौक़ के लिए भी इस्तेमाल करता है — उसका यह कहना कि सुबह हम ज्योतिष पर सम्मेलन करते हैं और शाम को पार्टी होती है जिसमें थोड़ा पीना होता है, और फिर आपत्ति का विरोध झगड़े और गाली से करना: यह, वे कहते हैं, आज सहा नहीं जाएगा।
अगर आप लोगों को अपराध करते देख रहे हैं, वक्ता कहते हैं, तो सोचिए कितने नए लोग होंगे जो ज्योतिष का विषय पढ़ने या समझने आए हैं — और लोग ऐसे लोगों को आदर्श मान लेते हैं। अब ज्योतिष शास्त्र को वेदों की आँख कहा जाता है। जो इसे पढ़ता है और इससे अपनी रोज़ी कमाता है, या जो बड़े उत्साह के लिए भी ज्योतिष इस्तेमाल करता है, वह कहता है कि सुबह हम ज्योतिष पर सम्मेलन करते हैं और शाम को पार्टी होती है जिसमें थोड़ा पीना होता है। आप क्या कह रहे हैं, वे पूछते हैं। और इसका विरोध करने पर आप झगड़े और गाली पर उतर आते हैं। तो आप जान लीजिए, वे कहते हैं: यह आज सहा नहीं जाएगा।
अनधिकृत मंत्र जाप के बारे में कर्म विपाक क्या कहता है?
कई जन्मों तक गधे का जन्म
वक्ता कहते हैं कि कर्म विपाक हर पुराण में मिलेगा, और पढ़ेंगे तो पाएँगे कि जो अनधिकारी होकर इन मंत्रों का जाप करता है वह कई जन्मों तक गधे का जन्म लेता है। यही कर्म विपाक है। आप जाकर देखने तो जाएँगे नहीं — पर कम से कम जान तो लेंगे।
जीव को अपने पिछले जन्मों का पता कब चलता है?
माँ के गर्भ में गर्भ स्तुति
इसके लिए, वक्ता कहते हैं, श्रीमद् भगवद् गीता पर जाइए, और फिर पार्वती गीता पढ़िए: उसमें लिखा मिलेगा कि जब जीव माँ के गर्भ में होता है, तो उसके सब पिछले जन्मों की सारी गति उसे याद आ जाती है, सब उसकी स्मृति में रहता है — कितनी बार जन्म लिया — और वहाँ वह गर्भ स्तुति करता है कि हमने इतनी बार जन्म लिया और हमारी यह दशा रही, हमने ये-ये बुरे कर्म किए, इस बार ऐसा नहीं करेंगे, इस बार भगवती की आराधना करेंगे। यह ख़ासकर तब होता है जब व्यक्ति मनुष्य के गर्भ में आता है।
अब समझिए कि आपको कब पता चलेगा, वक्ता कहते हैं। इसके लिए श्रीमद् श्रीमद्भगवद्गीता पर जाइए। फिर पार्वती गीता पढ़िए, उसमें लिखा आएगा — कि जब जीव माँ के गर्भ में होता है, तो उसके सब पिछले जन्मों की सारी गति उसे याद आ जाती है; सब उसकी स्मृति में रहता है कि हमने इतनी बार जन्म लिया। और वहीं वह गर्भ स्तुति करता है: कि हमने इतनी बार जन्म लिया और हमारी यह दशा रही, कि हमने ये-ये बुरे कर्म किए, कि इस बार ऐसा नहीं करेंगे, कि इस बार भगवती की आराधना करेंगे। ख़ासकर जब व्यक्ति मनुष्य के गर्भ में आता है, वे कहते हैं। पशु-पक्षियों के गर्भ में जाने पर भी शायद ऐसा बोध होता हो — उन्होंने पढ़ा नहीं, पर उन्हें भी बोध होता होगा; बस उनके किस काम का, क्योंकि उन्हें सोचने या विचार करने की क्षमता ही नहीं मिलती।
पद्म पुराण के नौवें अध्याय का माहात्म्य क्या बताता है?
श्रापित अप्सरा जो कमलिनी बन गई
अगर भगवान की कृपा से हम पद्म पुराण के अनुसार श्रीमद् भगवद् गीता का माहात्म्य देखें, वक्ता कहते हैं, तो नौवें अध्याय का माहात्म्य पढ़ने पर मिलता है कि एक अप्सरा को ऋषि दुर्वासा ने श्राप दिया था और वह कमलिनी बन गई थी। वह एक तालाब में कमल, कमलिनी बनकर थी, जब ऊपर से गुज़रता एक गंधर्व उसके ऊपर से निकला और गिर पड़ा — उसकी शक्ति कुंठित हो गई। उसने पूछा तुम कौन हो और ऐसी दशा कैसे हुई, और उसने बताया कि वह पहले ऐसी थी, उसे श्राप मिला, पर फिर उसने भगवद् गीता का नौवाँ अध्याय पढ़ा और ऐसा हुआ।
और यह भगवान की कृपा से होता है, वक्ता कहते हैं: अगर हम पद्म महापुराण के अनुसार श्रीमद् भगवद् गीता का माहात्म्य देखें, तो यह उनमें है। जब आप नौवें अध्याय का माहात्म्य पढ़ते हैं, तो उसमें है कि एक अप्सरा को ऋषि दुर्वासा ने श्राप दिया था और वह कमलिनी बन गई थी। कमल, कमलिनी बनकर वह एक तालाब में थी, और एक गंधर्व — वे कहते हैं नाम याद नहीं, माहात्म्य पर पहुँचेंगे तो याद आ जाएगा — ऊपर से गुज़र रहा था; जब वह कमलिनी के ऊपर से निकला तो ऊपर से गिर पड़ा और उसकी शक्ति कुंठित हो गई। उसने उससे पूछा कि तुम कौन हो और ऐसी दशा कैसे हुई, और उसने बताया कि वह पहले ऐसी थी, उसे श्राप मिला था, पर फिर उसने भगवद् गीता का नौवाँ अध्याय पढ़ा और ऐसा हुआ। तो हो सकता है, वे कहते हैं, कि जड़ — पेड़ आदि — और पशुओं को भी कहीं न कहीं भगवान की कृपा से इसका आभास होता हो, जिसे आप-हम समझ न पाएँ। दूसरे अध्याय में भी, वे जोड़ते हैं, उन्होंने उस तोते के बारे में पढ़ा था जो भगवद् गीता जानता था और सुनाता था।
कर्म विपाक की चेतावनी से लोग रुकते क्यों नहीं?
जब तक आप ख़ुद बैल न बनें, इसे कहानी कहेंगे
दिक़्क़त यह है, वक्ता कहते हैं, कि जब कोई गधा या खच्चर या बैल या कुछ और बनता है, तो आप-हमें पता तो चलने वाला नहीं। हम कहेंगे यह कहानी है — पर जब आप ख़ुद बैल बनेंगे, तब क्या करेंगे? अभी आप कर्म विपाक नहीं मान रहे; अभी कहेंगे कि हम पीकर ज्योतिष करेंगे, तुम्हें क्या परेशानी; कि जो मंत्र तुम कहते हो नहीं करना, हम वही करेंगे।
पर दिक़्क़त यह है, वक्ता कहते हैं: जब कोई गधा बनता है, या खच्चर, या बैल, या जो भी, आप-हमें वह बात पता तो चलने वाली नहीं। हम कहेंगे यह कहानी है। पर जब आप ख़ुद बैल बनेंगे, तब उस समय क्या करेंगे? अभी आप कर्म विपाक नहीं मान रहे। अभी आप कहेंगे: हम पीकर ज्योतिष करेंगे, तुम्हें क्या परेशानी है। जो मंत्र तुम कहते हो नहीं करना, हम वही करेंगे।
लोग कौन से वर्जित मंत्र करने पर अड़ते हैं?
कार्तवीर्य अर्जुन, महादत्त, और सिद्ध कुंजिका के बृहद् मंत्र
वक्ता उन्हें वैसे ही गिनाते हैं जैसे उन्हें पलटकर कहे जाते हैं: हम हज़ार भुजाओं वाले कार्तवीर्य अर्जुन का मंत्र करेंगे, महादत्त मंत्र करेंगे — मना करो तो करो; सिद्ध कुंजिका के पूरे बृहद् मंत्र करेंगे। और, वे जोड़ते हैं, जितना आप किसी गुप्त मंत्र को खोलकर यूट्यूब और फ़ेसबुक पर डालेंगे, उतना वायरल होगा, उतने फ़ॉलोअर मिलेंगे और उतने लोग करेंगे।
अभी आप कहेंगे, वक्ता बताते हैं: जो मंत्र तुम कहते हो नहीं करना, हम वही मंत्र करेंगे। हम सहस्रबाहु का, कार्तवीर्य अर्जुन का मंत्र करेंगे; हम महादत्त मंत्र करेंगे। मना करना है तो करो। कैसे नहीं — हम सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् के पूरे बृहद् मंत्र करेंगे। और जितना आप किसी गुप्त मंत्र को खोलकर यूट्यूब और फ़ेसबुक पर डालेंगे, उतना वायरल होगा, उतने फ़ॉलोअर मिलेंगे, उतने लोग करेंगे। वे कहते हैं उन्हें उनसे कोई लेना-देना नहीं; सीधी बात यह है कि मेरे व्यूज़ आएँ और मुझे पैसा मिले, बस।
घर में नौ दिन का सप्तशती अनुष्ठान असल में कितने का पड़ता है?
घरेलू अनुष्ठान के नौ दिनों का हिसाब
वक्ता श्रोताओं से कहते हैं कि ख़ुद करके देखें। घर में रोज़ दुर्गा सप्तशती का साधारण पाठ कीजिए — साधारण पाठ तीन, साढ़े तीन या चार घंटे का होता है। माई को कम से कम एक फूल चढ़ाएँगे; कलश स्थापना करेंगे; अखंड ज्योत में कम से कम तीन-चार किलो घी या तीन-चार किलो सरसों का तेल लगेगा; रोज़ व्रत रखेंगे और खाएँगे-पिएँगे। इतना कीजिए, वे कहते हैं, और देखिए कि सीमा पंद्रह-बीस हज़ार से कम होगी क्या — और यह एक व्यक्ति के करने पर।
इस नवरात्र में दुनिया में ढूँढ़कर देखिए, वक्ता कहते हैं: नौ दिन का अनुष्ठान — अपने घर से, अपने घर में दुर्गा सप्तशती का साधारण पाठ कीजिए, और देखिए कैसे हो पाता है। घर में रोज़ दुर्गा सप्तशती का पाठ कीजिए। साधारण पाठ तीन, साढ़े तीन, चार घंटे का पाठ है। उसके अलावा माई को कम से कम एक फूल चढ़ाएँगे। कलश स्थापना कीजिए। अखंड ज्योति में कम से कम तीन-चार किलो घी या तीन-चार किलो सरसों का तेल लगेगा। रोज़ व्रत रखेंगे, तो खाएँगे-पिएँगे भी। इतना तो करेंगे न — फिर देखिए कि सीमा पंद्रह-बीस हज़ार से कम कुछ होगी क्या। और यह एक व्यक्ति के करने पर है।
जिसके पास बिल्कुल पैसा नहीं, वह मुफ़्त में क्या कर सकता है?
एक आसन, सप्तशती की एक किताब, और हिंदी में नौ दिन का पाठ
दुर्गा सप्तशती का एक-एक विधान चैनल पर दिया गया है, वक्ता कहते हैं। कोई आपसे ₹2100 नहीं माँग रहा — ख़ुद कीजिए। अगर आप ग़रीब हैं, तो पढ़ने में पैसा नहीं लगता। दो-तीन घंटे के लिए एक दीपक जलाइए; वह भी न जला सकें तो मंदिर में जाइए; एक आसन लीजिए; सप्तशती की एक किताब ख़रीदकर साथ ले जाइए। आपको हिंदी पढ़नी आती है, तो बैठकर हिंदी में पढ़िए। नौ दिन पढ़िए — रोज़ तेरहवाँ अध्याय; और अगर तेरहवाँ अध्याय नहीं हो पाएगा, तो महाविद्या क्रम भी समझाया गया है, उसे देखकर कीजिए।
आप कह रहे हैं कि कुछ भी मुफ़्त नहीं दिया गया, वक्ता जवाब देते हैं। दुर्गा सप्तशती का एक-एक विधान चैनल पर दिया गया है। आपसे कौन कुछ माँग रहा है? कौन कह रहा है कि ₹2100 दो? ख़ुद कीजिए। आप ग़रीब हैं — पर पढ़ने में पैसा नहीं लगता। दो-तीन घंटे के लिए एक दीपक जलाइए; वह भी न जला सकें तो मंदिर में जाइए; एक आसन लीजिए। न हो सके, तो उन्हें बताइए, वे ₹500 भेज देंगे — एक अच्छा आसन ख़रीदकर उस पर बैठिए। और सप्तशती की एक किताब ख़रीदकर साथ ले जाइए। आपको हिंदी पढ़नी आती है न। बैठकर हिंदी में पढ़िए। नौ दिन पढ़िए: रोज़ तेरहवाँ अध्याय — और अगर तेरहवाँ अध्याय नहीं पढ़ पाएँगे, तो महाविद्या क्रम भी समझाया गया है, उसे देखकर कीजिए।
महाकाली तंत्रोक्त मंडल पूजन असल में किसके लिए है?
जिनकी कुलदेवी कालिका हैं, या जो जीवन भर उनकी पूजा करेंगे
लोग महाकाली तंत्रोक्त मंडल पूजन मुफ़्त चाहते हैं, वक्ता कहते हैं — ऐसी चीज़ जिसकी उन्हें कोई ज़रूरत ही नहीं, पर वे देखते हैं कि वह पैसे वाली है। ज़रूरत क्या है? क्या आपको काली जी की पूजा करनी है? क्या जीवन में कभी काली जी के दरबार गए हैं? जिसकी कुलदेवी कालिका हैं, या जिसकी कुलदेवी काली जी से जुड़ी हैं, या जिसे ज़रूरत है, या जो जीवन भर काली जी की पूजा करना चाहता है — ऐसा व्यक्ति माँगे तो बात बनती है: लो भाई, करो। सिखाया जाएगा, वीडियो-दर-वीडियो दिखाया जाएगा; कोई बड़ी बात नहीं।
आपको इतनी ज़रूरी चीज़ें इतने खुले हाथ से दी जा रही हैं, वक्ता कहते हैं, और आप उन्हें नहीं चाहते। आप चाहते हैं महाकाली तंत्रोक्त मंडल पूजन, मुफ़्त — ऐसी चीज़ जिसकी आपको कोई ज़रूरत ही नहीं; पर आप देख रहे हैं कि वह पैसे वाली है। ज़रूरत क्या है? क्या आपको काली जी की पूजा करनी है? क्या जीवन में कभी काली जी के दरबार गए हैं? आप इसे क्यों चाहते हैं भाई? जिसकी कुलदेवी कालिका हैं, जिसकी कुलदेवी काली जी से जुड़ी हैं, जिसे इसकी ज़रूरत है, जो जीवन भर काली जी की पूजा करना चाहता है — अगर ऐसे व्यक्ति को ज़रूरत है और वह उनसे माँगता है, तो बात भी बनती है: मुझे दीजिए, वह कहता है। लो भाई, करो। सिखाया जाएगा; वीडियो-दर-वीडियो दिखाया जाएगा; कोई बहुत बड़ी बात नहीं। सीखो, करो।
वे एक साधारण व्यक्ति हैं जिनकी एकाग्रता टूट सकती है, कोई बड़े सिद्ध नहीं
एक साधारण व्यक्ति जिसकी एकाग्रता टूट सकती है
वक्ता साफ़ कहते हैं कि वे कोई बड़े सिद्ध नहीं हैं, और किसी भी तरह की साधना करते समय दिक़्क़त यहीं से शुरू होती है। लोग पूछते हैं कि वे इतने दिन लाइव क्यों नहीं आते, वीडियो क्यों नहीं आते, बात क्यों नहीं करते — यही, वे कहते हैं, कारण है। अगर हम जाप करने बैठे हैं, तो हम आप जैसे ही हैं: मन को समेटना पड़ता है। लोग ऐसी बातें कहेंगे कि फिर उन्हीं बातों पर विचार चलेगा, और मन को रोकने का जो अभ्यास बना है वह तुरंत चला जाएगा।
और कुल मिलाकर, जब कोई व्यक्ति किसी के बारे में इस तरह बोलता है, वक्ता कहते हैं — हम बहुत कहते हैं कि हम सिद्ध हैं, पर हम कोई सिद्ध नहीं हैं। आप जो कहते हैं कि आप सिद्ध हैं, यह-वह — ऐसा कुछ नहीं। जब किसी भी तरह की साधना की जाती है, तो दिक़्क़त ठीक यहीं से शुरू होती है। आप लोग पूछते हैं कि वे इतने दिन लाइव क्यों नहीं आते, इतने दिन वीडियो क्यों नहीं आते, इतने दिन बात क्यों नहीं करते। यही कारण है। अगर हम जप करने बैठे हैं, तो हम भी आप जैसे ही हैं। मन को समेटना पड़ता है। लोग ऐसे बोलेंगे कि फिर उन्हीं शब्दों पर विचार चलेगा, और मन के संयम का जो अभ्यास बना है वह तुरंत चला जाएगा। जितना चाहे कीजिए — हम साधारण लोग हैं। हाँ, फ़ेसबुक और यूट्यूब पर सिद्ध लोग हैं जो कहते हैं कि उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। हमें फ़र्क़ पड़ता है, वे कहते हैं; हम उनके जितने बड़े सिद्ध नहीं हैं।
जो उस अवस्था तक पहुँचता है, उसका आधा दिन बोलने की क्षमता के बिना बीतता है
आधा दिन बोलने की क्षमता के बिना बीतता है
अगर हम इतने बड़े सिद्ध हो जाते, वक्ता कहते हैं, तो वे जानते हैं कि हम यूट्यूब या फ़ेसबुक पर कुछ कह ही नहीं पाते — मुँह खुलता ही नहीं। जब व्यक्ति उस अवस्था को पाता है, तो आधा दिन यों ही बीत जाता है, और कुछ करने या कहने की अवस्था ही नहीं बनती। जो उस तरह की साधना कर रहे हैं वे ख़ुद यह देख सकते हैं: सब छोड़ देने की, एकांत में रहने की, किसी से न मिलने की, काम-धंधा तक छोड़ देने की इच्छा उठती है; मन में अलग तरह का भाव प्रकट होता है।
अगर हम इतने बड़े सिद्ध हो जाते, वक्ता कहते हैं, तो हम जानते हैं कि यूट्यूब या फ़ेसबुक पर कुछ कह नहीं पाते। मुँह खुलता ही नहीं। जब व्यक्ति उस अवस्था को पाता है, तो आधा दिन यों ही बीत जाता है; कुछ करने या कहने की अवस्था ही नहीं बनती। और जो लोग उस तरह की साधना कर रहे हैं वे यह बात ख़ुद देख सकते हैं। इच्छा उठती है: छोड़ो, एकांत में रहो, किसी से मिलो-जुलो मत। काम-धंधा भी छूट जाए; मन में अलग तरह का भाव प्रकट होता है। पर जिनका इन सब बातों से कोई लेना-देना नहीं, वे आकर ठीक इसी तरह बोलेंगे, और फिर ऐसी बातें मन में चलेंगी।
जब मन किसी झगड़े में फँसा हो, तो पूजा की ऊर्जा कहाँ जाती है?
इष्ट के लिए बनी शक्ति का किसी व्यक्ति की ओर मुड़ना
वक्ता कहते हैं कि पूजा में जो ऊर्जा भगवान की ओर जानी चाहिए, अपने इष्ट आराध्य की ओर जानी चाहिए, वह जब उसकी जगह उन लोगों की ओर जाने लगे — यही ठीक-ठीक दोष है। हमारा अपना भला नहीं हो रहा।
और जब पूजा में जो ऊर्जा भगवान की ओर जानी चाहिए, जो अपने इष्ट देवता और आराध्य की ओर जानी चाहिए, वह अब उसकी जगह उनकी ओर जाने लगे — यही बात, वक्ता कहते हैं, दोष है। हमारा अपना भला तो वैसे भी नहीं हो रहा।
छत्तीस-अक्षरी से पीतांबरा के उग्र रूप की उपासना में दफ़्तर का बॉस निशाना बन जाता है
पीतांबरा का उग्र रूप, छत्तीस-अक्षरी, और बॉस
मान लीजिए हम किसी दफ़्तर में काम करते हैं और हमारा बॉस हमें गाली देता है और ग़लत बोलता है — ऐसा सामान्य रूप से होता है। और मान लीजिए हम भगवती पीतांबरा के उग्र रूप की उपासना कर रहे हैं, रोज़ छत्तीस-अक्षरी का जाप करते हैं। अब छत्तीस-अक्षरी का जाप वीर भाव में होता है; हम वीर भाव में जाप कर रहे हैं, तो जब भी शत्रु के बारे में सोचेंगे, वहाँ शत्रु के रूप में कौन दिखेगा? वहाँ शत्रु के रूप में वही बॉस दिखेगा जिसने हमसे ग़लत बोला। पूरी ऊर्जा उसी पर केंद्रित हो जाएगी।
इसका भी एक सीधा उदाहरण, वक्ता कहते हैं: थोड़ी देर के लिए मान लीजिए कि हम किसी दफ़्तर में काम करते हैं। अब हमारे बॉस ने हमें गाली दी है, हमसे ग़लत बोला है — ऐसा सामान्य रूप से होता है। और हम भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। के उग्र रूप की पूजा कर रहे हैं। मान लीजिए हम छत्तीस-अक्षरी का जाप करते हैं, रोज़ कर रहे हैं। अब जब छत्तीस-अक्षरी का जाप होता है, तो वह वीर भाव में होता है। हम वीर भाव में जाप कर रहे हैं — तो जब भी शत्रु के बारे में सोचेंगे, वहाँ हमें शत्रु के रूप में कौन दिखेगा? वहाँ शत्रु के रूप में वही बॉस दिखेगा जिसने हमसे ग़लत बोला। पूरी ऊर्जा उसी पर केंद्रित हो जाएगी। उसका इससे कोई ख़ास संबंध नहीं। हो सकता है जब उसने ऐसा कहा तब हम ही ग़लत थे, या हो सकता है उसने जानबूझकर कहा। पर अगर ऐसा विषय मेरे मन में आ गया, ऐसे भाव आ गए, और हम ऐसे मंत्र का जाप कर रहे हैं, तो इस मंत्र का पूरा असर उसी व्यक्ति पर केंद्रित हो जाएगा।
जब जापक के पीछे पहले से लाखों जाप हों, तो परिणाम क्या होता है?
गर्भपात की निन्यानवे प्रतिशत आशंका, और पचास तरह के दोष
अगर हम पहले ही लाखों-लाखों जाप कर चुके हैं, वक्ता कहते हैं, तो उस व्यक्ति का दुर्भाग्य पहले ही दिन से शुरू हो जाएगा। जैसे, मान लीजिए उस आदमी की पत्नी गर्भवती है: लगभग निन्यानवे प्रतिशत आशंका होगी कि उसका गर्भपात हो जाए। क्योंकि यहाँ मंत्र सिद्ध है, शत्रु स्तंभित हो गया, और पचास तरह के दोष लग गए। पर जो मंत्र जाप कर रहा था वह भी नहीं बचेगा — वह भी दूषित होगा।
और अगर हम पहले ही लाखों-लाखों जाप कर चुके हैं, वक्ता कहते हैं, तो पहले ही दिन से उस व्यक्ति का दुर्भाग्य शुरू हो जाएगा। अब जैसे, मान लीजिए उस आदमी की ब्याहता पत्नी गर्भवती है। तो लगभग निन्यानवे प्रतिशत आशंका होगी कि उसका गर्भपात हो जाए। क्योंकि यहाँ मंत्र सिद्ध है, शत्रु स्तंभित हो गया, और पचास तरह के दोष लग गए। पर जो मंत्र जाप कर रहा था वह भी नहीं बचेगा। वह भी दूषित होगा।
साधकों से सोशल मीडिया से दूर रहने को क्यों कहा जाता है?
पूजन में एकाग्रता, और बहस का ख़तरा
इसीलिए, वक्ता कहते हैं, कहा जाता है कि पूजन-पाठ के समय मन को समेटकर एक जगह स्थिर रखना चाहिए, और यह एक कारण है कि साधकों से कहा जाता है कि जहाँ तक हो सके, आज के हिसाब से, सोशल मीडिया से दूर रहें। क्योंकि सोशल मीडिया पर जाएँगे तो यों ही कोई बहस या जवाबी बहस हो जाती है, आप कहीं उलझ जाते हैं, और फिर आपकी पूरी ऊर्जा कहीं और केंद्रित हो जाती है।
असल में वार किसकी क्षमता करती है?
मंत्र और उसके देवता की औक़ात, और लौटकर आने वाला बराबर का नुक़सान
पर व्यक्ति की तो ऐसी क्षमता होती नहीं, वक्ता कहते हैं: क्षमता उस मंत्र की और उस मंत्र के देवता की है। जब आप जाप करते हैं तो वह सीधे असर देता है, और अगर ग़लती से आपने उसकी सिद्धि कर ली, तो बहुत बड़ा नुक़सान है। और याद रखिए: सामने वाले का जितना नुक़सान होगा, ठीक उतना ही नुक़सान आपका होगा। अब प्रायश्चित्त कीजिए, मंत्र शुद्धि करते रहिए, गुरु के सामने मानिए कि अपराध हुआ है — तभी कुछ ठीक होता है।
पर व्यक्ति की तो औक़ात होती नहीं, वक्ता कहते हैं। औक़ात उस मंत्र की है, और उस मंत्र के देवता की। जब आप जाप करते हैं, तो वह सीधे अपना असर देता है। और अगर ग़लती से आपने उसकी सिद्धि कर ली, तो बहुत बड़ा नुक़सान है। और सामने वाले का जितना नुक़सान होगा, याद रखिए — ठीक उतना ही नुक़सान आपका होगा। अब प्रायश्चित्त कीजिए; मंत्र शुद्धि करते रहिए; गुरु के सामने मानिए कि अपराध हुआ है। तभी बात ठीक होती है। पर हम तो अपराध मानेंगे भी नहीं।
लोग अब उन्हीं गुरुओं की सार्वजनिक निंदा करने बैठते हैं जिनसे सीखा
जिससे सीखा, उसकी सार्वजनिक निंदा
आजकल लोग बैठकर अपने ही गुरुओं की निंदा कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं — अच्छे गुरुओं की। उन्होंने यूट्यूब पर और उनके फ़ेसबुक पर देखा है: वे उन्हीं लोगों की निंदा करते हैं जिनसे सीखा। अब पूरी दुनिया जानती है कि वे उनके गुरु हैं — तो हमें मानने वाले क्या सीखेंगे, अगर हम अपने ही गुरु के ख़िलाफ़ बोलें?
