गृह बंधन और घर की रक्षा — भूमि शोधन से भैरव दीपदान तक
गृह बंधन द्वारा घर की रक्षा पर एक लाइव सत्र।
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कौन-सी शक्तियाँ, कब, कैसे, किससे बचें, और असर कितने समय तक रहता है
बात का ढाँचा — कौन-सी शक्तियाँ, कब, कैसे और कितने समय तक
यह कैसे करना है, कौन-सी शक्तियों का प्रयोग करना है, कब और कैसे करना है, किसका प्रयोग नहीं करना है, जो भी हम लगाते हैं वह कितने समय तक असर करता है, और उसका असर कब खत्म होता है। वे कहते हैं कि इन सब विषयों को जानकर ही घर की रक्षा करना ज़रूरी है।
वे उन प्रश्नों को गिनाते हैं जिन पर यह बात चलेगी। यह किस तरीके से होता है? इसे कैसे करना चाहिए? कौन-सी शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए? कब करना चाहिए, और कैसे? किसका प्रयोग नहीं करना चाहिए? और जो प्रयोग हम करते हैं, वे कितने समय तक असर करते हैं, और उनका असर कब खत्म होता है। वे कहते हैं कि इन सब विषयों को जानकर ही अपने घर की रक्षा करना ज़रूरी है।
यह ज्ञान घरों में क्यों छूट गया है?
आधुनिक शिक्षा इस विषय में बौद्धिक रुकावट
वे कहते हैं कि पहले घर के बड़े-बुज़ुर्ग इस विषय को बहुत अच्छे से जानते थे और बहुत कुछ बहुत सही ढंग से करते थे। आज जो परिवार बहुत पढ़े-लिखे होने के अर्थ में मज़बूत हैं, वह आधुनिक मज़बूती उन्हें यह मानने ही नहीं देती कि ऐसी कोई प्रक्रिया हो भी सकती है।
वे कहते हैं कि पहले के समय में घर के बड़े-बुज़ुर्ग इस विषय को बहुत अच्छे से जानते थे, और ऐसी बहुत-सी चीज़ें बहुत सही तरीके से करते थे। आज के समय में जो परिवार मज़बूत हैं — इस अर्थ में मज़बूत कि वे बहुत पढ़-लिख गए हैं और इन सब चीज़ों का बहुत ज्ञान रखते हैं — उनमें सबसे पहले यह होता है कि बौद्धिक रूप से, अपनी आधुनिकता के कारण, अपने जीवन में आई आधुनिक मज़बूती के कारण, वे कभी यह मानने को तैयार ही नहीं होते कि ऐसी कोई प्रक्रिया हो भी सकती है।
जब दशकों तक इस विषय की अनदेखी होती है तो क्या होता है?
पंद्रह से पच्चीस साल की अनदेखी के बाद परेशानी की जड़ जमना
उस इनकार के कारण नकारात्मक शक्तियों का आना-जाना आसान हो जाता है, और धीरे-धीरे यह चीज़ ऐसी जड़ पकड़ लेती है कि बाद में आप कितना भी बंधन लगाएँ, कितना भी रक्षण प्रयोग करें, आम तौर पर वह काम नहीं करता। वे कहते हैं कि खासकर तब, जब पंद्रह, बीस या पच्चीस साल तक इस बात की पूरी तरह अनदेखी हुई हो।
वे कहते हैं कि उस बौद्धिक इनकार के कारण जब नकारात्मक शक्तियों का आना-जाना आसानी से होने लगता है, तो धीरे-धीरे यह चीज़ ऐसी जड़ पकड़ लेती है कि बाद में आप कितना भी बंधन लगाएँ, कितना भी रक्षण प्रयोग करें, आम तौर पर वह बात बनती नहीं। खासकर अगर मान लें कि पंद्रह, बीस या पच्चीस साल तक इस बात की पूरी तरह अनदेखी हुई और इसे किनारे रखा गया — तब परेशानी जड़ पकड़ लेती है।
क्या अकेला रक्षण प्रयोग घर को सुरक्षित करने के लिए काफ़ी है?
जगह में पहले से क्या है
नहीं। वे कहते हैं कि यह ज़रूरी नहीं कि कोई जगह केवल इसलिए सुरक्षित हो जाए कि हमने वहाँ कोई रक्षण प्रयोग कर दिया; यह भी मायने रखता है कि वह घर कैसा है — क्या उस जगह पर पहले से कोई देवी तत्त्व रहा है, क्या वह शक्तियों का स्थान रहा है, जो सकारात्मक भी हो सकती हैं और नकारात्मक भी।
वे कहते हैं कि यह ज़रूरी नहीं कि कोई जगह केवल तभी सुरक्षित हो जब हम वहाँ किसी तरह का रक्षण प्रयोग करें। यह भी ज़रूरी है कि वह घर खुद कैसा है। क्या उस जगह पर पहले से कोई देवी तत्त्व रहा है? क्या वह शक्तियों का स्थान रहा है? वे सकारात्मक भी हो सकती हैं और नकारात्मक भी, दोनों। एक पल को मान लीजिए कि वह नकारात्मक शक्ति है — तब भी अगर आपके परिवार के रहने का ढंग उनके अपने स्वभाव जैसा है, तो कोई खास कठिनाई नहीं आएगी। तब वे खुशी से किसी और को वहाँ घुसने नहीं देंगी, जब तक उन्हें खुद कोई कष्ट न हो। वे कहते हैं कि यह भी आपको देखने में मिलेगा।
भगत और सोखा-ओझा किस्म के लोग घर की नकारात्मक ऊर्जाओं के साथ क्या करते हैं?
बाबा के नाम पर घर में बैठाई गई नकारात्मक शक्तियाँ
वे कहते हैं कि अक्सर यह भी होता है कि कोई परेशानी आने पर आप कहीं जाकर दिखवाते हैं, और ये भगतवाले लोग, या भगतई करने वाले ऐसे सोखा-ओझा लोग, नकारात्मक शक्तियों को ही बाबा कहकर घर में जगह दिलवा देते हैं — कहते हैं कि ये बाबा हैं, ये आपके घर की रक्षा कर रहे हैं, इनके नाम पर पूजा चढ़ाइए।
वे कहते हैं कि बहुत बार ऐसा होता है कि कोई परेशानी या कोई बात होने पर आप कहीं जाकर दिखवाते हैं। और ये भगतवाले लोग, या भगतई करने वाले ऐसे सोखा-ओझा लोग, नकारात्मक शक्तियों को ही बाबा कहकर घर में जगह दिलवा देते हैं: ये बाबा हैं, ये आपके घर की रक्षा कर रहे हैं, इनके नाम पर पूजा चढ़ाते रहिए।
प्लॉट पर पीर बाबा का स्थान बनाने के बारे में वे क्या कहते हैं?
चार ईंट का छोटा स्थान, जो बाद में बड़ी बलि माँगता है
वे कहते हैं कि ऐसा भी देखा गया है कि जहाँ किसी खेत पर, या दस-पंद्रह साल पहले खरीदी या बनी जगह पर घर बना, कोई परेशानी आई और कहीं दिखवाया गया, तो पता चला कि वहाँ कोई मुस्लिम शक्ति है, और लोग उसकी भी पूजा करवा देते हैं — ये पीर बाबा हैं, इनकी पूजा करो, चार ईंट का छोटा मंदिर बनाओ, रोज़ धूप-दीप दिखाओ, फूल चढ़ाओ। वे कहते हैं कि बाद में वही छोटी-सी दी गई जगह बहुत बड़ी बलि माँगने लगती है।
वे कहते हैं कि ऐसी चीज़ें भी देखी गई हैं: आप किसी खेत पर घर बनाते हैं, या ऐसी कोई जगह खरीदकर, या वह दस-पंद्रह साल पहले बना था; कोई परेशानी आई और आपने कहीं दिखवाया। यह भी देखने में आया कि वहाँ कोई मुस्लिम शक्ति थी, और लोग उसकी भी पूजा करवा देते हैं। ये पीर बाबा हैं, इनकी पूजा करो। चार ईंट जैसा छोटा मंदिर बनाओ, उसमें रोज़ धूप और दीप दिखाओ, फूल चढ़ाओ। वे कहते हैं कि बाद में वही छोटी-सी दी गई जगह बहुत बड़ी बलि माँगने लगती है। इसीलिए ये प्रक्रियाएँ बहुत सोच-समझकर करनी चाहिए।
ज़मीन खरीदने से पहले क्या करना चाहिए?
खरीदने से पहले भूमि शोधन
वे कहते हैं कि जब भी आप ज़मीन खरीदें, खरीदने से पहले उस ज़मीन का शोधन करवाना चाहिए। आप जिस भी शहर या क्षेत्र में रहते हैं, वहाँ ऐसे साधक ज़रूर होंगे जो मिट्टी देखकर, या वहाँ जाकर, या आजकल वीडियो कॉल पर जगह देखकर भी बता सकते हैं कि वहाँ कौन है — वे आपका पता पूछते हैं और अपनी सिद्ध की हुई चीज़ें भेजते हैं।
यह कैसे होता है? सबसे पहले, इसे करने का तरीका क्या होना चाहिए? वे कहते हैं कि जब भी आप कोई ज़मीन खरीदें, खरीदने से पहले उस ज़मीन का शोधन करवाना चाहिए। आप जिस भी शहर और क्षेत्र में रहते हैं, वहाँ ऐसे साधक ज़रूर होंगे जो पता लगा सकते हैं कि वहाँ कौन है — ज़मीन की मिट्टी देखकर, या वहाँ जाकर देखकर, या आजकल वीडियो कॉल से उन जगहों को देखकर भी, क्योंकि उनके पास ऐसी चीज़ें होती हैं; वे आपसे पता पूछते हैं और अपनी सिद्ध की हुई चीज़ें भेजते हैं।
अगर प्लॉट की नकारात्मक ऊर्जा हटाई न जा सके तो क्या करें?
वह ज़मीन मत खरीदिए
वे कहते हैं कि अगर वहाँ कोई नकारात्मक ऊर्जा है, तो यह भी बात करनी चाहिए कि उसे हटाना संभव है या नहीं। और अगर वह हटाई नहीं जा सकती, तो वह ज़मीन मत खरीदिए — इसे लिखा हुआ मानिए, आपकी स्थिति कैसी भी हो, चाहे आज आप करोड़पति ही क्यों न हों।
अगर वहाँ कोई नकारात्मक ऊर्जा है, तो यह भी बात करनी चाहिए कि उसे हटाना संभव है या नहीं — ये जा पाएँगी या नहीं। और अगर ये नहीं जा पाएँगी, तो वह ज़मीन मत खरीदिए, वह भूमि मत खरीदिए। वे कहते हैं कि इसमें ज़बरदस्ती मत कीजिए, आज आप किसी भी स्थिति में हों; आज आप करोड़पति हो सकते हैं, पर यह देख लीजिए, यह लिखा हुआ है।
ज़मीन खरीदते या घर बनाते ही परेशानियाँ क्यों शुरू हो जाती हैं?
दो कारण — ज़मीन में दोष, और शत्रु की ईर्ष्या
वे कहते हैं कि इस बारे में लगातार फ़ोन आते हैं: किसी ने नया घर बनाया और उसके बाद परेशानी शुरू हो गई; किसी ने नई ज़मीन खरीदी और परेशानी शुरू हो गई; किसी ने घर बनवाना शुरू किया और ठीक उसी समय परेशानी शुरू हो गई। इसके दो कारण हैं — पहला, उस ज़मीन में दोष, और दूसरा, किसी शत्रु द्वारा ईर्ष्या में किया गया कोई आभिचारिक काम।
वे कहते हैं कि कितने ही लोगों के फ़ोन आते हैं, और आप सबको भी पता होगा: किसी ने नया घर बनाया और उसके बाद परेशानी शुरू हो गई; किसी ने नई ज़मीन खरीदी और परेशानी शुरू हो गई; किसी ने घर बनवाना शुरू किया और ठीक उसी समय परेशानी शुरू हो गई। इसके दो कारण हैं। पहला कारण है उस ज़मीन में दोष। दूसरा कारण है आपके किसी शत्रु द्वारा ईर्ष्या में किया गया कोई आभिचारिक काम। जब आप घर बनाते हैं, तो लोगों को लगता है कि इस आदमी के पास बहुत पैसा है; यह ईर्ष्या का कारण बन जाता है, और उस समय भी लोग अभिचार करवाते हैं।
दूसरे की ईर्ष्या को रोका नहीं जा सकता, पर ज़मीन का स्वभाव जाना जा सकता है
दूसरे की ईर्ष्या हमारे बस में नहीं, पर ज़मीन को हम जान सकते हैं
वे कहते हैं कि पहली बात हमारे हाथ में नहीं है — हम दूसरे की वाणी, मन या ईर्ष्या को नहीं रोक सकते कि कोई हम पर अभिचार कर्म न करे। पर हम कम से कम यह तो जान सकते हैं कि जिस ज़मीन पर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए घर बना रहे हैं, और जहाँ हमारे देवताओं और पितरों को जगह मिलेगी, वह कैसी जगह है।
वे कहते हैं कि पहली बात हमारे हाथ में नहीं है — कि हम घर बनाएँ और कोई हम पर किसी तरह का अभिचार कर्म न करे, कोई ईर्ष्या न करे। हम उनकी वाणी, उनके मन, उनकी ईर्ष्या को नहीं रोक सकते। पर यह हम कर सकते हैं: जिस ज़मीन पर हम घर खड़ा कर रहे हैं, जिस पर आने वाली पीढ़ियों के लिए आश्रय बना रहे हैं, जहाँ अपने देवताओं और पितरों को जगह देने वाले हैं, जहाँ उनकी सेवा-पूजा करेंगे, जहाँ देवताओं को अर्घ्य देंगे और जो जगह पितरों की सेवा-पूजा का माध्यम बनेगी — उस जगह के बारे में हमें कम से कम यह तो पता होना चाहिए कि वह कैसी जगह है।
संपत्ति खरीदते समय लोग पहली गलती क्या करते हैं?
पैसे के कारण चेतावनी को अनसुना कर देना आसान
वे कहते हैं कि पहली चूक यह है कि ज़मीन खरीदते समय अगर हमारे पास करोड़ों की संपत्ति और हाथ में करोड़ों रुपये हैं, तो हम सोचते हैं — क्या है, इतनी अच्छी संपत्ति है — और लोग अक्सर चेतावनी सुनकर भी अनसुनी कर देते हैं, कहते हैं ऐसा कुछ नहीं होगा, सब ठीक है, यह किसी का भ्रम होगा। और आप संपत्ति ले लेते हैं।
वे कहते हैं, यह जान लीजिए: वह जगह आप कितनी भी सस्ती खरीदें, कितनी भी महँगी खरीदें, अभी आपकी क्षमता कितनी भी अच्छी हो, पहली गलती, पहली चूक ज़मीन खरीदते समय ही होती है। अगर हमारे पास करोड़ों रुपये की संपत्ति है, हमारे पास करोड़ों रुपये हैं, और हम सोचते हैं — क्या है, इतनी अच्छी संपत्ति है — तो बहुत बार लोग सुनकर भी सुनी बात को अनदेखा कर देते हैं, कि ऐसा कुछ नहीं होगा, सब ठीक है, यह उसका भ्रम होगा। ऐसा भी होता है। और आप संपत्ति ले लेते हैं।
ऐसी जगह जाने के बाद आदमी का बल क्यों चला जाता है?
शरीर का बल तभी तक, जब तक शुभ शक्तियों की छाया है
वे कहते हैं कि इस शरीर में बल तभी तक रहता है जब तक आप शुभ शक्तियों के नियंत्रण में हैं। जहाँ आप अभी रहते हैं, वहाँ शुभ शक्ति तत्त्वों की मात्रा इतनी है कि वे आपके शरीर के रोम-रोम की रक्षा कर सकते हैं, इसलिए आप पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता — पर जैसे ही आप नकारात्मक ऊर्जा के क्षेत्र में जाते हैं और आपके शरीर पर उनका नियंत्रण छूटता है, वे नकारात्मक ऊर्जाएँ आपको खा जाती हैं।
वे कहते हैं कि पर लेने के बाद देखिए — क्षमता नहीं चलती। इस शरीर में जो बल है, वह तभी तक है जब तक आप शुभ शक्तियों के प्रभाव में हैं। जहाँ आप अभी रह रहे हैं, वहाँ शुभ शक्ति तत्त्वों की मात्रा इतनी बनी हुई है कि वे आपके शरीर के एक-एक रोम की रक्षा कर सकते हैं, इसी कारण आप पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता। पर जैसे ही आप किसी नकारात्मक ऊर्जा के क्षेत्र में जाते हैं, और आपके शरीर पर शुभ शक्तियों का असर, उनका नियंत्रण, उनका अधिकार छूट जाता है, उसके बाद वे नकारात्मक ऊर्जाएँ आपको खा जाती हैं।
वहाँ रहने जाने के बाद वह परेशानी किस रूप में आती है?
दस तरह के रोग, धन-हानि, कोर्ट-कचहरी
वे कहते हैं कि वहाँ जाने के बाद दस तरह के रोग, धन-हानि और कोर्ट-कचहरी की परेशानी आती है, और उसमें फँसना ही पड़ता है। उनका एक ही मकसद होता है कि वे नई जगह पर आपको नहीं चाहतीं।
वे कहते हैं कि फिर वहाँ जाने के बाद दस तरह के रोग, धन-हानि, कोर्ट और कचहरी की परेशानी — उसमें फँसना ही पड़ता है। और उनका मकसद एक ही है: नई जगह पर वे आपको वहाँ नहीं चाहतीं।
दूसरा रास्ता है उनके स्वभाव के अनुसार रहना — बलि भोग, और देव पूजन नहीं
उनके स्वभाव के अनुसार रहना — बलि भोग और देव पूजन नहीं
वे कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि अगर उनकी उपस्थिति है, तो आप उनके अनुसार रहिए: अगर कोई पैशाचिक शक्ति है, तो उनके ढंग से उन्हें बलि, पूजन और भोग दीजिए, तो वे आपको शांति से रहने देंगी, बस छोटी-मोटी परेशानी देंगी। देव पूजन वगैरह मत कीजिए, प्रेत-पिशाचों की तरह रहिए, गंदगी रखिए; अगर आप धूप-धूना करेंगे तो इससे वे परेशान होंगी और आपको कष्ट देंगी।
वे कहते हैं कि अगर उनकी उपस्थिति है, तो उनके अनुसार चलिए। अगर आप चाहें, और वह कोई पैशाचिक शक्ति है, तो उनके ढंग से उन्हें बलि, पूजन और भोग दीजिए। तब वे आपको शांति से रहने देंगी और बस छोटी-मोटी परेशानी देंगी। देव पूजन जैसा काम मत कीजिए; प्रेत-पिशाचों की तरह रहिए; गंदगी फैलाकर रखिए। अगर आप धूप और धूना करेंगे तो इससे वे परेशान होंगी और आपको कष्ट देंगी। वे कहते हैं कि फिर भी, वे कितनी भी पैशाचिक शक्तियाँ हों, उनका अपना स्वभाव है, उस योनि का अपना स्वभाव है — और उसके अनुसार वे घर के लोगों को परेशान ज़रूर करेंगी।
घर या प्लॉट लेते समय कौन-सी पहली गलती कभी नहीं करनी चाहिए?
सबसे पहले ज़मीन का शोधन
वे दोहराते हैं कि यह पहली गलती कभी नहीं करनी चाहिए: अगर आप घर ले रहे हैं या नए घर के लिए ज़मीन ले रहे हैं, तो सबसे पहले उस ज़मीन का शोधन करवाइए, ताकि जब भी आप वहाँ जाएँ, उस जगह पर आपको किसी तरह की परेशानी न हो।
वे कहते हैं कि इसलिए पहली गलती कभी नहीं करनी चाहिए। अगर आप घर ले रहे हैं, या घर के लिए ज़मीन ले रहे हैं, तो सबसे पहले, बाकी सब से पहले, उस भूमि का शोधन करवाइए। ताकि जब भी आप वहाँ जाएँ, उस जगह पर आपको किसी तरह की परेशानी न हो।
प्लॉट पर खड़े पुराने पेड़ों का क्या?
घर के डिज़ाइन के लिए लोगों द्वारा कटवाए गए पेड़
वे कहते हैं कि अगर उस ज़मीन पर कोई पुराना पेड़ है — पीपल, बरगद, शमी जी का पेड़, गुड़हल का कोई बहुत बड़ा पुराना पौधा, अकवन, आक या मदार, अनार का पौधा या पेड़, महुआ, नीम — तो लोग उसे कटवा देते हैं, यह कहकर कि यह पेड़ पूरे डिज़ाइन में बाधा डालेगा, इसे हटाना होगा।
वे कहते हैं कि दूसरी बात, अगर उस ज़मीन पर किसी तरह का पुराना पेड़ है — चाहे पीपल हो, बरगद हो, शमी जी का पेड़ हो, गुड़हल का कोई बहुत बड़ा पुराना पौधा हो, अकवन, आक या मदार का पौधा हो, अनार का पौधा या पेड़ हो, या उनसे जुड़े जैसे महुआ का पेड़ या नीम का पेड़ — तो लोग उसे कटवा देते हैं। वे सीधे वहाँ जाते हैं और कहते हैं: यह पेड़ यहाँ है, तो जो पूरा डिज़ाइन बनना है उसमें यह बाधा डालेगा; अब इसे यहाँ से हटवाइए, कटवाइए।
क्या कुछ पेड़ ऐसे हैं जिन्हें काटने में दोष नहीं है?
सागवान और ऐसे लकड़ी वाले पेड़
वे कहते हैं कि सागवान जैसे पेड़ बहुत लंबे समय तक नहीं रहते और लकड़ी के लिए ही इस्तेमाल होते हैं, इसलिए उन्हें कटवाने में कोई खास दोष नहीं है — फिर भी वे पूजे हुए नहीं होने चाहिए।
वे कहते हैं कि अब जब आप इस तरह के पेड़ कटवाते हैं — सागवान जैसे पेड़ बहुत लंबे समय तक नहीं चलते, और लकड़ी वगैरह के लिए ही इस्तेमाल होते हैं। ऐसा पेड़ कटवाने में कोई खास दोष नहीं है। फिर भी, वह ऐसा नहीं होना चाहिए जिसकी पूजा होती रही हो।
पीपल का पेड़ उखाड़ने के बारे में वे क्या कहते हैं?
पीपल, और उस पर निश्चित रूप से रहने वाली शक्ति
वे कहते हैं कि ऐसा संभव ही नहीं कि किसी पुराने पीपल के पेड़ पर, या साधारण पीपल के पेड़ पर भी, कोई शक्ति न हो। अगर आप पीपल का पेड़ उखड़वाते या कटवाते हैं, तो सौ प्रतिशत लिखा हुआ मानिए कि आपके जीवन में एक समय ऐसा आएगा जब आप कहीं के नहीं रहेंगे।
वे कहते हैं कि बहुत बार आप वहाँ जाते हैं और देखते हैं कि यह पीपल का पेड़ है, पुराना हो गया है, बूढ़ा हो गया है, या सड़ रहा है या सूख रहा है — तो इसे पूरा हटा दो; या वह बिल्कुल ठीक और हरा-भरा है, फिर भी आप उसे पूरा हटवा देते हैं। आपको पता भी नहीं कि उस जगह पर, उस पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के पेड़ पर — ऐसा संभव ही नहीं कि किसी पुराने पीपल पर, या साधारण पीपल पर भी, कोई शक्ति न हो। अगर आप पीपल का पेड़ जड़ से उखड़वाते हैं, कटवाते हैं, तो सौ प्रतिशत लिखा हुआ मानिए कि आपके जीवन में एक समय ऐसा आएगा जब आप कहीं के नहीं रहेंगे।
प्लॉट पर फूलों से भरा गुड़हल का पौधा क्या बताता है?
लाल फूलों में देवी शक्ति, जिसे मनाया जा सकता है
वे कहते हैं कि अगर वहाँ गुड़हल का पौधा लाल फूलों से खूब खिला हो, तो सौ प्रतिशत देवी शक्ति होगी — चाहे नकारात्मक रूप में हो, उग्रता में हो, या किसी भी रूप में — और उसे मनाया जा सकता है, क्योंकि ये देवी तत्त्वों से भरे फूल हैं।
वे कहते हैं कि अगर वहाँ गुड़हल जैसा पौधा लाल फूलों वगैरह से पूरा खिला हो, तो सौ प्रतिशत देवी शक्ति होगी — चाहे नकारात्मक में हो, उग्रता में हो, किसी भी रूप में हो। उसे मनाया जा सकता है। क्योंकि ये देवी तत्त्वों से भरे फूल हैं; फूल खिल रहे हैं, तो यह देखकर उसे मनाया जा सकता है। या तो वह जगह मत लीजिए, अगर आपको लगता है कि आपको यह सब नहीं करना। नहीं तो अगर ले रहे हैं, तो शांति से और अच्छे से लीजिए, वहाँ पूजन-पाठ शुरू करवाइए, घर में नित्य पूजन कीजिए, और कोई परेशानी नहीं होगी।
नागफनी से भरे प्लॉट का क्या अर्थ है?
प्रेत भूमि
वे कहते हैं कि अगर वहाँ नागफनी के पौधे ज़रूरत से ज़्यादा हों — आप जाकर देखें कि उस ज़मीन पर नागफनी ज़रूरत से ज़्यादा उग आई है — तो वह ज़मीन भूलकर भी कभी मत खरीदिए: जान लीजिए कि वह पहले ही प्रेत भूमि बन चुकी है।
वे कहते हैं कि इसी तरह, जहाँ बहुत सारे नागफनी के पौधे होते हैं, ज़मीन अपने आप उनसे भर जाती है। आप देखते हैं: दस घर बने हैं, बीच में एक खाली प्लॉट है, और पूरी नागफनी वहाँ अपने आप उग आएगी। अगर उस जगह पर इस तरह की चीज़ें हैं, और आप जाकर देखते हैं कि उस ज़मीन पर नागफनी के पौधे ज़रूरत से ज़्यादा उग आए हैं, तो वह ज़मीन भूलकर भी कभी मत खरीदिए। जान लीजिए कि वह प्रेत भूमि बन चुकी है।
जो रखना चाहिए उसे फेंक दिया जाता है, और जो कभी नहीं रखना चाहिए उसे सजाया जाता है
जो रखना चाहिए उसे फेंकना, और जो कभी नहीं रखना चाहिए उसे सजाना
वे इसे आज चल रही सबसे बड़ी विडंबना कहते हैं कि तथाकथित आधुनिक ज्योतिषी लोगों से कहते हैं कि जो चीज़ें घर में रखनी चाहिए उन्हें फेंक दो, इनसे अशुभ होगा और जीवन बर्बाद होगा, और जो चीज़ें घर में कभी रखनी ही नहीं चाहिए उन्हें सजाने को कहते हैं।
वे कहते हैं कि आज के समय में सबसे बड़ी विडंबना तथाकथित आधुनिक ज्योतिषियों के ज़रिए चल रही है: जो चीज़ें घर में रखनी चाहिए, उन्हें वे कहते हैं फेंक दो, इनसे अशुभ आएगा और जीवन बर्बाद होगा; और जो चीज़ें घर में कभी रखनी ही नहीं चाहिए, उनसे वे घर सजाने को कहते हैं। वे कहते हैं कि एक बहुत परेशान करने वाले व्यक्ति हैं, जिन्हें हम कहते देखते हैं कि घर में पाँच से ज़्यादा तुलसी जी के पौधे नहीं होने चाहिए — जबकि हम यहाँ लोगों से पूरा तुलसी जी का वन लगाने को कहते हैं।
क्या आक, अकवन और मदार को काट देना चाहिए?
