गृहस्थ साधक के प्रश्नोत्तर — अधिकार, विधान, और सार्वजनिक रूप से सिखाई जाने वाली बातों की सीमा
पूजन विधान, अधिकार, ज्योतिष और साधना क्रम पर प्रश्नोत्तर।
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क्या श्री राम को प्रसन्न करने का कोई तांत्रिक विधान है?
तंत्रोक्त विधान से श्री राम का मंत्र
रामचरितमानस कहता है कि श्री राम का प्रिय बनने के लिए शिव की भक्ति भी करनी चाहिए। इसी पर पूछा गया कि क्या तंत्र में श्री राम को प्रसन्न करने का कोई विधान है। वक्ता कहते हैं कि अवश्य है। भगवान श्री राम का मंत्र केवल भक्ति विधान से ही नहीं, तंत्रोक्त विधान से भी किया जा सकता है, जिसमें पंचांग सेवन का विधान रहेगा।
एक श्रोता बताते हैं कि रामचरितमानस में कहा गया है कि श्री राम का प्रिय बनने के लिए शिव की भक्ति भी करनी चाहिए। वे पूछते हैं कि क्या तंत्र में श्री राम को प्रसन्न करने का ऐसा कोई विधान है। वक्ता कहते हैं कि अवश्य है। भगवान श्री राम का मंत्र केवल भक्ति विधान से ही नहीं, तंत्रोक्त विधान से भी किया जा सकता है, जिसमें पंचांग सेवन का विधान रहेगा। वे कहते हैं कि अगर वैष्णव परंपरा में दीक्षा देने वाले उनके साधक मिल जाएँ, तो उनसे दीक्षा लेकर आप यह कर सकते हैं।
क्या दत्त माला मंत्र से पहले गुरु दत्तात्रेय की बारह नामों से पूजा की जा सकती है?
दत्त के बारह नाम, फिर दत्त माला मंत्र
एक श्रोता किसी परंपरा में दीक्षित हैं। वे पूछते हैं कि क्या वे गुरु दत्त का बारह नामों से पूजन करके बाद में दत्त माला मंत्र की ओर जा सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि हाँ, आप बिल्कुल कर सकते हैं।
एक श्रोता कहते हैं कि वे किसी परंपरा में दीक्षित हैं। वे पूछते हैं कि क्या वे गुरु दत्त का बारह नामों से पूजन कर सकते हैं और बाद में दत्त माला मंत्र की ओर बढ़ सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं।
घर में लड्डू गोपाल की सेवा कैसे करनी चाहिए?
शालिग्राम सेवा के ढंग पर लड्डू गोपाल की सेवा
वक्ता कहते हैं कि शालिग्राम सेवा का पूरा नियम यहाँ भी लागू होता है। अगर लगभग उतना नियम निभ सके तो उत्तम है। यानी रोज़ अभिषेक, अच्छा श्रृंगार, माखन-मिश्री का नैवेद्य, आरती, और संध्या आरती के बाद रात्रि का नैवेद्य भी, साथ ही उनके शयन की व्यवस्था।
एक श्रोता की बेटी को मायके से लड्डू गोपाल का विग्रह मिला है। वे पूछते हैं कि उनके पूजन और सेवा में क्या करना चाहिए और क्या नहीं। वक्ता कहते हैं कि विषय इतना ही है: जैसे शालिग्राम की सेवा का पूरा नियम होता है, वैसा ही लगभग नियम निभ सके तो उत्तम है। यानी उनका अभिषेक रोज़ हो, श्रृंगार अच्छा हो, माखन, मिश्री आदि का नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। लगे; आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। हो; और संध्या आरती आदि के बाद रात्रि का नैवेद्य भी लगे और उनके शयन की व्यवस्था की जाए — अगर आप दैनिक नियम से चलें।
तीसरा नेत्र जगाने की सबसे अच्छी विधि कौन-सी है?
तीसरे नेत्र की कोई उत्तम, मध्यम या निम्न विधि नहीं होती
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है — उत्तम विधि और मध्यम विधि जैसा कुछ नहीं। एक दिन में कर देने वाली सबसे अच्छी विधि की बात केवल अनुभवहीन लोग करते हैं। जिसे उस स्तर का अनुभव है, वह कभी नहीं कह सकता कि यह मध्यम है, वह निम्न है और कोई ऊँची। यह मंत्र जप से, त्राटक से, पंचांग साधना को अंग बनाकर, गीता के बार-बार पाठ से, सप्तशती पाठ से, हवनात्मक विधान से होता है — तपोबल बढ़ने से, और उसमें कम से कम थोड़ा ध्यान ज़रूर हो।
तीसरा नेत्र जगाने की सबसे उत्तम विधि पूछे जाने पर वक्ता इस सोच को ही नकारते हैं। वे कहते हैं कि ऐसा नहीं है भैया — उत्तम विधि और मध्यम विधि नहीं होती। यह सोच कि कोई उत्तम विधि है और एक दिन में यह तीसरा नेत्र खुल जाएगा — यह कभी एक दिन या किसी एक प्रक्रिया का विषय नहीं है। वे कहते हैं कि ऐसे विषय की बात केवल अनुभवहीन लोग ही कर सकते हैं। जिन्होंने इस स्तर का अनुभव पाया है, वे कभी नहीं कह सकते कि यह मध्यम है, वह कनिष्ठ है और कोई ऊँचा। बात सीधी है, क्योंकि यह मंत्र जप से भी होता है; त्राटक करने से भी होगा; पंचांग साधना को ही अंग बनाकर चलें तो भी होगा; गीता के बहुत-बहुत आवृत्तियों वाले दैनिक पाठ से होगा; भगवती के सप्तशती पाठ से होगा; हवनात्मक विधान से होगा। तपोबल बढ़ने से इसका जागरण होता है, और उसमें कम से कम थोड़ा ध्यान अवश्य होना चाहिए — इन सबसे यह होता है।
क्या त्रिनेत्र और दिव्य नेत्र मिलना एक ही बात है?
त्रिनेत्र और देव नेत्र दो अलग विषय हैं
वक्ता कहते हैं कि त्रिनेत्र वही है जिसका वर्णन वे अभी कर रहे थे; नेत्र मिलने की बात अलग है। देवताओं द्वारा नेत्र प्रदान करना, या भगतवाल में नेत्र की प्राप्ति, बिल्कुल अलग विषय है। किन तरीकों से नेत्र मिलता है, इस पर चैनल पर एक वीडियो है।
वक्ता कहते हैं कि आप जो स्पष्ट रूप से जानना चाहते हैं, त्रिनेत्र का अर्थ, वह वही विषय है जिसकी वे बात कर रहे थे। बाकी — नेत्र प्राप्त होने का विषय — अलग है। किन तरीकों से नेत्र मिलता है, इस पर चैनल पर एक वीडियो है। त्रिनेत्र और देव नेत्र को दो अलग तरह के विषय समझिए। संक्षेप में: देवताओं के द्वारा नेत्र प्रदान करना, या भगतवाल में होने वाली नेत्र की प्राप्ति, अलग बात है। इसे ध्यान में रखिए।
भैरव के दीपक से तेल रिसे या पितरों के कलश से पानी रिसे, तो इसका क्या अर्थ है?
तेल रिसना और कलश का रिसना कोई शकुन नहीं
वक्ता कहते हैं कि इन्हें बस ठीक से बदल दीजिए और इसमें कोई अर्थ मत पढ़िए। वे नहीं कह सकते कि तेल रिसना अशुभ है या पानी रिसना अच्छा या बुरा है। जोड़ वाला दीपक रिस सकता है, जबकि घी गाढ़ा होता है और नीचे जम जाता है, इसलिए नहीं रिसता। मटका अपने बारीक छिद्रों से थोड़ा रिसता ही है, और इसी से उसका पानी ठंडा रहता है — बिल्कुल न रिसे, यह संभव नहीं।
एक श्रोता अपने पूजा स्थान में रोज़ भैरव के लिए दीपक जलाते हैं। दीपक बदलने पर भी तेल रिसता है, पर घी के दीपक में ऐसा नहीं होता। और पितरों के लिए रखे कलश से, कलश बदलने के बाद भी, पानी रिसता है। वक्ता कहते हैं कि उनकी अपनी दृष्टि में इन्हें बस ठीक से बदल देना चाहिए। तेल रिसने वाला दीपक कोई विषय ही नहीं होना चाहिए — नया दीपक लाइए, पीतल का दीपक जलाइए। और कलश के लिए, पहले तो वह पूरी दुकान ही बदल दीजिए जहाँ से कलश लाते हैं। वैसे कलश से पानी रिसने में कोई दिक्कत नहीं; रिसे तो अच्छा ही है, कलश ठंडा रहेगा। बहुत ज़्यादा टपके, तब बदल दीजिए। यहाँ हम बिल्कुल नहीं कह सकते कि हाँ, तेल रिस रहा है तो इसमें अशुभ है, या पानी रिस रहा है तो यह शुभ या अशुभ है। ऐसा नहीं है भैया। अगर बहुत ज़्यादा हो और आपने बदला नहीं, तो सारा विधान करके देखिए, बदलिए, कई बार बदलिए। उसके बाद भी हो रहा हो — तो आपने जो दीपक रखा है वह जोड़ वाला दीपक होगा, उससे दिक्कत हो सकती है, वहाँ से रिसता है। घी गाढ़ा होता है, नीचे जम जाएगा, रिसेगा नहीं। सीधी बात: रिसने की बात हो तो घी भी रिसना चाहिए। और जहाँ मिट्टी के बर्तन से पानी रिस रहा है, यह सामान्य बात है कि उसमें छोटे छिद्र, बारीक कण होते हैं, तो रिसता है। पानी रिसता है, इसीलिए ठंडा रहता है। बिल्कुल न रिसे, यह संभव नहीं।
सूर्य देव को अर्घ्य कैसे देना चाहिए?
सूर्य को अर्घ्य, और तांबे का पात्र केवल पुरुषों के लिए
अगर आप संध्या करते हैं, तो संध्या के भीतर बताया गया अर्घ्य अलग विषय है, और उस तरह देना उत्तम है। संध्या न करें और सामान्य अर्घ्य देना हो, तो किसी पात्र में जल लेकर सादे जल से अर्घ्य दीजिए; अक्षत और चंदन — लाल चंदन या रोली — भी डाल सकते हैं, गुड़ भी डाला जा सकता है। पर अगर तांबे के पात्र, तांबे के लोटे से जल दें, तो केवल पुरुष दें: स्त्रियाँ तांबे के लोटे से जल न दें।
सूर्य देव को अर्घ्य कैसे दें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि जो लोग सामान्यतः संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। करते हैं, उनके लिए संध्या के भीतर बताया गया अर्घ्य अलग विषय है, और संध्या के भीतर उस तरह अर्घ्य दें तो उत्तम है। अगर आप संध्या नहीं करते और सामान्य अर्घ्य देना है, तो किसी पात्र में जल लीजिए और केवल सादे जल से अर्घ्य दे सकते हैं। और अगर चावल, अक्षत और चंदन — यानी लाल चंदन या रोली — डालकर देना चाहें, तो वह भी कर सकते हैं। उसमें गुड़ भी डाला जा सकता है। पर अगर ताम्र पात्र से, तांबे के लोटे से जल दें, तो केवल पुरुष ही दें। स्त्रियाँ तांबे के लोटे से जल न दें।
क्या काली की योगिनी पूजा मंदिर के भीतर की जा सकती है?
तंत्रोक्त विधान मंदिर में सार्वजनिक रूप से नहीं हो सकता
वक्ता कहते हैं कि मंदिर में भी वही विधान करना होगा, बस श्री विग्रह की जगह भगवती का विग्रह होगा। पर तंत्रोक्त विधान मंदिर में सार्वजनिक रूप से नहीं किया जा सकता। मंदिर में केवल मंत्र का जप हो सकता है, और वह भी दीपक जलाकर — कर्म साक्षी दीपक, भगवती का दीपक। पूरा विधान हमेशा एकांत में होगा।
एक श्रोता पूछते हैं कि काली मंदिर में काली योगिनी पूजा कैसे करें, क्योंकि वक्ता के बनाए वीडियो में घर का विधान बताया गया है। वक्ता कहते हैं कि अगर मंदिर में करना चाहें तो वहाँ भी वही विधान करना होगा। बस श्री विग्रह वहाँ नहीं होगा; श्री विग्रह की जगह भगवती का विग्रह है, और बाकी पूरा विधान आपको वैसे ही करना होगा। पर तंत्रोक्त विधान आप मंदिर में सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकते। मंदिर में करना हो तो यह ध्यान रखिए। मंदिर में केवल मंत्र का जप हो सकता है, और वह भी दीपक आदि जलाकर — कर्म साक्षी दीपक, भगवती का दीपक आदि जला हो। वह पूरा विधान हमेशा एकांत में ही होगा।
आहुति मृगी मुद्रा से क्यों दी जाती है, पर बगलामुखी के हवन में मुट्ठी भर क्यों?
आहुति की मुद्रा कर्म और संकल्प के अनुसार होती है
वक्ता कहते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि आहुति किस स्वरूप को, किस कारण से दी जा रही है, और उस समय संकल्प क्या है। भगवती षट्कर्म की देवी हैं। शांतिक और पौष्टिक कर्म की आहुति केवल मृगी मुद्रा से दी जाती है। जब आहुति उग्र विषय, विधान या मंत्र की हो — शत्रु को स्तंभित या उच्चाटित करने के लिए — तो देवी-देवता का विषय भी वैसा हो जाता है, इसलिए वैसे दी जाती है, विशेषकर फट्कार मंत्रों में।
एक श्रोता कहते हैं कि हवन में आहुति थोड़ी मात्रा में, मृगी मुद्रा में डाली जाती है, पर बगलामुखी के हवन में महाराज जी मुट्ठी भर-भर कर हवन कुंड में डालते हैं। वे पूछते हैं ऐसा क्यों। वक्ता कहते हैं कि भैया, यह इस पर निर्भर है कि आहुति किस स्वरूप को, किस कारण से दी जा रही है, और उस समय संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। क्या है। भगवती षट्कर्म की देवी हैं। जब आहुति शांतिक और पौष्टिक कर्म की होती है, तो मृगी मुद्रा से ही दी जाती है। जब आहुति किसी उग्र विषय की हो, या ऐसे विधान या मंत्र की जो शत्रु को स्तंभित या उच्चाटित करे, तो देवी-देवता के लिए भी वैसा ही विषय बन जाता है, और इसलिए आहुति उसी ढंग से दी जाती है — विशेषकर फट्कार मंत्रों में।
अमावस्या पर हवन किन मंत्रों और सामग्री से करना चाहिए?
अमावस्या का हवन — जयंती मंगला काली, गुग्गुल, घी और काले तिल
वक्ता कहते हैं कि अमावस्या पर हवन वैसे ही होता है जैसे सबका हवन होता है। मुख्य रूप से, अगर जयंती मंगला काली मंत्र से दिया जाए और आहुति घी के साथ गुग्गुल की हो, उसमें काले तिल मिले हों, तो बहुत दिव्य है। भगवान श्री हरि नारायण, भगवान शिव, भगवती लक्ष्मी और भगवती पार्वती के नाम मंत्रों से भी आहुति हो।
अमावस्या पर किन मंत्रों से हवन करें, किस सामग्री से आहुति दें और समिधा किसकी हो — यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि अमावस्या पर हवन वैसे ही होगा जैसे सबका हवन होता है। मुख्य रूप से, अगर जयंती मंगला काली मंत्र से दिया जाए, और आहुति घी के साथ गुग्गुल की हो, उसमें काले तिल मिले हों, तो बहुत दिव्य है। भगवान श्री हरि नारायण, भगवान शिव, भगवती लक्ष्मी और भगवती पार्वती — सभी के नाम मंत्रों से भी आहुति हो।
किसी ग्रह का बीज मंत्र सिद्ध करने के लिए कितना जप चाहिए?
सिद्धि के लिए सवा लाख, एकाक्षरी के लिए चार लाख
पूछा गया कि बृहस्पति का बीज मंत्र ग्यारह हज़ार जप से सिद्ध होता है या उसके चार गुना से। वक्ता कहते हैं कि संख्या उनके ध्यान में नहीं है, पर ग्यारह हज़ार से सिद्धि नहीं आती। चतुर्गुणी जप का विधान प्रयोग का है, सिद्धि के बाद। सिद्धि के लिए कम से कम सवा लाख, और एकाक्षरी बीज मंत्र कर रहे हों तो चार लाख — सामान्य संख्या एक लाख है, कलियुग में चार लाख। उसके बाद ही प्रयोग विधान आता है, जिसमें संख्या ग्यारह हज़ार हो तो ग्यारह हज़ार, और विशेष परिस्थिति में चतुर्गुणी जप।
एक श्रोता पूछते हैं कि गुरु ग्रह का बीज मंत्र ग्यारह हज़ार जप से सिद्ध होता है या उसके चार गुना करना पड़ता है। वक्ता कहते हैं कि संख्या मेरे ध्यान में नहीं है। रही सिद्ध की, सिद्धि की बात — अगर आप वह करना चाहते हैं, तो ग्यारह हज़ार से सिद्धि नहीं आती। चतुर्गुणी जप का विधान प्रयोग का है, सिद्धि के बाद। सिद्धि के लिए कम से कम सवा लाख, और अगर एकाक्षरी बीज मंत्र कर रहे हैं तो चार लाख। सामान्य संख्या एक लाख है; कलियुग में चार लाख। उसके बाद ही प्रयोग विधान पर आते हैं, और प्रयोग विधान में संख्या ग्यारह हज़ार हो तो ग्यारह हज़ार — और कोई विशेष परिस्थिति हो तो चतुर्गुणी जप।
क्या मैं शाम को रुद्री का पाँचवाँ अध्याय पढ़ सकता हूँ?
रुद्री पाठ के लिए यज्ञोपवीत आवश्यक
पूछा गया कि क्या तपोबल बढ़ाने के लिए, नमः मंत्र की तरह, शाम को रुद्री का पाँचवाँ अध्याय पढ़ा जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि अगर आप यज्ञोपवीत धारण करते हैं तो अवश्य पढ़ सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या वे शाम को रुद्री का पाँचवाँ अध्याय पढ़ सकते हैं, यह कहते हुए कि इससे नमः मंत्र की तरह उनका तपोबल बढ़ेगा। वक्ता कहते हैं कि भैया, अगर आप यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करते हैं, तो अवश्य कर सकते हैं।
किसी अपरिचित स्थानीय कुलदेवी की सेवा कैसे सीखें?
सरौंद की काली माई, जिन्हें चिल्ले भवानी भी कहते हैं
एक श्रोता कहते हैं कि उनकी कुलदेवी सरौंद की काली माई हैं, जो महाकाली का एक रूप हैं। उन्हें पता चला है कि वे दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर की भी कुलदेवी हैं और उनका नाम चिल्ले भवानी भी है। वे उनकी सेवा पूछते हैं। वक्ता कहते हैं कि उन्हें इन स्वरूपों का ज्ञान नहीं है; कभी स्वयं उस स्थान पर जाइए और वहीं से जानकारी लीजिए, और वहाँ उनका कोई भक्त हो तो वह आपको अच्छे से और सही बताएगा।
एक श्रोता लिखते हैं कि महाकाली का एक रूप, सरौंद की काली माई, उनकी कुलदेवी हैं; उन्हें ज्ञात हुआ है कि वे दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर की भी कुलदेवी हैं; और चिल्ले भवानी भी उनका नाम है। वे उनकी सेवा पूछते हैं। वक्ता उनका नाम लेकर कहते हैं कि मुझे इन स्वरूपों का ज्ञान नहीं है। समय निकालकर कभी इस स्थान पर जाइए और वहीं से जानकारी लीजिए। वहाँ उनका कोई भक्त हो तो वह आपको अच्छे से बताएगा — सही बताएगा।
एक ही बैठक में दो अलग मंत्रों का जप कैसे करें?
एक संकल्प, एक आसन; न्यास और समर्पण देवता-देवता करके
वक्ता कहते हैं कि हाँ, आप बिल्कुल ऐसा कर सकते हैं, पर यह अनुष्ठान नहीं होना चाहिए — यह आपका नित्य जप का विषय है। संकल्प एक ही होगा, एक आसन पर। पहले भगवती का न्यास करके उनका जप पूरा होगा, फिर शिव का न्यास और उनका जप। समर्पण हर एक के बाद: भगवती के जप के बाद भगवती का समर्पण, शिव के जप के बाद शिव का समर्पण।
एक श्रोता पूछते हैं कि दो मंत्रों का जप करने के लिए क्या वे पहले मंत्र का जप पूरा करके उसका समर्पण करें, फिर बिना उठे दूसरे का न्यास करके उसका जप शुरू करें; और क्या एक ही संकल्प लिया जा सकता है जिसमें दोनों मंत्रों का बराबर उल्लेख हो। वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल ऐसे कर सकते हैं, पर यह अनुष्ठान नहीं होना चाहिए। यह आपका नित्य जप आदि का विषय बन गया — जैसे कोई भगवान शिव का पंचाक्षरी भी कर रहा है और भगवती पार्वती का सप्ताक्षरी भी। तो संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। एक ही बार होगा, और एक ही आसन पर होगा। पहले भगवती का न्यास करके जप पूरा होगा; फिर भगवान शिव का न्यास करके जप होगा। समर्पण: भगवती के जप के बाद भगवती का समर्पण; भगवान शिव के जप के बाद भगवान शिव का समर्पण।
नरसिंह माला मंत्र के जप के बाद क्रोध क्यों आता है?
उग्र, वीर भाव का मंत्र अपने साथ कुछ क्रोध लाता है
एक श्रोता ने अविचार के नाश के लिए मंदिर में 108 दिन तक रोज़ नरसिंह माला मंत्र के 108 जप का संकल्प लिया है। वे कहते हैं कि पहले जप के बाद मन में क्रोध उठने लगा। वक्ता कहते हैं कि भगवान नरसिंह का जप उग्र भाव, वीर भाव से होता है; जब भाव ऐसा हो और देवता का विषय ऐसा हो, तो उग्रता से कुछ क्रोध की उपस्थिति होगी ही। क्षमा प्रार्थना आदि कीजिए और बाद में स्तुति पढ़िए — उससे क्रोध नहीं आएगा। इसे सौम्य रखिए।
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने अविचार के नाश के लिए मंदिर में 108 दिन तक रोज़ 108 बार नरसिंह माला मंत्र के जप का संकल्प लिया है, और आज के पहले जप के बाद मन में क्रोध उठने लगा। वक्ता कहते हैं कि भगवान नरसिंह का जप उग्र भाव से, वीर भाव से होता है। जब भाव ऐसा हो, जब देवता का विषय उस तरह का हो, तो उग्रता से थोड़ी क्रोध की उपस्थिति होगी ही। क्षमा प्रार्थना आदि कीजिए, और बाद में स्तुति पढ़ने की आदत बनाइए — उससे क्रोध नहीं आएगा। इसे सौम्य रखिए।
साधक को अपनी श्वास पर नियंत्रण रखने को क्यों कहा जाता है?
उग्र भाव का समर्पण भी समर्पण के समय करना है
वक्ता इसे पिछले प्रश्नकर्ता के उदाहरण से समझाते हैं: अगर वे नरसिंह के माला मंत्र का जप उग्र भाव से, मंत्र के अपने असली वीर भाव से करते हैं, तो उन्हें सबसे उत्तम फल मिलेगा — यह उग्र भाव से ही होना चाहिए। पर जब पूजा का समर्पण हो, उसी समय उस भाव का भी समर्पण देवता के चरणों में होना चाहिए, ताकि वह भाव, वीरता, उग्रता आपके शरीर में न रह जाए; नहीं तो बिना कारण क्रोध आएगा और आप उसे नियंत्रित नहीं कर पाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि श्वास पर नियंत्रण इसी कारण ज़रूरी है, और पिछले प्रश्नकर्ता को उदाहरण बनाते हैं। अगर वे भगवान नरसिंह के माला मंत्र का जप उग्र भाव से, वीर भाव से — मंत्र के मूल, असली भाव से — करते हैं, तो उन्हें सबसे उत्तम फल मिलेगा। यह उग्र भाव से ही होना चाहिए। पर जब पूजा का समर्पण हो, उसी समय उस भाव का भी समर्पण देवता के चरणों में होना चाहिए। ताकि वह भाव और वह वीरता, वह उग्रता आपके शरीर में बनी न रहे — क्योंकि तब आपको बिना कारण क्रोध आएगा और आप उसे नियंत्रण में नहीं ला पाएँगे। यह विषय साफ़-साफ़ ध्यान में रखना है।
क्या जयंती मंगला काली मंत्र और बटुक भैरव के 108 नाम एक ही माला पर किए जा सकते हैं?
दोनों के लिए एक माला, वज्र कवच में बताए ढंग से
वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं। वज्र कवच में जैसे बताया गया है, वैसे जप कीजिए। केवल एकाक्षरी का जप करें, तो वह भी सही है — कोई दिक्कत नहीं।
क्या जयंती मंगला काली मंत्र और बटुक भैरव के 108 नाम एक ही माला पर किए जा सकते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किए जा सकते हैं। वज्र कवच में जैसे बताया गया है, उस तरह जप कीजिए। केवल एक एकाक्षरी का जप करेंगे, तो वह भी सही है — उसमें कोई दिक्कत नहीं।
जब दरिद्रता चरम पर पहुँच जाए तो क्या करें?
किसी विद्वान ज्योतिषी से जन्म कुंडली का विश्लेषण कराइए
एक श्रोता लिखते हैं कि उनकी दरिद्रता सीमा पर पहुँच गई है; सरकारी नौकरी या कोई भी काम सोचते ही शरीर में बहुत कष्ट होने लगता है, और कोई काम नहीं होता, सब रुक जाता है। वक्ता कहते हैं कि इसके लिए किसी विद्वान ज्योतिषी से एक बार अपनी जन्म कुंडली का विश्लेषण ज़रूर कराइए, ताकि पता चले कि विषय क्या है।
एक श्रोता लिखते हैं कि उन पर दरिद्रता की चरम सीमा आ गई है; जब भी वे सरकारी नौकरी या कोई भी काम करने की सोचते हैं, शरीर में बहुत कष्ट होने लगता है; और किसी न किसी कारण से कोई काम नहीं होता, सब रुका हुआ है। वक्ता उनका नाम लेकर कहते हैं कि इसके लिए एक बार किसी विद्वान ज्योतिषी से अपनी जन्म कुंडली का विश्लेषण अवश्य कराइए — ताकि पता चल सके कि विषय क्या है।
क्या किसी स्त्री को बटुक भैरव ब्रह्म कवच से अभिमंत्रित धागा दिया जा सकता है?
इसके बजाय कामाख्या कवच से करें
पूछा गया कि क्या स्त्रियों को कमर में बाँधने के लिए बटुक भैरव ब्रह्म कवच से अभिमंत्रित धागा दिया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि इसे कामाख्या कवच से करना बेहतर है।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या स्त्रियों को बटुक भैरव ब्रह्म कवच से अभिमंत्रित करवाकर कमर में बाँधने के लिए धागा दिया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि भैया, उससे बेहतर कामाख्या कवच से कीजिए।
क्या देव तर्पण करते समय संकल्प लेना चाहिए?
देव तर्पण में संकल्प
पूछा गया कि क्या देव तर्पण करते समय संकल्प लेना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि अवश्य लेना चाहिए।
क्या देव तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। करते समय संकल्प लेना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि अवश्य लेना चाहिए।
गोत्र से अपनी कुलदेवी का पता कैसे लगाएँ?
वंशावली और गोत्रावली के ग्रंथ
भारद्वाज गोत्र के एक चतुर्वेदी श्रोता पूछते हैं कि गोत्र के अनुसार कुलदेवी की जानकारी कैसे मिल सकती है। वक्ता कहते हैं कि गोत्र के अनुसार जानकारी के लिए बहुत से ग्रंथ प्रकाशित हैं; वंशावली, गोत्रावली आदि के ग्रंथों में से किसी विद्वान ग्रंथ को एक बार देख लीजिए, बात सुलझ जाएगी।
भारद्वाज गोत्र के एक चतुर्वेदी श्रोता पूछते हैं कि गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है। के अनुसार कुलदेवी की जानकारी कैसे प्राप्त होती है। वक्ता कहते हैं कि गोत्र के अनुसार जानकारी के लिए बहुत सारे ग्रंथ प्रकाशित हैं। वंशावली, गोत्रावली और उन सबके ग्रंथों में से किसी विद्वान ग्रंथ को एक बार देख लीजिए। बात सुलझ जाएगी भैया।
विद्यार्थी पढ़ाई के लिए माँ सरस्वती की प्रचंड साधना कैसे करे?
पढ़ाई प्रचंडता से करें; साधना सीमित रखें
वक्ता कहते हैं कि प्रचंड साधना प्रचंडता से ही होगी — माँ सरस्वती या गणपति की जो साधना करनी हो, प्रचंडता से कीजिए। पर अगर पढ़ाई में अच्छा करना है, तो पढ़ाई अच्छे से कीजिए: प्रचंडता से पढ़ाई ही होनी चाहिए। साधना सौम्यता से, तय समय और तय संख्या में होनी चाहिए। प्रचंड साधना में डूब गए, तो विद्यार्थी की सारी विद्या उसी में चली जाएगी। सरस्वती कवच और भगवान गणपति के कवच का जप कीजिए और उसे सिद्ध करने का प्रयास कीजिए — लंबा चलाने की इच्छा हो तो रोज़ ग्यारह बहुत अच्छा है; रोज़ इससे अधिक की ज़रूरत नहीं।
पढ़ाई में अच्छा करने के लिए माँ सरस्वती की प्रचंड साधना कैसे सिद्ध करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: प्रचंडता से कीजिए। प्रचंड साधना प्रचंडता से ही होगी। माँ सरस्वती की जो भी साधना करनी हो, प्रचंडता से कीजिए; गणपति की जो करनी हो, वह भी प्रचंडता से कीजिए। पर अगर पढ़ने-लिखने में अच्छा करना है, तो पढ़ाई-लिखाई अच्छे से कीजिए। पढ़िए — प्रचंडता से पढ़िए भैया। साधना आपको सौम्यता से करनी चाहिए, और केवल तय समय और तय संख्या में। जब आप प्रचंड साधना में डूब जाते हैं, तो विद्यार्थी की सारी विद्या इस ओर लग जाएगी कि हम तो दिन भर साधना ही कर रहे हैं। साधना सीमा में रहे, अपने समय के अनुसार — होती ज़रूर रहे, नियमित रहे। उतने समय में, साधना स्थान पर एक-दो घंटे, अपनी प्रचंडता दिखाइए। सरस्वती कवच का जप कीजिए। भगवान गणपति के कवच का जप कीजिए। उसे सिद्ध करने का प्रयास कीजिए। लंबा चलाने की इच्छा बहुत प्रबल हो, तो रोज़ ग्यारह-ग्यारह। रोज़ इससे अधिक करने की ज़रूरत नहीं।
लंबी बीमारी, रुके व्यापार और बार-बार गर्भपात के लिए क्या करें?
पूरे विषय पर जन्म कुंडलियों के साथ चर्चा ज़रूरी
एक श्रोता लिखते हैं कि उनके माता-पिता और पत्नी का स्वास्थ्य अक्सर खराब रहता है, आठ साल से व्यापार में कुछ नया नहीं हो पा रहा, और तीन बार गर्भ गिर चुका है। वक्ता कहते हैं कि इस पर एक बार जन्म कुंडलियों के साथ पूरी चर्चा होनी चाहिए — तभी पता चलेगा कि विषय क्या है। यह घर और जन्म कुंडली का मामला है, परिवार के सदस्यों का मामला है।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनकी माँ, पिता और पत्नी का स्वास्थ्य अक्सर ठीक नहीं रहता; आठ साल बीत गए, व्यापार में कुछ नया नहीं हो पाया; और तीन बार गर्भ गिर चुका है। वक्ता कहते हैं कि इस पर एक बार पूरी चर्चा होनी चाहिए। जन्म कुंडली आदि के साथ — तब पता चलेगा कि विषय क्या है। यह घर का और जन्म कुंडली का मामला हो गया, और परिवार के सदस्यों का मामला।
क्या जयंती मंगला काली का जप महाकाली को, या एक साथ कई देवियों को समर्पित किया जा सकता है?
एक जप का समर्पण महाकाली, महालक्ष्मी और कुल दुर्गा को एक साथ
पूछा गया कि क्या जयंती मंगला काली का जप माँ महाकाली को समर्पित किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। फिर पूछा गया कि क्या महाकाली, महालक्ष्मी और अपनी कुल दुर्गा को एक ही समय साथ में समर्पित किया जा सकता है; वे कहते हैं कि वह भी किया जा सकता है।
क्या जयंती मंगला काली मंत्र का जप माँ महाकाली को समर्पण किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। फिर पूछा गया कि क्या महाकाली, महालक्ष्मी और अपनी कुल दुर्गा को एक साथ, एक ही समय समर्पण दिया जा सकता है। वे कहते हैं कि वह भी किया जा सकता है।
शिवलिंग की पूजा से पहले पूजन किस क्रम में होता है?
पहले कीर्तिमुख, फिर नंदी, त्रिशूल, अर्घी और लिंग
वक्ता कहते हैं कि सामान्य रूप से भगवान शिव के पूजन से पहले कीर्तिमुख के नाम से अर्घ्य दीजिए और अक्षत आदि अर्पित कीजिए; उसके बाद नंदीश्वर का पूजन, फिर भगवान के अस्त्र त्रिशूल का पूजन, फिर भगवान की अर्घी पर गणपति, कार्तिकेय, भगवती अशोक सुंदरी और भगवती पार्वती का पूजन; फिर अर्घी के निकास मार्ग पर सभी देवताओं का पूजन; फिर वासुकी नाग का पूजन; और उसके बाद शिवलिंग का पूजन।
कीर्तिमुख का पूजन कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता पूरा क्रम बताते हैं। सामान्य रूप से, भगवान शिव के पूजन से पहले कीर्तिमुख के नाम से अर्घ्य अर्पित करें और अक्षत आदि अर्पित करें। उसके बाद नंदीश्वर का पूजन; फिर भगवान के अस्त्र त्रिशूल का पूजन; फिर भगवान की अर्घी पर गणपति, कार्तिकेय, भगवती अशोक सुंदरी और भगवती पार्वती का पूजन; फिर अर्घी के निकास मार्ग पर सभी देवताओं का पूजन; फिर वासुकी नाग जी का पूजन। और उसके बाद शिवलिंग का पूजन।
क्या त्रिकोण में किया गया जप सिद्ध होता है?
त्रिकोण के भीतर किया गया जप और पाठ
पूछा गया कि कुंजिका कवच कैसे सिद्ध करें, और क्या त्रिकोण में किया गया जप सिद्ध होता है। वक्ता कहते हैं कि जप और पाठ — हाँ भैया, सिद्ध होता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि कुंजिका कवच को कैसे सिद्ध करें, और क्या त्रिकोण के भीतर किया गया जप सिद्ध होता है। वक्ता कहते हैं कि जप और पाठ — हाँ भैया, सिद्ध होता है।
क्या दूर रहने वाली परिवार की किसी दूर की शाखा का सूतक लगता है?
तेरह दिन का सूतक नहीं, पर एक नियम फिर भी बनाना चाहिए
एक श्रोता पूछते हैं कि चार पीढ़ी पहले की शाखा — उनके दादा के दूसरे भाई के परिवार — में सूतक-पातक लगा है; वे बाहर रहते हैं और आना-जाना नहीं है, तो क्या तेरह दिन पूजन-पाठ रुकेगा। वक्ता कहते हैं कि अगर आना-जाना और साथ खाना-पीना नहीं है, तो जहाँ तक सूतक का विषय है, तेरह दिन का सूतक नहीं है — पर एक नियम बनाना चाहिए: कम से कम पहले दिन का नियम, और अंतिम दिन, तेरहवें दिन जिस दिन दशकातर होता है, उसका सारा नियम आप लोगों को भी बनाना चाहिए, अगर यह आपकी जानकारी में है।
एक श्रोता चार पीढ़ी पहले की एक शाखा — उनके दादा के दूसरे भाई के परिवार — में लगे सूतक-पातक के बारे में पूछते हैं। वे बाहर रहते हैं और आना-जाना नहीं है; तो क्या तेरह दिन पूजन-पाठ नहीं होगा? वक्ता कहते हैं कि आपके दादा के दूसरे भाई, यानी आपके बड़े या छोटे दादा। आना-जाना नहीं है, खाना-पीना नहीं है। जहाँ तक सूतक का विषय है, तेरह दिन का सूतक नहीं है — पर एक नियम बनाना चाहिए। कम से कम पहले दिन का नियम, और जिस दिन दशकातर होगा, सबसे अंतिम दिन, तेरहवाँ दिन — उस समय का सारा नियम भी आप लोगों को बनाना चाहिए, अगर यह आपकी जानकारी में है।
अगर घर की कोई लोक देवी रुष्ट हो जाए तो क्या करें?
