तंत्र को गुप्त क्यों रखा जाता है — गृहस्थ के लिए गुप्त नवरात्रि, और लंबा लाइव प्रश्नोत्तर
आषाढ़ गुप्त नवरात्रि पर प्रवचन, कि तंत्र गुप्त क्यों रहता है।
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तंत्र शब्द का अर्थ क्या है?
तंत्र का अर्थ है हर बात को गुप्त रखना
वक्ता कहते हैं कि तंत्र का अर्थ ही है हर एक बात को गुप्त रखना। गृहस्थी में जन्म से लेकर मृत्यु तक सनातन संस्कृति में बहुत सारी ऐसी बातें हैं जो तंत्र से जुड़ी हैं। ये बातें हम करते हैं, चाहे हमें इनकी जानकारी हो या न हो।
वक्ता कहते हैं कि विषय यहीं से शुरू होता है: जब भी हम तंत्र पूजन करते हैं, तो उसमें गुप्त रखने को क्यों कहा गया? तंत्र का अर्थ ही है हर बात को गुप्त रखना। गृहस्थी में — सनातन संस्कृति की यह बात समझिए — जन्म लेने से लेकर मृत्यु तक बहुत सारी ऐसी बातें हैं जो तंत्र से जुड़ी हैं। ऐसी बातें जिनकी जाने-अनजाने हमें कोई जानकारी नहीं होती, फिर भी हम उन्हें करते हैं।
जन्म का सूतक तंत्र से कैसे जुड़ा है?
सूतक काल, मूल नक्षत्र और सत्ताईसवें दिन का सतईसा
जन्म लेते ही सबसे पहले सूतक काल लगता है। अगर बच्चा मूल नक्षत्र में जन्मे — मूल के चार-पाँच नक्षत्र होते हैं — तो सत्ताईसवें दिन, जिसे बोलचाल में सतईसा कहते हैं, जब वही नक्षत्र फिर आता है, तब उस नक्षत्र का पूजन होता है और वहीं से सूतक काल पूरा माना जाता है। वक्ता कहते हैं कि यह भी तंत्र का विषय है।
वक्ता कहते हैं कि देखिए, जन्म लेते ही सबसे पहले सूतक काल लगता है। सूतक काल में जब बच्चा जन्म लेता है और वह मूल नक्षत्र में पड़ गया हो — मूल के चार-पाँच नक्षत्र होते हैं — तो सत्ताईसवें दिन बोलचाल में जिसे सतईसा कहते हैं, वह होता है: सत्ताईस दिन बाद जब वही नक्षत्र फिर आएगा, तब उस नक्षत्र का पूजन होगा, और वहीं से सूतक काल समाप्त माना जाएगा। यह भी तंत्र का विषय है। और जब मृत्यु होती है, तो मृत्यु में जो पातक लगता है और उस पातक के समय में जो-जो बातें की जाती हैं — वह भी सूतक का ही विषय है।
धरती का अपना रजस्वला पर्व, नवजात के चेहरे की तरह छठी से पहले, गुप्त रखने के लिए था
अम्बुबाची, और छठी जिससे पहले पिता चेहरा न देखे
जब यह धरती अम्बुबाची पर्व मनाती है, जिसमें कहा जाता है कि जगदम्बा — धरती भगवती जगदम्बा का ही रूप है — साक्षात रजस्वला होती हैं, तो यह भी तंत्र का एक रूप है। पर ये सारी बातें गुप्त रखी गई थीं, और आज यह गुप्तता टूट रही है: लोग अब बच्चे के जन्म का ही वीडियो बनाते हैं, और छठी को भूल जाते हैं, जिससे पहले कुछ इलाकों में यह चलन है कि पिता भी चेहरा न देखे।
वक्ता कहते हैं कि जब यह धरती अम्बुबाची पर्व मनाती है — जिसमें कहा जाता है कि जगदम्बा, यह धरती जो भगवती जगदम्बा का रूप है, साक्षात रजस्वला होती हैं — तो यह भी तंत्र का एक रूप है। पर ये सारी बातें गुप्त रखी गई हैं। आज के समय में यह गुप्तता टूट रही है। बच्चा पैदा हो रहा है और लोग आजकल उसी समय उसका वीडियो बना रहे हैं। छठी की तो बात ही छोड़िए। कहा जाता है, और किसी न किसी इलाके में यह चलन है, कि छठी पूजन से पहले पिता भी चेहरा न देखे। और जो बच्चे मूल में पड़े हैं, सतईसा में पड़े हैं, उनके लिए तो बहुत बार पूरी तरह मना होता है। बड़े-बुज़ुर्ग लोग यह जानते होंगे।
पहले पिता अपने बच्चे का चेहरा देखने से पहले क्या करते थे?
नक्षत्र पूजन, छाया दान और पहले तेल में देखा चेहरा
पहले के समय में जब तक नक्षत्र के अनुसार नक्षत्र पूजन न हो जाए, और कुछ मामलों में छाया दान या तेल दान जैसे दान न हो जाएँ, तब तक पिता पहले तेल में अपना चेहरा देखते थे, वह सारा दान पूरा करते थे, और उसके बाद ही अपनी संतान का चेहरा देखते थे। वक्ता कहते हैं कि आज के समय में ये सारी बातें पूरी तरह खत्म हो गई हैं।
वक्ता कहते हैं कि अब यह फैशन है। अब जब तक लोग सेल्फी लेकर पोस्ट न कर दें — कि हम पिता बन गए, हम माँ बन गए, हमारे बच्चा हुआ — तब तक बात ही नहीं बनती। पर पहले के समय में जब तक नक्षत्र के अनुसार नक्षत्र पूजन न हो, और कुछ मामलों में छाया दान या तेल दान जैसे दान आदि न हों, तब तक पिता पहले तेल में चेहरा देखते थे, वह सारा दान आदि पूरा करते थे, और उसके बाद ही अपनी संतान का चेहरा देखते थे। आज के समय में ये सारी बातें पूरी तरह खत्म हो गई हैं। तो यह तंत्र का ही पर्याय था; अब नहीं रहा। अब लोग आधुनिकता में यह बात भूल गए हैं।
नवजात का चेहरा देखने वाले पिता को कौन-सा दोष लगने की बात कही जाती थी?
पिता को दोष लगने की पुरानी कथाएँ
आज कोई नहीं सोचता कि इस काम से क्या नुकसान हो सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि पुरानी कथाओं में सुनने में आता था कि बेटे का चेहरा देखते ही पिता को फलाँ दोष लग गया — कोई अंधा हो गया, किसी के शरीर में परेशानी आ गई, उसकी दृष्टि उस पर पड़ी और शरीर में कष्ट आए, चर्म रोग आदि हो गए।
वक्ता कहते हैं कि इससे क्या नुकसान हो सकते हैं, यह आज कोई सोचता ही नहीं — कि हाँ, हम जो यह काम कर रहे हैं, उसके कारण पिता को यह होता है। पहले की कथाओं में आपने सुना होगा कि बेटे का चेहरा देखते ही पिता को फलाँ दोष लग गया: कोई अंधा हो गया, किसी के शरीर में कोई परेशानी आ गई; उसकी दृष्टि उस पर पड़ी और शरीर में कष्ट आए, चर्म रोग आदि हो गए। तो कहीं न कहीं पौराणिक दृष्टि से इस बात को रखने की कोशिश की गई है — कि इसके पीछे क्या उद्देश्य है, और ऐसा क्यों करना चाहिए।
बच्चा किस नक्षत्र में जन्म लेगा, यह किससे तय होता है?
पूर्व निर्धारित कर्म, कुंडली और पूरे परिवार पर असर
जब हम जन्म लेते हैं, तो पूर्व निर्धारित कर्म के अनुसार — पिछले जन्मों में हमने जो भी कर्म किए — हमें इस जन्म की कुंडली मिलती है, यानी वह नक्षत्र जिसमें हम जन्म ले रहे हैं। और उस नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता, उसके ग्रह अधिपति और उसकी राशि के अनुसार असर सिर्फ हम पर नहीं, पूरे परिवार पर पड़ता है।
वक्ता कहते हैं कि जब हम जन्म लेते हैं, तो पूर्व निर्धारित कर्म के अनुसार — पिछले जन्म में हमने जो भी कर्म किए हैं — हमें इस जन्म की कुंडली मिलती है, यानी हम जिस भी नक्षत्र में जन्म ले रहे हैं। और उस नक्षत्र के जो अधिष्ठाता देवता हैं, जो उसके ग्रह अधिपति हैं, जो राशि है — इन सबके अनुसार असर सिर्फ हम पर नहीं, हमारे पूरे परिवार पर पड़ता है। कहीं बच्चे ने जन्म लिया और परिवार उन्नति करने लगा; माता-पिता आगे बढ़ने लगे, सब स्वस्थ रहने लगे, परिवार में लक्ष्मी बढ़ने लगी। कहीं बच्चा जन्म लेता है और परिवार में दुर्घटनाएँ होने लगती हैं, परेशानियाँ बढ़ने लगती हैं। तो किसी का जन्म इसका कारण बन जाता है।
क्या किसी बुज़ुर्ग के जाने के बाद घर में लक्ष्मी बढ़ती है?
बुज़ुर्ग के जाने के बाद लक्ष्मी का बढ़ना या घटना
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी तरह जब कोई बुज़ुर्ग मृत्यु को प्राप्त होते हैं, तो उनके जाने के बाद घर में लक्ष्मी काफी बढ़ जाती है — जो सत्पुरुष होते हैं। और बहुत बार ऐसा होता है कि कुछ लोगों की मृत्यु के बाद घर में दुर्घटनाएँ बढ़ने लगती हैं और खासकर लक्ष्मी की बहुत हानि होती है। इसमें भी कहीं न कहीं तंत्र है।
ठीक इसी तरह मृत्यु के समय भी, जब कोई बुज़ुर्ग मृत्यु को प्राप्त होते हैं, तो उनके जाने के बाद घर में लक्ष्मी की अच्छी-खासी बढ़ोतरी होती है — जो सत्पुरुष होते हैं। और बहुत बार ऐसा होता है कि कुछ लोगों की मृत्यु के बाद घर में दुर्घटनाएँ बढ़ने लगती हैं, और खासकर लक्ष्मी की बहुत बड़ी हानि होने लगती है। तो इसमें भी कहीं न कहीं तंत्र है। क्योंकि आजकल लोग इसकी गुप्तता तोड़ते हैं, इसलिए आज नहीं तो कल बच्चे के जीवन में भी और परिवार के जीवन में भी कष्ट आते हैं। इसीलिए यहाँ एक मर्यादा है: कि जब बच्चा जन्म ले, तो उसे गुप्त रखिए।
बच्चे के साथ जन्मे देवताओं के बारे में सप्तशती कवच क्या कहता है?
कवच की पंक्ति, और उससे उठने वाला प्रश्न
सुनने वाले सभी लोग दुर्गा सप्तशती में कवच का पाठ करते होंगे, जिसमें पढ़ा जाता है कि बच्चे के जन्म के साथ जो देवता उत्पन्न होते हैं, वे इस कवच के पाठ के प्रभाव से दूर हो जाते हैं। तो जन्म के साथ कौन-से देवता प्रकट हुए? वक्ता कहते हैं कि यह प्रश्न कभी न कभी आपके मन में आया होगा। सप्तशती अपने आप में एक विशाल तंत्र है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात: आप सब दुर्गा सप्तशती में कवच का पाठ करते होंगे। सुनने वाले सब लोग उसमें पढ़ते होंगे कि बच्चे के जन्म लेने पर जन्म के साथ जो देवता उत्पन्न होते हैं, वे इस कवच के पाठ के प्रभाव से दूर हो जाते हैं। तो भाई — जन्म के साथ कौन-से देवता प्रकट हुए? यह प्रश्न कभी न कभी आपके मन में आया होगा। सप्तशती अपने आप में एक विशाल तंत्र है। वे कहते हैं कि आइए देखें, वहाँ तंत्र की दृष्टि से भी क्या बताया गया है।
शास्त्र क्या कहता है
The Devī Kavaca lists afflicting beings, beginning with those born along with a person (सहजा) and those of the family, and says they vanish when the armour is held in the heart.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा । अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः ॥ ५० ॥
जन्म के साथ प्रकट होने वाले और कुल के देवता, कण्ठमाला, डाकिनी और शाकिनी, अन्तरिक्ष में घूमने वाली भयानक और बलवान् डाकिनियाँ,
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः । ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥ ५१ ॥
ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड, भैरव आदि,
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते । मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ॥ ५२ ॥
जिसके हृदय में कवच बसा हो, उसे देखते ही ये सब भाग जाते हैं। राजा से उसका सम्मान बढ़ता है। यह कवच उत्तम है और तेज बढ़ाता है।
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बच्चे की पिछले जन्म की स्मृति का क्या होता है?
लगभग पंद्रह महीने बाद स्मृति का मिटना, और आत्मा से जुड़ी योनियाँ
कहा जाता है कि लगभग सवा वर्ष का होने के बाद — यानी एक साल तीन महीने, पंद्रह महीने — बच्चे की पिछले जन्म की जो भी स्मृतियाँ होती हैं, वे धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म हो जाती हैं। शरीर नया लिया गया है; आत्मा वही है। और उस आत्मा के साथ जो भी सिद्धियाँ, जो भी जप-तप और जो भी अच्छे-बुरे कर्म जुड़े थे, वे भी साथ जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जन्म के समय से ही कहा जाता है कि लगभग सवा वर्ष का होने के बाद — यानी एक साल तीन महीने, पंद्रह महीने — बच्चे की पिछले जन्म की जितनी भी स्मृतियाँ हैं, वे धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म हो जाती हैं। शरीर नया लिया गया है; आत्मा वही है। और उस आत्मा के साथ जो भी सिद्धियाँ, जो भी जप-तप, और जो भी अच्छे-बुरे कर्म जुड़े हैं, उसी क्रम के अनुसार पंचभौतिक शरीर के साथ पाँच योनियाँ भी साथ जाती मानी जाती हैं।
एक नक्षत्र अपने साथ क्या-क्या लेकर चलता है?
देवता, वृक्ष, सरीसृप योनि और धातु — और वह दिन जिसे मृत्यु अशुभ बना देती है
नक्षत्र के हिसाब से चलें तो नक्षत्र के अनुसार देवता होते हैं, नक्षत्र के अनुसार वृक्ष होते हैं, नक्षत्र के अनुसार सरीसृप योनि के जीव होते हैं, और सबको एक धातु दी गई है। इसी तरह तंत्र मानता है कि अगर कभी कुल में कोई गर्भवती स्त्री किसी कारण से मर जाए, तो जिस नक्षत्र और जिस दिन उसकी मृत्यु हुई, घर में उस दिन का मान लगता है।
वक्ता कहते हैं कि अगर नक्षत्र के अनुसार चलें, तो नक्षत्र के अनुसार देवता हैं, नक्षत्र के अनुसार वृक्ष हैं, नक्षत्र के अनुसार सरीसृप योनि के जीव हैं; और सबको एक धातु दी गई है। ठीक इसी तरह तंत्र में माना जाता है कि अगर कभी कुल में, मान लीजिए, कोई गर्भवती स्त्री किसी कारण से मृत्यु को प्राप्त हो जाए — तो जिस नक्षत्र में उसकी मृत्यु हुई, जिस दिन हुई, देखिए, लोग खासकर दिन मानते हैं: उस दिन घर में मान लगता है। कहा जाता है कि उस दिन लोग बाल नहीं कटवाते, कोई अच्छा और शुभ काम नहीं करते, यात्रा आदि शुरू नहीं करते। लोग कहीं-कहीं आज भी यह मानते हैं: कि भाई, आज के दिन ऐसी बात हुई थी, तो इस दिन हम शुरुआत नहीं करेंगे।
एक अतृप्त आत्मा जन्म के समय कैसे जुड़ जाती है?
अतृप्त आत्मा, मसान या कलवा बनकर गया बच्चा, और दूध न उतरना
वक्ता कहते हैं कि वह अतृप्त आत्मा, क्योंकि उसे कभी कष्ट दिया गया था, यह नहीं सोचेगी कि उसके अपने परिवार में जन्म ले रहे बच्चे पर क्या असर पड़ेगा या नहीं पड़ेगा। अगर वह गर्भवती थी, तो उसके गर्भ का जो बच्चा मसान या कलवा बनकर गया, वह उस समय उसके साथ जुड़ जाएगा; और जिस माँ के स्तनों में दूध उतरना है, उसे वह अतृप्त आत्मा सोख लेगी। वे कहते हैं कि इसीलिए बहुत बार स्तनों में दूध नहीं उतरता।
वक्ता कहते हैं कि इसी बात को तंत्र में लाइए। वह अतृप्त आत्मा — क्योंकि उसे कभी कष्ट दिया गया था — यह नहीं सोचेगी कि उसके अपने परिवार में जन्म ले रहे व्यक्ति, बच्चे पर क्या असर पड़ेगा या नहीं पड़ेगा। जन्म के साथ: अगर वह गर्भवती थी, तो जो बच्चा उसके गर्भ में था, जो मसान के रूप में गया हो, कलवा के रूप में गया हो, वह उस समय कहीं न कहीं उसके साथ जुड़ जाएगा। और जो स्त्री माँ बन रही है, जिसके स्तनों में दूध उतरना है — इसीलिए बहुत बार स्तनों में दूध नहीं उतरता; यहाँ यह विषय बनता है — उसे कहीं न कहीं वह अतृप्त आत्मा सोख लेगी, उस बच्चे के कारण जिसकी मृत्यु गर्भ की अवस्था में हुई थी।
एक अतृप्त आत्मा कुल में कितनी पीढ़ियों तक सोई पड़ी रह सकती है?
पीढ़ियों तक सोई पड़ी रहना, और किसी जन्म से जाग उठना
वक्ता कहते हैं कि वह आपसे दो-तीन पीढ़ी पहले की भी हो सकती है और फिर भी मौजूद हो सकती है। उसकी गति और मुक्ति नहीं हुई है। हो सकता है वह पहले कभी सक्रिय ही न हुई हो — उसने कुछ नहीं किया, चुपचाप पड़ी रही। पर किसी के जन्म के समय वह सक्रिय हो गई। और अगर कोई व्यक्ति उस मृत्यु का कारण बना था और उसे अपना प्रारब्ध भोगना है, तो वह फिर उसी घर में आकर जन्म लेगा, और यह अतृप्त आत्मा, पिछले कर्म से बँधी, उससे जुड़ जाएगी।
वक्ता कहते हैं कि वह आपसे दो-तीन पीढ़ी पहले की हो सकती है, पर फिर भी मौजूद है। यह विषय समझिए: वह कुल में पहले से मौजूद है, उसकी गति और मुक्ति नहीं हुई है। हो सकता है वह पहले कभी सक्रिय ही न हुई हो, उसने कुछ न किया हो, चुपचाप शांति से पड़ी रही हो। पर किसी के जन्म के समय वह सक्रिय हो गई। फिर यह माना जाएगा कि जब उसकी मृत्यु हुई, अगर कोई व्यक्ति उसका कारण बना था, और उसका अपना प्रारब्ध उसे भोगना है, तो वह फिर उसी घर में आकर जन्म लेगा — और जब वह जन्म लेगा, तो यह अतृप्त आत्मा, पिछले कर्म से बँधी, उनसे जुड़ जाएगी।
ब्रह्म कवच का पाठ वास्तव में क्या करता है?
ब्रह्म कवच से प्रारब्ध का कटना
कवच के पाठ से जो हो रहा है, वह यह है कि प्रारब्ध कट रहा है। आप भगवती का नाम इतनी बार ले रहे हैं, कह रहे हैं: हे भगवती, इस ओर से मेरी रक्षा करो, मेरे इस अंग की रक्षा करो — हर अलग-अलग रूप की। तो उस नाम जप से, और क्योंकि यह ब्रह्म कवच है, ब्रह्मा के मुख से कहा गया कवच, उनके प्रभाव से ये सारी बातें कटती हैं, वह प्रारब्ध कटता है, और इस तरह के दोष दूर होते हैं।
इसीलिए कवच के पाठ से — कवच के पाठ से क्या हो रहा है? प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। कट रहा है। आप भगवती का नाम इतनी बार ले रहे हैं, आप कह रहे हैं: हे भगवती, आप इस ओर से रक्षा करो, आप मेरे इस अंग की रक्षा करो — हर अलग-अलग रूप की। तो कहीं न कहीं उस नाम जप से, और क्योंकि कवच ब्रह्म कवच है, ब्रह्मा के मुख से कहा गया कवच, उनके प्रभाव से ये सारी बातें कटती हैं। यह प्रारब्ध कटता है, और इस तरह के दोष दूर होते हैं।
नवजात का चेहरा कब तक सार्वजनिक नहीं करना चाहिए?
छठी और शुरुआती संस्कारों तक — छह, बारह, तेरह या सत्ताईस दिन
जब तक छठी न हो जाए, और जब तक शुरुआती सारे कर्म न हो जाएँ, तब तक चेहरा हर जगह दिखाना नहीं चाहिए; बच्चे को कई तरह के कष्ट आ सकते हैं। खासकर कहीं यह छह दिन का है, कहीं बारह दिन का, कहीं तेरह दिन का, और अगर नक्षत्र मूल आदि में पड़े तो सत्ताईस दिन का। तंत्र में इसका महत्व है।
वक्ता कहते हैं कि यह पहली बात है, और इसी कारण से भी इसे मना किया गया है: कि जब भी बच्चा जन्म ले, जब तक उसकी छठी न हो, जब तक शुरुआती सारे कर्म आदि न हों, तब तक उसका चेहरा सब जगह दिखाना नहीं चाहिए। उसे कई तरह के कष्ट आ सकते हैं। खासकर कहीं यह छह दिन का है, कहीं बारह दिन का, कहीं तेरह दिन का; और अगर वह नक्षत्र के मूल आदि में पड़ा हो, तो सत्ताईस दिन का। तंत्र में इसका अपना महत्व है।
पूजा स्थान की फोटो क्यों नहीं खींचनी चाहिए?
श्री विग्रह में जमा पुण्य, जो देखने वाले हर व्यक्ति में बँट जाता है
मान लीजिए आप रोज़ सौ माला जप करते हैं और उसे अपने इष्ट के विग्रह को अर्पित करते हैं: उन्हें अर्पित ऊर्जा से आपका पुण्य बढ़ता है, और हर बार दर्शन करने पर आपका पुण्य बढ़ता है। जब और पचास लोग उसी श्री विग्रह का दर्शन करेंगे, तो उनका पुण्य भी बढ़ेगा — और आपका पुण्य घटेगा, क्योंकि वह आपका निजी था, आप और आपके परिवार तक सीमित था, और आपने उसे बाहर रख दिया।
वक्ता कहते हैं कि अब आगे बढ़ते हुए: नवरात्र में इसके साथ कैसे चलना चाहिए? सबसे पहली बात है आपका पूजा स्थान। आप उसे दिखाते हैं, पूजा करते हैं, फोटो खींचकर स्टेटस में लगा देते हैं: कि आप बहुत अच्छी पूजा कर रहे हैं, आपने बहुत अच्छा सजाया है। आप जितने भी पुण्य कर्म करते हैं, जो इस श्री विग्रह में स्थापित होते हैं — सोचिए, अगर आप रोज़ सौ माला जप कर रहे हैं और वे सौ माला अपने इष्ट के विग्रह को अर्पित कर रहे हैं, तो उन्हें जो ऊर्जा अर्पित हो रही है उससे आपका पुण्य बढ़ रहा है। हर बार दर्शन करने पर आपका पुण्य बढ़ेगा। जब और पचास लोग उसी श्री विग्रह का दर्शन करेंगे, तो उनका पुण्य भी बढ़ेगा — और आपके पुण्य में कमी होगी, क्योंकि वह आपकी अपनी निजी चीज़ थी, आप तक सीमित, आपके परिवार तक सीमित; पर आपने उसे बाहर रख दिया।
मंत्र को गुप्त रखने के बारे में ग्रंथ क्या कहते हैं?
कुलवधू की तरह रक्षा — माला गोमुखी में, पहनी नहीं जाती
तांत्रिक गुरु परंपरा से जुड़ी कोई भी पुस्तक या बाद में लिखा गया ग्रंथ देखें, तो उसमें बहुत बार कहा गया है: यह मंत्र कुलवधू की तरह गुप्त रखना चाहिए, यह यंत्र कुलवधू की तरह गुप्त रखना चाहिए। इसीलिए जप माला गोमुखी में रखनी है और पहननी नहीं है — क्योंकि कोई दूसरा व्यक्ति जो उसका दर्शन करेगा, उसे भी वह पुण्य मिलेगा।
वक्ता कहते हैं कि तांत्रिक गुरु परंपरा से जुड़ी कोई पुस्तक या बाद में लिखा गया कोई ग्रंथ भी देखें, तो उसमें बहुत बार कहा गया है: यह मंत्र कुलवधू की तरह गुप्त रखना चाहिए, यह यंत्र कुलवधू की तरह गुप्त रखना चाहिए। तात्पर्य यह है कि आपके द्वारा स्थापित, पूजित और अर्पित सारे श्री विग्रह, सारे यंत्र जिन्हें आप जप-हवन आदि अर्पित करते हैं, और जप माला — इसीलिए कहा जाता है कि जप माला गोमुखी में रखें, और जप माला पहनें नहीं। ये सारी चीज़ें गोपनीय रखनी चाहिए, क्योंकि जो भी दूसरा व्यक्ति उसका दर्शन आदि करेगा, उसे भी वह पुण्य मिलेगा।
गयासुर की कथा क्या है?
