काल भैरव अष्टमी की पूर्व संध्या — हर घर में बटुक भैरव क्यों, और लंबी प्रश्नोत्तरी
काल भैरव अष्टमी पर पूजा और बदनामी पर प्रवचन।
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घर में भैरव की पूजा को लेकर इतने लोग भ्रम में क्यों पड़ जाते हैं?
प्रसिद्ध वक्ताओं का भैरव के बारे में नकारात्मक बातें फैलाना
वक्ता कहते हैं कि वही प्रश्न बार-बार इसलिए आते हैं क्योंकि प्रसिद्ध कथावाचक और विद्वान कहलाने वाले लोग — जो स्वयं को त्रिकाल दृष्टि वाला और बिना बताए सब जानने वाला दिखाते हैं — भगवान भैरव के बारे में गलत या नकारात्मक बातें कहते हैं। फिर यह डर फैल जाता है कि घर में उनकी सेवा-पूजा नहीं करनी चाहिए।
वे कहते हैं कि यह बात वे पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं, फिर भी कह रहे हैं क्योंकि फिर से बहुत सारे प्रश्न आए हैं। लोग भ्रम में क्यों पड़ते हैं, यह उन्हें समझ नहीं आता, पर कारण दिखता है: अब तक लोगों ने यूट्यूब पर जो देखा या ज्ञानी कहलाने वालों से जो सुना, उसी से उनकी सोच बनी। वे कहते हैं कि सबके नाम नहीं लिए जा सकते, पर ऐसे प्रसिद्ध कथावाचक और प्रसिद्ध विद्वान हैं जो स्वयं को त्रिकाल दृष्टि वाला दिखाते हैं — मानो बिना किसी के बताए सब जानते हों, सिद्धि-संपन्न हों। जब ऐसे लोग भी भगवान भैरव के बारे में गलत या नकारात्मक बातें कहते हैं, तो जनता में डर बैठ जाता है कि घर में उनकी सेवा-पूजा नहीं करनी चाहिए। जो तर्क वे बताते हैं वह सीधा है: एक साधारण गृहस्थ ऐसे देवता की पूजा घर में क्यों करेगा जिसके बारे में कहा जाए कि उनके आहार में केवल मांस और मदिरा है? जो यह फैलाएगा, उसके बाद लोगों के पास पूजा करने का कोई कारण ही नहीं बचेगा। वे पूछते हैं कि जिस व्यक्ति से आप कोई विषय समझने जा रहे हैं, यदि उसे स्वयं देवता के स्वरूप का पूरा ज्ञान नहीं है और वह व्हाट्सऐप या कहीं और से आधी-अधूरी पढ़ी बातें बोलता है, तो और क्या होगा?
ऊँची देव शक्ति से मिली सिद्धि कैसा काम करती है?
शक्तिपीठ की महायोगिनी द्वारा दी गई दिव्य दृष्टि
जहाँ शक्ति ऊँचे स्तर की होती है — जैसे शक्तिपीठ की कोई महायोगिनी दिव्य दृष्टि दे — वहाँ वह शक्ति अध्यात्म, सनातन संस्कृति या तंत्र का ऐसा विषय भी साफ बता देती है जो उस व्यक्ति को स्वयं नहीं पता, और वह उनके माध्यम से उसे बता पाता है।
वक्ता कहते हैं कि इसे सीधे इस तरह समझिए: जो शक्तियाँ ऊँचे स्तर की होती हैं, ऊँचे स्तर की देव शक्तियाँ, वे एक खास तरह से काम करती हैं। मान लीजिए भगवती की किसी शक्तिपीठ की महायोगिनी ने कृपा करके किसी व्यक्ति को दिव्यदृष्टि दे दी। वह दृष्टि बिना कुछ पूछे आपके बारे में बातें बता देगी। और यदि आप उससे अध्यात्म, सनातन संस्कृति या तंत्र का कुछ पूछें — ऐसा विषय जो शायद उसे पता भी न हो — तब भी उसकी शक्तियाँ वह बात साफ बता देंगी, और उनके माध्यम से वह उसे कह पाएगा। केवल किसी विशेष कारण से ही ऐसा होता है कि ऐसा व्यक्ति न बोले: कुछ बातें बताकर रुक जाए।
क्षुद्र शक्ति से मिली सिद्धि में क्या अलग होता है?
क्षुद्र शक्तियाँ, जन कल्याण, और गुणवत्ता का अभाव
वक्ता कहते हैं कि जो क्षुद्र शक्तियों की साधना से सिद्धि पाते हैं, वे ज़रूरी नहीं कि बंधन में आएँ, क्योंकि वे अपनी जगह जन कल्याण का काम कर रहे हैं — ऐसी शक्तियाँ किसी महाशक्ति के अधीन होती हैं, ऐसा नहीं कि उन्हें कोई बाँध न सके। पर वह शक्ति हर बात का सही उत्तर कभी नहीं देगी, न अपने धारक में गुणवत्ता पैदा करेगी।
वक्ता अब उन लोगों की बात करते हैं जो क्षुद्र शक्तियों की साधना करके ऐसी सिद्धि पाते हैं। वे कहते हैं कि ऐसी शक्तियाँ किसी महाशक्ति के अधीन होती हैं — ऐसा नहीं कि उन्हें कोई बाँध न सके — पर क्योंकि ये लोग अपनी जगह जन कल्याण का काम कर रहे हैं, इसलिए व्यक्ति बंधन में नहीं आएगा। पर वह शक्ति कभी यह नहीं करेगी कि हर बात का सही उत्तर दे, या अपने धारक में गुणवत्ता पैदा करे।
भैरव या बगलामुखी का छह महीने का अनुष्ठान साधक में क्या पैदा करता है?
वाणी में ओजस्विता और देवत्व का विकास
मान लीजिए किसी ने छह महीने तक भगवती बगला के शतनाम का और भैरव जी का कई बार अनुष्ठान किया। इन छह महीनों में शायद उसका दुख-दर्द न मिटे और जीवन का कष्ट खत्म न हो, फिर भी उसमें ऐसी ओजस्विता आ जाएगी कि लोग उसे बोलते सुनकर ही मोहित हो जाएँगे और उसका पूरा व्यक्तित्व निखर जाएगा। वक्ता कहते हैं कि यही साधना का प्रभाव है — भगवती की कृपा से उसके भीतर जागा देवत्व।
वे एक उदाहरण देते हैं। सुनने वालों में बहुत से लोग घर में भगवान के किसी एक रूप की विशेष नित्य पूजा करते हैं। मान लीजिए चैनल देख-सुनकर किसी ने भगवती बगला के शतनाम का अनुष्ठान कई बार किया और भैरव जी का अनुष्ठान कई बार किया — मान लीजिए छह महीने तक किया। इन छह महीनों में हो सकता है उसका दुख-दर्द खत्म न हुआ हो, जीवन का कष्ट समाप्त न हो रहा हो। पर उसमें ऐसी ओजस्विता आ चुकी होगी कि जब वह कुछ बोलेगा तो उसकी वाणी में वह दिखेगी: सुनने वाले मोहित हो जाएँगे। जब वह चलेगा, जब किसी से आँख मिलाएगा, उसका पूरा व्यक्तित्व निखर चुका होगा; वह बिल्कुल अलग तरह का व्यक्ति होगा। वे कहते हैं कि यही उसकी साधना का प्रभाव होगा — भगवती की कृपा से उसके भीतर पैदा हुए देवत्व का प्रभाव।
निकृष्ट शक्ति से मिली सिद्धि क्या नहीं दे पाती?
देवत्व के बिना त्रिकाल ज्ञान — दिखावे की चादर
निकृष्ट शक्ति की सिद्धि लीजिए तो वह आपको त्रिकालज्ञ होने की सिद्धि दे सकती है — चैनल पर पहले से है कि कोई शक्ति किसी को दिव्य दृष्टि कैसे देती है और उससे क्या हानि होती है। पर वह देवत्व आपके भीतर नहीं टिक सकता; आप कहीं न कहीं दिखावे की चादर ओढ़े हुए हैं।
वे कहते हैं, ऐसी शक्ति की सिद्धि लीजिए जो निकृष्ट प्रकार की है। वह आपको त्रिकालज्ञ बनने की सिद्धि दे सकती है। यह सब चैनल पर पहले से है — कोई शक्ति किसी के लिए दिव्य दृष्टि आदि कैसे प्राप्त करती है, यह कैसे होता है, और इससे क्या हानि होती है। पर वह देवत्व आपके भीतर नहीं रह सकता। आप कहीं न कहीं दिखावे की चादर ओढ़े हुए हैं। वे कहते हैं कि जन कल्याण का काम अपनी जगह सही है, सब ठीक है, पर किसी तक गलत संदेश नहीं जाना चाहिए। जो काम आपका है वह कीजिए; भगवती की कृपा से आपके भीतर जो क्षमता आई है उससे जन कल्याण कीजिए। जिस विषय का आपको ज्ञान नहीं, उसमें जाना ठीक नहीं। वे कहते हैं कि वे ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि स्वयं यही करते हैं: जिस बात का ज्ञान नहीं, उसका उत्तर ही नहीं देते, या कहते हैं कि पता करके बताएँगे। अपनी झूठी प्रतिष्ठा बचाने के लिए बातें गढ़ना गलत है।
भगवान भैरव के कितने रूप हैं, और घर में किसकी पूजा करनी चाहिए?
काल, बटुक और बाल भैरव, और गृहस्थ के लिए चुनाव
भगवान भैरव का स्वरूप एक नहीं है। मुख्य रूप से उन्हें काल भैरव, बटुक भैरव और बाल भैरव के रूप में स्थित कहा जाता है; ब्रह्मवर्त पुराण और ब्रह्माण्ड पुराण में अनेक रूप मिलते हैं, और तंत्र ग्रंथों में और भी बहुत से रूप हैं जो पाठक ने कभी देखे न होंगे। वक्ता दोहराते हैं कि घर में अपने कुल भैरव की पूजा करें यदि उनका पता हो, नहीं तो मुख्य रूप से बटुक भैरव की; तीसरा विकल्प किसी शक्तिपीठ के भैरव हैं।
वे कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि भगवान भैरव का स्वरूप एक नहीं है। मुख्य रूप से कहा जाता है कि भगवान भैरव काल भैरव, बटुक भैरव और बाल भैरव के रूप में स्थित हैं। पुराणों के अनुसार — ब्रह्मवर्त पुराण पढ़िए, ब्रह्माण्ड पुराण पढ़िए — आपको भगवान भैरव के अनेक रूप मिलेंगे; और जब तंत्र ग्रंथों में जाएँगे तो ऐसे-ऐसे रूप सुनेंगे और देखेंगे जो आपने कभी पढ़े या देखे न होंगे। स्वरूप भेद ऐसा है। घर में किस रूप की पूजा करें, इस पर वे कहते हैं कि वे बार-बार बताते हैं: यदि अपने कुल भैरव का ज्ञान है तो उनकी; नहीं तो मुख्य रूप से बटुक भैरव की पूजा कीजिए। तीसरी संभावना यह है कि किसी शक्तिपीठ के भैरव की पूजा भी घर में की जा सकती है। ऐसा करने में कठिनाई आ सकती है — जैसे काशी का शक्तिपीठ, जहाँ काल भैरव विराजमान हैं।
क्या काशी के काल भैरव, जो सबसे उग्र रूप हैं, की पूजा घर के भीतर हो सकती है?
काल भैरव का साधारण पूजन बनाम विशिष्ट पूजन
वे मणिकर्णिका के रक्षक हैं और माँ विशालाक्षी के रक्षक हैं, और लोग पूछते हैं कि क्या इतने उग्र रूप की पूजा घर में हो सकती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि काल भैरव का बिल्कुल साधारण पूजन करने में कोई कठिनाई नहीं; पर यदि आप उनका स्वरूप सामने रखकर विशिष्ट पूजन कर रहे हैं, तो बटुक स्वरूप में चले जाइए — वे भी वही हैं।
वे कहते हैं कि काल भैरव वह देवता हैं जो मणिकर्णिका के रक्षक हैं; काल भैरव माँ विशालाक्षी के रक्षक हैं। तो लोग पूछते हैं कि यदि हम घर में उनकी सेवा-पूजा करें, तो वह तो सबसे उग्र स्वरूप है — क्या घर में काल भैरव की पूजा हो सकती है? इसीलिए, वे कहते हैं, वे लोगों को बताते हैं कि काल भैरव का बिल्कुल साधारण पूजन करने में कोई कठिनाई नहीं होती। पर यदि आप उनका स्वरूप स्थापित करके विशिष्ट पूजन करते हैं, तो बटुक स्वरूप में जाइए — आखिर वे भी वही हैं।
घर में बटुक भैरव की पूजा अनिवार्य क्यों है?
हर घर में भैरव, जैसे गणपति और हनुमान
वे कहते हैं कि बटुक भैरव की पूजा अत्यंत आवश्यक है। जैसे आप गणपति का पूजन और हनुमान जी की पूजा करते हैं, वैसे ही घर में भैरव जी की पूजा अनिवार्य रूप से होनी चाहिए — हर घर में बटुक भैरव की पूजा होनी चाहिए।
वे बताते हैं कि इन विषयों पर अनुभव वाले वीडियो अभी क्यों डाले जा रहे हैं: अनुभव तो पहले के हैं, पर वे उन्हें अभी अपलोड कर रहे हैं ताकि लोग समझें कि घर में भैरव की पूजा अनिवार्य है। जैसे आप गणपति का पूजन करते हैं, जैसे हनुमान जी की पूजा करते हैं, ठीक उसी तरह घर में भैरव जी की पूजा अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। घर-घर में बटुक भैरव की पूजा होनी चाहिए।
जब मूर्तियाँ नहीं बन पाती थीं, तब साधारण घरों में भैरव को कैसे रखा जाता था?
भैरव के प्रतीक के रूप में तुलसी चौरे के पास त्रिशूल
प्रतीक रूप में। मध्यकाल में हर घर में मूर्ति नहीं बन पाती थी, इसलिए तुलसी चौरे पर — जहाँ हनुमान जी का झंडा गड़ा होता है — बड़े-बुज़ुर्ग पाँच तुलसी के पौधे लगाते थे, झंडे के पास खड़ाऊँ रखते थे, और थोड़ी दूर बगल में एक त्रिशूल गाड़ते थे। त्रिशूल भैरव का प्रतीक था और हनुमान जी लंगूरवीर का प्रतीक; दोनों रक्षाकारक देव हैं।
वे कहते हैं कि पहले हर घर में मूर्ति नहीं बन पाती थी — पहले तो बनती थीं, पर मध्यकाल में नहीं बन पाईं। तो प्रतीक रूप में, हर घर में जो चौरा बनता है — तुलसी जी का चौरा, जहाँ हनुमान जी का झंडा और ध्वजा गड़ी होती है — वहाँ पहले एक नियम था। यदि परिवार में बड़े-बुज़ुर्ग हैं तो उनसे पूछिए: वे पाँच तुलसी के पौधे ज़रूर लगाते थे। एक आवश्यक था, पर नियम पाँच का था। उनके पास, या तो झंडे के पास खड़ाऊँ रखी जाती थी, और थोड़ी दूर बगल में जाकर ज़मीन में एक त्रिशूल गाड़ा जाता था। त्रिशूल भैरव का प्रतीक था, और हनुमान जी लंगूरवीर का प्रतीक। दोनों रक्षाकारक देव हैं। इसी कारण पुराने समय में, जब आस-पास के लोगों के ज़रिये कुछ न कुछ होता था, तो बहुत सी चीज़ें उतना असर नहीं कर पाती थीं। समय के साथ लोग भ्रम में पड़ गए और यह सब छोड़ दिया।
काली या भैरव की पूजा होते देखकर लोग डर क्यों जाते हैं?
"तांत्रिक प्रभाव" का ठप्पा और उससे पैदा होने वाला डर
एक समय आया — और कई क्षेत्रों में आज भी है — कि किसी को काली जी की पूजा करते देखकर लोग डर जाते हैं: "यह तंत्र-मंत्र कर रहा है।" भैरव जी की पूजा देखकर तो उन्हें सौ प्रतिशत यकीन हो जाता है। वक्ता उन किताबों की ओर इशारा करते हैं जिन पर "तांत्रिक प्रभाव वाली काली चालीसा" छपा होता है, या हनुमान चालीसा या सुंदरकांड पर भी यही ठप्पा — यह पढ़कर लोग डर जाते हैं।
वे कहते हैं कि एक समय आया, और बहुत से क्षेत्रों में आज भी ऐसा है, कि यदि कोई किसी को काली जी की पूजा करते देख ले तो लोग डर जाते हैं: यह आदमी तंत्र-मंत्र कर रहा है, काली जी की पूजा कर रहा है। और यदि भैरव जी की पूजा होते देख लें, तो उन्हें सौ प्रतिशत यकीन हो जाता है। वे उसी दिन का एक मामला बताते हैं। उनके, जिसे वे अपना बड़ा परिवार कहते हैं, उसके एक साधक अपनी कुंडली दिखवा रहे थे और फोन पर इसकी बात की: बाहर से उनके परिवार में आए एक व्यक्ति ने एक काली चालीसा देखी जिस पर ऊपर 'तांत्रिक प्रभाव वाली' छपा था, और मन में बैठा लिया कि यह आदमी तंत्र-मंत्र करता है। वे कहते हैं कि 'तांत्रिक प्रभाव वाली' हनुमान चालीसा मिलती है, 'तांत्रिक प्रभाव वाला' सुंदरकांड इस तरह लिखा मिलता है। यह पढ़कर लोग डर जाते हैं: यह तंत्र-मंत्र करता है। और फिर वे पूछते हैं — तंत्र का अर्थ क्या है, आप उससे डरते क्यों हैं?
पंडित का मज़ाक क्यों उड़ाया जाता है जबकि तांत्रिक से डरा जाता है?
ब्राह्मण का उपहास और तांत्रिक का डर
वे इसकी तुलना करते हैं कि दूसरे समुदाय अपने नियम मानने वाले लोगों को कितना सम्मान देते हैं, जबकि सनातन समाज में शिखा रखने वाले ब्राह्मण का नाम रखकर मज़ाक उड़ाया जाता है; और कहते हैं कि उस समय का चलन था: पंडित पर हँसो, और तांत्रिक से डरो। जब ऐसा फैशन फैल गया, तो सब इस सबसे दूर भागने लगे।
वे कहते हैं कि दूसरे धर्म के लोगों में पाँच समय प्रार्थना करने वाले व्यक्ति को, वह और जो भी हो, बहुत आदर-सम्मान मिलता है, जबकि सनातन संस्कृति में शिखा रखने वाले ब्राह्मण का अपमान होता है; जो भी नियम मानने वाला दिखे, उसके लिए अजीब-अजीब नाम गढ़ लिए जाते हैं। वे अपने बचपन को उदाहरण के रूप में याद करते हैं कि लोगों को कैसे सिखाया गया: पंडित जी का मज़ाक उड़ाओ, और तांत्रिक से डरो। यदि नियम मानने वाले कोई पंडित जी पूजा कराने आते, तो लोग शिकायत करते कि उन्होंने पूजा बहुत लंबी कर दी और नींद आने लगी। वे पूछते हैं कि कितने लोग सत्यनारायण कथा में सो गए हैं — शंख बजता तभी नींद टूटती — जबकि आदमी दिखावे के लिए जाते और बाहर बैठकर क्रिकेट और राजनीति की बातें करते। कथा सुनने कौन गया? तो पंडित जी को कोई सम्मान नहीं मिलता; कोई तांत्रिक है तो उससे डरो; अघोरी है तो उससे डरो। बाद में ऐसा फैशन इतना फैला कि सब इस सबसे भागने लगे।
भैरव नाम का अर्थ क्या है, और उसके साथ क्या हो गया है?
भय हरने वाले, जिनका नाम ही अब डर पैदा करता है
वक्ता कहते हैं कि भैरव नाम का अर्थ है भय को हरने वाला, फिर भी यहाँ उल्टा चल रहा है: सबको तंत्र शब्द से डर है और भैरव जी के नाम से ही डर है। भैरव जी के नाम से डर भागना चाहिए; उल्टे लोग डर जाते हैं और कहते हैं, यह भैरव जी की पूजा करता है, इससे दूर रहो — यह कुछ कर देगा, तंत्र-मंत्र कर देगा।
वे कहते हैं कि तंत्र शब्द से डर है; भैरव जी के नाम से ही सबमें डर है। जबकि भैरव नाम का अर्थ है भय का हरण करने वाला — भय को दूर करने वाला। यहाँ उल्टा चल रहा है। वे इसकी तुलना इससे करते हैं कि पुलिस वाले के आने पर लोग कैसे इधर-उधर हो जाते हैं: वह जहाँ जाता है डर फैल जाता है। उसी तरह भैरव जी के नाम से डर भागना चाहिए, पर यहाँ लोगों को डराया जाता है — यह भैरव जी का पूजन करता है, इससे डरकर रहो, यह कुछ कर देगा, तंत्र-मंत्र कर देगा।
किसी वक्ता पर विश्वास करने के बजाय स्वयं शास्त्र पढ़िए, और अपने देवता को स्वयं समझिए।
वक्ता पर विश्वास करने के बजाय स्वयं शास्त्र पढ़ना
वे कहते हैं कि जिस दुराग्रह ने आपको जकड़ रखा है उससे बाहर आइए, और अपने ईश्वर, अपने देवता, अपने भगवान के स्वरूप को समझिए। यह केवल उनके कहने से नहीं होगा — आप उन पर विश्वास क्यों करें, हो सकता है वे कुछ गढ़ी हुई बात बता रहे हों। अपने शास्त्र और पुराण खोलिए: शिव महापुराण पढ़िए, और समय मिले तो लिंग पुराण पढ़िए, ताकि आप दूसरों को ठीक से उत्तर दे सकें।
वे कहते हैं कि जिस दुराग्रह ने आपको जकड़ रखा है, उससे अपने भीतर से बाहर आइए। अपने ईश्वर, अपने देवता, अपने भगवान के स्वरूप को समझिए। और यह, वे कहते हैं, उनके बोलने से भी नहीं होगा। आप उनकी बात पर विश्वास क्यों करें? हो सकता है वे कोई गढ़ी हुई बात बता रहे हों। अपने शास्त्र और पुराण खोलकर पढ़िए। शिव महापुराण पढ़िए — वे कहते हैं कि यह वे बार-बार बताते हैं — और समय मिले तो लिंग पुराण पढ़िए। तब आप उत्तर दे पाएँगे, और दूसरों को ठीक से उत्तर दे पाएँगे। लोगों के कहने पर मत चलिए।
समाज में तंत्र विद्या की बदनामी क्यों हुई?
विद्याओं का अनधिकारी हाथों में जाना
वक्ता एक महाराज जी से हुई चर्चा बताते हैं: क्योंकि विद्याएँ अयोग्य लोगों तक पहुँच गईं। किसी एक व्यक्ति ने जो तंत्र विद्या सिद्ध की, वह उपदेश से उसके बेटे को मिली; किसी गुरु ने किसी लोभ या लालच में तंत्र की विद्याएँ ऐसे व्यक्ति को दे दीं जिसमें न संयम था, न क्षमता, न विद्वानों का आदर। वे ज़ोर देते हैं कि यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र की बात नहीं — यह इन चीज़ों के अनधिकारी हाथों में जाने की बात है।
वे उस दिन एक महाराज जी से हुई चर्चा बताते हैं, जो उन्हें इतनी अच्छी लगी कि वे उसे सुनने वालों के सामने रखना चाहते थे। उन्होंने पूछा था कि यूट्यूब पर एक व्यक्ति लगातार गलत बातें कहता रहता है, ऐसे संगठनों के पास राजनीतिक समर्थन भी है, फिर उसके बारे में कुछ क्यों नहीं किया जाता। महाराज जी ने उत्तर दिया कि वह आदमी सही कर रहा है। कैसे, यह पूछने पर उन्होंने समझाया: जब ये चीज़ें अनधिकारी लोगों तक पहुँचीं — जिनका इन पर कोई अधिकार नहीं था — और वे इनका दुरुपयोग करने लगे, तो यही हुआ। आज भी ऐसा होता है: बेटे को पिता से गद्दी मिलती है और वह उसका दुरुपयोग करता है। वे इसकी तुलना भाई-भतीजावाद से करते हैं। तांत्रिकों में भी यही चला। किसी ने तंत्र विद्या सिद्ध की और उपदेश से अपने बेटे को दे दी — वह अयोग्य व्यक्ति तक पहुँच गई। किसी गुरु ने किसी लोभ या लालच में तंत्र की विद्याएँ ऐसे व्यक्ति को दे दीं जिसके भीतर न संयम है, न क्षमता, न विद्वानों का आदर करने की आदत। लोभ के कारण यह ऐसे लोगों में फैलती गई और धीरे-धीरे पूरे समाज में फैल गई। वे ज़ोर देकर कहते हैं कि यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र की बात बिल्कुल नहीं है। यह इन सब चीज़ों के अनधिकारी लोगों के पास जाने की बात है — जिन्होंने इन्हें जानने के बाद समाज को कष्ट देना शुरू कर दिया।
मारण प्रयोग कब धर्म कार्य है और कब दुरुपयोग?
गलत व्यक्ति पर मारण बनाम पैसे और ज़मीन के लिए मारण
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति सचमुच गलत है, और यह देखकर कि वह आपको अमुक तरह से परेशान कर रहा है आप उस पर मारण करवाते हैं, और जो इसमें सक्षम है वह करता है, तो ठीक है — यह धर्म कार्य है: कहीं आपने किसी निर्दोष की जान बचाई, एक परिवार बचाया। पर जब कोई ईर्ष्या, जलन या पैसे के लिए अपने ही मित्र या रिश्तेदार को मरवा दे, जब करने वाला कोई कारण न पूछे और बस पैसा ले, जब ज़मीन हड़पनी और बाँटनी हो — वह दुरुपयोग है।
वे पूछते हैं कि मारण प्रयोग करने वाले लोग कौन हैं। यदि कोई व्यक्ति गलत है, और आप उस पर मारण करवा रहे हैं — या दूसरा आदमी करता है — यह देखकर, और आप किसी के पास गए और कहा कि अमुक व्यक्ति आपको अमुक तरह से परेशान कर रहा है: यदि वह मारण करने में सक्षम है और करता है, तो ठीक है, यह धर्म कार्य है। कहीं आपने किसी निर्दोष की जान बचाई है; एक परिवार बचाया है। पर यदि कोई व्यक्ति जाकर बस अपने किसी मित्र या रिश्तेदार को मरवा दे — मारण करो, ईर्ष्या है, जलन है, पैसा दिया जा रहा है, कारण जानने की क्या ज़रूरत, पैसा लो और काम खत्म करो, कितनों को मरवाओगे, यहाँ ज़मीन हड़पनी है, आपस में बाँट ली और उसे खत्म कर दिया — वे कहते हैं, वह दूसरा मामला है। इसी तरह, जब ये सब विद्याएँ गलत लोगों के हाथों में गईं, तो परेशानी शुरू हुई।
अच्छे और गलत दोनों कर्म करने वाला व्यक्ति कष्ट से कैसे बच जाता है?
गयासुर का उदाहरण और दर्शन से मुक्ति का वरदान
क्योंकि किसी न किसी माध्यम से पुण्य आता रहता है। वे गयासुर का पौराणिक उदाहरण देते हैं, जिसने भगवान नारायण से वरदान लिया था कि जो उसे देखेगा वह मुक्त हो जाएगा — कितना भी पापी हो, सीधे स्वर्ग जाएगा। इसलिए दुष्ट लोग भी केवल उसके दर्शन से सद्गति पा जाते थे।
वक्ता कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति कुछ अच्छे काम करता है और साथ में गलत काम भी, और किसी न किसी माध्यम से उसे पुण्य मिलता रहता है, तो उसे कोई कष्ट नहीं भोगना पड़ता — और सुनने वालों ने ऐसे बहुत से लोग देखे होंगे। पौराणिक उदाहरण के लिए वे गयासुर को लेते हैं। गया में, जहाँ लोग अपने पितरों के मोक्ष के लिए जाते हैं, गयासुर को यह वरदान था: उसने भगवान नारायण से वर लिया था कि जो उसे देखेगा वह मुक्त हो जाएगा — कितना भी पापी हो, उसे देखकर सीधे स्वर्ग जाएगा। इस कारण देवताओं ने व्यवस्था की कि गयासुर के शरीर पर यज्ञ किया जाए। ब्रह्मा जी ने कहा कि जब तक उसका यज्ञ पूरा न हो, गयासुर नहीं उठेगा। तो गयासुर धरती पर लेट गया — उसका शरीर पवित्र था — और उस पर यज्ञ शुरू हुआ। जब वह उठने लगा, तो स्वयं नारायण प्रकट हुए और उन्होंने गयासुर के हृदय पर अपने चरण रख दिए। गयासुर नारायण के चरणों के नीचे बड़े आनंद में रहा, क्योंकि नारायण उसके आराध्य थे; उसने कहा, इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा कि आपके चरण सदा मेरे हृदय पर रहें। इस तरह दुष्ट आचरण वाले लोग भी उसके दर्शन से सद्गति पा गए।
वेद मंत्र जानने वाले गलत कर्म के बावजूद पुण्य कैसे पाते रहे?
रुद्राष्टाध्यायी से अभिषेक और यमराज पर रोक
ठीक इसी तरह, जिन्होंने वेद मंत्रों का उच्चारण सीखा था वे पुण्य पा रहे थे, क्योंकि रुद्राष्टाध्यायी से भगवान शिव का नित्य अभिषेक चल रहा था — जबकि दूसरी ओर वे तंत्र के टेढ़े कर्म भी कर सकते थे। वक्ता पूछते हैं कि यदि यमराज को निर्देश है कि जहाँ रुद्राभिषेक होता है और इस तरह रुद्र पाठ होता है वहाँ नहीं जाना, तो प्राण कैसे लिए जाएँगे, दोष कैसे लगेगा?
वे कहते हैं कि ठीक गयासुर की तरह, जो वेद जानते थे, जिन्होंने वेद मंत्रों का उच्चारण सीखा था, वे उनके माध्यम से पुण्य पा रहे थे — क्योंकि रुद्राष्टाध्यायी से भगवान शिव का नित्य अभिषेक चलता है। और साथ में, दूसरी ओर, तंत्र के टेढ़े कर्म भी किए जा सकते थे। तो कहीं न कहीं हर बात को झूठा कैसे ठहराया जा सकता है? यदि यमराज को निर्देश है कि जिस स्थान पर रुद्राभिषेक होता है, जहाँ इस तरह रुद्र पाठ होता है, वहाँ तुम नहीं जाओगे — तो प्राण कैसे लिए जाएँगे, दोष कैसे लगेगा? आधी बातें तो ऐसे ही निकल जाती हैं।
तंत्र विद्याओं का सामना करने के लिए बुद्ध अवतार क्यों हुआ?
वेदों का खंडन, और शंकराचार्य के चार पीठ
वक्ता कहते हैं कि इन सब चीज़ों को दूर करने के लिए बुद्ध अवतार हुआ और फिर वेदों का खंडन हुआ — कि वेद गलत है। जो हल्की स्थिति में थे, जिन पर अनधिकारी लोगों तक विद्याएँ पहुँचने का असर पड़ा था, वे समर्थन में चले गए, वेदों का खंडन किया और खुश हुए कि बौद्ध धर्म सबसे अच्छा धर्म है। जब यह भी हावी हो गया और अशोक जैसे व्यक्ति ने भी बुद्ध की शरण ली, और सनातन संस्कृति गड्ढे में जाने लगी, तब कहा जाता है कि भगवान शंकर शंकराचार्य के रूप में प्रकट हुए और बत्तीस वर्ष की आयु में चार स्थानों पर चार पीठ स्थापित किए।
वे कहते हैं कि इस सबको दूर करने के लिए बुद्ध अवतार हुआ — यानी बात को आज के समय तक ले आएँ — और फिर वेदों का खंडन हुआ: कि वेद गलत है। जो हल्की स्थिति में थे, जिन लोगों पर इन चीज़ों के अनधिकारी हाथों में पहुँचने का कहीं न कहीं असर पड़ा था, वे समर्थन में उधर चले गए और वेदों का खंडन किया। बहुत अच्छा, वे व्यंग्य में कहते हैं — वेद का खंडन करो और फिर खुश हो जाओ कि बौद्ध धर्म सबसे अच्छा धर्म है। फिर जब यह भी हावी हो गया, और अशोक जैसा व्यक्ति भी बुद्ध की शरण में चला गया, और पूरी सनातन संस्कृति गड्ढे में जाने लगी, तब फिर — ऐसा कहा जाता है — भगवान शंकर शंकराचार्य के रूप में प्रकट हुए, फिर अवतार लिया, और इतनी छोटी आयु में, बत्तीस वर्ष की आयु में, चारों स्थानों पर चार पीठ स्थापित किए। धर्म की रक्षा हुई और सनातन आगे बढ़ा। वे कहते हैं कि ऐसे बहुत से इतिहास हैं: जब चीज़ें दुष्ट लोगों के हाथ में जाती हैं, तो वे इसी तरह उनका दुरुपयोग करते हैं।
बिना नाम लिए "हुक्का बाबा" अथर्ववेद को नहीं मानते और लोगों से कहते हैं कि पूजा, पाठ, यज्ञ या हवन से जुड़ी हर बात को नकार दो।
बिना नाम के "हुक्का बाबा" और उनका अथर्ववेद को नकारना
वे उनका नाम लेने से मना करते हैं — "हुक्का बाबा" — और कहते हैं कि वे अथर्ववेद को बिल्कुल नहीं मानते, और लोगों से कहते हैं कि जहाँ पूजा, पाठ, यज्ञ या हवन की बात आए उसे मत मानो। वे स्वयं को वेदांती कहते हैं और बहुत विद्वान हैं, बोलने का ढंग बहुत तीखा है; पर वक्ता कहते हैं कि उनकी पूरी सोच प्लास्टिक की सोच है — वे किताबी बातें पढ़ते हैं और उन्हें ज्यों का त्यों समझाते हैं।
वे कहते हैं कि वे इस व्यक्ति का नाम भी नहीं लेना चाहते — सुनने वाले जानते हैं कि वे कौन हैं। वे बहुत बढ़िया दर्शन देते हैं और सब कुछ गलत बताते हैं; अथर्ववेद को बिल्कुल नहीं मानते; कहते हैं कि जहाँ भी पूजा, पाठ, यज्ञ या हवन की बात आए, उसे मत मानो। वे बहुत टेढ़े शब्द इस्तेमाल करते हैं और स्वयं को वेदांती कहते हैं; उनके बोलने का ढंग बहुत तीखा है। वक्ता कहते हैं कि उनकी बहुत सी बातें सही होने के बावजूद, उस व्यक्ति की पूरी सोच वैसी है जिसे प्लास्टिक कहा जाए — जैसे प्लास्टिक मनी। वे केवल किताबी बातें देखते हैं और उन्हें ज्यों का त्यों समझाते जाते हैं। वे विरोधाभासों पर ज़ोर देते हैं। वे साधारण देवी-देवताओं या मूर्ति को नहीं मानते; ठीक है — पर यदि आप वेद को मानते हैं, तो वेद के भीतर अथर्व को क्यों नहीं मानते? यदि वेद भगवान है, तो उसे भी मानिए। वे गीता को मानते हैं, पर उस स्थान को नहीं जहाँ भगवान कहते हैं कि पितरों में मैं अर्यमा नाम का पितर हूँ। वे तीसरे अध्याय को नहीं मानते, जिसमें भगवान कहते हैं कि देवता मनुष्यों का भला करें और मनुष्य मंत्र विद्या, मंत्र पाठ और हवन से देवताओं को संतुष्ट करें। वक्ता कहते हैं कि वहाँ स्वयं भगवान यज्ञ के पक्ष में बोल रहे हैं — तो आप उसे मना करने वाले कौन होते हैं? वे जोड़ते हैं कि लोग ऐसे व्यक्ति के पीछे इसलिए चलते हैं क्योंकि सबको आज़ादी और छूट चाहिए। वे कहते हैं, इन लोगों को सुनने के बजाय अपनी सनातन संस्कृति से जुड़ी बातें सुनिए, जानिए और समझिए।
शास्त्र क्या कहता है
Kṛṣṇa says that among the ancestors he is Aryamā.
