नवरात्र प्रश्नोत्तरी — नवरात्र के अंतिम दिनों का लाइव प्रश्न-उत्तर सत्र
दीक्षा, मंत्र और पूजा विधि पर नवरात्रि प्रश्नोत्तरी।
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नवार्ण की विधि ऑनलाइन कभी नहीं बताई जाती: विधिवत शाक्त दीक्षा लें, फिर गुरु का आदेश लेकर मंत्र का जप करें
नवार्ण की विधि सार्वजनिक प्रसारण में नहीं दी जाती
नहीं। नवार्ण मंत्र साधना की विधि पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह विधि वे ऑनलाइन कभी नहीं बता सकते। विधिवत शाक्त दीक्षा लें, फिर अपने गुरु का आदेश लें, और उस मंत्र का जप करें।
एक श्रोता नवार्ण मंत्र साधना की विधि पूछते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह विधि वे ऑनलाइन कभी नहीं बता सकते। इसके बदले वे यह बताते हैं: विधिवत शाक्त दीक्षा लें, और उसके बाद अपने गुरु का आदेश लेकर उस मंत्र का जप करें।
देवी अथर्वशीर्ष के अध्ययन का अधिकार किसे है?
अथर्ववेद के मंत्र पर अधिकार
वक्ता कहते हैं कि यह वैदिक मंत्र है, अथर्ववेद का मंत्र है, इसलिए इस पर सबका अधिकार नहीं है — यही सत्य है। पर जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं, उन्हें इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिए, और तीनों वर्णों के सभी साधकों को करना चाहिए। जो यह नहीं मानेंगे, वे कहते हैं, वे अब उनका विषय नहीं हैं; यह उनकी अपनी इच्छा है।
देवी अथर्वशीर्ष में किन दो मंत्रों की चर्चा है?
पंचदशी और नवार्ण — भगवती के मंत्रराज
पहला पंचदशी और दूसरा नवार्ण। वक्ता इन्हें देवी के मंत्रराज कहते हैं, दिव्य से भी दिव्य, जिनके आगे कुछ भी नहीं है। भगवती के मुख्य मंत्र केवल ये दो हैं, और ये इसलिए मुख्य हैं क्योंकि अथर्वशीर्ष इन्हीं का खुलकर नाम लेता है।
एक-दिवसीय रुद्रगण साधना बिना किसी अशुभ फल के दोहराई जा सकती है — रुद्रगण के समय में दो घंटे लें, सबसे अच्छा 8:00 से 9:00
एक-दिवसीय रुद्रगण साधना दोहराना, और उसका समय
हाँ, की जा सकती है, और इससे कोई अशुभ फल नहीं होगा। समय लगभग 16 सितंबर को ही ग्रुप में डाल दिया गया था: 2 तारीख को रुद्रगण का समय मोटे तौर पर सुबह 6:00 से 10:00 तक है। उसके भीतर दो घंटे लें; बीच का 8:00 से 9:00 का घंटा साफ तौर पर सबसे अच्छा है, नहीं तो उन चार घंटों में जब समय मिले तब कर लें।
पूछा गया कि 18 सितंबर को की गई एक-दिवसीय रुद्रगण साधना क्या 2 अक्टूबर को भी की जा सकती है। वक्ता कहते हैं, हाँ, की जा सकती है। जिस तरह के बुरे परिणाम का डर है, वैसा कुछ नहीं होगा; एक बार वीडियो देख लें, जहाँ क्या करना है और कैसे, यह काफी हद तक स्पष्ट किया गया है। वे याद दिलाते हैं कि समय लगभग 16 सितंबर को ही ग्रुप में डाल दिया गया था — 2 तारीख को किस समय से किस समय तक रुद्रगण साधना करनी है। रुद्रगण का समय संभवतः सुबह 6:00 से 10:00 के बीच रहेगा। उसमें से दो घंटे भी ले लें। चूँकि इसे बीच वाले भाग में करना है, इसलिए 8:00 से 9:00 का एक घंटा साफ तौर पर ठीक रहेगा; बाकी, उन चार घंटों में जब समय मिले तब कर लें। करिए, वे कहते हैं, और फिर परिणाम देखिए।
भैरव संपुट वाले प्रसंग का साधक यज्ञोपवीतधारी दीक्षित था, जो उस मंत्र का चार लाख का पुरश्चरण पहले ही पूरा कर चुका था
चैनल पर दिखाए गए प्रसंग के पीछे चार लाख का पुरश्चरण
वक्ता कहते हैं कि उस वीडियो का साधक यज्ञोपवीतधारी और दीक्षित साधक था, जिसने पहले उस मंत्र का चार लाख का पुरश्चरण विधिपूर्वक पूरा किया था, क्योंकि वह पहले से गायत्री आदि कर रहा था। वे कहते हैं कि यह बात उन्होंने जानबूझकर बताई ताकि सामान्य लोग यह न सोचें कि मंत्र को बस उठाकर प्रयोग कर लिया गया।
एक श्रोता, जो सामान्य वैष्णव नारायण मंत्र में दीक्षित हैं, उस वीडियो के संदर्भ में पूछते हैं जिसमें सप्तश्लोकी को भैरव जी के बीज मंत्र से संपुटित किया गया था — क्या तंत्र के नाश के लिए ऐसा कुछ किया जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि उस वीडियो में उन्होंने यह बात स्पष्ट की थी: वह साधक यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करने वाला और दीक्षित साधक था, और उसने पहले उस मंत्र का चार लाख का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। विधिपूर्वक पूरा किया था, क्योंकि वह पहले से गायत्री आदि कर रहा था। वे कहते हैं कि उस प्रसंग में और भी बहुत बातें हैं, पर कम से कम इतना उन्होंने बताया ताकि कोई सामान्य व्यक्ति यह न सोचे कि मंत्र बस उठाकर लगा दिया गया — ऐसा नहीं था। वीडियो सत्रह मिनट का है; आगे ऐसे प्रसंग-विश्लेषण चाहिए हों तो वे हर तत्व को बेहतर ढंग से रखने का प्रयास करेंगे। पूरे विस्तार से विश्लेषण करें तो वह एक प्रसंग डेढ़ से दो घंटे का वीडियो बन जाएगा, और बहुत कुछ छोड़ दिया गया है, क्योंकि इतनी देर वही सुनेगा जो इस क्षेत्र के हर तत्व को समझना चाहता हो। ज़्यादातर लोग, वे कहते हैं, इसे कहानी की तरह सुनेंगे और मान लेंगे कि यह गढ़ी हुई है — जब तक उनके साथ न घटे।
जो दीक्षित नहीं है, या किसी दूसरे कुल में दीक्षित है, उसे संपुट लगाने से पहले क्या करना चाहिए?
गुरु का आदेश, और संपुट के लिए सौम्य बीज
जो किसी भी रूप में दीक्षित नहीं हैं, या दूसरे कुल में दीक्षित हैं, उन्हें कम से कम अपने गुरु का आदेश लेना चाहिए। यह बात वे वीडियो में भी कहते हैं। जो इतना भी न कर सकें, वे सौम्य शक्तियों का प्रयोग करें — नारायण की परंपरा हो तो भगवान नरसिंह का बीज भी संपुट के रूप में काम करेगा।
अब जो किसी भी प्रकार दीक्षित नहीं हैं, या दूसरे कुल में दीक्षित हैं, वे यह करने से पहले कम से कम अपने गुरु का आदेश लें, वक्ता कहते हैं — और वीडियो में भी उन्होंने गुरु के आदेश से ही करने को कहा था। जो इतना भी न कर सकें, वे सौम्य शक्तियों की ओर जाएँ: यदि परंपरा नारायण की है, तो भगवान नरसिंह का बीज भी संपुट के रूप में काम करेगा। वे एक वीडियो का उल्लेख करते हैं जिसे उन्होंने बनाना शुरू किया था, जिसमें महादेव के मंत्रों आदि से संपुट का पूरा विधान रखा जाना था, पर वह पूरा नहीं हो सका। उसमें एकाक्षरी बीज नहीं लगाया जाएगा; वहाँ संपुट तीन-तीन अक्षरों का होगा। अब समय कम है, इसलिए इस बार नहीं हो पाएगा; कल आधा घंटा भी मिला तो वे वह वीडियो भी अपलोड कर देंगे।
सप्तश्लोकी दुर्गा को प्रयोग में लेने से पहले क्या पूरा करना चाहिए?
पहले सात हज़ार पाठ, फिर एकाक्षरी, फिर प्रयोग
पहले सप्तश्लोकी को ही सिद्ध करें। सात हज़ार पाठ हुए थे — सप्तश्लोकी के सातों मंत्रों का कुल मिलाकर सात हज़ार होता है। पहले वह सात हज़ार करें; उसके बाद ही एकाक्षरी करें, एक हज़ार या ग्यारह सौ या बारह सौ, और तब जाकर प्रयोग करें। तब प्रभाव भी उसी स्तर का होगा।
अभी के लिए, वक्ता कहते हैं, कम से कम सप्तश्लोकी को सिद्ध करें — श्रोता ने उसका वृत्तांत सुना है, सात हज़ार पाठ किए गए थे। सप्तश्लोकी के सातों मंत्रों का पूरा अर्थ यह है कि सातों मंत्रों का कुल पाठ सात हज़ार हुआ। इसलिए पहले वह सात हज़ार करें, वे कहते हैं। उसके बाद एकाक्षरी करें — एक हज़ार, ग्यारह सौ, बारह सौ — और फिर प्रयोग करने जाएँ। तब प्रभाव भी उसी स्तर पर मिलेगा।
क्या शिव रक्षा स्तोत्र बिना दीक्षा या यज्ञोपवीत के रोज़ पढ़ा जा सकता है?
शिव रक्षा स्तोत्र बिना दीक्षा के भी खुला है
हाँ। पूछा गया कि क्या शिव रक्षा स्तोत्र बिना दीक्षा और बिना यज्ञोपवीत के रोज़ किया जा सकता है; वक्ता उत्तर देते हैं कि अवश्य किया जा सकता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या दीक्षा लिए बिना और यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण किए बिना शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ रोज़ किया जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है।
किसी मंत्र का न्यास करते समय कौन-सा प्रणव लगाना चाहिए?
वैदिक प्रणव के स्थान पर तांत्रिक प्रणव
वैदिक या पौराणिक मंत्र का न्यास किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं, पर यदि उसमें प्रणव हो, तो वहाँ तांत्रिक प्रणव बोलें, वैदिक प्रणव नहीं। वे कहते हैं कि वैदिक प्रणव वैसे भी सबके लिए नहीं है; सामान्यतः हम सबको तांत्रिक प्रणव ही बोलना चाहिए, और वैदिक प्रणव विशेष रूप से संन्यासियों के लिए है।
जिसने घर बदल लिया है और अब पूरा नवरात्रि अनुष्ठान नहीं कर सकता, वह क्या करे?
स्थान बदलने के बाद जितना संभव हो उतना करना
एक श्रोता, जो अपने पुराने निवास के पास के मंदिर में अखंड दीप जलाते और मंडल बनाते थे, पूछते हैं कि अब घर बदलने पर क्या करें ताकि कोई दोष न लगे। वक्ता का उत्तर सीधा है: जितना संभव हो उतना करें।
प्रश्नकर्ता बताते हैं कि जहाँ वे पहले रहते थे, वहाँ बगल के मंदिर में अपनी सामर्थ्य भर नवरात्रि अनुष्ठान करते थे — अखंड दीप जलाते, मंडल बनाते आदि। अब स्थान बदल जाने के कारण यह सब संभव नहीं होगा। वे पूछते हैं कि क्या करें ताकि कोई दोष न लगे। वक्ता का उत्तर छोटा है: जितना संभव हो उतना करें।
कामाख्या में रहने वाले व्यक्ति को नवरात्रि में क्या करना चाहिए?
सौभाग्य कुंड में खड़े होकर जप, और वहाँ अक्षय तृतीया
वहाँ जाकर भगवती के सामने अर्चन और पूजन करें, वक्ता कहते हैं। सौभाग्य कुंड में नाभि तक पानी में खड़े होकर अपने दीक्षा मंत्र का जप करें। वहाँ हर एक दिन का महत्व है; और देवी भागवत तथा देवी पुराण महाभागवत के अनुसार, जो अक्षय तृतीया पर कामाख्या क्षेत्र में उपस्थित होकर वहाँ एक दिन का अनुष्ठान या पुरश्चरण पूरा करता है, उसे सर्वोच्च फल मिलता है।
कामाख्या क्षेत्र के एक श्रोता कामाख्या के बारे में पूछते हैं। आप तो वहीं रहते हैं, वक्ता कहते हैं — वहाँ जाइए, और भगवती के सामने अर्चन और पूजन कीजिए। सौभाग्य कुंड में नाभि तक पानी में खड़े होकर अपने दीक्षित मंत्र का जप कीजिए। वहाँ हर एक दिन का अपना महत्व है। देवी भागवत और देवी पुराण महाभागवत के अनुसार, वे कहते हैं, यदि कोई व्यक्ति अक्षय तृतीया के दिन कामाख्या क्षेत्र में उपस्थित हो और वहाँ एक दिन का अनुष्ठान या पुरश्चरण पूरा करे, तो सर्वश्रेष्ठ फल प्राप्त होता है।
क्या शक्तिपीठ में तिथि देखने की आवश्यकता है?
सौ बलि से स्थान जाग्रत होता है — और सबसे ऊपर कामाख्या
शक्तिपीठ में तिथि आदि देखने की विशेष आवश्यकता नहीं है, वक्ता कहते हैं, विशेषकर उन क्षेत्रों में जो अधिक जाग्रत हैं। जहाँ सौ बलि दी जाती हैं, वह स्थान जाग्रत माना जाता है; कामाख्या में पर्व काल में रोज़ सौ बलि दी जाती थीं, इसलिए वह सबसे दिव्य और सबसे उग्र पीठ है, और उसे यूँ ही महाशक्तिपीठ नहीं कहा जाता — अनेक कारणों से उसे शक्तिपीठों में सर्वोच्च माना गया है।
शक्तिपीठों में, वक्ता कहते हैं, तिथि आदि देखने की विशेष आवश्यकता नहीं है, खासकर उन क्षेत्रों में जो सबसे अधिक जाग्रत हैं। वे यह मापदंड देते हैं: जहाँ सौ बलि दी जाती हैं, वह स्थान जाग्रत माना जाता है। कामाख्या में, यदि देखें, तो पर्व काल में रोज़ सौ बलि दी जाती थीं। इसलिए वह अत्यंत दिव्य और अत्यंत उग्र पीठ है। उसे यूँ ही महाशक्तिपीठ नहीं कहा जाता, वे कहते हैं; शक्ति पीठ में उसे सर्वोच्च माना गया है, और इसके पीछे बहुत सारे कारण हैं। प्रश्नकर्ता की स्थिति, वे टिप्पणी करते हैं, वैसी है जैसे बच्चा गोद में हो और ढिंढोरा शहर में — वहाँ जाइए और कीजिए।
क्या खैर की लकड़ी से हवन किया जा सकता है?
नवग्रह की समिधाओं में से एक, खैर
हाँ, अवश्य। वक्ता कहते हैं कि खैर नवग्रह की समिधाओं में से एक है और इसमें कोई कठिनाई नहीं है; आराम से कीजिए।
पूछा गया कि क्या खैर की लकड़ी से हवन किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं, अवश्य किया जा सकता है। यह नवग्रह की समिधाओं में से एक है, वे कहते हैं, इसलिए कोई समस्या नहीं है — आराम से कीजिए।
बगला अष्टोत्तर शतनाम को और प्रभावी कैसे बनाएँ?
अभ्यास जम जाने के बाद चक्र विधि
इसका विधान चैनल पर पहले से है, वक्ता कहते हैं, और यदि आपको इसका अभ्यास हो गया है, तो इसे चक्र विधि से कीजिए। आज डाले गए वीडियो में भी इस विषय का वर्णन है।
एक श्रोता पूछते हैं कि बगला अष्टोत्तर शतनाम को और प्रभावी कैसे बनाएँ। इसका विधान चैनल पर पहले से है, वक्ता उत्तर देते हैं। और यदि आपको इसका अभ्यास आ गया है, तो इसे चक्र विधि से कीजिए। वे जोड़ते हैं कि आज डाले गए वीडियो में भी इस विषय का वर्णन है।
दत्त माला मंत्र में कौन-सा प्रणव लगाना चाहिए?
जहाँ भी वैदिक प्रणव हो, वहाँ तांत्रिक प्रणव
जहाँ भी प्रणव आए, वक्ता दोहराते हैं, यदि वह वैदिक प्रणव है तो वहाँ तांत्रिक प्रणव कीजिए। अब से वे प्रयास करेंगे कि PDF में हर जगह तांत्रिक प्रणव ही लिखा जाए। तांत्रिक प्रणव कोई भी बोल सकता है।
दुर्गा बत्तीस नामावली के चक्र विधि से कितने चक्र करने चाहिए?
तैंतीस पाठ से एक चक्र बनता है
चक्र विधि से पाठ करें, वक्ता कहते हैं, तो लगभग तैंतीस पाठ हो जाते हैं, और वह एक चक्र है। कम से कम तीन चक्र करें; या जितना कर सकें — तीन चक्र करें, पाँच चक्र करें, या सुबह-शाम मिलाकर नौ चक्र करें। बस इतना, और वह अद्भुत और दिव्य हो जाएगा।
पूछा गया कि दुर्गा बत्तीस नामावली का चक्र विधि से कितनी बार पाठ करें। वक्ता कहते हैं कि एक बार कीजिए — यदि पाठ चक्र विधि से है तो लगभग तैंतीस पाठ हो रहे हैं, और वह एक चक्र है। इसलिए कम से कम तीन चक्र करें, वे कहते हैं। या जितना कर सकें: तीन चक्र करें, पाँच चक्र करें। या सुबह और शाम मिलाकर नौ चक्र पूरे करें। बस इतना — और वह अद्भुत और दिव्य हो जाएगा।
क्या जयंती मंगला काली के जप के लिए अलग दीपक चाहिए?
कुल भैरव का दीपक ही कर्म का साक्षी
नहीं, वक्ता कहते हैं, ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है। यदि कोई दीपक है ही नहीं, तो अवश्य जलाया जाएगा; नहीं तो कुल भैरव और कुल देवी के लिए जो दीपक पहले से जल रहा है, वही पर्याप्त है। उसी में अपना संकल्प कीजिए — वे कर्म के साक्षी बनेंगे।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या जयंती मंगला काली के समय कुल भैरव वाले दीपक के अलावा एक अलग दीपक जलाना है। ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है, वक्ता उत्तर देते हैं। यदि कोई दीपक है ही नहीं, तो दीपक अवश्य जलाया जाएगा। नहीं तो कुल भैरव और कुलदेवी के लिए जो दीपक है, वही काफी है। उसी दीपक में संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। कीजिए; वे कर्म के साक्षी बनेंगे।
हवन में कौन-सी सामग्री और कितनी मात्रा में लें?
गुग्गुल और घी, साथ में पंचमेवा, मधु और काले तिल
गुग्गुल और घी से कीजिए, वक्ता कहते हैं — पौष्टिक हवन में हमेशा गुग्गुल और घी लें, यही सबसे अच्छा है। उसमें पंचमेवा, मधु आदि मिला दें तो और भी अच्छा: पंचमेवा, मधु, काले तिल और गुग्गुल-घी सबसे श्रेष्ठ है। बस इतना ध्यान रखें कि पुरुष घी की मात्रा अधिक रखेंगे और स्त्रियाँ गुग्गुल की मात्रा अधिक रखेंगी। इसी मंत्र से 108 आहुति दें।
पूछा गया कि हवन कैसे करें। वक्ता कहते हैं कि गुग्गुल और घी से कीजिए। पौष्टिक हवन में हमेशा गुग्गुल और घी लें — यही सबसे अच्छा है। उसमें पंचमेवा, मधु आदि मिला दें तो और भी अच्छा। पंचमेवा, मधु, काले तिल और गुग्गुल-घी, वे कहते हैं, सबसे उत्तम है। बस इतना ध्यान रखना है: पुरुष घी की मात्रा अधिक रखेंगे, और स्त्रियाँ गुग्गुल की मात्रा अधिक रखेंगी। इसी मंत्र से 108 आहुति दीजिए।
जिसकी कुंडली में मार्च से राहु के कारण वायव्य दोष दिख रहा हो, वह क्या करे?
इस नवरात्रि कवच अनुष्ठान शुरू करें और उसके बाद रुकें नहीं
अभी जो समय चल रहा है, उसका लाभ लीजिए, वक्ता उनसे कहते हैं। यदि कोई ऊपरी बाधा बनती दिख रही है और हल्की परेशानी शुरू हो गई है, तो इस नवरात्रि से भगवती के दिए गए मंत्र विधानों में से कोई एक — बत्तीस नामावली अनुष्ठान, अष्टोत्तर शतनाम अनुष्ठान — या कवच अनुष्ठान शुरू कीजिए, जिस रूप में श्रद्धा हो उसका कवच या रक्षा मंत्र चुनकर। और नवरात्र के बाद रुकिए नहीं।
अभिषेक कुमार लिखते हैं कि उनकी कुंडली दिखाने पर बताया गया कि राहु के कारण वायव्य दोष बन रहा है, जो मार्च 2025 से शुरू होगा, और वे उसे अभी से महसूस करने लगे हैं। बिल्कुल निश्चिंत रहिए, वक्ता कहते हैं, और अभी जो समय चल रहा है उसका लाभ लीजिए। यदि आपको लगता है कि कोई ऊपरी बाधा बन रही है, हल्की परेशानी शुरू हो गई है, तो इस नवरात्र से भगवती से जुड़े दिए गए मंत्र विधानों में से कोई शुरू कीजिए — दुर्गा बत्तीस नामावली का अनुष्ठान है, अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। का अनुष्ठान है — या इनके अलावा जो कवच अनुष्ठान दिए गए हैं, जिस रूप में आपकी श्रद्धा हो उसका कवच या रक्षा मंत्र लेकर। और नवरात्र के बाद अब इसे रोकना नहीं है। नवरात्रि है, फिर मार्गशीर्ष का महीना, फिर कार्तिक का महीना, सबसे दिव्य महीना, सब इसी अवधि में पड़ते हैं; मार्च से पहले जो चार-पाँच महीने आपको मिल रहे हैं, उनमें इतना कवच कीजिए। एक चीज़ पकड़िए और उसी एक को दोहराते रहिए — उसे बदलिए मत। हम हज़ार चीज़ें देंगे, वे कहते हैं, पर सब नहीं हो पातीं, और बहुत लोग सबसे अच्छे की प्रतीक्षा में रह जाते हैं। जब तक भगवती न चाहें, तब तक यह विचार भी किसी के मन में नहीं आता कि यह करना चाहिए, यह अनुष्ठान लेना चाहिए। इसलिए जो एक चीज़ आपको श्रद्धा से भरी लगे, उसे पकड़िए और उसका पुरश्चरण और अनुष्ठान बार-बार, विधिपूर्वक करते रहिए।
क्या मनचाहे विवाह के लिए नवरात्रि में चौथा अध्याय और पत्नीं मनोरमां वाला मंत्र किया जा सकता है?