कौन-सी लोक देवी है, यह जाने बिना कुछ नहीं कहा जा सकता
पूछा गया कि घर की रुष्ट हुई लोक देवी को मनाने के लिए क्या करें। वक्ता कहते हैं कि उस लोक देवी के बारे में जाने बिना इस पर कुछ कहा ही नहीं जा सकता — वे कौन हैं, कैसे मानेंगी, यह कैसे बताया जा सकता है?
घर की रुष्ट हुई लोक देवी को मनाने के लिए क्या करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि लोक देवी के बारे में जाने बिना इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता। वे कौन हैं, किस तरह मानेंगी — यह कैसे बताया जा सकता है?
कौन-सी शक्तियाँ व्यक्ति से बिना जाने भविष्य की बातें कहलवाती हैं?
पारलौकिक शक्तियाँ जो मोहित करके आगे का मार्ग रोक देती हैं
एक श्रोता कहते हैं कि वे जिसे जो बताते हैं वह सच होता है — बुझा से मृत्यु तक निकाल देते हैं — पर कभी समझ नहीं पाए कि यह कैसे करते हैं, और कभी-कभी यह साधना में रहते हुए होता है। वक्ता कहते हैं कि पारलौकिक शक्तियाँ ठीक ऐसी ही होती हैं: अपनी छटांक भर कृपा करके व्यक्ति को मोहित करती हैं और फिर आगे का पूरा मार्ग रोक देती हैं। इनमें नहीं फँसना चाहिए। मैं कैसे जानता हूँ, कैसे जानूँगा, यह क्या हो रहा है — कभी-कभी पता ही नहीं चलता। जानने की ज़रूरत क्या है? आपका लक्ष्य केवल इतने तक सीमित थोड़े ही है।
एक श्रोता लिखते हैं कि वे किसी को जो भी बताते हैं वह सच होता है, वे बूझा से मृत्यु तक निकाल देते हैं, पर आज तक यह नहीं जान पाए कि यह कैसे कर लेते हैं — और कभी-कभी ऐसा तब होता है जब वे साधना में होते हैं। वक्ता प्रश्नकर्ता का नाम लेकर कहते हैं कि पारलौकिक शक्तियाँ ठीक इसी तरह की होती हैं। वे अपनी छटांक भर कृपा करके व्यक्ति को मोहित करती हैं और फिर आगे का पूरा मार्ग रोक देती हैं। मेरी अपनी दृष्टि के अनुसार, मेरे अपने अनुभव के अनुसार — और वे कहते हैं कि इस पर वे कई लाइव में बहुत विस्तार से चर्चा कर चुके हैं — इनमें नहीं फँसना चाहिए। मैं कैसे जानता हूँ, कैसे जानूँगा, यह जो हो रहा है क्या है? कभी-कभी मुझे पता ही नहीं चलता। जानने की ज़रूरत क्या है? आपका लक्ष्य केवल इतने तक सीमित नहीं है।
बटुक भैरव की मूर्ति कितनी बड़ी होनी चाहिए?
तीन इंच कोई नियम नहीं — छह तक, घर में दस तक भी
पूछा गया कि क्या बटुक भैरव की मूर्ति तीन इंच की ही होनी चाहिए। वक्ता कहते हैं कि यह निर्भर करता है — तीन ही हो, ऐसा नहीं; छह तक की रख सकते हैं। घर में दस तक की भी रख सकते हैं, पर तब सेवा-पूजा ठीक से हो।
क्या बटुक भैरव की मूर्ति केवल तीन इंच की ही रखनी चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि भैया, यह निर्भर करता है। ऐसा नहीं है कि तीन ही हो — छह तक रख सकते हैं। घर में दस तक की भी रख सकते हैं, पर तब सेवा और पूजा अच्छे से हो।
क्या यंत्र धारण करने के लिए शाकंभरी नवरात्रि में पंडित से 27000 नवार्ण जप कराया जा सकता है?
नवार्ण जप कराकर फिर यंत्र धारण करना
एक श्रोता शाकंभरी नवरात्रि में किसी पंडित जी से नवार्ण मंत्र के 27000 जप कराकर फिर यंत्र धारण करना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं कि हाँ भैया, बिल्कुल कर सकते हैं — कैसे और किस विधान से करना है, यह पंडित जी बताएँगे।
एक श्रोता कहते हैं कि वे शाकंभरी नवरात्रि में किसी पंडित जी से नवार्ण मंत्र के 27000 जप कराकर फिर यंत्र धारण करना चाहते हैं, और पूछते हैं कि क्या ऐसा कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि हाँ भैया, बिल्कुल कर सकते हैं। कैसे और किस विधान से करना है, यह पंडित जी आपको बताएँगे। इससे आगे कुछ कहने को नहीं है।
मंत्र के दस संस्कारों की विधि यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर पहले से पूरी वायरल है, इसलिए उनसे पुष्टि लेने की ज़रूरत नहीं
यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर वायरल दस संस्कार
मंत्र जागृत हो, इसके लिए मंत्र के दस संस्कारों की विधि पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि लोग पहले से बता रहे हैं — यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर पूरी वायरल है, देख लीजिए। वे कहते हैं कि वे जानते हैं प्रश्न कहाँ से आ रहा है और उनसे पुष्टि लेने की ज़रूरत नहीं: वीडियो में दिखाया गया है कि दस विधियाँ किस ढंग से होती हैं और मंत्र को किन बीजों से संपुटित करना है, ताकि मंत्र जागृत हो जाए। कीजिए और आनंद लीजिए, वे कहते हैं; उन्होंने इस पर बोलना छोड़ दिया है।
मंत्र के दस संस्कार वास्तव में किस परिस्थिति में और किस मंत्र पर किए जाते हैं?
कोई नहीं बता रहा कि किसका मंत्र-संस्कार कभी नहीं करना
वक्ता प्रश्न को उलटकर रखते हैं। आजकल लोग भगवती तारा के मंत्र का बहुत जप कर रहे हैं, जैसे बीच में भगवती बगला का कर रहे थे। मान लीजिए आपको लगता है कि कोई मंत्र प्रभाव नहीं दे रहा। यूट्यूब पर एक चैनल कहता है कि भगवती तारा के इस मंत्र का जप करो; दूसरा चैनल कहता है कि मंत्र प्रभाव न दे तो उसके दस संस्कार करो। पर दोनों में से कोई नहीं बता रहा कि किसका संस्कार कभी नहीं करना। जिस मंत्र का आप जप कर रहे हैं, क्या उसका कभी संस्कार होगा? वह कौन-सा मंत्र है — देवता का, महाविद्या का, देवी का, योगिनी का? किस कुल का? किस कुल में संस्कार किस ढंग से होता है? क्या सबके लिए एक जैसा है?
मंत्र के दस संस्कार किस परिस्थिति में और किस मंत्र पर होते हैं, यह प्रश्न उठाकर वक्ता पूरी स्थिति रखते हैं। महामंत्रों को लीजिए: आजकल लोग भगवती तारा के मंत्र का बहुत जप कर रहे हैं, और बीच में भगवती बगला का कर रहे थे। एक पल के लिए मान लीजिए भगवती तारा का मंत्र — और मान लीजिए कि आपके अपने अनुमान में वह प्रभाव नहीं दे रहा। यूट्यूब पर एक चैनल आपको बता रहा है: हाँ, भगवती तारा के इस मंत्र का जप कीजिए। दूसरा चैनल बता रहा है: अगर कोई मंत्र प्रभाव नहीं दे रहा, तो उसके दस संस्कार कीजिए। अब इन दोनों में से कोई नहीं बता रहा कि किसका संस्कार कभी करना ही नहीं चाहिए। आप जिस मंत्र का जप कर रहे हैं — क्या उस मंत्र का कभी संस्कार होगा? वह कौन-सा मंत्र है? देवता का मंत्र है, महाविद्या का मंत्र है, देवी का मंत्र है, योगिनी का मंत्र है? मंत्र किस कुल का है? किस कुल में संस्कार किस ढंग से होता है? क्या सबके लिए एक ही है?
जो मंत्र के दस संस्कार करता है, उसे किसी पर उँगली उठाने के बजाय पूछना चाहिए कि क्या साथ में उसके अपने सोलह संस्कार तैयार हैं
सोलहवाँ संस्कार, और अपने कर्तव्य कर्म में रहना
वक्ता कहते हैं कि यह सब जाने बिना अगर कोई अब मंत्र प्रभाव न देने पर उसके दस संस्कार करे — तो वह उस मंत्र के दस संस्कार करेगा, या साथ में अपने सोलह संस्कार तैयार करेगा, और उसी समय उसे सोलहवाँ संस्कार बताया जाएगा? वे किसी पर उँगली इसलिए नहीं उठाते कि तुरंत बात बन जाएगी "आप फलाँ का विरोध कर रहे हैं, आप द्वेष रखते हैं"। यही कारण है, और वे यह नहीं कर सकते, न करेंगे: वे अपने कर्तव्य कर्म में रहेंगे, और आपमें विवेक है तो आप स्वयं समझने का प्रयास करेंगे कि क्यों। भगवती की कृपा और गुरु आदेश से क्या उनके पास इन चीज़ों की कमी है? बस ये बाँटी नहीं जा सकतीं।
वक्ता कहते हैं कि यह सब जाने बिना कोई अब किसी मंत्र के प्रभाव न देने पर उसके दस संस्कार करता है। तो वह उस मंत्र के दस संस्कार करेगा — या साथ में अपने सोलह संस्कार तैयार करेगा, और उसी समय उसे सोलहवाँ संस्कार बताया जाएगा? वे कहते हैं कि वे किसी की ओर संकेत इसलिए नहीं करते: अगर हम अब संकेत करें, तो सीधे बात बन जाएगी — अच्छा, आप फलाँ का विरोध कर रहे हैं, आप द्वेष रख रहे हैं। यही कारण है। हम ऐसा नहीं कर सकते, और करेंगे भी नहीं। जहाँ तक सीमित है, हम अपने कर्तव्य कर्म में ही रहेंगे। अगर आपमें विवेक है, तो आप स्वयं समझने का प्रयास करेंगे कि क्यों। भगवती की कृपा से और गुरु आदेश की कृपा से, क्या हमारे पास इन सब चीज़ों की कोई कमी है? ये बाँटी नहीं जा सकतीं।
क्या श्री कुल में दीक्षित व्यक्ति काली कुल के शिक्षक की विधि अपना सकता है?
कुरुकुल्ला हमारी विधि से, श्री विद्या उनकी — कोई भी कुलों के पार नहीं चलती
वक्ता श्रोता से सीधे पूछते हैं: अगर आप श्री कुल में दीक्षित हैं और हम काली कुल में हैं, तो क्या आप हमारी दी हुई विधि से कुरुकुल्ला का विधान कर सकते हैं? मेरी परंपरा में दी गई विधि से, क्या आप श्री विद्या के अंतर्गत आने वाले मंत्रों आदि का पूरा विधि-विधान कर सकते हैं? वे कहते हैं कि प्रयोग के लिए इतना ज्ञान होना चाहिए — कम से कम यह तो पता हो कि कोई चीज़ किसके लिए है, और उसे सार्वजनिक कैसे किया जा सकता है।
वक्ता कहते हैं कि प्रयोग के लिए, या इस दूसरे विषय के लिए कि यहाँ कोई चीज़ कैसे पूरी होती है और उसमें क्या होता है, इतना ज्ञान होना चाहिए: कम से कम यह पता हो कि वह किसके लिए है। उसे सार्वजनिक कैसे करेंगे? अगर आप श्री कुल में दीक्षित हैं, और हम काली कुल में हैं — क्या आप हमारी दी हुई विधि से कुरुकुल्ला का विधान कर सकते हैं? दी गई विधि से, जो विधि मेरी परंपरा में है, क्या आप श्री विद्या के अंतर्गत आने वाले मंत्रों आदि का पूरा विधि-विधान कर सकते हैं?
मंत्र को सूतक कब लगता है, मंत्र त्याज्य कैसे किया जाता है और फिर कैसे ग्रहण होता है — ये जटिल, अलग विधान हैं जो सबके लिए नहीं
ये विधान जटिल हैं और सबके लिए नहीं हैं
वक्ता कहते हैं कि मंत्र को किस समय सूतक लगता है और किस समय नहीं, किस मंत्र में नहीं लगता, और इन सब विधानों के लिए मंत्र फिर कैसे त्याज्य किया जाता है और कैसे दोबारा ग्रहण होता है, कौन-सा मंत्र छोड़ना है — ये सब विषय बहुत जटिल और अलग हैं, और सबके लिए नहीं हैं। उनकी दृष्टि में जो दीक्षा परंपरा में नहीं हैं और सार्वजनिक मंच पर यह बटोरने की कोशिश कर रहे हैं, उनका इस विषय से कोई संबंध ही नहीं। जो इस पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं, उनसे जानकारी लीजिए और फिर उसका व्यावहारिक विधान कीजिए; हम न इसकी चर्चा करते हैं, न कभी बताना चाहते हैं, क्योंकि जिस ढंग से यह व्यावहारिक रूप से दिखाया जा रहा है वह सबके लिए नहीं है, और हम आपको गड्ढे में डालने का काम नहीं कर सकते।
वक्ता कहते हैं कि मंत्र के भीतर सूतक किस समय लगता है और किस समय नहीं, किसमें नहीं लगता; और इन सब विधानों के लिए फिर मंत्र का त्याग कैसे होता है, उसका दोबारा ग्रहण कैसे होता है, कौन-सा मंत्र छोड़ना है — ये सब विषय बहुत जटिल और अलग हैं। और ये सबके लिए नहीं हैं। मेरी दृष्टि में, जो दीक्षा परंपरा में नहीं हैं और सार्वजनिक मंच पर इन सब विषयों का ज्ञान पाने की कोशिश कर रहे हैं — उनके लिए इस विषय का कोई संबंध ही नहीं है। तो मेरी दृष्टि में, जो इस विषय पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं, वहीं से जानकारी लीजिए, और फिर बाद में उसका व्यावहारिक विधान कीजिए। हम न इसकी चर्चा करते हैं, न कभी इसे बताना चाहते हैं। हाँ, एक जानकारी दी जा सकती है: जिस ढंग से इसे व्यावहारिक रूप से बताया जा रहा है, वह सबके लिए नहीं है, और हम आपको गड्ढे में डालने का काम नहीं कर सकते।
एकादशी को जन्मे शूद्र के लिए नारायण का कौन-सा मंत्र उचित है?
शूद्र के लिए विष्णु सहस्रनाम और उसकी फलश्रुति
एक श्रोता कहते हैं कि वे शूद्र हैं और एकादशी को जन्मे हैं, और पूछते हैं कि उनके लिए नारायण का कौन-सा मंत्र उचित होगा। वक्ता कहते हैं कि जब तक आपकी दीक्षा नहीं हुई, जब तक आप कहीं दीक्षित नहीं हैं, भगवान श्री हरि नारायण के विष्णु सहस्रनाम का पाठ कीजिए। उसकी फलश्रुति में लिखा है कि शूद्र इसका पाठ करे तो क्या पाएगा। फिर उसमें इस विषय का संकल्प रखिए, क्योंकि आप भगवान श्री हरि नारायण के मंत्र के इच्छुक हैं और एकादशी का जन्म भी इसका कारण बन रहा है, और आपमें श्रद्धा है, तो उन्हीं को समर्पित रहिए। सच्चे शूद्र बनिए; नियम और नीति से चलिए। आपका सामर्थ्य तपस्वियों के बराबर होगा, और भगवान की कृपा से आपको सही मार्ग मिलेगा और आप उसमें फलेंगे-फूलेंगे।
एक श्रोता लिखते हैं कि वे शूद्र हैं और एकादशी के दिन जन्मे हैं, और पूछते हैं कि उनके लिए नारायण का कौन-सा मंत्र उचित होगा। वक्ता कहते हैं कि देखिए भैया: जब तक आपकी दीक्षा नहीं हुई, जब तक आप कहीं दीक्षित नहीं हैं, भगवान श्री हरि नारायण के विष्णु सहस्रनाम का पाठ कीजिए। उसकी फलश्रुति में लिखा है कि शूद्र इसका पाठ करे तो क्या प्राप्त करेगा। उसके बाद उसमें इस विषय का संकल्प रखिए — क्योंकि आप भगवान श्री हरि नारायण के मंत्र के इच्छुक हैं, और एकादशी पर आपका जन्म भी आपके लिए इसका कारण बन रहा है, और आपमें श्रद्धा है, आपने इसे स्वीकार किया है — तो उन्हीं को समर्पित रहिए। सच्चे शूद्र बनिए। नियम और नीति से चलिए। आपका सामर्थ्य उनके बराबर होगा जो तपस्वी हैं, और भगवान की कृपा से आपको सही मार्ग मिलेगा, और उसमें आप फलेंगे-फूलेंगे।
भगवान श्री नारायण को स्तुति बहुत प्रिय है, और सहस्रनाम के जप में जप और स्तुति दोनों एक साथ हो जाते हैं
सहस्रनाम कंठस्थ करें, नामावली से अर्चन करें, स्तुति अर्पित करें
वक्ता तीन काम बताते हैं। सहस्रनाम, या जो भी जप आप करते हैं, धीरे-धीरे कंठस्थ कीजिए। समय-समय पर उनकी नामावली से अर्चन भी कीजिए। और क्योंकि भगवान श्री नारायण को स्तुति बहुत प्रिय है, उनकी स्तुति करने की आदत बनाइए। सहस्रनाम के जप में जप भी हो जाता है और स्तुति भी — सहस्रनाम की महिमा बड़ी है, विष्णु सहस्रनाम की तो अनंत है।
वक्ता कहते हैं कि ये तीन काम कीजिए। भगवान का सहस्रनाम, या जो भी जप हो — उसे धीरे-धीरे कंठस्थ कीजिए। और समय-समय पर उनकी नामावली से अर्चन भी कीजिए। भगवान श्री नारायण को स्तुति बहुत प्रिय है; उनकी स्तुति करने की आदत बनाइए। सहस्रनाम के जप में जप भी हो जाएगा, और स्तुति भी। सहस्रनाम की महिमा बड़ी है; विष्णु सहस्रनाम की अनंत है।
नामावली से अर्चन करने पर भगवती भी क्यों प्रसन्न होती हैं?
देवता के शरीर पर श्रृंगार और सोना उनकी शक्ति, उनकी श्री है
वक्ता कहते हैं कि जब आप उनकी नामावली से उनका सहस्र अर्चन करते हैं, तो भगवती लक्ष्मी भी बहुत प्रसन्न होंगी कि भगवान शक्ति सहित हैं — उनकी शक्ति श्री हैं। किसी देवता का मूर्त स्वरूप अकेला भी हो, तो उनके शरीर पर जो श्रृंगार और सोने के आभूषण हैं, उनमें जो सौंदर्य दिखता है, वही उनकी शक्ति, उनकी श्री है: वह उनकी अर्धांगिनी का प्रतीक है। इसलिए जब अर्चन होता है, तो भगवान श्री नारायण और भगवती दोनों प्रसन्न होंगे, और दोनों की कृपा मिलेगी।
वक्ता कहते हैं कि जब आप उनकी नामावली से उनका सहस्र अर्चन करते हैं, तो भगवती लक्ष्मी भी बहुत प्रसन्न होंगी — कि भगवान शक्ति सहित हैं, और उनकी शक्ति श्री हैं। किसी देवता का मूर्त स्वरूप अकेला भी खड़ा हो, तो उनके शरीर पर जो भी श्रृंगार और सोने के आभूषण हैं, उनमें जो भी सौंदर्य दिख रहा है, वही उनकी शक्ति है, श्री है। वह उनकी अर्धांगिनी का प्रतीक है, जो उनके साथ हैं। इसलिए जब उनका अर्चन होता है, तो उससे भगवान श्री नारायण और भगवती दोनों प्रसन्न होंगे। दोनों की कृपा आपको मिलेगी।
भगवान श्री नारायण के लिए किस मंत्र का जप किया जा सकता है?
भागवत का श्लोक "कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने"
वक्ता कहते हैं कि इस तरह वे नहीं बता सकते कि कौन-सा मंत्र — उसके लिए पूरा विषय देखना पड़ेगा। पर श्रीमद् भगवद्गीता का श्लोक, और श्रीमद् भागवत का मंत्र "कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने" आदि — मंत्र की दृष्टि से इसका जप आप जितना हो सके कर सकते हैं, क्योंकि यह श्लोक पौराणिक श्लोक के रूप में है।
कौन-सा मंत्र करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि अगर आप मंत्र के जप आदि का विषय देखना चाहते हैं, तो इस तरह हम नहीं बता सकते — उसके लिए पूरा विषय जाँचना पड़ेगा। यह भगवान श्री नारायण के लिए है। पर श्रीमद् भगवद्गीता का श्लोक, मंत्र की दृष्टि से; और श्रीमद् भागवत का मंत्र "कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने" आदि — इसका जप आप जितना हो सके कर सकते हैं, क्योंकि यह श्लोक पौराणिक श्लोक के रूप में है।
क्या भगवती की मूल साधना से पहले छोटी साधना के रूप में नरसिंह का द्वादश नाम स्तोत्र किया जा सकता है?
क्रमागत सीढ़ी में चौथे वीर, नरसिंह
एक श्रोता क्रमागत साधना में गणेश जी, भैरव जी और हनुमान जी कर चुके हैं, और भगवती की मूल साधना से पहले चौथे वीर नरसिंह जी की एक छोटी साधना करना चाहते हैं। वे पूछते हैं कि क्या नरसिंह के बारह नाम वाले स्तोत्र का उपयोग कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं।
एक श्रोता कहते हैं कि क्रम विद्या साधना में गणेश जी, भैरव जी और हनुमान जी के बाद वे भगवती की मूल साधना से पहले चौथे वीर, नरसिंह जी की एक छोटी साधना करना चाहते हैं, और पूछते हैं कि क्या नरसिंह के बारह नाम वाले स्तोत्र का उपयोग कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं।
क्या लिया हुआ नियम न निभाना पाप है?
तीनों द्विज वर्णों के लिए संध्या अनिवार्य है
एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें डर है कि नियम न निभाने से पाप लगेगा। वक्ता कहते हैं कि भैया, अगर आप जानबूझकर नहीं निभाना चाहते, तो पाप लगेगा ही। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य — तीनों के लिए संध्या अनिवार्य है। वे द्विज हैं; तीनों के लिए संध्या अनिवार्य है।
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्हें डर है कि नियम न निभाने के कारण पाप लगेगा। वक्ता कहते हैं कि भैया, अगर आप जानबूझकर नहीं निभाना चाहते, तो पाप लगेगा ही। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य — इन तीनों के लिए संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। अनिवार्य है। वे द्विज हैं। तीनों के लिए संध्या अनिवार्य है।
क्या कलियुग में केवल नाम जप पर्याप्त है?
केवल नाम जप के लिए सारे कर्म छोड़ना देह-चोरी है
वक्ता कहते हैं कि नाम की शरण लेकर — यह कहकर कि कलियुग में केवल नाम का ही आधार है और उसके स्मरण से मनुष्य पार उतरता है — और इसी आधार पर सारे कर्म छोड़ देना, हर कर्म समाप्त करके केवल नाम जप को ही सब कुछ मान लेना, यह आपकी देह-चोरी है, और कुछ नहीं। जिन दूसरे कर्मों से आपको सुख मिलता है, उन्हें आप कभी समाप्त नहीं करेंगे। पर संध्या में शरीर हिलाना-डुलाना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी, मंत्र कंठस्थ करने होंगे, विधि-विधान सीखना होगा — दस-पंद्रह मिनट की बात; और उतने से भी बचने के लिए आप संध्या समाप्त करने को तैयार हैं, तो भैया इस मूर्खता से बड़ी कोई बात नहीं। संध्या के बिना द्विज का किया नाम जप किसी भी तरह फल नहीं देता।
वक्ता कहते हैं कि यह कहकर — नाम की शरण लेकर, कि कलियुग में केवल नाम का ही आधार है और उसके स्मरण से मनुष्य पार उतरता है — अब हम सारे कर्म छोड़ देते हैं, हर कर्म समाप्त कर देते हैं, और केवल नाम जप को ही सब कुछ मान लेते हैं: यह आपकी देह-चोरी है, और कुछ नहीं। बाकी सारे कर्म जिनसे आपको सुख मिलता है, उन्हें आप कभी समाप्त नहीं करेंगे। पर संध्या में शरीर हिलाना-डुलाना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी, मंत्र कंठस्थ करने होंगे, विधि-विधान सीखना होगा। यह लगभग दस-पंद्रह मिनट का विषय रहेगा — और फिर भी उतने से बचने के लिए आप संध्या समाप्त करने को तैयार हैं। तो भैया, इस मूर्खता से बड़ी कोई बात नहीं। संध्या के बिना द्विज द्वारा किया गया नाम जप किसी भी प्रकार से फल नहीं देता।
नाम जप उस सचमुच अनपढ़ व्यक्ति को फल देता है जिसके पास न विधि-विधान है न योग्य गुरु, जानबूझकर मूर्ख बनने वाले को नहीं
अनपढ़ व्यक्ति का नाम जप, और वे किसे जाहिल कहते हैं
वक्ता जानबूझकर मूर्ख बनने वालों और सचमुच अनपढ़ लोगों में अंतर करते हैं। चौथे वर्ण का व्यक्ति, मूर्ख व्यक्ति, वज्र — जिसे विधि-विधान नहीं पता, जिसे योग्य गुरु नहीं मिला, जो विद्वान नहीं, पढ़ा-लिखा नहीं, अनपढ़, गँवार है: अगर वह किसी कारण संध्या नहीं कर पाता और गुरु का नाम जप कर लेता है, तो उसे फल अवश्य मिलेगा। ऐसे व्यक्ति को वे जाहिल कहने से भी मना करते हैं। वे कहते हैं कि जाहिल वे हैं जो सब जानते हैं और करना नहीं चाहते, जो अड़ जाते हैं कि हम नहीं करेंगे, केवल नाम जप हमें पार लगा देगा। पर जो पढ़े-लिखे नमूने केवल दूसरों को सुन-देखकर, शरीर की मेहनत से बचने के लिए संध्या को दस-पंद्रह मिनट नहीं देंगे — वे इस भ्रम में न रहें कि नाम जप से इति श्री हो जाती है। नहीं होती।
वक्ता कहते हैं कि आप जानबूझकर मूर्ख हो। चौथे वर्ण का व्यक्ति हो, मूर्ख व्यक्ति हो, वज्र हो — यानी जिसे विधि-विधान पता नहीं, जिसे योग्य गुरु नहीं मिला, और जो विद्वान नहीं; पढ़ा-लिखा नहीं, अनपढ़, गँवार। जाहिल तो हम कहेंगे भी नहीं। जाहिल वे लोग हैं जो सब जानते हैं और करना नहीं चाहते। जाहिल वे हैं जो अड़ जाते हैं: नहीं, हम नहीं करेंगे, केवल नाम जप मुझे पार लगा देगा। ये जाहिल लोग हैं। जो अनपढ़ है, गँवार है, मूर्ख है, जिसे भाषा का ज्ञान नहीं — अगर वह किसी कारण संध्या नहीं कर पाता और गुरु का नाम जप कर लेता है, तो उसे फल अवश्य मिलेगा। पर जो पढ़े-लिखे नमूने हैं, जो केवल दूसरों को सुनकर और देखकर, अपने शरीर से मेहनत करने से बचने के लिए संध्या के लिए दस-पंद्रह मिनट नहीं देंगे — वे कृपया इस भ्रम में न रहें कि नाम जप से इति श्री हो जाती है। नहीं होती।
निष्ठा से नियम निभाने से वास्तव में क्या बनता है?
अपनी पीढ़ियों के लिए रखी गई नींव
वक्ता कहते हैं कि जो अशास्त्रीय है उसे करके भला चाहोगे, तो भला ज़रूर होगा — पर फिर सोचना कि वह भला कब भाला बन जाता है। जब कोई निष्ठा से, नीति और नियम से चलता है, तो अपने साथ-साथ वह कहीं न कहीं अपने भविष्य और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नींव बनाता है। वे नींव बहुत मज़बूत होती हैं, और जब वह ज़बरदस्त ढंग से उन्नति की ओर बढ़ता है, तो अकेला नहीं बढ़ता: उसकी पीढ़ियाँ बढ़ती हैं।
वक्ता कहते हैं कि जो भी चीज़ अशास्त्रीय है, और उसे करके आप अपना भला चाहते हैं — भला ज़रूर होगा; पर वह भला कब भाला बन जाएगा, यह फिर सोच लीजिए। जब कोई निष्ठा से, नीति और नियम से चलता है, तो अपने साथ-साथ अपने भविष्य के लिए और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए कहीं न कहीं एक नींव बनाता है। उसकी नींव बहुत मज़बूत होती है। और जब वह सबसे ज़बरदस्त ढंग से उन्नति की ओर बढ़ता है, तो वह अकेला नहीं बढ़ता — उसकी पीढ़ियाँ बढ़ती हैं।
तीन पीढ़ियों में एक परिवार अपना अभ्यास कैसे खो देता है?
संध्या करने वाला पिता, उसे दिखावा कहने वाला बेटा, कुछ न जानने वाला पोता
वक्ता क्रम बताते हैं। पिता संध्या करते थे; वे वैश्य वर्ण के थे, संध्या सीखी थी, उनके गुरु जी थे, यज्ञोपवीत पहनते थे, शिखा रखते थे, सबका ज्ञान था, और समय-समय पर हवन भी करते थे। अगली पीढ़ी आते ही आप कॉर्पोरेट जगत के बड़े चैंपियन बन गए और समय की कमी हो गई — पर आपने यह नहीं कहा कि समय की कमी से ऐसा कर रहे हैं। आपने कहा यह सब दिखावा है, पाखंड है, हम कर्मकांड में नहीं पड़ेंगे, इस आडंबर में नहीं पड़ेंगे, केवल नाम जप करेंगे और उसी से मेरा कल्याण होगा; और यह कहकर सब छोड़ दिया। अब जब तीसरी पीढ़ी आएगी, उसे न संध्या का ज्ञान होगा न नाम जप का। वे यो-यो ड्यूड करेंगे, और फिर आपसे भी यो-यो करवाएँगे। और कुछ नहीं — यही होगा।
वक्ता कहते हैं कि पर जो लोग अपनी ही नींव बिगाड़ते हैं — और वे पूरा क्रम रखते हैं। जैसे, उदाहरण के लिए, पिता संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। करते थे। पिता वैश्य वर्ण के थे; उन्होंने संध्या सीखी थी, उनके गुरु जी थे, वे यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। भी पहनते थे, शिखा रखते थे, उन्हें हर चीज़ का ज्ञान था। वे संध्या करते थे। समय-समय पर हवन आदि भी करते थे — सब करते थे। पर जैसे ही आपकी अगली पीढ़ी आई, भैया आप कॉर्पोरेट जगत के बड़े चैंपियन बन गए, और आपके पास समय की कमी हो गई; और फिर आपने यह नहीं कहा कि हम समय की कमी से ऐसा कर रहे हैं। आपने कहा: यह सब दिखावा है, पाखंड है। हम कर्मकांड में नहीं पड़ेंगे, इस आडंबर में नहीं पड़ेंगे, हम सीधे केवल नाम जप करेंगे और उसी से मेरा कल्याण हो जाएगा। यह कहकर आपने हर चीज़ छोड़ दी। अब जब तीसरी पीढ़ी आएगी — जो आपके पिता से तीसरी पीढ़ी है — उस पीढ़ी को न संध्या का ज्ञान होगा, न नाम जप का। वे यो-यो ड्यूड करेंगे, और फिर आपसे भी यो-यो करवाएँगे। और कुछ नहीं; यही होगा। न किया जाए तो और क्या होगा?
क्या घर में चाँदी का दीपक जलाया जा सकता है?
पीतल की जगह चाँदी का दीपक
पीतल का दीपक जलाने वाली एक श्रोता पूछती हैं कि क्या वे अपने घर में चाँदी का दीपक जला सकती हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल जला सकती हैं।
एक श्रोता पूछती हैं कि क्या वे अपने घर में चाँदी का दीपक जला सकती हैं; वे पीतल का दीपक जलाती हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल जला सकती हैं।
कौन-सा शिव सहस्रनाम पढ़ना चाहिए?
श्री हरि नारायण द्वारा की गई सहस्रनाम स्तुति
वक्ता कहते हैं कि आप जो भी शिव सहस्रनाम चाहें, कर सकते हैं। शिव महापुराण की चर्चा में कई शिव सहस्रनामों का विषय आया था। पर भगवान श्री हरि नारायण ने भगवान शिव के हज़ार नामों से जो स्तुति की थी — वह करें तो बहुत दिव्य है, क्योंकि उसमें भगवान ने बहुत कुछ प्राप्त किया। भगवान श्री हरि नारायण भगवान शिव के सबसे बड़े भक्त हैं; उनकी की हुई शिव सहस्रनाम स्तुति कीजिए।
कौन-सा शिव सहस्रनाम करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि आप जो चाहें कर सकते हैं। शिव सहस्रनाम की बात — जब शिव पुराण की चर्चा चल रही थी, जब शिव चर्चा हुई, तब उसमें शिव महापुराण के कई शिव सहस्रनामों का विषय आया था। भगवान श्री हरि नारायण ने भगवान शिव के हज़ार नामों से जो स्तुति की थी — वह करें तो बहुत दिव्य है भैया, क्योंकि उसमें भगवान ने बहुत कुछ प्राप्त किया। भगवान शिव के सबसे बड़े भक्त भगवान श्री हरि नारायण हैं। उनके द्वारा की गई शिव सहस्रनाम स्तुति — वह कीजिए।
जब वैवाहिक कष्ट व्यक्ति को वैराग्य की ओर धकेल रहा हो तो क्या करें?
आप अपनी जगह सही हैं, पर एक बात सुनिए
एक श्रोता अंग्रेज़ी में अपने भौतिक और वैवाहिक जीवन में बहुत कष्ट की बात लिखते हैं और कुंडली देखने को कहते हैं। वक्ता कहते हैं कि इस सारे कष्ट के कारण आप वैराग्य की ओर जा रहे हैं। एक विषय जानिए: ठीक है, आप वैराग्य की ओर जा रहे हैं और वैवाहिक जीवन में भी रहना चाहते हैं; अपनी जगह आप सही हैं। पर इसमें एक दिव्यता है — आगे की बात को अपने ऊपर मत लीजिए।
एक श्रोता अंग्रेज़ी में लिखते हैं कि उनके भौतिक जीवन और वैवाहिक जीवन में बहुत कष्ट है, और कुंडली देखकर मदद करने को कहते हैं। संदेश पढ़कर वक्ता कहते हैं कि इस सारे कष्ट के कारण आप वैराग्यसंपूर्ण त्याग व कठोर तपस्या का मार्ग — अधिकांश के लिए दुष्कर, और रस भक्ति के साथ मोक्ष के दो समान रूप से वैध मार्गों में से एक। में जा रहे हैं। एक विषय जानिए। ठीक है — आप वैराग्य में जा रहे हैं, और वैवाहिक जीवन में ही रहना भी चाहते हैं। अपनी जगह आप सही हैं। पर एक विषय पर, इसे अपने ऊपर मत लीजिए; इसमें एक दिव्यता है।
युवा साधक, जिनसे पूछा जाता है कि वे कौन-सा मार्ग चाहते हैं, साधना मार्ग कहते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि वे गिर जाएँगे
हम साधना मार्ग चाहते हैं, क्योंकि जानते हैं कि गिर जाएँगे
वक्ता कहते हैं कि जब साधकों में चर्चा होती है — युवा और कुछ अधेड़ उम्र के, कुछ जिनका विवाह होने वाला है, फ़ोन पर या अन्य माध्यमों से — तो वे पूछते हैं कि क्या होगा। वे उनसे पूछते हैं कि किस मार्ग पर जाना चाहते हो, और वे कहते हैं कि साधना मार्ग पर जाना चाहते हैं, क्योंकि गृहस्थ में तो जाना ही है, और गृहस्थ में हम ऐसे बड़े विरक्त संन्यासी बनकर इतना कठिन ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने की स्थिति में नहीं हैं। हम जानते हैं कि हम गिर जाएँगे। यह लिखने-पढ़ने की बात नहीं। न उतना सामर्थ्य है, न ऐसा प्रबल वैराग्य। तो हम वैरागी बनना तो चाहते हैं, पर इसी आश्रम से, इसमें जाकर, ताकि हमसे गिरने की कोई बात न हो।
वक्ता कहते हैं कि जब साधकों में चर्चा होती है — इन्हीं लोगों में, जो युवा उम्र के साधक हैं और कुछ अधेड़ उम्र तक पहुँचे हैं — जिनका विवाह होने वाला है, और कभी फ़ोन पर चर्चा होती है, कॉल मी पर या अन्य माध्यमों से फ़ोन आता है, और फ़ोन पर बात करते हुए ये विषय आते हैं: भैया, क्या होगा? उसमें हम कहते हैं: आप किस मार्ग पर जाना चाहते हो? वे कहते हैं कि हम साधना मार्ग पर जाना चाहते हैं। क्योंकि गृहस्थ में तो जाना ही है। गृहस्थ में हम इतने बड़े विरक्त संन्यासी बनने और इतना कठिन ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। व्रत धारण करने की स्थिति में नहीं हैं। हम जानते हैं कि हम पतित हो जाएँगे। यह लिखने-पढ़ने का विषय नहीं है। न उतना सामर्थ्य है, न ऐसा प्रबल वैराग्य। तो हम वैरागी बनना तो चाहते हैं, पर इसी आश्रम से — इसमें जाकर — ताकि हमसे गिरने की कोई बात न हो।
अगर पत्नी इस मार्ग पर साथ न दे तो क्या करें?
