कामाख्या तंत्र महापर्व — तंत्र क्षेत्र वास्तव में क्या है, और इसके बारे में क्या कहा गया है

कामाख्या तंत्र से जुड़ी भ्रांतियों पर एक लाइव सत्र।

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01

कामाख्या तंत्र क्षेत्र असल में क्या है?

विषय का परिचय — आगम रहस्यों में कामाख्या तंत्र का स्थान, और उसके आसपास फैला भ्रम

· 01:41–02:49 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि सनातन संस्कृति के आगम रहस्यों में तंत्र से जुड़े विषयों में कामाख्या तंत्र का बहुत प्रमुख स्थान है। इसके बारे में समाज में बहुत सारी भ्रांतियाँ फैली हैं। वे बताएँगे कि सच क्या है। तंत्र क्षेत्र की गुप्त बातें ऐसी भ्रांतियों के ज़रिए कैसे फैलाई जाती हैं। और इन्हीं के कारण इस क्षेत्र में आने वाले नए तंत्र साधकों और साधिकाओं का दोहन और शोषण कैसे होता है।

02

कामाख्या के असली साधक कैसे होते हैं?

क्षेत्र की सच्चाई, और ऑनलाइन दिखने वाले साधक

· 02:50–03:34 · Also a question

वे कहते हैं कि वे खुलकर सबके सामने रखेंगे कि सच्चाई क्या है। कामाख्या तंत्र लोगों की बातचीत में इतना प्रचलित क्यों है और उसकी असली रूपरेखा क्या है। कामाख्या के असली साधक कैसे होते हैं। और फेसबुक और यूट्यूब पर लोग जिन साधकों के बारे में पढ़ते-सुनते हैं, उनकी सच्चाई क्या है।

वक्ता कहते हैं कि इसके साथ वे खुलकर सबके सामने रखेंगे कि सच्चाई क्या है। कामाख्या तंत्र लोगों की बातचीत में इतना प्रचलित कैसे हो गया। उसकी असली रूपरेखा क्या है। कामाख्या के असली साधक कैसे होते हैं। और फेसबुक और यूट्यूब पर लोग जिन साधकों के बारे में पढ़ते और सुनते हैं, उनके पीछे की सच्चाई क्या है।

03

यूट्यूब के ज़माने में कुछ भी गुप्त नहीं रहा, और जो सामने आ रहा है वह आधा सच और भ्रम का मेल है

यूट्यूब के ज़माने में कुछ गुप्त नहीं रहा, और जो सामने आ रहा है वह आधा सच है

· 03:35–04:05

वक्ता कहते हैं कि यूट्यूब के कारण अब कुछ भी गुप्त नहीं रहा। और जो उजागर हो रहा है वह आधा सच है — कहीं आधा सच, और कुछ भ्रम की बातें। ये समाज में फैलाई जाती हैं, ताकि आधी जानकारी से लोगों को भ्रम में डाला जाए और उनका शोषण हो।

04

गुह्य बातें सही ढंग से उजागर होनी चाहिए; सच सुनकर कोई क्या करता है, यह वक्ता के हाथ में नहीं

सच साफ़ कहना, और जो वक्ता के हाथ में नहीं

· 04:06–04:40

वे कहते हैं कि जब बातें गुप्त रह ही नहीं रहीं, तो ज़रूरी है कि लोगों के सामने जो गुह्य बातें हैं वे सही ढंग से उजागर हों। ताकि लोग जानें कि सच क्या है और भ्रम से बाहर आएँ। और अगर सच जानकर भी कोई अपना नाश करवाना चाहे, तो वह भगवती की इच्छा और उसका अपना प्रारब्ध है — उसमें वे या आप क्या कर सकते हैं। वे इस पर चर्चा करेंगे कि सच क्या है।

05

भगवती कामरूप कामाख्या वहाँ किस रूप में पूजी जाती हैं?

वह अंग जिससे सारा जन्म होता है, और जिसे समाज में सबसे नीचा कहा जाता है

· 04:41–05:30 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि सुनने वाले सब जानते हैं कि भगवती कामाख्या वहाँ किस रूप में पूजी जाती हैं। यह वह क्षेत्र है जिसके भीतर हर जन्म लेने वाले जीव के — केवल मनुष्य के नहीं — अंग और अवयव बनते हैं। जिससे हम अपना प्रारब्ध भोगने के लिए शरीर पाते हैं, और जिस पर हम सबसे ज़्यादा टिके हैं। और ठीक उसी चीज़ को समाज में सबसे घृणित कहा जाता है।

06

कामाख्या जिस रूप में पूजी जाती हैं, उसे घृणित क्यों माना जाता है?

हमारी अपनी मानसिकता, और ऐसा समाज जो यह ज्ञान देता ही नहीं

· 05:31–06:06 · Also a question

वक्ता जवाब देते हैं — आपकी और हमारी मानसिकता। जिस चीज़ के कारण इस पूरी धरती पर हमारा जन्म हुआ, उसी को हम घृणित कहते हैं। क्योंकि हममें ऐसा संयम नहीं है कि अपने बारे में सच कहा जा सके। और संयम आएगा कैसे, जब हमारे समाज में ऐसा ज्ञान दिया ही नहीं जाता।

वक्ता पूछते हैं — जानते हैं इसका कारण क्या है? आपकी और हमारी मानसिकता। जिस चीज़ के कारण इस पूरी धरती पर हमारा जन्म हुआ, उसी को हम घृणित बताते हैं। क्योंकि ऐसा संयम नहीं है कि अपने बारे में सच कहा जा सके। और संयम आएगा कहाँ से, जब हमारे समाज में ऐसा ज्ञान दिया ही नहीं जाता?

07

चुप्पी और बेहद छूट दोनों घातक हैं — बिना मर्यादा दिया गया ज्ञान उतना ही हानिकारक है जितना रोका गया ज्ञान

दोनों अति घातक हैं — चुप्पी, और बेहद छूट

· 06:07–06:37

वक्ता कहते हैं कि जब यह ज्ञान दिया जाता है, तो इतने खुलेपन से नहीं दिया जाता कि कोई मर्यादा ही न बचे — दोनों बातें अपनी जगह बहुत हानिकारक हैं। जब छूट और आज़ादी दी जाती है, तो इतनी आज़ादी दी जाती है और बातें आपके सामने ऐसे रखी जाती हैं कि आप अपने रास्ते से भटक जाते हैं।

08

अंबुवाची पर्व पास आते ही आम गृहस्थ कामाख्या क्षेत्र के बारे में पूछने लगते हैं

अंबुवाची पर्व का आना, और तब कौन पूछने लगता है

· 06:38–06:58

वक्ता कहते हैं — क्योंकि अंबुवाची पर्व आ रहा है। जब भी अंबुवाची आती है, लोग इस समय आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं — आम गृहस्थ यह जानने के लिए कि कामाख्या क्षेत्र क्या है और अंबुवाची में क्या करना चाहिए, और तंत्र क्षेत्र में रुचि रखने वाले उसकी सच्चाई जानने के लिए।

09

भगवती कामरूप कामाख्या कब प्रकट हुईं, और मंदिर किसने बनाया?

सतयुग, और कामदेव की रखी पहली ईंट

· 06:59–07:26 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भगवती कामरूप कामाख्या का प्राकट्य काल सतयुग था। कहा जाता है कि कामरूप प्रदेश में बना कामाख्या मंदिर कामदेव और रति ने बनाया — देव कामदेव ने वह मंदिर स्थापित किया, और पहले भगवान विश्वकर्मा की मदद से उसका निर्माण किया। यानी पहली ईंट कामदेव ने रखी, और इसी कारण उस क्षेत्र का नाम कामरूप प्रदेश पड़ा।

10

कामाख्या क्षेत्र का विंध्य क्षेत्र से क्या संबंध है?

कल्प भेद — हर शक्तिपीठ अपने-अपने कल्प में बना

· 07:27–07:55 · Also a question

भगवान ने सुदर्शन चक्र से भगवती का जो मुख्य अंग काटा, उससे वहाँ महातीर्थ बना, और वह क्षेत्र जगदंबा के पूरे संसार की उत्पत्ति का कारण बना। वक्ता कहते हैं कि कल्पों की गणना से, एक कल्प में विंध्य क्षेत्र बना — जिसका मुख्य ध्यान और मणिदीप का ध्यान हम करते हैं — और दूसरे कल्प में कामाख्या क्षेत्र बना। कल्प भेद से हर शक्तिपीठ का अपना महत्व रहा है।

11

क्या इन क्षेत्रों की महिमा कभी घटती है?

कामरूप, रजरप्पा और बाकी क्षेत्रों की महिमा हर कल्प और हर युग में बनी रहती है

· 07:56–08:21 · Also a question

वक्ता कहते हैं — नहीं। चाहे तंत्र क्षेत्र हो, कामरूप कामाख्या क्षेत्र हो, या रजरप्पा का छिन्नमस्तिका क्षेत्र — इन सब क्षेत्रों की महिमा हर कल्प और हर युग में हमेशा बनी रहती है; उसमें कोई कमी नहीं आती। सतयुग में कामरूप कामाख्या का पहला समय वहाँ तंत्र क्षेत्र की उत्पत्ति का समय माना जाता है।

12

कामाख्या स्थान पर असल में क्या है, और उसे देखना किसके लिए वर्जित है?

लाल कपड़े में लिपटी महाशिला, और अविवाहितों पर रोक

· 08:22–08:59 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जिस स्वरूप को हम सब वहाँ देखते हैं, उसमें एक महाशिला है। उसे ढककर लाल कपड़े से लपेटकर रखा जाता है, और उसका दर्शन और पूजन वर्जित है — उनके लिए जिनका विवाह नहीं हुआ। इस बात पर भी बहुत भ्रांतियाँ हैं। वे कहते हैं कारण साफ़ है: आज लोग यूट्यूब चैनलों पर अघोर शब्द सुनकर उसकी ओर खिंचते हैं, और यह सोचकर कि वहाँ बड़ी शक्तियाँ मिलेंगी, पल भर में शमशान में साधना करने को तैयार हो जाते हैं।

13

शमशान को असल में क्या माना जाता है?

महा शून्य क्षेत्र, और माँ के गर्भ के भीतर की साँस

· 09:00–09:40 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि शमशान को महा शून्य क्षेत्र कहा जाता है। जैसे हम माँ के गर्भ से जन्म लेते हैं, उस जन्म से पहले माँ के गर्भ में हम जो साँस ले रहे होते हैं — साँस की ठीक वही अवस्था शमशान में महा शून्य अवस्था मानी जाती है। और एक अवस्था के बाद आप अपनी माँ का गर्भ नहीं देख सकते।

14

क्या गृहस्थ को शमशान में रुकने की अनुमति है?

वहाँ ज़्यादा देर रुकने पर रोक, और पिछले पंद्रह-बीस साल में शमशानों के आसपास बने मंदिर

· 09:41–10:00 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इस कारण से भी गृहस्थ के लिए शमशान में ज़्यादा देर रुकना वर्जित है; शमशान क्षेत्र में जाने पर रोक है। यह कलियुग और आज के समय का असर है कि पिछले पंद्रह-बीस साल में शमशानों के आसपास बहुत सारे मंदिर बन गए हैं — वरना पहले के समय में लोग इस तरह और इस समय शमशान में जाकर साधना नहीं करते थे।

वक्ता कहते हैं कि इसी कारण गृहस्थ के शमशान में ज़्यादा देर रुकने पर भी रोक है। शमशान के क्षेत्र में जाने पर रोक है। यह कलियुग और आज के समय का असर है कि पिछले पंद्रह-बीस साल में शमशानों के आसपास बहुत सारे मंदिर बन गए हैं। वरना पहले के समय में लोग इस तरह और इस समय शमशान में जाकर साधना नहीं करते थे।

15

शमशान क्षेत्र की वीर भाव साधनाएँ कौन करता था?

सैनिक, सेनापति और क्षत्रिय — आज की यूँ ही की जाने वाली यात्राओं के उलट

· 10:01–10:43 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि शमशान क्षेत्र की वीर भाव साधनाएँ राजा के सैनिक, कोई सेनापति, युद्ध में भाग लेने वाला, क्षत्रिय या क्षत्रिय से जुड़ा काम करने वाला, या समाज के कल्याण के लिए तंत्र से जुड़ी सिद्धियाँ करने वाला करता था। ऐसे लोग जाकर ठहरकर रहते और सिद्धि करते थे। आज जैसा नहीं — शनि परेशान कर रहा है, तो चलो शमशान काली मंदिर; शत्रु का नाश करना है, सब शमशान काली मंदिर पहुँच जाते हैं।

16

"महादेव ने कहा है कि शमशान सबसे पवित्र जगह है" — ऐसा कहने में क्या गलत है?

टीवी सीरियल से ली गई एक पंक्ति, बिना संदर्भ के

· 10:44–11:15 · Also a question

वक्ता बताते हैं कि लोग कहते हैं शमशान सबसे पवित्र जगह है, महादेव ने ऐसा कहा है — कहाँ कहा है? सीरियल में कहा है, यहाँ कहा है। किस संदर्भ में कहा, यह जानने की ज़रूरत ही नहीं समझी जाती। और इसी तरह जब ये बातें न जानने वाले लोग कामरूप क्षेत्र में जाते हैं, तो मुश्किल होती है।

17

कामरूप कामाख्या की स्त्रियों के बारे में लोक में क्या भ्रांति है?

जादूगरनियों की कहानी जो पुरुषों को कबूतर और बकरी बना देती हैं

· 11:16–11:47 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आप सबने सुना होगा कि कामरूप कामाख्या की स्त्रियाँ बड़ी जादूगरनियाँ हैं, वे मनुष्यों को कबूतर, भेड़ और बकरी बनाकर रख लेती हैं, और जो वहाँ जाता है वह लौट नहीं पाता। यह लोक भ्रांति है। वे कहते हैं कि इसे समाज में कहीं न कहीं इसीलिए फैलाया गया ताकि हर व्यक्ति उस तंत्र पीठ तक न पहुँचे।

18

क्या कामरूप क्षेत्र में जन्मे लोग भगवती का अंश हैं?

