महाशिवरात्रि किसकी रात्रि है, और पितर पहली बार कैसे उत्पन्न हुए — रुद्र संहिता, सती खंड
महाशिवरात्रि और पितरों की उत्पत्ति पर एक लाइव सत्र।
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सती खंड से यह तय होता है कि पितर पहले से थे या किसी की मृत्यु के बाद बने।
पितर योनि पहले से तय थी या मृत्यु से बनी
वक्ता बताते हैं कि शिव महापुराण की रुद्र संहिता के सती खंड से वे जानेंगे कि पितर पहली बार कैसे बने। क्या सृष्टि बनने के बाद किसी की मृत्यु हुई और तब पितर बने? या पितर योनि भगवान ने पहले से तय कर दी थी, और पितर पहले से दिव्य रूप में मौजूद थे?
शुरुआत में विषय बताया गया है: शिव पुराण की रुद्र संहिता का सती खंड, और उसमें यह प्रश्न कि पितृ पहली बार कैसे अस्तित्व में आए। वे दोनों संभावनाएं साफ़ रखते हैं। या तो सृष्टि बनने के बाद किसी की मृत्यु हुई और वह पितर बना। या पितर योनि भगवान ने पहले से तय कर रखी थी, और पितर पहले से दिव्य रूप में मौजूद हैं। वे कहते हैं, यह विषय जानना ज़रूरी है।
नए साधक के लिए चमत्कार का क्या अर्थ है?
नए साधक के लिए चमत्कार है अनुभव और ज्ञान मिलना
वे कहते हैं कि चमत्कार एक अलग विषय है। पर नए साधकों के लिए चमत्कार बस यही है कि आपको अपने जीवन से जुड़ी किसी बात का अनुभव मिले, और ख़ास तौर पर ज्ञान मिले। अगर बुद्धि खुलने लगे और सद्बुद्धि मिलने लगे, तो यही सबसे बड़ी बात है।
वे बताते हैं कि लगभग चौदह-पंद्रह लोगों ने निजी संदेश भेजे। उन्होंने जीवन में पहली बार चारों प्रहर की पूजा की, और उसे कठिन नहीं, आसान पाया। वे उस रात के अनुभवों के बारे में भी यही कहते हैं। वे कहते हैं, चमत्कार एक अलग विषय है। नए साधकों के लिए चमत्कार यह है कि आपको अपने जीवन से जुड़ी किसी बात का अनुभव मिले, और ख़ास तौर पर ज्ञान मिले। अगर बुद्धि खुलने लगे, सद्बुद्धि मिलने लगे, तो वे कहते हैं, यही सबसे बड़ी बात है।
विद्वान अब महाशिवरात्रि के बारे में क्या दावा कर रहे हैं?
आज के दो दावे: उस दिन विवाह नहीं हुआ, और पहला ज्योतिर्लिंग
एक दावा यह है कि शिव और पार्वती का विवाह महाशिवरात्रि पर नहीं हुआ, और किसी पुराण में इसका वर्णन नहीं है। दूसरे लोग कहते हैं कि उस रात शिव पहली बार ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए। वक्ता कहते हैं कि दूसरे लोग भी ग़लत कह रहे हैं, क्योंकि वे उस दिन भी प्रकट नहीं हुए।
वे कहते हैं कि हर जगह महाशिवरात्रि पर शिव और पार्वती का विवाह दिखाया जाता है। और अब विद्वान लोग कह रहे हैं कि नहीं, उस दिन विवाह नहीं हुआ, और इसका वर्णन किसी भी पुराण में नहीं मिलता। तो वे पूछते हैं, हम उसी दिन विवाह क्यों दिखाते हैं, और यह प्रथा कहां से आई? उस दिन कुछ और हुआ था। वह क्या था? वे कहते हैं, कुछ लोग कह रहे हैं और पोस्ट कर रहे हैं कि उस रात शिव पहली बार ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए, इसलिए हम शिवरात्रि मनाते हैं। वे कहते हैं, यह भी ग़लत कहा जा रहा है। वे उस दिन प्रकट नहीं हुए।
जिन्होंने महाशिवरात्रि मनाई, उन्हें शंका तुरंत दूर करनी चाहिए, नहीं तो गठबंधन पूजा का फल चला जाता है।
पूजा के बाद मन में शंका पूजा का फल नष्ट कर देती है
क्योंकि श्रोताओं ने एक दिन पहले महाशिवरात्रि मनाई और शिव और जगदंबा की गठबंधन पूजा की। वे पूछते हैं, अगर अब मन में इस पर शंका बैठ जाए, तो उस पूजा का फल कैसे मिलेगा? शंका दूर होनी चाहिए, इसलिए वे यह विषय सामने रखते हैं।
वे कहते हैं कि पूरी बात अलग से प्रमाण के साथ रखी जाएगी, कि कहां और कैसे लिखा है। पर आज संक्षेप में जान लेना चाहिए। कारण तुरंत का है। श्रोताओं ने एक दिन पहले पर्व मनाया, और शिव और मां जगदंबा के गठबंधन की पूजा की। वे पूछते हैं, अगर अब मन में शंका आ जाए, तो उस पूजा का फल कैसे मिलेगा? वह शंका दूर होनी चाहिए, इसीलिए वे अभी यह विषय सामने रखते हैं।
शिव पहली बार ज्योतिर्लिंग रूप में कब प्रकट हुए?
मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष तृतीया, महाशिवरात्रि नहीं
वे कहते हैं, मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को, महाशिवरात्रि पर नहीं। यह श्रोता शिव महापुराण कथा सुनते समय शुरू की विद्येश्वर संहिता में पहले ही जान चुके हैं।
वे कहते हैं, श्रोता शिव पुराण की कथा पहले से सुन रहे हैं, तो शुरू की विद्येश्वर संहिता में यह जान चुके हैं। वहां बताया है कि शिव मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए, महाशिवरात्रि पर नहीं।
शास्त्र क्या कहता है
The Vidyeshwar Samhita gives the month and asterism of Shiva's first pillar-form appearance as the origin the speaker is pointing to for the Jyotirlinga.
The text confirms the month Mārgaśīrṣa but names the asterism Ārdrā nakṣatra, not a Kṛṣṇa Pakṣa Tṛtīyā tithi — a nakshatra and a tithi are different reckonings, and the text nowhere gives Tritiya.
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यत्पुनः स्तम्भरूपेण स्वाविरासमहं पुरा। स कालो मार्गशीर्षे तु स्यादार्द्राऋक्षमर्भकौ॥ १५
हे पुत्रो! जब मैं पहले स्तम्भके रूपमें स्वयं प्रकट हुआ था, वह समय मार्गशीर्ष मासमें आर्द्रा नक्षत्रका था।
आर्द्रायां मार्गशीर्षे तु यः पश्येन्मामुमासखम्। मद्वेरमपि वा लिङ्गं स गुहादपि मे प्रियः॥ १६
मार्गशीर्षमें आर्द्रा नक्षत्रके दिन जो उमासहित मेरा, मेरी मूर्तिका अथवा लिंगका दर्शन करे, वह मुझे गुहसे भी अधिक प्रिय है।
महाशिवरात्रि की रात क्या हुआ?
पंचानन रूप में प्रकट होना और प्रणव, गायत्री व पंचाक्षरी का जन्म
वे कहते हैं, महाशिवरात्रि की रात शिव ब्रह्मा और विष्णु के सामने साकार रूप में, पंचानन स्वरूप में प्रकट हुए। उस दिन प्रणव, गायत्री और पंचाक्षरी मंत्र, तीनों शिव के मुख से निकले। ब्रह्मा और विष्णु को इन तीनों की गुरु दीक्षा मिली।
वक्ता कहते हैं कि महाशिवरात्रि की रात शिव ब्रह्मा और विष्णु के सामने साकार रूप में प्रकट हुए, पंचानन स्वरूप में। प्रणव, गायत्री मंत्र और पंचाक्षरी मंत्र, तीनों की उत्पत्ति उस दिन शिव के मुख से हुई। और तीनों की गुरु दीक्षा ब्रह्मा और विष्णु को मिली। वे कहते हैं, जो पहली गुरु-शिष्य परंपरा शुरू हुई, वह महाशिवरात्रि की उसी रात से, उसी दिन से शुरू हुई।
ब्रह्मा और विष्णु शिव और पार्वती के पहले शिष्य बने, और शिव ने वरदान दिया कि यह रात महाशिवरात्रि नाम से प्रसिद्ध होगी।
पहले शिष्य, और रात का नाम रखने वाला वरदान
दीक्षा लेकर वे शिव और मां पार्वती के पहले शिष्य बने। फिर दोनों ने शिव की पूजा की। शिव ने महाशिवरात्रि का वरदान दिया, यह कहकर कि यह रात महाशिवरात्रि नाम से प्रसिद्ध होगी।
वे कहते हैं, दीक्षा मिलने के बाद ब्रह्मा और विष्णु शिव और मां पार्वती के पहले शिष्य बने। दीक्षा पाकर दोनों ने फिर शिव की पूजा की। और शिव ने यह कहकर महाशिवरात्रि का वरदान दिया कि यह रात महाशिवरात्रि नाम से प्रसिद्ध होगी।
शिव और पार्वती का विवाह किन तिथियों पर माना जाता है?
कल्प भेद: मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीया और वैशाख शुक्ल पंचमी
विवाह के प्रश्न पर वे श्रोता को फिर कल्प भेद में ले जाते हैं। अलग-अलग पुराणों में थोड़े अलग वर्णन हैं, संकेत के रूप में। मुख्य रूप से दो दिए गए हैं: मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष द्वितीया तिथि, और वैशाख शुक्ल पंचमी। इन दिनों भगवती पार्वती और शिव का विवाह हुआ।
वे कहते हैं, विवाह के बारे में फिर कल्प भेद में जाना होगा। अलग-अलग पुराणों में थोड़े अलग वर्णन मिलेंगे, सांकेतिक रूप में। वे कहते हैं कि पूरी लग्न पत्रिका आदि जल्द ही श्रोताओं के सामने रखी जाएगी। दो मुख्य बताए गए हैं। पहला, मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि। दूसरा, वैशाख शुक्ल पंचमी। कहा गया है कि इन दिनों भगवती पार्वती और शिव का विवाह हुआ।
शिव नवरात्र प्रतिपदा से शुरू होता है या पंचमी से?
शिव नवरात्र पंचमी से शुरू होता है, इसलिए गिनती पर ही मतभेद है
शिव नवरात्र में भी माना गया है कि सप्तमी तक, नवमी को विवाह हुआ। पर वे पूछते हैं, फिर किस दिन को नवमी माना जा रहा है? क्योंकि शिव नवरात्र पंचमी से शुरू होता है, प्रतिपदा से नहीं। वे कहते हैं, मतभेद इसीलिए होते हैं कि लोग शास्त्र प्रमाण सामने नहीं रखते।
महाशिवरात्रि के विवाह के पीछे की सच्चाई क्या है?
सती दाह, शिव का भटकना, और सुदर्शन चक्र
सच्चाई शुरू होती है जब भगवती सती ने यज्ञ की अग्नि में अपना शरीर जला दिया। शिव मोह में आकर उन्हें उठाकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। और विष्णु के चलाए सुदर्शन चक्र से भगवती सती का शरीर टुकड़ों में बंट गया।
वे कहते हैं, असलियत यह है। जब भगवती सती का सती दाह हुआ, यानी उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपना शरीर भस्म कर दिया, तब शिव मोह में आकर उन्हें उठाकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। फिर विष्णु का सुदर्शन चक्र चला, और उससे भगवती सती का शरीर बंट गया, उसके टुकड़े हो गए।
भगवती सती का हृदय कहां गिरा?
वैद्यनाथ क्षेत्र हृदय पीठ, और वहां की शक्ति जया दुर्गा
वे कहते हैं, वैद्यनाथ क्षेत्र में, यानी आज के झारखंड राज्य के देवघर में भगवती सती का हृदय गिरा। यह शक्ति पीठ है, साक्षात शक्ति पीठ। उस हृदय पीठ की अधिष्ठात्री शक्ति जया दुर्गा हैं। वे वहां की महाशक्ति हैं, और हृदय गिरने पर वहां प्रकट हुईं।
वे कहते हैं, आप सब जान लें कि वैद्यनाथ क्षेत्र में भगवती सती का हृदय गिरा है। सोचिए: जगदंबा का हृदय देवघर में गिरा, उस राज्य में जो आज झारखंड कहलाता है। यह शक्ति पीठ है, साक्षात प्रकट शक्ति पीठ। उस हृदय पीठ की अधिष्ठात्री शक्ति जया दुर्गा बनीं। वे उस स्थान की महाशक्ति हैं। वे वहां पहले से मौजूद हुईं। जब सती का हृदय उस जगह गिरा, तब भगवती वहां प्रकट हुईं।
शिव वैद्यनाथ में कैसे विराजमान हुए?
रावण को दिया गया आत्मलिंग, और गणपति की लीला
वहां सती का हृदय गिरा था, इसलिए शिव उस जगह हृदय के रूप में ही विराज सकते थे। इसलिए एक लीला रची गई। आत्मलिंग, जो स्वयं शिव थे, रावण को ज्योतिर्लिंग के रूप में दिया गया। रावण उसे लंका ले जाना चाहता था और उसी रास्ते से गया। वैद्यनाथ क्षेत्र में गणपति ने लीला की और ज्योतिर्लिंग वहीं स्थापित हो गया।
वक्ता कहते हैं, यह कथा जानिए कि शिव वहां कब विराजमान हुए। उस जगह भगवती सती का हृदय गिरा था, इसलिए शिव वहां हृदय के रूप में ही विराज सकते थे। इसलिए एक लीला रची गई। आत्मलिंग, जो साक्षात शिव थे, रावण को ज्योतिर्लिंग के रूप में दिया गया। पूरे ब्रह्मांड में वह एक ही आत्मलिंग था। रावण उसे लंका ले जाना चाहता था और उसी रास्ते से गया। उस क्षेत्र में, भगवान वैद्यनाथ के क्षेत्र में पहुंचकर गणपति ने लीला रची, और उस जगह ज्योतिर्लिंग स्थापित हो गया। तो जहां वह आत्मलिंग स्थापित है, उसी जगह भगवती सती विराजमान हैं।
वैद्यनाथ क्षेत्र को चिता भूमि क्यों कहते हैं?
चिता भूमि और भस्म क्षेत्र, और मणिकर्णिका में तर्पण
क्योंकि इसे चिता भूमि कहा जाता है। माना जाता है कि भगवती सती का अंतिम संस्कार, दाह संस्कार उसी क्षेत्र में हुआ। वैद्यनाथ क्षेत्र को चिता भूमि और भस्म क्षेत्र कहते हैं। पर तर्पण सरस्वती नदी के किनारे मणिकर्णिका क्षेत्र में हुआ। सरस्वती अब लुप्त है और अदृश्य रूप में है। उस जगह शिव ने अंतिम संस्कार नहीं किया।
वे समझाते हैं कि इसे चिता भूमि कहा जाता है। माना जाता है कि भगवती सती का अंतिम संस्कार, दाह संस्कार भी उसी क्षेत्र में हुआ। तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। सरस्वती नदी के किनारे, मणिकर्णिका क्षेत्र में हुआ। वह सरस्वती जो इस समय लुप्त हो चुकी है और अदृश्य रूप में विराजमान है। वे कहते हैं, उस जगह शिव ने अंतिम संस्कार नहीं किया। उस जगह तर्पण की बात कही गई है। वैद्यनाथ क्षेत्र को चिता भूमि कहते हैं, और भस्म क्षेत्र कहते हैं।
वैद्यनाथ क्षेत्र की पूरी स्थापना कब हुई?
पार्वती अवतार के बाद ही पूरी स्थापना, सब देवताओं की उपस्थिति में
भगवती सती वहां पहले से विराजमान हुईं। पर उस क्षेत्र की पूरी स्थापना तभी हुई जब उन्होंने फिर पार्वती रूप में अवतार लिया। रावण लिंग उठा नहीं सका, तो उसे अंगूठे से दबाकर चला गया। जब वह उसे ले नहीं जा सका और स्थापना हो गई, तब सब देवी-देवता वहां उपस्थित हुए।
उस जगह भगवती सती पहले से विराजमान हुईं। और फिर जब उन्होंने पार्वती स्वरूप में अवतार लिया, तभी उस क्षेत्र की पूरी स्थापना हुई। वही जगह जहां रावण ज्योतिर्लिंग, आत्मलिंग को ले गया और जहां स्थापना हुई। रावण जब उसे ले नहीं जा सका, तो अंगूठे से दबाकर चला गया। और जब वह ज्योतिर्लिंग को नहीं ले जा सका और वहां स्थापना हो गई, तब सब देवता और देवियां उस जगह उपस्थित हुए।
वैद्यनाथ में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात क्या हुआ?
जया दुर्गा और वैद्यनाथ का गठबंधन, ब्रह्मा और विष्णु ने कराया
वे कहते हैं, कई कल्पों और युगों के बाद जया दुर्गा रूप में भगवती सती और शिव वहां मिले, और उनका गठबंधन हुआ। ब्रह्मा और विष्णु ने इसे कराया। वह रात फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात कहलाती है, वही महाशिवरात्रि है। वहां से उन सबके लिए आशीर्वाद मिला जो उस दिन भगवती और भगवान का गठबंधन करें। इस तरह वहां एक विवाह हुआ।
कई कल्पों और कई युगों के बाद भगवती सती, जो जया दुर्गा रूप में हैं, और शिव दोनों वहां मिले। इसलिए उस जगह दोनों का गठबंधन हुआ। वे कहते हैं, ब्रह्मा और विष्णु ने मां और बाबा का गठबंधन कराया। वह रात फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात कहलाती है। वही महाशिवरात्रि है। गठबंधन वहीं से शुरू हुआ, और वहीं से उन सबके लिए आशीर्वाद मिला जो उस दिन भगवती और भगवान का गठबंधन कराएँ। इस रूप में वहां एक विवाह हुआ।
वैद्यनाथ जयंती कब मनाई जाती है?
वैद्यनाथ जयंती और पुनर्मिलन एक ही रात
वे साफ़ कहते हैं कि भगवान वैद्यनाथ और मां जया दुर्गा का विवाह महाशिवरात्रि की फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी की रात हुआ। वैद्यनाथ जयंती उसी दिन मनाई जाती है। उसी दिन दोनों का विवाह, यानी पुनर्मिलन हुआ, और उस क्षेत्र की स्थापना पूरी हुई।
वे कहते हैं, भगवान वैद्यनाथ और मां जया दुर्गा का विवाह महाशिवरात्रि की फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी की रात हुआ। वे श्रोताओं से कहते हैं, इसे साफ़ समझ लीजिए। वैद्यनाथ जयंती भी हम उसी दिन मनाते हैं। और उसी दिन दोनों का विवाह, यानी पुनर्मिलन हुआ, और उस क्षेत्र की स्थापना पूरी हुई, महाशिवरात्रि की महारात्रि को ही।
वैद्यनाथ हृदय पीठ के लिए संकल्प में कौन-से शब्द बोले जाते हैं?
संकल्प में हृदय पीठ, और हर ज्योतिर्लिंग पर गठबंधन का वरदान
वहां हृदय था, इसलिए वह हृदय प्रदेश है। वे कहते हैं, संकल्प लेते समय संकल्प में "हृदय पीठ पीठाधीश्वरी भगवती जया दुर्गा" बोला जाता है, और "आत्मलिंग स्वरूपाय महा ज्योतिर्लिंगाय क्षेत्रे बाबा वैद्यनाथ" भी बोला जाता है। उसी वरदान से यह प्रथा बनी कि उस दिन हर ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में गठबंधन होता है।
वे कहते हैं, इसी कारण वरदान मिला, आशीर्वाद दिया गया, और यह प्रथा बनी कि उस दिन हर ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में गठबंधन होता है। शिव और पार्वती के पुनर्मिलन के प्रतीक रूप में उस दिन वैवाहिक वर्षगांठ मनाई जाती है। क्योंकि कई कल्पों के बाद वे वहां उस रूप में स्थापित हुए, क्योंकि वहां हृदय था। वह हृदय प्रदेश है। इसलिए जब हम संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेते हैं, तो संकल्प में हृदय पीठ पीठाधीश्वरी भगवती जया दुर्गा बोला जाता है। और वे कहते हैं, हम आत्मलिंग स्वरूपाय महा ज्योतिर्लिंगाय क्षेत्रे बाबा वैद्यनाथ बोलते हैं।
शिव और पार्वती के विवाह का मुख्य स्थान कहां है?
वैशाख शुक्ल पंचमी को त्रियुगी नारायण, और कल्प भेद से कनखल
वे कहते हैं, शिव और पार्वती का मुख्य विवाह उत्तराखंड के त्रियुगी नारायण मंदिर का है, और उसका वर्णन वैशाख शुक्ल पंचमी में आता है। दूसरा, कल्प भेद से, सती से जुड़ा कनखल क्षेत्र है। अब सती खंड शुरू हो रहा है, तो उसका वर्णन भी आएगा।
वह आशीर्वाद मिला था, इसलिए यह बात हर जगह मानी जाने लगी, और हर जगह विवाह उत्सव मनाया जाता है। वे कहते हैं, शिव और पार्वती का बाकी मुख्य विवाह जो हुआ, वह उत्तराखंड का त्रियुगी नारायण मंदिर है, और उसका वर्णन वैशाख शुक्ल पंचमी में आता है। दूसरा, कल्प भेद के अनुसार, सती से जुड़ा कनखल क्षेत्र है। उसका वर्णन भी बहुत जल्द आएगा, क्योंकि आज से सती खंड शुरू हो रहा है।
जो महाशिवरात्रि के विवाह को झूठा कहते हैं, उन्होंने रावणेश्वर वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग क्षेत्र का प्रमाण कभी नहीं पढ़ा।
रावणेश्वर वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग जाकर वहां का प्रमाण पढ़ें
वे श्रोताओं से कहते हैं कि लोगों के ग़लत कहने पर मन में शंका न लाएं। वे कहते हैं, ऐसा कहने वालों ने बाबा वैद्यनाथ के बारे में कभी कुछ नहीं पढ़ा। वे रावणेश्वर वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग क्षेत्र जाएं, वहां सारे प्रमाण देखें, और बाबा वैद्यनाथ जयंती के बारे में पढ़ें। वे कहते हैं कि पूजा-पाठ पूरा होने पर वे लिखित प्रमाण चैनल पर डालेंगे।
वे श्रोताओं से कहते हैं, लोगों के यह कहने पर कि यह ग़लत है, वह ग़लत है, मन में यह शंका मत लाइए। अगर आदमी को ज्ञान ही नहीं है, तो वह क्या कहेगा? वे ऐसे आलोचकों से कहते हैं, आपने बाबा वैद्यनाथ के बारे में कभी कुछ नहीं पढ़ा। अब वे पूछेंगे कि यह प्रमाण किस ग्रंथ में है। ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में जाइए, रावणेश्वर वैद्यनाथ बाबा ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में, वहां जाकर इस विषय के सारे प्रमाण देखिए। बाबा वैद्यनाथ जयंती पढ़िए। लिखित प्रमाण के बारे में वे कहते हैं कि उन्होंने यह सब बहुत पहले पढ़ा था, और याद है क्योंकि वे शुरू से यह पर्व मनाते आए हैं। वे कहते हैं, जैसे ही समय मिलेगा, पूजा-पाठ पूरा होने पर वे इसे चैनल पर भी डालेंगे, ताकि लोग कम से कम विषय देख सकें। वहां गठबंधन का वर्णन मिलेगा, वह उत्सव जो ब्रह्मा और विष्णु ने पुनर्मिलन के लिए पूरे विधि विधान से मनाया।
वैद्यनाथ के वर्णन में सिंदूर दान नहीं है; वहां प्रतीक रूप में पुनर्मिलन मिलता है।
सिंदूर दान का वर्णन नहीं; केवल प्रतीक रूप में पुनर्मिलन
वे कहते हैं, अगर आप वहां यह खोजने जाएं कि सिंदूर दान हुआ या नहीं, तो यही ग़लत है। उसका वर्णन कहीं नहीं मिलेगा। आपको जो मिलेगा वह है प्रतीक रूप में जो कुछ हुआ, यानी पुनर्मिलन। और वह ग़लत बात नहीं है। इसीलिए उस दिन मां और बाबा का पूरा वैवाहिक महोत्सव मनाया जाता है और वैवाहिक वर्षगांठ की शुभकामनाएं कही जाती हैं।
अब सिंदूर दान हुआ या नहीं, वे कहते हैं, अगर आप वहां यह सब खोजने जाएंगे, तो वही ग़लत बात है। इसका वर्णन कहीं नहीं मिलने वाला। आपको वे बातें मिलेंगी जो प्रतीक रूप में हुईं, जो पुनर्मिलन हुआ। वह पूरी बात आपको मिलेगी। वह ग़लत बात नहीं है। इसी उद्देश्य से उस दिन हम मां और बाबा का पूरा वैवाहिक महोत्सव मनाते हैं, और वैवाहिक वर्षगांठ की शुभकामनाएं कहते हैं।
महाशिवरात्रि के विवाह को नकारना खंडोबा और मलसा के विवाह और शिव के हर दूसरे रूप को नकारना होगा।
खंडोबा और मलसा: एक विवाह नकारें तो सब नकारने होंगे
वे तर्क देते हैं कि कुछ ग़लत नहीं कहा जा रहा। हरि अनंत, हरि कथा अनंता। शिव ने कितने अवतार लिए, कितने रूप लिए। क्या शिव ने कोई ऐसा अवतार नहीं लिया जिसमें विवाह हुआ? क्या खंडोबा और मलसा का विवाह नहीं हुआ? वहां जगदंबा ने भी दो रूपों में अवतार लिया। अगर आप यह नहीं मानेंगे, तो क्या आप कहेंगे कि उस दिन वैवाहिक वर्षगांठ की शुभकामना महादेव की नहीं, खंडोबा और मलसा की है, और वे पार्वती और शिव नहीं हैं?
वे ज़ोर देकर कहते हैं कि कुछ ग़लत नहीं कहा जा रहा। हरि अनंत, हरि कथा अनंता। भगवान ने कितने अवतार लिए, कितने रूपों में प्रकट हुए। क्या शिव ने कोई ऐसा अवतार नहीं लिया जिसमें विवाह हुआ? क्या खंडोबा और मलसा का विवाह नहीं हुआ? महाराष्ट्र की तरफ़ वहां भी जगदंबा ने दो रूप धरकर अवतार लिया। वहां भी उनका विवाह हुआ। वे कहते हैं, तो अगर आप यह नहीं मानेंगे, तो क्या आप कहेंगे कि उस दिन आप वैवाहिक वर्षगांठ की शुभकामना महादेव को नहीं देते, वह खंडोबा की है, मलसा की है, और ये माता पार्वती और शिव नहीं हैं? ऐसा नहीं होने वाला।
इस रात का महत्व दोगुना है, क्योंकि पहले से स्थापित महाशिवरात्रि पर परमेश्वर का प्रकृति से मिलन हुआ।
उस रात प्रकृति और परम पुरुष का मिलन हुआ
महाशिवरात्रि पहले से थी और प्रचलन में थी, इसलिए उसका महत्व दोगुना हो गया। वे कहते हैं, उस दिन परम सत्ता वहां हृदय के रूप में विराजमान थी, और उस परमेश्वर का प्रकृति से मिलन हुआ। उस दिन, महाशिवरात्रि में, प्रकृति और परम पुरुष मिले, और उनका गठबंधन और पूरा पूजन हुआ।
वे कहते हैं, इसकी महिमा इसलिए बढ़ी क्योंकि महाशिवरात्रि पहले से थी और प्रचलन में थी। इसलिए इसका महत्व दोगुना हो गया। और वे कहते हैं, इससे भी बड़ी बात सोचिए: उस दिन किसी का हृदय, परम सत्ता, वहां हृदय के रूप में विराजमान थी। और उस परम परमेश्वर का प्रकृति से मिलन हुआ। उस दिन, महाशिवरात्रि पर, प्रकृति और परम पुरुष मिले, इसलिए उनका गठबंधन और पूरा पूजन आदि हुआ। उस दिन का महत्व बढ़ा, गठबंधन की प्रथा पूरी दुनिया में फैली, और हर कोई वह पुण्य लेना चाहता है।
बाबा वैद्यनाथ में गठबंधन कब नहीं होता?
महाशिवरात्रि से पहले के एक-दो दिन छोड़कर सालभर 365 दिन गठबंधन
केवल महाशिवरात्रि से ठीक पहले के एक-दो दिनों में वहां गठबंधन का काम रुकता है। क्योंकि उन दिनों पूरी सफ़ाई और तैयारी चल रही होती है, और संकल्प पूजन आदि चल रहा होता है। वे कहते हैं, नहीं तो पूरे 365 दिन वहां जाने वालों का गठबंधन होता है।
वे कहते हैं, आज भी जब भी आप बाबा वैद्यनाथ क्षेत्र जाएं, केवल महाशिवरात्रि से पहले के एक-दो दिन ऐसे होते हैं जिनमें गठबंधन का काम रुकता है। कारण यह है कि उन दिनों पूरी सफ़ाई और सारी तैयारी चल रही होती है, और संकल्प पूजन आदि चल रहा होता है। नहीं तो पूरे 365 दिन वहां गठबंधन होता है। जो लोग जाते हैं, वे गठबंधन कराते हैं। वहां मां पार्वती और शिव का गठबंधन होता है, और यही परंपरा रही है।
वैद्यनाथ की गठबंधन परंपरा कितनी पुरानी है?
त्रेता युग से, जब से रावण ने लिंग स्थापित किया
वे कहते हैं, अगर युगों के हिसाब से भी गिनें, तो त्रेता युग से, जब से रावण उसे उस जगह स्थापित करके चला गया। वे श्रोताओं से कहते हैं, यह विचार मन से पूरी तरह निकाल दीजिए कि विवाह नहीं हुआ। वे कहते हैं, पहले यह शंका दूर करना ज़रूरी था।
वे कहते हैं, त्रेता युग से। अगर युगों के अनुसार भी गिनें, तो त्रेता युग से, जब से रावण उसे उस जगह स्थापित करके चला गया। वे कहते हैं, तो यह सोच अपने मन से निकाल दीजिए, यह विचार कि विवाह नहीं हुआ। पहले यह शंका दूर करना ज़रूरी था।
शक्ति पीठ आख़िर क्यों हैं?
सती के 108 खंड, जिनमें 51 प्रकट और बाकी गुप्त
अगर भगवती सती ने अपने शरीर की बलि न दी होती, हम सबके लिए वह त्याग न किया होता, तो पूरी दुनिया में कोई शक्ति पीठ न होता और इतनी भक्ति न होती। भगवती आदिशक्ति ने अपना शरीर त्यागकर जला दिया। माना जाता है कि वह कई टुकड़ों में, 108 खंडों में बंटा। कलि काल होने से उनमें 51 प्रकट हैं और बाकी गुप्त।
श्री गणपति के स्मरण के साथ सती खंड का सती चरित्र शुरू करते हुए वे कहते हैं: अगर भगवती सती ने अपने शरीर की बलि न दी होती, हम सबके लिए वह त्याग न किया होता, तो आज पूरी दुनिया में कहीं कोई शक्ति पीठ न होता, न इतनी भक्ति होती। भगवती आदिशक्ति ने अपना शरीर त्यागकर जला दिया, और माना जाता है कि वह कई टुकड़ों में है: 108 खंड गिने जाते हैं। और आज की गिनती में, कलि काल यानी कलियुग होने से, 51 प्रकट हैं और बाकी गुप्त। तो भगवती सती का चरित्र शुरू कैसे हुआ, और साथ में वे शंकाएं जिन पर सनातन संस्कृति में इतना विवाद है, वे कहते हैं, यही विषय समझना है।
ब्रह्मा से पहली कन्या कौन प्रकट हुई?
मानस पुत्रों के बाद प्रकट हुई संध्या
ब्रह्मा ने अपने सब मानस पुत्रों को जन्म दिया। उनमें सब ऋषि थे, सप्त ऋषि आदि, नारद, सब। उसके बाद पहली कन्या प्रकट हुई, जिसका नाम संध्या है। जब सृष्टि रचनी थी, तब दक्ष प्रजापति आदि सब पहले बनाए जा चुके थे।
वे कहते हैं, ब्रह्मा ने अपने सब मानस पुत्र प्रकट किए, उन्हें जन्म दिया। मानसी पुत्रों में सब ऋषि थे, सप्त ऋषि आदि, नारद, सब। उसके बाद पहली कन्या प्रकट हुई, और उस पहली कन्या का नाम संध्या है। वे कहते हैं, जब सृष्टि रचनी थी, तब दक्ष प्रजापति आदि सब पहले ही बनाए जा चुके थे।
शास्त्र क्या कहता है
Brahma's manas-putra sons (Marichi, Atri, Pulaha, Pulastya, Angira, Kratu, Vasistha, Narada, Daksha, Bhrigu) were created, and Sandhya arose from his mind at that same time.
