गृहस्थ के लिए कार्तिक मास — स्नान, दीपदान, और साधक अपना मंत्र खर्च क्यों न करे
नित्य नियम और मंत्र की मर्यादा पर कार्तिक मास का प्रवचन।
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कम समय वाले लोगों के लिए कार्तिक मास विशेष रूप से उपयोगी क्यों है?
कम परिश्रम, अधिक लाभ — समय की कमी वाले गृहस्थ के लिए कार्तिक
वक्ता कहते हैं कि इस मास में बहुत कम परिश्रम करके बहुत कुछ पाया जा सकता है। साधक वर्ग का विषय अलग है — जो परिश्रम से डरे वह साधक कैसा — पर जो कहते हैं कि उनके पास समय कम है और वे चाहते हैं कि फल परिश्रम से अधिक मिले, उनके लिए कार्तिक मास सर्वश्रेष्ठ है।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि परम पवित्र कार्तिक मास शुरू हो गया है: कल सुबह जब सूर्य उगेगा, तब कार्तिक मास प्रारंभ हो चुका होगा। वे कहते हैं कि इस समय में जो लोग कम परिश्रम करके अधिक पाना चाहते हैं, वे ऐसा कर सकते हैं। साधक वर्ग की बात बिलकुल अलग है — जो परिश्रम से डरता है, वह साधक कैसा। पर जो कहते हैं कि उनके पास समय कम है, और चाहते हैं कि परिश्रम कम हो और फल एक माप से अधिक मिले, उनके लिए, विशेषकर समय की कमी वाले साधकों के लिए, कार्तिक मास सर्वश्रेष्ठ है। वे कहते हैं कि पहले वे बताएँगे कि कल से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा, यानी देव दीपावली, तक चलने वाले इस मास में कौन-सी मूल बातें करनी हैं।
नवरात्र के कलश पर नारियल किस ओर रखना चाहिए?
पूर्ण पात्र पर नारियल की जटा की दिशा
वक्ता बताते हैं कि एक शंकराचार्य ने, एक ऐसे ग्रंथ का प्रमाण देकर जिसमें कर्मकांड के सारे विषय दिए हैं, समझाया कि नारियल की जटा पीछे की ओर, ऊपर की ओर, उल्टा, या बिना पूर्ण पात्र के रखने से क्या हानि होती है — और सही विधि बताई कि नारियल सदा पूर्ण पात्र पर रखा जाए, उसकी जटा, उसका मुख, उसका सिर अपनी ओर हो।
जहाँ कुलदेवी उग्र रूप की हों, वहाँ शक्ति कलश पर खड़ा नारियल रखा जाता है।
शक्ति कलश — चंडिका के उग्र रूपों के लिए खड़ा नारियल
वक्ता कहते हैं कि तंत्रोक्त विषय में उन्होंने एक बात जोड़ी: यदि आपकी कुलदेवी की घर में विशेष पूजा होती है और वे उग्र रूप की हैं, और परंपरा पहले से ही है कि पूर्ण पात्र नहीं रखा जाएगा और नारियल खड़ा रहेगा, तो ऐसा नारियल चंडिका के उग्र रूपों के लिए रखा जाता है। तब उसे शक्ति कलश कहते हैं, बहुत-से विधि-नियम अलग हो जाते हैं, और यह सबके लिए एक जैसा नहीं हो सकता।
वक्ता कहते हैं कि सामान्य विषय चैनल पर दिए जा चुके हैं; शंकराचार्य प्रमाण से बोलते हैं, और जहाँ कोई बात पारंपरिक लोक-बात हो, उसे वे किदवंती कहेंगे और आगे कुछ नहीं कह सकते, इसलिए उन्होंने केवल वही बताया जो शास्त्र में लिखा है। वक्ता कहते हैं कि जोड़ी गई एक बात यह है: यदि आपके कुल की देवी-देवता, और विशेषकर जहाँ आपके घर में कुलदेवी का विशेष पूजन होता है, उग्रात्मक देवी हैं, और पहले से परंपरा चली आ रही है कि पूर्ण पात्र नहीं रखा जाएगा और खड़ा नारियल रहेगा — तो ऐसा नारियल चंडिका के उग्रात्मक रूपों के लिए रखा जाता है। यह देखकर भी इसे नए सिरे से नहीं अपनाना चाहिए। जब भगवती का नारियल इस प्रकार रखा जाता है तो उसे शक्ति कलश कहते हैं, और तब बहुत-से विधि-नियम अलग हो जाते हैं, और यह सबके लिए एक जैसा नहीं होगा। यह सबके लिए एक जैसा हो भी नहीं सकता। यह कुलदेवी पर निर्भर करता है, और उन शक्तियों के लिए किया जाता है जो जाग्रत हैं। सौम्य, पुष्टिकर शक्तियों के लिए इस तरह के कलश जल्दी नहीं रखे जाते, और यहाँ भी बहुत भेद आ जाता है। इसीलिए, वे कहते हैं, उन्होंने बहुत स्पष्ट कहा: ऐसा हो तभी रखें, नहीं तो ऐसे न रखें — सामान्य रखें, ताकि किसी हानि की संभावना न रहे।
विद्वानों के इस अपमान का दोष किसका है?
अपने ही माता-पिता से मिला संस्कार
वक्ता कहते हैं कि दोष टिप्पणी करने वाले का अपना नहीं है: माता-पिता बच्चे को जैसा संस्कार देते हैं, बच्चा वैसा ही करेगा। आप उनका अपमान इसलिए करते हैं क्योंकि आपने अपने माता-पिता को ऐसा करते देखा है।
वक्ता कहते हैं कि सबसे बड़ी विडंबना यह है — जानते हैं दोष किसका है? यह आपका दोष नहीं है। वे केवल शंकराचार्यों और दूसरे बड़े विद्वानों की बात नहीं कर रहे, बल्कि विशेषकर उन वैदिक विद्वानों की, जो बिना प्रमाण के अर्थ या अनर्थ की कोई बात नहीं रखते, जो ठीक प्रमाण से बात रखते हैं, उससे जो भी ऊँच-नीच हो — वह उनका अपना विषय है। जानते हैं आप उनका अपमान क्यों करते हैं? क्योंकि आपने अपने माता-पिता को ऐसा करते देखा है। माता-पिता बच्चे को जैसा संस्कार देते हैं, बच्चा वैसा ही करेगा। आपने अपने माता-पिता को साधुओं का उपहास करते देखा है।
पंडित, ब्राह्मण, ज्योतिषी और तांत्रिक — जाति कोई भी हो, सबको एक जैसा अपमान मिलता है।
पंडित, ब्राह्मण, ज्योतिषी, तांत्रिक — जाति देखे बिना अपमान
वक्ता कहते हैं कि लोगों ने देखा है कि पंडित से टेढ़ा बोला जाता है, ब्राह्मण को पेटू, पाखंडी, लुटेरा कहा जाता है, ज्योतिषियों को लुटेरा कहा जाता है — और तांत्रिकों की तो बात ही छोड़ दीजिए। जाति कोई भी हो, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र, यदि कोई ऐसे मार्ग पर चलता है और साधक है, तो उसे लुटेरा, ठग, धोखेबाज़, फ़रेबी, मूर्ख कहा जाता है।
वक्ता कहते हैं कि आपने यह देखा है: पंडित से टेढ़ा बोलो, ब्राह्मण से टेढ़ा बोलो, उसे पेटू कहो, पाखंडी कहो, लुटेरा कहो, ज्योतिषियों को लुटेरा कहो। तांत्रिकों का विषय तो पूरी तरह छोड़ दीजिए। इस वर्ग के सारे लोग, जो भी साधक है — यह बात छोड़ दीजिए कि उसकी जाति क्या थी, ब्राह्मण था, क्षत्रिय था, वैश्य था या शूद्र — यदि वह इस तरह के मार्ग पर चलने वाला है, यदि वह साधक है, तो वह लुटेरा, ठग, धोखेबाज़, फ़रेबी, मूर्ख, सब कुछ है। यह आपने अपने माता-पिता से सीखा है। आपके माता-पिता जीवन भर यही करते रहे, आपने देखा, और आप भी यही कर रहे हैं। अब आप स्वयं बहुत बड़े विद्वान बन गए हैं और दिया गया प्रमाण भी नहीं मानते। और जब आप इतने बड़े विद्वानों को भी नहीं मानते, तो आप निश्चित ही इधर-उधर भटकेंगे, और कठिनाई निश्चित ही आएगी — इसमें दो राय नहीं।
जान-बूझकर वर्षों तक अपराध करते रहने से पूर्वजों का पुण्य क्षीण होता है और अपराध आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है।
पूर्वजों के पुण्य का क्षय, और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ने वाला अपराध
वक्ता कहते हैं कि ऐसा कभी नहीं हो सकता कि जो आप गलत जानते हुए भी करें और उसमें आनंद लें, यह कहते हुए कि पाँच, दस या पचास वर्षों में कोई हानि नहीं हुई, उसका दुष्प्रभाव न आए। आपके पूर्वजों ने जो पुण्य कर्म किए, वे अभी आपके साथ हैं और उन्हीं से आप खड़े हैं; जिस दिन वे क्षीण होंगे और आपके अपने टेढ़े कर्म जागेंगे, आपकी पीढ़ियाँ भुगतेंगी और पूछेंगी कि उन्होंने कौन-सा अपराध किया था।
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने सदा कहा है कि यदि आप जान-बूझकर अपराध कर रहे हैं और उसमें आनंद ले रहे हैं, और कह रहे हैं कि जो आप करते हैं वह ठीक है, उसका कोई दुष्प्रभाव नहीं, कि आप पाँच वर्ष, दस वर्ष, पचास वर्ष से कर रहे हैं — तो ऐसा कभी नहीं हो सकता कि दुष्प्रभाव न आए, यदि आप जानते हैं कि यह गलत है और फिर भी जान-बूझकर करते जा रहे हैं। वे कहते हैं, सदा याद रखिए कि आपके पूर्वजों का और अतीत का जो भी पुण्य कर्म और फल है, वह अभी आपके साथ है। इसीलिए आप खड़े हैं। जिस दिन वह समाप्त होगा, और आप जो टेढ़े कर्म कर रहे हैं वे जागेंगे, आपकी पीढ़ियाँ भुगतेंगी, और आपकी पीढ़ियाँ कहेंगी — हमने कौन-सा अपराध किया? इसे लिख लीजिए। वर्तमान समय में, चाहे वे हों या आप, जब हम कष्ट भुगतते हैं और कहते हैं कि हम इतनी पूजा, इतना हवन, इतनी तीर्थयात्रा कर रहे हैं फिर भी कष्ट नहीं जाता — वक्ता कहते हैं कि यह उस काल का विषय है जब पूर्वजों का पुण्य क्षीण हो चुका है और अब पाप कर्म उदय में है। और जो पुण्य आप अभी कर रहे हैं, जो अच्छा काम कर रहे हैं, वह भी आपको मिलेगा — मिलना हो तो इसी जीवन में; नहीं तो आप इसी वंश में फिर जन्म लेंगे, अपने ही पोते या परपोते के रूप में, और वह सुख फिर भोगेंगे।
आज जन्म-कुंडलियों में बृहस्पति को लेकर क्या दिख रहा है?
बृहस्पति-जनक दोष और राहु-गुरु अंतर्दशा
वक्ता कहते हैं कि कुंडलियों के विश्लेषण के अपने अनुभव से, शनि की साढ़ेसाती सौ में से शायद पचहत्तर-अस्सी लोगों के लिए उतनी बड़ी समस्या नहीं लाती; पर जब भी बृहस्पति राहु के अंतर में आते हैं, या राहु बृहस्पति के अंतर में, तब असाधारण उथल-पुथल मच जाती है। चूँकि बृहस्पति विद्वानों, विद्या, धन और आचार्यों-गुरुओं के कारक हैं, वे इसे विद्वानों का अपमान करने वाली पीढ़ी को मिल रहा दंड मानते हैं।
वक्ता कहते हैं कि आज बृहस्पति से जितना बड़ा दोष उत्पन्न हो रहा है, वह उनका अपना निजी अनुभव है। कुंडलियों के विश्लेषण के इतने समय में उन्होंने सदा एक बात देखी है। शनि की साढ़ेसाती, मान लीजिए सौ में से पचहत्तर-अस्सी लोगों के लिए उतनी बड़ी समस्या नहीं लाती। साढ़ेसाती भी, अठारह वर्ष चलने वाली महादशा भी, ठीक है, निकल जाती है; यह सामान्य है। पर बृहस्पति — जब भी बृहस्पति राहु के अंतर में आते हैं, या राहु बृहस्पति के अंतर में आते हैं, उस समय असाधारण उथल-पुथल मच जाती है। यह सबसे बड़ा उपद्रव करने वाला योग है; चाहे यह अनुभव हो या अब ऐसी ही कुंडलियाँ आ रही हों, यह एक अलग ही विषय बन गया है। वे कहते हैं कि इसके पीछे का कारण साफ़ दिखता है। बृहस्पति देव, जो विद्वानों, विद्या, धन, आचार्यों और गुरुओं के कारक हैं — यदि सबकी कुंडली में ऐसी समस्या आ रही है, तो इसका अर्थ है कि यह पीढ़ी सबसे तीखे ढंग से विद्वानों का अपमान करने वाली है, और बृहस्पति कष्ट दे रहे हैं।
चाहें तो खुलकर विद्वानों का अपमान करें, पर फिर यह न पूछें कि हानि क्यों हुई।
खुलकर अपमान करें, पर फिर क्यों न पूछें
वक्ता कहते हैं: मुझसे यह न कहें कि विद्वानों के अपमान से हानि होगी, यह कहकर मैं आपको डरा रहा हूँ। खुलकर कीजिए, डरते क्यों हैं, पूरा कीजिए — पर फिर यह न पूछिए कि ऐसा क्यों हो रहा है। वे कहते हैं कि ज्योतिष कभी गलत नहीं हो सकता; केवल उसे पकड़ने का ढंग हर व्यक्ति का अलग होता है।
वक्ता कहते हैं कि साफ़ है, यदि आप आज यह कर रहे हैं और दोहरा रहे हैं, तो आगे भुगतने के लिए भी तैयार रहिए। डर की इस बात पर — यह न कहिए कि हम आपको डरा रहे हैं, कि अपमान करोगे तो हानि होगी। खुलकर कीजिए भाई, डरते क्यों हैं? पूरा कीजिए। पर फिर यह प्रश्न मत पूछिए कि ऐसा क्यों है? वे कहते हैं कि ज्योतिष कभी गलत नहीं हो सकता; केवल उसे पकड़ने का ढंग सबका अलग है। अपने-अपने अनुभव होते हैं, अपने-अपने सूत्र होते हैं, और यदि किसी ने किसी प्रकार की सिद्धि की है तो लोग उसी अनुसार अलग-अलग बातें कहते हैं — वह अलग विषय है। पर यह जो अपमान का धंधा चल रहा है, यह आपको डुबोकर ही छोड़ेगा, और जो बृहस्पति देव की महादशा में इसे भुगत रहे हैं, वे जानते हैं।
क्या कुंडली के राजयोग बृहस्पति की दशा में व्यक्ति की रक्षा कर सकते हैं?
कुंडली में बल और मित्रता होते हुए भी बृहस्पति का दंड
वक्ता कहते हैं कि साफ़ जान लीजिए, आपकी कुंडली में कितने भी राजयोग बने हों, बृहस्पति की दशा-अंतर्दशा में — चाहे बृहस्पति आपके कारक ग्रह हों, चाहे लग्नेश के मित्र हों, चाहे पंचम या भाग्य भाव में या अपनी बलवान स्थितियों और राशियों में पूरे बलाबल के साथ बैठे हों — यदि आप भुगत रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि आपने उस स्तर का अपराध और अपमान किया है, और वे दंड देने आए हैं।
वक्ता कहते हैं, साफ़ जान लीजिए: आपकी कुंडली में कितने भी राजयोग बने हों, बृहस्पति की दशा और अंतर्दशा में — चाहे बृहस्पति आपके कारक ग्रह हों, चाहे आपके लग्नेश के मित्र हों, चाहे पंचम भाव में, भाग्य भाव में, अपने बलवान ग्रहों और राशियों में, पूरे बलाबल के साथ बैठे हों — यदि फिर भी आप भुगत रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि आपने उस स्तर का अपमान, उस स्तर का अपराध किया है, और अब जब वे आए हैं तो दंड देंगे। वे कहते हैं कि आज लोगों के जीवन और शरीर में जो भयंकर मानसिक अवसाद, मन से जुड़ी समस्याएँ, विक्षिप्तता, जड़ता, और नसों से जुड़ी सारी समस्याएँ आ रही हैं, वे सब इस समय उन्हीं की देन हैं। राहु को छोड़िए, राहु क्या कर रहे हैं वह छोड़िए, राहु देव और केतु देव का विषय हटा दीजिए। यहाँ बृहस्पति देव एक अलग ही उथल-पुथल मचा रहे हैं, और बिलकुल ठीक कर रहे हैं।
रावण अपार विद्वान और महान शिवभक्त था, पर उसने न भक्तों की रक्षा की न विद्वानों की।
रावण विद्वान और शिवभक्त, पर रक्षक नहीं
वक्ता मानते हैं कि रावण अपार विद्वान और बहुत बड़ा शिवभक्त था, दोनों बातें सच हैं; पर कहते हैं कि उसने न भक्तों की रक्षा की, न विद्वानों की, न नारी जाति की। वे वाल्मीकि रामायण की ओर संकेत करते हैं, कहते हुए कि नींद से उठकर अपने कक्ष से बाहर आते समय वह रास्ते में पड़ी नग्न स्त्रियों को रौंदता हुआ निकल जाता था।
वक्ता कहते हैं कि आज भी आप रावण जी के कारण राम जी का अपमान करने में कोई कसर नहीं छोड़ते, और आज भी इस पर बहस करते हैं। कितना भी प्रमाण दिया जाए — रावण लाख गुना विद्वान था, यह सच है; वह बहुत बड़ा शिवभक्त था, यह भी सच है। पर उसने भक्तों की रक्षा नहीं की, यह आप नहीं देखते। उसने विद्वानों की रक्षा नहीं की, किसी नारी जाति की रक्षा नहीं की। वे कहते हैं, वाल्मीकि रामायण पढ़िए। जब वह नींद से उठता था, उठने के बाद जब अपने कक्ष से बाहर आता था, तो रास्ते में नग्न स्त्रियाँ पड़ी रहती थीं, और वह उन्हें रौंदता हुआ निकल जाता था। उस ऊँचे स्तर के लिए उसे जो नाम देना हो दीजिए।
शास्त्र क्या कहता है
Rāvaṇa's house held princesses he had carried off by force.
9.70 says the opposite of most of them: none was won by force or loved another man, except Sītā.
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राक्षसीभिश्च पत्नीभी रावणस्य निवेशनम् । आहृताभिश्च विक्रम्य राजकन्याभिरावृतम् ॥ ६ ॥
रावण का घर उसकी राक्षसी पत्नियों से और बलपूर्वक हरकर लाई गई राजकुमारियों से भरा था।
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On waking, Rāvaṇa stepped over sleeping, unclothed women as he went out.
Sundara 9–11 shows the women asleep in disarray, and 18.3–6 shows Rāvaṇa waking and going out to the grove. Neither passage says he trampled or stepped over them.
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अथ मङ्गलवादित्रैः शब्दैः श्रोत्रमनोहरैः । प्राबुध्यत महाबाहुर्दशग्रीवो महाबलः ॥ ३ ॥
तब महाबाहु, महाबली दशग्रीव कानों को भाने वाले मंगल बाजों के स्वर से जागा।
विबुध्य तु यथाकालं राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् । स्रस्तमाल्याम्बरधरो वैदेहीमन्वचिन्तयत् ॥ ४ ॥
प्रतापी राक्षसराज ठीक समय पर जागा। उसकी माला और वस्त्र खिसक रहे थे। वह वैदेही के बारे में सोचने लगा।
भृशं नियुक्तस्तस्यां च मदनेन मदोत्कटः । न स तं राक्षसः कामं शशाकात्मनि गूहितुम् ॥ ५ ॥
काम ने उसे सीता में बहुत बाँध रखा था, और वह मद से उन्मत्त था। वह राक्षस उस काम को अपने भीतर छिपा न सका।
स सर्वाभरणैर्युक्तो बिभ्रच्छ्रियमनुत्तमाम् । तां नगैर्बहुभिर्जुष्टां सर्वपुष्पफलोपगैः ॥ ६ ॥
सब गहनों से सजा, अनुपम शोभा धारण किए वह उस वाटिका में गया। वह हर तरह के फूल-फल वाले बहुत-से पेड़ों से भरी थी।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
शक्ति पाने के बाद राक्षस आसुरी क्यों हो जाता है?
वरदान तक अनुशासन, उसके बाद आसुरी स्वभाव — और शाप का प्रभाव
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने सदा कहा है कि राक्षस सामर्थ्य मिलने तक बहुत विधि और नियम से रहते हैं, और सामर्थ्य और वरदान मिलने के बाद अपना आसुरी स्वभाव धारण कर लेते हैं। वे शापित होते हैं, और शाप का प्रभाव उन पर पड़ना ही है।
वक्ता कहते हैं कि सामर्थ्य के बारे में उन्होंने सदा यह बताया है: राक्षस सामर्थ्य मिलने तक बहुत बड़े विधि और नियम से रहते हैं, और उसे प्राप्त भी कर लेते हैं। सामर्थ्य मिलने के बाद, वरदान मिलने के बाद, वे अपना आसुरी स्वभाव धारण कर लेते हैं। वे शापित होते हैं, और शाप का प्रभाव उन पर पड़ना ही है। वे विष्णु महापुराण में शंखचूड़ से जुड़े खंड का उल्लेख करते हैं, जहाँ यह भी बताया गया है: उसे अपने पिछले जन्म के बारे में पता था, कि वह भगवान का पार्षद था, और उस सामर्थ्य से उसने तीनों लोकों का राज्य भी जीत लिया और इंद्र के पद पर बैठ गया। पर उस पर आसुरी स्वभाव क्यों हावी हुआ? क्योंकि उस पर राधा रानी का शाप था, और उसे भुगतना ही था। वे कहते हैं कि आसुरी स्वभाव निश्चित ही हावी होगा। रावण के साथ भी ऐसा ही था।
रावण का महिमामंडन करने में क्या हानि है?
उसके पीछे होने वाला हनुमान, राम, वशिष्ठ और अगस्त्य का अपमान
वक्ता कहते हैं कि रावण का महिमामंडन करने के प्रयास में आप हनुमान जी का अपमान करते हैं, राम जी का अपमान करते हैं, वशिष्ठ मुनि का और अगस्त्य ऋषि का अपमान करते हैं — और पूछते हैं कि इसका फल आप कहाँ भुगतेंगे। वे श्रोताओं से कहते हैं कि पुराण पढ़ें और समझने का प्रयास करें, आचार्यों और विद्वानों से पूछें, या यदि नहीं जानते तो चुप रहें।
वक्ता कहते हैं कि उसका महिमामंडन करने के धंधे में आप हनुमान जी का अपमान करते हैं, राम जी का अपमान करते हैं, वशिष्ठ मुनि का अपमान करते हैं, अगस्त्य ऋषि का अपमान करते हैं। इसका फल कहाँ भुगतेंगे? अगस्त्य ऋषि का प्रसंग सुनकर लोग अब उसके भीतर जाकर नहीं देखते कि क्या विषय बताया गया है, पुराणों की बात क्या है — कि हमें इसे पढ़ना, देखना, जानना, समझने का प्रयास करना चाहिए। यदि नहीं जानते तो आचार्यों और विद्वानों से पूछिए, या देखने का प्रयास कीजिए; या यदि नहीं जानते तो चुप रहिए। पर उपहास में आप सबसे आगे रहते हैं। भाई, विद्वानों का अपमान करके आप कहाँ जाएँगे? उन्होंने जो कुछ दिया, वह सब आज आप भोग रहे हैं; यदि उन्हीं का अपमान करेंगे तो कैसे बचेंगे? वे कहते हैं, सदा याद रखिए कि यदि आप इस तरह के कर्म कर रहे हैं तो ये कर्म आपको आज नहीं तो कल डुबो देंगे। आप इसमें डूबेंगे, बचेंगे नहीं।
क्या विद्वानों के अपमान और अपराध से आया कष्ट कभी दूर हो सकता है?
इकट्ठे अपराध से निकलने का मार्ग — बहुत-से रास्ते हैं, यदि कोई उन पर चलना चाहे
वक्ता कहते हैं कि ऐसे कष्टों से निकलने के लिए बहुत-से मार्ग बने हैं; ऐसा नहीं कि कष्ट कभी समाप्त नहीं हो सकता — पर तभी, जब आप करना चाहें। आप किसी निर्देश को कैसे लेते हैं, कैसे समझते हैं, और फिर उस पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है, यही आपका जीवन बदलती है।
वक्ता कहते हैं कि अब विषय यहाँ आता है: यदि हम ऐसी बात ढो रहे हैं, यदि हमारे जीवन में इस प्रकार के कष्ट जमे हुए हैं, तो इन कष्टों से निकलने के लिए भी बहुत-से मार्ग बने हैं। ऐसा नहीं कि यह कष्ट कभी समाप्त नहीं हो सकता — पर तभी, जब आप करना चाहें। आरंभ में वे यही बात कह रहे थे: यदि आपको कोई विषय बताया जाए, तो आप उसे किस ढंग से लेते हैं, किस ढंग से समझते हैं, और फिर उस पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है, यही आपका जीवन बदलने वाला निकलता है।
क्या कार्तिक केवल वैष्णवों का मास है?
ऐसा कोई भेद नहीं — यह मास सबके लिए है
वक्ता कहते हैं कि यह वैष्णवों के लिए परम पवित्र है, फिर भी शाक्तों के लिए इसमें कोई कमी नहीं है। ऐसा नहीं कि शाक्त यह कहकर निश्चिंत बैठ जाए कि दुर्गा पूजा हो गई, बलि दे दी गई, सारा काम हो गया, अब कार्तिक में कृष्ण भक्त और नारायण भक्त भजन करें। यह हम सबके लिए है, और ऐसे भेद नहीं रखने हैं।
कार्तिक मास में सबसे पहला काम क्या है?
सूर्योदय से पहले स्नान, स्थिर जल में सब तीर्थों का आवाहन करके
दीपदान सबसे आवश्यक है, और उससे भी पहले प्रातः स्नान। सूर्योदय से एक या डेढ़ घंटा पहले तक स्नान करें — यदि सूर्य 5:00 बजे उगना है, तो 4:00 बजे तक स्नान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। सरोवर या नदी में स्नान का अद्भुत माहात्म्य है; घर पर बाल्टी में जल स्थिर करके उसमें सब तीर्थों का आवाहन करें, शॉवर के नीचे नहीं।
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक मास में पहला काम दीपदान है, जो सबसे आवश्यक है; और उससे भी पहले प्रातः स्नान। सूर्योदय से एक या डेढ़ घंटा पहले तक — जैसे, यदि सूर्य 5:00 बजे उगने वाला है, तो 4:00 बजे तक भी स्नान कर लें तो सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। स्नान का माहात्म्य सबसे बड़ा है। सरोवर या नदी में स्नान करें तो माहात्म्य अद्भुत है। पर घर पर भी, बाल्टी में जल को स्थिर करके सब तीर्थों का आवाहन करें, और फिर उससे स्नान करें। शॉवर से करेंगे तो नहीं होगा; शॉवर से करें तो मानसिक स्मरण के साथ स्नान करें। पर यदि आप जल एक जगह इकट्ठा करके उसमें सब तीर्थों और नदियों का आवाहन करें — मन से गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, इस प्रकार आवाहन करके — और फिर उससे स्नान करें, तो वह सबसे पहले आता है।
कार्तिक में प्रातः स्नान के बाद क्या करना चाहिए?
इष्ट का शतनाम या सहस्रनाम से अर्चन, फिर माला जप
स्नान के बाद पूजा स्थान पर जाकर जितना हो सके नित्य पूजन करें। सबसे श्रेष्ठ है अपने इष्ट आराध्य का शतनाम या सहस्रनाम से अर्चन या पाठ; यह कार्तिक मास में, सुबह जल्दी, अवश्य होना चाहिए। उसके बाद जो भी माला जप या दूसरी विधि आपकी है, वह करें — वह उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि स्नान के बाद पूजन स्थान पर जाइए और जितना नित्य पूजन कर सकें, कीजिए। सबसे श्रेष्ठ है अपने इष्ट आराध्य का शतनाम से या सहस्रनाम से अर्चन या पाठ। यह कार्तिक मास में अवश्य होना चाहिए, और सुबह जल्दी होना चाहिए। उसके बाद जो भी माला जप आपका है, या कोई दूसरी विधि, वह कीजिए — वह उत्तम है।
कार्तिक का दीपदान कहाँ और कितनी बार करना चाहिए?
सुबह और शाम दीपदान, हनुमान जी की ध्वजा पर और तुलसी के पास
दीपदान दोनों समय, सुबह और शाम, अवश्य होना चाहिए; शाम का दीपदान तो पूरी तरह अनिवार्य है। यह मोटे तौर पर दीवाली में जो किया जाता है उसका एक छोटा दैनिक रूप हो — हनुमान जी की ध्वजा के पास और तुलसी जी के पास। जो कार्तिक मास में तुलसी जी की रक्षा और सेवा करता है, उसे स्वयं विष्णु जी के समान माना गया है, और हर स्त्री-पुरुष को इस मास में तुलसी सेवा अवश्य करनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि दूसरा विषय दीपदान है। यह दोनों समय, सुबह और शाम, अवश्य होना चाहिए; शाम का दीपदान तो पूरी तरह अनिवार्य है। शाम का दीपदान कहाँ करें? मोटे तौर पर दीवाली के समय जो किया जाता है, उसका एक छोटा दैनिक रूप। यानी हनुमान जी की ध्वजा के पास, और तुलसी जी के पास। जो कार्तिक मास में तुलसी जी की सेवा करता है, तुलसी जी की रक्षा करता है, उसे स्वयं विष्णु जी के समान माना गया है। इसलिए हर स्त्री-पुरुष को कार्तिक मास में तुलसी जी की सेवा अवश्य करनी चाहिए।
क्या कार्तिक में रविवार को तुलसी के लिए दीपक जलाना चाहिए?
यदि मन में संकोच हो, तो उस दिन हनुमान जी की ध्वजा पर जलाएँ
वक्ता कहते हैं कि रविवार हो या कोई और तिथि, कार्तिक मास में दीपक तुलसी जी के बिलकुल पास न जलाकर, उदाहरण के लिए, हनुमान जी की ध्वजा के पास जलाएँ, यदि तुलसी जी उसके बगल में हों। यदि मन में ऐसा संकोच हो तो उस दिन तुलसी जी के लिए अलग से न जलाएँ, और बाकी दिनों में जलाएँ।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ एक प्रश्न उठेगा: रविवार को तुलसी जी की सेवा करें या नहीं, कार्तिक मास में उनके लिए दीपक जलाएँ या नहीं? रविवार हो या कोई और तिथि, कार्तिक मास में, तुलसी जी के बिलकुल पास न जाकर — कम से कम, यदि तुलसी जी हनुमान जी की ध्वजा के पास हैं, तो दीपक वहीं ध्वजा के पास जला दीजिए। यदि मन में इस तरह की बातें हैं तो उस दिन तुलसी जी के लिए अलग से न जलाएँ; और बाकी दिनों में जलाएँ। तुलसी जी के पास तुलसी सेवा अवश्य होनी चाहिए।
क्या बिना दीपक जलाए या नैवेद्य चढ़ाए केवल नाम जप काफ़ी है?
नाम जप का अपना विधान है; पूजा सेवा वैकल्पिक नहीं
वक्ता कहते हैं कि यदि आप केवल नाम जप करते हैं तो उसका एक विशेष विधान है; केवल यूँ ही दोहराते रहने से नहीं होगा। इस भ्रम में न रहें कि केवल नाम जप करें तो कोई पूजा सेवा करने की आवश्यकता नहीं — बिलकुल है, जितना आपका शरीर साथ दे और जितना समय हो।
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद अगला विषय है अपने इष्ट आराध्य का जितना हो सके स्मरण करना। मन से, वह नाम जप के अंतर्गत आएगा। यदि आप केवल नाम जप करते हैं, तो उसका एक विशेष विधान है। केवल इस तरह दोहराते रहने से नहीं होगा। यदि आप सोच रहे हैं कि हम न दीपक जलाएँगे न नैवेद्य चढ़ाएँगे — वह सब तो भगवान ने ही उसकी बुद्धि देकर बनाया है। केवल वे ही उनकी पूजा कर सकते हैं। यह कई बार कहा गया है: वे सामर्थ्य देंगे, वे बुद्धि देंगे, तभी उनकी पूजा संपन्न होगी; नहीं तो वे स्वयं को अपूजित छोड़ देंगे। और उन्हें अपूजित छोड़ना अपने मनुष्य जीवन की हानि है। इसलिए, वे कहते हैं, इस भ्रम में न रहें कि केवल नाम जप करना है तो कोई पूजा सेवा करने की कोई बाध्यता या आवश्यकता नहीं है। बिलकुल है — जितना आपका शरीर साथ दे, और जितना समय हो उसके अनुसार।
कार्तिक में गृहस्थ को प्रतिदिन कितनी सेवा करनी चाहिए?
घर में रहकर भी अनासक्त — एक घंटा अर्चन, नारायण के श्लोक, तुलसी सेवा, चौखट पूजन
गृहस्थी साथ लेकर चलते हुए — वैरागी की तरह नहीं, पर घर में रहते हुए भी अनासक्त होकर — जितनी हो सके सेवा करनी चाहिए। प्रातः स्नान के बाद जो भी एक घंटा मिले, उसमें इष्ट आराध्य का शतनाम या सहस्रनाम से अर्चन-पूजन करें; साथ में नारायण से जुड़े श्लोक, या उनका अष्टोत्तर शतनाम पढ़ें, या उनकी कोई स्तुति गाएँ; और तुलसी जी की सेवा हो। चौखट पूजन बारहों महीने होना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि गृहस्थी साथ लेकर चलते हुए — वैरागी की तरह नहीं, बल्कि गृहस्थी साथ लेकर और घर में रहते हुए भी अनासक्त होकर — जितनी सेवा कर सकें, करनी चाहिए। तो, प्रातः स्नान के बाद, जो भी एक घंटे का समय मिले, उसमें इष्ट आराध्य का शतनाम से या सहस्रनाम से अर्चन और पूजन। और साथ में नारायण से जुड़े श्लोकों का पाठ भी करें। हो सके तो उनका अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। पढ़ें या उनकी कोई स्तुति गाएँ — वह सर्वश्रेष्ठ है। और तुलसी जी की सेवा हो। चौखट पूजन बारहों महीने होना चाहिए: जिनकी चौखट पर दीपक जलता है, जो उसका श्रृंगार करते हैं, उन्हें इसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
कार्तिक में गौ सेवा से क्या मिलता है?