शक्तिपीठ में जो जन्म लेता है वह भगवती का अंश है

· 11:48–12:39 · Also a question

एक बात यह है कि कामरूप प्रदेश की लड़कियाँ और युवतियाँ — क्योंकि कामाख्या कामनाओं की देवी हैं — उस क्षेत्र की हैं। और शक्तिपीठ में जो भी जन्म लेता है, वह कहीं न कहीं भगवती का अंश है, उसे उनका अंश स्वरूप मानना चाहिए। वहाँ के कुत्ते-बिल्ली भी कहीं न कहीं भगवती के गढ़ हैं; कौन सा सिद्ध चारण किस रूप में घूम रहा है, पता नहीं।

19

कामाख्या क्षेत्र में इतना आकर्षण क्यों है?

काम गंध, और वहाँ साधना को बहुत महत्वपूर्ण क्यों कहा गया

· 12:40–12:48 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि सब सुंदर हैं, और कामाख्या क्षेत्र की स्त्रियाँ भी बहुत सुंदर हैं। आज लोग यूट्यूब और इंटरनेट साइटों पर दूसरे क्षेत्रों की स्त्रियों को देखते हैं; पहले ऐसा नहीं होता था। इसलिए जो उस क्षेत्र में जाते — पूजा-पाठ के लिए या किसी और काम से — वे मोहित हुए बिना नहीं रह पाते थे। इसमें कहीं उस क्षेत्र की तंत्र प्रधानता भी थी और स्त्रियों का इतना आकर्षण भी; और उस क्षेत्र की गंध, जिसे काम गंध कहते हैं, वहाँ जाने वाले बाहरी लोगों को मोहित कर लेती थी।

20

स्त्रियों के सात-आठ संदेशों से यह विषय उठा, और अठारह से कम उम्र वालों से न सुनने का निवेदन

स्त्रियों के सात-आठ संदेश, और नाबालिगों से निवेदन

· 12:49–13:35

वे कहते हैं कि शुरू में एक निवेदन करना भूल गए थे: अगर आप वयस्क नहीं हैं, आपकी उम्र अठारह साल से कम है, और इन विषयों में आपकी रुचि नहीं है, तो न सुनें। वे विषय केवल भ्रांतियाँ दूर करने के लिए साफ़ कर रहे हैं। क्योंकि इस समय उनके पास कम से कम सात-आठ स्त्रियों के संदेश हैं, जो कामाख्या तंत्र से जुड़ी बिल्कुल अलग तरह की बातें कह रही हैं, या किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में हैं जो उन्हें ऐसी बातें बता रहा है।

21

तंत्र में किसे महत्व दिया गया है — और क्या परंपराएँ केवल दो ही हैं?

भाव, और आचार का वर्गीकरण

· 13:36–14:14 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि चौदह-पंद्रह वर्ष की आयु के बाद, चाहे पुरुष हो या स्त्री, तंत्र में भावों को महत्व दिया गया है। एक कौल परंपरा है, जिसे वाममार्गी परंपरा कहते हैं, और एक दक्षिणमार्गी परंपरा है — पर यह जान लें कि परंपरा केवल इतनी ही नहीं है। जिन आचारों के बारे में आप सुनते हैं, दक्षिणाचार और वामाचार, उनका वर्गीकरण किया गया है, और उस वर्गीकरण में भावों को महत्व दिया गया है।

22

तीन भाव कौन-से हैं, और पशु भाव क्या है?

पशु, वीर और दिव्य — और पंद्रह वर्ष तक की अवस्था

· 14:15–14:41 · Also a question

तीन प्रकार के भाव बताए गए हैं: पशु भाव, वीर भाव और दिव्य भाव। पशु भाव में साधक की अवस्था पंद्रह वर्ष की आयु तक की अवस्था है — क्योंकि पंद्रह वर्ष तक शरीर में काम भाव बहुत नहीं होता, न आप किसी से बहुत ईर्ष्या करना जानते हैं, न सही-गलत जानते हैं; एक तरह से आपको दुनियादारी का ज्ञान नहीं होता, इसलिए पंद्रह वर्ष तक की अवस्था को पशु भाव कहा जाता है।

23

कौन-से मार्ग पशु भाव के माने गए हैं?

वैदिक, वैष्णव, शैव और दक्षिणाचार मार्ग, और क्यों

· 14:42–15:05 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि पशु भाव की उसी अवस्था में, कौल परंपरा के अनुसार, वैदिक पद्धति मानी गई है; वैष्णव परंपरा मानी गई है, शैव परंपरा मानी गई है, और दक्षिणाचार माना गया है। ये चारों आचार पशु भाव में रखे गए हैं, क्योंकि उस भाव में स्थित व्यक्ति के भीतर कामनाएँ नहीं होतीं — पंद्रह वर्ष की आयु तक क्या कामना होगी? कोई विशेष कामना नहीं, इसलिए ऐसा माना गया।

24

पंद्रह के बाद क्या बदलता है, और तब संस्कार क्यों दिए जाते थे?

हार्मोन और ऊर्जा का बढ़ना, और मुगलों के आने के बाद क्या छूट गया

· 15:06–15:50 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि पंद्रह वर्ष के बाद, सोलह-सत्रह में, हार्मोन विकसित होते हैं, हमारा भाव बढ़ता है और विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण बढ़ता है; उस समय शरीर की ऊर्जा बहुत बढ़ी होती है, और अगर उस ऊर्जा को सही दिशा न दी जाए तो उसका ह्रास होता है और हम उसका दुरुपयोग करने लगते हैं। इसीलिए पहले, जब संस्कार होते थे, लोगों को पूजन-पाठ, संस्कार और तरह-तरह की दीक्षा देकर लगाया जाता था — यह मुगलों के आने से पहले का समय था; उसके बाद सोलह वर्ष के बाद की अवस्था की ये सारी चीज़ें हटा दी गईं।

25

वीर भाव और दिव्य भाव क्या हैं, और कामाख्या में कौन-सा भाव ज़रूरी है?

पंद्रह से पैंतालीस या पचपन, और पचास के बाद का भाव

· 15:51–16:36 · Also a question

पंद्रह वर्ष से पैंतालीस या पचपन वर्ष तक की अवस्था को वीर भाव कहा जाता है, क्योंकि इसमें स्त्री हो या पुरुष, भीतर शुक्र और रज बहुत होता है, उसका स्खलन काफ़ी होता है, जिसके कारण शरीर में शक्ति रहती है; इसी के भीतर वामाचार और सिद्धांताचार माने गए हैं। उसके बाद दिव्य भाव आता है, पचास वर्ष के बाद की अवस्था, जिसमें हम सारे भोग भोग चुके होते हैं — और वक्ता कहते हैं कि कामरूप कामाख्या में यही दिव्य भाव माना गया है: कि दिव्य भाव से ही भगवती की सेवा-पूजा की जा सकती है।

26

पंचमकार के बारे में लोगों ने जो सुना है, क्या वह गलत है?

पाँचों गलत नहीं हैं — उनका उपयोग गलत हो गया है

· 16:37–17:28 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि पंचमकार अपनी जगह पर बिलकुल सही है। वे इन पाँचों पर बहुत विस्तार से चर्चा नहीं करेंगे, पर आप सबने इनके बारे में जो सुना है वह गलत नहीं है — वह सही है। गलत हो रहा है उसका उपयोग। वे आगे कहते हैं, अब सोचिए, जो वीर भाव से आगे बढ़ रहे हैं या जो कहते हैं कि बस इसी अवस्था को पकड़कर बैठ जाएँगे, उनके बीच पंचमकार को लेकर कितनी भ्रांतियाँ फैली हैं।

27

अगर मदिरा और मैथुन से सिद्धि मिलती, तो क्या होता?

शराब की दुकान की लाइन, और हर गृहस्थ सिद्ध

· 17:29–18:02 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर ऐसा होता कि गांजा फूँकने से सिद्धि मिलती और मदिरा पीने से सिद्धि मिलती, तो अंग्रेज़ी शराब की दुकान और देसी शराब की दुकान के बाहर लाइन में खड़े सभी लोगों को सिद्धि मिल गई होती। ठीक इसी तरह, अगर मैथुन — जिसकी पंचमकार में बात होती है — सबसे बड़ा सिद्धि देने वाला होता, तो हर गृहस्थ, और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले सभी लोग सिद्ध बन गए होते।

28

नए बने तांत्रिक लोगों से क्या कहते हैं?

"तुम्हारे भीतर भैरवी तत्व है" — और भैरव-भैरवी शब्दों की बदनामी

· 18:03–18:57 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इसी क्रम में आते हैं नए-नए बने लड़के जो तांत्रिक बन जाते हैं, और वे उनके लिए एक भद्दी गाली का प्रयोग करते हैं। वे किसी से भी कह देंगे कि तुम्हारे भीतर भैरवी तत्व है, भैरवी बन जाओ; कि एक भैरव एक से ज़्यादा भैरवी रख सकता है, कि वह यह कर सकता है, वह कर सकता है। वे बार-बार कहते हैं कि यह चीज़ कभी इस तरह नहीं होती, और आज के समय में भैरव और भैरवी शब्दों को बदनाम कर दिया गया है।

29

लोकप्रिय तंत्र कहानियों के तांत्रिक असल में कहाँ अटके हुए थे?

वीर भाव की आरंभिक साधनाओं में अटके — एक नकल, पौंड्रक की तरह

· 18:58–19:35 · Also a question

वक्ता कहते हैं, जानकारी के लिए, ये सब वीर भाव की आरंभिक साधनाओं में ही अटके रह गए थे। वे इसे रेप्लिका कहते हैं — किसी असली चीज़ की अपने ढंग से नकल बनाकर उसी से आगे बढ़ना। जैसे भगवान श्री कृष्ण का एक बहुरूपिया था, पौंड्रक, जो स्वयं को वासुदेव कृष्ण कहता था और हमेशा यही डायलॉग मारता था कि सुदर्शन चक्र मेरा है।

30

कामरूप कामाख्या कभी किसका मुख्य स्थान था?

काली और तारा का सम्यक स्वरूप, और त्रिपुर सुंदरी श्री विद्या का साधन

· 19:36–20:07 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि ठीक उसी तरह, भगवती कामरूप कामाख्या मुख्य महाशक्ति हैं, जिन्हें भगवती काली और तारा का सम्यक स्वरूप माना गया है; और कामरूप कामाख्या क्षेत्र एक समय भगवती त्रिपुर सुंदरी का, श्री विद्या का, मुख्य साधन था। इस तरह की गढ़ी हुई बातों के कारण लोग दूर होते गए, कहीं न कहीं ज्ञान बाँटने में एक खाई बन गई, और आज लोग उस चीज़ को किसी और ही कारण से जानते हैं।

31

नीलांचल के मंदिर से आगे, भगवती का मुख्य पिंड असल में कहाँ है?

कदली क्षेत्र, और मंदिर केवल एक अंश

· 20:08–20:33 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इस क्षेत्र की वास्तविकता से लोग कलि काल में बहुत दूर हो गए हैं — शायद भगवती ने अपनी महामाया से वह आवरण डाल रखा है, जैसे अभी काशी विश्वनाथ के बारे में दिख रहा है कि क्या ज्ञानवापी असली मंदिर था। वे कहते हैं, आप सब यह जानकर चकित होंगे कि मुख्य कामाख्या क्षेत्र में भगवती का प्रधान पिंड कामरूप प्रदेश में और कदली क्षेत्र में पड़ता है; जिस मंदिर में हम जाते हैं वह केवल एक अंश है, नीलांचल पर्वत पर।

32

उस प्रधान पिंड तक कौन पहुँचता है, और क्या आम लोग जा सकते हैं?

नीलांचल के पार कदली वन की ओर, जहाँ प्रवेश आज भी वर्जित है

· 20:34–21:01 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि नीलांचल पर्वत के उस पार, और उसके उत्तर-पूर्वी भाग में, जब आप कदली वन की ओर जाते हैं, वहाँ आपको प्रधान पिंड मिलेगा, जहाँ आज भी आम लोगों का प्रवेश वर्जित है — इतनी भ्रांतियाँ फैला दी गई हैं कि कोई वहाँ जा नहीं पाता। कुल परंपराओं में सेवित साधक वहाँ तक पहुँचते हैं और दर्शन-पूजन करते हैं। वे कहते हैं, प्रधान चीज़ आज भी कहीं न कहीं गुप्त रखी गई है।

33

वामाचार पूजा में कारण चढ़ाते समय लोग क्या नहीं जानते?

मदिरा शापित है — और द्वारका के बाद श्री कृष्ण का शाप

· 21:02–21:50 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि लोग यह भी नहीं जानते कि अगर आप कारण चढ़ा रहे हैं — अघोर परंपरा में जाकर, शराब चढ़ाकर, दीक्षित होकर वामाचार पूजा कर रहे हैं — तो आपको पता होना चाहिए कि शराब, यानी मद्य, शापित है। किसका शाप? भगवान श्री कृष्ण के वंशज यादव, द्वारिकापुरी के विनाश के समय मदिरा-पान के कारण ही सब नष्ट हो गए; ऐसी कथा है। उसके बाद श्री कृष्ण ने मदिरा को शाप दिया कि मदिरा तत्व में शाप रहेगा, और जो इसे पिएगा उसे दोष लगेगा।

34

मदिरा पर शुक्राचार्य का शाप क्या है, और शोधन क्या है?

