महाशिवरात्रि किसकी रात्रि है, और पितर पहली बार कैसे उत्पन्न हुए — रुद्र संहिता, सती खंड

महाशिवरात्रि और पितरों की उत्पत्ति पर एक लाइव सत्र।

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Questions this answers

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01

सती खंड से यह तय होता है कि पितर पहले से थे या किसी की मृत्यु के बाद बने।

पितर योनि पहले से तय थी या मृत्यु से बनी

· 01:22–02:03

वक्ता बताते हैं कि शिव महापुराण की रुद्र संहिता के सती खंड से वे जानेंगे कि पितर पहली बार कैसे बने। क्या सृष्टि बनने के बाद किसी की मृत्यु हुई और तब पितर बने? या पितर योनि भगवान ने पहले से तय कर दी थी, और पितर पहले से दिव्य रूप में मौजूद थे?

02

नए साधक के लिए चमत्कार का क्या अर्थ है?

नए साधक के लिए चमत्कार है अनुभव और ज्ञान मिलना

· 02:04–03:38 · Also a question

वे कहते हैं कि चमत्कार एक अलग विषय है। पर नए साधकों के लिए चमत्कार बस यही है कि आपको अपने जीवन से जुड़ी किसी बात का अनुभव मिले, और ख़ास तौर पर ज्ञान मिले। अगर बुद्धि खुलने लगे और सद्बुद्धि मिलने लगे, तो यही सबसे बड़ी बात है।

03

विद्वान अब महाशिवरात्रि के बारे में क्या दावा कर रहे हैं?

आज के दो दावे: उस दिन विवाह नहीं हुआ, और पहला ज्योतिर्लिंग

· 03:39–04:33 · Also a question

एक दावा यह है कि शिव और पार्वती का विवाह महाशिवरात्रि पर नहीं हुआ, और किसी पुराण में इसका वर्णन नहीं है। दूसरे लोग कहते हैं कि उस रात शिव पहली बार ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए। वक्ता कहते हैं कि दूसरे लोग भी ग़लत कह रहे हैं, क्योंकि वे उस दिन भी प्रकट नहीं हुए।

04

जिन्होंने महाशिवरात्रि मनाई, उन्हें शंका तुरंत दूर करनी चाहिए, नहीं तो गठबंधन पूजा का फल चला जाता है।

पूजा के बाद मन में शंका पूजा का फल नष्ट कर देती है

· 04:34–05:02

क्योंकि श्रोताओं ने एक दिन पहले महाशिवरात्रि मनाई और शिव और जगदंबा की गठबंधन पूजा की। वे पूछते हैं, अगर अब मन में इस पर शंका बैठ जाए, तो उस पूजा का फल कैसे मिलेगा? शंका दूर होनी चाहिए, इसलिए वे यह विषय सामने रखते हैं।

05

शिव पहली बार ज्योतिर्लिंग रूप में कब प्रकट हुए?

मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष तृतीया, महाशिवरात्रि नहीं

· 05:03–05:16 · Also a question

वे कहते हैं, मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को, महाशिवरात्रि पर नहीं। यह श्रोता शिव महापुराण कथा सुनते समय शुरू की विद्येश्वर संहिता में पहले ही जान चुके हैं।

वे कहते हैं, श्रोता शिव पुराण की कथा पहले से सुन रहे हैं, तो शुरू की विद्येश्वर संहिता में यह जान चुके हैं। वहां बताया है कि शिव मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए, महाशिवरात्रि पर नहीं।

शास्त्र क्या कहता है

The Vidyeshwar Samhita gives the month and asterism of Shiva's first pillar-form appearance as the origin the speaker is pointing to for the Jyotirlinga.

The text confirms the month Mārgaśīrṣa but names the asterism Ārdrā nakṣatra, not a Kṛṣṇa Pakṣa Tṛtīyā tithi — a nakshatra and a tithi are different reckonings, and the text nowhere gives Tritiya.

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15

यत्पुनः स्तम्भरूपेण स्वाविरासमहं पुरा। स कालो मार्गशीर्षे तु स्यादार्द्राऋक्षमर्भकौ॥ १५

हे पुत्रो! जब मैं पहले स्तम्भके रूपमें स्वयं प्रकट हुआ था, वह समय मार्गशीर्ष मासमें आर्द्रा नक्षत्रका था।

16

आर्द्रायां मार्गशीर्षे तु यः पश्येन्मामुमासखम्। मद्वेरमपि वा लिङ्गं स गुहादपि मे प्रियः॥ १६

मार्गशीर्षमें आर्द्रा नक्षत्रके दिन जो उमासहित मेरा, मेरी मूर्तिका अथवा लिंगका दर्शन करे, वह मुझे गुहसे भी अधिक प्रिय है।

06

महाशिवरात्रि की रात क्या हुआ?

पंचानन रूप में प्रकट होना और प्रणव, गायत्री व पंचाक्षरी का जन्म

· 05:17–05:37 · Also a question

वे कहते हैं, महाशिवरात्रि की रात शिव ब्रह्मा और विष्णु के सामने साकार रूप में, पंचानन स्वरूप में प्रकट हुए। उस दिन प्रणव, गायत्री और पंचाक्षरी मंत्र, तीनों शिव के मुख से निकले। ब्रह्मा और विष्णु को इन तीनों की गुरु दीक्षा मिली।

07

ब्रह्मा और विष्णु शिव और पार्वती के पहले शिष्य बने, और शिव ने वरदान दिया कि यह रात महाशिवरात्रि नाम से प्रसिद्ध होगी।

पहले शिष्य, और रात का नाम रखने वाला वरदान

· 05:38–05:58

दीक्षा लेकर वे शिव और मां पार्वती के पहले शिष्य बने। फिर दोनों ने शिव की पूजा की। शिव ने महाशिवरात्रि का वरदान दिया, यह कहकर कि यह रात महाशिवरात्रि नाम से प्रसिद्ध होगी।

वे कहते हैं, दीक्षा मिलने के बाद ब्रह्मा और विष्णु शिव और मां पार्वती के पहले शिष्य बने। दीक्षा पाकर दोनों ने फिर शिव की पूजा की। और शिव ने यह कहकर महाशिवरात्रि का वरदान दिया कि यह रात महाशिवरात्रि नाम से प्रसिद्ध होगी।

08

शिव और पार्वती का विवाह किन तिथियों पर माना जाता है?

कल्प भेद: मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीया और वैशाख शुक्ल पंचमी

· 05:59–06:23 · Also a question

विवाह के प्रश्न पर वे श्रोता को फिर कल्प भेद में ले जाते हैं। अलग-अलग पुराणों में थोड़े अलग वर्णन हैं, संकेत के रूप में। मुख्य रूप से दो दिए गए हैं: मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष द्वितीया तिथि, और वैशाख शुक्ल पंचमी। इन दिनों भगवती पार्वती और शिव का विवाह हुआ।

09

शिव नवरात्र प्रतिपदा से शुरू होता है या पंचमी से?

शिव नवरात्र पंचमी से शुरू होता है, इसलिए गिनती पर ही मतभेद है

· 06:24–06:42 · Also a question

शिव नवरात्र में भी माना गया है कि सप्तमी तक, नवमी को विवाह हुआ। पर वे पूछते हैं, फिर किस दिन को नवमी माना जा रहा है? क्योंकि शिव नवरात्र पंचमी से शुरू होता है, प्रतिपदा से नहीं। वे कहते हैं, मतभेद इसीलिए होते हैं कि लोग शास्त्र प्रमाण सामने नहीं रखते।

10

महाशिवरात्रि के विवाह के पीछे की सच्चाई क्या है?

सती दाह, शिव का भटकना, और सुदर्शन चक्र

· 06:43–07:05 · Also a question

सच्चाई शुरू होती है जब भगवती सती ने यज्ञ की अग्नि में अपना शरीर जला दिया। शिव मोह में आकर उन्हें उठाकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। और विष्णु के चलाए सुदर्शन चक्र से भगवती सती का शरीर टुकड़ों में बंट गया।

वे कहते हैं, असलियत यह है। जब भगवती सती का सती दाह हुआ, यानी उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपना शरीर भस्म कर दिया, तब शिव मोह में आकर उन्हें उठाकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। फिर विष्णु का सुदर्शन चक्र चला, और उससे भगवती सती का शरीर बंट गया, उसके टुकड़े हो गए।

11

भगवती सती का हृदय कहां गिरा?

वैद्यनाथ क्षेत्र हृदय पीठ, और वहां की शक्ति जया दुर्गा

· 07:06–07:45 · Also a question

वे कहते हैं, वैद्यनाथ क्षेत्र में, यानी आज के झारखंड राज्य के देवघर में भगवती सती का हृदय गिरा। यह शक्ति पीठ है, साक्षात शक्ति पीठ। उस हृदय पीठ की अधिष्ठात्री शक्ति जया दुर्गा हैं। वे वहां की महाशक्ति हैं, और हृदय गिरने पर वहां प्रकट हुईं।

12

शिव वैद्यनाथ में कैसे विराजमान हुए?

रावण को दिया गया आत्मलिंग, और गणपति की लीला

· 07:46–08:27 · Also a question

वहां सती का हृदय गिरा था, इसलिए शिव उस जगह हृदय के रूप में ही विराज सकते थे। इसलिए एक लीला रची गई। आत्मलिंग, जो स्वयं शिव थे, रावण को ज्योतिर्लिंग के रूप में दिया गया। रावण उसे लंका ले जाना चाहता था और उसी रास्ते से गया। वैद्यनाथ क्षेत्र में गणपति ने लीला की और ज्योतिर्लिंग वहीं स्थापित हो गया।

13

वैद्यनाथ क्षेत्र को चिता भूमि क्यों कहते हैं?

चिता भूमि और भस्म क्षेत्र, और मणिकर्णिका में तर्पण

· 08:28–09:02 · Also a question

क्योंकि इसे चिता भूमि कहा जाता है। माना जाता है कि भगवती सती का अंतिम संस्कार, दाह संस्कार उसी क्षेत्र में हुआ। वैद्यनाथ क्षेत्र को चिता भूमि और भस्म क्षेत्र कहते हैं। पर तर्पण सरस्वती नदी के किनारे मणिकर्णिका क्षेत्र में हुआ। सरस्वती अब लुप्त है और अदृश्य रूप में है। उस जगह शिव ने अंतिम संस्कार नहीं किया।

14

वैद्यनाथ क्षेत्र की पूरी स्थापना कब हुई?

पार्वती अवतार के बाद ही पूरी स्थापना, सब देवताओं की उपस्थिति में

· 09:03–09:36 · Also a question

भगवती सती वहां पहले से विराजमान हुईं। पर उस क्षेत्र की पूरी स्थापना तभी हुई जब उन्होंने फिर पार्वती रूप में अवतार लिया। रावण लिंग उठा नहीं सका, तो उसे अंगूठे से दबाकर चला गया। जब वह उसे ले नहीं जा सका और स्थापना हो गई, तब सब देवी-देवता वहां उपस्थित हुए।

15

वैद्यनाथ में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात क्या हुआ?

जया दुर्गा और वैद्यनाथ का गठबंधन, ब्रह्मा और विष्णु ने कराया

· 09:37–10:14 · Also a question

वे कहते हैं, कई कल्पों और युगों के बाद जया दुर्गा रूप में भगवती सती और शिव वहां मिले, और उनका गठबंधन हुआ। ब्रह्मा और विष्णु ने इसे कराया। वह रात फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात कहलाती है, वही महाशिवरात्रि है। वहां से उन सबके लिए आशीर्वाद मिला जो उस दिन भगवती और भगवान का गठबंधन करें। इस तरह वहां एक विवाह हुआ।

16

वैद्यनाथ जयंती कब मनाई जाती है?

वैद्यनाथ जयंती और पुनर्मिलन एक ही रात

· 10:15–10:36 · Also a question

वे साफ़ कहते हैं कि भगवान वैद्यनाथ और मां जया दुर्गा का विवाह महाशिवरात्रि की फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी की रात हुआ। वैद्यनाथ जयंती उसी दिन मनाई जाती है। उसी दिन दोनों का विवाह, यानी पुनर्मिलन हुआ, और उस क्षेत्र की स्थापना पूरी हुई।

17

वैद्यनाथ हृदय पीठ के लिए संकल्प में कौन-से शब्द बोले जाते हैं?

संकल्प में हृदय पीठ, और हर ज्योतिर्लिंग पर गठबंधन का वरदान

· 10:37–11:08 · Also a question

वहां हृदय था, इसलिए वह हृदय प्रदेश है। वे कहते हैं, संकल्प लेते समय संकल्प में "हृदय पीठ पीठाधीश्वरी भगवती जया दुर्गा" बोला जाता है, और "आत्मलिंग स्वरूपाय महा ज्योतिर्लिंगाय क्षेत्रे बाबा वैद्यनाथ" भी बोला जाता है। उसी वरदान से यह प्रथा बनी कि उस दिन हर ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में गठबंधन होता है।

18

शिव और पार्वती के विवाह का मुख्य स्थान कहां है?

वैशाख शुक्ल पंचमी को त्रियुगी नारायण, और कल्प भेद से कनखल

· 11:09–11:51 · Also a question

वे कहते हैं, शिव और पार्वती का मुख्य विवाह उत्तराखंड के त्रियुगी नारायण मंदिर का है, और उसका वर्णन वैशाख शुक्ल पंचमी में आता है। दूसरा, कल्प भेद से, सती से जुड़ा कनखल क्षेत्र है। अब सती खंड शुरू हो रहा है, तो उसका वर्णन भी आएगा।

19

जो महाशिवरात्रि के विवाह को झूठा कहते हैं, उन्होंने रावणेश्वर वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग क्षेत्र का प्रमाण कभी नहीं पढ़ा।

रावणेश्वर वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग जाकर वहां का प्रमाण पढ़ें

· 11:52–12:41

वे श्रोताओं से कहते हैं कि लोगों के ग़लत कहने पर मन में शंका न लाएं। वे कहते हैं, ऐसा कहने वालों ने बाबा वैद्यनाथ के बारे में कभी कुछ नहीं पढ़ा। वे रावणेश्वर वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग क्षेत्र जाएं, वहां सारे प्रमाण देखें, और बाबा वैद्यनाथ जयंती के बारे में पढ़ें। वे कहते हैं कि पूजा-पाठ पूरा होने पर वे लिखित प्रमाण चैनल पर डालेंगे।

20

वैद्यनाथ के वर्णन में सिंदूर दान नहीं है; वहां प्रतीक रूप में पुनर्मिलन मिलता है।

सिंदूर दान का वर्णन नहीं; केवल प्रतीक रूप में पुनर्मिलन

· 12:42–13:02

वे कहते हैं, अगर आप वहां यह खोजने जाएं कि सिंदूर दान हुआ या नहीं, तो यही ग़लत है। उसका वर्णन कहीं नहीं मिलेगा। आपको जो मिलेगा वह है प्रतीक रूप में जो कुछ हुआ, यानी पुनर्मिलन। और वह ग़लत बात नहीं है। इसीलिए उस दिन मां और बाबा का पूरा वैवाहिक महोत्सव मनाया जाता है और वैवाहिक वर्षगांठ की शुभकामनाएं कही जाती हैं।

21

महाशिवरात्रि के विवाह को नकारना खंडोबा और मलसा के विवाह और शिव के हर दूसरे रूप को नकारना होगा।

खंडोबा और मलसा: एक विवाह नकारें तो सब नकारने होंगे

· 13:03–13:35

वे तर्क देते हैं कि कुछ ग़लत नहीं कहा जा रहा। हरि अनंत, हरि कथा अनंता। शिव ने कितने अवतार लिए, कितने रूप लिए। क्या शिव ने कोई ऐसा अवतार नहीं लिया जिसमें विवाह हुआ? क्या खंडोबा और मलसा का विवाह नहीं हुआ? वहां जगदंबा ने भी दो रूपों में अवतार लिया। अगर आप यह नहीं मानेंगे, तो क्या आप कहेंगे कि उस दिन वैवाहिक वर्षगांठ की शुभकामना महादेव की नहीं, खंडोबा और मलसा की है, और वे पार्वती और शिव नहीं हैं?

22

इस रात का महत्व दोगुना है, क्योंकि पहले से स्थापित महाशिवरात्रि पर परमेश्वर का प्रकृति से मिलन हुआ।

उस रात प्रकृति और परम पुरुष का मिलन हुआ

· 13:36–14:06

महाशिवरात्रि पहले से थी और प्रचलन में थी, इसलिए उसका महत्व दोगुना हो गया। वे कहते हैं, उस दिन परम सत्ता वहां हृदय के रूप में विराजमान थी, और उस परमेश्वर का प्रकृति से मिलन हुआ। उस दिन, महाशिवरात्रि में, प्रकृति और परम पुरुष मिले, और उनका गठबंधन और पूरा पूजन हुआ।

23

बाबा वैद्यनाथ में गठबंधन कब नहीं होता?

महाशिवरात्रि से पहले के एक-दो दिन छोड़कर सालभर 365 दिन गठबंधन

· 14:07–14:33 · Also a question

केवल महाशिवरात्रि से ठीक पहले के एक-दो दिनों में वहां गठबंधन का काम रुकता है। क्योंकि उन दिनों पूरी सफ़ाई और तैयारी चल रही होती है, और संकल्प पूजन आदि चल रहा होता है। वे कहते हैं, नहीं तो पूरे 365 दिन वहां जाने वालों का गठबंधन होता है।

24

वैद्यनाथ की गठबंधन परंपरा कितनी पुरानी है?

त्रेता युग से, जब से रावण ने लिंग स्थापित किया

· 14:34–14:51 · Also a question

वे कहते हैं, अगर युगों के हिसाब से भी गिनें, तो त्रेता युग से, जब से रावण उसे उस जगह स्थापित करके चला गया। वे श्रोताओं से कहते हैं, यह विचार मन से पूरी तरह निकाल दीजिए कि विवाह नहीं हुआ। वे कहते हैं, पहले यह शंका दूर करना ज़रूरी था।

वे कहते हैं, त्रेता युग से। अगर युगों के अनुसार भी गिनें, तो त्रेता युग से, जब से रावण उसे उस जगह स्थापित करके चला गया। वे कहते हैं, तो यह सोच अपने मन से निकाल दीजिए, यह विचार कि विवाह नहीं हुआ। पहले यह शंका दूर करना ज़रूरी था।

25

शक्ति पीठ आख़िर क्यों हैं?

सती के 108 खंड, जिनमें 51 प्रकट और बाकी गुप्त

· 14:52–15:47 · Also a question

अगर भगवती सती ने अपने शरीर की बलि न दी होती, हम सबके लिए वह त्याग न किया होता, तो पूरी दुनिया में कोई शक्ति पीठ न होता और इतनी भक्ति न होती। भगवती आदिशक्ति ने अपना शरीर त्यागकर जला दिया। माना जाता है कि वह कई टुकड़ों में, 108 खंडों में बंटा। कलि काल होने से उनमें 51 प्रकट हैं और बाकी गुप्त।

26

ब्रह्मा से पहली कन्या कौन प्रकट हुई?

मानस पुत्रों के बाद प्रकट हुई संध्या

· 15:48–16:32 · Also a question

ब्रह्मा ने अपने सब मानस पुत्रों को जन्म दिया। उनमें सब ऋषि थे, सप्त ऋषि आदि, नारद, सब। उसके बाद पहली कन्या प्रकट हुई, जिसका नाम संध्या है। जब सृष्टि रचनी थी, तब दक्ष प्रजापति आदि सब पहले बनाए जा चुके थे।

वे कहते हैं, ब्रह्मा ने अपने सब मानस पुत्र प्रकट किए, उन्हें जन्म दिया। मानसी पुत्रों में सब ऋषि थे, सप्त ऋषि आदि, नारद, सब। उसके बाद पहली कन्या प्रकट हुई, और उस पहली कन्या का नाम संध्या है। वे कहते हैं, जब सृष्टि रचनी थी, तब दक्ष प्रजापति आदि सब पहले ही बनाए जा चुके थे।

शास्त्र क्या कहता है

Brahma's manas-putra sons (Marichi, Atri, Pulaha, Pulastya, Angira, Kratu, Vasistha, Narada, Daksha, Bhrigu) were created, and Sandhya arose from his mind at that same time.

