गृहस्थ साधक के प्रश्नोत्तर — अधिकार, विधान, और सार्वजनिक रूप से सिखाई जाने वाली बातों की सीमा

पूजन विधान, अधिकार, ज्योतिष और साधना क्रम पर प्रश्नोत्तर।

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Questions this answers

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The notes
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01

क्या श्री राम को प्रसन्न करने का कोई तांत्रिक विधान है?

तंत्रोक्त विधान से श्री राम का मंत्र

· 01:20–01:53 · Also a question

रामचरितमानस कहता है कि श्री राम का प्रिय बनने के लिए शिव की भक्ति भी करनी चाहिए। इसी पर पूछा गया कि क्या तंत्र में श्री राम को प्रसन्न करने का कोई विधान है। वक्ता कहते हैं कि अवश्य है। भगवान श्री राम का मंत्र केवल भक्ति विधान से ही नहीं, तंत्रोक्त विधान से भी किया जा सकता है, जिसमें पंचांग सेवन का विधान रहेगा।

02

क्या दत्त माला मंत्र से पहले गुरु दत्तात्रेय की बारह नामों से पूजा की जा सकती है?

दत्त के बारह नाम, फिर दत्त माला मंत्र

· 02:38–02:50 · Also a question

एक श्रोता किसी परंपरा में दीक्षित हैं। वे पूछते हैं कि क्या वे गुरु दत्त का बारह नामों से पूजन करके बाद में दत्त माला मंत्र की ओर जा सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि हाँ, आप बिल्कुल कर सकते हैं।

एक श्रोता कहते हैं कि वे किसी परंपरा में दीक्षित हैं। वे पूछते हैं कि क्या वे गुरु दत्त का बारह नामों से पूजन कर सकते हैं और बाद में दत्त माला मंत्र की ओर बढ़ सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं।

03

घर में लड्डू गोपाल की सेवा कैसे करनी चाहिए?

शालिग्राम सेवा के ढंग पर लड्डू गोपाल की सेवा

· 02:51–03:39 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि शालिग्राम सेवा का पूरा नियम यहाँ भी लागू होता है। अगर लगभग उतना नियम निभ सके तो उत्तम है। यानी रोज़ अभिषेक, अच्छा श्रृंगार, माखन-मिश्री का नैवेद्य, आरती, और संध्या आरती के बाद रात्रि का नैवेद्य भी, साथ ही उनके शयन की व्यवस्था।

04

तीसरा नेत्र जगाने की सबसे अच्छी विधि कौन-सी है?

तीसरे नेत्र की कोई उत्तम, मध्यम या निम्न विधि नहीं होती

· 03:40–04:52 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है — उत्तम विधि और मध्यम विधि जैसा कुछ नहीं। एक दिन में कर देने वाली सबसे अच्छी विधि की बात केवल अनुभवहीन लोग करते हैं। जिसे उस स्तर का अनुभव है, वह कभी नहीं कह सकता कि यह मध्यम है, वह निम्न है और कोई ऊँची। यह मंत्र जप से, त्राटक से, पंचांग साधना को अंग बनाकर, गीता के बार-बार पाठ से, सप्तशती पाठ से, हवनात्मक विधान से होता है — तपोबल बढ़ने से, और उसमें कम से कम थोड़ा ध्यान ज़रूर हो।

05

क्या त्रिनेत्र और दिव्य नेत्र मिलना एक ही बात है?

त्रिनेत्र और देव नेत्र दो अलग विषय हैं

· 04:53–05:13 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि त्रिनेत्र वही है जिसका वर्णन वे अभी कर रहे थे; नेत्र मिलने की बात अलग है। देवताओं द्वारा नेत्र प्रदान करना, या भगतवाल में नेत्र की प्राप्ति, बिल्कुल अलग विषय है। किन तरीकों से नेत्र मिलता है, इस पर चैनल पर एक वीडियो है।

06

भैरव के दीपक से तेल रिसे या पितरों के कलश से पानी रिसे, तो इसका क्या अर्थ है?

तेल रिसना और कलश का रिसना कोई शकुन नहीं

· 05:14–06:50 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इन्हें बस ठीक से बदल दीजिए और इसमें कोई अर्थ मत पढ़िए। वे नहीं कह सकते कि तेल रिसना अशुभ है या पानी रिसना अच्छा या बुरा है। जोड़ वाला दीपक रिस सकता है, जबकि घी गाढ़ा होता है और नीचे जम जाता है, इसलिए नहीं रिसता। मटका अपने बारीक छिद्रों से थोड़ा रिसता ही है, और इसी से उसका पानी ठंडा रहता है — बिल्कुल न रिसे, यह संभव नहीं।

07

सूर्य देव को अर्घ्य कैसे देना चाहिए?

सूर्य को अर्घ्य, और तांबे का पात्र केवल पुरुषों के लिए

· 06:51–07:37 · Also a question

अगर आप संध्या करते हैं, तो संध्या के भीतर बताया गया अर्घ्य अलग विषय है, और उस तरह देना उत्तम है। संध्या न करें और सामान्य अर्घ्य देना हो, तो किसी पात्र में जल लेकर सादे जल से अर्घ्य दीजिए; अक्षत और चंदन — लाल चंदन या रोली — भी डाल सकते हैं, गुड़ भी डाला जा सकता है। पर अगर तांबे के पात्र, तांबे के लोटे से जल दें, तो केवल पुरुष दें: स्त्रियाँ तांबे के लोटे से जल न दें।

08

क्या काली की योगिनी पूजा मंदिर के भीतर की जा सकती है?

तंत्रोक्त विधान मंदिर में सार्वजनिक रूप से नहीं हो सकता

· 07:38–08:14 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि मंदिर में भी वही विधान करना होगा, बस श्री विग्रह की जगह भगवती का विग्रह होगा। पर तंत्रोक्त विधान मंदिर में सार्वजनिक रूप से नहीं किया जा सकता। मंदिर में केवल मंत्र का जप हो सकता है, और वह भी दीपक जलाकर — कर्म साक्षी दीपक, भगवती का दीपक। पूरा विधान हमेशा एकांत में होगा।

09

आहुति मृगी मुद्रा से क्यों दी जाती है, पर बगलामुखी के हवन में मुट्ठी भर क्यों?

आहुति की मुद्रा कर्म और संकल्प के अनुसार होती है

· 08:15–08:59 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि आहुति किस स्वरूप को, किस कारण से दी जा रही है, और उस समय संकल्प क्या है। भगवती षट्कर्म की देवी हैं। शांतिक और पौष्टिक कर्म की आहुति केवल मृगी मुद्रा से दी जाती है। जब आहुति उग्र विषय, विधान या मंत्र की हो — शत्रु को स्तंभित या उच्चाटित करने के लिए — तो देवी-देवता का विषय भी वैसा हो जाता है, इसलिए वैसे दी जाती है, विशेषकर फट्कार मंत्रों में।

10

अमावस्या पर हवन किन मंत्रों और सामग्री से करना चाहिए?

अमावस्या का हवन — जयंती मंगला काली, गुग्गुल, घी और काले तिल

· 09:00–09:21 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अमावस्या पर हवन वैसे ही होता है जैसे सबका हवन होता है। मुख्य रूप से, अगर जयंती मंगला काली मंत्र से दिया जाए और आहुति घी के साथ गुग्गुल की हो, उसमें काले तिल मिले हों, तो बहुत दिव्य है। भगवान श्री हरि नारायण, भगवान शिव, भगवती लक्ष्मी और भगवती पार्वती के नाम मंत्रों से भी आहुति हो।

11

किसी ग्रह का बीज मंत्र सिद्ध करने के लिए कितना जप चाहिए?

सिद्धि के लिए सवा लाख, एकाक्षरी के लिए चार लाख

· 09:22–10:09 · Also a question

पूछा गया कि बृहस्पति का बीज मंत्र ग्यारह हज़ार जप से सिद्ध होता है या उसके चार गुना से। वक्ता कहते हैं कि संख्या उनके ध्यान में नहीं है, पर ग्यारह हज़ार से सिद्धि नहीं आती। चतुर्गुणी जप का विधान प्रयोग का है, सिद्धि के बाद। सिद्धि के लिए कम से कम सवा लाख, और एकाक्षरी बीज मंत्र कर रहे हों तो चार लाख — सामान्य संख्या एक लाख है, कलियुग में चार लाख। उसके बाद ही प्रयोग विधान आता है, जिसमें संख्या ग्यारह हज़ार हो तो ग्यारह हज़ार, और विशेष परिस्थिति में चतुर्गुणी जप।

12

क्या मैं शाम को रुद्री का पाँचवाँ अध्याय पढ़ सकता हूँ?

रुद्री पाठ के लिए यज्ञोपवीत आवश्यक

· 10:10–10:25 · Also a question

पूछा गया कि क्या तपोबल बढ़ाने के लिए, नमः मंत्र की तरह, शाम को रुद्री का पाँचवाँ अध्याय पढ़ा जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि अगर आप यज्ञोपवीत धारण करते हैं तो अवश्य पढ़ सकते हैं।

एक श्रोता पूछते हैं कि क्या वे शाम को रुद्री का पाँचवाँ अध्याय पढ़ सकते हैं, यह कहते हुए कि इससे नमः मंत्र की तरह उनका तपोबल बढ़ेगा। वक्ता कहते हैं कि भैया, अगर आप यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करते हैं, तो अवश्य कर सकते हैं।

13

किसी अपरिचित स्थानीय कुलदेवी की सेवा कैसे सीखें?

सरौंद की काली माई, जिन्हें चिल्ले भवानी भी कहते हैं

· 10:26–10:55 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि उनकी कुलदेवी सरौंद की काली माई हैं, जो महाकाली का एक रूप हैं। उन्हें पता चला है कि वे दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर की भी कुलदेवी हैं और उनका नाम चिल्ले भवानी भी है। वे उनकी सेवा पूछते हैं। वक्ता कहते हैं कि उन्हें इन स्वरूपों का ज्ञान नहीं है; कभी स्वयं उस स्थान पर जाइए और वहीं से जानकारी लीजिए, और वहाँ उनका कोई भक्त हो तो वह आपको अच्छे से और सही बताएगा।

14

एक ही बैठक में दो अलग मंत्रों का जप कैसे करें?

एक संकल्प, एक आसन; न्यास और समर्पण देवता-देवता करके

· 10:56–11:49 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि हाँ, आप बिल्कुल ऐसा कर सकते हैं, पर यह अनुष्ठान नहीं होना चाहिए — यह आपका नित्य जप का विषय है। संकल्प एक ही होगा, एक आसन पर। पहले भगवती का न्यास करके उनका जप पूरा होगा, फिर शिव का न्यास और उनका जप। समर्पण हर एक के बाद: भगवती के जप के बाद भगवती का समर्पण, शिव के जप के बाद शिव का समर्पण।

15

नरसिंह माला मंत्र के जप के बाद क्रोध क्यों आता है?

उग्र, वीर भाव का मंत्र अपने साथ कुछ क्रोध लाता है

· 11:50–12:18 · Also a question

एक श्रोता ने अविचार के नाश के लिए मंदिर में 108 दिन तक रोज़ नरसिंह माला मंत्र के 108 जप का संकल्प लिया है। वे कहते हैं कि पहले जप के बाद मन में क्रोध उठने लगा। वक्ता कहते हैं कि भगवान नरसिंह का जप उग्र भाव, वीर भाव से होता है; जब भाव ऐसा हो और देवता का विषय ऐसा हो, तो उग्रता से कुछ क्रोध की उपस्थिति होगी ही। क्षमा प्रार्थना आदि कीजिए और बाद में स्तुति पढ़िए — उससे क्रोध नहीं आएगा। इसे सौम्य रखिए।

16

साधक को अपनी श्वास पर नियंत्रण रखने को क्यों कहा जाता है?

उग्र भाव का समर्पण भी समर्पण के समय करना है

· 12:19–13:08 · Also a question

वक्ता इसे पिछले प्रश्नकर्ता के उदाहरण से समझाते हैं: अगर वे नरसिंह के माला मंत्र का जप उग्र भाव से, मंत्र के अपने असली वीर भाव से करते हैं, तो उन्हें सबसे उत्तम फल मिलेगा — यह उग्र भाव से ही होना चाहिए। पर जब पूजा का समर्पण हो, उसी समय उस भाव का भी समर्पण देवता के चरणों में होना चाहिए, ताकि वह भाव, वीरता, उग्रता आपके शरीर में न रह जाए; नहीं तो बिना कारण क्रोध आएगा और आप उसे नियंत्रित नहीं कर पाएँगे।

17

क्या जयंती मंगला काली मंत्र और बटुक भैरव के 108 नाम एक ही माला पर किए जा सकते हैं?

दोनों के लिए एक माला, वज्र कवच में बताए ढंग से

· 13:09–13:26 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं। वज्र कवच में जैसे बताया गया है, वैसे जप कीजिए। केवल एकाक्षरी का जप करें, तो वह भी सही है — कोई दिक्कत नहीं।

क्या जयंती मंगला काली मंत्र और बटुक भैरव के 108 नाम एक ही माला पर किए जा सकते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किए जा सकते हैं। वज्र कवच में जैसे बताया गया है, उस तरह जप कीजिए। केवल एक एकाक्षरी का जप करेंगे, तो वह भी सही है — उसमें कोई दिक्कत नहीं।

18

जब दरिद्रता चरम पर पहुँच जाए तो क्या करें?

किसी विद्वान ज्योतिषी से जन्म कुंडली का विश्लेषण कराइए

· 13:27–14:01 · Also a question

एक श्रोता लिखते हैं कि उनकी दरिद्रता सीमा पर पहुँच गई है; सरकारी नौकरी या कोई भी काम सोचते ही शरीर में बहुत कष्ट होने लगता है, और कोई काम नहीं होता, सब रुक जाता है। वक्ता कहते हैं कि इसके लिए किसी विद्वान ज्योतिषी से एक बार अपनी जन्म कुंडली का विश्लेषण ज़रूर कराइए, ताकि पता चले कि विषय क्या है।

19

क्या किसी स्त्री को बटुक भैरव ब्रह्म कवच से अभिमंत्रित धागा दिया जा सकता है?

इसके बजाय कामाख्या कवच से करें

· 14:02–14:10 · Also a question

पूछा गया कि क्या स्त्रियों को कमर में बाँधने के लिए बटुक भैरव ब्रह्म कवच से अभिमंत्रित धागा दिया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि इसे कामाख्या कवच से करना बेहतर है।

एक श्रोता पूछते हैं कि क्या स्त्रियों को बटुक भैरव ब्रह्म कवच से अभिमंत्रित करवाकर कमर में बाँधने के लिए धागा दिया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि भैया, उससे बेहतर कामाख्या कवच से कीजिए।

20

क्या देव तर्पण करते समय संकल्प लेना चाहिए?

देव तर्पण में संकल्प

· 14:11–14:15 · Also a question

पूछा गया कि क्या देव तर्पण करते समय संकल्प लेना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि अवश्य लेना चाहिए।

क्या देव तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। करते समय संकल्प लेना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि अवश्य लेना चाहिए।

21

गोत्र से अपनी कुलदेवी का पता कैसे लगाएँ?

वंशावली और गोत्रावली के ग्रंथ

· 14:16–14:40 · Also a question

भारद्वाज गोत्र के एक चतुर्वेदी श्रोता पूछते हैं कि गोत्र के अनुसार कुलदेवी की जानकारी कैसे मिल सकती है। वक्ता कहते हैं कि गोत्र के अनुसार जानकारी के लिए बहुत से ग्रंथ प्रकाशित हैं; वंशावली, गोत्रावली आदि के ग्रंथों में से किसी विद्वान ग्रंथ को एक बार देख लीजिए, बात सुलझ जाएगी।

22

विद्यार्थी पढ़ाई के लिए माँ सरस्वती की प्रचंड साधना कैसे करे?

पढ़ाई प्रचंडता से करें; साधना सीमित रखें

· 14:41–15:59 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि प्रचंड साधना प्रचंडता से ही होगी — माँ सरस्वती या गणपति की जो साधना करनी हो, प्रचंडता से कीजिए। पर अगर पढ़ाई में अच्छा करना है, तो पढ़ाई अच्छे से कीजिए: प्रचंडता से पढ़ाई ही होनी चाहिए। साधना सौम्यता से, तय समय और तय संख्या में होनी चाहिए। प्रचंड साधना में डूब गए, तो विद्यार्थी की सारी विद्या उसी में चली जाएगी। सरस्वती कवच और भगवान गणपति के कवच का जप कीजिए और उसे सिद्ध करने का प्रयास कीजिए — लंबा चलाने की इच्छा हो तो रोज़ ग्यारह बहुत अच्छा है; रोज़ इससे अधिक की ज़रूरत नहीं।

23

लंबी बीमारी, रुके व्यापार और बार-बार गर्भपात के लिए क्या करें?

पूरे विषय पर जन्म कुंडलियों के साथ चर्चा ज़रूरी

· 16:00–16:19 · Also a question

एक श्रोता लिखते हैं कि उनके माता-पिता और पत्नी का स्वास्थ्य अक्सर खराब रहता है, आठ साल से व्यापार में कुछ नया नहीं हो पा रहा, और तीन बार गर्भ गिर चुका है। वक्ता कहते हैं कि इस पर एक बार जन्म कुंडलियों के साथ पूरी चर्चा होनी चाहिए — तभी पता चलेगा कि विषय क्या है। यह घर और जन्म कुंडली का मामला है, परिवार के सदस्यों का मामला है।

24

क्या जयंती मंगला काली का जप महाकाली को, या एक साथ कई देवियों को समर्पित किया जा सकता है?

एक जप का समर्पण महाकाली, महालक्ष्मी और कुल दुर्गा को एक साथ

· 16:20–16:30 · Also a question

पूछा गया कि क्या जयंती मंगला काली का जप माँ महाकाली को समर्पित किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। फिर पूछा गया कि क्या महाकाली, महालक्ष्मी और अपनी कुल दुर्गा को एक ही समय साथ में समर्पित किया जा सकता है; वे कहते हैं कि वह भी किया जा सकता है।

क्या जयंती मंगला काली मंत्र का जप माँ महाकाली को समर्पण किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। फिर पूछा गया कि क्या महाकाली, महालक्ष्मी और अपनी कुल दुर्गा को एक साथ, एक ही समय समर्पण दिया जा सकता है। वे कहते हैं कि वह भी किया जा सकता है।

25

शिवलिंग की पूजा से पहले पूजन किस क्रम में होता है?

पहले कीर्तिमुख, फिर नंदी, त्रिशूल, अर्घी और लिंग

· 16:31–17:01 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि सामान्य रूप से भगवान शिव के पूजन से पहले कीर्तिमुख के नाम से अर्घ्य दीजिए और अक्षत आदि अर्पित कीजिए; उसके बाद नंदीश्वर का पूजन, फिर भगवान के अस्त्र त्रिशूल का पूजन, फिर भगवान की अर्घी पर गणपति, कार्तिकेय, भगवती अशोक सुंदरी और भगवती पार्वती का पूजन; फिर अर्घी के निकास मार्ग पर सभी देवताओं का पूजन; फिर वासुकी नाग का पूजन; और उसके बाद शिवलिंग का पूजन।

26

क्या त्रिकोण में किया गया जप सिद्ध होता है?

त्रिकोण के भीतर किया गया जप और पाठ

· 17:02–17:17 · Also a question

पूछा गया कि कुंजिका कवच कैसे सिद्ध करें, और क्या त्रिकोण में किया गया जप सिद्ध होता है। वक्ता कहते हैं कि जप और पाठ — हाँ भैया, सिद्ध होता है।

एक श्रोता पूछते हैं कि कुंजिका कवच को कैसे सिद्ध करें, और क्या त्रिकोण के भीतर किया गया जप सिद्ध होता है। वक्ता कहते हैं कि जप और पाठ — हाँ भैया, सिद्ध होता है।

27

क्या दूर रहने वाली परिवार की किसी दूर की शाखा का सूतक लगता है?

तेरह दिन का सूतक नहीं, पर एक नियम फिर भी बनाना चाहिए

· 17:18–17:57 · Also a question

एक श्रोता पूछते हैं कि चार पीढ़ी पहले की शाखा — उनके दादा के दूसरे भाई के परिवार — में सूतक-पातक लगा है; वे बाहर रहते हैं और आना-जाना नहीं है, तो क्या तेरह दिन पूजन-पाठ रुकेगा। वक्ता कहते हैं कि अगर आना-जाना और साथ खाना-पीना नहीं है, तो जहाँ तक सूतक का विषय है, तेरह दिन का सूतक नहीं है — पर एक नियम बनाना चाहिए: कम से कम पहले दिन का नियम, और अंतिम दिन, तेरहवें दिन जिस दिन दशकातर होता है, उसका सारा नियम आप लोगों को भी बनाना चाहिए, अगर यह आपकी जानकारी में है।

28

अगर घर की कोई लोक देवी रुष्ट हो जाए तो क्या करें?

कौन-सी लोक देवी है, यह जाने बिना कुछ नहीं कहा जा सकता

· 17:58–18:05 · Also a question

पूछा गया कि घर की रुष्ट हुई लोक देवी को मनाने के लिए क्या करें। वक्ता कहते हैं कि उस लोक देवी के बारे में जाने बिना इस पर कुछ कहा ही नहीं जा सकता — वे कौन हैं, कैसे मानेंगी, यह कैसे बताया जा सकता है?

घर की रुष्ट हुई लोक देवी को मनाने के लिए क्या करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि लोक देवी के बारे में जाने बिना इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता। वे कौन हैं, किस तरह मानेंगी — यह कैसे बताया जा सकता है?

29

कौन-सी शक्तियाँ व्यक्ति से बिना जाने भविष्य की बातें कहलवाती हैं?

पारलौकिक शक्तियाँ जो मोहित करके आगे का मार्ग रोक देती हैं

· 18:06–18:51 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि वे जिसे जो बताते हैं वह सच होता है — बुझा से मृत्यु तक निकाल देते हैं — पर कभी समझ नहीं पाए कि यह कैसे करते हैं, और कभी-कभी यह साधना में रहते हुए होता है। वक्ता कहते हैं कि पारलौकिक शक्तियाँ ठीक ऐसी ही होती हैं: अपनी छटांक भर कृपा करके व्यक्ति को मोहित करती हैं और फिर आगे का पूरा मार्ग रोक देती हैं। इनमें नहीं फँसना चाहिए। मैं कैसे जानता हूँ, कैसे जानूँगा, यह क्या हो रहा है — कभी-कभी पता ही नहीं चलता। जानने की ज़रूरत क्या है? आपका लक्ष्य केवल इतने तक सीमित थोड़े ही है।

30

बटुक भैरव की मूर्ति कितनी बड़ी होनी चाहिए?

तीन इंच कोई नियम नहीं — छह तक, घर में दस तक भी

· 18:52–19:06 · Also a question

पूछा गया कि क्या बटुक भैरव की मूर्ति तीन इंच की ही होनी चाहिए। वक्ता कहते हैं कि यह निर्भर करता है — तीन ही हो, ऐसा नहीं; छह तक की रख सकते हैं। घर में दस तक की भी रख सकते हैं, पर तब सेवा-पूजा ठीक से हो।

क्या बटुक भैरव की मूर्ति केवल तीन इंच की ही रखनी चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि भैया, यह निर्भर करता है। ऐसा नहीं है कि तीन ही हो — छह तक रख सकते हैं। घर में दस तक की भी रख सकते हैं, पर तब सेवा और पूजा अच्छे से हो।

32

मंत्र के दस संस्कारों की विधि यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर पहले से पूरी वायरल है, इसलिए उनसे पुष्टि लेने की ज़रूरत नहीं

यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर वायरल दस संस्कार

· 19:25–19:52

मंत्र जागृत हो, इसके लिए मंत्र के दस संस्कारों की विधि पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि लोग पहले से बता रहे हैं — यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर पूरी वायरल है, देख लीजिए। वे कहते हैं कि वे जानते हैं प्रश्न कहाँ से आ रहा है और उनसे पुष्टि लेने की ज़रूरत नहीं: वीडियो में दिखाया गया है कि दस विधियाँ किस ढंग से होती हैं और मंत्र को किन बीजों से संपुटित करना है, ताकि मंत्र जागृत हो जाए। कीजिए और आनंद लीजिए, वे कहते हैं; उन्होंने इस पर बोलना छोड़ दिया है।

33

मंत्र के दस संस्कार वास्तव में किस परिस्थिति में और किस मंत्र पर किए जाते हैं?