नवरात्र में विवाह का प्रयोग खुला है
हाँ, अवश्य किए जा सकते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या मनचाहे विवाह के लिए नवरात्र में चौथा अध्याय और पत्नीं मनोरमां वाला मंत्र किया जा सकता है। बिल्कुल किए जा सकते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं।
अच्छी माला न हो तो क्या अर्गला का पहला मंत्र हाथ में फूल लेकर किया जा सकता है?
माला के स्थान पर हाथ में फूल
हाँ, यह भी बिल्कुल किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि यदि अच्छी माला उपलब्ध न हो, तो क्या अर्गला का पहला मंत्र केवल हाथों में फूल लेकर किया जा सकता है। यह भी बिल्कुल किया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं।
गुरु के नाम पर कितने दीपक और अपने नाम पर कितने जलाएँ?
अपने लिए अधिक रखें, और रोज़ एक दीपक पर्याप्त है
एक श्रोता, जो वक्ता के नाम पर पाँच और अपने नाम पर दो दीपक जलाते हैं, से कहा जाता है कि वे वक्ता के लिए बहुत अधिक कर रहे हैं। अपने लिए अधिक रखिए और मेरे लिए कम, वक्ता कहते हैं। यदि आप केवल दो जलाते हैं, या संख्या कम रख रहे हैं, तो अधिक से अधिक अंतिम दिन पाँच कीजिए; नहीं तो रोज़ के अभ्यास में बस एक दीपक रखिए। वे कहते हैं कि अधिक दीपक की बात उन्होंने एक-दिवसीय अनुष्ठान में, या अंतिम दिन के लिए कही थी; नित्य अभ्यास में एक दीपक भी पर्याप्त है।
एक श्रोता बताते हैं कि वे वक्ता के नाम पर पाँच दीपक और अपने नाम पर दो दीपक जलाते हैं, और अंत में लौंग और कपूर जलाते हैं। आप मेरे लिए पाँच दीपक कर रहे हैं — यह बहुत अधिक है, वक्ता कहते हैं। अपना अधिक रखिए और मेरा कम; अपना बढ़ाइए। यदि आप केवल दो जलाते हैं, या संख्या कम रख रहे हैं, तो अंतिम दिन एक बार पाँच कीजिए। नहीं तो रोज़ के अभ्यास में एक दीपक रखिए। अधिक दीपक जलाने की बात उन्होंने एक-दिवसीय अनुष्ठान में, या अंतिम दिन के लिए कही थी; नित्य अभ्यास में एक दीपक बिल्कुल पर्याप्त है।
माला मंत्र कवच का न्यूनतम जप कितना है?
ग्यारह हज़ार जप न्यूनतम सीमा
कम से कम ग्यारह हज़ार, अवश्य। वक्ता कहते हैं कि माला मंत्र कवच का न्यूनतम 11,000 जप करना ही चाहिए।
11,000 जप की संख्या पर निशांत त्यागी को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि कम से कम इतना तो अवश्य करना चाहिए। माला मंत्र कवच का न्यूनतम 11,000 जप करना ही है।
आयोजित अनुष्ठान से जुड़ने वाले अमावस्या से दशमी तक शारीरिक और मानसिक, पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं
कल से बारह तारीख की दशमी तक पूर्ण ब्रह्मचर्य
गृहस्थ तंत्र द्वारा आयोजित अनुष्ठान में भाग लेने वाले कल, यानी अमावस्या से लेकर बारह तारीख की दशमी तक पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करने का प्रयास करें — शारीरिक और मानसिक दोनों। यह नवरात्र का समय है, वक्ता कहते हैं, इसलिए इसमें कोई गलती या अपराध न करें।
गृहस्थ तंत्र द्वारा आयोजित किए जा रहे अनुष्ठान से जो भी जुड़ रहे हैं, वक्ता कहते हैं, वे कल से — जो अमावस्या है — बारह तारीख की दशमी तक पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने का प्रयास करें। ब्रह्मचर्य रखना चाहिए। ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से करें। यह नवरात्र का समय है; इसमें कोई गलती या अपराध न करें। जो कोई अनुष्ठान नहीं कर रहे और न करवा रहे हैं, वे भी, वक्ता कहते हैं — नवरात्र में घूमिए-फिरिए, पर गलत भोजन मत कीजिए और ब्रह्मचर्य का पालन कीजिए। ये दो बातें अवश्य करनी हैं। और जो अनुष्ठान या साधना कर रहे हैं, उनके लिए तो नियम ही है कि पूरी तरह और ठीक से व्यवस्थित रहना है।
नवरात्र में गृहस्थ को घर पर कम से कम क्या करना चाहिए?
धूप, दीप, आरती और श्रृंगार पूजा, और एक छोटा श्री विग्रह
जो अनुष्ठान करवा रहे हैं, उन्हें घर पर भी कुछ अवश्य करना चाहिए — सुबह-शाम धूप, दीप और आरती; और कुछ न हो तो श्रृंगार करके श्रृंगार पूजा, जिसे वक्ता सबसे अच्छा कहते हैं। जो कुछ भी नहीं कर पाते, जो वृद्ध हैं या रोग से पीड़ित हैं, उनके घर में कम से कम भगवती का एक छोटा, लगभग पाँच-छह इंच का श्री विग्रह हो, जिसका वे रोज़ अभिषेक, श्रृंगार और आरती कर सकें।
क्या नौ दिनों में विग्रह को उसके आसन से उठाया जा सकता है?
कलश और अखंड ज्योत स्थापित हो जाने पर आसन नहीं हिलाया जाता
यदि आपने कलश स्थापना की है, अखंड ज्योत जलाई है और श्री विग्रह स्थापित है, तो नवरात्र के नौ दिनों में विग्रह को हिलाना नहीं है। यदि आपका रोज़ भगवती को स्नान कराने का नियम है, तो अपने गुरु से पूछिए कि आसन हिलाया जा सकता है या नहीं; वक्ता के अपने ज्ञान और अभ्यास के अनुसार आसन नहीं हिलाना चाहिए। अभिषेक की ऐसी व्यवस्था कीजिए कि उन्हें आसन से उठाना न पड़े। पूरा विधिवत स्नान केवल पहले दिन होता है; अगले दिन से उन्हें हटाना नहीं चाहिए।
क्या रात में झाड़ू लगाई जा सकती है?
झाड़ू लगा सकते हैं, पर कूड़ा देहरी पार न करे
वक्ता पहले कहते हैं कि रात में झाड़ू बिल्कुल नहीं लगानी चाहिए। एक मित्र, जो रात में झाड़ू लगा रहे थे, ने उनसे कहा कि लगा सकते हैं, बस कूड़ा देहरी के बाहर न जाए, और वे मानते हैं कि यह ठीक है: कूड़ा देहरी के पार बाहर नहीं ले जाना चाहिए। झाड़ू लगाई जा सकती है। कई जगह यह नियम भी है कि शाम होने के बाद झाड़ू को छूना नहीं चाहिए। पर मुख्य बात, वे कहते हैं, यह है कि कूड़ा देहरी से बाहर न जाए, मुख्य द्वार से बाहर न जाए; अंदर सफ़ाई की जा सकती है।
रात में झाड़ू बिल्कुल नहीं लगानी चाहिए, वक्ता शुरू करते हैं। वे बताते हैं कि एक मित्र रात में झाड़ू लगा रहे थे और उन्होंने मना किया, तब मित्र ने कहा कि रात में झाड़ू लगा सकते हैं, बशर्ते कूड़ा देहरी के बाहर न ले जाया जाए। हाँ, यह ठीक है, वक्ता सहमत होते हैं: कूड़ा देहरी के पार बाहर नहीं ले जाना चाहिए; झाड़ू लगाई जा सकती है। और कई जगह यह नियम भी है कि शाम होने के बाद झाड़ू को छूना नहीं चाहिए, इसलिए कुछ लोग छूते ही नहीं। पर बात का सार, जिस पर ज़्यादातर ज़ोर है, यह है कि कूड़ा देहरी से बाहर न जाए और मुख्य द्वार से बाहर न जाए। अंदर सफ़ाई की जा सकती है।
घर में ज्योति कलश कौन रख सकता है?
ज्योति कलश कोई भी रख सकता है
घर में ज्योति कलश कोई भी रख सकता है, वक्ता कहते हैं। यदि आपके घर में रखने का नियम है, तो ज्योति कलश रखिए।
घर में ज्योति कलश कोई भी रख सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं। यदि आपके यहाँ ज्योति कलश रखने का नियम है, तो रखिए।
क्या जयंती मंगला के जप के साथ सारी विद्याएँ भी पढ़नी होंगी?
केवल जप पर्याप्त है; पूरा पाठ वैकल्पिक
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा। यदि आप केवल जप करना चाहते हैं, तो केवल जप कीजिए; और यदि पूरा पाठ करने की इच्छा और सामर्थ्य है, तो पूरा पाठ भी कीजिए।
विनय पूछते हैं कि क्या जयंती मंगला काली के जप के साथ सारी विद्याएँ भी पढ़नी होंगी। वक्ता कहते हैं कि उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कही। यदि आप केवल जप करना चाहते हैं, तो केवल जप कीजिए। और यदि पूरा पाठ करने की इच्छा और सामर्थ्य है, तो पूरा पाठ भी कीजिए।
क्या नवरात्र के केवल पहले तीन या पाँच दिन पूजा की जा सकती है?
यात्रा करनी हो तो छोटा अनुष्ठान
हाँ, बिल्कुल की जा सकती है, वक्ता कहते हैं।
एक श्रोता बताती हैं कि उन्हें नवरात्र के बीच में बाहर जाना है, क्योंकि उसी समय उनके पति की छुट्टी पड़ती है, और पूछती हैं कि क्या वे केवल पहले तीन या पाँच दिन पूजा कर सकती हैं। हाँ, बिल्कुल की जा सकती है, वक्ता उत्तर देते हैं।
चक्र विधि में कितने फूल अर्पित करने चाहिए?
तैंतीस अर्पण, या एक फूल पर तैंतीस पाठ
तैंतीस बार करना अधिक उचित रहेगा, वक्ता कहते हैं; जितना अधिक करें उतना अच्छा। यदि यह संभव न हो तो एक ही फूल पर तैंतीस पाठ कर सकते हैं। यदि आप पाँच चक्र पाठ कर रहे हैं, तो उस तरह करना चाहें तो तैंतीस गुणा पाँच अर्पण होने चाहिए; नहीं तो केवल पाँच फूलों पर, हर एक पर तैंतीस पाठ कीजिए। इसमें भी कोई कठिनाई नहीं है — पर यदि अधिक उपलब्ध हो, तो अधिक करना बेहतर है।
पूछा गया कि क्या चक्र विधि में पुष्प समर्पण तैंतीस बार करना होगा। वक्ता कहते हैं कि तैंतीस बार करना अधिक उचित रहेगा, और अच्छा रहेगा; जितना अधिक करें, उतना अच्छा। यदि नहीं हो पा रहा, तो एक ही फूल पर तैंतीस पाठ भी कर सकते हैं। और यदि पाँच चक्र पाठ करने हैं, तो तैंतीस गुणा पाँच अर्पण होने चाहिए — हाँ, यदि आप उस तरह करना चाहें। नहीं तो केवल पाँच फूलों पर कीजिए, हर एक पर तैंतीस पाठ। इसमें भी कोई कठिनाई नहीं है; पर यदि आपके पास अधिक उपलब्ध है, तो अधिक करना और भी अच्छा है।
क्या केले की बलि दी जा सकती है?
सब्ज़ी-फल की बलि — केला, खीरा, लौकी, कुष्मांड, नींबू, नारियल
बिल्कुल दी जा सकती है, वक्ता कहते हैं। केले, खीरे, लौकी, कुष्मांड की बलि सबसे उत्तम है; नींबू, नारियल — इन सबकी बलि दी जा सकती है।
पूछा गया कि क्या केले की बलि दी जा सकती है। वक्ता कहते हैं, बिल्कुल दी जा सकती है। केले, खीरे, लौकी, कुष्मांड की बलि सबसे श्रेष्ठ है; नींबू की, नारियल की — इन सबकी बलि दी जा सकती है।
हर चक्र के लिए दो लौंग रखें या एक?
हर पाठ पर एक लौंग — एक चक्र में तैंतीस लौंग
दो लौंग की आवश्यकता नहीं है, वक्ता कहते हैं; केवल एक रखें। जोड़े की ज़रूरत नहीं, क्योंकि इसमें केवल भगवती हैं, और यहाँ संपुट भगवती के प्रणवों का है। इसलिए एक-एक लौंग लेते हुए, चूँकि तैंतीस पाठ हैं, एक चक्र पूरा करने में तैंतीस लौंग लगेंगी। अंत में इन्हें अवश्य जलाया जा सकता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या एक पूरे चक्र के लिए हाथ में दो लौंग लें, और फिर अगले के लिए फिर दो। दो लौंग की कोई आवश्यकता नहीं है, वक्ता कहते हैं — बस एक रखिए। यहाँ जोड़े की ज़रूरत नहीं, क्योंकि इसमें केवल भगवती हैं, और जो संपुट लगाया जा रहा है वह भगवती के प्रणवों का है। इसलिए एक-एक लौंग लेते हुए: चूँकि तैंतीस पाठ हैं, एक चक्र पूरा करने में तैंतीस लौंग लगेंगी। और अंत में इन्हें बिल्कुल जलाया जा सकता है। यदि चाँदी का पात्र उपलब्ध हो तो उत्तम; नहीं तो मिट्टी के पात्र में या जो भी आपको ठीक लगे — ताँबे का पात्र, पीतल का पात्र — उसमें कपूर आदि रखकर इन्हें बलि के रूप में जलाया जा सकता है। यह भी अच्छा है, बहुत अच्छा।
जयंती मंगला काली मंत्र का पुरश्चरण कितनी संख्या पर पूरा होता है?
मंत्र के लिए पाँच हज़ार, और ग्यारह हज़ार पर पुरश्चरण
जयंती मंगला मंत्र पाँच हज़ार पर है, वक्ता कहते हैं, और इस तरह आपका पुरश्चरण ग्यारह हज़ार पर पूरा हो जाता है। जिन श्रोता ने इक्कीस हज़ार कर लिया है, उनसे कहा जाता है कि यह उत्तम है, और यदि वे उस मंत्र को स्वतंत्र रूप से, पूरा न्यास आदि विधिपूर्वक करके करें, तो बहुत अच्छा रहेगा।
एक श्रोता बताते हैं कि उन्होंने अब तक जयंती मंगला काली का 21,000 पाठ किया है। जयंती मंगला मंत्र पाँच हज़ार पर है, वक्ता कहते हैं; उस तरह आपका पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। ग्यारह हज़ार पर पूरा हो जाता है। यदि आपने 21,000 कर लिया है, तो यह उत्तम है। और यदि आप उस मंत्र को स्वतंत्र रूप से, पूरा न्यास आदि विधिपूर्वक करके करें, तो बहुत ही अच्छा रहेगा।
किसी कामना के लिए प्रयोग से पहले सप्तशती के कितने पाठ होने चाहिए?
कम से कम शतचंडी, और नवार्ण दीक्षा की आवश्यकता
कम से कम शतचंडी पूरी हो जाए तो अच्छा है, वक्ता कहते हैं। नवचंडी के बाद भी इसे काम में ले सकते हैं; पर यदि आपने भगवती की कृपा पाने के लिए बिना संपुट के, सादे 108 पाठ करके भगवती को अर्पित कर दिए हैं, तो उसके बाद आप अधिकृत हैं और इसे काम में ले सकते हैं। पर अधिकार होना चाहिए — नवार्ण आदि की दीक्षा होनी चाहिए।
अक्षय तंवर पूछते हैं कि जिसका सप्तशती का संस्कृत पाठ शुद्ध है, उसे किसी कामना के लिए प्रयोग करने से पहले कितने पाठ पूरे कर लेने चाहिए। वक्ता इसे बहुत अच्छा प्रश्न कहते हैं। कम से कम यदि शतचंडी पूरी हो जाए, तो सबसे अच्छा। नवचंडी अनुष्ठान के बाद भी आप इसे काम में ले सकते हैं। पर यदि आपने भगवती की कृपा के लिए, बिना संपुट के, सामान्य प्रकार के 108 पाठ करके भगवती को अर्पित कर दिए हैं — इस शर्त के साथ कि आपके पास अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। हो, नवार्ण आदि की दीक्षा हो — तो उसके बाद आप अधिकृत हैं, और तभी इसे काम में लेने जाइए। तब भगवती बहुत अच्छी तरह अपनी कृपा करती हैं।
संकल्प में कौन-सा नाम लेना चाहिए?
जिस नाम से पुकारे जाते हैं, राशि का नाम नहीं
संकल्प उसी नाम से रखिए जिस नाम से आपको पुकारा जाता है, वक्ता कहते हैं। राशि आदि की आवश्यकता नहीं है। यदि शुरू से आप अपने पूजन में राशि नाम या नक्षत्र नाम से संकल्प लेते आए हैं, तो वह अच्छा है और वही चलाते रहिए; नहीं तो जो नाम प्रचलन में है, वही दीजिए।
संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। उसी नाम से रखिए जिस नाम से आपको पुकारा जाता है, वक्ता कहते हैं। राशि आदि की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि शुरू से आप अपने पूजन में राशि नाम से, या नक्षत्र नाम से संकल्प लेते आए हैं, तो वह अच्छा है — उसी से लीजिए। नहीं तो जो नाम प्रचलन में है, वही दीजिए।
क्या स्त्री दिन में एक चंडी पाठ कर सकती है?
स्त्री का चंडी पाठ, संस्कृत में या हिंदी में
बिल्कुल कर सकती है, वक्ता कहते हैं। यदि विधि-विधान ज्ञात है, सारा उच्चारण स्पष्ट है और गुरु का आदेश है, तो क्यों नहीं कर सकती? संस्कृत में, या चाहें तो हिंदी में — हिंदी में भी बिल्कुल कर सकती है।
पूछा गया कि क्या स्त्री दिन में एक चंडी पाठ कर सकती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल कर सकती है। यदि विधि-विधान ज्ञात है, यदि सारा उच्चारण स्पष्ट है, और यदि गुरु का आदेश है, तो वह क्यों नहीं कर सकती? संस्कृत में, या चाहें तो हिंदी में — हिंदी में भी बिल्कुल कर सकती है।
क्या नवरात्रि में उपवास करने वाले को ज़मीन पर सोना ही चाहिए?
कुश या कंबल पर भूमि शयन, खाट पर कभी नहीं
यदि शरीर में शक्ति है तो भूमि शयन कीजिए — कुश पर, या कंबल पर, या कंबल मोटा कर लीजिए। खाट पर नहीं सोना चाहिए। पलंग पर न सोएँ, यही सबसे अच्छा है। और यदि ज़मीन पर जगह ही नहीं है इसलिए ऊपर सो रहे हैं, या परिवार में ऐसी कोई बात है, तो कोई कठिनाई नहीं: भगवती से क्षमा माँगकर ऊपर सो जाइए। पर भूमि शयन सबसे श्रेष्ठ है — ज़मीन पर कुश की चटाई, या कंबल।
सप्तशती के किन मंत्रों से आहुति नहीं दी जाती?
उवाच वाले मंत्र और चौथे अध्याय की स्तुति
कुछ मंत्रों में अस्त्र का नाम नहीं होता, और उनसे आहुति नहीं दी जाती। उवाच वाली पंक्तियों से भी आहुति नहीं होती — ऋषिरुवाच, वैश्य उवाच, राजोवाच, देवा ऊचुः, ये सब। और चौथे अध्याय की स्तुति के बाद वाला मंत्र, शूलेन पाहि नो देवि, उससे भी आहुति नहीं होगी। इनसे आहुति के स्थान पर या तो केवल पाठ कीजिए, या केवल घृत की आहुति दीजिए, या पान के पत्ते पर केला रखकर उसकी आहुति दीजिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि सप्तशती में अस्त्र मंत्रों को कैसे संभालें, यह बताते हुए कि कुछ मंत्रों में अस्त्र का नाम नहीं होता और फिर भी आहुति नहीं होती, और इस पर एक वीडियो माँगते हैं। वक्ता कहते हैं कि अब देर हो गई है, इसलिए आज सप्तशती पर पूरा वीडियो संभव नहीं; कल समय मिला तो बनाएँगे। उवाच वाली पंक्तियों से भी आहुति नहीं होती — ऋषिरुवाच, वैश्य उवाच, राजोवाच, देवा ऊचुः, ये सब: 'उवाच' से आहुति नहीं दी जाती। और चौथे अध्याय की स्तुति के बाद जो मंत्र आता है, शूलेन पाहि नो देवि, उसे इन मंत्रों के साथ आहुति नहीं मिलेगी। इनसे आहुति के स्थान पर या तो केवल पाठ कीजिए, या केवल घृत की आहुति दीजिए, या फिर पान के पत्ते पर केला रखकर उसकी आहुति दीजिए। वे जोड़ते हैं कि कल एक अलग वीडियो भी बनाएँगे।
क्या संकटनाशन दोहराना चाहिए?
संकटनाशन स्तोत्र दोहराना
हाँ — संकटनाशन दोहराइए, वक्ता सीधे कहते हैं।
संकटनाशन के बारे में पूछे जाने पर वक्ता प्रश्नकर्ता से बिना किसी शर्त के कहते हैं कि इसे दोहराइए।
क्या रात्रि सूक्त और जयंती मंगला काली एक साथ किए जा सकते हैं?
एक समय में एक मंत्र, दो प्रचंड शक्तियाँ एक साथ कभी नहीं
एक साथ मत कीजिए — एक कीजिए, वक्ता प्रतिभा से कहते हैं। नहीं तो इतनी देवियाँ आ जाएँगी कि आप संभाल नहीं पाएँगी, और उनकी भक्ति के हिस्से में कमी रह जाएगी। दोनों में प्रचंड शक्तियाँ हैं। इसलिए केवल एक कीजिए; एक समय में एक मंत्र का जप करना हमेशा अच्छा है।
पूछा गया कि क्या रात्रि सूक्तम् और जयंती मंगला काली एक साथ किए जा सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि एक साथ मत कीजिए — इनमें से एक कीजिए। नहीं तो इतनी देवियाँ आ जाएँगी कि आप संभाल नहीं पाएँगी, वे कहते हैं, और उनकी भक्ति के हिस्से में कमी रह जाएगी। दोनों में प्रचंड शक्तियाँ हैं। इसलिए केवल एक कीजिए: किसी भी समय एक बार में एक ही मंत्र का जप करना सबसे अच्छा है।
क्या बजरंग बाण विधि में पंचधान्य के दीपक का कोई विकल्प है?