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सृष्ट्वा प्रजापतीन्दक्षप्रमुखान्सुरसत्तमान् । अमन्यं सुप्रसन्नोऽहं निजं सर्वमहोन्नतम् ॥
दक्ष आदि प्रमुख प्रजापतियों की तथा देवश्रेष्ठों की रचना करके मैं बड़ा ही प्रसन्न हुआ तथा अपने को सबसे महान् समझने लगा।
मरीचिमत्रिं पुलहं पुलस्त्याङ्गिरसौ क्रतुम् । वसिष्ठं नारदं दक्षं भृगुं चेति महाप्रभून् ॥
मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, अंगिरा, क्रतु, वसिष्ठ, नारद, दक्ष तथा भृगु — इन महान् प्रभुतासम्पन्न मानस पुत्रों —
ब्रह्माहं मानसान्पुत्रानसर्जं च यदा मुने । तदा मन्मनसो जाता चारुरूपा वराङ्गना ॥
हे मुने! जिस समय मुझ ब्रह्मा ने इन मानस पुत्रों की सृष्टि की, उसी समय मेरे मन से एक सुन्दर रूपवाली श्रेष्ठ युवती भी उत्पन्न हुई।
जिसमें भी अहंकार हो, भगवान उसका अहंकार ले लेते हैं, ब्रह्मा भी अपवाद नहीं, जैसे नारद मोह की कथा में।
अहंकार आने पर ब्रह्मा को भी नहीं छोड़ा जाता
क्योंकि जब भी किसी को अहंकार होता है, भगवान वह अहंकार ले लेते हैं, चाहे वह स्वयं ब्रह्मा हों। वे याद दिलाते हैं कि पिछली बार श्रोताओं ने नारद मोह की कथा सुनी। जब नारद का मोह बढ़ा, तो उनका मोह ले लिया गया। जब ब्रह्मा भी ख़ुद को विधाता मानकर अहंकार करते हैं, तो परब्रह्म परमेश्वर उसे हटाने के लिए लीला रचते हैं। ब्रह्मा को बहुत अहंकार हो गया।
वक्ता कहते हैं, जब सृष्टि रचनी थी और सब बन चुके थे, तब देखिए क्या होता है: जब भी किसी को अहंकार होता है, चाहे वह स्वयं ब्रह्मा हों, भगवान वह अहंकार ले लेते हैं। वे याद दिलाते हैं, पिछली बार नारद मोह की कथा सुनी। जब नारद का मोह बढ़ा, तो उनका मोह उनसे ले लिया गया। तो ब्रह्मा भी जब ख़ुद को विधाता मानकर अहंकार करते हैं, तो परब्रह्म परमेश्वर वह अहंकार लेने के लिए लीलाएं रचते हैं, रचते रहते हैं। ब्रह्मा को बहुत बड़ा अहंकार हो गया।
ब्रह्मा को सृष्टि रचने की सामर्थ्य कैसे मिली?
शिव के पांच मुख अलग-अलग कल्पों में ज्ञान देते हैं
शिव एक बार पंचानन स्वरूप में प्रकट हुए। उसके बाद अलग-अलग कल्पों में, जब भी ब्रह्मा ने सृष्टि रचने का प्रयास किया, शिव ने हर बार अलग रूप लिया: सद्योजात का रूप, वामदेव का रूप, ईशान का रूप, अघोर का रूप, या तत्पुरुष का रूप। अलग-अलग कल्पों में ये पांच रूप लेकर उन्होंने ब्रह्मा को फिर ज्ञान दिया और सामर्थ्य दी। शिव की सामर्थ्य से ही वे विधाता बने।
वे कहते हैं, आप सब जान लें कि शिव एक बार पंचानन स्वरूप में प्रकट हुए। उसके बाद अलग-अलग कल्पों में, जब ब्रह्मा ने सृष्टि रचने का प्रयास किया, तब हर कल्प में शिव ने अलग रूप लिया। चाहे सद्योजात का रूप हो, वामदेव का रूप, ईशान का रूप, अघोर का रूप, या तत्पुरुष का रूप। अलग-अलग कल्पों में ये पांच रूप लेकर शिव ने ब्रह्मा को फिर ज्ञान दिया और सामर्थ्य दी। शिव की सामर्थ्य से ही वे विधाता बने। पर वक्ता कहते हैं, जैसे ही रचना हो जाती है, भाव बदल जाता है। जब तक काम नहीं हुआ, तब तक "हे प्रभु, आप"। जैसे ही काम हुआ, "हमने किया"।
कर्तापन के अभिमान के बारे में गीता क्या सिखाती है?
कर्तापन का अभिमान वर्जित है
यह कि कर्तापन का अभिमान नहीं होना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता पढ़िए, अपने आराध्य की गीता पढ़िए। हर जगह कहा गया है कि कर्ता होने का अभिमान नहीं होना चाहिए: कि हम घर चला रहे हैं, हम दुनिया चला रहे हैं, हम पूरा अस्पताल चला रहे हैं, हम पूरा ऑफ़िस चला रहे हैं। यह अभिमान नहीं होना चाहिए। हम कर्ता नहीं हैं; कर्ता भगवान हैं।
वे कहते हैं, यही बात बार-बार कही गई है: श्रीमद्भगवद्गीता पढ़िए, अपने आराध्य की गीता पढ़िए। हर जगह कहा गया है कि कर्तापन का अभिमान नहीं होना चाहिए। कि हम ही करने वाले हैं। कि हम घर चला रहे हैं, हम दुनिया चला रहे हैं, हम पूरा अस्पताल चला रहे हैं, हम पूरा ऑफ़िस चला रहे हैं। यह अभिमान नहीं होना चाहिए। वे कहते हैं, हम कर्ता नहीं हैं। कर्ता भगवान हैं।
क्या भक्त को अपने जप का अभिमान हो सकता है?
अपने जप, परिक्रमा और यात्रा का अभिमान भी ले लिया जाता है
हां। भक्त को भी अहंकार हो जाता है कि हमने एक रात में 500 माला जप किया। जैसे ही वह अभिमान आया, भगवान वह अभिमान ले लेंगे। अगर आपको अभिमान हो कि आपने गोवर्धन परिक्रमा की, त्रिकोण यात्रा की, कि यह कर्म करके आपको वह चीज़ मिली, तो जब भी अभिमान आएगा, अपनी भक्ति का, अपने जप का, वह हटा दिया जाएगा।
वे कहते हैं, जब कर्तापन का अभिमान, अहंकार आता है, तो भक्त को भी अहंकार हो जाता है: कि हमने कल रात, पूरी रात, 500 माला जप किया। आपको अभिमान हो गया है। अब भगवान वह अभिमान ले लेंगे। अब आपको अभिमान हो गया कि आपने गोवर्धन परिक्रमा की; अभिमान कि आपने त्रिकोण परिक्रमा की। जब भी आपको अभिमान होगा, अपनी भक्ति का, अपने जप का, अपने पाए किसी भी चीज़ का, कि यह कर्म करके यह मिला, वह ले लिया जाएगा।
सनातन के अलावा दूसरे पंथ कहते हैं कि अपनी सफलता का आनंद लो, पर सनातन कहता है कि उसे माता-पिता को समर्पित करो।
अपनी सफलता का आनंद लो, बनाम प्राप्त का समर्पण
वक्ता कहते हैं कि दूसरी जगहों पर, सनातन के अलावा सभी पंथों में, कहा जाता है कि तुमने मेहनत की है, तो अपनी सफलता का आनंद लो। सनातन संस्कृति में बड़ी सफलता पाकर भी कहा जाता है कि इसे माता-पिता को समर्पित करो, भगवान को समर्पित करो। हम समर्पण करते हैं कि जो कुछ मिला है, वह आपकी कृपा से और आपके आशीर्वाद से मिला है। कर्तापन के अभिमान को मना किया गया है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी जगहों पर, सनातन के अलावा जो भी पंथ हैं, वहाँ कहा जाता है कि तुमने मेहनत की है, अपनी सफलता का आनंद लो। वे पूछते हैं, क्या हमारे यहाँ ऐसा है? सनातन संस्कृति को देखिए: बड़ी सफलता पाकर भी कहा जाता है कि इसे अपने माता-पिता को समर्पित करो, भगवान को समर्पित करो। हम समर्पण करते हैं कि हाँ, जो कुछ मिला है, वह आपकी कृपा से, आपके आशीर्वाद से मिला है। कर्तापन के अभिमान को मना किया गया है। और ब्रह्मा जी को कर्तापन का बहुत बड़ा अभिमान हो गया।
संध्या कैसे प्रकट हुईं?
ब्रह्मा जी के आत्ममुग्ध मन से, प्रातः और सायं संध्या के रूप में
ब्रह्मा जी आत्ममुग्धता में पूरी तरह मोहित हो गए कि जो वे चाहेंगे, वही होगा। वे खुद को बहुत बड़ा समझने लगे। जब ऐसी आत्ममुग्धता आई और वे खुद को ऐश्वर्य वाला मानने लगे, तब उनके मन से बहुत सुंदर रूप वाली एक उत्तम युवती उत्पन्न हुई। उसका नाम संध्या हुआ: प्रातः संध्या और सायं संध्या, दो रूप।
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्मा जी को कर्तापन का बहुत बड़ा अभिमान हो गया, और आत्ममुग्धता से वे पूरी तरह मोहित हो गए कि जो हम चाहेंगे, वही होगा। वे खुद को बहुत बड़ा समझने लगे। फिर जब इस तरह आत्ममुग्धता आई और वे खुद को ऐश्वर्य वाला मानने लगे, तब उनके मन से बहुत सुंदर रूप वाली एक उत्तम युवती उत्पन्न हुई। उसका नाम संध्या हुआ: प्रातः संध्या और सायं संध्या, दो रूप।
शास्त्र क्या कहता है
Having created the Prajapatis, Brahma became filled with pride, considering himself most exalted; it was then that the beautiful woman Sandhya arose from his mind, later known in her morning and evening forms.
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सृष्ट्वा प्रजापतीन्दक्षप्रमुखान्सुरसत्तमान् । अमन्यं सुप्रसन्नोऽहं निजं सर्वमहोन्नतम् ॥
दक्ष आदि प्रमुख प्रजापतियों की तथा देवश्रेष्ठों की रचना करके मैं बड़ा ही प्रसन्न हुआ तथा अपने को सबसे महान् समझने लगा।
मरीचिमत्रिं पुलहं पुलस्त्याङ्गिरसौ क्रतुम् । वसिष्ठं नारदं दक्षं भृगुं चेति महाप्रभून् ॥
मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, अंगिरा, क्रतु, वसिष्ठ, नारद, दक्ष तथा भृगु — इन महान् प्रभुतासम्पन्न मानस पुत्रों —
ब्रह्माहं मानसान्पुत्रानसर्जं च यदा मुने । तदा मन्मनसो जाता चारुरूपा वराङ्गना ॥
हे मुने! जिस समय मुझ ब्रह्मा ने इन मानस पुत्रों की सृष्टि की, उसी समय मेरे मन से एक सुन्दर रूपवाली श्रेष्ठ युवती भी उत्पन्न हुई।
नाम्ना सन्ध्या दिवाक्षान्ता सायं संध्या जपन्तिका । अतीव सुन्दरी सुभ्रूर्मुनिचेतोविमोहिनी ॥
वह संध्या के नाम से प्रसिद्ध हुई, जो प्रातःसंध्या तथा सायंसंध्या के रूप में क्रमशः दिवाक्षान्ता तथा जपन्तिका कही गयी। वह अत्यन्त सुन्दरी, सुन्दर भौंहोंवाली तथा मुनियों के मनको मोहित करनेवाली थी।
शिव महापुराण से संध्या का कौन सा नाम बच्चे को दिया जा सकता है?
दिवक्षान्ता, संध्या का एक नाम, गृहस्थों के बच्चों के लिए
वक्ता कहते हैं कि शिव महापुराण में गृहस्थ आश्रम में रहने वालों के लिए, जब आगे उनके बच्चे हों, बहुत अच्छे नाम हैं। वे कहते हैं कि दिवक्षान्ता संध्या का एक नाम है, और यह बहुत सुंदर नाम है।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ एक बहुत अच्छा नाम है। आप सब जो गृहस्थ आश्रम में रहते हैं, और आगे जब आपके बच्चे हों, उनके लिए शिव पुराण में कितने अच्छे नाम हैं। दिवक्षान्ता संध्या का एक नाम है। यह बहुत सुंदर नाम है।
शास्त्र क्या कहता है
Divākṣāntā is named in the text as Pratah Sandhya's own name (with Japantikā for evening Sandhya).
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नाम्ना सन्ध्या दिवाक्षान्ता सायं संध्या जपन्तिका । अतीव सुन्दरी सुभ्रूर्मुनिचेतोविमोहिनी ॥
वह संध्या के नाम से प्रसिद्ध हुई, जो प्रातःसंध्या तथा सायंसंध्या के रूप में क्रमशः दिवाक्षान्ता तथा जपन्तिका कही गयी। वह अत्यन्त सुन्दरी, सुन्दर भौंहोंवाली तथा मुनियों के मनको मोहित करनेवाली थी।
जब स्वामी अभिमान करता है तो सेवक भी करते हैं, और सप्तऋषि भी ब्रह्मा जी के अभिमान में साझी हुए।
स्वामी को अभिमान तो सेवकों को भी, और ब्रह्मचर्य उसे बढ़ाता है
क्योंकि सात ऋषियों और दूसरों ने ब्रह्मा जी की मदद की थी, और जब स्वामी को अभिमान होता है तो सेवक भी अभिमान करते हैं। सबको अभिमान हो रहा था कि हम सब कुछ करने में समर्थ हैं। कहीं न कहीं अपने ब्रह्मचर्य के कारण, ब्रह्मचारी होने के कारण भी सबको अभिमान हो रहा था। वे यही सोच रहे थे, तभी संध्या प्रकट हुईं।
वक्ता कहते हैं कि उनके प्रकट होने के बाद, क्योंकि सात ऋषियों, सप्तऋषि आदि और बाकी सबने ब्रह्मा जी की मदद की थी — जब स्वामी को अभिमान होता है, तो सेवक भी अभिमान करते हैं। सबको अभिमान हो रहा था कि हम सब कुछ करने में समर्थ हैं। और कहीं न कहीं अपने ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। के कारण, ब्रह्मचारी होने के कारण भी सबको अभिमान हो रहा था। इस तरह वे अभी सोच ही रहे थे, और उसी समय संध्या प्रकट हुईं।
संध्या के प्रकट होने पर ऋषियों के मन में क्या हुआ?
विक्षोभ, शिव की माया, और कामदेव का जन्म
जब संध्या प्रकट हुईं, तो उन्हें देखकर सबके मन में विक्षोभ पैदा हुआ। वक्ता कहते हैं कि यह महाशिव की माया चल रही है। जैसे ही वह माया प्रकट हुई, शिव ने अपनी लीला शुरू कर दी। उसी क्षण, जब सब एक स्त्री को देखकर उस तरह सोचने लगे, तब कामदेव, जिन्हें ब्रह्मा जी का पहला पुत्र माना जाता है, वहाँ प्रकट हुए।
जब संध्या प्रकट हुईं, तो उन्हें देखकर सबके मन में विक्षोभ पैदा हुआ। वक्ता कहते हैं कि यह महाशिव की माया चल रही है। जैसे ही वह माया प्रकट हुई, शिव ने अपनी लीला शुरू कर दी। उसी समय, जब सब लोग उन्हें देखकर, एक स्त्री को देखकर, उस तरह सोचने लगे, तब कामदेव, जिन्हें ब्रह्मा जी का पहला पुत्र माना गया है, वहाँ प्रकट हुए।
प्रकट होते ही कामदेव ने क्या पूछा?
उनका प्रश्न: मैं कौन हूँ और मेरा काम क्या होगा
उनका रूप अत्यंत सुंदर था। प्रकट होकर उन्होंने हाथ जोड़कर पूछा कि वे कौन हैं और उनका काम क्या होगा। मुझे मेरे बारे में बताइए, आज्ञा दीजिए कि आगे मुझे क्या करना है, और मुझे कौन सी आज्ञा माननी है।
वक्ता कहते हैं कि कामदेव का रूप अत्यंत सुंदर था, उनका स्वरूप बहुत सुंदर था। जब वे प्रकट हुए, तो प्रकट होकर उन्होंने पूछा: हम कौन हैं, और मेरा काम क्या होगा? उन्होंने पूछा, मुझे मेरे बारे में बताइए, आज्ञा दीजिए कि आगे मुझे क्या करना है। और हाथ जोड़कर पूछा कि मुझे कौन सी आज्ञा माननी है।
ब्रह्मचर्य रखने वालों का तेज कैसा होता है?
तपस्वियों के शरीर का तेज, और ब्रह्मा जी के सुंदर मन से जन्मे मन्मथ
वक्ता कहते हैं, तपस्या करने वालों को देखिए, तपस्वियों को, बहुत जप करने वालों को, पूरे नियम और निष्ठा से ब्रह्मचर्य रखकर रहने वालों को: उनके शरीर का तेज बिल्कुल अलग होता है, चाहे स्त्री हो या पुरुष। उन्हें देखकर लोग विचलित हो जाते हैं, तुरंत लगता है कि यह अलग तरह का तेज है। और ये कामदेव थे, जिन्हें मन्मथ कहते हैं, जो सीधे ब्रह्मा जी के मन के सुंदर विचार से प्रकट हुए।
ब्रह्मा जी उनकी सुंदरता देखकर विचार करने लगे। वक्ता कहते हैं, कोई भी बहुत सुंदर — तपस्या करने वालों को देखिए, तपस्वियों को देखिए, बहुत जप करने वालों को, पूरे नियम और निष्ठा से ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। रखकर रहने वालों को: उनके शरीर का तेज बिल्कुल अलग होता है, चाहे स्त्री हो या पुरुष। उन्हें देखकर लोग विचलित हो जाते हैं। उन्हें देखते ही लगता है कि यह बिल्कुल दूसरी तरह का तेज है। और ये कामदेव थे, जिन्हें मन्मथ कहते हैं, जो सीधे ब्रह्मा जी के मन के सुंदर विचार से प्रकट हुए। उन्हें देखकर ब्रह्मा जी सोचने लगे कि इन्हें क्या वरदान दिया जाए और क्या कहा जाए, क्योंकि इनके आने से सबके मन में विक्षोभ पैदा हो गया था।
ब्रह्मा जी ने कामदेव को क्या वरदान दिया?
फूलों के पाँच बाण, और यह वरदान कि कोई उनसे बच न सकेगा
ब्रह्मा जी ने फूलों के पाँच बाण दिए और कहा: सृष्टि की रचना में, सनातन सृष्टि की रचना में सहायता करो। इन पाँच बाणों से त्रिलोकी का कोई देवी-देवता बच नहीं पाएगा, और कोई इनका उल्लंघन नहीं कर सकेगा। साथ ही उन्होंने यह वरदान भी दिया कि हम, वासुदेव और शंकर भी तुम्हारे वश में रहेंगे — दूसरे प्राणियों की तो बात ही क्या।
वक्ता कहते हैं, फिर ब्रह्मा जी ने फूलों के पाँच बाण दिए और कहा कि सृष्टि की रचना में, सनातन सृष्टि की रचना में तुम्हें सहायता करनी है। इन पाँच बाणों से इस त्रिलोकी का कोई देवी या देवता बच नहीं पाएगा। कोई इसका उल्लंघन नहीं कर सकेगा। और साथ में उन्होंने यह वरदान भी दिया कि हम, वासुदेव और शंकर भी तुम्हारे वश में रहेंगे — फिर दूसरे प्राणियों की तो बात ही क्या। वक्ता कहते हैं कि मोह में वे सब कुछ कहते चले गए।
वरदान पाते ही कामदेव का पहला विचार था कि इसे वहीं खड़े ब्रह्मचारियों पर परखा जाए।
भस्मासुर वाली स्थिति — सभा पर वरदान की परीक्षा
वक्ता कहते हैं कि यहाँ भस्मासुर वाली बात हो गई। जैसे ही ये शब्द कहे गए, कामदेव के मन में पहला विचार आया कि जब यह वरदान मिला है, तो इसे यहीं परखता हूँ — सब ब्रह्मचारी वहीं खड़े थे।
वक्ता कहते हैं, जैसे ही यह कहा गया, यहाँ भस्मासुर वाली बात हो गई। कामदेव के मन में सबसे पहला विचार यही आया: अच्छा, जब हमें यह वरदान मिला है, तो इसे यहीं परखते हैं — सब ब्रह्मचारी यहीं खड़े हैं। वे कहते हैं, जो ब्रह्म की तरह आचरण करते हैं, ब्रह्म को धारण करते हैं, वे ऐसा काम कभी नहीं कर सकते। और यह कभी नहीं हो सकता कि जिसमें विधाता, सारी सृष्टि के रचयिता, बसते हों, वह ऐसा करे।
ससुर को अपने बच्चे की बहू देखकर केवल खुशी होती है, कभी विकार नहीं; यही बताता है कि जो हुआ, वह नहीं होना चाहिए था।
ससुर बहू को बेटी की तरह देखता है
वक्ता कहते हैं, एक सरल उदाहरण लीजिए: जब माता-पिता अपने बच्चों का विवाह करते हैं, तो एक सुंदर बहू आती है, जो बेटी की तरह होगी। क्या ऐसा हो सकता है कि अपने बच्चे की बहू को देखकर किसी के मन में विकार आए? यह संभव नहीं है। खुशी होती है कि इतनी सुंदर बेटी घर में आई है।
वक्ता कहते हैं, एक सरल उदाहरण लीजिए। जब माता-पिता अपने बच्चों का विवाह करवाते हैं, तो एक बहू आती है, सुंदर, और वह बेटी की तरह होगी। तो क्या ऐसा हो सकता है कि अपने बच्चे की बहू को देखकर, वधू को देखकर, किसी के मन में विकार आए? यह संभव नहीं है। खुशी होती है कि इतनी सुंदर बेटी घर में आई है। ऐसा ही विचार आता है।
ऊँचा पद पाने के बारे में यह प्रसंग क्या सिखाता है?
ब्रह्मा एक पद है, और किसी भी पद पर अभिमान पतन लाता है
उन्होंने शिव महापुराण में पहले सुना है कि ब्रह्मा, विष्णु या महेश का पद भी पाया जा सकता है। फिर उन्हें देखिए जो मोक्ष नहीं पा रहे: ब्रह्मा एक पद है। उस पद पर जाकर भी अगर आप अभिमान करेंगे, तो बच नहीं सकते — चाहे आप इंद्र हों, वरुण, यम, कुबेर, दस दिक्पालों में से एक, या स्वयं ब्रह्मा।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ यही बात दिखाई गई है। अब तक उन्होंने शिव पुराण की पिछली कथा में सुना है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पद भी पाया जा सकता है। वे कहते हैं, फिर उन्हें देखिए जो मोक्ष नहीं पा रहे। ब्रह्मा एक पद है। उस पद पर जाकर भी अगर आप अभिमान करेंगे, तो बच नहीं सकते — चाहे आप इंद्र हों, वरुण, यम, कुबेर, दस दिक्पालों में से एक; कोई भी पद पाएँ, या स्वयं ब्रह्मा ही क्यों न हों। अगर आप अपनी रचना पर, अपने विधाता होने पर, अपनी श्रेष्ठता पर घमंड और अहंकार करते हैं — क्योंकि जब अभिमान आता है तो आप बेलगाम हो जाते हैं। फिर आप बनाई गई मर्यादाओं के खिलाफ आचरण करने लगते हैं और खुद को ही सब कुछ मानने लगते हैं। इस तरह उनका मन इतना विचलित हुआ कि जो वरदान आया, दे दिया, और भस्मासुर वाली स्थिति बन गई।
ब्रह्मा जी की सभा में कामदेव के बाण छोड़ने पर क्या हुआ?
पूरी सभा के मन में विकार पैदा होना
वहीं कामदेव ने अपने बाण छोड़ दिए, और बाण छूटने के कारण सबके मन में विकार पैदा हो गया।
वक्ता कहते हैं कि वहीं, जो कामदेव वहाँ मौजूद थे, उन्होंने अपने बाण छोड़ दिए। बाण छूटने के कारण सबके मन में विकार पैदा हो गया।
संध्या के प्रसंग को कैसे समझना चाहिए?
सांकेतिक, शारीरिक नहीं — संध्या का कोई शरीर नहीं
वक्ता कहते हैं कि वेदों के अनुसार इन बातों को समझना साधारण व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। ब्रह्मा, संध्या और सप्तऋषि को पुराणों के माध्यम से सांकेतिक ढंग से समझाया जा रहा है। संध्या शरीरधारी हैं ही नहीं। जैसे पृथ्वी का अपना कोई रूप नहीं है, फिर भी हम पढ़ते हैं कि पृथ्वी माता ने रूप धारण किया और जब महिषासुर ने उन्हें बहुत सताया, तो वे कैलाश भाग गईं।
जब विकार पैदा हुआ — वक्ता कहते हैं, अब देखिए: वेदों के अनुसार इन बातों को समझना साधारण आदमी के लिए संभव नहीं है। ब्रह्मा, संध्या, सप्तऋषि आदि: यही बात पुराण के माध्यम से सांकेतिक ढंग से समझाई जा रही है। संध्या शरीरधारी हैं ही नहीं। ब्रह्मा जी के बारे में वे जानते हैं कि उन्हें चतुर्मुख, पंचानन आदि कैसे कहा जाता है। समझाने के लिए यह बात यहाँ सांकेतिक ढंग से कही गई है। संध्या रूप कैसे धारण कर सकती हैं — पृथ्वी का कोई रूप नहीं है, फिर भी हम यहाँ पढ़ते हैं कि पृथ्वी माता ने सचमुच रूप धारण किया और जब महिषासुर ने उन्हें बहुत सताया, तो वे भागकर कैलाश लोक गईं; पृथ्वी लोक छीन लिया गया था।
संध्या किसी को मोहित क्यों नहीं कर सकती थीं?
संध्या सदा पवित्र है, और सेवा-पूजा का समय है
वक्ता पूछते हैं, वे सचमुच स्त्री का रूप कैसे धारण करती हैं? संध्या को हम सुबह की संध्या, शाम की संध्या, उषा और प्रत्युषा के रूप में जानते हैं। वे शरीरधारी कैसे हुईं? और संध्या किसी को भला कैसे मोहित कर सकती हैं? संध्या सदा पवित्र है। उसी समय में हमें सेवा और पूजा करनी होती है।
वक्ता पूछते हैं, वे सचमुच स्त्री का रूप कैसे धारण करती हैं? संध्या को हम सुबह की संध्या, शाम की संध्या, उषा और प्रत्युषा के रूप में जानते हैं। वे शरीरधारी कैसे हुईं? और संध्या किसी को भला किस तरह मोहित कर सकती हैं? संध्या सदा पवित्र है। उसी समय में हमें सेवा और पूजा करनी होती है। वे कहते हैं, यहाँ यही बात समझाई जा रही है: इसे समझिए।
ऋषियों ने कामदेव को क्या नाम दिया?
मन्मथ, और असर केवल क्षणार्ध तक
क्योंकि कामदेव ने सब पर बाण चलाए थे, ऋषियों ने कहा: तुम ब्रह्मा से जन्मे हो और तुमने सबके मन में विक्षोभ पैदा किया है, इसलिए तुम्हारा नाम मन्मथ होगा। फिर भी असर सबके मन पर केवल क्षणार्ध के लिए पड़ा, क्योंकि ब्रह्मा जी का वरदान था और उसका मान रखना था।
क्योंकि कामदेव ने सब पर बाण चलाया था, ऋषियों ने उनसे कहा: तुम ब्रह्मा से उत्पन्न हुए हो, और तुमने सबके मन में विक्षोभ पैदा किया है। उन्होंने कहा, इसलिए तुम्हारा नाम मन्मथ होगा। वक्ता जोड़ते हैं कि फिर भी असर सबके मन पर केवल आधे क्षण के लिए पड़ा, क्योंकि यह ब्रह्मा जी का वरदान था और उसका मान रखना था।
शास्त्र क्या कहता है
The sages (not Brahma) name the newly-appeared being Manmatha, explaining the name as meaning "you have churned (pramathase) our very being."
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यस्मात्प्रमथसे तत्त्वं जातोऽस्माकं यथा विधेः । तस्मान्मन्मथनामा त्वं लोके ख्यातो भविष्यसि ॥
"'चूँकि विधि से उत्पन्न होते ही तुमने हमारे तत्त्व को मथ डाला है, इसलिये तुम लोक में मन्मथ नाम से प्रसिद्ध होगे।
कामदेव और रति का विवाह कैसे हुआ?
दक्ष प्रजापति के शरीर से रति का प्रकट होना
फिर प्रजापति दक्ष की पुत्री प्रकट हुईं — उस समय दक्ष प्रजापति के शरीर से, रति नाम से; और कामदेव और रति का विवाह हुआ।
वक्ता कहते हैं, फिर प्रजापति दक्ष की जो पुत्री उस समय दक्ष प्रजापति के शरीर से प्रकट हुईं, उनका नाम रति था। और उनका विवाह हुआ — कामदेव और रति का।
उस क्षण शिव का आवाहन किसने किया, और कामदेव को तभी अशरीर क्यों नहीं किया गया?
धर्मराज द्वारा शिव का आवाहन, और ब्रह्मा जी का लीला को रोकना
जैसे ही विकार आदि पैदा हुए, वहाँ मौजूद धर्मराज ने तुरंत शिव का आवाहन किया। वक्ता कहते हैं कि उसी समय बहुत कुछ हो सकता था, पर ब्रह्मा जी ने वहाँ भी उस लीला को रोक रखा था — कि यह अभी नहीं होना चाहिए। क्या अभी नहीं होना चाहिए? कि कामदेव को अशरीर, यानी बिना शरीर का, कर दिया जाए।
वक्ता कहते हैं, जैसे ही विकार आदि पैदा हुए, धर्मराज वहाँ मौजूद थे, और धर्मराज ने तुरंत शिव का आवाहन किया। और देखिए, वे कहते हैं: उसी समय बहुत कुछ हो सकता था, पर ब्रह्मा जी ने वहाँ भी उस लीला को रोक रखा था। कि यह अभी नहीं होना चाहिए। क्या अभी नहीं होना चाहिए? कि कामदेव को अशरीर कर दिया जाए — यानी बिना शरीर का।
शास्त्र क्या कहता है
It was Dharma who invoked/praised Shiva at that moment, prompting his appearance to rebuke Brahma.
The verse's speaker tag names the deity Dharma (dharma uvāca), not "Dharmaraj" — a title normally denoting Yama. The speaker conflates the two.
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देवदेव महादेव धर्मपाल नमोऽस्तु ते । सृष्टिस्थितिविनाशानां कर्ता शंभो त्वमेव हि ॥
"हे देवदेव! हे महादेव! हे धर्मपाल! आपको नमस्कार है। हे शम्भो! सृष्टि, स्थिति और विनाश के कर्ता आप ही हैं।
प्रकट होकर शिव ने क्या कहा, और ब्रह्मा जी पर क्या असर हुआ?
शिव ने वरदान को कारण बताया, और ब्रह्मा जी को लज्जा हुई
जब शिव प्रकट हुए, तो उन्होंने सबसे कहा कि ब्रह्मनिष्ठ होकर भी वे कामदेव से इस तरह विचलित हुए, क्योंकि ब्रह्मा जी पहले ही ऐसा वरदान दे चुके थे — जब ऐसा वरदान दिया जाता है, तो ठीक यही होता है। शिव की बात सुनकर ब्रह्मा जी को वह वरदान देने पर कुछ लज्जा हुई।
वक्ता कहते हैं, जब शिव प्रकट हुए, तो शिव ने सबसे कहा कि ब्रह्मनिष्ठ होकर भी वे कामदेव के द्वारा इस तरह विचलित हुए, क्योंकि ब्रह्मा जी पहले ही इस तरह का वरदान दे चुके थे। जब ऐसा वरदान दिया जाता है, तो यही होता है। फिर शिव की बात सुनकर ब्रह्मा जी को थोड़ी लज्जा हुई — कि हमने ऐसा वरदान दे दिया।
ब्रह्मा जी से पितृगण कैसे उत्पन्न हुए?
ब्रह्मा जी के पसीने से जन्मे अग्निस्वात और ब्रह्मसद पितर
उनके शरीर से पसीना निकला — जैसे आदमी लज्जा या डर से पसीने में आ जाता है। शिव से डरकर और लज्जित होकर ब्रह्मा जी के शरीर से पसीना निकला, और उस पसीने से पितृगण उत्पन्न हुए। पितृगण कई तरह के माने गए हैं। ब्रह्मा जी के शरीर से जो उत्पन्न हुए, वे अग्निस्वात और ब्रह्मसद नाम से प्रसिद्ध हुए, जो सदा संसार से विमुख रहते हैं: 64,000 अग्निस्वात पितर और 86,000 ब्रह्मसद पितर माने गए हैं।
वक्ता कहते हैं, फिर उनके शरीर से पसीना निकला। जब आदमी लज्जित होता है या डरता है — शिव से डरकर और लज्जित होकर उनके शरीर से पसीना निकला, और उस पसीने से पितृगण उत्पन्न हुए। पितृ कई तरह के माने गए हैं। इनमें जो ब्रह्मा जी के शरीर से उत्पन्न हुए, वे अग्निस्वात और ब्रह्मसद नाम से प्रसिद्ध हुए। वे सदा संसार से विमुख रहते हैं। 64,000 अग्निस्वात पितर माने गए हैं; 86,000 ब्रह्मसद पितर माने गए हैं — जो ब्रह्मा जी के शरीर से उत्पन्न हुए।
शास्त्र क्या कहता है
Pitrs arose from the sweat of Brahma's shame/fear, numbering 64,000 of one class and 86,000 of a second class.
