देवशयनी एकादशी, गुरु पूर्णिमा और पूरा सावन — गृहस्थ वास्तव में क्या करे
देवशयनी एकादशी, गुरु पूर्णिमा और सावन की विधि।
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क्या देवशयनी एकादशी पर मुहूर्त देखना पड़ता है?
दोनों एकादशियों पर न मुहूर्त, न चौघड़िया
वक्ता कहते हैं कि सबसे सामान्य बात जो सबको पता होनी चाहिए, वह यह है कि देवशयनी एकादशी और देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन किसी भी प्रकार का मुहूर्त देखने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। चौघड़िया आदि देखे बिना, यदि आप कोई विशेष कार्य करना चाहते हैं, तो उस दिन कर सकते हैं।
एकादशी पर पहला प्रश्न लेते हुए वक्ता कहते हैं कि सबसे सामान्य और सबसे जरूरी बात यह है कि देवशयनी एकादशी और देवप्रबोधिनी एकादशी पर किसी भी तरह का मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। चौघड़िया या ऐसा कुछ भी देखे बिना, यदि आप कोई विशेष कार्य करना चाहते हैं, तो उस दिन कर सकते हैं। वे कहते हैं, यह पहली बात है।
क्या देवशयनी एकादशी पर नई साधना शुरू की जा सकती है?
चातुर्मास के लिए नरसिंह अनुष्ठान की शुरुआत
हाँ — यदि आप कोई नई साधना शुरू करना चाहते हैं, जैसे इस चैनल पर बताया गया भगवान नरसिंह से जुड़ा कोई विशेष अनुष्ठान, या उनके कवच का अनुष्ठान, तो कर सकते हैं। यदि आप एक शक्ति को पकड़कर जीवन में चलना चाहते हैं और वह शक्ति भगवान नरसिंह हैं, तो कल से देवप्रबोधिनी एकादशी यानी तुलसी विवाह के दिन तक रोज़ अपनी क्षमता अनुसार नरसिंह कवच का पाठ करने से, इस चातुर्मास व्रत के प्रभाव से, आपको बहुत कुछ मिल सकता है।
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई श्रोता कोई नई साधना शुरू करना चाहता है — जैसे चैनल पर बताया गया भगवान नरसिंह से जुड़ा कोई विशेष अनुष्ठान, या उनके कवच का अनुष्ठान — तो वह इस दिन शुरू किया जा सकता है। यदि आप एक शक्ति को पकड़कर जीवन में चलना चाहते हैं, और आपके लिए वह शक्ति भगवान नरसिंह हैं, तो कल से देवप्रबोधिनी एकादशी तक — यानी तुलसी विवाह के दिन तक — रोज़ अपनी क्षमता अनुसार नरसिंह कवच का पाठ करें। इस चातुर्मास व्रत के प्रभाव से, इन चार महीनों में बहुत कुछ प्राप्त हो सकता है।
तंत्र बाधा से पीड़ित व्यक्ति को, जिसे कहीं से राहत नहीं मिल रही, क्या करना चाहिए?
नरसिंह कवच और नरसिंह यंत्र की स्थापना
जो लोग पर्सनल मैसेज भेजते हैं कि परिवार में बहुत तंत्र बाधाएँ हैं, जो हर जगह भटक रहे हैं, YouTube पर सुने कई लोगों से बात कर रहे हैं, और कई अनुष्ठान कर रहे हैं पर किसी एक को भी दोहरा नहीं पाते — उन्हें वक्ता एक सुझाव देते हैं: भटकने के बजाय, यदि आपकी आस्था भगवान नरसिंह में है, तो देवशयनी एकादशी से देवप्रबोधिनी एकादशी तक हर दिन नरसिंह कवच के एक सौ आठ पाठ करें, और यदि संभव हो तो किसी जानकार साधक, किसी वैष्णव साधक, या इस विषय का ज्ञान रखने वाले किसी व्यक्ति से घर में नरसिंह यंत्र स्थापित करवाएँ।
वे बताते हैं कि वे किनसे बात कर रहे हैं: जिनके घर में बहुत तंत्र बाधाएँ हैं, जो पर्सनल मैसेज भेजते हैं जिनका अक्सर जवाब नहीं दिया जा पाता, जो कई जगह भटक रहे हैं, YouTube पर सुने कई लोगों से बात कर रहे हैं, और कई अनुष्ठान कर रहे हैं पर किसी एक को बार-बार दोहरा नहीं पाते। उन्हें वे एक सुझाव देते हैं — जगह-जगह भटकने के बजाय, यदि आपकी आस्था भगवान नरसिंह और उनकी शक्ति पर टिकी है, तो देवशयनी एकादशी यानी कल के दिन से देवप्रबोधिनी एकादशी तक, हर दिन नरसिंह कवच के एक सौ आठ पाठ करें। और यदि संभव हो, तो कवच के नियमित अनुष्ठान के साथ-साथ, किसी जानकार साधक, किसी वैष्णव साधक, या इस विषय का ज्ञान रखने वाले किसी व्यक्ति से अपने घर में भगवान नरसिंह का यंत्र स्थापित करवाएँ। ये दो काम करें।
सबसे प्रसिद्ध तांत्रिकों के पास से भी लोग बिना ठीक हुए क्यों लौटते हैं?
सिद्धि कितनी भी बड़ी हो, हर मनुष्य की एक सीमा है
वक्ता कहते हैं कि तंत्र कितना भी बड़ा हो, यदि आप यह नरसिंह कवच अनुष्ठान पूरे चार महीने पूरा करते हैं, तो इन चार महीनों में ही आपको अपने जीवन का सबसे बड़ा बदलाव दिखने लगेगा। वे कहते हैं कि वे किसी का नाम नहीं लेना चाहते, पर आज तंत्र के विषय में भारत के सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति से भी — जिसकी सबसे बड़ी फैन फॉलोइंग है, जिसकी क्षमता पूरी दुनिया देख रही है — लोग लौटकर मैसेज करते हैं कि वह सब कुछ बता देता है पर काट नहीं हो रही, परेशानी वैसी ही है। इन सबसे उनका निवेदन है कि कोई कितना भी बड़ा हो, वह एक सामान्य मनुष्य है और हर किसी की एक क्षमता होती है।
वे कहते हैं कि वे केवल उनके लिए बोल रहे हैं जिन पर बहुत बड़ा तंत्र किया गया है: तंत्र कितना भी बड़ा हो, यदि आप पूरे चार महीने नरसिंह कवच का अनुष्ठान करते हैं, तो इन चार महीनों में ही आपके जीवन का सबसे बड़ा बदलाव दिखने लगेगा। वे कहते हैं कि वे नाम नहीं लेना चाहते, पर इस समय तंत्र के विषय में भारत का सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति — जिसकी सबसे ज़्यादा फैन फॉलोइंग है, जिसकी क्षमता पूरी दुनिया देख रही है — उसके पास से भी लोग लौटते हैं; उनके मैसेज आते हैं कि वह सब कुछ बता रहा है पर काट नहीं हो रही और परेशानी अभी भी है। ऐसे सभी लोगों से उनका निवेदन यह है: कोई कितना भी बड़ा हो, वह एक सामान्य मनुष्य है, और हर किसी की एक क्षमता होती है, सिद्धि कितनी भी बड़ी हो।
नरसिंह कवच के रोज़ कितने पाठ करने चाहिए?
एक सौ आठ, या चौवन, या सत्ताईस
वक्ता कहते हैं कि यदि किसी व्यक्ति के द्वारा आपके तंत्र की काट नहीं हो रही, तो अपने प्रयास से कोशिश करें। नरसिंह कवच काफी छोटा है: यदि आप सक्षम हैं तो एक सौ आठ पाठ करें; नहीं तो चौवन करें; उससे भी कम करना चाहें तो सत्ताईस पाठ करें। पर कल से शुरू करें तो पूरा का पूरा देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन तक चलाना होगा।
वे कहते हैं कि यदि किसी व्यक्ति के द्वारा तंत्र की काट नहीं हो पा रही, तो स्वयं प्रयास करें। नरसिंह कवच काफी छोटा है। यदि आप सक्षम हैं तो एक सौ आठ पाठ करें; यदि नहीं हैं तो चौवन करें; उससे भी कम करना चाहें तो सत्ताईस पाठ करें। पर कल से जो भी शुरू करें, उसे पूरा का पूरा देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन तक जारी रखें।
क्या चार महीने के पाठ को पितृ पक्ष या नवरात्रि में रोकना चाहिए?
पितृ पक्ष या नवरात्रि में कोई विराम नहीं
बीच में पितृ पक्ष पड़े तो रोकने की जरूरत नहीं, और नवरात्रि आए तो भी रोकने की जरूरत नहीं। आप नवरात्रि का पूजन पूरा कर सकते हैं, और पितृ पक्ष में पितरों के लिए जो अनुष्ठान करना चाहें वह अलग से कर सकते हैं — पर कल जो नियम उठाएँगे, उसे तुलसी विवाह के दिन तक पूरा का पूरा निभाना होगा।
तंत्र से परेशान व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या क्या है?
सबसे पहले बुद्धि कुंठित होती है
वक्ता कहते हैं कि तंत्र से परेशान व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब भी किसी पर तंत्र का विशेष प्रभाव पड़ता है, उसकी बुद्धि कुंठित हो जाती है। आप किसी की क्षमता को सही से परख नहीं पाते। आप भूत, प्रेत, पिशाच से पीड़ित हो सकते हैं, तंत्र बाधा से आपको शारीरिक और आर्थिक परेशानियाँ हो सकती हैं — पर सबसे बड़ी परेशानी यह है कि आप मानसिक रूप से पीड़ित होते हैं।
वे कहते हैं कि यह पहला भाग उनके लिए था जो तंत्र बाधा और अभिचार बाधा से परेशान हैं और जिन्हें कोई समाधान नहीं मिल रहा। तंत्र से परेशान व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब किसी पर तंत्र का विशेष प्रभाव पड़ता है, तो उसकी बुद्धि कुंठित हो जाती है। तब आप किसी की क्षमता को सही से परख नहीं पाते। आप प्रेत, पिशाच आदि से पीड़ित हो सकते हैं; तंत्र बाधा से आपको शारीरिक और आर्थिक परेशानियाँ हो सकती हैं — पर सबसे बड़ी परेशानी यह है कि आप मानसिक रूप से पीड़ित होते हैं।
आप पर तंत्र करने वाले के पास वास्तव में कितनी शक्ति होती है?
सीमित शक्ति, और डर से होने वाला नुकसान
वक्ता कहते हैं कि आप पर तंत्र करने वाले की शक्तियाँ एक सीमित मात्रा तक ही होती हैं: वह अपनी विद्याओं से आप पर श्मशान के प्रेत आदि प्रोजेक्ट कर रहा होता है। आप उसकी क्षमता को उससे कहीं ज़्यादा आँकते हैं। कहा जाता है कि यदि रणभूमि में शत्रु को देखकर आप डर गए, तो आप वहीं युद्ध हार गए — और वे कहते हैं कि आज यही सबसे बड़ी समस्या है, और इसी का फायदा दूसरे लोग और आपके शत्रु उठाते हैं।
वे कहते हैं कि आप पर तंत्र करने वाले की शक्तियाँ एक सीमित मात्रा में ही होती हैं। वह क्या कर रहा है? अपनी विद्याओं से वह आप पर श्मशान के प्रेत आदि प्रोजेक्ट कर रहा है। आप उसकी क्षमता को उससे कहीं ज़्यादा आँकते हैं। कहा जाता है कि रणभूमि में शत्रु को देखकर यदि आप डर गए, तो आप वहीं युद्ध हार गए। वे कहते हैं कि वर्तमान समय की यही सबसे बड़ी समस्या है, और ठीक इसी का फायदा दूसरे लोग और आपके शत्रु उठाते हैं। और आप डरते क्यों हैं? क्योंकि आपको बार-बार नुकसान हो रहा है और आप कुछ कर नहीं पा रहे।
क्षुद्र विद्या का जानकार व्यक्ति निश्चित रूप से क्या सिद्ध करता है?
हरकारे का काम करने वाला मसान
वक्ता इसे एक रोचक विषय बताते हैं: जब भी कोई चालाक व्यक्ति किसी पर तंत्र करवाता है, और क्षुद्र शक्तियाँ सिद्ध करने वाला जानकार व्यक्ति उसे करता है, तो उसने मसान अवश्य सिद्ध किया होगा — यह सौ प्रतिशत है, मसान अवश्य सिद्ध होगा। इसलिए जब भी वह किसी पर प्रयोग करता है, तो हरकारा या डाकिया — यानी किसी की पूरी जानकारी तुरंत पहुँचाना — यह सब इन्हीं शक्तियों के माध्यम से होता है।
वे कहते हैं कि श्रोताओं को यह विषय थोड़ा रोचक लगेगा। जब भी कोई चालाक व्यक्ति किसी पर तंत्र करवाता है, और क्षुद्र शक्तियाँ सिद्ध करने वाला जानकार व्यक्ति उसे करता है, तो उसने मसान अवश्य सिद्ध किया होगा। वे कहते हैं, यह सौ प्रतिशत है; मसान अवश्य सिद्ध होगा। इसलिए जब भी ऐसा व्यक्ति किसी पर प्रयोग करता है, तो हरकारा — या कहें डाकिया, यानी किसी की पूरी जानकारी तुरंत पहुँचाना, बताना, ये सब बातें — इन्हीं शक्तियों के माध्यम से होता है। और जब चौकी चलाई जाती है, तो यह चीज़ वहाँ कहीं न कहीं अवश्य मौजूद होती है, चाहे खुले रूप में हो या लपेटकर गुप्त रूप से दी गई हो, ऐसे रूप में जिसका आपको पता भी न हो।
शत्रु को कैसे पता चलता है कि आप किससे डरते हैं?
आपके डर की खबर पहुँचाई जाती है और उसे मोहरा बनाया जाता है
वक्ता कहते हैं कि आप यहाँ जिन चीज़ों से डरते हैं, वह सारी जानकारी उधर जाती है; जिसने प्रयोग किया है, उसी तक पहुँचाई जाती है कि यह व्यक्ति उस व्यक्ति से डर रहा है, इसे इस चीज़ का भय है। और उसी चीज़ को मोहरा बनाकर वे आपके जीवन में उन बातों को बहुत बढ़ा देते हैं।
वे कहते हैं कि आप जिस चीज़ से भी डरते हैं, वह सारी जानकारी जाती है; जिसने प्रयोग किया है, उसी तक पहुँचाई जाती है — कि यह आदमी उस व्यक्ति से डर रहा है, इसे इस खास चीज़ का भय है। उसी चीज़ को मोहरा बनाकर वे उसे आपके जीवन में बढ़ा देते हैं। फिर सबसे बड़ी उलझन यह होती है कि आप मानसिक रूप से इतने कमज़ोर हो जाते हैं कि घर के सामने एक बाल भी गिरा मिले तो उसमें तंत्र प्रयोग देखते हैं; धागा गिरा, सुई गिरी, और आपको तंत्र प्रयोग दिखता है। कोई कपड़ा, या आपकी अपनी लापरवाही — कोई पूजा पाठ कर रहा है, हाथ से दीपक गिर जाता है, थोड़ी आग लग जाए या कुछ भी हो जाए, तो आप हर चीज़ को तंत्र से जोड़ने लगते हैं। वे कहते हैं कि यह कहीं न कहीं तंत्र से आपकी बुद्धि कुंठित होने का परिणाम है, बुद्धि के स्तंभित होने का परिणाम है।
षट्कर्म का प्रयोग किस क्रम में एक घर को नष्ट करता है?
पहले विद्वेषण, फिर कुल शक्ति और पितरों का अपमान
वक्ता कहते हैं कि केवल भगवती बगलामुखी ही बुद्धि का स्तंभन नहीं करतीं। जब तंत्र में कोई शत्रु आप पर षट्कर्म का प्रयोग करता है, तो सबसे पहले आपस में विद्वेषण, परिवार में विद्वेषण आता है — पहले झगड़े होंगे। झगड़े शुरू होंगे तो आप पूजा पाठ छोड़ देंगे; गुस्से और झगड़े में आप एक-दूसरे का अपमान करेंगे, और कुल शक्तियाँ नाराज़ होने लगेंगी। धीरे-धीरे आप पितरों का भी अपमान करेंगे, और गुस्से में अपने पूर्वजों को कठोर शब्द कहेंगे।
वे कहते हैं कि केवल भगवती बगलामुखी ही बुद्धि का स्तंभन नहीं करतीं। जब तंत्र में कोई शत्रु आप पर षट्कर्म के प्रयोग करता है, तो सबसे पहले आपस में विद्वेषण, परिवार में विद्वेषण आता है — यह वे पहले भी बता चुके हैं। पहले झगड़े होंगे। झगड़ा शुरू होगा तो आप पूजा पाठ छोड़ देंगे। झगड़े और गुस्से में आकर आप एक-दूसरे का अपमान करेंगे, और कुल शक्तियाँ नाराज़ होने लगेंगी। धीरे-धीरे आप पितरों का भी अपमान करेंगे; गुस्से में अपने पूर्वजों को कठोर शब्द कहेंगे — कि उन्होंने क्या किया, क्या दिया। आप देवताओं की पूजा छोड़ देंगे, या आधे मन से करेंगे, यह कहते हुए: मैं इतने समय से पूजा कर रहा हूँ, आपने मुझे क्या दिया? मैं आपके लिए इतना अनुष्ठान करता हूँ, आप क्या देते हैं?
घर के देवी-देवता नाराज़ होने के बाद शत्रु किसके मन पर हमला करता है?
घर के मुख्य पूजा करने वाले का उच्चाटन
जब आपके द्वारा आपके कुल देवी देवता का अपमान हो चुका होता है और आपके और उनके बीच श्रद्धा की कमी आ जाती है, तो शत्रु ठीक उसी दरार का फायदा उठाकर अपना मुख्य प्रयोग करता है। पहले विद्वेषण, उसके बाद बाकी सब, और फिर घर के मुख्य व्यक्ति — जो सबसे ज़्यादा पूजा पाठ करता है, जिसके कारण घर के देवी-देवता प्रसन्न रहते हैं — उसके मन का उच्चाटन किया जाता है।
वे कहते हैं कि इस तरह दोष लगता है, और उसके बाद शत्रु अपना मुख्य प्रयोग करता है। इसमें, क्योंकि आपके द्वारा आपके कुल देवी देवता का अपमान हो चुका है, आपके और उनके बीच श्रद्धा की कमी आ गई है, और शत्रु ठीक इसी का फायदा उठाता है। पहले विद्वेषण, उसके बाद बाकी सब; और फिर घर का मुख्य व्यक्ति — जो सबसे ज़्यादा पूजा पाठ करता है, जिसके कारण घर के देवी देवता प्रसन्न रहते हैं — उसके मन का उच्चाटन किया जाता है।
जब घर की सबसे कमज़ोर कड़ी आपकी पूजा का मज़ाक उड़ाने लगे तो क्या होता है?
परिवार के किसी सदस्य के मुँह से बुलवाए गए नकारात्मक शब्द
यदि शत्रु देखता है कि मुख्य पूजा करने वाला हार नहीं मान रहा, तो घर की सबसे कमज़ोर कड़ी का इस्तेमाल होता है — जो पूजा पाठ का विरोध करता है, जो आपके पूजा करने पर आपका मज़ाक उड़ाता है, और जो बार-बार कहता है: तुम इतना पूजा पाठ करते हो, जीवन में क्या पा लिया? वक्ता कहते हैं कि जब ऐसा व्यक्ति ऐसे बोले, तो समझ लें कि यदि आपका घर तंत्र से प्रभावित है, तो वह अपने आप नहीं बोल रहा, बल्कि तंत्र के द्वारा उससे बुलवाया जा रहा है।
यदि मुख्य पूजा करने वाले के मन का उच्चाटन काफी न हो — यदि शत्रु देखे कि यह व्यक्ति हार नहीं मान रहा — तो घर में जो सबसे कमज़ोर कड़ी है उसका इस्तेमाल होता है: जो पूजा पाठ का विरोध करता है, जो आपके पूजा करने पर आपका मज़ाक उड़ाता है। ऐसा व्यक्ति बार-बार कहेगा: तुम इतना पूजा पाठ करते हो, जीवन में क्या पा लिया? जब सामने वाला इस तरह बोले, तो समझ लें कि यदि आपका परिवार और घर तंत्र से प्रभावित है, तो वह व्यक्ति अपने आप नहीं बोल रहा; तंत्र के द्वारा उससे बुलवाया जा रहा है। वे कहते हैं कि कहीं न कहीं ऐसी विद्याएँ होती हैं जो मन में ऐसी चीज़ भेजती हैं, ऐसे विचार प्रोजेक्ट करती हैं, ताकि सामने वाला नकारात्मक बोले। और जब कोई प्रिय व्यक्ति, आपके अपने घर का सदस्य, ऐसे बोलता है, तो यह आपको चोट पहुँचाता है।
अंत में एक हमला किसी व्यक्ति की आस्था को कैसे कम करता है?
पैसा, अहंकार, और एक जगह न टिक पाना
वक्ता कहते हैं कि जब बार-बार चोट लगती है, तो आप अपना पूजा पाठ कम कर देंगे, क्योंकि आपको लगेगा कि आय का कोई साधन नहीं है, या है भी तो सारा पैसा पूजा में जा रहा है — कि आप हज़ारों-हज़ारों खर्च कर रहे हैं, इतनी महँगी सामग्री खरीद रहे हैं, पूजा में सबसे अच्छी क्वालिटी का घी दे रहे हैं। यह आपके अहंकार पर भी चोट करता है, और फिर आप पूजा छोड़ने लगते हैं, या आपकी श्रद्धा में कमी आ जाती है।
जब बार-बार चोट लगेगी तो आप अपना पूजा पाठ कम कर देंगे, क्योंकि आपको लगेगा कि आय का कोई साधन नहीं है, या जहाँ है भी वहाँ आपकी सारी आय पूजा में जा रही है: मैं हज़ारों-हज़ारों लगा रहा हूँ, इतनी महँगी सामग्री लाता हूँ, पूजा में सबसे अच्छी क्वालिटी का घी देता हूँ। वे कहते हैं कि यह आपके अहंकार पर भी चोट करेगा, और ऐसी बातें तब तक होती हैं जब तक आप पूजा छोड़ने न लगें, या आपकी श्रद्धा में कमी न आ जाए। इस सब के बाद ही घर के देवी देवता उस व्यक्ति का साथ देना बंद करने लगते हैं। और वे कहते हैं कि इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि आप कभी एक जगह टिक नहीं पाएँगे — न एक देवी देवता पर, न एक मंत्र पर, न एक गुरु पर, न एक तीर्थ धाम पर। किसी एक जगह आप रुक नहीं पाएँगे।
भटकाव का अंत क्यों होना चाहिए?
वह भटकाव जिसे तंत्र-पीड़ित व्यक्ति रोक नहीं पाता
वक्ता कहते हैं कि जब तक उस परम शक्ति की कृपा आप पर नहीं आती, तब तक आप बहुत भटक चुके होंगे — और वह भटकाव खत्म नहीं होगा। भटकाव का खत्म होना बहुत ज़रूरी है, जो तंत्र-पीड़ित व्यक्ति जल्दी नहीं कर पाता। ऐसे व्यक्ति को समझाया भी नहीं जा सकता; उसके सामने कितना भी बड़ा सिद्ध हो, प्यार से बोले या गाली से, प्रभाव आपको वहाँ से हटा देगा — और यदि आप नहीं हटे, तो आपके अपने परिवार के द्वारा हटाए जाएँगे।
वे कहते हैं कि तंत्र की सबसे बड़ी बात यह है कि जब तक उस परम शक्ति की कृपा आप पर नहीं पड़ती, तब तक आप बहुत भटक चुके होंगे, और वह भटकाव खत्म नहीं होगा। उस भटकाव का खत्म होना बहुत ज़रूरी है, और तंत्र-पीड़ित व्यक्ति उसे जल्दी खत्म नहीं कर पाता। ऐसे व्यक्ति को समझाया भी नहीं जा सकता; उसके सामने कितना भी बड़ा सिद्ध हो, प्यार से बोले या गाली से, प्रभाव आपको वहाँ से हटा देगा। यदि आप खुद नहीं हटेंगे, तो आपके अपने परिवार के द्वारा हटाए जाएँगे। दूसरे लोगों के द्वारा आपके बारे में ऐसी बातें की जाएँगी कि आप नकारात्मक होकर हट जाएँगे — और यह रहस्य, यह षड्यंत्र, आप कभी नहीं समझ पाएँगे। जब तक समझेंगे, बहुत देर हो चुकी होगी।
तंत्र-पीड़ित लोग साधकों और गुरुओं से झगड़ा क्यों कर बैठते हैं?
शत्रु मनोवैज्ञानिक रूप से खेलता है
वक्ता कहते हैं कि जब तक आप समझेंगे, तब तक आप दो-चार तांत्रिकों से, गुरुओं से, किसी से झगड़ा कर चुके होंगे; आपका भला चाहने वाले किसी भगतवाल साधक से झगड़ चुके होंगे; किसी को ढोंगी, ठग, कुछ भी कह चुके होंगे। सच यह है कि आप ऐसा करना भी नहीं चाहते थे — पर वे दोहराते हैं कि शत्रु पक्ष, जो क्षुद्र विद्याओं से दूसरों को कष्ट देता है, मन से खेलना जानता है, और आपके साथ मनोवैज्ञानिक रूप से, बहुत सही ढंग से खेलता है।
वे कहते हैं कि जब तक आप षड्यंत्र समझेंगे, तब तक आप दो-चार तांत्रिकों से, गुरुओं से, किसी से झगड़ा कर चुके होंगे; आपका भला चाहने वाले किसी भगतवाल साधक से झगड़ा मोल ले चुके होंगे; किसी को पाखंडी, ठग, कुछ भी कह चुके होंगे। वे कहते हैं कि सच यह है कि आप भी ऐसा नहीं करना चाहते थे — पर शत्रु पक्ष, जो क्षुद्र विद्याओं से दूसरों को कष्ट देता है, मन से खेलना जानता है। वह आपके साथ मनोवैज्ञानिक रूप से, बहुत सही ढंग से खेलता है, और उसे अच्छी तरह पता होता है कि कमज़ोर कड़ी कहाँ है। और वे कहते हैं कि ये आम बातें होंगी: लाइव सुन रहे जिस किसी के घर में ऐसी चीज़ें हैं, उसे ये आम लगेंगी। ठीक इसी तरह होता है।
क्या कोई व्यक्ति तंत्र की समस्या का सौ प्रतिशत समाधान दे सकता है?
सच बताना एक विद्या है; समाधान करना दूसरी
वक्ता कहते हैं कि आप कितना भी कर लें, कोई जादू की छड़ी नहीं घुमाने वाला। किसी के बारे में सौ प्रतिशत सच बताना एक विद्या है — पर उस समस्या का समाधान करना, सौ प्रतिशत निराकरण करना, लिखकर रख लीजिए: वह किसी व्यक्ति के हाथ में बिल्कुल नहीं है। केवल महाशक्ति ही यह कर सकती है, और उनके लिए, उन्हें प्रसन्न करने के लिए, आप स्वयं अनुष्ठान कर सकते हैं या किसी और से करवा सकते हैं।
वे कहते हैं कि आप कितना भी कर लें, कोई जादू की छड़ी नहीं घुमाने वाला। किसी के बारे में सौ प्रतिशत सच बताना एक विद्या है। पर उस समस्या का समाधान करना, सौ प्रतिशत निराकरण करना — लिखकर रख लीजिए — किसी व्यक्ति के हाथ में बिल्कुल नहीं है। केवल महाशक्ति ही यह कर सकती है। और उस महाशक्ति के लिए, उन्हें प्रसन्न करने के लिए, आप स्वयं अनुष्ठान कर सकते हैं या किसी और से करवा सकते हैं। जब तक आपमें क्षमता नहीं है, जब तक आप उसे रोक नहीं सकते, किसी और से करवाएँ — पर धीरे-धीरे आपको भी वहाँ खड़ा होना पड़ेगा। तभी आप उससे हमेशा के लिए हटेंगे। वे कहते हैं कि इसी कारण चैनल पर इतनी साधनाएँ दी गई हैं।
तांत्रिकों के हाथों आर्थिक रूप से लुट चुके व्यक्ति को क्या करना चाहिए?
किसी को एक रुपया न दें; एकादशी से स्वयं बैठें
जो बहुत भटक चुके हैं, जो परेशान किए गए हैं, जिनका तांत्रिकों और साधकों ने आर्थिक शोषण किया है, जिन्हें लगता है कि उनसे इतना पैसा ले लिया गया और उन्होंने ज्योतिषियों और तांत्रिकों को हज़ारों और लाखों-लाखों दिए पर कोई कल्याण नहीं हुआ — उनसे वक्ता कहते हैं: आधा आना भी खर्च न करें, किसी को एक रुपया न दें। कल से स्वयं बैठें।
जो बहुत भटक चुके हैं और परेशान किए गए हैं, जिनका तांत्रिकों ने आर्थिक शोषण किया है, जिनका साधकों ने भी शोषण किया है, और जिनके मन में यह विचार उठ रहा है कि इतना पैसा ले लिया गया और उन्होंने ज्योतिषियों और तांत्रिकों को हज़ारों और लाखों-लाखों दिए पर कोई कल्याण नहीं हुआ — उनसे वे कहते हैं: आधा आना भी खर्च न करें, किसी को एक रुपया भी न दें। स्वयं बैठें। विचार कितना भी बड़ा हो, कल से। आपका मन डगमगाएगा, और मन में बार-बार बातें आएँगी — कि नहीं, मैं यह नहीं करना चाहता, मुझे यह नहीं करना चाहिए, इससे कुछ नहीं होने वाला। वे कहते हैं कि ध्यान रखें, जब भी यह विचार आए, ठीक यही बात मन में लाएँ: कि यह मैं नहीं बोल रहा; यह विचार मुझ पर कोई और थोप रहा है। और कल से नरसिंह कवच शुरू करें, और देवप्रबोधिनी तक करें।
चार महीने के पाठ के साथ कैसा आचरण रखना चाहिए?
ब्रह्मचर्य, असत्य से बचना, और कहीं और मोहित न होना
वक्ता कहते हैं कि और कुछ न भी हो, यदि इन चार महीनों में आप सही ढंग से चले, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए और कम से कम असत्य न बोलते हुए — वे मानते हैं कि सौ प्रतिशत सच बोलना संभव नहीं, जीवन ऐसा ही है और वे भी यह जानते हैं — पर कम से कम कोशिश करें कि असत्य न बोलना पड़े। गृहस्थ अवस्था में रहते हुए भी इस तरह चलकर, कुछ हद तक ब्रह्मचर्य का ठीक से पालन करके, नारायण की कृपा से इन चार महीनों के बाद आपके जीवन में ज़मीन-आसमान का अंतर होगा।
वे कहते हैं कि और कुछ न भी हो, यदि इन चार महीनों में आप सही ढंग से चले, ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन करते हुए और कम से कम असत्य न बोलते हुए — सौ प्रतिशत सच बोलना संभव नहीं, जीवन ऐसा ही है और वे भी यह जानते हैं, पर कम से कम कोशिश करें कि असत्य न बोलना पड़े। जब आप इस तरह चलेंगे, गृहस्थ अवस्था में रहते हुए भी, कुछ हद तक ब्रह्मचर्य का ठीक से पालन करते हुए, तो नारायण की कृपा से इन चार महीनों के बाद आपके जीवन में ज़मीन-आसमान का अंतर होगा। वे कहते हैं, इसमें दो राय नहीं। पर बीच में आपको कहीं और मोहित नहीं होना है। यही ध्यान रखना है: यहाँ से आप इसी पर अडिग होकर चलेंगे और हटेंगे नहीं। मुख्य रूप से इन्हीं को पकड़ें, और जो और परेशान करता है — पैसे की परेशानी, ऑफिस की परेशानी, व्यापार की परेशानी — उसे छोड़ दें, इन्हीं पर अडिग हो जाएँ।
जिनके गुरु शरीर छोड़ चुके हैं, वे गुरु पूर्णिमा पर क्या करें?