पंचधान्य का दीपक प्रचंड सिद्धि वाले रूप का है
वक्ता कहते हैं कि वह दीपक ठीक प्रचंड सिद्धि के लिए ही है, यदि आप वही कर रहे हैं। नहीं तो सिद्ध साबरी विद्या चैनल पर एक और वीडियो मिलेगा — उसे सुनिए, जहाँ उन्होंने अलग तरीका बताया है।
एक श्रोता प्रचंड सिद्धि के लिए बजरंग बाण विधि में पंचधान्य के दीपक के स्थान पर कोई दूसरा दीपक पूछते हैं। वह दीपक प्रचंड सिद्धि के लिए ही है, वक्ता कहते हैं, यदि आप वह कर रहे हैं। नहीं तो सिद्ध साबरी विद्या चैनल पर आपको एक और वीडियो मिलेगा; उसे सुनिए। वहाँ भी उन्होंने अलग तरीका समझाया है।
क्या तंत्रोक्त रात्रि सूक्त में हवन आवश्यक है?
तंत्रोक्त रात्रि सूक्त में हवन वैकल्पिक है
न कर पाएँ तो कोई समस्या नहीं, वक्ता कहते हैं। करें तो बहुत अच्छा; न करें तो कोई समस्या नहीं।
पूछा गया कि यदि तंत्रोक्त रात्रि सूक्त में हवन न हो पाए तो क्या कोई समस्या है। वक्ता कहते हैं कि कोई समस्या नहीं है। करें तो बहुत अच्छा है। न करें तो कोई समस्या नहीं।
धूनी कैसे बनाई जाती है?
पहले उपले जलाएँ, फिर मंत्र के साथ गुग्गुल डालें
पहले गोबर का उपला जलने दीजिए, वक्ता कहते हैं; जब आग पूरी तरह पकड़ ले, तब मंत्र बोलते हुए उस पर गुग्गुल डाला जाता है। उससे जो धुआँ निकलता है, वही धूनी है।
देव शर्मा को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि पहले गोबर का उपला जलाना चाहिए। जब आग पूरी तरह पकड़ ले, तब मंत्र बोलते हुए उस पर गुग्गुल छोड़ा जाता है। तब जो धुआँ निकलता है, वही धूनीविशेष लकड़ियों व बीजों को जलाकर घर या स्थान से नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा दूर करने हेतु की जाने वाली धूनी। है।
क्या नवरात्र में इक्कीस दिन का संकल्प लिया जा सकता है?
नवरात्र का संकल्प केवल नौ दिन का होता है
ऐसे नहीं चलेगा, वक्ता आशीष कुमार से कहते हैं। नवरात्र का संकल्प केवल नौ दिन का होगा। यदि बाद में इक्कीस दिन का अनुष्ठान करना चाहते हैं, तो किसी और महीने में, अष्टमी से, या शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से, इक्कीस दिन लगातार चलाइए — और किस देवता का, किसलिए करना है, यह सब करने से पहले देख लीजिए।
जिस मंदिर में कभी नरबलि होती थी और अब भी बकरे की बलि होती है, वह कितना जाग्रत है?
ऐसे मंदिरों की क्षमता, और वह कैसे सो जाती है
बहुत जाग्रत होगा, वक्ता कहते हैं। ऐसे मंदिरों में बड़ी क्षमता होती है; पर लोग उस क्षमता का अच्छा उपयोग नहीं करते, उसे काम में नहीं लेते, भूल जाते हैं और छोड़ देते हैं। तब वह समाप्त हो जाती है — उस क्षेत्र की जो चेतना जाग्रत रहती है, वह धीरे-धीरे निद्रा की अवस्था में चली जाती है।
एक श्रोता बताते हैं कि उनके क्षेत्र में पुराने समय में नरबलि होती थी, और अब उस सिद्ध पीठ में बकरे की बलि दी जाती है, और पूछते हैं कि वह मंदिर कितना जाग्रत होगा। बहुत जाग्रत, वक्ता उत्तर देते हैं। ऐसे मंदिरों में बड़ी क्षमता होती है — पर लोग उस क्षमता का अच्छा उपयोग नहीं करते, उसे काम में नहीं लेते, सब भूलकर एक ओर छोड़ देते हैं। तब वह समाप्त हो जाती है। जो समाप्त होती है, वह उस क्षेत्र में जाग्रत रहने वाली चेतना है; वह धीरे-धीरे निद्रा की अवस्था में चली जाती है।
बलि के लिए नारियल, कुष्मांड या नींबू को अभिमंत्रित कैसे करते हैं?
छेदन से पहले पूजन की पूरी शृंखला, और दीक्षा क्यों आवश्यक है
यदि आप अभिमंत्रण के विधान में जाएँ, वक्ता कहते हैं, तो पहले बलि पीठ का पूजन कीजिए, फिर अस्त्र पूजन; उसमें वीराचार के मंत्र आदि प्राप्त होने चाहिए, और यदि गुरु ने फट्कार मंत्र कान में दिए हैं तो उत्तम। तभी बलि देने से पहले योगिनियों का पूजन कीजिए; फिर बलि का पूजन, प्रतिष्ठा, और तभी छेदन, जिसके समय के अपने नियम हैं। इतने नियम, वे पूछते हैं, बिना दीक्षा के कैसे सीखेंगे?
पूछा गया कि बलि के लिए नारियल, कुष्मांड या नींबू को अभिमंत्रित कैसे करते हैं। वक्ता कहते हैं कि यदि आप अभिमंत्रण के विधान में प्रवेश करते हैं, तो पूरी प्रक्रिया साथ आती है। पहले बलि पीठ का पूजन कीजिए, फिर अस्त्र पूजन; उसके भीतर वीराचार के मंत्र आदि आपको प्राप्त होने चाहिए, और यदि गुरु ने फट्कार मंत्र कान में दिए हैं तो उत्तम है। फिर बलि देने से पहले ही योगिनी का पूजन कीजिए। फिर बलि का पूजन कीजिए, प्रतिष्ठा कीजिए, और तभी छेदन — और छेदन के क्षण के भी नियम हैं। इतने नियम, वे कहते हैं: बिना दीक्षा के आप इसे कैसे सीखेंगे? यह केवल प्रतिष्ठा विधि से नहीं होगा; यदि आप प्रतिष्ठा करते हैं तो सारी पूरी प्रक्रियाएँ करनी होंगी, तुरंत तर्पण का विषय उठेगा, और विधान जटिल हो जाता है।
सप्तश्लोकी दुर्गा प्रयोग में हवन किस मंत्र से होता है?
संपुट मंत्र और सप्तश्लोकी के मंत्र दोनों की आहुति
जिससे आप संपुट कर रहे हैं, उससे, वक्ता कहते हैं — और सप्तश्लोकी का भी। दोनों होंगे; संपुट का अपना अलग हवन होगा। आज डाले गए वीडियो में संपुट भ्राम मंत्र से था, तो भ्राम स्वाहा, भ्राम स्वाहा अलग होगा, और फिर सप्तश्लोकी के हर मंत्र की अपनी अलग आहुति होगी।
पूछा गया कि सप्तश्लोकी दुर्गा प्रयोग में हवन किस मंत्र से होता है। वक्ता कहते हैं कि यह उसी मंत्र से होता है जिससे आप संपुट कर रहे हैं। उसका हवन होगा और सप्तश्लोकी का हवन भी होगा — दोनों करने हैं। संपुट का अपना हवन अलग से होगा। जैसा आज सुने गए वीडियो में, वे कहते हैं, जिसमें संपुट भ्राम मंत्र से हो रहा था: भ्राम स्वाहा, भ्राम स्वाहा, वह अलग होगा; और फिर सप्तश्लोकी के हर मंत्र को अपनी अलग आहुति मिलेगी।
हवन या संपुट में क्या प्रणव केवल पहले श्लोक पर लगता है?
आहुति देने के दो तरीके, और किसमें प्रणव लगता है
यदि आप प्रणव से ही संपुट कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं, तो वह सभी पर लगेगा। दो तरीके हैं: आप हर मंत्र को क्रम से नौ-नौ आहुति दे सकते हैं, या यदि आपने सौ पाठ किए हैं, तो दशांश के रूप में ग्यारह पाठ का हवन कीजिए। हर मंत्र की एक-एक आहुति क्रम से देना आवश्यक नहीं है। पहले मंत्र की नौ आहुति, फिर दूसरे की नौ, फिर तीसरे की नौ दे सकते हैं — और यह बेहतर है। प्रणव तब लगता है जब आप इस तरह हर मंत्र की नौ आहुति चलाते हैं।
पत्नीं मनोरमां मंत्र का कितना जप करना चाहिए?
दस माला जप, फिर पाठ
यदि जप करना है, तो पत्नीं मनोरमां का दस माला जप कीजिए, वक्ता कहते हैं, और फिर जो पाठ करना है, अपनी इच्छा से कीजिए — पाँच पाठ, सात पाठ; नौ दिनों में 108 कर सकें तो उत्तम।
वक्ता पूछते हैं कि क्या श्रोता पत्नीं मनोरमां से संपुट करने की सोच रहे हैं, या केवल स्वतंत्र जप चाहते हैं। यदि जप करना है, तो पत्नीं मनोरमां का दस माला जप कीजिए। और फिर जो पाठ करना है, अपनी इच्छा के अनुसार कीजिए — पाँच पाठ, सात पाठ। नौ दिनों में जितना पाठ कर सकें; यदि 108 पूरे कर लें, तो उत्तम।
क्या दुर्गा सप्तशती का कवच हिंदी में पढ़ा जा सकता है?
सप्तशती का कवच हिंदी में
हाँ, हिंदी में बिल्कुल पढ़ा जा सकता है, वक्ता कहते हैं।
पूछा गया कि क्या सप्तशती का दुर्गा कवच हिंदी में भी पढ़ा जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल पढ़ा जा सकता है।
राहु से पीड़ित व्यक्ति, जिसका काम नहीं बन रहा और पैसा जा रहा है, क्या करे?
शिव गर्भगृह की चौखट का श्रृंगार
राहु से जुड़े विषय चैनल पर पहले ही अलग से बताए गए हैं, वक्ता कहते हैं, और उनमें सबसे अच्छी बात यह है: भगवान शिव की पूजा कीजिए, और शिव की चौखट का श्रृंगार कीजिए। ऐसा मंदिर चुनिए जहाँ भगवान शिव के गर्भगृह में चौखट हो। इतना कीजिए, बहुत लाभ होगा, और जल्दी लाभ होगा।
एक श्रोता बताते हैं कि कोई काम नहीं बन रहा, पैसा लगातार जा रहा है, और वे राहु से पीड़ित हैं, और पूछते हैं कि क्या करें। यदि आप राहु से पीड़ित हैं, वक्ता कहते हैं, तो — राहु से जुड़ा विषय चैनल पर पहले ही अलग से बताया गया है, और उसमें सबसे अच्छी बात यह है कि आप भगवान शिव की पूजा करें और भगवान शिव की चौखट का श्रृंगार करें। ऐसा मंदिर चुनिए जिसमें भगवान शिव के गर्भगृह में चौखट हो। इतना कीजिए, बहुत लाभ होगा, और जल्दी लाभ होगा। वे जोड़ते हैं कि शिव कवच पर एक वीडियो पहले से है।
छिन्नमस्तिका का विधान गुप्त नवरात्रि तक टाला गया है, क्योंकि उसका मंत्र अभी विषय को बहुत लंबा कर देता है
छिन्नमस्तिका गुप्त नवरात्रि तक टली
इस बार यह संभव नहीं होगा, वक्ता कहते हैं, क्योंकि जो मंत्र इसमें लगेगा वह विषय को थोड़ा लंबा कर देता है, और समय कम होने के कारण उन्हें अभी इतना लंबा वीडियो डालना ठीक नहीं लगता। अगली बार, या नवरात्र के बाद जब फिर समय मिलेगा, वे इसे डालेंगे — माँ की गुप्त नवरात्रि के समय।
छिन्नमस्तिका माँ के विषय में वक्ता कहते हैं कि इस बार पूरा विषय नहीं दिया जा सकता, क्योंकि जो मंत्र इसमें आएगा वह विषय को कुछ लंबा कर देता है। और अभी इतना लंबा वीडियो डालना उन्हें ठीक नहीं लगता; समय कम है। अगली बार, या नवरात्र के बाद जब फिर समय मिलेगा, वे इसे डालेंगे — माँ की गुप्त नवरात्रि के समय।
आवश्यक सामग्री उपलब्ध न हो तो क्या करना चाहिए?
स्थान में जो मिले उसी से साधना, मानसिक समर्पण तक
जो साधन उपलब्ध हैं, उन्हीं से कीजिए, वक्ता विकास से कहते हैं। जिस स्थान पर रहते हैं, वहाँ उपलब्ध साधनों के अनुसार साधना और अनुष्ठान करना चाहिए। नियम तो यहाँ तक जाता है, वे कहते हैं, कि यदि उस क्षेत्र में फल-पत्ते की भी कमी हो, तो मानसिक रूप से अर्पण करके पूजन पूरा कीजिए।
जो साधन आपके पास उपलब्ध हैं, उन्हीं से कीजिए, वक्ता कहते हैं। जिस भी स्थान पर कोई रहता है, वहाँ उपलब्ध साधनों के अनुसार साधना और अनुष्ठान करना चाहिए। नियम तो यहाँ तक जाता है: यदि उस क्षेत्र में फल-पत्ते की भी कमी हो, तो मानसिक रूप से अर्पण करके पूजन कीजिए।
क्या बत्तीस नाम माला मंत्र से चारों पुरुषार्थों का संकल्प लिया जा सकता है?
बत्तीस नामावली के संकल्प में चारों पुरुषार्थ
हाँ, बत्तीस नाम माला मंत्र के पाठ में चारों पुरुषार्थों का संकल्प बिल्कुल लिया जा सकता है, वक्ता कहते हैं।
बत्तीस नाम माला मंत्र के पाठ में चारों पुरुषार्थों का संकल्प लेने के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल लिया जा सकता है।
क्या बिना दीक्षा के चंडी पाठ किया जा सकता है?
त्रुटिहीन उच्चारण, और गायत्री करने वाले ब्राह्मण से उपदेश
यदि आप संस्कृत में कर रहे हैं और दीक्षा नहीं है, वक्ता कहते हैं, तो सब कुछ भली-भाँति ज्ञात होना चाहिए, ताकि उच्चारण में कोई त्रुटि या दोष न हो। नवार्ण की एक माला बिना दीक्षा के चल जाएगी। पर चंडी पाठ के लिए अभ्यास करते समय कम से कम गायत्री करने वाले किसी ब्राह्मण से उपदेश लेना चाहिए; या घर में कोई बड़े हों जो साधना-पूजा करते हैं, तो उनसे उपदेश और अनुमति लीजिए। अनुमति लेकर करना सबसे अच्छा रहेगा।
पूछा गया कि क्या बिना दीक्षा के चंडी पाठ किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि यदि आप संस्कृत में कर रहे हैं और दीक्षा नहीं है, तो सब कुछ भली-भाँति ज्ञात होना चाहिए, ताकि उच्चारण में कोई त्रुटि या दोष न हो। नवार्ण मंत्र की एक माला बिना दीक्षा के चल जाएगी, वे मानते हैं। पर अकेले चंडी पाठ के लिए कम से कम इतना करना चाहिए: अभ्यास करते समय गायत्री करने वाले किसी ब्राह्मण से उपदेश लीजिए। या यदि आपके घर में कोई बड़े हैं जो साधना और पूजा करते हैं, तो उनसे उपदेश और अनुमति लीजिए — पर अनुमति लेकर करना सबसे अच्छा रहेगा।
नर्मदेश्वर शिवलिंग ला रहे हों, तो दो छोटे शिवलिंगों का क्या करें?
तीन शिवलिंग एक साथ नहीं रखने चाहिए
तीन शिवलिंग नहीं रखने चाहिए, वक्ता कहते हैं। देखिए कि वे दो छोटे शिवलिंग क्या हैं, कौन हैं और क्या बात है; फिर नया लाइए और उसके बाद ही उन दोनों का विसर्जन कीजिए।
एक श्रोता, जिनके पास दो छोटे शिवलिंग हैं और जो नर्मदेश्वर शिवलिंग लाना चाहते हैं, से कहा जाता है कि तीन शिवलिंग नहीं रखने चाहिए। और उन दो छोटे शिवलिंगों के बारे में — देखिए वे कौन हैं, किस प्रकार के हैं, क्या बात है। यह देखकर, नया लाइए, और तभी उन दोनों का विसर्जन कीजिए।
क्या देवी कवच का स्वतंत्र रूप से पाठ करके उसे सिद्ध किया जा सकता है?
स्वतंत्र सिद्धि के रूप में देवी कवच
हाँ, वक्ता कहते हैं: देवी कवच का पाठ स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है, और उसे सिद्ध किया जा सकता है।
पूछा गया कि क्या दुर्गा कवच का स्वतंत्र रूप से पाठ करके उसे सिद्ध किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि पाठ स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है और उसे सिद्ध किया जा सकता है। किया जा सकता है, वे दोहराते हैं।
कोर्ट केस के लिए नवरात्रि में कौन-सी साधना करनी चाहिए?
कोर्ट के मामले के लिए बत्तीस नामावली या जयंती मंगला काली
इस नवरात्रि इन दो में से एक कीजिए — बत्तीस नामावली, या जयंती मंगला काली — वक्ता अंशुल राज तिवारी से कहते हैं, क्योंकि कोर्ट-कचहरी का मामला चल रहा है।
अंशुल राज तिवारी को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि इस नवरात्र इन दो साधनाओं में से एक कीजिए: दुर्गा बत्तीस नामावली, या जयंती मंगला काली। वे कारण सीधे बताते हैं: क्योंकि कोर्ट-कचहरी का मामला चल रहा है।
क्या माँ दुष्टों की बलि माँगती हैं?
पहले योगिनियाँ लेती हैं, फिर माँ
माँ हमेशा दुष्टों की बलि माँगती हैं, वक्ता कहते हैं। जो बहुत अधिक उपद्रव करते हैं — उनकी बलि भी वे लेती हैं। पहले उनकी योगिनियाँ उन्हें लेती हैं; माँ बाद में लेती हैं।
आरती में रोज़ डाली जाने वाली लौंग का बाद में क्या करें?
इन्हें इकट्ठा करें, केसर के साथ पीसें, और तिलक लगाएँ
आरती के लिए जो लौंग डालते हैं — आरती हो जाने और दीपक की आग शांत होकर ठंडी हो जाने के बाद उन लौंगों को एक जगह इकट्ठा करते जाइए, वक्ता कहते हैं। उनका चूर्ण बनाइए, उसमें केसर आदि मिलाइए, और नवरात्र के बाद रोज़ उसका तिलक लगाइए। दीपकों में जो जला है, उसे तो वैसे भी खाली करना ही है।
एक श्रोता देवी आरती के उस विधान का उल्लेख करते हैं जिसमें रोज़ दो लौंग डाली जाती हैं, और पूछते हैं कि क्या उन्हें उसी पात्र में जमा होने दें। आपका मतलब, वक्ता कहते हैं, उन लौंगों से है जो आरती के लिए डाली जाएँगी। जब आरती हो जाए और दीपक में जलाई गई आग शांत होकर ठंडी हो जाए, तो उन लौंगों को एक जगह इकट्ठा करते जाइए। उनका चूर्ण बनाइए, केसर आदि मिलाइए, और नवरात्र के बाद रोज़ तिलक के रूप में लगाइए। दीपकों में जो जला है, वे कहते हैं, उसे तो वैसे भी खाली करना है।
क्या चावल से देवता का आवाहन और स्थापना की जा सकती है?
आवाहन के लिए चावल, पर फूलों का न होना अलग बात है
हाँ, वक्ता हितेश गौरी से कहते हैं, चावल से आवाहन बिल्कुल किया जा सकता है और स्थापना की जा सकती है; इसमें कोई समस्या नहीं। पर यहाँ जो बात उठती है, वे कहते हैं, वह यह है कि यदि फूल हैं ही नहीं — फूलों का पूरी तरह अभाव — तो वह विचार का विषय है।
चावल से आवाहन बिल्कुल किया जा सकता है और स्थापना की जा सकती है, वक्ता कहते हैं; इसमें कोई समस्या नहीं। पर यहाँ जो बात उठती है वह यह है: यदि फूलों का पूरी तरह अभाव है, यदि फूल हैं ही नहीं, तो वह विचार का विषय है।
शेयर बाज़ार के लिए साधना शुरू करने से पहले क्या करना चाहिए?
पहले कुंडली विश्लेषण — पंचमेश, राहु और भाग्य
शेयर बाज़ार के लिए, वक्ता कहते हैं, पहले किसी योग्य और विद्वान ज्योतिषी से कुंडली का विश्लेषण करवाइए, और अपना पंचमेश, राहु, भाग्य और सब कुछ दिखवाइए, ताकि पता चले कि बात क्या है और क्या ठीक रहेगा, क्या नहीं। तभी उससे जुड़ी साधना कीजिए, और लाभ होगा।
शेयर बाज़ार के लिए, वक्ता कहते हैं, पहले किसी योग्य, विद्वान ज्योतिषी से कुंडली का विश्लेषण करवाइए। अपना पंचमेश, राहु, भाग्य और ऐसी सब बातें जँचवाइए और दिखवाइए — स्थिति क्या है, क्या ठीक रहेगा और क्या नहीं। तभी उससे जुड़ी साधना कीजिए, ताकि लाभ हो।
दशमी 10:58 पर लगती है, घट उसके बाद हटाया जाता है, और विसर्जन दोपहर 12:00 के बाद किया जा सकता है
बारह तारीख को 10:58 से दशमी, और विसर्जन का समय
बारह तारीख को, 11:00 के बाद, वक्ता कहते हैं। दशमी 10:58 पर लगेगी; घट उसके बाद हटाना है। विसर्जन, यदि ऐसी बात हो, उस दिन दोपहर 12:00 के बाद किया जा सकता है; नहीं तो यदि आपके क्षेत्र में रविवार को विदाई नहीं होती, तो रविवार छोड़कर सोमवार को कीजिए। यह भी किया जा सकता है।
पूछा गया कि इस बार घट किस दिन हटाना है और विसर्जन कब करना है। वक्ता कहते हैं: बारह तारीख को, 11:00 के बाद। दशमी लगेगी — 10:58 पर — और घट उसके बाद हटाना है। विसर्जन के बारे में, यदि ऐसी कोई बात हो तो उस दिन दोपहर 12:00 के बाद किया जा सकता है; और नहीं तो, यदि आपके क्षेत्र में रविवार को विदाई नहीं होती, तो रविवार छोड़कर सोमवार को कीजिए। यह भी किया जा सकता है।
हवन कुंड किस धातु का होना चाहिए?
