श्रावण की प्रश्नोत्तरी — सप्तशती का रहस्य, अनधिकृत ज्ञान और साधक का प्रारब्ध
दुर्गा सप्तशती, तंत्र की गोपनीयता और नैतिकता पर प्रश्नोत्तर।
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क्या पंचाक्षरी और सप्ताक्षरी के हवन के बाद तर्पण और मार्जन करना ज़रूरी है, और कितना?
हवन, तर्पण और मार्जन का दशांश अनुपात
एक श्रोता के पूछने पर वक्ता कहते हैं कि अगर करें तो बहुत बढ़िया है, पर इन दोनों मंत्रों में न कर सकें तो कोई बाध्यता नहीं है। हर चरण में मात्रा दशांश की होती है: सवा लाख जप यानी 1250 माला पर हवन 120 माला, तर्पण 12 माला और मार्जन लगभग एक माला।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या पंचाक्षरी और सप्ताक्षरी के हवन के बाद तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। और मार्जन करना ज़रूरी है, और कितना। वक्ता उत्तर देते हैं कि अगर करेंगे तो बहुत बढ़िया है; अगर नहीं कर पाते, तो इन दोनों मंत्रों में कोई बाध्यता नहीं है। मात्रा दशांश से होती है। मान लीजिए आपने सवा लाख जप किया — यानी 1250 माला जप — तो हवन ठीक उसका दशांश, 120 माला होगा; तर्पण 12 माला बनता है, और मार्जन लगभग एक माला। इस प्रकार।
कुब्जिका कवच से शत्रु बाधा से मुक्ति का क्या उपाय है?
किसी भी कवच या सतनाम के लिए चालीस हज़ार जप की सीमा
वक्ता कहते हैं: कवच कीजिए। कवच के लिए वे हमेशा कहते हैं कि जब तक उसका चालीस हज़ार जप न हो जाए — कवच हो, सतनाम हो, ये सब — तब तक आज के समय को देखते हुए किसी उपाय से प्रारब्ध का कटना और उसका पूरा फल मिलना नहीं होगा। अपने तप का सामर्थ्य बढ़ाइए, फिर कोई भी कवच या सतनाम काम करेगा।
कुब्जिका कवच से शत्रु बाधा से मुक्ति का उपाय पूछे जाने पर वक्ता का उत्तर सीधा है: कवच कीजिए। कवच के लिए वे कहते हैं कि वे हमेशा लोगों को बताते हैं कि जब तक उसका चालीस हज़ार जप पूरा न हो — कवच हो, सतनाम हो, ये सब — तब तक आज के सामान्य हालात को देखते हुए प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। का कटना और उसका पूरा फल मिलना नहीं होगा। उपाय से नहीं, वे कहते हैं। अपने तप का सामर्थ्य बढ़ाइए; फिर वह काम करेगा, चाहे कोई भी कवच हो या सतनाम।
कवच की अपनी फलश्रुति ही प्रयोग है; उसके साथ केवल संकल्प चाहिए
कवच की अपनी फलश्रुति ही प्रयोग है; केवल संकल्प चाहिए
वक्ता कहते हैं कि कोई उन्हें बार-बार संदेश भेजता है कि 1100 जप हो गया, प्रयोग बताइए। वे पूछते हैं कि उससे प्रयोग होगा कैसे। कवच में जो लिखा है वही पढ़िए: उसमें लिखा है कि इस कवच के पाठ से भगवती स्वयं शत्रुओं का निग्रह करती हैं। अलग से कोई विशेष प्रयोग नहीं करना है — प्रयोग में केवल संकल्प लेना है।
वक्ता बताते हैं कि आजकल कोई उन्हें बार-बार संदेश भेजता है कि 1100 जप हो गया, प्रयोग बताइए; 1100 जप हो गया, प्रयोग बताइए। वे उलटे पूछते हैं कि उससे प्रयोग किया कैसे जाएगा, और उस व्यक्ति को करना क्या है। वे कहते हैं, उसके अंदर जो लिखा है वह पढ़िए। कवचों में ही लिखा है कि इस कवच के पाठ से भगवती स्वयं शत्रुओं का निग्रह करती हैं। ऐसा नहीं है कि आपको अलग से कोई विशेष प्रयोग करना है। प्रयोग में केवल संकल्प लेना है।
1100 जप से कोई विशेष फल क्यों नहीं मिल सकता?
हल्का-सा पाठ एक महीने का प्रारब्ध भी क्यों नहीं काट सकता
वक्ता पूछते हैं कि 1100 जप के बाद कोई व्यक्ति कौन-सा विशेष फल चाहता है। हो सकता है वह हमारे अपने एक महीने के कर्म का प्रारब्ध भी न काट सके, क्योंकि वह उतने विधि-विधान से नहीं होगा, उसमें कोई सामग्री प्रयोग नहीं हो रही, वह सामान्य पाठ है, उच्चारण सौ प्रतिशत शुद्ध होने की कोई गारंटी नहीं, और वह गुरु से लेकर नहीं किया जा रहा। कई विषय आते हैं, इसलिए समय लगता है।
वे कहते हैं कि यह विषय उन्होंने कई बार समझाया है, पर पूछते हैं: 1100 जप के बाद आपको कौन-सा विशेष फल मिल जाएगा? हो सकता है वह हमारे अपने शायद एक महीने के कर्म का प्रारब्ध भी काटने में सक्षम न हो। क्योंकि, वे गिनाते हैं, वह उतने विधि-विधान से होना नहीं है; आप उसमें सामग्री का प्रयोग नहीं करने वाले; आप सामान्य पाठ कर रहे हैं। उसमें यह प्रश्न भी नहीं उठेगा कि उच्चारण सौ प्रतिशत शुद्ध रहा। और वह गुरु से लेकर भी नहीं किया जा रहा। इतने सारे विषय उसमें आते हैं, वे कहते हैं, इसीलिए समय लगता है।
जब तीनों रहस्य मार्कण्डेय पुराण में वर्णित नहीं हैं, तो उन्हें सप्तशती से क्यों जोड़ा गया?
सप्तशती एक स्वतंत्र शाक्त ग्रंथ के रूप में
वक्ता उत्तर देते हैं कि तीनों रहस्य, और उनसे आगे कवच, अर्गला और कीलक — वह पूरा विषय — इसलिए है क्योंकि सप्तशती एक स्वतंत्र शाक्त ग्रंथ बन चुकी है। वे कहते हैं कि जब आप कीलक का पाठ करेंगे, तब आपको पता चलेगा कि वह विषय क्या है।
प्रखर नाम के एक श्रोता पूछते हैं कि तीनों रहस्य सप्तशती में क्यों जोड़े गए, जबकि वे मार्कण्डेय पुराण में वर्णित नहीं हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि तीनों रहस्य, और उनसे आगे कवच, अर्गला और कीलक — वह पूरा विषय — इसलिए वहाँ है क्योंकि दुर्गा सप्तशती एक स्वतंत्र शाक्त ग्रंथ बन चुकी है। वे कहते हैं, जब आप कीलक का पाठ करेंगे, उसी समय आपको पता चलेगा कि वह विषय क्या है।
क्या आज उपलब्ध तांत्रिक ग्रंथ ही सब कुछ हैं?
जो सामग्री अभी सार्वजनिक नहीं हुई, और बीजात्मक सप्तशती
वक्ता एक बात दोहराते हैं जो वे पहले भी कह चुके हैं: यह ज़रूरी नहीं कि चीज़ें उतने तक ही सीमित हों जितने तांत्रिक ग्रंथ आज आपको पुस्तक रूप में सीधे मिलते हैं। उनसे आगे बहुत-सी बातें हैं जो अभी सार्वजनिक नहीं हुईं, और जब होती हैं तो सामान्य लोग उन्हें मानने में बहुत समय लगाते हैं, या मानते ही नहीं, क्योंकि उन्हें लगता है सामग्री प्रामाणिक नहीं। ऐसा ही एक विषय, वे कहते हैं, क्रिया योग के संदर्भ में जिन गुप्त अवतार बाबाजी की बात होती है, उनसे जुड़ी बीजात्मक या मंत्रात्मक सप्तशती है।
सात सौ श्लोक वास्तव में कैसे बने, यह समझाने के लिए वक्ता कहते हैं कि वे एक बात दोहराएँगे: यह ज़रूरी नहीं कि चीज़ें उतनी ही सीमित हों जितनी आज आपको ग्रंथों के रूप में सीधे उपलब्ध हैं — तंत्रों के जो भी ग्रंथ आप तक पहुँचते हैं। उसके बाद और उससे आगे भी बहुत-सी बातें हैं जो अभी सार्वजनिक नहीं हुईं। और जब वे सार्वजनिक होती हैं, तो सामान्य लोग उन्हें स्वीकार करने में ही बहुत समय लगाते हैं, या फिर स्वीकार नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता है कि बातें प्रामाणिक नहीं हैं। उसी श्रेणी में, वे कहते हैं, एक विषय है: गुप्त अवतार बाबाजी, जिनके बारे में श्रोताओं ने क्रिया योग के संदर्भ में सुना होगा। ऐसे व्यक्तित्वों के माध्यम से जो मंत्रात्मक — या कहें बीजात्मक — सप्तशती का पूरा विषय सामने रखा गया है, उसे लेकर बहुत लोग भ्रमित हो जाते हैं। पर वास्तव में, वे कहते हैं, यह कोई स्वरचित या गढ़ा हुआ विषय नहीं है।
भगवती वेदव्यास के सामने हज़ार सहस्राक्षर बीजों वाले कमल पर विराजमान होकर प्रकट हुईं
हज़ार सहस्राक्षर बीजों वाले कमल पर विराजमान भगवती
वक्ता कहते हैं कि वहाँ यह विषय स्पष्ट किया गया है: जब भगवती वेदव्यास के सामने प्रकट हुईं, तो जिस कमल आसन पर माँ विराजमान थीं उस पर हज़ार सहस्राक्षर बीज साफ़ दिखाई दे रहे थे। अर्थात भगवती बीज मातृकाओं पर विराजमान हैं, और उन बीज मातृकाओं में हर एक स्वतंत्र बीज की अपनी स्वतंत्र साधना है।
वे कहते हैं, उस सामग्री में यह विषय स्पष्ट है: वास्तव में जब भगवती वेदव्यास के सामने प्रकट हुईं, तो जिस कमल आसन पर माँ विराजमान थीं, उस पर हज़ार सहस्राक्षर बीज साफ़ दिखाई दे रहे थे। अर्थात भगवती बीज मातृकाओं पर विराजमान हैं। और उन बीज मातृकाओं में हर एक स्वतंत्र बीज की अपनी स्वतंत्र साधना है।
मातृका ग्रंथ वायरल हो गए हैं, पर मातृका साधना गुरु के बिना नहीं हो सकती
मातृका साधना गुरु के बिना नहीं हो सकती
वक्ता बताते हैं कि मातृका साधना से जुड़े ग्रंथ अब वायरल होकर लोगों तक पहुँच गए हैं। वह गुरु के बिना नहीं हो सकती। पर आज के युग में सब कुछ बता देने की होड़ है — यह दिखाने की कि मैं विद्वान हूँ, मेरे पास यह चीज़ है, इसलिए बता रहा हूँ — इसलिए लोग उसे डाल देते हैं, क्योंकि तभी वे वायरल होंगे और तभी लोगों को पता चलेगा कि यह सक्षम व्यक्ति है जिसके पास इतनी चीज़ें हैं।
हज़ार मातृकाओं में से हर एक का क्या अपना होता है?
हर मातृका का अलग ऋषि और अलग भैरव
वक्ता कहते हैं कि वे सहस्र मातृकाएँ, जिनमें हर एक किसी एक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है, सबके अपने अलग ऋषि और अलग भैरव हैं, स्वतंत्र रूप से। वे कहते हैं, वह साधकों के लिए है।
वे कहते हैं, इसे देखिए: वे सहस्राक्षर — वे हज़ार मातृकाएँ, जिनमें हर एक किसी एक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है — सबके अपने अलग ऋषि और अलग भैरव हैं, स्वतंत्र रूप से। वे जोड़ते हैं, वह साधकों का विषय हो गया।
ग्रंथ की रचना के लिए भगवती ने क्या आदेश दिया?
ऐसा ग्रंथ जिससे सामान्य लोग लाभ ले सकें, बीजों को क्रम में रखकर
वक्ता कहते हैं कि भगवती का दिया आदेश यह था: ऐसा विषय रचो, ऐसा ग्रंथ हो, जिससे सामान्य लोग लाभ ले सकें — और यह इन बीजों को क्रम में रखकर करो।
वक्ता आदेश बताते हैं: भगवती द्वारा यह आदेश दिया गया कि तुम ऐसा विषय रचो, ऐसा ग्रंथ हो, जिससे सामान्य लोग उसका लाभ ले सकें। और यह, उन्होंने कहा, इन बीजों को एक क्रम में रखकर करो।
सप्तशती शब्द वास्तव में किसका सूचक है?
सप्तशती, सप्त-सती यानी सात सतियों का अपभ्रंश
वक्ता कहते हैं कि सप्तशती को एक अपभ्रंश रूप माना गया है। पुराने ग्रंथों में, और परंपरागत लोगों से, यह सुनने को मिलता है — और कहीं-कहीं लिखा भी मिलता है — कि यह सप्त-सती है, यानी सात सतियाँ, और उन सात सतियों का सामर्थ्य इन सात सौ श्लोकों में समन्वित किया गया है। पर वास्तव में, वे कहते हैं, ये सहस्राक्षरी हैं: ये मातृकाएँ हज़ार से अधिक हैं, जिनमें से केवल सात सौ सामान्य लोगों के लिए रखी गईं।
तो वास्तव में, सप्तशती के विषय पर आते हुए, वक्ता कहते हैं कि सप्तशती को एक अपभ्रंश रूप माना गया है। जब आप पुराने ग्रंथों में इसका वर्णन पढ़ते हैं, या परंपरागत लोग इसकी बात करते हैं — और कहीं-कहीं लिखा भी मिलता है — तो यह सप्त-सती है, यानी सात सतियाँ। उन सात सतियों का जो सामर्थ्य है, उसे इन सात सौ श्लोकों में समन्वित किया गया। पर वास्तव में, वे कहते हैं, ये सहस्राक्षरी हैं। ये मातृकाएँ हज़ार से अधिक हैं। केवल सात सौ ही सामान्य लोगों के लिए रखे गए।
सप्तशती का सहस्राधिक स्वरूप क्या है?
तीन सौ और, जो अब प्रचलन में आ गए हैं
वक्ता कहते हैं कि तीन सौ और हैं। सहस्राधिक अब प्रचलन में आ गया है — लोगों ने उसे भी वायरल कर दिया है, और सप्तशती का सहस्राधिक स्वरूप प्रचलित कर दिया गया है।
वक्ता कहते हैं, तीन सौ और हैं। सहस्राधिक अब तो प्रचलन में आ गया है; लोगों ने उसे भी वायरल कर दिया है। सप्तशती का जो सहस्राधिक स्वरूप है, उसे भी प्रचलित कर दिया गया है।
सप्तशती के छह अंग कौन-से हैं?
षडंग — कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य
वक्ता इन्हें षडंग, यानी छह अंग बताते हैं: कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य। वे कहते हैं कि यह पूरा विषय अभी बताई गई बात से जुड़ा है। इन छह अंगों के बिना सात सौ श्लोकों वाली आज की सप्तशती पूरी नहीं हो सकती।
तो ये रहस्य, या जिन्हें छह अंग कहा जाता है — जो षडंग बनता है — वे हैं कवच, अर्गला स्तोत्र, कीलक और तीनों रहस्य। वक्ता कहते हैं कि यह पूरा विषय अभी बताई गई बात से जुड़ा है। इन छह अंगों के बिना, वर्तमान समय में जैसी है, सात सौ श्लोकों वाली मूल सप्तशती पूरी नहीं हो सकती।
कुल परंपरा के भीतर साधक क्रम से सक्षम होता है और बीजात्मक साधना का आदेश पाता है
क्रम से सक्षम होना और बीजात्मक साधना का आदेश पाना
वक्ता कहते हैं कि जब आप कुल परंपरा में जाएँगे, तो वहाँ विधि अनुसार, कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हुए सक्षम होंगे, और आपको बीजात्मक साधना का आदेश मिलेगा। अगर आप ऐसे कुल में गए हैं, और वहाँ हर शक्ति की साधना विधि अनुसार होती है, तब आपको पता चलेगा कि यह विषय इतना आसान नहीं है।
पर जब आप कुल परंपरा में जाएँगे, वक्ता कहते हैं, तो वहाँ विधि अनुसार, क्रम से आगे बढ़ते हुए आप सक्षम होंगे, और आपको बीजात्मक साधना का आदेश मिलेगा। अगर आप ऐसे कुल में गए हैं, और उनमें हर शक्ति की साधना विधि अनुसार की जाती है, तब आपको पता चलेगा कि यह विषय इतना आसान नहीं है।
क्या सप्तशती का हर श्लोक अपने आप में मंत्र है?
हर श्लोक स्वतंत्र रूप से सिद्ध, अपने अलग प्रयोग के साथ
वक्ता कहते हैं कि ऐसा बताया जाता है कि हर श्लोक स्वतंत्र है और हर एक का अपना अलग प्रयोग है; हर श्लोक अपने आप में सिद्ध है और हर श्लोक स्वयं एक मंत्र है। यहाँ, वे कहते हैं, आप कहानी पढ़ रहे हैं; श्लोक पढ़ते हुए लग सकता है कि उसमें से कोई मंत्र-अर्थ निकल ही नहीं रहा। पर जब आप वास्तव में वहाँ जाएँगे, तब यह सब पता चलेगा।
यहाँ कथा के माध्यम से, सुरथ और समाधि के द्वारा जो रखा गया है, वह ऐसा है कि हर श्लोक का — जैसा कहते हैं — अपना स्वतंत्र प्रयोग है। हर श्लोक अपने आप में सिद्ध है; हर श्लोक स्वयं एक मंत्र है। पर यहाँ आप कहानी पढ़ रहे हैं। तो उससे क्या समझ आएगा? कि देवी वाच में कोई ऐसा विषय आ गया, या जो एक शब्द, एक श्लोक हम पढ़ रहे हैं उसमें से किसी मंत्र का अर्थ निकलता ही नहीं लगता। इसमें कौन-सा मंत्र आएगा? पर वास्तव में, वे कहते हैं, जब आप वहाँ जाएँगे, तब ये सारे विषय आपको पता चलेंगे।
गुप्त विषय जितना आसानी से उपलब्ध होता है, उसका महत्व और प्रभाव उतना कम होता है
जितनी आसान उपलब्धता, उतना कम महत्व और प्रभाव
वक्ता कहते हैं कि आप इसे पढ़ सकते हैं — अब ये चीज़ें खोजेंगे तो आसानी से मिल जाएँगी — फिर जोड़कर समझिए। पर ये गुप्त बातें हैं, और ये जितनी आसानी से लोगों तक पहुँचेंगी, उतना इनका महत्व घटेगा, और जब इन्हें काम में लिया जाएगा तो कोई प्रभाव नहीं देंगी। क्योंकि जब व्यक्ति को बस इतना पता चल जाता है कि ऐसी चीज़ है, तो उसमें समर्पण होता ही नहीं।
आप इसे पढ़ सकते हैं, वक्ता कहते हैं; अब ये सारी चीज़ें खोजेंगे तो आराम से मिल जाएँगी। फिर जोड़िए, समझिए। पर ये गुप्त विषय हैं, वे कहते हैं, और ये जितनी आसानी से लोगों तक पहुँचेंगे, जितने आसानी से उपलब्ध होंगे, उतना इनका महत्व घटता जाएगा। और जब इन्हें काम में लिया जाएगा, तो ये कोई प्रभाव नहीं देंगे। कैसे? जब आपको पता चलेगा, जब मालूम हो जाएगा कि अच्छा, यह ऐसा है — तो उस व्यक्ति का उसमें समर्पण होता ही नहीं। उसे बस जानकारी हो रही होती है। तो जब वह स्वयं भी इसे करता है, क्योंकि उसके पास विधि अनुसार क्रमागत साधना का कोई मार्ग नहीं है, तो यह काम नहीं करता।
एकाक्षरी मंत्र ठीक से लिया जाए तो क्या कर सकता है?
एकाक्षरी का मूल प्रसारण चार लाख
वक्ता एकाक्षरी मंत्र का उदाहरण देते हैं — भगवती काली का चिंतामणि, काली प्रणव, देवी प्रणव, या किसी भी देवता का एकाक्षरी प्रणव मंत्र, जैसे भगवती पीताम्बरा बगलामुखी का। अगर केवल वही ठीक क्रमागत शाक्त दीक्षा में लिया जाए, और उसके बाद चार लाख किया जाए — एक लाख से एक प्रसारण होता है, पर चार लाख को मूल प्रसारण माना गया है, कम से कम चौगुना — और परंपरागत ढंग से किया जाए, तो उस एक एकाक्षरी मंत्र के प्रभाव से बहुत सारे काम और प्रयोग हो सकते हैं, और उससे कई मंत्रों का प्रयोग सिद्ध हो सकता है।
उदाहरण के लिए ऐसे समझिए, वे कहते हैं: एक एकाक्षरी मंत्र लीजिए — चाहे भगवती काली का चिंतामणि हो, काली प्रणव हो, देवी प्रणव हो, या किसी भी देवता का एकाक्षरी प्रणव मंत्र, जैसे भगवती पीताम्बरा बगलामुखी का। अगर केवल उसी की ठीक शाक्त दीक्षा क्रमागत रूप से हो जाए, और उसके बाद चार लाख किया जाए — एक लाख में एक प्रसारण होगा, पर चार लाख को मूल प्रसारण माना गया है, कम से कम चौगुना — और वह इतना करेगा और परंपरागत रहेगा, तो उस एकाक्षरी मंत्र के प्रभाव से बहुत सारे काम और प्रयोग किए जा सकते हैं। उससे पूर्णता में कई मंत्रों का प्रयोग किया जा सकता है।
क्रमागत एकाक्षरी दीक्षा के साथ और क्या होना चाहिए?
महामृत्युंजय, भैरव, और दीक्षा रकार में हुई या लकार में
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा बहुत सारे विषय जुड़ जाते हैं: अगर एकाक्षरी की क्रमागत दीक्षा हुई है, तो साथ में और क्या और कैसे करना है, महामृत्युंजय, भैरव को कैसे साथ लेकर चलना है, और आपकी दीक्षा किस बीजाक्षरी में हुई — रकार में या लकार में। यह सब, वे कहते हैं, केवल आपके गुरु ही स्पष्ट करेंगे।
पर इसके अलावा, वक्ता कहते हैं, बहुत सारे विषय जुड़ जाते हैं। अगर क्रमागत दीक्षा हो रही है और वह एकाक्षरी की हुई है, तो उसके साथ और क्या करना है और कैसे करना है; महामृत्युंजय मंत्र; भैरव को कैसे साथ लेकर चलना है। आपकी दीक्षा किस बीजाक्षरी में हुई है — रकार में हुई या लकार में। यह सारा विषय, वे कहते हैं, केवल आपके गुरु ही स्पष्ट करेंगे।
बगलामुखी और महाविद्याएँ कितने आम्नायों में पूजी जाती हैं?
सभी छह आम्नायों में उपस्थिति
वक्ता कहते हैं कि भगवती बगलामुखी भी छह आम्नायों में अलग-अलग रूपों में पूजी जाती हैं। ऐसा नहीं कि वे चार आम्नायों में हैं या केवल एक में — उनकी उपस्थिति सभी आम्नायों में है। दस महाविद्याएँ सभी आम्नायों की हैं। व्यक्ति इसमें जितना गहरे जाएगा, उतना जानेगा।
इकट्ठी की गई पीडीएफ़ और रील्स विधि स्पष्ट होने से पहले ही साधक का समर्पण नष्ट कर देती हैं
इकट्ठी की गई फ़ाइलें साधक का समर्पण नष्ट करती हैं
वक्ता कहते हैं कि जब तक वह पूरा विषय स्पष्ट न हो, और हज़ार मंत्रों का पूरा विधि-विधान आपको सीधे न मिल रहा हो, तब तक आपका समर्पण बस नष्ट हो रहा है। लोग जो पीडीएफ़ अपने मोबाइल और लैपटॉप में जमा करके रखते हैं, सबसे गुप्त विषय अपलोड हो रहे हैं, वीडियो बन रहे हैं, इंस्टाग्राम पर रील्स बन रही हैं — यह, वे कहते हैं, आपको नष्ट कर देगा। आपका समर्पण नहीं रहेगा, आपके भीतर कोई भाव नहीं जगेगा; आप बस जानेंगे और कहेंगे, अच्छा, यह ऐसा है।
तो जब तक वह पूरा विषय स्पष्ट नहीं होता, वक्ता कहते हैं, और हज़ार-हज़ार मंत्रों का पूरा विधि-विधान आप तक सीधे नहीं पहुँच रहा, तब तक आपका समर्पण बस नष्ट हो रहा है। जो पीडीएफ़ आप अपने मोबाइल में, अपने लैपटॉप में सजाकर रखते हैं — गुप्त से गुप्त विषय जो लोग अपलोड करते रहते हैं, जो वीडियो बनाए जा रहे हैं, इंस्टाग्राम पर जो रील्स बन रही हैं — यह आपको नष्ट कर देगा, वे कहते हैं। आपका समर्पण नहीं रहेगा, आपके भीतर कोई भाव नहीं जगेगा। आप बस इसे जानेंगे और कहेंगे, अच्छा, यह ऐसा है।
जब आखिरकार गुरु मिलते हैं, तब क्या होता है?
यह सोचना कि गुरु जो सिखा रहे हैं वह आप पहले से जानते हैं
वक्ता कहते हैं कि जब भी आपको गुरु मिलेंगे, अगर कर्म से कोई गुरु मिल गए और वे समझाने का प्रयास करेंगे, तो आपके मन में चलेगा: यह सब तो हम पहले से जानते हैं। अरे, गुरु जी कुछ कम बता रहे हैं। अरे, यह कुछ गलत बता रहे हैं। और क्योंकि मंत्र भाव पर काम करते हैं, वहीं कहानी खत्म।
और जब भी आपको गुरु मिलेंगे, वक्ता कहते हैं — अगर आपके कर्म के कारण कोई गुरु मिल गए हैं — जब वे समझाने का प्रयास करेंगे, तो आपके मन में चलेगा: यह सब तो हम पहले से जानते हैं। अरे, गुरु जी इससे कुछ कम बता रहे हैं। अरे, यह कुछ गलत बता रहे हैं। क्योंकि मंत्र भाव पर काम करते हैं, वे कहते हैं। और इसी के साथ कहानी खत्म।
बगलामुखी के रकार, लकार और त्र्यक्षरी के बारे में पहले से पढ़ लेने पर गुरु के बोलने से पहले ही भाव बँट जाता है
बगलामुखी का रकार, लकार और त्र्यक्षरी, और बँटा हुआ भाव
वक्ता कहते हैं: गुरु जी आपसे एकाक्षरी का जप करने को कहेंगे। पर आप पहले ही पढ़-सुन-जान चुके हैं कि बगलामुखी माई में यह रकार में नहीं है; कि ल और र वाला लिया जाए तो मंत्र त्र्यक्षरी हो जाता है, और एकाक्षरी में किया जाए तो भी उग्र हो जाता है। और गुरु जी ने वह वाला नहीं दिया। तो आप जप तो एकाक्षरी का कर रहे हैं, पर आपका भाव उस मंत्र में है ही नहीं — आपका भाव कहीं और चला गया है। वे कहते हैं, इन चीज़ों को अनधिकृत रूप से पाने से यही होता है।
गुरु जी कहेंगे, एकाक्षरी का जप करो, वक्ता कहते हैं। अब आप पहले से पढ़, सुन और जान चुके हैं कि बगलामुखी माई में यह रकार में नहीं है; कि ल और र वाला लें तो मंत्र त्र्यक्षरी हो जाता है, और एकाक्षरी में करें तो भी उग्र हो जाता है। और गुरु जी ने वह वाला नहीं दिया। तो आपका भाव — आप जप एकाक्षरी में कर रहे हैं, पर आपका भाव उस मंत्र में है ही नहीं। आपका भाव कहीं और चला गया है। कहानी वहीं खत्म हो गई, वे कहते हैं। इन चीज़ों को अनधिकृत तरीके से पाने से यही होता है।
देवताओं के स्वरूप भी गुप्त क्यों रखे जाते हैं?
द्विभुजा पीताम्बरा और उस ध्यान से जुड़ी बातें
इसी कारण, वक्ता कहते हैं, देवी-देवताओं के स्वरूप भी गुप्त रखे जाते हैं। जब भगवती पीताम्बरा, ब्रह्मास्त्र विद्या बगलामुखी का ध्यान उनके दो भुजाओं वाले रूप में किया जा रहा है — तो उस द्विभुजा रूप में देवी का वाहन कौन है, उनका आसन क्या है, उस समय उनके भैरव का स्वरूप क्या होगा?
इसी कारण, वक्ता कहते हैं, देवी-देवताओं के स्वरूप भी गुप्त रखे जाते हैं। जब भगवती पीताम्बरा, ब्रह्मास्त्र विद्या बगलामुखी का ध्यान उनके द्विभुजा — दो भुजाओं वाले — रूप में किया जा रहा है, तो उस द्विभुजा रूप में देवी का वाहन कौन है? उनका आसन क्या है? उस समय उनके भैरव का स्वरूप क्या होगा?