शुक्राचार्य का शाप, और चढ़ाने से पहले कारण को मुक्त करना

· 21:51–22:14 · Also a question

इसी तरह, जब भगवान नारायण ने मोहिनी स्वरूप लेकर असुरों को मदिरा पिलाई जिससे वे अमृत से वंचित रह गए, तब दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने भी शाप दिया। वक्ता कहते हैं, इसी कारण शोधन की एक प्रक्रिया है: जब किसी देव शक्ति को कारण चढ़ाया जाता है, तो चढ़ाने से पहले उसे कृष्ण और शुक्र के शाप से मुक्त किया जाता है — तभी उसे चढ़ाया जाता है, और तभी पिया जाता है।

35

तारापीठ में कारण कैसे चढ़ाया जाता है, और उसे देखना क्यों मना है?

शृंगार पूजन में प्रयुक्त मुद्राएँ और गुरु-प्रदत्त मंत्र

· 22:15–23:08 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि वाम पद्धति में, जब आप पश्चिम बंगाल में राम राम घाट पर तारापीठ जाते हैं, तो वहाँ जिस समय कारण चढ़ाया जाता है उस समय आपको देखना मना है। आजकल पैसे लेकर सब दिखाया जाता है, और वहाँ सब कुछ खुल गया है; पर मुख्य पूजन के समय, शृंगार पूजन के समय, पंचमकार में आने वाली मुद्राओं से कारण को शुद्ध किया जाता है, और गुरु परंपरा में दिए गए मंत्रों से उसे कृष्ण और शुक्र के शाप से मुक्त किया जाता है, और तभी देवी को चढ़ाकर पिया जाता है।

36

पंचमकार में मत्स्य और मुद्रा का क्या?

तब हर बंगाली और हर मछुआरा सिद्ध होता, और मुद्रा को पैसा समझना

· 23:09–23:48 · Also a question

वक्ता कहते हैं, मत्स्य को लें: अगर यही होता, तो हर बंगाली सिद्ध होता — बंगाल के लोग माछ-भात के बिना नहीं रह सकते, मछली ही खाते हैं; अगर मछली खाने से होता, तो सब सिद्ध होते, और मछुआरे सबसे बड़े सिद्ध होते। मुद्रा के बारे में, किसी ने मुद्राएँ बताईं और किसी ने कहा इसका मतलब पैसा है — तो पैसे वाले सिद्ध हो जाते हैं, और जिन्हें मुद्राओं का ज्ञान है वे सिद्ध हो जाते हैं, सब सिद्ध हो जाते हैं। वे कहते हैं, ये फैलाई गई भ्रांतियाँ हैं; ऐसा नहीं है।

37

असल में भैरव किसे कहा गया है?

भरण-पोषण की क्षमता, जो नए साधक में नहीं होती

· 23:49–24:24 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जिसके भीतर भरण-पोषण की क्षमता होती है, उसे भैरव कहा गया है — और वह किसी नए साधक में कभी नहीं होती। फिर वे असली प्रश्न पूछते हैं: नए साधक को भैरवी की ज़रूरत किस समय होती है, भैरवी दीक्षा किस समय दी जाती है, और अगर कोई कामाख्या दीक्षा पाता है तो वह किस तरह पाई जाती है, और उससे पहले क्या करना होता है।

38

कौल या शाक्त मार्ग में सही गुरु शिष्य से सबसे पहले क्या करवाते हैं?

गुरु साधना, फिर भैरव साधना — और स्त्रियों के सामने उससे बनने वाला भाव

· 24:25–25:03 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जब भी आप किसी शक्ति पीठ की सेवा करते हैं, या जब भी किसी शक्ति की दीक्षा लेते हैं, तो जो सही मायने में पारंपरिक गुरु हैं — कौल मार्ग में जाइए, शाक्त मार्ग में जाइए — वे सबसे पहले गुरु साधना के बाद भैरव जी की साधना करवाते हैं। भैरव साधना में ऐसी क्षमता और ऐसा अनुभव मिलता है कि बाद में जब स्त्रियाँ आपके सामने आएँगी, तो आपका भाव ही अलग होगा; पारंपरिक तरीके से सबके सामने आपका भाव अलग होगा।

39

क्या लोकप्रिय तंत्र जीवन-कथाएँ और आत्मकथाएँ कामाख्या की साधना हैं, या क्षुद्र शक्तियों की?

वह क्षुद्र शक्तियों की साधना है, कामाख्या की साधना नहीं

· 25:04–25:49 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात है शरीर के बारे में, भैरव और भैरवी के बारे में, ऊर्जा के बारे में फैलाई गई भ्रांतियाँ — आजकल चल रही तंत्र कहानियाँ, बड़े साधकों की लिखी तंत्र आत्मकथाएँ, इतनी किताबें, जिन्हें पढ़कर लोग अब कहानियाँ भी बनाने लगे हैं। वे साफ़ कहते हैं कि वह क्षुद्र शक्तियों की साधना है, कामाख्या की साधना नहीं: क्षुद्र शक्तियों की साधना उस तरह चलती है, शमशानिक शक्तियाँ जिनका तत्व कहीं न कहीं काली और कामाख्या के स्वरूप के नीचे मिला दिया जाता है, जो भी एक प्रकार की तंत्र प्रक्रिया है।

40

ऐसी क्षुद्र शक्ति असल में बनती कैसे है?

अकाल मृत्यु पाए व्यक्ति की शक्तिशाली योनि, और संचित शुक्र

· 25:50–26:30 · Also a question

वक्ता कहते हैं, मान लीजिए सोलह-सत्रह वर्ष की कोई युवती अकाल मृत्यु पाती है, या किसी तंत्र क्रिया से मार दी जाती है: वह जिस योनि में जाती है, वह बहुत शक्तिशाली योनि होती है। जैसा उन्होंने देवपुत्रों के बारे में समझाया था, चौदह-पंद्रह वर्ष के लड़के, और चालीस-पैंतालीस वर्ष की आयु तक, या पच्चीस-तीस वर्ष के जो अविवाहित रहते हैं — उनकी शक्ति बहुत अधिक होती है, कारण यह कि शरीर में बना शुक्र कहीं स्खलित नहीं हुआ और क्षमता बनी रहती है। स्त्री के साथ भी यही होता है।

41

उस ऊर्जा का क्या किया जाता है, और उसे कैसे प्रक्षेपित किया जाता है?

भगवती काली की किसी योगिनी के नीचे उसे स्थापित करना, और किसी पर डालने के बाद क्या होता है

· 26:31–27:10 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि उस ऊर्जा को बचाए रखने के लिए जब वे उसकी सिद्धि करते हैं, तो भगवती काली की किसी योगिनी के नीचे करते हैं। अलग से भी सिद्ध करें, तो उसी रूप में सिद्ध होती है। फिर जब वह किसी को खिलाई जाती है या किसी पर डालनी होती है, तब कठिनाई होती है। आज ऐसे साधक ये चीजें सिद्ध करते हैं — शक्ति तो होगी। फिर जब कोई दुखी स्त्री उनके पास आती है, तो वे उससे कहते हैं कि तुम्हारे भीतर भैरवी तत्व है, और वह शक्ति उस पर डलवा देते हैं।

42

जिस पर ऐसी शक्ति स्थापित हो, उसके साथ क्या होता है?

कामनाओं का उफान, और हमेशा सोलह साल का होने का एहसास

· 27:11–27:48 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि तब उसके भीतर कामनाओं का बहुत बड़ा उफान होगा। उसकी उम्र कुछ भी हो — अठारह-बीस की लड़की हो, पच्चीस-तीस की हो, या चालीस-पैंतालीस की — उसके भीतर ऐसी क्रियाएं होंगी कि वह खुद को सोलह साल की ही महसूस करेगी, और हर समय काम-पीड़ित रहेगी। ठीक इसी तरह पुरुषों पर भी प्रयोग होता है। और वे कहते हैं, इसे हम समझते हैं कि उच्च कोटि का तंत्र हो गया।

43

क्या ऐसे लोगों को सौभाग्य अर्चन और चक्र पूजन में प्रवेश मिलता है?

प्रवेश पर रोक, और स्त्री-पुरुष दोनों की शाप-मुक्ति

· 27:49–28:21 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आप सबको जानकर बहुत आश्चर्य होगा कि वीर भाव की प्रक्रिया में, सौभाग्य अर्चन और चक्र पूजन में, उनका प्रवेश वर्जित रहता है। ऐसी स्त्रियों का प्रवेश भी वर्जित रहता है। जैसे मुद्रा से मद्य को शुद्ध करके शाप से मुक्त किया जाता है, ठीक वैसे ही स्त्री के लिए है, और ठीक वैसे ही पुरुष के लिए। दोनों को शाप से मुक्त करने की एक प्रक्रिया है। उसे किए बिना कोई कभी भीतर नहीं जा सकता; चक्र पूजन में कभी नहीं।

44

क्या ब्रह्मचारी रहे बिना साधना सफल हो सकती है, जैसा नए मनमुखी पंथ कहते हैं?

मनमुखी विधान, और यह दावा कि ब्रह्मचर्य के बिना भी साधना चलती है

· 28:22–28:51 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जो चक्र पूजन को ठीक से नहीं जानता, वह कुछ भी कह सकता है। आजकल मनमुखी विधान चल रहा है, जिसमें कुछ भी चल सकता है। जैसे वैदिक विधान का अपना महत्व है, वैसे ही कौल और शाक्त का अपना महत्व है; आप उसमें छेड़छाड़ करके अपना कुछ भी बना सकते हैं। आजकल नई परंपरा बन रही है — मुक्त पंथ, यह पंथ, वह पंथ — और उसमें लोग यह भी कह रहे हैं कि ब्रह्मचारी रहे बिना साधना-पूजा करो, तब भी तुम्हारी गति होगी। वे कहते हैं, इंसान को इसमें कभी छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए।

45

अगर कोई शक्ति हमसे किसी तरह का भोग ले रही हो, तो क्या करना चाहिए?

मंत्र जप शरीर में क्या बढ़ाता है, और उसे कौन नियंत्रित करता है

· 28:52–29:19 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जब भी आप मंत्र जप करते हैं, शरीर में अलग-अलग तरह का प्रभाव बढ़ता है। मूलाधार पर प्रभाव बढ़े, तो काम और क्रोध दोनों बढ़ते हैं। भगवती काली से जुड़ी साधना करें, तो आपके भीतर क्रोध भी बढ़ेगा और कामनाएं भी बढ़ेंगी — यानी आप काम से बहुत पीड़ित होंगे। इसे नियंत्रित कौन करेगा? शिव करेंगे। इसलिए शिव का अभिषेक, भैरव का अभिषेक ज़रूरी है।

46

अगर कोई कहे कि मेरे भीतर कामाख्या तत्व या भैरवी तत्व है, तो क्या?

ये चीजें हर इंसान के शरीर में होती हैं — और सवारी आने का एहसास

· 29:20–29:42 · Also a question

वक्ता कहते हैं, भाई, सीधी और एक ही बात में, यह गलत है। ऐसी चीजें हर इंसान के शरीर में होती हैं: मंत्र के प्रभाव से हर इंसान मदमस्त होता है, हर इंसान अनियंत्रित होता है। जितना ज़्यादा जप होगा, उस मंत्र का प्रभाव हर शरीर पर अलग पड़ता है; और अनियंत्रण की हालत में ऐसा भी लगेगा कि किसी की सवारी आ रही है। वह आ भी सकती है, नहीं भी — मंत्र जप के प्रभाव से वह क्षणिक भी हो सकता है, काफ़ी भी।

47

अगर लगे कि मुझ पर सवारी आ रही है, तो वह क्या होने की संभावना है?

नब्बे प्रतिशत बार, पहले हुई कोई तंत्र दुर्घटना

· 29:43–30:15 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इसमें नब्बे प्रतिशत बार, अगर आपके साथ पहले कोई तंत्र दुर्घटना हो चुकी है, आपके शरीर पर तंत्र का प्रभाव है, किसी ने पहले प्रक्षेपण किया है, और आपने अब तक कोई उच्च कोटि की साधना नहीं की जिसका सही प्रभाव आप पर पड़ा हो, और आपको लग रहा है कि आप पर कोई सवारी आ रही है — तो भाई, कहीं न कहीं आप पर नकारात्मक असर हो रहा है।

48

अगर कोई साधक को भैरव या भैरवी कहकर अपनी ओर खींचे, तो साधक क्या करे?

धन या शरीर का दोहन, और असली परीक्षा कितनी कड़ी है

· 30:16–31:00 · Also a question

इसलिए, स्त्री हो या पुरुष, अगर साधना काल में कोई आपको भैरवी या भैरव कहकर आकर्षित करने की कोशिश करे, आपका धन या शरीर दोहने की कोशिश करे, या कहे कि नहीं, आपके भीतर कामाख्या तत्व है और आपको फलां चक्र पूजन करना चाहिए — तो वक्ता कहते हैं, यह बात एक ही बार में गलत है। ऐसी चीजें न ऐसे होती हैं, न ऐसे की जाती हैं। इस तरह का पूजन करने की परीक्षा बहुत कड़ी होती है; वे चीजें बहुत शक्तिशाली हैं, और वे राह चलते नहीं होतीं।

49

क्या कोई स्त्री कामाख्या धाम का प्रसाद कवच में भरकर पहन सकती है, और इसका क्या महत्व है?

22 से 26 जून का अंबुवाची पर्व, और प्रसाद में दिया जाने वाला वस्त्र

· 31:01–31:43 · Also a question

एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि यह प्रचलित रूप से जाना जाता है कि जब कामरूप कामाख्या में भगवती रजस्वला होती हैं, तो हर साल 22 जून से 26 जून तक अंबुवाची पर्व मनाया जाता है। इसमें माना जाता है कि पृथ्वी, स्वयं धरती माता, रजस्वला होती हैं, और उस योनि मंडल से रक्त का प्रवाह होता है जहां भगवती कामरूप कामाख्या का पीठ है। उसे ढककर रखा जाता है, जिससे वह वस्त्र, जो सफ़ेद होता है, लाल हो जाता है और प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

50

क्या बाहर बिक रहा अंबुवाची वस्त्र असली है?