दूध वाले पेड़, जिन्हें बच्चों की पहुँच से दूर रखना है, नष्ट नहीं करना
वे कहते हैं कि ऐसे ज्योतिषी कहते हैं कि अकवन का पेड़ होना ही नहीं चाहिए और उसे काटकर फेंकने को कहते हैं। आक, अकवन और मदार दूध वाले पेड़ हैं; इतना काफ़ी है कि वे बच्चों की पहुँच से दूर रहें, और घर के बाहर या आस-पास उनके होने में कोई कठिनाई नहीं है। मदार के पेड़ पर कौन-सी शक्ति है, यह आप कभी नहीं जान पाएँगे, और अगर आप उसे उखड़वाते या कटवाते हैं, तो आपका जीवन भी पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा।
वे कहते हैं कि वे कहते हैं अकवन का पेड़ होना ही नहीं चाहिए। भाई — आक, अकवन, मदार वगैरह दूध वाले पेड़ हैं; वे बच्चों की पहुँच से दूर रहें, इतना काफ़ी है, पर घर के बाहर या पास में उनके होने में कोई कठिनाई नहीं है। वे कहते हैं इसे काटकर फेंक दो। मदार के पेड़ पर कौन-सी शक्ति होगी, यह आप कभी नहीं जान पाएँगे; और अगर आप उसे उखड़वाते हैं, कटवाते हैं, तो आपका जीवन भी अच्छी तरह बर्बाद हो जाएगा।
वे घर में नागफनी रखने पर आपत्ति क्यों करते हैं?
नागफनी — प्रेत, मसान या पिशाच का स्थायी आसन
वे कहते हैं कि वे लोग घर में नागफनी लगाने को कहते हैं, दावा करते हैं कि इससे सूर्य या चंद्रमा मज़बूत होता है। अगर ऐसे लोगों की बात मानकर आप नागफनी लगाते हैं और आपके घर में एक भी नकारात्मक ऊर्जा है — कोई प्रेत, मसान या पिशाच — तो उसका वहाँ बसना तय है; आप लाख कोशिश करें, निकारी करें, यज्ञ और हवन करवाएँ, वह नहीं जाएगी।
और घर में वे कहते हैं नागफनी के पौधे लगाओ, इससे किसी का सूर्य मज़बूत होता है, किसी का चंद्रमा। वे कहते हैं कि ऐसे लोगों की बातों में आकर आप नागफनी के पौधे लगा लेते हैं। अगर आपके घर में एक भी नकारात्मक ऊर्जा है, कोई प्रेत, मसान या पिशाच, तो उसका वहाँ बसना तय है। आप लाख कोशिश करें, निकारी करें, यज्ञ और हवन करवाएँ — वह नहीं जाएगी। उसका अंश उसमें बैठा रहेगा, और वह फिर आकर उस जगह पर मौजूद हो जाएगी, जब तक आप ये नागफनी के पौधे घर में रखेंगे।
जिस घर में कोई देवी शक्ति ही न हो, वहाँ क्या किया जाता है?
धूमावती प्रयोग
वे कहते हैं कि जब किसी के घर में कोई देवी शक्ति न हो, उस घर में कोई देवी शक्ति से युक्त तत्त्व न हो, तो वहाँ धूमावती भगवती की प्रक्रिया की जाती है; धूमावती तंत्र का प्रयोग होता है। आप इसके बारे में कभी-कभी सुनेंगे; यह खासकर पुराने समय में होता था, और आज किया जाए तो मानवाधिकार वाले और वन विभाग शिकायत करेंगे और केस बन जाएगा।
वे कहते हैं कि कोई ज्योतिषी कितना भी कहे कि ऐसा है, वैसा है, हम आपको सही बात बताते हैं: जब किसी के घर में कोई देवी शक्ति न हो, उस घर में कोई देवी शक्ति से युक्त तत्त्व न हो, तो उस घर में धूमावती भगवती की प्रक्रिया की जाती है। धूमावती तंत्र का प्रयोग होता है। आप इसके बारे में कभी-कभी सुनेंगे। यह खासकर पुराने समय में होता था। आज के समय में अगर यह सब किया जाए, तो मानवाधिकार वाले लोग सीधे पहुँच जाएँगे, वन्यजीव और वन विभाग वाले शिकायत करेंगे, और केस बन जाएगा।
घर में धूमावती प्रयोग कब और कैसे किया जाता था?
ब्रह्म भाग में बाँस, धूमावती मंत्र का संपुट, और काक तंत्र
वे कहते हैं कि पहले के समय में जहाँ घर में पशु मरते रहते थे, जहाँ अकाल मृत्यु होती रहती थी, जहाँ अशुभ पीछा नहीं छोड़ता था, वहाँ उस घर में धूमावती प्रयोग किया जाता था: घर के ब्रह्म भाग में, यानी बीच के हिस्से में, सीधा एक बाँस गाड़ा जाता था, उसे धूमावती मंत्र से संपुटित किया जाता था, और उस पर काक तंत्र का प्रयोग होता था, ताकि जगह की सारी नकारात्मक ऊर्जा एक जगह आ जाए।
वे कहते हैं कि पहले के समय में, जब इस तरह की प्रक्रिया ज़रूरी हो जाती थी — किसी के घर में लगातार पशु मर रहे हैं, घर में बार-बार अकाल मृत्यु हो रही है, अशुभ संकेत पीछा नहीं छोड़ रहे — ऐसे समय उस घर में धूमावती प्रयोग किया जाता था। इसमें, वहाँ जितनी भी नकारात्मक ऊर्जा थी उसे एक जगह लाने के लिए, घर के सीधे ब्रह्म भाग में, बीच के हिस्से में, एक बाँस — बाँस के पेड़ की लकड़ी, उस पर उगने वाला बाँस — गाड़ा जाता था, उसे धूमावती मंत्र से संपुट किया जाता था, और उस पर काक तंत्र का प्रयोग होता था। सूप और काक तंत्र के प्रयोग से ही सारी शक्तियाँ उस जगह पर उपस्थित हो जाती थीं।
इकट्ठी की गई ऊर्जाओं को घर से बाहर कैसे निकाला जाता था?
अभिमंत्रित हांडी और नागफनी का पौधा — उतारे का पात्र
वे कहते हैं कि उन्हें बाहर निकालने के लिए बहुत काँटेदार नागफनी के पौधे का प्रयोग होता था। लोग जो हांडी या हड़िया देखते हैं, उसे अभिमंत्रित किया जाता था, और नागफनी के पौधे के ज़रिए ही — मान लीजिए वहाँ पाँच तरह की प्रेत ऊर्जा थी — उन्हें उन पर उतारकर रखा जाता था, फिर निकारी की जाती थी। यह एक दिन में पूरा करना होता था; अगर एक बार में पूरी सफलता नहीं मिलती थी, क्योंकि कोई पैशाचिक शक्ति निकल ही नहीं रही थी, तो और प्रयोग बढ़ाए जाते थे।
वे कहते हैं कि उन्हें बाहर लाने के लिए यही बहुत काँटेदार पौधा, नागफनी, इस्तेमाल होता था। जो हंडी या हड़िया आप लोग देखते हैं — उस हांडी को अभिमंत्रित किया जाता था, और नागफनी के पौधे के ज़रिए ही, मान लीजिए वहाँ पाँच तरह की प्रेत ऊर्जा थी, उन्हें उन पर उतारकर वहाँ रखा जाता था, और फिर उसकी निकारी की जाती थी। और बाद में यह एक दिन के भीतर पूरा करना होता था। अगर एक बार में पूरी सफलता नहीं मिलती थी, अगर कोई पैशाचिक शक्ति ऐसी थी जो निकल ही नहीं रही थी, तो उसके लिए और प्रयोग बढ़ाए जाते थे।
ग्रंथों में ऐसे प्रयोग कहाँ आते हैं?
सर्वेश्वर और बगला तंत्रों में निग्रह दारुण सप्तक, और काक व उल्लूक तंत्र
वे कहते हैं कि सर्वेश्वर तंत्र में और भगवती बगला के तंत्र में लोग जो निग्रह दारुण सप्तक वगैरह पढ़ते हैं, वे इसी तरह के प्रयोग का अंग हैं। इनका पूरा विधि-विधान काक तंत्र में है, और उल्लूक तंत्र वगैरह में इसका प्रयोग होता है; जिन सब वाममार्गी तंत्रों से प्रेत-पिशाच एक झटके में हटाए जाते हैं, उन सब में इनका प्रयोग होता है।
वे कहते हैं कि जो निग्रह दारुण सप्तक वगैरह आप शायद पढ़ रहे हों — सर्वेश्वर तंत्र में, भगवती बगला के तंत्र में; बहुत लोग ऐसी किताबें पढ़ते हैं और यह सब देखते हैं — निग्रह दारुण सप्तक और ऐसे प्रयोग इसी तरह के प्रयोग का अंग हैं। इसका पूरा विधि-विधान काक तंत्र में भी है, और उल्लूक तंत्र वगैरह में इसका प्रयोग होता है। इन सब वाममार्गी तंत्रों में, जिनसे प्रेत और पिशाच एक झटके में हटाए जाते हैं, इन सबका प्रयोग होता है।
सात्त्विक तंत्र बेहतर है क्योंकि उससे कुछ उजड़ता नहीं, प्रेत भूमि को छोड़कर
सात्त्विक तंत्र, क्योंकि कुछ उजड़ता नहीं — प्रेत भूमि का अपवाद
वे कहते हैं कि इन सबसे ज़्यादा, ऐसे क्षेत्र में, जहाँ भी प्रेत और पिशाच हों, उन्हें हमारा सात्त्विक तंत्र ज़्यादा असरदार दिखता है, क्योंकि उससे कुछ उजड़ता नहीं। पर जहाँ जगह पहले ही प्रेत भूमि बन चुकी हो, वहाँ शुरू में उस तरह का तंत्र करवाकर जगह खाली करवाना ज़रूरी हो जाता है, और उसके बाद ही किसी उच्च कोटि की महाशक्तियों का प्रयोग करना होता है।
वे कहते हैं कि इन सबसे ज़्यादा, इस तरह के क्षेत्र में, जहाँ भी प्रेत और पिशाच हों, उन्हें जो ज़्यादा असरदार दिखता है वह हमारा सात्त्विक तंत्र है — क्योंकि उससे कुछ उजड़ता नहीं। ये वाममार्गी तंत्र जब लगाए जाते हैं, तो कुछ जगहों पर यह ज़रूरी हो जाता है। जहाँ पहले ही प्रेत भूमि बन चुकी हो, वहाँ उस तरह का सात्त्विक तंत्र किस काम का; वहाँ ज़रूरी है कि शुरू में इस तरह का तंत्र करवाया जाए, जगह खाली करवाई जाए, और उसके बाद ही आप किसी उच्च कोटि की महाशक्तियों का प्रयोग करें। वे कहते हैं कि वह भी चलेगा — वह एक विधि है। हम यह नहीं कह रहे कि यह नहीं हो सकता; दोनों हो सकते हैं, और यहाँ सबके अपने विचार हो सकते हैं।
ज्योतिष की सलाह पर घर में चीज़ें लाने के बारे में वे क्या चेतावनी देते हैं?
ऐसी चीज़ जो घर में पहले से मौजूद चीज़ को ठिकाना दे दे
वे कहते हैं कि आजकल लोग ज्योतिष के नाम पर कुछ भी करवा लेते हैं। आपको कोई जानकारी नहीं, आप कुछ लाकर घर में रख देते हैं — और आपको पता नहीं कि आपके घर में कौन-सी चीज़ हो सकती है जिसे उसमें जगह मिल जाए। इसलिए ऐसी ज़मीन कभी मत खरीदिए जहाँ इस तरह के पौधे हों।
वे कहते हैं कि आज के समय में लोग ज्योतिष के नाम पर कुछ भी करवा लेते हैं। अब आपको कोई जानकारी ही नहीं; आप कुछ लाकर घर में रख देते हैं। आपको कैसे पता चलेगा कि आपके घर में कौन-सी चीज़ हो सकती है जिसे वह जगह मिल जाए? इसलिए ऐसी भूमि कभी मत लीजिए जहाँ इस तरह के पौधे हों।
अगर प्लॉट के किसी पेड़ की पहले से पूजा हो रही थी तो क्या करें?
पूछना कि किसकी पूजा होती थी, और विसर्जन व शुद्धिकरण करवाना
वे कहते हैं कि अगर वहाँ बरगद या पीपल या कोई देव वृक्ष है, या कोई पेड़ पहले से है जिस पर कोई पूजा करता था — वहाँ धूप-दीप जलता था, सिंदूर चढ़ता था, कोने में खड़ा है — तो या तो वह जगह मत लीजिए, या लेने से पहले उसे दिखवाइए और पूछिए कि कौन-सा पूजन चल रहा था, अगर उनकी विसर्जन विधि है तो वह करवाइए, उस जगह का शुद्धिकरण करवाइए, और जानकर तय कीजिए कि आप उनकी पूजा करेंगे या नहीं। उसे काटना किसी भी हाल में नहीं चलेगा।
और अगर आप ऐसी ज़मीन ले रहे हैं जहाँ बरगद या पीपल के पेड़ हैं या देव वृक्ष हैं, कुछ भी, या वहाँ पहले से कोई पेड़ था जिस पर लोग पूजा करते थे — उसकी पूजा करते थे, वहाँ धूप और दीप जलता था, सिंदूर चढ़ता था, आप उसे कोने में खड़ा देख सकते हैं — तो या तो उसे मत लीजिए। या अगर लें, तो लेने से पहले उसे दिखवाइए; पूछिए कि कौन-सा पूजन चल रहा था; अगर उनकी कोई विसर्जन विधि है, तो वह करवाइए; उस जगह का शुद्धिकरण करवाइए। अगर वह देव-पूजित है, तो आप उनकी पूजा करेंगे या नहीं — यह सब जानकर और सुनकर, तब लीजिए; नहीं तो मत लीजिए। वे कहते हैं कि उसे काटना किसी भी हाल में नहीं चलेगा।
पीपल पर बैठाए गए जिन्न बाबा की हिंदू ही हर शुक्रवार पूजा करने लगते हैं
पीपल पर बैठाए गए जिन्न बाबा, जिनकी हिंदू शुक्रवार को पूजा करते हैं
वे कहते हैं कि लोग अक्सर घर के प्रेत-पिशाचों को भी देव वृक्षों पर जगह दे देते हैं — जहाँ किसी घर में ब्रह्म की पूजा होती है और बगल में पीपल खड़ा है, लोग उन्हें उस पर जगह दे देते हैं। आजकल लोग मुस्लिम तंत्र के जिन्नों को भी जगह दे रहे हैं: एक साधिका बताती हैं कि उनके घर के ठीक सामने एक पेड़ है जिस पर हिंदू ही हर शुक्रवार पूजा करने जाते हैं, यह कहकर कि वह जिंद बाबा का स्थान है।
वे कहते हैं कि बहुत बार लोग घर के प्रेत और पिशाचों को भी देव वृक्षों पर जगह दे देते हैं। जहाँ किसी घर में ब्रह्म की पूजा होती है और साथ में पीपल का पेड़ खड़ा है, लोग उन्हें उस पर जगह दे देते हैं। आजकल मुस्लिम तंत्र में ये जिन्न वगैरह हैं, और लोग उन्हें भी जगह दे रहे हैं। वे कहते हैं कि एक साधिका बताती हैं कि उनके घर के ठीक सामने एक पेड़ है, और हिंदू लोग ही हर शुक्रवार जाकर उस पर पूजा करते हैं, यह कहकर कि वहाँ जिंद बाबा का स्थान है। वे कहते हैं, ज़रा देखिए यह बड़ी मूर्खता कहाँ तक बढ़ गई है।
ऐसी जगहों से दूरी रखिए, या उनके नियम और विधि का ठीक पालन कीजिए
दूरी रखना, या नियम और विधि का पालन
वे कहते हैं कि अब अगर कोई पास में घर खरीदे, या वह पेड़ किसी की ज़मीन पर हो और वह उसे हटवाना चाहे, तो विपत्ति आएगी। इसलिए ऐसी जगहें लीजिए ही मत, उनसे दूरी रखिए; और अगर लें, तो नियम और विधि का पालन कीजिए।
वे कहते हैं कि अब कोई ऐसी जगह के पास घर खरीदेगा, या वह पेड़ किसी की ज़मीन पर होगा और वह उसे हटवाना चाहेगा — भाई, विपत्ति आएगी। इसलिए ऐसी जगहें लीजिए ही मत; दूरी रखिए। और अगर लें, तो नियम और विधि का पालन कीजिए। वे कहते हैं कि यह पहली बात थी।
नींव की खुदाई शुरू होने से पहले क्या करना चाहिए?
ज़मीन की सफ़ाई और चौबीस घंटे का अखंड कीर्तन या सुंदरकांड पाठ
वे कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि जब ज़मीन खरीद ली गई और नींव की खुदाई होनी है, तो खुदाई शुरू करने से पहले किसी योग्य विद्वान या तंत्र साधक से ज़मीन की अच्छे से सफ़ाई करवानी चाहिए, और उस जगह पर अखंड कीर्तन करवाना चाहिए — चाहे एक ही दिन, चौबीस घंटे ही — या सुंदरकांड पाठ करवाना चाहिए।
वे कहते हैं कि दूसरी बात है जब आप घर बनवा रहे हों — यानी ज़मीन खरीद ली गई है और नींव की खुदाई होनी है। ज़मीन खुदवाना शुरू करने से पहले यह काम करना चाहिए: किसी योग्य विद्वान से, किसी तंत्र साधक से ज़मीन की अच्छे से सफ़ाई करवाइए, और उस जगह पर अखंड कीर्तन करवाइए, चाहे एक ही दिन के लिए, चौबीस घंटे के लिए ही। या सुंदरकांड पाठ करवाइए। भूमि पूजन के नाम पर भूमि पूजन हो, और उसके बाद कोई चौबीस घंटे का पाठ हो।
घरों के बीच खाली प्लॉट को खास ध्यान की ज़रूरत क्यों है?
पड़ोसी खाली ज़मीन पर अपना उतारा फेंकते हैं
वे कहते हैं कि अगर पुरानी ज़मीन है, और उसके चारों ओर घर बन गए हैं और बीच का प्लॉट बचा रह गया है, तो आस-पास के लोग भी अपनी चीज़ें लाकर वहाँ फेंक देते हैं — उतारी-निकाली करते हैं, कोई उतारा फेंक देते हैं, कोई तंत्र-मंत्र करते हैं, खाली जगह में फेंक देते हैं। अब आप किस-किस के पीछे सफ़ाई करते फिरेंगे।
वे कहते हैं कि अगर आप कर सकें, और चाहे पता न भी चला हो — मान लीजिए मन में शंका है कि यहाँ कुछ हो सकता है, पुरानी ज़मीन है — तो उसके आस-पास, अगर दोनों तरफ़ घर बन गए हैं और बीच का प्लॉट बचा रह गया है, तो यह होता है कि पास के लोग भी अपनी चीज़ें लाकर वहाँ फेंक देते हैं। वे उतारी और निकाली करेंगे, कोई उतारा फेंक देंगे, कोई तंत्र-मंत्र भी करेंगे — जगह खाली है, वहीं फेंक दो। वे पूछते हैं, अब आप किस-किस के पीछे सफ़ाई करते फिरेंगे।
भूमि पूजन के लिए वे ठीक-ठीक क्या बताते हैं?
पंचगव्य, अखंड कीर्तन या अखंड रामायण, संपुट सुंदरकांड, या नवचंडी
वे कहते हैं कि जब भी आप घर बनवाने जाएँ, नींव पूजन से पहले भूमि पूजन करवाइए। इसके लिए पहले सफ़ाई करवाइए, पूरी जगह को अच्छे से शुद्ध कीजिए, हो सके तो गोमूत्र और पंचगव्य छिड़कवाइए, और फिर जो भी कर सकें — या तो उस जगह पर चौबीस घंटे का अखंड कीर्तन या अखंड रामायण; और अगर वह संभव न हो, तो संपुट के साथ सुंदरकांड पाठ, ऐसे मंत्र लगाकर जिनसे हनुमान जी आते हैं; या हो सके तो वहाँ पहले नवचंडी करवाइए।
वे कहते हैं कि ऐसी स्थिति में, जब भी आप घर बनवाने जाएँ, तो नींव पूजन होने से पहले भूमि पूजन करवाइए। भूमि पूजन के लिए पहले सफ़ाई करवाइए, उस पूरी जगह को अच्छे से शुद्ध करवाइए, और हो सके तो गोमूत्र और पंचगव्य वगैरह छिड़कवाइए। फिर जो भी आप कर सकें — या तो उस जगह पर चौबीस घंटे का अखंड कीर्तन या अखंड रामायण। अगर वह न हो सके, तो संपुट के साथ सुंदरकांड वगैरह का पाठ, ऐसे मंत्रों का संपुट लगाकर जिनसे हनुमान जी पधारते हैं। या अगर आपके लिए संभव हो, तो उसी जगह पर पहले नवचंडी अनुष्ठान करवाइए। अगर नवचंडी न हो सके, तो एक ब्राह्मण से पाठ करवाइए, एक दिन के लिए करवाइए।
ज़मीन को शुद्ध करने के ऊँचे उपाय कौन-से हैं?
महाविद्या सप्रयोग, महाभैरव, या कम से कम हवनात्मक प्रयोग
वे कहते हैं कि अगर आपके लिए संभव हो, तो महाविद्या सप्रयोग करवाइए — वह भी चलेगा; वह नहीं, तो महाभैरव; और अगर इनमें से कुछ भी न हो सके, तो अगर कोई साधक, कोई तंत्र साधक है, तो उनसे वहाँ अग्नि, हवन, कर्मकांड और तंत्रकांड ज़रूर करवाइए।
वे कहते हैं कि या अगर आपके लिए संभव हो, तो महाविद्या सप्रयोग, कोई महाविद्या, करवाइए। वह भी चलेगा। अगर वह संभव न हो, तो महाभैरव। और अगर वह भी संभव न हो — अगर ये सब चीज़ें न हो सकें — तो हवनात्मक प्रयोग: अगर कोई साधक, कोई तंत्र साधक है, तो उनसे वहाँ अग्नि, हवन, कर्मकांड और तंत्रकांड वगैरह ज़रूर करवाइए।
इस चरण में बलि प्रदान से क्या होता है?
ज़मीन की नकारात्मकता उसी समय निकल जाना
वे कहते हैं कि शुरू में ही बलि प्रदान वगैरह करवाइए: जो भी नकारात्मक चीज़ें हैं, वे उसी समय उस ज़मीन से निकल जाएँगी। वे कहते हैं कि घर बनाने से पहले यही आपकी सबसे बड़ी सावधानी होगी।
वे कहते हैं कि यह करवाने से क्या होगा — बलि प्रदान वगैरह करवाइए। शुरू में ही, जो भी नकारात्मक चीज़ें हैं, वे उसी समय उस ज़मीन से निकल जाएँगी। घर बनाने से पहले यही आपकी सबसे बड़ी सावधानी होगी।
नींव पूजन कब करना चाहिए?
योग्य विद्वान का बताया मुहूर्त
वक्ता कहते हैं कि ये सब क्रियाएँ करवाकर जब आप निश्चिंत हो जाएँ, तब नींव पूजन आता है। नींव पूजन जब शुरू हो, तो श्रेष्ठ विद्वान जो मुहूर्त बताएँ, ठीक उसी समय उसे करवाएँ।
वे कहते हैं, यह सब क्रिया करवाकर निश्चिंत हो जाएँ, उसके बाद नींव पूजन आता है। जब नींव पूजन शुरू होना हो, तो श्रेष्ठ विद्वान जो मुहूर्त बताएँ — कि इस समय नींव पूजन हो — ठीक उसी समय उसे करवाएँ।
नींव में आठों दिशाओं में कौन-सी शक्तियाँ स्थापित करें?
अष्ट भैरव, अष्ट मातृका या दिक्पालों से अष्ट दिग्बंधन
वक्ता कहते हैं कि फिर घर का पूरा नक्शा सामने रखकर — ये मेरे कोने हैं — आठों कोनों में आठ शक्तियाँ ज़रूर स्थापित करें, नींव में ही। जिस जानकार के पास आप जाएँ, वे अष्ट दिग्बंधन के लिए जो शक्तियाँ लगाते हों, वही लगाएँ: अष्ट भैरव, अष्ट मातृका, दिक्पाल से जुड़ी शक्तियाँ, या अपनी श्रद्धा से सिद्ध किए मंत्र।
वे कहते हैं, उसके बाद भी घर का जो पूरा नक्शा आपके पास है — हाँ, यह-यह मेरा कोना है — आठों कोनों में आठ शक्तियाँ ज़रूर स्थापित होनी चाहिए, नींव में ही। अष्ट शक्तियाँ। अब आप जिस भी जानकार के पास जाएँ, वे दिग्बंधन के लिए जो शक्तियाँ लगाते हों, वही लगाएँ — अष्ट भैरव लगाएँ, अष्टमातृका लगाएँ, दिक्पाल से जुड़ी शक्तियाँ लगाएँ, या अपनी श्रद्धा से जो मंत्र सिद्ध किए हों। इन्हें नींव में ही लगवाना चाहिए।
नींव में यंत्र और कलश कहाँ रखें?
ईशान में कलश, आठों दिशाओं में यंत्र, ब्रह्म भाग में वास्तु पुरुष
वक्ता कहते हैं कि किसी अच्छे साधक से करवाएँ — पास में कोई अच्छा, योग्य महाविद्या का जानकार हो तो उनसे बात करके करवाएँ — और यंत्र नींव में ही स्थापित करें। कलश होगा तो ईशान कोने में स्थापित होगा। पर अगर आठों दिशाओं में यंत्र भी लगें और ब्रह्म भाग में वास्तु पुरुष आदि स्थापित हों, तो वहाँ कोई वास्तु दोष हो भी, तो उसी समय दूर हो जाएगा। बाद में ज़्यादा परेशानी नहीं होगी।
वे कहते हैं, किसी अच्छे साधक से करवाएँ। पास में कोई अच्छा, योग्य महाविद्या का जानकार हो, तो उनसे बात करके करवाएँ; यंत्र आदि नींव में ही स्थापित करें। जब कलश होगा, तो वह ईशान कोने में स्थापित होगा। पर अगर आठों दिशाओं में यंत्र भी स्थापित हों, और ब्रह्म भाग में वास्तु पुरुष आदि स्थापित हों, तो वहाँ कोई न कोई वास्तु दोष हो भी, तो उसका निवारण उसी समय हो जाएगा। फिर बाद में बहुत ज़्यादा परेशानी नहीं होगी — अगर यह शुरू में ही, नींव में ही हो जाए।
घर पूरा होने पर क्या करना चाहिए?
सही मुहूर्त में गृह प्रवेश, पहले दिन अनुष्ठान
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद अपना घर पूरा करें। घर पूरा हो जाए तो गृह प्रवेश सही, शुभ मुहूर्त और तिथि में हो, और साथ में पहले ही दिन वहाँ अपनी श्रद्धा के अनुसार अनुष्ठान करवाएँ। तब आप उस घर में लंबे समय तक बिना बाधा के रह पाएँगे।
वे कहते हैं, उसके बाद अपना घर पूरा करें। जब घर पूरा हो जाए, तो गृह प्रवेश सही, शुभ मुहूर्त और तिथि में हो। साथ में पहले ही दिन वहाँ अपनी श्रद्धा के अनुसार अनुष्ठान करवाएँ। आप उस घर में लंबे समय तक बिना बाधा के रह पाएँगे। वहाँ समय-समय पर साधना, अनुष्ठान आदि होते रहें; अपनी साधना करते रहें।
घर में पूजा स्थान कहाँ नहीं बनाना चाहिए?
शौचालय के पास नहीं, दक्षिणमुख नहीं, सीढ़ी के नीचे नहीं
वक्ता कहते हैं कि घर का पूजा स्थान कभी भूलकर भी शौचालय के पास न बनाएँ। न ही कभी भूलकर दक्षिण आदि दिशा में ऐसा बनाएँ कि आपका मुँह दक्षिण की ओर हो। पूजा स्थान सीढ़ी के नीचे भी नहीं बनना चाहिए।
वे कहते हैं, घर में जो पूजा स्थान आप बनाते हैं, उसे कभी भूल-चूक से भी शौचालय के पास न बनवाएँ। न ही कभी भूल-चूक से दक्षिण आदि दिशा में ऐसा बनवाएँ कि आपका मुँह दक्षिण की ओर हो। इन सब बातों का ध्यान रखकर बनाएँ। पूजा स्थान सीढ़ी के नीचे नहीं बनना चाहिए।
अगर घर पहले से बना हो और उस पर अभिचार हो रहा हो तो?