चार और आठ भैरव, चौंसठ योगिनियाँ और पटल — सब निर्धारित करने होते हैं
चार और आठ भैरव, चौंसठ योगिनियाँ, और पटल
वक्ता आगे कहते हैं: उनके साथ चलने वाले वीरों के भैरव के चार रूप — वह कौन-सा होगा? आठ भैरव वही आठ होंगे, पर उनका मंत्र किस प्रकार होगा? साथ में चौंसठ योगिनियाँ होंगी — उनका स्वरूप क्या होगा? अगर पटल में पूजन करना है, तो किस पटल में जाएँगे, आवृत वृत्त में जाएँगे, किसमें जाएँगे? ये बातें, वे कहते हैं, आपके गुरु बहुत सही ढंग से बता सकते हैं, अगर आप दीक्षित होकर करेंगे।
उनके साथ चलने वाले भैरव के चार रूप, वीरों के भैरव — वह कौन-सा होगा? जो आठ भैरव होंगे वे वही आठ हैं, पर उनका मंत्र किस प्रकार होगा? उनके साथ चौंसठ योगिनी होंगी — उनका स्वरूप कैसा होगा? अगर पटल में पूजन होना है, तो किस पटल में जाएँगे, आवृत वृत्त में जाएँगे, किसमें जाएँगे? ये बातें, वे कहते हैं, आपके गुरु बहुत सही ढंग से बता सकते हैं, अगर आप दीक्षित होकर करेंगे।
क्या पीताम्बरा के बहुभुजा रूप पुस्तकों में मिलते हैं?
जो केवल परंपरागत गुरु की व्याख्या दे सकती है
वक्ता कहते हैं कि भगवती पीताम्बरा के द्विभुजा, चतुर्भुजा और अष्टभुजा रूप, और उनमें क्रमागत मंत्र कैसे चलेगा, यह आपको कम से कम अभी तो ग्रंथों में नहीं मिलेगा। हो सकता है कोई नया छाप दे — रोज़ इतने छप रहे हैं कि लोग छाप भी दें। पर कोई कितना भी कर ले, जब तक कोई परंपरागत गुरु विषय खोलकर न बताएँ, तब तक उन रूपों का रहस्य जानना और समर्पण बनाना दो अलग विषय रहते हैं।
पर भगवती पीताम्बरा के द्विभुजा, चतुर्भुजा और अष्टभुजा रूप, और उनमें क्रमागत मंत्र कैसे चलेगा — यह सब, वक्ता कहते हैं, आपको कम से कम अभी तो ग्रंथों में नहीं मिलेगा। हो सकता है, वे मानते हैं, कोई नया उसे भी छाप दे; रोज़ इतने छप रहे हैं कि लोग छाप भी दें। पर कोई कितना भी कर ले, जब तक कोई परंपरागत गुरु आपको विषय खोलकर नहीं बताते, तब तक उन रूपों का रहस्य जानना और समर्पण बनाना दो अलग-अलग विषय हैं।
इन रहस्यों को अनधिकृत रूप से पाने में लाभ है या हानि?
पहले योग्य बनिए — विंध्याचल का त्रिकोण
इस कारण, वक्ता कहते हैं, हानि बहुत है और लाभ कोई नहीं। इसीलिए वे बार-बार कहते हैं: अनधिकृत रूप से मत जाइए, योग्य बनिए और फिर रहस्य जानिए। उन्होंने कई बार कहा है कि जब आप विंध्याचल जाएँ, त्रिकोण कीजिए, योग्य बनिए, और भगवती आपको रहस्य बताएँगी, रहस्य देंगी, और आप समझ जाएँगे।
इस कारण हानि बहुत है, वक्ता कहते हैं, और लाभ बिल्कुल नहीं। आप सोचते हैं कि हम बार-बार क्यों कहते हैं कि अनधिकृत तरीके से नहीं करना चाहिए — योग्य बनिए, और रहस्य जानिए। हमने कई बार कहा है, वे जोड़ते हैं, कि जब आप विंध्याचल जाएँ, त्रिकोण कीजिए, योग्य बनिए; भगवती आपको रहस्य बताएँगी, रहस्य देंगी, और आप समझ जाएँगे।
माया के बारे में साधक को सबसे बड़ी बात क्या याद रखनी चाहिए?
एक ओर महामाया, दूसरी ओर माया
वक्ता कहते हैं कि सबसे बड़ी बात यह है कि माया हमेशा साधक के साथ चलती है — इसे याद रखिए। एक ओर महामाया हैं; दूसरी ओर माया अपना काम करती रहती है।
और एक सबसे बड़ी बात, वक्ता कहते हैं: माया हमेशा साधक के साथ चलती है। इसे स्मरण में रखिए। एक ओर महामाया हैं; दूसरी ओर माया है, और वह अपना काम करती रहती है।
बड़ी संख्या में जप पूरा होने के बाद माया क्या करती है?
अहंकार, और गुरु या विद्वान बनने की जल्दी
वक्ता कहते हैं कि जहाँ भी आपने किसी मंत्र का सवा लाख जप किया, या पाँच लाख, या दस लाख, वहाँ माया सक्रिय हो जाएगी। वह आपमें, हममें, साधकों में अहंकार भर देगी — और फिर गुरु बनने का ढोंग आता है, गुरु बनने की जल्दी, विद्वान बनने की जल्दी, यह भाव कि मैं बहुत बड़ा विद्वान हूँ और मुझसे बड़ा कोई नहीं। वे कहते हैं, यह माया आज के समय में हर तरह से साधकों को निरर्थक बना रही है।
जहाँ भी आपने किसी मंत्र का सवा लाख, पाँच लाख, दस लाख जप पूरा किया, वहाँ माया सक्रिय हो जाएगी, वक्ता कहते हैं। वह आपके भीतर अहंकार भरेगी, हमारे भीतर भरेगी; साधकों के भीतर अहंकार आ जाएगा। और उसके साथ गुरु बनने का ढोंग, गुरु बनने की जल्दी, विद्वान बनने की जल्दी — कि भाई, हम बहुत बड़े विद्वान हैं, हमसे बड़ा कोई नहीं। यह माया, वे कहते हैं, आज के समय में साधकों को हर तरह से निरर्थक बना रही है, जैसा हम देख रहे हैं। इस बात के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। लोग इतनी जल्दी में हैं। अब दोनों में से एक चुन लीजिए।
माया अच्छे साधकों को बाँध लेती है और जागने नहीं देती
माया बाँधती है और जागने नहीं देती
वक्ता कहते हैं कि यह कहना भी अनुचित लगता है, क्योंकि लोग इसे समझेंगे नहीं या समझना नहीं चाहते। पर सच्चाई जानिए: अच्छे साधकों का नुकसान हो रहा है। किसी को कितना भी जगाने की कोशिश की जाए, जब माया उसे बाँध लेती है तो जागने नहीं देती। और अगर वह व्यक्ति जाग भी जाए, तो ऐसी जगह से गिरेगा कि उसे जीवन भर ढोंग बनाए रखना पड़ेगा, और असली साधना वह नहीं कर पाएगा।
यह बात कहना भी अनुचित लगता है, वक्ता कहते हैं, क्योंकि लोग इसे समझ नहीं पाएँगे, या समझना नहीं चाहते। पर सच्चाई जानिए, वे कहते हैं: अच्छे साधकों का नुकसान हो रहा है। किसी व्यक्ति को कितना भी जगाने का प्रयास किया जाए, जब माया उसे बाँध लेती है तो जागने नहीं देती। और अगर वह व्यक्ति जाग जाए, तो फिर ऐसी जगह से गिरेगा कि उसे जीवन भर ढोंग बनाए रखना पड़ेगा; असली साधना वह नहीं कर पाएगा।
जिस ज्ञान का अधिकार नहीं है, उसके साथ क्या करें?
जानिए, पर अपनी सीमा और मर्यादा में रहिए
वक्ता कहते हैं: इस कारण ये सारी बातें ज़रूर जानिए, पर अगर ये आपके लिए अनधिकृत हैं, तो उस दिशा में मत बढ़िए। अपनी सीमा में रहिए, मर्यादा में रहिए, और काम करते रहिए।
इस कारण, वक्ता कहते हैं, ये सारी बातें ज़रूर जानिए — पर अगर अनधिकृत हैं, तो उनकी ओर मत बढ़िए। अपनी सीमा में रहिए; मर्यादा में रहते हुए काम करते चलिए।
दैनिक पूजा में भगवान शिव को क्या अर्पित करना चाहिए?
जलाभिषेक और श्रृंगार सबसे आवश्यक
वक्ता उत्तर देते हैं कि भगवान शिव की नित्य पूजा में उनका जलाभिषेक और श्रृंगार सबसे आवश्यक हैं। अभिषेक उन्हें प्रिय है, इसलिए अभिषेक रोज़ होना चाहिए। उसके अलावा बिल्व पत्र के साथ जो भी आप अर्पित कर सकें।
भगवान शिव की नित्य पूजा में क्या अर्पित करना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि उनका जलाभिषेक और श्रृंगार सबसे आवश्यक है। अभिषेक उन्हें प्रिय है, इसलिए अभिषेक रोज़ होना चाहिए। बाकी, जो भी आप उन्हें अर्पित कर सकें — बिल्व पत्र के साथ।
क्या कोई स्त्री रोज़ श्रीसूक्त का पाठ कर सकती है?
श्रीसूक्त और पुरुषसूक्त वैदिक मंत्र, और उनका उच्चारण कौन कर सकता है
एक श्रोता बताती हैं कि वे रोज़ श्रीसूक्त के तीन पाठ करती हैं। वक्ता का उत्तर: अगर आप स्त्री हैं, तो सीधी बात है कि श्रीसूक्त वैदिक में आता है; इसलिए उसका उच्चारण केवल यज्ञोपवीत धारण करने वाले ही करें। आज दक्षिण भारत और दूसरी जगहों के वीडियो देखकर लोग कहते हैं कि किसे कौन रोकता है, सब करते हैं — पर, वे कहते हैं, भाई, आप नहीं कर सकते। उनकी जानकारी के अनुसार श्रीसूक्त और पुरुषसूक्त वैदिक मंत्र हैं, और जब गायत्री का ही अधिकार नहीं है तो उनके उच्चारण का अधिकार नहीं है।
अनीता श्री नाम की एक श्रोता लिखती हैं कि उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और वे रोज़ श्रीसूक्त के तीन पाठ करती हैं। वक्ता कहते हैं कि यहाँ संदर्भ यह है: अगर आप स्त्री हैं, तो सीधी बात है — श्रीसूक्त वैदिक में आता है। और क्योंकि श्रीसूक्त वैदिक में आता है, उसका उच्चारण केवल यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करने वालों को ही करना चाहिए। आज के समय में दक्षिण भारत के वीडियो और यहाँ के वीडियो देखकर लोग कहते हैं कि भाई, किसे कौन रोकता है, सब करते हैं। भाई, वे कहते हैं, आप नहीं कर सकते। उनकी जानकारी के अनुसार श्रीसूक्त और पुरुषसूक्त वैदिक मंत्र हैं। तो उनके उच्चारण का अधिकार — जब गायत्री मंत्र का ही अधिकार नहीं है।
भगवती के सामान्य रूपों और अवतारों ने भी यह मर्यादा रखी
भगवती के अवतारों ने भी मर्यादा रखी
वक्ता कहते हैं कि वैदिक ब्राह्मण अपने वीडियो में यह विषय स्पष्ट कर रहे हैं: कि इन सब चीज़ों का अधिकार अवतार लेकर लीला करने वाले भगवती के सामान्य रूपों ने भी मर्यादा में रखा। तो, वे पूछते हैं, हम कौन हैं?
ब्राह्मण, वैदिक ब्राह्मण, अपने वीडियो में यह विषय स्पष्ट कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं: कि इन सब चीज़ों के अधिकार के मामले में, अवतार लेकर लीला करने वाले भगवती के सामान्य रूपों ने भी यह मर्यादा रखी। तो फिर, वे पूछते हैं, हम कौन हैं? वे कहते हैं, यह पहली बात है।
क्या पारद शिवलिंग रखना चाहिए, और किसे?
सौ प्रतिशत पारद पर संदेह, और उसकी साधना किसे करनी चाहिए
दूसरी बात पारद शिवलिंग की है। वक्ता कहते हैं कि आज के समय में कोई पारस रस सिद्ध करके सौ प्रतिशत पारद शिवलिंग बनाकर दे रहा है, यह अपने आप में आश्चर्य का विषय है। अगर मूल पारद शिवलिंग है तो ठीक है। वे कहते हैं कि वे इसमें ज़्यादा हस्तक्षेप नहीं कर सकते और आपकी श्रद्धा खंडित नहीं करना चाहते, पर उनका कहना है कि कम से कम जो साधक हैं, उस स्तर के दीक्षित साधक जिनके पास गुरु का आदेश है, वही पारद शिवलिंग की साधना करें।
दूसरी चीज़, वक्ता कहते हैं, पारद शिवलिंग है। कि आज के समय में कोई पारस रस सिद्ध करके सौ प्रतिशत पारद शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। बनाकर दे रहा है — यह भी आश्चर्य का विषय है। अगर मूल पारद शिवलिंग है, तो ठीक है। उनके अनुसार — जैसा वे शुरू से मानते आए हैं — वे इसमें बहुत हस्तक्षेप नहीं कर सकते। आपकी जो श्रद्धा है, उसे वे खंडित नहीं करना चाहते। फिर भी उनका कहना है कि कम से कम जो साधक हैं, उस स्तर के दीक्षित साधक जिनके पास गुरु का आदेश है, वही पारद आदि शिवलिंग की साधना करें।
रस सिद्ध पारद के बारे में क्या कहा जाता है?
पारद स्वर्ण का भक्षण करता है
वक्ता कहते हैं कि रस सिद्ध पारद स्वर्ण का भक्षण करने वाला होता है। पारद शिवलिंग, या पारस से जुड़ा जो असली पारद है, वह स्वर्ण का ही भक्षण करता है: जैसे चाँदी का वर्क होता है, वैसे सोने का वर्क लगाया जाता है, और वे उसे खा जाते हैं। इससे समझिए, वे कहते हैं, कि विषय क्या है; और यह हर किसी के लिए करना उचित नहीं है।
रस सिद्ध पारद, वक्ता कहते हैं, स्वर्ण का भक्षण करने वाला होता है। पारद शिवलिंग, या पारस से जुड़ा जो वास्तव में असली पारद होगा, वह स्वर्ण का ही भक्षण करता है। जैसे चाँदी का वर्क होता है, वैसे सोने का वर्क लगाया जाता है, और वे उसे खा जाते हैं। तो समझिए कि विषय क्या है, वे कहते हैं। और यह चीज़ हर किसी के लिए करना उचित भी नहीं है।
गृहस्थ को कौन-सा शिवलिंग रखना चाहिए?
नर्मदेश्वर या रत्न का शिवलिंग
वक्ता के अनुसार — या, वे सुधारते हैं, विद्वानों के अनुसार — धन, धान्य और सुख की इच्छा रखने वाले गृहस्थ को या तो नर्मदेश्वर जी रखने चाहिए, या रत्नों से बना शिवलिंग, चाहे स्फटिक का हो, पन्ने का हो, या जो भी आपके सामर्थ्य में हो। स्फटिक शिवलिंग कोई भी आराम से रख सकता है; नर्मदेश्वर जी कोई भी आराम से रख सकता है, और रखने चाहिए।
उनके अनुसार — या यूँ कहें, वे कहते हैं, उनके अनुसार नहीं बल्कि विद्वानों के अनुसार — धन, धान्य और सुख की इच्छा रखने वाले गृहस्थ को या तो नर्मदेश्वर शिवलिंगम् जी रखने चाहिए, या रत्नों से बना शिवलिंग, चाहे वह स्फटिकस्फटिक की माला, जब साधक की कुंडली में शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो, तब रुद्राक्ष के स्थान पर चुनी जाती है। का हो, पन्ने का हो, या जो भी आपके सामर्थ्य में हो। स्फटिक शिवलिंग कोई भी आराम से रख सकता है। नर्मदेश्वर जी कोई भी आराम से रख सकता है; उन्हें रखने चाहिए।
जहाँ कठिनाई आर्थिक हो, वहाँ चैनल पर पहले से दी गई शिव और लक्ष्मी की विधियाँ काम आती हैं
चैनल पर पहले से दी गई विधियाँ
वक्ता कहते हैं कि अगर आपकी कठिनाई आर्थिक है, तो चैनल पर भगवान शिव और भगवती लक्ष्मी से जुड़े ऐसे कई विधि-विधान दिए गए हैं जो आप कर सकते हैं।
और अगर आपको आर्थिक रूप से कठिनाई है, वक्ता कहते हैं, तो चैनल पर ऐसे कई विधि-विधान बताए गए हैं — भगवान शिव से जुड़े और भगवती लक्ष्मी से जुड़े — जो आप कर सकते हैं।
थोड़े-से शहद से शिवलिंग का अभिषेक श्रावण का सरल उपाय है
थोड़ी मात्रा में शहद से शिवलिंग का अभिषेक
श्रावण चल रहा है, इसलिए वक्ता फिर एक सामान्य विषय बताते हैं: भगवान शिव के शिवलिंग का अभिषेक कीजिए, और विशेष रूप से शहद से उनका अभिषेक कीजिए। थोड़े-से शहद से ही हो, इतना नहीं कि पूरी बोतल लगे, रोज़ 250 ग्राम — अभिषेक बस एक चम्मच का हो, पर हो।
एक सामान्य विषय — सावन चल रहा है, तो वे कहते हैं कि वे स्वयं इसे एक बार फिर बताएँगे। भगवान शिव के शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। का अभिषेक कीजिए, और विशेष रूप से मधु से, शहद से उनका अभिषेक कीजिए। बहुत थोड़े-से शहद से ही हो, वे कहते हैं, इतना नहीं कि रोज़ पूरी बोतल शहद, 250 ग्राम लगे। अभिषेक एक चम्मच का ही हो — पर हो।
अभिषेक के बाद चंदन या केसर से रंगे 108 अखंड चावल और पाँच बिल्व पत्र
चंदन या केसर से रंगे 108 अखंड चावल, और पाँच बिल्व पत्र
वक्ता कहते हैं: फिर जल आदि से अभिषेक करने के बाद 108 अखंड चावल लीजिए और जो चंदन या केसर उपलब्ध हो उससे उन दानों को अच्छे से रंग लीजिए। अगर अर्चन बिल्व पत्र से होगा तो बहुत अच्छा; पर अगर उतनी मात्रा में बिल्व पत्र न मिलें, तो कम से कम पाँच बिल्व पत्र शिव जी को अर्पित कीजिए।
और फिर जल आदि से अभिषेक करके, वक्ता कहते हैं, 108 अखंड चावल लीजिए, और जो चंदन या केसर आता है उससे उन दानों को अच्छे से रंग लीजिए। और अगर अर्चन बिल्व पत्र से करना हो, तो बहुत अच्छा है। पर अगर उतनी मात्रा में बिल्व पत्र न मिलें, तो कम से कम पाँच बिल्व पत्र शिव जी को अर्पित कीजिए।
हर चावल का दाना किस मंत्र से अर्पित करना चाहिए?
शिव के 108 नाम, या जिस पंचाक्षरी का अधिकार हो
उसके बाद, वक्ता कहते हैं, भगवान शिव के 108 नामों से, या अधिकृत पंचाक्षरी मंत्र से अर्पित कीजिए — चाहे आप स्त्री हों या पुरुष, यज्ञोपवीत हो या न हो, उस पूरी विधि के अनुसार जो उन्होंने कई बार बताई है। पंचाक्षरी में जिस मंत्र का आपको अधिकार है, उसके अनुसार एक-एक चावल का दाना लेकर इस कामना से भगवान शिव पर अर्पित करना शुरू कीजिए कि हमें धन-धान्य प्राप्त हो।
और उसके बाद, वक्ता कहते हैं, भगवान शिव के 108 नामों से, या फिर अधिकृत पंचाक्षरी मंत्र से — चाहे आप स्त्री हों, चाहे पुरुष, चाहे आपके पास यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। हो या न हो, उस पूरी विधि के अनुसार जो वे कई बार बताते हैं — पंचाक्षरी में जिस मंत्र का आपको अधिकार है उसके अनुसार, एक-एक चावल का दाना लेकर, इस कामना के साथ कि हमें धन-धान्य प्राप्त हो, उसे भगवान शिव पर अर्पित करना शुरू कीजिए।
गृहस्थ की समृद्धि के लिए संध्या के समय क्या पाठ करना चाहिए?
सहस्र नामों से विष्णु द्वारा की गई शिव स्तुति
वक्ता कहते हैं: विष्णु जी द्वारा सहस्र नामों से की गई शिव जी की स्तुति — उसका पाठ संध्या के समय कीजिए। वे कहते हैं, धन-धान्य की प्राप्ति के लिए, गृहस्थ के सुख के लिए यह अद्भुत है।
विष्णु जी द्वारा सहस्र नामों से शिव जी की जो स्तुति की गई है — उसका पाठ संध्या के समय कीजिए, वक्ता कहते हैं। धन-धान्य की प्राप्ति के लिए, गृहस्थ के सुख के लिए यह अद्भुत है।
क्या भगवान दक्षिणामूर्ति के मंत्र कीलित हैं?
दक्षिणामूर्ति, त्रिपुर भैरवी के महाभैरव
यह पूछे जाने पर कि क्या दक्षिणामूर्ति के मंत्र कीलित हैं, और क्या महाकाल ज्योतिर्लिंग को दक्षिणामूर्ति इसलिए कहते हैं कि ज्योतिर्लिंग दक्षिणमुखी है, वक्ता उत्तर देते हैं कि तंत्र के क्षेत्र में भगवान दक्षिणामूर्ति से जुड़ा विषय गुरु के बिना पूरी तरह सिद्ध नहीं हो सकता। उनसे जुड़े कई मंत्र आज ऐसे फैलाए जा रहे हैं जैसे कोई भी कर ले — पर वे भगवती त्रिपुर भैरवी के महाभैरव हैं, जो दस महाविद्याओं में पाँचवीं विद्या हैं, और वे उनके भैरव हैं। कीलित या अकीलित का प्रश्न छोड़ दीजिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या भगवान दक्षिणामूर्ति के मंत्र कीलित हैं, और क्या महाकाल ज्योतिर्लिंग को दक्षिणामूर्ति इसलिए कहते हैं कि ज्योतिर्लिंग दक्षिणमुखी है। देखिए, वक्ता कहते हैं: जब आप तंत्र के क्षेत्र में जाते हैं, तो भगवान दक्षिणामूर्ति से जुड़ा विषय गुरु के बिना पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं हो सकता। उनसे जुड़े ऐसे कई मंत्र हैं जो आज के समय में यह कहकर फैलाए जा रहे हैं कि ऐसे कर सकते हैं, वैसे कर सकते हैं। पर वे भगवती त्रिपुर भैरवी के महाभैरव हैं। दस महाविद्याओं में भगवती त्रिपुर भैरवी पाँचवीं विद्या हैं, और वे उनके भैरव हैं। कीलित और अकीलित का विषय छोड़ दीजिए, वे कहते हैं।
कोई स्तुति या स्तोत्र पढ़ा जा सकता है या नहीं, यह कैसे तय करें?
विधि-निषेध के लिए फलश्रुति पढ़िए
वक्ता कहते हैं कि इन स्वरूपों का सामान्य विधि-विधान भी उनकी परंपरा के किसी योग्य जानकार से लिए बिना स्वयं करना अनुचित होगा। स्तुति, सहस्रनाम और स्तोत्र के लिए फलश्रुति देखिए: जहाँ लिखा है कि हाँ, कोई भी कर सकता है, कि गृहस्थ ने किया तो ये चीज़ें प्राप्त हुईं, वह ज़रूर किया जा सकता है। पर अगर फलश्रुति कहती है कि दीक्षा के बिना नहीं हो सकता, या उसमें कोई भी प्रतिबंध, कोई विधि-निषेध रखा गया है, तो वह नहीं किया जा सकता। वे कहते हैं, यह हर स्वरूप पर लागू होता है।
इन स्वरूपों का सामान्य विधि-विधान भी, वक्ता कहते हैं, कम से कम उनकी परंपरा के किसी योग्य जानकार व्यक्ति से लिए बिना स्वयं करना अनुचित होगा। स्तुति, सहस्रनाम और स्तोत्र के लिए हर एक की फलश्रुति देखिए। जहाँ उसमें बताया गया है कि हाँ, इसे कोई भी कर सकता है — कि गृहस्थों ने किया तो ये प्राप्तियाँ हुईं — वह ज़रूर किया जा सकता है। पर अगर फलश्रुति में दिया है कि यह दीक्षा के बिना नहीं हो सकता, या उसमें किसी भी प्रकार का प्रतिबंध रखा गया है, विधि-निषेध है, तो वह नहीं किया जा सकता। यह, वे कहते हैं, हर स्वरूप के लिए है।
क्या दक्षिणामूर्ति स्वरूप वही है जो दक्षिण की ओर मुख किए शिव हैं?
स्वरूप और दिशा में अंतर
ज्योतिर्लिंग वाले प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि दक्षिणामूर्ति स्वरूप और दक्षिण दिशा की ओर देखते भगवान शिव के अर्थ वाले दक्षिणामूर्ति में कम से कम कुछ अंतर तो है। और दूसरी बात, वे कहते हैं, उन्होंने कहीं प्रामाणिक, शास्त्रीय रूप से नहीं पढ़ा कि भगवान शिव का वही रूप दक्षिणामूर्ति के रूप में है, अगर ज्योतिर्लिंग की ही बात हो।
और जहाँ बात ज्योतिर्लिंग की है — दक्षिणामूर्ति ज्योतिर्लिंग — वक्ता कहते हैं कि दक्षिणामूर्ति स्वरूप और दक्षिण दिशा की ओर देखते भगवान शिव के अर्थ वाले दक्षिणामूर्ति में, दोनों में कम से कम कुछ अंतर तो है। और दूसरी बात यह है कि प्रामाणिक रूप से, शास्त्रीय रूप से उन्होंने कहीं नहीं पढ़ा कि भगवान शिव का वही रूप दक्षिणामूर्ति के रूप में है, अगर ज्योतिर्लिंग की ही बात हो रही हो।
उन्होंने अलग विवरण पढ़ा है और जिस पहचान की पुष्टि नहीं सुनी उसे वे नहीं कहेंगे
उन्होंने अलग विवरण पढ़ा है और जिस पहचान की पुष्टि नहीं सुनी उसे वे नहीं कहेंगे
उसकी जगह, वक्ता कहते हैं, उन्होंने बिल्कुल अलग विषय पढ़ा है। हो सकता है उन्हें जानकारी न हो; अगर कोई विद्वान प्रमाण के साथ बता रहे हैं कि यही भगवान का दक्षिणामूर्ति स्वरूप है, तो आप मान सकते हैं। पर अपनी मेधा, अपनी बुद्धि, अपने स्वाध्याय में, और विद्वानों से, उन्होंने ऐसा नहीं सुना — इसलिए वे यह बात बोल ही नहीं सकते।
उसकी जगह, वक्ता कहते हैं, उन्होंने कुछ बिल्कुल ही अलग विषय पढ़ा है। तो हो सकता है उन्हें जानकारी न हो। अगर कोई विद्वान व्यक्ति प्रमाण के साथ यह विषय बता रहे हैं — कि यही भगवान का दक्षिणामूर्ति स्वरूप है — तो आप मान सकते हैं। पर उनकी मेधा में, उनकी बुद्धि में, उनके स्वाध्याय में, या विद्वानों से, उन्होंने ऐसा विषय नहीं सुना। इसलिए, वे कहते हैं, हम यह बात बोल ही नहीं सकते।
हरिद्वार में क्षेत्रपाल के लिए कौन-सा मंदिर ठीक है?
स्थानीय जानकारी न होने से वे प्रश्न का उत्तर नहीं देते
हरिद्वार के कनखल के एक श्रोता पूछते हैं कि क्षेत्रपाल के लिए कौन-सा मंदिर ठीक रहेगा, और दक्ष मंदिर और बिल्वेश्वर महादेव का ज़िक्र करते हैं, जहाँ माता पार्वती ने बेल पत्र खाकर तीन हज़ार साल तपस्या की। वक्ता उत्तर देते हैं कि उन्हें हरिद्वार से जुड़ी विशेष जानकारी नहीं है, इसलिए वे नहीं कह सकते। उस जगह के लिए वे कनखल क्षेत्र की शक्तिपीठ और पूरे विषय का अच्छे से स्वाध्याय करके ही बता पाएँगे; बेहतर होगा कि आप वहाँ रहने वाले लोगों से पूछें।
एक श्रोता लिखते हैं कि वे हरिद्वार के कनखल में रहते हैं, और पूछते हैं कि क्षेत्रपाल के लिए कौन-सा मंदिर उचित रहेगा — एक ओर दक्ष मंदिर, और दूसरी ओर बिल्वेश्वर महादेव, जहाँ माता पार्वती ने बेल पत्र खाकर तीन हज़ार साल तपस्या की। वक्ता कहते हैं कि उन्हें हरिद्वार से जुड़ी विशेष जानकारी नहीं है, इसलिए वे यह नहीं कह सकते। उस जगह के लिए, कनखल क्षेत्र की शक्ति पीठ और पूरे विषय का अच्छे से स्वाध्याय करने के बाद ही वे आपको बता पाएँगे। और ज़्यादा उचित होगा, वे कहते हैं, कि आप वहाँ रहने वाले लोगों से पूछें।
क्या पूरे शहर का एक ही क्षेत्रपाल होता है?