गुरु परंपरा के अपने विधान का पालन करें
गुरु पूर्णिमा पर आते हुए वक्ता कहते हैं कि जिन सबके अपने गुरु, अपने सद्गुरु हैं — यदि वे गुरु गुरु मंडल में, अपने धाम, अपने निज धाम जा चुके हैं — तो उनकी गुरु परंपरा में उनके लिए पूजन पाठ, हवन यज्ञ और दान पुण्य का जो भी नियम है, उसका पालन करें।
सावन की तैयारी से आगे बढ़कर गुरु पूर्णिमा पर आते हुए वे कहते हैं कि जिन सबके अपने गुरु, अपने सद्गुरु हैं, और जिनके गुरु गुरु मंडल में, अपने निज धाम जा चुके हैं, वे अपनी गुरु परंपरा में उनके लिए पूजन पाठ, हवन यज्ञ और दान पुण्य का जो भी नियम है, उसका पालन करें।
जिसने कभी गुरु दीक्षा नहीं ली, वह गुरु पूर्णिमा पर क्या करे?
सदाचारी वृद्ध पुजारी का सम्मान करें
जिन्होंने आज तक गुरु दीक्षा नहीं ली, उनके लिए वक्ता पिछली बार कही बात दोहराते हैं: सबसे अच्छा यह है कि नारायण मंदिर, भगवती मंदिर या शिव मंदिर के किसी वृद्ध पुजारी को खोजें — चाहे उन्हें चारों वेदों का ज्ञान हो या एक का भी नहीं, बस वे वृद्ध हों, सदाचारी हों, या त्रिकाल गायत्री करने वाले पुजारी हों — और उस दिन श्रद्धा भाव से उन्हें यथाशक्ति दान पुण्य और दक्षिणा दें, और प्राणायाम करें। गुरु की विशेष कृपा प्राप्त होगी।
जिन्होंने आज तक गुरु दीक्षा नहीं ली, उनके लिए वे पिछली बार दिया गया निर्देश दोहराते हैं। सबसे अच्छा यह है कि नारायण मंदिर, या भगवती मंदिर, या शिव मंदिर के कोई वृद्ध पुजारी — चाहे उन्हें चारों वेदों का ज्ञान हो या एक भी वेद का नहीं, बस वे वृद्ध और सदाचारी हों, या कोई त्रिकाल गायत्री करने वाले पुजारी हों — खोजे जाएँ। उस दिन श्रद्धा भाव से उन्हें यथाशक्ति दान पुण्य और दक्षिणा दें, और प्राणायाम करें। गुरु की विशेष कृपा प्राप्त होगी।
जो भौतिक गुरु चाहते हैं, उनके लिए दोनों चैनलों पर चार-पाँच गुरु प्राप्ति साधनाएँ पहले से दी गई हैं
दोनों चैनलों पर दी गई गुरु प्राप्ति साधनाएँ
वक्ता कहते हैं कि तीसरा कार्य उनके लिए है जो भौतिक रूप से गुरु प्राप्त करना चाहते हैं: इसके लिए चार से पाँच साधनाएँ इसी चैनल पर और सिद्ध साबरी विद्या चैनल पर दी गई हैं। उनमें से कोई एक अनुष्ठान उस दिन से, उसमें जितने दिन बताए गए हैं उतने दिनों के लिए, शुरू किया जा सकता है।
वे कहते हैं कि तीसरा कार्य उनके लिए है जो भौतिक रूप से गुरु प्राप्ति चाहते हैं: इसके लिए चार से पाँच साधनाएँ इसी चैनल पर और सिद्ध साबरी विद्या चैनल पर बताई गई हैं। उनमें से कोई एक अनुष्ठान उस दिन, उसमें जितने दिन बताए गए हैं उतने दिनों के लिए, शुरू किया जा सकता है। गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरु के लिए — जिन्हें आप मानसिक रूप से गुरु मानते हैं वे भी इसमें शामिल हैं — अपनी क्षमता के भीतर जो भी भक्ति हो, अर्पित करें। यदि उनसे मिल सकते हैं तो मिलें और आशीर्वाद लें; यदि दूर से श्रद्धा के फूल अर्पित करना चाहते हैं, तो उनके निमित्त जो कर सकें करें, जैसे किसी मंदिर में दान पुण्य। वे कहते हैं कि जहाँ तक हो सके, अपने हाथों से सेवा करें। इतना करना चाहिए।
क्या सावन में शिव पर दूध चढ़ाना ज़रूरी है?
सामर्थ्य हो तो गाय का दूध, न हो तो जल
सावन पर आते हुए वक्ता कहते हैं कि दूध को लेकर हज़ारों प्रश्न होते हैं — क्या दूध चढ़ाना ज़रूरी है, क्या उसके बिना शिव प्रसन्न नहीं होंगे? पहली बात: यदि आपका सामर्थ्य है तो गाय के दूध से शिव का अभिषेक करें। सामर्थ्य नहीं है तो न करें; कोई दिक्कत नहीं, जल से अभिषेक करें।
अब वे इस पर आते हैं कि श्रावण मास में क्या करना चाहिए। वे कहते हैं कि गृहस्थ अवस्था में रहने वाले व्यक्ति के श्रावण में पहले हज़ार प्रश्न शिव पर दूध को लेकर होते हैं। क्या दूध चढ़ाना ज़रूरी है? दूध न चढ़ाएँ तो क्या शिव प्रसन्न नहीं होंगे? पहली बात: यदि आपका सामर्थ्य है तो गाय के दूध से शिव का अभिषेक करें। सामर्थ्य नहीं है तो न करें — कोई दिक्कत नहीं; जल से अभिषेक करें।
सावन में जलाभिषेक क्यों ज़रूरी है?
विषपान के बाद महादेव को शीतल करना
वक्ता कहते हैं कि जलाभिषेक इसलिए ज़रूरी है कि पुराणों में वर्णन है कि यही वह समय था जब भगवान महारुद्र, महाशिव ने विष पिया था, और उसकी गर्मी से उनके शरीर में ऐसी अग्नि उठी कि उन्हें शीतल रखने के लिए, शीतल करने के लिए, पूरे श्रावण मास विभिन्न देवताओं और भगवती ने अभिषेक किया, जिससे उनका विष शांत हुआ, उनका शरीर सौम्य रूप में आया, और वे सृष्टि का कल्याण कर सके।
जलाभिषेक क्यों ज़रूरी है? वे कहते हैं, क्योंकि पुराणों में वर्णन है कि यही वह समय था जब भगवान महारुद्र, महाशिव ने विषपान किया था, और उसकी गर्मी से उनके शरीर में इतनी अग्नि उठी कि उन्हें शीतल रखने के लिए, शीतल करने के लिए, पूरे श्रावण मास विभिन्न देवताओं और भगवती ने अभिषेक किया। इससे उनका विष शांत हुआ, उनका शरीर सौम्य रूप में आया, और उन्होंने सृष्टि का कल्याण किया। वे कहते हैं कि जब उन्होंने पूरी सृष्टि को बचाया, तो सृष्टि का भी कर्तव्य है कि हम उस पिता, उस परम पिता का बार-बार सम्मान करें, और बार-बार उनकी सेवा पूजा करें। इसी तरह सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
दूध को पीने के बजाय शिव को क्यों चढ़ाना चाहिए?
बरसात के तीन महीनों में दूध विषैला हो जाता है
वक्ता कहते हैं कि इसका बहुत अच्छा कारण बताया गया है: आषाढ़, श्रावण और भादों के तीन महीनों में जिन गायों और ऐसे सब पशुओं का दूध आप पीते हैं, वे घास चरते हैं, और इन महीनों में बारिश के कारण ज़हरीले पौधे भी उगते हैं, जिन्हें खाने से इन सब जीवों का दूध ज़हरीला, विषैला हो जाता है और शरीर पर गलत प्रभाव देता है। इसीलिए इन तीन महीनों में दूध से बने सभी खाद्य पदार्थ खाना भी मना है — दही नहीं खाना, दूध से बनी दूसरी चीज़ें इस समय नहीं लेनी।
वे कहते हैं कि यहाँ बहुत अच्छा कारण दिया गया है। आषाढ़, श्रावण और भादों के तीन महीनों में जिन गायों और ऐसे सब पशुओं का दूध आप पीते हैं, वे घास चरते हैं; इन महीनों में बारिश के कारण ज़हरीले पौधे भी उगते हैं, और उन्हें खाने से इन सब जीवों का दूध ज़हरीला, विषैला हो जाता है और शरीर पर गलत प्रभाव देता है। इसीलिए इन तीन महीनों में दूध से बने सभी खाद्य पदार्थ खाना भी मना है — दही नहीं खाना, और दूध से बनी दूसरी चीज़ें इस अवधि में, इस समय नहीं लेनी। तो उसका क्या करें? इस समय कहा गया है: शिवार्पणम्, उसे शिव को अर्पित करें। विष को केवल शिव ही स्वीकार करते हैं, तो उन्हीं को अर्पित करें। यह भी यहाँ दिए गए कारणों में से एक है; इसलिए यथाशक्ति शिव पर गाय के दूध का अभिषेक करें।
क्या शिव पर चढ़ाया दूध गरीबों को दिया जा सकता है?
वक्ता चढ़ाया हुआ दूध बाँटने के फैशन को नकारते हैं
अगला प्रश्न यह है कि क्या शिव पर चढ़ाया दूध किसी को दिया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि आजकल एक फैशन चल पड़ा है यह दिखाने का कि दूध चढ़ाकर गरीबों में बाँटना चाहिए। उनके मत में यह बात सही नहीं है, और आपको ऐसा नहीं करना चाहिए।
अगला प्रश्न जो उठता है वह यह है कि क्या शिव पर चढ़ाया दूध किसी को दिया जा सकता है। वे कहते हैं कि आजकल यह दिखाया जा रहा है — खास तौर पर एक फैशन चल पड़ा है — कि दूध चढ़ाकर गरीबों में बाँटना चाहिए। उनके मत में यह सही नहीं है, और आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं कि पहले शिवालय भूमि की शुद्धि के लिए, भूमि शोधन के लिए प्रयोग होता था — यद्यपि आजकल शिवालय कहीं भी बनाया जा रहा है। शिव पर चढ़ाया दूध धरती में जाता था, जिससे कहीं न कहीं भूमि की शुद्धि होती थी।
शिवलिंग के लिए अर्थिंग का उदाहरण क्या है?
शिव धनात्मक और भगवती ऋणात्मक धरती के रूप में
वक्ता कहते हैं कि विज्ञान कितना भी आगे बढ़ गया हो, बिजली से चलने वाली जो भी मशीन आप प्रयोग करते हैं, उसे ग्राउंड, अर्थिंग चाहिए; अर्थिंग के बिना वह नहीं चल सकती — उसे वह ऋणात्मक शक्ति चाहिए, और सूखेपन में ऋणात्मक शक्ति जल्दी नहीं मिलती। उस क्षेत्र के इंजीनियर जानते हैं कि अर्थिंग वाली जगह का वातावरण गीला रखा जाता है ताकि करंट के प्रवाह में जल्दी कोई रुकावट न आए। ठीक उसी तरह भगवान सदाशिव के शिवलिंग को प्रतीक रूप में धनात्मक और भगवती को ऋणात्मक माना जाता है।
वे दो-तीन उदाहरण देते हैं। आज विज्ञान कितना भी आगे बढ़ गया हो, बिजली से चलने वाली जो भी मशीन आप प्रयोग करते हैं, उसे ग्राउंड, अर्थिंग अवश्य चाहिए; अर्थिंग के बिना वह नहीं चल सकती, यानी उसे वह ऋणात्मक शक्ति चाहिए, और सूखेपन में ऋणात्मक शक्ति जल्दी नहीं मिलती। वे एक छोटा उदाहरण, उसका एक अंश देते हैं: जो इस क्षेत्र में इंजीनियर हैं वे जानते हैं कि जिस जगह से अर्थिंग ली जाती है, वहाँ वातावरण को गीला रखने का प्रयास किया जाता है ताकि करंट के प्रवाह में जल्दी कोई रुकावट न आए। ठीक उसी तरह, भगवान सदाशिव के शिवलिंग को प्रतीक रूप में धनात्मक, और भगवती को ऋणात्मक माना जाता है। वे कहते हैं कि सभी श्रोता जानते होंगे कि भगवती, धरती, को ऋणात्मक रूप और शिव को धनात्मक रूप माना जाता है; और इन दोनों से एक ग्रह का जन्म हुआ जिन्हें हम मंगल के नाम से जानते हैं।
धरणीगर्भसम्भूतं का क्या अर्थ है?
धरती के गर्भ से जन्मे मंगल, जिनके पिता सदाशिव हैं
वक्ता कहते हैं कि जब हम पौराणिक मंत्र पढ़ते हैं, तो उसमें धरणीगर्भसम्भूतं पढ़ते हैं। धरणी गर्भ का अर्थ क्या है? जिनका जन्म धरती के गर्भ से हुआ, वे मंगल ग्रह हैं, जिनके पिता सदाशिव हैं। तो सदाशिव धनात्मक हैं और भगवती नीचे ऋणात्मक रूप में, ऋणात्मक शक्ति के रूप में उपस्थित हैं, जिन पर शिव स्थित हैं।
वे कहते हैं कि जब हम पौराणिक मंत्र पढ़ते हैं, तो उसमें धरणीगर्भसम्भूतं पढ़ते हैं। धरणी गर्भ का अर्थ क्या है? जिनका जन्म धरती के गर्भ से हुआ — वे मंगल ग्रह हैं, जिनके पिता सदाशिव हैं। तो सदाशिव धनात्मक हैं, और भगवती नीचे ऋणात्मक रूप में, ऋणात्मक शक्ति के रूप में उपस्थित हैं, जिन पर शिव स्थित हैं। वे कहते हैं कि इसीलिए जब शिव की स्थापना होती है, तो वहाँ ऐसी चीज़ों का प्रयोग होता है कि जगह सूखी न रहे, नम रहे।
शिवाभिषेक में धरती में जाने वाले जल का क्या प्रभाव है?
पिंड की शक्ति और नकारात्मक शक्तियों का बंधन
वक्ता कहते हैं कि इसे एक माप के रूप में माना गया है कि शिवाभिषेक से जितना जल धरती में जाता है, उतनी मात्रा में धरती का भीतरी भाग तरल रहता है, जिससे उस पिंड की — एक तरह से शिवलिंग की — शक्ति काफी बढ़ी हुई रहती है।
वे कहते हैं कि इसे एक माप माना गया है कि शिवाभिषेक से जितना जल धरती में जाता है, उतना धरती का भीतरी भाग तरल रहता है, जिससे उस पिंड की शक्ति — एक तरह से शिवलिंग की शक्ति — काफी बढ़ी हुई रहती है। इतना ही नहीं: धरती में, पाताल में जाने वाले दूध के कारण, जो भी नकारात्मक शक्तियाँ हैं वे उस क्षेत्र को कभी छोड़ नहीं सकतीं। यानी महादेव के क्षेत्र में, उस स्थान के अधिष्ठाता के क्षेत्र में — सौ धनुष से लेकर हज़ार धनुष तक का माप माना गया है — उतने क्षेत्र में वे शक्तियाँ सौम्य और शांत रूप में रहेंगी। वे कहते हैं कि यह भी एक कारण है कि हम जानते हैं कि शिव गण सदाशिव के शिवलिंग के पास ही स्थित रहते हैं। इस तरह अलग-अलग ढंग से कितने ही कारण बनते हैं; और जब आप यह जान लेंगे, तो कोई आपत्ति नहीं उठाएँगे।
शिवलिंग पर चढ़ाई गई चीज़ पर किसका अधिकार होता है?
चंड का अधिकार, और बाणलिंग का अपवाद
एक बार शिवलिंग पर कुछ चढ़ा दिया, तो उस पर किसी मनुष्य का अधिकार नहीं रहता — केवल भगवान शिव के एक गण चंड का उस पर अधिकार होता है। तो जब आप फल चढ़ाते हैं, उस पर चंड का अधिकार हो जाता है; पर जब दूध चढ़ाते हैं तो जाकर किसी को भी पीने को दे देते हैं। ऐसा क्यों? वक्ता कहते हैं कि यह दोष लगने वाली बात है, इसलिए नहीं देना चाहिए। बाणलिंग, यानी नर्मदेश्वर, में माना जाता है कि उस पर चढ़ाया हुआ किसी को दिया जा सकता है — यद्यपि इसमें भी मतभेद हैं, और उनके मत में नहीं देना चाहिए।
वे कहते हैं कि यदि शिवलिंग पर कुछ भी चढ़ा दिया गया, तो उस पर किसी मनुष्य का अधिकार नहीं रहता — केवल भगवान शिव के एक गण चंड का अधिकार होता है। तो जब आप फल चढ़ाते हैं, उस पर चंड का अधिकार हो जाता है; पर जब दूध चढ़ाते हैं तो किसी को भी पीने को दे देते हैं। ऐसा क्यों? यह दोष लगने वाली बात है, इसलिए नहीं देना चाहिए। बाणलिंग में — यानी नर्मदेश्वर में — माना जाता है कि उस पर जो चढ़ाएँ वह किसी को दिया जा सकता है। वे कहते हैं कि इसमें भी कुछ जगह मतभेद हैं; उनके अपने मत में इसे कहीं भी नहीं देना चाहिए। जब उन्हें अर्पित कर दिया, तो कर दिया। शिव ही आपको इतना सामर्थ्य दे रहे हैं; उसी से आप उनका उन्हीं को अर्पित करते हैं।
यदि कोई गरीबों की सेवा दूध से ही करना चाहे, तो कौन-सा दूध दे?
चरने वाली गाय का नहीं, शुद्ध किया हुआ दूध दें
वक्ता कहते हैं कि यदि आपकी इच्छा गरीबों की सेवा करने की है, कि आप नर में नारायण देखेंगे, और आपका सामर्थ्य है, तो कम से कम विषैली चीज़ न दें। आजकल शुद्ध किया हुआ दूध मिलता है; यदि इतना सामर्थ्य है तो गरीबों को वैसा दूध दें। पर यदि चरने जाने वाली गाय को चरकर लौटने के बाद दुहकर वह दूध गरीबों को देंगे, तो उनका नुकसान होगा — आप नर नारायण सेवा नहीं कर रहे, बल्कि कहीं न कहीं उन्हें कष्ट दे रहे हैं।
वे कहते हैं कि यदि आपकी इच्छा गरीबों की सेवा करने की है — कि आप नर में नारायण देखेंगे — और आपका सामर्थ्य है, तो कम से कम विषैली चीज़ न दें। आजकल शुद्ध किया हुआ दूध मिलता है; गरीबों को वैसा दूध दें। यदि इतना सामर्थ्य है तो उस तरह दें। पर यदि गाय चरने जाती है, और चरकर लौटने के बाद आप उसे दुहकर वह दूध गरीबों को देते हैं, तो उनका नुकसान होगा; आप नर नारायण सेवा नहीं कर रहे बल्कि कहीं न कहीं उन्हें कष्ट दे रहे हैं। वे कहते हैं, इससे बचें। देना ही चाहते हैं तो उन्हें कुछ और दें।
सावन में कौन-से मंत्र करने चाहिए, और स्त्रियों के लिए क्या बदलता है?
दीक्षित और अदीक्षित का जप, और प्रणव का नियम
वक्ता कहते हैं कि जो गृहस्थ दीक्षित हैं, वे अपने गुरुजी से मिले मंत्रों की साधना करें; पंचाक्षरी के बारे में वे पिछले लाइव में बता चुके हैं। यदि दीक्षा नहीं मिली, तो पुरुष प्रणव के बिना जप करें। स्त्रियाँ नमः बाद में लगाएँ, पहले लगाकर जप न करें, और प्रणव का उच्चारण न करें।
गृहस्थ को सावन में किस ज्योतिर्लिंग की पूजा करनी चाहिए?
बारह में से सबसे नज़दीकी, नाम मंत्र से
पिछले वर्ष के श्रावण में बताई एक साधना दोहराते हुए वक्ता कहते हैं कि बारह ज्योतिर्लिंग हैं, और उन बारह में से जो ज्योतिर्लिंग क्षेत्र आपके घर के सबसे नज़दीक पड़ता है, उसके नाम से पूजा करें। जैसे, यदि आप गुजरात क्षेत्र में हैं, तो सोमनाथ महादेव का मंदिर सौराष्ट्र में है; सोमनाथ को पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है, तो घर पर उनके नाम से अभिषेक करें।
वे कहते हैं कि पिछले वर्ष के श्रावण लाइव में यह बहुत अच्छे से बताया गया था, और वे वही साधना दोहराएँगे क्योंकि इससे बहुत लाभ होते हैं। बारह ज्योतिर्लिंग हैं, और उन बारह में से जो ज्योतिर्लिंग क्षेत्र आपके घर के सबसे नज़दीक पड़ता है, उसके नाम से पूजा करें। जैसे, यदि आप गुजरात क्षेत्र में हैं, तो सोमनाथ महादेव का मंदिर सौराष्ट्र में है; सोमनाथ को पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है, तो घर पर उनके नाम से अभिषेक करें — सोमनाथाय नमः से, यथाशक्ति, चाहे चाँदी का एक छोटा-सा चम्मच लाकर रोज़ गाय के दूध के एक सौ आठ चम्मच से उनका अभिषेक करें। बस इतना करें।
घर पर रोज़ के अभिषेक के साथ कौन-सा संकल्प लें?
आपका जो भी संकल्प हो, दूध अर्पित करते हुए लें
वक्ता कहते हैं कि आपका जो भी संकल्प हो वह लें — रोग नाश के लिए लेना चाहें तो वह लें; कोई और संकल्प हो तो वह लें — और उसी संकल्प के साथ दूध अर्पित करें। बाहर नहीं जाना चाहते तो घर पर कर सकते हैं; जिन साधकों ने घर में शिवलिंग स्थापित किया है वे उस पर अभिषेक कर सकते हैं, या मंदिर जा सकते हैं।
वे कहते हैं कि आपका जो भी संकल्प हो वह लें: रोग नाश के लिए लेना चाहें तो वह लें; कोई और संकल्प हो तो वह लें। और उसी संकल्प के साथ उन्हें दूध अर्पित करें। बाहर नहीं जाना चाहते तो घर पर कर सकते हैं। जिन साधकों ने अपने घर में शिवलिंग स्थापित किया है, वे उस पर अभिषेक कर सकते हैं, या मंदिर जाकर कर सकते हैं। तो जो ज्योतिर्लिंग क्षेत्र आपके घर के पास पड़ता है, उसका अभिषेक इस तरह करना चाहिए। या यदि किसी सिद्ध पीठ का ज्योतिर्लिंग है, तो उसका भी अभिषेक होता है — जैसे विंध्य क्षेत्र में, वे कहते हैं, हम विंध्येश्वर महादेव का दूध आदि से शिवाभिषेक करते हैं।
जीवन में कोई विशेष काम अटका हो तो क्या करना चाहिए?
सबसे नज़दीकी ज्योतिर्लिंग के नाम मंत्र का सवा लाख जप
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई ऐसा काम है जिसके बिना आपका जीवन आगे नहीं बढ़ सकता — किसी का विवाह अटका है, किसी की नौकरी या व्यापार से जुड़ी समस्या है — तो जो क्षेत्र आपके सबसे नज़दीक पड़ता है, उसके नाम मंत्र का कम से कम सवा लाख जप, यथाशक्ति, करें। जैसे, यदि आप काशी क्षेत्र में रहते हैं, या भगवान विश्वनाथ का क्षेत्र सबसे नज़दीक पड़ता है, तो विश्वनाथाय नमः मंत्र — दीक्षित हों या जनेऊ पहनते हों तो प्रणव सहित, और नहीं तो कोई दिक्कत नहीं, केवल उनके नाम के साथ नमः लगाकर — रुद्राक्ष की माला से सवा लाख करें।
अब उनके लिए जो विशेष रूप से कृपा पाना चाहते हैं: कोई ऐसा काम जिसके बिना आपका जीवन आगे नहीं बढ़ सकता, कोई विशेष काम — किसी का विवाह अटका है, किसी की नौकरी या व्यापार से जुड़ी समस्या है। तब आप जिस भी क्षेत्र में हों, जो क्षेत्र आपके सबसे नज़दीक पड़ता है, उसके नाम मंत्र का कम से कम सवा लाख जप, यथाशक्ति, करें। जैसे, यदि आप काशी क्षेत्र के निवासी हैं, या भगवान विश्वनाथ का क्षेत्र सबसे नज़दीक पड़ता है, तो विश्वनाथाय नमः मंत्र — यदि आप दीक्षित हैं या आपका जनेऊ है तो प्रणव सहित, और नहीं तो कोई दिक्कत नहीं, केवल उनके नाम के साथ नमः लगाकर — रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला से सवा लाख करें।
यदि कोई माला पर जप गिनना न चाहे तो क्या करे?
प्रतिपदा से रक्षाबंधन तक रोज़ एक घंटा जप
वक्ता कहते हैं कि यदि आप माला से जप नहीं करना चाहते, तो बस पूरे श्रावण मास, प्रतिपदा से लेकर रक्षाबंधन के दिन तक, रोज़ एक घंटा जप करें। और यदि संभव हो, तो गुरु पूर्णिमा से श्रावण पूर्णिमा के दिन तक करें।
यदि आप माला से जप नहीं करना चाहते, तो बस पूरे श्रावण मास, प्रतिपदा से लेकर रक्षाबंधन के दिन तक, रोज़ एक घंटा जप करें। और वे कहते हैं, यदि संभव हो, तो गुरु पूर्णिमा से श्रावण पूर्णिमा के दिन तक करें।
जो विशेष सिद्धियाँ चाहते हैं, वे सावन में क्या करें?
बारहों ज्योतिर्लिंगों में से हर एक का बारह हज़ार जप
इसके अलावा, जो विशेष प्रकार की सिद्धियाँ चाहते हैं, जिनकी इच्छा किसी देव कृपा में, सिद्धि में है, उनके लिए वक्ता कहते हैं कि समय मिला तो वे पूरा विधि विधान अलग से समझाने का प्रयास करेंगे। संक्षेप में: बारह ज्योतिर्लिंग हैं, और पूरे श्रावण मास में हर ज्योतिर्लिंग के नाम का बारह हज़ार जप करें। वे कहते हैं कि यह अद्भुत लाभ देता है — आप सोच भी नहीं सकते कि कितना लाभ देता है।
इसके अलावा, जो लोग विशेष प्रकार की सिद्धियाँ चाहते हैं, जिनकी इच्छा किसी देव कृपा में, सिद्धि में, इन सब बातों में है, उनके लिए वे कहते हैं कि सबसे अच्छा उपाय वह है जिसे समय मिलने पर वे पूरे विधि विधान के साथ अलग से बनाने का प्रयास करेंगे। संक्षेप में वे इतना कहते हैं: बारह ज्योतिर्लिंग हैं, और पूरे श्रावण मास में उनमें से हर एक के नाम का बारह हज़ार जप करें। वे कहते हैं कि यह अद्भुत, अद्भुत लाभ देने वाली चीज़ थी; आप सोच नहीं सकते कि यह आपको कितना लाभ देती है। बारहों ज्योतिर्लिंगों की अलग-अलग महिमा है।
सोमनाथ की महिमा क्या है, और उनका जप किसके लिए है?
चंद्रमा का क्षय रोग और महामृत्युंजय
यदि शरीर में कई तरह के रोग हैं जिनसे छुटकारा नहीं मिल रहा, या घर में कोई पीड़ित है, तो भगवान सोमनाथ — जिनकी महिमा, वक्ता कहते हैं, आपको इससे पता चलेगी कि चंद्रमा को शाप मिलने पर क्या हुआ। चंद्रमा को क्षय रोग से ग्रस्त होने का शाप मिला; तब सौराष्ट्र क्षेत्र में भगवान चंद्रदेव ने वहाँ शिवलिंग स्थापित कर तपस्या की। महामृत्युंजय मंत्र उस समय कीलित माना गया था; मार्कंडेय मुनि वहाँ उपस्थित थे और उनके द्वारा कहा गया — फिर भी विशेष मंत्रों के द्वारा, जो तब तंत्रोक्त मंत्र हो जाता है, चंद्रदेव ने आराधना की, सदाशिव प्रकट हुए, और सदा के लिए उस ज्योतिर्लिंग में स्थित हो गए।
यदि शरीर में कई तरह के रोग हैं, जिनसे छुटकारा नहीं मिल रहा, या आपके घर-परिवार में कोई पीड़ित है, तो भगवान सोमनाथ — और उनकी महिमा, वे कहते हैं, आपको इससे पता चलेगी कि चंद्रमा को शाप मिलने पर क्या हुआ। चंद्रमा को क्षय रोग से ग्रस्त होने का शाप मिला। तब सौराष्ट्र क्षेत्र में भगवान चंद्रदेव ने वहाँ शिवलिंग स्थापित कर तपस्या की। महामृत्युंजय मंत्र उस समय कीलित माना गया था। मार्कंडेय मुनि वहाँ उपस्थित थे, और उनके द्वारा कहा गया — फिर भी विशेष मंत्रों के द्वारा, जो तब तंत्रोक्त मंत्र हो जाता है, जब चंद्रदेव ने आराधना की, तो सदाशिव प्रकट हुए और सदा के लिए उस ज्योतिर्लिंग में स्थित हो गए।
कौन-सा ज्योतिर्लिंग रोग के लिए है, और कौन-सा भूत प्रेत और पितृ दोष के लिए?
रोग के लिए सोमनाथ, अभिचार और पितरों के लिए महाकालेश्वर
जिन्हें बहुत रोग, कष्ट और पीड़ा है, वे पूरे श्रावण मास सोमनाथ महादेव का कम से कम बारह हज़ार जप, या सवा लाख जप करें। जिन्हें भूत, प्रेत, पिशाच और अभिचार से जुड़ी समस्याएँ हैं, या जिन्हें काफी पितृ संबंधी दोष है, वे महाकालेश्वर महादेव का जप करें — सवा लाख, या कम से कम बारह हज़ार जप।
विवाह न हो रहा हो तो कौन-सा ज्योतिर्लिंग सहायक है?
विवाह बाधा के लिए वैद्यनाथ और काशी विश्वनाथ
वक्ता कहते हैं कि यदि विवाह नहीं हो रहा, विवाह में बहुत बड़ा कष्ट और बहुत बड़ी कठिनाई है, तो इसमें आप भगवान वैद्यनाथ की सहायता लेकर उनके नाम मंत्र का जप कर सकते हैं, या काशी विश्वनाथ की सहायता लेकर उनके नाम मंत्र का भी जप कर सकते हैं।
यदि विवाह आदि नहीं हो रहा, विवाह में बहुत बड़ा कष्ट और बहुत बड़ी परेशानी है, तो इसमें आप भगवान वैद्यनाथ की सहायता लेकर उनके नाम मंत्र का जप कर सकते हैं, या काशी विश्वनाथ की सहायता लेकर भी उनके नाम मंत्र का जप कर सकते हैं। वे कहते हैं कि वे बारह ज्योतिर्लिंगों पर अलग वीडियो बनाएँगे, पर अभी संक्षेप में इतना: अपनी समस्या के अनुसार आप पूरे श्रावण मास ऐसा जप कर सकते हैं।
तीर्थ क्षेत्र में रहने वाले क्या करें, और शिव महापुराण का क्या?
स्थानीय महादेव, और शिव महापुराण का पाठ
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा जो तीर्थ क्षेत्र में रहते हैं, वे उस स्थान पर महादेव का जो भी रूप है, उस स्थान के अनुसार उसकी साधना और पूजा करें। और शिव महापुराण का पाठ — यदि आप श्रावण मास में पूरा शिव महापुराण पढ़ें — अद्भुत लाभ देता है।
इसके अलावा जो तीर्थ क्षेत्र आदि में रहते हैं, वे उस स्थान पर महादेव का जो भी रूप है, उस स्थान के अनुसार उसकी साधना और पूजा करें। वे कहते हैं कि शिव महापुराण का पाठ — यदि आप श्रावण मास में पूरा शिव महापुराण पढ़ें — अद्भुत लाभ देता है।
यदि पूरा शिव महापुराण न पढ़ सकें तो क्या पढ़ें?