गाय को गुड़ और रोटी, और कई जन्मों के संतान संबंधी दोष
वक्ता कहते हैं कि यदि कार्तिक मास में गाय को गुड़ और रोटी खिलाई जाए — सर्दी शुरू हो रही होती है, तो वैसे भी यह अनुकूल है — तो कई-कई जन्मों के संतान संबंधी दोष नष्ट होते हैं, उनमें वह भी जहाँ कोई शाप पड़ा हो कि वंश नहीं बढ़ेगा।
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद गौ सेवा आती है। गोवत्स द्वादशी और सारी परम पवित्र तिथियाँ इसी मास में पड़ती हैं। तो कार्तिक मास में यदि गाय को गुड़ और रोटी खिलाई जाए — सर्दी शुरू होती है, तो उस तरह भी अनुकूल है — तो कई-कई जन्मों के संतान संबंधी दोष नष्ट होते हैं। हो सकता है कोई शाप पड़ा हो कि वंश नहीं बढ़ेगा। हो सकता है इस जन्म में किसी पुण्य कर्म से संतान हो गई, या आपकी संतान आईवीएफ़ से हुई; बहुत-सी तकनीकें आ गई हैं, और वह भी उन्हीं की कृपा से हो रहा है। ताकि यह दोष आगे न रहे, यह बात आपकी आने वाली संतानों में न रहे, गौ सेवा अवश्य होनी चाहिए। वैसे तो यह हर दिन का नियम है, पर कार्तिक मास में किया जाए तो यह बात सुलझ जाती है।
कार्तिक में पीपल और बट वृक्ष की सेवा से क्या मिलता है?
अश्वत्थ और बट वृक्ष की प्रदक्षिणा, और प्रायश्चित्त की अग्नि
वक्ता कहते हैं कि यदि कार्तिक में अश्वत्थ, यानी पीपल के वृक्ष, की सेवा की जाए और उसकी प्रदक्षिणा हो, और बट वृक्ष की प्रदक्षिणा हो, तो भगवान बटुक और त्रिदेव, सभी प्रसन्न होते हैं। बट वृक्ष के पास शिव का बटुक भैरव रूप और उनका दक्षिणामूर्ति रूप बहुत प्रसन्न होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यदि कार्तिक मास में अश्वत्थ, यानी पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के वृक्ष, की सेवा की जाए और उसकी प्रदक्षिणा हो, और बट वृक्ष की प्रदक्षिणा हो, तो भगवान बटुक और त्रिदेव, तीनों-चारों प्रसन्न हो जाते हैं। बट वृक्ष के पास बटुक भैरव — यानी शिव का बटुक भैरव रूप — और दक्षिणामूर्ति रूप होते हैं, जो अत्यंत प्रसन्न होते हैं। जब कोई बड़ा पाप हुआ हो, जब जान-बूझकर कोई पाप किया गया हो, और अब आपके हृदय में प्रायश्चित्त की अग्नि बहुत तेज़ जल रही हो — कि यह बहुत बड़ा अपराध था, पता नहीं उस समय कैसी बुद्धि हो गई थी कि ऐसा कुकर्म हो गया — तो उस प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। की अग्नि में जो जलाने की शक्ति है, वह आपके पाप को तभी नष्ट करेगी जब आप बट वृक्ष की सेवा करेंगे। वहाँ दीपक जलाइए और बट वृक्ष की परिक्रमा कीजिए। वहाँ भगवान दक्षिणामूर्ति शिव और भगवान बटुक भैरव की जो भी स्तुति कर सकें, कीजिए; या केवल उनका नाम स्मरण करते हुए, या इष्ट आराध्य का नाम जप करते हुए, 108 प्रदक्षिणा पूरी कीजिए — वह सर्वश्रेष्ठ है।
कार्तिक में तीर्थ जाने का क्या महत्व है?
तीर्थ पर एक दिन भी; गंगा, बद्री नारायण और प्रयागराज
वक्ता कहते हैं कि हो सके तो कार्तिक में एक दिन के लिए भी किसी तीर्थ जाकर तीर्थ के जल में स्नान करने से बहुत पुण्य मिलते हैं; और यदि गंगा जी हों तो सबसे श्रेष्ठ। भगवान बद्री नारायण, बद्री विशाल के क्षेत्र में और प्रयागराज में सब देवता सदा निवास करते हैं, पर कार्तिक में कहा गया है कि स्वयं भगवान वहाँ तीर्थराज के रूप में उपस्थित रहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यदि संभव हो, और कार्तिक मास में आप एक दिन के लिए भी किसी तीर्थ जाकर तीर्थ के जल में स्नान करें, तो बहुत पुण्य मिलते हैं। यदि गंगा जी में हो जाए तो सबसे श्रेष्ठ। यदि आप भगवान बद्री नारायण, बद्री विशाल के क्षेत्र में, और प्रयागराज में, तीर्थराज प्रयाग में जाएँ — उस समय सब देवता वहाँ वैसे भी सदा निवास करते हैं, पर कहा गया है कि कार्तिक मास में स्वयं भगवान वहाँ तीर्थराज के रूप में उपस्थित रहते हैं। और केवल दर्शन से, प्रयाग में गंगा जी का केवल दर्शन करने से पाप नष्ट होते हैं। स्नान की महिमा तो और ही है।
तीर्थ स्नान का फल वास्तव में कहाँ मिलता है?
पारलौकिक फल, और भौतिक इच्छा तभी पूरी जब व्यक्ति सजग रहे
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई संगम पर जाकर स्नान करे तो वह अद्भुत है — स्वयं विष्णु के रूप को धारण करने का सामर्थ्य। पर, पहले कही बात याद दिलाते हुए, यह सब पारलौकिक विषय है और इसका फल वहाँ मिलता है। यहाँ हम अपना मूल भुगतेंगे, पर पता नहीं चलेगा। ऐसा नहीं कि भौतिक सुख की इच्छा पूरी नहीं होगी — अवश्य होगी, पर सजग रहना पड़ेगा।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप संगम पर जाकर स्नान करें, तो वह अद्भुत है — स्वयं विष्णु के रूप को धारण करने का सामर्थ्य। पर, वे जोड़ते हैं, पहले कही बात याद रखिए: यह सब परलोक से जुड़ा विषय है, और इसका फल वहीं मिलता है। यहाँ हम अपना मूल भुगतेंगे, पर हमें उसका पता नहीं चलेगा। भगवान इतनी कृपा तो अवश्य करते हैं, और वह कभी व्यर्थ नहीं जाता। ऐसा नहीं कि भौतिक सुख की इच्छा पूरी नहीं होगी या नहीं मिलेगी। अवश्य मिलेगी — पर सजग रहना पड़ेगा। यह बात भी ध्यान में रखिए।
कार्तिक की कौन-सी आवश्यक बातें बिलकुल नहीं छूटनी चाहिए?
प्रातः स्नान और दीपदान, और आगे आने वाली पंचरात्रि दीवाली
वक्ता कहते हैं कि ध्यान रखिए, पहला काम प्रातः स्नान है और दूसरा दीपदान, और ये बिलकुल नहीं छूटने चाहिए; इनके अलावा जो जप और हवन कर सकें, कीजिए। वे बताते हैं कि दीवाली का पंचरात्रि, यानी पाँच दिन का, उत्सव आ रहा है, जिसमें भगवती कालिका और चंडिका सहित भगवती के अनेक रूप प्रकट होते हैं, और जो भगवती कमला का प्राकट्य काल है।
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक माहात्म्य का विषय वे अवसर मिलने पर किसी और समय रखेंगे, क्योंकि नहीं तो प्रश्नोत्तर सत्र हट जाएगा। पर इतना ध्यान रखिए: तीन-चार बातों में पहली प्रातः स्नान, दूसरी दीपदान — ये बिलकुल न छूटें। इनके अलावा जो भी जप, हवन आदि आप करते हैं, कीजिए। क्योंकि अब दीवाली का पंचरात्रि, यानी पाँच दिन का उत्सव आएगा, और उसमें, भाई, समय अत्यंत अद्भुत है। भगवती कालिका और चंडिका सहित भगवती के अनेक रूप प्रकट होते हैं, और साथ में यह भगवती कमला के प्राकट्य का काल है। इसके अलावा यह भगवान नारायण के लिए सर्वश्रेष्ठ है, और पूरा मास कार्तिकेय जी के नाम पर है, जिसका अपना कारण है: भगवान नारायण का सबसे प्रिय मास, और नाम कार्तिकेय जी पर। तो यह सब देवताओं के लिए अत्यंत प्रिय समय है।
कार्तिक का दीपक घर में कहाँ जलाना चाहिए?
घर का सबसे ऊँचा स्थान, या बाँस पर आकाश दीप
यदि आपका घर बड़ा है, या पहली-दूसरी मंज़िल वाला दो-तीन तल का है, तो सबसे ऊँचे स्थान पर — घर के शिखर पर — दीपक जलाने की व्यवस्था करें, जो सर्वश्रेष्ठ है। जिनकी छत तक पहुँच नहीं है, उनके लिए पूरे कार्तिक मास बाँस पर दीप मालिका की व्यवस्था करने, या थोड़ा ऊँचा करके लालटेन जलाने की परंपरा है, जिसे आकाश दीप कहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यदि आपका घर काफ़ी बड़ा है, या दूसरी और पहली मंज़िल वाला दो-तीन तल का है, तो सबसे ऊँचे स्थान पर दीपक जलाने की व्यवस्था कीजिए। यदि आप घर के शिखर पर दीपक जलाएँ, तो वह सर्वश्रेष्ठ है। बाकी लोग, जिनके घर ऐसे हैं — जैसे उनकी अपनी छप्पर वाली कुटिया, जहाँ छत पर जाना ही नहीं होता — उनके लिए पूरे कार्तिक मास बाँस पर दीप मालिका की व्यवस्था करने, या लालटेन आदि को थोड़ा ऊँचा करके जलाने की परंपरा है, जिसे आकाश दीप कहते हैं। यह किया जाए तो सर्वश्रेष्ठ है।
आकाश दीप पितरों के लिए क्या करता है?
पितरों की तृप्ति और उनके मार्ग का खुलना
वक्ता कहते हैं कि इससे पितर तृप्त होते हैं और उनके लिए मार्ग खुलता है। यह विशेषकर उनके लिए है जिनका पितृ दोष बहुत प्रबल है, जो बहुत कुछ कर रहे हैं फिर भी सद्गति नहीं हो रही — विशेषकर जहाँ किसी की अकाल मृत्यु हुई हो, या हत्या हुई हो, या शस्त्र के प्रहार से मृत्यु हुई हो, और वे कष्ट दे रहे हों।
वक्ता कहते हैं कि इससे पितरों की तृप्ति होती है, और पितरों के लिए मार्ग खुल जाता है। यह विशेषकर उनके लिए है जिनका पितृ दोष सचमुच बहुत प्रबल है, जो बहुत कुछ कर रहे हैं और जिनकी सद्गति आदि नहीं हो रही — और विशेषकर जहाँ किसी की अकाल मृत्यु हुई हो, या हत्या आदि हुई हो, या शस्त्र के प्रहार से मृत्यु हुई हो, और वे कष्ट दे रहे हों। जहाँ उनके लिए नारायण बलि, त्रिपिंडी आदि भी हो चुके हों, फिर भी यदि वे उपद्रव कर रहे हों — यानी वे अटक गए हैं और उनकी गति नहीं हो रही — तो कार्तिक मास के लिए यह उपाय है।
कार्तिक में अटके हुए पितरों के लिए कौन-सा पाठ बताया गया है?
गीता का ग्यारहवाँ अध्याय, पार्वती गीता या विष्णु सहस्रनाम, हरे बाँस की लालटेन के साथ
कार्तिक मास में उनके लिए संकल्प लेकर श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करें, या यदि आप विशेषकर भगवती भक्त हैं तो श्री पार्वती गीता का पाठ; या जिनके भक्त हैं उनकी गीता और सहस्रनाम, या श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ, इस संकल्प के साथ कि उनकी गति हो — और साथ में आकाश दीप।
वक्ता कहते हैं कि कार्तिक मास में उनके लिए संकल्प लेकर श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करें, या यदि आप विशेषकर भगवती भक्त हैं तो श्री पार्वती गीता का पाठ। या आप जिनके भक्त हैं, उनकी गीता और सहस्रनाम का पाठ इस संकल्प के साथ करें कि उनकी गति हो; या श्री विष्णु सहस्रनाम आदि का पाठ करें। और साथ में यह आकाश मालिका, यानी आकाश दीप। यानी हरा बाँस — जो पका न हो, कच्चा बाँस। उसमें लालटेन बनाकर, हर दिन शाम को, संध्या के समय, अपने पितरों का और यमराज का, धर्मराज आदि का ध्यान करते हुए वह दीपक जलाने से उन्हें अवश्य मार्ग मिलता है, और शांति अवश्य मिलती है।
कार्तिक में पितरों के लिए और अपने इष्ट के लिए और क्या किया जा सकता है?
उनके लिए तीर्थ पर पाठ; अपने इष्ट का पुराण पढ़ना; सहस्रार्चन
इसके अलावा तीर्थ क्षेत्र का सहारा है — यदि गंगा जी के पास उनके लिए पाठ हो सके, या किसी से करवाएँ, तो कार्तिक में उनके लिए एक दिन का पाठ-पूजा भी सर्वश्रेष्ठ है और मार्ग खुलता है। और आप जिनके भक्त हैं उनसे जुड़ा पुराण कार्तिक में पढ़ना भी सर्वश्रेष्ठ है — भगवती भक्त के लिए श्रीमद् देवी भागवत और महापुराण, या हो सके तो प्रतिदिन सहस्रार्चन।
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा तीर्थ क्षेत्र का सहारा है: गंगा जी आदि के पास, यदि उनके लिए पाठ किया जाए, या आप किसी से करवाएँ — तो कार्तिक मास में उनके लिए एक दिन का पाठ और पूजा भी सर्वश्रेष्ठ है, और मार्ग खुल जाता है। यदि कार्तिक मास में आप जिनके भक्त हैं उनसे जुड़े पुराण आदि का पठन और पाठ करें, तो वह भी सर्वश्रेष्ठ है। यदि आप भगवती भक्त हैं, तो श्रीमद् देवी भागवत का पाठ करें, महापुराण का पाठ करें। या, यदि हर दिन संभव हो, तो उनके लिए सहस्रार्चन आदि करें — वह सर्वश्रेष्ठ है।
कार्तिक में भोर का स्नान इतना पुण्यदायी क्यों माना जाता है?
शंखासुर, चुराए गए वेद, और जल में बिखरे मंत्र
वक्ता कथा बताते हैं कि शंखासुर नाम का एक राक्षस वेदों को चुराकर समुद्र में ले गया; जब भगवान नारायण ने उसका वध किया, तो वेदों के सारे मंत्र इधर-उधर जल में समा गए। इसी कार्तिक मास में सब ऋषियों ने वेद के अलग-अलग मंत्र और पन्ने इकट्ठे किए, और जिसे जो मंत्र मिला वह बाद में उस मंत्र का ऋषि कहलाया — यह भगवान नारायण का आशीर्वाद था।
वक्ता कहते हैं कि इसमें सबसे बड़ा महत्व भोर में उठने का है। कहा गया है, क्योंकि कथा यह है, कि शंखासुर नाम का एक राक्षस वेदों को चुराकर समुद्र में ले गया; तो जब भगवान नारायण ने उसका वध किया, तो वेद के सारे मंत्र इधर-उधर जल में समा गए। फिर इसी कार्तिक मास में, जितने भी ऋषि थे, सबने वेद के अलग-अलग मंत्र और पन्ने इकट्ठे करके लाए, और जिसे जो मंत्र मिला, वह बाद में उस मंत्र का ऋषि कहलाया — यह भगवान नारायण का आशीर्वाद रहा। वे कहते हैं कि यह विषय बताया गया है; इसके पीछे का पूरा मनोविज्ञान और साहित्यिक बात अलग है, दर्शन अलग है।
कार्तिक के जल में वेदों की उपस्थिति से क्या निकलता है?
जल रूप में नारायण, और चंद्रमा की शीतलता से जल में अमृत
इसी कारण कार्तिक में जल में सब वेद मंत्रों की उपस्थिति मानी गई है; और वेद स्वयं भगवान हैं, वेद स्वयं नारायण हैं, तो नारायण जल रूप में उपस्थित हैं। इसलिए कार्तिक में जल में स्नान, और वह भी सूर्योदय से पहले, सर्वश्रेष्ठ और बहुत पुण्यदायी माना गया है। यह भी माना गया है कि रात के चंद्रमा की शीतलता से जल में अमृत उपस्थित हो जाता है, जिससे कई प्रकार के दोष शांत होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसी बात में भगवान ने अपना आशीर्वाद दिया: इस कारण कार्तिक मास में जल में सब वेद मंत्रों की उपस्थिति मानी गई है। और वेद स्वयं भगवान हैं; वेद स्वयं नारायण हैं, इसलिए नारायण जल रूप में उपस्थित हैं। तो कार्तिक मास में जल में स्नान, और वह भी सूर्योदय से पहले, सर्वश्रेष्ठ और अत्यधिक पुण्यदायी माना गया है। और यह भी माना गया है कि इस समय रात के चंद्रमा की शीतलता के कारण जल में अमृत उपस्थित हो जाता है, जिससे कई प्रकार के दोष शांत होते हैं। कार्तिक स्नान का महत्व अत्यंत अद्भुत है। केवल पूर्णिमा का स्नान न करें — यदि गंगा जी आपके पास हैं, तो हो सके तो पूरे कार्तिक मास स्नान करना चाहिए।
पुरश्चरण कब दोहराना चाहिए, और किन तिथियों के बीच?
पापांकुशा एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक
वक्ता कहते हैं कि आपने पहले जो भी अनुष्ठान किए हैं, मंत्रों के जो भी पुरश्चरण किए हैं, वे कार्तिक मास में दोहराए जाएँ तो सर्वश्रेष्ठ है। वे नियम बताते हैं कि शारदीय नवरात्र के बाद अभी बीती पापांकुशा एकादशी से लेकर उस देवोत्थान एकादशी तक, जिस दिन तुलसी विवाह होता है, यदि किसी भी मंत्र का पुरश्चरण किया जाए, तो आगे बताई बात लागू होती है।
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद आने वाले विषय यह हैं कि आपने पहले जो भी अनुष्ठान किए हैं, मंत्रों के जो भी पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। किए हैं, यदि वे कार्तिक मास में दोहराए जाएँ तो सर्वश्रेष्ठ है। नवरात्र अभी बीते हैं। वे कहते हैं कि नवरात्र के समय की एक बात है: शारदीय नवरात्र के बाद अभी जो पापांकुशा एकादशी बीती है — उस एकादशी से लेकर देवोत्थान एकादशी तक, जिस दिन तुलसी विवाह होता है, यदि किसी मंत्र का पुरश्चरण किया जाए, चाहे वह कोई भी मंत्र हो। विशेषकर महाशक्तियों से जुड़ा ऐसा मंत्र, जिसके बारे में आपको लगता है कि वह कृपा नहीं दिखा रहा।
नाभि तक जल में खड़े होकर किए गए जप के बारे में क्या कहा गया है?
जल में एक मुहूर्त का जप मंत्र को सिद्ध और चैतन्य करता है
वक्ता बताते हैं कि कहा गया है, नाभि तक जल में खड़े होकर, केवल एक मुहूर्त के जप से — मान लीजिए लगभग चालीस मिनट के जप से — मंत्र पूरी तरह सिद्ध और चैतन्य हो जाता है। यदि जप एकादशी को हो तो ऐसी महिमा है।
नदी में जप की व्यवस्था कैसे करनी चाहिए?
सूर्योदय पर पाँच, सात या ग्यारह दिन, या एकादशी से एकादशी तक
पापांकुशा एकादशी बीत चुकी है, तो कल से जितना समय निकाल सकें — पाँच दिन, सात दिन, ग्यारह दिन, या कृष्ण पक्ष की एकादशी से शुक्ल पक्ष की देवोत्थान एकादशी तक — करें। यदि आप गंगा जी या किसी देव नदी के पास हैं, तो भोर में, सूर्योदय के समय वहाँ जाकर जप करें। साफ़ जगह पर करें ताकि मच्छर न काटें, और जप नाभि तक जल में खड़े होकर ही करना है।
वक्ता कहते हैं कि अब कार्तिक मास शुरू हो रहा है; पापांकुशा एकादशी तो बीत चुकी है, तो कल से, या आने वाले समय में, जितना समय निकाल सकें — पाँच दिन, सात दिन, ग्यारह दिन, या चाहें तो कृष्ण पक्ष की एकादशी से शुक्ल पक्ष की देवोत्थान एकादशी तक। यदि आप गंगा जी या किसी देव नदी के पास हैं, तो वहाँ जाकर भोर में, सूर्योदय के समय जप करें। वे सावधान करते हैं कि साफ़ जगह पर करें, ताकि मच्छर आदि न काटें, नहीं तो डेंगू की समस्या हो जाती है; जप वहीं कर पाएँगे जहाँ सफ़ाई उस स्तर की हो। यह ध्यान रखते हुए — पर करना नाभि तक जल में खड़े होकर ही है। यह किया जाए तो सर्वश्रेष्ठ है।
यदि गुरु से मिला मंत्र किया हो और उससे कुछ भी न हुआ हो तो?
दो-तीन पुरश्चरण और कोई अनुभव नहीं — प्रारब्ध नष्ट नहीं हो रहा
वक्ता उस व्यक्ति का उदाहरण लेते हैं जिसे गुरु मंत्र मिला, दीक्षा हुई, गुरु ने पुरश्चरण करने को कहा और उसने किया, पर कोई प्रभाव नहीं मिला — दो-तीन पुरश्चरण करके, मंत्र प्रभावी हो इसके लिए कई चीज़ों का सहारा लेकर भी, किसी प्रयोग के सफल होने की कोई संभावना नहीं, मंत्र का कोई अनुभव नहीं, कोई दिव्य दर्शन नहीं, स्वप्न में कुछ नहीं। इसका अर्थ है कि हमारा प्रारब्ध, हमारा बुरा प्रारब्ध, इतना बढ़ा हुआ है कि हमारे मंत्र जप से नष्ट नहीं हो रहा।
वक्ता कहते हैं, मान लीजिए किसी को गुरु मंत्र मिला, गुरु जी से मंत्र की दीक्षा हुई, गुरु जी ने कहा पुरश्चरण करो और आपने किया, पर आपको उसका कोई प्रभाव नहीं मिल रहा। आपने दो-तीन बार पुरश्चरण किया है। आपने कई प्रकार की चीज़ों का सहारा लिया है ताकि आपका मंत्र प्रभावी हो, पर किसी काम में किसी प्रयोग के सफल होने की कोई संभावना नहीं दिखती, और मंत्र का कोई अनुभव आपको हो ही नहीं रहा, न कोई दिव्य दर्शन, न स्वप्न आदि में कुछ पता चल रहा। यानी हमारा प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। भी इतना बढ़ा हुआ है — बुरा प्रारब्ध — कि हमारे मंत्र जप आदि से नष्ट नहीं हो रहा। वे कहते हैं कि इसी कारण गंगा जी में खड़े होकर जप का विधान बताया गया है।
क्या गंगा में जप के लिए तिथि या नक्षत्र देखना पड़ता है?
तिथि या नक्षत्र की आवश्यकता नहीं; पर सूर्योदय पर करें
वक्ता कहते हैं कि एक दिन भी करें तो आपको उसका अनुभव अवश्य होगा; गंगा जी में किए जप के लिए तिथि और नक्षत्र देखने की भी आवश्यकता नहीं। तिथि-नक्षत्र देखकर किया जाए तो सर्वश्रेष्ठ है, पर कार्तिक मास में किसी भी समय जाकर जप करें — और यदि सूर्योदय के समय करें तो मंत्र का प्रभाव आपको पूरी तरह मिलने लगेगा।
वक्ता कहते हैं कि एक दिन भी करें, तो आपको उसका अनुभव अवश्य होगा। गंगा जी में किए गए जप के लिए तिथि और नक्षत्र देखने की भी आवश्यकता नहीं है। तिथि और नक्षत्र देखकर किया जाए तो सर्वश्रेष्ठ है, पर कार्तिक मास में किसी भी समय जाकर जप करें — बस, यदि सूर्योदय के समय करें, तो मंत्र का प्रभाव आपको पूरी तरह मिलने लगेगा। और जब प्रभाव मिलने लगे, तो संतुलन का विषय किस ढंग से साधना है, वह आपका अपना सिरदर्द है: क्या करना है और कैसे, यह आपको स्वयं समझना होगा, और आपके अपने गुरु जी बताएँगे।
शाबर मंत्र किन महीनों में जाग्रत और प्रबल किए जाते हैं?
शाबर साधना के लिए श्रावण, नवरात्र, कार्तिक और मार्गशीर्ष
वक्ता कहते हैं कि जब हम सिद्धियों में आते हैं, तो शाबर मंत्र की अनदेखी नहीं की जा सकती। जो शाबर साधना करते हैं और शाबर मंत्रों को सिद्ध रखते हैं, उन्हें श्रावण मास, नवरात्र के मास, कार्तिक मास और मार्गशीर्ष मास में, विशेषकर मंत्रों को जगाने और जगे हुए मंत्रों को प्रबल करने के लिए, आराधना और साधना करनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा, जब हम सिद्धियों आदि में जाते हैं, तो सबर मंत्र की अनदेखी नहीं की जा सकती। जो लोग शाबर साधना करते हैं, जो शाबर मंत्रों की सिद्धि रखते हैं — श्रावण मास, नवरात्र का मास, कार्तिक मास, मार्गशीर्ष मास: इन सब में विशेषकर मंत्रों के जागरण के लिए, और जगे हुए मंत्रों को प्रबल करने के लिए, आराधना और साधना करनी चाहिए।
इन महीनों में क्रूर प्रयोग कम से कम क्यों करने चाहिए?
मंत्र देवता अपनी सेवा में होते हैं, और मंत्र चालन उन्हें खींच ले जाता है
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि इस समय मंत्रों के देवता एक विशेष अवस्था में होते हैं — शाबर मंत्रों में कोई न कोई शक्ति होगी, और बहुत हद तक उनमें लोक शक्तियाँ अवश्य शामिल होती हैं — और वे अपनी चरादि सेवा में रहते हैं। जब आप मंत्र को किसी काम में लगाते हैं, तो कहीं न कहीं मंत्र चालन होता है, और सिद्ध देवता वह सेवा छोड़कर चल पड़ते हैं; इससे दोष उत्पन्न होता है।
वक्ता कहते हैं कि जो प्रयोग क्रूर विधियाँ हैं, या किसी काम में किसी भी तरह का प्रयोग, वह इन समयों में जितना कम हो सके उतना करना चाहिए। क्योंकि इस समय देवताओं की स्थिति ऐसी होती है — वे देवता जो मंत्रों के देवता हैं। शाबर मंत्रों में कोई न कोई शक्ति होगी, और बहुत बड़ी हद तक उनमें लोक शक्तियाँ अवश्य शामिल होती हैं। तो वे स्वयं अपनी चरादि सेवा में रहते हैं। जब आप किसी काम में प्रयोग करेंगे, तो कहीं न कहीं मंत्र चालन होगा, और सिद्ध देवता सेवा छोड़कर चल पड़ेंगे। इससे दोष उत्पन्न होता है।
गुरु कुछ मंत्रों को कुछ समय पर प्रयोग करने से क्यों मना करते हैं?
साधक लंबी दृष्टि रखकर मास, तिथि और दिन के नियम मानते हैं
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए गुरु उपदेश देते समय शिष्य से कहते हैं कि यह मंत्र सदा प्रयोग नहीं किया जा सकता। काम में प्रयोग होने वाले सीधे-सीधे मंत्र, जो कटान विद्या आदि में चलते हैं, उनके लिए तो कोई बात ही नहीं; पर बहुत-से सिद्ध मंत्र हैं जिनके बारे में गुरु बस कहते हैं कि ऐसा नहीं करना। विशेषकर पुष्टिकारक मंत्रों में, जिनमें पुण्य पाने की बात भी है, साधक वर्ग बहुत कड़े नियम रखता है — इस मास में नहीं, इस तिथि को नहीं, इस दिन नहीं।
वक्ता कहते हैं कि यही कारण है कि कई बार जब गुरु उपदेश देते हैं, तो गुरु यह बात कहते हैं: भाई, ऐसा है कि यह मंत्र तुम सदा प्रयोग नहीं कर सकते। काम में प्रयोग होने वाले जो सीधे-सीधे मंत्र होते हैं, जो कटान विद्या आदि में चलते हैं, उनके लिए तो कोई बात ही नहीं है। पर बहुत-से सिद्ध मंत्र हैं जिनके लिए गुरु बस कहते हैं कि ऐसा नहीं करना चाहिए। और विशेषकर पुष्टिकारक मंत्रों में, जिनमें पुण्य पाने की बात भी है — वहाँ भी आप देखेंगे कि साधक वर्ग बहुत कड़े नियम और नीति से चलता है: इस मास में नहीं, इस तिथि को नहीं, इस दिन नहीं। इसके पीछे कारण है। वे लंबी दृष्टि रखते हैं, कि इसका प्रभाव उन्हें जीवन भर और जीवन के बाद भी मिलता रहे, कि वे सिद्ध वर्ग में बने रहें।
जिन्हें केवल वर्तमान दिखता है, वे मंत्र का बैंक जल्दी खाली कर देते हैं।
मंत्र का बैंक कभी जल्दी खाली न करें
वक्ता उन लोगों का वर्णन करते हैं जिन्हें केवल वर्तमान दिखता है — कि शाबर में तुरंत चलेगा, तुरंत काटेगा — ऐसे लोग कहते हैं आज मज़ा लो, जो करोड़ों हैं आज ही उड़ा दो, कल किसने देखा, भूकंप या सुनामी आ जाए। पर जब मनुष्य शरीर मिला है, तो कल को भी देखना है, क्योंकि केवल आध्यात्मिकता साथ ले जाई जा सकती है; पैसा नहीं। अपने मंत्रों की सिद्धियाँ अपने बैंक से कभी जल्दी खाली न करें।
वक्ता कहते हैं कि जिन्हें केवल वर्तमान दिखता है — जिनके लिए वैसा कुछ नहीं, कि शाबर में तुरंत चलेगा और तुरंत काटेगा — ऐसे लोग कहते हैं: आज है भाई, जीवन जी लो; आज है भाई, मज़ा ले लो; आज करोड़ों रुपये हैं, करोड़ों रुपये आज ही उड़ा दो। कल किसने देखा, क्या पता कल भूकंप आ जाए, सुनामी आ जाए। उनका स्वभाव ऐसा है; कल की कल देखी जाएगी, उन्हें कल की चिंता नहीं। पर जब मनुष्य शरीर मिला है, तो कल को भी देखना है — हम कितना बचाकर साथ ले जा सकते हैं। आप केवल यही बचा सकते हैं: आध्यात्मिकता बचा सकते हैं; पैसा साथ नहीं ले जा सकते। पैसा जितना उड़ाना हो उड़ाइए। पर मंत्रों की सिद्धियाँ, आप जिस भी प्रकार के मंत्रों का पुरश्चरण करते हैं, उन्हें अपने बैंक से कभी जल्दी खाली न करें। प्रयास कीजिए कि जब भी बात आए, मंत्र का प्रयोग कम से कम करना पड़े।
संचित जप पच्चीस करोड़ की जमा राशि जैसा है; जो साधक सीधे मंत्र खर्च करता है, वह दस लाख नकद निकाल रहा है।
पच्चीस करोड़ जमा, और दस लाख नकद
वक्ता उदाहरण लेते हैं एक कल्पेश कुमार का, जिनके एसबीआई खाते में 25 करोड़ रुपये हैं और जिन्हें 5 से 10 लाख चाहिए। बैंक जाने पर मैनेजर ऐसे व्यक्ति को विशेष व्यवहार देता है, अपने केबिन में बिठाता है, चाय-कॉफ़ी मँगवाता है — और क्योंकि पता है कि 25 करोड़ हैं, 10 लाख भी उन्हें मिल जाते हैं, उन्हें पता भी नहीं चलता कहाँ से; ओवरड्राफ़्ट और जो भी दूसरी व्यवस्थाएँ हैं, और उन्हें कोई हानि नहीं होने वाली। जिसके खाते में 10,000 या 50,000 हैं, उसे लाइन में खड़ा होना पड़ेगा और कोई विशेष व्यवहार नहीं मिलेगा।
वक्ता कहते हैं कि राज के लिए किए जाने वाले काम के लिए बस संकल्प लेकर कहिए — हे भगवान, यह मेरी बात है, कृपया इसे देखिए। वह अधिक उचित है। वे एक उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए एक कल्पेश कुमार जी हैं, और कल्पेश कुमार जी के पास 25 करोड़ रुपये हैं, जो उनके एसबीआई बैंक में हैं। अब उन्हें 5 से 10 लाख चाहिए। वे वहाँ जाकर कहते हैं, भाई, मुझे 10 लाख नकद चाहिए। 25 करोड़ वाले आदमी को मैनेजर तो विशेष व्यवहार देगा ही; अपने केबिन में बिठाएगा, वहाँ के ब्रांच मैनेजर चाय-कॉफ़ी लाएँगे — जी सर, बोलिए सर, बोलिए सर, अरे सर यह, सर वह। वे कहते हैं, हमें नकद चाहिए, 10 लाख। और क्योंकि पता है कि 25 करोड़ हैं, उस सारी आवभगत के बाद 10 लाख भी उन्हें मिल जाते हैं; उन्हें पता भी नहीं चलेगा कि कहाँ से आए। ओवरड्राफ़्ट, उसमें जो भी व्यवस्थाएँ हैं, और उन्हें कोई हानि नहीं होने वाली। और उन्हें यह सम्मान क्यों मिलता है? क्योंकि वे 25 करोड़ वहाँ पड़े हैं, 10 लाख आसानी से आ जाएँगे, और उन्हें पता भी नहीं चलेगा कि 10 लाख कब उनके ब्याज से कट गए। ठीक वैसे ही, जिसके खाते में 10,000 या 50,000 हैं, वह जाएगा तो भाई, उसे लाइन में खड़ा होना पड़ेगा। उसे कोई विशेष व्यवहार नहीं मिलने वाला।
संचित जप देवताओं की दृष्टि में साधक को क्या बना देता है?
