त्रिवाचा और गृहस्थ — शक्ति से लिया वचन एक अनुबंध क्यों है, और उसकी शर्तों की कीमत
त्रिवाचा और देवी शक्ति से जुड़े भ्रमों को दूर करना।
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विषय की शुरुआत उनसे, जिन पर अभिचार हुआ है और जिन्हें उपायों से राहत नहीं मिलती
वे पीड़ित जिन्हें उपायों से राहत नहीं मिलती
वक्ता तंत्र और अभिचार से पीड़ित लोगों से बात शुरू करते हैं — जिन पर कोई तंत्रोक्त क्रिया की गई है, जो बहुत परेशान हैं और बहुत से प्रयोगों का सहारा ले रहे हैं, पर उन उपायों से उन्हें कोई खास राहत नहीं मिलती। वे कहते हैं कि पहले यह समझिए कि इसके पीछे क्या है, ऐसा क्यों होता है, और वचन का कितना महत्व है और वह कहाँ तक जाता है।
वक्ता विषय वहाँ से शुरू करते हैं जहाँ से वचन लेने की बात उठती ही है। वे लोग जो तंत्र और अभिचार से पीड़ित रहते हैं — जिन पर किसी न किसी प्रकार की तंत्रोक्त क्रियाएँ की गई हैं। व्यक्ति बहुत परेशान है और बहुत से प्रयोगों का सहारा ले रहा है, पर उन उपायों से उसे कोई खास राहत नहीं मिल रही। इसके पीछे कारण क्या है, और ऐसा क्यों होता है? वे कहते हैं कि पहले यह विषय समझिए: वचन का कितना महत्व है, और वह कहाँ तक जाता है। वे कहते हैं कि सबसे पहले यह साफ करना है कि किसी वचन में शक्ति आती कैसे है, और आज के समय में वचन देने वाली शक्तियाँ कौन सी हैं।
साधक परिवारों में जन्मे गृहस्थ अक्सर दादा की स्थापित शक्ति से मुक्ति चाहते हैं
दादा या पिता द्वारा कुल में स्थापित शक्तियाँ
वक्ता कहते हैं कि अभी चल रहे कलिकाल में उनके अपने गृहस्थ तंत्र परिवार में कई लोग ऐसे हैं जो किसी अच्छे साधक के परिवार से हैं और अपने ही कुल में स्थापित शक्तियों से छुटकारा चाहते हैं। किसी के दादा, किसी के पिता अच्छे तंत्र साधक थे और उन्होंने कुछ शक्तियाँ पाईं; अब वे लोग कठिनाई में हैं और उससे मुक्ति चाहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि पहले यह जानिए: आज के समय में, इस चल रहे कलिकाल में, ऐसे लोग हैं — साधक भी — और उनके गृहस्थ तंत्र परिवार में भी कई ऐसे लोग हैं जो किसी अच्छे साधक के परिवार से हैं और अपने ही कुल में स्थापित शक्तियों से मुक्ति चाहते हैं। किसी के दादा, किसी के पिता अच्छे तंत्र साधक थे और उन्होंने कुछ शक्तियाँ पाईं; पर अब उन पर परेशानी आ रही है, और वे उससे छुटकारा चाहते हैं। वे कहते हैं कि पहले यह विषय समझिए।
किसी शक्ति की कृपा माँगने और उससे वचन लेने में क्या अंतर है?
कृपा एक बात है, प्रत्यक्ष वचन दूसरी
वक्ता कहते हैं कि जब आप कोई उच्च कोटि की साधना करते हैं और किसी विशेष शक्ति की कृपा पाना चाहते हैं, तो वह अलग बात है। पर जब आप चाहते हैं कि वह शक्ति प्रत्यक्ष होकर आपको वचन दे — और आपको, मान लीजिए किसी गुरु से, पता चल गया है कि वचन में क्या लेना है और त्रिवाचा क्या है — तब आप वह साधना शुरू करते हैं, और तब बात अलग होती है।
वक्ता कहते हैं कि कारण यह बनता है। जब आप किसी उच्च कोटि की साधना करते हैं और किसी विशेष शक्ति की कृपा पाना चाहते हैं, तो वह विषय अलग है। पर जब आप चाहते हैं कि शक्ति आपके सामने प्रत्यक्ष हो और आपको वचन दे — और वचन में क्या लेना है, त्रिवचा क्या है, यह सब आपको पता है, मान लीजिए किसी गुरु के माध्यम से — तब आप साधना करना शुरू करते हैं।
किस प्रकार की शक्ति को सिद्ध होने में लंबा समय लगता है?
देवलोक की देव वर्ग शक्ति, इस भूमंडल की नहीं
मान लीजिए आप देव वर्ग की किसी उच्च कोटि की शक्ति की साधना कर रहे हैं, जो इस लोक से जुड़ी नहीं है — भूमंडल से नहीं, देवलोक से जुड़ी शक्ति। तब, वक्ता कहते हैं, आपको समय लगेगा। उनका उदाहरण किसी सौम्य स्वरूप की यक्षिणी की साधना है — हालाँकि वे बताते हैं कि ऐसे सभी स्वरूप गृहस्थ के लिए नहीं होते।
वक्ता कहते हैं, मान लीजिए आप देव वर्ग की किसी उच्च कोटि की शक्ति की साधना कर रहे हैं, जो इस लोक से जुड़ी नहीं है — भूमंडल से जुड़ी शक्ति नहीं, बल्कि देवलोक से जुड़ी शक्ति। तब उसे सिद्ध करने में आपको समय लगेगा। जैसे किसी सौम्य स्वरूप की यक्षिणी की साधना। हालाँकि, वे जोड़ते हैं, सभी स्वरूप गृहस्थ के लिए नहीं होते — फिर भी मान लीजिए। देव वर्ग में ऐसी बहुत सी शक्तियाँ हैं जिन्हें मर्यादित जीवन जीने वाले गृहस्थ आज के समय में भी सिद्ध करते हैं।
उच्च कोटि की साधना में सबसे पहले क्या परखा जाता है?
आपके भय की परीक्षा, और सात्विक विधि में लगने वाला समय
वक्ता कहते हैं कि जब आप ऐसी उच्च कोटि की साधना करते हैं, तो सबसे पहले आपके भय की परीक्षा होती है। गृहस्थ को केवल सात्विक ढंग से ही साधना करनी चाहिए, और जब आप सात्विक मर्यादा में रहते हैं तो समय भी अधिक लगता है — और लोग आमतौर पर साधना केवल इक्कीस या इकतालीस दिन के लिए उठाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब आप ऐसी उच्च कोटि की साधना करते हैं, तो सबसे पहले आपके भय की परीक्षा होगी। यह भी, वे कहते हैं, आप सबको पता है और आपने सुना होगा। गृहस्थ को केवल सात्विक ढंग से ही साधना करनी चाहिए। और जब आप सात्विक मर्यादा में रहकर साधना करते हैं, तो समय भी अधिक लगता है। और जब समय अधिक लगने लगता है — तो लोग कितने दिन की साधना उठाएँगे? वे इक्कीस दिन, इकतालीस दिन की साधना उठाते हैं।
इकतालीस दिन में कुछ न होने पर लोग क्या निष्कर्ष निकालते हैं?
साधना को मनगढ़ंत मानकर छोड़ देना
यदि इकतालीस दिन में कोई प्रत्यक्षीकरण नहीं हुआ और शक्ति का कोई खास अनुभव नहीं आया, तो वे हार मान लेते हैं। उन्हें लगने लगता है कि यह मनगढ़ंत, बनाई हुई साधना है, या ऐसा कुछ होता ही नहीं, या जिस मार्गदर्शक ने यह साधना बताई उसने पूरी बात नहीं बताई — और ऐसा सोचकर वे साधना छोड़ देते हैं।
यदि इकतालीस दिन में उनका कोई प्रत्यक्षीकरण नहीं हुआ, शक्ति का कोई खास अनुभव नहीं हुआ, तो वे हार मान लेते हैं। उन्हें लगता है कि यह मनगढ़ंत, बनाई हुई साधना है; या ऐसा कुछ होता ही नहीं; या शायद जिस मार्गदर्शक ने उन्हें यह साधना बताई उसने पूरी बात नहीं बताई। ऐसा सोचकर वे साधना छोड़ देते हैं।
क्या इकतालीस दिन बाद छोड़ी गई साधना व्यर्थ जाती है?
तपोबल उन तक पहुँचता है, और उनकी दृष्टि आप पर बनी रहती है
नहीं। वह साधना करने से जो तपोबल बना, और उस मंत्र की जो ऊर्जा बनी, वह उन तक अवश्य पहुँची। हो सकता है वे आपके सामने प्रत्यक्ष न हुई हों, कोई वचन न दिया हो, आपको कोई अनुभव ही न हुआ हो — पर अप्रत्यक्ष रूप से अब उनकी दृष्टि सदा आप पर रहती है। वक्ता कहते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं।
मान लीजिए किसी ने किसी सौम्य स्वरूप की यक्षिणी की इकतालीस दिन की साधना की। वह साधना करने से जो तपोबल बना और उस मंत्र की जो ऊर्जा बनी, वह उन तक अवश्य पहुँची। हो सकता है वे आपके सामने प्रत्यक्ष न हुई हों, आपको कोई वचन न दिया हो, आपको कोई अनुभव ही न हुआ हो, थोड़ा भी नहीं — पर अप्रत्यक्ष रूप से अब उनकी दृष्टि हमेशा, सदा के लिए आप पर रहती है। वक्ता कहते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं।
देवलोक की शक्ति दृढ़ता और धैर्य को और परखने के लिए भी प्रत्यक्ष होना रोक सकती है
दृढ़ता और धैर्य की आगे की परीक्षा
वक्ता कहते हैं कि कारण बहुत से हो सकते हैं। हो सकता है वे आपकी और परीक्षा लेना चाहती हों, आपकी दृढ़ता देखना चाहती हों, देखना चाहती हों कि आपमें कितना धैर्य है। वे कहते हैं कि किसी देवलोक की उच्च कोटि की शक्ति इतनी आसानी से प्राप्त नहीं होती।
वक्ता कहते हैं कि उनके आपके सामने प्रत्यक्ष न होने के कारण बहुत से हो सकते हैं। हो सकता है वे आपकी आगे और परीक्षा लेना चाहती हों, आपकी दृढ़ता देखना चाहती हों, देखना चाहती हों कि आपके भीतर कितना धैर्य है। किसी देवलोक की उच्च कोटि की शक्ति इतनी आसानी से प्राप्त नहीं होती।
इकतालीस दिन की सेवा के बदले जीवन भर की आज्ञाकारिता का सौदा कोई नहीं मानेगा
इकतालीस दिन की सेवा का राजेश शर्मा वाला उदाहरण
वक्ता श्रोता से सीधे पूछते हैं: यदि वे कहें कि वे इकतालीस दिन आपकी सेवा करेंगे पर उसके बाद आपको जीवन भर उनकी बात माननी होगी, तो क्या आप इस आधार पर मान जाएँगे? राजेश शर्मा नाम के श्रोता का उदाहरण लेकर वे कहते हैं कि उन्होंने इकतालीस दिन उनकी पूरी सेवा की — समय पर भोजन-पानी, उनकी सारी श्रृंगार की वस्तुएँ, पान, चाय — और राजेश शर्मा ने देखा कि वे नियम से कर रहे हैं; पर क्या जीवन भर की आज्ञाकारिता के लिए यह पूरी परीक्षा है?
वक्ता कहते हैं, मान लीजिए हम आपसे कहें कि हम इकतालीस दिन आपकी सेवा करेंगे, पर उसके बाद जीवन भर आपको हमारी बात माननी होगी। क्या आप ऐसे ही मान जाएँगे? इस विषय पर जरूर सोचिए। मान लीजिए आपका नाम राजेश शर्मा है। मैंने इकतालीस दिन राजेश शर्मा जी की पूरी सेवा की: समय पर भोजन-पानी, समय पर उनकी सारी श्रृंगार की वस्तुएँ आदि, उनके लिए पान, चाय, सब दिया। इकतालीस दिन में उन्होंने देखा कि हाँ, यह बहुत नियम से कर रहा है। पर क्या इकतालीस दिन में परीक्षा पूरी हो गई — कि हाँ, अब जीवन भर हम आपके वश में आ जाएँगे, और जब आप बुलाएँगे, जो कहेंगे वह करेंगे? वक्ता कहते हैं, यह इतना आसान नहीं है। देव वर्ग की शक्तियाँ इतनी आसानी से नहीं आतीं।
साधना के अलावा शक्ति इस जन्म के कर्म और बुलाने के पीछे की नीयत को भी तौलती है
इस जन्म के कर्म और बुलाने के पीछे की नीयत
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा शक्तियाँ आपके इस जन्म के कर्म देखती हैं, हमने जो भी अच्छा-बुरा किया है, और यह कि आपके मन में क्या है। क्या यह किसी से दुश्मनी के कारण यह शक्ति सिद्ध कर रहा है, ताकि सिद्ध होने पर उससे किसी की हत्या करवाए? क्या यह धन का लोभी है, किसी खास व्यक्ति से अधिक धनी बनना चाहता है, बहुत तीव्र लोभ के साथ? तब भी, वे कहते हैं, शक्ति सिद्ध नहीं होगी।
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा आपके इस जन्म के कर्म हैं — हमने जो भी कर्म किए हैं, अच्छे और बुरे — और उनके अनुसार भी वे शक्तियाँ देखती हैं कि क्या फलित होगा। वे देखती हैं: यह बुला तो रहा है, पर इसके मन में क्या है? यह क्या करवाना चाहता है? क्या यह किसी से दुश्मनी के कारण यह शक्ति सिद्ध कर रहा है, कि जब मुझे सिद्ध कर लेगा तो मुझसे किसी की हत्या करवाएगा? या — यह धन का लोभी है। यह फलाने व्यक्ति से अधिक धनी बनना चाहता है, और इसका लोभ बहुत ही तीव्र है। तब भी, वक्ता कहते हैं, शक्ति सिद्ध नहीं होगी।
शक्ति सिद्ध होने पर शत्रु को नचाने की मंशा रखने से क्या होता है?
पहले वह आपको हजार बार नचाएगी
यदि आपने पहले से मन में ठान रखा है कि आपका एक शत्रु है जो आपसे कहीं ज्यादा ताकतवर है, और आपने इच्छा की है कि इस यक्षिणी को सिद्ध करके आप उसे नचाएँगे — तो, वक्ता कहते हैं, सिद्ध होने से पहले वह आपको हजार बार नचाएगी। वे कहते हैं, यह जान लीजिए।
तो जो भाव आपने पहले से मन में रखा होगा — कि हमारा कोई शत्रु है, कि वह आपसे काफी अधिक शक्तिशाली है, और आपने मन में एक इच्छा बना ली है। कि जब हम इस यक्षिणी को सिद्ध कर लेंगे, तब तुम्हें नचाएँगे। तो सिद्ध होने से पहले वह आपको हजार बार नचाएगी। वक्ता कहते हैं, यह जान लीजिए।
क्या साधना में भौतिक इच्छाएँ रखना गलत है?
इच्छा गलत नहीं; शक्ति को अपनी मर्जी से बाँधना कठिन है
वक्ता कहते हैं कि भौतिक इच्छा करना गलत नहीं है। पर जब आप किसी शक्ति को अपने बंधन में लेकर अपनी मर्जी से चलाना चाहते हैं, तब वहाँ आपके लिए बातें काफी कठिन हो जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि भौतिक इच्छा करना गलत नहीं है। पर जब आप किसी शक्ति को अपने बंधन में लेकर उसे अपनी इच्छा से चलाना चाहते हैं — तब, उस बिंदु पर, बातें आपके लिए काफी कठिन हो जाती हैं।
कौन सा भाव शक्ति को जल्दी लाता है?
समर्पण — मैं आपकी आज्ञा से चलूँगा
यदि आप समर्पित होकर करते हैं — यह कहते हुए कि मैं आपको सिद्ध करने का प्रयास कर रहा हूँ पर आपकी आज्ञा के अनुसार चलूँगा; मेरे जीवन के कष्टों को अपनी इच्छा से देखिए और यह कष्ट दूर कीजिए; और आपकी कृपा से मेरा मुख्य लक्ष्य आध्यात्मिक उन्नति और भगवती की ओर जाना होगा; मुझे मार्ग दिखाइए, मुझे आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने और परोपकार करने दीजिए — तो, वक्ता कहते हैं, वह जल्दी सिद्ध होगी। पर यह भाव किसी के भीतर आता नहीं।
वक्ता कहते हैं, यदि आप यह समर्पित होकर करते हैं — कि हाँ, मैं आपको सिद्ध करने का प्रयास कर रहा हूँ, पर मैं आपकी आज्ञा के अनुसार चलूँगा। मेरे जीवन के जो भी कष्ट हैं, उन्हें आप अपनी इच्छा से देखिए। कृपया यह कष्ट दूर कीजिए, और आपकी कृपा से मेरा मुख्य लक्ष्य आध्यात्मिक उन्नति और भगवती की ओर जाना रहेगा। मुझे मार्ग दिखाइए। मुझे आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने दीजिए, परोपकार करने दीजिए। वक्ता कहते हैं, यदि आपकी सोच यही रहे, तो वह जल्दी सिद्ध होगी — पर यह किसी के भीतर बनता ही नहीं।
शक्ति उसे सिद्ध करने का प्रयास करने वाले साधक की परीक्षा कैसे लेती है?
षड्बल से माया, क्रोध और मोह भेजना, फिर आना ही नहीं
वक्ता कहते हैं कि जब वह माया फैलाती है, तो षड्बल से हर तरह से आपकी परीक्षा लेती है। वह आपको माया, क्रोध, मोह, माया, सब देगी। इसी बीच असली परीक्षा होती है — और फिर वह आती नहीं।
वक्ता कहते हैं कि जब वह माया फैलाती है, तो षड्बल से हर तरह से आपकी परीक्षा लेती है। वह आपको माया, क्रोध, मोह, माया — सब कुछ देगी। इसी बीच असली परीक्षा होती है, और फिर वह आती नहीं।
ऊँची यक्षिणी साधना में स्वयं यक्षिणी के अलावा और क्या साथ चलता है?
यक्षराज, क्रोध भैरव, और शिव की दो-तीन साधनाएँ
वक्ता कहते हैं कि ऐसी उच्च कोटि की साधना के साथ बहुत सी चीजें चलती हैं। साधक ने यक्षराज की साधना की होगी; क्रोध भैरव के साथ साधना करनी होती है, और गुरु ने वह करवाई होगी; और साथ में भगवान शिव से जुड़ी दो-तीन मुख्य साधनाएँ होती हैं।
अब जिस व्यक्ति ने इकतालीस दिन बाद यह कहकर साधना छोड़ दी कि कुछ होता नहीं — उस तपोबल के कारण, जितनी उच्च कोटि की साधना की गई है, उसके साथ बहुत सी चीजें चली होंगी। उसने यक्षराज की साधना की होगी। क्रोध भैरव के साथ साधना करनी होती है; गुरु ने वह करवाई होगी। और साथ में भगवान शिव से जुड़ी दो-तीन मुख्य साधनाएँ होती हैं।
छोड़ी गई साधना के बिना उपयोग हुए तपोबल का क्या होता है?
बिना खर्च हुआ तपोबल और उसके बाद आने वाला प्रस्ताव
इतनी साधना के बाद, जब देवलोक की यक्षिणी का प्रयास किया गया और वह सिद्ध नहीं हुई, तो आपने साधना छोड़ दी पर जो तपोबल बना था उसे कहीं उपयोग नहीं कर पाए। तब, वक्ता कहते हैं, आपको कोई व्यक्ति मिलता है जो कहता है कि वह आपसे कोई मसानी शक्ति सिद्ध करवा देगा, जो आपकी यक्षिणी से बड़ी है और बहुत कुछ देगी — या आपने ऐसा कोई प्रलोभन देखा, और उसमें आकर इस तरह की शक्ति सिद्ध करने चले गए।
इतनी साधना करने के बाद, जब देवलोकी यक्षिणी की साधना की गई और वह सिद्ध नहीं हुई — आपने साधना छोड़ दी, पर जो तपोबल बना था उसे आप कहीं उपयोग नहीं कर पाए। अब आपको कोई व्यक्ति मिला जिसने कहा: हम आपसे कोई मसानी शक्ति सिद्ध करवाएँगे, और वह आपकी यक्षिणी से बड़ी है, बहुत कुछ देगी। या आपने इसी तरह का कोई प्रलोभन देखा। और प्रलोभन में आकर आप इस तरह की शक्ति सिद्ध करने चले गए।
मसानी शक्ति एक ही रात में कैसे सिद्ध होती है?
दीवाली की रात जलती चिता, धार और मांस का टुकड़ा
वक्ता कहते हैं कि वह आपसे एक रात में सिद्ध हो जाएगी। आपको दीपावली की रात मसान में ले जाया गया; जलती चिता पर दारू की धार लगाई गई और मांस का एक टुकड़ा डाला गया; वहीं वह प्रत्यक्ष हो गई। वचन, वाचा और सब कुछ हो गया। और भोग बताया गया: हर अमावस्या को यह दारू और यह भोग दो, वह तुम्हारा काम करेगी; जब भी काम करवाना हो, यह भोग देते रहो।
वक्ता कहते हैं कि वह आपसे एक रात में सिद्ध हो जाएगी। दीपावली की रात आपको मसान में ले जाया गया। जलती चिता पर दारू की धार लगाई गई, मांस का एक टुकड़ा डाला गया, और वहीं वह प्रत्यक्ष हो गई। वचन, वाचा और बाकी सब हो गया। और आपको आनंद भी आने लगा। भोग बताया गया: हर अमावस्या को उसे यह दारू और यह भोग दो — बस वही, और वह तुम्हारा काम करेगी। जब भी काम करवाना हो, यह भोग देते रहो।
एक रात में प्रत्यक्ष हुई शक्ति साधारण भोग और शाबर मंत्रों पर चलती है
साधारण भोग और शाबर मंत्रों पर चलने वाली शक्ति
वक्ता कहते हैं कि यह भी देखिए कि कौन सा वचन लिया गया, प्रत्यक्षीकरण किस तरह हुआ, और आपमें ऐसी क्षमता कहाँ से आई। वहाँ आपके जो भी तंत्र गुरु थे, उन्होंने आपको उस तरह की शक्ति दी — एक रात में, या मान लीजिए ग्यारह रातों में, उन्होंने आपसे साधारण भोग पर चलने वाली शक्ति सिद्ध करवाई, शाबर जैसे मंत्रों पर चलने वाली शक्तियाँ।
और कौन सा वचन लिया गया? प्रत्यक्षीकरण भी किस तरह हुआ? आपमें ऐसी क्षमता कहाँ से आई, यह सब कैसे हुआ? वक्ता कहते हैं, यह भी देखिए। वहाँ आपके जो भी तंत्र गुरु थे, जब उन्होंने आपको उस तरह की शक्ति दी — एक रात में, मान लीजिए ग्यारह रातों आदि में — तो उन्होंने आपसे साधारण भोग पर चलने वाली शक्ति सिद्ध करवाई। उन्होंने आपसे सबर मंत्र आदि पर चलने वाली शक्तियाँ सिद्ध करवाईं। उसके बाद फिर क्या होता है?
मसानी सिद्धि वाला व्यक्ति क्यों कहता है कि उसे कोई परेशानी नहीं है?
आभा के आसपास अभी भी खड़ा पुण्य और तपोबल
वक्ता स्वयं आपत्ति रखते हैं: आप कहते हैं कि इस तरह की निम्न कोटि की तामसिक शक्तियाँ सिद्ध करने से कष्ट आता है, पर मेरे पास ऐसी सिद्धि है और मुझे कोई कष्ट नहीं — उल्टे वह मेरी बात मानती है। उनका उत्तर है: कब तक? केवल तब तक, जब तक आपकी की हुई देव वर्ग की साधना से बना तपोबल, उससे बना पुण्य, परोपकार की शक्तियाँ आपके ऑरा मंडल के पास खड़ी हैं — तब तक वे आपका कुछ नहीं बिगाड़ेंगी।
वक्ता कहते हैं, यहाँ आप यह प्रश्न रखेंगे: भाई, आप गलत कहते हैं। आप कहते हैं कि इस तरह की निम्न कोटि की तामसिक शक्तियाँ सिद्ध करने से कष्ट आता है — पर मुझे तो कोई कष्ट आ ही नहीं रहा। क्योंकि मैंने भी सिद्धि की है। मेरे पास भी फलानी मसानी शक्ति है, पर मुझे कोई कष्ट नहीं। उल्टे वह मेरी बात मानती है। कब तक? — वे पूछते हैं। जब तक जिस देव वर्ग की शक्ति की आपने साधना की, उससे बना तपोबल, उससे बना पुण्य, परोपकार की शक्तियाँ आपके ऑरा मंडल के पास खड़ी हैं — तब तक वे आपका कुछ नहीं बिगाड़ेंगी।
मसानी सिद्धि के बाद के पहले साल कैसे दिखते हैं?
एक, दो, तीन साल की दिखती हुई उन्नति
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण जो भी मसानी शक्तियाँ सिद्ध करता है, उसे शुरुआत में बहुत कुछ फलित होता दिखता है। एक साल, दो साल, तीन साल आप उन्हें काफी ऊँचाइयों पर जाते, बहुत आगे बढ़ते देखेंगे; वे आर्थिक रूप से उन्नति करेंगे; लोगों की भीड़ जुटेगी; बहुत कुछ होगा।
वक्ता कहते हैं कि यही कारण है कि जो भी मसानी शक्तियाँ सिद्ध करता है, उसे शुरुआत में बहुत कुछ फलित होता है। एक साल, दो साल, तीन साल आप उन्हें काफी ऊँचाई पर जाते, बहुत आगे बढ़ते देखेंगे। वे आर्थिक रूप से उन्नति करेंगे। लोगों की भीड़ जुटेगी। बहुत कुछ होगा।
मसानी सिद्धि बाद में अपने धारक के ही विरुद्ध क्यों हो जाती है?
नकारात्मक ऊर्जा में लिपटी शक्ति किसी को माया से मुक्त नहीं कर सकती
क्योंकि जैसे-जैसे तीन, पाँच, सात साल बीतते हैं — जब ऐसी मसानी शक्ति आती है, तो वह है क्या? एक तरह से वह कहीं न कहीं नकारात्मक ऊर्जा में लिपटी है, और वह स्वयं माया से मुक्त नहीं है; तो आपको माया से कहाँ से मुक्त करेगी? उल्टे वह आपको उसी तरह की चीजों में डालेगी। आप तामसिक पदार्थों का उपयोग कर रहे हैं। दो-चार साल बाद आपका पतन शुरू होता है, और फिर आपको बचाने वाला कोई नहीं रहता।
पर जैसे-जैसे तीन साल, पाँच साल, सात साल बीतते हैं — क्योंकि जब इस तरह की मसानी शक्ति आती है, तो वह है क्या? एक तरह से वह कहीं न कहीं नकारात्मक ऊर्जा में लिपटी है, और वह स्वयं माया से मुक्त नहीं है। तो वह आपको माया से कहाँ से मुक्त करेगी? उल्टे, वह आपको उसी तरह की चीजों में डालेगी। आप तामसिक पदार्थों का उपयोग कर रहे हैं। और फिर क्या होता है? दो-चार साल बाद आपका पतन शुरू होता है, और फिर आपको बचाने वाला कोई नहीं होता।
निकृष्ट शक्तियों का त्रिवाचा कभी नहीं करना चाहिए, प्रलोभन कितना भी बड़ा हो
निकृष्ट शक्तियों का त्रिवाचा कभी न करें
वक्ता कहते हैं कि याद रखने की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निकृष्ट शक्तियों का त्रिवाचा आदि कभी नहीं करना चाहिए। और किसी के प्रलोभन में आकर भी एक बार त्रिवाचा हो ही जाता है।
तो याद रखने वाली मुख्य बात, वक्ता कहते हैं, यह है कि निकृष्ट शक्तियों का त्रिवचा आदि कभी नहीं करना चाहिए। किसी के प्रलोभन में आकर भी एक बार त्रिवाचा हो ही जाता है। अब, वे कहते हैं, यहाँ प्रश्न उठता है: त्रिवाचा क्या है? त्रिवाचा सिद्धि क्या है? और गृहस्थ जीवन में उसकी मर्यादाएँ क्या हैं — जो एक मुख्य विषय है।
वचन लेते समय शक्ति किस रूप में प्रत्यक्ष होती है?
मानवी स्वरूप या सूक्ष्म स्वरूप — यह गुरु पर निर्भर है
यह पूछे जाने पर कि तीन वचन क्या हैं और साधना के बाद शक्ति कैसे प्रत्यक्ष होती है — मानवी स्वरूप में, सूक्ष्म स्वरूप में, या किस तरह — वक्ता कहते हैं कि यह आपके गुरु पर निर्भर है। गुरु ही होते हैं जो, जब आप व्यावहारिक रूप से प्रत्यक्षीकरण करेंगे, आपको इन सब बातों में ले जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ उठने वाली सबसे खास बात यह है कि त्रिवाचा क्या है और गृहस्थ जीवन में उसे किस तरह लेना चाहिए। तीन वचन, जिनके बारे में हम सुनते हैं। जब हमने साधना कर ली हो, तो किसी देवी शक्ति से वचन के रूप में क्या लेना होता है — और साधना करने के बाद वह शक्ति किस तरह प्रत्यक्ष होती है? क्या वह मानवी स्वरूप में प्रत्यक्ष होती है, या सूक्ष्म स्वरूप में, या किस तरह? वक्ता कहते हैं, यह आपके गुरु पर निर्भर है। गुरु ही होते हैं जो, जब आप व्यावहारिक रूप से प्रत्यक्षीकरण करेंगे, आपको इन सब बातों में ले जाते हैं।
प्रत्यक्षीकरण पच्चीस लाख की गाड़ी जैसा है — घर आने के बाद रखरखाव शुरू होता है
पच्चीस लाख की गाड़ी और उसका रखरखाव
वक्ता कहते हैं कि पूरी बात सुनिए — यहीं से यह कहकर मत कूदिए कि हाँ, हमें प्रत्यक्षीकरण करना है; जानिए कि उसके बाद क्या आता है। गाड़ी घर लाइए, बहुत अच्छी बात है, पूरी दुनिया को दिखाइए कि आपके पास पच्चीस लाख की गाड़ी है; पर पच्चीस लाख की गाड़ी लाएँगे तो उसका रखरखाव भी वैसा ही रखना होगा — साल का बीमा, उसकी धुलाई का खर्च, पचास तरह की चीजें। इसलिए पहले यह पूरा जान लीजिए।
वक्ता कहते हैं कि पूरी बात सुनिए, जो काफी आगे तक जाती है। बस यहीं से मत कूदिए कि हाँ, हमें प्रत्यक्षीकरण करना है। उसके बाद आने वाली बातें जानिए। क्योंकि देखिए — गाड़ी घर लाइए, बहुत अच्छी बात है। पूरी दुनिया को दिखाइए कि आपके पास पच्चीस लाख की गाड़ी है। पर अगर पच्चीस लाख की गाड़ी लाएँगे, तो उसका रखरखाव भी उसी तरह रखना होगा। साल का बीमा, उसकी धुलाई का खर्च, पचास तरह की चीजें। इसलिए पहले यह सब पूरा जान लीजिए।
शक्ति को प्रकट करवाने से पहले गुरु क्या करते हैं?
दिव्य दृष्टि देना, रक्षा घेरा, और साधना की अवधि
जब गुरु ने अपनी इच्छा से आपको दिव्य दृष्टि आदि दी हो — जिसे आँखें खोलना कहते हैं — यह कहकर कि इस तरह आप उस शक्ति को देख पाएँगे; जब उन्होंने आपको रक्षा घेरे आदि में बैठाया हो; और इकतालीस दिन की साधना, या तीन-चार महीने की साधना, या साल भर की साधना हुई हो — तब, जब ऐसी शक्ति आपके सामने प्रत्यक्ष हुई, आपसे तीन वचन लेने को कहा गया।
जब गुरु ने अपनी इच्छा से आपको दिव्यदृष्टि आदि दी — जिसे आँखें खोलना कहते हैं — यह कहकर कि हाँ, ठीक है, इस तरह आप उस शक्ति को देख पाएँगे। जब उन्होंने आपको रक्षा घेरे आदि में बैठाया, और इकतालीस दिन की साधना हुई, या तीन-चार महीने की साधना, या साल भर की साधना। जब उस तरह की शक्ति आपके सामने प्रत्यक्ष हुई, तो आपसे तीन वचन लेने को कहा गया।
आमतौर पर कौन से तीन वचन लिए जाते हैं?
बुलाने पर आना, भेजने पर जाना, कहा हुआ करना
वक्ता कहते हैं कि वचन देने के बाद के नियम होते हैं और उससे पहले के नियम होते हैं, और वचन अलग-अलग तरह से भी करवाया जाता है। पर तीन वचनों में मुख्य बात यही रहती है: जब मैं बुलाऊँ, तुम्हें आना होगा; जहाँ भेजूँ, तुम्हें जाना होगा; और जो कहूँ, तुम्हें करना होगा। आमतौर पर भगतवाल में मुख्य रूप से इन्हीं बातों पर वचन लिया जाता है। यही तीन वचन हैं।
तीन वचनों आदि में कुछ नियम वचन देने के बाद के होते हैं, और कुछ नियम वचन देने से पहले के। वचन भी अलग-अलग तरह से करवाया जाता है। तो तीन वचनों में मुख्य बात यही रहती है: जब मैं बुलाऊँ, तुम्हें आना होगा; जहाँ मैं भेजूँ, तुम्हें जाना होगा। और जो मैं करने को कहूँ, तुम्हें करना होगा। आमतौर पर भगतवाल में मुख्य रूप से इन्हीं बातों पर लिया जाता है। यही तीन वचन हैं।
क्या उच्च कोटि के तंत्र में वचन लिया ही जाता है?
वहाँ साधक बाँधने के बजाय समर्पण करता है
वक्ता कहते हैं कि जब आप उच्च कोटि के तंत्र क्षेत्र में जाते हैं, तो वहाँ इस तरह के वचन नहीं होते। वहाँ जब शक्तियाँ प्रत्यक्ष होती हैं, तो भाव ही अलग हो जाता है; यह कि मैं ये तीन वचन लूँगा और यह करूँगा, ऐसा वचन लेना बनता ही नहीं। वहाँ साधक समर्पित हो जाते हैं — दिव्य दृष्टि पाया हुआ साधक ऐसी भव्य शक्ति को सूक्ष्म रूप में भी देखकर भाव-विभोर होकर उनके चरणों में गिर जाता है और कहता है: आप जो भी शक्ति हों, जिस भी रूप में हों, बस अपनी कृपा कीजिए।
पर जब आप उच्च कोटि के तंत्र क्षेत्र में जाते हैं, वक्ता कहते हैं, तो वहाँ देखें तो इस तरह के वचन आदि होते ही नहीं। वहाँ जब शक्तियाँ प्रत्यक्ष होती हैं, तो भाव ही अलग हो जाता है। वहाँ इतना वचन लेना — कि मैं ये तीन वचन लूँगा, मैं यह करूँगा — बनता ही नहीं। वहाँ साधक समर्पित हो जाते हैं। जब उस भव्य प्रकार की शक्ति प्रत्यक्ष होती है, सूक्ष्म स्वरूप में भी, और दिव्य दृष्टि पाया हुआ साधक ऐसी शक्ति को देख पाता है — तो वह भाव-विभोर होकर उनके चरणों में गिर जाता है और कहता है: आप जो भी शक्ति हों, जिस भी रूप में हों, बस अपनी कृपा कीजिए। जैसी आपकी इच्छा, वैसे मुझे चलाइए; बस मेरा कल्याण हो।
सबसे बड़ी शक्ति कौन सी है?