आजकल लोग बैठकर अपने ही गुरुओं की निंदा कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं — अच्छे-अच्छे गुरुओं की। उन्होंने यूट्यूब पर और उनके फ़ेसबुक पर देखा है: वे बैठकर उन्हीं की निंदा करते हैं जिनसे सीखा। अब पूरी दुनिया को पता चल रहा है कि वे उनके गुरु हैं। तो हमें मानने वाले लोग क्या सीखेंगे, अगर हम अपने ही गुरु के ख़िलाफ़ बोलें? यही हालत बन जाती है।
नवरात्र में साधक अपने कार्यस्थल पर क्या करे?
छुट्टी लें, कम बोलें, जवाब न दें, और मन में कुछ न बैठने दें
इसी कारण, वक्ता कहते हैं, अगर आप ख़ासकर नवरात्र में साधना करने जा रहे हैं, तो हो सके तो जहाँ काम करते हैं वहाँ से छुट्टी ले लीजिए; न हो सके, तो कम से कम जितना हो सके कम बोलिए; और कोई कुछ कहे तो बिल्कुल जवाब मत दीजिए — निष्क्रिय रहिए। और वह बात मन में भी मत बैठने दीजिए। मन में बैठ गई तो संकल्प पूरा होगा ही नहीं: नवरात्र में आप जो भी पूजन-पाठ कर रहे हों, पूरी ऊर्जा उसके विनाश में लग जाएगी, और उसका परिणाम आपको भी भुगतना पड़ेगा।
अनुष्ठान चलते समय वीडियो और लाइव क्यों बंद हो जाते हैं?
पहले ख़ुद को बचाइए, फिर दूसरे को
यही कारण है, वक्ता कहते हैं, कि नवरात्र हो या कोई भी पर्व काल, जब उनका अपना अनुष्ठान चलता है तो वीडियो कम आते हैं, लाइव कम आते हैं, और वे बिल्कुल बात नहीं करते। क्योंकि पहले हम ख़ुद को बचाएँगे, तभी दूसरे को बचाएँगे। वे कहते हैं यह व्यावहारिक रूप से उनका अपना अनुभव है, और वे बता रहे हैं कि यह दिक़्क़त हो सकती है — मानिए या न मानिए, आपकी मर्ज़ी।
यही कारण है, वक्ता कहते हैं: नवरात्र हो या कोई भी पर्व काल, जब अपना अनुष्ठान चल रहा होता है तो वीडियो कम आते हैं, लाइव कम आते हैं, और वे बिल्कुल बात नहीं करते। क्योंकि पहले हम ख़ुद बचेंगे, तभी दूसरे को बचाएँगे। यह व्यावहारिक रूप से उनका अपना अनुभव है, वे कहते हैं, इसलिए वे बताते हैं कि यह दिक़्क़त हो सकती है। मानिए या न मानिए — यह आपकी अपनी इच्छा है।
जिनकी कुंडली में नवग्रह दोष हैं, उनके लिए क्या बताया गया है?
नौ ग्रह और उनकी माताएँ नव योगिनियों के रूप में
वक्ता कहते हैं कि जिनकी कुंडली में नवग्रह से जुड़े दोष हैं: नवग्रहों की माताएँ हैं, और नौ ग्रहों की उन माताओं का रूप नव योगिनियों का माना गया है। इन सबसे जुड़े मंत्र चैनल पर पूरे विस्तार से दिए गए हैं।
नवरात्र में नवग्रह साधना कैसे की जाती है?
हर दिन एक ग्रह, कम से कम पाँच माला
नवग्रहों और उनकी माताओं की साधना नवरात्र में हर दिन एक ग्रह की करनी है, और पूरा विधि विधान समझाया गया है। आपको जो भी दोष हो — चंद्र और केतु का ग्रहण दोष, पिशाच दोष, कुंडली में बना पितृ दोष — बहुत न कर सकें तो भी नवरात्र में इन नौ तरह की देवियों, सप्त देवियों, का कम से कम पाँच माला जाप करना चाहिए। सप्त देवियाँ, वे कहते हैं, नवग्रहों के साथ माताएँ हैं।
अगर ग्रह भगवती से नीचे हैं, तो उनका जाप क्यों करें?
भगवती का अपना कथन कि वे ही नक्षत्र और ग्रह हैं
वक्ता आपत्ति लेते हैं — कि ग्रह और नक्षत्र भगवती से नीचे हैं, ऊपर नहीं, तो ग्रहों का जाप क्यों करें — और जवाब देते हैं: भगवती दुर्गा के माला मंत्र पढ़िए, या उनका सहस्रनाम पढ़िए, वहाँ माई ख़ुद कह रही हैं सप्तविंशति नक्षत्रेण रूपेण, यानी सत्ताईस नक्षत्रों का रूप मैं ही हूँ; नवग्रहों का रूप मैं ही हूँ। तो ग्रहों और नक्षत्रों के सब रूप भगवती के ही हैं; कहीं न कहीं उन्होंने ख़ुद उन्हें बनाया, कहकर कि लोगों के कर्मों के अनुसार उनके जीवन में असर दो। इसलिए हम नवग्रहों को लाँघकर आगे नहीं जा सकते।
अब कोई कह सकता है कि ग्रह और नक्षत्र भगवती से नीचे हैं, ऊपर नहीं, तो हम ग्रहों का जाप क्यों करें — यह भी एक प्रश्न है, वक्ता कहते हैं। तो भाई, यह भी पढ़िए। कभी भगवती दुर्गा के माला मंत्र पढ़िए, या उनका सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। पढ़िए, उसमें माई ख़ुद कह रही हैं: सप्तविंशति नक्षत्रेण रूपेण — यानी सत्ताईस नक्षत्रों का रूप मैं ही हूँ। नवग्रहों का रूप मैं ही हूँ। तो ग्रहों और नक्षत्रों के सब रूप भगवती के ही हैं। कहीं न कहीं उन्होंने ख़ुद उन्हें बनाया है, कहकर कि लोगों के कर्मों के अनुसार उनके जीवन में असर दो। तो हम नवग्रहों से आगे निकलकर नहीं जा सकते।
लग्न कुंडली के अनुसार किन चार ग्रहों का जाप करना चाहिए?
लग्नेश, पंचमेश, नवमेश और लाभेश
यह जानना बहुत ज़रूरी है, वक्ता कहते हैं, कि आपकी कुंडली किस लग्न की है, क्योंकि उसके अनुसार चार ग्रहों का जाप करना चाहिए: लग्नेश, पंचमेश, नवमेश, और ग्यारहवें — यानी लाभेश — का। ज्योतिष के अनुसार ये चार ग्रह।
वे इसे बहुत सीधे बताते हैं, वक्ता कहते हैं: लग्न कुंडली के अनुसार कौन सा जाप और कैसे करना है। यह जानना बहुत ज़रूरी है कि आपकी कुंडली किस लग्न की है। उसके अनुसार किन चार ग्रहों का जाप करना चाहिए: लग्नेश का, पंचमेश का, नवमेश का, और ग्यारहवें का — यानी लाभेश का। ज्योतिष के अनुसार ये चार ग्रह।
ग्रहों का जाप राशि से तय हो या लग्न से?
सूर्य कुंडली को सबसे ज़रूरी माना गया
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने ज्योतिष पर बहुत कम वीडियो डाले हैं, पर हर लग्न कुंडली का एक है। उन्होंने राशि के अनुसार नहीं डाले, राशि का जाप नहीं बताया, चंद्र कुंडली का नहीं बताया, सूर्य कुंडली का बताया है — सूर्य कुंडली सबसे ज़रूरी है। चंद्र कुंडली की अपनी मान्यता है, बिल्कुल है, पर वे सूर्य कुंडली और लग्न कुंडली के अनुसार जाप बताते हैं: किन ग्रहों का जाप करना चाहिए। बाक़ी सब, दशांतर दशा, छोड़िए, वे कहते हैं — इतना भी करने से बहुत शुभ असर मिलता है।
उन्होंने ज्योतिष पर बहुत कम वीडियो डाले हैं, वक्ता कहते हैं, पर हर लग्न कुंडली का एक है। उन्होंने राशि के अनुसार नहीं डाले; राशि का जाप नहीं बताया; चंद्र कुंडली नहीं बताई; सूर्य कुंडली बताई है। सूर्य कुंडली सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। चंद्र कुंडली की अपनी मान्यता है, बिल्कुल है — पर सूर्य कुंडली और लग्न कुंडली के अनुसार कौन सा जाप और कैसे करना चाहिए, और किन ग्रहों का जाप करना चाहिए। और बाक़ी, दशांतर दशा, छोड़िए, वे कहते हैं: केवल इतना भी करें, तो बहुत शुभ असर मिलता है।
कुछ लोगों को तंत्र साधना में सिद्धि क्यों नहीं मिलती?
मेष लग्न कुंडली के पंचम में शनि
यह ग्रहों का असर है, वक्ता कहते हैं। जैसे, मान लीजिए लग्न कुंडली मेष लग्न की है और शनि देव पंचम भाव में बैठे हैं। पंचम में बैठे शनि देव अपनी तीसरी दृष्टि से सप्तम भाव को देखेंगे। शनि देव का पहला असर यह है कि वे जिस स्थान को देखते हैं उसे बढ़ाते हैं — कुछ कहते हैं वे उस स्थान की हानि करते हैं, पर यह इस पर निर्भर है कि वे लग्नेश के शत्रु हैं या मित्र, और उनका बल कितना है। पर अगर शनि पंचम स्थान में बैठे हों और कुंडली मेष लग्न की हो, तो जानिए कि अगर आप तंत्र विद्या से जुड़े विषय पढ़ें और उस राह पर जाएँ, तो आपको सफलता मिलने की संभावना ज़्यादा है।
जिनकी तंत्र साधना में सिद्धि नहीं हो रही — यह ग्रहों का असर है न, वक्ता कहते हैं। जैसे, मान लीजिए लग्न कुंडली मेष लग्न की है, और शनि देव पंचम भाव में बैठे हैं। पंचम भाव में बैठे शनि देव किस भाव को देखेंगे — उनकी तीसरी दृष्टि है। तीसरी दृष्टि से देखते हुए वे सप्तम भाव को देखेंगे। अब शनि देव का सबसे पहला असर यह है कि वे जिस स्थान को देखते हैं उसकी वृद्धि करते हैं। कुछ कहते हैं कि वे उस स्थान की हानि करते हैं, पर यह इस पर निर्भर है कि वे लग्नेश के शत्रु हैं या मित्र; यह इस पर भी निर्भर है कि उनका बलाबल कितना है। पर अगर शनि पंचम स्थान में बैठे हों और कुंडली मेष लग्न की हो, तो यह जानिए: अगर आप तंत्र विद्या से जुड़े विषय पढ़ें और उस राह पर जाएँ, तो आपको सफलता मिलने की संभावना ज़्यादा है।
शनि की कौन सी स्थितियाँ किसी भी शक्ति की तंत्रोक्त साधना के अनुकूल हैं?
मकर और कुंभ लग्न, शनि नवम, अष्टम या पंचम में
अगर कुंडली मकर या कुंभ लग्न की है, जिनके लग्नाधिपति स्वयं शनि देव हैं, और वे आपके नवम भाव में, या अष्टम भाव में, या पंचम भाव में बैठे हैं, और आप किसी भी शक्ति की तंत्रोक्त साधनाएँ करते हैं, तो आपको बहुत बड़ा लाभ होगा। पर आप बस इन्हीं को पकड़कर नहीं चल सकते, वक्ता कहते हैं: इसके अलावा बाक़ी भी देखना पड़ता है।
अगर कुंडली मकर और कुंभ लग्न की है, जिनके लग्नाधिपति स्वयं शनि देव हैं, वक्ता कहते हैं — अगर वे आपके नवम भाव में आकर बैठे हैं, अगर वे आपके अष्टम भाव में भी बैठे हैं, या पंचम भाव में बैठे हैं, और आप किसी भी शक्ति की तंत्रोक्त साधनाएँ करते हैं, तो आपको बहुत बड़ा लाभ होगा। पर आप बस इन्हीं को पकड़कर नहीं चल सकते; इसके अलावा बाक़ी भी देखना पड़ता है।
कुंडली में गूढ़ विद्या पर कौन से ग्रह राज करते हैं?
ख़ासकर पंचमेश, और राहु-केतु
ख़ासकर पंचमेश को ज़्यादा देखना पड़ता है, वक्ता कहते हैं। उसके बाद राहु और केतु को भी देखना पड़ता है, क्योंकि गूढ़ विद्या — यानी जादुई तंत्र और ऐसी सब चीज़ें — पर उनका आधिपत्य ज़्यादा है। ज्योतिष के अनुसार यही माना गया है।
ख़ासकर, वक्ता कहते हैं, पंचमेश को ज़्यादा देखना पड़ता है। फिर राहु और केतु को भी देखना पड़ता है, क्योंकि गूढ़ विद्या — यानी जादुई तंत्र, ये सब चीज़ें — पर उनका आधिपत्य ज़्यादा है। ज्योतिष के अनुसार ऐसा माना गया है। अब अगर किसी का जन्म रात में हुआ है और राहु उसके पंचम भाव में बैठे हैं — मान लीजिए उदाहरण के लिए यह सूर्य लग्न कुंडली है — तो रात और दिन का यह असर भी गिना जाएगा।
उनकी कुल गुरु परंपरा में भगवान श्री कृष्ण, नारायण रूप में, सबसे बड़े कौल हैं
भगवान श्री कृष्ण, और सबसे बड़े कौल नारायण
वक्ता कहते हैं कि जिस संप्रदाय से वे जुड़े हैं — उनके क्षेत्र में भगवती विंध्यवासिनी महादुर्गा हैं — और उनकी कुल गुरु परंपरा में भगवान श्री कृष्ण स्वयं महाकौल माने गए हैं। उनसे ऊपर कोई कौल नहीं; उन्हें महाकौल कहा गया है। और शाक्त की पूरी परिभाषा, कि सभा के बीच में वैष्णव रूप है, स्वयं नारायण से ली गई है। नारायण से बड़ा कोई कौल नहीं, जिन्होंने अलग-अलग समय पर दस महाविद्याओं की परम सिद्धि की। इन्हीं को वे परम गुरु मानते हैं — यानी हमारे गुरु नारायण के ही रूप में हैं।
जैसे रात के प्रहरों में भगवान श्री कृष्ण के साथ, वक्ता कहते हैं — आप जानते हैं कि जिस संप्रदाय से हम जुड़े हैं, हमारे क्षेत्र में भगवती विंध्यवासिनी महादुर्गा हैं, और हमारी कुल गुरु परंपरा में भगवान श्री कृष्ण स्वयं महाकौल माने गए हैं। उनसे ऊपर कोई कौल नहीं। उन्हें महाकौल कहा गया है। और शाक्त की पूरी परिभाषा — कि सभा के बीच में वैष्णव रूप है — स्वयं नारायण से ली गई है। नारायण से बड़ा कोई कौल नहीं, जिन्होंने अलग-अलग समय पर दस महाविद्याओं की परम सिद्धि की है। इन्हीं को हम परम गुरु मानते हैं: यानी हमारे गुरु नारायण के ही रूप में हैं। और नारायण जितना बड़ा कौल हो सकते हैं, उतना कोई और देवता नहीं। बहुत से लोगों को इस विषय से दिक़्क़त होने लगेगी, वे कहते हैं, पर यही सच है — जब आप तंत्र के विषय समझेंगे, तब।
शक्ति व्यक्ति को क्या करने की क्षमता देती है?
अपना तंत्र विकसित करने की क्षमता
शक्ति वह सामर्थ्य देती है, वक्ता कहते हैं, जिससे व्यक्ति अपना तंत्र विकसित कर सके। और यहाँ भगवान तो स्वयं भगवान हैं — वे व्यक्ति भी नहीं हैं — तो उन्होंने इतना सामर्थ्य दिया है।
शक्ति वह सामर्थ्य देती है, वक्ता कहते हैं, जिससे व्यक्ति अपना एक तंत्र विकसित कर सके। और यहाँ भगवान तो स्वयं भगवान हैं; वे व्यक्ति भी नहीं हैं। तो उन्होंने इतना सामर्थ्य दिया है।
कवच के विनियोग में क्या होता है?
ऋषि, छंद, देवता, और उद्देश्य
जब आप कोई कवच पढ़ते हैं तो उसमें विनियोग होता है, वक्ता कहते हैं; चंडी कवच होता है तो उसमें भी विनियोग है। विनियोग में ऋषि होते हैं, छंद होता है, देवता होते हैं, और वह उद्देश्य जिसकी सिद्धि के लिए हम कर रहे हैं। जो बहुत विस्तार से करते हैं उनके विनियोग में कीलक आदि भी होते हैं; कीलक पूरी शक्ति देता है। पर साधारण रूप से ऋषि का अर्थ है: जिसने सबसे पहले वह कवच सिद्ध किया, या जो उसका रचयिता है।
अब बाक़ी सब छोड़कर थोड़ी हल्की बात पर आइए, वक्ता कहते हैं। आप कवच पढ़ते हैं। जब आप कोई कवच पढ़ते हैं, तो उसमें विनियोग होता है। जब चंडी कवच होता है, तो उसमें भी विनियोग होता है। तो चंडी कवच के विनियोग में ऋषि कौन हैं? उसमें ऋषि हैं, छंद है, देवता हैं। और अपने किस काम की सिद्धि के लिए हम कर रहे हैं — वह विनियोग में है। जो कीलक आदि बहुत विस्तार से करते हैं, उनके विनियोग में कीलक भी होता है, और कीलक सारी शक्ति देता है। पर साधारण रूप से ऋषि का अर्थ है: जिसने सबसे पहले वह कवच सिद्ध किया, या जो उसका रचयिता है।
कवच, अर्गला और कीलक में कौन से ऋषि और देवता हैं?
ऋषि ब्रह्मा, विष्णु और शिव; देवता चंडिका, महालक्ष्मी और महासरस्वती
कवच, अर्गला और कीलक सब जानते होंगे और सब पढ़ते होंगे, वक्ता कहते हैं। कवच में देखिए: ब्रह्मा जी ऋषि हैं। अर्गला में विष्णु जी ऋषि हैं। और कीलक में शिव जी ऋषि हैं। पर वहाँ देवता देखिए। ब्रह्मा जी ऋषि हैं — पर देवता कौन? चंडिका, यानी कालिका, काली जी, महाकाली जी। अर्गला में देखिए: विष्णु, नारायण, ऋषि तो हैं — पर देवता कौन? महालक्ष्मी। और कीलक में देखिए: यहाँ शिव जी ऋषि हैं, पर देवी महासरस्वती हैं। होना तो यह चाहिए था, वे कहते हैं, कि जहाँ ब्रह्मा जी हैं वहाँ सरस्वती जी होतीं, और जहाँ शिव जी हैं वहाँ भगवती कालिका होतीं।
कवच, अर्गला और कीलक सब जानते होंगे; सबने सुना होगा, वक्ता कहते हैं। सब दुर्गा सप्तशती पढ़ते होंगे, और इसलिए कवच, अर्गला और कीलक भी। कवच में देखिए: ब्रह्मा जी ऋषि हैं। अर्गला स्तोत्र में विष्णु जी ऋषि हैं। और कीलक में शिव जी ऋषि हैं। पर वहाँ देवता देखिए। ब्रह्मा जी ऋषि तो हैं — पर देवता कौन? चंडिका। चंडिका, यानी कालिका; काली जी, महाकाली जी। अर्गला में देखिए: विष्णु, नारायण, ऋषि तो हैं — पर देवता कौन? महालक्ष्मी। और कीलक में देखिए: यहाँ शिव जी ऋषि हैं, पर देवी महासरस्वती हैं। अब होना तो यह चाहिए था, वे कहते हैं, कि जहाँ ब्रह्मा जी हैं वहाँ सरस्वती जी होतीं, और जहाँ शिव जी हैं वहाँ भगवती कालिका होतीं। कुछ साफ़ हुआ?
पंचमुखी हनुमान कवच के ऋषि कौन हैं?
ऋषि रामचंद्र, और पंचमुखी हनुमान की राम की अपनी साधना
वक्ता कहते हैं कि तंत्र के भीतर जाएँगे तो ऐसे बहुत से विषय दिखेंगे। पंचमुखी हनुमान का कवच पढ़िए, सप्तमुखी हनुमान का कवच पढ़िए। तंत्र में वर्णन है कि पंचमुखी हनुमान की साधना भगवान श्री रामचंद्र जी ने की; और जब आप पंचमुखी हनुमान कवच का न्यास और विनियोग करते हैं, तो वहाँ भी रामचंद्र ऋषि पढ़ेंगे — यानी उस कवच का निर्माण और उसका पहला पाठ, सिद्धि और कृपा सबसे पहले भगवान रामचंद्र ने की। सोचिए, वे कहते हैं: जिनके आराध्य राम हैं — राम ने ख़ुद उस रूप की साधना की ताकि हनुमान जी से मित्रता स्थापित हो, और यही वर्णन है।
इसी तरह, वक्ता कहते हैं, जब आप तंत्र के भीतर जाएँगे तो बहुत से विषय देखेंगे। और इनमें एक विषय है: भगवान हनुमान जी के बहुत से रूप हैं, और उनमें पंचमुखी हनुमान का कवच पढ़िए। सप्तमुखी हनुमान का कवच पढ़िए। तंत्र में यह वर्णन आया है कि पंचमुखी हनुमान की साधना भगवान श्री रामचंद्र जी ने की थी। और जब आप पंचमुखी हनुमान कवच का न्यास और विनियोग करते हैं, तो वहाँ भी आपको रामचंद्र ऋषि पढ़ने को मिलेगा — यानी उस कवच का निर्माण, और उसका पहला पाठ, उसकी सिद्धि और कृपा, सब सबसे पहले भगवान रामचंद्र ने किए। सोचिए, वे कहते हैं: जिनके आराध्य राम जी हैं — राम ने ख़ुद इस रूप की साधना की, और वर्णन है कि उन्होंने यह इसलिए किया ताकि हनुमान जी से मित्रता स्थापित हो। और कहीं न कहीं यह पंचमुखी हनुमान जी की साधना का असर था। सोचिए कि देवता हमारे सामने क्या रख रहे हैं और क्यों रख रहे हैं: हनुमान जी दिन भर भगवान श्री रामचंद्र जी का नाम लेते हैं, और वही राम जी हनुमान जी के तंत्रोक्त रूप की उपासना करके उन्हें उस रूप में स्थापित कर चुके हैं।
अहिरावण और महिरावण के हाथों पंचमुखी रूप ने क्या किया?
पाताल कालिका को दी जाने वाली बलि रोकी गई
वक्ता बताते हैं कि जब अहिरावण और महिरावण राम जी और लक्ष्मण जी को पाताल ले गए और पाताल कालिका को उनकी बलि देने वाले थे, तब इन्हीं पंचमुखी हनुमान जी ने जाकर उनकी शक्ति कुंठित की और वहाँ अहिरावण और महिरावण को मारकर लौटे।
और वही पंचमुखी रूप, वक्ता कहते हैं: जब अहिरावण और महिरावण राम जी को ले गए, लक्ष्मण जी को पाताल ले गए, और पाताल कालिका को उनकी बलि देने वाले थे — उस समय इन्हीं पंचमुखी हनुमान जी ने जाकर उनकी शक्ति कुंठित की, और वहाँ अहिरावण और महिरावण को मारकर लौट आए।
विंध्याचल में हनुमान का वह रूप कहाँ देखा जा सकता है?
सीता कुंड, और अष्टभुजा के भैरव
कभी विंध्याचल में सीता कुंड जाइए, वक्ता कहते हैं: सीता कुंड पर हनुमान जी का ठीक यही रूप स्थापित है। जिन अहिरावण और महिरावण को उन्होंने मारा वे उनके पैरों के नीचे हैं, और वे वहाँ उस उग्र, प्रचंड रूप में — अपने चंड रूप में — खड़े हैं, और उन्हें उस स्थान का भैरव माना जाता है। जो अष्टभुजा भगवती की सेवा-पूजा करते हैं, और जिनकी वे कुलदेवी हैं — जानते हों तो ठीक, न जानते हों तो — उस स्थान के भैरव सीता कुंड के यही हनुमान जी माने जाते हैं। वे बताते हैं कि यह पुराना स्थान है, बाद में थोड़ा बनाया गया, और उन्होंने यह वहाँ के लोगों से सुना, जो ऐसा कहते हैं।
कभी विंध्याचल में सीता कुंड जाइए, वक्ता कहते हैं: सीता कुंड पर हनुमान जी का ठीक यही रूप स्थापित है। जिन अहिरावण और महिरावण को उन्होंने मारा वे उनके पैरों के नीचे हैं; वे वहाँ ऐसे प्रचंड रूप में हैं — यह उनका चंड रूप है — और उन्हें उस स्थान का भैरव माना जाता है। यानी जो अष्टभुजा भगवती की सेवा और पूजा करते हैं — जिनकी वे कुलदेवी हैं, जानते हों तो ठीक, न जानते हों तो — उस स्थान के भैरव सीता कुंड के यही हनुमान जी माने जाते हैं। यह पुराना स्थान है, वे कहते हैं, बाद में थोड़ा बनाया गया। और यह बात भी उन्होंने वहाँ के लोगों से सुनी है; वही ऐसा कहते हैं।
सीता कुंड पर और क्या है, और विंध्याचल के कुंड कैसे बने?