बात बिगड़े तो वैरागी बनो, बात बने तो उसे साथ लाओ
वे पूछते हैं कि मान लीजिए विवाह हो गया और जो धर्मपत्नी आई वह हमारे साथ न रही — तब क्या? वक्ता कहते हैं: अगर पत्नी आई और उसके बाद आपकी नहीं बनी, तो बस ऐसे ही वैरागी बन जाइए और इसी मार्ग में आ जाइए। आ जाइए, हम कमंडल लेंगे और दोनों भाई गंगा जी के किनारे मज़े से बैठेंगे — हर हर महादेव, दिक्कत क्या है? और अगर अच्छी पत्नी आ गई, तो उसे भी साथ ले आइए; वह भी हर हर महादेव, वह भी जप करेगी और आप भी जप करेंगे। अच्छी निकले तो साथ आइए; बुरी निकले तो अकेले आइए। हर स्थिति में अपनी स्थिति देखिए और कैसे निकलना है।
तो ऐसा विषय — मान लीजिए विवाह हो गया, और जो धर्मपत्नी आई वह हमारे साथ नहीं रही, तब क्या होगा? कैसे चलेगा? वक्ता कहते हैं कि हम कहते हैं, भैया: अगर पत्नी आई और उसके बाद आपकी नहीं बनी, तो ऐसे ही वैरागी बन जाइए। इसी मार्ग में आ जाइए। क्या है भैया — आप भी आ जाइए; हम कमंडल लेंगे और दोनों भाई गंगा जी के किनारे मज़े से बैठेंगे। हर हर महादेव। दिक्कत क्या है? और अब अगर अच्छी पत्नी आ गई है, तो पत्नी को भी अपने साथ ले आइए। वह भी हर हर महादेव। वह भी जप करेगी, और आप भी जप कीजिए। अच्छी निकले तो साथ आइए; बुरी निकले तो अकेले आइए। हर स्थिति में अपनी स्थिति देखिए और कैसे निकलना है।
क्या दुःख से जन्मा वैराग्य सच्चा वैराग्य है?
कष्ट से उपजी विरक्ति प्रबल नहीं होगी
वक्ता कहते हैं कि अगर आप वैराग्य को ऐसे समझ रहे हैं — कि आपकी विरक्ति कष्ट के कारण उपज रही है — तो वह प्रबल विरक्ति नहीं होगी। यह सच्ची बात है, और इसका एक कारण है।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप वैराग्य को यह मान रहे हैं — कि कष्ट के कारण आपकी विरक्ति उपज रही है — तो वह प्रबल विरक्ति नहीं होगी। यह सच्ची बात है। इसका एक कारण है।
दुःख से जन्मा वैराग्य व्यक्ति को वापस गृहस्थ में क्यों ले आता है?
बढ़ता तपोबल आकर्षण को लौटा लाता है
वक्ता उदाहरण देते हैं। मान लीजिए वैवाहिक जीवन में कष्ट आया, मन उदास हुआ, अपनी पत्नी को ही कामिनी मान लिया, मन कामिनी से हट गया, और व्यक्ति साधना मार्ग में चला गया। जब उस साधना से तपोबल बढ़ा — क्योंकि तपोबल बढ़ेगा और यह चिंतन मन में बना रहेगा — तो उसके प्रभाव से यह आकर्षण भी फिर बनेगा। आपके भीतर का वैराग्य समाप्त हो जाएगा और आप फिर गृहस्थ में आएँगे, अवश्य, चाहे उसी के साथ या किसी और व्यवस्था से। किसी न किसी तरह माया आपको फिर यहीं ले आएगी। इसीलिए यह क्षणिक वैराग्य है; इससे विचलित मत होइए। प्रबल वैराग्य हमेशा ज्ञान की प्राप्ति से होता है।
वक्ता कहते हैं कि इसे इस तरह, एक बेहतर उदाहरण से समझिए। अगर वैवाहिक जीवन में किसी तरह का कष्ट आया, व्यक्ति मानसिक रूप से उदास हो गया, उसने अपनी पत्नी को ही कामिनी मान लिया — मन कामिनी से हट गया — और वह साधना मार्ग में चला गया। जब साधना के कारण आपके तपोबल में वृद्धि हुई, तो क्योंकि तपोबल बढ़ेगा और यह चिंतन आपके मन में बना रहेगा, उसके प्रभाव से यह आकर्षण भी फिर बनेगा। आपके भीतर का वैराग्य भी समाप्त हो जाएगा, और आप फिर गृहस्थ में आएँगे — अवश्य आएँगे। चाहे उसी के साथ आएँ, या कोई और विषय बन जाए। तो किसी न किसी तरह माया आपको फिर यहीं ले आएगी। इसीलिए यह क्षणिक वैराग्य है। इससे विचलित मत होइए। प्रबल वैराग्य हमेशा ज्ञान की प्राप्ति से होता है।
दूसरों को सावधान करना अच्छा काम है, पर दस में से आठ विषय स्त्री के शारीरिक रूप पर हों तो उस काम का वज़न खत्म हो जाता है
दूसरों को सावधान करना अच्छा काम है, पर अति उसका वज़न खत्म कर देती है
वक्ता कहते हैं कि एक बहुत विद्वान व्यक्ति हैं जिनका कोई गुरु नहीं, जिनके बारे में वे ज़्यादा और कुछ नकारात्मक नहीं कहेंगे। पर वे देखते हैं कि यह व्यक्ति स्त्री के शारीरिक रूप पर चरम तक टिप्पणियाँ करते हैं — उनके दस विषय लिखे हों तो उनमें आठ यही होते हैं, खासकर पुरुषों के लिए: सावधान रहो, यह करो, वह करो, स्त्री का शरीर भोगोगे तो यह होगा। उनकी दृष्टि में अगर व्यक्ति ब्रह्मचारी है, तो वही चिंतन नहीं होना चाहिए। दूसरों को सावधान करना बहुत अच्छा काम है; पर अगर आप रोज़ हज़ार पोस्ट लिखते हैं और उनमें 999 इसी एक विषय पर रहती हैं, तो उन्हें लगता है कि सबसे ज़्यादा चिंतन आप ही कर रहे हैं, और दूसरों को भी चिंतन में धकेल रहे हैं। वे मानते हैं कि वह व्यक्ति असत्य नहीं लिखता — सत्य लिखता है, पर अति हो जाती है; और बार-बार लिखने से लोग उसे महत्व नहीं देते और अनदेखा कर देते हैं। वे स्वयं भी लोगों से कहते हैं कि गलत मत करो, पर सही समय पर उदाहरण के साथ सटीक चोट होनी चाहिए, ताकि हमारे सनातनी साधक मज़बूत बनें — मानसिक रूप से, शारीरिक रूप से, और लंगोट से भी, हर तरह से उनमें श्रेष्ठता और बल हो।
वक्ता कहते हैं कि एक बहुत विद्वान व्यक्ति हैं जिनका कोई गुरु नहीं। उनके बारे में हम बहुत ज़्यादा नहीं कहेंगे, और यह नकारात्मक नहीं, सकारात्मक विषय है। पर कभी-कभी, व्यक्तिगत रूप से — और वे कहते हैं कि उन्होंने इस व्यक्ति की चर्चा कहीं नहीं की — हम देखते हैं कि वे स्त्री के शारीरिक रूप पर बहुत ज़्यादा, चरम टिप्पणियाँ करते हैं। उनके दस विषय लिखे हों, तो उनमें आठ विषय यही रहते हैं। खासकर पुरुषों के संबंध में: सावधान रहो, यह करो, वह करो, स्त्री का शरीर भोगोगे तो यह होगा, वह होगा। वे कहते हैं कि मुझे लगता है, जो व्यक्ति ब्रह्मचारी है उसके जीवन में ठीक वही चिंतन नहीं होना चाहिए। वे बहुत अच्छा काम करते हैं; दूसरों को सावधान कर रहे हैं। पर आप दिन में हज़ार पोस्ट लिख रहे हैं, हज़ार विषय लिख रहे हैं, और उनमें 999 विषय केवल यही रह रहे हैं — तो मुझे लगता है कि सबसे ज़्यादा चिंतन आप ही कर रहे हैं। और दूसरों को भी चिंतन के लिए मजबूर कर रहे हैं: अरे, अच्छा, ऐसा होता है, ऐसा होता है। वे ये सब बातें बहुत अजीब ढंग से लिखते हैं। हालाँकि वे असत्य नहीं लिखते — जो लिखते हैं वह सत्य है, पर अति हो जाती है। आज के समय में इतना लिखने का अर्थ है कि आप हर एक चीज़ व्यक्ति के लिए सुलभ कर देंगे। बार-बार ऐसा लिखिए तो फिर कोई उसे महत्व नहीं देगा: अरे, यह तो हमेशा यही लिखता रहता है; छोड़ो, अनदेखा करो, दिन भर यही लिखता है। हम भी कहते हैं भैया, मत करो; ऐसे मत करो, यह गलत है, वह गलत है। पर सही समय पर, उदाहरण के साथ सटीक चोट होनी चाहिए, ताकि हमारे सनातनी साधक मज़बूत बनें। मानसिक रूप से, शारीरिक रूप से, लंगोट से भी — हर तरह से उनमें श्रेष्ठता हो, बल हो। पर अगर इतनी अति से किया जाए, तो विषय मुश्किल बन जाएगा।
बहुत अच्छा काम करने वाले किसी शिक्षक को लेकर डर यह है कि अगर कुछ नकारात्मक निकल आया तो बहुतों के दिल और मन टूट जाएँगे
जब कुछ नकारात्मक निकलता है तो बहुतों के दिल टूटते हैं
अपने मन की बात कहते हुए वक्ता कहते हैं कि वे मनुष्य हैं और किसी को बहुत अच्छा काम करते देखकर बहुत अच्छा लगता है — पर मन में डर रहता है कि वह व्यक्ति कहीं कुछ गलत कर दे, या कोई नकारात्मक बात निकल आए, और फिर लोग उस पर भी टूट पड़ेंगे, बहुतों के मन टूटेंगे, मन खराब होंगे। जो लोग बहुत अच्छा कर रहे हैं, अच्छा लिख रहे हैं, उनसे वे एक आशा रखते हैं; और फिर उनके बारे में कोई ऐसी बात पता चलती है, लोग ऐसे प्रमाण रख देते हैं। तब लगता है कि इस व्यक्ति ने कितनी मेहनत की और उनके कितने अनुयायी होंगे — और अब उनके अनुयायी सच जानकर भी उन पर भरोसा नहीं करेंगे। कुछ अंधभक्ति की तरह पीछे चलेंगे, कुछ विरोध करेंगे, और कुछ जो अब तक उनके बताए नियम से चल रहे थे, वह छोड़ देंगे।
वक्ता कहते हैं कि उनकी कार्यशैली, कुछ हद तक — हमें लगता है कि जब कोई बहुत अच्छा कर रहा हो, हम अपने मन की बात बता रहे हैं। हम मनुष्य हैं; यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि कोई बहुत अच्छा कर रहा है। पर पता है मेरे मन में क्या रहता है? कि यह व्यक्ति कहीं कोई गलती न कर दे, या कोई नकारात्मक बात न हो जाए — और फिर लोग उस पर भी टूट पड़ेंगे, बहुत लोगों के मन टूटेंगे, मन खराब होंगे। और हम भी कहीं न कहीं ऐसे लोगों से आशा रखते हैं जो बहुत अच्छा कर रहे हैं, जो अच्छा लिख रहे हैं। और फिर उनके बारे में कोई न कोई ऐसी बात पता चलती है; लोग ऐसे प्रमाण रख देते हैं। तब लगता है: यार, उन्होंने कितनी मेहनत की, और उनके कितने अनुयायी रहे होंगे। अब उनके अनुयायी सच जानकर भी उन पर भरोसा नहीं करेंगे। कुछ लोग अंधभक्ति की तरह उनके पीछे चलेंगे, कुछ लोग विरोध करेंगे, और कुछ लोग जो अब तक उनके बताए नियम के अनुसार चल रहे थे, उसे छोड़ देंगे। यही होता है।
शिक्षकों के बारे में सिद्धांतवादी क्यों होना चाहिए, व्यक्तिवादी क्यों नहीं?
व्यक्ति में दोष निकले तो भी सिद्धांत से समझौता न करें
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए हम बार-बार कहते हैं: सिद्धांतवादी बनिए, व्यक्तिवादी नहीं — ताकि जब उस व्यक्ति के बारे में कुछ अच्छा-बुरा पता चले, तब भी आप सिद्धांत से समझौता न करें, और अब तक जो करते आए हैं उसे न छोड़ें। वे उदाहरण देते हैं: लगभग पूरे भारत की जनता एक समय प्रेमानंद जी महाराज को बहुत अच्छे से फ़ॉलो कर रही थी, और उन्हें भी बहुत अच्छा लगता था — उस दिन तक जब तक उन्होंने भगवती और भगवान शिव के बारे में टेढ़ी बातें नहीं कहीं। जिस दिन उन्होंने वह विषय बोला, बाद में चाहे जितनी बार उसकी लीपापोती की गई, कि नहीं, ऐसा था, यह सब कहकर — बाद में आप जो भी कहिए, जिस अहंकार में उस समय वह विषय बोला गया, उसी क्षण से समर्पण का पर्दा हट गया, कि हाँ, वे नैष्ठिक हैं, ऐसे हैं; और वह फिर नहीं चढ़ा। बाकी लोगों के लिए चढ़ जाए, पर इस क्षेत्र के विद्वान जिन्होंने उन्हें एक सम्मान दिया था, वे उसे वापस नहीं ला पाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए हम बार-बार कहते हैं: सिद्धांतवादी बनिए, व्यक्तिवादी नहीं — ताकि जब उस व्यक्ति के बारे में आपको कुछ ऊँचा-नीचा पता चले, तब भी आप सिद्धांत से समझौता न करें, कि अब तक जो किया है उसे हम नहीं छोड़ेंगे। हम एक सामान्य उदाहरण दे रहे हैं। लगभग पूरे भारत की जनता एक समय प्रेमानंद जी महाराज को बहुत अच्छे से फ़ॉलो कर रही थी। हमें भी बहुत अच्छा लगता था — उस दिन तक जब तक उन्होंने भगवती के बारे में और भगवान शिव के बारे में टेढ़ी और गलत बातें नहीं कहीं। जिस दिन उन्होंने वह विषय बोला, बाद में चाहे लाख बार उसकी थूक-पॉलिश की गई — कि नहीं, वह ऐसा था, कि उन्होंने यह सब कहा — बाद में आप जितना भी कहिए, उस समय जिस अहंकार में उन्होंने वह विषय बोला, उसी समय से वह पर्दा हट गया, समर्पण वाला: कि हाँ, वे नैष्ठिक हैं, ऐसे हैं, ऐसे हैं। फिर वह दोबारा नहीं चढ़ा। बाकी लोगों के लिए चढ़ जाए, पर जो विद्वान हैं, जो इस क्षेत्र के हैं और जिन्होंने उन्हें एक सम्मान दिया था, वे उसे वापस नहीं ला पाएँगे। और यह बहुत लोगों के साथ होता है। कुछ लोग बोलते हैं; कुछ जो चुपचाप अनुयायी हैं, जो चुपचाप सुनते हैं, वे फिर नहीं सुनेंगे। बाकी विषय ठीक-ठाक ले लेंगे — हाँ, ठीक है — पर जो श्रद्धा पहले थी, वह नहीं रहेगी। हर बात नहीं मानेंगे। फिर देखेंगे, फिर तौलने लगेंगे। यहाँ यही होता है; और इसे भैया, कभी क्षीण मत होने दीजिए।
दुःख के कारण अपनाया गया त्याग सुख लौटने पर क्या होता है?
कष्ट में विरक्त, सुख में फिर आसक्त
जहाँ तक जीवन में यह विषय आता है कि शरीर और जीवन में कष्ट आ गया, इसलिए अब हम विरक्त हो रहे हैं — वक्ता कहते हैं कि जब सुख आएगा, तो आप विरक्त होकर फिर आसक्त हो जाएँगे। यह विषय भी समझिए।
जितना विषय जीवन में आता है — कि अब शरीर में, जीवन में कष्ट आ गया, इसलिए हम विरक्त हो रहे हैं — वक्ता कहते हैं: जब सुख आएगा, तब विरक्त होकर आप फिर आसक्त हो जाएँगे, है न? यह विषय भी समझिए।
जब वैवाहिक जीवन में कष्ट आए तो पहला कदम क्या है?
पहले जन्म कुंडलियाँ मिलवाइए
वक्ता कहते हैं कि उनकी दृष्टि में, ऐसी परिस्थिति में जब वैवाहिक जीवन में कष्ट आ रहा हो — भले वे विषय से हटकर बहुत बातें कह गए, यह विषय भी देखना ज़रूरी है — सबको समझना चाहिए कि जब जीवन में वैवाहिक जीवन से जुड़ा कष्ट और कठिनाई आए, तो सबसे पहले, भैया, अगर जन्म कुंडलियाँ नहीं मिलवाईं, तो पहले वह ज़रूर करवाइए।
वक्ता कहते हैं कि मेरी दृष्टि में, ऐसी परिस्थिति में जब आपको वैवाहिक जीवन में कष्ट आ रहा हो — भले हम विषय से हटकर कई विषय बोल गए, यह विषय भी देखना ज़रूरी है। सब लोग यह विषय समझें: जब जीवन में वैवाहिक जीवन से जुड़ा कष्ट और कठिनाई आए, तो सबसे पहले, भैया, अगर आपने जन्म कुंडली नहीं मिलवाई होगी, तो सबसे पहले उसे ज़रूर मिलवाइए।
अगर विवाह के समय दिया गया पत्नी का जन्म विवरण असली न हो तो क्या करें?
असली जन्म विवरण प्राप्त करें, या हाथ पढ़वाएँ
वक्ता कहते हैं कि उनसे सीधे पूछना चाहिए: क्या यह आपका असली जन्म विवरण था, या आपने मार्कशीट वाला अलग दे दिया था? कृपया सही बताइए, जब भी आप जन्मीं — चाहे आप मुझसे दो साल बड़ी हों, अब विवाह हो गया है और हम अब छोड़ नहीं सकते। तो पहले असली प्राप्त कीजिए। अगर असली न मिल सके, तो हाथ की रेखाओं और माथे की रेखाओं से, कोई विद्वान हो, तो उनसे जितनी जानकारी निकल सके, निकलवाइए। नहीं तो, सही जन्म विवरण मिल जाए तो दोनों की जन्म कुंडली के अनुसार ठीक से मिलान करवाइए और देखिए कि कौन-से दोष हैं।
वक्ता कहते हैं कि और यह पूछते हुए — हे देवी जी, क्या यह आपका असली जन्म विवरण था, या आपने मार्कशीट वाला अलग दे दिया था। कृपया सही बताइए, जिसमें भी आप जन्मीं, जब भी। चाहे आप मुझसे दो साल बड़ी हों — अब विवाह हो गया है, अब हम छोड़ नहीं सकते। कृपया वह बताइए। तो पहले असली प्राप्त कीजिए। और अगर असली न मिल सके, तो हाथ की रेखाओं और माथे की रेखाओं आदि से, कोई विद्वान व्यक्ति हो, तो उनसे जितनी जानकारी निकल सके, उतनी निकलवाइए। नहीं तो, सही जन्म विवरण मिल जाए, तो दोनों का जन्म कुंडली के अनुसार ठीक से मिलान करवाइए और देखिए कि कौन-से दोष हैं। कुछ न कुछ उन्नीस-बीस तो ज़रूर होगा।
वैवाहिक कष्ट के लिए कुंडली में कौन-से बिंदु जाँचने चाहिए?
सप्तमेश, शुक्र, ससुराल, और दोनों के बीच का ऋण
वक्ता कहते हैं कि जो भी उन्नीस-बीस हो, पूरी जाँच सप्तमेश से करवाइए। सप्तमेश की स्थिति ज़रूर देखिए। पुरुष को शुक्र की स्थिति भी देखनी चाहिए। ससुराल की स्थिति भी देखिए। और दो-तीन चीज़ें — ऋण परिहार, ऋण भी ज़रूर देखिए, पत्नी के साथ कौन-सा ऋण बन रहा है जिसके कारण वह झगड़ा और कलह कर रही है। सारे विषय देखकर ठीक से परिहार की व्यवस्था कीजिए। परिहार कीजिए; उनके व्यवहार में बदलाव आएगा या नहीं, यह भगवती पर छोड़ दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि जो भी उन्नीस-बीस हो, उसकी पूरी जाँच सप्तमेश से करवाइए। सप्तमेश की स्थिति ज़रूर देखिए। सप्तमेश की स्थिति देखिए। पुरुष को अब शुक्र की स्थिति भी देखनी चाहिए। ससुराल की स्थिति भी देखिए। दो-तीन चीज़ें — ऋण परिहार; ऋण भी ज़रूर देखिए, पत्नी के साथ कौन-सा ऋणानुबंध बन रहा है जिसके कारण वह झगड़ा और कलह कर रही है। सारे विषय देखकर फिर ठीक से परिहार की व्यवस्था कीजिए। परिहार कीजिए; उनके व्यवहार में बदलाव आएगा या नहीं, यह भगवती पर छोड़ दीजिए।
क्या सफल वशीकरण प्रयोग से भाग्य बदल जाता है?
प्रयोग नियति को टालता है, बदलता नहीं
वक्ता कहते हैं कि प्रयोग करने से बचना चाहिए — हालाँकि जो केवल अपने वैवाहिक जीवन और भौतिकता से जुड़े हैं, उन्हें वे प्रयोग से मना भी नहीं करेंगे। पर एक बात हमेशा ध्यान रखिए: वशीकरण आदि का प्रयोग किया या करवाया जाए और वह सफल हो जाए, तो उससे आपकी नियति नहीं बदलती। वह टल ज़रूर जाती है। अब वह आपके सम्मोहन में बँधी रहेगी और सब ठीक हो जाएगा; पर जिस दिन वह टूटेगा, उस दिन आपको कठिनाई होगी, और बहुत ज़्यादा कठिनाई।
वक्ता कहते हैं कि प्रयोग करने से बचिए। हालाँकि जिनका लगाव केवल अपने वैवाहिक जीवन और भौतिकता से है, उन्हें हम प्रयोग से मना भी नहीं करेंगे। पर प्रयोग में एक बात हमेशा ध्यान रखिए: वशीकरण आदि का प्रयोग किया जाता है, करवाया जाता है, और वह सफल हो जाता है — उससे आपकी नियति नहीं बदलती। वह टल ज़रूर जाती है। अब वह आपके सम्मोहन में बँधी रहेगी। सब ठीक हो जाएगा। पर जिस दिन वह टूटेगा, उस दिन आपको कठिनाई होगी, और बहुत कठिनाई।
क्या ऋण प्रयोग के बजाय जप, श्रम और सेवा से काटा जा सकता है?
जप, श्रम और सेवा से काटिए, और ऋण से मुक्त होइए
वक्ता कहते हैं कि अच्छी बात यह है कि यह चीज़ जप आदि से, श्रम आदि से, सेवा से कटे; और जो भी ऋण है, उससे भी मुक्त हुआ जाए। और यह प्रयास हो कि ग्रहों और नक्षत्रों का जो उन्नीस-बीस रह गया है, वह जहाँ तक हो सके ठीक हो — इसके लिए अपनी ओर से जो संभव हो, वह करते हुए। कोई बहुत बड़ी चीज़ नहीं; सामान्य ढंग से करें तो भी उसका कोई न कोई उपाय हो जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि तो अच्छी बात यह है कि यह चीज़ जप आदि से, श्रम आदि से, सेवा से कटे, और जो भी ऋण है उससे भी उऋण हुआ जाए। और प्रयास यह हो कि ग्रहों और नक्षत्रों का जो भी विषय उन्नीस-बीस रह गया है, वह जहाँ तक हो सके ठीक हो — इसके लिए अपनी ओर से जो भी संभव हो, वह करते हुए। कोई बहुत बड़ी-बड़ी चीज़ नहीं; अगर हम सामान्य ढंग से करें, तो उसका कोई न कोई निवारण हो जाएगा।
पिता या माता से मिलने वाला कष्ट, परिवर्तन के लिए तप करके हटाने से बेहतर है ऋण के रूप में चुकाया जाए
वे परिवर्तन से ज़्यादा ऋण में विश्वास करते हैं
वक्ता कहते हैं कि उनकी अपनी राय थोड़ी अलग है: वे ऋण में ज़्यादा और परिवर्तन में कम विश्वास करते हैं। अगर पिता हमें कष्ट दे रहे हैं, तो वे उस कष्ट को हटाने के लिए तप करके उसे कभी नहीं हटाना चाहेंगे — वे चाहेंगे कि वह ऋण चुक जाए। माता कष्ट दे रही हों, तो वे उऋण होना चाहेंगे। भाई कष्ट दे, तो उऋण होना चाहेंगे — क्योंकि आज किसी तरह के प्रयोग से उसे अपने अनुकूल कर लें, तो कल वह कई गुना होकर लौटेगा। पर अगर उनके लिए जप करके, उनके लिए तीर्थ करके, उनके लिए दान करके हम उन्हें शांत कर रहे हैं, और वे सचमुच हमारे अनुकूल हो जाते हैं, और वास्तव में हमारी परिस्थितियाँ अनुकूल हो जाती हैं और वे हमारे सहायक बन जाते हैं, तो वह सबसे सही बात है।
वक्ता कहते हैं कि इसके लिए हम एक अलग वीडियो भी ज़रूर बनाएँगे; हालाँकि इस विषय पर हम ऋण आदि में ज़्यादा विश्वास रखते हैं, और परिवर्तन में कम विश्वास रखते हैं। इसमें मेरी राय थोड़ी अलग है। मेरी दृष्टि में, अगर पिता हमें कष्ट दे रहे हैं, तो हम उस कष्ट को हटाने के लिए तप करके उसे कभी नहीं हटाना चाहेंगे। हम चाहेंगे कि जो ऋण है, वह चुक जाए। अगर हमें अपनी माता से कष्ट मिल रहा है, तो हम उऋण होना चाहेंगे। हम उसे शांत नहीं करना चाहेंगे। अगर हमें किसी भाई से कोई कष्ट मिल रहा है, तो भैया हम उऋण होना चाहेंगे। उऋण हो जाए — क्योंकि अगर आज किसी तरह के प्रयोग से हम उन्हें अपने अनुकूल कर लें, तो कल वह कई गुना बढ़कर लौटेगा। पर अगर उनके लिए जप करके, उनके लिए तीर्थ करके, उनके लिए दान करके हम उन्हें शांत कर रहे हैं, और वास्तव में वे हमारे अनुकूल हो जाते हैं — सचमुच हमारी परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल हो जाती हैं, वे हमारे सहायक बन गए — तो वह सबसे सही बात है।
क्या परिवार में मृत्यु के एक वर्ष के भीतर नया व्रत लिया जा सकता है?
वर्ष भर कोई नया व्रत नहीं; पुराने चलते रहते हैं
एक श्रोता के पति के दादा की मृत्यु को एक साल नहीं हुआ है; उन्होंने हर महीने शुक्ल पक्ष में माँ लक्ष्मी के ग्यारह व्रतों का संकल्प पहले ही ले लिया है और तीन पूरे कर चुकी हैं। वक्ता कहते हैं कि जब संदेह था, उसी समय कम से कम पास के किसी विद्वान या पंडित जी से पूछ लेना चाहिए था — पास के मंदिर में कोई पुरोहित होंगे, वे बता देते; यह बहुत सामान्य बात है कि वर्ष के भीतर कोई नया व्रत नहीं करना। जो पुराना व्रत आप करती आ रही हैं — प्रदोष, अष्टमी, एकादशी — वह नहीं रुकेगा, वह चलेगा। बस नया कोई न करे। और वे कहते हैं कि अब हम यह कहकर उसे रुकवाएँगे भी नहीं: इसके लिए अपने पुरोहित जी से पूछिए।
एक श्रोता लिखती हैं कि उनके पति के दादा की मृत्यु को एक साल नहीं हुआ, उन्होंने हर महीने शुक्ल पक्ष में माँ लक्ष्मी के ग्यारह व्रत करने का संकल्प लिया है, तीन हो चुके हैं, और उन्हें नहीं पता कि करें या अब क्या करें। वक्ता कहते हैं कि अगर आपको नहीं पता, तो अब अपना आनंद लीजिए — पूछने का क्या लाभ। संदेह की स्थिति में आपने व्रत किया; संदेह की स्थिति में ये सब किया, और इतना होने के बाद अब पूछ रही हैं। जब संदेह था, जब यह विषय उठा, उसी समय आपको कम से कम अपने पास के किसी विद्वान, किसी पंडित जी से पूछ लेना चाहिए था। पास के मंदिर में कोई न कोई पुरोहित जी होंगे; वे आपको बता देते। भैया, यह बहुत सामान्य बात है कि वर्ष के भीतर कोई नया व्रत नहीं करना। जो पुराना व्रत आप करती आ रही हैं — प्रदोष, अष्टमी, एकादशी — वह नहीं रुकेगा, वह चलता रहेगा। बस नया कोई न करे। और अब हम यह कहकर उसे छुड़वाएँगे भी नहीं। इसके लिए अपने पुरोहित जी से पूछिए।
विंध्याचल में गुरु दत्तात्रेय की चरण पादुका कहाँ है?
महासरस्वती के बगल वाले द्वार के पीछे, दो परम तंत्र स्थानों के बीच
एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें भगवती सरस्वती के बगल में गुरु दत्तात्रेय की चरण पादुका नहीं दिखी, जबकि वक्ता ने कहा था कि वहीं है। वक्ता कहते हैं कि उन्होंने सरस्वती जी के पीछे कहा था: आज जहाँ महासरस्वती का स्थान है, उनके ठीक बगल में एक द्वार है; उस द्वार से पीछे जाइए। वहाँ दो परम तंत्र स्थान हैं, और उन दो परम तंत्र स्थानों के बीच देवी-देवताओं के श्री विग्रह स्थापित हैं — उन्हीं में भगवान दत्त की पादुका भी है।
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्हें भगवती सरस्वती जी के बगल में गुरु दत्तात्रेय जी की चरण पादुका नहीं दिखी, जबकि वक्ता ने कहा था कि वह वहीं है। वक्ता कहते हैं कि भगवती सरस्वती जी के बगल में — अगर हमने किसी लाइव में ऐसा कहा है, तो क्लिप काटकर भेजिए; हम भी देखें कि हमने क्या गलती बोली। हमने सरस्वती जी के पीछे कहा है। आज जहाँ महासरस्वती का स्थान है, उनके ठीक बगल में एक द्वार है। उस द्वार से पीछे जाइए। ठीक है — वहाँ दो परम तंत्र स्थान हैं, और उन दो परम तंत्र स्थानों के बीच देवी-देवताओं के श्री विग्रह स्थापित हैं। उन्हीं में भगवान दत्तात्रेय की पादुका भी है।
शक्तिपीठ पर शाकंभरी कवच का एक दिन का अनुष्ठान कैसे किया जाता है?
पहुँचिए, स्थान खोजिए, और भोर में 108 पाठ कीजिए
वक्ता कहते हैं कि जब शाकंभरी कवच का अभ्यास हो जाए, तब शक्तिपीठ जाएँ — मान लीजिए आज पहुँचे हैं — तो आज आराम से स्थान खोजिए, देखिए, पूरी जगह घूमिए और देखिए कि कहाँ बैठकर जप करेंगे। फिर अगले दिन सुबह-सुबह भोर में दर्शन करना है; यह भोर में ही होना चाहिए, और सूर्योदय से पहले हो तो सर्वोत्तम। उसके बाद आराम से अपने आसन पर बैठिए और शाकंभरी कवच के कम से कम 108 पाठ कीजिए।
बत्तीस नामों वाले शक्तिपीठ पर शाकंभरी कवच का एक दिन का अनुष्ठान कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता इस प्रकार बताते हैं। जब आपको शाकंभरी कवच का अभ्यास हो जाए, तो अभ्यास होने के बाद, जब आप किसी शक्ति पीठ पर जाएँ — मान लीजिए आज आप पहुँचे हैं — तो आज आराम से स्थान खोजिए, उसे देखिए, पूरी जगह घूमिए और देखिए कि कहाँ बैठकर जप आदि करेंगे। अब अगले दिन सुबह-सुबह, भोर में, दर्शन आदि करने हैं; यह भोर में ही होना चाहिए। सूर्योदय से पहले हो सके तो सर्वोत्तम। उसके बाद आराम से अपने आसन पर बैठिए और शाकंभरी कवच के कम से कम 108 पाठ कीजिए।
जप के बाद हवन आता है, या हवन न हो सके तो दीपक या नारियल खप्पर विधि, और फिर कन्या पूजन
हवन या दीपक, और फिर कन्या पूजन
उसके बाद हवन की व्यवस्था कीजिए; संभव हो और आपने स्वयं सीखा हो, तो स्वयं कीजिए; वे स्वयं न करने दें तो किसी की सहायता से कीजिए; और सहायता से भी न करने दें, तो दीपक आदि जलाइए, या जो नारियल खप्पर विधि बताई गई है, वह कीजिए। कहीं न कहीं प्रज्वलन का विधान होगा — यानी जप और हवन। और उसके बाद कन्या पूजन: शक्तिपीठ है तो वहाँ एक कन्या का पूजन भी सर्वोत्तम है, और ठीक से कन्या पूजन न हो सके, तो कम से कम वहाँ किसी कन्या को प्रसन्नता से मिठाई आदि दक्षिणा के साथ दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद हवन आदि की व्यवस्था कीजिए। संभव हो और आपने स्वयं सीखा हो, तो अपने हाथ से कीजिए। अगर वे आपको स्वयं न करने दें, तो किसी की सहायता से कीजिए। और अगर किसी की सहायता से भी न करने दें, तो दीपक आदि जलाइए; जो नारियल खप्पर विधि बताई गई है, वह कीजिए। उससे पूरा हो जाएगा; कहीं न कहीं प्रज्वलन का विधान अवश्य रहेगा। यानी: जप और हवन। और उसके बाद कन्या पूजन। शक्तिपीठ है, तो वहाँ एक कन्या का भी पूजन हो जाए, तो सर्वोत्तम है। अगर विधिवत कन्या पूजन न हो सके, तो कम से कम, जहाँ तक हो सके, वहाँ किसी कन्या को प्रसन्नता से दक्षिणा आदि के साथ मिठाई आदि अवश्य दीजिए।
क्या बत्तीस नामों की साधना में सिद्ध किया धागा पहनने के बाद कोई नियम है?