विशेष श्रेणी का भक्त, और ऐसी यात्रा जो मृत्यु पर समाप्त नहीं होती
वक्ता कहते हैं कि यदि आपने किसी मंत्र का सवा लाख, चार लाख, दस लाख, बीस लाख, करोड़ों जप पूरा किया है, तो आप देवताओं के लिए विशेष व्यवहार की श्रेणी के भक्त बन गए हैं। हम नहीं देखते कि कौन-सा देवता हमें देख रहा है, हम किस पिच में जा रहे हैं, वहाँ कोई शक्ति हमारे लिए क्या रखती है — वह भी एक लोक है। सनातन संस्कृति में जीवन यात्रा मृत्यु के बाद समाप्त नहीं होती; केवल शरीर बदलता है।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ भी ऐसा ही है। यदि आपने किसी मंत्र का सवा लाख, चार लाख, दस लाख, बीस लाख, करोड़ों जप किया है, तो आप देवताओं के लिए विशेष व्यवहार की श्रेणी के भक्त बन गए हैं। यह बात याद रखिए। आप और हम नहीं देख रहे कि कौन-सा देवता हमें देख रहा है, हम किस पिच में जा रहे हैं, वहाँ कोई शक्ति हमारे लिए क्या विषय रखती है। वह भी एक लोक है। सनातन संस्कृति में हमारी जीवन यात्रा मृत्यु के बाद समाप्त नहीं होती। यह सच है। बस वह बदल जाएगी; शरीर बदल जाएगा। वह वायु का शरीर होगा, अग्नि तत्व वाला शरीर होगा; पंचभूत अलग होंगे, और पंचभूतात्मक बात के अनुसार हम कारण शरीर या सूक्ष्म शरीर धारण करेंगे, और उस लोक में फिर हमारी नई रचना होगी, हम जिस भी योनि में गए हों। यदि दूसरा रूप लेकर फिर मनुष्य शरीर में जन्म हो, तो वह बात अलग है। अंतर केवल इतना है कि मनुष्य शरीर धारण करने पर व्यक्ति कर्म करता है, और उससे हमारा आने वाला समय बदल सकता है। मनुष्य शरीर इसीलिए मिलता है कि आप अपना पुण्य बढ़ाएँ और अनंत कोटि लोकों के रचयिता भगवान में विलीन होने का सामर्थ्य पाएँ। जितना हो सके जप और तप बढ़ाइए।
निष्कीलन करके किए गए सप्तशती पाठ के फल के बारे में कीलक क्या कहता है?
स्वयं गंधर्व बन जाना, पूरी पृथ्वी पर विचरने में समर्थ
वक्ता कहते हैं कि आप जो भी पुण्य करते हैं, उसे भोगने के लिए आपको कई शरीर मिलेंगे — सिद्ध का, या देवता, यक्ष, गंधर्व का शरीर। वे कीलक की ओर संकेत करते हैं, जिसमें कहा गया है कि जो निष्कीलन करके दुर्गा सप्तशती का पाठ करता है, वह स्वयं गंधर्व हो जाता है, और पूरी पृथ्वी पर विचरने के सामर्थ्य से युक्त हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि बाकी, आप जो भी पुण्य करते हैं, उसे भोगने के लिए आपको कई शरीर मिलेंगे — आपको सिद्ध का, देवता का, यक्ष का, गंधर्व का शरीर मिल सकता है। जब आप कीलक का पाठ करते हैं, तो उसमें क्या विषय कहा गया है? कि जो निष्कीलन करके दुर्गा सप्तशती का पाठ करता है, वह स्वयं गंधर्व हो जाता है। वह पूरी पृथ्वी पर विचरने के सामर्थ्य से युक्त हो जाता है। वे कहते हैं, आपने पढ़ा होगा — जिन्होंने अभी दुर्गा सप्तशती का पाठ किया है, कीलक में पढ़िए; वहाँ यह विषय पढ़ने को मिलेगा कि वह गंधर्वों की तरह विचरने के सामर्थ्य से युक्त हो जाता है। तो यह कैसे हो रहा है? मनुष्य का अगला जन्म उस प्रकार की शक्ति से युक्त होता है, और वह उस लोक में चला गया है। हमारा जीवन समाप्त नहीं हुआ; केवल शरीर समाप्त हुआ।
शास्त्र क्या कहता है
Whoever unpins the hymn and recites it daily with clear utterance becomes perfected, an attendant of the Goddess, and a gandharva.
The speaker adds that he can roam the whole earth; the text's next verse speaks only of no fear wherever he goes.
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यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम् । स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः ॥ ९ ॥
जो इस प्रकार कील खोलकर प्रतिदिन इसका स्पष्ट उच्चारण से पाठ करता है, वह मनुष्य सिद्ध हो जाता है। वह देवी का पार्षद होता है और गन्धर्व भी।
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मध्यम स्तर की शक्तियाँ साधक की प्रगति में बाधा क्यों डालती हैं?
उपदेव श्रेणी — उन्हें देवता क्यों नहीं कहा जाता
वक्ता कहते हैं कि आपके पास जितना अधिक जप होगा, देवता आपको उस स्तर पर उतना अधिक मानेंगे, और वे भी चाहेंगे कि इस साधक या साधिका का जप-तप जल्दी समाप्त न हो। पर उपदेव श्रेणी की मध्यम स्तर की शक्तियाँ कभी नहीं चाहतीं कि आप उनसे आगे जाएँ — इसीलिए उन्हें उपदेव कहा गया है, देवता नहीं। इसलिए वे बाधाएँ डालती हैं, और आपके जीवन में कुछ अच्छी चीज़ें भी देती हैं ताकि आपका आकर्षण टूट जाए।
वक्ता कहते हैं कि ठीक वैसे ही, जब मनुष्य शरीर मिला है और हम जप कर रहे हैं: हमारे पास जितना अधिक जप होगा, देवता उस स्तर पर हमारा उतना अधिक हालचाल पूछेंगे। वे भी चाहेंगे कि इस व्यक्ति का, इस साधक का, इस साधिका का जप-तप जल्दी समाप्त न हो। पर मध्यम स्तर की उपदेवता श्रेणी की शक्तियाँ कभी नहीं चाहतीं कि आप उनसे आगे बढ़ें। वे कहते हैं, यह बात भी समझिए; वह विषय वहाँ भी अवश्य है। इसीलिए उन्हें उपदेव कहा गया है, देवता नहीं कहा गया। तो वे इस तरह की बाधाएँ और अड़चनें उत्पन्न करती हैं। वे आपके जीवन में कुछ अच्छी चीज़ें भी दे देती हैं ताकि आपकी अरुचि हो जाए, आप किसी तरह अपनी साधना से विमुख हो जाएँ, आपका आकर्षण टूट जाए।
किसी देवता की शक्ति दूसरी चीज़ों को आकर्षक बनाकर साधक को कैसे भटकाती है?
इंद्र का सिंहासन, और इंद्रियों के माध्यम से आकर्षण
वक्ता उस व्यक्ति का उदाहरण लेते हैं जो भगवती से बहुत जुड़ा है, दिन भर दुर्गा-दुर्गा कहता है: कोई शक्ति आपको कुछ ऐसा दे देगी कि दुर्गा-दुर्गा की जगह आप कुछ और करने लगें। वह कहती है, भाई, वह छोड़ो, इधर देखो — उस सेवा से यह मिला, वह मिला, इधर आओ। पुण्य कहता है कि वह दुर्गा का काम था, पर आप कहीं और चले गए। जैसे इंद्र का सिंहासन इस डर से डोलता है कि आसन माँग लिया जाएगा, वैसे ही आपके स्तर पर भी इंद्रियों से उत्पन्न चीज़ों के आकर्षण आपके सामने रखे जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि आप किसी देवता से बहुत जुड़े हैं, जैसे भगवती से — अब आप दिन भर दुर्गा-दुर्गा कहते हैं। फिर कोई शक्ति आपको कुछ ऐसा दे देगी कि दुर्गा-दुर्गा की जगह आप कुछ और करने लगेंगे। अरे भाई, वह छोड़ो, इधर देखो — इस सेवा से यह मिला, वह मिला, इधर आओ। पुण्य कहता है कि वह दुर्गा का अपना काम था, पर आप कहीं और चले गए। उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि आप करोड़ों जप पूरा करके देवी लोक पा लें, या देवी आपको वह पद दे दें। जैसे इंद्र देव करते हैं, जिनका सिंहासन डोलता है कि कहीं हमारा आसन न माँग लिया जाए। आप सबसे ऊँचे स्तर पर नहीं कर रहे, पर जिस स्तर पर कर रहे हैं, वहाँ भी यही मोह और माया है — वही इंद्र, बल्कि इंद्र द्वारा उत्पन्न चीज़ों का आकर्षण। इंद्रियों से उत्पन्न चीज़ें आपके लिए आकर्षक बनाई जाएँगी ताकि आप उस लोभ में पड़ जाएँ, और फिर उस ओर नहीं जा पाएँगे।
बहुत जप वाला साधक केवल संकल्प से क्या पूरा कर सकता है?
भगवान और उनके नियुक्त पार्षदों से संकल्प, बनाम करोड़ों माँगते हुए 11,000 जप
वक्ता कहते हैं कि आपके पास जितना अधिक मंत्र जप है, केवल स्मरण से हम भगवान से — उन्होंने जिन पार्षदों को ब्रांच मैनेजर नियुक्त किया है, उनसे — बस कहेंगे और वहीं संकल्प लेंगे: भगवान, यह मेरा काम है, कृपा कीजिए। यदि काम धर्म से जुड़ा है, तो तुरंत पूरा होगा। पर जिसके पास कोई तपोबल नहीं और जिसने ग्यारह हज़ार जप करके बैठकर कहा, भगवान, मुझे 25 करोड़ दिलवा दो, वह अलग बात है।
वक्ता कहते हैं कि तो, आपके पास जितना अधिक मंत्र जप है, तो केवल स्मरण से हम भगवान से बस कहेंगे: जो ब्रांच मैनेजर होंगे, उन्होंने जिन भी पार्षदों को नियुक्त किया है — वहीं हम संकल्प लेंगे, भगवान, हाँ, यह मेरा काम है, कृपा कीजिए। यदि वह धर्म से जुड़ा काम है, तो वह काम तुरंत पूरा हो जाएगा। पर हमारे पास कोई तपोबल ही नहीं। 11,000 मंत्र जप करके बैठकर कहते हैं: हाँ भगवान, मुझे 25 करोड़ रुपये दिलवा दो। वे फ़ेसबुक पर साझा हुए एक इंद्र देव वीडियो को याद करते हैं, जिसमें मंत्र था — मम २०० करोड़ देहि देहि स्वाहा। वे कहते हैं कि ऐसे मंत्र किए जाएँगे, और इस प्रकार सिद्धि कहाँ से आएगी? पर यदि आपने करोड़ों जप किया होता और कहते २०० करोड़ देहि देहि स्वाहा, तो शायद भगवान दे देते: लो भाई, 200 करोड़। उनका इसमें क्या जाता है? उन्हें किस चीज़ की कमी है? वे 200 की जगह 2,000 करोड़ दे देंगे।
संकल्प और मंत्र के सीधे प्रयोग में क्या अंतर है?
मूलधन निकालना — टूटा हुआ पाँच सौ का नोट
वक्ता कहते हैं कि जितना अधिक जप होगा, आपका काम उतना अधिक पूरा होगा; पर जब आप मंत्र को किसी काम में प्रयोग करते हैं, तो आप अपना बचत खाता, अपने 25 करोड़, सीधे प्रयोग कर रहे हैं। आप ब्याज से नहीं ले रहे, कोई घुमावदार व्यवस्था नहीं लग रही; आप मूलधन ही उठाकर दे रहे हैं। एक बार मूलधन जाने लगे तो जाने ही लगता है — जैसे 500 रुपये का नोट एक बार टूटे तो टूटता ही जाता है, 400 हो जाता है, फिर 300, और आपको पता भी नहीं चलेगा कि कब समाप्त हो गया।
वक्ता कहते हैं कि तो जितना अधिक जप होगा, आपका काम उतना अधिक पूरा होगा। पर जब आप मंत्र को किसी काम में प्रयोग करते हैं, तो वह बैंक का वही बचत खाता है, या वही 25 करोड़ जो आपने रखे हैं, और अब आप उसे सीधे प्रयोग कर रहे हैं। अब आप उससे नहीं ले रहे; कोई घुमावदार व्यवस्था नहीं लग रही, कोई ब्याज नहीं है। आप मूलधन ही उठाकर दे रहे हैं। और यदि मूलधन उठाकर देंगे, तो एक बार जाने लगे — है न? 500 रुपये का नोट एक बार टूटता है, तो टूटता ही जाता है। फिर वह 400 होगा, फिर 300; आपको पता भी नहीं चलेगा कि कब समाप्त हो जाएगा। वह कहेगा, मैंने खर्च कहाँ किया। यहाँ भी यही होगा।
साधक को अपना मंत्र सीधे प्रयोग करने की आदत कैसे पड़ती है?
प्रयोग का स्वाद, और अपने सिर लिया हुआ पाप
वक्ता ऐसे व्यक्ति का वर्णन करते हैं जिसे सिद्धि पर बैठा कहा जाता है: पहले वह प्रयोग बिलकुल नहीं करता था, भगवान पर निर्भर था और बार-बार संकल्प लेकर उनके लिए जप करता था, तो काम एक बार में नहीं, दस बार में होता था — पर होता था। फिर एक दिन उसने अपना मंत्र सीधे प्रयोग किया और तुरंत सफल हुआ। उसे स्वाद लग जाता है, वह मंत्र तेज़ी से प्रयोग करता है, धन और यश पाता है और लोग कहते हैं उसके पास शक्ति और सिद्धि है। पर वह नहीं जानता कि यह अक्षय नहीं है: वह अपनी बचत खत्म कर रहा है और दूसरे का पाप और दोष अपने सिर ले रहा है।
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि प्रभाव तो आएगा। जैसे किसी को सिद्धि पर बैठा कहा जाता है: पहले वह प्रयोग बिलकुल नहीं कर रहा था, भगवान पर निर्भर था, बार-बार संकल्प लेकर उनके लिए जप करता था। तो काम एक बार में पूरा नहीं होता था; दस बार में होता था, पर होता था। फिर एक दिन उसने अपना मंत्र सीधे प्रयोग किया, और एक बार में काम हो गया। अब उसे स्वाद लग गया — यह क्या! हम उनसे कह रहे थे तो नहीं हो रहा था, पर इसका नाम उनसे बड़ा है, इसका मंत्र उनसे बड़ा है। मंत्र प्रयोग करते ही काम तुरंत हो गया। अब वह मंत्र तेज़ी से प्रयोग करेगा। उसे धन-धान्य मिलेगा, यश मिलेगा; लोग उसका बहुत हालचाल पूछेंगे, कि इस आदमी के पास सामर्थ्य है, शक्ति है, सिद्धि है। पर वह नहीं जानता कि यह अक्षय नहीं है। आप बचत खत्म कर रहे हैं, और दूसरे का पाप और दोष अपने सिर ले रहे हैं।
अक्षय पुण्य क्या है, और अक्षय पाप उसे कैसे काट सकता है?
अक्षय नवमी, चुराया हुआ लोटा, और अक्षय पुण्य का कटना
वक्ता अक्षय नवमी, अक्षय तृतीया, संधि काल की पूजा और महाअष्टमी की महारात्रि, महानिशा, की ओर संकेत करते हैं, जिनके बारे में कहा गया है कि उनमें की गई पूजा अक्षय पुण्य देती है और जप अक्षय फल देता है। पर किसी व्यक्ति ने उसी समय अक्षय पाप भी किया हो सकता है — अक्षय नवमी पर दुकानदार के मुड़ते ही एक लोटा अपने थैले में डाल लिया। उसका पाप भी उसी समय में अक्षय हो गया।
वक्ता कहते हैं कि अब इसे सरल करके और अच्छे से समझिए। अक्षय नवमी, अक्षय तृतीया, या संधि काल की पूजा, या महाअष्टमी की सारी दिव्य महारात्रि, महानिशीथ की पूजा — जिनके बारे में कहा गया है कि उनमें की गई पूजा अक्षय पुण्य देगी, कि जप का अक्षय फल मिलेगा। ठीक है, हम अक्षय हो गए। अब कोई हमारे पास आता है जिसके लिए हम संकल्प लेकर जप करना और पुण्य के रूप में किसी काम में मंत्र प्रयोग करना चाहते हैं। और उस आदमी ने इन्हीं दिव्य समयों में अक्षय पाप किया है। अक्षय नवमी के ही दिन उसने चोरी की: वह बर्तन ख़रीदने गया था, दुकानदार दूसरा बर्तन निकालने के लिए मुड़ा, और भले आदमी ने एक लोटा अपने थैले में डाल लिया। तो उसका पाप भी इसी समय में अक्षय हो गया। इसी समय में उसने चोरी से लेकर किसी दूसरे व्यक्ति को हानि पहुँचाने तक कोई कुकर्म किया, जिससे उसका पाप अक्षय हो गया।
ऐसे व्यक्ति के लिए मंत्र प्रयोग करने पर उसका अक्षय पाप आपके अक्षय पुण्य से टकराता है और दोनों नष्ट हो जाते हैं।
अक्षय पाप अक्षय पुण्य से मिलता है और दोनों नष्ट होते हैं
वक्ता कहते हैं कि आप नहीं जानते कि वह आदमी कौन-सा पाप करके आया है; आप केवल उसका कष्ट देख रहे हैं, कि वह संकट में है और शरण में आया है, इसलिए आप मंत्र प्रयोग करेंगे। फिर आपके मंत्र प्रयोग से उसका अक्षय पाप आपसे जुड़ जाता है, आपके अक्षय पुण्य के बराबर आ जाता है, और दोनों नष्ट हो जाते हैं — और आप शून्य पर आ जाते हैं, जबकि कहते हैं कि मेरा पुण्य तो कभी क्षीण नहीं हुआ।
वक्ता कहते हैं कि अब वह आदमी आया है, और आप नहीं जानते कि वह कौन-सा पाप करके आया है। आप केवल उसका कष्ट देख रहे हैं, कि वह संकट में है और शरणागत है, तो हम मंत्र प्रयोग करेंगे। अब आपके मंत्र प्रयोग के कारण उसका जो अक्षय पाप था, वह आपसे जुड़ गया। वह आपके अक्षय पुण्य के बराबर आ गया, और दोनों नष्ट हो गए। अब आप शून्य पर आ रहे हैं। और आप कहते हैं, मेरा पुण्य तो कभी क्षीण नहीं हुआ — यह कैसा अक्षय? जब समाप्त हो गया, तो कैसा अक्षय? वे कहते हैं, भाई, ऐसी कोई बात नहीं; यह बराबरी का मुक़ाबला था। वह अक्षय पाप करके आया, आप अक्षय पुण्य करके बैठे हैं।
सिद्ध ऋषि-मुनि मंत्रों का इतना कम प्रयोग क्यों करते हैं?
प्रयोग के बदले शरणागति, और दूसरे के प्रारब्ध में हस्तक्षेप न करना
वक्ता कहते हैं कि पुण्य तभी भारी पड़ेगा जब आपने बहुत-से अक्षय पुण्य किए हों; यदि आपने एक किया है और वह अक्षय पाप करके आया है, तो आपका अक्षय पुण्य भी यहाँ नष्ट हो जाएगा — क्योंकि आप अधर्म से जुड़ा काम कर रहे हैं, सीधे दूसरे के प्रारब्ध में हस्तक्षेप कर रहे हैं। इसीलिए सिद्ध ऋषि-मुनि मंत्रों का बहुत कम प्रयोग करते हैं। वे हर बात में भगवान का नाम और उनकी शरणागति लेते हैं, कष्ट सहते और रोते रहेंगे पर जल्दी प्रयोग नहीं करेंगे; वे निर्धन और दरिद्र हैं, पर सीधे प्रयोग नहीं करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि पुण्य का भारी पड़ना तब होगा जब आपने बहुत-से अक्षय पुण्य किए हों। यदि आपने एक बार अक्षय पुण्य किया है, और वह हर तरह के अक्षय पाप करके आया है, तो आपका अक्षय पुण्य भी यहाँ नष्ट हो जाएगा। क्योंकि आप अधर्म से जुड़ा काम कर रहे हैं; आप सीधे दूसरे के प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। में हस्तक्षेप कर रहे हैं। सीधे करने के बदले — इसीलिए सिद्ध ऋषि-मुनि, देखिए वे मंत्र का कितना प्रयोग करते हैं। बहुत कम। हर बात में वे केवल भगवान का नाम लेते हैं, उनकी शरणागति लेते हैं: भगवान, आप देखिए; जगदंबा, आप देखिए, मैया, आपकी इच्छा पूरी हो। वे कष्ट सहते और रोते रहेंगे, पर जल्दी प्रयोग नहीं करेंगे। वे निर्धन हैं, दरिद्र हैं, पर सीधे प्रयोग नहीं करेंगे। वे जानते हैं कि यह दरिद्रता हमारा पुराना प्रारब्ध है; यदि यह कट जाए तो अच्छा — पर यदि हम प्रयोग करेंगे, तो प्रयोग करने के बाद फिर एक नया कर्म बनता है, और फिर उसे भुगतना पड़ता है। वे कहते हैं कि उससे अच्छा है कि इसी को निपटा लें।
क्या बिना माला के उँगलियों पर जप करने से मंत्र सिद्ध होता है?
बिना माला के जप
यह पूछे जाने पर कि जब माला न हो तो उँगलियों पर किया गया मंत्र जप क्या सिद्ध नहीं होगा, वक्ता उत्तर देते हैं कि नहीं — ऐसा नहीं है। पर वे जोड़ते हैं कि बिना माला का जप ऐसा विषय है जो थोड़ा व्यावहारिक रूप से भीतर जाने पर अलग हो जाता है।
यह पूछे जाने पर कि जब माला न हो, तो उँगली पर किया गया मंत्र जप क्या सिद्ध नहीं होगा, वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं। पर, वे कहते हैं, बिना माला का जप ऐसा विषय है जो थोड़ा व्यावहारिक रूप से उसमें जाने पर अलग हो जाता है।
क्या दीवाली के पाँच दिनों में दुर्गा या भैरव का यंत्र बनवाया जा सकता है?
शुभ दिन पर पीठ यंत्र बनवाना
पीठ यंत्र के बारे में और उसे अच्छे दिन करने के बारे में एक वीडियो में कही बात के संदर्भ में यह पूछे जाने पर कि क्या दीवाली के पाँच दिनों में दुर्गा जी और भैरव जी का यंत्र बनवाया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं: बिलकुल, बनवाइए। शुभ दिन पर आप अवश्य कर सकते हैं।
एक श्रोता वक्ता द्वारा एक वीडियो में पीठ यंत्र के बारे में कही बात का, और उनके इस कथन का उल्लेख करते हैं कि यह अच्छे दिन करना चाहिए, और पूछते हैं कि क्या दीवाली के पाँच दिनों में दुर्गा जी और भैरव जी का यंत्र बनवाया जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं, बिलकुल, बनवाइए। शुभ दिन पर आप अवश्य कर सकते हैं।
यदि माँ को प्रतिदिन चढ़ाया गया भोग गाय को नहीं खिलाया गया तो?
अनार का भोग और जिसे खिलाने का काम सौंपा गया
एक श्रोता जो प्रतिदिन सहस्रनाम पाठ करती हैं और अनार का भोग चढ़ाती हैं, उसे गाय को खिलाने ले गईं, और केवल एक खिलाने दिया गया, वहाँ की महिला ने कहा कि बाकी वे बाद में खिला देंगी। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह प्रश्नकर्ता की चिंता नहीं है — जिसे दिया, उसने समझ लिया। यदि उन्होंने नहीं खिलाया तो यह उनकी बात है और प्रश्नकर्ता को कोई दोष नहीं लगेगा; और यदि उन्होंने स्वयं खा लिया तो भी कोई कठिनाई नहीं, उन्हें गाय का पुण्य मिलेगा।
श्रोता बताती हैं कि प्रतिदिन सहस्रनाम पाठ होता है जिसमें माँ को अनार का भोग चढ़ाया जाता है; वे उसे गौ माता को खिलाने गईं और उन्हें केवल एक खिलाने दिया गया, वहाँ की महिला ने कहा कि बाकी वे बाद में खिला देंगी। वक्ता उन्हें नाम से संबोधित करते हुए, और यह बताते हुए कि उन्होंने पिछली बार भी यही पूछा था, उत्तर देते हैं कि यह आपकी चिंता नहीं है। जिसे दिया, उसने समझ लिया। यदि उन्होंने नहीं खिलाया, तो वह उनकी अपनी बात है और आपको कोई दोष नहीं लगेगा। और यदि उन्होंने खिलाया, तो वे स्वयं नहीं खाएँगी; और यदि स्वयं खा भी लें तो भी कोई कठिनाई नहीं — उन्हें भी पुण्य मिलेगा, गौ माता का पुण्य।
क्या बत्तीस नामों का पाठ मन में किया जा सकता है?
दुर्गा बत्तीस नामावली का मानसिक पाठ, बैठकर
यह पूछे जाने पर कि बत्तीस नामों का मंत्र पाठ मन में किया जा सकता है या बोलकर करना चाहिए, वक्ता कहते हैं कि मन में अवश्य किया जा सकता है, कोई कठिनाई नहीं — पर बैठकर करें। चलते-फिरते करें तो बात थोड़ी अलग है, क्योंकि उसमें उग्रात्मक बीज अधिक है; भगवती दुर्गा के मंत्र उग्र हैं।
यह पूछे जाने पर कि बत्तीस नामों का मंत्र पाठ मन में किया जा सकता है, या बोलकर करना चाहिए, वक्ता उत्तर देते हैं कि मन में किया जा सकता है। पर यदि आप चलते-फिरते करें, तो थोड़ी सावधानी चाहिए, क्योंकि उसमें उग्रात्मक बीज अधिक है; भगवती दुर्गा के मंत्र आदि उग्र हैं। तो बैठकर कीजिए। आप मन में भी बिलकुल कर सकते हैं, इसमें कोई कठिनाई नहीं।
साधना का आसन कैसे धोना चाहिए?
पहली धुलाई सादे पानी में, और साधना के बीच कभी न धोएँ
वक्ता कहते हैं कि साधना का आसन धोया जा सकता है। पहली बार धोते समय उसे साबुन और डिटर्जेंट से न धोएँ — बाल्टी में पानी लें, पुराना आसन उसमें डालें और उसी बाल्टी में पूरा निचोड़ लें। वह पानी किसी पौधे में डाल दें, और उसके बाद ठीक से धोएँ। साधना चलते समय, बीच में आसन नहीं धोना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि साधना का आसन धोया जा सकता है। पहली बार धोते समय उसे साबुन और डिटर्जेंट से न धोएँ। किसी बाल्टी में साफ़ पानी लें, पुराना आसन उसमें डालें, और उसी बाल्टी में उसे पूरा निचोड़ लें। अब जो पानी निकले — उसे किसी पौधे में डाल दें। और उसके बाद, फिर उसे अच्छे से धोएँ। साधना चलते समय, बीच में आसन नहीं धोना चाहिए।
क्या इष्ट की पूजा महीने के साथ बदलती है?
इष्ट वही रहते हैं; महीने के देवता जोड़े जाते हैं
वक्ता कहते हैं कि महीना कोई भी हो, आपकी अपनी शक्ति वही रहनी चाहिए। यदि आप नारायणी की, जगदंबा की सेवा करते हैं, तो हर महीने उन्हीं की पूजा होगी। साथ में, अपने सामर्थ्य के अनुसार उस महीने के देवताओं का पूजन भी करें। श्रावण में रुद्राभिषेक, शिव जी की पूजा और नित्य अभिषेक अवश्य होते हैं, पर साथ में भगवती की पूजा भी होगी — वे प्रधान हैं और छोड़ी नहीं जा सकतीं।
वक्ता कहते हैं कि महीना कोई भी हो, शक्ति आपकी अपनी होनी चाहिए। यदि आप नारायणी की सेवा करते हैं, यदि जगदंबा की सेवा करते हैं, तो हर महीने उन्हीं की पूजा होगी। हाँ — साथ में, अपने सामर्थ्य के अनुसार उस महीने के देवताओं का पूजन भी कीजिए। जब श्रावण चलता है, तो रुद्राभिषेक और शिव जी की पूजा, नित्य अभिषेक आदि अवश्य होते हैं; पर साथ में भगवती की पूजा भी होगी। वे प्रधान हैं; उन्हें कैसे छोड़ा जा सकता है? तो कार्तिक मास में भी नारायण की पूजा ठीक से। नारायण को क्या प्रिय है? नारायण स्तुति प्रिय हैं। तो नारायण के लिए स्तुति कीजिए: सहस्रनाम कीजिए, शतनाम से कीजिए, उनकी जो भी स्तुति आपको अच्छी लगे वह कीजिए, जगज्जालपालं, अधरं मधुरं कीजिए। वे स्तुति प्रिय हैं।
क्या चल रहा अनुष्ठान कार्तिक में भी जारी रहता है?
इष्ट का अनुष्ठान चलता रहे, साथ में तुलसी पूजा और दीपदान
वक्ता कहते हैं कि महीने के देवता के साथ-साथ अपने इष्ट आराध्य को, जिनका आप जप-तप करते हैं, जारी रखिए — अनुष्ठान उन्हीं का चलेगा। और तुलसी जी की पूजा, दीपदान आदि सब करना आवश्यक है; वह सब करते रहिए।
वक्ता कहते हैं कि उसके साथ, आपके जो भी इष्ट आराध्य हैं, जिनका आप जप-तप करते हैं, उन्हें जारी रखिए; अनुष्ठान उन्हीं का होगा। और तुलसी जी की पूजा, दीपदान आदि — वह सब करना आवश्यक है। वह सब करते रहिए।
गायत्री मंत्र का अधिकार किसे है?
यज्ञोपवीत संस्कार से गायत्री; दूसरों के लिए पौराणिक गायत्री
वक्ता कहते हैं कि केवल इतना समझना है — किसे कौन-सा अधिकार है। जहाँ यज्ञोपवीत संस्कार हो रहा है, वहाँ गायत्री आदि का अधिकार मिलता है; यदि आप यज्ञोपवीत संस्कार के अधिकारी हैं तो वहाँ आपको गायत्री दी जाती है। बाकी सब पौराणिक गायत्री आदि करें, या पंचाक्षरी, लघु गायत्री करें।
वक्ता प्रश्नकर्ता को संबोधित करते हुए कहते हैं कि केवल इतना समझिए: किसे कौन-सा अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। है। जहाँ यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। संस्कार हो रहा है, वहाँ आपको गायत्री मंत्र आदि का अधिकार मिलता है। यदि आप यज्ञोपवीत संस्कार के अधिकारी हैं, तो वहाँ आपको गायत्री दी जाती है। बाकी सब पौराणिक गायत्री आदि करें। या पंचाक्षरी मंत्र, लघु गायत्री करें।
जहाँ पति पूरी तरह नशे का आदी हो और परिवार की उपेक्षा करे, वहाँ मंत्र उपाय की सीमाएँ हैं।
पूरी लत के लिए मंत्र उपाय की सीमाएँ
एक श्रोता, जिनके पति रोज़ शराब पीते हैं, बच्चों का ध्यान नहीं रखते, सरकारी नौकरी में हैं, घर में पैसे नहीं देते और बहुत कलह करते हैं, के पूछने पर वक्ता कहते हैं कि शराब का पूरा विषय वे अलग से एक लाइव और एक वीडियो में बताएँगे। अभी वे केवल इतना कहते हैं: होलिका के समय दिए कुछ प्रयोग कई लोगों के लिए काम आए, पर जो पूरी लत में पड़ चुके हैं उनके लिए यह तुरंत संभव नहीं — मंत्र बल से छूट भी जाए तो शरीर कष्ट पाने लगता है, एक आदत जाती है और दूसरी पकड़ लेती है।
प्रश्नकर्ता को नाम से संबोधित करते हुए वक्ता उनकी बताई बात दोहराते हैं: कि वे रोज़ पीते हैं, बच्चों का ध्यान नहीं रखते, सरकारी नौकरी में हैं, घर में पैसे नहीं देते और बहुत कलह करते हैं। वे कहते हैं कि इस विषय पर वे अलग से एक लाइव और एक वीडियो में पूरी चर्चा करेंगे — शराब का पूरा विषय। अभी वे केवल इतना कहेंगे: कई लोगों के लिए शराब का विषय सँभला है, होलिका के समय कुछ प्रयोग दिए गए थे और कई लोगों का काम हुआ। पर जो पूरी लत में पड़ चुके हैं, उनके लिए यह तुरंत संभव नहीं। बहुत बड़ी कठिनाई आती है: मंत्र बल से छूट भी जाए, तो उनके शरीर में कठिनाई शुरू हो जाती है — आप जानते हैं शराब छोड़ने से शरीर में क्या समस्याएँ आती हैं। एक छूटेगी और दूसरी पकड़ लेगी, और फिर वे कहेंगे कि आपके कहने से ऐसा हुआ। तो यह विषय थोड़ा अलग हो जाता है और श्रेणी के अनुसार बताया जाएगा।
क्या घर पर माला मंत्र का हवन किया जा सकता है?
