आपके कुल भैरव कौन हैं — कुल देवता, कुल देवी और काल भैरव अष्टमी पर सदस्यों का लाइव
काल भैरव अष्टमी से पहले कुल भैरव पर लाइव प्रश्नोत्तर।
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क्या किसी परिवार के कोई कुल भैरव ही न हों, ऐसा हो सकता है?
बिना कुल भैरव के परिवार का होना असंभव
नहीं। वक्ता कहते हैं कि लोग इस भ्रम में पड़ते हैं कि कुल भैरव केवल वहीं होते हैं जहाँ घर में भगवती की पूजा कुल शक्ति के रूप में होती है। और यह मानना बहुत बड़ा भ्रम है कि कुल भैरव होते ही नहीं। ऐसा हो ही नहीं सकता।
वक्ता शुरुआत में वह भ्रम बताते हैं जिसे वे दूर करना चाहते हैं: क्या कुल भैरव केवल उसी घर में होते हैं जहाँ भगवती की पूजा होती है, जहाँ उनके किसी स्वरूप की पूजा कुल शक्ति के रूप में हो रही है। वे कहते हैं कि एक और बहुत बड़ा भ्रम है — कि कभी-कभी कुल भैरव होते ही नहीं। ऐसा हो ही नहीं सकता।
गृहस्थ को अक्सर यह क्यों पता नहीं होता कि उसके कुल भैरव कौन हैं?
स्वरूपों का ज्ञान खो जाता है, पर रक्षा करने वाला गण नहीं
वक्ता कहते हैं कि गृहस्थ को उन स्वरूपों का ज्ञान न हो, यह बिल्कुल हो सकता है। पर जब भी कोई विशेष संकट आने वाला होता है, और आप घर की किसी शक्ति को समर्पित साधना और सेवा-पूजा कर रहे होते हैं, तब उस विपत्ति से बचाने के लिए जो शक्ति सबसे पहले तैयार रहती है, वह उस आराध्य का, उस कुल शक्ति का सबसे समर्पित गण होता है — और वे भैरव के रूप में खड़े होते हैं।
वे कहते हैं, सीधी बात समझिए: गृहस्थ को उन स्वरूपों का ज्ञान न हो, ऐसा हो सकता है। जब भी कोई विशेष संकट आने वाला होता है, और आप अपने घर की किसी भी शक्ति को समर्पित साधना कर रहे हैं, उनकी सेवा-पूजा कर रहे हैं — तब उस संकट से, उस विपत्ति से बचाने के लिए सबसे पहले जो शक्ति तैयार होती है, वह आपके आराध्य का, आपकी कुल शक्ति का सबसे समर्पित गण होता है। और वे, वक्ता कहते हैं, भैरव के रूप में खड़े होते हैं: कुल के भैरव।
कुल भैरव का काल भैरव और बटुक भैरव से क्या संबंध है?
कुल भैरव महान भैरवों के अंशात्मक रूप हैं
वक्ता कहते हैं कि जैसे काल भैरव, बटुक भैरव और बाल भैरव हैं, जो महाशक्तियाँ हैं, वैसे ही उनके अंशात्मक रूप में ऐसी शक्तियाँ हैं जिन्हें कुल भैरव का स्थान दिया गया है।
जब घर में किसी पर देवी की सवारी आती है, तो सबसे पहले कौन सी शक्ति आती है?
किसी भी सवारी पर सबसे पहले कुल भैरव आते हैं
वक्ता कहते हैं कि जब भी घर की देवी की या घर की किसी शक्ति की सवारी सच में किसी पर आ रही होती है, तो उन पर सबसे पहले कुल के भैरव, यानी रक्षक आते हैं। वे कहते हैं कि यह बात ऐसे हर व्यक्ति पर सौ प्रतिशत लागू होती है, और सुनने वाले इसे मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र हैं।
वक्ता कहते हैं कि आप सबको यह भी जानना चाहिए: जब भी किसी पर सच में सवारी आ रही होती है — घर की देवी की, घर की किसी भी शक्ति की — तो सबसे पहले जो शक्ति उन पर आती है, वह कुल के भैरव, रक्षक होते हैं। वही आते हैं। वे कहते हैं कि यह बात ऐसे हर व्यक्ति पर सौ प्रतिशत लागू होती है। आप इसे मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र हैं। उनकी गुरु परंपरा के जो लोग देख पाते हैं, जिन्हें भगवती की कृपा से दिव्य दृष्टि मिली है, वे जानते हैं कि ऐसा ही है — क्योंकि आपका शरीर कई तरह के कष्टों से घिरा हो सकता है।
देवी के आने से पहले भैरव का आना क्यों ज़रूरी है?
शक्ति के आने से पहले पंचतत्व के शरीर को संतुलित करना होता है
क्योंकि शरीर पंचतत्व से बना है। वक्ता कहते हैं कि अगर आप पूजन-पाठ करते हैं, तो उस शरीर के तत्व सही अनुपात में होने चाहिए, ताकि जब कुल शक्ति या कोई देवी आप पर आए, तो शरीर में कोई अशुद्ध असंतुलन न रहे और आपको कोई कष्ट न हो। इसी के लिए कुल भैरव सबसे पहले आते हैं — चाहे एक पल के लिए, एक-दो मिनट के लिए, या पाँच-दस मिनट के लिए।
वक्ता कहते हैं कि हर कोई हर समय आपके शरीर पर नहीं आ सकता। शरीर पंचतत्व से बना है, और आप पूजन-पाठ करते हैं। अगर आप पूजा-पाठ करते हैं, तो उस शरीर में तत्व ठीक-ठीक मात्रा में होने चाहिए, ताकि जब कुल की शक्ति आए, या कोई देवी आप पर आए, तो आपके शरीर में कोई अशुद्ध असंतुलन न हो और आपको कोई कष्ट न हो। इसी के लिए कुल के भैरव सबसे पहले आते हैं — चाहे वे एक पल के लिए आएँ, एक-दो मिनट के लिए, या पाँच-दस मिनट के लिए।
कैसे पता चले कि कुल भैरव आ गए हैं?
आते ही लगाया जाने वाला जयकारा
वक्ता कहते हैं कि उनका सबसे बड़ा प्रभाव, या उसे देखने का तरीका यह है कि आते ही वे जयकारा लगाते हैं। आप घर में उन्हें किसी भी रूप में पूज रहे हों — वीर के रूप में, किसी देव शक्ति के रूप में, शायद ब्रह्म के नाम से भी — पर देव शक्ति के रूप में सबसे पहले कुल के भैरव ही आते हैं, और यही देखने वाली बात है।
वक्ता कहते हैं कि उनका सबसे बड़ा प्रभाव, या उसे देखने का तरीका यह है: आते ही वे जयकारा लगाते हैं। अब आप घर में उन्हें किसी भी रूप में पूज रहे हों — वीर के रूप में पूज सकते हैं, किसी देव शक्ति के रूप में जान सकते हैं, शायद ब्रह्म के नाम से भी जान सकते हैं। पर देव शक्ति के रूप में सबसे पहले कुल के भैरव ही आते हैं, और यही देखने वाली बात है।
शक्ति आने पर कवच का पाठ शरीर पर क्या असर करता है?
कवच पाठ से बँधे दस द्वार
वक्ता कहते हैं कि जब आप पूजन-पाठ करते हैं, तो शरीर बँध जाता है। अगर आप कवच का पाठ करते हैं, तो सब कुछ बँध जाता है और आपके दसों द्वार बंद हो जाते हैं; और जब दसों द्वार बंद हों, तो न सकारात्मक शक्ति और न नकारात्मक शक्ति बहुत तेज़ वेग से आ सकती है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि जब आप पूजन-पाठ कर रहे होते हैं, तो आपका शरीर बँधा होता है। अगर आप कवच का पाठ करते हैं, तो सब कुछ बँध जाता है। आपके दसों द्वार बँध जाते हैं। जब दसों द्वार बंद हों, तो चाहे सकारात्मक शक्ति हो या नकारात्मक शक्ति, वे बहुत तेज़ वेग से नहीं आएँगी।
जो लोग कोई कवच पाठ नहीं करते, उनके साथ क्या होता है?