The counts match exactly, but the text names the second class Barhiṣad, not "Brahmasad" as the speaker says — a near-homophone slip, not what the verse says.
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मच्छरीरात्तु घर्माभो यत्पपात द्विजोत्तम । अग्निष्वात्ताः पितृगणा जाताः पितृगणास्ततः ॥
हे द्विजोत्तम! मेरे शरीर से जो पसीना गिरा, उससे अग्निष्वात्त तथा अन्य पितृगणों की उत्पत्ति हुई।
भिन्नाञ्जननिभाः सर्वे फुल्लराजीवलोचनाः । नितान्तयतयः पुण्याः संसारविमुखाः परे ॥
वे सभी अंजन के समान श्याम वर्णवाले, खिले हुए कमल के समान नेत्रोंवाले, अत्यन्त संयमी, पुण्यशाली तथा संसार से विमुख थे।
सहस्राणां चतुःषष्टिरग्निष्वात्ताः प्रकीर्तिताः । षडशीतिसहस्राणि तथा बर्हिषदो मुने ॥
चौंसठ हजार अग्निष्वात्त पितर, तथा हे मुने, छियासी हजार बर्हिषद् पितर कहे गये हैं।
उस समय और कौन से पितृ वर्ग उत्पन्न हुए?
चार ऋषियों से सोमपा, आज्यपा, सुकालीन और हविष्मान
दक्ष के शरीर से भी पितर उत्पन्न हुए। और वहाँ जो छह ऋषि थे, उनमें क्रतु, वशिष्ठ, पुलस्त्य और अंगिरा — इन चार ऋषियों को छोड़कर बाकी का इंद्रिय निग्रह था, यानी उनमें विकार नहीं आया। पर इन चार ऋषियों के मन में विकार आया, और उससे चार और तरह के पितर हुए: सोमपा, आज्यपा, सुकालीन और हविष्मान। ये सब पितर रूप में उत्पन्न हुए और कव्य ग्रहण करने वाले बने।
वक्ता कहते हैं, दक्ष के शरीर से भी पितर उत्पन्न हुए। और वहाँ जो मुनि थे, छह ऋषि, उनमें इन चार ऋषियों — क्रतु, वशिष्ठ, पुलस्त्य और अंगिरा — को छोड़कर बाकी का इंद्रिय निग्रह था, यानी उनमें विकार नहीं आया। पर इन चार ऋषियों के मन में विकार आया, और इससे चार और तरह के पितृ प्रकट हुए। उनके नाम सोमपा, आज्यपा, सुकालीन और हविष्मान बताए गए हैं। ये सब पितर रूप में उत्पन्न हुए, और कव्य ग्रहण करने वाले बने।
शास्त्र क्या कहता है
Four further pitr classes — Somapa, Ajyapa, Sukalin and Havishman — arose from the rishis Kratu, Vasistha, Pulastya and Angira respectively.
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सोमपा आज्यपा नाम्ना तथैवान्ये सुकालिनः । हविष्मन्तः सुताः सर्वे कव्यवाहाः प्रकीर्तिताः ॥
सोमपा, आज्यपा नामक, तथा इसी प्रकार अन्य सुकालिन् तथा हविष्मान् — ये सभी पुत्र कव्यवाह कहे गये हैं।
क्रतोस्तु सोमपाः पुत्रा वसिष्ठात्कालिनस्तथा । आज्यपाख्याः पुलस्त्यस्य हविष्मन्तोऽङ्गिरः सुताः ॥
क्रतु के सोमपा पुत्र, वसिष्ठ के कालिन्, पुलस्त्य के आज्यपा नामक, तथा अंगिरा के हविष्मान् पुत्र हुए।
जातेषु तेषु विप्रेन्द्र अग्निष्वात्तादिकेष्वथ । लोकानां पितृवर्गेषु कव्यवाट् स समन्ततः ॥
हे विप्रेन्द्र! इस प्रकार अग्निष्वात्त आदि पितरों के उत्पन्न हो जाने पर, लोकों के पितृवर्गों में वह सर्वत्र कव्यवाट् हुआ।
पितरों में अर्यमा का क्या स्थान है?
अर्यमा, जिनकी उत्पत्ति यहाँ नहीं बताई गई, नारायण के स्वरूप
वक्ता कहते हैं, हम जानते हैं कि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने स्वयं कहा है कि पितरों में मैं अर्यमा नाम का पितर हूँ। इस प्रसंग में अर्यमा की उत्पत्ति नहीं बताई गई है। वे कहते हैं कि अर्यमा पितर साक्षात भगवान नारायण का स्वरूप हैं।
वक्ता कहते हैं, अब हम जानते हैं कि श्रीमद् श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने स्वयं कहा है कि पितरों में मैं अर्यमा नाम का पितर हूँ। यहाँ अर्यमा की उत्पत्ति नहीं बताई गई है। वे कहते हैं कि अर्यमा पितर साक्षात भगवान नारायण का स्वरूप हैं।
ब्रह्मा जी ने कामदेव को क्या श्राप दिया?
शिव की नेत्राग्नि से भस्म होना
इस सबके बाद ब्रह्मा जी को बहुत क्रोध आया, और क्रोध के कारण उन्होंने उसी क्षण श्राप दे दिया: तुमने जो दुष्ट काम किया है, उसके लिए मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम शिव की नेत्राग्नि से भस्म हो जाओगे। उन्होंने उसी समय श्राप दे दिया।
वक्ता कहते हैं, इस सबके बाद ब्रह्मा जी को बहुत क्रोध आया, और क्रोध के कारण उन्होंने तुरंत, उसी क्षण श्राप दे दिया। उन्होंने कामदेव को वरदान भी दिया था। अब जब इस तरह किसी को अधिकार मिल जाता है — किसी अयोग्य व्यक्ति को, जो बिना मेहनत किए कुछ पा लेता है — तो वह ऐसे ही दुष्ट काम करता है। अधिकार दिया गया था कि तुम्हारे बाण का असर स्वयं ब्रह्मा पर भी पड़ेगा; तो उन्होंने सीधे ब्रह्मा जी पर ही बाण छोड़ दिया। वक्ता कहते हैं, यह तुम्हें करने के लिए नहीं, परखने के लिए दिया गया था, और उन्होंने सीधे ब्रह्मा जी पर चला दिया। श्राप यह था: तुमने जो दुष्ट काम किया है, उसके लिए मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम शिव की नेत्राग्नि से भस्म हो जाओगे।
जो अयोग्य लोग न खान-पान में संयम रखते हैं न रहन-सहन में, वे दिव्य शक्ति मिलते ही उसका दुरुपयोग करते हैं।
बिना मेहनत दिव्य शक्ति पाने वाले अयोग्य लोग उसका दुरुपयोग करते हैं
वक्ता कहते हैं, इसी तरह आज के वे अयोग्य लोग जो खुद को संयम में नहीं रखते, जो न खान-पान में संयम रखते हैं न रहन-सहन में — अगर किसी भी तरह किसी व्यक्ति से, किसी साधक से, किसी गुरु से उन्हें कोई दिव्यता, कोई दिव्य शक्ति मिल जाए, जिससे वे बातें जानने-समझने लगें, तो वे उसका केवल दुरुपयोग ही करेंगे।
वक्ता कहते हैं, इसी तरह आजकल वे अयोग्य लोग जो खुद को संयम में नहीं रखते, जो न खानपान में संयम रखते हैं न अपने रहन-सहन में — अगर किसी भी तरह, किसी व्यक्ति से, किसी साधक से, किसी गुरु से उन्हें कोई दिव्यता मिल जाए, कोई दिव्य शक्ति मिल जाए, जिससे वे जानने-समझने लायक हो जाएँ, अगर ऐसी कोई भी चीज़ मिल जाए — तो वे उसका केवल दुरुपयोग ही करेंगे। क्योंकि वे घिसे नहीं हैं, रगड़े नहीं गए हैं। जब बिना मेहनत के आराम से कुछ मिल जाता है, तो उसका दुरुपयोग सबसे ज़्यादा होता है। कामदेव ने यहाँ ठीक यही किया।
श्राप मिलने पर कामदेव ने क्या किया?
उनकी दलील कि उन्होंने आज्ञा नहीं तोड़ी, और फटकार
कामदेव डरकर तुरंत उनके सामने आए और हाथ जोड़ने लगे कि मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया — पर आपने ही कहा था, और मैंने आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया। तब उन्हें फटकारा गया: आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया, यह अलग बात है, पर तुम्हें इस तरह, सबके सामने, ऐसा नहीं करना चाहिए था। इसके लिए उन्हें उसी समय श्राप मिला।
फिर कामदेव डरकर तुरंत प्रकट हुए, उनके सामने गए और हाथ जोड़ने लगे: मुझसे यह बहुत बड़ा अपराध हो गया। उन्होंने कहा, आपने स्वयं ही कहा था; हमने आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया। तब उन्हें फटकारा गया — आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया, यह अलग बात है, पर तुम्हें इस तरह, सबके सामने, ऐसा नहीं करना चाहिए था। इसके लिए उन्हें उसी समय शाप मिला।
यह शरीर किससे जन्मा है?
शरीर काम से जन्मा है; इससे भागना नहीं, इसे जीतना है
वक्ता सार बताते हैं कि ये दो बातें थीं: पितर कैसे उत्पन्न हुए, और कामदेव को उसी समय श्राप मिल चुका था, पूरी लीला का आरंभ तभी हो गया था। आगे कामदेव का विवाह आता है, शरीर रूप में। वे कहते हैं, जान लीजिए कि आपका और मेरा शरीर काम से ही जन्मा है। इससे भागना नहीं है, इस पर विजय पानी है। विजय पाना बिल्कुल अलग विषय है।
वक्ता कहते हैं, तो ये दो बातें थीं: पितरों की उत्पत्ति कैसे हुई, और कामदेव को उसी समय श्राप मिल चुका था — पूरी लीला का आरंभ उसी समय हो गया था। इसके बाद कामदेव का विवाह आता है, शरीर रूप में। और वे कहते हैं, यह जान लीजिए: आपका और मेरा शरीर काम से ही उत्पन्न हुआ है। इससे भागना नहीं है, इस पर विजय पानी है। विजय पाना बिल्कुल अलग तरह का विषय है।
साधक का मन बार-बार क्यों भटकता है?
भोग के बाद निवृत्ति — भोजन का उदाहरण
साधक कहते हैं कि साधना करने की इच्छा नहीं होती, मन बहुत भटकता है और बेचैनी खत्म नहीं होती। वक्ता पूछते हैं, खत्म कैसे होगी? जब आप भोग भोग लेते हैं, तब उनसे निवृत्ति होती है। जब आप मन का भोजन — पूरी कचौरी, रसमलाई, राजभोग — खाकर पूरी तरह तृप्त हो जाते हैं, तब और खाने को दिया जाए तो आप नहीं खाएँगे, या उल्टी कर देंगे।
वक्ता बताते हैं कि साधक कहते हैं, साधना करने की इच्छा नहीं हो रही, मन बहुत भटक रहा है, बेचैनी खत्म ही नहीं हो रही। वे पूछते हैं, खत्म कैसे होगी? जब आप भोग भोग लेते हैं, तब बाद में उनसे निवृत्ति होती है। जब भी आप भोजन करते हैं और मन का भोजन मिलता है — पूरी कचौरी, रसमलाई, राजभोग — और मन भर जाता है, आप तृप्त हो जाते हैं, तब और खाने को दिया जाए तो आप नहीं खाएँगे, या उल्टी कर देंगे।
गृहस्थों के लिए कौन सा आचरण बताया गया है?
गृहस्थों के लिए पूरा विधि विधान, केवल संतान उत्पत्ति के लिए
वक्ता कहते हैं कि जो गृहस्थ अवस्था में चले गए हैं, उनके लिए आचरण तय किया गया है — आचरण कैसे करना है। केवल संतान उत्पत्ति के लिए आपके पास पूरा विधि विधान है। पर इसका इतना मज़ाक बनाया गया है कि आज कोई इस विषय को आगे नहीं बढ़ाता; यह पूरी तरह हँसी-मज़ाक की बात बन गई है।
वक्ता कहते हैं, इसलिए जो गृहस्थ अवस्था में चले गए हैं, उन गृहस्थों के लिए आचरण तय किया गया है कि आचरण किस तरह करना है। केवल संतान उत्पत्ति के लिए, आपके पास इसका पूरा विधि विधान है। पर इसका इतना मज़ाक बनाया गया है कि आजकल कोई उस विषय को आगे नहीं बढ़ाता। अब यह पूरी तरह मज़ाक का विषय बन गया है।
छिन्नमस्तिका के रूप में काम और रति पर विजय कैसे दिखाई गई है?
सहस्रदल कमल पर कामदेव और रति के ऊपर खड़ी भगवती
भगवती का एक रूप है, दस महाविद्याओं में से एक, माँ छिन्नमस्तिका। उनका रूप देखिए: नीचे एक कमल है, हज़ार पंखुड़ियों वाला कमल, और उस पर कामदेव और रति विपरीत मुद्रा में लेटे दिखते हैं। माँ उनके ऊपर खड़ी हैं। वक्ता कहते हैं, यानी अगर आप जगदंबा की शरणागति स्वीकार करें और उनके शरणागत हो जाएँ, तो भगवती इन दोनों के ऊपर खड़ी होती हैं।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ विषय यह है कि काम और रति पर, इन दोनों पर, विजय कैसे पाई जाती है। भगवती का एक रूप है — दस महाविद्या में से एक, माँ छिन्नमस्तिका। उनका स्वरूप देखिए तो दिखेगा कि नीचे एक कमल का फूल है, सहस्रदल कमल, और उस पर कामदेव और रति विपरीत मुद्रा में लेटे दिखते हैं, एक स्त्री और एक पुरुष लेटे हैं। वे कौन हैं? यही कामदेव और रति हैं। उनके ऊपर माँ खड़ी हैं। यानी: सब कुछ छोड़कर केवल यह एक बात याद रखिए — अगर आप जगदंबा की शरणागति स्वीकार करें और उनके शरणागत हो जाएँ, तो भगवती इन्हीं के ऊपर खड़ी होती हैं।
सांसारिक प्रयोजन पूरा होने के बाद क्या होता है?
लक्ष्य पूरा होने के बाद वहाँ कोई काम नहीं बचता
जब आपने यह केवल अपने सांसारिक काम के लिए किया और वह पूरा हो गया — प्रयोजन संतान उत्पन्न करना था और संतान आ गई — उसके बाद वहाँ आपका कोई काम नहीं है। आपने जगदंबा की शरणागति ली है, और जगदंबा फिर आपको समर्थ बनाएँगी, सामर्थ्य देंगी। पर वक्ता जोड़ते हैं, शरणागति वैसी होनी चाहिए जैसी शरणागति होनी चाहिए, केवल ऊपर-ऊपर से कही हुई नहीं।
वक्ता समझाते हैं, यानी जब आपने यह केवल अपने सांसारिक प्रयोजन के लिए किया, और आपका जो प्रयोजन था वह पूरा हो गया — संतान उत्पन्न करनी थी, और संतान आ गई — उसके बाद वहाँ आपका कोई काम नहीं है। आपने जगदंबा की शरणागति ली है; जगदंबा तब आपको समर्थ बनाएँगी, सामर्थ्य देंगी। पर वे कहते हैं, शरणागति वैसी होनी चाहिए जैसी शरणागति होनी चाहिए। केवल ऊपर-ऊपर से कही हुई नहीं।
सप्तशती के उत्कीलन के बारे में कीलक स्तोत्र क्या कहता है?
कृष्ण पक्ष चतुर्दशी की रात सब कुछ समर्पित करना और प्रसाद रूप में वापस लेना
वक्ता कहते हैं, जब हम दुर्गा सप्तशती में कीलक स्तोत्र का पाठ करते हैं, तो वहाँ लिखा है कि सप्तशती का उत्कीलन कैसे होगा। एक माना हुआ उत्कीलन यह है: कृष्ण पक्ष चतुर्दशी की रात को — जो पिछली शाम से उस दिन तक रही हो — अपना सब कुछ समर्पित कर दिया जाए, और फिर उसे प्रसाद रूप में दोबारा भोगा जाए; तब सप्तशती का उत्कीलन होता है।
वक्ता कहते हैं, जब हम दुर्गा सप्तशती में कीलक स्तोत्र का पाठ करते हैं, तो वहाँ यही लिखा है कि सप्तशती का उत्कीलन कैसे होगा। श्री दुर्गा सप्तशती के उत्कीलन में माना गया एक तरह का उत्कीलन यह है: कृष्ण पक्ष चतुर्दशी की रात को — जो पिछली शाम से उस दिन तक रही हो — अपना सब कुछ समर्पित कर देना चाहिए। और फिर उसे प्रसाद रूप में दोबारा भोगना चाहिए; इस तरह सप्तशती का उत्कीलन होता है। या: आपके पास जो कुछ है, पूरा घर-द्वार, संपत्ति, संतान, धर्मपत्नी, सब कुछ — भगवती को समर्पित कर दीजिए, यह कहकर कि जगदंबा, मेरा कुछ नहीं, सब आपका है; और उसे प्रसाद रूप में ले लीजिए।
समर्पण के बाद सबसे आम गलती क्या है?
समर्पण करके फिर मालिक बनकर भोगना
आपने वहाँ उत्कीलन के लिए समर्पण किया, पर बाद में आप मालिक बनकर भोगते रहते हैं। वक्ता कहते हैं कि तब फल भी वैसा ही होगा। मन उसी भटकन में रहेगा। माया से मोहित होकर आप बार-बार गिरते रहेंगे। आप 41 दिन की साधना करें, नाम जप करें, किसी मंत्र के इतने पुरश्चरण करें, हवन करें — बाद में हालत ठीक वैसी ही हो जाएगी।
वक्ता कहते हैं कि आपने वहाँ उत्कीलन करने के लिए समर्पण किया है। पर बाद में आप मालिक बनकर भोग रहे हैं। तब फल भी वैसा ही होगा। मन उसी भटकन में रहेगा। माया से बार-बार मोहित होकर आप बार-बार गिरते रहेंगे। आप कोई साधना उठाएँ — अच्छा, चलो 41 दिन की साधना करें, नाम जप करें, फलाँ मंत्र के इतने पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करें, हवन करें — और उसके बाद हालत वैसी ही हो जाएगी जैसी थी। वक्ता कहते हैं कि समर्पण करके और समर्पित होकर फिर मालिक मत बनिए।
समर्पण के बाद कितना पाने की उम्मीद रखनी चाहिए?
जितना पुजारी दे — प्रसाद उसकी इच्छा पर है
ऐसे जिएँ जैसे आप प्रसाद रूप में भोगकर केवल जीवन चला रहे हैं। फिर वे जितना दें, उतना प्रसाद। प्रसाद तो पुजारी की इच्छा पर है न। किसी को चार दाने ज़्यादा देता है, किसी को दो दाने कम। जितना वे प्रसाद रूप में दे रही हैं, उतना लेकर स्वीकार कर लें तो काम बनेगा। पर ऐसा होता नहीं।
वक्ता कहते हैं कि यदि कहते हैं कि जगदम्बा, यह सब आपका है और हम तो जीवन चलाने के लिए इसे प्रसाद रूप में भोग रहे हैं — तो उसी तरह कीजिए भी। फिर वे जितना दें, उतना प्रसाद। प्रसाद तो पुजारी की इच्छा पर है न। किसी को चार दाने ज़्यादा देता है, किसी को दो दाने कम देता है। जितना वे प्रसाद रूप में दे रही हैं, उतना लेकर स्वीकार कर लें, तो काम बनेगा। पर ऐसा होता नहीं।
निष्काम विधान को सकाम भाव से करने पर क्या गड़बड़ होती है?
विधान निष्काम और करने वाला सकाम हो तो बनती खिचड़ी
हम यह समर्पण इसलिए करते हैं कि सप्तशती उत्कीलित हो जाए, पर भीतर कहीं स्वार्थ रहता है — कि इन मंत्रों का ऐसा उपयोग हो कि पहले हम धन से भर जाएँ। यही गलती है। विधान तो निष्काम है, पर आप उसे सकाम करते हैं। इसलिए फल भी खिचड़ी बनकर निकलता है। आप सोचते हैं कि आप चतुराई कर रहे हैं, और जगदम्बा महामाया हैं — वे आपके साथ पूरा खेल खेलती हैं।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ हम समर्पण करते हैं ताकि सप्तशती उत्कीलित हो जाए और इन मंत्रों का अच्छा उपयोग करके — या भीतर कहीं स्वार्थ रहता है कि इनका ऐसा उपयोग हो कि पहले हम धनवान हो जाएँ, धन-धान्य से पूर्ण हो जाएँ। इससे काम नहीं बनेगा। गलती यहीं होती है। आप इसे किसी मकसद से लगा रहे हैं, पर जिस समर्पण से आप उत्कीलन कर रहे हैं, वह आपकी ओर से निष्काम नहीं है। विधान तो निष्काम है, आप उसे सकाम करते हैं। इसलिए फल भी उसी ढंग से, खिचड़ी बनकर पकता है — आप न इधर के रहते हैं, न उधर के। आप सोचते हैं कि आप चतुराई कर रहे हैं, और जगदम्बा महामाया हैं। वे आपके साथ पूरा खेल खेलती हैं।
काम और रति पर अधिकार पाना सबसे कठिन किसके लिए है?
खास तौर पर युवाओं के लिए, और स्त्रियों को आने वाला आख्यान क्यों समझाना चाहिए
वक्ता कहते हैं कि जब तक आप ठीक तरह से भगवती के प्रति समर्पित नहीं होते, तब तक इन दोनों पर प्रभाव जमाना, इनसे छूटना, इन पर अधिकार पाना बहुत कठिन है। खास तौर पर युवाओं के लिए। आज के समय में बचना बहुत कठिन हो जाता है। कामदेव और रति के विवाह का पूरा वर्णन बहुत विस्तृत है। वक्ता उसे आगे के लिए छोड़ते हैं और बताते हैं कि अगले दिन संध्या-अरुंधति का आख्यान शुरू होगा।
बुनियादी कर्मकांड कहाँ सीखें, और क्या दत्तात्रेय जाप से पितृ दोष दूर होता है?
तीर्थ क्षेत्रों के आश्रम, और पितृ दोष के लिए दत्तात्रेय मंत्र
पूछा गया कि क्या कोई आश्रम या गुरुकुल है जहाँ बुनियादी कर्मकांड और पूजा विधि सीखी जा सके। वक्ता कहते हैं कि हाँ, खोजेंगे तो मिल जाएगा। हर तीर्थ क्षेत्र में होता है। पूछा गया कि क्या भगवान दत्तात्रेय के मंत्र जाप से पितृ दोष से छुटकारा मिलता है। वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल मिलता है।
पूछा गया कि क्या कोई आश्रम या गुरुकुल है जहाँ बुनियादी कर्मकांड और पूजा विधि सीखी जा सके। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, खोजेंगे तो मिल जाएगा — हर तीर्थ क्षेत्र में होता है। पूछा गया कि क्या भगवान दत्तात्रेय के मंत्र जाप से पितृ दोष से छुटकारा मिलता है। वक्ता साफ़ उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल मिलता है।
क्या कोई आत्मा बिना कारण किसी व्यक्ति से जुड़ सकती है?
आत्माएँ और प्रेत-पिशाच किसी शरीर से क्यों जुड़ते हैं
एक व्यक्ति, जो अकेले चौकीदारी का काम करता है, पूछता है कि क्या दुर्घटना में मरे लोगों की आत्माएँ बिना कारण हमसे जुड़ सकती हैं। वक्ता कहते हैं कि अच्छी आत्मा खास तौर पर अपनी गति के लिए जुड़ती है। आम तौर पर वह किसी शरीर से इसलिए जुड़ती है कि उसे वहाँ कोई आशा होती है। भूत, प्रेत और पिशाच दो कारणों से जुड़ते हैं। या तो वे मंत्र बल से विवश किए जाते हैं — कोई तांत्रिक चार क्रियाओं से उन्हें चलाता है और वे वाणी आदि से हानि करते हैं। या फिर उन्हें कोई लालच दिया गया होता है।
पूछा गया कि क्या दुर्घटना में मरे व्यक्ति की आत्मा बिना कारण हमसे जुड़ सकती है। वक्ता कहते हैं कि अच्छी आत्मा खास तौर पर अपनी गति के लिए जुड़ती है। आम तौर पर जब वह किसी शरीर से जुड़ती है, तो इसलिए कि उसे कहीं कोई आशा होती है। भूत, प्रेत और पिशाच दो तरह से जुड़ते हैं। या तो वे मंत्र बल से विवश किए जाते हैं — कोई तांत्रिक चार क्रियाओं से उन्हें चलाता है, और विवश होकर वे अभिचार से, दिए गए वचनों आदि से हानि करते हैं। या उन्हें कोई लालच दिया गया होता है: कि हम तुम्हारी सद्गति करवा देंगे; या यह लालच कि तुम इस शरीर को भोगो, इस व्यक्ति के द्वारा भोग भोगो। उनका अपना कोई न कोई स्वार्थ हमेशा होता है, इसलिए वे किसी शरीर से जुड़ते हैं। वे भी कहीं जाना चाहते हैं ताकि उनकी सद्गति हो, क्योंकि वे एक जगह बँध गए हैं और वहाँ से निकल नहीं पाएँगे।
जिसके पास लंबी पूजा का समय नहीं, उसके लिए वक्ता क्या बताते हैं?
जयंती मंगला मंत्र और अपने इष्ट के बारह नाम
वक्ता कहते हैं कि जिसके पास ज़्यादा पूजा-पाठ का समय नहीं, उसके लिए आज नाम जप सबसे ज़रूरी है। जिनकी श्रद्धा भगवती में है और जिन्होंने उनकी शरणागति ली है, उनसे वे वही कहते हैं जो कई बार कह चुके हैं: और कुछ न कर सकें, तो जयंती मंगला मंत्र — अर्गला का पहला मंत्र — जीवन में उतार लीजिए। और जिनमें आपकी श्रद्धा है, उनके बारह नाम याद कर लीजिए। उनका पाठ तब तक कीजिए जब तक वे मन में अपने-आप न चलने लगें।
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए आज के समय में नाम जप सबसे ज़्यादा ज़रूरी है, उसके लिए जिसके पास बहुत पूजा-पाठ का समय नहीं है। कम से कम जिनकी श्रद्धा भगवती में है और जिनकी शरणागति आपने ली है, उनसे वे वही कहते हैं जो बार-बार कहते आए हैं: और कुछ नहीं कर सकते, तो जयंती मंगला काली मंत्र, जो अर्गला स्तोत्र का पहला मंत्र है, जीवन में उतार लीजिए। वक्ता कहते हैं कि नाम जप पर उन्होंने अलग वीडियो बनाए हैं। जिनमें आपकी श्रद्धा है, उनके बारह नाम याद कर लीजिए। उनका पाठ इतना लगातार कीजिए कि वे मन में अपने-आप चलने लगें। एक नाम से आगे बढ़ना हो, तो एक नाम से आगे बढ़िए।
अजपा जप क्या है और यह कैसे काम करता है?
श्वास के साथ चलता सोहम हंस, परमहंस मंत्र के रूप में
नाम जप छोड़ना नहीं चाहिए। नाम जप करते रहेंगे तो अजपा जप होता रहेगा, और अजपा जप की एक विधि है। जब कर्मकांड का विषय सीखा जाता है, तब सीखते हैं कि भीतर-बाहर चलती श्वास को सोहम और हंस कैसे ले जाते हैं, क्योंकि वह स्वाभाविक रूप से उसी तरह चलती है। इसे परमहंस मंत्र माना गया है। पर यह संकल्प लेकर फलित होता है। और संकल्प वही लेगा जिसका मन विकार से मुक्त रहे।
वक्ता कहते हैं कि नाम जप छोड़ना नहीं चाहिए। नाम जप करते रहेंगे तो अजपा जप होता रहेगा, और अजपा जप की अपनी एक विधि है। जब कर्मकांड का विषय सीखा जाता है, तब सीखते हैं कि हमारे भीतर-बाहर चलने वाली श्वास को सोऽहम् और हंस किस तरह ले जाते हैं, क्योंकि वह स्वाभाविक रूप से उसी तरह चल रही है। इसे परमहंस मंत्र माना गया है। पर यह संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर फलित होता है। और संकल्प कौन लेगा? वही, जिसका मन विकार से मुक्त रहेगा। फिर पूरे दिन में हम जितनी बार साँस लेते और छोड़ते हैं, उतना अजपा जप का फल अपने-आप मिलेगा — क्योंकि हर बार साँस लेने पर एक मंत्र जप हो रहा है, और हर बार छोड़ने पर एक मंत्र जप हो रहा है। यह 24 घंटे चलता है, सोते हुए, जागते हुए या कुछ भी करते हुए। पर उस अवस्था को समझना होगा।
क्या गुरु के मुख से न मिला मंत्र काम करता है?
यह दावा गलत कि गुरु के बिना नाम का असर नहीं
वक्ता कहते हैं कि शुरुआत करने वाले के लिए ज़रूरी है कि हम मंत्र जप करें। चाहें तो माला से करें। यह प्रश्न कि जब तक किसी गुरु के मुख से भगवान का नाम न लें, मंत्र का असर नहीं होगा — वक्ता कहते हैं कि यह गलत बात है। ऐसा नहीं है। यह बात मन से निकाल दीजिए। जप करते रहेंगे, तो कोई आत्मा आपके आभामंडल में या शरीर में आपके साथ खड़ी भी होना चाहे, तो आपका कुछ नहीं बिगड़ेगा, क्योंकि आभामंडल मज़बूत रहेगा।
वक्ता कहते हैं कि शुरुआत करने वाले व्यक्ति के लिए ज़रूरी है कि हम मंत्र जप करें। चाहें तो माला से करें। भगवान का नाम लेने के बारे में प्रश्न — कि जब तक किसी गुरु के मुख से भगवान का नाम न लिया जाए, मंत्र का असर नहीं होगा — वक्ता कहते हैं कि यह गलत बात है। ऐसा नहीं है। इसलिए यह विषय मन से निकाल दीजिए। जप करते रहेंगे, तो आपके आभामंडल में या आपके शरीर में कोई आत्मा आपके साथ खड़ी भी होना चाहे, तो आपका कुछ नहीं बिगड़ेगा — बशर्ते आभामंडल मज़बूत रहे।
सूर्य स्तोत्र और शतनामावली का पाठ क्यों और कैसे किया जाता है?
सूर्य की प्रसन्नता और ग्रह से उपजी बाधा के लिए, उगते सूर्य के सामने
पूछा गया कि सूर्यदेव के स्तोत्र और शतनामावली का पाठ क्यों किया जाता है और उसकी विधि क्या है। वक्ता कहते हैं कि यह सूर्यदेव की प्रसन्नता के लिए किया जाता है, और उस ग्रह से कोई बाधा हो तो उसे दूर करने के लिए। विधि यह है कि पाठ खास तौर पर उगते सूर्य के समय सूर्यनारायण के सामने बैठकर किया जाता है।
पूछा गया कि सूर्यदेव के स्तोत्र और शतनामावली का पाठ क्यों किया जाता है और उसकी विधि क्या है। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह सूर्यदेव का है, इसलिए सूर्यदेव की प्रसन्नता के लिए किया जाता है, और उनसे उपजी किसी ग्रह-बाधा को दूर करने के लिए। विधि यह है: पाठ खास तौर पर उगते सूर्य के समय सूर्यनारायण के सामने बैठकर किया जाता है।
क्या किसी मंत्र को तारण मंत्र में बदला जा सकता है?