घर पर माला मंत्र और नवार्ण का हवन
माला मंत्र की हवन विधि के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह घर पर नहीं करना है — वे सदा इसके लिए मना करते हैं। वहाँ माला मंत्र दुर्लभतम स्थिति में किया जाता है, यदि बात व्यक्तिगत रूप से हो रही हो; यदि उन्होंने किसी को ऐसे-ऐसे करने को कहा है तो वह अलग बात है, पर यह सबके लिए नहीं है। नवार्ण मंत्र के लिए घर पर हवन करने के बारे में भी वे यही कहते हैं।
माला मंत्र की हवन विधि के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि भाई, यह घर पर नहीं करना है — वे सदा इसके लिए मना करते हैं। वहाँ माला मंत्र दुर्लभतम प्रकार का है; यदि बात व्यक्तिगत रूप से हो रही हो, और उन्होंने किसी से कहा हो कि हाँ, यह ऐसे-ऐसे करना है, तो वह अलग बात है। यह सबके लिए नहीं है। वे कहते हैं कि नवार्ण मंत्र के लिए घर पर हवन आदि करने पर भी यही लागू होता है।
लोग क्यों चाहते हैं कि प्रामाणिक लोग उनकी अपनी पद्धति से सहमत हों?
अपनी गलत पद्धति के लिए प्रामाणिकता खोजना
वक्ता एक श्रोता की बात से सहमत होते हैं: लोग गलतियाँ करते हैं और प्रामाणिक लोगों से यह भी सुनना चाहते हैं कि वे गलती नहीं कर रहे, ठीक कर रहे हैं — ठीक इसलिए कि उनके गलत कर्मों को भी प्रामाणिकता मिल जाए। वे इस शिकायत का उल्लेख करते हैं कि क्योंकि वे किसी मंत्र विधि के बारे में वह नहीं कह सकते जो लोग सुनना चाहते हैं, उनके चैनल के फ़ॉलोअर बहुत कम हैं और दिन-ब-दिन कम होते जाते हैं।
वक्ता एक श्रोता से सहमत होते हुए कहते हैं कि लोग गलतियाँ करते हैं, और प्रामाणिक लोगों से यह भी सुनना चाहते हैं कि वे गलती नहीं कर रहे बल्कि ठीक कर रहे हैं। बिलकुल सही — ताकि उनके गलत कर्मों को भी प्रामाणिकता मिल जाए। श्रोता ने कहा था कि यह मन को चुभता है। वे अपनी दृष्टि से बात रखते हैं: यदि हम किसी मंत्र विधि के बारे में वह नहीं कह सकते जो लोग सुनना चाहते हैं, तो इसी कारण हमारे चैनल के फ़ॉलोअर बहुत कम रहते हैं, हर दिन कम, और पहले से कम होते जाते हैं। और फिर शिकायत आती है: अरे, ये लोग हर बात में डराते हैं।
वक्ता कोई दीक्षा नहीं देते, और लोगों से कहते हैं कि अपने लिए योग्य गुरु खोजें।
वे कहते हैं कि वे दीक्षा बिलकुल नहीं देते, और योग्य गुरु खोजने को कहते हैं
वक्ता पूछते हैं कि डराकर उन्हें क्या मिलता है — क्या आप डर से पैसे दे रहे हैं? जिस ढर्रे का आरोप है, वह यह है कि किसी से कहा जाए कि बिना दीक्षा मंत्र न करो और आकर वक्ता से दीक्षा लो। वे कहते हैं कि उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया: वे कहते हैं कि वे कभी दीक्षा नहीं देंगे, बिलकुल नहीं देते, और लोग योग्य गुरु खोजकर दीक्षा लें और करें। वे यह अवश्य कहते हैं कि देव दीक्षा चाहिए, पर कभी नहीं कहा कि उनके पास आओ।
वक्ता कहते हैं कि यह बात आप गलत समझते हैं: हम डराते नहीं। डराकर हमें क्या मिलता है? क्या आप डर से हमें पैसे दे रहे हैं? जब आप कहते हैं कि हम डराते हैं — डराकर क्या हम आपके कंधे या सिर पर बंदूक रखकर कहते हैं कि यह मंत्र जप मत करो, हमें भेज दो? ढर्रा यह होता है: यदि बिना दीक्षा लिए यह मंत्र जप करोगे, इस मंत्र का जप करोगे, तो संकट होगा, इसलिए दीक्षा लो, मेरे पास आओ। वे कहते हैं, यह अपने लाभ के लिए डराना होता। क्या हमने कभी ऐसा किया है? हम कहते हैं कि हम कभी दीक्षा नहीं देंगे; हम देते ही नहीं। योग्य गुरु खोजिए, दीक्षा लीजिए, कीजिए। हाँ, हम यह अवश्य कहते हैं कि देव दीक्षा चाहिए — और यह भी नहीं कि मेरे पास आकर मुझसे लो। भाई, पूरा विषय चैनल पर उपलब्ध है। देखिए, एक-एक बात कीजिए। यदि काशी जाकर करना है, गंगा जी जाकर करना है, तो एक-एक सामग्री से लेकर बाकी सब कुछ उपलब्ध है; हमसे संपर्क करने की बिलकुल आवश्यकता नहीं। यदि आप हमें गाली देते हैं, देते रहिए — आप एक व्यक्ति को गाली दे रहे हैं। विधान के बारे में आप टेढ़ा नहीं बोल सकते।
किसी विधान को डराने का साधन कहने में क्या हानि है?
विधान शास्त्र-सम्मत है; एक नकारात्मक श्रोता दस और को नकारात्मक बनाता है
वक्ता कहते हैं कि विधान विधि के अनुसार है — जाकर गंगा जी पर कीजिए; भगवान ने समझा और आपने समझा, और उसी में आपका कल्याण है। यदि आपको उनसे व्यक्तिगत समस्या है, तो रखिए। पर जब लोग विधान के बारे में कहते हैं कि यह डराना है, तो बहुत गलत बोल रहे हैं। वे कहते हैं कि वे लोगों को जगा रहे हैं ताकि उनके भीतर चेतना बैठे और जीवन में कभी कोई कठिनाई न आए; यदि आपको कठिनाई है तो यह सनातन की अपनी हानि है, क्योंकि जो नकारात्मक होता है वह दस और को नकारात्मक बनाता है।
वक्ता कहते हैं कि विधान विधि के अनुसार है। जाइए, गंगा जी पर कीजिए। भगवान ने समझा और आपने समझा; उसी में आपका कल्याण है। यदि आपको उनसे समस्या है, तो समस्या रखिए; उनसे व्यक्तिगत समस्या रखिए, उसमें कोई भारत-पाकिस्तान वाली कठिनाई नहीं। पर जब वे विधान के बारे में बोलते हैं और कहते हैं कि लोग डरा रहे हैं — वे कहते हैं कि यह बहुत गलत बोला गया है। हम आपको जगा रहे हैं, ताकि आपके भीतर चेतना बैठ जाए; हम ऐसा इसलिए करते हैं कि आपके जीवन में कभी कोई कठिनाई न आए। यदि आपको कठिनाई है, तो यह सनातन की अपनी हानि है। यदि आप नकारात्मक होंगे, तो दस लोगों को नकारात्मक बनाएँगे।
जब किसी की अपनी उपासना फल देती है, तो वह क्या फैलाता है?
लोग वही फैलाते हैं जिसकी वे उपासना करते हैं — पिशाच शक्तियाँ भी
वक्ता तर्क देते हैं कि यदि कोई व्यक्ति सही, तंत्रोक्त विधान से दीपदान करता है और उसके घर में सब अच्छा चलता है, तो वह दस और लोगों को बताएगा और केवल भला करेगा — किसी को हानि नहीं पहुँचाएगा। जो जिसकी उपासना कर रहा है, वह उससे मिलने वाला लाभ फैला रहा है: जिसकी नौकरी किसी बाबा की उपासना से लगती है वह उसे फैलाता है; और जो मसानी आदि के नाम पर पिशाच शक्तियों की उपासना कर रहे हैं, उन्हें बड़े-बड़े नाम दे रहे हैं, वे वही फैला रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि अब यदि कोई व्यक्ति सही विधान से जुड़ा दीपदान कर रहा है, तंत्रोक्त विधान से दीपदान कर रहा है, और उसके घर में सब अच्छा चल रहा है, तो वह दस और लोगों को बताएगा और केवल ठीक ही करेगा। वह किसी को कोई हानि नहीं पहुँचाएगा। जो जिसकी उपासना कर रहा है, वह उससे मिलने वाला लाभ फैला रहा है — जिस आदमी की नौकरी किसी बाबा की उपासना से लगती है, वह उस बाबा को फैलाता है, कहते हुए कि हाँ भाई, उनकी उपासना करो, उनकी उपासना करो। और जो मसानी के नाम पर, इस-उस के नाम पर पिशाचों की उपासना कर रहे हैं, पिशाची शक्तियों की उपासना कर रहे हैं और उन्हें बड़े-बड़े नाम दे रहे हैं — वे लोग वही फैला रहे हैं। तो यह देखिए: जब सही बात बताई जा रही है, और उससे आपका भला होता है, तो आप केवल सही बात बताएँगे — कि हनुमान जी की पूजा इस प्रकार, इस तंत्रोक्त विधान से करनी चाहिए, और इसमें आपको कोई दोष नहीं लगेगा। आप यहाँ किसी का सिर काटकर चढ़ाने नहीं जा रहे। यह एक साधारण बात है।
आज किस मंत्र का सबसे अधिक दुरुपयोग हो रहा है?
नवार्ण मंत्र, जो बिना प्रणव और बिना गुरु उपदेश के सिखाया जा रहा है
वक्ता कहते हैं कि आज जिन मंत्रों का सबसे अधिक दुरुपयोग हो रहा है, उनमें नवार्ण मंत्र सबसे आगे है। कुछ चैनल केवल उसी मंत्र पर आधारित हैं, उनके हर दो में से एक वीडियो उसी पर है। आजकल गीता प्रेस गोरखपुर का संदर्भ दिया जा रहा है कि वहाँ लिखा है कि जप बिना प्रणव के करें — पर, वे पूछते हैं, वहाँ कहाँ लिखा है कि बिना गुरु उपदेश के आप मंत्र सिद्ध कर सकते हैं, उसका जप कर सकते हैं, और मंत्र का अधिकार पा सकते हैं?
देवी अथर्वशीर्ष किन दो मंत्रों का पूरा वर्णन करता है?
पंचदशी और नवार्ण — अथर्वशीर्ष के दो मंत्र
वक्ता कहते हैं कि पहले के समय में बातें इतनी गुप्त रखी जाती थीं कि किसी को पता ही नहीं था कि मंत्र क्या होता है, और आज इतना प्रचार हो गया है कि लोगों को लगता है मंत्र कुछ भी नहीं। वे नवार्ण को मंत्रराज कहते हैं, जिसे सब मंत्रों का राजा कहा गया है। भगवती के अथर्वशीर्ष में — वह एक अथर्वशीर्ष जिससे अकेले पाँचों अथर्वशीर्षों का फल मिलता है — केवल दो मंत्रों का पूरा वर्णन दिया गया है: भगवती राजराजेश्वरी, माँ त्रिपुरसुंदरी, माँ जगदंबा की पंचदशी, और नवार्ण मंत्र।
वक्ता कहते हैं कि पहले के समय में यही कारण था कि बातें इतनी गुप्त रखी जाती थीं कि किसी को पता ही नहीं था कि मंत्र क्या होता है। और वर्तमान समय में इसका इतना प्रचार हो गया है कि लोगों को अब लगता है कि मंत्र कुछ भी नहीं है। भाई, इस मंत्र को मंत्रराज कहा गया है। इसे सब मंत्रों का राजा कहा गया है। और इस मंत्र के बारे में, देव अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है। में — भगवती का अथर्वशीर्ष, वह एक अथर्वशीर्ष जिससे अकेले पाँचों अथर्वशीर्षों का फल मिलता है — उस अथर्वशीर्ष में केवल दो मंत्रों के बारे में पूरा वर्णन दिया गया है। पहला मंत्र भगवती राजराजेश्वरी, माँ त्रिपुरसुंदरी, माँ जगदंबा की पंचदशी है, और दूसरा मंत्र नवार्ण मंत्र है। और इन दोनों में, पंचदशी भी खतरनाक ढंग से चल रही है, उसे भी लोग सिखाते फिर रहे हैं; और नवार्ण के बारे में, कि यदि आप कुछ आगे के स्तर के साधक हैं तो नवार्ण कीजिए, बिना प्रणव के कीजिए — नवार्ण क्या है, यह है नवार्ण, बहुत आसान है। टीवी धारावाहिकों में महामृत्युंजय मंत्र और नवार्ण मंत्र की धज्जियाँ उड़ा दी गई हैं; कोई तांत्रिक कोई तंत्र क्रिया करता है तो नवार्ण मंत्र से क्रिया कर रहा होता है।
धारावाहिकों में नवार्ण मंत्र के बारे में क्या दिखाया जाता है?
चामुंडा के नाम से मारण, और जो इसे ठीक से समझाए उसे गाली
वक्ता कहते हैं कि दिखाया जा रहा है कि नवार्ण मंत्र में चामुंडा के नाम से लोगों को मारा जाता है। वे कहते हैं कि इस मंत्र से आप अपनी उतनी हानि कर रहे हैं जितनी कोई और नहीं करेगा। और जब कोई यही बात ठीक से समझाता है, तो लोग उसे भरपूर गाली देते हैं — कि वह पाखंडी है, धोखेबाज़ है, लूट रहा है, डरा रहा है, कि डरने की कोई बात नहीं और माँ को माँ मानकर करना चाहिए।
उनका क्या जो कहते हैं कि दस साल से कर रहे हैं और कुछ नहीं हुआ?
कुछ नहीं हुआ और कुछ नहीं होगा — देवी उपनिषद ने पहले ही बता दिया है
जो कहते हैं कि माँ को माँ मानकर करो, कुछ नहीं होगा, हमने दस साल किया और कुछ नहीं हुआ, उन्हें वक्ता उत्तर देते हैं: बिलकुल ठीक, कुछ नहीं हुआ, और आगे भी कुछ नहीं होगा। दस साल की जगह दस जन्म कीजिए और कुछ नहीं होगा। जब अथर्वशीर्ष जैसी चीज़ में, उपनिषद में, देव उपनिषद में बात की चर्चा हो चुकी है और उसका पूरा विस्तृत विषय दिया गया है, तो बात सीधी है।
वे कहते हैं, माँ को माँ मानकर करो और कुछ नहीं होगा — हम दस साल से कर रहे हैं और कुछ नहीं हुआ। वक्ता उत्तर देते हैं, बिलकुल ठीक, कुछ नहीं हुआ; और आगे भी कुछ नहीं होगा। दस साल की जगह दस जन्म कीजिए और कुछ नहीं होगा। और, भाई, बात सीधी है: जब किसी विषय की चर्चा अथर्वशीर्ष जैसी चीज़ में, उपनिषद में, देव उपनिषद में हो चुकी है, जब वहाँ हो चुकी है, और उसका पूरा विस्तृत विषय बताया गया है — तो बात वहीं तय हो जाती है।
सिद्ध कुंजिका कैसे बाँटी जा रही है?
सिद्ध कुंजिका करो — न विधान, न आसन, न वस्त्र, न दिशा
वक्ता पूछते हैं कि लोग सिद्ध कुंजिका को क्या समझते हैं: सिद्ध कुंजिका करो, सिद्ध कुंजिका करो — यह किसकी है, क्यों है, कैसे करनी है, इसका विधान क्या है, करने से क्या होगा? इससे रत्ती भर फ़र्क नहीं पड़ता। लिखा है सिद्ध कुंजिका, यानी सिद्धि मिलेगी, तो करो। और बस इतना ही है: जप करो, जितना करना है करो, जप के बाद कोई विषय ही नहीं — कौन-सा आसन, कौन-सा वस्त्र, कौन-सी दिशा, कुछ भी नहीं।
वक्ता पूछते हैं, आप सिद्ध कुंजिका को क्या समझते हैं — सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् करो, सिद्ध कुंजिका करो। सिद्ध कुंजिका किसकी है? क्यों है? कैसे करनी है? विधान क्या है, और करने से क्या होगा? रत्ती भर फ़र्क नहीं पड़ता। लिखा है सिद्ध कुंजिका, यानी सिद्धि मिलेगी, तो करो। बस। और इतना काफ़ी है: जप करो। जप के बाद कोई विषय ही नहीं। जप करो, जितना करना है करो, जप करो। कौन-सा आसन, कौन-सा वस्त्र, कौन-सी दिशा — यह कुछ नहीं करना; माँ को माँ मानकर जप करो।
जो माँ को माँ मानकर करना चाहते हैं, उन्हें इसके बदले क्या करना चाहिए?
दुर्गा नाम का जप — प्रतिदिन दस हज़ार, जैसा मुंडमाला तंत्र बताता है
वक्ता कहते हैं कि यदि माँ को माँ मानकर जप करना है, तो स्वयं दुर्गा जी के नाम का जप कीजिए। मुंडमाला तंत्र में पूरा वर्णन दिया गया है कि दुर्गा नाम के जप से क्या होता है: दिन-रात दुर्गा नाम जपिए। वे जोड़ते हैं कि एक श्रोता ने उन्हें यह बात भेजी थी कि देवी साधक को प्रतिदिन दुर्गा नाम का दस हज़ार — एक अयुत — जप करना चाहिए, उसका पूरा माहात्म्य बताया गया था, और पूछते हैं कि लोग उसका प्रचार क्यों नहीं करते।
वक्ता कहते हैं कि तो यदि माँ को माँ मानकर जप करना है, भाई, तो स्वयं दुर्गा जी के नाम का जप कीजिए। मुंडमालन तंत्रश्मशान से संबंधित अनुष्ठानों का वर्णन करने वाला एक उन्नत तांत्रिक ग्रंथ। में पूरा वर्णन दिया गया है कि दुर्गा जी के नाम के जप से क्या होता है। दिन-रात दुर्गा नाम जपिए। कीजिए — दुर्गा दुर्गा दुर्गा दुर्गा कहिए। आप यह क्यों नहीं कहते कि प्रतिदिन दुर्गा नाम जपो? एक श्रोता ने उन्हें यह बात भेजी थी कि देवी साधक को हर दिन दुर्गा नाम का दस हज़ार — एक अयुत, यानी दस हज़ार — जप करना चाहिए, और उसका पूरा माहात्म्य बताया गया था। उन्होंने यह कहकर भेजा था कि उन्हें कहीं से मिला। वे कहते हैं कि वे इसे लोगों के पढ़ने के लिए ग्रुप में भेजेंगे, और पूछते हैं कि लोग उसका प्रचार क्यों नहीं करते।
जो सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि दीक्षा अनावश्यक है, शायद वे स्वयं दीक्षित हैं और दूसरों की हानि चाहते हैं।
शायद वे स्वयं दीक्षित हैं और आपकी हानि चाहते हैं
वक्ता कहते हैं कि जब आप बिना अधिकार के दूसरों से कहते हैं कि यह मंत्र करो, वह मंत्र करो, तो वास्तव में हानि आपकी नहीं है। जो चिल्लाते हैं कि उन्होंने कभी दीक्षा नहीं ली फिर भी किया और कोई हानि नहीं हुई, उनके बारे में वे कहते हैं: कौन जाने, शायद उसने दीक्षा ली हो और आपकी हानि चाहता हो, इसीलिए ऐसा कहता है। यह बात आपके मन में कभी नहीं आती। शायद वह जनेऊ पहनता हो, दीक्षा ली हो, और उसके गुरु ने उससे साधना ठीक से करवाई हो — और वह आपकी हानि चाहता हो।
वक्ता कहते हैं कि अनधिकृत होकर आप दूसरों से कहते हैं, यह मंत्र करो, वह मंत्र करो। सच में हानि आपकी नहीं है। जो चिल्लाते हैं कि उन्होंने दीक्षा नहीं ली फिर भी किया और कोई हानि नहीं हुई, हम उन्हें जाकर देखने वाले नहीं। तो कौन जाने — शायद उसने दीक्षा ली हो, शायद वह आपकी-हमारी हानि करना चाहता हो और इसीलिए ऐसा कहता हो। यह आपके मन में कभी नहीं आता। कोई वहाँ लिखता है कि हम प्रमाण से बोल रहे हैं, कि यह विषय यहाँ बताया गया है, कि दीक्षित होकर करना चाहिए; और वह कहता है कि ऐसा कुछ नहीं होता, हम दस साल से कर रहे हैं, ऐसी कोई कठिनाई नहीं आई, माँ को माँ मानकर करो। कौन जाने, शायद वह जनेऊ पहनता हो, दीक्षा ली हो, उसके गुरु ने उससे साधना ठीक से करवाई हो — और वह आपकी हानि चाहता हो।
कोई दूसरे साधक को भटकाना क्यों चाहेगा?
वैमनस्य — यह डर कि आप उससे आगे निकल जाएँगे
वक्ता कहते हैं कि वैमनस्य, यानी शत्रुता का भाव, लोगों में बहुत आसानी से आता है: यह डर कि यह मंत्र करके वह मुझसे आगे न निकल जाए, कि वह इतना पूछ रहा है और इतना कर लेगा। वे कहते हैं कि यह संभावना भी है, और इस पर कोई कभी विचार नहीं करता — केवल यही विचार दिखता है कि उन्हें रोका जा रहा है।
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि वैमनस्य, शत्रुता का भाव, लोगों के भीतर बहुत आसानी से आता है: भाई, यह मंत्र करके यह मुझसे आगे न निकल जाए। यह इतना पूछ रहा है, इतना कर लेगा। यह भी विषय हो सकता है। इस पर कोई कभी विचार ही नहीं करता। केवल यही विचार दिखता है कि उन्हें रोका जा रहा है।
पंचाक्षरी मंत्र के बारे में सार्वजनिक रूप से क्या कहा जाता है?
लोकप्रिय उत्तर — यह शिव का है, कोई दोष नहीं लगता, बस करो
वक्ता लोकप्रिय स्वर को यह कहते हुए बताते हैं कि पंचाक्षरी के लिए लोगों को रोका जा रहा है — बेटा, कुछ नहीं होता, पंचाक्षरी शिव जी का है, बाबा के मंत्र में कोई दोष नहीं लगता, बस करो। उनका उत्तर है: कभी शिव महापुराण उठाकर पढ़िए। इस पर उत्तर आता है, हम क्यों पढ़ें, पढ़ने से क्या होगा, जब बिना पढ़े हम इतने अमीर हो गए और करोड़ों फ़ॉलोअर हैं, तो पढ़कर क्या करेंगे?
वक्ता लोकप्रिय स्वर को यह कहते हुए बताते हैं कि पंचाक्षरी के लिए रोका जा रहा है — बेटा, कुछ नहीं होता। पंचाक्षरी मंत्र शिव जी का है; बाबा के मंत्र में कोई दोष नहीं लगता; बस करो। वे उत्तर देते हैं, कभी शिव पुराण उठाकर पढ़िए। और उत्तर आता है: हम क्यों पढ़ें? पढ़ने से क्या होगा? जब बिना पढ़े हम इतने अमीर हो गए, जब मेरे करोड़ों फ़ॉलोअर हैं, तो पढ़कर क्या करेंगे? वे कहते हैं, तो वे स्वयं डूबते हैं, और साथ में करोड़ों फ़ॉलोअरों को डुबो रहे हैं। यह कलियुग है। कलियुग फलेगा कैसे? यदि सब शास्त्रोक्त विधि को पकड़कर चलने लगें — देखो, लिखा है, देखो, लिखा है, ठीक करो, ठीक करो — तो भाई, कलियुग भी परेशान हो जाएगा।
शास्त्र क्या कहता है
The Śiva Purāṇa gives rules for the five-syllable mantra: received from a teacher, in a set form and count, which differ by varṇa, with the teacher setting the order for women.
17.129 also says anyone in need should always repeat it, so the text sets an order for the mantra without closing it to anyone.
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गुरूपदेशाज्जाप्यं वै ब्राह्मणानां नमोऽन्तकम्। पञ्चाक्षरं पञ्चलक्षमायुष्यं प्रजपेद्विधिः॥ १२२
ब्राह्मणोंके लिये गुरुके उपदेशके अनुसार जपने योग्य मन्त्र 'नमः'से अन्त होता है। आयुके लिये विधिपूर्वक पंचाक्षरका पाँच लाख जप करना चाहिये।
स्त्रीत्वापनयनार्थं तु पञ्चलक्षं जपेत्पुनः। मन्त्रेण पुरुषो भूत्वा क्रमान्मुक्तो भवेद् बुधः॥ १२३
स्त्रीत्वसे छूटनेके लिये फिर पाँच लाख जप करे। मन्त्रके प्रभावसे पुरुष होकर वह ज्ञानी क्रमसे मुक्त हो जाता है।
क्षत्रियः पञ्चलक्षेण क्षत्रत्वमपनेष्यति। पुनश्च पञ्चलक्षेण क्षत्रियो ब्राह्मणो भवेत्॥ १२४
पाँच लाख जपसे क्षत्रिय अपना क्षत्रियपन छोड़ देता है। फिर पाँच लाख जपसे वह क्षत्रिय ब्राह्मण हो जाता है।
मन्त्रसिद्धिर्जपाच्चैव क्रमान्मुक्तो भवेन्नरः। वैश्यस्तु पञ्चलक्षेण वैश्यत्वमपनेष्यति॥ १२५
जपसे उसे मन्त्रकी सिद्धि मिलती है और वह मनुष्य क्रमसे मुक्त हो जाता है। पाँच लाख जपसे वैश्य अपना वैश्यपन छोड़ देता है।
पुनश्च पञ्चलक्षेण मन्त्रक्षत्रिय उच्यते। पुनश्च पञ्चलक्षेण क्षत्रत्वमपनेष्यति॥ १२६
फिर पाँच लाख जपसे वह मन्त्र-क्षत्रिय कहलाता है। फिर पाँच लाख जपसे वह क्षत्रियपन भी छोड़ देता है।
पुनश्च पञ्चलक्षेण मन्त्रब्राह्मण उच्यते। शूद्रश्चैव नमोऽन्तेन पञ्चविंशतिलक्षतः॥ १२७
फिर पाँच लाख जपसे वह मन्त्र-ब्राह्मण कहलाता है। शूद्र भी 'नमः'से अन्त होनेवाले मन्त्रका पचीस लाख जप करके,
मन्त्रविप्रत्वमापद्य पश्चाच्छुद्धो भवेद् द्विजः। नारी वाथ नरो वाथ ब्राह्मणो वान्य एव वा॥ १२८
मन्त्र-ब्राह्मण बन जाता है, और फिर शुद्ध होकर द्विज हो जाता है। स्त्री हो या पुरुष, ब्राह्मण हो या कोई और,
नमोऽन्तं वा नमः पूर्वमातुरः सर्वदा जपेत्। तत्र स्त्रीणां तथैवोह्य गुरुर्निर्देशयेत्क्रमात्॥ १२९
जिसे आवश्यकता हो, वह 'नमः' अन्तमें या 'नमः' आरम्भमें लगाकर सदा जप करे। स्त्रियोंके लिये भी गुरु इसी प्रकार सोचकर क्रमसे मार्ग बताये।
आदि गुरु शंकराचार्य के समय कलियुग ने क्या कहा था?
पृथ्वी पर अवतारों से परेशान कलियुग
वक्ता बताते हैं कि आदि गुरु शंकराचार्य के समय कलियुग ने परेशान होकर कहा: महाराज, यदि आप लोग इसी तरह पृथ्वी पर अवतार लेते रहेंगे, तो कलियुग कैसा कलियुग, और धर्म के पैर किससे टूटेंगे — आप तो चारों पैर खड़े कर देंगे। तो, वे कहते हैं, यह भी कलियुग है, और उसका प्रभाव लोगों को मिल रहा है, तो वे अवश्य ऐसा करेंगे। यह भी जान लीजिए।
वक्ता बताते हैं कि शंकराचार्य जी के समय, आदि गुरु शंकराचार्य के समय, कलियुग ने परेशान होकर कहा: महाराज, यदि आप लोग इसी तरह पृथ्वी पर अवतार लेते रहेंगे, जब-तब, तो कलियुग कैसा कलियुग? धर्म के पैर किससे टूटेंगे? फिर तो आप लोग चारों पैर खड़े कर देंगे। तो यह कलियुग है, और उसका प्रभाव भी लोगों को मिल रहा है, तो वे अवश्य ऐसा करेंगे। यह भी जान लीजिए। वे कहते हैं कि इससे बचना है या नहीं, यह आपकी अपनी बुद्धि में है। यदि भगवती हमें इस स्थान से जोड़ रही हैं, इस स्थान पर ला रही हैं, तो वे इतना समझते हैं: कि माँ बुद्धि ठीक रख रही हैं। यदि हम करोड़ों फ़ॉलोअरों के पीछे, महीने में दस लाख की आय के पीछे, वीडियो वायरल होने के पीछे नहीं भाग रहे, यदि हमें इससे कोई मतलब नहीं कि लोग जिएँ या मरें — यदि कोई हमें गाली दे और फिर भी हम कहें, यह नहीं करना है, करना है तो ऐसे ही करना है, नहीं तो भाड़ में जाओ, हमें तुमसे कोई लेना-देना नहीं, जो गलती करनी हो करो।
क्या टेलीफ़ोन पर दी गई दीक्षा मान्य है?
मुफ़्त दीक्षा, दस हज़ार रुपये की दीक्षा, और डरावने नाम
वक्ता उनका वर्णन करते हैं जो इसके बदले लोगों से व्यक्तिगत संबंध बनाते हैं, सहमत होते हैं कि वे ठीक हैं — बिलकुल पंचाक्षरी करो, बिलकुल पंचदशी करो — और फ़ोन पर दीक्षा देते हैं। कोई मुफ़्त दीक्षा देता है; कोई कहता है, ठीक है, खुश रहो, दस हज़ार रुपये दो और हम दीक्षा देंगे। शांभवी दीक्षा, घोर दीक्षा, मालकांगनी के रस की दीक्षा — वे कहते हैं कि पता नहीं आजकल कौन-कौन सी दीक्षाएँ चल रही हैं, जो भी डरावना नाम लिखा जा सके उस नाम से दी जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि नहीं तो वे लोगों से ये व्यक्तिगत संबंध बनाते रहते हैं: हाँ, हाँ, आप ठीक बोल रहे हैं, बिलकुल पंचाक्षरी करो, बिलकुल पंचदशी करो। कोई आपको फ़ोन पर दीक्षा देता है। हम भी करते हैं। कोई मुफ़्त में दीक्षा दे देगा। ठीक है, खुश रहो — दस हज़ार रुपये दो और हम दीक्षा देंगे। यह दीक्षा दी जाएगी, शांभवी दीक्षा, घोर दीक्षा, मालकांगनी के रस की दीक्षा; पता नहीं आजकल कौन-कौन सी दीक्षाएँ चल रही हैं। जो भी डरावना नाम हो, वह लिखकर दीक्षा दे दो।
तीर्थ पर पूजा के पाँच सौ रुपये को लूट कहा जाता है, जबकि टेलीफ़ोन पर मंत्र के एक लाख को नहीं।
तीर्थ पर पाँच सौ रुपये लूट है; फ़ोन पर मंत्र के लिए एक लाख लूट नहीं
वक्ता कहते हैं कि यदि तीर्थ क्षेत्र में आपके नाम से पूजा-पाठ हो रहा है तो कहा जाता है कि आपको लूटा जा रहा है — 500, 1100, 2100 रुपये लूट है, बैंक बैलेंस बढ़ाए जा रहे हैं, पूजा में कोई खर्च नहीं हो रहा; तीर्थ में आपके नाम-गोत्र से की गई पूजा लूट है और आपको नहीं मिलेगी। पर फ़ोन पर दिए गए एक मंत्र के 15,000, 40,000, एक लाख लूट नहीं — और उससे सिद्धि मिलेगी, गुरु दूसरी ओर से आपके कान में मंत्र फूँकेंगे और देवी साक्षात प्रकट होकर कहेंगी, बोलो बेटा, मुझे क्यों बुलाया।
वक्ता कहते हैं कि यदि तीर्थ क्षेत्र में आपके नाम से पूजा-पाठ हो रहा है, तो उसमें आपको लूटा जा रहा है, है न? अब 500, 1100, 2100 रुपये लूट है, भाई; बैंक बैलेंस बढ़ाए जा रहे हैं। पूजा में कोई खर्च नहीं हो रहा, वह सब कुछ नहीं, वह लूट है। यदि तीर्थ पर आपके नाम और गोत्र से पूजा हो रही है, तो वह लूट है; आपको नहीं मिलेगी। पर एक मंत्र के लिए 15,000, 40,000, एक लाख हम आपसे लेंगे, और वह भी फ़ोन पर। उससे सिद्धि मिलेगी। उसमें आपको भला कहाँ लूटा जा रहा है; वहाँ गुरु जी इस ओर से फ़ोन पर आपके कान में मंत्र फूँकते हैं, और देवी साक्षात प्रकट होकर कहेंगी, बोलो बेटा, क्यों बुलाया। इतनी तीखी और खतरनाक सिद्धि है। वे कहते हैं, तो आप लोग उसी का आनंद लीजिए; वह मज़ा लीजिए।
शालिग्राम जी को कैसे रखना और उनकी सेवा कैसे करनी चाहिए?
नित्य अभिषेक और श्रृंगार, और तुलसी दल से कभी अलग नहीं
वक्ता कहते हैं कि शालिग्राम जी के लिए अलग वीडियो नहीं है, पर जैसे नर्मदेश्वर जी का नित्य नियम से अभिषेक और श्रृंगार होता है, वैसे ही शालिग्राम जी का भी नित्य श्रृंगार, पूजन और अभिषेक होगा — और उन्हें तुलसी दल से कभी अलग नहीं करना है। तुलसी दल सदा, प्रतिदिन, उन पर रहेंगे।
वक्ता कहते हैं कि शालिग्राम जी के लिए अलग वीडियो नहीं है। पर जैसे नर्मदेश्वर जी का अभिषेक और श्रृंगार नित्य नियम से होता है, वैसे ही शालिग्राम जी का भी नित्य श्रृंगार और पूजन होगा, और अभिषेक होगा। और उन्हें तुलसी दल से कभी अलग नहीं करना है। तुलसी दल सदा, प्रतिदिन, उन पर रहेंगे।
क्या घर के मुख्य द्वार पर गणपति की मूर्ति लगाई जा सकती है?