हर देवता ने सतयुग में कुंड बनाया; सीता ने त्रेता में
सीता कुंड के पास और भी प्रमुख स्थान हैं, वक्ता कहते हैं; वे कभी वीडियो बनाकर बताएँगे कि वे कैसे हैं — जिनकी वे कुलदेवी हैं वे समझेंगे कि वहाँ क्षेत्रपाल किन रूपों में खड़े हैं और दर्शन कहाँ करने चाहिए। स्थान बहुत छोटा है, पर है। और सीता कुंड वही स्थान है जहाँ विंध्याचल में वहाँ गए हर देवता ने सतयुग में अपना कुंड बनाया; वैसे ही भगवती सीता के साथ भी, कि त्रेता में भगवती सीता ने अष्टभुजा पहाड़ी के नीचे सीता कुंड स्थापित किया।
वहाँ, सीता कुंड के पास, कुछ और प्रमुख स्थान भी हैं, वक्ता कहते हैं: वे कभी वीडियो डालेंगे और बताएँगे कि वे कैसे हैं। जिनकी वे कुलदेवी हैं वे वह बात समझेंगे — वहाँ क्षेत्रपाल किन रूपों में खड़े हैं और दर्शन कहाँ करने चाहिए। स्थान बहुत छोटा है, पर है। और सीता कुंड वही स्थान है जहाँ, विंध्याचल में, वहाँ गए हर देवी-देवता ने अपना कुंड बनाया, सतयुग में। तो उसी तरह भगवती सीता के साथ भी है: कि त्रेता में भगवती सीता ने अष्टभुजा पहाड़ी के नीचे सीता कुंड स्थापित किया। वहाँ आपको यह रूप देखने को मिलेगा।
हनुमान जी को विवाह क्यों करना पड़ा?
एक सिद्धि जिसकी दीक्षा से पहले विवाह ज़रूरी था
वक्ता कहते हैं कि वे पहले एक लाइव में कह चुके हैं और फिर कहते हैं: हनुमान जी को विवाह करना पड़ा। सब कहते हैं कि अष्ट सिद्धियों में एक सिद्धि के लिए अनिवार्य था कि दीक्षा से पहले वे विवाह करें, और इसी कारण हनुमान जी को विवाह करना पड़ा — सूर्य नारायण ने अपनी पुत्री से उनका विवाह कराया। जब आप भगवान हनुमान जी से जुड़े आगम ग्रंथ पढ़ेंगे, वे कहते हैं, तो जानेंगे कि उस समय उन्हें भगवती के किस रूप की उपासना करनी थी, वह कौन सी सिद्धि थी जिसके कारण उन्हें विवाह करना पड़ा, और वह सिद्धि उन्हें कैसे मिली; और उन्हें अपना मर्कटेश्वर रूप कैसे, किस रूप की पूजा से मिला।
ये सब तंत्रोक्त विषय, वक्ता कहते हैं — समझिए कि भगवती के जितने रूप हैं, और उनसे जुड़े जितने स्तोत्र हैं, वैसा ही यहाँ है: उन्होंने पहले एक बार लाइव में कहा था, और आज एक बार फिर कहते हैं, कि हनुमान जी को विवाह करना पड़ा। सब कहते हैं कि अष्ट सिद्धियों में एक सिद्धि थी जिसके लिए अनिवार्य था कि दीक्षा से पहले वे विवाह करें, और इसी कारण हनुमान जी को विवाह करना पड़ा। सूर्य नारायण ने अपनी पुत्री से उनका विवाह कराया। जब आप भगवान हनुमान जी से जुड़े ऐसे आगम ग्रंथ पढ़ेंगे, तब उनमें जानेंगे कि असल में भगवती के किस रूप की उपासना करनी थी, वह कौन सी सिद्धि थी जो उस समय हनुमान जी की थी जिसके कारण उन्हें विवाह करना पड़ा, और वह सिद्धि उन्हें कैसे मिली। और हनुमान जी का मर्कटेश्वर रूप — वह मर्कटेश्वर रूप उन्हें कैसे, किस रूप की पूजा से मिला।
हनुमान को उनकी शक्तियाँ कैसे मिलीं, इस पर तंत्र क्या खोलता है?
बचपन के वरदान, और प्राप्ति असल में कैसे हुई
कोई रूप यों ही नहीं होता, वक्ता कहते हैं: हम हनुमान जी को साधारण रूप से जानते हैं, कि उन्होंने अवतार लिया, और उनके भीतर के वरदान अलग विषय हैं — कि बचपन में उन्हें सबका वरदान मिला। पर इनकी प्राप्ति उन्हें कब हुई, और किन तरीक़ों से हुई, यह तंत्र में खोला गया है। ऐसी चीज़ों में ही आपको जानकारी मिलेगी।
कोई रूप यों ही वैसा नहीं होता, वक्ता कहते हैं। हम हनुमान जी को साधारण रूप से जानते हैं: हाँ, उन्होंने अवतार लिया। पर उनके भीतर के वरदान आदि अलग विषय हैं — कि बचपन में उन्हें सबका वरदान मिला था। पर उसकी प्राप्ति उन्हें कब हुई, और किस तरह, किन तरीक़ों से हुई — तंत्र में यह खोला गया है। ऐसी चीज़ों में ही आपको जानकारी मिलेगी।
'किताब से पढ़कर बता रहे हो' वाली आपत्ति यह भूल जाती है कि आगम ग्रंथ परंपरा से आते हैं
गुरु परंपरा से आने वाले आगम ग्रंथ
बात घूमकर वहीं लौट आती है, वक्ता कहते हैं: भाई, तुम किताब से पढ़कर बता रहे हो, जबकि हनुमान जी मुझसे सीधे आकर बात करते हैं और उन्होंने ख़ुद बताया कि हाँ, उन्होंने ऐसे-ऐसे पाया। उनका जवाब है कि आगम ग्रंथ गुरु परंपरा से आते हैं; जब आप भी ऐसी गुरु परंपरा में जाएँगे, तो आपके अपने गुरु जी देंगे — उनका भरोसा जीतिए और वे बताएँगे।
पर फिर घूम-फिरकर बात वहीं लौट आती है, वक्ता कहते हैं: भाई, तुम किताब से पढ़कर बता रहे हो — जबकि मेरे पास तो हनुमान जी सीधे आकर बात करते हैं, और उन्होंने ख़ुद बताया कि हाँ, उन्होंने ऐसे-ऐसे पाया। आगम ग्रंथ गुरु परंपरा से आते हैं। जब आप भी ऐसी गुरु परंपरा में जाएँगे, तो आपके अपने गुरु जी आपको देंगे; उनका भरोसा जीतिए और वे बताएँगे। हाँ, वे जोड़ते हैं, अंगूर खट्टे वाली हालत बहुत से लोगों की होती है।
अगर सब कुछ अभ्यास न कर सकें, तब भी स्वाध्याय का क्या मूल्य है?
पूरे रूप जानने से समर्पण बढ़ता है
स्वाध्याय कभी ग़लत नहीं, वक्ता कहते हैं: स्वाध्याय करेंगे तभी दूसरों को जानकारी दे पाएँगे। आज स्वाध्याय न हो, तो चूँकि कोई अपने जीवन में इतनी चीज़ें नहीं कर सकता, कम से कम जानकारी दी जा सकती है और लोगों को प्रेरित किया जा सकता है। कल जब आप हनुमान जी के सामने जाएँगे तो बस यह जानकर जा रहे हैं कि तुलसीदास जी की रची हनुमान चालीसा पढ़ेंगे — पर जब उनके दूसरे रूपों के बारे में जानेंगे, उनके सामर्थ्य के बारे में जानेंगे, तो सोचिए आपका समर्पण कितना बढ़ेगा।
और स्वाध्याय कभी ग़लत नहीं होता, वक्ता कहते हैं। स्वाध्याय करेंगे तभी दूसरों को जानकारी दे पाएँगे। अगर आज स्वाध्याय न हो — और कोई अपने जीवन में इतनी सारी चीज़ें नहीं कर सकता — तो कम से कम जानकारी दी जा सकती है और लोगों को प्रेरित किया जा सकता है। कल जब आप हनुमान जी के सामने जाएँगे, तो बस यह जानकर जा रहे हैं कि वहाँ हनुमान चालीसा पढ़ेंगे। आप बस तुलसीदास जी की रची हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं। पर जब आप उनके दूसरे रूपों के बारे में जानेंगे, उनके सामर्थ्य और उनके बारे में जानेंगे — तो सोचिए आपका समर्पण कितना बढ़ेगा।
हनुमान ने किस बल से अहिरावण और महिरावण को कुचला?
उनके सामने भगवती तारा स्तंभित
क्या आज आप जानते हैं, वक्ता पूछते हैं, कि अहिरावण और महिरावण को ऐसा वरदान मिला था कि ब्रह्मा भी उनके वश में थे? फिर भी हनुमान जी ऐसे अहिरावण और महिरावण को पैरों तले रौंदे रखते हैं — किस सामर्थ्य के बल पर? वह किस शक्ति का सामर्थ्य था? भगवती तारा उनके सामने कैसे स्तंभित हुईं — वे तारा जो जगदंबा का वह रूप हैं जिसने भगवान शिव के विष की ज्वाला को भी शांत किया?
क्या आज आप जानते हैं, वक्ता पूछते हैं, कि अहिरावण और महिरावण को जो वरदान मिला था वह ऐसा था कि ब्रह्मा भी उनके वश में थे? पर हनुमान जी ऐसे अहिरावण और महिरावण को अपने पैरों तले रौंदे रखते हैं — किस सामर्थ्य के बल पर? वह किस शक्ति का सामर्थ्य था? भगवती तारा उनके सामने कैसे स्तंभित हुईं — वे जो जगदंबा का वह रूप हैं जिसने भगवान शिव के विष की ज्वाला को भी शांत किया?
क्या लंकिनी बस एक राक्षसी है?
सहस्रनाम के भीतर एक नाम के रूप में लंकिनी
वक्ता पूछते हैं कि भगवती लंकिनी लंका में किस रूप में स्थापित थीं, और हनुमान जी के सामने उन्होंने कुछ क्यों नहीं कहा, उन्हें भीतर कैसे जाने दिया। लंकिनी बस राक्षसी नहीं है: माई भी लंकिनी रूप में हैं। सहस्रनाम पढ़िए तो वहाँ लंकिनी रूप पढ़ने को मिलेगा — और आप कहेंगे यह तो लंकिनी राक्षसी का नाम है। पर सहस्रनाम में, वे कहते हैं, 'मूत्र सुधानी' भी लिखा है: यानी जहाँ मल-मूत्र है, उस स्थान में भी जगदंबा का एक रूप है। कहीं कुछ छोड़ा नहीं गया। यह कौल है, वे कहते हैं; यही सच है, और बहुत कुछ जानना है।
भगवती लंकिनी लंका में किस रूप में स्थापित थीं, वक्ता पूछते हैं, और हनुमान जी के सामने उन्होंने कुछ क्यों नहीं कहा, उन्हें भीतर कैसे जाने दिया? लंकिनी बस राक्षसी नहीं है; माई भी लंकिनी रूप में हैं। सहस्रनाम पढ़िए तो वहाँ लंकिनी का रूप पढ़ने को मिलेगा — और आप कहेंगे कि यह तो लंकिनी राक्षसी के नाम के रूप में लिखा है। पर सहस्रनाम में, वे कहते हैं, मूत्र सुधानी भी लिखा है: यानी जहाँ मल और मूत्र हैं, उस स्थान में भी जगदंबा का एक रूप है। कहीं से कुछ हटाया नहीं गया। यह कौल है भाई; यही सच है, और बहुत कुछ जानना है।
ऐसे विषय आम जनता से दूर क्यों रखे गए हैं?
आम लोग इन्हें स्वीकार भी नहीं कर पाते
जब आप हनुमान जी के तांत्रिक रूपों में भी जाएँगे, वक्ता कहते हैं, तो ऐसे विषय जानेंगे कि कहेंगे इस संसार में सब कुछ अजीब है। इसीलिए ये विषय दूर रखे गए हैं: क्योंकि आम जनता इन विषयों को स्वीकार भी नहीं कर पाती — और स्वीकार करेगी तभी सच जान पाएगी।
और जब आप हनुमान जी के तांत्रिक रूपों में भी जाएँगे, वक्ता कहते हैं, तो ऐसे विषय जानेंगे कि कहेंगे: भाई, इस संसार में सब कुछ अजीब है। इसीलिए ये विषय दूर रखे गए हैं। क्योंकि आम जनता इन विषयों को स्वीकार भी नहीं कर पाती — और जब स्वीकार करेगी तभी सच जान पाएगी।
गीता का तीसरा अध्याय पितरों को कैसे मुक्त करता है?
पेड़ के नीचे ब्रह्म पिशाच, और उसे पढ़ने वाला पुत्र
जब तक चीज़ें जोड़ेंगे नहीं, वक्ता कहते हैं, आप देखेंगे नहीं — जैसे वे अभी श्रीमद् भगवद् गीता का माहात्म्य पढ़ रहे हैं और उसे पितरों से जोड़ रहे हैं। तीसरे अध्याय के माहात्म्य में बताया गया है कि एक ब्राह्मण बहुत दुष्ट था; डाकुओं ने उसे मार दिया और वह ब्रह्म पिशाच बनकर बैठ गया। उसका पुत्र, जो बड़ा तपस्वी था, जब पिता की कोई ख़बर नहीं आई, तो उन्हें खोजने निकला, और उसी पेड़ के नीचे बैठकर जिस पर पिता ब्रह्मराक्षस बनकर बैठे थे, तीसरा अध्याय पढ़ा। पिता वहाँ साक्षात प्रकट हुए, उनका रूप बदल गया, और उन्होंने कहा: तुम्हें काशी जाने की ज़रूरत नहीं — लड़का काशी जा रहा था — मेरी मुक्ति यहीं हो गई।
जब तक आप जोड़ेंगे नहीं, वक्ता कहते हैं — जैसे अभी हम श्रीमद् भगवद् गीता का माहात्म्य और वे सब विषय पढ़ रहे हैं, हम जोड़ रहे हैं, देख रहे हैं कि यह पितरों से कैसे जुड़ा है। तीसरे अध्याय के माहात्म्य से पितर कैसे मुक्त होंगे? तीसरे अध्याय में बताया गया है कि एक ब्राह्मण बहुत दुष्ट था; डाकुओं ने उसे मार दिया, और वह ब्रह्म पिशाच बनकर बैठ गया। उसका पुत्र, जो बड़ा तपस्वी था, जब पिता की कोई ख़बर नहीं आई, तो उन्हें खोजने निकला। और उसी पेड़ के नीचे, जिस पर पिता ब्रह्मराक्षस बनकर बैठे थे, पुत्र ने बैठकर तीसरा अध्याय पढ़ा। और पिता वहाँ साक्षात प्रकट हुए; उनका रूप बदल गया। उन्होंने कहा: तुम्हें काशी जाने की ज़रूरत नहीं — लड़का काशी जा रहा था — मेरी मुक्ति यहीं हो गई।
तीसरा अध्याय क्यों काम करता है, केवल कहानी नहीं?
आत्मा और गति पर अर्जुन को दिया गया उपदेश
केवल कहानी पढ़ने से कुछ नहीं होता, वक्ता कहते हैं; पद्म पुराण के ये माहात्म्य भर पढ़ने से कुछ नहीं होता। तीसरा अध्याय ही पढ़िए तो जानेंगे कि मुक्ति क्यों हुई। जब आप तीसरा अध्याय पढ़ें और श्लोक-दर-श्लोक बहुत ध्यान से वह उपदेश पढ़ें जो भगवान नारायण अर्जुन को आत्मा और गति के बारे में दे रहे हैं, और विषय समझने की कोशिश करें, तब समझेंगे: जो मर गया उसके पास कुछ नहीं बचा — न धन, न संपत्ति, न मान, न शत्रु, न मित्र — वह भूत बनकर ख़ाली पड़ा है, और वह जानता है कि जो पढ़ा जा रहा है वही सच है। जैसे ही वह इसे भीतर उतारता है, भगवान उसे अपने दर्शन देते हैं और कहते हैं: जाओ भाई, तुम्हारी गति हो गई; यही तुम्हें समझाना था।
केवल कहानी पढ़ने से नहीं होगा, वक्ता कहते हैं; पद्म महापुराण के ये माहात्म्य भर पढ़ने से कुछ नहीं होता। अब तीसरा अध्याय पढ़िए और पता चलेगा कि मुक्ति क्यों हुई। जब आप तीसरा अध्याय पढ़ें, और बहुत ध्यान से, श्लोक-दर-श्लोक, वह उपदेश पढ़ें जो भगवान नारायण अर्जुन को आत्मा और गति के बारे में दे रहे हैं, और विषय समझने की कोशिश करें, तब आप समझेंगे। जैसा उन्होंने उस दिन लाइव में कहा था: जो मर गया उसके पास अब कुछ नहीं बचा — न धन, न संपत्ति, न मान, न शत्रु, न मित्र, कुछ नहीं। वह भूत बनकर यों ही ख़ाली पड़ा है। अब वह जानता है कि जो पढ़ा जा रहा है वही सच है। जैसे ही वह इसे अपने भीतर उतारता है, भगवान उसे अपने दर्शन देते हैं और कहते हैं: जाओ भाई, तुम्हारी गति हो गई। यही तुम्हें समझाना था।
गीता जीते जी क्यों सुननी चाहिए?
इससे पहले कि मरने के बाद किसी को आपको सुनानी पड़े
सोचिए, वक्ता कहते हैं, वही तीसरा अध्याय: जब तक हम ज़िंदा हैं किसी के पास समय नहीं; यह बेकार है, गाली देनी है, झगड़ना है, यह करना है — पर इस पर कोई चिंतन नहीं, न उसका न आपका। फिर भी मरने के बाद पितृ लोक या प्रेत लोक में बैठकर हम एक-दूसरे को बुलाएँगे कि आओ गीता सुनो। तो इससे पहले कि मरने के बाद किसी को आपको गीता सुनानी पड़े, जीते जी सुनिए; जीते जी पढ़िए।
और वही तीसरा अध्याय सोचिए, वक्ता कहते हैं: जब तक हम ज़िंदा रहते हैं, किसी के पास समय नहीं। यह बेकार चीज़ है; गाली देनी है, झगड़ा करना है, यह करना है। पर इस पर विचार और चिंतन — न हमें करना है, न आपको। पर मरने के बाद, पितृ लोक या प्रेत लोक में बैठकर, हम एक-दूसरे को बुलाएँगे। वे यह बातचीत करके दिखाते हैं: हेलो, तो तुम भी भूत बन गए; हाँ, हम भी बन गए; चलो फिर, जाकर गीता सुनो — और जवाब कि जब तुम लाइव में सुना रहे थे तब सुन लेते तो भूत न बनते; ठीक से चिंतन नहीं हुआ, और उस समय हम इसका मज़ाक़ उड़ा रहे थे, कह रहे थे यह कथा है, अमर चित्र कथा; अब हम ख़ुद भूत योनि में अमर हो गए और यहाँ से मर भी नहीं सकते। तो इससे पहले कि आपके मरने के बाद कोई आपको गीता सुनाए, जीते जी सुनिए। जीते जी पढ़िए।
क्या काशी में मरना अपने आप गति देता है?
आत्महत्या, डूबना, और मणिकर्णिका के तांत्रिक
लोग कहते हैं कि काशी में कहीं भी मरने वाले की गति हो जाती है, वक्ता कहते हैं — वे नहीं जानते कि ऐसा कुछ नहीं होता। गति क्यों और कब होती है यह अलग विषय है। जो जाकर आत्महत्या करता है उसकी गति नहीं होगी। अगर आदमी किसी कारण से अपने आप मरता है, तो गति होती है। पर अगर वह जाकर आत्महत्या करे, या काशी में गंगा में डूबकर प्राण त्यागे, तो मणिकर्णिका घाट के किनारे बैठे तांत्रिक उसे अपनी खोपड़ी में जगा लेंगे।
आप जानते हैं कि लोग काशी के बारे में क्या कहते हैं, वक्ता कहते हैं: कि जो भी काशी में कहीं भी मरता है, उसकी गति हो जाती है। वे यह नहीं जानते कि ऐसा कुछ नहीं होता। गति क्यों और कब होती है, यह अलग विषय है। अगर कोई जाकर आत्महत्या करे, तो उसकी गति नहीं होगी। अगर आदमी किसी कारण से अपने आप मरता है, तो गति होती है। पर अगर वह जाकर आत्महत्या करे, या काशी में गंगा जी में डूबकर प्राण त्यागे, तो मणिकर्णिका घाट के किनारे बैठे सब तांत्रिक उसे अपनी खोपड़ी में जगा लेंगे।
जो तांत्रिक ऐसे प्रेत को पकड़ता है, वह उसके साथ क्या करता है?
एक वादा, मंत्र बल की मार, और चार-बाय-चार इंच की खोपड़ी
वह मरे हुए से पूछता है कि क्यों मरा, और उसे बताया जाता है कि पड़ोस की एक स्त्री ने उसे धोखा दिया; तो: ठीक है, हम तुम्हें वह दिला देंगे, जाओ मेरा यह काम करो। न करे, तो मंत्र बल से पिटाई। अब खोपड़ी में बैठो — चार बाय चार इंच — जिसमें दिन भर दारू और धुआँ, बाहर उड़कर काम करके लौटना: फलाँ पर वशीकरण करो, फलाँ को मारो। और जब प्रेत कहता है कि मारने से पाप लगेगा, तो उससे कहा जाता है कि भूत को पाप नहीं लगता, जाओ मारो। मुक्ति या मोक्ष माँगो तो जवाब: चुप रहो, ज़्यादा बोले तो श्मशान की लकड़ी में जला देंगे। यही, वक्ता कहते हैं, वह गति है जो होने वाली है।
तुम क्यों मरे, वह उससे पूछता है। और जवाब आता है पड़ोस की उस स्त्री के बारे में जिसने उसे धोखा दिया और इसलिए वह मर गया। ठीक है तो, आओ — हम तुम्हें वह दिला देंगे; जाओ मेरा यह काम करो। नहीं करोगे, तो मंत्र बल से पिटाई पड़ेगी। अब खोपड़ी में बैठे रहो, उसके चार बाय चार इंच में, उसी खोपड़ी में दारू और दिन भर उसमें धुआँ, और तुम बाहर उड़कर काम करके लौटोगे: फलाँ पर वशीकरण करो, फलाँ को मारो। वह कहेगा: भाई, मारूँगा तो क्या पाप नहीं लगेगा? भूत को पाप नहीं लगता — जाओ, मारो, जाओ। और वह जाकर मारेगा और लौटकर वहीं बैठ जाएगा। भाई, मुझे मुक्ति दो, मोक्ष दो। चुप। ज़्यादा बोले तो श्मशान की लकड़ी में जला देंगे, यह करेंगे, वह करेंगे। यही, वक्ता कहते हैं, वह गति है जो होने वाली है।
आप भी एक कहानी बन जाएँगे, जिसे कोई और सुनाएगा
आप भी कहानी बन जाएँगे
अगर इसके बजाय थोड़ा समय निकालकर कुछ आत्मचिंतन किया जाए, और इन विषयों पर बात हो — हाँ भाई, यह ग़लती मत करो, यह काम ऐसे करो — पर इसके बजाय आप बैठकर गाली देते हैं। तो दीजिए गाली; बाद में उसी तांत्रिक की खोपड़ी में, उसके ढक्कन में रहेंगे, या अपने ही घर में भूत बन जाएँगे, जैसे धुंधुकारी प्रेत बनकर हवा और बवंडर बनकर घूमता रहा। किसी ने कमेंट किया था कि यह कहानी है: चिंता मत कीजिए, वे कहते हैं, मरने के बाद आप भी कहानी में आ जाएँगे। जो भी होंगे वे आपके बने भूत की कहानी सुनाएँगे — फलाँ जगह एक भूत था, वहाँ भूत घूम रहा है। आप भी कथा बन जाएँगे।
अगर वह थोड़ा समय जुटाकर थोड़ा आत्मचिंतन किया जा सके, वक्ता कहते हैं, और इन सब विषयों पर बात हो — हाँ भाई, यह ग़लती मत करो, यह काम ऐसे करो — पर इसके बजाय आप बैठकर गाली देंगे। तो दीजिए गाली। बाद में उसी तांत्रिक की खोपड़ी में, उसके ढक्कन में होंगे; या अपने ही घर में भूत बन जाएँगे, जैसे धुंधुकारी प्रेत बना और हवा और बवंडर बनकर घूमता रहा। यही होगा। किसी ने कमेंट किया था कि यह कहानी है। चिंता मत कीजिए, वे कहते हैं: मरने के बाद आप भी कहानी में आ जाएँगे। जो भी होंगे वे उस भूत की कहानियाँ सुनाएँगे जो आप बनकर घूमेंगे — फलाँ-फलाँ जगह एक भूत था, वहाँ एक भूत घूम रहा है। आप भी कथा बन जाएँगे। आज, जब शरीर ज़िंदा है, आप कहते हैं वह कथा थी; मरने के बाद आप भी कथा होंगे। एक डरावनी कहानी, और कोई उसे फ़ेसबुक पर लिखेगा और वह कहानी डाल देगा। बचपन में लोगों ने उस चुड़ैल के बारे में सुना होगा जो सिर पर मोमबत्ती लेकर घूमती है। आप भी वही होंगे। अच्छा यही है, वे कहते हैं, कि जीते जी कुछ अच्छा काम हो जाए। बस बैठकर दूसरों की निंदा करने से नहीं होगा।
अखंड ज्योत, चंडी पाठ और संपुटित चंडी पाठ की व्यवस्था की जा रही है
अखंड ज्योत, चंडी पाठ, और संपुटित चंडी पाठ
वक्ता कहते हैं कि जैसे चैत्र नवरात्र में बहुत से लोगों के लिए अखंड ज्योत स्थापना करवाई गई थी और उसका वीडियो चैनल पर है जिसमें दिखता है कि कितनी भव्यता से हुआ, वैसा ही अनुष्ठान इस बार भी होगा। जो सरसों के तेल या घी की अखंड ज्योत स्थापना करवाना चाहते हैं, उनके लिए व्यवस्था है; जो पूरे नौ दिन का चंडी पाठ करवाना चाहते हैं उनके लिए व्यवस्था है; और जो नौ दिन का संपुटित चंडी पाठ करवाना चाहते हैं उनके लिए व्यवस्था है — पर व्यवस्था सीमित है, क्योंकि दिन में केवल दो पाठ की क्षमता है। जो पहले आएँगे उनका होगा।
वे एक बार बताते हैं: पूजन-पाठ करवाने के लिए उनके पास बहुत ज़्यादा लोग नहीं हैं, पर जितने हैं उनमें कम लोग आते हैं और अच्छे से होता है। जैसे चैत्र नवरात्र में, वक्ता कहते हैं, बहुत से लोगों के लिए अखंड ज्योत स्थापना करवाई गई थी, और उसका वीडियो चैनल पर उपलब्ध है जिसमें दिखता है कि कितनी भव्यता से हुआ। इस बार भी वैसा ही अनुष्ठान होगा। जो सरसों के तेल या घी की अखंड ज्योत स्थापना करवाना चाहते हैं, उनके लिए भी व्यवस्था है। जो पूरे नौ दिन का चंडी पाठ करवाना चाहते हैं उनके लिए व्यवस्था है, और जो नौ दिन का संपुटित चंडी पाठ करवाना चाहते हैं उनके लिए भी व्यवस्था है। पर व्यवस्था सीमित है। ऐसा नहीं कि अनगिनत लोग आएँगे और वे अनगिनत लोगों के लिए करेंगे: दिन में केवल दो पाठ की क्षमता है। तो जो पहले आएँगे उनका होगा, और जो बाद में आएँगे — न हो तो वे कह देंगे कि नहीं है।
कलश स्थापना, अखंड ज्योत, नौ दिन का पूजन और दसवें दिन का विसर्जन
कलश स्थापना, अखंड ज्योत, नौ दिन का पूजन और दसवें दिन का विसर्जन
दूसरी बात पूरा अनुष्ठान है: कि कलश स्थापना भी हो, अखंड ज्योत भी करवाई जाए, और अपना पूरा नौ दिन का पूजन-पाठ हो। सबके लिए व्यवस्था है। वहाँ लिखी सहयोग राशि देख लेनी चाहिए, और अगर आसपास कहीं ऐसा होता हो तो वहाँ पूछिए — यह एक दिन का नहीं; पूरे नौ दिन, दस दिन का अनुष्ठान है, क्योंकि नौ दिन तो होते ही हैं और दसवें दिन विसर्जन की पूजा भी है।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, पूरा अनुष्ठान है — कि कलश स्थापना भी हो भाई, अखंड ज्योत भी करवाई जाए, और अपना पूरा नौ दिन का पूजन-पाठ हो। इन सबके लिए व्यवस्था है। और वहाँ लिखी सहयोग राशि भी देख लेनी चाहिए; और आपके आसपास जहाँ कुछ होता हो, पता हो तो वहाँ जाकर पूछिए। यह एक दिन के लिए नहीं; यह पूरे नौ दिन, दस दिन के अनुष्ठान के लिए है। नौ दिन तो होते ही हैं, और दसवें दिन विसर्जन की पूजा भी है — सब कुछ है।
ये केवल उनके लिए हैं जो घर में सप्तशती या पूरी विधि नहीं कर सकते
उनके लिए जो घर में सप्तशती या पूरी विधि नहीं कर सकते
इसके अलावा आप जो ख़ुद करेंगे — अपना पूजन और अनुष्ठान घर में करेंगे। उनका उद्देश्य, वक्ता कहते हैं, बस इतना है: अगर आप घर में सप्तशती पाठ नहीं कर पा रहे, या आपको लगता है कि पूरे विधि विधान से नहीं कर सकते — जैसे वे पूरा मंडल पूजन, आवरण पूजन, पचास चीज़ें, तंत्रोक्त पूजन, बलि करते हैं — तो उसमें से जो घर में कर सकें वह कीजिए, और जो न कर सकें वह करवाइए। नौ दिन के लिए सबसे कम उन्होंने ₹1100 रखा है, और उससे कम वाला भी है।
इसके अलावा, नवरात्र में आप जो ख़ुद करेंगे — अपने घर में पूजन और अनुष्ठान करेंगे, वक्ता कहते हैं। यहाँ जो अनुष्ठान हो रहा है, उसमें आप देख सकते हैं कि वे कितनी भव्यता से करते और करवाते हैं। हमारा उद्देश्य बस इतना है: कि अगर आप घर में सप्तशती पाठ नहीं कर पा रहे। ध्यान रखिए, वे कहते हैं: मेरा उद्देश्य बस इतना है, कि आप सप्तशती पाठ नहीं कर सकते, या आपको लगता है कि आप पूरे विधि विधान से नहीं कर सकते — जैसे हम पूरा मंडल पूजन करते हैं, आवरण पूजा करते हैं, पचास चीज़ें हैं, तंत्रोक्त पूजन है, बलि है। वे पूरा विस्तृत ब्यौरा, वीडियो आदि, डालेंगे कि क्या-क्या होता है, और लिखकर भी देंगे। उसमें से जितना घर में कर सकें कीजिए; जो न कर सकें, करवाइए। नौ दिन के लिए ₹1100 सबसे कम रखा है; उससे कम वाला भी है — आप देख सकते हैं।
इन नौ दिनों में हर घर कम से कम क्या करे?