कोई विशेष नियम नहीं — हमेशा पहना जा सकता है
पूछा गया कि बत्तीस नामों की साधना में जो धागा सिद्ध करना था, उसे पहनने के बाद कोई नियम है क्या। वक्ता कहते हैं कि नहीं — आप उसे हमेशा पहन सकते हैं, और उसमें आप जैसा चाह रहे हैं वैसा कोई विशेष नियम नहीं है।
एक श्रोता पूछते हैं कि बत्तीस नामों की साधना में जो धागा सिद्ध करने को बताया गया था, उसे पहनने के बाद कोई नियम होगा क्या। वक्ता कहते हैं कि नहीं, आप उसे हमेशा पहन सकते हैं। और उसमें आप जैसा चाह रहे हैं, वैसा कोई विशेष नियम नहीं है।
दत्त पादुका का दैनिक नियम क्या है?
गुरु स्थान पर पीला वस्त्र, अभिषेक, चंदन और कुमकुम
वक्ता कहते हैं कि दत्त पादुका हमेशा गुरु स्थान पर रहेगी — यानी पूजन स्थान पर, जहाँ आप अच्छी व्यवस्था करें, पीला वस्त्र बिछाएँ और उस पर गुरु पादुका, दत्त पादुका को स्थान दें। आप उनका रोज़ अभिषेक कर सकते हैं; अभिषेक के बाद सुगंधित चंदन, कुमकुम आदि से उन्हें सजाइए, उन पर स्वस्तिक आदि बनाइए, फूल चढ़ाइए और धूप दिखाइए। पादुका पूजन में सामान्यतः इत्र भी लगा सकते हैं। इस प्रकार पादुका पूजन होगा।
वक्ता कहते हैं कि दत्त पादुका हमेशा गुरु स्थान पर रहेगी — यानी पूजन स्थान पर, जहाँ आपको पीला वस्त्र बिछाकर अच्छी व्यवस्था करनी चाहिए, और उस पर गुरु पादुका, दत्त पादुका को स्थान देना चाहिए। आप उनका रोज़ अभिषेक कर सकते हैं। अभिषेक करके सुगंधित चंदन, कुमकुम आदि से उन्हें सजाइए, उन पर स्वस्तिक आदि बनाइए; फूल आदि चढ़ाइए; धूप दिखाइए। पादुका पूजन में यहाँ सामान्यतः इत्र आदि लगा सकते हैं। इस प्रकार यह पादुका पूजन होगा।
भैरवी कवच कहाँ लगाना चाहिए, और पादुका के लिए कौन-सा श्लोक पढ़ें?
मुख्य द्वार के ऊपर कवच, और गुरु ब्रह्मा स्तुति
भैरवी कवच आप मुख्य द्वार पर, ऊपर की ओर लगा सकते हैं — फ़्लैट हो या घर, द्वार के ऊपर लगाइए। और श्लोक पाठ के लिए, भगवान दत्त की पूजा और पादुका पूजन के लिए "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः" आदि वाली स्तुति सर्वश्रेष्ठ है।
वक्ता कहते हैं कि और भैरवी कवच आप मुख्य द्वार पर, ऊपर की ओर लगा सकते हैं — फ़्लैट हो या घर, द्वार के ऊपर लगाइए। श्लोक पाठ के लिए, भगवान दत्त की पूजा के लिए और पादुका पूजन के लिए "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः" आदि वाली स्तुति सबसे श्रेष्ठ है।
मासिक धर्म के दौरान साधिका क्या कर सकती है?
पाँचवें दिन तक पूजन नहीं, केवल मानसिक प्रणाम
वक्ता कहते हैं कि जब स्त्री साधिका मासिक धर्म में हो, उस समय वह यह कोई पूजन नहीं करेगी। परिवार का कोई और सदस्य करेगा। कोई और न करे, तो जब तक वह पाँचवें दिन बाल धोकर पूरी तरह शुद्ध न हो जाए, वह स्पर्श नहीं करेगी — मन से प्रणाम ज़रूर कर सकती है, कोई दोष नहीं लगेगा। अगर वह चौथे दिन बाल धो ले, तो चौथे दिन बाल धोकर शुद्ध होने पर भी उस दिन पूजन का अधिकार नहीं मिलता: उस दिन वह केवल अपने पति के लिए शुद्ध होती है, उनके लिए सेवा कर सकती है या उन्हें छू सकती है, पर देव पूजन की अधिकारी पाँचवें दिन ही होती है। जो यह विषय नहीं मानना चाहते, जिनके लिए यह अंधविश्वास है और जो कुछ आजकल चल रहा है, वे अपना आनंद लें — विषय उनके लिए था ही नहीं। वे कहते हैं कि किसी को रोकना मेरा काम नहीं; हमने असली विषय बोल दिया, नहीं मानना तो मत मानिए।
वक्ता कहते हैं कि जब कोई स्त्री साधिका मासिक धर्म में हो, उस समय वह यह कोई पूजन नहीं करेगी। परिवार का कोई और सदस्य करेगा। कोई और व्यक्ति न करे, तो जब तक वह पाँचवें दिन बाल धोकर पूरी तरह शुद्ध न हो जाए, तब तक स्पर्श नहीं करेगी। मन से प्रणाम आदि ज़रूर कर सकती है; कोई दोष नहीं लगेगा। अगर वह चौथे दिन बाल धो ले, तो चौथे दिन बाल धोकर शुद्ध होने पर भी उस दिन पूजन का अधिकार नहीं मिलता। उस दिन वह केवल अपने पति के लिए शुद्ध होती है; उनके लिए सेवा कर सकती है, या छू सकती है। पर देव पूजन की अधिकारी वह पाँचवें दिन ही होती है। जो यह विषय नहीं मानना चाहते, या जिनके लिए यह अंधविश्वास है और जो कुछ आजकल चल रहा है, वे अपना आनंद ले सकते हैं; विषय उनके लिए था ही नहीं। किसी को टोकना या रोकना मेरा काम नहीं। हमने असली विषय बोल दिया। नहीं मानना चाहते, तो मत मानिए।
क्या हवन में आहुति देते समय नमः लगाना चाहिए?
स्वाहा से पहले नमः रहे या हटे
वक्ता कहते हैं कि यह मंत्र पर निर्भर है। अगर पूरे मंत्र के भीतर नमः है, तो कई जगह मिलता है कि नमः के साथ ही जाता है — जैसे महागणपति मंत्र में नमः है और स्वाहा है, नमः से पहले नमः, तो वह साथ रहेगा। और कई जगह ऐसा है कि नमः बाद में आता है, तब उसे हटाकर सीधे स्वाहा कहना है। तो जयंती मंगला काली में नमोस्तुते के बाद नमः लगाने की ज़रूरत नहीं — सीधे स्वाहा; इसमें नमः तो लगाना ही नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि यह मंत्र पर निर्भर है। अगर पूरे मंत्र के भीतर नमः है, तो कई जगह यह मिलता है — कि वह नमः के साथ है। जैसे महागणपति मंत्र में नमः है, स्वाहा है, नमः से पहले नमः। तो वह साथ रहेगा। और कई जगह ऐसा है कि नमः बाद में आता है; तब उसे हटाकर सीधे स्वाहा कहना है। तो जयंती मंगला काली में, इसमें नमोस्तुते के बाद नमः लगाने की ज़रूरत नहीं — सीधे स्वाहा। इसमें नमः तो लगाना ही नहीं है।
विंध्याचल में तीन दिन की त्रिकोण परिक्रमा करने वाले यात्री को किसकी तैयारी करनी चाहिए?
ठंड, नंगे पैर, और गंगा जी में स्नान
वक्ता कहते हैं कि पहला मार्गदर्शन यह है कि ठंड बहुत है — व्यवस्था करके आइए, क्योंकि पहाड़ पर जाने पर ठंड दुगनी-तिगुनी लगेगी। नंगे पैर की बात: वे ठंड में भी नंगे पैर परिक्रमा के पक्ष में हैं, क्योंकि वे स्वयं करते हैं; पर अभी यह नहीं कहेंगे — अपने शरीर की स्थिति के अनुसार पादुका पहनकर कीजिए। अगर साधना के स्तर पर आप अपने आराध्य पर निर्भर हैं और उन पर बहुत गहरी आस्था है, तो नंगे पैर कीजिए। गंगा जी में स्नान के बारे में भी: करेंगे तो अच्छा होगा, क्योंकि वे कर रहे हैं; पर ठंड ज़्यादा लगे, तो केवल जल छिड़क लीजिए।
विंध्यवासिनी धाम में तीन दिन की त्रिकोण परिक्रमा के लिए आ रहे एक श्रोता से वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल भैया, आइए। सबसे पहला मार्गदर्शन यह होगा: ठंड बहुत है। व्यवस्था करके आइए, क्योंकि पहाड़ पर ऊपर जाने पर ठंड दुगनी-तिगुनी लगेगी। आप कहाँ के निवासी हैं? वहाँ की ठंड और यहाँ की ठंड में अंतर है। इस तरह हम इसके पक्ष में हैं कि ठंड में भी, भैया, त्रिकोण परिक्रमा नंगे पैर कीजिए — क्योंकि हम करते हैं, तो आप क्यों नहीं करेंगे? पर अभी हम यह नहीं कहेंगे। अपने शरीर की स्थिति के अनुसार पादुका पहनकर कीजिए। अगर साधना के स्तर पर आप अपने आराध्य पर निर्भर हैं और उन पर बहुत गहरी आस्था है, तो नंगे पैर कीजिए। गंगा जी में स्नान के लिए भी — अब कैसे कहें: करेंगे तो अच्छा होगा, क्योंकि हम कर रहे हैं, तो कहेंगे कि आप भी कीजिए। पर ठंड ज़्यादा लगे, तो बस जल छिड़क लीजिए।
विंध्याचल में त्रिकोण यात्रा कैसे शुरू होती है?
गंगा स्नान, संकल्प, और मंदिर परिसर में लघु त्रिकोण
वक्ता कहते हैं कि गंगा जी में स्नान के बाद आप त्रिकोण की यात्रा शुरू करेंगे। सबसे पहले गंगा जी से स्नान करके, वहाँ सब पूरा करके, आप संकल्प लेंगे। संकल्प लेने के बाद भगवती विंध्यवासिनी के दर्शन करेंगे और वहाँ पूजन करेंगे। और विंध्यवासिनी माई के साथ, वहाँ के मुख्य मंदिर में विराजमान भगवती काली और भगवती महासरस्वती के दर्शन करेंगे; मंदिर परिसर में सबके दर्शन करेंगे। वहाँ एक लघु त्रिकोण पूरा हो गया।
वक्ता कहते हैं कि गंगा जी के स्थान के बाद आप त्रिकोण की यात्रा शुरू करेंगे। सबसे पहले गंगा जी से स्नान करके और वहाँ सब पूरा करके आप संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेंगे। संकल्प लेने के बाद आप भगवती विंध्यवासिनी के दर्शन करेंगे। वहाँ पूजन करेंगे। और विंध्यवासिनी माई के साथ, मुख्य मंदिर में, वहाँ विराजमान भगवती काली और भगवती महासरस्वती के दर्शन करेंगे। मंदिर परिसर में सबके दर्शन करेंगे। वहाँ एक लघु त्रिकोण पूरा हो गया।
विंध्यवासिनी मंदिर से निकलने के बाद त्रिकोण का मार्ग क्या है?
विंध्येश्वर महादेव, कोतवाली, बरतर हनुमान और प्रत्यंगिरा चौराहा
वहाँ से निकलकर विंध्येश्वर महादेव के दर्शन-पूजन; उसके बाद सीधे कोतवाली जाकर दर्शन कीजिए — बटुक भैरव जी, भगवती भैरवी, फिर बरतर हनुमान जी — और फिर वहाँ से निकलिए। लाल भैरव भी जा सकते हैं, पर लंबा हो जाएगा; इसलिए लाल भैरव की जगह बरतर हनुमान जी के बगल से सीधा रास्ता पकड़िए और प्रत्यंगिरा चौराहा आ जाइए। वहाँ भगवती प्रत्यंगिरा के दर्शन कीजिए। रास्ते में निहुत वीर हनुमान जी हैं; लौटते समय उनके दर्शन कीजिए। जाते समय जहाँ-जहाँ आपके बाईं ओर देवताओं का स्थान पड़े, वहाँ कपूर जलाते चलिए।
वक्ता कहते हैं कि वहाँ से निकलकर विंध्येश्वर महादेव के दर्शन-पूजन। उसके बाद आप सीधे कोतवाली जाएँगे; वहाँ दर्शन करेंगे — बटुक भैरव जी, भगवती भैरवी, फिर बरतर हनुमान जी — और फिर वहाँ से निकलेंगे। ऐसे आप लाल भैरव भी जा सकते हैं, पर लंबा हो जाएगा। तो लाल भैरव की जगह बरतर हनुमान जी के बगल से सीधा रास्ता पकड़िए और प्रत्यंगिरा चौराहा आ जाइए। वहाँ भगवती महाप्रत्यंगिरा के दर्शन। रास्ते में निहुत वीर हनुमान जी हैं; लौटते समय उनके दर्शन कीजिए। जाते समय जहाँ-जहाँ आपके बाईं ओर देवताओं का स्थान पड़े, वहाँ कपूर जलाते चलिए।
त्रिकोण परिक्रमा कहाँ समाप्त होती है?
बंधवा वीर, काली खोह, अष्टभुजा, तारापीठ और वापसी
प्रत्यंगिरा चौराहे से सीधे जाकर पास के हनुमान जी, बंधवा वीर तक पहुँचिए। बंधवा वीर हनुमान जी के दर्शन-पूजन करके काली खोह निकल जाइए; काली खोह से अष्टभुजा, अष्टभुजा से तारापीठ, और तारापीठ से वापस विंध्यवासिनी माई के मंदिर। रास्ते में जो भी देवी-देवता मिलें, सबके स्थान पर कपूर जलाते चलिए।
वक्ता कहते हैं कि और प्रत्यंगिरा चौराहे से सीधे चलते हुए पास के हनुमान जी — बंधवा वीर — तक पहुँचिए। बंधवा वीर हनुमान जी के दर्शन-पूजन करके काली खोह निकल जाइए। काली खोह से अष्टभुजा; अष्टभुजा से तारापीठ; तारापीठ से वापस विंध्यवासिनी माई के मंदिर। रास्ते में जो भी देवी-देवता मिलें, सबके स्थान पर कपूर जलाते चलिए।
त्रिनेत्र में कितनी परतें होती हैं, और क्या उसके जागने पर किसी देवी की शक्ति आती है?
यह यूट्यूब का विषय नहीं है
पूछा गया कि त्रिनेत्र में कितनी परतें हैं, त्रिनेत्र जागने के बाद क्या होता है, क्या किसी देवी की शक्ति आती है, और क्या फिर किसी दूत को अलग से प्रत्यक्ष करना पड़ता है। वक्ता इन्हें बहुत अच्छे ढंग से पूछे गए बहुत अच्छे प्रश्न कहते हैं — और कहते हैं: किसी योग्य दिव्य गुरु के मार्गदर्शन में यह विधान जानिए और कीजिए। उनकी दृष्टि में यह यूट्यूब का विषय नहीं है। संकट नाशन पर वे भविष्य में विस्तार से चर्चा करेंगे कि कैसे और क्या होता है; पर जानकारी एक विषय है और व्यावहारिक रूप से यह विषय अलग है, और यह व्यक्ति-व्यक्ति में अलग होता है। वे यह कई बार कह चुके हैं और इसे पूरा बोलने का मन भी नहीं करता, क्योंकि लोगों ने फ़ेसबुक और यूट्यूब पर इन विषयों पर अपनी विशेषज्ञता इतनी ठूँस दी है कि बोलते हुए भी उन्हें लगता है कि उनके अनुयायियों को बुरा लगेगा।
एक श्रोता पूछते हैं कि त्रिनेत्र में कितनी परतें होती हैं, वह क्या है, क्या त्रिनेत्र के जागने के बाद किसी देवी की शक्ति आती है, और क्या इसके लिए फिर किसी दूत आदि को अलग से प्रत्यक्ष करना पड़ता है। वक्ता कहते हैं कि भैया, ये बहुत अच्छे प्रश्न हैं, और बहुत अच्छे ढंग से आप यह विषय जानने का प्रयास कर रहे हैं। किसी योग्य दिव्य गुरु के मार्गदर्शन में यह विधान जानिए और कीजिए। मेरी दृष्टि में यह यूट्यूब का विषय नहीं है। संकट नाशन पर भी हम भविष्य में विस्तार से चर्चा करेंगे कि कैसे और क्या होता है। पर जानकारी अलग विषय है; व्यावहारिक रूप से यह विषय अलग है — यह चीज़ व्यक्ति-व्यक्ति में अलग होती है। कई बार हम इस विषय पर बोल चुके हैं। पूरा बोलने की इच्छा भी नहीं है। लोगों ने फ़ेसबुक और यूट्यूब पर इन विषयों पर अपनी विशेषज्ञता इतनी ठूँस दी है कि बोलते हुए भी हमें लगता है कि अगर हम बोलें, तो उनके अनुयायियों को बुरा लगेगा।
संकट नाशन स्तोत्र में "विघ्नराजेन्द्रं" है या "विघ्नराजं"?
दोनों पाठ भगवान को राजा कहते हैं
वक्ता कहते हैं कि आपने यह बहुत सही पूछा है। कहीं-कहीं विघ्नराजेन्द्रं भी लिखा जाता है, और विघ्नराजं है; विघ्नराज अधिकतर जगह मिलता है। विघ्नराजेन्द्रं पढ़ें तो वह राजाओं का इंद्र है, और विघ्नराजं पढ़ें तो राजा — तो दोनों में, दोनों में भगवान के लिए ही है। दोनों में से जो अच्छा लगे, पढ़िए; कोई दिक्कत नहीं। "सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं", "सप्तमं विघ्नराजं": राजेन्द्रं में भी और राजं में भी, दोनों में भगवान राजा हैं।
संकट नाशन स्तोत्र में सातवाँ नाम विघ्नराजेन्द्रं है या विघ्नराजं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि श्रोता ने यह बहुत सही पूछा है। कहीं-कहीं विघ्नराजेन्द्रं भी लिखा जाता है, और विघ्नराजं है। विघ्नराज अधिकतर जगह मिलता है। और अगर आप विघ्नराजेन्द्रं पढ़ें, तो वह राजाओं का इंद्र है; और राजं पढ़ें, तो राजा। तो दोनों में, दोनों में भगवान के लिए ही है। दोनों में से जो अच्छा लगे, पढ़ सकते हैं; कोई दिक्कत नहीं। "सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं", "सप्तमं विघ्नराजं"। राजेन्द्रं भी, और राजं भी — दोनों में भगवान राजा हैं।
जब बड़े चैनल छिन्नमस्तिका का मंत्र सार्वजनिक रूप से बाँटें तो क्या करें?
कमेंट में बहस मत कीजिए; उन्हें जो करना है करने दीजिए
एक श्रोता कहते हैं कि बड़े चैनलों पर लोग छिन्नमस्तिका माता का मंत्र दे रहे हैं और कह रहे हैं कि इसके लिए माला की ज़रूरत नहीं; उन्होंने कमेंट में लोगों को समझाने की कोशिश की तो गालियाँ मिलीं, इसलिए उन्होंने बोलना बंद कर दिया। वक्ता कहते हैं कि यही तो विषय है — बोलने की ज़रूरत क्या है? कुछ मत कहिए। उन्हें छिन्नमस्तिका, धूमावती, सब करने दीजिए। जो दे रहे हैं और जो बोल रहे हैं, वह उनका विषय है; और जो सुन रहे हैं, वह उनका।
एक श्रोता लिखते हैं कि बड़े चैनलों पर लोग छिन्नमस्तिका माता का मंत्र दे रहे हैं और कह रहे हैं कि इसके लिए माला की ज़रूरत नहीं; उन्होंने कमेंट में लोगों को बताने की कोशिश की तो उन्हें गालियाँ दी गईं, इसलिए उन्होंने बोलना बंद कर दिया। वक्ता कहते हैं कि तो यही तो विषय है, है न। बोलने की ज़रूरत क्या है? कुछ मत कहिए। उन्हें छिन्नमस्तिका, धूमावती, सब करने दीजिए। जो दे रहे हैं, जो बोल रहे हैं — वह उनका विषय है। और जो सुन रहे हैं — वह उनका।
त्रिपुर के लोगों को मार्ग से भटकाने गया मुंडी कोई सामान्य व्यक्ति नहीं था, और नारद उसके पहले शिष्य थे
भगवान नारायण ने स्वयं मुंडी का रूप लिया, और नारद उनके पहले शिष्य थे
वक्ता कहते हैं कि इसे ऐसे समझिए — इसीलिए हम कहते हैं स्वाध्याय कीजिए। जब भगवान शिव को त्रिपुर का नाश करना था, तो एक बार पढ़िए कि उन्होंने त्रिपुर नाश की पूरी योजना कैसे बनाई, आपको पता चल जाएगा। जो वहाँ मुंडी के रूप में उन्हें मार्ग से भटकाने गया, वह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं था: मुंडी किसका अवतार है? भगवान श्री नारायण स्वयं वह मुंडी बनकर गए। उन्होंने स्वयं अपने बाल मुँडवाए और वहाँ पहुँचे; और जब पहुँचे और कोई उनकी सुन ही नहीं रहा था, तो उनका पहला शिष्य कौन बना? नारद जी स्वयं जाकर बने। पहली दीक्षा किसकी हुई? नारद जी की, मुंडी में। और त्रिपुर के सारे राक्षस इनसे दीक्षित होते और अपना ही वध करवा लेते — मंत्री उनका नाश करेगा; क्या देवता स्वयं आएँगे?
वक्ता कहते हैं कि इसे इस तरह समझिए। इसीलिए कहते हैं: स्वाध्याय कीजिए। जब भगवान शिव को त्रिपुर नाश करना था, तो एक बार पढ़िए, स्वाध्याय कीजिए कि भगवान शिव ने त्रिपुर नाश की पूरी योजना किस तरह बनाई, आपको पता चल जाएगा। वहाँ जो मुंडी के रूप में उन्हें पथभ्रमित करने गया, वह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं था। मुंडी किसका अवतार है? भगवान श्री नारायण स्वयं वह मुंडी बनकर गए। उन्होंने स्वयं अपने बाल मुँडवाए और वहाँ पहुँचे। और जब पहुँचे और कोई उनकी सुन ही नहीं रहा था, तो उनका पहला शिष्य कौन बना? नारद जी स्वयं जाकर बने। पहली दीक्षा किसकी हुई? नारद जी की, मुंडी में। यही है — इसे यहीं समझिए। और त्रिपुर के सारे राक्षस इन लोगों से दीक्षित होते और अपना ही संहार करवा लेते। मंत्री उनका नाश करेगा; क्या देवता स्वयं आएँगे?
शास्त्र क्या कहता है
Before Tripura could be destroyed, Bhagavān Viṣṇu formed from his own body a shaven-headed mendicant (muṇḍin) — a being he calls his own form — to undermine the Tripura demons' dharma with a false, heterodox teaching.
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असृजच्च महातेजाः पुरुषं स्वात्मसम्भवम्। एकं मायामयं तेषां धर्मविघ्नार्थमच्युतः॥ १
भगवान् अच्युत विष्णुने उन त्रिपुरवासी दैत्योंके धर्ममें विघ्न डालनेके लिये अपने ही स्वरूपसे उत्पन्न, मायामय एक पुरुषकी रचना की।
मुण्डिनं म्लानवस्त्रं च गुम्फिपात्रसमन्वितम्। दधानं पुञ्जिकां हस्ते चालयन्तं पदे पदे॥ २
वह मुण्डित सिर, मलिन वस्त्रधारी, गूँथे हुए पात्रसे युक्त, हाथमें एक पोटली धारण किये हुए, पग-पगपर डगमगाता हुआ था।
वस्त्रयुक्तं तथा हस्तं क्षीयमाणं मुखे सदा। धर्मेति व्याहरन्तं हि वाचा विक्लवया मुनिम्॥ ३
उसका हाथ भी वस्त्रसे लिपटा था, मुख सदा क्षीण-सा रहता था, और वह मुनि लड़खड़ाती वाणीसे "धर्म-धर्म" कहता रहता था।
स नमस्कृत्य विष्णुं तं तत्पुरः संस्थितोऽथ वै। उवाच वचनं तत्र हरिं स प्राञ्जलिस्तदा॥ ४
उसने उस विष्णुको प्रणामकर उनके सामने खड़े होकर हाथ जोड़कर हरिसे वहाँ वचन कहा।
अरिहन्नच्युतं पूज्यं किं करोमि तदादिश। कानि नामानि मे देव स्थानं वापि वद प्रभो॥ ५
हे अरिहन्! हे अच्युत! हे पूज्य! मैं क्या करूँ, यह आदेश दीजिये। हे देव! मेरे क्या नाम होंगे तथा मेरा स्थान भी बताइये, हे प्रभो!
इत्येवं भगवान्विष्णुः श्रुत्वा तस्य शुभं वचः। प्रसन्नमानसो भूत्वा वचनं चेदमब्रवीत्॥ ६
इस प्रकार उसके शुभ वचन सुनकर भगवान् विष्णु प्रसन्नचित्त होकर यह वचन बोले।
यदर्थं निर्मितोऽसि त्वं निबोध कथयामि ते। मदङ्गज महाप्राज्ञ मद्रूपस्त्वं न संशयः॥ ७
जिस प्रयोजनसे तुम्हें रचा गया है, वह जानो, मैं तुमसे कहता हूँ। हे मेरे अंगसे उत्पन्न, हे महाप्राज्ञ! तुम निःसंदेह मेरा ही स्वरूप हो।
ममाङ्गाच्च समुत्पन्नो मत्कार्यं कर्तुमर्हसि। मदीयस्त्वं सदा पूज्यो भविष्यति न संशयः॥ ८
मेरे ही अंगसे उत्पन्न होकर तुम मेरा कार्य करनेके योग्य हो; मेरे होनेके कारण तुम सदा पूज्य होगे, इसमें संशय नहीं है।
अरिहन्नाम ते स्यात्तु ह्यन्यानि न शुभानि च। स्थानं वक्ष्यामि ते पश्चाच्छृणु प्रस्तुतमादरात्॥ ९
तुम्हारा नाम "अरिहन्" होगा, इसके अतिरिक्त अन्य कोई नाम शुभ नहीं होगा। तुम्हारा स्थान मैं बादमें बताऊँगा, अभी आदरपूर्वक प्रस्तुत बातको सुनो।
मायिन्मायामयं शास्त्रं तत्षोडशसहस्रकम्। श्रौतस्मार्तविरुद्धं च वर्णाश्रमविवर्जितम्॥ १०
हे मायावी! सोलह हजारवाला मायामय शास्त्र, जो श्रौत-स्मार्त आचारके विरुद्ध तथा वर्णाश्रमसे रहित हो।
अपभ्रंशमयं शास्त्रं कर्मवादमयं तथा। रचयेति प्रयत्नेन तद्विस्तारो भविष्यति॥ ११
अपभ्रंशयुक्त तथा कर्मवादप्रधान वह शास्त्र प्रयत्नपूर्वक रचो; आगे चलकर उसका विस्तार होगा।
ददामि तव निर्माणे सामर्थ्यं तद्भविष्यति। माया च विविधा शीघ्रं त्वदधीना भविष्यति॥ १२
मैं तुम्हें उसके निर्माणका सामर्थ्य देता हूँ, वह तुम्हें प्राप्त होगा; और अनेक प्रकारकी माया भी शीघ्र तुम्हारे अधीन हो जायगी।
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हरेश्च परमात्मनः। नमस्कृत्य प्रत्युवाच स मायी तं जनार्दनम्॥ १३
परमात्मा हरिके उस वचनको सुनकर वह मायी प्रणामकर जनार्दनसे आगेकी बात बोला।
यत्कर्तव्यं मया देव द्रुतमादिश तत्प्रभो। त्वदाज्ञयाखिलं कर्म सफलं च भविष्यति॥ १४
हे देव! मुझे जो करना हो वह शीघ्र बताइये, हे प्रभो! आपकी आज्ञासे सारा कार्य सफल होगा।
इत्युक्त्वा पाठयामास शास्त्रं मायामयं तथा। इहैव स्वर्गनरकप्रत्ययो नान्यथा पुनः॥ १५
ऐसा कहकर उसे मायामय शास्त्र पढ़ाया — इस लोकमें ही स्वर्ग-नरककी प्रतीति है, अन्यथा नहीं।
तमुवाच पुनर्विष्णुः स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम्। मोहनीया इमे दैत्याः सर्वे त्रिपुरवासिनः॥ १६
तत्पश्चात् विष्णुने शिवके चरणकमलका स्मरणकर उससे पुनः कहा — त्रिपुरमें रहनेवाले ये समस्त दैत्य मोहित किये जाने योग्य हैं।
कार्यास्ते दीक्षिता नूनं पाठनीयाः प्रयत्नतः। मदाज्ञया न दोषस्ते भविष्यति महामते॥ १७
इन्हें अवश्य दीक्षित करना है और प्रयत्नपूर्वक यह शास्त्र पढ़ाना है; मेरी आज्ञासे तुम्हें कोई दोष नहीं लगेगा, हे महामते!