द्वार पर प्रतीक चिह्न, बैठे हुए गणपति नहीं
वक्ता कहते हैं कि मुख्य द्वार आदि पर गणपति जी की मूर्ति कभी नहीं लगानी है; प्रतीक चिह्न लगाया जाता है। आप घर के सामने ऐसे प्रतीक लगा सकते हैं — स्वस्तिक, या भैरव जी का त्रिशूल। पर मुख्य द्वार पर सजे हुए गणपति जी को न बिठाएँ। यदि आप वहाँ गणपति जी को बिठाते हैं, तो वहीं उनकी नित्य सेवा-पूजा की व्यवस्था करें। उनके अपने विचार में प्रतीक चिह्न सबसे अच्छा है।
वक्ता कहते हैं कि मुख्य द्वार आदि पर गणेश जी की मूर्ति कभी नहीं लगानी है; प्रतीक चिह्न लगाया जाता है। वे अभी हुए गणपति जी के अनुष्ठान का और उससे भेजे गए स्वस्तिकों का उल्लेख करते हैं: उसमें दस दिनों तक जप और हवन था और नौ कुंडों का एक वीडियो था, और उस वीडियो में देखा जा सकता है कि स्वस्तिक मेखलाओं पर कैसे रखे गए और उनका पूजन किया गया, और उसके बाद ही वे आपके पास गए। तो ऐसे प्रतीक आप अपने घर के सामने लगा सकते हैं — स्वस्तिक लगा सकते हैं, भैरव जी का त्रिशूल लगा सकते हैं। पर मुख्य द्वार पर सजे हुए गणपति जी को उस तरह न बिठाएँ। प्रतीक लगाइए। और यदि आप गणपति जी को बिठाते हैं, तो वहीं उनकी नित्य सेवा और पूजा की व्यवस्था कीजिए। वे कहते हैं, उनकी दृष्टि में प्रतीक चिह्न सबसे अच्छा है।
जब अनुष्ठान में बहुत बाधाएँ आएँ तो क्या करना चाहिए?
एक मास तक संकटनाशन गणपति स्तोत्र
यदि अनुष्ठान में बहुत अधिक बाधाएँ आ रही हैं, तो गणपति जी की पूजा बिलकुल आवश्यक है। कम से कम सवा महीने, या चतुर्थी से चतुर्दशी, या एक चतुर्थी से अगली चतुर्थी तक, कृष्ण पक्ष से शुक्ल पक्ष, या कृष्ण पक्ष से कृष्ण पक्ष, या शुक्ल पक्ष से शुक्ल पक्ष तक — यानी पूरा एक महीना — संकटनाशन गणपति स्तोत्र का पाठ करें। इससे अनुष्ठान की बाधाएँ और अड़चनें नष्ट होंगी।
वक्ता कहते हैं कि यदि अनुष्ठान में बहुत अधिक बाधाएँ आ रही हैं, तो गणेश जी की पूजा बिलकुल आवश्यक है। कम से कम सवा महीने, या चतुर्थी से चतुर्दशी, या चतुर्थी से अगली चतुर्थी तक, कृष्ण पक्ष से शुक्ल पक्ष, या कृष्ण पक्ष से कृष्ण पक्ष, या शुक्ल पक्ष से शुक्ल पक्ष तक — यानी पूरा एक महीना — संकट नाशन स्तोत्र, संकटनाशन गणपति स्तोत्र का पाठ कीजिए। इससे इस अनुष्ठान की बाधाएँ और अड़चनें नष्ट होंगी।
जब कोई भी बाधा अनुष्ठान रोके, तो सामान्य नियम क्या है?
बारह मूल नाम, प्रतिदिन एक पाठ, और कलौ चण्डीविनायकौ
जब भी अनुष्ठान में अत्यधिक बाधा आने लगे — किसी भी प्रकार की, धन से, शरीर से, रोग से, शत्रु से जुड़ी, जिससे आपका अनुष्ठान पूरा ही न हो पाए — तो सीधे गणपति जी को पकड़िए। सबसे श्रेष्ठ है संकटनाशन, उनके बारह मूल नाम, वह मंत्र जो प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् से शुरू होता है; प्रतिदिन उसका एक पाठ शुरू करें। इतना काफ़ी है: एक महीने के भीतर भगवान गणपति अपना पूरा प्रभाव देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब भी अनुष्ठान में अत्यधिक बाधा आने लगे — बाधा किसी भी प्रकार की हो, धन से जुड़ी, शरीर से जुड़ी, रोग से, शत्रु से, जिससे आपका अनुष्ठान पूरा ही न हो पाए — तो सीधे गणपति जी को पकड़िए, और उनमें सबसे श्रेष्ठ है संकटनाशन, जो उनके बारह मूल नाम हैं, मंत्र प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् आदि। प्रतिदिन उसका एक पाठ शुरू कीजिए। इतना बहुत है। एक महीने के भीतर भगवान गणपति अपना पूरा प्रभाव देते हैं। वे कहते हैं, कलौ चण्डीविनायकौ — कलियुग के लिए विनायक का यह नाम यूँ ही नहीं रखा गया।
क्या घर के मंदिर में दुर्गा की दो मूर्तियाँ रखी जा सकती हैं?
एक ही मंदिर में दुर्गा की पीतल की दो मूर्तियाँ
यह पूछे जाने पर कि क्या घर के मंदिर में दुर्गा माँ की दो मूर्तियाँ, दोनों पीतल की ली हुई, रखी जा सकती हैं और दोनों की पूजा हो सकती है, वक्ता उत्तर देते हैं कि रखी जा सकती हैं — दुर्गा जी के श्री विग्रह के मामले में कोई कठिनाई नहीं।
यह पूछे जाने पर कि क्या घर के मंदिर में दुर्गा माँ की दो मूर्तियाँ रखी जा सकती हैं, दोनों पीतल में ली हुई, और क्या दोनों की पूजा हो सकती है, वक्ता उत्तर देते हैं कि रखी जा सकती हैं। वे कहते हैं कि दुर्गा जी के श्री विग्रह के मामले में कोई कठिनाई नहीं है।
जहाँ किसी बात के लिए मना किया जा रहा हो, वहाँ उसे न करना उचित है।
जहाँ किसी बात की मनाही हो, वहाँ न करना ही अच्छा
वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि मना किया जा रहा है तो इसका अर्थ है कि नहीं करना है, और वही उचित होगा। विवाह के विषयों पर वे कहते हैं कि वे बहुत स्पष्ट बोलते हैं, विशेषकर स्त्रियों के लिए; पर फिर भी, वे जोड़ते हैं, यह आपकी अपनी व्यक्तिगत बात है।
वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि मना किया जा रहा है, तो इसका अर्थ है कि नहीं करना है; वही उचित होगा। वे कहते हैं कि विवाह आदि के लिए वे इस विषय पर बहुत स्पष्ट हैं, विशेषकर स्त्रियों के लिए। पर फिर भी, यह आपकी अपनी व्यक्तिगत बात है।
नवचंडी अनुष्ठान ऐसे कैसे करें कि वह बोझ न बने?
नौ सप्ताह में, रविवार से शनिवार, महाविद्या क्रम से नवचंडी
वक्ता कहते हैं कि नवचंडी कोई भी कर सकता है, और इसे महाविद्या क्रम से करें। वे ठाकुर प्रसाद द्वारा प्रकाशित श्री दुर्गा अर्चन पद्धति की ओर संकेत करते हैं, जिसमें यह विषय भी बताया गया है: यदि आप चाहें तो महाविद्या क्रम से नवचंडी अनुष्ठान नौ सप्ताह लेगा। आप रविवार को शुरू करेंगे और शनिवार को पूरा करेंगे, एक बार में एक चंडी, इस तरह नौ बार अनुष्ठान करते हुए। यह आसानी से होगा और बोझ नहीं बनेगा।
क्या शिवलिंग की पूरी परिक्रमा करने वाले को टोकना चाहिए?
आधी परिक्रमा, और क्यों न टोकें
एक श्रोता बताती हैं कि उन्होंने शिव मंदिर में शिवलिंग की पूरी परिक्रमा कर रही एक महिला से कहा कि आधी परिक्रमा की जाती है, और महिला ने उत्तर दिया कि वे सदा पूरी करते आए हैं और पूछा कि यह कहाँ से सीखा। वक्ता कहते हैं कि बिलकुल ठीक — वे पूरी करती हैं, पहले से करती आई हैं; प्रमाण दें तो भी वे कहेंगी कि आप बेकार बातें बता रही हैं। कहने की आवश्यकता नहीं। उन्हें अपनी पूजा करने दीजिए।
एक श्रोता बताती हैं कि आज एक शिव मंदिर में एक महिला शिवलिंग की पूरी परिक्रमा कर रही थीं, और उन्होंने उनसे कहा कि शिवलिंग की आधी परिक्रमा की जाती है; महिला ने उत्तर दिया कि वे सदा पूरी करते हैं, और पूछा कि यह कहाँ से सीखा। वक्ता कहते हैं, बिलकुल ठीक — आपने कहाँ से सीखा? वे पूरी करती हैं, वे शिव जी की पूरी परिक्रमा करती हैं, उन्हें वही करना है; वे पहले से ऐसा करती आई हैं। प्रमाण भी दें तो वे कहेंगी, कहाँ से बेकार बातें बता रही हो? हाँ, अपनी पूजा कीजिए। तो वह ठीक है, और कहना नहीं है। कोई आवश्यकता नहीं। आप किसी के भले के लिए बोल रही हैं, पर उन्हें लगता है कि आप उनसे अधिक विद्वान हो गईं, कि वे बचपन से शिव जी की पूजा करती आई हैं — वे वहीं आपको शाप दे सकती हैं। इसीलिए किसी से न बोलिए; छोड़ दीजिए।
एक नवचंडी में साकल्य के साथ वच की आहुति देने पर विवाद हुआ, और ग्रंथ इसका निर्णय करते हैं।
साकल्य के साथ वच चढ़ाने का विवाद, और उसका निर्णय करने वाले ग्रंथ
वक्ता बताते हैं कि एक नवचंडी या शायद शतचंडी अनुष्ठान में वच की आहुति पर चर्चा छिड़ गई — कि वच की आहुति साकल्य के साथ लेकर नहीं देनी चाहिए — और किसी ने पूछा कि यह कहाँ कहा गया है। वे कहते हैं कि जो पूछता है कहाँ कहा गया है, उसने कभी दुर्गा अर्चन पद्धति या भगवती दुर्गा के याग से जुड़े ग्रंथ नहीं देखे, न दुर्गा कल्पद्रुम या शारदा तिलक और वे स्थान जहाँ हविष्य आदि की चर्चा है, या फिर उसके गुरु जी ने उसे कभी नहीं बताया। क्यों नहीं देनी चाहिए, इसका कारण वहाँ स्पष्ट बताया गया है।
क्या किसी दूसरे के कर्मकांड को टोकना चाहिए भी?
टोकें तो चतुराई से; जहाँ अहंकार को चोट लगे, वहाँ छोड़ दें
वक्ता कहते हैं कि उनकी दृष्टि में ऐसी बात कहना ही उचित नहीं। उनकी कठिनाई यह नहीं होगी कि वे नहीं जानते थे और आप बता रहे हैं, बल्कि यह कि वे विद्वान हैं, उन्होंने इतने चंडी अनुष्ठान करवाए और किए और किसी ने कभी यह नहीं कहा। बात वहीं अटक जाती है, इसलिए बीच में बोलना ही नहीं है। यदि सुधार करना ही है, तो चतुराई से करें; यदि सामने वाले के अहंकार को चोट लगने लगे, तो छोड़ दें।
वक्ता कहते हैं कि उनकी दृष्टि में ऐसी बात बोलना भी उचित नहीं। यदि आप कहेंगे, तो उन्हें लगेगा — उनकी कठिनाई यह नहीं होगी कि वे नहीं जानते थे और आपने बताया। उनकी कठिनाई यह होगी: भाई, हम विद्वान हैं, हमने इतने चंडी अनुष्ठान करवाए हैं, किए हैं, और आज तक किसी ने यह नहीं कहा, तो इसने कैसे कह दिया? बात वहीं अटक जाती है। इसीलिए बीच में बिलकुल नहीं बोलना है। वे जोड़ते हैं कि कभी-कभी किसी क्षेत्र में पूजन करवाने जाने पर ऐसे पंडित जी लोगों से पाला पड़ता है कि लगता है — यदि मास्क पहनकर पूजा करने बैठते तो भीतर-भीतर हँस सकते थे। केवल स्वस्तिवाचन सुनकर लगता है कि पूजा हो गई और देवता प्रसन्न हो गए। हमारे साथ भी होता है। क्या किया जा सकता है? कहा नहीं जा सकता, क्योंकि यदि आप उन्हें स्वस्तिवाचन से समझाएँ तो यही मुद्दा उठता है: अच्छा, तो आप अधिक जानते हैं। तो भाई, आप ही खुश रहिए, यहाँ आप ही देवता हैं। वह आपका-हमारा विषय भी नहीं होना चाहिए। यदि सुधार करना है, तो चतुराई से करें; यदि सामने वाले के अहंकार को चोट लगने लगे, तो छोड़ दें। कुछ लोग विवशता में करते हैं, कुछ जान-बूझकर आदत बना लेते हैं; वहाँ आप कुछ नहीं कर सकते।
यदि दस रिश्तेदारों से अनुष्ठान करने को कहा और कुछ ने नहीं किया, तो क्या?
यदि दसों महालक्ष्मी अष्टकम् करते, तो सब करोड़पति बन जाते
एक श्रोता बताते हैं कि उन्होंने महालक्ष्मी अष्टकम् का अनुष्ठान करने के लिए दस रिश्तेदारों को फ़ोन किया और एक-दो ने नहीं किया। वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि दसों करते, तो सब करोड़पति बन जाते; और यदि सब करोड़पति बन जाते, तो आपस में मुक़ाबला काफ़ी कड़ा हो जाता। वे कहते हैं, इसीलिए भगवती भी अपनी माया चलाती हैं — वे सबसे कैसे करवाएँगी?
एक श्रोता बताते हैं कि उन्होंने महालक्ष्मी अष्टकम् का अनुष्ठान करवाने के लिए दस रिश्तेदारों को फ़ोन किया, और एक-दो ने नहीं किया। वक्ता नाम लेकर उत्तर देते हैं, तो क्या दसों करेंगे — फिर तो सब करोड़पति बन जाएँगे। और यदि सब करोड़पति बन जाएँ, तो आपस में मुक़ाबला काफ़ी कड़ा हो जाएगा। इसीलिए भगवती भी अपनी माया चलाती हैं; वे सबसे कैसे करवाएँगी?
हनुमान चालीसा के संकल्प में बाधाएँ क्यों आती हैं?
जो अभी आपकी पूजा ले रहा है, वह पकड़ा नहीं जाना चाहता
एक अनुष्ठान में बाधाओं के बारे में पूछे जाने पर, जिसके लिए हनुमान चालीसा का पाँच दिन का संकल्प लिया गया था, वक्ता कहते हैं कि इसका अर्थ है कि भले आपकी कुलदेवी जाग्रत हों, कोई ऐसा जो इस समय आपकी पूजा आदि ले रहा है, चाहता है कि उसका पता न चले। इसलिए गणपति जी और क्षेत्रपाल आदि का पूजन कीजिए, और यह तुरंत नष्ट हो जाएगा — यह दोष तुरंत समाप्त हो जाएगा।
पाँच दिन के लिए लिए गए हनुमान चालीसा के संकल्प के बारे में पूछे जाने पर, जिसमें अनुष्ठान में बाधा आ रही है, वक्ता कहते हैं कि इसका अर्थ है कि भले आपकी कुलदेवी जाग्रत हों, कोई ऐसा जो इस समय आपकी पूजा आदि ले रहा है, चाहता है कि उसका पता न चले। इसलिए गणेश जी और क्षेत्रपाल आदि का पूजन कीजिए। तब यह तुरंत नष्ट हो जाएगा। यह दोष तुरंत समाप्त हो जाएगा।
क्या विवाहित बहन के लिए अनुष्ठान किया जा सकता है?
हाँ — पर जड़ उस घर में है जहाँ उसका विवाह हुआ
वक्ता कहते हैं कि अपनी बहन के लिए बिलकुल कर सकते हैं, इसमें कोई समस्या नहीं। पर उसके क्षेत्र से जुड़ी सीधी समस्या को ठीक से सँभालना चाहिए। यहाँ विषय धन का है, क्योंकि उसकी पैसे से जुड़ी समस्या बहुत बड़ी है; और यह विवाह के बाद, ससुराल की परेशानियों के साथ आई है, तो यह केवल उसकी समस्या नहीं होगी — जिस घर में उसका विवाह हुआ है उसमें अवश्य कोई समस्या होगी। इसलिए पूरी जड़ वहीं देखनी चाहिए।
प्रश्नकर्ता को संबोधित करते हुए वक्ता कहते हैं कि अपनी बहन के लिए आप यह बिलकुल कर सकते हैं; इसमें कोई समस्या नहीं, बहन आदि के लिए। पर वह जिस क्षेत्र में है उससे जुड़ी सीधी समस्या को ठीक से सँभालना चाहिए। यहाँ विषय यह बन गया है कि धन के लिए करना है, क्योंकि उसकी पैसे से जुड़ी समस्या बहुत बड़ी है। अब यह बात विवाह के बाद हुई है — परेशानियाँ ससुराल की हैं। वह केवल उसकी समस्या नहीं होगी। जिस घर में उसका विवाह हुआ है, उसमें अवश्य कोई समस्या रही होगी। तो आपको पूरी जड़ वहीं देखनी चाहिए।
जिस घर में बहन का विवाह हुआ है, वहाँ क्या देखना चाहिए?
जीजा की कुंडली, घर की उपासना और वास्तु, और उनका अपना प्रयास
वक्ता कहते हैं कि यदि विवाह से पहले की बात होती तो अलग होती; क्योंकि विवाह के बाद की है, तो वहाँ विषय बहन से अधिक जीजा का है। तो पहले उस घर की पूरी जड़ देखिए — वे कौन-सी पूजा करते हैं, क्या छोड़ दिया है, कौन-से अपराध किए हैं, और घर के मुखिया जीजा की कुंडली देखिए, और वास्तु से जुड़ी बातें। फिर जो भी कमी मिले, उसे धीरे-धीरे ठीक कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि यदि विवाह से पहले की बात होती, तो अलग होती। क्योंकि विवाह के बाद की बात है, तो बहन से अधिक यह वहाँ आपके जीजा का विषय बन जाता है। तो पहले उस घर का पूरा मूल विषय देखिए: वे कौन-सी पूजा करते हैं, क्या छोड़ दिया है, कौन-से अपराध किए हैं, बात क्या है; और घर के मुखिया जीजा की कुंडली भी देखिए, और वास्तु से जुड़ी बातें। फिर उसमें जो भी कमी या अधिकता आपको लगे, जो भी हो सके, उसे धीरे-धीरे ठीक कीजिए, और ठीक करवाइए।
क्या एक व्यक्ति का प्रयास दूसरे घर को बदलने के लिए काफ़ी है?
उन्हें भी कुछ करना होगा, कम से कम दीपदान और प्रातः स्नान
वक्ता कहते हैं कि केवल आपके करने से बहुत कुछ नहीं होगा; उनका भी अपना प्रारब्ध और कर्म है। तो इतना कीजिए, और साथ में वे भी कुछ करें — कम से कम दीवाली पर दीपदान करें, हर सुबह स्नान करें, शास्त्र नामों का पाठ करें, तुलसी जी की सेवा और तुलसी स्तोत्र और स्तुति का पाठ करें। यदि लक्ष्मी से जुड़ी समस्या है, तो लक्ष्मी जी और कुबेर जी का स्तुति पाठ करें; तब पैसे से जुड़ी समस्या धीरे-धीरे दूर होगी।
वक्ता कहते हैं कि केवल आपके करने से बहुत कुछ नहीं होगा। उनका भी अपना प्रारब्ध और कर्म है। उस घर में भी अवश्य कुछ और रहा होगा। तो इतना कीजिए, और साथ में वे भी कुछ करें। कम से कम, मान लीजिए, दीवाली पर वे दीपदान करें। बस हर सुबह स्नान करें। शास्त्र नामों आदि का पाठ करें। तुलसी जी की सेवा करें, तुलसी स्तोत्र का पाठ करें, स्तुति आदि करें। यदि लक्ष्मी से जुड़ी समस्या है, तो लक्ष्मी जी और कुबेर जी का स्तुति पाठ करें। तब पैसे से जुड़ी समस्या धीरे-धीरे दूर होगी। आप अकेले करेंगे तो नहीं होगा; उन्हें भी वहाँ करना पड़ेगा।
क्या खील से सहस्रार्चन किया जा सकता है, और महीना कब शुरू होता है?
खील से सहस्रार्चन; पूर्णिमांत और अमांत गणना
दीवाली के पाँच दिनों के लिए खील, यानी चावल के लावे, के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि आप खील से सहस्रार्चन आदि अवश्य कर सकते हैं। एक दूसरे प्रश्नकर्ता से वे कहते हैं कि आप जहाँ हैं, वहाँ जब शुरू होता है तब शुरू कीजिए: आपके लोग अमांत गणना मानते हैं जबकि हम पूर्णिमांत, पूर्णिमा के बाद वाली — हमारे लिए महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है और अगले दिन से नया महीना शुरू होता है।
दीवाली के पाँच दिनों के लिए खील, चावल के लावे वाले रूप, के बारे में पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बिलकुल, आप खील से सहस्रार्चन आदि कर सकते हैं। एक दूसरे प्रश्नकर्ता से वे कहते हैं कि गणना अलग है: आपके लोग अमांत गणना से करते हैं, हम पूर्णिमांत से, पूर्णिमा के बाद से। हमारे लिए समाप्ति पूर्णिमा पर है; पूर्णिमा के अगले दिन से नया महीना शुरू होता है। तो जहाँ आप हैं, वहाँ जब से शुरू होता है, तब से शुरू कीजिए।
क्या दीवाली के पाँच दिनों में अष्टलक्ष्मी माला मंत्र किया जा सकता है?
देखिए कि अष्टलक्ष्मी माला मंत्र का कौन-सा पाठ है
वक्ता कहते हैं कि राधा कृपा कटाक्ष और तुलसी वंदना बिलकुल किए जा सकते हैं, और अष्टलक्ष्मी माला मंत्र दीवाली के पाँच दिनों में किया जा सकता है, पाँच दिनों में 1100 पाठ पूरे करके। पर यदि आप अष्टलक्ष्मी माला मंत्र करना चाहते हैं, तो पहले उसे भेजिए ताकि देखा जा सके कि आप कौन-सा करेंगे — किसी यामल ग्रंथ के अनुसार, तिलक के अनुसार, या किस प्रमाण से। यह देखना चाहिए, क्योंकि मंत्र और फलश्रुति पढ़ेंगे तो कारण समझ आएगा; पूरा विषय जाने बिना किया जाए तो कठिनाई आती है।
वक्ता कहते हैं कि राधा कृपा कटाक्ष और तुलसी वंदना बिलकुल किए जा सकते हैं। अष्टलक्ष्मी माला मंत्र दीवाली के पाँच दिनों में किया जा सकता है; पाँच दिनों में 1100 पाठ पूरे होंगे। पर यदि आप अष्टलक्ष्मी माला मंत्र करना चाहते हैं, तो पहले उसे भेजिए ताकि एक बार देखा जा सके कि आप कौन-सा करेंगे — किसी यामल ग्रंथ के अनुसार कर रहे हैं, तिलक के अनुसार, किस प्रमाण के अनुसार और कौन-सा। यह देखना चाहिए। कारण क्या है? जब आप मंत्र और फलश्रुति पढ़ेंगे तो समझ जाएँगे। यदि पूरा विषय जाने बिना करेंगे तो कठिनाई है, क्योंकि उसमें भी एक बात है; फिर यह कुछ कठिन मामला बन जाता है और उचित नहीं होगा।
क्या पूजा-पाठ से वास्तु दोष दूर हो सकता है?
पूजा वास्तु दोष के प्रभाव को दबाती है पर स्थायी समाधान नहीं
यह पूछे जाने पर कि जिनके घर में पूजा-पाठ अच्छे से होता है क्या उन्हें वास्तु दोष की चिंता करनी चाहिए, वास्तु कितना महत्वपूर्ण है, और क्या पूजा-पाठ से वास्तु दोष दूर हो सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं कि हर चीज़ का अपना माहात्म्य है। ऐसा नहीं कि केवल पूजा-पाठ करने से वास्तु शांत हो जाएगा। इतना अवश्य होगा: वास्तु दोष से उत्पन्न विपत्ति अपना प्रभाव नहीं दे पाएगी और तब तक निष्क्रिय रहेगी जब तक आपका जप, तप, पूजन, पाठ और विधि-नियम चलते रहें। पर यह स्थायी समाधान नहीं है।
प्रश्नकर्ता को संबोधित करते हुए वक्ता कहते हैं कि बिलकुल हर चीज़ का अपना माहात्म्य है। ऐसा नहीं कि केवल पूजा-पाठ करने से वास्तु शांत हो जाएगा। इतना अवश्य होगा: वास्तु दोष से उत्पन्न विपत्ति, आपके जप, तप, पूजन, पाठ और विधि-नियम के कारण, जब तक वह चलता रहेगा, अपना प्रभाव नहीं दे पाएगी — वह निष्क्रिय हो जाएगी। पर यह स्थायी समाधान नहीं है। मान लीजिए एक, दो, चार, पाँच वर्ष बाद किसी कारण से आपके पूजन-पाठ का प्रभाव घट गया: तब वह फिर अपना प्रभाव बढ़ाएगी। इसलिए उसका पूरा निवारण आवश्यक है।
सहस्रार्चन की सामग्री का बाद में क्या किया जाता है?
फूल विसर्जन में, कुमकुम और अष्टगंध तिलक के रूप में, मेवा प्रसाद के रूप में
वक्ता पूछते हैं कि भगवती लक्ष्मी का, या किसी का भी, सहस्रार्चन किससे किया जा रहा है — फल, फूल या मेवा। फूल आदि विसर्जन में जाएँगे। कुमकुम आदि आप तिलक के रूप में प्रयोग कर सकते हैं, और अष्टगंध भी वैसे ही तिलक के रूप में। यदि आप मेवे से सहस्रार्चन कर रहे हैं, तो सब उसे प्रसाद के रूप में खा सकते हैं।
वक्ता पूछते हैं कि जब आप भगवती लक्ष्मी का सहस्रार्चन करते हैं, या किसी का भी सहस्रार्चन करते हैं: आप किससे कर रहे हैं — फल से, फूल से, मेवे से, किससे? फूल आदि विसर्जन में जाएँगे; पुष्प आदि का विसर्जन किया जाएगा। कुमकुम आदि आप तिलक के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। अष्टगंध आदि आप तिलक के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। यदि आप मेवे से, यानी सूखे मेवों से सहस्रार्चन कर रहे हैं, तो सब उसे प्रसाद के रूप में खा सकते हैं।
जहाँ घर में नकारात्मक ऊर्जा हो, वहाँ जप कैसे शुरू करना चाहिए?
पहले मंदिर, फिर चौखट पूजन और निकारी, फिर घर पर जप
वक्ता प्रश्नकर्ता को चैनल के उन दो-तीन वीडियो की ओर भेजते हैं जो बताते हैं कि घर में नकारात्मक ऊर्जा हो तो जप-तप कैसे करें। संक्षेप में: पहले मंदिर में कैसे करना है, फिर चौखट पूजन कैसे होना है, निकारी कैसे करनी है ताकि कोई अनिष्ट प्रभाव न पड़े, और फिर धीरे-धीरे आप घर में अपना जप करेंगे। घर पर जप करने की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यदि नकारात्मक ऊर्जा हो तो उसका उपद्रव बढ़ जाता है।
प्रश्नकर्ता को नाम से संबोधित करते हुए वक्ता कहते हैं कि घर में नकारात्मकता से जुड़ा विषय चैनल पर अलग से उपलब्ध है — कि यदि घर में नकारात्मक ऊर्जा हो, तो हमें जप, तप आदि कैसे करने चाहिए। वह विषय सुनिए; चैनल पर दो-तीन वीडियो हैं और पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा। यदि आप जप आदि करना चाहते हैं: पहले मंदिर में कैसे करना है, फिर चौखट पूजन कैसे होगा, निकारी कैसे होगी ताकि कोई अनिष्ट प्रभाव न पड़े, और फिर धीरे-धीरे आप अपना जप घर में करेंगे। घर पर जप करने की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यदि घर में नकारात्मक ऊर्जा है, तो उसका उपद्रव बढ़ जाता है। जिसका आभामंडल कमज़ोर है, जो जप-तप नहीं करता, या जिसका आभामंडल अधिक संवेदनशील है, उन्हें कष्ट दिया जाने लगेगा — प्रत्यक्ष भी और अप्रत्यक्ष भी।
क्या कालका योगिनी साधना में निमंत्रण दोबारा दिया जाता है?
निमंत्रण केवल पहली बार; और सरसों के तेल का दीपक
वक्ता कहते हैं कि कालका योगिनी साधना में निमंत्रण दूसरी बार नहीं देना है — निमंत्रण केवल पहली बार दिया जाता है, और अगली बार से आप घर पर करेंगे। दीपक के बारे में अलग से पूछे जाने पर वे कहते हैं कि सरसों के तेल का दीपक जलाना भी उत्तम है; यह आवश्यक नहीं कि केवल घी का दीपक जलाया जाए।
वक्ता कहते हैं कि कालका योगिनी साधना में निमंत्रण दूसरी बार नहीं देना है। निमंत्रण केवल पहली बार दिया जाता है; अगली बार से आप फिर घर पर करेंगे। दीपक के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि सरसों के तेल का दीपक भी जलाएँ तो उत्तम है। यह आवश्यक नहीं कि केवल घी का दीपक जलाया जाए। आप सरसों के तेल का भी जला सकते हैं।
जहाँ कई देवताओं के प्रति अपराध हुए हों, वहाँ प्रायश्चित्त क्या है?
शिव की शरणागति, गंगा स्नान, प्रायश्चित्त के संकल्प से जप और दान
वक्ता कहते हैं कि यदि भगवान के अलग-अलग रूपों के प्रति अपराध हुआ है, तो शिव जी की शरणागति लें, गंगा जी में स्नान करें और वहाँ प्रायश्चित्त विधि करें। यहाँ प्रायश्चित्त का अर्थ है कि आप प्रायश्चित्त का संकल्प लेकर किसी भी मंत्र का जप करें; दान आदि करें, और वहाँ हृदय से क्षमा माँगें — भगवान अवश्य क्षमा करेंगे।
प्रश्नकर्ता को नाम से संबोधित करते हुए वक्ता कहते हैं कि यदि भगवान के अलग-अलग रूपों के प्रति, यानी अलग-अलग स्वरूपों के प्रति अपराध हुआ है, तो शिव जी की शरणागति लीजिए, गंगा जी आदि में स्नान कीजिए, और वहाँ प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। विधि कीजिए। वे कहते हैं कि प्रायश्चित्त का अर्थ है कि आप प्रायश्चित्त का संकल्प लेकर किसी भी मंत्र का जप करें। और दान आदि कीजिए; वहाँ हृदय से क्षमा माँगिए, और भगवान अवश्य क्षमा करेंगे।
लक्ष्मी माला मंत्र के पाठ में चढ़ाए कमलगट्टे का क्या किया जाता है?
कमलगट्टे को जप के लिए दोबारा प्रयोग करना, बनाम अर्चन में चढ़ाना
यह पूछे जाने पर कि लक्ष्मी माला मंत्र अष्टक का पाठ करते समय चढ़ाए गए कमलगट्टे का अगले दिन क्या करना चाहिए, वक्ता कहते हैं कि जितने दिन आप जप करना चाहें, उसी कमलगट्टे से बार-बार जप कर सकते हैं। यदि आप अर्चन कर रहे हैं, तो बात अलग है: यदि अर्चन के बाद चढ़ा रहे हैं, तो उतना विसर्जन में चला जाएगा। हो सके तो आप उसे बो भी सकते हैं, ताकि उसमें कमल खिले।
यह पूछे जाने पर कि लक्ष्मी माला मंत्र अष्टक का पाठ करते समय जो कमलगट्टा चढ़ाया जाता है, उसका अगले दिन क्या करना चाहिए, वक्ता उत्तर देते हैं कि जितने दिन आप जप करना चाहें, उसी कमलगट्टे से बार-बार जप कर सकते हैं। यदि आप अर्चन कर रहे हैं, तो बात अलग है। यदि अर्चन के बाद चढ़ा रहे हैं, तो उतना विसर्जन में जाएगा। यदि आप चाहें, तो उसे बो भी सकते हैं, ताकि उसमें कमल खिले, यदि आपके लिए संभव हो।
महालक्ष्मी के दीपदान में कितने दीपक चढ़ाए जाते हैं?
सोलह दीपक, और पान के पत्ते और मदिरा पात्र का विसर्जन
वक्ता कहते हैं कि महालक्ष्मी के लिए दीपदान सोलह दीपकों का होना चाहिए। एक दूसरे प्रश्न के उत्तर में वे कहते हैं कि पान का पत्ता और मदिरा पात्र और ऐसी सब चीज़ें विसर्जन में जाएँगी — सात्विक मदिरा।
क्या दीपदान में नारियल का जल जाना अशुभ है?
दीपदान और खप्पर में नारियल का जलना
एक श्रोता बताते हैं कि कल नारियल के खोल से दीपदान किया और नारियल जल गया, और पूछते हैं कि क्या यह अशुभ है। वक्ता उत्तर देते हैं कि इसमें कुछ अशुभ नहीं — नारियल तो जलेगा ही, दीपदान में भी और खप्पर में भी, उसका जलना तय है। नारियल जितना अधिक जले, उतना शुभ। खप्पर विधि में खप्पर का नारियल कभी पूरा राख हो जाता है और कभी कुछ जला रह जाता है; दीपदान में भी कभी थोड़ा जलता है और कभी पूरा। जो जल गया सो जल गया; जो बचा है उसका विसर्जन कर दीजिए।
एक श्रोता बताते हैं कि कल नारियल के खोल से दीपदान किया गया और नारियल जल गया, और पूछते हैं कि सुबह इसे क्या समझा जाए, क्या यह अशुभ है। वक्ता उत्तर देते हैं कि कुछ भी अशुभ नहीं है। नारियल जलेगा। दीपदान में और खप्पर में, दोनों में, नारियल जलेगा; उसका जलना तय है। इसमें क्या अशुभ है? नारियल जितना अधिक जले, उतना शुभ है। खप्पर विधि में कभी खप्पर का नारियल पूरा राख हो जाता है, कभी थोड़ा जला रह जाता है। दीपदान में भी कभी थोड़ा जलता है और कभी पूरा। इससे कोई कठिनाई नहीं। जो जल गया, सो जल गया; जो बचा है, उसका विसर्जन कर दीजिए।
ऋण मुक्ति के लिए क्या किया जाता है, और गोत्र में संदेह हो तो संकल्प कैसे लें?