हर पक्ष में रुद्र संहिता का एक पारायण
वक्ता कहते हैं कि यदि आप पूरा पाठ नहीं कर सकते, तो वे दो संहिताएँ पढ़ने को कहेंगे। पहली, रुद्र संहिता पढ़ें — चाहे एक पारायण करें या दो। इसका अर्थ है: कृष्ण पक्ष में पूरी रुद्र संहिता एक बार पढ़ें, फिर शुक्ल पक्ष में भी पूरी रुद्र संहिता एक बार पढ़ें। यदि वह न कर सकें, तो उसकी जगह कैलास संहिता पढ़ सकते हैं; इन दोनों में से एक संहिता का पूरा पाठ हर पक्ष में एक बार होना चाहिए।
यदि आप पूरा नहीं पढ़ सकते, और कुछ और भी नहीं करना चाहते, तो वे दो संहिताएँ पढ़ने को कहेंगे। पहली, रुद्र संहिता पढ़ें — चाहे एक पारायण करें या दो। अर्थ यह है: कृष्ण पक्ष में पूरी रुद्र संहिता एक बार पढ़ें, और शुक्ल पक्ष में भी शिव महापुराण की पूरी रुद्र संहिता एक बार पढ़ें। चाहें तो पूरा परिवार किसी भी समय साथ बैठ सकता है, एक व्यक्ति पढ़े और बाकी सुनें, सामान्य शुद्धि की अवस्था में, शुद्धता के साथ। दूसरी, यदि वह न कर सकें, तो कैलास संहिता है; उसे भी पढ़ सकते हैं। इन दोनों में से एक संहिता का पूरा पाठ हर पक्ष में एक बार होना चाहिए। जितने अध्याय हैं उनके अनुसार बाँट लें, तय करके कि रोज़ कितने अध्याय पढ़ने हैं। वे कहते हैं कि इतना करने से भी आपके बहुत से दोषों की शांति होगी।
शिव पुराण स्वयं रुद्र संहिता के बारे में क्या कहता है?
सूत जी: ऐसा कोई पाप नहीं जिसे इसका पाठ न जला दे
वक्ता कहते हैं कि पहले शिव पुराण में ही शिव पुराण का माहात्म्य पढ़ें: उसमें सूत जी कहते हैं कि इस पूरे संसार में उन्होंने ऐसा कोई पाप नहीं देखा, ऐसा कोई दोष नहीं देखा, जो रुद्र संहिता के पाठ से खत्म न हो, जलकर भस्म न हो। यानी सभी दोषों की शांति होगी।
वे कहते हैं कि पहले शिव पुराण में ही शिव पुराण का माहात्म्य पढ़ें। उसमें सूत जी कहते हैं कि इस पूरे संसार में उन्होंने ऐसा कोई पाप नहीं देखा, ऐसा कोई दोष नहीं देखा, जो रुद्र संहिता के पाठ से नष्ट न हो और जलकर भस्म न हो। यानी पूरे दोष समूह की शांति होगी। वे इस पहले आधे भाग को इस आशा के साथ समाप्त करते हैं कि श्रोता श्रावण मास में भगवान सदाशिव की महिमा समझेंगे और जो कर सकें उसे पकड़ेंगे।
जप के समय भगवान के प्रति अपशब्द के विचार क्यों उठते हैं?
गुरु चांडाल योग और पीड़ित चंद्रमा
एक श्रोता ने पूछा कि जप करते समय उसके मन में भगवान को अपशब्द कहने के विचार क्यों आते रहते हैं और कभी-कभी सच में अपशब्द निकल जाता है; वक्ता कहते हैं कि वे समझ सकते हैं और इससे परेशान नहीं होना चाहिए, ऐसा बहुत बार होता है। उनके अपने मत और अवलोकन में, प्रश्नकर्ता की जन्म कुंडली में दो दोष हो सकते हैं: पहला, उनके बृहस्पति अवश्य किसी ऐसे भाव में या किसी ऐसे प्रभाव में होंगे — गुरु चांडाल योग, भले केवल गोचर में — जिसके कारण ऐसे विचार आते हैं; और दूसरा, यदि चंद्रमा पीड़ित हो, भले गोचर में, तो भी ऐसे भाव उठते हैं।
एक श्रोता ने पूछा कि जप करते समय उसके मन में भगवान को अपशब्द कहने का विचार क्यों उठता रहता है, और कभी-कभी सच में मुँह से अपशब्द निकल जाता है; वक्ता कहते हैं कि वे समझ सकते हैं, इससे परेशान नहीं होना चाहिए, और ऐसा बहुत बार होता है। वे कहते हैं कि प्रश्नकर्ता की जन्म कुंडली में कहीं — और यह उनका अपना मत, अपना अवलोकन है — दो दोष हो सकते हैं। पहला, उनके बृहस्पति अवश्य किसी ऐसे भाव में या किसी ऐसे प्रभाव में होंगे, गुरु चांडाल योग बना होगा, भले केवल गोचर में, जिसके कारण ऐसे विचार उठते हैं। दूसरा, यदि चंद्रमा पीड़ित हो, भले गोचर में, तो भी ऐसे भाव आते हैं। वे कहते हैं कि इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए।
पूजा के समय मुँह से अपशब्द निकल जाए तो क्या उपाय है?
भगवती गंगा का नाम ग्यारह बार लेना
वक्ता कहते हैं कि पूजन पाठ के समय जब भी मन में कोई गलत भाव आए — और यह सबके लिए है, उनके साथ भी कभी-कभी होता है, क्योंकि गृहस्थ अवस्था में रहने वाले संसारी लोगों को यह समस्या होती है — तो उस अवस्था में शांत होकर बार-बार भगवती गंगा का नाम लें। यदि एक बार अपशब्द निकल गया, तो भगवती गंगा का नाम ग्यारह बार लें।
वे कहते हैं कि आप चाहते नहीं, पर मन के भीतर एक और बैठा है; वे समझते हैं कि यह सबके साथ होता है, और उनके साथ भी कभी-कभी होता है। वे प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि वे बहुत समर्पित हैं, इसलिए जितना वे कह रहे हैं उतना नहीं होगा, पर कुछ ऊँच-नीच होती है — संसारी लोग, जो गृहस्थ अवस्था में रहते हैं, उन्हें यह परेशानी होती है। कहीं की खीज कहीं न कहीं निकल जाती है। ऐसी अवस्था में शांत होकर बार-बार, बार-बार भगवती गंगा का नाम लें। यदि एक बार अपशब्द निकल गया, तो भगवती गंगा का नाम ग्यारह बार लें, मन में ही सही।
गंगा का नाम लेने से मानसिक पाप क्यों धुलता है?
जहाँ पाप उठा, वहीं शुद्धि
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि यह मानसिक पाप है — अपशब्द आपके मन से, आपके हृदय से निकला, या विचार आपके मस्तिष्क में आया — तो धुलाई भी उसी जगह करनी होगी, शुद्धि उसी जगह करनी होगी; और गंगा जी के नाम से वह चीज़ पूरी तरह साफ हो जाएगी। बाद में यह विचार मन में नहीं आना चाहिए कि आपने अपशब्द कहा: जैसे अपशब्द का भाव उठा था, वैसे ही भगवती गंगा की पवित्रता का भाव लाएँ।
वे कहते हैं कि क्योंकि यह मानसिक पाप है — अपशब्द आपके मन से निकला, आपके हृदय से निकला, या विचार आपके मस्तिष्क में उठा — तो धुलाई उसी जगह करनी होगी, शुद्धि उसी जगह करनी होगी, और गंगा जी के नाम से वह चीज़ पूरी तरह साफ हो जाएगी। उसके बाद मन में यह विचार नहीं आना चाहिए कि नहीं, मैंने तो अपशब्द कहा था। जैसे आपके मन में अपशब्द कहने का भाव उठा, वैसे ही भगवती गंगा की पवित्रता का भाव लाएँ, ताकि अशुद्धि दूर हो। वे कहते हैं कि यह बात सबको पता होनी चाहिए: भगवती गंगा का नाम लेना।
फ्लैट न बिक रहा हो और कर्ज़ चढ़ गया हो तो क्या करें?
नरसिंह ऋण मोचन, या संकल्प के साथ शिव अभिषेक
एक श्रोता कहते हैं कि उनका फ्लैट नहीं बिक रहा, पैसा अटका है और सिर पर बहुत भारी कर्ज़ है। वक्ता उन्हें भगवान नरसिंह के ऋण मोचन की ओर इंगित करते हैं, इन सब बातों का संकल्प लेकर, एकादशी से एकादशी तक; या यदि वे भगवान सदाशिव से जुड़ी साधना करना चाहें, तो घर पर चाँदी के चम्मच से दूध का अभिषेक जो बताया गया है — मंदिर में करें तो उत्तम है, पर मंदिर में बहुत भीड़ हो और संभव न हो, तो घर पर अभिषेक करें और मंदिर जाकर भी संकल्प के साथ दूध चढ़ाएँ।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनका एक फ्लैट है जो बिक नहीं रहा, पैसा अटका है और सिर पर बहुत बड़ा कर्ज़ है। वक्ता उन्हें भगवान नरसिंह के ऋण मोचन की ओर इंगित करते हैं, इन सब बातों का संकल्प लेकर, एकादशी से एकादशी तक। या, यदि वे भगवान सदाशिव से जुड़ी साधना करना चाहें, तो घर पर चाँदी के चम्मच से दूध का अभिषेक जो बताया गया है। मंदिर में करें तो उत्तम है; यदि मंदिर में बहुत भीड़ हो और संभव न हो, तो घर पर अभिषेक करें और मंदिर जाकर भी संकल्प लेकर दूध चढ़ाएँ।
कर्ज़ से मुक्ति और पितृ दोष के लिए कौन-सा ज्योतिर्लिंग सबसे अच्छा है?
कर्ज़ के लिए वैद्यनाथ, पितृ और नाग दोष के लिए नागेश्वर
प्रश्नकर्ता ने जो कुछ लिखा है उस सबके लिए, कर्ज़ से मुक्ति के लिए, वक्ता कहते हैं कि यदि आप यह विशेष रूप से भगवान वैद्यनाथ के नाम से करें तो बहुत बड़ा लाभ मिलेगा। और यदि पितृ दोष आदि है, तो बारह ज्योतिर्लिंगों में भगवान नागेश्वर — यद्यपि जिस भी ज्योतिर्लिंग का करें लाभ मिलेगा, पर नागेश्वर के नाम से शिवार्चन करने से पितृ दोष में, नाग दोष में, और जिनके पाँचवें भाव में राहु है उन्हें विशेष लाभ मिलता है।
प्रश्नकर्ता ने जो सब बातें लिखी हैं, उन सबके लिए, कर्ज़ से मुक्ति के लिए, वे कहते हैं कि यदि आप यह विशेष रूप से भगवान वैद्यनाथ के नाम से करें तो बहुत बड़ा लाभ मिलेगा। यदि पितृ दोष आदि है, तो बारह ज्योतिर्लिंगों में भगवान नागेश्वर — यद्यपि जिस भी ज्योतिर्लिंग का करें लाभ मिलेगा, पर नागेश्वर के नाम से शिवार्चन करने से पितृ दोष में, नाग दोष में, और जिनके पाँचवें भाव में राहु है उन्हें विशेष लाभ मिलता है।
कौन-सा विधान शिव शक्ति के साथ सांभविक बनाता है और रक्षा भी देता है?
शिव शक्ति मंत्र की रोज़ सौ माला
एक श्रोता ने ऐसा विधान पूछा जिससे शिव शक्ति के साथ सांभविक हुआ जाए और रक्षा भी हो; वक्ता कहते हैं कि पिछले वर्ष सावन शुरू होने से पहले उन्होंने इसी प्रश्नकर्ता से कहा था कि हर दिन शिव मंत्र का जप करें, रोज़ सौ माला। यदि एक वर्ष तक वे रोज़ शिव शक्ति मंत्र की सौ, एक सौ आठ, एक सौ एक माला करते, तो ऐसा कौन-सा चमत्कार है जो भगवती अब तक न कर चुकी होतीं?
एक श्रोता ने ऐसा विधान पूछा जिससे शिव शक्ति के साथ सांभविक हुआ जाए और जिससे रक्षा भी हो; वक्ता उत्तर देते हैं कि पिछले वर्ष सावन शुरू होने से पहले उन्होंने इसी प्रश्नकर्ता से कहा था कि हर दिन शिव मंत्र का जप करें, रोज़ सौ माला। यदि एक वर्ष तक, हर दिन, वे जो शिव शक्ति मंत्र कर रहे हैं उसकी सौ माला, एक सौ आठ माला, एक सौ एक माला करते — तो ऐसा कौन-सा चमत्कार है जो भगवती अब तक न कर चुकी होतीं? बहुत कुछ हो चुका होता; वे इतने आत्म-संतुष्ट होते कि कुछ कहा नहीं जा सकता।
हर परिस्थिति में साधना में मन स्थिर कैसे रखें?
अपने इष्ट की गीता, और शिव महापुराण
एक श्रोता ने पूछा कि हर परिस्थिति में साधना में मन स्थिर कैसे रखें; वक्ता उत्तर देते हैं: गीता पाठ। किसकी गीता? यदि आप मुख्य रूप से भगवान सदाशिव की उपासना करते हैं, तो शिव गीता पढ़ें — आपके हर प्रश्न का उत्तर उसमें मिलेगा। जो भी आपके इष्ट हों, उन्हीं इष्ट की गीता पढ़ें; नहीं तो भगवद्गीता तो है ही। शिव महापुराण पढ़ें तो आपके बहुत से प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे; रोज़ एक अध्याय, या आधा अध्याय पढ़ें।
एक श्रोता ने पूछा कि हर परिस्थिति में साधना में मन स्थिर कैसे रखा जाए; वे उत्तर देते हैं: गीता पाठ। किसकी गीता? यदि आप मुख्य रूप से भगवान सदाशिव की उपासना करते हैं, तो शिव गीता पढ़ें; उसमें आपको अपने हर प्रश्न का उत्तर मिलेगा। जो भी आपके इष्ट हों, उन्हीं की गीता पढ़ें। नहीं तो भगवद्गीता तो है ही। शिव महापुराण पढ़ें तो आपको अपने बहुत से प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे। रोज़ एक अध्याय, या आधा अध्याय पढ़ें। मन को स्थिर रखना बहुत ज़रूरी है।
क्या साधना कभी छोड़नी चाहिए?
किसी भी स्थिति में साधना नहीं छोड़नी
वक्ता कहते हैं कि साधना किसी भी स्थिति में बिल्कुल नहीं छोड़नी है, और फिर आगे के श्रोताओं का नाम लेकर अभिवादन करते हैं।
वे कहते हैं कि साधना किसी भी स्थिति में बिल्कुल नहीं छोड़नी है।
शनि के अशुभ प्रभाव के लिए कौन-सा पाठ और उपाय है?
दशरथकृत शनि स्तोत्र और तेरह दीपक
एक श्रोता ने शनि के अशुभ प्रभाव के लिए पाठ और स्वतंत्र उपाय पूछे; वक्ता कहते हैं कि आप शनि, शनैश्चर महाग्रह से जुड़ा पाठ कर सकते हैं: दशरथकृत शनि स्तोत्र। मंदिर में जो शमी का पेड़ है, वहाँ दीपदान कर सकते हैं। दीपक कैसे जलाएँ? जब भी शनिश्चर या अमावस्या पड़े, उस दिन भगवान शनि के निमित्त तेरह दीपक जलाने चाहिए — सरसों के तेल का दीपक, सरसों के तेल में काले तिल डालकर।
एक श्रोता ने शनि के अशुभ प्रभाव के लिए पाठ और स्वतंत्र उपाय पूछे; वक्ता कहते हैं कि आप शनि, शनैश्चर महाग्रह से जुड़ा पाठ भी कर सकते हैं: दशरथकृत शनि स्तोत्र। मंदिर में जो शमी जी का पेड़ है, वहाँ दीपदान कर सकते हैं। दीपक कैसे जलाएँ? जब भी शनिश्चर या अमावस्या पड़े, उस दिन भगवान शनि के निमित्त तेरह दीपक जलाने चाहिए — सरसों के तेल का दीपक, सरसों के तेल में काले तिल डालकर। अलग से वे जोड़ते हैं कि यदि आप हनुमान जी से जुड़ा पाठ और पूजा करें, तो उससे भी बहुत विशेष लाभ मिलेगा।
क्या सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से अलग किया जा सकता है?
पूरी तरह केवल योग सिद्ध ही कर सकता है
एक श्रोता ने पूछा कि क्या हम सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से अलग करके उस रूप में बाहर घूम सकते हैं, और ऐसा करें तो क्या कोई हमें बाँध सकता है; वक्ता इसे बहुत ऊँचे स्तर का योग संबंधी प्रश्न बताते हैं। वे कहते हैं कि सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से अलग करना केवल योग सिद्ध व्यक्ति ही कर सकता है। हम स्वयं कुछ क्षणों के लिए ये चीज़ें देख सकते हैं: जब आप बहुत मंत्र जप करते हैं, जब श्वास नियंत्रित करने की विधि आ जाती है, तब आप क्षण भर के लिए यह क्रिया कर सकते हैं — पर इसे पूरी तरह करने के लिए योग सिद्ध होना ज़रूरी है।
एक श्रोता ने पूछा कि क्या हम सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से अलग करके उस रूप में बाहर घूम सकते हैं, और ऐसा करें तो क्या कोई हमें बाँध सकता है; वक्ता इसे बहुत ऊँचे स्तर का योग संबंधी प्रश्न बताते हैं। वे कहते हैं कि सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से अलग करना केवल योग सिद्ध व्यक्ति ही कर सकता है। हम स्वयं कुछ क्षणों के लिए ये चीज़ें देख सकते हैं। जब आप बहुत मंत्र जप करते हैं, जब — एक तरह से कहें — अंदर आती और बाहर जाती श्वास को नियंत्रित करने की विधि आ जाती है, तब आप क्षण भर के लिए यह क्रिया कर सकते हैं; और इसे पूरा करने के लिए योग सिद्ध होना ज़रूरी है।
श्रावण में कुलदेवी की कृपा कैसे प्राप्त करें?
पक्ष के अनुसार कुलदेवी सप्तमी, और पंचमी पर नाग पूजन
वक्ता कहते हैं कि पूरे श्रावण मास सदाशिव के साथ विशेष रूप से कुलदेवी की सेवा करें। श्रावण शुक्ल पक्ष सप्तमी कुलदेवी सप्तमी है: जिनकी कुलदेवी पूजा कृष्ण पक्ष में होती है वे कृष्ण पक्ष में करें, और जिनकी शुक्ल पक्ष में होती है वे शुक्ल पक्ष की सप्तमी को कुलदेवी पूजा करें। कुल पितरों के निमित्त, नाग रूप में स्थित सभी पितरों के निमित्त, पंचमी तिथि को विशेष नाग पूजन करें; इसका पूरा विधि विधान चैनल पर अलग से बनाया गया है, और इसका खर्च दो सौ से तीन सौ रुपये है।
वे कहते हैं कि पूरे श्रावण मास, सदाशिव के साथ, विशेष रूप से कुलदेवी की सेवा करें। श्रावण शुक्ल पक्ष सप्तमी कुलदेवी सप्तमी है; जिनकी कुलदेवी पूजा कृष्ण पक्ष में होती है वे कृष्ण पक्ष में करें, और जिनकी शुक्ल पक्ष में होती है वे शुक्ल पक्ष की सप्तमी को कुलदेवी पूजा करें। कुल पितरों के निमित्त, नाग रूप में स्थित सभी पितरों के निमित्त, पंचमी तिथि को विशेष नाग पूजन करें; इसका पूरा विधि विधान चैनल पर अलग से बनाया गया है। पूजन का खर्च दो सौ से तीन सौ रुपये है, और पूरा विधि विधान दिखाया गया है — हर कोई इसे कर सकता है।
क्या सावन में बजरंग बाण सिद्ध किया जा सकता है?
हाँ, पर साथ में छोटा शिव पूजन भी
एक श्रोता ने पूछा कि क्या सावन में बजरंग बाण सिद्ध करने का विधान किया जा सकता है; वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। उसके साथ एक छोटा शिव पूजन भी अवश्य करें: कम से कम शिव जी के बारह नाम, बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम लेते हुए अभिषेक करें। इतना साथ में अवश्य करें, और उसके बाद बजरंग बाण सिद्ध करें।
एक श्रोता ने पूछा कि क्या सावन में बजरंग बाण सिद्ध करने का विधान किया जा सकता है; वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। उसके साथ एक छोटा शिव पूजन भी अवश्य करें। कम से कम शिव जी के बारह नाम — बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम — नाम पाठ के रूप में लेते हुए अभिषेक करें। इतना साथ में अवश्य करें, और उसके बाद बजरंग बाण सिद्ध करें।
क्या कोई ऐसा मंत्र है जिसे कभी पढ़ना या गाना नहीं चाहिए?
एक श्रोता का लिखा मंत्र, सीधे मना
एक श्रोता ने एक मंत्र लिखकर भेजा; उसका उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि लिखा गया मंत्र कभी पढ़ना नहीं है, कभी बोलना नहीं है, और भजन कीर्तन में भी उसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह अत्यंत विशेष मंत्र है। वे उनसे कहते हैं, हर हर महादेव बोलिए।
एक श्रोता ने एक मंत्र लिखकर भेजा है। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह मंत्र कभी पढ़ना नहीं है, कभी बोलना नहीं है, और इससे न भजन करना चाहिए न कीर्तन। वे कहते हैं कि यह अत्यंत विशेष मंत्र है। इसकी जगह हर हर महादेव बोलिए। एक दूसरे श्रोता ने, पहले की बातचीत में, कहा था कि उनके शत्रुओं ने उनके घर में और तंत्र में इतना कुछ किया, और उन्होंने सब कुछ अपने इष्ट पर छोड़ दिया और कोई नुकसान नहीं हुआ। वक्ता उत्तर देते हैं: कोई नुकसान नहीं हुआ — और क्या चाहिए? अब स्वयं को अच्छी तरह मज़बूत कीजिए; इन सब प्रश्नों का उत्तर शुरुआत में ही दिया जा चुका है।
चंद्रमा के लिए चाँदी की अंगूठी या कड़ा कैसे पहनें?
पहले कुंडली का विश्लेषण, फिर मंत्र
एक श्रोता ने पूछा कि चंद्र ग्रह के लिए चाँदी की अंगूठी या कड़ा कैसे अभिमंत्रित करके पहनें, और चंद्रमा के लिए कौन-सी पूजा या साधना करें; वक्ता उलटा प्रश्न करते हैं: चंद्रमा किस स्थिति में हैं कि आपको चाँदी की अंगूठी या कड़ा पहनना चाहिए? इसके लिए पहले किसी अच्छे ज्योतिषी या किसी साधक से अपनी जन्म कुंडली का विश्लेषण करवाएँ, और तभी पहनें। उसके अनुसार मंत्र है — तंत्रोक्त मंत्र भी है, और साबर मंत्र भी हैं।
एक श्रोता ने पूछा कि चंद्र ग्रह के लिए चाँदी की अंगूठी या कड़ा कैसे अभिमंत्रित करके पहना जाए, और चंद्रमा के लिए कौन-सी पूजा या साधना की जाए; वक्ता उलटा पूछते हैं कि चंद्रमा किस स्थिति में हैं कि चाँदी की अंगूठी या कड़ा पहना जाए। इसके लिए पहले किसी अच्छे ज्योतिषी या किसी साधक से अपनी जन्म कुंडली का विश्लेषण करवाएँ, और फिर पहनें। उसके अनुसार मंत्र है; तंत्रोक्त मंत्र भी है, और साबर मंत्र आदि भी हैं।
क्या नया शरीर ले चुके गुरु से अब भी संपर्क हो सकता है?
गुरु मंडल की कृपा सूक्ष्म रूप में बनी रहती है
एक श्रोता ने पूछा कि यदि गुरु ने नया शरीर पा लिया है, तो क्या उनके पुराने रूप में उनसे संपर्क करना और मार्गदर्शन लेना अब भी संभव है, या यह भ्रम है; वक्ता कहते हैं: गुरु कोई भी हों, जब आपने किसी परंपरा में दीक्षा ली है, तो अपने कर्म की गति के कारण गुरु ने नया शरीर पा भी लिया हो, तब भी गुरु मंडल की कृपा आप पर सदा बनी रहती है। सूक्ष्म रूप में गुरु कृपा करते रहते हैं। पुराने रूप में संपर्क बिल्कुल किया जा सकता है; मार्गदर्शन लेना संभव है या नहीं, यह गुरु मंडल पर निर्भर करता है।
एक श्रोता ने पूछा कि यदि गुरु पहले ही नया शरीर पा चुके हैं, तो क्या पुराने रूप में उनसे संपर्क और उनसे मार्गदर्शन अब भी संभव है, या यह भ्रम है; वक्ता उत्तर देते हैं कि गुरु कोई भी हों, जब आपने किसी परंपरा में दीक्षा ली है और गुरु ने अपने कर्म की गति के कारण नया शरीर पा लिया है, तब भी गुरु मंडल की कृपा आप पर सदा बनी रहती है। सूक्ष्म रूप में गुरु कृपा करते रहते हैं। पुराने रूप में संपर्क बिल्कुल किया जा सकता है। मार्गदर्शन लेना संभव है या नहीं, यह गुरु मंडल पर निर्भर करता है।
पारंपरिक परंपरा में दीक्षा वास्तव में कौन देता है?
परम गुरु, और शाक्त मार्ग के आदि गुरु के रूप में नारायण
वक्ता कहते हैं कि ध्यान रखें, जब दीक्षा होती है — यदि आप पारंपरिक दीक्षा ले रहे हैं — तो जो व्यक्ति वहाँ शरीर में बैठकर आपको दीक्षा देता है, वह वास्तव में देने वाला नहीं होता; बल्कि परम गुरु देते हैं, यानी वे जो उस पंथ के, उस मार्ग के पहले प्रवर्तक थे। वे कहते हैं कि हम जिस मार्ग में हैं, हम शाक्त परंपरा में, शाक्त मार्ग में हैं — पर इस मार्ग में भी हमारे पहले गुरु भगवान नारायण हैं; जिन आदि गुरु की सबसे पहले पूजा होती है, वे भगवान नारायण हैं। यानी हमारी परंपरा में माना जाता है कि शाक्त दीक्षा आपको नारायण दे रहे हैं।
वे कहते हैं कि ध्यान रखें, जब दीक्षा होती है — यदि आप पारंपरिक दीक्षा ले रहे हैं — तो जो व्यक्ति वहाँ शरीर में बैठकर आपको दीक्षा दे रहा है, वह वास्तव में देने वाला नहीं है; बल्कि परम गुरु देते हैं: वे जो उस पंथ के, उस मार्ग के पहले प्रवर्तक थे। उदाहरण के रूप में वे अपना ही देते हैं: हम शाक्त परंपरा में, शाक्त मार्ग में हैं, पर इस मार्ग में भी हमारे पहले गुरु भगवान नारायण हैं; जिन आदि गुरु की सबसे पहले पूजा होती है, वे भगवान नारायण हैं। यानी हम मानते हैं, और हमारी परंपरा में माना जाता है, कि शाक्त दीक्षा आपको नारायण दे रहे हैं। वे कहते हैं कि ठीक इसी तरह सबको इसे समझना और मानना चाहिए।
क्या तंत्र के विरुद्ध चार महीने शिव कवच पढ़ा जा सकता है?
अमोघ शिव कवच, और उसे कब शुरू करें
एक श्रोता ने तंत्र से लड़ने के लिए मंदिर में चार महीने शिव कवच पढ़ने के बारे में पूछा; वक्ता कहते हैं कि यह बिल्कुल किया जा सकता है: आप अमोघ शिव कवच का पाठ शुरू कर सकते हैं। कल से, या गुरु पूर्णिमा से, या श्रावण की कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से शुरू कर सकते हैं। संकल्प स्पष्ट रखें — शिव जी की कृपा के लिए, और उनकी कृपा से शत्रुओं द्वारा किए जा रहे सभी अभिचार के नाश के लिए।
एक श्रोता ने तंत्र से लड़ने के लिए मंदिर में चार महीने शिव कवच का पाठ करने के बारे में पूछा; वक्ता कहते हैं कि यह बिल्कुल किया जा सकता है: अमोघ शिव कवच का पाठ शुरू करें। आप कल से, गुरु पूर्णिमा से, या श्रावण की कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से शुरू कर सकते हैं। संकल्प स्पष्ट रखें: शिव जी की कृपा के लिए, और उनकी कृपा से शत्रुओं द्वारा किए जा रहे सभी अभिचार के नाश के लिए। अलग से पूछा गया कि क्या ससुराल में किए मंत्र जप का हवन मायके में किया जा सकता है; वे कहते हैं हाँ, किया जा सकता है; ऐसी कोई दिक्कत नहीं है।
तंत्र में गैंडे के सींग से बने कड़े का क्या उपयोग है?
गृहस्थ के लिए वर्जित
गैंडे के सींग से बने कड़े के उपयोग के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि तंत्र में इसका प्रयोग विशेष ढंग से होता है, और इसका पहला प्रयोग साबर विद्याओं आदि में है — पर कहीं न कहीं गृहस्थ के लिए यह प्रयोग वर्जित किया गया है। वे कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि प्रश्नकर्ता इसके साथ किस पंथ का पालन कर रहे हैं, और बहुत-सी चीज़ें हैं जिन्हें घर में रखना गृहस्थ के लिए वर्जित है।
गैंडे के सींग से बने कड़े के उपयोग के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि तंत्र में इसका प्रयोग विशेष ढंग से होता है। इसका पहला प्रयोग साबर विद्याओं आदि में है — पर कहीं न कहीं गृहस्थ के लिए यह प्रयोग वर्जित किया गया है, और उन्हें नहीं पता कि प्रश्नकर्ता इसके संबंध में किस पंथ का पालन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि गृहस्थ के लिए बहुत-सी चीज़ें हैं जिन्हें घर में रखना वर्जित किया गया है।
क्या गैंडे का सींग घर में रखना चाहिए?
जिसने दिया उससे पूछें; जब तक जीवन पर न बन आए, न रखें
वक्ता बताते हैं कि यह श्रोता पहले भी यही प्रश्न पूछ चुके हैं और बार-बार पूछ रहे हैं। वे कहते हैं, यदि आपके पास है, तो जिस व्यक्ति से लिया है उससे उसके प्रयोग ठीक से सीखें। उनके अपने मत और ज्ञान के अनुसार, गृहस्थ को इसे घर में तब तक प्रयोग नहीं करना चाहिए जब तक यह बिल्कुल ज़रूरी न हो और जीवन ही दाँव पर न हो।
वे बताते हैं कि श्रोता यह प्रश्न पहले भी पूछ चुके हैं और बार-बार पूछ रहे हैं। यदि आपके पास है, तो जिससे लिया है उससे उसके प्रयोग ठीक से सीखें। उनके अपने मत और प्राप्त ज्ञान के अनुसार, गृहस्थ को इसका प्रयोग घर में तब तक नहीं करना चाहिए जब तक यह बिल्कुल ज़रूरी न हो, जब तक जीवन ही दाँव पर न हो।
गुरु साधना के बाद साधनाओं का क्रम क्या है?
गुरु, गणपति, भैरव, फिर ग्रह, फिर कुल देवता
एक श्रोता ने पूछा कि दत्तात्रेय की, यानी गुरु की, साधना के बाद अगले चरण में गणेश जी और हनुमान जी की कौन-सी साधनाएँ की जा सकती हैं; वक्ता क्रम बताते हैं: गुरु, गणपति, फिर भैरव जी; उसके बाद आपकी जन्म कुंडली के अनुसार पाँचवें और नौवें भाव से जुड़े ग्रहों की साधना, या लग्नेश की साधना, जिसे भी मज़बूत करने की ज़रूरत हो; फिर कुल देवी देवता की साधना; और फिर मुख्य साधना।
एक श्रोता ने पूछा कि दत्तात्रेय की — यानी गुरु की — साधना के बाद अगले चरण में गणेश जी और हनुमान जी की कौन-सी साधनाएँ की जा सकती हैं; वक्ता क्रम बताते हैं। गुरु, फिर गणपति, फिर भैरव जी। उसके बाद आपकी जन्म कुंडली के अनुसार पाँचवें और नौवें भाव से जुड़े ग्रहों की साधना, या लग्नेश की साधना, जिसे भी मज़बूत करने की ज़रूरत हो। तभी कुल देवी देवता की साधना, और तभी मुख्य साधना। अलग से पूछा गया कि जिसने कभी नरसिंह की उपासना नहीं की, क्या वह माँ बगलामुखी की उपासना कर सकता है; वे कहते हैं हाँ, बिल्कुल; करें तो कोई दिक्कत नहीं।
क्या बिना दीक्षा के पाशुपतास्त्र की साधना की जा सकती है?