धर्मास्तत्र प्रकाशन्ते श्रौतस्मार्त्ता न संशयः। अनया विद्यया सर्वे स्फोटनीया ध्रुवं यते॥ १८
वहाँ निःसंदेह श्रौत-स्मार्त धर्म प्रकाशित हो रहे हैं; इस विद्याके द्वारा हे यते! उन सबको अवश्य नष्ट करना है।
गन्तुमर्हसि नाशार्थं मुण्डिंस्त्रिपुरवासिनाम्। तमोधर्मं सम्प्रकाश्य नाशयस्व पुरत्रयम्॥ १९
हे मुण्डिन्! त्रिपुरवासियोंके विनाशके लिये जाओ; तमोगुणी धर्मको प्रकाशितकर तीनों पुरोंका नाश करो।
ततश्चैव पुनर्गत्वा मरुस्थल्यां त्वया विभो। स्थातव्यं च स्वधर्मेण कलिर्यावत्समाव्रजेत्॥ २०
उसके बाद हे विभो! पुनः जाकर तुम्हें मरुस्थलमें अपने धर्मके साथ तबतक रहना है, जबतक कलियुग न आ जाय।
प्रवृत्ते तु युगे तस्मिन्स्वीयो धर्मः प्रकाश्यताम्। शिष्यैश्च प्रतिशिष्यैश्च वर्तनीयस्त्वया पुनः॥ २१
उस युगके प्रवृत्त होनेपर अपना धर्म प्रकाशित करना और शिष्य-प्रशिष्योंके द्वारा पुनः उसका आचरण करते रहना।
मदाज्ञया भवद्धर्मो विस्तारं यास्यति ध्रुवम्। मदनुज्ञापरो नित्यं गतिं प्राप्स्यसि मामकीम्॥ २२
मेरी आज्ञासे तुम्हारे इस धर्मका निश्चय ही विस्तार होगा; मेरी आज्ञामें सदा तत्पर रहते हुए तुम मेरी ही गति प्राप्त करोगे।
एवमाज्ञा तदा दत्ता विष्णुना प्रभविष्णुना। शासनाद्देवदेवस्य हृदा त्वन्तर्दधे हरिः॥ २३
इस प्रकार महाशक्तिशाली विष्णुने तब यह आज्ञा दी; देवाधिदेव शिवके शासनसे हरि हृदयसे अन्तर्धान हो गये।
ततस्समुण्डी परिपालयन्हरेराज्ञां तथा निर्मितवांश्च शिष्यान्। यथास्वरूपं चतुरस्तदानीं मायामयं शास्त्रमपाठयत्स्वयम्॥ २४
तत्पश्चात् उस मुण्डी अरिहन्ने हरिकी आज्ञाका पालन करते हुए अपने ही स्वरूपमें चार शिष्य बनाये और उसी समय स्वयं उन्हें मायामय शास्त्र पढ़ाया।
यथा स्वयं तथा ते च चत्वारो मुण्डिनः शुभाः। नमस्कृत्य स्थितास्तत्र हरये परमात्मने॥ २५
जैसा वह स्वयं था, वैसे ही वे चारों शुभ मुण्डी भी थे; वे परमात्मा हरिको प्रणामकर वहाँ स्थित हो गये।
हरिश्चापि मुनेस्तत्र चतुरस्तांस्तदा स्वयम्। उवाच परमप्रीतः शिवाज्ञापरिपालकः॥ २६
हे मुने! शिवकी आज्ञाका पालन करनेवाले हरिने भी वहाँ अत्यन्त प्रसन्न होकर स्वयं उन चारोंसे कहा।
यथा गुरुस्तथा यूयं भविष्यथ मदाज्ञया। धन्याः स्थ सद्गतिमिह सम्प्राप्स्यथ न संशयः॥ २७
जैसे गुरु हैं, वैसे ही मेरी आज्ञासे तुमलोग भी बनोगे; तुम धन्य हो, यहाँ सद्गति निःसंदेह प्राप्त करोगे।
चत्वारो मुण्डिनस्तेऽथ धर्मं पाषण्डमाश्रिताः। हस्ते पात्रं दधानाश्च तुण्डवस्त्रस्य धारकाः॥ २८
तत्पश्चात् वे चारों मुण्डी पाषण्ड-धर्मका आश्रय लेकर हाथमें पात्र धारण किये, मुखपर वस्त्र बाँधे हुए,
मलिनान्येव वासांसि धारयन्तो ह्यभाषिणः। धर्मो लाभः परं तत्त्वं वदन्तस्त्वतिहर्षतः॥ २९
केवल मलिन वस्त्र धारण करते, मौन रहते, अत्यन्त हर्षसे "धर्म ही लाभ, परम तत्त्व है" ऐसा कहते हुए,
मार्जनीं ध्रियमाणाश्च वस्त्रखण्डविनिर्मिताम्। शनैः शनैश्चलन्तो हि जीवहिंसाभयाद्ध्रुवम्॥ ३०
वस्त्रके छोटे-छोटे टुकड़ोंसे बनी मार्जनी धारण किये, जीव-हिंसाके भयसे निःसंदेह अत्यन्त धीरे-धीरे चलते हुए,
ते सर्वे च तदा देवं भगवन्तं मुदान्विताः। नमस्कृत्य पुनस्तत्र मुने तस्थुस्तदग्रतः॥ ३१
हे मुने! वे सभी तब प्रसन्नतापूर्वक भगवान् देवको पुनः प्रणामकर उनके सामने खड़े हो गये।
हरिणा च तदा हस्ते धृत्वा च गुरवेऽर्पिताः। अभ्यधायि च सुप्रीत्या तन्नामानि विशेषतः॥ ३२
और हरिने तब उनका हाथ पकड़कर गुरुको सौंप दिया, और बड़े प्रेमसे उनके नाम विशेषरूपसे बताये।
यथा त्वं च तथैवैते मदीया वै न संशयः। आदिरूपं च तन्नाम पूज्यत्वात्पूज्य उच्यते॥ ३३
जैसे तुम मेरे हो, वैसे ही ये भी निःसंदेह मेरे हैं; वह नाम आदिरूप है — पूज्य होनेके कारण "पूज्य" कहा जाता है।
ऋषिर्यतिस्तथाकीर्य उपाध्याय इति स्वयम्। इमान्यपि तु नामानि प्रसिद्धानि भवन्तु वः॥ ३४
ऋषि, यति, तथा कीर्य और उपाध्याय — ये नाम भी स्वयं तुमलोगोंके प्रसिद्ध हों।
ममापि च भवद्भिश्च नाम ग्राह्यं शुभं पुनः। अरिहन्निति तन्नाम ध्येयं पापप्रणाशनम्॥ ३५
और मेरा भी शुभ नाम तुमलोगोंको ग्रहण करना चाहिये — वह नाम "अरिहन्" है, जो पापका नाश करनेवाला है, ध्यान करने योग्य है।
भवद्भिश्चैव कर्तव्यं कार्यं लोकसुखावहम्। लोकानुकूलं चरतां भविष्यत्युत्तमा गतिः॥ ३६
तुमलोगोंको लोक-सुखकारी कार्य ही करना चाहिये; लोकके अनुकूल आचरण करते हुए तुम्हारी उत्तम गति होगी।
ततः प्रणम्य तं मायी शिष्ययुक्तःस्वयं तदा। जगाम त्रिपुरं सद्यः शिवेच्छाकारिणं मुमा॥ ३७
तत्पश्चात् उसे प्रणामकर वह मायी स्वयं शिष्योंसहित शिवकी इच्छाके अनुसार कार्य करनेवाले त्रिपुरकी ओर हर्षपूर्वक तुरन्त चल पड़ा।
प्रविश्य तत्पुरं तूर्णं विष्णुना नोदितो वशी। महामायाविना तेन ऋषिर्मायां तदाकरोत्॥ ३८
विष्णुद्वारा प्रेरित वह जितेन्द्रिय, महामायावी ऋषि उस नगरमें शीघ्र प्रविष्ट होकर तब माया करने लगा।
नगरोपवने कृत्वा शिष्यैर्युक्तः स्थितिं तदा। मायां प्रवर्तयामास मायिनामपि मोहिनीम्॥ ३९
नगरके बाहर उपवनमें शिष्योंसहित निवासकर उसने बड़े-बड़े मायावियोंको भी मोहित करनेवाली माया फैलायी।
शिवार्चनप्रभावेण तन्माया सहसा मुने। त्रिपुरे न चचालाशु निर्विण्णोऽभूत्तदा यतिः॥ ४०
हे मुने! शिव-अर्चनके प्रभावसे उसकी वह माया त्रिपुरमें सहसा नहीं चली, तब वह यति खिन्न हो उठा।
अथ विष्णुं स सस्मार तुष्टाव च हृदा बहु। नष्टोत्साहो विचेतस्को हृदयेन विदूयता॥ ४१
तब उत्साहरहित, चेतनाशून्य और व्यथित हृदयवाला वह विष्णुका स्मरणकर हृदयसे उनकी बहुत स्तुति करने लगा।
तत्स्मृतस्त्वरितं विष्णुःसस्मार शङ्करं हृदि। प्राप्याज्ञां मनसा तस्य स्मृतवान्नारदं द्रुतम्॥ ४२
उसके द्वारा स्मरण किये गये विष्णुने त्वरासे हृदयमें शंकरका स्मरण किया, और उनकी आज्ञा प्राप्तकर मनसे शीघ्र नारदका स्मरण किया।
स्मृतमात्रेण विष्णोश्च नारदः समुपस्थितः। नत्वा स्तुत्वा पुरस्तस्य स्थितोऽभूत्साञ्जलिस्तदा॥ ४३
विष्णुके स्मरण करते ही नारद वहाँ उपस्थित हो गये; प्रणामकर तथा स्तुति करके वे उनके सामने हाथ जोड़े खड़े हो गये।
अथ तं नारदं प्राह विष्णुर्मतिमतां वरः। लोकोपकारनिरतो देवकार्यकरः सदा॥ ४४
तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विष्णुने नारदसे कहा, जो सदा लोकोपकारमें निरत और देवकार्य करनेवाले हैं।
शिवाज्ञयोच्यते तात गच्छ त्वं त्रिपुरं द्रुतम्। ऋषिस्तत्र गतः शिष्यैर्मोहार्थं तत्सुवासिनाम्॥ ४५
हे तात! शिवकी आज्ञासे कहा जा रहा है — तुम शीघ्र त्रिपुर जाओ; एक ऋषि वहाँ अपने शिष्योंके साथ उस नगरके सुन्दर निवासियोंको मोहित करनेके लिये गया है।
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य नारदो मुनिसत्तमः। गतस्तत्र द्रुतं यत्र स ऋषिर्मायिनां वरः॥ ४६
उनका यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद शीघ्र वहाँ गये, जहाँ मायावियोंमें श्रेष्ठ वह ऋषि था।
नारदोऽपि तथा मायी नियोगान्मायिनः प्रभोः। प्रविश्य तत्पुरं तेन मायिना सह दीक्षितः॥ ४७
नारद भी उस मायावी प्रभु विष्णुकी आज्ञासे स्वयं मायी बनकर, उस नगरमें प्रविष्ट होकर उस मायीसे दीक्षित हुए।
ततश्च नारदो गत्वा त्रिपुराधीशसन्निधौ। क्षेमप्रश्नादिकं कृत्वा राज्ञे सर्वं न्यवेदयत्॥ ४८
तत्पश्चात् नारदने त्रिपुराधीशके पास जाकर कुशल-क्षेम आदि पूछकर राजासे सब कुछ निवेदन किया।
कश्चित्समागतश्चात्र यतिर्धर्मपरायणः। सर्वविद्याप्रकृष्टो हि वेदविद्यापरान्वितः॥ ४९
यहाँ कोई धर्मपरायण यति आया है, जो सर्वविद्याओंमें प्रकृष्ट तथा वेदविद्यामें विशेष रूपसे प्रवीण है।
दृष्ट्वा च बहवो धर्मा नैतेन सदृशाः पुनः। वयं सुदीक्षिताश्चात्र दृष्ट्वा धर्मं सनातनम्॥ ५०
हमने बहुत-से धर्म देखे हैं, परन्तु इसके समान फिर कोई नहीं; हम भी यहाँ इसके सनातन धर्मको देखकर भलीभाँति दीक्षित हो चुके हैं।
तवेच्छा यदि वर्तेत तद्धर्मे दैत्यसत्तम। तद्धर्मस्य महाराज ग्राह्या दीक्षा त्वया पुनः॥ ५१
हे दैत्यसत्तम! यदि आपकी इच्छा उस धर्ममें हो, तो हे महाराज! आपको भी उस धर्मकी दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये।
तदीयं स वचः श्रुत्वा महदर्थसुगर्भितम्। विस्मितो हृदि दैत्येशो जगौ तत्र विमोहितः॥ ५२
महान् अर्थसे भरे उनके उस वचनको सुनकर दैत्येश हृदयमें विस्मित और वहाँ अत्यन्त मोहित होकर बोला।
नारदो दीक्षितो यस्माद्वयं दीक्षामवाप्नुमः। इत्येवं च विदित्वा वै जगाम स्वयमेव ह॥ ५३
"जब नारदने दीक्षा ले ली है, तो हम भी दीक्षा प्राप्त करें" — ऐसा जानकर वह स्वयं ही वहाँ गया।
तद्रूपं च तदा दृष्ट्वा मोहितो मायया तथा। उवाच वचनं तस्मै नमस्कृत्य महात्मने॥ ५४
उसका रूप देखकर तथा उसकी मायासे मोहित होकर उसने उस महात्माको प्रणामकर यह वचन कहा।
दीक्षा देया त्वया मह्यं निर्मलाशय भो ऋषे। अहं शिष्यो भविष्यामि सत्यं सत्यं न संशयः॥ ५५
हे निर्मल अन्तःकरणवाले ऋषे! आप मुझे दीक्षा दीजिये; मैं आपका शिष्य बनूँगा, यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं।
इत्येवं तु वचः श्रुत्वा दैत्यराजस्य निर्मलम्। प्रत्युवाच सुयत्नेन ऋषिः स च सनातनः॥ ५६
दैत्यराजके इस निर्मल वचनको सुनकर उस सनातन ऋषिने बड़े प्रयत्नसे उत्तर दिया।
मदीया करणीया स्याद्यद्याज्ञा दैत्यसत्तम। तदा देया मया दीक्षा नान्यथा कोटियत्नतः॥ ५७
हे दैत्यसत्तम! यदि मेरी आज्ञाका पूर्णतः पालन किया जाय, तभी मैं दीक्षा दूँगा — अन्यथा करोड़ों प्रयत्नोंसे भी नहीं।
इत्येवं तु वचः श्रुत्वा राजा मायामयोऽभवत्। उवाच वचनं शीघ्रं यतिं तं हि कृताञ्जलिः॥ ५८
यह वचन सुनकर राजा सर्वथा मायाके अधीन हो गया और हाथ जोड़कर शीघ्र उस यतिसे यह वचन बोला।
यथाज्ञां दास्यसि त्वं च तत्तथैव न चान्यथा। त्वदाज्ञां नोल्लङ्घयिष्ये सत्यं सत्यं न संशयः॥ ५९
आप जैसी आज्ञा देंगे, मैं वैसा ही करूँगा, अन्यथा नहीं; आपकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करूँगा, यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं।
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य त्रिपुराधीशितुस्तदा। दूरीकृत्य मुखाद्वस्त्रमुवाच ऋषिसत्तमः॥ ६०
त्रिपुराधीशका यह वचन सुनकर उस ऋषिश्रेष्ठने अपने मुखसे वस्त्र हटाकर कहा।
दीक्षां गृह्णीष्व दैत्येन्द्र सर्वधर्मोत्तमोत्तमाम्। येन दीक्षाविधानेन प्राप्स्यसि त्वं कृतार्थताम्॥ ६१
हे दैत्येन्द्र! सब धर्मोंमें सर्वश्रेष्ठ यह दीक्षा ग्रहण करो, जिस दीक्षाविधानसे तुम कृतार्थताको प्राप्त करोगे।
इत्युक्त्वा स तु मायावी दैत्यराजाय सत्वरम्। ददौ दीक्षां स्वधर्मोक्तां तस्मै विधिविधानतः॥ ६२
ऐसा कहकर उस मायावीने दैत्यराजको शीघ्र ही विधि-विधानपूर्वक अपने धर्ममें कही गयी दीक्षा प्रदान की।
दैत्यराजे दीक्षिते च तस्मिन्ससहजे मुने। सर्वे च दीक्षिता जातास्तत्र त्रिपुरवासिनः॥ ६३
हे मुने! उस दैत्यराजके अपने भाई-बन्धुओंसहित दीक्षित हो जानेपर वहाँ त्रिपुरके सभी निवासी भी दीक्षित हो गये।
मुनेः शिष्यैः प्रशिष्यैश्च व्याप्तमासीद् द्रुतं तदा। महामायाविनस्तत्तु त्रिपुरं सकलं मुने॥ ६४
हे मुने! उस समय उस महामायावीके शिष्यों तथा प्रशिष्योंसे सम्पूर्ण त्रिपुर शीघ्र ही व्याप्त हो गया।
Nārada was the very first person the deluding mendicant (Arihan) initiated in Tripura.
Arihan first creates four disciples of his own; only afterward, when his māyā fails against Tripura's Śiva-worship, does Viṣṇu additionally send Nārada in as reinforcement, given a sham initiation purely as cover for espionage.
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असृजच्च महातेजाः पुरुषं स्वात्मसम्भवम्। एकं मायामयं तेषां धर्मविघ्नार्थमच्युतः॥ १
भगवान् अच्युत विष्णुने उन त्रिपुरवासी दैत्योंके धर्ममें विघ्न डालनेके लिये अपने ही स्वरूपसे उत्पन्न, मायामय एक पुरुषकी रचना की।
मुण्डिनं म्लानवस्त्रं च गुम्फिपात्रसमन्वितम्। दधानं पुञ्जिकां हस्ते चालयन्तं पदे पदे॥ २
वह मुण्डित सिर, मलिन वस्त्रधारी, गूँथे हुए पात्रसे युक्त, हाथमें एक पोटली धारण किये हुए, पग-पगपर डगमगाता हुआ था।
वस्त्रयुक्तं तथा हस्तं क्षीयमाणं मुखे सदा। धर्मेति व्याहरन्तं हि वाचा विक्लवया मुनिम्॥ ३
उसका हाथ भी वस्त्रसे लिपटा था, मुख सदा क्षीण-सा रहता था, और वह मुनि लड़खड़ाती वाणीसे "धर्म-धर्म" कहता रहता था।
स नमस्कृत्य विष्णुं तं तत्पुरः संस्थितोऽथ वै। उवाच वचनं तत्र हरिं स प्राञ्जलिस्तदा॥ ४
उसने उस विष्णुको प्रणामकर उनके सामने खड़े होकर हाथ जोड़कर हरिसे वहाँ वचन कहा।
अरिहन्नच्युतं पूज्यं किं करोमि तदादिश। कानि नामानि मे देव स्थानं वापि वद प्रभो॥ ५
हे अरिहन्! हे अच्युत! हे पूज्य! मैं क्या करूँ, यह आदेश दीजिये। हे देव! मेरे क्या नाम होंगे तथा मेरा स्थान भी बताइये, हे प्रभो!
इत्येवं भगवान्विष्णुः श्रुत्वा तस्य शुभं वचः। प्रसन्नमानसो भूत्वा वचनं चेदमब्रवीत्॥ ६
इस प्रकार उसके शुभ वचन सुनकर भगवान् विष्णु प्रसन्नचित्त होकर यह वचन बोले।
यदर्थं निर्मितोऽसि त्वं निबोध कथयामि ते। मदङ्गज महाप्राज्ञ मद्रूपस्त्वं न संशयः॥ ७
जिस प्रयोजनसे तुम्हें रचा गया है, वह जानो, मैं तुमसे कहता हूँ। हे मेरे अंगसे उत्पन्न, हे महाप्राज्ञ! तुम निःसंदेह मेरा ही स्वरूप हो।
ममाङ्गाच्च समुत्पन्नो मत्कार्यं कर्तुमर्हसि। मदीयस्त्वं सदा पूज्यो भविष्यति न संशयः॥ ८
मेरे ही अंगसे उत्पन्न होकर तुम मेरा कार्य करनेके योग्य हो; मेरे होनेके कारण तुम सदा पूज्य होगे, इसमें संशय नहीं है।
अरिहन्नाम ते स्यात्तु ह्यन्यानि न शुभानि च। स्थानं वक्ष्यामि ते पश्चाच्छृणु प्रस्तुतमादरात्॥ ९
तुम्हारा नाम "अरिहन्" होगा, इसके अतिरिक्त अन्य कोई नाम शुभ नहीं होगा। तुम्हारा स्थान मैं बादमें बताऊँगा, अभी आदरपूर्वक प्रस्तुत बातको सुनो।
मायिन्मायामयं शास्त्रं तत्षोडशसहस्रकम्। श्रौतस्मार्तविरुद्धं च वर्णाश्रमविवर्जितम्॥ १०
हे मायावी! सोलह हजारवाला मायामय शास्त्र, जो श्रौत-स्मार्त आचारके विरुद्ध तथा वर्णाश्रमसे रहित हो।
अपभ्रंशमयं शास्त्रं कर्मवादमयं तथा। रचयेति प्रयत्नेन तद्विस्तारो भविष्यति॥ ११
अपभ्रंशयुक्त तथा कर्मवादप्रधान वह शास्त्र प्रयत्नपूर्वक रचो; आगे चलकर उसका विस्तार होगा।
ददामि तव निर्माणे सामर्थ्यं तद्भविष्यति। माया च विविधा शीघ्रं त्वदधीना भविष्यति॥ १२
मैं तुम्हें उसके निर्माणका सामर्थ्य देता हूँ, वह तुम्हें प्राप्त होगा; और अनेक प्रकारकी माया भी शीघ्र तुम्हारे अधीन हो जायगी।
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हरेश्च परमात्मनः। नमस्कृत्य प्रत्युवाच स मायी तं जनार्दनम्॥ १३
परमात्मा हरिके उस वचनको सुनकर वह मायी प्रणामकर जनार्दनसे आगेकी बात बोला।
यत्कर्तव्यं मया देव द्रुतमादिश तत्प्रभो। त्वदाज्ञयाखिलं कर्म सफलं च भविष्यति॥ १४
हे देव! मुझे जो करना हो वह शीघ्र बताइये, हे प्रभो! आपकी आज्ञासे सारा कार्य सफल होगा।
इत्युक्त्वा पाठयामास शास्त्रं मायामयं तथा। इहैव स्वर्गनरकप्रत्ययो नान्यथा पुनः॥ १५
ऐसा कहकर उसे मायामय शास्त्र पढ़ाया — इस लोकमें ही स्वर्ग-नरककी प्रतीति है, अन्यथा नहीं।
तमुवाच पुनर्विष्णुः स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम्। मोहनीया इमे दैत्याः सर्वे त्रिपुरवासिनः॥ १६
तत्पश्चात् विष्णुने शिवके चरणकमलका स्मरणकर उससे पुनः कहा — त्रिपुरमें रहनेवाले ये समस्त दैत्य मोहित किये जाने योग्य हैं।
कार्यास्ते दीक्षिता नूनं पाठनीयाः प्रयत्नतः। मदाज्ञया न दोषस्ते भविष्यति महामते॥ १७
इन्हें अवश्य दीक्षित करना है और प्रयत्नपूर्वक यह शास्त्र पढ़ाना है; मेरी आज्ञासे तुम्हें कोई दोष नहीं लगेगा, हे महामते!
धर्मास्तत्र प्रकाशन्ते श्रौतस्मार्त्ता न संशयः। अनया विद्यया सर्वे स्फोटनीया ध्रुवं यते॥ १८
वहाँ निःसंदेह श्रौत-स्मार्त धर्म प्रकाशित हो रहे हैं; इस विद्याके द्वारा हे यते! उन सबको अवश्य नष्ट करना है।
गन्तुमर्हसि नाशार्थं मुण्डिंस्त्रिपुरवासिनाम्। तमोधर्मं सम्प्रकाश्य नाशयस्व पुरत्रयम्॥ १९
हे मुण्डिन्! त्रिपुरवासियोंके विनाशके लिये जाओ; तमोगुणी धर्मको प्रकाशितकर तीनों पुरोंका नाश करो।
ततश्चैव पुनर्गत्वा मरुस्थल्यां त्वया विभो। स्थातव्यं च स्वधर्मेण कलिर्यावत्समाव्रजेत्॥ २०
उसके बाद हे विभो! पुनः जाकर तुम्हें मरुस्थलमें अपने धर्मके साथ तबतक रहना है, जबतक कलियुग न आ जाय।
प्रवृत्ते तु युगे तस्मिन्स्वीयो धर्मः प्रकाश्यताम्। शिष्यैश्च प्रतिशिष्यैश्च वर्तनीयस्त्वया पुनः॥ २१
उस युगके प्रवृत्त होनेपर अपना धर्म प्रकाशित करना और शिष्य-प्रशिष्योंके द्वारा पुनः उसका आचरण करते रहना।
मदाज्ञया भवद्धर्मो विस्तारं यास्यति ध्रुवम्। मदनुज्ञापरो नित्यं गतिं प्राप्स्यसि मामकीम्॥ २२
मेरी आज्ञासे तुम्हारे इस धर्मका निश्चय ही विस्तार होगा; मेरी आज्ञामें सदा तत्पर रहते हुए तुम मेरी ही गति प्राप्त करोगे।
एवमाज्ञा तदा दत्ता विष्णुना प्रभविष्णुना। शासनाद्देवदेवस्य हृदा त्वन्तर्दधे हरिः॥ २३
इस प्रकार महाशक्तिशाली विष्णुने तब यह आज्ञा दी; देवाधिदेव शिवके शासनसे हरि हृदयसे अन्तर्धान हो गये।
ततस्समुण्डी परिपालयन्हरेराज्ञां तथा निर्मितवांश्च शिष्यान्। यथास्वरूपं चतुरस्तदानीं मायामयं शास्त्रमपाठयत्स्वयम्॥ २४
तत्पश्चात् उस मुण्डी अरिहन्ने हरिकी आज्ञाका पालन करते हुए अपने ही स्वरूपमें चार शिष्य बनाये और उसी समय स्वयं उन्हें मायामय शास्त्र पढ़ाया।
यथा स्वयं तथा ते च चत्वारो मुण्डिनः शुभाः। नमस्कृत्य स्थितास्तत्र हरये परमात्मने॥ २५
जैसा वह स्वयं था, वैसे ही वे चारों शुभ मुण्डी भी थे; वे परमात्मा हरिको प्रणामकर वहाँ स्थित हो गये।
हरिश्चापि मुनेस्तत्र चतुरस्तांस्तदा स्वयम्। उवाच परमप्रीतः शिवाज्ञापरिपालकः॥ २६
हे मुने! शिवकी आज्ञाका पालन करनेवाले हरिने भी वहाँ अत्यन्त प्रसन्न होकर स्वयं उन चारोंसे कहा।
यथा गुरुस्तथा यूयं भविष्यथ मदाज्ञया। धन्याः स्थ सद्गतिमिह सम्प्राप्स्यथ न संशयः॥ २७
जैसे गुरु हैं, वैसे ही मेरी आज्ञासे तुमलोग भी बनोगे; तुम धन्य हो, यहाँ सद्गति निःसंदेह प्राप्त करोगे।
चत्वारो मुण्डिनस्तेऽथ धर्मं पाषण्डमाश्रिताः। हस्ते पात्रं दधानाश्च तुण्डवस्त्रस्य धारकाः॥ २८
तत्पश्चात् वे चारों मुण्डी पाषण्ड-धर्मका आश्रय लेकर हाथमें पात्र धारण किये, मुखपर वस्त्र बाँधे हुए,
मलिनान्येव वासांसि धारयन्तो ह्यभाषिणः। धर्मो लाभः परं तत्त्वं वदन्तस्त्वतिहर्षतः॥ २९
केवल मलिन वस्त्र धारण करते, मौन रहते, अत्यन्त हर्षसे "धर्म ही लाभ, परम तत्त्व है" ऐसा कहते हुए,
मार्जनीं ध्रियमाणाश्च वस्त्रखण्डविनिर्मिताम्। शनैः शनैश्चलन्तो हि जीवहिंसाभयाद्ध्रुवम्॥ ३०
वस्त्रके छोटे-छोटे टुकड़ोंसे बनी मार्जनी धारण किये, जीव-हिंसाके भयसे निःसंदेह अत्यन्त धीरे-धीरे चलते हुए,
ते सर्वे च तदा देवं भगवन्तं मुदान्विताः। नमस्कृत्य पुनस्तत्र मुने तस्थुस्तदग्रतः॥ ३१
हे मुने! वे सभी तब प्रसन्नतापूर्वक भगवान् देवको पुनः प्रणामकर उनके सामने खड़े हो गये।
हरिणा च तदा हस्ते धृत्वा च गुरवेऽर्पिताः। अभ्यधायि च सुप्रीत्या तन्नामानि विशेषतः॥ ३२
और हरिने तब उनका हाथ पकड़कर गुरुको सौंप दिया, और बड़े प्रेमसे उनके नाम विशेषरूपसे बताये।
यथा त्वं च तथैवैते मदीया वै न संशयः। आदिरूपं च तन्नाम पूज्यत्वात्पूज्य उच्यते॥ ३३
जैसे तुम मेरे हो, वैसे ही ये भी निःसंदेह मेरे हैं; वह नाम आदिरूप है — पूज्य होनेके कारण "पूज्य" कहा जाता है।
ऋषिर्यतिस्तथाकीर्य उपाध्याय इति स्वयम्। इमान्यपि तु नामानि प्रसिद्धानि भवन्तु वः॥ ३४
ऋषि, यति, तथा कीर्य और उपाध्याय — ये नाम भी स्वयं तुमलोगोंके प्रसिद्ध हों।
ममापि च भवद्भिश्च नाम ग्राह्यं शुभं पुनः। अरिहन्निति तन्नाम ध्येयं पापप्रणाशनम्॥ ३५
और मेरा भी शुभ नाम तुमलोगोंको ग्रहण करना चाहिये — वह नाम "अरिहन्" है, जो पापका नाश करनेवाला है, ध्यान करने योग्य है।
भवद्भिश्चैव कर्तव्यं कार्यं लोकसुखावहम्। लोकानुकूलं चरतां भविष्यत्युत्तमा गतिः॥ ३६
तुमलोगोंको लोक-सुखकारी कार्य ही करना चाहिये; लोकके अनुकूल आचरण करते हुए तुम्हारी उत्तम गति होगी।
ततः प्रणम्य तं मायी शिष्ययुक्तःस्वयं तदा। जगाम त्रिपुरं सद्यः शिवेच्छाकारिणं मुमा॥ ३७
तत्पश्चात् उसे प्रणामकर वह मायी स्वयं शिष्योंसहित शिवकी इच्छाके अनुसार कार्य करनेवाले त्रिपुरकी ओर हर्षपूर्वक तुरन्त चल पड़ा।
प्रविश्य तत्पुरं तूर्णं विष्णुना नोदितो वशी। महामायाविना तेन ऋषिर्मायां तदाकरोत्॥ ३८
विष्णुद्वारा प्रेरित वह जितेन्द्रिय, महामायावी ऋषि उस नगरमें शीघ्र प्रविष्ट होकर तब माया करने लगा।
नगरोपवने कृत्वा शिष्यैर्युक्तः स्थितिं तदा। मायां प्रवर्तयामास मायिनामपि मोहिनीम्॥ ३९
नगरके बाहर उपवनमें शिष्योंसहित निवासकर उसने बड़े-बड़े मायावियोंको भी मोहित करनेवाली माया फैलायी।
शिवार्चनप्रभावेण तन्माया सहसा मुने। त्रिपुरे न चचालाशु निर्विण्णोऽभूत्तदा यतिः॥ ४०
हे मुने! शिव-अर्चनके प्रभावसे उसकी वह माया त्रिपुरमें सहसा नहीं चली, तब वह यति खिन्न हो उठा।
अथ विष्णुं स सस्मार तुष्टाव च हृदा बहु। नष्टोत्साहो विचेतस्को हृदयेन विदूयता॥ ४१
तब उत्साहरहित, चेतनाशून्य और व्यथित हृदयवाला वह विष्णुका स्मरणकर हृदयसे उनकी बहुत स्तुति करने लगा।
तत्स्मृतस्त्वरितं विष्णुःसस्मार शङ्करं हृदि। प्राप्याज्ञां मनसा तस्य स्मृतवान्नारदं द्रुतम्॥ ४२
उसके द्वारा स्मरण किये गये विष्णुने त्वरासे हृदयमें शंकरका स्मरण किया, और उनकी आज्ञा प्राप्तकर मनसे शीघ्र नारदका स्मरण किया।
स्मृतमात्रेण विष्णोश्च नारदः समुपस्थितः। नत्वा स्तुत्वा पुरस्तस्य स्थितोऽभूत्साञ्जलिस्तदा॥ ४३
विष्णुके स्मरण करते ही नारद वहाँ उपस्थित हो गये; प्रणामकर तथा स्तुति करके वे उनके सामने हाथ जोड़े खड़े हो गये।
अथ तं नारदं प्राह विष्णुर्मतिमतां वरः। लोकोपकारनिरतो देवकार्यकरः सदा॥ ४४
तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विष्णुने नारदसे कहा, जो सदा लोकोपकारमें निरत और देवकार्य करनेवाले हैं।
शिवाज्ञयोच्यते तात गच्छ त्वं त्रिपुरं द्रुतम्। ऋषिस्तत्र गतः शिष्यैर्मोहार्थं तत्सुवासिनाम्॥ ४५
हे तात! शिवकी आज्ञासे कहा जा रहा है — तुम शीघ्र त्रिपुर जाओ; एक ऋषि वहाँ अपने शिष्योंके साथ उस नगरके सुन्दर निवासियोंको मोहित करनेके लिये गया है।
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य नारदो मुनिसत्तमः। गतस्तत्र द्रुतं यत्र स ऋषिर्मायिनां वरः॥ ४६
उनका यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद शीघ्र वहाँ गये, जहाँ मायावियोंमें श्रेष्ठ वह ऋषि था।
नारदोऽपि तथा मायी नियोगान्मायिनः प्रभोः। प्रविश्य तत्पुरं तेन मायिना सह दीक्षितः॥ ४७
नारद भी उस मायावी प्रभु विष्णुकी आज्ञासे स्वयं मायी बनकर, उस नगरमें प्रविष्ट होकर उस मायीसे दीक्षित हुए।
ततश्च नारदो गत्वा त्रिपुराधीशसन्निधौ। क्षेमप्रश्नादिकं कृत्वा राज्ञे सर्वं न्यवेदयत्॥ ४८
तत्पश्चात् नारदने त्रिपुराधीशके पास जाकर कुशल-क्षेम आदि पूछकर राजासे सब कुछ निवेदन किया।
कश्चित्समागतश्चात्र यतिर्धर्मपरायणः। सर्वविद्याप्रकृष्टो हि वेदविद्यापरान्वितः॥ ४९
यहाँ कोई धर्मपरायण यति आया है, जो सर्वविद्याओंमें प्रकृष्ट तथा वेदविद्यामें विशेष रूपसे प्रवीण है।
दृष्ट्वा च बहवो धर्मा नैतेन सदृशाः पुनः। वयं सुदीक्षिताश्चात्र दृष्ट्वा धर्मं सनातनम्॥ ५०
हमने बहुत-से धर्म देखे हैं, परन्तु इसके समान फिर कोई नहीं; हम भी यहाँ इसके सनातन धर्मको देखकर भलीभाँति दीक्षित हो चुके हैं।
तवेच्छा यदि वर्तेत तद्धर्मे दैत्यसत्तम। तद्धर्मस्य महाराज ग्राह्या दीक्षा त्वया पुनः॥ ५१
हे दैत्यसत्तम! यदि आपकी इच्छा उस धर्ममें हो, तो हे महाराज! आपको भी उस धर्मकी दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये।
तदीयं स वचः श्रुत्वा महदर्थसुगर्भितम्। विस्मितो हृदि दैत्येशो जगौ तत्र विमोहितः॥ ५२
महान् अर्थसे भरे उनके उस वचनको सुनकर दैत्येश हृदयमें विस्मित और वहाँ अत्यन्त मोहित होकर बोला।
नारदो दीक्षितो यस्माद्वयं दीक्षामवाप्नुमः। इत्येवं च विदित्वा वै जगाम स्वयमेव ह॥ ५३
"जब नारदने दीक्षा ले ली है, तो हम भी दीक्षा प्राप्त करें" — ऐसा जानकर वह स्वयं ही वहाँ गया।
तद्रूपं च तदा दृष्ट्वा मोहितो मायया तथा। उवाच वचनं तस्मै नमस्कृत्य महात्मने॥ ५४
उसका रूप देखकर तथा उसकी मायासे मोहित होकर उसने उस महात्माको प्रणामकर यह वचन कहा।
दीक्षा देया त्वया मह्यं निर्मलाशय भो ऋषे। अहं शिष्यो भविष्यामि सत्यं सत्यं न संशयः॥ ५५
हे निर्मल अन्तःकरणवाले ऋषे! आप मुझे दीक्षा दीजिये; मैं आपका शिष्य बनूँगा, यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं।
इत्येवं तु वचः श्रुत्वा दैत्यराजस्य निर्मलम्। प्रत्युवाच सुयत्नेन ऋषिः स च सनातनः॥ ५६
दैत्यराजके इस निर्मल वचनको सुनकर उस सनातन ऋषिने बड़े प्रयत्नसे उत्तर दिया।
मदीया करणीया स्याद्यद्याज्ञा दैत्यसत्तम। तदा देया मया दीक्षा नान्यथा कोटियत्नतः॥ ५७
हे दैत्यसत्तम! यदि मेरी आज्ञाका पूर्णतः पालन किया जाय, तभी मैं दीक्षा दूँगा — अन्यथा करोड़ों प्रयत्नोंसे भी नहीं।
इत्येवं तु वचः श्रुत्वा राजा मायामयोऽभवत्। उवाच वचनं शीघ्रं यतिं तं हि कृताञ्जलिः॥ ५८
यह वचन सुनकर राजा सर्वथा मायाके अधीन हो गया और हाथ जोड़कर शीघ्र उस यतिसे यह वचन बोला।
यथाज्ञां दास्यसि त्वं च तत्तथैव न चान्यथा। त्वदाज्ञां नोल्लङ्घयिष्ये सत्यं सत्यं न संशयः॥ ५९
आप जैसी आज्ञा देंगे, मैं वैसा ही करूँगा, अन्यथा नहीं; आपकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करूँगा, यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं।
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य त्रिपुराधीशितुस्तदा। दूरीकृत्य मुखाद्वस्त्रमुवाच ऋषिसत्तमः॥ ६०
त्रिपुराधीशका यह वचन सुनकर उस ऋषिश्रेष्ठने अपने मुखसे वस्त्र हटाकर कहा।
दीक्षां गृह्णीष्व दैत्येन्द्र सर्वधर्मोत्तमोत्तमाम्। येन दीक्षाविधानेन प्राप्स्यसि त्वं कृतार्थताम्॥ ६१
हे दैत्येन्द्र! सब धर्मोंमें सर्वश्रेष्ठ यह दीक्षा ग्रहण करो, जिस दीक्षाविधानसे तुम कृतार्थताको प्राप्त करोगे।
इत्युक्त्वा स तु मायावी दैत्यराजाय सत्वरम्। ददौ दीक्षां स्वधर्मोक्तां तस्मै विधिविधानतः॥ ६२
ऐसा कहकर उस मायावीने दैत्यराजको शीघ्र ही विधि-विधानपूर्वक अपने धर्ममें कही गयी दीक्षा प्रदान की।
दैत्यराजे दीक्षिते च तस्मिन्ससहजे मुने। सर्वे च दीक्षिता जातास्तत्र त्रिपुरवासिनः॥ ६३
हे मुने! उस दैत्यराजके अपने भाई-बन्धुओंसहित दीक्षित हो जानेपर वहाँ त्रिपुरके सभी निवासी भी दीक्षित हो गये।
मुनेः शिष्यैः प्रशिष्यैश्च व्याप्तमासीद् द्रुतं तदा। महामायाविनस्तत्तु त्रिपुरं सकलं मुने॥ ६४
हे मुने! उस समय उस महामायावीके शिष्यों तथा प्रशिष्योंसे सम्पूर्ण त्रिपुर शीघ्र ही व्याप्त हो गया।
क्या महाविद्या साधनाएँ अनधिकृत ढंग से सिखाने वाले लोग अज्ञानी हैं?
वे विद्वान हैं, उनके पास सिद्धियाँ हैं, और उनके शिष्य बड़े लोग हैं
वक्ता कहते हैं कि जो लोग इस तरह की चीज़ें अनधिकृत ढंग से करते हैं, वे विद्वान लोग हैं — उनके पास जानकारी की भरमार है, और उनके पास सिद्धियाँ हैं भैया। और उनके शिष्य भी बड़े-बड़े लोग हैं। तो बस वही हो रहा है: स्वाध्याय कीजिए, समझ जाएँगे कि कहाँ से क्या चल रहा है और कैसे बचना है।
वक्ता कहते हैं कि जो लोग इस तरह के विषय अनधिकृत ढंग से करते हैं, वे विद्वान लोग हैं। उनके पास जानकारी की भरमार है; उनके पास सिद्धियाँ हैं भैया। और उनके शिष्य भी बड़े-बड़े लोग हैं। तो बस वही हो रहा है। स्वाध्याय कीजिए, आप समझ जाएँगे कि कहाँ से क्या चल रहा है, और कैसे बचना है।
क्या वज्र वैरोचनी साधना का अधिकार ऑनलाइन दिया जा सकता है?
बिना माला, बिना विधि-विधान, बिना गुरु परंपरा की साधना
एक श्रोता कहते हैं कि वज्र वैरोचनी की साधना का अधिकार बिना माला, बिना विधि-विधान और बिना गुरु परंपरा के ऑनलाइन दिया जा रहा है, और यह आश्चर्यजनक है। वक्ता कहते हैं कि आजकल यह चल रहा है; श्रोता ने जिस व्यक्ति का नाम लिया, उसका नाम लेकर वे कहते हैं कि वे कुछ भी कर सकते हैं, उनके गुरु वे स्वयं हैं। अपना आनंद लीजिए, कोई दिक्कत नहीं।
एक श्रोता कहते हैं कि वज्र वैरोचनी की साधना का अधिकार बिना माला, बिना विधि-विधान और बिना गुरु परंपरा के ऑनलाइन दिया जा रहा है, और यह आश्चर्यजनक है। श्रोता ने जिस शिक्षक का नाम लिया, उसका नाम लेकर वक्ता कहते हैं कि आजकल यह चल रहा है। वे कुछ भी कर सकते हैं। उनके गुरु वे स्वयं हैं। अपना आनंद लीजिए; कोई दिक्कत नहीं।
क्या साधक को अपना ज्ञान दिखाना चाहिए और गलत सिखाने वालों को सुधारना चाहिए?
जो भी बुद्धि मिले, उसका प्रदर्शन मत कीजिए
वक्ता गृहस्थ तंत्र के सभी साधकों से विनती करते हैं कि जो भी बुद्धि मिले, उसका कहीं प्रदर्शन न करें। किसी को रोकने की ज़रूरत नहीं। जहाँ आप खास तौर पर जानते हैं कि आपसे बड़े ज्ञानी और वैज्ञानिक लोग मौजूद हैं, और जहाँ भी आप बोलेंगे वहाँ आपको मारने, काटने और गाली देने पर उतर आएँगे — वहाँ ज़रूरत क्या है? छोड़िए, उन्हें अपना आनंद लेने दीजिए। उनका जीवन और उनकी नियति उन्हें वहाँ ले गई है।
वक्ता कहते हैं कि और कृपया, गृहस्थ तंत्र के जितने भी साधक हैं — आपको जो भी बुद्धि मिले, उसका कहीं प्रदर्शन मत कीजिए। किसी को रोकने की ज़रूरत नहीं। जहाँ आप खास तौर पर जानते हैं कि बड़े-बड़े ज्ञानी और वैज्ञानिक लोग मौजूद हैं, और जहाँ भी आप बोलेंगे वे आपको मारने, काटने, गाली देने पर उतर आएँगे — ज़रूरत क्या है? छोड़िए। उन्हें अपना आनंद लेने दीजिए। उनका जीवन, उनकी नियति, उन्हें वहाँ ले गई है।
लोग सही सलाह को अनदेखा करके ऐसी साधनाओं में क्यों उलझ जाते हैं?