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17

सृष्ट्वा प्रजापतीन्दक्षप्रमुखान्सुरसत्तमान् । अमन्यं सुप्रसन्नोऽहं निजं सर्वमहोन्नतम् ॥

दक्ष आदि प्रमुख प्रजापतियों की तथा देवश्रेष्ठों की रचना करके मैं बड़ा ही प्रसन्न हुआ तथा अपने को सबसे महान् समझने लगा।

18

मरीचिमत्रिं पुलहं पुलस्त्याङ्गिरसौ क्रतुम् । वसिष्ठं नारदं दक्षं भृगुं चेति महाप्रभून् ॥

मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, अंगिरा, क्रतु, वसिष्ठ, नारद, दक्ष तथा भृगु — इन महान् प्रभुतासम्पन्न मानस पुत्रों —

19

ब्रह्माहं मानसान्पुत्रानसर्जं च यदा मुने । तदा मन्मनसो जाता चारुरूपा वराङ्गना ॥

हे मुने! जिस समय मुझ ब्रह्मा ने इन मानस पुत्रों की सृष्टि की, उसी समय मेरे मन से एक सुन्दर रूपवाली श्रेष्ठ युवती भी उत्पन्न हुई।

27

जिसमें भी अहंकार हो, भगवान उसका अहंकार ले लेते हैं, ब्रह्मा भी अपवाद नहीं, जैसे नारद मोह की कथा में।

अहंकार आने पर ब्रह्मा को भी नहीं छोड़ा जाता

· 16:33–17:13

क्योंकि जब भी किसी को अहंकार होता है, भगवान वह अहंकार ले लेते हैं, चाहे वह स्वयं ब्रह्मा हों। वे याद दिलाते हैं कि पिछली बार श्रोताओं ने नारद मोह की कथा सुनी। जब नारद का मोह बढ़ा, तो उनका मोह ले लिया गया। जब ब्रह्मा भी ख़ुद को विधाता मानकर अहंकार करते हैं, तो परब्रह्म परमेश्वर उसे हटाने के लिए लीला रचते हैं। ब्रह्मा को बहुत अहंकार हो गया।

28

ब्रह्मा को सृष्टि रचने की सामर्थ्य कैसे मिली?

शिव के पांच मुख अलग-अलग कल्पों में ज्ञान देते हैं

· 17:14–17:43 · Also a question

शिव एक बार पंचानन स्वरूप में प्रकट हुए। उसके बाद अलग-अलग कल्पों में, जब भी ब्रह्मा ने सृष्टि रचने का प्रयास किया, शिव ने हर बार अलग रूप लिया: सद्योजात का रूप, वामदेव का रूप, ईशान का रूप, अघोर का रूप, या तत्पुरुष का रूप। अलग-अलग कल्पों में ये पांच रूप लेकर उन्होंने ब्रह्मा को फिर ज्ञान दिया और सामर्थ्य दी। शिव की सामर्थ्य से ही वे विधाता बने।

29

कर्तापन के अभिमान के बारे में गीता क्या सिखाती है?

कर्तापन का अभिमान वर्जित है

· 17:44–18:10 · Also a question

यह कि कर्तापन का अभिमान नहीं होना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता पढ़िए, अपने आराध्य की गीता पढ़िए। हर जगह कहा गया है कि कर्ता होने का अभिमान नहीं होना चाहिए: कि हम घर चला रहे हैं, हम दुनिया चला रहे हैं, हम पूरा अस्पताल चला रहे हैं, हम पूरा ऑफ़िस चला रहे हैं। यह अभिमान नहीं होना चाहिए। हम कर्ता नहीं हैं; कर्ता भगवान हैं।

30

क्या भक्त को अपने जप का अभिमान हो सकता है?

अपने जप, परिक्रमा और यात्रा का अभिमान भी ले लिया जाता है

· 18:11–18:40 · Also a question

हां। भक्त को भी अहंकार हो जाता है कि हमने एक रात में 500 माला जप किया। जैसे ही वह अभिमान आया, भगवान वह अभिमान ले लेंगे। अगर आपको अभिमान हो कि आपने गोवर्धन परिक्रमा की, त्रिकोण यात्रा की, कि यह कर्म करके आपको वह चीज़ मिली, तो जब भी अभिमान आएगा, अपनी भक्ति का, अपने जप का, वह हटा दिया जाएगा।

31

सनातन के अलावा दूसरे पंथ कहते हैं कि अपनी सफलता का आनंद लो, पर सनातन कहता है कि उसे माता-पिता को समर्पित करो।

अपनी सफलता का आनंद लो, बनाम प्राप्त का समर्पण

· 18:41–19:07

वक्ता कहते हैं कि दूसरी जगहों पर, सनातन के अलावा सभी पंथों में, कहा जाता है कि तुमने मेहनत की है, तो अपनी सफलता का आनंद लो। सनातन संस्कृति में बड़ी सफलता पाकर भी कहा जाता है कि इसे माता-पिता को समर्पित करो, भगवान को समर्पित करो। हम समर्पण करते हैं कि जो कुछ मिला है, वह आपकी कृपा से और आपके आशीर्वाद से मिला है। कर्तापन के अभिमान को मना किया गया है।

32

संध्या कैसे प्रकट हुईं?

ब्रह्मा जी के आत्ममुग्ध मन से, प्रातः और सायं संध्या के रूप में

· 19:08–19:42 · Also a question

ब्रह्मा जी आत्ममुग्धता में पूरी तरह मोहित हो गए कि जो वे चाहेंगे, वही होगा। वे खुद को बहुत बड़ा समझने लगे। जब ऐसी आत्ममुग्धता आई और वे खुद को ऐश्वर्य वाला मानने लगे, तब उनके मन से बहुत सुंदर रूप वाली एक उत्तम युवती उत्पन्न हुई। उसका नाम संध्या हुआ: प्रातः संध्या और सायं संध्या, दो रूप।

शास्त्र क्या कहता है

Having created the Prajapatis, Brahma became filled with pride, considering himself most exalted; it was then that the beautiful woman Sandhya arose from his mind, later known in her morning and evening forms.

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17

सृष्ट्वा प्रजापतीन्दक्षप्रमुखान्सुरसत्तमान् । अमन्यं सुप्रसन्नोऽहं निजं सर्वमहोन्नतम् ॥

दक्ष आदि प्रमुख प्रजापतियों की तथा देवश्रेष्ठों की रचना करके मैं बड़ा ही प्रसन्न हुआ तथा अपने को सबसे महान् समझने लगा।

18

मरीचिमत्रिं पुलहं पुलस्त्याङ्गिरसौ क्रतुम् । वसिष्ठं नारदं दक्षं भृगुं चेति महाप्रभून् ॥

मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, अंगिरा, क्रतु, वसिष्ठ, नारद, दक्ष तथा भृगु — इन महान् प्रभुतासम्पन्न मानस पुत्रों —

19

ब्रह्माहं मानसान्पुत्रानसर्जं च यदा मुने । तदा मन्मनसो जाता चारुरूपा वराङ्गना ॥

हे मुने! जिस समय मुझ ब्रह्मा ने इन मानस पुत्रों की सृष्टि की, उसी समय मेरे मन से एक सुन्दर रूपवाली श्रेष्ठ युवती भी उत्पन्न हुई।

20

नाम्ना सन्ध्या दिवाक्षान्ता सायं संध्या जपन्तिका । अतीव सुन्दरी सुभ्रूर्मुनिचेतोविमोहिनी ॥

वह संध्या के नाम से प्रसिद्ध हुई, जो प्रातःसंध्या तथा सायंसंध्या के रूप में क्रमशः दिवाक्षान्ता तथा जपन्तिका कही गयी। वह अत्यन्त सुन्दरी, सुन्दर भौंहोंवाली तथा मुनियों के मनको मोहित करनेवाली थी।

33

शिव महापुराण से संध्या का कौन सा नाम बच्चे को दिया जा सकता है?

दिवक्षान्ता, संध्या का एक नाम, गृहस्थों के बच्चों के लिए

· 19:43–20:00 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि शिव महापुराण में गृहस्थ आश्रम में रहने वालों के लिए, जब आगे उनके बच्चे हों, बहुत अच्छे नाम हैं। वे कहते हैं कि दिवक्षान्ता संध्या का एक नाम है, और यह बहुत सुंदर नाम है।

वक्ता कहते हैं कि यहाँ एक बहुत अच्छा नाम है। आप सब जो गृहस्थ आश्रम में रहते हैं, और आगे जब आपके बच्चे हों, उनके लिए शिव पुराण में कितने अच्छे नाम हैं। दिवक्षान्ता संध्या का एक नाम है। यह बहुत सुंदर नाम है।

शास्त्र क्या कहता है

Divākṣāntā is named in the text as Pratah Sandhya's own name (with Japantikā for evening Sandhya).

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20

नाम्ना सन्ध्या दिवाक्षान्ता सायं संध्या जपन्तिका । अतीव सुन्दरी सुभ्रूर्मुनिचेतोविमोहिनी ॥

वह संध्या के नाम से प्रसिद्ध हुई, जो प्रातःसंध्या तथा सायंसंध्या के रूप में क्रमशः दिवाक्षान्ता तथा जपन्तिका कही गयी। वह अत्यन्त सुन्दरी, सुन्दर भौंहोंवाली तथा मुनियों के मनको मोहित करनेवाली थी।

34

जब स्वामी अभिमान करता है तो सेवक भी करते हैं, और सप्तऋषि भी ब्रह्मा जी के अभिमान में साझी हुए।

स्वामी को अभिमान तो सेवकों को भी, और ब्रह्मचर्य उसे बढ़ाता है

· 20:01–20:31

क्योंकि सात ऋषियों और दूसरों ने ब्रह्मा जी की मदद की थी, और जब स्वामी को अभिमान होता है तो सेवक भी अभिमान करते हैं। सबको अभिमान हो रहा था कि हम सब कुछ करने में समर्थ हैं। कहीं न कहीं अपने ब्रह्मचर्य के कारण, ब्रह्मचारी होने के कारण भी सबको अभिमान हो रहा था। वे यही सोच रहे थे, तभी संध्या प्रकट हुईं।

35

संध्या के प्रकट होने पर ऋषियों के मन में क्या हुआ?

विक्षोभ, शिव की माया, और कामदेव का जन्म

· 20:32–20:59 · Also a question

जब संध्या प्रकट हुईं, तो उन्हें देखकर सबके मन में विक्षोभ पैदा हुआ। वक्ता कहते हैं कि यह महाशिव की माया चल रही है। जैसे ही वह माया प्रकट हुई, शिव ने अपनी लीला शुरू कर दी। उसी क्षण, जब सब एक स्त्री को देखकर उस तरह सोचने लगे, तब कामदेव, जिन्हें ब्रह्मा जी का पहला पुत्र माना जाता है, वहाँ प्रकट हुए।

36

प्रकट होते ही कामदेव ने क्या पूछा?

उनका प्रश्न: मैं कौन हूँ और मेरा काम क्या होगा

· 21:00–21:23 · Also a question

उनका रूप अत्यंत सुंदर था। प्रकट होकर उन्होंने हाथ जोड़कर पूछा कि वे कौन हैं और उनका काम क्या होगा। मुझे मेरे बारे में बताइए, आज्ञा दीजिए कि आगे मुझे क्या करना है, और मुझे कौन सी आज्ञा माननी है।

वक्ता कहते हैं कि कामदेव का रूप अत्यंत सुंदर था, उनका स्वरूप बहुत सुंदर था। जब वे प्रकट हुए, तो प्रकट होकर उन्होंने पूछा: हम कौन हैं, और मेरा काम क्या होगा? उन्होंने पूछा, मुझे मेरे बारे में बताइए, आज्ञा दीजिए कि आगे मुझे क्या करना है। और हाथ जोड़कर पूछा कि मुझे कौन सी आज्ञा माननी है।

37

ब्रह्मचर्य रखने वालों का तेज कैसा होता है?

तपस्वियों के शरीर का तेज, और ब्रह्मा जी के सुंदर मन से जन्मे मन्मथ

· 21:24–21:52 · Also a question

वक्ता कहते हैं, तपस्या करने वालों को देखिए, तपस्वियों को, बहुत जप करने वालों को, पूरे नियम और निष्ठा से ब्रह्मचर्य रखकर रहने वालों को: उनके शरीर का तेज बिल्कुल अलग होता है, चाहे स्त्री हो या पुरुष। उन्हें देखकर लोग विचलित हो जाते हैं, तुरंत लगता है कि यह अलग तरह का तेज है। और ये कामदेव थे, जिन्हें मन्मथ कहते हैं, जो सीधे ब्रह्मा जी के मन के सुंदर विचार से प्रकट हुए।

38

ब्रह्मा जी ने कामदेव को क्या वरदान दिया?

फूलों के पाँच बाण, और यह वरदान कि कोई उनसे बच न सकेगा

· 21:53–22:31 · Also a question

ब्रह्मा जी ने फूलों के पाँच बाण दिए और कहा: सृष्टि की रचना में, सनातन सृष्टि की रचना में सहायता करो। इन पाँच बाणों से त्रिलोकी का कोई देवी-देवता बच नहीं पाएगा, और कोई इनका उल्लंघन नहीं कर सकेगा। साथ ही उन्होंने यह वरदान भी दिया कि हम, वासुदेव और शंकर भी तुम्हारे वश में रहेंगे — दूसरे प्राणियों की तो बात ही क्या।

39

वरदान पाते ही कामदेव का पहला विचार था कि इसे वहीं खड़े ब्रह्मचारियों पर परखा जाए।

भस्मासुर वाली स्थिति — सभा पर वरदान की परीक्षा

· 22:32–23:06

वक्ता कहते हैं कि यहाँ भस्मासुर वाली बात हो गई। जैसे ही ये शब्द कहे गए, कामदेव के मन में पहला विचार आया कि जब यह वरदान मिला है, तो इसे यहीं परखता हूँ — सब ब्रह्मचारी वहीं खड़े थे।

40

ससुर को अपने बच्चे की बहू देखकर केवल खुशी होती है, कभी विकार नहीं; यही बताता है कि जो हुआ, वह नहीं होना चाहिए था।

ससुर बहू को बेटी की तरह देखता है

· 23:07–23:33

वक्ता कहते हैं, एक सरल उदाहरण लीजिए: जब माता-पिता अपने बच्चों का विवाह करते हैं, तो एक सुंदर बहू आती है, जो बेटी की तरह होगी। क्या ऐसा हो सकता है कि अपने बच्चे की बहू को देखकर किसी के मन में विकार आए? यह संभव नहीं है। खुशी होती है कि इतनी सुंदर बेटी घर में आई है।

41

ऊँचा पद पाने के बारे में यह प्रसंग क्या सिखाता है?

ब्रह्मा एक पद है, और किसी भी पद पर अभिमान पतन लाता है

· 23:34–24:16 · Also a question

उन्होंने शिव महापुराण में पहले सुना है कि ब्रह्मा, विष्णु या महेश का पद भी पाया जा सकता है। फिर उन्हें देखिए जो मोक्ष नहीं पा रहे: ब्रह्मा एक पद है। उस पद पर जाकर भी अगर आप अभिमान करेंगे, तो बच नहीं सकते — चाहे आप इंद्र हों, वरुण, यम, कुबेर, दस दिक्पालों में से एक, या स्वयं ब्रह्मा।

42

ब्रह्मा जी की सभा में कामदेव के बाण छोड़ने पर क्या हुआ?

पूरी सभा के मन में विकार पैदा होना

· 24:17–24:35 · Also a question

वहीं कामदेव ने अपने बाण छोड़ दिए, और बाण छूटने के कारण सबके मन में विकार पैदा हो गया।

वक्ता कहते हैं कि वहीं, जो कामदेव वहाँ मौजूद थे, उन्होंने अपने बाण छोड़ दिए। बाण छूटने के कारण सबके मन में विकार पैदा हो गया।

43

संध्या के प्रसंग को कैसे समझना चाहिए?

सांकेतिक, शारीरिक नहीं — संध्या का कोई शरीर नहीं

· 24:36–25:05 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि वेदों के अनुसार इन बातों को समझना साधारण व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। ब्रह्मा, संध्या और सप्तऋषि को पुराणों के माध्यम से सांकेतिक ढंग से समझाया जा रहा है। संध्या शरीरधारी हैं ही नहीं। जैसे पृथ्वी का अपना कोई रूप नहीं है, फिर भी हम पढ़ते हैं कि पृथ्वी माता ने रूप धारण किया और जब महिषासुर ने उन्हें बहुत सताया, तो वे कैलाश भाग गईं।

44

संध्या किसी को मोहित क्यों नहीं कर सकती थीं?

संध्या सदा पवित्र है, और सेवा-पूजा का समय है

· 25:06–25:39 · Also a question

वक्ता पूछते हैं, वे सचमुच स्त्री का रूप कैसे धारण करती हैं? संध्या को हम सुबह की संध्या, शाम की संध्या, उषा और प्रत्युषा के रूप में जानते हैं। वे शरीरधारी कैसे हुईं? और संध्या किसी को भला कैसे मोहित कर सकती हैं? संध्या सदा पवित्र है। उसी समय में हमें सेवा और पूजा करनी होती है।

45

ऋषियों ने कामदेव को क्या नाम दिया?

मन्मथ, और असर केवल क्षणार्ध तक

· 25:40–25:59 · Also a question

क्योंकि कामदेव ने सब पर बाण चलाए थे, ऋषियों ने कहा: तुम ब्रह्मा से जन्मे हो और तुमने सबके मन में विक्षोभ पैदा किया है, इसलिए तुम्हारा नाम मन्मथ होगा। फिर भी असर सबके मन पर केवल क्षणार्ध के लिए पड़ा, क्योंकि ब्रह्मा जी का वरदान था और उसका मान रखना था।

शास्त्र क्या कहता है

The sages (not Brahma) name the newly-appeared being Manmatha, explaining the name as meaning "you have churned (pramathase) our very being."

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4

यस्मात्प्रमथसे तत्त्वं जातोऽस्माकं यथा विधेः । तस्मान्मन्मथनामा त्वं लोके ख्यातो भविष्यसि ॥

"'चूँकि विधि से उत्पन्न होते ही तुमने हमारे तत्त्व को मथ डाला है, इसलिये तुम लोक में मन्मथ नाम से प्रसिद्ध होगे।

46

कामदेव और रति का विवाह कैसे हुआ?

दक्ष प्रजापति के शरीर से रति का प्रकट होना

· 26:00–26:26 · Also a question

फिर प्रजापति दक्ष की पुत्री प्रकट हुईं — उस समय दक्ष प्रजापति के शरीर से, रति नाम से; और कामदेव और रति का विवाह हुआ।

वक्ता कहते हैं, फिर प्रजापति दक्ष की जो पुत्री उस समय दक्ष प्रजापति के शरीर से प्रकट हुईं, उनका नाम रति था। और उनका विवाह हुआ — कामदेव और रति का।

47

उस क्षण शिव का आवाहन किसने किया, और कामदेव को तभी अशरीर क्यों नहीं किया गया?

धर्मराज द्वारा शिव का आवाहन, और ब्रह्मा जी का लीला को रोकना

· 26:27–26:54 · Also a question

जैसे ही विकार आदि पैदा हुए, वहाँ मौजूद धर्मराज ने तुरंत शिव का आवाहन किया। वक्ता कहते हैं कि उसी समय बहुत कुछ हो सकता था, पर ब्रह्मा जी ने वहाँ भी उस लीला को रोक रखा था — कि यह अभी नहीं होना चाहिए। क्या अभी नहीं होना चाहिए? कि कामदेव को अशरीर, यानी बिना शरीर का, कर दिया जाए।

शास्त्र क्या कहता है

It was Dharma who invoked/praised Shiva at that moment, prompting his appearance to rebuke Brahma.

The verse's speaker tag names the deity Dharma (dharma uvāca), not "Dharmaraj" — a title normally denoting Yama. The speaker conflates the two.

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32

देवदेव महादेव धर्मपाल नमोऽस्तु ते । सृष्टिस्थितिविनाशानां कर्ता शंभो त्वमेव हि ॥

"हे देवदेव! हे महादेव! हे धर्मपाल! आपको नमस्कार है। हे शम्भो! सृष्टि, स्थिति और विनाश के कर्ता आप ही हैं।

48

प्रकट होकर शिव ने क्या कहा, और ब्रह्मा जी पर क्या असर हुआ?

