हनुमान जी का सामर्थ्य और चांदी का वर्क — भेंट, बिगाड़े गए ग्रंथों और साधकों के प्रश्नों पर लंबा लाइव सत्र
हनुमान जी को चांदी का वर्क चढ़ाने के विरुद्ध चेतावनी, और उसका कारण।
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आपमें सौ किलो उठाने की ताकत है, पर वह वज़न तक पहुँचने के रास्ते में ही खर्च हो जाती है
वज़न उठाने की ताकत, पर रास्ते की नहीं
आपके भीतर बहुत बल है — सौ किलो उठाने जितना। आपको चुनौती दी जाती है कि आओ, उठाकर अपना बल दिखाओ। पर वज़न तक पहुँचने से पहले रास्ते में आग जला दी जाती है और गरम लोहे का टुकड़ा रख दिया जाता है, जिस पर न आप चल सकते हैं, न उसे लांघ सकते हैं। इसलिए आप वज़न कभी नहीं उठा पाते, और सामने वाला कहता है कि आपमें कोई ताकत थी ही नहीं।
वक्ता कहते हैं कि विषय बहुत ज़रूरी है, और एक उदाहरण से शुरू करते हैं। आपके भीतर बहुत बड़ा बल है, बहुत बड़ा सामर्थ्य है — उस सामर्थ्य से आप सौ किलो उठा सकते हैं। वज़न आपके सामने रखा जाता है और चुनौती दी जाती है: अगर सच में ताकत है, तो आओ, उठाओ, अपने बल का परिचय दो। पर सौ किलो के वज़न तक पहुँचने से पहले रास्ते में कुछ रख दिया जाता है। आग जला दी जाती है; गरम लोहे का टुकड़ा रख दिया जाता है। आप उस पर चल नहीं सकते, क्योंकि वह सामर्थ्य आपमें नहीं है; उसे लांघने का सामर्थ्य भी नहीं है। तो आप वज़न कभी नहीं उठा पाते, और सामने वाला कहता है: क्या दावा किया था, कि इतनी ताकत है? चलने की ताकत तक नहीं है, आप आ ही नहीं सकते।
यह उदाहरण हनुमान जी पर चढ़ाए जाने वाले चांदी के वर्क के बारे में है
हनुमान जी पर चढ़ाया जाने वाला चांदी का वर्क
वक्ता कहते हैं कि यह लोगों की सबसे बड़ी गलती है: वे हनुमान जी पर चांदी का वर्क चढ़ाते हैं और फिर कहते हैं कि हनुमान जी उनका दुख और कष्ट दूर करने नहीं आते।
वक्ता कहते हैं कि लोग ठीक यही करते हैं, और यह उनकी सबसे बड़ी गलती है — वे हनुमान पर चांदी का वर्क चढ़ाते हैं। हनुमान जी पर चांदी का वर्क चढ़ाते हैं, और उसके बाद कहते हैं: हनुमान जी, आप मेरा दुख दूर करने नहीं आते, मेरा कष्ट हरने नहीं आते। वे कहते हैं, यूट्यूब पर खोजकर देख लीजिए; और कहीं जाने की ज़रूरत नहीं। अच्छे, प्रामाणिक चैनलों ने वीडियो बनाकर यह दिखाया है कि चांदी का वर्क कैसे बनता है।
क्या अब ऐसी फैक्ट्रियाँ नहीं हैं जो चांदी का वर्क ठीक तरह से बनाती हैं?
गलती यह है कि लोग नहीं जानते वर्क कैसे बनता है
वक्ता मानते हैं कि आजकल कुछ फैक्ट्रियाँ हैं जहाँ चांदी का वर्क बिल्कुल सही तरीके से बनता है। पर गलती यह है कि लोगों को पता ही नहीं कि जो वर्क वे खरीदते हैं वह कैसे बना है — उन्हें बस इतना पता है कि चांदी चढ़ाएँगे तो हनुमान जी प्रसन्न होंगे, और वे पाँच-दस रुपये की चांदी से उन्हें प्रसन्न करते हैं।
हाँ, वक्ता मानते हैं कि आज के समय में कुछ ऐसी फैक्ट्रियाँ हैं जहाँ चांदी का वर्क पूरी तरह सही ढंग से बन रहा है। पर गलती कहाँ हो रही है? इसमें कि लोगों को यह जानकारी नहीं है कि वर्क कैसे तैयार हो रहा है। चांदी के वर्क के बारे में बस इतना पता है कि इसे चढ़ाएँगे तो हनुमान जी प्रसन्न होंगे — चांदी चढ़ाई जा रही है। पाँच-दस रुपये की चांदी से हनुमान जी को प्रसन्न किया जा रहा है।
अगर कोई हनुमान जी को चांदी चढ़ाना चाहे, तो क्या चढ़ाए?
चांदी का कड़ा, राम लॉकेट, मुकुट
वक्ता कहते हैं, थोड़ा ज़्यादा पैसा खर्च कीजिए: हनुमान जी के चरणों में चांदी का कड़ा चढ़ाइए; चांदी के राम बनवाइए, राम जी का लॉकेट बनवाकर उनके गले में डालिए। वे जीवन भर आपसे प्रसन्न रहेंगे। इसकी जगह लोग दूसरों की देखा-देखी दस रुपये का चांदी का वर्क चढ़ाते हैं।
वक्ता कहते हैं, थोड़ा ज़्यादा पैसा खर्च कीजिए। हनुमान जी के चरणों में चांदी का कड़ा चढ़ाइए। चांदी के राम बनवाइए, राम जी का लॉकेट बनवाइए और उनके गले में डालिए। वे जीवन भर आपसे प्रसन्न हो जाएँगे। पर आप दूसरों को देखकर हनुमान जी पर बस दस रुपये का चांदी का वर्क चढ़ाना चाहते हैं।
वक्ता के अनुसार चांदी का वर्क कैसे बनता है?
चमड़े की परतों के बीच पीटकर पतला किया जाता है
कहीं दिखाया गया है कि चांदी को भेड़ की खाल में रखा जाता है, और कहीं कि गाय की आँत की थैली में रखकर पीटा जाता है। जो चीज़ बहुत लंबी और फैलानी हो, वह सीधे पीटने पर टूट जाएगी, इसलिए जिसके भीतर उसे रखा जाए वह चोटों से फटनी नहीं चाहिए — चमड़े की पतली परतें इसी काम के लिए होती हैं।
और वह चांदी का वर्क बनता कैसे है? कहीं दिखाया जाता है कि वह भेड़ की खाल में जाता है; कहीं और, कि चांदी को गाय की आँत की थैली के अंदर रखकर वहाँ पीटा जाता है। क्योंकि जिस चीज़ को बहुत लंबा करना है, फैलाना है, वह सीधे पीटने पर टूट जाएगी। जिसके अंदर रखकर उसे पीटकर पतला किया जाए, वह ऐसी होनी चाहिए जो चोट से फटे नहीं। चमड़े की परतों के बीच, खाल के पतले-पतले पन्नों के बीच, यह बनता है। और वक्ता कहते हैं कि यह काम ज़्यादातर दूसरे मज़हब के लोग करते हैं — जहाँ कोई स्थानीय कत्लखाना होता है, उसके आसपास इस तरह का काम चलता है।
सनातन पहले से विद्यमान है, फिर भी आधुनिकता के चक्कर में अब घर में कब्र पूजी जाती है
घर में कब्र-पूजा, और सनातन का पहले से होना
सनातन पहले से विद्यमान है — सत्य सनातन वैदिक धर्म — पर आधुनिकता के चक्कर में लोग अब नए-नए देवताओं के पीछे चलते हैं, और साईं को अपना बाबा बनाकर घर में कब्र पूजते हैं, कहते हैं कि उन पर काली आती है और साईं बाबा उनके गुरु हैं।
यह पहले से विद्यमान है। यह सत्य सनातन धर्म है, सत्य सनातन वैदिक धर्म। वक्ता कहते हैं, यह अलग बात है कि आज आधुनिकता के चक्कर में लोग नए देवताओं के पीछे चलते हैं, और नए-नए आते ही जा रहे हैं; और साईं को अपना बाबा बनाकर घर के अंदर कब्र की पूजा करते हैं — कहते हैं कि उन पर काली आ रही है और साईं बाबा उनके गुरु हैं।
नैवेद्य का नियम क्या है, और लोग उसकी जगह क्या चढ़ाते हैं?
शुद्ध देसी गाय के दूध की मिठाई, केमिकल नहीं
नैवेद्य का नियम है कि शुद्ध देसी गाय, वेद-लक्षणा गाय के दूध से बनी मिठाई देवता को चढ़ाई जाए। आज लोग कैडबरी डेयरी मिल्क चढ़ाते हैं; और वेद-लक्षणा गाय की बात छोड़ भी दें, तो जो मिलता है वह भेड़, बकरी या भैंस के दूध का होता है, या केमिकल से बनी चीज़ होती है, और वही भोग में चढ़ता है।
वक्ता कहते हैं कि भोग का, नैवेद्य का नियम ऐसा है: शुद्ध देसी गाय के, वेद-लक्षणा गाय के दूध से बनी मिठाई देवता को चढ़ाई जाए। अब वेद-लक्षणा गाय की बात छोड़ दीजिए। यहाँ तो भेड़, बकरी और भैंस के दूध से बनती है — और पता नहीं उसमें दूध है भी या नहीं। केमिकल से बनी चीज़ भोग में चढ़ाई जाती है। और नए-नए फैशन आते हैं: आजकल लोग भोग में कैडबरी डेयरी मिल्क चढ़ाते हैं। बाद में पूछते हैं कि आश्रम में बाबा की इतनी पूजा की, फिर भी हमारा कुछ ठीक क्यों नहीं हुआ।
मारवाड़ी दुकानदार आज भी मंगलवार और शनिवार का लड्डू पुराने नियम से रखते हैं
मारवाड़ी दुकानदार और मंगल-शनि का लड्डू
वक्ता मारवाड़ी दुकानदारों की बात करते हैं। राजस्थान, जम्मू, पूरब और थोड़ा दक्षिण घूमकर, उन्हें हर जगह ऐसे लोग मिले हैं — खासकर मारवाड़ी समाज के — जो मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की पूजा के लिए लड्डू की अलग, बिल्कुल ताज़ी व्यवस्था रखते हैं, और मिठाई देने से पहले पूछते हैं कि क्या यह हनुमान जी के लिए है।
वक्ता कहते हैं कि हर जगह संस्कृति खत्म कर दी गई है; पर अभी भी ऐसे प्रतिष्ठान हैं — मारवाड़ी दुकानदार, ये लोग इन सब बातों का बहुत ध्यान रखते हैं। वे बहुत से शहरों में घूमे हैं, राजस्थान की ओर गए, जम्मू की ओर, पूर्व दिशा की ओर, और दक्षिण की ओर थोड़ा कम। हर जगह उन्हें ऐसे लोग ज़रूर मिले हैं, खासकर मारवाड़ी समाज के। मंगलवार और शनिवार को वे हनुमान जी की पूजा के लिए लड्डू की अलग, पूरी व्यवस्था रखते हैं। वे पूछते हैं: क्या हनुमान जी के लिए चाहिए? तो दूसरा देंगे। साधारण वाला पूछकर दे भी दें, पर हनुमान जी के लिए अलग माल रखा जाता है, बिल्कुल ताज़ा। वक्ता कहते हैं, कुछ नियम तो वे लोग भी मानते हैं; उन्हें भी पता है कि उन्हें दोष लग सकता है।
चांदी का वर्क चढ़ाने की प्रथा क्यों शुरू की गई?
हनुमान जी का सामर्थ्य रोकने के लिए, जैसे भैरव को रोका गया
वक्ता कहते हैं, उसी सामर्थ्य को रोकने के लिए — कहीं न कहीं यह प्रथा इसी उद्देश्य से चलाई गई। इसी तरह भैरव को घर से निकाला गया, लोग कहने लगे कि भैरव की पूजा मत करो; और आज भी लोग घरों से कृष्ण, कान्हा, लड्डू गोपाल को निकलवा रहे हैं, और यह कहकर हनुमान जी की पूजा रुकवा रहे हैं कि बालाजी की पूजा मत करो।
वक्ता कहते हैं कि हनुमान जी का सामर्थ्य कितना बड़ा है, इसकी चर्चा आज के वीडियो में होगी। उसी सामर्थ्य को रोकने के लिए कहीं न कहीं यह प्रथा चलाई गई। जिस तरह भैरव को घर से निकाल दिया गया — भैरव की पूजा मत करो — उसी तरह आज प्रेत लोक के वासी धरती पर मौजूद हैं, उनके लिए एक के बाद एक धाम बन रहे हैं। कोई तो लोगों को किसी देवता की सेवा-पूजा करने को कह रहा है। पर ऐसे लोग हैं जो घर से कृष्ण, कान्हा को निकलवा रहे हैं — घर में लड्डू गोपाल की पूजा मत करो। घरों से देवता हटाए जा रहे हैं। लोगों को हनुमान जी की पूजा से रोका जा रहा है: बालाजी की पूजा मत करो। वे कहते हैं, अगर आप खुद नियम और निष्ठा से नहीं रहेंगे, और इसमें दूसरों के साथी बन जाएँगे — तो यह कैसी बात है?
हनुमान जी की पूजा इतनी व्यापक क्यों हुई?
उनकी सेवा-पूजा सबसे सरल थी, और चालीसा सबको याद थी
क्योंकि उनकी सेवा-पूजा सबसे सरल थी, और हनुमान चालीसा सबको याद थी। और हनुमान जी की साधना की पहली शर्त है कि ब्रह्मचर्य रखना बहुत ज़रूरी है — और जब ब्रह्मचर्य रखा जाता है, तो शरीर में तेज और बल बढ़ना निश्चित है।
हनुमान जी का सामर्थ्य ऐसा रहा, और हनुमान जी इतने प्रचलित हुए, क्योंकि उनकी सेवा-पूजा सबसे सरल रही। हनुमान चालीसा सबको याद रही। जब मुस्लिम आक्रांताओं ने देखा कि लोग इस तरह हनुमान जी की साधना कर रहे हैं — क्योंकि हनुमान जी की साधना करने के लिए पहली बात यह है कि ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। रखना बहुत ज़रूरी है। और जब ब्रह्मचर्य रखा जाता है, तो शरीर में तेज और बल निश्चित रूप से बढ़ेगा।
पुराने समय में हनुमान जी की साधना कौन करता था?
पहलवान, और उनके वीरों को सिद्ध करने वाले
पहले जो भी लोग पहलवानी सीखते थे, वे हनुमान जी की पूजा खास तौर पर करते थे — अखाड़े में, कुश्ती में, और युद्ध के मैदान में जाने के लिए, उनकी पूजा और साधना विशेष रूप से करते थे, वीर भाव में साधना करते थे। और ऐसे लोग भी थे जो हनुमान जी के वीरों की, उनके मुख्य गणों की सिद्धि करते थे।
वक्ता कहते हैं कि पहले के समय में जो भी पहलवानी सीखते थे, वे हनुमान जी की पूजा विशेष रूप से करते थे। अखाड़े में, कुश्ती में, और चाहे युद्ध के मैदान में जाना हो, वे हनुमान जी की पूजा विशेष रूप से करते थे, उनकी साधना विशेष रूप से करते थे, वीर भाव में साधना। और साफ है कि ऐसे लोग भी थे जो हनुमान जी के वीर की, उनके गणों की, उनके मुख्य गणों की सिद्धि करते थे। और उसमें सबसे बड़ा नियम बस यही था: शुद्ध और पूर्ण शाकाहारी भोजन, पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन। उनका उद्देश्य था कि वे सेवा के लिए समर्पित रहें, सनातन की सेवा के लिए।
आक्रांताओं ने अपनी हारों का विश्लेषण किया और सीधा वार करने की जगह वर्क चलाया
उन्होंने हारों का विश्लेषण कर वर्क चलाया
वक्ता कहते हैं, ऐसा नहीं था कि आक्रांता आए और एक ही झटके में सब खत्म कर दिया। जब वे हारे, तो उन्होंने विश्लेषण किया कि यह ताकत कहाँ से आ रही है; और जिस तरह भैरव की पूजा रुकवाई गई, उसी तरह इसे भी रोकने के लिए उन्होंने वर्क का इस्तेमाल किया। देखिए, वे कहते हैं: चांदी के वर्क का प्रयोग पहले था ही नहीं — इतने पतले वर्क उस तरह बनाए ही नहीं जाते थे।
इसलिए, वक्ता कहते हैं, ऐसा नहीं था कि आक्रांता आज आए, सब करके आज ही चले गए, कि एक झटके में उनकी संस्कृति यहाँ फैल गई। जब वे हारे, तो उन्होंने विश्लेषण किया कि यह चीज़ कहाँ से हो रही है। कहीं न कहीं, जिस तरह भैरव की पूजा रुकवाई गई, उसी तरह हनुमान जी के मामले में भी इसे रोकने के लिए उन्होंने वर्क का इस्तेमाल किया। यह देखिए, वे कहते हैं: चांदी के वर्क का प्रयोग पहले नहीं था। इतने पतले वर्क इस तरह नहीं बनाए जाते थे। वह तरीका अलग हुआ करता था।
चांदी का प्रयोग पहले किस रूप में होता था?
भस्म और चूर्ण, जैसे च्यवनप्राश में — वर्क नहीं
च्यवनप्राश बहुत प्राचीन है और उसका वर्णन पौराणिक ग्रंथों में मिलता है; उसमें सोना और चांदी दोनों डाले जाते थे, पर भस्म के रूप में, वर्क के रूप में नहीं। भस्म के ऊपर आता है चूरा — जैसा चूर्ण हम खाते हैं। वर्क नहीं आता था। वर्क उनके द्वारा लाया गया, और उसके पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि चमड़े के बीच रखकर इस चीज़ को अशुद्ध किया जाए।
वक्ता कहते हैं कि वह तरीका अलग हुआ करता था, और च्यवनप्राश का उदाहरण देते हैं: यह बहुत प्राचीन है, और इसका वर्णन पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। उसमें सोना और चांदी दोनों डाले जाते थे — पर भस्म के रूप में, वर्क के रूप में नहीं। और भस्म के ऊपर आता है चूरा: जैसा चूर्ण हम खाते हैं। वर्क नहीं आता था। वर्क उनके द्वारा लाया गया, और उसके पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि चमड़े के बीच रखकर इस चीज़ को अशुद्ध किया जाए। अब आपको पता ही नहीं कि यह किसमें बना है — फेसबुक और व्हाट्सऐप से पता चल रहा है, और बहुत कम लोग यह जानते हैं।
वर्क चढ़ाना बहुत बड़ा पाप है, और कोई शास्त्र इसका समर्थन नहीं करता
बहुत बड़ा पाप, और कोई शास्त्र साथ नहीं देता
वक्ता कहते हैं, सोचिए कि आप कितना बड़ा पाप कर रहे हैं। आज फैक्ट्री का बना वर्क मिलता है, पर फैक्ट्रियाँ भी पूरी विधि नहीं दिखा रहीं — जर्मन सिल्वर और चाइनीज़ सिल्वर का नाम आता है, पर कोई प्रामाणिक स्रोत नहीं मिलता। अगर स्रोत पक्का हो जाए कि यह सच में 100% शाकाहारी है और ऐसी चीज़ें इसमें नहीं लगीं, तभी इसका प्रयोग कीजिए।
तो चांदी का वर्क चढ़ाकर, वक्ता कहते हैं, सोचिए आप कितना बड़ा पाप कर रहे हैं। आजकल फैक्ट्री में बना चांदी का वर्क मिलता है, पर फैक्ट्री वाले भी पूरी विधि नहीं दिखा रहे — किन चीज़ों का इस्तेमाल करके वे इसे फैला रहे हैं। इसमें जर्मन सिल्वर आता है, चाइनीज़ सिल्वर आता है, पर कहीं प्रामाणिक स्रोत नहीं मिलता। बेचने के लिए हो सकता है उस पर '100% शाकाहारी' लिखकर बेचा जाए। अगर स्रोत पता हो, कि हाँ, यह सच में 100% शाकाहारी है और इसमें उस तरह की चीज़ें नहीं लगीं, तभी इसका प्रयोग कीजिए। वे कहते हैं, खाने और मिठाइयों में जो लगता है वह अलग विषय है। पर हनुमान जी पर क्यों चढ़ाना? हनुमान जी सिंदूर चढ़ाने से प्रसन्न होते हैं। चांदी का वर्क चढ़ाने को आपसे किसने कहा? कहाँ वर्णन आता है कि हनुमान जी पर चांदी का वर्क चढ़ाया गया और वे प्रसन्न हुए? कहीं नहीं।
वर्क की जगह हनुमान जी को क्या चढ़ाया जा सकता है?
रामनामी लॉकेट, आभूषण, मुकुट, तुलसी माला, पत्ते पर राम
अगर चांदी चढ़ाने की इतनी इच्छा है और चांदी आपकी सामर्थ्य से बाहर नहीं है — तो हनुमान जी को रामनामी लॉकेट चढ़ाइए; सोने या चांदी का कोई आभूषण बनवाकर चढ़ाइए; मुकुट पहनाइए; तुलसी की माला; पान के पत्ते पर राम लिखकर, पीपल के पत्ते पर राम लिखकर। ये चढ़ाइए। किस भक्त ने कभी कहा कि चांदी का वर्क चढ़ाओ?
वक्ता कहते हैं, अगर आपको चांदी चढ़ाने की इतनी बड़ी इच्छा है, और चांदी आपकी सामर्थ्य से बाहर नहीं है, तो हनुमान जी को रामनामी लॉकेट चढ़ाइए। सोने या चांदी का जो भी आभूषण आप हनुमान जी को पहना सकें, बनवाकर चढ़ाइए; उन्हें मुकुट पहनाइए। तुलसी जी की माला। पान के पत्ते पर राम लिखकर, पीपल के पत्ते पर राम लिखकर — ये चढ़ाइए। किस भक्त ने कहा है कि चांदी का वर्क चढ़ाओ? यह नहीं चढ़ाना है। वे बताते हैं कि पहले के लाइव वीडियो में यह प्रश्न उनसे पूछा गया था, और एक-दो बार उन्होंने कहा था कि आजकल लोग इसका प्रयोग कर रहे हैं क्योंकि पैकेट पर 100% शाकाहारी लिखा होता है; चूँकि उन्होंने खुद कभी ऐसी चीज़ का प्रयोग नहीं किया, उन्होंने पूछा था, और उन्हें बस इतना बताया गया कि ऐसा नहीं है — यह जर्मन सिल्वर है, जिस पर 100% शाकाहारी का हरा निशान लगा है।
इस प्रथा का कहीं कोई वर्णन नहीं है — इसकी जगह सूखा सिंदूर या अष्टगंध चढ़ाइए
कहीं वर्णन नहीं — सूखा सिंदूर या अष्टगंध चढ़ाइए
क्योंकि यह प्रश्न बार-बार आता रहा, वक्ता ने इसे ठीक से देखा, और कहीं इसका कोई वर्णन नहीं है, कहीं नहीं कहा गया कि ऐसा करो। शुद्ध सिंदूर, शुद्ध तेल, शुद्ध देसी घी लाइए — और अगर घर पर खुद घी बनाते हैं, तो वही चढ़ाइए। अगर न मिले, तो सूखा सिंदूर चढ़ाइए; कोई दिक्कत नहीं, हनुमान जी प्रसन्न होंगे। अष्टगंध चढ़ाइए।
वक्ता कहते हैं कि यह प्रश्न बार-बार आता रहा, इसलिए उन्होंने तय किया कि इसे ठीक से देखा जाए: समस्या कहाँ है, क्या सच में कहीं इसका वर्णन है? और कहीं वर्णन नहीं है। कहीं नहीं बताया गया कि यह काम करना चाहिए। ऐसा करके आप बस अपने ही देवताओं का अहित करते हैं — क्योंकि आप जो भी उत्पाद कहीं से भी खरीदकर लाएँगे, उसमें कहीं 100% शुद्धता नहीं होगी। शुद्ध सिंदूर लाइए, शुद्ध तेल लाइए। अगर शुद्ध देसी घी मिल सके, और साथ में आप घर पर खुद घी बनाते हैं, तो हो सके तो वही हनुमान जी को चढ़ाइए। अगर वह न हो, तो सूखा सिंदूर चढ़ाइए। कोई दिक्कत नहीं; हनुमान जी प्रसन्न होंगे। अष्टगंध चढ़ाइए। कम से कम उसमें ऐसी घृणित चीज़ों का प्रयोग तो नहीं है — भेड़ की खाल, भैंस की खाल, जिनका प्रयोग वे लोग इसे बनाने में करते हैं।
तिल का तेल अपनी आँखों के सामने निकलवाकर लेना चाहिए, खासकर नवरात्र के आसपास
अपनी आँखों के सामने निकला तेल लीजिए
तिल का तेल सोच-समझकर इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि नवरात्र के आसपास इसके बहुत से ब्रांड आते हैं, बाहर की पैकिंग बढ़िया और अंदर की चीज़ ठीक नहीं; वह तिल का तेल जलाएँगे तो बस नुकसान ही देगा। अगर अपनी आँखों के सामने निकला तेल मिल सके तो वही लीजिए; नहीं तो शुद्ध सरसों का तेल, जो आजकल जगह-जगह लगी मशीनों से निकाला जाता है। पचास-सौ रुपये ज़्यादा लगेंगे, पर वह शुद्ध है, और उससे देवताओं का पोषण होगा।
नवरात्रि के आसपास के लाइव वीडियो में वक्ता ने कहा था कि तिल का तेल सोच-समझकर इस्तेमाल करना चाहिए। नवरात्र के आसपास आपको तिल के तेल के बहुत से ब्रांड दिखेंगे। बाहर की पैकिंग बहुत अच्छी होगी; अंदर की चीज़ सही नहीं होगी। आप वह तिल का तेल जलाएँगे, और वह तिल का तेल आपको बस नुकसान ही देगा। अगर अपनी आँखों के सामने निकला तेल मिल जाए, तो वही लीजिए। नहीं तो शुद्ध सरसों का तेल — और आजकल वह भी ज़्यादातर जगह-जगह लगी मशीनों से निकाला जाता है, तो अपने सामने निकलवाइए। थोड़ा महँगा पड़ेगा, पचास-सौ रुपये। पर आप जो चाहते हैं — समृद्धि, देवता की कृपा — वह उससे मिलेगी, क्योंकि वह शुद्ध है। देवताओं का उससे पोषण होगा। आपको खाने के लिए खराब तेल दिया जाता है; उससे आपका पोषण शायद ही होगा।
गौ मांस में बना वर्क चढ़ाने का दोष किसे लगता है?
चढ़ाने वाले को, हनुमान जी को नहीं, जो राममय हैं
आपको। जब आप गौ मांस के भीतर बना चांदी का वर्क चढ़ाते हैं, तो चूँकि आप खुद चढ़ा रहे हैं, दोषी आप ही बनते हैं। हनुमान जी का इसमें क्या — हनुमान जी राममय हैं; उन्हें क्या दोष लगेगा? उनके साथ यह आप ही कर रहे हैं।
वक्ता कहते हैं, जब आप गौ मांस लगाकर बना चांदी का वर्क चढ़ाते हैं, तो चूँकि आप खुद चढ़ा रहे हैं, दोषी आप ही बनते हैं। हनुमान जी का इसमें क्या? वे राममय हैं। उन्हें क्या कष्ट, क्या दोष लगने वाला है? उनके साथ इस तरह यह आप ही कर रहे हैं।
संकट में फँसा व्यक्ति हनुमान जी को पुकारे तो क्या होता है?
उनका सामर्थ्य शत्रु से करोड़ों गुना अधिक है
आप कहीं भी हों, जब संकट में फँसकर हनुमान जी को पुकारते हैं — सामने कितना भी बड़ा म्लेच्छ शत्रु खड़ा हो, उसने कितना भी नीच तंत्र और कैसी भी क्षुद्र शक्तियाँ लगाई हों — हनुमान जी का सामर्थ्य करोड़ों गुना अधिक है। वह तो बस प्रेत और पिशाच का प्रयोग कर सकता है; हनुमान जी स्वयं भगवान हैं, कोई छोटी दिव्यात्मा नहीं। पर आपके भीतर उन्हें उस तरह आवाहित करने की क्षमता होनी चाहिए।
पर आप कहीं भी हों, वक्ता कहते हैं, और जब संकट में फँसकर हनुमान जी को पुकारते हैं — सामने कितना भी बड़ा म्लेच्छ शत्रु खड़ा हो, कितना भी नीच तंत्र हो, उसने कैसी भी क्षुद्र शक्तियाँ लगाई हों — हनुमान जी का सामर्थ्य करोड़ों गुना अधिक है। वह तो बस प्रेत और पिशाच का प्रयोग कर सकता है। हनुमान जी साक्षात भगवान हैं। वे कोई छोटी दिव्यात्मा नहीं कि उस तरह की कोई चीज़ उन्हें छू सके। उन्हें मानना एक बात है; पर आपके भीतर उन्हें उस तरह आवाहित करने की क्षमता होनी चाहिए। तब सारा काम होगा।
हनुमान जी पर सुंदरकांड, और 'अतुलितबलधामं' से शुरू होने वाला ध्यान पढ़ना चाहिए
सुंदरकांड, और 'अतुलितबलधामं' से शुरू होने वाला ध्यान
सुंदरकांड — जो भी इसका पाठ करे, वह साल में कम से कम एक-दो बार ज़रूर करे। सुंदरकांड में हनुमान जी के बारे में बहुत सी बातें पता चलती हैं, कि उनमें कितना सामर्थ्य है। और जब हनुमान जी का ध्यान किया जाता है, तो सबसे पहले आता है "अतुलितबलधामं" — जिनका बल तौला नहीं जा सकता, जिनकी ताकत की कोई सीमा ही नहीं।
सुंदरकांड में — जो भी सुंदरकांड का पाठ करते हैं, साल में कम से कम एक-दो बार करें, वक्ता कहते हैं। सुंदरकांड में आपको हनुमान जी के बारे में बहुत सी बातें पता चलेंगी, कि उनका सामर्थ्य कितना बड़ा है। और जब हनुमान जी का ध्यान किया जाता है, तो उसमें सबसे पहले आता है: अतुलितबलधामं। जिनका बल अतुलित है। अतुलित बल के धाम — जिनके बल की कोई सीमा ही नहीं। और हनुमान जी को बचपन में ही ब्रह्मा जी से क्या आशीर्वाद, क्या वरदान मिला था? वह वरदान आपको याद है? आप अपने ही देवता की, अपने ही आराध्य की क्षमता नहीं जानेंगे।
दुख में लोग प्रेत शक्ति की ओर क्यों मुड़ते हैं?
प्रेत पहले दुख हरता है ताकि आपको अपना भक्त बना ले
वक्ता कहते हैं, यह सच है कि अगर आप प्रेत शक्ति की शरण में जाएँ तो वह सबसे पहले दुख दूर करती है। अगर आप दुख में गए हैं, बहुत पूजा-पाठ करते हैं और फिर भी आपकी शक्ति की कृपा आप पर नहीं हुई, तो आप प्रेत और पिशाच की शरण ले लेते हैं। और वे कृपा दिखाते भी हैं — क्योंकि उन्हें भी याद रहता है: इसे अपना भक्त बनाओ, अपना सामर्थ्य दिखाओ, इसे अपना बना लो।
वक्ता कहते हैं, क्योंकि आप अपने आराध्य की क्षमता नहीं जानते, इसलिए आप पीर-पैगंबरों और जो कुछ भी चल रहा है उसके आगे जाकर सिर पटकते हैं, यह कहकर कि हनुमान जी कुछ नहीं कर पाए और ये लोग दुख दूर करेंगे। अगर आप प्रेत शक्ति की शरण में जाएँ तो वह सबसे पहले दुख दूर करती है — यह बात सच है। अगर आप दुख में गए हैं, बहुत पूजा-पाठ करते हैं और फिर भी आपकी शक्ति की कृपा आप पर नहीं हुई, तो आप प्रेत और पिशाच के शरणागत बन जाते हैं। और क्या आप जानते हैं वे कृपा क्यों दिखाते हैं? क्योंकि उन्हें भी यह याद रहता है: इसे अपना भक्त बनाओ। अपना सामर्थ्य दिखाओ, इसे अपना बना लो। इसीलिए ऐसा होता है।
जब हनुमान जी बाली के सामने गए तो क्या हुआ?
बाली का वरदान और ब्रह्मा जी का हस्तक्षेप
बाली को वरदान था कि जो भी उसके सामने आएगा, उसका आधा बल बाली में चला जाएगा। जब बाली हनुमान जी से झगड़ने, लड़ने गया और हनुमान जी उसके सामने आए, तो बाली में इतना बल भर गया कि उसका शरीर फटने को हो गया — वह तेज सह नहीं पाया। ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले: बाली, यहाँ से चले जाओ; तुममें इनका तेज सहने का सामर्थ्य नहीं है।
वक्ता कहते हैं, आपने यह प्रसंग सुना होगा। बाली को वरदान था कि जो भी उसके सामने आएगा, उसका आधा बल बाली में चला जाएगा। जब बाली हनुमान जी से झगड़ने गया, उनसे युद्ध करने गया, और हनुमान जी उसके सामने आए — देखिए, वे कहते हैं, हनुमान जी दूसरों का मान रखना जानते हैं। उन्होंने अपनी शक्ति, अपने वरदान, अपनी सिद्धियों के घमंड में कभी किसी का मान नहीं तोड़ा; उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश के वरदान का मान रखा। तो जब बाली उनके सामने आया, तो बाली में इतना बल भर गया कि उसका शरीर फटने को हो गया। वह तेज सह नहीं पाया। ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले: बाली, यहाँ से चले जाओ। तुममें इनका तेज सहने का सामर्थ्य नहीं है।
हनुमान जी के एक रोम की ताकत कितनी मानी जाती है?
एक रोम इंद्र के दस हज़ार वज्रों के बराबर
हनुमान जी के शरीर के एक रोम का बल इंद्र के दस हज़ार वज्रों के बराबर माना जाता है। इसीलिए जब लोग हनुमान जी के साक्षात्कार की बात करते हैं, तो वे कभी पूरे तेज के साथ प्रकट नहीं होते — कलियुग में कभी नहीं।
वक्ता कहते हैं, हनुमान जी के शरीर पर जितने रोम हैं, उनमें से एक रोम का बल इंद्र के दस हज़ार वज्रों के बराबर माना जाता है। इसीलिए जब लोग हनुमान जी के साक्षात्कार की बात करते हैं, तो वे कभी पूर्ण तेज के साथ प्रकट नहीं होते। कलियुग में कभी नहीं।
हनुमान जी के उतरते ही अर्जुन का रथ जल गया, और उनकी गर्जना से कर्ण मूर्छित हो गया
जलता रथ, और गर्जना से कर्ण की मूर्छा
हनुमान जी अर्जुन के रथ के ऊपर ध्वजा पर बैठे थे; युद्ध खत्म होने पर कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि आखिरी बार रथ को देख लो, यह नहीं बचेगा — और जैसे ही हनुमान जी ध्वजा से हटे, रथ वहीं राख हो गया। और जब कृष्ण को बाण लगा, तो हनुमान जी क्रोधित होकर गरजे; सामने खड़ा कर्ण डर से मूर्छित हो गया, और कृष्ण ने कहा कि यह त्रेता नहीं, द्वापर है, ये आपका तेज नहीं सह पाएँगे — काम के बीच में मत आइए, ध्वजा पर बैठे रहिए।
वक्ता कहते हैं, महाभारत का प्रसंग सबने सुना होगा: कि हनुमान जी अर्जुन के रथ के ऊपर ध्वजा पर बैठे थे। जब युद्ध खत्म हुआ, तो नारायण — कृष्ण जी — ने अर्जुन से कहा: अब इस रथ को आखिरी बार देख लो, यह रथ नहीं रहेगा। और जैसे ही हनुमान जी ध्वजा से हटे और उनका रथ छोड़ा, रथ वहीं के वहीं जलकर राख हो गया। हनुमान जी के तेज से ही रथ बचा हुआ था। और महाभारत में वहीं यह प्रसंग भी आता है: कि एक बार हनुमान जी बहुत क्रोधित हो गए, क्योंकि कृष्ण को बाण लग गया था। क्रोध में वे गरजने लगे। कर्ण उनके सामने था, और कर्ण डर से मूर्छित हो गया। कृष्ण ने कहा: यह त्रेता युग नहीं, द्वापर है; ये आपका तेज नहीं सह पाएँगे। काम के बीच में मत आइए; ध्वजा पर बैठे रहिए। तब वे शांत हुए।
युद्ध में उनका सामर्थ्य यमराज, इंद्र, विष्णु और कुबेर के बराबर है
युद्ध में यमराज, इंद्र, विष्णु और कुबेर
बाली और रावण का बल सचमुच बहुत बड़ा था। और युद्ध में यमराज, इंद्र, विष्णु और कुबेर का जितना सामर्थ्य है — हनुमान जी का सामर्थ्य उतना है।
वक्ता कहते हैं, बाली और रावण का बल सचमुच बहुत ज़्यादा था। युद्ध में: यमराज, इंद्र, विष्णु और कुबेर — इनका जितना सामर्थ्य है, हनुमान जी का सामर्थ्य ठीक उतना है। और फिर भी, वे कहते हैं, आप ऐसे बात करते हैं कि इन पीर-पैगंबरों में ऐसा सामर्थ्य है जिसे हनुमान जी दूर नहीं कर पाएँगे, कि उनसे कुछ नहीं होगा।
नालंदा प्रामाणिक ग्रंथों के साथ जल गया, और उनके पीछे कोई छापाखाना नहीं था
नालंदा जला, और पीछे कोई छापाखाना नहीं
मध्यकाल में जब नालंदा विश्वविद्यालय जलाया गया, तो हमारे सारे प्रामाणिक ग्रंथ और शास्त्र उसके साथ जल गए। पहले के समय में वहाँ कोई प्रिंटिंग प्रेस नहीं बैठी थी कि आज छपी किताब की सौ या हज़ारों प्रतियाँ बनें और हर जगह बँटें। वह एक जगह, गुरुकुल में रहता था; व्यक्ति जाकर अपने गुरु से एक शास्त्र सीखता था।
वक्ता कहते हैं, मध्यकाल में जब नालंदा विश्वविद्यालय जलाया गया, तो हमारे पास जितने प्रामाणिक ग्रंथ और शास्त्र थे, सब उसके साथ जल गए। पहले के समय में वहाँ कोई प्रिंटिंग प्रेस नहीं बैठी थी कि आज छपी किताब सौ प्रतियों में, हज़ारों-हज़ार प्रतियों में छपे और हर जगह बँटे। वह एक जगह, गुरुकुल में रहता था। व्यक्ति जाकर अपने गुरु से कोई एक शास्त्र सीखता था। ब्राह्मणों के नाम — द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी — कहीं न कहीं इसका संकेत थे: कि द्विवेदी दो वेदों का ज्ञाता, त्रिवेदी तीन का; ऐसा कहा जाता है, और सच क्या है यह अपने शास्त्रों का अध्ययन करने पर पता चलेगा।
ज्ञान गुरु के मुख से सुनकर स्मृति में रखा जाता था
गुरु के मुख से सुना और स्मृति में रखा
गुरु के मुख से सुनकर और स्मृति में बिठाकर — जैसे आपके बचपन की स्कूल की प्रार्थना दो-तीन-चार महीने बस सुनते-सुनते आपको याद हो गई। सारे मंत्र और श्लोक विद्यार्थियों के मन में याद रहते थे, और मूल कहीं सुरक्षित रहता था; जो इस तरह विद्वान बनता, वह बाद में, अगर प्रभु की कृपा होती, उसे लिखकर अपनी परंपरा में रखता और अपने शिष्यों को देता।
तो वक्ता कहते हैं, गुरु के मुख से बात सुनकर व्यक्ति उसे स्मृति में बिठा लेता था। बचपन में जब आप स्कूल जाते थे, वहाँ जो प्रार्थना होती थी — वह भी आपने बार-बार सुनकर ही याद की। दो महीने, तीन महीने, चार महीने बाद वह चीज़ याद हो गई। वहाँ उस चीज़ का अभ्यास करवाया जाता था। तो कहीं न कहीं विद्यार्थियों के मन में सारे मंत्र, सारे श्लोक याद रहते थे, और मूल कहीं सुरक्षित रहता था। और जो इस तरह विद्वान बनता, वह बाद के समय में, अगर भगवान की कृपा होती, उसे लिखकर अपनी परंपरा में सुरक्षित रखता, और जो उसके शिष्य होते उन्हें देता। इस तरह यह फैला।
सबसे पहले कौन से केंद्र नष्ट किए गए, और इसका महत्व क्या है?