जिसे समर्पण किया, वह गिरने नहीं देती; कोई शक्ति बंधन नहीं चाहती
वक्ता कहते हैं कि वही सबसे बड़ी शक्ति है — वह कभी आपका पतन नहीं होने देगी। पर जब आप उसे इस वचन में बाँधते हैं कि मैं जो कहूँ वह करना होगा, तब भी: बंधन कोई नहीं चाहता। वे कहते हैं, ध्यान रखिए कि कोई भी शक्ति बंधन नहीं चाहती। आपने अपने मंत्र और ऊर्जा के प्रभाव से उसे खींचकर लाया है।
वक्ता कहते हैं कि वही सबसे बड़ी शक्ति है। वह कभी आपका पतन नहीं होने देगी। पर जब आप उसे वचन में बाँधते हैं — कि मैं जो कहूँ वह करना होगा — तब भी, बंधन कोई नहीं चाहता। वे कहते हैं, ध्यान रखिए: कोई भी शक्ति बंधन नहीं चाहती। आपने अपने मंत्र और अपनी ऊर्जा के प्रभाव से उसे खींचकर लाया है।
यदि वचन के पीछे का उद्देश्य नीच हो तो क्या होता है?
बाहर निकलने के लिए वह आपकी गलतियाँ खोजेगी
जब आपका उद्देश्य कुछ नीच हो — किसी को नुकसान पहुँचाना, अपने लिए कोई काम करवाना जैसे बहुत अधिक धन कमाने की लालसा और उसके लिए उस तरह के प्रयोग और कृत्या करना, परोपकार की भावना का अभाव, ईर्ष्या और द्वेष से किसी पर विशेष षट्कर्म करना — तो वह शक्ति भी एक-एक चीज देखेगी। वह माफ नहीं करेगी। वह भी आपमें गलतियाँ खोजेगी, ताकि आप गलती करें और वह बाहर निकल सके।
और जब आपका उद्देश्य कुछ नीच होगा — किसी को नुकसान पहुँचाना; अपने लिए कोई काम करवाना, जैसे बहुत अधिक धन कमाने की लालसा, और उसके लिए उस तरह के प्रयोग और कृत्या करना; परोपकार की भावना का अभाव; ईर्ष्या और द्वेष के कारण किसी पर विशेष षट्कर्म आदि करना। जब आप ये काम उस शक्ति से करवाते हैं, तो वह शक्ति भी एक-एक चीज देखेगी। वह माफ नहीं करेगी। वह भी आपके भीतर गलतियाँ खोजेगी — कि यह गलती करे, और मैं बाहर निकलूँ।
बदले में शक्ति गृहस्थ पर कौन से नियम लगाती है?
पत्नी से व्यवहार, भोजन, भोग, वर्जित शक्तियाँ और मंत्र
यदि आप वहाँ गृहस्थ हैं, तो शक्तियों के अपने नियम होंगे, और वे भी अपने वचन के अनुसार उनका पालन करवाएँगी: कि आप गृहस्थ जीवन में फलाने ढंग से नहीं रह सकते; कि आपको अपनी पत्नी से इस तरह और इस तरह व्यवहार करना है। आप इन सब बातों में बँध जाएँगे — यह नहीं खाना है; खाने से पहले इस तरह भोग देना है; ये काम आप कभी नहीं कर सकते; इन शक्तियों की आप कभी पूजा नहीं कर सकते; इन मंत्रों का जाप नहीं कर सकते। गुरु भी यह बताते हैं, और जब ऐसा वचन-वाचा होता है तो वे भी बताती हैं।
अब, यदि आप वहाँ गृहस्थ हैं, तो शक्तियों का अपना नियम होगा। वे भी अपने वचन के अनुसार उसका पालन करवाएँगी — कि भाई, आप गृहस्थ जीवन में इस तरह नहीं रह सकते। आपको अपनी पत्नी से इस तरह और इस तरह व्यवहार करना है। इन सब बातों में भी आप वहाँ बँध जाएँगे। यह आपको नहीं खाना है। खाने से पहले आपको इस तरह भोग देना है। ये काम आप कभी नहीं कर सकते। इन शक्तियों की आप कभी पूजा नहीं कर सकते। इन मंत्रों का आप जाप नहीं कर सकते। गुरु भी यह बताते हैं, और जब इस तरह का वचन-वाचा होता है, तो वे भी बताती हैं।
क्या वचनबद्ध साधक के लिए कुछ स्थान वर्जित होते हैं?
उसके लिए बंद क्षेत्र और तंत्र पीठ
हाँ। वक्ता कहते हैं कि साधक को बताया जाता है: इन क्षेत्रों में आप नहीं जा सकते। तंत्र पीठों में बहुत से ऐसे क्षेत्र होते हैं, और उन क्षेत्रों में वह नहीं जा सकता। ये सब बातें बताई जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ साधक को बताया जाता है: इन क्षेत्रों में आप नहीं जा सकते। तंत्र पीठ में बहुत से ऐसे क्षेत्र होते हैं। उन क्षेत्रों में वह नहीं जा सकता। ये सब बातें उसे बताई जाती हैं।
वचन की कौन सी दो शर्तें आमतौर पर बिना कहे रह जाती हैं?
क्या यह मृत्यु पर समाप्त होगा, और क्या शक्ति कुल में स्थापित होगी
वक्ता कहते हैं कि जब आप कहते हैं कि मैं जीवन भर आपसे वचन में हूँ, तो दो और बातें आती हैं: जब आपका शरीर छूटेगा — यानी मृत्यु पर — तो क्या वे वचन से मुक्त हो जाएँगी; या आप उस शक्ति को सदा के लिए अपने कुल में स्थापित कर रहे हैं। यह भी उसी समय बताना होता है। जो इसे नहीं बताते, या जिन्हें इसका ज्ञान नहीं होता, वे बाद में पूरी वंश परंपरा को कष्ट देते हैं, जो बँध जाती है — और यह बहुत कठिनाई का विषय बन जाता है।
इसके साथ, जब आप कहते हैं कि मैं जीवन भर आपसे वचन में हूँ, तो वहाँ दो और बातें आती हैं। कि जब आपका शरीर छूटेगा — यानी जब मृत्यु होगी — उसके बाद क्या वे वचन से मुक्त होंगी? या आप उस शक्ति को सदा के लिए अपने कुल में स्थापित कर रहे हैं? यह भी उसी समय बताना होता है। जो इसे नहीं बताते, या जिन्हें ज्ञान नहीं होता, वे आगे चलकर पूरी वंश परंपरा को कष्ट देते हैं, जो बँध जाती है। और यह बहुत कठिनाई का विषय बन जाता है।
वचन गृहस्थ की दिनचर्या को कैसे बदल देता है?
सुबह सात बजे तक पहला भोग
इतना सब करके एक शक्ति को त्रिवाचा में लिया जाता है। अब सिद्धि हो गई; पर जब आप गृहस्थ जीवन में आते हैं, पहले आप दस बजे सोकर उठते थे। जब तक सिद्धि नहीं हुई थी, आप दस बजे उठते थे। अब सिद्धि हो गई है और आपने वचन दे दिया है — और वचन के अनुसार पहला भोग, पहला भोजन, सुबह सात बजे तक अर्पित हो जाना चाहिए।
तो इतना सब करके एक शक्ति को त्रिवचा में लिया जाता है — जिसे आमतौर पर त्रिवाचा कहा जा रहा है। अब सिद्धि हो गई, ठीक है। अब जब आप गृहस्थ जीवन में आते हैं: पहले आप दस बजे सोकर उठते थे। जब तक सिद्धि नहीं हुई थी, तब तक आप दस बजे उठते थे। अब सिद्धि हो गई है। आपने वचन दे दिया है। अब वचन के अनुसार, जो पहला भोग उन्हें अर्पित होना चाहिए, पहला भोजन, वह सुबह सात बजे तक अर्पित हो जाना चाहिए।
यदि भोग दिया ही न जाए तो क्या होता है?
अपना लोक छोड़कर वह अंश रूप में आपके साथ रहती है
आप सोचते हैं कि मैं अर्पित नहीं करूँगा तो कुछ नहीं होगा। कब तक? दो दिन, चार दिन, एक साल, दो साल आपको कुछ नहीं होगा। पर जब आपने वचन लेकर उसे सिद्ध करके रखा है, और उसे भोग नहीं दे रहे — अपना लोक और अपना स्थान छोड़कर वह अंश रूप में सदा आपके साथ रहती है। एक बार वचन हो गया, तो वह अंश रूप में अवश्य रहेगी, चाहे वह कोई भी शक्ति हो, उसका लोक कोई भी हो। इसलिए जब आप नहीं देते, तो परेशानी होती है।
आप सोच रहे हैं कि मैं अर्पित नहीं करूँगा, तो कुछ नहीं होगा। कितने दिन? दो दिन, चार दिन, एक साल, दो साल आपको कुछ नहीं होगा। पर जब आपने वचन लेकर उसे सिद्ध करके रखा है, और उसे भोग नहीं दे रहे — अपने लोक छोड़कर, अपना स्थान छोड़कर, वह अंश रूप में सदा आपके साथ रहने के लिए है। एक बार वचन हो गया, तो वह अंश रूप में अवश्य रहेगी, चाहे वह कोई भी शक्ति हो। भले ही उसका लोक कुछ भी हो। इसलिए जब आप नहीं देंगे, तो कठिनाई होती है। अब आप कहेंगे कि सिद्धि की थी और कष्ट आने लगा है।
क्या शक्ति बताएगी कि परेशानी उसी की ओर से है?
वह कभी नहीं कहती, पर दोष अपने आप लगता है
वक्ता कहते हैं कि वह इस पर कभी चर्चा नहीं करेगी, और कभी नहीं कहेगी कि हाँ, मेरे कारण तुम्हें कष्ट आ रहा है। पर दोष अपने आप आपको लगता जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि इस पर कभी कोई चर्चा नहीं होगी। वह कभी नहीं कहेगी कि हाँ, मेरे कारण तुम्हें कष्ट आ रहा है। पर दोष अपने आप आपको लगता जाएगा।
उल्लंघन दोष क्या है?
किसी पहाड़ या मंदिर के शिखर को लाँघना
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा कुछ शक्तियाँ ऐसी होती हैं जिनमें उल्लंघन दोष लगता है। यदि आप किसी पहाड़ को लाँघते हैं, तो दोष लगता है। यदि आप किसी मंदिर के ऊपरी भाग को लाँघते हैं — यानी जिसे हम शिखर दर्शन, शिखर कहते हैं — तो दोष लगता है।
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा कुछ शक्तियाँ ऐसी होती हैं जिनमें उल्लंघन दोष लगता है। यदि आप किसी पहाड़ के पार जाते हैं, तो दोष लगता है। यदि आप किसी मंदिर के ऊपरी भाग के पार जाते हैं — यानी जिसे हम शिखर दर्शन, शिखर कहते हैं — यदि आप उसे लाँघते हैं, तो दोष लगता है।
ऐसे नियम में बँधे साधक पर हवाई यात्रा का क्या असर होता है?
इष्ट के शिखर को लाँघने से शक्ति कुंद होती है
आज के समय में आप बहुत बड़े साधक हैं, इस तरह की सिद्धि हुई है, और आप हवाई जहाज से उड़ रहे हैं — तो, वक्ता कहते हैं, उल्लंघन दोष लगना ही है। आपने पहाड़ भी लाँघे और शिखर भी लाँघे; और यदि आपने उनके अपने इष्ट आराध्य का शिखर लाँघा, तो आपकी शक्ति वैसे ही कुंद होनी ही है। ये सब दोष लगने लगेंगे।
अब आज के समय में आप बहुत बड़े साधक हैं, इस तरह की सिद्धि हुई है, आप हवाई जहाज से उड़ रहे हैं — तो भाई, उल्लंघन दोष लगना ही है। आपने पहाड़ भी लाँघे, और शिखर भी लाँघे। और यदि आपने उनके इष्ट देवता और आराध्य का शिखर लाँघा, तो आपकी शक्ति वैसे ही कुंद होनी ही है। ये सब दोष लगने लगेंगे।
क्या ये शर्तें साधक को बताई जाती हैं?
लगभग सब गुप्त रहता है; सही गुरु बताते हैं
वक्ता कहते हैं कि ये लगभग सारी बातें, एक-एक करके, गुप्त रहती हैं — शक्ति को ही खोलना होता है। यदि आपके गुरु उस तरह के हैं, तो वे सब बताएँगे: देखो, इतनी सारी नियम और शर्तें हैं।
अब ये सारी बातें — एक-एक करके, लगभग सब — गुप्त रहती हैं। शक्ति को ही खोलना होता है। यदि आपके गुरु उस तरह के हैं, तो वे हर ऐसी बात बताएँगे: देखो, इतनी सारी नियम और शर्तें हैं।
वचन की शर्तें वैसे ही मान ली जाती हैं जैसे सौ बिंदुओं की शर्तें बिना पढ़े
सौ बिंदुओं वाली नियम-शर्तें जिन्हें कोई नहीं पढ़ता
वक्ता कहते हैं कि हम नियम और शर्तें पढ़ते ही नहीं; आदत बन गई है — अब सीधे I agree, I accept पर जाते हैं, क्योंकि सौ बिंदु कौन पढ़ेगा। वहाँ भी शक्ति जो कहेगी, आप कहेंगे मैं स्वीकार करता हूँ: आप प्रत्यक्ष हो गईं, कोई जरूरत नहीं, जो कहें मुझे स्वीकार है। पर बाद में जब वह एक के बाद एक नियम-शर्त बताने लगती है — तुमने यह किया, इसलिए यह हुआ; तुमने वह किया, इसलिए वह हुआ — तब लगता है कि पढ़ना चाहिए था, देखना चाहिए था, जानना चाहिए था। या यदि गुरु ने कभी बताया ही नहीं, तो कठिनाई होती है।
वक्ता कहते हैं कि हम नियम और शर्तें पढ़ते ही नहीं — अब यह आदत बन गई है। अब हम सीधे I agree, I accept करके भाग जाते हैं। अरे बाप रे, सौ बिंदु कौन पढ़ेगा? वहाँ भी शक्ति जो कहेगी, आप कहेंगे मुझे स्वीकार है। आप प्रत्यक्ष हो गईं, कोई जरूरत नहीं, मुझे स्वीकार है, जो कहें, वैसा ही हो। पर बाद में जब वह एक-एक करके हर नियम-शर्त बताने लगती है — तुमने यह किया, और इसलिए यह हुआ; तुमने वह किया, और इसलिए वह हुआ — तब लगता है: अरे बाप रे, पढ़ना चाहिए था, देखना चाहिए था, जानना चाहिए था। या फिर, यदि गुरु ने बताया ही नहीं, तो कठिनाई होती है। वक्ता कहते हैं कि यह तो आपके अपने बल और सामर्थ्य से था, उसका अच्छा-बुरा जो भी हुआ हो।
अपने गुरु के माध्यम से भी शक्तियाँ गद्दी में ली जाती हैं, बिना साधक के अपनी योग्यता सिद्ध किए
अपने गुरु के माध्यम से शक्तियों को गद्दी में लेना
वक्ता कहते हैं कि दूसरा तरीका है अपने ही गुरु के माध्यम से इस तरह की शक्तियों को गद्दी में लेना। पहले रास्ते में अयोग्य साधक को भी अपनी योग्यता सिद्ध करनी पड़ती है; गुरु सहायता करते हैं, इसलिए उसे कुछ समझ रहती है कि इसे आगे ले जाना है, कि उसने मेहनत की है और ठीक से रहा है, और वह जीवन भर प्रयास करता है। शुरू में कष्ट आए तो भी ऐसे साधक समय के साथ सँभल जाते हैं — नब्बे प्रतिशत सँभल जाते हैं; दस प्रतिशत अपना नाश बुलाते रहते हैं, और नष्ट हो जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि दूसरा है अपने ही गुरु के माध्यम से इस तरह की शक्तियों को गद्दी में लेना। पहले रास्ते में यह होता है कि अयोग्य साधकों को भी अपनी योग्यता सिद्ध करनी पड़ती है। गुरु सहयोग करते हैं, इसलिए उन्हें कुछ समझ रहती है कि हाँ, इसे आगे ले जाना है, कि उन्होंने मेहनत की है और सही ढंग से रहे हैं; और वे जीवन भर प्रयास करते हैं। शुरुआत में कष्ट मिले तो भी ऐसे साधक समय के साथ सँभल जाते हैं। नब्बे प्रतिशत लोग सँभल जाते हैं; दस प्रतिशत अपना नाश बुलाते रहते हैं, और इसलिए नष्ट हो जाते हैं। पर उसमें लोग सँभल जाते हैं।
जो पाँच साल में मिलना चाहिए वह पाँच महीने में मिल जाए तो इसमें गलत क्या है?
उन्हें सँभालने की परिपक्वता के बिना सिद्धि और गद्दी
जब किसी गुरु के माध्यम से जो आप तक पाँच साल में पहुँचना चाहिए वह पाँच महीने में पहुँच जाता है — या वे ऐसी क्रियाएँ करके अपनी सारी चीजें तुरंत, एक साथ दे देते हैं — तो वह परिपक्वता कभी नहीं आती, जो उन्हें पाँच साल में आती, जो पाँच साल साधना करेंगे। और इसी कारण बहुत कष्ट मिलता है।
पर जब किसी गुरु के माध्यम से जो चीज आप तक पाँच साल में पहुँचनी चाहिए वह पाँच महीने में पहुँच जाती है — या जब वे इस तरह की क्रियाएँ करके अपनी सारी चीजें तुरंत, तात्कालिक रूप से दे देते हैं — तो वह परिपक्वता कभी नहीं आती। वह परिपक्वता जो उन्हें पाँच साल में आती, जो पाँच साल साधना करेंगे। और इसी कारण बहुत कष्ट मिलता है। सिद्धि मिलती है, गद्दी मिलती है, बड़े लोग उनकी चर्चा करते हैं। तुरंत, तत्काल लाभ मिलता है। जो आप कहें, वैसा हो जाता है: लगता है कि यह व्यक्ति दो महीने पहले ही मिला था और इसके पास कुछ नहीं था, और अब इसके पास इतनी शक्तियाँ, इतनी क्षमता, इतना बल, इतना सब कुछ है, धन-धान्य से भरपूर, गुरु कृपा से पाया हुआ। पर उसे धारण करने के लिए जो परिपक्वता होनी चाहिए, उसे सँभालने के लिए जो मानसिक स्थिति होनी चाहिए, वह नहीं है। और वह चीज धीरे-धीरे उसे खाने लगेगी। यह तुरंत नहीं होगा।
सच में उच्च कोटि और उच्च अवस्था वाले गुरु के बिना त्रिवाचा नहीं लेना चाहिए
सच में ऊँची अवस्था वाले गुरु के बिना न लें
इसलिए, वक्ता कहते हैं, जब भी आप त्रिवाचा के बारे में पढ़ें, वचन लेना चाहें, या इस तरह की क्रियाएँ करें, तो बहुत विशेष सावधानी रखनी चाहिए। सच में उच्च कोटि के और ऊँची अवस्था प्राप्त किसी गुरु को पाए बिना इसे नहीं लेना चाहिए।
इसलिए, वक्ता कहते हैं, जब भी आप त्रिवाचा के बारे में पढ़ें, वचन लेना चाहें, या इस तरह की क्रियाएँ करें, तो आपको बहुत विशेष सावधानी रखनी चाहिए। यदि आपको कोई सही, उच्च कोटि का, और ऊँची अवस्था प्राप्त गुरु नहीं मिलता, तो आपको इसे नहीं लेना चाहिए।
अपने नाम के साथ भैरव जोड़ने वाले साधक कभी नहीं बताते कि उन्होंने कौन सा भैरव सिद्ध किया
अपने नाम में भैरव जोड़ने वाले लोग
वक्ता कहते हैं कि आजकल भैरव जी के साधक हर जगह भरे पड़े हैं — कपाल भैरव, काल भैरव, लोग अपने नाम के आगे भैरव लगा लेते हैं। वे कौन सा भैरव सिद्ध करते हैं? और वे इतनी गलत जानकारी देते हैं; उनके वीडियो पर कुछ कहा नहीं जा सकता, और वे कहते हैं कि वे उस पर कभी बोलते नहीं, पर सुनते हैं, और सुनते हैं कि लोगों को किस तरह भटकाया जा रहा है।
वक्ता कहते हैं कि आजकल भैरव जी के साधक हर जगह भरे पड़े हैं। कपाल भैरव, काल भैरव — लोग अपने नाम के आगे भैरव लगा लेते हैं। ठीक है — वे कौन सा भैरव है जिसे सिद्ध करते हैं? और वे इतनी गलत जानकारी देते हैं। उनके वीडियो पर आप कुछ नहीं कह सकते; वे कहते हैं कि वे उनमें कभी बोलते नहीं, पर सुनते हैं: हाँ भाई, लोगों को किस तरह भटकाया जा रहा है।
गृहस्थों के लिए सीधी, सही शिक्षा को श्रोता नहीं मिलते, इसलिए बात सजाई जाती है
गृहस्थों के लिए सीधी सही शिक्षा को श्रोता नहीं मिलते
वक्ता कहते हैं कि यदि आप गृहस्थ के लिए सही और सरल बातें सीधे ढंग से बताते हैं, तो लोग सुनना ही नहीं चाहते। इसलिए उन्हें भी अपनी बात ऐसे रखनी पड़ती है कि लोग सुनें, ताकि उनकी लोकप्रियता भी बढ़े और काम भी हो जाए। इसी कारण असली बातें कोई कभी नहीं बताता।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप गृहस्थ के लिए सही और सरल बातें सीधे ढंग से बताते हैं, तो लोग सुनना भी नहीं चाहते। इसलिए उन्हें भी अपनी बात इस तरह रखनी पड़ती है कि लोग सुनें — ताकि उनकी लोकप्रियता भी बढ़े और काम भी हो जाए। इसी कारण होता यह है कि असली बातें कोई कभी नहीं बताता।
क्या भैरव बनना या उनके तत्व को सिद्ध करना आसान है?
शब्दों के जाल में फँस जाना
वक्ता कहते हैं कि भैरव कौन हैं, इसका ज्ञान आप सबको होना चाहिए — यह इतना आसान नहीं कि कोई भैरव बन जाए या भैरव के तत्व सिद्ध कर ले। अपनी बातें बहुत जोर से कहना, आत्ममुग्धता का शिकार होना, बातें ऐसे रखना कि आप उनके शब्दों के जाल में फँस जाएँ: ये सब चीजें, वे कहते हैं, आपको विनाश की ओर ले जाती हैं। यदि आप अपने ज्ञान से परख नहीं सकते, यदि इन विषयों पर आपके पास सोच और विवेक-बुद्धि नहीं है, तो आप फँस जाएँगे। बातें कितने ही तरीकों से सजाई जाती हैं, और सच्चाई कुछ और ही होती है।
वक्ता कहते हैं कि भैरव कौन हैं, इसका ज्ञान आप सबको होना चाहिए। यह इतना आसान नहीं कि कोई भैरव बन जाए, या भैरव के तत्व सिद्ध कर ले। उस तरह बहुत जोर से अपनी बातें कहना, आत्ममुग्धता का शिकार होना, बात ऐसे रखना कि आप उनके शब्दों के जाल में फँस जाएँ — ये सब जो चीजें होती हैं, वे कहते हैं, आपको विनाश की ओर ले जाती हैं। यदि अपने ज्ञान से आप उसे परख नहीं सकते, यदि इन विषयों पर आपके पास कोई सोच, कोई विवेक और बुद्धि नहीं है, तो आप फँस जाएँगे। बातें कितने ही तरीकों से सजाकर आपके सामने रखी जाती हैं; सच्चाई कुछ और ही होती है।
सार्वजनिक काल भैरव पूजा के साथ-साथ ब्रह्मचर्य न रख पाने की अक्षमता
यह दावा कि वे ब्रह्मचर्य नहीं रख पाते
आप काल भैरव मंदिर जाकर आमने-सामने उनकी पूजा कर सकते हैं — वक्ता कहते हैं, वाराणसी में लोग अच्छे से कर रहे हैं; पीछे की सच्चाई कुछ और है। वे छाती ठोककर बोलते हैं, पर उनके शब्दों में वे लंगोट के पक्के नहीं हैं। वे कहते हैं कि वे पूरे प्रमाण के साथ बता रहे हैं: यह बस कहने के लिए है कि हाँ, मैं काल भैरव का हूँ, और कि वे इतने बड़े साधक हैं, फलानी सिद्धि वाले। पर्दे के पीछे जाइए और जब सच्चाई से सामना होगा, तो पाएँगे कि वे ब्रह्मचर्य बिल्कुल नहीं रख सकते, उसे रखने की क्षमता उनमें नहीं है, मानसिक स्थिति ही उस तरह की नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि आप काल भैरव के मंदिर में जाकर आमने-सामने उनकी पूजा कर सकते हैं; वाराणसी में लोग अच्छे से कर रहे हैं। पीछे की सच्चाई कुछ और है। वे छाती ठोककर बोलते हैं, पर वे लंगोट के पक्के नहीं हैं। वक्ता कहते हैं कि वे यह पूरे प्रमाण के साथ बता रहे हैं। यह बस कहने के लिए है — कि हाँ, मैं काल भैरव का हूँ, और कि ये इतने बड़े साधक हैं, बहुत बड़े, और इनके पास फलानी सिद्धि है। जब आप पर्दे के पीछे जाकर देखेंगे, जब सच्चाई से सामना होगा, तब आपको पता चलेगा कि ये लोग ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। बिल्कुल नहीं रख सकते। उसे रखने की क्षमता ही इनमें नहीं है। मानसिक स्थिति ही उस तरह की नहीं है।
आने वाली हर स्त्री को भैरवी बनाना ऐसी मानसिकता है जो उच्च कोटि का साधक नहीं बना सकती
ऐसी मानसिकता जो उच्च कोटि का साधक नहीं बना सकती
वक्ता कहते हैं कि तंत्र विद्या सीखने या इस तरह की चीजें करने के लिए उनके पास जाने वाली हर दूसरी-तीसरी लड़की को वे भैरवी बना रहे हैं — भैरवी बन जाओ। वे पूछते हैं कि इस तरह की मानसिकता रखने वाले लोग उच्च कोटि के साधक कहाँ से बनेंगे?
तंत्र विद्या सीखने, या इस तरह की चीजें करने के लिए उनके पास जाने वाली हर दूसरी-तीसरी लड़की को वे सबको भैरवी बना रहे हैं — भैरवी बन जाओ। वक्ता पूछते हैं कि इस तरह की मानसिकता रखने वाले लोग उच्च कोटि के साधक कहाँ से बनेंगे?
क्या किसी नकारात्मक शक्ति को सिद्ध करने से भैरव मंदिर में जाना वर्जित हो सकता है?
नकारात्मक ऊर्जा को नियंत्रित करने की क्षमता भैरव से अधिक किसी में नहीं
वक्ता कहते हैं कि दूसरी मुख्य बात यह है कि वे शास्त्रों और पुराणों को किनारे करके अपना ही भैरव रच रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यदि आप कोई नकारात्मक शक्ति सिद्ध कर लें तो भैरव जी के मंदिर में पैर नहीं रख पाएँगे, या भैरव जी की ऊर्जा आपसे कहेगी: नहीं, नहीं, मत आओ। वे कहते हैं कि नकारात्मक ऊर्जा को नियंत्रित करने की क्षमता भैरव से अधिक किसी में नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि गृहस्थ के लिए दूसरी बात, जो उन्होंने मुख्य रूप से कही थी: भैरव। आप शास्त्रों और पुराणों को किनारे करके अपना ही भैरव रच रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यदि आप कोई नकारात्मक शक्ति सिद्ध कर लें, तो भैरव जी के मंदिर में पैर नहीं रख पाएँगे। कि भैरव जी की ऊर्जा आपसे कहेगी: नहीं, नहीं, मत आओ। नकारात्मक ऊर्जा को नियंत्रित करने की क्षमता भैरव से अधिक किसी में नहीं है।
भैरव पहली बार कैसे प्रकट हुए, और क्या उन्हें किसी गुरु की जरूरत थी?
महादेव के शरीर से जन्मे, ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काटा
वक्ता यह विषय पहले भी रख चुके हैं और फिर कहते हैं: कल्प के अनुसार अंतर है, और भैरव बहुत से हैं — एक भैरव नहीं है। पर एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब भैरव प्रकट हुए तो महादेव के शरीर से प्रकट हुए, और जब उन्होंने अपने नाखून से ब्रह्मा जी का पाँचवाँ सिर काटा, तो भैरव जी को न किसी गुरु की जरूरत थी, न सिद्ध होने के लिए कोई तपस्या करनी पड़ी। वे स्वयं परब्रह्म परमेश्वर थे, साक्षात शिव का स्वरूप। वे प्रत्यक्ष प्रकट हुए, और प्रकट होने के साथ ही उन्होंने अपना काम पूरा किया।
दूसरी बात, जो उन्होंने पहले भी रखी थी और फिर कहते हैं: जब भैरव पहली बार प्रकट हुए — कल्प के अनुसार अंतर है, भैरव बहुत से हैं, एक भैरव नहीं है; भैरव के अनुसार बहुत से भैरव हैं। पर एक पौराणिक कथा है जिसमें कहा गया है कि जब भैरव प्रकट हुए, तो महादेव के शरीर से प्रकट हुए; और जब उन्होंने अपने नाखून से ब्रह्मा जी का सिर, पाँचवाँ सिर, काटा, तब भैरव जी को न किसी गुरु की जरूरत थी, न सिद्ध होने के लिए कोई तपस्या करनी पड़ी। वे स्वयं परब्रह्म परमेश्वर थे; वे साक्षात शिव का स्वरूप थे। वे प्रत्यक्ष प्रकट हुए, और प्रकट होने के साथ ही उन्होंने अपना काम पूरा किया।
अब महाशक्ति-पुंज को तीन रात, चौदह दिन या सत्ताईस दिन में सिद्ध होने का दावा किया जाता है
तीन रात, चौदह दिन, सत्ताईस दिन
वक्ता कहते हैं कि ऐसे महाशक्ति-पुंज को लोग आजकल तीन रात, तीन रात, चौदह दिन, सत्ताईस दिन के साधना काल में सिद्ध करते हैं। यह भैरव और वह भैरव, पचास अलग-अलग तरीकों से, और उसमें अपने नियम भी जोड़ देते हैं। वे कहते हैं, इस तरह चीजें कभी नहीं होतीं।
वक्ता कहते हैं कि ऐसे महाशक्ति-पुंज को लोग आजकल तीन रात, तीन रात के साधना काल में, चौदह दिन की साधना में, सत्ताईस दिन की साधना में सिद्ध करते हैं। फलाना-फलाना। तो यह भैरव, वह भैरव, पचास अलग-अलग तरीकों से — और उसमें वे अपने नियम भी जोड़ देते हैं। वक्ता कहते हैं कि इस तरह चीजें कभी नहीं होतीं।
छोटी भैरव साधना में जो प्रकट होता है वह मसान की कोई प्रेत शक्ति है जिसे कोई नाम दे दिया गया
मसान की प्रेत शक्ति जिसे नाम दे दिया गया
वक्ता कहते हैं कि जो चीजें आप प्रकट होती देखते हैं, या वहाँ जो आपको दिया जा रहा है, वह भैरव नहीं बल्कि मसान की प्रेत शक्ति है, जिसे उन्होंने कोई न कोई नाम दे दिया है — अपने वचन में ली हुई, या अपने गुरु की दी हुई किसी बंधन शक्ति से बँधी हुई।
हाँ — वे क्या हैं? जो चीज आपके सामने प्रत्यक्ष दिख रही है, या जो वहाँ आपको दी जा रही है, वह भैरव नहीं है। वह मसान की वह प्रेत शक्ति है, जिसे उन्होंने कोई न कोई नाम दे दिया है। अपने वचन में ली हुई, या अपने गुरु की दी हुई ऐसी किसी बंधन शक्ति से बँधी हुई।
मसानी सिद्धि के लिए किसकी आत्मा का उपयोग होता है?