वह वरदान जिसने सृष्टि का संतुलन बिगाड़ा, और उसके शरीर पर ब्रह्मा का यज्ञ
गयासुर ने वरदान माँगा था कि जो भी उसके सामने आए, जिस पर उसकी दृष्टि पड़े, जो उसे दिखाई दे, उसकी गति और मुक्ति हो जाए। बड़े-बड़े पापी भी मुक्त होने लगे, और देवता बड़ी मुश्किल में पड़ गए कि सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया है। उन्होंने ब्रह्मा से कोई उपाय निकालने को कहा, और ब्रह्मा ने कहा: हे गयासुर, तुम्हारे शरीर से पवित्र कोई स्थान नहीं, इसलिए मैं तुम पर यज्ञ करना चाहता हूँ — और वे ऐसा करने लगे।
वक्ता कहते हैं कि गयासुर की कथा सब जानते हैं। गयासुर ने यही वरदान माँगा था: कि जो भी मेरे सामने पड़े, जिस पर मेरी दृष्टि पड़े, जो मुझे दिखाई दे — उसकी गति हो, उसकी मुक्ति हो। तब बहुत बड़े-बड़े पापी भी मुक्त होने लगे, और देवता बहुत बड़ी मुश्किल में पड़ गए कि सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया है। तब उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा, भाई, कोई उपाय कीजिए। तो ब्रह्मा जी ने कहा: हे गयासुर, तुम्हारे शरीर से पवित्र कोई स्थान नहीं है, इसलिए मैं तुम पर यज्ञ करना चाहता हूँ। और ब्रह्मा जी उसके शरीर पर यज्ञ करने लगे।
नारायण ने गयासुर को अपने चरणों से दबाया, और वह आज ईशान कोण के वास्तु पुरुष के रूप में स्थित है
उसके हृदय पर नारायण के चरण, और ईशान कोण के वास्तु पुरुष
यज्ञ पूरा होने को था, तब अलग-अलग अंगों पर अलग-अलग देवता स्थापित हो गए; और जब गयासुर फिर भी उठने लगा, तो भगवान नारायण ने उसके हृदय पर अपने चरण रखकर उसे धरती में दबा दिया। गयासुर प्रसन्न हुआ कि नारायण के चरण सदा उसके हृदय पर रहेंगे, और उसे बहुत आशीर्वाद मिले और यह वरदान कि उसके क्षेत्र में पितरों की सद्गति होगी — इसीलिए सब तीर्थ बार-बार और गया एक बार। अंश रूप में, अंशात्मक रूप में, यही गयासुर हमारे घर में वास्तु पुरुष के रूप में स्थित है।
वक्ता कहते हैं कि जब यज्ञ हुआ और पूरा होने को आया, तो लगा कि गयासुर अब उठ जाएगा — और फिर क्या होगा? तो अलग-अलग अंगों पर अलग-अलग देवता स्थापित हो गए। फिर भी जब गयासुर उठने लगा, तो भगवान नारायण ने उसके हृदय पर अपने चरण रखे और उसे धरती में धँसा दिया। इस पर गयासुर ने प्रसन्न होकर कहा: हे नारायण, अगर मैं इससे कहीं ज़्यादा पुण्य भी करता, तब भी यह कभी न पाता कि आपके चरण सदा मेरे हृदय पर रहें। गयासुर को बहुत आशीर्वाद और वरदान देते हुए कहा गया कि पितरों की सद्गति उसी के क्षेत्र में होगी। कहा जाता है: सब तीर्थ बार-बार, गया एक बार। इसीलिए गया का महत्व है। और यही, अंशात्मक रूप में वास्तु पुरुष बनकर, हमारे घर में स्थित है — यही गयासुर। तो घर में उसकी पूजा, ये सारी गुप्त बातें: आज के समय में कौन इन विषयों को ध्यान में रखता है? ईशान कोण में वास्तु पुरुष, यानी गयासुर, जो परम पवित्र सात्विक शक्ति है जहाँ ब्रह्मा विराजमान हैं, यानी जहाँ शुभ शक्तियाँ विराजमान हैं — उसे कभी नहीं दिखाना चाहिए। आजकल लोग उसे स्टेटस में लगा देते हैं।
गुप्त नवरात्रि में कुल के किन देवताओं की पूजा ज़रूरी है?
कुल का पूजन — कुलदेवी के साथ कुल भैरव
अपने इष्ट की पूजा कीजिए, पर गुप्त नवरात्रि में तीन काम अलग से ज़रूर करने चाहिए। पहला है कुल का: आपकी जो भी कुलदेवी हैं, उनके साथ जो भी भैरव हैं, जिनकी आपको जानकारी है — और अगर नहीं है, तो उनके नाम से, क्योंकि कुल में एक देवी और एक भैरव दोनों होते हैं।
कुल भैरव के बारे में क्या कभी न कहना चाहिए, न पूछना चाहिए?
न पूछो, न बताओ — और रात में या सूर्योदय से पहले दीपक और भोग
कुल का पूजन ज़रूर करना चाहिए, और यह सबसे ज़रूरी हो जाता है — और इसके बारे में कभी किसी को नहीं बताना चाहिए। कुल भैरव के बारे में आपको जगह-जगह न पूछना है, न बताना है। अगर जानकारी है तो कीजिए; नहीं है तो अपने घर के लोगों से पूछिए, बुज़ुर्गों से पूछिए — जगह-जगह पोस्ट और कमेंट करते रहने के बजाय। और अगर आप जानते भी हैं, तो कभी किसी को न बताइए कि ये मेरे कुल के देवता हैं, यह मेरे कुल के भैरव हैं, ये इतने शक्तिशाली हैं।
कुल का पूजन ज़रूर करना चाहिए; यह सबसे ज़रूरी हो जाता है। और इसके बारे में कभी किसी को किसी समय नहीं बताना चाहिए। कुल भैरव के बारे में आपको न जगह-जगह पूछना है, न बताना है। अगर जानकारी है तो कीजिए; अगर नहीं है, तो अपने घर के लोगों से पूछिए, बुज़ुर्गों से पूछिए — जगह-जगह पोस्ट करते न रहिए, कमेंट करते न रहिए। और अगर आप जानते भी हैं, तो कभी किसी को यह न बताइए: देखो, ये मेरे कुल के देवता हैं, यह मेरे कुल के भैरव हैं, ये इतने शक्तिशाली हैं। इन सारे विषयों में कभी नहीं बताना चाहिए। बहुत सारे लोगों को जानकारी है कि उनके घर के कौन-से देवता हैं, पर वे पूजन-पाठ नहीं करते। गुप्त नवरात्रि के समय उनके नाम से दो काम ज़रूर करने चाहिए: एक दीपक और एक भोग — और वह भी रात के समय, या सूर्योदय से पहले। अगर आप सिर्फ इतना भी करें, तो नवरात्र का समय किसी भी शक्ति की कृपा पाने के लिए बहुत प्रबल समय होता है।
तंत्र से परेशान घर को गुप्त नवरात्रि में क्या करना चाहिए?
घर से कम से कम सौ मीटर दूर शिव मंदिर में अनुष्ठान
अगर घर में किसी भी तरह के तंत्र से आप बहुत परेशान हैं और वह हल नहीं हो रहा, तो गुप्त नवरात्र वह समय है जब आपको किसी शक्तिपीठ पर, या घर से दूर किसी मंदिर में बैठना चाहिए — दूरी कम से कम सौ मीटर मानिए — सौ मीटर दूर खड़ा कोई शिव जी का मंदिर, और वहाँ अनुष्ठान कीजिए। पर आप कौन-सा अनुष्ठान कर रहे हैं, यह कभी किसी को नहीं बताना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात: अगर घर में किसी भी तरह के तंत्र से आप बहुत ज़्यादा परेशान हैं और वह ठीक नहीं हो रहा, तो गुप्त नवरात्र वह समय है जब आप किसी शक्ति पीठ पर, या घर से दूर किसी मंदिर में जा सकते हैं। घर से दूर का मंदिर कितनी दूर हो? कम से कम सौ मीटर की दूरी मानिए: सौ मीटर दूर खड़ा कोई शिव जी का मंदिर। वहाँ बैठकर अनुष्ठान कीजिए। पर आप जो भी अनुष्ठान करें, कौन-सा अनुष्ठान कर रहे हैं, यह कभी किसी को नहीं बताना चाहिए।
गुप्त नवरात्रि का अनुष्ठान किस समय करना चाहिए?
शाम या रात का समय, और पूर्णाहुति के बाद फल के बारे में मौन
सूर्योदय से पहले संभव न हो, तो अनुष्ठान रात के समय, या शाम छह-सात बजे के आसपास करना चाहिए। चैनल पर कई तरह के अनुष्ठान बताए गए हैं, उनमें से कोई भी किया जा सकता है। तीसरी मुख्य और खास बात यह है कि जब आप पूर्णाहुति पूरी कर लें और आपको कोई फल मिले, कोई सुखद अनुभव हो, तो उस फल की चर्चा तुरंत नहीं करनी चाहिए — उसे अपने तक सीमित रखना चाहिए। इसीलिए इसे गुप्त कहा गया है।
वक्ता कहते हैं कि सूर्योदय से पहले संभव न हो, तो अनुष्ठान रात के समय, या शाम छह-सात बजे के आसपास करना चाहिए। चैनल पर कई तरह के अनुष्ठान बताए गए हैं; आप कोई भी अनुष्ठान कर सकते हैं। तीसरी मुख्य और खास बात यह है कि जब आप पूर्णाहुति आदि पूरी कर लें, और आपको कोई फल मिले, कोई सुखद अनुभव हो, तो उस फल की चर्चा तुरंत नहीं करनी चाहिए। उसे अपने तक सीमित रखना चाहिए। इसी कारण इसे गुप्त कहा गया है।
गुप्त नवरात्रि में जल्दबाज़ी क्यों नहीं करनी चाहिए?
अच्छा कर्म और नकारात्मक वाणी दोनों बहुत जल्दी फलते हैं
गुप्त नवरात्र में आपका किया कोई भी कर्म, कोई भी सात्विक कर्म, कोई भी सही कर्म बहुत जल्दी फलता है। इसीलिए कभी जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नवरात्र के समय जब आप नकारात्मक विचार व्यक्त करते हैं, तो वे भी बहुत जल्दी फलते हैं — जैसे: हम पूरे साल से पूजा कर रहे हैं और कुछ भी नहीं हो रहा।
वक्ता कहते हैं कि गुप्त नवरात्र में आपका किया कोई भी कर्म, कोई भी सात्विक कर्म, कोई भी सही कर्म बहुत जल्दी फलता है। इसीलिए कभी जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। यह भी ध्यान रखना चाहिए: कि नवरात्र आदि के समय जब आप नकारात्मक विचार व्यक्त करते हैं, तो वे भी बहुत जल्दी फलते हैं। जैसे: हम एक साल से पूजा कर रहे हैं, कुछ भी नहीं हो रहा। तो जान लीजिए कि अगर घंटी बजने ही वाली थी, तो उस समय घंटी का लोलक निकल जाएगा, और फिर आप उसे बजा नहीं पाएँगे।
इस समय में निंदा क्यों मना है?
आपका पुण्य उसी को मिलता है जिसकी आप निंदा करते हैं
दूसरी बात यह है कि इस समय में किसी भी व्यक्ति की निंदा — चाहे आपसे बड़ा हो या छोटा — से बचना चाहिए, क्योंकि निंदा करने से आपका पुण्य उसी व्यक्ति को मिल जाता है जिसकी आप निंदा कर रहे हैं। तो कोशिश कीजिए कि ऐसा न हो: इस समय हमें किसी भी तरह निंदा नहीं करनी है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि इस समय में किसी भी व्यक्ति की निंदा, चाहे वह आपसे बड़ा हो या छोटा, से बचना चाहिए। क्योंकि निंदा करने से आपका पुण्य उस व्यक्ति को मिल जाता है जिसकी आप निंदा कर रहे हैं। तो कोशिश कीजिए कि यह न हो। इस समय हमें किसी भी तरह से निंदा नहीं करनी है।
साधना के दौरान सपने में मार्गदर्शन मिले तो क्या करें?
नए मंत्र के लिए चल रही साधना बीच में कभी न छोड़ें
तीसरी मुख्य बात: अगर साधना के बीच में सपने आदि के ज़रिए कोई मार्गदर्शन मिल रहा हो कि इस समय आपको ऐसे करना चाहिए, तो आपकी चल रही साधना किसी भी हालत में बीच में नहीं छोड़नी है। बहुत लोग साधना शुरू करते हैं, सपने में कोई नया मंत्र मिलता है, और बीच से ही वह करने लगते हैं। यह गलती कभी नहीं करनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि तीसरी मुख्य बात यह है: अगर साधना के बीच में सपने आदि के ज़रिए कोई मार्गदर्शन मिल रहा हो — कि इस समय आपको ऐसे करना चाहिए — तो आपके द्वारा की जा रही साधना किसी भी हालत में बीच में नहीं छोड़नी है। इसे आपको खास ध्यान में रखना चाहिए। बहुत सारे लोग हैं जिन्होंने साधना शुरू की, सपने आदि में कोई नया मंत्र मिला, और बीच से ही वह करने लगे। यह गलती कभी नहीं करनी चाहिए।
नवरात्र में कौन-सा आचरण मना है?
न चरण स्पर्श, न आशीर्वाद, न वरदान, न श्राप — और गाली को स्वीकार करना
न आपको किसी के पैर छूने हैं, न किसी को अपने पैर छूने देने हैं, न किसी को आशीर्वाद देना है, न किसी को वरदान देना है, न किसी को श्राप देना है। अगर दूसरे आपको गाली दें, मारें, पीटें — उसे खुशी से स्वीकार कीजिए। भगवती समझेंगी; वे इस पर विचार करेंगी।
वक्ता कहते हैं कि न आपको दूसरों के पैर छूने हैं, न अपने पैर किसी से छुआने हैं, न किसी को आशीर्वाद देना है, न किसी को वरदान देना है, न किसी को श्राप देना है। अगर दूसरे आपको गाली दें, मारें, पीटें — उसे खुशी से स्वीकार कीजिए। भगवती समझेंगी; वे इस पर विचार करेंगी। अगर आप किसी के लिए अच्छा कर्म कर रहे हैं और वह आपके प्रति दुर्व्यवहार और बुरे विचार रखता है, तो अपना महत्व मत समझिए — वह उसका कर्म है। आपको इसकी चिंता नहीं करनी है: राम-राम कहिए, आगे बढ़ जाइए। गुप्त नवरात्र के समय इन सब विषयों पर खास ध्यान रखिए।
आपके इलाके के लोकवीर कौन हैं?
नदियों और तालाबों के किनारे पिंड रूप में विराजमान वीर
वक्ता कहते हैं कि एक और मुख्य बात: आपके इलाके में, आप जिस भी जगह रहते हों, यह सौ प्रतिशत निश्चित है कि वहाँ तांत्रिक प्रवृत्ति के कुछ लोग रहते हैं, और जाने-अनजाने वहाँ कोई न कोई लोकवीर ज़रूर होगा। किसी पवित्र नदी या किसी साधारण नदी के किनारे, किसी तालाब के किनारे जाइए, वहाँ भी आपको कोई न कोई देवता पिंड रूप में विराजमान दिखेंगे।
वक्ता कहते हैं कि एक और मुख्य बात: लोकवीर। आपके इलाके में, आप जिस भी जगह रहते हों, यह सौ प्रतिशत निश्चित है कि वहाँ तांत्रिक प्रवृत्ति के कुछ लोग रहते होंगे। आपकी जानकारी में या अनजाने में वहाँ कोई न कोई लोकवीर ज़रूर होगा। किसी पवित्र नदी के किनारे, या किसी साधारण नदी के किनारे, या किसी तालाब के किनारे जाइए, वहाँ भी आपको कोई न कोई देवता पिंड रूप में विराजमान दिखेंगे। कहीं-कहीं लिखा होता है: पहलवान वीर बाबा, लोकवीर बाबा, या वीर बाबा — कुछ इसी तरह का लिखा होता है।
लोकवीर के रूप में पूजे जाने वाले वीर कौन माने जाते हैं?
मध्यकाल से चली आ रही शक्तियाँ, जीवन में सिद्ध या युद्ध में वीरगति प्राप्त
वे कहते हैं कि ये हिंदू संस्कृति से जुड़ी और मध्यकाल से चली आ रही ऐसी शक्तियाँ हैं, जिन्होंने अपने जीवनकाल में कोई न कोई तंत्र सिद्धि भी की थी और साथ में वीर प्रवृत्ति के थे, या युद्ध में वीरगति पाई थी, या कोई ऐसी सिद्धि पाई थी। अगर इस तरह के देवता आपके इलाके में हैं और आपको उनकी जानकारी है — और सिर्फ तभी जब जानकारी हो, और सिर्फ तभी जब वे सात्विक हों — तो गुप्त नवरात्र के समय उनके स्थान पर जाकर धूप-दीप जलाना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि ये हिंदू संस्कृति से जुड़ी और मध्यकाल से चली आ रही शक्तियाँ हैं, जिन्होंने अपने जीवनकाल में कोई न कोई तंत्र सिद्धि भी की थी, और साथ में वीर प्रवृत्ति के थे, या युद्ध में वीरगति पाई थी, या कोई ऐसी सिद्धि पाई थी। तो अगर इस तरह के देवता आपके इलाके में हैं, जिनकी आपको जानकारी है, तो गुप्त नवरात्र के समय — अगर जानकारी है, और सिर्फ तभी, और सिर्फ तभी जब वे सात्विक हों — आपको उनके स्थान पर जाकर धूप-दीप आदि जलाना चाहिए।
यहाँ क्षेत्रपाल की क्या भूमिका है?
पहले और आखिरी दिन क्षेत्रपाल पूजन
अगर वे क्षेत्रपाल के रूप में पूजे जाते हैं, तो आपको पहले और आखिरी दिन क्षेत्रपाल का पूजन ज़रूर देना चाहिए — क्योंकि उन्हीं के पूजन से आपके पूरे घर की शुद्धि होती है। अगर कोई घर में कोई विचार आदि भेजता है, तो क्षेत्रपाल ही उसे रोकते हैं और वापस भेजते हैं। वे ही मुख्य हैं।
वक्ता कहते हैं कि अगर वे क्षेत्रपाल के रूप में पूजे जाते हैं, तो आपको पहले और आखिरी दिन क्षेत्रपाल का पूजन ज़रूर देना चाहिए। क्योंकि उन्हीं के पूजन से आपके पूरे घर की शुद्धि होती है। अगर कोई घर में कोई विचार आदि भेजता है, तो क्षेत्रपाल उसे रोकते हैं और वापस भेज देते हैं। वे ही मुख्य हैं।
अगर आप शहर में रहते हैं और किसी वीर को नहीं जानते तो क्या करें?
नगर की सीमा पर खड़ा हनुमान या भैरव मंदिर
अगर आपको किसी की जानकारी नहीं है, अगर आप शहर में रहते हैं और पता ही नहीं चल पा रहा कि वहाँ कौन-से वीर पूजे जाते हैं, तो आपके नगर की सीमा पर जो हनुमान जी का मंदिर है, वहाँ जाकर पूजा देनी चाहिए; या नगर की सीमा पर या उसके पास जो भैरव जी का मंदिर है, वहाँ पहले और आखिरी दिन की पूजा देनी चाहिए, उस स्थान पर उन्हें जो चढ़ाया जाता है उसके अनुसार।
वक्ता कहते हैं कि अगर आपको किसी की जानकारी नहीं है, अगर आप शहर में रहते हैं और पता ही नहीं चल रहा कि यहाँ वीर के रूप में कौन पूजे जाते हैं, तो आपके नगर की सीमा पर जो हनुमान जी का मंदिर है — वहाँ जाकर आपको पूजा देनी चाहिए। या नगर की सीमा पर या उसके आसपास जो भैरव जी का मंदिर है: वहाँ जाकर आपको पहले और आखिरी दिन की पूजा देनी चाहिए, उस स्थान के अनुसार, वहाँ उन्हें जो चढ़ाया जाता है उसके अनुसार।
ये छोटे काम चुपचाप करने हैं, बिना सेल्फी या पोस्ट के
छोटे काम, बिना किसी शोर के
ये बहुत छोटे काम हैं, पर इन्हें करते हुए शोर नहीं मचाना है। ऐसा नहीं कि पहले दिन गए और सेल्फी लगा दी कि हमने हनुमान जी की पूजा की है, इतना अच्छा सजाया है। न ही किसी और दिन का कुछ प्रकाशित करना है। इस तरह गुप्त रहकर, छोटी बातों का ध्यान रखते हुए, गुप्त नवरात्र में साधनाएँ कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि आप ऐसे छोटे-छोटे काम करेंगे — पर ये काम करते हुए आपको शोर नहीं मचाना है। ऐसा नहीं कि पहले दिन गए और सेल्फी लगा दी: हमने हनुमान जी की पूजा की है, हमने इतना अच्छा सजाया है। न ही आप किसी और दिन की कोई बात प्रकाशित करेंगे। तो इस तरह गुप्त रहकर, गुप्त नवरात्र में छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखते हुए, अपनी साधनाएँ कीजिए।
क्या सूतक और पातक में कवच, स्तोत्र या रक्षा मंत्र किया जा सकता है?
उस समय सिर्फ मानसिक नाम जप या गीता
एक श्रोता के पूछने पर कि क्या सूतक और पातक में कवच स्तोत्र और रक्षा मंत्र किया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं कि उस समय नहीं करना चाहिए। सूतक और पातक के समय में सिर्फ मानसिक नाम जप करना चाहिए, या अपने आराध्य की गीता का पाठ करना चाहिए, या श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करना चाहिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या सूतक और पातक में हम कवच स्तोत्र और रक्षा मंत्र कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि उस समय नहीं करना चाहिए। सूतक और पातक के समय में सिर्फ मानसिक नाम जप करना चाहिए, या अपने आराध्य की गीता का पाठ करना चाहिए, या श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करना चाहिए।
दीपक कैसे जलाना चाहिए?
दीपक पर शुरुआत के पाँच से सात वीडियो
दीया कैसे जलाएँ, यह पूछे जाने पर वक्ता चैनल की बिल्कुल शुरुआत में बने कम से कम पाँच से सात वीडियो की ओर इशारा करते हैं, जिनमें बताया गया है कि दीपक का मुँह किस ओर रखना है, बत्ती कैसी हो — खड़ी बत्ती या सोई बत्ती — पितरों के लिए कैसा दीपक जलता है, अगर खड़ी बत्ती का दीपक जलाएँ तो कब जलाएँ, और देवता के किस ओर दीपक रहेंगे।
वक्ता कहते हैं कि दीये पर चैनल की बिल्कुल शुरुआत में कम से कम पाँच से सात वीडियो हैं। उनमें बताया गया है कि दीपक का मुँह किस ओर रखना है; दीपक में बत्ती कैसी होनी चाहिए, खड़ी बत्ती या सोई बत्ती; पितरों के लिए कैसा दीपक जलता है; अगर जलाएँ तो खड़ी बत्ती का दीपक कब जलाना चाहिए; और देवता के किस ओर दीपक रहेगा। इन सब विषयों पर वीडियो बिल्कुल शुरू में बनाए गए थे। बुनियादी वीडियो देखिए, जो इसी चैनल पर बिल्कुल शुरुआत में हैं।
नए साधक को इस गुप्त नवरात्रि में क्या करना चाहिए?
पहले गुरु से जुड़ी साधना — दत्तात्रेय, रामकृष्ण परमहंस, नाथ
नए साधक को सबसे पहले गुरु से जुड़ी साधना करनी चाहिए। वह भगवान दत्तात्रेय की कर सकता है, या भगवान रामकृष्ण परमहंस की; या अपने इलाके में गुरु रूप में जो भी शक्तियाँ विराजमान हैं उनकी; वह गुरु गोरखनाथ जी की कर सकता है, या नौ नाथों में से किसी एक की, या सिद्ध साबरी विद्या चैनल पर नौ नाथों के लिए एक साथ दिया गया विधान।
जो और कुछ न कर सकें, वे सप्तशती के चौथे अध्याय के चार रक्षा मंत्र जप से सिद्ध करें
सप्तशती के चौथे अध्याय के चार रक्षा मंत्र
वे देख रहे सभी लोगों से निवेदन करते हैं कि अगर वे अपने जीवन में कुछ भी न कर पा रहे हों, तो नवरात्र में दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय में बताए गए चार रक्षा मंत्र जप से सिद्ध करें। रोज़ 108 पाठ न कर सकें तो 27 कीजिए, नौ कीजिए, 11 कीजिए — पर चालू रखिए, नौ दिन कीजिए; और संभव हो तो इन नौ दिनों में 108-108 कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप भगवती की साधना करना चाहते हैं, तो सबसे पहले सप्तशती के वे रक्षा मंत्र हैं जो इस बार दिए गए हैं। यह जान लीजिए: वे कहते हैं कि मैं देख रहे सभी लोगों से निवेदन करूँगा — सबसे निवेदन है कि अगर आप अपने जीवन में कुछ भी न कर पा रहे हों, तो नवरात्र में ये चार रक्षा मंत्र जप से सिद्ध कीजिए, दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय में बताए गए चार रक्षा मंत्र। रोज़ 108 पाठ न कर सकें, तो 27 कीजिए; नौ कीजिए; 11 कीजिए — पर चालू रखिए, नौ दिन कीजिए। और अगर आपके लिए संभव हो, तो इन नौ दिनों में 108-108 कीजिए। अगर ज़्यादा कर सकें, तो उन चार मंत्रों का एक साथ कम से कम 1100 जप, जैसा उस विधि में बताया गया है — दो-तीन दिन पहले का एक वीडियो होगा, कि चार मंत्र, जिसे दुर्गा अभेद्य कवच कहा जाता है, गुप्त नवरात्र में सिद्ध करने चाहिए। कृपया सब लोग इसे करें, उसमें बताए गए विधान से।
शास्त्र क्या कहता है
Four verses of the gods' hymn ask the Goddess to protect with spear, sword, bell and bow, in every direction, through her gentle and fierce forms and all her weapons.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके । घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥ २४ ॥
हे देवी! शूल से हमारी रक्षा करें। हे अम्बिके! खड्ग से हमारी रक्षा करें। घण्टे की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमारी रक्षा करें।
प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे । भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि ॥ २५ ॥
हे चण्डिके! पूर्व, पश्चिम और दक्षिण में हमारी रक्षा करें। हे ईश्वरि! अपना शूल घुमाकर उत्तर में भी हमारी रक्षा करें।
सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते । यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम् ॥ २६ ॥
तीनों लोकों में विचरने वाले आपके जो सौम्य रूप हैं और जो अत्यन्त भयंकर रूप हैं, उन सबसे हमारी और इस पृथ्वी की रक्षा करें।
खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके । करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः ॥ २७ ॥
हे अम्बिके! आपके कोमल हाथों में जो खड्ग, शूल, गदा आदि अस्त्र हैं, उन सबसे सब ओर से हमारी रक्षा करें।
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पूरे कवच के बजाय चार मंत्र ही क्यों?