शिव ने वरदान को कारण बताया, और ब्रह्मा जी को लज्जा हुई

· 26:55–27:22 · Also a question

जब शिव प्रकट हुए, तो उन्होंने सबसे कहा कि ब्रह्मनिष्ठ होकर भी वे कामदेव से इस तरह विचलित हुए, क्योंकि ब्रह्मा जी पहले ही ऐसा वरदान दे चुके थे — जब ऐसा वरदान दिया जाता है, तो ठीक यही होता है। शिव की बात सुनकर ब्रह्मा जी को वह वरदान देने पर कुछ लज्जा हुई।

वक्ता कहते हैं, जब शिव प्रकट हुए, तो शिव ने सबसे कहा कि ब्रह्मनिष्ठ होकर भी वे कामदेव के द्वारा इस तरह विचलित हुए, क्योंकि ब्रह्मा जी पहले ही इस तरह का वरदान दे चुके थे। जब ऐसा वरदान दिया जाता है, तो यही होता है। फिर शिव की बात सुनकर ब्रह्मा जी को थोड़ी लज्जा हुई — कि हमने ऐसा वरदान दे दिया।

49

ब्रह्मा जी से पितृगण कैसे उत्पन्न हुए?

ब्रह्मा जी के पसीने से जन्मे अग्निस्वात और ब्रह्मसद पितर

· 27:23–28:00 · Also a question

उनके शरीर से पसीना निकला — जैसे आदमी लज्जा या डर से पसीने में आ जाता है। शिव से डरकर और लज्जित होकर ब्रह्मा जी के शरीर से पसीना निकला, और उस पसीने से पितृगण उत्पन्न हुए। पितृगण कई तरह के माने गए हैं। ब्रह्मा जी के शरीर से जो उत्पन्न हुए, वे अग्निस्वात और ब्रह्मसद नाम से प्रसिद्ध हुए, जो सदा संसार से विमुख रहते हैं: 64,000 अग्निस्वात पितर और 86,000 ब्रह्मसद पितर माने गए हैं।

शास्त्र क्या कहता है

लोकप्रचलित — ग्रंथ में ऐसा नहीं कहा गया श्रीशिवमहापुराण · रुद्रसंहिता — सतीखण्ड 3.48–50

Pitrs arose from the sweat of Brahma's shame/fear, numbering 64,000 of one class and 86,000 of a second class.

The counts match exactly, but the text names the second class Barhiṣad, not "Brahmasad" as the speaker says — a near-homophone slip, not what the verse says.

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48

मच्छरीरात्तु घर्माभो यत्पपात द्विजोत्तम । अग्निष्वात्ताः पितृगणा जाताः पितृगणास्ततः ॥

हे द्विजोत्तम! मेरे शरीर से जो पसीना गिरा, उससे अग्निष्वात्त तथा अन्य पितृगणों की उत्पत्ति हुई।

49

भिन्नाञ्जननिभाः सर्वे फुल्लराजीवलोचनाः । नितान्तयतयः पुण्याः संसारविमुखाः परे ॥

वे सभी अंजन के समान श्याम वर्णवाले, खिले हुए कमल के समान नेत्रोंवाले, अत्यन्त संयमी, पुण्यशाली तथा संसार से विमुख थे।

50

सहस्राणां चतुःषष्टिरग्निष्वात्ताः प्रकीर्तिताः । षडशीतिसहस्राणि तथा बर्हिषदो मुने ॥

चौंसठ हजार अग्निष्वात्त पितर, तथा हे मुने, छियासी हजार बर्हिषद् पितर कहे गये हैं।

50

उस समय और कौन से पितृ वर्ग उत्पन्न हुए?

चार ऋषियों से सोमपा, आज्यपा, सुकालीन और हविष्मान

· 28:01–28:49 · Also a question

दक्ष के शरीर से भी पितर उत्पन्न हुए। और वहाँ जो छह ऋषि थे, उनमें क्रतु, वशिष्ठ, पुलस्त्य और अंगिरा — इन चार ऋषियों को छोड़कर बाकी का इंद्रिय निग्रह था, यानी उनमें विकार नहीं आया। पर इन चार ऋषियों के मन में विकार आया, और उससे चार और तरह के पितर हुए: सोमपा, आज्यपा, सुकालीन और हविष्मान। ये सब पितर रूप में उत्पन्न हुए और कव्य ग्रहण करने वाले बने।

शास्त्र क्या कहता है

Four further pitr classes — Somapa, Ajyapa, Sukalin and Havishman — arose from the rishis Kratu, Vasistha, Pulastya and Angira respectively.

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56

सोमपा आज्यपा नाम्ना तथैवान्ये सुकालिनः । हविष्मन्तः सुताः सर्वे कव्यवाहाः प्रकीर्तिताः ॥

सोमपा, आज्यपा नामक, तथा इसी प्रकार अन्य सुकालिन् तथा हविष्मान् — ये सभी पुत्र कव्यवाह कहे गये हैं।

57

क्रतोस्तु सोमपाः पुत्रा वसिष्ठात्कालिनस्तथा । आज्यपाख्याः पुलस्त्यस्य हविष्मन्तोऽङ्गिरः सुताः ॥

क्रतु के सोमपा पुत्र, वसिष्ठ के कालिन्, पुलस्त्य के आज्यपा नामक, तथा अंगिरा के हविष्मान् पुत्र हुए।

58

जातेषु तेषु विप्रेन्द्र अग्निष्वात्तादिकेष्वथ । लोकानां पितृवर्गेषु कव्यवाट् स समन्ततः ॥

हे विप्रेन्द्र! इस प्रकार अग्निष्वात्त आदि पितरों के उत्पन्न हो जाने पर, लोकों के पितृवर्गों में वह सर्वत्र कव्यवाट् हुआ।

51

पितरों में अर्यमा का क्या स्थान है?

अर्यमा, जिनकी उत्पत्ति यहाँ नहीं बताई गई, नारायण के स्वरूप

· 28:50–29:08 · Also a question

वक्ता कहते हैं, हम जानते हैं कि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने स्वयं कहा है कि पितरों में मैं अर्यमा नाम का पितर हूँ। इस प्रसंग में अर्यमा की उत्पत्ति नहीं बताई गई है। वे कहते हैं कि अर्यमा पितर साक्षात भगवान नारायण का स्वरूप हैं।

वक्ता कहते हैं, अब हम जानते हैं कि श्रीमद् श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने स्वयं कहा है कि पितरों में मैं अर्यमा नाम का पितर हूँ। यहाँ अर्यमा की उत्पत्ति नहीं बताई गई है। वे कहते हैं कि अर्यमा पितर साक्षात भगवान नारायण का स्वरूप हैं।

52

ब्रह्मा जी ने कामदेव को क्या श्राप दिया?

शिव की नेत्राग्नि से भस्म होना

· 29:09–29:43 · Also a question

इस सबके बाद ब्रह्मा जी को बहुत क्रोध आया, और क्रोध के कारण उन्होंने उसी क्षण श्राप दे दिया: तुमने जो दुष्ट काम किया है, उसके लिए मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम शिव की नेत्राग्नि से भस्म हो जाओगे। उन्होंने उसी समय श्राप दे दिया।

53

जो अयोग्य लोग न खान-पान में संयम रखते हैं न रहन-सहन में, वे दिव्य शक्ति मिलते ही उसका दुरुपयोग करते हैं।

बिना मेहनत दिव्य शक्ति पाने वाले अयोग्य लोग उसका दुरुपयोग करते हैं

· 29:44–30:24

वक्ता कहते हैं, इसी तरह आज के वे अयोग्य लोग जो खुद को संयम में नहीं रखते, जो न खान-पान में संयम रखते हैं न रहन-सहन में — अगर किसी भी तरह किसी व्यक्ति से, किसी साधक से, किसी गुरु से उन्हें कोई दिव्यता, कोई दिव्य शक्ति मिल जाए, जिससे वे बातें जानने-समझने लगें, तो वे उसका केवल दुरुपयोग ही करेंगे।

54

श्राप मिलने पर कामदेव ने क्या किया?

उनकी दलील कि उन्होंने आज्ञा नहीं तोड़ी, और फटकार

· 30:25–31:07 · Also a question

कामदेव डरकर तुरंत उनके सामने आए और हाथ जोड़ने लगे कि मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया — पर आपने ही कहा था, और मैंने आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया। तब उन्हें फटकारा गया: आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया, यह अलग बात है, पर तुम्हें इस तरह, सबके सामने, ऐसा नहीं करना चाहिए था। इसके लिए उन्हें उसी समय श्राप मिला।

55

यह शरीर किससे जन्मा है?

शरीर काम से जन्मा है; इससे भागना नहीं, इसे जीतना है

· 31:08–31:40 · Also a question

वक्ता सार बताते हैं कि ये दो बातें थीं: पितर कैसे उत्पन्न हुए, और कामदेव को उसी समय श्राप मिल चुका था, पूरी लीला का आरंभ तभी हो गया था। आगे कामदेव का विवाह आता है, शरीर रूप में। वे कहते हैं, जान लीजिए कि आपका और मेरा शरीर काम से ही जन्मा है। इससे भागना नहीं है, इस पर विजय पानी है। विजय पाना बिल्कुल अलग विषय है।

56

साधक का मन बार-बार क्यों भटकता है?

भोग के बाद निवृत्ति — भोजन का उदाहरण

· 31:41–32:11 · Also a question

साधक कहते हैं कि साधना करने की इच्छा नहीं होती, मन बहुत भटकता है और बेचैनी खत्म नहीं होती। वक्ता पूछते हैं, खत्म कैसे होगी? जब आप भोग भोग लेते हैं, तब उनसे निवृत्ति होती है। जब आप मन का भोजन — पूरी कचौरी, रसमलाई, राजभोग — खाकर पूरी तरह तृप्त हो जाते हैं, तब और खाने को दिया जाए तो आप नहीं खाएँगे, या उल्टी कर देंगे।

57

गृहस्थों के लिए कौन सा आचरण बताया गया है?

गृहस्थों के लिए पूरा विधि विधान, केवल संतान उत्पत्ति के लिए

· 32:12–32:38 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जो गृहस्थ अवस्था में चले गए हैं, उनके लिए आचरण तय किया गया है — आचरण कैसे करना है। केवल संतान उत्पत्ति के लिए आपके पास पूरा विधि विधान है। पर इसका इतना मज़ाक बनाया गया है कि आज कोई इस विषय को आगे नहीं बढ़ाता; यह पूरी तरह हँसी-मज़ाक की बात बन गई है।

वक्ता कहते हैं, इसलिए जो गृहस्थ अवस्था में चले गए हैं, उन गृहस्थों के लिए आचरण तय किया गया है कि आचरण किस तरह करना है। केवल संतान उत्पत्ति के लिए, आपके पास इसका पूरा विधि विधान है। पर इसका इतना मज़ाक बनाया गया है कि आजकल कोई उस विषय को आगे नहीं बढ़ाता। अब यह पूरी तरह मज़ाक का विषय बन गया है।

58

छिन्नमस्तिका के रूप में काम और रति पर विजय कैसे दिखाई गई है?

सहस्रदल कमल पर कामदेव और रति के ऊपर खड़ी भगवती

· 32:39–33:25 · Also a question

भगवती का एक रूप है, दस महाविद्याओं में से एक, माँ छिन्नमस्तिका। उनका रूप देखिए: नीचे एक कमल है, हज़ार पंखुड़ियों वाला कमल, और उस पर कामदेव और रति विपरीत मुद्रा में लेटे दिखते हैं। माँ उनके ऊपर खड़ी हैं। वक्ता कहते हैं, यानी अगर आप जगदंबा की शरणागति स्वीकार करें और उनके शरणागत हो जाएँ, तो भगवती इन दोनों के ऊपर खड़ी होती हैं।

59

सांसारिक प्रयोजन पूरा होने के बाद क्या होता है?

लक्ष्य पूरा होने के बाद वहाँ कोई काम नहीं बचता

· 33:26–33:54 · Also a question

जब आपने यह केवल अपने सांसारिक काम के लिए किया और वह पूरा हो गया — प्रयोजन संतान उत्पन्न करना था और संतान आ गई — उसके बाद वहाँ आपका कोई काम नहीं है। आपने जगदंबा की शरणागति ली है, और जगदंबा फिर आपको समर्थ बनाएँगी, सामर्थ्य देंगी। पर वक्ता जोड़ते हैं, शरणागति वैसी होनी चाहिए जैसी शरणागति होनी चाहिए, केवल ऊपर-ऊपर से कही हुई नहीं।

60

सप्तशती के उत्कीलन के बारे में कीलक स्तोत्र क्या कहता है?

कृष्ण पक्ष चतुर्दशी की रात सब कुछ समर्पित करना और प्रसाद रूप में वापस लेना

· 33:55–34:28 · Also a question

वक्ता कहते हैं, जब हम दुर्गा सप्तशती में कीलक स्तोत्र का पाठ करते हैं, तो वहाँ लिखा है कि सप्तशती का उत्कीलन कैसे होगा। एक माना हुआ उत्कीलन यह है: कृष्ण पक्ष चतुर्दशी की रात को — जो पिछली शाम से उस दिन तक रही हो — अपना सब कुछ समर्पित कर दिया जाए, और फिर उसे प्रसाद रूप में दोबारा भोगा जाए; तब सप्तशती का उत्कीलन होता है।

61

समर्पण के बाद सबसे आम गलती क्या है?

समर्पण करके फिर मालिक बनकर भोगना

· 34:29–35:08 · Also a question

आपने वहाँ उत्कीलन के लिए समर्पण किया, पर बाद में आप मालिक बनकर भोगते रहते हैं। वक्ता कहते हैं कि तब फल भी वैसा ही होगा। मन उसी भटकन में रहेगा। माया से मोहित होकर आप बार-बार गिरते रहेंगे। आप 41 दिन की साधना करें, नाम जप करें, किसी मंत्र के इतने पुरश्चरण करें, हवन करें — बाद में हालत ठीक वैसी ही हो जाएगी।

62

समर्पण के बाद कितना पाने की उम्मीद रखनी चाहिए?

जितना पुजारी दे — प्रसाद उसकी इच्छा पर है

· 35:09–35:43 · Also a question

ऐसे जिएँ जैसे आप प्रसाद रूप में भोगकर केवल जीवन चला रहे हैं। फिर वे जितना दें, उतना प्रसाद। प्रसाद तो पुजारी की इच्छा पर है न। किसी को चार दाने ज़्यादा देता है, किसी को दो दाने कम। जितना वे प्रसाद रूप में दे रही हैं, उतना लेकर स्वीकार कर लें तो काम बनेगा। पर ऐसा होता नहीं।

63

निष्काम विधान को सकाम भाव से करने पर क्या गड़बड़ होती है?

विधान निष्काम और करने वाला सकाम हो तो बनती खिचड़ी

· 35:44–36:20 · Also a question

हम यह समर्पण इसलिए करते हैं कि सप्तशती उत्कीलित हो जाए, पर भीतर कहीं स्वार्थ रहता है — कि इन मंत्रों का ऐसा उपयोग हो कि पहले हम धन से भर जाएँ। यही गलती है। विधान तो निष्काम है, पर आप उसे सकाम करते हैं। इसलिए फल भी खिचड़ी बनकर निकलता है। आप सोचते हैं कि आप चतुराई कर रहे हैं, और जगदम्बा महामाया हैं — वे आपके साथ पूरा खेल खेलती हैं।

64

काम और रति पर अधिकार पाना सबसे कठिन किसके लिए है?

खास तौर पर युवाओं के लिए, और स्त्रियों को आने वाला आख्यान क्यों समझाना चाहिए

· 36:21–37:14 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जब तक आप ठीक तरह से भगवती के प्रति समर्पित नहीं होते, तब तक इन दोनों पर प्रभाव जमाना, इनसे छूटना, इन पर अधिकार पाना बहुत कठिन है। खास तौर पर युवाओं के लिए। आज के समय में बचना बहुत कठिन हो जाता है। कामदेव और रति के विवाह का पूरा वर्णन बहुत विस्तृत है। वक्ता उसे आगे के लिए छोड़ते हैं और बताते हैं कि अगले दिन संध्या-अरुंधति का आख्यान शुरू होगा।

65

बुनियादी कर्मकांड कहाँ सीखें, और क्या दत्तात्रेय जाप से पितृ दोष दूर होता है?

तीर्थ क्षेत्रों के आश्रम, और पितृ दोष के लिए दत्तात्रेय मंत्र

· 37:15–37:44 · Also a question

पूछा गया कि क्या कोई आश्रम या गुरुकुल है जहाँ बुनियादी कर्मकांड और पूजा विधि सीखी जा सके। वक्ता कहते हैं कि हाँ, खोजेंगे तो मिल जाएगा। हर तीर्थ क्षेत्र में होता है। पूछा गया कि क्या भगवान दत्तात्रेय के मंत्र जाप से पितृ दोष से छुटकारा मिलता है। वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल मिलता है।

66

क्या कोई आत्मा बिना कारण किसी व्यक्ति से जुड़ सकती है?

आत्माएँ और प्रेत-पिशाच किसी शरीर से क्यों जुड़ते हैं

· 37:45–38:35 · Also a question

एक व्यक्ति, जो अकेले चौकीदारी का काम करता है, पूछता है कि क्या दुर्घटना में मरे लोगों की आत्माएँ बिना कारण हमसे जुड़ सकती हैं। वक्ता कहते हैं कि अच्छी आत्मा खास तौर पर अपनी गति के लिए जुड़ती है। आम तौर पर वह किसी शरीर से इसलिए जुड़ती है कि उसे वहाँ कोई आशा होती है। भूत, प्रेत और पिशाच दो कारणों से जुड़ते हैं। या तो वे मंत्र बल से विवश किए जाते हैं — कोई तांत्रिक चार क्रियाओं से उन्हें चलाता है और वे वाणी आदि से हानि करते हैं। या फिर उन्हें कोई लालच दिया गया होता है।

67

जिसके पास लंबी पूजा का समय नहीं, उसके लिए वक्ता क्या बताते हैं?

जयंती मंगला मंत्र और अपने इष्ट के बारह नाम

· 38:36–39:10 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जिसके पास ज़्यादा पूजा-पाठ का समय नहीं, उसके लिए आज नाम जप सबसे ज़रूरी है। जिनकी श्रद्धा भगवती में है और जिन्होंने उनकी शरणागति ली है, उनसे वे वही कहते हैं जो कई बार कह चुके हैं: और कुछ न कर सकें, तो जयंती मंगला मंत्र — अर्गला का पहला मंत्र — जीवन में उतार लीजिए। और जिनमें आपकी श्रद्धा है, उनके बारह नाम याद कर लीजिए। उनका पाठ तब तक कीजिए जब तक वे मन में अपने-आप न चलने लगें।

68

अजपा जप क्या है और यह कैसे काम करता है?

श्वास के साथ चलता सोहम हंस, परमहंस मंत्र के रूप में

· 39:11–39:54 · Also a question

नाम जप छोड़ना नहीं चाहिए। नाम जप करते रहेंगे तो अजपा जप होता रहेगा, और अजपा जप की एक विधि है। जब कर्मकांड का विषय सीखा जाता है, तब सीखते हैं कि भीतर-बाहर चलती श्वास को सोहम और हंस कैसे ले जाते हैं, क्योंकि वह स्वाभाविक रूप से उसी तरह चलती है। इसे परमहंस मंत्र माना गया है। पर यह संकल्प लेकर फलित होता है। और संकल्प वही लेगा जिसका मन विकार से मुक्त रहे।

69

क्या गुरु के मुख से न मिला मंत्र काम करता है?

यह दावा गलत कि गुरु के बिना नाम का असर नहीं

· 39:55–40:42 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि शुरुआत करने वाले के लिए ज़रूरी है कि हम मंत्र जप करें। चाहें तो माला से करें। यह प्रश्न कि जब तक किसी गुरु के मुख से भगवान का नाम न लें, मंत्र का असर नहीं होगा — वक्ता कहते हैं कि यह गलत बात है। ऐसा नहीं है। यह बात मन से निकाल दीजिए। जप करते रहेंगे, तो कोई आत्मा आपके आभामंडल में या शरीर में आपके साथ खड़ी भी होना चाहे, तो आपका कुछ नहीं बिगड़ेगा, क्योंकि आभामंडल मज़बूत रहेगा।

70

सूर्य स्तोत्र और शतनामावली का पाठ क्यों और कैसे किया जाता है?