आने का वेग और उससे होने वाला असंतुलन
वक्ता कहते हैं कि जो लोग न कवच पाठ करते हैं, न कोई विशेष पाठ, उन पर जब कोई शक्ति आती है, तो बहुत तेज़ वेग से आती है; और जब इतने वेग से आती है, तो कठिनाई होती है — शरीर असंतुलित हो जाता है और शरीर में बहुत बुरी तरह पीड़ा होती है।
पर वक्ता कहते हैं कि जो लोग कोई कवच नहीं पढ़ते, कोई विशेष पाठ नहीं करते — उन लोगों पर जब कोई शक्ति आती है, तो बहुत तेज़ वेग से आती है। और जब वेग से आएगी, तो कठिनाई होगी। कठिनाई क्या है? शरीर का असंतुलित होना, और शरीर में बहुत बुरी तरह पीड़ा होना।
क्या नियमित पूजा-पाठ करने वालों पर भी बड़ी शक्तियाँ तेज़ वेग से आती हैं?
बड़ी शक्तियाँ: महायोगिनियाँ और त्रिनेत्र स्वरूपा, उपदेव नहीं
हाँ, वक्ता कहते हैं — पूजा-पाठ करने वालों के साथ भी ऐसा होता है, जब उन पर बड़ी शक्तियाँ आती हैं: भगवती की प्रमुख योगिनियाँ और महायोगिनियाँ, त्रिनेत्र स्वरूपा, यानी ऊँचे स्तर की, ऊँचे कुल की शक्तियाँ, कोई शक्तिपीठ या महाशक्ति, कोई बहुत प्राचीन शक्ति जो उपदेव श्रेणी की नहीं है और जिसका मूल तत्व शुरू से ही शक्ति है।
हालाँकि, वक्ता कहते हैं, ऐसा पूजा-पाठ करने वाले लोगों के साथ भी होता है — उनके साथ जिन पर बड़ी शक्तियाँ आती हैं। जिन पर भगवती की प्रमुख योगिनियाँ आती हैं, महायोगिनियाँ; जो त्रिनेत्र स्वरूपा हैं, यानी ऊँचे स्तर की शक्तियाँ, ऊँचे कुल की शक्तियाँ। वह कोई शक्ति पीठ हो सकता है, कोई महाशक्ति, कोई बहुत प्राचीन शक्ति — जो उपदेवता श्रेणी की नहीं है, जिसका मूल तत्व शुरू से ही शक्ति का है।
मृत्यु के बाद व्यक्ति का क्या होता है, उसके पूजे हुए देवता के अनुसार?
पूजा के पुण्य से मिलने वाला लोक या पद
वक्ता कहते हैं कि वे यह पहले स्पष्ट कर चुके हैं: जब हम मनुष्य शरीर पाकर पूजन-पाठ करते हैं, तो जो भी पुण्य कमाते हैं, और जिस देवता को समर्पित होकर पूजा करते हैं, मृत्यु के बाद हमें उस देव या देवी का लोक मिलेगा — या उस स्वरूप को पाकर यहीं इसी लोक में वह पद मिलेगा।
वक्ता कहते हैं कि वे यह पहले स्पष्ट कर चुके हैं, और पिछले दिन भी कहा था। जब हम मनुष्य शरीर पाकर पूजन-पाठ करते हैं, तो जो भी पुण्य हम कमाते हैं, और जिस देवता को समर्पित होकर हम वह पूजन-पाठ करते हैं — मृत्यु के बाद हमें उस देव का, उस देवी का लोक मिलेगा। या फिर, उस स्वरूप को पाकर, वह पद हमें इसी लोक में मिलेगा।
पूजा से मृत्यु के बाद मिले दिव्य पद के कर्तव्य क्या होते हैं?
अधिकार मिलने के बाद अपना-पराया नहीं रहता
वक्ता कहते हैं कि एक बार वह पद और वे अधिकार मिल जाएँ, तो उस समय आप अपना-पराया नहीं देख सकते। जीवित अवस्था में आप कौन थे, आपके माता-पिता और भाई-बहन कौन थे, आपके बेटे-पोते कौन हैं — आप उसी अधिकार के अनुसार चलेंगे जो आपको मिला है।
एक बार यह पद आपको मिल जाए, एक बार अधिकार आपको मिल जाएँ, तो उस समय आप अपना और पराया नहीं देख सकते। जीवित अवस्था में हम कौन थे, हमारे माता-पिता, भाई-बहन कौन थे, हमारे बेटे-पोते कौन हैं — आप उसी अधिकार के अनुसार चलेंगे जो आपको मिला है। अगर आप देव शक्ति बन गए, तो आप देव शक्ति के अनुसार चलेंगे; वह पूरा पुराना स्वरूप पीछे छूट गया। आप एक मुख्य धारा से, एक प्रधान शक्ति से जाकर जुड़ गए हैं और अपने पुण्यों के कारण वह अधिकार पाया है।
पूजा से मृत्यु के बाद मिला दिव्य पद आत्मा कितने समय तक रखती है?
एक तय अवधि, फिर पुण्य खत्म होता है और नया जन्म होता है
वक्ता कहते हैं कि वहाँ भी समय तय होता है — सौ साल हो सकते हैं, पाँच सौ साल हो सकते हैं, बहुत लंबे समय तक भी हो सकता है। पर एक समय आएगा जब वह पद छोड़कर आप या तो नया जन्म लेंगे या आपकी कोई और गति होगी, और आपकी जगह कोई नया आएगा। जब पुण्य खत्म हो जाता है, तो फिर से जन्म लेना पड़ता है।
वक्ता कहते हैं कि वहाँ भी समय तय होता है: इतने समय तक आपको रहना है। सौ साल हो सकते हैं, पाँच सौ साल हो सकते हैं, बहुत लंबे-लंबे समय तक हो सकता है। पर वह समय आएगा जब अपना वह पद छोड़कर आप या तो नया जन्म लेंगे या आपकी गति कहीं और होगी, और आपकी जगह कोई नया आएगा। कारण क्या है? जब पुण्य खत्म हो जाएगा, तो फिर जन्म लेना पड़ेगा। देवताओं को भी जन्म लेना पड़ता है — और यहाँ तो आप देवता बन रहे हैं। तो जन्म होगा; और आपकी जगह कोई और आत्मा, कोई और जीवात्मा, वही स्वरूप, वही सामर्थ्य, वही अधिकार लेकर वहाँ दिव्यात्मा के रूप में फिर से स्थापित होगी। वक्ता कहते हैं कि यह क्रम हमेशा चलता रहेगा।
क्या भगवती के लोक की बड़ी योगिनियाँ कभी जन्म लेती हैं?
दिव्य लोक की महातत्व शक्तियाँ
वक्ता कहते हैं कि महातत्व से युक्त शक्तियाँ — भगवती के लोक की योगिनियाँ — इस लोक की हैं ही नहीं, इस ब्रह्मांड के मृत्यु लोक की नहीं हैं। वे दिव्य लोक की हैं, और वे कभी जन्म नहीं लेंगी। यह असंभव है; केवल किसी कारण से, लीला से, उन्हें जन्म लेना पड़े तो पड़े, वरना नहीं लेंगी।
वक्ता कहते हैं कि साधारण तरह की शक्तियों का सामर्थ्य उनकी पूजा के अनुसार बढ़ता-घटता है, और घर के अंदर भी यही क्रम चलता है। वह अलग बात है। पर वे जिनकी बात कर रहे हैं, वे महातत्व से युक्त शक्तियाँ हैं — यानी भगवती के लोक की योगिनीयाँ। वे इस लोक की हैं ही नहीं; वे इस ब्रह्मांड के मृत्यु लोक की शक्तियाँ नहीं हैं। वे शक्तियाँ दिव्य लोक की ही हैं। वे कभी जन्म नहीं लेंगी। यह असंभव है। केवल किसी कारण से, लीला से, उन्हें कोई जन्म लेना पड़े — वरना वे जन्म नहीं लेंगी। वे दिव्यता से युक्त हैं और दूसरे लोक की निवासी हैं।
क्या किसी बड़े अनुष्ठान के दौरान कोई दिव्य शक्ति साधक के साथ जुड़ सकती है?