बने हुए घर के बंधन की बात
घर पूरा करने के बाद वक्ता अगली स्थिति पर आते हैं: मान लीजिए घर पहले से बना है, सब कुछ है, और अभी उस पर कोई प्रयोग चलाया जा रहा है। तब घर का बंधन किस तरह करें, क्या कैसे करें।
वे कहते हैं, इस तरह आपने सबसे पहले अपना घर पूरा किया। अब घर पूरा हो गया; इसके आगे की बात करते हैं। मान लीजिए घर पहले से बना है, सब कुछ है, और अभी कोई न कोई प्रयोग चलाया जा रहा है। तो घर का बंधन किस तरह करें, कैसे और क्या करें? वे बताते हैं कि चैनल पर कुछ वीडियो हैं जिनमें मंत्र सिद्ध करने की विधि, फिर चीज़ों को अभिमंत्रित कैसे करें, कैसे लगाएँ, कौन-सी शक्तियाँ कैसे — वह पूरी विधि दी गई है। वे कहते हैं, उन सबको एक बार देख लें, तो जानकारी और साफ़ मिलेगी।
क्या गृह बंधन में शक्ति लगाने से गृहस्थ नियमों में बँध जाता है?
बंधन से पहले नियम पालन की शंका
वक्ता लोगों की शंका उठाते हैं: जब भी हम बंधन के लिए घर का प्रयोग करते हैं, तो शंका हो सकती है कि कोई शक्ति लगाएँगे तो उसके लिए कोई नियम पालना होगा — और वे नियम क्या होंगे।
वे कहते हैं, दूसरी बात यह है कि जब भी हम घर का प्रयोग करते हैं, बंधन के लिए प्रयोग करते हैं, तो मन में कहीं से शंका या संदेह आ सकता है: अगर हम कोई शक्ति लगाएँगे, तो क्या उसके लिए कोई नियम पालना होगा, और वह नियम पालन क्या होगा?
जिस घर का कोई बंधन न हो, उसका क्या होता है?
सक्रिय शत्रु का अभिचार सौ प्रतिशत सफल होना
वक्ता कहते हैं कि पहली बात यह है: अगर आप गृह बंधन न करें और घर पूरा खुला छोड़ दें, और आपके शत्रु हों जो सक्रिय हों और आभिचारिक गतिविधि करते हों, तो उनके अभिचार के सौ प्रतिशत सफल होने की संभावना और-और बढ़ जाती है।
तंत्र का प्रक्षेपण घर में सबसे पहले किस पर असर करता है?
तुलसी का पौधा — और जब वह फिर भी हरा रहे
वक्ता कहते हैं कि जब भी तंत्र का प्रक्षेपण होता है, सबसे पहला असर तुलसी जी के पौधे पर होता है। पर अगर उसी तंत्र में, उसी चौकी में, कुछ शुभ शक्तियाँ भी भेजी गई हों जो कहीं मंत्र बल से बँधी हों, तो तुलसी जी पर भी कोई असर नहीं पड़ता। तुलसी जी पूरी हरी रहती हैं, और घर में पूरा कलह-क्लेश मच जाता है।
वे कहते हैं, जब भी तंत्र का प्रक्षेपण होता है, सबसे पहला असर तुलसी जी के पौधे पर होता है। पर अगर उसी तंत्र में, उसी चौकी में — अगर चौकी चलाई गई है — कुछ ऐसी शुभ शक्तियाँ भी भेजी गई हों जो कहीं मंत्र बल आदि से बँधी हों, तो तुलसी जी पर भी कोई असर नहीं पड़ता। तुलसी जी पूरी हरी-भरी रहती हैं, पर घर में पूरा कलह-क्लेश मच जाता है, हाहाकार मच जाता है।
तुलसी का पौधा असल में कब सूखता है?
केवल जब मूल तत्वों में हस्तक्षेप हो
वक्ता कहते हैं कि तुलसी जी आपके नुकसान में तभी जाती हैं और सूखने लगती हैं, जब आपके मूल तत्वों में हस्तक्षेप हो — जब पैशाचिक बाधा और दैवी प्रकोप दोनों पूरी तरह हों। तभी तुलसी जी सूखती हैं, तभी देव वृक्ष सूखता है। नहीं तो बहुत बार ऐसा होगा कि तुलसी जी हरी-भरी हैं और आपके घर में बाधा आ चुकी है।
वे कहते हैं, तुलसी जी आपके नुकसान में तभी जाती हैं और सूखने लगती हैं, जब आपके मूल तत्वों में हस्तक्षेप होता है। जब पैशाचिक बाधा और दैवी प्रकोप दोनों पूरी तरह होते हैं — तभी तुलसी जी सूखती हैं, तभी देव वृक्ष सूखता है। नहीं तो बहुत बार ऐसा होगा कि तुलसी जी हरी-भरी हैं और आपके घर में बाधा आ चुकी है।
गृह बंधन से पहले सबसे पहले क्या देखें?
कमरों की गिनती, या चार दिशाएँ और चार कोने
वक्ता कहते हैं कि गृह बंधन के लिए सबसे पहले देखें कि घर में कितने कमरे हैं। हर कमरा — या अगर कमरों के हिसाब से न चलें, तो कम से कम आठ दिशाओं में घर के कितने कोने हैं, चार दिशाएँ और चार कोने, और किसमें कौन-सी जगह है।
वे कहते हैं, गृह बंधन के लिए सबसे पहले देखें कि घर में कितने कमरे हैं। हर कमरा; या अगर कमरों के हिसाब से न चलें, तो कम से कम आठ दिशाओं में आपके घर के कितने कोने हैं — चार दिशाएँ और चार कोने — और कौन-सी जगह कहाँ है। अगर वहाँ बाथरूम आदि हो, तो वहाँ नहीं: उसके पास वाले कमरे में बंधन विधि करें।
बंधन विधि के लिए वे कौन-सा मंत्र बताते हैं?
भगवती का अर्गला मंत्र, कीलन से पहले ग्यारह या सत्ताईस हज़ार जप
वक्ता कहते हैं कि बंधन विधि करने के लिए आप भगवती के अर्गला मंत्र का उपयोग कर सकते हैं, जिसकी क्षमता बहुत बड़ी है। अगर आपने इस मंत्र का ग्यारह हज़ार या सत्ताईस हज़ार तक जप किया है, तो उसके बाद कीलन की विधि करें।
वे कहते हैं, बंधन विधि करने के लिए आप भगवती के अर्गला स्तोत्र मंत्र का उपयोग कर सकते हैं। इस मंत्र की क्षमता बहुत बड़ी है। अगर आपने इस मंत्र का ग्यारह हज़ार या सत्ताईस हज़ार तक जप किया है, तो उसके बाद उत्कीलन की विधि करें।
घर के कीलन से पहले क्या करना ज़रूरी है?
क्षेत्रपाल निकारी, बड़ी परेशानी हो तो कम से कम पाँच बार
वक्ता कहते हैं कि जब भी घर का कीलन करें, उससे पहले क्षेत्रपाल निकारी बहुत ज़रूरी है। घर में बहुत बड़ी समस्या हो तो कम से कम पाँच बार क्षेत्रपाल निकारी करें। इससे जो भी नकारात्मक शक्तियाँ हैं, वे धीरे-धीरे कमज़ोर होकर निकल जाती हैं।
वे कहते हैं, जब भी आप कीलन करें, उससे पहले क्षेत्रपाल निकारी बहुत ज़रूरी है। अगर घर में बहुत ज़्यादा समस्या है, तो कम से कम पाँच बार क्षेत्रपाल निकारी करें। क्षेत्रपाल निकारी होने से जितनी भी नकारात्मक शक्तियाँ हैं, वे धीरे-धीरे कमज़ोर होकर निकल जाती हैं।
गृह बंधन के दिन काम का क्रम क्या है?
क्षेत्रपाल निकारी, स्नान, फिर अभिमंत्रित त्रिधातु कील
वक्ता कहते हैं कि जिस दिन गृह बंधन करना हो, उस दिन भी क्षेत्रपाल निकारी करें, उसके बाद ही स्नान करके गृह बंधन की पूरी तैयारी करें। कीलें पहले अभिमंत्रित की जाती हैं — त्रिधातु कील, लोहे की कील, चाँदी की कील, ताँबे की कील, तीन तरह की कीलें जो हवन से अभिमंत्रित करके, अग्नि में तपाकर जगाई गई हों — और उन्हें गाड़ने से पहले क्षेत्रपाल निकारी की जाती है।
वे कहते हैं, जिस दिन आपको गृह बंधन करना है, उस दिन भी क्षेत्रपाल निकारी करके ही फिर नहा-धोकर गृह बंधन की पूरी तैयारी करें। पर बंधन — यानी जैसे हमने कील अभिमंत्रित की: त्रिधातु कील, लोहे की कील, चाँदी की कील, ताँबे की कील, तीन तरह की कीलें जिनका हमने हवन आदि से अभिमंत्रण किया, अग्नि में तपाकर उस तरह जगाया — उसे गाड़ने से पहले हम पहले क्षेत्रपाल निकारी करेंगे।
कलश में चीज़ें रखने से पहले उसे कैसे तैयार करें?
पंचगव्य और पंचामृत से स्नान, फिर कलश का अभिमंत्रण
वक्ता कहते हैं कि जो भी वस्तु आप अभिमंत्रित करने जा रहे हैं — कील हो, अस्त्र आदि हो, या कलश जो आप बिठाते हैं — कलश को पहले पंचगव्य और पंचामृत से नहलाकर शुद्ध करें, तभी उसमें कोई अभिमंत्रित वस्तु डालें। कलश को भी ऐसे मंत्र से अभिमंत्रित करें, उसके बाद ही उसमें कोई सामग्री भरें।
वे कहते हैं, जो भी वस्तु आप अभिमंत्रित करने जा रहे हैं — कील हो, अस्त्र आदि हो, या कलश जो आप बिठाते हैं। हम कलश की एक विधि डालेंगे; उस विधि का असर बहुत शक्तिशाली देखा गया है। हमारे कुछ साधकों को, जिन्हें ज़रूरत है, कलश आदि भी दिए जाते हैं। तो अगर आप ऐसा कलश भी बिठाएँ, तो उसे पंचगव्य और पंचामृत से नहलाकर शुद्ध करें, तभी उसमें कोई अभिमंत्रित वस्तु डालें। और कलश को भी अपने ऐसे मंत्र से अभिमंत्रित करें, उसके बाद ही उसमें कोई सामग्री भरें।
सामग्री में चाँदी का टुकड़ा क्यों ज़रूरी है?
चाँदी बंधन को सूतक-पातक से बचाती है
वक्ता कहते हैं कि जब भी कोई सामग्री लगाएँ, उसमें चाँदी का टुकड़ा ज़रूर लगाएँ — थोड़ी मात्रा में भी, पर जितना हो सके उतना। इसका असर यह है कि जब घर में सूतक-पातक पड़े, तो आपकी गाड़ी हुई कील और कलश से किया बंधन सूतक-पातक नहीं लेंगे, अशुद्ध नहीं होंगे।
वे कहते हैं, और जब भी कोई सामग्री लगाएँ, उसमें चाँदी का टुकड़ा ज़रूर लगाएँ। चाँदी का टुकड़ा लगाएँ — थोड़ी मात्रा में भी करें, पर जितना हो सके उतना होना चाहिए। इससे यह होता है: जब भी घर में सूतक-पातक पड़ता है, तो आपकी गाड़ी हुई कील, या कलश के ज़रिए किया बंधन, सूतक-पातक नहीं लेगा; अशुद्ध नहीं होगा। जैसे ही आपका सूतक-पातक खत्म हो और आप घर में तुलसी पत्र और गंगाजल छिड़कें, घर फिर से सुरक्षित हो जाता है। तो यह प्रयोग भी करना चाहिए।
क्या शक्तियों से घर बाँधने पर ऊर्जा की हानि होती है?
यह डर कि बिठाई शक्ति को हमेशा भोग देना होगा
वक्ता यह खास सवाल उठाते हैं कि रक्षण के लिए किसी जगह शक्तियाँ लगाकर बंधन करने से क्या ऊर्जा की कोई हानि होती है। वे कहते हैं कि लोगों में अक्सर यह विचार आता है कि किसी शक्ति को जगह देंगे तो उसे भोजन, भोग, जल देते रहना होगा — और उत्तर देते हैं कि अलग से कुछ देना तभी पड़ता है जब आपने कुछ बहुत खास किया हो।
वे कहते हैं, एक और खास बात है। जब हम उस जगह किसी तरह की शक्तियाँ लगाते हैं और रक्षण के लिए बंधन करते हैं, तो क्या उससे ऊर्जा की कोई हानि होती है? लोगों में बहुत बार ऐसा विचार आता है कि अगर हम किसी शक्ति को जगह देंगे, तो उस शक्ति को भोजन, भोग, जल आदि देते रहना होगा। वे कहते हैं, इसके लिए अलग से कुछ तभी देना पड़ता है जब आपने कभी कुछ बहुत खास किया हो।
ऐसा बंधन कौन करता है जिसमें लगातार भोग देना पड़ता है?
जिन्हें घर के अंदर तंत्र-मंत्र सिद्धि करनी होती है
वक्ता कहते हैं कि खासकर वे लोग ऐसा बंधन करते हैं जिन्हें घर में तंत्र-मंत्र सिद्धि करनी होती है। इसमें आठ दिशाएँ हों तो आठों में ऐसा बंधन होता है कि तय समय पर, पूर्णिमा के दिन और अमावस्या के दिन, आदि।
बंधन की वज्र विधि क्या है?
तीन स्थान — शिखा, नाभि और पुच्छ — अमावस्या और पूर्णिमा पर बलि भोग
वक्ता कहते हैं कि ऐसे लोग आठों दिशाएँ बाँधने के बजाय घर में तीन जगह बंधन करवाते हैं: मुख्य द्वार पर, ब्रह्म भाग में, और पीछे के हिस्से में — यानी शिखा, फिर बीच का हिस्सा नाभि, और उसके बाद पुच्छ। ये तीन बंधन बनते हैं, और तीनों जगह अमावस्या और पूर्णिमा पर बलि भोग दिया जाता है। यह भी एक विधि है, इसे वज्र विधि कहते हैं।
वे कहते हैं, वे घर में तीन जगह बंधन करवाएँगे; आठों दिशाएँ नहीं बँधवाते। मुख्य द्वार पर, ब्रह्म भाग में, और पीछे के हिस्से में — यानी शिखा, फिर बीच का हिस्सा, नाभि, और उसके बाद पुच्छ। वे ये तीन बंधन करवाएँगे, और तीनों जगह अमावस्या और पूर्णिमा पर बलि भोग दिलवाते हैं। यह भी एक विधि है; इसे वज्र विधि कहते हैं।
पूरी वज्र विधि आज कम क्यों होती है?
चौबीस जगह विधान, और उसके बाद की बाध्यता
वक्ता कहते हैं कि इस विधि में पूरी प्रक्रिया के लिए लगभग चौबीस जगह विधान करने पड़ते हैं। आज के समय में इतनी बड़ी विधि कोई नहीं करता, क्योंकि बाद में परेशानी यह होती है कि वहाँ अमावस्या और पूर्णिमा पर पूजा देनी ही पड़ती है — वह अनिवार्य हो जाता है।
वे कहते हैं, पर इस विधि में पूरी विधि पूरी करने के लिए लगभग चौबीस जगह विधान करने पड़ते हैं। तो आज के समय में इतनी बड़ी, विस्तृत विधि कोई नहीं करता। क्योंकि उसके बाद परेशानी यह आती है कि वहाँ अमावस्या और पूर्णिमा पर पूजा देनी पड़ती है। वह ज़रूरी हो जाता है।
बंधन की सामान्य विधि में क्या करना पड़ता है?
अलग से कुछ नहीं — आपकी पूजा और हवन ही उसे जगाए रखते हैं
वक्ता कहते हैं कि सामान्य विधि से चलें, तो यहाँ अलग से कुछ नहीं करना पड़ता। पूजा स्थान पर आप जो पूजा करते हैं, जो हवन करते हैं — साल का या जब भी — उसी से आपको सब चीज़ें मिलती रहेंगी; वह जगह जाग्रत, चैतन्य और सुरक्षित रहेगी, और नकारात्मक शक्तियाँ वहाँ से बाहर रहेंगी।
वे कहते हैं, पर अगर हम सामान्य विधि में जाएँ, तो यहाँ अलग से कुछ नहीं करना पड़ता। पूजन स्थान पर आप जो पूजा करते हैं, जो हवन करते हैं — साल का, या जब भी — उसी से आपको सब चीज़ें मिलती रहेंगी। वह जगह जाग्रत रहेगी, चैतन्य रहेगी, सुरक्षित रहेगी। नकारात्मक शक्तियाँ वहाँ से भगाई हुई रहेंगी।
किन शक्तियों में क्षेत्रपाल निकारी की ज़रूरत ही नहीं?
पंचमुखी हनुमान और मर्कटेश्वर हनुमान
वक्ता कहते हैं कि कुछ शक्तियाँ भी लगाई जाती हैं — जैसे पंचमुखी हनुमान जी या मर्कटेश्वर हनुमान जी — और उनकी प्रयोग विधि में क्षेत्रपाल निकारी न भी हो, तो उसकी ज़रूरत नहीं। क्योंकि जब भी मर्कटेश्वर तंत्र या उनसे जुड़ा कुछ लगाया जाता है, तो जो भी प्रेत और पैशाचिक बाधा है, वह उनके असर से या तो तुरंत हट जाएगी, या उसे दबकर रहना पड़ेगा।
वे कहते हैं, और ऐसा भी है कि कुछ शक्तियाँ लगाई जाती हैं — जैसे पंचमुखी हनुमान जी, या मर्कटेश्वर हनुमान जी लगाए जाएँ। उनकी प्रयोग विधि में क्षेत्रपाल निकारी न भी हो, तो उसकी ज़रूरत भी नहीं है। क्योंकि जब भी मर्कटेश्वर तंत्र, या उनसे जुड़ा कुछ भी लगाया जाता है, तो जो भी प्रेत और पैशाचिक बाधा है, वह उनके असर से या तो तुरंत हट जाएगी; और न हटी तो उसे दबकर रहना पड़ेगा — और कब तक, हमेशा? दबकर रहना किसी को पसंद नहीं।
जब दूसरी जगह खाली पड़ी हो, तो कोई — मनुष्य हो या प्रेत — दबकर रहना नहीं चुनता
कोई भी, मनुष्य हो या प्रेत, दबकर रहना नहीं चुनता
वक्ता कहते हैं कि मनुष्य हो, प्रेत हो या पिशाच, वे चले जाना पसंद करेंगे — भाई, और जगह खाली पड़ी है, वहाँ कोई परेशानी नहीं। जहाँ किसी जगह पहले से कुछ मौजूद हो, उसे हटाने के लिए आपको ये सब विधियाँ लगानी पड़ती हैं।
वे कहते हैं, कोई मनुष्य हो, या प्रेत या पिशाच, वे हट जाना पसंद करेंगे — भाई, और जगह खाली पड़ी है, वहाँ कोई परेशानी नहीं। जहाँ किसी जगह पहले से कुछ मौजूद है, उसे हटाने के लिए आपको ये सब विधियाँ लगानी पड़ती हैं।
क्या अपने इष्ट के कवच मंत्रों से घर की रक्षा हो सकती है?
भगवती, काली, दुर्गा या किसी महाविद्या का जाग्रत कवच
वक्ता कहते हैं कि अगर आपकी इष्ट-आराध्य माँ भगवती हैं, या काली जी, या दुर्गा जी, या आप दस महाविद्याओं में से किसी की उपासना करते हैं, तो जब आपने उनसे जुड़े कवच मंत्र जाग्रत कर लिए हों, तो उस कवच से घर की भी रक्षा होती है।
क्या ऐसे मंत्र लगाने से साधक की अपनी ऊर्जा घटती है?
रक्षा का मंत्र लगाने से ऊर्जा नहीं घटती
वक्ता कहते हैं कि यह सोचना कि ऐसा कोई मंत्र लगाने से हमारी ऊर्जा में कमी आएगी — ऐसा नहीं होता। इस बात का भी ध्यान रखें।
वे कहते हैं, और यह सोचना कि हम ऐसा कोई मंत्र लगा रहे हैं, इसलिए हमारी ऊर्जा में कमी आएगी — या ऐसा कुछ — इस तरह नहीं होता। ठीक है, इसका भी ध्यान रखें।
जिस धातु को अभिमंत्रित करते हैं, वह क्यों मायने रखती है?
धारण क्षमता — कोई पदार्थ कितना धारण कर सकता है
वक्ता कहते हैं कि यह विषय बताना ज़रूरी है, क्योंकि जब हम कोई ऊर्जा लगाते हैं, मंत्र ऊर्जा बनाते हैं, तो सबसे बड़ी बात यह है कि आप कौन-सी धातु अभिमंत्रित कर रहे हैं, कौन-सी वस्तु अभिमंत्रित कर रहे हैं — ताकि समझ आए कि उसकी धारण क्षमता कितनी है।
वे कहते हैं, यह विषय बताना ज़रूरी है, क्योंकि जब हम कोई ऊर्जा लगाते हैं, जब मंत्र ऊर्जा बनाते हैं — तो सबसे बड़ी बात यह है कि आप कौन-सी धातु अभिमंत्रित कर रहे हैं, हम कौन-सी वस्तु अभिमंत्रित कर रहे हैं, ताकि उसकी धारण क्षमता, वह कितना धारण कर सकती है, यह समझ आ सके।
बंधन में लगाया यंत्र कितने समय तक जाग्रत रहता है?
यंत्र अपने आप में चैतन्य
वक्ता कहते हैं कि अगर हम बंधन के समय यंत्र लगाते हैं, तो वह चीज़ लंबे समय तक बँधी और जाग्रत रहती है — क्योंकि यंत्र अपने आप में चैतन्य होते हैं और यंत्र में कई तरह की ऊर्जाएँ और शक्तियाँ होंगी, तो वहाँ आपको कोई ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।
वे कहते हैं, अगर हम बंधन आदि के समय यंत्र लगाते हैं, तो लंबे समय तक वह चीज़ बँधी रहती है और जाग्रत रहती है। क्योंकि यंत्र अपने आप में चैतन्य होगा; यंत्र में कई तरह की ऊर्जाएँ और शक्तियाँ होंगी, तो वहाँ आपको ज़रूरत भी महसूस नहीं होगी।
अभिमंत्रित कील कितने समय तक असरदार रहती है?
बारह वर्ष, फिर बलि याग या नया बंधन
वक्ता कहते हैं कि अगर आप कील अभिमंत्रित करें, तो मानिए कि वह बारह वर्ष तक चैतन्य अवस्था में रहेगी, सूतक-पातक लेने के बाद भी। बारह वर्ष बाद, जो इष्ट शक्तियाँ लगाई गई थीं, उनसे जुड़ा बलि याग आदि अपनी सामर्थ्य भर करें ताकि वह फिर जाग्रत हो; या बारह वर्ष बाद जगह को फिर से बाँधें।
वे कहते हैं, पर अगर आप कोई कील अभिमंत्रित करते हैं, तो मानिए कि वह बारह वर्ष तक चैतन्य अवस्था में रहेगी, सूतक-पातक लेने के बाद भी। बारह वर्ष बाद, जो भी इष्ट शक्तियाँ लगाई गई हैं, उनसे जुड़ा बलि याग आदि वहाँ अपनी सामर्थ्य भर करना चाहिए, ताकि वह फिर जाग्रत हो। या बारह वर्ष बाद जगह को फिर से बाँधना चाहिए। वे कहते हैं, इस तरह ये प्रयोग करने चाहिए।
बंधन के बाद उल्लंघन क्या होता है?
अभक्ष्य पदार्थ लेकर चौखट लाँघना
वक्ता उल्लंघन को चौखट लाँघना बताते हैं, जिसकी बात बार-बार होती है: शत्रु जानबूझकर कोई नकारात्मक चीज़, कोई अभक्ष्य पदार्थ लेकर आपकी चौखट लाँघ जाए, तो इससे सब चीज़ें अशुद्ध हो जाती हैं; या घर में रक्त आदि फेंक दिया जाए।
वे कहते हैं, बंधन करने के बाद अगर फिर किसी तरह का उल्लंघन हो जाए — उल्लंघन का मतलब क्या है? चौखट लाँघना, जिसकी बात बार-बार होती है। अगर कोई शत्रु ऐसी कोई नकारात्मक चीज़ लेकर, जानबूझकर कोई अभक्ष्य पदार्थ लेकर आपकी चौखट लाँघ जाए, तो इससे सब चीज़ें अशुद्ध हो जाती हैं। अगर वह घर में रक्त आदि फेंक दे — उससे अशुद्धि आएगी।
क्या उल्लंघन से बंधन हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है?
कुछ समय की रुकावट, सफ़ाई और पंचगव्य से दूर
नहीं — वक्ता कहते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि ये चीज़ें सौ प्रतिशत पूरी तरह खत्म हो जाएँगी। यह केवल कुछ समय के लिए लगी रुकावट है। जैसे ही वे चीज़ें साफ़ हों और आप फिर घर में पंचगव्य और पंचामृत छिड़कें, वह चीज़ अपनी अवस्था में लौटकर फिर जाग्रत हो जाती है।
वे कहते हैं, उससे अशुद्धि आएगी, पर इसका मतलब यह नहीं कि ये चीज़ें सौ प्रतिशत पूरी तरह खत्म हो जाएँगी। यह केवल कुछ समय के लिए लगा बंधन है। जैसे ही वे चीज़ें साफ़ हो गईं, और आपने फिर घर में पंचगव्य, पंचामृत आदि छिड़क दिया, यह चीज़ फिर अपनी अवस्था पा लेती है और जाग्रत हो जाती है।
अगर शत्रु घर के अंदर बैठकर प्रयोग करे तो?
कमरे के अंदर छिपाई, रखी या गाड़ी गई सामग्री
वक्ता कहते हैं कि अगर शत्रु घर के अंदर बैठकर कोई प्रयोग करे — और आपको पता भी न हो कि यह आदमी आपका शत्रु है; वह आपके घर आया, रात को सोया, उस कमरे में बैठकर कोई गतिविधि की, चीज़ें कीलीं, वहाँ कोई सामग्री छिपाई, रखी या गाड़ दी — तो यह आपके लिए परेशानी की बात बन जाती है। वे कहते हैं, वह अलग विषय है।
वे कहते हैं, पर अगर शत्रु ने घर में बैठकर किसी तरह का प्रयोग किया — अब आपको पता भी नहीं कि यह आदमी आपका शत्रु है; वह आपके घर आया, रात को सोया, और अब उस कमरे में बैठकर उसने कोई गतिविधि की, चीज़ें कीलीं। वहाँ कोई सामग्री छिपा दी, रख दी, या गाड़ दी। तो यह आपके लिए परेशानी की बात बन जाती है। वह अलग विषय हो गया।
शत्रु घर के बाहर से ही क्या कर सकता है?
श्मशान भस्म, अभिमंत्रित मांस और हड्डी फेंकना
वक्ता कहते हैं कि दूर से या घर के बाहर से शत्रु की क्षमता की एक तय सीमा है: वह केवल फेंका-फाँकी कर सकता है — श्मशान भस्म आदि फेंक सकता है, अभिमंत्रित मांस फेंक सकता है, हड्डी फेंक सकता है। लोग बस इतना ही करते हैं।
वे कहते हैं, दूर से, या घर के बाहर से, उसकी क्षमता तय है। वह केवल फेंका-फाँकी कर सकता है; श्मशान भस्म आदि फेंक सकता है, अभिमंत्रित मांस आदि फेंक सकता है, हड्डी फेंक सकता है। लोग बस इतना ही करते हैं। इन सबसे आपको परेशानी ज़रूर होगी, इसमें कोई शक नहीं, क्योंकि वहाँ उल्लंघन हो रहा है। पर जैसे ही आप ये चीज़ें हटाएँगे, आपने जो भी बंधन शक्तियाँ लगाई हैं, वे फिर अपना असर जमा लेंगी।
वह कल्प क्या है जो शत्रु का प्रयोग उसी पर लौटा देता है?