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अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥
नागों में मैं अनन्त हूँ, जल के प्राणियों में वरुण हूँ। पितरों में मैं अर्यमा हूँ, और दण्ड देने वालों में यमराज हूँ।
The Gītā teaches that people nourish the gods through sacrifice and the gods nourish them in turn, each sustaining the other.
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देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥
तुम इससे देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम्हें उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम परम कल्याण प्राप्त करोगे।
किसी मंत्र को स्वयं खोजने से क्या मिलता है?
भ्रम से निकलने के रास्ते के रूप में शास्त्र का अध्ययन
अपना शास्त्र स्वयं पढ़िए ताकि कोई आपको पलटकर जवाब न दे सके, ताकि आप दूसरों को उत्तर देने योग्य बनें, और ताकि अपने देवताओं, अपने इष्ट और अपने आराध्य में आपकी आस्था बढ़े। जब चैनल पर कोई मंत्र देखें, उसे खोजिए: खोजते हुए दस और बातें आपकी जानकारी में आएँगी, आप शास्त्र के अनुसार प्रेरित होंगे, और भ्रम से बाहर आएँगे — जिसके बाद आपका बौद्धिक, आध्यात्मिक और भौतिक विकास होता है।
वे कहते हैं, शास्त्र स्वयं पढ़िए ताकि कोई आपको पलटकर जवाब भी न दे सके — ताकि आप भी उत्तर देने योग्य बनें, और ताकि अपने देवताओं में, अपने इष्ट में, अपने आराध्य में आपकी आस्था भी बढ़े। जीवन में कष्ट है; उस कष्ट से बाहर आने के लिए अपने शास्त्र का अध्ययन कीजिए। जब चैनल पर कोई मंत्र देखें, उसे खोजिए। उस मंत्र को खोजते हुए बहुत सी बातें आपकी जानकारी में आएँगी — दस बातें मिलेंगी, और आप शास्त्र के अनुसार प्रेरित होंगे। आप उसे करें या न करें, वह दूर की बात है; पर उसके बारे में सोचने, जानने और समझने में बहुत सी नई बातें आपके पास आएँगी। वे कहते हैं कि इससे आप भ्रम से बाहर आते हैं। और भ्रम से बाहर आने पर आपका बौद्धिक विकास होता है; और बौद्धिक होने पर आध्यात्मिक भी, और इसी कारण भौतिक भी।
क्या साधना में अनुभवों और चमत्कारों के पीछे भागना चाहिए?
विशेष पूजन से पहले सामान्य पूजन, और चमत्कार के पीछे न भागना
वक्ता कहते हैं कि हर किसी को अपने घर में भगवान बटुक भैरव की पूजा करनी चाहिए, और जब आप साधारण पूजन शुरू करेंगे तभी विशेष पूजन कर पाएँगे। वे जो अनुभव डालते हैं, उनमें किसी का भी अनुभव एक, दो या दस दिन का नहीं है; और जहाँ एक या दस दिन में अनुभव आता है, वह व्यक्ति साधना के बीच में होता है और उससे आगे करवाई जाती है। ऐसा कभी नहीं होता कि आज साधना की और आज दर्शन हो गए। अनुभव के पीछे मत भागिए, चमत्कार के पीछे मत भागिए — साधना कीजिए।
वे कहते हैं कि हर किसी को अपने घर में भगवान बटुक भैरव की पूजा करनी चाहिए। जब आप साधारण पूजन शुरू करेंगे तभी विशेष पूजन कर पाएँगे। जिन लोगों के अनुभव वे डालते हैं, उनमें किसी का अनुभव एक दिन, दो दिन या दस दिन का नहीं है। और यदि एक, दो या दस दिन में अनुभव आता भी है, तो वे लोग साधना के बीच में होते हैं, और उनसे आगे करवाई जाती है। वे कहते हैं कि ऐसा कभी नहीं होता कि आपने आज साधना की और आज दर्शन हो गए, या कल यह हो गया। चमत्कार के पीछे मत भागिए; अनुभव के पीछे मत भागिए। साधना कीजिए। वे अनुभव इसलिए डालते हैं ताकि आपको प्रेरणा मिले — ताकि आप देखें कि चीज़ें होती हैं, लोगों के साथ हो रही हैं। दस लोग करते हैं और उनमें से एक के साथ होता है; वह अनुभव आपके सामने रखा जाता है ताकि आप सकारात्मक ढंग से आगे बढ़ें।
भैरव अष्टमी के दिन क्या करना चाहिए?
16 नवंबर को घर में बटुक भैरव की पूजा
उस वर्ष 16 नवंबर को — और जिस भी वर्ष भगवान भैरव की अष्टमी पड़े, जब भी आप यह लाइव सुनें — घर में बटुक भैरव की पूजा ज़रूर करनी चाहिए। साधारण पूजा से विशेष पूजा तक पूरा विधान चैनल पर है, साथ में यह भी कि जो घर में विशेष पूजन करना चाहते हैं वे भैरव जी की त्रिशूल स्थापना कैसे करें, और भोग कैसे चढ़ाएँ।
वे कहते हैं कि उस वर्ष 16 नवंबर को — और जिस भी वर्ष भगवान भैरव की अष्टमी पड़े, जब भी आप यह लाइव सुन रहे हों — घर में बटुक भैरव की पूजा ज़रूर करनी चाहिए। साधारण पूजा से लेकर विशेष पूजा तक पूरा विधान चैनल पर दिया गया है। वे कहते हैं कि जो घर में विशेष पूजन करना चाहते हैं, उसमें यह बताया गया है कि भैरव जी की त्रिशूल स्थापना कैसे करनी है; और यदि आप भोग आदि चढ़ाना चाहते हैं, तो भोग कैसे चढ़ाना है — और स्त्रियाँ वह भोग ले सकती हैं या नहीं।
किस भैरव का भोग कौन ले सकता है?
काल भैरव के मंदिर का प्रसाद, और बटुक व महाभैरव का भोग
जब आप मंदिर में भगवान काल भैरव की पूजा करते हैं, तो वहाँ जो भी भोग या प्रसाद चढ़ाया जाए, स्त्रियाँ उसे न लें और उन्हें दिया न जाए। बटुक भैरव का भोग — उन्हें बूँदी का लड्डू चढ़ाइए, या जो भी चढ़ाते हैं — स्त्री-पुरुष सब बराबर ले सकते हैं। महाभैरव पूजन में चढ़ाया भोग, जिसका मंत्र चैनल पर है, घर में पूजन हो तो वह भी सब ले सकते हैं; सब प्रसाद ले सकते हैं।
काल भैरव के भोग के बारे में: जब भी आप मंदिर में भगवान काल भैरव की पूजा करें, वहाँ जो भी भोग या प्रसाद चढ़ाया जाए — स्त्रियाँ उसे स्वीकार न करें, और उन्हें दिया न जाए। बटुक भैरव का भोग अलग है। उन्हें बूँदी का लड्डू चढ़ाइए, या जो भी और चढ़ाते हैं; स्त्री-पुरुष सब उसे बराबर स्वीकार कर सकते हैं। वे कहते हैं कि महाभैरव का मंत्र चैनल पर दिया गया है, और महाभैरव पूजन में चढ़ाया भोग भी, यदि पूजन घर में हो, तो सब स्वीकार कर सकते हैं। सब प्रसाद लें। वे एक सावधानी जोड़ते हैं: यदि किसी विशेष स्थिति में कहीं सामान्य रूप से कहा गया है कि ऐसा नहीं करना है, तो जो वीडियो आप सुन रहे हैं उसके अनुसार उस निर्देश को मानिए।
सुनने वाला कौन सी भैरव साधना से शुरुआत कर सकता है?
महाभैरव मंत्र, अष्टोत्तर शतनाम, और भैरव हृदय
वे एक प्रश्नकर्ता से कहते हैं, यहाँ से शुरू कीजिए: या तो महाभैरव मंत्र की साधना कीजिए, या अष्टोत्तर शतनाम की साधना कीजिए जो रिकॉर्ड हो चुकी है और अगली सुबह अपलोड होगी। जिन्हें ज़्यादा कठिनाई है वे भैरव हृदय भी कर सकते हैं, अच्छा रहेगा।
कौन सी साधनाएँ की जा सकती हैं, इसका उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि 108 नामों की आहुति और भगवान भैरव के अष्टोत्तर शतनाम की साधना रिकॉर्ड हो चुकी है और अगली सुबह अपलोड होगी; उसे सुनिए और कीजिए। वे कहते हैं, आप यहाँ से शुरू कर सकते हैं। या तो महाभैरव मंत्र की साधना कीजिए, या जो अष्टोत्तर शतनाम साधना डाली जाएगी उसे कीजिए। जिन्हें ज़्यादा परेशानी है वे भैरव हृदय भी कर सकते हैं; करेंगे तो अच्छा रहेगा।
बच्चे के बल, बुद्धि और विद्या के लिए उसके जन्मदिन पर क्या करना चाहिए?
जन्म तिथि और नक्षत्र के अधिपति देवता
पहले तो यह जन्म तिथि पर करना चाहिए — सनातन संस्कृति की तिथि पद्धति से, अंग्रेज़ी कैलेंडर से नहीं। उस दिन पूरे वर्ष के लिए दो-तीन काम किए जाते हैं। पहला और सबसे अच्छा है बच्चे के जन्म नक्षत्र के अधिपति देवता की विशेष पूजा करवाना। दूसरा है साधारण शिव पूजा करवाना।
बच्चों के जन्मदिन पर क्या करें ताकि उन्हें बल, बुद्धि और विद्या मिले, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं कि सबसे पहले यह जन्म तिथि पर करना चाहिए — सनातन संस्कृति की तिथि पद्धति से गिना गया जन्मदिन, अंग्रेज़ी कैलेंडर से नहीं। जन्म तिथि के दिन आने वाले पूरे वर्ष के लिए दो-तीन काम किए जाते हैं। पहला काम: आपके बच्चे का जो भी जन्म नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। हो, उस नक्षत्र के अधिपति देवता की उस दिन विशेष पूजा करवानी चाहिए। यह सबसे उत्तम है। दूसरा यह कि आप साधारण शिव पूजा करवाएँ।
बच्चे की जन्म तिथि पर कितना तुला दान करना चाहिए?
बच्चे के अपने हाथ से तुला दान
तीसरा है तुला दान, जितना संभव हो। मान लीजिए बच्चे का वज़न 40 किलो है और आपके पास 40 किलो का सामर्थ्य नहीं — तो उस दिन बच्चे के अपने हाथ से 4 किलो ही दान करवा दीजिए। बहुत अच्छा रहेगा, और उसमें पूरे वर्ष के लिए शुभ लाभ मिलेगा। इतना तो ज़रूर करवाना चाहिए।
वे कहते हैं कि तीसरी चीज़ है तुला दान, जितना संभव हो सके। मान लीजिए बच्चे का वज़न 40 किलो है। यदि 40 किलो आपके सामर्थ्य में नहीं है, तो 4 किलो ही सही — उस दिन बच्चे के अपने हाथ से दान करवा दीजिए। वे कहते हैं, यह बहुत अच्छा रहेगा। उसमें पूरे वर्ष के लिए शुभ लाभ मिलेगा। इतना तो ज़रूर करवाना चाहिए।
उस दिन तिलक, आशीर्वाद, बच्चे की आरती और जीवन भर का संकल्प किया जाता है।
बच्चे की आरती, आशीर्वाद, और जीवन भर का संकल्प
कई जगहों पर रिवाज है कि सुबह बच्चे से पूजा करवाई जाए, फिर तिलक लगाया जाए, आशीर्वाद दिया जाए और बच्चे की आरती की जाए — जिससे बच्चे के आभामंडल की नकारात्मक शक्तियाँ कम होती हैं। जब बच्चा पैर छुए तो माता-पिता उसकी इच्छा या कष्ट के अनुसार आशीर्वाद दें, और बच्चे को बड़े विद्वानों के पास ले जाया जाए। और उससे किसी एक अच्छे काम की शपथ दिलाई जाए — गीता या दुर्गा सप्तशती का एक श्लोक ही सही — जीवन भर रोज़ पाठ करने के संकल्प के साथ।
वे कहते हैं कि यह रिवाज कई जगह है और कई जगह नहीं: उस दिन सुबह बच्चों से पूजन करवाया जाता है, फिर उन्हें तिलक लगाया जाता है, आशीर्वाद दिया जाता है, और उनकी आरती की जाती है। आरती करने से बच्चों के आभामंडल में जो भी नकारात्मक शक्तियाँ हों, वे कम होती हैं। उस दिन यह ज़रूर करना चाहिए। इसके साथ, जब वे अपने माता-पिता के पैर छुएँ, तो माता-पिता बच्चे की इच्छा या उसके कष्ट के अनुसार विशेष आशीर्वाद दें। उन्हें बड़े विद्वानों के पास ले जाया जाए। और उनसे किसी एक बात की शपथ दिलाई जाए: कि आज से मैं यह शुभ कार्य करूँगा। जैसे आपके आराध्य से जुड़ा गीता का कोई श्लोक पढ़ना; या यदि दुर्गा सप्तशती का पाठ करवाना चाहें, तो उससे जुड़ा एक श्लोक ही — और उन्हें संकल्प से बाँधिए कि वे जीवन भर रोज़ उसका पाठ करेंगे। वे कहते हैं कि यह उनके जन्मदिन पर करवाना चाहिए, और यह जीवन भर उनके काम आएगा, और आपके भी, न केवल जीवन में बल्कि उसके बाद भी।
क्षेत्रपाल भैरव निकारी क्या है?
क्षेत्रपाल की निकारी, एक लाइव वीडियो में दिखाई गई
वक्ता कहते हैं कि क्षेत्रपाल भैरव की क्रिया — क्षेत्रपाल की जो निकारी की जाती है — उसकी पूरी विधि है, और एक लाइव वीडियो है जिसमें उन्होंने इसे करके दिखाया है।
क्षेत्रपाल भैरव की क्रिया के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि उसमें क्षेत्रपाल की जो निकारी की जाती है, उसकी पूरी विधि है। वे कहते हैं कि क्षेत्रपाल भैरव की निकारी का एक लाइव वीडियो है, जिसमें उन्होंने इसे करके दिखाया है।
क्षेत्रपाल निकारी में कौन सी सामग्री और विधि लगती है?
चौमुख दीपक के साथ पत्तल पर चावल, उड़द, दही और सिंदूर
दो लोगों के हिस्से के बराबर चावल लीजिए — साधारण अरवा धान का चावल — और उसमें 250 ग्राम उड़द, 100 ग्राम दही और लाल सिंदूर मिलाइए। इसे पत्तल पर रखिए, जो साल के पत्तों से बनी थाली है; उस पर चौमुख दीपक जलाइए, तिलक लगाइए, और पाँच तरह की मिठाई और दक्षिणा रखिए। फिर क्षेत्रपाल भैरव के नाम से इसे पूरे घर में घुमाइए, घर के सब लोगों के सिर पर से छुआइए, और प्रार्थना बोलते हुए इसे लेकर घर से बाहर जाइए।
वे कहते हैं कि क्षेत्रपाल भैरव की निकारी करने के लिए दो लोगों के हिस्से के बराबर चावल लेना चाहिए — जितना चावल सामान्य रूप से खाया जाता है — साधारण अरवा धान का चावल। उसमें 250 ग्राम उड़द, 100 ग्राम दही और लाल सिंदूर मिलाना चाहिए; ये सब चीज़ें आपस में मिला दी जाएँ। इन्हें पत्तल पर रखा जाता है — साल के पत्तों से बनी थाली को पत्तल कहते हैं। उस पर चौमुख दीपक जलाया जाता है, तिलक आदि लगाया जाता है, और फिर पाँच तरह की मिठाई, दक्षिणा आदि वहाँ रखी जाती है। फिर क्षेत्रपाल भैरव के नाम से इसे पूरे घर में घुमाया जाता है, घर के सब लोगों के सिर पर से छुआया जाता है, और फिर घर से बाहर ले जाया जाता है, यह कहते हुए: हे भगवान क्षेत्रपाल भैरव, हमारे घर के सब कष्ट और विपत्तियाँ, तंत्र, विचार, भूत, प्रेत, पिशाच — ये सब शांत हों और आपके नियंत्रण में रहें; और जब भी कोई शत्रु किसी तरह का षट्कर्म करे, या कोई प्रेत या पिशाच कृत्या प्रयोग आदि करे, तो उसे अपने स्थान से ही रोक दीजिए। इसी के लिए, और आपकी प्रसन्नता और आपके सब गणों की प्रसन्नता के लिए, मैं यह बलि अर्पित कर रहा हूँ।
क्षेत्रपाल की बलि कहाँ छोड़ी जाती है, और निकारी के बाद क्या होता है?
चौराहा, मिट्टी के गिलास में पानी, और बाद में गृह बंधन
मिट्टी के गिलास में पानी भी साथ ले जाना चाहिए, और पूरी चीज़ किसी चौराहे पर या घर से थोड़ी दूर रख देनी चाहिए। घर में फिर से घुसने से पहले हाथ-पैर धोइए और कपड़े बदलिए। वे कहते हैं, यह बहुत बड़ी बात है: क्षेत्रपाल के पूजन से प्रेत, पिशाच, विचार और तंत्र के मामलों में बहुत शांति मिलती है, और निकारी के बाद ही घर में बंधन की प्रक्रिया करनी चाहिए।
वे कहते हैं कि इसके साथ एक गिलास में — मिट्टी के गिलास में — पानी भी ले जाना चाहिए, और इसे किसी चौराहे पर रखना चाहिए, या अपने घर से थोड़ी दूर ले जाकर वहाँ छोड़ देना चाहिए। यह क्षेत्रपाल निकारी की साधारण प्रक्रिया है। घर में फिर से घुसने से पहले हाथ-पैर धोइए, कपड़े आदि बदलिए। वे कहते हैं, यह बहुत बड़ी बात है। जान लीजिए कि क्षेत्रपाल का पूजन करने से इन सब मामलों में बहुत शांति मिलती है — प्रेत, पिशाच, विचार, तंत्र। और निकारी के बाद ही घर में बंधन आदि की प्रक्रिया करनी चाहिए। वे जोड़ते हैं कि इसमें डरना नहीं चाहिए। बहुत से लोग बहुत डरते हैं — कि यह हो जाएगा, वह हो जाएगा। आप एक स्वरूप के लिए पूजन, बलि और भोग निकाल रहे हैं; यह कोई तामसिक चीज़ नहीं है।
क्या पूजा स्थान में भैरव जी का त्रिशूल स्थापित किया जा सकता है?
घर में त्रिशूल स्थापना, और दक्षिण के मार्तंड भैरव
वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल। वे जोड़ते हैं कि मार्तंड भैरव दक्षिण में पूजित हैं और स्वयं भैरव जी का ही एक रूप हैं, जिनकी पौराणिक कथा अलग से बताई जाएगी। एक और प्रश्न पर वे कहते हैं कि भगवती का नाम लेते हुए भी जप ज़रूर किया जा सकता है।
यह पूछे जाने पर कि क्या भैरव जी का त्रिशूल स्थापित करना है और क्या यह पूजन स्थान में हो सकता है, वे उत्तर देते हैं: बिल्कुल। वे जोड़ते हैं कि मार्तंड भैरव दक्षिण में पूजित हैं, और यह स्वयं भैरव जी का ही एक स्वरूप है। वे कहते हैं कि इसकी पौराणिक कथा अलग से बताई जाएगी। एक और प्रश्न पर वे उत्तर देते हैं कि भगवती का नाम लेते हुए भी जप ज़रूर किया जा सकता है।
भैरव की कृपा के लिए क्या दान देना चाहिए, और दीप दान कैसे होता है?
भैरव के लिए दीप दान और भोग, एक लाइव वीडियो में दिखाया गया
वक्ता कहते हैं कि लाइव वीडियो अगले दिन शाम तक आ जाएगा। भैरव जी के लिए दीप दान कैसे करना है, और मंदिर में या घर में उन्हें भोग कैसे चढ़ाना है, यह अगली सुबह करके दिखाया जाएगा।
एक श्रोता पूछते हैं कि कृपा पाने के लिए क्या दान दिया जा सकता है, और श्री भैरव जी के नाम से मंदिर में दीप दान कैसे करना है। इसका उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि लाइव वीडियो अगले दिन शाम तक आ जाएगा। मंदिर में भैरव जी के लिए दीप दान कैसे करना है, और घर में उन्हें भोग कैसे चढ़ाना है, यह अगली सुबह करके दिखाया जाएगा।
जिसने तीन बार पुरश्चरण पूरा कर लिया है, उसे आगे क्या करना चाहिए?
पुरश्चरण दोहराना और नित्य पूजन में माला रखना
वक्ता उत्तर देते हैं कि इसे बार-बार करते रहिए, और नित्य पूजन में एक-दो माला जप करना चाहिए। प्रयोग की विधि चैनल पर अनुभव वाले वीडियो में कई बार बताई गई है — उन्हें सुनिए और अपनी परेशानी के अनुसार कीजिए; और कुछ निजी हो तो संदेश भेजिए।
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने तीन बार पुरश्चरण किया है; वे उत्तर देते हैं: इसे बार-बार करते रहिए, और नित्य पूजन में एक-दो माला जप करना चाहिए। वे कहते हैं कि प्रयोग की विधि चैनल पर अनुभव वाले वीडियो में कई बार बताई गई है। उन वीडियो को सुनिए और आपकी जो भी परेशानी है उसके अनुसार कीजिए। और यदि उस तरह की कोई निजी बात हो, वे कहते हैं, तो संदेश भेजिए, वे बता देंगे।
क्या गायत्री मंत्र सबके लिए है?
गायत्री, अनधिकार पर शास्त्र का मत, और यज्ञोपवीत
गायत्री को इतने सरल ढंग से समझाने को कहे जाने पर कि सब कर सकें, वक्ता उत्तर देते हैं कि वे श्री राम शर्मा आचार्य जी के सब कथनों को नहीं मान सकते। वे कहते हैं कि गायत्री सबके लिए है, पर अनधिकार पर शास्त्र का जो मत है, वे उसी के अनुसार बोलेंगे, और वैदिक मंत्रों के लिए तो बिल्कुल मना करेंगे: हर कोई वैदिक मंत्र नहीं कर सकता — पहले उसका उच्चारण, उसका स्वभाव और उसके नियम सब जानने चाहिए। वे बताते हैं कि स्वयं राम शर्मा आचार्य से पूछा गया कि क्या जनेऊ पहने बिना गायत्री की जा सकती है, तो उन्होंने उत्तर दिया कि बस यज्ञोपवीत करवा लीजिए।
एक श्रोता उनसे गायत्री को बहुत सरल ढंग से समझाने को कहते हैं ताकि सब कर सकें। वे उत्तर देते हैं कि वे श्री राम शर्मा आचार्य जी के सब कथनों को नहीं मान सकते। वे कहते हैं कि गायत्री सबके लिए है, पर अनधिकार के बारे में शास्त्र का जो मत है, वे उसी से बोलेंगे। वैदिक मंत्रों के लिए वे बिल्कुल मना करेंगे: हर कोई वैदिक मंत्र नहीं बोल सकता — उसका उच्चारण, उसका स्वभाव और उसके नियम सब जानने चाहिए, और तभी करना चाहिए। वे पूछते हैं, वे मना कहाँ कर रहे हैं? वे यज्ञोपवीत पहनने पर राम शर्मा आचार्य के अपने लेखन की ओर इशारा करते हैं: उनके प्रश्नोत्तर संग्रह पढ़िए, जहाँ लोगों ने पूछा कि सब कहते हैं जनेऊ पहने बिना गायत्री नहीं करनी चाहिए — और उन्होंने उत्तर दिया, तो कठिनाई क्या है, यज्ञोपवीत करवा लीजिए। पर वक्ता पूछते हैं, कितने लोग यज्ञोपवीत के नियम मानते हैं?
जो व्यक्ति जनेऊ पहनकर उसके नियम तोड़ता है, उसका क्या होता है?
यज्ञोपवीत के साथ मांस और मदिरा, और उसके बाद मिलने वाला दंड
वक्ता कहते हैं कि यह सामान्य नियम है: यदि आप मांस खाने और मदिरा पीने वाले हैं, तो यज्ञोपवीत मत पहनिए। लोग कहते हैं कि तब तो कोई पहनेगा ही नहीं — इतने नियमों में कौन फँसेगा — और फिर भी पहन लेते हैं और वैसे ही खाते-पीते हैं, और इसका दंड पाते हैं। फिर दस दिन पूजा करते हैं और बाद में रोते हैं कि इतनी पूजा की और कुछ नहीं हो रहा।
वे कहते हैं, यदि आप मांस खाएँगे और मदिरा पिएँगे, तो यह सामान्य नियम है — यज्ञोपवीत पहनिए ही मत। लोग फिर कहते हैं, नहीं, छोड़िए, यज्ञोपवीत कौन पहनेगा, इतने नियमों में कौन उलझेगा। और पहनकर जैसे मन हो वैसे खाते-पीते हैं, और इससे दंड पाते हैं। फिर दंड मिलने पर वे दस दिन भगवान का पूजन करते हैं और बाद में रोते हैं कि इतनी पूजा की और कुछ नहीं हो रहा, कोई असर नहीं मिल रहा। वे उन्हें सीधे उत्तर देते हैं: आपने इतना मांस-मदिरा खाया-पिया, टेढ़े कर्म किए, जनेऊ पहनकर गलत काम किए — उसका फल कौन भोगेगा?
क्या पुराना मिट्टी का दीपक धोकर फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है?
मिट्टी के दीये का दोबारा उपयोग, और पर्यावरण का तर्क
वक्ता कहते हैं कि उनके अपने विचार में पुराने मिट्टी के दीपक को धोकर फिर इस्तेमाल करना ठीक नहीं। दूसरी बात पर, कि मिट्टी का दीपक पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है, वे उत्तर देते हैं कि पकी मिट्टी का दीपक कोई नुकसान नहीं करता — वह टूटकर कहीं न कहीं खत्म हो जाता है; यदि वह किसी और तरह की मिट्टी का दीपक है, तो वह अलग बात है।
पुराने मिट्टी के दीये को धोकर फिर इस्तेमाल करने के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि उनके अनुसार यह ठीक नहीं है। दूसरी बात यह उठाई गई कि क्या मिट्टी का दीपक पर्यावरण को कोई नुकसान करता है। वे पूछते हैं कि वह किस तरह का मिट्टी का दीपक है — यदि किसी अलग तरह का है, तो वह दूसरी बात है; नहीं तो वह बस टूटकर कहीं न कहीं खत्म हो जाता है। वे कहते हैं, पका हुआ दीपक शायद ही कोई नुकसान करता है। एक अलग प्रश्न पर वे कहते हैं: हनुमान जी को गुरु मानकर कीजिए।
वक्ता के विचार में किसे गायत्री जप नहीं करना चाहिए?
स्त्रियों पर और जनेऊ न पहनने वालों पर रोक
वे साफ कहते हैं कि हर कोई यह नहीं कर सकता: स्त्रियों को बिल्कुल नहीं करना चाहिए, और जो जनेऊ नहीं पहनते उन्हें गायत्री नहीं करनी चाहिए। जो फिर भी करेंगे वे स्वयं दंड के भागी बनेंगे और उसे भोगेंगे। और वे जोड़ते हैं कि ऐसे लोग अक्सर स्वयं नहीं भोगते — उनकी आने वाली पीढ़ियाँ भोगती हैं, फिर पूछती हैं कि हम किस दोष का फल भोग रहे हैं, और उसी वंश में फिर जन्म लेकर दोबारा भोगती हैं।
वे कहते हैं, हर कोई यह नहीं कर सकता। स्त्रियों को बिल्कुल नहीं करना चाहिए। वे दोहराते हैं कि वे अब भी कह रहे हैं: स्त्रियाँ, और जो जनेऊ नहीं पहनते, वे गायत्री न करें; और यदि करेंगे, तो स्वयं दंड के भागी बनेंगे और स्वयं भोगेंगे। वे कहते हैं, ऐसे लोग बहुत अच्छी तरह भोगते हैं। फिर वे एक सुधार जोड़ते हैं। वे सुनने वालों से साफ कहते हैं कि जो लोग इस तरह के काम करते हैं, वे शायद स्वयं न भोगें — उनकी आने वाली पीढ़ियाँ भोगती हैं। वे पीढ़ियाँ फिर कहती हैं, हमने क्या दोष किया कि हम कष्ट पा रहे हैं; और फिर उसी वंश में जन्म लेकर दोबारा भोगती हैं। वे कहते हैं, मंत्रों से कभी खिलवाड़ मत कीजिए। जिसका अधिकार है वह कीजिए; जिसका अधिकार नहीं है, वह बिल्कुल मत कीजिए।
वैदिक मंत्रों के क्या नियम हैं, और महामृत्युंजय किसे नहीं बोलना चाहिए?
महामृत्युंजय, पंचाक्षरी और नवार्ण, और दीक्षा में मिलने वाले मंत्र
वे कहते हैं कि वैदिक मंत्रों के बहुत सारे नियम हैं। स्त्री महामृत्युंजय नहीं कर सकती — यह वैदिक है और उसे बोलना भी नहीं चाहिए — फिर भी लोग यह नहीं मानते, और स्त्रियाँ बैठकर महामृत्युंजय करती हैं। वे पूछते हैं, किसने ऐसा कहा है, जबकि महामृत्युंजय का, पंचाक्षरी का, दुर्गा जी के नवार्ण का गाना चल रहा है, भजन चल रहा है। वे कहते हैं कि ये मंत्र दीक्षा में मिलते हैं और मुँह से कभी बोले नहीं जाते।
वे कहते हैं कि वैदिक मंत्रों के बहुत सारे नियम हैं। स्त्री महामृत्युंजय नहीं कर सकती — यह वैदिक है, और इसे बोलना भी नहीं चाहिए — पर लोग यह मानते ही नहीं। स्त्रियाँ महामृत्युंजय कर रही हैं, बैठकर कर रही हैं। वे पूछते हैं, किसने ऐसा कहा है: यहाँ गाना चल रहा है, भजन चल रहा है — महामृत्युंजय का, पंचाक्षरी का, दुर्गा जी के नवार्ण का। वे कहते हैं कि ये सब मंत्र दीक्षा में मिलते हैं और मुँह से कभी बोले नहीं जाते।
जब नियम टूटते हैं तो उसका परिणाम वास्तव में कौन भोगता है?
बच्चों और आगे की पीढ़ियों पर आने वाला कष्ट
वक्ता कहते हैं कि लोग नियम शायद ही मानेंगे, और बाद में कहेंगे कि कष्ट आ रहा है। कष्ट आपको नहीं आएगा — बच्चों को आएगा; और बच्चों को नहीं, आगे की पीढ़ियों में आएगा। और उसका कारण भी समझ नहीं आएगा: पितृ दोष बन गया, यह बन गया, वह बन गया, निवारण करवाते रहिए। इतने दोष हैं कि आप खोजते-खोजते थक जाएँगे। इसलिए जानबूझकर गलती मत कीजिए।
वे कहते हैं कि लोग नियम शायद ही मानेंगे। बाद में कहेंगे कि कष्ट हो रहा है। वे उत्तर देते हैं कि आपको कष्ट नहीं होगा — बच्चों को होगा। और बच्चों को भी नहीं: कष्ट आगे की पीढ़ियों में आएगा। और उसका कारण भी समझ नहीं आएगा। पितृ दोष बन गया, यह बन गया, वह बन गया — निवारण करवाते जाइए। इतने दोष हैं कि आप खोजते-खोजते थक जाएँगे। इसलिए, वे कहते हैं, जानबूझकर दोष नहीं करना चाहिए।
बटुक, काल भैरव और हर देवी के अपने भैरव में क्या अंतर है?
स्वरूप भेद जो एक साथ भेद भी है और एकता भी
बटुक, काल भैरव, सभी महापीर, और पुरुष तत्व भैरव जो हर दुर्गा के अपने पति स्वरूप हैं, इनके बारे में पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि स्वरूप के अनुसार सब अलग है। भेद हैं — और अलग होते हुए भी सब एक हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि बटुक, काल भैरव, सभी महापीर, और पुरुष तत्व भैरव जो दुर्गा जी के अपने-अपने रूपों के पति स्वरूप हैं — इनमें क्या भेद है। वे उत्तर देते हैं कि स्वरूप के अनुसार सब अलग है। भेद हैं — और अलग होते हुए भी सब एक ही हैं।
यदि चढ़ावा भीतर नहीं ले जाया जा सकता, तो उसे कहाँ अर्पित किया जाए?
शक्तिपीठ पर या मुख्य द्वार की देहरी पर अर्पण
वक्ता कहते हैं कि इसे किसी शक्तिपीठ पर अर्पित किया जा सकता है जहाँ भैरव जी विराजमान हों; और यदि वहाँ जाने की अनुमति नहीं है, तो मुख्य द्वार की देहरी के बगल में अर्पित किया जा सकता है।
वे कहते हैं कि जहाँ किसी शक्तिपीठ में भैरव जी विराजमान हों, वहाँ चढ़ावा अर्पित किया जा सकता है। और यदि आपको वहाँ भीतर जाने की अनुमति नहीं है, तो मुख्य द्वार की देहरी पर, उसके बगल में, अर्पित किया जा सकता है।
अभिचार करने वाला कितनी जल्दी वह काम दोहरा सकता है?
जब तक करने वाला सक्रिय है, दोहराने की कोई सीमा नहीं
वक्ता कहते हैं कि इसकी कहीं कोई सीमा नहीं — वे रोज़ कर सकते हैं। जब उनका किया हुआ काटा जाता है, तो वे बार-बार फिर कोशिश करेंगे। जब तक वे लोग सक्रिय हैं, कुछ भी नहीं कहा जा सकता: वे कभी भी कर सकते हैं।
यह पूछे जाने पर कि अभिचार करने वाले कितने दिन में दूसरी बार करते हैं, वे उत्तर देते हैं कि इसकी कहीं कभी कोई सीमा नहीं होती। वे हर दिन कर सकते हैं। जब उनकी की हुई चीज़ों की कटाई होती है, तो वे बार-बार कोशिश करेंगे। वे कहते हैं, जब तक वे लोग सक्रिय हैं, कुछ भी नहीं कहा जा सकता। वे कभी भी कर सकते हैं।
भैरव नामावली की तंत्रोक्त अनुष्ठान विधि अगले दिन उसकी पीडीएफ के साथ जारी होगी।
भैरव नामावली की विधि उसकी पीडीएफ के साथ
वक्ता कहते हैं कि भैरव नामावली के तंत्रोक्त अनुष्ठान की विधि अगले ही दिन पीडीएफ के साथ ज़रूर उपलब्ध होगी।
भैरव नामावली के तंत्रोक्त अनुष्ठान की विधि के बारे में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि वह अगले ही दिन पीडीएफ के साथ ज़रूर उपलब्ध करा दी जाएगी।
रक्षा देवताओं के बारे में पूछने वाले श्रोता को कौन सी साधना बताई जाती है?