गोवर्धन पर नौचंडी अनुष्ठान और प्रसन्न हुई दिव्य शक्ति
वक्ता कहते हैं कि जब कोई मनुष्य बहुत बड़ा अनुष्ठान करता है — जैसे उन्होंने अभी गोवर्धन पर्वत पर, गायों के बीच, श्री कृष्ण के स्थान पर नौचंडी अनुष्ठान किया था — तो उस क्षेत्र की कोई दिव्य शक्ति प्रसन्न होकर उस साधक के साथ चलना चाह सकती है, उससे पूजा पाना और उसके साथ जन-कल्याण का काम करना चाह सकती है।
जब कोई मनुष्य बहुत विस्तृत अनुष्ठान करता है — जैसे, वक्ता कहते हैं, उन्होंने अभी गोवर्धन पर्वत पर नवचंडी अनुष्ठान अनुष्ठान किया, बड़े भाव से, बड़े प्रेम से, गायों के बीच, और गोवर्धन पर ही, उस स्थान पर जो श्री कृष्ण का स्वरूप है, वहाँ भगवती की सेवा-पूजा करते हुए। हो सकता है उस क्षेत्र के ऊपर अंतरिक्ष हो, और कोई लोक होगा; वह स्थान तो भगवान श्री कृष्ण और माँ राधे रानी का ही लोक है, तो कुछ न कुछ तो वहाँ होगा ही। और वहाँ जब भी कोई दिव्य शक्ति प्रसन्न होकर आती है, और उसके मन में इच्छा होती है — मेरा यह बेटा इतना अच्छा अनुष्ठान कर रहा है, मैं इसके साथ जाऊँगी, इससे पूजी जाऊँगी, इसकी सेवा लूँगी, इसके साथ जन-कल्याण का काम करूँगी — तो यह उसकी अपनी इच्छा है।
अनुष्ठान से प्रसन्न हुई दिव्य शक्ति साधक को अपना परिचय कैसे देती है?
साधना के समय दिव्य शक्ति का परिचय, और बाद में बनने वाला मंदिर
वक्ता कहते हैं कि जब वह प्रसन्न होकर आती है और सामने वाला व्यक्ति साधक है, और गुरु कृपा से कुछ मिला हुआ है, तो वह साधना के समय अपना परिचय देगी: मैं इस स्वरूप में आई हूँ; अगर तुम चाहो तो मुझे स्थान दो, मैं इस तरह के काम में अपना योगदान देना चाहती हूँ और तुमसे सेवा और पूजन चाहती हूँ।
जब वह प्रसन्न होकर आती है, और सामने वाला व्यक्ति साधक है, और गुरु कृपा से कुछ मिला हुआ है, तो वह साधना के समय अपना परिचय देगी: मैं इस स्वरूप में आई हूँ। अगर तुम चाहो, तो मुझे स्थान देकर, मैं इस तरह के काम में अपना योगदान देना चाहती हूँ, और मैं तुमसे सेवा और पूजन चाहती हूँ। वक्ता कहते हैं कि यह बड़े सौभाग्य की बात है कि इतनी बड़ी दिव्य शक्ति अपना साथ देने आई है। तो उन्हें स्थान दिया गया और उनकी पूजा हुई। समय के साथ हो सकता है मन में आए कि उनका मंदिर बनवाया जाए, ताकि लोगों का भला हो और उनके वंशज उनकी पूजा करते रहें; और हो सकता है वे लोग बाद में प्रसिद्ध हो जाएँ, उनमें काफ़ी दिव्यता हो।
बड़ी शक्ति के आने पर शरीर क्यों जलता है और भारी हो जाता है?
शक्ति का अग्नि तत्व शरीर के पृथ्वी तत्व से मिलता है
वक्ता कहते हैं कि ऐसी शक्ति का वेग बहुत तेज़ होता है और उसका भार काफ़ी होता है, क्योंकि वह कभी वायु तत्व से युक्त नहीं होगी, बल्कि अग्नि तत्व से युक्त होगी। चूँकि वह मनुष्य शरीर पर आ रही है, जिसमें सबसे ज़्यादा पृथ्वी तत्व है, तो पृथ्वी और अग्नि के मिलने से शरीर बहुत गर्म और बहुत भारी हो जाता है — और ऐसी शक्तियों के जाने के बाद भी दो-तीन दिन शरीर दुखता है।
वक्ता कहते हैं कि हर बात को इतने विस्तार से समझाने का यही अर्थ है: जब इस तरह की शक्ति किसी पर भी आती है, तो उसका वेग बहुत तेज़ होगा और उसका भार काफ़ी होगा। क्योंकि वह कभी वायु तत्व से युक्त नहीं होगी; वह अग्नि तत्व से युक्त होगी। और चूँकि वह मनुष्य शरीर पर आ रही है — मनुष्य शरीर में कौन सा तत्व सबसे ज़्यादा है? पृथ्वी तत्त्व। हमारे अंदर ठोस ज़्यादा है; बाकी सब तत्वों की भागीदारी थोड़ी ही है। तो जब पृथ्वी तत्व और अग्नि तत्व मिलेंगे, तो क्या होगा? शरीर बहुत गर्म होगा और बहुत भार महसूस होगा। इसीलिए जब इतने ऊँचे स्तर की शक्तियाँ जाती हैं, तो दो-तीन दिन तक शरीर दुखता है।
अनुष्ठान से प्रसन्न दिव्य शक्ति का आना अपने पीछे क्या छोड़ जाता है?
दिव्य बना शरीर, और उसके बाद माँगा जाने वाला आचरण
वक्ता कहते हैं कि यह जान लीजिए: जब भी इस तरह की शक्ति किसी शरीर पर आती है, तो वह उस शरीर को अत्यंत दिव्य बनाकर जाती है — और फिर शरीर को उसी तरह रखना पड़ता है। अगर आप अपना आचरण, चाल-चलन और व्यवहार उसी तरह नहीं रखते, तो वह भी आपका साथ नहीं देती।
पर यह जान लीजिए, वक्ता कहते हैं: जब भी इस तरह की शक्ति किसी शरीर पर आ रही होती है, तो वह उस शरीर को अत्यंत दिव्य बनाकर जाती है। और उसी तरह अपना शरीर भी रखना पड़ता है। अगर आप अपना आचरण, अपना चाल-चलन और अपना व्यवहार उस तरह नहीं रखते, तो वे भी अपना साथ नहीं देतीं।
कभी-कभी शक्ति शरीर पर आती है पर बोलती क्यों नहीं?
शरीर में असंतुलित ऊर्जा बोलने नहीं देती
वक्ता, केवल सकारात्मक शक्तियों की बात करते हुए — कुल शक्ति, लोक शक्ति, किसी स्थान की शक्ति — कहते हैं कि अगर आपके शरीर की ऊर्जा संतुलित नहीं है, आपके पंचतत्व संतुलित नहीं हैं, तो उस अवस्था में वह बोलने में सक्षम नहीं होगी। वह आएगी, रोएगी और चली जाएगी।
वक्ता कहते हैं कि बहुत बार आप देखते हैं कि कोई शक्ति शरीर पर आ रही है पर बोल नहीं पा रही। वह नकारात्मक है या सकारात्मक, यह अलग बात है; उसे छोड़ दीजिए। यहाँ वे केवल सकारात्मक शक्तियों की बात कर रहे हैं — जो कुल शक्ति हो सकती है, लोक शक्ति हो सकती है, किसी स्थान की शक्ति हो सकती है। जब वह आपके शरीर पर आती है, अगर आपके शरीर की ऊर्जा संतुलित नहीं है, आपके पंचतत्व संतुलित नहीं हैं, तो ऐसी अवस्था में वे बोलने में सक्षम नहीं होंगी। वे आएँगी, रोएँगी और चली जाएँगी।
किसी तांत्रिक का लगाया बंधन, या वचनबद्धता, शक्ति को शरीर से बोलने से रोक सकती है।
तांत्रिक का लगाया बंधन, और वचनबद्धता
वक्ता कहते हैं कि दूसरा कारण यह है कि आप पर भगतवाल के किसी साधक ने, किसी तांत्रिक ने, या किसी और कारण से बंधन लगा दिया हो; या किसी को पता चल गया हो कि आप पर देव शक्ति आती है, और उसने किसी तरह का बंधन या वचन लेकर और चित्रपाल का पूजन देकर रोक लगा दी हो। तब वह उस वचनबद्धता के कारण बोलने में सक्षम नहीं होगी।
वक्ता कहते हैं कि यह असमर्थता दो कारणों से होती है। या तो आपकी ऊर्जा असंतुलित है और आपके तत्व असंतुलित हैं। या दूसरा कारण: कि आप पर भगतवाल के किसी साधक ने, किसी तांत्रिक ने, या किसी और कारण से बंधन लगा दिया है। या किसी को पता चल गया हो कि आप पर देव शक्ति आती है, और उसने किसी तरह का बंधन, कोई वचन आदि लेकर, और चित्रपाल का पूजन देकर, रोक लगा दी हो। उस स्थिति में वे वचनबद्धता के कारण बोलने में सक्षम नहीं होंगी।
भैरव शब्द का असल में क्या अर्थ है?