कवच लंबा है — 54 या 55 श्लोक, और कठिन संस्कृत
वे कहते हैं कि कवच आपके लिए लंबा पड़ता है: उसमें 54 से 55 श्लोक आते हैं। वृद्धि क्रम में जाएँ तो और बड़ा हो जाता है; कुछ लोग सप्तशती में दिए गए अलग-अलग प्रकारों के अनुसार अतिरिक्त करते हैं और यह और बढ़ जाता है; संस्कृत कठिन हो जाती है और उच्चारण नहीं आता। तो सिर्फ ये चार मंत्र कीजिए। यह सबको करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि कवच आपके लिए लंबा पड़ता है: उसमें 54 से 55 श्लोक आते हैं। वृद्धि क्रम में जाएँ तो और भी बड़ा हो जाता है। कुछ लोग सप्तशती के लिए दिए गए अलग-अलग प्रकारों के अनुसार उसमें अतिरिक्त चीज़ें करते हैं, और यह और बढ़ जाता है; संस्कृत कठिन हो जाती है, उच्चारण नहीं आता। तो सिर्फ ये चार मंत्र कीजिए। यह सबको करना चाहिए। आप कीजिए; अपने भाई-बहनों से करवाइए; अपने माता-पिता से करवाइए; घर के अपने सब लोगों से कहिए कि नवरात्र में कम से कम अपने लिए रोज़ एक दीपक जलाएँ। ऐसा नहीं कि आप एक दीपक जलाएँ और सब उसी एक से काम चला लें।
परिवार का हर व्यक्ति अपना दीपक जलाए और प्रतिपदा से दशमी तक मंत्र 21 या 27 बार पढ़े
हर व्यक्ति का एक दीपक, 21 या 27 पाठ, प्रतिपदा से दशमी
अगर पाँच लोग हैं, तो हर एक खुद जाकर एक-एक दीपक जलाए — सरसों के तेल का जलाएँ, तिल का जलाएँ, घी का जलाएँ, जो चाहे वह जलाएँ — और वह मंत्र 21 बार या 27 बार पढ़े। कम से कम यह 30 जून से 10 जुलाई तक, प्रतिपदा से दशमी तिथि तक करना चाहिए। इतना हर किसी को करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर पाँच लोग हैं, तो हर एक खुद जाकर एक-एक दीपक जलाए। सरसों के तेल का जलाएँ, तिल का जलाएँ, घी का जलाएँ — जो चाहे वह जलाएँ — और वह मंत्र 21 बार, 27 बार पढ़ें। कम से कम 30 जुलाई से, 30 जून से 10 जुलाई तक, प्रतिपदा से दशमी तिथि तक। इतना हर किसी को करना चाहिए। नए साधक अपनी साधनाएँ इसी तरह शुरू करें। उसके बाद आप आगे के मार्गदर्शन के लिए बात भी कर सकते हैं, और फिर एक शक्ति को ठीक से प्रकट करके आगे कैसे बढ़ना है — गुरु, गणपति, भैरव जी, कुल के देवता, और उसके बाद मुख्य देवता — यह किया जा सकता है।
बटुक भैरव की स्थापना और चल प्रतिष्ठा का वीडियो पहले से बना है और डाला जाएगा
बटुक भैरव चल प्रतिष्ठा का वीडियो, और गुप्त नवरात्रि में दत्त माला
विग्रह की चल प्रतिष्ठा पर वीडियो बनाने को कहे जाने पर वे कहते हैं कि चल प्रतिष्ठा पर एक वीडियो उनके पास पहले से है — बटुक भैरव जी की स्थापना का, चल प्रतिष्ठा का, सामान्य रूप में — और वह डाला जाएगा। यह पूछे जाने पर कि क्या गुप्त नवरात्रि में दत्त माला में साधना की जा सकती है, वे उत्तर देते हैं हाँ, ज़रूर, बहुत अच्छा रहेगा।
एक श्रोता कहते हैं कि विग्रह की चल प्रतिष्ठा पर भी एक वीडियो बनाइए। वक्ता कहते हैं कि देखिए, चल प्रतिष्ठा पर एक वीडियो पहले से बना है और उनके पास है: बटुक भैरव जी की स्थापना का, चल प्रतिष्ठा का, सामान्य रूप में। वह डाला जाएगा। एक श्रोता कहते हैं कि कुलदेवी को अलग से बताइए, और विस्तृत जानकारी माँगते हैं; वे कहते हैं कि उन्हें पूरी बात समझ नहीं आई और एक बार फिर से कहने को कहते हैं। कंचन जी पूछती हैं कि क्या गुप्त नवरात्रि में दत्त माला में साधना की जा सकती है। हाँ, ज़रूर की जा सकती है, वे उत्तर देते हैं; बहुत अच्छा रहेगा।
क्या आश्लेषा मूल नक्षत्र है, और क्या 28 के बाद नक्षत्र शांति का कोई महत्व है?
आश्लेषा मूल के रूप में, और 28 वर्ष के बाद शांति का सीमित असर
वे पुष्टि करते हैं कि आश्लेषा नक्षत्र भी मूल नक्षत्र माना जाता है। और 28 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद नक्षत्र शांति, मांगलिक शांति आदि का कोई खास असर नहीं रहता; फिर भी अगर अपने मन की शांति के लिए करवाना चाहें, तो करवा सकते हैं।
वक्ता पुष्टि करते हैं कि आश्लेषा नक्षत्र भी मूल नक्षत्र माना जाता है। अंकुर जी से वे कहते हैं: देखिए, 28 वर्ष की आयु हो जाने के बाद नक्षत्र शांति, मांगलिक शांति आदि का कोई खास असर नहीं रहता। फिर भी अगर आप अपने मन की शांति के लिए करवाना चाहें, तो करवा लीजिए।
गुह्य काली गुप्त क्यों हैं?
नाम ही गुह्य है — और काली के अठारह प्रकार
यह पूछे जाने पर कि गुह्य काली गुप्त क्यों हैं, वक्ता उत्तर देते हैं कि नाम ही गुह्य है। काली के अठारह प्रकार माने गए हैं; मुख्य रूप से काली की सेविकाएँ ऐसी मानी गई हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि गुह्य काली गुप्त क्यों हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि नाम ही गुह्य है। काली के अठारह प्रकार माने गए हैं। मुख्य रूप से काली की सेविकाएँ ऐसी मानी गई हैं।
क्या बंधन मंत्र करने से पहले सोच-समझ लेना चाहिए?
कोई भी बंधन मंत्र करने से पहले हज़ार बार सोचें
रिया सिन्हा के पूछने पर कि क्या दुर्गा चंडी कवच और अपराजिता स्तोत्रम् साथ में किए जा सकते हैं, और माँ अपराजिता का मंत्र क्या है, वक्ता कहते हैं कि आज वे सबको एक बात बता रहे हैं: जितने भी बंधन मंत्र हैं, उनमें से कोई भी करने से पहले हज़ार बार सोचिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या दुर्गा चंडी कवच और अपराजिता स्तोत्रम् साथ में किए जा सकते हैं, और माँ अपराजिता का मंत्र क्या है, वक्ता कहते हैं कि आज वे सबको एक बात बता रहे हैं। जितने भी बंधन मंत्र हैं, उन्हें करने से पहले हज़ार बार सोचिए। फिर वे उसी दिन आए एक कॉल के बारे में बताते हैं, किसी ऐसे व्यक्ति का जिनका नाम वे नहीं जानते और जो शायद सुन रहे हों या न हों। उन्होंने पंद्रह मिनट बात की, और उनकी पूरी बात यह थी: उन्हें सपनों आदि में कुछ परेशानी हुई थी, उन्होंने समझा कि उन पर कोई अभिचार कर्म आदि है, और इसलिए उन्होंने सबसे पहले नीलकंठ अघोरास्त्र का पाठ शुरू कर दिया।
प्रश्न यह था कि क्या मंत्र में हुई गलती के बदले विपरीत प्रत्यंगिरा का पाठ किया जा सकता है
क्या विपरीत प्रत्यंगिरा मंत्र दोष को काट सकती है
जब उन्होंने पाठ शुरू किया, तो कोई गलती हो गई। फिर उनका प्रश्न था कि क्या हुई गलती के बदले वे विपरीत प्रत्यंगिरा का पाठ कर सकते हैं — क्योंकि उसमें लिखा है कि अगर किसी भी तरह का मंत्र दोष लगे, तो विपरीत प्रत्यंगिरा का पाठ करना चाहिए, और उससे दोष नष्ट हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि जब उन्होंने पाठ शुरू किया, तो उनसे कोई गलती हो गई। फिर उनका प्रश्न यह था: कि क्या हुई गलती के बदले वे विपरीत महाप्रत्यंगिरा का पाठ कर सकते हैं। क्यों? क्योंकि उसमें लिखा है कि अगर किसी भी तरह का मंत्र दोष लगे, तो विपरीत प्रत्यंगिरा का पाठ करना चाहिए, और उससे दोष नष्ट हो जाता है। यही प्रश्न था।
अस्त्र मंत्र वास्तव में क्या कर रहा होता है?
बाँधो, मारो, काटो, खाओ — और मुझमें प्रवेश करो
वक्ता कहते हैं कि यहाँ ध्यान दीजिए: नीलकंठ अघोरास्त्र अपने आप में एक उग्र अघोरास्त्र है। यह एक अस्त्र है, अस्त्र मंत्र है। और अस्त्र मंत्र में देवता की अलग-अलग शक्तियाँ, अलग-अलग अस्त्र बताए जाते हैं: सामने वाले की जो भी पीड़ा हो — चाहे ग्रह हो, चाहे भूत-प्रेत-पिशाच हो, चाहे शत्रु हो — उन सबको बाँधो, मारो, काटो, खा जाओ। तुम मुझमें आवेशित हो जाओ।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ ध्यान दीजिए। नीलकंठ अघोरास्त्र अपने आप में एक उग्र अघोरास्त्र है। यह एक अस्त्र है; यह एक अस्त्र मंत्र है। और अस्त्र मंत्र में क्या होता है? देखिए: देवता की अलग-अलग शक्तियों, अलग-अलग अस्त्रों को संबोधित किया जाता है — कि सामने वाले की जो भी पीड़ा हो, चाहे वह ग्रह हो, चाहे भूत-प्रेत-पिशाच हो, या शत्रु हो, उन सबको बाँधो, मारो, काटो, खा जाओ। तुम मुझमें आवेशित हो जाओ।
किसी उग्र शक्ति का आवाहन साधारण शरीर के लिए खतरनाक क्यों है?
सत्तर किलो का शरीर हज़ारों किलो की शक्ति को बुलाता है
वक्ता कहते हैं कि तो बताइए: आप अपने शरीर में ऐसी उग्र शक्ति का आवाहन कर रहे हैं जिसे सहने की इस शरीर में क्षमता ही नहीं है। आपका वज़न ही उतना नहीं है — आप 70 किलो के हैं, 80 किलो के हैं, और आप हज़ारों-हज़ारों किलो की शक्ति को बुला रहे हैं। जब वह शरीर में आएगी, तो क्या आपको कष्ट नहीं होगा? क्या आपके जीवन में कष्ट नहीं होगा? और ऊपर से आप मंत्र डाल रहे हैं: बाँधो, मारो, काटो, फाड़ो, चीरो।
वक्ता कहते हैं कि तो बताइए: आप अपने शरीर में ऐसी उग्र शक्ति का आवाहन कर रहे हैं, जिसे सहने की क्षमता इस शरीर में है ही नहीं। आपका वज़न ही उतना नहीं है। आप 70 किलो के हैं, आप 80 किलो के हैं, और आप हज़ारों-हज़ारों किलो की शक्ति को बुला रहे हैं। तो जब वह शरीर में आएगी, क्या आपको कष्ट नहीं होगा? क्या आपके जीवन में कष्ट नहीं होगा? और उसके ऊपर आप मंत्र डाल रहे हैं: बाँधो, मारो, काटो, फाड़ो, चीरो। दूसरी बात, अपराजिता में या किसी और में: अगर आप उन बीज मंत्रों का सही तरीका नहीं जानते जिनका उच्चारण उसमें है, तो कहीं न कहीं सबसे पहले आपकी लक्ष्मी का बंधन होगा।
गलती दो तरह से सुधारी जा सकती है: दूसरे को उपहार देकर मनाकर, या उसके सिर पर लाठी लेकर खड़े होकर
उपहार देकर मनाना, या लाठी लेकर खड़ा होना
मान लीजिए रिया सिन्हा जी से किसी के साथ कोई गलती हो गई है। अब वे उन्हें दो तरह से मना सकती हैं। पहला यह कि मैं उन्हें मनाऊँ: भाई, गलती मुझसे हुई है, मैंने आपके साथ कुछ गलत किया जो मुझे नहीं करना चाहिए था, कृपया मुझे माफ़ कीजिए, क्षमा कीजिए — और इसके लिए हम उन्हें खुश करने की कोशिश करेंगे, अच्छा उपहार देंगे, मिठाई देंगे, मिलकर बात करेंगे, उनके अच्छे गुण बताएँगे, उनकी प्रशंसा करेंगे। इससे सामने वाला पिघल सकता है।
वक्ता कहते हैं कि तीसरी बात वह है जो आज उनसे पूछी गई: कि मंत्र दोष के बदले हमें विपरीत प्रत्यंगिरा का पाठ करना चाहिए या नहीं, या बगला प्रत्यंगिरा का पाठ करना चाहिए या नहीं। सीधी बात है। मान लीजिए किसी से — रिया सिन्हा जी से — कोई गलती हो गई है। उन्होंने कुछ गलत किया है। अब वे उन्हें दो तरह से मना सकती हैं। पहला: कि मैं उन्हें मनाऊँ — भाई, गलती मुझसे हुई है, मैंने आपके साथ कुछ गलत किया जो मुझे नहीं करना चाहिए था, कृपया मुझे माफ़ कीजिए, क्षमा कीजिए। और क्षमा के लिए: हम उन्हें खुश करने की कोशिश करेंगे, उन्हें अच्छा उपहार देंगे, मिठाई देंगे, कहेंगे आइए थोड़ा मिलकर बात करें, उनके अच्छे गुण बताएँगे, उनकी प्रशंसा करेंगे। तो पहला है: भाई, मान जाइए, नाराज़ मत होइए, गलती मेरी थी। इससे सामने वाला पिघल सकता है।
दूसरा तरीका है रस्सी और लाठी, और तंत्र सिर्फ पढ़कर नहीं करना चाहिए
रस्सी और लाठी लेकर खड़े होना — पढ़कर तंत्र न करें
दूसरा है: नहीं, हम सीधे लाठी लेकर खड़े हो जाएँगे और कहेंगे, मानोगे या नहीं? सामने वाला कहेगा, नहीं, गलती तो तुमने की है, मैं क्यों मानूँ? और फिर सीधे रस्सी, बंधन, लाठी — मानोगे, कैसे नहीं मानोगे। यही बात यह है। अगर मंत्र जप में गलती हो गई है और आप इंटरनेट पर पढ़कर, यूट्यूब पर सुनकर, फेसबुक पर पढ़कर आए हैं कि विपरीत प्रत्यंगिरा या बगला प्रत्यंगिरा का पाठ करने से मंत्र दोष दूर होता है — तो सोचिए यह कैसे काम करता है।
दूसरी बात है: नहीं। हम सीधे लाठी लेकर खड़े हो जाएँगे और कहेंगे, मानोगे या नहीं? सामने वाला कहेगा, नहीं भाई, गलती तो तुमने की है, मैं क्यों मानूँ? और सीधे बाँधने की रस्सी, लाठी, लाठी — शुरू: मानोगे, कैसे नहीं मानोगे। वक्ता कहते हैं कि यह बिल्कुल वही बात है। अगर मंत्र जप में गलती हो गई है, और आप इंटरनेट पर पढ़कर, यूट्यूब पर सुनकर, फेसबुक पर पढ़कर यहाँ आए हैं कि विपरीत प्रत्यंगिरा का पाठ करने से, बगला प्रत्यंगिरा का पाठ करने से मंत्र दोष शांत हो जाता है, और कोई भी मंत्र दोष लगा हो तो उससे मुक्ति मिल जाती है — तो खुद सोचिए कि मुक्ति कैसे आती है।
अघोरास्त्र में गलती होने के बाद इसके बजाय क्या करना चाहिए?
शिव का अभिषेक, फल-मिठाई का भोग, और क्षमा माँगना
अगर आपको मंत्र दोष लगा है, आपके जप में कोई गलती हुई है — तो अगर आप नीलकंठ अघोरास्त्र का पाठ कर रहे थे और गलती हुई, तो जाकर शिव जी का अभिषेक करके उन्हें मनाइए। उन्हें फल और मिठाई का भोग लगाइए। उनसे प्रार्थना कीजिए: हे प्रभु, मुझे क्षमा करो।
वक्ता कहते हैं कि अगर आपको मंत्र दोष लगा है, आपके जप में कोई गलती हुई है — तो अगर आप नीलकंठ अघोरास्त्र का पाठ कर रहे थे और आपसे गलती हुई, तो जाकर शिव जी का अभिषेक करके उन्हें मनाइए। उन्हें फल और मिठाई का भोग लगाइए। उनसे प्रार्थना कीजिए: हे प्रभु, मुझे क्षमा करो। इसके बजाय आप बगला प्रत्यंगिरा लेकर बैठ गए: मारो, मारो, सीधे वहीं। भ्रामरी, उन्हें भ्रमित करो। यही तो है न — जिसके मंत्र का वे पूरा उच्चारण नहीं करना चाहते, और करेंगे भी नहीं।
शिव पर बगला प्रत्यंगिरा का प्रयोग करने का क्या मतलब होता है?
शिव को बाँधकर और पीटकर मनवाना
वे कहते हैं कि आजकल बगला प्रत्यंगिरा सब जानते हैं। उस मंत्र में बाँधने और मारने को कहा गया है — तो उसका प्रयोग करना शिव जी को बाँधकर और पीटकर यह कहना है: भाई, बात ऐसी है, मेरी बात मानो, तुम्हारे मंत्र के जप में मुझसे गलती हो गई है; अगर नहीं मानोगे तो हम तुम्हें बाँध देंगे, जंभित कर देंगे, मोहित कर देंगे, सोख लेंगे। क्या यह उचित है?
वक्ता कहते हैं कि भाई, आजकल आप सब बगला प्रत्यंगिरा जानते हैं, सबको पता चल रहा है। तो उस मंत्र में बाँधने और मारने को कहा गया है। तो बगला प्रत्यंगिरा का मतलब यह है कि शिव जी को बाँधकर, पीटकर कहा जाए: भाई, बात ऐसी है, मेरी बात मानो; तुम्हारे मंत्र के जप में मुझसे गलती हो गई है। अगर नहीं मानोगे, तो हम तुम्हें बाँध देंगे, जंभित कर देंगे, मोहित कर देंगे, सोख लेंगे। क्या यह उचित है? अरे मेरे भाई, इसीलिए कहा जाता है: तंत्र के विधान कभी पढ़कर नहीं करने चाहिए।
विपरीत प्रत्यंगिरा वास्तव में किस मंत्र दोष के लिए है?
भूत, प्रेत, पिशाच, बैताल, ब्रह्मराक्षस, डाकिनी और शाकिनी के जप का दोष
अगर आपने भूत, प्रेत, पिशाच, बैताल, ब्रह्मराक्षस, ऊँच-नीच, डाकिनी, शाकिनी और इस तरह की चीज़ों का जप आदि किया है, और उसका दुष्प्रभाव आपके शरीर पर पड़ने लगा है — कोई बुरी शक्ति, कोई बुरी आत्मा आपको पकड़ लेगी और आप उसे संभाल नहीं पा रहे — तो उसके बदले विपरीत प्रत्यंगिरा का पाठ किया जाता है। शिव जी के मंत्र दोष के लिए विपरीत प्रत्यंगिरा, महा प्रत्यंगिरा, महा विपरीत प्रत्यंगिरा और बगला प्रत्यंगिरा नहीं किए जाएँगे।
वक्ता पूछते हैं कि यहाँ किस मंत्र दोष का यह उपाय है? विपरीत प्रत्यंगिरा से कौन-सा मंत्र दोष शांत होता है? अगर आपने भूत, प्रेत, पिशाच, बैताल, ब्रह्मराक्षस, ऊँच-नीच, डाकिनी, शाकिनी, इस तरह की चीज़ों का जप आदि किया है, और उसका दुष्प्रभाव आपके शरीर पर पड़ने लगा है — कोई बुरी शक्ति, कोई बुरी आत्मा आपको पकड़ लेगी, जिसे आप संभाल नहीं पा रहे — तो उसके बदले विपरीत प्रत्यंगिरा का पाठ किया जाता है। शिव जी के मंत्र दोष के लिए विपरीत प्रत्यंगिरा और महा प्रत्यंगिरा, महा विपरीत प्रत्यंगिरा और बगला प्रत्यंगिरा नहीं किए जाएँगे। यह बात समझिए; इसे अपने मन में बैठा लीजिए। और वे सज्जन, वे जोड़ते हैं, फोन काट गए — उन्होंने सोचा, यह हमें क्या बता दिया; वे संतुष्ट नहीं हुए, क्योंकि उन्हें पाठ करना है।
किसी भी अस्त्र या बंधन मंत्र से पहले क्या होना चाहिए?
पहले सवा महीने से तीन महीने सौम्य रूप की उपासना
वे दोहराते हैं कि कोई भी बीज मंत्र, अस्त्र मंत्र या बंधन मंत्र जिसमें बाँधने का विधान है, उससे पहले हज़ार बार सोचिए। उसके बाद सोचिए कि आपके कुल के देवता कौन हैं, उनकी क्या स्थिति है, क्या वे आपको ऐसा पूजा-पाठ करने देंगे। नहीं तो पहले महादेवों की, या जिस भी देवी की साधना आप करने जा रहे हैं, उनकी उपासना और पूजन ठीक से कीजिए, पहले कम से कम सवा महीने से तीन महीने उनके सौम्य रूप की पूजा कीजिए। उसके बाद ही उनके अस्त्र मंत्रों का पाठ करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि इसी तरह जब आप अपराजिता का पाठ भी करें, तो यह ध्यान रखिए। वे इसे बार-बार दोहराते हैं: कोई भी बीज मंत्र, अस्त्र मंत्र, बंधन मंत्र आदि जिसमें बाँधने का विधान है — भाई, हज़ार बार सोचिए। उसके बाद कीजिए। आपके कुल के देवता कौन हैं, उनकी क्या स्थिति है, क्या वे आपको इस तरह का पूजा-पाठ करने देंगे? अगर नहीं, तो सबसे पहले महादेवों की, या जिस भी देवी की साधना और पूजा आप करने जा रहे हैं, उनकी उपासना और पूजन ठीक से करके, पहले कम से कम सवा महीने, तीन महीने उनके सौम्य रूप की साधना और उपासना करनी चाहिए। उसके बाद उनके अस्त्र मंत्रों आदि का पाठ करना चाहिए।
नीलकंठ अघोरास्त्र दस-बारह लोग दो से तीन साल में भाग-भाग में करते हैं
दस-बारह लोग, भाग-भाग में, दो साल से — और रुद्राक्ष और कवच
वक्ता कहते हैं कि उन्हें लगता है कि हमारे साधक परिवार में दो से तीन साल से नीलकंठ अघोरास्त्र करवाया जा रहा है। और दो साल से ज़्यादा समय में बहुत लोग नहीं हुए — दस-बारह होंगे — और वे लोग इसे भाग-भाग में कर रहे हैं। इसमें के हर मंत्र की अनुष्ठान विधि अलग तरीके से की जा रही है।
वक्ता कहते हैं कि उन्हें लगता है कि हमारे साधक परिवार में तीन साल से, दो साल से नीलकंठ अघोरास्त्र का प्रयोग करवाया जा रहा है। और दो साल से ज़्यादा में बहुत लोग नहीं हुए; दस-बारह होंगे। वे लोग इसे भाग-भाग में कर रहे हैं। इसमें जो भी मंत्र हैं, हर एक की अनुष्ठान विधि अलग तरीके से की जा रही है। इसका एक तरीका है: कैसे करना है, उससे पहले क्या करना है। इसे ऐसे ही खाली नहीं करना चाहिए। जो ऊर्जा पैदा होगी उसे शरीर सह सके; इतनी क्षमता होनी चाहिए, और वह क्षमता हमारे अंदर नहीं है। वे कहते हैं कि इसीलिए मैं कहता हूँ कि रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । धारण करना ज़रूरी है। इष्ट का कवच ज़रूरी है। आपको शुद्ध भी रहना चाहिए, धारण भी करना चाहिए, और पूजन करना भी आना चाहिए — शुरुआती पूजन उस तरह से होना चाहिए। तभी आप इसे करें।
अगर कोई स्तोत्र कहे कि उसे सिर्फ दीक्षित ही पढ़ें, तो क्या करें?
छोड़ दें — या एक या तीन बार पढ़ें, एक सौ आठ बार नहीं
यह पूछे जाने पर कि गुरु मंत्र मिले बिना किसी स्त्रोत में दीक्षित होना कितना सही है, वक्ता कहते हैं कि जिस भी ग्रंथ में लिखा हो कि यह स्तोत्र दीक्षित ही पढ़ें, उसे छोड़ देना चाहिए। अच्छा है कि अदीक्षित उसे बिल्कुल न करें; और अगर करें, तो पूरी तरह सामान्य रूप से करें — 108 बार, हज़ार बार, 1100 बार के बजाय एक या तीन बार पढ़ें।
यह पूछे जाने पर कि गुरु मंत्र नहीं मिला पर किसी स्त्रोत में दीक्षित हैं, यह कितना सही है, वक्ता कहते हैं: देखिए, जिस भी ग्रंथ में लिखा है कि यह स्त्रोत दीक्षित ही पढ़ें, उसे छोड़ देना चाहिए। अच्छा है कि अदीक्षित उसे न करें। या अगर करें ही, तो पूरी तरह सामान्य रूप से करें — 108 बार, हज़ार बार, 1100 बार के बजाय एक या तीन बार पढ़ें।
क्या नाड़ी शोधन और चक्र संतुलन की कोई सरल विधि है?
प्राणायाम — कुंभक, रेचक, पूरक
किसी ऐसी सरल विधि के बारे में पूछे जाने पर जिससे नाड़ी शोधन और चक्र संतुलन हो, वक्ता उत्तर देते हैं कि प्राणायाम से सरल कोई विधि नहीं है। बस इतना अपना लीजिए — कुंभक, रेचक, पूरक — और यह बहुत होगा।
एक श्रोता किसी सरल विधि के बारे में पूछते हैं जिससे नाड़ी शोधन और चक्र संतुलन हो। वक्ता उत्तर देते हैं कि प्राणायाम से सरल कोई विधि नहीं है। कुंभक, रेचक, पूरक — बस इतना अपना लीजिए; यह बहुत होगा।
किस आसन में साधना ज़्यादा फल देती है?
गृहस्थ के लिए सुखासन — चर्म अलग विषय है
वक्ता कहते हैं कि गृहस्थ को साधारण सुखासन में बैठकर साधना करनी चाहिए। बाकी, अगर आसन से आपका मतलब चर्म से जुड़ी किसी चीज़ से है — कि वह सिंह या व्याघ्र चर्मासन हो, मृग चर्मासन हो — तो अगर बात उन सब चीज़ों से जुड़ी है, तो विषय बिल्कुल अलग हो जाता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि बताइए किस आसन में साधना ज़्यादा फल देती है। वक्ता कहते हैं कि देखिए: गृहस्थ को साधारण सुखासन में ही बैठकर साधना करनी चाहिए। बाकी, अगर आपके आसन का मतलब चर्म से जुड़ी किसी चीज़ से है — कि वह सिंह का या व्याघ्र चर्मासन हो, मृग चर्मासन हो — अगर बात इन सबसे जुड़ी है, तो विषय बिल्कुल अलग हो जाता है।
क्या गुरु पिछले कर्मों के कारण मिलते हैं?