भद्रकाली और वीरभद्र की साधना
वक्ता प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि भगवती भद्रकाली और वीरभद्र की साधना कीजिए।
एक श्रोता से वे बस इतना कहते हैं: भगवती भद्रकाली और वीरभद्र की साधना कीजिए।
क्या हनुमान जी वैदिक देवता हैं, और क्या उनकी पूजा के समय के नियम बाँधते हैं?
ऋग्वेद में हनुमान, और समय का नियम भाव की बात
वक्ता कहते हैं कि ऋग्वेद में भी हनुमान जी का वर्णन है — हनुमान जी वैदिक देवता हैं, और इस पर पूरी जानकारी जल्द उपलब्ध होगी। हनुमान जी की पूजा सुबह 7 से 2 के बीच और 5 के बाद करने की बात, क्योंकि बाद में वे राम जी की सेवा में होते हैं, यह भाव की बात है: वर्णन भाव के अनुसार दिया गया है। हनुमान जी के स्वरूप की स्वतंत्र रूप से पूजा होती है; ऐसा नहीं कि वे केवल भक्त रूप में ही हैं।
वे एक श्रोता से कहते हैं कि ऋग्वेद में भी हनुमान जी का वर्णन है — हनुमान जी वैदिक देवता हैं। वे कहते हैं कि इस पर पूरी जानकारी जल्द उपलब्ध कराई जाएगी। जहाँ तक दूसरी बात है, कि हनुमान जी की पूजा सुबह 7 से 2 के बीच और 5 बजे के बाद करनी चाहिए, क्योंकि बाद में वे राम जी की सेवा में होते हैं — वे कहते हैं, यह भाव की बात है। वर्णन भाव के अनुसार दिया गया है। हनुमान जी के स्वरूप की स्वतंत्र रूप से पूजा होती है। ऐसा नहीं कि वे केवल इसी भक्त रूप में हैं। वे कहते हैं, यदि आप तंत्र के भेदों में जाएँगे, तो वे बताएँगे।
हनुमान जी दास्य भाव में श्री राम के पास कैसे आए?
अगस्त्य द्वारा श्री राम को हनुमान के एकादश स्वरूप की दीक्षा
वक्ता कहते हैं कि श्री राम जी के वनवास के समय महर्षि अगस्त्य जी ने उन्हें भगवान श्री हनुमान जी के एकादश स्वरूप की दीक्षा दी और साधना करने की विधि बताई। जब श्री राम ने वह किया, तो उससे प्रसन्न होकर भगवान एकादशमुखी ने यह आशीर्वाद — वरदान कहिए — दिया और फलित किया: कि मैं दास स्वरूप में सदा आपके साथ रहूँगा। और उन्होंने सहायता की।
वे कहते हैं, सब सुनने वालों की जानकारी के लिए: श्री राम जी के वनवास के समय महर्षि अगस्त्य जी ने उन्हें भगवान श्री हनुमान जी के एकादश स्वरूप की दीक्षा दी और साधना करने की विधि बताई। जब श्री राम ने वह किया, तो उससे प्रसन्न होकर भगवान एकादशमुखी ने यह आशीर्वाद — वरदान कहिए — दिया और फलित किया: कि मैं दास स्वरूप में सदा आपके साथ रहूँगा। और उन्होंने सहायता की। वे कहते हैं कि इसमें बहुत भेद है। जो भक्त भाव में है, वह उसमें रहे; पर यदि आप तंत्र में जाएँगे, तो एक-एक चीज़ की जानकारी मिलेगी — किसने क्या किया, और कैसे।
यदि श्री कृष्ण परब्रह्म हैं, तो उन्होंने भगवती दुर्गा की पूजा क्यों की?
कृष्ण का अर्जुन को शिव के पास और भीम को भैरव लाने भेजना
वक्ता प्रश्न को पलट देते हैं। गीता के अनुसार जो श्री कृष्ण परब्रह्म परमेश्वर हैं, उन्होंने भगवती दुर्गा की उपासना क्यों की? अर्जुन से यह कहने की क्या ज़रूरत थी कि पाशुपतास्त्र पाने के लिए जाकर शिव जी की आराधना करो? बलशाली भीम को भैरव जी को लाने क्यों भेजा? हनुमान जी को प्रसन्न करो, यह क्यों कहा? कोई आवश्यकता नहीं थी — वे पूर्ण ब्रह्म परमात्मा थे। उन्होंने ये सब काम करवाए, और हर एक के पीछे कारण है।
वे कहते हैं कि गीता के अनुसार श्री कृष्ण परब्रह्म परमेश्वर हैं। फिर उन्होंने भगवती दुर्गा की उपासना क्यों की? ऐसी क्या ज़रूरत पड़ी कि उन्होंने अर्जुन से कहा कि पाशुपतास्त्र पाने के लिए जाकर शिव जी की आराधना करो? उन्होंने बलशाली भीम को यह कहकर क्यों भेजा कि जाओ भैरव जी को ले आओ? उन्होंने यह क्यों कहा कि हनुमान जी को प्रसन्न करो? कोई ज़रूरत ही नहीं थी। वे पूर्ण ब्रह्म परमात्मा थे — उन्हें क्या आवश्यकता थी? वक्ता कहते हैं कि उन्होंने ये सब काम करवाए, और इन सबके पीछे कारण है।
क्या हरे कृष्ण हरे राम जपने का सपना अच्छा संकेत है?
जप करते हुए भस्म किए जाने के सपने
एक सपने के बारे में पूछे जाने पर, जिसमें कुछ लोग हरे कृष्ण हरे राम जप रहे हैं और अभिचार करने वाले भस्म होते दिख रहे हैं, वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि यही दिख रहा है तो यह अच्छा सपना है। एक और प्रश्न पर वे दोहराते हैं कि भैरव जी का त्रिशूल पूजन स्थान में ज़रूर स्थापित किया जा सकता है।
एक सपने के बारे में पूछे जाने पर, जिसमें कुछ लोग हरे कृष्ण हरे राम जप रहे हैं और अभिचार करने वाले भस्म होते दिख रहे हैं, वे कहते हैं कि यदि हरे राम हरे कृष्ण दिख रहा है, तो यह अच्छा सपना है। एक अलग प्रश्न पर वे दोहराते हैं: भैरव जी का त्रिशूल पूजन स्थान पर बिल्कुल स्थापित किया जा सकता है।
क्या यह सच है कि हनुमान साधकों को भैरव साधना नहीं करनी चाहिए?
एक दावा जिसे वक्ता नकारते हैं, और कम पूजा की आदत पर उनका प्रहार
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने एक यूट्यूब वीडियो में देखा कि जो हनुमान जी की साधना करते हैं उन्हें भैरव जी की साधना नहीं करनी चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि वे ऐसी बात नहीं कहते और नहीं जानते किसने कही — किसने कहा कि हनुमान जी के साथ भैरव जी की पूजा नहीं करनी चाहिए? वे कहते हैं कि ऐसे बड़े लोग बहुत हैं, और उन्हीं के अनुयायी बढ़ते हैं, क्योंकि सबको आसान रास्ता चाहिए: कम काम करो, कम पूजा करो, हनुमान जी की पूजा केवल मंगलवार को करो।
एक श्रोता लिखते हैं कि एक यूट्यूब वीडियो में कहा गया था कि जो हनुमान जी की साधना करते हैं, उन्हें भैरव जी की साधना नहीं करनी चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं, आपने वीडियो में देखा — और कहा किसने? वे ऐसी बात नहीं कहते; उन्हें नहीं पता। किसने कहा कि हनुमान जी के साथ भैरव जी की पूजा नहीं करनी चाहिए? वे कहते हैं कि अब ऐसे बड़े लोग बहुत हैं, और उन्हीं के अनुयायी बढ़ते हैं। जो सही जानकारी देते हैं, उनका क्या होने वाला है? सबको आलस वाला रास्ता चाहिए: कम काम करो, कम पूजा-पाठ करो। हनुमान जी की पूजा केवल मंगलवार को करो। वे पूछते हैं, निर्मल बाबा कैसे प्रसिद्ध हुए — वे कहते थे, केवल मंगलवार को पढ़ो, और लोग उसी के अनुसार अनुभव बताते थे। और यहाँ सनातन संस्कृति में कहा गया है: सवा लाख का पुरश्चरण करो, बार-बार अनुष्ठान करो, इतनी बार जप करो।
किसी मंत्र को एक बार के बजाय 108 बार क्यों दोहराना चाहिए?
108 बार दोहराने के पीछे का विज्ञान
वे कहते हैं कि प्रोफ़ेसर और कॉलेज के शिक्षक भी, और जो मोटिवेशनल क्लासें आने लगीं वे भी, कहने लगे: 108 बार क्यों करें, क्या ज़रूरत है, एक बार करो, श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए। वे पूछते हैं, क्या उन्हें पता भी है कि इसके पीछे क्या विज्ञान है — 108 बार क्यों बताया गया है, क्यों और कैसे है? तुलसीदास जी ने क्यों लिखा कि जो इसे सौ बार पढ़ेगा वह इस तरह बंधन से छूट जाएगा?
वे कहते हैं कि कॉलेजों में भी प्रोफ़ेसर और शिक्षक यह कहने लगे, और जो मोटिवेशनल क्लासें आने लगीं उनमें भी उन्होंने यह सुना है। वे पूछते हैं, 108 बार क्यों करें — क्या ज़रूरत है? एक बार करो; श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए। वे पूछते हैं, क्या उन्हें पता भी है कि इसके पीछे विज्ञान क्या है? 108 बार क्यों बताया गया है? क्यों, कैसे, क्या है? तुलसीदास जी ने क्यों लिखा कि जो इसे सौ बार पढ़ेगा उसे इस तरह बंधन से छुटकारा मिलेगा?
क्या सात्विक खप्पर बटुक भैरव को भी चढ़ाया जा सकता है?
बटुक भैरव के लिए खप्पर, और दूधिया खप्पर की सावधानी
वक्ता उत्तर देते हैं कि बटुक भैरव के लिए सात्विक खप्पर चढ़ाया जा सकता है, पर भगवती का खप्पर भी साथ में रहेगा। और वे चेताते हैं कि अभी बिना बताए और बिना जाने इतना आगे मत बढ़िए, क्योंकि दूधिया खप्पर भी लगता है। अपने से खप्पर देने लगेंगे तो दिक्कत शुरू होगी। उस साधना में उन्होंने जितना बताया है उतना ही कीजिए। यदि आप कालिका योगिनी साधना कर रहे हैं तो उन्हें खप्पर दीजिए; भैरव जी के साथ बहुत सी चीज़ें अलग हो जाती हैं।
एक श्रोता कालिका योगिनी मैया के वीडियो का ज़िक्र करते हैं, जिसमें कहा गया था कि काल भैरव अष्टमी पर सात्विक खप्पर बटुक भैरव को भी चढ़ाया जा सकता है। वे उत्तर देते हैं कि बटुक भैरव के लिए सात्विक खप्पर चढ़ाया जा सकता है — पर भगवती का खप्पर भी साथ में रहेगा। और वे चेताते हैं कि अभी बिना बताए और बिना जाने इतना आगे मत जाइए, क्योंकि दूधिया खप्पर भी लगता है। यदि अपनी ओर से खप्पर चढ़ाने लगेंगे, तो दिक्कत शुरू हो जाएगी। उस साधना में उन्होंने जितना बताया है उतना ही कीजिए। यदि आप कालिका योगिनी साधना कर रहे हैं, तो उन्हें खप्पर दीजिए। वे कहते हैं, भैरव जी के साथ बहुत सारी चीज़ें अलग हो जाती हैं।
क्या नीलकंठ भैरव की पूजा बटुक भैरव की तरह की जा सकती है?
नीलकंठ भैरव के लिए दीक्षा आवश्यक; हर देवी के कई भैरव
वक्ता कहते हैं कि नीलकंठ भैरव के लिए विधान है कि दीक्षा लेकर पूरे विधि-विधान से किया जाए, जबकि बटुक भैरव की पूजा साधारण रूप से सब कर सकते हैं — और दोनों भैरव हैं। वे उदाहरण देते हैं: भगवती बगलामुखी के लिए भैरव स्वरूप में महामृत्युंजय की पूजा होती है, बटुक भैरव की भी पूजा होती है, और उनकी अंग विद्या में स्वर्णाकर्षण भैरव भी हैं। इसी तरह यहाँ नीलकंठ महादेव हैं, नीलकंठ भैरव हैं, और बटुक भैरव भी।
वे प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि नीलकंठ भैरव के लिए विधान है कि दीक्षा लेकर पूरे विधि-विधान से किया जाए। बटुक भैरव की पूजा साधारण रूप से सब कर सकते हैं — और वे कहते हैं, दोनों भैरव हैं। वे भगवती बगलामुखी से तुलना देते हैं: भैरव स्वरूप में उनके लिए महामृत्युंजय की पूजा होती है; बटुक भैरव की भी पूजा होती है; और उनकी अंग विद्या में स्वर्णाकर्षण भैरव भी हैं। ठीक इसी तरह, इस ओर नीलकंठ महादेव हैं, नीलकंठ भैरव हैं, और बटुक भैरव भी हैं।
क्या पूरी साधना के दौरान चमेली के तेल का दीपक जलते रहना चाहिए?
चमेली के तेल के दीपक और आग का खतरा
वक्ता कहते हैं: नहीं, चमेली का दीपक पूरे साधना काल में नहीं जलना चाहिए। और जो पहली बार चमेली के तेल का दीपक जला रहे हैं वे डरें नहीं — जान लीजिए कि चमेली के तेल में जलाने पर दीपक बहुत जल्दी जलता है और पूरा दीपक आग पकड़ लेता है। इसलिए पास में कुछ नहीं होना चाहिए, नहीं तो तुरंत आग लग जाएगी; यह पूरा भभक उठता है।
वे कहते हैं कि चमेली का दीपक पूरे साधना काल में नहीं जलना चाहिए। और दूसरी बात: जो पहली बार चमेली के तेल का दीपक जला रहे हैं, वे डरें नहीं। यह जान लीजिए — चमेली के तेल में जलाने पर दीपक बहुत जल्दी जलता है और पूरा दीपक आग पकड़ लेता है। वे चेताते हैं कि इसलिए आस-पास कुछ नहीं होना चाहिए, नहीं तो तुरंत आग लग जाएगी। यह ध्यान रखिए: यह पूरा भभक उठता है।
चालीस साल पहले गाँव के घर में "भैरव" के नाम से बिठाई गई शक्ति के बारे में क्या किया जा सकता है?
सोखा दादा द्वारा की गई स्थापना जो अब कष्ट नहीं काटती
एक श्रोता कहते हैं कि उनके बड़े दादा जी सोखा थे और उन्होंने किसी शक्ति को भैरव बोलकर गाँव में बिठा दिया; चालीस साल से उसकी पूजा हो रही है, अब वह विपत्ति नहीं काटती और अकाल मृत्यु का कारण बन रही है। वक्ता पूछते हैं कि घर में बिठाई थी या गाँव में, पता करते हैं कि गाँव के घर में है, और कहते हैं कि पूरी तरह पुरानी हो जाने से अब वह ऐसे ही व्यवहार करेगी — और दादा जी, जो स्वयं सोखा थे, उन्होंने स्वयं बिठाई और जाने से पहले उसका रहस्य नहीं बताया होगा।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनके बड़े दादा जी सोखा थे और उनके द्वारा किसी शक्ति को भैरव के नाम से गाँव में बिठा दिया गया। अब चालीस साल से उसकी पूजा हो रही है। वह न विपत्ति काटती है न रोकती है, और अकाल मृत्यु का कारण बन रही है। क्या उपाय करें? वक्ता पूछते हैं कि उसे घर में बिठाया गया था या गाँव में, और पता करते हैं कि उसे गाँव के घर में बिठाया गया था। वे कहते हैं, अब वह पूरी तरह पुरानी हो चुकी है, इसलिए ऐसे ही व्यवहार करेगी। वे जोड़ते हैं कि दूसरी बात यह है कि दादा जी ने उसे स्वयं बिठाया, और ऊपर से वे सोखा थे — और जाने से पहले उन्होंने उसका रहस्य नहीं बताया होगा।
बिठाई गई शक्ति को या तो कोई जानकार हटाता है, या उस स्थान पर छोटा शिव मंदिर बनाकर उसे ढक दिया जाता है।
जानकार द्वारा हटाना, या उसे छोटे शिव मंदिर के नीचे रखना
पहला, किसी जानकार को लाकर उसे वहाँ से हटवाइए। दूसरा, यदि आप उसे हटवा न सकें या वह न जाए, तो किसी जानकार और किसी योग्य ब्राह्मण दोनों की सहायता से अपनी ज़मीन पर बने एक छोटे शिव मंदिर के नीचे उस शक्ति को स्थापित कीजिए — उससे कहिए कि उसकी पूजा होगी, पर स्वतंत्र नहीं: शिव जी के नीचे जाओ। तब उसकी क्षमता ऐसी नहीं रहेगी कि किसी को परेशान कर सके। पर वे कहते हैं कि उनके अपने विचार में उसका विसर्जन करवाने का प्रयास कीजिए।
वे कहते हैं कि इसे करने के दो तरीके हैं। पहला है किसी जानकार व्यक्ति को लाकर उसे वहाँ से हटवाना। दूसरा: यदि आप लोग उसे हटवा न सकें, या वह न जाए, तो ऐसी स्थिति में किसी जानकार और किसी योग्य ब्राह्मण दोनों का सहयोग लीजिए, और अपनी ज़मीन पर बने एक छोटे शिव जी के मंदिर के नीचे उस शक्ति को स्थापित कीजिए। उससे कहिए: ठीक है, तुम्हारी पूजा होगी, पर स्वतंत्र नहीं होगी — शिव जी के नीचे जाओ। तब उसकी क्षमता ऐसी नहीं रहेगी कि वह किसी को परेशान कर सके। पर वे कहते हैं कि उनके अनुसार यह प्रयास कीजिए कि उसका विसर्जन हो, उस स्थान से उसकी गति हो। साधारण तरीके से यह संभव भी नहीं होगा, क्योंकि उसे मुफ़्त में खाने की आदत लग गई है — वह क्यों हटेगी?
भैरव जी के लिए कौन सा तेल इस्तेमाल करना चाहिए?
तिल के तेल की जगह सरसों का तेल
वक्ता कहते हैं कि तिल के तेल से सरसों का तेल अच्छा है — भैरव जी के लिए सरसों का तेल इस्तेमाल कीजिए।
तेलों के बारे में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि तिल के तेल से सरसों का तेल अच्छा है। भैरव जी के लिए सरसों का तेल इस्तेमाल कीजिए।
किसी देवी के निर्धारित भैरव और बटुक भैरव में क्या अंतर है?
बटुक भैरव हर रूप में विद्यमान
वक्ता उत्तर देते हैं कि स्वरूप भेद है, पर बटुक भैरव की पूजा भगवती के हर रूप के साथ की जा सकती है। जिस भी स्वरूप की आप उपासना कर रहे हैं, उस स्वरूप के भैरव की उपासना करनी चाहिए और करनी ही है; पर यदि आप बटुक भैरव की उपासना करते हैं, तो वह हर स्वरूप में काम आएगी, क्योंकि बटुक भैरव हर स्वरूप में वैसे भी विद्यमान हैं।
वे कहते हैं कि स्वरूप भेद तो है, पर बटुक भैरव की पूजा भगवती के हर स्वरूप के साथ की जा सकती है। एक श्रोता पूछते हैं कि गुरु और गणपति के बाद जिन भैरव की साधना होती है, और हर विशेष देवी के लिए जो भैरव बताए गए हैं, उनमें स्वरूप का क्या अंतर है। वे उत्तर देते हैं कि स्वरूप भेद भी है। आप जिस स्वरूप की उपासना करते हैं, उस स्वरूप के भैरव की उपासना ज़रूर करनी चाहिए — करनी ही पड़ती है। पर यदि आप बटुक भैरव की उपासना करते हैं, तो वह हर स्वरूप में काम आएगी। हर स्वरूप में बटुक भैरव वैसे भी विद्यमान हैं।
क्या भगवती के पास पहले से रखा पुराना पीतल का त्रिशूल भैरव पूजा के लिए इस्तेमाल हो सकता है?
बिना प्रतिष्ठा वाले त्रिशूल को पंचगव्य से फिर प्रतिष्ठित करना
यदि उस पुराने पीतल पर पहले कुछ प्रतिष्ठित नहीं किया गया है — यानी उस पर पहले कोई अस्त्र पूजन या ऐसी कोई विधि नहीं हुई है — तो आप उस पर बटुक भैरव जी के नाम से उनकी बताई विधि कर सकते हैं: उसे पंचगव्य आदि से शुद्ध करके फिर उस पर दोबारा करना।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या घर में भगवती के पास पहले से रखे लोहे या पीतल के त्रिशूल पर भैरव जी की पूजा हो सकती है, और यदि हाँ, तो विधि बताने का अनुरोध करते हैं। वे कहते हैं कि यदि उस पुराने पीतल पर पहले से कुछ प्रतिष्ठित नहीं है — यानी उस पर उनके लिए पहले कोई अस्त्र पूजन या ऐसी कोई विधि नहीं हुई है — तो आप बटुक भैरव जी के नाम से इसमें उनकी बताई विधि लगा सकते हैं: उसे पंचगव्य आदि से शुद्ध करना, और फिर उस पर दोबारा करना।
ब्रह्मचर्य को कैसे मज़बूत करना चाहिए?
ब्रह्मचर्य के सहारे के रूप में योग और प्राणायाम
वक्ता कहते हैं कि सबसे ज़रूरी बात यह है कि आप मन से तैयार हो भी जाएँ, तब भी आपका शरीर प्रकृति के विरुद्ध जाने में देर नहीं लगाएगा। इसके लिए आपको योग और प्राणायाम की सहायता लेनी होगी।
यह पूछे जाने पर कि ब्रह्मचर्य का पालन अधिक से अधिक कैसे हो, और कौन सी साधना उसकी शक्ति सबसे ज़्यादा बढ़ाती है, वे उत्तर देते हैं कि यहाँ सबसे ज़रूरी बात शरीर की है। वे कहते हैं कि आप मन से तैयार हो भी जाएँ, तब भी आपका शरीर प्रकृति के विरुद्ध जाने में ज़्यादा समय नहीं लगाएगा। इसके लिए आपको योग और प्राणायाम का सहयोग लेना होगा।
क्या संध्या गायत्री में साभिमूचन अनिवार्य है?
दस बार जप बनाम पूरी माला
एक श्रोता, जिनके गुरुदेव — जिनसे उन्हें जनेऊ के समय गायत्री मंत्र मिला था — अब जीवित नहीं हैं, पूछते हैं कि क्या संध्या गायत्री में साभिमूचन अनिवार्य है, क्योंकि वे पूरी माला नहीं, केवल दस बार जप करते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि आप दस बार जप करते हैं तो साभिमूचन की कोई अनिवार्यता नहीं; यदि एक माला करते हैं, तो कम से कम वह आवश्यक है।
प्रश्नकर्ता कहते हैं कि जिन गुरुदेव से उन्हें जनेऊ के समय गायत्री मंत्र मिला था, वे अब नहीं हैं, इसलिए वे उनसे पूछ नहीं सकते। वे पूरी माला नहीं, केवल दस बार जप करते हैं, और पूछते हैं कि क्या संध्या गायत्री में साभिमूचन अनिवार्य है। वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि आप दस बार जप करते हैं, तो साभिमूचन की कोई अनिवार्यता नहीं है। यदि आप एक माला करेंगे, तो कम से कम वह आवश्यक है।
क्या किसी देवी के निर्धारित भैरव के बजाय शिव जी की पूजा करने में दोष है?
निर्धारित भैरव के बिना पूजा अधूरी रह जाती है
वक्ता उत्तर देते हैं कि पूजा बस अधूरी रह जाएगी। भैरव स्वरूप में शिव जी ही हैं, पर यदि आप विशेष कृपा चाहते हैं और उनकी विशेष विधि से पूजा कर रहे हैं, तो यह आवश्यक हो जाता है। स्वरूप इसीलिए है कि उनका विशेष पूजन हो सके। इसलिए जिस भी स्वरूप की आप पूजा कर रहे हैं — यदि भगवती बगलामुखी की पूजा या उनकी कोई आराधना कर रहे हैं — तो उसके साथ कम से कम बटुक भैरव ज़रूर कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि यदि किसी देवी की पूजा में उनके निर्धारित भैरव की पूजा न करके शिव जी की पूजा की जाए तो क्या कोई दोष होता है, वे उत्तर देते हैं कि पूजा बस अधूरी रह जाएगी। वे कहते हैं कि भैरव स्वरूप में स्वयं शिव जी ही हैं, पर यदि आप विशेष कृपा चाहते हैं और उनकी पूजा विशेष विधि से कर रहे हैं, तो यह आवश्यक हो जाता है। स्वरूप इसीलिए बना है कि उनका विशेष पूजन हो सके। इसलिए जिस भी स्वरूप की आप पूजा कर रहे हैं — जैसे यदि आप भगवती बगलामुखी की पूजा कर रहे हैं, या उनकी कोई आराधना कर रहे हैं — तो उनके साथ कम से कम बटुक भैरव ज़रूर कीजिए।
बटुक भैरव को रामबाण और ब्रह्मास्त्र क्यों कहा जाता है?
वे कष्ट जिनमें बटुक भैरव काम आते बताए जाते हैं
वे कहते हैं कि आने वाली कालाष्टमी — काल भैरव अष्टमी — के दिन से बटुक भैरव की पूजा ज़रूर कीजिए। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ आपको बटुक भैरव की ज़रूरत न पड़े: घर में कलह-क्लेश, प्रेत दोष, तंत्र की बाधा, पढ़ाई में मन न लगना, नौकरी न मिलना, धन चाहिए, संतान चाहिए, पितरों का दोष। जहाँ ब्रह्मराक्षस का दोष हो वहाँ भी — भैरव हर स्वरूप में ब्रह्मा का सिर हाथ में लिए हैं, और उससे बड़ा प्रेत-पिशाच कोई नहीं हो सकता, फिर भी वे उसे सीधे पकड़ लेते हैं। और इन सबके ऊपर बटुक भैरव सौम्य और शांत हैं।
वे सुनने वालों से कहते हैं कि वे बार-बार यह कहते हैं: बटुक भैरव आपके लिए रामबाण हैं, बटुक भैरव आपके लिए ब्रह्मास्त्र हैं। जो कालाष्टमी अब आ रही है — काल भैरव अष्टमी आ रही है — उस दिन से बटुक भैरव की पूजा ज़रूर कीजिए। आपका ऐसा कोई क्षेत्र नहीं, ऐसी कोई जगह ही नहीं, जहाँ आपको बटुक भैरव की ज़रूरत न पड़े, जहाँ बटुक भैरव आप पर कृपा न करें। घर में कलह-क्लेश है; प्रेत दोष है; तंत्र की बाधा है; पढ़ाई में मन नहीं लग रहा; नौकरी नहीं मिल रही; धन चाहिए; संतान चाहिए। आपके पितरों का दोष है। हर जगह बटुक भैरव काम आते हैं। जहाँ ब्रह्मराक्षस का दोष हो — और यह ज्ञात है कि भैरव हर स्वरूप में ब्रह्मा का सिर हाथ में लिए हैं — उससे बड़ा प्रेत-पिशाच कोई नहीं हो सकता, फिर भी वे उसे सीधे पकड़ लेते हैं। इसलिए बटुक भैरव की पूजा कीजिए, वे कहते हैं: और इन सबके ऊपर वे सौम्य और शांत हैं। बटुक भैरव कीजिए, और हर स्वरूप में उनकी पूजा पूरी हो जाएगी।
क्या महाभैरव साधना में रोज़ हवन किया जा सकता है?
महाभैरव साधना में रोज़ हवन, और ईशान रुद्र मंत्र
वक्ता कहते हैं कि महाभैरव साधना में रोज़ हवन करना बिल्कुल ठीक रहेगा। रुद्र मंत्र से किसी प्रयोग के बारे में अलग से पूछे जाने पर वे पूछते हैं कि प्रश्नकर्ता ने कौन सा रुद्र मंत्र किया है, और बताते हैं कि उन्होंने जो डाले हैं उनमें केवल ईशान रुद्र दिया गया है — और वह भी रोज़गार के लिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या महाभैरव साधना में रोज़ हवन करना ठीक रहेगा, वे उत्तर देते हैं कि बिल्कुल ठीक रहेगा। रुद्र मंत्र से कोई प्रयोग पाने के बारे में एक अलग प्रश्न पर वे पूछते हैं कि श्रोता ने कौन सा रुद्र मंत्र किया है। वे कहते हैं कि उन्होंने जो डाले हैं, उनमें केवल ईशान रुद्र दिया है — और वह भी रोज़गार के लिए।
अपने और परिवार के कल्याण के लिए एक स्त्री को कौन सी पूजा और साधना करनी चाहिए?
शिव परिवार, कुलदेवी-देवता, और पंचायतन पूजा
वक्ता उत्तर देते हैं कि सबसे पहले शिव परिवार, जिसमें सब शामिल हैं — गणपति, स्कंद, माँ भगवती, शिव जी, शिव जी के गले में वासुकि, सिर पर भगवती गंगा, चंद्र देव, सोम, नंदी। वहाँ कोई भी नहीं छूटता; जब आप उनकी पूजा शुरू करते हैं, सबकी पूजा अपने आप हो जाती है। इसके अलावा आपकी कुलदेवी और कुलदेवता, और पंचायतन पूजा, जो एक साधारण गृहस्थ को ज़रूर करनी चाहिए।
अर्चना जी पूछती हैं कि स्त्रियों को कौन सी पूजा और साधना करनी चाहिए जिससे वे और उनके परिवार फलें-फूलें। उत्तर देते हुए वे शिव परिवार से शुरू करते हैं — जिसमें सब शामिल हैं। गणपति हैं, स्कंद हैं, माँ भगवती हैं, शिव जी हैं; शिव जी के गले में वासुकि नाग हैं, सिर पर भगवती गंगा हैं, चंद्र देव हैं; उनके साथ सोम और नंदी। कोई भी नहीं छूटेगा। जब आप उनकी पूजा शुरू करते हैं, सबकी पूजा अपने आप हो जाती है। इसलिए घर में मुख्य रूप से सबको उनकी पूजा करनी चाहिए। बाकी के लिए आपकी कुलदेवी और कुलदेवता हैं, और पंचायतन पूजा। यदि आप कहें कि पंचायतन पूजा और बाकी सब हो रहा है, तो वे सब वैसे भी आ जाते हैं — आप प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सबकी पूजा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि एक साधारण गृहस्थ को जो पंचायतन पूजा बताई गई है, वह ज़रूर करनी चाहिए।
वक्ता एक स्त्री को घर की नित्य पूजा का कौन सा क्रम बताते हैं?
सूर्य, तुलसी, गुरु पूजन और शिव तक का क्रम
पहले सूर्य को जल और तुलसी जी को जल दीजिए — पर यदि रविवार को तुलसी जी को जल नहीं देते, तो मत दीजिए। उसके बाद गुरु पूजन, गणपति पूजन, बटुक भैरव का पूजन, हनुमान जी का पूजन, और फिर भगवती का पूजन और फिर शिव जी का। बीच में, हनुमान जी के बाद, यदि करते हैं तो लक्ष्मी नारायण या राम जी की पूजा कीजिए। यदि शिव जी से पहले कुबेर की पूजा करते हैं, या आपकी कुलदेवी-कुलदेवता सोखा बाबा, गौरैया बाबा, बन्नी माता या बंदी परमेश्वरी हैं, तो शिव जी के पूजन के समय ही वीरभद्र और भद्रकाली का ध्यान मंत्र, जो भी पूजन पद्धति आपके पास हो उसके साथ, कर लीजिए।
वे कहते हैं, सबसे पहले सूर्य को जल देना और तुलसी जी को जल देना। यदि रविवार को आप तुलसी जी को जल नहीं देते, तो उस दिन मत दीजिए। उसके अलावा फिर: गुरु पूजन, गणपति पूजन, बटुक भैरव का पूजन, हनुमान जी का पूजन, और उसके बाद भगवती का पूजन, फिर शिव जी का पूजन। इनके बीच में, हनुमान जी के पूजन के बाद, लक्ष्मी नारायण या राम जी की पूजा कीजिए, जो भी आप करते हों। यदि शिव जी की पूजा से पहले आप कुबेर जी की पूजा करते हैं, या आपके कुलदेवी-देवता में सोखा बाबा, गौरैया बाबा, बन्नी माता या बंदी परमेश्वरी हैं, तो शिव जी के पूजन के समय ही वीरभद्र और भद्रकाली का ध्यान मंत्र, जो भी पूजन पद्धति आपके पास उपलब्ध हो उसके साथ, कर लीजिए। सबका पूजन पूरा हो जाएगा।
यदि कोई केवल एक रूप को मानना चाहे, तो बाकी के प्रति क्या करना होता है?
इष्ट के लिए कवच और सहस्रनाम, बाकी के लिए नाम-उच्चारण
यदि आप एक ही स्वरूप लेकर चलना चाहते हैं, तो कम से कम बाकी के नामों का उच्चारण ज़रूर होना चाहिए। वे यह नहीं कह रहे कि बैठकर हर एक का कवच कीजिए — पहले गणपति कवच, फिर गणपति सहस्रनाम, फिर हनुमान जी का। वे इसकी तुलना परिवार से करते हैं: आप अपने पति से बहुत प्रेम करती हैं, पर बड़ों का आदर करती हैं और छोटों को स्नेह देती हैं। इसलिए विशेष पूजन आपके आराध्य का हो — यदि भगवती दुर्गा आपकी आराध्य हैं तो उनका कवच, उनका सहस्रनाम, उनकी विशेष स्तुति; बाकी के लिए केवल नाम का उच्चारण, उनके दस नाम या द्वादश नाम स्तोत्र, और इतना काफ़ी है।
वे कहते हैं कि यदि आप कोई एक विशेष स्वरूप लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं, तो कम से कम बाकी के नामों का उच्चारण ज़रूर होना चाहिए। वे यह नहीं कह रहे कि आप बैठकर एक-एक करके सबका कवच कीजिए — पहले गणपति कवच, फिर गणपति सहस्रनाम, फिर हनुमान जी का। हनुमान जी का उतना करने की ज़रूरत नहीं। वे इसकी तुलना परिवार से करते हैं: जिस घर में आपकी शादी हुई है, वहाँ आप अपने पति से बहुत प्रेम करती हैं, पर परिवार के बड़ों का आदर करती हैं और छोटों को स्नेह देती हैं। ठीक उसी तरह, जो आपके आराध्य हैं उनका विशेष पूजन होता है। यदि भगवती दुर्गा आपकी आराध्य हैं, तो आप उनका कवच, उनका सहस्रनाम, उनकी सब विशेष स्तुति करेंगी। बाकी सबके लिए केवल नाम का उच्चारण — उनके दस नाम, या जो द्वादश नाम स्तोत्र है। इतना कीजिए; यह काफ़ी है।
स्वर्णाकर्षण भैरव अभी नहीं सिखाया जा रहा क्योंकि लोग उसके नियम नहीं मानेंगे और उसके लिए बटुक भैरव को छोड़ देंगे।
स्वर्णाकर्षण भैरव के नियम, और उसके लिए बटुक को छोड़ना
वे कहते हैं कि अभी वे स्वर्णाकर्षण भैरव पर नहीं बोल सकते। स्वर्णाकर्षण भैरव करने का एक नियम है; आजकल लोग उसे नहीं मान रहे। वे बटुक भैरव को एक तरफ़ छोड़कर स्वर्णाकर्षण के पीछे भागते हैं। वे मानते हैं कि यह किया जा सकता है, पर तब बहुत सी चीज़ें देखनी पड़ती हैं।
वे कहते हैं कि स्वर्णाकर्षण भैरव के बारे में वे अभी नहीं बता सकते। स्वर्णाकर्षण भैरव करने का एक नियम है, और आजकल लोग उसे मानते ही नहीं: वे बटुक भैरव करते हैं और छोड़ देते हैं, और स्वर्णाकर्षण के पीछे चले जाते हैं। वे कहते हैं कि स्वर्णाकर्षण भैरव ठीक है — किया जा सकता है — पर तब बहुत सारी चीज़ें देखनी पड़ती हैं।
क्या काल भैरव मंत्र का मानसिक जप किया जा सकता है?