योनि मंडल का वस्त्र कामरूप पीठ के बाहर बिना दीक्षा वालों को कभी नहीं दिया जाता

· 31:44–32:23 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इसका महत्व बड़ा है, पर आपको देखना होगा कि जो वस्त्र आपको मिल रहा है, वह सचमुच सही चीज़ है या नहीं। आप सब जान लें कि योनि मंडल का वस्त्र कामरूप पीठ के बाहर उन लोगों को कभी नहीं दिया जाता जो दीक्षित नहीं हैं — चाहे कोई ऑनलाइन दे रहा हो या कहीं से भी। अगर वे किसी शक्ति मंडल पीठ में दीक्षित लोग हैं, तो उनके पास वह चीज़ ज़रूर होगी; वरना हर कोई अपनी यह चीज़ सहेजकर रखता है।

51

क्या अंबुवाची वस्त्र कवच में भरकर पहना जा सकता है?

ज़रूर पहनें — पर दिव्य चीज़ शरीर पर धारण करने से पहले सौ बार सोचें

· 32:24–32:46 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर वह मिल जाए, तो हां, वह उसे कवच में भरकर ज़रूर पहन सकती है: भगवती का प्रभाव बहुत बड़ा होगा। पर वे जोड़ते हैं कि कोई भी दिव्य चीज़ शरीर पर पहनने से पहले, ऐसी दिव्य चीज़ शरीर पर धारण करने से पहले, सौ बार सोचना चाहिए कि हमारा शरीर उस तरह की ऊर्जा सहने में सक्षम है या नहीं।

52

माता कामाख्या की दीक्षा कहां मिल सकती है?

शक्ति पीठ के किसी साधक से, कौल मार्ग में

· 32:47–33:03 · Also a question

वक्ता उत्तर देते हैं कि ज़रूर, शक्ति पीठ के किसी साधक से ठीक से जानकारी लेकर दीक्षा लीजिए। कौल मार्ग में दीक्षा लेकर कीजिए — तभी वह सही होगा।

पूछा गया कि माता कामाख्या की दीक्षा कहां मिल सकती है। वक्ता कहते हैं: ज़रूर, शक्ति पीठ के किसी साधक से ठीक से जानकारी लेकर दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा। लीजिए। कौल मार्ग में दीक्षा लेकर कीजिए। तभी वह सही होगा।

53

किसी को खिलाई गई चीज़ काटी कैसे जाती है?

पहले खिलाए की उम्र, फिर इष्ट का कवच या अस्त्र मंत्र

· 33:04–33:42 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि देखना पड़ता है कि जो चीज़ खिलाई गई है, वह कितनी पुरानी है, और उसके बाद ही उसकी काट होती है। काटने के लिए आपको किसी खास समय पर अपने इष्ट का कवच या उनका अस्त्र मंत्र पढ़ना होता है, और उनकी कोई प्रिय वस्तु अभिमंत्रित करके वह व्यक्ति को खिलाई जाती है। बहुत-से साधक केला खिलाकर उल्टी कराते हैं; कुछ शहद खिलाकर उल्टी कराते हैं; कुछ अपने मुंह से नाभि के रास्ते वह चीज़ खींच लेते हैं — सबका अपना अलग तरीका है।

54

माता त्रिपुर सुंदरी की क्या महिमा है, और कामाख्या में कौन-सा दोष लगता है?

कामाख्या त्रिपुर सुंदरी का तंत्र स्वरूप, और वहां जप न करने का तंत्र दोष

· 33:43–34:17 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि मां की महिमा अनंत है। भगवती कामरूप कामाख्या को भगवती त्रिपुर सुंदरी का तंत्र स्वरूप माना गया है; दस महाविद्याएं और सारे भैरव अपने पूरे मंडल और परिवार के साथ कामरूप कामाख्या क्षेत्र में विराजमान हैं। साथ ही, जब भी कोई दीक्षित व्यक्ति कामरूप कामाख्या क्षेत्र में जाता है और वहां अपने दीक्षा मंत्र का जप नहीं करता, तो उसे तंत्र दोष लगता है — जिसे कामरूप कामाख्या का सबसे शक्तिशाली दोष माना गया है।

55

किसी तंत्र क्षेत्र में जाने से पहले क्या पता कर लेना चाहिए?

वहां के नियम, कहां बैठना है, और किस द्वार से नहीं जाना है

· 34:18–34:32 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि कामरूप कामाख्या क्षेत्र में, और किसी भी तंत्र क्षेत्र में, हमेशा यह जानकारी लेकर जाना चाहिए कि वहां के नियम क्या हैं। उस क्षेत्र में जाकर किस जगह बैठकर स्तुति और पूजा करनी है, यह अपने गुरु से ज़रूर पूछना चाहिए। और जिनके घर में ब्रह्म पूजे जाते हैं, उनके लिए कामरूप कामाख्या में एक ऐसा द्वार है जिससे प्रवेश नहीं करना चाहिए — जिसकी जानकारी, वे समझते हैं, शायद ही किसी को होगी।

56

जिस परिवार में ब्रह्म पूजे जाते हों, उसे कामाख्या मंदिर में जाने से पहले क्या करना चाहिए?

पहले ब्रह्मपुत्र में ब्रह्म का तर्पण और पूजन

· 34:33–35:05 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि कामरूप कामाख्या क्षेत्र में एक ऐसा द्वार है कि अगर आप उससे प्रवेश करें और आपके घर में ब्रह्म पूजे जाते हों, तो वे तुरंत बंध जाएंगे। जिनके घर या कुल में ब्रह्म हैं, पूजे और माने जाते हैं, उन्हें उस क्षेत्र में जाने से पहले पूजन करना होता है और बात की जानकारी देनी होती है; उनका आवाहन करके पहले ब्रह्मपुत्र नदी में उनका तर्पण और पूजन होता है — यानी उन्हें शुद्ध किया जाता है — और उसके बाद ही कामरूप क्षेत्र में, यानी कामाख्या मंदिर में, प्रवेश किया जाता है। यह किए बिना प्रवेश करें, तो कठिनाई होती है।

57

क्या जटिल यंत्र भोजपत्र की जगह कागज़ पर लिखा जा सकता है?

सफ़ेद कागज़, तांबे या चांदी की प्लेट — और सुनार का समय और आचरण

· 35:06–35:59 · Also a question

वक्ता उत्तर देते हैं कि हां, सफ़ेद कागज़ पर लिखा जा सकता है; प्राण प्रतिष्ठा की अपनी विधि है। अगर यंत्र बहुत जटिल है, तो सुनार से तांबे की प्लेट पर खुदवाइए, या चांदी की प्लेट पर खुदवाइए। जब भी यंत्र बनवाना हो, साधारण रूप से सुनार से भी, तो पहले शुभ दिन और व्यक्ति देखकर सुनार से बात कीजिए कि फलां घंटों के बीच बनाए — चाहे वह सौ या हज़ार रुपये ज़्यादा ले, यंत्र सही समय पर बनना चाहिए।

58

क्या केवल गुरु मंत्र से सारी सिद्धियां मिल सकती हैं?

सोलहवीं कला, और गुरु एक शिष्य को मंडल और दूसरे को केवल गुरु मंत्र क्यों देते हैं

· 36:00–37:27 · Also a question

महाभैरव मंत्र के बारे में पूछने पर वे कहते हैं कि अभी संकल्प लेकर इसका प्रयोग किया जा सकता है, और अभी वे इतना ही बता पाएंगे। वे कहते हैं, सारे मंत्र गुरु मंत्र की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं। फिर पूछा गया कि क्या केवल गुरु मंत्र से सारी सिद्धियां मिल सकती हैं, और अगर हां, तो इतनी तरह की साधनाओं की क्या ज़रूरत है। वे कहते हैं, यह महामाया की अपनी लीला है; यह बात अपनी जगह पूरी तरह सच है कि गुरु मंत्र से सब कुछ मिल सकता है।

59

कौन-सी गीता का पाठ करना चाहिए?

अपने इष्ट की गीता, और वे कुछ मंत्र क्यों रोककर रखते हैं

· 37:28–38:21 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि गुरु गीता में गुरु का महत्व बताया गया है, इसलिए आप जिसकी भी गीता पढ़ें, उसमें उस देवता की शक्ति का महत्व बताया गया है; इसलिए हमेशा अपने इष्ट से जुड़ी गीता का पाठ करना चाहिए, ताकि उनमें हमारी आस्था और-और बढ़े। हिंगलाज माता का सिद्ध मंत्र मांगने पर वे कहते हैं कि उन्होंने अब तक उनका मंत्र सार्वजनिक रूप से नहीं दिया है — वे बताएंगे, समय आने दीजिए — क्योंकि बात बताने के बाद कितने लोग सचमुच करते हैं?

60

ईश्वर से मिलने के लिए कितने जन्म इंतज़ार करना पड़ता है?

जन्म नहीं, भाव — और साधना के साथ स्तुति

· 38:22–39:06 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि उन्हें लगता है कि इसमें जन्म नहीं, हमारे भाव सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं। हम जो भी साधना करें, अगर साधना के साथ अपने इष्ट से जुड़ी स्तुति भी गाएं और ग्रंथों का पाठ भी करें, तो यह जल्दी होगा — कि हम अपने इष्ट से एक समानता, एक साम्यता पा लें।

61

मैं स्वयं तंत्र काट के उपाय करता हूं तो स्वास्थ्य क्यों खराब हो जाता है?

जिस स्थान में आप रहते हैं, वही तंत्र से घिरा हुआ है

· 39:07–39:38 · Also a question

वक्ता पूछते हैं — जब हम स्वयं तंत्र काट करते हैं तो शरीर खराब क्यों होता है? क्योंकि हम जिस स्थान में रह रहे हैं, वह स्थान ही तंत्र बाधा से ग्रसित है। अगर आपके निवास का स्थान ही किसी न किसी तंत्र से घिरा है, तो स्वास्थ्य लाभ कहां से होगा? इसलिए अगर आप स्वयं कर रहे हैं, तो जाप आदि हमेशा बाहर करें — मंदिर में या शक्तिपीठ में, या गंगा जी में, ताकि सबसे अधिक लाभ मिले। और जब वह अवस्था बन जाए, तब आप घर में कर सकते हैं।

62

हनुमान जी की सेवा कैसे करें कि कोई दोष न लगे?

आत्म-संयम, और यह भ्रम कि कामाख्या पूजा में खुली छूट है

· 39:39–40:34 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि हनुमान जी की सेवा पर एक वीडियो दिया जा रहा है। सबको एक ही चीज़ का डर है — दोष का। सब ब्रह्मचर्य पर जाते हैं — स्त्री हो या पुरुष, विपरीत लिंग को देखने की नज़र में कोई दोष न हो। आत्म-संयम रखकर ही कोई साधना हो सकती है। वे कहते हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि हनुमान जी की पूजा करनी है तो पूरा ब्रह्मचर्य व्रत रखना है, और भगवती कामाख्या की पूजा करेंगे तो खुली छूट है, क्योंकि कामाख्या स्वरूप की पूजा हो रही है और आप किसी को भी किसी भी रूप में देख सकते हैं। यह बहुत बड़ी भ्रांति है। सबमें एक ही नियम है — ब्रह्मचर्य का पालन करना ही होता है।

63

सुबह सूर्य को जल कैसे देना चाहिए?

जब तक उगते सूर्य को देखा जा सके — और स्त्रियों के लिए तांबे की मनाही

· 40:35–41:25 · Also a question

वक्ता कहते हैं, जब सूर्य देखने लायक हो, सूर्योदय के समय, हमारी आंखें उगते सूर्य को देख सकती हैं; जब वह अपना पूरा तेज धारण कर लेता है, तब हम उसे नहीं देख पाते। इसलिए जब तक भगवान सूर्यनारायण देखने की अवस्था में हों, तब तक जल दे देना चाहिए। और जो स्त्रियां कुंवारी हैं, और जिनका विवाह हो गया है और जो सधवा हैं, यानी श्रृंगार धारण करती हैं, उन्हें कभी तांबे के लोटे से जल नहीं देना चाहिए।

64

स्त्रियां तांबे के पात्र से अर्घ्य क्यों नहीं दे सकतीं?

तांबा सूर्य और मंगल का प्रतिनिधि है, और मंगल पृथ्वी का पुत्र है

· 41:26–42:10 · Also a question

वक्ता बताते हैं कि लोग कहते हैं तांबे से दे सकते हैं, क्योंकि वह सूर्य का प्रतिनिधि है और सूर्य का स्वरूप है; पर स्त्रियों को नहीं देना चाहिए। तांबा मुख्य रूप से सूर्य और मंगल ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है, और मंगल को माता पृथ्वी का अंश माना गया है। वे कहते हैं, इसे इस बात से जोड़िए कि माता पृथ्वी ही अंश रूप में हैं, या कहिए कि भगवती कामरूप कामाख्या ही पृथ्वी के रूप में अवतरित हैं, और अंबुवाची पर्व पर कहा जाता है कि पृथ्वी, स्वयं प्रकृति, रजस्वला होती है। और प्रकृति कभी अपने पुत्र को छूकर अर्घ्य नहीं देती; मंगल पृथ्वी का पुत्र है, और पुत्र को हाथ में लेकर अर्घ्य कभी नहीं दिया जाता।

65

क्या किसी स्त्री को तांबे का पात्र प्रयोग करने की अनुमति है?