सप्तश्लोकी सिद्ध करें — सात मंत्र, रात में पढ़ें
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, यह है कि घर में कम से कम नौ दिन में सप्तश्लोकी सिद्ध कर लीजिए। सप्तश्लोकी सिद्धि की विधि अगले दिन चैनल पर आएगी; उसे देखकर कीजिए — आप, आपकी पत्नी, बहन, माँ। सात मंत्र हैं; बहुत आसान है। देखकर बस पढ़ना है। चाहें तो 108 बार पढ़िए; चाहें तो नौ बार। पर नवरात्र में रात के समय पाठ करेंगे तो वह ज़रूर चैतन्य और सिद्ध हो जाता है।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, यह है कि घर में कम से कम नौ दिन के भीतर सप्तश्लोकी सिद्ध कर लीजिए। सप्तश्लोकी सिद्धि की विधि अगले दिन चैनल पर आएगी। उसे देखकर ख़ुद कीजिए; आपकी पत्नी करे, बहन, माँ। सात मंत्र हैं। बहुत आसान है। देखकर बस पढ़ना है। चाहें तो 108 बार पढ़िए; चाहें तो नौ बार पढ़िए। पर अगर नवरात्र में रात के समय पाठ करेंगे, तो वह ज़रूर चैतन्य और सिद्ध हो जाता है।
व्यक्ति को कौन सा प्रणव उच्चारित करना चाहिए?
यज्ञोपवीत पहनने वालों के लिए वैदिक प्रणव
फिर वे कहते हैं कि प्रणव का ध्यान रखिए। प्रणव यानी ॐ: आपको ध्यान रखना है कि कौन सा प्रणव उच्चारित करना है, ताकि सही फल मिले। यज्ञोपवीत पहनते हैं तो वैदिक प्रणव; नहीं तो बाक़ी सब। यह भी कहा गया है, वे जोड़ते हैं, कि वैदिक प्रणव संन्यासियों को उच्चारित करना चाहिए — एक व्यक्ति ने इस पर भी कमेंट किया था, और बात सही है, पर सब इसे नहीं मानेंगे। वे कहते हैं ठीक है, आपकी इच्छा; पर इन मंत्रों का कम से कम इतना सम्मान रखिए और इनका उल्लंघन मत कीजिए।
स्त्री उच्चारण और हवन के बारे में क्या करे?
वेदोक्त की जगह तांत्रिक उच्चारण और तंत्रोक्त हवन
आप स्त्री हैं, वक्ता कहते हैं: वैदिक उच्चारण मत कीजिए — तांत्रिक उच्चारण कीजिए। तंत्रोक्त हवन कीजिए। वे बताते हैं कि जो वेद पढ़ते हैं, जो वेदोक्त हवन करवाते हैं, वे कहते हैं कि स्त्री आहुति नहीं देगी और स्त्री स्वाहा नहीं कहेगी; लोग इस बारे में पूछते हैं, और वे कहते हैं बात सही है — वेदोक्त हवन आदि में नहीं करना चाहिए। तंत्रोक्त में छूट है, क्योंकि तंत्रोक्त आदि में ऐसी कोई विधि नहीं। तो आप तंत्रोक्त हवन कर सकती हैं, और उसकी पूरी विधि चैनल पर दी गई है।
आप स्त्री हैं, वक्ता कहते हैं: वैदिक उच्चारण मत कीजिए; तांत्रिक उच्चारण कीजिए। तंत्रोक्त हवन कीजिए। आपने वेदों में सुना होगा — यानी जो वेद पढ़ते हैं वे कहते हैं; जो वेदोक्त हवन करवाते हैं वे कहते हैं कि स्त्री आहुति नहीं देगी, कि स्त्री स्वाहा नहीं कहेगी। लोग इस बारे में पूछते हैं। बात सही है, वे कहते हैं: वेदोक्त हवन आदि में नहीं करना चाहिए। तंत्रोक्त में छूट है, क्योंकि तंत्रोक्त आदि में ऐसी कोई विधि नहीं। तो आप तंत्रोक्त हवन आदि कर सकती हैं, और उसकी पूरी विधि चैनल पर दी गई है। नवरात्र में आप वह पूरी विधि देखकर कर सकती हैं — तंत्रोक्त हवन कैसे करना है।
हवन में क्रव्यादि अंश क्या है?
श्मशान की अग्नि जिसे निकालना ज़रूरी है
हवन करने की एक-एक विधि समझाई गई है, वक्ता कहते हैं: कुंड कैसे सजाना है, अग्नि कैसे जलानी है, और क्रव्यादि अंश कैसे निकालना है। क्रव्यादि अंश का अर्थ, वे समझाते हैं, यह है कि श्मशान की अग्नि निकालनी है।
हवन करने की एक-एक विधि बताई गई है, वक्ता कहते हैं। कुंड कैसे सजाना है; अग्नि कैसे जलानी है। क्रव्यादि अंश कैसे निकालना है। क्रव्यादि अंश का अर्थ, वे समझाते हैं, यह है कि श्मशान की अग्नि निकालनी है।
बड़े चैनल हवन कुंड को चिता की तरह सजाते हैं, जिससे क्रव्यादि अग्नि बुलाई जाती है
चिता की तरह सजा कुंड क्रव्यादि अग्नि को बुलाता है
ऐसे चैनल हैं, वक्ता कहते हैं — बड़े चैनल, दस लाख सब्सक्राइबर वाले — जिन्होंने नवरात्र हवन के वीडियो बनाए हैं जिनमें वे पूरी चीज़ चिता की तरह सजाते हैं, लकड़ी जमाते हैं, और फिर आग लगाते हैं। वह, वे कहते हैं, क्रव्यादि अग्नि है; आज के समय में यही आपकी दिक़्क़त है। आपत्ति करो तो कहा जाता है तुम ग़लत हो — पर जो लाखों लोग उन्हें देखकर करेंगे उनकी क्या हालत होगी? बाद में आप बैठकर गाली देंगे कि सप्तशती पाठ किया और बर्बाद हो गए, हवन किया और बर्बाद हो गए। अगर आपने बर्बादी की आग बुलाई है, तो क्या बर्बाद नहीं होंगे?
हम ऐसे चैनल हैं कि उन्हें देखते हैं, वक्ता कहते हैं — बड़े-बड़े चैनल, दस लाख सब्सक्राइबर। और भाइयों ने नवरात्र हवन के वीडियो बनाए हैं जिनमें वे पूरी चीज़ चिता की तरह सजाते हैं, लकड़ी जमाते हैं, और फिर आग लगाते हैं। भाई, वह क्रव्यादि अग्नि है। आज के समय में यही आपकी दिक़्क़त है: आपत्ति करो तो कहा जाता है, भाई, तुम ग़लत हो। पर जो लाखों लोग उन्हें देखकर करेंगे — उनकी क्या हालत होगी? बाद में आप बैठकर गाली देंगे: सप्तशती पाठ किया और बर्बाद हो गए, हवन किया और बर्बाद हो गए। अगर आपने बर्बादी की आग बुलाई है, तो क्या बर्बाद नहीं होंगे? पूरी चीज़ चिता की तरह सजाकर अपने हवन कुंड में आग डालिए, सारी समिधा जमाकर फिर आग लगाइए, तो श्मशान की चिता की आग ही जलेगी।
क्रव्यादि अंश निकालने की सही विधि क्या है?
अग्नि कोण से नैऋत्य कोण, और फिर स्वाहा को वस्त्र
इसकी एक विधि है, वक्ता कहते हैं: हम क्रव्यादि अंश कैसे निकालते हैं, अग्नि कोण से आग लेकर पहले नैऋत्य कोण में रखकर, और फिर बाहर रखकर। फिर शुद्ध अग्नि को स्वाहा के रूप में बुलाते हैं। फिर वहाँ भगवती स्वाहा को वस्त्र के रूप में सजाते हैं: सरकंडा रखा जाता है, जो माँ का वस्त्र है। वह न दिया जाए, तो कहा जाएगा कि देवी स्वाहा ने वस्त्र स्वीकार नहीं किया, वस्त्र नहीं पहना। इन सब विषयों को जानकर ही — और फिर आहुति कैसे देनी है — आपको करना चाहिए।
इसकी विधि यह है, वक्ता कहते हैं: हम क्रव्यादि अंश कैसे निकालते हैं — अग्नि कोण से आग लेकर पहले नैऋत्य कोण में रखकर, और फिर बाहर रखकर। फिर शुद्ध अग्नि को हम स्वाहा के रूप में बुलाएँगे। फिर भगवती स्वाहा को हम वहाँ वस्त्र के रूप में सजाएँगे। सरकंडा रखा जाता है — वह माँ का वस्त्र है। वह न दिया जाए, तो कहा जाएगा कि देवी स्वाहा ने वस्त्र स्वीकार नहीं किया, कि उन्होंने वस्त्र नहीं पहना। तभी, इन सब विषयों को जानकर — और आहुति कैसे देनी है — आपको करना चाहिए।
नवरात्र में अर्गला का पहला मंत्र कैसे करना चाहिए?
रात में अर्गला, दिन में अष्टोत्तर शतनाम
नवरात्र के लिए अर्गला के पहले मंत्र का विधान कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि अगर आप दो समय करना चाहते हैं, तो वे कहेंगे अर्गला मंत्र का जाप रात के समय करें, और अष्टोत्तर शतनाम दिन में, दोपहर में, किसी भी समय। नवरात्र की पहली बात, वे जोड़ते हैं, यह है कि आप किसी भी समय पूजा कर सकते हैं: समय के हिसाब से कोई दिक़्क़त नहीं। ऐसा नहीं कि दोपहर या शाम को नहीं कर सकते; शरीर जितनी क्षमता दे उसके अनुसार कर सकते हैं।
वे बताते हैं कि माँ काली के अष्टोत्तर शतनाम की विधि दी जा चुकी है। नवरात्र के लिए अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र का विधान कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: अगर आप दो समय करना चाहते हैं, तो हम कहेंगे अर्गला मंत्र का जाप रात के समय कीजिए, और अष्टोत्तर शतनाम दिन में, दोपहर में, किसी भी समय। नवरात्र की पहली बात यह है कि आप किसी भी समय पूजा कर सकते हैं। समय के हिसाब से कोई दिक़्क़त नहीं। ऐसा नहीं कि आप दोपहर या शाम को नहीं कर सकते। शरीर जितनी क्षमता दे, उसके अनुसार कर सकते हैं।
अगर घर में किसी की मृत्यु तंत्र से हुई हो, तो पितृ पक्ष में क्या किया जा सकता है?
उसी संकल्प से भैरव अनुष्ठान, साधकों द्वारा
अगर पूरा एक साल हो चुका है, वक्ता कहते हैं, तो पहली बात यह कि पितृ पक्ष से पहले, भाद्रपद मास आदि में करें — और पहले पक्का कर लें कि सच में तंत्र से हुआ। इसका विधि विधान यह है कि ठीक इसी बात का संकल्प लेकर भैरव जी का अनुष्ठान किया या करवाया जाए। और अगर उस तरह का कोई साधक हो — यह साधकों से ही होगा; पंडित जी लोग ऐसा अनुष्ठान नहीं करेंगे।
अगर घर में मृत्यु तंत्र से हुई हो तो पितृ पक्ष में क्या किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: अगर पूरा एक साल हो चुका है, तो पहली बात यह कि पितृ पक्ष से पहले ही, भाद्रपद मास आदि में करना चाहिए। और पहले यह पक्का कर लीजिए कि यह तंत्र से हुआ। फिर इसका विधि विधान यह है कि ठीक इसी बात का संकल्प लेकर भैरव जी का अनुष्ठान किया या करवाया जाए। और अगर उस तरह का कोई साधक हो — यह साधकों से ही होगा; पंडित जी लोग ऐसा अनुष्ठान नहीं करेंगे।
वह न हो सके, तो अष्टमी से चतुर्दशी तक चंडी पाठ, या कृष्ण की शरण में सात दिन का अनुष्ठान
अष्टमी से चतुर्दशी तक चंडी पाठ, या कृष्ण की शरण में सात दिन का अनुष्ठान
वह न हो सके, वक्ता कहते हैं, तो कम से कम भाद्रपद में अष्टमी से चतुर्दशी तक — या जो कृष्ण जन्माष्टमी पड़े, उससे चतुर्दशी तक — चंडी पाठ आदि करवाइए या कीजिए। या स्वयं कृष्ण जी की शरण लेकर और जिनका श्राद्ध है उनकी शरण लेकर, संकल्प लेकर सात दिन का अनुष्ठान कीजिए या करवाइए।
और अगर नहीं, तो कम से कम चंडी पाठ आदि करवाइए, या कीजिए, वक्ता कहते हैं — भाद्रपद में अष्टमी से चतुर्दशी तक, या जो कृष्ण जन्माष्टमी आए, उससे चतुर्दशी तक। या स्वयं कृष्ण जी की शरण लीजिए: जिनका श्राद्ध है उनकी शरण लेकर, और संकल्प लेकर, सात दिन का अनुष्ठान कीजिए या करवाइए।
श्राद्ध क्रिया के समय क्या करना चाहिए?
गीता के ग्यारहवें अध्याय की ग्यारह आवृत्तियाँ
उसके बाद, जब आप पितृ पक्ष में श्राद्ध क्रिया आदि करें, उस समय श्रीमद् भगवद् गीता के ग्यारहवें अध्याय की ग्यारह आवृत्तियाँ ज़रूर करवाइए। इतना करवा लें, वक्ता कहते हैं, तो 99% संभावना है कि जिनकी मृत्यु अभिचार कर्म से हुई — और वे अभिचार के बंधन में हों तो भी — भगवान नारायण की कृपा से छूट जाएँगे। उनकी गति वहीं से हो जाएगी और वे बँधे नहीं रहेंगे।
उसके बाद, जब आप पितृ पक्ष में श्राद्ध क्रिया आदि करें, उस समय श्रीमद् श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय की ग्यारह आवृत्तियाँ ज़रूर करवाइए। इतना करवा लें, वक्ता कहते हैं, तो 99% संभावना है कि जिनकी मृत्यु अभिचार कर्म से हुई — और वे अभिचार के बंधन में हों तो भी — भगवान नारायण की कृपा से छूट जाएँगे। उनकी गति वहीं से हो जाएगी; वे बँधे नहीं रहेंगे।
जहाँ घर वालों ने पूरा संकल्प करके उन्हें बिठा दिया हो, जैसे यूपी और बिहार में, वहाँ बात अलग है
अकाल मृत्यु वालों को घर में स्थान देने की यूपी-बिहार की प्रथा
बात अलग है, वक्ता कहते हैं, अगर किसी ने उन्हें स्थान दे दिया हो — यानी पूरा संकल्प करके उन्हें बिठा दिया गया हो। घर में लोग स्थान देते हैं, और ऐसा नहीं करना चाहिए। क्योंकि जब किसी की मृत्यु अभिचार से होती है, तो — और वे कहते हैं उन्होंने ख़ासकर यूपी और बिहार में देखा है — जैसे ही पता चलता है कि फलाँ अभिचार से मारा गया, उसी को स्थान दे दिया जाता है। अब वह घर का देवता बन गया। फिर उसकी गति नहीं हो सकती।
यह अलग बात है, वक्ता कहते हैं, अगर किसी ने उन्हें स्थान दे दिया हो। कैसा स्थान? कि पूरा संकल्प करके उन्हें बिठा दिया गया हो। घर में लोग स्थान देते हैं — ऐसा नहीं करना चाहिए। क्योंकि जब किसी की मृत्यु अभिचार से होती है, तो — और वे कहते हैं उन्होंने यह ख़ासकर यूपी और बिहार में देखा है — जैसे ही पता चलता है कि फलाँ अभिचार से मारा गया, उसी को स्थान दे दिया जाता है। अब वह घर का देवता बन गया। फिर उसकी गति नहीं हो सकती।
अगर किसी साधना से काम का वेग बहुत बढ़ जाए तो क्या करें?
महागणपति, शिव पर ठंडी धारा, और अपने आराध्य की स्तुति
किसी साधना से काम का वेग बहुत बढ़ जाए तो शंकर जी का अभिषेक किन मंत्रों और द्रव्यों से करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि काम का वेग तब बहुत बढ़ता है जब मूलाधार गड़बड़ा रहा हो। उस समय सबसे पहले ख़ासकर महागणपति जी का पूजन; और साथ में शिव जी पर ठंडे जल की धारा देते हुए, अगर महादेव के 108 नाम आते हों तो उनका पाठ, और थोड़ी उग्रता से। दूसरी बात अपने आराध्य की स्तुति है: जब आप स्तुति करें, या उनसे जुड़ा चरित्र आदि गाकर पढ़ें, तो काम का वेग बहुत शांत हो जाएगा।
किसी साधना से काम का वेग बहुत ज़्यादा बढ़ जाए तो शंकर जी का अभिषेक किन मंत्रों और द्रव्यों से करना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: काम का वेग बहुत बढ़ता है अगर मूलाधार गड़बड़ा रहा हो। उस समय सबसे पहले ख़ासकर महागणपति जी का पूजन; और साथ में शिव जी पर ठंडे जल की धारा देते हुए, अगर महादेव के 108 नाम आते हों, तो उनका पाठ — और थोड़ी उग्रता से। दूसरी बात अपने आराध्य की स्तुति है। जब आप स्तुति करें, या उनसे जुड़ा चरित्र आदि गाकर पढ़ें, तो काम का वेग बहुत शांत हो जाएगा।
चंडी अनुष्ठान क्या है, और नव चंडी, शतचंडी और सहस्र चंडी क्या हैं?
आवृत्तियों की गिनती जिससे अनुष्ठान का नाम पड़ता है
सप्तशती के पूरे मंत्र, छह अंगों के साथ सात सौ मंत्र, मूल चंडी हैं। जब उसी की नौ दिन में नौ आवृत्तियाँ हों, या नौ ब्राह्मण एक दिन में मिलकर करें, तो नव चंडी है। सौ हो जाएँ तो शतचंडी; और 1008, या हज़ार हो जाएँ, तो सहस्र चंडी मानी जाती है।
चंडी अनुष्ठान पर उसी दिन एक वीडियो डाला गया, वक्ता कहते हैं; यह कैसे होता है, इसके लिए पहले के वीडियो भी उपलब्ध हैं, अनुष्ठान होते हुए — वे देखिए। सप्तशती के पूरे मंत्र, छह अंगों के साथ सात सौ मंत्र — वह मूल चंडी है। जब उसी की नौ दिन में नौ आवृत्तियाँ हों, या नौ ब्राह्मण एक दिन में मिलकर करें, तो वह नवचंडी अनुष्ठान है। सौ हो जाएँ, तो शतचंडी है; और 1008, या हज़ार हो जाएँ, तो वह सहस्र चंडी मानी जाती है।
मनसा देवी कहाँ स्थापित की जाती हैं?
भगवती पार्वती के बगल में
मनसा देवी कहाँ स्थापित होंगी, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि मनसा देवी माँ भगवती पार्वती के बगल में स्थापित होंगी।
मनसा देवी कहाँ स्थापित करनी हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं। मनसा देवी माँ भगवती पार्वती के बगल में स्थापित होंगी।
शिव मंदिर के उत्तर में कुबेर और राम मंदिर में इंद्र क्यों होते हैं?
शिव के मित्र यक्षराज कुबेर, और शिव मंडल के गण
शिव मंडल में देखिए, वक्ता कहते हैं, वहाँ यक्षराज कुबेर जी हैं — क्योंकि यक्षराज कुबेर जी शिव जी के मित्र हैं। और उनके अलावा उनके बहुत से गण भी हैं। वे श्रोता को शिव महापुराण की विश्वेश्वर संहिता वाले प्रसंग की ओर भेजते हैं: एक बार सुनिए, पढ़िए, वहाँ जब शिव जी का मंदिर बनता है, तो विस्तार से मिलेगा कि कौन-कौन स्थापित होते हैं, और उनके कितने गण स्थापित होते हैं।
महादेव के मंदिर में उत्तर दिशा में कुबेर जी, और राम जी के मंदिर में इंद्रदेव क्यों होते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: शिव मंडल में देखिए, वहाँ यक्षराज कुबेर जी हैं, क्योंकि यक्षराज कुबेर जी शिव जी के मित्र हैं। और उनके अलावा, उनके बहुत से गण भी — जब शिव पुराण का पाठ होता है, विश्वेश्वर संहिता वाला, एक बार सुनिए और पढ़िए। उसमें, जब शिव जी का मंदिर बनता है, वहाँ विस्तार से मिलेगा कि कौन-कौन स्थापित होते हैं, और उनके कितने गण स्थापित होते हैं।
क्या रुद्राक्ष पर महादेव का अभिषेक किया जा सकता है?
हाँ, पर उसे भीगा नहीं छोड़ना चाहिए
कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं — पर उसे पानी में डूबा मत रहने दीजिए। अभिषेक के बाद उसे ऊँची जगह पर रखना चाहिए और सूखा रहना चाहिए; नहीं तो, अगर पानी लगता रहा, तो दिक़्क़त होगी।
क्या रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । पर ही महादेव का अभिषेक किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि किया जा सकता है। पर उसे पानी में डूबा मत रहने दीजिए। अभिषेक के बाद उन्हें ऊँची जगह पर रखना चाहिए और सूखा रहना चाहिए; नहीं तो, अगर पानी लगता रहा, तो दिक़्क़त होगी।
अमावस्या पर पड़ने वाले ग्रहण पर क्या करना चाहिए?
न दिखने वाले ग्रहण पर केवल शिवगण और रुद्रगण साधना
14 तारीख़ के ग्रहण के बारे में और क्या वह भारत में दिखेगा, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि 14 वाला नहीं दिखेगा; 28 वाला दिखेगा। अमावस्या का ग्रहण नहीं दिखेगा, इसलिए उस दिन केवल शिवगण साधना, रुद्रगण साधना। अब तक दी गई रुद्रगण साधना, वे जोड़ते हैं, केवल आपके एक मंत्र पर टिकी है; समय मिला तो वे पहले उसकी तंत्रोक्त विधि भी डाल देंगे। इसे शुरू किया जा सकता है — उनके लिए कोई रोक नहीं।
महालय के बारे में, और क्या 14 तारीख़ का ग्रहण भारत में दिखेगा, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि 14 का ग्रहण नहीं दिखेगा। 28 वाला दिखेगा। अमावस्या का ग्रहण नहीं दिखेगा, इसलिए उस दिन केवल शिवगण साधना, रुद्रगण साधना। अब तक जो रुद्रगण साधना दी गई है वह केवल आपके एक मंत्र पर टिकी है। समय मिला, तो वे पहले उसकी तंत्रोक्त विधि भी डाल देंगे। इसे शुरू किया जा सकता है; उनके लिए कोई रोक नहीं।
पेट की लगातार शिकायत में क्या जाँचने को कहा जाता है?