कोई नहीं बता रहा कि किसका मंत्र-संस्कार कभी नहीं करना

· 19:53–20:51 · Also a question

वक्ता प्रश्न को उलटकर रखते हैं। आजकल लोग भगवती तारा के मंत्र का बहुत जप कर रहे हैं, जैसे बीच में भगवती बगला का कर रहे थे। मान लीजिए आपको लगता है कि कोई मंत्र प्रभाव नहीं दे रहा। यूट्यूब पर एक चैनल कहता है कि भगवती तारा के इस मंत्र का जप करो; दूसरा चैनल कहता है कि मंत्र प्रभाव न दे तो उसके दस संस्कार करो। पर दोनों में से कोई नहीं बता रहा कि किसका संस्कार कभी नहीं करना। जिस मंत्र का आप जप कर रहे हैं, क्या उसका कभी संस्कार होगा? वह कौन-सा मंत्र है — देवता का, महाविद्या का, देवी का, योगिनी का? किस कुल का? किस कुल में संस्कार किस ढंग से होता है? क्या सबके लिए एक जैसा है?

34

जो मंत्र के दस संस्कार करता है, उसे किसी पर उँगली उठाने के बजाय पूछना चाहिए कि क्या साथ में उसके अपने सोलह संस्कार तैयार हैं

सोलहवाँ संस्कार, और अपने कर्तव्य कर्म में रहना

· 20:52–21:41

वक्ता कहते हैं कि यह सब जाने बिना अगर कोई अब मंत्र प्रभाव न देने पर उसके दस संस्कार करे — तो वह उस मंत्र के दस संस्कार करेगा, या साथ में अपने सोलह संस्कार तैयार करेगा, और उसी समय उसे सोलहवाँ संस्कार बताया जाएगा? वे किसी पर उँगली इसलिए नहीं उठाते कि तुरंत बात बन जाएगी "आप फलाँ का विरोध कर रहे हैं, आप द्वेष रखते हैं"। यही कारण है, और वे यह नहीं कर सकते, न करेंगे: वे अपने कर्तव्य कर्म में रहेंगे, और आपमें विवेक है तो आप स्वयं समझने का प्रयास करेंगे कि क्यों। भगवती की कृपा और गुरु आदेश से क्या उनके पास इन चीज़ों की कमी है? बस ये बाँटी नहीं जा सकतीं।

35

क्या श्री कुल में दीक्षित व्यक्ति काली कुल के शिक्षक की विधि अपना सकता है?

कुरुकुल्ला हमारी विधि से, श्री विद्या उनकी — कोई भी कुलों के पार नहीं चलती

· 21:42–22:02 · Also a question

वक्ता श्रोता से सीधे पूछते हैं: अगर आप श्री कुल में दीक्षित हैं और हम काली कुल में हैं, तो क्या आप हमारी दी हुई विधि से कुरुकुल्ला का विधान कर सकते हैं? मेरी परंपरा में दी गई विधि से, क्या आप श्री विद्या के अंतर्गत आने वाले मंत्रों आदि का पूरा विधि-विधान कर सकते हैं? वे कहते हैं कि प्रयोग के लिए इतना ज्ञान होना चाहिए — कम से कम यह तो पता हो कि कोई चीज़ किसके लिए है, और उसे सार्वजनिक कैसे किया जा सकता है।

36

मंत्र को सूतक कब लगता है, मंत्र त्याज्य कैसे किया जाता है और फिर कैसे ग्रहण होता है — ये जटिल, अलग विधान हैं जो सबके लिए नहीं

ये विधान जटिल हैं और सबके लिए नहीं हैं

· 22:03–23:07

वक्ता कहते हैं कि मंत्र को किस समय सूतक लगता है और किस समय नहीं, किस मंत्र में नहीं लगता, और इन सब विधानों के लिए मंत्र फिर कैसे त्याज्य किया जाता है और कैसे दोबारा ग्रहण होता है, कौन-सा मंत्र छोड़ना है — ये सब विषय बहुत जटिल और अलग हैं, और सबके लिए नहीं हैं। उनकी दृष्टि में जो दीक्षा परंपरा में नहीं हैं और सार्वजनिक मंच पर यह बटोरने की कोशिश कर रहे हैं, उनका इस विषय से कोई संबंध ही नहीं। जो इस पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं, उनसे जानकारी लीजिए और फिर उसका व्यावहारिक विधान कीजिए; हम न इसकी चर्चा करते हैं, न कभी बताना चाहते हैं, क्योंकि जिस ढंग से यह व्यावहारिक रूप से दिखाया जा रहा है वह सबके लिए नहीं है, और हम आपको गड्ढे में डालने का काम नहीं कर सकते।

37

एकादशी को जन्मे शूद्र के लिए नारायण का कौन-सा मंत्र उचित है?

शूद्र के लिए विष्णु सहस्रनाम और उसकी फलश्रुति

· 23:08–24:03 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि वे शूद्र हैं और एकादशी को जन्मे हैं, और पूछते हैं कि उनके लिए नारायण का कौन-सा मंत्र उचित होगा। वक्ता कहते हैं कि जब तक आपकी दीक्षा नहीं हुई, जब तक आप कहीं दीक्षित नहीं हैं, भगवान श्री हरि नारायण के विष्णु सहस्रनाम का पाठ कीजिए। उसकी फलश्रुति में लिखा है कि शूद्र इसका पाठ करे तो क्या पाएगा। फिर उसमें इस विषय का संकल्प रखिए, क्योंकि आप भगवान श्री हरि नारायण के मंत्र के इच्छुक हैं और एकादशी का जन्म भी इसका कारण बन रहा है, और आपमें श्रद्धा है, तो उन्हीं को समर्पित रहिए। सच्चे शूद्र बनिए; नियम और नीति से चलिए। आपका सामर्थ्य तपस्वियों के बराबर होगा, और भगवान की कृपा से आपको सही मार्ग मिलेगा और आप उसमें फलेंगे-फूलेंगे।

38

भगवान श्री नारायण को स्तुति बहुत प्रिय है, और सहस्रनाम के जप में जप और स्तुति दोनों एक साथ हो जाते हैं

सहस्रनाम कंठस्थ करें, नामावली से अर्चन करें, स्तुति अर्पित करें

· 24:04–24:32

वक्ता तीन काम बताते हैं। सहस्रनाम, या जो भी जप आप करते हैं, धीरे-धीरे कंठस्थ कीजिए। समय-समय पर उनकी नामावली से अर्चन भी कीजिए। और क्योंकि भगवान श्री नारायण को स्तुति बहुत प्रिय है, उनकी स्तुति करने की आदत बनाइए। सहस्रनाम के जप में जप भी हो जाता है और स्तुति भी — सहस्रनाम की महिमा बड़ी है, विष्णु सहस्रनाम की तो अनंत है।

39

नामावली से अर्चन करने पर भगवती भी क्यों प्रसन्न होती हैं?

देवता के शरीर पर श्रृंगार और सोना उनकी शक्ति, उनकी श्री है

· 24:33–24:59 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जब आप उनकी नामावली से उनका सहस्र अर्चन करते हैं, तो भगवती लक्ष्मी भी बहुत प्रसन्न होंगी कि भगवान शक्ति सहित हैं — उनकी शक्ति श्री हैं। किसी देवता का मूर्त स्वरूप अकेला भी हो, तो उनके शरीर पर जो श्रृंगार और सोने के आभूषण हैं, उनमें जो सौंदर्य दिखता है, वही उनकी शक्ति, उनकी श्री है: वह उनकी अर्धांगिनी का प्रतीक है। इसलिए जब अर्चन होता है, तो भगवान श्री नारायण और भगवती दोनों प्रसन्न होंगे, और दोनों की कृपा मिलेगी।

40

भगवान श्री नारायण के लिए किस मंत्र का जप किया जा सकता है?

भागवत का श्लोक "कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने"

· 25:00–25:34 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इस तरह वे नहीं बता सकते कि कौन-सा मंत्र — उसके लिए पूरा विषय देखना पड़ेगा। पर श्रीमद् भगवद्गीता का श्लोक, और श्रीमद् भागवत का मंत्र "कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने" आदि — मंत्र की दृष्टि से इसका जप आप जितना हो सके कर सकते हैं, क्योंकि यह श्लोक पौराणिक श्लोक के रूप में है।

41

क्या भगवती की मूल साधना से पहले छोटी साधना के रूप में नरसिंह का द्वादश नाम स्तोत्र किया जा सकता है?

क्रमागत सीढ़ी में चौथे वीर, नरसिंह

· 25:35–25:49 · Also a question

एक श्रोता क्रमागत साधना में गणेश जी, भैरव जी और हनुमान जी कर चुके हैं, और भगवती की मूल साधना से पहले चौथे वीर नरसिंह जी की एक छोटी साधना करना चाहते हैं। वे पूछते हैं कि क्या नरसिंह के बारह नाम वाले स्तोत्र का उपयोग कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं।

एक श्रोता कहते हैं कि क्रम विद्या साधना में गणेश जी, भैरव जी और हनुमान जी के बाद वे भगवती की मूल साधना से पहले चौथे वीर, नरसिंह जी की एक छोटी साधना करना चाहते हैं, और पूछते हैं कि क्या नरसिंह के बारह नाम वाले स्तोत्र का उपयोग कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं।

42

क्या लिया हुआ नियम न निभाना पाप है?

तीनों द्विज वर्णों के लिए संध्या अनिवार्य है

· 25:50–26:25 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें डर है कि नियम न निभाने से पाप लगेगा। वक्ता कहते हैं कि भैया, अगर आप जानबूझकर नहीं निभाना चाहते, तो पाप लगेगा ही। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य — तीनों के लिए संध्या अनिवार्य है। वे द्विज हैं; तीनों के लिए संध्या अनिवार्य है।

एक श्रोता लिखते हैं कि उन्हें डर है कि नियम न निभाने के कारण पाप लगेगा। वक्ता कहते हैं कि भैया, अगर आप जानबूझकर नहीं निभाना चाहते, तो पाप लगेगा ही। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य — इन तीनों के लिए संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। अनिवार्य है। वे द्विज हैं। तीनों के लिए संध्या अनिवार्य है।

43

क्या कलियुग में केवल नाम जप पर्याप्त है?

केवल नाम जप के लिए सारे कर्म छोड़ना देह-चोरी है

· 26:26–26:58 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि नाम की शरण लेकर — यह कहकर कि कलियुग में केवल नाम का ही आधार है और उसके स्मरण से मनुष्य पार उतरता है — और इसी आधार पर सारे कर्म छोड़ देना, हर कर्म समाप्त करके केवल नाम जप को ही सब कुछ मान लेना, यह आपकी देह-चोरी है, और कुछ नहीं। जिन दूसरे कर्मों से आपको सुख मिलता है, उन्हें आप कभी समाप्त नहीं करेंगे। पर संध्या में शरीर हिलाना-डुलाना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी, मंत्र कंठस्थ करने होंगे, विधि-विधान सीखना होगा — दस-पंद्रह मिनट की बात; और उतने से भी बचने के लिए आप संध्या समाप्त करने को तैयार हैं, तो भैया इस मूर्खता से बड़ी कोई बात नहीं। संध्या के बिना द्विज का किया नाम जप किसी भी तरह फल नहीं देता।

44

नाम जप उस सचमुच अनपढ़ व्यक्ति को फल देता है जिसके पास न विधि-विधान है न योग्य गुरु, जानबूझकर मूर्ख बनने वाले को नहीं

अनपढ़ व्यक्ति का नाम जप, और वे किसे जाहिल कहते हैं

· 26:59–27:46

वक्ता जानबूझकर मूर्ख बनने वालों और सचमुच अनपढ़ लोगों में अंतर करते हैं। चौथे वर्ण का व्यक्ति, मूर्ख व्यक्ति, वज्र — जिसे विधि-विधान नहीं पता, जिसे योग्य गुरु नहीं मिला, जो विद्वान नहीं, पढ़ा-लिखा नहीं, अनपढ़, गँवार है: अगर वह किसी कारण संध्या नहीं कर पाता और गुरु का नाम जप कर लेता है, तो उसे फल अवश्य मिलेगा। ऐसे व्यक्ति को वे जाहिल कहने से भी मना करते हैं। वे कहते हैं कि जाहिल वे हैं जो सब जानते हैं और करना नहीं चाहते, जो अड़ जाते हैं कि हम नहीं करेंगे, केवल नाम जप हमें पार लगा देगा। पर जो पढ़े-लिखे नमूने केवल दूसरों को सुन-देखकर, शरीर की मेहनत से बचने के लिए संध्या को दस-पंद्रह मिनट नहीं देंगे — वे इस भ्रम में न रहें कि नाम जप से इति श्री हो जाती है। नहीं होती।

45

निष्ठा से नियम निभाने से वास्तव में क्या बनता है?

अपनी पीढ़ियों के लिए रखी गई नींव

· 27:47–28:15 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जो अशास्त्रीय है उसे करके भला चाहोगे, तो भला ज़रूर होगा — पर फिर सोचना कि वह भला कब भाला बन जाता है। जब कोई निष्ठा से, नीति और नियम से चलता है, तो अपने साथ-साथ वह कहीं न कहीं अपने भविष्य और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नींव बनाता है। वे नींव बहुत मज़बूत होती हैं, और जब वह ज़बरदस्त ढंग से उन्नति की ओर बढ़ता है, तो अकेला नहीं बढ़ता: उसकी पीढ़ियाँ बढ़ती हैं।

46

तीन पीढ़ियों में एक परिवार अपना अभ्यास कैसे खो देता है?

संध्या करने वाला पिता, उसे दिखावा कहने वाला बेटा, कुछ न जानने वाला पोता

· 28:16–30:17 · Also a question

वक्ता क्रम बताते हैं। पिता संध्या करते थे; वे वैश्य वर्ण के थे, संध्या सीखी थी, उनके गुरु जी थे, यज्ञोपवीत पहनते थे, शिखा रखते थे, सबका ज्ञान था, और समय-समय पर हवन भी करते थे। अगली पीढ़ी आते ही आप कॉर्पोरेट जगत के बड़े चैंपियन बन गए और समय की कमी हो गई — पर आपने यह नहीं कहा कि समय की कमी से ऐसा कर रहे हैं। आपने कहा यह सब दिखावा है, पाखंड है, हम कर्मकांड में नहीं पड़ेंगे, इस आडंबर में नहीं पड़ेंगे, केवल नाम जप करेंगे और उसी से मेरा कल्याण होगा; और यह कहकर सब छोड़ दिया। अब जब तीसरी पीढ़ी आएगी, उसे न संध्या का ज्ञान होगा न नाम जप का। वे यो-यो ड्यूड करेंगे, और फिर आपसे भी यो-यो करवाएँगे। और कुछ नहीं — यही होगा।

47

क्या घर में चाँदी का दीपक जलाया जा सकता है?

पीतल की जगह चाँदी का दीपक

· 30:18–30:29 · Also a question

पीतल का दीपक जलाने वाली एक श्रोता पूछती हैं कि क्या वे अपने घर में चाँदी का दीपक जला सकती हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल जला सकती हैं।

एक श्रोता पूछती हैं कि क्या वे अपने घर में चाँदी का दीपक जला सकती हैं; वे पीतल का दीपक जलाती हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल जला सकती हैं।

48

कौन-सा शिव सहस्रनाम पढ़ना चाहिए?

श्री हरि नारायण द्वारा की गई सहस्रनाम स्तुति

· 30:30–32:19 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आप जो भी शिव सहस्रनाम चाहें, कर सकते हैं। शिव महापुराण की चर्चा में कई शिव सहस्रनामों का विषय आया था। पर भगवान श्री हरि नारायण ने भगवान शिव के हज़ार नामों से जो स्तुति की थी — वह करें तो बहुत दिव्य है, क्योंकि उसमें भगवान ने बहुत कुछ प्राप्त किया। भगवान श्री हरि नारायण भगवान शिव के सबसे बड़े भक्त हैं; उनकी की हुई शिव सहस्रनाम स्तुति कीजिए।

49

जब वैवाहिक कष्ट व्यक्ति को वैराग्य की ओर धकेल रहा हो तो क्या करें?

आप अपनी जगह सही हैं, पर एक बात सुनिए

· 32:20–32:52 · Also a question

एक श्रोता अंग्रेज़ी में अपने भौतिक और वैवाहिक जीवन में बहुत कष्ट की बात लिखते हैं और कुंडली देखने को कहते हैं। वक्ता कहते हैं कि इस सारे कष्ट के कारण आप वैराग्य की ओर जा रहे हैं। एक विषय जानिए: ठीक है, आप वैराग्य की ओर जा रहे हैं और वैवाहिक जीवन में भी रहना चाहते हैं; अपनी जगह आप सही हैं। पर इसमें एक दिव्यता है — आगे की बात को अपने ऊपर मत लीजिए।

50

युवा साधक, जिनसे पूछा जाता है कि वे कौन-सा मार्ग चाहते हैं, साधना मार्ग कहते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि वे गिर जाएँगे

हम साधना मार्ग चाहते हैं, क्योंकि जानते हैं कि गिर जाएँगे

· 32:53–33:37

वक्ता कहते हैं कि जब साधकों में चर्चा होती है — युवा और कुछ अधेड़ उम्र के, कुछ जिनका विवाह होने वाला है, फ़ोन पर या अन्य माध्यमों से — तो वे पूछते हैं कि क्या होगा। वे उनसे पूछते हैं कि किस मार्ग पर जाना चाहते हो, और वे कहते हैं कि साधना मार्ग पर जाना चाहते हैं, क्योंकि गृहस्थ में तो जाना ही है, और गृहस्थ में हम ऐसे बड़े विरक्त संन्यासी बनकर इतना कठिन ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने की स्थिति में नहीं हैं। हम जानते हैं कि हम गिर जाएँगे। यह लिखने-पढ़ने की बात नहीं। न उतना सामर्थ्य है, न ऐसा प्रबल वैराग्य। तो हम वैरागी बनना तो चाहते हैं, पर इसी आश्रम से, इसमें जाकर, ताकि हमसे गिरने की कोई बात न हो।

51

अगर पत्नी इस मार्ग पर साथ न दे तो क्या करें?

बात बिगड़े तो वैरागी बनो, बात बने तो उसे साथ लाओ

· 33:38–34:23 · Also a question

वे पूछते हैं कि मान लीजिए विवाह हो गया और जो धर्मपत्नी आई वह हमारे साथ न रही — तब क्या? वक्ता कहते हैं: अगर पत्नी आई और उसके बाद आपकी नहीं बनी, तो बस ऐसे ही वैरागी बन जाइए और इसी मार्ग में आ जाइए। आ जाइए, हम कमंडल लेंगे और दोनों भाई गंगा जी के किनारे मज़े से बैठेंगे — हर हर महादेव, दिक्कत क्या है? और अगर अच्छी पत्नी आ गई, तो उसे भी साथ ले आइए; वह भी हर हर महादेव, वह भी जप करेगी और आप भी जप करेंगे। अच्छी निकले तो साथ आइए; बुरी निकले तो अकेले आइए। हर स्थिति में अपनी स्थिति देखिए और कैसे निकलना है।

52

क्या दुःख से जन्मा वैराग्य सच्चा वैराग्य है?

कष्ट से उपजी विरक्ति प्रबल नहीं होगी

· 34:24–34:57 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर आप वैराग्य को ऐसे समझ रहे हैं — कि आपकी विरक्ति कष्ट के कारण उपज रही है — तो वह प्रबल विरक्ति नहीं होगी। यह सच्ची बात है, और इसका एक कारण है।

वक्ता कहते हैं कि अगर आप वैराग्य को यह मान रहे हैं — कि कष्ट के कारण आपकी विरक्ति उपज रही है — तो वह प्रबल विरक्ति नहीं होगी। यह सच्ची बात है। इसका एक कारण है।

53

दुःख से जन्मा वैराग्य व्यक्ति को वापस गृहस्थ में क्यों ले आता है?

बढ़ता तपोबल आकर्षण को लौटा लाता है

· 34:58–35:39 · Also a question

वक्ता उदाहरण देते हैं। मान लीजिए वैवाहिक जीवन में कष्ट आया, मन उदास हुआ, अपनी पत्नी को ही कामिनी मान लिया, मन कामिनी से हट गया, और व्यक्ति साधना मार्ग में चला गया। जब उस साधना से तपोबल बढ़ा — क्योंकि तपोबल बढ़ेगा और यह चिंतन मन में बना रहेगा — तो उसके प्रभाव से यह आकर्षण भी फिर बनेगा। आपके भीतर का वैराग्य समाप्त हो जाएगा और आप फिर गृहस्थ में आएँगे, अवश्य, चाहे उसी के साथ या किसी और व्यवस्था से। किसी न किसी तरह माया आपको फिर यहीं ले आएगी। इसीलिए यह क्षणिक वैराग्य है; इससे विचलित मत होइए। प्रबल वैराग्य हमेशा ज्ञान की प्राप्ति से होता है।

54

दूसरों को सावधान करना अच्छा काम है, पर दस में से आठ विषय स्त्री के शारीरिक रूप पर हों तो उस काम का वज़न खत्म हो जाता है

दूसरों को सावधान करना अच्छा काम है, पर अति उसका वज़न खत्म कर देती है

· 35:40–37:28

वक्ता कहते हैं कि एक बहुत विद्वान व्यक्ति हैं जिनका कोई गुरु नहीं, जिनके बारे में वे ज़्यादा और कुछ नकारात्मक नहीं कहेंगे। पर वे देखते हैं कि यह व्यक्ति स्त्री के शारीरिक रूप पर चरम तक टिप्पणियाँ करते हैं — उनके दस विषय लिखे हों तो उनमें आठ यही होते हैं, खासकर पुरुषों के लिए: सावधान रहो, यह करो, वह करो, स्त्री का शरीर भोगोगे तो यह होगा। उनकी दृष्टि में अगर व्यक्ति ब्रह्मचारी है, तो वही चिंतन नहीं होना चाहिए। दूसरों को सावधान करना बहुत अच्छा काम है; पर अगर आप रोज़ हज़ार पोस्ट लिखते हैं और उनमें 999 इसी एक विषय पर रहती हैं, तो उन्हें लगता है कि सबसे ज़्यादा चिंतन आप ही कर रहे हैं, और दूसरों को भी चिंतन में धकेल रहे हैं। वे मानते हैं कि वह व्यक्ति असत्य नहीं लिखता — सत्य लिखता है, पर अति हो जाती है; और बार-बार लिखने से लोग उसे महत्व नहीं देते और अनदेखा कर देते हैं। वे स्वयं भी लोगों से कहते हैं कि गलत मत करो, पर सही समय पर उदाहरण के साथ सटीक चोट होनी चाहिए, ताकि हमारे सनातनी साधक मज़बूत बनें — मानसिक रूप से, शारीरिक रूप से, और लंगोट से भी, हर तरह से उनमें श्रेष्ठता और बल हो।

55

बहुत अच्छा काम करने वाले किसी शिक्षक को लेकर डर यह है कि अगर कुछ नकारात्मक निकल आया तो बहुतों के दिल और मन टूट जाएँगे

जब कुछ नकारात्मक निकलता है तो बहुतों के दिल टूटते हैं

· 37:29–38:03

अपने मन की बात कहते हुए वक्ता कहते हैं कि वे मनुष्य हैं और किसी को बहुत अच्छा काम करते देखकर बहुत अच्छा लगता है — पर मन में डर रहता है कि वह व्यक्ति कहीं कुछ गलत कर दे, या कोई नकारात्मक बात निकल आए, और फिर लोग उस पर भी टूट पड़ेंगे, बहुतों के मन टूटेंगे, मन खराब होंगे। जो लोग बहुत अच्छा कर रहे हैं, अच्छा लिख रहे हैं, उनसे वे एक आशा रखते हैं; और फिर उनके बारे में कोई ऐसी बात पता चलती है, लोग ऐसे प्रमाण रख देते हैं। तब लगता है कि इस व्यक्ति ने कितनी मेहनत की और उनके कितने अनुयायी होंगे — और अब उनके अनुयायी सच जानकर भी उन पर भरोसा नहीं करेंगे। कुछ अंधभक्ति की तरह पीछे चलेंगे, कुछ विरोध करेंगे, और कुछ जो अब तक उनके बताए नियम से चल रहे थे, वह छोड़ देंगे।

56

शिक्षकों के बारे में सिद्धांतवादी क्यों होना चाहिए, व्यक्तिवादी क्यों नहीं?