किसी क्षेत्र का और आपके अपने मोहल्ले का क्षेत्रपाल अलग हैं
वक्ता जोड़ते हैं कि वास्तव में पूरे हरिद्वार के क्षेत्रपाल का विषय एक बात है, और जिस मोहल्ले में आप रहते हैं उसके क्षेत्रपाल का विषय दूसरी बात। हरिद्वार के भीतर भी अलग-अलग क्षेत्र होंगे — इसलिए एक क्षेत्रपाल की जगह कई क्षेत्रपाल हो सकते हैं।
वास्तव में, वक्ता कहते हैं, पूरे हरिद्वार के क्षेत्रपाल का विषय एक बात हो गई, और जिस क्षेत्र में आप रहते हैं उसके क्षेत्रपाल का विषय दूसरी बात। हरिद्वार के भीतर भी अलग-अलग क्षेत्र होंगे, है न। तो एक क्षेत्रपाल होने की जगह कई क्षेत्रपाल हो सकते हैं।
क्या पंचाक्षरी को संपुट बनाने से उसकी ऊर्जा घटती है?
पंचाक्षरी से संपुट उसे कम नहीं करता
यह पूछे जाने पर कि अगर अब किसी मंत्र को फिर से पंचाक्षरी के साथ संपुट किया जाए तो क्या पंचाक्षरी की ऊर्जा कम होगी, वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल नहीं होगी। वे जोड़ते हैं कि इसके लिए, पंचाक्षरी के लिए, उन्होंने पहले ही अलग वीडियो बनाया है।
एक श्रोता पूछते हैं कि जो डिलीट हो गया था, उसके लिए अगर फिर से किसी मंत्र को पंचाक्षरी के साथ संपुट किया जाए, तो क्या पंचाक्षरी की ऊर्जा कम होगी। बिल्कुल नहीं होगी, वक्ता उत्तर देते हैं। इसके लिए, वे जोड़ते हैं, पंचाक्षरी पर अलग वीडियो पहले ही बनाया जा चुका है।
घर के सभी देवताओं की पूजा कैसे करनी चाहिए?
पूरा स्नान होता हो तो सुविधा अनुसार क्रम से
यह पूछे जाने पर कि घर के देवताओं की पूजा एक-एक करके करें, या पहले एक की फिर अगले की, वक्ता उदाहरण लेते हैं कि लक्ष्मी-गणेश जी, हनुमान जी, शिव जी और भगवती सब स्थापित हैं। सामान्यतः घर में अगर आप रोज़ सबको स्नान आदि कराते हैं और वह पूरी प्रक्रिया होती है, तो अपनी सुविधा से क्रम से कीजिए। पर अगर आप बिल्कुल सामान्य पूजन करते हैं — और सबके पास इतना समय नहीं होता — तो इतना करना चाहिए।
सारिक तिवारी नाम के एक श्रोता के पूछने पर कि घर के सभी देवी-देवताओं की पूजा कैसे करें — एक-एक करके, या पहले एक का पूजन फिर अगले का — वक्ता एक उदाहरण लेते हैं: मान लीजिए आपने लक्ष्मी-गणेश जी, हनुमान जी, शिव जी और भगवती, सबको स्थापित किया है। सामान्यतः घर में, हर दिन के लिए, अगर आप सबको स्नान आदि कराते हैं और वह पूरा विषय है, तो अपनी सुविधा के अनुसार क्रम से कीजिए। पर अगर आप बिल्कुल सामान्य पूजन करते हैं — हर किसी के पास इतना समय नहीं होता कि वे इतना करने को कहें — तो इतना करना चाहिए।
घर के देवताओं के लिए रोज़ की न्यूनतम विधि क्या है?
सुगंधित जल में मिला गंगाजल, छिड़ककर पोंछना
वक्ता कहते हैं कि गंगाजल और सुगंधित जल मिलाना चाहिए — गुलाब जल, गंगाजल, अगरु, और सुगंधित इत्र। यह सब मिलाकर किसी अच्छी स्प्रे बोतल में, या जल छिड़कने के बर्तन में रखिए, ताकि वह सुगंधित रहे। रोज़ सब पर उसे छिड़किए, और पहले साफ़ सूखे सूती कपड़े से हल्के से पोंछिए। हर एक को तिलक लगाइए।
इतना करना चाहिए, वक्ता कहते हैं: गंगाजल और सुगंधित जल को मिला लेना चाहिए। जैसे गुलाब जल, गंगाजल, अगरु, और सुगंधित इत्र। यह सब मिलाकर किसी अच्छी स्प्रे बोतल में, या जल छिड़कने के लिए जो बर्तन होता है उसमें रखिए, ताकि वह सुगंधित रहे। और रोज़ सब पर उसे छिड़ककर, पहले एक साफ़ सूखे कपड़े से, सूती कपड़े से, हल्के से पोंछिए। हर एक को तिलक आदि लगाइए।
किन मूर्तियों के साथ यह छोटा तरीका नहीं चलता?
शिवलिंग, शालिग्राम और पाषाण शिलाओं को क्रम से स्नान और श्रृंगार चाहिए
उसके बाद, वक्ता कहते हैं, उनका श्रृंगार कीजिए और फिर पूजन के लिए बैठिए। पर उसमें भी शिव जी के लिए यह नहीं चलेगा। शिव जी के लिए, या आपने जो भी पाषाण शिला रखी है — शालिग्राम जी, शिव जी, नर्मदेश्वर या कोई अन्य शिवलिंग, और इनके अलावा सोनभद्र की शिला, स्वर्णमुखी शिला, जो भी आप रखें — उन सबका फिर क्रम से स्नान और श्रृंगार कराना चाहिए।
उसके बाद, उनका श्रृंगार आदि करके, फिर पूजन के लिए बैठिए, वक्ता कहते हैं। पर उसमें भी शिव जी के लिए ऐसा नहीं हो सकता। शिव जी के लिए, या आपने जो भी पाषाण शिला रखी है — शालिग्राम जी, शिव जी, नर्मदेश्वर शिवलिंगम् या कोई अन्य शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप।, और इनके अलावा सोनभद्र की शिला, स्वर्णमुखी शिला, जो भी आप रखें — उन सबका फिर आपको क्रम से स्नान और श्रृंगार कराना चाहिए।
और कुछ न हो तो भी शिवलिंग का अभिषेक रोज़ बिना चूके होना चाहिए
कम से कम शिवलिंग का अभिषेक रोज़ हो
अगर आप सबके लिए नहीं करवाते, वक्ता कहते हैं, तो कोई कठिनाई नहीं; पर कम से कम शिवलिंग के लिए ज़रूर कीजिए। शालिग्राम जी का विषय आपके अनुसार है, आप उनकी सेवा कैसे करते हैं; पर शिवलिंग का अभिषेक रोज़ होना चाहिए। जल छिड़कना और तिलक लगाना, अगर रोज़ करते हैं, तो सब एक साथ कीजिए, फिर आसन पर बैठकर अपना आगे का कार्यक्रम कीजिए।
अगर आपने सबके लिए नहीं करवाया, तो कोई कठिनाई नहीं, वक्ता कहते हैं — पर कम से कम शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। के लिए ज़रूर कीजिए। शालिग्राम जी का विषय आपके अनुसार है, आप उनकी सेवा कैसे करते हैं। पर शिवलिंग का अभिषेक रोज़ होना चाहिए। यानी: स्नान आदि की बात, उन पर जल छिड़कना और तिलक लगाना, अगर आप रोज़ करते हैं, तो वह सब एक साथ कीजिए; फिर आसन पर बैठकर अपना आगे का कार्यक्रम कीजिए।
क्या अर्गला के पहले मंत्र का रात का जप सुबह किया जा सकता है?
समय बदलना ठीक है; बस अंतराल न हो
एक श्रोता बताते हैं कि वे रोज़ रात को अर्गला के पहले मंत्र की दस माला करने का प्रयास करते हैं, और पूछते हैं कि जिस दिन घर का कोई काम आ जाए, क्या सुबह कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं: ज़रूर कीजिए। बस ध्यान रहे कि अंतराल न हो। किसी कारण से स्त्रियों को पाँच दिन का अंतराल वैसे भी होगा — वह गिनती में नहीं आता।
एक श्रोता बताते हैं कि वे रोज़ अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र की दस माला का प्रयास करते हैं, रात को करते हैं, और पूछते हैं कि जिस दिन घर का कोई काम आ जाए, क्या सुबह कर सकते हैं। ज़रूर कीजिए, वक्ता कहते हैं। बस इतना देखिए कि अंतराल न हो। किसी कारण से स्त्रियों को पाँच दिन का अंतराल वैसे भी होगा — वह, वे कहते हैं, गिनती में नहीं है।
किसी दिन पूरी माला न हो सके तो क्या करें?
आसन पर बैठकर ग्यारह बार कीजिए
वक्ता कहते हैं कि अगर कभी लगे कि आज किसी कारण से इतना जप नहीं हो पाएगा, तो माला भर जप न भी हो सके, तब भी आसन पर बैठकर अपना जप ग्यारह बार ही कर लीजिए।
दुर्गा सप्तशती यंत्र के अंतिम आवरण की पूजा कैसे होती है?
नौवाँ आवरण — क्षेत्रपाल और दस दिक्पालों के आयुध
यह पूछे जाने पर कि श्री दुर्गा सप्तशती यंत्र के आवरण मंडल पूजन के अंतिम आवरण में बाकी आठ आवरणों की तरह करें, या केवल यंत्र पर चावल छोड़ें, या दोनों, वक्ता कहते हैं कि दो बातें हैं। पहली: अगर आप नौ आवरणों का पूजन कर रहे हैं, तो नौवें आवरण में, अंतिम आवरण में क्षेत्रपाल के आयुधों का पूजन होता है; और दस दिक्पालों के आयुधों का पूजन होता है।
राहुल शर्मा श्री दुर्गा सप्तशती यंत्र के आवरण मंडल पूजन के अंतिम आवरण के बारे में पूछते हैं: क्या इसे बाकी आठ आवरणों की तरह करना है, या केवल यंत्र पर चावल छोड़ने हैं, या दोनों। अब देखिए, वक्ता कहते हैं, यहाँ दो बातें हैं। पहली: अगर आप नौ आवरणों का पूजन कर रहे हैं, तो नौवें आवरण में, अंतिम आवरण में क्षेत्रपाल के आयुधों का पूजन होता है। और दस दिग्पाल के आयुधों का पूजन होता है।
अगर कोई दसवें आवरण में गया हो तो क्या किया जाता है?
कलश के पास पूजन, और कलश न हो तो क्या करें
और अगर उसके बाद आप दसवें आवरण में गए हैं, वक्ता कहते हैं, तो ऐंद्री शक्ति के द्वारा वे शक्तियाँ — दस दिक्पालों की मुख्य रूप से कुंडलिनी शक्ति से जुड़ी महाशक्तियाँ — अगर आप उनका पूजन कर रहे हैं, तो उसके लिए कहा गया है कि पूजन कलश के पास करना है। पर कलश हमेशा स्थापित नहीं होगा। तो आप वही चीज़ यंत्र पर ही जल और अक्षत से, या बाकी के लिए जो भी प्रयोग किया है उससे करेंगे।
और अगर उसके बाद आप दसवें आवरण में भी चले गए हैं, वक्ता कहते हैं, तो ऐंद्री शक्ति के द्वारा वे शक्तियाँ हैं — जिन्हें दस दिक्पालों की मुख्य रूप से कुण्डलिनी शक्ति से जुड़ी महाशक्तियाँ कहा जा सकता है। अगर आप उनका पूजन कर रहे हैं, तो उसके लिए लिखा है कि पूजन कलश के पास करना है। पर कलश हमेशा स्थापित नहीं होगा। तो आप यही चीज़ यंत्र पर ही, जल और अक्षत से, या बाकी के लिए जो भी आपने किया है उससे करेंगे। दूसरी बात, वे कहते हैं: अगर आप उन शक्तियों के स्तर तक भी पूजन कर रहे हैं, तब भी वह इसी तरह होगा। यह तब है जब आप दोनों आवरण शामिल कर रहे हैं; अगर आप वहाँ तक जा रहे हैं, तो यह ध्यान रखिए।
अगर कलश पूरे साल स्थापित रहता हो तो?
तब पूजन बताए अनुसार कलश के पास होता है
वक्ता कहते हैं: जैसे आपने बाकी सबके लिए किया है, वैसे यहाँ — नवरात्रि में, या अगर आप पूरे साल अपने पूजा स्थान पर कलश स्थापित रखते हैं, तो आपके लिए यह है कि उनका पूजन फिर कलश के पास ही होगा, जैसा बताया गया है।
जैसे आपने सबके लिए किया है, वैसे यहाँ, वक्ता कहते हैं। नवरात्रि में, या अगर आप पूरे साल अपने पूजा स्थान पर कलश स्थापित रखते हैं, तो आपके लिए यह उपलब्ध है कि उनका पूजन फिर कलश के पास ही होगा, जैसा बताया गया है।
सावन में पंचाक्षरी की कितनी माला करनी चाहिए?
पूरे महीने में सवा लाख पूरा करने के लिए रोज़ इकतालीस माला
एक श्रोता लिखती हैं कि वे रोज़ पाँच माला करती हैं। वक्ता कहते हैं कि कल से सावन शुरू हो रहा है, और पाँच माला में कोई आनंद नहीं — वह तो वे रोज़ करती ही हैं। अब करना यह है कि सावन में रोज़ कम से कम 41 माला हों; तभी पूरे सावन में आपका सवा लाख पूरा होगा।
मंजूषा नाम की एक श्रोता लिखती हैं कि महाराष्ट्र में कल से श्रावण शुरू हो रहा है और वे रोज़ पंचाक्षरी मंत्र की पाँच माला करती हैं। कल से सावन शुरू हो रहा है, वक्ता कहते हैं। पाँच माला में कोई आनंद नहीं आएगा — वह तो आप रोज़ करती ही हैं। अब करना यह है कि सावन में कम से कम रोज़ 41 माला हों। तभी पूरे सावन में आपका सवा लाख पूरा होगा।
सावन खत्म होने के बाद रोज़ की गिनती कितनी होनी चाहिए?
नित्य संध्या में पाँच नहीं, दस माला
वक्ता कहते हैं कि सावन खत्म होने के बाद पाँच माला पर मत चलिए, दस पर ले जाइए। क्योंकि नित्य गायत्री में, नित्य संध्या में, दस माला से कम करेंगे तो कोई आपको पूछेगा नहीं। आप शिवलोक पहुँच जाएँगे, वे कहते हैं, पर लोग आपको अनदेखा करेंगे; गण आपको नहीं पूछेंगे, पार्वती जी की सखियाँ आपको नहीं पूछेंगी। आप किनारे-किनारे घूमते रहेंगे यह सोचते हुए कि ये लोग हमें पूछ नहीं रहे, सबने हमें अनदेखा कर दिया। और वहाँ आप जप नहीं कर सकते, तो फिर से जन्म लेना पड़ेगा। इसलिए दस माला कीजिए।
और सावन खत्म होने के बाद पाँच माला नहीं, दस माला लेकर आगे चलिए, वक्ता कहते हैं, क्योंकि नित्य गायत्री मंत्र में, नित्य संध्या में, दस माला से कम करेंगे तो कोई आपको पूछेगा नहीं। आप शिवलोक पहुँच जाएँगे, वे कहते हैं, पर भाई, लोग आपको अनदेखा करेंगे। गण आपको नहीं पूछेंगे; पार्वती जी की सखियाँ आपको नहीं पूछेंगी। आप किनारे-किनारे घूमते रहेंगे, और आपको लगेगा कि ये लोग हमें पूछ नहीं रहे, सबने हमें अनदेखा कर दिया। और वहाँ आप जप नहीं कर सकते, तो फिर से जन्म लेना पड़ेगा। इसलिए दस माला कीजिए — दस माला से कम में उसके बाद कोई आनंद नहीं।
अमावस्या पर पितरों के लिए क्या करना चाहिए?
हर अमावस्या पर पितरों के लिए पंचबलि
एक श्रोता एक सपना बताते हैं — कच्ची रसोई में किन्नर को खाना बनाते देखना, फिर उसे खिलाने रसोई में जाना और दूध, चीनी, मक्खन, लस्सी और आटा बिखरा पाना — और बताते हैं कि आज अमावस्या थी। वक्ता उत्तर देते हैं: भाई, पितरों के लिए कीजिए। अमावस्या के दिन पितरों के निमित्त हर एक व्यक्ति को पंचबलि करनी चाहिए।
एक श्रोता एक सपने के बारे में लिखते हैं जिसमें उन्होंने कच्ची रसोई में किन्नर को खाना बनाते देखा; फिर उसे खिलाने रसोई में गए तो दूध, चीनी, मक्खन, लस्सी और आटा बिखरा देखा। वे जोड़ते हैं कि आज अमावस्या थी। भाई, वक्ता उत्तर देते हैं, पितृ के निमित्त कीजिए। अमावस्या के दिन पितरों के निमित्त हर एक व्यक्ति को पंचबलि ज़रूर करनी चाहिए।
क्या निखा लक्ष्मी का कोई छोटा नाम स्तोत्र है?
दशांश कवच का ही होना चाहिए
यह पूछे जाने पर कि क्या माता निखा लक्ष्मी का द्वादश या षोडश जैसा कोई छोटा नाम स्तोत्र है, वक्ता कहते हैं कि दशांश कवच का ही करना चाहिए, और वे उसे ग्रुप में डाल देंगे।
क्या पितरों के लिए बिल्व वृक्ष के नीचे दत्तात्रेय तर्पण किया जा सकता है?
पहले सवा महीना गीता पाठ
एक श्रोता बताते हैं कि वे बताए अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का पाठ कर रहे हैं, और पूछते हैं कि क्या वे बिल्व वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान दत्तात्रेय की अष्टोत्तर नामावली से पितरों के लिए तर्पण विधि कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं: अगर आपने कम से कम सवा महीना श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ कर लिया है, तो भगवान दत्तात्रेय का तर्पण वाला विधान शुरू कीजिए।
एक श्रोता बताते हैं कि वे बताए अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का पाठ कर रहे हैं, और पूछते हैं कि क्या वे बिल्व वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान दत्तात्रेय की अष्टोत्तर नामावली से पितृ के लिए तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। विधि कर सकते हैं। अगर आपने कम से कम सवा महीना श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ कर लिया है, वक्ता उत्तर देते हैं, तो भगवान दत्तात्रेय का तर्पण वाला विधान शुरू कीजिए।
सोमवार वाली चतुर्थी पर गणपति और शिव के लिए एक अधिक विशेष अनुष्ठान तैयार किया जा रहा है
गणपति और शिव के लिए विशेष अनुष्ठान, और एक बचा हुआ सोमवार
वक्ता कहते हैं कि इस बार एक साथ पड़ रहे चतुर्थी और सोमवार के लिए उनकी ओर से भगवान गणपति जी और भगवान शिव जी के लिए कुछ अधिक विशेष तैयारी होगी, क्योंकि उसके बाद केवल एक ही सोमवार और मिलेगा।
इस बार एक साथ पड़ रहे चतुर्थी और सोमवार के लिए, वक्ता कहते हैं, उनकी ओर से कुछ अधिक विशेष तैयारी होगी, भगवान गणपति जी और भगवान शिव जी के लिए। क्योंकि उसके बाद केवल एक ही सोमवार और मिलेगा। उस दिन, वे कहते हैं, कुछ अधिक विशेष और बड़ी तैयारी की जा रही है।
चंडी कवच वराह पुराण का है या मार्कण्डेय पुराण का?
यह दोनों में है, और इसे हरिहर-रचित भी कहा जाता है
यह पूछे जाने पर कि चंडी कवच वराह पुराण का है या मार्कण्डेय पुराण का, वक्ता कहते हैं कि कहीं-कहीं इसे हरिहर-रचित बताया गया है — और भाई, यह दोनों में है।
चंडी कवच वराह पुराण का है या मार्कण्डेय पुराण का, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि कहीं-कहीं इसे हरिहर-रचित कहा गया है। भाई, यह दोनों में है, वे कहते हैं।
नौकरी पाने का क्या उपाय है?
ईशान शिव विधान और भगवान सूर्यनारायण
नौकरी पाने का उपाय पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि नौकरी पाने के लिए ईशान शिव साधना का पूरा विधान है। भगवान सूर्यनारायण वाला भी है। और वे कहते हैं कि वे आगे देखकर इससे जुड़े और विषय डालेंगे।
एक श्रोता नौकरी पाने का उपाय पूछते हैं, कहते हैं कि इसकी बहुत ज़रूरत है। नौकरी पाने के लिए ईशान शिव साधना का पूरा विधान है, वक्ता कहते हैं। भगवान सूर्यनारायण वाला भी है। और हम आगे देखकर इससे जुड़े और विषय डालेंगे, वे जोड़ते हैं।
क्या पंचाक्षरी के बाद छिन्नमस्तिका के लिए अलग दीक्षा चाहिए?
शाक्त दीक्षा पंचाक्षरी दीक्षा से अलग है
यह पूछे जाने पर कि पंचाक्षरी मंत्र दीक्षा लेने के बाद क्या छिन्नमस्तिका मंत्र अलग से लेना पड़ेगा, वक्ता कहते हैं हाँ — माई की दीक्षा फिर बिल्कुल अलग होगी। पंचाक्षरी की दीक्षा हो गई हो तब भी, अगर भगवती छिन्नमस्तिका की है तो शाक्त दीक्षा लेनी होगी, और फिर उनका पूरा विधि-विधान अलग होगा।
यह पूछे जाने पर कि पंचाक्षरी मंत्र की दीक्षा लेने के बाद क्या छिन्नमस्तिका मंत्र अलग से लेना पड़ेगा, हाँ, वक्ता कहते हैं: माई की दीक्षा फिर से अलग होगी। पंचाक्षरी की दीक्षा हो गई हो तब भी, अगर भगवती छिन्नमस्तिका की है तो आपको शाक्त दीक्षा लेनी होगी, और फिर उनका पूरा विधि-विधान अलग रहेगा।
अगर कुलदेवी का पता न हो तो विंध्यवासिनी का विग्रह कैसे स्थापित करें?
सिंह पर सवार ठोस अष्टभुजा विग्रह, जिसमें सिंह का मुख बंद हो
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्हें अपनी कुलदेवी का पता नहीं है और वे माँ विंध्यवासिनी को अपनी कुलदेवी मानने लगे हैं, और पूछते हैं कि माँ के यहाँ से उनकी प्रतिमा लाकर घर में कैसे स्थापित करें। वक्ता कहते हैं कि सामान्यतः आप भगवती के रूप में भगवती का ऐसा श्री विग्रह स्थापित कर सकते हैं जो अष्टभुजा हो, ठोस हो, सिंह पर सवार हो, और जिसमें सिंह का मुख बंद हो — ऐसी सौम्य प्रतिमा — अगर आप हृदय में ऐसा भाव रखते हैं।
पंकज नाम के एक श्रोता लिखते हैं कि उन्हें अपनी कुलदेवी का पता नहीं है, कि वे माँ विंध्यवासिनी को अपनी कुलदेवी मानने लगे हैं, और पूछते हैं कि माँ के यहाँ से उनकी प्रतिमा किस प्रकार लाकर घर में स्थापित करें। तो सामान्यतः, वक्ता कहते हैं, भगवती का ऐसा श्री विग्रह जो अष्टभुजा हो, ठोस हो, सिंह पर सवार हो, और जिसमें सिंह का मुख बंद हो — ऐसी सौम्य प्रतिमा — आप चाहें तो भगवती के रूप में स्थापित कर सकते हैं, अगर आप हृदय में ऐसा भाव रखते हैं।
विग्रह को क्षेत्र से ही कैसे लाना चाहिए?
लाने से पहले स्नान और माई का पूरा पूजन
अगर आप उसे वहाँ ले जाकर, पूजन कराकर लाना चाहते हैं, वक्ता कहते हैं, तो उसे स्नान कराकर, माई का पूरा पूजन अच्छे से कराकर, उनके पास से ला सकते हैं।
और अगर वहाँ ले जाकर, पूजन करके लाने की इच्छा है, वक्ता कहते हैं, तो उसे स्नान कराकर और माई का पूरा पूजन अच्छे से कराकर, आप उनके पास से ला सकते हैं।
शक्तिपीठ पर जप का समर्पण कैसे करें?
मुख्य विग्रह के सामने जाना संभव न हो तो मानसिक समर्पण
यह पूछे जाने पर कि रोज़ जप करते समय जप का समर्पण मुख्य विग्रह के सामने जाकर करें या बिना जाए मानसिक रूप से, वक्ता कहते हैं कि हर शक्तिपीठ पर हर बार जाना संभव नहीं। बहुत भीड़ होती है, लाइन में लगना पड़ता है — तो इतना समर्पण करने आप कैसे जाएँगे? इसलिए मानसिक रूप से कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि शक्ति पीठ पर जप का समर्पण कैसे करें — मुख्य विग्रह के सामने जाकर, या बिना जाए मानसिक समर्पण — जब रोज़ जप हो रहा हो, देखिए, वक्ता कहते हैं: हर शक्तिपीठ पर हर बार जाना संभव नहीं है। बहुत भीड़ होती है; लाइन में लगना पड़ता है। तो इतना समर्पण करने आप कैसे जाएँगे? इसलिए इसे मानसिक रूप से कीजिए।
अंतिम दिन एक बार जाइए और शिखर के दर्शन करते हुए समर्पण कीजिए
अंतिम दिन एक बार जाना, और शिखर देखकर समर्पण करना
अंतिम दिन, जब जप आदि की पूर्णाहुति होती है — अगर आप हवन कर रहे हैं, या जो भी कर रहे हैं — तो समर्पण के बाद, समर्पण के लिए, चाहें तो एक बार ज़रूर जाइए। शिखर को देखकर समर्पण कीजिए। जैसे कामाख्या जी में, वक्ता कहते हैं, वहीं अपने आसन से शिखर दिखाई देगा; वहीं समर्पण कीजिए।
कारिक जी महाराज और मिथिलांचल के उनसे जुड़े देवता: वक्ता उनके स्वरूपों पर कम क्यों बोलते हैं
लगभग एक जैसे स्वरूपों की सीमित जानकारी, और एक मंदिर के अपने पुजारी से ली गई सामग्री
एक श्रोता, तुषार, के कारिक जी महाराज और मिथिलांचल क्षेत्र में उनके साथ पूजे जाने वाले देवताओं के बारे में पूछने पर वक्ता कहते हैं कि अभी इस पर ज़्यादा कहना उनके लिए संभव नहीं — उनके स्वरूपों के बारे में उनकी जानकारी बहुत सीमित है, क्योंकि उनका पूरा विषय, साथ के दो और स्वरूपों के साथ, लगभग एक जैसा निकलता है। जब तक वे इसे लिखकर अलग-अलग न करें और तभी बोलें, तब तक नहीं होगा। वह पूरा विषय मिथिलांचल क्षेत्र का है और उनके अपने से अलग है; उन्होंने वह वीडियो किसी ऐसे व्यक्ति से सुनकर और समझकर बनाया जो उनके विशेष पुजारी रहे थे, और उन्हीं के आदेश पर, जिन्होंने कहा कि यह जानकारी लोगों के पास नहीं है, इसे डालो। वह वीडियो, वे कहते हैं, उन्होंने दो-तीन साल पहले डाला था।
एक श्रोता, तुषार, के कारिक जी महाराज और मिथिलांचल क्षेत्र में उनके साथ पूजे जाने वाले देवताओं के बारे में पूछने पर वक्ता कहते हैं कि अभी इतना बताना भी उनके लिए संभव नहीं है। उनके स्वरूपों के बारे में उनकी जानकारी बहुत सीमित है, क्योंकि उनका पूरा विषय — साथ के दो और स्वरूपों के साथ — लगभग एक जैसा ही निकलता है। कारिक जी महाराज और इन सभी का, वे कहते हैं। तो जब तक हम इसे लिखकर एक-दूसरे से अलग न करें और तभी बोलें, तब तक नहीं होगा। क्योंकि यह पूरा विषय मिथिलांचल क्षेत्र का है और उनके अपने से अलग है। उन्होंने वह वीडियो किसी और से सुनकर और समझकर बनाया था — उनसे जो उनके विशेष पुजारी रहे थे। और उन्हीं के आदेश पर: उन्होंने कहा कि यह जानकारी लोगों के पास नहीं है, आप इसे डालिए। तब उन्होंने वह वीडियो डाला था, दो-तीन साल पहले।
क्या रक्षा के लिए छिन्नमस्तिका कवच का 1100 पाठ करना चाहिए?
जिसका अधिकार है वही कीजिए
एक श्रोता शरीर की रक्षा के लिए छिन्नमस्तिका कवच के 1100 पाठ के बारे में पूछती हैं, जो केवल ग्यारह दिन घर से बाहर जा पाती हैं। वक्ता कहते हैं कि अगर आप माँ छिन्नमस्तिका का कवच करती हैं तो विषय बिल्कुल अलग हो जाता है। वही कीजिए जिसका आपको अधिकार है।
साधक बार-बार उसी स्वरूप की ओर क्यों खिंचते हैं जो चलन में हो?
आकर्षण उसी स्वरूप की ओर जाता है जिसके बारे में सुना जाए
वक्ता कहते हैं कि हर स्वरूप में आकर्षण है: भगवती के जिस स्वरूप के बारे में आप जानेंगे, उसकी ओर आकर्षण बढ़ेगा। एक समय लोग भगवती पीताम्बरा की ओर खिंचते थे, और अब भी खिंचते हैं; पर अब, वे कहते हैं, जिनका पॉडकास्ट वायरल हुआ है वे भगवती तारा के साधक हैं, इसलिए लोग अब तारा माई की ओर खिंच रहे हैं। आपके भीतर की यह चीज़, वे कहते हैं, कम से कम सीमित रखिए। अपने आराध्य के प्रति समर्पित रहिए।
हर स्वरूप में आकर्षण है, वक्ता कहते हैं। भगवती के जिस स्वरूप के बारे में आप जानेंगे, उनकी ओर आकर्षण बढ़ेगा। एक समय लोग भगवती पीताम्बरा की ओर आकर्षित थे, और अब भी हैं। पर अब, वे कहते हैं, देखिए — जिनका पॉडकास्ट वायरल हुआ है वे भगवती तारा के साधक हैं। तो अब लोग तारा माई की ओर आकर्षित हो रहे हैं। आपके भीतर जो यह चीज़ है, इसे कम से कम सीमित रखिए। अपने आराध्य के प्रति समर्पित रहिए। इसी कारण, वे कहते हैं, वे आपसे कभी नहीं कहते कि इस या उस स्वरूप की ओर आकर्षित हो जाइए।
भगवती का मूल रूप क्या है?