बृहस्पति या राहु की महादशा और अंतर्दशा
पेट में बहुत परेशानी बताने वाले श्रोता से वक्ता कहते हैं: कृपया एक बार देखिए कि बृहस्पति या राहु की महादशा या अंतर्दशा तो नहीं चल रही। एक बार अपनी जन्म कुंडली का विवरण भेजिए, देख लिया जाएगा।
पेट में बहुत परेशानी बताने वाले एक श्रोता से वक्ता कहते हैं: कृपया एक बार देखिए कि बृहस्पति या राहु की महादशा या अंतर्दशा तो नहीं चल रही। एक बार अपनी जन्म कुंडली का विवरण भेजिए, देख लिया जाएगा।
दही या घी के अभिषेक के बाद रुद्राक्ष को कैसे सँभालें?
पोंछकर फिर से स्थापित करें, कभी भीगा न छोड़ें
रुद्राक्ष को पानी में डुबोकर रखेंगे तो वह ख़राब होगा ही, वक्ता दोहराते हैं — ख़राब होगा। उनका अभिषेक करने के बाद, जब आपने दही या घी आदि से अभिषेक किया हो, तो बाद में ऐसा होना चाहिए कि उन पर लगी हर चीज़ हट जाए; फिर उन्हें पोंछकर स्थापित कीजिए।
रुद्राक्ष को पानी में डुबोकर रखेंगे तो वह ख़राब होगा, वक्ता कहते हैं। होगा। ख़राब। उनका अभिषेक करने के बाद — जब आप दही से, या घी से, इन सबसे अभिषेक करें — बाद में ऐसा होना चाहिए कि उन पर लगी हर एक चीज़ हट जाए; और फिर उन्हें पोंछकर स्थापित करना चाहिए।
क्या माँ पार्वती के लिए सरस्वती का पाठ किया जा सकता है?
बिना किसी शर्त के अनुमति
बिल्कुल, वक्ता जवाब देते हैं: माँ पार्वती के लिए सरस्वती का पाठ किया जा सकता है।
क्या माँ पार्वती के लिए सरस्वती का पाठ किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: बिल्कुल। माँ पार्वती के लिए सरस्वती का पाठ किया जा सकता है।
हृदय का पाठ कौन कर सकता है?
केवल दीक्षित; अदीक्षित के लिए बहुत तीव्र
वक्ता जवाब देते हैं कि हृदय आदि का पाठ दीक्षित हों तभी करना उचित है। अदीक्षित व्यक्ति के लिए हृदय का पाठ करना, वे कहते हैं, बहुत बड़ी तीव्रता है।
वक्ता एक श्रोता को जवाब देते हैं कि हृदय आदि का पाठ दीक्षित हों तभी करना उचित है। अदीक्षित व्यक्ति के लिए हृदय का पाठ करने का अर्थ है बहुत बड़ी तीव्रता।
क्या दादा जी से मिली माला से जाप किया जा सकता है?
विरासत में मिली माला से जाप, या उसे देवता पर रखना
अगर माला दादा जी से मिली है, वक्ता कहते हैं, तो आप उससे बिल्कुल जाप कर सकते हैं। और अगर उससे जाप नहीं करना चाहते, तो रुद्राक्ष पूजा स्थान में रखा जा सकता है: रुद्राक्ष की माला हो तो शिव जी पर चढ़ाई जा सकती है, और तुलसी की माला हो तो नारायण जी पर।
कवच धारण करने के लिए क्या लिखा जाता है?
केवल मूल लिखा जाता है
कवच धारण करने के लिए, वक्ता कहते हैं, केवल मूल लिखा जाता है।
कवच धारण करने के बारे में पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं। कवच धारण करने के लिए केवल मूल लिखा जाता है।
क्या सूतक में पितरों के लिए पशु सेवा की जा सकती है?
गाय, कौए और कुत्ते का रोज़ का हिस्सा
बिल्कुल, वक्ता कहते हैं: सूतक में पशु सेवा तो होती ही है। रोज़ गाय, कौए और कुत्ते का हिस्सा निकलता है।
पूजा के अंत में देवताओं से जाने को कैसे कहा जाता है?
लक्ष्मी और गणपति से रुकने को कहा जाता है; बाक़ी से अपने लोक जाने को
दैनिक पूजन में, वक्ता कहते हैं, उनके अनुसार विसर्जन करने की कोई ज़रूरत नहीं होनी चाहिए; वह पूरी विधि साधारण गृहस्थों के लिए नहीं है। पर विशेष पूजन में, जब हम निवेदन करते हैं, तो विसर्जन मंत्र में यों प्रार्थना करते हैं: कि लक्ष्मी और गणेश, गणपति जी, ऋद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ के साथ, हमेशा हमारे निवास में अपना स्थान ग्रहण करें और यहीं रहें। और भगवती दुर्गा से कहते हैं: हे माँ जगदंबा, अपने लोक को प्रस्थान कीजिए, और वहाँ से अपने वज्र से हमारी रक्षा कीजिए; और जब भी कोई शुभ कार्य हो और मैं आपको फिर बुलाऊँ, तब हे माई, अपने परिवार के साथ फिर यहाँ आइए।
दैनिक पूजन और विशेष पूजन में गणेश जी और लक्ष्मी जी के अलावा दूसरे देवी-देवताओं से पूजा के बाद अपने लोक जाने का निवेदन कैसे किया जाता है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: दैनिक पूजन में, उनके अनुसार, विसर्जन करने की कोई ज़रूरत नहीं होनी चाहिए; यह पूरी विधि साधारण गृहस्थों के लिए नहीं है। पर विशेष पूजन आदि में, जब हम निवेदन करते हैं, तो विसर्जन मंत्र में हम यह कहते और प्रार्थना करते हैं — कि लक्ष्मी और गणेश, गणपति जी, ऋद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ के साथ, हमेशा हमारे निवास स्थान में अपना स्थान ग्रहण करें, कि वे यहीं रहें। और बाक़ी के लिए, जैसे हम भगवती दुर्गा से कहते हैं: हे माँ जगदंबा, अपने लोक को प्रस्थान कीजिए, और वहाँ से अपने वज्र से हमारी रक्षा कीजिए; और जब भी कोई शुभ कार्य हो और मैं आपको फिर बुलाऊँ, तब हे माई, अपने परिवार के साथ फिर यहाँ आइए। इसी तरह, यह श्लोक जो संस्कृत में है — अगर हम इसे हिंदी में कहें, तो ठीक है। ठीक इसी तरह आप बोलकर उन देवी-देवताओं का विसर्जन करेंगे जिनका कर रहे हैं। और उससे पहले आप कहते हैं: हे श्री गणपति जी महाराज, ऋद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ के साथ इसी स्थान पर निवास कीजिए। फिर बाक़ी देवी-देवता, और फिर प्रमुख देवी-देवता। वे कहते हैं कि सब श्लोक डाले जा रहे हैं; रिकॉर्ड हो गया है और बस आवाज़ ठीक से मिलानी है ताकि अच्छे से सुनाई दे, और अगले दिन अपलोड होगा, सप्तश्लोकी की सिद्धि और उसके प्रयोग के साथ।
कवच से माला मंत्र, हृदय और गीता तक की सीढ़ी क्या है?
हर एक को सौ से गुणा करें तो अगला बनता है
अब कवच पाठ को सौ से गुणा कीजिए, वक्ता कहते हैं, तो वह माला मंत्र बनता है। माला मंत्र को सौ से गुणा कीजिए तो हृदय बनता है। हृदय को सौ से गुणा कीजिए तो गीता बनती है। तो अंत में गीता आती है — और किसी भी देवी या देवता की, गीता सबसे बड़ा फल देती है।
अब कवच पाठ को सौ गुना कीजिए, वक्ता कहते हैं, तो वह माला मंत्र बनता है। माला मंत्र को सौ गुना कीजिए तो वह हृदय बनता है। हृदय को सौ गुना कीजिए तो वह गीता बनती है। अब कहिए: अंत में गीता आती है। किसी भी देवी या देवता की, गीता सबसे बड़ा फल देती है। और यह इसलिए कि गीता के ज़रिए, जिस चीज़ के लिए हमने जन्म लिया है, वह हमें दर्पण की तरह दिखाई जाती है — गीता के ज़रिए हमारे सामने दर्पण रखा जाता है। कोई भी गीता पढ़िए और गीता पढ़कर समझ जाएँगे कि आप कितने पानी में हैं। तो जैसा आपने लिखा, सौ-सौ से गुणा करते जाइए, सबसे अंत में गीता आती है, और गीता सबसे बड़ा असर देती है।
नारायण का द्वादशाक्षरी और अष्टादशाक्षरी कौन कर सकता है?
सार्वजनिक रूप से न बोला जाने वाला मंत्र, जिसके लिए वैष्णव दीक्षा चाहिए
अगर आप यज्ञोपवीत पहनते हैं, वक्ता कहते हैं, तो यह मंत्र तुलसी की माला से कर सकते हैं; और यज्ञोपवीत पहनते हैं, तो उनके समझाए तांत्रिक प्रणव और देवी प्रणव लगाकर किया जा सकता है। फिर भी यह मंत्र सार्वजनिक रूप से बोला भी नहीं जाना चाहिए। भगवान नारायण का यह द्वादशाक्षरी मंत्र उनका सबसे विशेष मंत्र है — या अष्टादशाक्षरी — इसलिए इसे दीक्षित होकर ही, किसी वैष्णव जन द्वारा, करना चाहिए।
ॐ जयंती मंगला काली मंत्र में कौन सी शक्तियाँ हैं?
ग्यारह देवियाँ, कुलदेवी, स्वधा, और अर्यमा
ॐ जयंती मंगला काली मंत्र पर पूरा वीडियो है, वक्ता कहते हैं। उसमें कुलदेवी के साथ ग्यारह देवियों की शक्तियाँ हैं। यह केवल काली जी और दुर्गा जी का नहीं: इसमें स्वधा भी हैं, यानी पितरों की शक्तियाँ भी इसमें हैं। और यम — यानी अर्यमा, जो पितरों के प्रमुख देवता हैं, नारायण का एक रूप, जिनके बारे में श्रीमद् भगवद् गीता में, उनके विचार से सातवें अध्याय में, भगवान ने कहा है कि पितरों में मैं अर्यमा नाम का पितर हूँ — और उनकी प्रमुख शक्ति स्वधा, जिनसे पितरों की तृप्ति होती है, वह भी उस मंत्र में हैं।
ॐ जयंती मंगला काली मंत्र पर पूरा वीडियो है, वक्ता कहते हैं। उसमें कुलदेवी के साथ ग्यारह देवियों की शक्तियाँ हैं। यह केवल काली जी और दुर्गा जी का नहीं। इसमें स्वधा भी हैं — यानी पितरों की शक्तियाँ भी इसमें हैं। और यम, यानी अर्यमा, जो पितरों के प्रमुख देवता हैं, नारायण का एक रूप, जिनके बारे में श्रीमद् भगवद् गीता में — जिस पर वे आगे चर्चा करेंगे, और जहाँ तक उन्हें याद है शायद सातवाँ अध्याय है — भगवान ने कहा है कि पितरों में मैं अर्यमा नाम का पितर हूँ। और उनकी प्रमुख शक्ति, स्वधा, जिनसे उनकी तृप्ति होती है: वह भी उस मंत्र में हैं।
शास्त्र क्या कहता है
Kṛṣṇa says that among the ancestors he is Aryamā.
The speaker recalls the line as from the seventh chapter; it is 10.29.
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अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥
नागों में मैं अनन्त हूँ, जल के प्राणियों में वरुण हूँ। पितरों में मैं अर्यमा हूँ, और दण्ड देने वालों में यमराज हूँ।
जाप के समय कमर दर्द हो तो क्या करें?
ऊँचा लकड़ी का आसन, और पैर ज़मीन से ऊपर
एक श्रोता, जो ब्रह्मचर्य रखते हैं, बत्तीस नामावली का नियमित जाप करते हैं, रोज़ गीता पाठ और शिव जी के पंचाक्षरी की रोज़ एक माला करते हैं, और जिनकी कमर में दर्द है, उनसे वक्ता कहते हैं: जितनी क्षमता है उतनी देर बैठिए, बहुत ज़ोर मत डालिए। अगर आसन पर बैठने में दिक़्क़त हो, तो थोड़ी ऊँची लकड़ी की चौकी बनवाकर उस पर आसन बिछवाइए, फिर बैठिए, ताकि बैठना आसान हो। दूसरी बात यह कि पैर बस ज़मीन पर न हों: अपना आसन बड़ा रखिए ताकि आराम से बैठ सकें। यह आप कर सकते हैं, वे कहते हैं; इसमें कोई दोष नहीं।
एक श्रोता, जो ब्रह्मचर्य रखते हैं, बत्तीस नामावली का नियमित जाप करते हैं, रोज़ गीता पाठ और शिव जी के पंचाक्षरी मंत्र की रोज़ एक माला करते हैं, और जिनकी कमर में दर्द है, उनसे वक्ता कहते हैं: ठीक है — जितनी क्षमता है उतनी देर बैठिए; बहुत ज़ोर मत डालिए। कमर में दर्द है और आप पाठ कर रहे हैं। और दूसरी बात: अगर आसन पर बैठने में दिक़्क़त हो, तो थोड़ी ऊँची लकड़ी की चौकी बनवाइए, उस पर आसन बिछवाइए, और फिर बैठिए, ताकि बैठना आसान हो। दूसरी बात यह कि पैर बस ज़मीन पर न हों; इसके लिए अपना आसन बड़ा रखिए, ताकि आराम से बैठ सकें। यह आप कर सकते हैं। इसमें कोई दोष नहीं।
व्यक्ति वैराग्य तक असल में कैसे पहुँचता है?
जीवन ख़ुद सिखाता है, अक्सर चोट से
यह बात, वक्ता कहते हैं, तभी होगी जब सच जानने के बाद उसका अभ्यास किया जाए। और उनके अनुसार जीवन ख़ुद सिखाता है। जब जीवन में हर तरह की चोट पड़ती है — जब वही व्यक्ति जिसके लिए आपने जान लगा दी, आपका अपमान करे, या उस तरह नीचा दिखाए — तब आपको लगेगा कि हाँ, यह संसार नश्वर है। लोग अध्यात्म की ओर कैसे बढ़ते हैं: जब किसी प्रिय के साथ कुछ होता है और वे विरक्त हो जाते हैं, जब प्रेम में धोखा मिलता है तो वे विरक्त होकर चले जाते हैं; जहाँ धोखा मिला वहाँ से वैराग्य की ओर जाते हैं। अगर यह बात अपने आप हो जाए तो बहुत बड़ी बात है — आज के समय में व्यक्ति बिना चोट खाए स्थिर नहीं होता।
यह बात, वक्ता कहते हैं, तभी होगी जब सच जानने के बाद उसका अभ्यास किया जाए। और उनके अनुसार, जीवन ख़ुद इसे सिखाता है। जब जीवन में हर तरह की चोट पड़ती है — जब वही व्यक्ति जिसके लिए आपने अपनी जान लगा दी, आपका अपमान करे, या उस तरह नीचा दिखाए — तब आपको लगेगा कि हाँ, यह संसार नश्वर है। लोग अध्यात्म की ओर कब बढ़ते हैं: जब किसी प्रिय के साथ ऐसा कुछ होता है, वे उच्चाटित हो जाते हैं; जब प्रेम में धोखा मिलता है तो वे उच्चाटित हो जाते हैं, और चले जाते हैं। जहाँ धोखा मिला, वहाँ से वे वैराग्य की ओर जाते हैं। तो अगर यह बात अपने आप हो जाए, तो बहुत बड़ी बात है। आज के समय में व्यक्ति बिना चोट खाए स्थिर नहीं होता।
पच्चीस साल पहले की अकाल मृत्यु, जिसकी क्रिया कभी नहीं हुई, उसके लिए क्या करें?
नारायण बलि, त्रिपिंडी, नागबलि और भागवत सप्ताह
घर में बीस-पच्चीस साल पहले अकाल मृत्यु से गए किसी व्यक्ति की मुक्ति के लिए, जिसका कोई क्रिया-कर्म नहीं हुआ, क्या करें और उसके दोष से कैसे बचें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: इसके लिए नारायण बलि, त्रिपिंडी और नागबलि करवाइए, और श्रीमद् भागवत का सप्ताह यज्ञ करवाइए, मूल पाठ करवाइए। और ख़ुद भी, हो सके तो, श्रीमद् भागवत आदि का पाठ कीजिए, या जिस इष्ट की उपासना करते हैं उसका। और श्रीमद् भगवद् गीता के तीसरे अध्याय का पाठ बार-बार कीजिए — सौ प्रतिशत उनकी गति होगी, अगर अकाल मृत्यु थी। पर कुछ समय तक जारी रखिए, और पूरे मन से समर्पित होकर।
घर के एक व्यक्ति की मुक्ति के लिए, जिसकी अकाल मृत्यु बीस-पच्चीस साल पहले हुई और जिसका कोई क्रिया-कर्म नहीं हुआ, क्या करें और उसके दोष से कैसे बचें, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: इसके लिए नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध और नागबलि करवाइए, और श्रीमद् भागवत का सप्ताह यज्ञ करवाइए; मूल पाठ करवाइए। और ख़ुद भी, हो सके तो, श्रीमद् भागवत आदि का, या जिस इष्ट आदि की उपासना करते हैं उसका पाठ कीजिए। और श्रीमद् भगवद् गीता के तीसरे अध्याय का पाठ बार-बार कीजिए। सौ प्रतिशत उनकी गति होगी — अगर अकाल मृत्यु थी। पर इसे कुछ समय तक जारी रखिए, और पूरे मन से समर्पित होकर।
योग्य ब्राह्मण ऐसे मृत व्यक्ति के लिए तीसरा अध्याय कैसे करे?
स्थापित शालिग्राम शिला के सामने, कृष्ण पक्ष में या कम से कम अमावस्या पर
अगर कोई योग्य ब्राह्मण हो जो त्रिकाल गायत्री आदि करता हो और शालिग्राम शिला की भी पूजा करता हो, तो बस वह शालिग्राम शिला स्थापित करके उसके सामने उससे पाठ करवाकर, कृष्ण पक्ष में रोज़ कम से कम 27 बार, या 21 बार, या 11 बार — या कम से कम अमावस्या पर — श्रीमद् भगवद् गीता के तीसरे अध्याय की आवृत्ति करवाई जाए, पर अकाल मृत्यु से गए लोगों को लक्ष्य करके, तो उनकी सद्गति ज़रूर होती है। पर उसके बाद आपको श्राद्ध आदि करना चाहिए; त्रिपिंडी और ये सब करना चाहिए। और अगर इतनी क्षमता न हो, तो कम से कम गीता को पकड़े रहिए, ताकि पहले उन्हें शांति मिले।
अगर कोई योग्य ब्राह्मण हो जो त्रिकाल गायत्री आदि करता हो, और जो शालिग्राम शिला की पूजा भी करता हो, वक्ता कहते हैं — तो बस वह शालिग्राम शिला स्थापित करके, उसकी उपस्थिति में और उसके द्वारा, श्रीमद् भगवद् गीता के तीसरे अध्याय की आवृत्ति रोज़ कम से कम 27 बार, या 21 बार, या 11 बार, कृष्ण पक्ष में, या कम से कम अमावस्या पर करवाई जाए — पर जिनकी अकाल मृत्यु हुई उन्हें लक्ष्य करके — तो उनकी सद्गति ज़रूर होती है। और उसके बाद, फिर भी, आपको श्राद्ध आदि करना चाहिए। त्रिपिंडी, ये सब करना चाहिए। और अगर आपकी इतनी क्षमता न हो, तो कम से कम गीता को पकड़े रहिए, ताकि पहले उन्हें शांति मिले।
किसी भी देवता को प्रसिद्ध किया जा सकता है, पर शास्त्रोक्त वर्णन नहीं मिलेगा
दक्षिण में उच्छिष्ट गणपति और नील सरस्वती के मंदिर
आप किसी भी देवी या देवता को प्रसिद्ध कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं — इसमें क्या बड़ी बात है? ठीक है: पर इनका शास्त्रोक्त वर्णन आपको नहीं मिलेगा। तंत्र शास्त्र में जैसा रूप वर्णित है, और उस वर्णन का ढंग, वह सार्वजनिक वर्णन है ही नहीं; यही सच्चाई है। अब दक्षिण में आपको उच्छिष्ट गणपति का मंदिर मिलेगा — उच्छिष्ट गणपति और भगवती नील सरस्वती का मंदिर।
दक्षिण में यह प्रसिद्ध सद्गुरु के कारण हो रहा है, वक्ता उनसे पूछे गए प्रश्न के बारे में कहते हैं। आप किसी भी देवी या देवता को प्रसिद्ध कर सकते हैं। इसमें क्या बड़ी बात है? ठीक है — पर इनका शास्त्रोक्त वर्णन आपको नहीं मिलेगा। तंत्र शास्त्र में जैसा रूप वर्णित है, और जिस ढंग से वर्णित है, वह सार्वजनिक वर्णन है ही नहीं; यही सच्चाई है। अब दक्षिण में आपको उच्छिष्ट गणपति का मंदिर मिलेगा। उच्छिष्ट गणपति और भगवती नीलसरस्वती का मंदिर।
वहाँ स्त्री और पुरुष अलग-अलग रास्ते से जाते हैं, और कोई जोड़ा साथ नहीं जाता
स्त्री और पुरुष के अलग रास्ते, और कोई जोड़ा साथ नहीं
वे कहते हैं कि वे ख़ुद नहीं गए, पर जो गए उनसे सुना है, और कहीं इसकी चर्चा हो रही थी: कि स्त्री और पुरुष, जोड़ा, कभी साथ जाकर एक ही समय वह दर्शन नहीं कर सकते। स्त्रियों के जाने का रास्ता अलग है; पुरुषों के जाने का रास्ता अलग। और इस पर भी, वे कहते हैं, किसी दिन झगड़ा होगा — हम साथ क्यों नहीं कर सकते, तुम्हारी सोच ग़लत है। कामाख्या मंदिर को लेकर भी होता है: जब उन्होंने वीडियो डाला, तो कितने लोग आकर ग़लत कमेंट करने लगे कि तुम्हारी सोच यह है, वह है।
अब देखिए, वक्ता कहते हैं, वे नहीं गए; पर जो गए उनसे यह बात सुनी है, और इसकी चर्चा हो रही थी, और कहीं बताया गया — कि उनका दर्शन कभी स्त्री और पुरुष, जोड़ा, एक समय में साथ जाकर नहीं कर सकते। स्त्रियों के जाने का रास्ता अलग है; पुरुषों के जाने का रास्ता अलग है। किसी दिन उस पर भी झगड़ा होगा: हम साथ क्यों नहीं कर सकते — तुम्हारी सोच ग़लत है। कामाख्या मंदिर को लेकर भी होता है: जब उन्होंने वीडियो डाला, तो कितने लोग आकर ग़लत कमेंट करने लगे, कि तुम्हारी सोच यह है, वह है।
जहाँ मन में क्षण भर को भी अपराध का भाव उठे, वहाँ दोष लग चुका
जहाँ क्षण भर का अपराध भाव उठा, वहाँ दोष लगा
पर सच्चाई बस यह है, वक्ता कहते हैं, कि दोष लगता है। जहाँ मन में क्षण भर को अपराध का भाव उठे, वहाँ दोष लग गया। इसी तरह यह रूप — यह विशेष रूप — सब लोगों के लिए है ही नहीं; वही जिसे महाराज ने पूरी दुनिया में फैलाया है। यहाँ कोई बोले तो क्या होगा, वे पूछते हैं; हम कुछ भी नहीं, और बड़े लोग बोलेंगे नहीं।
पर सच्चाई बस यह है, वक्ता कहते हैं: कि दोष लगता है। जहाँ मन में क्षण भर को अपराध का भाव उठा, वहाँ दोष लग गया। इसी तरह, यह जो रूप है — यह रूप सब लोगों के लिए है ही नहीं। वही जिसे महाराज ने पूरी दुनिया में फैलाया है। यहाँ कोई बोले तो क्या होगा, वे पूछते हैं। हम कुछ भी नहीं। और बड़े लोग बोलेंगे नहीं।
अगर तबीयत ठीक न हो, तो क्या अखंड ज्योत जलते समय व्रत ज़रूरी है?
समुद्री नमक की जगह सेंधा नमक, और सेवा जारी रह सकती है
तबीयत ठीक न हो तो अखंड ज्योत जलाने पर व्रत ज़रूरी है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: तबीयत ठीक नहीं — अगर आप अखंड ज्योत की देखभाल कर सकते हैं, तो बात यह है कि अगर नमक खाना है, तो पहाड़ी नमक वाला भोजन लीजिए; उस समय समुद्री नमक वाला भोजन मत लीजिए। इस तरह करके भी आप अखंड ज्योत की सेवा और पूजा कर सकते हैं।
जब अखंड ज्योति जली हो और तबीयत ठीक न हो, तो क्या व्रत रखना ज़रूरी है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: तबीयत ठीक नहीं; अगर आप अखंड ज्योत की देखभाल और रखवाली कर सकते हैं। बात यह है कि अगर नमक खाना है, तो पहाड़ी नमक वाला भोजन लीजिए; उस समय समुद्री नमक वाला भोजन मत लीजिए। इस तरह करके भी आप अखंड ज्योत की सेवा और पूजा कर सकते हैं।
सहस्रनाम पाठ का महत्व कहाँ बताया गया है?
हर सहस्रनाम के अंत में ही
सहस्रनाम पाठ का महत्व, वक्ता कहते हैं, हर सहस्रनाम के बाद ही आपको दिख जाएगा।
सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। पाठ के महत्व के बारे में पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं। सहस्रनाम पाठ का महत्व आपको हर सहस्रनाम के बाद ही दिख जाएगा।
क्या लंबे अनुष्ठान के दौरान एकादशी रखनी चाहिए?