उन्नीस से पच्चीस वर्ष में अकाल मृत्यु पाया अविवाहित पुरुष
वक्ता कहते हैं कि यह साफ समझिए। मान लीजिए कोई अविवाहित पुरुष मर गया है, किसी दुर्घटना आदि में उसकी अकाल मृत्यु हुई है। मृत्यु असमय होने और उम्र कम होने के कारण — उन्नीस, बीस, पच्चीस वर्ष तक की उम्र — उस समय की अवस्था, वैचारिक अवस्था, काफी अलग होती है। इसी कारण उनमें ऊर्जा का पुंज भी बहुत अधिक होता है।
वक्ता कहते हैं कि अब यह भी साफ समझिए। मान लीजिए कोई अविवाहित पुरुष मर गया है — किसी दुर्घटना आदि में उसकी अकाल मृत्यु हुई है। मृत्यु असमय होने के कारण, और उम्र कम होने के कारण — वह उम्र जो उन्नीस, बीस, पच्चीस वर्ष तक चलती है — उस समय की अवस्था, वैचारिक अवस्था, काफी अलग होती है। इसी कारण उनके भीतर ऊर्जा का पुंज भी बहुत अधिक होता है।
चिता पर धार और कपाल क्रिया द्वारा, मंत्र बल से, आत्मा को बंधन में लिया जाता है
चिता पर धार और कपाल क्रिया, मंत्र बल से
अब ऐसी मसानी शक्ति — वे ऐसे लोगों की चिता पर जाकर, अपने मंत्र बल से, ऐसी आत्माओं को अपने बंधन में ले लेते हैं। वक्ता कहते हैं कि आप जो कुछ पढ़ते, देखते और सुनते हैं, उसमें से लगभग सब वहीं से बताया गया है, और उसी तरह होता है: धार देकर, कपाल आदि की क्रिया करके, और अपने मंत्र बल से ऐसी आत्माओं को बाँधकर।
अब ऐसी मसानी शक्ति — ऐसे लोगों की चिता पर जाकर, अपने मंत्र बल से, और आप जो कुछ पढ़ते, देखते और सुनते हैं, उसमें से लगभग सब वहीं से बताया गया है और उसी तरह होता है। धार देकर, कपाल आदि की क्रिया करके, और अपने मंत्र बल से, वे ऐसी आत्माओं को अपने बंधन में ले लेते हैं।
सिद्धि काल भैरव की आज्ञा से चलती है, पर आज्ञा सिद्ध करने वाला देता है
काल भैरव या श्मशान भैरव — पर आज्ञा कौन देता है
उनकी सिद्धि काल भैरव के अधीन, श्मशान भैरव के अधीन हुई — यानी वे उनकी आज्ञा से चलेंगे। पर वह आज्ञा कौन देगा? देने वाला वही व्यक्ति होगा जो सिद्ध कर रहा है।
उनकी सिद्धि काल भैरव के अधीन हुई; श्मशान भैरव के अधीन हुई। यानी वे उनकी आज्ञा पर चलेंगे। पर वह आज्ञा कौन देगा? देने वाला वही व्यक्ति होगा जो सिद्ध कर रहा है।
वचन की सबसे बड़ी शर्त है पाँच या बारह साल की सेवा, बदले में त्रिपिंडी और मोक्ष का वादा
त्रिपिंडी और मोक्ष के वादे के बदले पाँच या बारह साल की सेवा
सिद्ध करने के बाद उनसे वही वचन लिया जाता है, और उसमें सबसे बड़ी नियम-शर्त यह होती है: मैं तुमसे इतने साल सेवा लूँगा। तुम पाँच साल मेरी सेवा करोगे, और उसके बाद मैं तुम्हारे मोक्ष के लिए त्रिपिंडी करवाऊँगा, यह करवाऊँगा — जो भी हो, वह वहाँ श्मशान आदि के क्षेत्र में वचन में यह कहेगा। या वह कहेगा: मैं तुमसे बारह साल सेवा लूँगा, और बारह साल बाद मैं तुम्हें मोक्ष देने के लिए बाध्य हूँ। इस तरह वह वचन लेगा।
और सिद्ध करने के बाद उनसे वही वचन लिया जाता है, और वचन में सबसे बड़ी नियम-शर्त क्या होती है? कि मैं तुमसे इतने साल सेवा लूँगा। तुम पाँच साल मेरी सेवा करोगे, और उसके बाद तुम्हारे मोक्ष के लिए मैं त्रिपिंडी श्राद्ध करवाऊँगा, यह करवाऊँगा — जो भी हो, वहाँ से वह वचन में कहेगा, श्मशान आदि के क्षेत्र में। या वह कहेगा: मैं तुमसे बारह साल सेवा लूँगा, और बारह साल बाद मैं तुम्हें मोक्ष देने के लिए बाध्य हूँ। इस तरह वह वचन लेगा।
बँधी हुई आत्मा बारह साल जो दुर्गति भोगती है, उसे कोई नहीं खोलता
बँधी आत्मा की दुर्गति, जिसे कोई नहीं खोलता
वक्ता कहते हैं कि वह आत्मा भैरव के नाम पर बारह साल जो दुर्गति भोगती है, उसे उस क्षेत्र का साधक अच्छी तरह समझ रहा होगा। यह बात कोई कभी नहीं खोलता। इसे ऐसे जानिए जैसे आप कष्ट भोग रहे हैं और कोई आपको देख नहीं सकता।
पर वह आत्मा बारह साल, भैरव के नाम पर, जो दुर्गति भोगती है — उसे उस क्षेत्र का साधक अच्छी तरह समझ रहा होगा। वक्ता कहते हैं कि यह बात कोई कभी नहीं खोलता। इसे ऐसे जानिए जैसे आप पर कष्ट आ रहा है और कोई आपको देख नहीं पा रहा।
वचन में बँधी आत्मा अवधि पूरी होने तक बंधुआ मजदूर की तरह रहती है
बारह साल का बंधुआ मजदूर
आपको हर तरह से उसके वचनों में बाँध दिया गया है और लाचार बना दिया गया है। आपको इतने दिनों बाद, बारह साल बाद मुक्ति मिलेगी — पर बारह साल आपको उसका बंधुआ मजदूर बनकर रहना है। जो मैं कहूँ, वही करना है। हर तरह से बाँधकर, फिर उसे वहाँ सौंपकर लाचार बना दिया जाता है।
आपको पूरी तरह से उसके वचनों में बाँध दिया गया है, और लाचार बना दिया गया है। इतने दिनों बाद, बारह साल बाद तुम्हें मुक्ति दी जाएगी — पर बारह साल तुम्हें मेरा बंधुआ मजदूर बनकर रहना है। जो मैं कहूँ, वही करना है। और हर तरह से बंधन में लेकर, फिर उसे वहाँ सौंप दिया जाता है और लाचार बना दिया जाता है।
बँधी आत्मा की शक्ति बनी रहती है क्योंकि उसके पीछे भैरव का तत्व जागृत खड़ा है
पीछे भैरव का तत्व प्रबल है, और आत्मा नियंत्रित है
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि उसके पीछे भैरव का तत्व प्रबल है: भैरव के ऐसे तत्वों का मंत्र, भोग आदि — उस तरह की तंत्र क्रियाएँ ऐसे की गई हैं, ऐसे जागृत की गई हैं, कि उस व्यक्ति, उस आत्मा में शक्ति तो है, पर बंधन में। वह पूरी तरह नियंत्रित है।
पर भैरव का तत्व, क्योंकि वह उसके पीछे प्रबल है — भैरव के ऐसे तत्वों का मंत्र, भोग आदि, उस तरह की तंत्र क्रियाएँ — इस तरह जागृत किया गया है कि उस व्यक्ति, उस आत्मा में शक्ति तो है, पर बंधन में। वह पूरी तरह नियंत्रित है।
छूटी हुई बँधी आत्मा स्वयं तांत्रिक और उसके शिष्यों के परिवारों पर वार करती है
वह तांत्रिक और उसके शिष्यों के परिवारों को बर्बाद कर देगी
और जब भी किसी कारण से कोई युक्ति लगाई जाए और वचन टूट जाए — यदि वह बंधन से मुक्त होकर खुल जाए — तो वह स्वयं तांत्रिक महाशय के साथ कांड करेगी, और जो उनके शिष्य बने हैं, या किसी और व्यक्ति ने जिसने इस तरह की सिद्धि ली है, उनके माध्यम से उनके परिवारों को भी बर्बाद कर देगी।
और जब भी किसी न किसी कारण से कोई युक्ति लगाई गई और वचन टूट गया — यदि वह बंधन से मुक्त होकर खुल गई — तो वह तांत्रिक महाशय के साथ भी कांड करेगी। और जो उनके शिष्य बने हैं, या किसी और व्यक्ति ने जिसने इस तरह की सिद्धि ली है, उनके माध्यम से वह उनके परिवारों को भी बर्बाद कर देगी।
त्रिवाचा लेने के बजाय गृहस्थ को क्या करना चाहिए?
भगवती और भैरव के कृपा कटाक्ष के संकल्प से साधना
इसलिए, वक्ता कहते हैं, गृहस्थ जीवन में रहते हुए त्रिवाचा से बचने का प्रयास करना चाहिए। हमेशा यह संकल्प लेकर साधना कीजिए: भगवती का कृपा कटाक्ष पाने के लिए, भगवान भैरव का कृपा कटाक्ष पाने के लिए। यदि आप गृहस्थ में हैं तो त्रिवाचा में पड़ने की कोई जरूरत नहीं। आपको अपना काम पूरा होने से मतलब होना चाहिए।
इसलिए गृहस्थ जीवन में रहते हुए त्रिवचा से बचने का प्रयास करना चाहिए। हमेशा भगवती का कृपा कटाक्ष पाने के लिए, भगवान भैरव का कृपा कटाक्ष पाने के लिए — यह संकल्प लेकर साधना कीजिए। यदि आप गृहस्थ में हैं, तो त्रिवाचा में पड़ने की कोई जरूरत नहीं। आपको अपना काम पूरा होने से मतलब होना चाहिए।
सच्ची भैरव साधना में कितना समय लगता है?
दीक्षा से बारह साल, भैरव और वीरभद्र दोनों के लिए
यदि आप तंत्र क्षेत्र में जाना चाहते हैं, तो वक्ता साफ कहते हैं: भैरव की साधना के बारे में कहा जाता है कि भैरव अपना मंत्र स्वयं देते हैं। जब से आप ऐसे सक्षम सिद्ध साधकों से दीक्षित होकर ऐसी परंपरा में जाते हैं, साधना बारह साल की होती है — चाहे भगवान वीरभद्र की हो या भगवान भैरव की।
और यदि आप तंत्र क्षेत्र में जाना चाहते हैं, तो वक्ता कहते हैं कि वे आपको साफ बता रहे हैं। भैरव की साधना के बारे में कहा जाता है कि भैरव अपना मंत्र स्वयं देते हैं। जब से आप उस तरह के सिद्ध और सक्षम साधकों से दीक्षित होकर ऐसी परंपरा में जाते हैं, साधना बारह साल की होती है। चाहे भगवान वीरभद्र की हो, चाहे भगवान भैरव की।
सभी उग्र शक्तियों में कितना समय लगता है?
बारह साल, एक क्षेत्र में या कई में
वक्ता कहते हैं कि जितनी भी उग्र शक्तियाँ हैं, वे बारह साल की साधना लेती हैं। आप अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर कर सकते हैं, या एक ही क्षेत्र में कर सकते हैं। उससे कम में नहीं होता। उसके बाद बहुत से नियम होते हैं।
जितनी भी उग्र शक्तियाँ हैं, वे बारह साल की साधना लेती हैं। या तो अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर कीजिए, या एक क्षेत्र में कीजिए। उससे कम में नहीं होता। उसके बाद बहुत से नियम होते हैं।
बारह सालों के दौरान मंत्र बहुत कुछ देता है; बस सिद्धि हलवे की तरह नहीं आती
मंत्र बहुत देता है, पर सिद्धि हलवे की तरह नहीं आती
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि बारह साल की अवस्था तक आपको कुछ नहीं मिलेगा। उस मंत्र में इतनी ऊर्जा है कि आपको बहुत कुछ मिलेगा। पर वह एक चीज जिसे आप सिद्धि कह रहे हैं — भैरव की सिद्धि — वह हलवे की तरह नहीं मिलती।
हाँ — ऐसा नहीं है कि बारह साल की अवस्था तक आपको कुछ नहीं मिलेगा। उस मंत्र में इतनी ऊर्जा है कि आपको बहुत कुछ मिलेगा। पर वह एक चीज जिसे आप सिद्धि कह रहे हैं, भैरव की सिद्धि — वह हलवे की तरह नहीं मिलती।
भैरव सिद्धि बाँटने वाले इतनी उम्र के भी नहीं कि बारह साल की तपस्या पूरी कर चुके हों
जो बारह साल की तपस्या करने लायक उम्र के भी नहीं
वक्ता कहते हैं कि और जिनकी अभी उम्र ही नहीं हुई — उन्हें देखकर लगता भी नहीं कि वे उस उम्र तक पहुँचे हैं जिसमें बारह साल तपस्या और सिद्धि की होगी, या इतना कुछ पाया होगा — वे भी आज भैरव, भैरव चिल्ला रहे हैं। भैरव की सिद्धि थोक में बाँटी जा रही है।
और जिनकी अभी उम्र ही नहीं हुई — देखने से ही नहीं लगता कि उनकी उम्र ऐसी हुई है कि उन्होंने बारह साल तक तपस्या और सिद्धि की हो, या इतना कुछ पाया हो — वे भी आज भैरव, भैरव चिल्ला रहे हैं। भैरव की सिद्धि थोक में बाँटी जा रही है।
ऐसे लोगों से ली गई दीक्षा गृहस्थ जीवन में दुष्प्रभाव लाती है
गृहस्थ जीवन को दुष्प्रभावों से बचाइए
इसलिए, वक्ता कहते हैं, ध्यान रखिए कि इस तरह के लोगों से, कहीं से भी दीक्षा लेकर, अपने गृहस्थ जीवन में इस तरह के दुष्प्रभाव आने से बचाइए। चीजों को जाने बिना कुछ मत कीजिए।
वक्ता कहते हैं, इसलिए ध्यान रखिए: इस तरह के लोगों से, कहीं से भी दीक्षा लेकर, अपने गृहस्थ जीवन में इस तरह के दुष्प्रभाव आने से खुद को बचाइए। चीजों को जाने बिना कुछ मत कीजिए।
दीक्षा के बाद भक्ति उन क्रियाओं से बिल्कुल अलग विषय है जिनसे सावधान किया जा रहा है
दीक्षा के बाद भक्ति बिल्कुल अलग विषय है
नहीं। वक्ता कहते हैं कि भक्ति करनी है तो दीक्षित होकर भक्ति कीजिए। जिनसे भी दीक्षा ले रहे हैं, जहाँ से भी ले रहे हैं, चाहे भैरव जी की हो या किसी और देवी-देवता की — उनकी भक्ति कीजिए; वे सब बातें अलग हैं।
वक्ता कहते हैं कि यदि भक्ति करनी है, तो दीक्षित होकर भक्ति कीजिए। जिनसे भी आप दीक्षा ले रहे हैं, जहाँ से भी दीक्षा ले रहे हैं — चाहे भैरव जी की ले रहे हों या किसी और देवी-देवता की — उनकी भक्ति कीजिए। वे सब बातें अलग हैं।
त्रिवाचा के प्रस्ताव में कुछ गलत होने का संकेत क्या है?
तुरंत प्रत्यक्ष होने का आत्मविश्वास भरा वादा
पर किसी से त्रिवाचा लेने से पहले, या जब उस तरह की क्रिया आपके सामने प्रलोभन के रूप में रखी जा रही हो, या जब आपसे छाती ठोककर कहा जा रहा हो कि आप बिल्कुल प्रत्यक्ष होंगे और ऐसा-ऐसा होगा — तो, वक्ता कहते हैं, दाल में कुछ काला है। यह ध्यान रखिए।
पर किसी से त्रिवाचा लेने से पहले, या जब उस तरह की क्रिया आपके सामने प्रलोभन के रूप में रखी जा रही हो, या जब आपसे छाती ठोककर कहा जा रहा हो — कि भाई, बिल्कुल प्रत्यक्षीकरण होगा और यह होगा — तो दाल में कुछ काला है। वक्ता कहते हैं, यह बात ध्यान रखिए।
शिक्षक का कौन सा निर्देश गलत नहीं है?
मार्ग पर चलिए, मंत्र लीजिए, समय और प्रारब्ध को अपना काम करने दीजिए
यदि कोई आपसे भक्ति करवा रहा है, कह रहा है कि इस मार्ग पर चलिए, जब उनकी इच्छा होगी तब आपको मिलेगा, अच्छे से भक्ति कीजिए, मंत्र ठीक से लीजिए, साधना ठीक से कीजिए, आपको समय लगेगा और आपका प्रारब्ध कटेगा — यदि कोई यह कहता है, तो वक्ता कहते हैं, यह गलत नहीं है। पर यदि कोई तुरंत कह रहा है कि प्रत्यक्षीकरण होगा, फलाने भैरव आएँगे, यह करो और वह करो, तो वह गलत है।
कोई आपसे भक्ति करवा रहा है, कोई आपसे कह रहा है कि हाँ, इस मार्ग पर चलिए; जब उनकी इच्छा होगी, आपको मिलेगा; अच्छे से भक्ति कीजिए, मंत्र ठीक से लीजिए, साधना सही ढंग से कीजिए, आपको समय लगेगा, आपका प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। कटेगा — यदि कोई यह कहता है, तो यह गलत नहीं है। पर यदि कोई आपसे तुरंत कह रहा है कि प्रत्यक्षीकरण होगा, फलाने भैरव आएँगे, यह करो, वह करो — तो वह गलत है।
बिना ज्ञान के यह करने का अंत भैरव के नाम पर घर में पूजे जाने वाले भूत में होता है
भैरव के नाम पर घर में भूत की पूजा
वक्ता कहते हैं कि इन विषयों को जाने बिना कभी नहीं करना चाहिए, नहीं तो आप घर में भूत पूजेंगे और पता भी नहीं चलेगा कि भैरव के नाम पर भूत की पूजा हुई है। जब तक पन्ना पलटेगा, आप कुछ नहीं कर पाएँगे और बँधे रह जाएँगे: न माला जाप हो पाएगा, न हवन, और क्योंकि आप स्वयं लाए थे, इन सब से कभी निकल भी नहीं पाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि इन विषयों को जाने बिना कभी नहीं करना चाहिए। नहीं तो आप घर में भूत पूजेंगे और आपको पता भी नहीं चलेगा कि भैरव के नाम पर भूत की पूजा हुई है। जब तक पन्ना पलटेगा, आप कुछ नहीं कर पाएँगे और बँधे रह जाएँगे। तब न माला जाप हो पाएगा, न हवन हो पाएगा; और क्योंकि आप स्वयं लाए थे, इन सब चीजों से कभी निकल भी नहीं पाएँगे।
गुप्त नवरात्रि में अपराजिता स्तोत्र को कैसे सिद्ध करें?
वही विधान जिससे आप पहले से पाठ करते हैं, बीज के सही उच्चारण के साथ
गुप्त नवरात्रि में अपराजिता स्तोत्र को सिद्ध करने का विधान पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: उसी विधान से कीजिए जिससे आप अब तक पाठ करते आए हैं। अपराजिता स्तोत्र के बारे में वे हर बार कहते हैं कि इसमें बीज मंत्रों का बहुत बड़ा समावेश है, इसलिए बीज का उच्चारण आपको ठीक से आना चाहिए। यदि आप उच्चारण ठीक से करते हैं, तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार पाठ कर सकते हैं।
क्या श्री विद्या खड्गमाला का पाठ किया जा सकता है?
उनके विचार में, अदीक्षित व्यक्ति द्वारा नहीं
श्री विद्या खड्गमाला का पाठ किया जा सकता है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि उनके अनुसार अदीक्षित व्यक्ति को श्री विद्या खड्गमाला का पाठ नहीं करना चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या श्री विद्या खड्गमाला का पाठ किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं: उनके अनुसार, अदीक्षित व्यक्ति को श्री विद्या की काली खड्गमाला का पाठ नहीं करना चाहिए।
गणेश साधना करने वाले को स्वप्न आते हैं पर दर्शन नहीं होते, तो क्या करे?
अनुभव निजी रखें, और दोनों चतुर्थियों पर हवन करें
एक श्रोता कहते हैं कि वे गणेश जी की साधना करते हैं, कुछ अनुभव होता है, स्वप्न में लगता है कि कोई साथ है पर वह न बोलता है न दर्शन देता है, और पूछते हैं कि दर्शन पाने के लिए क्या करें। वक्ता उत्तर देते हैं: स्वप्न आदि से जो भी अनुभव आ रहे हैं, उन्हें अपने तक या अपने गुरु जी तक रखिए, सार्वजनिक मत कीजिए। दूसरा, दर्शन उन पर निर्भर है कि किस तरह देंगे। आपको हवन करना चाहिए — जिन मंत्रों का जाप कर रहे हैं उनका अधिक से अधिक हवन कीजिए; कम से कम दोनों पक्षों की चतुर्थी तिथि पर हवन कीजिए। वे कहते हैं, हवन से चीजें काफी जल्दी फलित होती हैं।
एक श्रोता कहते हैं कि वे गणेश जी की साधना कर रहे हैं; कुछ अनुभव होता है, स्वप्न में लगता है जैसे कोई साथ है, पर वह न बोलता है न दर्शन देता है। वे पूछते हैं कि दर्शन पाने के लिए क्या करें। वक्ता कहते हैं कि स्वप्न आदि से जो भी अनुभव आ रहे हैं, वे अनुभव अपने तक या अपने गुरु जी तक बताइए; उन्हें सार्वजनिक मत कीजिए। दूसरी बात यह है कि दर्शन उन पर निर्भर है — वे किस तरह दर्शन देंगे। आपको हवन करना चाहिए। अधिक से अधिक हवन कीजिए; जिन भी मंत्रों का जाप कर रहे हैं, यदि अपनी सामर्थ्य से कर रहे हैं तो कम से कम दोनों पक्षों की चतुर्थी तिथि पर हवन अवश्य कीजिए। हवन से चीजें काफी जल्दी फलित होती हैं।
दुर्गा, काला काली और तारा को माँ विंध्यवासिनी की साधना के बराबर रखा गया है
दुर्गा, काला काली और तारा
वक्ता उसी श्रोता से माँ भगवती दुर्गा की साधना करने को कहते हैं; माँ विंध्यवासिनी की साधना के बराबर भगवती काला काली की, और भगवती तारा की साधना करने को।
वक्ता कहते हैं, माँ भगवती दुर्गा की साधना कीजिए। माँ विंध्यवासिनी की साधना के बराबर भगवती काला काली की कीजिए; भगवती तारा की कीजिए।
क्या शिव षडक्षरी मंत्र का जाप माया बीज के साथ किया जा सकता है?
अपने आप कभी कोई बीज न बदलें, न जोड़ें
यह पूछे जाने पर कि क्या शिव षडक्षरी मंत्र का जाप माया बीज के साथ हो सकता है, और यदि हाँ तो शिव मंत्र में माया बीज कहाँ लगेगा, वक्ता उत्तर देते हैं कि यह प्रश्न अपने गुरु से पूछना चाहिए। किसी भी मंत्र में स्वयं कोई बीज बदलना या जोड़ना गलत होगा। अपने गुरु से मार्गदर्शन लीजिए, और उसके बाद ही मंत्र में कोई हस्तक्षेप कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या शिव षडक्षरी मंत्र का जाप माया बीज के साथ किया जा सकता है, और यदि हाँ तो शिव मंत्र में माया बीज कहाँ लगाना होगा, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं कि यह प्रश्न अपने गुरु से पूछना चाहिए। किसी भी मंत्र में स्वयं कोई बदलाव करना, या कोई बीज जोड़ना, गलत होगा। अपने गुरु से मार्गदर्शन लेकर, उसके बाद ही मंत्र में कोई हस्तक्षेप कीजिए।
मंत्र का एक भी अक्षर इधर-उधर हो जाए तो क्या होता है?
मंत्र का स्वभाव, यंत्र विधान, मंडल और न्यास सब बदल जाते हैं
वक्ता कहते हैं कि यदि आप षडक्षरी कर रहे हैं, तो पहले विधि विधान जानिए; एक अक्षर भी इधर-उधर हो जाए तो उस मंत्र का स्वभाव बदल जाता है। पंचाक्षरी का यंत्र विधान, पूरा मंडल विधान, अलग है, और षडक्षरी का अलग है। आप जो कह रहे हैं, माया बीज जोड़ना, उससे यह बदल जाएगा; जब यह षडक्षरी बनता है, सब कुछ बदल जाता है। इन विषयों को जानकर और न्यास प्रक्रिया आदि जानकर ही करना चाहिए — हर एक का न्यास भी अलग होगा।
और यदि आप षडाक्षरी मंत्र कर रहे हैं, तो पहले विधि विधान जानिए। यदि एक अक्षर भी इधर-उधर हो जाए, तो उस मंत्र का स्वभाव बदल जाता है। पंचाक्षरी मंत्र का यंत्र विधान, वहाँ का पूरा मंडल विधान, अलग है; षडक्षरी का अलग है। आप जो कह रहे हैं, माया बीज जोड़ना — उससे यह बदल जाएगा; जब यह षडक्षरी बनता है, तो पूरी बात बदल जाती है। इन विषयों को जानकर, और न्यास प्रक्रिया आदि जानकर ही करना चाहिए। हर एक का न्यास भी अलग हो जाएगा।
क्या दोपहर बारह के बाद नित्य पूजा करने में दोष है?
सुबह आठ बजे से पहले, अधिक से अधिक नौ बजे तक
एक श्रोता कहते हैं कि उनकी नित्य पूजा सुबह बारह बजे के बाद तक खिंच जाती है और पूछते हैं कि क्या कोई दोष है, यह भी कहते हैं कि उन्हें दो घंटे और पूजा करनी चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि आप सुबह बारह बजे के बाद नित्य पूजा कर रहे हैं तो भाई, यह बहुत बड़ा दोष है। वे पूछते हैं, बारह बजे तक पूजा कौन करता है; बारह बजे के बाद के समय में पूजा कौन करता है? यदि पूजा करनी है तो प्रयास यह हो कि सुबह आठ बजे से पहले पूजा हो जाए, जो सबसे अच्छा है; नौ बजे भी चलेगा, पर बारह बजे तक देव पूजन का दोष है, और वह लगेगा।
एक श्रोता कहते हैं कि उनके नित्य पूजा-पाठ में समय सुबह बारह बजे से आगे चला जाता है और पूछते हैं कि क्या कोई दोष है, यह भी कहते हैं कि उन्हें दो घंटे और पूजा करनी चाहिए। वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं कि यदि आप अपनी नित्य पूजा सुबह बारह बजे के बाद कर रहे हैं, तो भाई, यह बहुत बड़ा दोष है। बताइए, बारह बजे तक पूजा कौन करता है? बारह बजे के बाद के समय में पूजा कौन करता है? यदि पूजा करनी है, तो प्रयास यह हो कि सुबह आठ बजे से पहले आपकी पूजा पूरी हो जाए — वही सबसे अच्छा है। नौ बजे भी चलेगा, ठीक है; पर बारह बजे तक देव पूजन का दोष है, और वह लगेगा।
सबको बता देने के बाद शक्ति के स्वप्न क्यों रुक गए?
स्वप्न का अनुभव सार्वजनिक करने से वह बंद हो जाता है
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्हें स्वप्न में एक शक्ति के दर्शन होते थे और वे सबको बताते थे। वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी कारण दिखना बंद हो गया। वे चैनल पर तीन-चार अलग वीडियो की ओर इशारा करते हैं जिनमें हर विषय समझाया गया है: यदि स्वप्न में कोई आपको वचन दे तो क्या होता है और उसे कैसे लेना या देना है; यदि स्वप्न में कोई मंत्र दे तो क्या करना चाहिए; यदि स्वप्न में आपको किसी तीर्थ क्षेत्र में ले जाया जा रहा है या बार-बार कुछ दिखाया जा रहा है तो क्या करना चाहिए; और अपने अनुभव बताने पर क्या होता है। वे कहते हैं, ये सब देखिए और इन सब बातों से खुद को बचाइए।
एक श्रोता लिखते हैं कि पहले उन्हें स्वप्न में एक शक्ति के दर्शन होते थे और वे सबको बताते थे। वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी कारण दिखना बंद हो गया। स्वप्न में देखी चीजें जब आप लोगों को बताते हैं, उस पर तीन-चार अलग वीडियो हैं जिनमें हर विषय समझाया गया है: यदि स्वप्न में कोई आपको वचन दे तो क्या होता है, और उसे कैसे लेना या देना है। यदि स्वप्न में कोई आपको मंत्र दे तो क्या करना चाहिए। यदि स्वप्न में आपको किसी तीर्थ क्षेत्र में ले जाया जा रहा है, या बार-बार कुछ दिखाया जा रहा है, तो क्या करना चाहिए। अपने अनुभव बताने पर क्या होता है। इन सब विषयों पर अलग वीडियो हैं; उन्हें देखिए और इन सब बातों से खुद को बचाइए।
क्या भगवती तय करती हैं कि उनके कुल में कौन जन्म लेगा?
कुलदेवी स्वयं जन्म तय करती हैं
यह पूछे जाने पर कि क्या भगवती स्वयं तय करती हैं कि उनके कुल में कौन जन्म लेगा, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल। आपके कुल की देवी स्वयं यह तय करती हैं — कि आप उनके कुल में जन्म लेंगे या नहीं।
यह पूछे जाने पर कि क्या भगवती स्वयं तय करती हैं कि उनके कुल में कौन जन्म लेगा, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल। आपके कुल की देवी स्वयं यह बात तय करती हैं — कि हाँ, उनके कुल में आप जन्म लेंगे या नहीं।
क्या शिव के दर्शन पाने वाला हर व्यक्ति एक ही रूप देखता है?
वैदिक प्रत्यक्षीकरण अब ऊँचे साधकों का है और गुप्त रहता है
यह पूछे जाने पर कि जिन्हें शिव जी के दर्शन हुए हैं वे उन्हें एक जैसा देखते हैं या किसी और रूप में, और क्या यह हमारे मन पर निर्भर है, वक्ता पहले कहते हैं कि वैदिक रूप में, आज के समय में, जिनका प्रत्यक्षीकरण हुआ है वे उच्च कोटि के साधक और महात्मा रहे हैं। और जिन्हें दर्शन होते हैं वे बहुत कम ही इसे सार्वजनिक करते हैं, क्योंकि दर्शन पाने के बाद बुद्धि में इतनी क्षमता नहीं रहती कि व्यक्ति ये बातें लोगों को बताए; और यह किसी भी तरह दिखावे की चीज नहीं, और जो इसका दिखावा करेंगे उन्हें ऐसे दर्शन होंगे ही नहीं। इसलिए वैदिक रूप बहुत दुर्लभ है — या कहें तो बस गुप्त है।
दर्शन के बारे में यह पूछे जाने पर कि जिन्हें शिव जी के दर्शन हुए हैं वे उन्हें वैसे ही देखते हैं, या उनका रूप कैसा दिखेगा, और क्या यह हमारे मन पर निर्भर है, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं। पहली बात यह है कि वैदिक रूप में, आज के समय में, जिनका प्रत्यक्षीकरण हुआ है वे उच्च कोटि के साधक और महात्मा रहे हैं। और जिन्हें दर्शन होते भी हैं — बहुत कम लोग कभी इसे सार्वजनिक करते हैं। क्योंकि दर्शन मिलने के बाद बुद्धि में इतनी क्षमता नहीं रहती कि व्यक्ति ये बातें लोगों को बताए। और यह सब किसी भी तरह दिखावे के लिए भी नहीं है। और जो इसका दिखावा करेंगे, उन्हें इस तरह दर्शन होंगे ही नहीं। इसलिए वैदिक स्वरूप बहुत ही दुर्लभ है। या, कहा जाए तो, बस गुप्त है।
शक्तियाँ सामान्यतः किस रूप में दर्शन देती हैं?
सूक्ष्म रूप में और सामान्य मनुष्य रूप में, बिना बताए
वक्ता उत्तर देते हैं कि इतना तो अवश्य कहा जा सकता है: कि सामान्य रूप में, सूक्ष्म रूप में भी, और एक सामान्य मनुष्य के रूप में भी, शक्तियाँ बिना बताए और बिना आपकी जानकारी के दर्शन देती हैं। उस समय बुद्धि भी कहीं माया से भ्रमित रहती है। बाद में समझ आता है कि यह हमारे आराध्य थे, जो हमें साथ देने आए थे, या साधना पूरी होने पर दर्शन देने आए थे। वे कहते हैं, ऐसी बहुत सी सच्ची घटनाएँ आपको सुनने को मिलेंगी।
पर हाँ, वक्ता कहते हैं, इतना तो अवश्य कहा जा सकता है: कि सामान्य रूप में, सूक्ष्म रूप में भी, और एक सामान्य मनुष्य के रूप में भी, शक्तियाँ बिना बताए, बिना किसी जानकारी के दर्शन देती हैं। उस समय बुद्धि भी कहीं न कहीं माया से भ्रमित रहती है। बाद में समझ आता है कि यह हमारे आराध्य थे, जो हमें साथ देने आए थे, या साधना पूरी होने पर दर्शन देने आए थे। ऐसी बहुत सी सच्ची घटनाएँ आपको सुनने को मिलेंगी।
विग्रह तक ले जाया जा रहा भोग अक्सर किसी धारण किए रूप में स्वीकार होता है और बाद में पहचाना जाता है
विग्रह तक जाते हुए रास्ते में लिया गया भोग
उनका उदाहरण: भगवती की साधना के अंतिम दिन आप भोग अर्पित करने ले जा रहे थे। यह खासकर तीर्थ क्षेत्रों और शक्ति पीठों में सुना जाता है — कि उस समय कोई रूप धारण करके उन्होंने स्वयं उसे स्वीकार कर लिया और आप समझ भी नहीं पाए। सामान्यतः यदि आप अपने हाथ से बना भोग भगवती के श्री विग्रह के आगे चढ़ाने ले जा रहे हैं और कोई कहे, भाई, मुझे खिला दो, मैं भूखा हूँ, तो अधिकतम संभावना यही है कि आप कहेंगे: दो मिनट रुको, भोग चढ़ा दूँ, उसके बाद सबसे पहले तुम्हें ही मिलेगा। और आप दो मिनट अवश्य रुकवाएँगे। पर जब वह शक्ति आपके सामने आती है, तो माया से भ्रमित व्यक्ति कभी नहीं कह पाएगा कि नहीं, पहले मैं चढ़ाऊँगा; वह पूरी तरह उन पर मोहित हो जाएगा और कहेगा, तुम खा लो। और जब वे वहाँ से हटकर गायब हो जाती हैं, तब समझ आता है: यह हमारे आराध्य थे।
जैसे, आपने भगवती की साधना की और अंतिम दिन आप भगवती को भोग आदि अर्पित करने ले जा रहे थे। यह खासकर तीर्थ क्षेत्रों में और शक्ति पीठ में हमेशा सुना जाता है — कि उस समय कोई रूप धारण करके उन्होंने स्वयं उसे स्वीकार कर लिया, और आप उसे समझ भी नहीं पाए। सामान्यतः यदि आप अपने हाथ से बना भोग भगवती के श्री विग्रह के आगे चढ़ाने ले जाते हैं, और कोई व्यक्ति कहे, भाई, मुझे खिला दो, मैं भूखा हूँ, तो अधिकतम संभावना यही है कि आप कहेंगे: दो मिनट रुको भाई, भोग चढ़ा दूँ, उसके बाद सबसे पहले तुम ही लेना। तो आप दो मिनट तो अवश्य रुकवाएँगे। पर जब वह शक्ति आपके सामने आती है, तो माया से भ्रमित व्यक्ति कभी नहीं कह पाएगा कि नहीं, पहले मैं चढ़ाऊँगा। वह पूरी तरह मोह में आ जाएगा, उन पर मोहित हो जाएगा, और यह कहकर दे देगा: तुम खा लो। और जब वे वहाँ से हटकर गायब हो जाती हैं, तब समझ आता है: अरे बाप रे, यह तो हमारे आराध्य थे।
गृहस्थ साधकों को आमतौर पर कैसे पता चलता है कि उन्हें दर्शन हुए?
बाद में ही पहचान होती है, स्वप्न में आई स्पष्टता से
वक्ता कहते हैं कि अधिकतर गृहस्थ साधक, या इस तरह के साधक, इसी तरह दर्शन पाते हैं। और बाद में स्वप्न आदि में स्पष्टता आती है — कि मैंने दर्शन दिए हैं। और स्वप्न में हर रूप में दर्शन हो सकते हैं।
तो अधिकतर, चाहे गृहस्थ साधक हों या इस तरह के साधक, इसी तरह दर्शन पाते हैं। और बाद में स्वप्न आदि में स्पष्टता आती है — कि मैंने दर्शन दिए हैं। और स्वप्न में हर रूप में दर्शन हो सकते हैं।
यदि कोई चाहे तो भगवती बगलामुखी की फोटो का विसर्जन कैसे करे?