तक्षशिला, और 64 योगिनी मंदिर
सबसे पहले जड़ मिटाई गई: ये सारी जगहें जलाई गईं, तक्षशिला खत्म कर दी गई। 64 योगिनी मंदिर, जो तंत्र साधना का मुख्य केंद्र था, उसके साथ ऐसा किया गया कि वहाँ पहुँचने लायक कोई नहीं रहा — आज लोग यूट्यूब और फेसबुक देखकर वहाँ जाते हैं। वक्ता कहते हैं, आपकी जड़ पहले हिलाई गई, इसीलिए आपकी बुद्धि कुंठित हो जाती है।
वक्ता कहते हैं, मूल कहीं न कहीं उन विश्वविद्यालयों में था जो बने थे, और वहीं था। सबसे पहले जड़ मिटाई गई। ये सारी जगहें जलाई गईं। तक्षशिला खत्म कर दी गई। 64 योगिनी मंदिर — अब कोई उसे देखने तक नहीं जाता; लोग यूट्यूब और फेसबुक देखकर जाते हैं। वह तंत्र साधना का मुख्य केंद्र था। उसके साथ ऐसा किया गया कि वहाँ पहुँचने लायक कोई नहीं रहा। तो आपकी जड़ पहले हिलाई गई, और इसीलिए आपकी बुद्धि कुंठित हो जाती है।
पीर और फकीर सनातन गुरुओं के शिष्य बनकर सीखे — यह एक अलग तरह का जिहाद था
सनातन गुरुओं के शिष्य, और एक अलग तरह का जिहाद
जितने भी पीर और फकीर हुए, ये लोग सनातन संस्कृति के किसी बड़े गुरु या धर्म-धुरंधर के शिष्य बने। वक्ता यह नहीं कहते कि सबने ऐसा किया, पर मानते हैं कि कहीं न कहीं उनके द्वारा इस तरह का जिहाद किया गया — यह भी जिहाद का एक रूप रहा है। वे शागिर्द बने, सारा ज्ञान लिया, और अपने ही किसी शिष्य को दे दिया।
वक्ता कहते हैं, जो ग्रंथ बाद में बने, जो बाद में किसी से प्राप्त हुआ, उसमें यह भी देखने-सुनने को मिलेगा। जितने भी पीर और फकीर हुए हैं, ये लोग सनातन संस्कृति के किसी बड़े गुरु, किसी धर्म-धुरंधर के चेले बने। वे जोड़ते हैं, वे यह नहीं कह रहे कि सबने ऐसा किया, पर कहीं न कहीं उनके द्वारा इस तरह का जिहाद किया गया। यह भी जिहाद का एक रूप रहा है; आँखें खोलकर देखिए। हमने उन्हें गुरु बनाया; वे शागिर्द बनकर आए, उनसे सारा ज्ञान प्राप्त किया, और अपने ही किसी शिष्य को दे दिया। हो सकता है कि पहले के मुस्लिम व्यक्तियों ने सब कुछ ठीक से सीखा हो और भगवान की कृपा से उनके मन में ऐसा भाव न आया हो — वे संत रामानुज स्वामी के वृत्तांतों में मिलने वाले उस मुस्लिम का उदाहरण देते हैं जो राम नाम में ही रम गया।
मूल को नष्ट किया जाता है और बदलाव टीका में घुसा दिए जाते हैं
मूल नष्ट करो, और बातें टीका में घुसाओ
जिसने किसी राम भक्त से सीखा, उसे शिक्षा उस राम भक्त के भक्ति भाव के साथ मिली, पर वह उसे ठीक वैसी ही अपने शिष्य को नहीं दे पाया; और जब उस शिष्य के पास उसे सुरक्षित रखने का काम आया, तो किया यह गया: पहले मूल ग्रंथ नष्ट करो, और जितना हो सके टीका में घुसा दो। उसमें ऐसी बातें घुसाई गईं जो इंद्र को सबसे बड़ा दोषी, ब्रह्मा को दोषी बनाएँ, और ब्रह्मा के सामर्थ्य पर लांछन लगाएँ।
वक्ता कहते हैं, जिन्होंने किसी राम भक्त से सीखा, उन्हें यह तब मिला जब उस राम भक्त ने अपने भक्ति भाव से अपने शिष्य पर कृपा की। पर ये लोग वह चीज़ अपने शिष्य को नहीं दे पाए। कम से कम ज्यों की त्यों तो नहीं दे पाए। और जब उनके शिष्य ने सीखा और उसे सुरक्षित रखने का काम आया, तो क्या किया गया? पहले मूल ग्रंथ नष्ट करो; और ग्रंथ में, टीका के काम में, जितना घुसाया जा सके उतना घुसा दो। उसमें ऐसी बातें घुसाई गईं जो भगवान इंद्र को सबसे बड़ा दोषी बनाएँ, ब्रह्मा को दोषी बनाएँ, ब्रह्मा के सामर्थ्य पर लांछन लगाएँ।
शिव और सती के विवाह में उनचास मरुद्गणों की कथा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है
शिव-सती के विवाह में उनचास मरुद्गण
वक्ता श्रोताओं से एक प्रश्न पूछते हैं: यह बात आप दस जगह पढ़ते हैं — शिव के विवाह के समय, शिव और सती के विवाह के समय, उनचास मरुद्गणों की कथा किस तरह है। उस जगह टीकाकार बात बहुत गलत ढंग से लिखते हैं, और फिर लिखते हैं कि विस्तार भय के कारण बात पूरी नहीं बताई जा रही। वे कहते हैं, इस पर गुस्सा आता है — बात डालिए, क्योंकि साधारण व्यक्ति पढ़कर उसे बस बेतुका समझेगा, बस गलत समझेगा।
वक्ता कहते हैं, वे एक प्रश्न रखते हैं: यह बात आप दस जगह पढ़ते हैं। उनचास मरुद्गण की कथा किस तरह है, शिव के विवाह के समय, शिव और सती के विवाह के समय — उस जगह टीकाकार बात बहुत गलत ढंग से लिखते हैं। इसीलिए समस्या खड़ी होती है। और फिर वहाँ लिख देते हैं कि विस्तार भय के कारण, यानी लंबाई के डर से, बात पूरी तरह नहीं बताई जा रही। इस पर गुस्सा आता है, वे कहते हैं: विस्तार भय क्या है — बात डालिए। नहीं तो साधारण व्यक्ति पढ़कर उसे बस बेतुका समझेगा, बस गलत समझेगा।
इक्कीस दिन का ब्रह्मचर्य एक साधारण साधक को स्थिर कर देता है — इसकी तुलना करोड़ों वर्षों के तप से कीजिए
इक्कीस दिन का ब्रह्मचर्य बनाम करोड़ों वर्षों का तप
आप एक साधारण साधना करते हैं, इक्कीस दिन ब्रह्मचर्य रखते हैं, और इक्कीस दिन बाद, बाईसवें दिन, आपके भीतर कोई काम भावना नहीं उठती। और वे तो स्वयं ब्रह्मा हैं, इस जगत के पिता, जिन्होंने सृष्टि रची, जो पाँच कल्पों से अग्रणी हैं और हर कल्प में करोड़ों-करोड़ों वर्ष भगवान सदाशिव के पाँच महारूपों की आराधना से सामर्थ्य पाते रहे — और आप कहते हैं कि उनके भीतर काम भावना आई, कि अपनी मानस पुत्री सरस्वती को देखकर वे बच नहीं पाए।
वक्ता कहते हैं, आप एक साधारण साधना करते हैं, इक्कीस दिन ब्रह्मचर्य में रहते हैं, और इक्कीस दिन बाद, बाईसवें दिन, आपके भीतर कोई काम भावना नहीं उठती। और वे साक्षात ब्रह्मा हैं। वे इस जगत के पिता हैं, उन्होंने सृष्टि की रचना की। पाँच कल्पों से वे अग्रणी रहे हैं; हर कल्प में ब्रह्मा जी ने भगवान सदाशिव के पाँच महारूपों की आराधना से, कई करोड़ वर्षों तक, सामर्थ्य पाया। उसके बाद वे सृष्टि करने में समर्थ हुए। और आप कहते हैं कि उनके भीतर काम भावना आ गई। आप कहते हैं कि सरस्वती जी उनकी पुत्री, उनकी मानस पुत्र हैं, और उन्हें देखकर उनके भीतर काम भावना उठी और वे बच नहीं पाए। वे कहते हैं, यह आपकी कुंठित बुद्धि है — कि आप समझ नहीं पाते कि आपके भीतर किस तरह षड्यंत्र और ज़हर ठूँसा गया है, थोड़ा-थोड़ा करके भरा गया है।
शास्त्र खुद पढ़िए — प्रत्यक्षं किं प्रमाणम्
शास्त्र खुद पढ़िए — प्रत्यक्षं किं प्रमाणम्
जब सनातन संस्कृति पर उँगली उठे, तो चुप और कुंठित होकर यह न सोचते रहिए कि सच में ऐसा कैसे हुआ होगा। जानने की कोशिश कीजिए, तब पता चलेगा कि यह कैसे हुआ। खोजिए। अगर लगे कि सामने वाला अपने उत्तर से आपको संतुष्ट नहीं कर पा रहा, तो शास्त्र खुद पढ़िए, खोजने की कोशिश कीजिए, किसी महापुरुष से सीखने की कोशिश कीजिए — तब तक खोजिए जब तक संतोष देने लायक उत्तर न मिल जाए। "प्रत्यक्षं किं प्रमाणम्" — प्रमाण देखिए।
वक्ता कहते हैं, आपकी सनातन संस्कृति पर कितनी भी उँगली उठे, आप कभी चुप रह जाते हैं — वह ठीक है; पर उस उँगली के कारण आप कुंठित हो जाते हैं, सोचते हैं कि सच में ऐसा कैसे हुआ होगा। जानने का प्रयास कीजिए, तब पता चलेगा कि यह कैसे हुआ। खोजिए। अगर आपको लगे कि सामने वाला अपने उत्तर से आपको संतुष्ट नहीं कर पा रहा, तो शास्त्र खुद पढ़िए, खोजने का प्रयास कीजिए। किसी महापुरुष से सीखने की कोशिश कीजिए। तब तक खोजिए जब तक संतोष देने लायक उत्तर न मिल जाए। आप बस यह मानकर बैठ जाते हैं कि जो कहा जा रहा है वह सही ही कहा जा रहा है। प्रत्यक्षं किं प्रमाणम् — जो प्रत्यक्ष है उसका क्या प्रमाण? प्रमाण देखिए।
रुद्राष्टाध्यायी का तीसरा अध्याय स्वयं इंद्र को पुकारता है
रुद्राष्टाध्यायी का तीसरा अध्याय इंद्र को पुकारता है
इतने नीच काम के लिए इंद्र को हमेशा निंदा का पात्र बना दिया गया है। पर जब शुक्ल यजुर्वेद का पाठ होता है, रुद्राष्टाध्यायी का पाठ होता है — अगर आपने कभी रुद्राभिषेक करवाया हो — तो सुनिए कि तीसरे अध्याय के पहले श्लोक में भगवान शिव से क्या कहा जाता है: वह इंद्र को पुकारता है, कि हे इंद्र, मेरे सब शत्रुओं का नाश करो, वज्र लेकर मेरे सब शत्रुओं के पीछे दौड़ो। यह क्यों कहा गया है?
वक्ता कहते हैं, इतने नीच कर्म के लिए इंद्र को हमेशा निंदा का पात्र बना दिया गया। जब शुक्ल यजुर्वेद का पाठ होता है, रुद्राष्टाध्यायी का पाठ होता है — अगर आपने कभी रुद्राभिषेक करवाया हो — तो थोड़ा सुनिए कि तीसरे अध्याय के पहले श्लोक में भगवान शिव से क्या कहा जाता है। वहाँ इंद्र को पुकारा जाता है: हे इंद्र, आप मेरे सब शत्रुओं का पूर्ण नाश करें; वज्र लेकर मेरे सब शत्रुओं के पीछे दौड़ें। वे पूछते हैं, यह क्यों कहा गया है? इंद्र वेदोक्त देवता हैं।
शास्त्र क्या कहता है
The opening verse of the Apratiratha hymn praises Indra as the sole hero who conquers a hundred armies at once.
The speaker paraphrases it as a plea to Indra to destroy one's enemies; this verse praises his conquest, and the call to strike enemies comes in the verses that follow.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम् । संक्रन्दनोऽनिमिष एकवीरः शतꣳ सेना अजयत्साकमिन्द्रः ॥ ३३ ॥
तेज़, शस्त्र तीखे करता हुआ, बैल जैसा भयंकर, प्रहार करने वाला, प्रजाओं को हिलाने वाला, गर्जन करने वाला, अपलक, अकेला वीर: इन्द्र ने एक साथ सौ सेनाएँ जीतीं।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
इंद्र, वरुण, यम और कुबेर वेदोक्त देवता हैं, कहानियों के पात्र नहीं
इंद्र, वरुण, यम और कुबेर
इंद्र, वरुण, यम, कुबेर — ये सब वेदोक्त देवता हैं। और आप उन्हें यूँ ही तरह-तरह की कहानियों में घसीट लेते हैं।
वक्ता कहते हैं, इंद्र, वरुण देव, यम, कुबेर — ये सब वेदोक्त देवता हैं। और आप उन्हें एकदम से ऐसी-ऐसी कहानियों में घसीट लेते हैं।
पुराणों की रचना आखिर क्यों हुई?
वेद सुलभ नहीं; फिर उपनिषद, और फिर कथा
क्योंकि कलियुग में आपके पास वेद पढ़ने का समय नहीं है, और पुराण इसलिए बना कि कलिकाल में आपकी मुक्ति हो। आप वेद का एक मंत्र नहीं पढ़ेंगे; अब आप वेद नहीं सीखेंगे। वेद सबको आसानी से सुलभ नहीं होते। इसलिए वेद को समझने के लिए उपनिषद बना, और वेद और उपनिषद की बातों को कथा और लीला के माध्यम से समझाने के लिए महर्षि वेदव्यास ने पुराणों की रचना की, ताकि हम उन बातों को आसानी से समझ सकें और उनसे जुड़ सकें।
पुराण कब बना, और भगवान वेदव्यास ने पुराण क्यों बनाया, वक्ता पूछते हैं। कलियुग में, कलिकाल में, क्या आपके पास वेद पढ़ने का समय है? पुराण इसलिए बना कि कलिकाल में आपकी मुक्ति हो। आप वेद का एक मंत्र नहीं पढ़ेंगे; अब आप वेद नहीं सीखेंगे। वेद सबको आसानी से सुलभ नहीं होते। इसलिए वेद को समझने के लिए उपनिषद बना; और वेद और उपनिषद की बातों को कथा के माध्यम से, लीला के माध्यम से समझाने के लिए, महर्षि वेदव्यास ने, भगवान वेदव्यास ने, पुराणों की रचना की, ताकि हम उन बातों को आसानी से समझ सकें और उनसे जुड़ सकें। तभी यह पूरा होगा।
इन ग्रंथों के अंत में फलश्रुति क्यों लिखी जाती है?
शिव सायुज्य, शिव पद, विष्णु लोक — और यह क्यों लिखा गया
वक्ता श्रोताओं से सोचने को कहते हैं कि अंत में बार-बार यह क्यों लिखा जाता है कि यह पूरा पाठ पूरा होने पर भगवान शिव का धाम मिलेगा, कि आप शिव लोक पाएँगे, शिव सायुज्य पाएँगे, शिव पद पाएँगे; और कहीं-कहीं कि आप विष्णु लोक पाएँगे। वे कहते हैं, इन सब बातों पर विचार कीजिए — बस फँस मत जाइए।
अब, यह बात समझाने के लिए, यह बार-बार क्यों लिखा जाता है? सबके अंत में लिखा होता है कि यह पूरा पाठ पूरा होने पर भगवान शिव का धाम मिलेगा, कि आप शिव लोक पाएँगे। आप शिव सायुज्य पाएँगे, आप शिव पद पाएँगे। कहीं लिखा है कि आप विष्णु लोक पाएँगे। यह बात क्यों लिखी गई है? वक्ता कहते हैं, इन सब बातों पर थोड़ा विचार कीजिए। बस फँसिए मत।
हनुमान जी का श्मशानी रूप कौन सा है?
मसानी हनुमान के रूप में पंचमुखी हनुमान
पंचमुखी हनुमान को मुख्य रूप से श्मशानी रूप, मसानी हनुमान के रूप में माना जाता है; और उसके ऊपर जो भी रूप है, उसका अपना अलग ध्यान स्वरूप है, और उसकी पूजा भी उसी तरह की जाती है।
पूछे जाने पर कि हनुमान जी का श्मशानी रूप कौन सा है, वक्ता कहते हैं कि पंचमुखी हनुमान को मुख्य रूप से हनुमान जी का श्मशानी रूप, मसानी हनुमान के रूप में माना जाता है। और उसके ऊपर जो भी रूप है, उसके अपने अलग ध्यान स्वरूप हैं, और उसी तरह उनकी पूजा भी की जाती है।
मर्कटेश्वर कौन हैं और उनके साधक से क्या अपेक्षित था?
श्मशान में कोई विरला, और जीवन भर ब्रह्मचर्य
श्मशान में भी कोई विरला ही व्यक्ति दक्षिणाचार या वामाचार विधि से मर्कट जी को, मर्कटेश्वर को प्रसन्न करता है। पहले के समय में मर्कट वीर, मर्कटेश्वर, को प्रसन्न कर सिद्ध किया जाता था; कहा जाता है कि जिसे मर्कटेश्वर की कृपा मिली, उसमें अकेले सौ लोगों को मारने का सामर्थ्य आ गया। पर सबसे बड़ी बात यह थी कि ऐसे व्यक्ति को पूर्ण ब्रह्मचर्य रखना होता था और पूरी निष्ठा से जीवन भर मर्कटेश्वर और हनुमान जी की सेवा-पूजा करनी होती थी।
वक्ता कहते हैं, श्मशान में भी कोई विरला पुरुष ही दक्षिणाचार या वामाचार विधि से मर्कट जी को, मर्कटेश्वर को प्रसन्न करता है। पहले के समय में मर्कट वीर, मर्कटेश्वर, को प्रसन्न कर सिद्ध किया जाता था। कहा जाता है कि जिस एक व्यक्ति को मर्कटेश्वर की कृपा मिली, उसमें अकेले सौ लोगों को, सौ लोगों को मारने का सामर्थ्य आ गया। पर सबसे बड़ी बात यह थी: उस व्यक्ति को पूर्ण ब्रह्मचर्य रखना होता था, और पूरी निष्ठा से जीवन भर मर्कटेश्वर और हनुमान जी की सेवा-पूजा करनी होती थी। ऐसे लोग सिद्धियाँ पाकर अपने राष्ट्र, अपने देश, अपने राज्य की सेवा में समर्पित रहते थे; वे शुरू से ही इस बात के लिए तैयार किए जाते थे। वे कहते हैं, ऐसी बहुत सी कथाएँ थीं, पर मैकाले की शिक्षा नीति में ये सब बातें हटा दी गईं ताकि लोगों को इनके बारे में कभी पता ही न चले।
गुरु मंत्र का कितने वर्ष जप करने पर गुरु शक्तियाँ सिद्ध होती हैं?
गुरु मंत्र पहले से सिद्ध है — सिद्ध साधक को होना है
वक्ता कहते हैं, गुरु मंत्र पहले से सिद्ध है — वह स्वयं सिद्ध है। गुरु मंत्र को सिद्ध नहीं किया जाता; स्वयं को सिद्ध किया जाता है। और यह बात गुरु मंत्र देते समय ही बता दी जाती है।
पूछे जाने पर कि गुरु मंत्र का कितने वर्ष जप करने पर गुरु शक्तियाँ सिद्ध होने लगती हैं, वक्ता तीखा उत्तर देते हैं कि प्रश्नकर्ता एक तंत्र केंद्र चलाता है और उसे यह नहीं पता कि गुरु मंत्र पहले से सिद्ध है, कि वह स्वयं सिद्ध है। गुरु मंत्र को सिद्ध नहीं किया जाता। स्वयं को सिद्ध किया जाता है। और गुरु मंत्र देते समय ही यह बात बता दी जाती है।
क्या मंत्र सिद्धि से बंधन, रक्षा घेरा और षट्कर्म, और गुरु मंत्र से शक्तिपात किया जा सकता है?
पहले सीखिए, तपोबल बढ़ाइए, किसी देव की कृपा पाइए — फिर गुरु की आज्ञा से
वक्ता प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि वह इस क्षेत्र में बिल्कुल नया लगता है। पहले चीज़ें सीखिए, अपना तपोबल बढ़ाइए, किसी देव की कृपा पाइए, अपना पुण्य बढ़ाइए, और फिर इस क्षेत्र में उतरिए। आप यह काम ज़रूर कर सकते हैं — पर गुरु की आज्ञा से कीजिए। रही शक्तिपात की बात: आपको खुद सिद्ध होना चाहिए और उसे करने का सामर्थ्य होना चाहिए। आपके पास दस लाख रुपये होंगे तभी आप किसी को पचास हज़ार दे सकेंगे। यह इस पर भी निर्भर है कि आपके गुरु में कितना सामर्थ्य है।
पूछे जाने पर कि क्या मंत्र सिद्धि से बंधन खोला-बाँधा जा सकता है, रक्षा का घेरा बनाया जा सकता है और षट्कर्म किया जा सकता है, और क्या गुरु मंत्र से शक्तिपात किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि उन्हें लगता है प्रश्नकर्ता इस क्षेत्र में बिल्कुल नया है और उसके बहुत से प्रश्न होंगे। पहले चीज़ें सीखिए। अपना तपोबल बढ़ाइए। किसी देव की कृपा पाइए। अपना पुण्य भी बढ़ाइए, और उसके बाद इस क्षेत्र में उतरिए। वे कहते हैं, आप यह काम पूरी तरह कर सकते हैं — पर गुरु की आज्ञा से कीजिए। रही बात कि शक्तिपात हो सकता है या नहीं: आपको खुद सिद्ध होना चाहिए, आपके भीतर शक्तिपात करने का सामर्थ्य होना चाहिए। जब आपके पास दस लाख रुपये होंगे, तभी आप किसी को पचास हज़ार दे पाएँगे। यहाँ आप अभी पूछ रहे हैं कि गुरु मंत्र कब सिद्ध होगा और साथ ही यह कि उससे शक्तिपात हो सकता है या नहीं। अगर दूसरे को देना चाहते हैं, तो उसके लायक बनिए। बाकी, आपके गुरु में कितना सामर्थ्य है, इस पर भी निर्भर करता है।
क्या दतिया में हुआ बगलामुखी हवन म्लेच्छों के नाश के लिए किया जा सकता है?
किया जा सकता है, आज भी
पूछे जाने पर कि अगर दतिया में हुआ माँ बगलामुखी का हवन धर्म की रक्षा और म्लेच्छों के नाश के लिए किया जाए तो क्या चमत्कार हो सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं: क्यों नहीं हो सकता? बिल्कुल हो सकता है। आज के समय में भी हो सकता है।
एक श्रोता माँ बगलामुखी के उस हवन के बारे में पूछता है जो दतिया में हुआ था — अगर उसे धर्म की रक्षा के लिए, म्लेच्छों के नाश के लिए किया जाए, तो क्या चमत्कार हो सकता है? क्यों नहीं हो सकता, वक्ता उत्तर देते हैं। पूरी तरह हो सकता है। आज के समय में भी हो सकता है।
क्या गृहस्थ को महामृत्युंजय मंत्र की साधना करनी चाहिए?
वैदिक मंत्र है — इसकी जगह पंचाक्षरी लीजिए
नहीं, वक्ता कहते हैं: आपको महामृत्युंजय मंत्र की साधना नहीं करनी चाहिए। महामृत्युंजय वैदिक मंत्र है, और उसकी साधना वैदिक लोगों को ही करनी चाहिए। इसकी जगह भगवान सदाशिव के उस पौराणिक मंत्र की साधना कीजिए जिसे गायत्री के बराबर माना गया है — पंचाक्षरी मंत्र, जिसमें अंत में "नमः" आता है। उससे भी आप महामृत्युंजय की कृपा पा सकते हैं।
एक श्रोता जो महामृत्युंजय मंत्र की साधना करना चाहती है, उसके पूछने पर वक्ता साफ कहते हैं कि उसे यह नहीं करनी चाहिए। महामृत्युंजय वैदिक मंत्र है। इसकी साधना मत कीजिए; इसकी जगह भगवान सदाशिव के उस पौराणिक मंत्र की साधना कीजिए जिसे गायत्री के बराबर माना गया है — वह पंचाक्षरी मंत्र है, जिसमें अंत में नमः आता है। उस मंत्र की साधना आप कर सकती हैं। महामृत्युंजय की साधना वैदिक लोगों को ही करनी चाहिए। और पंचाक्षरी से भी आप महामृत्युंजय की कृपा पा सकती हैं। यह भगवान शिव के पाँच मुखों से निकला मंत्र है; यह उनके पंचानन स्वरूप का मंत्र है। इसकी महिमा अनंत है — वही कीजिए।
क्या बजरंग बाण के 108 पाठ का अनुष्ठान किया जा सकता है?
कीजिए — 11 दिन का, 108 पाठ का अनुष्ठान
एक श्रोता कहता है कि वह बजरंग बाण के 108 पाठ का अनुष्ठान करना चाहता है और वक्ता के बताए अनुसार ग्यारह दिन पहले ही पूरे कर चुका है। बहुत अच्छा, वक्ता उत्तर देते हैं — ज़रूर कीजिए, ग्यारह का, 108 पाठ का अनुष्ठान।
एक श्रोता लिखता है कि उसे बजरंग बाण के 108 पाठ का अनुष्ठान करना है, अनुमति माँगता है, और कहता है कि वक्ता के बताए अनुसार वह ग्यारह दिन पहले ही कर चुका है। यह बहुत अच्छी बात है, वक्ता उत्तर देते हैं। ज़रूर कीजिए — ग्यारह का, 108 पाठ का अनुष्ठान।
जो व्यक्ति सदा हनुमान जी की पूजा करता है, वह फिर भी संकट में क्यों फँसा है?
कारण आपका अपना कर्म और उसका प्रारब्ध है
वक्ता उत्तर देते हैं कि वे कारण नहीं बता सकते — कारण आपका अपना कर्म और उसका प्रारब्ध है, कि आप संकट में फँसे हैं। और आप हनुमान जी की पूजा इसलिए कर रहे हैं कि वे आपको संकट से निकालें। क्या आप माता-पिता की सेवा सिर्फ इसलिए करते हैं कि आप पर कोई संकट न आए? बुढ़ापे में उन्हें सिर्फ इसीलिए खिलाते हैं? इतना स्वार्थ? कि हमारे जीवन में दुख है इसलिए हम पूजा करते हैं, यह कोई तर्क नहीं; यह बेमेल बात है, उस तरह की जो कहती है कि आपकी सारी समस्याएँ एक मिनट में हल होंगी — श्मशानी इल्म के माहिर बाबा बंगाली से मिलिए। ऐसी कोई बात अपने भीतर मत आने दीजिए।
एक श्रोता लिखता है कि वह सदा महावीर हनुमान जी की पूजा करता है, उन्हें अपना बड़ा भाई मानकर पूजता है, फिर भी संकट में फँसा है, और कारण पूछता है। कारण वे नहीं बता सकते, वक्ता कहते हैं। कारण आपका अपना कर्म और उसका प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। है, कि आप संकट में फँसे हैं। और आप हनुमान जी की पूजा इसलिए कर रहे हैं कि वे आपको संकट से निकालें। क्या आप अपने माता-पिता की सेवा सिर्फ इसलिए करते हैं, बूढ़े होने पर उन्हें सिर्फ इसलिए खिलाते हैं कि आप पर कोई संकट न आए? इतना स्वार्थ? अगर उनकी सेवा-पूजा में कुछ गलत हो रहा है, तो वह अलग बात है और पूछी जा सकती है। पर यह कि हमारे जीवन में दुख है और हम पूजा कर रहे हैं, यह कोई तर्क नहीं — यह बेमेल है, उस तरह की बात जो 'चौबीस घंटे में वशीकरण', 'आपकी सारी समस्याएँ एक मिनट में हल, श्मशानी इल्म के माहिर बाबा बंगाली से मिलिए' बन जाती है। ऐसी कोई बात अपने भीतर मत आने दीजिए। अगर आप हनुमान जी को अपना बड़ा भाई मानते हैं, तो वे ज़रूर कहीं न कहीं आपका साथ दे रहे होंगे। आपने यह कहकर शरणागति ली है: हे भगवान हनुमान, हम आपकी शरण में हैं, आप हमारे बड़े भाई हैं। तो उसके अनुसार चलिए भी। उन पर संदेह मत कीजिए।
संकट में फँसा व्यक्ति जो गुरु-दीक्षित नहीं है, क्या करे?
41 दिन, सुबह-शाम, हनुमान चालीसा से नित्य हवन
अगर आप गुरु-दीक्षित हैं तो अच्छी बात है; नहीं तो कम से कम हनुमान चालीसा से ही नित्य हवन कीजिए। संकट के अनुरूप हवन कीजिए, दोनों समय, सुबह और शाम। ज़्यादा खर्च नहीं है: गाय के गोबर का उपला लाइए, जलाइए, और उस पर घी की आहुति दीजिए — और अगर घी संभव न हो, तो साधारण हवन सामग्री से आहुति दीजिए। 41 दिन साधना कीजिए; परम कृपा प्राप्त होगी। साथ में राम नाम का जप भी कीजिए और राम रक्षा स्तोत्र का पाठ कीजिए।
वक्ता कहते हैं, अगर आप संकट में फँसे हैं, तो हनुमान जी की कितनी ही साधनाएँ हैं। अगर आप गुरु-दीक्षित हैं, तो अच्छी बात है; नहीं तो कम से कम हनुमान चालीसा से ही नित्य हवन कीजिए। संकट के अनुरूप हवन रूपी काम कीजिए। दोनों समय, सुबह और शाम, हवन कीजिए। हनुमान जी का हवन करने में बहुत ज़्यादा खर्च नहीं है। गाय के गोबर का उपला लाइए, जलाइए, और उस पर घी की आहुति देते हुए — और अगर घी की आहुति न दे सकें, लगे कि घी संभव नहीं होगा, तो साधारण हवन सामग्री से आहुति देते हुए हवन कीजिए। 41 दिन उनकी साधना कीजिए। परम कृपा प्राप्त होगी। साथ में राम जी के नाम का जप भी कीजिए, और रामरक्षा स्तोत्रम् का पाठ कीजिए।
किन दिनों तुलसी को जल नहीं देना या तोड़ना नहीं चाहिए?
रविवार को जल नहीं, गुरुवार या अमावस्या को तोड़ना नहीं
एक श्रोता कहता है कि माना जाता है रविवार को तुलसी जी को जल नहीं देना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि इस पर भी वे अलग वीडियो बनाएँगे — कि रविवार को जल क्यों नहीं दिया जाता, गुरुवार को क्यों नहीं तोड़ा जाता, और अमावस्या को क्यों नहीं तोड़ा जाता।
एक श्रोता लिखता है कि कहा जाता है रविवार को तुलसी जी को जल नहीं देना चाहिए। इसके लिए भी एक अलग वीडियो बनाया जाएगा, वक्ता कहते हैं। रविवार को जल क्यों नहीं दिया जाता; गुरुवार को क्यों नहीं तोड़ा जाता; अमावस्या को क्यों नहीं तोड़ा जाता।
नित्य पूजन के कितनी देर बाद भोग उठाना चाहिए?
प्राणाय स्वाहा, या अन्नपूर्णे मंत्र, और पाँच बार जल
पूजन पूरा करके "प्राणाय, व्यानाय, उदानाय, समानाय स्वाहा" पूरा कीजिए; और अगर यह न कर सकें, तो इस मंत्र का एक बार पाठ कीजिए — "अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे। ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥" वहाँ पाँच बार जल छोड़िए, और उसके बाद भोग प्रसाद उठाइए। यानी पूजा पूरी करने के बाद।
पूछे जाने पर कि नित्य पूजन के कितनी देर बाद भोग उठाना चाहिए, वक्ता कहते हैं: पूजन पूरा करके, प्राणाय, व्यानाय, उदानाय, समानाय स्वाहा पूरा करते हुए — और अगर यह न कर सकें, तो इस मंत्र का एक बार पाठ कीजिए: अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे। ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥ वहाँ पाँच बार जल छोड़िए, और उसके बाद भोग प्रसाद उठाइए। पूजा पूरी करने के बाद।
मंदिर में और घर में हनुमान जी को कौन सा दीपक देना चाहिए?
एकमुखी दीपक, और हो सके तो घी का
मंदिर में हनुमान जी के लिए एकमुखी दीपक जलाना सबसे अच्छा है; अगर घी का दीपक जलाएँ तो सबसे उत्तम। घर में आप एकमुखी या पंचमुखी हनुमान, किसी की भी सेवा-पूजा कर सकते हैं — इसमें कोई दिक्कत नहीं।
पूछे जाने पर कि मंदिर में हनुमान जी को दोमुखी या चौमुखी दीपक देना चाहिए, और घर में एकमुखी या पंचमुखी हनुमान की पूजा करनी चाहिए, वक्ता उत्तर देते हैं: मंदिर में हनुमान जी के लिए एकमुखी दीपक जलाना उनके लिए सबसे अच्छा है। अगर घी का दीपक जलाएँ तो सबसे उत्तम। घर में आप एकमुखी हनुमान या पंचमुखी हनुमान, किसी की भी सेवा-पूजा कर सकते हैं — कोई दिक्कत नहीं।
देवी की 32 नामावली के अनुष्ठान में कितना जप चाहिए?
महासिद्धि के लिए बत्तीस लाख, कम से कम बत्तीस हज़ार
वक्ता कहते हैं, स्रोत त्रिपुरा रहस्य है, और त्रिपुरा रहस्य में आगे यह भी बताया है कि इसका कितना जप करना है। 32 नाम हैं, तो 32 लाख में महासिद्धि है। अगर 32 लाख संभव न हो, तो कम से कम 32,000 जप कीजिए। दो-तीन हज़ार में क्या होगा?
एक श्रोता कहता है कि उसने माता की 32 नामावली का अनुष्ठान किया है, दो-तीन हज़ार से थोड़ा आगे गया है, और पूछता है कि उनकी उपासना को प्रसन्न करने के लिए अगला निर्देश क्या है। पढ़िए, वक्ता कहते हैं। किसी ने टिप्पणी की थी कि वे स्रोत नहीं बताते कि बात कहाँ दी गई है; यह त्रिपुरा रहस्य में दी गई है, और वहीं से लिखी गई थी। त्रिपुरा रहस्य में आगे लिखा है कि इसका कितना जप करना है। 32 नाम हैं, तो 32 लाख में महासिद्धि है। अगर 32 लाख संभव न हो, तो कम से कम 32,000 जप कीजिए। दो-तीन हज़ार में क्या होगा?
वक्ता क्यों कहते हैं कि हमारी वाणी से पुण्य घटता है?