यह गुरु के आदेश पर निर्भर है; उनका अपना नियम केवल एक देवता
जब भी कोई व्यक्ति कोई विस्तृत अनुष्ठान कर रहा हो, वक्ता कहते हैं, तो प्रश्न यह है कि उसे क्या गुरु निर्देश मिला है। मान लीजिए आप भगवती का 41 दिन का अनुष्ठान कर रहे हैं, और हर महीने की एकादशी रखते आए हैं, और 41 दिन के अनुष्ठान में दो एकादशी पड़ सकती हैं — एकादशी रखें या नहीं? यह इस पर निर्भर करेगा कि आपके गुरु जी ने इसके लिए क्या आदेश दिया है। जहाँ तक उनकी अपनी मान्यता है, और वे साफ़ कहते हैं कि यह मान्यता है, शास्त्रोक्त प्रमाण वाला उत्तर नहीं, उपासना केवल उसी देवता से जुड़ी होनी चाहिए जिसकी पूजा हो रही है।
जब भी कोई व्यक्ति कोई विस्तृत अनुष्ठान कर रहा हो, वक्ता कहते हैं, तो बात यह है कि उसे क्या गुरु निर्देश मिला है। मान लीजिए, जहाँ तक उन्होंने समझा, कि हम 41 दिन का अनुष्ठान कर रहे हैं और भगवती का कर रहे हैं। ठीक है। अब उसमें हम हर महीने की एकादशी भी रखते आए हैं। और 41 दिन के अनुष्ठान में हो सकता है दो एकादशी पड़ें। तो उस समय हमें एकादशी रखनी है या नहीं — शायद आपने यही पूछा है। यह इस पर निर्भर करेगा कि आपके गुरु जी ने इसके लिए क्या आदेश दिया है। जहाँ तक उनकी अपनी मान्यता है — और वे साफ़ कहते हैं, यह मान्यता है, वे इसे कोई तथ्य नहीं बता रहे, न यह शास्त्रोक्त प्रमाण वाला उत्तर है — उनके अनुसार उपासना केवल उसी देवता से जुड़ी होनी चाहिए जिसकी पूजा हो रही है।
भगवती विंध्यवासिनी के 41 दिन के आवरण पूजन में क्या अनुमति है?
इसके अलावा केवल शिव का अभिषेक; कोई और विशेष पूजन नहीं
जैसे, वक्ता कहते हैं, अगर हम भगवती विंध्यवासिनी के आवरण पूजन का 41 दिन का मंडल कर रहे हैं, तो उसके बीच किसी और देवी-देवता का विशेष पूजन भी नहीं हो सकता। उसमें हम केवल शिव जी का अभिषेक कर सकते हैं। बाक़ी साधारण देवी-देवताओं का, स्वस्तिवाचन आदि में जो उच्चारण होता है वह होता है। उसके बाद किसी का विशेष पूजन नहीं: केवल और केवल भगवती विंध्यवासिनी का पूरा आवरण पूजन, और उनका सहस्रनाम और गीता पाठ आदि, और उनका मंत्र जाप, दिन भर में जितना करें। किसी और देवी-देवता का कोई और विशेष पूजन नहीं होगा।
जैसे, वक्ता कहते हैं, अगर हम भगवती विंध्यवासिनी के आवरण पूजन का 41 दिन का मंडल कर रहे हैं, तो उसके बीच किसी और देवी-देवता आदि का विशेष पूजन भी नहीं हो सकता। उसमें हम केवल शिव जी का अभिषेक कर सकते हैं। बाक़ी साधारण देवी-देवताओं का, स्वस्तिवाचन आदि में जो उच्चारण होता है, वह होता है। उसके बाद किसी का विशेष पूजन नहीं: केवल और केवल भगवती विंध्यवासिनी का पूरा आवरण पूजा, और उनका सहस्रनाम और गीता पाठ आदि जो होता है, सब उन्हीं का, और उनका मंत्र जाप, दिन भर में जितना करें, जो भी करें। किसी और देवी-देवता का कोई और विशेष पूजन नहीं होगा। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, हम एकादशी रखना चाहें तो भी नहीं रख सकते, क्योंकि तब मेरा यह मंडल पूजन सफल ही नहीं होगा। उनके यहाँ यही चलता है, और वे उसी हिसाब से बता रहे हैं। वैसे वे एकादशी रखते ही नहीं: भगवती के उपासक होने के नाते वे अष्टमी और चतुर्दशी आदि मानते हैं। तो उनके अनुसार, आप जो साधना कर रहे हैं उसके लिए आपके जो गुरु जी हैं वही आपको यह बात ठीक से बता सकते हैं — क्या करना चाहिए।
क्या शूद्र साधक चंडी पाठ कर सकता है?
कौल में वर्ण का कोई वर्णन नहीं
वक्ता कहते हैं: ब्राह्मण शब्द छोड़िए — आजकल लोगों को ब्राह्मण के नाम से परेशानी है। अगर कोई साधक, शूद्र भी हो, कौल-दीक्षित है — और कौल में वर्ण का कोई वर्णन नहीं — और वह भगवती चंडिका का बहुत अच्छा पाठ करता है, या कोई भी साधक पाठ कर रहा है, और आप वहाँ हैं, तो हो गया।
हर किसी के लिए एक अखंड ज्योत अलग जलेगी, वक्ता कहते हैं; अगर कोई कलश माँगे, तो उसका अलग होगा। बाक़ी के लिए, अगर एक दिन में एक ब्राह्मण, या एक साधक, जो भी हो — ब्राह्मण शब्द छोड़िए, वे कहते हैं; आजकल लोगों को ब्राह्मण के नाम से परेशानी है। अगर कोई साधक, शूद्र होते हुए भी, कौल-दीक्षित है — और कौल में वर्ण का कोई वर्णन नहीं — और वह भगवती चंडिका का बहुत अच्छा पाठ करता है; या कोई भी साधक पाठ कर रहा है, और आप वहाँ हैं।
नौ ब्राह्मणों वाला तंत्रोक्त अनुष्ठान कैसे अलग है?
एक संकल्प से बँधे नौ पाठक, लाखों के ख़र्च पर
और तंत्रोक्त अनुष्ठान में, वक्ता कहते हैं, जहाँ नौ ब्राह्मण मिलकर अनुष्ठान करते हैं, वे नौ ब्राह्मण किसी और का अनुष्ठान नहीं करेंगे; वे हमारे अनुष्ठान के भीतर नहीं रहते। जहाँ लोग बड़े अनुष्ठान करवाते हैं — कि मेरी यह बात होनी ही चाहिए — वहाँ लक्ष्य होता है कि हाँ, नव चंडी होगी, नौ दिन का हवन होगा, नौ दिन का बहुत विस्तृत पूजन होता है। वे नौ लोग कहीं और कोई पूजन-पाठ नहीं करेंगे; उनका तय है, और एक व्यक्ति करवा रहा है। तो उसका ख़र्च लाखों रुपये का है, और इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं कि यहाँ वे 1100 में कर रहे हैं, कि 700 में सब मिलकर अच्छे से कर रहे हैं। अगर कोई कहे कि उस विधि विधान से नौ दिन में शतचंडी करवाओ, तो उसमें लाखों-लाखों का ख़र्च है।
और तंत्रोक्त अनुष्ठान में, वक्ता कहते हैं, जैसे जब नौ ब्राह्मण मिलकर अनुष्ठान करते हैं — वे नौ ब्राह्मण किसी और का अनुष्ठान नहीं करेंगे; वे हमारे अनुष्ठान के भीतर नहीं रहते। जहाँ लोग बड़े अनुष्ठान करवाते हैं — भाई, मेरी यह बात होनी ही चाहिए — वहाँ लक्ष्य होता है कि हाँ, नव चंडी होगी, नौ दिन का हवन होगा, नौ दिन का बहुत विस्तृत पूजन होता है। वे नौ लोग किसी और जगह कोई पूजन-पाठ नहीं करेंगे। उनका तय है। और एक व्यक्ति करवा रहा है। तो उसका ख़र्च लाखों रुपये का है। वह अलग है, और इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं कि हम यहाँ 1100 में कर रहे हैं, कि 700 में हम सब मिलकर अच्छे से कर रहे हैं। वे लोग ज़्यादा से ज़्यादा आवरण पूजन में आकर अपना आवरण पूजन करके चले जाएँगे, या अभिषेक आदि में मंत्र जाप आदि करेंगे, या जो भी। पर उनका कोई योगदान नहीं, न वे इस ओर कुछ कर सकते हैं; वे संकल्प से बँधे हैं, और अलग हैं। वहाँ लाखों है; फिर दस हज़ार क्या — उसमें एक-एक लाख जाएगा। और अगर कोई कहे कि शतचंडी करवाओ, कि नौ दिन में शतचंडी हो और यह विधि विधान, तो उसमें लाखों-लाखों का ख़र्च है।
किसी नए व्यक्ति की प्रेरणा ख़त्म करने के लिए दो नकारात्मक कमेंट काफ़ी हैं
दो नकारात्मक कमेंट नए व्यक्ति की प्रेरणा ख़त्म कर सकते हैं
यह ग़ुस्से की बात नहीं, वक्ता कहते हैं, समझाने की बात है, ताकि लोग समझें: व्यक्ति बड़ी मुश्किल से कोई साधना करने को प्रेरित होता है। और वह अभी सोच ही रहा होता है कि साधना करनी है, तभी दो-चार नकारात्मक बातें सुनकर-पढ़कर, कमेंट पढ़कर, वह व्यक्ति अपनी आशा छोड़ देता है। यही बात श्रीमद् भगवद् गीता में है — यह ग्यारहवें अध्याय का माहात्म्य है। और पहले अध्याय का माहात्म्य जो उन्होंने पढ़ा था: एक ज्ञानी व्यक्ति था, पर वह सबका अपमान करता और सबको भ्रष्ट करता रहता, और बाद में उसकी क्या दुर्गति हुई? यह सब करने से यही होता है।
यह ग़ुस्से की बात नहीं, वक्ता कहते हैं; यह समझाने की बात थी, ताकि लोग समझें — कि व्यक्ति बहुत मुश्किल से कोई साधना करने को प्रेरित होता है। और वह अभी सोच ही रहा होता है कि साधना करनी है, तभी दो-चार नकारात्मक बातें सुनकर-पढ़कर, कमेंट पढ़कर, वह व्यक्ति अपनी आशा छोड़ देता है। और यही बात श्रीमद् भगवद् गीता में है: यह ग्यारहवें अध्याय का माहात्म्य है। और पहले अध्याय का माहात्म्य जो उन्होंने पढ़ा था — उसमें क्या था? एक ज्ञानी व्यक्ति था, पर वह सबका अपमान करता और सबको भ्रष्ट करता रहता। और बाद में उसकी क्या दुर्गति हुई? यह सब करने के कारण यही होता है। पहले लोग आमने-सामने बोलकर करते थे; अब हम यूट्यूब और फ़ेसबुक पर कमेंट करके कर रहे हैं।
जो दूसरे को भक्ति मार्ग से हटाता है, उसका क्या होता है?
आप अपना आने वाला प्रारब्ध बनाते हैं
तो अगर आप किसी को भक्ति मार्ग से हटा रहे हैं, वक्ता कहते हैं, भगवत मार्ग से हटा रहे हैं, तो आप ख़ुद अपना आने वाला प्रारब्ध बना रहे हैं। उनकी कोशिश बस इतनी थी — इसे आपके अवचेतन मन में डालना: भाई, जागो, अपराध मत करो।
तो अगर आप किसी को भक्ति मार्ग से हटा रहे हैं, वक्ता कहते हैं, भगवत मार्ग से हटा रहे हैं — तो आप ख़ुद अपना आने वाला प्रारब्ध बना रहे हैं। उनकी कोशिश बस इतनी थी: इसे आपके अवचेतन मन में डालना। भाई, जागो; अपराध मत करो।
उस बहू का क्या, जिसके सास-ससुर न श्राद्ध करते हैं न करने देते हैं?
उसकी वृद्धि नहीं रुक सकती; उनकी अपनी गति उनकी अपनी बनाई है
एक श्रोता बताती हैं कि उनके सास-ससुर न श्राद्ध करते हैं न करने देते हैं, कि उन्होंने पितृ पक्ष में चुपके से अनुष्ठान करवाया, और घर में बस पितृ स्तोत्र और स्वधा स्तोत्र का जाप करती हैं। कोई बात नहीं, वक्ता जवाब देते हैं। जब सास-ससुर ऐसी सोच रखते हैं, तो यही वह बात है कि प्रारब्ध बना-बनाया नहीं आता — लोग उसे ख़ुद बनाते हैं। ऐसे व्यक्ति के लिए, कोई कहे भी कि गया जी में श्राद्ध कर रहे हैं ताकि उनकी गति हो, तो ऐसे लोगों की गति नहीं होती: वे धुंधुकारी जैसे प्रेत बनेंगे, और उसके बाद दोष होगा।
एक श्रोता बताती हैं कि उनके सास-ससुर न श्राद्ध करते हैं न करने देते हैं; कि उन्होंने पितृ पक्ष में चुपके से अनुष्ठान करवाया; और घर में वे बस पितृ स्तोत्र और स्वधा स्तोत्र का जाप करती हैं। कोई बात नहीं, वक्ता जवाब देते हैं। जब ये सास-ससुर ऐसी सोच रखते हैं, तो ठीक यही मतलब है जब कहा जाता है कि प्रारब्ध बना-बनाया नहीं रहता — लोग उसे ख़ुद बनाते हैं, वे उसका निर्माण कर रहे हैं। अब बताइए, ऐसे व्यक्ति के लिए: कोई कहे भी कि हम गया जी में श्राद्ध कर रहे हैं ताकि उनकी गति हो, तो ऐसे लोगों की गति नहीं होती। ये धुंधुकारी जैसे प्रेत बनेंगे। और उसके बाद दोष होगा।
जो कुलवधू ख़ुद पितृ कर्म करती है, उसकी क्या स्थिति है?
उसकी वृद्धि कोई नहीं रोक सकता
देखिए, वक्ता कहते हैं, बच्चे तो कर ही रहे हैं। और जो यह कर रही है, जो कुलवधू है, वह अपने कुल के पितरों के लिए कर रही है: उसकी वृद्धि कोई नहीं रोक सकता। पर जो सास-ससुर नहीं करने दे रहे, कह रहे हैं नहीं, यह सब बेकार है — देखिए उनकी मानसिक हताशा कितनी बड़ी है, उनका कितना ब्रेनवॉश हुआ है कि वे यह सब नहीं होने देना चाहते, या ख़ुद नहीं कर रहे। वे यह अपने लिए बना रहे हैं। अपना कर्म अपने पास आता है; गति और मुक्ति अपने हाथ में है। आपके-मेरे करने से नहीं होगा। पर शास्त्रों में जो वर्णित है, अपने पितरों के लिए श्राद्ध कर्म — जो भी कर सकें, वह ज़रूर कीजिए। आप कुछ ग़लत नहीं कर रहीं; आपमें क्षमता है, आप कर सकती हैं, तो ज़रूर कीजिए।
देखिए, वक्ता कहते हैं, बच्चे तो कर ही रहे हैं। अब जो यह कर रही है, जो कुलवधू है, वह अपने कुल के पितरों के लिए कर रही है — उसकी वृद्धि कोई नहीं रोक सकता। पर जो सास-ससुर नहीं करने दे रहे, कह रहे हैं नहीं, यह सब बेकार चीज़ है — देखिए उनकी मानसिक हताशा कितनी बड़ी है, उनका कितना ब्रेनवॉश हुआ है, कि वे यह सब नहीं होने देना चाहते, या ख़ुद नहीं कर रहे। वे यह अपने लिए बना रहे हैं। अपना कर्म अपने पास आता है। गति और मुक्ति अपने हाथ में है। आपके-मेरे करने से नहीं होगा, यह भी एक बात है। पर शास्त्रों में जो वर्णित है, अपने पितरों के लिए जो श्राद्ध कर्म आदि हैं — जो भी कर सकें, वह ज़रूर कीजिए। आप कुछ ग़लत नहीं कर रहीं। आपमें क्षमता है, आप कर सकती हैं: ज़रूर कीजिए।
अल्ज़ाइमर की स्थिति में कुंडली में क्या देखना चाहिए?
राहु या केतु पक्के, और लग्न, चंद्र और दशांतर दशा
केवल कमज़ोर बृहस्पति से बात नहीं बनेगी, वक्ता कहते हैं: कौन सी लग्न कुंडली है? चंद्र, राहु और केतु किस स्थिति में हैं? क्या असर पड़ रहा है, और कौन सी दशांतर दशा चल रही है? अगर स्थिति अल्ज़ाइमर की है तो राहु का असर ज़रूर होगा, या केतु का असर ज़रूर होगा, सौ प्रतिशत। अगर उनका असर है, तो अल्ज़ाइमर, डिस्लेक्सिया और ऐसी सब चीज़ें उन्हीं की देन हैं। वे कहते हैं कि वे अब यह देख रहे हैं — ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने से, और जितनी कुंडलियाँ देखी गईं उनसे, यही स्थिति है।
जहाँ अल्ज़ाइमर की स्थिति बन रही हो, वक्ता कहते हैं, वहाँ केवल कमज़ोर बृहस्पति से बात नहीं बनेगी। कौन सी लग्न कुंडली है? चंद्र, राहु और केतु किस स्थिति में हैं? क्या असर पड़ रहा है? और कौन सी दशांतर दशा चल रही है? यह सब। अगर अल्ज़ाइमर की स्थिति है, तो राहु का असर ज़रूर होगा, या केतु का असर ज़रूर होगा, सौ प्रतिशत। अगर उनका असर है, तो अल्ज़ाइमर, डिस्लेक्सिया — ये सब चीज़ें उन्हीं की देन हैं। हम अब यह देख रहे हैं, वे कहते हैं: ऐसे लोगों में जो बढ़ोतरी हुई है उससे, और जितनी कुंडलियाँ देखी गई हैं उनसे, यही स्थिति है।
लग्न कुंडली के अनुसार दान और जाप, रत्न, जड़ी या कवच पाठ के साथ
लग्न कुंडली के अनुसार दान और जाप; रत्न, जड़ी या कवच पाठ
इसके लिए, वक्ता कहते हैं, लग्न कुंडली के अनुसार दान और जाप करवाइए; ग्रहों के लिए किए जाएँ तो शांति ज़रूर बनेगी। अब अगर बृहस्पति कमज़ोर है — क्या बृहस्पति लग्नेश के मित्र हैं, या क्या हैं? अगर कमज़ोर हैं, तो उन्हें बल दीजिए। देखिए कि वे 6, 8 या 12 में तो नहीं, और किस भाव में हैं। और उसके बाद, अगर वे सब शुभ में हैं और कमज़ोर पड़ गए हैं, तो रत्न आदि पहनवाइए, या जड़ी पहनवाइए, या किसी से उनसे जुड़ा कवच आदि पढ़ने को कहिए, या उनके लिए ख़ुद कीजिए। यह सब पूरा देखकर ही, वे कहते हैं, बताया जा सकता है।
इसके लिए, वक्ता कहते हैं, लग्न कुंडली के अनुसार दान और जाप करवाइए; ग्रहों के लिए किए जाएँ, तो शांति ज़रूर बनेगी। अब अगर बृहस्पति कमज़ोर हैं — क्या बृहस्पति लग्नेश के मित्र हैं, या क्या हैं? अगर कमज़ोर हैं, तो उन्हें बल दीजिए। वे 6, 8 या 12 में तो नहीं हैं न — देखिए किस भाव में हैं। और उसके बाद, अगर वे सब शुभ में हैं और कमज़ोर पड़ गए हैं, तो रत्न आदि पहनवाइए, या जड़ी पहनवाइए, या उनसे जुड़ा कवच आदि पढ़ने को कहिए, या उनके लिए कीजिए। यह सब पूरा देखकर ही बताया जा सकता है।
क्या केवल माहात्म्य पढ़ना चाहिए, या साथ में अध्याय भी?
माहात्म्य के साथ सातवाँ अध्याय, बिना किसी ख़र्च के
केवल माहात्म्य नहीं पढ़ना है, वक्ता कहते हैं; माहात्म्य के साथ सातवाँ अध्याय भी पढ़ना है। आपकी आर्थिक स्थिति के कारण सातवें अध्याय के पाठ में आपको कोई दिक़्क़त नहीं: इसमें कुछ करने की ज़रूरत नहीं, बस संकल्प लेना है। जल मुफ़्त है, तुलसी का पत्ता मुफ़्त है, और पाठ आप अपने मुँह से कर सकते हैं। कोई दिक़्क़त नहीं।
केवल माहात्म्य नहीं पढ़ना है, वक्ता कहते हैं। माहात्म्य के साथ सातवाँ अध्याय भी पढ़ना है। आर्थिक स्थिति के कारण सातवें अध्याय के पाठ में आपको कोई दिक़्क़त नहीं। इसमें आपको कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं: बस संकल्प लीजिए। जल मुफ़्त है, तुलसी का पत्ता मुफ़्त है। और पाठ आप अपने मुँह से कर सकते हैं। कोई दिक़्क़त नहीं।
क्या ख़राब आर्थिक स्थिति का दोष पाठ पर डाला जा सकता है?
स्थिति कर्म से है, और पितरों के प्रति व्यवहार से
वक्ता कहते हैं यह बात मेल नहीं खाती — कि हम सातवें अध्याय का पाठ करते हैं और आर्थिक स्थिति ठीक नहीं। यानी आप कहना चाहते हैं कि सातवें अध्याय के पाठ के कारण दिक़्क़त हो रही है। ठीक यही बात बदलिए, वे कहते हैं; दोष यहीं लगता है। स्थिति सातवें अध्याय या किसी और कारण से नहीं, अपने कर्म से है: अगर आपके सास-ससुर या माता-पिता जैसे लोग पितरों के प्रति ऐसा व्यवहार रखें, तो आर्थिक स्थिति कहाँ से अच्छी होगी? जो पिता ने किया, वह पुत्र भी भुगतेगा।
यह बात मेल नहीं खाती, वक्ता कहते हैं: कि हम सातवें अध्याय का पाठ करते हैं और आर्थिक स्थिति ठीक नहीं। यानी आप कहना चाहते हैं कि सातवें अध्याय के पाठ के कारण दिक़्क़त हो रही है। यही बात बदलिए। दोष यहीं लगता है। स्थिति सातवें अध्याय से या किसी और कारण से नहीं; अपने कर्म से है। अगर आपके सास-ससुर जैसे, या माता-पिता जैसे लोग पितृों के प्रति ऐसा व्यवहार रखें, तो आर्थिक स्थिति कहाँ से अच्छी होगी? जो पिता ने किया, वह पुत्र भी भुगतेगा।
दारू और गुटखे के लिए क़र्ज़ लिया जाता है, पर सस्ते में करवाई पूजा पर परिवार शक करता है
दारू के लिए क़र्ज़, और सस्ती पूजा पर शक
लोग दारू, चिकन और गुटखे के लिए क़र्ज़ लेकर खाएँगे-पिएँगे, वक्ता कहते हैं; अपनी काम वासना बुझाने उधार लेकर ग़लत जगह जाएँगे — पर जब आप सीमित ख़र्च में सबसे बड़ी पूजा करवाकर भला करना चाहते हैं, तब वे आप पर शक करेंगे। करने दीजिए, वे कहते हैं; रहने दीजिए साहब। जिनके लिए हो रहा है वे जानते हैं; जो करवा रहे हैं वे जानते हैं; जो कर रहा है वह जानता है; कितना हो रहा है पता है — और जगदंबा जान रही हैं।
लोग दारू के लिए, चिकन के लिए, गुटखे के लिए क़र्ज़ लेंगे, और खाएँगे-पिएँगे, वक्ता कहते हैं। अपनी काम वासना बुझाने के लिए उधार लेकर ग़लत जगह जाएँगे। पर जब आप सीमित ख़र्च में सबसे बड़ी पूजा करवाकर भला करना चाहते हैं, तब ये आप पर शक करेंगे। रहने दीजिए। रहने दीजिए साहब। जिनके लिए हो रहा है वे जानते हैं; जो करवा रहे हैं वे जानते हैं; जो कर रहा है वह जानता है; कितना किया जा रहा है पता है — और जगदंबा जान रही हैं।
श्री यंत्र बनवाने में क्या ध्यान रखना चाहिए?
बनाने वाले से पूछिए; जन्म नक्षत्र के अनुसार बनवाया जा सकता है
श्री यंत्र बनवाने के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: यह बात उनसे करिए जिनसे बनवाएँगे। इसे जन्म नक्षत्र के अनुसार बनवाया जा सकता है।
श्री यंत्र बनवाने के बारे में पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं। यह बात एक बार उनसे करिए जिनसे बनवाएँगे। इसे जन्म नक्षत्र के अनुसार बनवाया जा सकता है।
कोई भूत वह दर्शन दे रहा है — सोने से पहले मंत्र पढ़िए
कोई भूत दर्शन दे रहा है; सोने से पहले मंत्र पढ़िए
एक श्रोता, जो कहते हैं कि उन्हें दो बार सपने में उनके दर्शन का अनुभव हुआ, धुंधला और हल्का याद, उनसे वक्ता कहते हैं: मेरे बिना मेरे दर्शन कहाँ से मिलेंगे? कोई भूत आपको दर्शन दे रहा होगा। तुरंत मंत्र पढ़िए और फिर सोइए।
एक श्रोता, जो कहते हैं कि दो बार उन्हें सपने में उनके दर्शन का अनुभव हुआ, धुंधला और हल्का याद, उनसे वक्ता कहते हैं: मेरे बिना मेरे दर्शन आपको कहाँ से मिलेंगे? कोई भूत आदि आपको दर्शन दे रहा होगा। तुरंत मंत्र पढ़िए और फिर सोइए।
काली जी की कौन सी स्तुतियाँ पढ़ी जा सकती हैं?
महिषासुर मर्दिनी, संकटा, आद्या काली, भद्रकाली, कालिका महिम्न
काली जी की जो भी स्तुति आप चाहें, वक्ता कहते हैं, कर सकते हैं। महिषासुर मर्दिनी कीजिए। संकटा स्तुति कीजिए। भगवती कालिका आद्या काली स्तुति कीजिए। भद्रकाली स्तुति है, वह कीजिए। कालिका महिम्न है, वह कीजिए।
काली जी की कौन सी स्तुति की जा सकती है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि जो भी चाहें, कर सकते हैं। महिषासुरमर्दिनी कीजिए। संकटा स्तुति कीजिए। भगवती कालिका आद्या काली स्तुति कीजिए। भद्रकाली स्तुति है — वह कीजिए। कालिका महिम्न है — वह कीजिए। एक श्रोता ने हिंगलाज माँ के बारे में पूछा, तो वे कहते हैं: ठीक है, हम कोशिश करेंगे।
अगर कोई पहले से काली कवच पढ़ता है, तो क्या सप्तशती का कवच भी करना ज़रूरी है?