व्यक्ति में दोष निकले तो भी सिद्धांत से समझौता न करें

· 38:04–39:26 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इसीलिए हम बार-बार कहते हैं: सिद्धांतवादी बनिए, व्यक्तिवादी नहीं — ताकि जब उस व्यक्ति के बारे में कुछ अच्छा-बुरा पता चले, तब भी आप सिद्धांत से समझौता न करें, और अब तक जो करते आए हैं उसे न छोड़ें। वे उदाहरण देते हैं: लगभग पूरे भारत की जनता एक समय प्रेमानंद जी महाराज को बहुत अच्छे से फ़ॉलो कर रही थी, और उन्हें भी बहुत अच्छा लगता था — उस दिन तक जब तक उन्होंने भगवती और भगवान शिव के बारे में टेढ़ी बातें नहीं कहीं। जिस दिन उन्होंने वह विषय बोला, बाद में चाहे जितनी बार उसकी लीपापोती की गई, कि नहीं, ऐसा था, यह सब कहकर — बाद में आप जो भी कहिए, जिस अहंकार में उस समय वह विषय बोला गया, उसी क्षण से समर्पण का पर्दा हट गया, कि हाँ, वे नैष्ठिक हैं, ऐसे हैं; और वह फिर नहीं चढ़ा। बाकी लोगों के लिए चढ़ जाए, पर इस क्षेत्र के विद्वान जिन्होंने उन्हें एक सम्मान दिया था, वे उसे वापस नहीं ला पाएँगे।

57

दुःख के कारण अपनाया गया त्याग सुख लौटने पर क्या होता है?

कष्ट में विरक्त, सुख में फिर आसक्त

· 39:27–39:42 · Also a question

जहाँ तक जीवन में यह विषय आता है कि शरीर और जीवन में कष्ट आ गया, इसलिए अब हम विरक्त हो रहे हैं — वक्ता कहते हैं कि जब सुख आएगा, तो आप विरक्त होकर फिर आसक्त हो जाएँगे। यह विषय भी समझिए।

जितना विषय जीवन में आता है — कि अब शरीर में, जीवन में कष्ट आ गया, इसलिए हम विरक्त हो रहे हैं — वक्ता कहते हैं: जब सुख आएगा, तब विरक्त होकर आप फिर आसक्त हो जाएँगे, है न? यह विषय भी समझिए।

58

जब वैवाहिक जीवन में कष्ट आए तो पहला कदम क्या है?

पहले जन्म कुंडलियाँ मिलवाइए

· 39:43–39:59 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि उनकी दृष्टि में, ऐसी परिस्थिति में जब वैवाहिक जीवन में कष्ट आ रहा हो — भले वे विषय से हटकर बहुत बातें कह गए, यह विषय भी देखना ज़रूरी है — सबको समझना चाहिए कि जब जीवन में वैवाहिक जीवन से जुड़ा कष्ट और कठिनाई आए, तो सबसे पहले, भैया, अगर जन्म कुंडलियाँ नहीं मिलवाईं, तो पहले वह ज़रूर करवाइए।

59

अगर विवाह के समय दिया गया पत्नी का जन्म विवरण असली न हो तो क्या करें?

असली जन्म विवरण प्राप्त करें, या हाथ पढ़वाएँ

· 40:00–40:35 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि उनसे सीधे पूछना चाहिए: क्या यह आपका असली जन्म विवरण था, या आपने मार्कशीट वाला अलग दे दिया था? कृपया सही बताइए, जब भी आप जन्मीं — चाहे आप मुझसे दो साल बड़ी हों, अब विवाह हो गया है और हम अब छोड़ नहीं सकते। तो पहले असली प्राप्त कीजिए। अगर असली न मिल सके, तो हाथ की रेखाओं और माथे की रेखाओं से, कोई विद्वान हो, तो उनसे जितनी जानकारी निकल सके, निकलवाइए। नहीं तो, सही जन्म विवरण मिल जाए तो दोनों की जन्म कुंडली के अनुसार ठीक से मिलान करवाइए और देखिए कि कौन-से दोष हैं।

60

वैवाहिक कष्ट के लिए कुंडली में कौन-से बिंदु जाँचने चाहिए?

सप्तमेश, शुक्र, ससुराल, और दोनों के बीच का ऋण

· 40:36–41:07 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जो भी उन्नीस-बीस हो, पूरी जाँच सप्तमेश से करवाइए। सप्तमेश की स्थिति ज़रूर देखिए। पुरुष को शुक्र की स्थिति भी देखनी चाहिए। ससुराल की स्थिति भी देखिए। और दो-तीन चीज़ें — ऋण परिहार, ऋण भी ज़रूर देखिए, पत्नी के साथ कौन-सा ऋण बन रहा है जिसके कारण वह झगड़ा और कलह कर रही है। सारे विषय देखकर ठीक से परिहार की व्यवस्था कीजिए। परिहार कीजिए; उनके व्यवहार में बदलाव आएगा या नहीं, यह भगवती पर छोड़ दीजिए।

61

क्या सफल वशीकरण प्रयोग से भाग्य बदल जाता है?

प्रयोग नियति को टालता है, बदलता नहीं

· 41:08–41:52 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि प्रयोग करने से बचना चाहिए — हालाँकि जो केवल अपने वैवाहिक जीवन और भौतिकता से जुड़े हैं, उन्हें वे प्रयोग से मना भी नहीं करेंगे। पर एक बात हमेशा ध्यान रखिए: वशीकरण आदि का प्रयोग किया या करवाया जाए और वह सफल हो जाए, तो उससे आपकी नियति नहीं बदलती। वह टल ज़रूर जाती है। अब वह आपके सम्मोहन में बँधी रहेगी और सब ठीक हो जाएगा; पर जिस दिन वह टूटेगा, उस दिन आपको कठिनाई होगी, और बहुत ज़्यादा कठिनाई।

62

क्या ऋण प्रयोग के बजाय जप, श्रम और सेवा से काटा जा सकता है?

जप, श्रम और सेवा से काटिए, और ऋण से मुक्त होइए

· 41:53–42:17 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अच्छी बात यह है कि यह चीज़ जप आदि से, श्रम आदि से, सेवा से कटे; और जो भी ऋण है, उससे भी मुक्त हुआ जाए। और यह प्रयास हो कि ग्रहों और नक्षत्रों का जो उन्नीस-बीस रह गया है, वह जहाँ तक हो सके ठीक हो — इसके लिए अपनी ओर से जो संभव हो, वह करते हुए। कोई बहुत बड़ी चीज़ नहीं; सामान्य ढंग से करें तो भी उसका कोई न कोई उपाय हो जाएगा।

63

पिता या माता से मिलने वाला कष्ट, परिवर्तन के लिए तप करके हटाने से बेहतर है ऋण के रूप में चुकाया जाए

वे परिवर्तन से ज़्यादा ऋण में विश्वास करते हैं

· 42:18–43:10

वक्ता कहते हैं कि उनकी अपनी राय थोड़ी अलग है: वे ऋण में ज़्यादा और परिवर्तन में कम विश्वास करते हैं। अगर पिता हमें कष्ट दे रहे हैं, तो वे उस कष्ट को हटाने के लिए तप करके उसे कभी नहीं हटाना चाहेंगे — वे चाहेंगे कि वह ऋण चुक जाए। माता कष्ट दे रही हों, तो वे उऋण होना चाहेंगे। भाई कष्ट दे, तो उऋण होना चाहेंगे — क्योंकि आज किसी तरह के प्रयोग से उसे अपने अनुकूल कर लें, तो कल वह कई गुना होकर लौटेगा। पर अगर उनके लिए जप करके, उनके लिए तीर्थ करके, उनके लिए दान करके हम उन्हें शांत कर रहे हैं, और वे सचमुच हमारे अनुकूल हो जाते हैं, और वास्तव में हमारी परिस्थितियाँ अनुकूल हो जाती हैं और वे हमारे सहायक बन जाते हैं, तो वह सबसे सही बात है।

64

क्या परिवार में मृत्यु के एक वर्ष के भीतर नया व्रत लिया जा सकता है?

वर्ष भर कोई नया व्रत नहीं; पुराने चलते रहते हैं

· 43:11–44:03 · Also a question

एक श्रोता के पति के दादा की मृत्यु को एक साल नहीं हुआ है; उन्होंने हर महीने शुक्ल पक्ष में माँ लक्ष्मी के ग्यारह व्रतों का संकल्प पहले ही ले लिया है और तीन पूरे कर चुकी हैं। वक्ता कहते हैं कि जब संदेह था, उसी समय कम से कम पास के किसी विद्वान या पंडित जी से पूछ लेना चाहिए था — पास के मंदिर में कोई पुरोहित होंगे, वे बता देते; यह बहुत सामान्य बात है कि वर्ष के भीतर कोई नया व्रत नहीं करना। जो पुराना व्रत आप करती आ रही हैं — प्रदोष, अष्टमी, एकादशी — वह नहीं रुकेगा, वह चलेगा। बस नया कोई न करे। और वे कहते हैं कि अब हम यह कहकर उसे रुकवाएँगे भी नहीं: इसके लिए अपने पुरोहित जी से पूछिए।

65

विंध्याचल में गुरु दत्तात्रेय की चरण पादुका कहाँ है?

महासरस्वती के बगल वाले द्वार के पीछे, दो परम तंत्र स्थानों के बीच

· 44:04–44:45 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें भगवती सरस्वती के बगल में गुरु दत्तात्रेय की चरण पादुका नहीं दिखी, जबकि वक्ता ने कहा था कि वहीं है। वक्ता कहते हैं कि उन्होंने सरस्वती जी के पीछे कहा था: आज जहाँ महासरस्वती का स्थान है, उनके ठीक बगल में एक द्वार है; उस द्वार से पीछे जाइए। वहाँ दो परम तंत्र स्थान हैं, और उन दो परम तंत्र स्थानों के बीच देवी-देवताओं के श्री विग्रह स्थापित हैं — उन्हीं में भगवान दत्त की पादुका भी है।

66

शक्तिपीठ पर शाकंभरी कवच का एक दिन का अनुष्ठान कैसे किया जाता है?

पहुँचिए, स्थान खोजिए, और भोर में 108 पाठ कीजिए

· 44:46–45:33 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जब शाकंभरी कवच का अभ्यास हो जाए, तब शक्तिपीठ जाएँ — मान लीजिए आज पहुँचे हैं — तो आज आराम से स्थान खोजिए, देखिए, पूरी जगह घूमिए और देखिए कि कहाँ बैठकर जप करेंगे। फिर अगले दिन सुबह-सुबह भोर में दर्शन करना है; यह भोर में ही होना चाहिए, और सूर्योदय से पहले हो तो सर्वोत्तम। उसके बाद आराम से अपने आसन पर बैठिए और शाकंभरी कवच के कम से कम 108 पाठ कीजिए।

67

जप के बाद हवन आता है, या हवन न हो सके तो दीपक या नारियल खप्पर विधि, और फिर कन्या पूजन

हवन या दीपक, और फिर कन्या पूजन

· 45:34–45:55

उसके बाद हवन की व्यवस्था कीजिए; संभव हो और आपने स्वयं सीखा हो, तो स्वयं कीजिए; वे स्वयं न करने दें तो किसी की सहायता से कीजिए; और सहायता से भी न करने दें, तो दीपक आदि जलाइए, या जो नारियल खप्पर विधि बताई गई है, वह कीजिए। कहीं न कहीं प्रज्वलन का विधान होगा — यानी जप और हवन। और उसके बाद कन्या पूजन: शक्तिपीठ है तो वहाँ एक कन्या का पूजन भी सर्वोत्तम है, और ठीक से कन्या पूजन न हो सके, तो कम से कम वहाँ किसी कन्या को प्रसन्नता से मिठाई आदि दक्षिणा के साथ दीजिए।

68

क्या बत्तीस नामों की साधना में सिद्ध किया धागा पहनने के बाद कोई नियम है?

कोई विशेष नियम नहीं — हमेशा पहना जा सकता है

· 45:56–46:21 · Also a question

पूछा गया कि बत्तीस नामों की साधना में जो धागा सिद्ध करना था, उसे पहनने के बाद कोई नियम है क्या। वक्ता कहते हैं कि नहीं — आप उसे हमेशा पहन सकते हैं, और उसमें आप जैसा चाह रहे हैं वैसा कोई विशेष नियम नहीं है।

एक श्रोता पूछते हैं कि बत्तीस नामों की साधना में जो धागा सिद्ध करने को बताया गया था, उसे पहनने के बाद कोई नियम होगा क्या। वक्ता कहते हैं कि नहीं, आप उसे हमेशा पहन सकते हैं। और उसमें आप जैसा चाह रहे हैं, वैसा कोई विशेष नियम नहीं है।

69

दत्त पादुका का दैनिक नियम क्या है?

गुरु स्थान पर पीला वस्त्र, अभिषेक, चंदन और कुमकुम

· 46:22–47:05 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि दत्त पादुका हमेशा गुरु स्थान पर रहेगी — यानी पूजन स्थान पर, जहाँ आप अच्छी व्यवस्था करें, पीला वस्त्र बिछाएँ और उस पर गुरु पादुका, दत्त पादुका को स्थान दें। आप उनका रोज़ अभिषेक कर सकते हैं; अभिषेक के बाद सुगंधित चंदन, कुमकुम आदि से उन्हें सजाइए, उन पर स्वस्तिक आदि बनाइए, फूल चढ़ाइए और धूप दिखाइए। पादुका पूजन में सामान्यतः इत्र भी लगा सकते हैं। इस प्रकार पादुका पूजन होगा।

70

भैरवी कवच कहाँ लगाना चाहिए, और पादुका के लिए कौन-सा श्लोक पढ़ें?

मुख्य द्वार के ऊपर कवच, और गुरु ब्रह्मा स्तुति

· 47:06–47:22 · Also a question

भैरवी कवच आप मुख्य द्वार पर, ऊपर की ओर लगा सकते हैं — फ़्लैट हो या घर, द्वार के ऊपर लगाइए। और श्लोक पाठ के लिए, भगवान दत्त की पूजा और पादुका पूजन के लिए "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः" आदि वाली स्तुति सर्वश्रेष्ठ है।

वक्ता कहते हैं कि और भैरवी कवच आप मुख्य द्वार पर, ऊपर की ओर लगा सकते हैं — फ़्लैट हो या घर, द्वार के ऊपर लगाइए। श्लोक पाठ के लिए, भगवान दत्त की पूजा के लिए और पादुका पूजन के लिए "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः" आदि वाली स्तुति सबसे श्रेष्ठ है।

71

मासिक धर्म के दौरान साधिका क्या कर सकती है?

पाँचवें दिन तक पूजन नहीं, केवल मानसिक प्रणाम

· 47:23–48:06 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जब स्त्री साधिका मासिक धर्म में हो, उस समय वह यह कोई पूजन नहीं करेगी। परिवार का कोई और सदस्य करेगा। कोई और न करे, तो जब तक वह पाँचवें दिन बाल धोकर पूरी तरह शुद्ध न हो जाए, वह स्पर्श नहीं करेगी — मन से प्रणाम ज़रूर कर सकती है, कोई दोष नहीं लगेगा। अगर वह चौथे दिन बाल धो ले, तो चौथे दिन बाल धोकर शुद्ध होने पर भी उस दिन पूजन का अधिकार नहीं मिलता: उस दिन वह केवल अपने पति के लिए शुद्ध होती है, उनके लिए सेवा कर सकती है या उन्हें छू सकती है, पर देव पूजन की अधिकारी पाँचवें दिन ही होती है। जो यह विषय नहीं मानना चाहते, जिनके लिए यह अंधविश्वास है और जो कुछ आजकल चल रहा है, वे अपना आनंद लें — विषय उनके लिए था ही नहीं। वे कहते हैं कि किसी को रोकना मेरा काम नहीं; हमने असली विषय बोल दिया, नहीं मानना तो मत मानिए।

72

क्या हवन में आहुति देते समय नमः लगाना चाहिए?

स्वाहा से पहले नमः रहे या हटे

· 48:07–48:59 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह मंत्र पर निर्भर है। अगर पूरे मंत्र के भीतर नमः है, तो कई जगह मिलता है कि नमः के साथ ही जाता है — जैसे महागणपति मंत्र में नमः है और स्वाहा है, नमः से पहले नमः, तो वह साथ रहेगा। और कई जगह ऐसा है कि नमः बाद में आता है, तब उसे हटाकर सीधे स्वाहा कहना है। तो जयंती मंगला काली में नमोस्तुते के बाद नमः लगाने की ज़रूरत नहीं — सीधे स्वाहा; इसमें नमः तो लगाना ही नहीं है।

73

विंध्याचल में तीन दिन की त्रिकोण परिक्रमा करने वाले यात्री को किसकी तैयारी करनी चाहिए?

ठंड, नंगे पैर, और गंगा जी में स्नान

· 49:00–49:54 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि पहला मार्गदर्शन यह है कि ठंड बहुत है — व्यवस्था करके आइए, क्योंकि पहाड़ पर जाने पर ठंड दुगनी-तिगुनी लगेगी। नंगे पैर की बात: वे ठंड में भी नंगे पैर परिक्रमा के पक्ष में हैं, क्योंकि वे स्वयं करते हैं; पर अभी यह नहीं कहेंगे — अपने शरीर की स्थिति के अनुसार पादुका पहनकर कीजिए। अगर साधना के स्तर पर आप अपने आराध्य पर निर्भर हैं और उन पर बहुत गहरी आस्था है, तो नंगे पैर कीजिए। गंगा जी में स्नान के बारे में भी: करेंगे तो अच्छा होगा, क्योंकि वे कर रहे हैं; पर ठंड ज़्यादा लगे, तो केवल जल छिड़क लीजिए।

74

विंध्याचल में त्रिकोण यात्रा कैसे शुरू होती है?

गंगा स्नान, संकल्प, और मंदिर परिसर में लघु त्रिकोण

· 49:55–50:35 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि गंगा जी में स्नान के बाद आप त्रिकोण की यात्रा शुरू करेंगे। सबसे पहले गंगा जी से स्नान करके, वहाँ सब पूरा करके, आप संकल्प लेंगे। संकल्प लेने के बाद भगवती विंध्यवासिनी के दर्शन करेंगे और वहाँ पूजन करेंगे। और विंध्यवासिनी माई के साथ, वहाँ के मुख्य मंदिर में विराजमान भगवती काली और भगवती महासरस्वती के दर्शन करेंगे; मंदिर परिसर में सबके दर्शन करेंगे। वहाँ एक लघु त्रिकोण पूरा हो गया।

75

विंध्यवासिनी मंदिर से निकलने के बाद त्रिकोण का मार्ग क्या है?

विंध्येश्वर महादेव, कोतवाली, बरतर हनुमान और प्रत्यंगिरा चौराहा

· 50:36–51:04 · Also a question

वहाँ से निकलकर विंध्येश्वर महादेव के दर्शन-पूजन; उसके बाद सीधे कोतवाली जाकर दर्शन कीजिए — बटुक भैरव जी, भगवती भैरवी, फिर बरतर हनुमान जी — और फिर वहाँ से निकलिए। लाल भैरव भी जा सकते हैं, पर लंबा हो जाएगा; इसलिए लाल भैरव की जगह बरतर हनुमान जी के बगल से सीधा रास्ता पकड़िए और प्रत्यंगिरा चौराहा आ जाइए। वहाँ भगवती प्रत्यंगिरा के दर्शन कीजिए। रास्ते में निहुत वीर हनुमान जी हैं; लौटते समय उनके दर्शन कीजिए। जाते समय जहाँ-जहाँ आपके बाईं ओर देवताओं का स्थान पड़े, वहाँ कपूर जलाते चलिए।

76

त्रिकोण परिक्रमा कहाँ समाप्त होती है?

बंधवा वीर, काली खोह, अष्टभुजा, तारापीठ और वापसी

· 51:05–51:25 · Also a question

प्रत्यंगिरा चौराहे से सीधे जाकर पास के हनुमान जी, बंधवा वीर तक पहुँचिए। बंधवा वीर हनुमान जी के दर्शन-पूजन करके काली खोह निकल जाइए; काली खोह से अष्टभुजा, अष्टभुजा से तारापीठ, और तारापीठ से वापस विंध्यवासिनी माई के मंदिर। रास्ते में जो भी देवी-देवता मिलें, सबके स्थान पर कपूर जलाते चलिए।

77

त्रिनेत्र में कितनी परतें होती हैं, और क्या उसके जागने पर किसी देवी की शक्ति आती है?

यह यूट्यूब का विषय नहीं है

· 51:26–52:17 · Also a question

पूछा गया कि त्रिनेत्र में कितनी परतें हैं, त्रिनेत्र जागने के बाद क्या होता है, क्या किसी देवी की शक्ति आती है, और क्या फिर किसी दूत को अलग से प्रत्यक्ष करना पड़ता है। वक्ता इन्हें बहुत अच्छे ढंग से पूछे गए बहुत अच्छे प्रश्न कहते हैं — और कहते हैं: किसी योग्य दिव्य गुरु के मार्गदर्शन में यह विधान जानिए और कीजिए। उनकी दृष्टि में यह यूट्यूब का विषय नहीं है। संकट नाशन पर वे भविष्य में विस्तार से चर्चा करेंगे कि कैसे और क्या होता है; पर जानकारी एक विषय है और व्यावहारिक रूप से यह विषय अलग है, और यह व्यक्ति-व्यक्ति में अलग होता है। वे यह कई बार कह चुके हैं और इसे पूरा बोलने का मन भी नहीं करता, क्योंकि लोगों ने फ़ेसबुक और यूट्यूब पर इन विषयों पर अपनी विशेषज्ञता इतनी ठूँस दी है कि बोलते हुए भी उन्हें लगता है कि उनके अनुयायियों को बुरा लगेगा।

78

संकट नाशन स्तोत्र में "विघ्नराजेन्द्रं" है या "विघ्नराजं"?

दोनों पाठ भगवान को राजा कहते हैं

· 52:18–53:19 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आपने यह बहुत सही पूछा है। कहीं-कहीं विघ्नराजेन्द्रं भी लिखा जाता है, और विघ्नराजं है; विघ्नराज अधिकतर जगह मिलता है। विघ्नराजेन्द्रं पढ़ें तो वह राजाओं का इंद्र है, और विघ्नराजं पढ़ें तो राजा — तो दोनों में, दोनों में भगवान के लिए ही है। दोनों में से जो अच्छा लगे, पढ़िए; कोई दिक्कत नहीं। "सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं", "सप्तमं विघ्नराजं": राजेन्द्रं में भी और राजं में भी, दोनों में भगवान राजा हैं।

79

जब बड़े चैनल छिन्नमस्तिका का मंत्र सार्वजनिक रूप से बाँटें तो क्या करें?