पलटना — और इसे बहुत कम क्यों लगाना चाहिए
वक्ता कहते हैं कि अक्सर ऐसा कल्प लगाया जाता है कि शत्रु जैसे ही ऐसी कोई गतिविधि करें, वह उन्हीं पर पलट जाए। पर इसमें एक नुकसान है: चीज़ें दोनों तरफ़ से पलटती हैं, इसलिए इसे बहुत कम लगाना चाहिए। जैसे ही यह पलटे, अगर आपके शत्रु ने फिर कुछ किया, तो आपके पास भी उसे रोकने का कोई उपाय नहीं रहेगा।
वे कहते हैं, अब इनमें भी बहुत बार ऐसा कल्प लगाया जाता है कि शत्रु जैसे ही ऐसी कोई गतिविधि करें, वह पलट जाए। पर फिर भी इसमें एक नुकसान यह है: चीज़ें दोनों तरफ़ से पलटती हैं, इसलिए इसे बहुत कम लगाना चाहिए। जैसे ही यह पलटे, अगर आपके शत्रु ने फिर कुछ किया है, तो आपके पास भी उसे रोकने का कोई उपाय नहीं रहेगा। अगर आप घर के अंदर हैं तो शायद बच जाएँ; अगर बाहर हैं, तो आपकी वही चीज़, जो आपने चलाई थी, आकर आपको ही लगती है।
ऐसे पलटने वाले प्रयोग किसे करने चाहिए?
साधक वर्ग, जिन्हें साधना में बैठे हुए कुछ पल चाहिए
वक्ता कहते हैं कि ऐसे प्रयोग या तो साधक वर्ग करता है, जिन्हें जानकारी है — मान लीजिए वे साधना में बैठे हैं और कोई शत्रु घर आकर प्रक्षेपण या अभिचार कर दे, दूर वाली बात छोड़ दें। ऐसी हालत में इस तरह के प्रयोगों से बंधन किया जाता है ताकि उन्हें कुछ समय मिल जाए।
वे कहते हैं, इसलिए ऐसे प्रयोग या तो ऐसा साधक वर्ग करता है जिसे जानकारी है। मान लीजिए वे साधना में बैठे हैं, और किसी शत्रु ने घर आकर ऐसा कोई प्रक्षेपण, कोई अभिचार कर दिया — दूर वाली बात छोड़ दीजिए। तो ऐसी हालत में, ताकि उन्हें कुछ समय मिल जाए, इस तरह के प्रयोगों से बंधन किया जाता है।
मुख्य रूप से भगवती के महासिंह का प्रयोग होता है — उनके सीधे मंत्र और उनके पंजों के मंत्रों के साथ
भगवती के महासिंह, और पंजों का मंत्र
वक्ता कहते हैं कि इनमें मुख्य रूप से भगवती के महासिंह का प्रयोग होता है। महासिंह के दो मंत्र हैं: एक उनका सीधा मंत्र, और दूसरे उनके पंजों से जुड़े मंत्र, जिनमें बीज का संपुट किया जाता है — रक्षण बीज का और अग्नि बीज का।
वे कहते हैं, इनमें मुख्य रूप से भगवती के महासिंह को लगाया जाता है। महासिंह का मंत्र — महासिंह के दो मंत्र हैं। एक उनका सीधा मंत्र है; दूसरे उनके पंजों से जुड़े मंत्र हैं। जिनमें बीज का, रक्षण बीज का, अग्नि बीज का संपुट किया जाता है।
आठ दिक्पालों के बीज मंत्र कौन-से हैं?
इंद्र का लं, अग्नि का रं, यमराज का यं, नैऋत्य का क्षं
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्मा और अनंत को छोड़ दें, तो पूरी पृथ्वी पर मुख्य रूप से आठ दिक्पाल हैं। उनके भी बीज मंत्र हैं — भगवान इंद्र का बीज मंत्र लं है, अग्नि देवता का रं, फिर यमराज का यं, और नैऋत्य का क्षं।
वे कहते हैं, और आठ दिक्पाल — मुख्य रूप से, अगर ब्रह्मा और अनंत को अलग रखें, तो हमारी पूरी पृथ्वी पर मुख्य रूप से आठ दिग्पाल हैं। उनके बीज मंत्र भी, जैसे भगवान इंद्र का बीज मंत्र लं है, अग्नि देवता का रं, फिर यमराज का यं, नैऋत्य का क्षं। तो अगर ऐसे अस्त्र मंत्रों का उनके बीज मंत्रों के साथ भी संपुट करके कोई वस्तु जाग्रत और चैतन्य की जाए, तो वह भी बहुत तीव्र असर देती है।
दिक्पालों और उनके अस्त्रों की पूजा और कहाँ होती है?
आवरण पूजन — इंद्र का वज्र और कुबेर की गदा
वक्ता कहते हैं कि जैसे हम आवरण पूजन आदि में भगवान इंद्र के वज्र की पूजा करते हैं और भगवान इंद्र की भी, कुबेर जी की गदा की पूजा होती है और कुबेर जी की भी — उसी तरह, जिस दिशा में जो अस्त्र रख रहे हैं, उस पर लगाई शक्ति और उस दिशा के दिक्पाल से जुड़े बीज मंत्रों का संपुट करें, तो वह बहुत तीव्र असर देता है।
जैसे हम आवरण पूजा आदि में भगवान इंद्र के वज्र की भी पूजा करते हैं, और भगवान इंद्र की भी पूजा करते हैं; जैसे कुबेर जी की गदा की भी पूजा होती है, और कुबेर जी की भी पूजा होती है — ठीक उसी तरह, आपकी जिस भी दिशा में हम जो भी अस्त्र रख रहे हैं, उस पर जो भी शक्ति लगा रहे हैं, अगर उस शक्ति और उस दिशा के दिक्पाल से जुड़े बीज मंत्रों से संपुट किया जाए, तो वह बहुत तीव्र असर देने वाला बन जाता है।
ऐसे अस्त्र मन्त्रों का प्रभाव महाविद्या के प्रयोग से कैसा है?
सप्रयुक्त महाविद्या जितना प्रभाव देने वाले अस्त्र मन्त्र
वे कहते हैं कि ऐसे में सप्रयुक्त महाविद्या से जैसा प्रभाव मिलता है, वैसा ही प्रभाव इस तरह के अस्त्र मन्त्रों से भी मिलता है। महाविद्या में प्रभाव बहुत ज़बरदस्त होता है, और इसमें भी बहुत ज़बरदस्त होता है।
यानी, वे कहते हैं, ऐसे में सप्रयुक्त महाविद्या से जैसा प्रभाव मिलता है, वैसा ही प्रभाव इस तरह के अस्त्र मन्त्रों से भी मिलता है। महाविद्या में भी प्रभाव बहुत ज़बरदस्त होता है, और इसमें भी बहुत ज़बरदस्त होता है।
जिस घर में पुरखों का हत्या दोष हो, वहाँ बन्धन क्यों नहीं टिकता?
पका हुआ पाप कर्म, जिसे भोगना ही है
वे कहते हैं कि अगर आपके घर में ऐसा कोई व्यक्ति रहा हो, या पहले के समय में ऐसी घटना हुई हो — परिवार के किसी पूर्वज से कोई हत्या, उस तरह का कोई दोष लगा हो, या आपके ही घर के लोगों ने तन्त्र-मन्त्र करके दूसरों के प्राण लिए हों — तो जब आप बन्धन करें, साफ़ जान लें कि अगर आपका पाप कर्म ऐसा उदय हुआ है कि उसे भोगना ही है, तो वहाँ छोटी-छोटी गलतियाँ ढूँढी जाएँगी।
इन सबके अलावा, वे कहते हैं, अगर आपके घर में कोई ऐसा व्यक्ति है, या पहले के समय में ऐसी घटना हुई — घर के किसी पूर्वज से कोई हत्या; इस तरह का कोई दोष लगा; या तन्त्र-मन्त्र करने वाले आपके ही घर के थे और उन्होंने दूसरों के प्राण लिए, उनकी मृत्यु करवाई — तो जब आप बन्धन आदि करें, तो वहाँ यह मत सोचिए; यह साफ़ जान लीजिए। अगर आपने पाप किया है, अगर आपका पाप कर्म ऐसा उदय हुआ है कि उसे भोगना ही है, तो वहाँ छोटी-छोटी गलतियाँ देखी जाएँगी। गृह बन्धन हो जाएगा, पर जहाँ भी कोई गलती हुई, जहाँ कोई गड़बड़ी हुई, जहाँ दोष लगा, वहाँ तुरन्त नकारात्मक शक्तियाँ घुस जाती हैं। इसी कारण कई जगह यह प्रभाव नहीं देता, वे कहते हैं, और लोग कहते हैं कि बन्धन तो करवाया पर प्रयोग प्रभाव नहीं दे रहा।
बन्धन प्रभाव देगा या नहीं, यह असल में किस पर निर्भर है?
करने वाले साधक की प्राण ऊर्जा और चैतन्यता
वे पूछते हैं: जिस साधक से आप घर का बन्धन करवा रहे हैं, उसकी प्राण ऊर्जा कैसी है? उसने कितनी चैतन्यता से उन मन्त्रों का जप किया, सिद्धि पाई, और उसका हाथ कैसा बना है? तब वह आकर कुछ करता है, या आपको कुछ रखने को देता है, तो उसका प्रभाव बहुत समय तक रहता है — जब तक आप उस व्यक्ति का अपमान नहीं करते।
यह प्रभाव कैसे देता है, वे पूछते हैं। जिस साधक से आप घर का बन्धन करवा रहे हैं, उसकी प्राण ऊर्जा कैसी है? उसने कितनी चैतन्यता से उन मन्त्रों का जप किया है, सिद्धि पाई है, उसका हाथ कैसा बना है? तब वह आकर कुछ करके जाता है, या आपको कुछ रखने को देता है, तो उसका प्रभाव बहुत समय तक रहता है — जब तक आप उस व्यक्ति का अपमान नहीं करते।
जिस साधक ने बन्धन किया, उसका अपमान करने से क्या होता है?
चौबीस लाख पुरश्चरण वाला गायत्री साधक, और टूटा हुआ मन
वे उदाहरण देते हैं कि किसी बहुत बड़े गायत्री साधक से, जिसने चौबीस लाख का पुरश्चरण किया है, अष्ट गायत्री और अष्ट मातृका के सम्पुट के साथ दिग्बन्धन करवाया, और बन्धन बहुत अच्छा हुआ। अगर बाद में आपके पाप उदय हों, कहा-सुनी हो जाए, आप उन्हें कुछ गलत कह दें और उनके मन को बुरा लगे, तो उन्होंने अपने तपोबल से वहाँ जो प्राण ऊर्जा जगाई थी, वह कहीं टूटेगी। उसका प्रभाव हल्का हो जाएगा — ऐसा नहीं कि खत्म हो जाएगा, पर धीरे-धीरे घटेगा।
मान लीजिए, वे कहते हैं, किसी बहुत बड़े गायत्री साधक से, जिसने चौबीस लाख का पुरश्चरण किया है, आपने दिग्बंधन आदि करवाया, अष्ट गायत्री मंत्र और अष्ट मातृका के सम्पुट के साथ, और बहुत अच्छा बन्धन हुआ। समय बीतने पर आपके पाप उदय हुए; किसी कारण से उनसे कहा-सुनी हो गई; आपने उन्हें कुछ गलत कहा और उनके मन को बुरा लगा। अब अगर उनके मन को ठेस पहुँची है, तो वहाँ जो प्राण ऊर्जा है — जो उन्होंने ज़रूर अपने तपोबल से जगाई है — वह कहीं टूटेगी। उसका प्रभाव हल्का हो जाएगा। ऐसा नहीं कि खत्म हो जाएगा, पर धीरे-धीरे घटेगा, क्योंकि वहाँ उनके तपोबल की शक्ति ही मौजूद थी।
पौधे खुश संगीत से खिलते हैं और नकारात्मक बातों से सूखते हैं
खुश संगीत से खिलने वाले और नकारात्मक बातों से सूखने वाले पौधे
वे कहते हैं कि यह बात आप सबने आधुनिक विज्ञान के अनुसार देखी है और पढ़ी होगी: पौधों के पास खुश संगीत बजाया जाए तो वे बहुत अच्छे से खिलते हैं, और कुछ नकारात्मक कहा जाए तो वे सूख जाते हैं। इसी तरह जो उतारा हम करते हैं, और लोग पेड़-पौधों पर जो मन्नतें बाँधते हैं — पेड़-पौधे भी सूख जाते हैं, यानी कहीं न कहीं वे हमारी ऊर्जा ले जाते हैं।
यह बात, वे कहते हैं, आप सबने आधुनिक विज्ञान के अनुसार देखी है, और पढ़ी होगी: पौधों के पास संगीत बजाया जाए, बहुत खुशनुमा संगीत, तो वे बहुत अच्छे से खिलते हैं; और कोई नकारात्मक बात की जाए तो वे सूख जाते हैं। इसी तरह जो उतारा हम भी करते हैं। लोग जो मन्नतें माँगकर किसी पेड़ या पौधे पर बाँधते हैं, उन्हें देखिए — पेड़-पौधे भी सूख जाते हैं, यानी कहीं न कहीं वे हमारी ऊर्जा ले जाते हैं। ठीक इसी तरह, जब बन्धन आदि होता है, तो उस समय हमारी ऊर्जा कैसी है, इस पर भी निर्भर करता है। जितनी चैतन्यता होगी, उतनी ही चैतन्यता वहाँ रहेगी।
पुरश्चरण के साथ किए बन्धन पर क्या साधक की बाद की स्थिति का असर पड़ता है?
ठीक से पुरश्चरित प्रयोग बाद की स्थिति से स्वतन्त्र रहता है
वे कहते हैं कि जैसे ही आप नकारात्मक होते हैं, या खुद को गिराने का प्रयास करते हैं, उसकी ऊर्जा भी गिर जाएगी। पर अगर बन्धन करते समय आप सचेत थे, बहुत सकारात्मक थे, और उन मन्त्रों का ठीक से पुरश्चरण करके प्रयोग किया था, तो बाद में आपकी स्थिति क्या होती है, इससे उसका कोई लेना-देना नहीं — बस उस समय सब ठीक होना चाहिए था। बिना पुरश्चरण के, उसका प्रभाव वैसा ही होगा जैसी आपकी अपनी स्थिति है।
जैसे ही आप नकारात्मक होते हैं, वे कहते हैं, या खुद को गिराने का प्रयास करते हैं, तब उसकी ऊर्जा भी गिर जाएगी। पर अगर बन्धन करते समय आप चेतना से भरे थे, बहुत सकारात्मक रहे, और उन मन्त्रों का ठीक से पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करके फिर यह प्रयोग किया — तो बाद में आपकी स्थिति क्या होगी, इससे उसका कोई लेना-देना नहीं। उस समय बिल्कुल ठीक होना चाहिए था। पर अगर आप बिना पुरश्चरण आदि के करते हैं, तो जैसी आपकी स्थिति है, वैसा ही उसका प्रभाव होगा। इन सब बातों को ध्यान में रखकर, वे कहते हैं, फिर गृह बन्धन जैसे काम करने चाहिए।
गृह बन्धन न हुआ हो और लोग परेशान हों तो क्या करें?
हनुमान चालीसा पाठ के साथ नियमित तन्त्रोक्त धूनी — धूम बन्धन
वे कहते हैं कि अगर गृह बन्धन नहीं हुआ है और घर के लोग परेशान हैं — जैसे गला दबाया जा रहा हो, जैसे कुछ चलता हुआ महसूस हो — तो वह न करके भी, अगर घर में कम से कम मन्त्र पाठ करते हुए, जैसे हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए, सही सामग्री के साथ नियमित तन्त्रोक्त धूनी दी जाए, तो इससे भी बन्धन होता है। इसे धूम बन्धन कहते हैं।
और अगर गृह बन्धन नहीं हुआ है, वे कहते हैं, और घर के लोग परेशान हो रहे हैं — जैसे गला दबाया जा रहा हो, जैसे कुछ चलता हुआ महसूस होता हो — तो वह आप न भी करें, पर अगर घर में कम से कम नियमित रूप से मन्त्र पाठ करते हुए, जैसे हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए, धूनी आदि, तन्त्रोक्त धूनी दी जाए — और धूनी में कौन-सी सामग्री लेनी चाहिए, यह सब भी आप करें — तो इससे भी बन्धन होता है। इसे ही धूम बन्धन कहते हैं।
धूम बन्धन में कौन-सा बीज लगता है?
वायु देवता का बीज
वे कहते हैं कि इसमें हम बीज मन्त्रों में मुख्य रूप से वायु देवता का बीज मन्त्र लगाते हैं, जो यं है; अगर हम उनसे जुड़ा बीज लगाएँ, तो यह चीज़ भी प्रभावी होती है।
इसमें, वे कहते हैं, मुख्य रूप से बीज मन्त्रों में वायु देवता का बीज मन्त्र भी यं है। अगर हम उनसे जुड़ा बीज लगाएँ, तो यह चीज़ भी प्रभावी हो जाती है।
गृह बन्धन के लिए अर्क प्रयोग क्या है?
नींबू, आकवन और हरी अपामार्ग लकड़ी का रस
या, वे कहते हैं, अर्क यानी रस का प्रयोग — जैसे नींबू, या आकवन, या अपामार्ग की लकड़ी की टहनी जो अभी काफ़ी गीली हो, यानी सूखी न हो। इन सबको निचोड़ने पर इनसे अर्क निकलता है; उन अर्कों को भी अभिमन्त्रित किया जाता है, और उनसे हम गृह बन्धन करते हैं — पर इसके लिए चारों दिशाएँ, आपका पूरा घर, खुला होना ज़रूरी है।
या, वे कहते हैं, अर्क का प्रयोग — अर्क यानी रस। जैसे नींबू है, वैसे आकवन है; या अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी, टहनी जो अभी काफ़ी गीली हो, यानी सूखी न हो। इन सबको निचोड़ने पर इनसे अर्क निकलता है। उन अर्कों को भी अभिमन्त्रित किया जाता है, और उनसे भी हम गृह बन्धन करते हैं; पर उसमें, गृह बन्धन के लिए, चारों दिशाएँ, आपका पूरा घर खुला होना ज़रूरी है।
अर्क वाला दिग्बन्धन कितने समय तक चलता है?
सवा महीना तेज़ प्रभाव, कुल तीन पक्ष
वे कहते हैं कि जब हम इससे दिग्बन्धन करते हैं, तो यह दिग्बन्धन लम्बे समय के लिए नहीं होता, पर मान लीजिए कम से कम सवा महीना इसका प्रभाव बहुत तीव्रता में रहता है। सवा महीना प्रभाव बना रहता है; सवा महीने के पैंतालीस दिन बाद प्रभाव धीरे-धीरे घटता है; यह तीन पक्ष तक काम करता है। इसका उपयोग खास तौर पर तब होता है जब कोई खास काम चल रहा हो और बन्धन का प्रभाव बार-बार घटता जा रहा हो।
और जब हम इससे दिग्बन्धन आदि करते हैं, वे कहते हैं, तो यह दिग्बन्धन लम्बे समय के लिए नहीं होता — पर मान लीजिए फिर भी कम से कम सवा महीना इसका प्रभाव बहुत तीव्रता में रहता है। सवा महीना इसका प्रभाव बना रहता है; सवा महीने में, पैंतालीस दिन के बाद, फिर प्रभाव धीरे-धीरे घटता है। यह तीन पक्ष तक काम करता है। इसका उपयोग खास तौर पर तब किया जाता है जब कोई ऐसा खास काम चल रहा हो और बन्धन का प्रभाव बार-बार कम होता जा रहा हो।
अर्क प्रयोग ऐसे काम क्यों करता है?
गन्ध के ज़रिए ज़मीन के नीचे और हवा में तीन तत्त्वों की उपस्थिति
क्योंकि जब भी अर्क का प्रयोग होता है, वे कहते हैं, वहाँ तीन तरह के तत्त्व ऐसे ही उपस्थित हो जाते हैं: गन्ध सबसे तीव्र हो जाती है, और गन्ध के कारण ज़मीन के नीचे और हवा में भी, लगाए गए शक्ति तत्त्वों की उपस्थिति बन जाती है।
क्योंकि जब भी अर्क का प्रयोग होता है, वे कहते हैं, वहाँ तीन तरह के तत्त्व ऐसे ही उपस्थित हो जाते हैं। गन्ध आदि सबसे तीव्र हो जाती है, और गन्ध के कारण ज़मीन के नीचे और हवा में भी, जो भी शक्ति तत्त्व लगाए गए हैं, उनकी उपस्थिति बन जाती है।
गन्ध से रक्षण, वशीकरण, आकर्षण और मारण भी होते हैं
गन्ध के ज़रिए रक्षण, वशीकरण, आकर्षण और मारण
वे कहते हैं कि कुछ मन्त्र ऐसे हैं जिनमें ये सब चीज़ें लगाने पर वे बहुत शक्तिशाली हो जाते हैं। गन्ध के माध्यम से विचार की बहुत-सी क्रियाएँ होती हैं: रक्षण के लिए, किसी का वशीकरण करने के लिए, आकर्षण के लिए, और मारण आदि में भी इसका प्रयोग होता है; किसी दिव्य शक्ति को आकर्षित करने के लिए भी, और ठीक इसी तरह रक्षण के लिए भी।
और कुछ मन्त्र ऐसे हैं, वे कहते हैं, जिनमें ये सब चीज़ें लगाने पर वे बहुत शक्तिशाली हो जाते हैं। गन्ध के माध्यम से विचार की बहुत-सी क्रियाएँ होती हैं। ये रक्षण के लिए भी हैं; किसी का वशीकरण करने के लिए भी हैं; आकर्षण के लिए भी हैं; मारण प्रयोग आदि में भी इनका प्रयोग होता है। किसी दिव्य शक्ति को आकर्षित करने के लिए भी, और ठीक इसी तरह रक्षण के लिए भी, ये सब चीज़ें लगाई जाती हैं। तो सबके अपने-अपने तरीके हैं; इन सब तरीकों से, वे कहते हैं, गृह बन्धन और दिग्बन्धन करना चाहिए।
क्या तीसरी आँख खोलने का कोई मन्त्र है?
मन्त्र से नहीं, मन्त्र के देवता की कृपा से
तीसरी आँख खोलने का कोई मन्त्र है या नहीं, इस पर वे कहते हैं कि जब तक आपकी ऊर्जा सही स्थिति में न हो, तीसरी आँख खोलने का कोई मन्त्र नहीं है। मन्त्र से नहीं — जब मन्त्र के देवता कृपा करते हैं, तब उनकी आँखें आपको मिलती हैं।
प्रश्न सत्र शुरू करते हुए वे सबको जय माँ विन्ध्यवासिनी कहते हैं, और एक श्रोता के पूछने पर कि क्या वे निर्मल या उदासीन साधु हैं, उत्तर देते हैं: नहीं। तीसरी आँख खोलने का भी कोई मन्त्र है क्या, इस पर वे कहते हैं कि जब तक आपकी ऊर्जा ठीक स्थिति में न हो, तीसरी आँख खोलने का कोई मन्त्र नहीं है। मन्त्र से नहीं, वे कहते हैं। जब किसी मन्त्र के देवता कृपा करते हैं, तब उनकी आँखें आपको मिलती हैं।
क्या 5 मई के चन्द्र ग्रहण पर रुद्रखण्ड साधना कर सकते हैं?
भारत में न दिखने वाला ग्रहण
5 मई के चन्द्र ग्रहण के बारे में वे कहते हैं कि यह भारत में नहीं दिखेगा, और रुद्रखण्ड साधना बिल्कुल की जा सकती है — रुद्रखण्ड के लिए यह बहुत अच्छा समय है।
5 मई के चन्द्र ग्रहण पर वे कहते हैं कि यह भारत में नहीं दिखेगा। रुद्रखण्ड साधना बिल्कुल की जा सकती है। रुद्रखण्ड के लिए यह बहुत अच्छा समय है।
खाने में बार-बार बाल आएँ तो इसका क्या अर्थ है?
घर में जल्दी शुभ अनुष्ठान करवाने का संकेत
खाने में बाल आने के बारे में वे कहते हैं कि जितनी जल्दी हो सके घर में शुभ और मांगलिक काम, अनुष्ठान आदि करें या करवाएँ, ताकि यह समस्या जल्दी दूर हो।
अगर आपके खाने में बाल आ रहे हैं, वे कहते हैं, तो जितनी जल्दी हो सके घर में शुभ और मांगलिक काम, अनुष्ठान आदि करें या करवाएँ, ताकि यह समस्या जल्दी दूर हो।
सूतक में क्या पाठ कर सकते हैं?
कवच और स्तोत्र का मानसिक पाठ, और गीता
वे कहते हैं कि सूतक में कवच और स्तोत्र का मानसिक पाठ कर सकते हैं। गीता आदि का पाठ करें।
सूतक में, वे कहते हैं, आप कवच और स्तोत्र का मानसिक पाठ कर सकते हैं। गीता आदि का पाठ करें। वे जलेश्वर जी को धन्यवाद देते हैं।
घर में बड़ी मूर्ति क्यों नहीं रखनी चाहिए?
शास्त्रों में बताई छह इंच की सीमा
वे कहते हैं कि घर में बड़ी मूर्ति न रखने के पीछे शास्त्रोक्त कारण है: हमारे शास्त्र, जो बताते हैं कि घर में कैसा शिव विग्रह रखें और कितना बड़ा, कहते हैं कि वह छह इंच से बड़ा न हो। घर में बड़े विग्रह रखने पर बाद में दोष बताया गया है — प्राणघात और वंश वृद्धि रुकने की सम्भावना, और कठिनाई हो सकती है।
घर में बड़ी मूर्ति न रखने के पीछे शास्त्रोक्त कारण है, वे कहते हैं। हमारे शास्त्र, जो यह निर्देश देते हैं कि घर में कैसा शिव विग्रह रखें और कितना बड़ा, कहते हैं कि वह छह इंच से बड़ा न रखें — घर में बड़े विग्रह। बड़ा विग्रह रखने से, उसके बाद उसमें दोष बताया गया है: प्राणघात आदि की, वंश की वृद्धि रुकने की सम्भावना होती है; कठिनाई हो सकती है।
क्या यूट्यूब से मन्त्र और सप्तशती सीखने में दोष है?
उनकी अपनी राय, राय के रूप में ही कही गई
वे कहते हैं कि श्रोता मोबाइल पर सुनकर सीख सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं। साफ़ बताते हुए कि यह उनकी अपनी राय है, जिससे श्रोता असहमत भी हो सकते हैं, वे कहते हैं कि आपमें से जो साधक भगवती के मन्त्र सीख रहे हैं, या यूट्यूब पर सुनकर दुर्गा सप्तशती का पाठ सीख रहे हैं, उसमें कोई दोष नहीं।
हाँ, वे कहते हैं, मोबाइल पर सुनकर सीखिए, कोई दिक्कत नहीं। वे एक बात साफ़ कहना चाहते हैं: यह उनकी अपनी राय है, आप इससे असहमत भी हो सकते हैं, पर यह उनकी अपनी निजी राय है जो वे सबको बता रहे हैं। आपमें से जो साधक भगवती के मन्त्र सीखते हैं, यूट्यूब पर सुनकर दुर्गा सप्तशती आदि का पाठ सीख रहे हैं — उसमें कोई दोष नहीं।
संस्कृति बचानी है, इसलिए सीखिए — उच्चारण में पवित्रता की शर्त पर
संस्कृति बचाने की ज़रूरत, उच्चारण में पवित्रता की शर्त के साथ
वे कहते हैं कि जो लोग सही उच्चारण के साथ रुद्राष्टाध्यायी और रुद्री पाठ सीखने की कोशिश कर रहे हैं, वे सीखें — आज के समय में अपनी संस्कृति बचाने की, उसे सीखने की ज़रूरत है, कोई कुछ भी कहे। पर उच्चारण तभी करें जब आप योग और पवित्रता रखें; वरना न करें।
जो लोग, वे कहते हैं, रुद्र अष्टाध्यायी और रुद्री पाठ आदि उच्चारण के साथ सीखने की कोशिश कर रहे हैं — भाई, आज के समय में अपनी संस्कृति बचाने की, उसे सीखने की ज़रूरत है। आप लोग सीखिए। कोई कुछ भी कहे। हाँ — उच्चारण आदि तभी करें जब आप योग और पवित्रता रखें। वरना न करें। बस इतना ध्यान रखें। बाकी सप्तशती पाठ में कोई दिक्कत नहीं; आप इसे संस्कृत में सीख सकते हैं, और इसकी दीक्षा हो या न हो, साधारण पाठ आप सब ज़रूर कर सकते हैं।
जिस कमरे का इतिहास पता न हो, उसे किराये पर लेते समय क्या करें?