जन्मों के पार का संबंध, और गुरु मंडल की कृपा
वक्ता कहते हैं कि सच बिल्कुल यही है: गुरु भी पिछले कर्मों के कारण ही मिलते हैं, और गुरु का जन्मों के पार का बंधन और संबंध होता है। जब हम अपना प्रारब्ध ठीक करने लगते हैं, तब गुरु की प्राप्ति होती है। भौतिक गुरु से परे गुरु मंडल की कृपा है; और जब गुरु मंडल कृपा करता है, तो वहाँ भौतिक गुरु का महत्व कुछ और हो जाता है।
यह पूछे जाने पर कि क्या गुरु भी पिछले कर्मों के कारण मिलते हैं या इसी जन्म से होते हैं, वक्ता कहते हैं कि सच बिल्कुल यही है: गुरु भी पिछले कर्मों के कारण ही मिलते हैं, और गुरु का जन्मों के पार का बंधन और संबंध होता है। जब हम अपना प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। ठीक करने लगते हैं, तब गुरु की प्राप्ति होती है। भौतिक गुरु से परे गुरु मंडल की कृपा है। जब गुरु मंडल कृपा करता है, तो वहाँ भौतिक गुरु का महत्व अलग हो जाता है। आप जान भी नहीं पाएँगे।
क्या ऐसे उदाहरण हैं जब सिद्धों ने बिना पहचाने लोगों का मार्गदर्शन किया?
नीम करोली बाबा, देवरहा बाबा, रामकृष्ण परमहंस
ऐसी बहुत कथाएँ हैं, एक तरह से सच्ची घटनाएँ, जिनमें कभी पता ही नहीं चला कि सामने वाले का मार्गदर्शन करने वाला भौतिक शरीर धारण किए कोई योगी, ऋषि या मुनि था। नीम करोली बाबा के बारे में ऐसी घटनाएँ मिलेंगी, देवरहा बाबा के बारे में भी, और रामकृष्ण परमहंस के बारे में भी ऐसी बहुत घटनाएँ सुनी जाती हैं: जब वे व्यक्ति के जीवन से चले गए, उसके कर्म पूरे करवाकर, तभी लोगों को पता चला कि वे सिद्ध बाबा थे।
वक्ता कहते हैं कि ऐसी बहुत कथाएँ हैं — एक तरह से सच्ची घटनाएँ। उनमें कभी पता ही नहीं चला कि सामने वाले का मार्गदर्शन करने वाला भौतिक शरीर धारण किए कोई योगी, ऋषि या मुनि था। नीम करोली बाबा के बारे में आपको ऐसी घटनाएँ मिलेंगी; देवरहा बाबा के बारे में ऐसी घटनाएँ सुनेंगे। जब वे व्यक्ति के जीवन से चले गए — यानी उनके कर्म पूरे करवाकर चले गए — तब उन्हें पता चला कि ये सिद्ध बाबा थे। रामकृष्ण परमहंस के बारे में भी ऐसी बहुत घटनाएँ सुनी जाती हैं। वे कहते हैं कि उनकी राय में यह एक तरह का मानसिक भ्रम है: कि हम सिर्फ और सिर्फ भौतिक में ही खोजते हैं।
क्या शिव तांडव स्तोत्र रोज़ पढ़ा जा सकता है?
हाँ — और जो मना करते हैं वे वायरल होने के लिए टिप्स दे रहे हैं
यह पूछे जाने पर कि जो कोई और स्तोत्र नहीं जानता, क्या वह भोले बाबा की सेवा में शिव तांडव स्तोत्र कर सकता है, वक्ता कहते हैं हाँ, शिव तांडव कीजिए, कोई दिक्कत नहीं; रोज़ कीजिए। नमूनों के चक्कर में मत पड़िए। जो कहते हैं कि शिव तांडव स्तोत्र नहीं पढ़ना चाहिए, कि तिल का तेल नहीं जलाना चाहिए, और तरह-तरह के अजीब टिप्स देते रहते हैं, वे अपना वीडियो वायरल करने के लिए ऐसा करते हैं।
वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, शिव तांडव कीजिए, कोई दिक्कत ही नहीं है; रोज़ कीजिए। नमूनों के चक्कर में मत पड़िए। जो लोग कहते हैं कि शिव तांडव स्तोत्र नहीं पढ़ना चाहिए, कि तिल का तेल नहीं जलाना चाहिए, और ऐसे ही कई अजीब और बेकार टिप्स देते रहते हैं, वे अपना वीडियो वायरल करने के लिए ऐसा करते हैं। उसमें कहा गया है कि अगर शाम को पूजा करते समय शिव तांडव स्तोत्र पढ़ा जाए, तो स्थिर लक्ष्मी मिलती है। तो बिना झिझक पढ़िए; कोई दिक्कत नहीं है।
अगर मन उच्चाटन में हो तो क्या करना चाहिए?
रुद्राभिषेक — और वज़न के हिसाब से दूध की मात्रा
अगर मन का उच्चाटन हो, तो सबसे अच्छा काम है कि आप महाशिव का रुद्राभिषेक करें। संभव हो तो किसी विप्र से नमक-चमक के आठ अध्यायों के पाठ के साथ करवाइए; या खुद करना चाहें, तो मान लीजिए आपका वज़न 70 किलो है — अगर सामर्थ्य हो, तो 7 किलो दूध, यानी उसमें सब कुछ मिलाकर, दूध भी और गन्ने का रस भी; इतने में आपका रुद्राभिषेक हो जाएगा। नहीं तो कम से कम 700 ग्राम दूध से अभिषेक करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर मन का उच्चाटन हो, तो सबसे अच्छा काम यह है कि आप महाशिव का रुद्राभिषेक करें। संभव हो तो किसी विप्र से नमक-चमक के आठ अध्यायों के पाठ के साथ करवाइए; या खुद करना चाहें, तो कम से कम — मान लीजिए आपका वज़न 70 किलो है। तो अगर सामर्थ्य हो, तो 7 किलो दूध; दूध यानी उसमें सब कुछ मिलाकर, उसमें दूध भी, गन्ने का रस भी। इतने में आपका रुद्राभिषेक हो जाएगा। नहीं तो कम से कम 700 ग्राम, इतने दूध से अभिषेक करना चाहिए। कम से कम दशांश के दशांश से चलिए; इतना करना चाहिए।
प्रणव या श्री बीज, और शुरुआती साधना किस क्रम में शुरू करनी चाहिए?
यज्ञोपवीत की कसौटी, और गुरु से मुख्य देवता तक की सीढ़ी
जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ है, वे श्री बीज लगाकर जप करें; जिनका यज्ञोपवीत है, वे प्रणव लगाकर कर सकते हैं। यह पूछे जाने पर कि शुरुआती साधना किस क्रम में शुरू करें, वे कहते हैं कि एक प्लेलिस्ट है: सबसे पहले गुरु साधना — गुरु से जुड़ी शक्तियों में से किसी एक की साधना — फिर गणपति की साधना, फिर बटुक भैरव या भैरव जी की, फिर कुल के देवताओं की, और उसके बाद मुख्य देवताओं की।
दिव्य दृष्टि वाले व्यक्ति को चीज़ें कैसे दिखती हैं?
दूर श्रवण और दूर दृष्टि — और त्रिकालदर्शिता क्यों नहीं होती
वक्ता कहते हैं कि दो बातें हैं: दूर श्रवण और दूर दृष्टि। जो त्रिकालदर्शिता पाते हैं — असलियत ठीक यही है कि त्रिकालदर्शिता नहीं होती। भूत सिद्धि मिलती है, यानी वे जो बीता हुआ दिन देख सकते हैं। वे सिर्फ देख सकते हैं; और सिर्फ इसी एक कारण से आप उन्हें सबसे बड़ा सिद्ध मान लेते हैं। पर जो पहले ही हो चुका है —
एक श्रोता पूछते हैं कि दिव्य दृष्टि वाले व्यक्ति को चीज़ें कैसे दिखती हैं, और समझाने को कहते हैं। वक्ता कहते हैं कि देखिए, दो बातें हैं: दूर श्रवण और दूर दृष्टि। और जिन्हें त्रिकालदर्शिता प्राप्त होती है — असलियत ठीक यही है कि त्रिकालदर्शिता नहीं होती। भूत सिद्धि मिलती है: यानी वे जो बीत चुका दिन देख सकते हैं। वे सिर्फ देख सकते हैं। और सिर्फ इसी एक कारण से आप उन्हें सबसे बड़ा सिद्ध मान लेते हैं। पर जो पहले ही घट चुका है —
ऐसे सिद्ध आज भी कहाँ मिलते हैं?
विंध्य क्षेत्र, और सिद्ध जो खुद को सीमित रखते हैं
वक्ता कहते हैं कि हम आपको विंध्य क्षेत्र के बारे में बता रहे हैं, और श्रोताओं से निवेदन करते हैं कि कहीं और न जाएँ; वे जोड़ते हैं कि श्रोताओं का ध्यान जिसकी ओर जा रहा हो, उस पर वे कोई टिप्पणी नहीं कर रहे। विंध्य क्षेत्र में वे इस तरह के सिद्धों को बहुत अच्छे से जानते हैं: उनके पास जाइए, वे आपको ऐसी बातें बताएँगे जो आप खुद नहीं जानते होंगे, जो बातें आप कभी भूल गए थे — वे तारीख के साथ बताएँगे।
वक्ता कहते हैं कि हम आपको विंध्य क्षेत्र के बारे में बता रहे हैं, और कृपया कहीं और न जाइए। श्रोताओं का ध्यान जिनकी ओर जा रहा हो, उनके बारे में वे कोई टिप्पणी नहीं कर रहे। विंध्य क्षेत्र में हम इस तरह के सिद्धों को बहुत अच्छे से जानते हैं। उनके पास जाइए: जो बात आप खुद नहीं जानते होंगे, वे आपको उसके बारे में बताएँगे। जो बात आप कभी भूल गए थे, वे उसे तारीख के साथ बताएँगे — कि देखो, जिस बात का आज आप लोग प्रचार देख रहे हो, वह है, और पहले से है। वे कहते हैं कि मुझे लगता है कि शक्तिपीठ पर ऐसे साधक मिलते हैं जिन्हें इस तरह की जानकारी है, पर वे लोग काफी सीमित संख्या में रहते हैं; वे खुद को बहुत सीमित रखते हैं। चीज़ें कैसे दिखती हैं और किस तरह दिखती हैं, यह हर किसी के लिए अलग हो सकता है।
क्या गुप्त नवरात्रि में नई साधना शुरू करनी चाहिए?
जो चल रही है उसे पूरा करें; नई शुरू न करें
वक्ता कहते हैं कि अगर पहले से चल रही कोई साधना गुप्त नवरात्रि में आ रही है, तो उसी को पूरा कीजिए; नई साधना शुरू मत कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि गुप्त नवरात्र में अगर पहले से चल रही कोई साधना आ रही है, तो उसी को पूरा कीजिए। नई साधना शुरू मत कीजिए।
अगर कोई भी प्रयोग काम न करे तो क्या करें?
शिव हर तरह के दोष से मुक्त करते हैं — गुड़ और दही से अभिषेक
वक्ता कहते हैं कि जब कोई भी प्रयोग काम नहीं कर रहा हो, तो सबसे पहले शिव जी ही हैं जो हर तरह के दोष से मुक्त करते हैं। इसीलिए शिव जी का पूजन सबसे ज़रूरी हो जाता है। शिव जी का गुड़ और दही से अभिषेक करने से हर तरह का दोष शांत होता है। तो प्रयास करना चाहिए और लंबे समय तक साधना करनी चाहिए — इसीलिए हम कहते हैं कि कम से कम चालीस दिन की साधना लीजिए।
यह पूछे जाने पर कि जो प्रयोग बिल्कुल काम न करे उसे कैसे ठीक करें और फलित करें, वक्ता कहते हैं: देखिए, जब कोई भी प्रयोग काम नहीं कर रहा, तो सबसे पहले शिव जी — वही हैं जो हर तरह के दोष से मुक्त करते हैं। इसीलिए शिव जी का पूजन सबसे ज़रूरी हो जाता है। शिव जी का गुड़ और दही से अभिषेक करने से हर तरह का दोष शांत होता है। तो प्रयास करना चाहिए, और लंबे समय तक साधना करनी चाहिए। इसीलिए हम कहते हैं: कम से कम चालीस दिन की साधना लीजिए। और अगर तब भी फलित न हो, तो थोड़ा इंतज़ार कीजिए; जल्दबाज़ी नहीं करनी है। अगर हम कुछ भी न करें तो उससे भी कुछ नहीं निकलेगा — तो करना ही बेहतर है। अगर कोई प्रयोग फलित नहीं हो रहा, तो शिव की शरण में रहिए और जितना हो सके उनका अभिषेक कीजिए।
अगर दीक्षा मिली पर मंडल पूजा नहीं दी गई, तो क्या करें?
अपने गुरु से पूछें — यंत्र, आवरण और मंडल की अवधि
वक्ता कहते हैं कि कोई उपाय नहीं है; उपाय सीधा है। मान लीजिए आपको भगवती महाकाली की दीक्षा मिली है पर आप मंडल पूजा नहीं जानते: तो मंडल पूजन के लिए अपने गुरु से प्रार्थना कीजिए — गुरु जी, मुझे अंग विद्याओं के पूजन की विधि बताइए, किस यंत्र में उनका पूजन करना है, महाकाली का करना है या आद्या काली का।
यह पूछे जाने पर कि जब कहीं दीक्षा मिली हो पर मंडल पूजा न दी गई हो, तो क्या उपाय है, वक्ता कहते हैं: देखिए, कोई उपाय नहीं है। उपाय सीधा-सा है। मान लीजिए आपको भगवती महाकाली की दीक्षा मिली है, पर आप मंडल पूजा नहीं जानते। तो मंडल पूजन के लिए अपने गुरु से प्रार्थना कीजिए: गुरु जी, मुझे अंग विद्याओं के पूजन की विधि बताइए — किस यंत्र में उनका पूजन करना है, महाकाली का करना है या आद्या काली का। और आवरण के बारे में जानकारी लीजिए: आवरण की स्थापना किस नक्षत्र में करनी है, किस नक्षत्र में और कब आप शुरू करेंगे।
मंडल कितने दिन का होता है, और उसमें किसकी पूजा होती है?
नौ दिन या चालीस, और एक शक्ति जीवन भर
मंडल कितने दिन का होगा — नौ दिन का या चालीस दिन का? उसके अनुसार पहले चलना चाहिए; हर मामले में यह सब अलग है। और मुख्य रूप से, आप किसका पूजन लेकर चलेंगे: अगर आप महाकाली कर रहे हैं, तो जीवन भर भक्ति भाव से सिर्फ महाकाली का ही करते रहेंगे; या अगर तंत्र से जुड़ी कोई शक्ति पाना चाहते हैं, तो उनकी कोई एक — योगिनी, उपयोगिनी, परिचारिका — अंग विद्याओं में से कोई भी एक जिसकी सेवा-पूजा हम अलग से करना चाहें। यह आपको पूछना चाहिए।
वक्ता पूछते हैं कि मंडल कितने दिन का बनेगा — नौ दिन का बनेगा, या चालीस दिन का? उसके अनुसार पहले चलना चाहिए। हर मामले में यह सब अलग है। और मुख्य रूप से, आप किसका पूजन लेकर चलेंगे? अगर आप महाकाली कर रहे हैं, तो जीवन भर भक्ति भाव से सिर्फ महाकाली का ही करते रहेंगे। या अगर आप तंत्र से जुड़ी कोई शक्ति पाना चाहते हैं, तो उनकी कोई एक — योगिनी, उपयोगिनी, परिचारिका, अंग विद्याओं में से कोई भी एक जिसकी सेवा-पूजा हम अलग से करना चाहें। यह आपको पूछना चाहिए।
क्या कष्ट कभी हमेशा के लिए खत्म होता है?
अर्गला का पहला मंत्र जीवन भर, और कष्ट सिद्धि न होने का प्रमाण नहीं
अर्गला के पहले मंत्र के 108 पाठ करने वाले से वे कहते हैं कि यह बहुत अच्छा है और जीवन भर करना चाहिए। मनुष्य जीवन मिला है, तो कष्ट हमेशा के लिए मिट जाए, यह संभव नहीं। कोई कितना भी बड़ा सिद्ध साधक हो, यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि उसे कोई कष्ट नहीं है, या उसके शरीर में या जीवन में कोई कष्ट नहीं है — यह पूरी तरह गलत बात है।
वक्ता कहते हैं कि अर्गला स्तोत्र का पहला मंत्र 108 बार — आप बहुत अच्छा करते हैं; जीवन भर पढ़िए। मनुष्य जीवन मिला है, तो कष्ट हमेशा के लिए मिट जाएगा, यह संभव नहीं है। कोई कितना भी बड़ा सिद्ध साधक हो, या कोई भी हो, यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि उसे कोई कष्ट नहीं है, या उसके शरीर में कोई कष्ट नहीं है, या उसके जीवन में कोई कष्ट नहीं है। यह पूरी तरह गलत बात है। वह तो होता रहेगा; पर खुद को आगे बढ़ाते रहना है। किसी का कष्ट देखकर यह अंदाज़ा नहीं लगाना है कि भाई, इसे कष्ट है, इसलिए इसे कोई सिद्धि नहीं है।
शास्त्र क्या कहता है
The जयन्ती मङ्गला काली salutation the listener recites 108 times is the first verse of the Argalā Stotra.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥
ॐ। जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा, तुम्हें नमस्कार है।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
क्या पंचमुखी शिव पूजा जप के रूप में भी की जा सकती है?
यज्ञोपवीत के साथ या बिना जप — पाँच से ग्यारह बार
यह पूछे जाने पर कि उनकी सिखाई पंचमुखी शिव जी की पूजा सिर्फ अभिषेक में ही उपयोग करनी है या जप भी किया जा सकता है, और अगर हाँ तो कितना, वक्ता कहते हैं कि जप बिल्कुल किया जा सकता है: अगर आप यज्ञोपवीत आदि धारण करते हैं, तो जितना हो सके उतनी ज़्यादा मात्रा में जप कीजिए; अगर यज्ञोपवीत धारण नहीं किया है, तो उसके पाँच से ग्यारह पाठ कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि देखिए, जप बिल्कुल किया जा सकता है। अगर आप जप करना चाहते हैं, तो अगर आप यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। आदि धारण करते हैं, तो जितना हो सके उतनी ज़्यादा मात्रा में जप कीजिए। अगर आपने यज्ञोपवीत धारण नहीं किया है, तो उसके पाँच से ग्यारह जप कर सकते हैं।
अगर आपके नगर की सीमा तय न हो, तो क्या करें?
मोहल्ले की सीमा लें, या नक्शे पर कोतवाली की सीमा
वक्ता कहते हैं कि देखिए, नगर की सीमा तय ही रहती है। नगर से यह ज़रूरी नहीं कि आप पूरा शहर लें — आप अपने मोहल्ले की सीमा भी ले सकते हैं। सीमा तो रहती है; बिना सीमा के कुछ नहीं होगा। नक्शा देखिए; उसमें सीमा देखिए। और अगर वह भी न दिखे, तो पुलिस का नक्शा देखिए — कोतवाली की सीमा होती है; जहाँ आपकी कोतवाली की सीमा है, वहाँ से कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि मेरे नगर की सीमा तो तय ही नहीं है, तो मैं कहाँ देखूँ। वक्ता कहते हैं कि देखिए, नगर की सीमा तय ही रहती है। नगर से यह ज़रूरी नहीं कि आप पूरा का पूरा शहर लें; आप अपने मोहल्ले की सीमा भी ले सकते हैं। सीमा तो रहती है; बिना सीमा के नहीं होगा। नक्शा देखिए, उसमें सीमा देखिए। और अगर वह भी न दिखे, तो पुलिस के पास जो नक्शा है वह देखिए — कोतवाली की सीमा तो होती है न; जहाँ आपकी कोतवाली की सीमा है, वहाँ से आप कर सकते हैं।
भैरव का कोतवाली से क्या संबंध है?
थाने में भैरव पूजन, और हर क्षेत्र के कोतवाल
वक्ता कहते हैं कि भैरव हमेशा कोतवाली में चलते हैं। कोतवाली में भैरव पूजन बहुत होता है — जाने-अनजाने, हमेशा कोई एक व्यक्ति होता है जो यह ज़िम्मेदारी निभाता है, शायद सिर्फ अपनी नौकरी की खातिर। जैसे धारावाहिकों में दिखाते थे कि डाकू और लुटेरे महाकाली की पूजा करके निकलते थे, ठीक उसी तरह उन्हें पकड़ने के लिए कोतवाली पूजन होता है। इसीलिए काशी के कोतवाल भैरव हैं, और हर क्षेत्र के कोतवाल भैरव हैं।
वक्ता कहते हैं कि भैरव हमेशा कोतवाली में चलते हैं। अब वह बात नहीं हो रही, पर आपको यह पता चल रहा है। जो पुलिस में हैं — पुलिस का कोई है शायद, जिसे इसकी जानकारी होनी चाहिए; वे बहुत पहले से जुड़े हैं, और अगर उनका कोई कमेंट आए, तो शायद उन्हें भी जानकारी होगी। कोतवाली में भैरव पूजन बहुत होता है। जाने-अनजाने, कोई न कोई एक व्यक्ति होता है जो यह ज़िम्मेदारी निभाता है — शायद सिर्फ अपनी नौकरी की खातिर — कोतवाली में भैरव पूजन करता है ताकि चोर आदि पकड़े जाएँ। पुराने समय में धारावाहिक दिखाते थे न, कि महाकाली की पूजा करके लुटेरे निकले, डाकू डकैती डालने निकले। ठीक उसी तरह उन्हें पकड़ने के लिए कोतवाली पूजन होता है। इसीलिए काशी के कोतवाल भैरव हैं; हर क्षेत्र के कोतवाल भैरव हैं। चाहे नगर खेड़ा हो, चाहे भैरव।
क्या परेशान करने वाले तांत्रिक पर मारण प्रयोग करना गलत है?
शास्त्र कब मारण प्रयोग की अनुमति देता है
यह पूछे जाने पर कि क्या परेशान करने वाले तांत्रिक पर मारण प्रयोग करना गलत है, और क्या माँ के सेवक को अपनी गति में कठिनाई होगी, वक्ता दो बातें स्पष्ट करते हैं। मारण प्रयोग करने में कोई दोष नहीं है: अगर कोई आपकी पत्नी पर, आपकी प्रिय पर बुरी नज़र डाले, अगर धन के मामलों में कोई आपका घर, आपकी ज़मीन, आपका पैसा छीन ले, या आपकी या आपके परिवार के किसी सदस्य की जान को खतरे की संभावना हो, तो शास्त्र मारण प्रयोग की अनुमति देता है; आप कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि देखिए, यहाँ दो बातें स्पष्ट की जाएँगी। मारण प्रयोग करने में कोई दोष नहीं है। अगर कोई आपकी पत्नी पर बुरी नज़र डाले, अगर कोई आपकी प्रिय पर बुरी नज़र डाले; धन से जुड़े मामलों में, अगर कोई आपका घर छीन ले, आपकी ज़मीन छीन ले, आपका पैसा छीन ले; अगर आपके परिवार पर या परिवार के किसी सदस्य पर, आप पर जान के खतरे की संभावना हो — तो शास्त्र मारण प्रयोग की अनुमति देता है। आप कर सकते हैं।
मारण प्रयोग का संकल्प खुद लेने में क्या खतरा है?
पूरी ज़िम्मेदारी आपकी हो जाती है — बेहतर है भगवती को सौंप दें
पर जब आप खुद संकल्प लेकर मारण प्रयोग करते हैं, तो वहाँ पूरी ज़िम्मेदारी आपकी है। अगर उस प्रयोग में आपसे कोई भी गलती हुई, तो वह आप पर ही पड़ सकता है; शत्रु भी उस तंत्र के असर में आ सकता है; कुछ भी हो सकता है। जबकि अगर आप ऐसे प्रयोग भगवती की शरण लेकर करें — उन्हें निर्देशित करते हुए, उन्हें अर्पित करते हुए, कहते हुए कि जगदम्बा, तुम करो, जैसा चाहो करो, देखो, यह मेरा शत्रु है, यह मुझे इस तरह परेशान कर रहा है और मैं इसे दंडित करवाना चाहता हूँ — तो जब वे दंड देंगी, तो बचाने वाला कोई नहीं होगा।
वक्ता कहते हैं कि पर मुझे सिर्फ एक बात कहनी है: जब आप खुद संकल्प लेकर मारण प्रयोग करते हैं, तो वहाँ उसकी पूरी ज़िम्मेदारी आपकी होगी। अगर उस प्रयोग में आपसे कोई भी गलती हुई, तो वह आप पर ही पड़ सकता है। वह शत्रु भी उस तंत्र के असर में आ सकता है; कुछ भी हो सकता है। पर आप ऐसे प्रयोग भगवती की शरण लेकर कीजिए, जिनमें आप भगवती को निर्देशित कर रहे हैं, उन्हें अर्पित कर रहे हैं: जगदम्बा, तुम करो, जो चाहो करो, देखो, यह मेरा शत्रु है, यह मुझे इस तरह कष्ट दे रहा है और मुझे इसे दंडित करवाना है। उसी अनुपात में उनकी साधना कीजिए, उनकी उग्र साधना कीजिए, और उनकी साधना उन्हीं को अर्पित कीजिए। जब वे दंड देंगी, तो बचाने वाला कोई नहीं होगा। तब कोई तांत्रिक उनकी विद्या को उलट नहीं पाएगा, उनकी शक्ति और सामर्थ्य के सामने खड़ा नहीं हो पाएगा।
तुरंत मिले परिणाम बाद में फँसने पर आपको बचाने वाला कोई नहीं छोड़ते
जल्दी परिणाम जो फँसा देते हैं, बनाम उन्हीं को पकड़े रहना
वक्ता कहते हैं कि परिणाम मिलेगा, तुरंत मिलेगा — पर जब आप बाद में फँसेंगे, तो बचाने वाला कोई नहीं होगा। लोग कहीं न कहीं हिसाब बराबर करने लगते हैं। जबकि अगर परिणाम नहीं मिल रहा और फिर भी हम उन्हीं को पकड़े रहें, तो उनकी इच्छा ज़रा-सी भी जागे, वे ज़रा-सी भी दृष्टि डालें, और काम हो जाता है — और जब वे काम करेंगी तो आप धन्य हो जाएँगे; तब आपको सोचना नहीं पड़ेगा।
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए मैं अपने सब साधकों से कहता हूँ। अभी प्रिंस जी का प्रश्न है: परिणाम नहीं मिल रहा। परिणाम मिलेगा, तुरंत मिलेगा — पर जब आप बाद में फँसेंगे, तो बचाने वाला कोई नहीं होगा। कहीं न कहीं लोग हिसाब बराबर करने लगेंगे। पर अगर परिणाम नहीं मिल रहा और फिर भी हम उन्हीं को पकड़े हैं: उनकी इच्छा ज़रा-सी भी जागे, वे ज़रा-सी भी दृष्टि डालें, और काम हो जाता है। और जब वे काम करवाएँगी, तो आप धन्य हो जाएँगे। तब आपको सोचना नहीं पड़ेगा। जब वे देंगी, तो छप्पर फाड़कर देंगी। जब तक वे नहीं दे रहीं, आपकी परीक्षा चल रही है: आप रो रहे हैं, रो रहे हैं, एक साल बीतता है, दो साल, ढाई साल, तीन साल।
जिसका नाम दिन-रात लिया जाए, वह पुकार को हमेशा अनसुना नहीं कर सकता
किसी का नाम दिन-रात लेना — वह कब तक अनसुना करेगा?