विंध्याचल की भगवती मूल, पार्वती का स्वरूप
वक्ता कहते हैं कि विंध्याचल में जो भगवती विराजमान हैं वे मूल रूप हैं। उनकी आरती देखिए, उसमें वही हैं जो वे सारे रूप धारण करती हैं — वे हर जगह पूजी जाएँगी। मूल पार्वती जी का स्वरूप है, इसलिए आप उन्हें किसी भी जगह, किसी भी स्थान पर, किसी भी रूप में पूज सकते हैं। फिर भी, वे कहते हैं, वे कभी नहीं कहते कि वे हमारी आराध्य हैं तो आप भी उन्हीं की कीजिए। भगवती कामाख्या भी मूल रूप हैं; कोई भी उन्हें कहीं भी पूज सकता है; पर फिर भी वे नहीं कह सकते कि नहीं, आप भी उन्हीं को पूजिए — जिन्हें आप शुरू से पूजते आए हैं, उन्हीं को पूजिए।
विंध्याचल में जो भगवती विराजमान हैं, वे मूल रूप हैं, वक्ता कहते हैं। अगर आप उनकी आरती देखें, तो उसमें वे वही हैं जो वे सारे रूप धारण करती हैं। वे हर जगह पूजी जाएँगी। मूल पार्वती जी का स्वरूप है, इसलिए आप उन्हें किसी भी जगह, किसी भी स्थान पर, किसी भी रूप में पूज सकते हैं। फिर भी, वे कहते हैं, हम कभी नहीं कहते कि वे हमारी आराध्य हैं, इसलिए आप भी उन्हीं की कीजिए। भगवती कामाख्या मूल रूप हैं। वे हर जगह पूजी जा सकती हैं; कोई भी उन्हें पूज सकता है। पर फिर भी हम नहीं कह सकते कि नहीं, आप भी उन्हीं को पूजिए। जिन्हें आप शुरू से पूजते आए हैं, उन्हीं को पूजिए।
इन क्षेत्रों में तपोबल बढ़ाइए और देवता बदलने की जगह अपने ही देवता को सशक्त कीजिए
तपोबल बढ़ाइए और अपने देवता को सशक्त कीजिए
इन क्षेत्रों में जाकर, वक्ता कहते हैं, अपना तपोबल बढ़ाइए। इन क्षेत्रों में जाकर, तीर्थ यात्रा करके, जप-तप करके, परिक्रमा करके, स्नान करके, दान देकर, मंत्रों का अच्छा पुरश्चरण करके — अपना सामर्थ्य बढ़ाइए और अपने देवता को सशक्त कीजिए। बार-बार देवता मत बदलिए।
इन क्षेत्रों में जाकर अपना तपोबल बढ़ाइए, वक्ता कहते हैं। इन क्षेत्रों में जाकर, तीर्थ यात्रा करके, जप-तप करके, परिक्रमा करके, स्नान करके, दान आदि देकर, मंत्रों का अच्छा पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करके — अपना सामर्थ्य बढ़ाइए और अपने देवता को सशक्त कीजिए। बार-बार अपना देवता मत बदलिए। स्वरूपों के प्रति आकर्षण मत जगने दीजिए; दूसरे स्वरूप में भी अपने ही देवता का स्वरूप देखिए।
भगवती के अलग-अलग स्वरूप आपस में कैसे जुड़े हैं?
पार्वती मूल हैं, जो काली, तारा और छिन्नमस्तिका बनती हैं
वक्ता कहते हैं कि वे सब एक हैं; अलग नहीं हैं। माँ पार्वती ही मूल रूप में हैं: वही काली बनती हैं, वही भगवती तारा बनती हैं। समय के अनुसार वे वही रूप धारण करती हैं। वही जया और विजया के साथ भगवती छिन्नमस्तिका बनती हैं, जहाँ जया और विजया डाकिनी और शाकिनी बनती हैं — वहाँ वे भगवती छिन्नमस्तिका बनती हैं।
सब एक ही हैं न, वक्ता कहते हैं। वे बिल्कुल अलग नहीं हैं। माँ पार्वती ही मूल रूप में हैं; वही काली बनती हैं, वही भगवती तारा बनती हैं। समय के अनुसार वे वही रूप धारण करती हैं। वही जया और विजया के साथ भगवती छिन्नमस्तिका बनती हैं — वहाँ जया और विजया डाकिनी और शाकिनी बनती हैं। और वहाँ वे भगवती छिन्नमस्तिका बनती हैं।
दूसरे स्वरूपों के वर्णन कैसे सुनने चाहिए?
उन्हें व्यापक रूप से सुनिए और अपने इष्ट के मूल रूप पर लौटिए
यह विषय अपने भीतर लाइए, वक्ता कहते हैं, तब आपका आकर्षण अपने इष्ट पर, अपने आराध्य पर रहेगा, और आप बार-बार डगमगाएँगे नहीं — आज इस रूप पर, कल जो वायरल हो उस पर। स्वरूपों के जो भी वर्णन सुनें, व्यापक रूप से सुनिए, और अपने इष्ट के मूल रूप की ओर लौटिए, यह कहते-सोचते और इस समर्पण के साथ कि हमारे आराध्य में इतना सामर्थ्य है कि वे यह रूप धारण करके ऐसा-ऐसा कर सकते हैं।
यह विषय अपने भीतर लाइए, वक्ता कहते हैं, तब आपका आकर्षण अपने इष्ट पर, अपने आराध्य पर रहेगा, और आप बार-बार डगमगाएँगे नहीं। कि आज इस रूप पर है, और कल जो वायरल हो गया, उसके रूप पर। स्वरूपों के जो भी वर्णन आप सुनें, व्यापक रूप से सुनिए — और अपने इष्ट देवता के मूल रूप पर लौटिए। यह कहते हुए, यह सोचते हुए, इस समर्पण के साथ: कि हमारे आराध्य में इतना सामर्थ्य है कि वे यह रूप धारण करके ऐसा-ऐसा कर सकते हैं; उनका ऐसा सामर्थ्य है। इस विषय को समझिए, वे कहते हैं।
कामाख्या क्षेत्र में पीठ किस क्रम में हैं?
ऊपर कामाख्या, बीच में धूमावती, नीचे भैरवी
भगवती त्रिपुर भैरवी का उदाहरण लेते हुए वक्ता कहते हैं कि जब आप कामाख्या जी के क्षेत्र में जाते हैं, तो भगवती त्रिपुर भैरवी का स्थान नीचे की ओर है। माँ कामाख्या ऊपर हैं, माँ भैरवी नीचे हैं, और बीच में भगवती धूमावती हैं। अब भैरवी नीचे क्यों हैं, उस स्थान का रहस्य क्या है, और कक्षप कुंड वहाँ क्यों है?
अब अगर भगवती त्रिपुर भैरवी का विषय आपके सामने कभी नहीं रखा गया, वक्ता कहते हैं: जब आप कामाख्या जी के क्षेत्र में जाते हैं, तो भगवती त्रिपुर भैरवी का स्थान नीचे की ओर है। ऊपर माँ कामाख्या हैं, माँ भैरवी नीचे हैं, और बीच में भगवती धूमावती हैं। अब भैरवी नीचे क्यों हैं? उस स्थान का रहस्य क्या है? कक्षप कुंड वहाँ क्यों है?
रजस उद्बोधन सुनने वालों को सुनी हुई बात के पीछे दौड़ाता है
रजस उद्बोधन सुनने वालों को सुनी बात के पीछे दौड़ाता है
वक्ता कहते हैं कि अगर उसका पूरा तंत्रात्मक विषय चर्चा में लाया जाए, और सौ लोग उसे ध्यान से सुनें, तो वे सौ लोग सबसे पहले उस दिशा में दौड़ पड़ेंगे। क्योंकि रजस उद्बोधन होता है: लोग किसी चीज़ के बारे में बहुत सुनकर और जानकर वहाँ दौड़ने लगते हैं कि वहीं जाना है। वे कहते हैं, ऐसे नहीं दौड़ना चाहिए।
और उसका पूरा तंत्रात्मक विषय — अगर उसकी चर्चा की जाए, और अगर सौ लोग उसे ध्यान से सुनें, तो वे सौ लोग सबसे पहले उस दिशा में दौड़ पड़ेंगे, वक्ता कहते हैं। क्योंकि रजस उद्बोधन होता है। लोग जब किसी चीज़ के बारे में बहुत सुनते और जान लेते हैं, तो उस दिशा में दौड़ने लगते हैं कि वहीं जाना है। तो ऐसे नहीं दौड़ना चाहिए, वे कहते हैं।
कामाख्या में सबसे ऊँचा पीठ कौन-सा है?
भुवनेश्वरी का पीठ, जो वहाँ कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है
वक्ता कहते हैं कि वहाँ सबसे ऊँचा पीठ भगवती भुवनेश्वरी का है। अगर आपको लगता है कि वहाँ भगवती कामाख्या कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं, तो यह जानकर आश्चर्य होगा कि अधिकतर वहाँ भगवती भुवनेश्वरी का पीठ ही कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। हर स्थान का एक रहस्य है, वे कहते हैं।
वहाँ सबसे ऊँचा पीठ भगवती भुवनेश्वरी का है, वक्ता कहते हैं। वहाँ के कुल देवता के विषय में अगर आपको लगे कि भगवती कामाख्या ही कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं — तो यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्रमुख रूप से वहाँ भगवती भुवनेश्वरी का पीठ ही कुलदेवी के रूप में पूजा जाता रहा है। हर स्थान का एक रहस्य है, वे कहते हैं।
क्या देवी का एक स्वरूप दूसरे से अधिक शक्तिशाली है?
हर शक्ति सर्वसमर्थ है
इस चक्कर में मत पड़िए, वक्ता कहते हैं, कि यह स्वरूप अधिक उग्र है, इसमें अधिक सामर्थ्य है। भाई, सामर्थ्य सबमें है। ऐसी कोई शक्ति है ही नहीं जो सक्षम न हो। हर शक्ति अपने आप में सर्वसमर्थ और सर्वसामर्थ्य से युक्त है।
ठीक है, वक्ता कहते हैं, तो इस चक्कर में, इस विषय में मत पड़िए कि यह स्वरूप अधिक उग्र है, इनमें अधिक सामर्थ्य है। भाई, सामर्थ्य सबमें है। ऐसी कोई शक्ति है ही नहीं जो सक्षम न हो। हर शक्ति अपने आप में सर्वसमर्थ और सर्वसामर्थ्य से युक्त है।
साधक को अंततः किस स्वरूप तक ले जाया जाता है, यह क्या तय करता है?
पिछले जन्म की अधूरी उपासना का ऋण
वक्ता कहते हैं कि जिस स्वरूप का आप पर ऋण है, वे आपको उसी के लिए वहाँ ले जाएँगे। अगर पिछले जन्म में आपने भगवती सरस्वती की उपासना की और वह किसी कारण बीच में अधूरी रह गई, तो इस जन्म में आप चाहे जिस देवता की साधना करें, समय आने पर जब आप पूरी तरह और ठीक से अपने स्तर पर पहुँचेंगे, तो इस जन्म के आपके आराध्य आपको वहाँ ले जाकर वह साधना पूरी कराएँगे। वे कोई ऋण बाकी नहीं छोड़ेंगे।
जिस स्वरूप का आप पर ऋण है, वक्ता कहते हैं, वे आपको उसी स्वरूप के लिए वहाँ ले जाएँगे। अगर पिछले जन्म में आपने भगवती सरस्वती की उपासना की थी, और बीच में किसी कारण वह अधूरी रह गई, तो इस जन्म में आप चाहे जिस देवता की साधना करें, समय आने पर, जब आप पूरी तरह और ठीक से अपने स्तर पर पहुँचेंगे, तब इस जन्म में आपके जो भी आराध्य हैं वे आपको वहाँ ले जाकर वह साधना पूरी कराएँगे। वे कोई ऋण बाकी नहीं रखेंगे, वे कहते हैं।
कथाओं में इंद्र पहले ब्रह्मा, फिर विष्णु, फिर शिव के पास क्यों जाते हैं?
देवताओं में एक व्यवस्था, सामर्थ्य की कमी नहीं
वक्ता पूछते हैं कि जब देवराज इंद्र पर विपत्ति आती है, तो वे ब्रह्मा जी के पास क्यों जाते हैं, यह जानते हुए भी कि वरदान ब्रह्मा जी ने ही दिया था — वे सीधे विष्णु जी या सीधे शिव जी के पास क्यों नहीं जाते? क्योंकि वहाँ एक व्यवस्था बनाई गई है। हर कथा में: ब्रह्मा जी के पास गए, विष्णु जी के पास गए, विष्णु जी ने कहा यह यहाँ नहीं होगा, शिव जी के पास चलो, और फिर वहाँ पहुँचे। और कई बार ऐसा हुआ कि शिव जी के पास गए और शिव जी विष्णु जी के पास गए। क्या इन तीनों देवताओं में सामर्थ्य की कमी है?
जब देवराज इंद्र पर विपत्ति आती है, वक्ता कहते हैं, तो वे ब्रह्मा जी के पास जाते हैं। भले ही वे जानते हों कि वरदान ब्रह्मा जी ने ही दिया है, वे ब्रह्मा जी के पास गए बिना, सीधे विष्णु जी के पास, सीधे शिव जी के पास ही जा सकते थे — पर ऐसा क्यों नहीं करते? वहाँ एक व्यवस्था बनाई गई है। हर कथा देखिए: ब्रह्मा जी के पास गए, विष्णु जी के पास गए, विष्णु जी ने कहा यह यहाँ नहीं होगा, शिव जी के पास चलो, और फिर वहाँ पहुँचे। और कई बार ऐसा हुआ कि शिव जी के पास गए, और शिव जी विष्णु जी के पास गए। क्या इन तीनों देवताओं में कोई सामर्थ्य की कमी है, वे पूछते हैं।
त्रिगुण आरती तीनों देवताओं के बारे में क्या दिखाती है?
ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव एक, अपनी बनाई सीमाओं के साथ
श्रावण चल रहा है और आप रोज़ आरती करेंगे, इसलिए वक्ता त्रिगुण स्वामी जी की आरती की ओर इशारा करते हैं — जो कोई नर गावे, ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, तीनों एक रूप धारण किए हुए। वे कहते हैं कि किसी पंथ या संप्रदाय में त्रिगुण स्वरूप की कोई आरती नहीं होती, पर अभी श्रावण में हर शिव भक्त इसे कर रहा है। तो तीनों एक हैं, अलग-अलग प्रणव अक्षरों के बीच — तीनों एक हैं। सामर्थ्य सबमें है, पर उन्होंने एक सीमा बनाई है: यह इनका है, ऐसी योजना बनी है, यह लीला इनके हाथों होनी है।
अब श्रावण चल रहा है, वक्ता कहते हैं, तो आप रोज़ आरती करेंगे। त्रिगुण स्वामी जी की आरती — जो कोई नर गावे, ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, तीनों एक रूप धारण किए हुए, अर्धांगी धारण किए हुए। और किसी पंथ या संप्रदाय में त्रिगुण स्वरूप की कोई आरती नहीं होती, वे कहते हैं, पर अभी श्रावण में हर शिव भक्त इसे कर रहा है। तो तीनों, अलग-अलग प्रणव अक्षरों के बीच — ये तीनों एक हैं, तीनों एक हैं। सामर्थ्य तो सबमें है। पर उन्होंने एक सीमा बनाई है: कि हाँ, यह इनका है; ऐसी योजना बनी है; यह लीला होनी है, तो इनके हाथों होगी।
वेदवती के साथ कुकर्म के बाद नियति बचाने के लिए विष्णु शिव और रावण के बीच प्रकट हुए
नियति बचाने के लिए विष्णु का शिव और रावण के बीच प्रकट होना
वक्ता कहते हैं कि रावण वध के प्रसंग में एक बहुत अच्छा विषय दिखाया गया: जब उसने वेदवती के साथ गलत कार्य किया, उसी समय शिव जी त्रिशूल लेकर उसे मारने उठे, और उसी क्षण उसका विनाश हो सकता था। पर विष्णु जी स्वयं साक्षात प्रकट हुए और उसकी रक्षा की — विष्णु जी दोनों के बीच, रावण और शिव जी के बीच आ गए, यह कहते हुए कि नहीं महादेव, आप ऐसा नहीं कर सकते। नियति तय है कि इसका वध कैसे होगा; अगर आप अभी इसे मारेंगे तो असंतुलन पैदा होगा। उन्होंने ऐसा नहीं होने दिया।
रावण वध के प्रसंग में एक बहुत अच्छा विषय दिखाया गया था, वक्ता कहते हैं: जब उसने वेदवती के साथ गलत कार्य किया, उसी क्षण शिव जी त्रिशूल लेकर उसे मारने उठे। उसी क्षण उसका विनाश हो सकता था। पर विष्णु जी स्वयं, साक्षात प्रकट हुए और उसकी रक्षा की। विष्णु जी दोनों के बीच, रावण और शिव जी के बीच आ गए, यह कहते हुए कि नहीं महादेव, आप ऐसा नहीं कर सकते। नियति तय करके रखी गई है कि इसका वध कैसे होगा। अगर आप अभी इसे मारेंगे, तो असंतुलन पैदा होगा। उन्होंने ऐसा नहीं होने दिया।
यमराज और उनके काल दंड के बारे में क्या कहा गया है?
यमदेव स्वयं काल, और कालरात्रि उनकी आराध्य
वक्ता यमराज के काल दंड की, यमदेव के काल दंड की बात करते हैं। वे काल देव हैं। उन्हें सर्वसमर्थ बनाया गया है, उन्हें यह दिया गया है, और हर एक की अपनी ज़िम्मेदारी है। उनकी इष्ट आराध्य शक्ति भगवती कालरात्रि हैं। तो भगवती का वह रूप, और उन्हें जो सामर्थ्य दिए गए हैं — क्यों दिए गए हैं? वे स्वयं काल हैं; उनसे आगे कौन जा सकता है?
यमराज के पास जो काल दंड है, वक्ता कहते हैं — यमदेव का काल दंड। वे काल देव हैं। उन्हें सर्वसमर्थ बनाया गया है; उन्हें यह दिया गया है; हर एक की अपनी ज़िम्मेदारी है। उनकी इष्ट आराध्य शक्ति भगवती कालरात्रि हैं। तो भगवती का वह रूप, और उन्हें जो सामर्थ्य दिए गए हैं — क्यों दिए गए हैं? वे स्वयं काल हैं। उनसे आगे कौन जा सकता है?
मार्कण्डेय मुनि की लीला क्यों रची गई?
पूरी सृष्टि के सामने महामृत्युंजय मंत्र को फलदायी दिखाने के लिए
पर एक लीला करनी थी, वक्ता कहते हैं — कि यहाँ काल से आगे भी महाकाल हैं। महामृत्युंजय मंत्र को सृष्टि में सबके सामने सक्षम और फलदायी दिखाना था। तब मार्कण्डेय मुनि की लीला रची गई।
पर एक लीला करनी थी, वक्ता कहते हैं: कि यहाँ काल से आगे भी महाकाल हैं। महामृत्युंजय मंत्र को सृष्टि में सबके सामने सक्षम, फलदायी दिखाना था। तब मार्कण्डेय मुनि की लीला रची गई।
यमराज के नियम तोड़े बिना मार्कण्डेय अमर कैसे बनाए गए?
काल की गति रोक दी गई ताकि उनकी आयु कभी पूरी न हो
वक्ता कहते हैं कि यह जानना चाहिए कि जब भगवान मार्कण्डेय मुनि की रक्षा के लिए उस रूप में प्रकट हुए और उन्हें सदा के लिए अजर-अमर कर दिया — सात चिरंजीवियों में मार्कण्डेय मुनि चिरंजीवी बने — तब भी उन्होंने भगवान यमराज की नीति-नियम, और उनकी ज़िम्मेदारी का उल्लंघन नहीं किया। उन्होंने काल की गति रोक दी: मार्कण्डेय मुनि की आयु पूरी ही नहीं होने दी। मार्कण्डेय मुनि के लिए, वे कहते हैं, यह जो आपकी टाइम-डाइलेशन थ्योरी कहलाती है — वह थ्योरी ही वहाँ खत्म कर दी गई, ताकि उनकी आयु कभी पूरी न हो सके, और वे हमेशा एक क्षण पीछे रहेंगे। उनके सात साल कभी पूरे नहीं होंगे; और जब पूरे ही नहीं होंगे, तो यमराज उनके प्राण कैसे ले जाएँगे?
पर आपको जानना चाहिए, वक्ता कहते हैं, कि जिस रूप में भगवान मार्कण्डेय मुनि की रक्षा के लिए प्रकट हुए, और उन्हें सदा के लिए अजर-अमर कर दिया — ताकि सात चिरंजीवियों में मार्कण्डेय मुनि चिरंजीवी बने — वहाँ एक विषय देखिए: उन्होंने ऐसा इस तरह नहीं किया कि भगवान यमराज की नीति-नियम, या उनकी जो ज़िम्मेदारी है, उसका उल्लंघन हो। उन्होंने उसे रद्द नहीं किया। उन्होंने काल की गति रोक दी। मार्कण्डेय मुनि की आयु उन्होंने पूरी ही नहीं होने दी। उन्होंने कहा कि मार्कण्डेय मुनि के लिए, यह जो आपकी टाइम-डाइलेशन थ्योरी है — वह थ्योरी ही वहाँ खत्म कर दी गई, ताकि उनकी आयु कभी पूरी न हो सके, और उस बिंदु तक वे हमेशा एक क्षण पीछे रहेंगे। न उनके सात साल पूरे होंगे; और जब सात साल कभी पूरे ही नहीं होंगे, तो यमराज उनके प्राण कैसे ले जाएँगे? वहीं रोक दिया गया। मार्कण्डेय मुनि के लिए काल की गति रोक दी गई। उनके लिए वह चीज़ रुकी हुई है।
सोशल मीडिया राहु है, और हर देवता अपने नियम से चलता है
सोशल मीडिया को राहु कहा जाता है
वक्ता कहते हैं कि हर देवता अपने नियम के अनुसार चलता है। यह विषय समझिए, और फिर यह जो पूरी बात आती है — कि अभी छिन्नमस्तिका, अभी भगवती तारा, अभी त्रिपुर भैरवी। सोशल मीडिया का क्षेत्र, वे कहते हैं, भाई, राहु कहलाता है। इतना सब जानते होंगे। और निन्यानवे प्रतिशत लोग राहु को केवल नकारात्मक में लेते हैं, कहते हैं कि राहु अचानक बहुत देता है और अचानक बहुत छीन लेता है और भ्रम देता है — बस यही लेकर चलते हैं।
श्री हरि ने जानते हुए दानव को अमृत दिया
श्री हरि ने जानते हुए दानव को अमृत दिया
मूल में जाइए, वक्ता कहते हैं: क्या भगवान श्री हरि नारायण को नहीं पता था कि वहाँ बैठा व्यप्रचित्त नाम का दानव है, कि वह देवता नहीं राक्षस है? क्या उन अंतर्यामी को नहीं पता था जब उन्होंने मोहिनी रूप में उसे अमृत पिलाया? पता होगा — आप सबमें कम से कम इतना सामान्य ज्ञान और बुद्धि होनी चाहिए कि उन्हें पता होगा।
राहु ग्रहों में कैसे गिना जाने लगा?
स्वरभानु का शीश कटा, पर अमृत पिया जा चुका था
वक्ता कहते हैं कि चंद्रदेव और सूर्यदेव दोनों ने जब समझा कि यह राक्षस है, तो कह दिया — स्वरभानु नाम का राक्षस; और उनके कहने के कारण उसका शीश कटा। तो उसमें कोई नियति थी, कि इसे भी अमृत देना है, यह भी अमृत पिएगा। तो उसने भी अमृत पिया है, और इस कारण वह देव बन गया और देवों के बराबर, समकक्ष माना गया। ग्रहों में उसका स्थान बना।
चंद्रदेव और सूर्यदेव दोनों ने जब समझा कि यह राक्षस है, तब उन्होंने कह दिया — स्वरभानु नाम का राक्षस, वक्ता कहते हैं। कि यह राक्षस है; और उनके कहने के कारण उसका शीश कटा। तो उसमें कोई नियति थी न — कि इसे भी अमृत देना है, यह भी अमृत पिएगा। तो उसने भी अमृत पिया है, और इस कारण वह देव बन गया, देवों के बराबर और समकक्ष माना गया। ग्रहों में उसका स्थान बना।
सोशल मीडिया पर राहु का शासन क्यों है?
पीड़ित भ्रमित रहते हैं; दूसरे उससे सकारात्मक सीखते हैं
सोशल मीडिया को ऐसा इसलिए कहते हैं, वक्ता कहते हैं, क्योंकि उसका अधिपति राहु है। और जो उससे पीड़ित हैं वे सोशल मीडिया से कभी सकारात्मक पक्ष नहीं ले पाते — वे हमेशा भ्रमित रहेंगे। देखिए कितने लोग हैं जो सोशल मीडिया से सकारात्मकता लेते हैं, चीज़ें सीखते हैं, उनका अच्छा उपयोग करते हैं, धन-धान्य कमाते हैं, अपने कष्ट दूर करते हैं और सही मार्ग पकड़कर चलते हैं। और कितने हैं जो इसी जगह से गलत चीज़ सीखते हैं। यह आपकी कुंडली पर भी निर्भर करता है, वे कहते हैं; यह भी सच बात है।
आज के समय में शिव को महत्व क्यों नहीं दिया जाता?
शिव तंत्र के प्रवर्तक, जबकि पूछा भैरव को जाता है
वक्ता कहते हैं कि अपने आराध्य को लेकर इस भ्रम की स्थिति में आज लोग शिव जी को कोई विशेष महत्व देते ही नहीं। साधकों को बताना पड़ता है कि भाई, शिव जी स्वयं तंत्र के प्रवर्तक हैं — वही भगवती पार्वती से तंत्र कहते हैं। पर पार्वती जी को कौन पूछ रहा है, शिव जी को कौन पूछ रहा है? भैरव जी को पूछ रहे हैं।
तो अपने आराध्य को लेकर बार-बार जो यह भ्रम की स्थिति बनती है — आज लोग, वक्ता कहते हैं, शिव जी को कोई विशेष महत्व देते ही नहीं। उनकी ओर से साधकों को बताना पड़ता है कि भाई, शिव जी स्वयं तंत्र के प्रवर्तक हैं। वही स्वयं भगवती पार्वती से तंत्र के विषय में कहते हैं। तो पार्वती जी को कौन पूछ रहा है, शिव जी को कौन पूछ रहा है? भैरव जी को पूछ रहे हैं।
वीडियो भैरव के ऐसे उग्र रूप दिखाते हैं जिनका सामान्य लोगों को कोई अधिकार नहीं
जिन रूपों का सामान्य लोगों को अधिकार नहीं, उन्हें ज्ञान दिखाने के लिए बताया जाता है
वक्ता कहते हैं कि हर चार वीडियो के बाद भैरव जी के ऐसे उग्र रूपों पर एक वीडियो आता है जिस रूप का सामान्य लोगों को अधिकार ही नहीं — और उनकी पूरी बात बता दी जाती है। और बतानी पड़ती है, वे कहते हैं, क्योंकि भाई, जनता को दिखाना है कि हमारे पास बहुत ज्ञान है।
हर चार वीडियो के बाद, वक्ता कहते हैं, भैरव जी के ऐसे उग्र रूपों पर एक वीडियो आता है — ऐसे रूप जिनका सामान्य लोगों को बिल्कुल अधिकार ही नहीं — और उनकी पूरी बात बता दी जाती है। और इसलिए बतानी पड़ती है, वे कहते हैं, क्योंकि भाई, जनता को दिखाना है कि हमारे पास बहुत ज्ञान है।
भगवती पार्वती के बारे में किस बात की उपेक्षा होती है?
पार्वती, दस महाविद्याओं का मूल स्रोत
भगवती के मूल रूप, भगवती पार्वती जी के बारे में, वक्ता कहते हैं, केवल कथा वाली सामान्य चर्चा होती है — यह केवल कथाओं में सुनने को मिलता है। माँ के मूल रूप की, कि वही दस महाविद्याओं का मूल स्रोत हैं, कि उन्हीं से सारी शक्तियाँ उग्र रूप में प्रकट होंगी, इसकी कोई चर्चा ही नहीं होती। यह, वे कहते हैं, आपको समझना है।
भगवती के मूल रूप, भगवती पार्वती जी के विषय में, वक्ता कहते हैं, केवल कथा वाली सामान्य चर्चा होती है; यह केवल कथाओं में सुनने को मिलता है। माँ के मूल रूप की कोई चर्चा ही नहीं होती — कि वही दस महाविद्या का मूल रूप और स्रोत हैं। वहीं से सारी शक्तियाँ उग्र रूप में प्रकट होंगी। यह, वे कहते हैं, आपको समझना है।
कवच धारण करने के क्या नियम हैं?