सूर्य की प्रसन्नता और ग्रह से उपजी बाधा के लिए, उगते सूर्य के सामने

· 40:43–41:01 · Also a question

पूछा गया कि सूर्यदेव के स्तोत्र और शतनामावली का पाठ क्यों किया जाता है और उसकी विधि क्या है। वक्ता कहते हैं कि यह सूर्यदेव की प्रसन्नता के लिए किया जाता है, और उस ग्रह से कोई बाधा हो तो उसे दूर करने के लिए। विधि यह है कि पाठ खास तौर पर उगते सूर्य के समय सूर्यनारायण के सामने बैठकर किया जाता है।

71

क्या किसी मंत्र को तारण मंत्र में बदला जा सकता है?

ऐसी कोई सामर्थ्य नहीं; तारण मंत्र वही नाम है जिस पर भरोसा हो

· 41:02–41:55 · Also a question

पूछा गया कि भगवान के किसी मंत्र को तारण मंत्र में कैसे बदला जाता है। वक्ता उलटा पूछते हैं कि उसे बदलना ही क्यों है, और क्या पूछने वाले में किसी मंत्र का मूल स्वभाव बदलने की सामर्थ्य है। वक्ता कहते हैं कि न आपमें, न मुझमें यह सामर्थ्य है कि मंत्र का मूल तत्त्व बदलकर उसे तारण मंत्र बना दें। आपके लिए तारण मंत्र वही नाम बनता है जिस पर आप निर्भर हैं और जिसमें आप श्रद्धा रखते हैं।

72

क्या घर के पारद शिवलिंग का रोज़ जलाभिषेक न करना दोष है?

शिवलिंग और शालिग्राम का रोज़ अभिषेक अनिवार्य

· 41:56–42:37 · Also a question

वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल दोष है। वे बार-बार कहते हैं कि घर में शिव का कोई भी रूप रखना हो, और खास तौर पर शिवलिंग रखें, तो शिवलिंग का अभिषेक सबसे ज़रूरी है। शिवलिंग और शालिग्राम शिला, दोनों का अभिषेक रोज़ होना चाहिए। यह पाँच मिनट का भी काम नहीं है। एक लोटा जल लें, साधारण नाम जप करते हुए स्नान कराएँ, तिलक लगाएँ, ऊपर अक्षत रखें, मुकुट पहनाएँ, और हो गया।

73

जो चौबीस घंटों में से पाँच मिनट अपने इष्ट को नहीं दे सकता, वह ख़ुद को सनातनी कहना बंद करे।

पारद शिवलिंग स्वयं शिव है और उसके लिए कड़ी विधि चाहिए

· 42:38–43:00

वक्ता कहते हैं कि 24 घंटों में से आप अपने इष्ट आराध्य को पाँच मिनट भी नहीं दे सकते, तो ख़ुद को सनातनी कहना बंद कर दीजिए। 24 घंटे के लिए मिले मनुष्य शरीर का क्या लाभ, अगर आदमी पाँच मिनट भी नहीं दे सकता? वक्ता कहते हैं कि पारद शिवलिंग को स्वयं शिवलिंग, शिव का रूप माना गया है। उसके लिए बहुत विधि और नियम होने चाहिए, और आप उसे स्नान तक नहीं करा रहे। यह गलत है।

74

क्या कुशा की पवित्री पहनकर हर मंत्र में प्रणव लगाया जा सकता है?

नहीं — गायत्री और महामृत्युंजय में भी नहीं

· 43:01–43:45 · Also a question

पूछा गया कि कुशा की पवित्री पहनकर क्या सभी मंत्रों में प्रणव लगा सकते हैं, और अगर हाँ, तो क्या गायत्री और महामृत्युंजय में भी। वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं। अगर ऐसा कोई विषय व्यक्तिगत रूप से बताया गया है, तो वह अलग बात है और उसका कारण अलग है, या किसी खास जगह किसी खास कारण से बताया गया है। इस तरह नहीं किया जा सकता। यह पवित्री आदि के बाद ही करना चाहिए।

75

चार प्रहर की पूजा को हर साल का नियम बनाना चाहिए, क्योंकि शरीर नित्य नहीं और यही एक रात की पूजा काम आएगी।

इसे हर साल का नियम बनाइए; शरीर नित्य नहीं

· 43:46–43:57

वक्ता कहते हैं कि अब हर साल इसे नियमित करना है। शरीर नित्य नहीं है। यह पूजा जो आप कर रहे हैं, यह एक रात की पूजा — भैया, यही काम आएगी।

वक्ता कहते हैं कि अब हर साल इसे नियम से करना है। शरीर नित्य नहीं है। यह पूजा जो आप कर रहे हैं, एक रात की पूजा — यही आपके काम आएगी।

76

साधारण व्यक्ति महाशिवरात्रि कैसे मनाए?

एकांत में अभिषेक और सहस्रनाम, कॉन्सर्ट और रात भर नाच नहीं

· 43:58–44:47 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि साधारण आदमी महाशिवरात्रि शुरुआत करने वाले की तरह मनाए। इस विचार में मत पड़िए कि महाशिवरात्रि का बड़ा वैज्ञानिक महत्त्व है, कि उस रात वीणा बजाते, नाचते हुए जागना चाहिए, फाउंडेशन वाले लोगों जैसा बड़ा डिस्को डांस करना चाहिए। वे लोग जीवनमुक्त हो गए हैं और उनके पास बहुत पैसा आ गया है। आप चारों प्रहर शिव का अभिषेक कीजिए और एकांत में उनके पास बैठकर सहस्रनाम का पाठ कीजिए।

77

घर में नर्मदेश्वर हों, तो क्या दीपदान के लिए शिव मंदिर जाना चाहिए?

क्या घर का शिवलिंग मंदिर के शिवलिंग जितना फल देता है

· 44:48–45:09 · Also a question

वक्ता से पूछा गया कि घर में नर्मदेश्वर जी हों, तो क्या दीपदान के लिए शिव मंदिर जाना चाहिए, और क्या घर के शिवलिंग से वही फल मिलता है जो मंदिर के शिवलिंग से मिलता है। वक्ता पहले कहते हैं कि घर में नर्मदेश्वर शिवलिंग और शालिग्राम शिला होना अच्छी बात है, और सबके घर में ये होने चाहिए।

78

फिर भी मंदिर क्यों जाना चाहिए?

मंदिर खास वास्तुकला से बनता है और उसकी ऊर्जा आभामंडल को शुद्ध करती है

· 45:10–45:49 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि मंदिर अपने-आप में एक खास वास्तुकला से बना होता है। जब हम वहाँ जाते हैं, तो वहाँ की ऊर्जा हमारे शरीर के आभामंडल को अलग तरह से शुद्ध करती है। इसलिए मंदिर ज़रूर जाना चाहिए, खास तौर पर पर्व काल में — कम से कम परिवार का कोई सदस्य जाए। अगर घर में रखे नर्मदेश्वर में, अपने इष्ट आराध्य में आपकी निष्ठा और श्रद्धा बहुत बड़ी है, तो वही आपके लिए मंदिर है। पर शरीर सक्षम हो और जा सकें, तो ज़रूर जाइए।

79

क्या केवल नाम लेने से फल कम मिलता है?

कचरे में पड़ा सोना — उसका मूल्य कभी कम नहीं होता

· 45:50–46:15 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि केवल नाम लेने से भी फल मिलेगा। उसमें कोई कमी नहीं है। सोना कचरे में पड़ा हो, कहीं भी पड़ा हो — वह वही फल देता है। उसका मूल्य कभी कम नहीं हो सकता। यह अलग बात है कि आप उसे कचरे से निकालकर साफ़ करके ले जाएँ, या जैसा है वैसा उठाकर रख दें।

वक्ता कहते हैं कि केवल नाम लेने से भी फल मिलेगा। उसमें कोई कमी नहीं है। सोना कचरे में पड़ा हो, कहीं भी पड़ा हो, वह वही फल देता है। उसका मूल्य कभी कम नहीं हो सकता। हाँ, यह अलग बात है कि आप उसे कचरे से निकालकर, साफ़ करके ले जाएँ, या जैसा है वैसा उठाकर ले जाकर रख दें। वक्ता कहते हैं, बात को समझिए।

80

क्या पितरों को सिर पर बुलाना चाहिए?

कभी नहीं — शरीर पर बुलाने से वे बंधन में पड़ते हैं

· 46:16–46:55 · Also a question

पूछा गया कि क्या पितर को सिर पर बुलाना चाहिए; श्रोता ने बताया कि देव पुत्र और देवी पुत्री परिवार से नाराज़ हैं। वक्ता कहते हैं: यह गलती कभी मत कीजिए। उन्हें शरीर पर बुलाने से वे बंधन में पड़ जाएँगे। आगे उनकी गति कभी नहीं होगी। वक्ता कहते हैं कि आम तौर पर माना गया है कि तीन पीढ़ियों के बाद — अगर उस समय उनकी गति हो जाए — तो सबसे अच्छा है। लोग त्रंबकेश्वर और बद्रीनाथ में नागबली आदि करवाते हैं। इतनी सामर्थ्य हो, तो उनकी गति हो जाती है और उनका दूसरा जन्म होता है।

81

सद्गति न होने पर पितर कितने समय तक रहते हैं?

कम से कम तीन पीढ़ी, पितरों के लिए सात, और महाकाली विधान

· 46:56–47:43 · Also a question

अगर सामर्थ्य न हो, या अभिचार दोष जैसे किसी और कारण से उनकी सद्गति न हो रही हो, तो ऐसी हालत में उन्हें कम से कम तीन पीढ़ी रहना पड़ता है। उनके जन्म और मृत्यु से तीन पीढ़ी गिनिए। तब तक उनकी उपस्थिति रहेगी, उसके बाद सद्गति होती है — अगर तीसरी पीढ़ी में नारायण नागबली करवाया जाए। पितरों के लिए सात पीढ़ी मानी गई है। वक्ता जोड़ते हैं कि पूजा करना अलग बात है: उन्होंने जो महाकाली विधान बताया है, जहाँ पीपल का पेड़ हो ऐसे काली मंदिर में किया जाता है, वह बाहर किया जाता है और भगवती के द्वारा परोक्ष रूप से काम करता है।

82

पितरों को सिर पर बुलाना शुरू करने से क्या होता है?

उनकी गति रुक जाती है और वे घर के देवता बन जाते हैं

· 47:44–48:15 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर आपने उन्हें सिर पर बुलाना शुरू कर दिया, तो उनकी गति कभी नहीं होगी। फिर वे सिर पर आने लगेंगे, और तीन नहीं, तीस पीढ़ियाँ बीत जाएँगी और आप तब भी पूजते रहेंगे। फिर वे घर के देवता बन जाएँगे। उनके अनुसार यह ठीक नहीं है; उनकी गति रुक जाएगी। इसकी जगह नाराज़ को मनाने की एक प्रक्रिया है: विधि विधान से, अपने इष्ट या कुल देवी-देवता के द्वारा, शिव के द्वारा आप उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं और उनकी गति का प्रयास कर सकते हैं।

83

स्त्रियों के गर्भ पर मसान की क्रिया — उसके कारण, लक्षण और उपाय — अलग सत्र के लिए रखी गई है।

गर्भ पर मसान क्रिया — अलग सत्र के लिए रखी गई

· 48:16–48:28

एक श्रोता स्त्रियों के गर्भ पर मसान की क्रिया — उसके कारण, लक्षण और उपाय — के बारे में जानकारी माँगते हैं। वे कहते हैं कि असम की स्त्रियों को यह परेशानी है और उन्हें लाभ होगा। वक्ता कहते हैं: ठीक है, वह हम अलग से बताएँगे।

एक श्रोता स्त्रियों के गर्भ पर मसान की क्रिया के बारे में जानकारी माँगते हैं: उसका कारण, उसके लक्षण और उसका उपाय। पूछने वाले कहते हैं कि असम की स्त्रियों को यह परेशानी है, और उन्हें इससे लाभ होगा। वक्ता उत्तर देते हैं: ठीक है, तो वह हम अलग से बताएँगे।

84

दीपदान के दीये के लिए कैसा कटोरा और कैसी बत्ती लें?

प्लास्टिक का कटोरा चलेगा, सिर से कोई दूसरा उतारे, और बत्ती मोटी हो

· 48:29–48:52 · Also a question

पूछा गया कि मिट्टी का कटोरा न मिले तो क्या प्लास्टिक का चलेगा। वक्ता कहते हैं, हाँ, चलेगा। पूछा गया कि दीया छोटा हो तो क्या फ़र्क पड़ता है, और क्या कोई दूसरा उसे सिर से उतार सकता है। वक्ता कहते हैं, हाँ — सिर से कोई दूसरा व्यक्ति ही उतारे; और दीया छोटा होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वक्ता कहते हैं कि दीये की बत्ती मोटी रखिए, ताकि उसका तेल जल्दी ख़त्म हो और दीया जल्दी पूरा हो।

85

नज़र के कारण गाय बछड़े को दूध न पिलाए, तो क्या करें?

हनुमान चालीसा के साथ तीन मूंज, आगे से पीछे की ओर उतारना

· 48:53–49:37 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इसके लिए मूंज लीजिए — वह धारदार पत्ता जिसे मूंज कहते हैं, जो हनुमान चालीसा की पंक्ति "काँधे मूँज जनेऊ साजै" में है। तीन मूंज लेकर, हनुमान चालीसा पढ़ते हुए, उन्हें गाय के शरीर पर ऊपर से नीचे, यानी आगे से पीछे की ओर फेरिए। उसके शरीर पर लगी नज़र उतर जाएगी। इसी तरह हनुमान चालीसा पढ़ते हुए लाल मिर्च, सरसों आदि उसके शरीर से उतार सकते हैं। पशुपतिनाथ महादेव के नाम से उसके सिर से उतारकर दूध चढ़ाने से भी उसे जल्दी लाभ होता है।

86

क्या चक्रों के अनुभव YouTube पर सुलझ सकते हैं?

चक्रों के अनुभव YouTube पर नहीं सुलझ सकते

· 49:38–50:01 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि उनके सारे चक्र गोल-गोल घूमते हैं, माथे पर भी और सिर पर भी। वक्ता उत्तर देते हैं कि ये सब बातें YouTube से पूरी तरह समझी या समझाई नहीं जा सकतीं। किसी सच्चे व्यक्ति के सामने जाकर बैठिए और सलाह लीजिए। जिसे इन सब बातों का ज्ञान हो, वही आपको सही मार्गदर्शन दे पाएगा, अगर सचमुच आपके चक्र जागृत हुए हैं।

87

गुरुदत्त की पूजा कितनी बार करनी चाहिए?

सामर्थ्य के अनुसार वही पूजा रोज़

· 50:02–50:20 · Also a question

वक्ता एक श्रोता से कहते हैं कि गुरुदत्त का विधान यह है कि जितनी सामर्थ्य हो, उतनी वही पूजा रोज़ करें।

एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि जहाँ तक सामर्थ्य हो, गुरुदत्त का विधान यही है कि वही पूजा रोज़ की जाए।

88

सोमवती अमावस्या पर 84 खंभा में क्या करना चाहिए?

84 खंभा में दीपदान, और कृष्ण के लिए मक्खन ले जाना

· 56:32–56:50 · Also a question

एक श्रोता कहती हैं कि उन्हें सोमवती अमावस्या पर 84 खंभा जाकर दीपदान करना है, और पिछली बार जब गई थीं तो लौटने के बाद उनकी तबीयत बहुत ख़राब हो गई थी। वक्ता पूछते हैं कि 84 खंभा जाने के बाद तबीयत क्यों ख़राब होनी चाहिए। वे कहते हैं कि इस बार साथ में मक्खन ले जाइए और वहाँ भगवान कृष्ण को मक्खन का भोग लगवाइए।

89

वृंदावन जैसे धाम में निवास बड़े पुण्य से मिलता है, इसलिए वहाँ की प्रार्थना अपने दुख से आगे जानी चाहिए।

धाम में निवास बड़े पुण्य से मिलता है, इसलिए अपने दुख से आगे प्रार्थना कीजिए

· 56:51–57:17

वक्ता उनसे कहते हैं कि वृंदावन में रहकर केवल इन सब बातों को सोचने से काम नहीं चलेगा। धाम में निवास बड़े पुण्य से मिलता है। किसी दुख के कारण भी अगर आदमी धाम में, और वृंदावन जैसे धाम में रहने लगे, तो सोचने को क्या बचा। 84 खंभा जाइए, वहाँ दीपदान कीजिए, और भगवान से प्रार्थना कीजिए — केवल अपने दुख के लिए नहीं। उनकी कृपा दृष्टि पड़ जाए, तो दुख तुरंत मिट जाता है।

90

जो ज़्यादा पूजा करता है, उसकी परेशानियाँ क्यों बढ़ती हैं?

धर्म के मार्ग पर रहते हुए प्रारब्ध एक साथ दे दिया जाता है

· 57:18–58:09 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह आम प्रश्न है: हम जितना पूजा-पाठ करते हैं, परेशानी उतनी बढ़ती है, जबकि सामने वाला शराब पीता है, गांजा पीता है, गलत काम करता है और मज़े में है। वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है। होता बस इतना है कि आप धर्म और कर्म पर चल रहे हैं, नियम रखे हैं — चार बजे उठना, नहाना, पूजा में बैठना, आठ बजे तक जप, अनुष्ठान, अष्टमी और एकादशी का व्रत, 84 खंभा जाना, गोवर्धन परिक्रमा, तीर्थ जाना — तो भगवती आपको सारे दुख एक साथ दे देती हैं, ताकि जब यह धर्म कर रहा है और भाग नहीं सकता, तब इसका प्रारब्ध जल्दी कट जाए।

91

गलत काम करने वाले इतने सुखी क्यों दिखते हैं?

उनका बचा हुआ पुण्य एक साथ दे दिया जाता है, ताकि पाप उभर सके

· 58:10–59:03 · Also a question

वक्ता पहले के एक लाइव का प्रश्न याद करते हैं: क्या पुण्य करने के लिए बहुत पैसा चाहिए? उन्होंने कहा था कि पुण्य करने के लिए पैसा नहीं चाहिए, पैसा पाप करने के लिए चाहिए। जो लोग पाप कर रहे हैं, गोवा घूमने जा रहे हैं, वहां दारू पी रहे हैं, चिकन-मटन और सीफूड खा रहे हैं, लड़कियों के साथ जो कृत्य कर सकें कर रहे हैं, शादीशुदा हों या न हों — ऐसे पाप बढ़ाते हुए वे बहुत सुखी रहते हैं। वक्ता कहते हैं, कारण यह है कि भगवान कहते हैं: इसका जो पुण्य बचा है, सब एक साथ दे दो, ताकि इसका पुण्य जल्दी से जल्दी खत्म हो। तभी पाप उभरेगा, और तब यह रोएगा।

92

पाप कटते समय कष्ट कितने समय तक रहता है?

दस-पंद्रह साल का कष्ट, और फिर भी न छोड़ना

· 59:04–1:00:03 · Also a question

जब हमारा पाप कट रहा होता है — पुण्य करने से पाप कटता है — तब दस-पंद्रह साल तक कष्ट ही कष्ट रहता है, और हम रोते हैं। मन पीछे हटता है; लगता है, और कितना दोगे। पर कई जन्मों के प्रारब्ध होते हैं, जो तब कटने लगते हैं जब आप साधना शुरू करते हैं, हवन शुरू करते हैं, शिव पर जल चढ़ाते हैं। कभी आप पूरे महीने का अनुष्ठान कर रहे होते हैं और उसी समय कष्ट बढ़ जाता है — तबीयत खराब, कर्ज़ आ जाता है — फिर भी आदमी नहीं रुकता, इस आस में कि एक दिन प्रभु ज़रूर सुनेंगे।

93

अनुष्ठान प्रारब्ध का क्या करता है?