हर शब्द पुण्य खर्च करता है; जप उसे लौटाता है
दिन भर में हम कितने शब्द बोलते हैं, और हर शब्द के साथ हमारा पुण्य घटता है। वक्ता कहते हैं, यहाँ वे जो बोल रहे हैं उसमें भी उनका अपना पुण्य जा रहा है। उसे बढ़ाया कैसे जाएगा? ज़्यादा से ज़्यादा माला जप, ज़्यादा से ज़्यादा मंत्र जप करके।
जिसने शिव पूजा से पहले जल न पीने का नियम लिया हो, वह आचमन कैसे करे?
इतना कम जल कि गले तक न पहुँचे
वक्ता कहते हैं, यह बहुत अच्छी बात है कि आप बाबा की पूजा किए बिना जल नहीं पीते — और आप आचमन कर सकते हैं। आचमन में बस इतना कम जल लेना है कि वह गले तक न जाए। वे बताते हैं कि यही प्रश्न बद्रीनाथ पीठ के वर्तमान शंकराचार्य से निर्जला एकादशी व्रत के बारे में पूछा गया था, जिनके वीडियो को वे प्रमाण मानते हैं: आचमन करना है, पर जल इतना कम हो कि नाम मात्र को मुँह में जाए और गले तक न पहुँचे।
एक श्रोता कहता है कि भोले बाबा की पूजा किए बिना जल न पीने के नियम के कारण वह नित्य पूजा में आचमन नहीं करता, और पूछता है कि क्या यह ठीक है या कोई और उपाय है। यह बहुत अच्छी बात है कि आप बाबा की पूजा किए बिना जल नहीं पीते, वक्ता कहते हैं। आप आचमन कर सकते हैं। आचमन में बस इतना ही जल लेना है कि वह गले तक न जाए। वे अपना स्रोत बताते हैं: यही प्रश्न निर्जला एकादशी व्रत के समय पूछा गया था, और शंकराचार्य महाराज से — बद्रीनाथ पीठ के वर्तमान शंकराचार्य से — पूछा गया था, और उनका एक वीडियो था, जिससे वे यह बात प्रमाणित रूप में बता रहे हैं। उन्होंने कहा था कि नहीं, आचमन करना है, पर जल इतना कम रहे कि नाम मात्र को मुँह में जाए, और गले तक न पहुँचे। तो आचमन कीजिए; जल गले तक नहीं जाना चाहिए।
क्या शिव पूजा में शंख बजाया जा सकता है?
बजाना वर्जित नहीं; केवल दक्षिणावर्ती शंख का पूजन वर्जित है
वक्ता कहते हैं, क्यों नहीं बजाया जा सकता — शंख बिल्कुल बजाया जा सकता है। उनके लिए जो वर्जित किया गया है वह दक्षिणावर्ती शंख की पूजा है; शंख बजाना वर्जित नहीं है। घर में भगवान शिव की पूजा गृहस्थ स्वरूप में होती है, और घर में आप केवल शिव पूजा नहीं, पंचायतन पूजा करते हैं। आप गृहस्थ हैं — आप अघोर परंपरा में नहीं चले गए; वहाँ तो आपको शंखिनी बजानी पड़ती, और शंखिनी बजाने से जितनी भी नकारात्मक शक्तियाँ हैं, वे आती हैं।
पूछे जाने पर कि क्या शिव पूजा में शंख बजाया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं: क्यों नहीं बजाया जा सकता? शंख बिल्कुल बजाया जा सकता है। उनके मामले में जो वर्जित किया गया है, वह दक्षिणावर्ती शंख की पूजा है। शंख बजाना वर्जित नहीं है। घर में भगवान शिव की पूजा गृहस्थ स्वरूप में होती है। और घर में आप केवल शिव पूजा नहीं करते, आप पंचायतन पूजा करते हैं। आप गृहस्थ हैं — आप अघोर परंपरा में नहीं चले गए। वहाँ तो शंखिनी बजानी पड़ती। और शंखिनी बजाने से जितनी भी नकारात्मक शक्तियाँ हैं, वे आती हैं।
आज दीक्षा और कल अघोरी — अब घर-घर में एक है
आज दीक्षा, कल अघोरी
उस तरह का अघोरी अब हर कोई है — घर-घर में अघोरी है, और अघोर शब्द बोलने में भी अब अटपटा लगने लगा है। जिसे देखो वह अघोरी बन रहा है; वीडियो आते हैं जिनमें लोग श्मशान में स्वाहा कहते हुए अपनी फोटो और वीडियो खींचते हैं, सीधे चिता पर हवन करते हैं, और बाबा बन गए हैं। आज दीक्षा हुई और कल अघोरी बन गए। ऐसा नहीं करना चाहिए।
तो एक अघोरी — या कहिए, उस तरह का अघोरी आजकल हर कोई है, वक्ता कहते हैं। घर-घर में अघोरी है। अब तो अघोर शब्द बोलने में भी अटपटा लगता है। आज जिसे देखो, वह अघोरी बन रहा है। वीडियो आते हैं जिनमें लोग श्मशान में अपनी फोटो और वीडियो खींच रहे हैं, स्वाहा कह रहे हैं, सीधे चिता के ऊपर हवन कर रहे हैं — और बाबा बन गए हैं। आज दीक्षा हुई; कल अघोरी बन गए। वे कहते हैं, ऐसा नहीं करना चाहिए।
भुजंग स्तोत्र क्या है, और कब किया जाता है?
हर देवता का एक होता है; छंद तय करता है कि कैसे गाया जाए
हर देवता का अपना भुजंग स्तोत्र होता है। स्तोत्र का अर्थ है कि जो स्तुति बनाई गई है उसकी एक लय, एक ढंग है; और जब हम उस ढंग से स्तुति करते हैं — जब उसका पाठ होता है — तो वह उस छंद में होता है जिसमें गाने को कहा गया है, छंद विनियोग में बताया जाता है, जैसे कहते हैं अनुष्टुप छंद, गायत्री छंद। हर छंद का गाने और बोलने का अपना ढंग है। वक्ता कहते हैं, ठीक यहीं गुरु की ज़रूरत होती है।
वक्ता कहते हैं, सभी देवताओं का अपना एक भुजंग स्तोत्र भी होता है। स्तोत्र का अर्थ है कि उनकी जो स्तुति बनाई गई है उसकी एक लय, एक ढंग है। जब हम उस ढंग से स्तुति करते हैं — यानी जब उसका पाठ होता है — तो वह उस छंद में होता है जिसमें उसे गाने को कहा गया है; विनियोग में छंद बताया रहता है, जैसे कहते हैं अनुष्टुभ् छंद, गायत्री छंद। हर छंद का गाने और बोलने का अपना ढंग होता है। ठीक यहीं गुरु की ज़रूरत पड़ती है।
क्या शुरू करने से पहले सबको छंद सीखने चाहिए?
वर्णाश्रम सही है, पर बोझ से लोग भाग जाते हैं
वक्ता कहते हैं कि शंकराचार्य महाराज की सारी बातें सही हैं, कि वर्णाश्रम धर्म के अनुसार चलना चाहिए। पर वे बस इतना जानते हैं कि अभी अपने सनातनियों को बचा लेना ही बहुत बड़ी बात है। अगर कर्मकांड का इतना बोझ डाल दिया जाए — अब छंद सीखो, सीखो कि हर एक कैसे गाया जाता है, और सीखने के बाद ठीक वैसा ही करना है — तो लोग भाग जाना बेहतर समझते हैं। नुकसान उनका है, पर वे इसे अपनी ज़िम्मेदारी मानते हैं कि उन्हें रोकें, रखें, थामें; और बाद में, जब उनका मन वैसा हो जाएगा और वे सनातन में रम जाएँगे, तो ये सब बातें खुद सीख लेंगे। तब उस ढंग से गाया भुजंग स्तोत्र फलश्रुति के अनुसार विशेष कृपा देगा।
वक्ता जोड़ते हैं, आज के समय के लिए वे एक बात कहेंगे: हर चीज़ अपनी जगह सही है। शंकराचार्य महाराज की सारी बातें सही हैं — कि वर्णाश्रम धर्म के अनुसार चलना चाहिए। पर हम बस इतना जानते हैं, वे कहते हैं: कि अगर अभी हमारे सनातनी बच जाएँ, तो वही बहुत बड़ी बात है। नहीं तो, अगर कर्मकांड का इतना बड़ा बोझ डाल दिया जाए — अब छंद सीखो, सीखो कौन सा छंद कैसे गाया जाता है, और सीखने के बाद ठीक उसी के अनुसार करना है — तो लोग भाग जाना बेहतर समझते हैं। नुकसान उनका है; पर कुछ ज़िम्मेदारी हमारी भी बनती है, उन्हें रोकने की, रखने की, थामने की। बाद में, जब उनका मन उस अवस्था में पहुँचेगा और वे सनातन में रम जाएँगे, तो ये सब बातें खुद सीख लेंगे। और जब आप भुजंग स्तोत्र उस ढंग से गाएँगे और पढ़ेंगे, तो फलश्रुति के अनुसार उसकी विशेष कृपा मिलेगी।
पीतांबरा शतनाम के 11,000 के अनुष्ठान को किस दिन से शुरू करें?
शुक्ल पक्ष का गुरुवार, मंगलवार, अष्टमी या चतुर्दशी, या पुष्य नक्षत्र
वक्ता कहते हैं, शुक्ल पक्ष के गुरुवार से शुरू कीजिए; या मंगलवार से शुरू कीजिए; या शुक्ल पक्ष की अष्टमी या चतुर्दशी तिथि से शुरू कीजिए; या जब गुरु पुष्य या रवि पुष्य नक्षत्र हो, तब शुरू कीजिए।
एक श्रोता कहता है कि वह पीतांबरा के स्तोत्र, शतनाम, का 11,000 का अनुष्ठान करना चाहता है, और पूछता है कि किस दिन से शुरू करे। शुक्ल पक्ष के गुरुवार से शुरू कीजिए, वक्ता कहते हैं। या मंगलवार से शुरू कीजिए; या शुक्ल पक्ष की अष्टमी या चतुर्दशी तिथि से शुरू कीजिए। या, अगर गुरु पुष्य नक्षत्र या रवि पुष्य नक्षत्र हो, तो उससे शुरू कीजिए।
एक सवारी घर में आई, खुद को घर की देवी बताया और बकरे की बलि ली — यह क्या है?
षड्यंत्र के रूप में तंत्र, और "खिलाने" का अर्थ
वक्ता कहते हैं, यह बहुत सावधान रहने की बात है। जब घर तोड़ने के लिए विचारों में ऐसी बातें चलती हैं, तो यह बहुत बड़ा षड्यंत्र है। यह जानिए: तंत्र बहुत बड़ा षड्यंत्र है। इसीलिए कहा जाता है कि तंत्र में लोग आपको कुछ खिला देते हैं — "खिलाना" ठीक यही है। सामने वाला तांत्रिक क्या बुद्धि लगाएगा, और कैसे खिलाएगा, यह कहना बहुत कठिन है।
एक श्रोता लिखता है कि ठीक जैसा वक्ता ने उस दिन के वीडियो में बताया था, उनके घर में एक सवारी आई, यह कहते हुए कि मैं इस घर की देवी हूँ, और उसने बकरे की बलि भी ली। यह बहुत सावधान रहने की बात है, वक्ता कहते हैं; ये अनुभव की बातें हैं। जब घर तोड़ने के लिए विचारों में इस तरह बातें चलती हैं — तो यह आपके विरुद्ध बहुत बड़ा षड्यंत्र है। तंत्र बहुत बड़ा षड्यंत्र है, यह जानिए। इसीलिए कहा जाता है कि तंत्र में लोग आपको कुछ खिला देते हैं। खिलाया-पिलाया ठीक यही है। सामने वाला तांत्रिक क्या बुद्धि लगाएगा, कैसे खिलाएगा, यह कहना बहुत कठिन बात है।
दूसरों को माता दुर्गा की भक्ति की ओर कैसे प्रेरित करें?
उनके अपने दुख से राहत के ज़रिए — और दंभी पर गीता
वक्ता कहते हैं, आज के समय में एक ही तरीका है: व्यक्ति को उसके दुख से निकालने के ज़रिए प्रेरित कीजिए — उससे कहिए, यह काम करो तो तुम्हें दुख से छुटकारा मिलेगा। एक बार उसे थोड़ा भी अनुभव हो गया तो उसे अच्छा लगने लगेगा, और फिर वह वह भक्ति करेगा। नहीं तो आज लोग अपने फायदे के बिना कुछ नहीं करना चाहते। और भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि इस तरह के दंभी लोगों से शास्त्रोक्त बातें कभी करनी ही नहीं चाहिए; उनसे यह करो, वह मत करो कहने की ज़रूरत नहीं। छोड़ दीजिए।
पूछे जाने पर कि दूसरों को माता दुर्गा की भक्ति, साधना और उपासना की ओर कैसे प्रेरित किया जाए, वक्ता कहते हैं कि सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि सामने वाले को कैसे प्रेरित किया जाए। आज के समय में एक ही तरीका है: उसके जो दुख हैं उनसे निकालने के ज़रिए प्रेरित कीजिए — कि अगर तुम यह काम करोगे तो तुम्हें अपने दुख से छुटकारा मिलेगा। एक बार उसे थोड़ा भी अनुभव हो गया, तो उसे अच्छा लगने लगेगा, और फिर वह वह भक्ति करेगा। नहीं तो आज के समय में जो लोग कोई काम नहीं करना चाहते, वे अपने फायदे के बिना कुछ भी नहीं करना चाहते। उन्हें भक्ति में इसलिए आना है कि — भाई, फायदा क्या होगा? फिर आप वहाँ अटक जाएँगे, क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में यह कहा है: कि जो लोग इस तरह के दंभी हैं, उनसे शास्त्रोक्त बातें कभी करनी ही नहीं चाहिए। उनसे यह करो, वह मत करो कहने की कोई ज़रूरत नहीं। छोड़ दीजिए। जितना अपना काम है उतना करने की कोशिश कीजिए, बताने की कोशिश कीजिए।
शास्त्र क्या कहता है
Kṛṣṇa says this teaching must never be spoken to one without austerity or devotion, to one unwilling to hear, or to one who finds fault with him.
The speaker's "dambhī" is a loose gloss of the hearers this verse excludes.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥
यह उपदेश तुम्हें कभी तपरहित को नहीं कहना चाहिए, न भक्तिरहित को, न सुनना न चाहने वाले को, और न उसको जो मुझमें दोष देखता है।
कौन सी साधना ग्रहों को अनुकूल करती है और शत्रुओं से रक्षा करती है?
अपने इष्ट के कवच या अष्टोत्तर शतनाम का 11,000 जप
जैसा बगलामुखी के शतनाम के 11,000 जप वाले पिछले प्रश्न में बताया: आपके जो भी आराध्य हैं, उनके कवच का या अष्टोत्तर शतनाम का 11,000 जप कीजिए। ग्यारह हज़ार एक साथ नहीं होगा — कम से कम तीन, चार, छह महीने लगेंगे। उसके बाद अपनी क्षमता के अनुसार रोज़ उसके 11 पाठ जीवन भर करते रहिए। आपको और कुछ खास करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी; और अगर ज़रूरत पड़ी भी, तो बहुत थोड़े से आपका काम हो जाएगा।
पूछे जाने पर कि कौन सी साधना करें जिससे ग्रह अनुकूल हों और शत्रुओं से रक्षा हो, वक्ता बगलामुखी के स्तोत्र, उनके शतनाम के 11,000 जप वाले पिछले प्रश्न का हवाला देते हैं। ठीक उसी तरह: आपके जो भी आराध्य हैं, उनके कवच का, या उनके अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। का 11,000 जप कीजिए। ग्यारह हज़ार जप तुरंत तो होगा नहीं; कम से कम तीन, चार, छह महीने लगेंगे। उसके बाद अपनी शक्ति के अनुसार रोज़ उसके 11 पाठ जीवन भर करते रहिए। आपको और कुछ खास करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी; और अगर ज़रूरत पड़ने वाली होगी, तो बहुत थोड़े से आपका काम सिद्ध हो जाएगा।
काल भैरव मंदिर में मंत्र जप के बाद सिरदर्द क्यों हुआ?
ऊर्जा और थकान — हर चीज़ को तंत्र से मत जोड़िए
वक्ता कहते हैं, आपने मंत्र जप नया-नया, पहली बार किया होगा, तो ऊर्जा का थोड़ा असर है — और थकान का भी असर है; शरीर थकता है। अब आप कहेंगे कि चार घंटे जप से पैर दुखा, कमर दुखी, बैठने से एसिडिटी हो गई। शरीर में क्षमता ही नहीं है। आप योग नहीं करेंगे, व्यायाम नहीं करेंगे, और फिर चार घंटे पूजा में बैठेंगे — तो अभ्यास होने तक कुछ दर्द होगा। इसमें डरने की कोई बात नहीं। हर एक चीज़ को तंत्र से मत जोड़िए; शरीर की भी अपनी क्षमता है।
एक श्रोता कहता है कि वह अष्टमी को काल भैरव मंदिर गया, सामने देखते हुए मंत्र जप किया, और रात को सिरदर्द हुआ, और पूछता है क्यों। आपने मंत्र जप नया-नया, पहली बार किया होगा, वक्ता कहते हैं — तो ऊर्जा का थोड़ा असर है। थकान का भी असर है; शरीर थक जाता है। अब आप कहेंगे कि चार घंटे मंत्र जप किया और पैर दुखने लगा, क्यों दुखा; कमर दुखने लगी, क्यों दुखी; बैठे और एसिडिटी हो गई, क्यों हुई। शरीर में क्षमता नहीं है। आप योग नहीं करेंगे, व्यायाम नहीं करेंगे, और फिर चार घंटे पूजा में बैठेंगे — तो अभ्यास होने तक कुछ दर्द होगा। इसमें इस तरह के डर की कोई बात नहीं। हर चीज़ को तंत्र से मत जोड़िए। शरीर का भी अपना सामर्थ्य है।
चंद्रमा बलवान होने पर भी केमद्रुम योग बने तो पक्का उपाय क्या है?
शिव पूजा, और मामा का आशीर्वाद
वक्ता कहते हैं, शिव जी की पूजा सबसे पक्का उपाय है। और अगर मामा हैं, तो मामा का आशीर्वाद सबसे ज़रूरी है।
पूछे जाने पर कि जब कुंडली में चंद्रमा बलवान हो और नीच का न हो, फिर भी केमद्रुम योग बने, तो पक्का उपाय क्या हो सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं: शिव जी की पूजा सबसे पक्का उपाय है। और अगर मामा हैं, तो मामा का आशीर्वाद सबसे ज़रूरी चीज़ है।
बच्चे शिवलिंग पर चॉकलेट चढ़ा रहे हैं — दोष किसका है?
अभिभावक वही संस्कार दे रहे हैं
वक्ता कहते हैं, बच्चे यह अपने आप नहीं करते। बच्चे सुनते नहीं, और ऊपर से बड़े भी यही कर रहे हैं; उनके अभिभावक उन्हें वही संस्कार दे रहे हैं। पितृ पक्ष में पितरों के आने का मज़ाक उड़ाते हैं और फिर हैलोवीन पर भूत बनकर घूमते हैं, विदेशी संस्कृति अपनाते हैं — तो ऐसे बच्चे क्या करेंगे? चॉकलेट खाएँगे और चॉकलेट चढ़ाएँगे। माता-पिता की ज़िम्मेदारी है कि ऐसी गलत चीज़ों को बढ़ावा न दें, और बच्चों को समझाएँ; अच्छे से समझाइए और करके दिखाइए, फिर बच्चे क्यों नहीं करेंगे?
एक श्रोता कहता है कि उसने शिवालय में बच्चों को शिवलिंग पर चॉकलेट चढ़ाते देखा है और यह गलत है। एक तो बच्चे सुनते नहीं, वक्ता कहते हैं, और ऊपर से बड़े भी यही कर रहे हैं — तो बच्चे यह अपने आप नहीं कर रहे। उनके अभिभावक उन्हें वही संस्कार दे रहे हैं। पितृ पक्ष में पितृ के आने की बात का मज़ाक उड़ाते हैं, और हैलोवीन पर भूत-प्रेत बनकर घूम रहे हैं, विदेशी संस्कृति अपना रहे हैं। तो ऐसे बच्चे क्या करेंगे? चॉकलेट खाएँगे और चॉकलेट चढ़ाएँगे। माता-पिता की ज़िम्मेदारी बनती है कि इस तरह की गलत चीज़ों को बढ़ावा न दें, और बच्चों को समझाएँ। अच्छे से समझाइए और करके दिखाइए, फिर बच्चे क्यों नहीं करेंगे?
नवरात्र में खरीदे नारियल बार-बार खराब निकले — इसका क्या अर्थ है?
देव योग हो सकता है, या बस पुराना नारियल
वक्ता कहते हैं, यह बचपन की बात है, और उस समय परिस्थितियाँ क्या थीं यह अब नहीं बताया जा सकता। ऐसा देव योग से भी हो सकता है। अगर नारियल पुराना है तो भी खराब निकल सकता है। और अगर आप उसे घर लाकर तोड़ रहे हैं, तो उससे भी कुछ दिक्कत हो सकती है।
कैसे पता करें कि घर के मंदिर का भोग भूत-प्रेत तो नहीं ले रहे?
जहाँ देवता भोग लेते हैं वह मंदिर भव्य दिखता है; देव दोष उसे सूना छोड़ देता है
वक्ता कहते हैं, अपने पूजा मंदिर को देखकर बताइए। अगर देवी-देवता पूजा और भोग लेते हैं, तो भव्यता होगी — एक दीपक भी जलाइए तो मंदिर भव्य दिखेगा। जहाँ विचार उस तरह का हो गया है, या जहाँ देव दोष है, वहाँ आप कितना भी सजाइए और हज़ारों रुपये खर्च कीजिए, मंदिर में पूरा फीकापन लगेगा; बिल्कुल नहीं लगेगा कि वहाँ देव शक्तियाँ विराजमान हैं। देखकर सूनेपन का भाव आता है।
एक श्रोता कहता है कि वक्ता का वीडियो देखकर उसे डर है कि उसके घर के मंदिर में देवी-देवताओं की जगह भूत-प्रेत आ गए हैं और भोग और पूजा ले रहे हैं, और पूछता है कि इससे कैसे बचे। वीडियो भ्रम दूर करने के लिए बनाए जाते हैं, वक्ता कहते हैं, पर लोग बहुत भ्रमित हो जाते हैं। बात इसलिए कही जाती है कि आप उसे पकड़ें और ठीक करने की कोशिश करें; भ्रमित मत होइए। एक-दो लोगों के साथ ऐसा बहुत हो भी सकता है, पर सामान्यतः सबके साथ नहीं हो सकता। किसी ने संदेश भेजा कि उसके घर में बहुत तंत्र हो रहा है, फिर भी तुलसी जी बढ़ रही हैं, तुलसी जी ठीक हैं — यह भी परखने का एक कारण बनता है। अपने पूजा मंदिर को देखकर बताइए। देखकर समझ आता है कि पूजा और भोग कहाँ जा रहे हैं। अगर देवी-देवता पूजा और भोग लेते हैं तो भव्यता होगी; एक दीपक भी जलाइए तो मंदिर भव्य दिखेगा। और जहाँ विचार उस तरह का हो गया है, या देव दोष है — कितना भी सजाइए और हज़ारों खर्च कीजिए, मंदिर में पूरा फीकापन लगेगा; बिल्कुल नहीं लगेगा कि वहाँ देव शक्तियाँ विराजमान हैं। देखकर सूनेपन का भाव आता है। तो इतनी चिंता मत कीजिए।
पंचगंध में कृष्ण पृष्ठ क्या है?
एक चीज़ के कई नाम, और गंध देवता और पुराण के अनुसार बदलते हैं
चंदन, कुमकुम, कृष्ण पृष्ठ, कपूर — शिवलिंग का लेपन इन पंचगंधों से किया जाता है। कृष्ण पृष्ठ किसे कहते हैं, इस पर वक्ता कहते हैं कि एक ही चीज़ के अलग-अलग नाम होते हैं; अगर यह पंचगंध के संदर्भ में कहा जा रहा है, तो देखना होगा कि आपने इसे कहाँ पढ़ा है। जैसे देवताओं का अष्टगंध अलग है और देवियों का अष्टगंध अलग, वैसे ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के त्रिगंध और पंचगंध भी अलग-अलग हैं; और इससे भी बड़ी बात, पुराणों के अनुसार देखें तो हर पुराण में इसकी कोई न कोई एक चीज़ बदल जाती है। इसलिए बिना देखे, वे कहते हैं, बताना उनके लिए थोड़ा कठिन होगा।
पूछे जाने पर कि कृष्ण पृष्ठ क्या है, वक्ता पहले संदर्भ बताते हैं: चंदन, कुमकुम, कृष्ण पृष्ठ, कपूर — शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। का लेपन इन पंचगंधों से किया जाता है। वे कहते हैं, एक ही शब्द, एक ही चीज़ के अलग-अलग नाम होते हैं। अब, कृष्ण पृष्ठ किसे कहते हैं? अगर इसकी बात पंचगंध के संदर्भ में हो रही है, तो देखना होगा कि आपने इसे कहाँ पढ़ा है। जैसे देवताओं का अष्टगंध अलग है और देवियों के लिए अष्टगंध अलग है, उसी तरह ब्रह्मा, विष्णु और महेश के लिए त्रिगंध और पंचगंध भी अलग-अलग हैं। और इससे भी बड़ी बात: अगर पुराणों के अनुसार देखें, तो हर पुराण में इसकी कोई न कोई एक चीज़ बदल जाती है। इसलिए बिना देखे बताना उनके लिए थोड़ा कठिन होगा।
शीतला माता की सात बहनें कौन हैं?
शीतला माता, सायर शीतला, फूलमती, अंगार, पनेसा
सात बहनों के साथ दो और के बारे में पूछे जाने पर — जिससे नौ हो जाएँगी — वक्ता सात बहनों के नाम बताते हैं: शीतला माता, सायर शीतला, फूलमती, अंगार, पनेसा और ये। अगर इनके अलावा दो और हैं, तो सामान्य रूप से ऐसा नहीं है, और प्रश्नकर्ता किसी खास क्षेत्र की बात कर रहा होगा।
एक श्रोता पूछता है कि शीतला माता के साथ दो अन्य और सात बहनें कौन हैं, और उनके नाम क्या हैं। दो अन्य और सात बहनें — तो नौ बहनें हो जाती हैं, वक्ता ध्यान दिलाते हैं। सात बहनें हैं: शीतला माता, सायर शीतला, फूलमती, अंगार, पनेसा — ये हैं। अगर इनके अलावा दो और हैं, तो सामान्य रूप से ऐसा नहीं है; उस स्थिति में प्रश्नकर्ता किसी खास क्षेत्र की बात कर रहा है।
पीपल पर कौन सी शक्ति बैठती है जिसे हटाने से हनुमान जी के साधक ने भी मना कर दिया?
पीपल पर ज़्यादातर ब्रह्म होता है, और वह भी खूनी ब्रह्म
वक्ता कहते हैं, अगर पीपल के पेड़ से हटाना था और वह नहीं हटा, तो इसके बहुत से कारण हो सकते हैं; और रही शक्ति की बात, तो पीपल पर ज़्यादातर ब्रह्म होता है। वह खूनी ब्रह्म होगा — किसी ने लाकर बिठाया हो, या अपने आप हो — और उसे हटाने में बहुत ही बड़ा जोखिम है।
एक श्रोता एक पीपल के बारे में पूछता है जिसमें ऐसी शक्ति रहती है कि हनुमान जी के एक साधक ने उसे हटाने से मना कर दिया, हालाँकि वह पहले चुनौती दे रहा था, और मना करके चला गया। अगर पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के पेड़ से हटाना था और वह नहीं हटा, तो इसके बहुत से कारण हो सकते हैं, वक्ता कहते हैं। और रही शक्ति की बात — पीपल पर ज़्यादातर ब्रह्म होता है। वह खूनी ब्रह्म होगा। किसी ने लाकर वहाँ बिठाया हो, या अपने आप हो। तो उसे हटाने में बहुत ही बड़ा जोखिम है।
क्या आवरण पूजा में चावल की जगह तिल का प्रयोग हो सकता है?
चावल चावल ही रहेगा; तिल तर्पण का है, अर्चन का नहीं
वक्ता कहते हैं, चावल की जगह तिल का प्रयोग क्यों करेंगे — चावल की जगह चावल ही लगेगा, तिल नहीं। दूसरी सामग्री के लिए चाहें तो फूल ले सकते हैं, पर तिल का इस तरह प्रयोग नहीं करना चाहिए। तिल का प्रयोग तर्पण के समय कर सकते हैं — जब आप यंत्र पर तर्पण कर रहे हों — अर्चन के समय नहीं।
पूछे जाने पर कि क्या आवरण पूजा में चावल की जगह तिल का प्रयोग हो सकता है और देवी के लिए और कौन सी सामग्री ली जा सकती है, वक्ता उत्तर देते हैं: चावल की जगह तिल का प्रयोग क्यों करेंगे? चावल की जगह चावल ही लगेगा; तिल नहीं। दूसरी सामग्रियों में चाहें तो फूल का प्रयोग कर सकते हैं, पर तिल का इस तरह प्रयोग नहीं करना चाहिए। तिल का प्रयोग आप तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। के समय कर सकते हैं — जब आप यंत्र पर तर्पण कर रहे हों। और अर्चन के समय नहीं।
माता काली का विग्रह जल जाए तो क्या करना चाहिए?
नौ दिन अभिषेक, क्षान्तिरूपेण श्लोक का 108 जप, और जीव सेवा
वक्ता कहते हैं, विग्रह आपकी अपनी लापरवाही से जला होगा। सबसे पहले कम से कम नौ दिन लगातार माता का अभिषेक कीजिए — पंचगव्य से, पंचामृत से और शुद्ध गंगाजल से, रोज़, नौ दिन बिना रुके, आज से या कल से शुरू करके। नौ दिन रोज़ पूरे मंत्र "या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥" का 108 जप कीजिए। साथ में जीव सेवा ज़रूर हो — गाय, कौआ, कुत्ता, किसी को भी खिलाइए; आपके पेट में जाने से पहले उनके पेट में जाए — और बार-बार क्षमा माँगने का भाव रखिए: हे भगवती, जाने-अनजाने हुए अपराध को क्षमा करो। अंतिम दिन अपनी शक्ति के अनुसार अन्नदान कीजिए।
एक श्रोता लिखता है कि आज माता काली का विग्रह जल गया है और पूछता है कि क्या करे। विग्रह आपकी अपनी लापरवाही के कारण जला होगा, वक्ता कहते हैं। सबसे पहले कम से कम नौ दिन लगातार माता का अभिषेक कीजिए। पंचगव्य से, पंचामृत से और शुद्ध गंगाजल से, नौ दिन लगातार रोज़ उनका अभिषेक कीजिए। आज से ही करना चाहिए; कल से शुरू कीजिए। अभिषेक अच्छे से होना चाहिए। और नौ दिन रोज़ इस पूरे मंत्र का 108 जप कीजिए: या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ साथ में जीव सेवा ज़रूर हो। चाहे गाय को खिलाइए, कौए को या कुत्ते को, आपके पेट में जाने से पहले उनके पेट में जाए; और बार-बार क्षमा प्रार्थना का भाव रखिए, कि हे भगवती, जाने-अनजाने जो भी अपराध हुआ है, उसे क्षमा करो। इतना कीजिए। और अंतिम दिन अपनी शक्ति के अनुसार अन्नदान कीजिए।
दुर्गा उपासना के भीतर उपासना का क्रम क्या है?
गणपति, फिर बटुक भैरव, फिर हनुमान, फिर नरसिंह
दुर्गा उपासना में सबसे पहले गणपति हैं; फिर बटुक भैरव; फिर हनुमान; और फिर अंत में भगवान नरसिंह। और भगवान नरसिंह की सीधी उपासना बहुत कम लोग करते हैं — कहीं सीधे ढंग से कोई बताएगा कि दुर्गा उपासना में चार वीरों में नरसिंह वीर की पूजा भी होती है। वक्ता कहते हैं, यह सब उस तरह करने की ज़रूरत नहीं; लोग इतना करना चाहेंगे भी नहीं। जिन्हें ज़रूरत है वही करें — जो चाहते हैं कि यहाँ जो है वह पूर्ण हो, जब उस तरह का समर्पण हो, और जब भगवती क्षमता दें।
दुर्गा उपासना के भीतर नरसिंह और गणेश की उपासना का क्रम और विधि पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: दुर्गा उपासना में सबसे पहले गणेश हैं। फिर बटुक भैरव आते हैं। फिर हनुमान जी आते हैं। और फिर अंत में भगवान नरसिंह आते हैं। और भगवान नरसिंह की सीधी उपासना बहुत कम लोग करते हैं। कहीं सीधे ढंग से कोई बताएगा कि दुर्गा उपासना में चार वीरों में नरसिंह वीर की पूजा भी होती है। यह सब उस तरह करने की ज़रूरत नहीं। चाहें भी तो लोग इतना नहीं करेंगे। जिन्हें ज़रूरत है वही करें: जो चाहते हैं कि यहाँ यह पूर्ण हो, जब उस तरह का समर्पण हो, और जब भगवती उसकी क्षमता दें — तब वे करें।
तंत्रोक्त विधि में पंचांग सेवन का क्रम क्या है?
पहले कवच सिद्ध करें; फिर शतनाम, हृदय, सहस्रनाम, कवच
जिस इष्ट की साधना आप कर रहे हैं, पंचांग सेवन की जितनी चीज़ें हैं — कवच, सहस्रनाम, शतनाम, स्तोत्र, स्तुति — उनमें सबसे पहले कवच सिद्ध करना चाहिए। सिद्ध करने के बाद रोज़ पंचांग करना और भी अच्छा होगा। पहले शतनाम करना चाहिए, फिर हृदय, फिर सहस्रनाम, फिर कवच, और उसके बाद ही उनके नाम का जो मंत्र जप और स्तुति करनी हो।
पूछे जाने पर कि तंत्रोक्त विधि में पंचांग सेवन का क्रम क्या है, क्योंकि इष्ट साधना में पंचांग सेवन ज़रूरी है, वक्ता कहते हैं: जिस इष्ट की साधना आप कर रहे हैं, पंचांग सेवन की जो भी चीज़ें हैं — कवच, सहस्रनाम, शतनाम, स्तोत्र, स्तुति — उनमें सबसे पहले कवच सिद्ध करना चाहिए। सिद्ध करने के बाद अगर आप रोज़ पंचांग करें तो और भी अच्छा होगा। पहले शतनाम करना चाहिए, फिर हृदय करना चाहिए, फिर सहस्रनाम करना चाहिए, फिर कवच करना चाहिए, और फिर अंत में उनके नाम का मंत्र जप आदि, स्तुति।
पाँचवें अंग का क्रमिक पुरश्चरण कितना ज़रूरी है?
गुरु के बिना हृदय का पुरश्चरण हार्ट अटैक तक ला सकता है
वक्ता कहते हैं, ज़रूरी है, पर अगर पुरश्चरण करने जाएँ तो जानिए कि यह चीज़ गुरु कृपा से ही संभव होती है। कवच तो आप कर लेंगे, पर हृदय का पुरश्चरण करने में हार्ट अटैक तक की संभावना बन जाती है। यह अतिशयोक्ति नहीं: ऊर्जा बहुत ज़्यादा हो जाती है। गुरु कृपा और सही मार्गदर्शन के बिना ऊर्जा इतनी बढ़ेगी कि आपको समझ नहीं आएगा कि दिल कहाँ से धड़क रहा है — दिल में चौबीस घंटे धड़कन बनी रहेगी।
पूछे जाने पर कि पाँचवें अंग का क्रमिक पुरश्चरण कितना ज़रूरी है, वक्ता कहते हैं कि ज़रूरी है — पर अगर आप पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करने जाएँ, तो जानिए कि यह चीज़ गुरु कृपा से ही संभव होती है। कवच तो आप कर भी लें; पर हृदय का पुरश्चरण करने में हार्ट अटैक तक की संभावना बन जाती है। वे कहते हैं, यह अतिशयोक्ति की बात नहीं — जानिए: ऊर्जा बहुत ज़्यादा हो जाती है। अगर गुरु कृपा नहीं, सही मार्गदर्शन नहीं, तो ऊर्जा इतनी बढ़ेगी कि आपको खुद समझ नहीं आएगा कि आपका दिल कहाँ से धड़क रहा है। दिल में चौबीस घंटे धड़कन बनी रहेगी।
पुरश्चरण ठीक से हो, इसके लिए गुरु को क्या देना होता है?
अर्पण, तर्पण, मंडल, यंत्र और सही मुद्रा
ठीक वहीं गुरु की ज़रूरत होती है कि उस तरह आपका मार्गदर्शन करें — अर्पण, तर्पण, मंडल और यंत्र सिखाएँ, इन सब चीज़ों का विधिवत ज्ञान दें, और बताएँ कि हृदय का जप किस मुद्रा में करना है। तभी बात ठीक से होगी। अगर बिना मुद्रा जप करेंगे, तो ऊर्जा इतनी बनेगी कि जहाँ पुरश्चरण में मान लीजिए 11,000 जप चाहिए, वहाँ ग्यारह जप में आपकी हालत खराब हो जाएगी। और शताक्षरी माला और सहस्राक्षरी माला तो बिल्कुल अलग बात है — उन्हें छोड़िए; बहुत से हृदयों में पहले से शताक्षरी होती है, तो ऊर्जा और बढ़ जाती है।
वक्ता कहते हैं, ठीक उसी जगह ज़रूरत पड़ती है कि गुरु उस तरह आपका मार्गदर्शन करें। अर्पण, तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण।, मंडल और यंत्र सिखाना; इन सब चीज़ों का विधिवत ज्ञान देना। बताना कि हृदय का जप किस न्यास और किस मुद्रा में करना है — तभी बात ठीक से होगी। अगर आप बिना मुद्रा की अवस्था में जप करेंगे, तो इतनी ऊर्जा बनेगी कि जहाँ पुरश्चरण में मान लीजिए 11,000 जप हैं, यहाँ ग्यारह जप में आपकी हालत खराब हो जाएगी। एक जप ही काफी है। उसके बाद शताक्षरी माला और सहस्राक्षरी माला सब अलग बात है — उन्हें बिल्कुल छोड़िए। और बहुत से हृदयों में पहले से शताक्षरी होती है, तो ऊर्जा और बढ़ जाती है। इसी कारण इसे सोच-समझकर करना चाहिए।
हनुमान पंजर, हनुमान बड़वानल और तंत्रोक्त अनुष्ठान अभी बताए जाने हैं
हनुमान पंजर, हनुमान बड़वानल और तंत्रोक्त अनुष्ठान
हनुमान जी की पूरी पूजा विधि पूछे जाने पर वक्ता बताने को राज़ी होते हैं, और जल्दी — हनुमान पंजर, हनुमान बड़वानल, तंत्रोक्त अनुष्ठान।
हनुमान जी की पूरी, संपूर्ण पूजा विधि पूछे जाने पर वक्ता मान जाते हैं: ठीक है, वे बताएँगे, और जल्दी बताएँगे। हनुमान पंजर, हनुमान बड़वानल, तंत्रोक्त अनुष्ठान।
सिर कटवा या मुंडी कटवा बाबा कौन होते हैं?