हवन कुंड ताँबे का, लोहे या स्टील का कभी नहीं
हवन कुंड हमेशा ताम्र का — ताँबे का लीजिए, वक्ता कहते हैं। लोहा, स्टील, इनमें से कुछ मत लीजिए।
पूछा गया कि हवन कुंड किस धातु का होना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि हमेशा ताम्र का, ताँबे का लीजिए। लोहा, स्टील, इनमें से कुछ नहीं।
क्या गणपति पूजा किए बिना सीधे देवी की पूजा की जा सकती है?
निश्चित क्रम — गुरु, गणपति, भैरव, हनुमान, फिर भगवती
नहीं, ऐसा नहीं किया जा सकता, वक्ता सक्षम से कहते हैं। पूजन क्रम से होगा: गुरु, गणपति, भैरव जी, हनुमान जी, और तब भगवती। नहीं तो कम से कम गणपति जी और भैरव जी, और फिर भगवती।
नए साधकों को अथर्वशीर्ष शुरू करने के लिए क्या चाहिए?
केवल उपदेश चाहिए, अलग से दीक्षा नहीं
यदि नए साधक अथर्वशीर्ष के लिए यज्ञोपवीत धारण कर रहे हैं, तो उन्हें इसका अभ्यास करना चाहिए, वक्ता कहते हैं — किसी गुरु से उपदेश लेकर। केवल उपदेश लेना है; इसमें अलग से कोई विशेष दीक्षा आवश्यक नहीं है।
यदि नए साधक अथर्वशीर्षम् के लिए यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करते हैं, तो उन्हें इसका अभ्यास करना चाहिए, वक्ता कहते हैं। किसी गुरु से उपदेश लेकर: इसमें केवल उपदेश लेना है। इसमें अलग से किसी विशेष दीक्षा की आवश्यकता नहीं है।
नवार्ण मंत्र शुरू करने के लिए क्या चाहिए?
नवार्ण से पहले गुरु से दीक्षा
किसी गुरु से दीक्षा लीजिए, और फिर कीजिए, वक्ता कहते हैं।
एक श्रोता नवार्ण मंत्र करने के बारे में पूछते हैं। किसी गुरु से दीक्षा लीजिए, वक्ता उत्तर देते हैं, और फिर कीजिए।
क्या घट स्थापना के बिना नौ दिन का व्रत रखा जा सकता है?
बिना घट के भगवती की सेवा
हाँ, बिल्कुल रखा जा सकता है, वक्ता कहते हैं। भगवती की सेवा और पूजा बिना घट के भी हो सकती है।
पूछा गया कि क्या घटस्थापना के बिना नौ दिन का व्रत रखा जा सकता है। वक्ता कहते हैं, हाँ, बिल्कुल रखा जा सकता है। केवल भगवती की सेवा और पूजा बिना घट के भी हो सकती है।
सहस्रनाम अनुष्ठान का हवन कैसे किया जाता है?
पूरी 1008 आहुति, या पहले नाम की 108
यदि आप सहस्रनाम अनुष्ठान करते हैं तो हवन सहस्रनाम से ही होगा; पूरी 1008 आहुति उत्तम है। और यदि इतना न कर सकें, तो उसके पहले नाम वाली आहुति की 108 आहुति दीजिए। सहस्रनाम का पाठ करके, यदि सहस्रनामावली से आहुति नहीं देना चाहते, तो केवल पहले नाम की 108 आहुति दीजिए।
यदि आप सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। का अनुष्ठान करते हैं, वक्ता कहते हैं, तो हवन भी सहस्रनाम से ही होगा — पूरी 1008 आहुति उत्तम है। और यदि इतना न कर सकें, तो उसके पहले नाम वाली आहुति लेकर उसे 108 बार दीजिए। सहस्रनाम का पाठ पूरा करके, यदि सहस्रनामावली से आहुति नहीं देना चाहते, तो केवल पहले नाम की 108 आहुति दीजिए।
क्या चौखट में पानी निकलने के लिए छोड़ी गई जगह कोई समस्या है?
चौखट में पानी निकलने की जगह
इतने से कोई कठिनाई नहीं होती, वक्ता कहते हैं।
एक श्रोता बताते हैं कि चौखट में पानी निकलने के लिए खाली जगह छोड़ी गई है। इतने से कोई कठिनाई नहीं है, वक्ता उत्तर देते हैं।
क्या नरसिंह माला मंत्र का पाठ किया जा सकता है?
नरसिंह माला मंत्र और उसका विधान
बिल्कुल, नरसिंह माला मंत्र का जप किया जा सकता है, वक्ता ऋषिकेश से कहते हैं; विधान भी चैनल पर दिया गया है।
नरसिंह माला मंत्र का जप बिल्कुल किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं। उसका विधान, वे जोड़ते हैं, चैनल पर भी रखा गया है।
क्या आहुति में सातों श्लोकों में से हर एक के आगे प्रणव लगाना चाहिए?
यह इस पर निर्भर है कि आहुति समूह में है या क्रम से
यदि आप हर श्लोक की आहुति अलग-अलग दे रहे हैं — पहले की नौ, फिर दूसरे की नौ — तो प्रणव सभी में लगेगा। पर यदि आप पूरा स्तोत्र पढ़ते हुए दे रहे हैं, पहले श्लोक की एक आहुति, फिर दूसरे की एक, फिर तीसरे की, इसी तरह, तो उस समय प्रणव लगाने की आवश्यकता नहीं होगी।
क्या नर्मदेश्वर लाने के बाद संगमरमर के शिवलिंग का विसर्जन किया जा सकता है?
संगमरमर के शिवलिंग का विसर्जन
हाँ — नर्मदेश्वर लाने के बाद संगमरमर के शिवलिंग का विसर्जन किया जा सकता है; कोई कठिनाई नहीं, वक्ता कहते हैं।
पूछा गया कि क्या नर्मदेश्वर शिवलिंग लाने के बाद संगमरमर के शिवलिंग का विसर्जन किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि किया जा सकता है और इसमें कोई कठिनाई नहीं है।
क्या बिना व्रत के घट और अखंड दीप की सेवा की जा सकती है?
घट और अखंड ज्योत की सेवा के लिए व्रत आवश्यक
घट की सेवा और अखंड ज्योत की सेवा के लिए थोड़ा-बहुत व्रत तो रखना ही पड़ता है, वक्ता कहते हैं; बिना व्रत के उनकी सेवा नहीं होगी। आधा-अधूरा मत कीजिए। भगवती से शक्ति माँगिए — जगदंबा, हमें समर्थ बनाइए, ताकि हम व्रत रखें और विधिपूर्वक आपकी सेवा करें। और यदि व्रत नहीं रख सकते, तो सुबह-शाम नित्य पूजन अच्छे से, भव्यता से कीजिए; उसमें भी कृपा मिलेगी। ऐसा नहीं है कि उसमें कृपा नहीं आएगी।
पूछा गया कि बिना व्रत के सेवा कैसे करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि घट की सेवा और अखंड ज्योति की सेवा के लिए कुछ न कुछ व्रत तो रखना ही पड़ता है। बिना व्रत के उनकी सेवा नहीं होगी। आधा-अधूरा मत कीजिए, वे कहते हैं। भगवती से सामर्थ्य माँगिए: जगदंबा, हमें समर्थ बनाइए, ताकि हम व्रत रख सकें और विधिपूर्वक आपकी सेवा कर सकें। और यदि व्रत नहीं रख सकते, तो सुबह-शाम नित्य पूजन अच्छे से और भव्यता से कीजिए। उसमें भी कृपा मिलेगी — ऐसा नहीं है कि उसमें कृपा नहीं मिलेगी।
क्या गौ माता सुरभि की पूजा की जा सकती है?
गौ माता सुरभि
गौ माता सुरभि की कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं।
गौ माता सुरभि के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह की जा सकती है।
क्या घट स्थापना के बिना रोज़ चंडी पाठ किया जा सकता है?
बिना घट के पंचोपचार पूजन, साक्षी दीपक और सात्विक बलि
कोई घट स्थापना किए बिना नवरात्र में रोज़ चंडी पाठ कर सकता है, वक्ता कहते हैं। पंचोपचार पूजन, एक साक्षी दीपक और सात्विक बलि — यह बिल्कुल ठीक है, और किया जा सकता है।
जल को अभिमंत्रित कैसे करते हैं?
पूरे जल अभिमंत्रण में मुद्रा चाहिए; सरल रूप में केवल दृष्टि और जप
जल को अभिमंत्रित करने के लिए फिर मुद्रा सीखनी पड़ती है, वक्ता कहते हैं, यदि आप इसे विधिपूर्वक चाहते हैं; और मुद्रा सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाई जा सकती। मुद्रा के लिए कम से कम गायत्री करते होने चाहिए, तब वह विषय स्पष्ट होगा। तंत्र में जल अभिमंत्रण की पूरी विधि में मुद्रा आती है। पर जल के सामान्य अभिमंत्रण के लिए बस जल सामने रखिए और उसे दृष्टि से देखते हुए, इस भाव से कि मंत्र की ऊर्जा उसमें जा रही है, जप कीजिए; वह अभिमंत्रित हो जाएगा।
जल को अभिमंत्रित करने के लिए फिर मुद्रापूजा या प्रतिमा-विज्ञान में प्रयुक्त एक प्रतीकात्मक हस्त-मुद्रा — जैसे वरद (वरदान देने वाली) या अभय (निर्भयता प्रदान करने वाली) — प्रत्येक का अपना विशिष्ट अर्थ होता है। सीखनी पड़ती है, वक्ता कहते हैं, यदि आप इसे विधिपूर्वक चाहते हैं — वीडियो बनाने लायक विषय तभी बनता है जब मुद्रा की बात आती है। मुद्रा के लिए कम से कम गायत्री करते होने चाहिए, तब वह विषय स्पष्ट होगा। मुद्रा का प्रदर्शन सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। तंत्र में जल अभिमंत्रण की पूरी विधि में मुद्रा आती है। और जल का सामान्य अभिमंत्रण बस इतना है: जल को अपने सामने रखिए, और उसे अपनी दृष्टि से देखते हुए, इस भाव से कि मंत्र की ऊर्जा उसमें प्रवेश कर रही है, जप कीजिए। वह अभिमंत्रित हो जाएगा।
दीक्षा मिली, यह कहने का वास्तव में क्या अर्थ है?
मंत्र बोल देना दीक्षा नहीं — उपदेश और कीलन से वह पूरी होती है
वक्ता एक प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि उनकी अपनी बात में ही विरोधाभास है। वे पूछते हैं कि कुलदेवी ने दीक्षा कैसे दी — सामने प्रकट होकर, स्वप्न में, या किसी के सिर पर आकर। पहले साफ़ समझिए कि दीक्षा का अर्थ क्या है, वे कहते हैं, फिर कहिए कि दीक्षा मिली: केवल कह देना दीक्षा नहीं है। स्वप्न दीक्षा होने पर भी उस मंत्र का उपदेश प्राप्त करना पड़ता है; मंत्र के साथ उपदेश हो तभी वह दीक्षा पूरी है। जब गुरु दीक्षा देते हैं, तो उच्चारण सहित मंत्र की पूरी विधि, उसका माहात्म्य, और यदि वह कीलित है तो उसे निष्कीलित कैसे करेंगे, यह सब स्पष्ट करते हैं।
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्हें अपनी कुलदेवी से नवार्ण मंत्र की दीक्षा मिली, उन्होंने आठ लाख का संकल्प पूरा किया, अंत में बगलामुखी देवी ने उन्हें बताया कि मंत्र सिद्ध हो गया, और उन्हें विधि नहीं पता। आपके प्रश्न में ही विरोधाभास है, वक्ता उत्तर देते हैं। आपने लिखा है कि दीक्षा कुलदेवी से मिली — अब, कुलदेवी ने आपको दीक्षा कैसे दी? क्या उन्होंने सामने प्रकट होकर दी, या स्वप्न में दी, या किसी के सिर पर आकर दी? पहले साफ़ समझिए कि दीक्षा का अर्थ क्या है, वे कहते हैं, और फिर कहिए कि दीक्षा मिली; केवल कोई बात कह देना दीक्षा नहीं है। स्वप्न दीक्षा होने पर भी उस मंत्र का उपदेश आपको प्राप्त करना पड़ता है — मंत्र के साथ उपदेश हो तभी वह दीक्षा पूरी है। दीक्षा का पूरा अर्थ यह है कि जब गुरु इसे देते हैं, तो उस मंत्र की पूरी विधि उच्चारण सहित स्पष्ट करते हैं, उसका माहात्म्य क्या है, और यदि वह कीलित है तो उसे निष्कीलित कैसे किया जाएगा — यह सब। तभी वह उस मंत्र की दीक्षा और उपदेश है।
दिव्य अनुभव को सार्वजनिक क्यों नहीं करना चाहिए?
सार्वजनिक किया गया दिव्य अनुभव उसी को हानि पहुँचाता है
या तो आपकी उनमें श्रद्धा नहीं है, वक्ता कहते हैं। जब बगलामुखी माँ ने आपको स्वप्न में बताया कि मंत्र सिद्ध हो गया, तो सार्वजनिक रूप से यह पूछने का क्या औचित्य है कि आपको विधि नहीं पता? वहाँ विधि की आवश्यकता कहाँ है, जब आप आठ लाख जप कर चुके हैं और मंत्र सिद्धि की पुष्टि आपको मिल चुकी है? वे यह नहीं कह रहे कि ऐसा नहीं हुआ — साधना के क्षेत्र में पारलौकिक गतिविधियाँ अपने आप में अद्भुत होती हैं — पर ऐसी बातें सोच-समझकर सार्वजनिक स्थानों पर रखिए: हानि आपकी होगी।
या तो आपकी उनमें श्रद्धा नहीं है, वक्ता कहते हैं। जब माँ बगलामुखी ने आपको स्वप्न में बताया कि मंत्र सिद्ध हो गया, तो यहाँ सार्वजनिक रूप से यह पूछने का क्या औचित्य है कि आपको विधि नहीं पता? वहाँ विधि की आवश्यकता कहाँ है, जब आप आठ लाख जप कर चुके हैं और मंत्र सिद्धि की पुष्टि भी आपको वहीं मिल चुकी है? अब आप पूछते हैं कि इसकी विधि क्या होगी — स्वयं सोचिए कि क्या यह उचित है। यदि आपको इस प्रकार का दिव्य अनुभव हुआ है, तो उसे सार्वजनिक रूप से कहने का कोई औचित्य नहीं; उसे कहना ही नहीं चाहिए। वे यह नहीं कह रहे कि ऐसा नहीं हुआ — साधना के क्षेत्र में पारलौकिक गतिविधियाँ अपने आप में आश्चर्यजनक होती हैं। पर ऐसी बातें सोच-समझकर सार्वजनिक स्थानों पर रखिए: आपकी अपनी हानि होगी। हर किसी को सावधान रहना चाहिए कि वह क्या पूछ रहा है। अपने ऐसे अनुभव फैलाइए, वे कहते हैं, तो हमारा कुछ नहीं जाता; लोग उसका मज़ाक बनाएँगे, और हानि आपकी होगी।
क्या महान सिद्धों ने अपनी सिद्धियों का प्रदर्शन किया?
वशिष्ठ, तैलंग स्वामी और रामकृष्ण परमहंस उन्हें दिखाते नहीं फिरे
यदि आप साधना फिर से ठीक से करना चाहते हैं, तो उसकी दीक्षा लेकर कीजिए; तब वह विधिपूर्वक होगी, और वह मंत्र किसी गुरु के मुख से प्राप्त कीजिए। शाक्त दीक्षित बनिए। यहाँ, बिना दीक्षा के, स्वयं भगवती द्वारा सिद्धि होने की घोषणा बताई जा रही है। वक्ता कहते हैं कि वे जानते हैं यह बुरा लग सकता है और पहले से क्षमा माँगते हैं, और ऐसे विषयों पर बोलने के लिए बहुत लोग उन्हें ट्रोल करने की कोशिश करते हैं — पर यह लोगों को भ्रमित करने का विषय बन जाता है, क्योंकि इसे सुनकर पचास और कहेंगे कि उनके साथ भी ऐसा हुआ, और भ्रम की स्थिति बन जाती है।
यदि साधना फिर से ठीक से करनी है, तो उसकी दीक्षा लेकर कीजिए — तब वह विधिपूर्वक होगी; वह मंत्र किसी गुरु के मुख से प्राप्त कीजिए। शाक्त दीक्षित बनिए। यहाँ, बिना दीक्षा के, भगवती द्वारा सिद्धि होने की घोषणा बताई जा रही है। वक्ता कहते हैं कि श्रोता को बुरा लग सकता है और वे पहले से इसके लिए क्षमा माँगते हैं; इन विषयों पर बोलने के लिए बहुत लोग उन्हें ट्रोल करने की कोशिश करते हैं। पर यह लोगों को भ्रमित करने का विषय बन जाता है: इसे सुनकर पचास और कहेंगे कि उनके साथ भी ऐसा-ऐसा हुआ, और भ्रम की स्थिति बन जाती है। और वैसे भी, यदि आपकी उस देवी में आस्था है जिसने दीक्षा दी और पुष्टि दी, तो कहीं भी पूछने का कोई औचित्य नहीं। वे ऐसा ही एक प्रसंग याद करते हैं जब एक साधक ने अपना पूरा अनुभव सुनाया — कैसे दर्शन हुए, कैसे वे प्रकट हुईं, कैसा दिव्य अनुभव हुआ, वे कितना रोए। लोगों ने उन्हें मना किया, कई ने कहा, भाई, यह सब सार्वजनिक मंच पर मत बताओ; कोई उनका बुरा नहीं चाहता था। पर उन सज्जन ने कहा, तुम्हें क्या समस्या है, ऐसा कुछ नहीं होता, यह कोई छोटी सिद्धि नहीं जो बताने से चली जाएगी। तो मुझे यह बताइए, वक्ता कहते हैं: वशिष्ठ मुनि अपनी तारा सिद्धि का प्रदर्शन करते कहाँ फिरे, यह कहते हुए कि हमने तारा सिद्ध कर ली, कि भगवती तारा हमें सिद्ध हैं — क्या ऐसा कोई प्रसंग है? क्या तैलंग स्वामी अपनी सामर्थ्य और सिद्धि का प्रदर्शन और घोषणा करते फिरे कि हम स्वयं शिव हैं और हमारे पास शक्ति है? या रामकृष्ण परमहंस दिखाते और बताते फिरे? जगत के कल्याण के लिए इन्होंने अपनी बातें एक सीमा तक लोगों के सामने रखीं, या इनके शिष्यों और इनके लोगों ने रखीं, ताकि हमारा और आपका कल्याण हो। आप और हम उस स्तर पर नहीं हैं कि हमारी दिव्य बातें सबके सामने रखी जाएँ। वे कहते हैं कि उन्होंने श्रोता के अपने कल्याण के लिए कहा है; यदि श्रोता बुरा मानकर भाग जाएँ और कहीं और बैठकर उन्हें गाली दें, तो वह उनका निजी मामला है।
क्या नवरात्रि में धनदा यंत्र की पूजा की जा सकती है?
नवरात्र में यंत्र पूजा
हाँ, नवरात्रि में बिल्कुल की जा सकती है, वक्ता कहते हैं।
पूछा गया कि क्या नवरात्रि में धनदा यंत्र की पूजा की जा सकती है। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल की जा सकती है।
क्या पार्वती के साथ लक्ष्मी का अलग रूप लेना आवश्यक है?
पार्वती के भीतर, और गणपति के रूपों में लक्ष्मी तत्व
लक्ष्मी तत्व की उपस्थिति स्वयं पार्वती जी के भीतर है, वक्ता कहते हैं; इसके लिए उनका अलग रूप लेने की आवश्यकता नहीं। गणपति जी के रूप देखिए, आपको कई ऐसे मिलेंगे जिनमें भगवती लक्ष्मी से जुड़ी शक्तियाँ उनके शक्ति-रूप में स्थित हैं। यही कारण है, वे कहते हैं, कि ऐसी बातें सामान्य लोगों के सामने नहीं करनी चाहिए — वे पूरी तरह झुँझला जाएँगे, कहेंगे लक्ष्मी जी तो उनकी माता हैं, आप ऐसी बात कैसे कह सकते हैं।
लक्ष्मी तत्व की उपस्थिति स्वयं पार्वती जी के भीतर है, वक्ता कहते हैं; उनका अलग रूप लेने की आवश्यकता नहीं है। गणेश जी के रूप देखिए, आप देखेंगे कि उनके कई रूप ऐसे हैं जिनमें भगवती लक्ष्मी से जुड़ी शक्तियाँ उनके शक्ति-रूप में स्थित हैं। और ठीक इसीलिए कहा जाता है कि ये बातें सामान्य लोगों के सामने नहीं करनी चाहिए: ऐसा व्यक्ति पूरी तरह झुँझला जाएगा, कहेगा लक्ष्मी जी तो उनकी माता हैं, आप ऐसा कैसे कह सकते हैं। इसलिए यह तंत्र का विषय बन जाता है, और यह गढ़ा हुआ विषय नहीं है। पर तंत्र के विषय को स्वीकार कर पाने के लिए योग्य मानसिकता और वैसा विवेक भी होना चाहिए; तभी आप इसकी चर्चा करेंगे और सामने वाला समझेगा — अच्छा, तो रहस्य यह है — और तब वह सुनेगा। यदि वह इतना ही सुनकर भाग जाए और उल्टा बोलने लगे कि आप भगवती लक्ष्मी के बारे में ऐसा कैसे बोल सकते हैं, तो उस विशेष गणपति के बारे में जानकर तो उसकी हालत बिगड़ जाएगी।
कालका योगिनी का पहले चरण का विधान बहुत प्रचंड होने के कारण हटा लिया गया, और अब PDF में दूसरे चरण का विधान है
पहले चरण का विधान बहुत प्रचंड होने से हटाया गया
कालका योगिनी का अगला विधान बदलकर उसी वीडियो में डाल दिया गया है, वक्ता कहते हैं; PDF देखिए। यदि आप नए सिरे से कर रहे हैं, तो यह विधान दूसरा चरण है; पहले चरण का विधान हटा दिया गया है, क्योंकि उससे बहुत लोगों को तरह-तरह के अनुभव होने लगे थे — वह कुछ प्रचंड था और उसमें बात थोड़ी अलग थी। दूसरे चरण वाला संतुलन बनाता है। अभी अपलोड की गई PDF दूसरा चरण है, और उसी तरीके से केवल जप करना है।
कालका योगिनी का अगला विधान बदलकर उसी वीडियो में डाल दिया गया है, वक्ता कहते हैं; एक बार PDF देख लीजिए। यदि आप नए सिरे से कर रहे हैं, तो यह विधान दूसरा चरण है। पहले चरण का विधान हटा दिया गया है, क्योंकि उससे बहुत लोगों को तरह-तरह के अनुभव होने लगे थे — वह कुछ प्रचंड था, और उसमें बात थोड़ी अलग थी। दूसरे स्तर वाला यह करता है कि संतुलन बनाता है। इसलिए अभी अपलोड की गई PDF दूसरा चरण है, और उसमें उसी तरीके से केवल जप करना है।
बत्तीस नामावली और जयंती मंगला की जप संख्या क्या है?