भरण-पोषण करने वाले के रूप में भैरव
वक्ता कहते हैं कि भैरव का अर्थ है जो भरण-पोषण करे, जो रक्षा करे। इसलिए हनुमान जी भी भैरव हो जाते हैं — ऐसा नहीं है कि भैरव का अर्थ केवल वही भैरव हैं जिन्हें हम आमतौर पर जानते हैं।
अब वक्ता इस प्रश्न पर आते हैं: अगर कुल में कोई देव हैं, तो क्या वही भैरव होंगे? अगर कुल में कोई देवी हैं, तो भैरव कौन होंगे? वे कहते हैं कि हनुमान जी भी भैरव हो जाते हैं। भैरव का अर्थ क्या है? जो भरण-पोषण करे। वे बताते हैं कि उन्होंने काल भैरव अष्टमी के लिए एक अच्छा वीडियो रिकॉर्ड किया है जो अभी अपलोड नहीं हुआ है, जिसमें उन्होंने बताया है कि कल्प विधान के अनुसार भैरव जी की उत्पत्ति हर तरह से कैसे हुई — किस कल्प में कौन से भैरव आए और कैसे।
क्या भैरव जी के अलावा दूसरे देवता भी भैरव का पद सँभाल सकते हैं?
कई स्थानों पर हनुमान जी और शिव भैरव के रूप में
हाँ। वक्ता कहते हैं कि भैरव का स्वरूप ऐसा नहीं है कि भैरव का अर्थ केवल वही भैरव जी हैं जिन्हें हम जानते हैं। भैरव का अर्थ है जो भरण-पोषण करे, जो रक्षा करे। बहुत से स्थानों पर हनुमान जी भैरव जी के रूप में हैं, और बहुत से स्थानों पर स्वयं शिव जी भैरव के रूप में हैं — इसके अलावा भैरव जी के अपने मूल स्वरूप, अलग-अलग तरह के भैरव, तो हैं ही।
वक्ता कहते हैं, यह बात जान लीजिए: ऐसा नहीं है कि भैरव के स्वरूप का अर्थ केवल वही भैरव जी हैं जिन्हें हम जानते हैं। भैरव का अर्थ है वह जो भरण-पोषण करे, जो रक्षा करे। बहुत से स्थानों पर हनुमान जी भैरव जी के रूप में हैं। बहुत से स्थानों पर स्वयं शिव जी भैरव के रूप में हैं। और भैरव जी का अपना मूल स्वरूप, अलग-अलग तरह के भैरव, भी तो हैं ही।
अगर घर में केवल हनुमान जी की पूजा होती है, तो कुल भैरव कौन हैं?
कुल भैरव के रूप में हनुमान जी, और बटुक भैरव की सांकेतिक पूजा
वक्ता कहते हैं कि अगर आपके यहाँ हमेशा भगवती की सेवा-पूजा हुई है और साथ में हनुमान जी पूजे जाते हैं, किसी और देव की पूजा नहीं होती, तो सूक्ष्म, सांकेतिक रूप में बटुक भैरव की पूजा कीजिए, क्योंकि चौकी में सब विराजमान होते हैं — पर मुख्य भैरव वही हनुमान जी होंगे जो पहले से पूजे जा रहे हैं: वही आपके कुल भैरव बन गए हैं।
मान लीजिए, वक्ता कहते हैं, आपके घर में आप शुरू से जानते हैं कि भगवती की सेवा-पूजा हो रही है, और उनके साथ हनुमान जी पूजे जाते हैं, और किसी और देव की पूजा नहीं होती। तो सूक्ष्म, सांकेतिक रूप में बटुक भैरव की पूजा कीजिए, क्योंकि चौकी में सब विराजमान होते हैं। पर मुख्य भैरव वही हनुमान जी होंगे जो पहले से पूजे जा रहे हैं — वही आपके कुल के भैरव बन गए हैं।
उत्तर प्रदेश और बिहार में देवी के साथ सती और ब्रह्म का होना क्या बताता है?
कुल देवी के रूप में सती और कुल देवता के रूप में ब्रह्म
वक्ता कहते हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार में लोग बताते हैं कि किसी पर देवी खेल रही हैं और देवी के साथ सती माँ हैं, और उनके साथ कोई ब्रह्म हैं। अगर सती और ब्रह्म दोनों पूजे जाते हैं और दोनों सात्विक और देव गुण से युक्त हैं, तो सती आपकी कुल देवी बन गई हैं और उनके साथ वाले ब्रह्म आपके कुल देवता बन जाते हैं — पर वे देव होने चाहिए, पिशाच और राक्षस नहीं।
वक्ता कहते हैं कि छोटे रूप में उत्तर प्रदेश और बिहार क्षेत्र के लोग भी सेवा-पूजा करते हैं। जब वे लोग पूजा करते हैं तो बताते हैं कि किसी पर देवी खेल रही हैं, और देवी के साथ सती माँ हैं, और उनके साथ कोई ब्रह्म हैं। तो इसे सूक्ष्मता से समझिए: अगर वे सती और वे ब्रह्म दोनों पूजे जाते हैं और दोनों सात्विक और देव गुण से युक्त हैं, तो सती आपके कुल की देवी बन जाती हैं और उनके साथ वाले ब्रह्म आपके कुल के देवता बन जाते हैं। पर वे देव होने चाहिए; वे पिशाच और राक्षस नहीं होने चाहिए।
देव श्रेणी के ब्रह्म को पिशाच या राक्षस से कैसे अलग पहचानें?
देव श्रेणी के ब्रह्म के लक्षण
वक्ता कहते हैं कि देव श्रेणी के ब्रह्म हमेशा गायत्री और जनेऊ से बलवान होंगे, सात्विकता से व्यवहार करेंगे, अपनी बात के बहुत पक्के होंगे, कभी गलत काम को बढ़ावा नहीं देंगे, और आपको देवी-देवताओं की पूजा की ओर ज़ोर देकर ले जाएँगे — बार-बार शिव जी और दुर्गा जी की पूजा करने को कहेंगे, गलत रास्ते पर जाने पर रोकेंगे, शिखा और जनेऊ के नियम रखने को कहेंगे, और हमेशा आपके साथ खड़े रहेंगे।
वक्ता कहते हैं कि देव, पिशाच और राक्षस में अंतर होता है; इसे ध्यान में रखिए। अगर कुल के ब्रह्म देव श्रेणी में हैं, तो वे हमेशा गायत्री से बलवान होंगे, जनेऊ से बलवान होंगे, सात्विकता से व्यवहार करेंगे, अपनी बात के बहुत पक्के होंगे, कभी गलत काम को बढ़ावा नहीं देंगे, और आपको देवी-देवताओं की पूजा की ओर ज़ोर देकर ले जाएँगे। वे आपसे बार-बार शिव जी और दुर्गा जी की पूजा करने को कहेंगे। अगर आप गलत रास्ते पर जाएँगे तो रोकेंगे; शिखा के बारे में बताएँगे, जनेऊ के नियम के बारे में बताएँगे, और हमेशा आपका साथ देंगे। यह अलग बात है कि इनमें कुपिता, यानी क्रोध का तत्व, कुछ ज़्यादा होता है, इसलिए ये जल्दी गुस्सा भी हो जाते हैं।
अगर किसी नकारात्मक शक्ति को केवल शांत करने के लिए घर में बिठा दिया जाए तो क्या होता है?
पिशाच को देव मानकर पूजना
वक्ता कहते हैं कि अगर वे नकारात्मक हैं और आपने उन्हें केवल शांत करने के लिए पूजा है — किसी ने कहा और आपने बिठा दिया — तो बाद में वे बहुत परेशानी देंगे। अगर वे राक्षस तत्व नहीं छोड़ पाए हैं, अगर वे पिशाच हैं और आप उन्हें देव मानकर पूज रहे हैं, तो उस अवस्था में उन्हें पहचानने के लिए कोई समर्पित भक्त चाहिए।
पर अगर वे नकारात्मक हैं, वक्ता कहते हैं, और आपने उनकी पूजा की, केवल उन्हें शांत करने के लिए — ठीक है, हम आपको आपकी पूजा देंगे; किसी ने कहा और आपने उन्हें बिठा दिया। उसके बाद वे बहुत कठिनाई देंगे। अगर वे नकारात्मक में हैं, अगर वे राक्षस तत्व नहीं छोड़ पाए हैं, अगर वे बस पिशाच हैं और आप उन्हें देव बनाकर पूज रहे हैं — तो उस अवस्था में उन्हें जानने के लिए कोई समर्पित भक्त चाहिए।
क्या ब्रह्म को देव या भैरव के रूप में स्वतंत्र स्थान दिया जा सकता है?