हवनात्मक या धूनी विधि के साथ हनुमान चालीसा, बजरंग बाण या हनुमान जंजीरा
अविनाश जी शहरों में किराये के कमरे लेने के बारे में पूछते हैं, जहाँ पता नहीं होता कि किसी ने उस कमरे में फाँसी तो नहीं लगाई। वे उत्तर देते हैं कि जब भी आप किराये का कमरा लें और पहले का कुछ पता न हो, तो उस जगह जाकर अपनी सामर्थ्य भर, साधारण रूप से कम से कम हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए हवनात्मक विधि करें, या बजरंग बाण का पाठ करते हुए धूनी की प्रक्रिया करें, या हनुमान जंजीरा करें।
अविनाश जी पूछते हैं, वे कहते हैं, कि शहरों में लोग किराये पर कमरे लेते हैं, और पता नहीं होता कि उस कमरे में किसी ने फाँसी तो नहीं लगाई — क्या करना चाहिए। जब भी आप किराये पर कमरे लें, वे उत्तर देते हैं, और पहले का कुछ पता न हो, तो जब भी उस जगह जाएँ, अपनी सामर्थ्य भर — साधारण रूप से कम से कम हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए हवनात्मक विधि भी कर सकते हैं; या बजरंग बाण का पाठ करते हुए धूनी आदि की प्रक्रिया करें; हनुमान जंजीरा करें। इन सबसे, सबसे पहले, अगर वहाँ कोई शक्ति है तो वह हट जाएगी।
उसके बाद भी किराये की जगह में परेशानी रहे तो क्या करें?
परेशानी बढ़ाने के बजाय जगह बदलना
दूसरी बात, वे कहते हैं, अगर आप वहाँ गए हैं और वहाँ आपको परेशानी हो रही है, तो जगह बदल लें — ज़्यादा समय रहकर अपनी परेशानी क्यों बढ़ाएँ।
दूसरी बात, वे कहते हैं, अगर आप वहाँ गए हैं और वहाँ आपको परेशानी हो रही है, तो जगह बदल लें। वहाँ और ज़्यादा रहकर अपनी परेशानी क्यों बढ़ाएँ।
पाठ से ऊर्जा ज़्यादा हो जाए तो क्या करें?
अभिषेक विधि, और खर्च हुई ऊर्जा फिर से बनाने के लिए हवन
हनुमान जी का संस्कृत पाठ कर रहीं आकांक्षा जी को उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि अगर ऊर्जा ज़रूरत से ज़्यादा हो रही है, तो अभिषेक की विधि करें। और जो ऊर्जा खर्च हो गई है, उसे फिर से बनाने के लिए हवनात्मक विधान करें, हवन करें — प्रभाव तुरन्त होगा।
आकांक्षा जी हनुमान जी का संस्कृत पाठ कर रही हैं, वे कहते हैं, और पूछते हैं कि कौन-सा संस्कृत पाठ। अगर ऊर्जा ज़रूरत से ज़्यादा हो रही है, अगर ऐसा हो रहा है, तो अभिषेक की विधि करें। जो ऊर्जा घट गई है, उसे फिर से बनाने के लिए हवनात्मक विधान करें, हवन करें — प्रभाव तुरन्त होगा।
चौराहा बन्धन और ग्राम देवता क्षेत्रपाल पूजन किसे करना चाहिए?
साधक की प्रक्रिया, साधारण व्यक्ति की नहीं
ग्राम देवता और क्षेत्रपाल पूजन और चौराहा बन्धन के बारे में वे कहते हैं कि चौराहा बन्धन जैसी प्रक्रिया साधकों को करनी होती है, जब वे उस तरह का कोई ज़रूरी खास काम करते हैं। साधारण व्यक्ति इस तरह की प्रक्रियाओं से बचें, और सीधे क्षेत्रपाल निकारी करें।
वे कहते हैं कि विदेश जाने आदि के लिए राम रक्षा कवच आदि का विधान कैसे करना है, यह वे बताएँगे। ग्राम देवता और क्षेत्रपाल पूजन और चौराहा बन्धन पर: चौराहा बन्धन की प्रक्रिया साधकों को करनी होती है, जब वे उस तरह का कोई ज़रूरी खास काम करते हैं। साधारण व्यक्ति इस तरह की प्रक्रियाओं से बचें। सीधे क्षेत्रपाल निकारी करें।
क्या गृह बन्धन न होने से साधना में दिक्कत हो सकती है?
बिना बन्धे घर में कुछ भी आसानी से आता-जाता है
हाँ, वे कहते हैं, साधना में दिक्कत बिल्कुल हो सकती है। अगर घर का बन्धन नहीं है, तो कुछ भी आसानी से आएगा-जाएगा। मान लीजिए हमारी साधना अभी इतनी जाग्रत नहीं है, आपने बहुत साधना नहीं की, वैसी ऊर्जा नहीं बनी — तो कभी-कभी यह भी होगा कि जैसे ही आपका चन्द्र बल कमज़ोर हुआ, या आपने कुछ समय परिवार में पूजन-पाठ कम किया, नकारात्मक ऊर्जा आसानी से घर में घुस जाएगी।
साधना में दिक्कत, वे कहते हैं, बिल्कुल हो सकती है। अगर घर का बन्धन नहीं है, तो कुछ भी आसानी से आएगा-जाएगा। मान लीजिए हमारी साधना अभी इतनी जाग्रत नहीं है; आपने बहुत साधना नहीं की, वैसी ऊर्जा नहीं बनी है। तो कभी-कभी यह भी होगा कि जैसे ही आपका चन्द्र बल आदि कमज़ोर हुआ, या आपने कुछ समय घर में पूजन-पाठ कम किया, किसी तरह की नकारात्मक ऊर्जा आसानी से घर में घुस जाएगी।
प्रेत-बाधा वाला मेहमान घर आए तो क्या होता है?
उनकी चीज़ें घर में आना, और लेन-देन की दो दिशाएँ
वे कहते हैं कि अगर प्रेत-पिशाच से पीड़ित कोई मेहमान आपके घर आए, तो उनकी चीज़ें घर में आएँगी और असर देंगी। दो तरह की बात होती है: या तो कोई आपसे ऊर्जा लेकर शान्ति महसूस करता है, या सामने वाला आपके आभामण्डल से बनकर निकलती ऊर्जा से परेशान हो जाता है।
अगर आपके घर कोई ऐसा मेहमान आए जो प्रेत-पिशाच से पीड़ित है, वे कहते हैं, तो उनकी चीज़ें घर में आएँगी। यह असर देगा। यह भी होगा। दो तरह की बात होती है। या तो कोई आपसे कुछ ऊर्जा लेकर शान्ति महसूस करता है, या सामने वाला उस ऊर्जा से परेशान हो जाता है जो आपके आभामंडल से बनकर निकलती है।
नियमित सेवा करने वाले के पास पीड़ित व्यक्ति कैसा व्यवहार करता है?
बेचैनी और भागने की इच्छा, या उल्टे शान्ति का अनुभव
अगर आप बहुत सकारात्मक सेवा और पूजन-पाठ करते हैं, वे कहते हैं, और सामने वाला प्रेत-पिशाच से पीड़ित है, तो उसके मन में उथल-पुथल होगी, बेचैनी होगी; वह भागना चाहेगा, अटपटी हरकतें करेगा, रुकने की इच्छा नहीं होगी — चाहे स्त्री हो या पुरुष। पर जहाँ उसके शरीर में कोई ऐसी शक्ति है और पहले वह बेचैन था और अब आपके पास बैठकर शान्ति पाता है, तो वह फिर अलग बात है।
अगर आप सकारात्मक रूप से बहुत पूजन-पाठ करते हैं, वे कहते हैं, और सामने वाला प्रेत-पिशाच से पीड़ित है, तो उसके मन में उथल-पुथल होगी, बेचैनी होगी; वह भागना चाहेगा, भागना। वह अटपटी हरकतें करेगा; उसकी रुकने की इच्छा नहीं होगी, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। पर जहाँ उसके शरीर में कोई ऐसी शक्ति है, और पहले वह बेचैन था और अब आपके पास बैठकर शान्ति पा रहा है — तो यह फिर अलग बात हो जाती है। इन सब बातों के लिए, वे कहते हैं, घर का बन्धन ज़रूरी है, ताकि आपकी अनुमति के बिना कुछ भी अन्दर न आए।
क्या वैरी नाशन काली कवच सीधे पढ़ना चाहिए?
पहले गणपति साधना, फिर भैरव जी, तभी काली जी
वे कहते हैं कि ज़रूरत हो तो करें; पर अगर ऐसा कोई शत्रु नहीं, तो क्या ज़रूरत? पहले गणपति साधना आदि करें, भैरव जी की करें, फिर काली जी की करें। वैरी नाशन काली कवच तब के लिए है जब कोई दुष्ट व्यक्ति आपको परेशान कर रहा हो — जब ज़रूरत नहीं, तो क्यों करें।
वैरी नाशन काली कवच सीधे करने पर वे कहते हैं: ज़रूरत हो, तो करें। पर अगर ऐसा कोई शत्रु नहीं, तो क्या ज़रूरत है? पहले गणपति साधना आदि करें; भैरव जी की करें; फिर बाद में काली जी की करें। शत्रु-नाशन, वैरी नाशन काली कवच किसी ऐसे दुष्ट व्यक्ति के लिए है जो आपको परेशान कर रहा हो। जब ज़रूरत नहीं, तो क्यों करें?
शक्ति न बोले तो इसका क्या अर्थ है?
या तो सामर्थ्य की कमी, या कोई बन्धन
शक्ति क्यों नहीं बोलती, इस पर वे कहते हैं कि यह दो में से एक बात हो सकती है — सामर्थ्य में कमी, या बन्धन। इसमें किसी की मदद लेना ज़्यादा ज़रूरी है। वे यह भी कहते हैं कि वास्तु पूजन करवाया जा सकता है, और घर पर कोई यज्ञ और अनुष्ठान रखवाकर तब यह करवाना चाहिए।
अगर शक्ति नहीं बोलती, वे कहते हैं, तो यह दो में से एक बात हो सकती है: सामर्थ्य में कमी, या बन्धन। इसमें किसी की मदद लेना ज़्यादा ज़रूरी है। वास्तु पूजन करवाया जा सकता है। घर पर कोई यज्ञ और अनुष्ठान आदि रखवाएँ, और तब करवाएँ।
तन्त्रात्मक या यन्त्रात्मक, कौन-सा प्रयोग ज़्यादा प्रभावी है?
जिसमें आपकी श्रद्धा हो
वे कहते हैं कि तन्त्रात्मक प्रभावी है या यन्त्रात्मक, यह इस पर निर्भर है कि आपकी श्रद्धा कहाँ है। जैसी आपकी श्रद्धा होगी, वैसा ही प्रभाव देगा।
इनमें कौन प्रभावी है, तन्त्रात्मक या यन्त्रात्मक, वे कहते हैं, यह इस पर निर्भर है कि आपकी श्रद्धा कहाँ है। जैसी आपकी श्रद्धा होगी, उसी तरह वह प्रभाव देगा।
नकारात्मकता के विरुद्ध जप शुरू करते ही परेशानी क्यों शुरू हो जाती है?
नकारात्मक ऊर्जा की तुरन्त प्रतिक्रिया — दीपन विधि, तुलसी पूजन, शिव पूजन
तीन दिन से अघोर बगला साबर का जप कर रही एक श्रोता बताती हैं कि दो दिन उन्होंने रोटियाँ बनाईं, फिर बीमार पड़ गईं और बना नहीं पाईं, और जप करते समय चक्कर आया। वे कहते हैं कि जैसे ही कोई नकारात्मक ऊर्जा मौजूद हो और आप इन चीज़ों को हटाने का प्रयोग करें, वह तुरन्त अपना असर देने लगती है। ऐसी स्थिति में, जिस महाशक्ति को आप लगा रहे हैं उसके नाम से दीपन विधि करें, तुलसी जी का पूजन करें, और हो सके तो तुरन्त किसी मन्दिर में शिव जी का पूजन करें, ताकि इतनी ऊर्जा और बल बने कि उसका असर आपके शरीर पर न पड़े।
एक श्रोता बताती हैं कि वे तीन दिन से अघोर बगला साबर का जप कर रही हैं; दो दिन उन्होंने रोटियाँ बनाईं, फिर उनकी तबीयत बिगड़ गई और वे बना नहीं पाईं; और जप करते समय उन्हें चक्कर आया। वे उत्तर देते हैं कि जैसे ही कोई नकारात्मक ऊर्जा मौजूद हो, और आप इन चीज़ों को हटाने का कोई प्रयोग करें, वह तुरन्त अपना असर देने लगती है। ऐसी स्थिति में, जिस भी महाशक्ति को आप लगा रहे हैं उसके लिए दीपन विधि करें, तुलसी जी का पूजन करें, और हो सके तो तुरन्त किसी मन्दिर में शिव जी का पूजन करें — ताकि इतनी ऊर्जा बने, इतना बल बने, कि उसका असर आप लोगों के शरीर पर न पड़े।
प्रयोग से परेशानी सहने से बाहर हो जाए तो क्या करें?
उसे छोड़ देना, और छोटे से शुरू करना
दूसरी बात, वे कहते हैं, अगर परेशानी ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ रही है और आप सह नहीं पा रहे, तो उसे छोड़ दें। ऐसी चीज़ें कभी ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए। वे हमेशा यही कहते हैं: किसी छोटी चीज़ से शुरू करें, धीरे-धीरे बढ़ाएँ, और जब आप ऐसा प्रयोग करें और आप साधक या साधिका उस स्तर के न हों, तो थोड़ा सोच-समझकर चलें और बिल्कुल जल्दबाज़ी न करें।
दूसरी बात, वे कहते हैं: अगर परेशानी ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ रही है और आप सह नहीं पा रहे, तो उसे छोड़ दें। ऐसे ज़बरदस्ती कभी नहीं करना चाहिए। यह बात हम हमेशा कहते हैं — हमेशा किसी छोटी चीज़ से शुरू करें, धीरे-धीरे चीज़ें बढ़ाएँ; और जब भी आप ऐसा प्रयोग करें और आप, साधक या साधिका, उस स्तर के न हों, तो थोड़ा सोच-समझकर चलें; बिल्कुल घबराना नहीं चाहिए। प्रयोग में थोड़ा असर होता है, और आप अभी सिद्धि विधान कर रहे हैं; उसमें ऐसा नहीं होना चाहिए। जब प्रयोग विधान आदि होता है, तब उसमें असर होता है — वह अलग बात है। अगर आप सिद्धि विधान करें, तो इन बातों से उसका कोई लेना-देना नहीं होगा, जब तक आप प्रयोग नहीं करते।
क्या कोई सीधे प्रत्यंगिरा कवच शुरू कर दे?
यह जाने बिना नहीं कि व्यक्ति दीक्षित और सक्षम है या नहीं
प्रत्यंगिरा कवच का सीधे पाठ और जप करने के बारे में वे कहते हैं कि यह वे नहीं कह सकते: किसी सक्षम व्यक्ति की मदद लें। उन्हें यह भी नहीं पता कि पूछने वाला दीक्षित है, साधक है, या साधारण वर्ग से है, तो प्रत्यंगिरा के लिए वे कैसे कहें।
महाप्रत्यंगिरा कवच का सीधे पाठ और जप करने पर, वे कहते हैं, यह वे नहीं कह सकते। किसी सक्षम व्यक्ति की मदद लें। और अगर घर पर — अब हमें यह भी नहीं पता कि आप दीक्षित हैं, साधक हैं, या साधारण वर्ग से हैं; तो प्रत्यंगिरा के लिए हम कैसे कहें।
यह करोड़ों जप वाले ऊँचे स्तर के गायत्री साधक को बताया गया था
करोड़ों जप वाला ऊँचे स्तर का गायत्री साधक
वे कहते हैं कि उनके साधक परिवार में एक बहुत ऊँचे स्तर के गायत्री साधक हैं, जो एक सरकारी विभाग में बहुत बड़े पद पर भी हैं, जिनसे बातचीत होती रहती है; शत्रु उन पर आभिचारिक गतिविधि कर रहे थे। उन्होंने खुद उनसे विपरीत प्रत्यंगिरा करने को कहा, क्योंकि वे उनकी सामर्थ्य जानते हैं — उनका जप करोड़ों में चलता है और हो चुका है। पर किसी अनजान के बारे में उन्हें यह भी नहीं पता कि उसने जीवन में कभी माला पकड़ी है या नहीं, तो अगर वह सीधे प्रत्यंगिरा करे, तो प्रत्यंगिरा पहले उसी को परेशान करेगी।
अब हमारे साधक परिवार में, वे कहते हैं, एक बहुत ऊँचे स्तर के गायत्री साधक हैं, जो एक सरकारी विभाग में बहुत ऊँचे पद पर भी हैं; उनसे बातचीत होती रहती है। शत्रु उन पर अभिचार आदि की गतिविधि कर रहे हैं। उन्होंने खुद उनसे कहा: भाई, प्रत्यंगिरा करो, विपरीत प्रत्यंगिरा। उनसे हम कह सकते हैं, क्योंकि उनमें सामर्थ्य है; हम जानते हैं कि वे इतने अच्छे स्तर के साधक हैं, सब कुछ करते आए हैं, उनका जप करोड़ों में चलता है और हो चुका है। पर अब हमें यह भी नहीं पता कि आपने जीवन में कभी माला पकड़ी है या नहीं। तो अगर आप सीधे प्रत्यंगिरा करेंगे, तो प्रत्यंगिरा पहले आपको ही परेशान करेगी। इतनी जलन होगी, ऐसी स्थितियाँ बनेंगी, कि फिर आप कष्ट में होंगे। इसके लिए, वे कहते हैं, हम बिल्कुल सलाह नहीं दे सकते।
जिन्न के सामने हनुमान जी का बल कितना बताया गया है?
हाथी, दिग्पाल, ऐरावत, इन्द्र और हनुमान जी के एक रोम का हिसाब
जिन्न के बारे में जय सिंह जी को उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि अगर आप अपने इष्ट-आराध्य पर भरोसा और आश्रय रखें, तो क्या नहीं हो सकता। वे एक महाराज जी का हवाला देते हैं, जो अब ब्रह्मलीन हैं, जिनका वीडियो वे डालेंगे: सौ हाथियों का बल एक दिग्पाल में होता है; सौ दिग्पालों का बल भगवान इन्द्र के ऐरावत में होता है; हज़ार ऐरावतों का बल भगवान इन्द्र में होता है; और हज़ारों इन्द्रों का बल भगवान हनुमान जी के एक रोम में होता है।
जय सिंह जी, वे कहते हैं — जिन्न हो या कुछ भी; अगर आप अपने इष्ट-आराध्य पर भरोसा और आश्रय करने लगें, तो क्या नहीं हो सकता। हनुमान जी की सामर्थ्य के बारे में एक महाराज जी हैं, बहुत अच्छे, जो अब ब्रह्मलीन हो गए हैं; वे उनका एक वीडियो डालेंगे। उन्होंने बहुत अच्छे से समझाया था: जितना बल सौ हाथियों में होता है, उतना बल एक दिग्पाल में होता है; जितना बल सौ दिग्पालों में होता है, उतना भगवान इन्द्र के ऐरावत में होता है। और हज़ार ऐरावतों का बल भगवान इन्द्र में होता है। और हज़ारों इन्द्रों का बल भगवान हनुमान जी के एक रोम का बल है। ऐसी सामर्थ्य हनुमान जी की बताई गई है, वे कहते हैं — शायद इससे भी ज़्यादा; उन्हें यह पंक्ति-दर-पंक्ति याद नहीं, और उसमें कुछ और बातें भी बताई गई थीं।
हनुमान जी पर भरोसा क्यों घट गया है?
आसानी से मिलने से विश्वास कमज़ोर होना
अब सोचिए, वे कहते हैं, हनुमान जी की सामर्थ्य कितनी बड़ी है — और एक जिन्न की क्या हैसियत; क्या जिन्न हनुमान जी के एक रोम की सामर्थ्य के बराबर भी खड़ा हो सकता है? पर कमी बस यही है कि हम लोगों को हनुमान जी पर भरोसा नहीं। जो चीज़ आप आसानी से उपलब्ध कर देते हैं, उस पर विश्वास ही घट जाता है: हनुमान चालीसा और हनुमान जी इतने आसानी से उपलब्ध हो गए हैं, हर जगह मन्दिर बन गए हैं, कि लगता है जैसे वे कुछ नहीं कर पाएँगे।
अब सोचिए, वे कहते हैं, हनुमान जी की सामर्थ्य कितनी बड़ी है। और एक जिन्न की क्या हैसियत हो सकती है? क्या जिन्न हनुमान जी के एक रोम की सामर्थ्य के बराबर भी खड़ा हो सकता है? पर कमी ठीक यही है कि हम लोगों को हनुमान जी पर भरोसा नहीं। कोई भी चीज़ आप आसानी से उपलब्ध कर दें, तो उस पर भरोसा ही घट जाता है। हनुमान जी और हनुमान चालीसा इतने आसानी से उपलब्ध हो गए हैं, हर जगह मन्दिर बना दिए गए हैं, कि लगता है जैसे वे कुछ नहीं कर पाएँगे। यही, वे कहते हैं, कारण है कि हमारा भरोसा कम है; और जहाँ भरोसा कम है, वहाँ प्रभाव कम है।
पाखण्डियों को उनके आचरण से पहचानिए, रुद्राक्ष और वाक्पटुता से नहीं
पाखण्डियों को आचरण से पहचानना, रुद्राक्ष और वाक्पटुता से नहीं
वे कहते हैं कि इसके उलट लोग यह जिन्न बाबा, वह बाबा, पीर बाबा और हर बाबा को बड़ी शक्ति वाला मानते हैं। पाखण्डियों को पहचानिए, वे कहते हैं: केवल जटा में रुद्राक्ष पहन लेने और बोलने की चतुराई सीख लेने से कोई बहुत बड़ा विद्वान या बड़ा ऋषि-मुनि नहीं बन जाता। उनका आचरण देखिए, वे कहते हैं, तो समझ आएगा कि ये लोग कितने बड़े, अक्षम्य अपराध कर रहे हैं।
और वहाँ, वे कहते हैं, हम यह जिन्न बाबा, वह बाबा, दूसरा बाबा, पीर बाबा, चमगादड़ बाबा मानते हैं — हर बाबा बहुत बड़ी शक्ति वाला है, भाई। पाखण्डियों को पहचानिए। पाखण्डियों को पहचानिए, वे कहते हैं। केवल जटा में रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । पहन लेने से, और केवल बोलने की चतुराई सीख लेने से, कोई बहुत बड़ा विद्वान और बहुत बड़ा ऋषि-मुनि नहीं बन जाता। उनका आचरण देखिए, तो समझ आएगा कि ये लोग कितने बड़े और अक्षम्य अपराध कर रहे हैं।
जिस स्त्री पर ऐसी क्रिया चल रही हो, वह क्या करे?
खुद जाकर दिखाना, अभिभावक के साथ, अकेले नहीं
निशा शर्मा जी को उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि अगर इस तरह की क्रिया हो रही है, तो पहले किसी सक्षम साधक, किसी अच्छे तन्त्र-सम्पन्न व्यक्ति को खुद जाकर दिखाएँ, अपने अभिभावक के साथ जाएँ, अकेले नहीं। और उसकी काट करवाएँ — तभी बात सँभलेगी, क्योंकि अगर कोई उपस्थिति लम्बे समय से शरीर में है तो वह जड़ पकड़ लेती है और परेशानी होगी।
निशा शर्मा जी, वे कहते हैं: अगर इस तरह की क्रिया हो रही है, तो पहले अपने अभिभावक के साथ, अकेले नहीं, जाकर किसी सक्षम साधक, किसी अच्छे तन्त्र-सम्पन्न व्यक्ति को खुद दिखाएँ। और उसकी काट करवाएँ। तभी यह बात बनेगी — क्योंकि अगर शरीर में लम्बे समय से कोई उपस्थिति बनी है, तो जब वह जड़ पकड़ लेती है, तब वहाँ परेशानी होगी।
बारह साल से चल रहे तंत्र विचार को काटना कितना कठिन है?
पुरानी उपस्थिति, और शत्रु अब भी सक्रिय
वे कहते हैं कि अगर कोई तंत्र विचार बारह साल से ज़्यादा समय से खड़ा है और शत्रु आज भी सक्रिय है, तो शुरुआत में उसे काटना और हटाना संभव नहीं होता। इसके लिए बहुत समर्पण चाहिए। और अगर आप बिना किसी बाहरी मदद के ख़ुद कर रहे हैं, तो आपको कुछ कठिनाई होगी।
वे कहते हैं, अगर कोई तंत्र विचार बारह साल से आगे खड़ा रहा है और शत्रु आज भी सक्रिय है, तो उसे काटना, हटाना शुरुआत में संभव नहीं होता। उसके लिए बहुत समर्पण चाहिए। अगर आप बिना किसी बाहरी मदद के ख़ुद कर रहे हैं, तो आपको थोड़ी परेशानी होगी।
निरंतरता टूटती है, शरीर के अशुद्ध दिन होते हैं, और अमावस्या-पूर्णिमा पर चंद्रमा असर करता है
निरंतरता, शरीर की अशुद्धि, और अमावस्या-पूर्णिमा पर चंद्रमा का प्रभाव
वे कहते हैं कि अगर आप स्त्री हैं, तो सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी निरंतरता नहीं बन पाएगी, और उन्हें मौका मिल जाएगा। जब-जब शरीर अशुद्ध होगा, उनका असर बढ़ेगा। अमावस्या और पूर्णिमा पर लड़कियों की स्थिति वैसे भी कुछ बिगड़ी रहती है, क्योंकि उनके भीतर चंद्रमा का प्रभाव सबसे ज़्यादा होता है। ऊपर से तंत्र विचार हो तो और भी बिगाड़। यहाँ जब लड़के परेशान होते हैं, तो लड़कियों की स्थिति और भी अलग हो जाती है।
वे कहते हैं, अगर आप स्त्री हैं, तो सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी निरंतरता नहीं बन पाएगी, और उन्हें मौका मिल जाएगा। जब-जब शरीर अशुद्ध होगा, उस समय उनका असर बढ़ेगा। अमावस्या और पूर्णिमा पर लड़कियों की स्थिति वैसे भी थोड़ी बिगड़ी रहती है, क्योंकि उनके भीतर चंद्रमा का प्रभाव सबसे ज़्यादा होता है। ऊपर से तंत्र विचार हो तो और भी बिगाड़। यहाँ जब लड़के परेशान होते हैं, तो लड़कियों की स्थिति और भी अलग हो जाती है।
एक अच्छे साधक में क्या होना चाहिए?
समर्पण, अपने पद से न डिगना, और किसी देव शक्ति को बुरा न कहना
पूछा गया कि अच्छे साधक में क्या होना चाहिए। वे उत्तर देते हैं: समर्पण। अपने इष्ट-आराध्य के प्रति समर्पण, चाहे दुनिया उलट-पलट हो जाए। अपने पद से मत डिगो, और किसी को मत तोड़ो — यानी किसी देव शक्ति को ऊँचा-नीचा मत कहो। वे साफ़ करते हैं कि देव शक्ति से उनका मतलब प्रेत-पिशाच नहीं है। समर्पण और तल्लीनता के साथ आगे बढ़ो।
उनसे पूछा जाता है कि अच्छे साधक में क्या होना चाहिए। वे उत्तर देते हैं: समर्पण। अपने इष्ट-आराध्य के प्रति समर्पण। दुनिया उलट-पलट हो जाए, अपने पद से मत डिगो, और किसी को मत तोड़ो — यानी किसी देव शक्ति को ऊँचा-नीचा मत कहो। वे कहते हैं, देव शक्ति से हमारा मतलब देव शक्ति है। हम प्रेत-पिशाच की बात नहीं कर रहे। समर्पण के साथ, तल्लीनता के साथ आगे बढ़ो।
क्या अष्टमी पर हवन कुंड में त्रिशूल रखा जा सकता है?