काल भैरव मंत्र का मानसिक जप
वक्ता कहते हैं कि काल भैरव के मंत्र का मानसिक जप किया जा सकता है, और पूजन में बैठकर किया जा सकता है।
वे उत्तर देते हैं कि काल भैरव के मंत्र का मानसिक जप किया जा सकता है। यह पूजन में बैठकर किया जा सकता है।
जिन्हें भगवती ने महायज्ञ करवाने का सामर्थ्य दिया है, उन्हें ऐसा करने की सद्बुद्धि नहीं मिल रही।
सद्बुद्धि के बिना सामर्थ्य, और गौ रक्षा के लिए नवचंडी यज्ञ
वक्ता पलटकर कहते हैं, क्यों नहीं करवाया जा सकता — जिन्हें भगवती ने इसे करवाने का सामर्थ्य दिया है, उन्हें ऐसा करने की सद्बुद्धि नहीं मिल रही। जिन्हें साधन दिए गए, उन्हें सद्बुद्धि नहीं दी गई। इसके उलट वे बताते हैं कि उन्हें जो साधन मिले उनसे क्या किया गया: 6 और 7 नवंबर को गौ रक्षा के लिए दो दिन का नवचंडी यज्ञ, गायों में फैली लंपी नाम की महामारी के कारण, ग्यारह ब्राह्मणों द्वारा नवचंडी याग और हवन, गौ माता को सवामणि भोजन, और जितना संभव हो सका ब्राह्मणों और साधुओं को भोजन।
एक श्रोता पूछते हैं कि सनातन धर्म को जो हानि हो रही है, उसे देखते हुए क्या मध्य प्रदेश के दतिया में माँ बगलामुखी का महायज्ञ एक बार फिर करवाया जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं, क्यों नहीं करवाया जा सकता। जिनके भीतर भगवती ने इसे करवाने का सामर्थ्य रखा है, उन्हें ऐसा करने की सद्बुद्धि नहीं मिल रही। जिन्हें साधन दिए गए, उन्हें सद्बुद्धि नहीं दी गई। और वे पूछते हैं, उनके जैसे लोगों और सुनने वालों का कितना सामर्थ्य है? भगवती ने उन्हें जितना दिया, और उन सबको माध्यम बनाकर, उन्होंने 6 और 7 नवंबर को गौ रक्षा के लिए दो दिन का नवचंडी यज्ञ करवाया — गौ माता में फैली लंपी नाम की महामारी के कारण। वे कहते हैं कि इसकी पूरी वीडियो शूटिंग भी एक सनातनी व्यक्ति से करवाई गई, और भेजे जाने पर वे उसे एडिट करके पूरा वीडियो डालेंगे: कैसे ग्यारह ब्राह्मणों द्वारा नवचंडी याग, हवन, गौ माता को सवामणि भोजन, और जितना संभव हो सका ब्राह्मणों और साधुओं को भोजन — यह सब किया गया, ताकि उन्हें शांति मिले। वे कहते हैं कि जिन्हें साधन दिए गए वे नहीं करवाते; यह उनके जैसे छोटे साधनों वाले लोगों पर आ जाता है। यह ऐसा युग है जिसमें अर्थ ही प्रधान है — जिनके पास पैसा और सामर्थ्य है, उनके पास अपने धर्म और संस्कृति के लिए कुछ करने का समय नहीं।
क्या बटुक भैरव की पूजा में खड़ी बत्ती का दीपक जलाया जा सकता है?
खड़ी बत्ती और सोई बत्ती
वक्ता कहते हैं कि आप जला सकते हैं, कोई कठिनाई नहीं — पर जितना हो सके सोई बत्ती का इस्तेमाल कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या बटुक भैरव की पूजा में खड़ी बत्ती का दीपक जलाया जा सकता है, वे उत्तर देते हैं कि जलाया जा सकता है और इसमें कोई कठिनाई नहीं। पर वे कहते हैं, जितना हो सके सोई बत्ती का उपयोग कीजिए।
क्या काल भैरव अष्टकम से हवन किया जा सकता है?
काल भैरव अष्टकम से हवन
वक्ता कहते हैं कि हाँ, किया जा सकता है और कोई कठिनाई नहीं — और यह पंक्ति उद्धृत करते हैं "काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे"। यदि काल भैरव अष्टक में आपकी आस्था है और आप उससे हवन करना चाहते हैं, तो कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या काल भैरव अष्टकम से हवन किया जा सकता है, वे उसमें से पढ़ते हैं: काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे। वे कहते हैं, हाँ, किया जा सकता है; इसमें कोई कठिनाई नहीं। यदि काल भैरव अष्टक में आपकी आस्था है और आप हवन करना चाहते हैं, तो कीजिए।
क्या 8000 जप वाली क्रोध भैरव साधना अपने आप शुरू करनी चाहिए?
क्रोध भैरव केवल पूरे विधि-विधान और दीक्षा के साथ
एक श्रोता कहते हैं कि एक तंत्र ग्रंथ में क्रोध भैरव की साधना दी गई है जिसमें केवल 8000 जप होता है, बहुत अच्छे परिणाम आ रहे हैं, और उनके एक मित्र ने इसे शुरू किया है। वक्ता उत्तर देते हैं कि जिन्हें बहुत अच्छे परिणाम मिल रहे हैं उन्हें जाँचना चाहिए — क्या यह केवल क्रोध भैरव का है, या वे इसका अंत नहीं बता रहे। उनके अनुसार क्रोध भैरव की साधना इस तरह नहीं करनी चाहिए: पूरा विधि-विधान जानकर और दीक्षा लेकर ही करनी चाहिए।
एक श्रोता बताते हैं कि एक तंत्र ग्रंथ में क्रोध भैरव की साधना दी गई है, जिसमें केवल 8000 जप होता है, बहुत अच्छे परिणाम मिल रहे हैं, और उनके एक मित्र ने माता की कृपा से इसे शुरू किया है। वक्ता कहते हैं, ठीक है — पर जिन्हें बहुत अच्छे परिणाम मिले हैं, उन्हें देखना चाहिए: क्या यह केवल क्रोध भैरव का किया है, या वे इसका अपना अंत नहीं बता रहे। वे कहते हैं कि उनके अनुसार क्रोध भैरव की साधना इस तरह नहीं करनी चाहिए। पूरा विधि-विधान जानकर और दीक्षा लेने के बाद ही करनी चाहिए।
सत्यनारायण की असली कथा क्या है?
सत्यनारायण कथा और उसकी फलश्रुति
एक श्रोता कहते हैं कि जो कथा सुनाई जाती है वह केवल फलश्रुति लगती है, और पूछते हैं कि असली कथा क्या है। वक्ता उत्तर देते हैं कि इस विषय पर वे उन्हें पूरा पुराण ही बताएँगे। एक किताब के बारे में अलग से पूछे जाने पर वे कहते हैं कि साधनाओं पर किताब ज़रूर छपेगी यदि यूट्यूब परिवार बढ़े और उससे कुछ आर्थिक सामर्थ्य बने, क्योंकि छोटे स्तर पर छपवाने में भी एक के बाद एक रजिस्ट्रेशन लगता है, और उसके लिए पैसा चाहिए।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनकी बातों से उन्हें एक प्रश्न याद आया: सत्यनारायण की असली कथा क्या है, क्योंकि जो सुनाई जाती है वह केवल फलश्रुति लगती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि इस विषय पर वे उन्हें पूरा पुराण ही बताएँगे। एक किताब के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि साधनाओं से जुड़ी किताब ज़रूर छपेगी — यदि यूट्यूब परिवार बढ़े और यहाँ से कुछ आर्थिक सामर्थ्य बने, तो इसकी व्यवस्था हो सकती है। वे कहते हैं कि छोटे स्तर पर किताब छपवाने जाने में भी शुरुआत में एक के बाद एक रजिस्ट्रेशन की पूरी प्रक्रिया है, और उसके लिए पैसा चाहिए। वे जोड़ते हैं कि वे बहुत कुछ करना चाहेंगे, और उतना सहयोग मिले तो अपना जीवन इसमें लगा देंगे — कि यदि उनके माध्यम से भगवती सौ सनातनियों का भी कल्याण करें, तो यह बहुत बड़ी बात होगी।
जब किसी ने आपकी भगवती को बाँधकर ले लिया हो, तो क्या किया जा सकता है?
अक्षत और सिंदूर से छल, और महाभैरव मंत्र प्रयोग
एक श्रोता लिखते हैं कि उनके चचेरे भाई, जो तांत्रिक हैं, ने छल से उनके माथे पर अक्षत और सिंदूर लगाकर उनकी भगवती को बाँध लिया, और पूछते हैं कि उन्हें वापस कैसे पाएँ। वक्ता कहते हैं कि जब कोई आपकी शक्ति को बंधन में ले, तो उसे खोलने के तीन-चार प्रयोग उन्होंने इसी चैनल पर दिए हैं; महाभैरव के मंत्र प्रयोग से भी बंधन खुलेगा। क्योंकि वह आपका भाई है, उसे आपके बारे में पूरी जानकारी होगी। इसलिए जो महाभैरव अनुष्ठान दिया गया है वह कीजिए।
धर्मेंद्र जी लिखते हैं कि उनके चचेरे भाई, जो तांत्रिक हैं, ने छल से उनके माथे पर अक्षत और सिंदूर लगाकर उनकी भगवती को बाँध लिया, और पूछते हैं कि क्या करें जिससे उनकी माँ उससे लौट आएँ। वक्ता कहते हैं कि जब कोई आपकी शक्ति को बंधन में ले, तो उसे खोलने के तीन-चार प्रयोग वे इसी चैनल पर पहले ही दे चुके हैं। महाभैरव के मंत्र प्रयोग से भी बंधन खुलेगा। यदि वे बँधकर कहीं चली गई हैं — और वे कहते हैं, ऐसा होता है, लोग देवी शक्तियों को बाँधकर ले जाते हैं और उनकी पूजा करते हैं — और क्योंकि वह आपका अपना भाई है, उसे आपके बारे में पूरी जानकारी होगी। इसलिए जो महाभैरव का अनुष्ठान दिया गया है, वह कीजिए। वे उस अनुभव की ओर इशारा करते हैं जो उन्होंने डाला है, कि तांत्रिकों का विनाश कैसे होता है। आप महाभैरव की साधना कर सकते हैं।
जब मुसीबत आती है तो परिवार में दोष किसे दिया जाता है?
पूजा करने वाले को सबसे पहले दोष दिया जाता है
वक्ता एक श्रोता से सहमत होते हैं कि जो तंत्र की बुराई करते हैं, वही लोग एक समय आने पर तांत्रिकों को खोजते फिरते हैं। जब जीवन में कुछ अच्छा होता है तो वह मेरे पुण्य और मेरी महिमा से; जब कुछ बुरा होता है तो भगवान कर रहे हैं; और जब उससे भी बुरा होता है, तो परिवार के उस सदस्य के कारण जो पूजा-पाठ करता है। वे कहते हैं कि परिवार में जो लड़का या लड़की बहुत पूजा करता है वह परिवार को बल देता है — पर कुछ बुरा शुरू होते ही सब उसी को दोष देने लगते हैं।
वे एक श्रोता से कहते हैं कि यह बिल्कुल सच है कि जो तंत्र की बुराई करते हैं, वही लोग एक समय आने पर तांत्रिकों को खोजते फिरते हैं। वे कहते हैं, जब जीवन में कुछ अच्छा हो रहा होता है, तो वह मेरे पुण्य और मेरी अपनी महिमा से है। जब कुछ बुरा होता है, तो भगवान कर रहे हैं। और यदि उससे भी बुरा कुछ हो, तो वह परिवार के उस सदस्य के कारण है जो पूजन-पाठ करता है। यदि परिवार में एक व्यक्ति — घर का कोई लड़का या लड़की — बहुत पूजन-पाठ करता है, तो उससे परिवार को बल मिलता है। पर यदि परिवार में कुछ बुरा शुरू होता है, तो सब उसी व्यक्ति को दोष देने लगते हैं: तुम इतनी पूजा करते हो, यह क्या हो रहा है; तुम्हारे पूजा-पाठ से कुछ नहीं हो रहा; यह सब बकवास है; तुम पूजन-हवन में पैसा बर्बाद करते हो। वे सुनने वालों से कहते हैं कि इसे अपने घरों से जोड़कर देखिए। लोग अपने कर्म नहीं देखते — उन्होंने क्या कर्म किए और उन्हें कैसे भोग रहे हैं। पर जो पूजन-पाठ कर रहा है, उसे सबसे पहले दोष दिया जाता है।
माँ काली की नित्य पूजा का मार्गदर्शन कहाँ है?
काली के नित्य पूजन में ध्यान देने वाली बातों पर लाइव सत्र
वक्ता कहते हैं कि माँ काली के नित्य पूजन में विशेष ध्यान देने वाली बातों पर एक लाइव सत्र है — उसे एक बार सुनिए, उसमें बहुत कुछ बताया गया है।
वे कहते हैं कि माँ काली के नित्य पूजन में जिन बातों पर विशेष ध्यान देना है, उन पर एक लाइव सत्र पहले से उपलब्ध है। वे कहते हैं, उसे एक बार सुनिए: उसमें काली जी के पूजन के बारे में बहुत कुछ बताया गया है।
यदि मंदिर में काल भैरव भगवती ब्रह्माणी के साथ विराजमान हैं, तो किसकी पूजा करनी चाहिए?
स्थापित जोड़ी की पूजा, और अष्ट भैरव केवल गुरु परंपरा से
वक्ता कहते हैं कि यदि मंदिर में काल भैरव जी भगवती ब्रह्माणी के साथ स्थापित हैं, तो आपको उन्हीं की पूजा करनी चाहिए। यदि आप अष्टमातृका के अनुसार अष्ट भैरव देख रहे हैं, तो वह तभी लागू होगा जब आपको वह गुरु परंपरा से मिला हो। आपके मंदिर में जिस भी कारण से काल भैरव भगवती ब्रह्माणी के साथ स्थापित हैं, उनकी पूजा कीजिए; बाकी रूप आप देख सकते हैं।
वे प्रकाश प्रजापति जी से कहते हैं कि यदि मंदिर में काल भैरव जी भगवती ब्रह्माणी के साथ स्थापित हैं, तो आपको उन्हीं की पूजा करनी चाहिए। बाकी, यदि आप अष्टमातृका के अनुसार अष्ट भैरव देख रहे हैं, तो वह तभी मान्य होगा जब आपको वह गुरु परंपरा से मिला हो। नहीं तो, आपके मंदिर में जिस भी कारण से काल भैरव भगवती ब्रह्माणी के साथ स्थापित हैं, उन्हीं की पूजा कीजिए। बाकी स्वरूप आप देख सकते हैं।
साधना चलते समय कठिनाइयाँ क्यों आती-जाती हैं?
बढ़ती ऊर्जा, एक जैसे न रहने वाले दिन, और सपनों को अनदेखा करना
एक दीक्षित साधक से वे कहते हैं कि कोई खास कठिनाई नहीं, हालाँकि जब ऊर्जा बढ़ती है तो थोड़ी परेशानी होती है। जब भी आप साधना करते हैं, हर दिन एक जैसा नहीं जाएगा: कभी भौतिक रूप से परेशानी बढ़ेगी, कभी आध्यात्मिक रूप से, कभी शारीरिक रूप से। लोग इससे बहुत घबरा जाते हैं; घबराइए मत। और यदि रोज़ नए अनुभव आएँ, एक के बाद एक सपने दिखें, तो उन्हें अनदेखा करना सीखिए — शुभ को अच्छा मानिए, और कुछ अशुभ दिखे तो आपकी साधना चल ही रही है, डरिए मत। उसे अनुभव मानकर भूल जाइए; अनुभवों में मत अटकिए।
अंकित तिवारी जी से वे कहते हैं: आप दीक्षित हैं, इसलिए कोई कठिनाई नहीं; जो साधक साधना कर रहे हैं उन्हें कोई खास कठिनाई नहीं होती। हालाँकि, वे जोड़ते हैं, जब ऊर्जा बढ़ती है तो थोड़ी परेशानी होती है। वे कहते हैं कि जब भी आप साधना करते हैं, हर दिन एक जैसा नहीं जाएगा। कभी आपकी परेशानी भौतिक रूप से बढ़ेगी; कभी आध्यात्मिक रूप से परेशानी बढ़ेगी; कभी शारीरिक रूप से। लोग इससे बहुत घबरा जाते हैं। घबराना नहीं चाहिए। और यदि रोज़ नए अनुभव आ रहे हैं, यदि एक के बाद एक सपने दिखते रहते हैं, तो उन्हें अनदेखा करना सीखिए। यदि कुछ शुभ दिख रहा है, तो उसे अच्छा मानिए; यदि कुछ अशुभ दिख रहा है, तो आपकी साधना चल ही रही है, इसलिए उसमें डरने की ज़रूरत नहीं। उसे अनुभव मानकर भूल जाइए — और अनुभव में अटकिए भी मत।
यंत्र-अर्चक एक साधक ने शिकायत की कि कालिका योगिनी साधना में उसके साथ अच्छा या बुरा कुछ भी नहीं हो रहा।
यंत्र-अर्चक एक साधक जो चाहता था कि कुछ बुरा ही हो जाए
उस दिन एक बहुत अच्छे साधक ने उन्हें संदेश भेजा कि कालिका योगिनी साधना में सबके अनुभव डाले गए हैं, पर उसके साथ अच्छा या बुरा कुछ भी नहीं हो रहा — और कुछ गलत ही हो जाता तो कम से कम संतोष होता। वक्ता कहते हैं, सोचिए: लोग अनुभवों के पीछे इतने अटके हैं कि कहते हैं कुछ गलत हो जाए तब भी खुश होंगे। और यह बहुत ऊँचे स्तर का साधक है, जो तंत्रोक्त यंत्र का अर्चन इतनी अच्छी तरह करता है।
वे कहते हैं कि उस दिन एक बहुत अच्छे साधक ने उन्हें संदेश भेजा: कि कालिका योगिनी साधना में उन्होंने सबके अनुभव डाले हैं, पर उसके साथ न अच्छा हो रहा है न बुरा — और कुछ गलत भी हो जाता, तो कम से कम यह संतोष होता कि कुछ हुआ। वक्ता कहते हैं, सोचिए। लोग अनुभव के पीछे इतने अटके हैं कि कहते हैं कुछ गलत हो जाए तब भी वे खुश होंगे। और यह बहुत अच्छे स्तर का साधक है। वह तंत्रोक्त यंत्र का अर्चन इतनी अच्छी तरह करता है: भगवती का सप्तशती यंत्र जिसे वह सजाता है, अलग-अलग तरह से सजाता है। क्योंकि सप्तशती यंत्र में सब शक्तियों का पूजन होता है, उसने यही बगला यंत्र पर लागू किया, तंत्रोक्त यंत्र स्थापित किया, पूरे विधि-विधान से अनुष्ठान करवाया, और उसे सुंदर ढंग से सजाता-सँवारता है — तंत्रोक्त यंत्र का मनमोहक श्रृंगार। और ऐसा व्यक्ति ऐसी बात कहता है। वे कहते हैं, अनुभवों में मत फँसिए।
रोज़ के गौ दान में क्या गाय और दूसरे गोवंश में भेद करना चाहिए?
गौ वंश में किसी को भी खिलाना
वक्ता कहते हैं कि आप किसी को भी खिला सकते हैं — गौ वंश में किसी को भी। ज़रूरी नहीं कि आप केवल गाय को खिलाएँ और नंदी जी को नहीं। आप बैल या साँड को बिल्कुल खिला सकते हैं; नर-मादा का भेद करने की ज़रूरत नहीं। गौ वंश को खिलाइए — अभी तो इतना करना भी बहुत है।
यह पूछे जाने पर कि रोज़ गाय को देते समय क्या गाय और दूसरे गोवंश में भेद करना चाहिए, वे उत्तर देते हैं कि किसी को भी खिलाया जा सकता है — गौ वंश में किसी को भी। वे कहते हैं कि ज़रूरी नहीं कि आप केवल गाय को खिलाएँगे और नंदी जी को नहीं खिलाएँगे। आप बैल या साँड को बिल्कुल खिला सकते हैं; नर और मादा करने की ज़रूरत नहीं। वे कहते हैं, गौ वंश को खिलाइए। अभी के लिए, यदि आप इतना भी करते हैं, तो बहुत है। तुलजा भवानी और खंडोबा के बारे में वे यह भी बताते हैं कि भगवती तुलजा और खंडोबा पर वे एक पिछले लाइव में बोल चुके हैं।
क्या घर के हर व्यक्ति के लिए अलग क्षेत्रपाल बलि चाहिए?
एक घर से एक बलि, हर माथे से छुआकर
वक्ता कहते हैं कि घर के हर व्यक्ति के लिए अलग से क्षेत्रपाल भैरव की बलि देने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। एक घर से केवल एक बलि निकलती है, और वह सबके माथे से छुआकर निकलेगी।
वे कहते हैं कि घर के हर एक व्यक्ति के लिए क्षेत्रपाल भैरव की बलि देने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। एक घर से केवल एक बलि निकलती है, और वह सबके माथे से छुआकर निकलेगी।
गुरु पूजन, गणपति, काल भैरव, कुलदेवी, हनुमान और शिव का सही क्रम क्या है?
गुरु से शिव जी तक नित्य पूजा का क्रम
पहले गुरु पूजन, फिर गणपति पूजन, फिर भैरव जी का पूजन, फिर हनुमान जी का पूजन, फिर लक्ष्मी नारायण का पूजन, फिर भगवती का पूजन, और फिर अंत में शिव जी का पूजन।
एक श्रोता गुरु पूजन, गणपति पूजन, काल भैरव, कुलदेवी, हनुमान और शिव के बीच सही क्रम पूछते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं, पहले गुरु पूजन; फिर गणपति पूजन; फिर भैरव जी का पूजन; फिर हनुमान जी का पूजन; फिर लक्ष्मी नारायण का पूजन; फिर भगवती का पूजन; और फिर अंत में जाकर शिव जी का पूजन। वे जोड़ते हैं कि पितरों के लिए अलग व्यवस्था है।
क्या देव पूजन के समय पितरों को याद करना चाहिए?
सूर्य अर्घ्य और तुलसी पर पितृ स्मरण, एक ही आसन पर नहीं
उनके अनुसार, और जितना उन्होंने सीखा और देखा है, पूजन स्थान में बैठकर उस तरह पितृ स्मरण नहीं करना चाहिए। यदि आप पितरों के लिए सूर्य को अर्घ्य और जल दे रहे हैं, तो वहाँ प्रतीक रूप में पितृ पूजन हो चुका — सूर्य सब कुछ पितृ लोक तक पहुँचा देंगे। यदि आप तुलसी जी का पूजन कर रहे हैं, तो वहाँ भी हो गया। अलग से, मंत्र से तुलसी जी को नमस्कार करने के बाद आप पितरों के लिए भी प्रणाम करके उन्हें वहाँ याद कर सकते हैं। पर जब आप देव पूजन में बैठे हों, तो उसी आसन पर पितृ स्मरण नहीं होता।
देव पूजन के समय पूजन स्थान में बैठकर पितरों को याद करने के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि उनके अपने विचार में, और जितना उन्होंने सीखा और देखा है, ऐसा उस तरह नहीं करना चाहिए। यदि आप पितृ के लिए सूर्य को अर्घ्य दे रहे हैं, जल दे रहे हैं, तो वहाँ प्रतीक रूप में पितृ पूजन हो चुका है। सूर्य सब चीज़ें पितृ लोक तक पहुँचा देंगे। यदि आप तुलसी जी का पूजन कर रहे हैं, तो वहाँ भी हो गया। अलग से, यदि आप चाहें, तो तुलसी जी को जो मंत्र बोलकर नमस्कार किया जाता है — महाप्रसादजननी सर्वसौभाग्यवर्धिनी। आधिव्याधिहरा नित्यं तुलसि त्वं नमोऽस्तु ते॥ — उसके बाद, उन्हें अर्घ्य देकर या मंत्र बोलकर, वहाँ पितरों के लिए भी प्रणाम कीजिए, और उन्हें वहाँ याद कीजिए। पर जब आप देव पूजन में बैठे हों, तो उसी आसन पर पितृ स्मरण नहीं होता।
क्या भैरव पर छत्तीसगढ़ की तरह काजल का लेप करना चाहिए?
बाल भैरव को काला करने की क्षेत्रीय परंपरा
एक श्रोता कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में भैरव जी पर काजल का लेप होता है, इसलिए उन्होंने अपने घर के बाल भैरव को काला कर दिया है, और पूछते हैं कि यदि बाल भैरव को काला होना पसंद न आया हो तो। वक्ता उत्तर देते हैं, ठीक है — आपके क्षेत्र में जैसा होता है वैसा कीजिए। यह पूछे जाने पर कि भैरव जी के अनुष्ठान में पुष्प अर्चन हो सकता है या नहीं, वे कहते हैं कि ज़रूर हो सकता है, उनकी शतनामावली से या उनकी सहस्रनामावली से।
एक श्रोता लिखते हैं कि छत्तीसगढ़ में भैरव जी पर काजल का लेप किया जाता है, इसलिए उन्होंने अपने घर के बाल भैरव को काला कर दिया है — और पूछते हैं कि यदि बाल भैरव को काला होना पसंद न आया हो तो। वक्ता उत्तर देते हैं, ठीक है: आपके क्षेत्र में जैसा होता है, वैसा कीजिए। यह पूछे जाने पर कि भैरव जी के अनुष्ठान के समय पुष्प अर्चन किया जा सकता है या नहीं, वे कहते हैं कि ज़रूर किया जा सकता है — उनकी शतनामावली से, या फिर उनकी सहस्रनामावली से।
कालाष्टमी क्या है, और काल भैरव अष्टमी का व्रत विशेष रूप से किसे रखना चाहिए?
हर महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी और अक्षम्य पाप
अष्टमी पर — कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर — हर महीने भैरव जी की अष्टमी, कालाष्टमी, पड़ती है, और उसी दिन उपवास रखा जाता है। विशेष रूप से वे लोग, जिनका जीवन किसी ज्योतिषी के बताए अनुसार कुंडली से प्रभावित है, या जिन्होंने इसी जीवन में कोई अक्षम्य पाप किया है जिसका निवारण नहीं हो रहा और जो बहुत कष्ट दे रहा है, या जिनके साथ कोई दुर्घटना या घटना हुई है — वे किसी अच्छे विद्वान से सलाह लेकर, काल भैरव अष्टमी के लिए बताए नियम के अनुसार व्रत, उपासना और पूजा करें।
वे कहते हैं कि अष्टमी के दिन — कृष्ण पक्ष की अष्टमी — हर महीने भैरव जी की अष्टमी, कालाष्टमी, पड़ती है, और उसी दिन उपवास रखा जाता है। जिन्होंने अपनी कुंडली के अनुसार, या अपने जीवन में, कोई अक्षम्य पाप किया है जिसका निवारण नहीं हो रहा, और जो इस कारण बहुत कष्ट पा रहे हैं, उन्हें इस पर ध्यान देना चाहिए। वे कहते हैं, विशेष रूप से वे लोग जिनका जीवन — यदि किसी ज्योतिषी ने कुंडली से ऐसा कहा हो — या जिनके साथ इसी जीवन में कोई घटना या दुर्घटना हुई है, या जिनके हाथों कोई अक्षम्य पाप हुआ है: उन्हें किसी अच्छे विद्वान से सलाह लेनी चाहिए और काल भैरव अष्टमी के लिए जो नियम है उसके अनुसार व्रत, उपासना और पूजा करनी चाहिए।
जब परिवार में किसी को पुराने भगतवाल के बारे में पता न हो, तो क्या किया जा सकता है?
नियंत्रण के लिए क्षेत्रपाल पूजन, हालाँकि वह चीज़ जाएगी नहीं
जहाँ दादा जी भगतवाल में थे और उनके बाद किसी को कोई जानकारी नहीं, वहाँ वक्ता कहते हैं कि निवारण के लिए उनकी बताई क्षेत्रपाल पूजन विधि करनी चाहिए। हालाँकि, वे जोड़ते हैं, उससे शांति मिलेगी और वे नियंत्रण में आ जाएँगे — पर वे चीज़ें जाएँगी नहीं।
जहाँ दादा जी भगतवाल में थे और उनके बाद किसी को उसकी कोई जानकारी नहीं, वहाँ वे कहते हैं कि उन्होंने क्षेत्रपाल पूजन की जो विधि बताई है, निवारण के लिए वही करनी है। हालाँकि, वे जोड़ते हैं, उससे शांति मिलेगी और वे नियंत्रण में आ जाएँगे — पर वे चीज़ें जाएँगी नहीं।
क्या कोरोना से मरने वालों को मुक्ति मिलेगी?
महामारी में हुई मृत्यु अकाल मृत्यु मानी जाती है
वे कहते हैं कि इसका उत्तर उन्होंने पिछले लाइव में भी दिया था। क्योंकि इसे महामारी के रूप में घोषित किया गया है, और महामारी में होने वाली मृत्यु हमेशा अकाल मृत्यु होती है, इसलिए उनकी मुक्ति के लिए भी जो पूरा विधान है वह करना चाहिए।
वे कहते हैं कि निशा जी ने बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है, और इसका उत्तर उन्होंने पिछले लाइव में भी दिया था: क्या कोरोना से मरने वालों को मुक्ति मिलेगी, और अकाल मृत्यु क्यों होती है। वे कहते हैं, क्योंकि इसे महामारी के रूप में घोषित किया गया है, और महामारी में होने वाली मृत्यु हमेशा अकाल मृत्यु होती है। इसलिए उनकी मुक्ति के लिए भी, जो पूरा विधान है वह करना चाहिए।
भैरव की प्राण प्रतिष्ठा विधि को जारी करने से पहले छोटा किया जा रहा है, क्योंकि कठिन विधि को कम ही लोग कर पाएँगे।
एक जटिल विधि जिसे कम लोग कर पाएँगे
वक्ता कहते हैं कि भैरव जी की प्राण प्रतिष्ठा की विधि है, पर उन्हें सोचना पड़ रहा है कि वे उसे कितना छोटा कर सकते हैं — क्योंकि यदि वे कठिन विधि देंगे, तो वह सबके लिए संभव नहीं होगी, और इसीलिए वे उसे अपलोड नहीं कर रहे। अब वे उसका पूरा हिंदी रूपांतर बनाकर भैरव जी और कुछ और देवताओं के लिए एक साथ डालेंगे।
वे कहते हैं कि भैरव जी की प्राण प्रतिष्ठा की विधि भी है, पर उन्हें सोचना पड़ रहा है कि वे उसे कितना सूक्ष्म कर सकते हैं। क्योंकि यदि वे कठिन विधि दे देंगे, तो वह सबसे नहीं हो पाएगी — और इसीलिए वे उसे अपलोड नहीं कर रहे। अब वे उसका पूरा हिंदी रूपांतर बनाकर भैरव जी के लिए, और कुछ और देवताओं के लिए भी, एक साथ डालेंगे।
क्या घर में शिव सहस्रनाम से भैरव जी का अभिषेक किया जा सकता है?
भैरव के अपने नामों से या शिव के नामों से अभिषेक
वक्ता सुझाव देते हैं कि भैरव जी के अपने नामों से कीजिए। शिव जी के नामों से भी किया जा सकता है, और उसमें कोई कठिनाई नहीं।
यह पूछे जाने पर कि क्या घर में शिव सहस्रनाम से भैरव जी का अभिषेक किया जा सकता है, वे उत्तर देते हैं: भैरव जी के अपने नामों से कीजिए। वे कहते हैं कि शिव जी के नामों से भी किया जा सकता है, और उसमें कोई कठिनाई नहीं।
क्या भैरव पूजन के साथ सिगरेट रखनी ज़रूरी है, जैसा कुछ मंदिरों में दिखता है?
मंदिर की प्रथाएँ जो घर में शुरू नहीं करनी चाहिए
वक्ता उत्तर देते हैं कि घर में यह नहीं रखनी है। मंदिरों में जो सब होता है — वह केवल वहीं कीजिए जहाँ होता है। जहाँ नहीं होता, वहाँ नए सिरे से शुरू मत कीजिए।
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने कई जगह भैरव जी के लिए जलती सिगरेट रखी देखी है, और पूछते हैं कि क्या भैरव पूजन के साथ सिगरेट रखनी पड़ेगी। वक्ता उत्तर देते हैं कि घर में नहीं रखनी पड़ेगी। वह सब मंदिरों में होता है; जहाँ होता है, केवल वहीं कीजिए। जहाँ नहीं होता, वहाँ नए सिरे से शुरू मत कीजिए।
घर में बटुक भैरव को कौन सा सात्विक भोग चढ़ाना चाहिए?
बूँदी का लड्डू, पंचमेवा, और भोग कौन ले सकता है
बूँदी का लड्डू चढ़ाइए; मिठाई में, नित्य पूजन के भोग में, चाहें तो उन्हें किशमिश, काजू, पंचमेवा आदि चढ़ा सकते हैं। और वह भोग सब ले सकते हैं — बटुक भैरव का भोग सब लेंगे: स्त्रियाँ, पुरुष, बच्चे, बूढ़े। जब काल भैरव का पूजन होता है, तो उनका भोग केवल पुरुष खाएँ।
वे सुनील पाराशर जी को इसी चैनल की भैरव तंत्र रहस्य नाम की प्लेलिस्ट देखने को कहते हैं, जहाँ उन्होंने हर चीज़ बताई है: घर में भगवान भैरव को भोग और पूजन कैसे चढ़ाना है, और उसे कैसे ग्रहण करना है। यहाँ वे इसे फिर से संक्षेप में बताते हैं। भोग के लिए बूँदी का लड्डू चढ़ाइए; मिठाई में, नित्य पूजन के भोग में, चाहें तो उन्हें किशमिश, काजू, पंचमेवा आदि चढ़ा सकते हैं। और वह भोग सब ग्रहण कर सकते हैं। बटुक भैरव का भोग सब ग्रहण करेंगे — स्त्रियाँ, पुरुष, बच्चे, बूढ़े। जब काल भैरव का पूजन किया जाता है, तब उनका भोग केवल पुरुष खाएँ।
अनुष्ठान में संकल्प रोज़ लेना चाहिए या 21 दिन के लिए एक बार?