बिना दीक्षा कोई अस्त्र मंत्र नहीं
एक श्रोता ने पूछा कि पाशुपतास्त्र क्या है और क्या बिना दीक्षा उसकी साधना की जा सकती है; वक्ता कहते हैं कि सभी अस्त्र मंत्र — चाहे पाशुपतास्त्र हो, नीलकंठ अघोर अस्त्र, माहेश्वर अस्त्र, अघोर अस्त्र — बिना दीक्षा नहीं करने चाहिए। वे कहते हैं कि यह उनका अपना मत है; आप अपने लिए निर्णय लेने को स्वतंत्र हैं। उनके मत में मुख्य साधना के बिना कभी अस्त्र साधना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अस्त्र एक अंग विद्या है।
एक श्रोता ने पूछा कि पाशुपतास्त्र क्या है, और क्या बिना दीक्षा उसकी साधना की जा सकती है; वक्ता उत्तर देते हैं कि सभी अस्त्र मंत्र — चाहे पाशुपतास्त्र हो, नीलकंठ अघोर अस्त्र, माहेश्वर अस्त्र, अघोर अस्त्र — बिना दीक्षा नहीं करने चाहिए। वे कहते हैं कि यह उनका अपना मत है; आप अपने लिए स्वतंत्र हैं। उनके अनुसार मुख्य साधना के बिना आपको कभी अस्त्र साधना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अस्त्र एक अंग विद्या है।
मुख्य विद्या के बिना अस्त्र साधना खतरनाक क्यों है?
जो ऊर्जा आप जगाते हैं, उसे सँभाल नहीं सकते
वक्ता कहते हैं कि आपने मुख्य विद्या की, अस्त्र धारण करने वाले की, सेवा पूजा नहीं की, और आपको दीक्षा नहीं मिली। यदि आप पाशुपतास्त्र के मंत्र जगाते हैं, तो क्या वहाँ उठने वाली ऊर्जा को सँभाल पाएँगे, क्या उसका लक्ष्य साध पाएँगे? कैसे सँभालेंगे? चाहे एक सौ आठ पाठ करें — एक सौ आठ छोड़िए, रोज़ ग्यारह पाठ भी करें — यदि आप उसके अधिकारी नहीं हैं, तो कहीं न कहीं आपका अपना ही विनाश होगा।
वे कहते हैं कि आपने मुख्य विद्या की, अस्त्र धारण करने वाले की, सेवा पूजा नहीं की, और आपको कोई दीक्षा नहीं मिली। यदि आप पाशुपतास्त्र के मंत्र जगाते हैं, तो क्या वहाँ उठने वाली ऊर्जा को सँभाल पाएँगे, क्या उसका लक्ष्य साध पाएँगे? कैसे सँभालेंगे? चाहे एक सौ आठ पाठ करें — एक सौ आठ छोड़िए, रोज़ ग्यारह पाठ भी करें — यदि आप उसके अधिकारी नहीं हैं, तो कहीं न कहीं आपका अपना ही विनाश होगा। इसलिए जानकारी जुटाएँ; सब कुछ केवल पढ़-सुनकर न करें। अस्त्र विद्या में सामान्यतः अस्त्र कैसे सिद्ध किए जाते हैं, इस पर नारायण अस्त्र के बारे में एक वीडियो है: उसे एक बार सुन लें, आपको अंदाज़ा हो जाएगा।
अपने ऊपर किए गए तंत्र प्रयोग को कैसे नष्ट करें?
मैदान में खड़े रहने का सामर्थ्य और मनोबल
एक श्रोता ने पूछा कि किसी भी तंत्र प्रयोग को कैसे नष्ट किया जाता है; वक्ता कहते हैं कि चैनल पर कई वीडियो पहले से तंत्र नाश के लिए अलग-अलग विद्याओं का प्रयोग सिखाते हैं। आप विद्याओं के द्वारा स्वयं तंत्र नष्ट कर सकते हैं — आपमें सामर्थ्य होना चाहिए, और आपका मनोबल ऐसा होना चाहिए कि आप मैदान में डटकर खड़े रह सकें। तभी आप अपने ऊपर किए गए प्रयोगों को नष्ट कर पाएँगे।
एक श्रोता ने पूछा कि किसी भी तंत्र प्रयोग को कैसे नष्ट किया जाए; वे कहते हैं कि वे यह पहले ही बता चुके हैं और इसी चैनल पर कई वीडियो हैं जो तंत्र नाश के लिए अलग-अलग विद्याओं का प्रयोग सिखाते हैं। आप विद्याओं के द्वारा स्वयं तंत्र नष्ट कर सकते हैं; आपमें सामर्थ्य होना चाहिए, और आपका मनोबल ऐसा होना चाहिए कि आप मैदान में डटकर खड़े रह सकें। तभी आप अपने ऊपर किए गए प्रयोगों को नष्ट कर पाएँगे। वे पूछते हैं, किसी तांत्रिक या भगतवाल साधक का मनोबल इतना ऊँचा क्यों होता है? क्योंकि जब उसने किसी विद्या को, किसी शक्ति को अपने वचन में ले लिया है, तो वह दृढ़ है कि जब भी वह प्रयोग करेगा, वह शक्ति उसके साथ खड़ी होगी। उसी बल पर वह तंत्र नाश, अभिचार आदि करता है।
जब कोई गुरु न हो तो क्या किसी देवी या देवता को गुरु माना जा सकता है?
ज्ञान, शक्ति और तपोबल; और देवता को गुरु मानना
वक्ता कहते हैं कि जब आपमें ज्ञान आएगा और शक्ति आएगी, तो आप स्वयं को इतना प्रेरित रखेंगे कि किसी के भी सामने खड़े हो सकें — इसलिए आपके पास उतनी जानकारी होनी चाहिए। यह पूछे जाने पर कि गुरु न हो तो क्या किसी देवी या देवता को गुरु माना जा सकता है, वे कहते हैं: बिल्कुल, ऐसा किया और माना जा सकता है; ऐसी कोई दिक्कत नहीं। प्रणव के उच्चारण में विशेष सावधानी रखें और धीरे-धीरे आगे बढ़ें।
वे कहते हैं कि जब आपमें ज्ञान आएगा और शक्ति आएगी, तो आप स्वयं को इतना प्रेरित रखेंगे कि किसी के भी सामने खड़े हो सकेंगे; आपके पास उतनी जानकारी होनी चाहिए। अभी जानकारी जुटाएँ, और आप स्वयं यह करने में सक्षम हो जाएँगे। सही और गलत की पकड़ आपको तब आएगी जब विद्या से तपोबल बढ़ेगा, जब पुण्य कर्मों से तपोबल बढ़ेगा और प्रारब्ध कटेगा; तभी आप यह कर पाएँगे। यह पूछे जाने पर कि यदि हमारा कोई गुरु नहीं है, तो क्या किसी देवी या देवता को गुरु माना जा सकता है, वे कहते हैं कि जब तक भौतिक गुरु न मिलें — और भौतिक गुरु कब और कैसे ज़रूरी हैं यह वे पहले ही समझा चुके हैं — तब तक यह बिल्कुल माना और किया जा सकता है; ऐसी कोई दिक्कत नहीं। प्रणव के उच्चारण में विशेष सावधानी रखें, और धीरे-धीरे आगे बढ़ें।
कौन-से स्तोत्र शिव की विशेष कृपा देते हैं, और किस क्रम में?
पहले द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र, रोज़ एक सौ आठ
एक श्रोता ने पूछा कि कौन-से स्तोत्र पाठ भगवान शिव की विशेष कृपा दिलाते हैं और किस क्रम में; वक्ता कहते हैं कि श्रावण मास में वे सबसे अच्छा यह मानते हैं कि आप पहले द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र, छोटा वाला, लें — सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥ — और यह पूरा पाठ रोज़ एक सौ आठ बार करना चाहिए।
एक श्रोता ने पूछा कि भगवान शिव की विशेष कृपा पाने के लिए कौन-से स्तोत्र पाठ करने चाहिए, और उनका क्रम क्या हो; वे कहते हैं कि श्रावण मास में भगवान सदाशिव की कृपा पाने के लिए वे सबसे अच्छा यह मानते हैं कि आप पहले द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र, छोटा वाला, लें। वे उसकी शुरुआत पढ़ते हैं: सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥ — यह पूरा पाठ। इसके रोज़ एक सौ आठ पाठ करने चाहिए।
शास्त्र क्या कहता है
The Śiva Purāṇa names the twelve Jyotirliṅgas, from Somanātha in Saurāṣṭra to Ghuśmeśa, and says reciting the twelve names on rising at dawn frees one from all sins.
The speaker recites the popular reading ओङ्कारममलेश्वरम्; the printed verse 21 reads ओंकारे परमेश्वरम्.
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सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोंकारे परमेश्वरम्॥ २१
सौराष्ट्रमें सोमनाथ, श्रीशैलपर मल्लिकार्जुन, उज्जयिनीमें महाकाल, ओंकारमें परमेश्वर,
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम्। वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे॥ २२
हिमालयपर केदार, डाकिनीमें भीमशंकर, वाराणसीमें विश्वेश, गौतमीके तटपर त्र्यम्बक,
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने। सेतुबंधे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये॥ २३
चिताभूमिमें वैद्यनाथ, दारुकावनमें नागेश, सेतुबन्धमें रामेश और शिवालयमें घुश्मेश — (ये बारह ज्योतिर्लिंग हैं)।
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्। सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिफलं लभेत्॥ २४
जो सवेरे उठकर इन बारह नामोंका पाठ करता है, वह सब पापोंसे छूटकर सब सिद्धियोंका फल पाता है।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र से क्या होता है?
इस जन्म और पिछले सात जन्मों के हल्के पाप
वक्ता कहते हैं कि इससे यह होता है कि सबसे पहले, सभी कायिक, मानसिक और वाचिक पापों में से — इस जन्म के और पिछले सात जन्मों के — जो सबसे कम प्रबल हैं, यानी जिनका दंड आपको कम भोगना है, या जिनमें कुछ काट संभव है, जहाँ आपको कुछ राहत मिल सकती है, वे जड़ से पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।
वे कहते हैं कि इससे यह होता है कि सबसे पहले, सभी कायिक, मानसिक और वाचिक पापों में से — इस जन्म के और पिछले सात जन्मों तक के — जो सबसे प्रबल से कम हैं, यानी जिनका दंड आपको कम भोगना है, या जिनमें कुछ काट संभव है, आपको कुछ राहत मिल सकती है, वे जड़ से पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। यह सबसे पहली बात है; इसलिए सबसे पहले द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र करना चाहिए।
शास्त्र क्या कहता है
Reciting the twelve Jyotirliṅga names on rising at dawn frees one from all sins and gives the fruit of every success.
The verse says nothing of seven past births or of the lesser sins the speaker distinguishes.
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द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्। सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिफलं लभेत्॥ २४
जो सवेरे उठकर इन बारह नामोंका पाठ करता है, वह सब पापोंसे छूटकर सब सिद्धियोंका फल पाता है।
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ज्योतिर्लिंग स्तोत्र के बाद क्या आता है?
शिव महिम्न या रुद्राष्टक, फिर रक्षा कवच
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद शिव महिम्न स्तोत्र गाना आना चाहिए, या शिव जी का रुद्राष्टक पढ़ना आना चाहिए। रुद्राष्टक यह है कि यह शीघ्र काम करता है: अभी आपको जिस भी चीज़ की ज़रूरत है, उसे पाने के लिए रुद्राष्टक अमोघ है। रक्षा के लिए, आगे बढ़कर, यदि विशेष रूप से ज़रूरत हो, तो अमोघ शिव कवच या शिव रक्षा कवच में से कोई एक करें।
वे कहते हैं कि उसके बाद शिव महिम्न स्तोत्र गाना आना चाहिए, या शिव जी का रुद्राष्टक पढ़ना आना चाहिए। रुद्राष्टक यह करता है कि शीघ्र काम करता है: इस समय आपको जिस भी चीज़ की ज़रूरत है, उसे पाने के लिए रुद्राष्टक अमोघ है। वह करना चाहिए। रक्षा के लिए, आगे बढ़कर, यदि आपको विशेष रूप से कुछ करना है, तो अमोघ शिव कवच या शिव रक्षा कवच में से कोई एक करें।
कौन-सा शिव सहस्रनाम पढ़ना चाहिए?
ऐसा चुनें जिसकी फलश्रुति में दीक्षा की शर्त न हो
वक्ता कहते हैं कि इन सबके अलावा, यदि आप आगे बढ़ना चाहते हैं, तो शिव सहस्रनाम पढ़ें। शिव सहस्रनाम कई प्रकार के हैं: उनमें से जो चाहें करें, पर यह देखें — यदि फलश्रुति में लिखा है कि बिना दीक्षा इसे पढ़ने से कठिनाई होगी, तो वह न करें; सामान्य वाला करें।
इन सबके अलावा, यदि आप और आगे बढ़ना चाहते हैं, तो शिव सहस्रनाम पढ़ें। शिव सहस्रनाम कई प्रकार के हैं। उनमें से जो चाहें करें — पर यह देखें: यदि फलश्रुति में लिखा है कि बिना दीक्षा इसे पढ़ने से कठिनाई होगी, तो वह न करें। सामान्य वाला करें।
क्या किसी महाविद्या को सिद्ध किया जा सकता है?
हमसे नहीं; केवल उनकी योगिनियाँ और परिचारिकाएँ सिद्ध होती हैं
एक श्रोता ने भगवती अपराजिता की उत्पत्ति के बारे में और यह पूछा कि उन्हें सिद्ध क्यों नहीं किया जा सकता; वक्ता कहते हैं कि कोई भी महाविद्या कभी भी आपसे या उनसे सिद्ध नहीं हो सकती। उन्हें नहीं पता कि कोई महाविद्या की सिद्धि की बात करके क्या मतलब रखता है। किसकी सिद्धि होती है? उनकी योगिनियाँ भी कृपा करती हैं। उप-योगिनियों की सेविकाओं, परिचारिकाओं में इतनी क्षमता होती है कि ऐसा कुछ नहीं जो वे न कर सकें — सिद्ध वही होती हैं, और वह भी बहुत सूक्ष्म रूप में, बड़ी सीमाओं में रहते हुए।
एक श्रोता ने भगवती अपराजिता की उत्पत्ति के बारे में और यह पूछा कि उन्हें सिद्ध क्यों नहीं किया जा सकता; वक्ता कहते हैं कि कोई भी महाविद्या कभी भी उनसे या हमसे सिद्ध नहीं हो सकती। उन्हें नहीं पता कि जब कोई कहता है कि महाविद्या की सिद्धि होती है तो उसका क्या अर्थ है। किसकी सिद्धि होती है? उनकी योगिनियाँ भी कृपा करती हैं। उप-योगिनियों की सेविकाओं और परिचारिकाओं में इतनी क्षमता होती है कि ऐसा कुछ नहीं जो वे न कर सकें — सिद्ध वही होती हैं, और वह भी बहुत सूक्ष्म रूप में, काफी सीमाओं में रहते हुए। वे कहते हैं कि किसी महाविद्या को, किसी सिद्ध विद्या को सिद्ध करने का सामर्थ्य इस तरह YouTube पर बैठने से नहीं आता; वे बिल्कुल नहीं कह सकते कि ऐसा होता है, क्योंकि उन्हें सिद्ध करने के बाद हमारा मन इन सब बातों में रहेगा ही नहीं। यह पहली बात है, और यह सामर्थ्य से परे की बात है।
भगवती अपराजिता की उपासना कैसे की जा सकती है?
विशेष कृपा के लिए दीक्षा के साथ, या दुर्गा सप्तशती के माध्यम से
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि यदि आप विशेष कृपा पाना चाहते हैं, तो दीक्षा लेकर उनकी विशेष साधना करनी चाहिए। फिर भी भगवती अपराजिता की स्वतंत्र रूप से भी सेवा पूजा की जा सकती है। उनका शक्तिपीठ बंगाल क्षेत्र में है, और अन्य रूपों में उनका शक्तिपीठ बांग्लादेश में भी है। तो यदि आप विशेष रूप से उनकी कृपा चाहते हैं, तो दीक्षा लेकर साधना कर सकते हैं, या दुर्गा सप्तशती के माध्यम से भी उनकी सेवा पूजा कर सकते हैं।
वे कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि यदि आप विशेष कृपा पाना चाहते हैं, तो दीक्षा लेकर उनकी विशेष साधना करनी चाहिए। वे जोड़ते हैं कि यद्यपि भगवती अपराजिता की स्वतंत्र रूप से भी सेवा पूजा की जा सकती है। उनका शक्तिपीठ बंगाल क्षेत्र में है, और अन्य रूपों में उनका शक्तिपीठ बांग्लादेश में भी है। तो यदि आप विशेष रूप से उनकी कृपा चाहते हैं, तो दीक्षित होकर साधना करें; या दुर्गा सप्तशती के माध्यम से भी उनकी सेवा पूजा कर सकते हैं।
किराए के घर में जप करते समय क्या ध्यान रखें?
गोपनीयता रखें; कोई आपको जप करते न देखे
एक श्रोता किराए के घर में रहने और वहाँ मंत्र जप करते समय किसी और के आ जाने के बारे में पूछते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं: जप के समय कोई न आए, कोई आपको जप करते न देखे, गोपनीयता रखें।
एक श्रोता किराए के घर में रहने और वहाँ मंत्र जप करते समय किसी और के अंदर आ जाने के बारे में पूछते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि जप के समय कोई नहीं आना चाहिए, कोई आपको जप करते न देखे; गोपनीयता रखें।
नया साधक गुरु प्राप्ति के लिए सावन में क्या कर सकता है?
उसी संकल्प के साथ रोज़ ज्योतिर्लिंग स्तोत्र के एक सौ आठ पाठ
तंत्र में नई एक श्रोता ने पूछा कि गुरु प्राप्ति के लिए सावन में क्या किया जा सकता है और कब शुरू करें; वक्ता कहते हैं: गुरु पूर्णिमा से शुरू करके श्रावण की पूर्णिमा तक, यदि आपकी यही इच्छा है, तो इसी संकल्प के साथ रोज़ भगवान सदाशिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र के एक सौ आठ पाठ करें।
एक श्रोता, जो कहती हैं कि वे तंत्र में नई हैं, पूछती हैं कि गुरु प्राप्ति के लिए सावन में क्या किया जा सकता है, और सावन में कब शुरू करना चाहिए; वक्ता उत्तर देते हैं। गुरु पूर्णिमा से शुरू करके श्रावण की पूर्णिमा तक, यदि आपकी यही इच्छा है, तो इसी संकल्प के साथ हर एक दिन भगवान सदाशिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र के एक सौ आठ पाठ करें।
क्या स्त्रियाँ शिवलिंग पर भस्म चढ़ा सकती हैं?
कई जगह स्त्रियों के लिए भस्म लेपन वर्जित
एक श्रोता ने पूछा कि क्या स्त्रियाँ शिवलिंग पर भस्म चढ़ा सकती हैं; वक्ता कहते हैं कि भस्म लेपन में कुछ जगह सामान्य रूप से भी निषेध है, कि हर व्यक्ति को हर समय और हर अवस्था में भस्म नहीं चढ़ानी चाहिए। पर स्त्रियों द्वारा भस्म चढ़ाने के विषय में बहुत-सी जगह निषेध है। स्त्रियों को भस्म नहीं चढ़ानी चाहिए, न माथे पर भस्म लेपन करना चाहिए; वे गले आदि पर भस्म लगा सकती हैं।
एक श्रोता ने पूछा कि क्या स्त्रियाँ शिवलिंग पर भस्म चढ़ा सकती हैं; वे कहते हैं कि भस्म लेपन कुछ जगह सामान्य रूप से भी वर्जित है — कि हर व्यक्ति को हर समय और हर अवस्था में भस्म नहीं चढ़ानी चाहिए। पर स्त्रियों द्वारा भस्म चढ़ाने के विषय में बहुत-सी जगह निषेध है। स्त्रियों को भस्म नहीं चढ़ानी चाहिए, न माथे पर भस्म लेपन करना चाहिए। वे गले आदि जगहों पर भस्म लगा सकती हैं। वे कहते हैं कि भस्म को लेकर आपकी जो भी जिज्ञासाएँ हैं, वे आप शिव महापुराण में पढ़ और देख सकते हैं।
क्या स्त्रियाँ शिवलिंग छू सकती हैं, और क्या भटकता मन दोष है?
छूना कहीं वर्जित नहीं; भटकना केवल अभ्यास की कमी है
वक्ता कहते हैं कि स्त्रियाँ शिवलिंग पर भस्म चढ़ा सकती हैं या नहीं, इस पर वे प्रमाणों के साथ अवश्य एक अलग वीडियो बनाएँगे। यह पूछे जाने पर कि मंत्र जप में भटकता मन क्या किसी दोष का संकेत है, वे उत्तर देते हैं कि भटकता मन कोई दोष नहीं — जब तक अभ्यास नहीं आता, मन भटकेगा। और शिवलिंग छूने के बारे में वे कहते हैं कि कहीं कोई निषेध नहीं: स्त्रियाँ शिवलिंग बिल्कुल छू सकती हैं, उसका शृंगार बिल्कुल कर सकती हैं, और इसमें निषेध जैसी कोई बात नहीं।
वे कहते हैं कि स्त्रियाँ शिवलिंग पर भस्म चढ़ा सकती हैं या नहीं, इस विषय पर वे प्रमाणों के साथ अवश्य एक अलग वीडियो बनाएँगे। यह पूछे जाने पर कि मंत्र जप में मन का भटकना क्या किसी गलती का संकेत है, वे उत्तर देते हैं नहीं — मन का भटकना दोष नहीं है; जब तक अभ्यास नहीं आता, मन भटकेगा। शिवलिंग छूने पर कहीं कोई निषेध नहीं है। स्त्रियाँ शिवलिंग बिल्कुल छू सकती हैं, उसका शृंगार बिल्कुल कर सकती हैं; कोई निषेध किए जाने की बात नहीं है।
क्या शरीर छोड़ चुके संत की गुरु रूप में पूजा की जा सकती है?
हाँ; भौतिक गुरु दो-तीन कारणों से ज़रूरी है
एक श्रोता ने पूछा कि क्या शरीर छोड़ चुके संत-महात्माओं की गुरु रूप में पूजा की जा सकती है; वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल की जा सकती है; कोई दिक्कत नहीं, और उनकी कृपा भी मिलेगी। वे दोहराते हैं कि भौतिक रूप में गुरु दो-तीन कारणों से चाहिए: जब आप विशेष रूप से किसी मंत्र की पूर्ण सिद्धि, या पूरे विधि विधान के साथ उसका जप चाहते हैं; और दूसरा, जब आप षट्कर्म प्रयोग आदि करना चाहते हैं।
एक श्रोता ने पूछा कि क्या शरीर छोड़ चुके संत-महात्माओं की गुरु रूप में पूजा की जा सकती है, और उनके लिए क्या करना चाहिए; वे कहते हैं कि बिल्कुल की जा सकती है — कोई दिक्कत नहीं, और उनकी कृपा भी मिलेगी। वे वही दोहराते हैं जो बार-बार कहते हैं: कि भौतिक रूप में गुरु की ज़रूरत आपको दो-तीन कारणों से है। पहला, जब आप विशेष रूप से किसी मंत्र की पूर्ण सिद्धि, या पूरे विधि विधान के साथ उसका जप चाहते हैं। दूसरा, जब आप षट्कर्म प्रयोग आदि करना चाहते हैं। इसके अलावा, आप ऐसे किसी की बिल्कुल पूजा कर सकते हैं।
रात दस बजे शुरू हुई पूजा बारह के बाद खत्म हो तो क्या दोष लगता है?
सुबह आठ बजे तक सबसे अच्छा; रात में काम करने वाले समय बदल सकते हैं
एक श्रोता ने पूछा कि दस बजे शुरू हुआ पूजा पाठ बारह के बाद खत्म हो तो क्या दोष लगता है; वक्ता कहते हैं कि यदि आप सुबह दस बजे पाठ करते हैं — क्योंकि प्रश्नकर्ता ने तारकासुर नाम लिखा है — तो उसी तरह उसे राक्षसी कर्म माना गया है। हो सके तो सुबह करने का प्रयास करें; वह बहुत अच्छा होगा, और कम से कम आठ बजे तक पूरा कर लेना चाहिए। पर यदि आपकी व्यवस्था ऐसी है कि आप नाइट शिफ्ट की नौकरी करते हैं, जिनमें से बहुत-सी में सारा काम हमेशा रात में करना पड़ता है और फिर आप सुबह पूजा नहीं कर पाते, तो शाम को, कम से कम समय पर, करने का प्रयास करें।
एक श्रोता ने पूछा कि यदि पूजा पाठ दस बजे शुरू होकर बारह के बाद खत्म हो तो क्या कोई दोष लगता है; वे उत्तर देते हैं कि यदि आप सुबह दस बजे पाठ करते हैं — प्रश्नकर्ता ने तारकासुर नाम लिखा है — तो उसी तरह उसे राक्षसी कर्म माना गया है। हो सके तो सुबह करने का प्रयास करें; वह बहुत अच्छा होगा, और कम से कम आठ बजे तक पूरा कर लेना चाहिए। पर यदि आपकी व्यवस्था ऐसी है कि आप नाइट शिफ्ट की नौकरी करते हैं — और बहुत-सी नौकरियाँ हैं जिनमें सारा काम हमेशा रात में करना पड़ता है, जिसके बाद आप सुबह पूजा नहीं कर पाते — तो प्रयास करें कि शाम को कम से कम समय पर हो जाए।
नाम जप के समय शरीर बहुत क्यों हिलता है?
या तो नकारात्मक शक्ति या ऊर्जा का असंतुलन
वक्ता कहते हैं कि मजबूरी हो तो आप दस बजे कर सकते हैं, पर शाम की पूजा समय पर होनी चाहिए, और देश, काल और परिस्थिति के अनुसार आप अपना समय तय कर सकते हैं — यह अनिवार्य नहीं, और यदि आपका जीवन ही ऐसा है कि आप सुबह नहीं कर पाते, तो कोई दोष नहीं। यह पूछे जाने पर कि नाम जप के समय शरीर में बहुत हलचल क्यों होती है कि आसन पर ठीक से बैठा नहीं जाता, वे कहते हैं कि इसके दो कारण हैं: या तो कोई नकारात्मक शक्ति, या ऊर्जा का असंतुलित होना। इनमें से कौन-सा है, यह आप ही जानेंगे।
वे कहते हैं कि मजबूरी हो तो आप दस बजे कर सकते हैं, पर शाम की पूजा समय पर होनी चाहिए। देश, काल और परिस्थिति के अनुसार आप अपना समय तय कर सकते हैं; यह अनिवार्य नहीं है। यदि आपका जीवन ही ऐसा है कि आप सुबह करने में सक्षम नहीं हैं, तो कोई दोष नहीं। यह पूछे जाने पर कि नाम जप करते समय शरीर में इतनी हलचल क्यों होती है कि आसन पर ठीक से बैठा नहीं जाता, वे कहते हैं कि नाम जप से या किसी भी मंत्र के जप से बहुत बेचैनी के दो कारण हैं। पहला, या तो कोई नकारात्मक शक्ति; दूसरा, ऊर्जा का असंतुलित होना। इनमें से कौन-सा लागू होता है, यह आप स्वयं जानेंगे — कि आपकी वंश-रेखा में कोई नकारात्मक ऊर्जा कष्ट दे रही है, या ऊर्जा असंतुलित है।
दक्षिणमुखी घर का स्थायी समाधान क्या है?
केवल दक्षिणमुखी होने से कुछ तय नहीं होता; पीला बंधनवार
एक श्रोता ने दक्षिणमुखी घर के वास्तु दोष का स्थायी समाधान पूछा; वक्ता कहते हैं कि केवल दक्षिणमुखी होने से यह नहीं कहा जा सकता: दक्षिणमुख के साथ बाकी सभी विषय भी देखने पड़ते हैं, और वे श्रोता से टेलीग्राम मैसेज पर एक सरल नक्शा भेजने को कहते हैं। दक्षिणमुख के लिए एक बहुत छोटे सामान्य उपाय के रूप में वे कहते हैं कि घर के मुख्य द्वार को सजाने के लिए जो बंधनवार लगता है, वह पीले कपड़े का बनाएँ, या जितना हो सके पीले रंग से सजाएँ।
एक श्रोता ने दक्षिणमुखी घर के वास्तु दोष का स्थायी समाधान पूछा; वे कहते हैं कि केवल दक्षिणमुखी होने से ऐसा नहीं कहा जा सकता: दक्षिणमुख के साथ बाकी सभी विषय भी देखने चाहिए। वे श्रोता से एक सरल नक्शा बनाकर टेलीग्राम मैसेज भेजने को कहते हैं, फिर वे बताएँगे। सामान्य रूप से, दक्षिणमुख के लिए सबसे छोटा उपाय यह है: आपके घर के सामने के मुख्य द्वार पर जो बंधनवार सजावट के लिए लगता है — यानी मुख्य द्वार की सजावट — वह पीले कपड़े से बना हो, या जितना हो सके पीले रंग का प्रयोग करके सजाया जाए।
सावन में रोज़ कितना पंचाक्षरी जप करें, और क्या न्यास ज़रूरी है?
विनियोग और न्यास के साथ इक्यावन माला
एक श्रोता कहते हैं कि वे रोज़ बाबा के पंचाक्षरी मंत्र की इक्यावन माला कर रहे हैं और पूछते हैं कि सावन में कितना करें और क्या विनियोग और न्यास ज़रूरी है। वक्ता कहते हैं कि यदि आप दीक्षित हैं, तो विनियोग, न्यास आदि करके इक्यावन माला जप करें। और दीक्षित न भी हों, पर इतना जप करते हों, तो न्यास आदि के साथ करना बहुत अच्छा है।
एक श्रोता कहते हैं कि वे रोज़ बाबा के पंचाक्षरी मंत्र की इक्यावन माला कर रहे हैं और पूछते हैं कि सावन में रोज़ कितना जप करें, और क्या उसका विनियोग और न्यास भी ज़रूरी है। वक्ता कहते हैं कि यदि आप दीक्षित हैं, तो विनियोग, न्यास आदि करते हुए अपनी इक्यावन माला का जप करें। और दीक्षित न भी हों पर इतना जप करते हों, तो न्यास आदि के साथ करना बहुत अच्छा है।
जब सपने में कोई आपकी गलतियाँ बताए पर बताने वाला दिखे नहीं, तो इसका क्या अर्थ है?
विशेष कृपा; न दिखने का अर्थ है तपोबल बढ़ाना है
एक श्रोता ने पूछा कि जब सपने में किसी की गलतियाँ बताई जाएँ और उनका उपाय भी दिया जाए पर बताने वाला न दिखे, तो इसका क्या संकेत है; वक्ता उत्तर देते हैं कि आप पर किसी शक्ति की बहुत विशेष कृपा है, क्योंकि आपकी गलतियाँ बताई जा रही हैं और उपाय भी दिया जा रहा है। दिखने या न दिखने में न उलझें: आपको इतनी कृपा मिली है कि आपको बताया जा रहा है। पर यदि वे नहीं दिखते, तो इसका अर्थ है कि आपको अपना तपोबल और बढ़ाना है।
एक श्रोता ने पूछा कि सपने में जब किसी व्यक्ति को उसकी गलतियाँ बताई जाएँ और उपाय भी बताया जाए, पर बताने वाला न दिखे, तो इसका क्या संकेत है; वे उत्तर देते हैं कि अवश्य किसी शक्ति की बहुत विशेष कृपा है, क्योंकि आपकी गलतियाँ बताई जा रही हैं और उपाय भी बताया जा रहा है। दिखने या न दिखने की बात में न फँसें; आपको इतनी कृपा मिली है कि आपको बताया जा रहा है। पर यदि वे नहीं दिखते, तो इसका अर्थ है कि आपको अपना तपोबल और बढ़ाना है।
क्या भोलेनाथ को गुरु और पंचाक्षरी को गुरु मंत्र मानना उचित है?