वे कहते हैं कि कभी न कभी फुसफुसाहट दीनबंधु के, भगवती के कानों तक पहुँचेगी। प्रिंस जी को उदाहरण बनाकर: मान लीजिए प्रिंस जी मुझे देख सकते हैं और सुन सकते हैं, और मैं दिन-रात उन्हें याद करता हूँ और उनका नाम लेता हूँ — प्रिंस, प्रिंस, प्रिंस — आप कितने दिन अनसुना करेंगे? जब भी देखेंगे, कहेंगे: यह तो मुझसे कुछ माँगता भी नहीं, रोज़ सुबह उठता है, नहाता है और मेरा नाम लेने लगता है, रोज़ मुझे भोग लगाता है, रोज़ मेरे लिए उपहार लाता है।
कभी न कभी फुसफुसाहट उनके कान में पड़ेगी न — दीनबंधु के कान में, भगवती के कान में; वे देखेंगी न कि हाँ, रोज़ — वे माफ़ी माँगते हैं कि उन्हें पूरा नाम नहीं पता, और प्रिंस जी के प्रश्न को उदाहरण बनाते हैं। मान लीजिए प्रिंस जी मुझे देख सकते हैं, मुझे सुन सकते हैं। मैं दिन-रात उन्हें याद करता हूँ और उनका नाम लेता हूँ। प्रिंस, प्रिंस, प्रिंस, प्रिंस, मैं कह रहा हूँ। आप कितने दिन अनसुना करेंगे? जब भी आप देखेंगे, कहेंगे: यह आदमी मुझसे कुछ माँगता भी नहीं; रोज़ सुबह उठकर नहा-धोकर मेरा नाम लेने लगता है, रोज़ मुझे भोग लगाने लगता है, रोज़ मेरे लिए उपहार लाता है। यह खास सक्षम नहीं है; इसके पास पैसे की कमी है, शरीर से भी अपने परिवार को लेकर इतना परेशान है — फिर भी आता है और, चाहे श्रद्धा न हो, चाहे इसके अंदर श्रद्धा न हो, फिर भी आता है और कुछ करता है, थोड़ी प्रार्थना करता है: ध्यान दीजिए।
क्या गुप्त नवरात्रि में गणपति पूजा हो सकती है, और क्या माता-पिता के पैर छू सकते हैं?
प्रतिपदा या चतुर्थी से गणपति; माता-पिता का चरण स्पर्श अनुमत
गुप्त नवरात्रि में श्री गणपति जी की पूजा विधि के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं हाँ, की जा सकती है — आप प्रतिपदा से भी कर सकते हैं, और चतुर्थी से भी। यह पूछे जाने पर कि क्या नवरात्रि में माता-पिता के पैर नहीं छूने चाहिए, वे कहते हैं कि माता-पिता के पैर छुए जा सकते हैं।
क्या नवरात्र में पत्नी अपने पति के पैर छू सकती है?
वे इस पर जो शर्तें रखते हैं, और नहीं तो क्या करें
अगर पत्नी अपने पति के प्रति समर्पित है, अगर वह कभी अपने पति का मज़ाक नहीं उड़ाती, अगर उसकी साधनाओं के प्रति, उसके इष्ट और आराध्य के प्रति, जहाँ वह भक्त या साधक है, उसकी श्रद्धा है; अगर वह सब देवताओं, ऋषि-मुनियों, मंत्रों और आपके शास्त्रों का सम्मान करती है और कभी उनका मज़ाक नहीं उड़ाती — तो वह छू सकती है, अनुमति दी जा सकती है, और उसमें कोई दोष नहीं है। पर अगर आपकी पत्नी में ऐसे दोष हैं, तो आप खुद उन्हें दूर से प्रणाम कीजिए: हे देवी, मुझे क्षमा करो; तुम अपनी जगह खुश रहो और हमें अपनी जगह खुश रहने दो।
वक्ता कहते हैं कि पत्नी और पति के बारे में: अगर वह अपने पति के मामले में समर्पित है, अगर वह कभी अपने पति का मज़ाक नहीं उड़ाती, अगर जहाँ वह भक्त या साधक है वहाँ उसकी सेवा-पूजा के प्रति, उसकी साधनाओं के प्रति, उसके इष्ट के प्रति, उसके आराध्य के प्रति उसकी श्रद्धा है — अगर वह सब देवताओं, ऋषि-मुनियों, मंत्रों, आपके शास्त्रों का सम्मान करती है, और कभी उनका मज़ाक नहीं उड़ाती — तो वह छू सकती है। और आप छूने की अनुमति दे सकते हैं; तब उसमें कोई दोष नहीं है। पर अगर आपकी पत्नी में इस तरह के दोष हैं, तो आप खुद उन्हें दूर से प्रणाम कीजिए: हे देवी जी, मुझे क्षमा करो; तुम अपनी जगह खुश रहो और हम अपनी जगह खुश रहेंगे।
अगर सूतक या पातक में कोई हम पर अभिचार करे तो क्या?
पचानवे प्रतिशत अभिचार सूतक और पातक में नहीं चलता
वे कहते हैं कि यह बहुत अच्छा प्रश्न है, और इस पर एक अलग वीडियो बना है जिसकी एडिटिंग बाकी है; फिर भी वे छोटा-सा उत्तर देते हैं। सबसे पहली बात: पचानवे प्रतिशत मामलों में अभिचार कर्म सूतक और पातक के समय में नहीं चलता। उसका पचानवे प्रतिशत किया ही नहीं जा सकता। जो पाँच प्रतिशत होता है, उसके पीछे कितना दिमाग लगाया गया है, इस पर वे अलग से चर्चा करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि देखिए, यह बहुत अच्छा प्रश्न है, और इस पर एक अलग वीडियो बना है; थोड़ी एडिटिंग बाकी है। उसमें हम इसे अच्छे से समझाएँगे; फिर भी वे छोटा-सा उत्तर देते हैं। सबसे पहली बात: पचानवे प्रतिशत अभिचार कर्म सूतक और पातक के समय में नहीं चलता। बस इतना जान लीजिए। उसका पचानवे प्रतिशत किया ही नहीं जा सकता। जो पाँच प्रतिशत होता है, उसके पीछे कितना दिमाग लगाया गया है, इस पर वे अलग से चर्चा करेंगे। जिन लोगों पर अभिचार कर्म किया गया है: सूतक काल में या तो उन पर और ज़्यादा अभिचार होने लगता है, या फिर कोई अभिचार होता ही नहीं। तकनीकी रूप से कैसे और क्या होता है, यह वे आगे के वीडियो में समझाएँगे; वह अलग से बना है, और जैसे ही समय मिलेगा, उसे बस एडिट करके अपलोड करना है।
धन प्राप्ति के लिए कौन-सी साधना बताई गई है?
धन के संकल्प के साथ सप्ताक्षरी और सप्तश्लोकी
वे कहते हैं कि सप्ताक्षरी साधना और ऐसी बहुत सारी साधनाएँ हैं जो आप गुप्त नवरात्रि में कर सकते हैं; वीडियो अपलोड हैं। सप्तश्लोकी साधना पर उन्होंने कई बार कहा है कि इसे एक बार पूरा करना चाहिए: मान लीजिए आपने किसी पिछली नवरात्रि में सप्तश्लोकी साधना की, तो इस बार जब फिर से करनी हो, तो धन प्राप्ति का संकल्प लेना चाहिए — धन प्राप्ति के लिए और लक्ष्मी की स्थिरता के लिए।
वक्ता कहते हैं कि सप्ताक्षरी साधना, और ऐसी बहुत सारी साधनाएँ जो आप गुप्त नवरात्रि में कर सकते हैं; वीडियो अपलोड हैं। सप्तश्लोकी साधना पर हमने कितनी बार कहा है कि इसे एक बार पूरा करना चाहिए। मान लीजिए किसी पिछले समय में आपने नवरात्रि में सप्तश्लोकी साधना की — तो इस बार जब आपको सप्तश्लोकी साधना करनी है, तो आपको धन प्राप्ति का संकल्प लेना है। और धन प्राप्ति के लिए और लक्ष्मी की स्थिरता के लिए: यह संकल्प लेकर आप फिर से इसका पाठ करेंगे।
धन के संकल्प के लिए हवन में क्या अर्पित करना चाहिए?
पुरुषों के लिए घी में मिश्री; स्त्रियों के लिए पंचमेवा और मधु के साथ साकल्य
उसके बाद जब आप हवन करें, तो अगर आप पुरुष हैं, तो घी में मिश्री मिलाकर हवन कीजिए — यानी आहुति किसी मीठी चीज़ की होगी। और अगर आप स्त्री हैं, तो जब साकल्य आदि मिलाकर करें, उसमें भी पंचमेवा और मधु और ये सब चीज़ें मिलाइए। वे कहते हैं कि इससे लक्ष्मी प्राप्त होगी।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद जब आप हवन करें, तो अगर आप पुरुष हैं, तो घी में मिश्री मिलाकर हवन कीजिए। यानी आहुति किसी मीठी चीज़ से होगी। और अगर आप स्त्री हैं, तो जब साकल्य आदि मिलाकर करें, तो उसमें भी पंचमेवा, मधु, ये सब चीज़ें मिलाकर कीजिए। इससे लक्ष्मी प्राप्त होगी।
दुर्गा सप्तशती का मंडल पूजन क्या है?
सबसे विशाल मंडल, जिसमें संसार की हर देवी की पूजा होती है
वक्ता कहते हैं कि दुर्गा सप्तशती का मंडल पूजन होता है और बहुत विशाल रूप में किया जाता है। सामान्य रूप से मंडल में कम से कम नौ दुर्गाओं का पूजन होता है। सप्तशती का मंडल पूजन बहुत विशाल और बहुत सुंदर है — आपको खूब आनंद आएगा। यह ऐसा है कि इसमें संसार की सभी देवियों का पूजन होता है; अगर सबसे ऊँचे की बात करें, सबसे ऊपर क्या है उसकी, तो वह सप्तशती मंडल है। इसमें कोई शक्ति, कोई देवी शक्ति छूटती ही नहीं — भैरव और गणपति तो अलग ही बात है।
वक्ता कहते हैं कि दुर्गा सप्तशती का मंडल पूजन होता है, और बहुत विशाल रूप में किया जाता है। और सामान्य रूप से मंडल में कम से कम नौ दुर्गाओं का पूजन होता है। सप्तशती का मंडल पूजन बहुत विशाल और बहुत सुंदर है; आपको खूब आनंद आएगा। सप्तशती का मंडल पूजन ऐसा है कि उसमें संसार की सभी देवियों का पूजन होता है। अगर सबसे बड़े की बात करनी हो, सबसे ऊपर क्या है उसकी बात करनी हो, तो वह सप्तशती मंडल है। उसमें ऐसी कोई शक्ति, कोई देवी शक्ति छूटती ही नहीं। भैरव और गणपति का — तो प्रश्न ही हटा दीजिए।
वे खुद को दीक्षा देने योग्य नहीं मानते और जिज्ञासुओं को किसी उच्च कोटि के विद्वान के पास भेजते हैं
वे खुद को दीक्षा देने के योग्य नहीं मानते
तिवारी जी के दीक्षा माँगने पर वक्ता उत्तर देते हैं: हमसे क्या दीक्षा लोगे? हम खुद को दीक्षा देने योग्य नहीं मानते, न ही हम योग्य हैं। किसी उच्च कोटि के विद्वान से दीक्षा लीजिए, जो खुद को स्वयं सिद्ध कहता हो, जिसके चारों ओर सिद्धियाँ मँडराती हों।
तिवारी जी कहते हैं कि वे उनसे दीक्षा लेना चाहते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि हमसे क्या दीक्षा लोगे। हम खुद को दीक्षा देने योग्य नहीं मानते; न ही हम योग्य हैं। किसी उच्च कोटि के विद्वान से दीक्षा लीजिए, जो खुद को स्वयं सिद्ध कहता हो, जिसके चारों ओर सिद्धियाँ मँडराती हों।
सरकार से जुड़ी समस्या के लिए कौन-सी पूजा शुरू करनी चाहिए?
राजकीय तंत्र से परेशानी में भगवती बगलामुखी की शरण
प्रश्न को सरकारी समस्या के बारे में समझकर वक्ता हीरावा पटेल जी से कहते हैं कि अगर राजकीय तंत्र से जुड़ी कोई परेशानी है — यानी कोई सरकारी कठिनाई — तो उस समय भगवती बगलामुखी की शरण लेनी चाहिए। बगलामुखी से जुड़े शुरुआती विषयों पर एक प्लेलिस्ट बनाई गई है, और उसे देखकर आप गुप्त नवरात्रि में साधना कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि शायद आप सरकारी समस्या कह रहे हैं; उन्हें GOV का मतलब समझ नहीं आया। हीरावा पटेल जी: अगर राजकीय तंत्र से जुड़ा कुछ है, यानी कोई सरकारी कठिनाई, तो उस समय आपको भगवती बगलामुखी की शरण लेनी चाहिए। बगलामुखी से जुड़े शुरुआती विषयों पर एक प्लेलिस्ट बनाई गई है; उसे देखकर आप गुप्त नवरात्रि में साधना कर सकते हैं। एक साधक ने पूछा था कि दीक्षा लिए बिना गुप्त नवरात्रि में बगलामुखी साधना किस तरह करनी चाहिए, और विधि-विधान क्या होना चाहिए।
दीक्षा के बिना बगलामुखी साधना कैसे करनी है?
षोडशोपचार पूजन, फिर 1108 नामों से अर्चन
वे कहते हैं कि आपको रोज़ पंचोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। सोलह तरह से पूजन करने का सबसे आसान तरीका है कि सामग्री इकट्ठा करके सोलह अलग-अलग पात्रों में रख लें, और उसके बाद सबसे पहले उनकी पूजा करें। षोडशोपचार पूजन के बाद सबसे अच्छा होगा अर्चन करना — यानी हल्दी मिले फूलों से 1108 नामों से उनका अर्चन करना।
एक साधक पूछते हैं कि विधि-विधान क्या होना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि आपको रोज़ पंचोपचार या दशोपचार या षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। सोलह तरह से पूजन करने का सबसे आसान तरीका है कि सामग्री इकट्ठा करके सोलह अलग-अलग पात्रों में रख लें, और उसके बाद सबसे पहले उनकी पूजा करें। षोडशोपचार पूजन करने के बाद सबसे अच्छा होगा अर्चन करना — यानी हल्दी मिले फूलों से 1108 नामों से भगवती का अर्चन करना।
उस बगलामुखी अनुष्ठान के साथ कौन-सा संकल्प और समापन के कर्म होते हैं?
सिर्फ एक संकल्प, नौ दिन अर्चन, दशमी को हवन, और एक कन्या
वे कहते हैं कि आप दीक्षित नहीं हैं — कोई दिक्कत नहीं; इतना कीजिए, और सिर्फ एक संकल्प रखिए। जो भी आपका संकल्प हो — शत्रु की बुद्धि का नाश, धन प्राप्ति, कर्ज़ से मुक्ति — वह संकल्प लेकर पूरी नवरात्रि, नौ दिन, 1108 नामों से उनका अर्चन कीजिए। और दशमी के दिन हवन कीजिए; नवमी को भी कर सकते हैं, पर संभव हो तो दशमी को हवन कीजिए, वह सबसे अच्छा होगा। उसके बाद कम से कम एक कन्या को भोजन भी कराइए, या एक कन्या के निमित्त किसी मंदिर में सारी सामग्री दान कीजिए — श्रृंगार, मिठाई, फूल, फल, सब कुछ।
वक्ता कहते हैं कि आप दीक्षित नहीं हैं; कोई दिक्कत ही नहीं है। इतना कीजिए, और सिर्फ एक संकल्प रखिए। जो भी आपका संकल्प हो — अगर शत्रु की बुद्धि के नाश के लिए है, तो वह; अगर धन प्राप्ति के लिए है, तो धन प्राप्ति के लिए; अगर कर्ज़ से मुक्ति के लिए है, तो वह। चाहे आप बगलामुखी माई का कर रहे हों, जैसा इन प्रश्नकर्ता ने सरकारी मामले के बारे में पूछा — अगर कोई सरकारी बाधा है, तो उसका संकल्प लेकर, इसी तरह पूरी नवरात्रि, नौ दिन, 1108 नामों से उनका अर्चन कीजिए। और दशमी के दिन आपको हवन करना चाहिए। नवमी को भी कर सकते हैं; संभव हो तो दशमी को हवन कीजिए, और वह सबसे अच्छा होगा। और उसके बाद कम से कम एक कन्या को भोजन भी कराइए, या एक कन्या के निमित्त किसी मंदिर में सारी सामग्री दान कीजिए — श्रृंगार, मिठाई, फूल, फल, सब कुछ।
गुप्त नवरात्रि में साबर मंत्र का जप कितना फल देता है?
सामान्य से बहुत ज़्यादा — पर सिर्फ एक ही मंत्र
वक्ता उत्तर देते हैं कि यह बहुत अच्छा फल देगा। जब आप गुप्त नवरात्रि में साबर मंत्र करते हैं तो यह सामान्य से बहुत ज़्यादा फल देगा — पर सिर्फ एक ही मंत्र का जप कीजिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि महाराज, गुप्त नवरात्रि में साबर मंत्र का जप कितना फल देगा। वक्ता उत्तर देते हैं कि बहुत अच्छा फल देगा। जब आप गुप्त नवरात्रि में सबर मंत्र करते हैं तो यह सामान्य से बहुत ज़्यादा फल देगा — पर सिर्फ एक ही मंत्र का जप कीजिए।
अगर चुनाव ड्यूटी या शिफ्ट का काम समय में बाधा डाले तो क्या करें?
पंचमी या षष्ठी से शुरू करना, और समय आगे-पीछे करना
जिनकी 30 तारीख और 6 से 2 तक चुनाव ड्यूटी है और जो पूछते हैं कि क्या रक्षा श्लोक का अनुष्ठान 3 या 4 से शुरू कर सकते हैं, उनसे वे कहते हैं हाँ — आप पंचमी या षष्ठी से शुरू कर सकते हैं। एक और व्यक्ति जो ड्यूटी के कारण एक ही समय पर पूजा नहीं कर सकते, पूछते हैं कि क्या अलग-अलग समय पर की जा सकती है, तो वे कहते हैं हाँ, की जा सकती है; ड्यूटी के कारण आपका समय आगे-पीछे हो सकता है, कोई दिक्कत नहीं, पर रोज़ कीजिए।
एक श्रोता कहते हैं कि उनकी 30 तारीख से और 6 से 2 तक चुनाव ड्यूटी है, और पूछते हैं कि क्या वे श्लोक का रक्षा अनुष्ठान 3 या 4 से शुरू कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि 3 या 4 से — एक, दो, तीन, चार — हाँ, ठीक है: आप पंचमी या षष्ठी से शुरू कर सकते हैं। एक और कहते हैं कि ड्यूटी के कारण वे नवरात्रि में एक ही समय पर पूजा नहीं कर पाते, और पूछते हैं कि क्या अलग-अलग समय पर की जा सकती है। वे उत्तर देते हैं कि ठीक है, हाँ, की जा सकती है, कोई दिक्कत नहीं। ड्यूटी के कारण हो सकता है आपका समय आगे-पीछे हो; कोई दिक्कत नहीं। पर रोज़ कीजिए।
गया में कौन-से भैरव हैं?
शक्तिपीठ के रूप में मंगला गौरी, और उनकी जानकारी में काल भैरव
यह पूछे जाने पर कि क्या गया के भैरव कपाल भैरव हैं जैसा वे हमेशा मानते आए, या — जैसा हाल में एक साधु ने प्रश्नकर्ता को बताया — यह गलत धारणा है और वहाँ अष्ट भैरव हैं, वक्ता उत्तर देते हैं कि गया का शक्तिपीठ मंगला गौरी है, वहाँ का मुख्य शक्तिपीठ और जगदम्बा का मुख्य स्थान। उनकी जानकारी में वहाँ के भैरव काल भैरव हैं। पूरी असलियत क्या है, यह वे अभी नहीं जानते, और जिसकी जानकारी नहीं उसके बारे में वे कुछ नहीं कहेंगे।
वक्ता कुणाल वत्स जी से कहते हैं कि गया का शक्तिपीठ मंगला गौरी है। मंगला गौरी वहाँ का मुख्य शक्ति पीठ है; यह जगदम्बा का मुख्य स्थान है। और वहाँ के भैरव — आपने कपाल भैरव लिखा है। वे कहते हैं कि मेरी जानकारी में वहाँ भी काल भैरव हैं। पूरी असलियत क्या है, यह मैं अभी नहीं जानता; और जिसकी मुझे जानकारी नहीं, उसके बारे में क्या कहूँ? मेरी जानकारी में वहाँ काल भैरव हैं। ठीक है — हम कभी गया जाएँगे, जल्दी ही, और इस विषय को स्पष्ट करेंगे। हालाँकि जब वे मंगला गौरी शक्तिपीठ गए थे तो वहाँ उन्हें सब बताया गया था, तो उनकी जानकारी में वहाँ काल भैरव ही हैं, क्योंकि मंगला गौरी मुख्य शक्तिपीठ है।
शिव पंचायतन के मुकाबले कुल देवता को कहाँ रखना चाहिए?
कुल देवता को सबसे सुंदर स्थान मिलना चाहिए
यह पूछे जाने पर कि क्या शिव पंचायतन स्थापित करने के बाद कुल देवता को बगल में स्थापित किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि कुल देवता को सबसे सुंदर स्थान मिलना चाहिए। शिव पंचायतन स्थापित कीजिए — पर कुल देवता आपके सब कुछ हैं; वे आपके घर के मालिक हैं। आपके माता-पिता मालिक नहीं हैं; वे हैं। उन्होंने चाहा कि आप उनके कुल में जन्म लें, और इसलिए आपका जन्म हुआ। इसीलिए उनका सम्मान सबसे ऊपर है, और कुल देवता और कुलदेवी की पूजा सबसे ऊपर है।
रोज़ दुर्गा कवच का पाठ? बिल्कुल किया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या शिव पंचायतन स्थापित करने के बाद कुल देवता को बगल में स्थापित किया जा सकता है, वे कहते हैं कि कुल देवता को सबसे सुंदर स्थान मिलना चाहिए। शिव पंचायतन स्थापित कीजिए — पर कुल देवता आपके सब कुछ हैं; आपके घर के मालिक वही हैं। आपके माता-पिता मालिक नहीं हैं; मालिक वे हैं। उन्होंने चाहा कि आप उनके कुल में जन्म लें, और इसलिए जन्म हुआ। इसीलिए उनका सम्मान सबसे ऊपर है। कुल के देवता और कुल की देवी का सम्मान, उनकी पूजा, सबसे ऊपर है।
उन पूर्वजों का क्या जिन्होंने पूजा करने से ही मना किया?
"वे लेते हैं" — और इसके बजाय सीधे धाम जाना
एक श्रोता कहते हैं कि उनके घर में उनके पूर्वज पूजा करने से मना करते थे, कहते थे किसी की पूजा मत करो, वे लेते हैं; अगर जाना ही है, तो सीधे धाम जाओ और वहाँ पूजा करो। वक्ता सुनील विश्वकर्मा जी से कहते हैं कि वे जो कह रहे हैं वह बिल्कुल संभव है, इसमें कुछ गलत नहीं, ऐसा होता था — ऐसा बिल्कुल होता था, उसी दिन इस पर चर्चा हो रही थी, यह बात एक समय होती थी।
एक श्रोता लिखते हैं कि मेरे घर में मेरे पूर्वज पूजा करने से मना करते थे; वे कहते हैं किसी की पूजा मत करो, वे लेते हैं; अगर जाना ही है, तो सीधे धाम जाओ और पूजा करो — ऐसी बात है। वक्ता उत्तर देते हैं कि सुनील विश्वकर्मा जी, आप जो कह रहे हैं वह बिल्कुल संभव है; इसमें कुछ गलत नहीं है। ऐसा होता था। ऐसा बिल्कुल होता था। आज भी इसी बात पर चर्चा हो रही थी। यह बात एक समय होती थी।
त्रिकोण मंडल से घर पर काली खोह की महाकाली, अष्टभुजा और विंध्यवासिनी एक साथ स्थापित होती हैं
काली खोह की महाकाली, अष्टभुजा और विंध्यवासिनी का त्रिकोण मंडल
वे कहते हैं कि विंध्याचल धाम जाइए, और वहाँ जाकर सबसे पहले उस स्थान की पूजा दीजिए, और भगवती विंध्यवासिनी की पूजा कीजिए। हो सके तो घर पर त्रिकोण मंडल की स्थापना कीजिए — यानी तीनों को एक साथ स्थापित कीजिए: काली खोह की महाकाली, अष्टभुजा और विंध्यवासिनी। विंध्यवासिनी से जुड़ा त्रिकोण यंत्र पूरे विधि-विधान से स्थापित कीजिए, और फिर उनका पूजन कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि विंध्याचल धाम जाइए; वहाँ जाकर सबसे पहले उस स्थान की पूजा दीजिए, और भगवती विंध्यवासिनी की पूजा कीजिए। हो सके तो घर पर त्रिकोण मंडल की स्थापना कीजिए — यानी तीनों को एक साथ स्थापित कीजिए: काली खोह की महाकाली, अष्टभुजा, और विंध्यवासिनी। विंध्यवासिनी से जुड़ा त्रिकोण यंत्र पूरे विधि-विधान से स्थापित कीजिए, और फिर उनका पूजन कीजिए। विंध्य भैरव होंगे, लाल भैरव होंगे; भैरव और भैरवी भी होंगे; उस स्थान की सायर माता भी होंगी। ये सब मंडल में आ जाएँगे, और इस तरह आप पूजा कर पाएँगे।
जिस शक्ति का नाम लिया गया, वह किसी पिछले काल में पूरी तरह स्थापित और शांत की गई थी और आज भी पूरी तरह समर्थ है
बहुत पहले शांत की गई शक्ति, आज भी पूरी तरह समर्थ
वे कहते हैं कि आपने यहाँ जिसका नाम लिखा है — यह बात एक समय बिल्कुल ऐसी ही थी। किसी काल में यह चीज़, यह शक्ति, पूरी तरह स्थापित और शांत की गई थी; उस समय उनका प्रभाव, जो इस लोक में और सब लोकों में व्याप्त हो गया था, शांत किया गया। और आज भी वे पूरी तरह समर्थ हैं। इसी कारण आपको इसे इस तरह करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि आपने यहाँ जिनका नाम लिखा है — यह बात एक समय बिल्कुल ऐसी ही थी। किसी काल में यह चीज़, यह शक्ति, पूरी तरह स्थापित की गई थी, शांत की गई थी। उस समय उनका प्रभाव, जो इस लोक में और सब लोकों में व्याप्त हो गया था, शांत किया गया। और आज भी वे पूरी तरह समर्थ हैं। तो इसी कारण आपको इसे इस तरह करना चाहिए।
क्या साधना के क्षेत्र में आने से पहले अपने सारे दोष नष्ट कर लेने चाहिए?