कमेंट में बहस मत कीजिए; उन्हें जो करना है करने दीजिए

· 53:20–53:31 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि बड़े चैनलों पर लोग छिन्नमस्तिका माता का मंत्र दे रहे हैं और कह रहे हैं कि इसके लिए माला की ज़रूरत नहीं; उन्होंने कमेंट में लोगों को समझाने की कोशिश की तो गालियाँ मिलीं, इसलिए उन्होंने बोलना बंद कर दिया। वक्ता कहते हैं कि यही तो विषय है — बोलने की ज़रूरत क्या है? कुछ मत कहिए। उन्हें छिन्नमस्तिका, धूमावती, सब करने दीजिए। जो दे रहे हैं और जो बोल रहे हैं, वह उनका विषय है; और जो सुन रहे हैं, वह उनका।

80

त्रिपुर के लोगों को मार्ग से भटकाने गया मुंडी कोई सामान्य व्यक्ति नहीं था, और नारद उसके पहले शिष्य थे

भगवान नारायण ने स्वयं मुंडी का रूप लिया, और नारद उनके पहले शिष्य थे

· 53:32–54:13

वक्ता कहते हैं कि इसे ऐसे समझिए — इसीलिए हम कहते हैं स्वाध्याय कीजिए। जब भगवान शिव को त्रिपुर का नाश करना था, तो एक बार पढ़िए कि उन्होंने त्रिपुर नाश की पूरी योजना कैसे बनाई, आपको पता चल जाएगा। जो वहाँ मुंडी के रूप में उन्हें मार्ग से भटकाने गया, वह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं था: मुंडी किसका अवतार है? भगवान श्री नारायण स्वयं वह मुंडी बनकर गए। उन्होंने स्वयं अपने बाल मुँडवाए और वहाँ पहुँचे; और जब पहुँचे और कोई उनकी सुन ही नहीं रहा था, तो उनका पहला शिष्य कौन बना? नारद जी स्वयं जाकर बने। पहली दीक्षा किसकी हुई? नारद जी की, मुंडी में। और त्रिपुर के सारे राक्षस इनसे दीक्षित होते और अपना ही वध करवा लेते — मंत्री उनका नाश करेगा; क्या देवता स्वयं आएँगे?

शास्त्र क्या कहता है

Before Tripura could be destroyed, Bhagavān Viṣṇu formed from his own body a shaven-headed mendicant (muṇḍin) — a being he calls his own form — to undermine the Tripura demons' dharma with a false, heterodox teaching.

मूल पाठ पढ़ें →
1

असृजच्च महातेजाः पुरुषं स्वात्मसम्भवम्। एकं मायामयं तेषां धर्मविघ्नार्थमच्युतः॥ १

भगवान् अच्युत विष्णुने उन त्रिपुरवासी दैत्योंके धर्ममें विघ्न डालनेके लिये अपने ही स्वरूपसे उत्पन्न, मायामय एक पुरुषकी रचना की।

2

मुण्डिनं म्लानवस्त्रं च गुम्फिपात्रसमन्वितम्। दधानं पुञ्जिकां हस्ते चालयन्तं पदे पदे॥ २

वह मुण्डित सिर, मलिन वस्त्रधारी, गूँथे हुए पात्रसे युक्त, हाथमें एक पोटली धारण किये हुए, पग-पगपर डगमगाता हुआ था।

3

वस्त्रयुक्तं तथा हस्तं क्षीयमाणं मुखे सदा। धर्मेति व्याहरन्तं हि वाचा विक्लवया मुनिम्॥ ३

उसका हाथ भी वस्त्रसे लिपटा था, मुख सदा क्षीण-सा रहता था, और वह मुनि लड़खड़ाती वाणीसे "धर्म-धर्म" कहता रहता था।

4

स नमस्कृत्य विष्णुं तं तत्पुरः संस्थितोऽथ वै। उवाच वचनं तत्र हरिं स प्राञ्जलिस्तदा॥ ४

उसने उस विष्णुको प्रणामकर उनके सामने खड़े होकर हाथ जोड़कर हरिसे वहाँ वचन कहा।

5

अरिहन्नच्युतं पूज्यं किं करोमि तदादिश। कानि नामानि मे देव स्थानं वापि वद प्रभो॥ ५

हे अरिहन्! हे अच्युत! हे पूज्य! मैं क्या करूँ, यह आदेश दीजिये। हे देव! मेरे क्या नाम होंगे तथा मेरा स्थान भी बताइये, हे प्रभो!

6

इत्येवं भगवान्विष्णुः श्रुत्वा तस्य शुभं वचः। प्रसन्नमानसो भूत्वा वचनं चेदमब्रवीत्॥ ६

इस प्रकार उसके शुभ वचन सुनकर भगवान् विष्णु प्रसन्नचित्त होकर यह वचन बोले।

7

यदर्थं निर्मितोऽसि त्वं निबोध कथयामि ते। मदङ्गज महाप्राज्ञ मद्रूपस्त्वं न संशयः॥ ७

जिस प्रयोजनसे तुम्हें रचा गया है, वह जानो, मैं तुमसे कहता हूँ। हे मेरे अंगसे उत्पन्न, हे महाप्राज्ञ! तुम निःसंदेह मेरा ही स्वरूप हो।

8

ममाङ्गाच्च समुत्पन्नो मत्कार्यं कर्तुमर्हसि। मदीयस्त्वं सदा पूज्यो भविष्यति न संशयः॥ ८

मेरे ही अंगसे उत्पन्न होकर तुम मेरा कार्य करनेके योग्य हो; मेरे होनेके कारण तुम सदा पूज्य होगे, इसमें संशय नहीं है।

9

अरिहन्नाम ते स्यात्तु ह्यन्यानि न शुभानि च। स्थानं वक्ष्यामि ते पश्चाच्छृणु प्रस्तुतमादरात्॥ ९

तुम्हारा नाम "अरिहन्" होगा, इसके अतिरिक्त अन्य कोई नाम शुभ नहीं होगा। तुम्हारा स्थान मैं बादमें बताऊँगा, अभी आदरपूर्वक प्रस्तुत बातको सुनो।

10

मायिन्मायामयं शास्त्रं तत्षोडशसहस्रकम्। श्रौतस्मार्तविरुद्धं च वर्णाश्रमविवर्जितम्॥ १०

हे मायावी! सोलह हजारवाला मायामय शास्त्र, जो श्रौत-स्मार्त आचारके विरुद्ध तथा वर्णाश्रमसे रहित हो।

11

अपभ्रंशमयं शास्त्रं कर्मवादमयं तथा। रचयेति प्रयत्नेन तद्विस्तारो भविष्यति॥ ११

अपभ्रंशयुक्त तथा कर्मवादप्रधान वह शास्त्र प्रयत्नपूर्वक रचो; आगे चलकर उसका विस्तार होगा।

12

ददामि तव निर्माणे सामर्थ्यं तद्भविष्यति। माया च विविधा शीघ्रं त्वदधीना भविष्यति॥ १२

मैं तुम्हें उसके निर्माणका सामर्थ्य देता हूँ, वह तुम्हें प्राप्त होगा; और अनेक प्रकारकी माया भी शीघ्र तुम्हारे अधीन हो जायगी।

13

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हरेश्च परमात्मनः। नमस्कृत्य प्रत्युवाच स मायी तं जनार्दनम्॥ १३

परमात्मा हरिके उस वचनको सुनकर वह मायी प्रणामकर जनार्दनसे आगेकी बात बोला।

14

यत्कर्तव्यं मया देव द्रुतमादिश तत्प्रभो। त्वदाज्ञयाखिलं कर्म सफलं च भविष्यति॥ १४

हे देव! मुझे जो करना हो वह शीघ्र बताइये, हे प्रभो! आपकी आज्ञासे सारा कार्य सफल होगा।

15

इत्युक्त्वा पाठयामास शास्त्रं मायामयं तथा। इहैव स्वर्गनरकप्रत्ययो नान्यथा पुनः॥ १५

ऐसा कहकर उसे मायामय शास्त्र पढ़ाया — इस लोकमें ही स्वर्ग-नरककी प्रतीति है, अन्यथा नहीं।

16

तमुवाच पुनर्विष्णुः स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम्। मोहनीया इमे दैत्याः सर्वे त्रिपुरवासिनः॥ १६

तत्पश्चात् विष्णुने शिवके चरणकमलका स्मरणकर उससे पुनः कहा — त्रिपुरमें रहनेवाले ये समस्त दैत्य मोहित किये जाने योग्य हैं।

17

कार्यास्ते दीक्षिता नूनं पाठनीयाः प्रयत्नतः। मदाज्ञया न दोषस्ते भविष्यति महामते॥ १७

इन्हें अवश्य दीक्षित करना है और प्रयत्नपूर्वक यह शास्त्र पढ़ाना है; मेरी आज्ञासे तुम्हें कोई दोष नहीं लगेगा, हे महामते!

18

धर्मास्तत्र प्रकाशन्ते श्रौतस्मार्त्ता न संशयः। अनया विद्यया सर्वे स्फोटनीया ध्रुवं यते॥ १८

वहाँ निःसंदेह श्रौत-स्मार्त धर्म प्रकाशित हो रहे हैं; इस विद्याके द्वारा हे यते! उन सबको अवश्य नष्ट करना है।

19

गन्तुमर्हसि नाशार्थं मुण्डिंस्त्रिपुरवासिनाम्। तमोधर्मं सम्प्रकाश्य नाशयस्व पुरत्रयम्॥ १९

हे मुण्डिन्! त्रिपुरवासियोंके विनाशके लिये जाओ; तमोगुणी धर्मको प्रकाशितकर तीनों पुरोंका नाश करो।

20

ततश्चैव पुनर्गत्वा मरुस्थल्यां त्वया विभो। स्थातव्यं च स्वधर्मेण कलिर्यावत्समाव्रजेत्॥ २०

उसके बाद हे विभो! पुनः जाकर तुम्हें मरुस्थलमें अपने धर्मके साथ तबतक रहना है, जबतक कलियुग न आ जाय।

21

प्रवृत्ते तु युगे तस्मिन्स्वीयो धर्मः प्रकाश्यताम्। शिष्यैश्च प्रतिशिष्यैश्च वर्तनीयस्त्वया पुनः॥ २१

उस युगके प्रवृत्त होनेपर अपना धर्म प्रकाशित करना और शिष्य-प्रशिष्योंके द्वारा पुनः उसका आचरण करते रहना।

22

मदाज्ञया भवद्धर्मो विस्तारं यास्यति ध्रुवम्। मदनुज्ञापरो नित्यं गतिं प्राप्स्यसि मामकीम्॥ २२

मेरी आज्ञासे तुम्हारे इस धर्मका निश्चय ही विस्तार होगा; मेरी आज्ञामें सदा तत्पर रहते हुए तुम मेरी ही गति प्राप्त करोगे।

23

एवमाज्ञा तदा दत्ता विष्णुना प्रभविष्णुना। शासनाद्देवदेवस्य हृदा त्वन्तर्दधे हरिः॥ २३

इस प्रकार महाशक्तिशाली विष्णुने तब यह आज्ञा दी; देवाधिदेव शिवके शासनसे हरि हृदयसे अन्तर्धान हो गये।

24

ततस्समुण्डी परिपालयन्हरेराज्ञां तथा निर्मितवांश्च शिष्यान्। यथास्वरूपं चतुरस्तदानीं मायामयं शास्त्रमपाठयत्स्वयम्॥ २४

तत्पश्चात् उस मुण्डी अरिहन्ने हरिकी आज्ञाका पालन करते हुए अपने ही स्वरूपमें चार शिष्य बनाये और उसी समय स्वयं उन्हें मायामय शास्त्र पढ़ाया।

25

यथा स्वयं तथा ते च चत्वारो मुण्डिनः शुभाः। नमस्कृत्य स्थितास्तत्र हरये परमात्मने॥ २५

जैसा वह स्वयं था, वैसे ही वे चारों शुभ मुण्डी भी थे; वे परमात्मा हरिको प्रणामकर वहाँ स्थित हो गये।

26

हरिश्चापि मुनेस्तत्र चतुरस्तांस्तदा स्वयम्। उवाच परमप्रीतः शिवाज्ञापरिपालकः॥ २६

हे मुने! शिवकी आज्ञाका पालन करनेवाले हरिने भी वहाँ अत्यन्त प्रसन्न होकर स्वयं उन चारोंसे कहा।

27

यथा गुरुस्तथा यूयं भविष्यथ मदाज्ञया। धन्याः स्थ सद्गतिमिह सम्प्राप्स्यथ न संशयः॥ २७

जैसे गुरु हैं, वैसे ही मेरी आज्ञासे तुमलोग भी बनोगे; तुम धन्य हो, यहाँ सद्गति निःसंदेह प्राप्त करोगे।

28

चत्वारो मुण्डिनस्तेऽथ धर्मं पाषण्डमाश्रिताः। हस्ते पात्रं दधानाश्च तुण्डवस्त्रस्य धारकाः॥ २८

तत्पश्चात् वे चारों मुण्डी पाषण्ड-धर्मका आश्रय लेकर हाथमें पात्र धारण किये, मुखपर वस्त्र बाँधे हुए,

29

मलिनान्येव वासांसि धारयन्तो ह्यभाषिणः। धर्मो लाभः परं तत्त्वं वदन्तस्त्वतिहर्षतः॥ २९

केवल मलिन वस्त्र धारण करते, मौन रहते, अत्यन्त हर्षसे "धर्म ही लाभ, परम तत्त्व है" ऐसा कहते हुए,

30

मार्जनीं ध्रियमाणाश्च वस्त्रखण्डविनिर्मिताम्। शनैः शनैश्चलन्तो हि जीवहिंसाभयाद्ध्रुवम्॥ ३०

वस्त्रके छोटे-छोटे टुकड़ोंसे बनी मार्जनी धारण किये, जीव-हिंसाके भयसे निःसंदेह अत्यन्त धीरे-धीरे चलते हुए,

31

ते सर्वे च तदा देवं भगवन्तं मुदान्विताः। नमस्कृत्य पुनस्तत्र मुने तस्थुस्तदग्रतः॥ ३१

हे मुने! वे सभी तब प्रसन्नतापूर्वक भगवान् देवको पुनः प्रणामकर उनके सामने खड़े हो गये।

32

हरिणा च तदा हस्ते धृत्वा च गुरवेऽर्पिताः। अभ्यधायि च सुप्रीत्या तन्नामानि विशेषतः॥ ३२

और हरिने तब उनका हाथ पकड़कर गुरुको सौंप दिया, और बड़े प्रेमसे उनके नाम विशेषरूपसे बताये।

33

यथा त्वं च तथैवैते मदीया वै न संशयः। आदिरूपं च तन्नाम पूज्यत्वात्पूज्य उच्यते॥ ३३

जैसे तुम मेरे हो, वैसे ही ये भी निःसंदेह मेरे हैं; वह नाम आदिरूप है — पूज्य होनेके कारण "पूज्य" कहा जाता है।

34

ऋषिर्यतिस्तथाकीर्य उपाध्याय इति स्वयम्। इमान्यपि तु नामानि प्रसिद्धानि भवन्तु वः॥ ३४

ऋषि, यति, तथा कीर्य और उपाध्याय — ये नाम भी स्वयं तुमलोगोंके प्रसिद्ध हों।

35

ममापि च भवद्भिश्च नाम ग्राह्यं शुभं पुनः। अरिहन्निति तन्नाम ध्येयं पापप्रणाशनम्॥ ३५

और मेरा भी शुभ नाम तुमलोगोंको ग्रहण करना चाहिये — वह नाम "अरिहन्" है, जो पापका नाश करनेवाला है, ध्यान करने योग्य है।

36

भवद्भिश्चैव कर्तव्यं कार्यं लोकसुखावहम्। लोकानुकूलं चरतां भविष्यत्युत्तमा गतिः॥ ३६

तुमलोगोंको लोक-सुखकारी कार्य ही करना चाहिये; लोकके अनुकूल आचरण करते हुए तुम्हारी उत्तम गति होगी।

37

ततः प्रणम्य तं मायी शिष्ययुक्तःस्वयं तदा। जगाम त्रिपुरं सद्यः शिवेच्छाकारिणं मुमा॥ ३७

तत्पश्चात् उसे प्रणामकर वह मायी स्वयं शिष्योंसहित शिवकी इच्छाके अनुसार कार्य करनेवाले त्रिपुरकी ओर हर्षपूर्वक तुरन्त चल पड़ा।

38

प्रविश्य तत्पुरं तूर्णं विष्णुना नोदितो वशी। महामायाविना तेन ऋषिर्मायां तदाकरोत्॥ ३८

विष्णुद्वारा प्रेरित वह जितेन्द्रिय, महामायावी ऋषि उस नगरमें शीघ्र प्रविष्ट होकर तब माया करने लगा।

39

नगरोपवने कृत्वा शिष्यैर्युक्तः स्थितिं तदा। मायां प्रवर्तयामास मायिनामपि मोहिनीम्॥ ३९

नगरके बाहर उपवनमें शिष्योंसहित निवासकर उसने बड़े-बड़े मायावियोंको भी मोहित करनेवाली माया फैलायी।

40

शिवार्चनप्रभावेण तन्माया सहसा मुने। त्रिपुरे न चचालाशु निर्विण्णोऽभूत्तदा यतिः॥ ४०

हे मुने! शिव-अर्चनके प्रभावसे उसकी वह माया त्रिपुरमें सहसा नहीं चली, तब वह यति खिन्न हो उठा।

41

अथ विष्णुं स सस्मार तुष्टाव च हृदा बहु। नष्टोत्साहो विचेतस्को हृदयेन विदूयता॥ ४१

तब उत्साहरहित, चेतनाशून्य और व्यथित हृदयवाला वह विष्णुका स्मरणकर हृदयसे उनकी बहुत स्तुति करने लगा।

42

तत्स्मृतस्त्वरितं विष्णुःसस्मार शङ्करं हृदि। प्राप्याज्ञां मनसा तस्य स्मृतवान्नारदं द्रुतम्॥ ४२

उसके द्वारा स्मरण किये गये विष्णुने त्वरासे हृदयमें शंकरका स्मरण किया, और उनकी आज्ञा प्राप्तकर मनसे शीघ्र नारदका स्मरण किया।

43

स्मृतमात्रेण विष्णोश्च नारदः समुपस्थितः। नत्वा स्तुत्वा पुरस्तस्य स्थितोऽभूत्साञ्जलिस्तदा॥ ४३

विष्णुके स्मरण करते ही नारद वहाँ उपस्थित हो गये; प्रणामकर तथा स्तुति करके वे उनके सामने हाथ जोड़े खड़े हो गये।

44

अथ तं नारदं प्राह विष्णुर्मतिमतां वरः। लोकोपकारनिरतो देवकार्यकरः सदा॥ ४४

तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विष्णुने नारदसे कहा, जो सदा लोकोपकारमें निरत और देवकार्य करनेवाले हैं।

45

शिवाज्ञयोच्यते तात गच्छ त्वं त्रिपुरं द्रुतम्। ऋषिस्तत्र गतः शिष्यैर्मोहार्थं तत्सुवासिनाम्॥ ४५

हे तात! शिवकी आज्ञासे कहा जा रहा है — तुम शीघ्र त्रिपुर जाओ; एक ऋषि वहाँ अपने शिष्योंके साथ उस नगरके सुन्दर निवासियोंको मोहित करनेके लिये गया है।

46

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य नारदो मुनिसत्तमः। गतस्तत्र द्रुतं यत्र स ऋषिर्मायिनां वरः॥ ४६

उनका यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद शीघ्र वहाँ गये, जहाँ मायावियोंमें श्रेष्ठ वह ऋषि था।

47

नारदोऽपि तथा मायी नियोगान्मायिनः प्रभोः। प्रविश्य तत्पुरं तेन मायिना सह दीक्षितः॥ ४७

नारद भी उस मायावी प्रभु विष्णुकी आज्ञासे स्वयं मायी बनकर, उस नगरमें प्रविष्ट होकर उस मायीसे दीक्षित हुए।

48

ततश्च नारदो गत्वा त्रिपुराधीशसन्निधौ। क्षेमप्रश्नादिकं कृत्वा राज्ञे सर्वं न्यवेदयत्॥ ४८

तत्पश्चात् नारदने त्रिपुराधीशके पास जाकर कुशल-क्षेम आदि पूछकर राजासे सब कुछ निवेदन किया।

49

कश्चित्समागतश्चात्र यतिर्धर्मपरायणः। सर्वविद्याप्रकृष्टो हि वेदविद्यापरान्वितः॥ ४९

यहाँ कोई धर्मपरायण यति आया है, जो सर्वविद्याओंमें प्रकृष्ट तथा वेदविद्यामें विशेष रूपसे प्रवीण है।

50

दृष्ट्वा च बहवो धर्मा नैतेन सदृशाः पुनः। वयं सुदीक्षिताश्चात्र दृष्ट्वा धर्मं सनातनम्॥ ५०

हमने बहुत-से धर्म देखे हैं, परन्तु इसके समान फिर कोई नहीं; हम भी यहाँ इसके सनातन धर्मको देखकर भलीभाँति दीक्षित हो चुके हैं।

51

तवेच्छा यदि वर्तेत तद्धर्मे दैत्यसत्तम। तद्धर्मस्य महाराज ग्राह्या दीक्षा त्वया पुनः॥ ५१

हे दैत्यसत्तम! यदि आपकी इच्छा उस धर्ममें हो, तो हे महाराज! आपको भी उस धर्मकी दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये।

52

तदीयं स वचः श्रुत्वा महदर्थसुगर्भितम्। विस्मितो हृदि दैत्येशो जगौ तत्र विमोहितः॥ ५२

महान् अर्थसे भरे उनके उस वचनको सुनकर दैत्येश हृदयमें विस्मित और वहाँ अत्यन्त मोहित होकर बोला।

53

नारदो दीक्षितो यस्माद्वयं दीक्षामवाप्नुमः। इत्येवं च विदित्वा वै जगाम स्वयमेव ह॥ ५३

"जब नारदने दीक्षा ले ली है, तो हम भी दीक्षा प्राप्त करें" — ऐसा जानकर वह स्वयं ही वहाँ गया।

54

तद्रूपं च तदा दृष्ट्वा मोहितो मायया तथा। उवाच वचनं तस्मै नमस्कृत्य महात्मने॥ ५४

उसका रूप देखकर तथा उसकी मायासे मोहित होकर उसने उस महात्माको प्रणामकर यह वचन कहा।

55

दीक्षा देया त्वया मह्यं निर्मलाशय भो ऋषे। अहं शिष्यो भविष्यामि सत्यं सत्यं न संशयः॥ ५५

हे निर्मल अन्तःकरणवाले ऋषे! आप मुझे दीक्षा दीजिये; मैं आपका शिष्य बनूँगा, यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं।

56

इत्येवं तु वचः श्रुत्वा दैत्यराजस्य निर्मलम्। प्रत्युवाच सुयत्नेन ऋषिः स च सनातनः॥ ५६

दैत्यराजके इस निर्मल वचनको सुनकर उस सनातन ऋषिने बड़े प्रयत्नसे उत्तर दिया।

57

मदीया करणीया स्याद्यद्याज्ञा दैत्यसत्तम। तदा देया मया दीक्षा नान्यथा कोटियत्नतः॥ ५७

हे दैत्यसत्तम! यदि मेरी आज्ञाका पूर्णतः पालन किया जाय, तभी मैं दीक्षा दूँगा — अन्यथा करोड़ों प्रयत्नोंसे भी नहीं।

58

इत्येवं तु वचः श्रुत्वा राजा मायामयोऽभवत्। उवाच वचनं शीघ्रं यतिं तं हि कृताञ्जलिः॥ ५८

यह वचन सुनकर राजा सर्वथा मायाके अधीन हो गया और हाथ जोड़कर शीघ्र उस यतिसे यह वचन बोला।

59

यथाज्ञां दास्यसि त्वं च तत्तथैव न चान्यथा। त्वदाज्ञां नोल्लङ्घयिष्ये सत्यं सत्यं न संशयः॥ ५९

आप जैसी आज्ञा देंगे, मैं वैसा ही करूँगा, अन्यथा नहीं; आपकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करूँगा, यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं।

60

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य त्रिपुराधीशितुस्तदा। दूरीकृत्य मुखाद्वस्त्रमुवाच ऋषिसत्तमः॥ ६०

त्रिपुराधीशका यह वचन सुनकर उस ऋषिश्रेष्ठने अपने मुखसे वस्त्र हटाकर कहा।

61

दीक्षां गृह्णीष्व दैत्येन्द्र सर्वधर्मोत्तमोत्तमाम्। येन दीक्षाविधानेन प्राप्स्यसि त्वं कृतार्थताम्॥ ६१

हे दैत्येन्द्र! सब धर्मोंमें सर्वश्रेष्ठ यह दीक्षा ग्रहण करो, जिस दीक्षाविधानसे तुम कृतार्थताको प्राप्त करोगे।

62

इत्युक्त्वा स तु मायावी दैत्यराजाय सत्वरम्। ददौ दीक्षां स्वधर्मोक्तां तस्मै विधिविधानतः॥ ६२

ऐसा कहकर उस मायावीने दैत्यराजको शीघ्र ही विधि-विधानपूर्वक अपने धर्ममें कही गयी दीक्षा प्रदान की।

63

दैत्यराजे दीक्षिते च तस्मिन्ससहजे मुने। सर्वे च दीक्षिता जातास्तत्र त्रिपुरवासिनः॥ ६३

हे मुने! उस दैत्यराजके अपने भाई-बन्धुओंसहित दीक्षित हो जानेपर वहाँ त्रिपुरके सभी निवासी भी दीक्षित हो गये।

64

मुनेः शिष्यैः प्रशिष्यैश्च व्याप्तमासीद् द्रुतं तदा। महामायाविनस्तत्तु त्रिपुरं सकलं मुने॥ ६४

हे मुने! उस समय उस महामायावीके शिष्यों तथा प्रशिष्योंसे सम्पूर्ण त्रिपुर शीघ्र ही व्याप्त हो गया।

Nārada was the very first person the deluding mendicant (Arihan) initiated in Tripura.