पुण्य की ऊर्जा से प्रारब्ध जड़ से कटवाया जाता है

· 1:00:04–1:00:59 · Also a question

जब आप धर्म के मार्ग पर चलते हैं, सेवा-भक्ति शुरू करते हैं — चाहे सप्तशती का पाठ विधि से करें, या इस चैनल पर बताया कोई अनुष्ठान, या अपना कोई — तो जब आप अनुष्ठान शुरू करते हैं, उसमें जो भी संकल्प लें, आपमें जो पुण्य की ऊर्जा बनती है, उससे भगवान सारा प्रारब्ध जड़ से कटवा देते हैं।

94

जब पुण्य उभरने लगता है तब क्या होता है?

कुछ अच्छे महीनों के बाद शुरू हुआ नया पाप, और कुबेर का उदाहरण

· 1:01:00–1:01:36 · Also a question

कर्म को आगे बढ़ाइए, वक्ता कहते हैं: जैसे ही हमारा पाप शून्य होने लगता है, पुण्य उभरने लगता है, और उसके बाद आनंद लीजिए। पर पुण्य उभरने के बाद क्या होता है? दो, चार या छह महीने बाद नया पाप शुरू हो जाता है, और आदमी फिर फंस जाता है। तो जब समय खराब है, तब आपने नियम बनाकर एकाग्र निष्ठा से अनुष्ठान किया; जब समय अच्छा हो, तो उस अनुष्ठान को बढ़ाइए। जैसा परसों चर्चा हुई थी, कुबेर को कुबेर का पद मिला, वे नव निधि के पति बने, अलकापुरी के राजा बने, और पद पाने के बाद शिव के मित्र बने।

95

अच्छा समय आने पर साधना कैसे बढ़ाएं?

महीने की जगह हर हफ्ते हवन, और विधि से अधिक तीर्थ यात्रा

· 1:01:37–1:02:19 · Also a question

कष्ट में तो आदमी भक्ति कर ही रहा होता है, ताकि कष्ट मिटे। जब शुभ समय आए, तो साधना और बढ़ानी चाहिए। जब अच्छी क्वालिटी का सामर्थ्य आए, तो अच्छी क्वालिटी का घी लगाइए; पहले महीने में एक बार हवन करते थे, तो अब हफ्ते में एक बार कीजिए। पहले पांच साल में एक बार तीर्थ यात्रा कर पाते थे और अब भगवान ने सामर्थ्य दिया है, तो साल में दो-तीन बार तीर्थ यात्रा कीजिए — और विधि-विधान से जाइए, टूरिस्ट बनकर घूमने नहीं।

96

बच्चों से क्या बनने को कहना चाहिए?

बच्चे से साधक बनने को कहिए, केवल डॉक्टर या इंजीनियर नहीं

· 1:02:20–1:03:02 · Also a question

जब समय खराब होता है, तब असलियत पता चलती है: कोई पूछने वाला नहीं होता, और चाचा, चाची, भाई, भाभी सब उस समय छोड़कर चले जाते हैं। तो वक्ता पूछते हैं, क्या कोई है जो अपने बच्चों को यह बात समझाए और कहे: बड़े होकर साधक बनो, जगदंबा की सेवा करो, शिव की सेवा करो, भगवान की भक्ति करनी है, भक्त बनना है? सब कहते हैं: डॉक्टर बनना है, इंजीनियर बनना है।

97

पूजा करने पर युवा का मज़ाक कैसे उड़ाया जाता है?

उदाहरण केवल जेल गए बाबाओं का, असली बाबाओं का कभी नहीं

· 1:03:03–1:04:06 · Also a question

अगर वह भगवद्गीता छू भी ले तो कहेंगे, संन्यासी बनना है क्या, बाबा जी बनना है? इतनी देर पूजा करते हो, हनुमान चालीसा पढ़ते हो — यह सब किसलिए; मत करो; यह नौटंकी नहीं चलेगी; यह माला कहां से उठा लाए; किसको जॉइन कर लिया? कहेंगे, बाबा जी बनोगे, बाबा जी लोगों का हाल देखो, सब जेल में पड़े हैं। वक्ता कहते हैं, ऐसे लोगों को केवल जेल वाले बाबा जी ही दिखेंगे। असली बाबा जी, जो अपना शरीर घिस रहे हैं और दिन-रात भगवती की भक्ति कर रहे हैं, कभी नहीं दिखते, और उनका उदाहरण कभी नहीं दिया जाता।

98

उपाय शुरू करते ही तंत्र का हमला क्यों नहीं हटता?

हमला करने वाले ने प्रक्षेपण से पहले महीनों प्रेत साधना की थी

· 1:04:07–1:05:02 · Also a question

वक्ता कहते हैं, कभी मत सोचिए कि हम भगवान की सेवा कर रहे हैं फिर भी तबीयत खराब हो गई। तंत्र विचार अपनी जगह है; उन्होंने विस्तार से बताया है कि यह कैसे काम करता है, इसका वैज्ञानिक आधार क्या है, यह कैसे असर करता है और आप पर कैसे उल्टा असर करेगा। इसका सामना करने की आपकी क्षमता सीमित है — आप सिद्ध पुरुष नहीं हैं। परेशानी आई, तब जाकर आपने मंत्र जप शुरू किया; पर परेशानी तो पांच-दस साल पहले ही जड़ पकड़ चुकी थी। जिसने प्रक्षेपण किया, उसने उस प्रेत की साधना छह महीने, चालीस दिन की होगी — श्मशान में बैठकर, भस्म पर बैठकर, शव के पास, जलते घाट पर, पीपल के पेड़ के नीचे, जैसे उसके गुरु ने बताया।

99

किसी पर लगाए गए प्रेत को क्या टिकाए रखता है?

हर अमावस्या को भोजन, और हमला करने वाले का तपोबल

· 1:05:03–1:05:42 · Also a question

सिद्धि पक्की करके वह उसे हर अमावस्या को भोजन देता होगा, उसे संतुष्ट रखता होगा, वचन से बांधे रखता होगा। जिन भी दैवी शक्तियों की सेवा करके उसने जो तपोबल बनाया है, वह तपोबल प्रेत खा रहा होगा। तभी उसने अभिचारिक क्रिया से आप पर, आपके शरीर पर प्रक्षेपण किया; और इसलिए वह आपके शरीर को नुकसान पहुंचा पाता है, क्योंकि तपोबल वह व्यक्ति दे रहा है जिसने प्रक्षेपण किया।

100

आखिरकार उपाय शुरू करने पर तुरंत लाभ क्यों नहीं होता?

हम गजेंद्र नहीं हैं, जिनकी एक पुकार पर नारायण दौड़े आए

· 1:05:43–1:06:38 · Also a question

जब आप पूरी तरह गड्ढे में गिर चुके, जब शरीर साथ देना बंद कर चुका, जब प्रेत-पिशाच चढ़ गया और परेशानी शुरू हो गई — तब आपने भगवान की शरणागति ली और अभी-अभी उपाय शुरू किया है। तो तुरंत लाभ नहीं होगा। वक्ता कहते हैं, आप भगवान के इतने बड़े भक्त नहीं हैं, न आपमें या मुझमें ऐसा भाव है कि भगवान तुरंत दौड़े आएं। न हम गजेंद्र जैसे हैं कि आधी रात को मगरमच्छ पैर पकड़े तो हम कान्हा-कान्हा पुकारें और नारायण वैकुंठ छोड़कर दौड़े आएं और चक्र से हमें छुड़ाएं।

101

प्रारब्ध से बनी मानसिकता आदमी को वहां रहते हुए भी केवल अभिचार ही दिखाती है, जहां गली-गली में नारायण घूमते हैं।

आपके प्रारब्ध ने मानसिकता बना दी है; जितना हो सके करते रहिए

· 1:06:39–1:07:18

वृंदावन को सोचिए, वक्ता कहते हैं, जहां गली-गली में नारायण घूमते हैं, जहां रज-रज में राधारानी का स्वरूप माना गया है, जिसके कण-कण की इतनी महिमा गाई गई है। वहां रहकर आप केवल यह सोचते हैं कि 84 खंभा के बाद आपकी तबीयत खराब हो गई और यह अभिचार तंत्र का असर है। वक्ता कहते हैं, यह कहीं न कहीं आपके अपने प्रारब्ध ने आपकी मानसिकता ऐसी बना दी है कि आप उससे निकल नहीं पा रहे। थोड़ा खुद को मोटिवेट कीजिए और देखिए कि आप कहां खड़े हैं।

102

शिवलिंग को किससे धोया जा सकता है?

साबुन या सर्फ कभी नहीं — शुद्ध जल, गंगाजल, दूध, पंचगव्य, पंचामृत

· 1:07:19–1:07:45 · Also a question

वक्ता कहते हैं, शिवलिंग को साबुन या सर्फ से धोने की ज़रूरत नहीं है; उसे साबुन या सर्फ से कभी नहीं धोना चाहिए। शिव का अभिषेक शुद्ध जल से, गंगाजल से, शुद्ध दूध से, पंचगव्य से, पंचामृत से — इन सबसे करना चाहिए। गाय के दूध को अमृत माना गया है; आप अमृत और पंचामृत की बात करते हैं, और उसकी जगह केमिकल वाला साबुन इस्तेमाल करेंगे। यह गलती मत कीजिए।

103

क्या सर्वेश्वर महादेव का पाठ शिव मंदिर में किया जा सकता है?

हां, पर ब्रह्मचर्य के साथ और पाठ कम रखकर

· 1:07:46–1:08:18 · Also a question

हां, वक्ता कहते हैं, मंदिर में किया जा सकता है; सामान्य पाठ किया जा सकता है, अगर दिक्कत बहुत अधिक है और आपका भाव उस स्वरूप में है। पर ध्यान रहे कि उस शिव मंदिर के प्रांगण में नारायण भी न हों। और दूसरी बात, ब्रह्मचर्य आदि का पालन नियम-निष्ठा से बहुत अच्छे से करना होगा। पाठ अधिक मात्रा में नहीं करना है — बहुत कम कीजिए: तीन, पांच, या एक भी। इससे ज़्यादा नहीं।

104

क्या सोमवती अमावस्या पर बेल वृक्ष पर दुग्धाभिषेक किया जा सकता है?

सोमवती अमावस्या पर बेल वृक्ष पर दुग्धाभिषेक और दत्तात्रेय

· 1:08:19–1:08:36 · Also a question

एक श्रोता सोमवती अमावस्या पर बेल वृक्ष पर दुग्धाभिषेक करना चाहते हैं, और भगवान दत्तात्रेय के बारे में पूछते हैं; वक्ता कहते हैं, यह बहुत ही बढ़िया है, ज़रूर कीजिए। वक्ता कहते हैं, दूसरे लोग भी करें: कल सोमवती अमावस्या है, और कल के दिन यथाशक्ति कीजिए।

एक श्रोता कहते हैं कि वे बेल वृक्ष पर दुग्धाभिषेक करना चाहते हैं, और भगवान दत्तात्रेय के बारे में पूछते हैं, सोमवती अमावस्या पर। बहुत-बहुत बढ़िया, वक्ता उत्तर देते हैं; ज़रूर कीजिए। और दूसरे भी करें, वक्ता कहते हैं: कल सोमवती अमावस्या है, और कल के दिन यथाशक्ति किया जाए।

105

आवाज़ें सुनाई देने और गंदी बदबू आने का क्या मतलब है?

ऐसा मामला देखना पड़ता है, दूर से तय नहीं होता

· 1:08:37–1:09:06 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि तंत्र क्रिया है: उन्हें आवाज़ सुनाई देती है, कोई न हो तब भी; लगता है किसी ने पुकारा, पर वहां जाने पर कोई नहीं मिलता; गंदी बदबू आती है, कभी खराब, कभी अच्छी। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह देखने का विषय है — कहां, क्या और कैसा है। तभी बताया जा सकेगा कि आपको क्या करना चाहिए और आप किस स्तर पर हैं।

106

पहली बार रात्रि जागरण करने का क्या अर्थ है?

रात्रि जागरण खुद भगवती की कृपा और शिव की महिमा है

· 1:09:07–1:09:20 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने जीवन में पहली बार रात्रि जागरण किया, और उनकी कृपा से पहली बार श्री पूजन अच्छे से किया। वक्ता उत्तर देते हैं, यह भगवती की इच्छा और कृपा है, और शिव की महिमा है, कि आप रात्रि जागरण कर पाए। और जिन बहुत से लोगों ने पहली बार रात्रि जागरण किया, उन पर ज़रूर कृपा रही है।

107

क्या भैरव महामंत्र की माला पर भैरव का कोई और मंत्र किया जा सकता है?

हां; और आठ दिन का शिव मंत्र जप जारी रखना चाहिए

· 1:09:21–1:09:53 · Also a question

जिसने आठ दिन शिव मंत्र का जप किया है, वह पूछता है कि इसका अनुष्ठान कैसे बनाएं; वक्ता कहते हैं: जारी रखिए, इसका विधि-विधान बताया जा चुका है। पूछा गया कि क्या भैरव महामंत्र वाली माला पर भैरव का कोई और मंत्र किया जा सकता है; वक्ता कहते हैं, कोई दिक्कत नहीं है।

108

ये काम जितने गुप्त रखे जाएं उतना अच्छा, क्योंकि लोगों के सामने आने से भजन का भोग लग जाता है और स्टाइल मेंटेन करनी पड़ती है।

ये काम जितने गुप्त रखे जाएं, उतना अच्छा

· 1:09:54–1:10:30

हम किसी से नहीं मिलते, वक्ता कहते हैं। ये सब काम आप जितना गुप्त रहकर करें, उतना अच्छा है। लोगों के सामने आने के बाद अपने भजन का भोग लग जाता है। उसके बाद बाबा जी मॉडल बन जाते हैं: फिर उन्हें स्टाइल मेंटेन करनी पड़ेगी, बाल छोटे कटवाने पड़ेंगे, तिलक की अपनी एक क्वालिटी हो जाएगी, एकदम चकाचक कपड़े पहनने पड़ेंगे, क्योंकि पता नहीं कब कहां कौन भक्त मिल जाए, और फिर हम यूट्यूबर, ब्लॉगर बन जाएंगे, दिन भर सेल्फी देते रहेंगे। उसके बाद जगह-जगह सारा पुण्य क्षीण होने लगेगा।

109

साधकों के बीच प्रसिद्धि क्या नुकसान करती है?

दुश्मनी में खड़े पचास साधक, और वैमनस्य का भाव

· 1:10:31–1:11:15 · Also a question

उसके बाद, वक्ता कहते हैं, पचास साधक दुश्मनी में खड़े हो जाएंगे, कि यह ऐसा करते हैं, इनके पास यह है। तो अंदर ही अंदर कहीं वैमनस्य का भाव आ जाएगा। हम किसी और के पतन का कारण क्यों बनें, वक्ता पूछते हैं — कि मेरे कारण दस आदमियों के भीतर द्वेष का भाव खड़ा हो, यह देखकर कि यही है, यही रुद्रांश, यही गृहस्थ तंत्र वाला। इससे अच्छा है कि हम नहीं मिलेंगे; अपनी जगह रहिए, भगवती का भजन कीजिए, जय जगदंबा की सेवा कीजिए, विधि-विधान चैनल पर है।

110

विंध्य क्षेत्र के सभी शक्तिपीठ और कुंड उपलब्ध क्यों नहीं हैं?

ऋणमुक्तेश्वर महादेव का मोतिया तालाब, आधा सूखा, और लुप्त हुए कुंड

· 1:11:16–1:12:15 · Also a question

कलिकाल का कोई कारण है, वक्ता कहते हैं, जिससे सभी शक्तिपीठ उपलब्ध नहीं हैं। विंध्य क्षेत्र में कई प्राकृतिक कुंड हैं जिनका वर्णन विंध्याचल माहात्म्य में मिलता है; और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि शुरू से ऐसे कई कुंड लुप्त हो चुके हैं और दिखते ही नहीं। ऋणमुक्तेश्वर महादेव के पास का मोतिया तालाब आधा सूख चुका है — वह क्षेत्र जहां विंध्य क्षेत्र के सिद्ध मुनि जाकर अदृश्य हो जाते हैं, जिसे अदृश्य क्षेत्र माना गया है — और वह सूखा पड़ा है। कई कुंड और झरने पूरी तरह सूख चुके हैं।

111

पूजा के समय घुंघरू की आवाज़ का क्या मतलब है?

अनदेखा कीजिए और आगे बढ़िए; उसमें रुके तो माया में रहेंगे

· 1:12:16–1:13:15 · Also a question

पूछा गया कि पूजा के समय घुंघरू की आवाज़ का क्या मतलब है; वक्ता कहते हैं, आप इसे जिस भाव में देखना चाहें देख सकते हैं; यह बहुत सामान्य बात है। अनदेखा करेंगे तो आगे बढ़ेंगे। अगर घुंघरू में रुक गए, तो जल्दी ही घुंघरू पहनने वाली कोई आपको मिल जाएगी — और फिर माया में रहिए।

112

अगर शरीर पूरी विधि न झेल सके तो क्या करें?

शरीर पर ज़बरदस्ती मत कीजिए; कुर्सी पर बैठिए, और सक्षम होने पर मुख्य अनुष्ठान कीजिए

· 1:13:16–1:14:35 · Also a question

जब शरीर पूरी तरह सक्षम न हो, वक्ता कहते हैं, तो उस पर बहुत ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए। अगर आप नए हैं और प्रारब्ध के कारण शरीर में परेशानी है, या कोई अभिचार दोष भी है, तो पूरा काम बैठकर कीजिए; ज़िद से मत कीजिए। बैठ नहीं पाते तो कुर्सी आदि पर बैठकर कर लीजिए। जब सक्षम हो जाएं, जब विचार थोड़ा कट जाए, जब भगवती की कृपा हो और शरीर थोड़ा सुरक्षित हो जाए, तब मुख्य अनुष्ठान कीजिए।

113

सर्वेश्वर महादेव कौन हैं, और वहां नारायण क्यों नहीं होने चाहिए?

सर्वेश्वर महादेव शरभ आकाश भैरव के रूप में, और नारायण को अलग रखना

· 1:14:36–1:15:10 · Also a question

अपने पहले उत्तर को स्पष्ट करते हुए वक्ता कहते हैं कि प्रश्नकर्ता ने सर्वेश्वर महादेव की पूजा करने के बारे में पूछा था। सर्वेश्वर महादेव शरभ आकाश भैरव हैं; और जहां भी उनकी सेवा-पूजा या अनुष्ठान होता है, वहां नारायण का कोई श्री विग्रह, फोटो, चिह्न आदि नहीं होना चाहिए। नारायण सब जगह हैं, वक्ता कहते हैं, पर यहां कर्म प्रधान है — और जो हम करने जा रहे हैं वह तंत्र कांड से जुड़ा है — इसलिए उनसे जुड़ा कोई अंश वहां नहीं होना चाहिए।

114

क्या पांडवों पर कभी तंत्र किया गया था?

पांडवों पर तंत्र करने वालों में सबसे पहले शकुनी

· 1:15:11–1:15:37 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि पांडवों पर तंत्र नहीं किया गया था; वक्ता उत्तर देते हैं: किसने कहा कि पांडवों पर तंत्र नहीं किया गया? पांडवों पर तंत्र करने वालों में सबसे पहले मामा शकुनी थे। वे सबसे बड़े तंत्र-मंत्र करने वाले थे। और ये लोग कहते हैं कि उसका असर नहीं हुआ।

आपसे किसने कहा, वक्ता एक श्रोता से पूछते हैं, कि पांडवों पर तंत्र नहीं किया गया था? पांडवों पर तंत्र करने वालों में सबसे पहले मामा शकुनी थे। वे सबसे बड़े तंत्र-मंत्र करने वाले थे। और ये लोग कहते हैं कि उसका असर नहीं हुआ।

115

क्या कुशा और दूर्वा भी पैकेट में जानी चाहिए?