गाँव के थान की पूजा, ब्राह्मण की हत्या, और डाकुओं की तंत्रोक्त साधनाएँ
सिर कटवा बाबा, यानी मुंडी कटवा बाबा, गाँवों में थान पर, बाग में पूजे जाते हैं। आज के लोगों को बड़ों से ज़्यादा जानकारी नहीं मिली होगी, इसलिए वे उसी नाम से रह गए हैं। मुख्य रूप से यह वहाँ होता है जहाँ किसी ब्राह्मण की हत्या हुई हो। और मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के इलाकों में — हालाँकि ऐसा हर जगह हुआ — एक समय ऐसा भी था जब शादियों के समय डाकू हमला करते थे; डाकू किसी एक समुदाय के नहीं, हर तरह के होते थे, और अगर किसी लड़ाई में किसी का सिर कट गया, तो वह भी ऐसी चीज़ बन गया, क्योंकि डाकू कभी बिना पूजा-पाठ और तैयारी के नहीं जाते थे, और तंत्रोक्त साधनाएँ करते थे।
पूछे जाने पर कि सिर कटवा बाबा कौन होते हैं, वक्ता कहते हैं कि वे मुंडी कटवा बाबा हैं। सिर कटवा बाबा गाँवों में थान पर, वन में पूजे जाते हैं। आज के लोगों को बड़ों से इतनी जानकारी नहीं मिली होगी, इसलिए वे उसी नाम से रह गए हैं। और मुख्य रूप से होता यह है कि किसी ब्राह्मण की हत्या होती है, और फिर उस तरह से वह हत्या होती है। और मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के इलाकों में, और बिहार के इलाकों में भी — हालाँकि यह चीज़ हर जगह हुई — ऐसा समय रहा है कि शादियों के समय डाकुओं द्वारा हमले होते थे। और ऐसा नहीं कि डाकुओं में किसी एक खास समुदाय के लोग ही आते थे; उनमें हर तरह के लोग थे। अब अगर उनमें किसी लड़ाई-झगड़े में किसी की मुंडी उड़ गई, तो वे लोग भी बाद में — क्योंकि डाकुओं में यह चीज़ होती थी कि वे बिना पूजा-पाठ किए, बिना तैयारी किए कभी नहीं जाते थे। वे तंत्रोक्त साधनाएँ करते थे।
गोरखपुर की तरकुलहा देवी इसका सकारात्मक स्वरूप हैं — उनके भक्तों को फाँसी नहीं लग सकी
गोरखपुर की तरकुलहा देवी और वे भक्त जिन्हें फाँसी नहीं लगी
वक्ता गोरखपुर की तरकुलहा देवी — वहाँ की भगवती — को इसका सकारात्मक स्वरूप बताते हैं। वे कहते हैं, उनके भक्तों ने इतने अंग्रेज़ों के सिर काटकर वहाँ चढ़ाए कि एक कुआँ भर गया। और भगवती ने उन्हें ऐसी सिद्धि दी कि जब अंग्रेज़ों ने उन्हें फाँसी दी तो वे मरे ही नहीं: कितनी भी बार लटकाया गया, वे जीवित रहे, और उतारे जाने पर भी जीवित थे, और उन्हें मृत्यु प्राप्त ही नहीं हुई।
इसी चीज़ के सकारात्मक स्वरूप में, वक्ता कहते हैं, हम तरकुलहा देवी की बात कर सकते हैं — गोरखपुर की भगवती। और उनके भक्त ऐसे थे कि उन्होंने इतने अंग्रेज़ों के सिर काटकर चढ़ाए कि वहाँ एक कुआँ भर गया। भगवती ने उन्हें ऐसी सिद्धि दी कि जब अंग्रेज़ों ने उन्हें फाँसी दी, तो वे मरे ही नहीं। कितनी भी बार फाँसी दी, वे जीवित रहे। उन्हें लटकाकर छोड़ दिया जाता, और उतारे जाने पर भी वे जीवित होते। उन्हें मृत्यु प्राप्त ही नहीं हुई। और वे जोड़ते हैं, डाकू भी इस तरह की चीज़ें करते थे।
घर में साधना कक्ष बनाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
देवताओं का स्थान, पूर्व मुख, और हवन के धुएँ के लिए खिड़की
सबसे अच्छा ध्यान यह रखना है कि देवी-देवताओं का स्थान सही जगह पर हो। जब आप साधना करने बैठें, अगर आपका मुख पूर्व की ओर पड़े तो सबसे अच्छा। प्रतिमाओं और श्री विग्रहों को जिस क्रम में रखना है उसके अनुसार पहले से स्थान बनाइए। और अगर उस जगह हवन करना है, तो खिड़की की व्यवस्था हो, ताकि धुआँ पूरी तरह बाहर जाए।
एक श्रोता कहता है कि उसके घर का नवीनीकरण हो रहा है और उसमें एक साधना कक्ष बन रहा है, और पूछता है कि क्या सावधानियाँ रखे। सबसे अच्छा ध्यान यह रखना है कि देवी-देवताओं का स्थान सही जगह पर हो, वक्ता कहते हैं। जब आप साधना करने बैठें, अगर आपका मुख पूर्व की ओर पड़े तो सबसे अच्छा होगा। इन सब बातों का खास ध्यान रखिए। देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ जिस क्रम में रखनी हैं, श्री विग्रह जिस क्रम में स्थापित करने हैं, उसके अनुसार पहले से स्थान बनाइए। और अगर उस जगह हवन करना है, तो हवन के समय के लिए खिड़की की व्यवस्था हो, ताकि धुआँ पूरी तरह बाहर जाए।
क्या घर की हनुमान मूर्ति पर सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाया जा सकता है?
घर में भी, कोई दिक्कत नहीं
पूछे जाने पर कि क्या घर में रखी हनुमान मूर्ति पर सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाया जा सकता है, या यह केवल मंदिर की मूर्ति पर करना चाहिए, वक्ता कहते हैं: घर में भी चढ़ा सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं।
एक श्रोता पूछता है कि क्या घर में रखी हनुमान जी की मूर्ति पर सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाया जा सकता है, या यह केवल मंदिर की मूर्ति पर ही करना चाहिए। घर में भी चढ़ा सकते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं। कोई दिक्कत नहीं।
क्या वर्क लगी मिठाई खाने पर घर की रोक सही है?
नहीं खानी चाहिए, और खाने वाले को दोष लगता है
एक श्रोता कहता है कि उसके घर में वर्क वाली मिठाई खाने पर रोक है। बहुत सही बात, वक्ता उत्तर देते हैं — इसे खाना ही नहीं चाहिए। वर्क इस गलत तरीके से बन रहा है, बार-बार चमड़े की थैली में रखा जाता है; और उसके बाद जो इसे खाएगा, क्या उसे दोष नहीं लगेगा? वह भी गौ मांस में, भैंस के मांस में, भेड़ के मांस में।
एक श्रोता लिखता है कि उसके घर में वर्क लगी मिठाइयाँ खाने पर रोक है। बहुत सही बात, वक्ता कहते हैं। इसे खाना ही नहीं चाहिए। वर्क इस गलत तरीके से बन रहा है — बार-बार चमड़े की थैली के अंदर रखकर बनाया जा रहा है। उसके बाद जो इसे खाएगा, क्या उसे दोष नहीं लगेगा? और वह भी गौ मांस में, भैंसों के मांस में, भेड़ों के मांस में।
अपराजिता और कुंजिका स्तोत्र गुप्त क्यों रखे जाते हैं?
क्षमता सबमें नहीं, और बीज मंत्रों का उच्चारण सब नहीं कर सकते
वक्ता कहते हैं, केवल अपराजिता स्तोत्र ही नहीं, कुंजिका स्तोत्र भी, और बहुत सी शताक्षरी और बहुत से हृदय — इनमें से किसी पर वे वीडियो नहीं बनाते, सबको गुप्त रखते हैं। इसके पीछे कारण यह है कि वह काम करने की क्षमता सबमें नहीं होती। अगर वे पूरी विधि बताएँ, तो लोग वैसा नहीं करेंगे; आधा-अधूरा करेंगे और फिर परेशान होंगे — और वे नहीं चाहते कि उनके कारण कोई परेशान हो, किसी को भटकाना नहीं चाहते। अपराजिता में इतने बीज मंत्र हैं कि उनका उच्चारण सबसे नहीं निकलेगा।
पूछे जाने पर कि वे बार-बार अपराजिता स्तोत्र को गुप्त क्यों रखते हैं और उसकी उपासना विधि क्यों नहीं बताते, वक्ता कहते हैं कि केवल अपराजिता स्तोत्र ही नहीं, सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् भी। बहुत सी शताक्षरी, बहुत से हृदय — इनमें से किसी पर वे वीडियो नहीं बनाते; सबको गुप्त रखते हैं। इसके पीछे एक कारण है: वह काम करने की क्षमता सबमें नहीं होती। अगर वे पूरी विधि दे दें, तो लोग वैसा नहीं करेंगे; आधा-अधूरा करेंगे, और बाद में परेशान होंगे। और वे नहीं चाहते कि उनके कारण कोई परेशान हो; वे किसी को भटकाना नहीं चाहते। अपराजिता में इतने बीज मंत्र हैं कि उनका उच्चारण सबसे नहीं हो पाएगा।
अगर अपराजिता की साधना की जाए, तो घर के अपने देवताओं का क्या होता है?
ज़्यादातर घरों के देवता स्थापित पूर्वज हैं, ऊँची शक्तियाँ नहीं
अपराजिता करने के बाद उनके घर के देवताओं पर संकट आएगा — क्योंकि आजकल सबके घर के देवी-देवता ऊँचे स्तर की स्थापित शक्तियाँ नहीं हैं। बहुत से लोगों ने कुल के किसी पूर्वज को पितृ के रूप में घर में स्थापित किया है, देवता के रूप में बिठाया है; किसी घर में मरी माता पूजी जाती हैं, किसी में कोई और। अब अगर उनसे अपराजिता साधना करवाइए, तो व्यक्ति बस बैठकर रोएगा। इसीलिए वे ये सब बातें नहीं बता सकते।
अपराजिता करने के बाद उस व्यक्ति के घर के देवी-देवताओं पर संकट आएगा, वक्ता कहते हैं। क्योंकि आज के समय में सबके घर में जो देवी-देवता हैं, वे ऊँचे स्तर की शक्तियाँ नहीं हैं जो वहाँ जमकर स्थापित हों। बहुत से लोगों ने अपने कुल के किसी पूर्वज को पितृ के रूप में घर में स्थापित किया है, देवता के रूप में स्थापित किया है। किसी घर में मरी माता पूजी जाती हैं; किसी में कोई और पूजा जाता है। अब अगर ऐसे व्यक्ति से अपराजिता साधना करवाइए, तो व्यक्ति बस बैठकर रोएगा। इसीलिए ये बातें नहीं बताई जा सकतीं।
कुंजिका के साथ पचास शक्तियाँ आती हैं, और शुरुआती आनंद के बाद विपत्ति आती है
पचास शक्तियाँ आती हैं, और शुरुआती सुख के बाद विपत्ति
वक्ता कहते हैं, लोग कुंजिका करवाएँगे। कुंजिका करने से पचास शक्तियाँ आती हैं। शुरू में बहुत आनंद आएगा। कुछ दिन बाद घर में ऐसी विपत्तियाँ पड़ने लगेंगी, परेशानी इतनी बढ़ेगी, कि बाद में पूछेंगे कि हमसे क्या गलती हुई। और जो कहते हैं कि उन्हें कुछ नहीं हुआ, इतना किया, वे अपनी पूरी बात नहीं बताएँगे — उनके घर में साधना कैसे होती है, और कौन वहाँ साधनाएँ करता है, उनके घर में कौन सी देवी पूजी जाती हैं, क्या भोग देते हैं। बस कहेंगे कि दो साल से कर रहे हैं और कुछ नहीं हुआ। करने से पहले पूरा विषय समझना चाहिए।
लोग कुंजिका करवाएँगे, वक्ता कहते हैं। कुंजिका करने से पचास शक्तियाँ आती हैं। शुरू में बहुत आनंद आएगा। कुछ दिन बाद घर में ऐसी विपत्तियाँ पड़ने लगेंगी, परेशानी इतनी बढ़ जाएगी, कि बाद में कहेंगे — हमसे क्या गलती हो गई? और जो लोग कहते हैं कि हमें तो कुछ नहीं हुआ, हमने इतना किया, ऐसा क्यों — वे अपनी पूरी बात नहीं बताएँगे: उनके घर में साधना किस तरह होती है, उनके घर में कौन लोग साधनाएँ करते हैं, उनके घर में कौन सी देवी पूजी जाती हैं, वे क्या भोग देते हैं। वे बस कहेंगे: हम दो साल से कर रहे हैं और कुछ नहीं हुआ। और आप भी प्रेरित होकर बोल पड़ेंगे कि ठीक है, हम भी करते हैं। करने से पहले पूरा विषय समझना चाहिए। इसीलिए वे यह नहीं बताते — हालाँकि व्यक्तिगत रूप से, वे कहते हैं, वे ऐसे व्यक्ति से उसके घर के देवी-देवताओं के बारे में पूछकर सब बता देते हैं।
घर के मंदिर में पूजा ले रहे भूत-प्रेत को कैसे हटाया जाए?
उग्र देवताओं से जुड़ा हवन रूपी प्रयोग — और अपामार्ग की समिधा
वक्ता कहते हैं, जब भी ऐसा लगे — और उन्होंने दो वीडियो में स्पष्ट किया है कि भूत-प्रेत कैसे आते हैं और आप कैसे जान सकते हैं कि प्रेत-पिशाच ले रहे हैं — तो हमारी सनातन संस्कृति के उग्र देवताओं से जुड़ा हवन रूपी प्रयोग खास तौर पर करना चाहिए। और हवन रूपी प्रयोग में भी यह बात है कि किस तरह की चीज़ों का प्रयोग हो। जहाँ घर में विचार वाली परेशानी हो, वहाँ हवन में सबसे बड़ी चीज़ जो लगनी चाहिए वह अपामार्ग की लकड़ी है — अपामार्ग की समिधा।
फिर से पूछे जाने पर कि घर के मंदिर में पूजा जा रहा भूत-प्रेत कैसे हटाया जाए ताकि पूजा-पाठ घर के देवताओं तक पहुँचे, वक्ता कहते हैं कि वे इस पर अलग वीडियो बनाएँगे, पर संक्षेप में बताते हैं। जब भी आपको ऐसा लगे — और यह कैसे होता है, उन्होंने दो वीडियो में स्पष्ट किया है: भूत-प्रेत कैसे आते हैं, और आप कैसे जान सकते हैं कि प्रेत-पिशाच ले रहे हैं। अब, हमारी सनातन संस्कृति के सभी उग्र देवताओं में, उनसे जुड़ा हवन रूपी प्रयोग खास तौर पर करना चाहिए। और हवन रूपी प्रयोग में भी यह ध्यान रखने की बात है कि किस तरह की चीज़ों का प्रयोग होना चाहिए। जहाँ भी किसी घर में इस तरह की विचार वाली बातें होती हैं, वहाँ हवन में सबसे बड़ी चीज़ जो लगनी चाहिए वह अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी है — अपामार्ग की समिधा।
अस्त्र मंत्रों में अपामार्ग का प्रयोग किसलिए होता है?
अभिचार नाश के लिए सबसे समर्थ वनस्पति
वक्ता कहते हैं, यह जानिए: अभिचार के नाश के लिए जितने भी अस्त्र मंत्र हैं, जब भी उनका हवन होता है — कुछ नष्ट करने के लिए, किसी अभिचार को नष्ट करने के लिए — यह सामान्यतः घर में नहीं होता, इसकी अपनी विधि है; और इसमें अपामार्ग की समिधा अत्यंत आवश्यक वस्तु है। जब वे लोगों को अपामार्ग के बारे में बताते हैं तो लोग सोचते हैं यह कुछ खास नहीं; वे बात समझ नहीं रहे। पर यह बहुत बड़ी चीज़ है: अगर अभिचार नाश में कोई वनस्पति सबसे समर्थ है, तो वह अपामार्ग की लकड़ी है।
अभिचार के नाश के लिए जितने भी अस्त्र मंत्र हैं — यह बात जानिए, वक्ता कहते हैं। जितने भी अस्त्र मंत्र हैं, जब भी उनका हवन होता है, कुछ नष्ट करने के लिए, किसी अभिचार को नष्ट करने के लिए — घर में यह सामान्यतः नहीं होता; इसकी अपनी विधि है। इसमें अपामार्ग की समिधा अत्यंत आवश्यक वस्तु है। और जब वे अपामार्ग के बारे में बोलते हैं, लोगों को बताते हैं, तो सब सोचते हैं कि यह कुछ खास नहीं। आप बात समझ नहीं रहे, जान नहीं रहे। पर यह बहुत बड़ी चीज़ है। अगर कोई वनस्पति अभिचार के नाश में सबसे समर्थ है, तो वह अपामार्ग की लकड़ी है।
एक दिन किया और अगले दिन संदेश कि कुछ नहीं हुआ
एक दिन किया और अगले दिन संदेश कि कुछ नहीं हुआ
वक्ता कहते हैं, आप लोगों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि एक दिन करते हैं और अगले दिन संदेश आने लगते हैं — कुछ नहीं हुआ, परेशानी बढ़ गई। यह रोना छोड़िए। अगर आपके पास बहुत पैसा है तो किसी व्यक्ति को, किसी साधक को, किसी अच्छे आदमी को घर बुलाकर करवाइए। अगर सामर्थ्य नहीं है, तो खुद कीजिए। क्या होगा — लगता है मर जाएँगे? तो अगर भगवान का नाम लेते हुए मरें, तो उसमें भी कोई दिक्कत नहीं। यही डर जिसमें आप हैं, आपको मारता है; आप भगवान का नाम लेने से भी डरते हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि आपके भीतर धैर्य होना चाहिए, वक्ता कहते हैं। आप लोगों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत क्या है? आप एक दिन करते हैं, और अगले दिन उनके पास संदेश आने लगते हैं: भैया, कुछ नहीं हुआ, गुरु जी, कुछ नहीं हुआ, परेशानी बढ़ गई। यह रोने का धंधा छोड़िए। अगर आपके पास बहुत पैसा है, तो किसी व्यक्ति को, किसी साधक को, किसी अच्छे आदमी को घर बुलाकर करवाइए, और देखिए। अगर सामर्थ्य नहीं है, तो खुद कीजिए। क्या होगा? लगता है आप बस मर जाएँगे — तो अगर भगवान का नाम लेते हुए मरें, तो उसमें भी कोई दिक्कत नहीं। यह डर जिसमें आप हैं, यह डर आपको मारता है। आप भगवान का नाम लेने से भी डरते हैं।
अपराजिता ठीक से की जाए तो क्या कर सकती है, और गलत की जाए तो क्या?
महा वैष्णवी महाविद्या — और गलती करने वाले के लिए घातक
अपराजिता महा वैष्णवी महाविद्याओं की श्रेणी में आती हैं। अगर उनका पाठ ठीक से हो, तो भूत-प्रेत ने जो भी किया है उसकी स्थिति तक बिगड़ जाएगी; और भूत-प्रेत के साथ वहाँ क्या नहीं होगा — ऐसी पिटाई होगी कि वे जीवन में उस घर के पास नहीं आएँगे। पर अगर आप वही अपराजिता पाठ में गलत करें, उच्चारण में, मंत्रों आदि में गलती करें, तो वही अपराजिता आपके लिए घातक बन जाती हैं।
ऊपर एक भाई के इस प्रश्न को लेकर कि अपराजिता क्यों नहीं बताई जाती, वक्ता घर में पूजा ले रहे प्रेत-पिशाच का उदाहरण देते हैं। अपराजिता महा वैष्णवी महाविद्या की श्रेणी में आती हैं। अगर उनका पाठ उचित तरीके से हो, तो भूत-प्रेत ने जो भी किया है उसकी स्थिति तक बिगड़ जाएगी। और भूत-प्रेत के साथ — वहाँ क्या नहीं होगा? ऐसी पिटाई होगी कि वे जीवन में उस घर की ओर नहीं आएँगे। पर अगर आप वही अपराजिता पाठ में गलत करें, उच्चारण में, मंत्रों आदि में गलती करें, तो वही अपराजिता आपके लिए घातक बन जाती हैं।
क्या महाविद्याएँ वह पराशक्ति हैं जिन्हें किसी आलंबन की ज़रूरत नहीं?
आठ, दस और अठारह भुजाएँ भूलिए — क्या लोक देवता के लिए भी सामर्थ्य है?
एक श्रोता पूछता है कि क्या महाविद्याएँ वह पराशक्ति हैं जिन्हें आलंबन नहीं चाहिए, और अठारह भुजा, दस भुजा और आठ भुजा वाली देवियों के बारे में; वक्ता बस इतना कहते हैं: आपमें और मुझमें कितना सामर्थ्य है? क्या आपमें एक साधारण लोक देवी-देवता को भी प्रसन्न करने का सामर्थ्य है? आठ, अठारह, दस भुजाओं को अभी भूल जाइए। उनकी सेवा-पूजा से क्या मिलेगा, क्या हो सकता है और क्या नहीं, क्या बातें हैं — आप जिस स्थिति में हैं, उसमें देवता बदलने की जगह जिन पर आपका ध्यान है उनकी सेवा-पूजा ठीक से कीजिए, और साधना अच्छे से कीजिए। सारा आधार आपको पहले ही दिया जा चुका है; आप चिंतित क्यों हैं?
एक श्रोता पूछता है कि क्या महाविद्या वह पराशक्ति हैं जिन्हें आलंबन नहीं चाहिए, और अठारह भुजा वाली देवी, दस भुजा वाली, आठ भुजा वाली के बारे में। देखिए आपने कितना बड़ा प्रश्न रखा है, वक्ता कहते हैं — वे बस इतना कहेंगे। आपमें और मुझमें कितना सामर्थ्य है? क्या आप एक साधारण लोक देवी-देवता को भी प्रसन्न करने का सामर्थ्य रखते हैं? आठ, अठारह और दस भुजाओं को अभी भूल जाइए। उनकी सेवा-पूजा से क्या मिलेगा, क्या हो सकता है और क्या नहीं, क्या बातें हैं और क्या नहीं — अभी की स्थिति में अपना देवता बदलने की जगह, जिन पर आपका ध्यान है उनकी सेवा-पूजा उचित ढंग से कीजिए, साधना अच्छे से कीजिए। पूरा आधार आपको पहले ही दिया जा चुका है, पहले ही बताया जा चुका है। आप चिंतित क्यों हो रहे हैं? प्रेत-पिशाच का भी अपना प्रारब्ध होता है, और वह भी भोगकर ही कटता है।
साधक को अपनी साधना के भीतर मंत्र कैसे मिलता है?
अष्टमी से चतुर्दशी की भैरव साधना में मिला मंत्र
वक्ता एक श्रोता का अनुभव बताते हैं: सतपाल जी का एक मित्र, जो खुद तंत्र का अच्छा जानकार है, साधनाएँ करता है और भगतवाल का साधक भी है, अष्टमी से चतुर्दशी तक की बताई गई भैरव साधना कर रहा था; साधना के भीतर उसे एक मंत्र मिला, इस आदेश के साथ कि इसी मंत्र का जप करना है। उसने वॉइस रिकॉर्डिंग भेजी, और वक्ता ने उसे एक वीडियो लिंक भेजा जिसमें मंत्र और विधि के साथ पूरा उत्तर है। जब आप सबसे उग्र साधना करते हैं, या कोई रक्षा साधना, और उस स्थान के देवी-देवता प्रसन्न हो जाते हैं, तो आपको क्या चाहिए? आप निकलेंगे कैसे? वे खुद आपको देंगे — स्वप्न के ज़रिए, या ध्यान में, किसी न किसी माध्यम से वह मंत्र सुना देंगे।
सतपाल जी का बहुत अच्छा अनुभव रहा, वक्ता कहते हैं। उनका एक मित्र, जो खुद तंत्र का बहुत अच्छा जानकार है, साधनाएँ करता है और भगतवाल का साधक भी है, बताई गई भैरव साधना कर रहा था — अष्टमी से चतुर्दशी तक वाली। साधना के भीतर उसे एक मंत्र मिला। उसने कहा कि कोई जानकार व्यक्ति उसे इस मंत्र के बारे में बताए, और यह आदेश आया था कि इसी मंत्र का जप करना है। सतपाल जी ने उसकी वॉइस रिकॉर्डिंग भेजी, पूछते हुए कि यह क्या है। वक्ता ने उसे एक वीडियो का लिंक भेजा, कहते हुए: यह देखिए, इसे सुनिए — आपके प्रश्न का पूरा उत्तर इस वीडियो में है, मंत्र और विधि के साथ। आप सबसे उग्र साधना करते हैं, कोई रक्षा साधना करते हैं; जब उस स्थान के देवी-देवता प्रसन्न हो जाते हैं, तो आपको क्या चीज़ चाहिए? आप उससे निकलेंगे कैसे? वे आपको देंगे। स्वप्न के ज़रिए, ध्यान में रहते हुए, किसी न किसी माध्यम से वे वह मंत्र आपको सुना देंगे।
अगर बाद की पीढ़ियाँ किसी महाशक्ति की सेवा भूल जाएँ, तो क्या पूरे कुल को उनका कोप झेलना पड़ता है?
महाशक्ति परेशान नहीं करतीं — उनके गण करते हैं
वक्ता कहते हैं, इसमें सच्चाई है, पर एक भेद के साथ। अगर आप महाशक्ति की सेवा नहीं करते, तो महाशक्ति आपको परेशान करने नहीं आने वालीं। महाशक्ति यानी परम सत्ता के भीतर की प्रमुख शक्तियाँ; वे परेशान नहीं करेंगी। हम उनके भीतर हैं और वे हमारे भीतर; उन्हीं से हम चल रहे हैं। पर उनके गण परेशान करते हैं — लोक गण खास तौर पर परेशान करते हैं। वे प्रश्नकर्ता को इसी चैनल पर भगतवाल नाम से बनी प्लेलिस्ट की ओर भेजते हैं, जो पूरे प्रश्न का क्रम से उत्तर देती है: अगर किसी पर कृपा हो और बाद के लोग वह न करें तो क्या होता है, और पहले वाले भगत के मरने पर क्या करना चाहिए।
पूछे जाने पर कि जब किसी महाशक्ति को साधना और भक्ति से सिद्ध किया गया हो और उस भक्त के बाद की पीढ़ियाँ उनकी सेवा-पूजा भूल जाएँ, तो क्या पूरे कुल को उनका कोप झेलना पड़ता है, वक्ता प्रश्नकर्ता को इसी चैनल पर भगतवाल नाम से बनी प्लेलिस्ट की ओर भेजते हैं, जो पूरे प्रश्न का क्रम से उत्तर देती है — अगर किसी पर कृपा आए और बाद के लोग वह न करें तो क्या होता है, और पहले वाले भगत के मरने पर क्या करना चाहिए। इसमें सच्चाई है, वे कहते हैं। अगर आप महाशक्ति की सेवा नहीं करते, तो महाशक्ति आपको परेशान करने नहीं आने वालीं। महाशक्ति यानी परम सत्ता के भीतर जो प्रमुख शक्तियाँ हैं। वे परेशान नहीं करेंगी। हम उनके भीतर हैं, वे हमारे भीतर हैं, और उन्हीं से हम चल रहे हैं। पर जो उनके गण हैं — वही परेशान करते हैं। लोक गण खास तौर पर परेशान करते हैं।
क्या रत्न पहनने से पहले उस पर जप ज़रूरी है?
कोई भी रत्न पहनने से पहले बिल्कुल ज़रूरी
वक्ता कहते हैं, बिल्कुल ज़रूरी है। कोई भी रत्न पहनने से पहले यह बिल्कुल ज़रूरी है।
पूछे जाने पर कि क्या ग्रहों के रत्न पहनने से पहले उन पर जप ज़रूरी है, वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल ज़रूरी है। कोई भी रत्न पहनने से पहले यह बिल्कुल ज़रूरी है।
रावण के परिवार में से हनुमान जी ने किस-किस को हराया?
अक्षय कुमार मारा गया, मेघनाद, कुंभकर्ण और रावण पिटे
उन्होंने अक्षय कुमार को सीधे मार डाला। मेघनाद को भी पीटा था। कुंभकर्ण की भी पिटाई की। और रावण पर भी एक घूँसा जमाया — यानी उस पूरे कुल को पीटा।
हनुमान जी ने अक्षय कुमार को सीधे मार डाला, वक्ता कहते हैं। मेघनाद को भी पीटा था। कुंभकर्ण की भी पिटाई की। और रावण पर भी एक घूँसा जमाया। यानी इस पूरे कुल को पीटा।
रामचरितमानस मेघनाद के हनुमान जी से बचने के बारे में क्या कहता है?
बार-बार पचार हनुमाना, निकट न आव मरमू सो जाना
वक्ता कहते हैं, रामचरितमानस में वर्णन है कि हनुमान जी के घूँसे का मर्म जान लेने के बाद मेघनाद हमेशा उनके सामने खुद को हारा हुआ मानता था; हनुमान जी के बार-बार ललकारने पर भी वह उनके पास नहीं जाता था, और बड़ी सावधानी से उनसे दूर रहता था। पंक्ति है: "बार-बार पचार हनुमाना, निकट न आव मरमू सो जाना" — हनुमान जी उसे बार-बार आने की ललकार दे रहे हैं, और मेघनाद पास नहीं जा रहा।
कहा जाता है कि जब मेघनाद हनुमान जी को बाँधकर ले गया था, तो हनुमान जी उससे पहले ही उसे पीट चुके थे, वक्ता कहते हैं। तो जब युद्ध चल रहा था — मेघनाद पहले ही मूर्छित किया जा चुका था — लक्ष्मण जी को शक्ति लगने के आसपास, जब भी मेघनाद लड़ने जाता, हनुमान जी से भागता था। वह नहीं चाहता था कि हनुमान जी से जाकर लड़े। रामचरितमानस में इसका वर्णन आता है: कि हनुमान जी के घूँसे का मर्म जान लेने के बाद मेघनाद हमेशा उनके सामने खुद को हारा हुआ मानता था। हनुमान जी के बार-बार ललकारने पर भी वह उनके पास नहीं गया। बड़ी सावधानी से उसने खुद को उनसे कटा रखा। बार-बार पचार हनुमाना, निकट न आव मरमू सो जाना। हनुमान जी उसे बार-बार आने की ललकार दे रहे हैं, और मेघनाद पास नहीं जा रहा।
निकुंभिला सप्तशती क्या है?
शूलेन पाहि नो देवि के संपुट वाली सप्तशती
यह वही मेघनाद है जिसने देवी निकुंभिला की कृपा से इंद्र को बाँधा। जो सिद्ध कुंजिका और निकुंभिला शक्ति से जुड़ी सप्तशती की विधि पढ़ना चाहते हैं: "शूलेन पाहि नो देवि" के संपुट के साथ इसे निकुंभिला सप्तशती कहा जाता है। वक्ता कहते हैं, सोचिए — उसे वह सिद्धि थी, और ऐसी सिद्धि कि उसने इंद्र को बाँध लिया; और वह हनुमान जी से बचता फिरता है।
यह वही मेघनाद है जिसने देवी निकुंभिला की कृपा से इंद्र को बाँधा, वक्ता कहते हैं। जो सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् और निकुंभिला शक्ति से जुड़ी सप्तशती की विधि पढ़ना चाहते हैं — शूलेन पाहि नो देवि के संपुट के साथ इसे निकुंभिला सप्तशती कहा जाता है। सोचिए: वह सिद्धि उसे प्राप्त थी। और ऐसी सिद्धि कि उसने इंद्र को बाँध लिया। और वह हनुमान जी से खुद को काटकर घूमता है — कि उनसे लड़ना नहीं है। और उन्हीं हनुमान जी को आप लोग इतना कमतर बताते हैं, कहते हैं कि यह मुस्लिम तंत्र है, यहाँ हनुमान जी शायद ही काम करें, हनुमान जी भाग जाएँगे। और यहाँ इन लोगों का बाप मेघनाद हनुमान जी से भागता फिरता है।
रत्न पहनने से पहले क्या जाँचना चाहिए?
ग्रह अस्त न हो, और वज़न सवा के हिसाब से
शुक्र का उदाहरण लीजिए: अगर आप शुक्र का रत्न, हीरा — या उसका उपरत्न, ज़िरकॉन — पहनने वाले हैं, तो सबसे पहले ध्यान दीजिए कि शुक्र अस्त न हो। पंडित जी से पूछिए कि क्या शुक्र अस्त चल रहा है; अगर अस्त है, तो पहनने का कोई असर नहीं होगा। शुक्र उदित होना चाहिए। और अपने वज़न के अनुसार: अगर आप 70 किलो हैं तो सवा सात रत्ती या उससे ज़्यादा; अगर सवा में, सवैया में बनवाना है, तो सवा सात रत्ती, सवा छह रत्ती — क्योंकि हमारे यहाँ सवा शुभ माना जाता है।
रत्न पहनने से पहले, आप जो भी रत्न पहनने जा रहे हों, वक्ता कहते हैं — एक उदाहरण लीजिए: आप शुक्र का रत्न, हीरा पहनने जा रहे हैं। हीरा नहीं, तो मान लीजिए उसका उपरत्न, ज़िरकॉन पहनना है। तो शुक्र अस्त नहीं होना चाहिए — सबसे पहले यह ध्यान दीजिए। पंडित जी से पूछिए कि क्या शुक्र अस्त चल रहा है। अगर शुक्र अस्त है, तो पहनने का कोई असर नहीं। शुक्र उदित होना चाहिए। और अपने वज़न के अनुसार: अगर आप 70 किलो हैं, तो सवा सात रत्ती या उससे ज़्यादा। अगर सवा में, सवैया में बनवाना है, तो सवा सात रत्ती, सवा छह रत्ती। हमारे यहाँ सवा शुभ माना जाता है, वे कहते हैं — और इसी संदर्भ में टिप्पणी करते हैं कि जहाँ किसी ने ₹449 भेजे थे, वहाँ ₹451 देने चाहिए, क्योंकि हमारे यहाँ एक रुपये की महिमा बड़ी है और वह शुभ माना जाता है; कम करना हो तो ₹441 कीजिए। पर एक रुपया कम का, 99 का धंधा हमारे लिए ठीक नहीं; वह जियो रिचार्ज है, यह नहीं।
शुक्र का रत्न किस दिन और किस पक्ष में सिद्ध किया जाए?
दानव गुरु के लिए कृष्ण पक्ष का शुक्रवार, देव गुरु के लिए शुक्ल पक्ष
शुक्रवार को, और सबसे पहले कृष्ण पक्ष का शुक्रवार। अगर देवता से जुड़ा ग्रह होता तो अलग होता: बृहस्पति देव गुरु हैं, उनका शुक्ल पक्ष में पड़ता है; शुक्राचार्य दानव गुरु हैं, उनका कृष्ण पक्ष में पड़ता है। कृष्ण पक्ष के शुक्रवार को, ठीक उस समय जब शुक्र उदित हो, पंचगव्य और पंचामृत से विधिवत उनका अभिषेक कीजिए — पूरा अवतरण संभव नहीं होगा, पर कम से कम अभिषेक कीजिए — और करके फिर शुद्ध गंगाजल से अभिषेक कीजिए। चौघड़िया पूजन के समय नहीं, पहनने के समय देखना है।
वक्ता कहते हैं, विधि का तीसरा भाग यह है कि यह शुक्रवार को होना चाहिए, और सबसे पहले कृष्ण पक्ष का शुक्रवार। अगर देवता से जुड़ा ग्रह होता तो अलग होता — बृहस्पति देव गुरु हैं, और उनका शुक्ल पक्ष में पड़ता है। यह दानव गुरु, शुक्राचार्य हैं; उनका कृष्ण पक्ष में पड़ता है। कृष्ण पक्ष के शुक्रवार को, ठीक उस समय जब शुक्र उदित हो, पंचगव्य से और पंचामृत से विधिवत उनका अभिषेक कीजिए। अवतरण आदि आप उस हद तक नहीं कर पाएँगे, पर कम से कम अभिषेक होना चाहिए। अभिषेक करके फिर शुद्ध गंगाजल से अभिषेक कीजिए। और समय भी देखना चाहिए — चौघड़िया देखना चाहिए। हालाँकि पूजन के समय चौघड़िया देखने की ज़रूरत नहीं; पहनने के समय, जब आप उसे पहनेंगे, तब चौघड़िया देखना होता है।
शुक्र के रत्न की पूरी तंत्रोक्त विधि क्या है, और जप संख्या कितनी?