बत्तीस हज़ार और ग्यारह हज़ार
बत्तीस नामावली का बत्तीस हज़ार जप, और जयंती मंगला का ग्यारह हज़ार जप।
वक्ता दोनों संख्याएँ सीधे बताते हैं। दुर्गा बत्तीस नामावली का बत्तीस हज़ार जप; जयंती मंगला काली का ग्यारह हज़ार जप।
क्या बगलामुखी मंत्र का बस लाखों जप किया जा सकता है?
बगलामुखी महाविद्या हैं, और महाविद्या का अपना नियम है
बगलामुखी महाविद्या हैं, वक्ता कहते हैं, और यदि आपने किसी महाविद्या के मंत्र का जप किया है तो आपने उसकी दीक्षा ली है — कौन-सी दीक्षा मिली, सीधे छत्तीस अक्षर वाली, या क्रमागत दीक्षा? वह विषय बहुत अलग है। केवल यह कहने से कि हमने कई लाख जप किए, बात नहीं बनती; बगलामुखी को एक वाक्य में समेटा नहीं जा सकता। वे ऐसी नहीं हैं कि उनका मंत्र कहीं देख लिया, या मिल गया, या किसी के अनुभव में सुन लिया, और बस लाखों में जप कर लिया।
अंशुल राज तिवारी, जो कहते हैं कि उन्होंने केवल बगलामुखी मंत्र का जप किया है, को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि बगलामुखी महाविद्या हैं। और यदि आपने किसी महाविद्या के मंत्र का जप किया है, तो आपने उसकी दीक्षा ली है — कौन-सी दीक्षा मिली? क्या आपको सीधे छत्तीस अक्षर वाली मिली, या यह क्रमागत दीक्षा है? वह बहुत अलग विषय है। केवल यह कहने से कि हमने कई लाख जप किए, बात तय नहीं होती; बगलामुखी को एक वाक्य में नहीं समेटा जा सकता। भगवती बगलामुखी ऐसी नहीं हैं कि हमने कहीं मंत्र देख लिया, या मिल गया, या किसी का अनुभव सुना और सीधे लाखों में जप कर लिया। नहीं। इसका एक तरीका है, एक विधि है। वे केवल विद्या नहीं, महाविद्या हैं। इसलिए श्रद्धा से महाविद्या का नियम और अनुशासन मानिए, उस मार्ग पर चलिए, पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। का विधान पूरा कीजिए — तब वह फल देगा और आपके शत्रु के जोड़ ढीले करेगा, और तभी उसे काम में लेने का अधिकार आपको मिलेगा। यदि आपने जैसे-तैसे किया है, तो एक लाख करें या एक करोड़, कुछ नहीं होगा। ऐसा नहीं कि कुछ नहीं होगा — पर जो होगा, वह उचित नहीं होगा।
आगे कुछ कहने से पहले यह पूछा जाता है कि बारह अक्षर वाले मंत्र का छह लाख जप दीक्षित होकर किया या अपने आप
श्रोता से लौटाया गया प्रश्न
वक्ता अंशुल तिवारी से एक बात और पूछते हैं: यदि उन्होंने बारह अक्षर वाले मंत्र का छह लाख जप किया है, तो क्या वह दीक्षित होकर किया, या अपने आप?
वक्ता श्रोता से एक और प्रश्न पूछते हैं। आपने बारह अक्षर वाले मंत्र का छह लाख जप किया है — क्या आपने वह दीक्षित होकर किया, या अपने आप किया?
यदि कुल के ब्रह्म बाबा की सवारी अपने आप आने लगे तो क्या करें?
मनाना, रोकना नहीं, और वर्ष में एक बार ही आने की विनती
यदि वे अपने आप आते हैं, तो उन्हें मनाना चाहिए, वक्ता कहते हैं। यदि कुल के ब्रह्म आने लगे हैं और आप चाहते हैं कि वे शरीर पर न आएँ, तो घर के बड़ों से उन्हें मनवाइए; केवल विनती से ही उन्हें रोका जा सकता है — कृपया बच्चे के शरीर पर मत आइए। यदि वे धर्म पर आ रहे हैं, यानी किसी ने उन्हें गलत तरीके से भेजा या उकसाया नहीं, कोई सौगंध नहीं डाली गई, और वे अपनी प्रसन्नता से आते हैं, तो उन्हें कठोरता से मत रोकिए। गुस्से में नहीं, प्रसन्नता से कहिए, और विनती कीजिए कि वर्ष में केवल एक बार अपनी वार्षिक पूजा के दिन आएँ, और नहीं तो तभी जब कोई बहुत बड़ी विपत्ति हो, जब प्राण संकट में हों।
यदि वे अपने आप आए हैं, तो उन्हें मनाना चाहिए, वक्ता कहते हैं। यदि कुल के ब्रह्म आने लगे हैं और आप चाहते हैं कि वे शरीर पर न आएँ, तो घर के बड़ों और बुज़ुर्गों से उन्हें मनवाइए। केवल विनती से ही उन्हें रोका जा सकता है: कृपया बच्चे के शरीर पर मत आइए। यदि वे धर्म पर आ रहे हैं — यानी किसी ने उन्हें गलत तरीके से भेजा या उकसाया नहीं, उन पर उस तरह की कोई सौगंध नहीं डाली गई, और वे अपनी प्रसन्नता से आ रहे हैं — तो उन्हें उस कठोर तरीके से मत रोकिए। गुस्से में नहीं; प्रसन्नता से उनसे बात कीजिए, उन्हें मनाइए, कहिए कि वर्ष में केवल एक बार अपनी वार्षिक पूजा के दिन आइए, और तब आइए जब कोई बहुत बड़ी विपत्ति या दुर्भाग्य हो, जब प्राण ही संकट में हों; तब आकर अपनी इच्छा बताइए। उस ढंग से कहेंगे तो वे अवश्य मान जाएँगे। पर यदि बिना मनाए बात सीधे झगड़े-लड़ाई या उस तरह की उग्रता पर पहुँच जाए, तो वे नहीं मानेंगे।
बारह अक्षर वाले मंत्र के कितने पुरश्चरण पूरे करने चाहिए?
कम से कम चार पुरश्चरण, मंत्र देने वाले के मार्गदर्शन में
यदि मंत्र किसी से लिया है, तो उनके मार्गदर्शन में उसका पुरश्चरण विधिपूर्वक पूरा कीजिए, वक्ता कहते हैं। बारह अक्षर वाला करके, उसके कम से कम चार पुरश्चरण पूरे करने चाहिए। और यदि मंत्र अपना प्रभाव नहीं दे रहा, सिद्धि करने के बाद भी सिद्ध नहीं हो रहा, तो कारण और उपाय दोनों उस गुरु को पता हैं जिन्होंने उसे सिद्ध किया है — इसलिए एक बार उस योग्य साधक से बात कीजिए जिनसे आपने इसे लिया।
यदि आपने मंत्र किसी से लिया था, तो उनके मार्गदर्शन में उसका पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। विधिपूर्वक पूरा कीजिए, वक्ता अंशुल राज तिवारी से कहते हैं। बारह अक्षर वाला करके, उसके कम से कम चार पुरश्चरण पूरे करने चाहिए। बाकी विद्याओं के बिना हो या बाकी विद्याओं के साथ, इसमें बहुत कुछ जुड़ा है — इसलिए एक बार उनसे बात कीजिए जिनसे आपने इसे लिया, जिन्हें आप योग्य साधक बताते हैं। यदि मंत्र अपना प्रभाव नहीं दे रहा, सिद्धि करने के बाद भी सिद्ध नहीं हो रहा, तो उसका कारण और उपाय दोनों उस गुरु को पता हैं जिन्होंने उसे सिद्ध किया है।
क्या एक शरीर में चालीस-पचास पिशाच रह सकते हैं?
एक ही काफी है, और कुछ शक्तियाँ अनेक होने का भ्रम बनाती हैं
कहानी खत्म करने के लिए एक पिशाच ही काफी है, वक्ता कहते हैं। यदि शरीर में चालीस-पचास होते, तो पेट स्वयं महादेव महाकाल का, महाकाली का क्षेत्र होता — वह श्मशान होता। जैसे धारा 144 में तीन या अधिक लोग भीड़ माने जाते हैं, वैसे ही यदि किसी शरीर में तीन-चार से अधिक प्रेत-पिशाच आ जाएँ, तो वह शरीर श्मशान के बराबर हो गया; चालीस-पचास हों तो बहुत पुराना श्मशान वहाँ होगा। वे कहते हैं यह मज़ाक की बात नहीं है। यदि किसी ने आपको चालीस-पचास बताए हैं, तो इतना खाकर कोई जीवित नहीं बचता। दूसरी बात, बहुत सी शक्तियाँ एक से अधिक होने का भ्रम बनाती हैं — वे एक-दो हो सकती हैं पर इतना रूप बदलेंगी कि व्यक्ति यह सोचकर पागल हो जाता है कि बहुत सारी हैं। पहले किसी योग्य विद्वान से मिलिए और पूरी बात उनके सामने खोलकर रखिए।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनके शरीर में चालीस-पचास पिशाच हैं। यदि शरीर में चालीस-पचास पिशाच रहने वाले हैं, वक्ता कहते हैं, तो कहानी खत्म करने के लिए एक पिशाच ही काफी है। आपने लिखा है कि आपके शरीर में चालीस-पचास हैं — तो आपका पेट स्वयं महादेव महाकाल का क्षेत्र, महाकाली का क्षेत्र बन गया है; वह श्मशान बन गया है। जैसे धारा 144 में तीन से अधिक लोग इकट्ठा नहीं होने चाहिए, और उसे भीड़ माना जाता है, वैसे ही यदि किसी के शरीर में तीन-चार से अधिक प्रेत-पिशाच आ जाएँ, तो वह शरीर श्मशान के बराबर हो गया। और आपने चालीस-पचास लिखा है — तो वहाँ बहुत पुराना श्मशान होगा। यह मज़ाक की बात नहीं है, वे कहते हैं; वे सच कह रहे हैं। दूसरी बात, बहुत सी शक्तियाँ ऐसी हैं जो आपके सामने अपने एक से अधिक होने का भ्रम रखती हैं। वे एक-दो होंगी पर चालीस का, सौ का भी भ्रम बनाएँगी; वे अपना रूप इतना बदलेंगी कि व्यक्ति पागल हो जाता है और उसे लगता है कि बहुत सारी चीज़ें हैं। इसलिए पहले किसी योग्य विद्वान से मिलिए और इन दानवों की पूरी बात उनके सामने स्पष्ट कीजिए, रहस्य खोलिए। और सोचिए: यदि सचमुच इतना होता, तो आप ऊर्जा के उतार-चढ़ाव को समझते — आप किसी से बात करने की हालत में भी नहीं होते। एक-दो ही हालत बिगाड़ देते हैं, और आपने चालीस-पचास लिखा है।
तंत्रोक्त मंत्र के पुरश्चरण के साथ क्या होना चाहिए?
तर्पण, मार्जन और हवन — और वैदिक मंत्र में स्त्रियों पर प्रतिबंध
तंत्रोक्त मंत्र का पुरश्चरण करने के लिए सबको तर्पण, मार्जन और हवन करना चाहिए, वक्ता कहते हैं। वैदिक मंत्र में, वे कहते हैं, स्त्रियाँ यह नहीं कर सकतीं।
तंत्रोक्त मंत्र के पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। के लिए सबको तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण।, मार्जन और हवन करना चाहिए, वक्ता कहते हैं। वैदिक मंत्र में, वे कहते हैं, स्त्रियाँ यह नहीं कर सकतीं।
विवाह के लिए पुरुष को कौन-सा अनुष्ठान करना चाहिए?
पत्नीं मनोरमां देहि, अर्गला का अंतिम मंत्र
अर्गला का अंतिम मंत्र, पत्नीं मनोरमां देहि, कीजिए, वक्ता कहते हैं। और यदि जीवन में आप सप्तश्लोकी का सात हज़ार जप पूरा कर लें, तो संपुट मंत्र का एक-एक पुरश्चरण करके उसे विवाह में, धन में, हर विषय में काम में ले सकते हैं। वे कहते हैं कि यह बात उन्होंने कई बार कही है।
पूछा गया कि विवाह के लिए पुरुष कौन-सा अनुष्ठान करे। वक्ता कहते हैं कि पत्नीं मनोरमां देहि मंत्र कीजिए — अर्गला स्तोत्र का अंतिम मंत्र। यदि आप जीवन में सप्तश्लोकी का सात हज़ार जप पूरा कर लें, तो विवाह में, धन में, हर विषय में आप संपुट मंत्र का एक-एक पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करके उसे काम में ले सकते हैं। यह उन्होंने कई बार कहा है, वे जोड़ते हैं।
क्या एक महीने पहले चाची की मृत्यु हुई हो तो अनुष्ठान किया जा सकता है?
वार्षिकी और तेरह दिन का सूतक
यदि आगे के क्रम में वार्षिकी पूरी हो चुकी है, और आपके घर में सूतक की बात लागू नहीं होती, तो बिल्कुल किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं। यदि वार्षिकी नहीं हुई और आपको पूरे तेरह दिन सूतक मानना पड़ा, तो आगे की बात की पूरी जानकारी अपनी परंपरा के अनुसार वहीं लीजिए, और तभी तय कीजिए कि किया जा सकता है या नहीं।
एक श्रोता बताते हैं कि परिवार में, चार-पाँच पीढ़ियों के भीतर, एक चाची की एक महीने पहले मृत्यु हुई। यदि वार्षिकी पूरी हो चुकी है और आपके घर में सूतक की बात लागू नहीं होती, तो बिल्कुल किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं। यदि वार्षिकी नहीं हुई और आपको पूरे तेरह दिन सूतक मानना पड़ा, तो आगे के प्रश्न की पूरी जानकारी अपनी परंपरा के अनुसार वहीं लीजिए, और तभी कीजिए — तय करके कि कर सकते हैं या नहीं।
कैसे पता चले कि कोई कवच या स्तोत्र सिद्ध हो गया है?
वे लक्षण जिनसे पता चलता है कि मंत्र जाग्रत हो गया
जब कोई मंत्र, स्तोत्र या कवच जाग्रत और सिद्ध हो जाता है, वक्ता कहते हैं, तो उसकी ऊर्जा हमारे आभामंडल में उपस्थित हो जाती है। आप स्वयं चैतन्य से भर जाएँगे। भूख सामान्य दिनों की तरह नहीं लगेगी। उसकी ऊर्जा ऐसी होगी कि चलते रहने की क्षमता आपमें सहज आ जाएगी। अपनी वासनाओं पर आपका नियंत्रण काफी बढ़ जाएगा। आपकी बुद्धि मलिन नहीं होगी; भीतर एक दिव्य बुद्धि प्रकाशित होती रहेगी। और जब आप अर्ध-चेतन, अर्ध-निद्रा की अवस्था में जाएँगे, तो दिव्य क्षण, दिव्य लोक, दिव्य प्रकाश, दिव्य शक्तियाँ और उनका आना-जाना देखेंगे। ये, वे कहते हैं, सिद्धि के सबसे निचले अनुभव कहलाते हैं — पर ये आपको आभास देंगे कि मंत्र जाग्रत और चेतन हो गया है।
जब कोई मंत्र, स्तोत्र या कवच जाग्रत और सिद्ध हो जाता है, वक्ता कहते हैं, तो उसकी ऊर्जा हमारे आभामंडल में उपस्थित हो जाती है। आप स्वयं चैतन्य से भर जाते हैं। भूख सामान्य दिनों की तरह नहीं लगेगी। उसकी ऊर्जा इतनी होगी कि चलते रहने की क्षमता आपमें सहज आ जाएगी, ताकि आप आराम से घूम-फिर सकें। अपनी वासनाओं पर बहुत हद तक नियंत्रण होगा। आपकी बुद्धि मलिन नहीं होगी, और भीतर एक दिव्य बुद्धि बार-बार प्रकाशित होगी। और साथ ही, जब आप अर्ध-चेतन, अर्ध-निद्रा की अवस्था में जाएँगे, तो कोई दिव्य क्षण, दिव्य लोक, दिव्य प्रकाश, दिव्य शक्तियाँ और उनका आना-जाना आपको दिखाई देगा। ये सब, वे कहते हैं, सिद्धि के अनुभवों में सबसे निचले कहलाते हैं — पर ये आपको इतना आभास देंगे कि हाँ, मंत्र जाग्रत और चेतन हो गया है। और जब आप इसे कई बार काम में लेते हैं, तो अंतर्ज्ञान बढ़ता है: आपको पता चलने लगता है कि इसे कैसे करना है। जैसे आज डाले गए वीडियो का विषय, जिसमें सप्तश्लोकी का पाठ काल भैरव के एकाक्षरी मंत्र के संपुट के साथ है — यह, वे कहते हैं, किसी तंत्र ग्रंथ में लिखा नहीं मिलेगा कि इसे काल भैरव के एकाक्षरी के संपुट से करना था। जब आप कोई सिद्धि करते हैं, तो इस तरह का विकास आपके मस्तिष्क में अपने आप होता है। वे पारलौकिक गतिविधियाँ हैं; आप सब समझने लगते हैं, कि यहाँ कैसे और क्या करना है। उसे आप अपने स्व-प्रयोग के रूप में विश्वास के साथ कर सकते हैं, बिना किसी तिर्यक प्रभाव के। जैसे, यदि आपके घर में कोई बीमार पड़ जाए — मान लीजिए आपने पूरा कवच सिद्ध किया है — और अब किसी के पेट में दर्द है, उस क्षण आपका मन काम करेगा: हाँ, यहाँ, किस देवी के मंत्र से, या उनके किस नाम-मंत्र से, किस संपुट या विधि से पाठ करना है, नींबू काटना है या क्या करना है। विचार हो या न हो, आपको आभास होने लगेगा। और यह कैसे होगा? उस मंत्र के प्रभाव से।
केवल जप गिनने से प्रभाव क्यों नहीं मिलता?
यांत्रिक दोहराव के बजाय समर्पण के साथ विधि-सम्मत अभ्यास
यदि वह चेतन नहीं हुआ, उसकी जागृति नहीं हुई — और यही होता है जब आप उसे बस गिनकर, जैसे-तैसे, इधर-उधर खिसकाते हुए पूरा कर देते हैं — तो वह प्रभाव नहीं आएगा, वक्ता कहते हैं। पर यदि आप उसे विधि के अनुसार, सही तरीके से, समर्पण के साथ करें, तो अवश्य होगा।
यदि मंत्र चैतन्य नहीं हुआ, यदि उसकी जागृति नहीं हुई, वक्ता कहते हैं, तो इसका कारण यह होगा कि आपने उसे बस गिनकर, जैसे-तैसे, इधर-उधर करते हुए पूरा कर दिया। तब प्रभाव नहीं आएगा। पर यदि आप उसे विधि के अनुसार करें, सही तरीके से करें, समर्पण के साथ करें — तो वह अवश्य होगा।
क्या शरीर में पहले से मौजूद रोग साधना से नष्ट हो सकता है?
अविचार नष्ट होता है, पर क्षतिग्रस्त अंग ठीक नहीं होता
जब शरीर में रोग पहले ही उत्पन्न हो चुका हो, वक्ता अमन अरोड़ा से कहते हैं, तो अविचार नष्ट होता है पर रोग नष्ट नहीं होता। यदि उसने किसी अंग को क्षति पहुँचा दी है, तो उसे फिर से ठीक करना संभव नहीं है।
जब शरीर में रोग पहले ही उत्पन्न हो चुका हो, वक्ता कहते हैं, तो अविचार नष्ट होता है; रोग नष्ट नहीं हो पाता। यदि उसने किसी अंग को क्षति पहुँचा दी है, तो उसे फिर से ठीक करना संभव नहीं है।
क्या एक से अधिक देवताओं के कवच सिद्ध किए जा सकते हैं?
एक साथ कई कवच सिद्धियाँ
हाँ, एक से अधिक देवताओं के कवच की सिद्धि बिल्कुल की जा सकती है, वक्ता कहते हैं; आप तीन-चार सिद्ध करके रख सकते हैं।
एक से अधिक देवताओं के कवच की सिद्धि बिल्कुल की जा सकती है, वक्ता कहते हैं। आप तीन-चार सिद्ध करके रख सकते हैं।
श्री यंत्र की पूजा का अधिकार किसे है?
श्रीकुल दीक्षा के बिना अधिकार नहीं, और उसके बदले क्या किया जा सकता है
श्रीकुल में दीक्षा के बिना, वक्ता कोमल परेवा से कहते हैं, कोई भी इसके पूजन का अधिकारी नहीं हो सकता। सामान्यतः आप इतना कर सकते हैं: तंत्रोक्त देवी सूक्तम् से रोज़ उनका अभिषेक कीजिए और श्रृंगार कीजिए। उससे भी उनकी कृपा और आशीर्वाद बना रहेगा। और यदि परिवार में कोई श्रीकुल में दीक्षा ले, पूरा विषय विधिपूर्वक सीखे और फिर उनका पूजन करे, तो उत्तम है।
श्रीकुल में दीक्षा के बिना कोई भी श्री यंत्र के पूजन का अधिकारी नहीं हो सकता, वक्ता कहते हैं। सामान्यतः आप इतना कर सकते हैं: तांत्रोक्त देवीसूक्तम् से रोज़ उनका अभिषेक कीजिए और श्रृंगार कीजिए। उससे भी उनकी कृपा और आशीर्वाद बना रहेगा। और यदि परिवार में कोई श्रीकुल में दीक्षा ले, पूरा विषय विधिपूर्वक सीखे और फिर उनका पूजन करे, तो उत्तम है। वे जोड़ते हैं कि यदि किसी पंडित ने कहा है कि सब कुछ किया जा सकता है, तो अवश्य पूजन और पाठ कीजिए।
नारियल की बलि कैसे फोड़नी चाहिए?
खड्ग से नहीं — पटककर, और एक हाथ से फोड़ें
नए नारियल की बलि खड्ग से नहीं दी जाती, वक्ता कहते हैं; उसे पटककर फोड़ा जाता है, जैसे होता है, जैसे हाथ से फोड़ते हैं। एक तंत्र ग्रंथ के अनुसार बलि केवल एक हाथ से फोड़ी जाती है। यह जो दोनों हाथों वाली प्रथा चल पड़ी है — वे कहते हैं कि वे शास्त्रोक्त बात कह रहे हैं, जो बिल्कुल लिखा है: नारियल केवल एक हाथ से, केवल दाहिने हाथ से फोड़ना है। एक हाथ से।
नए नारियल की बलि खड्ग से नहीं दी जाती, वक्ता कहते हैं; उसे पटककर फोड़ा जाता है, जैसे यह किया जाता है, जैसे हाथ से फोड़ते हैं। एक तंत्र ग्रंथ के अनुसार बलि केवल एक हाथ से फोड़ी जाती है। यह जो दोनों हाथों वाली प्रथा चलन में आ गई है — वे कहते हैं कि वे शास्त्रोक्त बात कह रहे हैं, जो बिल्कुल लिखा है। नारियल केवल एक हाथ से, केवल दाहिने हाथ से फोड़ना है। एक हाथ से।
यदि गलती से महिषासुर मर्दिनी का विग्रह स्थापित हो गया हो तो क्या करें?