कामाख्या कवच को छोड़कर कोई भी कवच विवाहित दंपती रोज़ पहन सकते हैं
वक्ता कहते हैं: जब भी आप कवच धारण करें — कोई भी कवच, कामाख्या कवच को छोड़कर — अगर आप पति-पत्नी हैं, तो उनके लिए क्या नियम होगा? आप कवच रोज़ पहन सकते हैं। पति-पत्नी होते हुए उसे पहने रखिए। सोते समय भी पहने रख सकते हैं।
सूतक और पातक में कवच का क्या करना चाहिए?
धागा बदलिए; धातु का कवच पहने रख सकते हैं
वक्ता कहते हैं कि सूतक और पातक के समय धागा बदलना है। अगर आपने धातु में, सोने या चाँदी में पहना है, तो पहने रख सकते हैं — कोई कठिनाई नहीं; अंग की तरह पहन सकते हैं। अगर भोजन में शुद्धता नहीं है, आचार-विचार-व्यवहार में किसी भी तरह की कठिनाई है, बाहर जाना पड़ता है, कई तरह के दोष हैं, तो इन चीज़ों पर थोड़ा ध्यान देना पड़ता है। पर अगर आप धर्म से जुड़े काम करते हैं, तो कोई कठिनाई की बात नहीं।
सूतक और पातक के समय धागा बदलना है, वक्ता कहते हैं। अगर आपने धातु में, सोने में या चाँदी में पहना है, तो आप उसे पहने रख सकते हैं — कोई कठिनाई नहीं; आप उसे शरीर के अंग की तरह पहन सकते हैं। अगर भोजन में शुद्धता नहीं है, अगर आचार, विचार और व्यवहार में किसी भी प्रकार की कठिनाई है; अगर बाहर जाना पड़ता है; अगर कई प्रकार के दोष हैं — तो इन चीज़ों पर थोड़ा ध्यान देना पड़ता है। पर अगर आप धर्म से जुड़े काम करते हैं, तो कोई कठिनाई की बात नहीं, वे कहते हैं।
कामाख्या कवच के लिए क्या सलाह है?
कामाख्या कवच की बार-बार आवृत्ति
वक्ता श्रोता अनीता श्री से कहते हैं: भगवती कामाख्या कवच की आवृत्ति बार-बार ज़रूर कीजिए।
कवच, अर्गला और कीलक मिलाकर कितने श्लोक बनते हैं?
अंगों सहित हज़ार श्लोक; मूल सप्तशती सहस्राधिक है
वक्ता कहते हैं कि कवच, अर्गला और कीलक मिलाकर हज़ार श्लोक बनते हैं — वह एक अलग विषय है। श्रोता महेश से वे कहते हैं कि केवल मूल सप्तशती ही सहस्राधिक है।
कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक मिलाकर हज़ार श्लोक बनते हैं, वक्ता कहते हैं। वह एक अलग विषय है। केवल मूल सप्तशती ही, वे श्रोता महेश से कहते हैं, सहस्राधिक है।
पूर्णागिरी मैया की नित्य सेवा कैसे करें?
अर्गला का पहला मंत्र, या दुर्गा सप्तशती यंत्र
यह पूछे जाने पर कि पूर्णागिरी मैया की सेवा कैसे करें और नित्य सेवा के लिए कौन-सा मंत्र बोलें, वक्ता कहते हैं कि 51 शक्तिपीठों, और मूल आधार पीठों में, जब भी किसी शक्ति या किसी देवी का पूजन होता है, तो भगवती पूर्णागिरी पीठ और जालंधर पीठ और इन सबका पूजन ज़रूर होता है। तो माई के रूप के अनुसार, या मूल रूप के अनुसार पूजन कीजिए; और अगर आप दीक्षित नहीं हैं, तो अर्गला के पहले मंत्र के अनुसार चलिए, या, अगर बृहद रूप में जाना चाहते हैं, तो दुर्गा सप्तशती के यंत्र के अनुसार।
यह पूछे जाने पर कि पूर्णागिरी मैया की सेवा कैसे करें, और उनकी नित्य सेवा के लिए कौन-सा मंत्र बोलें, वक्ता कहते हैं कि 51 शक्ति पीठ में, और मूल आधार पीठों में — जब भी किसी शक्ति का, किसी देवी का पूजन होता है, उसमें भगवती पूर्णागिरी पीठ का, जालंधर पीठ का, इन सबका पूजन ज़रूर होता है। तो माई के रूप के अनुसार पूजन कीजिए, या मूल रूप के अनुसार पूजन। और अगर आप दीक्षित नहीं हैं, तो आप अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र के अनुसार चल सकते हैं, और अगर बृहद रूप में जाना चाहते हैं, तो दुर्गा सप्तशती के यंत्र के अनुसार।
आवरण पूजन किसी जानकार से सीखना अच्छी बात है
आवरण पूजन किसी से सीखना अच्छी बात है
एक श्रोता बताते हैं कि उन्होंने अंबुबाची में विनियोग और न्यास के साथ सप्तश्लोकी साधना की थी, कि दिव्यांश प्राप्त हुआ था, और साधना पूरी करके बताने पर उनसे कहा गया कि अब वे आवरण पूजन सिखाना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं: आपने सप्तश्लोकी साधना की; और सप्तश्लोकी साधना करके आप आवरण पूजन सीखना चाहते हैं, या सीख रहे हैं, किसी से सीख रहे हैं — यह अच्छी बात है, सीखिए। इसमें, वे कहते हैं, हम आगे कुछ नहीं कर सकते।
एक श्रोता बताते हैं कि उन्होंने अम्बुबाची में विनियोग और न्यास के साथ सप्तश्लोकी साधना की थी, कि जिसे भी हो, दिव्यांश प्राप्त हुआ था, और साधना पूरी करके बताने पर उन्होंने कहा कि अब वे आवरण पूजा सिखाना चाहते हैं। आपने सप्तश्लोकी साधना की, वक्ता दोहराते हैं। सप्तश्लोकी साधना करके आप आवरण पूजन सीखना चाहते हैं, या सीख रहे हैं, किसी से सीख रहे हैं — यह अच्छी बात है, आप सीखिए। इसमें, वे कहते हैं, हम आगे कुछ नहीं कर सकते।
क्या बिना जनेऊ वाला पुरुष तत्पुरुष और सद्योजात मंत्र बोल सकता है?
नित्य अभिषेक में पाँचों मंत्र बनाम स्वतंत्र जप
यह पूछे जाने पर कि क्या बिना जनेऊ वाला पुरुष तत्पुरुष रूप और सद्योजात जी का मंत्र बोले, वक्ता कहते हैं कि नित्य अभिषेक में आप पाँचों मंत्रों से भगवान शिव का अभिषेक कर सकते हैं — कोई कठिनाई नहीं। पर अगर उनका स्वतंत्र रूप से, सबका जप करना है, और हर एक का विनियोग और न्यास करना है, तो विषय अलग है।
बिना जनेऊ वाले पुरुष के तत्पुरुष रूप का मंत्र और सद्योजात जी का मंत्र बोलने के बारे में पूछे जाने पर, नित्य अभिषेक में, वक्ता कहते हैं, पाँचों मंत्रों से भगवान शिव का अभिषेक कीजिए; उसमें कोई कठिनाई नहीं। जप आदि के लिए — अगर उसमें सबका स्वतंत्र रूप से जप करना है, और हर एक का विनियोग, न्यास आदि करना है, तो विषय अलग है।
पंचाक्षरी जप के दौरान दूसरा बीज आता है और उच्चाटन होने लगता है — इसका क्या अर्थ है?
तंद्रा की अवस्था से होने वाली सामान्य बात
एक श्रोता बताते हैं कि पंचाक्षरी जप के दौरान दूसरा बीज दिखता है, कि वे बीच में किसी बीज मंत्र का जप करने लगते हैं, और उच्चाटन होने लगता है। वक्ता उत्तर देते हैं: कोई बात नहीं, ऐसा होता है। इससे इतना परेशान नहीं होना चाहिए। तंद्रा की अवस्था बनने से ये सारी चीज़ें किसी भी साधक के साथ हो सकती हैं।
एक श्रोता बताते हैं कि पंचाक्षरी मंत्र जप के समय कोई दूसरा बीज दिख रहा है, कि बीच में वे किसी बीज मंत्र का जप करने लगते हैं, और उच्चाटन हो रहा है। कोई बात नहीं, वक्ता कहते हैं, ऐसा होता है। इससे इतना परेशान नहीं होना चाहिए। तंद्रा की अवस्था बनने से ये सारे विषय किसी भी साधक के साथ हो सकते हैं।
एक महीने की श्रावणी पंचाक्षरी अपने आप भाद्रपद के जप में चलती रहती है
एक महीने की श्रावणी पंचाक्षरी का भाद्रपद के जप में चलते रहना
मान लीजिए, वक्ता कहते हैं, आपने एक महीना श्रावणी पंचाक्षरी का जप किया। अब भाद्रपद के महीने में आप भगवती का मंत्र या गणपति जी का मंत्र जप रहे हैं। अगर थोड़ी भी तंद्रा की अवस्था बनी, तो क्योंकि यहाँ अभ्यास पंचाक्षरी का रहा है, आपको पता भी नहीं चलेगा कि कब पंचाक्षरी चलने लगी। तो यह सामान्य है, वे कहते हैं; इससे परेशान मत होइए।
मान लीजिए, उदाहरण के लिए, वक्ता कहते हैं, कि आपने एक महीना श्रावणी पंचाक्षरी मंत्र का जप किया। अब भाद्रपद के महीने में आप भगवती का मंत्र, या गणपति जी का मंत्र जप रहे हैं। अगर थोड़ी भी तंद्रा की अवस्था बनी, तो यहाँ अभ्यास पंचाक्षरी का हो गया है, और आपको पता भी नहीं चलेगा कि कब पंचाक्षरी चलने लगी। तो यह सामान्य है, वे कहते हैं। इससे परेशान मत होइए।
उच्चाटन या समर्पण की कमी हो तो क्या करना चाहिए?
स्तुति गाइए
जहाँ तक उच्चाटन की बात है — कि मन उच्चाटित हो रहा है, या जिस भगवान के रूप का पूजन कर रहे हैं उसके प्रति आस्था और समर्पण की कमी है — इसके लिए, वक्ता कहते हैं, आपको स्तुति ज़रूर गानी चाहिए। स्तुति गाइए।
और जहाँ तक उच्चाटन के विषय की बात है — कि मन उच्चाटित हो रहा है, या जिस भगवान के रूप का पूजन हो रहा है उसके प्रति आस्था की, समर्पण की कमी है — इसके लिए, वक्ता कहते हैं, आपको स्तुति ज़रूर गानी चाहिए। स्तुति गाइए।
व्यक्ति अपने अतीत को लेकर हमेशा दुखी क्यों रहता है?
ऐसे विचारों के बाद बुद्धि कुंठित होने पर कठिनाई
यह पूछे जाने पर कि किस कर्म से व्यक्ति अपने अतीत को लेकर हमेशा दुखी रहता है, वक्ता बात दोहराते हैं: अतीत के बारे में, कि मैंने उसका भला किया और उसने मेरा बहुत बुरा किया। ऐसा हो सकता है। पर जब ऐसे विचारों के बाद बुद्धि कुंठित हो जाती है, तब कठिनाई होती है। और वे कहते हैं कि यहाँ वे एक और विषय जोड़ेंगे, विशेष रूप से साधकों के लिए।
भाई, यह विचार — किस कर्म के कारण व्यक्ति अपने अतीत को लेकर हमेशा दुखी रहता है, यह पूछे जाने पर वक्ता बात दोहराते हैं। क्या? अतीत के बारे में: अरे, मैंने उसका भला किया और उसने मेरा बहुत बुरा किया। ऐसा हो सकता है। अब ऐसे विचारों के बाद अगर बुद्धि कुंठित हो जाए, तब कठिनाई होती है। और एक विषय और, वे प्रश्नकर्ता मोहित से कहते हैं, हम इसमें जोड़ेंगे। यह विशेष रूप से साधकों के लिए है।
युवा साधक बहुत जल्दी क्या करने लगते हैं?
मंत्र बाँटना, दीक्षा देना और शिविर लगाना
जैसा वे पहले कह रहे थे, वक्ता दोहराते हैं, साधक पर महामाया और माया दोनों की कृपा होती है; माया भी अपना काम करती है। आज के समय में, वे कहते हैं, नई पीढ़ी के लोग, युवा साधक, बहुत जल्दी सीधे मंत्र बाँटने लगते हैं, दीक्षा देने लगते हैं, शिविर तक लगाने लगते हैं, या चीज़ों का विस्तार करने लगते हैं — यह सब बहुत जल्दी शुरू कर देते हैं। वे बहुत जल्दी खुद को परिपक्व दिखाते हैं, कि हम परिपक्व हो गए, ज्ञान पूरा हो गया।
जैसा वे पहले कह रहे थे, वक्ता दोहराते हैं: साधक पर महामाया और माया दोनों की कृपा होती है। माया भी अपना काम करती है। आज के समय में, वे कहते हैं, देखिए — नई पीढ़ी के लोग, युवा साधक, बहुत जल्दी सीधे मंत्र बाँटने लगते हैं, दीक्षा देने लगते हैं, शिविर तक लगाने लगते हैं, या चीज़ों का विस्तार करने लगते हैं। ये सारी चीज़ें वे बहुत जल्दी शुरू कर देते हैं। वे बहुत जल्दी खुद को परिपक्व दिखाते हैं: कि हम परिपक्व हो गए, ज्ञान प्राप्त हो गया। ज़रूर, वे मानते हैं, आपके पास जानकारी हो सकती है। बहुत सारे विषयों का आपको अद्भुत ज्ञान हो सकता है। आपमें वाक्पटुता हो सकती है, चीज़ों को प्रस्तुत करने की क्षमता हो सकती है। सब कुछ हो सकता है।
समाज से जुड़ाव जितना बढ़ता है, तपोबल उतना घटता है
समाज से जुड़ाव बढ़ने पर तपोबल का घटना
पर इन चीज़ों में आपका जितना जुड़ाव होगा, वक्ता कहते हैं, उतना आपका तपोबल जाएगा — चाहे आप परंपरागत साधक हों या सामान्य साधक। और जब समाज से आपका जुड़ाव बढ़ने लगता है और तपोबल क्षीण होने लगता है, तो अभी समझ नहीं आएगा, पर लंबे समय में आपको कठिनाइयाँ होंगी। जब पाँच, दस, पंद्रह साल बीतेंगे, तो जिस समय में आपको फलना-फूलना था, वह उलटे क्रम में पीछे चलने लगेगा।
पर इन चीज़ों में आपका जितना जुड़ाव होगा, वक्ता कहते हैं, उतना आपका तपोबल जाएगा। चाहे आप परंपरागत साधक हों या सामान्य साधक। और जब समाज से आपका जुड़ाव बढ़ने लगेगा और तपोबल क्षीण होने लगेगा — अभी यह समझ नहीं आएगा, पर लंबे समय में आपको कठिनाइयाँ होंगी। जब पाँच साल बीतेंगे, दस साल बीतेंगे, पंद्रह साल बीतेंगे, तब जिस समय में आपको फलना-फूलना था — आपका वह समय उलटे क्रम में पीछे जाने लगेगा।
प्रभाव कुल परंपरा में जाता है और आने वाले वंश पर पड़ता है
आने वाले वंश पर प्रभाव जाना
वक्ता कहते हैं कि यह चीज़ कुल परंपरा में होती है — यानी अपने कुल में, अपने स्वकुल में भी। और इसके कारण बाद में आने वाले वंश पर प्रभाव पड़ता है। वे उदाहरण लेते हैं एक ऐसे घर का जिसमें दादा या परदादा साधना करते थे, किसी कुल में दीक्षित थे और चीज़ें सीख रहे थे — जिन्होंने दो-तीन साल में क्रमागत साधनाएँ बहुत अच्छे से सीखीं, कुछ पुरश्चरण भी किए, पाँच लाख, दस लाख, बीस लाख, और उस पुण्य से उनके जीवन में भी प्राप्तियाँ आईं, चाहे भौतिक रूप से या आध्यात्मिक रूप से।
यह चीज़, वक्ता कहते हैं, कुल परंपरा में होती है — यानी अपने कुल में, अपने स्वकुल में भी। और इसके कारण बाद में आने वाले वंश पर प्रभाव पड़ता है। कैसे? उदाहरण के लिए, मान लीजिए — और वे प्रश्नकर्ता मोहित से कहते हैं कि वे उनका नाम केवल उदाहरण के लिए ले रहे हैं — मान लीजिए कि मोहित जी के घर में उनके दादा या परदादा साधना करते थे, किसी कुल में दीक्षित थे, चीज़ें सीख रहे थे। एक साल, दो साल, तीन साल में उन्होंने क्रमागत साधनाएँ बहुत अच्छे से सीख लीं। कुछ पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। भी किए — पाँच लाख, दस लाख, बीस लाख — और इन पुण्यों के कारण उनके जीवन में भी प्राप्तियाँ हुईं, चाहे भौतिक रूप से या आध्यात्मिक रूप से।
कुछ सालों में मिला आत्मविश्वास समाज पर लगाया जाए तो वह दूसरे के प्रारब्ध में हस्तक्षेप बन जाता है
किसी दूसरे के प्रारब्ध में हस्तक्षेप
पर उन तीन-चार सालों में जो आत्मविश्वास उन्हें मिला, वक्ता कहते हैं, उसे वे अब समाज में लगाने लगे। जब समाज में दिया जाता है, कितना दिया जाता है, किस स्तर से दिया जाता है — यह बहुत सोच-विचार करके देना चाहिए। और जब कोई व्यक्ति इस क्षेत्र में जाता है, तो बहुत सारी विडंबनाएँ पैदा होती हैं। किसी के प्रारब्ध में हस्तक्षेप, वे कहते हैं: इसे हमेशा याद रखिए — किसी के प्रारब्ध में हस्तक्षेप।
पर इन तीन-चार सालों में जो आत्मविश्वास उन्हें मिला, वक्ता कहते हैं, उसे वे अब समाज में लगाने लगे। जब समाज में दिया जाता है, कितना दिया जाता है, किस स्तर से दिया जाता है — इसके लिए बहुत सोच-विचार करके देना चाहिए। और जब कोई व्यक्ति इस क्षेत्र में जाता है, तब बहुत सारी विडंबनाएँ पैदा होती हैं। किसी के प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। में हस्तक्षेप। इसे हमेशा याद रखिए: किसी के प्रारब्ध में हस्तक्षेप।
मृत्यु के निकट एक बच्चे को बचाने के लिए सिद्ध प्रयोग किया गया
मृत्यु के निकट बच्चे को बचाने के लिए सिद्ध प्रयोग
उदाहरण के लिए, वक्ता कहते हैं, जब मोहित जी के परदादा, जो साधनाएँ करते थे, सामर्थ्य पा चुके थे, तो कोई व्यक्ति आया जिसका बेटा मृत्यु के निकट था, मरने की अवस्था में। तो उन्होंने अपनी की हुई साधना का कर्म प्रयोग लगाकर उसके बेटे को बचा लिया। बेटा बच गया, ठीक हो गया।
उदाहरण के लिए, वक्ता कहते हैं: मोहित जी के परदादा, जो साधनाएँ करते थे — जब उन्होंने सामर्थ्य पा लिया था, तो कोई व्यक्ति आया जिसका बेटा मृत्यु के कगार पर था, मरने की अवस्था में। अब उन्होंने अपनी की हुई साधना का कर्म प्रयोग लगाकर उसके बेटे को बचा लिया। बेटा बच गया; वह ठीक हो गया।
तेरह साल से छोटा बच्चा किसका कर्म भोगता है?
पाँच साल तक माँ का और तेरह तक पिता का कर्म
पर ध्यान दीजिए, वक्ता कहते हैं: अगर वह बच्चा तेरह साल से छोटा था, तो उस समय वह अपने माता-पिता के कर्म भोग रहा था। तेरह साल तक शरीर की उन्नति या अवनति माता-पिता के कर्म के अनुसार होती है — पाँच साल तक माँ के, और उसके बाद तेरह तक बाकी वर्षों में पिता के। तो वह उन्हीं के कर्मों के अनुसार कष्ट भोग रहा था।
पर ध्यान दीजिए, वक्ता कहते हैं: अगर वह बच्चा तेरह साल से कम उम्र का था, तो उस समय वह अपने माता-पिता के कर्म भोग रहा था। तेरह साल तक शरीर की उन्नति या अवनति माता-पिता के कर्म के अनुसार होती है। पाँच साल तक माँ के, और उसके बाद तेरह तक बाकी वर्षों में पिता के। तो उन्हीं के कर्मों के अनुसार उसे कष्ट आ रहा था।
दो जीवों में हस्तक्षेप हुआ, और सच में उनके पीछे पूरे परिवार में
दो जीव, और सच में पूरा परिवार
अब यहाँ दो जीवों के प्रारब्ध में हस्तक्षेप हुआ है, वक्ता कहते हैं — और ठीक से देखा जाए तो पूरे परिवार के, क्योंकि अगर बच्चे को हानि होती तो पूरे परिवार को हानि होती। अब परदादा ने जो हस्तक्षेप किया है, वह पूरा उन पर पड़ेगा। यह कर्म है; इसे संतुलित होना ही है। काल, वे कहते हैं, इसे छोड़ेगा नहीं।
अब यहाँ दो जीवों के प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। में हस्तक्षेप हुआ है, वक्ता कहते हैं। और ठीक से देखा जाए तो पूरे परिवार के। क्योंकि अगर उसे हानि होती, तो पूरे परिवार को हानि होती। अब उनके परदादा ने जो यह हस्तक्षेप किया है — अब वह पूरी चीज़ उन पर पड़ेगी। यह कर्म है। इसे संतुलित होना ही है। काल, वे कहते हैं, इसे छोड़ेगा नहीं।
एक रास्ता प्रायश्चित्त के रूप में पुरश्चरण है, उसके बाद दान से निवृत्ति
पहला उपाय: प्रायश्चित्त के रूप में पुरश्चरण, फिर दान से निवृत्ति
यहाँ दो रास्ते हैं, वक्ता कहते हैं। या तो, अपने किए कर्म प्रयोग के प्रायश्चित्त के लिए वे पुरश्चरण करें — यह पहली बात है, पुरश्चरण करें। और दान आदि से उसकी निवृत्ति करें; तब उनके लिए भी वह बराबर हो जाता है और हट जाता है।
अब यहाँ दो रास्ते हैं, वक्ता कहते हैं: या तो, अपने किए कर्म प्रयोग के प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। के लिए वे पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करें। पहली बात, वे पुरश्चरण करें। और दान आदि के द्वारा उसकी निवृत्ति करें। तब वह बराबर हो जाता है, हट जाता है, उनके लिए भी।
दूसरा रास्ता प्रचार और भीड़ लाता है, जिससे जप, अनुष्ठान या प्रायश्चित्त का समय नहीं बचता
प्रचार, भीड़, और जप, अनुष्ठान या प्रायश्चित्त के लिए समय न बचना
पर दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, जब वे इस तरह की प्रक्रियाएँ करते हैं और उनका प्रचार होता है, तो उनके आसपास भीड़ बढ़ेगी। भीड़ बढ़ेगी तो उनके पास समय कम होगा। वे न अपने विशेष जप-तप में ज़्यादा जा पाएँगे, न कोई नया अनुष्ठान कर पाएँगे, न प्रायश्चित्त का कोई विशेष कर्म। कुछ समय करने के बाद भी — शुरू में हो सकता है कुछ समय करें, पर बाद में नहीं कर पाएँगे। उलझनें बढ़ेंगी।
पर दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, जब वे इस तरह की प्रक्रियाएँ करते हैं, और उनका प्रचार होता है, तो उनके आसपास भीड़ बढ़ेगी। भीड़ बढ़ेगी तो उनके पास समय कम होगा। न वे अपने विशेष जप-तप में ज़्यादा जा पाएँगे, न कोई नया अनुष्ठान कर पाएँगे, न प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। का कोई विशेष कर्म। एक हद तक करने के बाद भी — हो सकता है शुरू में कुछ समय करें, पर बाद में नहीं कर पाएँगे। उलझनें बढ़ेंगी।
पिछला पुण्य वर्तमान में हानि दूर रखता है, जबकि ऋण एक जगह जमा होता रहता है
पिछला पुण्य उनकी रक्षा करता है, जबकि ऋण एक जगह जमा होता है
पर अपने पहले के कर्मों, अपने पुरश्चरण, अपने जप-तप के कारण उन्हें कोई हानि नहीं हो रही, वक्ता कहते हैं। वर्तमान में कोई हानि नहीं होगी — बस उन्नति है, दिन दूनी रात चौगुनी। अब यह चीज़ एक जगह जमा रहेगी। यह एक जगह जमा रह गई है; ध्यान रखिए कि यह कभी नष्ट नहीं होने वाली, जब तक इसे नष्ट न किया जाए।
पर अपने पहले के कर्मों के कारण — अपने पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक।, अपने जप-तप के कारण — उन्हें कोई हानि नहीं हो रही, वक्ता कहते हैं। वर्तमान में कोई हानि नहीं होगी। बस वृद्धि है, दिन दूनी रात चौगुनी। अब यह चीज़ एक जगह जमा रहेगी। यह एक जगह जमा रह गई है। ध्यान रखिए, वे कहते हैं, कि यह कभी नष्ट नहीं होने वाली — जब तक इसे नष्ट न किया जाए।
रोज़ चार वीडियो के बाद किसी और चीज़ की फ़ुरसत नहीं बचती, और तपोबल नष्ट हो जाता है
रोज़ चार वीडियो और किसी और चीज़ की फ़ुरसत नहीं
अब यही बात, जितने लोगों के प्रारब्ध में उन्होंने हस्तक्षेप किया और उसे नष्ट भी नहीं किया — वह सब अब एक जगह इकट्ठा हो गया है, वक्ता कहते हैं। और अपने जीवन में उन्होंने इसके लिए कोई विशेष काम नहीं किया, क्योंकि समय नहीं है। आज के संदर्भ में देखें, तो सोशल मीडिया पर रोज़ चार वीडियो डालने से फ़ुरसत नहीं है। वे तंत्र काट रहे हैं, दूसरों को मंत्र दे रहे हैं, साधनाएँ बता रहे हैं — कई तरह की क्रियाएँ करके अपना तपोबल नष्ट कर रहे हैं। वे नई चीज़ें तो उठाते हैं, पर अपना प्रारब्ध नष्ट नहीं कर पाते।
अब यही बात, वक्ता कहते हैं: जितने लोगों के प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। में उन्होंने हस्तक्षेप किया, और उसे नष्ट भी नहीं किया — अब यह पूरी चीज़ एक जगह इकट्ठा हो गई है। और अपने जीवन में उन्होंने इसके लिए कोई विशेष काम नहीं किया, क्योंकि समय नहीं है। आज के संदर्भ में देखें, तो सोशल मीडिया पर रोज़ चार वीडियो डालने से फ़ुरसत नहीं है। वे तंत्र काट कर रहे हैं, दूसरों को मंत्र दे रहे हैं, साधनाएँ बता रहे हैं। कई तरह की क्रियाएँ करके वे अपना तपोबल नष्ट कर रहे हैं। वे नई चीज़ें तो उठाते हैं, पर अपना प्रारब्ध नष्ट नहीं कर पाते।
तंत्र का सबसे मूल नियम क्या है?
क्रिया-प्रधानता, भाव-प्रधानता नहीं
वक्ता कहते हैं कि अभी उन्हें जो मिल रहा है वह उनके अच्छे कर्मों का फल है, और ये गलत कार्य नहीं हैं — ये जीव और समाज की रक्षा के लिए किए गए अच्छे कर्म हैं; इनसे किसी का बुरा नहीं हुआ और ये किसी पर मारण प्रयोग नहीं कर रहे। पर, वे कहते हैं, तंत्र का सबसे मूल नियम क्रिया-प्रधानता है। यहाँ भाव-प्रधानता की बात नहीं — ध्यान रखिए, क्रिया-प्रधानता।
क्योंकि अभी उन्हें क्या फल मिल रहा है? हमारे अच्छे कर्मों का फल मिल रहा है, वक्ता कहते हैं। और ये कोई गलत कार्य नहीं हैं। जीव की रक्षा के लिए, समाज की रक्षा के लिए, उन्होंने केवल अच्छे कर्म किए हैं। इन्होंने किसी का बुरा नहीं किया; ये किसी पर मारण प्रयोग नहीं कर रहे। पर तंत्र का सबसे मूल नियम, वे कहते हैं, क्रिया-प्रधानता है। यहाँ भाव-प्रधानता का विषय नहीं है। ध्यान रखिए: क्रिया-प्रधानता।
गुरु मंडल पूजन में मुख्य संकल्प क्या होता है?