Arihan first creates four disciples of his own; only afterward, when his māyā fails against Tripura's Śiva-worship, does Viṣṇu additionally send Nārada in as reinforcement, given a sham initiation purely as cover for espionage.

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1

असृजच्च महातेजाः पुरुषं स्वात्मसम्भवम्। एकं मायामयं तेषां धर्मविघ्नार्थमच्युतः॥ १

भगवान् अच्युत विष्णुने उन त्रिपुरवासी दैत्योंके धर्ममें विघ्न डालनेके लिये अपने ही स्वरूपसे उत्पन्न, मायामय एक पुरुषकी रचना की।

2

मुण्डिनं म्लानवस्त्रं च गुम्फिपात्रसमन्वितम्। दधानं पुञ्जिकां हस्ते चालयन्तं पदे पदे॥ २

वह मुण्डित सिर, मलिन वस्त्रधारी, गूँथे हुए पात्रसे युक्त, हाथमें एक पोटली धारण किये हुए, पग-पगपर डगमगाता हुआ था।

3

वस्त्रयुक्तं तथा हस्तं क्षीयमाणं मुखे सदा। धर्मेति व्याहरन्तं हि वाचा विक्लवया मुनिम्॥ ३

उसका हाथ भी वस्त्रसे लिपटा था, मुख सदा क्षीण-सा रहता था, और वह मुनि लड़खड़ाती वाणीसे "धर्म-धर्म" कहता रहता था।

4

स नमस्कृत्य विष्णुं तं तत्पुरः संस्थितोऽथ वै। उवाच वचनं तत्र हरिं स प्राञ्जलिस्तदा॥ ४

उसने उस विष्णुको प्रणामकर उनके सामने खड़े होकर हाथ जोड़कर हरिसे वहाँ वचन कहा।

5

अरिहन्नच्युतं पूज्यं किं करोमि तदादिश। कानि नामानि मे देव स्थानं वापि वद प्रभो॥ ५

हे अरिहन्! हे अच्युत! हे पूज्य! मैं क्या करूँ, यह आदेश दीजिये। हे देव! मेरे क्या नाम होंगे तथा मेरा स्थान भी बताइये, हे प्रभो!

6

इत्येवं भगवान्विष्णुः श्रुत्वा तस्य शुभं वचः। प्रसन्नमानसो भूत्वा वचनं चेदमब्रवीत्॥ ६

इस प्रकार उसके शुभ वचन सुनकर भगवान् विष्णु प्रसन्नचित्त होकर यह वचन बोले।

7

यदर्थं निर्मितोऽसि त्वं निबोध कथयामि ते। मदङ्गज महाप्राज्ञ मद्रूपस्त्वं न संशयः॥ ७

जिस प्रयोजनसे तुम्हें रचा गया है, वह जानो, मैं तुमसे कहता हूँ। हे मेरे अंगसे उत्पन्न, हे महाप्राज्ञ! तुम निःसंदेह मेरा ही स्वरूप हो।

8

ममाङ्गाच्च समुत्पन्नो मत्कार्यं कर्तुमर्हसि। मदीयस्त्वं सदा पूज्यो भविष्यति न संशयः॥ ८

मेरे ही अंगसे उत्पन्न होकर तुम मेरा कार्य करनेके योग्य हो; मेरे होनेके कारण तुम सदा पूज्य होगे, इसमें संशय नहीं है।

9

अरिहन्नाम ते स्यात्तु ह्यन्यानि न शुभानि च। स्थानं वक्ष्यामि ते पश्चाच्छृणु प्रस्तुतमादरात्॥ ९

तुम्हारा नाम "अरिहन्" होगा, इसके अतिरिक्त अन्य कोई नाम शुभ नहीं होगा। तुम्हारा स्थान मैं बादमें बताऊँगा, अभी आदरपूर्वक प्रस्तुत बातको सुनो।

10

मायिन्मायामयं शास्त्रं तत्षोडशसहस्रकम्। श्रौतस्मार्तविरुद्धं च वर्णाश्रमविवर्जितम्॥ १०

हे मायावी! सोलह हजारवाला मायामय शास्त्र, जो श्रौत-स्मार्त आचारके विरुद्ध तथा वर्णाश्रमसे रहित हो।

11

अपभ्रंशमयं शास्त्रं कर्मवादमयं तथा। रचयेति प्रयत्नेन तद्विस्तारो भविष्यति॥ ११

अपभ्रंशयुक्त तथा कर्मवादप्रधान वह शास्त्र प्रयत्नपूर्वक रचो; आगे चलकर उसका विस्तार होगा।

12

ददामि तव निर्माणे सामर्थ्यं तद्भविष्यति। माया च विविधा शीघ्रं त्वदधीना भविष्यति॥ १२

मैं तुम्हें उसके निर्माणका सामर्थ्य देता हूँ, वह तुम्हें प्राप्त होगा; और अनेक प्रकारकी माया भी शीघ्र तुम्हारे अधीन हो जायगी।

13

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हरेश्च परमात्मनः। नमस्कृत्य प्रत्युवाच स मायी तं जनार्दनम्॥ १३

परमात्मा हरिके उस वचनको सुनकर वह मायी प्रणामकर जनार्दनसे आगेकी बात बोला।

14

यत्कर्तव्यं मया देव द्रुतमादिश तत्प्रभो। त्वदाज्ञयाखिलं कर्म सफलं च भविष्यति॥ १४

हे देव! मुझे जो करना हो वह शीघ्र बताइये, हे प्रभो! आपकी आज्ञासे सारा कार्य सफल होगा।

15

इत्युक्त्वा पाठयामास शास्त्रं मायामयं तथा। इहैव स्वर्गनरकप्रत्ययो नान्यथा पुनः॥ १५

ऐसा कहकर उसे मायामय शास्त्र पढ़ाया — इस लोकमें ही स्वर्ग-नरककी प्रतीति है, अन्यथा नहीं।

16

तमुवाच पुनर्विष्णुः स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम्। मोहनीया इमे दैत्याः सर्वे त्रिपुरवासिनः॥ १६

तत्पश्चात् विष्णुने शिवके चरणकमलका स्मरणकर उससे पुनः कहा — त्रिपुरमें रहनेवाले ये समस्त दैत्य मोहित किये जाने योग्य हैं।

17

कार्यास्ते दीक्षिता नूनं पाठनीयाः प्रयत्नतः। मदाज्ञया न दोषस्ते भविष्यति महामते॥ १७

इन्हें अवश्य दीक्षित करना है और प्रयत्नपूर्वक यह शास्त्र पढ़ाना है; मेरी आज्ञासे तुम्हें कोई दोष नहीं लगेगा, हे महामते!

18

धर्मास्तत्र प्रकाशन्ते श्रौतस्मार्त्ता न संशयः। अनया विद्यया सर्वे स्फोटनीया ध्रुवं यते॥ १८

वहाँ निःसंदेह श्रौत-स्मार्त धर्म प्रकाशित हो रहे हैं; इस विद्याके द्वारा हे यते! उन सबको अवश्य नष्ट करना है।

19

गन्तुमर्हसि नाशार्थं मुण्डिंस्त्रिपुरवासिनाम्। तमोधर्मं सम्प्रकाश्य नाशयस्व पुरत्रयम्॥ १९

हे मुण्डिन्! त्रिपुरवासियोंके विनाशके लिये जाओ; तमोगुणी धर्मको प्रकाशितकर तीनों पुरोंका नाश करो।

20

ततश्चैव पुनर्गत्वा मरुस्थल्यां त्वया विभो। स्थातव्यं च स्वधर्मेण कलिर्यावत्समाव्रजेत्॥ २०

उसके बाद हे विभो! पुनः जाकर तुम्हें मरुस्थलमें अपने धर्मके साथ तबतक रहना है, जबतक कलियुग न आ जाय।

21

प्रवृत्ते तु युगे तस्मिन्स्वीयो धर्मः प्रकाश्यताम्। शिष्यैश्च प्रतिशिष्यैश्च वर्तनीयस्त्वया पुनः॥ २१

उस युगके प्रवृत्त होनेपर अपना धर्म प्रकाशित करना और शिष्य-प्रशिष्योंके द्वारा पुनः उसका आचरण करते रहना।

22

मदाज्ञया भवद्धर्मो विस्तारं यास्यति ध्रुवम्। मदनुज्ञापरो नित्यं गतिं प्राप्स्यसि मामकीम्॥ २२

मेरी आज्ञासे तुम्हारे इस धर्मका निश्चय ही विस्तार होगा; मेरी आज्ञामें सदा तत्पर रहते हुए तुम मेरी ही गति प्राप्त करोगे।

23

एवमाज्ञा तदा दत्ता विष्णुना प्रभविष्णुना। शासनाद्देवदेवस्य हृदा त्वन्तर्दधे हरिः॥ २३

इस प्रकार महाशक्तिशाली विष्णुने तब यह आज्ञा दी; देवाधिदेव शिवके शासनसे हरि हृदयसे अन्तर्धान हो गये।

24

ततस्समुण्डी परिपालयन्हरेराज्ञां तथा निर्मितवांश्च शिष्यान्। यथास्वरूपं चतुरस्तदानीं मायामयं शास्त्रमपाठयत्स्वयम्॥ २४

तत्पश्चात् उस मुण्डी अरिहन्ने हरिकी आज्ञाका पालन करते हुए अपने ही स्वरूपमें चार शिष्य बनाये और उसी समय स्वयं उन्हें मायामय शास्त्र पढ़ाया।

25

यथा स्वयं तथा ते च चत्वारो मुण्डिनः शुभाः। नमस्कृत्य स्थितास्तत्र हरये परमात्मने॥ २५

जैसा वह स्वयं था, वैसे ही वे चारों शुभ मुण्डी भी थे; वे परमात्मा हरिको प्रणामकर वहाँ स्थित हो गये।

26

हरिश्चापि मुनेस्तत्र चतुरस्तांस्तदा स्वयम्। उवाच परमप्रीतः शिवाज्ञापरिपालकः॥ २६

हे मुने! शिवकी आज्ञाका पालन करनेवाले हरिने भी वहाँ अत्यन्त प्रसन्न होकर स्वयं उन चारोंसे कहा।

27

यथा गुरुस्तथा यूयं भविष्यथ मदाज्ञया। धन्याः स्थ सद्गतिमिह सम्प्राप्स्यथ न संशयः॥ २७

जैसे गुरु हैं, वैसे ही मेरी आज्ञासे तुमलोग भी बनोगे; तुम धन्य हो, यहाँ सद्गति निःसंदेह प्राप्त करोगे।

28

चत्वारो मुण्डिनस्तेऽथ धर्मं पाषण्डमाश्रिताः। हस्ते पात्रं दधानाश्च तुण्डवस्त्रस्य धारकाः॥ २८

तत्पश्चात् वे चारों मुण्डी पाषण्ड-धर्मका आश्रय लेकर हाथमें पात्र धारण किये, मुखपर वस्त्र बाँधे हुए,

29

मलिनान्येव वासांसि धारयन्तो ह्यभाषिणः। धर्मो लाभः परं तत्त्वं वदन्तस्त्वतिहर्षतः॥ २९

केवल मलिन वस्त्र धारण करते, मौन रहते, अत्यन्त हर्षसे "धर्म ही लाभ, परम तत्त्व है" ऐसा कहते हुए,

30

मार्जनीं ध्रियमाणाश्च वस्त्रखण्डविनिर्मिताम्। शनैः शनैश्चलन्तो हि जीवहिंसाभयाद्ध्रुवम्॥ ३०

वस्त्रके छोटे-छोटे टुकड़ोंसे बनी मार्जनी धारण किये, जीव-हिंसाके भयसे निःसंदेह अत्यन्त धीरे-धीरे चलते हुए,

31

ते सर्वे च तदा देवं भगवन्तं मुदान्विताः। नमस्कृत्य पुनस्तत्र मुने तस्थुस्तदग्रतः॥ ३१

हे मुने! वे सभी तब प्रसन्नतापूर्वक भगवान् देवको पुनः प्रणामकर उनके सामने खड़े हो गये।

32

हरिणा च तदा हस्ते धृत्वा च गुरवेऽर्पिताः। अभ्यधायि च सुप्रीत्या तन्नामानि विशेषतः॥ ३२

और हरिने तब उनका हाथ पकड़कर गुरुको सौंप दिया, और बड़े प्रेमसे उनके नाम विशेषरूपसे बताये।

33

यथा त्वं च तथैवैते मदीया वै न संशयः। आदिरूपं च तन्नाम पूज्यत्वात्पूज्य उच्यते॥ ३३

जैसे तुम मेरे हो, वैसे ही ये भी निःसंदेह मेरे हैं; वह नाम आदिरूप है — पूज्य होनेके कारण "पूज्य" कहा जाता है।

34

ऋषिर्यतिस्तथाकीर्य उपाध्याय इति स्वयम्। इमान्यपि तु नामानि प्रसिद्धानि भवन्तु वः॥ ३४

ऋषि, यति, तथा कीर्य और उपाध्याय — ये नाम भी स्वयं तुमलोगोंके प्रसिद्ध हों।

35

ममापि च भवद्भिश्च नाम ग्राह्यं शुभं पुनः। अरिहन्निति तन्नाम ध्येयं पापप्रणाशनम्॥ ३५

और मेरा भी शुभ नाम तुमलोगोंको ग्रहण करना चाहिये — वह नाम "अरिहन्" है, जो पापका नाश करनेवाला है, ध्यान करने योग्य है।

36

भवद्भिश्चैव कर्तव्यं कार्यं लोकसुखावहम्। लोकानुकूलं चरतां भविष्यत्युत्तमा गतिः॥ ३६

तुमलोगोंको लोक-सुखकारी कार्य ही करना चाहिये; लोकके अनुकूल आचरण करते हुए तुम्हारी उत्तम गति होगी।

37

ततः प्रणम्य तं मायी शिष्ययुक्तःस्वयं तदा। जगाम त्रिपुरं सद्यः शिवेच्छाकारिणं मुमा॥ ३७

तत्पश्चात् उसे प्रणामकर वह मायी स्वयं शिष्योंसहित शिवकी इच्छाके अनुसार कार्य करनेवाले त्रिपुरकी ओर हर्षपूर्वक तुरन्त चल पड़ा।

38

प्रविश्य तत्पुरं तूर्णं विष्णुना नोदितो वशी। महामायाविना तेन ऋषिर्मायां तदाकरोत्॥ ३८

विष्णुद्वारा प्रेरित वह जितेन्द्रिय, महामायावी ऋषि उस नगरमें शीघ्र प्रविष्ट होकर तब माया करने लगा।

39

नगरोपवने कृत्वा शिष्यैर्युक्तः स्थितिं तदा। मायां प्रवर्तयामास मायिनामपि मोहिनीम्॥ ३९

नगरके बाहर उपवनमें शिष्योंसहित निवासकर उसने बड़े-बड़े मायावियोंको भी मोहित करनेवाली माया फैलायी।

40

शिवार्चनप्रभावेण तन्माया सहसा मुने। त्रिपुरे न चचालाशु निर्विण्णोऽभूत्तदा यतिः॥ ४०

हे मुने! शिव-अर्चनके प्रभावसे उसकी वह माया त्रिपुरमें सहसा नहीं चली, तब वह यति खिन्न हो उठा।

41

अथ विष्णुं स सस्मार तुष्टाव च हृदा बहु। नष्टोत्साहो विचेतस्को हृदयेन विदूयता॥ ४१

तब उत्साहरहित, चेतनाशून्य और व्यथित हृदयवाला वह विष्णुका स्मरणकर हृदयसे उनकी बहुत स्तुति करने लगा।

42

तत्स्मृतस्त्वरितं विष्णुःसस्मार शङ्करं हृदि। प्राप्याज्ञां मनसा तस्य स्मृतवान्नारदं द्रुतम्॥ ४२

उसके द्वारा स्मरण किये गये विष्णुने त्वरासे हृदयमें शंकरका स्मरण किया, और उनकी आज्ञा प्राप्तकर मनसे शीघ्र नारदका स्मरण किया।

43

स्मृतमात्रेण विष्णोश्च नारदः समुपस्थितः। नत्वा स्तुत्वा पुरस्तस्य स्थितोऽभूत्साञ्जलिस्तदा॥ ४३

विष्णुके स्मरण करते ही नारद वहाँ उपस्थित हो गये; प्रणामकर तथा स्तुति करके वे उनके सामने हाथ जोड़े खड़े हो गये।

44

अथ तं नारदं प्राह विष्णुर्मतिमतां वरः। लोकोपकारनिरतो देवकार्यकरः सदा॥ ४४

तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विष्णुने नारदसे कहा, जो सदा लोकोपकारमें निरत और देवकार्य करनेवाले हैं।

45

शिवाज्ञयोच्यते तात गच्छ त्वं त्रिपुरं द्रुतम्। ऋषिस्तत्र गतः शिष्यैर्मोहार्थं तत्सुवासिनाम्॥ ४५

हे तात! शिवकी आज्ञासे कहा जा रहा है — तुम शीघ्र त्रिपुर जाओ; एक ऋषि वहाँ अपने शिष्योंके साथ उस नगरके सुन्दर निवासियोंको मोहित करनेके लिये गया है।

46

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य नारदो मुनिसत्तमः। गतस्तत्र द्रुतं यत्र स ऋषिर्मायिनां वरः॥ ४६

उनका यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद शीघ्र वहाँ गये, जहाँ मायावियोंमें श्रेष्ठ वह ऋषि था।

47

नारदोऽपि तथा मायी नियोगान्मायिनः प्रभोः। प्रविश्य तत्पुरं तेन मायिना सह दीक्षितः॥ ४७

नारद भी उस मायावी प्रभु विष्णुकी आज्ञासे स्वयं मायी बनकर, उस नगरमें प्रविष्ट होकर उस मायीसे दीक्षित हुए।

48

ततश्च नारदो गत्वा त्रिपुराधीशसन्निधौ। क्षेमप्रश्नादिकं कृत्वा राज्ञे सर्वं न्यवेदयत्॥ ४८

तत्पश्चात् नारदने त्रिपुराधीशके पास जाकर कुशल-क्षेम आदि पूछकर राजासे सब कुछ निवेदन किया।

49

कश्चित्समागतश्चात्र यतिर्धर्मपरायणः। सर्वविद्याप्रकृष्टो हि वेदविद्यापरान्वितः॥ ४९

यहाँ कोई धर्मपरायण यति आया है, जो सर्वविद्याओंमें प्रकृष्ट तथा वेदविद्यामें विशेष रूपसे प्रवीण है।

50

दृष्ट्वा च बहवो धर्मा नैतेन सदृशाः पुनः। वयं सुदीक्षिताश्चात्र दृष्ट्वा धर्मं सनातनम्॥ ५०

हमने बहुत-से धर्म देखे हैं, परन्तु इसके समान फिर कोई नहीं; हम भी यहाँ इसके सनातन धर्मको देखकर भलीभाँति दीक्षित हो चुके हैं।

51

तवेच्छा यदि वर्तेत तद्धर्मे दैत्यसत्तम। तद्धर्मस्य महाराज ग्राह्या दीक्षा त्वया पुनः॥ ५१

हे दैत्यसत्तम! यदि आपकी इच्छा उस धर्ममें हो, तो हे महाराज! आपको भी उस धर्मकी दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये।

52

तदीयं स वचः श्रुत्वा महदर्थसुगर्भितम्। विस्मितो हृदि दैत्येशो जगौ तत्र विमोहितः॥ ५२

महान् अर्थसे भरे उनके उस वचनको सुनकर दैत्येश हृदयमें विस्मित और वहाँ अत्यन्त मोहित होकर बोला।

53

नारदो दीक्षितो यस्माद्वयं दीक्षामवाप्नुमः। इत्येवं च विदित्वा वै जगाम स्वयमेव ह॥ ५३

"जब नारदने दीक्षा ले ली है, तो हम भी दीक्षा प्राप्त करें" — ऐसा जानकर वह स्वयं ही वहाँ गया।

54

तद्रूपं च तदा दृष्ट्वा मोहितो मायया तथा। उवाच वचनं तस्मै नमस्कृत्य महात्मने॥ ५४

उसका रूप देखकर तथा उसकी मायासे मोहित होकर उसने उस महात्माको प्रणामकर यह वचन कहा।

55

दीक्षा देया त्वया मह्यं निर्मलाशय भो ऋषे। अहं शिष्यो भविष्यामि सत्यं सत्यं न संशयः॥ ५५

हे निर्मल अन्तःकरणवाले ऋषे! आप मुझे दीक्षा दीजिये; मैं आपका शिष्य बनूँगा, यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं।

56

इत्येवं तु वचः श्रुत्वा दैत्यराजस्य निर्मलम्। प्रत्युवाच सुयत्नेन ऋषिः स च सनातनः॥ ५६

दैत्यराजके इस निर्मल वचनको सुनकर उस सनातन ऋषिने बड़े प्रयत्नसे उत्तर दिया।

57

मदीया करणीया स्याद्यद्याज्ञा दैत्यसत्तम। तदा देया मया दीक्षा नान्यथा कोटियत्नतः॥ ५७

हे दैत्यसत्तम! यदि मेरी आज्ञाका पूर्णतः पालन किया जाय, तभी मैं दीक्षा दूँगा — अन्यथा करोड़ों प्रयत्नोंसे भी नहीं।

58

इत्येवं तु वचः श्रुत्वा राजा मायामयोऽभवत्। उवाच वचनं शीघ्रं यतिं तं हि कृताञ्जलिः॥ ५८

यह वचन सुनकर राजा सर्वथा मायाके अधीन हो गया और हाथ जोड़कर शीघ्र उस यतिसे यह वचन बोला।

59

यथाज्ञां दास्यसि त्वं च तत्तथैव न चान्यथा। त्वदाज्ञां नोल्लङ्घयिष्ये सत्यं सत्यं न संशयः॥ ५९

आप जैसी आज्ञा देंगे, मैं वैसा ही करूँगा, अन्यथा नहीं; आपकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करूँगा, यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं।

60

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य त्रिपुराधीशितुस्तदा। दूरीकृत्य मुखाद्वस्त्रमुवाच ऋषिसत्तमः॥ ६०

त्रिपुराधीशका यह वचन सुनकर उस ऋषिश्रेष्ठने अपने मुखसे वस्त्र हटाकर कहा।

61

दीक्षां गृह्णीष्व दैत्येन्द्र सर्वधर्मोत्तमोत्तमाम्। येन दीक्षाविधानेन प्राप्स्यसि त्वं कृतार्थताम्॥ ६१

हे दैत्येन्द्र! सब धर्मोंमें सर्वश्रेष्ठ यह दीक्षा ग्रहण करो, जिस दीक्षाविधानसे तुम कृतार्थताको प्राप्त करोगे।

62

इत्युक्त्वा स तु मायावी दैत्यराजाय सत्वरम्। ददौ दीक्षां स्वधर्मोक्तां तस्मै विधिविधानतः॥ ६२

ऐसा कहकर उस मायावीने दैत्यराजको शीघ्र ही विधि-विधानपूर्वक अपने धर्ममें कही गयी दीक्षा प्रदान की।

63

दैत्यराजे दीक्षिते च तस्मिन्ससहजे मुने। सर्वे च दीक्षिता जातास्तत्र त्रिपुरवासिनः॥ ६३

हे मुने! उस दैत्यराजके अपने भाई-बन्धुओंसहित दीक्षित हो जानेपर वहाँ त्रिपुरके सभी निवासी भी दीक्षित हो गये।

64

मुनेः शिष्यैः प्रशिष्यैश्च व्याप्तमासीद् द्रुतं तदा। महामायाविनस्तत्तु त्रिपुरं सकलं मुने॥ ६४

हे मुने! उस समय उस महामायावीके शिष्यों तथा प्रशिष्योंसे सम्पूर्ण त्रिपुर शीघ्र ही व्याप्त हो गया।

81

क्या महाविद्या साधनाएँ अनधिकृत ढंग से सिखाने वाले लोग अज्ञानी हैं?