छह अंगों में से एक, सरस्वती कवच
अगर आप सप्तशती का पाठ कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं, तो बस सरस्वती कवच कीजिए; वही बहुत है। यह अंगों के अंतर्गत, अंग विद्या में आता है। छह अंगों में एक अंग कवच है, इसलिए इसे करना चाहिए।
पहले से काली कवच पढ़ते हुए क्या सप्तशती के अंतर्गत आने वाला कवच भी फिर से पढ़ना ज़रूरी है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: अगर आप सप्तशती का पाठ कर रहे हैं, तो बस सरस्वती कवच कीजिए। वही बहुत है। यह अंगों के अंतर्गत, अंग विद्या में आता है। छह अंगों में एक अंग कवच है — इसलिए इसे करना चाहिए।
नवरात्र में साधना और आवरण पूजन के लिए साधक क्या करे?
सरस्वती को मत छोड़िए; महाविद्या क्रम, हवन, और रात में जाप
नवरात्र में साधना और आवरण पूजन के लिए साधक क्या करे, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि आवरण पूजन तो सीखा जा चुका है। साधना आदि के लिए: सबसे पहले, सरस्वती को नहीं छोड़ना है। कम से कम महाविद्या क्रम से सरस्वती कीजिए। हवन आदि कीजिए, और रात के समय मंत्र जाप; इसके बारे में वे बताएँगे।
दस महाविद्या रूपों में से कौन सा रूप अपनाना चाहिए?
जिस रूप में आस्था हो, दीक्षा और पूरे विधि विधान के साथ
जिस रूप के प्रति आपका समर्पण है, वक्ता कहते हैं, वह रूप आप अपना सकते हैं। भगवती ने गीता में भी कहा है कि मेरे दस महाविद्या रूपों में जिस रूप में आस्था हो, उसकी दीक्षा लेकर पूरे विधि विधान से करना चाहिए।
मृत्यु के दो सूतकों के बाद माला और मंत्र शुद्धि के लिए क्या करना चाहिए?
फिर से पिरोना, अभिषेक, और माला को अग्नि से निकालना
आप अब भी कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं। श्राद्ध पक्ष बीत जाए, तो नवरात्र की प्रतिपदा के दिन — पर फिर, अगर माला में धागा है तो उसे ख़ुद पिरोना या पिरोवाना है और फिर पूरा विधि विधान करना है। यह उसी समय हो जाना चाहिए था; नहीं किया, तो कम से कम जाप माला को अग्नि दिखवाइए। गोमुखी धोइए, और गोमूत्र, गंगाजल, पंचगव्य, पंचामृत आदि से माला का अभिषेक करके, फिर शुद्ध जल से अभिषेक करके, अच्छे से पोंछकर सुखाइए; फिर शुभ मंत्रों से, गोबर के कंडों पर घी की आहुति देकर अग्नि देव को प्रज्वलित करके, माला को उसमें से निकालिए — उसे अग्नि छूने दीजिए।
आप अब भी कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं। जब श्राद्ध पक्ष बीत जाए, तो नवरात्र की प्रतिपदा के दिन — पर फिर यही है, कि अगर माला में धागा है तो उसे ख़ुद पिरोइए या पिरोवाइए, और फिर पूरा विधि विधान कीजिए। तो होना यह चाहिए था कि उसी समय हो जाता; अगर नहीं किया, तो कम से कम जाप माला को अग्नि दिखवाइए। गोमुखीगाय के मुख के आकार की कपड़े की माला-थैली, जिसमें मंत्र-जप के समय हाथ व माला को सार्वजनिक दृष्टि से छुपाया जाता है। धोइए। और गोमूत्र, गंगाजल, पंचगव्यगाय से प्राप्त पाँच पदार्थों से बना शुद्धिकारक मिश्रण, पंचामृत व तुलसी पत्तों के साथ घर, विशेषकर चौखट, की शुद्धि हेतु प्रयुक्त होता है।, पंचामृत आदि से माला का अभिषेक करके, और फिर शुद्ध जल से अभिषेक करके, उन्हें अच्छे से पोंछकर सुखाइए; फिर शुभ मंत्रों आदि से, गोबर के कंडों पर घी की आहुति देकर और अग्नि देव को प्रज्वलित करके, फिर माला को उसमें से आगे-पीछे निकालिए। उसे अग्नि छूने दीजिए।
प्रणव और माला, जिन पर पूरा तंत्र चलता है, सबसे कम देखे जाते हैं
प्रणव और माला, जिन पर पूरा तंत्र चलता है
यह विषय आज चैनल पर डाला गया है, वक्ता कहते हैं। आप क्या सोचते हैं — प्रणव का विषय, माला का यह विषय: सोचिए सबके लिए कितना ज़रूरी विषय है। कितने लोग देखते हैं? हज़ार लोग, दो हज़ार लोग। और इसी से पूरा तंत्र चलने वाला है: इसी माला और इन्हीं मंत्रों से आपका हर एक विषय चलेगा — और लोग इसे सुनेंगे-देखेंगे नहीं। पर डाल दो कि किसी पीर की सिद्धि हुई, जितने चाहे अनुभव वाले वीडियो डालो, वे देख लेंगे।
अब यह विषय आज चैनल पर डाला गया है, वक्ता कहते हैं। आप क्या सोचते हैं — प्रणव का यह विषय, माला का यह विषय: सोचिए सबके लिए कितना ज़रूरी विषय है। कितने लोग देखते हैं? हज़ार लोग, दो हज़ार लोग। और इसी से पूरा तंत्र चलने वाला है। इसी माला और इन्हीं मंत्रों से आपका हर एक विषय चलेगा — और लोग इसे सुनेंगे नहीं, देखेंगे नहीं। पर डाल दो कि किसी पीर की सिद्धि हुई; जितने चाहे अनुभव वाले वीडियो डालो। वे देख लेंगे। ठीक है, वे कहते हैं, पर आपके जीवन में भी वह अनुभव सही ढंग से हो, इसके लिए आपको बुनियादी बातें जाननी होंगी न।
माला फेरने में लोग क्या ग़लती करते हैं?
उलटा फेरना, और सुमेरु
लोग नहीं जानते कि माला जाप कैसे होता है, वक्ता कहते हैं: वे जैसे मन हो वैसे इधर-उधर माला फेरेंगे। बाद में कहेंगे, अरे, तो माला ऐसे फेरी जाती है — हमने आज तक ऐसे कभी नहीं फेरी; बस आदत थी, और वे सुमेरु से उलटा फेरने लगते थे। जब यह सब पता चलता है, वे कहते हैं, तो उन्हें लगता है कि लोग ऐसी ग़लतियाँ भी करते हैं, और उन्हें ख़ुद यह पता नहीं था। वे दोहराते हैं कि समाज में आने के बाद ही पता चला कि कितनी ग़लतियाँ हो रही हैं।
पता ही नहीं कि माला जाप कैसे होता है, वक्ता कहते हैं। उलटा, सीधा, जैसे लोगों का मन हो, वे माला फेरेंगे। बाद में कहेंगे, अरे, तो माला ऐसे फेरी जाती है — हमने आज तक ऐसे कभी नहीं फेरी। बस आदत थी; सुमेरु से उलटा फेरने लगते थे। हे भगवान, वे कहते हैं: जब यह सब पता चलता है, तो उन्हें लगता है कि लोग ऐसी ग़लतियाँ भी करते हैं, और अब तक उन्हें ख़ुद यह भी पता नहीं था। यही उन्होंने कहा था — कि समाज में आने के बाद ही पता चला कि कितनी ग़लतियाँ हो रही हैं। और लोगों की परेशानियाँ एक से बढ़कर एक हैं: किसी के लिए जितना भी करो, उनकी परेशानियाँ भी बहुत ऊँचे स्तर की हो जाती हैं।
क्या यह सच है कि तुलसी की गंध से भगवती चंडिका क्रोधित होती हैं?
फैलता हुआ एक श्लोक जिसे वे अनुचित कहते हैं
एक श्रोता कहते हैं कि आजकल एक श्लोक बहुत फैल रहा है जिसका अर्थ है कि तुलसी की गंध मात्र से भगवती चंडिका क्रोधित हो जाती हैं — इस हिसाब से तो कोई वैष्णव भगवती दुर्गा की पूजा कर ही नहीं सकता। कृपया एक बार श्लोक भेजिए, वक्ता जवाब देते हैं, और देखें इसका स्रोत क्या है और क्यों है; यह किसी स्थिति के कारण किसी वजह से लिखा गया होगा, यों ही नहीं लिखा गया। ऐसा होना अनुचित होगा। तुलसी के रूप में स्वयं जगदंबा हैं। श्लोक भेजिए और वे लाइव, किताब खोलकर, शास्त्र से प्रमाण देंगे: कि भगवती स्वयं धात्री, तुलसी आदि के रूप में प्रकट हुई हैं, और उनका माहात्म्य क्या है — यह आप देवी भागवत में भी पढ़ सकते हैं।
आजकल एक श्लोक बहुत फैल रहा है, श्रोता कहते हैं, जिसका अर्थ है कि तुलसी की गंध मात्र से भगवती चंडिका क्रोधित हो जाती हैं; उस हिसाब से तो कोई वैष्णव भगवती दुर्गा की पूजा कर ही नहीं सकता। यह जो श्लोक है — कृपया इसे एक बार भेजिए, वक्ता जवाब देते हैं, और देखें इसका स्रोत क्या है और क्यों है। यह किसी स्थिति के कारण किसी वजह से लिखा गया होगा; यों ही नहीं लिखा गया। ऐसी बात अनुचित होगी। तुलसी के रूप में स्वयं जगदंबा हैं। अब देवी भागवत — प्रमाण कल देना है, और कल हम प्रमाण देंगे। श्लोक भेजिए, और हम लाइव, किताब खोलकर, शास्त्र के अनुसार प्रमाण देंगे: कि भगवती स्वयं धात्री, तुलसी आदि के रूप में प्रकट हुई हैं, और उनका माहात्म्य क्या है। आप भी इसे देवी भागवत में पढ़ सकते हैं।
गृहस्थ को व्याघ्रचर्म पर बैठने से पहले क्या चाहिए?
आम्नाय और शाक्त दीक्षा, फिर वीर भाव में गुरु का आदेश
बाघ की खाल मिल जाए तो क्या करें और क्या उस पर बैठने से पहले उसे सिद्ध करना ज़रूरी है, यह पूछे जाने पर वक्ता पहले कहते हैं कि मिल जाए तो छिपा लीजिए, नहीं तो वन विभाग वालों को पता चल जाएगा और वे आपको उठा ले जाएँगे। अगर यह गुरु परंपरा से आ रही है और आप जानते हैं, तो कम से कम पहले उसके काग़ज़ात बनवाइए; और अगर नई मिल रही है, तो जहाँ तक वे जानते हैं छिपाना ही सबसे बड़ी बात है। दूसरी बात यह कि गृहस्थ के बाघंबर पर बैठकर साधना करने से पहले उचित दीक्षा होनी चाहिए — और उनके अनुसार, जब कुल परंपरा से आम्नाय दीक्षा, शाक्त दीक्षा आदि पूरी तरह हो जाएँ, तब बाद में, गुरु के आदेश से, जब उस पर वीर भाव में साधना हो, तब उस पर पहले भगवती आदि का जाप करना चाहिए। उस पर सीधे सिद्धि करना, वे कहते हैं, उनके मत में वर्जित है।
अगर मिल जाए, तो सबसे पहले उसे छिपा लेना चाहिए, वक्ता जवाब देते हैं; नहीं तो वन विभाग वालों को पता चल जाएगा और वे आपको उठा ले जाएँगे। हाँ — अगर यह गुरु परंपरा से पता है और मिल रही है, तो कम से कम पहले उसके काग़ज़ात बनवाइए। दूसरी बात यह कि अगर नई मिल रही है, तो जहाँ तक वे जानते हैं, छिपाना ही सबसे बड़ी बात है। दूसरी बात यह कि गृहस्थ के बाघंबर पर बैठकर साधना करने के लिए पहले उचित दीक्षा होनी चाहिए; और उनके अनुसार, जब कुल परंपरा से आम्नाय दीक्षा, शाक्त दीक्षा आदि पूरी तरह हो जाएँ — तब उसके बाद, गुरु के आदेश से, जब उस पर वीर भाव में साधना हो, तब उस पर पहले भगवती आदि का जाप करना चाहिए। उस पर सीधे ऐसी सिद्धि करना, उनके अनुसार, वर्जित है।
रोज़ का साधारण तेरहवाँ अध्याय क्या फल देता है?
वही फल, और महाविद्या क्रम से भी
जो पाठ आप रोज़ साधारण रूप से करते हैं — अगर तेरहवाँ अध्याय करें, वक्ता कहते हैं, तो उससे भी वही फल मिलेगा। महाविद्या क्रम से भी मिलेगा। सौ सप्ताह लगेंगे।
जो पाठ आप रोज़ साधारण रूप से करते हैं, अगर तेरहवाँ अध्याय करें, वक्ता कहते हैं, तो उससे भी वही फल मिलेगा। महाविद्या क्रम से भी मिलेगा। सौ सप्ताह लगेंगे।
ललिता सहस्रनाम के साथ न्यास करने का अधिकार किसे है?
न्यास श्री विद्या का है, इसलिए दीक्षा ज़रूरी
अगर आप ललिता सहस्रनाम बहुत पढ़ते हैं, वक्ता कहते हैं, या उस तरह का विशेष अनुभव पाना चाहते हैं, कृपा पाना चाहते हैं, तो दीक्षित होकर करना चाहिए — नहीं तो न्यास आदि के बिना करना चाहिए। क्योंकि न्यास करने का अधिकार श्री विद्या का है। इसलिए दीक्षा लेकर ही करना चाहिए।
अगर आप ललिता सहस्रनाम बहुत पढ़ते हैं, वक्ता कहते हैं, या उस तरह का विशेष अनुभव पाना चाहते हैं, कृपा पाना चाहते हैं — तो दीक्षित होकर करना चाहिए; नहीं तो न्यास आदि के बिना करना चाहिए। क्योंकि न्यास करने का अधिकार श्री विद्या का है। इसलिए दीक्षा करके ही, दीक्षा पाकर ही करना चाहिए।
क्या बिना दीक्षा नवार्ण मंत्र का जाप किया जा सकता है?
बिना दीक्षा नवार्ण और गायत्री वर्जित
बिना दीक्षा नवार्ण मंत्र का जाप — भाई, वक्ता कहते हैं, हम इसके बिल्कुल ख़िलाफ़ हैं। गायत्री और नवार्ण, उनके अनुसार — और वे चेताते हैं कि सच सुनकर थोड़ा बुरा लगेगा — उनके अनुसार बिना दीक्षा नहीं करने चाहिए। गुरु पाकर ही कीजिए। साधारण रूप से, वे कहते हैं, नौ बार कीजिए, सत्ताईस बार कीजिए, वही बहुत है। अगर एक माला तक भी जाएँ, तो बस उतना, उससे ज़्यादा नहीं।
नवार्ण जाप की जगह क्या करना चाहिए?
प्रणव के बिना सरस्वती की एक माला; या अर्गला और सप्तशती के दूसरे मंत्र
अगर आप सरस्वती कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं, तो एक माला कीजिए — और उसका जाप प्रणव के बिना करना चाहिए। दूसरी बात यह कि इसकी जगह, चाहें तो, अर्गला आदि के मंत्र इस्तेमाल कर सकते हैं; सप्तशती के दूसरे मंत्र इस्तेमाल कर सकते हैं, जिनसे आपकी इच्छा पूरी हो। और अगर केवल नवार्ण ही करना है, तो नवार्ण महादुर्गा का मंत्र है; यह केवल दुर्गा जी का नहीं — इसमें नौ शक्तियाँ बैठी हैं।
क्या सुबह दादा जी के सामने जलाया जाने वाला दीपक बंद कर देना चाहिए?
परंपरा में है और जल रहा है, तो जलने दीजिए
एक श्रोता, जो कहते हैं कि सुबह वे अपने दादा जी के सामने दीपक जलाते हैं, उनसे वक्ता कहते हैं: अगर यह बात परंपरा में है और जल रहा है, तो जलने दीजिए — आप क्यों बंद करेंगे? इससे पहले वे जोड़ते हैं कि नवरात्र में काल रात्रि पर यह बिल्कुल किया जा सकता है।
नवरात्र में, काल की रात्रि पर, यह बिल्कुल किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं। एक श्रोता, जो कहते हैं कि सुबह वे अपने दादा जी के सामने दीपक जलाते हैं, उनसे वे कहते हैं: देखिए — अगर यह बात परंपरा में है और जल रहा है, तो जलने दीजिए। आप क्यों बंद करेंगे?
अगर पड़ोसी घर पर बार-बार नज़र लगाते हों तो क्या करें?
चौखट बंधन और चौखट पर पंचमुखी हनुमान यंत्र
पड़ोसियों की नज़र के बारे में पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: चौखट का बंधन कीजिए। चौखट पर पंचमुखी हनुमान जी आदि का यंत्र स्थापित कीजिए — अगर घर पर बार-बार नज़र लग रही हो।
क्या सिद्ध कुंजिका बिना दीक्षा की जा सकती है?
पाठ की अनुमति, जाप की नहीं — शक्तियों को स्थान नहीं मिलेगा
बिना दीक्षा सिद्ध कुंजिका, एक बार से ज़्यादा नहीं, वक्ता कहते हैं: जाप नहीं करना चाहिए। पाठ किया जा सकता है। पाठ के लिए उन्होंने कभी मना नहीं किया — ऐसा कहना ग़लत है। उन्होंने जाप के लिए मना किया है, क्योंकि जब आप जाप करके आवृत्ति बढ़ाते हैं, तो शक्तियाँ आएँगी और उन्हें स्थान नहीं मिलेगा, और फिर दिक़्क़त होगी।
बिना दीक्षा सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्, एक बार से ज़्यादा नहीं, वक्ता कहते हैं। जाप नहीं करना चाहिए। पाठ किया जा सकता है। पाठ के लिए हमने कभी मना नहीं किया। ऐसा कहना ग़लत बात है। हमने जाप के लिए मना किया है, क्योंकि जब आप जाप करके आवृत्ति बढ़ाते हैं, तो शक्तियाँ आएँगी, उन्हें स्थान नहीं मिलेगा, और फिर दिक़्क़त होगी।
जो केवल माई की भक्ति चाहता है, वह इसकी जगह क्या पढ़े?
दुर्गा आपदुद्धार स्तुति
अगर आप केवल माई की भक्ति करना चाहते हैं, वक्ता कहते हैं, तो स्तुति आदि से कीजिए। दुर्गा आपदुद्धार कीजिए। दुर्गा आपदुद्धार स्तुति में लिखा है कि जो इसे पढ़ता है, भगवती उसकी हर इच्छा पूरी करेंगी, और सबसे बड़ी विपत्ति में फँसे व्यक्ति की भी हर विपत्ति दूर होगी — नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे। तो वह कीजिए। यहाँ दिक़्क़त, वे कहते हैं, यह है: जो चीज़ मना है वही करना।
अगर आप माई की भक्ति करना चाहते हैं, वक्ता कहते हैं, तो स्तुति आदि से कीजिए। दुर्गा आपदुद्धार कीजिए। दुर्गा आपदुद्धार स्तुति में लिखा है कि जो इसे पढ़ता है, भगवती उसकी हर इच्छा पूरी करेंगी, और सबसे बड़ी विपत्ति में फँसे व्यक्ति की भी हर विपत्ति दूर होगी। नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे — तो वह कीजिए। यहाँ दिक़्क़त, वे कहते हैं, यह है: कि जो हमें मना है, हम वही करते हैं। यही दिक़्क़त है।
अपना बल बढ़ाइए, या समय के घिसने तक उसे ढोइए — किसी का जीवन आसान नहीं
अपना बल बढ़ाइए, या समय के घिसने तक उसे ढोइए
किसी का जीवन आसान नहीं, वक्ता जवाब देते हैं: हर कोई अपनी जगह उसे बोझ की तरह ढो रहा है। हम भाग नहीं सकते। हमारे कर्म का प्रारब्ध है कि यह बोझ बन गया है। बोझ हल्का करने के लिए अब ये विकल्प हैं: या तो अपना बल बढ़ाइए और बोझ हल्का कीजिए, ताकि बोझ कितना भी बड़ा हो हमें पता भी न चले; या फिर उसे यों ही ढोते रहिए, जितना कम हो सके उतना लेकर। समय के साथ बोझ घिसकर ख़त्म हो जाएगा। ये, वे कहते हैं, आपके और उनके पास विकल्प हैं।
किसी का जीवन आसान नहीं, वक्ता जवाब देते हैं। हर कोई अपनी जगह उसे बोझ की तरह ढो रहा है। हम भाग नहीं सकते। हमारे कर्म का प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। है कि यह बोझ बन गया है। तो बोझ हल्का करने के लिए ये हैं: या तो अपना बल बढ़ाइए और बोझ हल्का कीजिए, ताकि बोझ कितना भी हो, हमें पता भी न चले; या फिर उसे यों ही ढोते रहिए, जितना कम हो सके उतना लेकर। जैसे-जैसे समय आएगा, बोझ घिसते-घिसते ख़त्म हो जाएगा। ये विकल्प आपके पास हैं, और हमारे पास हैं।
खोपड़ी के नीचे श्यामा देवी के पास कौन सा जानवर है?
सियार, जो दक्षिण कालिका के साथ भी हैं
क्या महाकाली तंत्र की देवी हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता हाँ कहते हैं और उनकी पूजा विधि वाले लाइव का ज़िक्र करते हैं। श्यामा देवी के बारे में पूछे जाने पर, जिनके पास लोमड़ी जैसा एक छोटा जानवर खोपड़ी के नीचे रहता है, वे जवाब देते हैं: वे माँ दक्षिण कालिका के साथ भी हैं — सियार।
क्या महाकाली तंत्र की देवी हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता हाँ कहते हैं; उनकी पूजा की विधि हो रही है, और एक लाइव है — उसे एक बार देखिए। श्यामा देवी के बारे में पूछे जाने पर, जिनके पास लोमड़ी जैसा एक छोटा जानवर रहता है जो खोपड़ी के नीचे रहता है: अच्छा। वे माँ दक्षिण कालिका के पास भी हैं। सियार।
भद्रकाली, महाकाली, काली और कालिका में क्या अंतर है?
जटा, आद्या शक्ति, कौशिकी का ललाट, और पीछे बचा रूप
बहुत अंतर है, वक्ता कहते हैं: भद्रकाली, महाकाली, कालिका और काली सब अलग हैं। भद्रकाली वे हैं जो भगवान शिव की जटा से, क्रोध तत्व से प्रकट हुईं। महाकाली स्वयं आद्या शक्ति का रूप हैं, जो आद्या हैं — आद्या काली, दक्षिण काली, महाकाली। और काली में भी एक काली और एक कालिका हैं। काली, जब आप दुर्गा सप्तशती का सातवाँ अध्याय पढ़ें, माँ कौशिकी के ललाट से प्रकट हुईं; उन्हें हम काली भी कहते हैं, और उन्हीं को चामुंडा भी कहते हैं। और एक कालिका हैं, जो वह रूप हैं जो भगवती कौशिकी के माँ पार्वती के शरीर से निकल जाने पर बचा; वह रूप कालिका नाम से प्रसिद्ध हुआ। यही, वे कहते हैं, रूप का मूल अंतर है।
भद्रकाली, महाकाली और काली माँ के रूपों में मुख्य अंतर — मुख्य अंतर बहुत है, वक्ता कहते हैं। भद्रकाली, महाकाली, कालिका, काली: सबमें अंतर है। और इसे इस तरह समझिए। भद्रकाली वे हैं जो भगवान शिव की जटा से, क्रोध तत्व से प्रकट हुई हैं। महाकाली वे हैं जो स्वयं आद्या शक्ति का रूप हैं, जो आद्या हैं। आद्या काली, दक्षिण काली, महाकाली। और जो काली हैं — काली में भी एक काली और एक कालिका हैं। तो जो काली हैं: जब आप दुर्गा सप्तशती का सातवाँ अध्याय पढ़ें, वे माँ कौशिकी के ललाट से प्रकट हुईं। उन्हें हम काली भी कहते हैं, और उन्हीं को चामुंडा भी कहते हैं। और एक कालिका हैं, जो वह रूप हैं जो भगवती कौशिकी के माँ पार्वती के शरीर से निकलने पर बचा; जो रूप बचा वह कालिका के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यही रूपों का मूल अंतर है।
महाकाली की सोलह नित्याएँ हैं, श्री विद्या की पंद्रह
महाकाली की सोलह, श्री विद्या में पंद्रह
इसमें, वक्ता कहते हैं, अगर आप ध्यान रूप और मंत्र आदि में जाएँ, तो तंत्र बहुत विस्तृत है, और फिर सबकी अपनी नित्याएँ हैं। इसमें भद्रकाली की भी नित्याएँ हैं, और भद्रकाली स्वयं भी नित्या रूप में हैं। महाकाली की भी सोलह नित्याएँ हैं। अब भगवती महाविद्या में जाइए, श्री विद्या में जाइए, तो श्री विद्या में भी पंद्रह नित्याएँ हैं — और एक तरह से उनमें भी सोलह नित्याएँ हैं।
इसमें, वक्ता कहते हैं, अगर आप ध्यान रूप और मंत्र आदि में जाएँ, तो तंत्र बहुत विस्तृत है, और फिर सबकी अपनी नित्याएँ हैं। इसमें भद्रकाली की भी नित्याएँ हैं, और भद्रकाली स्वयं भी नित्या रूप में हैं। महाकाली की भी सोलह नित्याएँ हैं। अब भगवती महाविद्या में जाइए, श्री विद्या में जाइए, तो श्री विद्या में भी पंद्रह नित्याएँ हैं। और एक तरह से उनमें भी सोलह नित्याएँ हैं। तो रूप बहुत विस्तृत हैं, वे कहते हैं; और अगर हम इस पर पूरे विस्तार से वीडियो बनाएँ, तो समझाना आसान नहीं, कुछ कठिन होगा, क्योंकि वे तंत्रोक्त विषय होंगे, और उसमें ज़्यादा से ज़्यादा ऐसे ही विषय आएँगे। तो लाइव में नहीं — पर वे आपके ज्ञान की वृद्धि के लिए एक अलग वीडियो बनाकर कुछ डालेंगे। बाक़ी, पूरे रूप में, इन विषयों को जानने वाले किसी जानकार के साथ बैठकर जानना सबसे अच्छा है।
जयंती मंगला का कितना जाप किया जा सकता है?