पूरी अवधि के लिए पहले दिन लिया गया संकल्प
वक्ता कहते हैं, अपने सामर्थ्य के अनुसार। यदि आप 21 दिन करना चाहते हैं, तो पहले ही दिन संकल्प लीजिए और 21 दिन पूरे कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि अनुष्ठान में संकल्प रोज़ लेना चाहिए या 21 दिन के लिए एक साथ, वे उत्तर देते हैं: अपने सामर्थ्य के अनुसार। यदि आपको 21 दिन करने हैं, तो पहले दिन ही संकल्प लीजिए और 21 दिन पूरे कीजिए।
क्या घर में बाल भैरव को लहसुन-प्याज़ वाला भोग चढ़ाया जा सकता है?
पूरी तरह सात्विक भोग, क्योंकि दूसरे देवता भी विराजमान हैं
उनका उत्तर है कि घर में बिना लहसुन-प्याज़ के जो भी सात्विक भोजन आप बनाते हैं, वही भोग में चढ़ाना चाहिए। क्योंकि आपके घर में केवल भैरव जी नहीं होंगे — और भैरव जी को, और बाल भैरव को भी, केवल पूरी तरह सात्विक भोग ही चढ़ाना चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या घर में भैरव जी को, बाल भैरव को, लहसुन-प्याज़ वाला भोग चढ़ाया जा सकता है, वे उत्तर देते हैं कि वे यह कहेंगे: घर में बिना लहसुन-प्याज़ के जो भी सात्विक भोजन आप बनाते हैं, वही भोग में चढ़ाइए। वे कहते हैं, क्योंकि आपके घर में केवल भैरव जी नहीं होंगे। और भैरव जी को भी, और बाल भैरव को भी, केवल पूरी तरह सात्विक भोग ही चढ़ाना चाहिए।
यदि अनुष्ठान का जप आधी रात को पूरा हो, तो क्या उसी समय हवन हो सकता है?
रात में तंत्रोक्त हवन
वक्ता उत्तर देते हैं कि तंत्रोक्त हवन आप रात में कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि यदि अनुष्ठान का जप रात 12 बजे पूरा हो, तो क्या उसी समय हवन भी किया जा सकता है, या केवल सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच ही करना चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि तंत्रोक्त हवन आप रात में कर सकते हैं।
जब पीढ़ियों से कुलदेवी का पता न हो, तो क्या करना चाहिए?
कुलदेवी आवाहन खंड का तीन रूपों वाला ध्यान मंत्र
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले उनका ध्यान मंत्र — जब कुलदेवी का ज्ञान न हो, तो कुलदेवी के तीन रूपों का ध्यान मंत्र है, जो कुलदेवी आवाहन खंड का वह भाग है। उस मंत्र से कुलदेवी का ध्यान कीजिए। दूसरा, आवाहन का नियम और विधि भी इस चैनल पर दी गई है; एक बार वीडियो देखिए और उसके अनुसार आवाहन कीजिए। पर यह जल्दी नहीं होगा: अनुष्ठान बार-बार करना पड़ेगा, और एक वर्ष के भीतर आपको उसका उत्तर सटीकता से मिलेगा। कुलदेवी आवाहन के लिए चौखट पर हवन करने की विधि भी बताई गई है, और वह सबसे ज़्यादा सटीक काम करती है।
वे सुनने वालों को चैनल की कुलदेवी प्लेलिस्ट देखने को कहते हैं और फिर उसे दोहराते हैं। सबसे पहले उनका ध्यान मंत्र, जो लोगों ने बार-बार देखा होगा। जब कुलदेवी का ज्ञान न हो, तो कुलदेवी के तीन स्वरूपों का ध्यान मंत्र है — वह कुलदेवी आवाहन खंड का एक भाग है। उस मंत्र से कुलदेवी का ध्यान कीजिए। दूसरी चीज़ है आवाहन का नियम और विधि, जो इस चैनल पर भी बताई गई है; एक बार वीडियो देखिए और उसके अनुसार आवाहन कीजिए। पर वे चेताते हैं कि यह जल्दी नहीं होगा। अनुष्ठान बार-बार करना पड़ेगा, और एक वर्ष के दौरान आपको उसका उत्तर सटीकता से मिलेगा। और कुलदेवी आवाहन के लिए चौखट पर हवन करने की विधि भी बताई गई है; वह सबसे ज़्यादा सटीक काम करती है।
माँ के सामने रखी ज्योति बार-बार बुझ क्यों जाती है?
न पिघलने वाला घी और न जलने वाली बत्ती
अजय शर्मा जी लिखते हैं कि वे तीन साल से माँ के सामने ज्योति जला रहे हैं, पर कुछ दिनों से पूजन के समय वह बुझ जाती है और फिर जलाने पर फिर बुझ जाती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि आप घी में जला रहे हैं, तो घी न पिघले तो बत्ती ठीक से नहीं जलेगी। पहले इस पर ध्यान दीजिए।
अजय शर्मा जी लिखते हैं कि वे तीन साल से माँ के सामने ज्योति जला रहे हैं, पर कुछ दिनों से जब वे पूजन करते हैं, तो ज्योति शांत हो जाती है, और फिर जलाने पर फिर शांत हो जाती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि आप घी में जला रहे हैं, तो घी न पिघले तो बत्ती ठीक से नहीं जलेगी। वे कहते हैं, पहले इस चीज़ पर थोड़ा ध्यान दीजिए।
क्या ग्राम देवता की पूजा के लिए महाभैरव मंत्र इस्तेमाल हो सकता है?
सिद्ध शाबरी विद्या चैनल पर ग्राम देवता का विधान
वक्ता प्रश्नकर्ता को दूसरी जगह भेजते हैं: ग्राम देवता के पूजन का विधान, और उनकी कृपा का विधान, सिद्ध शाबरी विद्या चैनल पर अलग से दिया गया है, और पूरा तरीका वहाँ है — आप वह प्रयोग इस्तेमाल कर सकते हैं।
यह पूछे जाने पर कि क्या ग्राम देवता की पूजा महाभैरव मंत्र से दी जा सकती है, वे प्रशांत द्विवेदी जी से कहते हैं कि ग्राम देवता के पूजन का विधान, और उनकी कृपा का विधान, उन्होंने सिद्ध शाबरी विद्या नाम के चैनल पर दिया है। वे कहते हैं कि पूरा तरीका वहाँ अलग से है; आप वह प्रयोग इस्तेमाल कर सकते हैं।
ब्रह्म कवच का पाठ शुरू करने के बाद घर में परेशानी क्यों बढ़ गई?
भैरव की सेवा शुरू होने पर विचलित होने वाली नकारात्मक उपस्थिति
वक्ता कहते हैं कि सबसे बड़ा कारण यह होगा: आपको घर में भैरव जी की पूजा करने को कहा जा रहा है, और वहाँ कोई नकारात्मक चीज़ बैठकर खा रही होगी; जब आप उनकी सेवा-पूजा शुरू करते हैं, तो वह परेशान होगी, और आपको नहीं छोड़ेगी। यदि आप पूजन छोड़ दें, तो वह फिर शांत हो जाएगी। पर भैरव जी के पूजन-पाठ से जो भी नकारात्मक चीज़ें हैं वे अभी आपको परेशान नहीं करेंगी — अभी आपके जीवन में कोई कष्ट नहीं होगा — पर एक समय आने पर वे कष्ट देने लगेंगी।
वे कहते हैं कि मनोज श्रवण जी की टिप्पणी बहुत अच्छी है, और सबको इसे सुनना चाहिए: आप हमें घर में बटुक भैरव की पूजा करने को कहते हैं; मैंने ब्रह्म कवच का पाठ किया, 108 नाम; घर में बहुत कलह शुरू हो गई, और पाठ करते समय शरीर में बहुत भारीपन लगा। वे उत्तर देते हैं कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह होगा: भैरव जी की पूजा की बात हो रही है; घर में कोई नकारात्मक चीज़ होगी, जो बैठकर खा रही है; और जब आप उनकी सेवा-पूजा शुरू करते हैं, तो वह परेशान होगी और आपको नहीं छोड़ेगी। यदि आप पूजन छोड़ देंगे, तो वह फिर शांत हो जाएगी। पर भैरव जी के पूजन-पाठ से, जो सब नकारात्मक चीज़ें हैं, वे अभी आपको परेशान नहीं करेंगी — अभी आपके जीवन में कोई कष्ट नहीं होगा — पर जब एक समय आएगा, तो वे कष्ट देने लगेंगी। और इसके बीच लोग कोई साधारण अनुष्ठान करने लगते हैं।
चतुर्मुख दीपक और बलि पूजन का न होना, और द्वार, रसोई और कुल शक्ति की उपेक्षा — ये आम गलतियाँ हैं।
चतुर्मुख दीपक और बलि पूजन का न होना, द्वार, रसोई, और कुल शक्ति
वे कहते हैं कि उन्हें नहीं पता प्रश्नकर्ता ने क्या किया या क्या नहीं किया या कौन सी गलती की, और वे एक सामान्य प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं कि ऐसा क्यों हो सकता है। हो सकता है आप पूजन के समय केवल भैरव जी कर रहे हों और उनकी बताई चतुर्मुख दीपक विधि कभी न करते हों, या भैरव जी की बलि पूजन विधि कभी न करते हों। आगे: यदि आपके घर का प्रवेश द्वार ठीक नहीं है, तो परेशानी हो सकती है; यदि रसोई में जूठे बर्तन पड़े हैं, तो परेशानी हो सकती है। और सबसे खास, यह प्रश्न है कि आपके कुल की शक्ति कौन हैं — उनसे भी परेशानी आ सकती है, हालाँकि बटुक भैरव के पूजन में ऐसा नहीं होता। और क्योंकि श्रोता ब्रह्म कवच कह रहे हैं, ब्रह्म कवच में बंधन की बातें हैं, जो उन्होंने कभी किसी को करने को नहीं दिया।
वे कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि प्रश्नकर्ता ने इसे कैसे किया, क्या किया या नहीं किया, या कौन सी गलती की; वे एक सामान्य प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं कि ऐसा क्यों हो सकता है — बाकी, हो सकता है आप बहुत सारी गलतियाँ कर रहे हों, और वह जाँचने की बात है। वे कहते हैं कि हो सकता है पूजन के समय आप केवल भैरव जी कर रहे हों, और उनकी बताई चतुर्मुख दीपक विधि कभी न कर रहे हों, और भैरव जी की बलि पूजन विधि कभी न कर रहे हों। फिर, यदि आपके घर का प्रवेश द्वार ठीक नहीं है, तो कठिनाई हो सकती है। यदि रसोई में जूठे बर्तन पड़े हैं, तो कठिनाई हो सकती है। ऐसी बहुत सारी चीज़ें हैं। और सबसे खास, वे पूछते हैं, आपके कुल की देवी शक्ति कौन हैं? उनसे भी कठिनाई आ सकती है — हालाँकि बटुक भैरव के पूजन में ऐसा नहीं होता। पर क्योंकि आप ब्रह्म कवच कह रहे हैं, वे कहते हैं, ब्रह्म कवच में बंधन की बातें हैं। उन्होंने ब्रह्म कवच कभी किसी को करने को नहीं दिया। इसलिए यह भी देखना पड़ेगा कि आप किस ब्रह्म कवच की बात कर रहे हैं।
पाठ के दौरान शरीर में भारीपन किस बात का संकेत है?
शरीर न छोड़ना चाहने वाली नकारात्मक उपस्थिति
वक्ता कहते हैं कि यदि शरीर में भारीपन लगा, तो बात सीधी है: कोई नकारात्मक चीज़ है जो शरीर नहीं छोड़ना चाहती। इसीलिए ऐसा होता है।
और जहाँ तक शरीर में भारीपन लगने की बात है, वे कहते हैं, बात सीधी है: कोई नकारात्मक चीज़ है जो शरीर नहीं छोड़ना चाहती। वे कहते हैं, इसीलिए ऐसा होता है।
यदि किसी पूर्वज की मृत्यु तांत्रिक क्रिया से हुई हो, तो क्या किया जा सकता है?
आत्मा उसी तंत्र शक्ति के अधीन जिसने उसे मारा
वक्ता कहते हैं कि जब ऐसा तंत्र क्रिया में होता है, तो वह आत्मा उसी तंत्र शक्ति के अधीन हो जाती है जिसने मारने का काम किया। इसलिए पहले उसे उस बंधन से छुड़ाना पड़ता है, और उसके बाद ही उसकी श्राद्ध क्रिया होती है और उसकी गति होती है। नहीं तो आप श्राद्ध करवाते रहेंगे और उनकी गति नहीं होगी, और आपकी अपनी परेशानी बढ़ती जाएगी।
यह पूछे जाने पर कि जहाँ किसी पूर्वज की मृत्यु तांत्रिक क्रियाओं से करवाई गई हो, वहाँ कोई उपाय हो सकता है या नहीं, वे कहते हैं कि जहाँ यह तंत्र क्रिया में होता है, वह आत्मा उसी तंत्र शक्ति के अधीन हो जाती है जो मारने का काम करती है। इसलिए सबसे पहले उसे बंधन से छुड़ाना पड़ता है, और उसके बाद ही उसकी श्राद्ध क्रिया होती है और उसकी गति होती है। वे कहते हैं, नहीं तो आप श्राद्ध करवाते जाएँगे और उनकी गति नहीं होगी, और आपकी अपनी कठिनाइयाँ बढ़ती जाएँगी। जो लोग कहते हैं कि उन्होंने गया करवाया, त्र्यंबकेश्वर, नासिक, हर जगह किया, और फिर भी परेशानी जैसी थी वैसी रही और बढ़ी — पता चलता है कि मृत्यु तंत्र क्रिया में हुई थी। जब तक वे तंत्र बंधन से मुक्त नहीं होते, गति कहाँ से होगी?
महाभैरव मंत्र कहाँ उपलब्ध है?
वीडियो के भीतर स्क्रीन पर दिखाया गया महाभैरव मंत्र
वक्ता कहते हैं कि महाभैरव मंत्र चैनल पर दिया गया है — उसे खोजिए, और यूट्यूब पर महाभैरव मंत्र गृहस्थ तंत्र खोजेंगे तो आ जाएगा। उसे सुनिए: उन्होंने वीडियो के बीच में पूरा महाभैरव मंत्र बताया है। उसकी कोई पीडीएफ नहीं है; वह वीडियो के बीच में ही स्क्रीन पर दिखेगा।
वे कहते हैं कि महाभैरव मंत्र चैनल पर दिया गया है। उसे खोजिए — यूट्यूब पर भी महाभैरव मंत्र गृहस्थ तंत्र खोजिए, आ जाएगा। उसे सुनिए; वीडियो के बीच में उन्होंने पूरा महाभैरव मंत्र बताया है। वे कहते हैं कि उसकी कोई पीडीएफ नहीं है। वह आपको वीडियो के भीतर ही स्क्रीन पर दिखेगा।
क्या गृहस्थ को उल्लू वाली या गजलक्ष्मी की छवि रखनी चाहिए?
गृहस्थ के लिए गजलक्ष्मी, दूसरों के लिए उल्लू
वक्ता मानते हैं कि उल्लू शुभ माना जाता है, पर गज रखना अधिक उचित होगा। गृहस्थों को घर में गजलक्ष्मी रखनी चाहिए — गज पर या कमल पर विराजमान। उल्लू उनके लिए ठीक है जो कालाबाज़ारी करते हैं और शेयर बाज़ार में पैसा लगाते हैं, और तंत्र-मंत्र करने वालों के लिए, तंत्रोक्त पूजन के लिए, वह अधिक उचित है।
वे विजय ग्रोवर जी से कहते हैं कि उल्लू शुभ माना जाता है — यह ठीक है। पर यदि आप गज रखेंगे, तो अधिक उचित होगा। गृहस्थों को घर में गजलक्ष्मी रखनी चाहिए, गज पर या कमल पर विराजमान। जो कालाबाज़ारी करते हैं, जो शेयर बाज़ार में पैसा लगाते हैं, उनके लिए उल्लू ठीक है। और जो तंत्र-मंत्र करते हैं, तंत्रोक्त पूजन के लिए, उनके लिए वह अधिक उचित है।
क्या बटुक भैरव के 108 नामों के प्रत्यक्षीकरण में छह महीने लगते हैं?
108 नामों के अंतिम नाम पर भैरव का प्रत्यक्ष होना
वक्ता उत्तर देते हैं, नहीं — अभी कीजिए और अभी होगा। जैसे ही 108 नाम पूरे होंगे, जैसे ही आप अंतिम नाम पढ़ेंगे, भैरव जी आपके सामने प्रकट होकर कहेंगे, माँगो वत्स, क्या वर चाहिए। आप सुनेंगे या देखेंगे, यह वे नहीं जानते; पर जिस क्षण आप 108 नाम पढ़ेंगे वे प्रत्यक्ष हो जाएँगे। बाकी आपका अपना सामर्थ्य है, आप उनसे बात कर पाएँ या नहीं।
यह पूछे जाने पर कि क्या बटुक भैरव के 108 नामों के प्रत्यक्षीकरण में छह महीने लगते हैं, वे उत्तर देते हैं: नहीं — अभी कीजिए और अभी होगा। जैसे ही 108 नाम पूरे होंगे, जैसे ही आप अंतिम नाम पढ़ेंगे, भैरव जी आपके सामने प्रकट होकर कहेंगे: माँगो वत्स, क्या वर चाहिए। अब आप उसे सुनेंगे या देखेंगे — यह, वे कहते हैं, वे नहीं जानते। पर जैसे ही आप 108 नाम पढ़ेंगे, वे प्रत्यक्ष हो जाएँगे। बाकी आपकी इच्छा है, यानी आपका सामर्थ्य — आप उनसे बात कर पाएँ या नहीं।
क्या ताँबे के कड़े वाले मंत्र से चाँदी का कड़ा सिद्ध किया जा सकता है?
सिद्ध मंत्र को दूसरे कड़े पर लगाना
वक्ता कहते हैं कि आपने ताँबे का कड़ा सिद्ध किया है — उसी मंत्र से चाँदी का कड़ा कीजिए। यह बिल्कुल हो सकता है। यह भी पूछे जाने पर कि घर में रात को कौन सा महाकाली सहस्रनाम पढ़ा जा सकता है, वे प्रश्नकर्ता से बताने को कहते हैं कि कौन सा, क्योंकि महाकाली सहस्रनाम एक से अधिक हैं।
निखिल जी दो प्रश्न पूछते हैं: क्या घर में हर रात महाकाली सहस्रनाम किया जा सकता है, और एक कड़े के बारे में। वक्ता पूछते हैं, कौन सा महाकाली सहस्रनाम — एक से अधिक हैं; बताइए कौन सा। कड़े के बारे में: आपने ताँबे का कड़ा सिद्ध किया है, तो उसी मंत्र से चाँदी का कड़ा कीजिए। यह बिल्कुल हो सकता है।
क्या बटुक भैरव मंत्र से भैरव हृदय का संपुट करना अधिक फलदायी है?
भैरव हृदय का संपुट और उससे पैदा होने वाली तीव्रता
वक्ता कहते हैं कि उन्हें नहीं पता प्रश्नकर्ता का सामर्थ्य क्या है। यदि आप बटुक भैरव से भैरव हृदय का संपुट करेंगे, तो यह बहुत तीव्र हो जाएगा — और आप उसकी शक्ति और उसकी ऊर्जा को सह पाएँगे या नहीं, यह वे नहीं जानते।
यह पूछे जाने पर कि क्या बटुक भैरव मंत्र से भैरव हृदय का संपुट करके किया गया जप अधिक फलदायी होगा, वे अभिषेक भारद्वाज जी से कहते हैं कि उन्हें नहीं पता उनका सामर्थ्य क्या है। वे कहते हैं कि यदि आप बटुक भैरव से भैरव हृदय का संपुट करेंगे, तो यह बहुत तीव्र हो जाएगा। और आप उसकी शक्ति, उसकी ऊर्जा को सह पाएँगे या नहीं — यह, वे कहते हैं, वे नहीं जानते।
काल भैरव का शाबर मंत्र सिद्ध होने पर उनसे बात कैसे की जाती है?
मंत्र सिद्ध होने पर अपनी ओर से बोलना
वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि सिद्ध हो गया है, तो बोलने में क्या कठिनाई है? हैलो, हैलो कहिए। भैरव जी उधर से तब बोलेंगे जब सामने वाला बोलेगा — और आप इधर से बोल ही नहीं रहे। यदि मंत्र सिद्ध हो गया है, तो काल भैरव जी इंतज़ार कर रहे होंगे कि आप अपनी ओर से कब बोलेंगे।
एक श्रोता कहते हैं कि काल भैरव जी का शाबर मंत्र सिद्ध हो गया है और पूछते हैं कि काल भैरव जी से बात कैसे करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि सिद्ध हो गया है, तो बोलने में क्या कठिनाई है? हैलो, हैलो कहिए। भैरव जी उधर से बोलेंगे; सामने वाला तभी बोलेगा जब आप बोलेंगे। और आप इधर से बोल ही नहीं रहे। यदि मंत्र सिद्ध हो गया है, तो काल भैरव जी इंतज़ार कर रहे होंगे कि आप इधर से कब बोलेंगे। वे उन्हें अपना वह वीडियो देखने को कहते हैं जिसमें कहा गया है कि सामने वाला तभी बोलेगा जब आप पहले बोलेंगे। वे कहते हैं, अपनी ओर से बोलिए।
यदि कोई सहस्रनाम नकारात्मकता खींचता है, तो कौन सा काली सहस्रनाम सात्विक है?
दक्षिण काली और आद्या काली बनाम श्मशान काली
आशीष जी लिखते हैं कि उन्हें पता चला है कि वे जो सहस्रनाम पढ़ते हैं उससे नकारात्मकता खिंचती है। वक्ता उत्तर देते हैं, दक्षिण काली सहस्रनाम कीजिए; आद्या काली सहस्रनाम कीजिए, उनसे ऐसा नहीं होगा। यदि आप श्मशान काली वाला कर रहे हैं, तो कठिनाई होगी।
आशीष जी सात्विक काली सहस्रनाम माँगते हुए लिखते हैं कि उन्हें पता चला है कि वे जो सहस्रनाम करते हैं उससे नकारात्मकता खिंचती है। वक्ता उत्तर देते हैं, दक्षिण काली सहस्रनाम कीजिए। आद्या काली सहस्रनाम कीजिए; उनसे ऐसा नहीं होगा। यदि आप श्मशान काली कर रहे हैं, तो कठिनाई होगी।
क्या बिना हवन के, बलि के साथ अनुष्ठान किया जा सकता है?
बलि के साथ और बिना हवन के अनुष्ठान
वक्ता उत्तर देते हैं, बिल्कुल, कीजिए।
दक्षिणाचार और कौलाचार में कौन श्रेष्ठ है?
दोनों मार्गों को ऊँचा-नीचा बताने से वक्ता का इनकार
वक्ता इस प्रश्न का उत्तर अपने एक प्रश्न से देते हैं: कौन श्रेष्ठ है, गुलाब जामुन या काला जामुन?
एक श्रोता पूछते हैं कि दक्षिणाचार और कौलाचार में कौन श्रेष्ठ है। वक्ता पलटकर पूछते हैं, कौन श्रेष्ठ है, गुलाब जामुन या काला जामुन? इसी हिस्से में पहले वे एक श्रोता से, जिनका बेटा कार्तिक पूर्णिमा को कृत्तिका नक्षत्र में दिन में पैदा हुआ, और ग्रहण के कारण इस बार कुछ नहीं हो सका, कहते हैं कि सब ठीक है।
क्या घर में लड्डू गोपाल की पूजा करनी चाहिए?
एक प्रसिद्ध तांत्रिक जो बालाजी और लड्डू गोपाल की पूजा से मना करते हैं
वक्ता कहते हैं कि यह प्रश्न शायद एक बहुत प्रसिद्ध तांत्रिक के बारे में है जिन्होंने अपना पूरा एक स्थान बना लिया है, जहाँ लोग जाते हैं और जहाँ वे प्रेतों और पिशाचों से कहते हैं कि वे उन्हें सीधे पितृ धाम मुक्त करते हैं, जैसे गया धाम में पितरों की मुक्ति होती है। वे उनका नाम नहीं लेना चाहते। वे व्यक्ति बालाजी की पूजा से मना करते हैं और लड्डू गोपाल की पूजा से मना करते हैं — वहाँ जाकर नौ बार हवन करवाओ और सब काम हो जाएगा, पर स्वयं कुछ करो तो कुछ नहीं होगा; लाखों रुपये खर्च करो। और वे पूछते हैं कि घर में लड्डू गोपाल की पूजा क्यों न हो — यह पूरी तरह शास्त्रोक्त विधि-विधान से है; लड्डू गोपाल की पूजा घर में बिल्कुल हो सकती है।
लड्डू गोपाल की पूजा पर जो बात करने का वादा था वह कब आएगी, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं कि प्रश्नकर्ता शायद एक बहुत प्रसिद्ध तांत्रिक के बारे में पूछ रहे हैं जिन्होंने अपना पूरा एक स्थान बना लिया है। लोग वहाँ जाते हैं, और वे प्रेतों और पिशाचों से कहते हैं कि वे उन्हें सीधे पितृ धाम आदि में मुक्त करते हैं — जैसे गया धाम में पितरों को मुक्ति मिलती है, वैसे ही वे भी करते हैं। वे कहते हैं, बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति हैं; वे उनका नाम भी नहीं लेना चाहते। वे व्यक्ति बालाजी की पूजा से मना करते हैं। लड्डू गोपाल की पूजा से मना करते हैं। उनके स्थान पर जाकर नौ बार हवन करवाओ और सब काम पूरे हो जाएँगे; स्वयं कुछ करो तो कुछ नहीं होगा; लाखों रुपये खर्च करो। और वक्ता पूछते हैं कि घर में लड्डू गोपाल की पूजा क्यों न हो। यह पूरे शास्त्रोक्त विधि-विधान के साथ है। लड्डू गोपाल की पूजा घर में बिल्कुल हो सकती है।
घर में लड्डू गोपाल को कैसे रखना और सेवा करनी चाहिए?
छोटे बच्चे जैसी देखभाल, और गोपाल सहस्रनाम
यदि आप घर में लड्डू गोपाल रखते हैं, तो उन्हें उस भाव में रखिए जिसमें छोटे बच्चे की देखभाल होती है। यदि आप उन्हें मुख्य अधिष्ठात्री देव मानकर पूजते हैं, तो सुबह सबसे पहले उनका नित्य पूजन होना चाहिए: उन्हें नहलाइए, कपड़े पहनाइए, फिर माखन-मिश्री का भोग, आरती आदि — और उसके बाद ही आपका जो भी नित्य पूजन हो। रात को उनकी संध्या पूजा कीजिए, और रात के पूजन के बाद उन्हें सुला देना चाहिए, पूरी तरह बाल भाव में। उनकी प्रसन्नता के लिए गोपाल सहस्रनाम का पाठ सबसे उत्तम है।
वे कहते हैं कि यदि आप घर में लड्डू गोपाल रखते हैं, तो उन्हें उस भाव में रखिए जिसमें छोटे बच्चे की देखभाल की जाती है — यदि आप उन्हें मुख्य अधिष्ठात्री देव मानकर पूजते हैं। तब लड्डू गोपाल का पूजन रोज़ होना चाहिए: सुबह-सुबह पहले उन्हें नहलाइए, कपड़े आदि पहनाइए, फिर माखन-मिश्री का भोग, आरती आदि — और उसके बाद आपका जो भी आगे का नित्य पूजन हो, वह कीजिए। और रात को उनका संध्या पूजन होता है, और रात के पूजन के बाद उन्हें सुला देना चाहिए। पूरी तरह बाल भाव में। वे कहते हैं कि उनकी प्रसन्नता के लिए गोपाल सहस्रनाम का पाठ सबसे उत्तम है।
झूठे कोर्ट केस के लिए कौन सा अनुष्ठान करना चाहिए?
ग्यारह दिन या 16 से 23 नवंबर तक बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनामावली
अगले दिन डाले जाने वाले बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनामावली के विधान से 11 दिन अनुष्ठान कीजिए; या फिर काल भैरव अष्टमी से, यानी 16 नवंबर से 23 नवंबर तक, और अंतिम दिन विधान में बताए अनुसार क्षेत्रपाल पूजन और भैरव जी का हवन कीजिए। आपके लिए जल्दी ही कोई न कोई रास्ता खुलेगा। वे यही उत्तर एक श्रोता को भी देते हैं जिनके भाई को एक झूठे केस में ज़मानत नहीं मिल रही, जिसमें ससुराल वालों ने दहेज हत्या का आरोप लगाया है।
योगेश जी से, जिनका एक झूठा कोर्ट केस है, वे कहते हैं: अगले दिन डाले जाने वाले बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनामावली के विधान से 11 दिन अनुष्ठान कीजिए। या फिर काल भैरव अष्टमी से, यानी 16 नवंबर से 23 नवंबर तक कीजिए, और अंतिम दिन, जैसा विधान में बताया जाएगा, क्षेत्रपाल पूजन और भैरव जी का हवन कीजिए। वे कहते हैं, आपके लिए जल्दी ही कोई न कोई रास्ता खुलेगा। यही निर्देश वे नितिन जी को देते हैं, जिनका प्रश्न था कि झूठे कोर्ट केस के कारण उनके भाई की ज़मानत नहीं हो रही — ससुराल वालों ने दहेज हत्या का आरोप लगाया है — और जिन्होंने पूछा था कि घर में कौन सा अनुष्ठान करें। वे कहते हैं, यह अनुष्ठान कीजिए; आजकल ये सब चीज़ें बहुत बढ़ गई हैं।
यदि राजस्थान में जखाड़ माता कुलदेवी हैं, तो कुल भैरव कौन हैं?
एक प्रश्न जिसे वक्ता स्थानीय साधकों से पूछे बिना नहीं बताते
वे कहते हैं कि उन्हें माता के उस रूप की जानकारी नहीं है, इसलिए उन्हें राजस्थान के साधकों से पूछना होगा और तभी वे प्रश्नकर्ता को बताएँगे।
आशीष जी पूछते हैं कि राजस्थान में जहाँ जखाड़ माता कुलदेवी हैं, वहाँ कुल भैरव कौन होंगे। वक्ता उत्तर देते हैं कि उन्हें माता के उस स्वरूप की जानकारी नहीं है, इसलिए उन्हें राजस्थान के साधकों से पूछना होगा और तभी वे उन्हें बताएँगे।
जब शरीर के अंग बहुत फड़कते हैं, ध्यान के समय भी, तो इसका क्या अर्थ है?
किसी जानकार से जाँच और हनुमान जंजीरा अनुष्ठान
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या शरीर के भीतर कोई भूत-प्रेत नाच रहा है, क्योंकि अलग-अलग अंग बहुत फड़कते हैं और ध्यान में बैठते ही यह शुरू हो जाता है। वक्ता कहते हैं कि प्रश्न अपनी जगह है, पर पहले एक बार किसी जानकार से अपनी जाँच करवाइए, और दूसरा, हनुमान जंजीरा का कम से कम एक अनुष्ठान कीजिए। उसके बाद अपना ध्यान कीजिए और देखिए कि कोई अंतर पड़ा या नहीं।
अभिषेक जी लिखते हैं कि उनके शरीर के अलग-अलग अंग बहुत फड़कते हैं, और ध्यान में बैठने पर भी यह शुरू हो जाता है; वे पूछते हैं कि क्या शरीर के भीतर कोई भूत-प्रेत नाच रहा है। वक्ता कहते हैं, ठीक है, आपका प्रश्न अपनी जगह है। सबसे पहले, एक बार किसी जानकार व्यक्ति से अपनी जाँच करवाइए। और दूसरा, हनुमान जंजीरा का कम से कम एक अनुष्ठान कीजिए। उसके बाद अपना ध्यान आदि कीजिए, और देखिए कि आपको कोई अंतर पड़ा या नहीं।
काल भैरव का शाबर मंत्र सिद्ध होने पर क्या दूत मिलता है?
जिससे मंत्र मिला उसी से पूछना
वक्ता उत्तर देते हैं, क्यों नहीं मिलेगा — ज़रूर मिलेगा। जाकर काल भैरव जी से पूछिए; तब वे मना नहीं करेंगे। पर वे जोड़ते हैं कि प्रश्नकर्ता उस व्यक्ति से पूछें जिससे उन्होंने मंत्र जप और विधि-विधान लिया है जो वे कर रहे हैं, क्योंकि उसे पूरी जानकारी होगी कि वह किस शाबर से किया गया और किस भैरव को संबोधित था। वे कहते हैं कि भैरव जी में, काल भैरव में, इसके अलावा भी बहुत कुछ है।
यह पूछे जाने पर कि काल भैरव जी का शाबर मंत्र सिद्ध होने पर क्या उनका दूत मिलता है, वे उत्तर देते हैं: क्यों नहीं मिलेगा — ज़रूर मिलेगा। वे कहते हैं, जाकर काल भैरव जी से बात कीजिए; तब वे मना नहीं करेंगे। वे जोड़ते हैं कि सुनील जी और ऊपर वाले एक और प्रश्नकर्ता उस व्यक्ति से पूछें जिससे वे मंत्र जप और विधि-विधान ले रहे हैं जो वे कर रहे हैं; वह व्यक्ति उन्हें तरीका बताएगा। वे कहते हैं कि उसे पूरी जानकारी होगी कि वे किस शाबर से किए गए और किस भैरव को संबोधित थे। भैरव जी में, काल भैरव में, इसके अलावा भी बहुत कुछ है।
सोखा शब्द का अर्थ क्या है?
गाँव का भगत, और वीरभद्र के रूप में सोखा बाबा
गाँव में जो भगत होते हैं, जिन्हें ग्रामीण भगतवाल की जानकारी होती है, उन्हें सोखा कहते हैं। और यदि आप सोखा बाबा के बारे में पूछ रहे हैं, जिनकी जगह-जगह कुल देवता के रूप में पूजा होती है, तो वे वीरभद्र जी का एक स्वरूप हैं।
यह पूछे जाने पर कि सोखा का अर्थ क्या है, वे कहते हैं कि गाँव में जो भगत होते हैं, जिन्हें ग्रामीण भगतवाल की जानकारी होती है, उन्हें सोखा कहते हैं। और यदि आप सोखा बाबा के बारे में पूछ रहे हैं, जिनकी जगह-जगह कुल देवता के रूप में पूजा होती है, तो वे वीरभद्र जी का एक स्वरूप हैं।
क्या हनुमान मंत्र सिद्धि करते समय हर महीने भैरव हवन किया जा सकता है?
हनुमान सिद्धि के साथ भैरव हवन, और बीस साल की प्रेत बाधा
वक्ता उत्तर देते हैं, बिल्कुल किया जा सकता है। आशीष पटेल जी से, जो लिखते हैं कि उनके घर में बीस साल से प्रेत बाधा है, वे कहते हैं कि बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनामावली अगले दिन चैनल पर डाली जाएगी, और यदि वे अभी करना चाहें, तो 16 नवंबर से घर में उसका अनुष्ठान शुरू करें।
यह पूछे जाने पर कि क्या हनुमान जी के मंत्र की सिद्धि कर रहा व्यक्ति महीने में एक बार भैरव जी का पूजन और हवन कर सकता है, वे उत्तर देते हैं: बिल्कुल कर सकते हैं। आशीष पटेल जी से, जो लिखते हैं कि उनके घर में बीस साल से प्रेत बाधा है, वे कहते हैं कि बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनामावली अगले दिन चैनल पर डाली जाएगी। यदि वे अभी के समय में करना चाहें, तो 16 नवंबर से घर में उसका अनुष्ठान शुरू कर दें।
क्या खिलाए हुए तंत्र से पीड़ित व्यक्ति साधना कर सकता है?