शुक्र यंत्र, कलश स्थान पर अंगूठी, और कलियुग में चौगुना जप
अगर पूरी तंत्रोक्त विधि में जाएँ: शुक्र का तंत्रोक्त यंत्र बनाइए, और मूल में, जहाँ शुक्र के नाम का कलश स्थापित है, वहाँ अंगूठी स्थापित कीजिए; और फिर शुक्र का जितना जप है, कलियुग में उसका चार गुना जप करना चाहिए। इतना विस्तार न भी करें, तो कम से कम 8,000 या 9,000 जप ज़रूर करना चाहिए; शुक्र के लिए कम से कम 6,000 जप ज़रूर करना चाहिए।
और उसके बाद, अगर आप उसकी पूरी तंत्रोक्त विधि में जाएँ, वक्ता कहते हैं, तो शुक्र का तंत्रोक्त यंत्र बनाइए। मूल में, जहाँ शुक्र के नाम का कलश स्थापित है, उस जगह अंगूठी स्थापित कीजिए। और फिर, शुक्र का जितना जप है, कलियुग में उसका चार गुना जप करना चाहिए। इतना विस्तार कुछ न भी करें, तो कम से कम न्यूनतम 8,000 जप, या 9,000 जप, ज़रूर करना चाहिए। शुक्र होने के कारण, कम से कम 6,000 जप ज़रूर करना चाहिए।
अगर वह जप संभव न हो तो कम से कम क्या करना चाहिए?
नवग्रह स्तोत्र का पौराणिक मंत्र, एक सप्ताह रोज़ 108 बार
तो पौराणिक मंत्र लीजिए — नवग्रह स्तोत्र वाला, जिसकी हम स्तुति करते हैं — और एक सप्ताह रोज़ कम से कम 108 बार उसका जप कीजिए। और अगले सप्ताह भी देखना है कि पहनने के समय शुक्रवार कृष्ण पक्ष में पड़ रहा हो, और चौघड़िया शुभ हो; तब आप सुबह पहन सकते हैं। नहीं तो शाम को भी, जब शुक्र उदित हो — अगर वह एक तारा दिख रहा हो तो और भी अच्छा। यंत्र का काम भले न हो, पर पत्थर को सामने रखकर जप ज़रूर करना चाहिए।
और अगर आप वह भी न कर सकें, वक्ता कहते हैं, तो पौराणिक मंत्र है — नवग्रह स्तोत्र वाला, जिसकी हम स्तुति करते हैं। एक सप्ताह रोज़ कम से कम 108 बार उसका जप करना चाहिए। और अगले सप्ताह भी देखना है कि पहनने के समय शुक्रवार कृष्ण पक्ष में पड़ रहा हो, और चौघड़िया शुभ हो; तब सुबह उस समय आप पहन सकते हैं। नहीं तो शाम को भी, जब शुक्र उदित हो — अगर वह एक तारा जो दिखता है वह हो, तो और भी अच्छा — उस समय शाम को आप पहन सकते हैं। इतना करना चाहिए। यंत्र का काम संभव न भी हो, तो कम से कम जप ज़रूर होना चाहिए। यंत्र का विधान अलग बात हो जाती है; पर उसे सामने रखकर जप ज़रूर करना चाहिए।
क्या सात्विक अनुष्ठान के दौरान घर के खाने में प्याज़-लहसुन चल सकता है?
नहीं चलता — सब्ज़ी छोड़िए और दूध-रोटी खाइए
वक्ता कहते हैं, नहीं चलता। पर अगर घर के लोग नहीं मान रहे, तो एक काम कर सकते हैं: जितने दिन साधना चले, सब्ज़ी छोड़ दीजिए। दूध और रोटी खाइए। घर वाले रोटी तो बनाएँगे ही; दूध, गाय का दूध लाइए, और उसके साथ दूध-रोटी लीजिए।
एक श्रोता कहता है कि वह साधना के दौरान नॉन-वेज नहीं खाता, पर घर में बनी सब्ज़ी में प्याज़ और लहसुन डाला जाता है, और पूछता है कि क्या सात्विक साधना में, साधना के अनुष्ठान में यह चलता है। चलता तो नहीं, वक्ता कहते हैं। पर अगर घर के लोग नहीं मान रहे, तो एक काम कर सकते हैं: जितने दिन साधना चले, उतने दिन सब्ज़ी छोड़ दीजिए। दूध और रोटी खाइए। अगर संभव हो — घर वाले रोटी तो बनाएँगे ही। उसके साथ दूध लाइए, गाय का दूध, और दूध-रोटी खाइए।
पूजा या जप के लिए बैठते ही रोना क्यों आता है?
यह आपका भाव और उनकी कृपा है
वक्ता कहते हैं, ये आपके भाव हैं। अगर आप अपने आराध्य के प्रति समर्पित हैं, तो आँसू आएँगे। यह अच्छी बात है। इसे इस तरह कहने की ज़रूरत नहीं कि रोना क्यों आता है — यह उनकी कृपा है कि आप उनके सामने रोते हैं। जहाँ समर्पण का भाव हो, वहाँ आँसू बार-बार आएँगे। नहीं तो यहाँ बड़े-बड़े लोग साधना करते हैं और फिर भी अपने इष्ट और आराध्य को देखकर कभी आँसू नहीं आते।
एक श्रोता लिखती हैं कि जब भी वे पूजा या जप करने बैठती हैं, उन्हें बहुत रोना आता है, और वे माता के सामने और बाबा के सामने बहुत मन भरकर रोती हैं, और पूछती हैं कि ऐसा क्यों होता है। ये आपके भाव हैं, वक्ता उत्तर देते हैं। अगर आप अपने आराध्य के प्रति समर्पित हैं, तो आँसू आएँगे। यह अच्छी बात है। इस बात को इस तरह कहने की ज़रूरत नहीं कि रोना क्यों आता है। यह उनकी कृपा है कि आप उनके सामने रोती हैं। जहाँ समर्पण का भाव रहता है, वहाँ आँसू बार-बार आएँगे। नहीं तो यहाँ बड़े-बड़े लोग साधना करते हैं, और फिर भी अपने इष्ट और आराध्य को देखकर कभी आँसू नहीं आते।
क्या दीपक के लिए कोल्ड-प्रेस्ड तिल का तेल ठीक है?
वे यह शब्द नहीं जानते — सामने निकला तेल, और कोई केमिकल नहीं
वक्ता साफ कहते हैं कि वे नहीं जानते कोल्ड-प्रेस्ड क्या है, तो बताएँ कैसे। वे इतना जानते हैं कि तेल निकालने की एक मशीन होती है और उसे सामने निकलवाकर लिया जाता है; उनके साधक मित्र माँगने पर उन्हें निकाला हुआ तेल भेज देते हैं। कोल्ड-प्रेस्ड और हॉट-प्रेस्ड क्या हैं, वे नहीं जानते — वे इतने पढ़े-लिखे नहीं। वे श्रोता से कहते हैं कि एक बार प्रक्रिया बताइए ताकि वे देख सकें; बस किसी केमिकल का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
पूछे जाने पर कि क्या दीपक के लिए कोल्ड-प्रेस्ड तिल का तेल ठीक है, वक्ता कहते हैं कि उन्हें यह भी नहीं पता कि कोल्ड-प्रेस्ड क्या होता है, तो वे कहाँ से बताएँगे। वे बस इतना जानते हैं: कि तेल निकालने की एक मशीन होती है, और उसे सामने निकलवाकर लिया जाता है। उनके साधक मित्र हैं; वे उन्हें फ़ोन करते हैं कि निकाला हुआ तेल चाहिए, और वे निकाला हुआ तेल भेज देते हैं। यह कोल्ड-प्रेस्ड और हॉट-प्रेस्ड क्या है, वे नहीं जानते — वे इतने पढ़े-लिखे नहीं। तो वे क्षमा माँगते हैं, और कहते हैं कि वे एक बार इस पर बात करेंगे; प्रक्रिया बताइए, वे देखेंगे। बस किसी केमिकल का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
क्या भैरव जी के त्रिशूल पर मिट्टी का नींबू लगाया जा सकता है?
असली नींबू लगाइए, हफ्ते में एक बार बदलिए — या गेंदा
वक्ता इसे मना करते हैं। मिट्टी का नींबू कहाँ से, वे पूछते हैं — असली चढ़ाइए; क्या नींबू की कोई कमी है? नींबू रोज़-रोज़ नहीं बदलना है; हफ्ते में एक दिन कम से कम एक नींबू उसमें लगाइए। और अगर नींबू न मिले, तो नींबू के अभाव में कम से कम गेंदे का फूल लगाइए, जो ज़रूर मिल जाएगा।
भैरव जी के त्रिशूल पर मिट्टी के नींबू के बारे में पूछे जाने पर वक्ता इसे खारिज करते हैं: मिट्टी का नींबू कहाँ से — उन्हें डर है कि कोई अमीर आदमी एक दिन पूछेगा कि क्या सोने का नींबू चढ़ा दें। कहाँ है? असली चढ़ाइए। असली नींबू चढ़ाने में क्या है; क्या नींबू की कमी है? और नींबू रोज़-रोज़ नहीं बदलना है। हफ्ते में एक दिन, कम से कम एक नींबू उसमें लगाइए। और अगर नींबू न मिले, तो नींबू के अभाव में कम से कम गेंदे का फूल उसमें लगाइए — वह मिल जाएगा।
स्त्री दोष क्या है?
पिछले जन्म में सताई गई स्त्री का शाप
स्त्री दोष वह है जो कुंडली में तब बनता है जब, कहा जाता है, पिछले जन्म में हमने अपनी पत्नी, अपनी माँ, अपनी बहन को दुख दिया; उनके दिल से जो आह निकलती है, दुखी स्त्री जो शाप देती है — वही अगले जन्म में फल देता है।
पूछे जाने पर कि स्त्री दोष क्या है, वक्ता कहते हैं कि अगर कुंडली में बन रहा है तो वह स्त्री दोष है। कहा जाता है कि अगर पिछले जन्म में हमने अपनी पत्नी को, अपनी माँ को, अपनी बहन को दुख दिया — तो उनके दिल से जो आह निकलती है, दुखी स्त्री जो शाप देती है, वही अगले जन्म में फलित होता है।
पंचमुखी हनुमान कवच साधना और हवन से पहले क्या जानना चाहिए?
बहुत उग्र मूल मंत्र, और उसके बाद आने वाली परीक्षा
वक्ता साफ कहते हैं: मंत्र बहुत उग्र है। और जितनी उग्रता है, उतनी परीक्षा की भी अपेक्षा रखिए। सबसे बड़ी बात यह है कि लोग डर जाते हैं। वे साधना माँगते हैं और वक्ता डाल देते हैं; बाद में ऐसे अनुभव आते हैं कि वे खुद हँसते हैं। साधना के पहले दिन वे डर जाएँगे — पर डरना नहीं है। पंचमुखी हनुमान का मूल मंत्र अत्यंत उग्र है।
पंचमुखी हनुमान की कवच साधना और हवन विधान पूछे जाने पर वक्ता बताने को मान जाते हैं, और सबसे बड़ी बात साफ कहते हैं: मंत्र बहुत उग्र है। और जितनी उग्रता है, मान लीजिए उतनी परीक्षा भी होगी। सबसे बड़ी बात यह है कि लोग डर जाते हैं। वे साधना माँगते हैं और वक्ता उसे डाल देते हैं; उसके बाद ऐसे अनुभव आते हैं कि वे खुद हँसते हैं — साधना के पहले दिन वे डर जाएँगे। एकदम से डरना नहीं है। वे यह साधना भी बताएँगे; पर पंचमुखी हनुमान का मूल मंत्र अत्यंत उग्र है।
पंचमुखी हनुमान की पूजा में गलती हो जाए तो क्या होता है?
वीर गण नींद में लात मारने में देर नहीं करते
वक्ता कहते हैं, यह भी जानिए: हनुमान जी मारते भी हैं। अगर आप पंचमुखी हनुमान की पूजा में ज़रा भी गलती करते हैं, चाहे आप केवल कवच साधना कर रहे हों, तो पंचमुखी हनुमान के वीर गण नींद में आप पर लात-घूँसे बरसाने में देर नहीं करते। और फिर डर के मारे अगले दिन सोचते हैं कि घर में प्रेत है, उसने मुझे मारा, ऐसा हो गया — यह सारा डर नहीं खाना है।
तो हनुमान जी मारते भी हैं — यह भी जानिए, वक्ता कहते हैं। अगर पंचमुखी हनुमान की पूजा में आपने ज़रा सी भी गलती की है, चाहे आप कवच साधना कर रहे हों — अगर गलती होती है, तो उसके बाद पंचमुखी हनुमान के वीर गण नींद में आप पर लात-घूँसे बरसाने में देर नहीं करते। और फिर डर के मारे, अगले दिन: घर में कोई प्रेत है, उसने मुझे मारा, ऐसा हो गया। यह सारा डर नहीं खाना है।
पंचमुखी हनुमान के जप के साथ क्या करना चाहिए?
पहले राम रक्षा स्तोत्र सिद्ध करें, कम से कम 108 पाठ
साथ में राम नाम का जप या राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करना होगा। पंचमुखी हनुमान के जप से पहले अगर आप राम रक्षा स्तोत्र सिद्ध कर लें तो अच्छा होगा — कम से कम 108 पाठ कीजिए। इससे बहुत मदद मिलेगी; ऊर्जा का स्तर बना रहेगा, संतुलन रहेगा, भले कोई गलती हो जाए।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, यह है कि इसके साथ राम नाम का जप या रामरक्षा स्तोत्रम् का पाठ करना होगा। पंचमुखी हनुमान के जप से पहले अगर आप राम रक्षा स्तोत्र सिद्ध कर लें तो अच्छा होगा — उसके कम से कम 108 पाठ कीजिए। इससे बहुत मदद मिलेगी। ऊर्जा का स्तर बना रहेगा। संतुलन रहेगा — भले कोई गलती हो जाए।
जब पूजा बँधी हो, तो भगवान प्रार्थना कैसे सुनेंगे?
भगवान और देवता एक नहीं — देवता एक योनि है
वक्ता कहते हैं, इस पर ध्यान दीजिए: भगवान और देवता में अंतर है। देवता एक योनि है, और भगवान परम महाशक्ति, परम सत्ता हैं। जैसे मनुष्य एक योनि है और पशु एक योनि है, वैसे ही देवता भी एक भोग योनि है। केवल मनुष्य कर्म योनि है: यहाँ आप जो कर्म करते हैं, और उसका जो फल आता है, वह तय करता है कि अगली कौन सी योनि मिलेगी। नीच कर्म कीजिए, गलत काम कीजिए, तो निचली योनियों में जाएँगे — पशु, पक्षी, जड़, चेतन; ऊँचे कर्म कीजिए तो यक्ष, किन्नर, गंधर्व, देवता में जाएँगे। ये योनियाँ हैं; भगवान नहीं। भगवान भगवान हैं — आदि, अविनाशी, जिनका न कोई रूप है न आकार, हालाँकि वे हमारे लिए साकार रूप में आए।
यह बहुत अच्छा प्रश्न है, वक्ता कहते हैं, क्योंकि उन्होंने इस सब पर वीडियो बनाए हैं: कि हम जो भी मंत्र जप कर रहे हैं, या जो भी पाठ और पूजा कर रहे हैं, वह भगवान तक नहीं पहुँच रहा। यहाँ इस बात पर ध्यान दीजिए। भगवान और देवता में अंतर है। देवता एक योनि है। और भगवान परम महाशक्ति हैं; वे परम सत्ता हैं। जैसे मनुष्य एक योनि है और पशु एक योनि है, वैसे ही देवता भी एक भोग योनि है। केवल मनुष्य ऐसी योनि है जो कर्मयोनि है। यहाँ आप जो कर्म करते हैं और जो फल मिलता है, वह तय करता है कि आपको अगली कौन सी योनि मिलेगी। अगर आप नीच कर्म करेंगे, गलत काम करेंगे, तो निचली योनियों में जाएँगे — पशु, पक्षी, जड़, चेतन, इन सब में। और अगर ऊँचे कर्म करेंगे, तो यक्ष, किन्नर, गंधर्व, देवता, इन सब योनियों में जाएँगे। तो जानिए कि ये दो तरह के हैं, कि ये योनियाँ हैं — भगवान नहीं। भगवान भगवान हैं। वे आदि और अविनाशी हैं; उनका न कोई रूप है, न आकार; पर वे हमारे लिए साकार रूप में आए।
वर्तमान दुख के पीछे किसका कर्म है, और किस उम्र से गिना जाता है?
बारह वर्ष तक कुछ दर्ज नहीं होता — सिलेबस से बाहर
वक्ता कहते हैं, प्रश्न उस जगह गलत है — वह भगवान तक पहुँच रहा है। पर अभी हम जो भोग रहे हैं, जो दुख मिल रहा है, उसके पीछे हमारे पहले के कर्म हैं। और पहले के कर्म का मतलब ज़रूरी नहीं कि पाँच साल पहले या बचपन में किया हुआ। बारह वर्ष की उम्र तक हम जो भी करते हैं उसका कोई हिसाब ही नहीं रखा जाता — वह हिसाब से बाहर की चीज़ है, सिलेबस से बाहर। भगवान चित्रगुप्त उसे कहीं नहीं लिखते; कहते हैं, वह बच्चा है, बालक है। इसके पीछे माण्डव्य ऋषि की कथा है। पर तेरह वर्ष की उम्र से, बाकी जीवन में हम जो अच्छे-बुरे काम करते हैं, उनका हिसाब रखा जाता है।
तो यह कहना कि यह भगवान तक नहीं पहुँच रहा — इस जगह प्रश्न गलत हो जाता है, वक्ता कहते हैं। यह भगवान तक पहुँच रहा है। पर अभी हम जो भोग रहे हैं, जो दुख हमें मिल रहा है, उसके पीछे हमारे पहले के कर्म हैं। अब पहले के कर्म में यह ज़रूरी नहीं — वे पहले ही बता देते हैं — कभी ज़रूरी नहीं कि आपने पाँच साल पहले किया, या बचपन में कुछ किया, और वही भोग रहे हैं। बारह वर्ष की उम्र तक हम जो भी करते हैं, उसका कोई भी हिसाब नहीं रखा जाता। वह हिसाब से बाहर की चीज़ है, सिलेबस से बाहर। भगवान चित्रगुप्त उसे कहीं नहीं लिखते; वे कहते हैं, यह बच्चा है, यह बालक है। इसके पीछे माण्डव्य ऋषि की कथा है। पर तेरह वर्ष की उम्र से आगे, बाकी जीवन में हम जो भी अच्छे-बुरे काम करते हैं, उनका हिसाब रखा जाता है।
जब हमें अपना कोई पाप याद नहीं, तब भी दुख क्यों आता है?
विशेष समय में कई गुना हुआ पुण्य भी भोगना पड़ता है, और पाप अपनी बारी से पकता है
वक्ता कहते हैं, इसे ऐसे समझिए। आप ग्रहण के समय जप करते हैं; कहा जाता है कि ग्रहण के समय किसी भी मंत्र का जप हज़ार गुना फल देता है। इसी तरह, किसी भी जन्म में और किसी भी समय, जब आप किसी विशेष समय पर कोई पुण्य काम करते हैं — तीर्थ यात्रा में जप करना, ग्रहण के समय करना, नदी किनारे, एकलिंग शिवालय में — तो आपका पुण्य बहुत बढ़ जाता है। अब बढ़ गया, तो उसे भोगना भी पड़ता है। तो आपको मनुष्य योनि मिली, आपका पुण्य कर्म उदय में है, जीवन में सुख है। और आपने कभी पाप भी किया है। हम जो पहले करते हैं वह खत्म होता है, उसका पुण्य खत्म होता है; फिर कुछ समय पाप चलता है; वह खत्म होता है, फिर पुण्य चलता है। जब पाप उदय होता है, जब उसके फल के उदय का समय आता है, तभी जीवन में परेशानियाँ आती हैं।
अब एक बात समझिए, वक्ता कहते हैं: आप कहते हैं हमने पुण्य काम किए; और जिस समय हमने अपराध किया, हमें याद भी नहीं कि क्या अपराध किया, क्या दुख दिया — पर अब हमें भोगना पड़ रहा है। इसके पीछे कारण क्या है? कारण इस तरह समझिए। आप ग्रहण के समय जप करते हैं। कहा गया है कि ग्रहण के समय किसी भी मंत्र का जप आपको हज़ार गुना फल देता है। उसी तरह, किसी भी जन्म में और किसी भी समय, जब आप किसी विशेष समय पर पुण्य काम करते हैं — तीर्थ यात्रा में रहते हुए जप करना, ग्रहण के समय करना, नदी किनारे करना, एकलिंग शिवालय में करना — तो आपका पुण्य बहुत बढ़ जाता है। अब यह बढ़ गया, तो इसे भोगना भी पड़ेगा। आपको मनुष्य योनि मिली; आपका पुण्य कर्म उदय में है, और आपके जीवन में सुख है। अब, किसी समय आपने पाप भी किया है। हम जो कर्म पहले करते हैं वह खत्म होता है, उसका पुण्य खत्म होता है, और फिर कुछ समय पाप चलता है; वह खत्म होता है, फिर पुण्य चलता है। तो जब पाप उदय होता है, जब उस पाप के फल के उदय का समय आता है, तब जीवन में परेशानियाँ आती हैं। उसी समय सारी परेशानियाँ आती हैं।
इसका उत्तर गीता के चौथे से सातवें अध्याय में है, हिंदी में पढ़िए
गीता के चौथे से सातवें अध्याय, हिंदी में
वक्ता कहते हैं, आपके प्रश्न का उत्तर भगवद गीता में बहुत अच्छे से मिलेगा। गीता के कर्म योग और भक्ति योग, ये दो अध्याय एक बार पढ़िए; चौथे अध्याय से सातवें तक। ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग, ये तीन-चार चीज़ें हिंदी में पढ़िए — संस्कृत में मत जाइए; उन्होंने समझने के लिए पढ़ने को कहा है। आपके पूरे प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा।
और जब परेशानी आती है, तब हम भगवान की ओर जाते हैं, भगवान के नाम का जप करते हैं, उन्हें याद करते हैं — पर कहीं न कहीं यह व्यवस्था भगवान ने ही बनाई है, वक्ता कहते हैं। आपके प्रश्न का उत्तर श्रीमद्भगवद्गीता में बहुत अच्छे से मिलेगा। एक बार पढ़िए, मिल जाएगा। भगवद गीता में जो कर्म योग और भक्ति योग, ये दो अध्याय हैं, उन्हें एक बार पढ़िए। चौथे अध्याय से सातवें तक। ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग — ये तीन, ये चार चीज़ें — हिंदी में पढ़िए; संस्कृत में मत जाइए। उन्होंने समझने के लिए पढ़ने को कहा है। आपके पूरे प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा।
क्या भगवान नहीं, बल्कि देवताओं तक पहुँचना रोका जा सकता है?
तंत्र विद्या से बँधा देवता अलग विषय है
वक्ता कहते हैं, ऐसा कभी नहीं होता कि हम जो पूजन-पाठ करते हैं वह भगवान तक नहीं पहुँच रहा — सब चीज़ें उनकी दृष्टि में हैं। देवताओं तक नहीं पहुँच रहा, यह तंत्र का विषय है; देवता मदद करने में असमर्थ हो रहे हैं, कि उन्हें तंत्र विद्या से बाँध दिया गया है, यह अलग विषय है। भगवान तक बिल्कुल पहुँच रहा है, और उन्हें हमारे साथ जो हो रहा है और जो होगा, सबका ज्ञान है। और कृपा वही करते हैं, जब इसका भी समय आता है।
तो ऐसा कभी नहीं होता कि हम जो पूजन और पाठ कर रहे हैं वह भगवान तक नहीं पहुँच रहा, वक्ता कहते हैं। सब चीज़ें उनकी दृष्टि में हैं। देवताओं तक नहीं पहुँच रहा — यह तंत्र का विषय है। देवता मदद करने में असमर्थ हो रहे हैं, कि उन्हें तंत्र विद्या से बाँध दिया गया है, यह अलग विषय है। भगवान तक बिल्कुल पहुँच रहा है। उन्हें सबका ज्ञान है: हमारे साथ क्या हो रहा है और क्या होगा। और कृपा वही करते हैं, जब इसका भी समय आता है।
भगवान सुनते हैं या नहीं, यह पूछने की जगह क्या पूछना चाहिए?
पूछिए कि देवता पर लगा तंत्र बंधन कैसे टूटे
ऐसा नहीं कि दस दिन किया और परेशानी नहीं गई तो करना छोड़ देंगे। कहीं न कहीं हमारे पाप कर्म उदय हुए हैं और हम उनका फल भोग रहे हैं, और उसका भी एक समय है; जब वह भी खत्म होता है, हमारे पुण्य उदय होते हैं और हम आगे बढ़ते हैं — और उसके लिए भी कृपा भगवान ही करते हैं। तो यह मत सोचिए कि भगवान तक नहीं पहुँचेगा। इसकी जगह पूछिए: देवता पर तंत्र में बंधन है, वह कैसे टूटेगा, कैसे हटाया जाए — वह वे बताएँगे।
ऐसा नहीं है कि अगर हमने दस दिन किया और परेशानी नहीं गई, तो करना छोड़ देंगे, वक्ता कहते हैं। कहीं न कहीं हमारे पाप कर्म उदय हुए हैं और हम उनका फल भोग रहे हैं; उसका भी अपना समय है। जब वह भी खत्म होता है, हमारे पुण्य उदय होते हैं और हम आगे बढ़ते हैं। और उसके लिए भी कृपा भगवान ही करते हैं। तो यह बात नहीं सोचनी है कि यह भगवान तक नहीं पहुँचेगा। इसकी जगह यह पूछिए: देवता पर तंत्र में बंधन है — वह कैसे टूटेगा, कैसे हटाया जाए? वह, वे कहते हैं, वे बताएँगे। भगवती ने जो बुद्धि दी है और विषय का जो ज्ञान दिया है, उससे वे आपको बताएँगे: यह काम कीजिए, आपको फल मिलेगा।
जब शुद्ध मिठाई न मिले तो क्या चढ़ाया जा सकता है?
काजू, बादाम और किशमिश
एक श्रोता कहता है कि शुद्ध मिठाई नहीं मिलती, वह अमूल की कोई मिठाई खरीदता है, और भोग में ज़्यादातर काजू, बादाम और किशमिश चढ़ाता है। यह बहुत अच्छी बात है, वक्ता उत्तर देते हैं। और यह बताए जाने पर कि यह सब — पैकेट में बिस्किट, और वर्क — मंदिरों में ही चल रहा है, वे मानते हैं कि मंदिरों में भी लोग चांदी का वर्क चढ़ा रहे हैं।
एक श्रोता लिखता है कि पैकेट में बिस्किट चढ़ाए जा रहे हैं, कि शुद्ध मिठाई नहीं मिलती, वह अमूल की कोई मिठाई खरीदता है, और भोग में ज़्यादातर काजू, बादाम और किशमिश चढ़ाता है। आजकल सब कुछ चढ़ाया जा रहा है, वक्ता कहते हैं; और काजू, बादाम और किशमिश चढ़ाना बहुत अच्छी बात है। श्रोता पूछता है कि जब यह मंदिर में ही चल रहा हो तो क्या करें, और क्या मूर्ति छूने से भी दोष लगेगा। आपका प्रश्न, वक्ता कहते हैं, शायद यह है — कि मंदिर में ही लोग वर्क चढ़ा रहे हैं, चांदी वाला। और अगर इसकी जानकारी ही न हो, तो कोई क्या करेगा?
मेहंदीपुर में तंत्र क्यों नहीं कटता?
लिया गया संकल्प जो कभी पूरा नहीं हुआ
वक्ता कहते हैं, क्यों नहीं कटा, इसके पीछे कारण है। लोग मेहंदीपुर जाते हैं, संकल्प लेते हैं, और फिर उसके लिए कुछ नहीं करते — और वे आपको आकर बताने वाले नहीं कि संकल्प पूरा नहीं कर पाए। यहाँ एक आदमी ने दस साल गलत काम किए; चरस-गांजा पिया, शराब पी, घर वालों की नहीं सुनी, देवी-देवताओं पर ध्यान नहीं दिया। फिर जब उस पर तंत्र आया तो उसने बालाजी को पकड़ा, और बाद में कहा कि बालाजी उसका तंत्र ठीक नहीं कर पाए, कि बालाजी में कमी है — और अपनी कमी कभी नहीं देखी। साथ ही, वे जोड़ते हैं, तीर्थ धामों के लोग भी वैसे हो गए हैं, और यह कलियुग का चलता समय है, तो कुछ कठिनाई तो होगी।
क्यों नहीं कटा — इसके पीछे का कारण अलग है, वक्ता कहते हैं। और तीर्थ धामों के लोग भी वैसे हो गए हैं। और अब कलियुग का काल चल रहा है, तो कुछ कठिनाई होगी। लोगों की अपनी गलतियाँ भी हैं। मेहंदीपुर में नहीं कटा; इसके पीछे एक कारण है। लोग मेहंदीपुर जाते हैं, मन्नत लेते हैं, और फिर उसके लिए कुछ नहीं करते — और वे आपको आकर बताने वाले नहीं कि संकल्प पूरा नहीं कर पाए। यहाँ दस साल एक आदमी ने गलत काम किए: चरस-गांजा पिया, शराब पी, घर वालों की नहीं सुनी, देवी-देवताओं पर ध्यान नहीं दिया। फिर जब तंत्र आया, तो उसने बालाजी को पकड़ा, और बाद में कहा कि बालाजी उसका तंत्र ठीक नहीं कर पाए, कि मेहंदीपुर के बालाजी में शक्ति ही नहीं है, कि वे कुछ भी नहीं कर पाए।
यह गयासुर वाली सोच है — खुलकर पाप करो, फिर मोक्ष के लिए दर्शन कर लो
गयासुर की कहानी — खुलकर पाप करो, और मोक्ष के लिए दर्शन करो
वक्ता कहते हैं, आदमी किसी का धन हड़प ले, किसी का पैसा ले ले, किसी के साथ गलत करे, किसी लड़की के साथ गलत करे, और फिर जब किसी शत्रु द्वारा उस पर तंत्र प्रयोग हो, तो बालाजी की शरण में भागे और शिकायत करे कि बालाजी कुछ नहीं कर पाए। यह गयासुर की कहानी बन गई है: गयासुर ने वरदान लिया, तो चलो, पाप करो, गयासुर के दर्शन करो और मोक्ष मिल जाएगा। लोगों ने ऐसा ही समझ लिया है — पर भगवान भी बहुत चतुर हैं; जिन्हें ठीक करते हैं उन्हें ठीक करते हैं, और जो ठीक नहीं होते वे नहीं होते।
देखिए उसने क्या किया है, और वह अपनी गलती नहीं देखता, वक्ता कहते हैं। उसने अपने भाई का धन हड़पा; कभी किसी का पैसा लिया; कभी किसी के साथ गलत किया, किसी लड़की के साथ गलत किया। और उसके बाद, जब उस पर तंत्र का प्रयोग आया, जब किसी शत्रु ने किया, तो अपना मज़ा लेकर वह बालाजी की शरण में जाएगा, और फिर कहेगा कि मेहंदीपुर के बालाजी में शक्ति ही नहीं है। यह बहुत आसान चीज़ बन गई है; यह गयासुर की कहानी बन गई है। गयासुर ने वरदान लिया — बहुत अच्छा, पाप करो, गयासुर के दर्शन करो और मोक्ष मिल जाएगा। तो लोगों ने ऐसा समझ लिया है। पर भगवान भी बहुत चतुर हैं: जिन्हें ठीक करते हैं उन्हें ठीक करते हैं, और जो ठीक नहीं होते वे नहीं होते। ऐसे ही लोगों को उत्तर देना है।
बच्चे के रूप में जंजीर से बँधा हाथी बड़ा होकर रस्सी तोड़ने की कोशिश ही नहीं करता
बच्चे में जंजीर से बँधा, और बड़ा होकर फिर कोशिश नहीं
जब हाथी छोटा होता है, बच्चा होता है, तो उसे बड़ी भारी, मोटी जंजीरों से बाँधकर रखा जाता है, ताकि वह तोड़ न सके। पर वही हाथी बड़ा होने पर कभी जंजीर से नहीं बाँधा जाता — उसके पास एक छोटी पतली रस्सी लपेटकर छोड़ दी जाती है, और हाथी उसे तोड़ने की कोशिश तक नहीं करता। कारण यह है कि बचपन से उसके मन में भर दिया गया है कि वह इसे नहीं तोड़ पाएगा। बड़ा होने पर वह जानता है कि कोशिश करने में कोई फायदा नहीं, वह नहीं तोड़ेगा। जब हाथी पागल हो जाता है, तब तोड़ता है।
पर अगर वे जानेंगे नहीं, तो ठीक यही करेंगे, वक्ता कहते हैं: वे हनुमान जी की क्षमता नहीं जानेंगे — दो-चार सबर मंत्र देखकर और दस लोगों की बातें सुनकर, उनमें यह मानसिकता घुस गई है कि यह नहीं होगा। आप सबने हाथी की कहानी सुनी है, वे कहते हैं। जब हाथी छोटा होता है, जब वह बच्चा होता है, तो उसे बड़ी भारी जंजीरों से बाँधकर रखा जाता है; मोटी जंजीरों में बाँधा जाता है ताकि वह तोड़ न सके। पर वही हाथी, जब बड़ा होता है, कभी जंजीर से नहीं बाँधा जाता। उसके पास एक छोटी पतली रस्सी लपेटकर छोड़ दी जाती है, और हाथी उसे तोड़ने का प्रयास कभी नहीं करता। इसके पीछे कारण यह है कि बचपन से उसके मन में भर दिया गया है कि तुम इसे नहीं तोड़ पाओगे। जब वह बड़ा होता है, तो जानता है कि प्रयास में कोई लाभ नहीं, कि हम इसे नहीं तोड़ पाएँगे। जब हाथी पागल हो जाता है, तब तोड़ता है। अब यही स्थिति है: मानसिकता भर दी गई है कि हनुमान जी कुछ नहीं, कि आप रोज़ हनुमान चालीसा करते हैं और उससे कुछ नहीं होता।
क्या भैरव को नींबू बलि का नींबू नीचे से जुड़ा रहना चाहिए?
दो टुकड़े, दो जगह रोली का तिलक
वक्ता कहते हैं, इसे टुकड़ों में काटा जाता है; जुड़ा रहने की ज़रूरत नहीं। दो टुकड़े कीजिए, और फिर उस पर बिंदी लगाइए — और बिंदी से लोग वह बिंदी न समझें: रोली लेकर उस पर दो जगह तिलक लगाना है।
पूछे जाने पर कि भैरव जी को बलि में दिया जाने वाला नींबू बलि के रूप में नीचे से जुड़ा रहना चाहिए, या दोनों अलग होने चाहिए, वक्ता कहते हैं: टुकड़े करके — जुड़ा रहने की ज़रूरत नहीं। दो टुकड़े कीजिए, और फिर उस पर बिंदी लगाइए। और बिंदी से लोग वह बिंदी न समझें: रोली लेकर उस पर दो जगह तिलक लगाना है।
कमज़ोर सूर्य के लिए तांबे का कड़ा कैसे सिद्ध करें?
रवि पुष्य नक्षत्र, भोर में सूर्योदय के समय, सूर्य कवच से
किस दिन: रवि पुष्य नक्षत्र के दिन कीजिए। किस तरह: बिल्कुल भोर में, जिस समय सूर्य उदय हो रहा हो, कवच का पाठ करके।
एक श्रोता याद दिलाता है कि वक्ता ने एक बार कहा था कि जिसका सूर्य कुंडली में कमज़ोर हो, वह सूर्य कवच से तांबे का कड़ा सिद्ध करके पहने, और पूछता है कि किस दिन और किस तरह। रवि पुष्य नक्षत्र के दिन कीजिए, वक्ता कहते हैं। किस तरह: बिल्कुल भोर में, जिस समय सूर्य उदय हो रहा हो, उस समय कवच का पाठ करते हुए।
क्या भैरव हृदय का अनुष्ठान केवल लौंग बलि से किया जा सकता है?
किया जा सकता है, पर मंदिर में कीजिए, घर में नहीं
एक श्रोता कहता है कि काले तिल के लड्डू का हवन बहुत महँगा है और पूछता है कि क्या भैरव हृदय का अनुष्ठान केवल लौंग बलि से हो सकता है। लौंग से पूरा कीजिए, वक्ता कहते हैं — अगर इतना कर सकते हैं तो कीजिए। पर इसकी भी ऊर्जा बहुत ज़्यादा बनेगी और असर बहुत तेज़ पड़ेगा। इसलिए अगर इस तरह का अनुष्ठान करना चाहते हैं, तो मंदिर में कीजिए; घर में मत कीजिए, क्योंकि उन्हें नहीं पता आपके घर की स्थिति क्या है।
पूछे जाने पर कि क्या भैरव हृदय का अनुष्ठान काले तिल के लड्डुओं के हवन के बिना, केवल लौंग की बलि से किया जा सकता है, क्योंकि खर्च बहुत ज़्यादा होगा, वक्ता उत्तर देते हैं: लौंग से पूरा कीजिए। अगर इतना कर सकते हैं, तो कीजिए। पर इसकी भी ऊर्जा बहुत ज़्यादा बनेगी, और असर भी बहुत तेज़ पड़ेगा। इसलिए वे प्रश्नकर्ता से कहेंगे: अगर आप इस तरह का अनुष्ठान करना चाहते हैं, तो मंदिर में कीजिए। घर में मत कीजिए — क्योंकि उन्हें नहीं पता कि आपके घर की स्थिति क्या है।
दक्षिण में चामुंडेश्वरी मंदिर में स्त्रियाँ नींबू के रस से दीपक क्यों बनाती हैं?