दुर्गा पूजा कीजिए, पर उग्रता बढ़ने पर ध्यान रखिए
दुर्गा पूजा बिल्कुल कीजिए, वक्ता शिवम भट्टाचार्य से कहते हैं; ऐसी कोई कठिनाई नहीं कि न की जा सके। पर यदि आपके घर में थोड़ी भी उग्रता बढ़ने लगे, तो आगे की बात देखिए। यदि आपके घर में बलि दी जाती है, तो उतनी कठिनाई नहीं होगी।
एक श्रोता बताते हैं कि उन्होंने गलती से महिषासुरमर्दिनी का विग्रह स्थापित कर लिया है, और पूछते हैं कि क्या घर पर छोटी, विधिवत दुर्गा पूजा करना उचित होगा। दुर्गा पूजा बिल्कुल कीजिए, वक्ता कहते हैं; ऐसी कोई कठिनाई नहीं कि न की जा सके। पर यदि आपके घर में थोड़ी भी उग्रता बढ़ने लगे, तो आगे की बात देखिए। यदि आपके घर में बलि दी जाती है, तो इतनी कठिनाई नहीं होगी।
परिवार में मृत्यु के बाद संकटनाशन कब शुरू किया जा सकता है?
सवा महीने का सूतक पूरा होने के बाद
सवा महीने का सूतक पूरा होने दीजिए, वक्ता कहते हैं; उसके बाद कर सकते हैं।
एक श्रोता, जो पहले क्रम से नामावली और महाविद्याएँ पूरी कर चुके हैं, बताते हैं कि उन्होंने संकटनाशन शुरू करने का सोचा था। सवा महीने का सूतक पूरा होने दीजिए, वक्ता कहते हैं। उसके बाद आप कर सकते हैं।
गर्भवती स्त्री पर कौन-से प्रतिबंध लागू होते हैं?
बलि नहीं, और तीसरे महीने के बाद पूजन स्थान में प्रवेश नहीं
गर्भवती स्त्री को बलि नहीं देनी चाहिए — किसी भी प्रकार की बलि बिल्कुल नहीं, वक्ता कहते हैं। और तीन महीने बीत जाने पर उसे पूजन स्थान में भी नहीं जाना चाहिए; दूर से प्रणाम करना चाहिए। जप और स्वाध्याय, स्तुति और मंत्र पाठ वह अपने आसन पर बैठकर, जहाँ है वहीं करे। पूजा-पाठ नहीं छोड़ना है; केवल पूजन स्थान में जाना छोड़ना है। बाकी सब वह कर सकती है — और बलि आदि नहीं देनी है।
गर्भवती स्त्री को बलि नहीं देनी चाहिए, वक्ता कहते हैं। किस प्रकार की, पूछे जाने पर वे कहते हैं कि उसे बलि बिल्कुल नहीं देनी चाहिए। और जब तीन महीने से अधिक हो जाएँ, तो उसे पूजन स्थान में भी नहीं जाना चाहिए; प्रणाम आदि दूर से करना चाहिए। जप और स्वाध्याय, स्तुति, मंत्र पाठ — ये वह अपने आसन पर बैठकर, वहीं करे जहाँ है। पूजा-पाठ नहीं छोड़ना है; केवल पूजन स्थान में नहीं जाना है। बाकी वह सब कुछ कर सकती है, और बलि आदि नहीं देनी है।
क्या रेत पर रखे गोबर के उपलों पर हवन किया जा सकता है?
हवन के लिए रेत पर गोबर के उपले
हाँ — रेत पर गोबर का उपला रखकर, गोबर से किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं।
पूछा गया कि क्या रेत पर रखे गोबर के उपलों पर हवन किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि रेत पर गाय का उपला रखकर, गोबर से किया जा सकता है।
क्या हिंदी में पढ़ा गया सरस्वती कवच सिद्ध होगा?
हिंदी से सिद्ध नहीं होगा, पर रक्षा करेगा और संस्कृत तक ले जाएगा
हिंदी वाला सरस्वती कवच सिद्ध नहीं होगा, वक्ता कहते हैं। पर यह निश्चित है कि यदि हिंदी में भी सरस्वती कवच कंठस्थ हो जाए, तो उसका प्रभाव अवश्य भावपूर्ण हो जाएगा। ऐसा नहीं कि उसकी रक्षा नहीं होगी, या वह आपकी रक्षा नहीं करेगा; बिल्कुल करेगा। और अक्सर, हिंदी में एक-दो हज़ार पाठ करते-करते बात इतनी स्पष्ट हो जाएगी कि संस्कृत अपने आप आने लगेगी; यदि हिंदी में इतना कर लिया है, तो पहले ही पाठ से आपकी संस्कृत स्पष्ट होगी कि उच्चारण क्या है।
जो सरस्वती कवच हिंदी में है, वह सिद्ध नहीं होगा, वक्ता कहते हैं। पर यह निश्चित है: यदि हिंदी में भी सरस्वती कवच आपको कंठस्थ हो जाए, तो उसका प्रभाव अवश्य भावपूर्ण हो जाएगा। ऐसा नहीं कि वह कोई रक्षा ही नहीं देगा, या आपकी रक्षा नहीं करेगा — बिल्कुल करेगा। और यह भी जानिए, वे कहते हैं: अक्सर ऐसा होता है, जैसा प्रश्नकर्ता भी चाहते हैं, कि आप हिंदी में हज़ार पाठ, दो हज़ार पाठ करेंगे, और हिंदी में पाठ करते-करते वह बात आपको इतनी स्पष्ट हो जाएगी कि संस्कृत अपने आप आने लगेगी। यदि आपने हिंदी में इतना किया है, तो पहले ही पाठ से आपकी संस्कृत स्पष्ट होगी कि उच्चारण क्या है।
जब कुल देवता हनुमान जी हों, तो क्या कुलदेवी भी हो सकती हैं?
कुल देवता के साथ कुलदेवी
हाँ — यदि कुल देवता हनुमान जी हैं, तो कुलदेवी भी बिल्कुल हो सकती हैं, वक्ता कहते हैं।
पूछा गया कि जब कुल देवता हनुमान जी हों, तो क्या कुलदेवी भी हो सकती हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल हो सकती हैं।
अभी कोई शिष्य नहीं बनाए जा रहे; चैनल पर समझाए गए विषय श्रद्धा से अभ्यास करने के लिए पर्याप्त प्रचंड हैं
अभी शिष्य नहीं बनाए जा रहे; चैनल पर जो है वह लीजिए
अभी ऐसी कोई बात नहीं है कि वे किसी से मिलें या शिष्य बनाएँ, वक्ता गौरव श्रीवास्तव से कहते हैं। चैनल पर बहुत सारे विषय समझाए गए हैं — उन्हें सुनिए, और जिसमें श्रद्धा हो उसका अभ्यास कीजिए। वे सब अपने आप में प्रचंड और सामर्थ्य से भरे हैं।
अभी ऐसी कोई बात नहीं है कि वे किसी से मिलें या शिष्य बनाएँ, वक्ता कहते हैं। चैनल पर बहुत सारे विषय रखे गए हैं; उन्हें सुनिए और जिसमें आपकी श्रद्धा हो, वह कीजिए। वे सब, वे कहते हैं, अपने आप में प्रचंड और सामर्थ्यवान हैं।
गर्भवती स्त्री को पूजन स्थान में जाने से क्यों मना किया जाता है?
अस्थिर ऊर्जा क्षेत्र, और शारीरिक शुद्धता का शास्त्रोक्त कारण
पूजन स्थान में जाना इसलिए मना है क्योंकि वहाँ ऊर्जा का स्तर कभी संतुलित या एक जैसा नहीं होता, वक्ता कहते हैं, और गर्भ में बच्चे के विकास को स्थिरता चाहिए। वे इसकी तुलना डॉक्टर द्वारा बार-बार अल्ट्रासाउंड मना करने से करते हैं, क्योंकि विकिरण का बच्चे के मस्तिष्क पर असर होता है: आपके पूजन स्थान में देवी-देवताओं और शक्तियों का निवास और उनका आना-जाना है, इसलिए वह भी ऊर्जा का क्षेत्र है। देवताओं की ऊर्जा की उपस्थिति के कारण, जो जीवात्मा शरीर में आई है और अपना रूप लेने वाली है, उसे कठिनाई होगी। और दूसरा, शास्त्रोक्त मत यह है कि तीसरे-चौथे महीने से, स्त्री का शरीर होने और पेट में बच्चा होने के कारण, शरीर से कोई न कोई द्रव निकलता रहता है, इसलिए शरीर के अशुद्ध होने की संभावना रहती है; ऐसी अवस्था में पूजन स्थान की किसी वस्तु या देवताओं का स्पर्श हो जाए, तो वह भी दोष लगाएगा।
पूजन स्थान में जाना मना है, वक्ता कहते हैं, क्योंकि पूजन स्थान पर ऊर्जा का स्तर कभी संतुलित या हमेशा एक जैसा नहीं होता। और गर्भावस्था में बच्चे के विकास के लिए स्थिरता चाहिए। डॉक्टर बार-बार अल्ट्रासाउंड क्यों मना करते हैं, वे पूछते हैं — दुर्लभ मामलों में, जब कोई परेशानी हो, तब करवाने को कहा जाता है, और वहाँ भी डॉक्टर कहते हैं कि इसका बच्चे के मस्तिष्क पर असर होगा; यह विकिरण का क्षेत्र है। वैसे ही आपका पूजन स्थान: वहाँ देवी-देवताओं का निवास है, शक्तियों का निवास और उनका आना-जाना है, इसलिए वह भी ऊर्जा का क्षेत्र है। जैसे विकिरण दिखता नहीं और किसी विशेष यंत्र से मापा जा सकता है, वैसे ही देवताओं की ऊर्जा की उपस्थिति के कारण, जो जीवात्मा शरीर में आई है और अपना रूप लेने वाली है, उसे कठिनाई होगी। और दूसरा शास्त्रोक्त मत, वे कहते हैं, यह है कि तीसरे और चौथे महीने से, स्त्री का शरीर होने और पेट में बच्चा होने के कारण, शरीर से कोई न कोई द्रव आता रहता है, इसलिए शरीर के अशुद्ध होने की संभावना रहती है; और यदि ऐसी अवस्था में पूजन स्थान में किसी वस्तु या देवताओं का स्पर्श हो जाए, तो वह भी दोष लगाएगा, और उसमें भी हानि है। इन कारणों से उन स्थानों पर जाना मना है। पर स्तुति पाठ अवश्य कीजिए — गर्भावस्था में पूरा पाठ करना है। गीता जी का पाठ कीजिए, सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। का पाठ कीजिए, स्तुति कीजिए; उस पर कोई रोक नहीं। बस उस समय, तीसरे और चौथे महीने के बाद से, किसी दिव्य वस्तु को मत छुइए।
दत्त वज्र कवच का न्यास कैसे करना चाहिए?
न्यास ठीक वैसे ही करें जैसा दिया गया है
दत्त वज्र कवच में न्यास की विधि जैसी दी गई है, ठीक उसी तरह करनी है — शुरू में भी और अंत में भी। उसमें कोई बदलाव करने की आवश्यकता नहीं है।
दत्त वज्र कवच में न्यास की विधि जैसी दी गई है, वक्ता कहते हैं, ठीक उसी तरह करनी है। शुरू में भी और अंत में भी। उसमें कोई बदलाव करने की आवश्यकता नहीं है।
चौंसठ योगिनियों का नाम-स्मरण क्रम में कहाँ आता है?
गणपति, भैरव, फिर चौंसठ योगिनियाँ
चौंसठ योगिनियों का नाम-स्मरण भैरव जी के बाद होता है, वक्ता कहते हैं: गणपति जी, भैरव जी, फिर चौंसठ योगिनियाँ।
ठीक होने वाले रोग के लिए क्या करना चाहिए?
सप्तश्लोकी का पुरश्चरण, फिर रोगनाशक मंत्र का हज़ार जप
यदि रोग ठीक होने वाला है, तो सप्तश्लोकी का पुरश्चरण पूरा कीजिए, वक्ता कहते हैं, और फिर अलग से दुर्गा सरस्वती में जो रोगनाशक मंत्र है, रोगानशेषान् मंत्र, उसका हज़ार जप कीजिए; और फिर उसे संपुट बनाकर रोज़ पूरा पाठ कीजिए।
यदि रोग ठीक होने वाला है, तो सप्तश्लोकी का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। पूरा कीजिए, वक्ता कहते हैं। फिर दुर्गा सरस्वती में जो रोगनाशक मंत्र है — रोगानशेषान् मंत्र — उसका अलग से हज़ार जप कीजिए। और फिर उसके साथ रोज़ पूरा पाठ कीजिए।
क्या शिखा कभी काटनी चाहिए?
शिखा कभी नहीं काटी जाती, और उसे कटवाने का दबाव द्वेष है
सब जानते हैं कि चोटी नहीं काटनी है, वक्ता कहते हैं: शिखा किसी भी अवस्था में नहीं काटी जाएगी। वे एक व्यक्ति का वर्णन करते हैं जो शिखा कटवाने के पीछे पड़ा था, यह पूछते हुए कि शिखा नहीं कटेगी तो शुद्धि कैसे होगी, और गाँव के लोग भी साथ हो गए — क्योंकि गाँव के लोग स्वयं शिखा नहीं रखते, तो वे पूछते हैं कि इस आदमी की शिखा कैसे रहने दी जाए। जब मेरी शिखा नहीं रह सकती, तो किसी की शिखा नहीं रहेगी। ठीक यही बात है, वे कहते हैं: इसी को द्वेष कहते हैं; शास्त्रों में इसी को द्वेष कहा गया है, और यह ईर्ष्या से होता है।
सब जानते हैं कि चोटी नहीं काटनी है, वक्ता कहते हैं: शिखा किसी भी अवस्था में नहीं काटी जाएगी। और एक व्यक्ति कह रहा है कि शिखा नहीं कटेगी तो शुद्धि कैसे होगी, और वह शिखा कटवाने पर अड़ गया है। गाँव के लोग भी साथ हो गए हैं — चूँकि गाँव के लोग शिखा नहीं रखते, वे पूछते हैं, भाई, इस आदमी की शिखा कैसे रहने दी जाए? जब मेरी शिखा नहीं रह सकती, तो किसी की शिखा नहीं रहेगी। ठीक यही बात है, वे कहते हैं। इसी को द्वेष कहते हैं; शास्त्रों में इसी को द्वेष कहा गया है। यह ईर्ष्या से आता है।
क्या कुब्जिका कवच किया जा सकता है?
कुब्जिका कवच
हाँ, कुब्जिका कवच बिल्कुल किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं।
कुब्जिका कवच के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह बिल्कुल किया जा सकता है।
क्या अनुलोम वर्णसंकर के संस्कार किए जा सकते हैं?
प्रायश्चित्त विधि और संकल्प के साथ संभव
लोम, अनुलोम, वर्णसंकर आदि की बात, वक्ता संजय यादव से कहते हैं, यदि प्रायश्चित्त विधि के साथ चले और वैसा संकल्प हो, तो बिल्कुल की जा सकती है।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या अनुलोम वर्णसंकर के संस्कार किए जा सकते हैं, और यदि उनके माता-पिता दूर हों तो क्या। लोम, अनुलोम, वर्णसंकर आदि की बात, वक्ता कहते हैं, यदि प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। विधि के साथ चले और उस प्रकार का संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। हो, तो बिल्कुल की जा सकती है।
क्या पेट के तेज़ दर्द के लिए अभिमंत्रित जल दिया जा सकता है?
पहले पुरश्चरण किए बिना यह काम नहीं करेगा
यदि दर्द आपका अपना है और आपने पहले पुरश्चरण नहीं किया है, तो यह नहीं होगा, वक्ता कहते हैं; उस स्थिति में किसी की सहायता लेनी चाहिए।
पूछा गया कि पेट के तेज़ दर्द वाले व्यक्ति के लिए जल कैसे छोड़ा जाए। वक्ता कहते हैं कि यदि दर्द अपना है और पहले कोई पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। नहीं किया गया, तो यह काम नहीं करेगा। उस स्थिति में आपको किसी और की सहायता लेनी चाहिए।
जिस शाकाहारी परिवार की कुलदेवी को बकरे की बलि दी जाती है, वह क्या करे?
प्रसाद उन्हें दीजिए जो उसे ग्रहण करने के अधिकारी हैं
देखिए कि उस बलि के ग्रहण करने वाले कौन हो सकते हैं, वक्ता वशिष्ठ यादव से कहते हैं, और बलि होने के बाद उन लोगों को दे दीजिए। सामान्यतः कुलदेवी या कुल देवता का बलि प्रसाद केवल कुल परंपरा के लोगों को ही लेना चाहिए — पर यदि आप उसे अब बिल्कुल नहीं खाते, तो विवशता का प्रश्न नहीं है। बलि ऐसी जगह कीजिए जहाँ ऐसे लोग उपस्थित हों और जिनका अधिकार हो, ताकि वे उसे खा सकें। इसमें जल्दी कोई बीच का रास्ता निकालना संभव नहीं। और यदि कुलदेवी के साथ लाग जुड़ी है, तो वह खाने वालों पर भी लगेगी, और फिर वहाँ भी पूजा चढ़ानी पड़ेगी तभी वे शांत होंगे।
एक श्रोता बताते हैं कि उनका पूरा परिवार शाकाहारी है और उनकी कुलदेवी को बकरे की बलि दी जाती है, और मार्गदर्शन माँगते हैं। देखिए कि उस बलि को ग्रहण करने वाले कौन-कौन हो सकते हैं, वक्ता कहते हैं, और बलि होने के बाद उन लोगों को दे दीजिए। सामान्यतः कुलदेवी या कुल देवता की बलि, बलि प्रसाद, केवल कुल परंपरा के लोगों को ही ग्रहण करना चाहिए। पर यदि आप लोग उसे अब बिल्कुल नहीं खाते, तो इसमें विवशता की कोई बात नहीं। बलि ऐसी जगह कीजिए जहाँ ऐसे लोग उपस्थित हों और जहाँ उनका अधिकार हो, ताकि वे उसे खा सकें। इसमें जल्दी कोई बीच का रास्ता निकालना संभव नहीं। और यदि कुलदेवी के साथ लाग की बात है, तो वह खाने वालों पर भी लगेगी, और फिर वहाँ भी पूजा चढ़ाई जाएगी तभी वे शांत होंगे।
क्या बकरे को वास्तव में मारने का कोई विकल्प है?
कान में चीरा लगाकर रक्त बलि पीठ पर गिराना, और पशु को छोड़ देना
यह बात भी है कि बलि होने के बाद पशु को ले जाकर समाधि दी जाती है, और उसके लिए एक निश्चित स्थान होता है। और कान काटने की प्रथा भी है, वक्ता कहते हैं: चूँकि वे उसे बिल्कुल नहीं खाते, बलि लाइए, संकल्प आदि करवाइए, और केवल कान का थोड़ा सा भाग काटा जाता है, ताकि जो गिरे वह बलि पीठ पर गिरे; उसी में भगवती को अर्पित करके पूरा विधान पूरा होता है, और बकरे को ले जाकर जंगल में छोड़ दिया जाता है। उसका जो होना है, हो। तब वह भगवती का हो गया, आपकी कुलदेवी का हो गया। यह एक विकल्प है — पर यह तभी करना चाहिए जब देख लें कि कुलदेवी में किस प्रकार की उग्रता है, और मनाने पर वे मानेंगी या नहीं।
आगे यह बात भी है, वक्ता कहते हैं, कि बलि होने के बाद पशु को ले जाकर समाधि दी जाती है, और उसके लिए एक निश्चित स्थान होता है। और कान काटने की यह बात भी बहुत है: चूँकि वे उसे बिल्कुल नहीं खाते, तो बलि लाइए, संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। आदि करवाइए, और केवल कान का थोड़ा सा भाग काटा जाएगा, ताकि जो गिरे वह बलि पीठ पर गिरे; और भगवती को अर्पित करके उसी में पूरा विधान पूरा हो जाएगा, और उस बकरे को ले जाकर जंगल आदि में छोड़ दिया जाएगा। उसका जो होना है, होने दीजिए। तब वह भगवती का हो गया; आपकी कुलदेवी का हो गया। यह बात भी है। यह एक विकल्प है — पर यह तभी करना चाहिए जब कुलदेवी को देख लें, देख लें कि उनमें किस प्रकार की उग्रता है, और मनाने पर वे मानेंगी या नहीं मानेंगी।
क्या ब्राह्मण अपनी कुलदेवी और कुल देवता को बलि देते हैं?
ब्राह्मण घरों में बलि फिर से क्यों आ गई है
आज के समय में सब कुछ चढ़ रहा है, वक्ता कहते हैं। कारण: लोगों ने अपनी कुलदेवी और कुल देवता को सुरक्षित कहाँ रखा? वे दूसरों-दूसरों को पूजते रहे; इसलिए अब कुल के देवी-देवता अपनी प्रधानता में आगे आ गए हैं, और इसलिए ब्राह्मणों को भी बलि देनी पड़ती है।
पूछा गया कि क्या ब्राह्मणों की भी कुलदेवी और कुल देवता होते हैं जिन्हें बलि दी जाती है। वक्ता कहते हैं कि आज के समय में सब कुछ चढ़ रहा है। कारण, वे कहते हैं, यह है: लोगों ने अपनी कुलदेवी और कुल देवता को सुरक्षित कहाँ रखा? वे इसको-उसको पूजते रहे। इसलिए अब कुल के देवी-देवता प्रधानता के साथ आगे आ गए हैं — और इसलिए ब्राह्मणों को भी बलि देनी पड़ती है।
क्या गुरु दीक्षा के बिना कुब्जिका स्तोत्र पढ़ा जा सकता है?
सीमित मात्रा में अनुमति
सीमित मात्रा में किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं।
कृष्ण कवच किस दिन सिद्ध किया जा सकता है?
कृष्ण कवच की सिद्धि के लिए एकादशी या अष्टमी
कृष्ण कवच एकादशी के दिन सिद्ध किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं; और अष्टमी के दिन भी सिद्ध किया जा सकता है।
कवच का हवन कैसे किया जाता है?
आहुति नामों से, श्लोकों से नहीं
कवच में जितने नाम हैं, सब अलग से लिख लीजिए, और उन नामों से आहुति दीजिए, वक्ता कहते हैं। श्लोक से आहुति नहीं होगी।
बत्तीस नाम के हज़ार पाठ या नवार्ण के सवा लाख — कौन बेहतर है?