एक पीड़ित व्यक्ति के साधना करने का डाला गया अनुभव
उन्होंने खिलाए हुए तंत्र से पीड़ित एक व्यक्ति का अनुभव डाला है जिसने साधना की, और उसमें कैसे हुआ और क्या हुआ। वक्ता कहते हैं, उसे सुनिए, और फिर कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या खिलाए हुए तंत्र से पीड़ित व्यक्ति साधना कर सकता है, वे कहते हैं कि उन्होंने एक अनुभव डाला है: खिलाए हुए तंत्र से पीड़ित एक व्यक्ति ने साधना की, और उसमें कैसे हुआ और क्या हुआ, यह है। वे कहते हैं, उसे सुनिए, और फिर कीजिए।
क्या घर में बसे ब्रह्म को हटाया जा सकता है, या वे अपनी मर्ज़ी से आते-जाते हैं?
चार स्थितियाँ जो तय करती हैं कि ब्रह्म हटाए जा सकते हैं या नहीं
वक्ता कहते हैं, यह निर्भर करता है। यदि ब्रह्म अभिचार से आपके घर में आए हैं, तो उन्हें हटाया जा सकता है। यदि कोई स्वयं उन्हें सिद्ध करने के लिए लाया, या आपने उनके स्थान पर अपना घर बनाया है, या पेड़ काटने या घर तोड़ने के कारण कोई ब्रह्म दोष लगा है, तो वहाँ कठिनाई अलग है। तीसरा, यदि वे घर के पूजित ब्रह्म हैं, या घर के ब्रह्म हैं, तो वे इस तरह की कठिनाई कर सकते हैं। चौथा, यदि कोई दोगला सोखा या ओझा है जो पैसा कमाने के लिए उन्हें ले जाता है और बार-बार फिर छोड़ देता है, तो भी यह परेशानी होगी।
पूजा श्रीवास्तव जी लिखती हैं कि पिछले लाइव में उन्होंने कहा था कि लोग और देवता ऐसे भ्रम को हटा सकते हैं, पर उन्होंने सुना है कि वे केवल अपनी मर्ज़ी से ही जा सकते हैं और बार-बार लौट आते हैं; वे स्वयं नहीं करना चाहती थीं बल्कि किसी ब्राह्मण से करवाना चाहती थीं। वे उत्तर देते हैं, यह निर्भर करता है। यदि ब्रह्म अभिचार से आपके घर में आए हैं — जिनके लिए भी वे बात कर रही हैं — यदि वे अभिचार में आए हैं, तो उन्हें हटाया जा सकता है। यदि कोई स्वयं उन्हें सिद्ध करने के लिए लाया है, या यदि आपने उनके स्थान पर अपना घर बनाया है, या यदि पेड़ काटने या कुछ तोड़ने के कारण कोई ब्रह्म दोष लगा है, तो यहाँ कठिनाई अलग होगी। तीसरी चीज़: यदि वे घर के पूजित ब्रह्म हैं, या घर के ब्रह्म हैं, तो वे इस तरह की कठिनाई कर सकते हैं। और चौथा, यदि कोई दोगला सोखा या ओझा है जो पैसा कमाने के लिए उन्हें ले जाएगा और बार-बार फिर छोड़ देगा, तो भी यह परेशानी होगी।
यदि कोई अच्छा गुरु न मिले तो किसे गुरु बनाना चाहिए?
गुरु मिलने तक भगवान दत्तात्रेय की उपासना
वक्ता इसे विचित्र प्रश्न कहते हैं — ऐसा गुरु जो बुरा गुरु न हो। वे अभी नहीं बता सकते कि उड़ीसा के श्रोता किसे गुरु बनाएँ। अभी, जब तक गुरु न मिलें, विशेष रूप से भगवान दत्तात्रेय की साधना और पूजा कीजिए; उसका सामान्य विधि-विधान चैनल पर समय-समय पर डाला जाता है। जब आप योग्य और सक्षम होंगे, और भगवान दत्त की कृपा होगी, तो आपको सच्चे गुरु मिलेंगे।
चंद्रहास जी लिखते हैं कि वे उड़ीसा में रहते हैं और पूछते हैं कि वहाँ किसे गुरु बनाएँ जो बुरे गुरु न हों। वक्ता कहते हैं, आपका प्रश्न बड़ा विचित्र है — ऐसे गुरु जो बुरे न हों। वे अभी नहीं बता सकते कि वहाँ आप किसे अपना गुरु बनाएँ। फिलहाल, जब तक आपको गुरु नहीं मिलते, विशेष रूप से भगवान दत्तात्रेय की साधना और पूजा कीजिए। वे उसका सामान्य विधि-विधान चैनल पर डालते रहते हैं; उसे देखिए और कीजिए। जब आप योग्य और सक्षम होंगे, और आप पर भगवान दत्त की कृपा होगी, तब आपको सच्चे गुरु मिलेंगे।
भोग कैसे चढ़ाना चाहिए ताकि भूत-प्रेत उसे न खा सकें?
घर पर निर्भर बात, और बटुक अनुष्ठान की जगह महाभैरव
वक्ता उत्तर देते हैं कि यह घर पर निर्भर करता है। एक और श्रोता, जो बटुक भैरव मंत्र अनुष्ठान माँग रहे हैं, उनसे वे कहते हैं कि बटुक भैरव मंत्र अनुष्ठान की ज़रूरत नहीं पड़ेगी — उनका महाभैरव मंत्र कीजिए, वह सबसे उत्तम होगा, और उसमें सब शामिल हो जाएँगे; और दूसरा, बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनामावली दी जाएगी, वह कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि भोग कैसे चढ़ाना चाहिए ताकि भूत-प्रेत उसे न खा सकें, वे उत्तर देते हैं कि यह घर पर निर्भर करता है। वरुण सिन्हा जी, जो कहते हैं कि बटुक भैरव का मंत्र अनुष्ठान भी दिया जाए, उनसे वे कहते हैं कि बटुक भैरव मंत्र अनुष्ठान की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। वे कहते हैं, उनका महाभैरव मंत्र कीजिए — वह सबसे उत्तम होगा, और उसमें सब शामिल हो जाएँगे। और दूसरी चीज़: बटुक भैरव की अष्टोत्तर शतनामावली दी जाएगी; वह कीजिए।
तंत्र विद्या से कुलदेवी का बंधन कैसे खोला जाता है?
बँधी हुई कुलदेवी के लिए महाभैरव विधान
वक्ता कहते हैं कि यदि बंधन तंत्र विद्या से हुआ है, तो महाभैरव विधान देखिए — उन्होंने थंबनेल पर ही लिखा है कि यदि कुलदेवी किसी भी कारण से बँधी हैं, तो महाभैरव मंत्र से मुक्त होती हैं। क्योंकि जब आप संकल्प लेते हैं कि कुलदेवी के बंधन से मुक्ति के लिए महाभैरव मंत्र अनुष्ठान कर रहे हैं, और महाभैरव के भीतर इतने रूप हैं — काल भैरव, बटुक भैरव, भूत भैरव, महाभैरव, सब — तो जब वे चलते हैं, जब उनका कोई भी गण चलता है, तो वे जानते हैं कि आवाहन किस उद्देश्य से हो रहा है, और वे आकर उसे खोल देंगे। उसके अनुकूल ढंग से अनुष्ठान कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि कुलदेवी का बंधन कैसे खोलें, और तंत्र विद्या से बताने का अनुरोध करने पर, वे कहते हैं कि यदि बंधन तंत्र विद्या से हुआ है तो महाभैरव विधान देखिए — उन्होंने थंबनेल पर ही लिखा है कि यदि कुलदेवी किसी भी कारण से बँधी हैं, तो महाभैरव मंत्र से मुक्त होती हैं। वे समझाते हैं, क्योंकि जब आप संकल्प लेते हैं कि हाँ, हम कुलदेवी की बंधन से मुक्ति के लिए महाभैरव मंत्र का अनुष्ठान कर रहे हैं — और महाभैरव के भीतर इतने स्वरूप हैं, काल भैरव, बटुक भैरव, भूत भैरव, महाभैरव, सब — तो जब वे चलते हैं, जब उनका कोई भी गण चलता है, तो वे जानते हैं कि आवाहन किस उद्देश्य से हो रहा है। इसलिए वे आकर उसे खोल देंगे। वे कहते हैं, उसके अनुकूल ढंग से अनुष्ठान कीजिए; उसी तरह कीजिए।
क्या जनेऊ संस्कार और शिखा के बिना भक्ति भाव से गायत्री जप किया जा सकता है?
साफ इनकार
वक्ता उत्तर देते हैं, नहीं, नहीं किया जा सकता।
यह पूछे जाने पर कि क्या जनेऊ संस्कार के बिना और शिखा के बिना भक्ति भाव से गायत्री जप किया जा सकता है, वे साफ उत्तर देते हैं: नहीं किया जा सकता।
काल भैरव को मदिरा का भोग कैसे चढ़ाना चाहिए?
दीक्षित न हों तो मंदिर के पुजारी के माध्यम से चढ़ाना
वक्ता कहते हैं, स्वयं नहीं। यदि आप काल भैरव को मदिरा का भोग चढ़ाना चाहते हैं, तो काल भैरव मंदिर के पुजारी के माध्यम से चढ़वाइए, जहाँ भी उनके पुजारी हों; वे आपके नाम से संकल्प करके चढ़ाएँगे। यदि आप दीक्षित नहीं हैं तो स्वयं मत चढ़ाइए।
यह पूछे जाने पर कि काल भैरव जी को मदिरा का भोग कैसे चढ़ाना है, वे कहते हैं: स्वयं नहीं। यदि आप काल भैरव को मदिरा का भोग चढ़ाना चाहते हैं, तो काल भैरव मंदिर के पुजारी के माध्यम से चढ़वाइए, जहाँ भी उनके पुजारी हों। वे आपके नाम से संकल्प करके चढ़ाएँगे। वे कहते हैं, यदि आप दीक्षित नहीं हैं, तो स्वयं मत चढ़ाइए।
लगातार बीमारी और शारीरिक कमज़ोरी के बारे में क्या कहा जा सकता है?
एक मामला जिसे नाम देने से पहले जाँचना पड़ेगा
एक श्रोता लिखते हैं कि शरीर में हमेशा बीमारी रहती है और समझ नहीं आता क्या करें — शरीर कमज़ोर है और पता नहीं कोई तंत्र है या कोई दोष। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह जाँच की बात है: जाँचने के बाद ही कहा जा सकता है कि यह तंत्र है या किसी ग्रह दोष के कारण है।
गणेश वैष्णव जी लिखते हैं कि उनके शरीर में हमेशा बीमारी रहती है और उन्हें समझ नहीं आता क्या करें; शरीर कमज़ोर है, और पता नहीं कोई तंत्र है या कोई दोष। वक्ता उत्तर देते हैं, यह जाँच की बात है। देखने के बाद ही कहा जा सकता है कि यह तंत्र है, या किसी ग्रह दोष के कारण है। वे जोड़ते हैं कि बहुत सारे प्रश्न छूट रहे हैं क्योंकि इतनी टिप्पणियाँ हैं, और हर नई टिप्पणी बाकी को ऊपर-नीचे कर देती है जिससे उन्हें पता नहीं चलता वे कहाँ थे।
जहाँ मनसा कुलदेवी हैं वहाँ किस शिव और भैरव की पूजा होती है, और शिव अंत में क्यों आते हैं?
क्रम: गुरु, गणपति, बटुक भैरव, हनुमान, लक्ष्मी नारायण, भगवती, शिव
मनसा माँ के भैरव के बारे में वे कहते हैं कि वे एक पूरा वीडियो डालकर प्रश्नकर्ता को सब बताएँगे, पर अभी नहीं डाल रहे — पहले भैरव अनुष्ठान पूरा हो जाए; अभी के लिए बटुक भैरव ज़रूर कीजिए। और क्रम पर: शिव जी की पूजा बिल्कुल अंत में होगी। पहले बटुक भैरव, फिर देवी जी, फिर शिव जी — गुरु, गणपति, फिर बटुक भैरव, फिर हनुमान जी, फिर लक्ष्मी नारायण, फिर भगवती का जो भी स्वरूप आप पूजना चाहें, आपकी कुलदेवी, भगवती दुर्गा, महाविद्याओं का कोई रूप, और उसके बाद भगवान शिव।
यह पूछे जाने पर कि जहाँ मनसा कुलदेवी हैं वहाँ शिव जी और भैरव के किस स्वरूप की पूजा होती है, वे पीके राजपूत जी से कहते हैं कि वे मनसा माँ के भैरवों पर एक पूरा वीडियो डालेंगे और वहाँ उन्हें पूरी बात बताएँगे। अभी वे इसे नहीं डाल रहे — पहले भैरव जी का अनुष्ठान निकल जाए। अभी के लिए बटुक भैरव ज़रूर कीजिए। क्रम के बारे में: शिव जी की पूजा बिल्कुल अंत में होगी। पहले बटुक भैरव, फिर देवी जी, फिर शिव जी। गुरु, गणपति, फिर बटुक भैरव, फिर हनुमान जी, फिर लक्ष्मी नारायण, फिर भगवती का जो भी स्वरूप आप पूजना चाहें — आपकी कुलदेवी, भगवती दुर्गा, महाविद्याओं का कोई स्वरूप — और उसके बाद भगवान शिव। वे समझाते हैं कि शिव जी बिल्कुल अंत में इसलिए हैं क्योंकि जब शिव जी का पूजन होता है, तो जो भी शक्तियाँ हैं और जो भी छूट गई हैं, महादेव उन सबको संतुष्ट कर देते हैं। इसीलिए पूजन इस तरह चलता है: पहले गुरु पूजन; शुरुआत गुरु पूजन से हुई; फिर गणपति, क्योंकि उन्हें सबसे पहले पूजे जाने का आशीर्वाद और वरदान है; फिर भैरव जी की पूजा, क्योंकि वे रक्षा करेंगे और सब आरंभों में भैरव सबसे आगे खड़े हैं — उनका आवाहन रक्षा देने के लिए है ताकि जिसका भी आवाहन हो रहा है उस तक कोई नकारात्मक शक्ति न आए; उसके बाद मुख्य रूप से हनुमान जी, और फिर बाकी सब शक्तियों का पूजन।
क्या एक विद्यार्थी श्री ललिता त्रिपुरसुंदरी की साधना कर सकता है?
विशेष साधना के लिए दीक्षा आवश्यक
वक्ता उत्तर देते हैं कि विशेष साधना के लिए आपको दीक्षा लेकर फिर करना चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या एक विद्यार्थी श्री ललिता त्रिपुर सुंदरी परमेश्वरी की साधना कर सकता है, वे उत्तर देते हैं कि विशेष साधना के लिए आपको दीक्षा लेकर फिर करनी चाहिए।
जब साधना शुरू होने से पहले हमेशा कुछ न कुछ बाधा आ जाए, तो क्या करना चाहिए?
छोटी साधनाएँ, और 11 माला और एक माला हवन का एक दिन का अनुष्ठान
वक्ता कहते हैं कि यदि आपसे नहीं हो पा रहा, तो बड़ी साधना शुरू मत कीजिए। तीन दिन की साधना कीजिए; पाँच दिन की, सात दिन की कीजिए; लंबी साधना मत कीजिए। और यदि वह भी संभव न हो, तो नित्य साधना कीजिए: जिस दिन आप ठीक और व्यवस्थित हों, उस दिन 11 माला जप और एक माला हवन का एक दिन का अनुष्ठान पूरा कीजिए। ऐसे कीजिए, और बड़ी साधना मत उठाइए।
एक श्रोता कहते हैं कि जब भी वे साधना शुरू करने की सोचते हैं, शुरू करने से पहले ही कोई मर जाता है, या उन्हें कहीं जाना पड़ता है, या कोई बीमार हो जाता है, और वे कभी शुरू नहीं कर पाते। वक्ता उत्तर देते हैं, ठीक है — यदि आपसे नहीं हो पा रहा, तो बड़ी साधना शुरू मत कीजिए। तीन दिन की साधना कीजिए। पाँच दिन की कीजिए, सात दिन की कीजिए। लंबी साधना मत कीजिए। और यदि वह भी नहीं हो पा रहा, तो नित्य साधना कीजिए। जिस दिन आप ठीक और व्यवस्थित हों, उस दिन एक दिन का अनुष्ठान पूरा कीजिए: 11 माला जप और एक माला हवन। वे कहते हैं, इस तरह कीजिए, और बड़ी साधना मत उठाइए।
घर के मंदिर में बटुक भैरव के लिए चाँदी का त्रिशूल कैसे स्थापित किया जाता है?
वही त्रिशूल स्थापना विधान, चाँदी की अनुमति के साथ
वक्ता कहते हैं कि त्रिशूल स्थापित करने का जो विधान वे पहले दे चुके हैं, उसी से कीजिए। चाँदी का त्रिशूल भी रखा जा सकता है।
आनंद जी पूछते हैं कि अपने घर के मंदिर में बटुक भैरव के लिए चाँदी का त्रिशूल कैसे स्थापित करें, और एक सरल विधान माँगते हैं। वे उत्तर देते हैं कि जिस विधान से उन्होंने पहले त्रिशूल स्थापित करना बताया है, उसी से कीजिए। वे कहते हैं, चाँदी के त्रिशूल भी रखे जा सकते हैं।
क्या राशि या कुंडली के अनुसार किसी व्यक्ति के कोई विशेष भैरव होते हैं?
क्रम भैरव साधना में नक्षत्र, राशि और लग्न के अनुसार भैरव
वक्ता कहते हैं कि यदि आप उतनी दूर जाएँ, तो ज़रूर हैं: नक्षत्र के अनुसार भी भैरव हैं, आपकी राशि के अनुसार भी, लग्न के अनुसार भी। जिन्हें क्रम भैरव साधना में जाना है, उनके लिए इस तरह का सब कुछ है। सबके लिए यह उस तरह आवश्यक नहीं है।
यह पूछे जाने पर कि क्या अष्ट भैरवों में से कोई विशेष भैरव किसी व्यक्ति की राशि या कुंडली के अनुसार उसके होते हैं, वे कहते हैं कि यदि आप उस हद तक जाएँ, तो बिल्कुल हैं। नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। के अनुसार भैरव हैं; आपकी राशि के अनुसार भैरव हैं; लग्न के अनुसार भैरव हैं। जिन्हें क्रम भैरव साधना में जाना है, उनके लिए इस तरह का सब कुछ है। वे कहते हैं, सबके लिए यह उस तरह आवश्यक नहीं है।
जलते बालों वाले एक तेजस्वी पुरुष और स्त्री के सपने का क्या अर्थ है?
एक ही सपना और उसके बारे में क्या कहा जा सकता है
विकास जी लिखते हैं कि उन्होंने सपने में अपने कमरे में एक तेजस्वी पुरुष और एक स्त्री देखे, जिनके बालों के सिरों पर आग थी, और जो सिर हिला रहे थे, और पूछते हैं कि इसका क्या अर्थ है। वक्ता पूछते हैं कि क्या उन्होंने यह सपना केवल एक बार देखा।
विकास जी लिखते हैं कि उन्होंने सपने में अपने कमरे में एक तेजस्वी पुरुष और एक स्त्री देखे, जिनके बालों के सिरों पर आग थी और जो सिर हिला रहे थे, और पूछते हैं कि इसका अर्थ क्या था। वक्ता पूछते हैं, क्या आपने सपना केवल एक बार देखा?
जब किसी वंश में एक बार ब्रह्म की पूजा हो जाती है, तो क्या होता है?
वचनबद्धता, बारह दिन में लौटना, और शिव मंदिर के नीचे स्थान
वक्ता कहते हैं कि यदि उनकी पूजा हुई है, तो वे वचनबद्धता में चले जाते हैं। यदि वंश में एक बार उनकी पूजा हुई, तो जिसने भी वह पूजा की उसने वचन दिया होगा कि हम सदा पूजेंगे। इसीलिए परिवार में एक बार ब्रह्म की पूजा हो जाने पर, जब तक उसकी गति अपने आप न हो, उसे हटाना बहुत कठिन है — और यदि आप हटा भी दें, क्योंकि घर के लोगों ने कभी वचन दिया है, तो जब तक वह स्वयं न माने, आप उसे कहीं भी बिठा दें, बारह दिन के भीतर वह लौट आएगा। उसे स्वतंत्र रूप से बिठाना भी समस्या है। इसलिए यदि वह नहीं जा रहा, और पहले के लोगों ने ऐसा काम किया है, तो एक छोटा शिव जी का मंदिर बनाकर उसे वहाँ स्थान दीजिए।
पूजा श्रीवास्तव जी लिखती हैं कि उन्हें अभिचार से भेजा गया था, पर लोग कहते हैं कि वे पूजित हैं, और उनकी पीढ़ी ने ऐसा नहीं किया और उन्हें नहीं पता कि वंश में किसने किया होगा। वे उत्तर देते हैं कि यदि उनकी पूजा हुई है, तो वे वचनबद्धता में चले जाते हैं। यदि वंश में एक बार उनकी पूजा हुई, तो जिसने भी वह पूजा की उसने वचन दिया होगा कि हम सदा उनकी पूजा करेंगे। इसीलिए, परिवार में एक बार ब्रह्म का पूजन हो जाने पर, जब तक उसकी गति अपने आप न हो, उसे हटाना बहुत कठिन है। और यदि आप उसे हटा भी दें, क्योंकि घर के लोगों ने पहले कभी वचन दिया है, तो जब तक वह स्वयं न माने, आप उसे ले जाकर कहीं भी बिठा दें, बारह दिन के भीतर वह लौट आएगा। और यदि आप उसे स्वतंत्र रूप से बिठाएँ, तो उसमें भी कठिनाई है। इसलिए यदि वह नहीं जा रहा, और पहले के लोग पहले ही ऐसा काम कर चुके हैं और इस तरह माँग चुके हैं, तो एक छोटा शिव जी का मंदिर बनवाइए और उन्हें वहाँ स्थान दीजिए।
क्या सुदर्शन चक्र भी सिद्ध किया जाता है?
किसी भी सिद्धि की शर्त के रूप में सामर्थ्य
वक्ता उत्तर देते हैं, ऐसा क्या है जो सिद्ध नहीं किया जाता। आपमें और हममें सामर्थ्य होना चाहिए — सक्षम बनिए, और सब कुछ हो सकता है। एक श्रोता से, जो कहती हैं कि साधना के समय आँखें बंद करने पर उन्हें तांत्रिक दिखते हैं, वे कहते हैं कि यह बहुत विचित्र बात है।
पिंकी जी लिखती हैं कि साधना के समय जब वे आँखें बंद करती हैं, तो तांत्रिक दिखते हैं। वे कहते हैं, यह बहुत विचित्र बात है। यह पूछे जाने पर कि क्या सुदर्शन चक्र भी सिद्ध किया जाता है, और उसकी विधि क्या है, वे उत्तर देते हैं: ऐसा क्या है जो सिद्ध नहीं किया जाता? आपमें और हममें सामर्थ्य होना चाहिए। सक्षम बनिए, और सब कुछ हो सकता है।
रजरप्पा में पशु बलि क्यों दी जाती है?
बलि का एक कारण, और स्वयं मांस खाने वालों की आपत्ति
वक्ता कहते हैं कि बलि देने का एक कारण है।
चंद्रास जी लिखते हैं कि रजरप्पा में देवी को पशु बलि दी जाती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि बलि देने का एक कारण है।
बिना दीक्षा वाला व्यक्ति काल भैरव को मदिरा की जगह क्या चढ़ा सकता है?
पानी, अदरक और गुड़ से बनी सात्विक मदिरा
वक्ता कहते हैं कि आप दीक्षित नहीं हैं, इसलिए आपको स्वयं भगवान काल भैरव को मदिरा का भोग नहीं चढ़ाना चाहिए। ऐसे में आपको सात्विक मदिरा चढ़ानी चाहिए: पानी में अदरक और गुड़ मिलाइए, और वह भोग में चढ़ा सकते हैं। पूरी मदिरा के लिए दीक्षित होना ज़रूरी है।
वे श्रोता से कहते हैं कि आप दीक्षित नहीं हैं, इसलिए आपको स्वयं भगवान काल भैरव को मदिरा का भोग नहीं चढ़ाना चाहिए। ऐसे में आपको सात्विक मदिरा चढ़ानी चाहिए: पानी में अदरक और गुड़ मिलाकर, वह भोग में चढ़ा सकते हैं। वे कहते हैं, पूरी मदिरा के लिए दीक्षित होना ज़रूरी है।
क्या हनुमान जंजीरा से काला कलुआ को रोका जा सकता है?
काला कलुआ के विरुद्ध हनुमान जंजीरा, और परेशानी आने पर छोटी साधनाएँ
वक्ता उत्तर देते हैं, हाँ, बिल्कुल रोका जा सकता है। सुनील परासी जी से, जो लिखते हैं कि जब भी वे कोई पूजा या साधना शुरू करते हैं, तीन-चार दिन बाद परेशानी आती है और घर में कलह होती है, वे कहते हैं: केवल तीन दिन की साधना कीजिए। तीन दिन कीजिए और बाकी दिन मत कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या हनुमान जंजीरा से काला कलुआ को रोका जा सकता है, वे उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल रोका जा सकता है। सुनील परासी जी लिखते हैं कि जब भी वे कोई पूजा या साधना शुरू करते हैं, तीन-चार दिन बाद परेशानी आती है और घर में कलह होती है। वक्ता उत्तर देते हैं, केवल तीन दिन की साधना कीजिए। तीन दिन कीजिए; बाकी दिन मत कीजिए।
क्या घर में सात्विक भाव से भैरव जंजीरा किया जा सकता है?
कौन सा जंजीरा है, इससे उत्तर तय होता है
वक्ता उत्तर देते हैं कि यह इस पर निर्भर करेगा कि कौन सा जंजीरा है। भैरव जी के बहुत सारे हैं, और हनुमान जी के भी बहुत सारे हैं; उनमें थोड़ा अंतर है, और भोग बदल जाता है।
यह पूछे जाने पर कि क्या घर में सात्विक भाव से भैरव जंजीरा की साधना की जा सकती है, वे कहते हैं कि यह इस पर निर्भर करेगा कि कौन सा जंजीरा है। वे कहते हैं, भैरव जी के बहुत सारे हैं, और हनुमान जी के भी बहुत सारे हैं। उनमें थोड़ा सा अंतर है: भोग बदल जाता है। एक और प्रश्न पर, कि वाहन लाने के लिए कौन सा दिन ठीक रहेगा, वे प्रश्नकर्ता से टेलीग्राम पर संपर्क करने को कहते हैं, क्योंकि सब कुछ देखकर ही बताना पड़ेगा।
इतने पाप से भरे युग में धर्म की रक्षा कैसे होगी?
पुण्यात्मा जो साथ में मौजूद हैं
वक्ता गौरव जी को उत्तर देते हैं, आप हैं न। हम सब जितना संभव है उतना कर रहे हैं; जितना हो सके अपनी बुद्धि धर्म में लगाए रखेंगे। जब पापी हैं, तो आप जैसे पुण्यात्मा भी हैं — आप भी इतना अच्छा काम कर रहे हैं; आप स्वयं को क्यों भूल रहे हैं? यदि 155 लोग सुन रहे हैं, तो उनमें कम से कम पाँच ऐसे होंगे जिनका मन कुछ पल के लिए भी धर्म में स्थिर हो जाए। ठीक इसी को बढ़ाना है।
गौरव जी लिखते हैं कि ऐसा पाप का युग आ गया है, और पापी जिस स्थिति में हैं, उसमें धर्म की रक्षा कैसे होगी। वक्ता उत्तर देते हैं, आप हैं न, गौरव जी। हम लोग जितना हो सकता है उतना कर रहे हैं। जितना हो सके, अपनी बुद्धि धर्म में लगाए रखेंगे। जब पापी हैं, तो आप जैसे पुण्यात्मा भी हैं। आप भी इतना अच्छा काम कर रहे हैं — आप स्वयं को क्यों भूल रहे हैं? यदि 155 लोग सुन रहे हैं, तो उनमें कम से कम पाँच ऐसे होंगे जिनकी बुद्धि कुछ पल के लिए भी धर्म में स्थिर हो जाए। वे कहते हैं, ठीक इसी को बढ़ाना है।
क्योंकि दुर्गा सप्तशती तंत्र है, क्या इसे बिना गुरु के करना चाहिए?
सप्तशती का हर मंत्र तंत्र है
वक्ता मानते हैं कि दुर्गा सप्तशती का हर मंत्र तंत्र है — यह सही बात है, सब सही है। भक्ति भाव से, भगवती की कृपा पाने के लिए, आप उनका कवच, अर्गला और कीलक कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्योंकि दुर्गा सप्तशती तंत्र है, क्या इसे गुरु की सहायता के बिना करना चाहिए — और यदि नहीं, तो माँ दुर्गा की कृपा पाने के लिए और क्या किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि दुर्गा सप्तशती का हर मंत्र तंत्र है; यह सही बात है, और सब सही है। भक्ति भाव से, भगवती की कृपा पाने के लिए, आप उनका कवच, उनका अर्गला और उनका कीलक कर सकते हैं।
सप्तशती के कौन से भाग बिना गुरु के पढ़े जा सकते हैं?
रात्रि सूक्त, चौथा, पाँचवाँ और ग्यारहवाँ अध्याय
स्तुतियों में आप रात्रि सूक्त भी कर सकते हैं; चौथे अध्याय की स्तुति कर सकते हैं; पाँचवें अध्याय में तंत्रोक्त रात्रि सूक्त के रूप में अलग से दी गई स्तुति कर सकते हैं; और ग्यारहवें अध्याय की स्तुति कर सकते हैं। बाकी के लिए, पूरा विधि-विधान और पूरा पाठ — उसकी विधि भी उन्होंने चैनल पर महाविद्या क्रम में दी है, जिसके लिए गुरु की ज़रूरत नहीं। जब आप किसी विशेष उद्देश्य से संस्कृत में पाठ करने जाएँ, या संपुट पाठ की सोच रहे हों, तब गुरु चाहिए, ताकि समझकर किया जाए।
वे कहते हैं कि स्तुतियों में रात्रि सूक्त भी किया जा सकता है। चौथे अध्याय की स्तुति की जा सकती है। पाँचवें अध्याय में तंत्रोक्त रात्रि सूक्त के रूप में जो अलग से दी गई है, वह की जा सकती है। ग्यारहवें अध्याय की स्तुति की जा सकती है। बाकी के लिए, उसका पूरा विधि-विधान, पूरा पाठ — उसकी विधि भी उन्होंने चैनल पर महाविद्या क्रम में दी है, और उसके लिए आपको गुरु की ज़रूरत नहीं। जब आप किसी विशेष उद्देश्य से संस्कृत में पाठ करने जाएँ, या संपुट पाठ की सोच रहे हों, तब आपको गुरु चाहिए, ताकि चीज़ें समझकर की जाएँ।
किसी का जीवन बर्बाद करना बहुत बड़ा पाप है, और जूनियर को सताने वाला विषैला सीनियर उसे भोगता है।
किसी का जीवन बर्बाद करना बड़ा पाप, और उसे कौन भोगता है
वे विजय लक्ष्मी जी से कहते हैं कि नौकरी छोड़ने से पहले एक बार प्रयास कीजिए। किसी का जीवन बर्बाद करना बहुत बड़ा पाप है। ऐसे सीनियर, जो विषैली सीनियरिटी दिखाते हैं, जूनियरों को परेशान करते हैं और उनके करियर से खेलते हैं, समय आने पर बहुत अच्छी तरह भोगते हैं; और वे नहीं तो उनके अपने बच्चे बहुत कष्ट पाते हैं — और जब बच्चे कष्ट पाते हैं, तो पिता वही आदमी है। वे कहते हैं, आपने ऐसे बहुत लोग देखे होंगे: उसके पिता बड़े अफ़सर थे, और बेटा ऐसा निकम्मा निकला कि पिता का बनाया सारा पैसा और सम्मान मिट्टी में मिला दिया।
विजय लक्ष्मी जी लिखती हैं कि दफ़्तर में उनके सीनियर बिना कारण उन्हें बहुत परेशान करते हैं और उनका मन नौकरी छोड़ने का करता है, और पूछती हैं कि क्या कोई उपाय है। वे कहते हैं, उपाय है। नौकरी छोड़ने से पहले एक बार प्रयास कीजिए। किसी का जीवन बर्बाद करना बहुत बड़ा पाप है। इस तरह के सीनियर, जो विषैली सीनियरिटी दिखाते हैं, जो जूनियरों को परेशान करते हैं और उनके करियर से खेलते हैं — ऐसे लोग समय आने पर बहुत अच्छी तरह भोगते हैं। वे सोचते हैं कि वे बहुत अच्छा कर रहे हैं; सीनियरिटी और पैसे से घमंड आता है, और ऐसे लोगों को दूसरों को परेशान करने में मज़ा भी आता है। और जब समय आता है, यदि वे स्वयं नहीं, तो उनके अपने बच्चे बहुत कष्ट पाते हैं — और जब बच्चे कष्ट पाते हैं, तो पिता वही आदमी है। वे कहते हैं, आपने ऐसे बहुत लोग देखे होंगे, और कहा होगा कि उसके पिता बड़े अफ़सर थे और बेटा ऐसा निकम्मा निकला कि पिता का बनाया सारा पैसा और सम्मान मिट्टी में मिला दिया।
सताने वाले सीनियर के विरुद्ध कौन सी साधना बताई जाती है?
संकल्प के साथ कामाख्या कवच, और भैरव हृदय
वक्ता कहते हैं, चिंता मत कीजिए। यदि कोई विकल्प मिले — नौकरी के अलावा कुछ और, या दूसरी नौकरी — तो बदल लीजिए, अपने घर की परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेकर। यदि कोई रास्ता नहीं, तो सहकर चलते रहिए। और साथ में ये दो चीज़ें जीवन में लीजिए: संकल्प के साथ कामाख्या कवच का अनुष्ठान, और भैरव हृदय। दोनों चैनल पर दिए हैं और अधिक से अधिक पाँच मिनट लेंगे; एक बार अनुष्ठान से उन्हें सिद्ध कीजिए और फिर रोज़ इस्तेमाल कीजिए। नहीं तो अघोर बगलामुखी शाबर मंत्र भी दिया गया है, जो कठिनाई बहुत ज़्यादा हो तो इस्तेमाल किया जा सकता है।
तो चिंता मत कीजिए, वे कहते हैं। यदि आपको कोई विकल्प मिले — यदि आप नौकरी के अलावा कुछ कर सकें, या दूसरी नौकरी उपलब्ध हो — तो बदल लीजिए। अपने घर की परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लीजिए। यदि कोई रास्ता नहीं, तो सहकर चलते रहिए। और साथ में ये दो चीज़ें अपने जीवन में लीजिए: संकल्प के साथ कामाख्या कवच का अनुष्ठान, और कामाख्या कवच के साथ भैरव हृदय। दोनों चैनल पर दिए गए हैं। ज़्यादा समय नहीं लगेगा — करने में अधिक से अधिक पाँच मिनट। एक बार अनुष्ठान करके उसे सिद्ध कीजिए, और फिर रोज़ इस्तेमाल कीजिए। और यदि वह नहीं, तो अघोर बगलामुखी शाबर मंत्र भी दिया गया है; वह भी किया जा सकता है। यदि बहुत ज़्यादा कठिनाई हो, तो उसे इस्तेमाल कीजिए। वे जोड़ते हैं कि यदि उनके हाथ में होता, तो जो बिना कारण दूसरों को परेशान करते हैं उन्हें वे बेल्ट और जूते से पीटते।
क्या पत्नी के बिना हवन किया जा सकता है?