भैरवत्व देवी द्वारा दिया गया अधिकार है
वक्ता कहते हैं कि अपनी सोच से कभी ब्रह्म को देवता या भैरव के रूप में स्वतंत्र स्थान न दें — कुछ भी करें या समझें, तो उनकी बात पूरी तरह समझकर ही, यह भी कि कौन भैरव हो सकता है और कौन नहीं। ऐसा नहीं है: भैरव का अधिकार देवी देती हैं।
और कभी भी, वक्ता कहते हैं, आप अपने हिसाब से ब्रह्म को देवता के रूप में, भैरव के रूप में स्वतंत्र स्थान नहीं देंगे। ऐसा कोई भी काम करें, या उसे समझें — उन जगहों पर भी जहाँ यह पहले से है — तो उनकी बात पूरी तरह समझकर ही: कौन भैरव हो सकता है और कौन नहीं। वे कहते हैं, ऐसा नहीं है। भैरवत्व का जो अधिकार है, वह देवी देती हैं।
जब ब्रह्म किसी की नहीं सुनते, तो उन्हें कौन मना सकता है?
केवल बड़ी भवानी, जगदंबा स्वरूप, की बात मानी जाती है
वक्ता कहते हैं कि जब ब्रह्म किसी की बात नहीं मानते, तब वे बड़ी भवानी की सुनते हैं — यानी वे जो बिल्कुल इस लोक की देवी नहीं हैं, दिव्य लोक की महाशक्ति, जगदंबा भगवती दुर्गा। काली जी के सेवक उन्हें तरह-तरह की मंत्र विद्या या तामसिक विद्या से परेशान कर सकते हैं, पर किसी देव शक्ति का दिल से मानना केवल और केवल दुर्गा जी, बड़ी भवानी, जगदंबा स्वरूप, त्रिनेत्र की कृपा से होता है, जिनकी कृपा से वे रुकते हैं।
जब ब्रह्म बात नहीं मानते, जब वे किसी की बात नहीं मानेंगे, तब वे बड़ी भवानी की सुनते हैं — यानी वे जो पूरी तरह, यानी इस लोक की कोई देवी नहीं हैं: दिव्य लोक की महाशक्तियाँ, जगदंबा भगवती दुर्गा। काली के सेवक भी तरह-तरह की मंत्र विद्या आदि से, या तामसिक विद्या से, उन्हें परेशान कर सकते हैं; पर दिल से मानने की बात, किसी देव शक्ति के मन से मानने की बात, केवल और केवल दुर्गा जी की है, जो बड़ी भवानी हैं, जो जगदंबा का स्वरूप हैं, जो त्रिनेत्र हैं, पूरी तरह महाशक्ति हैं। उन्हीं की कृपा से ये रुकते हैं — वे जो शुद्ध हैं।
अगर ब्रह्म का पिंड बिना किसी देवता के ऊपर रहे स्थापित कर दिया जाए तो क्या होता है?
स्वतंत्र रूप से बिठाए गए ब्रह्म का जाल
वक्ता कहते हैं कि अगर ज़िद में आकर किसी ब्रह्म ने परिवार को इतना परेशान किया कि वे किसी देवी-देवता के अधीन नहीं रहे — न शंकर जी का मंदिर बनवाया, न दुर्गा जी का, कुछ नहीं, हनुमान जी भी नहीं, और सीधे उस ब्रह्म का पिंड बिठा दिया — तो यहाँ आप फँस जाएँगे। अब वे आपको अपनी मर्ज़ी से चलाएँगे।
तो जब कोई नकारात्मक हो, वक्ता कहते हैं, अगर आप उसे स्वतंत्र स्थान दे दें। ज़िद में आकर उन्होंने इतना परेशान किया कि अब आप किसी देवी-देवता के अधीन नहीं रहे: न आपने शंकर जी का मंदिर बनवाया, न दुर्गा जी का, कुछ नहीं किया, न हनुमान जी, कुछ भी नहीं, और सीधे उनका पिंड बिठा दिया — हाँ ब्रह्म, हम आपकी पूजा करेंगे। अब यहाँ आप फँस जाएँगे। अब वे आपको अपनी मर्ज़ी से चलाएँगे। हो सकता है कुछ समय ठीक चला, एक साल, दो साल, पाँच साल, दस साल — पर उसके बाद, जहाँ भी आपके कुल में किसी ने किसी तरह की गलती की।
परिवार में किस तरह की गलती ब्रह्म को भड़काती है?
कुल की प्रकृति के विरुद्ध विवाह
वक्ता कहते हैं कि प्रेम विवाह आम बात है, और दूसरे कुल में विवाह शायद माफ़ भी हो जाए; पर घर की प्रकृति के विरुद्ध विवाह — जहाँ लहसुन-प्याज़ नहीं खाया जाता और मांस, मछली या शराब का सवाल ही नहीं, और ऐसे घर से लड़की कुल में आए जहाँ ये सब होता है — तो ब्रह्म उपद्रव करेंगे, और उन दोनों के साथ कुछ हो या न हो, आपके कुल और परिवार में परेशानी होगी।
वक्ता कहते हैं कि प्रेम विवाह अब आम बात है। आप ब्राह्मण हैं; किसी ने दूसरे कुल में विवाह कर लिया — ठीक है, दूसरे कुल में कर लिया, शायद वह भी माफ़ हो जाए। पर प्रकृति के विरुद्ध: आपके लोगों की प्रकृति यह है कि इस घर में लहसुन-प्याज़ नहीं खाया जाता, जबकि वहाँ मांस-मछली के बिना, दारू-शराब के बिना कोई बात ही नहीं। अब अगर ऐसे घर की लड़की घर में, कुल में आती है, तो ब्रह्म क्या उपद्रव नहीं करेंगे? उन दोनों के साथ कुछ हो या न हो, इधर आपके कुल और परिवार में कठिनाई होगी। और यहाँ आप कहते हैं — गलती हमारी नहीं थी, गलती उनकी थी। पर भाई, वह आपके कुल का है, और वे किसी को नहीं छोड़ेंगे। कल वे भी ज़रूर भुगतेंगे; आज वे आपको परेशान कर रहे हैं, और लड़के को लड़की से ज़्यादा भुगतना पड़ेगा, क्योंकि लड़की दूसरे कुल की है — वह भी भुगतेगी, पर कम, हालाँकि शायद ज़्यादा भी।
अगर ब्राह्मण लड़की ऐसे कुल में विवाह करे जिसके रीति-रिवाज उसके परिवार की प्रकृति के विरुद्ध हों, तो क्या होता है?
ब्रह्म के होने पर लगने वाला दोष
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी तरह, जब ब्राह्मण कुल की लड़की किसी दूसरे कुल में जाती है और वहाँ इस तरह के काम होते हैं, तो ब्रह्म के होने से दोष ज़रूर लगता है। वे पूरे परिवार को अच्छी तरह परेशान करते हैं; और जितना मनाना है, मनाया जा रहा है, पर यह उन पर निर्भर है।
ठीक इसी तरह, वक्ता कहते हैं, जब ब्राह्मण कुल की लड़की किसी दूसरे कुल में चली जाती है, और फिर वहाँ इस तरह के काम होते हैं। ब्रह्म तो हैं — दोष ज़रूर, ज़रूर लगेगा। वे पूरे परिवार को अच्छी तरह परेशान करके छोड़ते हैं। अब वहाँ, जितना मनाना चाहें, मनाइए; मनाया जा रहा है। पर यह उन पर निर्भर है। वे कहेंगे: तुमने गलती की है। सज़ा मेरी मर्ज़ी है — जितने समय तक चाहूँ, दूँ। आप यह नहीं कह सकते कि हमने इतनी छोटी गलती की, तो अब हमें माफ़ कर दो; नहीं, ऐसा भी नहीं हो सकता। यह उनकी मर्ज़ी है — एक बार में मान जाएँ, दस साल में मानें, या बिल्कुल न मानें — और आप, क्योंकि आप गलत हैं।
ब्रह्म के बारे में सबसे बड़ी नकारात्मक बात क्या है?
ब्रह्म को मनाने की कोई तय व्यवस्था नहीं
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्म की सबसे नकारात्मक बात उन्हें मनाने की व्यवस्था ही है। गलती छोटी हो या बड़ी, आप अपने हिसाब से हाथ जोड़े खड़े रह सकते हैं — पर वे कब मानेंगे, यह किसी के हाथ में नहीं।
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्म की सबसे नकारात्मक बात वह व्यवस्था है जिससे उन्हें मनाया जाता है। गलती छोटी हो, गलती बड़ी हो — अपने हिसाब से आप हाथ जोड़े खड़े रह सकते हैं। पर वे कब मानेंगे? यह किसी के हाथ में नहीं है।
क्या कोई तांत्रिक ब्रह्म को ज़बरदस्ती मना सकता है?