कुशा और दूर्वा भी पैकेट में होनी चाहिए

· 1:15:38–1:16:03 · Also a question

पूछा गया कि क्या लकड़ी के पैकेट में कुशा और दूर्वा भी रखनी चाहिए; वक्ता उत्तर देते हैं: हां, बिल्कुल, कुशा और दूर्वा भी होनी चाहिए। वे यह भी कहते हैं कि हर क्षेत्र में गुप्तता बरती जा रही है।

वक्ता कहते हैं कि जितने भी क्षेत्र हैं, सब जगह गुप्तता हो ही रही है। पूछा गया कि क्या लकड़ी के पैकेट में कुशा और दूर्वा भी होनी चाहिए; वक्ता उत्तर देते हैं: हां, बिल्कुल। कुशा और दूर्वा भी होनी चाहिए।

116

यूट्यूब और फेसबुक के ज़रिये अब सनातनियों में चेतना और जागृति आ रही है, लंबे समय तक धीरे-धीरे उनका ब्रेनवॉश किए जाने के बाद।

धीरे-धीरे हुआ ब्रेनवॉश, और अब सनातनियों में आती जागृति

· 1:17:23–1:18:00

इन लोगों ने, वक्ता कहते हैं, बहुत धीरे-धीरे हमारा दिमाग पूरी तरह धो दिया है। आज के समय में यूट्यूब और फेसबुक के कारण फिर भी सनातनियों में बहुत चेतना और जागृति आ रही है; नहीं तो ये सब बातें कहां थीं। अगर कोई इसकी बात करता, कोई शिखा रखता, कोई तिलक लगाता, तो लोग उसका मज़ाक उड़ाकर उसका जीना मुश्किल कर देते थे। और यह सारा मज़ाक उसी जगह से आया।

117

वही लोग ज्ञान छिपाने के लिए पंडितों और विद्वानों को गाली देते हैं, और फिर खुलकर सिखाने वालों को भी गाली देते हैं।

ज्ञान छिपाने पर पंडितों को गाली, फिर सबके सामने सिखाने वालों को गाली

· 1:19:00–1:19:35

आप बैठकर सारे पंडितों, ब्राह्मणों, जानकारों, विद्वानों को गाली देते हैं, वक्ता कहते हैं: तुम लोगों ने कुछ नहीं सिखाया। आप अधिकार की बात करते हैं — कि आपको उपवीत पहनना चाहिए, या आपको ऐसा अधिकार नहीं है। और आज, जब यूट्यूब के ज़रिये सिखाया और बताया जा रहा है, जब सौ, डेढ़ सौ, पांच सौ, हज़ार लोग आकर प्रमाण के साथ समझाने की कोशिश करते हैं, तब भी उन्हें गाली मिलती है।

118

वे खुद को ब्राह्मण नहीं, महाशूद्र कहते हैं, और चेताते हैं कि जानकारों को गाली देना अपनी ही जड़ काटना है।

महाशूद्र होने का उनका कथन, और अपनी ही जड़ काटना

· 1:19:36–1:20:03

हम पहले ही कहते हैं, वक्ता उनसे कहते हैं, कि हम ब्राह्मण हैं ही नहीं — हम महाशूद्र हैं, नीच व्यक्ति हैं; मुझसे बड़ा महाशूद्र कोई नहीं होगा। पर अगर आप मुझे शूद्र मानकर अपना भी मान लें, तब भी आप मानने वाले नहीं। आप कहते हैं हम कर्मकांड नहीं करेंगे, या मंत्र, या यह। यहां हर एक चीज़ हिंदी में करके बताई जा रही है — और वह भी आप लोगों को हज़म नहीं हो रही। आप लोगों को बस बहाना चाहिए। आप अपने ही पेड़ की जड़ काट रहे हैं, और कुछ नहीं।

119

क्या सिद्धि के प्रदर्शन की मांग करनी चाहिए?

बुद्धि और विवेक वालों का कोई नुकसान नहीं कर सकता, और पाकिस्तान उड़ाने की मांग

· 1:20:04–1:20:24 · Also a question

जिनके मन में सामर्थ्य, बुद्धि और विवेक है — आप उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। अगर कोई मज़ाक उड़ाने के लिए सिद्धि का प्रदर्शन करे, तो उनका क्या मज़ाक बनेगा, वक्ता पूछते हैं। तुम्हारे पास इतनी सिद्धि है, इतना सामर्थ्य है — तो जाओ, पाकिस्तान को उड़ा दो। कहां है? हम तुम्हारी सिद्धि लगाएंगे, हम यह करेंगे, वह करेंगे।

120

दतिया बगलामुखी शक्तिपीठ के राष्ट्र संत महाराज ने चीनी हमले के समय बगलामुखी मूल मंत्र का संपुट लगाकर शतचंडी की थी।

चीनी हमले के समय दतिया बगलामुखी शतचंडी

· 1:20:25–1:21:06

सिद्धि का वह प्रदर्शन, वक्ता कहते हैं, दतिया बगलामुखी शक्तिपीठ के राष्ट्र संत महाराज जी ने किया था। आप इसका वर्णन हर जगह पढ़ते, सुनते, देखते हैं: कि भगवती बगलामुखी के मूल मंत्र का संपुट लगाकर — हालांकि वर्णन सप्ताक्षरी मंत्र के संपुट का आता है — उन्होंने शतचंडी करवाई थी जब चीन ने भारत पर हमला किया था, और उन्हें पीछे हटना पड़ा। वक्ता कहते हैं, उनमें सामर्थ्य था; और जिसमें जितना सामर्थ्य होगा, वह उतना ही दिखाएगा। जगदंबा ने जो ब्रह्म तेज दिया है, जो आदमी का प्रारब्ध है, उसी तरह वह काम करता है।

121

क्या सीखने पर वर्ण या कुल की कोई रोक है?

जन्म से कुछ भी वर्जित नहीं — जो सिखा रहे हैं, उनसे जाकर सीखो

· 1:21:07–1:21:44 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जिस भी वर्ण में, जिस भी कुल में आपने जन्म लिया, कहीं कुछ वर्जित नहीं है। अधिकार का मतलब क्या है? सीखो भाई। अपने कुल और परिवार से बाहर निकलकर सीखो। जब एक ब्राह्मण रेलवे में जाकर चतुर्थ श्रेणी का काम कर सकता है, तो आप चौथे वर्ण में हो तो जाकर सीखो। किसने मना किया है? रुद्राष्टक का पाठ करना सीखो। जो सिखा रहे हैं, उनसे सीखो।

122

क्या स्त्रियों को गायत्री मंत्र का अधिकार है?

स्त्रियों के लिए हर तरह से वर्जित, ब्राह्मण की पत्नी के लिए भी

· 1:21:45–1:22:03 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि लोग गायत्री के अधिकार पर अटके रहते हैं: खुजली होती है कि गायत्री का अधिकार नहीं है। गायत्री का अधिकार क्यों नहीं है? क्योंकि शरीर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। योग्य बनो और करो। स्त्रियों के लिए यह हर तरह से वर्जित है; ब्राह्मण की पत्नी के लिए भी वर्जित है। स्त्री का मतलब यह नहीं कि शूद्र वर्ण की स्त्री को मना है और ब्राह्मण के लिए छूट है।

123

मेना कौन हैं, और आने वाला पार्वती खंड क्या सिखाता है?

पितरों की पुत्री मेना, और गृहस्थ धर्म पर उनका उपदेश

· 1:23:33–1:24:10 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि प्रतिपद धर्म के बारे में बहुत कुछ समझाया और सिखाया गया है। जब आगे पार्वती खंड पढ़ेंगे, तो देखेंगे कि पार्वती को भगवती मेना से क्या उपदेश मिला। मेना कौन हैं? पितरों की पुत्री को मेना कहा गया है। और फिर भगवती पार्वती उनकी पुत्री हैं — इस तरह भगवती पार्वती पितरों की परपोती हुईं। उन्हें गृहस्थ धर्म पर क्या उपदेश दिया जा रहा है, इस पर चर्चा होगी, और तब समझ आएगा कि स्त्री का कर्तव्य क्या है।

124

पुरुष लंपट है और सबसे बड़ा भोगी है, जबकि स्त्री सबसे श्रेष्ठ है और उसे उस श्रेष्ठता को सही ढंग से निभाना चाहिए।

पुरुष लंपट और सबसे बड़ा भोगी; तो श्रेष्ठता को सही ढंग से निभाओ

· 1:24:11–1:24:29

वक्ता कहते हैं कि पुरुष को तो सब कुछ सिखाया जाता है। पुरुष लंपट है — हम तो हमेशा कहते हैं। पुरुष सबसे बड़ा भोगी है; पुरुष नीच है। ब्राह्मण नीच है, पुरुष नीच है, स्त्री सबसे श्रेष्ठ है। अगर आप सबसे श्रेष्ठ हो, तो उस श्रेष्ठता को सही ढंग से निभाओ। मनमर्ज़ी से काम हो रहे हैं, मनमर्ज़ी से आचरण हो रहा है। यह गलत बात है न।

125

पहले भांडों और नगर वधुओं को कहाँ रखा जाता था?

भांड और नगर वधुएँ नगर के बाहर, समाज में कोई दखल नहीं

· 1:25:09–1:25:37 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि पहले के समय में भांडों को नगर के बाहर रखा जाता था, और नगर वधुओं को भी नगर के बाहर, जो नगर वधु कहलाती थीं। और जितने भी भांड होते थे जो कला दिखाते थे, वे बहुत धनी होते थे — पर समाज के जीवन में उनका कोई दखल नहीं था। पुराणों या शास्त्रों में कहीं नहीं पढ़ोगे कि किसी भांड या किसी नट को चारित्रिक विशेषता दी गई हो, या बच्चों से कहा गया हो कि उससे सीख लो। यह कहीं नहीं मिलेगा।

126

यूथ आइकन कौन होना चाहिए?

कोई पौराणिक व्यक्ति या पौराणिक क्षेत्र, हीरो-हीरोइन नहीं

· 1:25:38–1:26:19 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि पर आज आपकी बेटियाँ घर में सिक्स-पैक वाले नए हीरो लगाती हैं; लड़के हीरोइनें लगाते हैं और उनके बड़े फैन हैं। और वे स्त्रियाँ क्या दिखा रही हैं — शराब और सिगरेट पीना, हुक्का बार जाना, कूल दिखने के लिए बॉयफ्रेंड के साथ घूमना और पोस्ट करना। फिर बच्चे वही सीखेंगे और उन्हें ही अपना यूथ आइकन बनाएँगे। होना यह चाहिए कि किसी पौराणिक व्यक्ति को, किसी पौराणिक क्षेत्र को यूथ आइकन बनाओ। पर ऐसा होता नहीं।

127

बच्चे से दिन में दस बार क्या कहना चाहिए?

तुमने सनातन में साधक बनने के लिए जन्म लिया है, इंजीनियर बनने के लिए नहीं

· 1:26:20–1:26:55 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अपने बच्चे से कहो, बचपन से उसके भीतर यह बात बोलो: आपका बच्चा अभी कितना भी बड़ा हो, उससे कहो कि बड़े होकर तुम साधक बनोगे; तुमने सनातन में साधक बनने के लिए जन्म लिया है, इंजीनियर या डॉक्टर बनने के लिए नहीं। इंजीनियर या डॉक्टर बनना कर्म क्षेत्र है; वह तो बनना ही है। वह इस मिले हुए शरीर के लिए है — यह शरीर एक वस्त्र है, और कुछ नहीं। इसके भीतर जो आत्मा है, जिसके साथ तुमने जन्म लिया, उसके लिए तुम्हें साधक बनना है। बच्चों से दिन में दस बार कहो, और खुद से भी कहो, जिस भी स्तर पर हो, जब तक साँस चल रही है।

128

मारण और अफेयर की बातों में बीता जीवन बेकार चला जाता है, और अंत में कोई तांत्रिक आपको बाँध लेता है।

ऐसी बातों में बीतता जीवन, और ऊपर से तांत्रिक का बाँधना

· 1:26:56–1:27:23

वक्ता कहते हैं कि जीवन बस ऐसी ही बातों में बीत जाएगा — कि फलाँ ने मारण किया, फलाँ की बेटी सुंदर है और वहाँ अफेयर चल रहा है। बाद में आप खा लिए जाओगे और कुछ नहीं होगा। आप मरोगे और सड़ोगे; कोई तांत्रिक आपको भी बाँध लेगा और आप पर कुछ चलाता रहेगा, और आप पूरा जीवन यही करते रहोगे — जीते जी मरे हुए, और मरने के बाद भी। कुछ नहीं बदलेगा और हालत और खराब हो जाएगी। वक्ता कहते हैं, थोड़ा प्रयास करो अपने आत्म स्वरूप को, अपने आत्म तत्व को जानने का।

129

वे वही बताते हैं जो उन्होंने खुद किया है — उन्होंने भी किसी और की तरह शरीर का कष्ट सहकर चारों प्रहर निभाए हैं।

उनका कहना कि चारों प्रहर उन्होंने खुद निभाए, उसी शारीरिक कष्ट के साथ

· 1:27:24–1:28:05

वक्ता कहते हैं कि हम वही कहते हैं जो करते हैं; जो नहीं करते, वह नहीं कहते। अगर हमने आपसे चार प्रहर की पूजा करवाई, तो हमारी अपनी जो भी हालत रही हो, हमने भी प्रयास किया — वक्ता कहते हैं कि हम कोई योगयुक्त दिव्य पुरुष नहीं, बल्कि नीच, अधम, शूद्र, महाशूद्र, पतित हैं। हमने भी साधारण तरीके से चार प्रहर की पूजा का प्रयास किया। हमारी भी हालत खराब होती है; हमारी भी कमर दुखती है, पैर दुखते हैं। एक सीमा तक किया जा सकता है, उसके बाद समझ आता है — और इसीलिए हम आपकी तकलीफ समझ सकते हैं।

130

होलिका के लिए वे क्या तैयारी बताते हैं?

अभी से मंत्र चुनना, जिसे होलिका की रात सिद्ध करना है

· 1:28:06–1:28:35 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आज से हम आपको होलिका के लिए तैयार करना शुरू करेंगे: कि होलिका की रात हमें पूरी रात जागकर एक मंत्र सिद्ध करना है — मंत्र चुन लो। वहाँ दस लोग दस तरह के मंत्र सिद्ध करेंगे; और हम भी यहाँ बैठकर अपना करेंगे।

वक्ता कहते हैं कि अगर आज से हम आपको होलिका के लिए तैयार करना शुरू करें — कि होली की रात हमें पूरी रात जागकर यह मंत्र सिद्ध करना है, मंत्र चुन लो। वहाँ दस लोग अलग-अलग तरह का एक-एक मंत्र सिद्ध करेंगे। और हम भी यहाँ बैठकर अपना करेंगे।

131

55, 60 या 70 साल के लोगों के लिए कौन सी साधना बताई गई है?

भगवान का नाम लो और परिवार में आग मत लगाओ

· 1:28:59–1:29:33 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इन सब बातों में खुद को थोड़ा लगाओ; मन को संभालना सीखो। अगर आप बूढ़े हो गए हो, 55, 60, 70 साल के हो रहे हो, तो भगवान का नाम लो। बेटी, बेटे, दामाद और बहू के बीच आग लगाने का काम मत करो। आग मत लगाओ, बहुत बड़ी उम्मीदें मत रखो। आपने अपना जीवन देख लिया; बैठकर भगवान का चिंतन करो।

132

अगर बुज़ुर्ग इससे ज़्यादा न कर सकें तो क्या करें?

दीक्षा हो तो गुरु मंत्र, नहीं तो नाम; तुलसी सेवा और मंदिर की सीढ़ियाँ

· 1:29:34–1:29:53 · Also a question

अगर दीक्षा मिली है, तो गुरु मंत्र का जप करो; अगर नहीं मिली, तो जिसमें आपकी आस्था है उसका नाम लो। अगर कुछ भी न कर सको, तो चुपचाप बैठकर भगवान का कोई सीरियल देखो। अगर वह भी न कर सको, तो कम से कम स्मरण कर सकते हो। तुलसी जी की सेवा करो। मंदिर जाओ और मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर चिंतन करो।

133

चौदह-पंद्रह साल के बच्चे को क्या करना चाहिए?

अभी से खुद को संभालो — एक पीढ़ी तो पहले ही बर्बाद हो चुकी

· 1:29:54–1:30:20 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि और अगर आप छोटे हो, बस चौदह-पंद्रह साल के, तो अभी से खुद को संभालो। यूट्यूब और फेसबुक नहीं थे, फिर भी एक पीढ़ी बिगड़ गई, बर्बाद हो गई। यूट्यूब और फेसबुक के ज़रिए बस यह ब्लॉगिंग देखकर, किसी की ज़िंदगी में क्या चल रहा है उसमें झाँककर क्या मिलता है — भगवान जाने।

वक्ता कहते हैं कि और अगर कोई छोटा है, अभी चौदह-पंद्रह साल का, तो अभी से खुद को संभालो। यूट्यूब और फेसबुक नहीं थे, फिर भी एक पीढ़ी बिगड़ गई, बर्बाद हो गई। वक्ता कहते हैं कि यूट्यूब और फेसबुक के ज़रिए बस यह ब्लॉगिंग देखकर, किसी की ज़िंदगी में क्या चल रहा है उसमें झाँककर क्या मिलता है — भगवान जाने।

134

माला और मंत्र करते समय ऊब और नींद क्यों आती है?

पहले नींद पूरी करो, और जानो कि रस इसलिए नहीं कि चरित्र नहीं जानते

· 1:31:19–1:31:52 · Also a question

पूछा गया कि जब मन ऊब जाता है, मन नहीं करता, और माला व मंत्र करते समय नींद आती है, तो पूजा-पाठ में निरंतरता कैसे रखें। वक्ता कहते हैं: एक ही काम बार-बार करोगे तो ऊब जाओगे। नींद आती है तो पहले अपनी नींद पूरी करो। दो-तीन बातें समझनी हैं। नीरसता इसलिए आती है क्योंकि पूजा-पाठ में रस नहीं है। आप भगवान दत्त के चरित्र के बारे में नहीं जानते — उनका चरित्र पढ़ो, और पता करो कि दत्त कौन हैं, कैसे हैं, उनकी सामर्थ्य क्या है। पहले उनके बारे में सुनो, उन्हें जानो, समझने की कोशिश करो।

135

जब तक अपने इष्ट का स्तुति गायन सीखकर भाव से न गाया जाए, पूजा में नींद और ऊब आना तय है।

अपने इष्ट का स्तुति गायन, जिसके बिना नींद और ऊब निश्चित

· 1:31:53–1:32:10

वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात है स्तुति गायन, जिसकी वे बार-बार बात करते हैं। जब तक आप अपने इष्ट आराध्य का स्तुति गायन नहीं सीखते — और वह भी एक भाव के साथ — नींद आना तय है और ऊब होना तय है। और जब आप मंत्र जप करते हो, तो आपने जो भी गलत काम किए हैं, वे ठीक जप के समय ही याद आने लगते हैं।

वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात है स्तुति गायन, जिसकी हम बार-बार बात करते हैं। जब तक आप अपने इष्ट आराध्य का स्तुति गायन नहीं सीखते, और वह भी एक भाव के साथ, तब तक आपको नींद आना तय है और ऊब होना तय है। और जब आप मंत्र जप करते हो, तो आपने जो भी गलत काम किए हैं, वे ठीक जप करते समय ही याद आने लगते हैं।

136

मंत्र क्या है, और उसका चंद्रमा से क्या संबंध है?

मनन त्रायते इति मन्त्रः — मन के कारक चंद्रमा

· 1:32:11–1:32:42 · Also a question

वक्ता पूछते हैं कि फिर मंत्र क्या है: जो मन को सलाह दे — वह मन में ही चल रहा है। जैसा उन्होंने शुरू में कहा था: मन, मंत्र, चंद्रमा। चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है; मन पर अधिकार चंद्रमा का है। चंद्रमा का बल घटता-बढ़ता है, और मन पर असर पड़ता है; मंत्र का असर भी ठीक वैसे ही पड़ता है। जब मंत्र से हम चंद्रमा को बलवान बनाते हैं, तो चंद्रमा बलवान होने पर हमारा मंत्र फल देने लगता है, और हमारा मन हमारे वश में होता है।

137

सुबह उठकर पाँच मिनट दो-चार भजन या स्तोत्र सुनने से पूरा दिन अच्छा जाता है।

सुबह पाँच मिनट भजन या स्तोत्र, कान के पास लगाकर

· 1:32:43–1:33:16

वक्ता कहते हैं कि शुरू में ही बताया गया था: सुबह नींद से उठकर दो-चार भजन, स्तोत्र या स्तुतियाँ सुनो, जो भी आपकी पसंद की हों। आपका पूरा दिन अच्छा जाएगा; बस पाँच मिनट सुनना है, ज़्यादा नहीं, पर समय हो तो ठीक से सुन सकते हो। लाउडस्पीकर पर नहीं — सबके पास फोन है, तो कान के पास लगाकर सुनो। उसके बाद जब पूजा करने जाओ, तो वहाँ स्तुति गाओ।

138

जप के समय बहुत ज़्यादा नींद आना क्या बताता है?