हवन कुंड में लोहे का त्रिशूल
वे उत्तर देते हैं कि आप बिल्कुल हर अष्टमी पर हवन कुंड में भरत त्रिशूल रखकर हवन कर सकते हैं। कोई कठिनाई नहीं है। लोहे के त्रिशूल में कोई दिक्कत नहीं है, आप कर सकते हैं।
वे कहते हैं, बिल्कुल, आप हर अष्टमी पर हवन कुंड में भरत त्रिशूल रखकर हवन कर सकते हैं। कोई कठिनाई नहीं है। लोहे के त्रिशूल में कोई दिक्कत नहीं है, आप कर सकते हैं।
हनुमान का कौन-सा माला मंत्र करना चाहिए?
लक्ष्मण-कृत, शत्रुघ्न-कृत, विभीषण-कृत, बड़वानल या विचित्र वीर्य
पूछा गया कि हनुमान का कौन-सा माला मंत्र करें — लक्ष्मण-कृत, शत्रुघ्न-कृत, विभीषण-कृत, बड़वानल या विचित्र वीर्य। वे कहते हैं, जो आपको अच्छा लगे वह करो; अगर ऐसी बाधा है, तो करो।
उनसे पूछा जाता है, हनुमान का कौन-सा माला मंत्र — लक्ष्मण-कृत, शत्रुघ्न-कृत, विभीषण-कृत, या बड़वानल, या विचित्र वीर्य? वे उत्तर देते हैं, जो चाहो वह करो; अगर ऐसी बाधा है, तो करो।
हनुमान के बीज मंत्रों में क्या सावधानी चाहिए?
अग्नि बीज और हस्फ्रे जैसे उग्र बीज, और उच्चारण की शुद्धता
वे कहते हैं कि हनुमान जी के बीज मंत्र में अग्नि बीज है और हस्फ्रे जैसे कई उग्र बीज हैं। इसलिए इनके उच्चारण में बहुत शुद्धता ज़रूरी है। कोई गलती न हो। ब्रह्मचर्य का अच्छे से पालन करो। नहीं तो शरीर में बहुत शूल वेदना होगी — यानी दर्द, जैसे कोई काँटा चुभ रहा हो, जैसे वायरल बुखार में घुटनों में चुभन होती है।
वे कहते हैं, हनुमान जी के बीज मंत्र में अग्नि बीज है और हस्फ्रे, हस्फ्रे जैसे कई उग्र बीज हैं। इसलिए इनके उच्चारण में बहुत शुद्धता ज़रूरी है। कोई गलती न हो। ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। वगैरह का अच्छे से पालन करो। नहीं तो शरीर में बहुत शूल वेदना होगी — यानी दर्द होगा। ऐसा लगेगा जैसे कोई काँटा चुभ रहा हो, जैसे बुखार के समय घुटनों में चुभन होती है, जब वायरल बुखार होता है और ऐसी दिक्कतें शुरू होती हैं।
हनुमान माला मंत्र कैसे करना चाहिए?
नियम, निष्ठा और श्री राम व माँ जानकी के स्मरण के साथ एक साफ़ पाठ
वे कहते हैं कि अगर आप हनुमान जी का माला मंत्र कर रहे हैं, तो पूरे नियम, निष्ठा, समर्पण और शुद्धता से करो। चाहे एक बार ही करो, पर उच्चारण साफ़ हो, समर्पण के भाव से हो, और भगवान श्री राम व माँ जानकी का स्मरण करते हुए करो। तब बहुत अच्छा असर मिलेगा।
वे कहते हैं, अगर आप हनुमान जी का माला मंत्र कर रहे हैं, तो पूरे नियम, निष्ठा, समर्पण और शुद्धता से करो। चाहे एक बार ही करो — पर उच्चारण साफ़ हो, समर्पण का भाव हो, और भगवान श्री राम व माँ जानकी का स्मरण करते हुए करो। तब आपको बहुत अच्छा असर मिलेगा।
साधना पूरी होने पर भी मंत्र काम क्यों नहीं करता?
पूरे विधि-विधान की जगह औपचारिकता, और पहले दोषों का कटना
वे कहते हैं कि इसके कई कारण हो सकते हैं। आज सबसे बड़ी बात यह है कि साधना पूरे विधि-विधान से हो। अगर हम बस औपचारिकता पूरी करते हैं — हाँ, इक्कीस दिन की साधना है, तो किसी तरह इक्कीस दिन खींच दो — तो गड़बड़ यहीं है। फिर भी, जब महाशक्ति की साधना पूरी होती है, तो पहला असर यह होता है कि आपके परोक्ष और प्रत्यक्ष दोष कटते हैं। जब आपके पास कुछ ऊर्जा बचती है, तभी कोई मंत्र काम करता है।
वे कहते हैं, साधना पूरी होने पर मंत्र काम न करे, इसके कई कारण हो सकते हैं। साधना पूरे विधि-विधान से हो, यह आज सबसे बड़ी बात है। अगर हम बस औपचारिकता पूरी करें — हाँ, इक्कीस दिन की साधना है, तो किसी तरह इक्कीस दिन खींच दो — तो सबसे पहले यही चीज़ यहाँ गड़बड़ है। फिर भी, जब साधना पूरी होती है, तो उससे पहला असर यह होता है कि आपके परोक्ष दोष और प्रत्यक्ष दोष उखड़ते हैं, जब आप किसी महाशक्ति की साधना कर रहे हों। जब आपके पास कुछ ऊर्जा बचती है, तभी कोई मंत्र काम करता है।
एक अनुष्ठान की ऊर्जा कितने समय तक रहती है?
तय अवधि के लिए बनी ऊर्जा, जो कर्म से खर्च होती है
वे कहते हैं कि अगर हम कोई साधना या अनुष्ठान एक बार करते हैं, तो उसकी ऊर्जा एक तय समय के लिए ही बनेगी। फिर जब आप कर्म करने लगेंगे, तो वह घटती जाएगी।
वे कहते हैं, अगर हम कोई साधना या अनुष्ठान एक बार करते हैं, तो उसकी ऊर्जा एक तय समय के लिए ही बनेगी। फिर जब आप कर्म करने लगेंगे, तो वह घटती रहेगी।
दूसरे व्यक्ति के लिए तंत्र-मंत्र करने से क्यों मना किया गया है?
तपोबल, जिसे रोज़ बनाना पड़ता है
वे कहते हैं कि सबको दूसरे के लिए तंत्र-मंत्र करने से मना किया गया है — भाई, मत करो — क्योंकि आपको रोज़ अपने भीतर तपोबल बनाना होता है। अगर आप ऐसे मामलों को देख-सुनकर सलाह दे रहे हैं, चाहे आप ज्योतिषी ही हों, तो अनुष्ठान की क्रिया करो और साधना करते रहो।
वे कहते हैं, आप लोगों को कुछ बातें बताना ज़रूरी है। सबको तंत्र-मंत्र करने से, किसी दूसरे व्यक्ति के लिए करने से क्यों मना किया गया है — भाई, मत करो। क्योंकि आपको नित्य रूप से तपोबल बनाना चाहिए। अगर आप किसी का मामला देख-सुन रहे हैं — चाहे आप ज्योतिषी हों — तो अनुष्ठान वगैरह की क्रिया करो, साधना करते रहो।
साधना के लिए रखे समय में ही साधना छोड़ दी जाती है
साधना के समय में ही साधना का त्याग
वे कहते हैं कि अब नवरात्रि में भी वे अच्छे साधकों के चैनल देखते हैं, और उन्हें लगता है — भाई, नवरात्रि में कुंडली कैसे देख रहे हो, लाइव कैसे कर रहे हो, पैसा इतना ज़रूरी कैसे हो गया? वे कहते हैं, उन्होंने साधना के समय में साधना करना छोड़ दिया है और उसमें रीडिंग कर रहे हैं।
वे कहते हैं, अब नवरात्रि में भी हम अच्छे-अच्छे साधकों के चैनल देखते हैं, और हमें लगता है: भाई, नवरात्रि में कुंडली कैसे देख रहे हो, लाइव कैसे कर रहे हो, पैसा इतना ज़रूरी कैसे हो गया? उन्होंने साधना करना छोड़ दिया है। साधना के समय में आप रीडिंग कर रहे हो।
क्या ऐसे समय हैं जब कुंडली नहीं देखनी चाहिए?
कुंडली विवेचन और सिद्धि के प्रयोग के लिए वर्जित समय
वे कहते हैं कि विधान है: बहुत-से ऐसे समय हैं जिनमें कुंडली देखने पर रोक है, जिनमें जन्म कुंडली का विवेचन नहीं करना चाहिए, और जिनमें तंत्र से देखी जाने वाली चीज़ का — जो भी सिद्धि आपके पास हो — प्रयोग नहीं करना चाहिए। पर वे कहते हैं, लोग इसे मान कहाँ रहे हैं।
वे कहते हैं, जबकि विधान है, बहुत-से ऐसे समय हैं जिनमें कुंडली देखने पर रोक है — कि इस समय जन्म कुंडली का विवेचन नहीं करना चाहिए। इस समय तंत्र वगैरह से देखी जाने वाली चीज़ का, जो भी सिद्धि आपके पास हो, प्रयोग नहीं करना चाहिए। पर वे कहते हैं, लोग इसे मान कहाँ रहे हैं।
काल ज्ञान के बारे में गुरु पहला उपदेश क्या देते हैं?
किसी व्यक्ति का चरित्र कभी न देखना, और कभी न बताना
वे कहते हैं कि जब ऐसी क्षमता मिलती है कि आप किसी भी विषय, किसी भी व्यक्ति के बारे में पूरा ज्ञान पा सकें — जिसे काल क्षमता, काल ज्ञान कहते हैं, कि स्थिति क्या रही और अब क्या है — तो इन सब में गुरु पहला उपदेश यह देते हैं: भाई, किसी व्यक्ति का चरित्र कभी मत देखना। उनका चरित्र नहीं देखना चाहिए, ख़ासकर स्त्रियों का, माताओं-बहनों का। और अगर ऐसा कर भी लो, तो कभी उसके बारे में बोलना नहीं चाहिए।
वे कहते हैं, आपको यह ज्ञान होना चाहिए कि जब किसी भी तरह की ऐसी क्षमता मिलती है कि आप किसी विषय के बारे में, किसी व्यक्ति के बारे में पूरी जानकारी पा सकें — जिसे काल क्षमता कहते हैं, आपका काल ज्ञान हो जाना: वर्तमान में स्थिति क्या थी, अब क्या है — इन सब में गुरु पहला उपदेश यही देते हैं: भाई, किसी व्यक्ति का चरित्र मत देखना। उनका चरित्र नहीं देखना चाहिए, ख़ासकर स्त्रियों का, माताओं-बहनों का। और अगर इस तरह की बात कर भी लो, तो कभी उसके बारे में बोलना भी नहीं चाहिए।
लाइव वीडियो वायरल होता है, और बताने का दोष बताने वाले पर रहता है
वायरल हुआ लाइव वीडियो, और उससे बनने वाला दोष
वे कहते हैं कि आज के समय में लोगों ने इसे किनारे रख दिया है। वे छाती ठोककर बताते हैं कि आपका फलाँ के साथ अफ़ेयर चल रहा है, और लाइव वीडियो वायरल हो जाता है। वे पूछते हैं, भाई, आप किसका नुकसान कर रहे हो? वे मानते हैं कि क्षमता है — यह बिल्कुल सही है — पर इन सब बातों को सबके सामने बोलना या ऐसी क्रियाएँ करना ठीक नहीं है। जब लोग ऐसी क्रियाएँ करते हैं, तो उससे एक तरह का दोष भी बनता है।
वे कहते हैं, आज के समय में लोगों ने इसे ताक पर रख दिया है। वे छाती ठोककर बताते हैं: आपका फलाँ के साथ अफ़ेयर चल रहा है। लाइव वीडियो वायरल हो जाता है। वे पूछते हैं, भाई, आप किसका नुकसान कर रहे हो? कुछ कहा नहीं जा सकता। यहाँ लोग यह बात नहीं समझते। वे कहते हैं, नहीं, इतनी क्षमता है, ऐसा है; कुछ लोग निंदा करते हैं। हाँ, क्षमता है, यह बिल्कुल सही है — पर इन सब बातों को सबके सामने बोलना, या इस तरह की क्रियाएँ करना ठीक नहीं है। वे कहते हैं, जब लोग इस तरह की क्रियाएँ करते हैं, तो उससे एक तरह का दोष भी बनता है।
गुरुओं के महागुरु की महाशरणागति, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों हैं
महाशरणागति, गुरुओं के महागुरु, और वज्र पंजर
वे कहते हैं कि बिल्कुल निश्चिंत होकर महाशरणागति लो। ब्रह्मा, विष्णु और महेश — तीनों समर्थ शक्तियाँ उनके साथ हैं। वे सबके मूल हैं, गुरुओं के महागुरु हैं। अगर भौतिक जीवन में इच्छा है, तो वे भौतिकता भी देने वाले हैं। वे बार-बार कहते हैं कि वे स्मरण मात्र से साथ खड़ी होने वाली शक्ति हैं। भगवान दत्तात्रेय में आपकी सोच से ज़्यादा देने की क्षमता है — उनका वज्र पंजर पढ़ो, तब पता चलेगा कि उनकी क्षमता क्या है।
वे कहते हैं, बिल्कुल निश्चिंत होकर महाशरणागति लो। ब्रह्मा, विष्णु और महेश — तीनों समर्थ शक्तियाँ उनके साथ हैं। वे सबके मूल हैं, वे गुरुओं के महागुरु हैं। अगर भौतिक जीवन में इच्छा है, तो वे भौतिकता भी देने वाले हैं। और बार-बार कहा जाता है कि वे स्मरण मात्र से सहारा देने वाली शक्ति हैं। वे इतना देते हैं; भगवान दत्तात्रेय में आपकी सोच से ज़्यादा देने की क्षमता है, बहुत कुछ देने की क्षमता है। आप उन्हें बस अवधूत और दिगंबर कहते हो — उनका वज्र पंजर कवच पढ़ो, उनका पाठ पढ़ो, तभी पता चलेगा कि उनकी क्षमता क्या है।
अधूरा ज्ञान क्या नुकसान करता है?
अल्प ज्ञान, जो अध्यात्म और भौतिकता दोनों से दूर ले जाता है
वे कहते हैं कि दत्तात्रेय केवल दिगंबर और अवधूत अवस्था के लिए नहीं हैं, कि केवल वही लोग करेंगे। आपका थोड़ा-सा ज्ञान आपको अपने अध्यात्म से भी दूर ले जाता है और आपकी भौतिकता की प्राप्ति में भी बाधा बनाता है। आप एक जगह खड़े होकर कुत्ते की तरह भौंकते हो, और आख़िर में कुत्ते की तरह बच्चे आपको घर से बाहर कर देते हैं — न आध्यात्मिकता से कुछ मिलता है, न भौतिकता से। वे कहते हैं, इसलिए यह बकवास बंद करो।
वे कहते हैं, वे केवल दिगंबर और अवधूत अवस्था के लिए नहीं हैं — कि केवल वही लोग करेंगे। आपका थोड़ा-सा ज्ञान आपको अपने अध्यात्म से भी दूर ले जाता है, और आपकी भौतिकता की प्राप्ति में भी बाधा बनाता है। आप बस एक जगह खड़े होकर कुत्ते की तरह भौंकते रहते हो, और आख़िर में कुत्ते की तरह बच्चे आपको घर से बाहर करके बिठा देते हैं। न आध्यात्मिकता के साथ कुछ मिलता है, न भौतिकता के साथ। वे कहते हैं, इसलिए आप लोग यह बकवास बंद करो।
शिव त्रयोदशी और चतुर्दशी में कौन अधिक महत्वपूर्ण है?
प्रदोष, त्रयोदशी और चतुर्दशी — शिव से जुड़े व्रत
पूछा गया कि शिव त्रयोदशी और चतुर्दशी में किसका महत्व ज़्यादा है। वे कहते हैं कि चतुर्दशी का व्रत सुना गया है, और त्रयोदशी प्रदोष है — त्रयोदशी और चतुर्दशी भगवान शिव से जुड़े व्रत हैं। इनमें जिसके प्रति आपकी श्रद्धा हो, उसके प्रति समर्पित होकर उस तिथि का व्रत रख सकते हैं। इसमें गणना भी है, जिसे उन्हें देखकर बताना होगा — कब कितनी घटी और पल गिनने हैं, कैसे; पूरा विधि-विधान जानकर ही करना चाहिए।
शिव त्रयोदशी और चतुर्दशी में किसका महत्व ज़्यादा है, इस पर वे कहते हैं कि चतुर्दशी का व्रत सुना गया है; त्रयोदशी प्रदोष है, त्रयोदशी, चतुर्दशी। ये भगवान शिव से जुड़े व्रत हैं। इनमें जिसके प्रति आपकी श्रद्धा हो, उसके प्रति समर्पित होकर उस तिथि का व्रत रख सकते हैं। प्रदोष व्रत, शिवरात्रि, त्रयोदशी, चतुर्दशी। वे कहते हैं, इसमें कुछ गणना भी है, जिसे उन्हें देखकर बताना होगा — कब कितनी घटी और पल गिनने हैं, और कैसे करना है; पूरा विधि-विधान जानकर ही करना चाहिए।
क्या ग्रहण के दिन मंत्र जप से सिद्धि होगी?
केवल ग्रहण साधना, क्योंकि सूतक नहीं लगता
पूछा गया कि पाँच तारीख़ को चंद्र ग्रहण के दिन मंत्र जप की कोई सिद्धि होगी या नहीं। वे कहते हैं कि वह केवल ग्रहण साधना होगी — क्योंकि सूतक-पातक नहीं लग रहा, सूतक लगेगा ही नहीं।
वे कहते हैं, पाँच तारीख़ को चंद्र ग्रहण के दिन मंत्र जप की कोई सिद्धि होगी या नहीं — वह केवल ग्रहण साधना होगी। क्योंकि सूतक-पातक नहीं लग रहा; सूतक लगेगा ही नहीं।
क्या पूरा कर्मकांड यूट्यूब से सीखना चाहिए?
शुरुआती विधियाँ ऑनलाइन, पर व्यावहारिक प्रशिक्षण योग्य साधक के पास
चंद्रजीत चौहान जी को उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि पूरा कर्मकांड यूट्यूब से नहीं सीखना चाहिए। किसी योग्य साधक के साथ रहकर कर्मकांड सीखना बेहतर है। हाँ, जो शुरुआती विधि-विधान हैं, वे आपको मिल जाएँगे। आजकल मंडल पूजन भी बहुत-से जानकार पंडित जी लोग बहुत अच्छे से सिखाते हैं, उनके वीडियो हैं; उनसे भी सीख सकते हो। पर अगर व्यावहारिक रूप से कुशल न हो पाओ, तो किसी के साथ रहकर सीखना बेहतर होगा।
वे कहते हैं, चंद्रजीत चौहान जी, पूरा कर्मकांड यूट्यूब से नहीं सीखना चाहिए। किसी योग्य साधक के साथ रहकर कर्मकांड सीखा जाए तो बेहतर है। हाँ, जो शुरुआती विधि-विधान हैं, वे आपको मिल जाएँगे। आजकल मंडल पूजन भी बहुत-से अच्छे, जानकार पंडित जी लोग बहुत अच्छे से सिखाते हैं, और उनके वीडियो यूट्यूब पर हैं; आप उनसे भी सीख सकते हो। पर अगर आप व्यावहारिक रूप से उसमें कुशल न हो पाओ, तो किसी के साथ रहकर सीखना बेहतर होगा।
क्या घर में फूलों से भरा गुड़हल का पौधा शुभ संकेत है?
खिला हुआ गुड़हल, और उपवीत
घर में गुड़हल के पौधे पर बहुत फूल खिलने के बारे में पूछा गया, तो वे कहते हैं कि यह शुभ संकेत है। उपवीत के बारे में वे कहते हैं कि अगर आप ब्राह्मण नहीं हैं, अगर आप चौथे वर्ण में नहीं आते, तो आप ज़रूर उपवीत पहन सकते हैं — या अगर आपका काम उस तरह का नहीं है, तो पहनिए।
वे कहते हैं, घर में गुड़हल का पौधा है और बहुत फूल खिल रहे हैं — तो यह शुभ संकेत है। अगर आप ब्राह्मण नहीं हैं, अगर आप चौथे वर्ण में नहीं आते, तो आप ज़रूर उपवीत धारण कर सकते हैं। या अगर काम उस तरह का नहीं है, तो पहनिए।
घर में विवाह और मांगलिक कार्य क्यों नहीं होते?
तंत्र के सवाल से पहले पितृ बाधा
वे कहते हैं कि जहाँ मांगलिक कार्य और विवाह नहीं होते, वहाँ तंत्र-मंत्र छोड़ो — सबसे पहले यह आपके कुल के पितरों से जुड़ी बाधा है। इसे दूर करने के लिए पहले कम से कम एक साल अपनी क्षमता के अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करो, और पितृ पक्ष वगैरह में विशेष विधि-विधान करो। अगर पितृ शांति नहीं होती, तो विवाह और मांगलिक कार्यों में भरपूर बाधा रहेगी।
वे कहते हैं, जहाँ मांगलिक कार्य और विवाह नहीं होते, वहाँ तंत्र-मंत्र छोड़ो: सबसे पहले यह आपके कुल के पितृ से जुड़ी बाधा है। इन्हें दूर करने के लिए सबसे पहले कम से कम एक साल, अपनी क्षमता के अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करो; पितृ पक्ष वगैरह में विशेष विधि-विधान करो। अगर पितृ शांति नहीं होती, तो विवाह और मांगलिक कार्यों में भरपूर बाधा है। तंत्र विचार इसके बाद की बात है। और अगर अभिचारिक गतिविधि से पितरों को कोई दोष लगा है और आप विधि-विधान नहीं कर रहे, तो वह भी एक कठिनाई है।
क्या किसी आत्मा को मारकर बाँधा जा सकता है?
आत्मा और पैशाचिक योनि का अंतर
पूछा गया कि क्या आत्मा को मारकर बाँधा जा सकता है। वे कहते हैं: भाई, पहले आत्मा और प्रेत-पिशाच, यानी पैशाचिक योनि का अंतर समझो — फिर बात समझ में आ जाएगी।
आत्मा को मारकर बाँधने पर वे कहते हैं: भाई, पहले आत्मा और प्रेत-पिशाच, यानी पैशाचिक योनि का अंतर समझो। फिर समझ में आ जाएगा।
तांत्रिक धूनी में कौन-सी सामग्री लगती है?
पीली सरसों, लाल चिरमी और अपामार्ग की लकड़ी
वे कहते हैं कि तांत्रिक धूनी इस पर निर्भर है कि किसकी है; पर आम तौर पर तांत्रिक धूनी में पीली सरसों, लाल चिरमी और अपामार्ग की लकड़ी — अगर इनका प्रयोग करो, तो अभिचार नष्ट होगा और जो भी प्रेत-पिशाच हैं, वे हटेंगे।
वे कहते हैं, तांत्रिक धूनी इस पर निर्भर है कि किसकी है। आम तौर पर तांत्रिक धूनी में पीली सरसों, लाल चिरमी और अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी। अगर इसका प्रयोग करो, तो अभिचार-नाश होगा, और जो भी प्रेत-पिशाच हैं, वे हटेंगे।
बार-बार गंगा स्नान के सपने आएँ तो क्या करना चाहिए?
वहाँ जाकर स्नान करना, और कुछ दिनों का अनुष्ठान
गजशंकर जी को, जिन्हें बार-बार गंगा स्नान के सपने आते हैं, वे कहते हैं: तो जाकर गंगा जी में स्नान करो, और सही समय पर वहाँ कोई अनुष्ठान करो — कम से कम एक हफ़्ता, या तीन दिन, जितना कर सको।
वे गजशंकर जी से कहते हैं, गंगा जी में स्नान के सपने बार-बार आ रहे हैं। तो जाकर गंगा जी में स्नान करो, और सही समय पर वहाँ कोई अनुष्ठान वगैरह करो। कम से कम एक हफ़्ते का, या तीन दिन का, जितना कर सको।
क्या बगलामुखी साधना से तुलसी का पौधा सूखता है?
प्राण तोषिणी और अमृतेश्वरी विद्या, जिनके भैरव महामृत्युंजय हैं
वे कहते हैं कि यह संभव नहीं है। भगवती बगलामुखी प्राण तोषिणी विद्या हैं, अमृतेश्वरी विद्या हैं, जिनके भैरव स्वयं महामृत्युंजय हैं। जो मृत्यु के मुँह में चला गया हो, उसके लिए हम अमृतेश्वरी और महामृत्युंजय का अनुष्ठान करते हैं, जिनके मंत्र से ही ये सब जागते हैं। वे महामृत्युंजय, जिनके हाथ में कलश है, और उस कलश में अमृतेश्वरी देवी अमृत रूप में रहती हैं — उनसे तुलसी के पौधे कैसे सूखेंगे?
उनसे पूछा जाता है, क्या बगलामुखी साधना से तुलसी जी के पौधे सूखते हैं। वे कहते हैं, यह संभव नहीं है। प्राण तोषिणी विद्या, अमृतेश्वरी विद्या — वे भगवती बगलामुखी हैं, जिनके भैरव स्वयं महामृत्युंजय मंत्र हैं। जो मृत्यु के मुँह में चला गया हो, उसके लिए हम अमृतेश्वरी और महामृत्युंजय का अनुष्ठान करते हैं, जिनके मंत्र से ही ये सब जागते हैं। वे महामृत्युंजय, जिनके हाथ में कलश है, और उस कलश में अमृतेश्वरी देवी रहती हैं, अमृत रूप में रहती हैं — उनसे तुलसी के पौधे कैसे सूखेंगे?
या तो जप विधि गलत है, या तुलसी में रहने वाला कोई पितृ उससे कष्ट पा रहा है
तुलसी के पौधे में रहने वाले पितृ, जिन्हें जप से कष्ट होता है
वे कहते हैं कि या तो आपकी जप विधि गलत है और दोष लग रहा है, या तुलसी जी के पौधे तभी सूखेंगे जब आपके कुल में पितृ योनि में कुछ ऐसे हों जिन्हें बगलामुखी से कष्ट हो रहा है। आपके तुलसी जी के पौधे में पितरों की उपस्थिति बनती है। अलग-अलग तरह के पितृ अलग-अलग हिस्सों से अपना भाग लेते हैं — पत्तों से, तने से, जड़ से और मंजरियों से — और भगवती तुलसी उनकी शांति का माध्यम बनती हैं।
वे कहते हैं, या तो आपकी जप विधि गलत है और दोष लग रहा है, या तुलसी जी के पौधे तभी सूखेंगे जब आपके कुल में — यानी पितृ योनि में कुछ ऐसे मौजूद हों जिन्हें बगलामुखी से कष्ट हो रहा है। और आपके तुलसी जी के पौधे में पितरों की उपस्थिति बनती है। अलग-अलग तरह के पितृ अलग-अलग हिस्सों से अपना भाग लेते हैं: पत्तों से, तने से, जड़ से और मंजरियों से। भगवती तुलसी उनकी शांति का माध्यम बनती हैं। अगर आपके बगला जप से उन्हें कष्ट हो रहा है, तो तुलसी जी सूखेंगी।
बगलामुखी साधना से किसे पूरी तरह बचना चाहिए?
वे घर जिनके कुल में ऐसी शक्तियाँ मौजूद हैं
वे कहते हैं कि इसी कारण उन्होंने कहा है, और इस पर वीडियो भी है, कि बगलामुखी साधना, मंत्र वगैरह अपने कुल को देखकर करने चाहिए। जिनके कुल में इस तरह की शक्तियाँ मौजूद हैं, उन्हें उस तरह बगला जप नहीं करना चाहिए।
वे कहते हैं, और इसी कारण हमने यह भी कहा है, और वीडियो भी है: भाई, बगलामुखी साधना, उनका मंत्र वगैरह अपने कुल को देखकर करना चाहिए। जिनके कुल में इस तरह की शक्तियाँ मौजूद हैं, उन्हें ऐसे बगला जप नहीं करना चाहिए।
बार-बार बच्चों के सपने आने का क्या अर्थ है?