विधवा, जिसे तंत्र में धूमावती स्वरूप माना गया है

· 42:11–43:01 · Also a question

वक्ता कहते हैं — हां, जो स्त्री विधवा है। तंत्र में जाएं तो विधवा को कहीं न कहीं धूमावती स्वरूप में, धूम स्वरूप में माना गया है; और वहां किसी कारण से — जिसे वे स्पष्ट नहीं बता सकते — उन्हें ताम्र पात्र का अधिकार है और वे उसका प्रयोग कर सकती हैं। कहा जाए तो कहीं न कहीं उसमें वैराग्य की स्थिति आ जाती है। इसलिए कोई भी सौभाग्यशाली स्त्री और कोई भी कुंवारी स्त्री तांबे के लोटे या तांबे के पात्र से सूर्य को जल न दे; पुरुष दे सकते हैं, पर स्त्रियां नहीं।

66

जल किस प्रकार से डालना है?

गिरती धारा के बीच से दर्शन, और छींटे पैरों पर न पड़ें

· 43:02–43:38 · Also a question

वक्ता कहते हैं, जल दोनों हाथों से इस तरह देना है कि जब वह पृथ्वी पर गिरे, तो गिरती धारा के बीच से सूर्यनारायण के दर्शन होते रहें; और आंखें खोलकर चाक्षुसी विद्या आदि का पाठ करते रहें, या तमसो मा ज्योतिर्गमय, या सूर्यनारायण का जो भी मंत्र या पाठ आपको आता हो। गिरते जल के छींटे पैरों पर नहीं पड़ने चाहिए, इसलिए उसे किसी गमले में डालें या किसी पौधे को दें, ताकि छींटे आप पर न पड़ें।

67

ब्रह्म मुहूर्त में बेल वृक्ष के नीचे शिव चालीसा पढ़ने से कितना गुना अधिक प्रभाव मिलता है?

कितना गुना, यह क्यों नहीं बताया जा सकता, और एक ही साधना अलग-अलग लोगों पर अलग असर क्यों करती है

· 43:39–44:40 · Also a question

वक्ता कहते हैं, इस तरह के प्रश्न — कि कितना गुना लाभ मिलता है — तभी पता चलेंगे जब आप करेंगे, क्योंकि यह हर किसी के लिए अलग प्रकार का हो सकता है। हो सकता है कोई श्रोता, जिसने बहुत साधना की है, जिसका प्रारब्ध पहले से कटा है और जिसका पूरा समय साधनाओं में बीतता है, कल से बेल वृक्ष के नीचे पाठ शुरू करे और परसों से ही उसे अनुभव होने लगें; उसका प्रारब्ध भी जल्दी कटेगा और प्रभाव भी जल्दी मिलेगा। और अगर आप नए हैं, आपके शरीर में तरह-तरह के रोग-दोष हैं और कुंडली में दोष हैं, और आप पाठ शुरू करते हैं, तो आपको समय लगेगा — दो, चार, पांच साल।

68

क्या बगलामुखी सतनाम पूरा होने के बाद हवन ज़रूरी है, और क्या चोले के साथ रोज़ जनेऊ चढ़ा सकते हैं?

पूर्णता और रोज़ के चढ़ावे पर दो छोटे उत्तर

· 44:41–45:24 · Also a question

पूछा गया कि कोई माता बगलामुखी का सतनाम पूरा करे तो क्या उसके बाद हवन ज़रूरी है। वक्ता कहते हैं, नहीं, ज़रूरी नहीं; कोई दोष नहीं लगेगा, आप निश्चिंत होकर पाठ कर सकते हैं। पूछा गया कि क्या चोले के साथ रोज़ जनेऊ चढ़ा सकते हैं। वे कहते हैं, अगर आप स्वयं जनेऊ धारण करते हैं तो चढ़ा सकते हैं, और नहीं करते तो न चढ़ाएं; और अगर रोज़ चढ़ाएंगे, तो नियम टूटना नहीं चाहिए — इसलिए वे स्वयं कहेंगे कि रोज़ न चढ़ाएं, और रोज़ तभी चढ़ाएं जब आप पूरी तरह निश्चित हों कि चढ़ा सकते हैं।

69

सिद्धियों में बंधे व्यक्ति की क्या गति हो सकती है, जैसे उस बाबा की जिसने अपनी ही पत्नी को कामाख्या का स्थान दे दिया?

ऐसी सिद्धियों में बंधे जीव की क्या गति हो सकती है

· 45:25–46:10 · Also a question

कौरी सरकार नाम के एक दरबार के बारे में बताया गया, जहां एक बाबा ने अपनी ही पूर्व पत्नी को कामाख्या का स्थान दे दिया। वक्ता कहते हैं कि प्रश्नकर्ता ने सबको बता ही दिया कि खेल कैसे चलता है। वे पूछते हैं, गति क्या होगी — एक मनुष्य की क्या गति हो सकती है? आपका और हमारा सामर्थ्य कितना हो सकता है? जीवन में आप कितने भी बड़े साधक बन जाएं, एक करोड़, दो करोड़, दस करोड़, सौ करोड़ जप कर लें। उतना जप हो जाए तो मुक्ति होगी; और अगर उसे इस तरह की निकृष्ट सिद्धियों में बांध दिया जाए, तो उनकी गति कभी नहीं होने वाली।

70

जब भोले बाबा इस पृथ्वी पर विचरण करते थे, तब वे कितने बड़े थे?

कण-कण में शंकर — सबसे छोटा और सबसे बड़ा, दोनों वही हैं

· 46:11–46:59 · Also a question

पूछा गया कि इस पृथ्वी के आदि पुरुष भोले बाबा की कद-काठी कितनी रही होगी और वे किन-किन देशों में रहे। वक्ता उलटे पूछते हैं कि ऐसी कौन-सी जगह है जहां भोले बाबा नहीं हैं। वे कहते हैं, जिस तरह से प्रश्न पूछा जा रहा है — सूक्ष्म से सूक्ष्म चीज़ भी भोले बाबा हैं, और बड़ी से बड़ी चीज़ भी भोले बाबा हैं। ऐसा कुछ है ही नहीं — कण-कण में भोले व्याप्त हैं; इसीलिए कहा जाता है, कण-कण में शंकर। आप उनके बारे में क्या सोचते हैं, उसी पर आपके भोले बाबा निर्भर करते हैं: अगर आप सोचते हैं कि आपके भोले बाबा बहुत विशालकाय होने चाहिए, तो आपके भोले बाबा वैसे ही होंगे।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 9.37

Shiva himself declares that by his sameness in all things and his all-pervading nature he is the Self of everyone — the scriptural root of the idea that Shiva/"Bhole Baba" pervades every particle of creation.

मूल पाठ पढ़ें →
37

बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च ब्रह्माहं ब्रह्मकेशवौ। समत्वाद्व्यापकत्वाच्च तथैवात्माहमर्भकौ॥ ३७

हे ब्रह्मा और विष्णु! बड़ा होनेसे और सबको बढ़ानेवाला होनेसे मैं ब्रह्म हूँ। हे पुत्रो! सबमें समान और सबमें व्याप्त होनेसे मैं ही आत्मा हूँ।

71

क्या बड़े धाम में और साधारण मंदिर में पूजा करने में कोई अंतर है?

बैजनाथ धाम में और छोटे-से दुर्गा मंदिर में एक ही अनुभूति

· 47:00–48:05 · Also a question

वक्ता कहते हैं, जब हम जाकर बाबा बैजनाथ धाम महादेव के दर्शन-पूजन करते हैं, तो वहां उन्हें छूने का आनंद, मन की प्रसन्नता, संतृप्ति और संतुष्टि — वही संतृप्ति और संतुष्टि हमें कहीं और पूजा करने पर भी मिलती है। उन्हें दोनों जगहों में कोई अंतर नहीं दिखता। किसी साधारण दुर्गा जी के मंदिर में उन्हें देखकर मन में जो भाव आता है, जो संतुष्टि और आत्मीयता होती है, ठीक वही अनुभूति विंध्य क्षेत्र में विंध्यवासिनी के चरण पकड़ने पर होती है। वे कहते हैं, यह आपके भाव पर निर्भर है कि आप एक कंकड़ या पत्थर को शिव मानते हैं, या आपको शिव का साक्षात विशालकाय स्वरूप ही चाहिए।

72

सतनाम का हवन कैसे करना है?

108 नामों में से हर नाम से आहुति, और पुरुष व स्त्री हल्दी किसमें मिलाएं

· 48:06–48:50 · Also a question

वक्ता कहते हैं, सतनाम के 108 नामों को अलग-अलग करके हर नाम से आहुति देनी होती है। अगर आप पुरुष हैं, तो घी में हल्दी मिलाएं; अगर स्त्री हैं, तो हवन सामग्री में हल्दी मिलाएं।

73

क्या बाबा मोहन राम बावरी और मरघट काली क्षुद्र शक्तियां हैं या लोक देवता?

साधक लोक देवता कैसे बनता है, और जन कल्याण और मुक्ति के बीच चुनाव

· 48:51–49:46 · Also a question

वक्ता कहते हैं, बाबा मोहन राम बावरी का पूजन लोक देवता के रूप में ही होता है। अगर आप बहुत पूजन-पाठ और साधना करते हैं, तो साधना से उत्पन्न ऊर्जा आपके जीव शरीर में जीवात्मा को प्रबल करती है, और तप से वह पुष्ट होती जाती है; फिर अगर आपके इष्ट से साक्षात्कार हो गया या उस तरह की सिद्धियां मिल गईं, और आप चाहते हैं कि इस लोक में रहते हुए अपने अनुयायियों का कल्याण करें, तो यह सनातन की देन है कि आप अपनी शक्तियों और सिद्धियों के साथ स्थित रहकर जन कल्याण का कार्य कर सकते हैं। जो मुक्त होना चाहते हैं, वे अंश रूप में रहकर मुक्ति ग्रहण करते हैं और आगे दिव्य धाम को चले जाते हैं।

74

आठवें घर में चंद्र-केतु युति से मानसिक पीड़ा हो तो क्या करना चाहिए?

सदाशिव की उपासना, दूज का चांद, और दो-मुखी व नौ-मुखी रुद्राक्ष

· 49:47–50:48 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अगर चंद्र-केतु की युति बनी है, चाहे आठवें घर में ही हो, और बहुत अधिक मानसिक परेशानी है, तो आपको भगवान सदाशिव की उपासना करनी चाहिए: सदाशिव के शीश पर जो चंद्र हैं, उनका रोज़ ध्यान और पूजन करें। इसे दूज का चांद कहते हैं — दूज के दिन, कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को और शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भी, विशेष रूप से भगवान शिव का अभिषेक और पूजन करें। साथ ही, सदाशिव का दो-मुखी रुद्राक्ष चंद्र के साथ बनवाएं, या अगर केतु-चंद्र का योग है, तो नौ-मुखी और दो-मुखी रुद्राक्ष चंद्र के साथ बनवाकर पूजन के बाद धारण करें, और आजीवन धारण करें।

75

माला जप के समय आज्ञा चक्र में तेज़ दर्द हो तो क्या करना चाहिए?

स्पंदन से भागना नहीं, सूर्य त्राटक से उसे नियंत्रित करना सीखना

· 50:49–51:26 · Also a question

वक्ता प्रश्नकर्ता से कहते हैं, बहुत सही जा रहे हैं; इससे भागिए मत। आज्ञा चक्र में स्पंदन शुरू हो रहा है, तो अब इसे नियंत्रित करना शुरू कीजिए। कैसे नियंत्रित करेंगे? त्राटक साधना से। सूर्य त्राटक सबसे अच्छा है: सुबह उठिए, और सूर्योदय के समय फ्रेश होकर, अच्छे से बैठकर, सूर्य को देखते हुए त्राटक कीजिए — तो यह स्पंदन नियंत्रित होने लगेगा, और आपके इष्ट की छवि भी दिखने लगेगी। आगे चलकर इसी से दिव्य दृष्टि मिलती है। इससे भागिए मत; इसे नियंत्रित करना सीखिए।

76

मैं रोज़ सौ माला जप करता हूं और मुझे बुखार आ जाता है — क्या करूं?

जप उतना ही, जितना शरीर सामर्थ्य दे

· 51:27–51:48 · Also a question

वक्ता उत्तर देते हैं, जितना शरीर सामर्थ्य दे, उतना ही जप करना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि माता दुर्गा के साबर मंत्र सिद्ध साबरी विद्या चैनल पर उपलब्ध हैं, और मां विंध्यवासिनी की दीक्षा के लिए विंध्य क्षेत्र में जाकर किसी साधक से ली जा सकती है।

77

सियार सिंघी और हत्था जोड़ी को सिद्ध कैसे करें और उनकी सेवा कैसे करें?

एक जीवित पदार्थ, जिसे अपना सूतक लगता है — और स्त्रियां इसे क्यों न छुएं

· 51:49–52:54 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अगर ये आपको मिलें, तो पहले देने वाले से देख लीजिए कि सही चीज़ आप तक पहुंच रही है या नहीं। चूंकि यह एक जीवित पदार्थ, जीवित चीज़ है, इसकी सेवा-पूजा अलग तरीके से होती है, और वे इस पर अलग से वीडियो बनाएंगे। एक बात का विशेष ध्यान रखें: जब भी घर में सूतक आदि लगता है, तो जैसे किसी जीवित प्राणी को सूतक लगता है, वैसे ही सियार सिंघी और हत्था जोड़ी को भी सूतक लगता है, इसलिए उनका पूजन अलग तरह से होता है। दूसरी बात, स्त्रियों को इन्हें कभी नहीं छूना चाहिए, क्योंकि यह सिंदूर का, सौभाग्य का भक्षण करने वाली चीज़ है — सिंदूर ही इसका भोजन है।

78

सोलह सोमवार व्रत पर अलग वीडियो का वादा, और दुर्गा विसा यंत्र जैसी तंत्रोक्त वस्तुओं का प्रयोग समझ-बूझकर करें

अलग वीडियो का वादा, और दुर्गा विसा यंत्र के तीन प्रकार

· 52:55–53:44

वक्ता कहते हैं, इस तरह की तंत्रोक्त वस्तुओं का प्रयोग सोच-समझकर करें। सोलह सोमवार व्रत रखने का सबसे अच्छा तरीका पूछने पर वे कहते हैं कि इस पर अलग से वीडियो बनाएंगे, और एकादशियों पर भी, हर एक को अलग-अलग बताएंगे। दुर्गा विसा यंत्र और दुर्गा तांत्रिक यंत्र अलग हैं क्या, यह पूछने पर वे कहते हैं कि दुर्गा जी के बहुत सारे यंत्र हैं; दुर्गा विसा यंत्र रक्षात्मक चीज़ों के लिए है, और यह तीन प्रकार का है — एक धन के लिए, एक बुद्धि के लिए, और एक बल के लिए। मंडल यंत्र अलग चीज़ है।

79

क्या महालक्ष्मी योगिनी, महालक्ष्मी माता और कमलात्मिका अलग-अलग हैं?