दशमी तिथि, पीला कपड़ा, खोंइचा, और घर की स्त्री
एक श्रोता कहते हैं कि उनके घर में माँ बगलामुखी की फोटो है, जिसे उन्होंने गलती से रख लिया, और अब वे उसका विसर्जन करना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं कि भगवती की फोटो गलती से मत रखिए; भगवती की फोटो रखने से कोई तिर्यक प्रभाव बिल्कुल नहीं पड़ता — निश्चिंत रहिए। फिर भी, यदि विसर्जन करना चाहें: दशमी तिथि को, किसी ऐसे दिन जो बृहस्पतिवार न हो — रविवार, मंगलवार और बृहस्पतिवार के दिन छोड़कर — सबसे पहले उनकी पूजा, श्रृंगार आदि कीजिए; बार-बार क्षमा माँगते हुए उन्हें पीले कपड़े में अच्छे से लपेटिए; जिसे हमारे यहाँ खोंइचा भरना कहते हैं, उनके आँचल में चावल, दूब, फूल आदि बाँधकर, वह कीजिए; और यह सब घर की किसी स्त्री से करवाइए। श्रृंगार आदि सब करवाकर, उसके बाद विधिपूर्वक क्षमा माँगकर उनकी विदाई कीजिए।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनके गुरु देव के घर में माँ बगलामुखी की फोटो है, कि उन्होंने उसे गलती से रख लिया, और अब वे उसका विसर्जन करना चाहते हैं, और पूछते हैं कि इसमें क्या करना होगा। वक्ता कहते हैं कि भगवती की फोटो गलती से मत रखिए। भगवती की फोटो रखने से कोई तिर्यक् प्रभाव बिल्कुल नहीं पड़ता। निश्चिंत रहिए। फिर भी, यदि विसर्जन करना चाहते हैं, तो दशमी तिथि को, जो भी दिन बृहस्पतिवार न हो — रविवार, मंगलवार और बृहस्पतिवार का दिन छोड़कर — किसी भी और दिन, सबसे पहले उनकी पूजा और श्रृंगार आदि कीजिए। बार-बार क्षमा माँगते हुए, उन्हें पीले कपड़े में अच्छे से लपेटकर, जिसे हमारे यहाँ खोंइचा भरना कहते हैं — चावल, दूब, फूल आदि जो उनके आँचल में बाँधे जाते हैं — वह सब कीजिए, और यह घर की किसी स्त्री से करवाइए। श्रृंगार और सब कुछ करवाकर, उसके बाद विधिपूर्वक क्षमा माँगकर उनकी विदाई कीजिए।
देवी अथर्वशीर्ष का अध्ययन कौन कर सकता है?
एक वैदिक मंत्र, जनेऊ पहनने वाले पुरुष के लिए
देवी अथर्वशीर्ष से कोई उपाय पूछे जाने पर जो रात में किया जा सके, वक्ता उत्तर देते हैं: देखिए, देवी अथर्वशीर्ष एक वैदिक मंत्र है। यदि आप पुरुष हैं और जनेऊ पहनते हैं, तो अथर्वशीर्ष का अध्ययन कीजिए। अन्यथा कुछ और पौराणिक मंत्रों का अध्ययन कीजिए।
देवी अथर्वशीर्ष से कोई उपाय पूछे जाने पर, जो रात में किया जा सके, वक्ता उत्तर देते हैं: देखिए, देवी अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है। एक वैदिक मंत्र है। यदि आप पुरुष हैं और यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। पहनते हैं, तो अथर्वशीर्ष का अध्ययन कीजिए। अन्यथा कुछ और पौराणिक मंत्रों का अध्ययन कीजिए।
क्या वर्षों से नित्य पाठ करने वाले के साथ कोई शक्ति चलती है?
नित्य पूजा-पाठ में बड़ी शक्ति
यह पूछे जाने पर कि क्या वर्षों तक रोज स्तोत्र, चालीसा और पूजा-पाठ करने से कोई शक्ति अप्रत्यक्ष रूप से हमारे साथ चलती है, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल चलती है। जो कई वर्षों से पूजा-पाठ कर रहे हैं, उन्हें जीवन में कभी न कभी इस चीज का अनुभव भी होगा। नित्य पूजा-पाठ में बहुत शक्ति और सामर्थ्य है। वे कहते हैं कि नवरात्रि आदि में तो सारे नियम बाँधकर कोई विशेष अनुष्ठान करते ही हैं; पर नित्य पूजन-पाठ से भी, चाहे आप चालीसा, स्तोत्र या आरती ही कर रहे हों, बहुत सी शक्तियाँ आपके साथ चलने लगती हैं, क्योंकि आप इसे नियमित कर रहे हैं।
यह पूछे जाने पर कि क्या वर्षों तक रोज स्तोत्र, चालीसा और पूजा-पाठ करने से कोई शक्ति अप्रत्यक्ष रूप से हमारे साथ चलती है, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल चलती है। जो कई वर्षों से पूजा-पाठ कर रहे हैं — जीवन में कभी न कभी इस चीज का अनुभव आपको भी आएगा। नित्य पूजा-पाठ में बहुत शक्ति और सामर्थ्य है। नवरात्रि आदि में तो वे सारे नियम बाँधकर कोई विशेष अनुष्ठान करते ही हैं। पर नित्य पूजन-पाठ से भी — चाहे आप चालीसा, स्तोत्र या आरती ही कर रहे हों — उससे भी बहुत सी शक्तियाँ आपके साथ चलने लगती हैं, क्योंकि आप इसे नियमित कर रहे हैं। यदि आप इसे नियमित करते रहें, तो आपको बहुत लाभ होगा। इसे कभी छोड़ना नहीं चाहिए।
किसी स्तोत्र या चालीसा को जागृत कैसे किया जाता है?
नवरात्रि में सौ से अधिक पाठ, या हवन के साथ ग्यारह सौ
हाँ — वक्ता कहते हैं कि आप जो भी स्तोत्र या चालीसा पढ़ रहे हैं, यदि उसी को विधि विधान से जागृत करें, यानी नवरात्रि आदि में सौ से अधिक पाठ करें, ग्यारह सौ पाठ करें, और इस तरह हवन आदि करें, तो उससे अत्यंत बड़ा लाभ मिलता है।
हाँ — आप जो भी स्तोत्र या चालीसा पढ़ रहे हैं, यदि विधि विधान से उसी को जागृत करें, वक्ता कहते हैं — यानी नवरात्रि आदि में अधिक करें, मतलब सौ से अधिक पाठ; यदि ग्यारह सौ पाठ करें; यदि इस तरह करें और हवन आदि करें — तो उससे अत्यंत बड़ा लाभ मिलता है।
देवी पुराण के अनुसार, बिना दीक्षा जपे जा सकने वाले दुर्गा नाम मंत्र पर वीडियो का वादा
देवी पुराण के अनुसार नाम मंत्र
एक श्रोता उनसे दुर्गा नाम मंत्र पर वीडियो बनाने को कहते हैं, जिसका जाप सब बिना दीक्षा के कर सकें। वक्ता मान जाते हैं, कहते हैं कि वे जल्द ही दुर्गा जी के नाम मंत्र के जाप पर एक वीडियो बनाएँगे, और उसे देवी पुराण के अनुसार बनाएँगे; वे इसे बहुत अच्छी बात कहना बताते हैं।
एक श्रोता उनसे दुर्गा नाम मंत्र पर वीडियो बनाने को कहते हैं, जिसका जाप सब बिना दीक्षा के कर सकें। ठीक है, वक्ता कहते हैं। वे जल्द ही दुर्गा जी के नाम मंत्र के जाप पर वीडियो बनाएँगे; वे उसे देवी पुराण के अनुसार बनाएँगे। वे जोड़ते हैं, आपने बहुत अच्छी बात कही है।
हनुमान त्रिवाचा देने वाले गुरु के देहांत के बाद अनुभव क्यों घट सकते हैं?
किसी में इतनी क्षमता नहीं कि हनुमान जी का त्रिवाचा दे और वह फीका पड़ जाए
एक श्रोता कहते हैं कि गुरु कृपा से हनुमान जी का त्रिवाचा लिया गया था, पर गुरु जी के देहांत के बाद से अनुभव घट रहा है, हालाँकि उनके समर्पण या पूजा के भाव में कोई कमी नहीं है। वक्ता कहते हैं कि यह सोचने की बात है, और सामान्यतः ऐसा नहीं होना चाहिए — क्योंकि हनुमान जी हनुमान जी हैं, और किसी में इतनी क्षमता नहीं कि उनका त्रिवाचा दे और बाद में उसके अनुभवों में कमी आ जाए। दूसरी बात, यदि आपसे कोई दोष या किसी तरह की गलती हुई है, तो वह अलग विषय हो सकता है।
एक श्रोता लिखते हैं कि गुरु कृपा से उन्होंने हनुमान जी का त्रिवचा लिया था, पर गुरु जी के देहांत पर अनुभव घट रहा है; वे पूछते हैं कि क्या किया जा सकता है, और कहते हैं कि उनके समर्पण या पूजा के भाव में कोई कमी नहीं आई है। यदि यह हनुमान जी का त्रिवाचा है, और आपको गुरु जी की कृपा से मिला, और अब आप इसे कर रहे हैं और लगता है कि इसमें अनुभव घट रहा है — तो यह सोचने की बात है, वक्ता श्रोता का नाम लेकर कहते हैं। सामान्यतः ऐसा नहीं होना चाहिए। क्योंकि हनुमान जी हनुमान जी हैं। किसी में इतनी क्षमता नहीं कि उनका त्रिवाचा दे, और उसके बाद उसके अनुभवों में कोई कमी आए। दूसरी बात यह है: यदि आपसे कोई दोष या किसी तरह की गलती हुई है, तो वह अलग विषय हो सकता है।
ब्रह्मदंड या ब्रह्म दोष क्या है?
कुपित ब्रह्म, किसी ब्राह्मण की आत्मा
ब्रह्मदंड या दोष क्या है और उससे कैसे छुटकारा पाएँ, यह पूछे जाने पर वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं कि ब्रह्मदंड का अर्थ है कुपित ब्रह्म, किसी ब्राह्मण की आत्मा; चैनल पर इससे जुड़े चार-पाँच वीडियो हैं, और वे श्रोता से उन्हें अच्छे से सुनने को कहते हैं। वे जोड़ते हैं कि यदि आप Google पर ब्रह्म पिशाच प्रपंच खोजें, तो दस भागों में प्रकाशित एक कहानी मिलेगी — एक सच्ची घटना — जिसे आप grihasthtantra.com पर पढ़ सकते हैं, और यह पूरी बात साफ हो जाएगी।
ब्रह्मदंड या दोष क्या है, और उससे मुक्ति कैसे पाएँ, यह पूछे जाने पर वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं। ब्रह्मदंड — यानी कुपित ब्रह्म, किसी ब्राह्मण की आत्मा। इससे जुड़े चार-पाँच वीडियो चैनल पर हैं। उन्हें अच्छे से सुनिए। ब्रह्म पिशाच प्रपंच: यदि आप Google पर खोजें, तो दस भागों में प्रकाशित एक कहानी मिलेगी। यह एक सच्ची घटना है, जिसे आप grihasthtantra.com पर पढ़ सकते हैं। यह पूरी बात आपको साफ हो जाएगी। ब्रह्म पिशाच प्रपंच पढ़िए, Google पर खोजिए और आपको मिल जाएगा।
क्या निकृष्ट शक्तियाँ और तामसिक शक्तियाँ एक ही हैं?
तामसिक बलि भोग लेने वाली शूद्र शक्तियाँ
यह पूछे जाने पर कि क्या निकृष्ट शक्तियाँ और तामसिक शक्तियाँ एक ही हैं, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, वही शूद्र शक्तियाँ — यानी ऐसी शक्ति जो तामसिक बलि भोग आदि लेती है। हम उन्हीं के बारे में बात कर रहे हैं।
यह पूछे जाने पर कि क्या निकृष्ट शक्तियाँ और तामसिक शक्तियाँ एक ही चीज हैं, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, वही शूद्र शक्तियाँ। यानी ऐसी शक्ति जो तामसिक बलि भोग आदि लेती है। हम उन्हीं के बारे में बात कर रहे हैं।
क्या ऊँची शक्तियों का भी तामसिक रूप होता है?
होता है, पर गृहस्थ उसकी पूजा नहीं करते
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि तामस रूप वाली हर शक्ति ऐसी ही है। जो उच्च कोटि की शक्तियाँ हैं, उनका भी तामसिक स्वरूप होता है — पर गृहस्थ उसकी पूजा नहीं करता। और फिर निकृष्ट शक्तियाँ हैं, जो मसानी शक्तियाँ हैं: आप उन्हें कितने भी अच्छे से रखें, समय आने पर वे साथ नहीं देतीं। वे कहते हैं कि वे भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी आदि जैसी शक्तियों की बात कर रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि तामस रूप में हर शक्ति ऐसी ही है। जो उच्च कोटि की शक्तियाँ हैं, उनका भी तामसिक स्वरूप होता है — पर गृहस्थ उसकी पूजा नहीं करता। और फिर निकृष्ट शक्तियाँ हैं, जो मसानी शक्तियाँ हैं। आप उन्हें कितने भी अच्छे से रखें, समय आने पर वे साथ नहीं देतीं। वे कहते हैं कि वे उस तरह की शक्तियों की बात कर रहे हैं जो भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी आदि हैं।
क्या अप्सरा साधना सच में होती है?
अप्सरा, यक्ष, गंधर्व, किन्नर और विद्याधर सबकी साधनाएँ हैं
यह पूछे जाने पर कि क्या अप्सरा साधना सच में होती है, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं कि शक्तियों के जितने भी नाम आपने सुने हैं — अप्सरा, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, विद्याधर — उन सबकी साधना होती है। और जिस प्रत्यक्ष दर्शन की बात हो रही है, वह भी सच में होता है।
यह पूछे जाने पर कि क्या अप्सरा साधना सच में होती है, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं। शक्तियों के जितने भी नाम आपने सुने हैं — अप्सरा, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, विद्याधर — उन सबकी साधना होती है। ठीक है — और जिस प्रत्यक्ष दर्शन की बात हो रही है, वह भी सच में होता है।
दूसरे मजहब मृत्यु के बाद अप्सराओं का वादा करते हैं; सनातन में वे जीते जी प्राप्त हो सकती हैं
अन्यत्र मृत्यु के बाद अप्सराओं का वादा, सनातन में जीते जी प्राप्य
वक्ता हमारी सनातन संस्कृति में कौलांतक शक्ति पीठ के मुख्य आचार्य के एक वायरल हुए वीडियो का उल्लेख करते हैं, जिसमें आचार्य ने बहुत अच्छी बात कही थी, और वे कहते हैं कि श्रोता इससे जुड़ाव महसूस करेंगे: कि जो दूसरे मजहब बनाए गए हैं, उनमें कहा जाता है कि इस जन्म में कर्म करो और मृत्यु के बाद स्वर्ग में अप्सराएँ मिलेंगी — बहत्तर तरह की, आप समझ जाएँगे। पर केवल सनातन संस्कृति ही ऐसी है जिसमें कहा गया है कि जीते जी आप ऐसी साधनाएँ कर सकते हैं कि अप्सराएँ धरती पर आपके पास आ सकें, आपके लिए आ सकें।
वक्ता कहते हैं कि हमारी सनातन संस्कृति में एक कौलांतक शक्ति पीठ के आचार्य हैं, जो अभी वहाँ के मुख्य आचार्य हैं, और उनका एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें उन्होंने बहुत अच्छी बात कही थी; जितने लोग सुन रहे हैं, वे इससे अवश्य जुड़ाव महसूस करेंगे। कि जो दूसरे मजहब बनाए गए हैं, उन मजहबों में कहा जाता है कि इस जन्म में कर्म करो, और मृत्यु के बाद स्वर्ग में अप्सराएँ मिलेंगी। ठीक है — बहत्तर तरह की, आप समझ जाएँगे। पर केवल सनातन संस्कृति ही ऐसी है जिसमें कहा गया है कि जीते जी आप ऐसी साधनाएँ कर सकते हैं कि अप्सराएँ धरती पर आपके साथ आ सकें, आपके लिए आ सकें।
अप्सरा साधना वास्तव में किसलिए है?
पूर्णता नहीं, बल्कि धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष में सहायता
वक्ता कहते हैं कि वहाँ कभी रुकने को नहीं कहा गया: अप्सरा साधना में पूर्णता कभी घोषित नहीं की गई — कभी नहीं कहा गया कि अप्सरा साधना करके आप पूर्ण हो जाते हैं। अप्सरा साधना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में, काम में सहायता के लिए है, ताकि आपकी जो इच्छाएँ हैं उनसे आपका मन हट सके। जब आप पूर्ण हो जाएँगे, तब मोक्ष की ओर बढ़ेंगे, और अप्सरा आपकी सहायक बनेगी।
और वहाँ कभी रुकने को नहीं कहा गया, वक्ता कहते हैं। अप्सरा साधना में पूर्णता की बात कभी नहीं कही गई — कभी नहीं कहा गया कि अप्सरा साधना करके आप पूर्ण हो जाते हैं। अप्सरा साधना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में, काम में सहायता के लिए है — ताकि आपकी जो इच्छाएँ हैं, उनसे आपका मन हट सके। जब आप पूर्ण हो जाएँगे, तब मोक्ष की ओर बढ़ेंगे, और अप्सरा आपकी सहायक बनेगी। वक्ता कहते हैं, यह इस तरह होता है।
क्या मांगलिक दोष साधना मार्ग के लिए अच्छा है?
पहले भाव और बलाबल देखिए
यह पूछे जाने पर कि क्या मांगलिक दोष साधना मार्ग के लिए अच्छा है और मांगलिक व्यक्ति को कौन सी साधना करनी चाहिए, वक्ता कहते हैं कि उनके अपने अनुभव के अनुसार, जिसे भी मांगलिक दोष है उसे सबसे पहले भाव के अनुसार देखना चाहिए कि वह किस भाव में है और उसका बलाबल कितना है। साधना मार्ग के लिए अच्छा है या नहीं, यह केवल मांगलिक दोष से नहीं कहा जा सकता।
यह पूछे जाने पर कि क्या मांगलिक दोष साधना मार्ग के लिए अच्छा है, और मांगलिक व्यक्ति को कौन सी साधना करनी चाहिए, वक्ता कहते हैं: देखिए, अपने अनुभव के अनुसार वे कहेंगे कि जिसे भी मांगलिक दोष है, उसे सबसे पहले भाव के अनुसार देखना चाहिए कि वह किस भाव में है और उसका बलाबल कितना है। साधना मार्ग के लिए अच्छा है या नहीं — यह बात केवल मांगलिक दोष से नहीं कही जा सकती।
मजबूत मंगल वाले व्यक्ति के लिए कौन सी साधनाएँ उपयुक्त हैं?
बगलामुखी, हनुमान, और युद्धक्षेत्र की उग्र शक्तियाँ
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि यदि मंगल मजबूत है, तो यदि आप भगवती बगलामुखी की, हनुमान जी की, या युद्ध क्षेत्र से जुड़ी शक्तियों की साधना करें — उग्र शक्तियाँ, विशेषकर, हालाँकि सभी शक्तियाँ ऐसी हैं, फिर भी जिनका स्वरूप उस तरह का है — तो आपको शीघ्र फल मिलता है।
क्या ऐसी साधना करने में उम्र का महत्व है?
अट्ठाईस वर्ष के बाद अधिक देती है, उससे पहले दोष शांत करती है
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है: जब आप अट्ठाईस वर्ष से अधिक उम्र के बाद इस तरह की साधना करते हैं, तो वह अधिक लाभ देती है। जब उससे पहले करते हैं, तो दोष की शांति होती है — इसलिए हर तरह से आपके लाभ में है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है: अट्ठाईस वर्ष से अधिक उम्र होने के बाद जब आप इस तरह की साधना करते हैं, तो वह अधिक लाभ देती है। जब आप उससे पहले करते हैं, तो दोष की शांति होती है। इसलिए हर तरह से यह आपके लाभ में है।
काल सर्प दोष का सबसे सरल उपाय क्या है?
नारायण या सदाशिव का सहस्रनाम पाठ, अभिषेक के साथ
वक्ता कहते हैं कि यदि आप मानते हैं कि काल सर्प दोष है और उसका निवारण चाहते हैं, तो आपको भगवान श्री नारायण या भगवान महादेव सदाशिव का सहस्रनाम पाठ करना चाहिए, और उसी पाठ से अभिषेक करना चाहिए — यह सबसे सुलभ और सरल उपाय है। यदि भगवान सदाशिव का सहस्रनाम पाठ करते हुए आप दूध मिले जल से, मीठे जल से, हर सोमवार भी अभिषेक करें, तो इस दोष से बहुत ही शीघ्र मुक्ति मिलेगी; सर्प दोष आदि से मुक्ति बहुत शीघ्र मिलती है।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप मानते हैं कि यहाँ काल सर्प दोष है और उसका निवारण करना है, तो आपको भगवान श्री नारायण या भगवान महादेव सदाशिव का सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। पाठ करना चाहिए, और उसी से अभिषेक करना चाहिए। यह सबसे सुलभ और सरल उपाय है। यदि भगवान सदाशिव का सहस्रनाम पाठ करते हुए आप दूध मिले जल से, मीठे जल से अभिषेक करें, और हर सोमवार भी करें, तो बहुत ही शीघ्र आपको इस दोष से मुक्ति मिलेगी। सर्प दोष आदि से मुक्ति बहुत शीघ्र मिलती है।
किन नागों की पूजा करनी चाहिए, और किस तिथि को?
पंचमी को कुल नाग के साथ नवनाग, भगवती मनसा के साथ
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ पंचमी तिथि को: नागराज वासुकी, शेषनाग, या जो बारह नाग हैं, जो अष्टनाग हैं, जो दस नाग हैं — जितना आप समझ सकें, जो भी आपके अपने कुल के अनुसार हो, या जो द्वादश नाग हैं, या जो नवनाग हैं। उनके अनुसार कुल नाग के साथ नवनाग की पूजा करनी चाहिए — यानी पंचमी तिथि को नौ नागों की पूजा करनी चाहिए; और यदि भगवती मनसा के साथ भी करें, तो इसमें भी काफी सहायता मिलती है।
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ पंचमी तिथि को: नागराज वासुकी, शेषनाग, या जो बारह नाग हैं, जो अष्टनाग हैं, जो दस नाग हैं — जितना आप समझ सकें, जो भी आपके अपने कुल के अनुसार हो; या जो द्वादश नाग हैं, या जो नवनाग हैं। उनके अनुसार कुल नाग के साथ नवनाग का पूजन करना चाहिए। यानी पंचमी तिथि को नौ नागों की पूजा करनी चाहिए। और यदि आप भगवती मनसा के साथ भी करें, तो इसमें भी आपको काफी सहायता मिलती है।
बगला प्रत्यंगिरा कवच श्रोता के अपने गुरु पर छोड़ा गया, जिनके अधिकार का वे आकलन नहीं कर सकते
इनकार — वे आपके कुलदेवता की स्थिति या आपका अधिकार नहीं जानते
गुप्त नवरात्र में माँ बगला प्रत्यंगिरा कवच का पाठ कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: कृपया यह विधि विधान अपने गुरु जी से ठीक से समझकर ही कीजिए; बगला प्रत्यंगिरा से जुड़ा एक वीडियो चैनल पर है। वे कहते हैं कि वे इस तरह के विषय कभी नहीं बताते — वे केवल वही बताते हैं जो गृहस्थ के भले के लिए हो — क्योंकि उन्हें नहीं पता कि आपके घर के कुलदेवी और कुलदेवता की स्थिति क्या है, आप कितने बड़े साधक हैं, आपने किन मंत्रों का जाप किया है, आप दीक्षित हैं या नहीं। इसलिए बगला प्रत्यंगिरा के लिए, वे कहते हैं, वे कभी नहीं कहेंगे।
गुप्त नवरात्र में माँ बगला प्रत्यंगिरा कवच का पाठ कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: कृपया यह विधि विधान अपने गुरु जी से ठीक से समझ लीजिए, और तभी कीजिए; बगला प्रत्यंगिरा से जुड़ा एक वीडियो चैनल पर है। वक्ता कहते हैं कि वे इस तरह के विषय कभी नहीं बताते — वे ऐसी बातें बताते हैं जो गृहस्थ के भले के लिए हों — क्योंकि उन्हें नहीं पता कि आपके घर के कुलदेवी और कुलदेवता की स्थिति क्या है, आप कितने बड़े साधक हैं, आपने किन मंत्रों का जाप किया है, आप दीक्षित हैं या नहीं। इसलिए बगला प्रत्यंगिरा के लिए, वे कहते हैं, वे कभी नहीं कहेंगे।
उन्होंने कभी नहीं कहा कि वचन कभी नहीं लेना चाहिए — केवल यह कि गृहस्थ उसे निभा सके
अपने जीवन के अनुसार वचन लीजिए, यदि निभा सकें
एक श्रोता कहते हैं कि कुछ भ्रम है — आप कहते हैं कि शक्ति से वचन नहीं लेना चाहिए, तो फिर साधना में वचन प्रबंधन क्यों है? वक्ता उत्तर देते हैं: मैंने कभी नहीं कहा कि शक्ति से वचन नहीं लेना चाहिए। मैंने कहा कि गृहस्थ को अपने जीवन के अनुसार वचन लेना चाहिए। यदि आप उसे निभा सकते हैं, तो वचन लीजिए। यदि आपने कोई यक्षिणी सिद्ध की है, तो उससे तीन तरह के वचन लीजिए — यह केवल त्रिवाचा तक सीमित नहीं है।
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्हें थोड़ा भ्रम लग रहा है: आप कहते हैं कि शक्ति से वचन नहीं लेना चाहिए, तो साधना में वचन प्रबंधन क्यों है? मैंने यह कभी नहीं कहा, वक्ता उत्तर देते हैं, कि शक्ति से वचन नहीं लेना चाहिए। मैंने जो कहा वह यह था कि गृहस्थ को अपने जीवन के अनुसार वचन लेना चाहिए। यदि आप उसे निभा सकते हैं, तो वचन लीजिए। आपने कोई यक्षिणी सिद्ध की है: उससे तीन तरह के वचन लीजिए। यह केवल त्रिवचा तक सीमित नहीं है।
पत्नी रूप में यक्षिणी सिद्ध करने पर क्या होता है?
वह नहीं जो फैलाया गया भ्रम कहता है
फिर, यदि आप उसे पत्नी के रूप में सिद्ध करने जा रहे हैं — हालाँकि, वक्ता कहते हैं, यह उस तरह नहीं होता जिस तरह भ्रम फैलाया गया है — तो उसके बाद स्थिति काफी अलग हो जाती है। इसके पीछे कारण यह नहीं है कि यक्षिणी आपकी पत्नी को मार देगी क्योंकि उसे वचन में लिया गया है।
फिर, यदि आप उसे पत्नी के रूप में सिद्ध करने जा रहे हैं — हालाँकि, वक्ता कहते हैं, यह उस तरह नहीं होता जिस तरह भ्रम फैलाया गया है — उसके बाद परिस्थितियाँ काफी अलग हो जाती हैं। इसके पीछे कारण यह नहीं है कि यक्षिणी आपकी पत्नी को मार देगी, कि उसने उसे वचन में ले लिया है।
जब यक्षिणी किसी साधक से बँधती है तो वास्तव में क्या होता है?
उसकी ऊर्जा आपकी प्राण ऊर्जा से बँध जाती है
वक्ता कहते हैं कि जब आप किसी यक्षिणी को अपने लिए वचन में बाँधते हैं, तो — यक्ष और यक्षिणी नाम ही है — उसके शरीर में जो ऊर्जा है वह आपकी प्राण ऊर्जा से बँध जाती है। और जब वे प्राण ऊर्जा से बँध जाती हैं, तो आप जितना भी मंत्र जाप आदि करते हैं, उसी मंत्र जाप से उसे पोषण मिलता है, और वह आपका काम पूरा करेगी।
जब आप किसी यक्षिणी को अपने लिए वचन में बाँधते हैं — यक्ष, यक्षिणी, नाम ही यही है — तो उसके शरीर के भीतर जो ऊर्जा है वह आपकी प्राण ऊर्जा से बँध जाती है; वह बँध जाती है। और जब वह आपकी प्राण ऊर्जा से बँध जाएगी, तो आप जितना भी मंत्र जाप आदि करेंगे, उसी मंत्र जाप से उसे पोषण मिलेगा, और वह आपका काम पूरा करेगी।
गृहस्थ जीवन में वचन क्यों टूटता है?
प्राण ऊर्जा घटती है और शरीर कमजोर होता है
वक्ता कहते हैं कि जब आप गृहस्थ जीवन में जाते हैं, तो कहीं न कहीं आपकी साधना और तपस्या में बाधा आएगी; कहीं न कहीं उस तरह की चीजें आएँगी। इसके कारण प्राण ऊर्जा घटेगी, आप समय नहीं दे पाएँगे, शरीर कमजोर हो जाएगा, और फिर वहाँ वचन टूटेगा — और जब वचन टूटेगा तो कठिनाई होगी।
और जब आप गृहस्थ जीवन में जाएँगे, तो कहीं न कहीं आपकी साधना में, आपकी तपस्या में बाधा आएगी; कहीं न कहीं इस तरह की चीजें आएँगी। जिसके कारण प्राण ऊर्जा घटेगी, आप समय नहीं दे पाएँगे, शरीर कमजोर हो जाएगा, और फिर वहाँ वचन टूटेगा। यदि वचन टूटता है, तो कठिनाई होगी।
आखिर वचन कब लिया जा सकता है?
यदि आपमें क्षमता है, या आप परिवार छोड़ेंगे
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए मैंने कहा है कि यदि क्षमता नहीं है तो वचन नहीं लेना चाहिए। यदि आप अपना परिवार छोड़ना चाहते हैं, या उस तरह की शक्ति लेना चाहते हैं, तो बिल्कुल लीजिए — बाकी सब वे पहले ही साफ कर चुके हैं: वचन कैसे लेना है, किसका वचन लेना है और किसका नहीं, कितना और क्या जानना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए मैंने कहा है कि यदि क्षमता नहीं है तो वचन नहीं लेना चाहिए। यदि आप अपना परिवार छोड़ना चाहते हैं, या उस तरह की शक्ति लेना चाहते हैं, तो बिल्कुल लीजिए। बाकी सब बातें वे पहले ही साफ कर चुके हैं: वचन कैसे लिया जाता है, किसका वचन और किसका नहीं, क्या कितना जानना चाहिए।
जब कोई अज्ञात शक्ति जाप में बाधा डाले तो क्या करना चाहिए?
इष्ट के दिन इष्ट के मंत्र का हवनात्मक प्रयोग
एक श्रोता कहते हैं कि कोई अज्ञात शक्ति जाप में बाधा बन रही है — जो माला पाँच मिनट में होती थी, अब बीस मिनट लेती है। वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं कि अभी चल रहे समय में ये चीजें बहुत आती हैं। जब कोई अज्ञात शक्ति जाप में बाधा बन रही हो, तो हवनात्मक प्रयोग करना चाहिए: अपने इष्ट का, इष्ट से जुड़े दिन — जैसे यदि आप हनुमान जी की सेवा करते हैं तो मंगलवार और शनिवार को; या भगवान दत्तात्रेय की कर रहे हैं तो गुरुवार को — उनसे जुड़े मंत्रों का हवनात्मक प्रयोग। वे कहते हैं, यदि आपको बहुत अधिक लगे तो कम से कम एक हजार एक सौ आठ आहुतियाँ दीजिए।
एक श्रोता कहते हैं कि कोई अज्ञात शक्ति जाप में बाधा बन रही है — जो माला पाँच मिनट में होती है, उसमें बीस मिनट लग रहे हैं। एक बात यह भी है, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: अभी जो समय चल रहा है, उसमें ये सब चीजें बहुत आती हैं। जब कोई अज्ञात शक्ति जाप में बाधा बन रही हो, तो हवनात्मक प्रयोग करना चाहिए। अपने इष्ट देवता का, इष्ट से जुड़े दिन — जैसे यदि आप हनुमान जी की सेवा करते हैं, तो मंगलवार और शनिवार के दिन; या यदि आप भगवान दत्तात्रेय की कर रहे हैं, तो गुरुवार के दिन — उनसे जुड़े मंत्रों का हवनात्मक प्रयोग करना चाहिए। यदि आपको बहुत अधिक लग रहा हो, तो कम से कम एक हजार एक सौ आठ आहुति दीजिए।
क्या माँ दुर्गा का अष्टाक्षर मंत्र किया जा सकता है?
दीक्षा के बाद करना बेहतर
यह पूछे जाने पर कि क्या माँ दुर्गा का अष्टाक्षर मंत्र किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं: उनके अनुसार, यदि आप दीक्षित होकर करें, तो बहुत बेहतर है। बाकी आपकी अपनी इच्छा है।
यह पूछे जाने पर कि क्या माँ दुर्गा का अष्टाक्षर मंत्र किया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं: उनके अनुसार, यदि आप दीक्षित होकर करें, तो काफी बेहतर है। बाकी आपकी अपनी इच्छा है।
क्या तांत्रिक ताबीज पहनकर माला जाप किया जा सकता है?
सनातन का तांत्रिक ताबीज पहना जा सकता है
फिर से यह पूछे जाने पर कि क्या तांत्रिक ताबीज पहनकर माला जाप किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं: हाँ, तांत्रिक ताबीज पहनिए; यह सनातन से जुड़ा है, पहनकर कीजिए। वे जोड़ते हैं कि उन्हें समझ नहीं आता कि प्रश्नकर्ता यह क्यों पूछ रहे हैं — सब पहनते हैं।
एक बार फिर यह पूछे जाने पर कि क्या तांत्रिक ताबीज पहने हुए माला जाप किया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, तांत्रिक ताबीज पहनिए; यह सनातन से जुड़ा है, पहनकर कीजिए। वे कहते हैं कि उन्हें समझ नहीं आता कि प्रश्नकर्ता यह क्यों पूछ रहे हैं — सब पहनते हैं।
हर बीज पर अलग वीडियो का वादा, क्रीं और क्रिंग दोनों
हर बीज पर अलग वीडियो — क्रीं और क्रिंग
एक श्रोता उनसे कहते हैं कि यदि संभव हो तो क्रीं बीज मंत्र पर कुछ बताएँ। ठीक है, वक्ता कहते हैं — बीज मंत्रों पर वे हर एक बीज पर अलग से बनाएँगे; क्रीं और क्रिंग दोनों पर।
एक श्रोता नाम लेकर उनसे कहते हैं कि यदि संभव हो तो कृपा करके क्रीं बीज मंत्र पर कुछ बताएँ। ठीक है, वक्ता कहते हैं। बीज मंत्रों पर वे हर एक बीज (बीज मंत्र) पर अलग से बनाएँगे — क्रीं और क्रिंग दोनों पर।
क्या संकल्प लेने के बाद पाठ के बीच पानी पी सकते हैं?