ऐसी कोई सामर्थ्य नहीं; तारण मंत्र वही नाम है जिस पर भरोसा हो
पूछा गया कि भगवान के किसी मंत्र को तारण मंत्र में कैसे बदला जाता है। वक्ता उलटा पूछते हैं कि उसे बदलना ही क्यों है, और क्या पूछने वाले में किसी मंत्र का मूल स्वभाव बदलने की सामर्थ्य है। वक्ता कहते हैं कि न आपमें, न मुझमें यह सामर्थ्य है कि मंत्र का मूल तत्त्व बदलकर उसे तारण मंत्र बना दें। आपके लिए तारण मंत्र वही नाम बनता है जिस पर आप निर्भर हैं और जिसमें आप श्रद्धा रखते हैं।
पूछा गया कि भगवान के किसी मंत्र को किस तरह तारण मंत्र में बदला जाता है। वक्ता प्रश्न से ही उत्तर देते हैं: मंत्र को तारण मंत्र में बदलना ही क्यों है? क्या आपमें किसी मंत्र का मूल स्वभाव बदलने की सामर्थ्य है? वक्ता कहते हैं कि यह सामर्थ्य न आपमें है, न मुझमें — कि मंत्र का मूल तत्त्व बदलकर उसे तारण मंत्र बना दें। आपके लिए तारण मंत्र वही नाम बनता है जिस पर आप निर्भर हैं, वही देवता जिनमें आप श्रद्धा रखते हैं। जहाँ श्रद्धा नहीं, वहाँ स्वयं भगवान आकर आपके कान में हरि मंत्र दे दें, तब भी आप पार नहीं हो पाएँगे। पर जिनमें आपकी श्रद्धा और निष्ठा है, जिस रूप में आप यह विश्वास रखते हैं कि हाँ, ये हमारे साथ हैं — उन्हीं का नाम जप कीजिए, वही नाम जप आपको पार लगाएगा। बाद में जब आपमें सामर्थ्य हो, तब अनुष्ठान आदि कीजिए।
क्या घर के पारद शिवलिंग का रोज़ जलाभिषेक न करना दोष है?
शिवलिंग और शालिग्राम का रोज़ अभिषेक अनिवार्य
वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल दोष है। वे बार-बार कहते हैं कि घर में शिव का कोई भी रूप रखना हो, और खास तौर पर शिवलिंग रखें, तो शिवलिंग का अभिषेक सबसे ज़रूरी है। शिवलिंग और शालिग्राम शिला, दोनों का अभिषेक रोज़ होना चाहिए। यह पाँच मिनट का भी काम नहीं है। एक लोटा जल लें, साधारण नाम जप करते हुए स्नान कराएँ, तिलक लगाएँ, ऊपर अक्षत रखें, मुकुट पहनाएँ, और हो गया।
पूछा गया कि घर में रखे पारद शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। पर रोज़ जलाभिषेक न हो तो क्या दोष है। वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल है। वक्ता कहते हैं कि हम यह बार-बार कहते हैं। घर में शिव का कोई रूप रखना हो, और खास तौर पर शिवलिंग रखा हो, तो शिवलिंग का अभिषेक सबसे ज़रूरी है — शिवलिंग का और शालिग्राम शिला का। दोनों का अभिषेक रोज़ होना चाहिए। शालिग्राम शिला का अभिषेक करने में कितना समय लगता है? यह पाँच मिनट का भी काम नहीं है। एक लोटा जल लें; और कुछ नहीं तो साधारण नाम जप करते हुए स्नान कराएँ, तिलक लगाएँ, ऊपर अक्षत रखें, मुकुट आदि पहनाएँ। हो गया।
जो चौबीस घंटों में से पाँच मिनट अपने इष्ट को नहीं दे सकता, वह ख़ुद को सनातनी कहना बंद करे।
पारद शिवलिंग स्वयं शिव है और उसके लिए कड़ी विधि चाहिए
वक्ता कहते हैं कि 24 घंटों में से आप अपने इष्ट आराध्य को पाँच मिनट भी नहीं दे सकते, तो ख़ुद को सनातनी कहना बंद कर दीजिए। 24 घंटे के लिए मिले मनुष्य शरीर का क्या लाभ, अगर आदमी पाँच मिनट भी नहीं दे सकता? वक्ता कहते हैं कि पारद शिवलिंग को स्वयं शिवलिंग, शिव का रूप माना गया है। उसके लिए बहुत विधि और नियम होने चाहिए, और आप उसे स्नान तक नहीं करा रहे। यह गलत है।
वक्ता कहते हैं कि 24 घंटों में से आप अपने इष्ट आराध्य को पाँच मिनट भी नहीं दे सकते, तो आपको ख़ुद को सनातनी कहना बंद कर देना चाहिए। उस चीज़ का क्या लाभ जिसके लिए 24 घंटे मिले हैं, जिसके लिए मनुष्य शरीर मिला है, अगर वह आदमी अपने इष्ट आराध्य को पाँच मिनट भी देने लायक नहीं — और फिर भी पारद शिवलिंग रखने के बारे में पूछता है। पारद शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। को स्वयं शिवलिंग, शिव का रूप माना गया है। उसके लिए बहुत विधि और नियम होने चाहिए, और आप स्नान तक नहीं करा रहे। यह गलत है।
क्या कुशा की पवित्री पहनकर हर मंत्र में प्रणव लगाया जा सकता है?
नहीं — गायत्री और महामृत्युंजय में भी नहीं
पूछा गया कि कुशा की पवित्री पहनकर क्या सभी मंत्रों में प्रणव लगा सकते हैं, और अगर हाँ, तो क्या गायत्री और महामृत्युंजय में भी। वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं। अगर ऐसा कोई विषय व्यक्तिगत रूप से बताया गया है, तो वह अलग बात है और उसका कारण अलग है, या किसी खास जगह किसी खास कारण से बताया गया है। इस तरह नहीं किया जा सकता। यह पवित्री आदि के बाद ही करना चाहिए।
चार प्रहर की पूजा को हर साल का नियम बनाना चाहिए, क्योंकि शरीर नित्य नहीं और यही एक रात की पूजा काम आएगी।
इसे हर साल का नियम बनाइए; शरीर नित्य नहीं
वक्ता कहते हैं कि अब हर साल इसे नियमित करना है। शरीर नित्य नहीं है। यह पूजा जो आप कर रहे हैं, यह एक रात की पूजा — भैया, यही काम आएगी।
वक्ता कहते हैं कि अब हर साल इसे नियम से करना है। शरीर नित्य नहीं है। यह पूजा जो आप कर रहे हैं, एक रात की पूजा — यही आपके काम आएगी।
साधारण व्यक्ति महाशिवरात्रि कैसे मनाए?
एकांत में अभिषेक और सहस्रनाम, कॉन्सर्ट और रात भर नाच नहीं
वक्ता कहते हैं कि साधारण आदमी महाशिवरात्रि शुरुआत करने वाले की तरह मनाए। इस विचार में मत पड़िए कि महाशिवरात्रि का बड़ा वैज्ञानिक महत्त्व है, कि उस रात वीणा बजाते, नाचते हुए जागना चाहिए, फाउंडेशन वाले लोगों जैसा बड़ा डिस्को डांस करना चाहिए। वे लोग जीवनमुक्त हो गए हैं और उनके पास बहुत पैसा आ गया है। आप चारों प्रहर शिव का अभिषेक कीजिए और एकांत में उनके पास बैठकर सहस्रनाम का पाठ कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि साधारण आदमी को महाशिवरात्रि शुरुआत करने वाले के ढंग से मनानी चाहिए। इस विचार में मत पड़िए कि महाशिवरात्रि का बहुत बड़ा वैज्ञानिक महत्त्व है, कि उस रात वीणा बजाते, नाचते हुए जागना चाहिए, फाउंडेशन वाले लोगों जैसा बड़ा डिस्को डांस करना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि वे लोग जीवनमुक्त हो गए हैं; उन लोगों के पास बहुत पैसा आ गया है; वे लोग जीवनमुक्त हो गए हैं। वक्ता कहते हैं कि आप चारों प्रहर शिव का अभिषेक कीजिए और एकांत में उनके पास बैठकर सहस्रनाम का पाठ कीजिए। परिवार के साथ करना हो, तो परिवार के साथ कीजिए। इस संगीत-वंगीत में मत जाइए, कॉन्सर्ट में मत जाइए। उस सबसे कुछ नहीं मिलेगा — वहाँ शिव के नाम का भजन कम और दूसरा हल्ला-गुल्ला ज़्यादा होता है। इन सब चक्करों में नहीं पड़ना चाहिए।
घर में नर्मदेश्वर हों, तो क्या दीपदान के लिए शिव मंदिर जाना चाहिए?
क्या घर का शिवलिंग मंदिर के शिवलिंग जितना फल देता है
वक्ता से पूछा गया कि घर में नर्मदेश्वर जी हों, तो क्या दीपदान के लिए शिव मंदिर जाना चाहिए, और क्या घर के शिवलिंग से वही फल मिलता है जो मंदिर के शिवलिंग से मिलता है। वक्ता पहले कहते हैं कि घर में नर्मदेश्वर शिवलिंग और शालिग्राम शिला होना अच्छी बात है, और सबके घर में ये होने चाहिए।
एक श्रोता असुर गुरु साधना में रोज़ जलाए जाने वाले तीन दीपकों और गौरी के बारे में पूछते हैं। वक्ता कहते हैं कि वे यह बात समझे नहीं। दूसरे पूछते हैं: घर में नर्मदेश्वर जी हों, तो क्या शिव मंदिर जाकर दीपदान करना चाहिए? क्या घर के शिवलिंग से वही फल मिलेगा जो मंदिर के शिवलिंग से मिलता है? वक्ता पहले उत्तर देते हैं कि घर में नर्मदेश्वर शिवलिंग और शालिग्राम शिला रखना अच्छी बात है। सबके घर में ये होने चाहिए।
फिर भी मंदिर क्यों जाना चाहिए?
मंदिर खास वास्तुकला से बनता है और उसकी ऊर्जा आभामंडल को शुद्ध करती है
वक्ता कहते हैं कि मंदिर अपने-आप में एक खास वास्तुकला से बना होता है। जब हम वहाँ जाते हैं, तो वहाँ की ऊर्जा हमारे शरीर के आभामंडल को अलग तरह से शुद्ध करती है। इसलिए मंदिर ज़रूर जाना चाहिए, खास तौर पर पर्व काल में — कम से कम परिवार का कोई सदस्य जाए। अगर घर में रखे नर्मदेश्वर में, अपने इष्ट आराध्य में आपकी निष्ठा और श्रद्धा बहुत बड़ी है, तो वही आपके लिए मंदिर है। पर शरीर सक्षम हो और जा सकें, तो ज़रूर जाइए।
पर वक्ता कहते हैं कि मंदिर अपने-आप में एक खास वास्तुकला से बना होता है। जब हम वहाँ जाते हैं, तो वहाँ की ऊर्जा हमारे शरीर के आभामंडल को अलग तरह से शुद्ध करती है। इसलिए हमें मंदिर ज़रूर जाना चाहिए। पर्व काल आदि के समय कम से कम परिवार का कोई सदस्य जाए — यह भी अच्छा है। नहीं तो, अगर आपकी अपने इष्ट आराध्य में, घर में रखे नर्मदेश्वर जी में बहुत बड़ी निष्ठा और श्रद्धा है, तो आपके लिए वही मंदिर है। फिर भी, शरीर सक्षम हो और जा सकें, तो मंदिर ज़रूर जाइए।
क्या केवल नाम लेने से फल कम मिलता है?
कचरे में पड़ा सोना — उसका मूल्य कभी कम नहीं होता
वक्ता कहते हैं कि केवल नाम लेने से भी फल मिलेगा। उसमें कोई कमी नहीं है। सोना कचरे में पड़ा हो, कहीं भी पड़ा हो — वह वही फल देता है। उसका मूल्य कभी कम नहीं हो सकता। यह अलग बात है कि आप उसे कचरे से निकालकर साफ़ करके ले जाएँ, या जैसा है वैसा उठाकर रख दें।
वक्ता कहते हैं कि केवल नाम लेने से भी फल मिलेगा। उसमें कोई कमी नहीं है। सोना कचरे में पड़ा हो, कहीं भी पड़ा हो, वह वही फल देता है। उसका मूल्य कभी कम नहीं हो सकता। हाँ, यह अलग बात है कि आप उसे कचरे से निकालकर, साफ़ करके ले जाएँ, या जैसा है वैसा उठाकर ले जाकर रख दें। वक्ता कहते हैं, बात को समझिए।
क्या पितरों को सिर पर बुलाना चाहिए?
कभी नहीं — शरीर पर बुलाने से वे बंधन में पड़ते हैं
पूछा गया कि क्या पितर को सिर पर बुलाना चाहिए; श्रोता ने बताया कि देव पुत्र और देवी पुत्री परिवार से नाराज़ हैं। वक्ता कहते हैं: यह गलती कभी मत कीजिए। उन्हें शरीर पर बुलाने से वे बंधन में पड़ जाएँगे। आगे उनकी गति कभी नहीं होगी। वक्ता कहते हैं कि आम तौर पर माना गया है कि तीन पीढ़ियों के बाद — अगर उस समय उनकी गति हो जाए — तो सबसे अच्छा है। लोग त्रंबकेश्वर और बद्रीनाथ में नागबली आदि करवाते हैं। इतनी सामर्थ्य हो, तो उनकी गति हो जाती है और उनका दूसरा जन्म होता है।
एक श्रोता ने बताया कि देव पुत्र और देवी पुत्री उनके परिवार से नाराज़ हैं, और पूछा कि पितर को सिर पर बुलाना चाहिए या नहीं। वक्ता उत्तर देते हैं: यह गलती कभी मत कीजिए। जो उन्हें शरीर पर बुलाएगा, वही उन्हें बंधन में डालेगा। आगे उनकी गति कभी होगी ही नहीं। वक्ता कहते हैं, एक बात देखिए। आम तौर पर माना गया है कि तीन पीढ़ियों के बाद, अगर उसी समय उनकी गति हो गई — लोग त्रंबकेश्वर आदि में, बद्रीनाथ में नागबली आदि करवाते हैं; इतनी सामर्थ्य हो, तो यह सब करवाने से उनकी गति हो जाती है, और यह सबसे उत्तम है। उनका दूसरा जन्म होगा।
सद्गति न होने पर पितर कितने समय तक रहते हैं?
कम से कम तीन पीढ़ी, पितरों के लिए सात, और महाकाली विधान
अगर सामर्थ्य न हो, या अभिचार दोष जैसे किसी और कारण से उनकी सद्गति न हो रही हो, तो ऐसी हालत में उन्हें कम से कम तीन पीढ़ी रहना पड़ता है। उनके जन्म और मृत्यु से तीन पीढ़ी गिनिए। तब तक उनकी उपस्थिति रहेगी, उसके बाद सद्गति होती है — अगर तीसरी पीढ़ी में नारायण नागबली करवाया जाए। पितरों के लिए सात पीढ़ी मानी गई है। वक्ता जोड़ते हैं कि पूजा करना अलग बात है: उन्होंने जो महाकाली विधान बताया है, जहाँ पीपल का पेड़ हो ऐसे काली मंदिर में किया जाता है, वह बाहर किया जाता है और भगवती के द्वारा परोक्ष रूप से काम करता है।
वक्ता कहते हैं कि अगर सामर्थ्य न हो, या किसी और कारण से, अभिचार आदि के कारण, उनकी सद्गति न हो पा रही हो, तो ऐसी अवस्था में उन्हें कम से कम तीन पीढ़ी रहना पड़ता है। जो जन्म और मृत्यु हुई, उससे गिनिए। तब तक उनकी उपस्थिति रहेगी, और उसके बाद उनकी सद्गति होती है — अगर तीसरी पीढ़ी में नारायण नागबली करवाया जाए। और पितरों के लिए सात पीढ़ी मानी गई है। पर वक्ता कहते हैं कि पूजा करना अलग बात है। उन्होंने जो महाकाली विधान बताया है, किसी जानकार व्यक्ति का दिखाया हुआ — महाकाली के ऐसे मंदिर में जहाँ पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। का पेड़ हो, जहाँ आपको पूजा करनी है — वह बाहर की जाने वाली पूजा है। उसमें कोई दिक्कत नहीं, क्योंकि आप वहाँ सीधे कुछ नहीं कर रहे। परोक्ष रूप से, भगवती के द्वारा, आप उन्हें संतुष्ट कर रहे हैं; क्योंकि कलिकाल और देश, काल, परिस्थिति के अनुसार यह भी आपके अधिकार में है। वक्ता जोड़ते हैं कि इस विषय पर भी किसी स्थानीय जानकार की सलाह ले सकते हैं।
पितरों को सिर पर बुलाना शुरू करने से क्या होता है?
उनकी गति रुक जाती है और वे घर के देवता बन जाते हैं
वक्ता कहते हैं कि अगर आपने उन्हें सिर पर बुलाना शुरू कर दिया, तो उनकी गति कभी नहीं होगी। फिर वे सिर पर आने लगेंगे, और तीन नहीं, तीस पीढ़ियाँ बीत जाएँगी और आप तब भी पूजते रहेंगे। फिर वे घर के देवता बन जाएँगे। उनके अनुसार यह ठीक नहीं है; उनकी गति रुक जाएगी। इसकी जगह नाराज़ को मनाने की एक प्रक्रिया है: विधि विधान से, अपने इष्ट या कुल देवी-देवता के द्वारा, शिव के द्वारा आप उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं और उनकी गति का प्रयास कर सकते हैं।
पर वक्ता कहते हैं कि अगर आपने उन्हें सिर पर बुलाना शुरू कर दिया, तो उनकी गति कभी नहीं होगी। फिर वे सिर पर आने लगेंगे, और तीन नहीं, तीस पीढ़ियाँ बीत जाएँगी और आप तब भी पूजते रह जाएँगे। फिर वे घर के देवता बन जाएँगे। वक्ता कहते हैं कि उनके विचार में यह ठीक नहीं है; उनकी गति रुक जाएगी। इसलिए यह गलती मत कीजिए — उन्हें शरीर पर नहीं बुलाना चाहिए। नाराज़ को मनाने की एक प्रक्रिया है। विधि विधान से, अपने इष्ट या कुल देवी-देवता के द्वारा, शिव के द्वारा आप उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं, और उनकी गति का प्रयास कर सकते हैं।
स्त्रियों के गर्भ पर मसान की क्रिया — उसके कारण, लक्षण और उपाय — अलग सत्र के लिए रखी गई है।
गर्भ पर मसान क्रिया — अलग सत्र के लिए रखी गई
एक श्रोता स्त्रियों के गर्भ पर मसान की क्रिया — उसके कारण, लक्षण और उपाय — के बारे में जानकारी माँगते हैं। वे कहते हैं कि असम की स्त्रियों को यह परेशानी है और उन्हें लाभ होगा। वक्ता कहते हैं: ठीक है, वह हम अलग से बताएँगे।
एक श्रोता स्त्रियों के गर्भ पर मसान की क्रिया के बारे में जानकारी माँगते हैं: उसका कारण, उसके लक्षण और उसका उपाय। पूछने वाले कहते हैं कि असम की स्त्रियों को यह परेशानी है, और उन्हें इससे लाभ होगा। वक्ता उत्तर देते हैं: ठीक है, तो वह हम अलग से बताएँगे।
दीपदान के दीये के लिए कैसा कटोरा और कैसी बत्ती लें?
प्लास्टिक का कटोरा चलेगा, सिर से कोई दूसरा उतारे, और बत्ती मोटी हो
पूछा गया कि मिट्टी का कटोरा न मिले तो क्या प्लास्टिक का चलेगा। वक्ता कहते हैं, हाँ, चलेगा। पूछा गया कि दीया छोटा हो तो क्या फ़र्क पड़ता है, और क्या कोई दूसरा उसे सिर से उतार सकता है। वक्ता कहते हैं, हाँ — सिर से कोई दूसरा व्यक्ति ही उतारे; और दीया छोटा होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वक्ता कहते हैं कि दीये की बत्ती मोटी रखिए, ताकि उसका तेल जल्दी ख़त्म हो और दीया जल्दी पूरा हो।
पूछा गया कि मिट्टी का कटोरा न मिले, तो क्या प्लास्टिक का कटोरा चलेगा। वक्ता उत्तर देते हैं, हाँ, चलेगा। पूछा गया कि दीया छोटा हो तो क्या फ़र्क पड़ता है, और क्या कोई दूसरा उसे सिर से उतार सकता है। वक्ता कहते हैं, हाँ — सिर से कोई दूसरा व्यक्ति ही उतारे। दीया छोटा होने से कोई फ़र्क नहीं। वक्ता कहते हैं कि दीपदान के दीये की बत्ती मोटी रखिए, ताकि उसका तेल जल्दी ख़त्म हो और दीया जल्दी पूरा हो।
नज़र के कारण गाय बछड़े को दूध न पिलाए, तो क्या करें?
हनुमान चालीसा के साथ तीन मूंज, आगे से पीछे की ओर उतारना
वक्ता कहते हैं कि इसके लिए मूंज लीजिए — वह धारदार पत्ता जिसे मूंज कहते हैं, जो हनुमान चालीसा की पंक्ति "काँधे मूँज जनेऊ साजै" में है। तीन मूंज लेकर, हनुमान चालीसा पढ़ते हुए, उन्हें गाय के शरीर पर ऊपर से नीचे, यानी आगे से पीछे की ओर फेरिए। उसके शरीर पर लगी नज़र उतर जाएगी। इसी तरह हनुमान चालीसा पढ़ते हुए लाल मिर्च, सरसों आदि उसके शरीर से उतार सकते हैं। पशुपतिनाथ महादेव के नाम से उसके सिर से उतारकर दूध चढ़ाने से भी उसे जल्दी लाभ होता है।
वक्ता कहते हैं कि इसके लिए आपको मूंज चाहिए — वह धारदार पत्ता जिसे मूंज कहते हैं, जो उस पंक्ति में है जो हम हनुमान चालीसा में पढ़ते हैं: "काँधे मूँज जनेऊ साजै"। तीन मूंज लीजिए और हनुमान चालीसा पढ़ते हुए उन्हें गाय के शरीर पर ऊपर से नीचे की ओर — यानी आगे से पीछे की ओर — फेरिए। उसके शरीर पर लगी नज़र उतर जाएगी। जैसे बच्चे की नज़र उतारी जाती है, उसी तरह लाल मिर्च, सरसों आदि लेकर हनुमान चालीसा पढ़ते हुए उसके शरीर से उतारिए, वह भी काम करेगा। और पशुपतिनाथ महादेव के नाम से उसके सिर से उतारकर दूध चढ़ाया जाए, तो उसे जल्दी लाभ मिलता है।
क्या चक्रों के अनुभव YouTube पर सुलझ सकते हैं?
चक्रों के अनुभव YouTube पर नहीं सुलझ सकते
एक श्रोता कहते हैं कि उनके सारे चक्र गोल-गोल घूमते हैं, माथे पर भी और सिर पर भी। वक्ता उत्तर देते हैं कि ये सब बातें YouTube से पूरी तरह समझी या समझाई नहीं जा सकतीं। किसी सच्चे व्यक्ति के सामने जाकर बैठिए और सलाह लीजिए। जिसे इन सब बातों का ज्ञान हो, वही आपको सही मार्गदर्शन दे पाएगा, अगर सचमुच आपके चक्र जागृत हुए हैं।
एक श्रोता कहते हैं कि उनके सारे चक्र घूमते हैं, माथे पर भी और सिर पर भी। वक्ता उत्तर देते हैं कि ये सब बातें YouTube से पूरी तरह समझना और समझाना संभव नहीं है। किसी सच्चे व्यक्ति के आमने-सामने जाकर बैठिए और बात कीजिए — जिसे इन सब बातों का ज्ञान है, वही आपको सही मार्गदर्शन दे पाएगा, अगर सचमुच आपके चक्र जागृत हुए हैं।
गुरुदत्त की पूजा कितनी बार करनी चाहिए?
सामर्थ्य के अनुसार वही पूजा रोज़
वक्ता एक श्रोता से कहते हैं कि गुरुदत्त का विधान यह है कि जितनी सामर्थ्य हो, उतनी वही पूजा रोज़ करें।
एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि जहाँ तक सामर्थ्य हो, गुरुदत्त का विधान यही है कि वही पूजा रोज़ की जाए।
सोमवती अमावस्या पर 84 खंभा में क्या करना चाहिए?
84 खंभा में दीपदान, और कृष्ण के लिए मक्खन ले जाना
एक श्रोता कहती हैं कि उन्हें सोमवती अमावस्या पर 84 खंभा जाकर दीपदान करना है, और पिछली बार जब गई थीं तो लौटने के बाद उनकी तबीयत बहुत ख़राब हो गई थी। वक्ता पूछते हैं कि 84 खंभा जाने के बाद तबीयत क्यों ख़राब होनी चाहिए। वे कहते हैं कि इस बार साथ में मक्खन ले जाइए और वहाँ भगवान कृष्ण को मक्खन का भोग लगवाइए।
एक श्रोता कहती हैं कि कल सोमवती अमावस्या पर उन्हें 84 खंभा जाकर दीपदान करना है; पिछली बार वे गई थीं, और वहाँ से लौटने के बाद उनकी तबीयत बहुत ख़राब हो गई थी। वक्ता पूछते हैं कि 84 खंभा जाने के बाद तबीयत क्यों ख़राब होनी चाहिए? वक्ता कहते हैं, तो साथ में मक्खन ले जाइए। वहाँ भगवान कृष्ण को मक्खन का भोग लगवाइए।
वृंदावन जैसे धाम में निवास बड़े पुण्य से मिलता है, इसलिए वहाँ की प्रार्थना अपने दुख से आगे जानी चाहिए।
धाम में निवास बड़े पुण्य से मिलता है, इसलिए अपने दुख से आगे प्रार्थना कीजिए
वक्ता उनसे कहते हैं कि वृंदावन में रहकर केवल इन सब बातों को सोचने से काम नहीं चलेगा। धाम में निवास बड़े पुण्य से मिलता है। किसी दुख के कारण भी अगर आदमी धाम में, और वृंदावन जैसे धाम में रहने लगे, तो सोचने को क्या बचा। 84 खंभा जाइए, वहाँ दीपदान कीजिए, और भगवान से प्रार्थना कीजिए — केवल अपने दुख के लिए नहीं। उनकी कृपा दृष्टि पड़ जाए, तो दुख तुरंत मिट जाता है।
वक्ता कहते हैं कि वृंदावन में रहकर अगर आप केवल इन सब बातों को सोचेंगी, तो काम नहीं चलेगा। धाम में निवास बड़े पुण्य से मिलता है। किसी दुख के कारण भी अगर आदमी धाम में रहने लगे — और वृंदावन जैसे धाम में — तो सोचने को क्या बचा। आप 84 खंभा जाइए; वहाँ जाकर दीपदान कीजिए। और भगवान से प्रार्थना कीजिए — केवल अपने दुख के लिए नहीं। उनकी कृपा दृष्टि पड़ जाए, तो दुख तुरंत मिट जाता है।
जो ज़्यादा पूजा करता है, उसकी परेशानियाँ क्यों बढ़ती हैं?
धर्म के मार्ग पर रहते हुए प्रारब्ध एक साथ दे दिया जाता है
वक्ता कहते हैं कि यह आम प्रश्न है: हम जितना पूजा-पाठ करते हैं, परेशानी उतनी बढ़ती है, जबकि सामने वाला शराब पीता है, गांजा पीता है, गलत काम करता है और मज़े में है। वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है। होता बस इतना है कि आप धर्म और कर्म पर चल रहे हैं, नियम रखे हैं — चार बजे उठना, नहाना, पूजा में बैठना, आठ बजे तक जप, अनुष्ठान, अष्टमी और एकादशी का व्रत, 84 खंभा जाना, गोवर्धन परिक्रमा, तीर्थ जाना — तो भगवती आपको सारे दुख एक साथ दे देती हैं, ताकि जब यह धर्म कर रहा है और भाग नहीं सकता, तब इसका प्रारब्ध जल्दी कट जाए।
वक्ता कहते हैं कि व्यक्ति पुण्य करे, यह बहुत अच्छी बात है; और आपका प्रश्न हमेशा यही रहता है — कि हम जितना पूजा-पाठ करते हैं, दिक्कत उतनी बढ़ती है, जबकि सामने वाला शराब पी रहा है, गांजा पी रहा है, गलत काम कर रहा है, और देखो, उसे मज़े ही मज़े हैं। वक्ता कहते हैं कि यह गलत सोच है। ऐसा नहीं है। आपके साथ बस इतना हो रहा है: जब आप पूजा-पाठ कर रहे हैं, तो धर्म और कर्म पर चल रहे हैं; नियम और निष्ठा पर चल रहे हैं। आपने नियम बनाया है कि हम रोज़ सुबह चार बजे उठेंगे, फिर नहाकर पूजा-पाठ करने बैठेंगे; मेरा जप आठ बजे तक चलेगा, मेरा अनुष्ठान चलेगा; हम अष्टमी का व्रत कर रहे हैं, एकादशी का व्रत कर रहे हैं; हम 84 खंभा जाकर वहाँ दीया जला रहे हैं, या गोवर्धन परिक्रमा कर रहे हैं, या किसी तीर्थ जा रहे हैं। आप धर्म के अनुसार काम कर रहे हैं। वक्ता कहते हैं कि उस समय भगवान और भगवती जगदम्बा बस इतना करते हैं: जब आप धर्म का काम कर रहे हैं, तो वे आपको सारे दुख एक साथ दे देते हैं — कि यह अभी धर्म कर रहा है, इसका प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। जल्दी कट जाए, कट जाए। इसे अभी दे दो: अभी यह भागेगा नहीं, अभी यह धर्म का काम कर रहा है।
गलत काम करने वाले इतने सुखी क्यों दिखते हैं?
उनका बचा हुआ पुण्य एक साथ दे दिया जाता है, ताकि पाप उभर सके
वक्ता पहले के एक लाइव का प्रश्न याद करते हैं: क्या पुण्य करने के लिए बहुत पैसा चाहिए? उन्होंने कहा था कि पुण्य करने के लिए पैसा नहीं चाहिए, पैसा पाप करने के लिए चाहिए। जो लोग पाप कर रहे हैं, गोवा घूमने जा रहे हैं, वहां दारू पी रहे हैं, चिकन-मटन और सीफूड खा रहे हैं, लड़कियों के साथ जो कृत्य कर सकें कर रहे हैं, शादीशुदा हों या न हों — ऐसे पाप बढ़ाते हुए वे बहुत सुखी रहते हैं। वक्ता कहते हैं, कारण यह है कि भगवान कहते हैं: इसका जो पुण्य बचा है, सब एक साथ दे दो, ताकि इसका पुण्य जल्दी से जल्दी खत्म हो। तभी पाप उभरेगा, और तब यह रोएगा।
और जो लोग पाप कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं — वे याद करते हैं कि एक-दो दिन पहले के लाइव में किसी ने पूछा था कि क्या पुण्य करने के लिए बहुत पैसा चाहिए, और उन्होंने उत्तर दिया था कि पुण्य करने के लिए पैसा नहीं चाहिए, पैसा पाप करने के लिए चाहिए। जो लोग पाप कर रहे हैं, वे मस्त गोवा घूमने जा रहे हैं, वहां दारू पी रहे हैं, चिकन-मटन और सीफूड खा रहे हैं, लड़कियों के साथ जो कृत्य कर सकते हैं कर रहे हैं; शादीशुदा हैं या नहीं, इससे कोई मतलब नहीं। यह सब करके, अपना पाप बढ़ाकर, वे बहुत सुखी रहते हैं। वे सुखी क्यों होते हैं? वक्ता कहते हैं, इसके पीछे कारण यह है कि भगवान कहते हैं: इसका जो भी पुण्य बचा है, सब एक साथ इसे दे दो, ताकि इसका पुण्य जल्दी से जल्दी खत्म हो। क्योंकि वे उसे खत्म कर रहे हैं — गलत काम करके अपने सेविंग अकाउंट में बचा पुण्य खत्म कर रहे हैं। तो भगवान सारा पुण्य एक साथ देते हैं: लो, पुण्य पूरा खत्म करो; तभी पाप उभरेगा, तभी तुम रोओगे, तभी तुम्हें ठीक से दंड देने में आनंद आएगा। तुम वहां गिलास झुकाकर जो आनंद ले रहे हो, वह आनंद हम यहां अपने कमंडल का जल झुकाकर लेंगे, जब तुम्हारा पुण्य खत्म हो जाएगा।
पाप कटते समय कष्ट कितने समय तक रहता है?
दस-पंद्रह साल का कष्ट, और फिर भी न छोड़ना
जब हमारा पाप कट रहा होता है — पुण्य करने से पाप कटता है — तब दस-पंद्रह साल तक कष्ट ही कष्ट रहता है, और हम रोते हैं। मन पीछे हटता है; लगता है, और कितना दोगे। पर कई जन्मों के प्रारब्ध होते हैं, जो तब कटने लगते हैं जब आप साधना शुरू करते हैं, हवन शुरू करते हैं, शिव पर जल चढ़ाते हैं। कभी आप पूरे महीने का अनुष्ठान कर रहे होते हैं और उसी समय कष्ट बढ़ जाता है — तबीयत खराब, कर्ज़ आ जाता है — फिर भी आदमी नहीं रुकता, इस आस में कि एक दिन प्रभु ज़रूर सुनेंगे।
और जब हमारा पाप कट रहा होता है, वक्ता कहते हैं — पुण्य करने से पाप कटता है न — तब दस-दस साल, पंद्रह-पंद्रह साल तक कष्ट ही कष्ट रहता है, और आदमी रोता है। अब नहीं हो पाएगा, आदमी कहता है; फिर भी रोते-रोते करता रहता है। मन पीछे हटता है; लगता है, कितना दोगे। पर कई जन्मों के प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। होते हैं, जो तब कटने लगते हैं जब आप साधना शुरू करते हैं, हवन शुरू करते हैं, शिव पर जल चढ़ाते हैं और लगातार लगे रहते हैं। कभी आप पूरे ज़ोर से महीने भर का अनुष्ठान कर रहे होते हैं और उसी समय कष्ट बढ़ जाता है — तबीयत खराब हो जाती है, कर्ज़ हो जाता है, यह-वह। आदमी रो रहा है, आंखों से आंसू गिर रहे हैं, मन में कराह रहा है, फिर भी करना नहीं छोड़ता, इस आस में कि प्रभु एक दिन ज़रूर सुनेंगे। और किसी तरह आप पार निकल जाते हैं, भगवान सब कटवा देते हैं।
अनुष्ठान प्रारब्ध का क्या करता है?