नकारात्मक ऊर्जा भगाने में नींबू सबसे तेज़ है
हाँ, यह चीज़ की जाती है, वक्ता कहते हैं, और वे भी जल्दी इसे करवाएँगे — जैसे आँवले वाला और नारियल वाला करवाया जाता है, वैसे ही नींबू वाला भी करने को बताएँगे। इसे करने के पीछे कारण यह है कि नींबू नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाने में अत्यंत समर्थ है; यह सबसे तेज़ काम करता है। जैसे अपामार्ग की लकड़ी, अपामार्ग की समिधा नकारात्मक ऊर्जा को चूर-चूर करती है — शूल की तरह, वज्र की तरह प्रहार करती है — उसी तरह नींबू भी सबसे तेज़ असर डालता है। लौंग और कपूर भी बहुत तेज़ हैं।
पूछे जाने पर कि दक्षिण में चामुंडेश्वरी मंदिर में महिलाएँ नींबू का रस निकालकर उसके दीपक बनाकर क्यों जलाती हैं, वक्ता कहते हैं: हाँ, यह चीज़ की जाती है। नींबू के दीपक का प्रयोग होता है। और वे भी जल्दी इसे करवाएँगे — जैसे अभी आँवले वाला होता है और नारियल वाला होता है, वैसे ही नींबू वाला भी करने को बताएँगे। इसे करने के पीछे कारण यह है कि नींबू नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाने में अत्यंत समर्थ है। यह सबसे तेज़ काम करता है। जैसे अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी, अपामार्ग की समिधा, जिसके बारे में उन्होंने कहा है कि वह नकारात्मक ऊर्जा को चूर-चूर कर देती है — शूल की तरह प्रहार करती है, वज्र की तरह प्रहार करती है — उसी तरह नींबू भी सबसे तेज़ असर डालता है। लौंग और कपूर भी बहुत तेज़ हैं।
क्या माँ विंध्यवासिनी को नमक वाला भोजन चढ़ाना चाहिए?
क्षेत्र की मान्यता अलग है; उनके घर में नमक वाला भोजन चढ़ता है
वक्ता कहते हैं, सबकी अपनी श्रद्धा है। आपके क्षेत्र में एक मान्यता है और ऐसा हो सकता है, और वे इसे मान सकते हैं। उनके अपने यहाँ मान्यता यह है, और वे बचपन से देखते आए हैं: वे विंध्यवासिनी माई को कुछ चढ़ाए बिना नहीं खाते, और वे नमक वाला भोजन खाते हैं, क्योंकि बिना नमक के भोजन नहीं बना सकते। सेंधा नमक सबसे ज़्यादा लगता है, और साधारण नमक भी लगता है — वे झूठ क्यों बोलें? और भोग ज़रूर चढ़ता है; वे भोग चढ़ाए बिना नहीं खाते।
एक श्रोता कहता है कि वक्ता ने एक बार कहा था कि वे रोज़ घर का बना भोजन माँ विंध्यवासिनी को चढ़ाते हैं, जबकि श्रोता के क्षेत्र में मान्यता है कि नमक वाला भोजन ठाकुर जी के अलावा किसी को नहीं चढ़ाया जाता। सबकी अपनी श्रद्धा है, वक्ता कहते हैं। आपके क्षेत्र में एक मान्यता है; ऐसा हो सकता है, और हम इसे मान सकते हैं। मेरे यहाँ, भाई, मान्यता बस यही है, वे कहते हैं। हम बचपन से देखते आए हैं: हम विंध्यवासिनी माई को कुछ चढ़ाए बिना नहीं खाते। और हम नमक वाला भोजन खाते हैं — बिना नमक के हम भोजन नहीं बना सकते। हाँ, सेंधा नमक सबसे ज़्यादा लगता है, और साधारण नमक भी लगता है — हम झूठ क्यों बोलें? और भोग ज़रूर चढ़ता है; हम भोग चढ़ाए बिना नहीं खाते।
क्या अपामार्ग और चिरायता एक ही चीज़ हैं?
एक सुधार — अपामार्ग चिरचिरा या ऊँगा है, चिरायता अलग है
अपामार्ग लीजिए, वक्ता कहते हैं, और गलती मानते हैं: उनके बोलने में शायद भ्रम हुआ, और वे यह दोष स्वीकार करते हैं कि बहुत से वीडियो में उन्होंने चिरायता कहा। चिरायता का भी मुख्य रूप से प्रयोग होता है, पर अंतर के साथ — चिरायता की लकड़ी के प्रयोग से चीज़ों के असर में बस कमी आती है; वे जाती नहीं, उनका असर कम हो जाता है। वे और उनके लोग दोनों चीज़ों का प्रयोग करते हैं।
एक श्रोता लिखता है कि अपामार्ग और चिरायता को दो अलग चीज़ें बताया जाता है, कि उसके क्षेत्र में अपामार्ग को चिरचिरा या ऊँगा कहते हैं जबकि चिरायता अलग वस्तु है, और पूछता है कि कौन सा लें। अपामार्ग लीजिए, वक्ता कहते हैं। उनके बोलने में शायद भ्रम हुआ है, और वे यह गलती स्वीकार करते हैं: बहुत से वीडियो में उन्होंने चिरायता कहा है। चिरायता का भी मुख्य रूप से प्रयोग होता है, पर उससे होता यह है कि चिरायता की लकड़ी के प्रयोग से उन चीज़ों के असर में बस कमी आती है — वे जाती नहीं। उनका असर कम हो जाता है। हम दोनों चीज़ों का प्रयोग करते हैं, वे कहते हैं।
चिरायता का प्रयोग किसलिए होता है?
नज़र दोष के लिए चिरायता; तंत्र नाश के लिए अपामार्ग
चिरायता का मुख्य प्रयोग वहाँ होता है जहाँ नज़र दोष लगा हो। ऐसे लोग होते हैं जिन्होंने उस तरह की चीज़ें सीखी हैं और बस आकर देखना काफी है — जैसे किसी लड़की के बाल बहुत लंबे हों और वह देखने में बहुत सुंदर हो, और वे टिप्पणी करें कि कितने लंबे बाल हैं, गाय की पूँछ जैसे, ज़मीन छूते; बस कह देंगे, और सामने वाले की सेहत बिगड़ जाएगी। ठीक इसी जगह चिरायता का मुख्य प्रयोग होता है। अपामार्ग तंत्र के नाश के लिए प्रयोग किया जा रहा है। तो अपामार्ग की लकड़ी लीजिए — जिसे चिरचिरा, ऊँगा और कई और नामों से जाना जाता है।
उन चीज़ों का असर कम हो जाएगा, और वहीं चिरायता का खास प्रयोग होता है — जब भी नज़र दोष लगा हो, वक्ता कहते हैं। ऐसे लोग होते हैं न, जिन्होंने उस तरह की चीज़ें सीखी हैं, जिन्हें बस आकर देखना होता है। जैसे किसी लड़की के, किसी युवती के बाल बहुत लंबे हों और वह देखने में बहुत सुंदर हो, और बाल बहुत लंबे हों, तो वे टिप्पणी करेंगे: कितने लंबे बाल हैं, गाय की पूँछ जैसे, नीचे ज़मीन छूते हुए। वे बस कह देंगे, और सामने वाले की सेहत बिगड़ जाएगी। तो ठीक इसी जगह चिरायता का मुख्य प्रयोग होता है। अपामार्ग तंत्र के नाश के लिए प्रयोग किया जा रहा है। तो अपामार्ग की लकड़ी लीजिए। अगर उन्होंने चिरायता कहा है, तो सुधार की ज़रूरत है; उन वीडियो में टैग करना होगा, पिन करना होगा — अपामार्ग की समिधा लीजिए, जिसे चिरचिरा और ऊँगा कहते हैं और जिसके और भी कई नाम हैं। वे इस पर भी एक लाइव वीडियो बनाकर डालेंगे।
भैरव पूजा में त्रिकोण सीधा हो या उल्टा?
बस त्रिकोण बनाइए — भेद बहुत हैं
वक्ता कहते हैं, एक सरल बात ध्यान में रखिए: अगर आप इसके भीतर जाएँ, तो त्रिकोण को बस इतना लीजिए कि त्रिकोण होना चाहिए, और इतना ही मानिए। कारण यह है कि बलि देते समय का त्रिकोण अलग है, हवन के समय का अलग; यंत्र पूजन कर रहे हों तो उसका त्रिकोण अलग; भैरव के स्वरूप में त्रिकोण अलग; काशी क्षेत्र का त्रिकोण अलग — बहुत से भेद बनते हैं। तो त्रिकोण बनाइए; त्रिकोण भगवती और भैरव का प्रतीक रूप है। त्रिकोण बनाकर कीजिए; इतना काफी होगा और कोई दोष नहीं लगेगा।
पूछे जाने पर कि भैरव पूजा में बनाया जाने वाला त्रिकोण उल्टा हो या सीधा, क्योंकि उत्तर भारत और दक्षिण भारत में अंतर है, और गुजरात से कैसा होना चाहिए, वक्ता कहते हैं: एक सरल बात ध्यान में रखिए। अगर आप इसके भीतर जाएँ — तो त्रिकोण को बस इस हद तक लीजिए कि त्रिकोण होना चाहिए, और बस इतना ही मानिए। कारण यह है कि बलि देते समय त्रिकोण एक है, हवन के समय त्रिकोण दूसरा है; अगर आप यंत्र पूजन कर रहे हैं तो उसमें त्रिकोण दूसरा है; भैरव के स्वरूप में त्रिकोण दूसरा है; काशी क्षेत्र का त्रिकोण दूसरा है। बहुत से भेद बनते हैं। तो त्रिकोण का प्रश्न छोड़िए; बस त्रिकोण बनाइए। वे बस इतना कहेंगे: त्रिकोण बनाइए। त्रिकोण भगवती और भैरव का प्रतीक रूप है। त्रिकोण बनाकर कीजिए; और बाकी, उसे जोड़ दीजिए। इतना ही काम कर देगा; कोई दोष नहीं लगेगा। और जहाँ कोई विशेष विधि विधान है जिसे उन्होंने करके दिखाया है, वहाँ उन्होंने उसी तरह करने को कहा है; और अगर वह संभव न हो तो वे फिर से बनाकर दिखाएँगे।
हत्था जोड़ी या सूकर दंत की ज़रूरत किसे होती है?
जिन पर मारण प्रयोग हुआ हो, या जो दूसरों के घर निकारी करते हैं
हत्था जोड़ी मत पहनिए, वक्ता प्रश्नकर्ता से कहते हैं। हत्था जोड़ी और सूकर दंत सबके लिए नहीं हैं — आप कौन सा मारण प्रयोग झेलने वाले हैं? जिन पर खास तौर पर मारण प्रयोग हुआ हो, या जो तंत्र क्षेत्र में ऐसी चीज़ों से निपटते हैं — जो दूसरों के घर जाकर निकारी करते हैं, उतारा करते हैं, तंत्र प्रयोग नष्ट करते हैं — उन्हें इन चीज़ों की ज़रूरत होती है। क्योंकि यह जीवित चीज़ है: जब आप पर मारण प्रयोग आएगा तो यह उस ऊर्जा को सोख लेगी और खुद मृत्यु को प्राप्त होगी। हालाँकि इसे भगवती चामुंडा का रूप माना जाता है। वे जोड़ते हैं कि अभी हत्था जोड़ी पर प्रतिबंध है, कि मोदी जी ने इन सब चीज़ों पर प्रतिबंध लगाया है, और अगर असली मिले तो ये चीज़ें ठीक हैं।
हत्था जोड़ी मत पहनिए, वक्ता प्रश्नकर्ता से कहते हैं — हत्था जोड़ी और सूकर दंत सबके लिए नहीं हैं। आपको इन सब चीज़ों की क्या ज़रूरत है? आप कौन सा मारण प्रयोग झेलने वाले हैं? और अभी हत्था जोड़ी पर प्रतिबंध है; इन सब चीज़ों पर प्रतिबंध लगा है। अगर असली मिले तो ये चीज़ें ठीक हैं। जिन पर खास तौर पर मारण प्रयोग का प्रयोग हुआ हो, या जो तंत्र क्षेत्र में उस तरह की चीज़ों से निपटते हैं — जो सामने से दूसरों के घर जाकर निकारी करते हैं, उतारा करते हैं, तंत्र प्रयोग नष्ट करते हैं — उन्हें इन सब चीज़ों की ज़रूरत होती है। क्योंकि यह जीवित चीज़ है। जब आप पर मारण प्रयोग होगा, तो यह उस ऊर्जा को सोख लेगी और खुद मृत्यु को प्राप्त होगी। हालाँकि इसे भगवती चामुंडा का स्वरूप माना जाता है।
क्या पीतल की थाली में हवन किया जा सकता है?
नहीं — तांबे का छोटा हवन कुंड लीजिए
वक्ता कहते हैं, पीतल की थाली में हवन मत कीजिए। उसकी जगह तांबे का छोटा हवन कुंड लीजिए।
पूछे जाने पर कि क्या पीतल की थाली में हवन किया जा सकता है, वक्ता उल्टा पूछते हैं कि क्या प्रश्नकर्ता पीतल की थाली में हवन कर रहा है। भाई, पीतल की थाली में हवन मत कीजिए। अपनी थाली में इस तरह करने की जगह तांबे का छोटा हवन कुंड लीजिए।
क्या श्मशान काली की पूजा घर में की जा सकती है?
नए सिरे से मत कीजिए — प्रतीक रूप में आद्या काली को पूजिए
नहीं, वक्ता कहते हैं — मत कीजिए। अगर श्मशान काली आपकी कुलदेवी हैं, तो प्रतीक रूप में आद्या काली की ही पूजा कीजिए; और नहीं तो, अगर आपके घर का विधि-विधान पहले से चला आ रहा है, तो वही कीजिए। नई पूजा शुरू मत कीजिए। माता की पूजा काली जी के रूप में कीजिए; प्रतीक रूप में उनकी पूजा कीजिए।
पूछे जाने पर कि क्या माँ श्मशान काली की पूजा घर में की जा सकती है, वक्ता साफ उत्तर देते हैं: नहीं, भाई, मत कीजिए। अगर श्मशान काली आपकी कुलदेवी हैं, तो प्रतीक रूप में आद्या काली की ही पूजा कीजिए; और अगर नहीं, अगर आपके घर का विधि-विधान पहले से चला आ रहा है, तो वही कीजिए। नए सिरे से पूजा मत कीजिए। माता की पूजा काली जी के रूप में कीजिए। प्रतीक रूप में उनकी पूजा कीजिए।
कृष्ण की स्तुति में काली को श्मशान वासिनी, गृह देवी और ग्राम देवी, तीनों कहा गया है
श्मशान वासिनी, गृह देवी और ग्राम देवी एक ही हैं
वक्ता बताते हैं कि यह बात स्वयं भगवती काली कहती हैं। जब काली जी भगवान श्री कृष्ण के सामने प्रकट हुईं, तो उस समय उन्होंने जो स्तुति की उसमें कहा: आप ही श्मशान वासिनी काली हैं; घर-घर में आप गृह देवी के रूप में भी हैं; गाँव-गाँव में आप ग्राम देवी के रूप में भी हैं। तो जो श्मशान काली हैं, उन्हें घर में सौम्य रूप में पूजा जाए।
स्वयं भगवती काली यह बात कह रही हैं, वक्ता कहते हैं। जब काली जी भगवान श्री कृष्ण के सामने प्रकट हुईं, तो उस समय उन्होंने जो स्तुति की, उसमें यह कहा: कि आप ही श्मशान वासिनी काली हैं। घर-घर में आप गृह देवी के रूप में भी हैं। गाँव-गाँव में आप ग्राम देवी के रूप में भी हैं। तो जो श्मशान काली हैं, उन्हें घर में सौम्य रूप में पूजा जाए।
क्या 41 दिन सुबह हनुमान जी और शाम को काल भैरव का जप किया जा सकता है?
समय हो तो हाँ — पर विशेष सिद्धि के लिए केवल एक
हाँ, किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं — बशर्ते आपके पास इतना समय और क्षमता हो। कोई दिक्कत नहीं, क्योंकि आप दोनों की पूजा सात्विक ढंग से करेंगे, और वह चलेगा। पर अगर आप कोई विशेष सिद्धि करने जा रहे हैं, तो उनमें से केवल एक की कीजिए; वह बेहतर होगा।
पूछे जाने पर कि क्या 41 दिन सुबह हनुमान जी का और शाम को बाबा काल भैरव का जप किया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, किया जा सकता है। बशर्ते आपके पास इतना समय और क्षमता हो। किया जा सकता है; कोई दिक्कत नहीं। क्योंकि आप दोनों की पूजा सात्विक ढंग से ही करेंगे, तो चलेगा। पर अगर आप कोई विशेष सिद्धि करने जा रहे हैं, तो उनमें से किसी एक की कीजिए; वह बेहतर होगा।
रात भर बाहर रखी क्षेत्रपाल निकारी का क्या करना है?
दूर ले जाकर किसी अच्छी जगह विसर्जित कीजिए
अगर वह भोग किसी ने भी नहीं खाया — न कुत्ते ने, न गाय ने, किसी ने नहीं — तो उसे दूर ले जाकर किसी अच्छी जगह विसर्जित कीजिए।
पूछे जाने पर कि घर के बाहर रखी गई क्षेत्रपाल निकारीक्षेत्रपाल को अर्पित एक विसर्जन-अनुष्ठान — सुरक्षा तथा क्षेत्र में निवास करने वाली दुष्ट शक्तियों (डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल) की शांति हेतु प्रार्थना, जो घर की देहरी पर व्याप्त दुष्ट ऊर्जाओं को कम-से-कम 24 घंटे हेतु शुद्ध कर देती है। का अगले दिन क्या करें, वक्ता कहते हैं: अगर वह भोग किसी ने नहीं खाया — न कुत्ते ने, न गाय ने, किसी ने नहीं — तो उसे दूर ले जाकर किसी अच्छी जगह उसका विसर्जन कीजिए।
साईं बाबा किसके शिष्य थे, और क्या इससे वे पूजनीय हो जाते हैं?
स्वामी समर्थ, और गुरु और शिष्य का अंतर
वक्ता कहते हैं, प्रश्नकर्ता जो नाम याद करने की कोशिश कर रहा है वह स्वामी समर्थ है; कहा जाता है कि साईं स्वामी समर्थ के शिष्य थे। ठीक है, मान लेते हैं। महा स्वामी समर्थ अपने आप में अक्कलकोट के महा स्वामी हैं, एक महाशक्ति — ऐसा माना जाता है। पर बाद के समय में लोगों ने सब गलत कर दिया। साईं सच्चरित्र पढ़िए और देखिए उन्होंने क्या किया: एकादशी के दिन एक ब्राह्मण के मुँह में गौ मांस ठूँसा, और आप कहते हैं उन्हें मानना चाहिए। वे, अपनी ओर से, उन्हें मानने वाले नहीं।
एक श्रोता लिखता है कि जिन्हें साईं बाबा कहा जाता है, वे भी एक ऐसे संत योगी के शिष्य थे जो भूत बन गए थे, एक बहुत बड़े संत योगी के, और उसे नाम याद नहीं आ रहा। आप जो नाम लेना चाहते हैं वह स्वामी समर्थ है, वक्ता कहते हैं। कहा जाता है कि वे स्वामी समर्थ के शिष्य थे। ठीक है, हम मानते हैं कि वे स्वामी समर्थ के शिष्य थे। महा स्वामी समर्थ अपने आप में अक्कलकोट के महा स्वामी हैं; वे एक महाशक्ति हैं। ऐसा माना जाता है। पर बाद के समय में लोगों ने सब गलत कर दिया। और रही साईं बाबा की बात, तो उनका साईं सच्चरित्र पढ़िए और देखिए उन्होंने क्या कहा है: एकादशी के दिन उन्होंने एक ब्राह्मण के मुँह में गौ मांस ठूँसा — और आप कहते हैं उन्हें मानना है। भैया, वे कहते हैं, मैं मानने वाला नहीं।
क्या गुरु की महानता से शिष्य पूजनीय हो जाता है?
रावण और परशुराम, दोनों शिव के शिष्य थे
जो लोग शिव पूजा से रोकते हैं, उनसे वक्ता कहते हैं: आप कितने भी बड़े संत के शिष्य हों, संत संत है और गुरु गुरु; गुरु कोई भी हो, आप शिष्य बने हैं, और आप यहाँ गलती कर रहे हैं — आपको कैसे माना जाएगा? रावण को लीजिए: रावण भगवान महादेव का शिष्य है। भगवान परशुराम भी शिष्य हैं, स्वयं शिव जी के। आप घर में किसकी पूजा करते हैं? भगवान परशुराम की पूजा करते होंगे; रावण की पूजा तो नहीं करते। गुरु के कारण शिष्य को नहीं पूजा जाता — गुरु को पूजिए।
जो लोग शिव की पूजा से लोगों को रोक रहे हैं, उनसे वक्ता कहते हैं: नहीं — आप कितने भी बड़े संत के शिष्य हों। संत संत है, गुरु गुरु है। गुरु कोई भी हो, आप शिष्य बने हैं; और आप यहाँ गलती कर रहे हैं। आपको कैसे माना जाएगा? अब रावण को लीजिए। रावण भगवान महादेव का शिष्य है। और भगवान परशुराम भी शिष्य हैं, स्वयं शिव जी के। आप घर में किसकी पूजा करते हैं? आप भगवान परशुराम की पूजा करते होंगे। रावण की पूजा तो आप नहीं करते। ऐसा नहीं करना है। गुरु को देखकर शिष्य की पूजा नहीं की जाती। गुरु की पूजा कीजिए।
साईं मंदिर के सामने वे स्वामी समर्थ को याद करते हैं और भीड़ के लिए सद्बुद्धि माँगते हैं
वे स्वामी समर्थ को याद करते हैं और भीड़ के लिए सद्बुद्धि माँगते हैं
वक्ता अपना अभ्यास बताते हैं: अगर साईं मंदिर के सामने लोगों की भीड़ देखकर कोई ऐसा भाव उमड़ता है, तो वे स्वामी समर्थ को याद करते हैं। वहीं, उस मंदिर के ठीक सामने, स्वामी समर्थ का नाम लेते हैं। और इसलिए लेते हैं कि इन लोगों को सद्बुद्धि मिले — क्योंकि उनमें वहाँ खड़े होकर किसी को सद्बुद्धि देने का, उन्हें यह कहने का सामर्थ्य नहीं कि वे गलत कर रहे हैं। आखिर वे सब हिंदू हैं।
वे अपनी एक सच्ची बात बताएँगे, वक्ता कहते हैं। अगर साईं के मंदिर के सामने, लोगों की भीड़ देखकर, कोई ऐसा भाव उमड़ता है — तो वे अपना अभ्यास बताते हैं: वे स्वामी समर्थ को याद करते हैं। वे वहीं, उस मंदिर के ठीक सामने, स्वामी समर्थ का नाम लेते हैं। वे इस कारण लेते हैं: कि इन लोगों को सद्बुद्धि मिले। उनमें वहाँ खड़े होकर किसी को सद्बुद्धि देने का, उनसे यह कहने का सामर्थ्य नहीं कि आप गलत कर रहे हैं। वे सब हिंदू हैं।
शाबर मंत्रों में छेड़छाड़ हुई है, और सूर्य के नियम निभाना बहुत कठिन है
शाबर मंत्रों में छेड़छाड़, और सूर्य साधना से पहले योग
वक्ता कहते हैं, शाबर मंत्रों में भी सचमुच छेड़छाड़ हुई है। और सूर्य के नियम बहुत कठिन हैं — सूर्य के नियम न मानने पर बहुत कठिनाई होगी। वे बताएँगे, पर उसमें सच कहेंगे: अगर आप सूर्य का विधि-विधान करना चाहते हैं, तो पहले बहुत व्यवस्थित ढंग से योग साधना करनी चाहिए। जब योग में दक्षता आएगी, तो सूर्य की, भगवान सूर्य की कृपा जल्दी मिलेगी।
सबर मंत्र में भी सचमुच छेड़छाड़ हुई है, वक्ता कहते हैं। सूर्य के नियम बहुत कठिन हैं। सूर्य के नियम न मानने पर बहुत कठिनाई होगी। वे बताएँगे — पर उसमें सच कहेंगे: कि अगर आप सूर्य का विधि-विधान करना चाहते हैं, तो बहुत व्यवस्थित ढंग से पहले योग साधना करनी चाहिए। जब योग में दक्षता आएगी, तब सूर्य जी की, भगवान सूर्य की कृपा जल्दी मिलेगी।
किस ग्रंथ में बताया गया है कि सीता काली का अवतार कैसे हैं?
अनेक रामायणों में से एक में यह कथा है
वक्ता कहते हैं, बहुत सी रामायण हैं; उनमें एक रामायण है जिसमें यह कथा मिलती है। उन्होंने उस समय एक वीडियो भी डाला था, या शायद लाइव में बताया था — उन्हें याद नहीं; पर एक बार उन्होंने यह बात बताई थी। वे देखकर फिर से विस्तार से बताएँगे: सीता जी किस तरह काली जी का अवतार हैं, और इसका वर्णन कहाँ है।
एक श्रोता पूछता है कि सीता जी किस तरह काली का अवतार हैं, और किस ग्रंथ में इसे विस्तार से पढ़ा जा सकता है। बहुत सी रामायण हैं, वक्ता कहते हैं। उसी के भीतर एक रामायण है जिसमें यह कथा मिलती है। और उन्होंने शायद उस समय एक वीडियो भी डाला था, या लाइव में बताया था; उन्हें याद नहीं। पर एक बार उन्होंने यह बात बताई थी। वे इसे देखकर फिर से विस्तार से बताएँगे: सीता जी किस तरह काली जी का अवतार हैं, और इसका विस्तृत वर्णन कहाँ है।
भगवती को काली का रूप क्यों लेना पड़ा?
हज़ार मुख वाला रावण
हज़ार मुख वाले रावण के कारण भगवती को काली का अवतार, काली का स्वरूप लेना पड़ा। आजकल यह टीवी धारावाहिकों में भी दिखाया जा रहा है।
हज़ार मुख वाले रावण के कारण ही भगवती को काली का अवतार, काली का स्वरूप लेना पड़ा, वक्ता कहते हैं। आजकल यह टीवी धारावाहिकों में भी दिखाया जा रहा है।
क्या तुलसी के गणेश पर क्रोध की कहानी सच्ची है?
ब्रह्मा और सरस्वती की तरह — गलत प्रचलित बात
एक श्रोता कहता है कि ब्रह्मा और सरस्वती वाली बात की तरह एक और गलत बात प्रचलित है — कि तुलसी जी गणेश जी को देखकर क्रोधित हुईं और उन्हें शाप दिया। देखिए, वक्ता कहते हैं: जो बातें प्रचलित हैं वे बहुत अलग तरह की हैं। कथाकारों और टीकाकारों ने मूल बात समझे बिना उसे जैसा है वैसा लिख दिया है — और बस यही है।
एक श्रोता लिखता है कि ब्रह्मा और सरस्वती वाली बात की तरह यह गलत बात भी प्रचलित है: कि तुलसी जी गणेश जी को देखकर क्रोधित हुईं, और तुलसी जी ने उन्हें शाप दिया। देखिए, वक्ता कहते हैं, जो बातें प्रचलित हैं वे बहुत अलग तरह की हैं। मूल बात समझे बिना कथाकारों ने, टीकाकारों ने, उसे वैसा लिख दिया है। और बस यही है।
मसानी गणपति क्या हैं, और क्या गृहस्थ उनकी पूजा कर सकता है?
हेरंब और उच्छिष्ट गणपति, नील तारा के साथ पूजित — कभी अकेले नहीं
वक्ता कहते हैं, मसानी गणपति वही हैं जो हेरंब गणपति, और मसानी गणपति की पूजा की ज़रूरत सामान्यतः नहीं पड़ती। जिन्हें आप मसानी गणपति कह रहे हैं — हेरंब गणपति, उच्छिष्ट गणपति — यही उनका सही रूप है; भगवती नील तारा के साथ उच्छिष्ट गणपति पूजे जाते हैं, और मसानी गणपति वही स्वरूप हैं। और उन्हें नहीं लगता कि किसी गृहस्थ को कभी उस स्वरूप की सेवा-उपासना करनी चाहिए। अगर गृहस्थी में की जाए, तो पत्नी कर रही हो तो पति के साथ करेगी, और पति कर रहा हो तो पत्नी के साथ — पूजा केवल दंपति के रूप में हो सकती है। तंत्र का यह क्षेत्र ऐसा है: हेरंब गणपति और उच्छिष्ट गणपति की साधना कभी अकेले नहीं करनी चाहिए; या फिर आपको जीवन भर पूर्ण ब्रह्मचारी रहना होगा।
पूछे जाने पर कि मसानी गणपति क्या हैं और उनकी विद्या क्या है, वक्ता उत्तर देते हैं कि वे वही हैं जो हेरंब गणपति। मसानी गणपति की पूजा करने की ज़रूरत सामान्य रूप से नहीं पड़ती — यह जानिए। जिन्हें आप मसानी गणपति कह रहे हैं — हेरंब गणपति, उच्छिष्ट गणपति — यही उनका सही रूप है। भगवती नील तारा के साथ उच्छिष्ट गणपति पूजित हैं; मसानी गणपति वही स्वरूप हैं। और उन्हें नहीं लगता कि किसी गृहस्थ को कभी उस स्वरूप की सेवा-उपासना करनी चाहिए। और अगर गृहस्थी में की जाए, तो पत्नी कर रही हो तो पति के साथ मिलकर करेगी, और पति कर रहा हो तो पत्नी के साथ मिलकर। यह पूजा केवल दंपति में ही हो सकती है। तंत्र का यह क्षेत्र ऐसा है: हेरंब गणपति और उच्छिष्ट गणपति की साधना कभी अकेले नहीं करनी चाहिए — या फिर आपको पूरे जीवन पूर्ण ब्रह्मचारी रहना होगा।
आज कुलदेवी पूजा का क्या हाल हो गया है?
श्रद्धा और निष्ठा की जगह दिखावा और औपचारिकता
एक श्रोता लिखता है कि पहले लोग पूरी श्रद्धा और निष्ठा से कुलदेवी की आराधना करते थे, और आज के समय में कुलदेवी पूजन दिखावा और औपचारिकता पूरी करना भर रह गया है। यह सही बात है, वक्ता सहमत होते हैं।
एक श्रोता लिखता है कि पहले के समय के लोग कुलदेवी माँ की आराधना पूरी श्रद्धा और निष्ठा से करते थे। आज के समय में कुलदेवी पूजन के नाम पर सब दिखावा और औपचारिकता पूरी करने की बात रह गई है। सही बात है, वक्ता सहमत होते हैं।
एक बूढ़ी स्त्री का अपने खून से "काली" लिखते हुए सपना आने का क्या अर्थ है?
एक योगिनी अधूरी मन्नत दिखा रही है
आप बहुत खतरनाक सपना देख रही हैं, वक्ता उनसे कहते हैं। मंदिर जाकर काली जी की पूजा दीजिए। कोई मन्नत होगी जो पूरी नहीं हुई, इसलिए उनकी योगिनी आकर सीधे अपने खून से लिखा "काली" दिखा रही है — सोचिए वह कितनी समर्पित योगिनी है। जाकर काली जी की पूजा दीजिए।
एक श्रोता लिखती हैं कि कल उन्होंने सपने में एक बूढ़ी स्त्री देखी जो अपने खून से 'काली' लिख रही थी। आप बहुत खतरनाक सपना देख रही हैं, वक्ता कहते हैं। मंदिर जाइए और काली जी की पूजा दीजिए। कोई मन्नत होगी जो पूरी नहीं हुई, इसलिए उनकी योगिनी आकर सीधे अपने खून से लिखा 'काली' दिखा रही है। सोचिए वह कितनी समर्पित योगिनी है। जाकर काली जी की पूजा दीजिए।
बंदी हनुमान की साधना कैसे करनी चाहिए?
केवल पुरुषोत्तम क्षेत्र में — इसकी जगह बंदी मोचन कीजिए
आप बंदी हनुमान की साधना क्यों करना चाहते हैं, वक्ता पूछते हैं — इसकी जगह बंदी मोचन की कीजिए। अगर बंदी हनुमान की साधना करनी ही है, तो पुरुषोत्तम क्षेत्र चले जाइए। केवल उसी जगह उनकी साधना होती है; केवल उसी जगह करनी चाहिए।
पूछे जाने पर कि बंदी हनुमान की साधना कैसे करनी चाहिए, वक्ता उत्तर देते हैं: आप बंदी हनुमान की साधना क्यों करना चाहते हैं? इसकी जगह बंदी मोचन की कीजिए — तंत्र जगत। अगर बंदी हनुमान की साधना करनी है, तो पुरुषोत्तम मास चले जाइए — पुरुषोत्तम क्षेत्र। केवल उसी जगह उनकी साधना होती है। केवल उसी जगह करनी चाहिए।
क्या हनुमान जी के चरणों का सिंदूर अपने माथे पर लगाना चाहिए?
जिन पर तंत्र प्रयोग हो उनके लिए; नहीं तो माँ अंजना के नाम पर
जिन पर तंत्र का प्रयोग हुआ हो, उन्हें सामान्य रूप से लगाना चाहिए। और नहीं तो माँ अंजना के नाम पर — अगर किसी स्त्री की बहुत इच्छा हो, तो हनुमान जी के पास रखा सिंदूर लाकर लगा सकती है; और अगर कोई विवाहित स्त्री तंत्र प्रयोग में है तो वह भी लगा सकती है। हनुमान जी रक्षा करेंगे। सामान्य रूप से यह भगवती अंजना मैया के नाम पर है।
पूछे जाने पर कि क्या हनुमान जी के चरणों पर लगा सिंदूर और कुमकुम अपने माथे पर लगाना चाहिए, वक्ता कहते हैं: जिन पर तंत्र का प्रयोग हुआ हो, उन्हें सामान्य रूप से लगाना चाहिए। और नहीं तो माँ अंजनी के नाम पर — अगर आपकी बहुत इच्छा है, तो हनुमान जी के पास सिंदूर रखकर, वह लाकर लगा सकती है। अगर तंत्र का प्रयोग है, तो विवाहित स्त्री हो तो वह भी लगा सकती है। हनुमान जी रक्षा करेंगे। सामान्य रूप से यह भगवती अंजना मैया के नाम पर है।
क्या माँ काली मोक्ष नहीं दे सकतीं?
अगर वे नहीं दे सकतीं, तो कोई महाविद्या नहीं दे सकती
अगर माँ काली मोक्ष नहीं दे सकतीं, वक्ता उत्तर देते हैं, तो दस महाविद्याओं में से एक भी मोक्ष नहीं दे सकतीं। वे टिप्पणी करते हैं कि किसी बड़े विद्वान ने प्रश्नकर्ता को इस तरह का ज्ञान दिया है — और वे क्या कहें।
पूछे जाने पर कि क्या माँ काली मोक्ष नहीं दे सकतीं, वक्ता उत्तर देते हैं: अगर माँ काली मोक्ष नहीं दे सकतीं, तो दस महाविद्या में से एक भी देवी मोक्ष नहीं दे सकतीं। किसी बड़े विद्वान ने प्रश्नकर्ता को इस तरह का ज्ञान दिया है, वे टिप्पणी करते हैं। और वे क्या कहें।
ग्रहण के दौरान पाठ किया गया — अब सवारी को कैसे छुड़ाया जाए?
वही पाठ, संकल्प के साथ, हनुमान मंदिर में अनुष्ठान के रूप में
सवारी छुड़ाने के लिए, हनुमान मंदिर में, संकल्प लेकर, उसी चीज़ का लगातार अनुष्ठान कीजिए जिसका आपने पाठ किया है।
एक श्रोता कहता है कि उसने चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण के दौरान हनुमान जी का पाठ किया, और पूछता है कि अब सवारी छुड़ाने के लिए क्या करना है। सवारी छुड़ाने के लिए, संकल्प लेकर, हनुमान मंदिर में, उसी चीज़ का लगातार अनुष्ठान कीजिए जिसका आपने पाठ किया है। रही पितृ दोष की बात, वे जोड़ते हैं, तो चैनल पर सब बताया जा चुका है।
सूक्ष्म शरीर के प्रकार पिछले लाइव में बताए गए, और यंत्र के लिए पहले मूल बातें चाहिए
पिछले लाइव में बताया गया; और यंत्र के लिए पहले मूल बातें
सूक्ष्म शरीर के प्रकारों वाला प्रश्न उन्होंने पिछले लाइव में बहुत अच्छे से बताया है: कितने प्रकार हैं, और साथ में कौन कितना शक्तिशाली है, शरीर में आने पर किस तरह के असंतुलन होते हैं, और कैसे क्या करना चाहिए। बटुक भैरव यंत्र बनाने की विधि के बारे में: आप बनाएँगे कैसे, वे पूछते हैं — पहले यंत्र की शुरुआती बातें सीखनी होंगी, और उसके बाद ही।
श्रोता जो प्रश्न पूछ रहा है, वक्ता कहते हैं, उसे उन्होंने पिछले लाइव में बहुत अच्छे से बताया है। सूक्ष्म शरीर कितने प्रकार के होते हैं, और कितने प्रकार हैं इसके साथ, उनमें कौन कितना शक्तिशाली है; शरीर में आने पर किस तरह के असंतुलन होते हैं; कैसे क्या करना चाहिए — यह सब बताया गया है। बटुक भैरव यंत्र बनाने की विधि पूछे जाने पर वे उत्तर देते हैं: भाई, आप बनाएँगे कैसे? पहले यंत्र की शुरुआती बातें सीखनी होंगी, और उसके बाद।
क्या मंदिर में हनुमान जी का मुख दक्षिण की ओर हो सकता है?
दक्षिणमुखी हनुमान, और नैऋत्य कोण
हाँ — दक्षिणमुखी हनुमान होते हैं; ऐसा होता है। नैऋत्य कोण मुख्य है: हनुमान जी का मुख मुख्य रूप से नैऋत्य कोण में होता है, यानी वह कोना जो दक्षिण और पश्चिम के बीच पड़ता है। और इस तरह दक्षिणमुखी हनुमान भी होते हैं।
पूछे जाने पर कि क्या मंदिर में हनुमान जी का मुख दक्षिण की ओर भी हो सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, दक्षिणमुखी हनुमान होते हैं। ऐसा होता है। नैऋत्य कोण मुख्य है। हनुमान जी का मुख मुख्य रूप से नैऋत्य कोण में होता है, यानी उस कोने में जो दक्षिण और पश्चिम के बीच पड़ता है। और इस तरह दक्षिणमुखी हनुमान भी होते हैं।
क्या घर में हनुमान जी के लिए चमेली के तेल का दीपक चलेगा?