नियति उन्हें वहाँ ले जाती है, और उसे भुगतवाएगी
वक्ता कहते हैं कि जैसे कुछ लोगों की नियति उन्हें ऐसी जगह ले जाती है कि स्वयं ब्रह्मा जी भी कहें कि विघ्नराज गणपति का पूजन करो, तुम्हारा सारा कष्ट दूर हो जाएगा — और गणपति की पूजा कैसे करें पूछने पर कहें कि भगवान को दूर्वा चढ़ाओ, उनके 108 नामों से चढ़ाओ — तब भी वे ब्रह्मा जी की बात नहीं मानेंगे, क्योंकि उनकी नियति ऐसी है। वे नहीं मानेंगे। नियति उन्हें भुगतवाकर ही संतुष्ट होगी; वे भुगतेंगे। और ठीक इसी तरह, जिनका पूर्ण विनाश होना है, ऐसे शापित लोगों की नियति उन्हें ले जाएगी: वे ऐसे देवी-देवताओं की साधना में उलझेंगे जो बिना विधि-विधान, बिना परंपरा, बिना क्रम साधना के हो ही नहीं सकती — यह सबके लिए नहीं है, पर वे करवा लेंगे।
वक्ता कहते हैं कि जैसे कुछ लोगों की नियति उन्हें ऐसी जगह ले जाती है जहाँ स्वयं ब्रह्मा जी उनसे कहें: अरे, विघ्नराज गणपति का पूजन करो, तुम्हारा सारा कष्ट दूर हो जाएगा। गणपति जी की पूजा कैसे करें? तो वे कहें: हाँ भैया, भगवान को दूर्वा चढ़ाओ, उनके नाम से उनके 108 नामों से चढ़ाओ। पर वे ब्रह्मा जी की बात नहीं मानेंगे, क्योंकि उनकी नियति ऐसी है। वे नहीं मानेंगे। नियति उन्हें भुगतवाकर ही संतुष्ट होगी; वे भुगतेंगे। और ठीक इसी तरह ऐसे लोगों की नियति उन्हें ले जाएगी — जिनका पूर्ण विनाश होना है, ऐसे शापित लोग — कि वे ऐसे देवी-देवताओं की साधना में उलझेंगे जो, भैया, बिना विधि-विधान, बिना परंपरा, बिना क्रम साधना के हो ही नहीं सकती। यह सबके लिए नहीं है। पर वे करवा लेंगे।
पार्वती गीता महाविद्याएँ कौन कर सकता है, इस बारे में क्या कहती है?
भगवती कहती हैं कि दसों में से किसी की भी दीक्षा ली जा सकती है
वक्ता कहते हैं कि ऐसी बातें कहकर — कि फलाँ लोग कहते हैं, ज्ञानी लोग कहते हैं कि यह साधना नहीं की जा सकती — उन्होंने लोगों के मन में भ्रम पैदा कर दिया है कि इस महाविद्या की साधना नहीं हो सकती। वे कहते हैं, संदर्भ देखिए: पार्वती गीता में भगवती ने कहा है कि दस महाविद्याओं में से किसी की भी दीक्षा लेकर आप कर सकते हैं। तो जो कह रहे हैं कि आप धूमावती की साधना नहीं कर सकते, छिन्नमस्तिका की साधना नहीं कर सकते, क्या वे पार्वती जी से बड़े हो गए? बिल्कुल ऐसा नहीं है। वे आपको भ्रमित कर रहे हैं ताकि आप साधना न कर सकें, आपको शक्ति न मिले, आप ज्ञानी न बनें। वे आप पर राज करना चाहते हैं — इसीलिए आपको यह साधना करने से मना कर रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि और वे यह बार-बार कहकर करवा लेंगे: कि अरे, फलाँ लोग कहते हैं, ज्ञानी लोग कहते हैं कि यह साधना नहीं करनी — और ऐसा करके उन्होंने लोगों के मन में भ्रम पैदा कर दिया है कि इस महाविद्या की साधना नहीं हो सकती। संदर्भ देखिए। पार्वती गीता में भगवती ने कहा है कि दस महाविद्याओं में से किसी की भी दीक्षा लेकर आप कर सकते हैं। तो ये लोग जो कह रहे हैं कि आप धूमावती की साधना नहीं कर सकते, छिन्नमस्तिका की साधना नहीं कर सकते — क्या ये पार्वती जी से बड़े हो गए? बिल्कुल ऐसा नहीं है। वे आपको भ्रमित कर रहे हैं ताकि आप साधना न कर सकें, आपको शक्ति न मिले, आप ज्ञानी न बनें। वे आप पर राज करना चाहते हैं। इसीलिए वे आपको यह साधना करने से मना कर रहे हैं। ऐसा बोलकर वे सबको भ्रमित करेंगे। बात सही है न? पार्वती गीता में भगवती ने कहा है — तो यह कौन है आपको रोकने वाला?
ग्रंथ अपने कुल के भीतर महाविद्या साधना की नीति और नियम बताते हैं, जिसमें यह भी कि कुल देवी श्री कुल की हैं या नहीं
अपने कुल में महाविद्या साधना की नीति और नियम
वक्ता कहते हैं कि पर पार्वती गीता के बाद जब आप ग्रंथों में जाते हैं और तंत्र का अध्ययन करते हैं, तो इस विषय पर स्पष्टता मिलती है: अगर आप मातंगी साधना करेंगे, तो उसकी नीति और नियम क्या हैं? आपके कुलदेवी-देवताओं का कोई विषय मौजूद है या नहीं? अगर आपके कुल की देवी श्री कुल की हैं और आप धूमावती साधना में चल पड़े हैं, तो कोई न कोई नियम और निष्ठा होगी। तो यही नीति है। इसमें आपको और मुझे कहीं दखल नहीं देना चाहिए। बस एक विषय याद रखिए: यहाँ मुंडी पूर्ण विनाश करने गया है, और ये त्रिपुर के लोग हैं। इनका पूर्ण विनाश हो रहा है — अपना आनंद लीजिए, सामने से देखिए, और अपने भीतर विद्वत्ता लाइए।
वक्ता कहते हैं कि पर पार्वती गीता के बाद जब आप ग्रंथों में जाते हैं, जब आप तंत्र का अध्ययन करते हैं, तो उसमें इस विषय पर स्पष्टता है भैया। कि अगर आप मातंगी साधना करेंगे, तो उसकी नीति और नियम क्या हैं? आपके कुलदेवी-देवताओं का कोई विषय मौजूद है, या नहीं है? अगर आपके कुल की देवी श्री कुल की हैं, और आप धूमावती साधना में चल पड़े हैं, तो कोई न कोई नियम और निष्ठा होगी। तो यही नीति है। इसमें आपको और मुझे कहीं दखल नहीं देना चाहिए। बस एक विषय याद रखिए: कि यहाँ मुंडी पूर्ण विनाश करने गया है, और ये त्रिपुर के लोग हैं। इनका पूर्ण विनाश हो रहा है; अपना आनंद लीजिए, सामने से देखिए। अपने भीतर विद्वत्ता लाइए। सीधी बात।
संकट नाशन स्तोत्र को गणपति के बीजाक्षर से कैसे संपुटित करें?
पहले गणपति प्रणव के चार लाख जप
वक्ता कहते हैं कि अगर आप संकट नाशन को भगवान गणपति के बीजाक्षर से संपुटित करके पढ़ना चाहते हैं, तो सबसे पहले गणपति प्रणव वाले एकाक्षरी बीज के कम से कम चार लाख जप कीजिए, और उसके बाद ही संपुट लगाइए — बहुत अच्छा होगा।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप संकट नाशन स्तोत्र को भगवान गणपति के बीजाक्षर से संपुट करके पढ़ना चाहते हैं, तो सबसे पहले गणपति प्रणव वाले एकाक्षरी बीज के कम से कम चार लाख जप कीजिए, और फिर संपुट लगाइए। बहुत अच्छा होगा भैया।
अगर साधना का संकल्प पूरा न हो तो क्या करें?
उस देवता से क्षमा प्रार्थना, पूजन और दीपदान
पूछा गया कि साधना का संकल्प लेकर पूरा न हो, तो क्षमा प्रार्थना के रूप में क्या करें। वक्ता कहते हैं: जिस देवता का था, उनसे क्षमा प्रार्थना आदि कीजिए, जहाँ तक हो सके उनका पूजन कीजिए, और दीपदान कीजिए।
लिया हुआ साधना संकल्प पूरा न हो, तो उसकी क्षमा प्रार्थना के लिए क्या करें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं। जिस देवता का था, उनसे क्षमा प्रार्थना आदि कीजिए; जहाँ तक हो सके उनका पूजन कीजिए; दीपदान कीजिए।
देहरी पर कौन-से दीपक जलते हैं, और क्या चौमुखा दीपक लगाया जा सकता है?
दो दीपक काफ़ी हैं, और घी या तेल इस पर निर्भर है कि दीपक किसका है
वक्ता कहते हैं कि चौमुखा दीपक आप चौखट पर लगा तो सकते हैं, पर बहुत सारे दीपक जलाने के बजाय दो दीपक काफ़ी हैं। घी का दीपक हो या तेल का, यह इस पर निर्भर करेगा कि आप देहरी पर किसके दीपक जला रहे हैं — क्योंकि वहाँ भगवान नरसिंह का दीपक भी जलेगा; वहाँ पितरों के लिए, कुल पितरों के लिए भी जलता है; वहाँ कुल भैरव जी के लिए भी होता है, और कुलदेवी के लिए भी। तो यह इस पर निर्भर करेगा कि आप किसका दीपक जला रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि भैया, चौमुखा दीपक आप चौखट पर लगा तो सकते हैं, पर बहुत सारे दीपक आदि जलाने के बजाय दो दीपक ही काफ़ी हैं। घी का दीपक हो या तेल का, यह इस पर निर्भर करेगा कि आप देहरी पर किस-किसका दीपक जला रहे हैं। क्योंकि वहाँ भगवान नरसिंह का दीपक भी जलेगा। वहाँ पितृ के लिए भी, कुल पितरों के लिए भी जलता है। वहाँ कुल भैरव जी के लिए भी होता है, और कुलदेवी के लिए भी। तो यह इस पर निर्भर करेगा कि आप किसका दीपक जला रहे हैं।
कोर्ट केस में जीत के लिए क्या करना चाहिए?
दुर्गा सप्तशती का ग्यारहवाँ अध्याय
वक्ता कहते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि कोर्ट केस किस विषय का है। भगवती दुर्गा की उपासना विजय देने वाली है — यह दुर्गा सप्तशती में, ग्यारहवें अध्याय से है। उसका पाठ करें तो सर्वोत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि कोर्ट केस में जीत के लिए — आप क्या करना चाहते हैं, यह इस पर निर्भर है कि कोर्ट केस किस विषय का है। भगवती दुर्गा की उपासना जय देने वाली है। यह दुर्गा सप्तशती में, ग्यारहवें अध्याय से है। उसका पाठ करें, तो सर्वोत्तम है।
जब बहुत बुरा समय आ जाए, तो क्या घर में धूमावती मंत्र का जप किया जा सकता है?
उनकी दृष्टि में यह घर में नहीं किया जा सकता
पूछा गया कि जब बहुत बुरा समय आ गया हो, तो क्या घर में धूमावती मंत्र का जप किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि इस प्रश्न का उत्तर वे पिछली सभी लाइव में दे चुके हैं — और उनकी दृष्टि में, भैया, आप नहीं कर सकते।
एक श्रोता पूछते हैं कि अगर बहुत बुरा समय आ गया हो, तो क्या घर में धूमावती मंत्र का जप किया जा सकता है। वक्ता प्रश्नकर्ता का नाम लेकर कहते हैं कि आपके प्रश्न का उत्तर हम पिछली सभी लाइव में दे चुके हैं। मेरी दृष्टि में, भैया, आप नहीं कर सकते।
क्या नरसिंह की मुख्य साधना के साथ कई देवताओं की साधनाएँ एक साथ की जा सकती हैं?
एक मुख्य साधना; बाकी केवल अंग
पूछा गया कि क्या भगवान नरसिंह की मुख्य साधना के साथ भगवती कामाख्या दुर्गा की साधना भी करनी चाहिए, और क्या उसके साथ बटुक भैरव की भी। वक्ता कहते हैं कि यह इस पर निर्भर करेगा कि मुख्य साधना किसकी होनी है। सबकी साधना एक साथ नहीं हो सकती; क्रमागत करनी होगी। और मुख्य साधना एक ही होगी — बाकी केवल अंगों में रहेंगी।
पूछा गया कि अगर भगवान नरसिंह की मुख्य साधना के साथ भगवती कामाख्या दुर्गा जी की साधना भी करनी है, तो क्या उसके साथ बटुक भैरव जी की साधना भी करनी चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं। भैया, यह इस पर निर्भर करेगा कि मुख्य साधना किसकी करनी है। सबकी साधना एक साथ नहीं हो सकती; क्रमागत करनी होगी। और मुख्य साधना एक होगी; बाकी केवल अंगों में रहेंगी।
क्या माँ दुर्गा का वाहन केवल सिंह है, या बाघ भी हो सकता है?
सिंह और बाघ दोनों
एक श्रोता कहते हैं कि कोशिश करने पर भी ध्यान में बंद आँखों से उन्हें केवल बाघ दिखता है, और पूछते हैं कि क्या माँ दुर्गा का वाहन केवल सिंह है या बाघ भी हो सकता है। वक्ता कहते हैं कि अच्छा है भैया: सिंह और बाघ, दोनों हो सकते हैं। फिर पूछा गया कि क्या वे उन माँ में त्रिकोण कर सकते हैं; वे कहते हैं कि अवश्य कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या माँ दुर्गा का वाहन केवल सिंह है या बाघ भी हो सकता है, यह कहते हुए कि कोशिश करने पर भी ध्यान में बंद आँखों से उन्हें केवल बाघ दिखता है। वक्ता कहते हैं कि अच्छा है भैया। सिंह और बाघ — दोनों हो सकते हैं। फिर पूछा गया कि क्या वे उन माँ में त्रिकोण कर सकते हैं; वक्ता कहते हैं कि अवश्य कर सकते हैं।
क्या गणपति के बारह नाम वाले स्तोत्र का 27000 का संकल्प लिया जा सकता है?
द्वादश नाम स्तोत्र का 27000 का संकल्प
पूछा गया कि क्या गणपति जी के द्वादश नाम स्तोत्र का 27000 का संकल्प लेकर किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि अवश्य किया जा सकता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या वे गणपति जी के द्वादश नाम स्तोत्र का 27000 का संकल्प ले सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि अवश्य किया जा सकता है।
क्या कुल के धर्म के विरुद्ध हो जाने वाली पत्नी को छोड़ना उचित है?
एक बार पाणिग्रहण संस्कार हो गया, तो पुरुष को हर उपाय करना है
एक श्रोता पूछते हैं कि जो पत्नी कुल और धर्म के प्रति विधर्मी हो जाए, या जानबूझकर उन्हें दबाने और परेशान करने वाला व्यवहार करे, उसे छोड़ना उचित है क्या, क्योंकि बहस सहन से बाहर है। वक्ता कहते हैं कि उचित व्यवस्था करने के बाद, हाँ। पर यह ध्यान रखिए: एक बार पाणिग्रहण संस्कार हो गया, तो जहाँ तक हो सके, वह पुरुष का कितना भी अपमान करे, वह अपना ही बना-बिगाड़ रही है। अपनी ओर से साम, दाम, दंड और भेद लगाकर प्रयास कीजिए कि वह धर्म मार्ग पर आए — यह आपकी ज़िम्मेदारी है। प्रेम से समझाकर, परिवार की सहायता लेकर, रिश्तेदारों की सहायता लेकर, देवी-देवताओं के माध्यम से, शास्त्रों के विषय बताकर — हर तरह से प्रयास कीजिए कि वह अनुकूल हो, खासकर जब आप धर्म मार्ग पर चल रहे हों।
एक श्रोता पूछते हैं कि अगर पत्नी कुल और धर्म के प्रति विधर्मी हो जाए, या उन्हें दबाने और परेशान करने के लिए जानबूझकर व्यवहार करे, तो क्या पत्नी का त्याग उचित है, क्योंकि बहस उनकी सहन-शक्ति से बाहर है। वक्ता कहते हैं कि उसके लिए उचित व्यवस्था करने के बाद — हाँ। यह विषय जो आप बोल रहे हैं: एक बार पाणिग्रहण संस्कार हो गया, तो उसके बाद पुरुष से जितना हो सके, वह कितना भी अपमान कर रही हो, वह अपना बना-बिगाड़ रही है — यह बात ध्यान रखिए। अपनी ओर से साम, दाम, दंड और भेद लगाकर प्रयास कीजिए कि वह धर्म मार्ग पर आए। यह आपकी ज़िम्मेदारी है। प्रेम से समझाकर, परिवार का सहयोग लेकर, रिश्तेदारों का सहयोग लेकर, देवी-देवताओं के माध्यम से, शास्त्रों के विषय आदि बताकर — हर तरह से प्रयास कीजिए कि वह अनुकूल हो। खासकर जब आप धर्म मार्ग पर चल रहे हों।
जब पत्नी साथ चलने को तैयार न हो, तो क्या उसका त्याग उचित है?
उसका योगक्षेम उठाना पति की ज़िम्मेदारी बनी रहती है
वक्ता कहते हैं कि और अगर तब भी वह न माने और साथ चलना संभव न हो, तो ऐसी परिस्थिति में भी, अगर आप उसका त्याग करना चाहें, तो मेरी दृष्टि में, भैया, त्याग उचित नहीं। उसका योगक्षेम उठाने की ज़िम्मेदारी, कर्तव्य आपका है। इसलिए अगर त्याग करना ही हो, तो ऐसा हो कि उसकी पूरी व्यवस्था की जाए, और त्याग आपके मन से हो। वे जोड़ते हैं कि आपने शास्त्रोक्त दृष्टि से पूछा है, इसलिए वे आज का आधुनिक उत्तर नहीं दे सकते; वह आपका निर्णय होगा कि तलाक देंगे या कैसे व्यवहार करेंगे। पर एक साधक के अनुसार, ऐसी परिस्थिति में साधक को क्या करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि और अगर उसके बाद भी वह न माने, और साथ चलना संभव न हो, तो ऐसी परिस्थिति में भी, अगर आप उसका त्याग करना चाहें — मेरी दृष्टि में, भैया, त्याग उचित नहीं है। उसका योगक्षेम उठाने की ज़िम्मेदारी, कर्तव्य, आपका है। तो अगर त्याग करना ही हो, तो ऐसा हो कि उसकी व्यवस्था पूरी हो। त्याग आपके मन से हो। क्योंकि आपने शास्त्रोक्त दृष्टि से पूछा है — आज के समय में जो विषय है, उसका आधुनिक उत्तर हम नहीं दे सकते; वह आपका निर्णय होगा कि तलाक देंगे, कैसे व्यवहार करेंगे, या नहीं करेंगे। पर एक साधक के अनुसार: ऐसी परिस्थिति में साधक को क्या करना चाहिए?
त्याग किस शर्त पर अनुमत है?
जीवन भर के भरण-पोषण की व्यवस्था, और उससे कोई इच्छा न रखना
वक्ता कहते हैं कि परिस्थिति कितनी भी कठिन हो जाए, अपनी पत्नी का त्याग उसके भरण-पोषण का कर्तव्य छोड़कर नहीं किया जा सकता। इसलिए उसके भरण-पोषण के कर्तव्य की पूरी व्यवस्था जीवन भर के लिए की जाए, या जितना शरीर संभाल सके, और उसके अनुसार उसका पालन कीजिए। बाकी, उससे कोई इच्छा न रखिए। त्याग का यह अर्थ भी नहीं कि अब आप उसके हाथ का खाना-पानी भी नहीं लेंगे। तो उचित व्यवस्था करने के बाद आप त्याग अवश्य कर सकते हैं; इसमें कोई दोष नहीं।
वक्ता कहते हैं कि परिस्थिति कितनी भी कठिन हो जाए, अपनी पत्नी का त्याग उसके भरण-पोषण का कर्तव्य छोड़कर नहीं किया जा सकता। तो उसके भरण-पोषण के कर्तव्य की पूरी व्यवस्था उसके लिए जीवन भर के लिए की जाए — या जितना शरीर संभाल सके, और उसके अनुसार आपको उसका पालन करना चाहिए। बाकी, उससे कोई इच्छा न रखिए। त्याग का यह अर्थ भी नहीं हो गया कि अब आप उसके हाथ का खाना-पानी भी नहीं लेंगे। तो उचित व्यवस्था करने के बाद आप त्याग अवश्य कर सकते हैं; इसमें कोई दोष नहीं। वे जोड़ते हैं कि बहुत सारे विषय हैं, पर लोगों को वे पचेंगे नहीं। शास्त्रोक्त दृष्टि से, पंक्ति-पंक्ति करके उत्तर दिया जाए — देखिए, यहाँ लिखा है, वहाँ लिखा है — तब भी नहीं पचेगा। इसलिए हम कहते हैं: स्वाध्याय स्वयं कीजिए।
क्या जप के दौरान बाएँ हाथ से दीपक में तेल भरा जा सकता है, और कौन-सी बाती लगती है?
कर्म साक्षी दीपक में सोई बाती; खड़ी बाती प्रयोग के लिए
वक्ता कहते हैं कि भैया, पहले तो बड़ा दीपक रखिए: अगर दो-तीन घंटे जप करना है, तो उसी हिसाब से दीपक रखिए ताकि बार-बार तेल न डालना पड़े। एक बड़ा दीपक खरीद लीजिए। माला एक हाथ में है, इसलिए उल्टे हाथ से तेल डालना चाहें तो डाल सकते हैं — इसमें कोई बात नहीं। कर्म साक्षी की बाती सोई बाती होगी। खड़ी बाती प्रयोग में लगती है: जब हम किसी मंत्र का प्रयोग कर रहे हों, तब खड़ी बाती लगेगी।
एक श्रोता पूछते हैं कि सीधे हाथ से माला का जप करते हुए दीपक में तेल कम हो जाए, तो क्या उल्टे हाथ से तेल डाल सकते हैं; और क्या कर्म साक्षी दीपक की बाती सोई बाती हो या खड़ी बाती। वक्ता कहते हैं कि भैया, सबसे पहले बड़ा दीपक रखने की आदत बनाइए। अगर दो-तीन घंटे जप करना है, तो उसी हिसाब से दीपक रखिए, ताकि बार-बार तेल न डालना पड़े। एक बड़ा दीपक खरीद लीजिए। आप उल्टे हाथ से तेल डालना चाहते हैं — माला एक हाथ में है, तो डाल सकते हैं; इसमें कोई बात नहीं। कर्म साक्षी की जो बाती होगी, वह सोई बत्ती होगी। खड़ी बत्ती प्रयोग में लगती है। जब हम किसी मंत्र का प्रयोग कर रहे हों, तब खड़ी बाती लगेगी।
किसी तांत्रिक को उसके किए पाप का दंड कैसे दिया जा सकता है?
दंड देने का सामर्थ्य न आपमें है, न मुझमें
पूछा गया कि किसी तांत्रिक को उसके किए पाप का दंड कैसे दिया जाए, भले वह तांत्रिक उन्हीं देवी-देवता को पूजता हो जिन्हें हम पूजते हैं। वक्ता कहते हैं कि भैया, दंड देने का सामर्थ्य न आपमें है, न मुझमें। और अगर सामर्थ्य है, तो प्रश्न पूछने की ज़रूरत ही नहीं: सिद्धि प्रत्यक्ष हो, मंत्र शुद्ध हो, और सीधे प्रयोग कीजिए।
पूछा गया कि किसी तांत्रिक को उसके किए पाप का दंड कैसे दिया जाए, भले वह तांत्रिक उन्हीं देवी-देवता को पूजता हो जिन्हें हम पूजते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं। भैया, दंड देने का सामर्थ्य न आपमें है, न हममें। और अगर सामर्थ्य है, तो प्रश्न पूछने की ज़रूरत ही नहीं। सिद्धि प्रत्यक्ष हो, मंत्र शुद्ध हो — तब सीधे प्रयोग कीजिए।
कुलदेवी पर लगाया गया बंधन कैसे खोला जाता है?
प्रचंड साधना से मंत्र सिद्ध कीजिए और उससे उसकी विद्या बाँधिए
पूछा गया कि कुलदेवी पर किसी भी देवता द्वारा लगाया गया हर तरह का बंधन कैसे खोलें, जब तांत्रिक समय-समय पर वह बंधन बढ़ाता रहता है। वक्ता कहते हैं कि इसके लिए पहले किसी एक देवी-देवता की प्रचंड साधना करके मंत्र आदि सिद्ध कीजिए। और उस सिद्धि से, जिस भी मंत्र को आपने जागृत किया — भगवान नरसिंह का माला मंत्र ही देखिए: बहुत लोग भगवान शिव के मंदिर में, भगवान नारायण के मंदिर में, पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर उस तरह जप करके भगवान नरसिंह का माला मंत्र सिद्ध करते हैं। फिर उसके प्रयोग से पहले अधर्म भरा काम करने वाले तांत्रिक की विद्या और उसके आभिचारिक देवताओं का बंधन होगा; और आपके अपने देवी-देवताओं का सामर्थ्य पूरी तरह बढ़ेगा। इसमें भावनात्मक प्रयोग भी करना चाहिए।
पूछा गया कि कुलदेवी पर किसी भी देवता द्वारा लगाया गया हर तरह का बंधन कैसे खोलें, जब वह तांत्रिक समय-समय पर वह बंधन बढ़ा रहा है। वक्ता उत्तर देते हैं। इसके लिए सबसे पहले आपको किसी एक देवी-देवता की प्रचंड साधना करके मंत्र आदि सिद्ध करना चाहिए। और उस सिद्धि से, जिस भी मंत्र को आपने जागृत किया है — बहुत चीज़ें देखिए; भगवान नरसिंह का माला मंत्र ही देखिए। भगवान नरसिंह का माला मंत्र: लोग भगवान शिव के मंदिर में, भगवान नारायण के मंदिर में, पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के पेड़ के नीचे, इस तरह बैठकर जप आदि करके उसे सिद्ध करते हैं। फिर उसके प्रयोग से पहले अधर्म भरा काम करने वाले तांत्रिक की विद्या, और उसके आभिचारिक देवताओं का बंधन होगा। और आपके अपने देवी-देवताओं का सामर्थ्य पूरी तरह बढ़ेगा। इसमें भावनात्मक प्रयोग भी करना चाहिए।
श्री यंत्र की पूजा का अधिकार किसे है?
श्री यंत्र पूजन श्री विद्या में दीक्षितों का है
वक्ता कहते हैं कि पहला विषय यह है: श्री यंत्र के पूजन का अधिकार श्री विद्या में दीक्षित साधकों और साधिकाओं का है। गुरु आदेश से जो विधि बताई जाती है, उसी के अनुसार श्री यंत्र का पूजन होगा। श्री यंत्र का मंत्रहीन पूजन सामान्यतः नहीं होता। कम से कम गुरु पादुका मंत्र से, और श्री विद्या में आपने जिनकी दीक्षा ली है उनके मंत्र से होता है। वे कहते हैं कि यही दृष्टि है, यही विषय है; बाकी यह विषय मानना या न मानना आपकी इच्छा है।
एक श्रोता ने अपने घर के मंदिर में स्फटिक श्री यंत्र स्थापित किया है और रोज़ उसका अभिषेक और पंचोपचार पूजन करती हैं। वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला विषय यह है: श्री यंत्र के पूजन का अधिकार श्री विद्या में दीक्षित साधकों और साधिकाओं का है। गुरु आदेश से जो भी विधि बताई जाती है, उसी विधि के अनुसार श्री यंत्र का पूजन होगा। श्री यंत्र का मंत्रहीन पूजन सामान्यतः नहीं होता। कम से कम उसका पूजन गुरु पादुका मंत्र से, और श्री विद्या में आपने जिनकी भी दीक्षा ली हो उनके मंत्र से होता है। जो दृष्टि है, जो विषय है, वह हम बता रहे हैं। बाकी यह विषय आप मानें या न मानें, यह आपकी इच्छा है।
जब घर में पूजा करने वाली को यात्रा पर जाना हो, तो यंत्र का क्या करें?
साथ ले जाने के बजाय सुगंधित लाल सूती वस्त्र में लपेटकर प्रार्थना कीजिए
एक श्रोता कहती हैं कि उनके घर में कोई और पूजा नहीं करता — न सास, न ससुर, न पति — और उन्हें कुछ दिनों के लिए मायके जाना है; वे पूछती हैं कि किस विधि से ले जाएँ। वक्ता कहते हैं कि अगर घर में रोज़ अभिषेक और पंचोपचार पूजन करने वाला कोई नहीं होगा, तो साथ ले जाना, स्थान बदलना, देहरी लाँघना उचित नहीं। और आप उन्हें छोड़ भी नहीं सकतीं। एक काम कर सकती हैं: शुद्ध सूती लाल कपड़ा लीजिए और इत्र आदि लगाकर उसे सुगंधित कीजिए। यंत्र को चारों ओर से लपेट दीजिए — यानी उस कपड़े से ढक दीजिए। धूप-दीप दिखाइए। और उनसे प्रार्थना कीजिए कि इतने दिनों बाद जब मैं आऊँगी, तो फिर आपकी सेवा और पूजन करूँगी।
एक श्रोता कहती हैं कि उनके घर में कोई पूजा नहीं करता — न सास, न ससुर, न पति — और उन्हें कुछ दिनों के लिए मायके जाना है। वक्ता कहते हैं कि अगर घर में रोज़ अभिषेक और पंचोपचार पूजन करने वाला कोई नहीं होगा, तो साथ ले जाना — स्थान बदलना, चौखट लाँघना — उचित नहीं है। और आप उन्हें छोड़ भी नहीं सकतीं। एक काम आप कर सकती हैं: शुद्ध सूती लाल कपड़ा लीजिए, और इत्र आदि लगाकर उस कपड़े को सुगंधित कीजिए। और यंत्र को चारों ओर से लपेट दीजिए — यानी उस कपड़े से उन्हें ढक दीजिए। धूप-दीप दिखाइए। और उनसे प्रार्थना कीजिए कि जब इतने दिनों बाद मैं आऊँगी, तो फिर आपकी सेवा और पूजन करूँगी।
जिस घर में मांस खाया जाता हो, वहाँ शुचिता कैसे रखें?
मांसाहारियों के बीच सात्विक साधना, और पुंडरीकाक्ष का जप
एक श्रोता बताते हैं कि घर में अक्सर चिकन खाया जाता है, बिना हाथ धोए बर्तन धोए जाते हैं और बेसिन का नल छुआ जाता है, बाल्टी बाथरूम के साथ रखी जाती है; वे पूछते हैं क्या करें। वक्ता कहते हैं कि अब यह रावण की लंका में विभीषण बनने की कोशिश वाली बात हो गई। चिकन खाने वालों के बीच सात्विक साधना बड़ी कठिनाई है भैया। इसके लिए आपसे क्या कहें — जितना हो सके शुचिता का ध्यान रखिए। अपना सामर्थ्य बढ़ाइए, जहाँ तक हो सके प्रयास कीजिए। जहाँ तक हो सके भगवान पुंडरीकाक्ष का जप करते रहिए; उनके जप से शुद्धता मिलती रहेगी। समर्थ होकर एकनिष्ठ बनिए। एकांतिक बनिए, अलग होइए।
एक श्रोता बताते हैं कि घर में कई बार चिकन खाया जाता है, बिना हाथ धोए बर्तन धोए जाते हैं और बेसिन का नल छुआ जाता है, बाल्टी बाथरूम के साथ ही रखी जाती है, और पूछते हैं कि क्या करें। वक्ता कहते हैं कि अब देखिए, यह रावण की लंका में विभीषण बनने की कोशिश वाली बात हो गई। यहाँ अब विषय बस यही है। चिकन खाने वालों के बीच सात्विक साधना बड़ी कठिनाई है भैया। इसके लिए आपसे क्या कहें — जितना भी शुचिता का ध्यान रख सकें। अपना सामर्थ्य बढ़ाइए; जहाँ तक हो सके प्रयास कीजिए। जहाँ तक हो सके भगवान पुंडरीकाक्ष का जप करते रहिए; उनके जप से शुद्धता मिलती रहेगी। समर्थ होकर एकनिष्ठ बनिए। एकांतिक बनिए; अलग होइए।
बटुक भैरव के वाहन का नाम क्या है?
काल कंटक काल भैरव का वाहन है
बटुक भैरव जी के वाहन का नाम पूछे जाने पर वक्ता पहले काल कंटक कहते हैं, फिर स्वयं सुधारते हैं: काल भैरव जी के वाहन का नाम काल कंटक है। बटुक भैरव जी के वाहन का नाम अलग है और अभी ध्यान में नहीं आ रहा। काल कंटक उनका है, काल भैरव जी का, मुख्य स्वरूप का। फिर पूछा गया कि माता केला देवी के भैरव जी कौन हैं; वे कहते हैं कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है।
बटुक भैरव जी के वाहन का नाम पूछे जाने पर वक्ता पहले काल कंटक कहते हैं, और फिर स्वयं को सुधारते हैं। काल भैरव जी के वाहन का नाम काल कंटक है। बटुक भैरव जी के वाहन का नाम अलग है; अभी ध्यान में नहीं आ रहा। काल कंटक उनका है — काल भैरव जी का, मुख्य स्वरूप का। माता केला देवी के भैरव जी कौन हैं, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं कि भैया, इसकी जानकारी नहीं है।
क्या पिता की मृत्यु के बाद साधना की जा सकती है, और कौन-सा अध्याय?
पूर्ण आयु के लिए गीता का दसवाँ अध्याय, अचानक मृत्यु के लिए सातवाँ या ग्यारहवाँ
वक्ता कहते हैं कि भैया, आप अभी भी साधना कर सकते हैं। साधना में श्रीमद् भगवद्गीता की साधना कीजिए। अगर पिता की मृत्यु पूर्ण आयु पाकर हुई है, तो दसवाँ अध्याय पढ़िए, संकल्प लीजिए और उनके लिए साधना कीजिए। अगर अचानक आदि हुई है, तो सातवाँ अध्याय या ग्यारहवाँ अध्याय पढ़िए।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनके पिता का देहांत हो गया है। वक्ता कहते हैं कि तो भैया, आप अभी भी साधना कर सकते हैं। साधना में श्रीमद् श्रीमद्भगवद्गीता की साधना कीजिए। अगर पिता की मृत्यु पूर्णायु पाकर हुई है, तो दसवाँ अध्याय पढ़कर और संकल्प लेकर उनके लिए साधना कीजिए। अगर आकस्मिक आदि है, तो सातवाँ अध्याय या ग्यारहवाँ अध्याय पढ़िए।
भगवती महाकाली और बटुक भैरव को क्या प्रिय है?
भगवती को अर्चन और हवन, भैरव स्वरूपों को जप
पूछा गया कि जैसे शिव जी को अभिषेक और गणेश जी को तर्पण प्रिय है, वैसे भगवती महाकाली और बटुक भैरव जी को क्या प्रिय है। वक्ता कहते हैं कि भगवती महाकाली को अर्चन प्रिय है; भगवती के सभी स्वरूपों को अर्चन बहुत प्रिय है; 64 योगिनियों को भी अर्चन बहुत प्रिय है; और अर्चन के साथ हवन बहुत प्रिय है। और बटुक भैरव जी को क्या प्रिय है — अगर आप खास तौर पर भैरव स्वरूप में जाएँ, तो जितने भी भैरव हैं, भैरव स्वरूप, वे सबसे ज़्यादा और जल्दी जप से प्रसन्न होते हैं। भगवान को जप बहुत प्रिय है।
पूछा गया कि जैसे शिव जी को अभिषेक और गणेश जी को तर्पण प्रिय है, वैसे भगवती महाकाली और बटुक भैरव जी को क्या प्रिय है। वक्ता उत्तर देते हैं। भगवती महाकाली को अर्चन प्रिय है। भगवती के सभी स्वरूपों को अर्चन बहुत प्रिय है। 64 योगिनी को भी अर्चन बहुत प्रिय है। अर्चन के साथ हवन बहुत प्रिय है। और बटुक भैरव जी को क्या प्रिय है — अगर आप खास तौर पर भैरव स्वरूप में जाएँ, तो जितने भी भैरव हैं, भैरव स्वरूप, वे सबसे ज़्यादा, जल्दी, जप से प्रसन्न होते हैं। भगवान को जप बहुत प्रिय है।
क्या सिद्धासन में पैर देवता की ओर हों तो दोष लगता है?