दो पूजनों के बीच उत्पन्न दोष की निवृत्ति
वक्ता कहते हैं कि जब आप तंत्र के क्षेत्र में जाते हैं, तो गुरु दीक्षा में गुरु क्रम और गुरु पादुका का पूरा वर्णन मिलेगा; और गुरु मंडल का जो तांत्रिक पूजन होता है — हर पूर्णिमा को, या परंपरा के अनुसार — उसमें मुख्य संकल्प ठीक इसी विषय का होता है: कि इस अयन में, दक्षिणायन हो या उत्तरायण, इस महीने से इस महीने तक, दो पूजनों के बीच के समय में, जो भी तांत्रिक प्रक्रियाएँ हुई हैं और उनसे प्रारब्ध आदि से जुड़ा जो भी ज्ञात-अज्ञात दोष उत्पन्न हुआ है — एक पूरा व्यापक संकल्प — उसकी निवृत्ति के लिए हम गुरु पादुका पूजन का संकल्प ले रहे हैं। और फिर पूरा पूजन होता है।
जब आप तंत्र के क्षेत्र में जाते हैं, वक्ता कहते हैं, तो गुरु दीक्षा में गुरु क्रम, गुरु पादुका आदि का पूरा वर्णन मिलेगा; और गुरु मंडल का जो तांत्रिक पूजन होता है — हर पूर्णिमा को, या जैसी उसकी परंपरा हो — उसमें मुख्य संकल्प ठीक इसी विषय का होता है: कि इस अयन में, दक्षिणायन हो या उत्तरायण, इस अयन में इस महीने से इस महीने तक — यानी दो पूजनों के बीच का जो समय है — बीच में जो भी तांत्रिक प्रक्रियाएँ हुई हों, और उनके कारण प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। आदि से जुड़ा जो भी ज्ञात या अज्ञात दोष उत्पन्न हुआ हो, वह सब व्यापक रूप से — संकल्प पूरा रहता है। उसकी निवृत्ति के लिए हम गुरु पादुका पूजन का संकल्प ले रहे हैं। और फिर पूरा पूजन होता है।
गुरु पादुका पूजन के बाद क्या होता है?
तर्पण और मार्जन ताकि कोई दोष न रहे, क्योंकि भार गुरु पर भी पड़ता है
ये मूल बातें हैं, वक्ता कहते हैं, उन सभी साधकों के लिए जो गुरु परंपरा के भीतर ठीक क्रमागत परंपरागत साधनाओं में जाते हैं। वे इन्हें करते हैं। उसके बाद, चाहे गुरु पादुका मंत्र हो या उसके बाद का पूरा विषय, वह सब करके — अपना तर्पण, यानी अपना मार्जन आदि, किन मंत्रों से होगा, ताकि कोई दोष बाकी न रहे। क्योंकि उसका भार गुरु पर भी पड़ेगा।
ये मूल बातें हैं, वक्ता कहते हैं, जो उन सभी साधकों के लिए हैं जो गुरु परंपरा के भीतर पूरी तरह क्रमागत, परंपरागत साधनाओं में जाते हैं। वे इन्हें करते हैं। उसके बाद, चाहे गुरु पादुका मंत्र हो या उसके बाद का पूरा विषय, वह सब करना है — अपना तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण।, यानी अपना मार्जन और बाकी प्रक्रिया, किन मंत्रों से होगी, ताकि कोई दोष बाकी न रहे। क्योंकि उसका भार गुरु पर भी पड़ेगा।
परंपरागत लोग जैसे हैं वैसे सुरक्षित हैं; बाकी को यह स्वयं भोगना पड़ेगा
परंपरागत लोग सुरक्षित हैं; बाकी इसे स्वयं भोगेंगे
आज के समय में यह कौन कर रहा है, वक्ता पूछते हैं। जो परंपरागत हैं वे जैसे हैं वैसे सुरक्षित हैं, भाई; उन्हें ज़्यादा कुछ करना नहीं है। और जिन्हें करना नहीं है वे बड़े उत्साह से कर रहे हैं, रोज़ यह डाल रहे हैं, वह दिखा रहे हैं। वह कौन भोगेगा? वे स्वयं भोगेंगे, इसी तरह। वे फिर दूसरी या तीसरी पीढ़ी में जन्म लेंगे। कोई गति नहीं होगी, क्योंकि यह क्रिया-प्रधानता की बात है, और यह नष्ट नहीं हो सकती।
आज के समय में यह कौन कर रहा है, वक्ता पूछते हैं। जो परंपरागत लोग हैं वे जैसे हैं वैसे सुरक्षित हैं, भाई; उन्हें ज़्यादा कुछ करना नहीं है। और जिन्हें करना नहीं है वे बड़े उत्साह से कर रहे हैं — रोज़ यह डाल रहे हैं, वह दिखा रहे हैं, इतना सारा। वह कौन भोगेगा? वे स्वयं भोगेंगे, इसी तरह। वे फिर दूसरी या तीसरी पीढ़ी में जन्म लेंगे। कोई गति नहीं होगी, क्योंकि यह क्रिया-प्रधानता की चीज़ है, और यह नष्ट नहीं हो सकती।
इस तर्क का क्या कि देवी का भक्त सुरक्षित रहता है?
वह भाव-प्रधानता में कहा जाता है, और सिद्धि पाने का लाइसेंस नहीं था
अगर हम कहें कि नहीं, देवी का भक्त ऐसा होता है, या ऐसा-ऐसा, तो वह भाव-प्रधानता में कहा जा रहा है, वक्ता कहते हैं। उन्होंने आपसे सिद्धि पाने को नहीं कहा। यह विषय अपने तक सीमित रखना था; और इसके लिए गुरु को शुरू में ही आपको मार्गदर्शन देना चाहिए, जो भी परंपरा हो उसके अनुसार: कि आपको फलाने दिन फलाना करना है।
अगर हम कहें कि नहीं, देवी का भक्त ऐसा होता है, या इस तरह का — तो वह, वक्ता कहते हैं, भाव-प्रधानता में कहा जा रहा है। उन्होंने आपसे सिद्धि पाने को नहीं कहा। यह विषय अपने तक सीमित रखना था। और इसके लिए गुरु द्वारा आपको शुरू में ही मार्गदर्शन दिया जाना चाहिए: जो भी परंपरा हो, उस परंपरा के अनुसार, कि आपको फलाने दिन फलाना करना है।
पूर्णिमा पर ब्राह्मणों के श्रावणी उपाकर्म का तंत्र-आगम दीक्षितों के लिए कहीं बड़ा समकक्ष है
श्रावणी उपाकर्म, और तंत्र-आगम दीक्षितों के लिए कहीं बड़ा विषय
वक्ता उन लोगों की ओर इशारा करते हैं जो श्रावणी उपाकर्म विधि से करते हैं, जो अब पूर्णिमा पर होगा — श्रावणी पूर्णिमा पर ब्राह्मण जाकर यह सब करेंगे। वह विषय क्या है? वैदिक क्रम के अनुसार वे पूरे साल के लिए तय वह पूरा अभिषेक कर रहे हैं। पर बाकी सबके लिए, या जो तंत्र और आगम के अनुसार दीक्षित हैं उनके लिए, बहुत सारा विषय है।
जो लोग श्रावणी उपाकर्म आदि विधि से करते हैं, वक्ता कहते हैं — जो अब पूर्णिमा पर होगा; श्रावणी पूर्णिमा पर ब्राह्मण जाकर यह सब करेंगे — वह विषय क्या है? वैदिक क्रम के अनुसार वे पूरे साल के लिए तय वह पूरा अभिषेक कर रहे हैं। पर बाकी सबके लिए, या उन सबके लिए जो तंत्र और आगम के अनुसार दीक्षित हैं, बहुत सारा विषय है।
माला, यंत्र या कवच के शोधन की विधि क्या है?
पक्ष के अनुसार समय-समय पर पुनः प्रतिष्ठा और शुद्धिकरण
इतना भी जान लीजिए, वक्ता कहते हैं: जिस माला पर आप जप कर रहे हैं, जिस यंत्र पर पूजन कर रहे हैं, या जिस यंत्र के बारे में आप किसी को बता रहे हैं — उसके लिए बहुत व्यापक रूप में पूरा विधान है कि आपने जिस पक्ष में और जिस तरह उसे किया, उसके अनुसार समय-समय पर उसकी पुनः प्रतिष्ठा और शुद्धिकरण कब करना है। इसे शोधन की प्रक्रिया कहते हैं। चाहे यंत्र का हो, माला का हो, या कवच का — यह सबके लिए है।
इतना भी जान लीजिए, वक्ता कहते हैं: जिस माला पर आप जप कर रहे हैं, जिस यंत्र पर आप पूजन कर रहे हैं, या जिस यंत्र के बारे में आप किसी को बता रहे हैं — उसके लिए बहुत व्यापक रूप में पूरा विधान है कि समय-समय पर, आपने जिस पक्ष में और जिस तरह उसे किया उसके अनुसार, उसकी पुनः प्रतिष्ठा और शुद्धिकरण फिर कब करना है। इसे शोधन की प्रक्रिया कहते हैं। चाहे यंत्र का हो, माला का हो, या कवच का — यह सबके लिए है।
पूर्णाभिषिक्त होने तक लेन-देन सीमित क्यों रखा जाता है?
देने वाले का भार, और उसके बाद गुरु मंडल की कृपा
लेने वालों के लिए, वक्ता कहते हैं, बात बहुत सामान्य रहती है; पर चिंता देने वालों की है — और इसी कारण कहा गया है कि जब तक व्यक्ति पूर्णाभिषिक्त न हो जाए, यह लेन-देन की प्रक्रिया बहुत सीमित रखनी चाहिए। और पूर्णाभिषिक्त होने के बाद मंडल में, गुरु मंडल में, कम से कम आधी कुछ कृपा होती है — कि हाँ, परंपरा बढ़ाने के लिए धर्म-सम्मत कर्म हो रहा है — और वहाँ गुरुओं की कृपा से बहुत कुछ ठीक हो जाता है।
यह लेन-देन, वक्ता कहते हैं: लेने वालों के लिए विषय बहुत सामान्य रहता है; पर चिंता देने वालों की है। इसी कारण कहा गया है कि जब तक व्यक्ति पूर्णाभिषेक — पूर्णाभिषिक्त — न हो जाए, यह लेन-देन की प्रक्रिया बहुत सीमित रखनी चाहिए। और पूर्णाभिषिक्त होने के बाद क्या है: मंडल में, गुरु मंडल में, कम से कम आधी कुछ कृपा होती है — कि हाँ, परंपरा बढ़ाने के लिए धर्म-सम्मत कर्म किया जा रहा है — और वहाँ गुरुओं की कृपा से बहुत कुछ ठीक हो जाता है।
अब वृद्धि के लिए शोधन को टाल दिया जाता है — अपने परिवार तक सीमित रहिए
वृद्धि के लिए अनदेखा; अपने परिवार तक सीमित रहिए
पर जहाँ अधिकार नहीं है, वक्ता कहते हैं, वहाँ आपके आज के गुरु कहेंगे, अरे, कोई समस्या नहीं, करो, करो। समस्या है। जो मूल लोग थे उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा; मूल लोग पूरी तरह नियम से चलते आए। अब क्योंकि वृद्धि करनी है और ये चीज़ें बढ़ानी हैं, लोग यह सब पूरी तरह अनदेखा करते हैं। शोधन की प्रक्रिया कहीं नहीं हो रही। हो सकता है हो रही हो, वे मानते हैं, पर हालात देखकर लगता है कि करना तो दूर, उन्होंने इसके बारे में सुना भी नहीं होगा। और इसीलिए, वे कहते हैं, वे हमेशा कहते हैं: जो कर रहे हैं वह कीजिए, अपने परिवार तक सीमित रहिए — पर अगर परिवार से बाहर हलचल मचाने की कोशिश करेंगे, तो बाद में आपके साथ भी हलचल मचेगी, आप चाहे जिस क्षेत्र में हों।
पर बाकी के लिए, जहाँ अधिकार नहीं है — अब आपके आज के गुरु कहेंगे, अरे, कोई समस्या नहीं, करो, करो, वक्ता कहते हैं। समस्या है। जो मूल लोग थे, उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा। मूल लोग पूरी तरह नियम से चलते आए हैं। अब क्योंकि वृद्धि करनी है और ये चीज़ें बढ़ानी हैं, लोग यह सब पूरी तरह अनदेखा करते हैं। शोधन की प्रक्रिया कहीं नहीं हो रही। हो सकता है हो रही हो, पर जो स्थिति दिखती है उससे समझ आता है कि करना तो दूर, उन्होंने इसके बारे में सुना भी नहीं होगा। और यही कारण है, वे कहते हैं, कि वे हमेशा कहते हैं: अगर आप सच में इस चैनल से सीखते हैं, तो वे हमेशा यही कहते हैं — भाई, जो कर रहे हैं वह कीजिए, अपने परिवार तक सीमित रहिए। पर अगर परिवार से बाहर हलचल मचाने का प्रयास करेंगे, तो बाद में आपके साथ भी हलचल मचेगी। आप चाहे जिस क्षेत्र में हों।
राहु उसी चीज़ को मज़बूत करता है जो व्यक्ति को पहले से पसंद है, चाहे नियम से हो या नहीं
राहु उसी को मज़बूत करता है जो व्यक्ति को पहले से पसंद है
पर राहु का यह विषय इसमें इतना आता है, वक्ता कहते हैं। राहु क्या है? वह उस चीज़ को मज़बूत करता है जो हमें पसंद है। अगर किसी को अभी बताया गया नियम वाला मार्ग पसंद है, तो वह योग्य बनने का रास्ता खोजेगा, ताकि अगर इसी क्षेत्र में काम करना है तो पूरी नीति, नियम और विधि-विधान से हो। पर जो इसे दरकिनार करना चाहता है, उसके मन में राहु ठीक यही डालेगा: कि ये बेकार, बेतुकी बातें हैं, इनका कोई आधार ही नहीं। आधार तो आपको मिल जाएगा, वे कहते हैं, अगर हम दो-चार नाम बता दें — पर हम क्यों बताएँ? आप मौज कीजिए; हम भी मौज कर रहे हैं।
पर राहु का यह विषय इसमें इतना अधिक आता है, वक्ता कहते हैं। राहु क्या है? वह उस चीज़ को मज़बूत करता है जो हमें पसंद है। अगर किसी व्यक्ति को अभी जिस नियम वाले मार्ग की चर्चा हुई वह पसंद है, तो वह योग्य बनने का मार्ग खोजेगा — कि अगर हमें इसी क्षेत्र में काम करना है, तो पूरी नीति, नियम और विधि-विधान से हो। पर जो इसे दरकिनार करना चाहता है, उसके मन में राहु ठीक यही चीज़ डालेगा: कि ये बेकार, बेतुकी बातें हैं, इनका कोई आधार ही नहीं। आधार आपको मिल जाएगा, वे कहते हैं, अगर हम दो-चार नाम बता दें। पर हम क्यों बताएँ? आप मौज कीजिए; हम भी मौज कर रहे हैं।
शिष्य का कर्म किसका भार है?
गुरु को छठा भाग, पत्नी को आधा
वक्ता कहते हैं कि यह पूरा विषय समय आने पर वंशजों पर पड़ेगा, दूसरों के प्रारब्ध से जुड़ा वह कर्म जो जमा रह गया — इसीलिए रामकृष्ण परमहंस जी ने स्वयं इसे भोगा और चले गए; उन्होंने कष्ट सहा। ऐसे कई साधक मिलते हैं जिन पर उनके शिष्यों का भार पड़ता है: शिष्यों का छठा भाग गुरु पर पड़ता है। अगर आप किसी को शिष्य बना रहे हैं, और वह पाप करता है, तो उसका छठा भाग आपके पास आएगा। पत्नी को आधा दिया जाता है; गुरु को छठा दिया जाता है।
क्या शिष्य का पुण्य भी गुरु को मिलता है?
पुण्य और पाप दोनों का छठा भाग
तो जो सोचते हैं कि हम यह करेंगे, वह करेंगे — भाई, उसमें से उन पर पड़ रहा है। अगर वह पुण्य कर रहा है, तो वह भी आपको मिलेगा; और अगर वह पाप कर्म में लग गया, अगर आपने किसी अनधिकारी को दिया और वह अत्याचार करने लगा है, गलत कर रहा है, धर्म के विरुद्ध आचरण कर रहा है, तो वह भी मिलेगा — छठा भाग।
तो जो सोचते हैं, अरे, हम यह करेंगे और वह करेंगे — भाई, उससे उन पर पड़ रहा है, वक्ता कहते हैं। अगर वह पुण्य कर रहा है, तो वह भी आपको मिलेगा। और अगर वह पाप कर्म में लग गया — आपने किसी अनधिकारी को दे दिया, और वह अत्याचार करने लगा है और गलत कर रहा है, धर्म के विरुद्ध आचरण कर रहा है — तो वह भी मिलेगा, छठा भाग।
जमा हुआ संचित निमित्त बन जाता है, एक पिन जिस पर अभिचार अटकता है
संचित का निमित्त बनना, अभिचार के लिए पिन
और यही चीज़ जो जमा रहेगी — जैसा मोहित जी का प्रश्न था, अतीत के बारे में या किसी भी तरह — ये चीज़ें अभिचार के लिए बस निमित्त बन जाती हैं, वक्ता कहते हैं; वे पिन बन जाती हैं। ये जमा चीज़ें उस समय मन पर ज़ोर से चोट करेंगी और उन चीज़ों को नष्ट करने का प्रयास करेंगी, ताकि प्रारब्ध जल्दी नष्ट हो सके। और इसकी ताकत जितनी बढ़ेगी, कठिनाइयाँ उतनी बढ़ेंगी।
और यही चीज़ जो जमा रहेगी — जैसा मोहित जी का प्रश्न था, अतीत के बारे में या किसी भी तरह — ये चीज़ें, वक्ता कहते हैं, अभिचार के लिए बस निमित्त बनेंगी; वे पिन बन जाएँगी। जो चीज़ें जमा हैं, वे उस समय मन पर ज़ोर से चोट करेंगी और उन चीज़ों को नष्ट करने का प्रयास करेंगी, ताकि यहाँ प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। जल्दी नष्ट हो सके। और इसकी ताकत जितनी बढ़ेगी, कठिनाइयाँ उतनी बढ़ेंगी।
लेन-देन करने वालों को बहुत सजग रहना चाहिए, और कृपणता के जाल से बचना चाहिए
लेन-देन करने वालों के लिए बड़ी सजगता, और कृपणता का जाल
तो क्या करना चाहिए, वक्ता पूछते हैं। भाई, जो लेन-देन की प्रक्रिया करते हैं उन्हें बहुत अधिक सजग रहना चाहिए। अगर वे नीति-नियम का पालन नहीं कर रहे और कृपण बन रहे हैं, तो याद रखिए: कृपणता कहीं का नहीं छोड़ती।
तो फिर क्या करना चाहिए, वक्ता पूछते हैं। भाई, जो लोग लेन-देन की प्रक्रिया करते हैं, उन्हें बहुत अधिक सजग रहना चाहिए। अगर वे नीति-नियम का पालन नहीं कर रहे, अगर वे कृपण बन रहे हैं, तो कृपणता — याद रखिए — कहीं का नहीं छोड़ती।
पार्वती गीता के तीसरे अध्याय के अंतिम श्लोक यह बताते हैं
पार्वती गीता के तीसरे अध्याय के अंतिम श्लोक
अगर आप देवी भक्त हैं, वक्ता कहते हैं, तो इसे पार्वती गीता में पढ़िए। पार्वती गीता के पाँच अध्यायों में से तीसरे अध्याय के अंतिम चार-पाँच श्लोक पढ़िए। उसमें क्या विषय लिखा है? आप समझ जाएँगे कि कठिनाई कहाँ है।
अगर आप देवी भक्त हैं, वक्ता कहते हैं, तो इसे पार्वती गीता में पढ़िए। पार्वती गीता में जो पाँच अध्याय हैं, उन पाँचों में से तीसरे अध्याय के अंतिम चार-पाँच श्लोक पढ़िए। उसमें कौन-सा विषय लिखा गया है — वह विषय क्या है? आप समझ जाएँगे, वे कहते हैं, कि कठिनाई कहाँ है।
क्या शिव रक्षा स्तोत्र और अमोघ शिव कवच के प्रभाव में अंतर है?
दो अलग विषय, अलग प्रभाव
यह पूछे जाने पर कि शिव रक्षा स्तोत्र का अनुष्ठान कैसे करें और एक शिव कवच से उसके प्रभाव में क्या अंतर है, वक्ता कहते हैं कि प्रभाव में ज़रूर अंतर होगा। शिव रक्षा स्तोत्र एक अलग विषय हो जाता है; और अमोघ शिव कवच में बहुत सारा विषय है, इसलिए दोनों के प्रभाव ज़रूर अलग हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि शिव रक्षा स्तोत्र का अनुष्ठान कैसे करें — जो, वक्ता बताते हैं, पहले ही बताया जा चुका है — और एक शिव कवच से प्रभाव में क्या अंतर है। प्रभाव में ज़रूर अंतर होगा, वे कहते हैं। शिव रक्षा स्तोत्र एक अलग विषय हो जाता है। और अमोघ शिव कवच में बहुत सारा विषय है, इसलिए दोनों के प्रभाव ज़रूर अलग हैं।
क्या देवी सूक्त और रात्रि सूक्त का जप गौ-श्रृंगी से किया जा सकता है?
शंख का प्रयोग कीजिए, और शिवलिंग की जगह भगवती पर कीजिए
यह पूछे जाने पर कि क्या देवी सूक्त और रात्रि सूक्त का जप गौ-श्रृंगी से हो सकता है, और क्या शिवलिंग के अर्घ्य पर हो सकता है, वक्ता कहते हैं कि चाँदी आदि से हो सकता है, पर शंख से कीजिए। और शिवलिंग के अर्घ्य पर नहीं, भगवती पर कीजिए। शिवलिंग को शिवलिंग के अनुसार चलने दीजिए।
यह पूछे जाने पर कि देवी सूक्त और रात्रि सूक्त का जप गौ-श्रृंगी से किया जा सकता है या नहीं, और क्या शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। के अर्घ्य पर किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि चाँदी आदि से किया जा सकता है, पर शंख से कीजिए। और शिवलिंग के अर्घ्य पर नहीं, भगवती पर कीजिए। शिवलिंग को शिवलिंग के अनुसार चलने दीजिए, वे कहते हैं।
क्या खोखली हनुमान मूर्ति में धातु भरवाई जा सकती है?
प्रतिष्ठित, पूजित विग्रह में ऐसा मत कीजिए
यह पूछे जाने पर कि क्या अंदर से खोखली हनुमान जी की मूर्ति में धातु भरवाई जा सकती है, वक्ता कहते हैं कि अब अगर आप धातु भरवाएँगे तो वे उसे गर्म करके डालेंगे — और पूजित विग्रह प्रतिष्ठित हो जाता है, इसलिए ऐसा मत करवाइए। और शुरू में गणपति जी का, भैरव जी का गुरु पूजन कीजिए, और राम जी और सीता जी का पूजन करके, फिर कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या अंदर से खाली हनुमान जी की मूर्ति में धातु भरवाई जा सकती है, अब, वक्ता श्रोता मुकेश से कहते हैं, अगर आप धातु भरवाएँगे तो वे उसे गर्म करके डालेंगे — और पूजित विग्रह प्रतिष्ठित हो जाता है। इसलिए ऐसा मत करवाइए। और शुरुआत में गणपति जी का, भैरव जी का गुरु पूजन कीजिए, और राम जी और सीता जी का पूजन करके, फिर कीजिए।
क्या रोज़ किसी पुराण का एक अध्याय पढ़ने में कोई दोष है?
अपने आराध्य के पुराण का रोज़ एक अध्याय
वक्ता श्रोता वीरेंद्र साहू से कहते हैं कि वे रोज़ एक अध्याय पढ़कर बहुत अच्छा कर रहे हैं, और इसमें कोई दोष नहीं। जो भी हों, वे कहते हैं, अगर इसी तरह वे अपने आराध्य का कोई एक पुराण लें — देवी माँ भागवत लें, जिसकी भी पूजा करते हैं उसका पुराण लें — और रोज़ एक अध्याय पढ़ें, तो यह बहुत-बहुत अच्छी बात है। इसमें कोई दोष नहीं।
वीरेंद्र साहू जी बहुत अच्छा कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं; आप रोज़ एक अध्याय पढ़ रहे हैं, और भाई, इसमें कोई दोष नहीं। जितने भी लोग हैं, अगर इसी तरह वे अपने आराध्य का कोई एक पुराण लें — देवी माँ भागवत लें, जिसकी भी पूजा करते हैं उसका पुराण लें — और रोज़ एक अध्याय पढ़ें, तो यह बहुत-बहुत अच्छी बात है। इसमें कोई दोष नहीं।
क्या साधना काल में दवा ली जा सकती है?
शरीर को ज़रूरत हो तो दवा मत छोड़िए
बिल्कुल लीजिए, भाई, वक्ता कहते हैं। शरीर स्वस्थ रहेगा तभी आप साधना कर पाएँगे; अगर शरीर में बिना दवा के चलने का सामर्थ्य नहीं है, तो दवा मत छोड़िए।
क्या साधना काल में दवा ली जा सकती है — बिल्कुल लीजिए, भाई, वक्ता कहते हैं। शरीर स्वस्थ रहेगा तभी आप साधना कर पाएँगे। अगर शरीर में बिना दवा के चलने का सामर्थ्य नहीं है, तो दवा मत छोड़िए।
पवित्रीकरण मंत्र क्या है और उसका अर्थ क्या है?
अपवित्रः पवित्रो वा — पुण्डरीकाक्ष का स्मरण
वक्ता पूछते हैं कि पवित्रीकरण मंत्र पढ़ते समय हम क्या कहते हैं, और उसे बताते हैं: अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ तो, वे कहते हैं, हम भगवान पुण्डरीकाक्ष का स्मरण कर रहे हैं: कि हम जिस भी अवस्था में हों, हमें बाहर और भीतर से पवित्र कीजिए। यानी भगवान पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करके हम हर तरह से पवित्र हो जाते हैं। उस मंत्र में यह भावना रखिए।
जब हम पवित्रीकरण मंत्र पढ़ते हैं, वक्ता पूछते हैं, तो क्या कहते हैं? अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ तो हम भगवान पुण्डरीकाक्ष का स्मरण कर रहे हैं: कि हम जिस भी अवस्था में हों, बाहर और भीतर से हमें पवित्र कीजिए। यानी भगवान पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करके हम हर तरह से पवित्र हो जाते हैं। उस मंत्र में यह भावना रखिए, वे कहते हैं।
शास्त्र क्या कहता है
Whoever, pure or impure and in whatever state, remembers the lotus-eyed Lord becomes pure within and without; the verse opens Brahmā's rule of twilight worship.
The print reads सर्व्वावस्थां where the speaker has the common सर्वावस्थां.
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अथ सन्ध्याविधिं वक्ष्ये द्विजातीनां समासतः । अपवित्रः पवित्रो वा सर्व्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥ १ ॥
ब्रह्मा ने कहा: अब मैं द्विजों की सन्ध्या-विधि संक्षेप में बताऊँगा। पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी दशा में हो, जो कमलनयन भगवान को याद करता है, वह भीतर और बाहर शुद्ध है।
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क्या दवा लेने के बाद खुद को अपवित्र मानना चाहिए?
मंत्र का अर्थ समझिए और अपवित्रता का भाव मत रखिए
उस मंत्र का अर्थ समझिए, वक्ता कहते हैं, और उसमें वह भावना रखिए। दवा लेने पर अगर लगे कि शरीर अब अपवित्र हो गया है, तो वह भाव मत लाइए। शरीर अन्नमय कोश है, और उसे चलाने के लिए, भाई, दवा लेनी पड़ती है — हम उस सामर्थ्य से युक्त नहीं हैं, इसलिए दवा लीजिए।
उस मंत्र का अर्थ समझिए, वक्ता कहते हैं, और उसमें वह भावना रखिए। दवा लेने पर अगर ऐसा लगे कि शरीर अब अपवित्र हो गया है, तो वह भाव मत लाइए। शरीर अन्नमय कोश है; उसे चलाने के लिए, भाई, दवा लेनी पड़ रही है। हम उस सामर्थ्य से युक्त नहीं हैं — इसलिए दवा लीजिए।
स्नान के बाद आसन पर, नारायण के रूप का स्मरण करते हुए, भावना रखी जाती है
स्नान के बाद आसन पर, नारायण के रूप का स्मरण करते हुए
पर जब पवित्र होकर, स्नान आदि के बाद, आप अपने आसन पर बैठकर पवित्रीकरण मंत्र पढ़ें, तो वह भावना हमेशा याद रखिए: नारायण के उस रूप का ध्यान करते हुए, कि हमने आपका स्मरण किया, आपका मंत्र पढ़ा, अब हम पवित्र हैं। इस भाव पर ध्यान दीजिए।
पर जब पवित्र होकर, स्नान आदि के बाद, आप अपने आसन पर बैठकर पवित्रीकरण मंत्र पढ़ें, तो वह भावना हमेशा याद रखिए, वक्ता कहते हैं। नारायण के उस रूप का ध्यान करते हुए: कि हमने आपका स्मरण किया, आपका मंत्र पढ़ा, और अब हम पवित्र हैं। इस भाव पर अपना ध्यान दीजिए।
शरीर में ऊर्जा भरने और आलस्य दूर करने वाला क्या है?