पुण्य की ऊर्जा से प्रारब्ध जड़ से कटवाया जाता है
जब आप धर्म के मार्ग पर चलते हैं, सेवा-भक्ति शुरू करते हैं — चाहे सप्तशती का पाठ विधि से करें, या इस चैनल पर बताया कोई अनुष्ठान, या अपना कोई — तो जब आप अनुष्ठान शुरू करते हैं, उसमें जो भी संकल्प लें, आपमें जो पुण्य की ऊर्जा बनती है, उससे भगवान सारा प्रारब्ध जड़ से कटवा देते हैं।
और वे उसे जड़ से कटवा देते हैं, वक्ता बार-बार दोहराकर कहते हैं: जब आप धर्म के मार्ग पर चलते हैं, जब भगवान की सेवा-भक्ति शुरू करते हैं — चाहे आप दुर्गा सप्तशती का पाठ विधि से कर रहे हों, या इस चैनल पर बताया कोई अनुष्ठान, या अपना कुछ। जब आप अनुष्ठान करने लगते हैं, उसमें जो भी संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। ले रहे हों, आपमें जो पुण्य की ऊर्जा बनती है, उससे भगवान सारा प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। कदम-कदम पर जड़ से कटवा देते हैं। और भगवद्गीता में कृष्ण ने क्या कहा, वक्ता पूछते हैं: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। हम फल गिनते हैं — फल नहीं आया, फल नहीं आया। फल पर हमारा अधिकार है ही नहीं; हमें यह भी नहीं पता कि हमारा फल क्या होने वाला है, या हम कौन सा कर्म करके आए हैं। तो हम कैसे मान लें कि हमारा इतना पुण्य बचा है और पाप कट गया? पाप-पुण्य का हिसाब न आप रखते हैं, न मैं। हम केवल अपने कर्म को देख सकते हैं, कि उसे कितना सुधारना है और आगे बढ़ाना है।
जब पुण्य उभरने लगता है तब क्या होता है?
कुछ अच्छे महीनों के बाद शुरू हुआ नया पाप, और कुबेर का उदाहरण
कर्म को आगे बढ़ाइए, वक्ता कहते हैं: जैसे ही हमारा पाप शून्य होने लगता है, पुण्य उभरने लगता है, और उसके बाद आनंद लीजिए। पर पुण्य उभरने के बाद क्या होता है? दो, चार या छह महीने बाद नया पाप शुरू हो जाता है, और आदमी फिर फंस जाता है। तो जब समय खराब है, तब आपने नियम बनाकर एकाग्र निष्ठा से अनुष्ठान किया; जब समय अच्छा हो, तो उस अनुष्ठान को बढ़ाइए। जैसा परसों चर्चा हुई थी, कुबेर को कुबेर का पद मिला, वे नव निधि के पति बने, अलकापुरी के राजा बने, और पद पाने के बाद शिव के मित्र बने।
आगे बढ़ाइए, वक्ता कहते हैं। जैसे ही हमारा पाप शून्य होने लगता है, पुण्य उभरने लगता है; उसके बाद आनंद लीजिए। पर पुण्य उभरने के बाद क्या होता है? दो, चार या छह महीने बाद फिर नया पाप शुरू हो जाता है, और आदमी फिर फंस जाता है। तो कष्ट के समय, जब आपका समय खराब चल रहा है, आपने नियम बनाकर एकाग्र निष्ठा से अनुष्ठान किया। जब समय अच्छा हो जाए, तो उस अनुष्ठान को बढ़ाइए। जैसा परसों चर्चा हुई थी: कुबेर को कुबेर का पद मिला, वे नव निधि के पति बने, अलकापुरी के राजा बने, और पद पाने के बाद शिव के मित्र बने। इसी तरह एक समझदार पुरुष और समझदार स्त्री का यही कर्तव्य और कर्म होना चाहिए।
अच्छा समय आने पर साधना कैसे बढ़ाएं?
महीने की जगह हर हफ्ते हवन, और विधि से अधिक तीर्थ यात्रा
कष्ट में तो आदमी भक्ति कर ही रहा होता है, ताकि कष्ट मिटे। जब शुभ समय आए, तो साधना और बढ़ानी चाहिए। जब अच्छी क्वालिटी का सामर्थ्य आए, तो अच्छी क्वालिटी का घी लगाइए; पहले महीने में एक बार हवन करते थे, तो अब हफ्ते में एक बार कीजिए। पहले पांच साल में एक बार तीर्थ यात्रा कर पाते थे और अब भगवान ने सामर्थ्य दिया है, तो साल में दो-तीन बार तीर्थ यात्रा कीजिए — और विधि-विधान से जाइए, टूरिस्ट बनकर घूमने नहीं।
कष्ट में, वक्ता कहते हैं, आदमी भगवान की भक्ति कर ही रहा होता है, ताकि कष्ट मिट जाए। जब ऐसे व्यक्ति का शुभ समय आए, तो उसे अपनी साधना और बढ़ानी चाहिए। जब अच्छी क्वालिटी का सामर्थ्य आ जाए, तो अच्छी क्वालिटी का घी लगाइए; पहले महीने में एक बार हवन होता था, तो अब हफ्ते में एक बार हवन कीजिए। अगर पहले आप पांच साल में एक बार तीर्थ यात्रा कर पाते थे और अब भगवान ने सामर्थ्य दिया है — चाहे बेटों, पोतों और बहुओं के ज़रिये या अपने निजी कारण से, अब धन की कोई कमी नहीं — तो साल में दो-तीन बार तीर्थ यात्रा करनी चाहिए। और विधि-विधान से जाइए; टूरिस्ट बनकर घूमने मत जाइए। पूरे नियम से जाइए, सामर्थ्य के साथ जाइए।
बच्चों से क्या बनने को कहना चाहिए?
बच्चे से साधक बनने को कहिए, केवल डॉक्टर या इंजीनियर नहीं
जब समय खराब होता है, तब असलियत पता चलती है: कोई पूछने वाला नहीं होता, और चाचा, चाची, भाई, भाभी सब उस समय छोड़कर चले जाते हैं। तो वक्ता पूछते हैं, क्या कोई है जो अपने बच्चों को यह बात समझाए और कहे: बड़े होकर साधक बनो, जगदंबा की सेवा करो, शिव की सेवा करो, भगवान की भक्ति करनी है, भक्त बनना है? सब कहते हैं: डॉक्टर बनना है, इंजीनियर बनना है।
आपने दिन देखे हैं, वक्ता कहते हैं, कि वे कैसे खराब होते हैं। जब बुरा समय आता है, तब असलियत पता चलती है: कोई पूछने वाला नहीं होता। चाचा, चाची, भाई, भाभी सब उस समय छोड़कर चले जाते हैं। तो अपने बच्चों के बारे में — क्या कोई है जो अपने बच्चों को यह बात समझाए और कहे, बड़े होकर साधक बनो; बड़े होकर जगदंबा की सेवा करो, शिव की सेवा करो; भगवान की भक्ति करनी है, भक्त बनना है? कोई कहता है क्या, वक्ता पूछते हैं। सब कहते हैं: डॉक्टर बनना है, इंजीनियर बनना है। वह सांसारिक जीवन चलाने के लिए ज़रूरी है, कि चार पैसे आएं तो घर चले। पर भक्त बनना, साधक बनना — यह गुण पहले से विकसित कीजिए, तब जब उसके जीवन में कष्ट आएगा तो वह विचलित नहीं होगा। आप किसी को साधक बनने तब कहते हैं जब आपके सारे रास्ते बंद हो जाते हैं।
पूजा करने पर युवा का मज़ाक कैसे उड़ाया जाता है?
उदाहरण केवल जेल गए बाबाओं का, असली बाबाओं का कभी नहीं
अगर वह भगवद्गीता छू भी ले तो कहेंगे, संन्यासी बनना है क्या, बाबा जी बनना है? इतनी देर पूजा करते हो, हनुमान चालीसा पढ़ते हो — यह सब किसलिए; मत करो; यह नौटंकी नहीं चलेगी; यह माला कहां से उठा लाए; किसको जॉइन कर लिया? कहेंगे, बाबा जी बनोगे, बाबा जी लोगों का हाल देखो, सब जेल में पड़े हैं। वक्ता कहते हैं, ऐसे लोगों को केवल जेल वाले बाबा जी ही दिखेंगे। असली बाबा जी, जो अपना शरीर घिस रहे हैं और दिन-रात भगवती की भक्ति कर रहे हैं, कभी नहीं दिखते, और उनका उदाहरण कभी नहीं दिया जाता।
पहले तो अगर वह श्रीमद्भगवद्गीता छू ले, तो कहेंगे: संन्यासी बनना है क्या, बाबा जी बनना है? इतनी देर पूजा करते हो, हनुमान चालीसा पढ़ते हो। यह सब किसलिए करना है? मत करो; इतनी देर पूजा-पाठ करना है; यह फालतू की नौटंकी नहीं चलेगी। यह माला कहां से उठा लाए? किस-किसको जॉइन कर लिया? यही सब चलता है, वक्ता कहते हैं। बाबा जी बनोगे — बाबा जी लोगों का हाल देखो, सब जेल में पड़े हैं। ऐसे लोगों को केवल वही बाबा जी दिखेंगे जो जेल में पड़े हैं। असली बाबा जी नहीं दिखते — जो अपना शरीर घिस रहे हैं और भगवती की भक्ति कर रहे हैं, दिन-रात उनकी तपस्या में लगे हैं। उनका उदाहरण भी कभी नहीं देंगे। उदाहरण उन्हीं का देंगे जिससे बच्चे का मन भाग जाए। तो इस तरह आप अपने बच्चों में जो गलत समझ भरेंगे, बड़े होकर वह वैसे ही फल देगी।
उपाय शुरू करते ही तंत्र का हमला क्यों नहीं हटता?
हमला करने वाले ने प्रक्षेपण से पहले महीनों प्रेत साधना की थी
वक्ता कहते हैं, कभी मत सोचिए कि हम भगवान की सेवा कर रहे हैं फिर भी तबीयत खराब हो गई। तंत्र विचार अपनी जगह है; उन्होंने विस्तार से बताया है कि यह कैसे काम करता है, इसका वैज्ञानिक आधार क्या है, यह कैसे असर करता है और आप पर कैसे उल्टा असर करेगा। इसका सामना करने की आपकी क्षमता सीमित है — आप सिद्ध पुरुष नहीं हैं। परेशानी आई, तब जाकर आपने मंत्र जप शुरू किया; पर परेशानी तो पांच-दस साल पहले ही जड़ पकड़ चुकी थी। जिसने प्रक्षेपण किया, उसने उस प्रेत की साधना छह महीने, चालीस दिन की होगी — श्मशान में बैठकर, भस्म पर बैठकर, शव के पास, जलते घाट पर, पीपल के पेड़ के नीचे, जैसे उसके गुरु ने बताया।
कभी मत सोचिए, वक्ता कहते हैं, कि हम भगवान की सेवा कर रहे हैं और तबीयत खराब हो गई; कि हम जाकर सारे अनुष्ठान और पूजन कर रहे हैं और तबीयत खराब हो रही है। तंत्र विचार अपनी जगह है, वक्ता कहते हैं; वे पहले ही हर बात बता चुके हैं कि यह कैसे होता है, इसका वैज्ञानिक आधार क्या है, यह किस तरह काम करेगा और आप पर कैसे उल्टा असर करेगा। इसका सामना करने की आपकी क्षमता एक सीमा तक ही है — आप सिद्ध पुरुष नहीं हैं। आप पर परेशानी आई, तब जाकर आपने मंत्र जप शुरू किया; परेशानी तो पांच-दस साल पहले ही जड़ पकड़ चुकी थी। अब जिसने तंत्र का प्रयोग किया, जिसने आपके पीछे प्रेत या पिशाच लगाया — उसने उस प्रेत की साधना छह महीने, चालीस दिन की होगी, श्मशान में बैठकर, भस्म पर बैठकर, शव के पास, चाहे श्मशान घाट पर या आपके कब्रिस्तान में, अलग-अलग जगहों पर, पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर, जैसे भी उसके गुरु ने बताया होगा। उसने वह सिद्धि पक्की कर ली होगी।
किसी पर लगाए गए प्रेत को क्या टिकाए रखता है?
हर अमावस्या को भोजन, और हमला करने वाले का तपोबल
सिद्धि पक्की करके वह उसे हर अमावस्या को भोजन देता होगा, उसे संतुष्ट रखता होगा, वचन से बांधे रखता होगा। जिन भी दैवी शक्तियों की सेवा करके उसने जो तपोबल बनाया है, वह तपोबल प्रेत खा रहा होगा। तभी उसने अभिचारिक क्रिया से आप पर, आपके शरीर पर प्रक्षेपण किया; और इसलिए वह आपके शरीर को नुकसान पहुंचा पाता है, क्योंकि तपोबल वह व्यक्ति दे रहा है जिसने प्रक्षेपण किया।
वह सिद्धि पक्की करके, वक्ता कहते हैं, वह आदमी उसे हर अमावस्या को भोजन देता होगा, उसे संतुष्ट रखता होगा, वचन से बांधे रखता होगा। जिन भी दैवी शक्तियों की सेवा करके उसने जो तपोबल बनाया होगा, वह तपोबल प्रेत खा रहा होगा। तभी उसने अभिचारिक क्रिया से आप पर, आपके शरीर पर प्रक्षेपण किया; और इसलिए वह आपके शरीर को नुकसान पहुंचाने में सक्षम है — क्योंकि तपोबल वह व्यक्ति दे रहा है जिसने प्रक्षेपण किया, जिसने आप पर प्रेत या पिशाच लगाया।
आखिरकार उपाय शुरू करने पर तुरंत लाभ क्यों नहीं होता?
हम गजेंद्र नहीं हैं, जिनकी एक पुकार पर नारायण दौड़े आए
जब आप पूरी तरह गड्ढे में गिर चुके, जब शरीर साथ देना बंद कर चुका, जब प्रेत-पिशाच चढ़ गया और परेशानी शुरू हो गई — तब आपने भगवान की शरणागति ली और अभी-अभी उपाय शुरू किया है। तो तुरंत लाभ नहीं होगा। वक्ता कहते हैं, आप भगवान के इतने बड़े भक्त नहीं हैं, न आपमें या मुझमें ऐसा भाव है कि भगवान तुरंत दौड़े आएं। न हम गजेंद्र जैसे हैं कि आधी रात को मगरमच्छ पैर पकड़े तो हम कान्हा-कान्हा पुकारें और नारायण वैकुंठ छोड़कर दौड़े आएं और चक्र से हमें छुड़ाएं।
जब आप पूरी तरह गड्ढे में गिर चुके, वक्ता कहते हैं, जब शरीर ने साथ देना बंद कर दिया, जब प्रेत और पिशाच आप पर चढ़ गए और कठिनाई शुरू हो गई — तब आपने भगवान की शरणागति ली, और अभी-अभी उपाय शुरू किया है। तब तुरंत लाभ नहीं होगा। आप भगवान के इतने बड़े भक्त नहीं हैं, न आपके या मेरे भीतर ऐसा भाव है कि भगवान खुद अभी दौड़े आएं। न हम गजेंद्र जैसे हैं, कि रात के बारह बजे जब मगरमच्छ हमारा पैर पकड़े, हम उसी पल कान्हा-कान्हा पुकारें, और कान्हा — साक्षात नारायण — वैकुंठ छोड़कर दौड़े आएं और चक्र छोड़कर हमें संकट से छुड़ाएं। वह सामर्थ्य और वह भाव आपके या मेरे भीतर नहीं है।
प्रारब्ध से बनी मानसिकता आदमी को वहां रहते हुए भी केवल अभिचार ही दिखाती है, जहां गली-गली में नारायण घूमते हैं।
आपके प्रारब्ध ने मानसिकता बना दी है; जितना हो सके करते रहिए
वृंदावन को सोचिए, वक्ता कहते हैं, जहां गली-गली में नारायण घूमते हैं, जहां रज-रज में राधारानी का स्वरूप माना गया है, जिसके कण-कण की इतनी महिमा गाई गई है। वहां रहकर आप केवल यह सोचते हैं कि 84 खंभा के बाद आपकी तबीयत खराब हो गई और यह अभिचार तंत्र का असर है। वक्ता कहते हैं, यह कहीं न कहीं आपके अपने प्रारब्ध ने आपकी मानसिकता ऐसी बना दी है कि आप उससे निकल नहीं पा रहे। थोड़ा खुद को मोटिवेट कीजिए और देखिए कि आप कहां खड़े हैं।
वृंदावन को सोचिए, वक्ता कहते हैं, जहां गली-गली में नारायण घूमते हैं, जहां रज-रज में राधारानी का स्वरूप माना गया है, जिसके कण-कण की इतनी महिमा गाई गई है। वहां रहकर आप केवल यह सोचते हैं कि 84 खंभा के बाद तबीयत खराब हो गई और यह अभिचार तंत्र का असर है। तो यह कहीं न कहीं आपके प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। ने आपकी मानसिकता ऐसी बना दी है कि आप उससे निकल नहीं पा रहे। थोड़ा खुद को मोटिवेट कीजिए, वक्ता कहते हैं; देखिए तो सही कि आप कहां खड़े हैं। भगवान को लीला रचनी थी तो उन्होंने श्रीधामा गोप के द्वारा साक्षात भगवती को भी श्राप दिलवा दिया — वह लीला ही थी। तो आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, उनकी लीला स्थली में ही रहते हुए; कोई न कोई कारण ज़रूर रहा होगा। छोड़िए मत। जाइए, कीजिए, लगे रहिए, जितना सामर्थ्य हो उतना कीजिए। जान देने की ज़रूरत नहीं है, पर जितनी हो सके उतनी श्रद्धा, भक्ति और भाव से उन्हें बुलाइए।
शिवलिंग को किससे धोया जा सकता है?
साबुन या सर्फ कभी नहीं — शुद्ध जल, गंगाजल, दूध, पंचगव्य, पंचामृत
वक्ता कहते हैं, शिवलिंग को साबुन या सर्फ से धोने की ज़रूरत नहीं है; उसे साबुन या सर्फ से कभी नहीं धोना चाहिए। शिव का अभिषेक शुद्ध जल से, गंगाजल से, शुद्ध दूध से, पंचगव्य से, पंचामृत से — इन सबसे करना चाहिए। गाय के दूध को अमृत माना गया है; आप अमृत और पंचामृत की बात करते हैं, और उसकी जगह केमिकल वाला साबुन इस्तेमाल करेंगे। यह गलती मत कीजिए।
वक्ता कहते हैं, शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। को साबुन या सर्फ से धोने की ज़रूरत नहीं है; उसे साबुन या सर्फ से कभी नहीं धोना चाहिए। शिव का अभिषेक शुद्ध जल से, गंगाजल से, शुद्ध दूध से, पंचगव्य से, पञ्चामृतदूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बना पंचामृत, पूजा से पहले मूर्ति को स्नान कराने हेतु प्रयुक्त होता है। से — इन सबसे करना चाहिए। आप साबुन और सर्फ से धोएंगे, वक्ता पूछते हैं। गाय के दूध को अमृत माना गया है। और आप अमृत की, पंचामृत की बात करते हैं — और उसकी जगह केमिकल वाला साबुन इस्तेमाल करेंगे। यह गलती मत कीजिए।
क्या सर्वेश्वर महादेव का पाठ शिव मंदिर में किया जा सकता है?
हां, पर ब्रह्मचर्य के साथ और पाठ कम रखकर
हां, वक्ता कहते हैं, मंदिर में किया जा सकता है; सामान्य पाठ किया जा सकता है, अगर दिक्कत बहुत अधिक है और आपका भाव उस स्वरूप में है। पर ध्यान रहे कि उस शिव मंदिर के प्रांगण में नारायण भी न हों। और दूसरी बात, ब्रह्मचर्य आदि का पालन नियम-निष्ठा से बहुत अच्छे से करना होगा। पाठ अधिक मात्रा में नहीं करना है — बहुत कम कीजिए: तीन, पांच, या एक भी। इससे ज़्यादा नहीं।
पूछा गया कि क्या सर्वेश्वर महादेव का पाठ शिव मंदिर में किया जा सकता है; वक्ता उत्तर देते हैं, हां, मंदिर में किया जा सकता है। सामान्य पाठ किया जा सकता है; अगर बहुत अधिक दिक्कत है और आपका भाव इस स्वरूप में है, तो आप शिव के मंदिर में कर सकते हैं। पर ध्यान रखिए, वक्ता कहते हैं, कि उस शिव मंदिर के प्रांगण में नारायण भी न हों। और दूसरी बात, ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। आदि का पालन नियम-निष्ठा से बहुत अच्छे से करना होगा। पाठ अधिक मात्रा में नहीं करना है। पाठ बहुत कम कीजिए — तीन, पांच, या एक भी। इससे ज़्यादा नहीं।
क्या सोमवती अमावस्या पर बेल वृक्ष पर दुग्धाभिषेक किया जा सकता है?
सोमवती अमावस्या पर बेल वृक्ष पर दुग्धाभिषेक और दत्तात्रेय
एक श्रोता सोमवती अमावस्या पर बेल वृक्ष पर दुग्धाभिषेक करना चाहते हैं, और भगवान दत्तात्रेय के बारे में पूछते हैं; वक्ता कहते हैं, यह बहुत ही बढ़िया है, ज़रूर कीजिए। वक्ता कहते हैं, दूसरे लोग भी करें: कल सोमवती अमावस्या है, और कल के दिन यथाशक्ति कीजिए।
एक श्रोता कहते हैं कि वे बेल वृक्ष पर दुग्धाभिषेक करना चाहते हैं, और भगवान दत्तात्रेय के बारे में पूछते हैं, सोमवती अमावस्या पर। बहुत-बहुत बढ़िया, वक्ता उत्तर देते हैं; ज़रूर कीजिए। और दूसरे भी करें, वक्ता कहते हैं: कल सोमवती अमावस्या है, और कल के दिन यथाशक्ति किया जाए।
आवाज़ें सुनाई देने और गंदी बदबू आने का क्या मतलब है?
ऐसा मामला देखना पड़ता है, दूर से तय नहीं होता
एक श्रोता कहते हैं कि तंत्र क्रिया है: उन्हें आवाज़ सुनाई देती है, कोई न हो तब भी; लगता है किसी ने पुकारा, पर वहां जाने पर कोई नहीं मिलता; गंदी बदबू आती है, कभी खराब, कभी अच्छी। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह देखने का विषय है — कहां, क्या और कैसा है। तभी बताया जा सकेगा कि आपको क्या करना चाहिए और आप किस स्तर पर हैं।
एक श्रोता कहते हैं कि तंत्र क्रिया है: उन्हें आवाज़ सुनाई देती है, और तब भी सुनाई देती है जब कोई नहीं होता; लगता है किसी ने पुकारा, पर वहां जाने पर कोई नहीं होता। गंदी-गंदी बदबू आती है — कभी खराब, कभी अच्छी। यह, वक्ता उत्तर देते हैं, देखने का विषय है — कहां है, क्या है, कैसा है। तभी आपको बताया जा सकेगा कि आपको क्या करना चाहिए, और आप किस स्तर पर हैं।
पहली बार रात्रि जागरण करने का क्या अर्थ है?
रात्रि जागरण खुद भगवती की कृपा और शिव की महिमा है
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने जीवन में पहली बार रात्रि जागरण किया, और उनकी कृपा से पहली बार श्री पूजन अच्छे से किया। वक्ता उत्तर देते हैं, यह भगवती की इच्छा और कृपा है, और शिव की महिमा है, कि आप रात्रि जागरण कर पाए। और जिन बहुत से लोगों ने पहली बार रात्रि जागरण किया, उन पर ज़रूर कृपा रही है।
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने जीवन में पहली बार रात्रि जागरण किया, और उनकी कृपा से पहली बार श्री पूजन अच्छे से किया और बहुत अच्छा लगा। यह भगवती की इच्छा और कृपा है, वक्ता उत्तर देते हैं, और शिव की महिमा है, कि आप रात्रि जागरण कर पाए। और जिन बहुत से लोगों ने पहली बार रात्रि जागरण किया है, उन पर ज़रूर कृपा रही है।
क्या भैरव महामंत्र की माला पर भैरव का कोई और मंत्र किया जा सकता है?
हां; और आठ दिन का शिव मंत्र जप जारी रखना चाहिए
जिसने आठ दिन शिव मंत्र का जप किया है, वह पूछता है कि इसका अनुष्ठान कैसे बनाएं; वक्ता कहते हैं: जारी रखिए, इसका विधि-विधान बताया जा चुका है। पूछा गया कि क्या भैरव महामंत्र वाली माला पर भैरव का कोई और मंत्र किया जा सकता है; वक्ता कहते हैं, कोई दिक्कत नहीं है।
एक श्रोता ने आठ दिन शिव मंत्र का जप किया है — साम शिव मंत्र का जप — और पूछते हैं कि इसका अनुष्ठान कैसे बनाया जाए; वक्ता कहते हैं: जारी रखिए। इसका विधि-विधान बताया जा चुका है। पूछा गया कि क्या भैरव महामंत्र वाली माला पर भैरव जी का कोई और मंत्र किया जा सकता है — वक्ता उत्तर देते हैं कि कोई दिक्कत नहीं है।
ये काम जितने गुप्त रखे जाएं उतना अच्छा, क्योंकि लोगों के सामने आने से भजन का भोग लग जाता है और स्टाइल मेंटेन करनी पड़ती है।
ये काम जितने गुप्त रखे जाएं, उतना अच्छा
हम किसी से नहीं मिलते, वक्ता कहते हैं। ये सब काम आप जितना गुप्त रहकर करें, उतना अच्छा है। लोगों के सामने आने के बाद अपने भजन का भोग लग जाता है। उसके बाद बाबा जी मॉडल बन जाते हैं: फिर उन्हें स्टाइल मेंटेन करनी पड़ेगी, बाल छोटे कटवाने पड़ेंगे, तिलक की अपनी एक क्वालिटी हो जाएगी, एकदम चकाचक कपड़े पहनने पड़ेंगे, क्योंकि पता नहीं कब कहां कौन भक्त मिल जाए, और फिर हम यूट्यूबर, ब्लॉगर बन जाएंगे, दिन भर सेल्फी देते रहेंगे। उसके बाद जगह-जगह सारा पुण्य क्षीण होने लगेगा।
हम किसी से नहीं मिलते, वक्ता कहते हैं। ये सब काम आप जितना गुप्त रहकर करें, उतना अच्छा है। लोगों के सामने आने के बाद अपने भजन-भाजन का भोग लग जाता है। उसके बाद बाबा जी मॉडल बन जाते हैं। फिर उन्हें स्टाइल मेंटेन करनी पड़ेगी, बाल कटवाकर छोटे करने पड़ेंगे, तिलक की अपनी एक क्वालिटी हो जाएगी, एकदम चकाचक कपड़े पहनने पड़ेंगे — पता नहीं कब कहां कौन भक्त मिल जाए — और फिर हम यूट्यूबर बन जाएंगे, ब्लॉगर बन जाएंगे, दिन भर सेल्फी देते रहेंगे। उसके बाद जगह-जगह सारा पुण्य क्षीण होने लगेगा। फिर अपने लिए क्या करेंगे?
साधकों के बीच प्रसिद्धि क्या नुकसान करती है?
दुश्मनी में खड़े पचास साधक, और वैमनस्य का भाव
उसके बाद, वक्ता कहते हैं, पचास साधक दुश्मनी में खड़े हो जाएंगे, कि यह ऐसा करते हैं, इनके पास यह है। तो अंदर ही अंदर कहीं वैमनस्य का भाव आ जाएगा। हम किसी और के पतन का कारण क्यों बनें, वक्ता पूछते हैं — कि मेरे कारण दस आदमियों के भीतर द्वेष का भाव खड़ा हो, यह देखकर कि यही है, यही रुद्रांश, यही गृहस्थ तंत्र वाला। इससे अच्छा है कि हम नहीं मिलेंगे; अपनी जगह रहिए, भगवती का भजन कीजिए, जय जगदंबा की सेवा कीजिए, विधि-विधान चैनल पर है।
उसके बाद, वक्ता कहते हैं, पचास साधक दुश्मनी में खड़े हो जाएंगे — कि यह ऐसा करते हैं, इनके पास यह है। तो अंदर ही अंदर कहीं न कहीं वैमनस्य का भाव आ जाएगा। हम किसी और के पतन का कारण क्यों बनें? कि मेरे कारण दस आदमियों के भीतर द्वेष का भाव खड़ा हो, यह देखकर कि यही है, यही रुद्रांश, यही गृहस्थ तंत्र वाला। इससे अच्छा, वक्ता कहते हैं, कि न मिलेंगे, न कुछ होगा। अपनी जगह रहिए, भगवती का भजन कीजिए, जय जगदंबा की सेवा कीजिए; विधि-विधान चैनल पर है। हम हर एक चीज़ आपके सामने रखते हैं, वक्ता कहते हैं — देखिए, सीखिए, कीजिए। अगर कुछ समझ नहीं आ रहा, या कोई खास बाधा है, तो बात करके विषय समझिए।
विंध्य क्षेत्र के सभी शक्तिपीठ और कुंड उपलब्ध क्यों नहीं हैं?
ऋणमुक्तेश्वर महादेव का मोतिया तालाब, आधा सूखा, और लुप्त हुए कुंड
कलिकाल का कोई कारण है, वक्ता कहते हैं, जिससे सभी शक्तिपीठ उपलब्ध नहीं हैं। विंध्य क्षेत्र में कई प्राकृतिक कुंड हैं जिनका वर्णन विंध्याचल माहात्म्य में मिलता है; और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि शुरू से ऐसे कई कुंड लुप्त हो चुके हैं और दिखते ही नहीं। ऋणमुक्तेश्वर महादेव के पास का मोतिया तालाब आधा सूख चुका है — वह क्षेत्र जहां विंध्य क्षेत्र के सिद्ध मुनि जाकर अदृश्य हो जाते हैं, जिसे अदृश्य क्षेत्र माना गया है — और वह सूखा पड़ा है। कई कुंड और झरने पूरी तरह सूख चुके हैं।
कलिकाल का कोई न कोई कारण है, वक्ता कहते हैं, जिससे सभी शक्ति पीठ उपलब्ध नहीं हैं। विंध्याचल क्षेत्र में कई प्राकृतिक कुंड हैं जिनका वर्णन विंध्याचल माहात्म्य में मिलेगा। उनमें, आपको जानकर आश्चर्य होगा, शुरू से ऐसे कई कुंड हैं जो लुप्त हो चुके हैं और दिखते ही नहीं। ऋणमुक्तेश्वर महादेव के पास जो मोतिया तालाब है, वह आधा सूख चुका है। ऋणमुक्तेश्वर महादेव के उस क्षेत्र के बारे में माना जाता है कि विंध्य क्षेत्र के सिद्ध मुनि वहां जाकर अदृश्य हो जाते हैं; उसे अदृश्य क्षेत्र माना गया है। और वह इस समय सूखा पड़ा है। भगवती की माया, वक्ता कहते हैं। कई कुंड और झरने पूरी तरह सूख चुके हैं।
पूजा के समय घुंघरू की आवाज़ का क्या मतलब है?
अनदेखा कीजिए और आगे बढ़िए; उसमें रुके तो माया में रहेंगे
पूछा गया कि पूजा के समय घुंघरू की आवाज़ का क्या मतलब है; वक्ता कहते हैं, आप इसे जिस भाव में देखना चाहें देख सकते हैं; यह बहुत सामान्य बात है। अनदेखा करेंगे तो आगे बढ़ेंगे। अगर घुंघरू में रुक गए, तो जल्दी ही घुंघरू पहनने वाली कोई आपको मिल जाएगी — और फिर माया में रहिए।
पूछा गया कि पूजा के समय घुंघरू की आवाज़ का क्या मतलब है; वक्ता उत्तर देते हैं कि अब आप इसे जिस भाव में देखना चाहें, देख सकते हैं। यह बहुत सामान्य बात है। अनदेखा करेंगे, तो आगे बढ़ेंगे। अगर घुंघरू में रुक गए, तो जल्दी ही घुंघरू बजाने वाली कोई न कोई आपको मिल जाएगी। फिर माया में रहिए, वक्ता कहते हैं।
अगर शरीर पूरी विधि न झेल सके तो क्या करें?