दोनों का अपना महत्व है, तुलना नहीं करनी
यह तो ऐसा हो गया जैसे पूछना कि अमृत पिएँ या कल्पवृक्ष के पास जाकर कल्पवृक्ष से माँगें, वक्ता कहते हैं। दोनों का अपना महत्व और अपनी सामर्थ्य है। जहाँ नवार्ण मंत्र मंत्रराज है, वहीं भगवती जगदंबा स्वयं बत्तीस नामावली के माहात्म्य में कहती हैं कि हर प्रकार के संकट के निवारण के लिए बत्तीस नामावली है। दोनों का अपना महत्व है। नवार्ण महामंत्र है। दोनों की तुलना मत कीजिए।
चौंसठ योगिनियों के नाम शुरू करने के बाद उग्रता क्यों बढ़ती है?
बलि के बिना योगिनियों की ऊर्जाएँ संतुलित नहीं होतीं
श्रोता ने लौंग की बलि दी है, और मंगलवार-शनिवार को नींबू की बलि — एक नींबू ही, पर दी है। यदि आप बलि के बिना नाम-जप आदि करते हैं, वक्ता कहते हैं, तो उनकी सामर्थ्य अवश्य आएगी, उनकी ऊर्जाएँ अवश्य आएँगी, पर बलि के बिना वे संतुलित नहीं होंगी। नींबू, लौंग, जायफल, इन सबकी बलि दी जा सकती है।
हेमंत सोनी बताते हैं कि त्रिपुर सुंदरी माँ की चौंसठ योगिनी के नाम शुरू करने पर उग्रता बढ़ गई; उन्होंने लौंग की बलि दी है, और मंगलवार-शनिवार को नींबू की बलि भी — एक नींबू, पर दी है। यदि आप बलि के बिना नाम-जप आदि करते हैं, वक्ता कहते हैं, तो उनकी सामर्थ्य अवश्य आएगी, उनकी ऊर्जाएँ अवश्य आएँगी। पर बलि के बिना वे संतुलित नहीं होंगी। नींबू, लौंग, जायफल, इन सबकी बलि दी जा सकती है।
क्या बलि के लिए पैसे देने वाले शाकाहारी को हत्या का दोष लगता है?
कोई दोष नहीं, जब तक बलि भूत-प्रेत को न हो
ऐसी कोई बात नहीं, वक्ता कहते हैं। पर यदि आप भूत-प्रेत को बलि दे रहे हैं, तो केवल दोष नहीं, सब कुछ लगेगा। यह इस पर निर्भर है कि बलि कहाँ दी जा रही है, उसकी स्थिति क्या है, बात क्या है।
पूछा गया कि क्या बलि के लिए पैसे देने वाले शाकाहारी को जीव हत्या का दोष लगेगा। वक्ता कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है। पर यदि आप भूत-प्रेत को बलि दे रहे हैं, तो केवल दोष नहीं, सब कुछ लगेगा। बलि कहाँ दी जा रही है, उसकी अवस्था क्या है, बात क्या है — यह सब इस पर निर्भर है।
सती बन्नी माता कौन हैं?
भद्रकाली के रूप में बन्नी माता, और उनके लिए जयंती मंगला मंत्र
बन्नी माता को भद्रकाली का रूप कहा गया है, वक्ता कहते हैं। उन्होंने कई बार कहा है कि जिनकी कुलदेवी बन्नी माता हैं, उनके लिए जयंती मंगला काली मंत्र सबसे उत्तम है, क्योंकि उसमें भद्रकाली आती हैं। नाम बिगड़कर अलग हो जाते हैं; और चूँकि दोनों के साथ सोखा बाबा और गौरैया बाबा पूजे जाते हैं, इसलिए समझा जाता है कि शक्तियाँ एक ही हैं। भेद से दो मानें, तब भी रूप भद्रकाली का ही माना जाता है; और काशी क्षेत्र में, जहाँ मंदिर है, वही रूप माना जाता है — पाताल क्षेत्र में स्थित भगवती भद्रकाली।
पूछा गया कि सती बन्नी माता कौन हैं, दुर्गा जी या काली जी, और यह बताया गया कि उनकी कुलदेवी बन्नी माता को भद्रकाली का रूप कहा गया है। वक्ता कहते हैं कि उन्होंने कई बार बताया है कि जिनकी कुलदेवी बन्नी माता हैं, उनके लिए जयंती मंगला काली मंत्र सबसे उत्तम है। नाम बिगड़कर अलग हो जाते हैं, वे कहते हैं। और चूँकि दोनों के साथ सोखा बाबा और गौरैया बाबा पूजे जाते हैं, इसलिए समझा जाता है कि शक्तियाँ एक ही हैं। फिर भी यदि भेद से दो मानें, तब भी रूप भद्रकाली का ही माना जाता है। काशी क्षेत्र में भी, जहाँ मंदिर है, यही रूप माना जाता है: पाताल क्षेत्र में स्थित भगवती भद्रकाली का रूप। इसलिए उनके लिए जयंती मंगला मंत्र सबसे उत्तम है, क्योंकि उसमें भद्रकाली भी आती हैं।
आयोजित अनुष्ठान में संकल्प और पाठ सभी जुड़ने वालों की ओर से किए जाते हैं, और उस सेवा से दिव्यता बढ़ती है
सभी जुड़ने वालों की ओर से संकल्प और पाठ
पहले से जानकर कि कितने लोग आएँगे, उसी के भीतर अच्छे से हो जाता है, वक्ता कहते हैं। हमें सेवा का अवसर मिलता है, और उस सेवा में आप सबकी ओर से संकल्प और पाठ आदि किए जाते हैं, और उससे दिव्यता और बढ़ती है। सनातन का उत्थान, वे कहते हैं, यहाँ पूरे सहयोग से हो रहा है।
पहले से जानकर कि कितने लोग आएँगे, उसी के भीतर अच्छे से किया जाता है, वक्ता कहते हैं। हमें सेवा का अवसर मिलता है, और उस सेवा में आप सबकी ओर से संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। और पाठ आदि किए जाते हैं — और उससे दिव्यता और बढ़ती है। इस तरह सनातन का उत्थान, वे कहते हैं, यहाँ पूरे सहयोग से हो रहा है। इसमें और कोई विशेष बात नहीं है।
क्या दुर्गा अष्टाक्षरी मंत्र बिना दीक्षा के किया जा सकता है?
अष्टाक्षरी एक विद्या है, अकेला मंत्र नहीं
यह दुर्गा अष्टाक्षरी मंत्र अपने आप में अष्टाक्षरी विद्या है, वक्ता मृगेंद्र राजपूत से कहते हैं, और वे कभी किसी को बिना दीक्षा के मंत्र करने को नहीं कहते। कारण: जब तक दीक्षा न हो, इसे केवल स्वतंत्र मंत्र के रूप में नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह विद्या क्रम के भीतर आता है। नाम मंत्र कर सकते हैं; पर पूरा अष्टाक्षरी मंत्र उस तरह नहीं किया जा सकता। कम से कम किसी योग्य साधक से उपदेश लेकर उसके साथ कीजिए। और वैसे भी करने को इतनी चीज़ें हैं — अकेला मंत्र उस तरह स्वतंत्र रूप से नहीं किया जाता।
यह दुर्गा अष्टाक्षरी मंत्र, प्रणव सहित, अपने आप में अष्टाक्षरी विद्या है, वक्ता कहते हैं। इसलिए वे बिना दीक्षा के किसी को मंत्र करने को कभी नहीं कहते। कारण यह है कि जब तक दीक्षा न हो, इसे केवल स्वतंत्र मंत्र के रूप में नहीं किया जा सकता — यह विद्या क्रम के भीतर आता है। इसलिए आप नाम मंत्र कर सकते हैं। पर पूरा अष्टाक्षरी मंत्र उस तरह नहीं किया जा सकता। कम से कम किसी योग्य साधक से उपदेश लीजिए और वह उपदेश लेकर कीजिए। और वैसे भी करने को इतनी चीज़ें हैं; अकेला मंत्र उस तरह स्वतंत्र रूप से नहीं किया जाता।
अष्टाक्षरी के उपदेश के साथ क्या-क्या आता है?
ध्यान मंत्र, रुरु भैरव मंत्र, और योगिनी बलि के मंत्र
मान लीजिए किसी को अष्टाक्षरी की दीक्षा मिलती है, वक्ता कहते हैं: गुरु केवल अष्टाक्षरी दीक्षा नहीं देंगे, बल्कि उसके साथ उपदेश देंगे। वे बताएँगे कि अष्टाक्षरी मंत्र के अनुसार भगवती के अष्टाक्षरी रूप का यह ध्यान मंत्र है — कालाभ्र आदि से शुरू होने वाला मंत्र उसका ध्यान मंत्र होगा, और इसी मंत्र से ध्यान करना है। फिर, चूँकि उनके भैरव रुरु भैरव हैं, गुरु अलग से रुरु भैरव का मंत्र, उनका त्र्यक्षरी या पंचाक्षरी, देंगे। उसके बाद, यदि अष्टाक्षरी को आगे ले जाया जाए — उसमें योगिनी उपस्थित रहेंगी या नहीं, योगिनी पूजन होगा या नहीं, जप के बाद दक्षिण और ईशान कोण में बलि देनी है या नहीं — तो यदि देनी है, गुरु उसके लिए तीन और मंत्र देंगे।
उपदेश में, वक्ता कहते हैं, ठीक यही बताया जाता है। मान लीजिए किसी को अष्टाक्षरी की दीक्षा मिलती है: गुरु केवल अष्टाक्षरी की दीक्षा नहीं देंगे, बल्कि उसके साथ उपदेश देंगे। वे बताएँगे कि भगवती का जो अष्टाक्षरी रूप है, जो रूप अष्टाक्षरी मंत्र के अनुसार चलता है, उसका यह ध्यान मंत्र है — उसमें कालाभ्र आदि से शुरू होने वाला मंत्र ध्यान मंत्र होगा, और इसी मंत्र से आपको ध्यान करना है। फिर, चूँकि उनके भैरव रुरु भैरव हैं, आपको उनका भी साथ में करना होगा, और गुरु आपको अलग से रुरु भैरव का मंत्र, उनका त्र्यक्षरी या पंचाक्षरी मंत्र, देंगे। उसके बाद, यदि अष्टाक्षरी में और बातें आगे ले जाई जाएँ — उसमें योगिनी उपस्थित रहेंगी या नहीं, उसमें योगिनी का पूजन होगा या नहीं, मंत्र जप के बाद दक्षिण और ईशान कोण में योगिनी की बलि देनी है या नहीं — तो यदि देनी है, गुरु उसके लिए आपको तीन और मंत्र देंगे।
अष्टाक्षरी के साथ गुरु कम से कम क्या देते हैं?
दुर्गा का कवच, भैरव मंत्र, और कुल परंपरा के अनुसार एक अध्याय
पूरा न सही, तो कम से कम गुरु तीन चीज़ें अवश्य देंगे: दुर्गा जी का कवच — सप्तशती का चंडी कवच नहीं, बल्कि अष्टाक्षरी के साथ जाने वाला दुर्गा कवच — और भैरव जी का मंत्र। और वे सप्तशती का एक अध्याय देंगे, जो भी हो, कुल परंपरा के अनुसार: यदि काली जी का है, तो रात्रि सूक्त बताएँगे; यदि बात या झुकाव लक्ष्मी से जुड़ा है, तो चौथा अध्याय; यदि भगवती की कृपा और सिद्धि के लिए है, तो तंत्रोक्त देवी सूक्त। पर सीधे कह देना कि यह मंत्र ऐसे ही कर लो, थोड़ा अनुचित है। वे इसे अपना मत बताते हैं, और कहते हैं कि निर्णय श्रोताओं का अपना है।
यह पूरी बात है, विधिपूर्वक की जाए तो, वक्ता कहते हैं। इतना न सही, तो कम से कम गुरु इसके साथ तीन चीज़ें अवश्य देंगे: दुर्गा जी का कवच — सप्तशती का चंडी कवच नहीं, बल्कि अष्टाक्षरी के साथ जाने वाला दुर्गा कवच — और भैरव जी का मंत्र। और वे सप्तशती का एक अध्याय देंगे, जो भी हो। वह उनकी कुल परंपरा पर निर्भर करेगा: यदि काली जी का है, तो आपको रात्रि सूक्तम् बताएँगे; यदि आपकी बात या आपका झुकाव लक्ष्मी से जुड़ा है, तो आपको चौथा अध्याय बताएँगे; यदि यह भगवती की कृपा और सिद्धि आदि के पीछे है, तो आपको तांत्रोक्त देवीसूक्तम् बताएँगे। पर सीधे यह कहना कि यह मंत्र ऐसे ही तुरंत कर लो, थोड़ा अनुचित है। यह उनके अनुसार है, वे कहते हैं — यह उनका अपना मत था और उन्होंने इसे स्पष्ट किया है; बाकी निर्णय आप सबको स्वयं लेना है।
मृगेंद्र साधना के दो प्रकार कौन-से हैं?
वीर भाव की स्वतंत्र साधना, और भगवती का महासिंह
मृगेंद्र साधना दो प्रकार की होती है, वक्ता कहते हैं। एक मृगेंद्र साधना स्वतंत्र साधना है, वीर भाव की। और एक भगवती के महासिंह की है। उसमें भी यह जगदंबा के अलग-अलग रूपों पर निर्भर करता है: सबमें महाविष्णु हैं, पर रूप के अनुसार — जैसे अठारह भुजा वाली दुर्गा जी, जिनमें सिंह अलग विषय है, और आठ भुजा वाली में अलग हो जाता है। रूप के साथ मंत्र आदि का भी अंतर होता है।
मृगेंद्र साधना दो प्रकार की होती है, वक्ता कहते हैं। एक मृगेंद्र साधना स्वतंत्र साधना है, वीर भाव की। और एक भगवती के महासिंह की है। भगवती के महासिंह में भी यह जगदंबा के अलग-अलग रूपों पर निर्भर करता है। सबमें महाविष्णु हैं, पर रूप के अनुसार — जैसे अठारह भुजा वाली दुर्गा जी, उनमें सिंह अलग विषय बन जाता है, और आठ भुजा वाली में अलग हो जाता है। रूप के साथ मंत्र आदि का भी अंतर होता है।
अर्गला के पहले मंत्र का विनियोग और न्यास दो-तीन वीडियो में सार्वजनिक रूप से दिया गया
अर्गला के पहले मंत्र का विनियोग और न्यास, सार्वजनिक रूप से दिया गया
जयंती मंगला अर्गला के पहले मंत्र में इतनी बातें हैं, वक्ता कहते हैं, कि दो-तीन वीडियो बनाकर उसे स्पष्ट किया गया और पूरा सरल किया गया, और उसका विनियोग और न्यास भी दिया गया। खोजिए, पहला इसी चैनल पर मिलेगा; न्यास और विनियोग सहित अर्गला का पहला मंत्र आपको कहीं और नहीं मिलेगा। और यदि कोई संस्कृत विद्वान हैं, तो शास्त्र प्रमाण की बात छोड़कर, किसी संस्कृत विद्वान को दिखाइए कि जो वहाँ दिया गया है वह संस्कृत व्याकरण के अनुसार सही है या नहीं; उसी से आप समझ जाएँगे कि यहाँ की व्यवस्था पूरी तरह सही है। पर लोग संतुष्ट नहीं होते — समाज कभी संतुष्ट नहीं हो सकता; उन्हें कुछ और, कुछ विशेष, कुछ तगड़ा चाहिए।
जयंती मंगला अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र में इतनी बातें हैं, वक्ता कहते हैं, कि दो-तीन वीडियो बनाकर उसे स्पष्ट किया गया, पूरा सरल किया गया, और उसका विनियोग और न्यास भी दिया गया। खोजिए, वे कहते हैं, और पहला परिणाम इसी चैनल पर मिलेगा। न्यास और विनियोग सहित अर्गला का पहला मंत्र आपको कहीं नहीं मिलने वाला। और यदि कोई संस्कृत के विद्वान हैं — शास्त्र प्रमाण की बात छोड़ दीजिए — तो किसी संस्कृत विद्वान से जँचवाइए कि जो वहाँ दिया गया है वह संस्कृत व्याकरण के अनुसार सही है या नहीं। उतने से ही आप समझ जाएँगे कि यहाँ की व्यवस्था पूरी तरह सही है। पर लोग संतुष्ट नहीं होते। यह सच है, वे कहते हैं, कि लोग या समाज कभी संतुष्ट नहीं हो सकता; उन्हें कुछ और, कुछ विशेष, कुछ तगड़ा चाहिए। हमारी ओर से इतना प्रयास करना ही है।
सरस्वती हवन के लिए कौन-सी लकड़ी सबसे अच्छी है?
सरस्वती हवन के लिए बेल की लकड़ी
सरस्वती हवन के लिए बेल की लकड़ी मिल जाए तो उत्तम रहेगा, वक्ता कहते हैं।
सरस्वती के हवन के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि बेल की लकड़ी मिल जाए तो उत्तम रहेगा।
बहुत कम समय वाला साधक नवरात्र में क्या कर सकता है?
पौने बारह से डेढ़ बजे तक की रात्रि बैठक
जो अधिक समय नहीं दे सकते, जिनके पास समय की बहुत कमी है, वे नवरात्र के केवल नौ दिनों के लिए — इस बार नवरात्रि दस दिन की है, इसलिए सबको आराम से नौ दिन मिलेंगे — रोज़ रात 11:43 से 11:45, यानी पौने बारह का समय लें। पौने बारह से 1:30 तक, उस पूरे समय लगातार बैठकर, जो भी स्तोत्र, स्तुति, कवच या मंत्र हो उसका लगातार जप करें, बिना उठे और बिना हिले। उनके लिए यह दिव्य हो जाता है।
जो विशेष रूप से बहुत अधिक समय नहीं दे सकते, जिनके पास समय की अत्यंत कमी है, वे केवल यह करें, वक्ता कहते हैं: नवरात्र के नौ दिनों के लिए — इस बार नवरात्रि दस दिन की है, इसलिए सबको आराम से नौ दिन मिलेंगे — उन नौ दिनों में, रोज़ रात 11:43 से 11:45, पौने बारह का समय लीजिए। पौने बारह से 1:30 तक, उस पूरे समय लगातार बैठकर, जो भी स्तोत्र, स्तुति, कवच या मंत्र हो उसका लगातार जप करते हुए — उठना नहीं है, हिलना नहीं है। उनके लिए यह दिव्य हो जाता है। यदि आप दिन में नहीं कर पाते, काम या किसी और कारण से समय कम है, तो थोड़ा आराम करके वह समय लीजिए। बाकी, संध्या पूजन करना ही है; श्रृंगार, आरती और पूजन करना ही है। यह समय जप के लिए रखिए, और यह दिव्य है।
अपने क्षेत्र के अनुसार गिना गया अभिजित मुहूर्त पौष्टिक कर्म के लिए दिव्य समय है
पौष्टिक कर्म के लिए अभिजित मुहूर्त
दूसरा समय अपने क्षेत्र के अनुसार अभिजित मुहूर्त का है। अभिजित मुहूर्त में भी पौष्टिक कर्म से जुड़ी एक पूरी बात चलती है; वह आप कर सकते हैं।
दूसरा समय, वक्ता कहते हैं, अपने क्षेत्र के अनुसार अभिजित मुहूर्त का है। अभिजित मुहूर्त में भी पौष्टिक कर्म से जुड़ी एक पूरी बात चलती है; वह आप कर सकते हैं।
राहुकाल का उपयोग कौन कर सकता है, और उसमें क्या किया जाता है?
राहुकाल केवल उनके लिए जिनकी कुलदेवी बलि लेती हैं
तीसरा राहुकाल है, और वह विशेष रूप से उन साधकों के लिए है जिनकी कुलदेवी बलि लेती हैं। यह ध्यान रखिए, वक्ता कहते हैं: राहुकाल का समय केवल उनके लिए है जिनकी कुलदेवी या कुल देवता बलि लेते हैं। और रोज़ जप के बाद, उसी समय, जो भी मंत्र आप कर रहे हैं उससे नींबू, जायफल और लौंग की बलि देनी है। मान लीजिए राहुकाल 9:00 से 10:30 तक है, डेढ़ घंटा: 9:00 बजे आराम से बैठ जाइए, और 10:30 तक जयंती मंगला मंत्र पूरी तल्लीनता से लगातार चलेगा। प्रभाव देखिए।
और तीसरा, वक्ता कहते हैं, विशेष रूप से उन साधकों के लिए है जिनकी कुलदेवी बलि लेती हैं — राहुकाल। ध्यान रखिए: राहुकाल का समय केवल उनके लिए है जिनकी कुलदेवी या कुल देवता बलि लेते हैं। और रोज़ जप के बाद, उसी समय, जो भी मंत्र आप कर रहे हैं उससे नींबू, जायफल और लौंग की बलि देनी है — मान लीजिए वह भगवती का है, जैसे अर्गला का पहला मंत्र। अब यदि राहुकाल 9:00 से 10:30 तक है, डेढ़ घंटा, तो 9:00 बजे आराम से बैठ जाइए, और 10:30 तक जयंती मंगला काली मंत्र पूरी तल्लीनता से लगातार चलेगा। प्रभाव देखिए, वे कहते हैं।
जिनके कुल देवता बलि नहीं लेते, वे क्या करें?
राहुकाल छोड़ दें; और इन समयों में बलि से दोष क्यों नहीं लगता
जिनकी कुलदेवी और देवता उग्र नहीं हैं, वे यह जप घर के बजाय मंदिर में कर सकते हैं, और बलि विधान भी मंदिर में कर सकते हैं। पर जिन्हें पता ही नहीं, और जिनकी कुलदेवी और देवता को कोई बलि नहीं दी जाती, वे राहुकाल छोड़ दें; अभिजित में करें, या रात के समय, जो सबसे अच्छा है। और जब भी करें, यदि रोज़ के जप के बाद इन दिव्य समयों में बलि दें, तो उसका प्रभाव अच्छा रहता है और किसी प्रकार का दोष नहीं लगता — क्योंकि उस समय योगिनियाँ बड़ी उग्रता से आती हैं।
जिनकी कुलदेवी और देवता उग्र नहीं हैं, वे यह जप घर के बजाय मंदिर में कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं, और बलि विधान आदि भी मंदिर में कर सकते हैं। पर जिन्हें इसका कोई ज्ञान ही नहीं, और जिनकी कुलदेवी और देवता को कोई बलि नहीं दी जाती, वे राहुकाल छोड़ दें। वे अभिजित में करें, या रात के समय; वही सबसे अच्छा है। और जब भी करें — यदि रोज़ के जप के बाद इन दिव्य समयों में बलि दें, तो उसका प्रभाव अच्छा रहता है, और किसी प्रकार का दोष भी नहीं लगता, क्योंकि उस समय योगिनी बड़ी उग्रता से आती हैं।
सबसे विशिष्ट मुहूर्त कौन-सा है?