मसानिक दोष
किसी ने, जिसने कभी कोई साधना नहीं की, सपने में बच्चे दिखने के बारे में पूछा। वे कहते हैं कि अगर बच्चे ज़रूरत से ज़्यादा दिखें और वही सपना बार-बार आए, तो यह मसानिक दोष है।
उन्हें बताया जाता है कि सपने में बच्चे दिखते हैं और कभी कोई साधना नहीं की। वे कहते हैं, अगर बच्चे ज़रूरत से ज़्यादा दिखें और वही सपना यूँ ही बार-बार आए, तो यह मसानिक दोष है।
परिवार में मृत्यु के बाद पूजन फिर कब शुरू कर सकते हैं?
तेरहवीं और बरखी, और अपने समाज का नियम
वे अवधेश जी से कहते हैं कि अगर तेरहवीं हो गई है, तो पूजन करो; पर देखो कि बरखी हुई है या नहीं, और आपकी तरफ़ बरखी तक क्या नियम है। बहुत-सी जगहें हैं जहाँ बरखी होने तक लोग पूजा-पाठ और मांगलिक कार्य सब बंद रखते हैं। यह देखकर फ़ैसला लो।
वे कहते हैं, हाँ, अवधेश जी, अगर तेरहवीं हो गई है, तो पूजन करो। बरखी हुई है या नहीं — देखो कि आप लोगों की तरफ़ बरखी तक क्या नियम है। बहुत-सी ऐसी जगहें हैं जहाँ बरखी होने तक लोग पूजा-पाठ और सारे मांगलिक कार्य बंद रखते हैं। यह देखो और अपना फ़ैसला लो।
अगर खाना शरीर में न टिके, तो इसका क्या अर्थ है?
वात दोष, या कोई खिलाया-पिलाया बाहर निकल रहा है
वे शांभवी जी से कहते हैं कि इसका मतलब है कि या तो आपके शरीर में वात दोष है, या कोई खिलाया-पिलाया है जो आपके शरीर में टिक भी नहीं पा रहा। इसके लिए किसी साधक से, समस्या का स्वरूप बताकर, अभिमंत्रित वस्तु लो और खाओ; वह चीज़ बाहर निकल जाएगी और आपको राहत मिलेगी। या तो उसका समय पूरा हो गया है, या आप जो साधना कर रहे हो उससे वह परेशान है। उसके निकल जाने पर आपके शरीर में शांति बनेगी।
वे कहते हैं, शांभवी जी, इसका मतलब है कि या तो आपके शरीर में वात दोष है, या कोई खिलाया-पिलाया है जो आपके शरीर में रह भी नहीं पा रहा। इसके लिए किसी साधक से, यह बताकर कि इस तरह की समस्या हो रही है, अभिमंत्रित वस्तु लो — वह चीज़ खाओ, वह बाहर निकल जाएगी, और आपको राहत मिलेगी। वह टिक नहीं पा रहा; या तो उसका समय पूरा हो गया है, या आप जो साधना कर रहे हो उसके कारण वह परेशान है। यह निकल जाएगा, तो आपके शरीर में शांति बनेगी।
जिस पर तंत्र किया गया हो, क्या वह सीधे महाकाली बीज मंत्र करे?
पहले अष्टोत्तर शतनाम और कवच, फिर बीज
जय सिंह जी, जिन पर तंत्र किया गया है और जो सीधे महाकाली बीज मंत्र करना चाहते हैं, उनसे वे कहते हैं कि ऐसा मत करो। पहले भगवती से ही जुड़ी कम से कम शुरुआती साधना करो — उनका अष्टोत्तर शतनाम वगैरह — कवच करो, और तभी बीज मंत्र पर जाओ।
वे कहते हैं, जय सिंह जी, तंत्र किया गया है, और आप सीधे महाकाली बीज मंत्र करने की बात कर रहे हो — यह मत सोचो। पहले कम से कम वह शुरुआती साधना करो जो स्वयं भगवती से जुड़ी है: उनका अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। वगैरह। कवच करो, और फिर बीज मंत्र पर जाओ।
क्या नर्मदेश्वर शिवलिंग को मंदिर में ले जाना चाहिए?
इसे घर में ही रखना
वे सूर्य जी से कहते हैं कि नर्मदेश्वर जी को घर में ही रखो; मंदिर ले जाने की ज़रूरत नहीं है।
वे कहते हैं, सूर्य जी, नर्मदेश्वर जी को घर में ही रखो। मंदिर ले जाने की ज़रूरत नहीं है।
यज्ञ, हवन और अग्निहोत्र में क्या अंतर है?
अग्निहोत्र नित्य क्रम, हवन रोज़ या समय-समय पर, और यज्ञ सबसे बड़ा रूप
वे कहते हैं कि अग्निहोत्र की विधि नित्य क्रम के अनुसार है; उसका विधि-विधान नित्य है, और उसमें अग्निवास देखने की ज़रूरत नहीं होती — यह अग्निहोत्री ब्राह्मणों का, अग्निहोत्री लोगों का है। यज्ञ और हवन का अपना विधि-विधान है: यज्ञ बड़ा आयोजन है; हवन वह है जो आप रोज़, हर हफ़्ते या हर महीने करते हो। वे कहते हैं, हवन का सबसे बड़ा रूप यज्ञ है।
उनसे पूछा जाता है कि यज्ञ, हवन और अग्निहोत्र में क्या अंतर है। वे कहते हैं, अग्निहोत्र की विधि नित्य क्रम के अनुसार है। उनका विधि-विधान नित्य है, और उसमें अग्निवास वगैरह देखने की ज़रूरत नहीं होती। यह अग्निहोत्री ब्राह्मणों के लिए, अग्निहोत्री लोगों के लिए है। यज्ञ और हवन के लिए विधि-विधान है। यज्ञ बड़ा आयोजन है; हवन वह रोज़ का हवन है जो आप करते हो, या साप्ताहिक या मासिक हवन। बस इतना। हवन का सबसे बड़ा रूप यज्ञ है।
कुछ समय बाद पूजा से राहत मिलना क्यों बंद हो जाता है?
सक्रिय शत्रु जो काट ढूँढता है, और अपनी सीमित ऊर्जा
एक श्रोता बताते हैं कि उनका स्वास्थ्य खराब था, 2020 में उन्होंने हनुमान जी की पूजा शुरू की और बहुत ठीक हो गए, और अब सात-आठ महीने से मन नहीं लग रहा। वे कहते हैं, इसके दो अर्थ हैं: जब शुरुआत में आप कुछ करते हो तो राहत मिलती है, और अगर शत्रु अभिचार में सक्रिय है तो वह भी काट ढूँढेगा — यह आदमी ठीक कैसे हो रहा है। और आपकी ऊर्जा एक सीमित मात्रा तक ही है। हम बार-बार कहते हैं कि हमारे भीतर रामकृष्ण परमहंस जैसा समर्पण भाव नहीं आ सकता कि उस तरह की सुरक्षा मिले, और अपने को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं आँकना चाहिए।
वे कहते हैं, टेडी फॉक्स जी का अनुभव है: स्वास्थ्य खराब रहता था; 2020 से हनुमान जी की पूजा शुरू की, और तब से बहुत अच्छा हो गया; पिछले सात-आठ महीने से मन नहीं लग रहा। पहले राहत मिली, और बाद में नहीं। इसके दो अर्थ हैं। पहली बात: जब शुरुआत में आप कुछ करते हो, तो राहत मिलती है। अगर शत्रु अभिचार में सक्रिय है, तो वह भी काट ढूँढेगा — यह आदमी ठीक कैसे हो रहा है। और आपकी ऊर्जा एक सीमित मात्रा तक ही है। हम बार-बार कहते हैं कि हमारे भीतर रामकृष्ण परमहंस जैसा समर्पण भाव नहीं आ सकता कि उस तरह की सुरक्षा मिले। अपने को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं आँकना चाहिए।
जब पाठ का फल मिलना बंद हो जाए, तो क्या करना चाहिए?
शिव अभिषेक, सीताराम का जप, या भगवती अंजना से जुड़ा पाठ
वे कहते हैं कि जब लगे कि हमारा पाठ अब उस तरह फल नहीं दे रहा, तो तुरंत शिव जी से जुड़ी अभिषेक विधि करो। और अगर आप हनुमान जी का कर रहे हो, तो अपनी क्षमता के अनुसार भगवान श्री सीताराम जी का जप करो, या उनसे जुड़े कवच का पाठ करो। या, अगर हनुमान जी का कर रहे हो, तो उनकी माता भगवती अंजना से जुड़ा पाठ करो, ताकि यह बंधन दोष तुरंत कटे और असर फिर शुरू हो।
वे कहते हैं, जब लगे कि हमारा पाठ अब उस तरह फल नहीं दे रहा, तो तुरंत शिव जी से जुड़ी अभिषेक विधि वगैरह करो। और अगर आप हनुमान जी का कर रहे हो, तो अपनी क्षमता के अनुसार भगवान श्री सीताराम जी का जप करो, या उनसे जुड़े कवच वगैरह का पाठ करो। या, अगर आप हनुमान जी का कर रहे हो, तो उनकी माता भगवती अंजनी से जुड़ा पाठ करो, ताकि यह बंधन दोष तुरंत कटे और वह फिर असर देने लगे।
जयंती मंगला मंत्र के उन्नत रूप में क्या होता है?
पूरी बृहत् विधि से विनियोग, न्यास और यंत्र अर्चन
वे कहते हैं कि उन्नत स्तर पर जयंती मंगला मंत्र पूरे विधि-विधान से किया जाता है — उसके एक-एक अर्थ के साथ, विनियोग करके, न्यास करके, पूरी विधि से यंत्र अर्चन करके — और उनकी पूजा और सेवा पूरी बृहत् विधि से होती है। अर्गला के पहले मंत्र से ही सब कुछ पूरे विधि-विधान से किया जाता है।
वे कहते हैं, बिल्कुल, उन्नत स्तर पर जयंती मंगला काली मंत्र पूरे विधि-विधान से किया जाता है — उसके एक-एक अर्थ के साथ, विनियोग करके, न्यास करके, पूरी विधि से यंत्र अर्चन करके। उनकी पूजा और सेवा पूरी बृहत् विधि से होती है। अर्गला के पहले मंत्र से ही सब कुछ पूरे विधि-विधान से किया जाता है।
जो भगत आप पर प्रयोग कर रहा हो, उसके पास जाना बंद करें
आप पर प्रयोग करने वाले भगत के पास जाना बंद करना
वे वीरेंद्र सिंह जी से कहते हैं कि आपकी स्थिति बहुत अजीब तरह की है। अगर ऐसा हो रहा है तो यह शोध का विषय है और देखने का भी कि ऐसा हो कैसे सकता है। और अगर आप ऐसे भगत के पास जा रहे हैं जो आप पर इस तरह का कोई प्रयोग कर रहा है, तो मत जाइए। यह जोखिम मत लीजिए। जब समझ आ जाए कि वहाँ कुछ गलत हो रहा है, तो दोबारा जाने की ज़रूरत नहीं।
वीरेंद्र सिंह जी, वे कहते हैं, आपकी स्थिति बहुत अजीब तरह की है। अगर ऐसा हो रहा है तो यह शोध का विषय है और यह देखने का भी विषय है कि ऐसा हो कैसे सकता है। और अगर आप ऐसे भगत के पास जा रहे हैं जो आप पर इस तरह का कोई प्रयोग कर रहा है, तो मत जाइए। यह जोखिम मत लीजिए। जब समझ आ जाए कि वहाँ कुछ गलत हो रहा है, तो दोबारा जाने की ज़रूरत नहीं।
सिद्धियों का गलत उपयोग करने वालों को क्या दंड मिलता है?
सट्टे के नंबर बताने वाला, जिसकी बातें गलत होने लगीं
डॉ. सुनील जी पूछते हैं कि जो सिद्धियों से लोगों को ठगता है, उनकी शक्तियों का उच्चाटन और बंधन करता है और उन्हें मूर्ख बनाकर पैसे लेता है, उसे क्या दंड मिलता है। वे कहते हैं कि दंड बहुत अच्छी तरह मिलता है। ऐसे लोगों के हाथ-पैर अच्छे से तोड़े जाते हैं। वे बताते हैं कि एक दिन पहले एक महाराज जी ने उन्हें एक किस्सा सुनाया। जगह का नाम वे नहीं लेते। पंजाब, हरियाणा और उत्तर उत्तर प्रदेश की तरफ कोई सट्टे के नंबर बताता था। उसमें सामर्थ्य था और उसकी बातें सौ प्रतिशत सच होती थीं। फिर एक समय आया जब उसकी बातें गलत होने लगीं, और लोगों ने उसे घर पर बाँधकर रखा।
जो सिद्धियों से किसी को ठगता है, उनकी शक्तियों का उच्चाटन और बंधन करता है और उन्हें मूर्ख बनाकर पैसे लेता है, उसे क्या दंड मिलता है — इस पर वे कहते हैं कि दंड बहुत अच्छी तरह मिलता है। ऐसे लोगों के हाथ-पैर अच्छे से तोड़े जाते हैं। आज — नहीं, कल — वे कहते हैं, वे एक महाराज जी से बात कर रहे थे। उन्होंने एक किस्सा बताया। जगह का नाम वे नहीं लेंगे, क्योंकि बहुत लोग जानते होंगे। पंजाब, हरियाणा, उत्तर उत्तर प्रदेश की तरफ के लोग शायद उसे जानते भी हों। एक समय उसका बहुत चलन था। वह सट्टे के नंबर बताता था। उसमें सामर्थ्य था, और जो बताता था वह सौ प्रतिशत सच होता था। आज भी लोग ऐसे नंबर बताते हैं। लोग उसकी बात पर दाँव लगाते थे। फिर एक समय आया जब उसकी बातें गलत होने लगीं। और फिर ऐसा हुआ कि लोगों ने महाराज को घर पर बाँधकर रखा।
मसानिक शक्तियाँ लगाई जाती हैं, और सिद्ध शक्तियों की अपनी शर्तें होती हैं
मसानिक शक्तियाँ, और अपनी शर्तों वाली सिद्ध शक्तियाँ
वे कहते हैं कि ये चीज़ें ऐसे ही गलत नहीं होतीं। पहली बात, दिक्कत खास तौर पर तब होती है जब लोग मसानिक शक्तियाँ लगाकर इस तरह की क्रियाएँ करते हैं। और जो सिद्ध शक्ति ऐसी बातें बताती है, उसकी भी अपनी शर्तें और अपने नियम होते हैं। उन्हें लाँघकर कोई यह काम नहीं कर सकता। अगर करते हैं, तो वे दंड के भागी बनते हैं।
और ये चीज़ें ऐसे ही गलत नहीं होने लगतीं, वे कहते हैं। पहली बात, दिक्कत खास तौर पर तब होती है जब लोग किसी भी तरह की मसानिक शक्ति लगाकर इस तरह की क्रियाएँ करते हैं। और जो सिद्ध शक्ति होती है और ऐसी बातें बताती है, उसकी अपनी शर्तें हैं, अपने नियम हैं। उन्हें लाँघकर कोई यह काम नहीं कर सकता। अगर करते हैं, तो वे दंड के भागी बनते हैं।
जो सिद्धियों से पैसे ऐंठता है, उसका क्या होता है?
शक्ति को ठगा नहीं जा सकता, वह अच्छी तरह पीटती है
वे कहते हैं कि इसके साथ, अगर कोई अपनी सिद्धियों का ऐसा गलत उपयोग करता है — दूसरों का बंधन करना, उच्चाटन करना, पैसे निकालने के लिए खुद तरह-तरह के तंत्र प्रयोग चलाना — तो उस शक्ति को ठगा नहीं जा सकता। फिर वे अच्छी तरह पीटते हैं। उस आदमी के साथ भी ऐसा ही हुआ। लोग उसे उठाकर ले गए और बाद में हाथ-पैर तोड़कर वापस छोड़ गए। ऐसे बहुत किस्से आपको सुनने को मिलेंगे।
और उसके साथ, वे कहते हैं, अगर कोई अपनी सिद्धियों का ऐसा गलत उपयोग करता है — दूसरों का बंधन करना, उच्चाटन करना, पैसे निकालने के लिए खुद तरह-तरह के तंत्र प्रयोग चलाना — अगर कोई इस तरह का कुछ करता है, तो उस शक्ति को ठगा नहीं जा सकता। फिर वे अच्छी तरह पीटते हैं। इस आदमी के साथ भी ऐसा ही हुआ। वे लोग उसे उठाकर ले गए और बाद में हाथ-पैर तोड़कर वापस छोड़ गए। ऐसे बहुत किस्से, वे कहते हैं, आपको सुनने को मिलेंगे।
क्या नवार्ण मंत्र के लिए दीक्षा चाहिए?
इसमें महाशक्तियाँ हैं
वे चिंकी जोशी जी से कहते हैं कि नवार्ण मंत्र दीक्षित होकर करना चाहिए, बिना दीक्षा के नहीं करना चाहिए। इसमें महाशक्तियाँ हैं। वे डॉ. ऋचा सिंह जी को चैनल के एक अलग वीडियो के बारे में भी बताते हैं कि साधना सफल हुई है यह कैसे पता चलता है और क्या अनुभव होते हैं।
साधना सफल होने वाली हो, तो वे डॉ. ऋचा सिंह जी से कहते हैं, चैनल पर एक अलग वीडियो है कि साधना कैसे सफल होती है, क्या अनुभव होते हैं और किस तरह पता चलता है। चिंकी जोशी जी, वे कहते हैं, नवार्ण मंत्र दीक्षित होकर करना चाहिए। बिना दीक्षा के नहीं करना चाहिए। इसमें महाशक्तियाँ हैं।
बगला प्रत्यंगिरा के कितने पाठ किए जा सकते हैं?
रात में छत्तीस पाठ, केवल एक व्यक्ति के लिए बताए गए
वे मृणालिनी जी से कहते हैं कि सामान्य रूप से यह जानकारी उनके पास नहीं है। पर ऐसे में अगर बगला प्रत्यंगिरा के सौ नहीं कर सकतीं, तो छत्तीस कीजिए। वे साफ कहते हैं कि यह केवल उनके लिए कह रहे हैं। दूसरे लोग इसे अपने लिए न लें। उन्होंने मृणालिनी कल्याणी जी से बात की है और उनका विषय जानते हैं, इसीलिए रात में छत्तीस पाठ बताए।
बगला प्रत्यंगिरा का कितना पाठ किया जा सकता है — यह जानकारी हमारे पास नहीं है, वे मृणालिनी जी से कहते हैं। वे बताते हैं कि शायद उनसे बात हुई है। ऐसे में अगर बगला प्रत्यंगिरा के सौ नहीं कर सकतीं, तो छत्तीस कीजिए। यह हम केवल आपके लिए कह रहे हैं। दूसरे लोग यह बात अपने लिए न लें। वे कहते हैं कि उन्होंने मृणालिनी कल्याणी जी से बात की है और उनका विषय जानते हैं, इसीलिए रात के समय छत्तीस पाठ बताए।
जातवेदी, उल्कामुखी जैसे अस्त्र मंत्र कब किए जा सकते हैं?
केवल गुरु कृपा और आदेश से, आरंभिक साधनाओं की पूरी आवृत्ति और पुरश्चरण के बाद
वे कहते हैं कि जातवेदी, उल्कामुखी, बड़वामुखी और भगवती के ऐसे सब अस्त्र मंत्र केवल गुरु कृपा से, गुरु आदेश से, और आरंभिक साधनाओं की पूरी आवृत्ति और पुरश्चरण हो जाने के बाद ही करने चाहिए। इन्हें स्वतंत्र रूप से नहीं करना चाहिए। इनकी प्रयोग विधियाँ बहुत ऊँचे स्तर की हैं। अगर आप सक्षम नहीं हैं, तो करने से पहले बहुत परीक्षाएँ होती हैं।
जातवेदी, उल्कामुखी, बड़वामुखी — भगवती के जितने भी अस्त्र मंत्र आदि हैं, वे कहते हैं, भाई, ये सब चीज़ें केवल गुरु कृपा से, गुरु आदेश से करनी चाहिए। और आरंभिक साधनाओं की पूरी आवृत्ति हो जाने के बाद, पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। हो जाने के बाद ही। इन्हें ऐसे ही स्वतंत्र रूप से नहीं करना चाहिए। और इनकी प्रयोग विधि — ये सब विधियाँ बहुत ऊँचे स्तर की हैं। अगर आप सक्षम नहीं हैं, तो इन सबको करने से पहले बहुत परीक्षाएँ होती हैं।
जब कोई अनधिकारी ज़बरदस्ती मंत्र करता है तो क्या होता है?
वायरल वीडियो में गायत्री जप का मामला, और पहली दिक्कत त्वचा की
वे कहते हैं कि आजकल लोग अनधिकारी होकर भी नहीं मानते, जब आप समझाने जाते हैं कि यह मंत्र मत पढ़ो। वे राजेंद्र दास महाराज जी के एक वीडियो का ज़िक्र करते हैं जो उस दिन वायरल हुआ और किसी ने उन्हें भेजा। उसमें बताया गया कि गायत्री जप से एक लड़की पागल हो गई। उस पर बहुत टिप्पणियों में कहा गया कि यह अनधिकारी होने की बात है। अगर ज़बरदस्ती करेंगे तो मंत्र असर देगा और बाद में दिक्कत होगी। पहली दिक्कत त्वचा से जुड़ी समस्याएँ होती हैं।
जैसे आजकल लोग अनधिकारी होकर भी नहीं मानते, वे कहते हैं — अगर आप समझाने जाएँ कि भाई, इस मंत्र का पाठ मत करो। आज राजेंद्र दास महाराज जी का एक वीडियो वायरल हुआ, और किसी ने उन्हें भी भेजा, वे कहते हैं — शायद बिंदु जी ने भेजा था। उसमें बताया गया कि गायत्री जप से एक लड़की कैसे पागल हो गई। उन्होंने वह अनुभव सुनाया। और उसमें आपको बहुत लोगों की टिप्पणियाँ पढ़ने को मिलेंगी। सबने कहा कि इस तरह यह अनधिकारी होने की बात है। अगर ज़बरदस्ती करेंगे तो मंत्र असर देगा, और उसके बाद दिक्कत होगी। पहली दिक्कत जो होती है, वह त्वचा से जुड़ी समस्या है।
अस्त्र मंत्र क्या होता है?
बीज मंत्र जो अपना असर बढ़ाते हैं, चलते हैं, नाश करते हैं और फिर लीन हो जाते हैं
वे कहते हैं कि अस्त्र मंत्रों में ऐसे बीज मंत्रों का उपयोग हुआ है जिनके कारण वे अपना असर बढ़ाते हैं, चलते हैं, विनाश करते हैं, और फिर जाकर लीन हो जाते हैं।
अस्त्र मंत्र क्या है, वे पूछते हैं। इनमें ऐसे बीज मंत्रों का उपयोग हुआ है जिनके कारण वे अपना असर बढ़ाते हैं, वे चलते हैं, विनाश करते हैं, और फिर जाकर लीन हो जाते हैं।
अस्त्र मंत्र में सबसे ज़रूरी विधि कौन-सी है?
उपसंहार विधि, जिसके बिना ब्रह्मांड में कोई आपको नहीं बचा सकता
वे कहते हैं कि अस्त्र मंत्र में सबसे ज़रूरी विधि उपसंहार विधि है। इसका नियम ही यह है कि अगर आपको उपसंहार नहीं आता और आपने अस्त्र चला दिया, तो आप भी नहीं बचेंगे। चाहे आपने कितने भी पुरश्चरण किए हों, चाहे आपका जप करोड़ों में चला गया हो। अगर आपने अस्त्र मंत्र का उपसंहार सिद्ध नहीं किया, आप उसे नहीं जानते, आपने वह विधि नहीं की, तो पूरे ब्रह्मांड में आपको बचाने वाला कोई नहीं। और जो आपको बचाने की कोशिश करेगा, उसकी अपनी कहानी खत्म हो जाएगी।
अस्त्र मंत्र में, वे कहते हैं, सबसे ज़रूरी विधि उपसंहार विधि है। इसका नियम ही यह है कि अगर आपको उपसंहार नहीं आता और आपने उसे चला दिया, तो बाबू, आप भी नहीं बचेंगे। चाहे आपने कितने भी पुरश्चरण किए हों, चाहे आपका जप करोड़ों में चला गया हो। अगर आपने अस्त्र मंत्र का उपसंहार सिद्ध नहीं किया, आप उसे नहीं जानते, आपने वह विधि नहीं की, तो पूरे ब्रह्मांड में आपको बचाने वाला कोई नहीं। कोई आपको नहीं बचा सकता। और जो आपको बचाएगा, उसकी अपनी कहानी खत्म हो जाएगी। यह जान लीजिए, वे कहते हैं।
अच्छे साधक अस्त्र मंत्रों के प्रयोग से क्यों बचते हैं?
सिद्धि साधना का एक पड़ाव है, प्रयोग बिल्कुल अलग बात है
इसी कारण, वे कहते हैं, अच्छे साधक अस्त्र मंत्रों की प्रयोग विधि से बचते हैं। इन्हें सिद्ध करना अलग बात है। वह साधना का एक पड़ाव है जिसमें वह अस्त्र आता है: हाँ, यह करना चाहिए, इन अस्त्रों को सिद्ध करो, अब हमारी अवस्था वैसी हो गई। पर अगर आप उपसंहार नहीं करेंगे, और कोई ज़रूरत आने पर सीधे चला देंगे, तो अगर सामने वाले को दस कोड़े पड़ेंगे, तो आपको सौ खाने पड़ेंगे। ऐसी अवस्था हो जाती है।
इसी कारण, वे कहते हैं, जो साधक अच्छे हैं, वे अस्त्र मंत्रों की प्रयोग विधि से बचते हैं। इन्हें सिद्ध करना अलग बात है। वह साधना का एक क्रम है जिसमें वह अस्त्र आता है: हाँ भाई, यह करना चाहिए, इस अस्त्र पर, उस अस्त्र पर, इन अस्त्रों को सिद्ध करो — अब हमारी अवस्था वैसी हो गई। अब अगर आप उपसंहार नहीं करेंगे, और कोई ज़रूरत आई और आपने सीधे चला दिया, तो अगर सामने वाले पर दस कोड़े पड़ेंगे, तो भाई, आपको सौ कोड़े खाने पड़ेंगे। ऐसी अवस्था आ जाती है। इसी कारण, वे कहते हैं, इनमें से किसी भी चीज़ से कभी छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए।
क्या तंत्र से लंबाई बढ़ाई जा सकती है?
हार्मोन, और सिद्धियाँ एक अलग विषय
पूछा जाता है कि क्या तंत्र से लंबाई बढ़ सकती है। वे पूछते हैं कि क्या आपने किसी बाबा जी का वीडियो देखा जिसमें उन्होंने लंबाई बढ़ाई हो। ऐसा कुछ नहीं होता। यह सब हार्मोन का काम है। तंत्र से लंबाई बढ़ाना संभव है या नहीं — सामान्य स्तर पर, जिस स्तर पर हम बात कर रहे हैं, ऐसा संभव नहीं है, और उन्होंने देखा भी नहीं। सिद्धियाँ, वे कहते हैं, अलग विषय हैं, अलग टॉपिक हैं।
क्या तंत्र से लंबाई बढ़ सकती है, उनसे पूछा जाता है। क्या आपने किसी बाबा जी का वीडियो देखा, वे पूछते हैं, जिसमें उन्होंने लंबाई बढ़ाई हो? ऐसा कुछ नहीं होता। यह सब हार्मोन का कमाल है। तंत्र से लंबाई बढ़ाना संभव है या नहीं — सामान्य स्तर पर, जिस स्तर पर हम बात कर रहे हैं, ऐसा संभव नहीं है। हमने देखा भी नहीं। सिद्धियाँ अलग विषय हैं। वह अलग टॉपिक है।
भक्षिणी तंत्र क्या है?