इसके बजाय अपनी दिशा बदलिए
पूछा गया कि सिद्धासन में बैठते समय पैर आगे करने पड़ते हैं और इसलिए देवता की ओर जाते हैं, तो क्या दोष लगेगा। वक्ता पूछते हैं कि आप कैसे बैठ रहे हैं कि पैर आगे की ओर जा रहा है — ऐसे मत बैठिए। अपनी दिशा थोड़ी बदल लीजिए।
एक श्रोता कहते हैं कि सिद्धासन में बैठते समय पैर आगे करने पड़ते हैं, तो पैर देवता की ओर जाते हैं, और पूछते हैं कि क्या दोष लगेगा। वक्ता कहते हैं कि भैया, आप कैसे बैठ रहे हैं कि पैर आगे की ओर जा रहा है — ऐसे मत बैठिए। अपनी दिशा थोड़ी बदल लीजिए।
क्या सर्दी में बिना नहाए, केवल हाथ-पैर धोकर पूजा की जा सकती है?
कटि स्नान अंतिम उपाय है; स्नान छोड़ना नहीं है
वक्ता कहते हैं कि नहीं भैया, आप नहीं कर सकते। सर्दी है, तो गर्म पानी से नहाइए। शरीर बहुत संवेदनशील हो, तो कटि स्नान कीजिए, कमर से नहाइए। बाल मत धोइए। कंधे से नहाइए — पर नहाइए ज़रूर। सबसे अंतिम स्तर कमर से नहाना है। ठंड के मौसम में शौच आदि के बाद कपड़े पूरे बदलने होंगे, और कम से कम कमर से पूरा नहाना चाहिए; उसके बाद पूजन के बारे में सोच सकते हैं।
पूछा गया कि शरद ऋतु में शौच आदि के बाद नहा न सकें, तो क्या हाथ-पैर धोकर पूजा की जा सकती है, और क्या कोई दोष लगेगा। वक्ता उत्तर देते हैं। नहीं भैया, आप नहीं कर सकते। शरद है, तो गर्म पानी से नहाइए। शरीर बहुत संवेदनशील हो, तो कटि स्नान कीजिए — कमर से नहाइए। बाल मत धोइए। कंधे से नहाइए; पर नहाइए ज़रूर। सबसे अंतिम स्तर कमर से नहाना है। शौच आदि के बाद, ठंड के समय में, कपड़े पूरे बदलने होंगे, और कम से कम कमर से पूरा नहाना चाहिए। उसके बाद आप पूजन आदि के बारे में सोच सकते हैं।
पीपल के पेड़ पर उगने वाला पेड़ किस काम आता है?
बांदा, वनस्पति तंत्र का विषय
एक श्रोता याद दिलाते हैं कि वक्ता ने कहा था कि पीपल के पेड़ पर एक और पेड़ उगता है और उसका प्रयोग होता है। वक्ता कहते हैं कि भैया, आप फिर से बांदा की बात कर रहे हैं — वह वनस्पति तंत्र का विषय है। वनस्पति तंत्र के लिए कभी इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
एक श्रोता याद दिलाते हैं कि वक्ता ने एक बार बताया था कि पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के पेड़ पर एक और पेड़ उगता है, और उसका प्रयोग होता है। वक्ता कहते हैं कि भैया, आप फिर से बांदा की बात कर रहे हैं — वह वनस्पति तंत्र का विषय है। वनस्पति तंत्र के लिए कभी इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
क्या घर की दूसरी मंज़िल पर शिवालय बनाया जा सकता है?
मंदिर का अपना वास्तु शास्त्र होता है, और नीचे की ज़मीन पाताल बन जाती है
वक्ता कहते हैं कि अगर आप किसी मंदिर के विशेष, पूरे शिवालय की बात कर रहे हैं, तो वह नहीं बनाया जा सकता — शिव मंदिर केवल शिव मंदिर के पूरे विधि-नियम के अनुसार ही बनवाइए। सामान्यतः घर में स्फटिक शिवलिंग आदि रखकर पूजन करें, तो पूरा फल मिलेगा; नर्मदेश्वर जी का पूजन करें, तो भी मिलेगा। पर घर की देव मंज़िल पर शिवालय बनाना चाहना, जैसा आजकल बहुत हो रहा है — घर में मंदिर बनाना — उचित नहीं, क्योंकि मंदिर का अपना वास्तु शास्त्र है। जब शिव मंदिर स्थापित होता है, तो उसके नीचे की ज़मीन पाताल की स्थिति बन जाती है; आपकी पूरी नीचे की ज़मीन उन गणों का स्थान बन जाती है जो उसमें रहते हैं, और यह कठिनाई बनेगी।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या घर की दूसरी मंज़िल पर, ईशान कोण में, शिवालय बनाया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि अगर आप किसी मंदिर के विशेष और पूरे शिवालय की बात कर रहे हैं, तो वह नहीं बनाया जा सकता। शिव मंदिर केवल शिव मंदिर के पूरे विधि-नियम के अनुसार ही बनवाइए। सामान्यतः अगर घर में स्फटिक शिवलिंग आदि रखकर पूजन करें, तो भी पूरा फल मिलेगा; नर्मदेश्वर जी का पूजन करें, तो भी मिलेगा। पर आप घर में देव मंज़िल पर शिवालय बनाना चाहते हैं। आजकल यह विषय बहुत हो रहा है — घर में मंदिर बनाना। यह उचित नहीं है। क्योंकि मंदिर का अपना वास्तु शास्त्र होता है। जब शिव मंदिर स्थापित होता है, तो उसके नीचे की ज़मीन पाताल की स्थिति बन गई। आपकी पूरी नीचे की ज़मीन उन गणों का स्थान बन जाएगी जो वहाँ रहते हैं, और यह कठिनाई होगी।
क्या सपने में सुने वैदिक मंत्रों का जप बिना जनेऊ के किया जा सकता है?
यज्ञोपवीत के बिना वैदिक मंत्रों का अधिकार नहीं
एक श्रोता कहते हैं कि सपने में उन्हें वैदिक मंत्र बोले जा रहे हैं, और पूछते हैं कि क्या उनका जप शुरू कर सकते हैं; वे जोड़ते हैं कि विवाह के बाद उनका जनेऊ नहीं हुआ। वक्ता पूछते हैं कि जब आपका यज्ञोपवीत ही नहीं हुआ, तो आप वैदिक मंत्र कैसे कर सकते हैं? अगर सपने में कर रहे हैं, तो यह किसी न किसी पितर की कृपा है, और वे चाहते हैं कि आप करें — इसलिए आपको जनेऊ करवा लेना चाहिए। जनेऊ के बिना, चाहे सपने में मिले या प्रत्यक्ष मिले, किसी भी अधिकार से आप वैदिक मंत्र नहीं कर सकते।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या वे अपने सपने में बोले जा रहे वेद मंत्रों का जप शुरू कर सकते हैं; वे कहते हैं कि विवाह के बाद जनेऊ नहीं हुआ। वक्ता पूछते हैं कि सपने में वेद मंत्र बोले जा रहे हैं — पर जब आपका वह यज्ञोपवीत ही नहीं हुआ, तो आप वेद मंत्र कैसे कर सकते हैं? अगर आप सपने में कर रहे हैं, तो यह किसी न किसी पितृ की कृपा है, और वे चाहते हैं कि आप करें — तो आपको जनेऊ करवा लेना चाहिए। जनेऊ के बिना, चाहे सपने में मिले या प्रत्यक्ष मिले, किसी भी अधिकार से आप वैदिक मंत्र नहीं कर सकते।
क्या पहला अनुष्ठान जिस दिन समाप्त हो, उसी दिन दूसरा शुरू किया जा सकता है?
चतुर्दशी से फिर शुरू करना
पूछा गया कि अष्टमी से चतुर्दशी तक देव अनुष्ठान चल रहा हो, तो क्या उसी दिन चतुर्दशी से फिर दूसरा अनुष्ठान शुरू किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि कर सकते हैं — कोई दिक्कत नहीं।
एक श्रोता कहते हैं कि अष्टमी से चतुर्दशी तक देव अनुष्ठान चल रहा है, और पूछते हैं कि क्या चतुर्दशी से, उसी दिन फिर, दूसरा अनुष्ठान शुरू किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि कर सकते हैं; कोई दिक्कत नहीं।
शालिग्राम सेवा हर किसी को क्यों नहीं बताई जाती?
जिनके लिए नहीं है, उनके लिए शालिग्राम सेवा जटिल हो जाती है
क्योंकि शालिग्राम जी हर किसी के और सबके पूजन का विषय नहीं हैं — उनके लिए यह थोड़ा जटिल हो जाता है — वक्ता प्रश्नकर्ता का नाम लेकर कहते हैं कि वे इस पर नहीं बोलेंगे।
वक्ता श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि क्योंकि शालिग्राम जी — हर किसी के, सबके पूजन का विषय उनके लिए थोड़ा जटिल हो जाता है — इस कारण हम इस पर नहीं बोलेंगे।
कैसे पता करें कि मृत्यु अभिचार से हुई, और आत्मा को कैसे मुक्त करें?
परिवार को पता चलता है, और सपने इसे स्पष्ट कर देते हैं
वक्ता कहते हैं कि अगर वे परिवार के सदस्य हैं, तो समझ आ जाएगा। चाहे आप उनके लिए तर्पण करें या कुछ भी करें, आपको शांति नहीं मिलेगी। जब आप किसी को लक्ष्य करके, किसी अतृप्त आत्मा के लिए या किसी मृत व्यक्ति के लिए सेवा-पूजा करते हैं, तो आपको भी संतोष मिलेगा। एक श्रोता जोड़ते हैं कि घर में पंद्रह-सोलह साल से तंत्र की समस्या है, और यह सपनों आदि से समझ आता है। वक्ता कहते हैं कि ऐसा सपना आएगा जिससे समझ आ जाएगा कि जिनकी मृत्यु हुई है, वे आभिचारिक स्थिति में मरे हैं — गति नहीं है। कई बार तो ये लोग ऊपर ही हो जाते हैं।
पूछा गया कि अगर संदेह हो कि किसी का निधन अभिचार से हुआ, तो कैसे पता करें कि उनकी आत्मा किसी तांत्रिक के बंधन में है, और उसे उससे कैसे मुक्त करें। वक्ता उत्तर देते हैं। भैया, अगर वे परिवार के सदस्य हैं, तो समझ आ जाएगा। चाहे आप उनके लिए तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। करें, चाहे कुछ भी करें, आपको शांति नहीं मिलेगी। जब आप किसी को लक्ष्य करके, किसी अतृप्त आत्मा के लिए या किसी मृत व्यक्ति के लिए सेवा और पूजा करते हैं, तो आपको भी संतोष मिलेगा। एक श्रोता जोड़ते हैं कि घर में पंद्रह-सोलह साल से तंत्र की समस्या है, और यह सपनों आदि से समझ आता है। वक्ता कहते हैं कि ऐसा सपना आएगा जिससे समझ आ जाएगा कि जिनकी मृत्यु हुई है, वे आभिचारिक स्थिति में मरे हैं। गति नहीं है। कई बार तो ये लोग ऊपर ही हो जाते हैं।
क्या व्यक्ति पड़ोसी के तंत्र प्रयोग की काट स्वयं कर सकता है?
काट हवन से होगी; पहले विषय समझिए
पूछा गया कि क्या पड़ोसियों द्वारा की गई तंत्र समस्या की काट स्वयं की जा सकती है, और नहीं तो किस तरह के साधक से करवाएँ, और क्या यह हवन से होगी। वक्ता कहते हैं कि काट होगी — चैनल पर बहुत सारे वीडियो हैं। भैया, विषय समझिए; केवल कहने से नहीं होता।
क्या गुरु दत्तात्रेय को लाल रोली का तिलक लगाया जा सकता है?
दत्त वह एक देवता हैं जिनकी सेवा हर कोई कर सकता है
वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल लगा सकते हैं; और अगर कहीं कहा गया है कि नहीं लगा सकते, तो वह विषय कम से कम भगवान दत्त पर लागू नहीं होता। भगवान दत्त ऐसे एक देवता हैं जिनकी सेवा-पूजा गृहस्थ भी कर सकता है और परम विरक्त भी; जो परम आसक्त है, मलिन से मलिन साधक, और स्वच्छ से स्वच्छ व्यक्ति — दोनों कर सकते हैं।
क्या गुरु दत्तात्रेय जी को लाल रोली का तिलक लगाया जा सकता है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल लगाया जा सकता है। और अगर कहीं यह विषय बोला गया है कि आप नहीं लगा सकते, तो यह विषय कम से कम भगवान दत्त पर लागू नहीं होता। भगवान दत्त ऐसे एक देवता हैं जिनकी सेवा और पूजा गृहस्थ भी कर सकता है और परम विरक्त भी; जो परम आसक्त है, मलिन से मलिन साधक, और स्वच्छ से स्वच्छ व्यक्ति — दोनों कर सकते हैं।
अगर महिषासुर मर्दिनी कुलदेवी हों, तो क्या उनकी मूर्ति पूजा स्थान में रखी जा सकती है?
जहाँ कुल विधान पिंड का रहा, वहाँ पिंड और चित्र रखिए
वक्ता कहते हैं कि अगर भगवती का वही स्वरूप आपकी कुलदेवी है, तो रखिए — इसमें क्या बात है। अगर आपकी कुलदेवी छिन्नमस्तिका हैं, तो उनका भी रखिए और उनकी पूजा कीजिए। पर पहले पिंड का विधान चलता था; पिंड में छिन्नमस्तिका का पूजन होता था, और श्री विग्रह का विधान नहीं रहा। तो अगर आपके कुल में महिषासुर मर्दिनी के पिंड का विधान भी चला है, पहले से चलता आ रहा है, तो छाया चित्र रखिए और पिंड रखिए। श्री विग्रह मत रखिए — इसके पीछे कारण है। और अगर पहले से श्री विग्रह रहा है, तो उसे रखिए।
एक श्रोता कहती हैं कि महिषासुर मर्दिनी उनकी कुलदेवी हैं, और पूछती हैं कि क्या उनकी मूर्ति पूजन स्थान में रखी जा सकती है, और नहीं तो कोई वैकल्पिक उपाय। वक्ता कहते हैं कि नहीं — अगर भगवती का वही स्वरूप आपकी कुलदेवी है, तो रखिए। फिर क्या बात है। अगर आपकी कुलदेवी छिन्नमस्तिका हैं, तो उनका भी रखिए और उनकी पूजा कीजिए। पर पहले पिंड का विधान चलता था। पिंड में छिन्नमस्तिका का पूजन होता था। श्री विग्रह का विधान नहीं रहा। तो अगर आपके कुल में महिषासुरमर्दिनी के पिंड का विधान भी चला है, अगर पहले से चलता आ रहा है, तो छाया चित्र रखिए और पिंड रखिए। श्री विग्रह मत रखिए; इसके पीछे कारण है। और अगर पहले से श्री विग्रह रहा है, तो उसे रखिए।
क्या स्वास्थ्य के लिए बारह नामों का 108 बार पाठ किया जा सकता है?
आरोग्य के लिए बारह नामों के 108 पाठ
पूछा गया कि क्या आरोग्य के लिए बारह नामों के 108 पाठ किए जा सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि भैया, बिल्कुल किए जा सकते हैं।
क्या आरोग्य के लिए बारह नामों के 108 पाठ किए जा सकते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि भैया, बिल्कुल किए जा सकते हैं।
दत्तात्रेय, गणपति, सूर्य, जयंती मंगला और पंचाक्षरी के क्रम में भी कोई कवच नहीं है, और एक कवच होना ज़रूरी है
क्रम जो भी हो, उसमें एक कवच होना ही चाहिए
एक श्रोता अपना क्रम बताते हैं: गुरु दत्तात्रेय के एकाक्षरी की एक माला, फिर गणपति, फिर सूर्य की द्वादश नामावली, जयंती मंगला के बारह, पंचाक्षरी की एक माला, सुबह एक माला; और शाम को बटुक भैरव स्तोत्र और 64 योगिनियों की नामावली। वक्ता कहते हैं कि भैया, आपके इसमें तो कोई कवच है ही नहीं। कोई कवच भी शामिल कीजिए — अपने मुख्य आराध्य का कवच। बाकी सब बहुत अच्छा है, पर एक कवच ज़रूर हो। सभी साधक और साधिकाएँ ध्यान दें: सारे पाठ और जप एक तरफ़, अपने आराध्य का कवच एक तरफ़। कवच अवश्य होना चाहिए।
एक श्रोता अपना क्रम बताते हैं: गुरु दत्तात्रेय के एकाक्षरी की एक माला, फिर गणपति, फिर सूर्य की द्वादश नामावली, जयंती मंगला के बारह, पंचाक्षरी की एक माला, सुबह एक माला; और शाम को बटुक भैरव स्तोत्र और 64 योगिनियों की नामावली। वे पूछते हैं कि क्या क्रम सही है। वक्ता कहते हैं कि भैया, आपके इसमें तो कोई कवच है ही नहीं। कोई कवच भी शामिल कीजिए। जो भी आपके मुख्य आराध्य हैं, उनका कवच — बाकी सब बहुत अच्छा है, पर एक कवच अवश्य हो। सभी साधक और साधिकाएँ ध्यान दें: सारे पाठ और जप एक तरफ़, अपने आराध्य का कवच एक तरफ़। कवच अवश्य होना चाहिए।
क्या गणेश जी का तर्पण रोज़ विग्रह पर किया जा सकता है?
रोज़ तर्पण, पर बाद में वस्त्र बदलिए
वक्ता कहते हैं कि हाँ, कर सकते हैं, पर अगर आपने उन्हें वस्त्र पहनाए हैं, तो तर्पण के बाद रोज़ वस्त्र बदलिए। उन्हें भीगा मत रखिए — नहीं तो आपको भी ठंड लगेगी।
गणेश जी के लिए बताई गई तर्पण विधि क्या रोज़ गणेश जी के विग्रह पर की जा सकती है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि हाँ, की जा सकती है। पर अगर आपने उन्हें वस्त्र पहनाए होंगे, तो तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। के बाद रोज़ वस्त्र बदलिए। उन्हें भीगा मत रखिए; नहीं तो आपको भी ठंड लगेगी।
क्या जिन मंत्रों में पहले से स्वाहा है, उनमें स्वाहा दो बार कहना है?
परंपरा पर निर्भर; बिना दीक्षा वाले एक स्वाहा लगाएँ
पूछा गया कि जिन मंत्रों में स्वाहा है, जैसे अन्नपूर्णा के मंत्रों में, क्या आहुति के समय फिर से स्वाहा लगाना है। वक्ता कहते हैं कि यह परंपरा पर निर्भर है। कई बार दो स्वाहा होते हैं, स्वाहा स्वाहा; कई बार उसी स्वाहा में स्वाहा करवा देते हैं — तो यह परंपरा पर निर्भर है। अगर आपकी दीक्षा नहीं हुई और आप आहुति दे रहे हैं, तो एक ही स्वाहा में स्वाहा कीजिए। उसमें भी पूर्णता है।
पूछा गया कि जिन मंत्रों में स्वाहा है, उनमें आहुति के समय फिर से स्वाहा लगाना है क्या — जैसे अन्नपूर्णा के मंत्रों में। वक्ता कहते हैं: देखिए भैया, वैसे यह परंपरा पर निर्भर है। कई बार स्वाहा स्वाहा दो बार होता है; कई बार उसी स्वाहा में स्वाहा करवा देते हैं। तो यह परंपरा पर निर्भर है। अगर आपकी दीक्षा नहीं हुई और आप आहुति दे रहे हैं, तो एक ही स्वाहा में स्वाहा कीजिए। उसमें भी पूर्णता है।
क्या बत्तीस नामों की साधना कृष्ण पक्ष की अष्टमी से ही शुरू करनी है?
कृष्ण पक्ष अष्टमी बेहतर; चतुर्दशी भी संभव
पूछा गया कि जो साधना कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुरू करने को कही गई थी, क्या वह किसी और दिन या शुक्ल पक्ष में शुरू की जा सकती है। वक्ता कहते हैं कि भैया, कृष्ण पक्ष की अष्टमी से करेंगे तो बेहतर होगा। बाकी चतुर्दशी से भी कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि बत्तीस के बाकी स्थानों में जो कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुरू करने को बताया गया था, क्या वह किसी और दिन, या शुक्ल पक्ष में भी शुरू किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि भैया, कृष्ण पक्ष की अष्टमी से करेंगे, तो बेहतर होगा। बाकी, चतुर्दशी से भी कर सकते हैं।
क्या घर के मंदिर में चाँदी का दीपक लगाया जा सकता है?
घर के मंदिर में चाँदी का दीपक
पूछा गया कि क्या घर के मंदिर में चाँदी का दीपक जलाया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि हाँ, जलाया जा सकता है।
एक श्रोता पूछती हैं कि क्या वे अपने घर के मंदिर में चाँदी का दीपक जला सकती हैं। वक्ता कहते हैं कि हाँ, जला सकती हैं।
प्रयोग के लिए बारह नामों का पाठ किस दिन करना चाहिए?
किसी भी दिन; और दूसरे व्यक्ति के लिए भी किया जा सकता है
पूछा गया कि बारह नामों के फलदार पाठ को प्रयोग के रूप में कैसे करें, और क्या पाठ बृहस्पतिवार को करना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है। प्रयोग के लिए — संकल्प किस विषय का है? किसी भी दिन हो सकता है; आपातकाल में कोई भी किसी भी समय कर सकता है। और भैया, आप किसी और के लिए भी कर सकते हैं — कोई दिक्कत नहीं।
बारह नामों के फलदार पाठ का प्रयोग कैसे करें, और क्या पाठ बृहस्पतिवार को करना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं। पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है। प्रयोग के लिए — संकल्प किस विषय का है? किसी भी दिन हो सकता है; आपातकाल में कोई भी किसी भी समय कर सकता है। और भैया, किसी और के लिए भी आप कर सकते हैं; कोई दिक्कत नहीं।
क्या अभिषेक के लिए शालिग्राम जी को शिवलिंग पर रखा जा सकता है?
शिव राजाधिराज हैं और कभी बिना मुकुट के नहीं रखे जाते
वक्ता पूछते हैं कि ये सब विषय कहाँ से उठते हैं — यह कैसा प्रश्न है? किसने कहा कि शालिग्राम जी को शिव जी पर रखकर अभिषेक करना चाहिए? शिव महापुराण पढ़िए: भगवान श्री हरि नारायण और भगवान श्री ब्रह्मा जी ने भगवान शिव के बारे में क्या कहा है? वे भगवान शिव को राजा कहते हैं, कि आप राजाधिराज हैं — इसी कारण भगवान शिव को कभी बिना मुकुट के नहीं रखा जाता। और उन्हीं भगवान शिव पर आप कह रहे हैं कि शालिग्राम जी रखे जाएँ। वे कहते हैं कि यहीं उन्हें वैष्णवों के बारे में मुँह खोलना पड़ता है, जबकि वे बोलना नहीं चाहते, क्योंकि बहुत लोगों की भावनाएँ आहत होती हैं और फिर वे कील ठोकने लगते हैं कि आपको वैष्णवों से द्वेष है — ऐसा है तो पहले बोल दीजिए, फिर हम आपकी नहीं सुनेंगे।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या शालिग्राम जी को शिव पर रखकर अभिषेक करने के बाद, रुद्राभिषेक करते हुए, रोज़ चरणामृत लिया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि ये सब विषय कहाँ-कहाँ से उठते हैं। यह कैसा प्रश्न है? किसने ऐसी बात कही कि शालिग्राम जी को शिव जी पर रखकर अभिषेक करना है? प्रश्नकर्ता का नाम लेकर वे पूछते हैं: शालिग्राम जी को शिव जी पर रखकर पूजन करने का यह विषय किसने बोला? शिव पुराण पढ़िए। भगवान श्री हरि नारायण और भगवान श्री ब्रह्मा जी ने भगवान शिव के बारे में क्या कहा है? वे भगवान शिव को राजा कहते हैं — कि आप राजाधिराज हैं। इसी कारण भगवान शिव को कभी बिना मुकुट के नहीं रखा जाता। और उन्हीं भगवान शिव पर आप कह रहे हैं कि शालिग्राम जी रखे जाएँ। वे कहते हैं कि यहीं हमें वैष्णवों के बारे में मुँह खोलकर बोलना पड़ता है; हम बोलना नहीं चाहते। फिर बहुत लोगों की भावनाएँ आहत होती हैं। फिर वे मेल ठोकने लगते हैं कि आपको वैष्णवों से द्वेष है — ऐसा है तो पहले बोल दीजिए, उसके बाद हम आपकी नहीं सुनेंगे। क्या यह प्रश्न है? क्या आपकी अपनी कोई बुद्धि नहीं है? आप भगवान शिव पर शालिग्राम जी रखेंगे? क्या इससे शालिग्राम जी प्रसन्न होंगे?
जगन्नाथ जी पुरी में अपने ऊपर ली गई झूठी शपथ छोड़ देते हैं, पर भगवान शिव पर ली गई झूठी शपथ नहीं छोड़ते
जगन्नाथ अपने ऊपर ली शपथ क्षमा करते हैं, पर शिव पर ली झूठी शपथ नहीं
वक्ता कहते हैं कि एक परम वैष्णव जी स्वयं यह विषय कह रहे थे: जगन्नाथ पुरी में जगन्नाथ जी के सेवक, पुजारी और भक्त दो-चार पैसे कमाने के लिए जगन्नाथ जी की झूठी शपथ ले लेंगे, और जगन्नाथ जी इससे उन पर क्रोधित नहीं होते — कहते हैं ठीक है, कोई दिक्कत नहीं, मेरे कारण किसी ब्राह्मण के पेट में दो पैसे जा रहे हैं, अन्न जा रहा है, कोई दिक्कत नहीं। पर उसी विषय पर वही परम वैष्णव जी कहते हैं कि अगर कोई ब्राह्मण गलती से भी भगवान शिव की झूठी शपथ ले, झूठी कसम खाए, तो भगवान जगन्नाथ उसे नहीं छोड़ते: उनके शब्दों में, सुदर्शन चक्र चल पड़ता है और दौड़ा-दौड़ाकर उसे काटता है।
वक्ता कहते हैं कि परम वैष्णव जी स्वयं यह विषय कह रहे थे। कि जगन्नाथ पुरी में, जो जगन्नाथ जी के सेवक, पुजारी और भक्त हैं, वे दो-चार पैसे कमाने के लिए जगन्नाथ जी की झूठी शपथ ले लेंगे। जगन्नाथ जी इससे उन पर नाराज़ नहीं होते; कहते हैं, ठीक है, कोई दिक्कत नहीं। मेरे कारण किसी ब्राह्मण के पेट में दो पैसे जा रहे हैं, अन्न जा रहा है — कोई दिक्कत नहीं। पर जगन्नाथ जी के बारे में उसी विषय पर वही परम वैष्णव जी कहते हैं कि अगर कोई ब्राह्मण गलती से भी भगवान शिव की झूठी शपथ ले, झूठी कसम खाए, तो भगवान जगन्नाथ उसे नहीं छोड़ते। उनके शब्दों में, चक्र चल पड़ता है; उनका सुदर्शन दौड़ा-दौड़ाकर उसे काटता है।
शिव पर शालिग्राम रखना शिव, नारायण और ब्रह्मा के संबंध का उल्लंघन कैसे है?
राजा, युवराज और पुरोहित
वक्ता कहते हैं कि उन पर आप कह रहे हैं कि शालिग्राम जी भी बैठाए जाएँ, जो युवराज हैं — जो स्वयं कहते हैं कि मैं युवराज हूँ, आप राजा हैं, और ब्रह्मा जी आपके पुरोहित, आपके मंत्री हैं। क्या युवराज कभी राजा के ऊपर बैठता है? शालिग्राम जी कोई बच्चे नहीं हैं। पाप मोल लेने के लिए आप लोग ऐसे प्रोजेक्ट कहाँ से उठाते हैं? कृपया भाव के नाम पर अपनी बुद्धिहीनता और जड़ता का प्रदर्शन मत कीजिए; जड़ मत बनिए। वे प्रश्नकर्ता से सीधे कहते हैं कि यह उनसे नहीं कह रहे — हम जानते हैं यह आपका विषय नहीं, इसे अपने ऊपर मत लीजिए; हम तो बस आपके कंधे पर रखकर मशीनगन चला रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि उन पर आप कह रहे हैं कि शालिग्राम जी भी बैठाए जाएँ — जो युवराज हैं। जो स्वयं अपने बारे में कहते हैं, मैं युवराज हूँ; आप राजा हैं, और ब्रह्मा जी आपके पुरोहित, आपके मंत्री हैं। क्या युवराज कभी राजा के ऊपर बैठता है? शालिग्राम जी कोई बच्चे नहीं हैं। पाप मोल लेने के लिए आप लोग ऐसा प्रोजेक्ट कहाँ से उठा लेते हैं? कृपया भाव के नाम पर अपनी बुद्धिहीनता और जड़ता का प्रदर्शन मत कीजिए। जड़ मत बनिए। वे प्रश्नकर्ता को संबोधित करते हुए जोड़ते हैं: हम यह आपसे नहीं कह रहे, हम जानते हैं यह आपका विषय नहीं है, इसे अपने ऊपर मत लीजिए। बस इतना जानिए कि हम आपके कंधे पर रखकर मशीनगन चला रहे हैं। इसी कारण हमारा दिमाग खराब होता है। कृपया ऐसा मत कीजिए।
क्या रुद्राभिषेक और शालिग्राम पूजन अपने-अपने अनुशासन में होने चाहिए?
हर एक अपने अनुशासन में, और चरणामृत उसी अनुसार
वक्ता कहते हैं कि रुद्राभिषेक और ये सब विषय करते हुए: भगवान शिव की सेवा, पूजा और अभिषेक उनकी अपनी नीति-नियम में, उस अनुशासन में हो, और भगवान शालिग्राम जी का जो पूजन करना है, वह उनके अनुशासन में हो। चरणामृत उसी तरह लीजिए। उन्हें उनके मुकुट पर बैठाकर चरणामृत मत लीजिए।
वक्ता कहते हैं कि रुद्राभिषेक करते हुए — ये सब विषय, भगवान शिव की सेवा, पूजा और अभिषेक, उनकी अपनी नीति-नियम में, उस अनुशासन में हों; और भगवान शालिग्राम जी का जो पूजन करना है, वह उनके अनुशासन में हो। चरणामृत उसी तरह लीजिए। उन्हें उनके मुकुट पर बैठाकर चरणामृत मत लीजिए। वे जोड़ते हैं कि कोई यह स्क्रीनशॉट भी भेजे; इस पर हम पूरा विषय लिख भी देंगे। जिन्हें मानना है वे मानेंगे; जिन्हें नहीं मानना, वे जैसा चाहें करें।
भगवान शिव पर पैर रखकर रुद्राभिषेक करना न अहंकार है न मूर्खता, बल्कि आत्मविमुग्धता है
न अहंकार, न मूर्खता, बल्कि आत्मविमुग्धता
वक्ता याद करते हैं कि भगवान शिव पर पैर रखकर रुद्राभिषेक करने का वीडियो वायरल हुआ था; वह वीडियो अब भी होगा। वे कहते हैं कि उसे अहंकार भी नहीं कहा जा सकता, मूर्खता भी नहीं — उसे आत्मविमुग्धता कहते हैं। जब लोग आत्ममुग्ध हो जाते हैं, इतने अत्यधिक आत्मग्रस्त, तो उन्हें यह भी समझ नहीं आता कि वे स्वयं वही भगवान बन गए हैं; फिर वे स्वयं को भगवान कहते हैं। वे अपनी ही पूजा, अपनी ही स्तुति, अपना ही स्तोत्र रचते हैं। तब यही स्थिति होती है। उसके बाद ये लोग विष्णु जी को भी कुछ नहीं समझेंगे — और क्या विष्णु जी ऐसी बात सुनकर इन्हें छोड़ देंगे? कोई ऐसा करे, तो वे कौमोदकी गदा से मारेंगे।
न बोलने वाले बच्चे के लिए जो अलग चीज़ बताना बाकी था, वह शुद्ध 999 चाँदी की ठोस गोली है
शुद्ध 999 चाँदी की ठोस गोली
एक श्रोता ने पहले अपने बच्चे के न बोलने के बारे में पूछा था, और उन्हें ग्यारहवें अध्याय के मंत्र का जप बताया गया था, जो चल रहा है; उन्हें यह भी कहा गया था कि कुछ अलग बताया जाएगा। वक्ता कहते हैं कि चाँदी की गोली की बात बतानी बाकी रह गई थी: शुद्ध चाँदी की, 999 वाली पूरी तरह शुद्ध चाँदी की, एक ठोस गोली बनवाइए।
एक श्रोता कहती हैं कि कुछ दिन पहले उन्होंने अपने बच्चे के न बोलने के बारे में पूछा था, ग्यारहवें अध्याय के मंत्र का जप बताया गया था जो चल रहा है, और कुछ अलग भी बताया जाना था; वे मार्गदर्शन माँगती हैं। वक्ता कहते हैं कि भैया, चाँदी की गोली की बात बोलनी बाकी रह गई थी। चाँदी की एक ठोस गोली बनवाइए — 999 की शुद्ध चाँदी, वह चाँदी जो पूरी तरह शुद्ध हो।
बच्चे के लिए चाँदी की गोली कैसे अभिमंत्रित करें और पहनाएँ?
गणपति के बारह नाम, हरा धागा या चाँदी की चेन, बुधवार को बुध की होरा में
ठोस गोली बनवाकर उसे गणपति जी के बारह नामों से अभिमंत्रित कीजिए और हरे धागे में या चाँदी की चेन में ही गले में पहनाइए, बुधवार के दिन, बुध की होरा में, किसी भी पक्ष में। खासकर अगर चतुर्थी को बुधवार पड़े, तो उसी दिन पूजन हो सके; और इससे भी बेहतर, अगर किसी गणपति मंदिर के ब्राह्मण, या कोई भी ब्राह्मण जिन्हें गणपति अथर्वशीर्ष पढ़ने का अनुभव हो और जिन्होंने कम से कम 108 पाठ किए हों, उस ठोस गोली को एक ही दिन में गणपति अथर्वशीर्ष से 108 बार अभिमंत्रित कर दें — तो उसे बच्चे के गले में चाँदी की चेन में ही, बुधवार को बुध की होरा में पहनाइए, और खासकर बुधवार चतुर्थी को पड़े तो उस दिन।
वक्ता कहते हैं कि ठोस गोली बनवाइए, और गणपति जी के बारह नामों से अभिमंत्रित करवाकर उसे हरे धागे में या चाँदी की चेन में ही गले में पहनाइए। बुधवार के दिन, बुध की होरा में; पक्ष कोई भी हो। खासकर अगर चतुर्थी के दिन बुधवार हो, और उनका पूजन उसी दिन हो। और इससे भी बेहतर यह होगा: अगर किसी गणपति मंदिर के कोई ब्राह्मण, या ऐसे कोई भी ब्राह्मण जिन्हें गणपति अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है। पढ़ने का अनुभव हो, जो इसका पाठ करते हों, जिन्होंने कम से कम 108 पाठ किए हों — ऐसे ब्राह्मण से उस ठोस गोली को एक ही दिन में गणपति अथर्वशीर्ष से 108 बार अभिमंत्रित करवाइए। और उसे बच्चे के गले में चाँदी की चेन में ही, बुधवार को बुध की होरा में पहनाइए, और खासकर अगर बुधवार चतुर्थी के दिन पड़े, तो उस दिन।
चाँदी की गोली का प्रयोग वाणी और मन की किन परेशानियों के लिए होता है?