वे विद्वान हैं, उनके पास सिद्धियाँ हैं, और उनके शिष्य बड़े लोग हैं

· 54:14–54:25 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जो लोग इस तरह की चीज़ें अनधिकृत ढंग से करते हैं, वे विद्वान लोग हैं — उनके पास जानकारी की भरमार है, और उनके पास सिद्धियाँ हैं भैया। और उनके शिष्य भी बड़े-बड़े लोग हैं। तो बस वही हो रहा है: स्वाध्याय कीजिए, समझ जाएँगे कि कहाँ से क्या चल रहा है और कैसे बचना है।

वक्ता कहते हैं कि जो लोग इस तरह के विषय अनधिकृत ढंग से करते हैं, वे विद्वान लोग हैं। उनके पास जानकारी की भरमार है; उनके पास सिद्धियाँ हैं भैया। और उनके शिष्य भी बड़े-बड़े लोग हैं। तो बस वही हो रहा है। स्वाध्याय कीजिए, आप समझ जाएँगे कि कहाँ से क्या चल रहा है, और कैसे बचना है।

82

क्या वज्र वैरोचनी साधना का अधिकार ऑनलाइन दिया जा सकता है?

बिना माला, बिना विधि-विधान, बिना गुरु परंपरा की साधना

· 54:26–54:51 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि वज्र वैरोचनी की साधना का अधिकार बिना माला, बिना विधि-विधान और बिना गुरु परंपरा के ऑनलाइन दिया जा रहा है, और यह आश्चर्यजनक है। वक्ता कहते हैं कि आजकल यह चल रहा है; श्रोता ने जिस व्यक्ति का नाम लिया, उसका नाम लेकर वे कहते हैं कि वे कुछ भी कर सकते हैं, उनके गुरु वे स्वयं हैं। अपना आनंद लीजिए, कोई दिक्कत नहीं।

83

क्या साधक को अपना ज्ञान दिखाना चाहिए और गलत सिखाने वालों को सुधारना चाहिए?

जो भी बुद्धि मिले, उसका प्रदर्शन मत कीजिए

· 54:52–55:19 · Also a question

वक्ता गृहस्थ तंत्र के सभी साधकों से विनती करते हैं कि जो भी बुद्धि मिले, उसका कहीं प्रदर्शन न करें। किसी को रोकने की ज़रूरत नहीं। जहाँ आप खास तौर पर जानते हैं कि आपसे बड़े ज्ञानी और वैज्ञानिक लोग मौजूद हैं, और जहाँ भी आप बोलेंगे वहाँ आपको मारने, काटने और गाली देने पर उतर आएँगे — वहाँ ज़रूरत क्या है? छोड़िए, उन्हें अपना आनंद लेने दीजिए। उनका जीवन और उनकी नियति उन्हें वहाँ ले गई है।

84

लोग सही सलाह को अनदेखा करके ऐसी साधनाओं में क्यों उलझ जाते हैं?

नियति उन्हें वहाँ ले जाती है, और उसे भुगतवाएगी

· 55:20–56:13 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जैसे कुछ लोगों की नियति उन्हें ऐसी जगह ले जाती है कि स्वयं ब्रह्मा जी भी कहें कि विघ्नराज गणपति का पूजन करो, तुम्हारा सारा कष्ट दूर हो जाएगा — और गणपति की पूजा कैसे करें पूछने पर कहें कि भगवान को दूर्वा चढ़ाओ, उनके 108 नामों से चढ़ाओ — तब भी वे ब्रह्मा जी की बात नहीं मानेंगे, क्योंकि उनकी नियति ऐसी है। वे नहीं मानेंगे। नियति उन्हें भुगतवाकर ही संतुष्ट होगी; वे भुगतेंगे। और ठीक इसी तरह, जिनका पूर्ण विनाश होना है, ऐसे शापित लोगों की नियति उन्हें ले जाएगी: वे ऐसे देवी-देवताओं की साधना में उलझेंगे जो बिना विधि-विधान, बिना परंपरा, बिना क्रम साधना के हो ही नहीं सकती — यह सबके लिए नहीं है, पर वे करवा लेंगे।

85

पार्वती गीता महाविद्याएँ कौन कर सकता है, इस बारे में क्या कहती है?

भगवती कहती हैं कि दसों में से किसी की भी दीक्षा ली जा सकती है

· 56:14–56:47 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि ऐसी बातें कहकर — कि फलाँ लोग कहते हैं, ज्ञानी लोग कहते हैं कि यह साधना नहीं की जा सकती — उन्होंने लोगों के मन में भ्रम पैदा कर दिया है कि इस महाविद्या की साधना नहीं हो सकती। वे कहते हैं, संदर्भ देखिए: पार्वती गीता में भगवती ने कहा है कि दस महाविद्याओं में से किसी की भी दीक्षा लेकर आप कर सकते हैं। तो जो कह रहे हैं कि आप धूमावती की साधना नहीं कर सकते, छिन्नमस्तिका की साधना नहीं कर सकते, क्या वे पार्वती जी से बड़े हो गए? बिल्कुल ऐसा नहीं है। वे आपको भ्रमित कर रहे हैं ताकि आप साधना न कर सकें, आपको शक्ति न मिले, आप ज्ञानी न बनें। वे आप पर राज करना चाहते हैं — इसीलिए आपको यह साधना करने से मना कर रहे हैं।

86

ग्रंथ अपने कुल के भीतर महाविद्या साधना की नीति और नियम बताते हैं, जिसमें यह भी कि कुल देवी श्री कुल की हैं या नहीं

अपने कुल में महाविद्या साधना की नीति और नियम

· 56:48–57:27

वक्ता कहते हैं कि पर पार्वती गीता के बाद जब आप ग्रंथों में जाते हैं और तंत्र का अध्ययन करते हैं, तो इस विषय पर स्पष्टता मिलती है: अगर आप मातंगी साधना करेंगे, तो उसकी नीति और नियम क्या हैं? आपके कुलदेवी-देवताओं का कोई विषय मौजूद है या नहीं? अगर आपके कुल की देवी श्री कुल की हैं और आप धूमावती साधना में चल पड़े हैं, तो कोई न कोई नियम और निष्ठा होगी। तो यही नीति है। इसमें आपको और मुझे कहीं दखल नहीं देना चाहिए। बस एक विषय याद रखिए: यहाँ मुंडी पूर्ण विनाश करने गया है, और ये त्रिपुर के लोग हैं। इनका पूर्ण विनाश हो रहा है — अपना आनंद लीजिए, सामने से देखिए, और अपने भीतर विद्वत्ता लाइए।

87

संकट नाशन स्तोत्र को गणपति के बीजाक्षर से कैसे संपुटित करें?

पहले गणपति प्रणव के चार लाख जप

· 57:28–57:45 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर आप संकट नाशन को भगवान गणपति के बीजाक्षर से संपुटित करके पढ़ना चाहते हैं, तो सबसे पहले गणपति प्रणव वाले एकाक्षरी बीज के कम से कम चार लाख जप कीजिए, और उसके बाद ही संपुट लगाइए — बहुत अच्छा होगा।

वक्ता कहते हैं कि अगर आप संकट नाशन स्तोत्र को भगवान गणपति के बीजाक्षर से संपुट करके पढ़ना चाहते हैं, तो सबसे पहले गणपति प्रणव वाले एकाक्षरी बीज के कम से कम चार लाख जप कीजिए, और फिर संपुट लगाइए। बहुत अच्छा होगा भैया।

88

अगर साधना का संकल्प पूरा न हो तो क्या करें?

उस देवता से क्षमा प्रार्थना, पूजन और दीपदान

· 57:46–57:58 · Also a question

पूछा गया कि साधना का संकल्प लेकर पूरा न हो, तो क्षमा प्रार्थना के रूप में क्या करें। वक्ता कहते हैं: जिस देवता का था, उनसे क्षमा प्रार्थना आदि कीजिए, जहाँ तक हो सके उनका पूजन कीजिए, और दीपदान कीजिए।

लिया हुआ साधना संकल्प पूरा न हो, तो उसकी क्षमा प्रार्थना के लिए क्या करें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं। जिस देवता का था, उनसे क्षमा प्रार्थना आदि कीजिए; जहाँ तक हो सके उनका पूजन कीजिए; दीपदान कीजिए।

89

देहरी पर कौन-से दीपक जलते हैं, और क्या चौमुखा दीपक लगाया जा सकता है?

दो दीपक काफ़ी हैं, और घी या तेल इस पर निर्भर है कि दीपक किसका है

· 57:59–58:39 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि चौमुखा दीपक आप चौखट पर लगा तो सकते हैं, पर बहुत सारे दीपक जलाने के बजाय दो दीपक काफ़ी हैं। घी का दीपक हो या तेल का, यह इस पर निर्भर करेगा कि आप देहरी पर किसके दीपक जला रहे हैं — क्योंकि वहाँ भगवान नरसिंह का दीपक भी जलेगा; वहाँ पितरों के लिए, कुल पितरों के लिए भी जलता है; वहाँ कुल भैरव जी के लिए भी होता है, और कुलदेवी के लिए भी। तो यह इस पर निर्भर करेगा कि आप किसका दीपक जला रहे हैं।

90

कोर्ट केस में जीत के लिए क्या करना चाहिए?

दुर्गा सप्तशती का ग्यारहवाँ अध्याय

· 58:40–59:01 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि कोर्ट केस किस विषय का है। भगवती दुर्गा की उपासना विजय देने वाली है — यह दुर्गा सप्तशती में, ग्यारहवें अध्याय से है। उसका पाठ करें तो सर्वोत्तम है।

वक्ता कहते हैं कि कोर्ट केस में जीत के लिए — आप क्या करना चाहते हैं, यह इस पर निर्भर है कि कोर्ट केस किस विषय का है। भगवती दुर्गा की उपासना जय देने वाली है। यह दुर्गा सप्तशती में, ग्यारहवें अध्याय से है। उसका पाठ करें, तो सर्वोत्तम है।

91

जब बहुत बुरा समय आ जाए, तो क्या घर में धूमावती मंत्र का जप किया जा सकता है?

उनकी दृष्टि में यह घर में नहीं किया जा सकता

· 59:02–59:13 · Also a question

पूछा गया कि जब बहुत बुरा समय आ गया हो, तो क्या घर में धूमावती मंत्र का जप किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि इस प्रश्न का उत्तर वे पिछली सभी लाइव में दे चुके हैं — और उनकी दृष्टि में, भैया, आप नहीं कर सकते।

एक श्रोता पूछते हैं कि अगर बहुत बुरा समय आ गया हो, तो क्या घर में धूमावती मंत्र का जप किया जा सकता है। वक्ता प्रश्नकर्ता का नाम लेकर कहते हैं कि आपके प्रश्न का उत्तर हम पिछली सभी लाइव में दे चुके हैं। मेरी दृष्टि में, भैया, आप नहीं कर सकते।

92

क्या नरसिंह की मुख्य साधना के साथ कई देवताओं की साधनाएँ एक साथ की जा सकती हैं?

एक मुख्य साधना; बाकी केवल अंग

· 59:14–59:38 · Also a question

पूछा गया कि क्या भगवान नरसिंह की मुख्य साधना के साथ भगवती कामाख्या दुर्गा की साधना भी करनी चाहिए, और क्या उसके साथ बटुक भैरव की भी। वक्ता कहते हैं कि यह इस पर निर्भर करेगा कि मुख्य साधना किसकी होनी है। सबकी साधना एक साथ नहीं हो सकती; क्रमागत करनी होगी। और मुख्य साधना एक ही होगी — बाकी केवल अंगों में रहेंगी।

93

क्या माँ दुर्गा का वाहन केवल सिंह है, या बाघ भी हो सकता है?

सिंह और बाघ दोनों

· 59:39–59:56 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि कोशिश करने पर भी ध्यान में बंद आँखों से उन्हें केवल बाघ दिखता है, और पूछते हैं कि क्या माँ दुर्गा का वाहन केवल सिंह है या बाघ भी हो सकता है। वक्ता कहते हैं कि अच्छा है भैया: सिंह और बाघ, दोनों हो सकते हैं। फिर पूछा गया कि क्या वे उन माँ में त्रिकोण कर सकते हैं; वे कहते हैं कि अवश्य कर सकते हैं।

94

क्या गणपति के बारह नाम वाले स्तोत्र का 27000 का संकल्प लिया जा सकता है?

द्वादश नाम स्तोत्र का 27000 का संकल्प

· 59:57–1:00:06 · Also a question

पूछा गया कि क्या गणपति जी के द्वादश नाम स्तोत्र का 27000 का संकल्प लेकर किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि अवश्य किया जा सकता है।

एक श्रोता पूछते हैं कि क्या वे गणपति जी के द्वादश नाम स्तोत्र का 27000 का संकल्प ले सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि अवश्य किया जा सकता है।

95

क्या कुल के धर्म के विरुद्ध हो जाने वाली पत्नी को छोड़ना उचित है?

एक बार पाणिग्रहण संस्कार हो गया, तो पुरुष को हर उपाय करना है

· 1:00:07–1:01:13 · Also a question

एक श्रोता पूछते हैं कि जो पत्नी कुल और धर्म के प्रति विधर्मी हो जाए, या जानबूझकर उन्हें दबाने और परेशान करने वाला व्यवहार करे, उसे छोड़ना उचित है क्या, क्योंकि बहस सहन से बाहर है। वक्ता कहते हैं कि उचित व्यवस्था करने के बाद, हाँ। पर यह ध्यान रखिए: एक बार पाणिग्रहण संस्कार हो गया, तो जहाँ तक हो सके, वह पुरुष का कितना भी अपमान करे, वह अपना ही बना-बिगाड़ रही है। अपनी ओर से साम, दाम, दंड और भेद लगाकर प्रयास कीजिए कि वह धर्म मार्ग पर आए — यह आपकी ज़िम्मेदारी है। प्रेम से समझाकर, परिवार की सहायता लेकर, रिश्तेदारों की सहायता लेकर, देवी-देवताओं के माध्यम से, शास्त्रों के विषय बताकर — हर तरह से प्रयास कीजिए कि वह अनुकूल हो, खासकर जब आप धर्म मार्ग पर चल रहे हों।

96

जब पत्नी साथ चलने को तैयार न हो, तो क्या उसका त्याग उचित है?

उसका योगक्षेम उठाना पति की ज़िम्मेदारी बनी रहती है

· 1:01:14–1:01:59 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि और अगर तब भी वह न माने और साथ चलना संभव न हो, तो ऐसी परिस्थिति में भी, अगर आप उसका त्याग करना चाहें, तो मेरी दृष्टि में, भैया, त्याग उचित नहीं। उसका योगक्षेम उठाने की ज़िम्मेदारी, कर्तव्य आपका है। इसलिए अगर त्याग करना ही हो, तो ऐसा हो कि उसकी पूरी व्यवस्था की जाए, और त्याग आपके मन से हो। वे जोड़ते हैं कि आपने शास्त्रोक्त दृष्टि से पूछा है, इसलिए वे आज का आधुनिक उत्तर नहीं दे सकते; वह आपका निर्णय होगा कि तलाक देंगे या कैसे व्यवहार करेंगे। पर एक साधक के अनुसार, ऐसी परिस्थिति में साधक को क्या करना चाहिए?

97

त्याग किस शर्त पर अनुमत है?

जीवन भर के भरण-पोषण की व्यवस्था, और उससे कोई इच्छा न रखना

· 1:02:00–1:02:53 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि परिस्थिति कितनी भी कठिन हो जाए, अपनी पत्नी का त्याग उसके भरण-पोषण का कर्तव्य छोड़कर नहीं किया जा सकता। इसलिए उसके भरण-पोषण के कर्तव्य की पूरी व्यवस्था जीवन भर के लिए की जाए, या जितना शरीर संभाल सके, और उसके अनुसार उसका पालन कीजिए। बाकी, उससे कोई इच्छा न रखिए। त्याग का यह अर्थ भी नहीं कि अब आप उसके हाथ का खाना-पानी भी नहीं लेंगे। तो उचित व्यवस्था करने के बाद आप त्याग अवश्य कर सकते हैं; इसमें कोई दोष नहीं।

98

क्या जप के दौरान बाएँ हाथ से दीपक में तेल भरा जा सकता है, और कौन-सी बाती लगती है?

कर्म साक्षी दीपक में सोई बाती; खड़ी बाती प्रयोग के लिए

· 1:02:54–1:03:26 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भैया, पहले तो बड़ा दीपक रखिए: अगर दो-तीन घंटे जप करना है, तो उसी हिसाब से दीपक रखिए ताकि बार-बार तेल न डालना पड़े। एक बड़ा दीपक खरीद लीजिए। माला एक हाथ में है, इसलिए उल्टे हाथ से तेल डालना चाहें तो डाल सकते हैं — इसमें कोई बात नहीं। कर्म साक्षी की बाती सोई बाती होगी। खड़ी बाती प्रयोग में लगती है: जब हम किसी मंत्र का प्रयोग कर रहे हों, तब खड़ी बाती लगेगी।

99

किसी तांत्रिक को उसके किए पाप का दंड कैसे दिया जा सकता है?

दंड देने का सामर्थ्य न आपमें है, न मुझमें

· 1:03:27–1:03:59 · Also a question

पूछा गया कि किसी तांत्रिक को उसके किए पाप का दंड कैसे दिया जाए, भले वह तांत्रिक उन्हीं देवी-देवता को पूजता हो जिन्हें हम पूजते हैं। वक्ता कहते हैं कि भैया, दंड देने का सामर्थ्य न आपमें है, न मुझमें। और अगर सामर्थ्य है, तो प्रश्न पूछने की ज़रूरत ही नहीं: सिद्धि प्रत्यक्ष हो, मंत्र शुद्ध हो, और सीधे प्रयोग कीजिए।

100

कुलदेवी पर लगाया गया बंधन कैसे खोला जाता है?

प्रचंड साधना से मंत्र सिद्ध कीजिए और उससे उसकी विद्या बाँधिए

· 1:04:00–1:04:47 · Also a question

पूछा गया कि कुलदेवी पर किसी भी देवता द्वारा लगाया गया हर तरह का बंधन कैसे खोलें, जब तांत्रिक समय-समय पर वह बंधन बढ़ाता रहता है। वक्ता कहते हैं कि इसके लिए पहले किसी एक देवी-देवता की प्रचंड साधना करके मंत्र आदि सिद्ध कीजिए। और उस सिद्धि से, जिस भी मंत्र को आपने जागृत किया — भगवान नरसिंह का माला मंत्र ही देखिए: बहुत लोग भगवान शिव के मंदिर में, भगवान नारायण के मंदिर में, पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर उस तरह जप करके भगवान नरसिंह का माला मंत्र सिद्ध करते हैं। फिर उसके प्रयोग से पहले अधर्म भरा काम करने वाले तांत्रिक की विद्या और उसके आभिचारिक देवताओं का बंधन होगा; और आपके अपने देवी-देवताओं का सामर्थ्य पूरी तरह बढ़ेगा। इसमें भावनात्मक प्रयोग भी करना चाहिए।

101

श्री यंत्र की पूजा का अधिकार किसे है?

श्री यंत्र पूजन श्री विद्या में दीक्षितों का है

· 1:04:48–1:05:34 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि पहला विषय यह है: श्री यंत्र के पूजन का अधिकार श्री विद्या में दीक्षित साधकों और साधिकाओं का है। गुरु आदेश से जो विधि बताई जाती है, उसी के अनुसार श्री यंत्र का पूजन होगा। श्री यंत्र का मंत्रहीन पूजन सामान्यतः नहीं होता। कम से कम गुरु पादुका मंत्र से, और श्री विद्या में आपने जिनकी दीक्षा ली है उनके मंत्र से होता है। वे कहते हैं कि यही दृष्टि है, यही विषय है; बाकी यह विषय मानना या न मानना आपकी इच्छा है।

102

जब घर में पूजा करने वाली को यात्रा पर जाना हो, तो यंत्र का क्या करें?

साथ ले जाने के बजाय सुगंधित लाल सूती वस्त्र में लपेटकर प्रार्थना कीजिए

· 1:05:35–1:06:13 · Also a question

एक श्रोता कहती हैं कि उनके घर में कोई और पूजा नहीं करता — न सास, न ससुर, न पति — और उन्हें कुछ दिनों के लिए मायके जाना है; वे पूछती हैं कि किस विधि से ले जाएँ। वक्ता कहते हैं कि अगर घर में रोज़ अभिषेक और पंचोपचार पूजन करने वाला कोई नहीं होगा, तो साथ ले जाना, स्थान बदलना, देहरी लाँघना उचित नहीं। और आप उन्हें छोड़ भी नहीं सकतीं। एक काम कर सकती हैं: शुद्ध सूती लाल कपड़ा लीजिए और इत्र आदि लगाकर उसे सुगंधित कीजिए। यंत्र को चारों ओर से लपेट दीजिए — यानी उस कपड़े से ढक दीजिए। धूप-दीप दिखाइए। और उनसे प्रार्थना कीजिए कि इतने दिनों बाद जब मैं आऊँगी, तो फिर आपकी सेवा और पूजन करूँगी।

103

जिस घर में मांस खाया जाता हो, वहाँ शुचिता कैसे रखें?

मांसाहारियों के बीच सात्विक साधना, और पुंडरीकाक्ष का जप

· 1:06:14–1:07:05 · Also a question

एक श्रोता बताते हैं कि घर में अक्सर चिकन खाया जाता है, बिना हाथ धोए बर्तन धोए जाते हैं और बेसिन का नल छुआ जाता है, बाल्टी बाथरूम के साथ रखी जाती है; वे पूछते हैं क्या करें। वक्ता कहते हैं कि अब यह रावण की लंका में विभीषण बनने की कोशिश वाली बात हो गई। चिकन खाने वालों के बीच सात्विक साधना बड़ी कठिनाई है भैया। इसके लिए आपसे क्या कहें — जितना हो सके शुचिता का ध्यान रखिए। अपना सामर्थ्य बढ़ाइए, जहाँ तक हो सके प्रयास कीजिए। जहाँ तक हो सके भगवान पुंडरीकाक्ष का जप करते रहिए; उनके जप से शुद्धता मिलती रहेगी। समर्थ होकर एकनिष्ठ बनिए। एकांतिक बनिए, अलग होइए।

104

बटुक भैरव के वाहन का नाम क्या है?

काल कंटक काल भैरव का वाहन है

· 1:07:06–1:07:31 · Also a question

बटुक भैरव जी के वाहन का नाम पूछे जाने पर वक्ता पहले काल कंटक कहते हैं, फिर स्वयं सुधारते हैं: काल भैरव जी के वाहन का नाम काल कंटक है। बटुक भैरव जी के वाहन का नाम अलग है और अभी ध्यान में नहीं आ रहा। काल कंटक उनका है, काल भैरव जी का, मुख्य स्वरूप का। फिर पूछा गया कि माता केला देवी के भैरव जी कौन हैं; वे कहते हैं कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है।

105

क्या पिता की मृत्यु के बाद साधना की जा सकती है, और कौन-सा अध्याय?