तंत्र विद्या से ज़बरदस्ती मनाना और एक प्रतिशत चूक का खतरा
वक्ता कहते हैं कि ऊँचे स्तर के सेवक और साधक, तंत्र के जानकार, तंत्र विद्या से उन्हें ज़बरदस्ती बाँधकर और खींचकर मना सकते हैं। पर अगर एक प्रतिशत भी चूक हो, और ज़बरदस्ती ऐसा काम करने में दोष उन्हीं का रहा हो, तो वे तुरंत उस व्यक्ति पर, जिसने ज़बरदस्ती मनाया, या उसके परिवार पर वार करते हैं। यह खेलने की चीज़ नहीं है।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, यह है कि जो ऊँचे स्तर के सेवक और साधक हैं, तंत्र के जानकार हैं, वे ज़बरदस्ती — तंत्र विद्या से बाँधकर और खींचकर — उन्हें मना सकते हैं। पर जहाँ एक प्रतिशत भी चूक हुई, और अगर दोष उन्हीं का रहा, ज़बरदस्ती ऐसा काम करके, तो या तो वह व्यक्ति जिसने ज़बरदस्ती मनाया, या उस व्यक्ति का परिवार, तुरंत चपेट में आता है। वे यह सब करते हैं। इसलिए, वक्ता कहते हैं, इन सब चीज़ों से सोच-समझकर ही खेलना चाहिए। यह खिलवाड़ की चीज़ नहीं है।
अगर हनुमान जी कुल देवता हैं पर कुल देवी का पता नहीं, तो क्या करना चाहिए?
सेवा-पूजा में हनुमान जी के साथ भगवती को बिठाना
वक्ता कहते हैं कि अगर आपके घर में हनुमान जी पूजे जाते हैं, तो वे कुल देवता बन गए हैं; और अगर आपको कुलदेवी का नाम पता है तो ठीक है, पर अगर आपको केवल इतना पता है कि कुल में हनुमान जी पूजे जाते हैं, तो ऐसे समय में सेवा-पूजा में हनुमान जी के साथ भगवती को स्थान दीजिए।
तो अगर आपके घर में हनुमान जी कुल के देवता के रूप में पूजे जाते हैं, वक्ता कहते हैं, तो वे कुल के देवता बन गए हैं। अब कुलदेवी के रूप में — हनुमान जी पूजे जाते हैं, और उनके साथ कोई और शक्ति पूजी जाती है जिसे आप जानते हैं: अगर आपको कुलदेवी का नाम पता है तो ठीक है। पर अगर पता नहीं, अगर आपको बस इतना पता है कि कुल में केवल हनुमान जी पूजे जाते हैं, तो कुल की देवी कौन होंगी? ऐसे समय में, वक्ता कहते हैं, सेवा-पूजा में हनुमान जी के साथ भगवती को स्थान दीजिए।
अगर कोई पता न हो तो हनुमान जी के साथ किन भगवती की पूजा करें?
सबसे पास के शक्तिपीठ की भगवती
वक्ता कहते हैं कि अगर घर में हनुमान जी पूजे जाते हैं, तो उनके साथ उस शक्तिपीठ की भगवती की पूजा कीजिए जो आपके घर के पास है, अगर आपको नहीं पता कि कुलदेवी कौन हैं।
तो अगर घर में हनुमान जी पूजे जाते हैं, वक्ता कहते हैं — उन्होंने थोड़ी देर के लिए लाइव रोका था — तो हनुमान जी के साथ, आपके घर के पास जो भी शक्ति पीठ है, उन भगवती की पूजा कीजिए, अगर आपको नहीं पता कि वे कौन हैं।
अगर देवी पूजी जाती हैं पर भैरव का पता नहीं, तो किसकी पूजा करें?
स्वाभाविक रूप से कुल भैरव के रूप में बटुक भैरव
वक्ता कहते हैं कि अगर देवी पूजी जाती हैं और आपको नहीं पता कि भैरव जी कौन हैं, तो कुल भैरव के रूप में बटुक भैरव जी की पूजा कीजिए।
अगर देवी पूजी जाती हैं, वक्ता कहते हैं, और आपको नहीं पता कि भैरव जी कौन हैं, तो कुल भैरव के रूप में बटुक भैरव जी की पूजा कीजिए।
क्या आप स्वयं देवी से पूछ सकते हैं कि भैरव कौन हैं?
सवारी के समय पूछना, और यह उत्तर कि स्थान अभी खाली है
वक्ता कहते हैं कि अगर किसी पर भगवती की या आपके घर की देवी की सवारी आ रही है, तो उनसे साफ़ पूछिए कि भैरव के रूप में किसकी पूजा करें। अगर वे कहें कि अभी तक भैरव के पद पर किसी को स्थान नहीं दिया गया है, तो बटुक भैरव कीजिए।
अगर किसी पर भैरव जी की, भगवती की, आपके घर की देवी की सवारी आ रही है, वक्ता कहते हैं, तो उनसे साफ़ पूछिए: भैरव के रूप में किसकी पूजा करनी है? अगर वे कहें कि अभी तक भैरव के पद पर किसी को स्थान नहीं दिया गया है, तो आपको बटुक भैरव करने चाहिए।
क्या घरों में पूजे जाने वाले वीर भैरव गिने जाते हैं?
लोक वीर जो भैरव के स्थान पर हो भी सकते हैं और नहीं भी
वक्ता कहते हैं कि बहुत से घरों में लोक वीरों की सेवा-पूजा होती है, और वीर को भी भैरव का स्थान दिया जाता है, क्योंकि भैरव का स्थान उन देवों का है जो रक्षा करते हैं। तो जो वीर देवी के साथ हैं, वे भी भैरव के रूप में हैं — और बहुत बार नहीं भी होते।
वीर, वक्ता कहते हैं — लोक वीर — बहुत से घरों में सेवित और पूजित होते हैं। वीर को भी भैरव का स्थान दिया जाता है, क्योंकि भैरव का स्थान उन देवों का है जो रक्षा करते हैं। तो जो वीर देवी के साथ हैं, वे भी भैरव के रूप में हैं — और बहुत बार नहीं भी होते।
क्या कभी मसान को कुल भैरव के रूप में पूजा जा सकता है?
मसान को भैरव का स्थान देने पर पूरी रोक
नहीं। वक्ता कहते हैं कि कभी भी, गलती से भी नहीं — अगर आपके घर में भगतवाल की चीज़ें हैं और उनमें कोई मसान या इस तरह की चीज़ें हैं, और आपने उन्हें भैरव के रूप में पूजा — तो यह गलत हो जाएगा। इन सब बातों का ध्यान रखना पड़ता है।
जो नया साधक पता न लगा पाए कि उसके कुल भैरव और कुलदेवी कौन हैं, वह क्या करे?
सुरक्षित रास्ता: भगवती, महादेव और बटुक भैरव
वक्ता कहते हैं कि अगर आप नए-नए साधना कर रहे हैं और यह नई जानकारी ले रहे हैं कि आपके कुल भैरव और कुल देवी कौन हैं, और यह स्पष्ट नहीं हुआ है, तो कोई कठिनाई नहीं: भगवती और महादेव की सेवा-पूजा कीजिए, बटुक भैरव की सेवा-पूजा कीजिए, और भैरव जी के रूप में दी गई पूजा उसी को मिलेगी जिसे मिलनी है।
इसके अलावा, वक्ता कहते हैं, अगर आप नए-नए साधना कर रहे हैं, नई जानकारी ले रहे हैं कि आपके कुल के भैरव कौन हैं और आपके कुल की देवी कौन हैं। अगर आपको स्पष्ट नहीं हुआ है, तो कोई कठिनाई नहीं है। भगवती और महादेव की सेवा-पूजा कीजिए; बटुक भैरव की सेवा-पूजा कीजिए। उसके साथ, भैरव जी के रूप में दी गई पूजा केवल उन्हीं को मिलेगी जिन्हें दी जानी है।
क्या कोई नकारात्मक शक्ति शिवलिंग पर चढ़ाई गई पूजा ले सकती है?