दोष साधना करने से नष्ट होता है, उससे पहले नहीं
वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए: दोष तभी नष्ट होगा जब आप साधना के क्षेत्र में आएँगे। दोष नष्ट करके आप कैसे आएँगे? साधना करने से ही दोष नष्ट होगा। यह ऐसा कहना है कि खाना बनाने से पहले हमें ताकतवर हो जाना चाहिए — कि हम इतने ताकतवर हो जाएँ कि पूरा मन लगाकर बढ़िया खाना बनाएँ। अभी हम कमज़ोर हैं। भाई, ताकतवर तो तभी होंगे जब खाना बनाकर खाएँगे; तभी कमज़ोरी जाएगी।
यह पूछे जाने पर कि क्या साधना के क्षेत्र में उतरने से पहले अपने सारे दोष नष्ट करने के लिए कुछ करना चाहिए, वक्ता कहते हैं: देखिए, दोष तभी नष्ट होगा जब आप साधना के क्षेत्र में उतरेंगे। दोष नष्ट करके आप कैसे उतरेंगे? साधना करने से ही दोष नष्ट होगा। यह ऐसा हो गया कि खाना बनाने से पहले हमें ताकतवर हो जाना चाहिए। कि हम इतने ताकतवर हो जाएँ कि पूरा मन लगाकर बढ़िया खाना बनाएँ। अभी हम कमज़ोर हैं। भाई, ताकतवर तो तब होंगे जब खाना बनाकर खाएँगे; तब कमज़ोरी जाएगी। तो साधना करते हुए दोष नष्ट कीजिए। साधना के अलावा परोपकार आदि के काम कीजिए; तब दोष नष्ट होंगे। हाँ — अगर आपका मतलब सिद्धि से है, तो मैं कहूँगा कि सिद्धि से पहले दोष नष्ट होना चाहिए, क्योंकि सिद्धि सीधे-सीधे किसी शक्ति को अपनी बात के अधीन करने की बात है।
अगर पहले सूतक और पातक ठीक से न माना गया हो तो क्या किया जा सकता है?
पंचांग सेवन
एक श्रोता कहते हैं कि शुरुआती समय में वे सूतक-पातक के नियम नहीं निभा सके और अब उसे उसी तरह पूरा करना चाहते हैं, और पूछते हैं कि क्या बस पंचांग सेवन कर लें। वक्ता कहते हैं हाँ, बिल्कुल कीजिए; पंचांग सेवन ही कीजिए — आप काफी अच्छे साधक हैं।
एक श्रोता कहते हैं कि शुरुआती समय में सूतक-पातक के नियमों के कारण मैं नहीं कर सका, और अब इच्छा होती है कि उसी तरह पूरा करूँ — बस पंचांग सेवन कर लूँ। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल कीजिए। पंचांग सेवन ही कीजिए; आप काफी अच्छे साधक हैं।
तंत्र बाधा के लिए अब विंध्याचल में किससे मिला जा सकता है?
विकास कार्यों के बीच विंध्य क्षेत्र की स्थिति
अशोक पांडे जी के पूछने पर कि तंत्र बाधा से पीड़ित होने पर वे विंध्याचल में किसे दिखा सकते हैं, वक्ता कहते हैं कि आज के समय में यह कहना बेहद कठिन हो गया है। विंध्य क्षेत्र जिस हालत में है, उसे देखते हुए वे यह भी नहीं कह सकते कि आपको वहाँ जाना चाहिए। वे सारी जगहें जहाँ तंत्र बंधन आदि होते थे, खुद ही तोड़ दी गई हैं; एक हवन कुंड भी नहीं बचा। वह स्थान शायद हज़ारों साल पुराना था, और वे सारी चीज़ें हटा दी गई हैं।
वक्ता अशोक पांडे जी को उत्तर देते हैं कि आज के समय में यह कहना बेहद कठिन हो गया है। विंध्य क्षेत्र जिस हालत में है, उसे देखते हुए मैं यह भी नहीं कह सकता कि आपको वहाँ जाना चाहिए। वे सारी जगहें जहाँ तंत्र बंधन आदि होते थे, खुद ही तोड़ दी गई हैं। एक हवन कुंड भी नहीं बचा। वह स्थान शायद हज़ारों साल पुराना था; वे सारी चीज़ें हटा दी गई हैं। धार माता का मंदिर बचा है या नहीं, यह भी वे ठीक से नहीं जानते, न ही कोई बताना चाहता है।
आश्रम की ज़मीन करोड़ों में बिकने और कॉरिडोर का काम चलने से उस इलाके में सावधानी से जाना चाहिए
करोड़ों में बिकी आश्रम की ज़मीन, और कॉरिडोर का काम
वे कहते हैं कि मैं अभी बिल्कुल नहीं कह सकता कि आप वहाँ जाइए। अगर आप उस जगह के किसी ऐसे इलाके में जाएँ, तो आज के समय में सावधानी से जाइए। दर्शन और पूजन आदि कर सकते हैं; पर वहाँ जाकर किससे मिलना चाहिए, यह अब कहना काफी कठिन है, क्योंकि अगर मैं आपको वहाँ भेजूँ — और मैं इतना जानता हूँ कि यही क्षेत्र अभी वहाँ अस्त-व्यस्त है — तो आप क्रिया कर्म कहाँ करेंगे? विंध्य का जंगल, जो एक समय पूरी तरह गुप्त रहता था, जिसमें कभी आश्रम हुआ करते थे, करोड़ों में बिक गया है।
वक्ता कहते हैं कि मैं अभी बिल्कुल नहीं कह सकता कि आप वहाँ जाइए। अगर आप उस जगह के किसी ऐसे इलाके में जाएँ, तो आज के समय में सावधानी से, सोच-समझकर जाइए। दर्शन और पूजन आदि आप कर सकते हैं। पर वहाँ जाकर किससे मिलना चाहिए, यह अभी कहना काफी कठिन है। क्योंकि अगर मैं आपको वहाँ भेजूँ — और मुझे इतनी जानकारी है कि यह क्षेत्र खुद अभी वहाँ अस्त-व्यस्त है — तो आप क्रिया कर्म कहाँ करेंगे? विंध्य का जंगल, जो एक समय पूरी तरह गुप्त रहता था, वह स्थान जिसमें कभी आश्रम हुआ करता था: वह स्थान करोड़ों में बिक गया है। अब मैं आपको कहाँ भेजूँ? वे कहते हैं कि जब तक कॉरिडोर का काम पूरा नहीं होता, तंत्र से जुड़ी इन बातों पर जिनकी आप बात करते हैं, घाट आदि, मैं आपको कुछ नहीं बता सकता।
क्या कहीं अब भी तंत्र बाधा बैठाई जा सकती है?
काली खोह और उसके पीछे भैरव बाबा का स्थान — किसी जानकार के साथ
वे कहते हैं कि इतना वे ज़रूर कह सकते हैं: अगर आपकी पहचान में कोई जानकार व्यक्ति है जो आपके साथ है और वहाँ जाकर तंत्र से जुड़ी बाधा हटवाना चाहता है, तो काली खोह जाइए। काली खोह में, काली खोह के पीछे भैरव बाबा का स्थान है; उसके वीडियो सब बने हैं और वे एडिटिंग के बाद जल्दी अपलोड करेंगे, नवरात्रि के बाद या पहले अपलोड करने की कोशिश करेंगे, और उनमें बताएँगे कि कहाँ और कैसे क्या करना है।
वक्ता कहते हैं कि इतना मैं ज़रूर कह सकता हूँ: अगर आपकी पहचान में कोई जानकार व्यक्ति है जो आपके साथ है, और वे वहाँ जाकर तंत्र से जुड़ी बाधा हटवाना चाहते हैं, तो काली खोह जाइए। काली खोह में, काली खोह के पीछे भैरव बाबा का स्थान है। सारे वीडियो बने हैं; मैं एडिटिंग के बाद जल्दी उन्हें अपलोड करता हूँ। मैं नवरात्रि के बाद या पहले अपलोड करने की कोशिश करूँगा, और उसमें बताऊँगा कि कहाँ और कैसे क्या करना है। तंत्र बाधा कितनी भी बड़ी हो, वहाँ जाकर उसे बैठाया जा सकता है, और वह वहाँ से कभी वापस नहीं आती — पर आपके पास जानकार व्यक्ति होना चाहिए; जानकार व्यक्ति को साथ ले जाना पड़ेगा। उस जगह के लोगों ने, यह कॉरिडोर योजना शुरू होने के बाद, काम लेना बिल्कुल बंद कर दिया है। जो उस तरह के साधक हैं, सही कहें तो, अब बिना किसी सिफारिश के बिल्कुल नहीं करते।
विंध्यवासिनी की जीवन भर रोज़ की पूजा के लिए कौन-सा मंत्र या स्तोत्र?
सप्तशती का ग्यारहवाँ अध्याय, रोज़ अर्पित
वक्ता कहते हैं कि संजय मिश्रा जी, यह बहुत अच्छा प्रश्न है। मैं मंत्र नहीं बता सकता, पर इतना ज़रूर कहूँगा: दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय का पाठ रोज़ उन्हें अर्पित कीजिए। फिर आपको किसी चीज़ के बारे में सोचना नहीं पड़ेगा। कवच का पाठ कीजिए, और कवच के बाद ग्यारहवाँ अध्याय अर्पित कीजिए। भगवती विंध्यवासिनी समेत सबका पूजन हो जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि संजय मिश्रा जी, यह बहुत अच्छा प्रश्न है। मैं मंत्र नहीं बता सकता, पर इतना ज़रूर कहूँगा: दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय का पाठ — रोज़ उन्हें अर्पित कीजिए। फिर आपको किसी चीज़ के बारे में सोचना नहीं पड़ेगा। कवच का पाठ कीजिए; कवच के बाद ग्यारहवाँ अध्याय अर्पित कीजिए। भगवती विंध्यवासिनी समेत सबका पूजन हो जाएगा।
क्या दक्षिण काली की सेवा सदाशिव के साथ की जा सकती है?
दक्षिण काली सदाशिव-भैरव-सहित हैं
यह पूछे जाने पर कि क्या सदाशिव की सेवा के साथ दक्षिण काली की कृपा पाई जा सकती है, या उनकी सेवा भैरव के साथ करनी चाहिए, वक्ता कहते हैं कि दक्षिण काली सदाशिव-भैरव-सहित हैं। तो एक बात यह कि सदाशिव खुद भैरव के रूप में उनके साथ हैं; इसलिए आप उनके साथ दक्षिण काली की सेवा कर सकते हैं। अगर आप तंत्र में जाएँ, तो बटुक भैरव की सेवा अनिवार्य हो जाती है, और काल भैरव की सेवा भी अनिवार्य हो जाती है। आद्या काली में, दक्षिण काली में, सदाशिव ही विराजते हैं।
यह पूछे जाने पर कि क्या सदाशिव की सेवा के साथ दक्षिण काली की कृपा पाई जा सकती है, या उनकी सेवा भैरव के साथ करनी चाहिए, वे उत्तर देते हैं कि दक्षिण काली सदाशिव-भैरव-सहित हैं। तो एक बात यह कि सदाशिव खुद भैरव के रूप में उनके साथ हैं। इसलिए आप उनके साथ दक्षिण काली की सेवा कर सकते हैं। अगर आप तंत्र में जाएँ, तो बटुक भैरव की सेवा अनिवार्य हो जाएगी; काल भैरव की सेवा भी अनिवार्य हो जाएगी। आद्या काली में, दक्षिण काली में, सदाशिव ही विराजते हैं। वे जोड़ते हैं कि दिव्य दृष्टि जगाने के कई विधान हैं — पर सबसे पहले आपको उसे संभालना आना चाहिए। इसकी शुरुआत त्राटक से कीजिए।
हवन कब होना चाहिए, और अगर अग्निवास न समझ आए तो क्या करें?
नवरात्रि में नवमी या दशमी को अग्निवास देखने की ज़रूरत नहीं
उदय प्रताप जी के पूछने पर कि अगर साधना का मंत्र और स्तोत्र रात में होते हैं तो हवन रात में होगा या सुबह, और जब अग्निवास पता न कर सकें तो कैसे चलें, वक्ता कहते हैं कि अगर आप नवरात्रि आदि में कर रहे हैं, तो नवमी तिथि पर अग्निवास देखने की ज़रूरत नहीं है। न दशमी को देखने की कोई ज़रूरत है। जिस दिन आपके पूरे दिन पूरे हो रहे हों, उस दिन कर सकते हैं।
क्या गद्दी पर बैठने वाले भगत को गुरु बनाया जा सकता है?
सात्विक और गृहस्थ हों तो हाँ; तामसिक हों तो नहीं
रंजीत केवट जी के पूछने पर कि क्या बैठक या गद्दी लगाने वाले भगत से इष्ट मंत्र या गुरु मंत्र लेना उचित है, वक्ता कहते हैं कि आप ले सकते हैं — सात्विक तरीके से, गृहस्थ तरीके से। अगर वे तामसिक प्रवृत्ति के साधक हैं, या तामसिक साधना करते हैं, तो वे मना करेंगे।
यह पूछे जाने पर कि क्या बैठक या गद्दी लगाने वाले भगत से इष्ट मंत्र या गुरु मंत्र लेना उचित है, वक्ता रंजीत केवट जी से कहते हैं: आप ले सकते हैं — सात्विक तरीके से, गृहस्थ तरीके से। अगर वे तामसिक प्रवृत्ति के साधक हैं, या तामसिक साधना करते हैं, तो मैं मना करूँगा। दरिद्र दहन शिव स्तोत्र पर वे चेतन जी से कहते हैं कि विधान दिया गया है; चैनल से हटा दिया गया है या नहीं, वे नहीं जानते, और एक बार देखने को कहते हैं। दरिद्र दहन का यह विधान महाशिवरात्रि के समय के लिए दिया गया है।
अगर गुरु हमेशा पैसे के पीछे हों तो क्या करें?
बहुत कठिन स्थिति — और यह प्रश्न कि आपको संतोष किससे मिलता है
ए के पात्रो जी के पूछने पर कि जब गुरु हमेशा पैसे के पीछे हों और उनके पास जा भी न सकें तो क्या करें, वक्ता कहते हैं कि अगर आपके गुरु जी सब कुछ सिर्फ पैसे के हिसाब से करते हैं, तो भाई, यह बहुत बड़ी और कठिन स्थिति है। उनकी राय में होना यह चाहिए कि अगर सामने वाला कुछ करने में सक्षम है, तो उससे करवाइए; और अगर सक्षम नहीं है, तो उसे उस तरह के विधान दिए जाने चाहिए। यहाँ जो कठिनाई आती है वह यह है: आपका अपना संतोष क्या है — पैसे खर्च करके आपको संतोष मिलता है, या ऐसे संतोष मिलेगा? वे कहते हैं कि यही सबसे ज़रूरी बात है।
वक्ता कहते हैं कि अगर आपके गुरु जी सब कुछ सिर्फ पैसे के हिसाब से ही करते हैं, तो भाई, यह बहुत बड़ी और कठिन स्थिति है। मेरी राय में होना यह चाहिए कि अगर सामने वाला कुछ भी करने में सक्षम है, तो उससे करवाइए। अगर वह सक्षम नहीं है, तो उसे उस तरह के विधान दिए जाने चाहिए। यहाँ जो कठिनाई आती है वह है: आपका संतोष क्या है? क्या पैसे खर्च करके आपको संतोष मिल रहा है, या इस तरह आपको संतोष मिलेगा? यही सबसे ज़रूरी बात है।
गुरु द्वारा कब ठगा जा रहा होता है?
हर मंत्र की दीक्षा की कीमत बनाम एक बार दी जाने वाली तीन-चार चीज़ें
अगर हर मंत्र के लिए आपसे दीक्षा माँगी जा रही है, अगर कहा जा रहा है कि 11000 दो तो इस मंत्र की दीक्षा मिलेगी, 21000 दो तो वह मंत्र मिलेगा, और जप दीक्षा लेने के बाद ही करना है — तो सीधी बात है कि आपको ठगा जा रहा है। सिर्फ दो-तीन चीज़ें हैं जिनमें, जहाँ भी सही गुरु परंपरा चलती है, पैसा लगता है: जब आप किसी के सामने दीक्षित होते हैं तो वे अपनी परंपरा के अनुसार आपको एक माला देते हैं; अगर आप तंत्रोक्त विधि में दीक्षित हो रहे हैं तो वे आपको यंत्र और उसका पूरा विधि-विधान देते हैं; वे जप माला, धारण माला, कवच देते हैं। ये तीन-चार चीज़ें, और पैसा सिर्फ एक बार लगता है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात: अगर हर मंत्र के लिए आपसे दीक्षा लेने को कहा जा रहा है, अगर कहा जा रहा है कि 11000 दो तो इस मंत्र की दीक्षा मिलेगी, 21000 दो तो वह मंत्र मिलेगा, और मंत्र जप दीक्षा लेने के बाद ही करना है — तो सीधी बात है कि आपको ठगा जा रहा है। सिर्फ दो-तीन चीज़ें हैं जो होती हैं जहाँ भी सही गुरु परंपरा चलती है, या अगर कोई आपको बताए भी। पहली यह है: जब आप किसी के सामने जाकर दीक्षित होते हैं, तो वे अपनी परंपरा के अनुसार आपको एक माला देते हैं। अपनी परंपरा के अनुसार, अगर आप तंत्रोक्त विधि में दीक्षित हो रहे हैं, तो वे आपको यंत्र आदि की जानकारी देते हैं, और यंत्र के पूरे विधि-विधान के साथ देते हैं। वे जप माला, धारण माला, कवच आदि देते हैं। ये तीन-चार चीज़ें हैं, और इनमें पैसा सिर्फ एक बार लगता है।
पूरे परिवार के लिए कवच कैसे बनाए जाते हैं?
धीरे-धीरे, साल दर साल — हर त्योहार पर नया यंत्र नहीं
वे कहते हैं कि अगर आप खास तौर पर पूरे परिवार के लिए करवा रहे हैं, तो पूरे परिवार के लिए धीरे-धीरे होता है: हमारे भी ऐसे साधक हैं, और हम सब धीरे-धीरे चलते हैं — इस साल माता-पिता के लिए कवच आदि बना, अगले साल भाई के लिए बना, और ऐसे धीरे-धीरे चलता है। पर ऐसा नहीं कि हर बात में आपसे कहा जाए: अब नवरात्रि आई है, तो नवरात्रि में नया यंत्र और माला लो; शिवरात्रि आई है, शिवरात्रि पर यंत्र और माला लो। ऐसे नहीं चलता। ऐसे में आपको सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप खास तौर पर पूरे परिवार के लिए करवा रहे हैं, तो पूरे परिवार के लिए धीरे-धीरे होता है। हमारे भी ऐसे साधक हैं; हम सब धीरे-धीरे चलते हैं, कहते हुए कि भाई, आइए, आज माता-पिता के लिए कवच आदि बना, तो अगले साल अपने भाई के लिए बना — इसी तरह धीरे-धीरे चलते हुए। पर ऐसा नहीं कि हर बात में आपसे कहा जाए: अब नवरात्रि आई है, तो नवरात्रि में नया यंत्र और माला लो; शिवरात्रि आई है, शिवरात्रि पर यंत्र और माला लो। ऐसा नहीं होता। ऐसे में आपको सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए। माँ भगवती की सवारी और कृपा के बावजूद बनी रहने वाली समस्याओं के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि अगर सवारी आदि है, तो सवारी में आपने क्या किया है, वचन आदि क्या हैं, यह देखकर ही कुछ कहा जा सकता है।
क्या पिछले जन्म की साधना की शक्ति अगले जन्म में साथ जाती है?
एक साधना को पकड़े रहिए और शक्ति अपने आप जाग जाती है
यह पूछे जाने पर कि क्या पिछले जन्म की साधना की शक्ति अगले जन्म के साथ चलती है और उसे कैसे जगाया जाए, वक्ता कहते हैं कि जब आप कोई एक साधना पकड़कर आगे बढ़ते हैं, तो जो भी शक्ति आपके साथ है, वह अपने आप जाग जाएगी। उन्होंने यह विषय पहले भी समझाया है: कि कोई एक साधना करने से कैसे कोई दूसरी शक्ति या योगिनी अपनी कृपा करती है।
यह पूछे जाने पर कि क्या पिछले जन्म की साधना की शक्ति अगले जन्म के साथ चलती है, और उन्हें कैसे जगाया जाए, वक्ता कहते हैं: जब आप कोई एक साधना पकड़कर आगे बढ़ते हैं, तो जो भी शक्ति आपके साथ है, वह खुद जाग जाएगी। उन्होंने यह विषय पहले भी समझाया है: कि कोई एक साधना करने से कैसे कोई दूसरी शक्ति, कोई योगिनी, कृपा करती है।
लोग चाहते हैं 24 घंटे में वशीकरण और एक रात में सिद्धियाँ, जो उनके पास नहीं है
24 घंटे में वशीकरण, एक रात में सिद्धियाँ — जो उनके पास नहीं है
वक्ता कहते हैं कि श्रोता ऐसे होने चाहिए जो इन विषयों को सुनें। लोग जो चाहते हैं वह है: 24 घंटे में वशीकरण कैसे करें; एक रात में सिद्धियाँ कैसे पाएँ; गुप्त नवरात्रि में नौ दिन में नौ सिद्धियाँ आपके सामने प्रकट हों; बस इतना कीजिए — रात 12:04 पर बैठिए, बंदर की हड्डी हाथ में लीजिए और मंत्र जप कीजिए। इस तरह की चीज़ें, क्योंकि लोग यही चाहते हैं; उनके पास ये नहीं हैं।
क्या घी और तेल दोनों का अखंड दीपक जलाया जा सकता है?
हाँ — पर सिर्फ उतना रखिए जितना जीवन भर निभा सकें
वे आशीष जी से कहते हैं कि जलाए जा सकते हैं — पर उनकी उम्र और वे कितना कर रहे हैं, यह देखते हुए वक्ता कहते हैं कि उन्हें सिर्फ एक डर है: कि जिस उम्र में वे आज इतना कर रहे हैं, कल जब नौकरी करने जाएँगे, तो यह सब छूट जाएगा। आज आप दिन में चार बार आरती और शयन पूजन करते हैं, जो बहुत अच्छी बात है — पर क्या आप इसे जीवन भर कर पाएँगे?
वक्ता आशीष जी से कहते हैं कि जलाए जा सकते हैं। पर आशीष जी, आपकी उम्र और आप कितना कर रहे हैं, यह देखते हुए मुझे सिर्फ एक बात का डर है: कि जिस उम्र में आप आज इतना कर रहे हैं, कल जब आप नौकरी वगैरह करने जाएँगे, तो यह सब जो आप कर रहे हैं, छूट जाएगा न? आज आप दिन में चार बार आरती और शयन पूजन और सब कुछ करते हैं; यह बहुत अच्छी बात है। पर क्या आप इसे जीवन भर कर पाएँगे? दो-चार साल बाद, जब आप नौकरी करने लगेंगे, तब कैसे करेंगे?
गृहस्थ को कितना विधि-विधान अपनाना चाहिए?
सिर्फ उतना जितना आप या आपका परिवार बाद में निभा सके
वे कहते हैं कि तो विधि-विधान सिर्फ इतना ही रखिए। आज आप चार बार भोजन देते हैं; कल कहेंगे, मैया, अब नौकरी है, तो एक ही बार में संतुष्ट रहो, और बाकी समय मैं फलाहार लूँगा। इसलिए अपना भविष्य क्या है और उसके अनुसार आप कैसे चलना चाहते हैं, यह देखकर उतना ही कीजिए जितना आप बाद में निभा सकें, या जितना आपके घर के लोग, आपकी पत्नी आदि आपकी अनुपस्थिति में निभा सकें।
वक्ता कहते हैं कि तो विधि-विधान सिर्फ इतना ही रखिए। आज आप चार बार भोजन दे रहे हैं; कल कहेंगे: मैया, अब नौकरी है, अब तुम एक ही बार में संतुष्ट रहो, और बाकी समय मैं फलाहार लूँगा। इसलिए अपना भविष्य क्या है, यह देखकर, जिस तरह आप आगे बढ़ना चाहते हैं उसके अनुसार, सिर्फ उतना कीजिए जितना आप बाद में निभा सकें। या जितना आपके घर के लोग, आपकी पत्नी आदि आपकी अनुपस्थिति में निभा सकें।
क्या त्वचा की समस्याओं या जन्म से चली आ रही बीमारी के लिए कोई साधना है?
पहले कुंडली का विश्लेषण — सूर्य और मंगल, और ब्रह्म दोष
वे कहते हैं कि अगर जन्म से कोई बीमारी है, तो कुंडली के विश्लेषण के बाद ही कुछ करना चाहिए। बाकी, अगर त्वचा से जुड़ी समस्या है, तो सूर्य की स्थिति, मंगल की स्थिति और इन सब बातों को देखकर ही निर्णय लेना चाहिए; कम से कम कुंडली का विश्लेषण करवा लेना चाहिए। सुनील आशिमा जी ने जो लिखा है, उसमें दूसरी बात ब्रह्म दोष की आती है — और अगर ब्रह्म दोष हो, तो त्वचा की समस्या जल्दी ठीक नहीं होती।
वक्ता कहते हैं कि अगर जन्म से कोई बीमारी आदि है, तो कुंडली का विश्लेषण करने के बाद ही करना चाहिए। बाकी, अगर त्वचा से जुड़ी समस्या है, तो सूर्य की स्थिति, मंगल की स्थिति, इन सब बातों को देखकर ही निर्णय लेना चाहिए; कम से कम कुंडली का विश्लेषण करवा लेना चाहिए। सुनील आशिमा जी ने जो लिखा है, उसमें दूसरी बात ब्रह्म दोष की आती है। अगर ब्रह्म दोष है, तो त्वचा की समस्या बहुत जल्दी ठीक नहीं होती। जब तक वे शांत नहीं होते, त्वचा से जुड़ी समस्या भी जल्दी शांत नहीं होगी, चाहे आप कितना भी डॉक्टरी इलाज करवा लें। अगर पहले उनकी पूजा होती थी और कोई गलती हो गई, या बाद में विचारों में चले गए, तो वे त्वचा से जुड़ी समस्याएँ होने देने लगते हैं।
काली कलश कैसे स्थापित करना है, और क्या दुर्गा 32 नामों का माला अनुष्ठान हो सकता है?