आप स्वतंत्र हैं; पर षट्कर्म न करें, न वरदान दें न शाप
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने भोलेनाथ को गुरु बनाया है, शिव मंदिर जाकर विधि से उन्हें गुरु स्वीकार किया और संकल्प लिया है, और पूछते हैं कि क्या पंचाक्षरी मंत्र का गुरु मंत्र के रूप में जप करना उचित है। वक्ता कहते हैं कि आप अपने अनुसार यह करने को स्वतंत्र हैं; इसमें उचित-अनुचित की कोई बात नहीं। बहुत लोग इसे अनुचित कह सकते हैं और बहुत लोग समर्थन कर सकते हैं। उनके मत में, आपके भीतर जो भी भाव है, किसी के कुछ कहने से उसे न बदलें: यदि आपका समर्पण सदाशिव में है, यदि आप उन्हें गुरु मानकर चल रहे हैं और सब अच्छा चल रहा है, तो चलते रहें। बस षट्कर्म न करें, कभी किसी को वरदान न दें और कभी शाप न दें। शिव में डूबे रहें।
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्होंने भोलेनाथ को गुरु बनाया है, शिव मंदिर जाकर विधि से उन्हें गुरु स्वीकार किया और संकल्प लिया है, और पूछते हैं कि क्या पंचाक्षरी मंत्र का गुरु मंत्र के रूप में जप करना उचित है। वक्ता उत्तर देते हैं कि आप अपने अनुसार यह करने को स्वतंत्र हैं; इसमें उचित-अनुचित की कोई बात नहीं। बहुत लोग इसे अनुचित कह सकते हैं, और बहुत लोग इसका समर्थन कर सकते हैं। उनके अनुसार, आपके भीतर जो भी भाव है, किसी के कुछ कहने से उसे न बदलें। यदि आपका समर्पण सदाशिव में है और आप उन्हें गुरु मानकर चल रहे हैं, और सब अच्छा चल रहा है, तो चलते रहें। बस षट्कर्म न करें; कभी किसी को वरदान न दें और कभी शाप न दें। शिव में डूबे रहें — कोई दिक्कत नहीं।
तंत्र प्रयोग में पीड़ित को कुछ कैसे खिलाया जाता है?
विसर्जन पर, होलिका दहन के बाद, दीवाली की रात खिलाया गया
एक श्रोता ने पूछा कि तंत्र और बीमारी से कम उम्र में अकड़ गए और कमज़ोर हो गए शरीर को फिर से कैसे ठीक करें, और कायाकल्प कैसे होता है; वक्ता समझाते हैं कि जब तंत्र से शरीर में कोई रोग लगता है, तो पहली बात यह है कि कुछ खिलाया गया है — और खिलाना केवल एक बार नहीं होता। यह किसी विशेष नक्षत्र में, किसी विशेष समय पर किया जाता है: जैसे दुर्गा पूजा में विसर्जन के समय, जब कलश आदि विसर्जन के लिए घर से निकलते हैं, यदि उस समय मिठाई के बहाने कुछ खिला दिया गया हो। या होलिका दहन के बाद — वे कहते हैं कि होलिका के समय उन्होंने कम से कम दस वीडियो बनाकर हर बात साफ समझाई थी। या दीवाली की रात मिठाई कहकर, प्रसाद कहकर कुछ खिला दिया गया हो, तो यह बहुत कठिन हो जाता है।
एक श्रोता ने पूछा कि तंत्र और दूसरी बीमारियों से कम उम्र में अकड़ गया और कमज़ोर हो गया शरीर फिर से पहले जैसा कैसे हो सकता है, और कायाकल्प कैसे किया जाए; वक्ता कहते हैं कि जब तंत्र से शरीर में कोई रोग लगता है, तो पहली बात यह है कि कुछ खिलाया गया है, और खिलाना केवल एक बार नहीं होता। कुछ ऐसा होता है कि उसे किसी विशेष नक्षत्र में, किसी विशेष समय पर किया जाता है — जैसे दुर्गा पूजा में जब विसर्जन का समय आता है; जिस क्षण भगवती का विसर्जन हो रहा हो, जब कलश विसर्जन के लिए घर से निकलता है, यदि उस समय मिठाई के बहाने कुछ खिला दिया गया हो। या होलिका दहन के बाद — वे कहते हैं कि होलिका के समय उन्होंने कम से कम दस वीडियो बनाए थे, हर बात साफ समझाते हुए कि कैसे और क्या होता है। यदि उस समय कुछ खिला दिया गया हो; या दीवाली की रात मिठाई कहकर, प्रसाद कहकर, तो यह सचमुच बहुत कठिन हो जाता है।
खिलाए गए तंत्र की उम्र से क्या अंतर पड़ता है?
बारह दिन, बारह महीने, बारह वर्ष
वक्ता कहते हैं: बारह दिन, बारह महीने, या बारह वर्ष — इतनी देरी। यदि बारह दिन की देरी हुई, तो वह तंत्र कटेगा, बाहर निकलेगा, पर परेशान करेगा। यदि बारह महीने बीत गए, तो वह बीच से ऊपर चला गया, उसने अपनी जड़ फैला ली, और अब आपका कष्ट बड़ा होगा: आपकी बुद्धि उखड़ जाएगी और आप समझ नहीं पाएँगे। यदि बारह वर्ष बीत गए, तो उसकी काट किसी सिद्ध और ऊँचे स्तर के साधक द्वारा ही ठीक से होती है, या केवल देव कृपा से ही वह ठीक से सुधरता है।
वे कहते हैं: बारह दिन, बारह महीने या बारह वर्ष — यदि इतनी देरी हो गई है। यदि बारह दिन की देरी होती है, तो वह तंत्र कटेगा, बाहर निकलेगा, पर परेशान करेगा। यदि बारह महीने बीत गए, तो वह बीच के स्तर से ऊपर चला गया, उसने अपनी जड़ फैला ली, और अब आपका कष्ट बड़ा होगा; आपकी बुद्धि उखड़ जाएगी और आप समझ नहीं पाएँगे। यदि बारह वर्ष बीत गए, तो उसकी काट किसी सिद्ध और ऊँचे स्तर के साधक द्वारा ठीक से होती है, या केवल देव कृपा से ही वह ठीक से सुधरता है।
तंत्र से बिगड़े शरीर का कायाकल्प कैसे होता है?
पहले काट, बंधन और रक्षा; तभी कायाकल्प
वक्ता कहते हैं कि कायाकल्प के लिए पहली बात यह है कि तंत्र की काट — जड़, जो भी खिलाया या पिलाया गया, या तंत्र में जो कुछ और किया गया — पूरी तरह जड़ से नष्ट होनी चाहिए, बंधन होना चाहिए, और शरीर की रक्षा होनी चाहिए। तभी आप अलग से कायाकल्प का प्रयास कर सकते हैं। वे साफ कहते हैं कि वर्तमान समय में सौ प्रतिशत असंभव है; ऐसा बहुत बार होता है, पर तभी जब तपोबल और ऊर्जा उस तरह की हो और कुंडली में ग्रह भी ऐसे योग बना रहे हों।
कायाकल्प होने के लिए, यदि शारीरिक अवस्था बहुत बिगड़ गई है और क्षय आ गया है, तो सबसे पहले तंत्र की काट — वह जड़, जो भी खिलाया या पिलाया गया, या तंत्र का जो कुछ और किया गया — पूरी तरह जड़ से नष्ट होनी चाहिए; बंधन होना चाहिए, और शरीर की रक्षा की जानी चाहिए। तभी आप अलग से कायाकल्प आदि का प्रयास कर सकते हैं। वे साफ कहते हैं कि वर्तमान समय में सौ प्रतिशत असंभव है। ऐसा अक्सर होता है, पर तभी जब तपोबल और ऊर्जा उस स्तर की हो और कुंडली में ग्रह भी ऐसे योग बना रहे हों; नहीं तो पुराना हो जाने पर, जो नुकसान हो चुका है, वह इस जन्म में आसानी से पूरा नहीं होता। फिर भी ऐसा नहीं कि बिल्कुल नहीं हो सकता — सिद्ध कृपा करें, तो संभव है।
गाँव की देवियाँ बासंती और कंठी कौन हैं?
जानकारी के बिना वे उत्तर देने से मना करते हैं
एक श्रोता ने पूछा कि उनके गाँव में पूजी जाने वाली माता बासंती और माता कंठी भगवती का कौन-सा रूप हैं, और क्या वे कोई शक्ति हैं; वक्ता कहते हैं कि उन्हें उनके बारे में कोई जानकारी नहीं, इसलिए वे बिल्कुल नहीं बोल सकते। वे लोक देवियाँ हो सकती हैं, या किसी और रूप में हो सकती हैं — वे ऐसे ही कैसे कह दें? इसे देखना पड़ेगा। वे श्रोता से पूरा विवरण भेजने को कहते हैं ताकि वे पता कर सकें और तभी बोलें; अपने आप कैसे बोलें?
एक श्रोता ने पूछा कि उनके गाँव में पूजी जाने वाली माता बासंती और माता कंठी भगवती का कौन-सा रूप हैं, और क्या वे कोई शक्ति हैं; वक्ता कहते हैं कि उन्हें इस विषय की कोई जानकारी नहीं, इसलिए वे बिल्कुल नहीं बोल सकते। वे लोक देवियाँ हो सकती हैं, या किसी और रूप में होंगी; वे ऐसे ही कैसे कह दें? इसे देखना पड़ेगा। वे श्रोता से पूरा विवरण भेजने को कहते हैं, ताकि वे पता करवा सकें और तभी बोलें। वे पूछते हैं, अपने आप कैसे बोलें?
आम की लकड़ी न मिले तो हवन में कौन-सी लकड़ी प्रयोग करें?
आम वर्जित है; साल की लकड़ी प्रयोग करें
एक श्रोता ने पूछा कि आम की लकड़ी न मिले तो क्या हवन में उपलब्ध दूसरी लकड़ी प्रयोग कर सकते हैं; वक्ता कहते हैं कि इस विषय की सबसे बड़ी बात यह है कि हवन की लकड़ी हर जगह आसानी से मिल जाती है, इसीलिए लोग हवन में आम की लकड़ी प्रयोग करते हैं। पर यदि आप शास्त्रोक्त विधानों में जाएँ, तो हवन में आम की लकड़ी पूरी तरह वर्जित है। हवन में आम की लकड़ी बिल्कुल प्रयोग नहीं करनी चाहिए।
एक श्रोता ने पूछा कि हवन के लिए आम की लकड़ी न मिले तो क्या जो लकड़ी उपलब्ध है उसे प्रयोग कर सकते हैं; वक्ता कहते हैं कि इस विषय की सबसे बड़ी बात यह है कि हवन की लकड़ी आसानी से मिल जाती है, इसीलिए लोग हवन में आम की लकड़ी प्रयोग करते हैं। पर यदि आप शास्त्रोक्त विधानों में जाएँ, तो हवन में आम की लकड़ी पूरी तरह वर्जित है। हवन में आम की लकड़ी बिल्कुल प्रयोग नहीं करनी चाहिए। वे कहते हैं कि साल की लकड़ी आपको आराम से मिल सकती है।
साल की लकड़ी कहाँ से लाएँ और कैसे तैयार करें?
लकड़ी की टाल से, एक-एक बित्ता काटकर; या गोबर के उपले
वक्ता कहते हैं कि जहाँ लकड़ी रखी जाती है, लकड़ी की टाल जहाँ दरवाज़े आदि बनते हैं, ऐसी जगह से जितनी हो सके साल की लकड़ी लाकर रख लें। उसके छोटे-छोटे टुकड़े करें, हर एक एक बित्ता, एक हाथ की बालिश्त का, और उससे हवन करें; या मुख्य रूप से गाय के गोबर के उपलों का प्रयोग करें।
जहाँ लकड़ी रखी जाती है — लकड़ी की टाल जहाँ दरवाज़े आदि बनते हैं, जहाँ भी ऐसी लकड़ी रखी हो — उस जगह से जितनी हो सके साल की लकड़ी लाकर रख लें। उसके छोटे-छोटे टुकड़े करें, हर एक एक बित्ता, एक बालिश्त का, और उससे हवन करें। या वे कहते हैं, मुख्य रूप से गाय के गोबर के उपलों का प्रयोग करें, और फिर आगे के श्रोताओं का नाम लेकर अभिवादन करते हैं।
गुरु पूर्णिमा पर कौन-सी विशेष साधना करें?
गोरखनाथ, गुरु गोरख साबर नवनाथ, और दत्तात्रेय
एक श्रोता ने पूछा कि क्या गुरु पूर्णिमा पर विशेष साधना करनी चाहिए; वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं। जिन सबने विशेष रूप से भगवान गोरखनाथ की साधना की है, वे उस दिन फिर से गुरु गोरख साबर नवनाथ साधना आदि एक दिन के अनुष्ठान के रूप में करें। जिन्होंने भगवान दत्तात्रेय की की है, वे भगवान दत्तात्रेय की साधना करें। यह आप कर सकते हैं।
एक श्रोता ने पूछा कि क्या गुरु पूर्णिमा पर विशेष साधना करनी चाहिए; वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल की जा सकती है। जिन सबने विशेष रूप से भगवान गोरखनाथ की साधना की है, वे उस दिन फिर से गुरु गोरख साबर नवनाथ साधना आदि एक दिन के अनुष्ठान के रूप में करें। जिन्होंने भगवान दत्तात्रेय की की है, वे भगवान दत्तात्रेय की साधना करें। वे कहते हैं, यह आप कर सकते हैं।
क्या तंत्र से मुक्ति के लिए सहस्राक्षरी स्तोत्र सिद्ध किया जा सकता है?
शताक्षरी को छोड़कर नहीं
एक श्रोता पूछते हैं कि श्रावण में श्री सहस्राक्षरी स्तोत्र कैसे सिद्ध करें कि तंत्र से मुक्ति मिले। वक्ता उत्तर देते हैं कि सहस्राक्षरी स्तोत्र को सिद्ध करने के लिए भी — पर प्रश्नकर्ता ने अब शताक्षरी को छोड़ दिया है और सीधे सहस्राक्षरी में चले गए हैं। वे कहते हैं कि उनके अनुसार आप ऐसा नहीं कर सकते। अपने निर्णय के लिए आप स्वतंत्र हैं; उनके अनुसार आप इस तरह सहस्राक्षरी का प्रयोग नहीं कर सकते।
एक श्रोता पूछते हैं कि श्रावण में श्री सहस्राक्षरी स्तोत्र कैसे सिद्ध किया जाए ताकि तंत्र से मुक्ति मिले। वक्ता उत्तर देते हैं कि सहस्राक्षरी स्तोत्र को सिद्ध करने के लिए भी — पर प्रश्नकर्ता ने अब शताक्षरी को छोड़ दिया है और सीधे सहस्राक्षरी में चले गए हैं। वे कहते हैं कि उनके अनुसार आप इस तरह नहीं कर सकते। अपने निर्णय के लिए आप स्वतंत्र हैं; उनके अनुसार आप ऐसे सहस्राक्षरी का प्रयोग नहीं कर सकते।
क्या सूतक और पातक में पूजा पाठ फिर से शुरू किया जा सकता है?
पूरा होने तक पूरी तरह वर्जित
एक श्रोता कहते हैं कि उनके घर में सूतक और पातक दोनों लगे हैं — सूतक के इक्कीस दिन और पातक के अठारह दिन बीत चुके हैं — और पूछते हैं कि क्या वे श्रावण में शिव पुराण पढ़ सकते हैं और गुरु पूर्णिमा से पूजा और जप फिर शुरू कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि यदि सूतक और पातक लगे हैं और पूरे नहीं हुए, तो पूजा पाठ, धूप, दीप और श्री विग्रहों को छूना पूरी तरह वर्जित रखना चाहिए; ये नहीं करने चाहिए।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनके घर में सूतक और पातक दोनों लगे हैं: सूतक के इक्कीस दिन और पातक के अठारह दिन बीत चुके हैं। वे पूछते हैं कि क्या वे श्रावण मास में शिव पुराण का अध्ययन कर सकते हैं और गुरु पूर्णिमा से पूजा, जप आदि फिर शुरू कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि यदि सूतक और पातक लगे हैं और अभी पूरे नहीं हुए, तो पूजा पाठ, धूप, दीप और श्री विग्रहों को छूना पूरी तरह वर्जित रखना चाहिए। ये नहीं करने चाहिए।
सूतक और पातक में क्या पढ़ा जा सकता है?
शिव गीता, और बिना दीप-धूप के शिव महापुराण
कौन-सा पाठ किया जा सकता है? शिव महापुराण पढ़ने पर वक्ता कहते हैं कि वे पूरे निश्चय से नहीं कहेंगे, पर इस अवस्था में आप शिव गीता पढ़ सकते हैं। यदि पूरा शिव महापुराण भी पढ़ना चाहें, तो शुद्ध होकर, बिना धूप-दीप जलाए, अच्छे कपड़े पर और अच्छे आसन पर रखकर पढ़ सकते हैं। पर धूप, दीप और वह सब नहीं करना है, और पूजा कक्ष में या उपासना के स्थान पर नहीं करना है।
कौन-सा पाठ किया जा सकता है? शिव महापुराण पढ़ने पर वे कहते हैं कि वे पूरे निश्चय से नहीं कहेंगे, पर इसमें आप शिव गीता पढ़ सकते हैं। यदि आप पूरा शिव महापुराण भी पढ़ना चाहें, तो शुद्ध होकर, बिना धूप-दीप जलाए, उसे अच्छे कपड़े और अच्छे आसन पर रखकर पढ़ सकते हैं। पर धूप, दीप और वह सब नहीं करना है, और यह पूजा कक्ष में नहीं, उपासना के स्थान पर नहीं करना है।
घर या शरीर पर लगी मसानी शक्ति कैसे शांत की जाती है?
बामथ मसान, और काली और दुर्गा की योगिनियाँ
एक श्रोता ने पूछा कि घर या शरीर पर लगी मसानी शक्ति कैसे शांत की जाए; वक्ता कहते हैं कि उसे शांत करने के बहुत-बहुत प्रयोग हैं, और यह इस पर निर्भर है कि वह कौन-सी शक्ति है, और फिर उसी के अनुसार। एक श्रोता के "वैवत" या "भवत तामसिक शक्तियाँ" लिखने पर वे कहते हैं कि शायद शब्द का हेरफेर है: जिसे वैवत लिखा गया है, उसे मसान में हम बामथ कहते हैं। उसे शांत करने के लिए विशेष रूप से भगवती काली और भगवती दुर्गा की योगिनियों की सहायता ली जाती है।
एक श्रोता ने पूछा कि घर या शरीर पर लगी मसानी शक्ति कैसे शांत होती है; वे कहते हैं कि उसे शांत करने के बहुत-बहुत प्रयोग हैं; यह इस पर निर्भर है कि वह कौन-सी शक्ति है, और फिर उसी के अनुसार चलता है। एक श्रोता के लिखे शब्द पर वे कहते हैं कि शायद शब्द का हेरफेर हुआ है: जिसे वैवत लिखा गया है, उसे मसान में हम बामथ कहते हैं। उसे शांत करने के लिए विशेष रूप से भगवती काली और भगवती दुर्गा की योगिनियों की सहायता ली जाती है।
क्षेत्रपाल निकारी कितने दिन टिकती है, और उसके बाद क्या करना चाहिए?
तीन दिन, और उसके बाद ज़रूरी तेज बंधन
वक्ता कहते हैं कि क्षेत्रपाल निकारी में यह चीज़ तीन दिन के लिए हटती है। इसे तीन दिन से तेरह दिन तक माना गया है, पर तीसरे या चौथे दिन तक चीज़ें लौटने लगती हैं। इसलिए निकारी के बाद जो तीन दिन का समय मिलता है, उसमें बार-बार क्षेत्रपाल पूजा देते हुए घर का पूरा और ठीक तेज बंधन करना चाहिए, और चीज़ को रोककर उसका बंधन करना चाहिए।
वे कहते हैं कि क्षेत्रपाल निकारी में यह चीज़ तीन दिन के लिए हटती है। इसे तीन दिन से तेरह दिन तक माना गया है, पर तीसरे या चौथे दिन तक चीज़ें लौटने लगती हैं। इसलिए निकारी के बाद जब आपको वह तीन दिन का समय मिले, तो बार-बार क्षेत्रपाल पूजा देते हुए घर का पूरा और ठीक तेज बंधन होना चाहिए, चीज़ को रोकना चाहिए, और उसका बंधन करवाना चाहिए।
शिव पुराण का कौन-सा प्रकाशन लें, और अशोक के पत्तों का प्रयोग कैसे करें?
ठाकुर प्रसाद या गीता प्रेस; द्वार पर अशोक के पत्ते
एक श्रोता ने पूछा कि पाठ के लिए किस प्रकाशन का शिव पुराण लें; वक्ता कहते हैं कि आप ठाकुर प्रसाद का, या गीता प्रेस का ले सकते हैं, जो दो पूरे भागों, पूर्वार्ध और उत्तरार्ध, में आता है, जिसमें आप पूरा शिव महापुराण पढ़ सकते हैं; यह बहुत अच्छा रहेगा, और संक्षिप्त संस्करण से बचें। अशोक के पत्तों के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि इनका प्रयोग घर में सजावट के लिए होता है — मुख्य द्वार पर बंधनवार के लिए जिस जगह हम आम के पत्ते लगाते हैं, वहीं अशोक के पत्ते भी लगाने चाहिए, और घर के मंदिर को सजाने में भी इनका प्रयोग करना चाहिए।
एक श्रोता ने पूछा कि पाठ के लिए किस प्रकाशन का शिव पुराण लें; वे कहते हैं कि आप ठाकुर प्रसाद का, या गीता प्रेस का ले सकते हैं, जो दो भागों में आता है। दो भागों, पूर्वार्ध और उत्तरार्ध, में आप पूरा शिव महापुराण पढ़ सकते हैं; यह बहुत अच्छा रहेगा। वे कहते हैं, संक्षिप्त संस्करण से बचें। यह पूछे जाने पर कि कष्ट दूर करने के लिए अशोक के पत्तों का प्रयोग कैसे होता है, और क्या उन्हें दुर्गा माँ, शिव जी और सभी देवी देवताओं को दिखाकर रोज़ उनके आगे दीपक जलाया जा सकता है, वे कहते हैं हाँ, बिल्कुल: मुख्य द्वार पर बंधनवार के लिए जिस जगह हम आम के पत्ते लगाते हैं, वहीं घर सजाने में अशोक के पत्तों का प्रयोग होता है, और घर के मंदिर को सजाने में भी इनका प्रयोग करना चाहिए।
किसी रिश्तेदार को कैंसर हो तो परिवार क्या करे?
पहले चिकित्सा, साथ में रुद्राभिषेक
एक श्रोता ने पूछा कि किसी रिश्तेदार को कैंसर हो और घर में सब परेशान हों तो क्या करें; वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले जो चिकित्सा चल रही है, वह ठीक से चलनी चाहिए। उसके साथ, यदि आप सक्षम हैं, तो योग्य और विद्वान आचार्यों से रुद्राभिषेक का विधि विधान करवाएँ। वे कहते हैं कि कैंसर में शरीर में विष बनता है — इसे विषघाती रोग कहा गया है — और विष की शांति केवल भगवान सदाशिव के द्वारा ही संभव है।
एक श्रोता ने पूछा कि किसी रिश्तेदार को कैंसर हो और घर में सब परेशान हों तो क्या करना चाहिए; वे कहते हैं कि सबसे पहले जो चिकित्सा चल रही है, वह ठीक से चलनी चाहिए। उसके साथ, यदि आप सक्षम हैं, तो योग्य और विद्वान आचार्यों से रुद्राभिषेक का विधि विधान करवाएँ। वे कहते हैं कि कैंसर में शरीर में विष बनता है; इसे विषघाती रोग कहा गया है। और विष की शांति केवल भगवान सदाशिव के द्वारा ही संभव है।
एकादशनी करें या शतरुद्रीय?
किसी विद्वान की सलाह लें; कुछ लाभ अवश्य होगा
वक्ता कहते हैं कि चिकित्सा तो आपको करवानी ही है, पर उसके साथ किसी विद्वान व्यक्ति से सलाह लें कि रुद्राभिषेक कैसे किया जाए — एकादशनी करनी है या शतरुद्रीय। उनकी सलाह लेकर ठीक से करें; आपको कुछ न कुछ अवश्य प्राप्त होगा।
वे कहते हैं कि चिकित्सा तो आपको करवानी ही है, पर उसके साथ किसी विद्वान व्यक्ति की सलाह लें कि रुद्राभिषेक कैसे किया जाए, और करें। एकादशनी करनी है या शतरुद्रीय — उनकी सलाह लेकर ठीक से करें। आपको कुछ न कुछ अवश्य प्राप्त होगा।
भजन, भोजन और भोग को सदा गुप्त क्यों रखना चाहिए?
भजन, भोजन और भोग सदा गुप्त रखे जाते हैं
यह पूछे जाने पर कि वे रोज़ कितना जप या कितनी माला करते हैं, ताकि श्रोताओं को भी प्रेरणा मिले, वक्ता कहते हैं कि यह निर्भर करता है, और पूछते हैं कि वे क्यों बताएँ कि वे कितना करते हैं और क्या करते हैं। वे कहते हैं कि भजन, भोजन और भोग सदा गुप्त रखने चाहिए। इनके साथ आपका धन, आपका मंत्र, आपके गुरु, और — मुख्य रूप से कहें तो — आपके कुल की बहू, चाहे आपकी अपनी पत्नी हो या आपकी बेटी की बहू, ये सब सदा गुप्त रखने चाहिए और प्रकट नहीं करने चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि वे रोज़ कितना जप या कितनी माला करते हैं, ताकि श्रोताओं को भी प्रेरणा मिले, वे कहते हैं कि यह निर्भर करता है, और पूछते हैं कि वे क्यों बताएँ कि वे कितना करते हैं और क्या करते हैं। वे कहते हैं कि भजन, भोजन और भोग सदा गुप्त रखने चाहिए। इनके साथ आपका धन, आपका मंत्र, आपके गुरु, और — मुख्य रूप से कहें तो — आपके कुल की बहू, चाहे आपकी अपनी पत्नी हो या आपकी बेटी की बहू: ये सब सदा गुप्त रखने चाहिए और कभी प्रकट नहीं करने चाहिए।
यदि हमारे साथ की सकारात्मक शक्ति मदद न कर रही हो तो क्या करें?
हनुमान जी के उचित अनुष्ठान से उस शक्ति को बढ़ाएँ
एक श्रोता ने पूछा कि किसी के साथ कोई शक्ति हो फिर भी नकारात्मक ऊर्जा परेशान करे तो क्या करें; वक्ता कहते हैं कि यह देखने की बात है: आपके साथ जो भी सकारात्मक शक्ति है, उस शक्ति को बढ़ाएँ। मान लीजिए हनुमान जी का कोई गण आपके साथ है पर आपका सहयोग नहीं कर पा रहा — तो आपको हनुमान जी के किसी एक रूप, एकमुखी, पंचमुखी, सप्तमुखी या एकादशमुखी, का पूरे विधि विधान के साथ अनुष्ठान करना चाहिए। उसके साथ राम दरबार सहित भगवान श्री राम और सीता जी की सेवा पूजा होनी चाहिए।
एक श्रोता ने पूछा कि किसी के साथ कोई शक्ति हो और फिर भी नकारात्मक ऊर्जा परेशान करे तो क्या उपाय है; वक्ता कहते हैं कि यह देखने का विषय है: आपके साथ जो भी सकारात्मक शक्ति है, उसकी शक्ति बढ़ाएँ। मान लीजिए हनुमान जी का कोई गण आपके साथ है पर आपको सहयोग नहीं दे पा रहा। तब आपको पूरे विधि विधान के साथ हनुमान जी के किसी एक रूप का अनुष्ठान करना चाहिए — एकमुखी, पंचमुखी, सप्तमुखी या एकादशमुखी। उसके साथ राम दरबार सहित भगवान श्री राम और सीता जी की सेवा पूजा होनी चाहिए। आप हनुमान चालीसा का संपुटित पाठ कर सकते हैं, यह संकल्प लेकर कि यदि आप सकारात्मक ऊर्जा का नाम जानते हैं तो उसकी शक्ति बढ़े, उसके द्वारा आपको रक्षा मिले, और नकारात्मक शक्ति घटे।
क्या तुलसी जी के पास, विशेषकर कार्तिक में, अखंड दीपक जलाया जा सकता है?
हाँ, वहाँ शालिग्राम स्थापित करके, और बारिश का ध्यान रखकर
एक श्रोता ने पूछा कि क्या तुलसी जी के पास, विशेषकर कार्तिक में, अखंड दीपक जलाया जा सकता है; वक्ता कहते हैं कि जब भी आप तुलसी जी के पास अखंड दीपक जलाएँ, उस समय वहाँ शालिग्राम शिला भी स्थापित करें, या भगवान श्री नारायण का श्री विग्रह स्थापित करके करें। यदि आप बाहर अखंड ज्योत जलाते हैं और बारिश हो जाए, तो दिक्कत होगी, इसलिए जब भी निर्णय लें, सोच-समझकर लें।
एक श्रोता ने पूछा कि क्या तुलसी जी के पास, विशेषकर कार्तिक में, अखंड दीपक जलाया जा सकता है; वे कहते हैं कि जब भी आप तुलसी जी के पास अखंड दीपक जलाएँ, उस समय वहाँ शालिग्राम शिला भी स्थापित करें, या भगवान श्री नारायण का श्री विग्रह स्थापित करके करें। यदि आप बाहर अखंड ज्योत जलाते हैं और बारिश हो जाए, तो दिक्कत होगी; इसलिए जब भी निर्णय लें, सोच-समझकर लें। ऐसी व्यवस्था करें कि वहाँ तुलसी जी तक धूप पहुँचे और वे मुरझाएँ नहीं, और बारिश होने पर आपकी अखंड ज्योत भी न बुझे — तब आप जला सकते हैं।
राम या कृष्ण से जुड़े व्यक्ति को सावन में क्या पढ़ना चाहिए?
शिव रक्षा कवच, जो स्वप्न में उपदेश रूप में मिला
शिव जी के लिए सावन में श्री राम या कृष्ण जी से जुड़ा क्या किया जा सकता है, इस प्रश्न का उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि शिव रक्षा कवच भगवान नारायण ने एक ऋषि को सिखाया था। शिव रक्षा कवच स्वप्न में उपदेश रूप में दिया गया था, और जब आप राम जी और कृष्ण जी से जुड़ा कुछ करना चाहें, तो यही पढ़ना चाहिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि शिव जी के लिए सावन में श्री राम या कृष्ण जी से जुड़ा क्या किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि शिव रक्षा कवच भगवान नारायण ने एक ऋषि को सिखाया था। वे कहते हैं कि शिव रक्षा कवच स्वप्न में उपदेश रूप में दिया गया था; और जब आप राम जी और कृष्ण जी से जुड़ा कुछ करना चाहें, तो यही पाठ करना चाहिए।
नारायण ने स्वयं कौन-सा शिव सहस्रनाम पढ़ा था?
सुदर्शन चक्र पाने पर पढ़ा गया सहस्रनाम
वक्ता कहते हैं कि आप सब जानते हैं कि शिव जी के सहस्रनाम का पाठ भगवान श्री नारायण ने तब किया था जब उन्हें सुदर्शन चक्र प्राप्त हुआ। तो शिव महापुराण में भगवान श्री नारायण द्वारा किया गया जो शिव सहस्रनाम पाठ वर्णित है — उसका पाठ करें।
जो कृष्ण जी से जुड़ा कुछ करना चाहते हैं, उनके लिए वे कहते हैं: कृष्ण जी द्वारा भगवान सदाशिव की उपासना, या — वे कहते हैं कि आप सब जानते हैं कि शिव जी के सहस्रनाम का पाठ भगवान श्री नारायण ने तब किया था जब उन्हें सुदर्शन चक्र प्राप्त हुआ। तो शिव महापुराण में भगवान श्री नारायण द्वारा किया गया जो शिव सहस्रनाम पाठ वर्णित है — वह पढ़ें।
जप के समय रीढ़ और कनपटियों में उठने वाली झनझनाहट की लहरों का क्या अर्थ है?