नियम से नहीं; पर असहनीय हो तो आचमन करके फिर से शुरू करें
यह पूछे जाने पर कि पाठ का संकल्प लेने के बाद क्या पाठ के बीच उठकर पानी ले सकते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं: उनके अनुसार ऐसा नहीं करना चाहिए। पर यदि आपके लिए बिल्कुल असहनीय हो, यदि आप नए हैं, यदि गला पूरी तरह सूख रहा है और बोल पाने की स्थिति नहीं बची, तो थोड़ा पानी पी लीजिए, फिर से आचमन आदि कीजिए, और पाठ नए सिरे से शुरू कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि पाठ का संकल्प लेने के बाद क्या पाठ के बीच उठकर पानी ले सकते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं: उनके अनुसार ऐसा नहीं करना चाहिए। पर यदि आपसे बिल्कुल सहा नहीं जा रहा, यदि आप नए हैं, यदि गला पूरी तरह सूख रहा है और बोल पाने की स्थिति नहीं बची, तो थोड़ा पानी पी लेना चाहिए। फिर से आचमन आदि करके, पाठ दोबारा शुरू करना चाहिए।
क्या देव श्रेणी के साधक में मानसिक स्थिरता होनी चाहिए?
मानसिक स्थिति की स्थिरता आवश्यक है
यह पूछे जाने पर कि क्या देव श्रेणी के साधक में मानसिक स्थिति की स्थिरता की बात अवश्य होनी चाहिए, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल।
यह पूछे जाने पर कि क्या देव श्रेणी के साधक में स्थिर मानसिक स्थिति की बात अवश्य होनी चाहिए, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल।
धन और कुमकुम की वर्षा की सिद्धि कैसे मिलती है?
वसंत विजय महाराज के आयोजनों पर उनका उत्तर
एक श्रोता पूछते हैं कि धन और कुमकुम की वर्षा की सिद्धि कैसे मिलती है — जिससे देखने वाले के घर या जेब में नोट, सिक्के, कुमकुम आदि प्रकट हो जाते हैं — और यह सब कैसे होता है। वक्ता उत्तर देते हैं: वसंत विजय महाराज जी का चैनल देखिए, वे सब करवा देंगे। वे कहते हैं कि राष्ट्र संत वसंत विजय महाराज जी ने पिछली गुरु पूर्णिमा पर कुमकुम की वर्षा, चंदन की सुगंध, और करोड़ों रुपयों की वर्षा करवाई थी। वे प्रश्नकर्ता का नाम लेकर कहते हैं कि आप भी वहाँ मौजूद थे, और मैं भी मौजूद था; पर न आपके यहाँ कुछ हुआ न हमारे साथ कुछ हुआ — शायद हम उच्च कोटि के साधक नहीं हैं, हम दोनों में सुधार की जरूरत है, इसीलिए हमारे साथ नहीं हुआ। वे जोड़ते हैं कि वे जितने लोगों को जानते हैं जो यह कर रहे थे, उनमें से किसी के साथ नहीं हुआ। इसलिए, उनके अनुसार, हम यहीं ठीक हैं, भगवती की सेवा में ठीक हैं; नोटों और कुमकुम की वर्षा हमारे साथ होने वाली नहीं। वे कहते हैं, बेहतर है कि इस तरह की चीजों में पड़ा ही न जाए।
एक श्रोता पूछते हैं कि धन और कुमकुम की वर्षा की सिद्धि कैसे मिलेगी — कि जो भी देखे उसके घर या जेब में नोट, सिक्के, कुमकुम आदि प्रकट हो जाएँ — और यह सब कैसे होता है। वसंत विजय महाराज जी का चैनल देखिए, वक्ता उत्तर देते हैं; वे सब करवा देंगे। राष्ट्र संत वसंत विजय महाराज जी ने पिछली गुरु पूर्णिमा पर कुमकुम की वर्षा, चंदन की सुगंध, करोड़ों रुपयों की वर्षा करवाई थी। आप भी वहाँ मौजूद थे, वे प्रश्नकर्ता का नाम लेकर कहते हैं, और मैं भी मौजूद था; पर न आपके यहाँ कुछ हुआ, न हमारे साथ कुछ हुआ। शायद हम उच्च कोटि के साधक नहीं हैं, और हम दोनों में सुधार की जरूरत है — इसीलिए हमारे साथ नहीं हुआ। हालाँकि, वे जोड़ते हैं, वे जितने भी लोगों को जानते हैं जो यह कर रहे थे, उनमें से किसी के साथ नहीं हुआ। इसलिए उनके अनुसार हम यहीं ठीक हैं, भगवती की सेवा में ठीक हैं; नोटों और कुमकुम की वर्षा हमारे लिए होने वाली नहीं। वे कहते हैं, बेहतर है कि इस तरह की चीजों में न पड़ा जाए।
मणिबंध रेखा पर अलग से एक विशेष वीडियो चाहिए
एक विशेष वीडियो की आवश्यकता होगी
मणिबंध रेखा के बारे में जानकारी देने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि इस पर एक विशेष वीडियो बनाना होगा।
मणिबंध रेखा के बारे में जानकारी देने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि इस पर एक विशेष वीडियो बनाना होगा।
यात्रा से पहले साधक को क्या ध्यान रखना चाहिए?
यज्ञोपवीत के नियम, भोजन और ठहरने की शुद्धता, छुआछूत
यात्रा करने से पहले क्या ध्यान रखें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यदि आप साधक हैं तो इस पर पहले से एक अलग वीडियो बना है कि साथ में क्या चीजें ले जानी चाहिए और क्या करना चाहिए। फिर भी, यदि आप सात्विक ढंग से साधना कर रहे हैं, तो: पहला, यदि यज्ञोपवीत हुआ है तो यज्ञोपवीत से जुड़े नियमों में कोई चूक न हो; शुद्धता का ध्यान रखने के लिए आपकी सारी चीजें अलग होनी चाहिए। दूसरा, आप भोजन कहाँ करते हैं इस पर भी ध्यान देना चाहिए। तीसरा, जहाँ आप आराम करेंगे और सोएँगे उस स्थान की शुद्धता पर ध्यान देना चाहिए। और यह भी ध्यान रखें कि यात्रा में ऐसी कोई चीज साथ न ले जाएँ जिस पर छुआछूत का असर पड़ सकता हो।
यात्रा करने से पहले क्या ध्यान रखें, यह पूछे जाने पर वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: यदि आप साधक हैं, तो इसके लिए पहले से एक अलग वीडियो बना हुआ है कि यदि आप साधना करते हैं तो साथ में क्या चीजें ले जानी चाहिए, और क्या करना चाहिए। फिर भी, यदि आप सात्विक ढंग से साधना कर रहे हैं, तो सबसे पहले — यदि यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। हुआ है, तो यज्ञोपवीत से जुड़े नियमों में कोई चूक न हो। शुद्धता का ध्यान रखने के लिए आपकी सारी चीजें अलग होनी चाहिए। दूसरी बात है: आप भोजन कहाँ करते हैं? इस पर भी आपको ध्यान देना चाहिए। तीसरी बात है: जिस स्थान पर आप आराम करेंगे और सोएँगे — उन स्थानों की शुद्धता पर आपको ध्यान रखना चाहिए। और यात्रा में ऐसी कोई चीज साथ न ले जाएँ जिस पर छुआछूत का असर पड़ सकता हो। यह भी ध्यान रखना चाहिए।
जब पड़ोसी ने किसी के परिवार पर क्रिया करवाई हो तो उसे क्या करना चाहिए?
चालीस दिन का हनुमान चालीसा हवन
एक श्रोता कहते हैं कि पड़ोसी से कुछ झगड़ा हुआ था, पड़ोसी की तांत्रिकों और भगतों से जान-पहचान है, और उसने उनके घर और परिवार पर क्रिया करवा दी है। वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: चालीस दिन हनुमान चालीसा से हवन की विधि चैनल पर दी गई है; करवाइए, कीजिए, लगातार, हो सके तो सुबह-शाम। इसमें दस मिनट लगेंगे, पाँच से दस मिनट। यदि आपका समय ऐसा है, तो सुबह पाँच मिनट लगेंगे — सुबह कीजिए, और फिर रात को जब भी घर पहुँचें तब कीजिए। वे कहते हैं, एक बार करके देखिए। अभी गुप्त नवरात्रि से शुरू कीजिए और सावन पूर्णिमा तक कीजिए — तीस जून से रक्षा बंधन के दिन तक, लगातार सुबह-शाम हनुमान चालीसा से हवन कीजिए। विधियाँ बताई गई हैं; चैत्र नवरात्रि में हनुमान चालीसा से हवन करने की विधि इसी चैनल पर उपलब्ध है। उसे एक बार सुनिए और करके देखिए।
एक श्रोता कहते हैं कि पड़ोसी से कुछ कहासुनी हुई थी, कि पड़ोसी की तांत्रिकों और भगतों से जान-पहचान है, और उसने उनके घर और परिवार पर क्रिया करवा दी है। चालीस दिन हनुमान चालीसा से हवन की विधि चैनल पर दी गई है, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं। करवाइए; कीजिए, लगातार, हो सके तो सुबह-शाम। इसमें दस मिनट लगेंगे, पाँच से दस मिनट लगेंगे। यदि आपका समय ऐसा है, तो सुबह पाँच मिनट लगेंगे — सुबह कीजिए, और फिर रात को, जब भी घर आएँ, तब कीजिए। एक बार करके देखिए। अभी गुप्त नवरात्रि से शुरू कीजिए और सावन पूर्णिमा तक कीजिए। तीस जून से शुरू करके रक्षा बंधन के दिन तक, लगातार सुबह-शाम हनुमान चालीसा से हवन कीजिए। विधियाँ बताई गई हैं; चैत्र नवरात्रि में हनुमान चालीसा से हवन करने की विधि इसी चैनल पर उपलब्ध है। उसे एक बार सुनिए और करके देखिए।
महँगे तांत्रिक प्रयोग के बजाय हनुमान चालीसा हवन की सलाह, क्योंकि इसे कोई भी कर सकता है
हनुमान जी की चालीस दिन की मंडल पूजा
वक्ता कहते हैं कि स्थिति पहले ही बिगड़ चुकी है और अभी आप बहुत कुछ नहीं कर सकते; यदि वे आपको कोई बड़ा तांत्रिक प्रयोग बताएँ, या किसी के पास जाने को कहें, तो हर चीज में पैसा खर्च होगा। सबसे सुलभ चीज है हनुमान चालीसा से हवन करके देखना। लगातार चालीस दिन एक मंडल पूजा है — यानी चालीस दिन केवल हनुमान जी की पूजा कीजिए; मंगलवार और शनिवार को उनके पास जाकर हाजिरी लगाइए; हनुमान जी को भोग आदि चढ़ाइए। वे कहते हैं, उन चालीस दिनों के भीतर स्थिति काफी सुधर जाएगी।
वक्ता कहते हैं कि स्थिति पहले ही खराब हो चुकी है; अभी आप बहुत कुछ नहीं कर सकते। यदि वे आपको बड़े-बड़े तांत्रिक प्रयोग बताएँ, या किसी के पास जाने को कहें, तो इन सब चीजों में पैसा खर्च होगा। सबसे सुलभ चीज है: हनुमान चालीसा से हवन करके देखिए। लगातार चालीस दिन एक मंडल पूजा है — यानी चालीस दिन केवल हनुमान जी की पूजा कीजिए। मंगलवार और शनिवार को उनके पास जाकर हाजिरी लगाइए; हनुमान जी को भोग आदि चढ़ाइए। देखिए — चालीस दिन के भीतर स्थिति काफी सुधर जाएगी।
वैष्णो देवी या मैहर में कपाट बंद होते हैं या नहीं, यह अंबुवाची से अलग विषय है
कपाट बंद होना अलग विषय है
एक श्रोता कहते हैं कि आजकल लोग पैसे के लालच में अंबुवाची पर्व मानते ही नहीं, और उन्होंने कई पुजारियों को समझाया तो वे कहते हैं कि वैष्णो देवी में और मैहर में कपाट बंद नहीं होते। ठीक है, वक्ता उत्तर देते हैं, यह उनकी अपनी सोच है, या वे अपने स्थान के अनुसार कह रहे हैं। कपाट बंद होना अलग विषय है। यदि कपाट बंद नहीं हो रहे, तो ठीक है — वह शक्ति पीठ है। बाकी मानना या न मानना अपने ऊपर है।
एक श्रोता कहते हैं कि आजकल लोग पैसे के लालच में अम्बुबाची पर्व मानते ही नहीं, और उन्होंने कई पुजारियों को समझाया, जो कहते हैं कि वैष्णो देवी में या मैहर में कपाट बंद नहीं होते। ठीक है, वक्ता उत्तर देते हैं — यह उनकी अपनी सोच है, या वे अपने स्थान के अनुसार कह रहे हैं। कपाट बंद होना अलग विषय है। यदि कपाट बंद नहीं हो रहे, तो ठीक है; वह शक्ति पीठ है। बाकी मानना या न मानना अपने ऊपर है।
प्रार्थना में शत्रुओं की शिकायत करने से उल्टा असर क्यों होता है?
केवल अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना कीजिए
वक्ता श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि ऐसी स्थिति में, जब आप अपने शत्रुओं को लेकर कोई शिकायत करते हैं, तो वह असर उल्टा होने लगता है — आप जो भी प्रार्थना करते हैं उससे। ऐसी स्थिति में केवल अपनी रक्षा का प्रयास कीजिए।
ऐसी स्थिति में, जैसा आप लिख रहे हैं, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं — कि असर उल्टा आने लगता है: जब आप अपने शत्रुओं को लेकर कोई शिकायत करते हैं, तो वह असर उल्टा होने लगता है। आप जो भी प्रार्थना करते हैं, उससे। ऐसी स्थिति में केवल अपने रक्षण का प्रयास कीजिए।
धूनी चालीस दिन तक ठीक सुबह छह बजे और शाम छह बजे करनी है
चालीस दिन, ठीक सुबह छह और शाम छह बजे
और अभी जो भी तंत्र काट है, यदि आप बहुत विशेष रूप से समर्थ नहीं हैं, तो जो बताया गया है वह करके देखिए — आपको बहुत ही शीघ्र लाभ मिलने लगेगा। वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात है: यह नियम मान लीजिए कि सुबह छह बजे धूनी हो गई और शाम छह बजे धूनी हो गई। बस इतना चालीस दिन करके देखिए। यह बिल्कुल सटीक सुबह छह और शाम छह बजे, लगातार चालीस दिन करते रहिए। आपका शत्रु कितना भी बड़ा हो, उसने कितना भी किया हो, पर यदि आप घड़ी के हिसाब से पूरे चालीस दिन करें — यदि वह जमीन पर नाक न रगड़े, तो कहिएगा। वे कहते हैं, सटीक करके देखिए।
और अभी जो भी तंत्र काट है — यदि आप बहुत विशेष रूप से समर्थ नहीं हैं, तो उन्होंने जो बताया है वह करके देखिए; आपको बहुत ही शीघ्र लाभ मिलने लगेगा। दूसरी बात: यह नियम मान लीजिए कि सुबह छह बजे धूनीविशेष लकड़ियों व बीजों को जलाकर घर या स्थान से नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा दूर करने हेतु की जाने वाली धूनी। हो गई, और शाम छह बजे धूनी हो गई। बस इतना चालीस दिन करके देखिए। यह बिल्कुल सटीक, सुबह छह बजे और शाम छह बजे, लगातार चालीस दिन तक करते रहिए। आपका शत्रु कितना भी बड़ा हो, उसने कितना भी किया हो — पर यदि आप घड़ी के हिसाब से, पूरे चालीस दिन करें, तो यदि वह जमीन पर नाक न रगड़े, तो आप कहिएगा। पर सटीक करके देखिए, वक्ता कहते हैं।
मसान बहुत प्रकार के होते हैं, और पहले यह तय करना होता है कि कौन सा है
मसान कई प्रकार के होते हैं
मसान शक्ति के बारे में पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि देखना होगा कि यह कौन सी मसान शक्ति है, कौन सा मसान है — मसान बहुत प्रकार के होते हैं।
मसान शक्ति के बारे में पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि देखना होगा कि यह कौन सी मसान शक्ति है, कौन सा मसान है। मसान बहुत प्रकार के होते हैं।
क्या दत्तात्रेय के गणों और नाथ पंथ के सिद्धों की साधनाएँ होती हैं?
दोनों होती हैं, जैसे रुद्रगण साधना होती है
यह पूछे जाने पर कि जैसे रुद्रगण साधना होती है, वैसे क्या गुरु दत्तात्रेय के गणों या नाथ पंथ के सिद्धों की कोई साधना है, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, हाँ, बिल्कुल है। भगवान दत्तात्रेय की भी है, और नाथ पंथ के सिद्धों की भी है।
यह पूछे जाने पर कि जैसे रुद्रगण साधना होती है, वैसे क्या गुरु दत्तात्रेय के गण, नाथ पंथ (नाथ संप्रदाय) के सिद्धों की कोई ऐसी साधना है, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, हाँ, बिल्कुल है। भगवान दत्तात्रेय की भी है; नाथ पंथ के सिद्धों की भी है।
वचन के बाद भी कृपा क्यों नहीं आती?
तब आपके साथ कोई खेल हुआ है
एक श्रोता कहते हैं कि वचन के बाद भी कृपा नहीं आ रही। वक्ता उत्तर देते हैं कि वचन के बाद कृपा न आए, यह लगभग असंभव बात है; तब यहाँ आपके साथ कोई खेल खेला गया है। वे श्रोता का नाम लेकर एक बार अपने गुरु जी से बात करने को कहते हैं।
एक श्रोता कहते हैं कि वचन के बाद भी कृपा नहीं आ रही। वचन के बाद कृपा न आए, यह लगभग असंभव बात है, वक्ता उत्तर देते हैं। तब यहाँ आपके साथ कोई खेल खेला गया है। एक बार अपने गुरु जी से बात कीजिए, वे श्रोता का नाम लेकर कहते हैं।
जाप के लिए बीज मंत्र कैसे चुनना चाहिए?
देखिए कौन सा बीज, और किस उद्देश्य से
वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि बीज मंत्रों में काफी अंतर होते हैं: आप किस बीज का जाप कर रहे हैं, और किस उद्देश्य से कर रहे हैं — यह देखकर करना चाहिए।
वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि बीज मंत्रों में काफी अंतर होते हैं। आप किस बीज (बीज मंत्र) का जाप कर रहे हैं, और किस उद्देश्य से कर रहे हैं — यह देखकर करना चाहिए।
क्या त्रिवाचा सबको मिलता है?
केवल तभी जब आपके भीतर क्षमता आ गई हो
नहीं भैया, वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: त्रिवाचा तभी मिलता है जब आपके भीतर उतना सामर्थ्य आ गया हो। नहीं तो ऐसे ही नहीं मिलता।
नहीं भैया, वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं। त्रिवाचा तभी मिलता है जब आपके भीतर उतना सामर्थ्य आ गया हो। नहीं तो ऐसे ही नहीं मिलता।
क्या बगलामुखी के साथ अलग से लक्ष्मी साधना की जरूरत है?
बगलामुखी महावैष्णवी हैं, महालक्ष्मी का महा स्वरूप
वक्ता पूछते हैं कि बगलामुखी माई के साथ लक्ष्मी साधना करने की आवश्यकता ही क्या पड़ेगी। उन्हीं की मंडार विद्या आदि की दीक्षा ले लीजिए। बगलामुखी साक्षात महावैष्णवी हैं; वे महालक्ष्मी का महा स्वरूप हैं। आपको अलग से लक्ष्मी साधना करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
वक्ता पूछते हैं कि बगलामुखी माई के साथ लक्ष्मी साधना करने की आवश्यकता ही क्या पड़ेगी। उन्हीं की मंडार विद्या आदि की दीक्षा ले लीजिए। बगलामुखी साक्षात महावैष्णवी हैं; वे महालक्ष्मी का महा स्वरूप हैं। आपको अलग से लक्ष्मी साधना करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
तंत्र-मंत्र और शाम के डर से परेशान स्त्री को क्या करना चाहिए?
पास के किसी योग्य तांत्रिक से घर की जाँच करवाइए
एक श्रोता लिखती हैं कि वे तंत्र-मंत्र से परेशान रहती हैं, पूजा करती हैं पर स्थायी उपाय चाहती हैं, और शाम होते ही घर में डर लगने लगता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि ऐसी स्थिति में आपको कम से कम किसी एक योग्य तांत्रिक से, पास के किसी जानकार व्यक्ति से मिलना चाहिए, और पहले घर को ठीक करवाइए, उसकी जाँच करवाइए, दिखवाइए कि घर की स्थिति क्या है, और उसी के अनुसार निवारण करवाइए। वे कहते हैं कि उपाय बताने से कुछ नहीं होगा: आप स्थायी उपाय माँग रही हैं, तो स्थायी रूप से आपको दिखवाना होगा और वे चीजें करवानी होंगी।
एक श्रोता लिखती हैं कि वे तंत्र-मंत्र से परेशान रहती हैं, कि वे पूजा करती हैं पर स्थायी उपाय चाहती हैं, और शाम होते ही घर में डर लगने लगता है। ऐसी स्थिति में, वक्ता उत्तर देते हैं, आपको कम से कम किसी एक योग्य तांत्रिक से, पास के किसी जानकार व्यक्ति से मिलना चाहिए, और पहले घर को ठीक करवाइए — दिखवाइए, देखिए कि घर में स्थिति क्या है, और उसी के अनुसार निवारण करवाइए। उपाय बताने से कुछ नहीं होगा। आप स्थायी उपाय माँग रही हैं, तो स्थायी रूप से आपको दिखवाना होगा और वे चीजें करवानी होंगी।
गोरखनाथ और दत्तात्रेय की आगे की शाबर तंत्र साधनाएँ जल्द आएँगी
गोरखनाथ और दत्तात्रेय की साधनाएँ आएँगी
शाबर तंत्र की आगे की साधनाएँ, जैसे गुरु गोरखनाथ जी और गुरु दत्तात्रेय जी की, अपलोड करने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि वे जल्द ही करेंगे।
सबर मंत्र तंत्र की आगे की साधनाएँ — जैसे गुरु गोरखनाथ जी की और गुरु दत्तात्रेय जी की — अपलोड करने को कहे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि वे जल्द ही करेंगे।
भवानी का प्रत्यक्षीकरण कैसे होता है?
जीवन उन्हें समर्पित करके उन्हीं पर छोड़ दीजिए
भवानी का प्रत्यक्षीकरण कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: अपना जीवन भवानी को समर्पित कीजिए, और उन्हीं पर छोड़ दीजिए।
भवानी का प्रत्यक्षीकरण कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं। अपना जीवन भवानी को समर्पित कीजिए, और उन्हीं पर छोड़ दीजिए।
काली के मंत्रों के जाप से कोई अनुभव न हो तो क्या करें?
अनुभवों में मत उलझिए
एक श्रोता कहते हैं कि वे माँ काली के मंत्रों का जाप करते हैं पर कोई अनुभव नहीं हो रहा। वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं कि अनुभव में मत उलझिए; अनुभव की परीक्षा करेंगे तो कठिनाई में पड़ेंगे। अनुभव में क्यों उलझना — जीवन अनुभव के लिए नहीं मिला। अनुभव नहीं हो रहा: तो जिनके लिए जाप कर रहे हैं उनके लिए जाप कीजिए। वे अनुभव नहीं दे रहीं, बहुत अच्छा कर रही हैं। जो अनुभवों में उलझते हैं वे वहीं रह जाते हैं। फिर अनुभव न हो तो रोएँगे कि नहीं हो रहा, और हो जाए तो कहेंगे कि अब हो गया, फलाना करो। वे कहते हैं, इसीलिए अनुभवों में मत उलझिए।
एक श्रोता कहते हैं कि वे माँ काली के मंत्रों का जाप करते हैं पर कोई अनुभव नहीं हो रहा। अनुभव में मत उलझिए, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं। यदि आप अनुभव की परीक्षा करेंगे, तो कठिनाई में पड़ेंगे। अनुभव में क्यों उलझना? जीवन अनुभव के लिए नहीं मिला। अनुभव नहीं हो रहा — तो जिनके लिए जाप कर रहे हैं, उनके लिए जाप कीजिए। वे अनुभव नहीं दे रहीं: बहुत अच्छा कर रही हैं। जो अनुभवों में उलझते हैं, वे वहीं रह जाते हैं। फिर अनुभव न हो तो रोएँगे कि अनुभव नहीं हो रहा; और हो जाए तो कहेंगे कि अब हो गया, फलाना करो। इसीलिए, वक्ता कहते हैं, अनुभवों में मत उलझिए।
किस कुल भैरव की पूजा करनी है?
श्रोता के कुल भैरव के रूप में नीलकंठ भैरव का नाम
कुल भैरव जी की साधना और अनुष्ठान कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि नीलकंठ भैरव उनके कुल भैरव हैं।
कुल भैरव जी की साधना और अनुष्ठान कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: नीलकंठ भैरव आपके कुल भैरव हैं।
मंत्र संपुटन एक पूरा विज्ञान है और कभी स्वतंत्र रूप से नहीं रचा जाता
मंत्र संपुटन एक पूरा विज्ञान है और कभी स्वतंत्र रूप से नहीं किया जाता
एक श्रोता अपना लिखा एक संपुटित मंत्र भेजते हैं। वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं कि इस विषय पर उन्हें कोई जानकारी नहीं है और इसलिए वे क्षमा माँगते हैं। वे अपनी ओर से संपुटित मंत्र नहीं बना सकते, न श्रोता को बता सकते हैं कि यह सही है; उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं है, न वे इस तरह मंत्रों का संपुट कर सकते हैं। वे कहते हैं, मंत्र संपुटन एक पूरा विज्ञान है, और यह कभी स्वतंत्र रूप से नहीं किया जाता।
एक श्रोता अपना लिखा एक मंत्र संपुटित रूप में भेजते हैं। इस बारे में, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं, उन्हें कोई जानकारी नहीं है, और इसलिए वे क्षमा माँगते हैं। इस तरह वे अपनी ओर से संपुटित मंत्र आदि नहीं रच सकते, न आपको बता सकते हैं कि यह सही है। उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं है, न वे इस तरह मंत्रों का संपुट कर सकते हैं। मंत्र संपुटन एक पूरा विज्ञान है, और यह कभी स्वतंत्र रूप से नहीं किया जाता।
क्या घर के किसी नास्तिक को आस्तिक बनाया जा सकता है?
यह उसके मन के बदलाव और प्रारब्ध पर निर्भर है
वक्ता कहते हैं कि यदि घर में कोई नास्तिक है, तो वह आस्तिक बने, यह कभी आप पर और मुझ पर निर्भर नहीं करता। जब तक उसके अपने मन में बदलाव नहीं आता यह संभव नहीं, और जब तक प्रारब्ध में लिखा है कि वह नहीं बदलेगा, तब तक वह नहीं बदलेगा; उसे अपना भोगना होगा, और उसके बाद ही होगा। वे कहते हैं, देखिए: जो बहुत अच्छे शिक्षक होते हैं — उनका बेटा सबसे बिगड़ा निकलता है, एक नंबर का लंपट। इसके पीछे यही कारण है।
वक्ता कहते हैं कि यदि घर में कोई नास्तिक है, तो वह आस्तिक बने, यह कभी आप पर और मुझ पर निर्भर नहीं करता। जब तक उसके अपने मन में बदलाव नहीं आता, तब तक यह संभव नहीं; और जब तक प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। में लिखा है कि वह नहीं बदलेगा, तब तक वे नहीं बदलेंगे। उन्हें अपना भोगना होगा, और उसके बाद ही होगा। देखिए, वक्ता कहते हैं — जो बहुत अच्छे शिक्षक होते हैं, उनका बेटा सबसे बिगड़ा निकलता है। वह एक नंबर का लंपट निकलता है। इसके पीछे यही कारण है।
महालक्ष्मी योगिनी साधना से पहले स्वप्न में देवी के चरण दिखने का क्या अर्थ है?
बहुत अच्छा स्वप्न — तुरंत शुरू कीजिए
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने महालक्ष्मी योगिनी साधना का वीडियो देखा, मन में साधना करने की इच्छा जागी, और स्वप्न में उन्होंने देवी के चरण देखे और स्वप्न में कह रहे थे कि लक्ष्मी जी आई हैं। वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं कि यह बहुत अच्छा स्वप्न है — तुरंत शुरू कीजिए। भगवती महालक्ष्मी योगिनी की साधना, जिनसे भी और जहाँ से भी आप देख रहे हैं और कर रहे हैं, बहुत शुभ है; बिल्कुल कीजिए।
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने महालक्ष्मी योगिनी साधना का वीडियो देखा, मन में साधना करने की इच्छा जागी, और स्वप्न में उन्होंने देवी के चरण देखे और स्वप्न में कह रहे थे कि लक्ष्मी जी आई हैं। यह बहुत अच्छा स्वप्न है — तुरंत शुरू कीजिए, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं। भगवती महालक्ष्मी योगिनी की साधना, जिनसे भी और जहाँ से भी आप देख रहे हैं और कर रहे हैं, बहुत शुभ है। बिल्कुल कीजिए।
क्या संपुट और संपुटित पाठ एक ही हैं?
संपुट और संपुटित पाठ एक हैं
संपुटी पाठ क्या है और क्या संपुट और संपुटी पाठ एक ही हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि उन्हें लगता है प्रश्नकर्ता का मतलब संपुट पाठ से है, और वे संपुटित पाठ लिखना चाह रहे हैं। वे कहते हैं, संपुट और संपुटित पाठ एक ही हैं।
संपुटी पाठ क्या है, और क्या संपुट और संपुटी पाठ एक ही हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: संपुट और संपुटी पाठ — संपुटी पाठ से, उन्हें लगता है, आप संपुट पाठ की ही बात कर रहे हैं। आप संपुटित पाठ लिखना चाह रहे हैं। संपुट और संपुटित पाठ एक ही हैं।
मन को पूरी तरह एकाग्र कैसे करें?
आप किस परिवार में जन्मे, और क्या आपको साधना की ओर ले जाता है
मन को पूरी तरह एकाग्र कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता श्रोता का नाम लेकर यह बात ध्यान रखने को कहते हैं: हम जिस परिवार में जन्म लेते हैं, वह मायने रखता है। जब कोई व्यक्ति किसी परिवार में जन्म लेकर साधना करने जाता है — या तो उसके अपने मन ने उससे करवाया, इसलिए वह साधना करने जा रहा है; या उसकी परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि वह यह कहते हुए साधना की ओर बढ़ रहा है कि मेरे जीवन की परेशानियों से मुझे मुक्ति मिले।
मन को पूरी तरह एकाग्र कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: हम आपको एक बात बताएँगे। हम जिस भी परिवार में जन्म लेते हैं, यह बात ध्यान रखिए। जब कोई व्यक्ति किसी परिवार में जन्म लेता है, और जब वह साधना करने जाता है — एक, उसके अपने मन ने उससे करवाया, इसलिए वह साधना करने जा रहा है। दूसरा, उसकी परिस्थितियाँ ऐसी होंगी कि वह यह कहते हुए साधना की ओर बढ़ रहा है कि मेरे जीवन में जो परेशानियाँ हैं, उनसे मुझे मुक्ति मिले।
साधना शुरू करने पर किसका प्रारब्ध भोगा जाता है?
संकल्प के साथ परिवार का प्रारब्ध आता है
वक्ता कहते हैं कि यह पूरे परिवार पर निर्भर है: जब आपने साधना करनी शुरू की है, तो वहाँ केवल आपका नहीं है। वहाँ आपके परिवार के लोगों का प्रारब्ध भी कहीं न कहीं भोगना होता है — क्योंकि आप कभी केवल अपने लिए संकल्प नहीं लेते; आप पूरे परिवार के लिए कर रहे हैं: कि मेरे माता-पिता ठीक हो जाएँ, मेरी पत्नी ठीक हो जाए, मेरा भाई ठीक हो जाए, मेरी बहन ठीक हो जाए, उसकी शादी हो जाए। इसलिए आप उनके बदले में भी करेंगे।
और यह पूरे परिवार पर निर्भर है, वक्ता कहते हैं। जब आपने साधना करनी शुरू की है, तो वहाँ केवल आपका नहीं है। वहाँ आपके परिवार के लोगों का प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। भी कहीं न कहीं भोगना होता है। क्योंकि आप कभी केवल अपने लिए संकल्प नहीं लेते ना — आप पूरे परिवार के लिए कर रहे हैं: कि मेरे माता-पिता ठीक हो जाएँ, कि मेरी पत्नी ठीक हो जाए, कि मेरा भाई ठीक हो जाए, कि मेरी बहन ठीक हो जाए, कि उसकी शादी हो जाए। इसलिए आप उनके बदले में भी करेंगे।
क्यों कहा जाता है कि दूसरों के लिए ऐसी साधनात्मक क्रियाएँ केवल ब्राह्मण को करनी चाहिए?
क्योंकि ब्राह्मण शुरू से प्रशिक्षित होता है और त्रिकाल गायत्री करता है
वक्ता पूछते हैं कि क्यों कहा जाता है कि इस तरह की साधनात्मक क्रियाएँ केवल ब्राह्मण को करनी चाहिए, कि किसी के लिए मंत्र जाप और पूजा-पाठ केवल वही करे। क्योंकि आप करना चाहते हैं — बिल्कुल, आप भी कीजिए, किसी को मना नहीं है — पर आप त्रिकाल गायत्री नहीं करते। ब्राह्मण को शुरू से ही सब सिखाया जाता है: ब्राह्मणों में आठ-दस साल का बच्चा वैदिक पाठ कर रहा होता है। किसी और को देखिए — कोई जल्दी पाठ नहीं सीखता। यदि वे भी इसी तरह सीखें और करें, तो वे भी कर सकते हैं।
वक्ता पूछते हैं कि क्यों कहा जाता है कि इस तरह की साधनात्मक क्रियाएँ केवल ब्राह्मण को करनी चाहिए, कि किसी के लिए मंत्र जाप और पूजा-पाठ केवल वही करे। क्योंकि आप करना चाहते हैं — बिल्कुल, आप भी कीजिए; किसी को भी मना नहीं है। पर आप त्रिकाल गायत्री मंत्र नहीं करते। ब्राह्मण को शुरू से ही सब सिखाया जाता है। ब्राह्मणों में आठ-दस साल का बच्चा वैदिक पाठ कर रहा होता है। किसी और को देखिए: कोई जल्दी पाठ नहीं सीखता। यदि वे भी इसी तरह सीखें और करें, तो वे भी कर सकते हैं।
जब कोई ब्राह्मण किसी और के लिए जाप का संकल्प लेता है तो क्या स्थानांतरित होता है?