शरीर में तेज और शुक्र की कमी

· 1:33:17–1:33:36 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर नींद बहुत आ रही है, तो शरीर में तेज की कमी है, शुक्र की कमी है — इसीलिए ऐसा हो रहा है। ब्रह्मचर्य के पालन पर ध्यान दो, खान-पान पर खास ध्यान दो, अपनी नींद पूरी करो, तब ठीक होगा; नहीं तो नहीं होगा।

वक्ता कहते हैं कि अगर नींद बहुत आ रही है, तो वह शरीर में तेज की कमी है, शुक्र की कमी है; इसीलिए यह बात हो रही है। ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। के पालन पर ध्यान दो; खानपान पर खास ध्यान दो। अपनी नींद पूरी करो, तब ठीक होगा। नहीं तो नहीं होगा।

139

क्या महादेव का टैटू बनवा सकते हैं?

त्रिशूल, डमरू जैसे प्रतीक बेहतर; मंत्र वैदिक नहीं होना चाहिए

· 1:33:37–1:34:12 · Also a question

एक श्रोता ने पूछा जो महादेव का टैटू बनवाना चाहता है। वक्ता कहते हैं: बनवाओ — उनके विचार में भगवान का प्रतीक चिह्न बनवाना चाहिए। अगर महादेव से जुड़े प्रतीकात्मक चित्र बनवाओ, त्रिशूल, डमरू, ऐसी सब चीज़ें, तो वह ज़्यादा लाभकारी है। और अगर कोई मंत्र आदि लिखवाओ, तो वह वैदिक नहीं होना चाहिए।

140

महाशिवरात्रि पर जप का कितना फल मिलता है?

365 गुना फल — एक ही दिन में पूरे साल का

· 1:34:13–1:34:39 · Also a question

पूछा गया कि महाशिवरात्रि पर किए गए का कितने गुना फल मिलता है। वक्ता कहते हैं कि पूछने वाला इसी गुणा-भाग में अटका है — जान भी लो तो क्या हिसाब लगाओगे? बताया गया है: यह 365 गुना फल देता है। एक ही दिन में पूरे साल का फल लाता है, और ऐसे व्यक्ति को अनंत गुना फल मिलने वाला है।

141

मंदिर में रोज़ भोग सेवा करते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए?

शुचिता और ब्रह्मचर्य, और मासिक धर्म के समय रोक

· 1:34:40–1:35:34 · Also a question

एक श्रोता कहती हैं कि उनके घर के पास एक मंदिर में शिव और हनुमान विराजमान हैं और उन्हें रोज़ के भोग की सेवा मिली है; वे पूछती हैं कि भोग बनाते और चढ़ाते समय क्या सावधानी रखें। वक्ता कहते हैं कि यह बड़ा सौभाग्य है कि हनुमान जी के मंदिर में रोज़ के भोग का काम मिला है; मंदिर सेवा का भार किसी जन्म के पुण्य से ही मिलता है। शुचिता पर पूरा ध्यान रखो, और ब्रह्मचर्य का अच्छे से पालन करते हुए पवित्रता से आना-जाना करो। और चूँकि उनका नाम मोनिका है, अगर वे स्त्री हैं, तो मासिक धर्म के समय न जाएँ — उस समय के लिए कोई और व्यवस्था करवा लें।

142

क्या कुब्जिका तंत्र के दुर्गा कवच के समय हुए दर्शन खुली आँखों से थे?

क्षणार्ध दर्शन, और भाव अधूरा होने पर आने वाला संशय

· 1:35:35–1:36:31 · Also a question

एक पोस्ट के बारे में पूछा गया, जिसमें एक महाभाव वाले व्यक्ति को कुब्जिका तंत्र का दुर्गा कवच करते समय जगदंबा के दर्शन हुए थे, और क्या वे दर्शन खुली आँखों से थे। वक्ता कहते हैं: हाँ, उस व्यक्ति के कहे अनुसार खुली आँखों से थे। पर एक बात ध्यान रखो, वे जोड़ते हैं: खुली आँखों से होने पर भी, उस समय अवस्था क्या रही होगी, और किस समय यह होता है। क्योंकि जब हम एक मंत्र बार-बार दोहराते हैं, उस भाव में, मन एकाग्र करके, उनके रूप का ध्यान करते हुए, तो वे आधे क्षण के लिए भी दर्शन देती हैं। पर उलझन की स्थिति तब आती है जब हमारा भाव कहीं अधूरा होता है: क्या यह सच था, या बस झूठ।

143

क्या काली किसी व्यक्ति के शरीर पर आती हैं?

काली कभी किसी के शरीर पर नहीं आतीं; उनकी योगिनियाँ आती हैं, एक सीमा में

· 1:36:32–1:37:15 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि उनकी पत्नी पर माँ काली की सवारी आती है और वे लोगों को ठीक करती हैं, पर माँ प्रकट नहीं हो रहीं। वक्ता पूछते हैं कि वे प्रकट कैसे होंगी — क्या आपमें काली को प्रकट करने की सामर्थ्य है? और क्या प्रमाण है कि काली जी आपकी पत्नी पर आ रही हैं? काली जी आ रही हैं, तो वे लोगों को ठीक कर रही हैं — यह कैसी बात है? वे उन्हें ठीक क्यों कर रही हैं; किसी के प्रारब्ध में, किसी के शरीर पर दखल क्यों दे रही हैं? गद्दी का एक नियम और एक मर्यादा होती है। वक्ता कहते हैं कि काली जी कभी किसी के शरीर पर नहीं आतीं — यह पहली बात है; शरीर पाँच तत्वों से बना है। उनकी योगिनियाँ आती हैं, और उनकी एक सीमा है; वे परिवार के कल्याण और रक्षा के लिए आती हैं।

144

जहाँ सवारी बुलाई जाती है और गद्दी पर लोग जुटाए जाते हैं, वहाँ छल चल रहा है और उस काम का कोई फल नहीं मिलता।

छल चल रहा है — यह साफ कहना, यह जानते हुए कि बुरा लगेगा

· 1:37:16–1:38:31

अगर किसी पर सवारी आने लगे, और वे अपने आप लोगों को बुलाने लगें या लोग आने लगें, और आप उनके लिए यह सब करो, तो आगे इसका फल नहीं मिलेगा। वक्ता कहते हैं कि वे अनुभव से बोल रहे हैं, कि श्रोता को अभी यह अच्छा नहीं लगेगा, उनकी बातें कड़वी लगेंगी और शायद वे गाली भी दें; और जिस महिला पर माता आती हैं, वे सुनेंगी तो अपने बारे में कही बात पर और बड़ा हंगामा करेंगी। पर वक्ता कहते हैं, यही सच है। तो यहाँ छल चल रहा है — यह हम आपको सीधे बताएँगे; बाकी आपकी इच्छा।

145

भारी पितृ दोष के लिए वे क्या उपाय बताते हैं?

पोछे में सेंधा नमक, जीव सेवा, और गीता का सातवाँ अध्याय

· 1:38:32–1:39:16 · Also a question

एक श्रोता, जो कहते हैं कि उन पर बहुत पितृ दोष है और वे किसी को बुला नहीं पा रहे, उनसे वक्ता कहते हैं कि कोई दिक्कत नहीं, और तीन बातें बताते हैं जो वे खुद कर सकते हैं। पहली: रोज़ जब घर में पोछा लगे, तो सेंधा नमक डालकर पोछा लगवाओ। दूसरी: जीवों की सेवा ज़रूर होनी चाहिए — गाय की रोटी, कुत्ते की रोटी, कौए के लिए, पशु-पक्षियों के लिए; जो भी दिया जाए, वह रोज़ नियम से घर से निकलना चाहिए। तीसरी: घर का कोई एक सदस्य रोज़ श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का पाठ करे, चाहे हिंदी में ही, और पाठ करते समय ताँबे के लोटे में तीन कुशा और एक तुलसी पत्ता डाल दे।

146

उस उपाय में तुलसी पत्ते और जल के क्या नियम हैं?

जिन दिनों तुलसी नहीं तोड़ते, और द्वार पर जल छिड़कना

· 1:39:17–1:39:59 · Also a question

तुलसी पत्ता एकादशी और द्वादशी को — यानी सुदोष को — नहीं तोड़ना है, और रविवार या गुरुवार को भी नहीं तोड़ना है; इसलिए पहले से तोड़कर रख लो, फिर सातवें अध्याय का पाठ करो। जब पाठ से जल अभिमंत्रित हो जाए, तो उसमें से थोड़ा-थोड़ा सबको भगवान का चरणामृत मानकर पिलाओ, और घर में भी छिड़को, मुख्य द्वार पर तीन बार छिड़को। इसे कल से शुरू करो, सोमवती अमावस्या से, जो बहुत अच्छा और अत्यंत शुभ दिन है, और पूरे एक साल तक बिना रुके करते रहो। किसी को मत बुलाओ और कुछ और खास मत करो; बस इतना ही करो, और पितृ दोष में लाभ ज़रूर होगा।

147

क्या दीपदान में इस्तेमाल हुआ मिट्टी का दीया दोबारा इस्तेमाल कर सकते हैं?

दीपदान वाला मिट्टी का दीया दोबारा कभी इस्तेमाल नहीं होता

· 1:40:00–1:40:06 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जब भी मिट्टी के दीये से दीपदान किया जाता है, वह दीया दोबारा इस्तेमाल नहीं होता।

वक्ता कहते हैं कि जब भी मिट्टी के दीये से दीपदान किया जाता है, उसका इस्तेमाल दोबारा नहीं होता।

148

क्या दो लोग मिलकर 1800 आहुतियों का राहु मंत्र हवन कर सकते हैं?

दो लोग साथ बैठकर 900-900 आहुतियाँ दें तो 1800

· 1:40:07–1:40:31 · Also a question

पूछा गया कि 1800 हवन करना है, तो क्या दो लोग मिलकर 900-900 करके राहु मंत्र का हवन कर सकते हैं, या एक व्यक्ति दो दिन में करे। वक्ता कहते हैं: हाँ — दो लोग बैठकर साथ-साथ आहुतियाँ देते जाएँ; दोनों मिलकर 900-900 आहुतियाँ देंगे तो 1800 हो जाएँगी। दोनों साथ में कर सकते हैं।

149

क्या आत्माएँ जानती हैं कि हम उन्हें देख और महसूस कर सकते हैं?

जान भी सकती हैं, नहीं भी; सलाह है कि संकेत देने के बजाय अनदेखा करो

· 1:40:32–1:41:00 · Also a question

पूछा गया कि क्या कोई आत्मा या प्रेत समझता है कि यह व्यक्ति हमें देख रहा है, हमें महसूस कर पा रहा है। वक्ता कहते हैं: हाँ, बिल्कुल — ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी। अगर हम उन्हें बताना चाहें कि हम तुम्हें देख रहे हैं, तो ठीक है; अगर अनदेखा करो, तो अनदेखा हो गया। वक्ता पूछते हैं, उन्हें बताने की ज़रूरत क्या है?

150

देव दीक्षा में पहने गए कपड़ों का क्या करना चाहिए?

किसी योग्य ब्राह्मण को दान करो, या खुद पहनो

· 1:41:51–1:42:10 · Also a question

पूछा गया कि दीक्षा के बाद देव दीक्षा के कपड़ों आदि का क्या करना चाहिए। वक्ता कहते हैं: देव दीक्षा के बाद आप उन्हें किसी योग्य ब्राह्मण को दान कर सकते हो, या खुद भी पहन सकते हो।

पूछा गया कि दीक्षा के बाद, देव दीक्षा से जुड़े वस्त्र आदि का क्या करना चाहिए — वक्ता उत्तर देते हैं कि देव दीक्षा के बाद उन्हें किसी योग्य ब्राह्मण को दान किया जा सकता है। या आप उन्हें खुद पहन सकते हो।

151

कैसे पता चले कि मंत्र सिद्ध हुआ या नहीं?

उसका प्रभाव अपने आप मिलने लगता है; इसके लक्षण होते हैं

· 1:42:11–1:42:31 · Also a question

एक श्रोता ने शिव सहस्रनाम और शिव बीज मंत्र का जप किया है। वे पूछते हैं कि कैसे पता चलेगा कि मंत्र सिद्ध हुआ या नहीं। वक्ता कहते हैं: अगर मंत्र सिद्ध हो गया है, तो उसका प्रभाव अपने आप मिलने लगेगा। मंत्र सिद्धि के कुछ लक्षण होते हैं। उनका वीडियो चैनल पर मिल जाएगा, उससे आप समझ सकेंगे।

152

सप्तशती का संस्कृत पाठ कहाँ सीखा जा सकता है?

ऑनलाइन, या किसी योग्य ब्राह्मण के साथ बैठकर

· 1:42:32–1:42:52 · Also a question

पूछा गया कि सप्तशती का संस्कृत पाठ कहाँ सीखें। वक्ता कहते हैं कि यह सीखा जा सकता है। आप इसे ऑनलाइन सीख सकते हैं, और किसी योग्य ब्राह्मण के साथ बैठकर भी सीख सकते हैं।

पूछा गया कि दुर्गा सप्तशती का संस्कृत पाठ कहाँ से सीखें। वक्ता कहते हैं कि यह सीखा जा सकता है। आप इसे ऑनलाइन सीख सकते हैं। आप किसी योग्य ब्राह्मण के साथ बैठकर भी सीख सकते हैं।

153

सपने में प्रसाद खोना या खाना देखने का क्या अर्थ है?

जिस देवता का प्रसाद था, उन्हें अर्पित करें, फिर स्वयं लें

· 1:42:53–1:43:38 · Also a question

पूछा गया कि सपने में प्रसाद खोते हुए देखने का क्या अर्थ है। वक्ता प्रसाद खाने और खोने में अंतर बताते हैं। अगर प्रसाद खो गया है, तो जिसका प्रसाद था, उन्हें अर्पित करें — वे उसे ग्रहण करेंगे, फिर आप लें। अगर आप खुद को उसे खाते देखते हैं, तब भी जिन्हें आपने देखा, उनके लिए अर्पण करना अच्छा रहेगा।

154

सपने में घर का कोई सदस्य सोना दे, तो इसका क्या अर्थ है?

बार-बार होने पर यह विचार करने योग्य है; शुभ भी हो सकता है, आगे की कठिनाई भी

· 1:43:39–1:44:10 · Also a question

पूछा गया कि सपने में घर का कोई व्यक्ति हमें सोना दे, तो यह कैसा सपना है। वक्ता कहते हैं कि अगर यह बार-बार दिया जा रहा है, तो सवाल सच में सोचने-विचारने का बन जाता है। इसे ऐसे ही नहीं लिया जा सकता; इसके कई कारण हो सकते हैं। यह अच्छा भी हो सकता है, शुभ संकेत भी हो सकता है, और आगे के लिए किसी कठिनाई की बात भी हो सकती है।

155

राहु, केतु और सोशल मीडिया के बारे में वक्ता क्या कहते हैं?

सोशल मीडिया राहु है, और राहु पर जगदम्बा का नियंत्रण है

· 1:54:22–1:54:55 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि राहु और केतु उनके नियंत्रण में हैं। सोशल मीडिया राहु है। और राहु पर नियंत्रण करने वाली जगदम्बा हैं। यह उनसे बाहर नहीं है। वे एक इशारा करेंगी और सब हो जाएगा। अभी वे नहीं चाहतीं, तो नहीं चाहतीं। यही बात आपके भीतर भी है: आपको लगता है कि आपकी सेवा-पूजा से कुछ नहीं हो रहा — वे बस परीक्षा ले रही हैं और प्रारब्ध कटवा रही हैं।

156

प्राप्ति होने के बाद किस बात का ध्यान रखना चाहिए?

पाने के बाद खुद को संभालना, और काम का कभी घमंड न करना

· 1:54:56–1:55:47 · Also a question

वक्ता कहते हैं, पर उसके बाद ध्यान रखना: प्राप्ति के बाद उस प्राप्ति को संभालकर आगे बढ़ना; सही रास्ते पर चलना — यह बहुत बड़ा विषय है। अपने भीतर कभी यह विचार न आए कि हमने किया, हमसे हुआ, मेरी वजह से हुआ। अगर मेरी वजह से पंद्रह लोगों ने शिव की पूजा की, तो हमें इसका अहंकार नहीं हुआ कि हमने पंद्रह लोगों से करवाई — वरना कल नंदी पीछे से आकर सींग उठाकर हमें गिरा देंगे।

157

अगर शिव चाहते कि चार प्रहर का जागरण किसी और माध्यम से हो, तो वह श्रोताओं तक उसी माध्यम से पहुँचता।

अगर शिव न चाहते, तो किसी के भी द्वारा यह न होता

· 1:55:48–1:57:14

वक्ता कहते हैं कि उन्होंने उन्हें माध्यम बनाया। अगर शिव को शिवरात्रि पर आपका चार प्रहर का जागरण करवाना था, तो आप किसी और माध्यम से सुनते, किसी और माध्यम से जानते — पर आपको चार प्रहर की पूजा करनी थी। वह करवाई गई। और अगर वे आपसे न करवाना चाहते, तो शिव स्वयं यहाँ से आकर आपको समझाते, तब भी यह आपसे नहीं होता।

158

जो लोग यूट्यूब पर अपने परिवार को दिखाते हैं, उनके साथ क्या होता है?

अच्छे परिवार को यूट्यूब और फेसबुक पर दिखाने से हानि होने लगती है

· 1:57:15–1:57:41 · Also a question

वक्ता कहते हैं, हमने भी यह देखा है: जो लोग यूट्यूब और फेसबुक पर खुद को और अपने परिवार को दिखाते हैं — अच्छा परिवार होता है — कुछ हानि होने लगती है, फिर भी वे जारी रखते हैं। वे कहते हैं कि यह दिखाना बहुत गलत विषय बन जाता है; यह बिल्कुल अजीब है।

वक्ता कहते हैं, हमने भी यह देखा है: जो लोग यूट्यूब और फेसबुक पर खुद को और अपने परिवार को दिखाते हैं। परिवार अच्छा होता है; कुछ हानि होने लगती है — फिर भी वे जारी रखते हैं। यह दिखाना बहुत गलत विषय बन जाता है। वे कहते हैं, यह बिल्कुल अजीब है।

159

क्या किसी संकेत या घटना का अर्थ बार-बार पूछते रहना चाहिए?

सबको पता चल जाए तो फल चला जाता है; सार्वजनिक रूप से कभी न पूछें

· 1:57:42–1:58:17 · Also a question

वक्ता कहते हैं, इच्छा केवल भगवान की कृपा की रखनी चाहिए, और उनकी कृपा से ही चलना चाहिए। इस विषय में बार-बार कभी नहीं पूछना चाहिए — कि यह हुआ तो इसका क्या अर्थ है, वह हुआ तो उसका क्या अर्थ है। इस पूछने से, जो फल मिलने वाला है — अगर वह सबको पता चल जाए, तो चला जाएगा। वे कहते हैं, सार्वजनिक रूप से कभी पूछना ही नहीं चाहिए; व्यक्तिगत रूप से मैसेज कर सकते हैं।

160

क्या मुख्य द्वार पर पंचमुखी हनुमान का विग्रह लगाना चाहिए?

विग्रह पूजा स्थान में रहता है; द्वार पर केवल प्रतीक चिन्ह लगता है

· 1:58:18–1:58:41 · Also a question

पूछा गया कि क्या मुख्य द्वार पर पंचमुखी हनुमान का विग्रह लगाना चाहिए। वक्ता उल्टा पूछते हैं कि वहाँ विग्रह क्यों लगाएँगे। विग्रह मत लगाइए; प्रतीक चिन्ह, स्वस्तिक आदि लगा सकते हैं। विग्रह को पूजा स्थान में रखकर पूजना चाहिए। वे कहते हैं, वे राम जी के द्वार पर खड़े रहते हैं — आपके और मेरे द्वार पर नहीं।

161

भगवान का टैटू हो, तो नहाने का पानी नाली में जाने से क्या दोष लगता है?