शरीर पर ज़बरदस्ती मत कीजिए; कुर्सी पर बैठिए, और सक्षम होने पर मुख्य अनुष्ठान कीजिए
जब शरीर पूरी तरह सक्षम न हो, वक्ता कहते हैं, तो उस पर बहुत ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए। अगर आप नए हैं और प्रारब्ध के कारण शरीर में परेशानी है, या कोई अभिचार दोष भी है, तो पूरा काम बैठकर कीजिए; ज़िद से मत कीजिए। बैठ नहीं पाते तो कुर्सी आदि पर बैठकर कर लीजिए। जब सक्षम हो जाएं, जब विचार थोड़ा कट जाए, जब भगवती की कृपा हो और शरीर थोड़ा सुरक्षित हो जाए, तब मुख्य अनुष्ठान कीजिए।
जब शरीर पूरी तरह सक्षम न हो पाए, वक्ता कहते हैं, तो उस पर बहुत ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए। अगर आप नए हैं, और आपके प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। के कारण शरीर में परेशानी है, और अभी कोई अभिचार दोष भी है, तो पूरा काम बैठकर कीजिए। ज़िद से मत कीजिए। बैठ नहीं पाते तो कुर्सी आदि पर बैठकर कर लीजिए। जब आप सक्षम हो जाएं, जब विचार कुछ कट जाए, जब भगवती की कृपा हो और शरीर थोड़ा सुरक्षित हो जाए, तब मुख्य अनुष्ठान कीजिए।
सर्वेश्वर महादेव कौन हैं, और वहां नारायण क्यों नहीं होने चाहिए?
सर्वेश्वर महादेव शरभ आकाश भैरव के रूप में, और नारायण को अलग रखना
अपने पहले उत्तर को स्पष्ट करते हुए वक्ता कहते हैं कि प्रश्नकर्ता ने सर्वेश्वर महादेव की पूजा करने के बारे में पूछा था। सर्वेश्वर महादेव शरभ आकाश भैरव हैं; और जहां भी उनकी सेवा-पूजा या अनुष्ठान होता है, वहां नारायण का कोई श्री विग्रह, फोटो, चिह्न आदि नहीं होना चाहिए। नारायण सब जगह हैं, वक्ता कहते हैं, पर यहां कर्म प्रधान है — और जो हम करने जा रहे हैं वह तंत्र कांड से जुड़ा है — इसलिए उनसे जुड़ा कोई अंश वहां नहीं होना चाहिए।
जिनसे उन्होंने कहा कि शिव मंदिर में जप किया जा सकता है जहां नारायण न हों — वक्ता स्पष्ट करते हैं कि उन प्रश्नकर्ता ने कहा था कि उन्हें सर्वेश्वर महादेव की पूजा करनी है। सर्वेश्वर महादेव शरभ आकाश भैरव हैं। जहां भी उनकी सेवा-पूजा होती है या उनका अनुष्ठान होता है, वहां नारायण का कोई श्री विग्रह नहीं होना चाहिए, कोई फोटो नहीं, कोई चिह्न नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं। नारायण सब जगह हैं, वक्ता कहते हैं। पर यहां कर्म प्रधान है — और जो हम करने जा रहे हैं वह तंत्र कांड से जुड़ा है — इसलिए उनसे जुड़ा कोई अंश वहां नहीं होना चाहिए।
क्या पांडवों पर कभी तंत्र किया गया था?
पांडवों पर तंत्र करने वालों में सबसे पहले शकुनी
एक श्रोता कहते हैं कि पांडवों पर तंत्र नहीं किया गया था; वक्ता उत्तर देते हैं: किसने कहा कि पांडवों पर तंत्र नहीं किया गया? पांडवों पर तंत्र करने वालों में सबसे पहले मामा शकुनी थे। वे सबसे बड़े तंत्र-मंत्र करने वाले थे। और ये लोग कहते हैं कि उसका असर नहीं हुआ।
आपसे किसने कहा, वक्ता एक श्रोता से पूछते हैं, कि पांडवों पर तंत्र नहीं किया गया था? पांडवों पर तंत्र करने वालों में सबसे पहले मामा शकुनी थे। वे सबसे बड़े तंत्र-मंत्र करने वाले थे। और ये लोग कहते हैं कि उसका असर नहीं हुआ।
क्या कुशा और दूर्वा भी पैकेट में जानी चाहिए?
कुशा और दूर्वा भी पैकेट में होनी चाहिए
पूछा गया कि क्या लकड़ी के पैकेट में कुशा और दूर्वा भी रखनी चाहिए; वक्ता उत्तर देते हैं: हां, बिल्कुल, कुशा और दूर्वा भी होनी चाहिए। वे यह भी कहते हैं कि हर क्षेत्र में गुप्तता बरती जा रही है।
वक्ता कहते हैं कि जितने भी क्षेत्र हैं, सब जगह गुप्तता हो ही रही है। पूछा गया कि क्या लकड़ी के पैकेट में कुशा और दूर्वा भी होनी चाहिए; वक्ता उत्तर देते हैं: हां, बिल्कुल। कुशा और दूर्वा भी होनी चाहिए।
यूट्यूब और फेसबुक के ज़रिये अब सनातनियों में चेतना और जागृति आ रही है, लंबे समय तक धीरे-धीरे उनका ब्रेनवॉश किए जाने के बाद।
धीरे-धीरे हुआ ब्रेनवॉश, और अब सनातनियों में आती जागृति
इन लोगों ने, वक्ता कहते हैं, बहुत धीरे-धीरे हमारा दिमाग पूरी तरह धो दिया है। आज के समय में यूट्यूब और फेसबुक के कारण फिर भी सनातनियों में बहुत चेतना और जागृति आ रही है; नहीं तो ये सब बातें कहां थीं। अगर कोई इसकी बात करता, कोई शिखा रखता, कोई तिलक लगाता, तो लोग उसका मज़ाक उड़ाकर उसका जीना मुश्किल कर देते थे। और यह सारा मज़ाक उसी जगह से आया।
तो इन लोगों ने, वक्ता कहते हैं, बहुत धीरे-धीरे, बहुत आहिस्ता हमारा दिमाग धो दिया, मन को पूरी तरह धो दिया। आज जो समय चल रहा है, उसमें यूट्यूब और फेसबुक के कारण फिर भी सनातनियों में बहुत चेतना और जागृति आ रही है। नहीं तो ये सब बातें कहां थीं? अगर कोई इसकी बात करता, कोई शिखा रखता, कोई तिलक लगाता, तो लोग उसका मज़ाक उड़ाकर उसका जीना मुश्किल कर देते थे। और यह सारा मज़ाक — कहां से आया? उसी जगह से।
वही लोग ज्ञान छिपाने के लिए पंडितों और विद्वानों को गाली देते हैं, और फिर खुलकर सिखाने वालों को भी गाली देते हैं।
ज्ञान छिपाने पर पंडितों को गाली, फिर सबके सामने सिखाने वालों को गाली
आप बैठकर सारे पंडितों, ब्राह्मणों, जानकारों, विद्वानों को गाली देते हैं, वक्ता कहते हैं: तुम लोगों ने कुछ नहीं सिखाया। आप अधिकार की बात करते हैं — कि आपको उपवीत पहनना चाहिए, या आपको ऐसा अधिकार नहीं है। और आज, जब यूट्यूब के ज़रिये सिखाया और बताया जा रहा है, जब सौ, डेढ़ सौ, पांच सौ, हज़ार लोग आकर प्रमाण के साथ समझाने की कोशिश करते हैं, तब भी उन्हें गाली मिलती है।
एक तरफ, वक्ता कहते हैं, आप लोग बैठकर सारे पंडितों, ब्राह्मणों, जानकारों, विद्वानों को गाली देते हैं: तुम लोगों ने हमें कुछ नहीं सिखाया। आप अधिकार की बात करते हैं — कि आपको उपवीत पहनना चाहिए, या आपको ऐसा अधिकार नहीं है। और आज, जब यूट्यूब के ज़रिये सिखाया और बताया जा रहा है, जब सौ, डेढ़ सौ, पांच सौ, हज़ार लोग आकर प्रमाण के साथ समझाने की कोशिश करते हैं, तब भी उन पर गाली पड़ती है।
वे खुद को ब्राह्मण नहीं, महाशूद्र कहते हैं, और चेताते हैं कि जानकारों को गाली देना अपनी ही जड़ काटना है।
महाशूद्र होने का उनका कथन, और अपनी ही जड़ काटना
हम पहले ही कहते हैं, वक्ता उनसे कहते हैं, कि हम ब्राह्मण हैं ही नहीं — हम महाशूद्र हैं, नीच व्यक्ति हैं; मुझसे बड़ा महाशूद्र कोई नहीं होगा। पर अगर आप मुझे शूद्र मानकर अपना भी मान लें, तब भी आप मानने वाले नहीं। आप कहते हैं हम कर्मकांड नहीं करेंगे, या मंत्र, या यह। यहां हर एक चीज़ हिंदी में करके बताई जा रही है — और वह भी आप लोगों को हज़म नहीं हो रही। आप लोगों को बस बहाना चाहिए। आप अपने ही पेड़ की जड़ काट रहे हैं, और कुछ नहीं।
और भाई, वक्ता कहते हैं, हम पहले ही कहते हैं कि हम ब्राह्मण हैं ही नहीं — हम महाशूद्र हैं, नीच व्यक्ति हैं। मुझसे बड़ा महाशूद्र कोई नहीं होगा। पर चलिए, अगर आप मुझे शूद्र मानकर अपना भी मान लें, तब भी आप मानने वाले नहीं। आप कहते हैं कि हम कर्मकांड नहीं करेंगे, या मंत्र, या ऐसा कुछ। यहां, वक्ता कहते हैं, हर एक चीज़ हिंदी में करके बताई जा रही है — और वह भी आप लोगों को हज़म नहीं हो रही। आप लोगों को बस बहाना चाहिए। आप अपने ही पेड़ की जड़ काट रहे हैं, और कुछ नहीं।
क्या सिद्धि के प्रदर्शन की मांग करनी चाहिए?
बुद्धि और विवेक वालों का कोई नुकसान नहीं कर सकता, और पाकिस्तान उड़ाने की मांग
जिनके मन में सामर्थ्य, बुद्धि और विवेक है — आप उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। अगर कोई मज़ाक उड़ाने के लिए सिद्धि का प्रदर्शन करे, तो उनका क्या मज़ाक बनेगा, वक्ता पूछते हैं। तुम्हारे पास इतनी सिद्धि है, इतना सामर्थ्य है — तो जाओ, पाकिस्तान को उड़ा दो। कहां है? हम तुम्हारी सिद्धि लगाएंगे, हम यह करेंगे, वह करेंगे।
जिनके मन में सामर्थ्य, बुद्धि और विवेक है, वक्ता कहते हैं, आप उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। अगर मज़ाक उड़ाने के लिए कोई सिद्धि का प्रदर्शन करे, तो उनका क्या मज़ाक बनेगा? तुम्हारे पास इतनी सिद्धि है, इतना सामर्थ्य है — तो जाओ, पाकिस्तान को उड़ा दो। कहां है? हम तुम्हारी सिद्धि लगाएंगे, हम यह करेंगे, वह करेंगे।
दतिया बगलामुखी शक्तिपीठ के राष्ट्र संत महाराज ने चीनी हमले के समय बगलामुखी मूल मंत्र का संपुट लगाकर शतचंडी की थी।
चीनी हमले के समय दतिया बगलामुखी शतचंडी
सिद्धि का वह प्रदर्शन, वक्ता कहते हैं, दतिया बगलामुखी शक्तिपीठ के राष्ट्र संत महाराज जी ने किया था। आप इसका वर्णन हर जगह पढ़ते, सुनते, देखते हैं: कि भगवती बगलामुखी के मूल मंत्र का संपुट लगाकर — हालांकि वर्णन सप्ताक्षरी मंत्र के संपुट का आता है — उन्होंने शतचंडी करवाई थी जब चीन ने भारत पर हमला किया था, और उन्हें पीछे हटना पड़ा। वक्ता कहते हैं, उनमें सामर्थ्य था; और जिसमें जितना सामर्थ्य होगा, वह उतना ही दिखाएगा। जगदंबा ने जो ब्रह्म तेज दिया है, जो आदमी का प्रारब्ध है, उसी तरह वह काम करता है।
सिद्धि का वह प्रदर्शन, वक्ता कहते हैं, दतिया बगलामुखी शक्तिपीठ के राष्ट्र संत महाराज जी ने किया था। आप इसका वर्णन हर जगह पढ़ते, सुनते, देखते हैं: कि भगवती बगलामुखी के मूल मंत्र का संपुट लगाकर — वर्णन सप्ताक्षरी मंत्र के संपुट का आता है — उन्होंने शतचंडी करवाई थी, जब चीन ने भारत पर हमला किया था। उन्हें पीछे हटना पड़ा। उनमें सामर्थ्य था; सचमुच सामर्थ्य था। अब अगर किसी व्यक्ति में सामर्थ्य है, तो वह उतना ही दिखाएगा। जगदंबा ने जो ब्रह्म तेज दिया है, और जो व्यक्ति का प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। है, उसी तरह वह काम करता है। वह भी आप लोगों को हज़म नहीं होता, और वह भी आप लोग नहीं समझते।
क्या सीखने पर वर्ण या कुल की कोई रोक है?
जन्म से कुछ भी वर्जित नहीं — जो सिखा रहे हैं, उनसे जाकर सीखो
वक्ता कहते हैं कि जिस भी वर्ण में, जिस भी कुल में आपने जन्म लिया, कहीं कुछ वर्जित नहीं है। अधिकार का मतलब क्या है? सीखो भाई। अपने कुल और परिवार से बाहर निकलकर सीखो। जब एक ब्राह्मण रेलवे में जाकर चतुर्थ श्रेणी का काम कर सकता है, तो आप चौथे वर्ण में हो तो जाकर सीखो। किसने मना किया है? रुद्राष्टक का पाठ करना सीखो। जो सिखा रहे हैं, उनसे सीखो।
वक्ता कहते हैं कि जिस भी वर्ण में और जिस भी कुल में आपने जन्म लिया, कहीं कुछ वर्जित नहीं है। जिसे अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। कहते हैं, वह क्या है? सीखो भाई। अपने कुल और परिवार से बाहर निकलकर सीखो। जब एक ब्राह्मण रेलवे में जाकर चतुर्थ श्रेणी का काम कर सकता है, तो आप चौथे वर्ण में हो तो जाकर सीखो। किसने मना किया है? रुद्राष्टकम् का पाठ करना सीखो। जो सिखा रहे हैं, उनसे सीखो। जो कहते हैं कि हम नहीं सिखाएँगे, उन पर क्यों टूट पड़ते हो — वह मना कर रहा है, सिखाना नहीं चाहता, नहीं सिखाया; छोड़ो। जो सिखा रहे हैं, ऑनलाइन सिखा रहे हैं, घर पर बैठाकर पैसे लेकर सिखा रहे हैं, क्लास दे रहे हैं — अगर आपके भीतर इच्छा है, तो किसी भी तरह जाकर सीख सकते हो। लोग सीख रहे हैं।
क्या स्त्रियों को गायत्री मंत्र का अधिकार है?
स्त्रियों के लिए हर तरह से वर्जित, ब्राह्मण की पत्नी के लिए भी
वक्ता कहते हैं कि लोग गायत्री के अधिकार पर अटके रहते हैं: खुजली होती है कि गायत्री का अधिकार नहीं है। गायत्री का अधिकार क्यों नहीं है? क्योंकि शरीर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। योग्य बनो और करो। स्त्रियों के लिए यह हर तरह से वर्जित है; ब्राह्मण की पत्नी के लिए भी वर्जित है। स्त्री का मतलब यह नहीं कि शूद्र वर्ण की स्त्री को मना है और ब्राह्मण के लिए छूट है।
वक्ता कहते हैं कि लोग अटके रहते हैं: गायत्री मंत्र का अधिकार नहीं है — खुजली शुरू हो जाती है, गायत्री का अधिकार नहीं है, गायत्री का। आप इसी पर अटके हो भाई। गायत्री का अधिकार क्यों नहीं है? क्योंकि शरीर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। योग्य बनो और करो। स्त्रियों के लिए यह हर तरह से वर्जित है। ब्राह्मण की पत्नी के लिए भी वर्जित है। स्त्री का मतलब यह नहीं कि शूद्र वर्ण की स्त्री को मना है और ब्राह्मणी जाकर कर ले।
मेना कौन हैं, और आने वाला पार्वती खंड क्या सिखाता है?
पितरों की पुत्री मेना, और गृहस्थ धर्म पर उनका उपदेश
वक्ता कहते हैं कि प्रतिपद धर्म के बारे में बहुत कुछ समझाया और सिखाया गया है। जब आगे पार्वती खंड पढ़ेंगे, तो देखेंगे कि पार्वती को भगवती मेना से क्या उपदेश मिला। मेना कौन हैं? पितरों की पुत्री को मेना कहा गया है। और फिर भगवती पार्वती उनकी पुत्री हैं — इस तरह भगवती पार्वती पितरों की परपोती हुईं। उन्हें गृहस्थ धर्म पर क्या उपदेश दिया जा रहा है, इस पर चर्चा होगी, और तब समझ आएगा कि स्त्री का कर्तव्य क्या है।
वक्ता कहते हैं कि प्रतिपद धर्म के बारे में इतना कुछ समझाया और सिखाया गया है। जब आगे पार्वती खंड पढ़ेंगे, तो देखेंगे कि पार्वती को भगवती मेना से क्या उपदेश मिला। मेना कौन हैं? पितृों की पुत्री को मेना कहा गया है। और फिर भगवती पार्वती उनकी पुत्री हैं — इस तरह भगवती पार्वती पितरों की परपोती हुईं। उन्हें गृहस्थ धर्म पर क्या उपदेश दिया जा रहा है, इस पर चर्चा होगी, और तब आप समझेंगे कि स्त्री का कर्तव्य क्या है।
पुरुष लंपट है और सबसे बड़ा भोगी है, जबकि स्त्री सबसे श्रेष्ठ है और उसे उस श्रेष्ठता को सही ढंग से निभाना चाहिए।
पुरुष लंपट और सबसे बड़ा भोगी; तो श्रेष्ठता को सही ढंग से निभाओ
वक्ता कहते हैं कि पुरुष को तो सब कुछ सिखाया जाता है। पुरुष लंपट है — हम तो हमेशा कहते हैं। पुरुष सबसे बड़ा भोगी है; पुरुष नीच है। ब्राह्मण नीच है, पुरुष नीच है, स्त्री सबसे श्रेष्ठ है। अगर आप सबसे श्रेष्ठ हो, तो उस श्रेष्ठता को सही ढंग से निभाओ। मनमर्ज़ी से काम हो रहे हैं, मनमर्ज़ी से आचरण हो रहा है। यह गलत बात है न।
वक्ता कहते हैं कि पुरुष को तो सब कुछ सिखाया जाता है। पुरुष लंपट है — हम तो हमेशा कहते हैं। पुरुष सबसे बड़ा भोगी है; पुरुष नीच है। ब्राह्मण नीच है, पुरुष नीच है, स्त्री सबसे श्रेष्ठ है। अगर आप सबसे श्रेष्ठ हो, तो उस श्रेष्ठता को सही ढंग से निभाओ। मनमर्ज़ी से काम हो रहे हैं, मनमर्ज़ी से आचरण हो रहा है। यह गलत बात है न।
पहले भांडों और नगर वधुओं को कहाँ रखा जाता था?
भांड और नगर वधुएँ नगर के बाहर, समाज में कोई दखल नहीं
वक्ता कहते हैं कि पहले के समय में भांडों को नगर के बाहर रखा जाता था, और नगर वधुओं को भी नगर के बाहर, जो नगर वधु कहलाती थीं। और जितने भी भांड होते थे जो कला दिखाते थे, वे बहुत धनी होते थे — पर समाज के जीवन में उनका कोई दखल नहीं था। पुराणों या शास्त्रों में कहीं नहीं पढ़ोगे कि किसी भांड या किसी नट को चारित्रिक विशेषता दी गई हो, या बच्चों से कहा गया हो कि उससे सीख लो। यह कहीं नहीं मिलेगा।
वक्ता कहते हैं कि पहले के समय में भांडों को नगर के बाहर रखा जाता था; और नगर वधुओं को भी नगर के बाहर, जो नगर वधु कहलाती थीं। और जितने भी भांड होते थे, जो कला का प्रदर्शन करते थे, वे बहुत धनी होते थे। पर समाज के जीवन में उनका कोई दखल नहीं था। पुराणों में, शास्त्रों में कहीं नहीं पढ़ोगे कि किसी भांड या किसी नट को कहीं चारित्रिक विशेषता दी गई हो, या बच्चों से कहा गया हो कि उससे कोई सीख लो। यह कहीं नहीं मिलेगा। वे पूछते हैं, क्या कहीं मिला है? नहीं मिलेगा।
यूथ आइकन कौन होना चाहिए?
कोई पौराणिक व्यक्ति या पौराणिक क्षेत्र, हीरो-हीरोइन नहीं
वक्ता कहते हैं कि पर आज आपकी बेटियाँ घर में सिक्स-पैक वाले नए हीरो लगाती हैं; लड़के हीरोइनें लगाते हैं और उनके बड़े फैन हैं। और वे स्त्रियाँ क्या दिखा रही हैं — शराब और सिगरेट पीना, हुक्का बार जाना, कूल दिखने के लिए बॉयफ्रेंड के साथ घूमना और पोस्ट करना। फिर बच्चे वही सीखेंगे और उन्हें ही अपना यूथ आइकन बनाएँगे। होना यह चाहिए कि किसी पौराणिक व्यक्ति को, किसी पौराणिक क्षेत्र को यूथ आइकन बनाओ। पर ऐसा होता नहीं।
वक्ता कहते हैं कि पर आज आपकी बेटियाँ घर में जो भी नए हीरो हैं, सिक्स-पैक वाले, यह-वह, उन्हें लगाएँगी। लड़के हीरोइनें लगाएँगे और उनके बड़े फैन हैं। और वह क्या दिखा रही है? शराब और सिगरेट पी रही है, हुक्का बार जा रही है, कूल दिखने के लिए बॉयफ्रेंड के साथ घूम रही है और पोस्ट कर रही है। तो बच्चे ठीक वही सीखेंगे, और उसे ही अपना यूथ आइकन बनाएँगे। होना यह चाहिए कि किसी पौराणिक व्यक्ति को यूथ आइकन बनाओ, किसी पौराणिक क्षेत्र को यूथ आइकन बनाओ। पर ऐसा होता नहीं। बस किसी बच्चे का वीडियो वायरल हो जाएगा, और आप कहोगे कितना अच्छा बच्चा है, देखो क्या कर रहा है; आपका अपना बच्चा नहीं कर पाता।
बच्चे से दिन में दस बार क्या कहना चाहिए?
तुमने सनातन में साधक बनने के लिए जन्म लिया है, इंजीनियर बनने के लिए नहीं
वक्ता कहते हैं कि अपने बच्चे से कहो, बचपन से उसके भीतर यह बात बोलो: आपका बच्चा अभी कितना भी बड़ा हो, उससे कहो कि बड़े होकर तुम साधक बनोगे; तुमने सनातन में साधक बनने के लिए जन्म लिया है, इंजीनियर या डॉक्टर बनने के लिए नहीं। इंजीनियर या डॉक्टर बनना कर्म क्षेत्र है; वह तो बनना ही है। वह इस मिले हुए शरीर के लिए है — यह शरीर एक वस्त्र है, और कुछ नहीं। इसके भीतर जो आत्मा है, जिसके साथ तुमने जन्म लिया, उसके लिए तुम्हें साधक बनना है। बच्चों से दिन में दस बार कहो, और खुद से भी कहो, जिस भी स्तर पर हो, जब तक साँस चल रही है।
वक्ता कहते हैं कि हम बार-बार कहते हैं: अपने बच्चे से कहो, बचपन से उसके भीतर यह बात बोलो। आपका बच्चा अभी कितना भी बड़ा हो, उससे कहो कि बड़े होकर तुम साधक बनोगे; कि तुमने सनातन में साधक बनने के लिए जन्म लिया है, इंजीनियर या डॉक्टर बनने के लिए नहीं। इंजीनियर या डॉक्टर बनना कर्म क्षेत्र है — वह तो हर हाल में बनना ही है। वह इस मिले हुए शरीर के लिए है। वक्ता कहते हैं कि यह शरीर एक वस्त्र है, और कुछ नहीं। इसके भीतर जो आत्मा है, जिसके साथ तुमने जन्म लिया है, उसके लिए तुम्हें साधक बनना है। बच्चों से दिन में दस बार कहो। खुद से भी कहो, जिस भी स्तर पर हो। साँस चल रही है, आप जीवित हो; उतने समय तक कहते रहो कि हम साधक बनेंगे। और आप बन जाओगे।
मारण और अफेयर की बातों में बीता जीवन बेकार चला जाता है, और अंत में कोई तांत्रिक आपको बाँध लेता है।
ऐसी बातों में बीतता जीवन, और ऊपर से तांत्रिक का बाँधना
वक्ता कहते हैं कि जीवन बस ऐसी ही बातों में बीत जाएगा — कि फलाँ ने मारण किया, फलाँ की बेटी सुंदर है और वहाँ अफेयर चल रहा है। बाद में आप खा लिए जाओगे और कुछ नहीं होगा। आप मरोगे और सड़ोगे; कोई तांत्रिक आपको भी बाँध लेगा और आप पर कुछ चलाता रहेगा, और आप पूरा जीवन यही करते रहोगे — जीते जी मरे हुए, और मरने के बाद भी। कुछ नहीं बदलेगा और हालत और खराब हो जाएगी। वक्ता कहते हैं, थोड़ा प्रयास करो अपने आत्म स्वरूप को, अपने आत्म तत्व को जानने का।
वक्ता कहते हैं कि जीवन बस इन्हीं बातों में बीत जाएगा — कि फलाँ ने मारण किया, फलाँ की बेटी सुंदर है और वहाँ अफेयर चल रहा है। इसी सब में जीवन पार हो जाएगा; बाद में आप खा लिए जाओगे और कुछ नहीं होगा। आप मरोगे और सड़ोगे। कोई तांत्रिक आपको भी बाँध लेगा और आप पर कुछ चलाता रहेगा, और आप पूरा जीवन यही करते रहोगे। जीते थे, फिर भी मरे हुए; और मरने के बाद भी। कुछ नहीं बदलेगा, और हालत और खराब हो जाएगी। वक्ता कहते हैं, थोड़ा प्रयास करो अपने आत्म स्वरूप को, अपने आत्म तत्व को जानने का।
वे वही बताते हैं जो उन्होंने खुद किया है — उन्होंने भी किसी और की तरह शरीर का कष्ट सहकर चारों प्रहर निभाए हैं।
उनका कहना कि चारों प्रहर उन्होंने खुद निभाए, उसी शारीरिक कष्ट के साथ
वक्ता कहते हैं कि हम वही कहते हैं जो करते हैं; जो नहीं करते, वह नहीं कहते। अगर हमने आपसे चार प्रहर की पूजा करवाई, तो हमारी अपनी जो भी हालत रही हो, हमने भी प्रयास किया — वक्ता कहते हैं कि हम कोई योगयुक्त दिव्य पुरुष नहीं, बल्कि नीच, अधम, शूद्र, महाशूद्र, पतित हैं। हमने भी साधारण तरीके से चार प्रहर की पूजा का प्रयास किया। हमारी भी हालत खराब होती है; हमारी भी कमर दुखती है, पैर दुखते हैं। एक सीमा तक किया जा सकता है, उसके बाद समझ आता है — और इसीलिए हम आपकी तकलीफ समझ सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि और भाई, हम जो करते हैं वही कह रहे हैं; जो नहीं करते, वह नहीं कहते। अगर हमने आप लोगों से चार प्रहर की पूजा करवाई, तो हमारी अपनी जो भी हालत रही हो — हम कोई योगयुक्त दिव्य पुरुष नहीं; हम नीच, अधम, शूद्र, महाशूद्र, पतित हैं — हमने भी साधारण तरीके से चार प्रहर की पूजा करने का प्रयास किया। हमारी भी हालत खराब होती है। हमारी भी कमर दुखती है, पैर दुखते हैं। एक सीमा तक किया जा सकता है, उसके बाद समझ आता है; और इसीलिए हम आपकी तकलीफ समझ सकते हैं। ऐसा नहीं कि हमने आपको चार प्रहर की पूजा करने को कहा और खुद यहाँ बैठकर लाइव जाकर लोगों को दिखाते रहे, और पूरा फॉलोइंग का खेल चलता रहा।
होलिका के लिए वे क्या तैयारी बताते हैं?
अभी से मंत्र चुनना, जिसे होलिका की रात सिद्ध करना है
वक्ता कहते हैं कि आज से हम आपको होलिका के लिए तैयार करना शुरू करेंगे: कि होलिका की रात हमें पूरी रात जागकर एक मंत्र सिद्ध करना है — मंत्र चुन लो। वहाँ दस लोग दस तरह के मंत्र सिद्ध करेंगे; और हम भी यहाँ बैठकर अपना करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि अगर आज से हम आपको होलिका के लिए तैयार करना शुरू करें — कि होली की रात हमें पूरी रात जागकर यह मंत्र सिद्ध करना है, मंत्र चुन लो। वहाँ दस लोग अलग-अलग तरह का एक-एक मंत्र सिद्ध करेंगे। और हम भी यहाँ बैठकर अपना करेंगे।
55, 60 या 70 साल के लोगों के लिए कौन सी साधना बताई गई है?
भगवान का नाम लो और परिवार में आग मत लगाओ
वक्ता कहते हैं कि इन सब बातों में खुद को थोड़ा लगाओ; मन को संभालना सीखो। अगर आप बूढ़े हो गए हो, 55, 60, 70 साल के हो रहे हो, तो भगवान का नाम लो। बेटी, बेटे, दामाद और बहू के बीच आग लगाने का काम मत करो। आग मत लगाओ, बहुत बड़ी उम्मीदें मत रखो। आपने अपना जीवन देख लिया; बैठकर भगवान का चिंतन करो।
वक्ता कहते हैं कि इन सब बातों में खुद को थोड़ा लगाओ — वे एक श्रोता की यह बात उठाते हैं कि सच्चे सनातनी नीच कर्मों से दूर रहें, अच्छे कर्मों के लिए काम करें, आगे बढ़ते रहें और अपनी बुद्धि और विवेक से सजग रहें। मन को संभालना सीखो। अगर आप बूढ़े हो गए हो, 55, 60, 70 साल के हो रहे हो, तो भगवान का नाम लो। बेटी, बेटे, दामाद और बहू के बीच आग लगाने का काम मत करो। आग मत लगाओ। बहुत बड़ी उम्मीदें मत रखो। आपने अपना जीवन देख लिया है; बैठकर भगवान का चिंतन करो।
अगर बुज़ुर्ग इससे ज़्यादा न कर सकें तो क्या करें?
दीक्षा हो तो गुरु मंत्र, नहीं तो नाम; तुलसी सेवा और मंदिर की सीढ़ियाँ
अगर दीक्षा मिली है, तो गुरु मंत्र का जप करो; अगर नहीं मिली, तो जिसमें आपकी आस्था है उसका नाम लो। अगर कुछ भी न कर सको, तो चुपचाप बैठकर भगवान का कोई सीरियल देखो। अगर वह भी न कर सको, तो कम से कम स्मरण कर सकते हो। तुलसी जी की सेवा करो। मंदिर जाओ और मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर चिंतन करो।
वक्ता कहते हैं कि अगर दीक्षा मिली है, तो गुरु मंत्र का जप करो। अगर नहीं मिली, तो जिसमें आपकी आस्था है उसका नाम लो। अगर कुछ भी न कर सको, तो चुपचाप बैठकर भगवान का कोई सीरियल देखो। अगर वह भी न कर सको, तो कम से कम स्मरण कर सकते हो। तुलसी जी की सेवा करो। मंदिर जाओ, और वहाँ मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर अपना चिंतन करो।
चौदह-पंद्रह साल के बच्चे को क्या करना चाहिए?
अभी से खुद को संभालो — एक पीढ़ी तो पहले ही बर्बाद हो चुकी
वक्ता कहते हैं कि और अगर आप छोटे हो, बस चौदह-पंद्रह साल के, तो अभी से खुद को संभालो। यूट्यूब और फेसबुक नहीं थे, फिर भी एक पीढ़ी बिगड़ गई, बर्बाद हो गई। यूट्यूब और फेसबुक के ज़रिए बस यह ब्लॉगिंग देखकर, किसी की ज़िंदगी में क्या चल रहा है उसमें झाँककर क्या मिलता है — भगवान जाने।
वक्ता कहते हैं कि और अगर कोई छोटा है, अभी चौदह-पंद्रह साल का, तो अभी से खुद को संभालो। यूट्यूब और फेसबुक नहीं थे, फिर भी एक पीढ़ी बिगड़ गई, बर्बाद हो गई। वक्ता कहते हैं कि यूट्यूब और फेसबुक के ज़रिए बस यह ब्लॉगिंग देखकर, किसी की ज़िंदगी में क्या चल रहा है उसमें झाँककर क्या मिलता है — भगवान जाने।
माला और मंत्र करते समय ऊब और नींद क्यों आती है?