आप पर की गई क्रिया और ग्रह-नक्षत्र के दोष
क्योंकि जब वे यह संकल्प लेते हैं कि मैं फलाने के जीवन में आई विपत्ति और दुर्भाग्य के निवारण के लिए इस मंत्र के सवा लाख जाप का संकल्प लेता हूँ, तो ऐसी स्थिति में यह होता है: आप पर जो भी क्रिया की गई है, आपके जो भी ग्रह-नक्षत्र दोष आदि हैं। वक्ता जोड़ते हैं कि जिन्हें ज्ञान है वे यह भी देखेंगे — यदि आप किसी ग्रह का उतारा देंगे, तो वे दान नहीं लेंगे; ज्ञान रखने वाले ऐसे बहुत से ब्राह्मण ग्रहों का दान बिल्कुल नहीं लेते।
क्योंकि जब वे संकल्प लेते हैं — कि मैं फलाने के जीवन में आई विपत्ति और दुर्भाग्य के निवारण के लिए इस मंत्र के सवा लाख जाप का संकल्प लेता हूँ — तो ऐसी स्थिति में होता यह है कि आप पर जो भी क्रिया की गई है, आपके जो भी ग्रह-नक्षत्र दोष आदि हैं, वे आ जाते हैं। आप यह भी देखेंगे, वक्ता कहते हैं: जिन्हें ज्ञान है — यदि आप किसी ग्रह का उतारा देंगे, तो वे दान नहीं लेंगे। ज्ञान रखने वाले ऐसे बहुत से ब्राह्मण ग्रहों का दान बिल्कुल नहीं लेते।
कुछ अच्छे साधक दूसरों के लिए पूजा-पाठ करने से मना क्यों करते हैं?
और प्रारब्ध न भोगना चाहना
वक्ता पूछते हैं कि वे क्यों नहीं लेते। इसमें भी दो तरह के हैं: जो बहुत पूजा-पाठ करते हैं वे लेंगे — जिन पर उनके इष्ट की कृपा है, जिन्हें अनुभूति है। पर बहुत से ऐसे हैं जो अच्छे साधक हैं और फिर भी नहीं लेते, क्योंकि वे कहते हैं: मैं और प्रारब्ध नहीं भोगना चाहता। और वे किसी के लिए पूजा-पाठ भी नहीं करवाते। वे कहते हैं: मुझे ब्राह्मण जीवन मिला है, मुझे अपना सब करके आगे, आगे बढ़ने दो।
वक्ता पूछते हैं कि वे क्यों नहीं लेते। इसमें भी दो तरह के हैं: जो बहुत पूजा-पाठ कर रहे होंगे, वे लेंगे — जिन पर उनके इष्ट की कृपा है, जिन्हें अनुभूति है। बहुत से ऐसे हैं जो अच्छे साधक हैं और फिर भी नहीं लेते, क्योंकि वे कहते हैं: मैं और प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। नहीं भोगना चाहता। और वे किसी के लिए पूजा-पाठ भी नहीं करवाते। वे कहते हैं: मुझे ब्राह्मण जीवन मिला है; मुझे अपना सब करके आगे, आगे बढ़ने दो।
अपना जाप किए बिना दूसरों के लिए जाप करने वाले के लिए क्या खतरा है?
उनका प्रारब्ध आपके जीवन पर पड़ता है
वक्ता कहते हैं कि जब आप किसी और के लिए पूजा-पाठ और जाप कर रहे हैं, तो कहीं न कहीं उनका जो भी प्रारब्ध है, उसका असर आपके जीवन पर पड़ता है। और जब आप अच्छे साधक नहीं होंगे, त्रिकाल गायत्री नहीं कर रहे होंगे, अपने लिए कोई पूजा-पाठ नहीं कर रहे होंगे, अनुष्ठान आदि नहीं कर रहे होंगे, तो आपके जीवन में भी विपत्तियाँ आएँगी।
पर जब आप किसी और के लिए पूजा-पाठ और जाप कर रहे हैं, तो कहीं न कहीं उनका जो भी प्रारब्ध है, उसका असर आपके जीवन पर पड़ता है। और जब आप अच्छे साधक नहीं होंगे, जब आप त्रिकाल गायत्री नहीं कर रहे होंगे, जब आप अपने लिए कोई पूजा-पाठ नहीं कर रहे होंगे, जब आप अनुष्ठान आदि नहीं कर रहे होंगे — तो आपके जीवन में भी विपत्तियाँ आएँगी।
पैसे लेकर किए जाने वाले अनुष्ठान का ढर्रा क्या है?
दस हजार के लिए सात दिन का जाप, और उसके बाद कुछ नहीं
वक्ता कहते हैं कि अब जब आपको कोई अनुष्ठान मिला — कि हाँ, ठीक है, आपको दस हजार रुपये मिल रहे हैं और आप सात दिन जाप करेंगे — तो आपने बस वही सात दिन उनके लिए जाप किया। उसके बाद आपका पूजा-पाठ से कोई लेना-देना नहीं। तब कठिनाई होती है। वे कहते हैं, सामान्यतः लोग बस यही करते हैं।
अब जब आपको कोई अनुष्ठान मिला — कि हाँ, ठीक है, आपको दस हजार रुपये मिल रहे हैं, और आप सात दिन जाप करेंगे — तो आपने बस वही सात दिन उनके लिए जाप किया। उसके बाद आपका पूजा-पाठ से कोई लेना-देना ही नहीं। तब कठिनाई होती है। सामान्यतः लोग बस यही करते हैं।
सबका बोझ अपने ऊपर लेने के बाद कष्ट जल्दी क्यों नहीं हटता?
हजार किलो का बोझ एक-एक किलो करके लौटाना
जब जीवन में विपत्तियाँ आती हैं — किसी की बहन को परेशानी, किसी के भाई को, किसी के माता-पिता को — तो वे जाकर उस तरह पूजा-पाठ शुरू कर देते हैं। तो भाई, अब आपने सबका अपने ऊपर ले लिया, तो कष्ट कैसे मिटेगा? अब समय लगेगा। आपने पहले से हजार किलो वजन का बोझ तैयार रखा है, कर्मों का बोझ। अब यहाँ आप उसे एक-एक किलो करके लौटा रहे हैं — तो यह जल्दबाजी क्यों? इसे आराम से काटना होगा; चलने दीजिए, और साथ में प्रयास भी करते रहिए।
जब जीवन में विपत्तियाँ आती हैं — किसी की बहन को परेशानी, किसी के भाई को, किसी के माता-पिता को — तो वे जाकर उस तरह पूजा-पाठ शुरू कर देते हैं। तो भाई, अब आपने सबका अपने ऊपर ले लिया, तो कष्ट कैसे मिटेगा? अब समय लगेगा। आपने पहले से हजार किलो वजन का बोझ तैयार रखा है; यह कर्मों का बोझ है। अब यहाँ आप उसे एक-एक किलो करके लौटा रहे हैं — तो इतनी जल्दबाजी क्यों? इसे आराम से काटना होगा। चलने दीजिए, और साथ में प्रयास भी करते रहिए।
स्तोत्र और स्तुति के पाठ से क्या मिलता है?
बुद्धि निर्मल होती है और ज्ञान आता है
वक्ता कहते हैं कि स्तोत्र और स्तुति आदि के पाठ से बुद्धि निर्मल होती है। अपने इष्ट से जुड़े ग्रंथों के पाठ से आपको बहुत सी चीजों का ज्ञान मिलता है; चीजें समझ आने लगती हैं।
स्तोत्र और स्तुति आदि के पाठ से बुद्धि निर्मल होती है, वक्ता कहते हैं। अपने इष्ट देवता से जुड़े ग्रंथों के पाठ से आपको बहुत सी चीजों का ज्ञान होने लगता है; चीजें समझ आने लगती हैं।
किस देवता के जीवन में कोई कष्ट नहीं आया?
सदाशिव की लीलाओं में भी कष्ट है
वक्ता पूछते हैं कि भगवान सदाशिव ने जो लीलाएँ कीं, क्या उनके जीवन में कष्ट नहीं आया? ऐसे कौन से देवता हैं जिनके जीवन में कभी कष्ट नहीं दिखाया गया? जितनी भी पौराणिक कथाएँ हैं, उनमें से वे श्रोताओं से किसी ऐसे देवता का नाम कमेंट करने को कहते हैं जिन्हें कभी कष्ट आया ही न हो।
वक्ता पूछते हैं कि भगवान सदाशिव ने जो लीला की, क्या उनके जीवन में कष्ट नहीं आया? वे कौन से देवता हैं जिनके जीवन में कभी कष्ट नहीं दिखाया गया? जितनी भी पौराणिक कथाएँ हैं — मुझे किसी ऐसे देवता का नाम कमेंट कीजिए, वे कहते हैं, जिन्हें कभी कष्ट आया ही न हो।
अशोक सुंदरी और उनके पति की कथा क्या है?
भगवती का शोक दूर करने से नाम पड़ा; पति को अजगर होने का शाप
वक्ता कहते हैं कि अशोक सुंदरी, जिनके बारे में यह बात आई: जब भगवती ने उन्हें कल्पवृक्ष से माँगा, तो उनका नाम अशोक सुंदरी इसीलिए रखा गया क्योंकि उन्होंने भगवती का शोक दूर किया था। और उन्हीं अशोक सुंदरी के जो पति थे, उन्हें अगस्त्य ऋषि ने शाप देकर अजगर बना दिया। आज भी इंडोनेशिया या कंबोडिया में एक स्थान है जहाँ इसकी बात कही जाती है।
अशोक सुंदरी, जिनके बारे में यह बात उठी, वक्ता कहते हैं: जब भगवती ने उन्हें कल्पवृक्ष से माँगा, तो उनका नाम इसी कारण अशोक सुंदरी रखा गया — क्योंकि उन्होंने भगवती के शोक का निवारण किया था। और उन्हीं अशोक सुंदरी के जो पति थे — अगस्त्य ऋषि ने उन्हें शाप देकर अजगर बना दिया। आज भी, वे कहते हैं, इंडोनेशिया या कंबोडिया में एक स्थान है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह वही है।
देवताओं ने कष्ट भोगा ही क्यों?
यह लीला इसलिए रची गई कि हम भी सीखें कि प्रारब्ध से भाग नहीं सकते
वक्ता कहते हैं कि इंद्र बन जाने पर भी उन्हें अपनी गलती के कारण शाप मिला। तो बताइए — जो भगवान सदाशिव के दामाद हैं, उन्हें भी शाप मिला। किसके जीवन में कष्ट नहीं है? जब देवताओं के जीवन में कष्ट रहा है, जिन्होंने अपना प्रारब्ध रचा और भोगा और आपके सामने रखा, ताकि आप देखें कि कर्म के कारण यह चीज भोगनी होगी — तो आप और मैं कौन हैं? वे कहते हैं, देव शक्तियों ने यह लीला इसीलिए रची: ताकि हम भी उनसे सीखें कि हाँ, हमें भी भोगना होगा, हम भाग नहीं सकते। इसलिए थोड़ा धैर्य रखकर इन चीजों को पार करना है।
इंद्र बन जाने पर भी, वक्ता कहते हैं, उन्हें अपनी गलती के कारण शाप मिला। तो बताइए — जो भगवान सदाशिव के दामाद हैं, उन्हें भी शाप मिला। किसके जीवन में कष्ट नहीं है? जब देवताओं के जीवन में कष्ट रहा है — जिन्होंने अपना प्रारब्ध रचा और भोगा और आपके सामने रखा, कि देखो, कर्म के कारण यह चीज भोगनी होगी — तो आप और मैं कौन हैं? यह लीला देव शक्तियों ने क्यों रची? ताकि हम भी उनसे सीखें कि हाँ, हमें भी भोगना होगा; हम भाग नहीं सकते। इसलिए थोड़ा धैर्य रखकर इन चीजों को पार करना है। जो हो गया सो हो गया; अब जब कोई कष्ट में पड़ता है, तो बुद्धि खुलती है कि यह चीज हुई है।
वे कोई जिन्न नहीं रखते; एक और यूट्यूबर लाखों में बहुत डरावने जिन्न बाँटता है
उनके पास कोई नहीं; एक और यूट्यूबर लाखों में बाँटता है
एक श्रोता उनसे एक जिन्न ट्रांसफर करने को कहते हैं, उपहार में देने के लिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि जिन्न उनके पास है ही नहीं। उसके लिए, वे कहते हैं, एक और यूट्यूबर है जो बहुत डरावने जिन्न बाँटता है; सबको मिलकर उससे निवेदन करना होगा, क्योंकि पैसा इतना नहीं लगेगा — वे लाखों रुपये लेते हैं। तो मिलकर एक जिन्न ट्रांसफर करवा लीजिए। और फिर, वे पूछते हैं, आप शादी में जिन्न उपहार में देंगे, और जब पत्नी जिन्न लेकर भाग जाएगी, तब क्या करेंगे? आप दोस्ती निभा रहे हैं या दुश्मनी?
एक श्रोता उनसे एक जिन्न ट्रांसफर करने को कहते हैं, यह कहते हुए कि उसे उपहार में देना है। जिन्न तो हमारे पास है ही नहीं, वक्ता उत्तर देते हैं। उसके लिए एक और यूट्यूबर है, जो बहुत डरावने जिन्न बाँटता है। सबको मिलकर उससे निवेदन करना होगा — पैसा इतना नहीं लगेगा; वे लाखों रुपये लेते हैं। तो मिलकर एक जिन्न ट्रांसफर करवा लीजिए। और अब आप शादी में जिन्न उपहार में देंगे — और जब उसकी पत्नी जिन्न लेकर भाग जाएगी, तब क्या करेंगे? आप दोस्ती निभा रहे हैं, या दुश्मनी?
बिना गुरु वाले बिल्कुल नए व्यक्ति को कहाँ से शुरू करना चाहिए?
मंत्रों से पहले, जिस देवता में आस्था है उनके पुराण पढ़िए
एक श्रोता कहते हैं कि वे साधना करना चाहते हैं पर बिल्कुल नए हैं, और पूछते हैं कि कहाँ, कैसे और कब करें। वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: यदि आपके कोई गुरु नहीं हैं और आपके पास कुछ भी नहीं है, तो मंत्र पाठ से भी पहले वे कहेंगे कि पुराणों का पाठ कीजिए — जिस भी शक्ति में आपकी आस्था है, उनसे जुड़े पुराण पढ़ना शुरू कीजिए। यदि भगवान श्री कृष्ण में आपकी बहुत आस्था है, तो गीता के अठारह पाठ हैं — रोज एक पाठ करके अठारह दिन में एक बार पूरा कीजिए। वे कहते हैं, इस तरह शुरू कीजिए; उसके बाद फिर मंत्रों पर जाइए।
एक श्रोता कहते हैं कि वे साधना करना चाहते हैं पर बिल्कुल नए हैं, और पूछते हैं कि कहाँ से, कैसे और कब करना चाहिए। सबसे पहले आपको यह करना चाहिए, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: यदि आपके कोई गुरु नहीं हैं, यदि आपके पास कुछ भी नहीं है — तो मंत्र पाठ से भी पहले हम कहेंगे कि आप पुराणों का पाठ कीजिए। जिस भी शक्ति में आपकी आस्था है, उनसे जुड़े पुराण पढ़ना शुरू कीजिए। यदि भगवान श्री कृष्ण में आपकी बहुत आस्था है, तो गीता के अठारह पाठ हैं — रोज एक पाठ करके अठारह दिन में एक बार पूरा कीजिए। इस तरह शुरू कीजिए। उसके बाद फिर मंत्रों पर जाइए।
फोटो या मूर्ति न होने पर देवी की पूजा किस रूप में की जा सकती है?
सुपारी रूप में, जैसे गणेश जी की पूजा होती है
यह पूछे जाने पर कि जैसे हम गणेश जी की पूजा सुपारी रूप में करते हैं, वैसे फोटो या मूर्ति न होने पर देवी की पूजा किस रूप में करें, वक्ता उत्तर देते हैं: यदि आप प्रतीकात्मक रूप में करना चाहते हैं, तो सुपारी के रूप में सभी शक्तियाँ पूजित हो जाती हैं।
यह पूछे जाने पर कि जैसे हम सुपारी रूप में गणेश जी की पूजा करते हैं, वैसे फोटो या मूर्ति न होने पर देवी की पूजा किस रूप में करें — वक्ता उत्तर देते हैं: यदि आप प्रतीकात्मक रूप में करना चाहते हैं, तो सुपारी के रूप में सभी शक्तियाँ पूजित हो जाती हैं।
शाम होते ही शुरू होने वाले डर के बारे में क्या करना चाहिए?
घर पर होम हवन और क्षेत्रपाल निकारी
फिर से यह पूछे जाने पर कि शाम होते ही डर क्यों शुरू होता है, इसका कारण क्या हो सकता है, और रोज पूजा करने पर भी छुटकारा क्यों नहीं मिलता, वक्ता उत्तर देते हैं: एक बार किसी जानकार व्यक्ति को दिखाइए; घर पर अच्छे से होम हवन करवाइए; क्षेत्रपाल निकारी करवाइए। जब समस्या का पता चल जाए, तो सही ढंग से उसका उपचार करवाइए।
यह पूछे जाने पर कि शाम होते ही डर शुरू होने का कारण क्या हो सकता है, जबकि रोज पूजा की जाती है और फिर भी उससे छुटकारा नहीं मिलता, वक्ता उत्तर देते हैं: एक बार किसी जानकार व्यक्ति को दिखाइए। घर पर अच्छे से होम हवन करवाइए। क्षेत्रपाल की निकारी करवाइए — क्षेत्रपाल निकारी। जब समस्या का पता चल जाए, तो सही ढंग से उसका उपचार करवाइए।
जब परिवार के लोग बिना दीक्षा के झाड़-फूँक करें तो क्या किया जा सकता है?
झाड़-फूँक करने वाले पर पड़ने वाले नुकसान
एक श्रोता कहते हैं कि उनके घर में बिना दीक्षा और बिना योग्यता के रिश्तेदार मनमाने ढंग से झाड़-फूँक कर रहे हैं, कोई उनकी नहीं सुनता, वे कष्ट भोग रहे हैं और बहुत लाचार महसूस कर रहे हैं। वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं कि यह सबसे बुरी चीज है। वे समझते हैं कि वे क्या कह रहे हैं: कि घर के लोग झाड़-फूँक कर रहे हैं और उनमें से कोई दीक्षित नहीं है — और यदि घर में उस तरह की कोई शक्ति स्थापित है जिसके माध्यम से यह काम हो रहा है। वे कहते हैं कि भगतवाल ग्रामीण नाम की एक प्लेलिस्ट है, जिसमें उन्होंने हर चीज समझाई है: झाड़-फूँक करने से क्या परेशानियाँ आती हैं; झाड़-फूँक करने वाले पर क्या पड़ता है और उसके परिवार पर क्या पड़ता है; कैसे बचें। वे कहते हैं, इसमें आप कुछ नहीं कर सकते। यदि आपके घर के लोग नहीं सुन रहे, तो अपने इष्ट और आराध्य से प्रार्थना कीजिए कि उन्हें सद्बुद्धि मिले।
एक श्रोता कहते हैं कि उनके घर में बिना दीक्षा और बिना योग्यता के रिश्तेदारों द्वारा मनमाने ढंग से झाड़-फूँक की जा रही है; कि कोई उनकी नहीं सुनता; कि वे कष्ट भोग रहे हैं और बहुत लाचार महसूस करते हैं। यह चीज, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं, सबसे बुरी चीज है। वे समझते हैं कि वे क्या कह रहे हैं — कि घर के लोग झाड़-फूँक कर रहे हैं और कोई दीक्षित नहीं है। और यदि घर में इस तरह की कोई शक्ति स्थापित है, जिसके माध्यम से इस तरह का काम चल रहा है। भगतवाल ग्रामीण नाम की एक प्लेलिस्ट है, जिसमें उन्होंने एक-एक चीज समझाई है: जब आप झाड़-फूँक करते हैं, तो क्या परेशानियाँ आती हैं। झाड़-फूँक करने वाले पर क्या पड़ता है, और उसके परिवार में क्या पड़ता है। कैसे बचना है। इसमें, वे कहते हैं, आप कुछ नहीं कर सकते। यदि आपके घर के लोग नहीं सुन रहे, तो अपने इष्ट और आराध्य से प्रार्थना कीजिए कि उन्हें सद्बुद्धि मिले।
झाड़-फूँक में फँसे लोगों का उन्होंने क्या हाल होते देखा है?
एक तरह का नशा जो केवल दंड मिलने पर उतरता है
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने यह देखा है — यह उनका अपना निजी जीवन अनुभव है — कि जो लोग इसमें फँस जाते हैं, वे तब तक नहीं समझते जब तक उन्हें सही ढंग से दंड न मिले, या दूसरे शब्दों में, जब तक परिवार पूरी तरह बिखर न जाए। यह एक तरह का नशा है।
पर मैंने यह देखा है, वक्ता कहते हैं — यह मेरा अपना निजी जीवन अनुभव है — कि जो लोग इसमें फँस जाते हैं, जब तक उन्हें सही ढंग से दंड नहीं मिलता, या, कहा जाए तो, जब तक परिवार पूरी तरह बिखर नहीं जाता, तब तक उन्हें समझ नहीं आता। यह एक तरह का नशा है।
नवार्ण मंत्र का विनियोग और न्यास कैसे करना चाहिए?
बोलकर
नवार्ण मंत्र का विनियोग और न्यास आदि किस तरह करना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: बोलकर कीजिए।
नवार्ण मंत्र का विनियोग, न्यास आदि किस तरह करना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: बोलकर कीजिए।
रुद्रगण साधना से अभिचार से कैसे लड़ा जाता है?
अभिचार का नाम लेकर संकल्प के साथ शिव के पास नित्य पाठ
रुद्रगण साधना से अभिचार से कैसे लड़ें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: जब आपने संकल्प लेकर तीन से अधिक बार रुद्रगण साधना कर ली हो, तो यदि आप संकल्प लेकर शिव जी के पास नित्य पाठ करें, तो अभिचार से मुक्ति मिलती है। वे कहते हैं, संकल्प में यह लेना होगा: अभिचार से मुक्ति के उद्देश्य से।
रुद्रगण साधना से अभिचार से कैसे लड़ें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: जब आपने संकल्प लेकर तीन से अधिक बार रुद्रगण साधना कर ली हो, तब संकल्प लेकर यदि आप शिव जी के पास नित्य पाठ करें, तो अभिचार से मुक्ति मिलती है। संकल्प में यह लेना होगा: अभिचार से मुक्ति के उद्देश्य से।
क्या इक्कीस या इकतालीस दिन के नित्य पाठ के अलग नियम हैं?
हो सके तो ब्रह्मचर्य रखिए
यह पूछे जाने पर कि क्या इक्कीस या इकतालीस दिन रोज पाठ करने के कोई अलग नियम हैं, वक्ता उत्तर देते हैं: यदि संभव हो, तो ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए कीजिए — वही सबसे अच्छा है।
यह पूछे जाने पर कि क्या इक्कीस दिन या इकतालीस दिन रोज पाठ करने के कोई अलग नियम हैं, वक्ता उत्तर देते हैं: यदि संभव हो, तो ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन करते हुए कीजिए। वही सबसे अच्छा है।
माँ काली का मंत्र कितने लाख जाप से सिद्ध होता है?
एकाक्षरी से बाईस अक्षरी और सहस्राक्षरी तक
काली माता के मंत्र के कितने लाख जाप से वह सिद्ध होता है, यह पूछे जाने पर वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: यह उस मंत्र के अनुसार है जिसकी दीक्षा आपने दीक्षित होकर गुरु के सान्निध्य में ली है। देखिए, एकाक्षरी विधि से लेकर बाईस अक्षरी और सहस्राक्षरी तक मंत्र हैं। तो मान लेते हैं कि दक्षिण कालिका का मंत्र बाईस अक्षरों का है।
काली माता के मंत्र के कितने लाख जाप से मंत्र सिद्ध होता है, यह पूछे जाने पर वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: यह उस मंत्र के अनुसार है जिसकी दीक्षा आपने दीक्षित होकर गुरु के सान्निध्य में पाई है। देखिए — एकाक्षरी विधि से लेकर बाईस अक्षरी और सहस्राक्षरी तक मंत्र हैं। ठीक है — तो मान लेते हैं कि दक्षिण कालिका का मंत्र बाईस अक्षरों का है।
मंत्र की लंबाई के अनुसार जाप संख्या कितनी है?
एकाक्षरी के लिए चार लाख, महापुरश्चरण के लिए सोलह लाख
वक्ता कहते हैं कि काली जी का जो भी मंत्र आपने लिया है, उसके अनुसार कम से कम चार गुना अधिक जाप करना चाहिए। यदि एकाक्षरी लिया है, तो चार लाख। यदि महापुरश्चरण करना है, तो चार का चार गुना, यानी सोलह लाख कहा गया है; बारह से सोलह लाख माना जाता है। तो उसी अनुपात में सोचिए। यदि आपने पंचमुखी मंत्र लिया है — यानी भगवती काली का पंचाक्षरी मंत्र लिया है — तो तीन सौ गुना कीजिए; कम से कम पंद्रह लाख, और अधिकतम जाएँ तो पाँच-पाँच लाख चार बार करके गिनिए, इक्कीस लाख लीजिए। वे कहते हैं कि अभी आपके गुरु आपको ठीक से बताएँगे कि आपने कौन सा लिया है और वह कैसे दिया गया।
और काली जी का जो भी मंत्र आपने लिया है — उसके अनुसार कम से कम चार गुना अधिक जाप करना चाहिए। यदि आपने एकाक्षरी लिया है, तो चार लाख। यदि महापुरश्चरण करना है, तो चार का चार गुना, यानी सोलह लाख कहा गया है। बारह से सोलह लाख माना जाता है। तो उसी अनुपात में सोचिए: यदि आपने पंचमुखी मंत्र लिया है — यानी यदि आपने भगवती काली का पंचाक्षरी मंत्र लिया है — तो तीन सौ गुना कीजिए; कम से कम पंद्रह लाख, और अधिकतम जाएँ तो पाँच-पाँच लाख चार बार करके गिनते हुए, इक्कीस लाख लीजिए। अभी आपके गुरु आपको ठीक से बताएँगे कि आपने कौन सा लिया है और वह कैसे दिया गया।
उच्छिष्ट गणपति की गोद में बैठी शक्ति कौन हैं?
नील सरस्वती, और स्वयं उच्छिष्ट गणपति गुप्त
यह पूछे जाने पर कि क्या उच्छिष्ट गणपति या महागणपति की गोद में जो शक्ति है वह गुप्त है, वक्ता उत्तर देते हैं: उच्छिष्ट गणपति स्वयं गुप्त स्वरूप में हैं। उनकी गोद में बैठी शक्ति नील सरस्वती हैं।
यह पूछे जाने पर कि क्या उच्छिष्ट गणपति या महागणपति की गोद में जो शक्ति हैं वे गुप्त हैं, वक्ता उत्तर देते हैं: उच्छिष्ट गणपति स्वयं गुप्त स्वरूप में हैं। जो शक्ति उनकी गोद में बैठी हैं, वे नीलसरस्वती हैं।
क्या कोई स्त्री गोरखनाथ का धूना लगा सकती है?
केवल तभी जब वंश वृद्धि पूरी हो और गृहस्थ में न रहना हो
यह पूछे जाने पर कि क्या स्त्री गोरखनाथ का धूना लगा सकती है, वक्ता उत्तर देते हैं: आजकल आप क्या नहीं कर रहे? पर — वंश वृद्धि पूरी हो चुकी हो, और यदि अब आगे गृहस्थ में नहीं रहना है, तभी धूना लगाना चाहिए। फिर भी, वे कहते हैं, हम यही कहेंगे कि दीक्षित होकर और अपने गुरु जी से ये सब विषय ठीक से समझकर ही लगाइए।
यह पूछे जाने पर कि क्या स्त्री गोरखनाथ का धूना लगा सकती है, वक्ता उत्तर देते हैं: आजकल ऐसा क्या है जो आप नहीं कर रहे? पर — वंश वृद्धि पूरी हो चुकी हो, और यदि अब आगे गृहस्थ में नहीं रहना है, तभी धूना लगाना चाहिए। फिर भी, हम यही कहेंगे, वे जोड़ते हैं: दीक्षित होकर और अपने गुरु जी से ये सब विषय ठीक से समझकर ही लगाइए।
गज मस्तक का तांत्रिक रहस्य आने वाली गणपति पूजा तक टाल दिया गया
आने वाली गणपति पूजा तक टाला गया
यह पूछे जाने पर कि गणेश जी को गज मस्तक क्यों जोड़ना पड़ा, क्या इसमें तांत्रिक रहस्य हैं, और त्रिनयन गणपति तथा पंचमुखी गणपति का तांत्रिक महत्व क्या है, वक्ता कहते हैं कि ये सब विषय अलग से बताने होंगे। गणपति पूजा आ रही है, और उसमें वे अपनी सामर्थ्य और सीमा में रहकर गणपति जी से जुड़े तंत्रोक्त विषय बताने का लगातार प्रयास करेंगे।
यह पूछे जाने पर कि गणेश जी को गज मस्तक क्यों जोड़ना पड़ा, क्या इसमें तांत्रिक रहस्य हैं, और त्रिनयन गणपति तथा पंचमुखी गणपति का तांत्रिक महत्व क्या है — वक्ता उत्तर देते हैं कि ये सब विषय अलग से बताने होंगे। गणपति पूजा अब आ रही है; उसमें, अपनी सामर्थ्य और अपनी सीमाओं में रहकर, वे गणेश जी से जुड़े तंत्रोक्त विषय बताने का लगातार प्रयास करेंगे।
जिन पर सवारी आती है उन्हें रोजमर्रा के जीवन में क्या करना चाहिए?
सबसे ऊपर हवन और भोग, और अगियारी कभी न छूटे
जिन पर सवारी आती है वे रोजमर्रा के जीवन में शक्तियों का पूजन-अर्चन कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: जिन पर सवारी आती है, कम से कम रोज — उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण चीजें हवन और भोग हैं। यदि आप अगियारी करते हैं, तो चाहे अगियारी रोज की हो, या पूर्णिमा, अमावस्या या अष्टमी की, अगियारी छूटनी नहीं चाहिए; या यदि हवन करते हैं, तो हवन छूटना नहीं चाहिए। वे कहते हैं, यही सबसे आवश्यक है।
जिन पर सवारी आती है वे रोजमर्रा के जीवन में शक्तियों का पूजन-अर्चन कैसे करें, और इसमें मार्गदर्शन के लिए पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: जिन पर सवारी आती है, अपनी सामर्थ्य से, कम से कम रोज के ढंग से — उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण चीजें हवन और भोग हैं। यदि आप अगियारी करते हैं, तो चाहे अगियारी रोज की हो या पूर्णिमा, अमावस्या या अष्टमी की, अगियारी छूटनी नहीं चाहिए; या यदि आप हवन करते हैं, तो हवन छूटना नहीं चाहिए। यही सबसे आवश्यक है।
देखने-सुनने का काम करने वाले को हर अमावस्या को क्या करना चाहिए?
हर अमावस्या को घर की निकारी
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि यदि आप देखने और सुनने का काम करते हैं, तो भाई, उनके अनुसार हर अमावस्या को घर की निकारी होनी चाहिए — क्योंकि कौन आपके घर क्या लेकर आएगा, और क्या छोड़कर जाएगा, और कौन सा पूजा-पाठ किसे और किसमें आप बाँधेंगे: ये सब चीजें समय-समय पर साफ होती रहनी चाहिए।
दूसरी बात यह है, वक्ता कहते हैं: यदि आप देखने और सुनने का काम करते हैं, तो भाई, उनके अनुसार हर अमावस्या को घर से निकारी होनी चाहिए — निकारी। क्योंकि कौन आपके घर क्या लेकर आएगा, और क्या छोड़कर जाएगा? कौन सा पूजा-पाठ, और किसे, और किसमें आप बाँधेंगे? इसलिए वे सब चीजें समय-समय पर साफ होती रहनी चाहिए।
जिस पर सवारी आती है उसके लिए बलि क्यों आवश्यक है?
बलि अनिष्टता का नाश करती है
वक्ता कहते हैं कि तीसरी महत्वपूर्ण बात बलि है। जिस व्यक्ति पर सवारी आती है उसके लिए बलि बहुत आवश्यक है, क्योंकि बलि से अनिष्टता का नाश होता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि देखने-सुनने वाले व्यक्ति में कितनी भी क्षमता हो, कोई क्षुद्र शक्ति आपके दरबार में आ जाती है जो आपके परिवार के लोगों पर कष्ट का कारण बनती है। इसलिए, वे कहते हैं, बलि सबसे बड़ा माध्यम है।
तीसरी महत्वपूर्ण बात बलि है। जिस व्यक्ति पर सवारी आती है उसके लिए बलि बहुत आवश्यक है, क्योंकि बलि से अनिष्टता का नाश होता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि देखने और सुनने का काम करने वालों में कितनी भी क्षमता हो, कोई क्षुद्र विद्या शक्ति आपके दरबार में आ जाती है जो आपके परिवार के लोगों पर कष्ट का कारण बनती है। इसलिए बलि सबसे बड़ा माध्यम है।
क्या बलि का अर्थ बकरा है?
सात्विक पद्धति में बहुत सी बलियाँ होती हैं
वक्ता कहते हैं कि बलि से हम भेड़ या बकरे की बात नहीं कर रहे। आपकी अपनी जो भी सात्विक पद्धति हो, उसके अनुसार बहुत सी बलियाँ होती हैं। इसलिए कम से कम महीने में एक बार तो अवश्य करनी चाहिए।
बलि से, वक्ता कहते हैं, हम भेड़ या बकरे की बात नहीं कर रहे। आपकी अपनी जो भी सात्विक पद्धति हो, उसके अनुसार बहुत सी बलियाँ होती हैं। इसलिए कम से कम महीने में एक बार तो अवश्य करनी चाहिए।
सवारी में आने वाली योगिनी या लोक देवता के दिन क्या करना चाहिए?
हवन, और अपने हाथ से कुत्ते, गाय या पक्षी को खिलाना
वक्ता कहते हैं कि और सबसे मुख्य बात: आपके इष्ट को जो भी योगिनी समर्पित है — जैसे कोई योगिनी शक्ति आ रही है, या आपके कोई लोक देवता हैं — यदि वे सवारी में आते हैं, तो जो भी उनका दिन है उस दिन हवन करने का अवश्य प्रयास कीजिए, और जहाँ तक हो सके अपने हाथ से कुत्ते, गाय या पक्षी को खिलाइए। वे कहते हैं, इससे अनिष्टता का नाश होता है।
और सबसे मुख्य बात यह है, वक्ता कहते हैं: आपके इष्ट को जो भी योगिनी समर्पित है — जैसे कोई योगिनी शक्ति आ रही है, या आपके कोई लोक देवता हैं — यदि वे सवारी में आते हैं, तो जो भी उनका दिन है, उस दिन हवन करने का अवश्य प्रयास कीजिए; और जहाँ तक संभव हो, अपने हाथ से कुत्ते, गाय या पक्षी को खिलाइए। इससे अनिष्टता का नाश होता है।
लोक और वीर शक्तियाँ दरबार में क्या घोषणा करती हैं?