एक दृष्टि से एक, तंत्र की स्वरूप दृष्टि से अलग

· 53:45–54:20 · Also a question

वक्ता कहते हैं, जी बिल्कुल: महालक्ष्मी योगिनी अलग हैं, महालक्ष्मी माता अलग हैं, और मां भगवती कमला महाविद्या अलग हैं। एक तरह से सब एक ही हैं; पर अगर आप तंत्र की दृष्टि से, स्वरूप के भेद से जाएं, तो सब अलग-अलग हैं। पूछा गया कि क्या एक साधक के लिए 64 दिन में 64 विद्याएं और 16 कल्प सीखना संभव है। वे कहते हैं, बिल्कुल संभव नहीं — यहां 100 माला जप करने में बुखार आ जाता है, तो 64 विद्याएं सीखने कहां जाएगा; एक जीवन कम है, और जब तक किसी देव की कृपा न हो, यह संभव नहीं होता।

80

साधना के लिए कौन-सा भैरव मंत्र प्रयोग करना चाहिए?

चैनल पर दिया गया प्रणव-रहित महाभैरव मंत्र, जो स्त्री-पुरुष दोनों के लिए है

· 54:21–55:18 · Also a question

वक्ता कहते हैं, काल भैरव का साधना मंत्र, महाभैरव मंत्र, महाकाल स्टेटस ऑफिशियल चैनल पर दिया हुआ है। भैरव जी की साधना उसी मंत्र से करनी चाहिए; वह प्रणव-रहित है। साथ ही, वह भैरव बीज से संपुटित मंत्र है, और कोई भी स्त्री या पुरुष बिना किसी शक या संशय के उसकी साधना कर सकता है।

81

क्या एक कृत्या की शक्ति माता दुर्गा और दस महाविद्याओं से बड़ी है?

कृत्या हर शक्ति की अपनी सहोदर शक्ति है, अलग देवी नहीं

· 55:19–56:34 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि तंत्र के क्षेत्र में जितना बाज़ारीकरण इन लोगों ने किया है, उतना आज के समय में किसी और ने नहीं किया। रही बात कृत्या की शक्ति की, तो कृत्या कोई अलग चीज़ नहीं है। जैसा वे पहले भी बता चुके हैं, कृत्या हर शक्ति की अपनी अलग सहोदर शक्ति है। कृत्या कोई अलग देवी नहीं है। भगवती बगलामुखी को ही महाकृत्या कहा गया है। प्रत्यंगिरा को ही महाकृत्या कहा गया है। और भगवती बगलामुखी और भगवती छिन्नमस्तिका को भगवान शिव की कृत्या शक्ति कहा गया है।

82

जिसे तंत्र से जुड़ी बहुत ज़्यादा परेशानी हो, वह क्या करे?

पहले किसी जानकार को दिखाएँ, फिर रोज़ धूनी और चालीस दिन दत्तात्रेय माला मंत्र

· 56:35–57:23 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अगर तंत्र से जुड़ी बहुत परेशानी है, तो सबसे पहले किसी जानकार व्यक्ति से खुद को दिखवाइए। हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ करते हुए घर में रोज़ धूनी दीजिए। साथ में हो सके तो दत्तात्रेय माला मंत्र का अनुष्ठान भी कीजिए। दो-चार दिन करने से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा — परेशानी बढ़ेगी, यह वे पहले ही बता रहे हैं। कम से कम चालीस दिन करना होगा। चालीस दिन के बाद भी बार-बार करते रहिए, तब परेशानी कम होने लगेगी।

83

क्या गृहस्थ सकाम संकल्प ले, और क्या साधना में तर्पण और मार्जन ज़रूरी हैं?

गृहस्थ के लिए सकाम, और जहाँ हवन हो वहाँ तर्पण-मार्जन

· 57:24–57:59 · Also a question

वक्ता कहते हैं, गृहस्थ को सकाम संकल्प लेना चाहिए। अभी निष्काम की कोई ज़रूरत ही नहीं है। अगर हम निष्काम होते तो चैनल न सुन रहे होते। जब पूछा गया कि क्या साधना में तर्पण और मार्जन ज़रूरी हैं, तो वे कहते हैं: बिल्कुल। अगर आप हवन कर रहे हैं, तो तर्पण और मार्जन बहुत ज़रूरी हैं। साबर में ज़रूरी नहीं है — साबर में आचमन अलग ढंग से होता है। पर अगर आपने तंत्रोक्त मंत्रों आदि का जप किया है, तो तर्पण और मार्जन ज़रूरी हैं।

84

क्या जनेऊधारी ब्राह्मण कौल मार्ग में दीक्षा लेने पर ब्राह्मण नहीं रहता?

वशिष्ठ और अरुंधति, और वामाचार पद्धति से पूजी गईं तारा

· 58:00–58:51 · Also a question

जब पूछा गया कि क्या जनेऊधारी ब्राह्मण कौल मार्ग में दीक्षित होने पर पंचमकार के कारण ब्राह्मण नहीं रहता, तो वक्ता पहले चौंकते हैं, फिर उत्तर देते हैं: अब बताइए, भगवान ऋषि वशिष्ठ और माता अरुंधति से बड़ा ब्राह्मण कौन है? और भगवान गुरु वशिष्ठ ने भगवती तारा की वामाचार पद्धति से उपासना करके सिद्धि पाई। वे पूछते हैं, इससे ज़्यादा और क्या कहना।

85

क्या 108 मनकों की माला के नियम 27 मनकों की सुमिरनी पर भी लागू होते हैं?

सुमिरनी के बजाय अजपा जप, और घर की पूजा शक्तिपीठ के बराबर क्यों नहीं हो सकती

· 58:52–59:32 · Also a question

वक्ता कहते हैं, लोग आमतौर पर सुमिरन के लिए सुमिरनी का इस्तेमाल करते हैं। पर उनकी अपनी राय में अजपा जप करना चाहिए। सुमिरनी की ज़रूरत ही क्या है — जब सत्ताईस बार ही करना है, तो सुमिरनी नहीं रखनी चाहिए, अजपा जप करना चाहिए। जब पूछा गया कि घर की पूजा में क्या करें कि शक्तिपीठ की पूजा जैसा असर मिले, तो वे कहते हैं कि इसके लिए पहले आपको शक्तिपीठ में रहना होगा। शक्तिपीठ में रहकर कीजिए, तभी वह असर मिलेगा।

86

क्या चौखट पर रोज़ प्रसाद चढ़ाया जा सकता है?

चौखट, अष्टमी, और जीवित्पुत्रिका का चढ़ावा जो रोज़ के प्रसाद को जोखिम भरा बनाता है

· 59:33–1:00:30 · Also a question

वक्ता कहते हैं, नहीं, चौखट पर रोज़ प्रसाद नहीं चढ़ाना चाहिए। अगर आप कुलदेवी पूजन करते हैं, तो अष्टमी को चढ़ाया जाता है — अष्टमी को, या जिस तिथि को आपकी कुलदेवी का पूजन होता है, या भैरव जी का पूजन। तिथि के हिसाब से या दिन के हिसाब से चढ़ाया जा सकता है। रोज़ नहीं चढ़ाना चाहिए। चौखट पर दीया आप रोज़ जला सकते हैं, पर प्रसाद रोज़ नहीं चढ़ाना चाहिए।

87

मुझे घर में डर क्यों लगता है, और प्रतियोगी परीक्षा के लिए क्या करना चाहिए?

जगह का दोष डर पैदा करता है, और प्रतियोगिता के लिए ईशान मंत्र

· 1:00:31–1:01:09 · Also a question

डर महसूस करने वाले एक प्रश्नकर्ता से वक्ता कहते हैं: उलझना बंद कीजिए। घर में डर इसलिए लगता है क्योंकि उस जगह में दोष है, तो भय ज़रूर प्रकट होगा। डर से बाहर आने के लिए आपको बाहर उसी स्तर का प्रयास करना होगा। जब पूछा गया कि यूपीएससी या प्रतियोगी परीक्षा पास करने के लिए कौन-सी साधना या पूजा करें, तो वे कहते हैं कि यह वे अलग से बता चुके हैं — प्रतियोगिता के लिए भगवान रुद्र के पंचानन मंत्रों में से एक, ईशान मंत्र की साधना।

88

तारा का कौन-सा मंत्र जपना चाहिए, और क्या पहले दीक्षा ज़रूरी है?

एक दिन में कुछ नहीं होता — और तारा केवल दीक्षा के बाद

· 1:01:10–1:01:43 · Also a question

जब बताया गया कि अचानक सिर में आग जैसी सूरज की रोशनी दिखी और नींद टूट गई, तो वक्ता कहते हैं कि नियंत्रण आएगा — एक दिन में सब नहीं होगा, धीरे-धीरे होगा। नियंत्रण करना सीखना होगा। शुरुआत में चीज़ें ऊपर-नीचे होंगी और कठिन लगेगा। जब पूछा गया कि माता तारा के किस मंत्र का जप करें, तो वे कहते हैं कि माता तारा का जप दीक्षा लेने के बाद ही करना चाहिए।

89

मुंडमाला पहनने के क्या लाभ हैं?

सदाशिव ने इसे कब पहना, और गृहस्थ इसमें क्यों न उलझे

· 1:01:44–1:02:47 · Also a question

वक्ता व्यंग्य से कहते हैं, उसके लिए तो यह ज़बरदस्त है — पर आपको मुंडमाला पहनने की ज़रूरत ही क्यों है? अगर आप गृहस्थ हैं, तो मुंडमाला के चक्कर में मत उलझिए। भगवान सदाशिव ने मुंडमाला तभी पहनी है जब वे हर जन्म में भगवती सती से अलग रहे हैं, जब वे तंत्र क्षेत्र में रहे हैं, या जब वे भैरवी और भैरव के रूप में भगवती के साथ रहे हैं। मुंडमाला ऐसे ही नहीं पहननी चाहिए। आजकल लोग नियम बना रहे हैं कि तरह-तरह के नियम हैं, आदमी इसे पहनकर घर में रह रहा है, और लोग मुंडमाला पहनकर फ़ोटो भी लगाते हैं। पर वे कहते हैं, भीतर जाकर देखिए कि यह कितना और किस तरह असर डालती है।

90

क्या धर्म के अनुसार आत्महत्या में कोई हानि है?

मृत्यु पर किसी का अधिकार नहीं — आत्महत्या प्रारब्ध से भागना है

· 1:02:48–1:03:41 · Also a question

वक्ता कहते हैं, मृत्यु पर किसी का अधिकार नहीं है। अगर हम खुद को मारते हैं, तो हम प्रारब्ध से भाग रहे हैं। हम आत्महत्या क्यों करते हैं? किसी दुख से भाग रहे होते हैं — कर्ज़ में डूबे हैं, या कोई शारीरिक कष्ट है, और उस दुख से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या करते हैं। आत्महत्या के बाद किसी तरह गति मिल भी जाए — ठीक है, भूत या प्रेत नहीं बने, कुछ कर्म बचा था या माता-पिता ने ऐसे कर्म करवा दिए — तो भी अगले जन्म में वह भोगना ही पड़ेगा। आप भाग नहीं पाएँगे। तो आत्महत्या करके कितनी बार भागेंगे?

91

बुरा समय हो तो क्या प्रार्थना करनी चाहिए?

भोगने की क्षमता माँगिए, और चमत्कार के पीछे मत भागिए

· 1:03:42–1:04:10 · Also a question

वक्ता कहते हैं, आत्महत्या से बेहतर है कि जीते जी भोगा जाए और कोशिश की जाए कि प्रारब्ध कटे भी और भोगा भी जाए। जब समय बुरा चल रहा हो, तो भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए: आपने बुरा समय दिया है, तो उसे भोगने की क्षमता भी दीजिए। और वे दोहराते हैं कि किसी चमत्कार में नहीं फँसना चाहिए। वे कहते हैं, उनका लक्ष्य एक दिन में सिद्धि करवाना नहीं है।

92

क्या विंध्याचल में दीक्षा ली जा सकती है, और वहाँ किस पर भरोसा करें?

लाल या पीले वस्त्र में सप्तशती पढ़ने वाले ब्राह्मण, और जल्दबाज़ी न करना

· 1:04:11–1:05:09 · Also a question

वक्ता कहते हैं, विंध्य क्षेत्र में, विंध्याचल मंदिर में जाकर उन ब्राह्मणों को देखिए जो वहाँ सप्तशती का पाठ करते हैं — कुछ ब्राह्मण रोज़ नियम से वहाँ जाकर सप्तशती पढ़ते हैं, लाल वस्त्र या पीला वस्त्र पहनकर। उनमें से आप जाकर जानकारी ले सकते हैं, पूछ सकते हैं कि मुझे इस तरह की दीक्षा लेनी है। जब तक संतुष्ट न हों, उनसे सवाल पूछ सकते हैं — मेरी स्थिति यह है, यह मेरा कुल है, ऐसे होगा। संतुष्ट होने पर दीक्षा लीजिए। या पहली बार में दीक्षा लेने के बजाय कुछ दिन उनसे संपर्क बनाए रखिए।

93

क्या भगवती विंध्यवासिनी के अपने स्वरूप की दीक्षा आसानी से मिलती है?