महामृत्युंजय का वीर अभिषेक
यह पूछे जाने पर कि शरीर में ऊर्जा कैसे भरे, कि युद्ध के समय उसे याद करके व्यक्ति बहुत भयंकर हो जाए और कोई आलस्य न आए, वक्ता कहते हैं कि इसके लिए महामृत्युंजय का वीर अभिषेक है। वीर श्रेणी की सभी शक्तियों के दीक्षित साधक जब मंत्रों का पुरश्चरण — महापुरश्चरण — पूरा करते हैं, उदाहरण के लिए महामृत्युंजय को ही लें, जिसकी रूप के अनुसार अलग-अलग क्रमागत दीक्षाएँ और मंत्र हैं।
यह पूछे जाने पर कि शरीर में ऊर्जा कैसे भरे, कि युद्ध के समय उसे याद करने पर व्यक्ति बहुत भयंकर हो जाए और कोई आलस्य न आए, इसके लिए, वक्ता कहते हैं, महामृत्युंजय मंत्र का वीर अभिषेक है। वीर श्रेणी की जितनी शक्तियाँ हैं, उनके दीक्षित साधक — उदाहरण के लिए महामृत्युंजय को ही लें, जिसकी रूप के अनुसार अलग-अलग क्रमागत दीक्षाएँ और मंत्र हैं — जब वे मंत्रों का पुरश्चरण और महापुरश्चरण पूरा करते हैं।
चंडी कवच, भद्रकाली का वीर कवच, शिव का अघोर कवच, वीरभद्र का और पंचमुखी हनुमान का
चंडी कवच, भद्रकाली का वीर कवच, शिव का अघोर कवच, वीरभद्र का और पंचमुखी हनुमान का
वक्ता कहते हैं कि पहले के समय में यह होता था कि सेना में जाने वाले वीर योद्धाओं पर युद्ध में विजय पाने के लिए वही न्यास किया जाता था। इसी तरह, वे कहते हैं, श्री दुर्गा सप्तशती आदि का चंडी कवच, भगवती भद्रकाली का वीर कवच, भगवान शिव का अघोर कवच, भगवान वीरभद्र का रक्षा देने वाला कवच, पंचमुखी हनुमान जी का कवच — ये सब उग्रता से युक्त कवच लीजिए। इन सब कवचों का न्यास: यहाँ कवच के न्यास का अर्थ पूरे कवच का न्यास है।
इनमें, जब वे पुरश्चरण और महापुरश्चरण पूरा करते हैं, तो पहले के समय में, वक्ता कहते हैं, यह होता था कि सेना में जाने वाले वीर योद्धाओं पर युद्ध में विजय पाने के लिए वही न्यास किया जाता था। इसी तरह, श्री दुर्गा सप्तशती आदि का चंडी कवच, भगवती भद्रकाली का वीर कवच, भगवान शिव का अघोर कवच, भगवान वीरभद्र का रक्षा देने वाला कवच — ये सब उग्रता से युक्त कवच, पंचमुखी हनुमान जी का कवच। इन सब कवचों का न्यास — यहाँ कवच के न्यास का अर्थ पूरे कवच का न्यास है।
इसे केवल वही साधक कर सकता है जिसने कवच सिद्ध किया हो, और संकल्प के साथ
कवच सिद्ध किए हुए साधक का संकल्प के साथ करना
वक्ता स्पष्ट करते हैं कि वे यहाँ बाद में आने वाले विनियोग और मंत्र ऋषि न्यास की बात नहीं कर रहे। ध्यान रखिए, वे कहते हैं, कि पूरे कवच के न्यास की प्रक्रिया से ही यह चीज़ होती है — पर उसके लिए या तो किसी साधक ने कवच सिद्ध किया हो और संकल्प लेकर आप पर करे। रही इस पूरे विषय की बात, वे कहते हैं, तो व्यावहारिक रूप से उन्होंने इसे अपनी आँखों के सामने नहीं देखा, इसलिए वे इसे बता नहीं सकते — पर सुना ज़रूर है।
यहाँ हम उसके बाद आने वाले विनियोग और मंत्र ऋषि न्यास आदि की बात नहीं कर रहे, वक्ता कहते हैं। ध्यान रखिए कि पूरे कवच के न्यास की प्रक्रिया से ही यह चीज़ होती है। पर उसके लिए, या तो साधक ने कवच सिद्ध किया हो, और संकल्प लेकर आप पर करे — वह विषय — या, इस पूरे विषय की बात करें तो, व्यावहारिक रूप से उन्होंने इसे अपनी आँखों के सामने नहीं देखा, इसलिए वे इसे कह नहीं सकते। पर सुना ज़रूर है।
दतिया वाले स्वामी जी की सामग्री में ऐसे गोपनीय ग्रंथों का पुस्तकालय है
दतिया वाले स्वामी जी की सामग्री और गोपनीय ग्रंथों का पुस्तकालय
वक्ता कहते हैं कि दतिया वाले स्वामी जी के पूरे बृहद विषय में ऐसे कई गुप्त विषय दिए गए हैं — उनका पूरा व्यक्तिगत विवरण, उनका नाम क्या है, उनके गुरु कौन हैं, सब वहाँ बताया गया है, और उसमें इन सब विषयों की सामग्री है। और वे कहते हैं कि शायद वहाँ एक पुस्तकालय भी खुलने वाला है, जिसमें उनके गोपनीय ग्रंथ रखे जाएँगे। दतिया क्षेत्र के कई साधक वीडियो देखते हैं, और हो सकता है वे स्वयं उन चीज़ों को सामने लाएँ, तो आप तक और जानकारी पहुँचेगी।
दतिया वाले स्वामी जी के पूरे बृहद विषय में, वक्ता कहते हैं, ऐसे बहुत सारे गुप्त विषय बताए गए हैं — जिनमें उनका पूरा व्यक्तिगत विवरण, उनका नाम क्या है, उनके गुरु कौन हैं, सब कुछ बताया गया है; और उसमें इन सब विषयों की सामग्री है। और अभी शायद वहाँ एक पुस्तकालय भी खुलने वाला है, जिसमें उनके गोपनीय ग्रंथ रखे जाएँगे। दतिया क्षेत्र में कई साधक हैं जो हमारे सारे वीडियो देखते हैं। हो सकता है वे लोग स्वयं उन चीज़ों को सामने लाएँ, और तब आपको इन विषयों पर और जानकारी मिलेगी।
भैरव जी का आवाहन इसलिए होता है कि आलस्य कभी न आए, और उनके साथ महागणपति का
भैरव जी और महागणपति
भैरव जी का है, वक्ता कहते हैं — ताकि आलस्य बिल्कुल न आए, ताकि व्यक्ति भयंकर बन जाए — और महागणपति का है।
भैरव जी का है, वक्ता कहते हैं, ताकि आलस्य बिल्कुल न आए, ताकि व्यक्ति भयंकर बन सके। महागणपति का है।
हमारे भीतर के तत्व सप्तशती से कैसे जुड़े हैं?
नवार्ण में अग्नि, वायु और सूर्य तत्व
वक्ता श्रोता अभिषेक से कहते हैं कि सारे तत्व हमारे भीतर हैं, और सप्तशती में इन तत्वों का संबंध उस शक्ति से भी है जो वहाँ उपस्थित है। अग्निवायुसूर्यास्तत्त्वानि — जब आप नवार्ण में जाते हैं तो यह तीनों तत्वों के साथ आता है। हालाँकि, वे बताते हैं, प्रचलित सप्तशती में तत्वों के साथ विनियोग और न्यास नहीं दिया गया है।
सारे तत्व हमारे भीतर हैं, वक्ता श्रोता अभिषेक से कहते हैं, इसलिए सप्तशती में इन तत्त्व का संबंध उस शक्ति से भी है जो वहाँ उपस्थित है — जो भी शक्ति हो। अग्निवायुसूर्यास्तत्त्वानि: जब आप नवार्ण मंत्र में जाते हैं, तो यह तीनों तत्वों के साथ आता है। हालाँकि प्रचलित सप्तशती में, वे बताते हैं, तत्वों के साथ विनियोग और न्यास नहीं दिया गया है।
शास्त्र क्या कहता है
The viniyoga of the Saptaśatī's three episodes names fire, wind and sun as their elements (अग्निवायुसूर्यास्तत्त्वानि).
The speaker says the Saptaśatī gives no tattva in its viniyoga; the viniyoga before the recitation does name them.
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प्रथममध्यमोत्तरचरित्राणां ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि, नन्दाशाकम्भरीभीमाः शक्तयः, रक्तदन्तिकादुर्गाभ्रामर्यो बीजानि, अग्निवायुसूर्यास्तत्त्वानि, ऋग्यजुःसामवेदा ध्यानानि, सकलकामनासिद्धये श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ।
प्रथम, मध्यम और उत्तम चरित्रों के ऋषि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं; देवता श्रीमहाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती हैं; छन्द गायत्री, उष्णिक् और अनुष्टुप् हैं; शक्तियाँ नन्दा, शाकम्भरी और भीमा हैं; बीज रक्तदन्तिका, दुर्गा और भ्रामरी हैं; तत्त्व अग्नि, वायु और सूर्य हैं; ध्यान ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं। सब कामनाओं की सिद्धि और महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की प्रसन्नता के लिए जप में इसका विनियोग है।
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मूल सप्तशती प्रचलित सप्तशती से कैसे अलग है?
कहीं बड़ा पाठ, जिसमें हर अध्याय के अनुसार तत्व दिए गए हैं
पर मूल सप्तशती में, पुरानी वालियों में, वक्ता कहते हैं, अर्गला स्तोत्र, कीलक और सब कुछ बहुत बड़ा है — जिसे हम देखते हैं उस प्रचलित से बहुत अलग — और उसमें इस सबका पूरा विषय मौजूद है। दूसरी बात, वे कहते हैं, केवल तीन चरित्र और छह अंग ही नहीं; और भी विषय हैं, जो हर अध्याय के अनुसार चलते हैं, और उनमें भी तत्वों का व्यापक विवेचन है, और वे तत्व उसमें की मुख्य ऊर्जा, मुख्य शक्ति से सीधे जुड़े हैं।
पर मूल सप्तशती, पुरानी वाली, वक्ता कहते हैं — उनमें अर्गला स्तोत्र, कीलक, सब कुछ बहुत बड़ा है। जिसे हम प्रचलित रूप में देखते हैं, वह उससे बहुत अलग है, इसलिए उसमें इस सबका पूरा विषय मौजूद है। दूसरी बात यह है कि केवल तीन चरित्र और छह अंग ही नहीं; और भी विषय हैं, जो हर अध्याय के अनुसार चलते हैं, और उनमें भी तत्त्व का व्यापक विवेचन है। और वे तत्व उसमें की मुख्य ऊर्जा, मुख्य शक्ति से सीधे जुड़े हैं।
महाकाली की एकाक्षरी दीक्षा कैसे प्राप्त करें?
दीक्षा पाने के लिए किए जाने वाले संपुट की संख्या तय मत कीजिए
एक श्रोता तंत्र देवी सूक्त के जयंती मंगला काली से संपुट के बारे में पूछते हैं, और यह कि भगवती महाकाली की एकाक्षरी दीक्षा कैसे मिले, और कितना करें। वक्ता कहते हैं कि देवी सूक्त का जयंती मंगला से संपुट ठीक है। पर अगर आप संपुट इसलिए करना चाहते हैं कि दीक्षा मिल जाए, तो उसके लिए संख्या तय मत कीजिए — वह जब होना होगा तब होगा। पहले दोनों का स्वतंत्र रूप से जितना हो सके जप कीजिए, और उसके बाद ही संपुट कीजिए।
महेश नाम के एक श्रोता ने कई प्रश्न एक साथ लिखे हैं: तंत्र देवी सूक्त का जयंती मंगला काली से संपुट, और भगवती महाकाली की एकाक्षरी दीक्षा कैसे मिले, और कितना करें। देवी सूक्त का जयंती मंगला से संपुट करना है, वक्ता कहते हैं; वह ठीक है। उसके बाद आप लिखते हैं कि भगवती महाकाली की एकाक्षरी दीक्षा कैसे मिलेगी, और कितना करना होगा — चार हज़ार, चार हज़ार, संख्या तय करते हुए। अच्छा, तो आप संपुट इसलिए करना चाहते हैं कि आपको दीक्षा मिल जाए। तो उसके लिए संख्या तय मत कीजिए। वह जब होना होगा तब होगा। पहले दोनों का स्वतंत्र रूप से जितना हो सके जप कीजिए, और फिर वह संपुट कीजिए।
पार्वती गीता कहाँ मिल सकती है?
पहले से ग्रुप में है, और ऑनलाइन पीडीएफ़ में भी
वक्ता श्रोता गिरजा से कहते हैं कि पार्वती गीता पहले ही ग्रुप में डाली जा चुकी है, और अब सारी पीडीएफ़ ऑनलाइन भी मिल जाती है।
पार्वती गीता, वक्ता श्रोता गिरजा से कहते हैं, पहले ही ग्रुप में डाली जा चुकी है। अब, वे कहते हैं, सारी पीडीएफ़ आपको ऑनलाइन भी मिल जाएगी।
किस देवता का अभिषेक किस पात्र से होता है?
गोमुख श्रृंगी, योनि पात्र, शंख, गजमुख श्रृंगी — और भगवती के लिए श्री-युक्त शंख
एक श्रोता कहते हैं कि शिव जी को गोमुख श्रृंगी से, देवी को योनि पात्र से, नारायण को शंख से, और लक्ष्मी जी को गजमुख श्रृंगी से स्नान कराया जाता है, और पूछते हैं कि देवी सरस्वती का किस विशेष पात्र से होता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि भगवती के सभी रूपों के लिए श्री-युक्त शंख से करें तो सबसे उत्तम है — सरस्वती जी के लिए सफ़ेद वाला।
श्रोता आर्यन मोदी पूछते हैं: शिव जी का अभिषेक गोमुख श्रृंगी से, देवी का योनि पात्र से, नारायण का शंख से, लक्ष्मी जी का गजमुख श्रृंगी से होता है — तो देवी सरस्वती का अभिषेक किस विशेष पात्र से होता है? भगवती के सभी रूपों के लिए, वक्ता उत्तर देते हैं, अगर आप श्री-युक्त शंख से करें, तो सबसे उत्तम है। सरस्वती जी के लिए सफ़ेद वाला।
क्या पाठ वाले आसन पर खड़े होकर आरती की जा सकती है?
अपने पाठ के आसन पर खड़े होकर आरती करना ठीक है
यह पूछे जाने पर कि जिस आसन पर बैठकर पाठ करते हैं उस पर खड़े होकर आरती की जा सकती है या नहीं, वक्ता कहते हैं: बिल्कुल कर सकते हैं।
यह पूछे जाने पर कि जिस आसन पर बैठकर पाठ करते हैं, उस पर खड़े होकर आरती की जा सकती है या नहीं, बिल्कुल कर सकते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं।
अगर श्रावण में शिवलिंग के पास बैठकर पाठ न हो सके तो?
नंदी जी के पास बैठिए और पाठ उनके कान में अर्पित कीजिए
वक्ता कहते हैं कि श्रावण में अगर शिवलिंग के पास बैठकर पाठ करना न बने, तो आप नंदी जी के पास बैठकर पाठ करके नंदी जी को अर्पित कर सकते हैं। पाठ नंदी जी को कीजिए; समर्पण के लिए शिवलिंग के पास जाइए। अगर न जा सकें, तो वहीं अर्पित करके नंदी जी के कान में कहिए — एक कान बंद करके दूसरे में — कि मेरा यह जप प्रभु जी तक पहुँचा दीजिए। वे पहुँचा देंगे, वक्ता कहते हैं।
सावन में, वक्ता कहते हैं, अगर शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। के पास बैठकर पाठ करना न बने, तो आप नंदी जी के पास बैठकर पाठ करके नंदी जी को अर्पित कर सकते हैं। पाठ नंदी जी को कीजिए; समर्पण के लिए शिवलिंग के पास जाइए। अगर जाने को न मिले, तो वहीं अर्पित करके नंदी जी के कान में कहिए। एक कान बंद करके, दूसरे में: कि मेरा यह जप प्रभु जी तक पहुँचा दीजिए। वे पहुँचा देंगे, वक्ता कहते हैं।
क्या हनुमान जी के बाल रूप की मूर्ति रखी जा सकती है?
बाल हनुमान की मूर्ति माँ अंजना के साथ रखिए
यह पूछे जाने पर कि क्या हनुमान जी के बाल स्वरूप की मूर्ति रखी जा सकती है, वक्ता कहते हैं: रखिए, भाई — आजकल लोग सब कुछ रख रहे हैं, आप रख सकते हैं, अगर आपकी भावना उस रूप में है। बाल हनुमान जी के लिए रख सकते हैं; उनकी मूर्ति माँ अंजना के साथ रखिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या हनुमान जी के बाल स्वरूप की मूर्ति रखी जा सकती है, रखिए, भाई, वक्ता कहते हैं; आजकल लोग सब कुछ रख रहे हैं, आप रख सकते हैं, अगर आपकी भावना उस रूप में है। बाल हनुमान जी के लिए रख सकते हैं। उनकी मूर्ति माँ अंजना के साथ रखिए।
क्या विवाहित बेटी अपने मायके के भारी पितृदोष के लिए उपाय कर सकती है?
उनसे दक्षिणा लेकर ही करना चाहिए
एक श्रोता बताती हैं कि उनके मायके में भारी पितृदोष है, जिसका असर बहनों और भाई पर है, पर वहाँ कोई ठोस उपाय नहीं हो रहा, और पूछती हैं कि क्या वे और उनके पति कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि विवाह के बाद अगर आप उन लोगों से दक्षिणा लिए बिना करेंगी, तो कुछ नहीं होगा। सीधी बात है कि अब आप उनके घर की नहीं रहीं; विवाह हो गया और अब आप अलग हैं। चाहें तो माता-पिता के लिए कर सकती हैं, पर फिर नीति-नियम के अनुसार — उनसे, उनकी ओर से कम से कम सौ रुपये दक्षिणा लीजिए, ताकि प्रभाव मिले।
एक श्रोता पूछती हैं: उनके मायके में भारी पितृदोष है, जिसका प्रभाव बहनों और भाई पर पड़ रहा है, पर वे वहाँ कोई ठोस उपाय नहीं करवा रहे — तो क्या वे और उनके पति उपाय कर सकते हैं, और क्या कर सकते हैं; वे विवाहित हैं। देखिए, वक्ता कहते हैं: विवाह के बाद अगर आप उन लोगों से दक्षिणा लिए बिना करेंगी, तो कुछ नहीं होगा। सीधी बात है कि अब आप उनके घर की नहीं रहीं; विवाह हो गया, और अब आप अलग हैं। अगर आप अपने माता-पिता के लिए करना चाहें तो कर सकती हैं। पर फिर यहाँ जो नीति-नियम लागू होते हैं उनके अनुसार, सीधी बात है: उनसे, उनकी ओर से कम से कम सौ रुपये दक्षिणा लीजिए, ताकि प्रभाव मिले।
दक्षिणा लेना क्यों ज़रूरी है?
विवाह से पहले और बाद का संबंध अलग है; भाव बनाम क्रिया
एक तरह से कहें तो, वक्ता कहते हैं, हम अपना पारिश्रमिक ले रहे हैं — क्योंकि अगर आप वैसे करती हैं, तो विवाह से पहले का उनसे संबंध और आज की स्थिति, दो अलग बातें हैं। भाव-प्रधानता का विषय एक बात हो जाती है और क्रिया का विषय दूसरी। तो जितना चाहें, जो चाहें कीजिए; पर महीने में सौ रुपये ही सही, उन्हें बताकर कि हमने जो जप-तप किया उसके निमित्त — और फिर वे दें, और वह आपके हिस्से से कट जाएगा।
एक तरह से कहें, अगर कहना चाहें, वक्ता कहते हैं, तो हम अपना पारिश्रमिक ले रहे हैं। क्योंकि अगर आप वैसे करती हैं, तो विवाह से पहले का उनसे संबंध और आज की बात, दो अलग चीज़ें हैं। भाव-प्रधानता का विषय एक हो जाता है; क्रिया का विषय दूसरा। तो आप जितना चाहें, जो चाहें कीजिए — पर महीने में सौ रुपये ही सही, उन्हें यह बताकर कि हमने जितना जप-तप किया उसके निमित्त। और फिर वे दें, और वह आपके हिस्से से कट जाएगा।
वह बिना कुछ लिए कब कर सकती थी?
केवल तब जब भाई न हों और पूरी ज़िम्मेदारी उसी की हो
अब इसमें, वक्ता कहते हैं, विद्वान लोग कई तरह के विषय रख सकते हैं, कि नहीं, वह बिल्कुल कर सकती है। वह कब कर सकती थी? जब आपके भाई न होते, जब कोई और न होता — तब पूरी ज़िम्मेदारी आपकी होती और आप दोनों ही करते। पर वहाँ सब मौजूद हैं, और आप कर रही हैं; तो फिर वहाँ से कुछ लेकर करना चाहिए।
अब इसमें, वक्ता कहते हैं, विद्वान लोग कई तरह के विषय रख सकते हैं। कि नहीं, वह बिल्कुल कर सकती है। वह कब कर सकती थी? जब आपके भाई न होते। जब कोई और न होता — तब पूरी ज़िम्मेदारी आपकी होती; आप दोनों ही करते। पर वहाँ सब मौजूद हैं, और आप कर रही हैं। तो फिर वहाँ से कुछ लेकर करना चाहिए।
बच्चे के पाप किस उम्र तक नहीं लगते?
बारह से तेरह को आधा-आधा माना जाता है, और गिनती तेरह के बाद से
यह पूछे जाने पर कि क्या चौदह साल तक पाप नहीं लगते, वक्ता कहते हैं कि भाई, यह तेरह साल तक नहीं रहता। बारहवाँ शुरू होता है, बारहवाँ खत्म होता है; बारह और तेरह के बीच आधा-आधा मानिए। तेरह तक अभी भी नहीं गिना जाता; तेरह के बाद से गिना जाता है। पर आज के समय को देखते हुए, वे कहते हैं, इससे भी पहले से गिना जाना चाहिए।
क्या चौदह साल तक पाप नहीं लगते — भाई, यह तेरह साल तक नहीं रहता, वक्ता कहते हैं। बारहवाँ शुरू होता है, बारहवाँ खत्म होता है; बारह और तेरह के बीच आधा-आधा मानिए। तेरह तक अभी भी नहीं गिना जाता; तेरह के बाद से गिना जाता है। पर आज के समय को देखते हुए, वे कहते हैं, इससे भी पहले से गिना जाना चाहिए।
क्या स्त्रियाँ पितरों के लिए गीता पाठ और दूसरे उपाय कर सकती हैं?
हाँ, दूर्वा या कुश की अंगूठी के साथ
यह पूछे जाने पर कि क्या स्त्रियाँ पितरों के लिए गीता पाठ या कोई और उपाय कर सकती हैं, वक्ता कहते हैं: बिल्कुल कर सकती हैं। भगवद्गीता के पाठ में कोई समस्या नहीं। दूर्वा की अंगूठी, कुश की अंगूठी पहनिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या स्त्रियाँ पितृ के लिए गीता का पाठ या कोई और उपाय कर सकती हैं, बिल्कुल कर सकती हैं, वक्ता कहते हैं। भगवद्गीता का पाठ करने में कोई समस्या नहीं। दूर्वा की अंगूठी, कुश की अंगूठी पहनिए।
परिवार को मोहिनी वशीकरण से कैसे बचाएँ?
रोज़ की सेवा, संध्या की दस माला और कवच पुरश्चरण
यह पूछे जाने पर कि आजकल बहुत चल रहे मोहिनी वशीकरण से अपने परिवार के लोगों को कैसे बचाएँ, वक्ता कहते हैं: अगर आप रोज़ सुबह-शाम सामान्य सेवा-पूजा भी करते हैं, जितनी बताई जाती है, और अपनी संध्या की दस माला रखते हैं, और किसी एक कवच का पुरश्चरण किया है — कामाख्या कवच कीजिए — तो घर में कोई भी वशीकरण आप पर असर नहीं करेगा।
यह पूछे जाने पर कि आजकल बहुत चल रहे मोहिनी वशीकरण से अपने परिवार के लोगों को कैसे बचाएँ, अगर आप नित्य सुबह-शाम की सेवा-पूजा करते हैं, सामान्यतः जितनी बताई जाती है उतनी भी, वक्ता कहते हैं, और अपनी संध्या की दस माला रखी है, और किसी एक कवच का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। किया है — कामाख्या कवच कीजिए — तो घर में कोई भी वशीकरण आप पर कोई असर नहीं देगा।
मारकेश शुक्र दशा चल रही हो और स्वास्थ्य खराब हो तो क्या उपाय है?
शुक्रवार को दान, भंडारा, और चींटियों के लिए चीनी
एक श्रोता बताते हैं कि शुक्र की दशा चल रही है, शुक्र मारकेश है, और स्वास्थ्य बहुत खराब है। वक्ता कहते हैं: कम से कम शुक्रवार के दिन दान दीजिए। और कुछ नहीं तो भंडारा कीजिए। भंडारे के लिए पैसे की कमी नहीं होगी — कितना पैसा चाहिए? ज़्यादा नहीं, भाई, दस रुपये। दस रुपये का चीनी बूरा खरीदिए, या एक पैकेट, सौ ग्राम चीनी लाइए, और हर शुक्रवार ऐसी जगह ले जाकर चींटियों के लिए डालिए जहाँ वे सुरक्षित रहें और कोई उन्हें कुचले नहीं।
एक श्रोता बताते हैं कि शुक्र की दशा चल रही है, कि वह मारकेश है, और स्वास्थ्य बहुत खराब है। तो फिर, वक्ता कहते हैं, इतने में भी, कम से कम शुक्रवार के दिन दान दीजिए। और कुछ नहीं तो भंडारा कीजिए। भंडारे के लिए पैसे की कमी नहीं होगी। कितना पैसा चाहिए? ज़्यादा नहीं चाहिए, भाई — दस रुपये चाहिए। दस रुपये का चीनी बूरा खरीदिए, या एक पैकेट, सौ ग्राम चीनी लाइए, और हर शुक्रवार ऐसी जगह ले जाकर चींटियों के निमित्त डालिए जहाँ वे सुरक्षित रहें और कोई उन्हें कुचले नहीं।
जितने अधिक शुक्रवार यह किया जाए, उतनी जल्दी स्वास्थ्य ठीक होने लगता है
जितने अधिक शुक्रवार किया जाए, उतनी जल्दी स्वास्थ्य सुधरता है
इतना करना शुरू कीजिए, वक्ता कहते हैं: शुक्रवार को यह काम आप जितना करेंगे, उतनी जल्दी, बहुत जल्दी आपका स्वास्थ्य ठीक होने लगेगा — अगर कोई ऐसी परेशानी न हुई हो। और अगर परेशानी हो भी गई है, तब भी उसमें कमी आएगी।
इतना करना शुरू कीजिए, वक्ता कहते हैं। शुक्रवार को यह काम आप जितना करेंगे, उतनी जल्दी, बहुत जल्दी आपका स्वास्थ्य ठीक होने लगेगा। यानी, अगर कोई ऐसी कठिनाई पहले से न हो गई हो। और अगर कठिनाई हो भी गई है, तब भी उसमें कमी आएगी।
शुक्राचार्य का शिव और पार्वती से क्या संबंध है?
शुक्राचार्य उनके शिष्य भी और औरस पुत्र भी
अंधकासुर की जो कथा उन्होंने की थी उसे याद करते हुए वक्ता कहते हैं कि भगवान शिव और माँ पार्वती ने भगवान शुक्राचार्य को अपना पुत्र स्वीकार किया — अपना औरस पुत्र; वे औरस रूप में आए। तो भगवान शिव और माँ पार्वती उनके गुरु और गुरु माँ हैं, और साथ में उनके पिता और माता भी।
और इसके साथ, वक्ता कहते हैं, भगवती का और भगवान शिव का। अंधकासुर की जो पूरी कथा उन्होंने की थी उसे याद करते हुए, जिसमें भगवान शिव और माँ पार्वती ने भगवान शुक्राचार्य को अपना ही पुत्र स्वीकार किया — पूरा विषय क्या था; उन्होंने उन्हें अपना औरस पुत्र स्वीकार किया, और वे औरस रूप में आए। तो भगवान शिव और माँ पार्वती उनके गुरु और गुरु माँ हैं, और साथ में उनके पिता और माता भी हैं।
इस संबंध से शुक्र के उपाय के लिए कौन-सी शिव पूजा बनती है?
शिवलिंग पर चीनी बूरे का लेपन, फिर जल अभिषेक
तो अगर आप उनकी सेवा-पूजा करते हैं, वक्ता कहते हैं, तो शिव जी का अभिषेक भी कीजिए, और उन पर चीनी बूरा लगाकर, अच्छा पूरा लेपन करके, फिर जल से अभिषेक कीजिए। बहुत जल्दी आपको लाभ शुरू होगा। और अगर आप घर में पूजा करते हैं और स्फटिक शिवलिंग है, तो वह सबसे उत्तम है।
तो अगर आप उनकी सेवा-पूजा करते हैं, वक्ता कहते हैं, तो शिव जी का अभिषेक भी कीजिए। और उन पर चीनी बूरा लगाकर, अच्छा पूरा लेपन करके, फिर जल से अभिषेक कीजिए। बहुत जल्दी आपको लाभ शुरू होगा। और अगर आप घर में पूजा करते हैं, और स्फटिकस्फटिक की माला, जब साधक की कुंडली में शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो, तब रुद्राक्ष के स्थान पर चुनी जाती है। शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। है, तो वह सबसे उत्तम है।
क्या चौखट से निकलते समय बटुक भैरव सतनामावली पढ़ना अच्छा है?
चौखट पर इसका पाठ
एक श्रोता बताती हैं कि वे चौखट से बाहर निकलते समय बटुक भैरव सतनामावली पढ़ती हैं। वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल कीजिए, यह बहुत अच्छा है।
एक श्रोता बताती हैं कि चौखट से बाहर निकलते समय वे बटुक भैरव सतनामावली का पाठ करती हैं। बिल्कुल कीजिए, वक्ता कहते हैं। यह बहुत अच्छा है।
शराब का बार-बार आने वाला सपना क्या दर्शाता है?