पूर्ण आयु के लिए गीता का दसवाँ अध्याय, अचानक मृत्यु के लिए सातवाँ या ग्यारहवाँ

· 1:07:32–1:07:52 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भैया, आप अभी भी साधना कर सकते हैं। साधना में श्रीमद् भगवद्गीता की साधना कीजिए। अगर पिता की मृत्यु पूर्ण आयु पाकर हुई है, तो दसवाँ अध्याय पढ़िए, संकल्प लीजिए और उनके लिए साधना कीजिए। अगर अचानक आदि हुई है, तो सातवाँ अध्याय या ग्यारहवाँ अध्याय पढ़िए।

106

भगवती महाकाली और बटुक भैरव को क्या प्रिय है?

भगवती को अर्चन और हवन, भैरव स्वरूपों को जप

· 1:07:53–1:08:30 · Also a question

पूछा गया कि जैसे शिव जी को अभिषेक और गणेश जी को तर्पण प्रिय है, वैसे भगवती महाकाली और बटुक भैरव जी को क्या प्रिय है। वक्ता कहते हैं कि भगवती महाकाली को अर्चन प्रिय है; भगवती के सभी स्वरूपों को अर्चन बहुत प्रिय है; 64 योगिनियों को भी अर्चन बहुत प्रिय है; और अर्चन के साथ हवन बहुत प्रिय है। और बटुक भैरव जी को क्या प्रिय है — अगर आप खास तौर पर भैरव स्वरूप में जाएँ, तो जितने भी भैरव हैं, भैरव स्वरूप, वे सबसे ज़्यादा और जल्दी जप से प्रसन्न होते हैं। भगवान को जप बहुत प्रिय है।

107

क्या सिद्धासन में पैर देवता की ओर हों तो दोष लगता है?

इसके बजाय अपनी दिशा बदलिए

· 1:08:31–1:08:49 · Also a question

पूछा गया कि सिद्धासन में बैठते समय पैर आगे करने पड़ते हैं और इसलिए देवता की ओर जाते हैं, तो क्या दोष लगेगा। वक्ता पूछते हैं कि आप कैसे बैठ रहे हैं कि पैर आगे की ओर जा रहा है — ऐसे मत बैठिए। अपनी दिशा थोड़ी बदल लीजिए।

एक श्रोता कहते हैं कि सिद्धासन में बैठते समय पैर आगे करने पड़ते हैं, तो पैर देवता की ओर जाते हैं, और पूछते हैं कि क्या दोष लगेगा। वक्ता कहते हैं कि भैया, आप कैसे बैठ रहे हैं कि पैर आगे की ओर जा रहा है — ऐसे मत बैठिए। अपनी दिशा थोड़ी बदल लीजिए।

108

क्या सर्दी में बिना नहाए, केवल हाथ-पैर धोकर पूजा की जा सकती है?

कटि स्नान अंतिम उपाय है; स्नान छोड़ना नहीं है

· 1:08:50–1:09:36 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि नहीं भैया, आप नहीं कर सकते। सर्दी है, तो गर्म पानी से नहाइए। शरीर बहुत संवेदनशील हो, तो कटि स्नान कीजिए, कमर से नहाइए। बाल मत धोइए। कंधे से नहाइए — पर नहाइए ज़रूर। सबसे अंतिम स्तर कमर से नहाना है। ठंड के मौसम में शौच आदि के बाद कपड़े पूरे बदलने होंगे, और कम से कम कमर से पूरा नहाना चाहिए; उसके बाद पूजन के बारे में सोच सकते हैं।

109

पीपल के पेड़ पर उगने वाला पेड़ किस काम आता है?

बांदा, वनस्पति तंत्र का विषय

· 1:09:37–1:09:44 · Also a question

एक श्रोता याद दिलाते हैं कि वक्ता ने कहा था कि पीपल के पेड़ पर एक और पेड़ उगता है और उसका प्रयोग होता है। वक्ता कहते हैं कि भैया, आप फिर से बांदा की बात कर रहे हैं — वह वनस्पति तंत्र का विषय है। वनस्पति तंत्र के लिए कभी इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

एक श्रोता याद दिलाते हैं कि वक्ता ने एक बार बताया था कि पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के पेड़ पर एक और पेड़ उगता है, और उसका प्रयोग होता है। वक्ता कहते हैं कि भैया, आप फिर से बांदा की बात कर रहे हैं — वह वनस्पति तंत्र का विषय है। वनस्पति तंत्र के लिए कभी इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

110

क्या घर की दूसरी मंज़िल पर शिवालय बनाया जा सकता है?

मंदिर का अपना वास्तु शास्त्र होता है, और नीचे की ज़मीन पाताल बन जाती है

· 1:09:45–1:10:38 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर आप किसी मंदिर के विशेष, पूरे शिवालय की बात कर रहे हैं, तो वह नहीं बनाया जा सकता — शिव मंदिर केवल शिव मंदिर के पूरे विधि-नियम के अनुसार ही बनवाइए। सामान्यतः घर में स्फटिक शिवलिंग आदि रखकर पूजन करें, तो पूरा फल मिलेगा; नर्मदेश्वर जी का पूजन करें, तो भी मिलेगा। पर घर की देव मंज़िल पर शिवालय बनाना चाहना, जैसा आजकल बहुत हो रहा है — घर में मंदिर बनाना — उचित नहीं, क्योंकि मंदिर का अपना वास्तु शास्त्र है। जब शिव मंदिर स्थापित होता है, तो उसके नीचे की ज़मीन पाताल की स्थिति बन जाती है; आपकी पूरी नीचे की ज़मीन उन गणों का स्थान बन जाती है जो उसमें रहते हैं, और यह कठिनाई बनेगी।

111

क्या सपने में सुने वैदिक मंत्रों का जप बिना जनेऊ के किया जा सकता है?

यज्ञोपवीत के बिना वैदिक मंत्रों का अधिकार नहीं

· 1:10:39–1:10:57 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि सपने में उन्हें वैदिक मंत्र बोले जा रहे हैं, और पूछते हैं कि क्या उनका जप शुरू कर सकते हैं; वे जोड़ते हैं कि विवाह के बाद उनका जनेऊ नहीं हुआ। वक्ता पूछते हैं कि जब आपका यज्ञोपवीत ही नहीं हुआ, तो आप वैदिक मंत्र कैसे कर सकते हैं? अगर सपने में कर रहे हैं, तो यह किसी न किसी पितर की कृपा है, और वे चाहते हैं कि आप करें — इसलिए आपको जनेऊ करवा लेना चाहिए। जनेऊ के बिना, चाहे सपने में मिले या प्रत्यक्ष मिले, किसी भी अधिकार से आप वैदिक मंत्र नहीं कर सकते।

112

क्या पहला अनुष्ठान जिस दिन समाप्त हो, उसी दिन दूसरा शुरू किया जा सकता है?

चतुर्दशी से फिर शुरू करना

· 1:10:58–1:11:09 · Also a question

पूछा गया कि अष्टमी से चतुर्दशी तक देव अनुष्ठान चल रहा हो, तो क्या उसी दिन चतुर्दशी से फिर दूसरा अनुष्ठान शुरू किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि कर सकते हैं — कोई दिक्कत नहीं।

एक श्रोता कहते हैं कि अष्टमी से चतुर्दशी तक देव अनुष्ठान चल रहा है, और पूछते हैं कि क्या चतुर्दशी से, उसी दिन फिर, दूसरा अनुष्ठान शुरू किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि कर सकते हैं; कोई दिक्कत नहीं।

113

शालिग्राम सेवा हर किसी को क्यों नहीं बताई जाती?

जिनके लिए नहीं है, उनके लिए शालिग्राम सेवा जटिल हो जाती है

· 1:11:10–1:11:19 · Also a question

क्योंकि शालिग्राम जी हर किसी के और सबके पूजन का विषय नहीं हैं — उनके लिए यह थोड़ा जटिल हो जाता है — वक्ता प्रश्नकर्ता का नाम लेकर कहते हैं कि वे इस पर नहीं बोलेंगे।

वक्ता श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि क्योंकि शालिग्राम जी — हर किसी के, सबके पूजन का विषय उनके लिए थोड़ा जटिल हो जाता है — इस कारण हम इस पर नहीं बोलेंगे।

114

कैसे पता करें कि मृत्यु अभिचार से हुई, और आत्मा को कैसे मुक्त करें?

परिवार को पता चलता है, और सपने इसे स्पष्ट कर देते हैं

· 1:11:20–1:12:01 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर वे परिवार के सदस्य हैं, तो समझ आ जाएगा। चाहे आप उनके लिए तर्पण करें या कुछ भी करें, आपको शांति नहीं मिलेगी। जब आप किसी को लक्ष्य करके, किसी अतृप्त आत्मा के लिए या किसी मृत व्यक्ति के लिए सेवा-पूजा करते हैं, तो आपको भी संतोष मिलेगा। एक श्रोता जोड़ते हैं कि घर में पंद्रह-सोलह साल से तंत्र की समस्या है, और यह सपनों आदि से समझ आता है। वक्ता कहते हैं कि ऐसा सपना आएगा जिससे समझ आ जाएगा कि जिनकी मृत्यु हुई है, वे आभिचारिक स्थिति में मरे हैं — गति नहीं है। कई बार तो ये लोग ऊपर ही हो जाते हैं।

115

क्या व्यक्ति पड़ोसी के तंत्र प्रयोग की काट स्वयं कर सकता है?

काट हवन से होगी; पहले विषय समझिए

· 1:12:02–1:12:26 · Also a question

पूछा गया कि क्या पड़ोसियों द्वारा की गई तंत्र समस्या की काट स्वयं की जा सकती है, और नहीं तो किस तरह के साधक से करवाएँ, और क्या यह हवन से होगी। वक्ता कहते हैं कि काट होगी — चैनल पर बहुत सारे वीडियो हैं। भैया, विषय समझिए; केवल कहने से नहीं होता।

पूछा गया कि क्या पड़ोसियों द्वारा की गई तंत्र समस्या की तंत्र काट स्वयं की जा सकती है, और नहीं तो किस तरह के साधक से करवाएँ, और क्या यह हवन से होगी। वक्ता उत्तर देते हैं। काट होगी। चैनल पर बहुत सारे वीडियो हैं — विषय समझिए भैया। केवल कहने से नहीं होता।

116

क्या गुरु दत्तात्रेय को लाल रोली का तिलक लगाया जा सकता है?

दत्त वह एक देवता हैं जिनकी सेवा हर कोई कर सकता है

· 1:12:27–1:12:50 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल लगा सकते हैं; और अगर कहीं कहा गया है कि नहीं लगा सकते, तो वह विषय कम से कम भगवान दत्त पर लागू नहीं होता। भगवान दत्त ऐसे एक देवता हैं जिनकी सेवा-पूजा गृहस्थ भी कर सकता है और परम विरक्त भी; जो परम आसक्त है, मलिन से मलिन साधक, और स्वच्छ से स्वच्छ व्यक्ति — दोनों कर सकते हैं।

117

अगर महिषासुर मर्दिनी कुलदेवी हों, तो क्या उनकी मूर्ति पूजा स्थान में रखी जा सकती है?

जहाँ कुल विधान पिंड का रहा, वहाँ पिंड और चित्र रखिए

· 1:12:51–1:13:19 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर भगवती का वही स्वरूप आपकी कुलदेवी है, तो रखिए — इसमें क्या बात है। अगर आपकी कुलदेवी छिन्नमस्तिका हैं, तो उनका भी रखिए और उनकी पूजा कीजिए। पर पहले पिंड का विधान चलता था; पिंड में छिन्नमस्तिका का पूजन होता था, और श्री विग्रह का विधान नहीं रहा। तो अगर आपके कुल में महिषासुर मर्दिनी के पिंड का विधान भी चला है, पहले से चलता आ रहा है, तो छाया चित्र रखिए और पिंड रखिए। श्री विग्रह मत रखिए — इसके पीछे कारण है। और अगर पहले से श्री विग्रह रहा है, तो उसे रखिए।

118

क्या स्वास्थ्य के लिए बारह नामों का 108 बार पाठ किया जा सकता है?

आरोग्य के लिए बारह नामों के 108 पाठ

· 1:13:20–1:13:40 · Also a question

पूछा गया कि क्या आरोग्य के लिए बारह नामों के 108 पाठ किए जा सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि भैया, बिल्कुल किए जा सकते हैं।

क्या आरोग्य के लिए बारह नामों के 108 पाठ किए जा सकते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि भैया, बिल्कुल किए जा सकते हैं।

119

दत्तात्रेय, गणपति, सूर्य, जयंती मंगला और पंचाक्षरी के क्रम में भी कोई कवच नहीं है, और एक कवच होना ज़रूरी है

क्रम जो भी हो, उसमें एक कवच होना ही चाहिए

· 1:13:41–1:14:03

एक श्रोता अपना क्रम बताते हैं: गुरु दत्तात्रेय के एकाक्षरी की एक माला, फिर गणपति, फिर सूर्य की द्वादश नामावली, जयंती मंगला के बारह, पंचाक्षरी की एक माला, सुबह एक माला; और शाम को बटुक भैरव स्तोत्र और 64 योगिनियों की नामावली। वक्ता कहते हैं कि भैया, आपके इसमें तो कोई कवच है ही नहीं। कोई कवच भी शामिल कीजिए — अपने मुख्य आराध्य का कवच। बाकी सब बहुत अच्छा है, पर एक कवच ज़रूर हो। सभी साधक और साधिकाएँ ध्यान दें: सारे पाठ और जप एक तरफ़, अपने आराध्य का कवच एक तरफ़। कवच अवश्य होना चाहिए।

120

क्या गणेश जी का तर्पण रोज़ विग्रह पर किया जा सकता है?

रोज़ तर्पण, पर बाद में वस्त्र बदलिए

· 1:14:04–1:14:14 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि हाँ, कर सकते हैं, पर अगर आपने उन्हें वस्त्र पहनाए हैं, तो तर्पण के बाद रोज़ वस्त्र बदलिए। उन्हें भीगा मत रखिए — नहीं तो आपको भी ठंड लगेगी।

गणेश जी के लिए बताई गई तर्पण विधि क्या रोज़ गणेश जी के विग्रह पर की जा सकती है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि हाँ, की जा सकती है। पर अगर आपने उन्हें वस्त्र पहनाए होंगे, तो तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। के बाद रोज़ वस्त्र बदलिए। उन्हें भीगा मत रखिए; नहीं तो आपको भी ठंड लगेगी।

121

क्या जिन मंत्रों में पहले से स्वाहा है, उनमें स्वाहा दो बार कहना है?

परंपरा पर निर्भर; बिना दीक्षा वाले एक स्वाहा लगाएँ

· 1:14:15–1:14:38 · Also a question

पूछा गया कि जिन मंत्रों में स्वाहा है, जैसे अन्नपूर्णा के मंत्रों में, क्या आहुति के समय फिर से स्वाहा लगाना है। वक्ता कहते हैं कि यह परंपरा पर निर्भर है। कई बार दो स्वाहा होते हैं, स्वाहा स्वाहा; कई बार उसी स्वाहा में स्वाहा करवा देते हैं — तो यह परंपरा पर निर्भर है। अगर आपकी दीक्षा नहीं हुई और आप आहुति दे रहे हैं, तो एक ही स्वाहा में स्वाहा कीजिए। उसमें भी पूर्णता है।

122

क्या बत्तीस नामों की साधना कृष्ण पक्ष की अष्टमी से ही शुरू करनी है?

कृष्ण पक्ष अष्टमी बेहतर; चतुर्दशी भी संभव

· 1:14:39–1:15:03 · Also a question

पूछा गया कि जो साधना कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुरू करने को कही गई थी, क्या वह किसी और दिन या शुक्ल पक्ष में शुरू की जा सकती है। वक्ता कहते हैं कि भैया, कृष्ण पक्ष की अष्टमी से करेंगे तो बेहतर होगा। बाकी चतुर्दशी से भी कर सकते हैं।

एक श्रोता पूछते हैं कि बत्तीस के बाकी स्थानों में जो कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुरू करने को बताया गया था, क्या वह किसी और दिन, या शुक्ल पक्ष में भी शुरू किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि भैया, कृष्ण पक्ष की अष्टमी से करेंगे, तो बेहतर होगा। बाकी, चतुर्दशी से भी कर सकते हैं।

123

क्या घर के मंदिर में चाँदी का दीपक लगाया जा सकता है?

घर के मंदिर में चाँदी का दीपक

· 1:15:04–1:15:43 · Also a question

पूछा गया कि क्या घर के मंदिर में चाँदी का दीपक जलाया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि हाँ, जलाया जा सकता है।

एक श्रोता पूछती हैं कि क्या वे अपने घर के मंदिर में चाँदी का दीपक जला सकती हैं। वक्ता कहते हैं कि हाँ, जला सकती हैं।

124

प्रयोग के लिए बारह नामों का पाठ किस दिन करना चाहिए?

किसी भी दिन; और दूसरे व्यक्ति के लिए भी किया जा सकता है

· 1:15:44–1:16:05 · Also a question

पूछा गया कि बारह नामों के फलदार पाठ को प्रयोग के रूप में कैसे करें, और क्या पाठ बृहस्पतिवार को करना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है। प्रयोग के लिए — संकल्प किस विषय का है? किसी भी दिन हो सकता है; आपातकाल में कोई भी किसी भी समय कर सकता है। और भैया, आप किसी और के लिए भी कर सकते हैं — कोई दिक्कत नहीं।

125

क्या अभिषेक के लिए शालिग्राम जी को शिवलिंग पर रखा जा सकता है?

शिव राजाधिराज हैं और कभी बिना मुकुट के नहीं रखे जाते

· 1:16:06–1:17:09 · Also a question

वक्ता पूछते हैं कि ये सब विषय कहाँ से उठते हैं — यह कैसा प्रश्न है? किसने कहा कि शालिग्राम जी को शिव जी पर रखकर अभिषेक करना चाहिए? शिव महापुराण पढ़िए: भगवान श्री हरि नारायण और भगवान श्री ब्रह्मा जी ने भगवान शिव के बारे में क्या कहा है? वे भगवान शिव को राजा कहते हैं, कि आप राजाधिराज हैं — इसी कारण भगवान शिव को कभी बिना मुकुट के नहीं रखा जाता। और उन्हीं भगवान शिव पर आप कह रहे हैं कि शालिग्राम जी रखे जाएँ। वे कहते हैं कि यहीं उन्हें वैष्णवों के बारे में मुँह खोलना पड़ता है, जबकि वे बोलना नहीं चाहते, क्योंकि बहुत लोगों की भावनाएँ आहत होती हैं और फिर वे कील ठोकने लगते हैं कि आपको वैष्णवों से द्वेष है — ऐसा है तो पहले बोल दीजिए, फिर हम आपकी नहीं सुनेंगे।

126

जगन्नाथ जी पुरी में अपने ऊपर ली गई झूठी शपथ छोड़ देते हैं, पर भगवान शिव पर ली गई झूठी शपथ नहीं छोड़ते

जगन्नाथ अपने ऊपर ली शपथ क्षमा करते हैं, पर शिव पर ली झूठी शपथ नहीं

· 1:17:10–1:17:53

वक्ता कहते हैं कि एक परम वैष्णव जी स्वयं यह विषय कह रहे थे: जगन्नाथ पुरी में जगन्नाथ जी के सेवक, पुजारी और भक्त दो-चार पैसे कमाने के लिए जगन्नाथ जी की झूठी शपथ ले लेंगे, और जगन्नाथ जी इससे उन पर क्रोधित नहीं होते — कहते हैं ठीक है, कोई दिक्कत नहीं, मेरे कारण किसी ब्राह्मण के पेट में दो पैसे जा रहे हैं, अन्न जा रहा है, कोई दिक्कत नहीं। पर उसी विषय पर वही परम वैष्णव जी कहते हैं कि अगर कोई ब्राह्मण गलती से भी भगवान शिव की झूठी शपथ ले, झूठी कसम खाए, तो भगवान जगन्नाथ उसे नहीं छोड़ते: उनके शब्दों में, सुदर्शन चक्र चल पड़ता है और दौड़ा-दौड़ाकर उसे काटता है।

127

शिव पर शालिग्राम रखना शिव, नारायण और ब्रह्मा के संबंध का उल्लंघन कैसे है?

राजा, युवराज और पुरोहित

· 1:17:54–1:18:31 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि उन पर आप कह रहे हैं कि शालिग्राम जी भी बैठाए जाएँ, जो युवराज हैं — जो स्वयं कहते हैं कि मैं युवराज हूँ, आप राजा हैं, और ब्रह्मा जी आपके पुरोहित, आपके मंत्री हैं। क्या युवराज कभी राजा के ऊपर बैठता है? शालिग्राम जी कोई बच्चे नहीं हैं। पाप मोल लेने के लिए आप लोग ऐसे प्रोजेक्ट कहाँ से उठाते हैं? कृपया भाव के नाम पर अपनी बुद्धिहीनता और जड़ता का प्रदर्शन मत कीजिए; जड़ मत बनिए। वे प्रश्नकर्ता से सीधे कहते हैं कि यह उनसे नहीं कह रहे — हम जानते हैं यह आपका विषय नहीं, इसे अपने ऊपर मत लीजिए; हम तो बस आपके कंधे पर रखकर मशीनगन चला रहे हैं।

128

क्या रुद्राभिषेक और शालिग्राम पूजन अपने-अपने अनुशासन में होने चाहिए?

हर एक अपने अनुशासन में, और चरणामृत उसी अनुसार

· 1:18:32–1:18:53 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि रुद्राभिषेक और ये सब विषय करते हुए: भगवान शिव की सेवा, पूजा और अभिषेक उनकी अपनी नीति-नियम में, उस अनुशासन में हो, और भगवान शालिग्राम जी का जो पूजन करना है, वह उनके अनुशासन में हो। चरणामृत उसी तरह लीजिए। उन्हें उनके मुकुट पर बैठाकर चरणामृत मत लीजिए।

129

भगवान शिव पर पैर रखकर रुद्राभिषेक करना न अहंकार है न मूर्खता, बल्कि आत्मविमुग्धता है

न अहंकार, न मूर्खता, बल्कि आत्मविमुग्धता

· 1:18:54–1:19:50

वक्ता याद करते हैं कि भगवान शिव पर पैर रखकर रुद्राभिषेक करने का वीडियो वायरल हुआ था; वह वीडियो अब भी होगा। वे कहते हैं कि उसे अहंकार भी नहीं कहा जा सकता, मूर्खता भी नहीं — उसे आत्मविमुग्धता कहते हैं। जब लोग आत्ममुग्ध हो जाते हैं, इतने अत्यधिक आत्मग्रस्त, तो उन्हें यह भी समझ नहीं आता कि वे स्वयं वही भगवान बन गए हैं; फिर वे स्वयं को भगवान कहते हैं। वे अपनी ही पूजा, अपनी ही स्तुति, अपना ही स्तोत्र रचते हैं। तब यही स्थिति होती है। उसके बाद ये लोग विष्णु जी को भी कुछ नहीं समझेंगे — और क्या विष्णु जी ऐसी बात सुनकर इन्हें छोड़ देंगे? कोई ऐसा करे, तो वे कौमोदकी गदा से मारेंगे।

130

न बोलने वाले बच्चे के लिए जो अलग चीज़ बताना बाकी था, वह शुद्ध 999 चाँदी की ठोस गोली है

शुद्ध 999 चाँदी की ठोस गोली

· 1:19:51–1:20:08

एक श्रोता ने पहले अपने बच्चे के न बोलने के बारे में पूछा था, और उन्हें ग्यारहवें अध्याय के मंत्र का जप बताया गया था, जो चल रहा है; उन्हें यह भी कहा गया था कि कुछ अलग बताया जाएगा। वक्ता कहते हैं कि चाँदी की गोली की बात बतानी बाकी रह गई थी: शुद्ध चाँदी की, 999 वाली पूरी तरह शुद्ध चाँदी की, एक ठोस गोली बनवाइए।

131

बच्चे के लिए चाँदी की गोली कैसे अभिमंत्रित करें और पहनाएँ?