वाणी की, गले की, और बच्चे के मन की कठिनाइयाँ
वक्ता कहते हैं कि अगर वाणी से जुड़ी किसी तरह की कठिनाई हो, या खासकर गले से जुड़ी, या किसी बच्चे में बुद्धि या मस्तिष्क से जुड़ा कोई दोष उत्पन्न हो या जन्म से हो, तो उनके लिए भी इस तरह का प्रयोग विशेष विधि-विधान से करवाना चाहिए। और अगर आप स्वयं साधक हैं, तो स्वयं भी कर सकते हैं — करके देखिए, बहुत लाभ होगा।
वक्ता कहते हैं कि अगर वाणी से जुड़ी किसी तरह की कठिनाई हो, या खासकर गले से जुड़ी, या बुद्धि से जुड़ा कोई दोष — जैसे बच्चे के मस्तिष्क से जुड़ा कुछ — उत्पन्न हो, या जन्म से हो, तो उनके लिए भी इस तरह का प्रयोग विशेष विधि-विधान से करवाना चाहिए। और अगर आप स्वयं साधक हैं, तो स्वयं भी कर सकते हैं। यह करके देखिए; बहुत लाभ होगा।
अगर चाँदी की गोली के अभिमंत्रण के लिए कोई ब्राह्मण न मिले तो क्या करें?
संकट नाशन के बारह नामों का 108 बार उपयोग कीजिए
वक्ता कहते हैं कि और अगर पंडित जी न हों, कोई न मिल रहा हो, तो संकट नाशन वाले बारह नामों से 108 बार अभिमंत्रित करके पहनाइए। बाकी नियम वही रहेगा: चतुर्थी के दिन बुधवार पड़े तो सबसे उत्तम। बाकी आपातकाल हो, तो किसी भी बुधवार को पहना सकते हैं। उसमें कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष नहीं देखना है।
वक्ता कहते हैं कि और अगर पंडित जी न हों, कोई न मिल रहा हो, तो संकट नाशन स्तोत्र वाले बारह नामों से 108 बार अभिमंत्रित करके पहनाइए। बाकी नियम वही रहेगा: चतुर्थी के दिन बुधवार पड़े, तो सबसे उत्तम है। बाकी, आपातकाल हो, तो किसी भी बुधवार को पहना सकते हैं। उसमें कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष नहीं देखना है।
दीपदान के बाद दाँत का दर्द क्यों चला गया?
दीपदान की गर्मी — "यह साइंस है"
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्होंने जयंती के दिन दत्तात्रेय दीपदान किया था, उस समय उनका दाँत बहुत दर्द कर रहा था, और अगली सुबह तक वह अपने आप कम हो गया। वक्ता कहते हैं कि हाँ — आपने इतना दीपदान किया, तो दीपदान की गर्मी से कम हो गया होगा; इसके पीछे साइंस है, यह साइंस है। इसमें हमारी श्रद्धा का कम हाथ है; न हमारी न आपकी इसमें कोई श्रद्धा है। यह भीम साइंस है।
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्होंने जयंती के दिन दत्तात्रेय दीपदान किया था, उस समय दाँत में बहुत दर्द था, और अगली सुबह तक वह अपने आप कम हो गया। वक्ता कहते हैं कि हाँ — आपने इतना दीपदान किया, तो दीपदान की गर्मी से कम हो गया होगा। इसके पीछे साइंस है। यह साइंस है। इसमें हमारी श्रद्धा का कम हाथ है; हमारी और आपकी इसमें कोई श्रद्धा नहीं है। यह भीम साइंस है।
नर्मदेश्वर को जल चढ़ाते समय किस दिशा की ओर मुँह करना चाहिए?
दक्षिण सबसे अच्छी; उत्तर से कभी नहीं, जहाँ अर्घा बहता है
वक्ता कहते हैं कि भैया, किसी भी दिशा से चढ़ाइए, सब उत्तम हैं। नियम में जाएँ, तो उत्तर की ओर से, जिधर अर्घा बहता है, जल नहीं चढ़ाना चाहिए या पूजा नहीं करनी चाहिए। दक्षिण दिशा सबसे उत्तम है — यानी अर्घे के ठीक उलटी दिशा में। पर घर में यह सबके लिए संभव नहीं, कम से कम इसलिए कि अर्घा उत्तर की ओर हो तो नर्मदेश्वर जी को रखने की पूरी व्यवस्था उत्तर की ओर होगी, और फिर आपके घर की दीवारें दक्षिण की ओर हैं, तो वहाँ से उनका अभिषेक कैसे करेंगे। पर मंदिर में, क्योंकि वह चारों ओर से खुला रहता है, अगर वहाँ दक्षिण दिशा की ओर, दक्षिण दिशा से अभिषेक करें, तो सबसे उत्तम है।
नर्मदेश्वर जी को जल चढ़ाते समय किस दिशा की ओर मुँह करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: भैया, किसी भी दिशा से चढ़ाइए, सब उत्तम हैं। अगर नियम में जाएँ, तो उत्तर की ओर से, जिधर अर्घा बहता है, जल नहीं चढ़ाना चाहिए, पूजा नहीं करनी चाहिए। दक्षिण दिशा सबसे उत्तम है — यानी अर्घे के ठीक उलटी दिशा में। पर घर में यह सबके लिए संभव नहीं। कम से कम इसलिए कि अर्घा उत्तर की ओर होने का अर्थ है कि नर्मदेश्वर जी को रखने का पूरा विषय उत्तर की ओर होगा; पर अब आपके घर की दीवारें दक्षिण की ओर हैं, तो वहाँ से उनका अभिषेक कैसे करेंगे। पर मंदिर में, क्योंकि वह चारों ओर से खुला रहता है, अगर वहाँ दक्षिण दिशा की ओर, दक्षिण दिशा से अभिषेक करें, तो सबसे उत्तम है।
अनुष्ठान और साधना में क्या अंतर है?
साधना सिद्धि के लिए है; अनुष्ठान उसे किसी कार्य में लगाना है
वक्ता कहते हैं कि अगर हम साधना कर रहे हैं, तो साधन का निमित्त सिद्धि पाना हुआ। हम पंचाक्षरी कर रहे हैं, पाँच लाख जप कर रहे हैं; उसमें संकल्प यह है कि मंत्र सिद्ध हो, भगवान शिव प्रसन्न हों। यहाँ किसी कार्य में प्रयोग नहीं है। जो अनुष्ठान के रूप में किया जाता है, वह किसी कार्य में प्रयोग के अंतर्गत आता है: हम उस पंचाक्षरी को इसलिए लगा रहे हैं कि फलाँ का विवाह हो, उसे सुंदर, सुशील, धर्म मार्ग पर चलने वाली कन्या मिले। वह अनुष्ठान हो गया।
वक्ता कहते हैं कि अगर हम साधना कर रहे हैं, तो साधन का निमित्त यह हुआ: सिद्धि पाने के लिए। हम पंचाक्षरी कर रहे हैं, पाँच लाख जप कर रहे हैं। उसमें संकल्प यह है कि मंत्र सिद्ध हो, भगवान शिव प्रसन्न हों। यहाँ किसी कार्य में प्रयोग नहीं है। जो अनुष्ठान के रूप में किया जाता है, वह किसी कार्य में प्रयोग के अंतर्गत आता है। हम उस पंचाक्षरी को इसलिए लगा रहे हैं कि फलाँ का विवाह हो — कि उसे सुंदर, सुशील, धर्म मार्ग पर चलने वाली कन्या मिले। वह अनुष्ठान हो गया।
क्या माँ काली का बीज मंत्र हाथ पर टैटू करवाया जा सकता है?
प्रतीक हाँ; बीजाक्षर केवल उस स्तर के समर्पण पर
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या माँ काली का बीज मंत्र हाथ पर टैटू करवाया जा सकता है, यह बताते हुए कि एक फ़िल्म स्टार ने ऐसा टैटू बनवाया है। वक्ता कहते हैं कि वे प्रतीक बनवाने के पक्ष में हैं — अपने आराध्य का प्रतीक ज़रूर बनवाना चाहिए: सुदर्शन चक्र बनवाइए, कौमोदकी गदा बनवाइए, काली जी का खड्ग बनवाइए। बीजाक्षर को लेकर वे उन्नीस-बीस हो जाते हैं, क्योंकि पता नहीं आपके जीवन की नीति-नियम कैसी है, अनुकूल या प्रतिकूल; इसमें वे हाँ नहीं कहेंगे। प्रतीक चिह्न आप ज़रूर बनवा सकते हैं। उनकी दृष्टि में मंत्र और श्लोक वे लिखवाएँ तो बेहतर, जो अपने आराध्य के प्रति अत्यंत समर्पित हैं और जो अपने आराध्य को लेकर कभी संदेह में नहीं आते — अगर किसी रूप में हमें लगे कि हमारे आराध्य हमारा सिर माँग रहे हैं, गला काट रहे हैं, और देने में हम एक पल न लगाएँ, तो वह मंत्र लिखवाइए। बाकी आपका अपना विवेक और बुद्धि: सुंदर प्रतीक बनवाइए, और मंत्र लिखवाने में तभी जाइए जब समर्पण, वह निष्ठा उस स्तर की हो।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या माँ काली का बीज मंत्र हाथ पर टैटू करवाया जा सकता है, और जोड़ते हैं कि एक फ़िल्म स्टार ने भी ऐसा टैटू बनवाया है। वक्ता कहते हैं कि भैया, हम प्रतीक बनवाने के पक्ष में हैं; अपने आराध्य का प्रतीक ज़रूर बनवाना चाहिए। सुदर्शन चक्र बनवाइए; कौमोदकी गदा बनवाइए; काली जी का खड्ग बनवाइए। बीजाक्षर को लेकर हम थोड़े उन्नीस-बीस होने लगते हैं। इसका कारण यह है कि पता नहीं आपके जीवन की नीति-नियम कैसी है, अनुकूल या प्रतिकूल। इसलिए उसमें हम हाँ नहीं कहेंगे। प्रतीक चिह्न आप ज़रूर बनवा सकते हैं। मंत्र और श्लोक आदि — बहुत बेहतर होगा अगर वे लोग अपने लिए लिखवाएँ जो अपने आराध्य के प्रति अत्यंत समर्पित हैं, जो अपने आराध्य को लेकर कभी संदेह में नहीं आते। अगर किसी रूप में हमें ज़रा-सा भी संकेत मिले कि हमारे आराध्य हमारा सिर माँग रहे हैं, गला काट रहे हैं, कि अपना सिर चढ़ा दो — और देने में हम एक पल भी न लगाएँ — तो वही मंत्र लिखवाइए। बाकी, फिर भी, आपका अपना विवेक और बुद्धि। मेरी दृष्टि में, सुंदर-सुंदर प्रतीक चिह्न बनवाइए। मंत्र आदि लिखवाने के लिए, मेरी दृष्टि में, समर्पण, वह निष्ठा उस स्तर की हो, और फिर इसमें जाइए।
दुर्गा प्रणव के पाँच लाख जप के बाद, क्या माला मंत्र चक्र विधि में संपुटित करके किया जा सकता है?
चक्र विधि में माया बीज की जगह दुर्गा प्रणव
पूछा गया कि देवी दुर्गा प्रणव के पाँच लाख जप के बाद, क्या दुर्गा माला मंत्र चक्र विधि में देवी प्रणव के संपुट के साथ किया जा सकता है, और क्या चक्र विधि में देवी प्रणव माया बीज की जगह दुर्गा प्रणव लगाया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल लगा सकते हैं — सर्वोत्तम, बहुत अच्छा। अगर आपने दुर्गा बीज का जप, पाँच लाख, कर लिया है और अब उसके बाद यह प्रयोग करते हैं, तो पूरी तरह सही है, बिल्कुल कर सकते हैं। और उसमें माया बीज, देवी प्रणव अलग से लगाने की ज़रूरत नहीं।
गर्भवती स्त्री बच्चे की रक्षा के लिए कौन-सा कवच पढ़ सकती है?
गर्भ पर चैनल के तीन वीडियो, और कामाख्या कवच
वक्ता कहते हैं कि गर्भ से जुड़ा पूरा विषय चैनल पर है — वे इसे फिर साझा करेंगे, तीन वीडियो हैं। उनमें पूरा विधान बताया गया है कि किस महीने क्या करना चाहिए। यह सरल विषय है, बहुत विस्तृत या जटिल नहीं, क्योंकि इसमें तीसरे महीने के बाद से आराम ज़्यादा है। तो वह विधान एक बार सुनिए। उसमें पार्वती गीता से जुड़े विषय भी रखे गए हैं। तो वह कीजिए — और कामाख्या कवच पकड़ लीजिए।
पूछा गया कि गर्भवती स्त्री अपने घर में बच्चे की रक्षा के लिए और इसलिए कि वह पूरी तरह स्वस्थ जन्मे, कौन-सा कवच पढ़ सकती है। वक्ता उत्तर देते हैं। गर्भ से जुड़ा पूरा विषय चैनल पर है; हम इसे फिर साझा करेंगे, तीन वीडियो हैं। उनमें पूरा विधान बताया गया है कि किस महीने क्या करना चाहिए। यह सरल विषय है; बहुत विस्तृत नहीं, बहुत जटिल विषय नहीं, क्योंकि इसमें तीसरे महीने के बाद से आराम ज़्यादा है। तो वह विधान एक बार सुनिए। उसमें पार्वती गीता से जुड़े विषय भी रखे गए हैं। तो वह कीजिए, और कामाख्या कवच पकड़ लीजिए।
माँ सरस्वती का अनुष्ठान कहाँ करना सबसे अच्छा है?
सभी स्थान अपने आप में श्रेष्ठ हैं
एक श्रोता पूछते हैं कि सरस्वती अनुष्ठान काशी में करना बेहतर है या माँ विंध्यवासिनी और त्रिशभुजा के पास, यह बताते हुए कि वे एक बार प्रयागराज में सरस्वती का सवा लाख कर चुके हैं। वक्ता कहते हैं कि भैया, सभी स्थान अपने आप में श्रेष्ठ हैं — जहाँ इच्छा हो, वहाँ कीजिए। इसमें कम-ज़्यादा का कोई विषय नहीं।
एक श्रोता पूछते हैं कि माँ सरस्वती का अनुष्ठान कहाँ करना सबसे अच्छा है — काशी में, या माँ विंध्यवासिनी और त्रिशभुजा के पास — और जोड़ते हैं कि वे एक बार प्रयागराज में सरस्वती का सवा लाख कर चुके हैं। वक्ता कहते हैं कि भैया, सभी स्थान अपने आप में श्रेष्ठ हैं। जहाँ आपकी इच्छा हो, वहाँ कीजिए। इसमें कम-ज़्यादा का कोई विषय नहीं।
पूरा विधान मंदिर के भीतर क्यों नहीं किया जा सकता?
मंडल बनाना पड़ता है, और तंत्र की प्रक्रिया हमेशा गुप्त होती है
वक्ता कहते हैं कि भैया, मंदिर में मंडल और सब कुछ बनाना पड़ेगा, और इसीलिए हम कहते हैं कि तंत्र की प्रक्रिया हमेशा गुप्तता से होती है — इसलिए इसे एकांत में कीजिए। जब विधि-विधान हो जाए, तब मंत्र का जप एक बार ज़रूर कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि भैया, मंदिर में मंडल और बाकी सब बनाना पड़ेगा; इसीलिए हम कहते हैं कि तंत्र की प्रक्रिया हमेशा गुप्तता से होती है। इसलिए इसे एकांत में कीजिए। जब विधि-विधान हो जाए, तब मंत्र का जप एक बार ज़रूर कर सकते हैं।
शरीर मज़बूत करने के लिए नॉन-वेज खाने वालों को कैसे समझाएँ?
वे नहीं समझेंगे, और बदले में चार गालियाँ देंगे
पूछा गया कि जो लोग केवल शरीर को मज़बूत और शक्तिशाली बनाने के उद्देश्य से नॉन-वेज लेते हैं, उन्हें कैसे समझाएँ। वक्ता कहते हैं: ऐसे लोगों को भी समझाने की ज़रूरत आपको लग रही है — समझाइए, वे बिल्कुल नहीं समझेंगे। आप जितना समझाएँगे, उतना वे समझा रहे हैं, समझ कौन रहा है? बदले में वे आपको चार गालियाँ देंगे। भैया, ये लोग दुनिया का संतुलन बना रहे हैं: ताकि मुर्गे और बकरों की संख्या न बढ़े, खा-खाकर संतुलन बना रहे हैं।
पूछा गया कि जो लोग केवल अपने शरीर को मज़बूत और शक्तिशाली बनाने के उद्देश्य से नॉन-वेज खाते हैं, उन्हें कैसे समझाएँ। वक्ता उत्तर देते हैं। ऐसे लोगों को भी आपको समझाने की ज़रूरत लग रही है — तो समझाइए; वे बिल्कुल नहीं समझेंगे। जितना कोई समझाता है, उतना वे समझा रहे हैं; समझ कौन रहा है? बदले में वे आपको चार गालियाँ देंगे। भैया, ये लोग दुनिया का संतुलन बना रहे हैं। ताकि मुर्गे और बकरे की संख्या न बढ़े, वे खा-खाकर संतुलन बना रहे हैं।
प्रेत से मुक्ति जितनी जल्दी मिलनी चाहिए थी उससे देर से मिली, और घबराहट और अस्वीकार ने उसे रोके रखा
वह निष्ठा जो घबराहट में भी होनी चाहिए
एक श्रोता धन्यवाद लिखते हैं: जो खिलाया गया था वह निकल गया, प्रेत से मुक्ति मिल गई, और वे अगस्त से महाभैरव मंत्र का जप कर रहे थे। वक्ता कहते हैं कि मेरी दृष्टि में यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था — आप बस स्वीकार नहीं करते थे, बहुत घबरा जाते थे कि नहीं हो रहा, नहीं हो रहा। पर हम भी सराहेंगे कि आखिरकार आप जीत गए, क्योंकि आप बहुत घबराते थे फिर भी काम करना नहीं छोड़ा। निष्ठा इस लड़के जैसी होनी चाहिए: यह हॉस्टल में रहता है, चार साल ग्रसित रहा और इसकी स्थिति बहुत खराब हो गई, पर अपने बल पर साधना आदि करके महाभैरव की कृपा से आज स्वस्थ हो गया है।
एक श्रोता अंग्रेज़ी और हिंदी में धन्यवाद लिखते हैं: कि जो खिलाया गया था वह निकल गया, कि प्रेत से मुक्ति मिल गई, और कि वे अगस्त से महाभैरव मंत्र का जप कर रहे थे। वक्ता उनका नाम लेकर कहते हैं कि मेरी दृष्टि में यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था। आप बस स्वीकार नहीं करते थे। आप बहुत घबरा जाते थे, कहते थे कि नहीं हो रहा, नहीं हो रहा, नहीं हो रहा। पर हम भी सराहेंगे कि आखिरकार आप जीत गए — क्योंकि आप बहुत घबराते थे, और फिर भी आपने काम करना नहीं छोड़ा। निष्ठा इनके जैसी होनी चाहिए। यह लड़का हॉस्टल में रहता है; चार साल ग्रसित रहा और इसकी स्थिति बहुत खराब हो गई, पर अपने बल पर, साधना आदि करके, महाभैरव की कृपा से आज यह स्वस्थ हो गया है।
प्रणाम कैसे करना चाहिए, और मुद्राओं का क्या?
दोनों हाथ जोड़कर; विशेष मुद्राएँ अपने गुरु से मिलती हैं
मुद्राओं के बारे में और प्रणाम कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: दोनों हाथ जोड़कर कीजिए। विशेष मुद्रा के लिए, आप जिस भी कुल में दीक्षित हैं, आपके गुरु जी आपको खास तौर पर मुद्रा का ज्ञान देंगे। और जो लोग सामान्य मुद्राओं के बारे में कहते हैं कि इन्हें हर कोई कर सकता है, सब कर सकते हैं — भैया, कम से कम इसके लिए उपदेश तो ज़रूर होना चाहिए। क्या कहा जाए। किसी से उपदेश लेने में दिक्कत क्या है? करना ही है, तो उपदेश लीजिए।
मुद्राओं के बारे में, और प्रणाम कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: दोनों हाथ जोड़कर कीजिए। विशेष मुद्रापूजा या प्रतिमा-विज्ञान में प्रयुक्त एक प्रतीकात्मक हस्त-मुद्रा — जैसे वरद (वरदान देने वाली) या अभय (निर्भयता प्रदान करने वाली) — प्रत्येक का अपना विशिष्ट अर्थ होता है। के लिए, आप जिस भी कुल में दीक्षित होंगे, आपके गुरु जी आपको खास तौर पर मुद्रा का ज्ञान देंगे। और सामान्य मुद्राओं के लिए भी, जो लोग यह कहते हैं — कि यह मुद्रा हर कोई कर सकता है, सब कर सकते हैं — भैया, कम से कम इसके लिए उपदेश तो ज़रूर होना चाहिए। क्या कहा जाए। किसी से उपदेश लेने में दिक्कत क्या है? करना ही है, तो उपदेश लीजिए।
जो शिक्षक कहता है कि मुद्रा सब कर सकते हैं, उससे उपदेश कैसे लें?
जो यह कहता है, उसी से प्रत्यक्ष उपदेश देने को कहिए
वक्ता कहते हैं कि जो व्यक्ति कह रहा है कि यह करना चाहिए, उसी से कहिए कि आप स्वयं उपदेश दीजिए। हर कोई कभी न कभी किसी न किसी क्षेत्र में आएगा — पूछिए, भैया, प्रयाग कब आएँगे? वे कहेंगे, हाँ, फलाँ दिन आऊँगा। देर-सबेर कोई किसी तीर्थ क्षेत्र में जाएगा; उसे पकड़े रहिए। जो यूट्यूब पर कहते हैं कि मुद्राएँ करनी चाहिए — उनसे कहिए, भैया, आप दीजिए। जब आप उनके पास पहुँचें, तो उनके पास जाकर कहिए, भैया, कृपया मुझे उपदेश दीजिए। एक बार उनके सामने से मुद्रा सीखिए — वे सिखा ही रहे हैं; सीखकर रख लीजिए। बस एक बार उनकी उपस्थिति में उपदेश ले लीजिए: भैया, एक बार करके मुझे उपदेश दीजिए। इसमें क्या बिगड़ेगा? स्वयं देखिए। अगर उस समय वे सामने से दे दें, तो कहिए हाँ, यह विषय हुआ। अगर वे सामने से देने में हिचक रहे हैं, तो समझिए कि क्यों नहीं दे रहे — इसमें अपनी बुद्धि लगाइए। और अगर वे सामने से दे दें, तो जय-जय; पूरे आराम से, सुख से कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि जो भी कह रहा है कि यह करना चाहिए, उसी व्यक्ति से कहिए: भैया, आप स्वयं उपदेश दीजिए। कोई न कोई कभी न कभी किसी न किसी क्षेत्र में आएगा। कहिए: भैया, प्रयाग कब आएँगे? वे कहेंगे, हाँ, इस दिन आऊँगा। देर-सबेर कोई किसी तीर्थ क्षेत्र में जाएगा न — उसे पकड़े रहिए। जो यूट्यूब पर कहते हैं कि मुद्रा करनी चाहिए — उनसे कहिए, भैया, आप दीजिए। जब आप उनके पास पहुँचें, तो उनके पास जाकर कहिए: भैया, कृपया मुझे उपदेश दीजिए। एक बार उनके सामने से मुद्रा सीखिए। वे सिखा ही रहे हैं; सीखकर रख लीजिए। बस एक बार उनकी उपस्थिति में उपदेश ले लीजिए: भैया, एक बार करके मुझे उपदेश दीजिए। इसमें क्या बिगड़ेगा? बस देखिए। अगर उस समय वे सामने से दे दें, तो कहिए हाँ, यह विषय हुआ। अगर वे सामने से देने में टालमटोल कर रहे हैं, तो समझिए कि क्यों नहीं दे रहे। इसमें अपनी बुद्धि लगाइए। और अगर वे सामने से दे दें, तो जय-जय। फिर पूरे आराम से, सुख से कीजिए।
अगर कुंडली कहे कि नया घर दुर्भाग्य लाएगा, तो क्या करें?
कुंडली का फिर से विश्लेषण और मिलान करवाइए
पूछा गया कि जब कुंडली में लिखा हो कि नया घर लेने या बनवाने से दुर्भाग्य आएगा, तो क्या करें। वक्ता कहते हैं: ऐसी स्थिति में कुंडली का एक बार फिर विश्लेषण करवाइए। उसका क्रॉस-चेक करवाइए; स्पष्ट हो जाएगा, और अगर ऐसी बात होनी है, तो देखी जाएगी। और इसके लिए नए घर का विधान है — वे बताएँगे कि अगर सचमुच ऐसा है, तो इसे कैसे टालना है; इसका निराकरण बताया गया है।
जब कुंडली में लिखा हो कि नया घर लेने या बनवाने से दुर्भाग्य आएगा, तो क्या करें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं। ऐसी स्थिति में कुंडली का विश्लेषण एक बार फिर करवाइए। उसका क्रॉस-चेक करवाइए। स्पष्ट हो जाएगा; अगर ऐसी बात होनी है, तो देखी जाएगी। और इसके लिए नए घर का विधान है — वे बताएँगे कि अगर वास्तव में ऐसा है, तो इसे कैसे टालना है। इसका निराकरण बताया गया है।
गुरु मंत्र को और तीक्ष्ण और शक्तिशाली कैसे बनाया जा सकता है?
गुरु मंत्र पहले से तीक्ष्ण है; अपना तपोबल बढ़ाइए
वक्ता कहते हैं कि भैया, गुरु मंत्र पहले से ही तीक्ष्ण और शक्तिशाली है, क्योंकि वह परंपरा से आया मंत्र है। इसके लिए हमें अपना तपोबल बढ़ाना होता है।
अपने गुरु मंत्र को और तीक्ष्ण और शक्तिशाली कैसे बनाएँ, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं। भैया, गुरु मंत्र पहले से ही तीक्ष्ण और शक्तिशाली है, क्योंकि वह परंपरा से आया मंत्र है। इसके लिए हमें अपना तपोबल बढ़ाना होता है।
क्या बिना दीक्षा के भैरव मंत्र का कोई विधान है?
विधान चैनल पर है, और उसके नियम से ही करना होगा
वक्ता कहते हैं कि बिना दीक्षित हुए, महावरो मंत्र का विधान चैनल पर है कि कैसे करना है; पर आपको उसे उसके नियम से ही करना होगा। शिव जी के मंदिर में।
वक्ता कहते हैं कि बिना दीक्षाधारी हुए, महावरो मंत्र का विधान चैनल पर है कि कैसे करना है। पर आपको उसे उसके नियम से ही करना होगा। शिव जी के मंदिर में।
गर्भवती स्त्री कब तक पूजा कर सकती है?
तीसरे महीने तक पूजा की जा सकती है
एक प्रश्न पूछा जाता है कि गर्भवती स्त्री अपने धर्म की रक्षा के लिए क्या कर सकती है, जिसमें एक ऐसा शब्द है जिसे वक्ता समझ नहीं पाते। वे कहते हैं कि समझ नहीं आया और पूछते हैं कि इसका क्या अर्थ है, फिर कहते हैं: तीसरे महीने तक वह पूजा कर सकती है। बाकी विषय, वे कहते हैं, समझ नहीं आया।
एक प्रश्न पूछा जाता है कि गर्भवती स्त्री अपने धर्म की रक्षा के लिए क्या कर सकती है, जिसमें एक ऐसा शब्द है जिसे वक्ता समझ नहीं पाते। वे कहते हैं कि मैं समझा नहीं। इसका अर्थ क्या है? तीसरे महीने तक वह पूजा कर सकती है। वे कहते हैं कि उनका यह विषय हम समझ नहीं पाए।
क्या उग्र साधना में पेट की समस्या सामान्य है?
यह नियंत्रण खोने की बात है, और संतुलन चाहिए
वक्ता कहते हैं कि नहीं भैया, यह सामान्य की बात नहीं है। अगर उग्र साधना से हो रहा है, तो यह नियंत्रण खोने की बात है। जिनकी साधना आप कर रहे हैं, उनका विधि-विधान थोड़ा जानना चाहिए और पहले दूसरी विद्याओं की साधना करनी चाहिए — जैसे, अगर भगवती की साधना से परेशानी हो रही है, तो वहाँ संतुलन के लिए भैरव की, शिव जी की साधना करनी चाहिए।
क्या उग्र साधना में पेट की समस्या सामान्य है, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं। नहीं भैया, यह सामान्य की बात नहीं है। अगर उग्र साधना से हो रहा है, तो यह नियंत्रण खोने की बात है। जिनकी साधना आप कर रहे हैं, उनका विधि-विधान आपको थोड़ा जानना चाहिए और पहले दूसरी विद्याओं की साधना करनी चाहिए। जैसे, अगर भगवती की साधना से परेशानी हो रही है, तो वहाँ भैरव की, शिव जी की साधना करनी चाहिए — संतुलन के लिए।
स्त्री को माँ कामाख्या की उपासना किस दिन शुरू करनी चाहिए?
कामाख्या पूजन के लिए कोई नक्षत्र, तिथि या विधि-विधान नहीं
वक्ता कहते हैं कि कामाख्या माई के पूजन के लिए कोई नक्षत्र, तिथि या विधि-विधान मत सोचिए — आज इच्छा हो, तो आज रात से शुरू करवा दीजिए। माँ दुर्गा के सामने बिल्कुल कर सकते हैं; भगवती कामाख्या के रक्त वाले छाया चित्र की ज़रूरत नहीं। माँ कामाख्या का पूजन, यानी उनके कवच का जप — सुबह करना हो, रात को, दोपहर को या शाम को, बिस्तर पर बैठकर करना हो, ट्रेन में बैठे हों और करना हो — जब भी उनके कवच का जप करना हो, कीजिए। उनके लिए हम हमेशा यही कहते हैं, और स्त्रियों से भी कहते हैं: रजस्वला अवस्था में भी, बिस्तर पर लेटे या बैठे, कम से कम एक बार उनका जप स्मरण कीजिए, और कवच कंठस्थ हो तो कवच भी।
एक श्रोता कहते हैं कि उनकी पत्नी माँ कामाख्या की उपासना शुरू करना चाहती हैं, और पूछते हैं कि किस दिन से शुरू करें। वक्ता कहते हैं कि कामाख्या माई के पूजन के लिए कोई नक्षत्र, तिथि या विधि-विधान मत समझिए। आज इच्छा हो, तो आज रात से ही शुरू करवा दीजिए। माँ दुर्गा के सामने बिल्कुल कर सकते हैं; भगवती कामाख्या के रक्त वाले छाया चित्र की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। माँ कामाख्या का पूजन — यानी उनके कामाख्या कवच का जप — सुबह करना हो, रात को करना हो, दोपहर को करना हो, शाम को करना हो, बिस्तर पर बैठकर करना हो; ट्रेन में बैठे हों और करना हो — जब भी उनके कवच का जप करना हो, कीजिए। उनके लिए हम हमेशा यही कहते हैं। स्त्रियों से भी कहते हैं: रजस्वला अवस्था में भी, बिस्तर पर लेटे या बैठे, कम से कम एक बार उनका जप स्मरण कीजिए, और कवच कंठस्थ हो, तो कवच भी।
माँ कामाख्या को कौन-सा भोग लगाना चाहिए?
चाँदी के छोटे पात्र में शहद, नहीं तो किशमिश
वक्ता कहते हैं कि अगर संभव हो, तो चाँदी के छोटे पात्र में थोड़ा शहद भोग लगाना सबसे उत्तम है; नहीं तो किशमिश का भोग लगाइए।
भोग में क्या दें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं। अगर संभव हो, तो चाँदी के छोटे पात्र में थोड़ा मधु भोग लगाना सबसे उत्तम है। नहीं तो किशमिश का भोग लगाइए।
जब मन बहुत अस्थिर हो तो क्या करें?
देखिए कि गोचर में चंद्रमा कहाँ है
वक्ता कहते हैं कि भैया, अगर मन बहुत अस्थिर हो रहा है, तो चंदा मामा कहीं न कहीं अपनी जगह से हट गए हैं। देखिए कि गोचर में चंदा मामा कहाँ हैं। उन्हें प्रसन्न कीजिए। हालाँकि चंद्रमा को अर्घ्य देकर — कृष्ण पक्ष चल रहा है, तो अभी वे दिखेंगे भी नहीं। चंद्र देव के दर्शन भगवान शिव जी के सिर पर निरंतर रहते हैं, इसलिए शिव जी का दूध से अभिषेक कीजिए।
मन बहुत अस्थिर हो तो क्या करें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं। भैया, अगर मन बहुत अस्थिर हो रहा है, तो चंदा मामा कहीं न कहीं अपनी जगह से हट गए हैं। देखिए कि गोचर में चंदा मामा कहाँ हैं। उन्हें प्रसन्न कीजिए। हालाँकि चंद्रमा को अर्घ्य देकर — कृष्ण पक्ष चल रहा है, तो अभी वे दिखेंगे भी नहीं। चंद्र देव के दर्शन भगवान शिव जी के सिर पर निरंतर रहते हैं, इसलिए शिव जी का दूध से अभिषेक कीजिए।
जब किसी के विरुद्ध पशु बलि दी जा रही हो, तो वह अपनी रक्षा कैसे करे?
पहले यह इस पर निर्भर है कि देवी कौन हैं और उनके सामने कौन आ सकता है
वक्ता कहते हैं कि अगर आपकी जानकारी में आया है कि सामने वाला मारने के लिए पशु बलि देने वाला है, और हमें पता चल गया है कि वह ऐसा कर रहा है, तो यह विषय बहुत अलग हो जाता है। तब यह देखना ज़रूरी है: भैया, देवी कौन हैं, विषय क्या है, उनके सामने कौन आ सकता है; यह मंत्र के बल से चल रहा है या सीधे चल रहा है — कौन-सा विषय है?
पूछा गया कि अगर कोई किसी को मारने के लिए किसी देवी को पशु बलि दे, तो जिसके लिए यह किया जा रहा है, वह अपनी रक्षा कैसे करे। वक्ता उत्तर देते हैं। अगर यह जानकारी में आ गया है कि सामने वाला मारने के लिए पशु बलि देने वाला है, और हमें पता चल गया है कि वह ऐसा कर रहा है, तो यह विषय बहुत अलग हो जाता है। तब यह देखना ज़रूरी है: भैया, देवी कौन हैं? विषय कैसे और क्या है? उनके सामने कौन आ सकता है? क्या यह मंत्र बल से चल रहा है, या सीधे चल रहा है? कौन-सा विषय है?
क्या देवता से भौतिक इच्छाएँ माँगना उचित है?
काम तीसरा पुरुषार्थ है
वक्ता कहते हैं कि भैया, भौतिक इच्छा माँगना बिल्कुल उचित है — ऐसा नहीं कि नहीं माँगना चाहिए। क्यों नहीं माँगना चाहिए? बिल्कुल माँगना चाहिए; बिल्कुल माँगिए। धर्म, अर्थ, काम — तीसरा पुरुषार्थ काम ही है। जब इच्छाएँ पूरी होंगी, तभी आप मोक्ष की ओर जाएँगे। ज़रूर माँगिए।
भौतिक इच्छा के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: भैया, उसे माँगना बिल्कुल उचित है। ऐसा नहीं कि नहीं माँगना चाहिए। क्यों नहीं माँगना चाहिए? बिल्कुल माँगना चाहिए; बिल्कुल माँगिए। धर्म, अर्थ, काम — तीसरा पुरुषार्थ काम ही है। जब इच्छाओं की पूर्ति होगी, तभी आप मोक्ष की ओर जाएँगे। ज़रूर माँगिए।
ग्यारहवें अध्याय के पाठ से भगवती कितनी प्रसन्न होती हैं?
सप्तशती का एक श्लोक भी उन्हें प्रसन्न करता है
वक्ता कहते हैं कि भैया, वे बहुत प्रसन्न होती हैं। दुर्गा सप्तशती माई को अत्यंत प्रिय है। आप ग्यारह अध्यायों की बात कर रहे हैं — ग्यारह अध्याय तो क्या, अगर आप एक श्लोक भी पढ़ेंगे, तो उससे माई प्रसन्न हो जाएँगी।
एक श्रोता कहते हैं कि वे वक्ता से सुनना चाहते हैं कि ग्यारहवें अध्याय के पाठ से भगवती कितनी प्रसन्न होती हैं। वक्ता कहते हैं कि भैया, वे बहुत प्रसन्न होती हैं। दुर्गा सप्तशती माई को अत्यंत प्रिय है। आप ग्यारह अध्यायों की बात कर रहे हैं — ग्यारह अध्याय तो क्या, अगर आप एक श्लोक भी पढ़ेंगे, तो उससे माई प्रसन्न हो जाएँगी।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।