जो भी आए, उसे खाली नहीं लौटाना
वक्ता कहते हैं कि एक बात याद रखिए: जिन पर देव शक्तियाँ आती हैं, विशेषकर किसी तरह की लोक वीर शक्ति, कोई लोक शक्ति — वे यह बात खुलकर कहती हैं कि यदि कोई आए तो तुम उसे लौटाओगे नहीं, वापस नहीं भेजोगे; उसे अवश्य देखा-सुना जाएगा, हम उसे देखेंगे; मेरे दरबार से कोई खाली नहीं जाना चाहिए। इस तरह वे दहाड़ती हैं।
एक बात याद रखिए, वक्ता कहते हैं: जिन पर देव शक्तियाँ आती हैं — विशेषकर यदि किसी तरह की लोक वीर शक्ति हो, कोई लोक शक्ति — वे यह बात खुलकर कहती हैं: कि यदि कोई आए, तो तुम उसे लौटाओगे नहीं, वापस नहीं भेजोगे। उसे अवश्य देखा और सुना जाएगा; हम उसे देखेंगे। मेरे दरबार से कोई खाली नहीं जाना चाहिए। इस तरह वे दहाड़ती हैं।
घर के मुखिया को वे बंधन चाहिए जो आने वालों का बोझ परिवार तक न पहुँचने दें
सावधानियाँ और बंधन ताकि आने वालों का बोझ परिवार तक न पहुँचे
ठीक है — वे शक्तियाँ हैं; अपने अनुसार वे जो कह रही हैं वह उनकी अपनी मर्यादा है, और वे अपनी जगह ठीक कह रही हैं। पर यदि आप घर के मुखिया हैं, वक्ता कहते हैं, तो आपको यह ज्ञान होना चाहिए: कि यदि आपके घर दस लोग दस तरह की मलामत लेकर आ रहे हैं, तो उसका असर आपके परिवार के सदस्यों पर न पड़े, और जिस पर सवारी आ रही है उस पर न पड़े, इसके लिए आपको क्या सावधानियाँ रखनी हैं, कैसे बचना है, कौन सा बंधन कहाँ करना है।
ठीक है — वे शक्तियाँ हैं। अपने अनुसार वे जो कह रही हैं वह उनकी अपनी मर्यादा है; वे कह रही हैं, ठीक है, अपनी जगह। पर यदि आप घर के मुखिया हैं, तो आपको यह ज्ञान होना चाहिए: कि यदि आपके घर में दस लोग आ रहे हैं, अपने साथ दस तरह की मलामत लेकर, तो उसका असर आपके परिवार के सदस्यों पर न पड़े, और उस पर न पड़े जिस पर सवारी आ रही है, इसके लिए आपको क्या सावधानियाँ रखनी हैं, कैसे बचना है, कौन सा बंधन कहाँ करना है।
क्या गृहस्थ को घर पर ऐसा दरबार लगाना ही चाहिए?
उनका मत: गृहस्थ घर पर यह न करें
वक्ता कहते हैं कि अब उनके अनुसार, भाई, गृहस्थों को यह सब घर पर नहीं करना चाहिए। इसी में कोई कुछ लाता है, बैठाकर चला जाता है, और फिर सवारी वाले कुछ और ही खेलने लगते हैं, और कभी-कभी यह ठीक से पता भी नहीं चलता।
अब उनके अनुसार, वक्ता कहते हैं, भाई, गृहस्थों को यह सब घर पर नहीं करना चाहिए। इसी चीज में कोई कुछ लाता है, बैठाकर चला जाता है; और फिर सवारी वाले कुछ और ही खेलने लगते हैं। कभी-कभी यह ठीक से पता भी नहीं चलता।
सवारी शुरू होते ही लोगों को ठीक करना शुरू कर देने में क्या खतरा है?
अधूरी अवस्था जो बहुत घातक हो सकती है
एक श्रोता कहते हैं कि उनकी पत्नी पर देवी-देवताओं की सवारी आती है, वह लोगों को ठीक भी करती हैं, पर दिव्य दृष्टि नहीं खुल रही। वक्ता उत्तर देते हैं कि पहली बात उन्हें यही कहनी होगी कि जब सवारी आना शुरू होती है, लोग तुरंत लोगों को ठीक करना, देखना और सुनना शुरू कर देते हैं — और यह अधूरी अवस्था बहुत ही घातक हो सकती है। जब कोई शक्ति नई-नई आती है, तो असर काफी अधिक होता है और लोग ठीक भी होते हैं; बाद में फिर कठिनाई होगी।
देवरिया जिले के एक श्रोता कहते हैं कि उनकी पत्नी पर देवी-देवताओं की सवारी आती है, कि वह लोगों को ठीक भी करती हैं, पर दिव्य दृष्टि नहीं खुल रही। यदि आपकी पत्नी पर सवारी आ रही है, तो देखिए — पहली बात उन्हें आपसे यही कहनी होगी, वक्ता उत्तर देते हैं। जब सवारी आना शुरू होती है, तो तुरंत लोगों को ठीक करना, देखना और सुनना शुरू कर देते हैं — तो यह अधूरी अवस्था बहुत ही घातक हो सकती है। जब कोई शक्ति नई-नई आती है, तो असर काफी अधिक होता है; लोग ठीक भी होते हैं। बाद में फिर कठिनाई होगी।
जिस पर सवारी आती है उसके लिए क्या व्यवस्था करनी चाहिए?
उचित स्थान, तय दिन, और घर पर मन्नत नहीं
वक्ता कहते हैं कि किसी अच्छे जानकार व्यक्ति से मिलिए, और सबसे पहले उन्हें स्थान दिलवाइए, ताकि उनका स्थान ठीक से बने और वे सही ढंग से आएँ। उनका दिन तय कीजिए: कि रोज आने के बजाय पूर्णिमा हो, अष्टमी हो, किसी एक दिन आएँ; और यदि उस दिन दरबार लगाना चाहें, तो लगाइए। उनका भोग और पूजा का स्थान ठीक से रखिए। और इसके साथ, अब अपने घर पर मन्नत मत करवाइए। वे कहते हैं, यदि आप पूछ रहे हैं तो वे अपने अनुसार बता रहे हैं; बाकी आपकी अपनी इच्छा है — वे वही बता रहे हैं जो सच बात है।
तो किसी अच्छे जानकार व्यक्ति से मिलिए, और सबसे पहले उन्हें स्थान दिलवाइए, ताकि उनका स्थान ठीक से बन सके और वे सही ढंग से आ सकें। उनका दिन तय कीजिए: कि रोज आने के बजाय पूर्णिमा हो, अष्टमी हो; किसी एक दिन आएँ। यदि उस दिन आप दरबार लगाना चाहें, तो लगाइए। उनका भोग और पूजा का स्थान ठीक से रखिए। और इसके साथ, अब अपने घर पर मन्नत मत करवाइए। यदि आप पूछ रहे हैं, वक्ता कहते हैं, तो वे अपने अनुसार बता रहे हैं; बाकी आपकी अपनी इच्छा है। वे वही बात बता रहे हैं जो सच है।
क्या दिव्य दृष्टि कभी अपने आप खुलती है?
वह पल भर के लिए खुलती है, जब काम हो, और गुरु द्वारा
वक्ता कहते हैं कि दिव्य दृष्टि के बारे में यह भी जानिए: दिव्य दृष्टि कभी ऐसे ही अपने आप नहीं खुलेगी; वह पल भर में खुलेगी और बंद हो जाएगी। वह तब खुलेगी जब काम होगा। कैसे खुलेगी? जब आप किसी गुरु को स्वीकार करके वचन देते हैं — कहीं बीड़ा दिया जाता है, कहीं वचन में कुछ खिलाया जाता है — तब वे आँखें खोलते हैं। वे कहते हैं, वहाँ इसकी जरूरत होती है।
दिव्यदृष्टि की बात, यह भी जानिए, वक्ता कहते हैं: दिव्य दृष्टि कभी उस तरह अपने आप नहीं खुलेगी। वह पल भर में खुलेगी, और बंद हो जाएगी। वह तब खुलेगी जब काम होगा। कैसे खुलेगी? जब आप किसी गुरु को स्वीकार करके वचन देते हैं — कहीं बीड़ा दिया जाता है, कहीं वचन में कुछ खिलाया जाता है — तब वे आँखें खोलते हैं। वहाँ इसकी जरूरत होती है।
आँखें खुलने के बाद गुरु क्या बताते हैं?
कौन से देवी-देवता, किसकी पलटन, कौन आगे और पीछे चलता है
फिर कितने हैं, कौन से देवी-देवता हैं, किसकी पलटन है, कौन आगे और पीछे चल रहा है, कौन साथ रहता है — इन सबका ज्ञान गुरु एक-एक को बुलाकर देते हैं। वक्ता कहते हैं कि ये सब विषय किसी जानकार व्यक्ति के माध्यम से ठीक से जानने चाहिए। बिना जाने करेंगे तो अंधेरे में रहेंगे। अपने आप यह चीज संभव नहीं; अपने आप इतनी हद तक संभव नहीं। एक सीमा तक आप जा सकते हैं, पर इसमें किसी की मदद लेकर सही ढंग से कीजिए।
फिर कितने हैं, कौन से देवी-देवता हैं, किसकी पलटन है, कौन आगे चल रहा है और कौन पीछे, कौन साथ रहता है — इन सबका ज्ञान गुरु एक-एक को बुलाकर देते हैं। ये सब विषय किसी जानकार व्यक्ति के माध्यम से ठीक से जानने चाहिए। यदि आप बिना जाने करेंगे, तो अंधेरे में रहेंगे। अपने आप यह चीज संभव नहीं। अपने आप इतनी हद तक संभव नहीं। एक सीमा तक आप जा सकते हैं; पर इसमें किसी की मदद लीजिए, और सही ढंग से कीजिए।
जब एक अर्घ्य की लाखों में बोली लगती है, तो क्या करोड़ों की वर्षा मायावी है?
दूसरी परंपरा के दावे पर निर्णय देने से उनका इनकार
एक श्रोता कहते हैं कि वसंत विजय जी महाराज अब करोड़ों की वर्षा करवाते हैं, और फिर पूजन में एक अर्घ्य के नाम पर बोली लगाकर लाखों रुपये लेते हैं, इसलिए उन्हें संदेह है कि करोड़ों की वर्षा मायावी है, बस दिखावे के लिए। वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं कि इस विषय पर उन्हें ज्यादा जानकारी नहीं है, क्योंकि उनके सामने ऐसी कोई घटना नहीं हुई। बाकी यह उनकी अपनी गुरु परंपरा है; जैन परंपरा में इस तरह के विषय होते हैं। आपने स्वयं हमें बताया, और हमने भी देखा है, इसलिए उन्हें भी लगता है कि यह चीज हो सकती है। आप स्वयं कहते हैं कि इसमें सेठ इंद्र और इंद्राणी बनते हैं — तो हो सकता है वहाँ नियम यही हो कि आरती और इन सब चीजों की बोली लगती है। उनके अपने पंथ और संप्रदाय के नियम हैं, और वे उसी के अनुसार चल रहे होंगे। जहाँ तक मायावी होने का प्रश्न है, वे कहते हैं, यह वही बता सकता है जिसने यह चीज पाई है; आपने और मैंने नहीं पाई, तो हम कैसे कहें कि सही है या गलत।
एक श्रोता कहते हैं कि वसंत विजय जी महाराज अब करोड़ों की वर्षा करवाते हैं, और फिर पूजन में एक अर्घ्य के नाम पर बोली लगाकर लाखों रुपये लेते हैं; और इसलिए उन्हें संदेह है कि करोड़ों की वर्षा मायावी है, बस दिखावे के लिए। वक्ता उन्हें उपाधि से संबोधित करते हुए उत्तर देते हैं: इस विषय पर मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, क्योंकि मेरे सामने इस तरह की कोई घटना नहीं हुई। बाकी यह उनकी अपनी गुरु परंपरा है। जैन परंपरा में इस तरह के विषय होते हैं। आपने स्वयं हमें बताया, और हमने भी देखा है, इसलिए मुझे भी लगता है कि यह चीज हो सकती है। आप स्वयं कहते हैं कि इसमें सेठ इंद्र और इंद्राणी बनते हैं। तो हो सकता है वहाँ नियम यही हो कि आरती और इन सब चीजों की बोली लगती है। उनके अपने पंथ और संप्रदाय का जो भी नियम है, वे उसी के अनुसार चल रहे होंगे। जहाँ तक इसके मायावी होने की बात है — यह वही बता सकता है जिसने यह चीज पाई है। आपने और मैंने इसे नहीं पाया, तो हम कैसे कहें कि यह सही है या गलत।
सामान्य नित्य पूजा से क्या लाभ होते हैं?
जैसे रोज का पौष्टिक भोजन जीवन चलाता है
सामान्य नित्य पूजा से क्या लाभ होते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: जैसे हम रोज सामान्य भोजन करते हैं और पौष्टिक भोजन करने से हमारा जीवन अच्छा चलता है — उसी तरह जब आप नित्य पूजा और सेवा करते हैं, तो आपके जीवन में कठिनाइयाँ आती भी हैं तो आसानी से निकल जाती हैं और आप उनसे पार हो जाते हैं। नित्य सेवा और पूजा करने के लाभ अनंत हैं, और सनातन हिंदू संस्कृति में जन्मे व्यक्ति को जीवन भर, मृत्यु तक, जाप और पूजा-पाठ करना चाहिए, जब तक उसकी बुद्धि में स्थिरता है और उसकी मानसिक स्थिति ठीक है।
सामान्य नित्य पूजा से क्या लाभ होते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: जिस तरह हम रोज सामान्य भोजन करते हैं और पौष्टिक भोजन करने से हमारा जीवन अच्छा चलता है — उसी तरह जब आप नित्य पूजा और सेवा करते हैं, तो आपके जीवन में जो कठिनाइयाँ हैं, वे आती भी हैं तो आसानी से निकल जाती हैं; आप उनसे पार हो जाते हैं। नित्य सेवा और पूजा करने के लाभ अनंत हैं। और सनातन हिंदू संस्कृति में जन्मे व्यक्ति को जीवन भर, मृत्यु तक, जाप और पूजा-पाठ करना चाहिए — जब तक उसकी बुद्धि में स्थिरता है और आपकी मानसिक स्थिति ठीक है।
साक्षात दर्शन के लिए क्या आवश्यक है?
किसी योग्य आचार्य की शरण, और दीक्षा
वक्ता कहते हैं कि साक्षात दर्शन के लिए किसी जुड़े हुए और योग्य आचार्य की शरण में जाइए। ऐसे साध्य की शरण में जाकर और दीक्षित होकर, फिर साधना कीजिए।
साक्षात दर्शन के लिए किसी जुड़े हुए और योग्य आचार्य की शरण में जाइए, वक्ता कहते हैं। ऐसे व्यक्ति की शरण में जाकर और दीक्षित होकर, फिर साधना कीजिए।
रिश्ते अच्छे बनाने का सबसे अच्छा उपाय क्या है?
मीठी वाणी, जो दिल को चीर भी सकती है
रिश्ते अच्छे बनाने के उपाय पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: रिश्ता अच्छा बनाने के लिए मीठी वाणी सबसे अच्छी है। यदि रिश्ता बिगाड़ना है, तो उसी वाणी से आप किसी का भी दिल अच्छी तरह छलनी कर सकते हैं; और यदि रिश्ते अच्छे बनाने हैं, तो वाणी सबसे अच्छा उपाय है। बाकी, वे कहते हैं, यदि आप तंत्र में जाना चाहते हैं, तो वह अलग बात है।
रिश्ते अच्छे बनाने के उपाय पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: रिश्ता अच्छा बनाने के लिए मीठी वाणी सबसे अच्छी है। यदि रिश्ता बिगाड़ना है, तो उसी वाणी से आप किसी का दिल अच्छी तरह छलनी कर सकते हैं; और यदि रिश्ते अच्छे बनाने हैं, तो वाणी सबसे अच्छा उपाय है। बाकी, यदि आप तंत्र में जाना चाहते हैं, तो वह अलग विषय है।
वे किसी को तांत्रिक के पास नहीं भेजते, और जितना हो सके स्वयं काम करते हैं
वे किसी को नहीं भेजते, और जितना हो सके स्वयं काम करते हैं
वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि उनके पास ऐसा कोई तांत्रिक नहीं जिसके पास वे उन्हें भेज सकें। आप स्वयं प्रयास कर सकते हैं; चैनल पर बहुत से वीडियो हैं, और यदि आप कर सकते हैं, तो उसी के अनुसार कीजिए। वे कहते हैं, मैं किसी को किसी के पास नहीं भेजता: अपनी सामर्थ्य से और जहाँ तक संभव हो, मैं काम स्वयं और आपके माध्यम से करवाता हूँ।
वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि उनके पास ऐसा कोई तांत्रिक है ही नहीं जिसके पास वे उन्हें भेज सकें। आप स्वयं प्रयास कर सकते हैं। चैनल पर बहुत से वीडियो हैं; यदि आप कर सकते हैं, तो उसी के अनुसार कीजिए। मैं किसी को किसी के पास नहीं भेजता, वे कहते हैं। अपनी सामर्थ्य से और जहाँ तक संभव है, मैं काम स्वयं और आपके माध्यम से करवाता हूँ।
काल भैरव का कौन सा कवच पढ़ना चाहिए?
रुद्रयामल का कवच, फलश्रुति पढ़ने के बाद
काल भैरव जी का कौन सा कवच पढ़ें, यह पूछे जाने पर वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: रुद्रयामल का कवच पढ़िए; रुद्रयामल सबसे अच्छा रहेगा। वे जोड़ते हैं कि फलश्रुति पढ़िए, और यदि फलश्रुति में लिखा है कि अदीक्षित व्यक्ति इसका पाठ न करे, तो पाठ मत कीजिए।
काल भैरव जी का कौन सा कवच पढ़ना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: रुद्रयामल तंत्र का कवच पढ़िए; रुद्रयामल सबसे अच्छा रहेगा। फलश्रुति पढ़िए; और यदि फलश्रुति में लिखा है कि अदीक्षित व्यक्ति इसका पाठ न करे, तो पाठ मत कीजिए।
नए विवाहित साधक को अपने जाप में सूखापन क्यों लगता है?
गृहस्थ कर्तव्य पूरे होने के बाद का वैराग्य सबसे अच्छा है
वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि बात यह है: अभी आप नए-नए विवाहित हैं, और कहीं न कहीं आप अध्यात्म में हैं, इसलिए यह सूखापन आता-जाता रहेगा। जब आप अपने गृहस्थ जीवन के सारे काम पूरे कर लेंगे, तो उसके बाद जो वैराग्य आएगा वही सबसे अच्छा होगा।
वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर कहते हैं: बात यह है कि अभी आप नए-नए विवाहित हैं, और कहीं न कहीं आप अध्यात्म में हैं — इसलिए यह सूखापन आता-जाता रहेगा। जब आप अपने गृहस्थ जीवन के सारे काम पूरे कर लेंगे, तो उसके बाद जो वैराग्य आएगा, वही सबसे अच्छा होगा।
काली साधना करना चाहने वाला क्या कर सकता है?
योग्य साधक से दीक्षा; तब तक स्तोत्र और स्तुति
काली साधना करना चाहने वाले एक श्रोता से वक्ता कहते हैं कि यदि वे किसी योग्य साधक से दीक्षित होकर करें तो बहुत बेहतर होगा। प्रारंभिक साधनाएँ — भगवती की प्रसन्नता के लिए उनके स्तोत्र और स्तुति का गायन — यह सब आप कर सकते हैं।
काली साधना करना चाहने वाले एक श्रोता से वक्ता नाम लेकर कहते हैं: बिल्कुल — यदि आप किसी योग्य साधक से दीक्षित होकर करें, तो काफी बेहतर होगा। प्रारंभिक साधनाएँ, जो भगवती की प्रसन्नता के लिए हैं, उनके स्तोत्र और स्तुति का गायन — यह सब आप कर सकते हैं।
पूजा के लिए पूरे शिव परिवार में कौन-कौन आते हैं?
शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदी — फिर वाहन
यह पूछे जाने पर कि भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश और भगवान कार्तिकेय के अलावा क्या नंदी और कोई और भी पूरे शिव परिवार में आते हैं जिनकी साथ में पूजा होनी चाहिए, वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं, इतना पर्याप्त है। सामान्यतः इतना सब होना चाहिए — भगवान गणपति, भगवान कार्तिकेय, माँ पार्वती और भगवान भोलेनाथ, नंदी जी के साथ। इसके अलावा, यदि आप आगे जाएँ, तो कार्तिकेय जी का मयूर, श्री गणेश जी का मूषक और भगवती का सिंह है।
प्रणाम के साथ यह पूछे जाने पर कि पूरे शिव परिवार में — भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश और भगवान कार्तिकेय के अलावा — क्या नंदी और कोई और भी आते हैं, जिनकी साथ में पूजा होनी चाहिए, वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं, इतना पर्याप्त है। सामान्यतः इतना सब होना चाहिए। भगवान गणपति, भगवान कार्तिकेय, माँ पार्वती और भगवान भोलेनाथ, नंदी जी के साथ। इसके अलावा, यदि आप आगे जाएँ, तो सामने कार्तिकेय जी का मयूर, श्री गणेश जी का मूषक और भगवती का सिंह है।
क्या अपने बच्चों को बचाने के लिए साँप मारने में दोष है?
आत्मरक्षा में प्राण लेने पर ऐसा दोष नहीं लगता
एक श्रोता कहते हैं कि उनकी माँ ने एक बार एक साँप मारा था, और उन्हें बार-बार साँप दिखते रहते हैं; उनकी माँ ने अपने बच्चों को बचाने के लिए उसे मारा था। वक्ता उत्तर देते हैं कि जब आप अपनी रक्षा के लिए किसी का प्राण लेते हैं, तो उसमें उस तरह का दोष नहीं लगता।
एक श्रोता पूछते हैं कि अब क्या करें: एक बार उनकी माँ ने एक साँप मारा था, और उन्हें बार-बार साँप दिखते रहते हैं। उनकी माँ ने अपने बच्चों को बचाने के लिए साँप मारा था। जब आप अपनी रक्षा के लिए कभी भी किसी का प्राण लेते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं, तो उसमें उस तरह का दोष नहीं लगता।
यदि नाग दोष लग गया हो तो क्या उपाय है?
दोनों पंचमियों को शिवलिंग पर नाग-नागिन का जोड़ा
फिर भी, वक्ता कहते हैं, यदि नाग दोष लग गया है, तो किसी अच्छे आचार्य से मिलकर — और यह उन्होंने पहले भी बताया है — पंचमी तिथि को शिवलिंग पर नाग और नागिन का एक जोड़ा चढ़ाना चाहिए। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों की पंचमी तिथि को लगातार करवाइए। तार से बना नाग-नागिन का जोड़ा सौ या डेढ़ सौ रुपये में आसानी से मिल जाता है। संकल्प करके उसे शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए — कि जो नाग दोष लगा है उससे मुक्ति के लिए — और अपनी सामर्थ्य से आप शिव जी का अभिषेक करेंगे।
फिर भी, यदि नाग दोष लग गया है, तो किसी अच्छे आचार्य से मिलकर — और यह उन्होंने पहले भी बताया है — पंचमी तिथि को शिवलिंग पर नाग और नागिन का एक जोड़ा चढ़ाना चाहिए। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों की पंचमी तिथि को लगातार करवाइए। सौ या डेढ़ सौ रुपये में तार से बना नाग-नागिन का जोड़ा आसानी से मिल जाता है; वह मिलता है। संकल्प करके उसे शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए — कि जो नाग दोष लगा है उससे मुक्ति के लिए — और अपनी सामर्थ्य से आप शिव जी का अभिषेक करेंगे।
नाग दोष के लिए रुद्राभिषेक कितनी बार करना चाहिए?
हर तीन महीने, या खर्च उठा सकें तो हर महीने
वक्ता कहते हैं कि यदि संभव हो, तो हर तीन महीने में एक बार रुद्राभिषेक करवाइए; और यदि आप आर्थिक रूप से सक्षम हैं, तो हर महीने रुद्राभिषेक करवाइए। वे कहते हैं, एक साल के भीतर ये दोष पूरी तरह समाप्त हो जाएँगे।
यदि संभव हो, तो हर तीन महीने में एक बार रुद्राभिषेक करवाइए; और यदि आप आर्थिक रूप से सक्षम हैं, तो हर महीने रुद्राभिषेक करवाइए। एक साल के भीतर ये दोष पूरी तरह समाप्त हो जाएँगे।
तकनीकी और कंप्यूटर ज्ञान में निपुण होने के लिए किसकी साधना करनी चाहिए?
भगवान गणपति, जिनसे बुद्धि में कोई बड़ा नहीं
तकनीकी कंप्यूटर भाषा सीखने और तकनीकी ज्ञान में निपुण बनने में सहायता के लिए किसकी साधना करें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: आपको कंप्यूटर में तकनीकी ज्ञान चाहिए, और उसके लिए साधना करना चाहते हैं — भगवान गणपति की कीजिए। बुद्धि में उनसे बड़ा कौन है?
यह पूछे जाने पर कि यदि तकनीकी कंप्यूटर भाषा सीखनी हो और तकनीकी ज्ञान में निपुण बनना हो, तो किसकी साधना करें ताकि सहायता मिले, वक्ता उत्तर देते हैं: आपको कंप्यूटर में तकनीकी ज्ञान चाहिए, और उसके लिए आप साधना करना चाहते हैं। भगवान गणेश की कीजिए। बुद्धि में उनसे बड़ा कौन है?
क्या अपनी कुलदेवी जानने की कोई विधि है?
पहले बताई जा चुकी है, और सिद्ध साबरी विद्या में विस्तार से उपलब्ध है
कुलदेवी जानने की कोई विधि बताने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह पहले बताई जा चुकी है; यह इस चैनल पर भी उपलब्ध है, और सिद्ध साबरी विद्या में भी पूरे विस्तार से उपलब्ध है। वे कहते हैं, कृपया एक बार देख लीजिए।
कुलदेवी जानने की कोई विधि बताने को कहे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि यह पहले बताई जा चुकी है। यह इस चैनल पर भी उपलब्ध है। और सिद्ध साबरी विद्या में भी यह पूरे विस्तार से उपलब्ध है। कृपया एक बार देख लीजिए।
क्या गणेश जी के रूप बदलने पर वाहन बदलता है?
रूप के साथ वाहन बदलता है
यह पूछे जाने पर कि गणेश जी के रूप बदलने पर क्या वाहन बदलता है, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल।
यह पूछे जाने पर कि गणेश जी के रूप बदलने पर क्या वाहन भी बदलता है, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल।
साधना का अंतिम लक्ष्य क्या है?
मोक्ष, चार पुरुषार्थों में अंतिम, पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं
एक श्रोता पूछते हैं कि उन जैसे लोगों के लिए साधना का अंतिम लक्ष्य क्या है — क्या भक्ति करके और मोक्ष पाकर हम ब्रह्मलीन होते हैं, या अपने इष्ट के लोक में जाते हैं। इसे बहुत अच्छा प्रश्न बताते हुए वक्ता उत्तर देते हैं: चार पुरुषार्थों में मोक्ष सबसे अंत में आता है; और सोलह संस्कारों के माध्यम से यह चीज जन्म से मृत्यु तक हमारे जीवन में उतारी जाती है। वे कहते हैं, उनका कहना बस इतना है: मोक्ष गति या मुक्ति पूरी तरह आपके या मेरे हाथ में नहीं है। अपनी सामर्थ्य से हमें बस इतना करना चाहिए — जितनी भी सामर्थ्य हो उसके अनुसार भक्ति करें।
एक श्रोता पूछते हैं: भैया, हम जैसे लोगों के लिए साधना का अंतिम लक्ष्य क्या है? भक्ति करके और मोक्ष पाकर क्या हम ब्रह्मलीन होते हैं, या हमें अपने इष्ट के लोक में जाना है? आपका प्रश्न बहुत अच्छा है, वक्ता उत्तर देते हैं। साधना का अंतिम लक्ष्य क्या होना चाहिए, या क्या है? चार पुरुषार्थसाधक का अपना सतत, तीव्र प्रयास — साधना का फल साधक के नियंत्रण में नहीं होता, किंतु यह पुरुषार्थ सदैव उसके हाथ में रहता है। में मोक्ष सबसे अंत में आता है। और सोलह संस्कारों के माध्यम से यह चीज जन्म से मृत्यु तक हमारे जीवन में उतारी जाती है। मेरा कहना बस इतना है, वे कहते हैं: मोक्ष गति, या मुक्ति, पूरी तरह आपके और मेरे हाथ में नहीं है। अपनी सामर्थ्य से हमें बस इतना करना चाहिए: कि जितनी भी सामर्थ्य हो, उसके अनुसार भक्ति करें।
मोक्ष का प्रश्न एक ओर रखकर क्या करना चाहिए?
मोह-माया से मुक्त रहिए, लोगों की मदद कीजिए, परोपकार कीजिए
वक्ता कहते हैं कि संसार के सारे बंधनों में मोह और माया से मुक्त होकर, जितना हो सके लोगों का सहयोग कीजिए और परोपकार भी कीजिए। पर आगे बढ़ते रहिए। बाकी — ब्रह्मलीन होना है, या मोक्ष की प्राप्ति होगी, या अगला जन्म होगा — यह अपने आराध्य पर छोड़ दीजिए।
सांसारिक सारे बंधनों में मोह और माया से मुक्त होकर, वक्ता कहते हैं, जितना संभव हो लोगों का सहयोग कीजिए, और परोपकार भी कीजिए। पर आगे बढ़ते रहिए। बाकी — ब्रह्मलीन होना है, या मोक्ष की प्राप्ति होगी, या अगला जन्म होगा — यह अपने आराध्य पर छोड़ दीजिए।
नए साधक को किसे अधिक महत्व देना चाहिए — काली चालीसा या जगन मंगल काली कवच?
पहले चालीसा, बाद में जगन मंगल
माँ काली की सेवा के लिए चालीसा सिद्धि और जगन मंगल काली कवच में से किसे अधिक महत्व दें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: यदि आप नए साधक हैं, तो पहले काली चालीसा कीजिए। उसके बाद जगन मंगल कीजिए।
क्या सबको सियार सिंगी और हत्था जोड़ी रखनी चाहिए?
ये सबको नहीं जमतीं, और इनके नियम हैं
वक्ता फिर कहते हैं, जैसा पहले भी बता चुके हैं, कि सियार सिंगी सबको नहीं जमती, और इसलिए इसे हर किसी को नहीं रखना चाहिए। हत्था जोड़ी और सियार सिंगी के अपने नियम हैं — ये जीवित चीज हैं, जीवित तंत्रोक्त वस्तुएँ।
वक्ता एक बार फिर कहते हैं, जैसा पहले भी बता चुके हैं, कि सियार सिंगी सबको नहीं जमती, और इसी कारण इसे हर किसी को नहीं रखना चाहिए। हत्था जोड़ी और सियार सिंगी के अपने नियम हैं। यह जीवित चीज है — जीवित तंत्रोक्त वस्तुएँ, हालाँकि आजकल पूरी तरह...
सियार सिंगी जैसी तंत्रोक्त वस्तुएँ पहले कब दी जाती थीं?
वंश वृद्धि के बाद, जैसे सास बहू को चाबियाँ देती है
वक्ता कहते हैं कि पहले के समय में — यदि बुजुर्ग जीवित हैं तो उनसे पता कीजिए कि सियार सिंगी और हत्था जोड़ी कौन रखता था। यह तब होता था जब संतान बढ़ जाती थी, जब वंश वृद्धि हो जाती थी। जैसे परिवार में नई बहू आती है तो सास बहू की योग्यता देखती है और कुछ समय बाद ही उसे चाबियाँ देती है — उसी तरह बच्चे के जन्म के बाद, जब दूसरा बच्चा हो गया हो और दूसरा बच्चा कम से कम तीन साल का हो गया हो, या यदि एक ही बच्चा हो, तो कहा जाता है बारह साल का, तब तंत्रोक्त वस्तुएँ दी जाती थीं। आज, वे कहते हैं, आदमी बचपन से सियार सिंगी और हत्था जोड़ी लेकर घूम रहा है। और वे पूछते हैं, ये चीजें कौन मानता है।
पहले के समय में, वक्ता कहते हैं, क्या आप जानते हैं कि सियार सिंगी और हत्था जोड़ी कौन रखता था? यदि बुजुर्ग जीवित हैं, तो उनसे पता कीजिए। यह तब होता था जब संतान बढ़ जाती थी, जब वंश वृद्धि हो जाती थी। उसी तरह जैसे, जब परिवार में नई बहू आती है, तो सास बहू की योग्यता देखती है और कुछ समय बाद उसे चाबियाँ देती है — उसी तरह बच्चे के जन्म के बाद, जब दूसरा बच्चा हो गया हो और वह दूसरा बच्चा कम से कम तीन साल का हो गया हो; या, यदि एक बच्चा है, तो कहा जाता है, बारह साल का — तब तंत्रोक्त वस्तुएँ दी जाती थीं। आज, वे कहते हैं, आदमी बचपन से सियार सिंगी और हत्था जोड़ी लेकर घूम रहा है। और ये सब चीजें कौन मानता है, वे पूछते हैं।
आकर्षक व्यक्तित्व के लिए क्या करना चाहिए?
लग्नेश और इष्ट की पूजा, और माला या रत्न धारण
आकर्षक व्यक्तित्व के लिए क्या करें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: अपने लग्नेश और अपने इष्ट से जुड़ा पूजन-पाठ कीजिए। माला या रत्न आदि पहनिए — इस तरह व्यक्तित्व में निखार आएगा। और बिल्कुल, वे जोड़ते हैं, आप बगलामुखी स्तोत्र और सतनाम पाठ कर सकते हैं।
आकर्षक व्यक्तित्व के लिए क्या करें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: अपने लग्नेश से जुड़ा, और अपने इष्ट देवता से जुड़ा पूजन-पाठ कीजिए। माला या रत्न आदि पहनिए — इस तरह व्यक्तित्व में निखार आएगा। बिल्कुल, वे जोड़ते हैं, आप बगलामुखी स्तोत्र और सतनाम पाठ कर सकते हैं।
उनके अपने निजी जीवन की सीमाएँ ही कारण हैं कि वे लोगों को किसी और को खोजने को कहते हैं
उनके अपने जीवन की सीमाएँ, और प्रश्नकर्ता की संतुष्टि
एक श्रोता कहते हैं कि वे ठीक पूछ रहे हैं कि वक्ता लोगों को किसी और को खोजने को क्यों कहते हैं। वक्ता कहते हैं कि कारण यह है कि उनका अपना निजी जीवन ऐसा नहीं है कि वे सबके साथ इन सब विषयों में उतरें। अपनी सामर्थ्य से, गुरु की आज्ञा से, वे आप सबके सामने जितना संभव है उतना कर रहे हैं। उनके अपने जीवन की एक सीमा है, एक मर्यादा है, और वे उससे बाहर नहीं आना चाहते, न कभी किसी से मिलना चाहते हैं, न किसी से मिलते हैं। अपनी सामर्थ्य से, जहाँ तक हो सके, अपने बल और अपने साथी साधकों के बल के अनुसार, वे अवश्य सहयोग करते हैं। किसी और से मिलने को कहने का दूसरा कारण यह है कि आप संतुष्ट हों — वहाँ जाइए और वहीं से काम करवाइए। सेवा, पूजा, भक्ति और पाठ का अपना स्थान है, और जितनी जरूरत है वह अपनी जगह है; पर इन सब चीजों की पूरी गहराई तक जाना, और उसके बाद सामने वाले व्यक्ति की संतुष्टि, उसी पर निर्भर है।
एक श्रोता कहते हैं कि वे ठीक पूछ रहे हैं कि वक्ता लोगों को किसी और को खोजने को क्यों कहते हैं। कारण यह है, वक्ता कहते हैं: मेरा अपना निजी जीवन ऐसा नहीं है कि मैं सबके साथ इन सब विषयों में उतरूँ। अपनी सामर्थ्य से, गुरु की आज्ञा से, मैं आप सबके सामने जितना संभव है उतना कर रहा हूँ। मेरे अपने जीवन की एक सीमा है, एक मर्यादा है। मैं उससे बाहर नहीं आना चाहता, न कभी किसी से मिलना चाहता हूँ, न किसी से मिलता हूँ। अपनी सामर्थ्य से, जहाँ तक हो सके, अपने बल और अपने साथी साधकों के बल के अनुसार, मैं अवश्य सहयोग करता हूँ। किसी और से मिलने को कहने का दूसरा कारण यह है कि आप संतुष्ट हों — वहाँ जाइए और वहीं से काम करवाइए। सेवा, पूजा, भक्ति और पाठ का अपना स्थान है। जितनी जरूरत है वह अपनी जगह है; पर इन सब चीजों की पूरी गहराई तक जाना, और उसके बाद सामने वाले लोगों की संतुष्टि — यह उसी पर निर्भर है।
गणेश के अलावा कंप्यूटर ज्ञान के लिए किस देवी की साधना उपयुक्त है?