अष्टमी-नवमी का संधि काल, और दीक्षितों के लिए रखे गए तिथि-संक्रमण
सबसे विशिष्ट मुहूर्त अष्टमी और नवमी का संधि काल है, वक्ता कहते हैं। इसके अलावा संक्रमण काल भी हैं, एक तिथि के दूसरी में बदलने के — पर वह दीक्षित साधकों के लिए है, और फिर उसमें अमृत काल निकालना पड़ता है, इसलिए वे कहते हैं वह विषय छोड़ दीजिए। पर अष्टमी और नवमी के संधि काल पर इतना कुछ है, पूरे वीडियो और लाइव, कि किसी को भी उसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
शीतला माँ और मसानी के लिए कौन-सा समय चुनना चाहिए?
तीनों समयों में से चुनाव घर की परंपरा पर निर्भर है
इन तीन समयों में से जो आपके अनुकूल हो, वह चुनिए, वक्ता कहते हैं। उनका स्वभाव क्या है, आपके घर में किस प्रकार की पूजा होती है — यह आपको देखना होगा, तभी तय होगा।
पूछा गया कि शीतला माँ और मसानी के लिए कौन-सा समय लागू होगा। वक्ता कहते हैं कि तीनों समयों में से जो आपके अनुकूल हो, अपने हिसाब से चुनिए। उनका स्वभाव क्या है, आपके घर में किस प्रकार की पूजा होती है — यह आपको देखना होगा, तभी होगा।
संधि काल इतना दिव्य क्यों है?
भगवती चामुंडा के प्राकट्य का समय
संधि काल का समय इसलिए इतना दिव्य है क्योंकि यह भगवती चामुंडा के प्राकट्य का समय है, वक्ता कहते हैं। नवरात्रि शत्रु नाश, कृत्या और अविचार के नाश, शक्ति प्राप्ति और कामना पूर्ति का सबसे उत्तम समय है। और उस समय जितने अधिक सनातनी हिंदू पूजन करेंगे, उस समय की ऊर्जा उतनी ही प्रबल होगी, और आपका-हमारा जीवन उतना ही अच्छा और आसान होगा।
और संधि काल का समय इतना दिव्य इसलिए है, वक्ता कहते हैं, क्योंकि यह भगवती चामुंडा के प्राकट्य का समय है। नवरात्रि शत्रु नाश के लिए, कृत्या और अविचार के नाश के लिए, शक्ति प्राप्ति के लिए, और कामनाओं की पूर्ति के लिए सबसे उत्तम समय है। और उस समय जितने अधिक सनातनी हिंदू पूजन करेंगे, उस समय की ऊर्जा उतनी ही प्रबल होगी, और आपका और हमारा जीवन उतना ही अच्छा और आसान होगा।
यदि भारत तंत्र में इतना समृद्ध था, तो मुगल और अंग्रेज़ उस पर राज कैसे करने लगे?
शक्ति कहीं नहीं गई थी — लोग छल करने वाले थे
तंत्र ग्रंथों के लेखकों ने भी इस पर प्रश्नचिह्न लगाया है, वक्ता कहते हैं — उन्होंने स्वयं एक बार इसे पढ़ा था और एक लाइव में बात की थी: जब हमारा भारत तंत्र में इतना समृद्ध था, तो अंततः मुगल और अंग्रेज़ हम पर राज कैसे करने लगे, और उस समय तांत्रिकों की विद्या कहाँ चली गई थी? आज के समय में इस क्षेत्र में काम करते हुए, वे कहते हैं कि वे समझते हैं कि उनकी शक्ति कहीं नहीं गई थी। पर लोग स्वयं छल करने वाले थे। ऐसे लोगों की कमी नहीं जो आपसे बातें सीखकर फिर उन्हें आपके ही विरुद्ध चलाते हैं।
दूसरा और सबसे बड़ा खतरा, वक्ता कहते हैं, उन लोगों से है — देखिए, वे कहते हैं, तंत्र ग्रंथों के लेखकों ने भी इस पर प्रश्नचिह्न लगाया है; उन्होंने स्वयं एक बार इसे पढ़ा था और एक लाइव में इसकी बात की थी: जब हमारा भारत तंत्र में इतना समृद्ध था, तो अंततः मुगल और अंग्रेज़ हम पर राज कैसे करने लगे? उस समय तांत्रिकों की विद्या कहाँ चली गई थी? आज के समय में इस क्षेत्र में काम करते हुए, वे कहते हैं, वे समझते हैं कि उनकी शक्ति कहीं नहीं गई थी। पर लोग स्वयं छल करने वाले थे। ऐसे लोगों की कमी नहीं जो आपसे बातें सीखकर फिर उन्हें आपके ही विरुद्ध चलाते हैं, जो छल करते हैं — प्रचंड छल करने वाले लोग उपलब्ध हैं।
तांत्रिक विरासत हर क्षेत्र में बिना नष्ट हुए बची रही, पर छल करने वाले प्रभाव में लेकर कुछ लोगों को अब भी हानि पहुँचा सकते हैं
विरासत बची है, पर प्रभाव में लेकर कुछ को हानि पहुँचाई जा सकती है
फिर भी उन पूर्वजों का धन्यवाद कीजिए कि यह विरासत आज तक हर क्षेत्र में जीवित रही है, वक्ता कहते हैं: तंत्र के सबसे उग्र क्षेत्र, सब कुछ, आज भी हर जगह खड़ा है; यह नष्ट नहीं हुआ। इसलिए आज के समय में भी जो ऊँचे स्तर पर छल कर रहे हैं, वे अपने छल से चीज़ों को नष्ट नहीं करेंगे। पर यह निश्चित है कि दो-चार-दस लोगों को अपने प्रभाव में लेकर, वे उन्हें हानि पहुँचाने में पूरी तरह समर्थ हो जाएँगे।
फिर भी, वक्ता कहते हैं, उन पूर्वजों का धन्यवाद कीजिए कि आज भी यह विरासत हर क्षेत्र में जीवित रही है। तंत्र के सबसे उग्र क्षेत्र — सब कुछ आज भी खड़ा है, हर जगह। यह नष्ट नहीं हुआ। इसलिए आज के समय में भी जो ऊँचे स्तर पर छल कर रहे हैं, वे अपने छल से चीज़ों को नष्ट नहीं करेंगे। पर इतना निश्चित है: दो-चार-दस लोगों को अपने प्रभाव में लेकर, वे उन्हें हानि पहुँचाने में पूरी तरह समर्थ हो जाएँगे।
विपत्ति के समय कुंडलिनी शक्ति का क्या होता है?
डर मूलाधार में सोई शक्ति को जगा देता है
जब विपत्ति आती है, वक्ता कहते हैं, तो कुंडलिनी शक्ति बहुत अच्छे से जाग जाती है। आप सड़क पर शांति से चिप्स खाते, गाना सुनते जा रहे हैं, कोई कठिनाई नहीं — आराम से जाएँगे। पर यदि कोई कुत्ता आपके पीछे आए और वह काटने वाला हो, तो उसे देखकर आप दौड़ेंगे। जो दस फुट की दीवार आप पहले पार नहीं कर पाते, उसे उछलकर हाथ से पकड़कर चढ़ जाएँगे। इस डर ने आपकी कुंडलिनी शक्ति जगा दी; बिना डर के वह सामर्थ्य कहाँ थी? वह हवा से नहीं आई — वह आपके भीतर सो रही थी, जिसे हम मूलाधार में सोई शक्ति कहते हैं। इसलिए जब विपत्ति हमारी ओर आ रही होती है, तो कहीं न कहीं वह अवसर भी दे रही होती है: इस आपदा को अवसर बनाइए, और इसी समझ के साथ स्वयं को तैयार रखिए। साधना करते रहिए; वह काम आएगी। और यह बात अपनी अगली पीढ़ी तक भी पहुँचाइए।
जब विपत्ति आती है, वक्ता कहते हैं, तो कुण्डलिनी शक्ति बहुत अच्छे से जाग जाती है। आप सड़क पर शांति से जा रहे हैं, आराम से चिप्स खाते और गाना सुनते हुए, कोई कठिनाई नहीं — बहुत आराम से जाएँगे। पर यदि कोई कुत्ता आपके पीछे आए और वह काटने वाला हो, तो उसे देखकर आप दौड़ेंगे। जो दस फुट की दीवार आप पहले पार नहीं कर पाते, उसे कूदकर हाथ से पकड़ेंगे और चढ़ जाएँगे। इस डर ने आपकी कुंडलिनी शक्ति जगा दी; इस डर के बिना वह सामर्थ्य कहाँ थी? वह हवा से नहीं आई; वह आपके भीतर सो रही थी, जिसे हम मूलाधार में सोई शक्ति कहते हैं। तो यह एक बात है: जब विपत्ति हमारे पास आ रही होती है, तो कहीं न कहीं वह अवसर भी दे रही होती है। इस आपदा को अवसर बनाइए, और इसी समझ के साथ स्वयं को तैयार रखिए। साधना करते रहिए; वह काम आएगी। और यह बात अपनी अगली पीढ़ी तक भी पहुँचाइए।
कोरोना जैसी विपत्ति बिना किसी भविष्यवाणी के आती है, और उसके विरुद्ध रक्षा के रूप में महामृत्युंजय कवच अनुष्ठान रखा जाता है
विपत्ति को भविष्यवाणी की ज़रूरत नहीं, और महामृत्युंजय कवच अनुष्ठान
विपत्ति ऐसी चीज़ नहीं जो किसी के कहने से ही हो — वह कभी भी आ सकती है, वक्ता कहते हैं। क्या कोरोना के बारे में कोई विशेष भविष्यवाणी थी? लोग कहते हैं नहीं थी; थी या नहीं थी, विपत्ति आई और उसमें परेशानी हुई। जो लोग लंबे समय से महामृत्युंजय कवच आदि के अनुष्ठान पर ज़ोर दे रहे हैं, यदि वे उसे करते रहते, तो कम से कम कुछ और जानें बच जातीं।
विपत्ति किसी के कहने पर निर्भर नहीं करती, वक्ता कहते हैं; ऐसी कोई बात नहीं कि वह तभी होगी जब कोई उसकी बात करे। वह कभी भी आ सकती है। क्या कोरोना के बारे में कोई विशेष भविष्यवाणी थी? वे लोग कहते हैं नहीं थी; थी या नहीं थी — विपत्ति आई, और उसमें परेशानी हुई। जो लोग लंबे समय से महामृत्युंजय मंत्र के कवच आदि के अनुष्ठान पर ज़ोर दे रहे हैं, यदि वे उसे करते रहते, तो कम से कम कुछ और जानें बच जातीं।
राक्षसी स्वभाव के लोग साधक के विरुद्ध कैसे काम करते हैं?
पहले विश्वास जीतना, फिर धन की हानि, सम्मान की हानि, और पीठ में छुरा
ऐसे लोगों से बचिए, वक्ता कहते हैं, क्योंकि वे हर तरह से आपको धोखा देने का प्रयास करेंगे। पहले वे आपका विश्वास जीतेंगे; और हर बार जब आप आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे, साधना के क्षेत्र में या जीवन के क्षेत्र में, वे धन के माध्यम से आपको हानि पहुँचाएँगे, सौ प्रतिशत। आपके व्यवहार को जीतकर, वे आपका सम्मान नष्ट करने का पूरा प्रयास करेंगे। वे आपकी पीठ में छुरा घोंपने का प्रयास करेंगे, और यदि सफल हो गए तो जीवन भर आपको नीचा दिखाने का प्रयास करेंगे। यह सब करके उन्हें आत्म-संतोष मिलता है। ये राक्षसी स्वभाव के हैं — रावण ब्राह्मण था, पर फिर भी राक्षस था।
इन लोगों से बचना चाहिए, वक्ता कहते हैं, क्योंकि वे हर प्रकार से आपको धोखा देने का प्रयास करेंगे। पहले वे आपका विश्वास जीतेंगे। और जब भी आप आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे, साधना के क्षेत्र में या जीवन के क्षेत्र में, वे धन के माध्यम से आपको हानि पहुँचाएँगे, सौ प्रतिशत। आपके व्यवहार को जीतकर, वे आपका सम्मान नष्ट करने का पूरा प्रयास करेंगे। वे आपकी पीठ में छुरा घोंपने का प्रयास करेंगे, और यदि उसमें सफल हो गए, तो जीवन भर आपको नीचा दिखाने का प्रयास करेंगे। यह सब करने से उन्हें आत्म-संतोष मिलता है। ये राक्षसी स्वभाव के हैं, वे कहते हैं। रावण ब्राह्मण था, पर फिर भी राक्षस था — तो ये लोग उसी राक्षसी स्वभाव के हैं।
क्या नवार्ण मंत्र का जप बिना दीक्षा के करना चाहिए?
निषेध का सीधा दोहराव
वे साफ़ शब्दों में कहते हैं: बिना दीक्षा के नवार्ण मंत्र का जप मत कीजिए। बिना दीक्षा के जप करना उचित नहीं है।
वक्ता इसे साफ़ कहते हैं: बिना दीक्षा के नवार्ण मंत्र का जप मत कीजिए। बिना दीक्षा के जप करना, वे कहते हैं, उचित नहीं है।
क्या वांसदा की मेलोडी माँ राजराजेश्वरी हैं?
मेलोडी माँ न राजराजेश्वरी हैं, न तीनों गुणों की धारक
बात यह है, वक्ता कहते हैं: मेलोडी माँ राजराजेश्वरी नहीं हैं, न ही वे तीनों गुण धारण करती हैं।
एक श्रोता राजराजेश्वरी त्रिगुणात्मका माँ, मेलोडी धाम, वांसदा का उल्लेख करते हैं। बात यह है, वक्ता उत्तर देते हैं: मेलोडी माँ राजराजेश्वरी नहीं हैं, न ही वे त्रिगुण धारण करती हैं।
बिना दीक्षा के बीज मंत्र का कितना जप किया जा सकता है?
सीमित मात्रा की अनुमति, पर बृहद् अनुष्ठान के लिए उपदेश चाहिए
बीज मंत्र का जप आप एक सीमित मात्रा तक अवश्य कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं, क्योंकि यह भगवती भुवनेश्वरी का है और यह देवी प्रणव है — वह आप कर सकते हैं। पर यदि उनका बृहद् अनुष्ठान करना है, तो उपदेश लेकर करना सबसे अच्छा है, क्योंकि तब आवरण पूजन आदि की बात आती है। सवा लाख किया है तो कोई बात नहीं; उतना अवश्य कीजिए। रोज़ दस माला जप करना उत्तम है। पर यदि अब ग्यारह लाख या इक्कीस लाख करना चाहते हैं, तो दीक्षित हो जाना चाहिए।
बीज मंत्र (बीज मंत्र) का जप आप एक सीमित मात्रा तक अवश्य कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं, क्योंकि यह भगवती भुवनेश्वरी का है और यह देवी प्रणव है — वह आप कर सकते हैं। पर यदि उनका बृहद् अनुष्ठान करना है, तो उपदेश लेकर करना उत्तम है, क्योंकि तब आवरण पूजा आदि की बात आती है। यदि सवा लाख किया है, तो कोई बात नहीं; कम से कम उतना कीजिए। रोज़ दस माला जप करना उत्तम है। पर यदि अब आप ग्यारह लाख या इक्कीस लाख करना चाहते हैं, तो दीक्षित हो जाना चाहिए।
यदि कोई सहस्रनाम से तर्पण करने लगे तो क्या होगा?
सहस्रनाम से तर्पण
यदि आप सहस्रनाम से तर्पण आदि करने लगें, तो बात अद्भुत हो जाएगी, वक्ता कहते हैं।
यदि आप सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। से तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। आदि करने लगें, वक्ता कहते हैं, तो बात अद्भुत हो जाएगी।
क्या नरसिंह माला मंत्र के 108 पाठ का नकारात्मक प्रभाव होगा?
पहले नारायण की स्तुति करें और लक्ष्मी माला मंत्र के ग्यारह पाठ जोड़ें
यदि आप 108 पाठ करने वाले हैं, वक्ता ऋषिकेश से कहते हैं, तो पहले भगवान नारायण की स्तुति आदि अवश्य करना बेहतर रहेगा; और यदि 108 पाठ कर रहे हैं, तो साथ में भगवती लक्ष्मी के माला मंत्र के ग्यारह पाठ भी कीजिए। दोनों कीजिए।
पूछा गया कि क्या बहुत अधिक ऊर्जा के कारण नरसिंह जी के माला मंत्र के 108 पाठ से कोई नकारात्मक प्रभाव आएगा। वक्ता कहते हैं कि यदि 108 पाठ करने हैं, तो पहले भगवान नारायण की स्तुति आदि अवश्य करना बेहतर रहेगा। और यदि आप 108 पाठ कर रहे हैं, तो साथ में भगवती लक्ष्मी के माला मंत्र के ग्यारह पाठ भी कीजिए। दोनों कीजिए।
क्या माला मंत्र के स्थान पर महालक्ष्मी अष्टकम् किया जा सकता है?
किया जा सकता है, पर लक्ष्मी माला मंत्र अधिक उचित है
महालक्ष्मी अष्टकम् भी किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं, पर लक्ष्मी माला मंत्र चैनल पर पहले से है और वह करना अधिक उचित होता। यह लक्ष्मी नरसिंह हो जाता है: भगवती लक्ष्मी भगवान नरसिंह के साथ उनके सौम्य रूप में, आठ शक्तियों में से एक के रूप में स्थित हैं। इसलिए चूँकि वे शक्ति हैं, उनका दशांश होगा और वह उपयुक्त रहेगा। प्रत्यंगिरा भी इसी तरह प्रयुक्त होती हैं, वे कहते हैं, पर वे सबसे उग्र में आएँगी।
महालक्ष्मी अष्टकम् भी किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं, पर लक्ष्मी माला मंत्र चैनल पर पहले से है और वह करना अधिक उचित होता। यह लक्ष्मी नरसिंह हो जाता है, वे कहते हैं। भगवती लक्ष्मी भगवान नरसिंह के साथ उनके सौम्य रूप में, आठ शक्तियों में से एक के रूप में स्थित हैं। इसलिए चूँकि वे शक्ति हैं, उनका दशांश होगा, और वह उपयुक्त रहेगा। इसी तरह महाप्रत्यंगिरा भी की जाती हैं — पर वे सबसे उग्र में आएँगी।
क्या ऑनलाइन दीक्षा वैध दीक्षा है?
ऑनलाइन दीक्षा कोई दीक्षा नहीं
ऑनलाइन दीक्षा कोई दीक्षा ही नहीं है, वक्ता साफ़ कहते हैं। न माइक्रोफ़ोन से दी गई नवार्ण की दीक्षा दीक्षा है, न माइक्रोफ़ोन से दी गई पंचदशी की दीक्षा। यह सब — जो दीक्षा गुरु पूरी तरह विधिपूर्वक, शास्त्रोक्त विधि से देते हैं, वही उचित दीक्षा है। यह बात ध्यान में रखिए।
ऑनलाइन दीक्षा कोई दीक्षा ही नहीं है, वक्ता कहते हैं। साफ़ शब्दों में: न माइक्रोफ़ोन से दी गई नवार्ण मंत्र की दीक्षा दीक्षा है, न माइक्रोफ़ोन से दी गई पंचदशी की दीक्षा। यह सब — जो दीक्षा गुरु पूरी तरह विधिपूर्वक, शास्त्रोक्त विधि से देते हैं, वही दीक्षा उचित है। यह बात ध्यान में रखिए, वे कहते हैं।
त्रिकोण परिक्रमा कैसे करनी है?
अकेले या परिवार के साथ, आराम से एक ही दिन में
स्वयं अपने परिवार के साथ जाइए — अब त्रिकोण में जाने में कोई विशेष कठिनाई नहीं है; यह आराम से एक दिन में की जा सकती है।
स्वयं अपने परिवार के साथ जाइए, वक्ता कहते हैं; अब ऐसी कोई विशेष या कठिन स्थिति नहीं कि आप इसे अकेले, अपने परिवार के साथ न कर सकें। वे पूरा विषय कई बार स्पष्ट कर चुके हैं। आप त्रिकोण परिक्रमा आराम से एक ही दिन में कर सकते हैं। और यदि आप बिल्कुल अकेले हैं, तो जंगल वाले क्षेत्र में आने-जाने में थोड़ी कठिनाई है — वह स्थान वास्तव में कभी सुनसान नहीं होता, पर जब आपके लिए नया हो तो ऐसा लगता है, और यदि लंबा त्रिकोण करने जा रहे हैं तो दो-चार दिन आपको कुछ कठिनाई हो सकती है।
जब वर्षी नहीं हुई हो, तो क्या व्रत और पूरा पूजन रखा जा सकता है?
व्रत रखा जा सकता है, और तिथि का व्रत छोड़ा नहीं जा सकता
आप केवल व्रत रख सकते हैं, वक्ता कहते हैं; पूजन और पाठ की पूरी बात के लिए — एकादशी आदि में, वर्षी न हुई हो तब भी, एकादशी नहीं छोड़ी जा सकती। यदि आप किसी तिथि का व्रत रखते हैं तो उसे छोड़ नहीं सकते; वह आप कर सकते हैं।
पूछा गया कि जब घर में अभी वर्षी नहीं हुई, तो पूजन, पाठ और पूरा व्रत कैसे करें। वक्ता कहते हैं कि केवल व्रत रखा जा सकता है। पूजन और पाठ की पूरी बात के लिए — एकादशी आदि लीजिए: वार्षिकी न हुई हो तब भी, एकादशी नहीं छोड़ी जा सकती। यदि आप किसी तिथि का व्रत रखते हैं, तो उसे छोड़ नहीं सकते; वह आप कर सकते हैं।
जब कोई द्वैत भाव में स्थित हो जाए, तो क्या करना चाहिए?
साधना मार्ग पर आगे बढ़ने पर द्वैत अपने आप घुल जाता है
यदि आप स्वयं को द्वैत भाव में स्थित पाते हैं, तो अपने आराध्य, अपने इष्ट से प्रार्थना कीजिए, वक्ता कहते हैं। और एक बात याद रखिए: जब आप साधना मार्ग पर आगे बढ़ने लगते हैं, तो द्वैत का भाव धीरे-धीरे अपने आप समाप्त होने लगता है। हो सकता है कुछ समय के लिए आप एक जगह अटक गए हों, पर वह हमेशा नहीं रहेगा। आगे गति होगी, और वही परिश्रम अद्वैत में बदल जाएगा।
यदि आप द्वैत भाव में स्थित हो जाएँ, वक्ता कहते हैं, तो अपने आराध्य, अपने इष्ट से प्रार्थना कीजिए। और एक बात याद रखिए: जब आप साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने लगते हैं, तो द्वैत का भाव धीरे-धीरे अपने आप समाप्त होने लगता है। हो सकता है कुछ समय के लिए आप एक जगह अटक गए हों, पर वह हमेशा नहीं रहेगा। आगे गति होगी, और वही परिश्रम अद्वैत में बदल जाएगा। वे जोड़ते हैं कि नवरात्रि में विंध्याचल जा सकते हैं, पर बीच में छोड़कर नहीं आना चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।