ऋण मुक्ति के लिए अलग दीपक; पिता के गोत्र से संकल्प
वक्ता कहते हैं कि ऋण मुक्ति के लिए एक अलग दीपक जलाइए। यह पूछे जाने पर कि जिनके गोत्र में कोई अनियमितता है वे अनुष्ठान में कैसे भाग लें, वे कहते हैं कि आपके पिता का जो भी गोत्र है, उसी के अनुसार आप संकल्प लेंगे और देंगे।
वक्ता कहते हैं कि ऋण मुक्ति के लिए हर बार एक अलग दीपक जलाइए। उन लोगों के प्रश्न पर जिनके गोत्र में कोई अनियमितता है, और वे हो रहे अनुष्ठान में कैसे भाग लें — वे कहते हैं कि जहाँ गोत्र में अनियमितता है, वहाँ आपके पिता का जो भी गोत्र है, उसी के अनुसार आप संकल्प लेंगे और संकल्प देंगे।
महाविद्या का पुरश्चरण ऐसे प्रयोग को काटता है, पर इसके लिए सिद्ध साधक चाहिए।
महाविद्या पुरश्चरण काम करता है, पर सिद्ध साधक चाहिए
वक्ता कहते हैं कि बाकी — आप, या उस स्तर का साधक — यदि आपने किसी महाविद्या का पुरश्चरण किया है, तो उसके प्रभाव से वे चीज़ें नष्ट या दूर होती हैं; पर इसके लिए सिद्ध साधक चाहिए। यदि छोटा पुरश्चरण किया हुआ व्यक्ति प्रयोग करे, तो कठिनाई आएगी और कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला। सारी मसानिक उग्रात्मक शक्तियाँ इन चीज़ों को नष्ट करती हैं।
वक्ता कहते हैं कि बाकी, आप, या उस स्तर का साधक, यदि आपने किसी महाविद्या का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। किया है, तो उनके प्रभाव से वे चीज़ें नष्ट होती हैं या दूर होती हैं। पर तब सिद्ध साधक चाहिए। यदि छोटा पुरश्चरण किया हुआ व्यक्ति प्रयोग करे, तो कठिनाई आएगी, और उसके बाद कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला। जितनी भी मसानिक उग्रात्मक शक्तियाँ हैं, उन सबके प्रभाव से ये चीज़ें नष्ट होती हैं।
जहाँ अशुद्ध सामग्री प्रयोग होती है, क्या वहाँ से महाशक्तियाँ हट जाती हैं?
केवल किदवंती — पृथ्वी स्वयं सब सहती है और कृपा नहीं रोकतीं
वक्ता कहते हैं कि यह केवल एक किदवंती के रूप में फैलाया गया है — कि जहाँ भी इस तरह की चीज़ें प्रयोग होंगी, वहाँ से महाशक्तियाँ हट जाएँगी। पूरा जगत नारायण की श्रेणी में व्याप्त है। भगवती पृथ्वी स्वयं भगवती का रूप हैं; उन पर मल-मूत्र जाता है, तो क्या वे कृपा करना बंद कर देती हैं? पृथ्वी को धारण करने वाली से अधिक धैर्यवान कौन है? क्या इसलिए उनकी पूजा नहीं होती, या वे कृपा नहीं करतीं?
वक्ता कहते हैं कि यह केवल एक किदवंती के रूप में फैलाया गया है — कि जहाँ भी इस तरह की चीज़ें प्रयोग होंगी, वहाँ से महाशक्तियाँ हट जाएँगी। पूरा जगत नारायण की श्रेणी में व्याप्त है। भगवती पृथ्वी स्वयं भगवती का रूप हैं। उन पर मल-मूत्र आदि जाता है — तो क्या वे कृपा करना बंद कर देती हैं? पृथ्वी को धारण करने वाली से अधिक धैर्यवान कोई है? तो क्या उनकी पूजा नहीं होती? या वे कृपा नहीं करतीं? तो ऐसा नहीं कि प्रयोग की गई इन चीज़ों के विरुद्ध उस स्तर का प्रयोग किया जाए तो सब नष्ट हो जाएगा। प्रत्यंगिरा से जुड़े प्रयोगों के प्रभाव से ये चीज़ें तुरंत नष्ट होती हैं — पर बात यह है कि व्यक्ति ने उसमें सिद्धि प्राप्त की हो। नहीं तो फिर वही उसी स्तर का साधक है, और भगतवाल में वही हटाने-काटने का धंधा है।
क्या कार्तिक में आँवले का दीपदान किया जाता है?
हर शाम पाँच आँवले, और धर्म-रक्षा के लिए दीपदान
वक्ता कहते हैं कि धर्म-रक्षा के लिए यह बिलकुल किया जा सकता है, और दीपदान जितना हो सके करना चाहिए। यदि अभी आँवले का दीपदान किया जाए तो सर्वश्रेष्ठ है — हर दिन, शाम को, हर बार पाँच आँवलों का दीपदान करें। वे कहते हैं कि यह भी हर वर्ष करवाया जाता है और वीडियो डाले जाते हैं, और वे सब फिर से भेजे जाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि धर्म-रक्षा के लिए यह बिलकुल किया जा सकता है। जितना हो सके दीपदान कीजिए। यदि अभी आँवले का दीपदान करें, तो सर्वश्रेष्ठ है। हर दिन शाम को, हर बार पाँच आँवलों का दीपदान कीजिए। वे कहते हैं कि यह भी हर वर्ष करवाया जाता है, और सारे वीडियो डाले जाते हैं; वे सब फिर से भेजे जाएँगे। तो वह सब करना चाहिए। आँवले का दीपदान भी करें, तो सर्वश्रेष्ठ है।
क्या नाव चलाने या रिवर राफ़्टिंग से नदी पर चलने का दोष लगता है?
नदी में उतरने से नहीं, उसके ऊपर से यात्रा करने से लगता है
वक्ता कहते हैं कि नाव चलाने और रिवर राफ़्टिंग से भी यह दोष लगेगा। यदि आप नदी में उतरते हैं, तो दोष नहीं लगेगा; दोष तब है जब आप नदी के ऊपर से जा रहे हैं। यदि आप उसे छूकर माथे से लगा लें, तो दोष नहीं लगेगा।
वक्ता कहते हैं कि मुख्य पूजा में कमल का फूल आसन के लिए होगा, भगवती के सामने; और चित्र में भी पूजन किया जा सकता है। वे कहते हैं कि नाव चलाने और रिवर राफ़्टिंग से भी यह दोष लगेगा। यदि आप नदी के भीतर उतरकर जाएँ, तो दोष नहीं लगेगा। दोष तब है जब आप नदी के ऊपर से जा रहे हैं। यदि आप उसे छूकर माथे से लगा लें, तो दोष नहीं लगेगा।
यदि कार्तिक स्नान के लिए पास में कोई नदी या सरोवर न हो तो?
टब में गंगाजल, या स्नान करते समय केवल स्मरण भी
यह पूछे जाने पर कि जब सरोवर या नदी पास न हो तो टब में गंगाजल डालकर स्नान करने से भी पुण्य का लाभ मिलेगा या नहीं, वक्ता उत्तर देते हैं कि अवश्य मिलेगा — और यदि आप गंगाजल न भी डालें और उनका स्मरण करते हुए स्नान करें, तो भी लाभ मिलेगा। छिन्नमस्तिका के बारे में वे कहते हैं कि नाम जगाकर प्रार्थना की जा सकती है, इतना किया जा सकता है।
माँ छिन्नमस्तिका के बारे में वक्ता कहते हैं कि नाम जगाकर प्रार्थना की जा सकती है — इतना किया जा सकता है। यह पूछे जाने पर कि जब सरोवर या नदी पास न हो, तो टब में गंगाजल डालकर स्नान करने से पुण्य मिलेगा या नहीं, वे उत्तर देते हैं कि अवश्य मिलेगा। यदि आप गंगाजल न भी डालें, उनका स्मरण करते हुए स्नान करें, तो भी लाभ मिलेगा।
देह त्याग चुके गुरु से क्षमा-याचना कैसे की जाए?
गुरु से मिले मंत्र का जप उन्हें अर्पित करना
यह पूछे जाने पर कि मुक्ति के लिए कैसे उपासना करें, जहाँ प्रश्नकर्ता के गुरु जी ब्रह्मलीन हो गए हैं और उनके प्रति अपराध हुआ था, वक्ता कहते हैं: गुरु द्वारा दिए गए मंत्र का अधिक से अधिक जप कीजिए और उसे उनके निमित्त अर्पित कीजिए।
एक श्रोता बताते हैं कि गुरु से मिले मंत्र के संकल्प में भौतिक सुख की इच्छा न करने का पालन हो रहा है, जिसे वक्ता बहुत अच्छी बात कहते हैं। गुरु की दशा में बहुत कष्ट भुगतने के बारे में वे कहते हैं कि वह अवश्य हो रहा है, और उसका कारण वे पहले ही बता चुके हैं। फिर श्रोता बताते हैं कि उनके गुरु जी ब्रह्मलीन हो गए हैं, कि उनकी प्रसन्नता की और एक अपराध की बात थी, और पूछते हैं कि उससे मुक्ति के लिए पूजा और अर्चना किस प्रकार करनी चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि गुरु द्वारा दिए गए मंत्र का अधिक से अधिक जप कीजिए, और उसे उनके निमित्त अर्पित कीजिए।
दीवाली साधना के लिए क्या तैयारी चाहिए?
धनतेरस से भाई दूज तक पाँच दिन की साधना
यह पूछे जाने पर कि दीवाली साधना के लिए क्या तैयारी करनी चाहिए और क्या यह अष्टमी या नवमी तक है, वक्ता कहते हैं कि दीवाली की पाँच दिन की साधना धनतेरस से भाई दूज तक चलेगी। जहाँ तक हो सके नवमी के दिन, या दशमी को, विषयों पर चर्चा होगी — कृष्ण पक्ष की दशमी तक; एकादशी और द्वादशी, दो दिन, हाथ में रहेंगे। बाकी के लिए वे ग्रुप में संदेश डालते रहेंगे और हो सके तो लाइव आकर आगे चर्चा करेंगे।
यह पूछे जाने पर कि दीवाली साधना के लिए क्या तैयारी करनी चाहिए, और क्या यह अष्टमी या नवमी तक है, वक्ता उत्तर देते हैं कि दीवाली साधना के लिए पाँच दिन की साधना धनतेरस से भाई दूज तक चलेगी। जहाँ तक हो सके नवमी के दिन, या दशमी को, विषयों पर चर्चा होगी — कृष्ण पक्ष की दशमी तक। एकादशी और द्वादशी, दो दिन, हाथ में रहेंगे। बाकी के लिए, वे कहते हैं, वे ग्रुप में संदेश डालते रहेंगे, और यदि संभव हुआ तो लाइव आकर आगे चर्चा करेंगे।
काली जी के 108 नामों से अर्चन कैसे किया जाता है?
एक सौ आठ फूल, या कुमकुम मिली पंखुड़ियाँ
यह पूछे जाने पर कि क्या काली जी के 108 नामों के साथ फूलों से अर्चन किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि बिलकुल किया जा सकता है। यदि 108 नाम हैं तो अर्चन के लिए 108 फूल चाहिए; आप कुमकुम आदि मिलाकर पंखुड़ियों से भी कर सकते हैं।
यह पूछे जाने पर कि क्या काली जी के 108 नामों के साथ फूलों से अर्चन किया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं कि बिलकुल किया जा सकता है। यदि 108 नाम हैं, तो अर्चन के लिए 108 फूल चाहिए, हैं न। आप कुमकुम आदि मिलाकर पंखुड़ियों से भी कर सकते हैं।
क्या घर पर काली कवच पढ़ा जा सकता है?
घर पर काली कवच का पाठ, और कौन-सा कवच है
यह पूछे जाने पर कि क्या घर पर काली कवच का पाठ किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं: बिलकुल कीजिए। पर सिद्धि आदि का विषय इस पर निर्भर करेगा कि आप कौन-सा काली कवच कर रहे हैं।
यह पूछे जाने पर कि क्या घर में काली कवच का पाठ किया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं: बिलकुल कीजिए। पर सिद्धि आदि का विषय इस पर निर्भर करेगा कि आप कौन-सा काली कवच कर रहे हैं।
यदि साधना के लिए बनाया कलश बहुत छोटा निकले तो क्या करें?
कलश के बाहर कुछ नहीं रहना चाहिए
एक श्रोता बताते हैं कि कलश बनाया पर छोटा पड़ गया, और कुछ सामग्री उसमें नहीं जा सकी। वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं, तो बड़ा कलश लीजिए; धनतेरस के समय दूसरा, बड़ा कलश लाकर सारी सामग्री उसमें डाल दीजिए। सामग्री कलश के बाहर नहीं होनी चाहिए। वे बताते हैं कि पिछली बार जब उन्होंने कुबेर कलश बनाया, तो सारी सामग्री एक छोटे कलश में आ गई थी।
एक श्रोता बताते हैं कि कलश बनाया पर वह छोटा निकला, और कुछ सामग्री उसमें नहीं आ सकी। वक्ता उत्तर देते हैं, नहीं भाई — तो बड़ा कलश लीजिए। धनतेरस के समय दूसरा कलश, बड़ा वाला, लाइए और सारी सामग्री उसमें डाल दीजिए। सामग्री कलश के बाहर नहीं होनी चाहिए। वे कहते हैं कि पिछली बार जब हमने कुबेर कलश बनाया, तो सारी सामग्री एक छोटे कलश में आ गई थी। इस बार, जब धनतेरस पर स्वर्णाकर्षण कलश बनेगा — बात यह है कि आप लोग जितना जुड़ रहे हैं, हम भी उतनी अपनी चीज़ें बढ़ा रहे हैं; घटा नहीं रहे। आप लोग देखिए कि ये चीज़ें कैसे बढ़ाई जाती हैं।
मूल तांत्रिक पूजन की गुप्तता कभी नहीं तोड़ी जाती, और तंत्र पीठ का वीडियो नहीं बनाया जाता।
कभी न टूटने वाली गुप्तता, और तंत्र पीठ का कोई वीडियो नहीं
वक्ता कहते हैं कि चैनल पर कितने भी वीडियो प्रसारित हों और कितने भी लोग कुछ-कुछ दिखते हों, मूल लोग और पूरा मूल विषय कभी प्रसारित नहीं होता और गुप्तता कभी नहीं टूटती। आपके सामने केवल उतना विषय जाता है जिससे देखने वाले किसी को हानि न हो, ताकि उनका कोई विधान प्रकट न हो — चाहे अभी का स्वर्णाकर्षण भैरव हो या नवरात्र की बात, मूल तांत्रिक पूजन दिखाया ही नहीं जाता। वे यह भी कहते हैं कि तंत्र पीठ का वीडियो कभी नहीं बनाया जाता, कि लोग इसके लिए मना करते हैं और वे इसका कारण समझते हैं।
वक्ता कहते हैं कि और एक बात सदा याद रखिए: चैनल पर कितने भी वीडियो प्रसारित हों, कितने भी लोग कुछ-कुछ दिखते हों, मूल लोग और पूरा मूल विषय हम कभी प्रसारित नहीं करते; गुप्तता कभी नहीं टूटती। आपके सामने केवल उतना विषय जाता है जिसमें देखने वाले किसी को हानि न हो, ताकि मेरा कोई विधान लोगों के सामने प्रकट न हो — चाहे वह अभी स्वर्णाकर्षण भैरव का हो, या नवरात्र आदि की बात। जो मूल तांत्रिक पूजन आदि होता है, वह चर्चा में दिखाना ही नहीं है; वे उसे नहीं दिखाते। उसके लिए कोई कुछ भी कहे, कोई कितना भी सिर पीटे कि यह नहीं बताया, वह नहीं बताया — नहीं बताया जाएगा। यदि हम वह चीज़ दिखाएँ, तो भाई, लोग श्मशान में शव पर बैठकर जप करते दिखते हैं; सड़क का तमाशा देखना हो तो उनके पास जाइए। हम वह नहीं दिखाते। सीधी बात है। और जहाँ तक तंत्र पीठ के भीतर के वीडियो की बात है, कुछ लोग इसके लिए मना भी करते हैं, और हम भी समझते हैं कि क्यों नहीं बनाना चाहिए — इसलिए तंत्र पीठ का वीडियो कभी नहीं बनाया जाता।
मूल विषय का पंद्रह से बीस प्रतिशत छिपा रहता है, ताकि साधक स्वयं करने के लिए प्रोत्साहित हो।
पंद्रह से बीस प्रतिशत छिपा; आपको स्वयं करने के लिए प्रोत्साहित होना है
वक्ता कहते हैं कि यह गुप्तता सदा रहेगी। जो आपके सामने जाता है उससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि मूल विषय का पंद्रह से बीस प्रतिशत छिपा है, और जो दिखाया जाता है उसमें आपका अधिकतम आ जाता है — ताकि आप प्रोत्साहित होकर स्वयं करें। ऐसा कभी कुछ नहीं कि आप करना छोड़ दें और हम आपकी जगह करेंगे। उन्हें दस लाख भेजने का अर्थ यह नहीं कि वे जीवन भर आपके लिए पूजा, फूल और प्रसाद चढ़ाते रहेंगे और आप मौज करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि और यह गुप्तता सदा रहेगी, लोग अनुष्ठान में भाग लें या न लें; वह भगवती की इच्छा है, उनकी अपनी इच्छा नहीं। किसका संकल्प माँ की इच्छा से बनता है, कैसे होता है, कितनी दिव्यता है — जितना विषय आपके सामने जाता है, उससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि हाँ, निश्चित है कि मूल विषय का पंद्रह से बीस प्रतिशत हम छिपाते हैं, कि वह विषय दिखाना नहीं है। आपके सामने जो विषय है, उसमें आपकी अधिकतम बात ढक जाती है: हाँ, ठीक है, देखो, यह बात है, इससे प्रोत्साहित हो, देखो किस ढंग से हो रहा है, और स्वयं भी करो। यहाँ ऐसा कभी कुछ नहीं कि आप करना छोड़ दें और हम आपकी जगह करेंगे। नहीं, ऐसा नहीं होगा। हम सदा कहते हैं कि यदि आपका अनुष्ठान चल रहा है, तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप भी घर पर करें, तभी आपको उसका लाभ मिलेगा। ऐसा नहीं कि आपने यहाँ दस लाख भेज दिए और अब वे हमारे लिए जीवन भर पूजा, फूल और प्रसाद चढ़ाते रहेंगे और हम यहाँ मौज करेंगे। तब तो कोई लाभ ही नहीं।
तंत्रोक्त प्रतिष्ठा में सामान्य प्रतिष्ठा से इतना अधिक क्यों लगता है?
समय, धन और सामग्री — और साधक इसे मिलकर क्यों करते हैं
वक्ता कहते हैं कि जब अकेले एक पूरी माला पूरी की जाती है, तो इतना करना बहुत कठिन हो जाता है। प्रतिष्ठा के लिए दी गई सामान्य विधि चैनल पर उपलब्ध है — देखिए उसमें कितनी प्रक्रिया है। जब तंत्रोक्त विधि-विधान से विशेष प्रतिष्ठा की जाती है, तो अधिक समय, धन और सामग्री सब लगते हैं। जब अनुष्ठान चल रहा होता है तो लोग उपलब्ध होते हैं और साधक होते हैं, तो यह मिलकर जल्दी और अच्छे से होता है; अकेले संभव नहीं।
वक्ता कहते हैं कि यह दीवाली के समय फिर आएगा; अभी लाना संभव नहीं हो पा रहा, और वे फिर प्रयास करेंगे — क्योंकि अनुष्ठान होगा तभी अभिषेक आदि होगा। वे कहते हैं कि जब अकेले एक माला पूरी की जाती है, तो इतना करना बहुत कठिन हो जाता है। प्रतिष्ठा आदि के लिए जो सामान्य विधि दी गई है, वह चैनल पर उपलब्ध है; उसे देखिए कि उसमें कितनी प्रक्रिया है। अब जब तंत्रोक्त विधि-विधान से विशेष प्रतिष्ठा की जा रही हो, तो समय, धन और सामग्री सब अधिक लगते हैं। जब अनुष्ठान होता रहता है, तो उसमें लोगों की उपलब्धता रहती है, साधक रहते हैं। वे तुरंत मिलकर थोड़ा-थोड़ा करते हैं, तो जल्दी होता है और अच्छा भी होता है। अकेले इतना करना संभव नहीं, इसीलिए अभी नहीं रखा गया। फिर जैसे ही चार-पाँच दिन का अनुष्ठान होगा, उसमें किया जाएगा। और वे प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि इसे रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । पर कीजिए — वह अधिक उत्तम होगा।
षोडशोपचार पूजा के लिए सहस्रनाम से मंत्र कैसे निकाले जाते हैं?
सिंदूर पर कुंकुमप्रिया, आभूषण पर वैदूर्यमणिभूषिता, नैवेद्य पर मधुप्रिया
वक्ता कहते हैं कि यह सामान्य मंत्र से किया जाता है और सहस्रनाम आदि से संपुट भी किया जा सकता है। कौन-सा मंत्र प्रयोग करना है, यह आप पाठ करते हुए स्वयं समझ जाएँगे। यदि किसी सहस्रनाम में नाम कहता है कि कुमकुम भगवती को अत्यंत प्रिय है — कुंकुमप्रिया — तो षोडशोपचार विधि में जहाँ हम सिंदूर चढ़ाते हैं, वहाँ कुंकुमप्रिया मंत्र प्रयोग किया जा सकता है, या चढ़ाते समय दोनों मंत्र साथ पढ़े जा सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह सामान्य मंत्र से किया जाता है, और बाद में आप सहस्रनाम आदि के संपुट से, या सहस्रनाम के साथ भी कर सकते हैं। कौन-सा मंत्र प्रयोग करना है — यह सब पाठ करते हुए आप स्वयं समझ जाएँगे। जैसे, उदाहरण के लिए, आप किसी सहस्रनाम का पाठ कर रहे हैं, और उसमें कहीं भगवती के नाम का उल्लेख है कि कुमकुम भगवती को अत्यंत प्रिय है, कुंकुमप्रिया। तो इसका अर्थ है कि षोडशोपचार विधि में जिस स्थान पर हम सिंदूर चढ़ाते हैं, वहाँ कुंकुमप्रिया मंत्र आदि प्रयोग किया जा सकता है; या आप ये दोनों मंत्र साथ पढ़ते हुए चढ़ा सकते हैं।
सहस्रनाम के और कौन-से नाम किस उपचार से जुड़ते हैं?
वस्त्रालंकृता और वैदूर्यमणिभूषिता, और नैवेद्य पर मधुप्रिया
वक्ता कहते हैं कि इसी तरह, जहाँ भगवती को वस्त्रालंकृता कहा गया है, जहाँ वैदूर्यमणिभूषिता कहा गया है, उसका अर्थ है कि जिस स्थान पर सौभाग्य सूत्र और श्रृंगार के लिए रत्न चढ़ाने हैं, वहाँ हम ये मंत्र प्रयोग कर सकते हैं। जहाँ उन्हें मधुप्रिया कहा गया है, जहाँ कहा गया है कि मधु का नैवेद्य उन्हें अत्यंत प्रिय है, उसका अर्थ है कि षोडशोपचार पूजन विधि में जहाँ हम नैवेद्य चढ़ाते हैं, वहाँ उसे पढ़ेंगे।
वक्ता कहते हैं कि इसी प्रकार, जहाँ भगवती को वस्त्रालंकृता कहा गया है, जहाँ उन्हें वैदूर्यमणिभूषिता कहा गया है, उसका अर्थ है कि श्रृंगार के लिए जो सौभाग्य सूत्र और रत्न आदि चढ़ाने हैं — उस स्थान पर हम ये मंत्र प्रयोग कर सकते हैं। जहाँ भगवती को मधुप्रिया कहा गया है, जहाँ उनके बारे में कहा जा रहा है कि मधु का नैवेद्य उन्हें अत्यंत प्रिय है, तो इसका अर्थ है कि षोडशोपचार पूजन विधि में जब हम भगवती को नैवेद्य आदि चढ़ाते हैं, वहाँ हम उसे पढ़ेंगे। तो आप जिसका भी पाठ कर रहे हैं — जो भी शास्त्र नाम या स्तुति — उसमें यह आपको समझना होगा। आपको उसे निकालना होगा और फिर वहाँ बिठाकर उसका अभ्यास करना होगा। आप अलग-अलग स्तुतियों और स्तोत्रों आदि को एक साथ भी प्रयोग कर सकते हैं।
यदि आचमन का जल प्रतिदिन गिरा दिया जाता है, तो संकल्प का जल कहाँ से आए?
दो आचमन पात्र — एक देवताओं के लिए, एक अपने लिए
एक श्रोता पूछते हैं कि यदि भगवान के आचमन के लिए रखा जल हर दिन नित्य पूजन के बाद और संकल्प से पहले पृथ्वी पर चढ़ा दिया जाता है, तो संकल्प का जल कहाँ से लें। वक्ता उत्तर देते हैं कि इसी कारण दो आचमन पात्र रखने को कहा जाता है: एक से देवताओं का पूजन होगा, और दूसरे से व्यक्ति अपना आचमन आदि करेगा।
एक श्रोता नित्य पूजा में भगवान के आचमन के लिए रखे जल के बारे में पूछते हैं — कि नित्य पूजन कर्म करने के बाद और संकल्प से पहले, हर दिन भगवान के आचमन के लिए जल पृथ्वी पर चढ़ाना चाहिए, और पूजा केवल आचमन के लिए जल रखकर करनी चाहिए — और पूछते हैं कि संकल्प के लिए जल कहाँ से लें। वक्ता उत्तर देते हैं कि इसी कारण दो आचमन पात्र रखने को कहा जाता है। एक से देवताओं का पूजन होगा; दूसरे से व्यक्ति अपना आचमन आदि करेगा।
उल्लू का बोलना, या हथियारबंद शत्रु का स्वप्न, किस बात का संकेत है?
संकेत कि अभिचार की चर्चा हो रही है या किया जा रहा है
एक श्रोता बताते हैं कि एक उल्लू आकर बोल रहा है, और स्वप्न में उन्होंने हथियार लिए एक शत्रु और एक सोती हुई स्त्री देखी; वक्ता उत्तर देते हैं कि इसका अर्थ है कि अभिचार आदि के विषय की चर्चा हो रही है, या वह किया जा रहा है।
एक श्रोता बताते हैं कि एक उल्लू आकर बोल रहा है, और स्वप्न में उन्होंने हथियार लिए एक शत्रु और एक सोती हुई स्त्री देखी। उन्हें नाम से संबोधित करते हुए वक्ता उत्तर देते हैं कि इसका अर्थ है कि अभिचार आदि के विषय की चर्चा हो रही है — या वह किया जा रहा है।
एकादशी को हवन में कौन-सी सामग्री प्रयोग नहीं करनी चाहिए?
एकादशी को हवन में चावल वाली सामग्री नहीं
वक्ता कहते हैं: चावल वाली सामग्री से हवन न करें — एकादशी के दिन।
क्या किसी स्थानीय देवस्थान पर रखे नींबू, अंडे और शराब से घृणा करनी चाहिए?
यह इस पर निर्भर है कि वहाँ भगवती का कौन-सा रूप है
एक श्रोता बताती हैं कि लोग आकर उनकी माई के स्थान पर नींबू, अंडा, शराब आदि चढ़ाते हैं, वे मंदिर की सफ़ाई करती हैं, मन में घृणा का भाव आता है और वे उन्हें हटाकर पेड़ों में डाल देती हैं, और पूछती हैं कि क्या यह ठीक है या उन्हें छूना नहीं चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि वहाँ भगवती का कौन-सा रूप है: यदि वहाँ भी इस तरह के पदार्थ प्रयोग होते हैं, तो घृणा नहीं करनी चाहिए। यह शक्ति के लिए चढ़ाया गया है, तो मन में ऐसा विचार नहीं रखना चाहिए।
एक श्रोता बताती हैं कि कुछ लोग आकर उनकी माई के स्थान पर नींबू, अंडा, शराब आदि चढ़ाते हैं, कि वे मंदिर की सफ़ाई करती हैं, कि मन में घृणा का भाव आता है और प्रयास करते हुए वे उन्हें हटाकर पेड़ों में डाल देती हैं, और पूछती हैं कि क्या यह ठीक है या उन्हें छूना नहीं है। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि भगवती का कौन-सा रूप है। यदि वहाँ भी इस तरह के पदार्थ प्रयोग होते हैं, तो आपको घृणा नहीं करनी चाहिए। यह शक्ति के लिए चढ़ाया गया है, तो आपको मन में ऐसी बात नहीं रखनी चाहिए।
क्या गणपति का विग्रह या तुलसी का पौधा चुराना शुभ है?
एक क्षेत्रीय मान्यता जिसे वक्ता नकारते हैं — देव विग्रह की चोरी
यह पूछे जाने पर कि राजस्थान के सिरोही और उदयपुर क्षेत्र की यह मान्यता, कि भगवान गणपति का विग्रह चुराना और भगवती तुलसी को चुराना बहुत शुभ माना जाता है, क्या अंधविश्वास है, वक्ता कहते हैं कि उन्होंने आज तक यह कहीं नहीं पढ़ा। वे उन क्षेत्रों के लोगों और सुन रहे किसी भी साधक से प्रमाण भेजने को कहते हैं, कि यह सच है या झूठ, किदवंती है या ऐसी कोई बात। उनके अनुसार यह गलत बात है: यह सोने जैसा है, और इसमें सोना चुराने का दोष लगता है; देव विग्रह चुराना बहुत बड़ा अपराध है।
एक श्रोता बताते हैं कि राजस्थान के सिरोही और उदयपुर क्षेत्र में भगवान गणेश का विग्रह चुराना बहुत शुभ माना जाता है, और भगवती तुलसी को चुराना भी शुभ माना जाता है, और पूछते हैं कि क्या यह अंधविश्वास है। वक्ता उत्तर देते हैं, देखिए, हमने आज तक यह कहीं नहीं पढ़ा। अब राजस्थान और उदयपुर क्षेत्र के लोग और सिरोही क्षेत्र के लोग और जो भी दूसरे साधक हैं, यदि आप हमें सुन रहे हैं, तो इसका प्रमाण हमें भेजिए — यह सच है, झूठ है, अंधविश्वास है? यदि यह किसी प्रकार की किदवंती है, या ऐसी कोई बात है, तो हमें बताइए। वे कहते हैं कि उनके अनुसार यह गलत बात है; पर यदि ऐसी कोई बात है, चोरी करने की पौराणिक काल की कोई घटना, तो हमें बताइए — हम भी अमीर बनने के लिए वहाँ गणपति जी और तुलसी जी को चुराने आएँगे। हमारे अनुसार यह सोने जैसा है, और इसमें सोना चुराने का दोष लगता है। बाकी, आप हमें बताइए। देव विग्रह चुराना बहुत बड़ा अपराध है।
क्या ब्रह्म-तुल्य शक्ति से दर्शन में मिली दीक्षा पर मार्गदर्शन दिया जा सकता है?
एक पारलौकिक विषय, जिस पर मार्गदर्शन संभव नहीं
एक श्रोता बताते हैं कि सवारी के रूप में आई एक ब्रह्म-तुल्य शक्ति से दीक्षा मिली है, और इस समय किसी गुरु से संपर्क नहीं है; वक्ता कहते हैं कि यह पारलौकिक विषय बन गया है और इस तरह मार्गदर्शन देना संभव नहीं।
एक श्रोता बताते हैं कि किसी ब्रह्म-तुल्य शक्ति के सवारी के रूप में आने से दीक्षा मिली है, और इस समय किसी गुरु से संपर्क नहीं है, और मार्गदर्शन की कृपा माँगते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह पारलौकिक विषय बन गया है। इसमें इस तरह मार्गदर्शन देना संभव नहीं।
क्या पहली बार बनाया पकवान भगवती को चढ़ाया जा सकता है?
जो भी दिव्य पकवान बने, वह भोग में चढ़ाया जाता है
एक श्रोता लिखती हैं कि उनके मार्गदर्शन और महालक्ष्मी की कृपा से, जिसे चाय बनाना भी नहीं आता, उसने पहली बार खीर बनाई और माँ को उसका भोग लगाया, हालाँकि दूध कम पड़ गया। वक्ता कहते हैं कि यह बहुत अच्छी बात है कि आज उन्होंने भगवती को खीर का नैवेद्य चढ़ाया, और कहते हैं कि कभी पूरी खीर भी बनाइए। अपने बारे में वे कहते हैं कि वे जो भी दिव्य पकवान बनाते हैं, उसका भोग भगवती को लगाते हैं और कहते हैं — माँ, आप स्वयं इसे जो नाम देना चाहें, दीजिए।
एक श्रोता लिखती हैं कि उनके मार्गदर्शन और महालक्ष्मी की कृपा से, जिसे चाय बनाना भी नहीं आता, उसने कल पहली बार खीर बनाई और माँ को उसका भोग लगाया, हालाँकि दूध थोड़ा कम पड़ गया। वक्ता उन्हें नाम से संबोधित करते हुए कहते हैं, बहुत अच्छा — यह बहुत अच्छी बात है कि आज आपने खीर बनाकर भगवती को नैवेद्य चढ़ाया। कभी पूरी खीर भी बनाइए। जहाँ तक हमारी बात है, वे कहते हैं, हम जो भी दिव्य पकवान बनाते हैं, उसका भोग भगवती को लगाते हैं और कहते हैं: माँ, आप स्वयं कीजिए, इसे जो नाम देना चाहें दीजिए। हम भी नए-नए आविष्कार करते रहते हैं।
क्या फ़र्श के बराबर काले ग्रेनाइट की पट्टी चौखट मानी जाएगी?