पूरी तरह चलेगा
पूछे जाने पर कि क्या घर में हनुमान जी के लिए चमेली के तेल का दीपक चलेगा, वक्ता उत्तर देते हैं: पूरी तरह चलेगा।
पूछे जाने पर कि क्या घर में हनुमान जी के लिए चमेली के तेल का दीपक चलेगा, वक्ता उत्तर देते हैं: पूरी तरह चलेगा।
शनि की साढ़े साती का उपाय क्या है?
पहले देखिए कुंडली में शनि क्या हैं — फिर द्वादश नाम, चालीसा, नारायण
वक्ता कहते हैं, साढ़े साती से बस डरिए मत। आपकी कुंडली में शनि क्या हैं, कैसे हैं, आपके लिए अच्छे हैं या बुरे — पहले यह देखिए। अगर बुरे हैं, तो शनि देव के द्वादश नाम का पाठ, हनुमान चालीसा का पाठ, और नारायण का पाठ आपको सबसे ज़्यादा राहत देगा।
पूछे जाने पर कि शनि की साढ़े साती का उपाय क्या है, वक्ता कहते हैं कि सबसे अच्छा उपाय यह है: शनि साढ़े साती से बस डरिए मत। आपकी कुंडली में शनि क्या हैं? कैसे हैं? आपके लिए अच्छे हैं या बुरे? पहले यह देखिए। अगर बुरे हैं, तो शनि देव के द्वादश नाम — उसका पाठ; हनुमान चालीसा का पाठ; नारायण का पाठ। इनसे आपको सबसे ज़्यादा राहत मिलेगी।
वे पाठ शनि को शांत क्यों करते हैं?
नारायण उनके आराध्य, हनुमान को उनका वरदान, शिव उनके गुरु
क्योंकि भगवान शनि के आराध्य नारायण हैं: उन्होंने कृष्ण जी की पूजा की, कृष्ण जी की सेवा की, और गोलोक जाकर शांति पाई; वे कृष्ण की सेवा-पूजा विशेष रूप से करते हैं, इसलिए कृष्ण के नाम से वे शांति पाएँगे और शांत होंगे। उन्होंने हनुमान जी को वरदान दिया है, तो हनुमान जी की सेवा-पूजा करेंगे तो शांति मिलेगी। वे शिव जी के शिष्य हैं, तो शिव पूजन करेंगे तो शांति मिलेगी। और इन सबसे ऊपर, अगर आप जगदंबा की सेवा करें तो कोई ग्रह आपको इस तरह परेशान नहीं करेगा; प्रारब्ध का होना अलग बात है, पर ग्रहों से आने वाली पीड़ा नहीं आएगी।
क्यों, वक्ता पूछते हैं, और उत्तर देते हैं: भगवान शनि के आराध्य नारायण हैं। उन्होंने कृष्ण जी की पूजा की, कृष्ण जी की सेवा की; गोलोक जाकर उन्होंने शांति पाई। इसलिए वे कृष्ण की सेवा-पूजा विशेष रूप से करते हैं, और कृष्ण के नाम से ही वे शांति पाएँगे, शांत हो जाएँगे। उन्होंने हनुमान जी को वरदान दिया है: हनुमान जी की सेवा-पूजा कीजिए और आपको शांति मिलेगी। वे शिव जी के शिष्य हैं: शिव पूजन कीजिए और आपको शांति मिलेगी। और इन सबसे ऊपर — जगदंबा की सेवा कीजिए, और कोई ग्रह आपको इस तरह परेशान नहीं करेगा। प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। का होना अलग बात है; पर जो पीड़ा ग्रहों की होती है, वह पीड़ा नहीं होगी।
क्या स्त्रियाँ शंख बजा सकती हैं?
दो मत; उनका अपना मत है कि केवल गर्भवती स्त्री न बजाए
वक्ता कहते हैं, दो मत प्रचलित हैं। कहीं कहा जाता है बजा सकती हैं, कहीं कि नहीं; न बजाने के पीछे तर्क यह दिया जाता है कि गर्भाशय पर असर पड़ता है। पर वे कहते हैं, यहाँ सबसे सच्ची बात यह है: अगर ऐसा होता, तो बंगाल क्षेत्र में तो सबसे ज़्यादा स्त्रियाँ ही शंख बजाती हैं। उनका अपना मत बस इतना है — कि गर्भवती स्त्री को कभी शंख नहीं बजाना चाहिए, क्योंकि गर्भ पर असर, दबाव पड़ सकता है। बाकी, सामान्यतः कोई भी शंख बजा सकता है। और पांचजन्य जैसे शंख के लिए निषेध रहता है, क्योंकि उसमें ज़्यादा ज़ोर लगाना पड़ता है।
पूछे जाने पर कि क्या स्त्रियाँ शंख बजा सकती हैं, वक्ता कहते हैं कि इस पर दो तरह के मत प्रचलित हैं। कहीं कहते हैं बजा सकती हैं, कहीं कहते हैं नहीं बजा सकतीं। न बजाने के पीछे तर्क यह दिया जाता है कि गर्भाशय पर असर पड़ता है। पर यहाँ सबसे सच्ची बात यह है: अगर ऐसा होता, तो बंगाल क्षेत्र में तो सबसे ज़्यादा स्त्रियाँ ही शंख बजाती हैं। उन्होंने साधना के दौरान यह देखा है, पश्चिम बंगाल में काफी दिन रहकर। वे शंख बजाकर ऐसा शोर करती हैं; जब तक पूजा चलती है, लगातार बजाती रहती हैं। और जहाँ भी लड़कियों की शंख बजाने की प्रतियोगिता होती है, सबसे ज़्यादा बंगाली लड़की जीतती है। यह भी उन्होंने देखा है — दुर्गा पूजा में वहाँ शंख बजाने की प्रतियोगिता होती है। तो इस हिसाब से बंगाल क्षेत्र में वंश वृद्धि ही रुक जानी चाहिए। उनके अनुसार बस इतना है: कि जो स्त्री गर्भवती है उसे कभी शंख नहीं बजाना चाहिए, क्योंकि गर्भ पर असर पड़ सकता है, दबाव पड़ सकता है। बाकी, सामान्य रूप से कोई भी शंख बजा सकता है। पांचजन्य शंख आदि के लिए निषेध रहता है, क्योंकि उसमें ज़्यादा ज़ोर लगाना पड़ता है।
भैरव पूजन कुलदेवी पूजन से पहले हो या बाद में?
पहले भैरव, बाद में कुलदेवी
वक्ता कहते हैं, पहले भैरव पूजन कीजिए। उसके बाद कुलदेवी का पूजन कीजिए। भैरव जी का पूजन पहले होगा। अलग से पूछे जाने पर कि क्या मंत्र तंत्र नाम का कोई ग्रंथ है, वे कहते हैं कि बहुत से ग्रंथ हैं।
पूछे जाने पर कि क्या मंत्र तंत्र नाम का कोई ग्रंथ है, वक्ता कहते हैं कि बहुत से ग्रंथ हैं। पूछे जाने पर कि भैरव पूजन कुलदेवी से पहले करना चाहिए या कुलदेवी के पूजन के बाद, वे उत्तर देते हैं: पहले भैरव पूजन कीजिए। उसके बाद कुलदेवी का पूजन कीजिए। भैरव जी का पूजन पहले किया जाएगा।
अगर स्त्री को ॐ नहीं बोलना चाहिए, तो उन मंत्रों का क्या जो ॐ से शुरू होते हैं?
जप वर्जित है; उच्चारण चलेगा — देवी प्रणव का प्रयोग कीजिए
वक्ता कहते हैं, बहुत अच्छा प्रश्न है। जिस मंत्र का आप पाठ कर रहे हैं उसके आरंभ में जहाँ भी ॐ है — अपने वीडियो में उन्होंने यह कहा है: देवी प्रणव का जप कीजिए। जप वर्जित है; उच्चारण चलेगा। पर अगर आपको बार-बार ज़्यादा करना है, तो देवी प्रणव लगाकर कीजिए। उसका पाठ देवी प्रणव के साथ कीजिए।
भैरव देवदान में आठ स्थानों के प्रसाद का क्या किया जाए?
आठ स्थानों का परिवार में बाँटिए, दीपक के नीचे वाला कुत्ते को
आठ स्थानों का प्रसाद परिवार के साथ सबमें बाँटना है। और जो प्रसाद दीपक के नीचे है, वह कुत्ते को जाता है।
एक श्रोता बताता है कि जिन दिनों वह ब्रह्म कवच और बटुक भैरव के शतनाम का पाठ करता था, छोटे-बड़े उल्लू आकर घर के आसपास चक्कर लगाते और हर दिशा से उसे घूरते; और पूछता है कि बाद में भैरव देवदान में आठ स्थानों के प्रसाद और दीपक के नीचे वाले प्रसाद का क्या करना है। आठ स्थानों का प्रसाद परिवार के साथ सबमें बाँटना है, वक्ता कहते हैं। और जो प्रसाद दीपक के नीचे होगा, वह कुत्ते को जाता है।
क्या बटुक हृदय का हवन तिल के लड्डू की जगह घी और गुग्गुल से हो सकता है?
हाँ, हृदय के लिए हो सकता है
हाँ, कीजिए, वक्ता कहते हैं — हृदय का घी और गुग्गुल से हो सकता है। वे यह भी बताते हैं कि भगवान शिव के अमोघ कवच का वीडियो चैनल पर है।
भगवान शिव के अमोघ कवच के वीडियो के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि अमोघ कवच का वीडियो चैनल पर है। बटुक हृदय वाले वीडियो में, तिल के लड्डू के हवन की जगह, क्या घी और गुग्गुल से किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर — हाँ, कीजिए, वे कहते हैं। हृदय का घी और गुग्गुल से किया जा सकता है।
क्या गोबर के उपलों पर घी से हनुमान चालीसा का हवन हो सकता है, और गीता दान का क्या?
हवन हाँ; और गीता दान करने से अच्छा, एक श्लोक आगे भेजिए
गोबर के उपलों पर घी से हनुमान चालीसा का हवन बिल्कुल किया जा सकता है। एक श्रोता के इस आह्वान पर कि आने वाली गीता जयंती पर सब 108 गीता दान करें: दान क्यों, वक्ता पूछते हैं — दी गई गीता कौन पढ़ता है? आप गीता दान करेंगे और सामने वाला पढ़ेगा। इससे अच्छा होगा कि गीता जयंती पर कोई एक श्लोक ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को भेजिए, या खुद एक श्लोक गाकर आगे भेजिए, या अपने फेसबुक पर डालिए। यह कहीं अच्छा होगा। अगर आप गीता दान में देंगे, तो कोई ले लेगा और जीवन में कभी नहीं पढ़ेगा; ज़्यादा से ज़्यादा रखकर घंटी बजाएगा और उसकी पूजा करने लगेगा।
पूछे जाने पर कि क्या गोबर के उपलों पर घी से हनुमान चालीसा का हवन किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं: बिल्कुल किया जा सकता है। एक श्रोता लिखता है कि गीता जयंती आ रही है और सबसे अनुरोध करता है कि अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार 108 गीता दान करें। दान क्यों, वक्ता पूछते हैं। दान में मिली गीता कौन लेकर पढ़ता है? आप गीता दान करेंगे और सामने वाला पढ़ेगा। इससे अच्छा यह होगा: गीता जयंती के दिन कोई एक श्लोक जितने लोगों को भेज सकें भेजिए, या खुद एक श्लोक गाकर आगे भेजिए, या अपने फेसबुक पर डालिए। यह बहुत अच्छा होगा। अगर आप किसी को गीता दान में देंगे, तो वह ले लेगा और जीवन में कभी नहीं पढ़ेगा। ज़्यादा से ज़्यादा वह उसे रखेगा, उस पर घंटी बजाएगा और पूजा करने लगेगा।
दिन में बारह घंटे काम करने वाला व्यक्ति क्या करे जब रोज़ जप संभव न हो?
हनुमान जी के बारह नामों का स्तोत्र, सुबह-शाम बारह बार
वक्ता कहते हैं, बस दो काम कीजिए। हनुमान जी का एक स्तोत्र है जिसमें उनके बारह नाम बताए गए हैं — वे बारह नाम याद कर लीजिए। सुबह उठते ही उसका बारह बार पाठ कीजिए; या नहाकर, सुबह, बारह बार पाठ कीजिए। इसमें दो-तीन मिनट लगेंगे। शाम को या रात को, जब भी घर आएँ, हाथ-पैर धोकर, कपड़े बदलकर और तरोताज़ा होकर, दीपक जलाइए और फिर से उस स्तोत्र का बारह बार पाठ कीजिए। बस इतना कीजिए।
एक श्रोता लिखता है कि उसका काम बारह घंटे का है, थकान के कारण रोज़ जप नहीं हो पाता, और वह साधना में नियमितता नहीं रख पाता। कोई दिक्कत नहीं, वक्ता कहते हैं। आपका बारह घंटे का काम है; उसके बाद आपका सारा समय आने-जाने में, खाने-पीने में, सोने में जाता होगा — वे समझते हैं। बस दो काम कीजिए। आपके जो भी आराध्य हों — उदाहरण के लिए मान लीजिए आपके आराध्य हनुमान जी हैं। हनुमान जी का एक स्तोत्र है जिसमें उनके बारह नाम बताए गए हैं। वे बारह नाम याद कर लीजिए। सुबह, जब नींद से उठें, उस समय उसका बारह बार पाठ कीजिए। या नहाकर, सुबह बारह बार पाठ कीजिए। इसमें आपको दो-तीन मिनट लगेंगे। शाम को या रात को, जब भी घर लौटें, उस समय भी, हाथ-पैर धोकर, कपड़े बदलकर और तरोताज़ा होकर, फिर दीपक जलाइए और उस स्तोत्र का फिर से बारह बार पाठ कीजिए। बस इतना कीजिए।
ऐसे व्यक्ति को खाली समय मिले तो क्या करना चाहिए?
ज़्यादा जप, अनुष्ठान, और नींद तक नाम दोहराना जब तक अजपा जप शुरू न हो
और जब भी छुट्टी मिले, जब भी कोई खास समय मिले, उसी स्तोत्र का जितना हो सके जप कीजिए — 108 कीजिए, और ज़्यादा करना चाहें तो ज़्यादा कीजिए, अनुष्ठान कीजिए। जब भी संभव हो, उन बारह नामों को मन में बार-बार कहने का अभ्यास कीजिए। सोते समय, जब बिस्तर पर जाएँ, उसी नाम को बोलते हुए सो जाइए। जीवन में ऐसा समय आए कि आपके मन में अपने आप उनके नाम का अजपा जप शुरू हो जाए।
और जब भी छुट्टी मिले, जब भी कोई खास समय मिले, उसी स्तोत्र का जितना हो सके जप कीजिए, वक्ता कहते हैं। 108 कीजिए; और ज़्यादा करना चाहें, तो ज़्यादा कीजिए — अनुष्ठान कीजिए। इतना कीजिए, और जब भी हो, प्रयास कीजिए: उन बारह नामों को मन के भीतर बार-बार कहने का अभ्यास कीजिए। सोते समय, जब बिस्तर पर जाएँ, उसी नाम को बोलते हुए सो जाइए। आपके जीवन में ऐसा समय आए कि आपके मन के भीतर अपने आप उनके नाम का अजपा जप शुरू हो जाए। यह कीजिए।
किराए के घर में कुलदेवी की सेवा कैसे करें?
नित्य सेवा-पूजा हाँ; प्रतिष्ठा नहीं
आप नित्य सेवा-पूजा कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं। बस प्रतिष्ठा मत कीजिए — इतना ही।
एक श्रोता पूछता है कि उसके किराए के घर में जो कुलदेवी महारानी जी और महाराज जी हैं, उनकी नित्य सेवा-पूजा कैसे करे। आप नित्य सेवा-पूजा कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं। बस प्राण प्रतिष्ठा मत कीजिए — बस इतना।
जब पाँच देवियाँ सवारी बनकर आएँ और हटाई न जा सकें तो क्या करना चाहिए?
सोखा-ओझा का चक्कर छोड़िए और किसी साधक से कवच अनुष्ठान करवाइए
वक्ता श्रोता से कहते हैं: अगर ऐसी स्थिति है और आप उसे उतरवाना चाहते हैं, तो सोखा और ओझा का यह सारा चक्कर छोड़िए; और अगर देवियाँ आप पर ऐसी स्थिति में हैं, तो किसी कवच का जप अनुष्ठान करवाइए — और केवल किसी साधक से ही करवाइए। वह सब करवाइए। सोखैती और ओझैती के चक्कर में, आप जो कुछ कह रहे हैं उससे, एक दिन आपका जीवन खतरे में पड़ जाएगा; यह कठिनाई की बात बन जाएगी।
एक श्रोता लिखता है कि उस पर पाँच देवियों की सवारी आती है, कि जब उन्होंने उसे घर में बैठी नकारात्मकता दिखाई तो घर वालों ने उसे बहुत कुछ कहा, कि जब उसने उतारने की कोशिश की तो किसी को उतारा नहीं जा सका, और अब उसका मन अनियंत्रित हो गया है। आपकी स्थिति बहुत खतरनाक हो गई है, वक्ता कहते हैं। वे बस इतना कहेंगे: अगर ऐसी स्थिति है और आप उसे उतरवाना चाहते हैं, तो सोखा और ओझा का यह सारा चक्कर छोड़कर, अगर देवियाँ आप पर ऐसी स्थिति में हैं, तो किसी कवच का जप अनुष्ठान करवाइए — और केवल किसी साधक से ही करवाइए। वह सब करवाइए। सोखैती और ओझैती के चक्कर में, आप जो कुछ कह रहे हैं उससे, एक दिन आपका जीवन खतरे में पड़ जाएगा। यह कठिनाई की बात बन जाएगी।
क्या चामुंडा के लिए भेंट काली मंदिर में दी जा सकती है?
काली मंदिर में चामुंडा के नाम पर दी जा सकती है
एक श्रोता, जिसकी कुलदेवी चामुंडा हैं, पूछता है कि उसके भैरव कौन होंगे, और क्या बड़ी दुर्गा मंदिर की जगह काली मंदिर में चामुंडा के नाम पर भेंट दी जा सकती है — दी जा सकती है, वक्ता कहते हैं। दी जा सकती है।
एक श्रोता लिखता है कि उसकी कुलदेवी चामुंडा हैं, और पूछता है कि उसके भैरव कौन होंगे। पूछे जाने पर कि क्या बड़ी दुर्गा मंदिर की जगह काली मंदिर में चामुंडा के नाम पर दिया जा सकता है — दिया जा सकता है, वक्ता कहते हैं। दिया जा सकता है।
पेठा कैसे चढ़ाया जाता है, और क्या हनुमान जी को लौंग बलि दी जा सकती है?
सामान्य विधि, पर मंदिर में करना बेहतर
अगर पेठा चढ़ाना है, तो उसकी विधि सामान्य ही रहेगी; पर अगर किसी मंदिर में करवाएँ तो बेहतर है।
पूछे जाने पर कि क्या हनुमान जी के लिए लौंग बलि की जा सकती है, और पेठा किस तरह चढ़ाया जाता है और मंत्र जप किया जाता है, वक्ता उत्तर देते हैं: अगर पेठा चढ़ाना है, तो उसकी विधि सामान्य ही रहेगी। पर अगर किसी मंदिर में करवाएँ, तो वह बेहतर है।
कैसे पता चले कि जप सही दिशा में जा रहा है?
जब नहीं जा रहा, तो उथल-पुथल बढ़ती है
अगर जप सही दिशा में नहीं जाता, वक्ता कहते हैं, तो उथल-पुथल ज़्यादा होगी। जब मंत्र जप गलत जाने लगता है, तब उथल-पुथल ज़्यादा होने लगती है।
पूछे जाने पर कि कैसे पता चलेगा कि जप सही दिशा में जा रहा है या नहीं, वक्ता उत्तर देते हैं: अगर जप सही दिशा में नहीं जाता, तो उथल-पुथल ज़्यादा होगी। जब मंत्र जप गलत जाने लगता है, तब उथल-पुथल बढ़ने लगती है।
क्या जहाँ शिवलिंग या रुद्राक्ष हो, वहाँ प्रेत और पिशाच की पकड़ छूट जाती है?
वे शिव के गण हैं — वहाँ पूजा नहीं ले सकते
हाँ, बिल्कुल, वक्ता कहते हैं। जहाँ नर्मदेश्वर शिवलिंग हो, भगवान शिव से जुड़ा जो कुछ भी हो, जहाँ रुद्राक्ष हो और रुद्राक्ष धारण करने वाला हो — क्योंकि जितने भी भूत, प्रेत और पिशाच हैं, वे शिव जी के गण हैं; वास्तव में वे सभी देवताओं के गण हैं — तो वे वहाँ पूजा नहीं ले पाएँगे। उन्हें वहाँ शांति मिलेगी; वे शांत हो जाएँगे। न वे ले पाएँगे, न कुछ कर पाएँगे। पर प्रयास अलग-अलग तरीकों से चलेगा: अगर वे नहीं ले सकते, तो और भी चीज़ें हैं, और तांत्रिक उनका प्रयोग करेंगे। बहुत सी चीज़ें हैं।
पूछे जाने पर कि क्या गुरु दीक्षा के बाद की पूजा से नकारात्मकता को शांति मिलती है, वक्ता कहते हैं कि ज़रूर मिलती है — क्यों नहीं मिलेगी? गुरु भी उसके अनुसार मार्ग दिखाएँगे। पूछे जाने पर कि अगर घर में शिवलिंग की पूजा हो, तो क्या भूत-प्रेत वह पूजा नहीं ले सकते और वहाँ बचा जा सकता है — हाँ, बिल्कुल, वे कहते हैं। चाहे नर्मदेश्वर शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। हो, भगवान शिव से जुड़ा जो कुछ भी हो, चाहे रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । हो और रुद्राक्ष धारण करने वाला हो — क्योंकि जितने भी भूत, प्रेत और पिशाच हैं, वे शिव जी के गण हैं। वास्तव में वे सभी देवताओं के गण हैं। इसलिए वे वहाँ पूजा नहीं ले पाएँगे। उन्हें वहाँ शांति मिलेगी, वे शांत हो जाएँगे। न वे ले पाएँगे, न कुछ कर पाएँगे। पर प्रयास अलग-अलग तरीकों से चलेगा। अगर वे नहीं ले सकते, तो और भी चीज़ें हैं, और तांत्रिक उनका प्रयोग करेंगे। बहुत सी चीज़ें हैं।
बावन प्रकार के वीरों से रक्षा किससे होती है?
सर्वेश्वर भैरव, अघोर रूप, हनुमान के रूप, प्रत्यंगिरा, काली, अग्नि गायत्री
वक्ता कहते हैं, बावन प्रकार के वीर बताए गए हैं; और अगर किसी पर बावन प्रकार के वीर लगा दिए जाएँ, तो उसका बचना कठिन है। अगर सच में ऐसा है, तो सर्वेश्वर भैरव की कृपा से रक्षा हो सकती है। भगवान महादेव के अघोर स्वरूप से रक्षा हो सकती है। पंचमुखी, सप्तमुखी, एकादशमुखी हनुमान के प्रयोग से रक्षा हो सकती है। भगवती प्रत्यंगिरा से रक्षा हो सकती है। काली जी के सबसे उग्र रूपों की सहायता से रक्षा हो सकती है। और गायत्री के भीतर अग्नि गायत्री के जप से — यानी मूल गायत्री की अग्नि गायत्री — शांति भी हो सकती है और रक्षा भी।
बावन प्रकार के वीर बताए गए हैं, वक्ता कहते हैं। अगर किसी पर बावन प्रकार के वीर लगा दिए जाएँ, तो उसका बचना कठिन है। और अगर सच में ऐसा है, तो सर्वेश्वर भैरव की कृपा से रक्षा हो सकती है। भगवान महादेव के अघोर स्वरूप से रक्षा हो सकती है। हनुमान जी के पंचमुखी, सप्तमुखी और एकादशमुखी रूपों के प्रयोग से रक्षा हो सकती है। भगवती महाप्रत्यंगिरा से रक्षा हो सकती है। काली जी के सबसे उग्र स्वरूपों की सहायता से रक्षा हो सकती है। और गायत्री के भीतर की अग्नि गायत्री से — यानी मूल गायत्री की अग्नि गायत्री आदि के जप से — शांति भी हो सकती है और रक्षा भी।
काल संकर्षण तंत्रोक्त स्तोत्र के कितने पाठ करने चाहिए?
एक सावधानी — वहाँ अष्टोत्तर में केवल 105 नाम हैं, और गुरु कृपा चाहिए
काल संकर्षण तंत्रोक्त के लिए वे कुछ नहीं कह सकते, वक्ता उत्तर देते हैं, क्योंकि वही बात फिर खड़ी होगी: उसमें भी बीज मंत्र है, उसके भीतर मूल बीज दिया है। और इस पर ध्यान दीजिए — अलग-अलग करने पर 108 नाम नहीं, केवल 105 हैं। अगर मूल स्तोत्र मिले तो उसमें 108 मिलेंगे: काल संकर्षण तंत्रोक्त बटुक भैरव स्तोत्र। एक बार पढ़कर देखिए; केवल 105 होंगे। अगर आपके पास मूल किताब, मूल ग्रंथ हो, तो उसमें 108 मिलेंगे। नहीं तो इसे अष्टोत्तर कहा जाता है, पर वहाँ तीन नाम कम मिलते हैं। और चूँकि इसमें मूल मंत्र और बाकी सब दिया है, वहाँ गुरु कृपा ज़रूरी हो जाती है।
पूछे जाने पर कि काल संकर्षण तंत्रोक्त के कितने पाठ करने चाहिए और क्या सिद्धि जगानी चाहिए, वक्ता कहते हैं कि काल संकर्षण तंत्रोक्त के लिए वे कुछ नहीं कह सकते — वही बात फिर खड़ी होगी। क्योंकि उसमें भी बीज मंत्र (बीज मंत्र) है; उसके भीतर जो मूल बीज दिया है, वह आप जानते होंगे। और एक बात और है: यह अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। है, पर इस पर ध्यान दीजिए — अलग-अलग करने पर 108 नाम नहीं हैं, केवल 105 हैं। अगर आपको मूल स्तोत्र मिले, तो उसमें 108 मिलेंगे: आपने जिस काल संकर्षण तंत्रोक्त बटुक भैरव स्तोत्र की बात की है। एक बार पढ़कर देखिए; केवल 105 होंगे। अगर आपके पास मूल किताब, मूल ग्रंथ हो, तो उसमें 108 मिलेंगे। नहीं तो यह अष्टोत्तर है, पर वहाँ तीन नाम कम मिलते हैं। और चूँकि इसमें मूल मंत्र और बाकी सब दिया है, उस जगह गुरु कृपा ज़रूरी हो जाती है।
नकारात्मक विचारों का आध्यात्मिक उपाय क्या है?
शिव पूजा से चंद्रमा को बलवान कीजिए
वक्ता कहते हैं, भगवान शिव की पूजा कीजिए और चंद्रमा को बलवान कीजिए। शिव पूजा से चंद्रमा बलवान होगा।
नकारात्मक विचारों का आध्यात्मिक उपाय पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: भगवान शिव की पूजा कीजिए; चंद्रमा को बलवान कीजिए। शिव पूजा से चंद्रमा बलवान होगा।
क्या पितरों को जल अलग से देना ज़रूरी है?
तुलसी को दिया जल पितरों और देवों, दोनों को तृप्त करता है
पितरों के लिए अलग से जल देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, वक्ता श्रोता से कहते हैं। तुलसी जी को जल दीजिए, पितर अपने आप तृप्त हो जाएँगे। तुलसी जी का स्वरूप, जो भगवती का स्वरूप है, पितरों और देवों दोनों को तृप्त करता है। अलग से कुछ कहने की ज़रूरत नहीं; बस उनका मंत्र बोलना है — "महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्य दायनी आधि व्याधि जरा मुक्ति तुलसी त्वम नमस्तुते"। बस इतना बोलकर जल दीजिए। पितरों के लिए तिल और गुड़ का अलग प्रयोग मत कीजिए।
पितरों के लिए अलग से जल देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, वक्ता श्रोता से कहते हैं। तुलसी जी को जल दीजिए; पितृ अपने आप तृप्त हो जाएँगे। तुलसी जी का स्वरूप, जो भगवती का स्वरूप है, पितरों और देवों दोनों को तृप्त करता है। आपको अलग से कुछ नहीं कहना है; बस उनका मंत्र बोलना है: महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्य दायनी आधि व्याधि जरा मुक्ति तुलसी त्वम नमस्तुते। बस इतना बोलकर जल दीजिए। पितरों के लिए तिल और गुड़ का अलग प्रयोग मत कीजिए।
रविवार को जल सूर्य को जाता है, जो पिता के कारक हैं, और उससे पितर तृप्त होते हैं
सूर्य को दिया जल भी पितरों को तृप्त करता है — वे पिता के कारक हैं
रविवार को आप नहीं देंगे, वक्ता कहते हैं — तो आप सूर्य को जल देंगे। सूर्य को जल देने से भी पितर तृप्त होते हैं। सूर्य पिता के कारक ग्रह हैं। और अच्छी नौकरी के लिए: सूर्य पूजन से अच्छी नौकरी, ईशान शिव की पूजा से अच्छी नौकरी, अपनी कुलदेवी की पूजा से अच्छी नौकरी; हनुमान जी की सेवा-पूजा कीजिए, उससे और भी अच्छी नौकरी।
और रविवार को आप नहीं देंगे, वक्ता कहते हैं — तो आप सूर्य को जल देंगे। सूर्य को जल देने से भी पितर तृप्त होते हैं। सूर्य पिता के कारक ग्रह हैं। सूर्य पूजन से अच्छी नौकरी। ईशान शिव की पूजा से अच्छी नौकरी। अपनी कुलदेवी की पूजा से अच्छी नौकरी। हनुमान जी की सेवा-पूजा कीजिए, और उससे और भी अच्छी नौकरी।
जब पूजा में मन बिल्कुल न लगे तो क्या करना चाहिए?
उच्चाटन ज़्यादा हो तो कुछ दिन पूजा छोड़िए और तीर्थ यात्रा कीजिए
अगर उच्चाटन बहुत हो रहा है, तो कुछ दिन पूजन-पाठ छोड़ दीजिए, वक्ता कहते हैं। नाम जप आदि कीजिए। और हो सके तो किसी तीर्थ की यात्रा कीजिए — ज़रूरी नहीं कि दूर जाएँ; आपके आसपास भी कोई अच्छी जगह होगी, वहाँ जाइए, वहाँ पूजा दीजिए। अगर कोई शक्ति पीठ पास हो और संभव हो, तो वहाँ जाकर पूजा दीजिए। उच्चाटित मन शांत हो जाएगा।
एक श्रोता लिखता है कि पहले पूजा-पाठ में बहुत मन लगता था, पर अब मन उसमें बिल्कुल नहीं लगता और वह पूरा नहीं होता। अगर उच्चाटन बहुत हो रहा है, तो कुछ दिन पूजन-पाठ छोड़ दीजिए, वक्ता कहते हैं। नाम जप आदि कीजिए। और अगर संभव हो, तो किसी तीर्थ की यात्रा कीजिए। ज़रूरी नहीं कि आप दूर जाएँ; आपके आसपास भी कोई अच्छी जगह होगी। वहाँ जाइए, वहाँ पूजा दीजिए। अगर पास में कोई शक्ति पीठ हो और संभव हो, तो वहाँ जाकर पूजा दीजिए। उच्चाटित मन शांत हो जाएगा।
संहार करती नरसिंह मूर्ति के सपने का क्या अर्थ है?
कोई संकट आने वाला है जिस पर नरसिंह की कृपा से विजय मिलेगी
वक्ता कहते हैं, कोई संकट आने वाला है, जिस पर भगवान नरसिंह की कृपा से आप विजय पा सकते हैं।
पूछे जाने पर कि सपने में भगवान नरसिंह की संहार करती मूर्ति देखने का क्या अर्थ है, वक्ता उत्तर देते हैं: कोई संकट आने वाला है। और वह ऐसा है जिस पर, भगवान नरसिंह की कृपा से, आप विजय पा सकते हैं। वे एक अन्य श्रोता से जोड़ते हैं कि अपराजिता स्तोत्र बहुत कठिन है पर वह काट सकता है — वे इसे देंगे और बताएँगे, और उन्हें चिंता नहीं करनी है।
क्या अर्गला का पहला मंत्र प्रणव के साथ बोलना है?
जनेऊ पहनते हैं तो प्रणव के साथ, नहीं तो बिना
अर्गला का पहला मंत्र: अगर आप जनेऊ पहनते हैं तो प्रणव के साथ, और नहीं पहनते तो बिना प्रणव के। इसे देवी प्रणव के साथ भी किया जा सकता है।
अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: अगर आप यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। पहनते हैं, तो प्रणव के साथ; अगर नहीं पहनते, तो बिना प्रणव के। इसे देवी प्रणव के साथ भी किया जा सकता है।
जो हाथ से निकल गया उसे भगवती पर छोड़िए, और फिर खड़े होइए
उलझी बातें भगवती पर छोड़िए, और फिर खड़े होइए
उलझन में मत रहिए, वक्ता कहते हैं — सब सुलझ जाएगा, घबराइए मत। जब बातें उलझ जाएँ और अपने हाथ में न रहें, तो उन्हें ईश्वर के हाथ में, भगवती के हाथ में छोड़ देना चाहिए। अगर आप घबराएँगे, रोएँगे और चिंता करेंगे, तो बस और परेशान होंगे। जो होना था हो गया; जो अभिचार तंत्र करके परेशान करना चाहते थे, उन्होंने अपनी कर ली। अब आपको खड़ा होना है। हारना ठीक है — जैसा उन्होंने पिछले दिन भी कहा था, हार मानकर बैठ नहीं जाना है। रोइए मत। हम फिर खड़े होंगे, फिर चलेंगे, फिर जीतेंगे।
एक श्रोता लिखती हैं कि वे बहुत उलझन में हैं। उलझन में मत रहिए, वक्ता कहते हैं। सब सुलझ जाएगा; घबराइए मत। जब बातें उलझ जाएँ, जब वे अपने हाथ में न रहें, तो उन्हें ईश्वर के हाथ में, भगवती के हाथ में छोड़ देना चाहिए। अगर आप घबराएँगी, रोएँगी, चिंता करेंगी, तो उससे और परेशान होंगी। परेशान मत होइए। जो होना था हो गया। जिन्हें अभिचार तंत्र करके आपको परेशान करना था, उन्होंने अपनी कर ली। अब आपको खड़ा होना है। और इसीलिए, वे कहते हैं, वे इतना समय देते हैं और इतना समझाते हैं: कि आप मज़बूत बनें, सक्षम बनें। इसी के लिए वे इतना बताते हैं, केवल मंत्र देकर यह-वह करो कहकर नहीं। वे सबको उनके इष्ट और आराध्य के बारे में बिंदुवार बताते हैं, ताकि उनमें श्रद्धा, भक्ति और विश्वास बढ़े। तो चिंतित मत होइए; खुद को मज़बूत रखिए। हारना ठीक है — हार मानकर बैठना नहीं है, और रोना नहीं है। हम फिर खड़े होंगे, फिर चलेंगे, फिर जीतेंगे।
मंत्र जप में ध्यान स्थिर न रहे तो क्या करना चाहिए?
त्राटक, और देखने के लिए एक सुंदर फोटो या विग्रह
उसके लिए थोड़ा त्राटक करना चाहिए, वक्ता कहते हैं। थोड़ा अभ्यास कीजिए — पंद्रह-बीस दिन का भी, और स्थिर होने लगेगा। अपने आराध्य की मूर्ति को देखते हुए, उनके चरणों, उनके हाथों, उनकी आँखों को देखते हुए, ध्यान करके फिर पाठ कीजिए — होने लगेगा। और इसके लिए ज़रूरी है कि एक सुंदर फोटो या विग्रह स्थापित हो।
पूछे जाने पर कि मंत्र जप के समय ध्यान बिल्कुल स्थिर न रहे तो क्या करें, वक्ता उत्तर देते हैं: उसके लिए थोड़ा त्राटक करना चाहिए। थोड़ा अभ्यास कीजिए — पंद्रह-बीस दिन का भी — और स्थिर होने लगेगा। अपने आराध्य की मूर्ति को देखते हुए, उनके चरणों को, उनके हाथों को, उनकी आँखों को देखते हुए, ध्यान करके फिर पाठ करते हुए — होने लगेगा। और इसके लिए ज़रूरी है कि एक सुंदर फोटो या विग्रह स्थापित हो।
घर में और मंदिर में कौन सा दीपक और बत्ती प्रयोग करनी चाहिए?
लंबी बत्ती जलानी है; खड़ी बत्ती प्रयोग के समय
लंबी बत्ती से करना चाहिए; लंबी बत्ती जलानी चाहिए। खड़ी बत्ती प्रयोग के समय जलानी चाहिए। आरती के समय आप खड़ी बत्ती, लंबी गोल वाली, लंबी वाली प्रयोग कर सकते हैं।
पूछे जाने पर कि घर में और मंदिर में कौन से दीपक जलाने चाहिए, खड़ी वाली या लंबी रुई वाली, और यह ध्यान दिलाते हुए कि विंध्यवासिनी मंदिर में आरती मोमबत्ती जैसे दीपकों से होती है, वक्ता उत्तर देते हैं: लंबी बत्ती से करना चाहिए; लंबी बत्ती जलानी चाहिए। खड़ी बत्ती प्रयोग के समय जलानी चाहिए। आरती के समय आप खड़ी बत्ती, लंबी गोल वाली, जो लंबी बत्ती होती है, प्रयोग कर सकते हैं।
विंध्यवासिनी मंदिर की आरती में क्या प्रयोग होता है?