पहले से दी गई विधि, हर गृहस्थ के लिए एक जैसी
अनिकेत जी से वे कहते हैं कि स्थापना की विधि बताई गई है, और गृहस्थ के लिए यह सबके लिए एक ही रहेगी। यह पूछे जाने पर कि क्या दुर्गा 32 नामों का माला अनुष्ठान किया जा सकता है, वे कहते हैं कि यह बहुत अच्छा है, बिल्कुल किया जा सकता है।
अनिकेत जी पूछते हैं कि काली कलश कैसे स्थापित करना चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि स्थापना की विधि बताई गई है। गृहस्थ के लिए यह सबके लिए एक ही रहेगी। क्या दुर्गा बत्तीस नामावली का माला अनुष्ठान किया जा सकता है? यह बहुत अच्छा है; बिल्कुल किया जा सकता है।
कौन-सी शक्ति त्रिकाल दृष्टि का ज्ञान देती है?
त्रिकाल दृष्टि कभी नहीं मिलती — सिर्फ वर्तमान और भूत
वक्ता कहते हैं कि दीपक वैष्णव जी, त्रिकाल दृष्टि कभी नहीं मिलती। वर्तमान और भूत की मिलती है। सीधी बात है: त्रिकाल दृष्टि पाना न आपके बस में है, न मेरे। भविष्य देखने की क्षमता होती ही नहीं; भविष्य का आप सिर्फ वर्तमान और भूत के अनुसार अंदाज़ा लगा सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि दीपक वैष्णव जी, त्रिकाल दृष्टि कभी नहीं मिलती। वर्तमान की और भूत की मिलती है। सीधी बात है। त्रिकाल दृष्टि पाना न आपके बस में है, न मेरे। भविष्य देखने की क्षमता होती ही नहीं। भविष्य का आप सिर्फ वर्तमान और भूत के अनुसार अंदाज़ा लगा सकते हैं।
काल में झाँकने की क्या कीमत चुकानी पड़ती है?
शक्तियाँ इसकी बहुत बड़ी कीमत लेती हैं
वे कहते हैं कि सामान्य रूप से भी समझिए कि वर्तमान का जो एक पल बीत रहा है, वह भी भूत में चला गया — उसमें भी आप काल में झाँक रहे हैं, और इसके लिए शक्तियाँ बहुत बड़ी कीमत लेती हैं। याद रखिए। यह सुनने में बहुत मज़ा आता है कि हमें किसी के बारे में सब पता चल जाता है; पर उसके बाद क्या गति होती है, क्या कठिनाइयाँ होती हैं, यह सिर्फ वही जानता है जिसे यह मिलता है।
वक्ता कहते हैं कि पर भविष्य देखने की क्षमता — यानी काल में — सामान्य रूप से भी समझिए कि वर्तमान का जो एक पल बीत रहा है, वह भी भूत में चला गया। उसमें भी आप काल में झाँक रहे हैं, और इसके लिए शक्तियाँ बहुत बड़ी कीमत लेती हैं। याद रखिए। सुनने में बहुत मज़ा आता है: यार, हमें किसी के बारे में सब पता चल जाता है। पर उसके बाद क्या गति होती है, क्या कठिनाइयाँ होती हैं — यह सिर्फ वही जानता है जिसे यह मिलता है।
क्या अविवाहित व्यक्ति कामाख्या मंदिर जा सकता है?
सिर्फ गुरु के आदेश या दीक्षा के साथ
वक्ता कहते हैं कि अगर गुरु का आदेश हो, अगर दीक्षा हो, तो कामाख्या जा सकते हैं। वे प्रदीप जी से कहते हैं कि वे यह विषय पहले ही पूरा और अलग से समझा चुके हैं — अगर आप अविवाहित हैं, तो कामाख्या मंदिर क्यों नहीं जाना चाहिए, क्या बात है और क्या नहीं। दूसरी बात, अगर आपके पास गुरु का आदेश है, तो गुरु जी के साथ जा सकते हैं, या उन्होंने जो निर्देश दिए हैं उनके अनुसार कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि अगर गुरु का आदेश हो, अगर दीक्षा हो, तो कामाख्या जा सकते हैं। प्रदीप जी, यह विषय हम पहले ही पूरा और अलग से बता चुके हैं: अगर कोई अविवाहित है, तो कामाख्या मंदिर क्यों नहीं जाना चाहिए, क्या बात है और क्या नहीं। दूसरी बात यह कि अगर आपके पास गुरु का आदेश है, तो आप गुरु जी के साथ जा सकते हैं, या उन्होंने जिस तरह निर्देश दिया है उसके अनुसार कर सकते हैं।
अगर उपनयन न हुआ हो, तो क्या प्रणव की जगह माया बीज लगाया जा सकता है?
सतनाम पाठ के लिए हाँ; पर नवार्ण के लिए वे दीक्षा माँगते हैं
यह पूछे जाने पर कि उपनयन न होने पर क्या प्रणव की जगह माया बीज लगाकर सतनाम पाठ किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं हाँ, बिल्कुल किया जा सकता है। नवार्ण के जप के लिए, वे कहते हैं, वे बार-बार दीक्षा की बात करते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या इससे कोई नुकसान होगा, वे कहते हैं कि कोई नुकसान नहीं है।
उपनयन नहीं हुआ है, तो क्या प्रणव की जगह माया बीज लगाकर सतनाम पाठ किया जा सकता है? वक्ता कहते हैं हाँ, बिल्कुल किया जा सकता है। वे जोड़ते हैं कि नवार्ण मंत्र के जप के लिए मैं बार-बार दीक्षा की बात करता हूँ। क्या इससे कोई नुकसान होगा? कोई नुकसान नहीं है।
क्या किसी रुद्रगण को मित्र के रूप में सिद्ध किया जा सकता है?
उन्हें प्रत्यक्ष करने की गलती न करें
वक्ता कहते हैं कि केशव जी, उन्हें प्रत्यक्ष करने की गलती मत कीजिए। रुद्रगण अपने आप में बेहद तेज़ और उग्र गण हैं। एक साधना से भी वे परोक्ष रूप से बहुत मदद करते हैं, चाहे आप समझें या न समझें। अगर आप उन्हें प्रत्यक्ष करने की कोशिश करेंगे, तो बहुत बंधन लगते हैं, बहुत कुछ होता है, आपको नियमों से रहना पड़ेगा — और वे जल्दी प्रत्यक्ष भी नहीं होंगे, पर आप मुश्किल में ज़रूर पड़ जाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि केशव जी, उन्हें प्रत्यक्ष करने की गलती मत कीजिए। रुद्रगण अपने आप में बेहद तेज़ और उग्र गण हैं। एक साधना से भी वे परोक्ष रूप से बहुत मदद करते हैं, चाहे आप समझें या न समझें। अगर आप उन्हें प्रत्यक्ष करने की कोशिश करेंगे, तो बहुत बंधन लगते हैं; बहुत कुछ होता है। आपको नियमों से रहना पड़ेगा। और वे जल्दी प्रत्यक्ष भी नहीं होंगे — पर आप मुश्किल में ज़रूर पड़ जाएँगे। कृपा पाइए; अपना काम अच्छे से चलने दीजिए। अगर आपको गृहस्थी में रहना है, तो थोड़ा घर-बार छोड़ना पड़ता है।
क्या दीक्षा के बाद आषाढ़ गुप्त नवरात्रि में नवार्ण मंत्र किया जा सकता है?
जब दीक्षा ले ली है, तो आनंद से कीजिए
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने गुरु बनाए हैं और माँ दुर्गा सप्तशती मंत्र की दीक्षा भी ली है, और पूछते हैं कि क्या वे आषाढ़ गुप्त नवरात्रि में नवार्ण मंत्र का जप कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि जब आपने दीक्षा ले ली है, तो पूरे आनंद से कीजिए; मन लगाकर कीजिए। जब गुरु दीक्षा हो गई है, तो आराम से कीजिए।
सप्तशती में दी गई दुर्गा मानस पूजा कैसे करनी चाहिए?
दो रूप — पंचोपचार मानस पूजन और ललिता से जुड़ा, जिसे गाकर पढ़ना है
वक्ता कहते हैं कि जो मानस पूजा दी गई है, वह दो तरह की है। एक साधारण मानस पूजन है, जिसमें पंचोपचार की पूजन विधि है। दूसरा एक पाठ्यक्रम है जो भगवती ललिता से जुड़ा है; उसका पाठ आपको गाकर करना चाहिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि दुर्गा सप्तशती में दुर्गा मानस पूजा दी गई है — इसे कैसे करना चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि जो मानस पूजा दी गई है, वह दो तरह की है। एक साधारण मानस पूजन है, जिसमें पंचोपचार की पूजन विधि है। दूसरा एक पाठ्यक्रम दिया गया है, जो भगवती ललिता से जुड़ा है। उसका पाठ आपको गाकर करना चाहिए।
21 माला से दस महाविद्याओं को सिद्ध करने में कितना समय लगता है?
आप हवा में हैं — ज़मीन पर आइए
यह पूछे जाने पर कि अगर कोई नवरात्रि में बिना दीक्षा के 21 माला से दस महाविद्याओं की साधना करे और सिद्धि पाए तो प्रत्यक्षीकरण में कितना समय लगता है, और अगर बाद में न करे तो क्या होता है, वक्ता ज़ीरो किंग जी से कहते हैं कि वे काफी हवा में हैं। ऐसा कुछ नहीं होता। ज़मीन पर आइए। अगर आप नहीं करेंगे, तो भाई, ऐसे भी कुछ नहीं होगा और वैसे भी कुछ नहीं — मज़े कीजिए।
बिना दीक्षा के दस महाविद्या साधना, नवरात्रि में 21 माला, सिद्धि, प्रत्यक्षीकरण, कितना समय लगता है, और अगर बाद में न किया जाए तो — श्रोता पूछते हैं। वक्ता कहते हैं कि ज़ीरो किंग जी, आप काफी हवा में हैं। ऐसा कुछ नहीं होता। ज़मीन पर उतर आइए। 21 माला में दस महाविद्या, और एक बार में प्रत्यक्षीकरण। अगर आप नहीं करेंगे, तो भाई, ऐसे भी कुछ नहीं होगा और वैसे भी कुछ नहीं। मज़े कीजिए।
साधना के आसपास कितने दिन ब्रह्मचर्य रखना चाहिए?
तीन दिन पहले और बाद — और चतुर्दशी से पूर्णिमा तक
वक्ता कहते हैं कि कम से कम तीन दिन पहले और तीन दिन बाद तक होना चाहिए। नवरात्रि में पूर्णिमा तक। अमावस्या से शुरू करके — उनका अपना कहना होगा अमावस्या से एक दिन पहले से: चतुर्दशी से ब्रह्मचर्य का पालन शुरू कीजिए, और पूर्णिमा तिथि तक ब्रह्मचर्य में रहिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि कितने दिन पहले और बाद ब्रह्मचर्य होना चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि कम से कम तीन दिन पहले और तीन दिन बाद तक। नवरात्रि में पूर्णिमा तक। अमावस्या से शुरू करके — मेरा कहना होगा अमावस्या से एक दिन पहले से। चतुर्दशी से ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन शुरू कीजिए। पूर्णिमा तिथि तक ब्रह्मचर्य में रहिए। हनुमान बड़वानल स्तोत्र पर वे कहते हैं कि इसे अलग से बताना पड़ेगा; ठीक है, हम बताएँगे।
क्या सप्तशती कवच का हवन होता है?
किसी भी अस्त्र मंत्र या कवच मंत्र का हवन — कभी नहीं
वक्ता उत्तर देते हैं कि नहीं, अर्चना जी, कभी मत कीजिए। किसी भी अस्त्र मंत्र या कवच मंत्र का हवन नहीं होगा। जब आपने सप्तशती कवच का जप पूरा कर लिया — मान लीजिए आपने सप्तशती कवच के 1100 जप किए हैं और अब चाहते हैं कि उसमें हवन आदि की विधि हो — तो अगर आप स्त्री हैं, तो शाकल आदि से; और अगर पुरुष हैं, तो घी से, भगवती के मूल मंत्र की, या अर्गला के पहले मंत्र की आहुति दीजिए।
अर्चना जी पूछती हैं कि क्या सप्तशती के कवच का हवन होता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि नहीं, अर्चना जी, कभी मत कीजिए। किसी भी अस्त्र मंत्र या कवच मंत्र का हवन नहीं होगा। जब आपने सप्तशती कवच का जप पूरा कर लिया — मान लीजिए आपने सप्तशती कवच के 1100 जप किए हैं, और अब आप चाहते हैं कि उसमें हवन आदि की विधि हो — तो अगर आप स्त्री हैं, तो शाकल आदि से; और अगर आप पुरुष हैं, तो घी से, भगवती के मूल मंत्र की, या अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र की आहुति दीजिए।
सप्तशती कवच हवन के लिए कौन-सा संकल्प लेना चाहिए?
कवच की कृपा के लिए संकल्प के शब्द
वक्ता कहते हैं कि इसमें यह संकल्प लीजिए: कि सप्तशती में वर्णित भगवती दुर्गा के कवच की पूर्ण कृपा के लिए, और उसमें स्थित सभी शक्तियों की प्रसन्नता और उनकी कृपा के लिए, और ताकि जब भी मैं कवच का पाठ करूँ, उनसे मेरी रक्षा हो — इसके लिए, उन्हें तृप्त करने और पुष्ट करने के लिए, मैं अर्गला के पहले मंत्र से हवन करने का संकल्प लेता हूँ। यह कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि इसमें यह संकल्प लीजिए: कि मैं, सप्तशती में वर्णित भगवती दुर्गा के कवच की पूर्ण कृपा के लिए, और उसमें स्थित सभी शक्तियों की प्रसन्नता के लिए और उनकी कृपा के लिए, और ताकि जब भी मैं कवच का पाठ करूँ, उनसे मेरी रक्षा हो — इसके लिए, उन्हें तृप्त करने के लिए, उन्हें पुष्ट करने के लिए, मैं अर्गला के पहले मंत्र से हवन करने का संकल्प लेता हूँ। यह कीजिए।
वे किन आहुतियों को स्त्रियों के लिए वर्जित मानते हैं?
वैदिक मंत्रों की आहुति, और महामृत्युंजय
वक्ता कहते हैं कि देखिए, वैदिक मार्ग में वैदिक मंत्रों की आहुति वर्जित है: स्त्रियों को वैदिक मंत्रों की आहुति नहीं देनी चाहिए; घी की आहुति नहीं देनी चाहिए। पौराणिक और तंत्रोक्त मंत्रों की आहुति — क्योंकि तंत्र में स्त्रियों की भी पूजा होती है — उसमें वे सब कुछ कर सकती हैं, हवन, पूजन, सब। पर महामृत्युंजय जैसे वैदिक मंत्र की, वे कहते हैं, अगर आप आहुति दे रही हैं तो आपकी जानकारी में कमी है: स्त्री को कभी महामृत्युंजय की आहुति नहीं देनी चाहिए, खुद नहीं देनी चाहिए; वह पति का हाथ पकड़कर आहुति दे सकती है।
वक्ता कहते हैं कि देखिए, वैदिक मार्ग में वैदिक मंत्रों की आहुति वर्जित है। स्त्रियों को वैदिक मंत्रों की आहुति नहीं देनी चाहिए। घी की आहुति नहीं देनी चाहिए। पौराणिक और तंत्रोक्त मंत्रों की आहुति — क्योंकि तंत्र में स्त्री की भी पूजा होती है — उसमें वह सब कुछ कर सकती है, हवन, पूजन, सब। तो कीजिए। पर महामृत्युंजय मंत्र जैसा वैदिक मंत्र: अगर आप उसकी आहुति दे रही हैं, तो मैं सिर्फ इतना कहूँगा कि आपकी ओर से जानकारी की कमी है। स्त्री को कभी महामृत्युंजय की आहुति नहीं देनी चाहिए। उसे खुद नहीं देनी चाहिए। वह अपने पति का हाथ पकड़कर आहुति कर सकती है। पर वैदिक मंत्रों की आहुति वर्जित है। गायत्री की आहुति के बारे में, वे कहते हैं कि अब लोग जप और आहुति सब कर रहे हैं; वह विषय अलग से बताया जाएगा।
इक्षु बलि का क्या महत्व है?
सात्विक बलि में पशु बलि से कई गुना ऊर्जा होती है
गणेश पूजा और कामेश्वरी पूजा में इक्षु बलि के महत्व के बारे में पूछे जाने पर वक्ता इसे बहुत अच्छा प्रश्न बताते हैं। इक्षु बलि यानी गन्ने की बलि। सात्विक विधि में माना जाता है कि पशु बलि में, तामसिक बलि में जो ऊर्जा होती है, उससे कई गुना ज़्यादा ऊर्जा इस तरह के कर्म में, इस तरह के अच्छे कर्म में होती है। प्रतीकात्मक रूप में भी इस तरह की बलि का महत्व ज़्यादा है।
वक्ता कहते हैं कि गणेश पूजा में और कामेश्वरी पूजा में इक्षु बलि का महत्व — यह बलि से जुड़ा बहुत अच्छा प्रश्न है। इक्षु बलि, यानी ईख की, गन्ने की बलि। सात्विक विधि में माना जाता है कि पशु बलि में, तामसिक बलि में जो ऊर्जा होती है, उससे कई गुना ज़्यादा ऊर्जा इस तरह के कर्म में, इस तरह के अच्छे कर्म में होती है। प्रतीकात्मक रूप में भी इस तरह की बलि का महत्व ज़्यादा है। तो गन्ने की बलि भी की जा सकती है।
कुष्मांड बलि कहाँ चढ़ती है, और कहाँ दी जाती है?
कुष्मांड बलि, काली और विश्वकर्मा पूजा, और मंडप में दी जाने वाली बलि
वक्ता कहते हैं कि कुष्मांड की बलि भी होती है, और सिर्फ गणेश पूजा और कामेश्वरी पूजन में ही नहीं, भगवती काली के पूजन में भी, और विश्वकर्मा के पूजन में भी गन्ने आदि की बलि का महत्व है। बलि मंडप में ही दी जाती है; गन्ने की बलि के लिए बहुत बार अलग बलि वेदी नहीं बनाई जाती।
वक्ता कहते हैं कि कुष्मांड की बलि भी होती है। और सिर्फ गणेश पूजा और कामेश्वरी पूजन में ही नहीं, भगवती काली के पूजन में भी, और विश्वकर्मा के पूजन में भी गन्ने आदि की बलि का महत्व है। उस मामले में बलि मंडप में ही दी जाती है। अलग से बलि वेदी के लिए — गन्ने की बलि के लिए बहुत बार अलग बलि वेदी नहीं बनाई जाती।
कैसे पता चलेगा कि अपनी कुलदेवी कौन हैं?
चैनलों पर दी गई आवाहन विधि, और ध्यान मंत्र
वक्ता कहते हैं कि उनके आवाहन की विधि सिद्ध साबरी विद्या नाम के चैनल पर बताई गई है; इस चैनल पर भी उनका ध्यान मंत्र आदि बताया गया है। जब आप नहीं जानते, तो वे विधान अपनाने चाहिए। और यह दो दिन या तीन दिन में नहीं होता: हवन आदि की भी विधि है — कम से कम तीन महीने और ज़्यादा से ज़्यादा तीन साल लगते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि कैसे पता चलेगा कि कुलदेवी कौन हैं। वक्ता कहते हैं कि उनके आवाहन की विधि सिद्ध साबरी विद्या नाम के चैनल पर बताई गई है। इस चैनल पर भी उनका ध्यान मंत्र आदि बताया गया है। जब आप नहीं जानते, तो आपको वे विधान अपनाने चाहिए। और यह दो दिन में, तीन दिन में नहीं होता। हवन आदि की भी विधि है: कम से कम तीन महीने और ज़्यादा से ज़्यादा तीन साल लगते हैं।
जब कुलदेवी सच में कुल में आती हैं, तो क्या होता है?
वे इतनी प्रबलता से आती हैं कि जन्म कुंडली एक ओर रह जाती है
वक्ता कहते हैं कि सीधी बात है: अगर आप सच में चाहते हैं कि इस तरह की कृपा आए, कि वे सच में कुलदेवी हैं, तो तीन साल पकड़े रहिए और अच्छे से आगे बढ़िए। पर एक बार वे कुल में आ गईं, तो इतनी प्रबलता से आएँगी कि फिर आपको सोचना नहीं पड़ेगा। मान लीजिए कि आपकी जन्म कुंडली जहाँ है वहीं पड़ी रह जाएगी; और आपके घर-परिवार के लोग, अगर वे भी सही चल रहे हैं और इसे स्वीकार कर रहे हैं, तो उनकी जन्म कुंडली भी जहाँ है वहीं पड़ी रह जाएगी। भगवती उन्हें पूरी तरह आशीर्वाद देंगी। पर समय कहाँ है — सब दस-ग्यारह दिन में सब कुछ चाहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि सीधी बात है। अगर आप सच में, वास्तव में चाहते हैं कि हाँ, इस तरह की कृपा हो, कि वे सच में कुलदेवी हैं — तो तीन साल पकड़े रहिए और अच्छे से आगे बढ़िए। पर एक बार वे कुल में आ गईं, तो इतनी प्रबलता से आएँगी कि फिर आपको सोचना नहीं पड़ेगा। फिर मान लीजिए कि आपकी जन्म कुंडली जैसी है वैसी ही पड़ी रह जाएगी। और आपके घर-परिवार में भी, अगर वे लोग भी सही चल रहे हैं और इसे स्वीकार कर रहे हैं, तो उनकी जन्म कुंडली भी जैसी है वैसी ही पड़ी रह जाएगी। भगवती उन्हें पूरी तरह आशीर्वाद देंगी। पर समय कहाँ है? सब दस दिन में, ग्यारह दिन में सब कुछ चाहते हैं।
कैद से छुटकारे के लिए क्या उपाय है?
हर मंगलवार सुंदरकांड का संपुटित पाठ
एक श्रोता कहती हैं कि उनके पिता और भाई एक साल से जेल में हैं और पूछती हैं कि कैद से छुटकारे के लिए क्या उपाय करें। वक्ता कहते हैं कि हनुमान जी का संपुटित पाठ करवाइए: हर मंगलवार सुंदरकांड का यह संपुटित पाठ कीजिए या करवाइए। किस मंत्र से और कैसे करना है, इसके लिए वे रूबी जी से टेलीग्राम पर — ग्रुप में भी — मैसेज करने को कहते हैं, और वे संपुटित पाठ की पूरी विधि भेज देंगे।
एक श्रोता पूछती हैं कि मेरे पिता और भाई एक साल से जेल में हैं; कैद से छुटकारे के लिए क्या उपाय करना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि हनुमान जी का संपुट पाठ करवाइए। हर मंगलवार सुंदरकांड का यह संपुटित पाठ कीजिए, या करवाइए। किस मंत्र से करना है, कैसे करना है — रूबी जी, मुझे एक बार टेलीग्राम पर मैसेज कीजिए; ग्रुप में ही कर दीजिए, और मैं आपको संपुटित पाठ की पूरी विधि भेज दूँगा। चाहें तो प्रिंटआउट निकलवाकर पाठ कर सकती हैं; या अगर किसी ब्राह्मण से करवाएँ, तो घर पर नहीं बल्कि किसी मंदिर में संकल्प करवाइए — बंधन से मुक्ति के लिए, राजकीय तंत्र से मुक्ति के लिए, शासन तंत्र से मुक्ति के लिए, इन सबका संकल्प करवाकर, फिर आपको करना चाहिए।
पाठ के साथ एक छोटी मन्नत, निर्दोषता, और दान-पुण्य के साथ पश्चाताप होना चाहिए
एक छोटी मन्नत, निर्दोषता, और दान-पुण्य के साथ पश्चाताप
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ एक छोटी मन्नत भी मानिए — कि हे हनुमान जी, जब भी वे छूटें। पर वे निर्दोष होने चाहिए। अगर उनकी कोई गलती, कोई भूल है, तो उनसे कहिए कि वहाँ पश्चाताप करें। और दूसरी बात, उनके पश्चाताप के लिए आपको यहाँ बाहर भी दान-पुण्य आदि करना चाहिए। अगर वे दिल से पश्चाताप करें, तो उनकी रिहाई जल्दी होगी। और सामान्य रूप से भगवती दुर्गा और हनुमान जी की सेवा-पूजा।
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ एक छोटी मन्नत भी मानिए: कि हे हनुमान जी, जब भी वे छूटें। पर वे निर्दोष होने चाहिए। अगर उनकी कोई गलती, कोई भूल है, तो उनसे कहिए कि वहाँ पश्चाताप करें। दूसरी बात, उनके पश्चाताप के लिए आपको यहाँ बाहर भी दान-पुण्य आदि करना चाहिए। अगर वे दिल से पश्चाताप करें, तो उनकी रिहाई जल्दी होगी। और सामान्य रूप से भगवती दुर्गा और हनुमान जी की सेवा-पूजा।
काली पूजा का सही तरीका क्या है जिससे कोई टोना-टोटका असर न करे?
पंचांग सेवन, कवच और सहस्रनाम, और हर अमावस्या को हवन
यह पूछे जाने पर कि माँ काली की पूजा की सही विधि क्या है जिससे किसी पर कोई टोना-टोटका असर न करे, वक्ता कहते हैं: भगवती का पंच पढ़िए — सहस्रनाम, पंचांग सेवन, कवच और सहस्रनाम। हर अमावस्या को, अमावस्या दर अमावस्या, हवन कीजिए। तीन से छह महीने बाद कोई तंत्र-मंत्र असर नहीं करेगा।
एक श्रोता पूछते हैं कि माँ काली की पूजा करने की सही विधि क्या है, जिससे किसी पर कोई टोना-टोटका असर न करे। वक्ता उत्तर देते हैं कि भगवती का पंच, सहस्रनाम, पंचांग सेवन, कवच और सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। पढ़िए। हर अमावस्या को हवन कीजिए — अमावस्या दर अमावस्या। तीन से छह महीने बाद कोई तंत्र-मंत्र असर नहीं करेगा।
नियम टूटने का दोष कैसे दूर किया जाए?
यह इस पर निर्भर है कि कौन-सा नियम टूट रहा है
यह पूछे जाने पर कि नियम टूटने पर जो दोष लगता है उसका उपाय कैसे करें, वक्ता कहते हैं कि दोष इस पर निर्भर करेगा कि आपसे कौन-सा नियम टूट रहा है।
एक श्रोता पूछते हैं कि पंडित जी, नियम टूटने पर जो दोष लगता है उसका उपाय कैसे करना चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि दोष इस पर निर्भर करेगा कि आपसे कौन-सा नियम टूट रहा है।
काली माता की सवारी कैसे खोलें, और घर में किया-कराया कैसे ठीक करें?