वे भी आपको परखते हैं — और लक्ष्मी से जुड़ी दीक्षाएँ ही क्यों दी जाती हैं

· 1:05:10–1:06:11 · Also a question

वक्ता कहते हैं, वे भी आपको परखेंगे और देखेंगे कि आप इतनी बड़ी दीक्षा के योग्य हैं या नहीं, तभी देंगे। विंध्याचल में विंध्यवासिनी के स्वरूप की दीक्षा लेना बहुत कठिन है। बाहर के किसी को मुश्किल से ही मिलेगी। पर उनके स्वरूप में स्थित शक्तियों की दीक्षा मिल सकती है। क्योंकि सबकी लौकिक इच्छाएँ होती हैं, मुख्य रूप से धन की इच्छा, और सिद्धि की इच्छा में भी कहीं न कहीं धन छिपा होता है — इसलिए वहाँ के लोग मुख्य रूप से लक्ष्मी से जुड़ी दीक्षाएँ ही देते हैं।

94

कौन-सी साधना आत्मबल बढ़ाती है?

जिन पर आस्था हो उनका कवच पाठ, कम से कम ग्यारह सौ बार

· 1:06:22–1:06:46 · Also a question

वक्ता कहते हैं, जिन पर आपकी श्रद्धा और आस्था है, उनका कवच पाठ आत्मबल सबसे ज़्यादा बढ़ाता है। जब आप पाठ करते हैं और पढ़ते हैं कि फलाँ स्वरूप मेरे इस अंग की रक्षा करे, और जब भावना जागने लगती है, तब आपका आत्मबल अपने आप बढ़ेगा। जितना हो सके पाठ करना चाहिए। कम से कम ग्यारह सौ पाठ तो ज़रूर करने चाहिए।

95

क्या पंचमकार के प्रयोग के बाद गायत्री अनुष्ठान किया जा सकता है?

वह गायत्री जो उस कौल परंपरा में दी जाती है जिसमें दीक्षा हुई हो

· 1:06:47–1:07:04 · Also a question

वक्ता प्रश्नकर्ता से कहते हैं, जब आप कौल परंपरा में दीक्षित होते हैं — अभी आप गायत्री कर रहे हैं — तो वहाँ कौल परंपरा के अनुसार, जिसमें आप दीक्षित हैं उससे जुड़ी गायत्री आपको दी जाती है।

जब पूछा गया कि क्या पंचमकार का प्रयोग करने के बाद गायत्री अनुष्ठान किया जा सकता है, तो वक्ता कहते हैं: जब आप कौल परंपरा में दीक्षित होते हैं — अभी आप गायत्री कर रहे हैं। वहाँ कौल परंपरा के अनुसार, जिसमें आप दीक्षित होंगे, उससे जुड़ी गायत्री आपको दी जाती है।

96

क्या खंडित और अपूजित मंदिर में जप और पाठ करना ठीक है?

उग्र शक्तियाँ और जगह पर लगा शाप, और पहले करने ज़रूरी शांति पूजन और बलि

· 1:07:05–1:07:59 · Also a question

वक्ता कहते हैं, खंडित और अपूजित मंदिर में उग्र तरह की शक्तियों का असर सबसे ज़्यादा होता है। जिस भी कारण से वह मंदिर खंडित और अपूजित रहा हो, उस पर शाप लगा होता है और वे लोग शापित रहते हैं। इसलिए उस जगह की शक्ति बहुत ज़्यादा उग्र होती है। अगर आप उस मंदिर में सेवा-पूजा या कोई अनुष्ठान करने जा रहे हैं, तो सबसे पहले उस जगह की शक्तियों के लिए शांति पूजन आदि ज़रूर कीजिए। अगर आप ब्राह्मण हैं, या साधक भी हैं, तो वहाँ गायत्री अनुष्ठान आदि करके सबको तृप्त और संतुष्ट कीजिए, तभी वहाँ कोई अनुष्ठान कीजिए।

97

भद्राक्षी कौन हैं, और वे किस लोक की हैं?

भद्रकाली का योगिनी और परिचारिका स्वरूप, जिनकी तामस ढंग से पूजा होती है

· 1:08:00–1:09:07 · Also a question

वक्ता कहते हैं, लोक की बात करें तो शिव लोक ही आएगा। भद्राक्षी माँ भद्रकाली की अंग विद्याओं में योगिनी स्वरूप में हैं, और परिचारिकाओं में भी भद्राक्षी नाम आता है। पर अगर आप इस स्वरूप के बारे में पूछने वाले पहले व्यक्ति हैं, और अगर वे आपकी कुलदेवी हैं, तो पूजन हमेशा मुख्य रूप से भगवती भद्रकाली के स्वरूप में ही होगा। उनका पूजन स्वतंत्र रूप से नहीं हो सकता, क्योंकि वे उग्र और तमस-प्रधान देवी हैं। उनका पूजन तामस ढंग से होता है। साफ़ कहें तो पुराने समय का असुर कुल देवी भद्राक्षी की उग्र ढंग से, बलि पूजन आदि करके उपासना करता था।

98

दक्षिणमुखी दरवाज़े के लिए क्या करें, और नदी संगम के पास जप में क्या सावधानी रखें?

दक्षिण दरवाज़े पर पीला कपड़ा, और जहाँ संगम के पास शमशान हो वहाँ रक्षा मंत्र

· 1:09:08–1:10:02 · Also a question

वक्ता कहते हैं, घर के दक्षिणमुखी दरवाज़े के लिए सबसे पहले दक्षिणमुखी दरवाज़े पर पीला कपड़ा या पीला पर्दा लगाना चाहिए। अगर पीले कपड़े से जुड़ा ध्वज स्थापित हो सके, तो वह हमेशा वहाँ रहना चाहिए — अगर आपका प्रवेश द्वार दक्षिणमुखी है। जब पूछा गया कि नदी संगम के पास, जहाँ शमशान भी है, जप में क्या सावधानी रखें, तो वे कहते हैं कि अगर दीक्षित हैं, तो रक्षा मंत्र आदि का पाठ ज़रूर करना चाहिए। और सुनसान जगह पर कोई जप या पाठ बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

99

अगर मैं अपने गुरु से नहीं मिल सकता, तो क्या खुद साबर प्रयोग कर सकता हूँ, और साधना किस क्रम में शुरू करूँ?

क्रम — गुरु मंत्र, दत्तात्रेय, गणपति और भैरव, फिर कुलदेवी, फिर शिव

· 1:10:03–1:10:55 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अगर आपने साबर मंत्र सिद्ध किए हैं, तो आप उनका प्रयोग कर सकते हैं। जब पूछा गया कि कुलदेवी साधना और शिव साधना कहाँ करें, मंदिर में या घर में, और किस क्रम में, तो वे कहते हैं: अगर आप नए हैं और अपनी पहली साधना कर रहे हैं, तो सबसे पहले गुरु मंत्र की साधना करनी चाहिए। अगर गुरु नहीं हैं, तो भगवान दत्तात्रेय अपने भीतर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का स्वरूप रखते हैं, इसलिए भगवान दत्तात्रेय से जुड़े मंत्रों का जप और साधना करनी चाहिए। उसके बाद, अगर शिव जी की साधना करनी है, तो उससे पहले कुलदेवी की साधना कीजिए। और उससे भी पहले गणपति और भैरव की साधना करनी चाहिए। क्रम से ऐसे ही चलता है।

100

साधना के दौरान बार-बार लगता है कि कोई शक्ति मेरे सिरहाने खड़ी है — यह सही है या गलत?

कसौटी यह है कि अच्छा लगता है या डर लगता है

· 1:10:56–1:11:15 · Also a question

वक्ता उत्तर देते हैं: बताइए कि आपको डर और भय लग रहा है, या अच्छा लग रहा है। अगर आपको अच्छा लग रहा है, सुखद लग रहा है, तो वह अच्छी शक्ति है। अगर डर लग रहा है, तो वह उग्र शक्ति हो सकती है, और नकारात्मक शक्ति भी हो सकती है।

101

माला, यंत्र या आसन का विसर्जन करने के बजाय उसे जीवन भर क्यों रखना चाहिए?

माला, यंत्र और आसन जितने पुराने, उतने बढ़ते हैं — हर चीज़ के विसर्जन वाली परंपरा के विपरीत

· 1:11:54–1:12:52 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि एक ही बात से साफ़ समझ लीजिए: सनातन में और हर तंत्र परंपरा में सदा यही कहा गया है कि एक माला, एक यंत्र, एक आसन जीवन भर उपयोग करना चाहिए — वह जितना पुराना होगा, उतना बढ़ेगा। उनकी परंपरा में हर यंत्र का विसर्जन कराया जाता है। आप लक्ष्मी साधना भी करें, तो वे कहेंगे कि पंद्रह दिन की साधना के बाद विसर्जन कर दो। वे कहते हैं, भाई, यही तंत्र चल रहा है — हर चीज़ का विसर्जन; कारण चाहे जो दे दीजिए।

102

कौन-सा कवच सूतक और पातक से अशुद्ध नहीं होता?

कामाख्या कवच — और वह एक स्थिति जिसमें बड़ा दोष लगता है

· 1:12:53–1:13:47 · Also a question

वक्ता कहते हैं: कामाख्या कवच। सूतक और पातक में किसी भी स्थिति में, किसी भी प्रकार से इसका प्रभाव कम नहीं होता, न यह अशुद्ध होता है। पर अगर कोई पुरुष या स्त्री कभी यह कवच पहनकर किसी पराए पुरुष या पराई स्त्री से संबंध बनाता है, तो बहुत बड़ा दोष लगता है। इसके अलावा यह कभी अशुद्ध नहीं होता।

103

क्या रुद्रगणों के लिए क्षेत्र की कोई सीमा है, और निकुंभला पाठ के बावजूद रावण का नाश कैसे हुआ?

रुद्रगणों के लिए क्षेत्र की कोई मर्यादा नहीं, और गलत कर्म पर नाश, तांत्रिक चाहे जितना बड़ा हो

· 1:13:48–1:14:18 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि रुद्रगणों की कोई मर्यादा नहीं, क्षेत्र की कोई मर्यादा नहीं — हाँ, अगर आपने उन्हें किसी अशुभ काम के संकल्प से भेजा है, तो वहाँ वे मर्यादा में बँधे रहेंगे। पूछा गया कि अंग पूजन कितना ज़रूरी है, और रावण निकुंभला क्रम से सप्तशती का पाठ कर रहा था, फिर भी उसका नाश कैसे हुआ। वे कहते हैं: पाठ चाहे जिस क्रम से करे, तंत्र का ज्ञाता चाहे जितना बड़ा हो, अगर वह गलत कर्म करेगा तो उसका नाश निश्चित होगा। देवता स्वयं उसका नाश करेंगे।

104

निकुंभला पाठ क्या था, और रावण ने वास्तव में क्या किया?

अपनी चौंसठ योगिनियों सहित प्रत्यंगिरा की सिद्धि, और नलकुबेर का श्राप

· 1:14:19–1:15:03 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि निकुंभला क्रम से पाठ करने का अर्थ है कि उसे भगवती प्रत्यंगिरा के स्वरूप की सिद्धि थी; भगवती अपनी चौंसठ योगिनियों के साथ वहाँ सदा विराजमान रहती थीं। पर उसने किसका हरण किया — किस स्त्री को छुआ, जो स्वयं भगवती का ही स्वरूप थीं, और किस दृष्टि से उन्हें उठाया, यह आप सब जानते हैं। तो उसका वध क्यों न हो, उसका नाश क्यों न हो। उसने अपनी ही पुत्रवधू के साथ गलत कर्म किया, और पुत्र समान नलकुबेर ने श्राप दिया कि अगर तुम कभी किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध छुओगे और ऐसा कृत्य करोगे, तो उसी क्षण तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।

105

सीता जी ने रावण को कभी सीधी दृष्टि से क्यों नहीं देखा?

उनकी दृष्टि में बैठी अग्नि, और भगवान क्या बात समझा रहे थे

· 1:15:04–1:15:47 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आप सबको एक और जानकारी होनी चाहिए: जगह-जगह संत अपने प्रवचनों में बताते हैं कि सीता जी रावण को कभी सीधी दृष्टि से नहीं देखती थीं। हम सब इसे मर्यादा के रूप में जानते हैं — फिर भी अगर वे देख लेतीं, तो उनकी दृष्टि में बैठी अग्नि उसे भस्म कर देती। वे पूछते हैं कि जो परम महाशक्ति हैं, उनके सामने रावण क्या है; वे क्या नहीं कर सकती थीं, उनके सामने उसकी क्या क्षमता होती। पर यह एक लीला थी, ताकि भगवान हम सबके सामने यह बात रख सकें: कोई चाहे जितना शक्तिशाली हो, गलत करेगा तो बचेगा नहीं।

106

रुद्राक्ष माला को शुद्ध कैसे करें?

मुख्य तंत्र साधनाएँ सार्वजनिक क्यों नहीं की जातीं, और शुद्धि की विधि कहाँ है

· 1:15:48–1:16:26 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि स्वर्णाकर्षण भैरव साधना की जानकारी इस चैनल पर कभी नहीं मिल सकती, और इसके लिए वे क्षमा माँगते हैं — क्योंकि मुख्य तंत्र साधनाएँ बहुत विशेष साधनाएँ भी हैं, और उन्हें सार्वजनिक करने से कोई लाभ नहीं; लोग बस सुनते हैं, और फिर उसका केवल दुरुपयोग होता है। पूछा गया कि खरीदी हुई रुद्राक्ष माला को कैसे शुद्ध करें, तो वे कहते हैं कि शुद्धि की विधि चैनल पर दी हुई है — शुरुआत के पाँच-सात वीडियो देखिए, उनमें माला की पूरी विधि बताई गई है। पूछा गया कि साधना शुरू करने के लिए कौन-सा मंत्र लें, तो वे कहते हैं कि बीजाक्षरी भी कर सकते हैं, और माला मंत्र भी कर सकते हैं।

107

भगवती कामाख्या स्त्री के भीतर कहाँ निवास करती हैं?