कौन से शिवलिंग सुरक्षित हैं — नर्मदेश्वर या प्राण-प्रतिष्ठित
वक्ता कहते हैं कि शिवलिंग पर की गई पूजा कोई नकारात्मक शक्ति कभी नहीं ले सकती — पर केवल नर्मदेश्वर शिवलिंग या मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठित शिवलिंग। अगर आप खुद कोई पत्थर उठाकर रख दें और उसकी पूजा करें, तो वहाँ कुछ नहीं कहा जा सकता; वहाँ कुछ भी हो सकता है।
शिवलिंग पर की गई पूजा, वक्ता कहते हैं, कोई नकारात्मक शक्ति कभी नहीं ले सकती — पर कौन सा शिवलिंग: नर्मदेश्वर शिवलिंग, या फिर मंदिर में स्थित प्राण-प्रतिष्ठित शिवलिंग। अगर आप खुद कोई पत्थर उठाकर रख दें और उसकी पूजा करें, तो वहाँ कुछ नहीं कहा जा सकता; वहाँ कुछ भी हो सकता है। पर जो शिवलिंग विधि-विधान से है — पहला, नर्मदेश्वर, जिसके लिए कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं, और दूसरा, मंदिर वाला। इन दोनों पर अगर आप पूजा करते हैं, तो सबकी पूजा पूरी हो जाती है।
काल भैरव अष्टमी 16 दिसंबर को है, सुबह 5:30 बजे से उस पूरे दिन।
16 दिसंबर की अष्टमी और उसका समय
वक्ता कहते हैं कि इस बार काल भैरव अष्टमी 16 दिसंबर को है; अष्टमी सुबह 5:30 बजे भोर से अगले दिन तक रहेगी, इसलिए पूरा 16 दिसंबर भैरव अष्टमी है। अगर आपको अपने कुल के भैरव के बारे में जानकारी नहीं है, तो बटुक भैरव के रूप में उनकी सेवा-पूजा कीजिए, या जैसा उन्होंने अब तक समझाया है।
तो कुल भैरव के रूप में, वक्ता कहते हैं, इस बार पड़ने वाली काल भैरव अष्टमी 16 दिसंबर को है। अष्टमी सुबह 5:30 बजे भोर से अगले दिन तक रहेगी, इसलिए पूरा 16 दिसंबर भैरव अष्टमी है। अगर आपको अपने कुल के भैरव के बारे में कोई जानकारी नहीं है, तो बटुक भैरव के रूप में उनकी सेवा-पूजा कीजिए, या अब तक जो बताया गया है उसके अनुसार।
भैरव का विधि-विधान कितनी बार करना चाहिए?
हर अष्टमी, वरना घर का कोई रक्षक नहीं
वक्ता कहते हैं कि उनका विधि-विधान हर अष्टमी को ज़रूर करना चाहिए, उसी तरह जैसे हम रोज़ भगवती की पूजा करते हैं। अगर आप भैरव की पूजा नहीं करते, तो घर में रोकने और रक्षा करने वाला कोई नहीं है। रक्षा पाने के लिए भैरव जी की पूजा ज़रूरी है।
उनका विधि-विधान, वक्ता कहते हैं, हर अष्टमी को ज़रूर करना चाहिए, उसी तरह जैसे हम रोज़ भगवती की पूजा करते हैं। अगर आप भैरव की पूजा नहीं करते, तो घर में कोई नहीं है जो रोके, जो रक्षा करे। तो रक्षा पाने के लिए भैरव जी की पूजा ज़रूरी है। वे जोड़ते हैं कि उन्होंने यह विषय एक अलग वीडियो में समझाया है, जो अपलोड होगा — भैरव जी की पूजा कैसे रोकी गई, उसका बुरा परिणाम क्या हुआ, क्यों रोकी गई, किसने रोकी, और उन्हें घर-घर से कैसे निकाला गया — ताकि सुनने वालों की गलतफ़हमियाँ दूर हों।
सोखा बाबा और गौरैया बाबा कौन हैं?
सोखा बाबा के रूप में पूजे जाने वाले वीरभद्र, और गौरैया बाबा के रूप में उनके दूसरे गण
सोखा बाबा, गौरैया बाबा और बन्नी परमेश्वरी कौन हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि शिव जी के प्रमुख गणों में एक वीरभद्र महाराज हैं, और वीरभद्र ही बाद के समय में उत्तर प्रदेश और बिहार क्षेत्र में सोखा बाबा के रूप में पूजे जाने लगे; और गौरैया बाबा के रूप में उनके दूसरे गण — पर ये दो रूपों में पूजे जाते हैं।
अलग-अलग क्षेत्रों में कुल शक्तियों की पूजा इतनी मिलती-जुलती क्यों है?
एक ही तरीका, अलग नाम, और अक्सर कोई नाम ही नहीं
वक्ता कहते हैं कि आप कहीं भी जाएँ — राजस्थान, उत्तराखंड, बिहार, ये पूर्वी और उत्तरी क्षेत्र — कुल की शक्ति की पूजा का तरीका लगभग हर जगह एक जैसा है, बस उन्नीस-बीस का फ़र्क है। ज़्यादा से ज़्यादा नाम पता होता है, और बहुत बार नाम भी नहीं; छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही है। स्वरूप थोड़ा बदलता है और नाम बदलता है, पर पूजा का तरीका लगभग एक जैसा हो जाता है।
वे दो रूपों में पूजे जाने लगे क्योंकि, वक्ता कहते हैं, आप कहीं भी जाएँ — राजस्थान में, उत्तराखंड में, बिहार में, इन पूर्वी और उत्तरी क्षेत्रों में — जितना उन्होंने देखा है, कुल की शक्ति की पूजा का तरीका सबका लगभग एक जैसा है। थोड़ा उन्नीस-बीस का फ़र्क है। ज़्यादा से ज़्यादा केवल नाम पता होता है, और बहुत बार नाम भी पता नहीं होता। छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही है। तो स्वरूप थोड़ा बदलता है, नाम बदलता है; पूजा का तरीका लगभग एक जैसा हो जाता है। वार्षिक पूजा में बलि आदि का विधान भी चलता है, और बहुत से स्थानों पर सात्विक विधान चलता है।
क्या गौरैया बाबा और बन्नी माता के लिए मंत्र सहित पूरी विधि उपलब्ध है?
गौरैया बाबा और बन्नी माता की मंत्र सहित कोई नियमित विधि नहीं
वक्ता कहते हैं कि अगर उनकी पूरी, नियमित जानकारी मंत्र सहित माँगी जाए, तो वह उस स्वरूप में नहीं मिलेगी — न गौरैया बाबा की, न बन्नी माता की। पर उनके मुख्य स्वरूपों में जाया जा सकता है: सोखा बाबा का वीरभद्र पर आता है।
इनकी, वक्ता कहते हैं, अगर मंत्र सहित पूरी विधिवत जानकारी माँगी जाए, तो वह उस स्वरूप में नहीं मिलेगी। न गौरैया बाबा की, और न बन्नी माता की। पर अगर आप उनके मुख्य स्वरूप में जाएँ, तो सोखा बाबा का वीरभद्र पर आता है।
गौरैया बाबा और बन्नी माता के मूल रूप क्या हैं?
भृंगी, और उत्तराखंड से लाया गया कालिका स्वरूप
वक्ता कहते हैं कि गौरैया बाबा का स्वरूप भृंगी का है; और बन्नी परमेश्वरी के दो स्वरूप हैं। एक बन्नी माता हैं, जिन्हें उत्तराखंड से लाया गया था, और उनके उस क्षेत्र में आने की पूरी कथा है — वह कालिका का स्वरूप है, भगवती का वही स्वरूप जिसकी कालिका योगिनी साधना उन्होंने दी है।
गौरैया बाबा का, वक्ता कहते हैं, भृंगी का स्वरूप है। और बन्नी परमेश्वरी के दो स्वरूप हैं। एक बन्नी माता हैं, जिन्हें उत्तराखंड से लाया गया था — उनकी भी पूरी कथा है कि वे इस क्षेत्र में कैसे आईं। वह कालिका का स्वरूप है: भगवती का वही स्वरूप जिसकी कालिका योगिनी साधना उन्होंने दी है। वे जोड़ते हैं कि उनके बारे में जानकारी कहीं उपलब्ध होनी चाहिए, और वे वही बता रहे हैं जो लोगों में प्रचलित है।
बन्नी परमेश्वरी और बंदी परमेश्वरी में क्या अंतर है?
पाताल कालिका और भद्रकाली के रूप में बंदी माता
वक्ता कहते हैं कि यहाँ अंतर करना पड़ेगा, क्योंकि नामों से भ्रम होता है: बंदी माता पाताल कालिका हैं, और वे भद्रकाली के रूप में भी हैं।
दूसरी, वक्ता कहते हैं, बंदी माता हैं; अब यहाँ आपको अंतर करना होगा। बन्नी परमेश्वरी है या बंदी परमेश्वरी? नाम के कारण थोड़ी गड़बड़ हो जाती है। बंदी माता पाताल कालिका हैं। और वे भद्रकाली के रूप में भी हैं।
जहाँ सोखा बाबा पूजे जाते हैं, वहाँ कुल देवी कौन हैं?