चार पहर की आरती, और जमे घी और कपूर का रुआ — मोमबत्ती नहीं
विंध्यवासिनी मंदिर में चार पहर की आरती होती है, वक्ता कहते हैं; और चारों आरतियों की सजावट और श्रृंगार पूरी तरह प्राकृतिक, शुद्ध वस्तुओं से होता है। रुआ भी वहाँ के पंडित खुद बनाते हैं — आप उन्हें मंदिर के पीछे, माता के खज़ाने पर, बैठकर तैयार करते देख सकते हैं। शुद्ध घी में घी डुबोकर, जमाकर, कपूर आदि मिलाया जाता है; यह मोमबत्ती नहीं, रुआ है। इसे जमाया जाता है ताकि यह धीरे-धीरे जले। और इसका प्रयोग केवल विंध्यवासिनी मंदिर में नहीं, दूसरे मंदिरों में भी होता है।
अगर आप विंध्यवासिनी मंदिर में रहते हैं या जाते हैं, तो वहाँ की आरती देखिए, वक्ता कहते हैं: मंदिर में चार पहर की आरती होती है। और चारों आरतियों की सजावट, श्रृंगार, पूरी तरह प्राकृतिक और शुद्ध वस्तुओं से होता है। रुआ भी वे खुद बनाते हैं, वहाँ के पंडे। मंदिर के पीछे, जहाँ माता का खज़ाना है, पंडित जी लोग बैठकर सब बनाते हैं, और तैयार करते हैं। शुद्ध घी में घी डुबोकर जमाया जाता है, कपूर आदि मिलाया जाता है — यह मोमबत्ती नहीं, रुआ है। इसे जमाया जाता है ताकि यह धीरे-धीरे जले। और वह चीज़ केवल विंध्यवासिनी मंदिर में नहीं, दूसरे मंदिरों में भी प्रयोग होती है।
बूढ़ी माई कौन हैं, और बन्नी माता कौन हैं?
एक लोक देवी और लोक योगिनी; और भगवती भद्रकाली
बूढ़ी माई एक लोक देवी, एक लोक योगिनी हैं, वक्ता कहते हैं। और बन्नी माता, जैसा वे पहले बता चुके हैं, भगवती भद्रकाली हैं।
क्या चमड़े का बटुआ या चमड़े के जूते नहीं रखने चाहिए?
हो सके तो कीजिए, पर फैक्ट्री के सेफ्टी शू में संभव नहीं
आज के समय में क्या यह संभव है, वक्ता पूछते हैं — पहले के लोगों के लिए संभव था। अभी जूता ज़्यादातर चमड़े का ही मिलेगा; स्पोर्ट्स शू एक चीज़ है जिसमें यह सब चमड़ा नहीं मिलता। तो अगर आपके लिए संभव है, अगर आप उस तरह का काम नहीं करते, तो बिना चमड़े का जूता पहनिए; बहुत अच्छा होगा। बिना चमड़े का पर्स मिलता है — वह रखिए। पर अगर आप किसी फैक्ट्री आदि में काम करते हैं, तो सेफ्टी शू चमड़े का ही बनता है, और वहाँ यह आपके लिए संभव नहीं होगा।
एक श्रोता लिखता है कि चमड़े का बटुआ नहीं रखना चाहिए, और जूते भी चमड़े के होते हैं। आज के समय में क्या यह संभव है, वक्ता पूछते हैं। पहले के लोगों के लिए संभव था। अभी जूता ज़्यादातर चमड़े का ही मिलेगा। स्पोर्ट्स शू एक चीज़ है जिसमें आपको यह सब चमड़ा नहीं मिलता। तो अगर आपके लिए संभव है, अगर आप उस तरह का काम नहीं करते, तो बिना चमड़े का जूता पहनिए; बहुत अच्छा होगा। बिना चमड़े का पर्स मिलता है — वह रखिए। पर अगर आप किसी फैक्ट्री आदि में काम करते हैं, तो सेफ्टी शू चमड़े का ही बनता है, और वहाँ यह आपके लिए संभव नहीं होगा।
अगर लहसुन और प्याज़ वर्जित हैं, तो क्या हींग और अदरक प्रयोग कर सकते हैं?
छोड़ दीजिए — हींग तीखी है और साधना में परेशान करेगी
आप जीभ के इतने लालची क्यों हो रहे हैं, वक्ता प्रश्नकर्ता से पूछते हैं। अगर वर्जित है तो छोड़ दीजिए — हींग भी काफी तेज़ और तीखी है। तीखा खाएँगे तो गैस की समस्या होगी; साधना में बैठेंगे तो पेट दर्द, कमर दर्द, सिरदर्द होगा। फिर आप कहेंगे कि साधना का बुरा असर हो रहा है, और ये सब बातें नहीं बताएँगे। रही अदरक: अगर कोई समस्या है तो खा सकते हैं; कोई समस्या नहीं है तो छोड़िए, त्याग दीजिए, सादा भोजन खाइए।
पूछे जाने पर कि चूँकि लहसुन और प्याज़ वर्जित हैं, क्या हींग और अदरक का प्रयोग किया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं: आप जीभ पर इतने लालची क्यों हो रहे हैं? अगर वर्जित है, तो छोड़ दीजिए — हींग भी काफी तेज़ और तीखी है। तीखा खाएँगे तो गैस की समस्या होगी। साधना में बैठेंगे तो पेट दर्द, कमर दर्द, सिरदर्द होगा। फिर आप कहेंगे कि साधना का बुरा असर मिल रहा है — और ये सब बातें आप नहीं बताएँगे। रही अदरक: अगर कोई समस्या है, तो खा सकते हैं। अगर कोई समस्या नहीं है, तो छोड़िए, त्याग दीजिए, सादा भोजन खाइए।
क्या लहसुन-प्याज़ खाकर हनुमान जी का जप करना चाहिए, और क्या कोई मंदार तंत्र है?
नहीं; और मंदार विद्या और मंदार तंत्र दो अलग चीज़ें हैं
लहसुन और प्याज़ खाने के बाद हनुमान जी का जप नहीं करना चाहिए, वक्ता कहते हैं। और पूछे जाने पर कि क्या मंदार तंत्र नाम का कोई ग्रंथ है — हाँ है; मंदार विद्या भगवती की एक अंग विद्या है, जिसका अपना अलग मंत्र है, और मंदार तंत्र बिल्कुल अलग चीज़ है।
लहसुन और प्याज़ खाने के बाद हनुमान जी का जप नहीं करना चाहिए, भाई, वक्ता कहते हैं। पूछे जाने पर कि क्या मंदार तंत्र नाम का कोई ग्रंथ है: हाँ, है। मंदार विद्या भगवती की एक अंग विद्या है, और उसका अपना अलग मंत्र है। और मंदार तंत्र बिल्कुल अलग चीज़ है।
घर से साईं की मूर्ति कैसे हटाई जाए?
फेंकिए मत — सफेद कपड़े में लपेटकर, मिठाई देकर, विदा करके विसर्जित कीजिए
बस ले जाकर जल में दे दीजिए, वक्ता कहते हैं। फेंकिए मत — आप कभी श्रद्धा से लाए होंगे। सनातन संस्कृति में कभी किसी शक्ति का अनादर करना नहीं सिखाया गया; हमने कभी किसी का अनादर नहीं किया। चूँकि आप उन्हें लाए हैं, तो यह कीजिए: पूरे सम्मान के साथ उन्हें विदा कीजिए — बाबा, आप अपने स्थान को प्रस्थान करें। उन्हें सफेद कपड़े में लपेटिए, साथ में कुछ मिठाई आदि रखिए, उन्हें बाय-बाय, गुडबाय, टा-टा कहिए, और फिर विसर्जित कर दीजिए।
पूछे जाने पर कि घर में जो साईं की मूर्ति है उसे कैसे फेंकें, वक्ता कहते हैं: बस ले जाकर जल में दे दीजिए। फेंकिए मत। आप कभी श्रद्धा से लाए होंगे। सनातन संस्कृति में कभी किसी शक्ति का अनादर करना नहीं सिखाया गया। हमने कभी किसी का अनादर नहीं किया। चूँकि आप उन्हें लाए हैं, तो एक काम कीजिए: पूरे सम्मान के साथ उन्हें विदा कीजिए — कि बाबा, आप अपने स्थान को प्रस्थान करें। उन्हें सफेद कपड़े में लपेटिए, और उसके बाद साथ में कुछ मिठाई आदि रखिए, उन्हें बाय-बाय, गुडबाय, टा-टा कहिए, और फिर विसर्जित कर दीजिए।
विंध्याचल शक्ति पीठ के भैरव कौन हैं?
एक नहीं, कई — लाल भैरव, बटुक भैरव, और भैरवी के साथ भैरव
जानिए कि विंध्याचल शक्ति पीठ में एक भैरव नहीं हैं, वक्ता कहते हैं। आपका लाल भैरव के दर्शन करना बहुत अच्छी बात है; लाल भैरव भी भैरव हैं। विंध्याचल मंदिर के ठीक बाहर, एक तरफ भगवती शीतला हैं और दूसरी तरफ बटुक भैरव जी — वे माई के प्रमुख लाल हैं, जिन्हें हम चंडी हृदय नंदन कहते हैं। और मंदिर के ठीक सामने वाली सड़क पर, जो कोतवाली की ओर जाती है, आपको दुनिया का एकमात्र मंदिर मिलेगा जहाँ भैरव और भैरवी साथ हैं; उसका अपना माहात्म्य है, और वह पौराणिक युग का है — सृष्टि के आरंभ से माना जाता है। वह भी पुराना पीठ है, और वहाँ भैरव के रूप में मुख्य रूप से वही पूजे जाते हैं।
एक श्रोता पूछता है कि विंध्याचल शक्ति के भैरव कौन हैं, उनका मंदिर कहाँ है, और कहता है कि जब भी वह जाता है, लाल भैरव जी के दर्शन करता है। यह जानिए, वक्ता कहते हैं: विंध्याचल शक्ति पीठ में एक भैरव नहीं हैं। आप लाल भैरव के दर्शन करते हैं, यह बहुत अच्छी बात है; लाल भैरव भी भैरव हैं। विंध्याचल मंदिर के ठीक बाहर, एक तरफ भगवती शीतला हैं, और दूसरी तरफ बटुक भैरव जी हैं — वे माई के प्रमुख लाल हैं, जिन्हें हम चंडी हृदय नंदन कहते हैं। और मंदिर के ठीक सामने वाली सड़क पर, कोतवाली की ओर जाते हुए — उन्होंने शायद कल भी यह बताया था — उधर जाइए, आपको दुनिया का एकमात्र मंदिर मिलेगा जहाँ भैरव और भैरवी साथ हैं। उसका भी पूरा माहात्म्य है, विंध्याचल शक्ति पीठ का, पौराणिक युग से; उसे सृष्टि के आरंभ से माना जाता है। बाद के समय में लोग ये सब बातें अपने ढंग से बताते हैं; पर वह भी पुराना पीठ है, और वहाँ भैरव के रूप में मुख्य रूप से वही पूजे जाते हैं।
विंध्याचल में उस भैरव मंदिर तक कैसे पहुँचें?
सीढ़ियों से नीचे, सीधी सड़क, और कोतवाली के भैरव पूछिए
जब दर्शन करके बाहर आएँ, सीढ़ियों से नीचे उतरते हैं; वहाँ से जो सड़क सीधी जाती है — किसी से भी पूछिए कि कोतवाली के भैरव कहाँ हैं, और उधर जाइए।
पूछे जाने पर कि मंदिर के ठीक सामने किस तरफ से निकलते हैं, वक्ता कहते हैं: जब आप दर्शन करके बाहर आते हैं, सीढ़ियों से नीचे उतरते हैं। वहाँ से जो सड़क सीधी जाती है — किसी से भी पूछिए कि कोतवाली के भैरव कहाँ हैं, और उधर जाइए।
उनकी अपनी कहानी सुनने लायक नहीं — इसकी जगह भगवती की कहानी सुनी जाए
इसकी जगह भगवती की कहानी सुनिए
पूछे जाने पर कि वे इस लाइन में कैसे आए, और यह कहे जाने पर कि उनकी कहानी बहुतों के लिए प्रेरणा होगी, वे कहते हैं: मेरी कहानी से क्या मिलेगा? भगवती की कहानी सुनी जाए — उससे कुछ प्राप्त होगा।
एक श्रोता लिखता है, पूछता है कि वे इस लाइन में कैसे आए, कहता है कि वे उसके जैसे बहुत से लोगों के लिए प्रेरणा हैं, और उनसे अपनी कहानी वीडियो में बताने को कहता है। मेरी कहानी से क्या मिलेगा, वक्ता उत्तर देते हैं। भगवती की कहानी सुनी जाए; उससे कुछ प्राप्त होगा।
जहाँ शत्रु बार-बार मसानी क्रियाएँ करते हों, वहाँ क्या करना चाहिए?
हनुमान चालीसा से हवन, और नरसिंह कवच
अगर आपके घर में यह सब बहुत हो रहा है, वक्ता कहते हैं, तो सबसे पहले हनुमान चालीसा से हवन, और अपनी शक्ति के अनुसार नरसिंह कवच का पाठ — ये दो चीज़ें अपने जीवन में उतारिए। अगर आप ये चीज़ें दो महीने भी लगातार ठीक से करें, तो शत्रु कितना भी बड़ा हो, वह रास्ते पर आ जाएगा।
एक श्रोता लिखता है कि उसके घर में मसानी क्रियाएँ बहुत होती हैं और शत्रु उन्हें करते रहते हैं, और पूछता है कि वह कौन सी साधना करे। अगर आपके घर में यह सब बहुत हो रहा है, वक्ता कहते हैं, तो सबसे पहले हनुमान चालीसा से हवन, और अपनी शक्ति के अनुसार नृसिंह कवच का पाठ। ये दो चीज़ें अपने जीवन में उतारिए। अगर आप यह काम दो महीने भी लगातार ठीक से करें, तो शत्रु कितना भी बड़ा हो — वह रास्ते पर आ जाएगा।
क्या काली को नींबू की माला चढ़ाई जा सकती है, और पंचमुखी हनुमान क्यों रोके गए हैं?
नींबू की माला हाँ; तंत्रोक्त चीज़ें देने से पहले सोचना पड़ता है
काली जी को नींबू की माला बिल्कुल चढ़ाई जा सकती है, वक्ता कहते हैं। पंचमुखी हनुमान के मंत्र और कवच के पूरे विधान के बारे में: राम रक्षा वे पहले ही दे चुके हैं; पंचमुखी हनुमान देने होंगे। पर तंत्रोक्त चीज़ें देने से पहले थोड़ा सोचना पड़ता है — सबके लिए आम तौर पर क्या बताया जाए कि सब कर सकें? क्योंकि सब उसका पालन नहीं करेंगे।
पूछे जाने पर कि क्या काली जी को नींबू की माला चढ़ाई जा सकती है, वक्ता कहते हैं: बिल्कुल, चढ़ाई जा सकती है। राम रक्षा और पंचमुखी हनुमान के मंत्र और कवच का पूरा विधान पूछे जाने पर, वे कहते हैं कि राम रक्षा वे पहले ही दे चुके हैं; पंचमुखी हनुमान देने होंगे। तंत्रोक्त चीज़ें देने से पहले थोड़ा सोचना पड़ता है। आम तौर पर क्या बताया जाए, कि सब उसे कर सकें? क्योंकि सब उसका पालन नहीं करेंगे।
तंत्रोक्त माला क्या है?
निष्कासन से लेकर पूर्ण अभिमंत्रण तक, तंत्रोक्त विधि से
जो माला तंत्रोक्त विधि से सिद्ध की जाती है: उसके निष्कासन से लेकर उसे पूरी तरह अभिमंत्रित करने तक, जो पूरी प्रक्रिया है, वह तंत्रोक्त विधि-विधान से की जाती है।
जो माला तंत्रोक्त विधि से सिद्ध की जाती है, वक्ता कहते हैं — उसके निष्कासन से लेकर उसे पूरी तरह अभिमंत्रित करने तक, जो प्रक्रिया है — वह तंत्रोक्त विधि-विधान से की जाती है।
क्या दरबारी रूप में माँ दुर्गा के साथ काल भैरव की पूजा की जा सकती है?
हाँ; और क्षेत्रपाल निकारी अगले दिन ठंडी की जाती है
दरबारी रूप में माँ दुर्गा के साथ काल भैरव की पूजा बिल्कुल की जा सकती है। और क्षेत्रपाल निकारी को अगले दिन ठंडा करना है — अगर किसी ने नहीं खाई हो।
दरबारी रूप में माँ दुर्गा के साथ काल भैरव की पूजा बिल्कुल की जा सकती है, वक्ता कहते हैं। और क्षेत्रपाल निकारी को अगले दिन ठंडा करना है, अगर किसी ने उसे नहीं खाया हो।
क्या हनुमान और भैरव की साधना एक साथ की जा सकती है?
साधना साथ नहीं — सेवा-पूजा साथ करना अलग बात है
हनुमान जी और भैरव जी की साधना साथ मत कीजिए, वक्ता कहते हैं। उन्हें अलग-अलग कीजिए; सेवा-पूजा साथ कीजिए।
हनुमान जी और भैरव जी की साधना साथ मत कीजिए, वक्ता कहते हैं। उन्हें अलग-अलग कीजिए। सेवा-पूजा साथ कीजिए।
अपने माथे पर किसका तिलक लगाना चाहिए?
श्रृंगार के बाद देवता का ही तिलक — अपने लिए अलग से घिसा हुआ कभी नहीं
आप लगा सकते हैं, वक्ता कहते हैं। वास्तव में विधान यह है कि देवता का श्रृंगार करने के बाद जो तिलक बचे, वही अपने माथे पर लगाना है। अपने लिए अलग तिलक बनाकर नहीं लगाना चाहिए। आचमन या अभिषेक करते समय उन पर जो भी रोली, कुमकुम, अष्टगंध आदि चढ़ाया जाता है — वही उठाकर, इकट्ठा करके रखना चाहिए, और वही माथे पर लगाना चाहिए। उन पर जो चढ़ा है वही है; अपने लिए अलग तिलक नहीं घिसना है। वे कहते हैं, यही शास्त्रोक्त विधान है।
पूछे जाने पर कि क्या श्रृंगार के बाद शिवलिंग पर अष्टगंध लगाकर उसका तिलक लिया जा सकता है, वक्ता कहते हैं: आप लगा सकते हैं। वास्तव में विधान यह है कि देवता का श्रृंगार करने के बाद जो तिलक बचे, वही अपने माथे पर लगाना है। अपने लिए अलग तिलक बनाकर नहीं लगाना चाहिए। जब आप साधारण आचमन या अभिषेक आदि करते हैं, उस समय उन पर जो भी रोली, कुमकुम, अष्टगंध आदि चढ़ाया जाता है — वही उठाकर, इकट्ठा करके रखना चाहिए, और वही माथे पर लगाना चाहिए। उनका जो चढ़ा है वही है; अपने लिए अलग तिलक नहीं घिसना है। यही शास्त्रोक्त विधान है।
सपने में अपने सारे दाँत टूटने का क्या अर्थ है?
पितरों से जुड़ा कारण — सूर्य उपासना कीजिए
दाँत टूटने के पीछे का कारण कहीं न कहीं पितरों से जुड़ा है, वक्ता कहते हैं। थोड़ी सूर्य उपासना कीजिए। और जहाँ बारह वर्ष से अधिक पुराना शिवलिंग हो, उस मंदिर में अपनी शक्ति के अनुसार शिव जी की थोड़ी पूजा कीजिए, अगर लगे कि कठिनाई है।
एक श्रोता लिखता है कि उसने सपने में देखा कि उसके सारे दाँत टूट गए हैं। किसी लड़की को परेशान न करने का मज़ाक करने के बाद, कि नहीं तो वह उसके दाँत तोड़ देगी, वक्ता कहते हैं: दाँत टूटने के पीछे का कारण कहीं न कहीं पितृ से जुड़ा है। थोड़ी सूर्य उपासना कीजिए। और जहाँ भगवान सदाशिव का बारह वर्ष से अधिक पुराना शिवलिंग हो, उस मंदिर में अपनी शक्ति के अनुसार शिव जी की थोड़ी पूजा कीजिए, अगर लगे कि कठिनाई है।
दारिद्र्य दुख दहन शिव स्तोत्र कहाँ बताया गया है, और शिव कवच का वीडियो कहाँ है?
शिवरात्रि के आसपास; और शिव कवच का वीडियो अनलिस्टेड लगता है
पूछे जाने पर कि दारिद्र्य दुख दहन शिव स्तोत्र के पाठ का प्रयोग कैसे करें, वक्ता कहते हैं कि उन्होंने शिवरात्रि के आसपास यह बताया था और वीडियो होगा। यह बताए जाने पर कि शिव कवच का वीडियो नहीं मिल रहा, वे कहते हैं कि अब लगता है वह अनलिस्टेड है, और वे देखेंगे।
पूछे जाने पर कि दारिद्र्य दहन स्तोत्र के पाठ का प्रयोग कैसे करना है, वक्ता कहते हैं कि उन्होंने शिवरात्रि के आसपास यह बताया था; वीडियो होगा। यह बताए जाने पर कि शिव कवच का वीडियो नहीं मिल रहा, वे कहते हैं: तो लगता है वह अनलिस्टेड है। वे उसे देखेंगे।
क्या घर में भैरव का विग्रह रखा जा सकता है?
बटुक भैरव का विग्रह रखा जा सकता है
पूछे जाने पर कि घर में भैरव जी का विग्रह रखने से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, वक्ता कहते हैं कि बटुक भैरव का विग्रह रखा जा सकता है।
पूछे जाने पर कि घर में भैरव जी का विग्रह रखने से पहले किस बात का ध्यान रखें, वक्ता कहते हैं: बटुक भैरव का विग्रह रखा जा सकता है।
क्या बिना किसी मन्नत के, केवल आशीर्वाद के लिए पशु बलि दी जा सकती है?
ज़रूरत नहीं; कोई इच्छा या कारण हो तभी दीजिए
इस तरह उसकी कोई ज़रूरत नहीं, वक्ता कहते हैं। और अगर कोई इच्छा हो, कोई ऐसा कारण हो, तभी दीजिए — वह बेहतर होगा। आशीर्वाद पाने के लिए बलि देने की क्या ज़रूरत है? वे जोड़ते हैं कि उस कर्म के बाद ऊर्जा का क्षय होता है, घिसाव होता है, और इसलिए ऊर्जा नीचे जाती है।
पूछे जाने पर कि जिन मंदिरों में पशु बलि दी जाती है, वहाँ क्या बिना किसी मन्नत के, केवल देवी का आशीर्वाद पाने के लिए बलि दी जा सकती है, वक्ता उत्तर देते हैं: इस तरह उसकी कोई ज़रूरत नहीं। और अगर कोई इच्छा हो, कोई ऐसा कारण हो, तभी दीजिए — वह बेहतर होगा। आशीर्वाद पाने के लिए बलि देने की क्या ज़रूरत है? उस कर्म के बाद ऊर्जा का क्षय होता है, घिसाव होता है, और इसलिए ऊर्जा नीचे जाती है।
दीपक की बत्ती में बनने वाला "फूल" क्या है?
जहाँ तेल बत्ती के ऊपर तक नहीं पहुँचता, वहाँ जमा कार्बन
यह कार्बन है, वक्ता कहते हैं। गोल बत्ती में बत्ती ऊपर की ओर थोड़ी छोटी होती है और तेल भरा रहता है; बार-बार जलने से उसमें कालिख बनना तय है — 99% संभावना है कि बनेगी। जब तेल बत्ती के ऊपरी हिस्से तक ठीक से नहीं पहुँच रहा, तभी वहाँ कार्बन जमने लगता है, और तभी आप कहते हैं कि बत्ती में फूल बन गया। इसमें कुछ खास नहीं। नवरात्र में सबका बनता है, ज़्यादातर लोगों का बनता है; जो इसे साफ नहीं करते उनका बड़ा फूल बनता है, और जो ढक्कन से ढकते हैं उनका और भी बड़ा। एक बड़ा दीपक लीजिए, बत्ती थोड़ी पतली रखिए और तेल भर दीजिए, तो पूरे दिन उस बत्ती में तरह-तरह के फूल बनते रहेंगे।
गोल बत्ती में, वक्ता कहते हैं, बत्ती ऊपर की ओर थोड़ी छोटी होती है और तेल भरा रहता है। बार-बार जलने से उसमें कालिख बनना तय है। 99% संभावना है कि उसमें बनेगी। और उन्होंने पिछले दिन भी यह कहा था: जब तेल बत्ती के ऊपरी हिस्से तक ठीक से नहीं पहुँच रहा होता, तभी वहाँ कार्बन जमने लगता है, और तभी आप कहते हैं कि फूल बन गया, बत्ती में फूल बन गया। इसमें कुछ इतना खास नहीं। नवरात्रि में सबका बनता है, ज़्यादातर लोगों का बनता है। जो इसे साफ नहीं करते, उनका बड़ा फूल बनता है; और जो इसे ढक्कन से ढक देते हैं, उनका और भी बड़ा फूल बनता है। वे साफ कहते हैं: एक बड़ा दीपक लीजिए, बत्ती थोड़ी पतली रखिए, और तेल भर दीजिए। पूरे दिन उस बत्ती में तरह-तरह के फूल बनते रहेंगे।
दीपक की बत्ती का फूल कालिख और कचरा है, और नवरात्र व्रत विधि इसे हटाने को कहती है
कालिख और कचरा — और नवरात्र व्रत विधि इसे हटाने को कहती है
वक्ता कहते हैं, यह बस अपने मन को संतोष देने वाली चीज़ है, और एक वीडियो वायरल हुआ और हज़ारों लोगों ने वही वीडियो बनाकर डाल दिया। फूल वहाँ नहीं बना — आप मूर्ख बन रहे हैं; मूर्ख मत बनिए। अगर बत्ती में फूल बन रहा है, तो इसका अर्थ है कि आप जो भोजन खा रहे हैं उसमें अशुद्धि है; फूल अशुद्धि है। नवरात्र व्रत की पौराणिक बातों में पढ़िए कि दीपक और बत्ती को कैसे ठीक करना है, जमी कालिख कब हटानी है और कौन सा मंत्र बोलना है। अगर वह चीज़ शुभ होती, तो उसमें यह कहा जाता: फूल बन रहा है, बहुत अच्छा है, बनने दो। पर यह कालिख जम रही है; यह कचरा है।
अगर दाँत टूटने का सपना बार-बार आए तो क्या करना चाहिए?
शिव का अभिषेक — हो सके तो रुद्राभिषेक
अगर लगे कि दाँत टूट गए हैं, सपने में जो भी देखा हो, और अगर आप एक से ज़्यादा बार देख रहे हैं, तो शिव जी का अभिषेक ज़रूर कीजिए। अगर आप रुद्राभिषेक करवाएँ, तो बहुत ही अच्छा — पूरे साल इस तरह की जो भी चीज़ें आपके पास आएँगी, सब ठीक हो जाएँगी। नहीं तो अपनी शक्ति के अनुसार खुद शिव जी के किसी पुराने, कम से कम बारह वर्ष पुराने मंदिर में जाइए, और उस मंदिर में अभिषेक कीजिए।
जहाँ एक घर के दो लोगों ने एक ही सपने के बारे में लिखा था, वक्ता कहते हैं कि वे नहीं बता सकते कि किसका दाँत टूटा। अगर दाँत टूट गया है — अगर ऐसा लगे, सपने में आपने जो भी देखा हो — और अगर आप एक से ज़्यादा बार देख रहे हैं, तो शिव जी का अभिषेक ज़रूर कीजिए। अगर आप रुद्राभिषेक करवाएँ, तो बहुत ही अच्छा है; पूरे साल इस तरह की जो भी चीज़ें आपके पास आएँगी, सब ठीक हो जाएँगी। नहीं तो अपनी शक्ति के अनुसार खुद शिव जी के किसी पुराने मंदिर में जाइए — कम से कम बारह वर्ष पुराने — और उस मंदिर में अभिषेक कीजिए।
ऐसे लोगों ने भैरवी नाम को बदनाम किया है — साफ समझिए कि उनका इससे क्या मतलब है
समझिए उनका इससे क्या मतलब है — उन्होंने भैरवी नाम को बदनाम किया है
समझिए भैरवी पूजा का अर्थ क्या है, वक्ता कहते हैं: वे सीधे उनसे अपने साथ गलत, अनुचित काम करने को कह रहे हैं। और ऐसे कपटी लोग, जो दूसरों से इस तरह की चीज़ें करने को कहते हैं, उन्हें जूतों से ही पीटना चाहिए। उन्होंने भैरवी नाम को ही बदनाम कर दिया है। वे साफ कहते हैं कि उनके शरीर पर एक नकारात्मक ऊर्जा है, एक क्षुद्र चीज़, एक नीच और सड़ी हुई चीज़ जो उनके शरीर पर गलत काम कर रही है। वे जोड़ते हैं, लड़कों को भी यह समस्या होती है, पर लड़के जल्दी नहीं बोलते और उनमें अलग डर पनपता है; लड़कियाँ जब इससे बहुत परेशान हो जाती हैं, किसी पर भरोसा करके बोलती हैं, और फिर ये दुष्ट इसे "भैरवी पूजा" का नाम दे देते हैं — कामी, कपटी लोग, जिन्हें गाली देने का मन करे।
एक श्रोता लिखती हैं कि यह चीज़ उनके साथ सीधे नहीं, परोक्ष रूप से, सोते समय हो रही है, और इस समस्या के समाधान के लिए वे जिस भी साधक के पास गईं, उसने उनसे 'भैरवी पूजा' करने को कहा — और पूछती हैं कि इससे कैसे बचें। समझिए भैरवी पूजा का अर्थ क्या है, वक्ता कहते हैं। भैरवी पूजा का अर्थ यह है कि वह सीधे उनसे अपने साथ गलत, अनुचित काम करने को कह रहा है। और ऐसे कपटी लोग, जो दूसरों से इस तरह की चीज़ें करने को कहते हैं, उन्हें जूतों से ही पीटना चाहिए। उन्होंने भैरवी नाम को ही बदनाम कर दिया है। उनके शरीर पर एक नकारात्मक ऊर्जा है; उस पर एक क्षुद्र चीज़ है, एक नीच और सड़ी हुई चीज़ उनके शरीर पर है जो गलत काम कर रही है। वे जोड़ते हैं, लड़कों को भी यह समस्या होती है, और लड़के जल्दी नहीं बोलते — उनमें अलग डर पनपता है। लड़कियाँ जब इससे बहुत परेशान हो जाती हैं, किसी पर भरोसा करके बोलती हैं, और फिर ये दुष्ट इसे भैरवी पूजा का नाम दे देते हैं: कामी, कपटी लोग, जिन्हें गाली देने का मन करे।
क्षुद्र/नकारात्मक ऊर्जा से परेशान स्त्री के लिए वक्ता कौन सी अपामार्ग धूनी बताते हैं?
सरसों, लाल गुंजा, काली मिर्च, कपूर और गुग्गुल, गोबर के उपले पर
पहला काम: अपामार्ग की समिधा घर में लाइए। और रोज़ सरसों, लाल गुंजा, काली मिर्च और कपूर — सरसों लेनी है, काली मिर्च लेनी है, रक्त गुंजा लेनी है, और कपूर, साथ में थोड़ा गुग्गुल। इन सबको मिलाकर कूटिए। कूटने के बाद गोबर का उपला जलाइए; दस मिनट अच्छे से जलने और दहकने दीजिए; फिर अपामार्ग की लकड़ी सरसों के तेल या घी, किसी एक में डुबोकर आग पर रखिए ताकि वह थोड़ी जले। जब जलने लगे, तो जल्दी-जल्दी हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए उस पर मिश्रण डालते रहिए। स्वाहा कहने की ज़रूरत नहीं — हनुमान चालीसा का साधारण पाठ कीजिए और बनाई हुई सारी सामग्री डालते जाइए। जब पूरा धुआँ उठने लगे और हनुमान चालीसा का पाठ पूरा हो, तो वह धुआँ पूरे घर में दिखाइए, और जहाँ वे सोती हैं, वहाँ रखकर छोड़ दीजिए।
आप एक काम कीजिए, वक्ता उनसे कहते हैं: आपको इस तरह की परेशानी है, तो सबसे पहला काम कीजिए — अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की समिधा घर में लाइए। और रोज़: सरसों, लाल गुंजा, काली मिर्च और कपूर। इसका एक वीडियो चैनल पर भी है, वे कहते हैं, और वे उनसे अलग से संपर्क कर सकती हैं; अगर उन्हें याद न रहे तो वे लिखकर दे देंगे। सरसों लेनी है, काली मिर्च लेनी है, रक्त गुंजा लेनी है, और कपूर, साथ में थोड़ा गुग्गुल। इन सबको मिलाइए, कूटिए। कूटने के बाद गोबर का उपला जलाइए। दस मिनट जलने दीजिए, अच्छे से दहकने दीजिए; फिर अपामार्ग की लकड़ी सरसों के तेल में या घी में, किसी एक में डुबोकर आग पर रखिए ताकि वह थोड़ी जले। जब वह जलने लगे, तो जल्दी-जल्दी हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए उस पर डालना है। स्वाहा कहने की ज़रूरत नहीं। हनुमान चालीसा का साधारण पाठ कीजिए और बनाई हुई सारी सामग्री उस पर डालते जाइए। इतना कीजिए; और जब पूरा धुआँ उठने लगे और हनुमान चालीसा का पाठ पूरा हो जाए, तो वह धुआँ पूरे घर में दिखाइए, और जिस जगह आप सोती हैं, वहाँ रखकर छोड़ दीजिए।
(नकारात्मक ऊर्जा की पीड़ा के लिए) अपामार्ग धूनी कितने समय तक करनी चाहिए, और अगर कुछ दिन न कर पाएँ तो?
लगातार, सुबह-शाम; चार-पाँच दिन छोड़े जा सकते हैं
यह काम लगातार कीजिए, वक्ता कहते हैं। महीने के जिन चार-पाँच दिनों में आप नहीं कर पाएँगी, उस कठिनाई का तनाव नहीं लेना है — चाहें तो किसी और से करवा सकती हैं, और कोई न करे तो उन दिनों छोड़ दीजिए; बाकी समय आराम से कीजिए। एक महीने, डेढ़ महीने में पहले दिन से ही आपको इसका शुभ असर मिलने लगेगा; और एक महीना, इकतालीस दिन पूरे होते-होते यह चीज़ हमेशा के लिए आपके शरीर के पास से चली जाएगी, और कम से कम इस तरह की परेशानी नहीं होगी। दोनों समय, सुबह और शाम, कीजिए।
यह काम लगातार कीजिए, वक्ता कहते हैं। महीने के जिन चार-पाँच दिनों में आप नहीं कर पाएँगी, उस समय कठिनाई का तनाव नहीं लेना है; चाहें तो किसी और से करवा सकती हैं, और अगर कोई न करे, तो उन दिनों छोड़ दीजिए। बाकी समय वह काम आराम से कीजिए। एक महीने, डेढ़ महीने में, पहले दिन से ही आपको इसका शुभ असर मिलने लगेगा। एक महीना, इकतालीस दिन पूरे होते-होते, यह चीज़ हमेशा के लिए आपके शरीर के पास से हट जाएगी; कम से कम इस तरह की परेशानी आपको नहीं आएगी। और ऐसे घटिया लोगों के पास मत जाइए, वे कहते हैं — ऐसे नीच और गंदे लोगों से इस तरह की बातें सोच-समझकर ही कहनी हैं। तो इसे दोनों समय, सुबह और शाम, कीजिए।
पीड़ित व्यक्ति अकेले निकारी नहीं कर सकता, इसलिए घर के किसी अभिभावक को बताना होगा
पीड़ित स्वयं निकारी नहीं कर सकती
दूसरी बात यह है कि अगर कभी संभव हो तो उनके घर के किसी अभिभावक से बात करवाई जाए, और वे उन्हें बताएँगे — क्योंकि उनके लिए अकेले सब करना संभव नहीं होगा, और वक्ता को नहीं पता कि उनकी उम्र क्या है या वे क्या करती हैं। तो अगर उनका कोई भाई हो, या पिता, या अगर वे विवाहित हैं तो पति, और उनके बीच अच्छी समझ हो, तो वह व्यक्ति उनसे पाँच मिनट बात करे और वे उन्हें समझा देंगे; क्योंकि निकारी आदि की प्रक्रिया वे खुद नहीं कर पाएँगी, और उन्हें करनी भी नहीं चाहिए, क्योंकि वे खुद पीड़ित हैं।
पहले यह काम शुरू कीजिए, वक्ता कहते हैं। दूसरी बात यह है कि आपके घर का कोई अभिभावक — अगर कभी संभव हो, तो किसी अभिभावक से बात करवाइए और वे उन्हें बताएँगे। क्योंकि आपके लिए अकेले सब करना संभव नहीं होगा; और उन्हें नहीं पता कि आपकी उम्र क्या है, आप क्या करती हैं या नहीं करतीं। तो अगर आपका कोई भाई हो, या पिता, या अगर आप विवाहित हैं तो आपके पति, और आपके बीच अच्छा तालमेल हो, तो एक बार पाँच मिनट उनसे बात कीजिए और वे उन्हें समझा देंगे। क्योंकि निकारी आदि की प्रक्रिया आप खुद नहीं कर पाएँगी। और आपको करनी भी नहीं चाहिए — क्योंकि आप खुद पीड़ित हैं। वे उन्हें वे सब बातें बताएँगे, कैसे क्या करना है; आपस में कीजिए, और आपको राहत मिलेगी। इसके साथ वे सत्र समाप्त करते हैं, कहते हुए कि अगर समय मिला तो अगले दिन फिर लाइव आने की कोशिश करेंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।