मन को नाली जैसा रखने से पहले दोष लगता है

· 1:58:42–1:59:59 · Also a question

पूछा गया कि भगवान का टैटू बनवाने के बाद नहाने का पानी नाली में जाए, तो क्या दोष नहीं लगेगा। वक्ता उल्टा पूछते हैं: और जो भगवान हमारे भीतर बैठे हैं — मन में, आत्मा में, पाँच इंद्रियों में — जिन्हें लोग दिन-रात नाली की तरह गंदा रखते हैं, क्या वहाँ भगवान को कोई दोष नहीं लगता? इसी मन से हम मंत्र का चिंतन करते हैं; इसी मन से पुराणों की कथाएँ सुनते हैं और उसमें भगवान का भाव बनता है। उसी मन में हम भाव बनाते हैं कि भगवती जगदम्बा अष्टभुजा हैं, त्रिनेत्रा हैं, माथे पर चंद्रमा है, सिंह पर सवार हैं — और उसी मन में किसी स्त्री के बारे में गलत सोचते हैं, और उसी मन को नाली बना देते हैं। तब यह गलत नहीं लगता; पर टैटू का पानी नाली में जाना दोष है।

162

वक्ता के अनुसार कैसा टैटू नहीं बनवाना चाहिए?

केवल प्रतीक चिन्ह, पूरा स्वरूप नहीं

· 2:00:00–2:00:42 · Also a question

वक्ता कहते हैं, बाहरी शरीर पर टैटू और उसके पानी के नाली में जाने का विषय अलग है; फिर भी भगवान का प्रतीक चिन्ह ही बनवाना चाहिए। उनके विचार में पूरा स्वरूप भेद नहीं बनवाना चाहिए। पूछा गया कि कैसे पता चलेगा कि वर्ण परिवर्तन हुआ है। वे कहते हैं कि पूछने वाले शायद मंत्र विधि के अनुसार पूछ रहे हैं, और यह तभी आता है जब आप पूरा काम ठीक विधि से करें।

163

ब्रह्मदेव को कैसे शांत करें?

यह इस पर निर्भर है कि 52 प्रकार के ब्रह्म में से वे कौन-से हैं

· 2:00:43–2:01:21 · Also a question

पूछा गया कि ब्रह्मदेव को कैसे शांत करें। वक्ता कहते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि वे किस प्रकार के ब्रह्म हैं। ब्रह्म 52 प्रकार के होते हैं। बिना देखे, इसमें जो बातें सामान्य हैं, वे हैं शिव का अभिषेक और गीता का पाठ।

पूछा गया कि ब्रह्मदेव को कैसे शांत करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि वे किस प्रकार के ब्रह्म हैं। ब्रह्म 52 प्रकार के होते हैं। बिना देखे, जो बातें सामान्य हैं, वे ये हैं: शिव का अभिषेक, और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ।

164

काली और दुर्गा की असीम कृपा पाने के लिए क्या करें?

पहले समर्पण, फिर जो भी स्तुति मन को भाए

· 2:01:22–2:02:14 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अगर माँ कालिका और माँ दुर्गा की असीम कृपा पानी है, तो सबसे पहले भगवती के प्रति समर्पित हो जाइए। उनकी बहुत सारी स्तुतियाँ हैं: जो आपके मन को भाए और जो आप चाहें, उससे स्तुति कीजिए। तब बहुत अच्छा होगा।

165

क्या दूसरे देवताओं की पूजा से वैष्णव शरणागति टूटती है?

बिल्कुल नहीं — विवाह में पत्नी की शरणागति का उदाहरण

· 2:02:15–2:02:46 · Also a question

पूछा गया कि वैष्णव शरणागति लेने के बाद हनुमान या शिव जैसे दूसरे देवताओं की पूजा करने से क्या शरणागति टूटती है। वक्ता कहते हैं: नहीं, बिल्कुल नहीं टूटेगी। शरणागति को इस भाव से समझिए: जब पत्नी विवाह करके पाणिग्रहण संस्कार से किसी की वामांगी बनती है, तो कहीं न कहीं दोनों ने एक तरह से एक-दूसरे की शरणागति ली है — पत्नी ने पति की, और पति ने अपनी पत्नी की।

166

पति के साथ व्यवहार अलग, ऊँचा और दिव्य रहता है, जबकि विवाह से बने नए परिवार के साथ व्यवहार सामान्य रहता है।

पति के साथ अलग, ऊँचा और दिव्य व्यवहार; बाकी सबके साथ सामान्य

· 2:02:47–2:03:23

पर इसके साथ, जब विवाह होता है, तो पति को नए सास-ससुर, नए साले-सालियाँ मिलते हैं, नया परिवार बनता है; और जब पत्नी आती है, तो उसका भी यहाँ नया परिवार बनता है। तो ऐसा नहीं कि उसका व्यवहार, शरणागति का भाव, प्रेम का व्यवहार केवल पति के साथ ही रहेगा। पति के साथ वह अलग तरह का रहेगा, ऊँचे स्तर का, दिव्य, दोनों के बीच का; बाकी सबके साथ सामान्य रहेगा, सामाजिक और पारिवारिक रूप से प्रेमपूर्ण। इससे शरणागति नहीं बिगड़ेगी।

167

जब पत्नी पति के माता-पिता की सेवा अपने माता-पिता की तरह करती है, तो पति और भी प्रसन्न होता है; इष्ट देवता भी इसी तरह प्रसन्न होते हैं।

जब उसके माता-पिता की सेवा अपने माता-पिता की तरह हो, तो पति और प्रसन्न होता है

· 2:03:24–2:04:02

अगर वह ससुर की सेवा अपने पिता की तरह करती है, तो पति और भी प्रसन्न होगा — वह हमारे पिता को अपना पिता मान रही है, हमारी माँ को अपनी माँ मान रही है; वह समर्पित हो जाएगा। इसी तरह, जब आप नारायण की सेवा कर रहे हैं और उनकी शरणागति ली है, और भाव से, किसी भी कारण, पर्व काल में या किसी भी समय, हनुमान की सेवा या शिव की सेवा करते हैं, तो भगवान अवश्य प्रसन्न होंगे।

168

हनुमान साक्षात रुद्र के अवतार हैं, और ब्रह्मा, विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं है।

हनुमान रुद्र के अवतार हैं, और ब्रह्मा, विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं

· 2:04:03–2:04:25

वक्ता पूछते हैं, ये अलग कहाँ हैं? हनुमान साक्षात रुद्र के अवतार हैं, और ब्रह्मा, विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं है, इसके अनगिनत प्रमाण दिए गए हैं। तो कोई कठिनाई नहीं है। बस आपके मन में यह भाव नहीं आना चाहिए कि हमारी शरणागति टूट रही है।

वक्ता पूछते हैं, ये अलग कहाँ हैं? हनुमान साक्षात रुद्र के अवतार हैं, और ब्रह्मा, विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं है, इसके बहुत-बहुत प्रमाण दिए गए हैं। तब कोई कठिनाई नहीं है। हाँ, आपके मन में यह भाव नहीं आना चाहिए कि हमारी शरणागति टूट रही है।

169

शिव महापुराण पंचायतन पूजन के बारे में क्या कहता है?

पंचदेव पूजन का विधान है, और बड़े वैष्णवों ने रुद्राभिषेक किया

· 2:04:26–2:04:59 · Also a question

वक्ता कहते हैं, पंचदेव पूजन के लिए, पंचायतन पूजन के लिए, शिव महापुराण में भी कहा गया है — उन्होंने इस पर चर्चा की थी — तो कोई कठिनाई नहीं है। वे पूछते हैं, क्या हम, जो भगवती विंध्यवासिनी की सेवा करते हैं, अगले दिन महादेव की सेवा नहीं करते? सब करते हैं। जो बड़े परम वैष्णव हैं — उन सबने रुद्राभिषेक आदि किया।

170

शिव और विष्णु एक-दूसरे के शत्रुओं के बारे में क्या कहते हैं?

विष्णु-द्रोही शिव को कभी स्वीकार नहीं, और शिव-द्रोही विष्णु को कभी नहीं

· 2:05:00–2:05:37 · Also a question

वक्ता पूछते हैं, रुद्र रूप में स्वयं शिव कौन हैं; विष्णु के अनुसार वे कौन हैं? विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं होना चाहिए। शिव कहते हैं: जो विष्णु का शत्रु है, वह मुझे कभी स्वीकार नहीं। विष्णु कहते हैं: जो शिव से द्रोह करता है, वह मुझे कभी स्वीकार नहीं। दोनों ने यह कहा है। विष्णु की कृपा से शिव भक्ति मिलती है; शिव की कृपा से विष्णु भक्ति मिल रही है। और हनुमान हर जगह हैं — भगवती के मंडल में भी, नारायण के मंडल में भी, और वे साक्षात शिव के अवतार हैं।

171

स्त्री को गायत्री मंत्र की जगह क्या करना चाहिए?

गायत्री की जगह पंचाक्षरी; तीनों एक ही दिन प्रकट हुए

· 2:05:38–2:06:06 · Also a question

एक श्रोता से वक्ता कहते हैं कि यह बहुत अच्छी बात है कि वे गायत्री मंत्र नहीं कर रहीं: आप स्त्री हैं, तो गायत्री मंत्र की जगह आपको पंचाक्षरी मंत्र करना चाहिए, जैसा बार-बार कहा गया है। पंचाक्षरी, गायत्री और प्रणव — तीनों एक ही दिन, एक ही समय, शिव से, महाशिवरात्रि पर प्रकट हुए, जैसा आज उन्होंने चर्चा की। पहले प्रणव, फिर पंचानन स्वरूप, और फिर चतुर्मुख स्वरूप से त्रिपदा गायत्री प्रकट हुई।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 10.16–22

The order of origination given — Pranav (Om) first from Shiva's five mouths, then the Panchakshara mantra from the Pranav, then the Tripada Gayatri from the four-faced form — is exactly the sequence Shiva's teaching to Brahma and Vishnu follows in this chapter.

मूल पाठ पढ़ें →
16

उपादिशं निजं मन्त्रमोङ्कारमुरुमङ्गलम्। ॐकारो मन्मुखाज्जज्ञे प्रथमं मत्प्रबोधकः॥ १६

मैंने अपने महामंगलकारी मन्त्र ओंकारका उपदेश किया। ओंकार सबसे पहले मेरे मुखसे प्रकट हुआ। वह मेरा बोध करानेवाला है।

17

वाचकोऽयमहं वाच्यो मन्त्रोऽयं हि मदात्मकः। तदनुस्मरणं नित्यं ममानुस्मरणं भवेत्॥ १७

यह वाचक है और मैं वाच्य हूँ। यह मन्त्र मेरा स्वरूप ही है। उसका नित्य स्मरण मेरा ही स्मरण होता है।

18

अकार उत्तरात् पूर्वमुकारः पश्चिमाननात्। मकारो दक्षिणमुखाद् बिन्दुः प्राङ्मुखतस्तथा॥ १८

पहले उत्तरवर्ती मुखसे अकार और पश्चिम मुखसे उकार निकला। दक्षिण मुखसे मकार तथा पूर्ववर्ती मुखसे बिन्दु निकला।

19

नादो मध्यमुखादेवं पञ्चधासौ विजृम्भितः। एकीभूतः पुनस्तद्वदोमित्येकाक्षरोऽभवत्॥ १९

मध्यवर्ती मुखसे नाद निकला। इस प्रकार यह पाँच रूपोंमें फैला। फिर उसी प्रकार एक होकर यह ओम् इस रूपमें एक अक्षर बन गया।

20

नामरूपात्मकं सर्वं वेदभूतकुलद्वयम्। व्याप्तमेतेन मन्त्रेण शिवशक्त्योश्च बोधकः॥ २०

नाम और रूपवाला सब कुछ और वेदमें बताये प्राणियोंके दोनों कुल इस मन्त्रसे व्याप्त हैं। और यह शिव और शक्तिका बोध करानेवाला है।

21

अस्मात् पञ्चाक्षरं जज्ञे बोधकं सकलस्य तत्। अकारादिक्रमेणैव नकारादि यथाक्रमम्॥ २१

इससे पंचाक्षर मन्त्र उत्पन्न हुआ। वह सकल रूपका बोध करानेवाला है। वह अकारादि क्रमसे ही और क्रमशः नकारादि क्रमसे प्रकट हुआ।

22

अस्मात् पञ्चाक्षराज्जाता मातृकाः पञ्चभेदतः। तस्माच्छिरश्चतुर्वक्त्रात्त्रिपाद्गायत्रिरेव हि॥ २२

इस पंचाक्षर मन्त्रसे पाँच भेदोंसे मातृका वर्ण उत्पन्न हुए। उससे शिरोमन्त्र निकला, और निश्चय ही चार मुखोंसे त्रिपदा गायत्री ही प्रकट हुई।

172

गायत्री कौन कर सकता है और पंचाक्षरी किसे करना चाहिए?

जिनका अधिकार है और जो वैदिक विधि से जीते हैं; बाकी लोग पंचाक्षरी करें

· 2:06:07–2:06:40 · Also a question

वक्ता कहते हैं, जिनका गायत्री का अधिकार है और जो वैदिक विधि से जीते हैं, वे गायत्री करें; बाकी लोग पंचाक्षरी करें। स्त्रियाँ, और जो यज्ञोपवीत नहीं पहनते, वे नमः — चतुर्थी विभक्ति नमः — बाद में लगाकर इसी तरह जप करें। वही गायत्री है। यह उनके पाँच मुखों से प्रकट हुई: उन पाँच मुखों से पंचमुखी विद्या, पंचाक्षरी विद्या प्रकट हुई, हर मुख एक अक्षर से दर्शाया गया।

शास्त्र क्या कहता है

The Panchakshara mantra is presented in the text as the source from which Gayatri itself later arose, supporting the claim that Panchakshari can substitute for Gayatri.

The chapter establishes the genealogy (Pranav -> Panchakshara -> Gayatri) but does not itself state a rule about who must use which mantra — that adhikāra rule is the speaker's own extrapolation.

मूल पाठ पढ़ें →
16

उपादिशं निजं मन्त्रमोङ्कारमुरुमङ्गलम्। ॐकारो मन्मुखाज्जज्ञे प्रथमं मत्प्रबोधकः॥ १६

मैंने अपने महामंगलकारी मन्त्र ओंकारका उपदेश किया। ओंकार सबसे पहले मेरे मुखसे प्रकट हुआ। वह मेरा बोध करानेवाला है।

17

वाचकोऽयमहं वाच्यो मन्त्रोऽयं हि मदात्मकः। तदनुस्मरणं नित्यं ममानुस्मरणं भवेत्॥ १७

यह वाचक है और मैं वाच्य हूँ। यह मन्त्र मेरा स्वरूप ही है। उसका नित्य स्मरण मेरा ही स्मरण होता है।

18

अकार उत्तरात् पूर्वमुकारः पश्चिमाननात्। मकारो दक्षिणमुखाद् बिन्दुः प्राङ्मुखतस्तथा॥ १८

पहले उत्तरवर्ती मुखसे अकार और पश्चिम मुखसे उकार निकला। दक्षिण मुखसे मकार तथा पूर्ववर्ती मुखसे बिन्दु निकला।

19

नादो मध्यमुखादेवं पञ्चधासौ विजृम्भितः। एकीभूतः पुनस्तद्वदोमित्येकाक्षरोऽभवत्॥ १९

मध्यवर्ती मुखसे नाद निकला। इस प्रकार यह पाँच रूपोंमें फैला। फिर उसी प्रकार एक होकर यह ओम् इस रूपमें एक अक्षर बन गया।

20

नामरूपात्मकं सर्वं वेदभूतकुलद्वयम्। व्याप्तमेतेन मन्त्रेण शिवशक्त्योश्च बोधकः॥ २०

नाम और रूपवाला सब कुछ और वेदमें बताये प्राणियोंके दोनों कुल इस मन्त्रसे व्याप्त हैं। और यह शिव और शक्तिका बोध करानेवाला है।

21

अस्मात् पञ्चाक्षरं जज्ञे बोधकं सकलस्य तत्। अकारादिक्रमेणैव नकारादि यथाक्रमम्॥ २१

इससे पंचाक्षर मन्त्र उत्पन्न हुआ। वह सकल रूपका बोध करानेवाला है। वह अकारादि क्रमसे ही और क्रमशः नकारादि क्रमसे प्रकट हुआ।

22

अस्मात् पञ्चाक्षराज्जाता मातृकाः पञ्चभेदतः। तस्माच्छिरश्चतुर्वक्त्रात्त्रिपाद्गायत्रिरेव हि॥ २२

इस पंचाक्षर मन्त्रसे पाँच भेदोंसे मातृका वर्ण उत्पन्न हुए। उससे शिरोमन्त्र निकला, और निश्चय ही चार मुखोंसे त्रिपदा गायत्री ही प्रकट हुई।

173

कौन-से पाँच मुख पाँच अक्षर देते हैं, और पंचाक्षरी को क्या कहा गया है?

सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष, ईशान — और लघु गायत्री

· 2:06:41–2:07:06 · Also a question

सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष, ईशान: इन पाँच मुखों से पाँच अक्षर निकले और पंचाक्षरी बनी। वक्ता कहते हैं कि इसका वर्णन शिव महापुराण में है — हम अपने मन से नहीं कह रहे। और उस पंचाक्षरी को साक्षात गायत्री कहा गया है, लघु गायत्री के रूप में। जिनका गायत्री का अधिकार नहीं है, वे यह करेंगे। और यह बताया गया कि अगर आप गायत्री मंत्र की दस माला नहीं कर सकते, जो लंबा है, तो पंचाक्षरी की दस माला करें। किसी और मंत्र को यह महत्व नहीं दिया गया।

174

हर तरह के व्यक्ति के लिए वक्ता रोज़ का न्यूनतम क्या बताते हैं?

रोज़ दस माला — गायत्री या पंचाक्षरी, और स्त्रियों के लिए शिवाय नमः

· 2:07:07–2:07:34 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अगर आप किसी पंथ में दीक्षित हैं, तो वहाँ गुरु जो देते हैं, वह अलग विषय है, और आपको उसी मंत्र का जप करना चाहिए। पर जो सामान्य रूप से यज्ञोपवीत पहनते हैं, उन्हें रोज़ गायत्री या पंचाक्षरी की दस माला अवश्य करनी चाहिए। स्त्री को चतुर्थी विभक्ति बाद में लगाकर रोज़ शिवाय नमः की दस माला करनी चाहिए। वे कहते हैं, यही मूल है।

175

क्या अभी युग का अंतिम अवसर चल रहा है?

ब्रह्मा का 51वाँ वर्ष, सातवें मनु, और 28वाँ महायुग

· 2:07:35–2:08:33 · Also a question

वक्ता कहते हैं, युग का अंतिम अवसर नहीं चल रहा। दूसरे परार्ध का पहला भाग अभी शुरू ही हुआ है। ब्रह्मा के पचास वर्ष बीत चुके हैं; अब 51वाँ वर्ष चल रहा है। यह सातवें मनु हैं; मनु चौदह हैं, और जब चौदह मनुओं का शासन पूरा होगा, तब प्रलय आएगा। अभी केवल सातवें हैं; अभी सात और मनु आएँगे। और एक मनु का युग 71 महायुग का है — यानी चारों युग 71 बार बीतेंगे। अभी 28वाँ चल रहा है। प्रलय आने में बहुत-बहुत लंबा समय है; और प्रलय भी चार प्रकार का होता है।

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जो भस्म लगाता है और भगवती की सेवा करता है, उससे अप्सराएँ और परियाँ दूर रहती हैं।

भस्म लगाने वाले और भगवती के सेवक से अप्सराएँ दूर रहती हैं

· 2:08:34–2:10:31

चैनल पर अप्सरा साधना या परी साधना का वीडियो माँगा गया। वक्ता कहते हैं कि उन्होंने पहले भी कहा है कि अप्सराएँ और परियाँ उनसे बहुत दूर रहती हैं, उनसे नाराज़ रहती हैं — वे उन्हें श्राप न दे दें। वे कहते हैं, हम भगवती की सेवा करेंगे, महादेव की सेवा करेंगे, रुद्रदेव की सेवा करेंगे, रुद्राभिषेक करेंगे। अप्सराएँ और परियाँ आकर क्या करेंगी — जैसे भस्म लगाने वाला और दिन-रात इस तरह रहने वाला उन्हें कोई आकर्षण दे सके।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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