इकतालीस दिन तक ग्यारह माला, या एक सौ आठ भी
जयंती मंगला बिल्कुल कीजिए, वक्ता कहते हैं: इकतालीस दिन तक ग्यारह माला आप बिल्कुल कर सकते हैं। कोई दोष नहीं। ग्यारह की जगह 108 माला भी करें, तो जयंती मंगला में कोई परेशानी नहीं।
जयंती मंगला काली बिल्कुल कीजिए, वक्ता कहते हैं। इकतालीस दिन तक ग्यारह माला आप बिल्कुल कर सकते हैं। कोई दोष नहीं। ग्यारह की जगह 108 माला भी करें, तो जयंती मंगला में कोई परेशानी नहीं।
सूतक के बाद किन मंत्रों की शुद्धि चाहिए, और किनकी नहीं?
कुल मंत्र और इष्ट मंत्र, स्तोत्र और कवच नहीं
सूतक में माँ जलेसा के शाबर मंत्र और काल भैरव अष्टक को कैसे शुद्ध करें, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: नहीं — स्तोत्र या कवच को शुद्ध करने की ज़रूरत नहीं। दीक्षित मंत्र, ख़ासकर जिसे कुल मंत्र कहा जाता है, उसे शुद्ध करना होता है: परंपरागत गुरु कुल मंत्र देते हैं, यानी वह मंत्र जो उनके कुल में पहले से चला आ रहा है। दूसरा, वह इष्ट मंत्र जिसका आप नित्य जाप कर रहे हैं। स्तोत्र, स्तुति, कवच, माला मंत्र — अगर आप माला मंत्र बहुत करते हैं — सप्ताक्षरी, सहस्राक्षरी आदि, इन्हें शुद्ध करने की ज़रूरत नहीं।
सूतक में माँ जलेसा के शाबर मंत्र और काल भैरव अष्टक को कैसे शुद्ध करें, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: नहीं, देखिए — स्तोत्र या कवच को शुद्ध करने की ज़रूरत नहीं। दीक्षित मंत्र है, और ख़ासकर वह जिसे कुल मंत्र कहा गया है। जो गुरु परंपरागत गुरु हैं वे कुल मंत्र देते हैं — यानी वह मंत्र जो उनके कुल में पहले से चला आ रहा है। उन्हें शुद्ध करना होता है। दूसरा, वह इष्ट मंत्र जिसका आप नित्य जाप कर रहे हैं — वे। स्तोत्र, स्तुति, कवच, माला मंत्र — अगर आप माला मंत्र बहुत करते हैं — सप्ताक्षरी, सहस्राक्षरी आदि: इन्हें शुद्ध करने की ज़रूरत नहीं।
माँ कटा हुआ सिर क्यों पकड़े हैं?
वे रक्त पीती हैं; सियारों का अपना माहात्म्य है
वे रक्त पीने के लिए बैठी हैं, वक्ता कहते हैं। माँ मुंड हाथ में लेती हैं — वे रक्त पान करती हैं। तंत्र में उनका रूप वहाँ वैसा क्यों है, और वे कौन हैं, और सियार: वे वहाँ क्यों हैं इसका अपना अलग माहात्म्य है, एक अलग तंत्रोक्त विषय, जैसे डाकिनी, शाकिनी आदि जिन्हें हम दूसरे देवी-देवताओं के साथ देखते हैं।
वे रक्त पीने के लिए बैठी हैं, वक्ता कहते हैं। माँ मुंड हाथ में लेती हैं न। तो वे रक्त पान करती हैं। बाक़ी, तंत्र में उनका रूप वहाँ वैसा क्यों है, और वे कौन हैं — जैसे हम दूसरे देवी-देवताओं के साथ देखते हैं: डाकिनी, शाकिनी आदि। और सियार — वे वहाँ क्यों हैं इसका अपना अलग माहात्म्य है। यह अलग विषय है, तंत्रोक्त विषय।
बिना दीक्षा दुर्गा पाठ कैसे किया जा सकता है?
साधारण महाविद्या क्रम से, हिंदी में
आप साधारण महाविद्या क्रम से कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं; आप हिंदी में कर सकते हैं।
क्या भगवती की उपासना करने वाले को तुलसी की कंठी माला उतार देनी चाहिए?
नारायण स्वयं इस शक्ति को धारण करते हैं, इसलिए दोष नहीं होना चाहिए
अब जो भगवती की उपासना कर रहे हैं उनसे कहा जा रहा है कि जो तुलसी की कंठी माला ली है उसे उतरवा दें, वक्ता बताते हैं। वे कहते हैं कि वे ऐसे विषयों पर टिप्पणी कर ही नहीं सकते, क्योंकि सबकी अपनी मति, गति, बुद्धि और अपना कुल क्रम है — हो सकता है यह उनका कुल क्रम हो। पर उनके अनुसार यह सब बिना दीक्षा नहीं करवाया जा सकता। और जो नारायण इस शक्ति, पीतांबरा, को धारण करते हैं — जहाँ तक उन्हें लगता है, पीतांबरा को धारण करने वाले सबसे बड़े और सबसे सक्षम सिद्ध साधक स्वयं भगवान नारायण हैं; वे उन्हें हमेशा धारण करते हैं, वे उन्हें प्रिय हैं, और उनकी ऊर्जा उनके नियंत्रण में है, इसलिए इसमें कोई दोष नहीं होना चाहिए। सतनाम में तो कम से कम बिल्कुल नहीं। हाँ, अगर कोई उनके तंत्रोक्त मंत्र और ऐसे विशेष विषय करे, तब।
अब, जो भगवती की उपासना कर रहे हैं उनसे कहा जा रहा है कि जो तुलसी की कंठी माला ली है उसे उतरवा दें, वक्ता बताते हैं। हम ऐसे विषयों पर टिप्पणी कर ही नहीं सकते, वे कहते हैं। हम टिप्पणी नहीं कर सकते क्योंकि सबकी अपनी मति, अपनी गति, अपनी बुद्धि, और अपना कुल क्रम है। हो सकता है यह उनका कुल क्रम हो। पर मेरे अनुसार, यह सब बिना दीक्षा नहीं करवाया जा सकता। और जो नारायण इस शक्ति, पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम।, को धारण करते हैं — जहाँ तक मुझे लगता है, पीतांबरा को धारण करने वाले सबसे बड़े और सबसे सक्षम सिद्ध साधक स्वयं भगवान नारायण हैं। और वे इसे हमेशा धारण करते हैं; वे उन्हें प्रिय हैं, और उनकी ऊर्जा उनके नियंत्रण में है, इसलिए इसमें कोई दोष नहीं होना चाहिए। सतनाम में तो कम से कम बिल्कुल नहीं। हाँ — अगर कोई उनके तंत्रोक्त मंत्र और ऐसे विशेष विषय करे, तब। और यह भी देखिए, वे कहते हैं: यही शक्ति वैष्णवी रूप में है। इस शक्ति को परम वैष्णव, महावैष्णव स्वरूपा कहा गया है।
एक साधिका से कहा गया कि सिखाए जाने से पहले हर मूर्ति विसर्जित करके ख़ाली होकर आओ
सिखाए जाने से पहले ख़ाली होकर आने को कहा जाना
वक्ता बताते हैं कि उसी समूह के एक आचार्य ने, जिनके बारे में वे कहते हैं कि लोग बुरा मानते हैं क्योंकि अब उनका चैनल कुछ बड़ा है पर फिर भी यह सच है, उनसे बात करने वाली एक साधिका से कहा: अगर मेरे हिसाब से चलना है, तो अपने घर में जो भी फ़ोटो और मूर्तियाँ रखी हैं, पहले जाकर उन्हें उठाकर विसर्जित करो। तभी पूरी तरह ख़ाली होकर आओ, फिर हम साधना करवाएँगे। अब सोचिए, वे कहते हैं: जो व्यक्ति पाँच-दस साल से मन से कोई विग्रह या फ़ोटो लाकर रखता है, उसकी सेवा-पूजा करता है, और धीरे-धीरे सबसे उसका लगाव बन जाता है — और सामने वाला साफ़ कहता है, सबको उठाकर रख दो और आओ, पूरी तरह ख़ाली होकर आओ, तभी सिखाएँगे। यह, वे कहते हैं, अत्यधिक आत्ममुग्धता है जो उन्होंने वहाँ देखी, और इसीलिए वे बहुत चुप रहते हैं।
उसी समूह के एक आचार्य, वक्ता कहते हैं — जिनके बारे में वे बोलें तो, चूँकि उनका अपना चैनल अब कुछ बड़ा है, लोगों को बहुत चुभता है, पर यह सच है — एक स्त्री साधिका थीं, और बताया गया है कि उन्होंने उनसे बात की। और उन्होंने कहा: अगर मेरे हिसाब से चलना है, तो अपने घर में जो भी फ़ोटो और मूर्तियाँ रखी हैं, उन्हें उठाकर पहले जाकर उनका विसर्जन करो। तभी पूरी तरह ख़ाली होकर आओ, और फिर हम साधना करवाएँगे। अब बताइए, वे कहते हैं: अगर कोई व्यक्ति पाँच-दस साल से मन से कोई विग्रह या फ़ोटो लाकर रखता है, उसकी सेवा और पूजा करता है, तो धीरे-धीरे उन सबसे लगाव बन जाता है। और सामने वाला साफ़ कहता है: सबको उठाकर रख दो और आओ; पूरी तरह ख़ाली होकर आओ, तभी सिखाएँगे। और यही अत्यधिक आत्ममुग्धता हमने वहाँ देखी है, वे कहते हैं; इसीलिए हम बहुत चुप रहते हैं। हम कहीं टिप्पणी नहीं करते; जहाँ उन्होंने टिप्पणी की है, वहाँ तुरंत विरोध शुरू होते देखते हैं। कुछ लोगों का काम बस यही है कि अच्छा बोलो या बुरा, जवाब टेढ़ा ही मिलेगा। हमने यह करना छोड़ दिया है।
क्या गीता प्रेस का संस्करण इस्तेमाल किया जा सकता है, और क्या शिव कवच में न्यास किया जा सकता है?
दोनों की अनुमति
गीता प्रेस में जो दिया है, वक्ता कहते हैं, वह आप कर सकते हैं। हाँ, कीजिए। क्या किसी शिव कवच में न्यास किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर वे जवाब देते हैं कि किया जा सकता है।
गीता प्रेस में जो दिया है, वक्ता कहते हैं, वह आप कर सकते हैं। हाँ, कीजिए। क्या किसी शिव कवच में न्यास किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर वे जवाब देते हैं कि किया जा सकता है।
श्री यंत्र बनवाने का समय किससे तय होता है?
अपनी दीक्षा की नित्या, पूर्णिमा या त्रयोदशी, और जन्म नक्षत्र
श्री यंत्र बनवाने के लिए, वक्ता दोहराते हैं, एक बार उनसे पूछिए जिनसे बनवा रहे हैं। अगर आप दीक्षित हैं — श्री विद्या में दीक्षित — तो जिस नित्या की दीक्षा आपको दी गई है उसके अनुसार, या अभी आप किस क्रम पर हैं, एकाक्षरी या त्र्यक्षरी, उसके अनुसार आपके गुरु जी बताएँगे। या पूर्णिमा का दिन प्रमुख है; पूर्णिमा पर बनवाया जाता है, और त्रयोदशी पर भी होता है। उनके लिए विषय तिथि का इतना नहीं: साधक का जन्म नक्षत्र आदि देखना ज़रूरी है, और चंद्रमा और नक्षत्र देखकर उसके अनुसार बनवाया जाता है। तो यह उसी पर निर्भर करेगा।
श्री यंत्र बनवाने के लिए, वक्ता वही दोहराते हैं जो श्रोता से कहा: एक बार उनसे पूछिए जिनसे बनवा रहे हैं। अगर आप दीक्षित हैं — श्री विद्या में दीक्षित — तो जिस नित्या की दीक्षा आपको दी गई है उसके अनुसार, या अभी आप किस क्रम पर हैं, एकाक्षरी या त्र्यक्षरी, उसके अनुसार आपके गुरु जी बताएँगे। या पूर्णिमा का दिन प्रमुख है; पूर्णिमा पर बनवाया जाता है। त्रयोदशी पर भी होता है। उनके लिए विषय तिथि का इतना नहीं; साधक का जन्म नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। आदि देखना ज़रूरी है, और चंद्रमा और नक्षत्र देखकर उसके अनुसार बनवाया जाता है। तो यह उसी पर निर्भर करेगा।
क्या पूर्वज की फ़ोटो के सामने दीपक जलाना चाहिए?
दस गात्र के दिन, और उसके बाद साल भर की यात्रा
अगर पहले से इसका कोई नियम नहीं, वक्ता पूछते हैं, तो आप इतना दीपक क्यों जला रहे हैं — दीपक जलाएँगे तो उनकी आत्मा कभी जा नहीं पाएगी। पूर्वजों के सामने दीपक जलाना कहीं नहीं मिलता: बस जब दस दिन के दस गात्र आदि होते हैं, तब होता था — और फ़ोटो, छाया चित्र, पहले उस तरह होता भी नहीं था। बस इतना कि ग्यारह दिन तक आत्मा की स्थिति वहाँ रहती है, इसलिए जलता था; और दस गात्र हो जाने के बाद उसकी अपनी यात्रा शुरू होती थी। वैकुंठ के लिए, या जिसे हम भवसागर, वैतरणी आदि कहते हैं, उसकी यात्रा शुरू होती, और वह पूरे एक साल की यात्रा थी।
अगर पहले से कोई नियम नहीं, वक्ता पूछते हैं, तो आप इतना दीपक क्यों जला रहे हैं? दीपक जलाएँगे, तो उनकी आत्मा कभी जा नहीं पाएगी। पूर्वजों के सामने दीपक जलाना — यह आपको कहीं नहीं मिलेगा; बस जब दस दिन के दस गात्र आदि होते हैं, उस समय। और फ़ोटो, छाया चित्र, पहले उस तरह होता भी नहीं था। बस इतना कि जलता था, कि हाँ, ग्यारह दिन तक आत्मा की स्थिति वहाँ रहती है; और दस गात्र आदि हो जाने के बाद उसकी अपनी यात्रा शुरू होती थी। वैकुंठ के लिए, या जिसे हम भवसागर कहते हैं, वैतरणी आदि के लिए, उसकी यात्रा शुरू होती, और वह पूरे एक साल की यात्रा थी।
किसी दिवंगत के लिए दीपक जलाने से असल में क्या होता है?
जब वह प्रेत तत्व में है, शक्ति देवत्व में स्थिर हो जाती है
अब बताइए, वक्ता कहते हैं: उसे वैतरणी की साल भर की यात्रा करके यमपुरी, पितृ लोक आदि जाना है, या वैकुंठ आदि जाना है — और आप उसके लिए दीपक जलाते जा रहे हैं। दीपक जलाने से होता यह है कि शक्ति स्थिर हो जाती है। जिस शक्ति की ओर आप संकल्प लेते हैं, जिसे लक्ष्य करके दीपक जलाते हैं, वह वाहन के रूप में देवत्व में स्थापित हो जाती है। तो जो प्रेत तत्व में है — वह भी फिर वहीं रह जाएगा। बात अलग है, वे जोड़ते हैं, अगर आपने उसे स्थान दिया है। फ़ोटो रखकर उसके सामने दीपक मत जलाइए।
अब बताइए, वक्ता कहते हैं: उसे वैतरणी की साल भर की यात्रा करके यमपुरी, पितृ लोक आदि जाना है; या उसे वैकुंठ आदि जाना है। और आप उसके लिए दीपक जलाते जा रहे हैं। दीपक जलाने से क्या होता है? शक्ति स्थिर हो जाती है। वह शक्ति जिसकी ओर आप संकल्प लेते हैं, जिसे लक्ष्य करके दीपक जलाते हैं, वाहन के रूप में देवत्व में स्थापित हो जाती है। तो जो प्रेत तत्व में है — वह भी फिर वहीं रह जाएगा। हाँ, अगर आपने उसे स्थान दिया है, तो बात अलग है। पर फ़ोटो रखकर उसके सामने दीपक मत जलाइए।
पितरों के लिए रोज़ का दीपक कहाँ जलाया जा सकता है?
अमावस्या, रसोई में पानी का स्थान, और तुलसी के पास शाम का दीपक
हाँ, अगर केवल अमावस्या पर किया जाए तो बात अलग है: अमावस्या पर एक दिन का दीपक दिया जा सकता है। देवताओं के सामने सुबह-शाम एक जलाइए। पितरों के लिए भी, चाहें तो, नित्य दीपदान कर सकते हैं, जहाँ रसोई में पीने के पानी का स्थान है — वहाँ जला सकते हैं। शाम को, संध्या के समय, तुलसी जी के पास जो दीपक जलता है वह भी पितरों के लिए है: तुलसी महारानी उसे स्वीकार करती हैं, और पितर भी उनकी जड़, तने और पत्तों में स्थित होकर अपना हिस्सा पाते हैं। पर अगर आप केवल एक पितर को लक्ष्य करके करें, तो इसमें दिक़्क़त है।
हाँ, अगर केवल अमावस्या पर किया जाए, तो बात अलग है, वक्ता कहते हैं। अमावस्या पर एक दिन का दीपक दिया जा सकता है। देवताओं के सामने रोज़ सुबह-शाम जलाना चाहिए। पितरों के लिए भी, चाहें तो, नित्य दीपदान कर सकते हैं: जहाँ रसोई में पीने के पानी का स्थान है, वहाँ जला सकते हैं। शाम को, संध्या के समय, तुलसी जी के पास जो दीपक जलता है वह भी पितरों के लिए है। तुलसी महारानी उसे स्वीकार करती ही हैं, और पितर भी उनकी जड़ में, तने में और पत्तों में स्थित होकर अपना हिस्सा पाते हैं। पर अगर आप केवल एक पितर को लक्ष्य करके करें, तो इसमें दिक़्क़त है।
तामसिक ढंग से पूजी जाने वाली देवी की घर में पूजा कैसे करें?
उसी रूप में, पर बलि केवल उनके स्थान पर
अगर कहीं किसी देवी की तामसिक ढंग से पूजा होती है — जैसे श्रोता शामलेश्वरी देवी के बारे में पूछ रहे हैं — तो ऐसा नहीं है, वक्ता कहते हैं: अगर आप उस जगह के, उस क्षेत्र के हैं, या आपके कुल में उनकी पूजा होती है, तो आप घर में उनकी पूजा करेंगे ही, और उसी रूप में करेंगे। पर बलि आदि आप उनके स्थान पर देंगे; और घर में, अगर नहीं दी जाती, तो नहीं देंगे।
देखिए, अगर कहीं किसी देवी की तामसिक ढंग से पूजा होती है, वक्ता कहते हैं — जैसे आप शामलेश्वरी देवी के बारे में कह रहे हैं — तो ऐसा नहीं है। अगर आप उस जगह के, उस क्षेत्र के हैं, या आपके कुल में उनकी पूजा होती है, तो आप घर में उनका पूजन करेंगे ही, और उसी रूप में करेंगे। पर बलि आदि आप उनके अपने स्थान पर देंगे। घर में, अगर नहीं दी जाती, तो नहीं देंगे।
क्या हर देवता के तीनों गुण होते हैं?
हर देवी और भैरव के सात्विक, राजसिक और तामसिक रूप
हर देवी के भीतर तीनों रूप हैं, वक्ता कहते हैं: हमारे सब देवी-देवताओं और महाशक्तियों के तीनों रूप हैं — सात्विक, राजसिक और तामसिक। भैरव जी के भी तीनों हैं। लोग बस यह जानते हैं कि वे श्मशान भैरव हैं और केवल श्मशान में रहते हैं — नहीं भाई। उनके भी तीनों रूप हैं, और तीनों रूपों का ध्यान है। त्रिगुणातीत — तीनों गुणों से परे, तीनों गुणों के पार, और वे तीनों गुणों के भीतर भी हैं। तो भगवती के भी तीनों रूप हैं, और तीनों रूपों में उनकी पूजा हो सकती है।
श्रेणी के हिसाब से, हर देवी के भीतर तीनों रूप हैं, वक्ता कहते हैं: हमारे जितने देवी-देवता और महाशक्तियाँ हैं, सबके सात्विक, राजसिक और तामसिक, तीनों रूप हैं। भैरव जी के भी तीनों हैं। लोग बस यह जानते हैं कि वे श्मशान भैरव हैं, कि वे केवल श्मशान में रहते हैं। नहीं भाई। उनके भी तीनों रूप हैं; तीनों रूपों का ध्यान है। त्रिगुणातीत — तीनों गुणों से परे, तीनों गुणों के पार, और तीनों गुणों के भीतर भी वे हैं। तो भगवती के भी तीनों रूप हैं। तीनों रूपों में उनकी पूजा हो सकती है। अगर घर के लोग नहीं मानेंगे, तो कोई बात नहीं, वे जोड़ते हैं; चलने दीजिए। उन्होंने कहीं से सुनकर किया होगा। आपने मुझसे जो पूछा, वह हम बता रहे हैं।
ताँबे में बंद, प्राण प्रतिष्ठित, उसी वेदी पर नौ दिन के जाप के साथ
ताँबे में बंद, प्राण प्रतिष्ठित, उसी वेदी पर नौ दिन का जाप
रक्षा कवच किस तरह सिद्ध किया जा रहा है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि रक्षा कवच के लिए उन्होंने बस यह लिखा है कि वह शुद्ध ताँबे में बंद होगा — यानी कवच ताँबे का ही होगा — और उसके भीतर, जिस भी देवी-देवता का कवच आप लें, उस देवी-देवता का कवच पूरे नौ दिन के जाप के साथ प्राण प्रतिष्ठित होगा। अगर कोई नवरात्र के आख़िरी दिन कहे, तो उन्होंने पहले से अतिरिक्त बनाकर रखे होंगे, और उसमें बस उस व्यक्ति के नाम का संकल्प होगा; बस इतना होगा, और आपको मिल जाएगा।
रक्षा कवच किस तरह सिद्ध किया जा रहा है, और क्या खड्ग, कड़ा आदि भी सिद्ध किए जा रहे हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: रक्षा कवच के लिए हमने बस यह लिखा है कि वह शुद्ध ताँबे में बंद होगा — यानी कवच ताँबे का ही होगा। और उसके भीतर, जिस भी देवी-देवता का कवच आप लें, उस देवी-देवता का कवच पूरे नौ दिन के जाप के साथ प्राण प्रतिष्ठित होगा। अगर कोई नवरात्र के आख़िरी दिन कहे, तो हमारे पास यह होगा — कि अतिरिक्त बनाकर रखे होंगे, और उसमें बस उनके नाम का संकल्प होगा। बस इतना होगा। और आपको मिल जाएगा।
यह चंडी पाठ, हवन और रोज़ की बलि वाली उसी वेदी पर चलता है
चंडी पाठ, हवन और रोज़ की बलि वाली उसी वेदी पर
जिसका भी जाप हो — जैसे अगर नवदुर्गा का है, तो पूरा चंडी पाठ, हवन आदि और रोज़ की बलि आदि चल रहे हैं — तो सब वहीं, उसी वेदी पर स्थापित होगा; अलग से करने की ज़रूरत नहीं, और साधारण दिन में इतना नहीं हो सकता। भैरव जी का अलग से हो रहा है, तो जिनका हो रहा है, उनका वहाँ हो रहा है।
बहुत शत्रुओं वालों के लिए शूलिनी दुर्गा दी जा रही हैं, एक व्यक्ति केवल उन्हीं को समर्पित
बहुत शत्रुओं वालों के लिए, एक व्यक्ति केवल उन्हीं को समर्पित
शूलिनी दुर्गा वे केवल इसलिए दे रहे हैं, वक्ता कहते हैं, क्योंकि बहुत से लोगों को शत्रुओं से बहुत परेशानी है, और शत्रु एक नहीं, एक से ज़्यादा हैं; तो उन लोगों के लिए शूलिनी दुर्गा आदि हैं। उनके लिए एक अलग व्यक्ति रहेगा, जो केवल और पूरी तरह शूलिनी दुर्गा करेगा। खड्ग और विशेष कवच आदि उन्होंने चैनल या वेबसाइट पर नहीं डाले: निजी रूप से संपर्क कीजिए और बताइए क्या चाहिए। इसी नवरात्र में वे वह व्यवस्था कर देंगे। नवरात्र के बाद बताएँगे तो उन्हें ज़्यादा समय लगेगा, क्योंकि अकेले उनके लिए इतना जाप संभव नहीं — और वे यह नहीं कह सकते कि लो भाई, क्योंकि आप देखने तो आ नहीं रहे। नवरात्र में समय है और लोग हैं, इसलिए इस समय सब हो सकता है: उनसे बात कीजिए और बताइए कि खड्ग चाहिए या जो भी, कालिका खड्ग आदि, और पूरी व्यवस्था समय पर हो जाएगी। बाद में करेंगे, तो जाप आदि के लिए पंद्रह दिन देने पड़ेंगे।
शूलिनी दुर्गा, वक्ता कहते हैं, वे केवल इसलिए दे रहे हैं क्योंकि बहुत से लोगों को शत्रुओं से बहुत परेशानी है। और शत्रु एक नहीं; एक से ज़्यादा हैं। तो उन लोगों के लिए शूलिनी दुर्गा आदि हैं। उनके लिए एक अलग व्यक्ति रहेगा, जो केवल और पूरी तरह शूलिनी दुर्गा करेगा। खड्ग आदि, या विशेष कवच आदि — वे उन्होंने चैनल या वेबसाइट पर नहीं डाले। निजी रूप से उनसे संपर्क कीजिए और बता सकते हैं कि क्या चाहिए; इसी नवरात्र में वे वह व्यवस्था कर देंगे। अगर नवरात्र के बाद बताएँगे, तो उन्हें ज़्यादा समय लगेगा, क्योंकि अकेले उनके लिए इतना जाप संभव नहीं। और वे यह नहीं कर सकते कि हाँ, लो भाई — क्योंकि आप देखने तो आ नहीं रहे। तो वह उनके पास नहीं होगा। नवरात्र में समय है, लोग हैं; इस समय सब हो सकता है। तो उनसे बात कीजिए और बताइए कि खड्ग चाहिए, या जो भी चाहिए — कालिका खड्ग आदि — बताइए और हो जाएगा, और पूरी व्यवस्था समय पर हो जाएगी। अगर बाद में करेंगे, तो जाप आदि के लिए पंद्रह दिन देने पड़ेंगे; समय लगेगा, और अकेले वे इतनी जल्दी नहीं कर पाएँगे।
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