गणपति के बारह नाम, हरा धागा या चाँदी की चेन, बुधवार को बुध की होरा में

· 1:20:09–1:20:49 · Also a question

ठोस गोली बनवाकर उसे गणपति जी के बारह नामों से अभिमंत्रित कीजिए और हरे धागे में या चाँदी की चेन में ही गले में पहनाइए, बुधवार के दिन, बुध की होरा में, किसी भी पक्ष में। खासकर अगर चतुर्थी को बुधवार पड़े, तो उसी दिन पूजन हो सके; और इससे भी बेहतर, अगर किसी गणपति मंदिर के ब्राह्मण, या कोई भी ब्राह्मण जिन्हें गणपति अथर्वशीर्ष पढ़ने का अनुभव हो और जिन्होंने कम से कम 108 पाठ किए हों, उस ठोस गोली को एक ही दिन में गणपति अथर्वशीर्ष से 108 बार अभिमंत्रित कर दें — तो उसे बच्चे के गले में चाँदी की चेन में ही, बुधवार को बुध की होरा में पहनाइए, और खासकर बुधवार चतुर्थी को पड़े तो उस दिन।

132

चाँदी की गोली का प्रयोग वाणी और मन की किन परेशानियों के लिए होता है?

वाणी की, गले की, और बच्चे के मन की कठिनाइयाँ

· 1:20:50–1:21:10 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर वाणी से जुड़ी किसी तरह की कठिनाई हो, या खासकर गले से जुड़ी, या किसी बच्चे में बुद्धि या मस्तिष्क से जुड़ा कोई दोष उत्पन्न हो या जन्म से हो, तो उनके लिए भी इस तरह का प्रयोग विशेष विधि-विधान से करवाना चाहिए। और अगर आप स्वयं साधक हैं, तो स्वयं भी कर सकते हैं — करके देखिए, बहुत लाभ होगा।

133

अगर चाँदी की गोली के अभिमंत्रण के लिए कोई ब्राह्मण न मिले तो क्या करें?

संकट नाशन के बारह नामों का 108 बार उपयोग कीजिए

· 1:21:11–1:21:35 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि और अगर पंडित जी न हों, कोई न मिल रहा हो, तो संकट नाशन वाले बारह नामों से 108 बार अभिमंत्रित करके पहनाइए। बाकी नियम वही रहेगा: चतुर्थी के दिन बुधवार पड़े तो सबसे उत्तम। बाकी आपातकाल हो, तो किसी भी बुधवार को पहना सकते हैं। उसमें कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष नहीं देखना है।

134

दीपदान के बाद दाँत का दर्द क्यों चला गया?

दीपदान की गर्मी — "यह साइंस है"

· 1:21:36–1:22:00 · Also a question

एक श्रोता लिखते हैं कि उन्होंने जयंती के दिन दत्तात्रेय दीपदान किया था, उस समय उनका दाँत बहुत दर्द कर रहा था, और अगली सुबह तक वह अपने आप कम हो गया। वक्ता कहते हैं कि हाँ — आपने इतना दीपदान किया, तो दीपदान की गर्मी से कम हो गया होगा; इसके पीछे साइंस है, यह साइंस है। इसमें हमारी श्रद्धा का कम हाथ है; न हमारी न आपकी इसमें कोई श्रद्धा है। यह भीम साइंस है।

135

नर्मदेश्वर को जल चढ़ाते समय किस दिशा की ओर मुँह करना चाहिए?

दक्षिण सबसे अच्छी; उत्तर से कभी नहीं, जहाँ अर्घा बहता है

· 1:22:01–1:23:08 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भैया, किसी भी दिशा से चढ़ाइए, सब उत्तम हैं। नियम में जाएँ, तो उत्तर की ओर से, जिधर अर्घा बहता है, जल नहीं चढ़ाना चाहिए या पूजा नहीं करनी चाहिए। दक्षिण दिशा सबसे उत्तम है — यानी अर्घे के ठीक उलटी दिशा में। पर घर में यह सबके लिए संभव नहीं, कम से कम इसलिए कि अर्घा उत्तर की ओर हो तो नर्मदेश्वर जी को रखने की पूरी व्यवस्था उत्तर की ओर होगी, और फिर आपके घर की दीवारें दक्षिण की ओर हैं, तो वहाँ से उनका अभिषेक कैसे करेंगे। पर मंदिर में, क्योंकि वह चारों ओर से खुला रहता है, अगर वहाँ दक्षिण दिशा की ओर, दक्षिण दिशा से अभिषेक करें, तो सबसे उत्तम है।

136

अनुष्ठान और साधना में क्या अंतर है?

साधना सिद्धि के लिए है; अनुष्ठान उसे किसी कार्य में लगाना है

· 1:23:09–1:23:26 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर हम साधना कर रहे हैं, तो साधन का निमित्त सिद्धि पाना हुआ। हम पंचाक्षरी कर रहे हैं, पाँच लाख जप कर रहे हैं; उसमें संकल्प यह है कि मंत्र सिद्ध हो, भगवान शिव प्रसन्न हों। यहाँ किसी कार्य में प्रयोग नहीं है। जो अनुष्ठान के रूप में किया जाता है, वह किसी कार्य में प्रयोग के अंतर्गत आता है: हम उस पंचाक्षरी को इसलिए लगा रहे हैं कि फलाँ का विवाह हो, उसे सुंदर, सुशील, धर्म मार्ग पर चलने वाली कन्या मिले। वह अनुष्ठान हो गया।

137

क्या माँ काली का बीज मंत्र हाथ पर टैटू करवाया जा सकता है?

प्रतीक हाँ; बीजाक्षर केवल उस स्तर के समर्पण पर

· 1:23:27–1:24:32 · Also a question

एक श्रोता पूछते हैं कि क्या माँ काली का बीज मंत्र हाथ पर टैटू करवाया जा सकता है, यह बताते हुए कि एक फ़िल्म स्टार ने ऐसा टैटू बनवाया है। वक्ता कहते हैं कि वे प्रतीक बनवाने के पक्ष में हैं — अपने आराध्य का प्रतीक ज़रूर बनवाना चाहिए: सुदर्शन चक्र बनवाइए, कौमोदकी गदा बनवाइए, काली जी का खड्ग बनवाइए। बीजाक्षर को लेकर वे उन्नीस-बीस हो जाते हैं, क्योंकि पता नहीं आपके जीवन की नीति-नियम कैसी है, अनुकूल या प्रतिकूल; इसमें वे हाँ नहीं कहेंगे। प्रतीक चिह्न आप ज़रूर बनवा सकते हैं। उनकी दृष्टि में मंत्र और श्लोक वे लिखवाएँ तो बेहतर, जो अपने आराध्य के प्रति अत्यंत समर्पित हैं और जो अपने आराध्य को लेकर कभी संदेह में नहीं आते — अगर किसी रूप में हमें लगे कि हमारे आराध्य हमारा सिर माँग रहे हैं, गला काट रहे हैं, और देने में हम एक पल न लगाएँ, तो वह मंत्र लिखवाइए। बाकी आपका अपना विवेक और बुद्धि: सुंदर प्रतीक बनवाइए, और मंत्र लिखवाने में तभी जाइए जब समर्पण, वह निष्ठा उस स्तर की हो।

138

दुर्गा प्रणव के पाँच लाख जप के बाद, क्या माला मंत्र चक्र विधि में संपुटित करके किया जा सकता है?

चक्र विधि में माया बीज की जगह दुर्गा प्रणव

· 1:24:33–1:24:55 · Also a question

पूछा गया कि देवी दुर्गा प्रणव के पाँच लाख जप के बाद, क्या दुर्गा माला मंत्र चक्र विधि में देवी प्रणव के संपुट के साथ किया जा सकता है, और क्या चक्र विधि में देवी प्रणव माया बीज की जगह दुर्गा प्रणव लगाया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल लगा सकते हैं — सर्वोत्तम, बहुत अच्छा। अगर आपने दुर्गा बीज का जप, पाँच लाख, कर लिया है और अब उसके बाद यह प्रयोग करते हैं, तो पूरी तरह सही है, बिल्कुल कर सकते हैं। और उसमें माया बीज, देवी प्रणव अलग से लगाने की ज़रूरत नहीं।

139

गर्भवती स्त्री बच्चे की रक्षा के लिए कौन-सा कवच पढ़ सकती है?

गर्भ पर चैनल के तीन वीडियो, और कामाख्या कवच

· 1:24:56–1:25:41 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि गर्भ से जुड़ा पूरा विषय चैनल पर है — वे इसे फिर साझा करेंगे, तीन वीडियो हैं। उनमें पूरा विधान बताया गया है कि किस महीने क्या करना चाहिए। यह सरल विषय है, बहुत विस्तृत या जटिल नहीं, क्योंकि इसमें तीसरे महीने के बाद से आराम ज़्यादा है। तो वह विधान एक बार सुनिए। उसमें पार्वती गीता से जुड़े विषय भी रखे गए हैं। तो वह कीजिए — और कामाख्या कवच पकड़ लीजिए।

140

माँ सरस्वती का अनुष्ठान कहाँ करना सबसे अच्छा है?

सभी स्थान अपने आप में श्रेष्ठ हैं

· 1:25:42–1:25:51 · Also a question

एक श्रोता पूछते हैं कि सरस्वती अनुष्ठान काशी में करना बेहतर है या माँ विंध्यवासिनी और त्रिशभुजा के पास, यह बताते हुए कि वे एक बार प्रयागराज में सरस्वती का सवा लाख कर चुके हैं। वक्ता कहते हैं कि भैया, सभी स्थान अपने आप में श्रेष्ठ हैं — जहाँ इच्छा हो, वहाँ कीजिए। इसमें कम-ज़्यादा का कोई विषय नहीं।

141

पूरा विधान मंदिर के भीतर क्यों नहीं किया जा सकता?

मंडल बनाना पड़ता है, और तंत्र की प्रक्रिया हमेशा गुप्त होती है

· 1:25:52–1:26:04 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भैया, मंदिर में मंडल और सब कुछ बनाना पड़ेगा, और इसीलिए हम कहते हैं कि तंत्र की प्रक्रिया हमेशा गुप्तता से होती है — इसलिए इसे एकांत में कीजिए। जब विधि-विधान हो जाए, तब मंत्र का जप एक बार ज़रूर कर सकते हैं।

वक्ता कहते हैं कि भैया, मंदिर में मंडल और बाकी सब बनाना पड़ेगा; इसीलिए हम कहते हैं कि तंत्र की प्रक्रिया हमेशा गुप्तता से होती है। इसलिए इसे एकांत में कीजिए। जब विधि-विधान हो जाए, तब मंत्र का जप एक बार ज़रूर कर सकते हैं।

142

शरीर मज़बूत करने के लिए नॉन-वेज खाने वालों को कैसे समझाएँ?

वे नहीं समझेंगे, और बदले में चार गालियाँ देंगे

· 1:26:05–1:26:51 · Also a question

पूछा गया कि जो लोग केवल शरीर को मज़बूत और शक्तिशाली बनाने के उद्देश्य से नॉन-वेज लेते हैं, उन्हें कैसे समझाएँ। वक्ता कहते हैं: ऐसे लोगों को भी समझाने की ज़रूरत आपको लग रही है — समझाइए, वे बिल्कुल नहीं समझेंगे। आप जितना समझाएँगे, उतना वे समझा रहे हैं, समझ कौन रहा है? बदले में वे आपको चार गालियाँ देंगे। भैया, ये लोग दुनिया का संतुलन बना रहे हैं: ताकि मुर्गे और बकरों की संख्या न बढ़े, खा-खाकर संतुलन बना रहे हैं।

143

प्रेत से मुक्ति जितनी जल्दी मिलनी चाहिए थी उससे देर से मिली, और घबराहट और अस्वीकार ने उसे रोके रखा

वह निष्ठा जो घबराहट में भी होनी चाहिए

· 1:26:52–1:27:30

एक श्रोता धन्यवाद लिखते हैं: जो खिलाया गया था वह निकल गया, प्रेत से मुक्ति मिल गई, और वे अगस्त से महाभैरव मंत्र का जप कर रहे थे। वक्ता कहते हैं कि मेरी दृष्टि में यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था — आप बस स्वीकार नहीं करते थे, बहुत घबरा जाते थे कि नहीं हो रहा, नहीं हो रहा। पर हम भी सराहेंगे कि आखिरकार आप जीत गए, क्योंकि आप बहुत घबराते थे फिर भी काम करना नहीं छोड़ा। निष्ठा इस लड़के जैसी होनी चाहिए: यह हॉस्टल में रहता है, चार साल ग्रसित रहा और इसकी स्थिति बहुत खराब हो गई, पर अपने बल पर साधना आदि करके महाभैरव की कृपा से आज स्वस्थ हो गया है।

144

प्रणाम कैसे करना चाहिए, और मुद्राओं का क्या?

दोनों हाथ जोड़कर; विशेष मुद्राएँ अपने गुरु से मिलती हैं

· 1:27:31–1:27:53 · Also a question

मुद्राओं के बारे में और प्रणाम कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: दोनों हाथ जोड़कर कीजिए। विशेष मुद्रा के लिए, आप जिस भी कुल में दीक्षित हैं, आपके गुरु जी आपको खास तौर पर मुद्रा का ज्ञान देंगे। और जो लोग सामान्य मुद्राओं के बारे में कहते हैं कि इन्हें हर कोई कर सकता है, सब कर सकते हैं — भैया, कम से कम इसके लिए उपदेश तो ज़रूर होना चाहिए। क्या कहा जाए। किसी से उपदेश लेने में दिक्कत क्या है? करना ही है, तो उपदेश लीजिए।

145

जो शिक्षक कहता है कि मुद्रा सब कर सकते हैं, उससे उपदेश कैसे लें?

जो यह कहता है, उसी से प्रत्यक्ष उपदेश देने को कहिए

· 1:27:54–1:29:05 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जो व्यक्ति कह रहा है कि यह करना चाहिए, उसी से कहिए कि आप स्वयं उपदेश दीजिए। हर कोई कभी न कभी किसी न किसी क्षेत्र में आएगा — पूछिए, भैया, प्रयाग कब आएँगे? वे कहेंगे, हाँ, फलाँ दिन आऊँगा। देर-सबेर कोई किसी तीर्थ क्षेत्र में जाएगा; उसे पकड़े रहिए। जो यूट्यूब पर कहते हैं कि मुद्राएँ करनी चाहिए — उनसे कहिए, भैया, आप दीजिए। जब आप उनके पास पहुँचें, तो उनके पास जाकर कहिए, भैया, कृपया मुझे उपदेश दीजिए। एक बार उनके सामने से मुद्रा सीखिए — वे सिखा ही रहे हैं; सीखकर रख लीजिए। बस एक बार उनकी उपस्थिति में उपदेश ले लीजिए: भैया, एक बार करके मुझे उपदेश दीजिए। इसमें क्या बिगड़ेगा? स्वयं देखिए। अगर उस समय वे सामने से दे दें, तो कहिए हाँ, यह विषय हुआ। अगर वे सामने से देने में हिचक रहे हैं, तो समझिए कि क्यों नहीं दे रहे — इसमें अपनी बुद्धि लगाइए। और अगर वे सामने से दे दें, तो जय-जय; पूरे आराम से, सुख से कीजिए।

146

अगर कुंडली कहे कि नया घर दुर्भाग्य लाएगा, तो क्या करें?

कुंडली का फिर से विश्लेषण और मिलान करवाइए

· 1:29:06–1:29:32 · Also a question

पूछा गया कि जब कुंडली में लिखा हो कि नया घर लेने या बनवाने से दुर्भाग्य आएगा, तो क्या करें। वक्ता कहते हैं: ऐसी स्थिति में कुंडली का एक बार फिर विश्लेषण करवाइए। उसका क्रॉस-चेक करवाइए; स्पष्ट हो जाएगा, और अगर ऐसी बात होनी है, तो देखी जाएगी। और इसके लिए नए घर का विधान है — वे बताएँगे कि अगर सचमुच ऐसा है, तो इसे कैसे टालना है; इसका निराकरण बताया गया है।

147

गुरु मंत्र को और तीक्ष्ण और शक्तिशाली कैसे बनाया जा सकता है?

गुरु मंत्र पहले से तीक्ष्ण है; अपना तपोबल बढ़ाइए

· 1:29:33–1:29:46 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भैया, गुरु मंत्र पहले से ही तीक्ष्ण और शक्तिशाली है, क्योंकि वह परंपरा से आया मंत्र है। इसके लिए हमें अपना तपोबल बढ़ाना होता है।

अपने गुरु मंत्र को और तीक्ष्ण और शक्तिशाली कैसे बनाएँ, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं। भैया, गुरु मंत्र पहले से ही तीक्ष्ण और शक्तिशाली है, क्योंकि वह परंपरा से आया मंत्र है। इसके लिए हमें अपना तपोबल बढ़ाना होता है।

148

क्या बिना दीक्षा के भैरव मंत्र का कोई विधान है?

विधान चैनल पर है, और उसके नियम से ही करना होगा

· 1:29:47–1:30:01 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि बिना दीक्षित हुए, महावरो मंत्र का विधान चैनल पर है कि कैसे करना है; पर आपको उसे उसके नियम से ही करना होगा। शिव जी के मंदिर में।

वक्ता कहते हैं कि बिना दीक्षाधारी हुए, महावरो मंत्र का विधान चैनल पर है कि कैसे करना है। पर आपको उसे उसके नियम से ही करना होगा। शिव जी के मंदिर में।

149

गर्भवती स्त्री कब तक पूजा कर सकती है?

तीसरे महीने तक पूजा की जा सकती है

· 1:30:02–1:30:25 · Also a question

एक प्रश्न पूछा जाता है कि गर्भवती स्त्री अपने धर्म की रक्षा के लिए क्या कर सकती है, जिसमें एक ऐसा शब्द है जिसे वक्ता समझ नहीं पाते। वे कहते हैं कि समझ नहीं आया और पूछते हैं कि इसका क्या अर्थ है, फिर कहते हैं: तीसरे महीने तक वह पूजा कर सकती है। बाकी विषय, वे कहते हैं, समझ नहीं आया।

एक प्रश्न पूछा जाता है कि गर्भवती स्त्री अपने धर्म की रक्षा के लिए क्या कर सकती है, जिसमें एक ऐसा शब्द है जिसे वक्ता समझ नहीं पाते। वे कहते हैं कि मैं समझा नहीं। इसका अर्थ क्या है? तीसरे महीने तक वह पूजा कर सकती है। वे कहते हैं कि उनका यह विषय हम समझ नहीं पाए।

150

क्या उग्र साधना में पेट की समस्या सामान्य है?

यह नियंत्रण खोने की बात है, और संतुलन चाहिए

· 1:30:26–1:30:50 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि नहीं भैया, यह सामान्य की बात नहीं है। अगर उग्र साधना से हो रहा है, तो यह नियंत्रण खोने की बात है। जिनकी साधना आप कर रहे हैं, उनका विधि-विधान थोड़ा जानना चाहिए और पहले दूसरी विद्याओं की साधना करनी चाहिए — जैसे, अगर भगवती की साधना से परेशानी हो रही है, तो वहाँ संतुलन के लिए भैरव की, शिव जी की साधना करनी चाहिए।

151

स्त्री को माँ कामाख्या की उपासना किस दिन शुरू करनी चाहिए?

कामाख्या पूजन के लिए कोई नक्षत्र, तिथि या विधि-विधान नहीं

· 1:30:51–1:31:35 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि कामाख्या माई के पूजन के लिए कोई नक्षत्र, तिथि या विधि-विधान मत सोचिए — आज इच्छा हो, तो आज रात से शुरू करवा दीजिए। माँ दुर्गा के सामने बिल्कुल कर सकते हैं; भगवती कामाख्या के रक्त वाले छाया चित्र की ज़रूरत नहीं। माँ कामाख्या का पूजन, यानी उनके कवच का जप — सुबह करना हो, रात को, दोपहर को या शाम को, बिस्तर पर बैठकर करना हो, ट्रेन में बैठे हों और करना हो — जब भी उनके कवच का जप करना हो, कीजिए। उनके लिए हम हमेशा यही कहते हैं, और स्त्रियों से भी कहते हैं: रजस्वला अवस्था में भी, बिस्तर पर लेटे या बैठे, कम से कम एक बार उनका जप स्मरण कीजिए, और कवच कंठस्थ हो तो कवच भी।

152

माँ कामाख्या को कौन-सा भोग लगाना चाहिए?

चाँदी के छोटे पात्र में शहद, नहीं तो किशमिश

· 1:31:36–1:32:08 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर संभव हो, तो चाँदी के छोटे पात्र में थोड़ा शहद भोग लगाना सबसे उत्तम है; नहीं तो किशमिश का भोग लगाइए।

भोग में क्या दें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं। अगर संभव हो, तो चाँदी के छोटे पात्र में थोड़ा मधु भोग लगाना सबसे उत्तम है। नहीं तो किशमिश का भोग लगाइए।

153

जब मन बहुत अस्थिर हो तो क्या करें?

देखिए कि गोचर में चंद्रमा कहाँ है

· 1:32:09–1:32:38 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भैया, अगर मन बहुत अस्थिर हो रहा है, तो चंदा मामा कहीं न कहीं अपनी जगह से हट गए हैं। देखिए कि गोचर में चंदा मामा कहाँ हैं। उन्हें प्रसन्न कीजिए। हालाँकि चंद्रमा को अर्घ्य देकर — कृष्ण पक्ष चल रहा है, तो अभी वे दिखेंगे भी नहीं। चंद्र देव के दर्शन भगवान शिव जी के सिर पर निरंतर रहते हैं, इसलिए शिव जी का दूध से अभिषेक कीजिए।

154

जब किसी के विरुद्ध पशु बलि दी जा रही हो, तो वह अपनी रक्षा कैसे करे?

पहले यह इस पर निर्भर है कि देवी कौन हैं और उनके सामने कौन आ सकता है

· 1:32:39–1:33:28 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर आपकी जानकारी में आया है कि सामने वाला मारने के लिए पशु बलि देने वाला है, और हमें पता चल गया है कि वह ऐसा कर रहा है, तो यह विषय बहुत अलग हो जाता है। तब यह देखना ज़रूरी है: भैया, देवी कौन हैं, विषय क्या है, उनके सामने कौन आ सकता है; यह मंत्र के बल से चल रहा है या सीधे चल रहा है — कौन-सा विषय है?

155

क्या देवता से भौतिक इच्छाएँ माँगना उचित है?

काम तीसरा पुरुषार्थ है

· 1:33:29–1:33:51 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भैया, भौतिक इच्छा माँगना बिल्कुल उचित है — ऐसा नहीं कि नहीं माँगना चाहिए। क्यों नहीं माँगना चाहिए? बिल्कुल माँगना चाहिए; बिल्कुल माँगिए। धर्म, अर्थ, काम — तीसरा पुरुषार्थ काम ही है। जब इच्छाएँ पूरी होंगी, तभी आप मोक्ष की ओर जाएँगे। ज़रूर माँगिए।

भौतिक इच्छा के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: भैया, उसे माँगना बिल्कुल उचित है। ऐसा नहीं कि नहीं माँगना चाहिए। क्यों नहीं माँगना चाहिए? बिल्कुल माँगना चाहिए; बिल्कुल माँगिए। धर्म, अर्थ, काम — तीसरा पुरुषार्थ काम ही है। जब इच्छाओं की पूर्ति होगी, तभी आप मोक्ष की ओर जाएँगे। ज़रूर माँगिए।

156

ग्यारहवें अध्याय के पाठ से भगवती कितनी प्रसन्न होती हैं?

सप्तशती का एक श्लोक भी उन्हें प्रसन्न करता है

· 1:33:52–1:34:09 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भैया, वे बहुत प्रसन्न होती हैं। दुर्गा सप्तशती माई को अत्यंत प्रिय है। आप ग्यारह अध्यायों की बात कर रहे हैं — ग्यारह अध्याय तो क्या, अगर आप एक श्लोक भी पढ़ेंगे, तो उससे माई प्रसन्न हो जाएँगी।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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