चौखट उठी हुई होनी चाहिए, केवल अलग रंग की नहीं
एक श्रोता बताते हैं कि घर की चौखट काले ग्रेनाइट की है, घर में सफ़ेद टाइलें लगी हैं, और काला ग्रेनाइट उनके बराबर स्तर पर है, और पूछते हैं कि क्या वह चौखट होगी। वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं भाई, नहीं होगी, क्योंकि वह बराबर है — रंग से नहीं होगी। काला और सफ़ेद रखना ठीक है, पर चौखट का अर्थ है कि वह थोड़ी उठी हुई हो; ऊँचाई बनाइए, ग्रेनाइट की एक और पंक्ति लगाइए, तब वह चौखट बनेगी।
एक श्रोता बताते हैं कि घर की चौखट काले ग्रेनाइट की है, कि घर में सफ़ेद टाइलें लगी हैं, और कि काला ग्रेनाइट उनके बराबर स्तर पर है, और पूछते हैं कि क्या वह चौखट होगी। वक्ता उत्तर देते हैं, नहीं — वह बराबर है, तो रंग से नहीं होगी, भाई। आपने काला और सफ़ेद रखा है, वह ठीक है। पर चौखट का अर्थ है कि वह थोड़ी उठी हुई हो; ऊँचाई बनाइए। ग्रेनाइट की एक और पंक्ति लगाइए। तब वह चौखट बनेगी।
साधना में हुई गलती कैसे सुधारनी चाहिए?
उसे दोहराएँ नहीं — प्रायश्चित्त करें और आगे बढ़ें
वक्ता कहते हैं कि अपराजिता कवच दीवाली के समय उपलब्ध होगा, और हर अमावस्या पर काली जी का अर्चन बिलकुल किया जा सकता है, जैसा वे पहले बता चुके हैं। गलतियाँ सुधारने के लिए क्या करें, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं: गलती हो गई है, उसे दोहराना नहीं है — प्रायश्चित्त कीजिए और आगे बढ़िए।
वक्ता कहते हैं कि अपराजिता कवच दीवाली के समय उपलब्ध होगा। हर अमावस्या पर काली जी के अर्चन के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं: हाँ, बिलकुल — हम पहले ही बता चुके हैं। गलतियाँ सुधारने के लिए क्या करना चाहिए, यह पूछे जाने पर वे उत्तर देते हैं: गलती हो गई है; उसे दोहराना नहीं है। प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। कीजिए और आगे बढ़िए।
अखंड ज्योत की बची हुई बत्ती का क्या किया जाता है?
बिना जली बत्ती रख लें, जली खड़ी बत्ती तिलक में प्रयोग करें
यह पूछे जाने पर कि अखंड ज्योत की बची बत्ती का विसर्जन करें या किसी काम में लें, वक्ता कहते हैं कि यदि वह जली नहीं और बस बच गई है, तो आप उसे रख सकते हैं; और यदि उनका आशय जली हुई खड़ी बत्ती से है, तो उसे भी आप तिलक आदि में प्रयोग कर सकते हैं। जिन अक्षत के दानों पर जप किया गया हो, उनके बारे में वे कहते हैं कि आप उन्हें पक्षियों को खिला सकते हैं।
अखंड ज्योति की बची हुई बत्ती के बारे में पूछे जाने पर — कि उसका विसर्जन करें या किसी काम में लें — वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि वह जली नहीं और बस बच गई है, तो भी आप उसे रख सकते हैं। और यदि उनका आशय जली हुई खड़ी बत्ती से है, तो उसे भी आप तिलक आदि में प्रयोग कर सकते हैं। वे कहते हैं कि अक्षत के जिन दानों पर जप किया गया है, उन्हें आप पक्षियों को खिला सकते हैं।
झूठे आरोप में निलंबित सरकारी कर्मचारी के लिए क्या बताया गया है?
न्याय के लिए भगवती की बत्तीस नामावली का रात्रि चक्र, बलि के साथ
एक श्रोता बताती हैं कि कलेक्टर ने उन्हें निलंबित किया, विभाग ने उन पर एक स्त्री-संबंधी मामले का कलंक लगवाया, कलंक सिद्ध न होने पर उन्हें शिकायत वापस लेने के लिए ब्लैकमेल किया गया और तीन साल से उनकी बहाली नहीं हुई। वक्ता पहले पूछते हैं कि क्या क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती। फिर कहते हैं: सरकारी विभाग के जो लोग इस तरह की समस्या में फँसे हों, उनके लिए गुरु हों या न हों कोई फ़र्क नहीं — हर दिन रात को चक्र विधि से भगवती की बत्तीस नामावली के एक चक्र का पाठ करें, अनार की बलि दें, या अनार की बलि संभव न हो तो जायफल की, और न्याय के लिए भगवती से प्रार्थना करें।
एक श्रोता लिखती हैं कि कलेक्टर ने उन्हें निलंबित किया, कि विभाग ने उन पर एक स्त्री-संबंधी मामले का कलंक लगवाया, कि कलंक सिद्ध न होने पर उन्हें स्वयं शिकायत वापस लेने के लिए ब्लैकमेल किया जा रहा है, और कि तीन साल से उनकी बहाली नहीं हुई। उन्हें संबोधित करते हुए वक्ता पहले पूछते हैं कि क्या वे इसके लिए कोई क़ानूनी कार्यवाही नहीं कर सकतीं — जब सिद्ध हो चुका है कि आप सही थीं और आप पर गलत आरोप लगाया गया, और फिर भी बहाली नहीं हो रही, तो क्या आप इसमें कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं कर सकतीं? आपसे ही शिकायत वापस लेने को क्यों कहा जा रहा है? वे कहते हैं कि सरकारी विभागों की समस्याएँ बहुत विचित्र माननी पड़ेंगी; जब सिद्ध हो गया कि लड़की का दोष नहीं था, तो उसे बहाल कीजिए, इसमें क्या समस्या है। वे कहते हैं कि यदि आपको सरकारी विभाग से जुड़ी इस तरह की कठिनाई हो रही है, तो एक काम कीजिए। जब सरकारी विभाग के लोग विशेषकर इस तरह की समस्या में फँस जाएँ, तो — आपके गुरु हों या न हों, कोई फ़र्क नहीं — हर दिन रात के समय चक्र विधि से भगवती की बत्तीस नामावली के एक चक्र का पाठ कीजिए। अनार की बलि दीजिए। यदि अनार की बलि न दे सकें, तो जायफल की बलि दीजिए। और न्याय के लिए भगवती से प्रार्थना कीजिए।
रात्रि का पाठ लाल वस्त्र में, लाल आसन पर, दो दीपकों और तीन प्रारंभिक पाठों के साथ किया जाता है।
लाल वस्त्र और आसन, दो दीपक, और तीन प्रारंभिक पाठ
पहले गुरु का स्मरण करें। लाल वस्त्र पहनकर और लाल आसन पर करें तो सर्वश्रेष्ठ है। दो दीपक जलेंगे, उनमें लाल बत्तियाँ होंगी: एक सरसों के तेल का, बटुक भैरव जी के नाम से, और दूसरा घी का दीपक, भगवती के नाम से। पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके, लाल कपड़ा पहनकर बैठें। पहले गुरु स्मरण, फिर संकटनाशन गणपति का पाठ, फिर भैरव जी के 108 नामों का पाठ — ये तीन पाठ आरंभ में हों।
वक्ता पूछते हैं कि विधि कैसी होगी, और उत्तर देते हैं: सबसे पहले हम गुरु स्मरण करेंगे। यदि लाल वस्त्र पहनकर और लाल आसन पर किया जाए, तो सर्वश्रेष्ठ है। दो दीपक जलेंगे, और उनमें लाल बत्तियाँ होंगी। एक दीपक सरसों के तेल का होगा, बटुक भैरव जी के नाम से, और दूसरा भगवती के नाम से, घी का दीपक। पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके, लाल कपड़ा पहनकर। पहले गुरु स्मरण कीजिए। गणपति जी के संकट नाशन स्तोत्र का पाठ कीजिए। भैरव जी के 108 नामों का पाठ कीजिए — ये तीन पाठ आरंभ में हों।
बत्तीस नामावली की चक्र विधि कैसे की जाती है?
तैंतीस पाठ, कपूर और जायफल, और शुरू करने के दिन
उसके बाद चक्र विधि से बत्तीस नामावली का पाठ करें — उसकी पीडीएफ़ चैनल पर उपलब्ध है। यह संकल्प लें कि भगवती आपको न्याय दें, कहते हुए कि बात ऐसी-ऐसी है और न्याय दीजिए, आप उनकी शरण में हैं। एक चक्र विधि का अर्थ है कि आपको तैंतीस बार पाठ करना होगा। फिर उसे भगवती को अर्पित करें: एक पात्र में कपूर रखकर और उस पर जायफल रखकर उसे जलाएँ। इसमें खाने-पीने का कोई नियम या निषेध नहीं। रात 8 या 9 बजे के बाद किया जाए तो सर्वश्रेष्ठ है।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद चक्र विधि से बत्तीस नामावली का पाठ कीजिए। उसकी पीडीएफ़ आपको चैनल पर मिल जाएगी। संकल्प लीजिए: भगवती, मुझे न्याय मिले; बात ऐसी-ऐसी है, इसमें न्याय दीजिए, मैं आपकी शरण में हूँ। और एक चक्र विधि का अर्थ है कि आपको तैंतीस बार पाठ करना होगा। वह पाठ उस विधि से कीजिए और भगवती को अर्पित कीजिए। एक पात्र में कपूर रखकर और उस पर जायफल रखकर उसे जलाइए। इसमें आपके लिए खाने-पीने का किसी प्रकार का कोई नियम या निषेध नहीं। जो खाते-पीते हैं, खाइए-पीजिए; घर जैसे चलता है वैसे चलाइए। पर यदि आप यह काम रात 8 या 9 बजे के बाद करें तो सर्वश्रेष्ठ होगा। कब से कब तक करना है? कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुरू कीजिए और तब तक जारी रखिए जब तक यह समस्या हल न हो जाए; या चतुर्दशी से — इसे केवल कृष्ण पक्ष में करना है।
हर अष्टमी पर एक कन्या का पूजन प्रयोग के परिणाम को शीघ्र करता है।
हर अष्टमी पर एक कन्या का पूजन
इसके अलावा, जब भी समय हो, भगवती के मंदिर जाकर धूप-दीप दें और प्रार्थना और निवेदन करते रहें। और यदि समस्या से बहुत जल्दी निकलना है, तो हर अष्टमी पर एक कन्या का भी पूजन अवश्य करें — दो से दस वर्ष की आयु की कन्या, जो रजस्वला न हुई हो। जाति देखने की आवश्यकता नहीं; पर यदि क्षत्रिय वर्ण की कन्या मिल जाए, तो सर्वश्रेष्ठ होगा।
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा, यदि संभव हो, जब भी समय मिले, भगवती के मंदिर जाइए, उन्हें धूप-दीप दीजिए और प्रार्थना और निवेदन करते रहिए। और यदि आप समस्या का बहुत जल्दी समाधान चाहते हैं, इस समस्या से जल्दी निकलना चाहते हैं, तो हर अष्टमी पर एक कन्या का भी पूजन अवश्य कीजिए। एक कन्या भी मिल जाए, दो से दस वर्ष की आयु के भीतर की कन्या। वह रजस्वला न हुई हो — आजकल कन्याएँ कम आयु में भी रजस्वला हो जाती हैं, तो यह ध्यान रखिए। जो कन्या रजस्वला न हुई हो; इसमें इस तरह जाति आदि देखने की आवश्यकता नहीं, पर यदि क्षत्रिय वर्ण की कन्या मिल जाए, तो सर्वश्रेष्ठ होगा।
कन्या का चरण पूजन होता है, नैवेद्य चढ़ाया जाता है, और उसे दक्षिणा और उपहार देकर विदा किया जाता है।
चरण पूजन, नैवेद्य, और दक्षिणा व उपहार देकर विदाई
उसका चरण पूजन, यानी पैरों का पूजन, अवश्य करें। पैर अच्छे से धोएँ, धोकर उनका श्रृंगार करें और फिर उसे नैवेद्य आदि चढ़ाएँ — खीर, पूरी, चना, जो भी वह खा सके, वह खिलाएँ। और दक्षिणा के साथ कोई उपहार देकर उसे विदा करें। हर अष्टमी पर ऐसा करें और आप जल्दी इस समस्या से मुक्त होंगे। जो भी सुन रहा है और जिसके जीवन में राज्य-संबंधी समस्या है, वह यह प्रयोग कर सकता है, और भगवती बहुत जल्दी कृपा करती हैं।
वक्ता कहते हैं कि उसका चरण पूजन अवश्य कीजिए — यानी उसके पैरों का पूजन। पैर अच्छे से धोइए। धोकर उनका श्रृंगार आदि कीजिए, और फिर उसे नैवेद्य आदि चढ़ाइए। चाहे खीर, पूरी या चना — जो भी वह खा सके, वह खिलाइए। और दक्षिणा के साथ कोई उपहार आदि देकर उसे विदा कीजिए। हर अष्टमी पर ऐसा कीजिए और आप बहुत जल्दी इस समस्या से मुक्त हो जाएँगे। और जो भी सुन रहा है, जिसके भी जीवन में राज्य-संबंधी समस्या है, यदि वह यह प्रयोग करे, तो भगवती सचमुच बहुत जल्दी कृपा करती हैं।
अथर्वशीर्ष और रुद्री का अभ्यास करने का अधिकार किसे है?
यज्ञोपवीत के बिना अभ्यास का भी अधिकार नहीं
वक्ता कहते हैं कि यदि यज्ञोपवीत नहीं है तो वैदिक पाठ का अधिकार नहीं; अथर्वशीर्ष, रुद्री आदि का अभ्यास करना अनुचित है, क्योंकि अभ्यास तक का अधिकार यज्ञोपवीत से मिलता है। इसके बदले, वे कहते हैं कि शिव महापुराण में उपमन्यु जी द्वारा की गई स्तुति रुद्री के समान फल देती है और उसका अभ्यास किया जा सकता है; और अथर्वशीर्ष के स्थान पर तंत्रोक्त सूक्तम् का पाठ किया जा सकता है।
वक्ता कहते हैं कि यदि यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। नहीं है, तो वैदिक पाठ का अधिकार नहीं है। अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है।, रुद्री आदि का अभ्यास करना अनुचित है, क्योंकि जो अधिकार अभ्यास के लिए भी है, वह यज्ञोपवीत से मिलता है। शिव पुराण में उपमन्यु जी द्वारा की गई स्तुति रुद्री के समान फल देती है। उसका अभ्यास आप कर सकते हैं। और अथर्वशीर्ष के स्थान पर आप तंत्रोक्त सूक्तम् का पाठ कर सकते हैं।
नवम भाव में चंद्र और राहु का ग्रहण योग किस बात का संकेत है?
वृश्चिक लग्न में राहु मारकेश, और मातृ-संबंधी दोष
वृश्चिक लग्न के साथ नवम भाव में चंद्र और राहु के ग्रहण योग के बारे में बताए जाने पर वक्ता कहते हैं कि तब राहु आपका मारकेश बन जाता है। केवल ऐसे नहीं बताया जा सकता, पर उपाय के बारे में — सीधे पितृ दोष बनता है, और पितृ से भी अधिक मातृ-संबंधी दोष की उपस्थिति है। अपनी माता की सेवा कीजिए। नवम भाग्य भाव है और धर्म का भाव भी, तो जितना हो सके भगवती और शिव जी की सेवा और पूजा कीजिए। क्योंकि वृश्चिक है, आपके मंगल देव अच्छे होने चाहिए; मंगल को सदा शुभ रखिए।
वक्ता पढ़कर सुनाते हैं कि नवम भाव में चंद्र और राहु का ग्रहण योग है, और लग्न वृश्चिक है — तो राहु आपका मारकेश बन जाता है। वे कहते हैं कि केवल ऐसे नहीं बताया जा सकता, पर इसमें उपाय के बारे में: सीधे पितृ दोष बनता है। और पितृ से भी अधिक, यहाँ मातृ-संबंधी दोष की उपस्थिति है। अपनी माता की सेवा कीजिए। क्योंकि यह नवम भाव है, यह भाग्य का भाव है और साथ में धर्म का भाव भी, तो जितना हो सके भगवती और शिव जी की सेवा और पूजा कीजिए। क्योंकि वृश्चिक है, आपके मंगल देव अच्छे होने चाहिए; मंगल को सदा शुभ रखिए।
जब राहु या ग्रहण दोष कष्ट दे, तो भगवती की चौखट पर क्या किया जाता है?
चौखट धोना और सुगंधित करना, और कीर्तिमुख की प्रसन्नता
वक्ता कहते हैं कि मंगलवार को भगवती के मंदिर जाकर उनकी सेवा करें, और भगवती की चौखट को सुगंधित करें। जब भी राहु कष्ट दे या ग्रहण दोष आदि बने, भगवती के मंदिर जाकर उनकी चौखट धोएँ, उसका श्रृंगार करें, इत्र आदि से सुगंधित करें, कुमकुम और अष्टगंध लगाएँ और उस पर दीपक जलाएँ: इससे भगवती बहुत प्रसन्न होती हैं और दोष जल्दी समाप्त होता है। यदि आप भगवान शिव की चौखट के बाहर, या चौखट पर, यही करें, तो कीर्तिमुख जी की प्रसन्नता से यह सारा दुःख दूर होता है।
वक्ता कहते हैं कि मंगलवार को मंदिर जाकर भगवती की सेवा कीजिए। भगवती की चौखट को सुगंधित कीजिए। जब भी राहु कष्ट दे, या ग्रहण दोष आदि बने — भगवती के मंदिर जाइए और उनकी चौखट धोइए, उसका श्रृंगार कीजिए, इत्र आदि से सुगंधित कीजिए, कुमकुम लगाइए, अष्टगंध आदि लगाइए, और उस पर दीपक आदि जलाइए। इससे भगवती बहुत प्रसन्न होती हैं और दोष जल्दी समाप्त होता है। या यदि आप भगवान शिव की चौखट के बाहर, या चौखट पर, यह करें, तो भी कीर्तिमुख जी की प्रसन्नता से यह सारा दुःख दूर होता है।
एकलिंग क्षेत्र का क्या महत्व है?
सिद्ध पीठ के समान
वक्ता कहते हैं कि एकलिंग क्षेत्र का महत्व स्वयं एक सिद्ध पीठ के समान समझिए। वर्तमान समय में इसके बारे में कैसे जाना जाए, इस पर वे कहते हैं कि खोजने से पता चलेगा।
वक्ता कहते हैं कि एकलिंग क्षेत्र का महत्व स्वयं एक सिद्ध पीठ के समान समझिए। यह पूछे जाने पर कि वर्तमान समय में इसे कैसे जाना जाए — वे उत्तर देते हैं कि खोजने से पता चलेगा।
लंबे जप में सिर भारी क्यों हो जाता है?
अभ्यास की कमी — अभ्यास बनने तक कम करें
यह पूछे जाने पर कि दिन में किए लंबे जप से सिर भारी होने लगे तो क्या करें, वक्ता कहते हैं कि यदि लंबे जप का अभ्यास नहीं है तो कठिनाई अवश्य आएगी। जब तक अभ्यास न आए, कम करें। सिर तो भारी होगा ही — लंबा खींचेंगे तो सिर भारी होगा और शरीर भारी होगा।
यह पूछे जाने पर कि दिन में किए गए लंबे जप से सिर भारी होने लगे तो क्या करना चाहिए, वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि लंबे जप का अभ्यास नहीं है, तो कठिनाई अवश्य आएगी। जब तक अभ्यास न आए, कम कीजिए। सिर तो भारी होगा ही — यदि लंबा खींचेंगे, तो सिर भारी होगा और शरीर भारी होगा।
जो अपनी मनमानी पर अड़ी हो, वह काँटों समेत पूरा पेड़ ही चढ़ा दे।
तो काँटों समेत पूरा पेड़ ही चढ़ा दीजिए
वक्ता कहते हैं कि उनसे कहिए कि डंठल समेत पूरा पेड़ काटकर चढ़ा दें — एक-एक पत्ता तोड़कर क्यों ला रहे हैं? काँटों समेत भगवान को चढ़ा दीजिए; उसमें भी पूरा पुण्य है। यदि मनमानी करनी है, तो पूरी मनमानी कीजिए; कोई आपको रोक नहीं रहा।
वक्ता कहते हैं कि उनसे कहिए कि डंठल समेत पूरा पेड़ काटकर चढ़ा दें। एक-एक पत्ता तोड़कर क्यों ला रहे हैं? काँटे समेत भगवान को चढ़ा दीजिए; उसमें भी पूरा पुण्य है। यदि मनमानी करनी है, तो पूरी तरह मनमानी कीजिए। कोई आपको रोक नहीं रहा।
पंडित ने हर मंत्र आधा पढ़ा, क्योंकि दक्षिणा सौ रुपये थी।
सौ रुपये की दक्षिणा पर आधा मंत्र
वक्ता बताते हैं कि वे भगवती के एक अच्छे मंदिर गए जहाँ उनके साथ वालों ने फूल, नैवेद्य और मिठाई चढ़ाई, और पंडित जी ने भगवती के मंत्र, सरस्वती से जुड़े सारे मंत्र पढ़े, पर कोई भी पूरा नहीं पढ़ा — सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके, और फिर चुप हो जाते। चार-पाँच मंत्र ऐसे ही थे। पूछने पर कि मंत्र पूरे क्यों नहीं पढ़ रहे, उन्होंने कहा कि वे पूरे इसलिए नहीं पढ़ रहे क्योंकि पूरा मंत्र सुनकर भगवती कृपा कर देंगी, और दी जा रही दक्षिणा सौ रुपये है।
वक्ता कहते हैं कि कुछ दिन पहले वे भगवती के एक बहुत अच्छे मंदिर गए थे; उनके साथ के लोगों ने भगवती को फूल, नैवेद्य और मिठाई चढ़ाई, और वहाँ के पंडित जी भगवती के मंत्र पढ़ रहे थे, सरस्वती से जुड़े सारे मंत्र। पर वे कोई भी मंत्र पूरा नहीं पढ़ रहे थे। सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके — और फिर चुप हो जाते। उन्होंने ऐसे चार-पाँच मंत्र बोले, उनसे उनका पूजा संकल्प करवाया, और बाहर हम परेशान थे: वे मंत्र पूरे क्यों नहीं पढ़ रहे? तो उन्होंने कहा कि वे मंत्र पूरे इसलिए नहीं पढ़ रहे क्योंकि पूरा मंत्र सुनकर भगवती कृपा कर देंगी, और आप जो दक्षिणा दे रहे हैं वह सौ रुपये है। इसीलिए वे मंत्र भी आधे-आधे पढ़ रहे थे। वक्ता कहते हैं कि इससे परेशान नहीं होना है: उन्हें जो करना है करने दीजिए — हमें अपना पूजन और सेवा पूरी करनी है।
शास्त्र क्या कहता है
The full verse सर्वमङ्गलमङ्गल्ये… नारायणि नमोऽस्तु ते is the one the pandit recited only half of.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥
तुम सब मंगलों में सबसे मंगलमयी हो। तुम कल्याणी हो और हर प्रयोजन सिद्ध करती हो। तुम शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी हो। नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
उस दावे का क्या कि पितृ दोष होता ही नहीं और केवल जप चाहिए?
कर्म सत्य है, पर उपाय भी शास्त्र में दिए गए हैं
एक बहुत लोकप्रिय संत के बारे में पूछे जाने पर, जो कहते हैं कि पितृ दोष कुछ नहीं, कोई भी दोष या रोग पिछले जन्म का अपना कर्म है और केवल जप करना चाहिए — और क्या इसलिए इलाज नहीं लेना चाहिए — वक्ता कहते हैं कि इसका उत्तर कई बार दिया जा चुका है, और वे संत शंकराचार्य महाराज से बड़े नहीं, जिन्होंने इस विषय का प्रमाण सहित उल्लेख किया है। यह सच है कि यह अपने कर्म का फल है, पर इसके साधन भी बताए गए हैं: दोष बनने के पीछे कारण क्या हैं और उसका उपाय कैसे होता है। केवल नाम जप से पूरी बात नहीं निकलेगी; निकलती तो ये सब विषय क्यों बताए जाते?
एक श्रोता बताते हैं कि एक बहुत लोकप्रिय संत कहते हैं कि पितृ दोष कुछ भी नहीं है, कि यदि कोई दोष लगे या कोई रोग आए तो वह पिछले जन्म का अपना कर्म है और केवल जप करना चाहिए — और पूछते हैं कि क्या तब इलाज नहीं लेना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि इसका उत्तर कई बार दिया जा चुका है। और वे संत निश्चित ही शंकराचार्य महाराज से बड़े नहीं, जिन्होंने इस विषय का प्रमाण सहित उल्लेख किया है। और यदि शास्त्रों में इन विषयों का उल्लेख है, तो आप उन्हें कैसे नकार सकते हैं? यह सच है कि यह अपने कर्म का फल है। पर उसके लिए भी साधन बताए गए हैं, हैं न — कि यदि यह दोष बन रहा है, तो उसके पीछे कारण क्या हैं और उसका निवारण कैसे होता है। केवल नाम जप से पूरी बात नहीं निकलेगी। यदि केवल नाम जप से बात निकल जाती, तो ये इतने सारे विषय क्यों बताए जाते? सीधी बात है।
तुलसी दल नैवेद्य में चढ़ाया जाए या केवल चरणों में?
शंखचूड़ प्रकरण और तुलसी दल पर भगवान का वरदान
वक्ता कहते हैं कि उसी पॉडकास्ट के गुरु, जिनके वीडियो वायरल हो रहे हैं, कहते हैं कि उनकी परंपरा में भगवान के नैवेद्य में तुलसी जी नहीं चढ़ाई जातीं। पर यह शास्त्रोक्त बात है — शिव महापुराण के शंखचूड़ प्रकरण में अभी देखा गया कि भगवान ने आशीर्वाद और वरदान दिया कि नैवेद्य में तुलसी जी चढ़ाई जाएँगी तभी वे भोग स्वीकार करेंगे, नहीं तो नैवेद्य स्वीकार नहीं करेंगे। फिर भी वे कहते हैं कि तुलसी केवल भगवान के चरणों में चढ़ाई जाती है, और नैवेद्य में चढ़ाने से नैवेद्य ही जूठा हो जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि अब उनके गुरु जी, जिनका पॉडकास्ट वायरल हो रहा है और जिसे लोग देख-सुन रहे हैं — उनका कथन है कि हमारे यहाँ भगवान के नैवेद्य में तुलसी जी नहीं चढ़ाई जातीं। पर यह शास्त्रोक्त बात है: शिव महापुराण में भी, अभी शंखचूड़ प्रकरण में, हमारे सामने देखा गया कि भगवान ने आशीर्वाद दिया, वरदान दिया, कि नैवेद्य में तुलसी जी चढ़ाई जाएँगी तभी वे वह भोग स्वीकार करेंगे, नहीं तो नैवेद्य स्वीकार नहीं करेंगे। इसके प्रमाण आपको कई जगह मिलेंगे। पर वे लोग कहते हैं नहीं, तुलसी केवल भगवान के श्री चरणों पर चढ़ाई जाती है; यदि नैवेद्य में चढ़ाई गई तो नैवेद्य ही जूठा हो जाएगा। अब जिन्हें स्वयं हरि का प्रसाद कहा गया है, कि भगवान तुलसी दल डाले बिना नैवेद्य स्वीकार नहीं करते — उनकी दो-तीन सौ साल पुरानी एक परंपरा में यह बात कही जा रही है कि तुलसी दल डालना ही नहीं है।
शास्त्र क्या कहता है
In the Śaṅkhacūḍa story, Viṣṇu's boon makes tulasī the foremost means in the worship of the gods, always near Hari.
The boon puts tulasī first in worship, but it does not say the Lord refuses naivedya without a tulasī leaf. That part of the speaker's claim is not in these verses.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
कियत्कालं महादेवि देवपूजनसाधने । प्रधानरूपा तुलसी भविष्यति वरेण मे ॥ ४५॥
हे महादेवि! कुछ कालतक मेरे वरसे तुलसीके रूपमें तुम देवपूजनके साधनमें प्रधानरूपा होगी।
स्वर्गे मर्त्ये च पाताले तिष्ठ त्वं हरिसन्निधौ । भव त्वं तुलसीवृक्षो वरा पुष्पेषु सुन्दरि ॥ ४६॥
स्वर्ग, मर्त्य तथा पातालमें हरिके समीप रहो; हे सुन्दरि! तुम पुष्पोंमें श्रेष्ठ तुलसीवृक्ष बन जाओ।
गृहस्थ को किसी परंपरा के अपने विशेष नियमों से कैसे जुड़ना चाहिए?
जिस परंपरा में दीक्षित हैं उसके नियम मानें; गृहस्थ मर्यादा में रहे
वक्ता बताते हैं कि सब जानते हैं कि वे संत जिस परंपरा के हैं, वह एकादशी व्रत आदि नहीं रखती। यदि आप उस परंपरा में दीक्षित हैं, तो वहाँ के नियम मानिए; और जो उस परंपरा में नहीं है — गृहस्थ के लिए गृहस्थ अवस्था के अनुसार मर्यादा में चलना सबसे अच्छा है। वे जोड़ते हैं कि उन्होंने श्राद्ध के विषयों का भी उपहास किया है, और ऐसे वीडियो मिल जाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि आप सब जानते हैं कि वे संत जिस परंपरा में खड़े हैं, उसमें वे लोग एकादशी व्रत आदि नहीं रखते। तो यदि आप उस परंपरा में दीक्षित हैं, तो वहाँ के नियम मानिए। और जो उस परंपरा में नहीं है — गृहस्थ के लिए गृहस्थ अवस्था के अनुसार मर्यादा में चलना सबसे अच्छा है। वे कहते हैं कि उन्होंने श्राद्ध के विषयों का भी उपहास किया है; आपको ऐसे वीडियो मिल जाएँगे।
संत के वेश में आत्म-मुग्धता से अशास्त्रीय वाणी निकलती है, जो साधारण गृहस्थों को हानि पहुँचाती है।
संत के वेश में आत्म-मुग्धता, और अशास्त्रीय वाणी
वक्ता कहते हैं कि यह अति हो जाती है। जब आप संत का वेश धारण करते हैं और करोड़ों लोग आपका हालचाल पूछने लगते हैं, तो व्यक्ति आत्म-मुग्धता में पड़कर कई तरह के अशास्त्रीय शब्द बोलता है, जिनसे हानि केवल साधारण गृहस्थों की होती है। वे उन वीडियो की ओर संकेत करते हैं जिनमें कहा जाता है — किसी के मरने के बाद उसके नाम पर लड्डू खिलाने से क्या होगा, तेरह दिन के शोक और रोने से क्या होगा, इसकी जगह नाम जप करो और उसकी सद्गति होगी। वे कहते हैं, यह कहना उचित होता कि लड्डू खिलाने के साथ नाम जप चले तो दिव्यता मिलती है; पर सीधे मना करना अनुचित है।
वक्ता कहते हैं कि यह अति हो जाती है। जब आप संत का वेश पहनते हैं और करोड़ों लोग आपका हालचाल पूछने लगते हैं, तो आत्म-मुग्धता में पड़कर व्यक्ति कई तरह के अशास्त्रीय शब्द बोलता है, जिनसे हानि केवल साधारण गृहस्थों की होती है। आपको ऐसे वीडियो मिलेंगे जिनमें वे कह रहे हैं: कोई मर गया, उसके नाम पर लड्डू खिलाने से क्या होगा? तेरह दिन जो शोक और रोना करते हो उससे क्या होगा? उसकी जगह नाम जप करो और उसकी सद्गति होगी। वे कहते हैं, यह कहना उचित होता — कि लड्डू खिलाने के साथ-साथ नाम जप चलेगा तब उसे दिव्यता मिलेगी। पर सीधे मना करना अनुचित है।
कर्मकांड को नकारना पराशर और वेदव्यास से बड़ा होने का दावा करने के बराबर है।
क्या आप पराशर और वेदव्यास से बड़े हैं?
वक्ता पूछते हैं कि पितृ कर्म विपाक और ऋषि-मुनियों ने जो कुछ सिखाया, उसके रहते क्या आप पराशर जी से बड़े, वेदव्यास जी से बड़े हो गए — क्योंकि यदि उनकी बात उस तरह मानी जाए, तो वेदव्यास के रचे पुराणों में आने वाली श्रीमद्भागवत समाप्त हो जाएगी, धुंधकारी का पूरा प्रसंग समाप्त हो जाएगा, सारे विषय समाप्त हो जाएँगे। यदि कर्मकांड का कोई महत्व नहीं और केवल नाम जप करना है, तो वहाँ भगवान का इतना श्रृंगार क्यों होता है, रास्ते में इतने फूल क्यों बिछाए जाते हैं?
वक्ता पूछते हैं कि पितृ कर्म विपाक आदि के रहते, और ऋषि-मुनि जो इतने सारे विषय सिखाकर गए — तो क्या आप पराशर जी से बड़े हो गए, वेदव्यास जी से बड़े हो गए? वेदव्यास जी, जिन्होंने इतने पुराण रचे, जिनके भीतर श्रीमद्भागवत जी का विषय तब समाप्त हो जाता है; धुंधकारी का पूरा विषय समाप्त हो जाता है; सारे विषय समाप्त हो जाते हैं, हैं न, यदि उनकी बात उस तरह मानी जाए। कर्मकांड का कोई महत्व नहीं, केवल नाम जप करो — ठीक है, कोई आवश्यकता नहीं, धूप-दीप मत जलाओ। तो वहाँ भगवान का इतना श्रृंगार क्यों हो रहा है? हम तो केवल नाम जप करेंगे। रास्ते में इतने फूल बिछाए जा रहे हैं, इतने पुष्प जिनसे उनका श्रृंगार होता है — क्यों? वहाँ भाव उठता है, और हमारी पूजा में भाव पाखंड दिखने लगता है। यही समस्या है।
राहु और केतु के मंत्रों का जप किन दिनों किया जा सकता है?
राहु और केतु के लिए बुधवार और शनिवार
यह पूछे जाने पर कि राहु और केतु के मंत्रों का जप किस दिन किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि सप्ताह के दिनों की गणना से, यदि राहु और केतु का ही करना है, तो आप बुधवार और शनिवार को कर सकते हैं।
यह पूछे जाने पर कि राहु और केतु के मंत्रों का जप किस दिन किया जा सकता है, वक्ता सप्ताह के दिनों की गणना से उत्तर देते हैं। आप बुधवार और शनिवार को कर सकते हैं। यदि केवल राहु और केतु का ही करना है।
खिलाया-पिलाया की सामग्री कहाँ मिलेगी?