भगवती सरस्वती; नील सरस्वती तंत्रोक्त हैं और उनके नियम हैं
कंप्यूटर ज्ञान के लिए गणेश जी के अलावा किसी देवी की साधना के बारे में पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: अच्छा, आप देवी की साधना करना चाहते हैं — भगवती सरस्वती से जुड़ी साधना कीजिए। यदि आप नील सरस्वती से जुड़ी साधना करेंगे, तो वह तंत्रोक्त हो जाएगी; यदि आप नियम निभा सकें, तो कीजिए। अन्यथा भगवती सरस्वती की कीजिए।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के बारे में और गणेश जी के अलावा कंप्यूटर ज्ञान के लिए किसी देवी की साधना के बारे में पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: अच्छा, आप देवी की साधना करना चाहते हैं। भगवती सरस्वती से जुड़ी साधना कीजिए। यदि आप नीलसरस्वती से जुड़ी साधना करेंगे, तो वह तंत्रोक्त हो जाएगी; यदि आप नियम निभा सकें, तो कीजिए। अन्यथा भगवती सरस्वती की कीजिए।
स्वप्न में देवताओं के साथ गंदी चीजें दिखने का क्या अर्थ है?
अभिचार कर्म में डाले जाने का संकेत
एक श्रोता कहते हैं कि कभी-कभी उन्हें स्वप्न में कोई गंदी चीज दिखती है और उसके साथ भगवान भी दिखते हैं, और पूछते हैं कि इसका क्या अर्थ है। वक्ता उत्तर देते हैं कि इसका अर्थ है कि आपको अभिचार कर्म में डाला गया है। अभिचार कर्म में देवता और शुभ शक्ति और उस दूसरी तरह की शक्ति एक साथ होते हैं; ऐसा होता है, यह चलता है। वे कहते हैं, तंत्र में यह चीज आसानी से संभव है; लोग इस तरह की विद्याएँ चलाते हैं, और उसी कारण ये चीजें दिखती हैं।
एक श्रोता कहते हैं कि कभी-कभी उन्हें स्वप्न में कोई गंदी चीज भी दिखती है और स्वप्न में उसके साथ भगवान भी दिखते हैं, और पूछते हैं कि इसका अर्थ क्या है। इसका अर्थ यह है, वक्ता उत्तर देते हैं: कि आपको अभिचार कर्म में डाला गया है। अभिचार कर्म में देवता और शुभ शक्ति, और उस दूसरी तरह की शक्ति, एक साथ होते हैं; ऐसा होता है, ये चलते हैं। तंत्र में यह चीज आसानी से संभव है। लोग इस तरह की विद्याएँ चलाते हैं, और उसी कारण ये चीजें दिखती हैं।
नया साधक अधिक से अधिक कितने पाठ कर सकता है?
शुरुआत में छत्तीस पाठ
अधिक से अधिक कितने पाठ किए जा सकते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: छत्तीस पाठ कीजिए, यदि शुरुआत में करना है और आप नए हैं।
अधिक से अधिक कितने पाठ किए जा सकते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: छत्तीस पाठ कीजिए, यदि शुरुआत में करना है और आप नए हैं।
ऊर्जा बनानी होती है, किसी और की ऊर्जा से खींचनी नहीं
इनकार — अपनी ऊर्जा बनाइए
एक श्रोता उनसे ऊर्जा खींचने की विधि बताने को कहते हैं। वक्ता श्रोता का नाम लेकर पूछते हैं कि आप कहाँ अटक रहे हैं; किसकी ऊर्जा खींचनी है? अपनी ऊर्जा बनाइए — दूसरे की कहाँ से खींचना चाहते हैं? यह तो वैसा ही हो गया जैसे कहना: मुझे धन खींचने की विधि बताइए। सबने मेहनत से कमाया है। खींचना और खींचने वाली चीजें हम यहाँ नहीं बताते, वे कहते हैं; किसी और की मदद लीजिए जो आपको खींचने की विधि बताएगा। यह सब काम यहाँ नहीं होता।
एक श्रोता उनसे ऊर्जा खींचने की विधि बताने को कहते हैं। आप कहाँ अटक रहे हैं, वक्ता श्रोता का नाम लेकर पूछते हैं। किसकी ऊर्जा खींचनी है? अपनी ऊर्जा बनाइए — दूसरे की कहाँ से खींचना चाहते हैं? यह तो बिल्कुल वैसी ही बात हो गई जैसे कहना: मुझे धन खींचने की विधि बताइए। सबने मेहनत से कमाया है। खींचना, और खींचने वाली चीजें, हम यहाँ नहीं बताते। किसी और की मदद लीजिए, जो आपको खींचने की विधि बताएगा। यह सब काम यहाँ नहीं होता।
यदि शक्ति केवल मंदिर में ही सवारी में आती है तो उसे कैसे मुक्त करें?
वहीं उससे बुलवाइए, और उनके भैरव की मदद लीजिए
एक श्रोता पूछते हैं कि यदि सवारी उन पर केवल मंदिर में ही आती है तो उस शक्ति को बंधन से कैसे मुक्त करें। वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: यदि वह किसी वचन में होगी, यदि किसी अभिचार में उस पर किसी तरह का बंधन डाला गया है, तो उस स्थान पर पहले उनसे बुलवाइए। उनके भैरव से जुड़ी मदद लीजिए — वे उन्हें वचन से खोलकर मुक्त करते हैं। चीजें अपने स्थान पर होती हैं; जब सवारी आए, वहीं पूछना चाहिए। वे स्वयं बताएँगी।
एक श्रोता पूछते हैं कि यदि सवारी उन पर केवल मंदिर में ही आती है तो उसे बंधन से कैसे मुक्त करें। आपका कहना यह है, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं, कि आप पर कोई सवारी आती है, और यदि वह केवल मंदिर में ही आती है, तो उसे बंधन से कैसे मुक्त करें। यदि वह किसी वचन में होगी, यदि किसी अभिचार में उस पर किसी तरह का बंधन डाला गया है, तो उस स्थान पर पहले उनसे बुलवाइए। उनके भैरव से जुड़ी मदद लीजिए — वे उन्हें वचन से खोलकर मुक्त करते हैं। चीजें अपने स्थान पर होती हैं; जब सवारी आए, वहीं पूछना चाहिए। वे स्वयं बताएँगी।
शक्ति को वचन से मुक्त करने के लिए क्या उपयोग होता है?
उतारा, खप्पर, बलि, शाबर मंत्र, उल्टा खप्पर
वक्ता कहते हैं कि यदि वे बताएँगी कि यहाँ कौन सा वचन है, क्या है और कैसा है, तो उसका एक काट होता है, और बाद में उतारा किया जाता है। खप्पर आदि का उपयोग होता है; बलि का उपयोग होता है; दूसरी तरह के शाबर मंत्रों का भी उपयोग होता है; उल्टा खप्पर लगाया जाता है। इन सबके माध्यम से वह वचन से मुक्त होती है, और उसके बाद वे चली जाएँगी।
यदि वे बताएँगी — कि यहाँ कौन सा वचन है, क्या है, कैसा है — तो उसका एक काट होता है, और बाद में उतारा किया जाता है। खप्पर आदि का उपयोग होता है; बलि का उपयोग होता है। दूसरी तरह के सबर मंत्र का भी उपयोग होता है; उल्टा खप्पर लगाया जाता है। इन सबके माध्यम से वह वचन से मुक्त होती है; और उसके बाद वे चली जाएँगी।
वाक सिद्धि के लिए क्या करना चाहिए?
किसी एक चीज पर एकाग्र रहिए
वाक सिद्धि के लिए क्या करें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: अभी आप काफी अस्थिर दिख रहे हैं। किसी एक चीज पर एकाग्र रहिए; उसी चीज से आपको सब कुछ मिलेगा।
वाक् सिद्धि के लिए क्या करें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: अभी आप काफी अस्थिर दिख रहे हैं। किसी एक चीज पर एकाग्र रहिए। उसी चीज से आपको सब कुछ मिलेगा।
सुगंधित पदार्थ मंत्रोक्त विधि से धारण करना सबसे अच्छा है
मंत्रोक्त विधि से धारण किए सुगंधित पदार्थ
वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि पिछली बार उन्होंने उन्हें यह बात बताई थी कि कैसे और क्या करना चाहिए। आपको सुगंधित पदार्थ मंत्रोक्त विधि से धारण करने चाहिए — वे कहते हैं, वही सबसे अच्छा रहेगा।
वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि पिछली बार उन्होंने उन्हें इस चीज के बारे में बताया था कि कैसे और क्या करना चाहिए। आपको सुगंधित पदार्थ मंत्रोक्त विधि से धारण करने चाहिए। वही सबसे अच्छा रहेगा।
यहाँ कोई शक्ति ट्रांसफर नहीं होती — न क्रेडिट, न डेबिट
न क्रेडिट, न डेबिट
यह पूछे जाने पर कि क्या वे शक्ति ट्रांसफर करते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं भाई, हम कोई शक्ति ट्रांसफर नहीं करते। देखिए — यदि आपको शक्ति ट्रांसफर करवानी है, या कोई ऊर्जा खिंचवानी है, तो आपस में बात कर लीजिए; यह आपस में लेन-देन की अच्छी बात है। मेरे यहाँ यह सब नहीं होता। हम ट्रांसफर-ट्रांसफर नहीं करते। न क्रेडिट, न डेबिट।
यह पूछे जाने पर कि क्या वे शक्ति ट्रांसफर करते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं भाई, हम कोई शक्ति ट्रांसफर नहीं करते। देखिए — यदि आप शक्ति ट्रांसफर करवाना चाहते हैं, या कोई ऊर्जा खिंचवानी है, तो आपस में बात कर लीजिए। यह आपस में लेन-देन की अच्छी बात है। मेरे यहाँ यह सब नहीं होता। हम ट्रांसफर-ट्रांसफर नहीं करते। न क्रेडिट, न डेबिट।
लाल गुड़हल के फूल का तांत्रिक महत्व क्या है?
शमी के सौ फूल बनाम एक लाल कनेर या गुड़हल
गणेश पूजा और काली माँ की पूजा में लाल गुड़हल के फूल का तांत्रिक महत्व और रहस्य पूछे जाने पर वक्ता इसे बहुत अच्छा प्रश्न बताते हैं और बस इतना कहते हैं: कि यदि शमी के सौ फूल चढ़ाए जाएँ, और यदि एक लाल कनेर या एक लाल गुड़हल का फूल चढ़ाया जाए, तो उतना ही फल मिलता है — इन दोनों को एक के ऊपर एक चढ़ाने पर।
गणेश पूजा और काली माँ की पूजा में लाल गुड़हल के फूल का तांत्रिक महत्व और रहस्य पूछे जाने पर वक्ता इसे बहुत अच्छा प्रश्न बताते हैं। वे बस इतना ही कहेंगे: कि यदि शमी के सौ फूल चढ़ाए जाएँ, और रक्त कनेर, लाल गुड़हल का फूल, यदि एक चढ़ाया जाए, तो उतना फल मिलता है — इन दोनों को एक के ऊपर एक चढ़ाने पर।
क्या गुरु से मिला मंत्र रात में किया जा सकता है?
गुरुमुख मंत्र रात में अवश्य किया जा सकता है
वक्ता कहते हैं कि गुरु के मुख से मिला मंत्र आप बिल्कुल रात के समय कर सकते हैं।
गुरु के मुख से मिला मंत्र, वक्ता कहते हैं, आप बिल्कुल रात के समय कर सकते हैं।
क्या पंचांगुली साधना के दुष्प्रभाव होते हैं?
एक सात्विक साधना; परेशानी तामसिक उग्र विधि से आती है
पंचांगुली साधना पर वक्ता कहते हैं कि अलग से बताना होगा। दूसरी बात पर — जो उन्हें लगता है प्रश्नकर्ता की टिप्पणी थी, कि इसका कोई दुष्प्रभाव है या नहीं — वे कहते हैं कि यह सात्विक साधना है; दुष्प्रभाव होना एक भ्रम है। केवल जब इसे तामसिक, उग्र विधि से और किसी योगिनी की मदद से किया जाता है, तब यह परेशानी देती है: ऊर्जाएँ ऊपर आती हैं, और शरीर टूटता है।
पंचांगुली साधना पर अलग से बताना होगा, वक्ता प्रश्नकर्ता को संबोधित करते हुए कहते हैं। दूसरी बात — शायद आपका प्रश्न था, कहीं कोई टिप्पणी थी, कि इसका कोई दुष्प्रभाव है या नहीं। यह सात्विक साधना है। दुष्प्रभाव होना एक भ्रम है। जब इसी को तामसिक, उग्र विधि से और किसी योगिनी की मदद से किया जाता है, तब यह कठिनाई देती है। ऊर्जाएँ ऊपर आती हैं; शरीर टूटता है।
सेवा के दौरान शरीर में तेज ऊर्जा बहे तो क्या करना चाहिए?
नवरात्रि में अपने स्वरूप का कवच पढ़िए; फिर पहचान खुलवाइए
एक श्रोता कहते हैं कि उन पर कुछ खेल रहा है, पूरे शरीर में एक तेज ऊर्जा बह रही है, और वे सेवा और पूजा भी करते हैं। वक्ता श्रोता का नाम लेकर दो काम करने को कहते हैं। सबसे पहले, भगवती के जिस स्वरूप की आप उपासना करते हैं, उससे जुड़ा कवच नवरात्र में जितना हो सके, अपनी सामर्थ्य से पढ़िए। यदि उसके बाद भी शक्ति आती है, तो किसी जानकार की मदद लेकर उसकी पहचान खुलवाइए — वह स्वयं शायद ही बताएगी।
एक श्रोता कहते हैं कि उन पर कोई खेल रहा है, पूरे शरीर में एक तेज ऊर्जा बह रही है, और वे सेवा और पूजा भी करते हैं। तो दो काम कीजिए, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं। सबसे पहले, भगवती के जिस स्वरूप की आप उपासना करते हैं, उनसे जुड़ा कवच अपनी सामर्थ्य से और जितना हो सके, नवरात्रि में पढ़िए। यदि उसके बाद भी शक्ति आती है, तो किसी ज्ञान रखने वाले की मदद लेकर उसकी पहचान खुलवाइए। वह स्वयं शायद ही बताएगी।
सस योग कब फलित होता है?
शनि की महादशा, अंतर्दशा और सूक्ष्मदशा में
यह पूछे जाने पर कि क्या सस योग फलित होता है, वक्ता उत्तर देते हैं: शनि की महादशा, अंतर्दशा, सूक्ष्मदशा आदि में। और साथ में, यदि आपकी जन्म कुंडली में शनि की स्थिति ठीक हो।
यह पूछे जाने पर कि क्या सस योग फलित होता है, वक्ता उत्तर देते हैं: शनि की महादशा, अंतर्दशा, सूक्ष्मदशा आदि में। और साथ में, यदि आपकी जन्म कुंडली में शनि की स्थिति ठीक हो।
शरीर में दर्द किस बात का संकेत है?
किसी बड़ी शक्ति की उपस्थिति
शरीर में दर्द के बारे में पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि कोई बड़ी शक्ति होगी, तो यह चीज होगी।
शरीर में दर्द के बारे में पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: यदि कोई बड़ी शक्ति होगी, तो यह चीज होगी।
क्या माँ गौरी के रूप में देवी की पूजा की जा सकती है?
माँ गौरी के रूप में पूजा गलत नहीं
वक्ता कहते हैं कि यह बिल्कुल गलत नहीं है; आप माँ गौरी के रूप में पूजा कर सकते हैं।
यह बिल्कुल गलत नहीं है, वक्ता कहते हैं। आप माँ गौरी के रूप में पूजा कर सकते हैं।
क्या बहुत शराब पीने वाले पति के लिए कोई उपाय है?
पहले बताई गई होलिका की विधि, समय आने पर फिर बताई जाएगी
बहुत शराब पीने वाले पति की शराब छुड़वाने का कोई उपाय पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि होलिका की एक विधि बताई गई थी; अभी, जब ऐसा समय आएगा, तो फिर बताई जाएगी।
बहुत शराब पीने वाले पति की शराब छुड़वाने का कोई उपाय पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि होलिका की एक विधि बताई गई थी। अभी — जब ऐसा समय आएगा, तब फिर बताई जाएगी।
जब आने वाले विवाह के विरुद्ध शत्रु काम कर रहे हों तो क्या करना चाहिए?
शत्रुओं के स्तंभन के लिए दुर्गा सप्तशती का संपुट पाठ
एक श्रोता कहते हैं कि उनके भाई की शादी होने वाली है पर शत्रु लोग बहुत दबाव डाल रहे हैं, और कुछ टोटके पूछते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं: गुप्त नवरात्रि में किसी मंदिर में किसी अच्छे दुर्गा पाठी ब्राह्मण से दुर्गा सप्तशती का संपुट पाठ करवाइए — शत्रुओं के स्तंभन के लिए।
एक श्रोता कहते हैं कि उनके भाई की शादी होने वाली है, पर शत्रु लोग बहुत ज्यादा दबाव डाल रहे हैं, और कुछ टोटके पूछते हैं। गुप्त नवरात्रि में किसी मंदिर में, किसी अच्छे दुर्गा पाठी ब्राह्मण से दुर्गा सप्तशती का संपुट पाठ करवाइए। शत्रुओं के स्तंभन के लिए।
विवाह इतना पास होने पर टोटका काम नहीं आएगा; सप्तमी से नवमी का पाठ आएगा
मंदिर में सप्तमी, अष्टमी और नवमी का तीन दिन का पाठ
वक्ता कहते हैं कि जब सब कुछ इतना पास है तो टोटका करने से काम नहीं चलेगा। और कुछ नहीं तो तीन दिन का ही करवा लीजिए — सप्तमी, अष्टमी और नवमी का — और आपको काफी राहत मिलेगी। यदि मंदिर में करवाएँगे, तो खर्च कम पड़ेगा, मंडल पूजा और बहुत सारे पूजा-पाठ का खर्च बचेगा, और जल्दी भी हो जाएगा। वे कहते हैं, अपने ही क्षेत्र में करवाइए।
जब सब कुछ इतना पास है, तो टोटका करने से काम नहीं चलेगा, वक्ता कहते हैं। और कुछ नहीं तो तीन दिन का ही करवा लीजिए — सप्तमी, अष्टमी और नवमी का — और आपको काफी राहत मिलेगी। यदि मंदिर में करवाएँगे, तो आपका खर्च कम पड़ेगा; मंडल पूजा और बहुत सारे पूजा-पाठ का खर्च बचेगा, और जल्दी भी हो जाएगा। अपने ही क्षेत्र में करवाइए।
किसी देवता का कवच अधिक शक्तिशाली है या शाबर रक्षा मंत्र?
कवच
यह पूछे जाने पर कि किसी देवता का कवच स्तोत्र अधिक शक्तिशाली है या शाबर रक्षा मंत्र, वक्ता उत्तर देते हैं: कवच।
क्या कोई तांत्रिक आपके साथ चल रही यक्षिणी को छल से ले जा सकता है?
ले जा सकता है, क्योंकि आपके पास उसे रखने और बचाने का ज्ञान नहीं है
यह पूछे जाने पर कि यदि किसी यंत्र से यक्षिणी जैसी कोई शक्ति अदृश्य रूप में आपके साथ चलने लगे, तो क्या कोई तांत्रिक छल से उसे ले जाकर अपने पास रख सकता है, और क्या ऐसे में शक्ति विरोध नहीं करती, वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं, वह नहीं करती। आप मेहनत करेंगे, पर आपके पास यह ज्ञान नहीं है कि उन्हें अपने साथ कैसे रखें या सुरक्षा में कैसे रखें। सामने वाले व्यक्ति के पास ऐसी विद्या है; वचन देकर और अपनी विद्याओं का उपयोग करके वह उसे ले जाकर रख सकता है।
यह पूछे जाने पर कि यदि किसी यंत्र से यक्षिणी जैसी कोई शक्ति अदृश्य रूप में आपके साथ चलने लगे, तो क्या कोई तांत्रिक छल से उसे ले जाकर अपने पास रख सकता है, और क्या ऐसे में शक्ति विरोध नहीं करती — वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं, वह नहीं करती। आप मेहनत करेंगे; पर आपके सामने, आपके पास यह ज्ञान नहीं है कि उन्हें किस तरह अपने साथ रखना है या सुरक्षा में रखना है। सामने वाले व्यक्ति के पास ऐसी विद्या है। वचन देकर और अपनी विद्याओं का उपयोग करके, वह उसे ले जाकर रख सकता है।
ले जाए जाने का शक्ति विरोध करती है, पर वह लाचार होती है
वह विरोध करती है, पर लाचार है
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि शक्ति विरोध नहीं करती — वह विरोध करती है; पर वह लाचार होती है।
ऐसा नहीं है कि शक्ति विरोध नहीं करती, वक्ता कहते हैं। ऐसा नहीं है कि वे विरोध नहीं करतीं। पर वे लाचार होती हैं।
क्या उच्छिष्ट गणपति में नील कमल का महत्व है?
बहुत महत्वपूर्ण
यह पूछे जाने पर कि क्या उच्छिष्ट गणपति में नील कमल के फूल का महत्व है, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बहुत महत्वपूर्ण है।
यह पूछे जाने पर कि क्या उच्छिष्ट गणपति में नील कमल के फूल का महत्व है, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बहुत महत्वपूर्ण है।
अलग-अलग देवताओं के लिए एक माला होनी चाहिए या अलग-अलग?
मुख्य जाप के लिए एक, बाकी सबके लिए एक — इसलिए दो आवश्यक
यह पूछे जाने पर कि देवी-देवताओं के जाप के लिए माला एक होनी चाहिए या अलग-अलग, वक्ता उत्तर देते हैं: यदि आप सामान्य कर रहे हैं, तो एक ही रखिए, अलग-अलग नहीं। मुख्य रूप से ऐसा होना चाहिए: कि जो आपका प्रधान जाप है उसके लिए एक माला हो, और बाकी सभी देवी-देवताओं के लिए एक माला हो। वे कहते हैं, इसीलिए दो मालाएँ आवश्यक हैं।
यह पूछे जाने पर कि देवी-देवताओं के जाप के लिए माला एक होनी चाहिए या अलग-अलग, वक्ता उत्तर देते हैं: यदि आप सामान्य कर रहे हैं, तो एक ही रखिए; अलग-अलग नहीं। मुख्य रूप से ऐसा होना चाहिए: कि जो आपका प्रधान जाप है उसके लिए एक माला हो, और बाकी सभी देवी-देवताओं के लिए एक माला हो। इसीलिए दो मालाएँ आवश्यक हैं।
यक्षिणी साधना YouTube पर नहीं बताई जाती और कभी नहीं बताई जाएगी
YouTube पर नहीं बताई जाती, और कभी नहीं बताई जाएगी
कृपा करके यक्षिणी साधना बताने को कहे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: यक्षिणी साधना YouTube पर ऐसे नहीं बताई जाती, न बताई जाएगी। केवल भगवती की सेवा और पूजा — बस उतना ही।
कृपा करके यक्षिणी साधना बताने को कहे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: यक्षिणी साधना YouTube पर ऐसे नहीं बताई जाती, न बताई जाएगी। भगवती की सेवा और पूजा — केवल उतना ही। भगवती आप पर अपना आशीर्वाद बनाए रखेंगी।
कॉल पर सवारी को पूरी तरह हटाना एक झूठा आश्वासन है जो वे देने से मना करते हैं
झूठा आश्वासन देने से इनकार
यह पूछे जाने पर कि यदि उनसे टेलीग्राम पर बात करते हुए सवारी आ जाए तो क्या वे उसे पूरी तरह हटा देंगे, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: टेलीग्राम पर बात कीजिए, पर पूरी तरह हटाना संभव नहीं है। वे कहते हैं, मैं बिल्कुल ऐसा झूठा आश्वासन नहीं दे सकता कि फोन पर बात करते हुए मैं निवारण कर दूँगा। चाहे कोई भी शक्ति हो, नकारात्मक या सकारात्मक, मैं यहाँ से हस्तक्षेप भी नहीं कर सकता। इतना मैं अवश्य कर सकता हूँ: उनसे सम्मान से बात करके, प्रार्थना और निवेदन करके, पूछ सकता हूँ कि क्या है और क्या नहीं, और अपने अनुसार आपकी ओर से भगवती से प्रार्थना कर सकता हूँ। इससे अधिक मैं आपको झूठा आश्वासन नहीं दे सकता — कि मैं यह करूँगा और वह करूँगा; न ऐसा कुछ होता है।
यह पूछे जाने पर कि यदि उनसे टेलीग्राम पर बात करते हुए सवारी आ जाए तो क्या वे उसे पूरी तरह हटा देंगे, वक्ता श्रोता का नाम लेकर उत्तर देते हैं: टेलीग्राम पर बात कीजिए; पर जहाँ तक पूरी तरह हटाने की बात है, यह संभव नहीं है। मैं बिल्कुल ऐसा झूठा आश्वासन नहीं दे सकता कि फोन पर बात करते हुए मैं निवारण कर दूँगा। चाहे कोई भी शक्ति हो — नकारात्मक, सकारात्मक — मैं यहाँ से उनमें हस्तक्षेप भी नहीं कर सकता। इतना मैं अवश्य कर सकता हूँ: उनसे सम्मान के साथ बात करके, प्रार्थना और निवेदन करके, पूछ सकता हूँ कि क्या है और क्या नहीं। अपने अनुसार मैं आपके लिए भगवती से प्रार्थना कर सकता हूँ। इससे अधिक मैं आपको झूठा आश्वासन नहीं दे सकता — कि मैं यह करूँगा, वह करूँगा; न ऐसा कुछ होता है।
सेवा के लिए माँ विंध्यवासिनी का लक्ष्मी स्वरूप बताया गया
उनका लक्ष्मी स्वरूप
वक्ता एक श्रोता से माँ विंध्यवासिनी जी के लक्ष्मी स्वरूप की सेवा और पूजा करने को कहते हैं।
माँ विंध्यवासिनी जी के लक्ष्मी स्वरूप की सेवा और पूजा कीजिए, वक्ता एक श्रोता से कहते हैं।
सुरक्षा मंत्र कितने समय तक रक्षा करता है?
जब तक आपका शरीर शुद्ध है
सुरक्षा मंत्र कितने समय तक रक्षा देता है, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: जब तक आपका शरीर शुद्ध है, तब तक।
सुरक्षा मंत्र कितने समय तक रक्षा करता है, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: जब तक आपका शरीर शुद्ध है, तब तक।
क्या माँ दुर्गा के बत्तीस नाम सिद्ध करने के लिए गुरु दीक्षा आवश्यक है?
बिल्कुल आवश्यक नहीं — चक्र विधि चैनल पर है
यह पूछे जाने पर कि माँ दुर्गा के बत्तीस नाम सिद्ध करने के लिए क्या गुरु दीक्षा लेना आवश्यक है, वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल आवश्यक नहीं; आप आराम से कर सकते हैं, और इसकी विधि भी बताई गई है। सुरक्षा के लिए जो भी चाहे — दुर्गा जी के बत्तीस नाम की विधि, जो चक्र विधि चैनल पर बताई गई है, कि द्वात्रिंशन्नाम माला कैसे सिद्ध करें — गुप्त नवरात्रि में उसे सिद्ध कर सकते हैं। किसी दीक्षा की आवश्यकता नहीं है।
यह पूछे जाने पर कि माँ दुर्गा के बत्तीस नाम सिद्ध करने के लिए क्या गुरु दीक्षा लेना आवश्यक है, वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल आवश्यक नहीं है। आप आराम से कर सकते हैं; इसकी विधि भी बताई गई है। सुरक्षा के लिए जो भी चाहे — दुर्गा जी के बत्तीस नाम की जो विधि है, जो चक्र विधि चैनल पर बताई गई है, कि द्वात्रिंशन्नाम माला किस तरह सिद्ध करें — आप उसे गुप्त नवरात्रि में सिद्ध कर सकते हैं। किसी दीक्षा की आवश्यकता नहीं है।
स्वयं शुरू किया गया भोग बंद कर दें तो क्या होता है?
अपने आप बंद करने से परेशानी बढ़ती है
एक श्रोता लिखती हैं कि उन्होंने अपनी ओर से देवी-देवताओं को भोग देना शुरू किया था, लगातार देती आ रही हैं, और अब बंद करना चाहती हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि उनके अनुसार, यदि आप अब अपनी ओर से बंद करेंगी, तो परेशानी और कठिनाई बढ़ेगी।
एक श्रोता लिखती हैं कि उन्होंने अपनी ओर से देवी-देवताओं को भोग देना शुरू किया था, कि वे लगातार भोग देती आ रही हैं, और अब उसे बंद करना चाहती हैं। उनके अनुसार, वक्ता उत्तर देते हैं, यदि आप अब अपनी ओर से बंद करेंगी, तो परेशानी और कठिनाई बढ़ेगी।
क्या किसी विशेष कुल में और उन्हीं माता-पिता के यहाँ जन्म मिलता है?
यह कुल की शक्ति पर निर्भर है और हिसाब-किताब का विषय है
वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि उनका प्रश्न बहुत अच्छा है, पर यह कुल की शक्ति पर निर्भर है — किसी कुल में जन्म होगा या नहीं, वही माता-पिता मिलेंगे या नहीं। वे कहते हैं, यह रखे गए हिसाब-किताब का विषय बन जाता है: क्या बनेंगे और क्या नहीं।
वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि उनका प्रश्न बहुत अच्छा है, पर यह कुल की शक्ति पर निर्भर है — किसी कुल में जन्म होगा या नहीं; वही माता-पिता भी मिलेंगे या नहीं। यह, वे कहते हैं, रखे गए हिसाब-किताब का विषय बन जाता है। क्या बनेंगे, क्या नहीं।
गुप्त नवरात्रि में बिल्कुल नई साधिका को क्या करना चाहिए?
जिस स्वरूप की वे पूजा करती हैं उसकी चालीसा
वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि यदि वे बिल्कुल नई साधिका हैं, तो भगवती के जिस स्वरूप की सेवा और पूजा करती हैं, उससे जुड़ी चालीसा अपनी सामर्थ्य से पढ़ें। वे जोड़ते हैं कि चालीसा सिद्ध की जा सकती है, और काली चालीसा और तंत्रोक्त दुर्गा चालीसा को सिद्ध करने की विधि चैनल पर बताई गई है।
गुप्त नवरात्रि में, वक्ता एक श्रोता का नाम लेकर कहते हैं, यदि आप बिल्कुल नई साधिका हैं, तो भगवती के जिस स्वरूप की आप सेवा और पूजा करती हैं, उससे जुड़ी चालीसा अपनी सामर्थ्य से पढ़िए। चालीसा सिद्ध की जा सकती है। उसे सिद्ध करने की विधि — काली चालीसा और तंत्रोक्त दुर्गा चालीसा — चैनल पर बताई गई है।
चालीसा से ऊपर की सीढ़ी क्या है?
चालीसा, फिर बत्तीस नामावली, फिर सतनाम और कवच, फिर सहस्रनाम और हृदय
वक्ता कहते हैं कि जितने भी नए साधक हैं, जो बिल्कुल नए हैं और कुछ नहीं किया है, उन्हें चालीसा से शुरू करना चाहिए। जो उससे आगे बढ़ गए हैं वे बत्तीस नामावली आदि की सिद्धि कर सकते हैं। जो उससे और आगे बढ़ गए हैं वे सतनाम आदि की, कवच की, और दूसरे स्तोत्रों की कर सकते हैं। उसके बाद सहस्रनाम आदि की ओर, और हृदय की ओर बढ़ सकते हैं।
जितने भी नए साधक हैं, जो बिल्कुल नए हैं और जिन्होंने कुछ नहीं किया है — उन्हें चालीसा से शुरू करना चाहिए। जो उनसे आगे बढ़ गए हैं, वे बत्तीस नामावली आदि की सिद्धि कर सकते हैं। जो उससे और आगे बढ़ गए हैं, वे सतनाम आदि की कर सकते हैं; कवच की कर सकते हैं; जो दूसरे स्तोत्र हैं उनकी कर सकते हैं। उसके बाद सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। आदि की ओर, और हृदय की ओर बढ़ सकते हैं।
क्या हर अलग साधना के लिए अलग दीक्षा चाहिए?
दीक्षा केवल एक बार होती है
यह पूछे जाने पर कि क्या अलग-अलग साधनाओं के लिए अलग दीक्षा लेना आवश्यक है, वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं। दीक्षा केवल एक बार होती है। यदि आप कोई विशेष साधना कर रहे हैं, तो मंत्र के विधि विधान के बारे में एक बार अपने गुरु से पूछ लेना चाहिए, और वे दिशा देंगे; बस इतना होता है।
दुर्गा सप्तश्लोकी का दिन में कितनी बार जाप करना चाहिए?
सात बार; और सप्तशती के स्तोत्रों के बाद लौंग और कपूर
दुर्गा सप्तश्लोकी का दिन में कितनी बार जाप करना सबसे अच्छा है, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: सात बार — सप्तश्लोकी, सात बार। यह पूछे जाने पर कि क्या सप्तशती के स्तोत्रों के पाठ के बाद कपूर में लौंग दी जा सकती है, वे उत्तर देते हैं: बिल्कुल दी जा सकती है।
सप्तश्लोकी का दिन में कितनी बार जाप करना सबसे अच्छा है, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: सात बार। सप्तश्लोकी, सात बार। यह पूछे जाने पर कि क्या दुर्गा सप्तशती के स्तोत्रों के पाठ के बाद कपूर में लौंग दी जा सकती है, वे उत्तर देते हैं: बिल्कुल दी जा सकती है।
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