वैदिक हवन, तंत्रोक्त हवन, और वामांगी
वक्ता कहते हैं कि वैदिक हवन में उनकी ज़रूरत होती है। तंत्रोक्त हवन में, जो लोग स्वयं करते हैं, तंत्रोक्त ग्रंथों में भी कई जगह लिखा है कि यदि आप अपनी वामांगी, यानी अपनी धर्मपत्नी के साथ करेंगे, तो अधिक फल मिलेगा। इसलिए यदि आप वैसा कर रहे हैं, तो उनके साथ कीजिए। यदि उनकी रुचि न हो, तो स्वयं कीजिए।
पहले वे प्रश्नकर्ता के ऑटोकरेक्ट पर मज़ाक करते हैं जो शब्दों को बेतुका बना देता है, फिर उत्तर देते हैं: आप पूछ रहे हैं कि क्या बिना महिला के हवन किया जा सकता है। यदि आप विवाहित हैं और हवन करना चाहते हैं — वैदिक हवन में, वे कहते हैं, उनकी ज़रूरत होती है। तंत्रोक्त हवन में, जो लोग स्वयं करते हैं, तंत्रोक्त ग्रंथों में भी कई जगह लिखा है कि यदि आप अपनी वामांगी, यानी अपनी धर्मपत्नी के साथ करेंगे, तो अधिक फल मिलेगा। इसलिए यदि आप वैसा कर रहे हैं, तो उन्हें साथ लेकर कीजिए। और यदि उनकी रुचि न हो, तो स्वयं कीजिए। वे कहते हैं, आज के समय में बहुत बड़े सौभाग्य से ऐसी धर्मपत्नी मिलती है जो पूजन, पाठ और साधनाओं में रुचि ले और आपके साथ कदम मिलाकर चले — जबकि दुर्भाग्य और प्रारब्ध काटने के लिए ऐसी पत्नी मिलती है जो आहुति नहीं डालती बल्कि उसी स्रुवा से पीटती है। सौभाग्य हो तो उनके साथ हवन कीजिए; न हो तो स्वयं कीजिए।
यदि घर में बार-बार चमगादड़ आएँ तो क्या करना चाहिए?
पहले क्षेत्रपाल निकारी, फिर पाँच रविवार गायत्री हवन
वक्ता अश्विन सोनी जी से कहते हैं कि पहले दो काम करने चाहिए। पहला, क्षेत्रपाल निकारी आवश्यक है। दूसरा, हर रविवार घर में किसी ऐसे ब्राह्मण से गायत्री हवन करवाइए जो गायत्री जप अच्छी तरह करते हों — शुद्ध सात्विक ब्राह्मण — और उनके हवन में भाग लीजिए; यदि पूरे परिवार के साथ संभव हो, तो शुक्ल पक्ष के रविवार से शुरू कीजिए, और कम से कम पाँच रविवार करवाइए। बहुत खर्च नहीं होगा। निकारी केवल एक बार करनी है। वे कहते हैं, जब चमगादड़ बार-बार आते हैं और बहुत परेशानी होती है, तो इसका अर्थ है कि नकारात्मक चीज़ें बढ़ती मात्रा में आने-जाने लगी हैं।
वे अश्विन सोनी जी से कहते हैं कि यदि घर में बार-बार चमगादड़ आ रहे हैं, तो पहले दो काम करने चाहिए। पहला, क्षेत्रपाल निकारी आवश्यक है। दूसरा, हर रविवार घर में किसी ऐसे ब्राह्मण से गायत्री हवन करवाइए जो गायत्री जप आदि अच्छी तरह करते हों — शुद्ध सात्विक ब्राह्मण — और स्वयं उनके हवन में भाग लीजिए। यदि पूरे परिवार के साथ संभव हो, तो शुक्ल पक्ष के रविवार से शुरू कीजिए। कम से कम पाँच रविवार करवाइए। खर्च भी बहुत नहीं होगा, और इतनी सामग्री आप जुटा सकते हैं। निकारी केवल एक बार करनी है। वे कहते हैं, यदि आप इतना कर सकें, तो बहुत होगा। वे कहते हैं कि चमगादड़ बार-बार आ रहे हैं और बहुत परेशानी है, इससे पता चलता है कि नकारात्मक चीज़ें बढ़ती-बढ़ती मात्रा में आने-जाने लगी हैं।
छिन्नमस्तिका साधना में बार-बार दिखने वाली क्रोधित सफ़ेद लड़की कौन है?
बिना दीक्षा वालों के लिए चेतावनी, या दीक्षितों के लिए छूटी हुई पूजा
वक्ता कहते हैं कि यदि आप छिन्नमस्तिका साधना कर रहे हैं तो आप ज़रूर दीक्षित होंगे, और उन्हें ऐसी आशा है। और यदि आप दीक्षित नहीं हैं, तो सावधान हो जाइए — वे आपको सावधान करने के लिए दिख रही हैं। छिन्नमस्तिका साधना दीक्षित होने के बाद ही कीजिए। यदि आप दीक्षित हैं, तो इस बारे में अपने गुरु से पूछिए, वे बताएँगे: आप जिस भी मार्ग में हैं, उस मार्ग की कोई पूजा छूट गई होगी, और इसीलिए वे दिख रही हैं।
करण बाबू जी लिखते हैं कि उनकी साधना में एक छोटी सफ़ेद रंग की लड़की बार-बार क्रोध में दिखती है, और पूछते हैं कि छिन्नमस्तिका साधना में वह कौन है। वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि आप छिन्नमस्तिका साधना कर रहे हैं, तो आप ज़रूर दीक्षित होंगे — उन्हें ऐसी आशा है। और यदि आप दीक्षित नहीं हैं, तो सावधान हो जाइए। वे आपको सावधान करने के लिए दिख रही हैं। छिन्नमस्तिका साधना दीक्षित होने के बाद ही कीजिए। और यदि आप दीक्षित हैं, तो इस बारे में अपने गुरु से पूछिए, वे आपको बताएँगे। आप जिस भी मार्ग में हैं, उस मार्ग की कोई पूजा छूट गई होगी, और इसीलिए वे दिख रही हैं।
बिना दीक्षा के एक महीने गायत्री मंत्र करने वाले श्रोता के साथ क्या हुआ?
कुंडलिनी जागरण, समाधि और नींद न आना
एक श्रोता लिखते हैं कि वक्ता सही हैं कि गुरु दीक्षा के बिना गायत्री मंत्र नहीं करना चाहिए — उन्हें पता नहीं था, और उन्होंने एक महीने किया; कुंडलिनी जागरण हुआ, समाधि लगने लगी, नींद आना बंद हो गया, और फिर वे डॉक्टर के पास गए। वक्ता चकित होकर कहते हैं, इतना कुछ हो गया। वैदिक मंत्रों पर वीडियो बनाने को अलग से कहे जाने पर — कौन करे और कौन न करे, और क्या सावधानियाँ रखें — वे मानते हैं कि यह सही बात है और कहते हैं कि वे बनाएँगे।
एक श्रोता उनसे कहते हैं कि वे इतना समझाते हैं, तो वैदिक मंत्रों पर एक वीडियो बनाएँ: कौन करे, कौन न करे, और क्या सावधानियाँ रखी जाएँ। वे कहते हैं, यह सही बात है; वे बनाएँगे। एक और श्रोता लिखते हैं कि वे सही हैं कि गुरु दीक्षा के बिना गायत्री मंत्र नहीं करना चाहिए — उन्हें पता नहीं था, और उन्होंने एक महीने किया; कुण्डलिनी जागरण हुआ, समाधि लगने लगी, नींद आना बंद हो गया, और फिर वे डॉक्टर के पास गए। वक्ता चकित होकर कहते हैं, इतना कुछ हो गया।
क्या प्याज़ और लहसुन छोड़ना ज़रूरी है?
शरीर में गर्मी और साधना पर उसका असर
वक्ता कहते हैं कि यदि आप उनसे पूछें, तो इन्हें छोड़ना बिल्कुल ज़रूरी है, विशेषकर साधकों के लिए। जो पूछते हैं कि क्या ब्रह्मचर्य का पालन करना ज़रूरी है, उन्हें वे उत्तर देते हैं कि प्याज़ और लहसुन शरीर में गर्मी की मात्रा इतनी बढ़ा देते हैं — विशेषकर पुरुषों में — कि एक समय के बाद आप साधना कर ही नहीं पाएँगे। यदि कोई शारीरिक परेशानी है, शरीर में कोई कमी है, और वैद्य या डॉक्टर ने प्याज़-लहसुन लेने को कहा है, तो आप उन्हें बिल्कुल दवा की तरह ले सकते हैं। ज़रूरत न हो तो मत लीजिए; यदि आप शारीरिक रूप से ठीक हैं, तो ज़रूरत नहीं।
श्री कृष्ण भक्त के यह पूछने पर कि प्याज़ और लहसुन छोड़ना ज़रूरी है या नहीं, वे कहते हैं कि यदि उनके अनुसार पूछें, तो इन्हें छोड़ना बिल्कुल ज़रूरी है, विशेषकर साधकों के लिए। वे कहते हैं, ये वही लोग हैं जो पूछते हैं कि क्या ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन करना ज़रूरी है। प्याज़ और लहसुन शरीर में गर्मी की मात्रा इतनी बढ़ा देते हैं — विशेषकर पुरुषों में — कि एक समय के बाद आप साधना नहीं कर पाएँगे। यदि शरीर में कोई परेशानी है, कोई कमी है, और वैद्य या डॉक्टर ने आपको प्याज़-लहसुन लेने को कहा है, तो आप उन्हें बिल्कुल दवा की तरह ले सकते हैं। यदि ज़रूरत नहीं है, तो मत लीजिए। यदि आप शारीरिक रूप से ठीक हैं, तो इन्हें लेने की ज़रूरत नहीं।
क्या मांस खाने वाला व्यक्ति घर में बटुक भैरव स्थापित कर सकता है?
मूर्ति प्रतिष्ठा की जगह फ़ोटो
वक्ता उत्तर देते हैं कि बटुक भैरव की मूर्ति की प्रतिष्ठा मत कीजिए। उनकी फ़ोटो रखिए और जो भी पूजन करना है कीजिए। यदि आप प्रतिष्ठा करके पूजा करना चाहते हैं, तो नियमों को मानते हुए कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या मांस खाने वाला व्यक्ति घर में बटुक भैरव स्थापित कर सकता है, वे उत्तर देते हैं: बटुक भैरव की मूर्ति की प्रतिष्ठा मत कीजिए। उनकी फ़ोटो रखिए, और जो भी पूजन करना है कीजिए। यदि आप प्रतिष्ठा करने के बाद पूजा करना चाहते हैं, तो नियमों को मानते हुए कीजिए।
यदि पास में भैरव मंदिर न हो, तो क्या माँ काली के सामने भैरव का अनुष्ठान किया जा सकता है?
काली के सामने भैरव अनुष्ठान
वक्ता शरद जी को उत्तर देते हैं, हाँ, कीजिए, कोई कठिनाई नहीं। एक और श्रोता से, जो कहते हैं कि वे भी परेशानियाँ आने के कारण साधना शुरू नहीं कर पाते, वे कहते हैं: ज़रूर प्रयास कीजिए — भैरव जी हर तरह के कष्ट और बाधा दूर करते हैं।
यह पूछे जाने पर कि यदि भैरव मंदिर पास में न हो, तो क्या उनका अनुष्ठान और पूजा माता काली के सामने की जा सकती है, वे उत्तर देते हैं: हाँ, कीजिए, कोई कठिनाई नहीं। एक और श्रोता से, जो कहते हैं कि वे भी परेशानियाँ आने के कारण साधना शुरू नहीं कर पाते, वे कहते हैं: ज़रूर प्रयास कीजिए। वे कहते हैं, भैरव जी हर तरह के कष्ट और बाधाएँ दूर करते हैं।
पूजा के समय नींद क्यों आती है, और व्यावहारिक उपाय क्या है?
अधूरी नींद, मोबाइल, और अलार्म लगाकर पाँच मिनट की झपकी
वक्ता निशा शर्मा जी से कहते हैं कि यदि आप सुबह-सुबह पूजन करती हैं और आपकी नींद पूरी नहीं हुई, तो ऐसा होगा — और इसका सबसे बड़ा कारण आपका मोबाइल होगा, क्योंकि रात को आप उसे देखते-देखते सोती हैं। यदि शाम को करती हैं, तो भी होगा, दिन भर की थकान से; यह साधारण बात है। व्यावहारिक रूप से: यदि पूजा स्थान थोड़ा बड़ा है, तो चादर बिछाकर बैठिए; और जब नींद आने लगे, तो केवल पाँच मिनट का अलार्म लगाकर सो जाइए। क्षमा माँग लीजिए, कोई दोष नहीं लगेगा; चिंता मत कीजिए। पाँच मिनट बाद उठेंगी तो पूरे डेढ़-दो घंटे अच्छी तरह साधना कर पाएँगी।
पूजा करते समय बहुत नींद क्यों आती है, यह पूछे जाने पर वे निशा शर्मा जी को उत्तर देते हैं: यदि आप सुबह-सुबह पूजन करती हैं और आपकी नींद पूरी नहीं हुई है, तो ऐसा होगा। वे कहते हैं कि इसका सबसे बड़ा कारण आपका मोबाइल होगा: रात को आप मोबाइल देखती रहती हैं और नींद आने पर सो जाती हैं; नींद पूरी नहीं होती, इसलिए पूजा में नींद आती है। यदि आप शाम को कर रही हैं, तो तब भी होगा, दिन की थकान से; यह साधारण बात है। फिर वे एक छोटी सी व्यावहारिक बात बताते हैं। यदि आपको पूजन करना है और पूजा स्थान थोड़ा बड़ा है, तो चादर बिछाकर बैठ जाइए। और जब नींद आने लगे, तो केवल पाँच मिनट का अलार्म लगाइए, और पाँच मिनट सो जाइए। क्षमा माँग लीजिए, कोई दोष नहीं लगेगा; चिंता मत कीजिए। फिर उन पाँच मिनट के बाद जब आप उठेंगी, तो पूरे डेढ़-दो घंटे बहुत अच्छी तरह साधना कर पाएँगी। वे जोड़ते हैं कि नए साधक इतना न सोचें कि नींद न आए, पैर न दुखें, रीढ़ बिल्कुल सीधी रहे। अभी अभ्यास कीजिए, चीज़ें ठीक हो जाएँगी।
साधना के समय के अनुसार नींद की व्यवस्था कैसे करनी चाहिए?
शाम की साधना के लिए दोपहर की नींद, और भोर की साधना के लिए रात 9 बजे सोना
वे कहते हैं कि सबसे अच्छी बात यह है कि यदि शाम को साधना करनी है, तो दोपहर में कम से कम डेढ़-दो घंटे अच्छी तरह सोइए; दोपहर में वह नींद मिल जाए तो शाम की साधना बिल्कुल ताज़ा होगी। और यदि भोर में साधना करनी है, तो रात 9 बजे — वे लड़के-लड़कियों, सब युवाओं से कहते हैं — अपने सोना बाबू को अलविदा कहिए; ज़रूरत हो तो ब्रेकअप कीजिए, जवाब ही मत दीजिए; मोबाइल बंद; साधना करनी है तो करनी है। भोर में उठकर साधना कीजिए, नींद नहीं आएगी। यदि नींद अधूरी है और मन में सोना बाबू की टेंशन है, तो साधना कहाँ से होगी?
वे कहते हैं कि इसके लिए सबसे अच्छी बात यह है कि यदि आपको शाम को साधना करनी है, तो दोपहर में कम से कम डेढ़-दो घंटे अच्छी तरह सोइए। दोपहर में आराम से सोइए। यदि दोपहर में डेढ़-दो घंटे की नींद मिल गई, तो शाम की साधना बिल्कुल ताज़ा होगी। और यदि साधना भोर में करनी है, तो रात 9 बजे — वे लड़कों और लड़कियों, सब युवाओं से कहते हैं — अपने सोना बाबू को टाटा, बाय-बाय, गुडबाय कहिए। ज़रूरत हो तो उससे ब्रेकअप कीजिए; जवाब ही मत दीजिए। मोबाइल बंद। साधना करनी है, तो साधना करनी है। उसके बाद कोई सोना बाबू नहीं। सुबह, भोर में उठिए, और फिर साधना कीजिए; नींद नहीं आएगी। यदि नींद पूरी नहीं हुई और मन में सोना बाबू की टेंशन बनी है, तो साधना कहाँ से होगी?
जब तिल के तेल की ज्योति बार-बार बुझ जाए, तो इसका क्या अर्थ है?
दुर्लभतम स्थिति जो चल रहे प्रयोग का संकेत देती है
यदि तिल का तेल भी ठीक है और बत्ती भी ठीक है, और ज्योति बार-बार शांत हो जाती है और परेशानी है, तो सबसे पहले अपने घर में निकारी करवानी चाहिए — स्वयं नहीं, बल्कि पूजन-पाठ करने वाले किसी जानकार व्यक्ति के माध्यम से। इस समय कोई न कोई आपके घर पर प्रयास कर रहा है; अभी सफल नहीं हुआ, पर सफल हो गया तो परेशानी होगी। वे कहते हैं, ज्योति का न जलना दुर्लभतम स्थिति है: आप दीपक जला रहे हैं और सब ठीक होते हुए भी वह नहीं जलेगा। तुरंत स्वयं मत कीजिए, क्योंकि चीज़ें बहुत सक्रिय हैं और उन्हें तुरंत माध्यम मिल जाएगा — इसलिए किसी जानकार के माध्यम से उनकी पूजा भेजिए, क्षेत्रपाल निकारी करवाइए, और फिर देखिए; लाभ मिलेगा।
अजय शर्मा जी कहते हैं कि उनकी तिल के तेल की ज्योति, फिर से जलाने पर, कुछ पलों बाद फिर शांत हो जाती है। वक्ता कहते हैं कि यदि ज्योति नहीं जल रही, तो वे उन्हें व्यावहारिक बात बताएँगे। यदि तिल का तेल भी ठीक है और बत्ती भी ठीक है, और ज्योति बार-बार शांत हो जाती है, और कठिनाई है, तो सबसे पहले आपको अपने घर में यह करवाना चाहिए। स्वयं नहीं — पूजन-पाठ करने वाले किसी जानकार व्यक्ति के माध्यम से — घर की निकारी करवाइए। इस समय कोई न कोई आपके घर पर प्रयास कर रहा है। अभी सफल नहीं हुआ है, पर सफल हो गया तो परेशानी होगी। वे कहते हैं कि ज्योति का न जलना दुर्लभतम स्थितियों में होता है: आप दीपक जला रहे हैं और बाकी सब ठीक होते हुए भी दीपक नहीं जलेगा। तुरंत स्वयं मत कीजिए, क्योंकि स्वयं करने में कठिनाई यह है कि चीज़ें बहुत सक्रिय हैं और उन्हें तुरंत माध्यम मिल जाएगा। इसलिए किसी जानकार व्यक्ति के माध्यम से, जो निकारी की जाती है उसके द्वारा क्षेत्रपाल की पूजा भेजकर, यह कीजिए और देखिए; आपको लाभ मिलेगा।
कलकत्ता की काली की मसानी कौन है?
एक महाशक्ति जिसके नीचे अनगिनत मसानियाँ हैं
वक्ता इस प्रश्न को बेतुका मानते हैं। वे पूछते हैं, आप लोग ये प्रश्न कहाँ से लाते हैं — मसानी मसानी है। कलकत्ता की काली महाशक्ति हैं; उनके नीचे लाखों मसानियाँ होंगी, एक तो शायद ही। और यदि आप मसानी की बात करें, तो मसानी की बात बिल्कुल अलग चीज़ हो जाती है।
एक श्रोता पूछते हैं कि कलकत्ता की काली माँ की मसानी कौन है। वक्ता चौंककर कहते हैं, अरे बाप रे, और व्यंग्य में कहते हैं: आइए, कालीघाट में ही बैठे हैं, खोजा जाए कि उनकी मसानी कौन है। वे पूछते हैं, आप लोग ये प्रश्न कहाँ से लाते हैं। मसानी मसानी है। कलकत्ता की काली महाशक्ति हैं। उनके नीचे लाखों मसानियाँ होंगी — केवल एक तो शायद ही हो। और यदि आप मसानी की बात करें, वे कहते हैं, तो मसानी की बात बिल्कुल अलग चीज़ हो जाती है।
क्या गृहस्थ को श्मशानिक और अघोर साधना में पढ़ना-उलझना चाहिए?
यूट्यूब या फ़ेसबुक के ज़रिये इन मार्गों में जाने पर रोक
वक्ता प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि गृहस्थ को इन चीज़ों में बिल्कुल नहीं पड़ना चाहिए। और विशेषकर युवा: यदि आप तंत्र साधना में श्मशानिक साधना में, अघोर में जाना चाहते हैं, तो यूट्यूब और फ़ेसबुक के रास्ते मत जाइए। यदि आप सबसे उग्र साधना करना चाहते हैं, तो ज़रूर कीजिए — साधना करने के लिए ही है: मन बना लीजिए कि आपको गृहस्थ में नहीं जाना, साधना भी करनी है, तंत्र मार्ग में तामसिक साधना करनी है, वीर भाव में साधना करनी है, और उस मार्ग पर आगे बढ़ना है। ज़रूर बढ़िए — पर निर्णय लेकर, किसी के साथ जाकर, किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में, आमने-सामने। सारी साधना यूट्यूब और फ़ेसबुक से नहीं होती।
वे विजय पटेल जी से कहते हैं कि गृहस्थ को इन सब चीज़ों में नहीं पड़ना चाहिए। और विशेषकर जो युवा हैं: यदि आप लोग तंत्र साधना में श्मशानिक साधना में, अघोर में, इन सब चीज़ों में जाना चाहते हैं, तो यूट्यूब और फ़ेसबुक के रास्ते मत जाइए। वे यह अपने वीडियो में बार-बार कहते हैं, और अपने कई लाइव में लोगों को उत्तर देते हुए कह चुके हैं: यदि आप सबसे उग्र साधना करना चाहते हैं, तो बिल्कुल कीजिए — साधना करने के लिए ही है। मन बना लीजिए। आपको गृहस्थ में नहीं जाना; आपको साधना भी करनी है; और तंत्र मार्ग में तामसिक साधना करनी है, वीर भाव में साधना करनी है; उस मार्ग पर आगे बढ़ना है — तो ज़रूर आगे बढ़िए। पर निर्णय लेकर, किसी के साथ जाकर, किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में, आमने-सामने। वे कहते हैं कि सारी साधना यूट्यूब और फ़ेसबुक से नहीं होती। न ही इस बारे में उस तरह कुछ करना चाहिए।
दोहराते समय जिस विद्यार्थी का दिमाग खाली हो जाए, उसके लिए क्या उपाय है?
स्मरण शक्ति और एकाग्रता के लिए बसंत पंचमी का प्रयोग
वक्ता कहते हैं कि यह पूरी दुनिया के विद्यार्थियों की समस्या है, और वे इसका बहुत अच्छा उपाय देते हैं — जो उन साधकों के भी काम आता है जो मंत्र याद करना चाहते हैं और नहीं कर पाते, या दस साल से सहस्रनाम पढ़ रहे हैं और अब भी बिना देखे नहीं पढ़ पाते। इसका विशेष प्रयोग बसंत पंचमी के दिन है, जिस दिन हम सरस्वती पूजा करते हैं; उसे सिद्ध करने के लिए वही दिन विशेष है। नहीं तो किसी भी शुभ मुहूर्त में कर सकते हैं।
एक श्रोता लिखते हैं कि जब वे पढ़ते हैं और फिर दोहराने बैठते हैं, तो लगता है कि कुछ पढ़ा ही नहीं और पूरा दिमाग खाली हो जाता है। वे कहते हैं, यह पूरी दुनिया के विद्यार्थियों की समस्या है। इसके लिए वे बहुत अच्छा उपाय देते हैं — राज शर्मा जी के लिए और उन सब विद्यार्थियों और घर के बच्चों के लिए जिन्हें इस तरह की समस्या है। और वे जोड़ते हैं कि यह साधकों के लिए भी है: उनके लिए जो मंत्र याद करना चाहते हैं और जिन्हें बहुत समय से मंत्र याद नहीं हो रहा; उनके लिए जो दस साल से सहस्रनाम पढ़ रहे हैं और आज भी बिना देखे पढ़ने को कहा जाए तो नहीं पढ़ पाते। वे कहते हैं कि इसका विशेष प्रयोग बसंत पंचमी के दिन है — जिस दिन हम सरस्वती पूजा करते हैं; उसे सिद्ध करने के लिए वही दिन विशेष है। बाकी, चाहें तो किसी भी शुभ मुहूर्त में कर सकते हैं।
धनिया और मिश्री प्रयोग में कौन सी सामग्री और कितनी मात्रा लगती है?
पिसा धनिया ताल मिश्री के साथ, पीतल की कटोरी में, ताँबे में कभी नहीं
धनिया के बीज चाहिए, मिक्सर-ग्राइंडर में पीसकर पाउडर बनाया हुआ — कम से कम 250 ग्राम धनिया। फिर ताल मिश्री: राशन की दुकान पर ताल मिश्री माँगिए, मिल जाएगी। यदि 250 ग्राम धनिया लिया है, तो 100 ग्राम ताल मिश्री लीजिए; यदि आधा किलो धनिया लेंगे तो आराम से पूरा महीना चलेगा, और तब 200 से 250 ग्राम ताल मिश्री लीजिए। इसे भी ग्राइंडर में साथ पीसना है। दोनों को अच्छी तरह पीसकर एक कटोरी में रखिए — पीतल की कटोरी बहुत अच्छी है। ध्यान रखिए कि इसमें ताँबे की कटोरी या ताँबे का बर्तन इस्तेमाल न हो।
वे कहते हैं कि इसके लिए धनिया चाहिए — धनिया के बीज। उसे मिक्सर-ग्राइंडर में पीसकर उसका पाउडर बनाइए। कितना? कम से कम 250 ग्राम धनिया। फिर ताल मिश्री है। राशन की दुकान पर कहिए कि ताल मिश्री चाहिए, मिल जाएगी; उस तरह की मिश्री लाइए। कितनी लानी है? यदि आपने 250 ग्राम धनिया लिया है, तो 100 ग्राम ताल मिश्री लीजिए। यदि आधा किलो धनिया लेंगे, तो आराम से पूरा महीना चलेगा — और तब 200 से 250 ग्राम ताल मिश्री लीजिए। इसे भी ग्राइंडर में साथ पीसना है। दोनों चीज़ें अच्छी तरह पीसकर एक कटोरी में रखिए। कटोरी पीतल की हो तो सबसे उत्तम है। वे कहते हैं, ध्यान रखिए कि इसमें ताँबे की कटोरी या ताँबे का कोई बर्तन इस्तेमाल नहीं करना है।
धनिया और मिश्री के मिश्रण को कैसे अभिमंत्रित करके लिया जाता है?
सरस्वती का द्वादश नाम स्तोत्र, बारह या 108 पाठ, और खाली पेट एक चम्मच
मिश्रण को अपने पूजन स्थान पर रखिए, वहाँ बैठिए, और भगवती सरस्वती का द्वादश नाम स्तोत्र — जो "प्रथमं भारती नाम द्वितीयं च सरस्वती" से शुरू होता है — 108 बार, या कम से कम 12 बार पढ़िए। 12 पाठ करके बर्तन ढक दीजिए और पूजन स्थान में ही रहने दीजिए। हर दिन 12 पाठ करने हैं, मिश्रण को एक दूसरे छोटे बर्तन में रखकर। जब पूजन आदि पूरा हो जाए, तो चूर्ण सीधे थोड़ा, एक चम्मच खा सकते हैं — या पानी में घोलकर पी सकते हैं; यह खाली पेट करना है।
वे कहते हैं, इस मिश्रण को अपने पूजन स्थान पर रखिए, और वहाँ बैठकर भगवती सरस्वती का द्वादश नाम स्तोत्र पढ़िए। स्तोत्र इस तरह चलता है: प्रथमं भारती नाम द्वितीयं च सरस्वती। वे कहते हैं कि शायद उन्होंने इसे इस चैनल पर भी सरस्वती पूजा के समय दिया है, और सुनने वालों से एक बार खोजने को कहते हैं। उस स्तोत्र के आपको 108 पाठ करने हैं, या कम से कम 12 पाठ। 12 पाठ करके बर्तन ढक दीजिए और उसे पूजन स्थान में ही रहने दीजिए। हर दिन 12 पाठ करने हैं, मिश्रण को एक दूसरे, छोटे बर्तन में रखकर; 12 पाठ कीजिए, और जब आपका पूजन और सब कुछ पूरा हो जाए, तब — क्योंकि चूर्ण बना हुआ है — आप उसे सीधे भी खा सकते हैं, थोड़ा, एक चम्मच लेकर। या चाहें तो पानी में घोलकर पी सकते हैं। यह खाली पेट करना है।
धनिया प्रयोग क्या परिणाम देता है, और कठिनाई हो तो क्या करें?
एकाग्रता और स्मरण शक्ति, और नौ बार पढ़ा गया सरस्वती कवच
वक्ता कहते हैं कि आपका पूरा दिन भी अच्छा जाएगा, आपकी एकाग्रता बढ़ेगी, और आपकी स्मरण शक्ति सबसे तेज़ हो जाएगी। एक हफ़्ते या पंद्रह दिन में आपको अंतर दिखने लगेगा। कोई खास कठिनाई न हो तो लाभ जल्दी आएगा। और यदि आपको कोई कठिनाई या परेशानी लगे, तो यही चूर्ण सामने रखकर भगवती सरस्वती का कवच कम से कम नौ बार पढ़िए, और तभी उसे खाइए — बहुत लाभ मिलेगा।
वे कहते हैं कि आपका पूरा दिन भी ठीक जाएगा, और आपकी एकाग्रता भी बढ़ेगी; स्मरण शक्ति सबसे तेज़ हो जाएगी। एक हफ़्ते या पंद्रह दिन के भीतर आपको अंतर दिखने लगेगा। यह चीज़ करके देखिए। यदि कोई खास कठिनाई न हो, तो आपको जल्दी लाभ मिलेगा। और यदि आपको कोई कठिनाई या परेशानी लगे, तो यही चूर्ण सामने रखकर भगवती सरस्वती का कवच कम से कम नौ बार पढ़िए, और फिर उसे खाइए। वे कहते हैं, आपको बहुत लाभ मिलेगा।
बिना गुरु वाले दक्षिण काली और कृष्ण भक्त को क्या करना चाहिए?
गुरु स्वरूप में रामकृष्ण परमहंस और माँ शारदा की पूजा
यदि आप कोलकाता की ओर से हैं, या विशेष रूप से भगवती दक्षिण काली की साधना करना चाहते हैं, तो गुरु स्वरूप में सबसे पहले परम गुरु श्री स्वामी रामकृष्ण परमहंस महाराज और उनकी शक्ति भगवती शारदा, माँ शारदा की पूजा कीजिए — दोनों को गुरु स्वरूप मानकर पूजिए। उसके बाद भगवती की सेवा-पूजा कीजिए और उनसे प्रार्थना कीजिए; तब योग्य गुरु भी मिलेंगे, और आपकी अपनी योग्यता इतनी बढ़ेगी कि आपको सही गुरु मिलेंगे।
एक श्रोता लिखते हैं कि वे साधना करना चाहते हैं पर उनके कोई गुरु नहीं हैं, और वे माँ दक्षिण काली और श्री कृष्ण को अधिक मानते हैं। वक्ता पूछते हैं, क्या आप कोलकाता की ओर से हैं? यदि आप उस ओर से हैं, या यदि आप विशेष रूप से भगवती दक्षिण काली की साधना करना चाहते हैं, तो गुरु स्वरूप में सबसे पहले परम गुरु श्री स्वामी रामकृष्ण परमहंस महाराज और उनकी शक्ति भगवती शारदा — माँ शारदा — की पूजा कीजिए। दोनों की गुरु स्वरूप में पूजा कीजिए। उसके बाद भगवती की सेवा-पूजा कीजिए और उनसे प्रार्थना कीजिए। तब योग्य गुरु भी मिलेंगे; आपकी अपनी योग्यता इतनी बढ़ेगी कि आपको सही गुरु मिलेंगे।
क्या भैरव सहस्रनाम के लिए दीक्षा चाहिए, और न्यास क्यों हटाया गया?
नियम न माने जाने के कारण शतनामावली से न्यास हटाया गया
वक्ता कहते हैं कि भैरव सहस्रनाम के लिए दीक्षा की ज़रूरत नहीं, पर यदि उसकी फलश्रुति में कोई विशेष विधि-विधान है, तो लेनी चाहिए। कठिनाई न्यास आदि को लेकर आती है। अगले दिन वे जो भैरव स्तोत्र शतनामावली विधान देंगे, उसमें पूरी न्यास विधि है — पर लोग नियम नहीं मानते: मदिरा और मांस खाएँगे-पिएँगे, टेढ़े काम करेंगे, गाँजा पिएँगे, स्त्रियों और लड़कियों को छुएँगे, और साथ में भैरव जी की पूजा भी करेंगे और उनके स्तोत्र का पूरा अनुष्ठान भी करेंगे। उसका क्या असर होगा? इसलिए उन्होंने उसमें से न्यास विधि हटा दी है और वीडियो में कहा है कि न्यास नहीं करना चाहिए। जो सोच-समझकर पूरे विधि-विधान से करना चाहते हैं, वे उनसे संपर्क करें, वे बताएँगे।
वे कहते हैं कि भैरव सहस्रनाम के लिए दीक्षा की कोई ज़रूरत नहीं — पर यदि उसकी फलश्रुति में कोई विशेष विधि-विधान है, तो लेनी चाहिए। कठिनाई न्यास आदि को लेकर आती है। जो सहस्रनाम का विशेष अनुष्ठान करते हैं, उनमें न्यास की प्रक्रिया होती है — जैसे अगले दिन वे जो भैरव स्तोत्र शतनामावली विधान देंगे, उसमें पूरी न्यास विधि है। पर जो नियम नहीं मानते, वे कहते हैं — कौन से नियम: वे मदिरा और मांस खाएँगे-पिएँगे, टेढ़े काम करेंगे, गाँजा पिएँगे, स्त्रियों और लड़कियों को छुएँगे, और इन सबके साथ भैरव जी की पूजा भी करेंगे और भैरव जी के स्तोत्र का पूरा अनुष्ठान भी करते जाएँगे। उसका क्या असर होगा? इसलिए उन्होंने उसमें से न्यास विधि हटा दी है, यह कहते हुए: न्यास मत कीजिए। उन्होंने वीडियो में भी यह कहा है — पूरा सुनिए, उन्होंने वहाँ समझाया है कि न्यास नहीं करना चाहिए, और उन्होंने न्यास विधि नहीं दी है। जो पूरे विधि-विधान से और सोच-समझकर करना चाहते हैं, वे उनसे संपर्क करें, और वे बताएँगे कि और क्या विधि-विधान है। सामान्य विधि उन्होंने सबको दी है, और सब उसे कर सकते हैं।
न्यास का अर्थ क्या है, और दूषित चरित्र वाले के लिए यह खतरनाक क्यों है?