शरीर में जप की ऊर्जा का संचय
एक श्रोता कहते हैं कि जप के समय रीढ़ में और सिर के ऊपर कनपटियों में गुदगुदी जैसी लहरें उठती हैं, और कभी-कभी जप के समय हल्का मीठा दर्द होता है, और जप करते हुए कई दिन बीत चुके हैं। वक्ता कहते हैं कि ऐसे साधकों के लिए यह अनुभव बिल्कुल चिंता की बात नहीं: जब आप जप करते हैं, तो जप की ऊर्जा आपके शरीर में कहीं संचित हो रही होती है, इसीलिए ऐसा हो रहा है। घबराएँ नहीं और डरें नहीं; अपना जप जारी रखें।
एक श्रोता बताते हैं कि कई दिनों के जप के बाद, जप के समय रीढ़ में और सिर के ऊपर कनपटियों में गुदगुदी जैसी लहरें उठती हैं, और कभी-कभी हल्का मीठा दर्द होता है। वक्ता कहते हैं कि ऐसे साधकों के लिए यह अनुभव बिल्कुल चिंता की बात नहीं। जब आप जप करते हैं, तो जप की ऊर्जा आपके शरीर में कहीं संचित हो रही होती है, इसीलिए ऐसा हो रहा है। इससे घबराएँ नहीं और डरें नहीं; अपना जप जारी रखें।
शरीर में ऊर्जा जमा हो तो जप के बाद क्या करना चाहिए?
इष्ट को समर्पण, और इष्ट मंत्र से प्राणायाम
वक्ता कहते हैं कि यहाँ मुख्य बात यह है कि जब आप जप करें, तो बाद में उसे अपने इष्ट को समर्पित करें। और जहाँ तक संभव हो, शुरुआत में जिस इष्ट मंत्र का जप कर रहे हैं उसी के द्वारा प्राणायाम भी अवश्य करें। प्राणायाम करने से यह चीज़ कुछ संतुलित हो जाती है।
वे कहते हैं कि यहाँ मुख्य बात यह है कि जब जप किया जाए, तो बाद में उसे अपने इष्ट को समर्पित करना चाहिए। और शरीर में, जहाँ तक संभव हो, शुरुआत में अपने इष्ट मंत्र के द्वारा, जिसका आप जप कर रहे हैं, प्राणायाम भी अवश्य करना चाहिए। प्राणायाम करने से यह चीज़ कुछ संतुलित हो जाती है।
हम भगवान की भक्ति की ओर क्यों खिंचते हैं?
पहले कष्ट, फिर अच्छे कर्म
एक श्रोता ने पूछा कि हमारे कौन-से कर्म हमें भगवान की भक्ति की ओर आकर्षित करते हैं; वक्ता कहते हैं कि भक्ति की ओर आकर्षण सबसे पहले तब होता है जब जीवन में कष्ट आता है। जब जीवन में कष्ट आता है तो हम तंत्र मंत्र देखने लगते हैं, कथा और पुराण की ओर जाते हैं, हवन सीखने और बलि देने और ये सब विधि विधान जानने का प्रयास करते हैं। पहले यही होता है। जब भगवान हमें अपने पास बुलाना चाहते हैं तो कष्ट देने लगते हैं, और तब हम उनकी ओर जाते हैं। दूसरी बात कर्म है: जब कर्म अच्छे होते हैं, तब भी।
एक श्रोता ने पूछा कि कौन-से कर्म हमें ईश्वर की भक्ति की ओर आकर्षित करते हैं; वक्ता कहते हैं कि भगवान की भक्ति की ओर आकर्षण सबसे पहले तब आता है जब जीवन में कष्ट आता है। जब जीवन में कष्ट आता है, तभी हम तंत्र मंत्र देखते हैं, तभी अपनी कथा और पुराण की ओर जाते हैं, तभी हवन सीखने, बलि देने और ये सब विधि विधान जानने का प्रयास करते हैं। सबसे पहले यही होता है। जब भगवान हमें अपने पास बुलाना चाहते हैं, तो कष्ट देने लगते हैं, और तब हम उनकी ओर जाते हैं। दूसरी बात कर्म है: जब कर्म अच्छे होते हैं — यह बिल्कुल ऐसा ही है — तब हम अपने जीवन में अपने आप उनकी ओर जाने लगते हैं।
क्या सप्तशती की तरह शिव पुराण पढ़ने का भी कोई विशेष विधान है?
इसका विधान शुरुआत में है, और सप्तशती से कम कठोर है
वक्ता कहते हैं कि यदि आपने सनातन संस्कृति में, सनातन धर्म में जन्म लिया है, तो आपने सनातन की ओर जाने के लिए ही जन्म लिया है; और सनातन का स्वरूप ही शिव है, इसलिए जन्म शिव की ओर जाने के लिए ही लिया है। यह पूछे जाने पर कि क्या सप्तशती की तरह शिव पुराण पढ़ने का भी कोई विशेष विधान है, वे कहते हैं कि उसका विधान बिल्कुल शुरुआत में दिया गया है — एक बार पढ़कर देखें कि कैसे करना चाहिए। वे कहते हैं कि आप उसके हर नियम का पालन नहीं कर पाएँगे, पर सप्तशती जैसा कोई जटिल नियम नहीं है, क्योंकि यह पुराण है।
वे कहते हैं कि यदि आपने सनातन संस्कृति में, सनातन धर्म में जन्म लिया है, तो जन्म ही सनातन की ओर जाने के लिए लिया है; और सनातन का स्वरूप शिव है, इसलिए जन्म शिव की ओर जाने के लिए ही लिया है। यह पूछे जाने पर कि क्या सप्तशती की तरह शिव पुराण पढ़ने का भी कोई विशेष विधान है, वे कहते हैं कि जब आप शिव महापुराण पढ़ते हैं, तो उसका विधान बिल्कुल शुरुआत में बताया गया है — एक बार पढ़कर देखें कि कैसे करना चाहिए। वे कहते हैं कि आप उसके हर नियम का पालन नहीं कर पाएँगे, पर सप्तशती जैसा कोई जटिल नियम नहीं है, क्योंकि यह पुराण है।
शिव महापुराण पढ़ते समय फिर भी क्या पालन करना ज़रूरी है?
शौच और अशौच, और रोज़ एक अध्याय
वक्ता कहते हैं कि इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए शौच और अशौच का पूरा ध्यान रखना है। सप्तशती में यदि आप एक बैठक में संस्कृत में पूरा पाठ कर रहे हैं, तो कई क्रम निकलते हैं; और शिव महापुराण में भी उसका अपना बहुत सारा क्रम है, पर आप सामान्य पाठ कर सकते हैं। आप रोज़ एक अध्याय पढ़ सकते हैं, या उससे ज़्यादा भी कर सकते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या वे दीक्षा देते हैं, वे उत्तर देते हैं: नहीं।
वे कहते हैं कि जितनी भी बातें हैं उन्हें ध्यान में रखते हुए, शौच और अशौचपरिवार में जन्म या मृत्यु जैसे अवसरों पर उत्पन्न अशुद्धि की स्थिति, जिसके दौरान कुछ अनुष्ठान व पाठ वर्जित रहते हैं। का पूरा ध्यान रखना है। सप्तशती में कहा गया है कि यदि आप एक बैठक में संस्कृत में पूरा पाठ कर रहे हैं, तो उसमें कई क्रम निकलते हैं; और शिव महापुराण में भी उसका अपना बहुत सारा क्रम है, पर आप सामान्य पाठ कर सकते हैं। आप रोज़ एक अध्याय पढ़ सकते हैं, या उससे ज़्यादा भी। यह पूछे जाने पर कि क्या वे दीक्षा देते हैं, वे साफ उत्तर देते हैं: नहीं।
क्या गाय को डंडे से चोट पहुँचाने से पाप लगता है?
वंश को, धन को हानि, और ब्रह्महत्या का दोष
एक श्रोता ने पूछा कि गाय को डंडे या लकड़ी से कष्ट देने पर क्या पाप लगता है; वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल लगता है। गाय को कष्ट देने से वंश पर आघात होता है; धन और लक्ष्मी की हानि होती है; और ब्रह्महत्या का दोष भी लगता है। इसलिए सामान्य रूप से गाय को कष्ट नहीं देना चाहिए।
एक श्रोता ने पूछा कि गौ माता को डंडे या लकड़ी से कष्ट देने पर क्या पाप लगता है; वे उत्तर देते हैं कि बिल्कुल लगता है। गाय को कष्ट देने से वंश पर आघात होता है, धन और लक्ष्मी की हानि होती है, और ब्रह्महत्या का दोष भी लगता है। इसलिए सामान्य रूप से गाय को कष्ट नहीं देना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि गाय पालने में एक अलग बात है: यदि गाय मारने वाली हो, या ऐसा कुछ हो, तो बचाव के लिए उसे हल्के से रोकना, उसे पीटने और सताने से अलग बात है — पर तब भी क्षमा माँगनी चाहिए, उसकी सेवा करनी चाहिए, और उसके स्वभाव को अपने अनुरूप बदलने का प्रयास करना चाहिए।
क्या अधिक रजोगुण वाले व्यक्ति को साधना में सफलता में कठिनाई होती है?
कठिनाई नियमों के पालन में होती है
एक श्रोता ने पूछा कि जिस व्यक्ति में रजोगुण अधिक हो, क्या उसे साधना की सफलता में कठिनाई होती है; वक्ता पूछते हैं कि रजोगुण का अर्थ क्या है और सफलता में क्या कठिनाई होगी। जब भी आप साधना करते हैं, उस समय आपको नियम लेने पड़ते हैं: ब्रह्मचर्य का पूरा पालन, सात्विक आचरण, विचार, व्यवहार, भोजन आदि। इन पूरे नियमों में, पूरा अनुशासन बनाए रखते हुए चलने में कठिनाई आती है — इसीलिए आप कहते हैं कि सफलता नहीं मिलेगी। पर ऐसा नहीं कि सफलता नहीं मिलेगी; कठिनाई यह है कि आपको अपने नियमों के पालन में कुछ परेशानी होगी।
एक श्रोता ने पूछा कि जिस व्यक्ति में रजोगुण अधिक हो, क्या उसे साधना की सफलता में कठिनाई होती है; वे पूछते हैं कि रजोगुण का अर्थ क्या है और सफलता में कठिनाई क्या होगी। जब भी आप साधना करते हैं, उस समय आपको नियम लेने पड़ते हैं — ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पूरा पालन, सात्विक आचरण और विचार, व्यवहार, भोजन आदि। इन पूरे नियमों में, पूरा अनुशासन बनाए रखते हुए चलने में कष्ट आता है। इसीलिए आप कहते हैं कि सफलता नहीं मिलेगी। पर ऐसा नहीं कि सफलता नहीं मिलेगी; कठिनाई यह होगी कि आपको अपने नियमों के पालन में कुछ परेशानी होगी।
गुरु साधना के बाद गणपति की कौन-सी साधना करें?
संकटनाशन गणेश स्तोत्र, छह महीने या चतुर्थी से चतुर्थी
एक श्रोता ने पूछा कि गुरु के बाद गणपति करनी हो तो गणपति की कौन-सी साधना करें; वक्ता कहते हैं: सबसे पहले संकटनाशन गणेश स्तोत्र करें। वह साधना छह महीने अवश्य करनी चाहिए। यदि छह महीने भी न कर सकें, तो चतुर्थी से चतुर्थी, एक महीना, पाठ करना चाहिए।
एक श्रोता ने पूछा कि जब गुरु के बाद गणपति करनी हो तो गणपति की कौन-सी साधना की जा सकती है; वे कहते हैं कि सबसे पहले आपको संकटनाशन गणेश स्तोत्र करना चाहिए। वह साधना छह महीने अवश्य करनी चाहिए। यदि छह महीने न कर सकें, तो चतुर्थी से चतुर्थी, एक महीने, पाठ करना चाहिए। उसके साथ, यदि संभव हो, तो हर चतुर्थी तिथि पर वह स्तोत्र आठ बार लिखकर, संकल्प और कुछ दक्षिणा के साथ, किसी ब्राह्मण को दान करना चाहिए। बहुत-बहुत कष्ट कट जाते हैं, और आगे की साधना में सफलता भी बहुत जल्दी मिलती है।
अपनी साधना को सुरक्षित कैसे रखें?
साधनाएँ अपने नियमों से सुरक्षित रहती हैं
एक श्रोता ने पूछा कि अपनी साधना को, या जप की ऊर्जा को, सुरक्षित कैसे रखें; वक्ता उत्तर देते हैं कि साधनाएँ नियम से सुरक्षित रहती हैं। अलग से यह पूछे जाने पर कि पारद माला पर किन देवी देवताओं का जप किया जा सकता है, वे कहते हैं कि पारद से सबका जप किया जा सकता है।
एक श्रोता ने पूछा कि अपनी साधना को कैसे सुरक्षित रखना चाहिए — या जप आदि की ऊर्जा को कैसे सुरक्षित रखना चाहिए; वे उत्तर देते हैं कि साधनाएँ नियम से सुरक्षित रहती हैं। यह पूछे जाने पर कि पारद माला से किन देवी देवताओं का जप किया जा सकता है, वे कहते हैं कि पारद से सबका जप किया जा सकता है।
जिसे विंध्य त्रिकोण के लिए कोई जानकार व्यक्ति न मिले, वह क्या करे?
त्रिकोण यात्रा के लिए किसी की ज़रूरत नहीं; स्वयं जाएँ
एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें विंध्य त्रिकोण करने को कहा गया पर कोई जानकार व्यक्ति नहीं मिल रहा, और मार्गदर्शन माँगते हैं। वक्ता कहते हैं कि विंध्य त्रिकोण यात्रा करने के लिए वास्तव में किसी की ज़रूरत नहीं — आप स्वयं कर सकते हैं। दूसरा, यदि कोई जानकार व्यक्ति नहीं मिल रहा, तो जब भी विंध्याचल जाएँ, वहाँ भगवती के सामने अपने कष्ट और कठिनाई के लिए मन्नत माँगें, और घर पर बार-बार उनकी सेवा पूजा करें।
एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें विंध्य त्रिकोण करने को कहा गया पर कोई जानकार व्यक्ति नहीं मिल रहा, और मार्गदर्शन माँगते हैं। वक्ता कहते हैं कि विंध्य त्रिकोण यात्रा करने के लिए वास्तव में किसी की ज़रूरत नहीं; आप स्वयं कर सकते हैं। दूसरा, यदि कोई जानकार व्यक्ति नहीं मिल रहा, तो जब भी विंध्याचल जाएँ, वहाँ भगवती के सामने अपने कष्ट और कठिनाई के लिए मन्नत माँगें, और घर पर बार-बार उनकी सेवा पूजा करें।
विंध्याचल जाने वाले बहुत कष्ट में पड़े व्यक्ति के लिए कौन-सा छोटा उपाय सहायक है?
विंध्यवासिनी के नाम वाली ठोस चाँदी की सुपारी
वक्ता कहते हैं कि उनसे बड़ा कुछ नहीं; जब जीवन के सारे द्वार बंद हो जाते हैं और लगता है कि कोई मनुष्य साथ नहीं देगा, तब वे देवी शक्तियाँ ही साथ देती हैं। इसलिए जब भी आप विंध्याचल जाएँ और कोई व्यक्ति न मिल रहा हो, और आपके जीवन में बहुत कष्ट और तंत्र से जुड़ी परेशानी हो, तो यह छोटा-सा काम करें: जाने से पहले चाँदी की एक सुपारी बनवाएँ, ठोस, खोखली नहीं, चाँदी की पत्ती पर। उस पर या तो भगवती विंध्यवासिनी का नाम लिखवाएँ, या कुछ लिखवाना न हो तो ॐ, त्रिशूल का चिह्न, या भगवती का मुख बनवाएँ। यह एक तरह की चाँदी की बुटिका बन जाती है।
वे कहते हैं कि उनसे बड़ा कुछ नहीं: जब जीवन के सारे द्वार बंद हो जाते हैं और लगता है कि अब कोई मनुष्य साथ नहीं देगा, तब वे देवी शक्तियाँ ही साथ देती हैं। इसलिए जब भी आप विंध्याचल जाएँ और कोई व्यक्ति न मिल रहा हो, और आपके जीवन में बहुत बड़ा कष्ट और तंत्र से जुड़ी परेशानी हो, तो यह एक छोटा-सा काम करें: जाने से पहले चाँदी की एक सुपारी बनवाएँ — ठोस, खोखली नहीं, चाँदी की पत्ती पर। उस पर या तो भगवती विंध्यवासिनी का नाम लिखवाएँ, या कुछ लिखवाना न हो तो ॐ, त्रिशूल का चिह्न, या भगवती का मुख बनवाएँ। सामान्य रूप से यह चाँदी की एक बुटिका बन जाती है।
विंध्याचल में चाँदी की सुपारी को कैसे सिद्ध करें?
भगवती के चरणों में स्पर्श, या भैरव कुंड में स्नान
जब आप विंध्याचल जाएँ, तो वहाँ जो भी पंडित जी या पंडा दर्शन करवाते हैं, उनसे पहले ही बात कर लें, और कहें कि इसे भगवती के चरणों में स्पर्श कराकर, या भगवती से स्पर्श कराकर, आपको वापस दें। यदि वे स्पर्श कराकर दें तो उत्तम है। नहीं तो भगवती का जो स्नान रोज़ होता है — भगवती विंध्यवासिनी को जीवित प्रतिमूर्ति माना जाता है और जगदंबा रोज़ स्नान करती हैं; उनके शरीर से मैल भी निकलता है, और उस मैल की भी तंत्र में अपनी असीम महिमा है, और वह हर किसी को नहीं मिलता, यद्यपि बहुत लोगों के पास है। वह स्नान का जल भैरव कुंड के पास होता है।
जब आप विंध्याचल जाएँ, तो वहाँ जो भी पंडित जी, जो भी पंडा दर्शन करवाते हैं, उनसे पहले ही बात कर लें, और कहें कि आप चाहते हैं कि इसे भगवती के चरणों में स्पर्श कराया जाए, या भगवती से स्पर्श कराकर आपको वापस दिया जाए। यदि वे स्पर्श कराकर दें, तो उत्तम है। नहीं तो जो स्नान होता है: जगदंबा रोज़ स्नान करती हैं, भगवती विंध्यवासिनी को जीवित प्रतिमूर्ति माना जाता है। उनके शरीर से मैल भी निकलता है, और उस मैल की भी तंत्र में अपनी असीम महिमा है; वह हर किसी को नहीं मिलता, यद्यपि बहुत लोगों के पास है। YouTube पर भी ऐसे लोग हैं जिनके पास है और जो यह कहते हैं। आजकल यह आसानी से मिल जाता है, पर इसकी महिमा असीम है। उस स्नान का जल भैरव कुंड के पास होता है।
भैरव कुंड पर क्या प्रार्थना करनी चाहिए?
जगदंबा से परिवार की रक्षा के लिए कोई सौम्य योगिनी भेजने की विनती
कुंड भगवती विंध्यवासिनी के मंदिर के ठीक पीछे, विंध्य भैरव के पास है; कोई निषेध नहीं और कोई भी उसे छू सकता है। उसमें सुपारी को स्नान कराएँ, और भगवती से बार-बार प्रार्थना करें: हे जगदंबा, इसमें अपनी शक्तियाँ समाहित करें, और अपनी कोई एक सौम्य रूप योगिनी स्थापित करके हमारे परिवार की रक्षा के लिए इसके साथ भेजें। पूरी तरह समर्पित होकर, विनम्र भाव से जगदंबा से बार-बार प्रार्थना करें।
वह कुंड भगवती विंध्यवासिनी के मंदिर के ठीक पीछे, विंध्य भैरव जी के पास है। उस कुंड में कोई निषेध नहीं है; कोई भी उसे छू सकता है। उसमें सुपारी को स्नान कराएँ, और भगवती से बार-बार प्रार्थना करें: हे जगदंबा, इसमें अपनी शक्तियाँ समाहित करें, और अपनी कोई एक सौम्य रूप योगिनी स्थापित करके हमारे परिवार की रक्षा के लिए इसके साथ भेजें। पूरी तरह समर्पित होकर, विनम्र भाव से जगदंबा से बार-बार प्रार्थना करें, और उन्हें घर लाकर ठीक से स्थापित करें।
चाँदी की सुपारी को घर में कैसे स्थापित करें?
लाल कपड़े पर रोली का त्रिकोण, धूप और दीप के साथ
इसे कैसे स्थापित करें: लाल कपड़े के एक टुकड़े पर रोली से त्रिकोण बनाएँ और बीच में उन्हें स्थापित करें। उनके सामने उनके नाम से धूप और दीप अर्पित करें। रास्ता खुलेगा, और जगदंबा अवश्य कृपा करेंगी। वक्ता कहते हैं कि यह केवल संजय मिश्रा जी के लिए है।
इसे कैसे स्थापित करें: लाल कपड़े के एक टुकड़े पर रोली से त्रिकोण बनाएँ, और उसके बीच में उन्हें स्थापित करें। उनके सामने उनके नाम से धूप और दीप अर्पित करें। रास्ता खुलेगा; जगदंबा अवश्य कृपा करेंगी। वे साफ कहते हैं कि यह केवल संजय मिश्रा जी के लिए है।
जिस शक्ति को किसी ने बाँध दिया हो, उसे कैसे मुक्त करें?
किसी जानकार की सहायता लें; शिव या भैरव का हवन उसे बल देता है
एक श्रोता ने पूछा कि किसी ने किसी शक्ति को बाँध दिया हो तो उसे कैसे मुक्त करें; वक्ता कहते हैं: किसी जानकार व्यक्ति की सहायता लें। यदि आपको स्वयं ज्ञान है, तो संबंधित शक्तियों के अनुसार — जैसे वह भगवती दुर्गा की कोई सेविका, कोई योगिनी है — तो भगवान सदाशिव से जुड़ा हवन करने से उसे बल और सामर्थ्य मिलेगा। यदि आप भैरव जी से जुड़ी साधना करके हवन करें, तो उससे उसे सामर्थ्य मिलेगा।
एक श्रोता ने पूछा कि जिस शक्ति को किसी ने बाँध दिया है उसे कैसे मुक्त किया जाए; वे कहते हैं: किसी जानकार व्यक्ति की सहायता लें। यदि आपको स्वयं ज्ञान है, तो संबंधित शक्तियों के अनुसार — जैसे यदि वह भगवती दुर्गा की कोई सेविका, कोई योगिनी है — तो भगवान सदाशिव से जुड़ा हवन करने से उसे बल और सामर्थ्य मिलेगा। यदि आप भैरव जी से जुड़ी साधना करके हवन करें, तो उससे उसे सामर्थ्य मिलेगा।
क्या अविवाहित कन्या शनि देव की पूजा कर सकती है?
हाँ; और सातवें भाव पर शनि की दृष्टि से विवाह में देरी
एक श्रोता ने पूछा कि क्या अविवाहित कन्या शनि देव की पूजा कर सकती है; वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकती है; ऐसी कोई बात नहीं। और यदि शनि देव के कारण विवाह में देरी हो रही है — जैसे जब शनि की दृष्टि सातवें भाव पर पड़ती है, जिसके बारे में कहा जाता है कि विवाह देर से होता है — तो उनके अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए, यद्यपि कुंडली देखे बिना कुछ नहीं कहा जा सकता, पहली बात यह है कि उनसे जुड़े दान करने चाहिए।
एक श्रोता ने पूछा कि अविवाहित कन्या शनि देव की पूजा कर सकती है या नहीं; वे कहते हैं कि बिल्कुल कर सकती है; ऐसी कोई बात नहीं। और यदि शनि देव के कारण विवाह में देरी हो रही है — जैसे जब शनि की दृष्टि सातवें भाव पर पड़ती है, जिसके बारे में कहा जाता है कि विवाह देर से होता है — तो उनके अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए — वे कहते हैं कि सामान्य रूप से कुंडली देखे बिना कुछ नहीं कहा जा सकता; फिर भी जब आप इस तरह लिखते हैं, तो पहली बात यह है कि आपको उनसे जुड़े दान करने चाहिए।
सांवली दुल्हन को उसके अपने विवाह में प्रयोग के लिए उपहार देना दूसरा उपाय है
सांवली दुल्हन को उसके विवाह में प्रयोग के लिए उपहार
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि जब भी आपकी किसी सहेली का, या आपके जान-पहचान, रिश्तेदारों या पड़ोसियों में किसी सांवले रंग की लड़की का विवाह हो रहा हो, तो उसे — अपनी क्षमता अनुसार, यथाशक्ति — कोई ऐसी वस्तु दें जिसका वह अपने विवाह के समय प्रयोग करे। यदि वह विवाह में उसका प्रयोग करती है, तो आपको बहुत शीघ्र प्रभाव मिलेगा।
दूसरी बात: जब भी आपकी किसी सहेली का, या आपके जान-पहचान, रिश्तेदारों या पड़ोसियों में किसी सांवले रंग की लड़की का विवाह हो रहा हो, तो अपनी क्षमता अनुसार और यथाशक्ति उसे कोई ऐसी वस्तु दें जिसका वह अपने विवाह के समय प्रयोग करे। वे कहते हैं कि यदि वह विवाह में उसका प्रयोग करती है, तो आपको बहुत शीघ्र प्रभाव मिलेगा। फिर वे एक दूसरे श्रोता से कहते हैं कि उनके प्रश्न का उत्तर पहले ही दिया जा चुका है, और यह पूछे जाने पर कि घर का बंधन हो जाने पर क्या पीड़ित व्यक्ति को सपने आना बंद हो जाता है, कहते हैं कि ऐसा नहीं है — बंधन के कारण सपने बंद होना एक अलग विषय है।
जब घर में नकारात्मक शक्तियाँ सीधे दिखाई दें तो क्या करें?
पाँच सप्ताह तक मंगलवार से शनिवार संपुटित सुंदरकांड
वक्ता कहते हैं कि यदि घर में कोई नकारात्मक शक्ति सीधे दिखाई दे रही है, तो इसका अर्थ है कि उसकी ऊर्जा काफी प्रबल हो रही है, कि जिस व्यक्ति के द्वारा प्रोजेक्शन किया गया वह बहुत बलि आदि का प्रयोग कर रहा है, और आपके घर में सकारात्मक शक्तियों का स्तर बहुत नीचे गिर गया है। आपको पहले, यदि संभव हो, अपने घर पर सुंदरकांड का संपुटित पाठ करवाना चाहिए; और संभव हो तो मंगलवार से शनिवार तक, कम से कम पाँच सप्ताह लगातार, हर दिन हवन के साथ करवाएँ।
एक श्रोता ने पूछा कि यदि नकारात्मक शक्तियाँ साफ और सीधे दिखाई दें तो क्या करें; वे कहते हैं कि यदि घर में कोई नकारात्मक शक्ति सीधे दिखाई दे रही है, तो इसका अर्थ है कि उसकी ऊर्जा बहुत प्रबल हो रही है, कि जिस व्यक्ति के द्वारा प्रोजेक्शन किया गया वह बहुत बलि आदि का प्रयोग कर रहा है, और आपके घर में सकारात्मक शक्तियों का स्तर बहुत नीचे हो गया है। आपको सबसे पहले, यदि संभव हो, अपने घर पर सुंदरकांड का संपुटित पाठ करवाना चाहिए। और यदि संभव हो, तो मंगलवार से शनिवार तक, कम से कम पाँच सप्ताह लगातार, हर दिन हवन के साथ करवाएँ।
सुंदरकांड के संपुट के रूप में हनुमान जी की कोई चौपाई लगाई जाती है, और रोज़ ग्यारह बजरंग बाण पढ़े जाते हैं
संपुट के रूप में हनुमान जी की चौपाई, और रोज़ ग्यारह बजरंग बाण
वक्ता कहते हैं कि यदि इतना न करवा सकें, तो स्वयं करें, पर हर मंगलवार या हर शनिवार संपुटित सुंदरकांड का पाठ करवाएँ। संपुट मंत्र के लिए, पाठ करने वालों को बताएँ कि नकारात्मक ऊर्जा इस तरह की है, और हनुमान जी के आवाहन और उनकी कृपा पाने के लिए जो भी चौपाई काम आती है उसे संपुट के रूप में लगवाएँ। आपको बहुत शीघ्र लाभ मिलेगा। उसके साथ घर में स्वयं रोज़ कम से कम ग्यारह बार पूरे बजरंग बाण का पाठ करें, और उसकी ध्वनि करें।
यदि इतना न करवा सकें, तो स्वयं करें; पर हर मंगलवार या हर शनिवार संपुटित सुंदरकांड का पाठ करवाएँ। संपुट मंत्र के लिए: जो सुंदरकांड पाठ आप करवाएँगे, उसमें उन्हें बताएँ कि नकारात्मक ऊर्जा इस-इस तरह की है, और हनुमान जी के आवाहन और उनकी कृपा पाने के लिए जो भी चौपाई है, उसे संपुट के रूप में लगवाएँ। आपको बहुत शीघ्र लाभ मिलेगा। उसके साथ घर में स्वयं हर दिन कम से कम ग्यारह बार पूरे बजरंग बाण का पाठ करें, और उसकी ध्वनि करें। वे कहते हैं कि उसके बाद क्षेत्रपाल निकारी आदि की बात आती है।
जीवन में कितने गुरु बनाए जा सकते हैं, और क्या बच्चे दत्तात्रेय का जप कर सकते हैं?
गुरुओं की कोई सीमा नहीं; बच्चों के लिए श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा
यह पूछे जाने पर कि जीवन में हम कितने गुरु बना सकते हैं, वक्ता कहते हैं कि ऐसी कोई सीमा नहीं। यह पूछे जाने पर कि क्या बच्चे गुरु दत्तात्रेय के मंत्र का जप कर सकते हैं, वे कहते हैं हाँ, कर सकते हैं — ऐसा नहीं कि भगवान दत्तात्रेय का जप नहीं किया जा सकता। वे कहते हैं, उनसे "दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा" का जप करवाएँ; भजन के रूप में इस मंत्र का जप बच्चों के लिए अत्यंत लाभदायक है।
यह पूछे जाने पर कि अपने जीवन में हम कितने गुरु बना सकते हैं, वे कहते हैं कि ऐसी कोई सीमा नहीं। यह पूछे जाने पर कि क्या बच्चे गुरु दत्तात्रेय के मंत्र का जप कर सकते हैं, वे कहते हैं हाँ, कर सकते हैं; ऐसा नहीं कि भगवान दत्तात्रेय का जप नहीं किया जा सकता। वे कहते हैं, उनसे "दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा" का जप करवाएँ। भजन के रूप में इस मंत्र का जप बच्चों के लिए अत्यंत लाभदायक है।
रुद्राक्ष पहनने के नियम क्या हैं?