हर स्त्री के भीतर विराजमान कामाख्या तत्व, पहले मासिक धर्म से उसके रुकने तक

· 1:16:27–1:17:15 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भगवती कामरूप कामाख्या हर स्त्री के भीतर विराजमान रहती हैं। जब से किसी स्त्री को पहली बार मासिक धर्म होता है, तब से लेकर जब तक वह उसके शरीर से स्थायी रूप से समाप्त नहीं हो जाता, तब तक कामाख्या तत्व हर स्त्री के भीतर विराजमान रहता है; और इन्हीं भगवती के आशीर्वाद से किसी की संतान बढ़ती है। अगर किसी का वंश बढ़ता है, तो उसमें भगवती कामाख्या का आशीर्वाद है।

108

कुलदेवियों का कामरूप क्षेत्र से क्या संबंध है?

विंध्य के पंडों का भगवती विंध्यवासिनी को चार दिन के लिए कामाख्या ले जाना

· 1:17:16–1:17:42 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि मुख्य रूप से जितनी भी कुलदेवियाँ और कुलदेवता हैं, उनका कामरूप क्षेत्र में स्थान अवश्य है; वहाँ उनकी नियमित उपस्थिति अवश्य रहती है, वे जाते हैं। वे जोड़ते हैं कि आपको यह जानकारी भी होनी चाहिए: विंध्य क्षेत्र में भी, जब अंबुवाची पर्व होता है, तो वहाँ के साधक और मुख्य पुजारी और पंडे भगवती विंध्यवासिनी को, उनके कुलदेवी स्वरूप में, चार दिन के लिए भगवती कामरूप कामाख्या के पास ले जाते हैं। ऐसी उस क्षेत्र की महिमा है; इससे कहीं न कहीं उसकी महानता दिखाई गई है।

109

रजस्वला स्त्री के लिए पूजा वर्जित क्यों है?

यह दावा कि आधुनिक साधनों से यह रोक अनावश्यक है, और उस पर उनका उत्तर

· 1:17:43–1:18:22 · Also a question

वक्ता बताते हैं कि कुछ बहुत बड़े YouTubers ने अपने चैनलों पर कहा है कि अगर नवरात्रि में कोई स्त्री साधना कर रही है और नवरात्रि के बीच रजस्वला हो जाती है, तो वह साधना कर सकती है और कोई दोष नहीं लगता — कि पहले के समय में लोग ऐसा इसलिए करते थे क्योंकि अशुद्धि का प्रभाव होता था, जबकि अब बहुत-से साधन हैं जिनसे आप शुद्ध रह सकते हैं। वे कहते हैं कि यह पूरी तरह गलत है: जो लोग शास्त्र की मर्यादाएँ तोड़कर ऐसी घटिया बातें बताते हैं, उनसे बड़ा दुष्ट और पापी कोई नहीं हो सकता। मर्यादा कभी नहीं तोड़नी चाहिए।

110

रजस्वला होने पर स्त्री के भीतर अग्नि तत्व क्या करता है?

भीतर बढ़ता अग्नि तत्व, और उसके बाद आने वाला चिड़चिड़ापन

· 1:18:23–1:19:04 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि कारण क्या है, यह जानिए। जब स्त्री रजस्वला होती है, तो कामरूप कामाख्या, जो भगवती का मुख्य स्वरूप हैं, कामनाओं का स्वरूप और अग्नि का स्वरूप हैं। स्त्री के भीतर अग्नि तत्व की मात्रा बढ़ जाती है — यह वे पहले भी कह चुके हैं — और देवों का स्वरूप भी अग्नि तत्व से ही जुड़ा है। अब अग्नि तत्व से भरी स्त्री, जो स्वयं शक्ति का ही स्वरूप बन चुकी है, और एक सामान्य स्त्री में अग्नि तत्व की प्रधानता के कारण चिड़चिड़ापन आ जाता है — उस समय कोई भी स्त्री बहुत चिड़चिड़ी होगी, गुस्सा आएगा, रोएगी, बहुत भावुक होगी, यानी उसका सामान्य स्तर हिल जाएगा। ऐसी स्थिति में जब वह पूजन करने बैठेगी, तो मर्यादाएँ टूटेंगी।

111

अग्नि तत्व से भरी स्त्री देव विग्रह को छुए तो क्या होता है?

शीतलता नहीं मिलती, और लोक शक्ति उस स्थान से हट जाती है

· 1:19:05–1:19:44 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि अग्नि तत्व से भरी स्त्री अगर अग्नि तत्व से भरे देव विग्रह को छूती है, पूजन करती है, फूल आदि से अर्चन करती है, या पूजा स्थान पर बैठकर उनके नाम का जप और स्मरण करती है, तो उसे इससे कष्ट होगा — क्योंकि अग्नि अग्नि को बढ़ाएगी, और शीतलता बिल्कुल नहीं मिलेगी। इस कारण भी यह वर्जित है। दूसरे, अगर वहाँ कोई लोक शक्ति है, तो लोक शक्ति तुरंत उस स्थान से हट जाती है: जैसे मोहन राम बाबा के बारे में किसी ने पूछा था, अगर किसी के घर में ऐसी शक्तियों की पूजा होती है और रजस्वला स्त्री उनके स्थान पर जाती है, तो वे चीज़ें तुरंत हट जाती हैं।

112

क्या तंत्र में रजस्वला स्त्री को कामाख्या का स्वरूप मानकर पूजा जाता है?

वह मर्यादा अलग है, और ऐसा पूजन केवल कहाँ होता है

· 1:19:45–1:20:28 · Also a question

वक्ता ध्यान दिलाते हैं कि लोग कहते हैं कि तंत्र के क्रम में रजस्वला स्त्री को कामाख्या का स्वरूप माना गया है और उसकी पूजा की गई है। वे उत्तर देते हैं: भाई, उसकी मर्यादा अलग है — वह पूजन पीठ में होता है। और पीठ में जो कर्म पूजन और चक्र पूजन होते हैं, ध्यान रखिए कि हर चक्र पूजन में और हर सौभाग्य अर्चन में रजस्वला स्त्री का प्रवेश वर्जित है। यह केवल कामरूप क्षेत्र में और उस तरह के पूजनों में होता है — कामाख्या के भी हर पूजन में नहीं।

113

घर के लोगों को रजस्वला स्त्री के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए?

विशेष सम्मान, शांत होने वाले दोष, और पूर्वजों का विश्राम वाला नियम

· 1:20:29–1:21:38 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इस बात की मर्यादा बनी रहनी चाहिए, और जब भी घर में कोई स्त्री इस अवस्था में हो, तो उसे विशेष सम्मान देना चाहिए — हर पुरुष को ऐसा करना चाहिए, और उसका ध्यान रखना चाहिए। कहीं न कहीं, जब वह शांत और संतुष्ट रहती है, तो आपकी जन्म कुंडली में अगर कोई स्त्री-जनित दोष है, वह भी इससे शांत होता है। इसलिए कहीं न कहीं यह हमारे पूर्वजों का बनाया बहुत अच्छा नियम था: कि ऐसे समय स्त्रियाँ खाना आदि नहीं बनाएँगी, विश्राम करेंगी, और उस समय बाकी लोग काम करें।

114

अगर केवल किसी बाबा के कह देने से घटना हो जाए, तो अपनी श्रद्धा और मेहनत के लिए कुछ बचेगा ही नहीं

अगर बाबा के कहने से घटना हो जाए, तो बचेगा क्या

· 1:21:39–1:22:25

वक्ता प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि वे बस इतना कहेंगे: अगर केवल किसी बाबा के कह देने से कोई घटना हो जाए, तो फिर बचा ही क्या। अगर आप IAS बनना चाहती हैं, तो ख़ुद पर विश्वास रखिए, और केवल उन्हीं को पकड़िए जिन पर आपका सबसे ज़्यादा भरोसा और श्रद्धा है। अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार, एक सीमा में रहकर जो सेवा-पूजा कर सकें, उसे नियमित रूप से पकड़िए — जैसे अगर आप शिव जी की पूजा करती हैं, तो शिव जी के सतनाम और उनके ईशान मंत्र का, प्रणव-रहित, जप कर सकती हैं, और उनके कवच का पाठ कर सकती हैं। और यह सब करते हुए अपने इष्ट के लिए तैयारी कीजिए, और बाकी उन पर छोड़ दीजिए।

115

क्या अमीर घर में शादी प्रारब्ध के लिखे को बदल सकती है?

प्रारब्ध का पीछा करना, और वे कुंडली और हाथ की रेखाओं से ऊपर भगवती पर भरोसा क्यों करते हैं

· 1:22:26–1:23:37 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि मान लीजिए आपके प्रारब्ध में लिखा है कि शादी गरीब घर में होगी, और आप किसी न किसी तरह अमीर घर में शादी कर लेते हैं: अमीर घर में शादी हो भी जाए, पर अगर गरीबी में जीवन बिताना लिखा है, तो कोई न कोई घटना अवश्य होगी, जिससे दो-चार, पाँच-दस साल में आप गरीब हो जाएँगे। और अगर आपका प्रारब्ध अच्छा है और आप सेवा-पूजा करते हैं, तो यह बदल भी सकता है — हो सकता है गरीबी में रहना लिखा था, पर गरीबी उस स्तर की न हो।

116

माला या यंत्र का विसर्जन कब करना चाहिए, और कामाख्या का स्वरूप क्या माना गया है?

टूटने पर विसर्जन, और कामाख्या काली और तारा का मिश्रित स्वरूप

· 1:23:38–1:23:58 · Also a question

पूछा गया कि माला या यंत्र का विसर्जन कब करना चाहिए, तो वक्ता कहते हैं: अगर माला टूट जाए, या यंत्र खंडित हो जाए, तब। और भगवती कामाख्या को एक तरह से माँ काली और तारा का मिश्रित स्वरूप माना गया है; कामाख्या अपने आप में एक महायोगिनी और एक अलग स्वरूप हैं।

पूछा गया कि किसी भी माला या यंत्र का विसर्जन कब करना चाहिए, तो वक्ता कहते हैं: अगर माला टूट जाए, या अगर यंत्र खंडित हो जाए, तब। भगवती कामाख्या को एक तरह से माँ काली और तारा का मिश्रित स्वरूप माना गया है। कामाख्या अपने आप में एक महायोगिनी और एक अलग स्वरूप हैं।

117

अंबुवाची पर्व में साधक को घर पर क्या करना चाहिए?

22 जून को विग्रह को स्नान कराकर पूरी तरह लाल वस्त्र से ढकना

· 1:23:59–1:24:43 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आख़िरी बात वे यह कहेंगे कि अंबुवाची पर्व में क्या करना है और क्या नहीं। हर साधक, चाहे साधिका हो या साधक, अंबुवाची पर्व के समय अपने घर में भगवती के श्री विग्रहों को — जैसे आप भगवती दुर्गा की पूजा करते हैं, या भगवती कालिका की पूजा करते हैं — 22 जून से 26 जून तक लाल वस्त्र से ढक दे। 22 जून को सुबह-सुबह, एकदम सुबह भगवती को स्नान आदि कराइए, और उन्हें पूरी तरह लाल वस्त्र से ढक दीजिए। केवल उनकी आँखें और मुख हल्के से दिखें। उनके शरीर पर जो भी आभूषण हों, सारे आभूषण उतार दिए जाएँ; अगर उनके हाथों में पहनाने-देने वाले अस्त्र-शस्त्र हों, तो उन्हें निकालकर विश्राम दिया जाए।

118

अंबुवाची के चार दिनों में भगवती को क्या अर्पित करें, और उनका आवरण कैसे हटाएँ?

सुबह-शाम मधु, और हल्दी के जल व सुगंधित द्रव्यों से आवरण हटाना

· 1:24:44–1:25:28 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि उन्हें पूरी तरह लाल वस्त्र से ढककर रखा जाए और वे उसी अवस्था में रहेंगी; उस समय भगवती को हर सुबह और शाम मधु का भोग अवश्य लगाना चाहिए। चार दिनों में जो भी सेवा-पूजा, साधना, हवन आदि करना चाहें, कर सकते हैं; मंत्रों का जागरण आदि कर सकते हैं। आख़िरी दिन, 26 के बाद — यानी 27 को — आप फिर भगवती के शरीर से वस्त्र हटाएँगे और हल्दी के जल और सुगंधित द्रव्यों आदि से उनका ठीक से अभिषेक करेंगे। फिर उन्हें नया वस्त्र पहनाएँगे और आभूषण पहनाएँगे, और भगवती ने जो वस्त्र चार दिन पहना था, उसे वहाँ रखिए जहाँ आप अपना धन रखते हैं, या कवच में पहनिए, या हाथ पर बाँधिए — जैसे चाहें उसका सदुपयोग कर सकते हैं।

119

अंबुवाची पर्व में भगवती के कौन-से स्वरूप ढकने चाहिए?

घर में स्थापित जो भी श्री विग्रह हो

· 1:25:29–1:25:57 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अंबुवाची पर्व के समय हर व्यक्ति को इसी तरह पूजन करना चाहिए — भगवती का स्वरूप चाहे जो हो, चाहे काली, या दुर्गा, या माँ भगवती बगला; मुख्य रूप से जिनका भी श्री विग्रह घर में स्थापित है, उन्हें अवश्य ढकना चाहिए। यह विषय चैनल पर अलग से भी बताया गया है, और वे इसे फिर से डालेंगे।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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