दूषित हो रहे शरीर में देवता की शक्तियों को स्थापित करना
वक्ता समझाते हैं कि न्यास का अर्थ है भैरव की उन शक्तियों को अपने शरीर में बसाना। और जब देव शक्तियाँ आपके शरीर में बस गई हों, और आपके मन में विकार उठ रहा हो, और उस विकार से आपका खाना, रहना और चरित्र दूषित हो रहा हो, और आप उस भाव में किसी को छुएँ — तो आपकी कठिनाई बढ़ेगी और आपको सफलता नहीं मिलेगी। फिर आप रोएँगे कि इतना किया।
वे कहते हैं कि न्यास का अर्थ है भैरव की उन शक्तियों को अपने शरीर के भीतर बसाना। और जब देव शक्तियाँ आपके शरीर में अपना निवास बना चुकी हों, और उस समय आपके मन में विकार उठ रहा हो — और उस विकार के वश में आपका खाना-पीना, आपके रहने का ढंग, आपका चरित्र दूषित हो रहा हो, और आप उस भाव में किसी को छुएँ — तो आपकी कठिनाई बढ़ेगी। तब आपको सफलता नहीं मिलेगी। तब आप रोएँगे कि आपने इतना किया था। वे बताते हैं कि पिछले दिन टेलीग्राम ग्रुप में एक बहन ने संदेश भेजा था कि एक आदमी उन्हें निजी संदेश भेज रहा था कि आओ, दोस्ती करें। वे कहते हैं, इसीलिए कठिनाई आती है: इधर आप साधना कर रहे हैं और उधर परेशान करने का काम कर रहे हैं। क्या यह उनसे छिप सकता है? वे कहते हैं, आप मुझे धोखा दे सकते हैं, पर जिनकी साधना और आराधना आप कर रहे हैं, वे फिर दंड देंगे। और जब वे डंडा चलाएँगे, तो आप कहेंगे कि आपने साधना की और फिर भी आपके साथ गलत हुआ।
क्या बटुक दशनाम स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है?
बटुक भैरव का दस नामों वाला स्तोत्र
वक्ता कहते हैं, हाँ, आप बटुक दशनाम स्तोत्र बिल्कुल कर सकते हैं, और उसका आरंभ पढ़ते हैं: कपाली कुण्डली भीमो भैरवो भीमविक्रमः… वे दोहराते हैं कि यह किया जा सकता है।
इस बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं: आप बटुक दशनाम स्तोत्र बिल्कुल कर सकते हैं। वे उसका आरंभ पढ़ते हैं: कपाली कुण्डली भीमो भैरवो भीमविक्रमः… वे कहते हैं कि यह किया जा सकता है, और कुछ नाम दोहराते हैं।
क्या सब कुल देवताओं का भोग एक ही बर्तन में चढ़ाया जा सकता है?
दो बर्तनों का तरीका और तुलसी का पत्ता जो इसे तय करता है
वक्ता कहते हैं कि यह बहुत अच्छा प्रश्न है और सबको इसे सुनकर मानना चाहिए। घर में एक से अधिक देवी-देवता बिल्कुल रखे जा सकते हैं; कोई कठिनाई नहीं, जैसी आपकी इच्छा। भोग दो जगह चढ़ाइए। यदि दो जगह चढ़ाते हैं, तो एक बर्तन का भोग पूरे शिव परिवार और शिव से जुड़ी सब शक्तियों के लिए है, जिन्हें तुलसी का पत्ता अर्पित नहीं होता — क्योंकि यदि आप तुलसी का पत्ता डाल देंगे, तो वह भोग गणपति का अंश भी स्वीकार नहीं करेगा, भगवती दुर्गा स्वीकार नहीं कर सकतीं, भगवान शिव स्वीकार नहीं कर सकते, और बहुत सी शक्तियाँ स्वीकार नहीं करेंगी।
श्रोता पूछते हैं कि क्या अपने कुल के सब पूज्य देवताओं का भोग एक ही बर्तन में चढ़ाया जा सकता है, या हर एक के लिए अलग बर्तन में चढ़ाना होगा। वे कहते हैं, बहुत अच्छा प्रश्न है; सबको इसे सुनना चाहिए और इसे मानना चाहिए। वे कहते हैं कि घर में एक से अधिक देवी-देवता बिल्कुल रखने चाहिए; इसमें कोई कठिनाई नहीं, जैसी आपकी इच्छा। पर भोग दो जगह चढ़ाइए। वे कहते हैं कि वे यह बार-बार कहते हैं, और लोगों से समझने को कहते हैं कि भोग दो जगह क्यों चढ़ाना है, और यह भी सुनने को कि एक जगह चढ़ाएँ तो विधि क्या है। यदि आप दो जगह चढ़ाते हैं, तो एक बर्तन का भोग पूरे शिव परिवार और शिव से जुड़ी सब शक्तियों के लिए है, जिन्हें तुलसी का पत्ता अर्पित नहीं होता। यदि आप तुलसी का पत्ता डाल देंगे, तो वह भोग गणपति का अंश भी स्वीकार नहीं करेगा। भगवती दुर्गा वह भोग स्वीकार नहीं कर सकतीं। भगवान शिव वह भोग स्वीकार नहीं कर सकते। बहुत सारी शक्तियाँ हैं जो उसे स्वीकार नहीं करेंगी। इसलिए दो बर्तन।
दोनों बर्तनों में एक जैसा भोग जाता है; उनमें से एक में तुलसी का पत्ता उसे वैष्णव भोग बना देता है।
तुलसी के साथ वैष्णव भोग, और बाकी सबके लिए दूसरा बर्तन
एक बर्तन में वैष्णव भोग। दोनों बर्तनों में एक ही चीज़ें डालिए — जो किशमिश और काजू आप आमतौर पर चढ़ाते हैं, या पंचमेवा, या जो भी मीठा भोग चढ़ाते हैं। उनमें से एक में तुलसी का पत्ता डालिए: नारायण से जुड़ी सब वैष्णव शक्तियाँ, हनुमान जी, कृष्ण जी, नारायण, राम दरबार, सब उसी से भोग स्वीकार करेंगे। दूसरा बर्तन बाकी सब शक्तियों के लिए है — कुल देवता, कुलदेवी, उनका जो भी रूप हो। तब आपको दस जगह बर्तन नहीं लगाने पड़ेंगे।
एक बर्तन में वैष्णव भोग जाता है — यानी दोनों बर्तनों में आप एक ही चीज़ें डालेंगे: जो किशमिश और काजू आप चढ़ाते हैं, या पंचमेवा, या जो भी मीठा भोग आप चढ़ाते हैं। उनमें से एक में तुलसी का पत्ता डालिए। जितनी भी वैष्णव शक्तियाँ हैं, जो नारायण से जुड़ी हैं — हनुमान जी, कृष्ण जी, नारायण, पूरा राम दरबार — वे सब उसी से भोग स्वीकार करें। और दूसरा बर्तन बाकी सब शक्तियों के लिए है। आपके कुल देवता और कुलदेवी का जो भी स्वरूप हो, उसमें उसके अनुसार चढ़ाइए। वे कहते हैं, हो जाएगा; आपको दस जगह बर्तन नहीं लगाने पड़ेंगे।
यदि भोग एक ही बर्तन में चढ़ाया जाए तो विधि क्या है?
अन्नपूर्णा का स्मरण, पाँच बार जल घुमाना, और तुलसी का पत्ता अंत में
यदि आप एक जगह चढ़ाते हैं, तो तुलसी का पत्ता पहले मत डालिए। भोग रखिए और पूजन शुरू कीजिए। जब पूजन हो जाए, आरती से पहले, या आरती के बाद भी: भोग के बर्तन के पास आप जल तो ज़रूर रखेंगे — आचमनी से जल निकालकर भोग के चारों ओर पाँच बार घुमाइए। वैदिक मंत्र छोड़िए; आप अन्नपूर्णे सदापूर्णे मंत्र या "श्री अन्नपूर्णायै नमः" बोल सकते हैं, भगवती अन्नपूर्णा को याद करते हुए: हे भगवती अन्नपूर्णा, सब देवताओं और सब देवियों को भोजन परोसिए, सबको अन्न का अपना भाग मिले, नैवेद्य सब तक पहुँचे। वहाँ पाँच बार जल डालिए। फिर एक तुलसी का पत्ता डालिए और हाथ जोड़कर प्रार्थना कीजिए कि सब देवता भोग स्वीकार करें — नारायण भी स्वीकार करेंगे, और बाकी शक्तियाँ भी।
वे कहते हैं, यदि आप एक ही जगह चढ़ाते हैं, तो एक जगह चढ़ाते समय तुलसी का पत्ता पहले नहीं डालना है। भोग रखिए। पूजन शुरू कीजिए। जब पूजन पूरा हो जाए, तो अंत में, आरती करने से पहले — या आरती करने के बाद भी — भोग की प्रक्रिया के लिए आप क्या करेंगे? भोग के बर्तन के पास आप जल भी ज़रूर रखेंगे। उसमें से आचमनी से जल निकालना है, और उसे भोग के चारों ओर पाँच बार घुमाना है — भोग के बर्तन के ऊपर। वे कहते हैं, वहाँ मंत्र छोड़िए — वैदिक मंत्र आदि बोलने की बात। आप अन्नपूर्णे सदापूर्णे मंत्र बोल सकते हैं, या श्री अन्नपूर्णायै नमः, भगवती अन्नपूर्णा को याद करते हुए: हे भगवती अन्नपूर्णा, सब देवताओं और सब देवियों को भोजन परोसिए; सबको अन्न का अपना भाग मिले; नैवेद्य सबको अर्पित हो। तो भगवती अन्नपूर्णा को याद करते हुए वहाँ पाँच बार जल डालिए। सब देवताओं को भोग और जल मिल जाएगा। उसके बाद तुलसी का एक पत्ता डालिए और फिर हाथ जोड़कर प्रार्थना कीजिए कि सब देवता भोग स्वीकार करें। तब भोग नारायण को भी अर्पित हो जाएगा; वे भी उसे स्वीकार करेंगे, और बाकी शक्तियाँ भी।
भोग की व्यवस्था सरल क्यों रखनी चाहिए?
हर कोई हर देवता के लिए अलग बर्तन नहीं कर सकता
उन्हें आशा है कि यह तरीका लोगों के काम आएगा, क्योंकि हर कोई इतनी लंबी विधि नहीं कर सकता कि कुल के देवी-देवता के लिए एक बर्तन में, कुल भैरव के लिए एक में, नारायण के लिए एक में, शिव जी के लिए एक में चढ़ाए। कोई कहेगा कि उसकी पूरी तनख्वाह भगवान को भोग चढ़ाने में जा रही है, और ऐसे तो वह स्वयं भोग बन जाएगा। इसलिए इसे साधारण रखिए।
उन्हें आशा है कि यह विधि लोगों के काम आएगी, क्योंकि हर कोई इतनी लंबी विधि नहीं कर सकता कि अपने कुल के देवी-देवता के लिए एक बर्तन में, कुल भैरव के लिए एक में, नारायण के लिए एक में, शिव जी के लिए एक में चढ़ाए। कोई कहेगा, भाई, पूरी तनख्वाह भगवान को भोग चढ़ाने में जा रही है — ऐसे तो हम स्वयं भोग बन जाएँगे। वे कहते हैं, इसलिए इसे साधारण रखिए।
शव साधना क्या है और यह कहाँ आती है?
वीर भाव में और अघोर परंपरा में एक ऊँची तांत्रिक साधना
वक्ता कहते हैं कि शव साधना ऊँचे स्तर की तांत्रिक साधना है। इसे ऐसे समझिए: जैसे जब आप भगवती काली की साधना कर रहे हों, वीर भाव की साधना — शव साधना उसके भीतर आती है। शैव साधना में भी, यानी भगवान शिव की परंपरा में, जब अघोर में, नार संप्रदाय में साधना होती है, तो तंत्र साधना में भी शव साधना आती है। विशेषकर मध्यकाल में इसका बहुत बोलबाला था, हालाँकि यह शुरू से रही है।
यह पूछे जाने पर कि शव साधना क्या है और क्यों की जाती है, वे उत्तर देते हैं कि शव साधना ऊँचे स्तर की तांत्रिक साधना है, और जब कोई तंत्र में आगे बढ़ता है तो यह सामने आती है। वे कहते हैं, इसे इस तरह समझिए: जैसे जब भगवती काली की साधना हो रही हो — जो साधना वीर भाव की है — शव साधना उसके भीतर आती है। शैव साधना में भी, यानी भगवान शिव की परंपरा में, जब अघोर में, नार संप्रदाय में साधना की जाती है, तो तंत्र साधना में भी शव साधना आती है। वे कहते हैं कि शव साधना का बोलबाला विशेषकर मध्यकाल में बहुत था — हालाँकि यह शुरू से रही है, उस समय ऐसा था — क्योंकि शव साधना एक तरह की नहीं है।
शव साधना से क्या सिद्ध होता है?
वीर, भैरव और बैताल साधना, खेचरी और कौतुक विद्या
शव साधना से वीर साधना भी होती है। शव साधना से भैरव साधना भी होती है। शव साधना से बैताल साधना भी होती है। शव साधना से खेचरी सिद्धि, आकाश गमन की सिद्धि, भी सिद्ध होती है। और फिर इंद्रजालिक सिद्धियाँ भी होती हैं — इन्हें कौतुक विद्या कहते हैं — और वह भी इससे होती है। वे कहते हैं कि बहुत सी चीज़ें हैं, इसलिए एक तरह से साधक अपने भीतर की योग्यता और क्षमता बढ़ाने के लिए इस मार्ग में जाता है।
वे कहते हैं कि शव साधना से वीर साधना भी की जाती है। शव साधना से भैरव साधना भी की जाती है। शव साधना से बैताल साधना भी की जाती है। शव साधना से खेचरी सिद्धि — आकाश गमन की सिद्धि — भी सिद्ध होती है। और फिर इंद्रजालिक सिद्धियाँ भी होती हैं, जिन्हें कौतुक विद्या कहते हैं, और वे भी इससे की जाती हैं। वे कहते हैं कि बहुत सी चीज़ें हैं, इसलिए एक तरह से जो साधक इस मार्ग में जाता है, वह अपने भीतर की योग्यता बढ़ाने, अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए जाता है।
क्या शव साधना मुक्ति के लिए की जाती है?
असली उद्देश्य कौतुक विद्या और सिद्धि, और लिंग पुराण
वक्ता कहते हैं कि शव साधना में मुक्ति के लिए जो किया जाता है, वह पूरी तरह शुद्ध साधना बन जाती है, और वह बिल्कुल अलग चीज़ है — लोग उसके लिए साधना करते ही नहीं। लोग मुक्ति के लिए शव साधना नहीं करते; शुद्ध साधना के लिए कहाँ करते हैं? वे कौतुक विद्या पाने के लिए करते हैं; सिद्धि पाने के लिए करते हैं। मोक्ष के लिए, वे कहते हैं, लिंग पुराण पढ़िए — तंत्र ग्रंथ छोड़िए, या तंत्र के प्रवचन और व्याख्यान, या जो कुछ वे स्वयं कह रहे हैं वह भी छोड़िए, और लिंग पुराण पढ़िए, जहाँ आपको अच्छा वर्णन मिलेगा कि शव साधना का विधान क्या है, कैसे करनी चाहिए, और उससे कौन सी मुक्ति मिलती है।
वे कहते हैं कि शव साधना में मुक्ति आदि के लिए जो है, वह फिर पूरी तरह शुद्ध साधना बन जाती है। वह बिल्कुल अलग चीज़ हो गई है। लोग उस उद्देश्य से वह साधना करते ही नहीं। लोग मुक्ति के लिए शव साधना नहीं करते। वे उसे शुद्ध साधना के रूप में कहाँ करते हैं? वे कौतुक विद्या पाने के लिए करते हैं। सिद्धि पाने के लिए करते हैं। वे कहते हैं, शव साधना के मोक्ष वाले पक्ष के लिए लिंग पुराण पढ़िए। तंत्र ग्रंथ एक तरफ़ छोड़िए; तंत्र के प्रवचन और व्याख्यान छोड़िए, या जो कुछ वे स्वयं कह रहे हैं वह सब भूल जाइए। लिंग पुराण पढ़िए। लिंग पुराण में आपको अच्छा वर्णन मिलेगा कि शव साधना का विधान क्या है, कैसे करनी चाहिए, और उससे कौन सी मुक्ति मिलती है। वे कहते हैं, उसमें भी इस बारे में थोड़ा दिया गया होगा।
पहले के समय में बैताल और वीर साधना क्यों की जाती थी?
आक्रमणकारियों से रक्षा, रूप बदलना, और गुप्तचर
पहले के समय में लोग बैताल साधना और वीर साधना इसलिए करते थे कि जब दूसरे शत्रु आक्रमण करें, तो रक्षा हो। अपना रूप बदलने की विद्या, और मायावी सिद्धियाँ, इन सब चीज़ों से काम करती थीं, और ऐसे ही साधनों से गुप्तचर विभाग में काम करने वाले काम करते थे। वे कहते हैं कि अब यह सुनने में बड़ा मनोरंजक लगता है, पर यह सब करता कौन है? न सामर्थ्य है न सिखाने वाला कोई बचा है; और जो कर सकते हैं वे समाज से कटे हुए हैं। सौभाग्य से उनके दर्शन मिल जाते हैं, पर वे प्रदर्शन नहीं करते — बहुत प्रसन्न हों तो ज़रूर बता देंगे कि ऐसी चीज़ होती है।
वे कहते हैं, बैताल साधना, वीर साधना — पहले के समय में लोग ये सब चीज़ें इसलिए करते थे कि जब दूसरे शत्रु आक्रमण करें तो रक्षा हो सके। अपना स्वरूप बदलने की विद्या; जो गुप्तचर विभाग में काम करते थे; जो मायावी सिद्धियाँ हैं — इन्हीं सब चीज़ों से यह काम चलता था। वे कहते हैं, आज के समय में यह सुनने में बड़ा मनोरंजक है, पर यह सब करता कौन है? न उतना सामर्थ्य है, न इसके बारे में बताने वाले लोग हैं। और जो ये सब चीज़ें कर सकते हैं, वे समाज से कटे हुए हैं। ऐसे सौभाग्य से उनके दर्शन मिलते हैं, पर वे दिखाते नहीं; कोई प्रदर्शन नहीं होता। यदि वे बहुत प्रसन्न हों, तो ज़रूर बता देंगे कि यह चीज़ ऐसे होती है।
एक स्थिर गृहस्थ साधक किसी सिद्ध की नज़र में कैसे आता है?
सिद्ध पीठ पर पहचाना जाने वाला तपोबल और शुद्ध आभामंडल
वे एक उदाहरण देते हैं। मान लीजिए कोई श्रोता भगवती की बहुत साधना करता है, काली जी की बहुत अच्छी पूजा करता है, रोज़ 108 माला जप करता है, उनके स्तोत्र का पाठ और आरती करता है, हर अमावस्या को भगवती काली का हवन करता है, हर शनिवार उनके मंदिर जाता है, बहुत नियम और संयम से, पवित्रता से रहता है, जीवों की सेवा करता है, माता-पिता की आज्ञा मानता है, जितना अच्छा हो सके जीता है — और यह स्थिति एक साल, दो साल, तीन साल चलती है। उसमें जो तपोबल बनेगा और जो आभामंडल बनेगा, वह बहुत शुद्ध हो जाएगा। और जब वह किसी सिद्धों के पास, किसी तंत्र क्षेत्र में, किसी सिद्ध पीठ या ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में जाएगा, तो जिन सिद्धों के पास वे शक्तियाँ हैं, वे उसके तपोबल के तेज से आकर्षित होकर अनुभव करेंगे कि यह लड़का योग्य है और इसे कुछ देना चाहिए ताकि यह समाज में अच्छा काम करे।
वे कहते हैं, मान लीजिए विवेक कुमार साहू जी भगवती की बहुत साधना करते हैं। मान लीजिए वे काली जी की पूजा बहुत अच्छी तरह करते हैं। रोज़ 108 माला जप करते हैं; उनके स्तोत्र का पाठ और उनकी आरती करते हैं। हर अमावस्या को वे भगवती काली का हवन करते हैं; हर शनिवार उनके मंदिर जाते हैं। वे बहुत नियम से रहते हैं, संयम से रहते हैं, पवित्रता से जीवों की सेवा करते हैं, माता-पिता की आज्ञा मानते हैं, और जितना अच्छा हो सके जीते हैं। उनकी यह स्थिति एक साल, दो साल, तीन साल चलती है। उनमें जो तपोबल बनेगा, जो आभामंडल बनेगा, वह बहुत शुद्ध हो जाएगा। और जब वे किसी सिद्धों के पास जाएँगे, किसी तंत्र क्षेत्र में, किसी सिद्ध पीठ में, किसी ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में जाएँगे, तो — उनके तपोबल के तेज से आकर्षित होकर, क्योंकि आप और हम आभामंडल नहीं देख सकते, सिद्ध न होने के कारण, पर जो सिद्ध हैं और जिनके पास वे शक्तियाँ हैं वे देख सकते हैं — वे अनुभव करेंगे कि यह लड़का योग्य लड़का है। इसे कुछ देना चाहिए, ताकि यह समाज में अच्छा काम करे।
जब कोई सिद्ध किसी योग्य साधक पर ध्यान देता है, तो ज्ञान उस तक वास्तव में कैसे पहुँचता है?
अनियोजित मुलाकातों और सिद्ध द्वारा मन में उठाए प्रश्नों से पहुँचने वाला ज्ञान
वक्ता कहते हैं कि वे अपने आप आपके साथ कोई ऐसी क्रिया करेंगे, या वहाँ कोई ऐसी घटना होगी कि आप स्वयं ऐसे व्यक्ति तक पहुँच जाएँगे, या वह आप तक पहुँच जाएगा; और वे आपके मन में ये प्रश्न उठाएँगे, ताकि आप पूछें और वे फिर बताएँ। ये सब चीज़ें उनकी इच्छा के अनुसार होंगी। इस तरह आपको जानकारी मिलेगी। और यदि आप और भी योग्य हैं, तो कहानी पर कहानी है — आपको चीज़ें सीधे देखने का अवसर भी मिलेगा।
वे कहते हैं कि वे अपने आप आपके साथ कोई ऐसी क्रिया करेंगे, या मान लीजिए वहाँ कोई ऐसी घटना होगी — कि आप स्वयं ऐसे व्यक्ति तक पहुँच जाएँगे, या वह आप तक पहुँच जाएगा। और वे आपके मन में ये प्रश्न उठाएँगे, ताकि आप पूछें और वे फिर बताएँ। ये सब चीज़ें उनकी अपनी इच्छा के अनुसार होंगी। इस तरह आपको जानकारी मिलेगी। और यदि आप और भी योग्य हैं, तो कहानी पर कहानी है — आपको चीज़ें सीधे देखने का अवसर भी मिलेगा।
गिरनार क्षेत्र के साधक अनंत जी रावल को सिद्धों के दर्शन हुए।
गिरनार क्षेत्र के साधक अनंत जी रावल, जिन्हें सिद्धों के दर्शन हुए हैं
वक्ता कहते हैं कि अनंत जी रावल की ऐसी बहुत सी बातें आप सुनेंगे — उन्हें इन सब चीज़ों के दर्शन हुए। वे गिरनार क्षेत्र के साधक हैं, और आपको ऐसी बहुत सी बातें पता चलेंगी।
वे कहते हैं कि अनंत जी रावल की ऐसी बहुत सी बातें आप सुनेंगे: उन्हें इन सबके दर्शन हुए। वे गिरनार क्षेत्र के साधक हैं, और फिर आपको ऐसी बहुत सी बातें पता चलेंगी।
जिस घर में डायन तंत्र, खिलाया हुआ और बंधन हो, वहाँ क्या करना चाहिए?
एक मामला जिसे स्वयं नहीं करना चाहिए
एक श्रोता पूछते हैं कि डायन तंत्र से कैसे छुटकारा पाएँ, परिवार को जो खिलाया गया है उसे कैसे निकालें, और घर के बंधन के बारे में — उनकी माँ चार साल से उल्टी कर रही हैं और वे स्वयं बहुत कठिनाई में हैं और उनका दिमाग काम नहीं करता। वक्ता कहते हैं कि आपकी हालत सुनकर नहीं लगता कि आप स्वयं कुछ कर पाएँगे। इसलिए वे यह कहेंगे: किसी अभिभावक की सहायता से किसी सही व्यक्ति को घर ले जाइए और ये सब चीज़ें ठीक करवाइए। यदि आप स्वयं करेंगे, और स्थिति ज़रा भी असंतुलित हुई, तो आप कठिनाई में पड़ जाएँगे।
एक श्रोता पूछते हैं कि डायन तंत्र से छुटकारा कैसे मिले, परिवार को जो खिलाया गया है उसे कैसे निकालें, और घर के एक बंधन के बारे में: उनकी माँ चार साल से उल्टी कर रही हैं, वे स्वयं बहुत परेशान हैं, और उनका दिमाग काम नहीं करता। वक्ता उत्तर देते हैं कि आपकी हालत सुनकर नहीं लगता कि आप स्वयं कुछ कर पाएँगे। इसलिए वे यह कहेंगे: किसी अभिभावक की सहायता से किसी सही व्यक्ति को अपने घर ले जाइए और ये सब चीज़ें ठीक करवाइए। यदि आप स्वयं करेंगे, और स्थिति थोड़ी भी असंतुलित हुई, तो आप कठिनाई में पड़ जाएँगे।
क्या पुरुष कामाख्या कवच कर सकते हैं?
पुरुषों के लिए भी खुला कामाख्या कवच
वक्ता उत्तर देते हैं कि कामाख्या कवच बिल्कुल किया जा सकता है — पुरुष भी, कोई कठिनाई नहीं।
इस बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि कामाख्या कवच बिल्कुल किया जा सकता है। वे कहते हैं, पुरुष इसे कर सकते हैं; कोई कठिनाई नहीं।
डायन और चुड़ैल में क्या अंतर है?
चुड़ैल मृत्यु के बाद बनती है, डायन एक जीवित व्यक्ति और एक विद्या
वक्ता कहते हैं कि चुड़ैल वह है जो मृत्यु के बाद बनती है; डायन कोई व्यक्ति है। डायन को एक तरह से विद्या समझिए — जैसे आप गणित पढ़ते हैं, विज्ञान पढ़ते हैं, वैसे ही डायन भी एक तरह की विद्या है, अपने आप में पूरा विषय, जो निकृष्ट तंत्र, क्षुद्र तंत्र आदि के भीतर आती है। और यदि ऐसा कहा जाए, तो यह एक ऊँची विद्या की प्रतिकृति है — प्रतिकृति यानी उसकी फ़ोटोकॉपी, उसकी ज़ेरॉक्स: ऊँची विद्या किसी की रक्षा के लिए आई है, और वही चीज़ क्षुद्र विद्या के रास्ते किसी को कष्ट देने के लिए है।
यह पूछे जाने पर कि डायन और चुड़ैल में क्या अंतर है, वे उत्तर देते हैं: चुड़ैल वह है जो मृत्यु के बाद बनती है; डायन कोई व्यक्ति है। डायन को एक तरह से विद्या समझिए — जैसे आप गणित पढ़ते हैं, जैसे विज्ञान पढ़ते हैं। तो डायन भी एक तरह की विद्या है, अपने आप में एक पूरी चीज़, जो निकृष्ट तंत्र, क्षुद्र तंत्र आदि के भीतर आती है। और यदि ऐसा कहा जा सके, वे कहते हैं, तो यह एक ऊँची विद्या की प्रतिकृति है। प्रतिकृति यानी उसकी फ़ोटोकॉपी, उसकी ज़ेरॉक्स। ऊँची विद्या किसी की रक्षा के लिए आई है; वही चीज़, क्षुद्र विद्या के माध्यम से, किसी को कष्ट देने के लिए है। यही वह है।
उपाय के साथ विद्यार्थी का अपना परिश्रम भी होना चाहिए।
उपाय के साथ अपना परिश्रम
राज शर्मा, जो लिखते हैं कि उनके हमेशा 80 से 90 प्रतिशत आते थे पर तीन साल से दोहराते समय दिमाग पूरी तरह खाली हो जाता है, उनसे वे कहते हैं कि उनके प्रश्न का उत्तर वे पहले ही दे चुके हैं — और पूछते हैं कि एक ही बात पर इतनी बार टिप्पणी क्यों की। और वे कहते हैं, सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने केवल वह बताया है जो किया जा सकता था; आपका अपना परिश्रम भी होना चाहिए। बाकी, वे जोड़ते हैं, भीतर की बात प्रश्नकर्ता स्वयं जानते होंगे।
राज शर्मा लिखते हैं कि उनके हमेशा 80 से 90 प्रतिशत आते थे, पर अब तीन साल से जब भी वे पढ़ते हैं सब समझ आता है, और दोहराने के समय दिमाग पूरी तरह खाली हो जाता है। वक्ता कहते हैं कि आपके प्रश्न का उत्तर वे पहले ही दे चुके हैं — पर आपने एक ही बात पर इतनी बार टिप्पणी क्यों की? और वे कहते हैं, सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने उन्हें वही बताया है जो किया जा सकता था। आपकी अपनी मेहनत भी होनी चाहिए। बाकी, भीतर की बात आप स्वयं जानते होंगे।
क्या स्त्रियों को गायत्री मंत्र का अधिकार है?
पवित्रता के मानदंड के रूप में गार्गी, मैत्रेयी, सीता और द्रौपदी
राम शर्मा आचार्य जी द्वारा वैदिक मंत्रों और गार्गी, मैत्रेयी, माता सीता आदि के उदाहरण देकर यह कहने पर कि स्त्रियों को गायत्री का अधिकार है, उनका क्या विचार है, यह पूछे जाने पर वक्ता एक बात में उत्तर देते हैं: वेद मंत्रों और गायत्री के अधिकार के लिए — यदि इन लोगों के भीतर वैसी पवित्रता है जैसी भगवती सीता में थी, तो गायत्री कीजिए। यदि द्रौपदी जैसी पवित्रता है, तो वेद मंत्र पढ़िए। यदि आपके भीतर मैत्रेयी और गार्गी जैसा सामर्थ्य है, तो गायत्री कीजिए। इतना ही उनका विचार है। जिस तरह भगवती सीता ने पतिव्रता धर्म निभाया, यदि मानव रूप में आपमें वह सामर्थ्य है, तो कीजिए; यदि आपके भीतर गार्गी और मैत्रेयी जैसा सामर्थ्य है और आप वह पवित्रता धारण कर सकते हैं, तो गायत्री कीजिए, वेद मंत्रों का पाठ कीजिए — किसने किसी को रोका है? उदाहरण देना आसान है; उस पर चलना नहीं।
एक श्रोता पूछते हैं कि उनका क्या विचार है, जबकि राम शर्मा आचार्य जी कुछ वैदिक मंत्रों का हवाला देकर कहते हैं कि स्त्रियों को भी गायत्री का अधिकार है। वे कहते हैं कि वैदिक मंत्रों का हवाला देकर वे गार्गी, मैत्रेयी, माता सीता आदि के उदाहरण देते हैं, और कहते हैं कि गायत्री का अधिकार है, इत्यादि। तब वे एक बात कहेंगे, वे उत्तर देते हैं: वेद मंत्रों और गायत्री के अधिकार के लिए — यदि इन लोगों के भीतर भगवती सीता जैसी पवित्रता है, तो गायत्री कीजिए। यदि द्रौपदी जैसी पवित्रता है, तो वेद मंत्र पढ़िए। यदि आपके भीतर मैत्रेयी और गार्गी जैसा सामर्थ्य है, तो गायत्री कीजिए। वे कहते हैं, इतना ही उनका विचार है। जिस तरह भगवती सीता ने पतिव्रता धर्म निभाया — यदि मानव रूप में आपमें वह सामर्थ्य है, तो कीजिए। यदि आपके भीतर गार्गी और मैत्रेयी जैसा सामर्थ्य है, यदि आप वह पवित्रता धारण कर सकते हैं, तो गायत्री कीजिए, वेद मंत्रों का पाठ कीजिए। किसने किसी को रोका है? वे कहते हैं, उदाहरण देना आसान है; उस पर चलना नहीं।
शिव मंदिर के पुजारी को अपने घर में चमगादड़ों के बारे में क्या करना चाहिए?
एक षोडश से अगले षोडश तक रुद्र गायत्री हवन
एक श्रोता लिखते हैं कि उनके घर में चमगादड़ रहते थे और उन्होंने तीन मार दिए, कि एक महीने पहले कुछ फिर आए, कि वे स्वयं शिव मंदिर में पूजा करने वाले पुजारी हैं, स्वयं गायत्री करते हैं, और पूछते हैं कि क्या वे किसी पंडित से हवन करवा सकते हैं। वक्ता कहते हैं, यह बहुत अच्छी बात है कि आप शिव मंदिर में पुजारी हैं — यह कीजिए: यदि आप शिव जी के मंदिर में पूजन करते हैं, तो घर में रुद्र गायत्री से हवन कीजिए। एक षोडश से शुरू करके अगले षोडश तक, अपने ही घर में रोज़ रुद्र गायत्री से हवन कीजिए। यह सबसे उत्तम होगा। स्वयं कीजिए; किसी और की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनके घर में चमगादड़ रहते थे और उन्होंने तीन मार दिए; कि एक महीने पहले कुछ दिनों के लिए कुछ फिर आए; कि वे स्वयं शिव मंदिर में पूजा करते हैं और पुजारी हैं; कि वे स्वयं गायत्री करते हैं, और पूछते हैं कि क्या वे किसी पंडित से हवन करवा सकते हैं। वक्ता कहते हैं, यह बहुत अच्छी बात है कि आप शिव मंदिर में पुजारी हैं। एक काम कीजिए। यदि आप शिव जी के मंदिर में पूजन करते हैं, तो घर में रुद्र गायत्री से हवन कीजिए। एक षोडश से शुरू करके अगले षोडश तक, अपने ही घर में रोज़ रुद्र गायत्री से हवन कीजिए। वे कहते हैं, यह सबसे उत्तम होगा। स्वयं कीजिए; किसी और की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
मृत्युंजय भैरव को कैसे सिद्ध किया जाता है?
दीक्षा और कृपा से सीधी सिद्धि
वक्ता कहते हैं कि आप लोगों को उन्हें सीधे सिद्ध करना है — दीक्षित होकर उनकी कृपा पाइए। अंत में वे कहते हैं कि अगले दिन से भगवान काल भैरव और बटुक भैरव से जुड़ा जो भी विशेष विधि-विधान है वह चैनल पर आता रहेगा, और सुनने वाले अपनी तैयारी करें।
यह पूछे जाने पर कि मृत्युंजय भैरव को कैसे सिद्ध करना है, वे कहते हैं कि आप लोगों को उन्हें सीधे सिद्ध करना है। वे कहते हैं, दीक्षित होकर उनकी कृपा पाइए। वे कहते हैं, आज के लिए इतना ही। अगले दिन से भगवान काल भैरव और बटुक भैरव से जुड़ा जो भी विशेष विधि-विधान है, वह चैनल पर आता रहेगा; अपनी तैयारी कीजिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।