पहले भोजन के नियम; मांस खाते समय नहीं पहनना
एक श्रोता ने जनेऊ और रुद्राक्ष पहनने के नियम पूछे, और केवल रुद्राक्ष के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि गृहस्थों के लिए पहला नियम यह है कि जब भी रुद्राक्ष पहनें, भक्ष्य-अभक्ष्य का ध्यान रखें। यदि आप मांसाहारी हैं और रुद्राक्ष पहनते हैं, तो मांस खाने के समय — वे कहते हैं अभी कलियुग है, और वे जानते हैं कि शुरुआत में नियम पूरी तरह नहीं निभेंगे — फिर भी यदि शिव की कृपा आई है, तो प्रयास करें कि मांसाहार न हो। और फिर भी मांस और शराब का सेवन हो, तो जब भी करें, उन्हें पहने हुए न करें; स्नान के बाद फिर पहन सकते हैं।
एक श्रोता ने जनेऊ और रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । पहनने के नियम पूछे, और केवल रुद्राक्ष के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि गृहस्थों को पहला नियम यह मानना चाहिए कि जब भी रुद्राक्ष पहनें, भक्ष्य-अभक्ष्य का ध्यान रखें। यदि आप मांसाहारी हैं और रुद्राक्ष पहनते हैं, तो मांस खाने के समय — वे कहते हैं अभी कलियुग है, और वे जानते हैं कि शुरू में नियम पूरी तरह नहीं निभेंगे — फिर भी यदि शिव की कृपा आई है, तो प्रयास करें कि मांसाहार न हो। और फिर भी मांस और शराब का सेवन हो, तो जब भी करें, उन्हें पहने हुए न करें। स्नान के बाद आप उन्हें फिर पहन सकते हैं।
गृहस्थ कार्य के समय रुद्राक्ष शरीर पर नहीं होना चाहिए, और घर से बाहर यात्रा में ढका होना चाहिए
गृहस्थ कार्य के समय शरीर पर नहीं, और यात्रा में ढका हुआ
वक्ता कहते हैं कि वह पहला था। दूसरी बात यह है कि गृहस्थ कार्य करने से पहले रुद्राक्ष शरीर पर नहीं होना चाहिए। जब भी घर से बाहर यात्रा करें और माला पहनें, तो वह ढकी होनी चाहिए ताकि कभी दिखाई न दे; उस समय उसे शरीर से अलग करने की ज़रूरत नहीं — पर फिर से, यदि आप मांस और शराब का सेवन करते हैं, तो वह शरीर पर नहीं होनी चाहिए। कम से कम इतना नियम निभाना चाहिए।
वे कहते हैं कि वह पहला था; दूसरी बात यह है कि गृहस्थ कार्य करने से पहले रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । शरीर पर नहीं रहना चाहिए। जब भी घर से बाहर यात्रा करें और माला पहनें, तो वह ढकी होनी चाहिए और कभी दिखाई नहीं देनी चाहिए; उस समय उसे शरीर से अलग करने की ज़रूरत नहीं। पर फिर से, यदि आप मांस और शराब का सेवन करते हैं, तो वह शरीर पर नहीं होनी चाहिए। कम से कम इतना नियम निभाना चाहिए।
क्या जिस शक्ति की पूजा हो रही है, उसके अलावा किसी और शक्ति से कृपा आ सकती है?
पिछले वीडियो में उत्तर दिया गया; और श्रावण में कौन-सी साधना सबसे अच्छी
एक श्रोता ने पूछा कि क्या ऐसा हो सकता है कि हम एक देवता की पूजा करें और कृपा और आशीर्वाद किसी और शक्ति से आए; वक्ता कहते हैं कि उन्होंने तीन-चार दिन पहले के एक वीडियो में यह पूरा विषय समझाया है, और श्रोता से उसे एक बार सुनने को कहते हैं। यह पूछे जाने पर कि श्रावण में पंचाक्षरी मंत्र या गुरु मंत्र में से कौन बेहतर फल देता है, वे कहते हैं: जिसमें आपकी श्रद्धा है वही करें — वही सबसे अच्छा फल देता है। श्रावण सभी देवताओं को प्रिय है, क्योंकि यह देवों के महादेव का महीना है, इसलिए सभी कृपा करते हैं।
एक श्रोता ने पूछा कि क्या ऐसा हो सकता है कि हम एक देवता की पूजा कर रहे हों और कृपा और आशीर्वाद किसी और शक्ति से आए; वे कहते हैं कि उन्होंने तीन-चार दिन पहले के एक वीडियो में यह पूरा विषय समझाया है और श्रोता से उसे एक बार सुनने को कहते हैं। यह पूछे जाने पर कि श्रावण मास में पंचाक्षरी मंत्र की साधना सबसे अच्छी है या गुरु मंत्र की, वे कहते हैं: जिसमें आपकी श्रद्धा है वही करें — वही सबसे अच्छा फल देता है। श्रावण मास सभी देवताओं को प्रिय है, क्योंकि यह देवों के महादेव का महीना है; इसलिए सभी कृपा करते हैं।
यदि बच्चा दाँतों के साथ जन्म ले तो इसका क्या अर्थ है?
तुलसीदास जी के जन्म के समय बत्तीस दाँत थे
एक श्रोता ने पूछा कि उनके ममेरे भाई के बेटे के जन्म के समय दाँत थे, इससे क्या परेशानियाँ आ सकती हैं, और क्या कोई दोष या उपाय है; वक्ता कहते हैं कि लोक में सब जानते हैं कि तुलसीदास जी जब जन्मे तो उनके बत्तीस दाँत थे, और उन्हें जन्म देने के बाद उनके माता-पिता की मृत्यु हो गई, इसलिए इसे अशुभ माना गया। फिर भी वही तुलसीदास थे जिन पर स्वयं भगवती जगदंबा ने कृपा की: भगवती पार्वती माँ के रूप में उनके साथ रहीं और युवावस्था तक उनका मार्गदर्शन किया। तो ऐसा बिल्कुल नहीं कि इससे कोई बहुत बड़ा दोष आने वाला है — फिर भी यदि आप इसे दोष मानते हैं, तो अपने पास के विद्वानों से इसका उपाय करवा सकते हैं।
एक श्रोता ने पूछा कि उनके मामा के बेटे के जन्म के समय दाँत थे, इससे क्या परेशानियाँ आ सकती हैं, और यदि कोई दोष है तो क्या उपाय है; वक्ता कहते हैं कि लोक में सब जानते हैं कि तुलसीदास जी जब जन्मे तो उनके बत्तीस दाँत थे, और उन्हें जन्म देने के बाद उनके माता-पिता की मृत्यु हो गई, इसलिए इसे अशुभ माना गया। पर वही तुलसीदास थे जिन पर स्वयं भगवती जगदंबा ने कृपा की: भगवती पार्वती, माँ के रूप में, उनके साथ रहीं और युवावस्था तक उनका मार्गदर्शन किया। तो ऐसा बिल्कुल नहीं कि इससे कोई बहुत बड़ा दोष आने वाला है। फिर भी यदि आप इसे दोष मानते हैं, तो अपने पास के विद्वानों से इसका निराकरण करवा सकते हैं।
जागृत कुंडलिनी को कैसे शांत करें?
पूरी तरह व्यावहारिक विषय, जिसमें योग गुरु का पास होना ज़रूरी है
एक श्रोता कहती हैं कि उनकी कुंडलिनी जागृत हो गई है और पूछती हैं कि उसे कैसे शांत करें, क्योंकि वह दिन भर चलती रहती है। वक्ता कहते हैं कि यह पूरी तरह व्यावहारिक विषय है: वे यहाँ समझाएँ और बोलें भी, तो भी समझ नहीं आएगा — किस स्तर पर है, कहाँ क्या हो रहा है और क्या नहीं। यह पास के किसी योग गुरु के द्वारा, और अपने अभिभावक के साथ, करना चाहिए, क्योंकि, जैसा वे उनसे कहते हैं, आप स्त्री हैं और इस विषय को समझें।
एक श्रोता कहती हैं कि उनकी कुंडलिनी जागृत हो गई है और पूछती हैं कि उसे कैसे शांत करें, क्योंकि वह दिन भर इधर-उधर चलती रहती है। वक्ता कहते हैं कि यह पूरी तरह व्यावहारिक विषय है। वे यहाँ समझाएँ और बोलें भी, तो भी आप नहीं समझ पाएँगी — किस स्तर पर है, कहाँ क्या हो रहा है और क्या नहीं। यह पास के किसी योग गुरु के द्वारा, और अपने अभिभावक के साथ, करना चाहिए; वे कहते हैं, आप स्त्री हैं, इस विषय को समझें।
देवी मंत्र के जप को क्या संतुलित करता है?
साथ में शिव मंत्र का जप
वक्ता उनसे कहते हैं कि आप मंत्र जप करती हैं, यह उत्तम है। आप जिसके भी मंत्र का जप कर रही हैं — जैसे यदि दुर्गा जी का कर रही हैं — तो साथ में शिव मंत्र का जप होना चाहिए, जिससे संतुलन आता है। यह पूछे जाने पर कि साधना से कोई लाभ न मिले तो क्या करें, वे कहते हैं कि जब शिव जी की पूजा और साधना से लाभ न मिल रहा हो, तो जो द्वादश ज्योतिर्लिंग अनुष्ठान बताया गया है, वह विशेष रूप से श्रावण मास में करना चाहिए।
वे उनसे कहते हैं कि आप मंत्र जप करती हैं, यह उत्तम है। आप जिसके भी मंत्र का जप कर रही हैं — जैसे यदि दुर्गा जी का कर रही हैं — तो उसके साथ शिव मंत्र का जप होना चाहिए, जिससे संतुलन आता है। यह पूछे जाने पर कि साधना से कोई लाभ न मिले तो क्या करना चाहिए, वे कहते हैं कि जब शिव जी की पूजा और साधना से लाभ न मिल रहा हो, तो जो द्वादश ज्योतिर्लिंग अनुष्ठान बताया गया है, वह विशेष रूप से श्रावण मास में करना चाहिए।
नर और नारायण का व्याख्यान टाल दिया जाता है, और पितरों के साथ चल रहे प्रेत के लिए तीन पीढ़ियों को देखा जाता है
व्याख्यान टला; तीन पीढ़ियों की जाँच
यह पूछे जाने पर कि नर और नारायण कौन हैं, वक्ता कहते हैं कि इसकी व्याख्या बहुत उत्तम है पर आज वे और नहीं बोलेंगे; किसी और समय। यह पूछे जाने पर कि जब किसी के भेजे प्रेत तीन पीढ़ियों से किसी घर में पितरों के साथ चल रहे हों, तो निवारण कैसे करवाया जाए कि वह हमेशा के लिए चला जाए, वे पहले कहते हैं कि यदि तीन पीढ़ियाँ हुई हैं तो उसने तीन पीढ़ियों को परेशान रखा होगा; और दूसरा, कि यदि वह पितरों के साथ है तो दो-तीन प्रश्न उठते हैं — यदि तीन पीढ़ियाँ हो गईं, तो क्या उसमें सामर्थ्य नहीं है?
यह पूछे जाने पर कि नर और नारायण कौन हैं और इस पर मार्गदर्शन माँगा गया, वे कहते हैं कि इसकी व्याख्या बहुत उत्तम है, पर आज वे आगे नहीं बोलेंगे; किसी और समय। यह पूछे जाने पर कि जब किसी के घर में किसी और का भेजा प्रेत तीन पीढ़ियों से पितरों के साथ चल रहा हो, तो निवारण कैसे करवाया जाए कि वह हमेशा के लिए चला जाए, वे पहले कहते हैं कि यदि तीन पीढ़ियाँ हैं तो उसने तीन पीढ़ियों को परेशान रखा होगा। दूसरा, यदि वह पितृ के साथ है, तो यहाँ दो-तीन प्रश्न उठते हैं: यदि वह तीन पीढ़ियों से वहाँ है, तो क्या उसमें सामर्थ्य नहीं है?
पितरों के साथ चल रहे प्रेत को कैसे हटाया जाता है?
निकारी, स्वयं पितर, या दत्तात्रेय साधना
वक्ता कहते हैं कि यदि आपका वंश बढ़ रहा है, तो उसमें सामर्थ्य नहीं है। आप निकारी आदि प्रयोग करवाकर विधि विधान से उसे हटवा सकते हैं। यदि वह पितरों के साथ है, तो — यदि पितरों को कोई दोष नहीं लग रहा, या आपके पितर अभी भी मज़बूत हैं — उनके द्वारा भी हटाया जा सकता है। और भगवान दत्तात्रेय के द्वारा, उनकी विशेष साधना से — जिससे केवल पितर तृप्त होते हैं और प्रेतों को कष्ट मिलता है — भी हटाया जा सकता है।
वे कहते हैं कि यदि आपका वंश बढ़ रहा है, तो उसमें सामर्थ्य नहीं है। आप निकारी आदि प्रयोग करवाकर विधि विधान से उसे हटवा सकते हैं। यदि वह पितृ के साथ है, तो — यदि पितरों को कोई दोष नहीं लग रहा, या आपके पितर अभी भी मज़बूत हैं — उनके द्वारा भी हटाया जा सकता है। और भगवान दत्तात्रेय के द्वारा, उनकी विशेष साधना से — जिससे केवल पितर तृप्त होते हैं और प्रेतों को कष्ट मिलता है — उनके द्वारा भी हटाया जा सकता है।
"एकं ब्रह्म द्वितीयं नास्ति" का विष्णु द्वारा शिव की पूजा से मेल कैसे बैठता है?
केवल सनातन ही अनेक ईश्वरवाद को मानता है
एक श्रोता ने पूछा कि "एकं ब्रह्म द्वितीयं नास्ति" होते हुए भी हमारा सनातन धर्म कभी विष्णु जी को शिव जी की पूजा करते और कभी शिव जी को राम जी का ध्यान करते क्यों दिखाता है; वक्ता कहते हैं कि उनमें आपस में सामंजस्य है: सनातन संस्कृति ही ऐसी है, यह धर्म ही ऐसा है, जिसमें अनेक ईश्वरवाद की उपस्थिति मानी गई है। वे कहते हैं, कोई भी पुराण पढ़ें — आपके जो भी इष्ट हों उनसे जुड़ा पुराण पढ़ें — और आप यह विषय समझ जाएँगे।
एक श्रोता ने पूछा कि एकं ब्रह्म द्वितीयं नास्ति होते हुए भी हमारा सनातन धर्म कभी विष्णु जी को शिव जी की पूजा करते और कभी शिव जी को राम जी का ध्यान करते क्यों दिखाता है; वक्ता कहते हैं कि उनमें आपस में सामंजस्य है। सनातन संस्कृति ही ऐसी है, यह धर्म ही ऐसा है, जिसमें अनेक ईश्वरवाद की उपस्थिति मानी गई है। कोई भी पुराण पढ़ें — आपके जो भी इष्ट हों उनसे जुड़ा पुराण पढ़ें — और आप यह विषय समझ जाएँगे। क्योंकि वेद और उपनिषद सामान्य लोगों की समझ में नहीं आ रहे थे, इसलिए भगवान वेदव्यास ने अठारह पुराणों की रचना की, जिनमें उन्हीं बातों को कथा आदि के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया।
मूल ग्रंथों को सीधे क्यों देखना चाहिए?
विरोधी टीकाकारों द्वारा अनुवाद में डाली गई त्रुटियाँ
वक्ता कहते हैं कि बाद के समय में ऐसे बहुत लोग हुए जो सनातन को नुकसान पहुँचाने के लिए उठे — एक तरह से टीकाकार, जिन्होंने संस्कृत को हिंदी में बदला। लिखने में उनसे त्रुटियाँ हुईं; उन्होंने कुछ बातें गलत लिखीं। जब आप मूल ग्रंथों को ठीक से देखेंगे, तो आपको बहुत-सी बातें पता चलेंगी।
वे कहते हैं कि बाद के समय में ऐसे बहुत लोग हुए जो सनातन को नुकसान पहुँचाने के लिए उठे — जो एक तरह से टीकाकार बने, जिन्होंने संस्कृत को हिंदी में बदला। लिखने में उनसे त्रुटियाँ हुईं; उन्होंने कुछ बातें गलत लिखीं। वे कहते हैं कि जब आप मूल ग्रंथों का ठीक से अवलोकन करेंगे, तो आपको बहुत-सी बातें जानने को मिलेंगी।
शक्ति एक है या अनेक?
एक शक्ति, जिसने अलग-अलग रूप धारण किए
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि शक्ति एक ही है और उसने अलग-अलग रूप धारण किए हैं; यही हमारे सनातन की व्यापकता है। और इसी कारण वे बार-बार कहते हैं: अपने इष्ट की गीता पढ़ें। हर शक्ति में, हर रूप में यही एक बात कही गई है।
दूसरी बात यह है कि शक्ति एक ही है और उसने अलग-अलग रूप धारण किए हैं; वे कहते हैं, यही हमारे सनातन की व्यापकता है। और इसी कारण वे बार-बार दोहराते हैं: अपने इष्ट की गीता पढ़ें। हर शक्ति में, हर रूप में यही एक बात कही गई है। जैसे गीता में भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं कि आप किसी भी देवी देवता की पूजा करें, वह मुझ तक ही पहुँचेगी, और दूसरे देवी देवता की पूजा से आपको मोक्ष आसानी से नहीं मिलेगा, जबकि मेरी पूजा से मोक्ष आसानी से मिलेगा — ठीक उसी तरह जब आप शिव गीता पढ़ते हैं, तो वहाँ भगवान शिव भी यही बात कह रहे हैं। शिव पुराण पढ़ें तो वहाँ भी शिव जी ने यही बात कही है।
हर पुराण के सृष्टि-वर्णन की जड़ में क्या है?
निराकार ईश्वर का अपना साकार रूप चाहना
वक्ता कहते हैं कि आप जिसे भी मानें, उन्हें सुनें; उन्होंने वही बात कही है — सबकी वाणी एक जैसी है। रूप अलग हो रहा है पर सब कहीं न कहीं एक हैं। जब आप सबकी शुरुआत देखें: श्रीमद् देवी भागवत पढ़ें तो वहाँ बताया गया है कि सभी देवी देवता भगवती से प्रकट हो रहे हैं; शिव महापुराण में सब शिव जी से प्रकट हो रहे हैं; दूसरे वैष्णव पुराण पढ़ें तो सभी देवी देवता विष्णु जी से प्रकट हो रहे हैं। पर सबकी जड़ में एक बात आती है — कि पहले ईश्वर निराकार था, उसमें इच्छा उठी, और उसने अपना साकार रूप प्रकट किया।
वे कहते हैं कि आप जिसे भी मानें, उन्हें सुनें; उन्होंने वही बात कही है। सबकी वाणी एक जैसी है — यानी रूप अलग हो रहा है, पर सब कहीं न कहीं एक हैं। जब आप सबकी शुरुआत देखें: श्रीमद् देवी भागवत पढ़ें तो बताया गया है कि सभी देवी देवता भगवती से प्रकट हो रहे हैं; शिव महापुराण में सब शिव जी से प्रकट हो रहे हैं; दूसरे वैष्णव पुराण पढ़ें तो सभी देवी देवता विष्णु जी से प्रकट हो रहे हैं। पर सबकी जड़ में एक बात आती है — कि पहले ईश्वर निराकार था, उसमें इच्छा उठी, और उसने अपना साकार रूप प्रकट किया। तो जड़ को देखें; और जब आप इन सबका ठीक से अध्ययन, चिंतन और मनन करेंगे, तो जड़ तक पहुँचेंगे। यही उनकी व्यापकता और उनकी लीला है।
जिसका शरीर स्वस्थ न रहता हो, वह साधना के लिए क्या करे?
नाम जप और स्तुति गायन
एक श्रोता कहते हैं कि उनका शरीर स्वस्थ नहीं रहता और वे साधना करना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं कि यदि आप अस्वस्थ रहते हैं और साधना करना चाहते हैं, तो नाम जप और स्तुति गायन आदि का सहारा लें। वे जोड़ते हैं कि सबका समय आता है, और समय से पहले कुछ नहीं होता।
एक श्रोता कहते हैं कि उनका शरीर स्वस्थ नहीं रहता और वे साधना करना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं कि यदि आप अस्वस्थ रहते हैं और साधना करना चाहते हैं, तो नाम जप और स्तुति गायन आदि का सहारा लें। वे कहते हैं कि सबका समय आता है; समय से पहले कुछ नहीं होता। इसी कारण वे बार-बार पुराण पढ़ने को कहते हैं।
राक्षसों और शापों के बारे में पुराण क्या कहते हैं?
नारद के शाप से जय और विजय रावण और कुंभकर्ण बने
वक्ता कहते हैं कि पुराणों में आप पाएँगे कि जो भी राक्षस हुए, उन्हें किसी न किसी ने शाप दिया था। रावण इतना बड़ा अहंकारी, इतना बड़ा कुकर्मी था, उसके भीतर हज़ार बुराइयाँ थीं — पर वह कौन था? भगवान श्री नारायण के द्वारपाल जय और विजय, जिन्होंने रावण और कुंभकर्ण के रूप में जन्म लिया; उन्हें जन्म लेना पड़ा, क्योंकि नारद जी ने दोनों को शाप दिया था।
वे कहते हैं कि पुराणों में आप पाएँगे कि जो भी राक्षस हुए, उन्हें किसी न किसी ने शाप दिया था। रावण इतना बड़ा अहंकारी, इतना बड़ा कुकर्मी था, उसके भीतर हज़ार बुराइयाँ थीं — पर वह कौन था? भगवान श्री नारायण के द्वारपाल जय और विजय, जो रावण और कुंभकर्ण के रूप में अवतरित हुए। उन्हें जन्म लेना पड़ा; क्यों? क्योंकि नारद जी ने दोनों को शाप दिया था।
रावण का ब्राह्मण वंश कर्म और जन्म के बारे में क्या दिखाता है?
बुरे कर्म से शाप और वैसा ही जन्म मिलता है
वक्ता पूछते हैं कि जब रावण को राक्षस योनि में जन्म लेना पड़ा — पर उसके पिता कौन थे? उसके परदादा ब्रह्मा जी हैं, जिनके ब्रह्म कुल में उसका जन्म हुआ। ब्राह्मण होते हुए भी उसे शाप के कारण राक्षस जैसे कर्म करने पड़े। ठीक उसी तरह जब कर्म बुरे होते हैं, तो ऐसा शाप मिलेगा, और ऐसे घर और ऐसे वंश में जन्म लेकर वैसे ही कर्म करने पड़ेंगे, और वह कष्ट मिलेगा।
जब रावण को राक्षस योनि में जन्म लेना पड़ा — पर उसके पिता कौन थे, वे पूछते हैं। उसके परदादा ब्रह्मा जी हैं, जिनके ब्रह्म कुल में उसका जन्म हुआ। ब्राह्मण होते हुए भी उसे शाप के कारण राक्षस जैसे कर्म करने पड़े। ठीक उसी तरह, जब कर्म बुरे होते हैं, तो ऐसा शाप मिलेगा, और ऐसे घर में, ऐसे वंश में जन्म लेकर वैसे ही कर्म करने पड़ेंगे और वह कष्ट मिलेगा। वे कहते हैं, यही बात समझनी है। यदि आप अच्छे कर्म नहीं करेंगे, तो ऐसे घर में जन्म लेंगे। मान लीजिए आपका जन्म सनातन संस्कृति में हुआ और आप पूरा जीवन दूसरों को कष्ट देने में बिताते हैं — तो बाद में कहा जाएगा कि जाओ, ऐसे वंश में जन्म लो जहाँ दूसरों को कष्ट देना पड़े, और फिर ऐसे लोगों को कष्ट दिया जाए।
क्या किसी का दिया गैंडे के सींग का कड़ा पहना जा सकता है, और श्रावण में कितना रुद्राष्टक पढ़ें?
देने वाले के निर्देश से पहनें; रुद्राष्टक के आठ या नौ पाठ
एक श्रोता कहते हैं कि गैंडे के सींग की वह वस्तु उन्हें एक गिरीश जी ने भेंट की थी, जिन्होंने उसे केवल पहनने के लिए दिया। वक्ता कहते हैं, तो पहनें; कोई दिक्कत नहीं, और क्योंकि उन्होंने दिया है, उन्हीं से निर्देश लें। यह पूछे जाने पर कि श्रावण में कितना रुद्राष्टक पढ़ना चाहिए, वे कहते हैं: रोज़ आठ पाठ करें, या नौ पाठ करें।
एक श्रोता बताते हैं कि वह वस्तु उन्हें एक गिरीश जी ने भेंट की थी, जिन्होंने उसे केवल पहनने के लिए दिया। वक्ता कहते हैं, तो पहनें; कोई दिक्कत नहीं। क्योंकि उन्होंने दिया है, उन्हीं से निर्देश लें — उन्हें लगता है कि गैंडे के सींग के बारे में ही पूछा जा रहा था — आप पहन सकते हैं। यह पूछे जाने पर कि श्रावण में रुद्राष्टक कितना पढ़ना चाहिए, वे कहते हैं: रोज़ आठ पाठ करें, या नौ पाठ।
गुरु महाराज के नाम पर क्या दान करना चाहिए?
कपड़े, अनाज, जो भी आप चाहें
यह पूछे जाने पर कि गुरु महाराज के नाम पर क्या दान करें या दें, वक्ता कहते हैं: जो भी आप चाहें — कपड़े, अनाज आदि दान करने चाहिए। एक श्रोता, जो कहते हैं कि उन्हें सुनकर उन्होंने पाशुपतास्त्र का पाठ बंद कर दिया, यद्यपि वे उसे केवल शिव कृपा पाने के लिए पढ़ते थे और उन्हें ऐसा संकल्प लेना पड़ा था, और अब शिव कवच शुरू किया है — उनसे वे कहते हैं कि वे एक बात बार-बार दोहराते हैं: हर कोई अपना निर्णय लेने को स्वतंत्र है।
यह पूछे जाने पर कि गुरु महाराज के नाम पर क्या दान करें या दें, वे कहते हैं: आपकी जो भी इच्छा हो — कपड़े, अनाज आदि दान करने चाहिए। एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें सुनकर उन्होंने पाशुपतास्त्र का पाठ बंद कर दिया, यद्यपि वे उसे हमेशा केवल शिव कृपा पाने के लिए पढ़ते थे और पहले उन्हें ऐसा संकल्प लेना पड़ा था, और अब उन्होंने उसे बंद करके शिव कवच शुरू किया है। वक्ता उत्तर देते हैं कि वे एक बात बार-बार कहते हैं: हर कोई अपने निर्णय के लिए स्वतंत्र है।
ऐसा अनुष्ठान अपने पास के उस शक्तिपीठ पर करवाया जा सकता है जिसकी ओर मन राज़ी हो
पास के शक्तिपीठ पर, जहाँ मन राज़ी हो
वक्ता कहते हैं कि यदि आप चाहें, तो अपने घर के सबसे नज़दीक पड़ने वाले किसी शक्तिपीठ पर ऐसे साधकों के द्वारा इस तरह का अनुष्ठान करवा सकते हैं। मन राज़ी हो, क्योंकि जब मन में श्रद्धा होती है तभी फल मिलता है। शनि की दृष्टि दसवें भाव पर पड़ने के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि यह पूरी कुंडली देखकर ही पता चलेगा — लग्न क्या है, भाव क्या है।
यदि आप चाहें, तो अपने घर के सबसे नज़दीक पड़ने वाले किसी शक्तिपीठ पर ऐसे साधकों के द्वारा इस तरह का अनुष्ठान करवा सकते हैं। वे कहते हैं कि आपका अपना मन राज़ी हो, क्योंकि जब मन में श्रद्धा होती है, तब फल मिलता है। ललिता सहस्रनाम पर एक वीडियो के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। यह पूछे जाने पर कि शनि की दृष्टि दसवें भाव पर पड़ने से उनके जीवन पर क्या प्रभाव होगा, वे कहते हैं कि यह पूरी कुंडली देखकर ही पता चलेगा — लग्न क्या है, भाव क्या है।
कौन-सा गोमूत्र लाभदायक है, और उसका प्रयोग कैसे होता है?
एक रंग की, गिरनारी या देसी गाय का, दुहने के समय
यह पूछे जाने पर कि जो खिलाया या पिलाया गया है क्या वह गोमूत्र से ठीक होता है, और किस गोमूत्र से, वक्ता कहते हैं: एक रंग की गाय, गिरनारी गाय, देसी गाय। जब सुबह देसी गाय को दुहा जा रहा हो — जिस समय दूध निकाला जा रहा हो — उस समय गाय जो मूत्र करती है। यदि उस गोमूत्र को मंत्रों से अभिमंत्रित करके, चाहे किसी साधक के द्वारा या कोई सामान्य व्यक्ति स्वस्तिवाचन आदि पढ़कर, मुख्य रूप से सेवन किया जाए, तो उससे बहुत बड़ा लाभ होता है।
यह पूछे जाने पर कि जो खिलाया या पिलाया गया है क्या वह गोमूत्र से ठीक होता है, और किस गोमूत्र से, वे पूछते हैं कि कौन-सा गोमूत्र लाभदायक है और उत्तर देते हैं। एक रंग की गाय, गिरनारी गाय, देसी गाय। जब सुबह देसी गाय को दुहा जा रहा हो — जिस समय दूध निकाला जा रहा हो — उस समय गाय जो मूत्र करती है। यदि उस गोमूत्र को मंत्रों से अभिमंत्रित करके, चाहे किसी साधक के द्वारा या कोई सामान्य व्यक्ति स्वस्तिवाचन आदि पढ़कर, मुख्य रूप से सेवन किया जाए, तो उससे बहुत बड़ा लाभ होता है।
सपने में हरे साँप का पीछा करना क्या दर्शाता है?
देव दोष, और इक्कीस दिन तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम्
एक श्रोता सपने में एक अजीब हरे साँप के बारे में बताते हैं जो तीन बार गुस्से में उन्हें काटने दौड़ा, जिससे वे बच गए और फिर हवा में उड़ने लगे, और जिसके बाद डरकर उन्होंने ग्राम भगवती की पूजा की। वक्ता कहते हैं कि हरे साँप का काटने दौड़ना देव दोष दर्शाता है — कि किसी देवी देवता से जुड़ी कोई गलती हुई है, जिसके कारण यह बार-बार दिख रहा है। यदि ऐसा है, तो एक बार इसकी जाँच करें; और यदि पता न चले कि कौन-सी गलती या कौन-सा दोष था, तो कम से कम इक्कीस दिन तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम् का पाठ करें।
एक श्रोता सपने में एक अजीब हरे साँप के बारे में बताते हैं जो तीन बार गुस्से में उन्हें काटने दौड़ा, जिससे वे बच गए और फिर हवा में उड़ने लगे, और कैसे डरकर उन्होंने फिर ग्राम भगवती की पूजा की। वक्ता कहते हैं कि हरे साँप का काटने दौड़ना देव दोष का अर्थ रखता है: किसी देवी देवता से जुड़ी कोई गलती हुई है, जिसके कारण आप इसे बार-बार देख रहे हैं। यदि ऐसा है, तो एक बार इसकी जाँच करें। यदि पता नहीं चल रहा कि गलती क्या थी, दोष क्या था, तो कम से कम इक्कीस दिन तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम् का पाठ करें, यह संकल्प लेकर कि जिस भी प्रकार का दोष हो, जिस भी देवी देवता को मैंने नाराज़ किया हो, वे मुझे क्षमा करें।
क्या सावन में बिना दीक्षा के महामृत्युंजय किया जा सकता है?
वैदिक मंत्र, जिसके लिए यज्ञोपवीत और दीक्षा ज़रूरी है
यह पूछे जाने पर कि क्या सावन में महामृत्युंजय करना है और क्या उसमें मंडल पूजन ज़रूरी है, वक्ता उत्तर देते हैं कि महामृत्युंजय वैदिक मंत्र है: इसे यज्ञोपवीत धारण करके और दीक्षित होकर ही करना चाहिए। एक श्रोता, जो कहते हैं कि पिछली बार बताया गया जप कभी कम कभी ज़्यादा होकर चल रहा है, और वे सूर्य का नित्य नियम कर रहे हैं, और एक बच्चे की छोटी-सी चूक के लिए क्षमा माँगते हैं — उनसे वे कहते हैं कि कोई चूक नहीं है और आराम से सेवा करें।
यह पूछे जाने पर कि क्या सावन में महामृत्युंजय करना है, और क्या उसमें मंडल पूजन ज़रूरी है या जप काफी है, वे उत्तर देते हैं कि महामृत्युंजय वैदिक मंत्र है: इसे यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करके और दीक्षित होकर ही करना चाहिए। एक श्रोता कहते हैं कि पिछली बार बताया गया जप चल रहा है, यद्यपि कभी कम कभी ज़्यादा होता है, और वे सूर्य का नित्य नियम कर रहे हैं, और एक बच्चे की छोटी-सी चूक के लिए क्षमा माँगते हैं। वक्ता कहते हैं कि कोई चूक नहीं है; आराम से सेवा करें। योगिनी तंत्र ग्रंथ पर प्रकाश डालने को कहे जाने पर वे बस इतना कहते हैं, ठीक है।
खाना बनाने के लिए वास्तव में कौन-सी साधना लागू होगी?