किसी जानकार की मदद लीजिए — वेग संभाला नहीं जा सकता
वक्ता कहते हैं कि हरि प्रिया मेहता जी, आपको किसी जानकार व्यक्ति की मदद लेनी चाहिए। अगर बातें वैसी हैं जैसी आप बता रही हैं, तो बिना मदद के आप इस पर कैसे काम कर पाएँगी? क्योंकि अगर सवारी खुल भी जाए, तो वह कितने वेग में आएगी, यह आप संभाल नहीं पाएँगी, अगर उसे बाँधा गया है। किसी की मदद लीजिए।
एक श्रोता पूछती हैं कि काली माता की सवारी कैसे खोलें, और घर में किया-कराया कैसे ठीक करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि हरि प्रिया मेहता जी, आपको किसी जानकार व्यक्ति की मदद लेनी चाहिए। बिना मदद के आप इस पर कैसे मेहनत कर पाएँगी, अगर बातें वैसी हैं जैसी आप बता रही हैं? क्योंकि अगर सवारी खुल भी जाए, तो वह कितने वेग में आएगी — आप उसे संभाल नहीं पाएँगी, अगर उसे बाँधा गया है। किसी की मदद लीजिए।
नवरात्रि में श्री विद्या मंत्र अनुष्ठान में कितने मंत्र किए जाते हैं?
क्रम विद्या, एक ही क्रम, और चतुराक्षरी के लिए चार लाख
वक्ता कहते हैं कि सुनील जी, अगर आपने श्री विद्या की दीक्षा ली है, तो उसके अनुसार कीजिए। अगर आप क्रम विद्या से लें, तो वह सबसे अच्छा है; और क्रम विद्या में भी एक ही क्रम में कीजिए, एक ही एकाक्षरी कीजिए, चतुराक्षरी कीजिए — पर अनुष्ठान एक को ही पकड़कर करना चाहिए। अब अगर आपने चतुराक्षरी ली है, तो जब तक चार लाख पूरे न हों, उसी मंत्र का अनुष्ठान बार-बार करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि सुनील जी, अगर आपने श्री विद्या की दीक्षा ली है, तो उसके अनुसार कीजिए। अगर आप क्रम विद्या से लें, तो वह सबसे अच्छी है; और क्रम विद्या में भी किसी एक ही क्रम में कीजिए — किसी एक ही एकाक्षरी को कीजिए, चतुराक्षरी कीजिए — पर अनुष्ठान एक को ही पकड़कर करना चाहिए। अब, जैसा आपने चतुराक्षरी ली है, तो जब तक चार लाख पूरे न हों, आपको उसी मंत्र का अनुष्ठान बार-बार करना चाहिए।
क्या रुद्रगण मंत्र रोज़ की पूजा के दीपक के साथ किया जा सकता है?
एक दिन की साधना जिसे दोहराना है, और रोज़ कम से कम पाँच जप
वक्ता कहते हैं कि देखिए, जिन्होंने रुद्रगणों की साधना की है — क्योंकि रुद्रगणों की साधना एक दिन की साधना है, वे बार-बार उनसे कहते हैं कि इसे दोहराते रहें। जब भी ऐसा समय पड़े — यानी जब सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण हो और फिर भी न हो — तो सबसे पहले उनकी साधना दोहराइए। और रोज़, चाहे सिर्फ पाँच बार ही, उस मंत्र का जप कीजिए। यह रोज़ के दीपक के साथ किया जा सकता है; अलग ज्योत जलाने की ज़रूरत नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि देखिए, जिन्होंने रुद्रगणों की साधना की है — क्योंकि रुद्रगणों की साधना एक दिन की साधना है, मैं बार-बार कहता हूँ: इसे दोहराते रहिए। जब भी ऐसा समय पड़े, यानी जब सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण हो और फिर भी न हो, तो सबसे पहले उनकी साधना दोहराइए। और रोज़, चाहे सिर्फ पाँच बार ही, उस मंत्र का जप कीजिए। यह किया जा सकता है। अलग से ज्योत जलाने की भी ज़रूरत नहीं है।
अगर कामाख्या न जा सकें तो अम्बुबाची में घर पर क्या करना चाहिए?
लाल कपड़ा, कोई श्रृंगार नहीं, और 22 से 26 जून तक मधु का भोग
मनीषा राजपाल जी, चैनल पर एक अलग वीडियो है जिसमें हमने बताया है कि हम सबको अम्बुबाची में 22 जून से 26 जून तक क्या करना चाहिए, और वह फिर से टेलीग्राम पर और यूट्यूब पर डाला गया है। उसमें सामान्य रूप से पहले दिन भगवती के श्री विग्रह को स्नान कराकर रक्त वस्त्र, यानी लाल कपड़े से ढक देना चाहिए। उनका किसी तरह का श्रृंगार नहीं होगा। मधु का भोग लगेगा, और उनकी सेवा, पूजा और अर्चन रोज़ चलेगा; मंत्र जप करके उन्हें अर्पित किया जाएगा।
मनीषा राजपाल जी अम्बुबाची के बारे में पूछती हैं कि कामाख्या नहीं जा सकते — घर पर कैसे करें। इसके लिए चैनल पर एक अलग वीडियो है जिसमें हमने बताया है कि हम सबको अम्बुबाची में 22 जून से 26 जून तक क्या करना चाहिए, और वही बात हमने फिर से टेलीग्राम पर और यूट्यूब पर डाली है। उसमें सामान्य रूप से पहले दिन भगवती के श्री विग्रह को स्नान आदि कराकर रक्त वस्त्र, यानी लाल कपड़े से ढक देना चाहिए। उनका किसी तरह का श्रृंगार नहीं होगा। मधु का भोग लगेगा, और उनकी सेवा, पूजा, अर्चन आदि रोज़ चलेगा। मंत्र जप करते हुए उन्हें अर्पित करते जाएँगे।
अम्बुबाची का पालन कैसे पूरा होता है?
26 को कपड़ा हटाना, अभिषेक, पाँच तरह का भोग और हवन
26 तारीख को कपड़ा हटाना है, और फिर से उनका अभिषेक और श्रृंगार आदि होगा। कम से कम पाँच तरह का अच्छा भोग लगेगा। और हवन आदि करना है। सामान्य रूप से इतना करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि 26 तारीख को वह कपड़ा हटाना है, और उनका अभिषेक, श्रृंगार आदि फिर से होगा। कम से कम पाँच तरह का अच्छा भोग लगेगा। और हवन आदि करना है। सामान्य रूप से इतना करना चाहिए।
परीक्षा पास करने के लिए क्या करना चाहिए?
पहले पढ़ाई — और परीक्षा के लिए दी गई एक शिव साधना
वक्ता कहते हैं कि परीक्षा पास करने के लिए सबसे पहले पढ़ाई कीजिए। दूसरी बात, भगवान शिव से जुड़ी एक साधना दी गई है जो सिर्फ परीक्षाओं के लिए है — किसी भी तरह की सरकारी परीक्षा या साधारण परीक्षा के लिए। जो भी लोग परीक्षा और इंटरव्यू आदि देते हैं, उन्हें सामान्य रूप से इसे करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि परीक्षा पास करने के लिए सबसे पहले पढ़ाई कीजिए। दूसरी बात यह है: भगवान शिव से जुड़ी एक साधना दी गई है, जो सिर्फ परीक्षाओं के लिए है — चाहे किसी भी तरह की सरकारी परीक्षा हो, चाहे साधारण परीक्षा हो। जो भी लोग परीक्षा, इंटरव्यू और ये सब देते हैं, उन्हें सामान्य रूप से इसे करना चाहिए।
लक्ष्मी काली माता को कौन-सा भोग दिया जाता है?
मखाना, काजू-किशमिश, दो लौंग और एक इलायची, और चंडिका के लिए मधु
वक्ता कहते हैं कि अगर आप भोग के बारे में पूछ रहे हैं, तो एक तो मखाना है, जो आप दे सकते हैं; दूसरा काजू-किशमिश। कम से कम, अगर आप काली जी की पूजा कर रहे हैं, तो उनके लिए दो लौंग और एक इलायची — ये सब चीज़ें होनी चाहिए। अगर भगवती चंडिका हैं, तो उनके लिए मधु।
एक श्रोता पूछते हैं कि लक्ष्मी काली माता को क्या-क्या दिया जाता है। अगर आप भोग के बारे में पूछ रहे हैं, तो देखिए: एक तो मखाना है। वह आप दे सकते हैं। दूसरा काजू-किशमिश है। कम से कम, अगर आप काली जी की पूजा कर रहे हैं, तो उनके लिए दो लौंग और एक इलायची। ये सब चीज़ें होनी चाहिए। अगर भगवती चंडिका हैं, तो उनके लिए मधु।
दस महाविद्याओं को सिद्ध करने में कितना समय लगता है?
बचकाना प्रश्न — एक लोक योगिनी भी इस जीवन का मोह छुड़ा देती है
वक्ता कहते हैं कि अरे भाई, क्या आप जानते भी हैं कि दस महाविद्याएँ क्या हैं — आप बच्चे जैसा प्रश्न पूछ रहे हैं, कि दस महाविद्याएँ भी सिद्ध हो जाएँगी। इस पूरे संसार में, पूरी दुनिया में, महाविद्या तो छोड़िए: अगर एक लोक योगिनी भी सिद्ध हो जाए, तो इसी जीवन का मोह छूट जाएगा; वे इतना देती हैं। आप समझ ही नहीं रहे कि महाविद्या क्या है।
एक श्रोता पूछते हैं कि दस महाविद्याएँ कितने समय में सिद्ध होती हैं। वक्ता कहते हैं कि अरे भाई, जानिए तो सही कि दस महाविद्या क्या हैं; आप बच्चे जैसा प्रश्न पूछ रहे हैं — कि दस महाविद्याएँ भी सिद्ध हो जाएँगी। इस पूरे संसार में, पूरी दुनिया में, महाविद्या तो छोड़िए: अगर एक लोक योगिनी भी सिद्ध हो जाए — अगर वह सिद्ध हो जाए — तो इसी जीवन का मोह छूट जाएगा। वे इतना देती हैं। आप समझ ही नहीं रहे कि महाविद्या क्या है। और वे जोड़ते हैं कि मेरे बारे में जानकर आप क्या करेंगे; मैं क्या करता हूँ और क्या नहीं करता — मैं जो हूँ सो हूँ।
नवरात्रि में ललिता के कितने पाठ होते हैं, और क्या हवन होता है?
51 पाठ नहीं, और त्रिशक्ति का हवन नहीं
ललिता पर, और नवरात्रि में कितने पाठ होते हैं: क्या 51 पाठ किए जाते हैं, इस पर वे कहते हैं कि नहीं करना चाहिए। त्रिशक्ति का हवन नहीं होगा; पाठ आप कर सकते हैं।
ललिता पर, और नवरात्रि में कितने पाठ होते हैं: क्या 51 पाठ किए जाते हैं, इस पर वक्ता कहते हैं कि नहीं करना चाहिए। त्रिशक्ति का हवन नहीं होगा; पाठ आप कर सकते हैं।
फल देने के लिए तीन लाख जप कितने दिनों में करने चाहिए?
जप और फल दो अलग बातें हैं
वक्ता कहते हैं कि देखिए, यहाँ जप और फल दो अलग बातें हो गई हैं। फल न आपके हाथ में है, न मेरे, इसलिए हम उसे तय नहीं कर सकते।
एक श्रोता पूछते हैं कि फल देने के लिए तीन लाख जप कितने दिनों में करने चाहिए। वक्ता कहते हैं कि देखिए, यहाँ जप और फल दो अलग बातें हो गई हैं। फल न आपके हाथ में है, न मेरे हाथ में; इसलिए हम उसे तय नहीं कर सकते।
गणेश जी की तांत्रिक पूजा में अस्त्र पूजा और नाग पूजा के बारे में क्या?
अस्त्र पूजा का वीडियो, इस भाद्रपद से पहले फिर अपलोड होगा
गणेश जी की तांत्रिक पूजा में अस्त्र पूजा और नाग पूजा के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि नाग पूजा का कोई वीडियो नहीं है, पर अस्त्र पूजा का एक वीडियो बनाया गया था। वे इस बार के भाद्रपद महीने से पहले उसे फिर अपलोड करेंगे: गणपति की अस्त्र पूजा कैसे करनी है।
ऊर्जा खींच लिए जाने के बारे में पूछने वाले से वक्ता कहते हैं: तो इतनी ऊर्जा बनाइए कि सामने वाले की हालत खराब हो जाए — और इसके लिए सबसे पहले आपको अपने आराध्य की कवच साधना करनी चाहिए। यह पूछे जाने पर कि साधना में दोष कितने तरह से लगता है, वे कहते हैं कि इसके लिए एक पूरा अलग विवरण और एक वीडियो चाहिए होगा। एक श्रोता गणेश जी की तांत्रिक पूजा में अस्त्र पूजा और नाग पूजा के बारे में पूछते हैं। वक्ता कहते हैं कि यह वीडियो — नाग पूजा का नहीं; पर अस्त्र पूजा का एक वीडियो बनाया गया था। हम इस बार के भाद्रपद महीने से पहले इसे फिर अपलोड करेंगे: गणेश की अस्त्र पूजा कैसे करनी है।
सिद्धि को प्रत्यक्ष होने में कितना समय लगता है?
यूट्यूब पर सिद्धि प्रत्यक्ष नहीं होती
यह पूछे जाने पर कि अगर हर साल बार-बार साधना की जाए तो सिद्धि को प्रत्यक्ष होने में कितना समय लगता है, वक्ता कहते हैं: करके देखिए। कितनी बार, कितना समय लगेगा, और अगर सिद्धि प्रत्यक्ष हो गई तो क्या होगा — ज़ीरो किंग जी, यूट्यूब पर सिद्धि प्रत्यक्ष नहीं होती, याद रखिए। ये भ्रम मत पालिए; मैं आपको कभी ये भ्रम नहीं दूँगा कि यूट्यूब पर सिद्धि प्रत्यक्ष होगी। ज़मीन के स्तर पर आइए, ऐसे साधक के साथ रहकर कीजिए, और तब शायद सिद्धि प्रत्यक्ष हो। यहाँ से प्रत्यक्ष नहीं होगी।
एक श्रोता पूछते हैं कि अगर हर साल बार-बार साधना की जाए तो सिद्धि को प्रत्यक्ष होने में कितना समय लगता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि करके देखिए। कितनी बार, कितना समय लगेगा, और अगर सिद्धि प्रत्यक्ष हो गई तो क्या होगा — ज़ीरो किंग जी, यूट्यूब पर सिद्धि प्रत्यक्ष नहीं होती; याद रखिए। ये भ्रम मत पालिए। मैं आपको कभी ये भ्रम नहीं दूँगा कि यूट्यूब पर सिद्धि प्रत्यक्ष होगी। ज़मीन के स्तर पर उतर आइए; उस तरह के साधक के साथ रहकर कीजिए, और तब शायद सिद्धि प्रत्यक्ष हो। यहाँ से प्रत्यक्ष नहीं होगी।
रुद्रगण साधना ठीक कब करनी है?
जब चंद्र ग्रहण हो पर आपके रहने की जगह सूतक न लगे
वक्ता कहते हैं कि विशाल जी, भगवान रुद्रगण की साधना बताई गई है; यह एक दिन की साधना है — जब चंद्र ग्रहण हो और फिर भी न हो, यानी जब दुनिया में कहीं चंद्र ग्रहण हुआ हो पर जहाँ आप रह रहे हैं वहाँ सूतक काल न लगा हो। और अगर नवरात्रि में सूतक या पातक पड़े, तो साधना नहीं करनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि विशाल जी, भगवान रुद्रगण की साधना बताई गई है; यह एक दिन की साधना है। यह तब है जब चंद्र ग्रहण हो और फिर भी न हो — यानी दुनिया में किसी जगह चंद्र ग्रहण हुआ हो, पर जिस जगह आप रह रहे हैं वहाँ सूतक काल न लगा हो। अगर नवरात्रि में सूतक और पातक पड़ें, तो साधना नहीं करनी चाहिए।
पुष्कर तीर्थ में कौन-सी साधना करनी चाहिए?
मोक्ष से जुड़ी साधना और पितृ दोष का निवारण
वक्ता कहते हैं कि देखिए, पुष्कर क्षेत्र में आप कोई भी साधना कर सकते हैं — पर वहाँ ऐसी साधना जो मोक्ष से जुड़ी हो, जिसमें आप चाहते हैं कि आपको मुक्ति या मोक्ष मिले। अगर पितरों से जुड़ा दोष आदि है, तो उसके निवारण के लिए आप वहाँ खास तौर पर साधना कर सकते हैं; भगवान नारायण से जुड़ी, या शिव से जुड़ी साधना भी कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि देखिए, पुष्कर क्षेत्र में आप कोई भी साधना कर सकते हैं। पर वहाँ ऐसी साधना जो मोक्ष से जुड़ी हो, जिसमें आप चाहते हैं कि आपको मुक्ति या मोक्ष मिले — वह। अगर पितृ से जुड़ा दोष आदि है, तो उसके निवारण के लिए आप वहाँ खास तौर पर साधना कर सकते हैं। भगवान नारायण से जुड़ी, या शिव से जुड़ी साधना भी कर सकते हैं।
पुष्कर में पितरों के लिए मुख्य रूप से क्या किया जाता है?
ब्राह्मणों से विष्णु सहस्रनाम या गायत्री, संकल्प के साथ
वे कहते हैं कि वहाँ खास तौर पर पितरों की गति और मुक्ति के लिए साधना होती है: ब्राह्मणों से सहस्रनाम, विष्णु सहस्रनाम आदि का पाठ; या गायत्री आदि का पाठ और जप, जो आप संकल्प लेकर कर सकते हैं। यह सबसे अच्छा है। अगर कोई पितृ दोष या उनसे जुड़ा कुछ है, या उनकी गति के लिए भी, तो वहाँ साधना करके आप पितरों की कृपा भी पा सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि वहाँ खास तौर पर पितृ की गति और मुक्ति के लिए साधना होती है। ब्राह्मणों से सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं।, विष्णु सहस्रनाम आदि का पाठ; या गायत्री मंत्र आदि का पाठ, और जप, जो आप संकल्प लेकर कर सकते हैं। यह सबसे अच्छा है। अगर कोई पितृ दोष है, या उनसे जुड़ा कुछ है, या उनकी गति के लिए भी, तो वहाँ साधना करके आप पितरों की कृपा भी पा सकते हैं।
जिन स्त्रियों की ऊर्जा गलत प्रयोगों से सोख ली गई हो, उनके लिए क्या बताया गया है?
कवच सिद्ध करें, धारण करें, और फिर ऊर्जा का कीलन करें
वक्ता कहते हैं कि देखिए, स्त्रियों के साथ जो बातें हो रही हैं — कि ऊर्जा की कमी हुई है, और तांत्रिक प्रवृत्ति के लोग गलत तरीके से प्रयोग आदि करते हैं — उसके लिए सबसे पहले कवच आदि का प्रयोग है: खुद कवच सिद्ध करना, फिर कवच धारण करना, और उसके बाद इस तरह की ऊर्जा का कीलन करना, ताकि किसी चीज़ का असर आप पर न पड़े। इस तरह स्थित होकर आगे बढ़ना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि देखिए, स्त्रियों के साथ जो ये बातें हो रही हैं — कि ऊर्जा की कमी हुई है, और जो तांत्रिक प्रवृत्ति के लोग हैं वे गलत तरीके से प्रयोग आदि करते हैं — उसके लिए सबसे पहले कवच आदि का प्रयोग है: खुद कवच सिद्ध करना। फिर कवच धारण करना; और उसके बाद इस तरह की ऊर्जा का कीलन करना, ताकि किसी चीज़ का असर आप पर न पड़े। इस तरह स्थित होकर आगे बढ़ना चाहिए।
किस देवता को सबसे बड़ा मानना चाहिए?
अपने इष्ट को ही सृष्टिकर्ता और संहारकर्ता मानिए
केशव सिंह जी के पूछने पर कि जब हर देवता के बारे में कहा जाता है कि वही सबसे बड़े हैं, उन्होंने ही सब बनाया और वही सब मिटाएँगे, तो भ्रमित कैसे न हों, वक्ता इसे बहुत अच्छा प्रश्न बताते हैं और उत्तर देते हैं: सबसे पहले अपने इष्ट और आराध्य पर भरोसा रखिए, और उन्हीं को सब कुछ मानिए — कि वही सृष्टिकर्ता हैं और वही संहारकर्ता।
वक्ता कहते हैं कि हनुमान चालीसा जब चाहें पढ़ी जा सकती है, सुबह या शाम; दोनों समय, सुबह और शाम पढ़िए। केशव सिंह जी लिखते हैं कि सभी देवी-देवताओं के बारे में कहा जाता है कि वही सबसे बड़े हैं, उन्होंने ही सब बनाया और वही सब मिटाएँगे, तो ऐसे में भ्रम हो जाता है। वक्ता कहते हैं कि केशव सिंह जी, यह बहुत अच्छा प्रश्न है, और इसका उत्तर यह है। सबसे पहले अपने इष्ट और आराध्य पर भरोसा रखिए, और उन्हीं को सब कुछ मानिए: कि वही सृष्टिकर्ता हैं और वही संहारकर्ता।
क्या हर कल्प में अलग ब्रह्मा, विष्णु और महेश होते हैं?
हर कल्प में अलग ब्रह्मा, विष्णु और महेश
वे कहते हैं कि एक और बात दो तरह से समझनी है: कल्प के अनुसार। जब एक कल्प बीतता है और दूसरा कल्प आता है — जैसे अभी श्वेत वराह कल्प चल रहा है, और इसी तरह श्वेत लोहित कल्प चल रहा है — तो हर कल्प के अपने अलग ब्रह्मा, विष्णु और महेश होते हैं, और अपने अलग देवता। इसी संबंध में आप कहीं पढ़ेंगे कि जो भगवती काली हैं, वही कृष्ण के रूप में आईं; कहीं वर्णन आता है कि भगवती काली ने ही राम जी का रूप लिया। तो भेद कल्प के अनुसार है।
वक्ता कहते हैं कि एक दूसरी बात है, दो तरह से, उसे भी समझिए: कल्प के अनुसार। शक्तियाँ — जब एक कल्प बीतता है और दूसरा कल्प आता है, जैसे अभी श्वेत वराह कल्प चल रहा है; इसी तरह श्वेत लोहित कल्प चल रहा है — तो हर कल्प के अपने अलग होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश थे; अलग देवी-देवता थे। इसी संबंध में आप कहीं पढ़ेंगे कि जो भगवती काली हैं, वही कृष्ण के रूप में आईं। कहीं वर्णन आता है कि भगवती काली ने ही राम जी का रूप लिया। तो भेद कल्प के अनुसार है। एक कल्प में आप पढ़ते हैं कि भगवान नारायण ने राम अवतार लिया; वह कल्प के अनुसार है। तो अपने आराध्य को ही अपना सब कुछ मानिए: अगर आप नारायण को मानते हैं, तो उन्हें मानिए; अगर भगवती को मानते हैं, तो उन्हें मानिए। बस इतना ही; इसमें कोई भ्रम नहीं है।
पूरे परिवार के प्रति सम्मान के साथ पति के लिए स्त्री का खास प्रेम दिखाता है कि किसी को सबसे ऊपर कैसे प्रेम किया जाए
पूरे परिवार के बीच स्त्री का अपने पति के लिए प्रेम
वक्ता कहते हैं कि एक स्त्री को लीजिए, और देखिए कि स्त्री का प्रेम उसके परिवार में कैसे काम करता है। जिस तरह का प्रेम वह अपने पति के लिए रखती है — ठीक उसी तरह वह अपने घर के बड़ों को भी आदर और सम्मान देती है; ससुर का सम्मान करती है, जेठ का सम्मान करती है, देवर का सम्मान करती है, बेटे को भी प्रेम देती है। तो उसका प्रेम सबके साथ है; पर जो प्रेम उसके पति के साथ है, वह बेहद ऊँचा, अलग तरह का है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह थी: एक स्त्री को लीजिए, और देखिए कि स्त्री का प्रेम अपने परिवार में कैसे काम करता है। जिस तरह का प्रेम वह अपने पति के लिए रखती है — ठीक उसी तरह वह आदर और सम्मान अपने घर के बड़ों को भी देती है। वह ससुर का भी सम्मान करती है, जेठ का भी सम्मान करती है, देवर का भी सम्मान करती है, बेटे को भी प्रेम देती है। तो उसका प्रेम सबके साथ है; पर जो प्रेम उसके पति के साथ है, वह बेहद ऊँचा है, अलग तरह से।
इष्ट के प्रति लगाव कैसा होना चाहिए?
नाम पर रोमांच — जैसे नई दुल्हन सुनती है कि पति आ रहे हैं
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी तरह आपको देव शक्तियों के सभी रूपों से प्रेम करना चाहिए और सबका सम्मान करना चाहिए; पर अपने इष्ट और आराध्य से खास लगाव, खास प्रेम होना चाहिए। आपको उनके लिए पूरी तरह समर्पित होना चाहिए, ऐसा कि उनका नाम सुनते ही शरीर में रोमांच आ जाए — जैसे नई दुल्हन अपने पति के बारे में सुनकर रोमांचित हो जाती है, कि वे आ रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी तरह, देव शक्तियों के जितने भी रूप हैं, सबसे आपको प्रेम करना चाहिए, और सबका सम्मान करना चाहिए। पर अपने इष्ट और आराध्य से आपका खास लगाव, खास प्रेम होना चाहिए। आपको उनके लिए पूरी तरह समर्पित होना चाहिए; ऐसा होना चाहिए कि उनका नाम सुनते ही शरीर में सिहरन आ जाए। जैसे नई दुल्हन अपने पति के बारे में सुनकर रोमांचित हो जाती है — अरे, वे आ रहे हैं — वैसा ही आपका अनुभव होना चाहिए: कि जब हम अपने इष्ट और आराध्य का नाम सुनें, तो शरीर में रोमांच आ जाए।
विंध्यवासिनी नाम उनके लिए सब कुछ है और सुनते ही रोमांच ले आता है
विंध्यवासिनी नाम उनके लिए सब कुछ है
वे कहते हैं कि जहाँ तक हमारी बात है — और किसकी बात करूँ — जब मैं खुद विंध्यवासिनी का नाम सुनता हूँ, तो बहुत रोमांच आता है। विंध्यवासिनी नाम मेरे लिए सब कुछ है। ठीक इसी तरह आपका मन वहाँ, इष्ट और आराध्य में बसना चाहिए। मेरा मन विंध्य क्षेत्र में बसता है; देखिए आपका कहाँ बसता है, और उनके प्रति समर्पित हो जाइए। एक तरह से कहें तो यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आपकी भक्ति घंटाकर्ण जैसी हो जानी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि जैसे हम — और किसकी बात करूँ — जब मैं खुद विंध्यवासिनी का नाम सुनता हूँ, तो बहुत रोमांच आता है। विंध्यवासिनी नाम मेरे लिए सब कुछ है। तो ठीक इसी तरह, अपने इष्ट और आराध्य के लिए आपका मन वहीं बसना चाहिए। मेरा मन विंध्य क्षेत्र में बसता है। देखिए आपका कहाँ बसता है, और उनके प्रति समर्पित हो जाइए। एक तरह से कहें तो यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आपकी भक्ति वहाँ घंटाकर्ण की भक्ति हो जानी चाहिए।
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