पहले नींद पूरी करो, और जानो कि रस इसलिए नहीं कि चरित्र नहीं जानते
पूछा गया कि जब मन ऊब जाता है, मन नहीं करता, और माला व मंत्र करते समय नींद आती है, तो पूजा-पाठ में निरंतरता कैसे रखें। वक्ता कहते हैं: एक ही काम बार-बार करोगे तो ऊब जाओगे। नींद आती है तो पहले अपनी नींद पूरी करो। दो-तीन बातें समझनी हैं। नीरसता इसलिए आती है क्योंकि पूजा-पाठ में रस नहीं है। आप भगवान दत्त के चरित्र के बारे में नहीं जानते — उनका चरित्र पढ़ो, और पता करो कि दत्त कौन हैं, कैसे हैं, उनकी सामर्थ्य क्या है। पहले उनके बारे में सुनो, उन्हें जानो, समझने की कोशिश करो।
पूछा गया कि मन बहुत ऊब क्यों जाता है, मन क्यों नहीं करता, माला और मंत्र करते समय नींद क्यों आती है, और पूजा-पाठ में निरंतरता कैसे रखें। वक्ता पहले यह उत्तर देते हैं: एक ही काम बार-बार करोगे, तो ऊब जाओगे। नींद आती है तो पहले अपनी नींद पूरी करो। यहाँ दो-तीन बातें समझनी हैं। नीरसता क्यों आती है? क्योंकि पूजा-पाठ में रस नहीं है। आप भगवान दत्तात्रेय के चरित्र के बारे में नहीं जानते। उनका चरित्र पढ़ो: भगवान दत्त आखिर कौन हैं, कैसे हैं, उनकी सामर्थ्य क्या है। पहले उनके बारे में सुनो, उनके बारे में जानो, उन्हें समझने की कोशिश करो।
जब तक अपने इष्ट का स्तुति गायन सीखकर भाव से न गाया जाए, पूजा में नींद और ऊब आना तय है।
अपने इष्ट का स्तुति गायन, जिसके बिना नींद और ऊब निश्चित
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात है स्तुति गायन, जिसकी वे बार-बार बात करते हैं। जब तक आप अपने इष्ट आराध्य का स्तुति गायन नहीं सीखते — और वह भी एक भाव के साथ — नींद आना तय है और ऊब होना तय है। और जब आप मंत्र जप करते हो, तो आपने जो भी गलत काम किए हैं, वे ठीक जप के समय ही याद आने लगते हैं।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात है स्तुति गायन, जिसकी हम बार-बार बात करते हैं। जब तक आप अपने इष्ट आराध्य का स्तुति गायन नहीं सीखते, और वह भी एक भाव के साथ, तब तक आपको नींद आना तय है और ऊब होना तय है। और जब आप मंत्र जप करते हो, तो आपने जो भी गलत काम किए हैं, वे ठीक जप करते समय ही याद आने लगते हैं।
मंत्र क्या है, और उसका चंद्रमा से क्या संबंध है?
मनन त्रायते इति मन्त्रः — मन के कारक चंद्रमा
वक्ता पूछते हैं कि फिर मंत्र क्या है: जो मन को सलाह दे — वह मन में ही चल रहा है। जैसा उन्होंने शुरू में कहा था: मन, मंत्र, चंद्रमा। चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है; मन पर अधिकार चंद्रमा का है। चंद्रमा का बल घटता-बढ़ता है, और मन पर असर पड़ता है; मंत्र का असर भी ठीक वैसे ही पड़ता है। जब मंत्र से हम चंद्रमा को बलवान बनाते हैं, तो चंद्रमा बलवान होने पर हमारा मंत्र फल देने लगता है, और हमारा मन हमारे वश में होता है।
वक्ता पूछते हैं कि तो मंत्र क्या है: मनन त्रायते इति मन्त्रः — जो मन को सलाह दे। वह मन में ही चल रहा है, जैसा उन्होंने बिल्कुल शुरू में कहा था: मन, मंत्र, चंद्रमा। चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है। मन पर अधिकार चंद्रमा का है। चंद्रमा का बल बढ़ता-घटता है, और मन पर असर पड़ता है; मंत्र का असर भी ठीक उसी तरह पड़ता है। जब मंत्र से हम चंद्रमा को बलवान बनाते हैं, तो चंद्रमा बलवान होने पर हमारा मंत्र अपना फल देने लगता है, और हमारा मन हमारे वश में होता है।
सुबह उठकर पाँच मिनट दो-चार भजन या स्तोत्र सुनने से पूरा दिन अच्छा जाता है।
सुबह पाँच मिनट भजन या स्तोत्र, कान के पास लगाकर
वक्ता कहते हैं कि शुरू में ही बताया गया था: सुबह नींद से उठकर दो-चार भजन, स्तोत्र या स्तुतियाँ सुनो, जो भी आपकी पसंद की हों। आपका पूरा दिन अच्छा जाएगा; बस पाँच मिनट सुनना है, ज़्यादा नहीं, पर समय हो तो ठीक से सुन सकते हो। लाउडस्पीकर पर नहीं — सबके पास फोन है, तो कान के पास लगाकर सुनो। उसके बाद जब पूजा करने जाओ, तो वहाँ स्तुति गाओ।
वक्ता कहते हैं कि हमने शुरू में ही बताया था: सुबह नींद से उठकर दो-चार भजन, स्तोत्र, स्तुतियाँ सुनो — जो भी आपकी पसंद की हों। आपका पूरा दिन अच्छा जाएगा। बात पाँच मिनट सुनने की है, ज़्यादा नहीं; समय हो तो ठीक से सुन सकते हो। लाउडस्पीकर लगाकर नहीं — सबके पास फोन है, तो अपने कान के पास लगाकर सुनो। उसके बाद जब पूजा करने जाओ, तो वहाँ स्तुति गाओ। शिव जी की कर रहे हो तो शिव जी की; दुर्गा जी की तो दुर्गा जी की; नारायण की कर रहे हो तो नारायण की स्तुति गाना सीखो, जो भी आपकी पसंद हो। तभी यह बात होगी।
जप के समय बहुत ज़्यादा नींद आना क्या बताता है?
शरीर में तेज और शुक्र की कमी
वक्ता कहते हैं कि अगर नींद बहुत आ रही है, तो शरीर में तेज की कमी है, शुक्र की कमी है — इसीलिए ऐसा हो रहा है। ब्रह्मचर्य के पालन पर ध्यान दो, खान-पान पर खास ध्यान दो, अपनी नींद पूरी करो, तब ठीक होगा; नहीं तो नहीं होगा।
वक्ता कहते हैं कि अगर नींद बहुत आ रही है, तो वह शरीर में तेज की कमी है, शुक्र की कमी है; इसीलिए यह बात हो रही है। ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। के पालन पर ध्यान दो; खानपान पर खास ध्यान दो। अपनी नींद पूरी करो, तब ठीक होगा। नहीं तो नहीं होगा।
क्या महादेव का टैटू बनवा सकते हैं?
त्रिशूल, डमरू जैसे प्रतीक बेहतर; मंत्र वैदिक नहीं होना चाहिए
एक श्रोता ने पूछा जो महादेव का टैटू बनवाना चाहता है। वक्ता कहते हैं: बनवाओ — उनके विचार में भगवान का प्रतीक चिह्न बनवाना चाहिए। अगर महादेव से जुड़े प्रतीकात्मक चित्र बनवाओ, त्रिशूल, डमरू, ऐसी सब चीज़ें, तो वह ज़्यादा लाभकारी है। और अगर कोई मंत्र आदि लिखवाओ, तो वह वैदिक नहीं होना चाहिए।
एक श्रोता ने पूछा कि उसका मन महादेव का टैटू बनवाने का है, वह क्या करे। वक्ता उत्तर देते हैं: बनवाओ। उनके विचार में भगवान का प्रतीक चिह्न बनवाना चाहिए। अगर महादेव से जुड़ा प्रतीकात्मक चित्र बनवाओ — त्रिशूल, डमरू, ऐसी सब चीज़ें — तो वह ज़्यादा लाभकारी है। और अगर उस पर कोई मंत्र आदि लिखवाओ, तो वह वैदिक नहीं होना चाहिए।
महाशिवरात्रि पर जप का कितना फल मिलता है?
365 गुना फल — एक ही दिन में पूरे साल का
पूछा गया कि महाशिवरात्रि पर किए गए का कितने गुना फल मिलता है। वक्ता कहते हैं कि पूछने वाला इसी गुणा-भाग में अटका है — जान भी लो तो क्या हिसाब लगाओगे? बताया गया है: यह 365 गुना फल देता है। एक ही दिन में पूरे साल का फल लाता है, और ऐसे व्यक्ति को अनंत गुना फल मिलने वाला है।
पूछा गया कि महाशिवरात्रि पर किए गए जप का कितने गुना फल मिलता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि लोग इसी गुणा-भाग में अटके हैं। जान भी लो, तो जाकर क्या हिसाब लगाओगे? वक्ता कहते हैं, बताया गया है: यह 365 गुना फल देता है। एक ही दिन में पूरे साल का फल लाता है, और ऐसे व्यक्ति को अनंत गुना फल मिलने वाला है। अब अगला, वे कहते हैं।
मंदिर में रोज़ भोग सेवा करते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए?
शुचिता और ब्रह्मचर्य, और मासिक धर्म के समय रोक
एक श्रोता कहती हैं कि उनके घर के पास एक मंदिर में शिव और हनुमान विराजमान हैं और उन्हें रोज़ के भोग की सेवा मिली है; वे पूछती हैं कि भोग बनाते और चढ़ाते समय क्या सावधानी रखें। वक्ता कहते हैं कि यह बड़ा सौभाग्य है कि हनुमान जी के मंदिर में रोज़ के भोग का काम मिला है; मंदिर सेवा का भार किसी जन्म के पुण्य से ही मिलता है। शुचिता पर पूरा ध्यान रखो, और ब्रह्मचर्य का अच्छे से पालन करते हुए पवित्रता से आना-जाना करो। और चूँकि उनका नाम मोनिका है, अगर वे स्त्री हैं, तो मासिक धर्म के समय न जाएँ — उस समय के लिए कोई और व्यवस्था करवा लें।
एक श्रोता कहती हैं कि उनके घर के पास बने एक मंदिर में शिव और हनुमान विराजमान हैं, उन्हें वहाँ रोज़ के भोग की सेवा मिली है, और पूछती हैं कि उसे बनाते और चढ़ाते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए। वक्ता कहते हैं कि यह बहुत बड़ा सौभाग्य है कि भगवान हनुमान जी के मंदिर में आपको रोज़ के भोग का काम मिला है। जब किसी जन्म का पुण्य होता है, तभी इष्ट आराधना का, और खासकर मंदिर सेवा का भार दिया जाता है — कि आप यह करो, उनके सेवक बनो। दुनिया में हर कोई किसी न किसी का सेवक बनता है; भगवान का सेवक बनना सौभाग्य से ही मिलता है। वक्ता कहते हैं, शुचिता पर पूरा ध्यान रखो। ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। आदि का अच्छे से पालन करते हुए, आना-जाना पवित्रता से करना है। और वे जोड़ते हैं कि नाम मोनिका है, तो उनके विचार में वे स्त्री हैं: अगर ऐसा है, तो मासिक धर्म के समय न जाएँ। इसका ध्यान रखें; उस समय के लिए कोई और व्यवस्था करवा लें।
क्या कुब्जिका तंत्र के दुर्गा कवच के समय हुए दर्शन खुली आँखों से थे?
क्षणार्ध दर्शन, और भाव अधूरा होने पर आने वाला संशय
एक पोस्ट के बारे में पूछा गया, जिसमें एक महाभाव वाले व्यक्ति को कुब्जिका तंत्र का दुर्गा कवच करते समय जगदंबा के दर्शन हुए थे, और क्या वे दर्शन खुली आँखों से थे। वक्ता कहते हैं: हाँ, उस व्यक्ति के कहे अनुसार खुली आँखों से थे। पर एक बात ध्यान रखो, वे जोड़ते हैं: खुली आँखों से होने पर भी, उस समय अवस्था क्या रही होगी, और किस समय यह होता है। क्योंकि जब हम एक मंत्र बार-बार दोहराते हैं, उस भाव में, मन एकाग्र करके, उनके रूप का ध्यान करते हुए, तो वे आधे क्षण के लिए भी दर्शन देती हैं। पर उलझन की स्थिति तब आती है जब हमारा भाव कहीं अधूरा होता है: क्या यह सच था, या बस झूठ।
उनसे एक पोस्ट के बारे में पूछा गया जो उन्होंने कुछ दिन पहले डाला था, जिसमें एक महाभाव वाले व्यक्ति को कुब्जिका तंत्र का दुर्गा कवच करते समय जगदंबा के दर्शन हुए थे, और क्या वे दर्शन खुली आँखों से थे — वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, उस व्यक्ति के कहे अनुसार खुली आँखों से थे। पर एक बात ध्यान रखो: खुली आँखों से होने पर भी, उस समय अवस्था क्या रही होगी, और किस समय यह होता है। क्योंकि जब हम एक मंत्र बार-बार दोहराते हैं, उस भाव में, मन एकाग्र करके, उनके स्वरूप का ध्यान करते हुए — तो वे आधे क्षण के लिए भी दर्शन देती हैं। पर उलझन की स्थिति तब आती है जब हमारा भाव कहीं अधूरा होता है: कि वह सच था, या बस झूठ।
क्या काली किसी व्यक्ति के शरीर पर आती हैं?
काली कभी किसी के शरीर पर नहीं आतीं; उनकी योगिनियाँ आती हैं, एक सीमा में
एक श्रोता कहते हैं कि उनकी पत्नी पर माँ काली की सवारी आती है और वे लोगों को ठीक करती हैं, पर माँ प्रकट नहीं हो रहीं। वक्ता पूछते हैं कि वे प्रकट कैसे होंगी — क्या आपमें काली को प्रकट करने की सामर्थ्य है? और क्या प्रमाण है कि काली जी आपकी पत्नी पर आ रही हैं? काली जी आ रही हैं, तो वे लोगों को ठीक कर रही हैं — यह कैसी बात है? वे उन्हें ठीक क्यों कर रही हैं; किसी के प्रारब्ध में, किसी के शरीर पर दखल क्यों दे रही हैं? गद्दी का एक नियम और एक मर्यादा होती है। वक्ता कहते हैं कि काली जी कभी किसी के शरीर पर नहीं आतीं — यह पहली बात है; शरीर पाँच तत्वों से बना है। उनकी योगिनियाँ आती हैं, और उनकी एक सीमा है; वे परिवार के कल्याण और रक्षा के लिए आती हैं।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनकी पत्नी पर माँ काली की सवारी आती है और वे लोगों को ठीक करती हैं, पर माँ प्रकट नहीं हो रहीं — वे क्या करें? वक्ता पूछते हैं कि वे प्रकट कैसे होंगी। क्या आपमें काली को प्रकट करने की सामर्थ्य है? और क्या प्रमाण है कि काली जी आपकी पत्नी पर आ रही हैं? काली जी आ रही हैं, और इसलिए वे लोगों को ठीक कर रही हैं — यह कैसी बात है? वे उन्हें ठीक क्यों कर रही हैं, किसी के प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। में, किसी के शरीर पर दखल क्यों दे रही हैं? गद्दी का एक नियम होता है; उसकी एक मर्यादा होती है। वक्ता कहते हैं कि काली जी कभी किसी के शरीर पर नहीं आतीं — यह पहली बात है। यह पाँच तत्वों से बना शरीर है। उनकी योगिनीयाँ आती हैं; उनकी एक सीमा है, और वे परिवार के कल्याण और रक्षा के लिए आती हैं। जिन्हें पारलौकिक कर्म, दिव्य कर्म करना है, जिन्हें गद्दी स्थापित करनी है — उस अवस्था के अनुसार वे सामर्थ्य देती हैं, और सीधे आदेश देती हैं कि किसे गुरु बनाना है। मुख भराई आदि का काम उचित तरीके से होता है, और उसमें भी नियम है कि यह इतना और इस तरह से है। यह ऐसे ही नहीं होता।
जहाँ सवारी बुलाई जाती है और गद्दी पर लोग जुटाए जाते हैं, वहाँ छल चल रहा है और उस काम का कोई फल नहीं मिलता।
छल चल रहा है — यह साफ कहना, यह जानते हुए कि बुरा लगेगा
अगर किसी पर सवारी आने लगे, और वे अपने आप लोगों को बुलाने लगें या लोग आने लगें, और आप उनके लिए यह सब करो, तो आगे इसका फल नहीं मिलेगा। वक्ता कहते हैं कि वे अनुभव से बोल रहे हैं, कि श्रोता को अभी यह अच्छा नहीं लगेगा, उनकी बातें कड़वी लगेंगी और शायद वे गाली भी दें; और जिस महिला पर माता आती हैं, वे सुनेंगी तो अपने बारे में कही बात पर और बड़ा हंगामा करेंगी। पर वक्ता कहते हैं, यही सच है। तो यहाँ छल चल रहा है — यह हम आपको सीधे बताएँगे; बाकी आपकी इच्छा।
वक्ता कहते हैं कि अगर किसी पर सवारी आने लगे, और वे अपने आप लोगों को बुलाने लगें, या लोग आने लगें, और आप उनके लिए ये सब काम करो — तो आगे इसका फल नहीं मिलेगा। वक्ता कहते हैं कि हम आपको अनुभव की बात बता रहे हैं। अभी आपको यह अच्छा नहीं लगेगा; अभी मेरी बातें आपको कड़वी लगेंगी और आप मुझे चार गाली देंगे। और वह महिला जिस पर माता आ रही हैं — अगर वे सुनेंगी तो और बड़ा हंगामा होगा, कि मेरे बारे में ऐसी बात कही गई; उन पर और खेलेंगे। पर यही सच है। तो भाई, यहाँ छल चल रहा है — यह हम आपको सीधे बताएँगे। बाकी आपकी इच्छा। वक्ता कहते हैं कि इन सब विषयों पर ज़्यादा बोलने से लोग एक तरह से सोचने लगते हैं।
भारी पितृ दोष के लिए वे क्या उपाय बताते हैं?
पोछे में सेंधा नमक, जीव सेवा, और गीता का सातवाँ अध्याय
एक श्रोता, जो कहते हैं कि उन पर बहुत पितृ दोष है और वे किसी को बुला नहीं पा रहे, उनसे वक्ता कहते हैं कि कोई दिक्कत नहीं, और तीन बातें बताते हैं जो वे खुद कर सकते हैं। पहली: रोज़ जब घर में पोछा लगे, तो सेंधा नमक डालकर पोछा लगवाओ। दूसरी: जीवों की सेवा ज़रूर होनी चाहिए — गाय की रोटी, कुत्ते की रोटी, कौए के लिए, पशु-पक्षियों के लिए; जो भी दिया जाए, वह रोज़ नियम से घर से निकलना चाहिए। तीसरी: घर का कोई एक सदस्य रोज़ श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का पाठ करे, चाहे हिंदी में ही, और पाठ करते समय ताँबे के लोटे में तीन कुशा और एक तुलसी पत्ता डाल दे।
एक श्रोता, जो कहते हैं कि उन पर बहुत पितृ दोष है और वे किसी को बुला नहीं पा रहे, उनसे वक्ता कहते हैं कि कोई दिक्कत ही नहीं है। दो-तीन काम करो; आप उन्हें खुद कर सकते हो। पहला: रोज़, जब भी घर में पोछा लगे, तो सेंधा नमक डालकर पोछा लगवाओ। दूसरा: जो जीव सेवा होनी चाहिए, वह ज़रूर हो — गाय को दी जाने वाली रोटी, कुत्ते की रोटी, कौए के लिए, पशु-पक्षियों के लिए; यह सब रोज़ नियम से घर से ज़रूर निकलना चाहिए। तीसरी बात: घर का कोई एक सदस्य रोज़ श्रीमद् श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का पाठ करे, चाहे हिंदी में ही। और पाठ करते समय ताँबे के लोटे में तीन कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। और एक तुलसी पत्ता डाल दे।
उस उपाय में तुलसी पत्ते और जल के क्या नियम हैं?
जिन दिनों तुलसी नहीं तोड़ते, और द्वार पर जल छिड़कना
तुलसी पत्ता एकादशी और द्वादशी को — यानी सुदोष को — नहीं तोड़ना है, और रविवार या गुरुवार को भी नहीं तोड़ना है; इसलिए पहले से तोड़कर रख लो, फिर सातवें अध्याय का पाठ करो। जब पाठ से जल अभिमंत्रित हो जाए, तो उसमें से थोड़ा-थोड़ा सबको भगवान का चरणामृत मानकर पिलाओ, और घर में भी छिड़को, मुख्य द्वार पर तीन बार छिड़को। इसे कल से शुरू करो, सोमवती अमावस्या से, जो बहुत अच्छा और अत्यंत शुभ दिन है, और पूरे एक साल तक बिना रुके करते रहो। किसी को मत बुलाओ और कुछ और खास मत करो; बस इतना ही करो, और पितृ दोष में लाभ ज़रूर होगा।
वक्ता कहते हैं कि तुलसी पत्ता एकादशी या द्वादशी को — यानी सुदोष को — नहीं तोड़ना है; यह ध्यान रखो। और रविवार या गुरुवार को भी नहीं तोड़ना है, इसलिए पहले से तोड़कर तैयार रख लो। उसके बाद आपको सातवें अध्याय का पाठ करना है। जब पाठ से जल अभिमंत्रित हो जाए, तो उसमें से थोड़ा-थोड़ा सबको भगवान का चरणामृत मानकर पिलाना है, और घर में भी छिड़कना है — मुख्य द्वार पर तीन बार। यह काम अभी से, कल से शुरू करो: कल सोमवती अमावस्या है, बहुत अच्छा दिन, अत्यंत शुभ दिन। कल से शुरू करके पूरे एक साल तक लगातार करते रहो। किसी को मत बुलाओ और कुछ और खास मत करो। वक्ता कहते हैं, बस इतना ही करो, और पितृ दोष में लाभ ज़रूर, ज़रूर होगा।
क्या दीपदान में इस्तेमाल हुआ मिट्टी का दीया दोबारा इस्तेमाल कर सकते हैं?
दीपदान वाला मिट्टी का दीया दोबारा कभी इस्तेमाल नहीं होता
वक्ता कहते हैं कि जब भी मिट्टी के दीये से दीपदान किया जाता है, वह दीया दोबारा इस्तेमाल नहीं होता।
वक्ता कहते हैं कि जब भी मिट्टी के दीये से दीपदान किया जाता है, उसका इस्तेमाल दोबारा नहीं होता।
क्या दो लोग मिलकर 1800 आहुतियों का राहु मंत्र हवन कर सकते हैं?
दो लोग साथ बैठकर 900-900 आहुतियाँ दें तो 1800
पूछा गया कि 1800 हवन करना है, तो क्या दो लोग मिलकर 900-900 करके राहु मंत्र का हवन कर सकते हैं, या एक व्यक्ति दो दिन में करे। वक्ता कहते हैं: हाँ — दो लोग बैठकर साथ-साथ आहुतियाँ देते जाएँ; दोनों मिलकर 900-900 आहुतियाँ देंगे तो 1800 हो जाएँगी। दोनों साथ में कर सकते हैं।
पूछा गया कि राहु मंत्र के हवन के लिए, क्या दो व्यक्ति मिलकर 900-900 करें, या एक व्यक्ति दो दिन में करे, क्योंकि 1800 हवन करना है — वक्ता उत्तर देते हैं हाँ: दो व्यक्ति बैठकर साथ-साथ आहुतियाँ देते जाएँ। दोनों मिलकर 900-900 आहुतियाँ देंगे तो 1800 हो जाएँगी। वक्ता कहते हैं कि दोनों साथ में कर सकते हैं; और कल करो, क्योंकि कल सोमवती अमावस्या है।
क्या आत्माएँ जानती हैं कि हम उन्हें देख और महसूस कर सकते हैं?
जान भी सकती हैं, नहीं भी; सलाह है कि संकेत देने के बजाय अनदेखा करो
पूछा गया कि क्या कोई आत्मा या प्रेत समझता है कि यह व्यक्ति हमें देख रहा है, हमें महसूस कर पा रहा है। वक्ता कहते हैं: हाँ, बिल्कुल — ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी। अगर हम उन्हें बताना चाहें कि हम तुम्हें देख रहे हैं, तो ठीक है; अगर अनदेखा करो, तो अनदेखा हो गया। वक्ता पूछते हैं, उन्हें बताने की ज़रूरत क्या है?
पूछा गया कि क्या कोई आत्मा या प्रेत आदि समझता है कि यह व्यक्ति हमें देख रहा है, हमें महसूस कर पा रहा है। वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल — ऐसा हो भी सकता है, और नहीं भी हो सकता। अगर हम उन्हें बताना चाहें कि हम तुम्हें देख रहे हैं, तो ठीक है। उन्हें अनदेखा करो, तो अनदेखा हो गया। वक्ता पूछते हैं, बताने की ज़रूरत क्या है?
देव दीक्षा में पहने गए कपड़ों का क्या करना चाहिए?
किसी योग्य ब्राह्मण को दान करो, या खुद पहनो
पूछा गया कि दीक्षा के बाद देव दीक्षा के कपड़ों आदि का क्या करना चाहिए। वक्ता कहते हैं: देव दीक्षा के बाद आप उन्हें किसी योग्य ब्राह्मण को दान कर सकते हो, या खुद भी पहन सकते हो।
पूछा गया कि दीक्षा के बाद, देव दीक्षा से जुड़े वस्त्र आदि का क्या करना चाहिए — वक्ता उत्तर देते हैं कि देव दीक्षा के बाद उन्हें किसी योग्य ब्राह्मण को दान किया जा सकता है। या आप उन्हें खुद पहन सकते हो।
कैसे पता चले कि मंत्र सिद्ध हुआ या नहीं?
उसका प्रभाव अपने आप मिलने लगता है; इसके लक्षण होते हैं
एक श्रोता ने शिव सहस्रनाम और शिव बीज मंत्र का जप किया है। वे पूछते हैं कि कैसे पता चलेगा कि मंत्र सिद्ध हुआ या नहीं। वक्ता कहते हैं: अगर मंत्र सिद्ध हो गया है, तो उसका प्रभाव अपने आप मिलने लगेगा। मंत्र सिद्धि के कुछ लक्षण होते हैं। उनका वीडियो चैनल पर मिल जाएगा, उससे आप समझ सकेंगे।
एक श्रोता ने शिव सहस्रनाम और शिव बीज मंत्र का जप किया है। वे पूछते हैं कि कैसे पता चलेगा कि मंत्र सिद्ध हुआ या नहीं — वक्ता उत्तर देते हैं कि अगर मंत्र सिद्ध हो गया होगा, तो उसका प्रभाव अपने आप मिलने लगेगा। वे कहते हैं कि मंत्र सिद्धि के कुछ लक्षण होते हैं। उनका वीडियो चैनल पर मिल जाएगा; उससे आप समझ सकेंगे।
सप्तशती का संस्कृत पाठ कहाँ सीखा जा सकता है?
ऑनलाइन, या किसी योग्य ब्राह्मण के साथ बैठकर
पूछा गया कि सप्तशती का संस्कृत पाठ कहाँ सीखें। वक्ता कहते हैं कि यह सीखा जा सकता है। आप इसे ऑनलाइन सीख सकते हैं, और किसी योग्य ब्राह्मण के साथ बैठकर भी सीख सकते हैं।
पूछा गया कि दुर्गा सप्तशती का संस्कृत पाठ कहाँ से सीखें। वक्ता कहते हैं कि यह सीखा जा सकता है। आप इसे ऑनलाइन सीख सकते हैं। आप किसी योग्य ब्राह्मण के साथ बैठकर भी सीख सकते हैं।
सपने में प्रसाद खोना या खाना देखने का क्या अर्थ है?
जिस देवता का प्रसाद था, उन्हें अर्पित करें, फिर स्वयं लें
पूछा गया कि सपने में प्रसाद खोते हुए देखने का क्या अर्थ है। वक्ता प्रसाद खाने और खोने में अंतर बताते हैं। अगर प्रसाद खो गया है, तो जिसका प्रसाद था, उन्हें अर्पित करें — वे उसे ग्रहण करेंगे, फिर आप लें। अगर आप खुद को उसे खाते देखते हैं, तब भी जिन्हें आपने देखा, उनके लिए अर्पण करना अच्छा रहेगा।
पूछा गया कि सपने में प्रसाद खोते हुए देखने का क्या अर्थ है। वक्ता पहले दोनों बातें अलग करते हैं: प्रसाद खाना, या प्रसाद खोना। अगर प्रसाद खो गया है, तो जिसका प्रसाद था, उन्हें अर्पण करें। वे उसे ग्रहण करेंगे, फिर आप लें। अगर आप खुद को उसे खाते देखते हैं, तब भी जिन्हें आपने देखा, उनके लिए अर्पण करना अच्छा रहेगा।
सपने में घर का कोई सदस्य सोना दे, तो इसका क्या अर्थ है?
बार-बार होने पर यह विचार करने योग्य है; शुभ भी हो सकता है, आगे की कठिनाई भी
पूछा गया कि सपने में घर का कोई व्यक्ति हमें सोना दे, तो यह कैसा सपना है। वक्ता कहते हैं कि अगर यह बार-बार दिया जा रहा है, तो सवाल सच में सोचने-विचारने का बन जाता है। इसे ऐसे ही नहीं लिया जा सकता; इसके कई कारण हो सकते हैं। यह अच्छा भी हो सकता है, शुभ संकेत भी हो सकता है, और आगे के लिए किसी कठिनाई की बात भी हो सकती है।
पूछा गया कि सपने में घर का कोई व्यक्ति हमें सोना दे, तो यह कैसा सपना है — वक्ता कहते हैं कि अगर यह बार-बार दिया जा रहा है, तो सवाल सच में सोचने-विचारने का बन जाता है। इसे वैसे नहीं लिया जा सकता; इसके बहुत सारे कारण हो सकते हैं। यह अच्छा भी हो सकता है, शुभ संकेत भी हो सकता है; और आने वाले समय के लिए किसी कठिनाई की बात भी हो सकती है।
राहु, केतु और सोशल मीडिया के बारे में वक्ता क्या कहते हैं?
सोशल मीडिया राहु है, और राहु पर जगदम्बा का नियंत्रण है
वक्ता कहते हैं कि राहु और केतु उनके नियंत्रण में हैं। सोशल मीडिया राहु है। और राहु पर नियंत्रण करने वाली जगदम्बा हैं। यह उनसे बाहर नहीं है। वे एक इशारा करेंगी और सब हो जाएगा। अभी वे नहीं चाहतीं, तो नहीं चाहतीं। यही बात आपके भीतर भी है: आपको लगता है कि आपकी सेवा-पूजा से कुछ नहीं हो रहा — वे बस परीक्षा ले रही हैं और प्रारब्ध कटवा रही हैं।
प्राप्ति होने के बाद किस बात का ध्यान रखना चाहिए?
पाने के बाद खुद को संभालना, और काम का कभी घमंड न करना
वक्ता कहते हैं, पर उसके बाद ध्यान रखना: प्राप्ति के बाद उस प्राप्ति को संभालकर आगे बढ़ना; सही रास्ते पर चलना — यह बहुत बड़ा विषय है। अपने भीतर कभी यह विचार न आए कि हमने किया, हमसे हुआ, मेरी वजह से हुआ। अगर मेरी वजह से पंद्रह लोगों ने शिव की पूजा की, तो हमें इसका अहंकार नहीं हुआ कि हमने पंद्रह लोगों से करवाई — वरना कल नंदी पीछे से आकर सींग उठाकर हमें गिरा देंगे।
वक्ता कहते हैं, पर उसके बाद ध्यान रखना: प्राप्ति के बाद उस प्राप्ति को संभालकर आगे बढ़ना। सही रास्ते पर चलना — यह बहुत बड़ा विषय है। अपने भीतर कभी यह विचार न हो कि हमने किया, हमसे हुआ, मेरी वजह से हुआ। अगर मेरी वजह से पंद्रह लोगों ने शिव की पूजा की, तो हमें इसका अहंकार नहीं हुआ कि हमने पंद्रह लोगों से शिव की पूजा करवाई। वे कहते हैं, इसका घमंड करो, और कल नंदी पीछे से आकर सींग उठाकर आपको गिरा देंगे। फिर हम कहाँ होंगे? फिर कौन आकर हमें उठाएगा और दोबारा बिठाएगा? उस दंड के डर से ही सही — पर अभिमान कभी नहीं।
अगर शिव चाहते कि चार प्रहर का जागरण किसी और माध्यम से हो, तो वह श्रोताओं तक उसी माध्यम से पहुँचता।
अगर शिव न चाहते, तो किसी के भी द्वारा यह न होता
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने उन्हें माध्यम बनाया। अगर शिव को शिवरात्रि पर आपका चार प्रहर का जागरण करवाना था, तो आप किसी और माध्यम से सुनते, किसी और माध्यम से जानते — पर आपको चार प्रहर की पूजा करनी थी। वह करवाई गई। और अगर वे आपसे न करवाना चाहते, तो शिव स्वयं यहाँ से आकर आपको समझाते, तब भी यह आपसे नहीं होता।
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने उन्हें माध्यम बनाया। अगर शिव को शिवरात्रि के दिन आपका चार प्रहर का जागरण करवाना था, तो आप किसी और माध्यम से सुनते, किसी और माध्यम से जानते — पर उस दिन आपको चार प्रहर की पूजा करनी थी। वह करवाई गई। और अगर वे आपसे न करवाना चाहते, तो शिव स्वयं यहाँ से आकर आपको समझाते, तब भी यह आपसे नहीं होता।
जो लोग यूट्यूब पर अपने परिवार को दिखाते हैं, उनके साथ क्या होता है?