कोई विद्याधर, या भगवती अन्नपूर्णा की कोई अंग विद्या
वक्ता कहते हैं कि यदि आप इसके बारे में पूरी तरह गंभीर हैं — यदि आप मास्टर शेफ बनना चाहते हैं या इस क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं और ऐसी कोई साधना करना चाहते हैं — तो उन्हें एक बार इसे देखना पड़ेगा, क्योंकि यह प्रश्न पहली बार आया है और वे तुरंत नहीं कह सकते। इसमें विद्याधर साधना की जा सकती है, पर कौन-सा विद्याधर, यह देखना पड़ेगा; इसमें भगवती अन्नपूर्णा से जुड़ी कोई अंग विद्या करनी पड़ेगी। उन्हें देखना पड़ेगा कि भगवती अन्नपूर्णा के मंडल पूजन में कौन-सी अंग विद्या सामान्य रूप से कोई भी कर सकता है, ताकि हाथ में ही स्वाद आ जाए।
वे कहते हैं कि यदि आप इसके बारे में पूरी तरह गंभीर हैं — यदि आप मास्टर शेफ बनना चाहते हैं या इस क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं और ऐसी कोई साधना करना चाहते हैं — तो उन्हें एक बार इसे देखना पड़ेगा, क्योंकि यह प्रश्न पहली बार आया है और वे तुरंत नहीं कह सकते। इसमें विद्याधर साधना की जा सकती है, पर कौन-सा विद्याधर, यह देखना पड़ेगा; भगवती अन्नपूर्णा से जुड़ी कोई अंग विद्या करनी पड़ेगी। उन्हें देखना पड़ेगा कि भगवती अन्नपूर्णा के मंडल पूजन में कौन-सी अंग विद्या सामान्य रूप से कोई भी कर सकता है, ताकि हाथ में ही स्वाद आ जाए — कि यदि आप पानी में चीनी और नमक मिलाकर दें, तो उसमें भी अमृत जैसा स्वाद हो।
ब्रह्मराक्षस के लिए काल भैरव अनुष्ठान करें या विपरीत प्रत्यंगिरा?
दोनों उचित हैं
यह पूछे जाने पर कि ब्रह्मराक्षस हटाने के लिए काल भैरव अनुष्ठान करवाना उचित होगा या विपरीत प्रत्यंगिरा, वक्ता कहते हैं कि दोनों उचित हैं: आप दोनों में से कोई भी करवा सकते हैं — काल भैरव भी करवा सकते हैं, और विपरीत प्रत्यंगिरा भी करवा सकते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या घर की दीवार पर महाकालेश्वर बाबा की फोटो लगाई जा सकती है, वे कहते हैं कि बिल्कुल लगाई जा सकती है।
यह पूछे जाने पर कि ब्रह्मराक्षस हटाने के लिए काल भैरव अनुष्ठान उचित होगा या विपरीत प्रत्यंगिरा, वक्ता कहते हैं कि दोनों उचित हैं: आप कोई भी करवा सकते हैं। आप काल भैरव भी करवा सकते हैं, और विपरीत प्रत्यंगिरा भी करवा सकते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या घर की दीवार पर महाकालेश्वर बाबा की फोटो लगाई जा सकती है, वे कहते हैं कि बिल्कुल लगाई जा सकती है। आठवें भाव में चंद्रमा के साथ केमद्रुम योग दोष और छठे भाव में शनि और राहु के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि वे बस उत्तर देते जाएँगे, और श्रोता ने एक-एक करके सब कुछ पूछ लिया है।
अत्यधिक काम पीड़ा और टूटे ब्रह्मचर्य के लिए क्या करें?
सदाशिव की शरण लें; पंद्रह मिनट की पूजा
एक श्रोता कहते हैं कि वे नौ वर्षों से बुरी संगत और अशुद्ध आचरण में फँसे हैं, ब्रह्मचर्य नहीं रख पाते, और सब कुछ बर्बाद हो गया है। वक्ता कहते हैं कि जब काम ज्वर और काम पीड़ा बहुत अधिक हो, तो काम के नाश के लिए भगवान सदाशिव की शरण लें। क्या करें? आपको पंद्रह मिनट की पूजा करनी है। वे जोड़ते हैं कि श्रोता का शुक्र अवश्य गिरी हुई अवस्था में होगा, कुंडली में चंद्रमा अवश्य पीड़ित होगा, और पंचमेश राहु हो सकता है, जिसके कारण यह अवस्था आई है।
एक श्रोता लिखते हैं कि बुरी संगत में पड़कर वे नौ वर्षों से अशुद्ध आचरण में फँसे हैं, कि वे ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। नहीं रख पाते, कि सब कुछ बर्बाद हो गया है, और उपाय पूछते हैं। वक्ता कहते हैं कि जब काम ज्वर और काम पीड़ा बहुत अधिक हो, तो काम के नाश के लिए भगवान सदाशिव की शरण लें। क्या करना है? आपको पंद्रह मिनट की पूजा करनी है। वे कहते हैं कि आपका शुक्र अवश्य गिरी हुई अवस्था में होगा; कुंडली में चंद्रमा अवश्य पीड़ित होगा; पंचमेश राहु हो सकता है, जिसके कारण आपकी यह अवस्था आई है।
काम के नाश के लिए पंद्रह मिनट की पूजा क्या है?
द्वादश लिंग स्तोत्र के साथ पीतल के सात लोटे जल
वक्ता कहते हैं कि यदि आपको ऐसा कष्ट बहुत हो रहा है, तो सबसे पहले, श्रावण मास में, गुरु पूर्णिमा से शुरू करके श्रावण की पूर्णिमा तक, रोज़ पीतल के लोटे से भगवान सदाशिव पर कम से कम सात लोटे जल चढ़ाएँ — वे कहते हैं पीतल के लोटे से करें, क्योंकि उन्हें नहीं पता प्रश्नकर्ता कौन हैं — द्वादश लिंग स्तोत्र पढ़ते हुए, और उसके बाद भस्म से सदाशिव का शृंगार करें।
यदि आपको इस तरह का कष्ट बहुत हो रहा है, तो सबसे पहले, श्रावण मास में, गुरु पूर्णिमा से शुरू करके श्रावण की पूर्णिमा तक, हर दिन पीतल के लोटे से भगवान सदाशिव पर कम से कम सात लोटे जल चढ़ाएँ — वे कहते हैं पीतल के लोटे से करें, क्योंकि उन्हें नहीं पता आप कौन हैं। वह जल द्वादश लिंग स्तोत्र पढ़ते हुए चढ़ाएँ। और उसके बाद भस्म से सदाशिव का शृंगार करें।
अरघी से ली गई भस्म गले, माथे और नाभि पर लगाई जाती है
अरघी से, गले, माथे और नाभि पर
वक्ता कहते हैं कि जो भस्म आप अरघी पर लगाते हैं, उसे अपने गले पर, माथे पर और नाभि आदि जगहों पर लगाएँ। इसके साथ एक बार अपनी कुंडली का विश्लेषण भी करवाएँ, ताकि वास्तव में पता चल सके कि आपको कहाँ चोट करनी है।
जो भस्म आप अरघी पर लगाते हैं — उसे अपने गले पर, अपने माथे पर, और नाभि आदि जगहों पर लगाएँ। वे कहते हैं कि इसके साथ एक बार अपनी कुंडली का विश्लेषण भी करवाएँ, ताकि वास्तविकता पता चल सके: कि आपको किस पर चोट करनी है।
साधना के दौरान स्त्री के सपनों का क्या अर्थ है?
बहुत सामान्य; पर सामान्य, तंत्र, दोष, स्थान या भोजन कुछ भी हो सकता है
साधना के समय में स्त्री से जुड़े सपनों के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह बहुत सामान्य बात है, और उन्होंने इस विषय पर अलग वीडियो बनाया है। यह पूरी तरह जाँच का विषय है कि यह सामान्य बात है, या किसी तरह का तंत्र प्रयोग है, या आप जो साधना कर रहे हैं उसमें कुछ आ रहा है। इस पूरी चीज़ को देखना पड़ता है; यह निर्भर करता है। यह हर किसी के लिए अलग हो सकता है, और सामान्य भी हो सकता है। जब शरीर बहुत थक जाता है तब भी ऐसा होता है; और इसमें तंत्र आदि के दोष, देव दोष, स्थान का दोष और भोजन का दोष होते हैं।
साधना के समय में स्त्री से जुड़े सपनों के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह बहुत सामान्य बात है और उन्होंने इस विषय पर अलग वीडियो बनाया है। यह पूरी तरह जाँच का विषय है: कि यह सामान्य बात है, या किसी तरह का तंत्र प्रयोग है, या आपके द्वारा की जा रही साधना में कुछ आ रहा है। इस पूरी चीज़ को देखना पड़ता है; यह निर्भर करने वाली बात है, हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है, और सामान्य भी हो सकती है। वे कहते हैं कि जब शरीर बहुत थक जाता है, तब भी ऐसा होता है। और इसमें तंत्र आदि के दोष होते हैं; देव दोष भी होते हैं, स्थान का दोष होता है, और भोजन का दोष होता है।
बीज मंत्र कब शुरू करें, और क्या यह गुरु मंत्र हो सकता है?
गुरु पूर्णिमा से शुरू करें; हाँ, गुरु मंत्र के रूप में काम कर सकता है
यह पूछे जाने पर कि मंत्र की पलट क्या है, वक्ता कहते हैं कि उनके मत में प्रश्न अधूरा है। यह पूछे जाने पर कि बीज मंत्र का जप कब शुरू करें और क्या उसे गुरु मंत्र के रूप में प्रयोग कर सकते हैं, वे कहते हैं हाँ, कर सकते हैं — गुरु पूर्णिमा के दिन से शुरू करें। एक श्रोता, जो माँ काली से पूरी तरह जुड़ना और सपने में उनके दर्शन पाना चाहती हैं, उनसे वे कहते हैं कि दर्शन देना उन पर निर्भर है; पर यदि आप उनकी सेवा पूजा करना चाहती हैं, तो शुभ समय पर उनके स्तोत्र और स्तुति का गायन और उनकी आरती शुरू करें।
यह पूछे जाने पर कि मंत्र की पलट क्या है, वे कहते हैं कि उनके मत में प्रश्न पूरा नहीं है। एक और श्रोता कहते हैं कि मरघट की मसानी समझाई जा चुकी है। यह पूछे जाने पर कि बीज मंत्र का जप कब शुरू करें और क्या उसे गुरु मंत्र के रूप में प्रयोग कर सकते हैं, वे कहते हैं हाँ, कर सकते हैं — गुरु पूर्णिमा के दिन से शुरू करें। एक श्रोता लिखती हैं कि वे माँ काली से पूरी तरह जुड़ना और सपने में उनके दर्शन पाना चाहती हैं। वे कहते हैं कि दर्शन देना उन पर निर्भर है; पर यदि आप उनकी सेवा पूजा करना चाहती हैं, तो शुभ समय पर उनके स्तोत्र और स्तुति का गायन और उनकी आरती शुरू करें।
गायत्री मंत्र में कितनी शक्ति है?
हर गीता कहती है: मंत्रों में मैं गायत्री हूँ
यह पूछे जाने पर कि गायत्री मंत्र में कितनी शक्ति है, वक्ता आश्चर्य प्रकट करते हैं, और कहते हैं कि वे स्वयं मंत्र नहीं बोलेंगे, पर वेद में गायत्री सर्वोपरि हैं, और जितनी भी गीताएँ हैं उन सबमें कहा गया है कि मंत्रों में मैं गायत्री हूँ — शिव गीता में शिव जी, शिव महापुराण में भी शिव जी, और गीता में स्वयं श्री कृष्ण। तो उनकी महिमा असीम है।
यह पूछे जाने पर कि गायत्री मंत्र में कितनी शक्ति है, वे आश्चर्य प्रकट करते हैं, और कहते हैं कि वे मंत्र नहीं बोलेंगे, यह नहीं कहेंगे कि कौन-सा मंत्र। पर वेद में गायत्री सर्वोपरि हैं, और जितनी भी गीताएँ हैं उन सबमें कहा गया है कि मंत्रों में मैं गायत्री हूँ। शिव गीता में शिव जी; शिव महापुराण में भी शिव जी। गीता में स्वयं श्री कृष्ण: मंत्रों में मैं गायत्री हूँ। तो उनकी महिमा असीम है।
शास्त्र क्या कहता है
Kṛṣṇa says that among metres he is the Gāyatrī.
The verse says among metres (छन्दसाम्), where the speaker says among mantras.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥
सामों में मैं बृहत्साम हूँ, छन्दों में गायत्री हूँ। महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ, और ऋतुओं में फूलों वाला वसन्त हूँ।
दुर्गा सप्तशती का पाठ कैसे करना चाहिए?
चैनल पर बताए गए महाविद्या क्रम से
यह पूछे जाने पर कि दुर्गा सप्तशती का पाठ कैसे करें, वक्ता कहते हैं: दुर्गा सप्तशती का पाठ महाविद्या क्रम से करें, जो इसी चैनल पर बताया गया है — जिसमें किसी दिन एक अध्याय, किसी दिन दो अध्याय, और किसी दिन तीन अध्याय पढ़ने होते हैं। इसमें आपको शाप विमोचन आदि भी नहीं करना पड़ेगा। दुर्गा सप्तशती के पाठ पर एक लाइव भी है; उसे पूरा सुनें और आपकी हर शंका उसमें दूर हो जाएगी।
यह पूछे जाने पर कि दुर्गा सप्तशती का पाठ कैसे करें, वे कहते हैं: इसे महाविद्या क्रम से पढ़ें, जो इसी चैनल पर बताया गया है। इसमें किसी दिन एक अध्याय, किसी दिन दो अध्याय, और किसी दिन तीन अध्याय पढ़ने होते हैं। इसमें आपको शाप विमोचन आदि भी नहीं करना पड़ेगा। दुर्गा सप्तशती के पाठ पर एक लाइव भी है; उसे पूरा सुनें और उसमें आपकी हर शंका दूर हो जाएगी। यह पूछे जाने पर कि क्या अर्गला स्तोत्र की रोज़ की मालाएँ अच्छा फल देंगी, वे कहते हैं कि बिल्कुल देंगी, और वे बहुत अच्छा कर रही हैं।
जिस बेटी को शिवलिंग पूजा के सपने आते हैं, उसे क्या सिखाएँ?
शिव पूजन और रुद्राष्टक गायन के लिए प्रोत्साहित करें
एक श्रोता कहते हैं कि उनकी बेटी को हमेशा शिवलिंग या उससे जुड़ी पूजा के सपने आते हैं और पूछते हैं कि कौन-सी साधना करनी चाहिए। वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले, आपकी बेटी को इतना अच्छा सपना आ रहा है: उसे शिव पूजन करने के लिए प्रेरित करें। उसे रुद्राष्टक की स्तुति गाना सिखाएँ — पढ़ना नहीं, गाना, और अच्छे से गाना। वह रोज़ शिवलिंग का अभिषेक करे, उसका शृंगार करे, और साथ में रुद्राष्टक पढ़े। उसे यहीं से शुरू करवाएँ।
एक श्रोता, बातों को इतनी सरलता और शुद्धता से रखने के लिए धन्यवाद देते हुए, लिखते हैं कि उनकी बेटी को हमेशा शिवलिंग या उससे जुड़े पूजा पाठ के सपने आते हैं, और पूछते हैं कि कौन-सी साधना करनी चाहिए। वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले, आपकी बेटी को इतना अच्छा सपना आ रहा है: उसे शिव पूजन करने के लिए प्रेरित करें। उसे रुद्राष्टक की स्तुति गाना सिखाएँ — पढ़ना नहीं, गाना, और अच्छे से गाना। वह रोज़ शिवलिंग का अभिषेक करे, उसका शृंगार करे, और उसके साथ रुद्राष्टक पढ़े। वे कहते हैं, उसे यहीं से शुरू करवाएँ। यह पूछे जाने पर कि सिद्ध कुंजिका स्तोत्र में कितनी शक्ति है, वे कहते हैं कि बहुत है, हमारी सोच से भी ज़्यादा।
किसके दर्शन करने चाहिए, और विंध्याचल में क्या करें?
दर्शन उसके होते हैं जिसके भीतर कुछ हो; विंध्याचल त्रिकोण यात्रा
यह पूछे जाने पर कि किसके दर्शन करने चाहिए, वक्ता कहते हैं: दर्शन का अर्थ क्या है? दर्शन उसके होते हैं जिसके भीतर कुछ हो। वे कहते हैं, भगवती के दर्शन करें; विंध्याचल आइए, उनके लिए वहाँ सब कुछ है। भगवती विंध्यवासिनी के दर्शन करें, त्रिकोण यात्रा करें; अब वहाँ घूमने की भी बहुत-सी जगहें हैं, तो आराम से आइए और घूमिए, आपको कुछ न कुछ प्राप्त होगा।
यह पूछे जाने पर कि किसके दर्शन करने चाहिए, वे कहते हैं: दर्शन का अर्थ क्या है? दर्शन उसके होते हैं जिसके भीतर कुछ हो। वे कहते हैं, भगवती के दर्शन करें। विंध्याचल आइए; उनके लिए वहाँ सब कुछ है। भगवती विंध्यवासिनी के दर्शन करें और त्रिकोण यात्रा करें। अब वहाँ घूमने की भी बहुत-सी जगहें हैं, तो आराम से आइए और घूमिए; आपको कुछ न कुछ प्राप्त होगा। यह पूछे जाने पर कि क्या त्राटक से यक्षिणी और कृत्या सिद्ध होती हैं, वे बस कहते हैं: अच्छा।
पूजा का सबसे अधिक प्रभाव कहाँ होता है?
घर, गुरु का घर, बारह वर्ष से पुराना मंदिर, तीर्थ
महावतार बाबाजी और उनका आशीर्वाद कैसे पाएँ, इस बारे में पूछे जाने पर वक्ता इसे बहुत अच्छा प्रश्न बताते हैं और कहते हैं कि उन्हें सभी सिद्ध गुरुओं के लिए अलग वीडियो बनाने होंगे — चाहे महावतार बाबाजी हों, श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय हों, या तैलंग स्वामी जैसे दूसरे सिद्ध पुरुष। यह पूछे जाने पर कि किस स्थान पर पूजा का सबसे अधिक प्रभाव होता है, वे कहते हैं कि उनके मत में गृहस्थ अपने घर में पूजा करे तब भी प्रभाव होता है; गुरु के घर पर करे तब भी प्रभाव होता है; सबकी महिमा अलग है। बारह वर्ष से अधिक पुराने शिव मंदिर में, जिसकी स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा हुई हो, पूजा करने का अधिक प्रभाव होता है; और तीर्थ क्षेत्र में, गंगा में, नर्मदा क्षेत्र आदि में पूजा का असीम प्रभाव होता है।
महावतार बाबाजी और उनका आशीर्वाद कैसे मिल सकता है, इस बारे में पूछे जाने पर वे इसे बहुत अच्छा प्रश्न बताते हैं और कहते हैं कि उन्हें सभी सिद्ध गुरुओं के लिए अलग वीडियो बनाने होंगे — चाहे महावतार बाबाजी हों, श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय हों, या तैलंग स्वामी जैसे दूसरे सिद्ध पुरुष। यह पूछे जाने पर कि किस स्थान पर पूजा का बहुत अधिक प्रभाव होता है, वे कहते हैं कि उनके मत में गृहस्थ व्यक्ति अपने घर में पूजा करे तब भी प्रभाव होता है; गुरु के घर पर करे तब भी प्रभाव होता है; सबकी महिमा अलग है। बारह वर्ष से अधिक पुराने शिव मंदिर में — जहाँ स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा हुई हो — पूजा करने का अधिक प्रभाव होता है; और तीर्थ क्षेत्र में, गंगा में, नर्मदा क्षेत्र आदि में की गई पूजा का असीम प्रभाव होता है।
क्या श्री विद्या दीक्षा के बिना ललिता सहस्रनाम पढ़ा जा सकता है?
नहीं, उनके मत में और दीक्षित ऊँचे साधकों के मत में
यह पूछे जाने पर कि क्या श्री विद्या दीक्षा के बिना ललिता सहस्रनाम नहीं किया जा सकता, वक्ता कहते हैं कि उनके अनुसार नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसमें मूल विद्या, मूल मंत्र और ऐसे मंत्र हैं जिनका उच्चारण बिना दीक्षा नहीं करना चाहिए; लोग उसके अधिकारी नहीं होते, और उसमें न्यास आदि की प्रक्रिया है। वे कहते हैं कि श्री विद्या में दीक्षित ऊँचे स्तर के साधकों ने भी यही कहा है — कि इसे नहीं करना चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या श्री विद्या दीक्षा के बिना ललिता सहस्रनाम नहीं किया जा सकता, वे कहते हैं कि उनके अनुसार नहीं किया जा सकता। क्योंकि उसमें मूल विद्या, मूल मंत्र, और ऐसे मंत्र हैं जिनका उच्चारण बिना दीक्षा नहीं करना चाहिए; लोग उसके अधिकारी नहीं होते, और उसमें न्यास आदि की प्रक्रिया है। और श्री विद्या में दीक्षित ऊँचे स्तर के साधकों ने भी यही कहा है: कि इसे नहीं करना चाहिए। जो ध्यान नहीं कर पाते, उनके पूछने पर कि क्या त्राटक कर सकते हैं, वे कहते हैं करें; यह पूछे जाने पर कि क्या भैरव जी और हनुमान जी की साथ में उपासना हो सकती है, वे कहते हैं हाँ; बेल पत्र के सपनों का अर्थ पूछे जाने पर वे कहते हैं कि बेल पत्र से भगवती और शिव जी की पूजा करें।
क्या गृहस्थ घर में काल भैरव की पूजा कर सकता है?
घर में बटुक भैरव, बाहर काल भैरव
यह पूछे जाने पर कि हनुमान जी का कौन-सा स्तोत्र या पाठ हर तरह की स्थिति के लिए अच्छा है, वक्ता कहते हैं: बड़वानल करें। यह पूछे जाने पर कि क्या गृहस्थ काल भैरव की पूजा कर सकते हैं, वे कहते हैं कि घर में काल भैरव का मंत्र जप, पूजा और स्थापना करने के बजाय बटुक भैरव का करना चाहिए; काल भैरव की पूजा घर के बाहर, शिव मंदिर आदि में करनी चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि हनुमान जी का कौन-सा स्तोत्र या पाठ हर तरह की स्थिति के लिए अच्छा रहेगा, वे कहते हैं: बड़वानल करें। यह पूछे जाने पर कि क्या गृहस्थ काल भैरव की पूजा कर सकते हैं, वे कहते हैं कि घर में काल भैरव का मंत्र जप, पूजा और स्थापना करने के बजाय बटुक भैरव का करना चाहिए; काल भैरव की पूजा घर के बाहर, शिव मंदिर आदि में करनी चाहिए।
क्या अघोरी या तामसिक गुरु पाने की कोई साधना है?
उसी इच्छा को मन में रखकर गुरु साधना करें
यह पूछे जाने पर कि नहाने के पानी में क्या मिलाएँ, वे कहते हैं कि यह निर्भर करता है — गंगाजल मिलाकर नहाएँ। यह पूछे जाने पर कि क्या गुरु प्राप्ति की साधना उनके लिए भी काम करती है जो तामसिक या अघोर साधना के लिए अघोरी गुरु या तामसिक गुरु चाहते हैं, वे कहते हैं: बिल्कुल, उसी इच्छा को मन में रखकर करें — कि हमें तामसिक साधना के लिए ऐसे गुरु चाहिए, कि हमें अघोरी गुरु चाहिए — और ऐसे गुरु मिलेंगे।
यह पूछे जाने पर कि नहाने के पानी में क्या मिलाना चाहिए, वे कहते हैं कि यह निर्भर करता है; गंगाजल मिलाकर नहाएँ। यह पूछे जाने पर कि जब गुरु प्राप्ति की साधना है, तो जो तामसिक या अघोर साधना करना चाहते हैं उन्हें अघोरी गुरु या तामसिक गुरु चाहिए, क्या उन्हें पाने की कोई साधना है, वे कहते हैं: बिल्कुल, उसी इच्छा को अपने मन में रखकर करें — कि हमें तामसिक साधना के लिए ऐसे गुरु चाहिए, कि हमें अघोरी गुरु चाहिए — और ऐसे गुरु मिलेंगे।
मंदिर बनवाने से कौन-सा पुण्य मिलता है, और अकाल मृत्यु के लिए क्या किया जाता है?
असीम पुण्य; अकाल मृत्यु के लिए नारायण नागबलि
यह पूछे जाने पर कि मंदिर बनवाने से कौन-सा पुण्य मिलता है, वक्ता कहते हैं कि असीम पुण्य मिलता है; कहा जाता है कि मंदिर बनवाने वाले लोग कई पीढ़ियों को तार देते हैं। एक श्रोता, जिनके बड़े भाई की दो वर्ष पहले अकाल मृत्यु हुई और जो अब बहुत परेशान किए जा रहे हैं, उनसे वे कहते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि उनकी उम्र क्या थी — यदि उनकी मृत्यु अभिचार आदि से, अकाल मृत्यु में हुई, तो वे बहुत ज़्यादा परेशान करेंगे। यदि अकाल मृत्यु दुर्घटना से हुई, तो नारायण नागबलि आदि करवाकर, और विधि विधान से उनके लिए श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करवाकर, उन्हें गति दी जा सकती है।
यह पूछे जाने पर कि मंदिर बनवाने से किस प्रकार का पुण्य मिलता है, वे कहते हैं कि असीम पुण्य मिलता है; कहा जाता है कि मंदिर बनवाने वाले लोग कई पीढ़ियों को तार देते हैं। एक श्रोता कहते हैं कि उनके बड़े भाई की दो वर्ष पहले अकाल मृत्यु हुई और अब वे बहुत परेशान किए जा रहे हैं, और उपाय पूछते हैं। वक्ता कहते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि उनकी उम्र क्या थी, और उसी के अनुसार देखना पड़ेगा — कि वे क्यों परेशान किए जा रहे हैं। यदि उनकी मृत्यु अभिचार आदि से, अकाल मृत्यु में हुई, तो वे बहुत ज़्यादा परेशान करेंगे। यदि अकाल मृत्यु दुर्घटना से हुई, तो नारायण नागबलि आदि करवाकर, और विधि विधान से उनके लिए श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करवाकर, उन्हें गति दिलाई जा सकती है।
क्या बहुत ज़्यादा बजरंग बाण पढ़ने से हनुमान जी नाराज़ होते हैं?
सिद्ध करके रखें; केवल कष्ट आने पर प्रयोग करें
यह पूछे जाने पर कि क्या बहुत ज़्यादा बजरंग बाण पढ़ने से हनुमान जी नाराज़ होंगे — मानो कह रहे हों, तुम कौन हो जो मुझे राम जी की सौगंध दे रहे हो — वक्ता कहते हैं: आपको इसे सिद्ध करके रखना चाहिए, और बार-बार प्रयोग नहीं करना चाहिए; प्रयोग तब करना चाहिए जब कोई कष्ट आए। यदि आपके जीवन में कोई कष्ट नहीं है, तो बजरंग बाण पढ़ने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं।
यह पूछे जाने पर कि क्या बहुत ज़्यादा बजरंग बाण पढ़ने से हनुमान जी नाराज़ होंगे — मानो पूछ रहे हों कि तुम कौन हो जो उन्हें राम जी की सौगंध दे रहे हो — वक्ता कहते हैं कि आपको इसे सिद्ध करके रखना चाहिए। बार-बार प्रयोग नहीं करना चाहिए; प्रयोग तब करना चाहिए जब कोई कष्ट आए। यदि आपके जीवन में कोई कष्ट नहीं है, तो बजरंग बाण पढ़ने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं।
शक्तिशाली स्तोत्र की तुलना असली ज़रूरत के लिए रखी तलवार से क्यों की जाती है?
सेब काटने के लिए चाकू लाते हैं, तलवार नहीं
वक्ता कहते हैं: एक बात बताइए — यदि आपको सेब काटकर खाना है, तो क्या उसे काटने के लिए तलवार लाएँगे, या चाकू? वहाँ आप चाकू का प्रयोग करेंगे। तीर और तलवार रखने की चीज़ें हैं — जैसे उनके साथ जिन्होंने पहले पाशुपतास्त्र के बारे में पूछा: पाशुपतास्त्र पढ़ने की ज़रूरत कब पड़ेगी? जब ऐसी समस्या हो, और जब आपके भीतर उतना सामर्थ्य हो। बजरंग बाण अपने आप में अत्यंत शक्तिशाली चीज़ है; जब ऐसी ज़रूरत हो तब उसका प्रयोग करें। नहीं तो हनुमान चालीसा।
वे कहते हैं: एक बात बताइए — यदि आपको सेब काटकर खाना है, तो क्या उसे काटने के लिए तलवार लाएँगे, या चाकू? वहाँ आप चाकू का प्रयोग करेंगे। तीर और तलवार रखने की चीज़ें हैं — जैसे उनके साथ जिन्होंने पहले पाशुपतास्त्र के बारे में पूछा। पाशुपतास्त्र पढ़ने की ज़रूरत कब पड़ेगी? जब ऐसी समस्या हो, और जब आपके भीतर उतना सामर्थ्य हो। बजरंग बाण अपने आप में अत्यंत शक्तिशाली चीज़ है; जब ऐसी ज़रूरत हो तब उसका प्रयोग करें। नहीं तो हनुमान चालीसा।
घूंघट मसानी क्या है?
ऐसी मसानी जो बिल्कुल भेद नहीं देती
यह पूछे जाने पर कि घूंघट मसानी क्या है, वक्ता कहते हैं कि यह ऐसी मसानी है जो भेद नहीं देती — इसीलिए उसे घूंघट मसानी कहा जाता है। वह मुँह भी नहीं खोलेगी; आप चौकी का भेद नहीं पा सकेंगे। यदि किसी भगतवाल साधक ने घूंघट मसानी के साथ प्रयोग किया है, तो अगले व्यक्ति को कितना भी मारा-पीटा जाए, वह बताएगा ही नहीं कि उस पर कौन-सी शक्ति है, क्या है, क्या नहीं। वे कहते हैं कि भगतवाल में लोग उसे बुलवाने में थक जाते हैं; बराटी आदि का प्रयोग भी बहुत बार विफल हो जाता है।
यह पूछे जाने पर कि घूंघट मसानी क्या है, वे कहते हैं कि यह ऐसी मसानी है जो भेद नहीं देती — इसीलिए उसे घूंघट मसानी कहा गया है। वह मुँह भी नहीं खोलेगी; आप चौकी का भेद नहीं पा सकेंगे। यदि किसी भगतवाल साधक ने घूंघट मसानी के साथ प्रयोग किया है, तो अगले व्यक्ति को कितना भी मारा-पीटा जाए, वह बताएगा ही नहीं कि उस पर कौन-सी शक्ति है, क्या है, क्या नहीं। भगतवाल में लोग उसे बुलवाने में थक जाते हैं; बराटी आदि का प्रयोग भी बहुत बार विफल हो जाता है।
घूंघट मसानी के विरुद्ध क्या चाहिए, और बजरंग बाण में सप्त मृतिका का क्या?
ऊँचे स्तर का तंत्र और महाविद्याएँ; सप्त मृतिका वैकल्पिक
वक्ता कहते हैं कि इसमें ऊँचे स्तर की तंत्र साधनाओं का सहारा लेना पड़ता है; महाविद्याओं का सहारा लेना पड़ता है। यह पूछे जाने पर कि बजरंग बाण के समय प्रयोग होने वाले पाँच तरह के अनाज के आटे में क्या सप्त मृतिका मिलानी है, वे कहते हैं: मिलाएँ तो उत्तम है; और न मिलाएँ तो भी कोई बात नहीं।
वे कहते हैं कि इसमें ऊँचे स्तर की तंत्र साधनाओं का सहारा लेना पड़ता है; महाविद्याओं का सहारा लेना पड़ता है। यह पूछे जाने पर कि बजरंग बाण के समय जो पाँच तरह के अनाज का आटा प्रयोग होता है, उसमें क्या सप्त मृतिका मिलानी है, वे कहते हैं: मिलाएँ तो उत्तम है; और न मिलाएँ तो भी कोई बात नहीं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।