खिलाया-पिलाया का पूरा विषय चैनल पर है
वक्ता एक श्रोता से कहते हैं कि खिलाया-पिलाया का विषय चैनल पर है — खिलाया-पिलाया की कटाई कैसे करनी है, उसमें मंत्र जप आदि कैसे होगा, पूरा विषय चैनल पर है। वीडियो खोजकर देखिए: खिलाया-पिलाया लिखिए, और खोज में राजतंत्र लिखिए तो आ जाएगा।
प्रश्नकर्ता को नाम से संबोधित करते हुए वक्ता कहते हैं कि खिलाया-पिलाया का विषय चैनल पर है। खिलाया-पिलाया की कटाई कैसे करनी है, उसमें मंत्र जप आदि कैसे होगा — पूरा विषय चैनल पर है। वीडियो खोजकर देखिए। वे कहते हैं, खिलाया-पिलाया लिखिए। राजतंत्र लिखकर खोजिए, और आ जाएगा।
क्या शाम को माँ काली को फूल चढ़ाए जाते हैं?
वक्ता के अपने स्थान पर दिन में चार श्रृंगार पूजा
एक श्रोता बताते हैं कि एक पंडित जी ने उनसे कहा कि शाम को माँ काली को फूल नहीं चढ़ाए जाते। वक्ता उत्तर देते हैं कि उनके अपने स्थान पर चार श्रृंगार पूजा होती हैं — वे शाम को भी माँ का पूरा श्रृंगार करते हैं, और फिर रात को भी। उनके यहाँ ऐसा होता है; वे बचपन से देखते आए हैं और सदा देखते हैं, इसके आगे वे नहीं जानते।
एक श्रोता बताते हैं कि पंडित जी ने उनसे कहा कि शाम को माँ काली को फूल नहीं चढ़ाए जाते। वक्ता उत्तर देते हैं, अब भाई, हमारे यहाँ चार श्रृंगार पूजा होती हैं। हम शाम को भी माँ का पूरा श्रृंगार करते हैं, और फिर रात को भी। हमारे यहाँ तो होता है। हम बचपन से देखते आए हैं और सदा देखते हैं। इसके आगे, पता नहीं।
जब व्यापार और स्वयं को बार-बार नज़र लगे तो क्या करना चाहिए?
आभामंडल बहुत नाज़ुक है और जप-हवन से उसे कठोर बनाना है
वक्ता कहते हैं कि यदि बात केवल नज़र की है, कि नज़र लग रही है, तो इसका अर्थ है कि संवेदनशीलता जितनी होनी चाहिए उससे अधिक है और आभामंडल बहुत नाज़ुक स्थिति में है। आभामंडल को कठोर बनाना है। और कठोरता कहाँ से आएगी? आपका अपना मंत्र जप उस स्तर का हो, और हवन सहित अनुष्ठान उस स्तर का हो, ताकि आपके आभामंडल में उपस्थित सकारात्मक ऊर्जाएँ दृढ़ और कठोर हो जाएँ। तब सुरक्षा बनती है।
एक श्रोता बताती हैं कि व्यापार को नज़र लगती है, और उन्हें भी, बार-बार, और पूछती हैं कि क्या करना चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं, देखिए, यदि बात केवल नज़र की है, कि नज़र लग रही है, तो इसका अर्थ है कि संवेदनशीलता जितनी होनी चाहिए उससे अधिक है। आभामंडल बहुत नाज़ुक स्थिति में है। आभामंडल को कठोर बनाना है। और कठोरता कहाँ से आएगी? तो अपना मंत्र जप उस स्तर का हो। हवन सहित अनुष्ठान उस स्तर का हो, ताकि हमारा आभामंडल, और हमारे आभामंडल में उपस्थित ऊर्जाएँ, सकारात्मक ऊर्जाएँ, दृढ़ और कठोर हो जाएँ। तब सुरक्षा बनेगी।
समर्पित साधक को तंत्रोक्त विधान से शरीर पर क्या धारण करना चाहिए?
बंध — बाजूबंद, कमरबंद, मणिबंध — और शिखा
यह पूछे जाने पर कि समर्पित साधक को तंत्रोक्त विधान से शरीर पर कौन-से आभूषण पहनने चाहिए और उनका क्या महत्व है, वक्ता कहते हैं कि यह इस पर भी निर्भर है कि साधक कौन है और किस देवता का है। शरीर पर बंध होने चाहिए: बाजूबंद, कमरबंद, और मणिबंध पर भी एक। ऊपर से नीचे देखें तो शिखा अवश्य होनी चाहिए — और यदि स्त्री, साधिका है, तो उसकी शिखा के बाल कभी खुले नहीं होने चाहिए; वहाँ गाँठ अवश्य बँधी होनी चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि तंत्रोक्त विधान के अनुसार समर्पित साधक को अपने शरीर पर कौन-से आभूषण पहनने चाहिए, और उनका क्या महत्व है, वक्ता कहते हैं कि यह इस पर भी निर्भर है कि साधक कौन है और वह किस देवता का साधक है। शरीर पर बंध होने चाहिए: बाजूबंद, कमरबंद, और मणिबंध पर भी एक। सबसे पहले, यदि ऊपर से नीचे देखें, तो शिखा अवश्य होनी चाहिए। यदि स्त्री है, साधिका है, तो उसकी शिखा के बाल भी कभी खुले नहीं होने चाहिए। वहाँ गाँठ अवश्य बँधी होनी चाहिए — गाँठ बँधकर ही रहेगी।
गले और भुजाओं पर क्या पहनना चाहिए?
चाँदी या सोने में इष्ट का कवच, रुद्राक्ष माला, और बाहुबंद
गले पर आएँ तो गले में माला अवश्य हो, और अपने आराध्य से जुड़ा कवच सदा रहे — जैसे, यदि आप भगवती की, काली जी की सेवा-पूजा करते हैं, तो भगवती माँ कालिका से जुड़ा कोई कवच आपके गले में अवश्य हो, और चाँदी या सोने में हो तो सर्वश्रेष्ठ; और साथ में उनसे जुड़ी रुद्राक्ष माला। फिर दोनों भुजाओं का बाहुबंद: दोनों पर पहन सकते हैं, कम से कम दाईं पर एक अवश्य हो। मणिबंध पर रुद्राक्ष, और दाएँ हाथ पर कलावे और रक्षा सूत्र के साथ रुद्राक्ष, कम से कम साधना के समय।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद हम गले पर आते हैं: गले में माला अवश्य होनी चाहिए, और अपने आराध्य से जुड़ा कवच सदा रहना चाहिए। जैसे, यदि आप भगवती की, काली जी की सेवा-पूजा कर रहे हैं, तो भगवती माँ कालिका से जुड़ा कोई कवच आपके गले में अवश्य होना चाहिए। यदि वह चाँदी या सोने में हो तो सर्वश्रेष्ठ है। और साथ में गले में उनसे जुड़ी रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । माला। उसके बाद दोनों भुजाओं का बाहुबंद, बाजूबंद। आप दोनों पर पहन सकते हैं; कम से कम दाईं पर एक अवश्य होना चाहिए। मणिबंध पर रुद्राक्ष, और दाएँ हाथ पर कलावे के साथ, रक्षा सूत्र के साथ, रुद्राक्ष आदि होना चाहिए — कम से कम साधना के समय तो अवश्य होना चाहिए।
नाभि और कमर की रक्षा कैसे करनी है?
कमर में चाँदी की चेन, या तंत्रोक्त सामग्री के साथ अभिमंत्रित धागा
वक्ता कहते हैं कि फिर कमर पर, अपनी नाभि को अवश्य सुरक्षित रखना है। नाभि और कमर की रक्षा के लिए, चाहें तो वहाँ कमर में चाँदी की चेन पहन सकते हैं, या फिर कुछ तंत्रोक्त सामग्री के साथ अभिमंत्रित धागा आदि पहनें — वह सर्वश्रेष्ठ है।
वक्ता कहते हैं कि फिर कमर पर, अपनी नाभि को अवश्य सुरक्षित रखना है। तो नाभि की रक्षा और कमर की रक्षा के लिए, वहाँ कमर में आप चाहें तो चाँदी की चेन पहन सकते हैं। या फिर धागे आदि का अभिमंत्रण करके कुछ तंत्रोक्त सामग्री के साथ पहनें — वह सर्वश्रेष्ठ है।
साधिका को पैरों और हाथों में क्या पहनना चाहिए?
पैरों में पायल और हाथों में बाला; बेटी के हाथ में सोना
वक्ता कहते हैं कि फिर पैर: यदि स्त्री है, तो बिना पायल के साधना करना उचित नहीं। यदि स्त्री ने हाथ में बाला नहीं पहना — साधिकाओं को हाथ में बाला पहनना चाहिए। आजकल लड़कियाँ हाथ में कुछ नहीं पहनतीं, जिसे वे अलग ही स्तर का छिछोरापन कहते हैं: साधिका, और हाथ खाली। माता-पिता को भी बच्चे के हाथ में सोना डालना चाहिए; बेटी के हाथों में जितना सोना होगा, आपके घर की लक्ष्मी उतनी बढ़ेगी।
वक्ता कहते हैं कि और उसके बाद फिर पैर। यदि स्त्री है, तो यदि वह बिना पायल के साधना करे, तो उचित नहीं। यदि स्त्री ने हाथ में बाला नहीं पहना — साधिकाओं को हाथ में बाला पहनना चाहिए। आजकल लड़कियाँ हाथ में कुछ भी नहीं पहनतीं; उनका छिछोरापन बिलकुल अलग स्तर का है। साधिका, और हाथ खाली। माता-पिता को भी बच्चे के हाथ में सोना डालना चाहिए। बेटी के हाथ में जितना सोना होगा, आपके घर की लक्ष्मी उतनी बढ़ेगी।
यदि ठोस सोना संभव न हो, और लड़कों के लिए क्या?
सोने के पत्र वाला शाखा-पोला; लड़कों के लिए चाँदी या ताँबा; पायल और धन
वक्ता कहते हैं कि यदि सब ठोस सोने का न बनवा सकें, तो शाखा-पोला जैसा होता है जिस पर सोने का पत्र लगा होता है; वैसा पहनवाइए, सस्ता रहता है, पर बेटी के हाथ में सोना रखिए। लड़के के हाथ में सोना नहीं आ सकता: चाँदी रखिए, ताँबा रखिए, पर कुछ रखिए। पैरों में पायल हो तो माता-पिता के धन की वृद्धि होती है, और क्योंकि वह पति के घर की स्वामिनी, गृहस्थी की स्वामिनी है, तो लक्ष्मी की वृद्धि होती है।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप पूरा ठोस सोने का न बनवा सकें, तो वह शाखा-पोला जैसा होता है जिस पर सोने का पत्र लगा होता है। वैसा पहनवाइए; सस्ता रहता है। पर बेटी के हाथ में सोना रखिए। लड़के के हाथ में सोना नहीं आ सकता — चाँदी रखिए, ताँबा रखिए। पर कुछ रखिए। यदि पैरों में पायल हो, तो माता-पिता के धन की वृद्धि होती है; और वह पति के घर की स्वामिनी है, गृहस्थी की स्वामिनी है, तो लक्ष्मी की वृद्धि होती है।
पायल स्त्री की रक्षा के लिए क्या करती है?
चाँदी की पायल से शरीर की आधी से अधिक रक्षा
वक्ता कहते हैं कि नकारात्मक शक्तियों के मामले में, जो माँ या बहन पैरों में पायल पहनती है, उससे उनके सामर्थ्य घट जाते हैं। पैर में धागा बाँधने से यह नहीं होगा, पर चाँदी की पायल पहनी जाए तो शरीर की आधी से अधिक रक्षा वहीं से हो जाती है। इसलिए पहननी चाहिए। उसके बाद ही साधना हो: यदि आप साधना करने बैठ रही हैं तो पैरों में पायल और हाथों में बाला, या जो भी पहन सकें — चूड़ियाँ पहनें तो सर्वश्रेष्ठ, नहीं तो बाला अवश्य हो।
वक्ता कहते हैं कि और यह जान लीजिए: नकारात्मक शक्तियाँ, जितनी भी हैं — जब कोई स्त्री, माँ, बहन, पैरों में पायल पहनती है, तो उससे उनके सामर्थ्य घट जाते हैं। पैर में धागा बाँधने से यह नहीं होगा; पर यदि चाँदी की पायल पहनी जाए, तो शरीर की आधी से अधिक रक्षा वहीं से हो जाती है। इसलिए पहननी चाहिए। उसके बाद ही साधना होनी चाहिए। यदि आप साधना करने बैठ रही हैं, तो पैरों में पायल, हाथों में बाला, या जो भी पहन सकें; चूड़ियाँ पहनें तो सर्वश्रेष्ठ है, और नहीं तो बाला आदि अवश्य होना चाहिए।
कर्णछेदन संस्कार क्यों किया जाता है?
सोलह संस्कारों में से एक, अपनी तिथि, नक्षत्र और मंत्रों के साथ
वक्ता कहते हैं कि पुरुषों के लिए कर्णछेदन संस्कार आज मज़ाक का विषय बन गया है; वे कई बड़े सेलिब्रिटी और ज्योतिष के लोगों को कहते देखते हैं कि कर्णछेद कहाँ से आया। यह सोलह संस्कारों में से एक है — कर्णछेद संस्कार होता है। इसकी भी तिथि और नक्षत्र आदि होते हैं, और कान का छेदन "भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः" जैसे मंत्रों के उच्चारण के साथ होता है। यह केवल ज्योतिष का उपाय नहीं कि बुध खराब है या शुक्र खराब है, या बच्चे मर रहे थे।
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा, पुरुष का कर्णछेदन संस्कार आज मज़ाक का विषय बन गया है; वे कई लोगों को, बड़े सेलिब्रिटी और ज्योतिष के लोगों को, कहते देखते हैं — कर्णछेद कहाँ से आया? भाई, यह सोलह संस्कारों में से एक है; कर्णछेद संस्कार होता है। इसकी भी तिथि और नक्षत्र आदि होते हैं। कान "भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः" जैसे मंत्रों के उच्चारण के साथ छेदा जाता है। दोनों कानों में। यह केवल ज्योतिष का उपाय नहीं, कि बुध खराब है या शुक्र खराब है, या कुछ बच्चे मर रहे थे इसलिए कान छेदा गया — वह विषय अलग है। पर कर्णवेध संस्कार होता आया है।
क्या पुरुष साधक को भी कानों में सोना पहनना चाहिए?
पुरुष साधक के कानों में सोने के आभूषण; स्त्री के लिए अनिवार्य
वक्ता कहते हैं कि पुरुष साधक के कानों में भी सोने के आभूषण अवश्य होने चाहिए — यह किसी गायक के प्रशंसक के लिए नहीं जो कूल दिखने के लिए पहने; यह नियम है। यदि आप तंत्रोक्त पद्धति से चल रहे हैं, तो दोनों कान ठीक से, सही समय पर, सही मुहूर्त में, मंत्रों के उच्चारण के साथ छिदवाइए, और उनमें सोने की बालियाँ अवश्य पहनिए। स्त्री के लिए यह अनिवार्य है। कानों में सोना न हो तो दरिद्रता है; कम से कम एक छोटा टॉप्स हो, पर सोने का, तो सर्वश्रेष्ठ। लड़कियों और स्त्रियों की नाक में सोना अवश्य होना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि पर कर्णवेध संस्कार होता आया है, और पुरुष साधक के कान में भी सोने के आभूषण अवश्य होने चाहिए। वह चीज़ किसी गायक के प्रशंसक के लिए नहीं, कि कूल दिखना है तो पहनो — नहीं। यह नियम है। यदि आप तंत्रोक्त पद्धति से चल रहे हैं, तो दोनों कान ठीक से, सही समय पर, सही मुहूर्त में, मंत्रों के उच्चारण के साथ छिदवाइए, और उनमें सोने की बालियाँ अवश्य पहनिए। और स्त्री के लिए यह अनिवार्य है। यदि कान में सोना नहीं है तो दरिद्रता है; यदि निर्धनता है, तो वह विषय अलग है — पर कम से कम एक छोटा टॉप्स हो, बस वह सोने का हो, तो सर्वश्रेष्ठ है। लड़कियों की, कुमारियों की, स्त्रियों की नाक में सोना अवश्य होना चाहिए।
सोना दिखावे के लिए नहीं, श्री तत्व के रूप में क्यों पहना जाता है?
सनातन में कोई देवता श्री तत्व से रहित नहीं
वक्ता कहते हैं कि सोने के बिना इन सबमें देवता प्रसन्न नहीं होते और मंत्र जप पूरा फल नहीं देता, क्योंकि लक्ष्मी का अभाव दिखता है। सनातन में ऐसा कोई देवता नहीं जो श्री तत्व से युक्त न हो; और यदि आप श्री तत्व से रहित होकर जप कर रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि आप विरक्ति की बात में चले गए, और ज़बरदस्ती कोई चीज़ करेंगे तो नहीं होगी। आप गृहस्थ हैं — गृहस्थ की मर्यादा के अनुसार श्री तत्व धारण कीजिए और फिर कीजिए। सोने में श्री तत्व की मात्रा सबसे अधिक मानी गई है।
वक्ता कहते हैं कि सोने के बिना, इन सबमें फिर देवता प्रसन्न नहीं होते। मंत्र जप पूरा फल नहीं देता, क्योंकि लक्ष्मी का अभाव दिखता है। सनातन में ऐसा कोई देवता नहीं जो श्री तत्व से युक्त न हो। और यदि आप श्री तत्व से रहित होकर जप कर रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि आप विरक्ति की बात में चले गए हैं; और यदि आप कोई चीज़ ज़बरदस्ती करेंगे, तो वह नहीं होगी। आप गृहस्थ हैं: गृहस्थ की मर्यादा के अनुसार श्री तत्व धारण कीजिए और फिर कीजिए। सोने में श्री तत्व की मात्रा सबसे अधिक मानी गई है। तो स्त्रियों की नाक में भी सोना हो, और कान में भी सोना। और गृहस्थ की मर्यादा के अनुसार ठीक से श्रृंगार करके आप जितनी सेवा करें, उतना श्रेष्ठ। एक वस्त्र का महत्व है; आज वह संभव नहीं, और लोग सिला हुआ कपड़ा पहनकर करते हैं — ठीक है, वह भी चलता है।
शरीर पर क्या कभी खाली नहीं छोड़ना चाहिए?
हाथ, पैर और कमर — और सबसे बढ़कर स्त्री की कमर
वक्ता कहते हैं कि कम से कम हाथ पर, पैर पर, कमर पर ये चीज़ें कभी खाली न रखें। स्त्रियों को अपनी कमर कभी खाली नहीं रखनी चाहिए। पुरुषों की बात अलग है, क्योंकि वे शर्माते हैं — पहनेंगे तो कोई छेड़ेगा; पर यदि आप साधक हैं, तो पहनिए, और लोग क्या कहते हैं यह मत देखिए, आप बिना कपड़ों के तो नहीं घूम रहे। स्त्री की कमर कभी खाली नहीं रहनी चाहिए: हो सके तो कमर में सदा चाँदी की एक मज़बूत चेन ही पहनें, विशेषकर यदि आप साधिका हैं।
वक्ता कहते हैं कि पर कम से कम, हाथ पर, पैर पर, कमर पर ये चीज़ें कभी खाली न रखें। स्त्रियों को अपनी कमर कभी खाली नहीं रखनी चाहिए। पुरुषों की बात अलग है, क्योंकि वे शर्माते हैं; वे आधे-अधूरे में परेशान रहते हैं — पहनेंगे तो कोई छेड़ेगा। ठीक है। पर यदि आप साधक हैं, तो पहनिए। लोग क्या कहते हैं यह मत देखिए; ऐसा नहीं कि आप बिना कपड़ों के घूम रहे हैं। तो स्त्री की कमर कभी खाली नहीं रहनी चाहिए। यदि संभव हो, तो कमर में सदा चाँदी की एक मज़बूत चेन ही पहनिए — विशेषकर यदि आप साधिका हैं।
ये आभूषण वास्तव में क्या रक्षा देते हैं?
श्री तत्व कम नहीं होता, और अभिचार दोष लगाना कठिन हो जाता है
वक्ता कहते हैं कि यदि ये सब चीज़ें आपके शरीर पर बनी रहें, तो एक तो आपका श्री तत्व कभी कम नहीं होगा; घर भी धन-धान्य से भरा रहेगा; कोई दोष नहीं लगेगा; और वह बात कि कोई आपके मंत्र जप की ऊर्जा चुरा ले, आप पर अभिचार दोष आदि लगे, कोई तंत्र प्रयोग करे — इतनी आसान नहीं रहेगी। वे कहते हैं, देखिए, भगवती को भी आभूषण चढ़ाए जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यदि ये सब चीज़ें आपके शरीर पर बनी रहें, तो एक तो आपका श्री तत्व कभी कम नहीं होगा। घर भी धन-धान्य से भरा रहेगा। कोई दोष नहीं लगेगा। और यह एक विषय जो आता है — कि कोई मंत्र जप की ऊर्जा चुरा लेता है, कि आप पर अभिचार दोष आदि लगता है, कि कोई तंत्र प्रयोग करता है — यह इतना आसान नहीं रहेगा। वे कहते हैं, देखिए, भगवती को भी आभूषण चढ़ाए जाते हैं।
भगतवाल साधक घर की किन शक्तियों को निशाना बनाते हैं?
सौम्य योगिनी शक्तियाँ जो अभिचार का उत्तर नहीं देतीं
यह कहते हुए कि बोलना उचित नहीं फिर भी वे एक और बात बताएँगे, तंत्र की एक प्रायोगिक बात, वक्ता उन घरों का वर्णन करते हैं जिनमें किसी देवी की उपस्थिति रहती है — भगवती की कोई प्रधान योगिनी शक्ति, बहुत करुणामय स्वभाव की, जो किसी तांत्रिक अभिचार प्रयोग का उत्तर ही नहीं देतीं। ऐसी सौम्य शक्तियाँ बहुत-से लोगों के घरों और कुलों में उपस्थित हैं, और वे दुर्लभतम स्थिति में ही क्रोधित या रौद्र होती हैं। कठिनाई यह है कि भगतवाल क्षेत्र के साधक ऐसी शक्तियों के साथ बहुत उपद्रव करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि एक बात और वे बताएँगे, हालाँकि बोलना उचित नहीं — और इसके बाद वे लाइव समाप्त करेंगे। यह तंत्र की एक प्रायोगिक बात है। उन घरों में जिनमें किसी देवी की उपस्थिति रहती है, जहाँ भगवती की कोई प्रधान योगिनी शक्ति है, बहुत करुणामय स्वभाव की, जो किसी के तांत्रिक अभिचार प्रयोग आदि का कोई उत्तर नहीं देतीं — ऐसी शक्तियाँ, जो सौम्यता रखती हैं। बहुत-से लोगों के घरों और कुलों में ऐसी शक्तियों की उपस्थिति है। ये शक्तियाँ दुर्लभतम स्थिति में ही क्रोधित और रौद्र होती हैं; नहीं तो बहुत सौम्य होती हैं। पर कठिनाई यहीं है कि भगतवाल क्षेत्र के साधक इस तरह की शक्तियों के साथ बहुत उपद्रव करते हैं।
ऐसे साधक घर की शक्ति को क्यों ले जाना चाहते हैं?
क्योंकि उपदेव शक्तियाँ उनके अधीन चलती हैं और उनकी शरण लेती हैं
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि इन शक्तियों में सामर्थ्य है: कई प्रकार की उपदेव श्रेणी की शक्तियाँ उनके अधीन चलती हैं, उनकी बात मानती हैं और उनकी शरण लेती हैं। इसलिए लोग इस तरह की शक्तियों को ले जाकर अपने यहाँ रखना चाहते हैं, और इसके लिए अनेक प्रकार के तांत्रिक प्रयोग करते हैं — सबकी अपनी विद्या है। फिर वे कहते हैं कि इन विद्याओं से रक्षा के लिए, सारे तांत्रिक पर्वों पर — चाहे अभी बीती अष्टमी की महानिशा हो, या आने वाली दीवाली की महानिशा —
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि उनके भीतर सामर्थ्य है। कई प्रकार की उपदेवता श्रेणी की शक्तियाँ उनके अधीन चलती हैं, उनकी बात मानती हैं और उनकी शरण लेती हैं। तो लोग इस तरह की शक्तियों को लेकर अपने यहाँ रखना चाहते हैं, और इसके लिए अनेक प्रकार के तांत्रिक प्रयोग करते हैं। सबकी अपनी विद्या है। तो आपकी जानकारी के लिए, वे कहते हैं, जान लीजिए कि इन विद्याओं से रक्षा के लिए, जो भी तांत्रिक पर्व आते हैं — चाहे अभी बीती अष्टमी की महानिशीथ हो, या अब आने वाली दीवाली की महानिशा —
उन पर्वों पर सिर से नाखून तक पूरा श्रृंगार अभिमंत्रित करके विग्रह पर चढ़ाया जाता है।
सिर से नाखून तक पूरा श्रृंगार, अभिमंत्रित करके विग्रह पर चढ़ाया हुआ
वक्ता कहते हैं कि इसी समय, जहाँ लोगों ने अपने यहाँ भगवती का श्री विग्रह या उनका पिंड स्थापित किया है, वहाँ जितने भी आभूषण हैं, अभिमंत्रित करके चढ़ाए जाते हैं — सिर से नाखून तक सब, चाहे बिछिया हो, पायल, उनके हाथों की चीज़ें, बाला आदि, करधनी, गले में मंगलसूत्र पहनाना, हार पहनाना, नथिया, माँग टीका, उनका पूरा श्रृंगार होगा। पर सब कुछ पूरी विधि के अनुसार मंत्र से अभिमंत्रित करके।
वक्ता कहते हैं कि इसी समय, जहाँ लोगों ने अपने यहाँ भगवती का श्री विग्रह या उनका पिंड आदि स्थापित करके रखा है, तो जितने भी आभूषण हैं, उनका अभिमंत्रण करके चढ़ाए जाते हैं। सिर से लेकर नाखून तक सब — चाहे बिछिया हो, पायल, उनके हाथों की चीज़ें, बाला आदि, करधनी, चाहे गले में मंगलसूत्र पहनाया जाए, हार पहनाया जाए, नथिया, माँग टीका — उनका पूरा श्रृंगार होगा। पर सब कुछ विधि के अनुसार मंत्र से अभिमंत्रित करके।
जब कोई तांत्रिक घर में घुसे तो अभिमंत्रित आभूषण कैसे काम करते हैं?
सौम्य शक्ति उत्तर नहीं देतीं, पर अभिमंत्रित आभूषण पलटवार करते हैं
वक्ता कहते हैं कि वे सोने या चाँदी की चीज़ें अपने आप में इतनी विशेष हो जाती हैं कि जब उन्हें भगवती के विग्रह पर या उस पिंड पर पहनाया जाता है जिसमें भगवती, वह योगिनी शक्ति, वह दिव्य शक्ति, सदा निवास करती हैं — तो यदि कोई तांत्रिक छल से, आपका रिश्तेदार बनकर या मेहमान बनकर यह कहते हुए आए कि वह आगंतुक है, और वहाँ तांत्रिक प्रयोग करे, तो उन्हें कुछ नहीं करना पड़ेगा और वे उत्तर नहीं देंगी, क्योंकि वे सौम्य शक्ति हैं। पर उन्होंने जो अभिमंत्रित आभूषण पहने हैं, वे उन पर अस्त्र के रूप में काम करते हैं, क्योंकि उनमें ऐसे मंत्र प्रयोग हुए हैं, और तुरंत पलटवार होता है — और वहीं से कष्ट शुरू होता है।
वक्ता कहते हैं कि और वे सोने की चीज़ें या चाँदी की चीज़ें अपने आप में इतनी विशेष हो जाती हैं कि जब उन्हें भगवती के विग्रह पर, या उस पिंड पर पहनाया जाता है जिसमें भगवती का सदा निवास है, जिसमें उस योगिनी शक्ति का, उस दिव्य शक्ति का सदा निवास है — और यदि कोई तांत्रिक वहाँ छल से आए, आपका रिश्तेदार बनकर, आपके यहाँ मेहमान बनकर, कहते हुए कि हाँ भाई, हम आगंतुक हैं, और वहाँ तांत्रिक प्रयोग आदि करे — तो उसके केवल करने से उन्हें कुछ नहीं करना पड़ेगा, वे उत्तर नहीं देंगी, क्योंकि वे सौम्य शक्ति हैं। पर उन्होंने जो ये अभिमंत्रित आभूषण पहने हैं — यही, उन पर अस्त्र के रूप में, क्योंकि उनमें ऐसे मंत्र प्रयोग हुए हैं — यही तुरंत पलटवार करते हैं। और वहीं से उनके लिए कठिनाई शुरू होती है। वे कहते हैं, यह एक प्रयोग है।
साधारण साधिका को अपने आभूषणों के साथ क्या करना चाहिए?
कवच से अभिमंत्रित, और आराध्य को चढ़ाए बिना कभी न पहनें
वक्ता कहते हैं कि इसी तरह, मान लीजिए आप किसी कवच का पाठ करती हैं: तो आभूषणों को कवच आदि से अभिमंत्रित करके पहनिए। और साधिका या साधक को कोई भी आभूषण पहले अपने आराध्य को चढ़ाए बिना कभी नहीं पहनना चाहिए — चाहे वह दस रुपये का हो या दस लाख का, जितना संभव हो।
जो भी पहना जाए, वह पहले भगवती विंध्यवासिनी के रात्रि श्रृंगार में जाता है, और फिर जीवन भर पहना जाता है।
पहले भगवती विंध्यवासिनी के रात्रि श्रृंगार में, फिर जीवन भर पहनना
वक्ता कहते हैं कि उनके अपने शरीर पर जो कुछ भी है — सौ रुपये का हो या किसी भी मूल्य का, सोने का हो या किसी और चीज़ का — वे उसे पहले भगवती विंध्यवासिनी को उनके मूल स्वरूप श्रृंगार में दिए बिना पहनते ही नहीं। माँ के श्रृंगार में जो भी जाता है, सौ रुपये का हो या दस हज़ार का, वह सीधे माँ के यहाँ रात्रि श्रृंगार में जाएगा और वे उसे रात भर पहनेंगी। सुबह हम उसे जीवन भर के लिए पहन लेते हैं। एक तो हृदय का भाव जाग्रत रहता है; दूसरे, इतनी शक्तिशाली शक्ति ने उसे रात भर पहना, तो सोचिए उसकी ऊर्जा कितनी होगी।
वक्ता कहते हैं कि हमारे शरीर पर जो भी चीज़ है — सौ रुपये की हो या किसी भी मूल्य की, सोने की हो या किसी और चीज़ की — हम उसे भगवती विंध्यवासिनी को मूल स्वरूप श्रृंगार में दिए बिना पहनते ही नहीं। माँ के यहाँ श्रृंगार में जो भी जाता है, यदि वह सौ रुपये का भी हो, दस हज़ार रुपये का हो, तो माँ के यहाँ, भाई, वह सीधे रात्रि श्रृंगार में, रात्रि शयन श्रृंगार में जाएगा, और वे उसे रात भर पहनेंगी। सुबह हम फिर उसे जीवन भर के लिए पहन लेते हैं। एक तो हृदय का भाव भी जाग्रत रहता है; दूसरे, इतनी बड़ी और शक्तिशाली शक्ति ने उसे रात भर पहना — सोचिए उसकी ऊर्जा कितनी है।
आभूषण किसी दिव्य क्षेत्र में छोड़ दिए जाएँ, या वापस लाए जाएँ?
कामाख्या का प्रसंग — माँ का अपना स्पर्श, पंडित का हाथ नहीं
वक्ता कहते हैं कि यह घर पर कीजिए; वे यह नहीं कह रहे कि किसी दिव्य क्षेत्र में जाकर छोड़ आइए, और बाद में पता चले कि वह कभी वापस मिला ही नहीं। वे बताते हैं कि कामाख्या में, जहाँ वे वीडियो में दिखाई पायल आदि लेकर गए थे, एक पंडित जी ने कहा कि पंडितों को दे दीजिए, वहाँ चढ़ाने की आवश्यकता नहीं, भुला दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि वे पंडित जी को दे देंगे पर तब माँ उसे छुएँगी भी नहीं। कामाख्या के भीतर पूरा अँधेरा रहता है, केवल दीपक जलते हैं; उन्होंने आभूषणों का पूरा सेट — दो पायल और सोने का एक नाक का आभूषण — उठाकर सब नीचे माँ के पास रख दिया।
वक्ता कहते हैं कि तो आप भी ऐसा कीजिए। घर पर कीजिए; हम यह नहीं कह रहे कि किसी दिव्य क्षेत्र में जाकर छोड़ आइए और फिर पता चले कि वह आपको कभी वापस मिला ही नहीं। वे बताते हैं कि कामाख्या में, जब उन्होंने वीडियो डाला था — वे ये पायल और यह सब कामाख्या ले गए थे, और एक पंडित जी ने कहा, पंडित जी को दे दीजिए, उन्हें दे दीजिए, सब दे दीजिए, वहाँ चढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं, भुला दिया जाएगा। हमने कहा कि हम पंडित जी को दे देंगे, पर तब माँ उसे छुएँगी भी नहीं। अब यदि आप कभी कामाख्या में भीतर जाएँ, तो वहाँ देखिए — पूरा अँधेरा रहता है, केवल दीपक जलते रहते हैं। हमने आभूषणों का पूरा सेट उठाया, दो पायल और उनका सोने का एक नाक का आभूषण, जो सब हमने वीडियो में डाला था, और सब नीचे माँ के पास रख दिया। हमने कहा, माँ, इसे कुछ देना पड़ेगा, इसमें से वे स्वयं सब दे देंगी। भगवती समझें और वह समझे — हम पंडित जी को क्यों दें? अब यदि हम सीधे पंडित जी को दें, तो पंडित जी उसे छुआएँगे भी नहीं। और हम चाहते हैं कि माँ स्वयं उसे छुएँ; यह हमारे पूरे गृहस्थ परिवार का है, ताकि माँ सब पर कृपा करें। तो आप इस तरह कर सकते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।