अच्छे परिवार को यूट्यूब और फेसबुक पर दिखाने से हानि होने लगती है
वक्ता कहते हैं, हमने भी यह देखा है: जो लोग यूट्यूब और फेसबुक पर खुद को और अपने परिवार को दिखाते हैं — अच्छा परिवार होता है — कुछ हानि होने लगती है, फिर भी वे जारी रखते हैं। वे कहते हैं कि यह दिखाना बहुत गलत विषय बन जाता है; यह बिल्कुल अजीब है।
वक्ता कहते हैं, हमने भी यह देखा है: जो लोग यूट्यूब और फेसबुक पर खुद को और अपने परिवार को दिखाते हैं। परिवार अच्छा होता है; कुछ हानि होने लगती है — फिर भी वे जारी रखते हैं। यह दिखाना बहुत गलत विषय बन जाता है। वे कहते हैं, यह बिल्कुल अजीब है।
क्या किसी संकेत या घटना का अर्थ बार-बार पूछते रहना चाहिए?
सबको पता चल जाए तो फल चला जाता है; सार्वजनिक रूप से कभी न पूछें
वक्ता कहते हैं, इच्छा केवल भगवान की कृपा की रखनी चाहिए, और उनकी कृपा से ही चलना चाहिए। इस विषय में बार-बार कभी नहीं पूछना चाहिए — कि यह हुआ तो इसका क्या अर्थ है, वह हुआ तो उसका क्या अर्थ है। इस पूछने से, जो फल मिलने वाला है — अगर वह सबको पता चल जाए, तो चला जाएगा। वे कहते हैं, सार्वजनिक रूप से कभी पूछना ही नहीं चाहिए; व्यक्तिगत रूप से मैसेज कर सकते हैं।
एक श्रोता की एकमात्र इच्छा है कि भगवान की कृपा बनी रहे। वक्ता उनसे कहते हैं, इच्छा रखिए — इच्छा केवल भगवान की कृपा की रखनी चाहिए, और उनकी कृपा से ही चलना चाहिए। और इस विषय में बार-बार कभी नहीं पूछना चाहिए: कि यह हुआ तो इसका क्या अर्थ है; वह हुआ तो उसका क्या अर्थ है। यह पूछने से, जो फल मिलने वाला है — अगर वह सबको पता चल जाए, तो चला जाएगा। इसलिए सार्वजनिक रूप से कभी पूछना ही नहीं चाहिए; व्यक्तिगत रूप से उनसे बात कीजिए, मैसेज भेजिए।
क्या मुख्य द्वार पर पंचमुखी हनुमान का विग्रह लगाना चाहिए?
विग्रह पूजा स्थान में रहता है; द्वार पर केवल प्रतीक चिन्ह लगता है
पूछा गया कि क्या मुख्य द्वार पर पंचमुखी हनुमान का विग्रह लगाना चाहिए। वक्ता उल्टा पूछते हैं कि वहाँ विग्रह क्यों लगाएँगे। विग्रह मत लगाइए; प्रतीक चिन्ह, स्वस्तिक आदि लगा सकते हैं। विग्रह को पूजा स्थान में रखकर पूजना चाहिए। वे कहते हैं, वे राम जी के द्वार पर खड़े रहते हैं — आपके और मेरे द्वार पर नहीं।
पूछा गया कि क्या मुख्य द्वार पर पंचमुखी हनुमान का विग्रह लगाना चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं: वहाँ विग्रह क्यों लगाएँगे? विग्रह मत लगाइए। प्रतीक चिन्ह, स्वस्तिक आदि लगा सकते हैं। विग्रह को पूजा स्थान में रखकर वहीं पूजना चाहिए। वे कहते हैं, वे राम जी के द्वार पर खड़े रहते हैं — आपके और मेरे द्वार पर नहीं।
भगवान का टैटू हो, तो नहाने का पानी नाली में जाने से क्या दोष लगता है?
मन को नाली जैसा रखने से पहले दोष लगता है
पूछा गया कि भगवान का टैटू बनवाने के बाद नहाने का पानी नाली में जाए, तो क्या दोष नहीं लगेगा। वक्ता उल्टा पूछते हैं: और जो भगवान हमारे भीतर बैठे हैं — मन में, आत्मा में, पाँच इंद्रियों में — जिन्हें लोग दिन-रात नाली की तरह गंदा रखते हैं, क्या वहाँ भगवान को कोई दोष नहीं लगता? इसी मन से हम मंत्र का चिंतन करते हैं; इसी मन से पुराणों की कथाएँ सुनते हैं और उसमें भगवान का भाव बनता है। उसी मन में हम भाव बनाते हैं कि भगवती जगदम्बा अष्टभुजा हैं, त्रिनेत्रा हैं, माथे पर चंद्रमा है, सिंह पर सवार हैं — और उसी मन में किसी स्त्री के बारे में गलत सोचते हैं, और उसी मन को नाली बना देते हैं। तब यह गलत नहीं लगता; पर टैटू का पानी नाली में जाना दोष है।
पूछा गया कि अगर भगवान का टैटू बनवाया हो, तो नहाने का पानी नाली में जाने से क्या दोष नहीं लगेगा। वक्ता एक सवाल से उत्तर देते हैं। और जो भगवान हमारे भीतर साक्षात बैठे हैं — मन में, आत्मा में, पाँच इंद्रियों में, इन सबमें — जिन्हें लोग दिन-रात नाली की तरह गंदा रखते हैं: तब क्या भगवान को कोई दोष नहीं लगता? इसी मन से हम मंत्र का चिंतन करते हैं; इसी मन से पुराणों की कथाएँ सुनते हैं, और उस मन में भगवान का भाव बनता है। उसी मन में भाव बनता है कि भगवती अष्टभुजा हैं, त्रिनेत्रा हैं, माथे पर चंद्रमा है, सिंह पर सवार हैं; उस भाव से हम स्तुति करते हैं। और उसी मन से, उसी मंत्र में, हम किसी स्त्री के बारे में गलत सोचते हैं, और उसी मन को नाली बना देते हैं। तब यह गलत नहीं लगता — पर टैटू का पानी नाली में जाना दोष होगा। वे कहते हैं, दोष तो वहाँ भी लगेगा, उस गलत चिंतन में जो आप मन में कर रहे हैं। यह ध्यान रखिए।
वक्ता के अनुसार कैसा टैटू नहीं बनवाना चाहिए?
केवल प्रतीक चिन्ह, पूरा स्वरूप नहीं
वक्ता कहते हैं, बाहरी शरीर पर टैटू और उसके पानी के नाली में जाने का विषय अलग है; फिर भी भगवान का प्रतीक चिन्ह ही बनवाना चाहिए। उनके विचार में पूरा स्वरूप भेद नहीं बनवाना चाहिए। पूछा गया कि कैसे पता चलेगा कि वर्ण परिवर्तन हुआ है। वे कहते हैं कि पूछने वाले शायद मंत्र विधि के अनुसार पूछ रहे हैं, और यह तभी आता है जब आप पूरा काम ठीक विधि से करें।
वक्ता कहते हैं, जहाँ तक बाहरी शरीर पर टैटू बनवाने और नाली का पानी नाली में जाने की बात है, वह अलग विषय है। फिर भी भगवान का प्रतीक चिन्ह ही बनवाना चाहिए। उनके विचार में पूरा स्वरूप भेद नहीं बनवाना चाहिए। पूछा गया कि कैसे पता चलेगा कि वर्ण परिवर्तन हुआ है। वे कहते हैं कि पूछने वाले शायद मंत्र विधि के अनुसार पूछ रहे हैं — तब यह तभी होता है जब आप पूरी विधि से करें।
ब्रह्मदेव को कैसे शांत करें?
यह इस पर निर्भर है कि 52 प्रकार के ब्रह्म में से वे कौन-से हैं
पूछा गया कि ब्रह्मदेव को कैसे शांत करें। वक्ता कहते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि वे किस प्रकार के ब्रह्म हैं। ब्रह्म 52 प्रकार के होते हैं। बिना देखे, इसमें जो बातें सामान्य हैं, वे हैं शिव का अभिषेक और गीता का पाठ।
पूछा गया कि ब्रह्मदेव को कैसे शांत करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि वे किस प्रकार के ब्रह्म हैं। ब्रह्म 52 प्रकार के होते हैं। बिना देखे, जो बातें सामान्य हैं, वे ये हैं: शिव का अभिषेक, और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ।
काली और दुर्गा की असीम कृपा पाने के लिए क्या करें?
पहले समर्पण, फिर जो भी स्तुति मन को भाए
वक्ता कहते हैं, अगर माँ कालिका और माँ दुर्गा की असीम कृपा पानी है, तो सबसे पहले भगवती के प्रति समर्पित हो जाइए। उनकी बहुत सारी स्तुतियाँ हैं: जो आपके मन को भाए और जो आप चाहें, उससे स्तुति कीजिए। तब बहुत अच्छा होगा।
किसी ऐसे स्तोत्र या मंत्र के बारे में पूछा गया जिससे माँ कालिका और माँ दुर्गा की असीम कृपा मिले। वक्ता उत्तर देते हैं कि अगर वह कृपा पानी है, तो सबसे पहले भगवती के प्रति समर्पित हो जाइए। उनकी स्तुतियाँ बहुत सारी हैं। उनमें से जो आपके मन को भाए और जो आप चाहें, उससे स्तुति कीजिए। वे कहते हैं, तब बहुत अच्छा होगा।
क्या दूसरे देवताओं की पूजा से वैष्णव शरणागति टूटती है?
बिल्कुल नहीं — विवाह में पत्नी की शरणागति का उदाहरण
पूछा गया कि वैष्णव शरणागति लेने के बाद हनुमान या शिव जैसे दूसरे देवताओं की पूजा करने से क्या शरणागति टूटती है। वक्ता कहते हैं: नहीं, बिल्कुल नहीं टूटेगी। शरणागति को इस भाव से समझिए: जब पत्नी विवाह करके पाणिग्रहण संस्कार से किसी की वामांगी बनती है, तो कहीं न कहीं दोनों ने एक तरह से एक-दूसरे की शरणागति ली है — पत्नी ने पति की, और पति ने अपनी पत्नी की।
पति के साथ व्यवहार अलग, ऊँचा और दिव्य रहता है, जबकि विवाह से बने नए परिवार के साथ व्यवहार सामान्य रहता है।
पति के साथ अलग, ऊँचा और दिव्य व्यवहार; बाकी सबके साथ सामान्य
पर इसके साथ, जब विवाह होता है, तो पति को नए सास-ससुर, नए साले-सालियाँ मिलते हैं, नया परिवार बनता है; और जब पत्नी आती है, तो उसका भी यहाँ नया परिवार बनता है। तो ऐसा नहीं कि उसका व्यवहार, शरणागति का भाव, प्रेम का व्यवहार केवल पति के साथ ही रहेगा। पति के साथ वह अलग तरह का रहेगा, ऊँचे स्तर का, दिव्य, दोनों के बीच का; बाकी सबके साथ सामान्य रहेगा, सामाजिक और पारिवारिक रूप से प्रेमपूर्ण। इससे शरणागति नहीं बिगड़ेगी।
वक्ता कहते हैं, पर इसके साथ, जब विवाह होता है, तो पति को नए सास-ससुर मिलते हैं; नए साले-सालियाँ बनते हैं, उसका नया परिवार बनता है; और जब पत्नी आती है, तो उसका भी यहाँ नया परिवार बनता है। तो ऐसा नहीं कि उसका व्यवहार, शरणागति का भाव, प्रेम का व्यवहार केवल अपने पति के साथ ही रहेगा। पति के साथ वह अलग तरह का रहेगा — ऊँचे स्तर का, दिव्य, जैसा उन दोनों के बीच रहना है। बाकी सबके साथ सामान्य रहेगा: सामाजिक और पारिवारिक रूप से, प्रेम से रहेगा। इससे शरणागति बिल्कुल नहीं बिगड़ेगी।
जब पत्नी पति के माता-पिता की सेवा अपने माता-पिता की तरह करती है, तो पति और भी प्रसन्न होता है; इष्ट देवता भी इसी तरह प्रसन्न होते हैं।
जब उसके माता-पिता की सेवा अपने माता-पिता की तरह हो, तो पति और प्रसन्न होता है
अगर वह ससुर की सेवा अपने पिता की तरह करती है, तो पति और भी प्रसन्न होगा — वह हमारे पिता को अपना पिता मान रही है, हमारी माँ को अपनी माँ मान रही है; वह समर्पित हो जाएगा। इसी तरह, जब आप नारायण की सेवा कर रहे हैं और उनकी शरणागति ली है, और भाव से, किसी भी कारण, पर्व काल में या किसी भी समय, हनुमान की सेवा या शिव की सेवा करते हैं, तो भगवान अवश्य प्रसन्न होंगे।
वक्ता कहते हैं, अगर वह ससुर की सेवा पिता की तरह करती है, तो शरणागति — उसका पति और भी प्रसन्न होगा। वह हमारे पिता को अपना पिता मान रही है; हमारी माँ को अपनी माँ मान रही है। पति कहेगा: बताओ प्रिये, क्या चाहिए; मैं सिर काटकर दे दूँ, तुम ऐसी हो। वह समर्पित हो जाएगा। तो जब आप नारायण की सेवा कर रहे हैं और उनकी शरणागति ली है, और अगर भाव से, किसी भी कारण, पर्व काल में या किसी भी समय, हनुमान जी की सेवा करते हैं, शिव की सेवा करते हैं — तो भगवान अवश्य प्रसन्न होंगे।
हनुमान साक्षात रुद्र के अवतार हैं, और ब्रह्मा, विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं है।
हनुमान रुद्र के अवतार हैं, और ब्रह्मा, विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं
वक्ता पूछते हैं, ये अलग कहाँ हैं? हनुमान साक्षात रुद्र के अवतार हैं, और ब्रह्मा, विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं है, इसके अनगिनत प्रमाण दिए गए हैं। तो कोई कठिनाई नहीं है। बस आपके मन में यह भाव नहीं आना चाहिए कि हमारी शरणागति टूट रही है।
वक्ता पूछते हैं, ये अलग कहाँ हैं? हनुमान साक्षात रुद्र के अवतार हैं, और ब्रह्मा, विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं है, इसके बहुत-बहुत प्रमाण दिए गए हैं। तब कोई कठिनाई नहीं है। हाँ, आपके मन में यह भाव नहीं आना चाहिए कि हमारी शरणागति टूट रही है।
शिव महापुराण पंचायतन पूजन के बारे में क्या कहता है?
पंचदेव पूजन का विधान है, और बड़े वैष्णवों ने रुद्राभिषेक किया
वक्ता कहते हैं, पंचदेव पूजन के लिए, पंचायतन पूजन के लिए, शिव महापुराण में भी कहा गया है — उन्होंने इस पर चर्चा की थी — तो कोई कठिनाई नहीं है। वे पूछते हैं, क्या हम, जो भगवती विंध्यवासिनी की सेवा करते हैं, अगले दिन महादेव की सेवा नहीं करते? सब करते हैं। जो बड़े परम वैष्णव हैं — उन सबने रुद्राभिषेक आदि किया।
शिव और विष्णु एक-दूसरे के शत्रुओं के बारे में क्या कहते हैं?
विष्णु-द्रोही शिव को कभी स्वीकार नहीं, और शिव-द्रोही विष्णु को कभी नहीं
वक्ता पूछते हैं, रुद्र रूप में स्वयं शिव कौन हैं; विष्णु के अनुसार वे कौन हैं? विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं होना चाहिए। शिव कहते हैं: जो विष्णु का शत्रु है, वह मुझे कभी स्वीकार नहीं। विष्णु कहते हैं: जो शिव से द्रोह करता है, वह मुझे कभी स्वीकार नहीं। दोनों ने यह कहा है। विष्णु की कृपा से शिव भक्ति मिलती है; शिव की कृपा से विष्णु भक्ति मिल रही है। और हनुमान हर जगह हैं — भगवती के मंडल में भी, नारायण के मंडल में भी, और वे साक्षात शिव के अवतार हैं।
वक्ता पूछते हैं, रुद्र रूप में स्वयं शिव कौन हैं? विष्णु के अनुसार वे कौन हैं? विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं होना चाहिए। शिव कहते हैं: विष्णु का शत्रु मुझे कभी स्वीकार नहीं। विष्णु कहते हैं: जो शिव से द्रोह करता है, वह मुझे कभी स्वीकार नहीं। दोनों ने यह बात कही है। विष्णु की कृपा से शिव भक्ति मिलती है। शिव की कृपा से विष्णु की भक्ति मिल रही है। और हनुमान हर जगह हैं — देखिए, वे भगवती के साथ भी हैं, जगदम्बा के मंडल में भी हैं, और दूसरी ओर नारायण के मंडल में भी हैं। वे साक्षात शिव के अवतार हैं। वे कहाँ नहीं हैं? वे हर जगह हैं।
स्त्री को गायत्री मंत्र की जगह क्या करना चाहिए?
गायत्री की जगह पंचाक्षरी; तीनों एक ही दिन प्रकट हुए
एक श्रोता से वक्ता कहते हैं कि यह बहुत अच्छी बात है कि वे गायत्री मंत्र नहीं कर रहीं: आप स्त्री हैं, तो गायत्री मंत्र की जगह आपको पंचाक्षरी मंत्र करना चाहिए, जैसा बार-बार कहा गया है। पंचाक्षरी, गायत्री और प्रणव — तीनों एक ही दिन, एक ही समय, शिव से, महाशिवरात्रि पर प्रकट हुए, जैसा आज उन्होंने चर्चा की। पहले प्रणव, फिर पंचानन स्वरूप, और फिर चतुर्मुख स्वरूप से त्रिपदा गायत्री प्रकट हुई।
वक्ता एक श्रोता से कहते हैं, गायत्री मंत्र न करना बहुत अच्छा है। आप नहीं कर रहीं; आप स्त्री हैं, तो गायत्री मंत्र की जगह आपको पंचाक्षरी मंत्र करना चाहिए — क्योंकि यह बार-बार कहा गया है। पंचाक्षरी, गायत्री और प्रणव — तीनों एक दिन, एक समय, और शिव से, महाशिवरात्रि पर प्रकट हुए; आज उन्होंने इस पर चर्चा की। पहले प्रणव, फिर पंचानन स्वरूप, और फिर चार मुख वाले, चतुर्मुख स्वरूप से त्रिपदा गायत्री प्रकट हुई।
शास्त्र क्या कहता है
The order of origination given — Pranav (Om) first from Shiva's five mouths, then the Panchakshara mantra from the Pranav, then the Tripada Gayatri from the four-faced form — is exactly the sequence Shiva's teaching to Brahma and Vishnu follows in this chapter.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
उपादिशं निजं मन्त्रमोङ्कारमुरुमङ्गलम्। ॐकारो मन्मुखाज्जज्ञे प्रथमं मत्प्रबोधकः॥ १६
मैंने अपने महामंगलकारी मन्त्र ओंकारका उपदेश किया। ओंकार सबसे पहले मेरे मुखसे प्रकट हुआ। वह मेरा बोध करानेवाला है।
वाचकोऽयमहं वाच्यो मन्त्रोऽयं हि मदात्मकः। तदनुस्मरणं नित्यं ममानुस्मरणं भवेत्॥ १७
यह वाचक है और मैं वाच्य हूँ। यह मन्त्र मेरा स्वरूप ही है। उसका नित्य स्मरण मेरा ही स्मरण होता है।
अकार उत्तरात् पूर्वमुकारः पश्चिमाननात्। मकारो दक्षिणमुखाद् बिन्दुः प्राङ्मुखतस्तथा॥ १८
पहले उत्तरवर्ती मुखसे अकार और पश्चिम मुखसे उकार निकला। दक्षिण मुखसे मकार तथा पूर्ववर्ती मुखसे बिन्दु निकला।
नादो मध्यमुखादेवं पञ्चधासौ विजृम्भितः। एकीभूतः पुनस्तद्वदोमित्येकाक्षरोऽभवत्॥ १९
मध्यवर्ती मुखसे नाद निकला। इस प्रकार यह पाँच रूपोंमें फैला। फिर उसी प्रकार एक होकर यह ओम् इस रूपमें एक अक्षर बन गया।
नामरूपात्मकं सर्वं वेदभूतकुलद्वयम्। व्याप्तमेतेन मन्त्रेण शिवशक्त्योश्च बोधकः॥ २०
नाम और रूपवाला सब कुछ और वेदमें बताये प्राणियोंके दोनों कुल इस मन्त्रसे व्याप्त हैं। और यह शिव और शक्तिका बोध करानेवाला है।
अस्मात् पञ्चाक्षरं जज्ञे बोधकं सकलस्य तत्। अकारादिक्रमेणैव नकारादि यथाक्रमम्॥ २१
इससे पंचाक्षर मन्त्र उत्पन्न हुआ। वह सकल रूपका बोध करानेवाला है। वह अकारादि क्रमसे ही और क्रमशः नकारादि क्रमसे प्रकट हुआ।
अस्मात् पञ्चाक्षराज्जाता मातृकाः पञ्चभेदतः। तस्माच्छिरश्चतुर्वक्त्रात्त्रिपाद्गायत्रिरेव हि॥ २२
इस पंचाक्षर मन्त्रसे पाँच भेदोंसे मातृका वर्ण उत्पन्न हुए। उससे शिरोमन्त्र निकला, और निश्चय ही चार मुखोंसे त्रिपदा गायत्री ही प्रकट हुई।
गायत्री कौन कर सकता है और पंचाक्षरी किसे करना चाहिए?
जिनका अधिकार है और जो वैदिक विधि से जीते हैं; बाकी लोग पंचाक्षरी करें
वक्ता कहते हैं, जिनका गायत्री का अधिकार है और जो वैदिक विधि से जीते हैं, वे गायत्री करें; बाकी लोग पंचाक्षरी करें। स्त्रियाँ, और जो यज्ञोपवीत नहीं पहनते, वे नमः — चतुर्थी विभक्ति नमः — बाद में लगाकर इसी तरह जप करें। वही गायत्री है। यह उनके पाँच मुखों से प्रकट हुई: उन पाँच मुखों से पंचमुखी विद्या, पंचाक्षरी विद्या प्रकट हुई, हर मुख एक अक्षर से दर्शाया गया।
वक्ता कहते हैं, जिनका गायत्री का अधिकार है, जो वैदिक विधि से जीते हैं, वे गायत्री करें। बाकी लोग पंचाक्षरी मंत्र करें। स्त्रियाँ, और जो यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। नहीं पहनते, वे पंचाक्षरी में नमः — चतुर्थी विभक्ति, नमः — बाद में लगाएँ, और इसी तरह जप करें। वही गायत्री है। यह उनके पाँच मुखों से प्रकट हुई। सोचिए: शिव के पाँच मुख, जिन्हें पंचानन महा स्वरूप माना जाता है, परब्रह्म का स्वरूप जिसे पाँच मुख वाला माना जाता है। उन पाँच मुखों से पंचमुखी विद्या, पंचाक्षरी विद्या प्रकट हुई, हर एक मुख एक अक्षर से दर्शाया गया। उसी का जप करने को आपसे कहा जा रहा है।
शास्त्र क्या कहता है
The Panchakshara mantra is presented in the text as the source from which Gayatri itself later arose, supporting the claim that Panchakshari can substitute for Gayatri.
The chapter establishes the genealogy (Pranav -> Panchakshara -> Gayatri) but does not itself state a rule about who must use which mantra — that adhikāra rule is the speaker's own extrapolation.
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उपादिशं निजं मन्त्रमोङ्कारमुरुमङ्गलम्। ॐकारो मन्मुखाज्जज्ञे प्रथमं मत्प्रबोधकः॥ १६
मैंने अपने महामंगलकारी मन्त्र ओंकारका उपदेश किया। ओंकार सबसे पहले मेरे मुखसे प्रकट हुआ। वह मेरा बोध करानेवाला है।
वाचकोऽयमहं वाच्यो मन्त्रोऽयं हि मदात्मकः। तदनुस्मरणं नित्यं ममानुस्मरणं भवेत्॥ १७
यह वाचक है और मैं वाच्य हूँ। यह मन्त्र मेरा स्वरूप ही है। उसका नित्य स्मरण मेरा ही स्मरण होता है।
अकार उत्तरात् पूर्वमुकारः पश्चिमाननात्। मकारो दक्षिणमुखाद् बिन्दुः प्राङ्मुखतस्तथा॥ १८
पहले उत्तरवर्ती मुखसे अकार और पश्चिम मुखसे उकार निकला। दक्षिण मुखसे मकार तथा पूर्ववर्ती मुखसे बिन्दु निकला।
नादो मध्यमुखादेवं पञ्चधासौ विजृम्भितः। एकीभूतः पुनस्तद्वदोमित्येकाक्षरोऽभवत्॥ १९
मध्यवर्ती मुखसे नाद निकला। इस प्रकार यह पाँच रूपोंमें फैला। फिर उसी प्रकार एक होकर यह ओम् इस रूपमें एक अक्षर बन गया।
नामरूपात्मकं सर्वं वेदभूतकुलद्वयम्। व्याप्तमेतेन मन्त्रेण शिवशक्त्योश्च बोधकः॥ २०
नाम और रूपवाला सब कुछ और वेदमें बताये प्राणियोंके दोनों कुल इस मन्त्रसे व्याप्त हैं। और यह शिव और शक्तिका बोध करानेवाला है।
अस्मात् पञ्चाक्षरं जज्ञे बोधकं सकलस्य तत्। अकारादिक्रमेणैव नकारादि यथाक्रमम्॥ २१
इससे पंचाक्षर मन्त्र उत्पन्न हुआ। वह सकल रूपका बोध करानेवाला है। वह अकारादि क्रमसे ही और क्रमशः नकारादि क्रमसे प्रकट हुआ।
अस्मात् पञ्चाक्षराज्जाता मातृकाः पञ्चभेदतः। तस्माच्छिरश्चतुर्वक्त्रात्त्रिपाद्गायत्रिरेव हि॥ २२
इस पंचाक्षर मन्त्रसे पाँच भेदोंसे मातृका वर्ण उत्पन्न हुए। उससे शिरोमन्त्र निकला, और निश्चय ही चार मुखोंसे त्रिपदा गायत्री ही प्रकट हुई।
कौन-से पाँच मुख पाँच अक्षर देते हैं, और पंचाक्षरी को क्या कहा गया है?
सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष, ईशान — और लघु गायत्री
सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष, ईशान: इन पाँच मुखों से पाँच अक्षर निकले और पंचाक्षरी बनी। वक्ता कहते हैं कि इसका वर्णन शिव महापुराण में है — हम अपने मन से नहीं कह रहे। और उस पंचाक्षरी को साक्षात गायत्री कहा गया है, लघु गायत्री के रूप में। जिनका गायत्री का अधिकार नहीं है, वे यह करेंगे। और यह बताया गया कि अगर आप गायत्री मंत्र की दस माला नहीं कर सकते, जो लंबा है, तो पंचाक्षरी की दस माला करें। किसी और मंत्र को यह महत्व नहीं दिया गया।
वक्ता कहते हैं, सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष, ईशान: इन पाँच मुखों से पाँच अक्षर निकले और पंचाक्षरी मंत्र बना। वे कहते हैं, इसका वर्णन शिव पुराण में है — हम अपने मन से नहीं कह रहे। और उस पंचाक्षरी को साक्षात गायत्री कहा गया है, लघु गायत्री के रूप में। जिनका गायत्री का अधिकार नहीं है, वे यह करेंगे। और जो गायत्री की दस माला नहीं कर सकते, उनसे यह भी कहा गया है: भाई, गायत्री मंत्र लंबा है; अगर दस माला नहीं कर सकते, तो पंचाक्षरी की दस माला करो। किसी और मंत्र का ऐसा महत्व नहीं बताया गया।
हर तरह के व्यक्ति के लिए वक्ता रोज़ का न्यूनतम क्या बताते हैं?
रोज़ दस माला — गायत्री या पंचाक्षरी, और स्त्रियों के लिए शिवाय नमः
वक्ता कहते हैं, अगर आप किसी पंथ में दीक्षित हैं, तो वहाँ गुरु जो देते हैं, वह अलग विषय है, और आपको उसी मंत्र का जप करना चाहिए। पर जो सामान्य रूप से यज्ञोपवीत पहनते हैं, उन्हें रोज़ गायत्री या पंचाक्षरी की दस माला अवश्य करनी चाहिए। स्त्री को चतुर्थी विभक्ति बाद में लगाकर रोज़ शिवाय नमः की दस माला करनी चाहिए। वे कहते हैं, यही मूल है।
वक्ता कहते हैं, हाँ, अगर आप किसी पंथ में दीक्षित हैं, तो वहाँ गुरु जो देते हैं, वह अलग विषय है; उसी मंत्र का जप कीजिए। पर जो सामान्य रूप से यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। पहनते हैं, उन्हें रोज़ गायत्री या पंचाक्षरी की दस माला अवश्य करनी चाहिए। स्त्री को चतुर्थी विभक्ति बाद में लगाकर शिवाय नमः का जप करना चाहिए — रोज़ दस माला। वे कहते हैं, यही मूल है।
क्या अभी युग का अंतिम अवसर चल रहा है?
ब्रह्मा का 51वाँ वर्ष, सातवें मनु, और 28वाँ महायुग
वक्ता कहते हैं, युग का अंतिम अवसर नहीं चल रहा। दूसरे परार्ध का पहला भाग अभी शुरू ही हुआ है। ब्रह्मा के पचास वर्ष बीत चुके हैं; अब 51वाँ वर्ष चल रहा है। यह सातवें मनु हैं; मनु चौदह हैं, और जब चौदह मनुओं का शासन पूरा होगा, तब प्रलय आएगा। अभी केवल सातवें हैं; अभी सात और मनु आएँगे। और एक मनु का युग 71 महायुग का है — यानी चारों युग 71 बार बीतेंगे। अभी 28वाँ चल रहा है। प्रलय आने में बहुत-बहुत लंबा समय है; और प्रलय भी चार प्रकार का होता है।
वक्ता कहते हैं, युग का अंतिम अवसर नहीं चल रहा। दूसरे परार्ध का पहला अभी शुरू ही हुआ है। इस पूरे विषय पर एक लाइव में चर्चा हुई थी; वे अलग वीडियो बनाकर समझाएँगे। ब्रह्मा के पचास वर्ष बीत चुके हैं। अब 51वाँ वर्ष चल रहा है। यह सातवें मनु हैं। मनु चौदह हैं। जब चौदह मनुओं का शासन पूरा होगा, तब प्रलय आएगा। और अभी केवल सातवें हैं; अभी सात और मनु आएँगे। और एक मनु का युग 71 महायुग व कल्प का है — यानी चारों युग 71 बार बीतेंगे, तभी। अभी 28वाँ चल रहा है। समझे? प्रलय आने में बहुत-बहुत लंबा समय है। और प्रलय भी चार प्रकार का होता है, जिसके बारे में अलग से बताया जाएगा।
जो भस्म लगाता है और भगवती की सेवा करता है, उससे अप्सराएँ और परियाँ दूर रहती हैं।
भस्म लगाने वाले और भगवती के सेवक से अप्सराएँ दूर रहती हैं
चैनल पर अप्सरा साधना या परी साधना का वीडियो माँगा गया। वक्ता कहते हैं कि उन्होंने पहले भी कहा है कि अप्सराएँ और परियाँ उनसे बहुत दूर रहती हैं, उनसे नाराज़ रहती हैं — वे उन्हें श्राप न दे दें। वे कहते हैं, हम भगवती की सेवा करेंगे, महादेव की सेवा करेंगे, रुद्रदेव की सेवा करेंगे, रुद्राभिषेक करेंगे। अप्सराएँ और परियाँ आकर क्या करेंगी — जैसे भस्म लगाने वाला और दिन-रात इस तरह रहने वाला उन्हें कोई आकर्षण दे सके।
चैनल पर अप्सरा साधना या परी साधना के वीडियो के बारे में पूछा गया। वक्ता कहते हैं: भाई, हमने पहले कहा था कि अप्सराएँ और परियाँ हमसे बहुत दूर भागती रहती हैं, हमसे नाराज़ रहती हैं। वे कहते हैं, वे हमें श्राप न दे दें। हम भगवती की सेवा करेंगे, महादेव की सेवा करेंगे, रुद्रदेव की सेवा करेंगे, रुद्राभिषेक करेंगे। अप्सराएँ और परियाँ आकर क्या करेंगी — जैसे भस्म लगाने वाला और दिन-रात इस तरह रहने वाला उन्हें कोई आकर्षण दे सके।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।