आभिचारिक गतिविधियों पर किसी बाद के सत्र के लिए टाला गया
पहले वे किसी से कहते हैं कि नींबू हटाइए और फिर हवन कीजिए। भक्षिणी तंत्र के बारे में पूछने पर वे कहते हैं कि आप या तो डाकिनी विद्या के भक्षिणी तंत्र के बारे में पूछ रहे हैं या यक्षिणी विद्या के। वे सब विषय किसी और समय आएँगे, आभिचारिक गतिविधियों और इस तरह के तंत्र के विषय पर।
नींबू हटाइए और फिर हवन कीजिए, भाई, वे कहते हैं। भक्षिणी तंत्र पर: आप भक्षिणी तंत्र के बारे में पूछ रहे हैं, यानी या तो आप डाकिनी विद्या के भक्षिणी तंत्र के बारे में पूछ रहे हैं, या यक्षिणी विद्या वाले के बारे में। अब वे सब विषय किसी और समय, वे कहते हैं — आभिचारिक गतिविधियों के विषय पर और इस तरह के तंत्र के विषय पर, किसी और समय।
सबसे ऊपर दीपदान विधि, खास तौर पर भैरव अष्टमी पर
दीपदान विधि, खास तौर पर भैरव अष्टमी पर
वे कहते हैं कि दो-तीन अनुष्ठान हैं जिन्हें वे बार-बार कहते हैं कि जारी रखिए। खास तौर पर दीपदान विधि: भैरव अष्टमी के दिन दीपदान विधि, चाहे भैरू जी के मंदिर में हो या घर पर, जहाँ भी करें। इससे इतनी ऊर्जा बनती है कि कितना भी बड़ा विचार हो, उसे अच्छी तरह हिला देती है। 108 दीपदान की विधि, वे कहते हैं, चैनल पर बताई गई है।
दो-तीन अनुष्ठान हैं, वे कहते हैं, जिनके बारे में हम बार-बार कहते हैं कि इन्हें करते रहिए। खास तौर पर दीपदान विधि। भैरव अष्टमी के दिन दीपदान विधि, चाहे भैरू जी के मंदिर में या घर पर, जहाँ भी करें। इतनी ऊर्जा बनती है, इतनी ऊर्जा, कि कितना भी बड़ा विचार हो, उसे अच्छी तरह हिला देती है। 108 दीपदान की विधि भी चैनल पर बताई गई है।
हर कृष्ण पक्ष अष्टमी पर दीपदान से क्या होता है?
ऐसा विचार कर्म जो कटे बिना नहीं रह सकता
वे कहते हैं कि अगर हर अष्टमी तिथि पर — चाहे केवल कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर — आप भैरू जी के नाम से वह दीपदान करें, तो ऐसा हो नहीं सकता कि विचार कर्म हुआ हो और वह कटे नहीं, टूटे नहीं। वह उसे खत्म कर देगा। भैरव तंत्र में ऐसी दीपदान विधि है, जितनी सरल और आसान हो सके उतनी बताई गई है। करके देखिए, वे कहते हैं, बहुत ऊर्जा बनती है।
अगर हर अष्टमी तिथि पर, वे कहते हैं — चाहे केवल कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर — आप भैरू जी के नाम से वह दीपदान करें, तो ऐसा हो नहीं सकता कि विचार कर्म हुआ हो और वह कटे नहीं, टूटे नहीं। वह उसे खत्म कर देगा। भैरव तंत्र में ऐसी दीपदान विधि है। जितनी सरल और आसान हो सके, उतनी बताई गई है। करके देखिए। बहुत ऊर्जा बनती है।
नारिकेल दीपदान विधि क्या है?
नारियल में 108 वर्तिकाओं का दीपदान, पर्व काल में
दूसरी, वे कहते हैं, नारियल में दीपदान की विधि है। वे कहते हैं कि वे इसे बार-बार बताते हैं, कई लाइव में भी, और अब वीडियो बार-बार शेयर नहीं करते। किसी भी पर्व काल में नारियल में दीपदान विधि, 108 वर्तिकाओं से — यानी 108 बत्तियाँ बनाकर। वे कैसे बनानी हैं, यह पूरी विधि लाइव में दिखाई गई थी। इसे करने से, अगर आपके पास एक प्रतिशत भी सकारात्मक ऊर्जा है, तो उसका सामर्थ्य इतना बढ़ जाता है कि उन्हें आपकी रक्षा करने का सामर्थ्य मिल जाता है, और मार्गदर्शन ठीक से मिलता है।
पहली वह थी; दूसरी वह दीपदान विधि है जो नारियल में बताई गई है, वे कहते हैं। जब भी पर्व काल आए — हम बार-बार कहते हैं, कई लाइव में भी कहा है, अब वह वीडियो बार-बार शेयर नहीं करते — भाई, नारियल में यह दीपदान विधि कीजिए। उसमें 108 वर्तिकाएँ, यानी 108 बत्तियाँ बनाकर। वे कैसे बनानी हैं, पूरी विधि लाइव में दिखाई गई थी। इसे करने से, अगर आपके पास एक प्रतिशत भी सकारात्मक ऊर्जा है, तो उसका सामर्थ्य इतना बढ़ जाएगा कि उन्हें आपकी रक्षा करने का सामर्थ्य मिल जाएगा, और मार्गदर्शन ठीक से मिलेगा।
नकारात्मक को देखने की बजाय अपनी सकारात्मक ऊर्जा क्यों बढ़ाएँ?
वह एक प्रतिशत जिसके कारण आप अभी भी खा रहे हैं और चल रहे हैं
वे कहते हैं: केवल नकारात्मक चीज़ें मत देखिए — कि शत्रु ने हम पर विचार किया है, प्रेत-पिशाच बाधा है, ऐसी परेशानी है। वह है और तब तक रहेगी जब तक उसकी काट न हो। पर अगर आपके पास एक प्रतिशत भी सकारात्मक शक्ति है, जिसके कारण आप खा-पी रहे हैं — अगर सौ प्रतिशत नकारात्मक होता तो आपका चलना-फिरना मुश्किल हो जाता — तो भाई, सबसे पहला काम उसे बढ़ाना है।
केवल नकारात्मक चीज़ें मत देखिए, वे कहते हैं — कि किसी शत्रु ने हम पर विचार किया है, प्रेत-पिशाच बाधा है, ऐसी परेशानी है। वह है। जब तक उसकी काट नहीं होगी, वह रहेगी। पर अगर आपके पास एक प्रतिशत भी सकारात्मक शक्ति है, जिसके कारण आप खा-पी रहे हैं — अगर सौ प्रतिशत नकारात्मक ही होता, तो आपका चलना-फिरना मुश्किल हो जाता। अगर एक प्रतिशत भी सकारात्मक ऊर्जा है, तो भाई, सबसे पहले यह कीजिए: उसे बढ़ाइए।
भैरव दीपदान व्यक्ति के आभामंडल और घर पर क्या करता है?
तेज़ आभामंडल, और नकारात्मकता के ढेर से खाली हुआ घर
वे कहते हैं कि जैसे-जैसे उनका सामर्थ्य बढ़ेगा, भैरव दीपदान से आपका आभामंडल तेज़ हो जाएगा और आपके घर की ऊर्जा बहुत अच्छी तरह बढ़ेगी। वहाँ जमा नकारात्मक ऊर्जाओं का ढेर पूरी तरह खाली हो जाएगा।
नारियल में पंच दीपदान किसके नाम से किया जाता है?
कुलदेवी और कुलदेवता, गृह शक्तियाँ, शक्ति पीठ, और जिसका पर्व काल हो
नारियल में जो पंच दीपदान करना है, वे कहते हैं, वह अपनी कुलदेवी और कुलदेवता के नाम से, गृह शक्तियों के नाम से, शक्ति पीठ के नाम से, और जिसका पर्व काल हो उसके नाम से होता है। सौ प्रतिशत, इससे इतनी ऊर्जा बनती है, इतनी ऊर्जा पैदा होती है, कि अगर उस समय उसके बाद आप वहीं बैठकर कोई भी मंत्र जप करें, तो आपको बहुत लाभ देगा।
नारियल में जो पंच दीपदान करना है, वे कहते हैं, वह अपनी कुलदेवी और कुलदेवता के लिए, गृह शक्तियों के लिए, शक्ति पीठ के लिए, और जिसका पर्व काल हो उसके लिए है। सौ प्रतिशत — इससे इतनी ऊर्जा बनती है, इतनी ऊर्जा पैदा होती है, कि अगर उस समय इसे करके आप वहीं बैठकर कोई भी मंत्र जप करें, तो आपको बहुत लाभ देगा। अगर आप नित्य पाठ करते हैं, तो भैरव दीपदान विधि कीजिए और वहीं बैठकर वही पाठ कीजिए। उसकी ऊर्जा पूरी बढ़ जाएगी और वह असर देने लगेगा।
जिस घर में लगातार झगड़े होते हों, वहाँ क्या करें?
जहाँ कलह-क्लेश न रुके, वहाँ भैरव दीपदान
जिस घर में कलह और क्लेश बहुत होता है — आपस में बार-बार झगड़ा, कुछ भी करें तो झगड़ा, दीया जलाने जाएँ तो भी झगड़ा — उस घर की रक्षा के लिए, वे कहते हैं, जहाँ भी ये चीज़ें हो रही हैं वहाँ भैरव दीपदान विधि ज़रूर करनी चाहिए।
घर के रक्षण के लिए, वे कहते हैं, जहाँ कलह और क्लेश बहुत होता है — आपस में झगड़ा होता है, झगड़ा, झगड़ा। हम कुछ भी करें, झगड़ा हो जाता है। हम दीया जलाने जाते हैं और झगड़ा हो जाता है। तो जहाँ भी ये चीज़ें हो रही हैं, वहाँ भैरव दीपदान की विधि ज़रूर करनी चाहिए।
अष्टमी के अलावा किन दिनों भैरव दीपदान करना चाहिए?
कोई भी पर्व काल — पूर्णिमा, अमावस्या, गंगा दशहरा, नरसिंह चतुर्दशी
वे कहते हैं: हर अष्टमी पर भैरव दीपदान विधि कीजिए, और जब भी पर्व काल आए — चाहे पूर्णिमा हो, अमावस्या हो, गंगा दशहरा आए, या अभी जो चतुर्दशी पड़ रही है, नरसिंह चतुर्दशी। उस दिन भी आप भैरव दीपदान कर सकते हैं, क्योंकि भगवान नरसिंह भी भैरव रूप में हैं। चतुर्दशी पर भी दीपदान हो सकता है। और अगर आप पर लगातार तंत्र विचार किया जा रहा है, तो भैरव दीपदान कीजिए।
हर अष्टमी पर भैरव दीपदान विधि कीजिए, वे कहते हैं, और जब भी पर्व काल आए — चाहे पूर्णिमा हो, अमावस्या हो, गंगा दशहरा आए, या अभी जो चतुर्दशी पड़ रही है, नरसिंह चतुर्दशी। उस दिन के लिए, वे कहते हैं, अगले दिन वे भगवान नरसिंह से जुड़ी कुछ साधनाएँ, कवच आदि डालेंगे। यह उन सबके रक्षण के लिए होगा जिन पर बहुत प्रेत और विचार बाधा है, क्योंकि ये सब विधियाँ सबसे तीव्र हैं। उस दिन दीपदान कीजिए। उस दिन भी आप भैरव दीपदान कर सकते हैं, क्योंकि भगवान नरसिंह भी भैरव रूप में हैं। चतुर्दशी पर भी दीपदान हो सकता है। और अगर आप पर लगातार तंत्र विचार किया जा रहा है, तो भैरव दीपदान कीजिए।
इस दीपदान की असली विधि क्या है?
कोई खास मंत्र नहीं — दीया, तेल, यंत्र, संकल्प, भोग, और जलते समय जप
वे कहते हैं कि इन सबमें किसी खास मंत्र का सवाल ही नहीं है। एक दीया है। उसे आराम से सजाना है, तेल डालना है, यंत्र बनाना है — पूरा वीडियो बनाकर दिखाया गया था। सुंदर सजाइए। संकल्प आदि की विधि बताई गई है। भोग लगाइए और फिर दीया जलाइए। और उसके बाद, हो सके तो पाँच-दस मिनट, या जब तक दीया जले, मंत्र जप कीजिए। यह बहुत खास असर देगा।
इन सबमें, वे कहते हैं, किसी खास मंत्र का विषय ही नहीं है। एक दीपक है। उसे आराम से सजाना है, तेल डालना है, यंत्र बनाना है — पूरा वीडियो बनाकर दिखाया गया है। सुंदर सजाइए। संकल्प आदि की विधि बताई गई है। भोग आदि लगाइए और फिर दीया जलाइए। और उसके बाद, हो सके तो पाँच मिनट या दस मिनट, या जब तक दीया जले, मंत्र जप कीजिए। यह बहुत खास असर देगा।
भ्रम ही वह ज़रिया है जिससे नकारात्मक शक्तियाँ पलती रहती हैं
भ्रम, जिसके ज़रिए नकारात्मक शक्तियाँ पलती रहती हैं
जब और कुछ समझ न आए, वे कहते हैं, तो यह सब कीजिए। और अगर मन में कोई शंका आए — कि यह मंत्र करेंगे तो ऐसा हो जाएगा — ऐसा कुछ नहीं। आपको भ्रमित करने के तरीके हैं, ताकि आप भ्रम में पड़ें और हनुमान चालीसा न पढ़ पाएँ, भैरव जी का पाठ न कर पाएँ। आप भ्रमित रहेंगे तभी वे नकारात्मक शक्तियाँ आपके ज़रिए अपना भोजन खाती रहेंगी, भोग भोगती रहेंगी। और जैसे ही आप भैरव दीपदान, नारिकेल दीप विधि करते हैं, उनका असर घटने लगता है। इसलिए इसे हमेशा जारी रखना चाहिए।
जब कुछ समझ न आए, वे कहते हैं, तो यह सब कीजिए। और अगर मन में कोई शंका आए — कि यह मंत्र करेंगे तो ऐसा हो जाएगा — ऐसा कुछ नहीं। आपको भ्रमित करने के तरीके हैं: भाई, भ्रम में पड़ जाओ, ताकि आप हनुमान चालीसा न पढ़ पाएँ, ताकि आप भैरव जी का पाठ न कर पाएँ। आप भ्रमित रहेंगे तभी वे नकारात्मक शक्तियाँ आपके ज़रिए अपना भोजन खाती रहेंगी, भोग भोगती रहेंगी। और जैसे ही आप भैरव दीपदान करते हैं, नारिकेल दीप विधि करते हैं, नारिकेल दीप विधि — बस यह सब करने से उनका असर घटने लगता है। इसलिए इसे हमेशा जारी रखना चाहिए।
पाँच साल पहले मंदिर में रखी तस्वीरें क्या वापस घर लाई जा सकती हैं?
जो घर से निकल गया, उसे वापस नहीं लाना चाहिए
पूछा जाता है कि पाँच साल पहले घर के मंदिर से जो तस्वीरें एक मंदिर में रख दी थीं, क्या उन्हें वापस घर में रखा जा सकता है। वे कहते हैं, नहीं — जो आपने घर से निकालकर मंदिर में रख दिया, उसे वापस मत लाइए।
कुछ तस्वीरें पाँच साल पहले घर के मंदिर से भगवान जी के मंदिर में रख दी थीं, क्या उन्हें वापस घर में रखा जा सकता है, उनसे पूछा जाता है। नहीं, भाई, वे कहते हैं। जो आपने घर से निकालकर मंदिर में रख दिया — उसे वापस मत लाइए। वे एक दूसरे प्रश्नकर्ता से यह भी कहते हैं कि अगर बंदर दिख रहे हैं तो हनुमान जी की सेवा कीजिए।
घर में कितने गणपति होने चाहिए?
केवल दो
घर में तीन गणपति इकट्ठे हो जाने के बारे में पूछने पर वे कहते हैं कि केवल दो गणपति होने चाहिए।
घर में तीन गणपति हो गए हैं, उन्हें बताया जाता है। केवल दो गणेश होने चाहिए, वे जवाब देते हैं।
पीपल के पत्तों पर दत्तात्रेय तर्पण अमावस्या पर दोहराएँ या पूर्णिमा पर?
पीपल के पत्तों पर दत्तात्रेय के नामों से तर्पण, केवल अमावस्या पर
एक श्रोता बताते हैं कि उन्होंने अमावस्या पर पीपल के पत्तों पर दत्तात्रेय के नामों से तर्पण किया था, और पूछते हैं कि क्या फिर से अमावस्या पर करें। वे जवाब देते हैं: नहीं, पूर्णिमा पर मत कीजिए — केवल अमावस्या पर कीजिए।
पूजा में न्यास कब करना चाहिए?
न्यास हमेशा संकल्प के बाद, मंत्र जप के समय
वे कहते हैं कि न्यास रोज़ करना चाहिए। आप जो भी मंत्र पाठ करें, चाहे भवानी सप्ताक्षरी मंत्र हो या कोई और मंत्र, न्यास हमेशा संकल्प के बाद करना होता है। संकल्प हम शुरू में लेते हैं — शुरू में गणपति या स्वस्तिवाचन आदि करके वहीं संकल्प ले लेंगे। उसके बाद न्यास करेंगे, जब मंत्र पाठ करने जाएँगे, जब मंत्र जप करने जाएँगे।
न्यास रोज़ करना चाहिए, वे कहते हैं। आप जिस भी मंत्र का पाठ करें — चाहे भवानी सप्ताक्षरी हो या कोई और मंत्र — न्यास हमेशा संकल्प के बाद करना होता है। संकल्प हम शुरू में लेते हैं: शुरू में गणपति या स्वस्तिवाचन आदि करके, वहीं संकल्प ले लेंगे। उसके बाद न्यास करेंगे, जब मंत्र पाठ करने जाएँगे, जब मंत्र जप करने जाएँगे।
सपने में शक्तियाँ दूर जाती दिखें तो इसका क्या अर्थ है?
या तो कोई अपराध हुआ है, या कोई आभिचारिक गतिविधि
एक श्रोता बताते हैं कि कुछ साल पहले सपने में लगा कि शक्तियाँ उनसे दूर जा रही हैं, और तब से जीवन बिगड़ गया है। वे जिन भवानी की पूजा करते थे। वे कहते हैं कि भगवती जिन भवानी के स्थान पर जाकर देखिए। यह केवल दो तरह से हो सकता है। या तो आपसे जाने-अनजाने कोई अपराध हुआ है, जिसके कारण भगवती की शक्तियाँ आपसे दूर चली गई हैं। या फिर कोई आभिचारिक गतिविधि हुई है और यह उसके कारण है।
कुछ साल पहले सपने में लगा कि शक्तियाँ मुझसे दूर जा रही हैं, और उसके बाद जीवन बिगड़ गया, एक श्रोता कहते हैं। वे जिन भवानी की पूजा करते थे। भगवती जिन भवानी के स्थान पर जाकर देखिए, वे जवाब देते हैं। यह केवल दो तरह से हो सकता है। या तो आपसे जाने-अनजाने कोई अपराध हुआ है, जिसके कारण भगवती की शक्तियाँ आपसे दूर चली गई हैं। या फिर कोई आभिचारिक गतिविधि हुई है, और यह उसके कारण है।
सेवा-पूजा और क्षमा याचना के साथ उनके स्थान पर लौटिए
सेवा-पूजा और क्षमा याचना के साथ उनके स्थान पर लौटना
वे कहते हैं कि दोनों बातों के लिए, अगर आप भगवती की पूजा करते थे, तो फिर से उन्हीं के स्थान पर जाइए। वहाँ माई की सेवा-पूजा कीजिए, और क्षमा याचना करते हुए कहिए कि आप फिर से आगे बढ़ना चाहते हैं, कि उनकी कृपा मिली है। तब भगवती ज़रूर आप पर कृपा करेंगी।
दोनों बातों के लिए, वे कहते हैं, अगर आप भगवती की पूजा करते थे, तो एक बार फिर उन्हीं के स्थान पर जाइए। वहाँ माई की सेवा-पूजा कीजिए, और क्षमा याचना करते हुए कहिए कि आप फिर से आगे बढ़ना चाहते हैं, कि उनकी कृपा मिली है। तब भगवती ज़रूर आप पर कृपा करेंगी।
खड्ग, मुद्गर, नरमुंड और खप्पर वाला रूप क्या दर्शाता है?
खप्पर वाली कालिका उग्र, दक्षिण कालिका के मुकाबले
एक श्रोता एक रूप बताते हैं जिसमें खड्ग, मुद्गर, नरमुंड और खप्पर है, शिव जी चरणों में हैं और बायाँ पैर माता जी का ऊपर है — यानी भगवती ने अपना बायाँ पैर शिव जी पर रखा है। वे कहते हैं कि अगर खप्पर वाली कालिका है तो वह उग्र है। दक्षिण कालिका होती तो केवल नरमुंड और खड्ग होता।
खड्ग, मुद्गर, नरमुंड और खप्पर है; शिव जी चरणों में हैं, बायाँ पैर माता जी का ऊपर है, एक श्रोता बताते हैं — यानी भगवती ने अपना बायाँ पैर शिव जी पर रखा है। देखिए, वे कहते हैं: अगर खप्पर वाली कालीका है, तो वह उग्र है। दक्षिण कालिका होती, तो केवल नरमुंड होता, खड्ग होता।
पूजा में मन न लगे तो क्या करना चाहिए?
मासिक शिवरात्रि पर शिव पर चाँदी का चंद्र चढ़ाना
जिस श्रोता के कामाख्या कवच से स्वप्न दोष हो रहा है, उनसे वे कहते हैं कि अगर कवच ठीक से प्राप्त नहीं हुआ है तो अपना मुख्य कवच इस तरह मत कीजिए। जिनका मन बहुत कोशिश के बाद भी चंद्र के कारण पाठ में नहीं लगता, उनसे वे कहते हैं कि मासिक शिवरात्रि के दिन संकल्प करके शिव जी पर चाँदी का चंद्र चढ़ाना चाहिए। जैसे ही वह शांत होगा, उच्चाटन का असर कम होगा और मन पूजा-पाठ में लगेगा।
कामाख्या कवच से स्वप्न दोष होने पर वे श्रोता से कहते हैं कि अगर कवच ठीक से प्राप्त नहीं हुआ है, तो अपना मुख्य कवच इस तरह मत कीजिए। जिनका मन बहुत कोशिश के बाद भी चंद्र के कारण पाठ में नहीं लगता, उनसे वे कहते हैं कि मासिक शिवरात्रि के दिन संकल्प करके शिव जी पर चाँदी का चंद्र चढ़ाना चाहिए। जैसे ही वह शांत होगा, उच्चाटन का असर कम होगा, और मन पूजा-पाठ में लगेगा।
रक्षा प्रयोग में बेल की लकड़ी से क्या किया जाता है?
बेल की समिधा पर अनुष्ठान, और बेल की लकड़ी की कील
वे कहते हैं कि जहाँ बेल के पेड़ की लकड़ी पर, समिधा पर तंत्र मंत्रों का अनुष्ठान होता है, वहाँ जो मंत्र रक्षा-प्रधान हैं वे ज़्यादा असर देते हैं। और फिर बेल की लकड़ी से कील बनाई जाती है, और उसके ज़रिए भी रक्षण की विधि की जाती है।
कुत्ते वाला प्रयोग निष्कासित तत्व से युक्त है, वे कहते हैं, और अगर हम उसे निष्कासन में लगाते हैं, तो सीधे भावनात्मक क्रिया कर्म करते हैं। या बेल के पेड़ की लकड़ी पर, समिधा पर तंत्र मंत्रों का अनुष्ठान होता है। तब जो मंत्र रक्षा-प्रधान हैं, वे ज़्यादा असर देते हैं। और फिर बेल के पेड़ की लकड़ी से कील बनाई जाती है, और उसके ज़रिए भी रक्षण की विधि की जाती है।
निकारी विधि में श्री-तत्व वाली चीज़ें क्यों नहीं लेनी चाहिए?
घर की श्री देने वाली शक्ति का असर घटना, और बंधन के बाद लक्ष्मी का घटना
वे कहते हैं कि अगर निकारी के लिए हम श्री तत्व से युक्त चीज़ें लेते हैं, तो कभी-कभी गड़बड़ हो जाती है। मान लीजिए घर में कोई तत्व-युक्त शक्ति है जो रक्षा-प्रधान नहीं, बल्कि श्री देने वाली है — तो उसका असर भी कम हो जाता है। ऐसी अवस्था में बंधन होने के बाद लक्ष्मी घटने लगेगी और श्री की हानि होगी। इसी कारण ऐसी चीज़ें निकारी विधि में ऐसे ही कभी नहीं लेनी चाहिए।
अगर निकारी के लिए हम श्री तत्व से युक्त चीज़ें लेते हैं, वे कहते हैं, तो कभी-कभी यह गड़बड़ हो जाती है। मान लीजिए घर में कोई तत्व-युक्त शक्ति है जो श्री देने वाली है, रक्षा-प्रधान नहीं — तो उसका असर भी कम हो जाता है। ऐसी अवस्था में होगा यह कि बंधन होने के बाद लक्ष्मी घटने लगेगी, श्री की हानि होने लगेगी। इसी कारण निकारी विधि में इसे ऐसे ही, सीधे कभी नहीं लेना चाहिए।
जो नवार्ण मंत्र में दीक्षित नहीं है, उसे क्या पढ़ना चाहिए?
दुर्गा चालीसा के साथ जयंती मंगला मंत्र
नेहा चौधरी जी, जिन्हें सपने में माँ काली ने प्रसाद दिया, उन्हें वे कहते हैं कि अगर दीक्षित हैं तो नवार्ण मंत्र का जप कीजिए। नहीं तो, अगर भगवती की दुर्गा चालीसा का पाठ कर रही हैं, तो अपनी क्षमता के अनुसार जयंती मंगला मंत्र का जप कीजिए।
माँ काली ने सपने में प्रसाद दिया, नेहा चौधरी जी कहती हैं। और अगर आप दीक्षित हैं तो नवार्ण मंत्र का जप कीजिए, वे जवाब देते हैं। नहीं तो, अगर आप भगवती की दुर्गा चालीसा का पाठ कर रही हैं, तो अपनी क्षमता के अनुसार जयंती मंगला काली मंत्र का जप कीजिए।
गोत्र पता न हो तो क्या करना चाहिए?
कश्यप गोत्र मानकर चलना
वे कहते हैं कि अगर गुड़गाँव की शीतला मैया की फोटो नहीं रखी है, तो भगवती दुर्गा की फोटो रखकर पूजा कीजिए। और अगर गोत्र पूरा पता न चल सके, तो कश्यप गोत्र मानकर चलिए। पता करना हो तो किसी बड़े-बुज़ुर्ग से ही पता चलेगा। आज के समय में बहुत से घर ऐसे हैं जो गोत्र आदि के बारे में भूल गए हैं।
भगवती दुर्गा की फोटो रखकर पूजा कीजिए, वे कहते हैं, अगर आपने गुड़गाँव की शीतला मैया की फोटो नहीं रखी है। और अगर गोत्र पूरा पता न चल सके, तो कश्यप गोत्र ही मानकर चलिए। पता करना — कैसे पता करेंगे; कोई बड़ा-बुज़ुर्ग हो तभी पता चलेगा कि कैसा है। आज के समय में बहुत से घर ऐसे हैं जो गोत्र आदि के बारे में भूल गए हैं।
रोज़ के भैरव महामंत्र हवन की पूर्णाहुति कैसे दें?
रोज़ हवन हो तो सुपारी से पूर्णाहुति
रोज़ भैरव महामंत्र की एक माला का हवन करने के बारे में पूछने पर वे कहते हैं कि अगर आप रोज़ पूर्णाहुति भी कर रहे हैं, तो पूर्ण फल दे सकते हैं — यानी सुपारी से।
अगर रोज़ भैरव महामंत्र की एक माला का हवन हो, तो पूर्णाहुति का क्या, उनसे पूछा जाता है। अगर आप रोज़ पूर्णाहुति कर रहे हैं, वे कहते हैं, तो पूर्ण फल दे सकते हैं — यानी सुपारी से। वे सत्र यह कहकर समाप्त करते हैं कि फिर मिलेंगे, और तब तक, जय माँ विंध्यवासिनी।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।