एक बार कुछ नहीं; बार-बार हो तो लाग का विषय हो सकता है
एक श्रोता बहन का एक सपना बताती हैं: शराब बहुत दिखती है, जैसे कोई देव विग्रह पर शराब डाल रहा है और वह घूम रही है; जहाँ सब पी रहे हैं; पंद्रह-सोलह साल की एक लड़की उसे वहाँ से ले आई; एक रोटी पर दीया जलाकर बुझाया गया और उसका काजल बहन को लगाया गया। वक्ता कहते हैं कि अगर यह एक बार देखा है तो कोई बात नहीं; अगर बार-बार दिख रहा है तो उन्हें बताइए। तब उसमें लाग लगने का विषय हो सकता है।
एक श्रोता अपनी बहन का एक सपना बताती हैं: शराब बहुत दिखती है, जैसे कोई देव विग्रह पर शराब डाल रहा है और वह घूम रही है; एक जगह जहाँ सब पी रहे हैं; पंद्रह-सोलह साल की एक लड़की उसे वहाँ से ले आई; एक रोटी पर दीया जलाकर बुझाया गया और उसका काजल बहन को लगाया गया। अगर यह आपने एक बार देखा है, वक्ता कहते हैं, तो कोई बात नहीं। अगर बार-बार देख रही हैं, तो उन्हें बताइए। तब इसमें लाग लगने का विषय हो सकता है।
कई चीज़ें एक साथ कैसे धारण करें?
सबको मिलाकर चाँदी की एक माला बनवाइए
वक्ता श्रोता उमा सूत से कहते हैं कि सब कुछ मिलाकर चाँदी की एक सुंदर माला बनवाइए, और उसे पहनिए। कम से कम पूजन के समय उसे गले में पहनिए।
सब कुछ मिलाकर चाँदी की एक सुंदर माला बनवाइए, वक्ता श्रोता उमा सूत से कहते हैं, और उसे पहनिए। कम से कम पूजन के समय उसे गले में पहनिए।
क्या हनुमान जी और शिव जी की साधना एक साथ की जा सकती है?
एक साथ की जा सकती है
यह पूछे जाने पर कि क्या हनुमान जी और शिव जी की साधना एक साथ की जा सकती है, वक्ता उत्तर देते हैं: क्यों नहीं हो सकती — बिल्कुल कीजिए।
विंध्याचल में माता विंध्यवासिनी का विग्रह कहाँ मिल सकता है?
कोतवाली रोड की दुकानें और श्रृंगार रूप वाला पीतल का श्री विग्रह
यह पूछे जाने पर कि क्या विंध्याचल में माता विंध्यवासिनी का विग्रह मिलता है, वक्ता कहते हैं हाँ, मिल जाएगा। पूरे कोतवाली रोड पर कई बड़ी और अच्छी दुकानें हैं, और उनमें आपको भगवती विंध्यवासिनी का पीतल का श्री विग्रह मिलेगा — और वहाँ जो विग्रह है वह वैसा ही है जैसी माई श्रृंगार के बाद दिखती हैं; वही विग्रह आपको वहाँ मिलेगा। अगर आपका भाव है, तो आप वह विग्रह भी ले सकते हैं; कोई कठिनाई नहीं।
यह पूछे जाने पर कि क्या विंध्याचल में माता विंध्यवासिनी का विग्रह मिलता है, हाँ, माई जी, मिल जाएगा, वक्ता कहते हैं। कोतवाली वाली रोड पर, पूरी उस रोड पर, कई बड़ी और काफ़ी अच्छी दुकानें हैं, और उनमें आपको भगवती विंध्यवासिनी का पीतल का श्री विग्रह मिलेगा। पर वहाँ जो विग्रह है — वह वैसा ही है जैसी माई श्रृंगार के बाद दिखती हैं; उसी तरह का विग्रह आपको वहाँ मिलेगा। अगर आपका भाव है, तो आप वह विग्रह भी ले सकते हैं; कोई कठिनाई नहीं।
क्या महाभैरव की साधना की जा सकती है, और कुंडली न हो तो क्या?
महाभैरव साधना की अनुमति; कुंडली न हो तो हस्तरेखा
वक्ता श्रोता जय सिंह से कहते हैं कि वे भी महाभैरव की साधना बिल्कुल कर सकते हैं। यह पूछे जाने पर कि जिनकी कुंडली नहीं है उनके बारे में कुछ कैसे बताया जा सकता है, वे कहते हैं: हाथ से, हस्तरेखा से।
आप भी महाभैरव की साधना बिल्कुल कर सकते हैं, वक्ता श्रोता जय सिंह से कहते हैं। यह पूछे जाने पर कि जिनके पास कुंडली नहीं है उनके बारे में कुछ कैसे बताया जा सकता है, हाथ से, वे कहते हैं — हस्तरेखा से।
शिवलिंग न हो तो क्या विकल्प है?
दो-तीन सौ में एक छोटा नर्मदेश्वर खरीद लीजिए
यह पूछे जाने पर कि शिवलिंग न हो तो क्या कोई विकल्प है, वक्ता कहते हैं: बिल्कुल विकल्प है — बाज़ार जाइए और खरीदकर ले आइए। दो-तीन सौ में एक बढ़िया नर्मदेश्वर जी शिवलिंग मिल जाएगा; छोटा ही सही, मिल जाएगा।
यह पूछे जाने पर कि शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। न हो तो क्या कोई विकल्प है, बिल्कुल विकल्प है, वक्ता कहते हैं: बाज़ार जाइए और खरीदकर ले आइए। दो-तीन सौ में एक बढ़िया नर्मदेश्वर शिवलिंगम् जी शिवलिंग मिल जाएगा। छोटा ही सही, मिल जाएगा।
ब्रह्मचर्य टूट जाए तो क्या प्रायश्चित्त है?
साधना छोड़े बिना पाँच अतिरिक्त माला और क्षमा याचना
अगर ब्रह्मचर्य टूट जाए, वक्ता कहते हैं, तो प्रायश्चित्त के लिए अलग से पाँच माला जप कीजिए और बोलकर क्षमा माँगिए। अगर रात में टूटा, तो अगली सुबह प्रायश्चित्त कीजिए। साधना मत छोड़िए — अगर पाँच माला जप करते थे, तो पाँच माला और कीजिए। यह मानवीय है, यह अपराध है, और वे क्षमा करेंगे। पर साधना मत छोड़िए, मन उच्चाटित मत होने दीजिए; निरंतरता बनाए रखिए। कोई कठिनाई नहीं। आप यक्ष-यक्षिणी की साधना नहीं कर रहे, वे कहते हैं, कि वे आकर आपकी जान ले लेंगे।
अगर ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। टूट जाए, तो प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। के लिए अलग से पाँच माला जप कीजिए, वक्ता कहते हैं। बोलकर क्षमा माँगिए। मान लीजिए ब्रह्मचर्य रात में टूटा; तो अगली सुबह प्रायश्चित्त कीजिए। साधना मत छोड़िए। अगर आप पाँच माला जप करते थे, तो पाँच माला और कीजिए। यह मानवीय है, यह अपराध है, और वे क्षमा करेंगे। पर साधना मत छोड़िए; मन उच्चाटित मत होने दीजिए। वह निरंतरता बनाए रखिए। कोई कठिनाई नहीं। आप यक्ष और यक्षिणी की साधना नहीं कर रहे, वे कहते हैं, कि वे आकर आपकी जान ले लेंगे।
जो अभिमंत्रित रुद्राक्ष पूजा स्थान में न रखा जा सके, उसका क्या करें?
रुद्राक्ष को बंद करके रखिए और केवल पर्व काल में पूजिए
एक श्रोता, उमा सूत, के ऐसे अभिमंत्रित रुद्राक्ष के बारे में पूछने पर जिसे पूजा स्थान में नहीं रखना है, वक्ता कहते हैं कि उसे बनवाकर बंद करके रखिए। उसका पूजन केवल पर्व काल में कीजिए; बाकी समय उसे अपनी अलमारी में बंद रखिए — इसमें कोई समस्या नहीं, वह अभिमंत्रित है, कोई कठिनाई नहीं। साल के वार्षिक पूजन में, दीवाली और नवरात्रि पर, उसे पूजा स्थान में रखिए; बाकी समय उसे सौभाग्य के रूप में सँभालकर रखिए, क्योंकि ऐसा रुद्राक्ष दुर्लभ है — वे कहते हैं कि अब उनके पास भी नहीं है।
एक श्रोता, उमा सूत, के पास एक अभिमंत्रित रुद्राक्ष है जिसे पूजा स्थान में नहीं रखना है। तो उसे बनवाकर बंद करके रखिए, वक्ता उमा सूत से कहते हैं। अगर उसे पूजा स्थान में नहीं रखना है, तो केवल पर्व काल में पूजन कीजिए। बाकी समय उसे अपनी अलमारी में बंद रखिए। इसमें कोई समस्या नहीं। वह अभिमंत्रित है; कोई कठिनाई नहीं। जब आप साल का वार्षिक पूजन करें, दीवाली और नवरात्रि पर, तब उन्हें पूजा स्थान में रखिए। बाकी समय उन्हें सौभाग्य के रूप में रखिए — क्योंकि, वे जोड़ते हैं, वह रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । उनके पास भी नहीं है।
दत्तात्रेय माला मंत्र कहाँ सीखा जा सकता है?
एक पुराना लाइव इसे पूरा बताता है
वक्ता श्रोता दिव्यजय से कहते हैं कि दत्तात्रेय माला मंत्र के लिए पहले से एक लाइव है, जिसमें इसे पूरे बृहद रूप में बताया गया है। उसे एक बार सुनिए, वे कहते हैं; वह लगभग एक साल पुराना होगा।
दत्तात्रेय माला मंत्र के लिए पहले से एक लाइव है, वक्ता श्रोता दिव्यजय से कहते हैं। वहाँ इसे पूरे बृहद रूप में बताया गया है। उसे एक बार सुनिए। वह लगभग एक साल पुराना होगा।
क्या उसी गाँव में रहने वाली तलाकशुदा चचेरी बहन का सूतक मानना चाहिए?
सूतक मानना चाहिए, और उसकी गति के लिए कर्म करने चाहिए
यह पूछे जाने पर कि चाचा की तलाकशुदा बेटी, जो दस साल से अपने मायके — यानी प्रश्नकर्ता के अपने गाँव — में रह रही थी, उसका सूतक-पातक मानना चाहिए या नहीं, वक्ता कहते हैं: बिल्कुल मानना चाहिए। अगर उसकी मृत्यु यहाँ हुई है, और वह इसी जगह रहती थी, तो पूरे विषय के साथ, पूरी नीति-नियम से उसका सूतक माना जाएगा। और उसके लिए आप लोगों को ही सब कुछ करना चाहिए, उसकी गति के लिए।
यह पूछे जाने पर कि चाचा की तलाकशुदा बेटी का सूतक-पातक — जो दस साल से अपने मायके में, यानी प्रश्नकर्ता के अपने गाँव में रह रही थी — मानना चाहिए या नहीं, बिल्कुल मानना चाहिए, वक्ता कहते हैं। अगर अब उसकी मृत्यु यहाँ हुई है, और वह इसी जगह रहती थी, तो पूरे विषय के साथ, पूरी नीति-नियम से उसका सूतक माना जाएगा। और उसके लिए, आप लोगों को स्वयं भी सब कुछ करना चाहिए, उसकी गति के लिए।
क्या रुद्राक्ष माला की रोज़ विग्रह की तरह पूजा की जा सकती है?
हर मनके का अभिषेक और शोधन करने का उनका अपना रोज़ का अभ्यास
यह पूछे जाने पर कि क्या रुद्राक्ष माला की रोज़ विग्रह की तरह पूजा की जा सकती है, वक्ता कहते हैं: बिल्कुल कर सकते हैं, महेश जी — हम रोज़ करते हैं। माई के विग्रह पर नौ-मुखी रुद्राक्ष हैं, पूरा सेट; उनका अभिषेक और स्नान रोज़ होता है, और हर एक मनके का पूजन और शोधन की प्रक्रिया रोज़ चलती है।
यह पूछे जाने पर कि क्या रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । माला की रोज़ विग्रह की तरह पूजा की जा सकती है, बिल्कुल कर सकते हैं, महेश जी, वक्ता कहते हैं; हम रोज़ करते हैं। माई के विग्रह पर, माई के विग्रह पर, नौ-मुखी रुद्राक्ष हैं, पूरा — उनका अभिषेक और स्नान रोज़ होता है, और हर एक मनके का पूजन और शोधन की प्रक्रिया रोज़ चलती है, अपनी तरह से।
रोज़ पाँच लोगों से बात करने में भी हस्तक्षेप होता है, इसलिए प्रायश्चित्त कर्म रोज़ किया जाता है
लोगों से बात करने में होने वाले हस्तक्षेप के लिए प्रायश्चित्त कर्म
आप क्या सोचते हैं, वक्ता पूछते हैं — कि जितने लोगों से वे यहाँ, या टेलीग्राम पर, या कॉल पर बात करते हैं, उसमें ऐसा नहीं होता? अगर उन्होंने पाँच लोगों से भी बात की है, तो उसके निमित्त फिर पूरी प्रक्रिया की जाएगी। जैसे आज चर्चा हुई कि जब साधक प्रारब्ध में हस्तक्षेप करता है तो प्रायश्चित्त कर्म और सारा विधि-विधान गहनता से करके पूरा करना चाहिए — तो भाई, ये सब चीज़ें उसमें आती हैं। इसलिए इसे रोज़ ज़रूर कीजिए।
आप क्या सोचते हैं, वक्ता पूछते हैं — कि जितने लोगों से वे यहाँ, या टेलीग्राम पर, या कॉल पर बात करते हैं, उसमें ऐसा नहीं होता? अगर उन्होंने पाँच लोगों से भी बात की है, तो उसके निमित्त फिर पूरी प्रक्रिया की जाएगी। जैसे आज चर्चा हुई, वे कहते हैं — कि जब साधक प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। में हस्तक्षेप करता है, तो प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। कर्म और सारा विधि-विधान कैसे करना चाहिए। उसे गहनता से पूरा करना चाहिए। तो भाई, ये सारी चीज़ें उसमें आती हैं। इसलिए इसे रोज़ ज़रूर कीजिए।
यंत्रों और विग्रहों की रोज़ की देखभाल कैसे करें?
यंत्रों पर रुद्राक्ष मालाएँ, अलग व्यवस्थाएँ, एक घंटे का क्रम
जितने भी यंत्र हैं, वक्ता कहते हैं, सब यंत्रों पर रुद्राक्ष मालाएँ पहनाइए। सबका अभिषेक रोज़ होता है। श्री विग्रह के लिए अलग व्यवस्था बनाइए और यंत्र के लिए अलग। सुनने में यह बहुत भारी प्रक्रिया लगेगी, पर जब अभ्यास हो जाएगा, जब आप साधक हैं और ऐसा अभ्यास आ गया है, तो सबका एक क्रम बना लीजिए और एक घंटे में फटाफट हो जाएगा। अभिषेक और श्रृंगार की प्रक्रिया विधि अनुसार एक बार चलेगी; फिर विधि-विधान से आराम से आसन पर बैठकर दूसरी प्रक्रिया, और फिर सबका आवरण पूजन और बाकी जो भी हो। वे यहीं रुक जाते हैं, यह कहते हुए कि और नहीं बताएँगे वरना लोग उसे भी शामिल करने लगेंगे।
जितने भी यंत्र हैं, सब यंत्रों पर रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । मालाएँ पहनाइए, वक्ता कहते हैं। सबका अभिषेक रोज़ होता है। श्री विग्रह के लिए अलग व्यवस्था बनाइए और यंत्र के लिए अलग। सुनने में लगेगा कि यह बहुत भारी प्रक्रिया हो गई; पर जब आपको अभ्यास हो जाएगा, जब आप साधक हैं और ऐसा अभ्यास आ गया है, तो सबका एक क्रम बना लीजिए और एक घंटे में फटाफट हो जाएगा। अभिषेक और श्रृंगार की प्रक्रिया विधि अनुसार एक बार चलेगी। विधि-विधान से आराम से आसन पर बैठकर दूसरी प्रक्रिया; फिर सबका आगे का आवरण पूजा और जो भी हो — वह सब चलेगा। यह इस तरह चलेगा, वे कहते हैं; और ज़्यादा न बताएँ, वरना लोग उसे भी शामिल करने लगेंगे।
छोटे साँप के पैर में काटने के सपने का क्या अर्थ है?
पितरों से जुड़ी बात, जो कष्ट में हैं
यह पूछे जाने पर कि रात में सपने में एक छोटे साँप ने पैर में काटा और सपने में बहुत दर्द हुआ, इसका क्या अर्थ है, वक्ता श्रोता अक्षय से कहते हैं कि यह पितरों से जुड़ी बात है — पितर कष्ट में हैं।
यह पूछे जाने पर कि इसका क्या अर्थ है जब रात में, सपने में, एक छोटे साँप ने पैर में काटा, और सपने में बहुत दर्द हुआ, वक्ता श्रोता अक्षय से कहते हैं कि यह पितृ से जुड़ा विषय है। पितर कष्ट में हैं।
चढ़ाए गए छह दल वाले बिल्व पत्र का क्या करना चाहिए?
उसे शिव महापुराण में रखिए और स्कंद के रूप में पूजिए
वक्ता श्रोता शशिकांत से कहते हैं कि उन्होंने जो छह दल वाला बेल पत्र चढ़ाया, उसे पूजन के बाद प्रणाम करके उठा लें, या निर्माल्य के समय जब उठाना हो तब उठाकर शिव महापुराण आदि में रख दें। आप उसकी स्कंद के रूप में पूजा कर सकते हैं, वे कहते हैं। मंगल बहुत मज़बूत और प्रसन्न होगा — उसे रखिए।
क्या ऐसे अभ्यासों को टोटका कहकर टाल देना चाहिए?
हर चीज़ को टोटका नहीं कहा जा सकता, न टोटके में रखा जा सकता है
उसमें मत जाइए, वक्ता कहते हैं — हर चीज़ को टोटका नहीं कहा जा सकता, और हर चीज़ को टोटके में रखा भी नहीं जा सकता। कुछ चीज़ें बहुत अच्छी होती हैं, जो दिव्य प्रभाव से ही मिलती हैं; तो वह कीजिए, और उसे रखिए।
उसमें मत जाइए, वक्ता कहते हैं: हर चीज़ को टोटका नहीं कहा जा सकता, और हर चीज़ को टोटके में रखा भी नहीं जा सकता। कुछ चीज़ें बहुत अच्छी होती हैं, जो दिव्य प्रभाव से ही मिलती हैं। तो वह कीजिए, और उसे रखिए।
पाँच लाख पंचाक्षरी करने के बाद से नींद क्यों बढ़ गई है?
गणपति या भगवती का कुछ भी नहीं किया
एक श्रोता बताते हैं कि पिछले साल पाँच लाख पंचाक्षरी करने के बाद से नींद बहुत आती है, और कारण पूछते हैं। वक्ता जो नहीं किया गया उसकी ओर इशारा करके उत्तर देते हैं: अगर आपने गणपति जी का कुछ भी नहीं किया होगा, अगर भगवती का कुछ भी नहीं किया होगा, तो।
एक श्रोता बताते हैं कि पिछले साल उन्होंने पंचाक्षरी मंत्र का पाँच लाख किया, और तब से बहुत नींद आती है; कारण क्या हो सकता है? अगर आपने गणपति जी का कुछ भी नहीं किया होगा, वक्ता उत्तर देते हैं, अगर भगवती का कुछ भी नहीं किया होगा, तो।
घर में बढ़ने वाले नर्मदेश्वर के बारे में वे क्या कहते हैं?
सिलेबस से बाहर, और दर्शन का अनुरोध
एक श्रोता घर में रखे एक नर्मदेश्वर के बारे में लिखते हैं जो बढ़ रहा है। वक्ता शशिकांत से कहते हैं कि भाई, यह सिलेबस से बाहर का प्रश्न है — हम इतने जानकार नहीं। वे ऐसे दिव्य शिवलिंग के दर्शन कराने को भी कहते हैं: अगर ये बढ़ रहे हैं, यानी अगर ये जीवित नर्मदेश्वर जी हैं, तो यह अद्भुत विषय है।
एक श्रोता नर्मदेश्वर शिवलिंगम् जी की विशेष पूजा के बारे में लिखते हैं, घर में रखे एक नर्मदेश्वर के बारे में जो बढ़ रहा है। भाई, यह सिलेबस से बाहर का प्रश्न है, वक्ता श्रोता शशिकांत से कहते हैं; हम इतने जानकार नहीं। हमें भी ऐसे दिव्य शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। के दर्शन कराइए। अगर ये बढ़ रहे हैं — यानी अगर ये जीवित नर्मदेश्वर जी हैं — तो यह अद्भुत विषय है। हमें भी एक बार दर्शन कराइए; दर्शन देकर कृपा कीजिए।
अविचार ही व्यक्ति को अपने भले की बात मानने से रोकता है
अविचार अपने भले की बात मानने से रोकता है
वक्ता श्रोता जय सिंह से कहते हैं कि वे कितने समय से परेशान हैं, इससे वे उन्हें व्यक्तिगत रूप से पहचानते हैं, और उनकी कठिनाई इतनी लंबी नहीं चलनी चाहिए। अगर आप करते रहते, तो अब तक यह नष्ट हो चुकी होती। आप बहुत भ्रमित हो जाते हैं — मैं आपको कितना समझाऊँ? भ्रमित मत होइए। अविचार की सबसे बड़ी नकारात्मक बात, वे कहते हैं, यह है कि व्यक्ति अपने कल्याण के लिए कही बात भी स्वीकार नहीं कर पाता। आपके साथ भी यही है। दिखाना-बताना कीजिए; उस तरह का कोई सक्षम व्यक्ति हो — पर स्वयं भी कीजिए।
वक्ता श्रोता जय सिंह से कहते हैं कि वे जितने समय से परेशान हैं, उससे वे उन्हें व्यक्तिगत रूप से पहचानते हैं। आपकी कठिनाई इतनी लंबी नहीं चलनी चाहिए। अगर आप करते रहते, अगर करते रहें, तो यह अब तक नष्ट हो चुकी होती। आप बहुत भ्रमित हो जाते हैं — मैं आपको कितना समझाऊँ? भ्रमित नहीं होना चाहिए। अविचार की सबसे बड़ी नकारात्मक बात, वे कहते हैं, यह है कि सामने वाला व्यक्ति अपने कल्याण के लिए कही बात भी स्वीकार नहीं कर पाता। आपके साथ भी यही है। मेरी बात मानिए। दिखाना और बताना कीजिए; उस तरह का कोई सक्षम व्यक्ति हो, सब कुछ — पर स्वयं भी कीजिए।
क्या यज्ञोपवीतधारी बिना दीक्षा के तीनों संध्याओं में सप्तशती के तीन पाठ कर सकता है?
शर्तें — यज्ञोपवीत का नियम, गायत्री या पंचाक्षरी की दस माला, और स्पष्ट उच्चारण
यह पूछे जाने पर कि क्या यज्ञोपवीत धारण करने वाला व्यक्ति बिना दीक्षा के रोज़ त्रिसंध्या में दुर्गा सप्तशती के तीन पाठ, तीनों एक साथ, कर सकता है, वक्ता कहते हैं कि अगर आप यज्ञोपवीत पहनकर नियम से चल रहे हैं, संध्या में गायत्री आदि कर रहे हैं, या आपके गुरु ने जो उपदेश दिया है — और अगर गायत्री नहीं करते, तो कम से कम तीनों संध्याओं में पंचाक्षरी की दस-दस माला — और साथ में सप्तशती का स्पष्ट, सही उच्चारण, अगर वह आपको आ गया है, तो तीनों संध्याएँ कीजिए; कोई समस्या नहीं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करने वाला व्यक्ति रोज़ त्रिसंध्या में मैया की दुर्गा सप्तशती के तीन पाठ, तीनों एक साथ, कर सकता है, जब दीक्षा नहीं है। कुछ लोग, वक्ता बताते हैं, यह विषय उनके मुँह से सुनना चाहते हैं। भाई, अगर आप यज्ञोपवीत पहनकर नियम से चल रहे हैं, संध्या में गायत्री मंत्र आदि कर रहे हैं, या आपके गुरु जी ने जो भी उपदेश दिया है — और अगर गायत्री नहीं करते, तो कम से कम तीनों संध्याओं में पंचाक्षरी मंत्र की दस-दस माला कीजिए — और साथ में सप्तशती का स्पष्ट उच्चारण। सही उच्चारण। अगर वह आपको आ गया है, तो तीनों संध्याएँ कीजिए; कोई समस्या नहीं।
अगर उच्चारण अभी सही नहीं है तो?
स्पष्ट होने तक एक संध्या कीजिए, फिर तीनों
यज्ञोपवीत का नियम मानिए, वक्ता कहते हैं, और उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध हो। अगर आप हिंदी में कर रहे हैं तो अलग बात है, पर अगर संस्कृत में कर रहे हैं, तो उच्चारण गलत नहीं होना चाहिए — बस। अगर उच्चारण में गलती है, तो सुधारिए; फिर तीनों संध्याएँ कीजिए। जब तक उच्चारण स्पष्ट नहीं हो रहा, तीनों संध्याएँ मत कीजिए, केवल एक में कीजिए — पर पहले उसे पूरी तरह स्पष्ट कीजिए। सौ पाठ करते-करते आपको महारत मिल जाएगी, और उसके बाद आराम से तीनों संध्याएँ कीजिए; कोई समस्या नहीं।
यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। का नियम मानिए, वक्ता कहते हैं, और उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध हो। अगर आप हिंदी में कर रहे हैं तो अलग बात है — पर अगर संस्कृत में कर रहे हैं, तो उच्चारण गलत नहीं होना चाहिए; बस। अगर उच्चारण में गलती है, तो उसे सुधारिए। फिर तीनों संध्याएँ कीजिए। जब तक उच्चारण स्पष्ट नहीं हो रहा, तीनों संध्याएँ मत कीजिए, केवल एक में कीजिए — और पहले उसे पूरी तरह स्पष्ट कीजिए। सौ पाठ करते-करते आपको महारत मिल जाएगी। उसके बाद आराम से तीनों संध्याएँ कीजिए; कोई समस्या नहीं।
तीनों संध्याओं में कितना समय लगता है?
कम से कम ढाई से तीन घंटे, और किसी आचार्य से सलाह लीजिए
वक्ता एक और बात जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि वे यह अपने अनुसार बता रहे हैं — कि अगर सुबह, दोपहर और शाम को करना है — और वे नहीं कहेंगे कि आप भी वैसा ही करें, पर फिर भी एक बार किसी विद्वान से सलाह लीजिए, अपने आचार्य जी से पूछिए, जो स्वयं भी मार्ग पर चल रहे हों। अगर तीनों संध्याएँ करनी हैं, तो समय लगता है: अभ्यास हो जाने के बाद भी कम से कम ढाई से तीन घंटे तो ज़रूर लगेंगे, अगर थोड़ी नियमितता से किया जाए।
पर एक बात और, अगर आप ध्यान दें, वक्ता कहते हैं। अब यहाँ, अगर सुबह, दोपहर और शाम को करना है — यह हम अपने अनुसार बता रहे हैं। हम आपसे नहीं कहेंगे कि आप भी ऐसा ही करें; पर फिर भी एक बार किसी विद्वान से सलाह लीजिए, अपने आचार्य जी से पूछिए, जो स्वयं भी मार्ग पर चल रहे हों। कि अगर तीनों संध्याएँ करनी हैं, तो समय लगता है: अभ्यास हो जाने के बाद भी कम से कम ढाई से तीन घंटे तो ज़रूर लगेंगे। अगर आप थोड़ी नियमितता से करें।
तीन संध्याएँ करने के साथ भोजन का क्या नियम है?
अन्न कम रखिए — शाम की संध्या तक फल या रस, और नमक नहीं
अब अगर आप अन्न खाकर करते हैं, वक्ता कहते हैं, तो यहाँ समस्या है — थोड़ी कठिनाई होगी। तो अगर आप लोग इसे जीवन भर रोज़ करना चाहते हैं, तो वे ऐसा-ऐसा करने को नहीं कहेंगे; पर अगर यह 108 दिन का, एक साल का, दो साल का है, तो अन्न का नियम थोड़ा कम रखिए: कि शाम की संध्या होने तक फल या फलों का रस लीजिए; और अगर अन्न खाएँ भी, तो आपका अन्न पूरी तरह शुद्ध और पवित्र हो, नमक या लवण युक्त न हो। और भोजन रात में कीजिए।
अब अगर आप अन्न खाकर करेंगे, तो यहाँ एक समस्या है, वक्ता कहते हैं: थोड़ी कठिनाई होगी। तो अगर आप लोग इसे रोज़ करना चाहते हैं, जीवन भर भी — ऐसा-ऐसा हम नहीं कहेंगे — पर अगर यह 108 दिन का, एक साल का, दो साल का है, तो अन्न का नियम थोड़ा कम रखिए। कि शाम की संध्या होने तक फल लेते हुए या फलों का रस पीते हुए; और अगर अन्न खाएँ भी, तो आपका अन्न पूरी तरह शुद्ध और पवित्र हो, नमक से, लवण से युक्त न हो। और भोजन रात के समय कीजिए।
क्या तीन की जगह केवल दो गायत्री संध्याएँ करने में दोष है?
आज के समय में दो संध्याएँ भी बहुत हैं
एक श्रोता बताते हैं कि वे गायत्री संध्या केवल दो बार कर पाते हैं, तीन बार नहीं, और पूछते हैं कि क्या कोई दोष है। वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं, कोई दोष नहीं। आज के समय में दो संध्याएँ होना भी बहुत है। उन्हें कीजिए, और दोनों संध्याओं को पकड़े रहिए।
एक श्रोता बताते हैं कि वे गायत्री मंत्र संध्या केवल दो बार कर पाते हैं, तीन बार नहीं होती, और पूछते हैं कि क्या कोई दोष है। नहीं, कोई दोष नहीं, वक्ता उत्तर देते हैं। आज के समय में दो संध्याएँ होना भी बहुत है। उन्हें कीजिए, वे कहते हैं; दोनों संध्याओं को पकड़े रहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।