जोड़े के रूप में कुल देवता वीरभद्र और कुल देवी भद्रकाली
वक्ता कहते हैं कि वीरभद्र, यानी सोखा बाबा, के साथ लोगों ने अब सती माँ की भी पूजा करवाई है, या बाद के समय में वे पूजी जाने लगीं; पर सोखा बाबा के साथ मुख्य पूजा भद्रकाली की होगी, क्योंकि भद्रकाली वीरभद्र की शक्ति, उनकी विवाहित पत्नी हैं। जहाँ सोखा बाबा पूजे जाते हैं, वहाँ भद्रकाली कुलदेवी बन जाती हैं; जहाँ बंदी परमेश्वरी पूजी जाती हैं, वहाँ सोखा बाबा अपने आप कुल देवता बन जाते हैं।
वीरभद्र, यानी सोखा बाबा — उनके साथ लोगों ने अब सती माँ की भी पूजा करवाई है, या बाद के समय में वे पूजी जाने लगीं। पर सोखा बाबा के साथ मुख्य पूजा भद्रकाली की होगी, क्योंकि भद्रकाली वीरभद्र की शक्ति, उनकी विवाहित पत्नी हैं। दोनों महाशक्तियाँ हैं। अंश रूप में, घर-घर में, जहाँ भी वे कुल के देवी-देवता के रूप में पूजे जाते हैं: जहाँ सोखा बाबा पूजे जाते हैं, वहाँ भद्रकाली कुलदेवी बन गईं; जहाँ बंदी परमेश्वरी पूजी जाती हैं, वहाँ सोखा बाबा अपने आप उनके कुल के देवता बन जाते हैं। वक्ता कहते हैं कि नामों के कारण यह ज्ञान बाद के समय में इधर-उधर सिमट कर रह गया।
गुड़गाँव की देवियों की पूजा किस क्रम में होती है?
शीतला माता से पहले कौशांबी माता, बाद में मसानी माता
गुड़गाँव की शीतला माता के बारे में पूछे जाने पर वक्ता सुनने वाले की बात की पुष्टि करते हैं: उनसे पहले गुड़गाँव की कौशांबी माता पूजी जाती हैं, और शीतला माता के बाद उसी स्थान की मसानी माता पूजी जाती हैं। वे कहते हैं कि उस स्थान का नियम वैसा ही है जैसा सुनने वाले ने बताया, और कुलदेवी सच में शीतला माता ही हैं।
गुड़गाँव की शीतला माता हैं; उनसे पहले गुड़गाँव की कौशांबी माता पूजी जाती हैं, और शीतला माता के बाद उसी स्थान की मसानी माता पूजी जाती हैं। हाँ, यह ठीक है, वक्ता कहते हैं — आप उस स्थान के नियम के अनुसार पूछ रहे हैं, और यह सही है। कुलदेवी शीतला माता ही हैं।
जब तीन कुल देवियाँ जुड़ी हों, तो रोज़ की पूजा क्या हो?
विग्रह स्थापित किए बिना, नाम से पूजा
एक सुनने वाले ने पूछा, जो घर में दुर्गा माता का विग्रह रखते हैं और सबसे ज़्यादा उन्हीं की पूजा करते हैं। वक्ता कहते हैं कि जब तक आपने श्री विग्रह नहीं रखा है, उसे रखना ज़रूरी नहीं; जिन पर आप पूजा कर रहे हैं, उसी पर उनके नाम से पूजा कीजिए। विग्रह रखने के बाद नियम बदल जाते हैं — जैसे गुड़गाँव की मसानी को घर में नहीं रखा जा सकता, हालाँकि शीतला माता को रखा जा सकता है।
देखिए, वक्ता कहते हैं: जब तक आपने श्री विग्रह नहीं रखा है, उसे रखना ज़रूरी नहीं है। जिन पर आप पूजा कर रहे हैं, उसी पर उनके नाम से पूजा कीजिए। विग्रह रखने के बाद नियम बदल जाएगा। अगर आप उनका रखेंगे — तो अब गुड़गाँव की मसानी को घर में कैसे रखेंगे? शीतला माता को, ठीक है, रख भी सकते हैं। तो उनकी पूजा उसी तरीके से कीजिए जो उनके लिए उचित है।
कोल्हापुर की महालक्ष्मी के भैरव कौन हैं?
सप्तशती में अठारह भुजा और दस भुजा वाले रूप
कोल्हापुर की महालक्ष्मी माता के बारे में पूछे जाने पर वक्ता दुर्गा सप्तशती से शुरू करते हैं: महिषासुर वध के समय भगवती को अठारह भुजाओं वाली दिखाया गया है, और वे वहाँ दो स्वरूपों में थीं। कोल्हासुर राक्षस के वध के समय, जिससे कोल्हापुर का नाम है, वे महालक्ष्मी स्वरूप में, अठारह भुजाओं वाली महिषासुर मर्दिनी हैं; पर जब दूसरे कल्प में उन्होंने महिषासुर का वध किया, तो वे उसी स्थान पर दस भुजाओं वाले रूप में तुलजा भवानी के रूप में स्थापित हैं।
देखिए, वक्ता कहते हैं: भगवती महालक्ष्मी — अगर आप दुर्गा सप्तशती के अनुसार चलें, तो भगवती उस समय जब उन्होंने महिषासुर का वध किया। महिषासुर वध के समय उनकी भुजाएँ अष्टादश, यानी अठारह, दिखाई गई हैं। वे वहाँ दो स्वरूपों में थीं। एक, कोल्हासुर राक्षस के वध के समय, जिससे कोल्हापुर का नाम है: महालक्ष्मी स्वरूप में, अठारह भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी। पर जब दूसरे कल्प में उन्होंने महिषासुर का वध किया, तो वे उसी स्थान पर दस भुजाओं वाले रूप में, तुलजा भवानी के रूप में स्थापित हैं।
दस भुजाओं वाली तुलजा भवानी के भैरव कौन हैं?
तंत्र में नीलकंठ भैरव, व्यवहार में काल भैरव
वक्ता कहते हैं कि अगर आप दस भुजाओं वाली तुलजा भवानी की ओर जाएँ, तो दस भुजा वाले रूप के भैरव नीलकंठ भैरव हैं। पर वहाँ मुख्य रूप से काल भैरव की पूजा होती है; तंत्र के अनुसार नीलकंठ भैरव की पूजा तब होती है जब उस रूप का मंडल पूजन किया जाता है।
तो इस रूप के अनुसार, वक्ता कहते हैं, अगर आप दस भुजाओं वाली तुलजा भवानी में जाएँ, तो दस भुजा वाले रूप के भैरव नीलकंठ भैरव हैं। पर वहाँ मुख्य रूप से केवल काल भैरव की ही पूजा होती है। तंत्र के अनुसार नीलकंठ भैरव की पूजा तब होती है जब उनका मंडल पूजन होता है।
कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर में भैरव के रूप में कौन खड़े हैं?
भैरव और द्वारपाल के रूप में गणपति, और स्वरूप-भेद से नारायण
वक्ता कहते हैं कि अगर आप तंत्र ग्रंथों के अनुसार चलें, तो यह जानकर हैरान होंगे कि वहाँ गणपति भैरव के रूप में, द्वारपाल के रूप में हैं; और अगर स्वरूप-भेद से चलें, तो नारायण उनके भैरव निकलते हैं। पुराणों के अनुसार गणेश जी स्वयं नारायण का स्वरूप हैं, इसलिए थोड़ा अंतर आ जाता है। वे जोड़ते हैं कि यह जानकारी उन्हें महालक्ष्मी मंदिर के पुजारियों से मिली, जब सुनने वाले ने पहले पूछा था।
और कोल्हापुर की महालक्ष्मी के भैरव, वक्ता कहते हैं — अगर आप तंत्र ग्रंथों के अनुसार चलें, तो यह जानकर हैरान होंगे कि वहाँ भैरव के रूप में, द्वारपाल के रूप में, गणेश खड़े हैं। और अगर आप इस तरह, स्वरूप-भेद के अनुसार जाएँ, तो नारायण उनके भैरव निकलते हैं। तो यहाँ दोनों बातें हैं; और पुराणों के अनुसार गणेश जी नारायण का ही स्वरूप हैं, इसलिए थोड़ा अंतर आ जाता है। वे बताते हैं कि वे जो बता रहे हैं वह आपके महालक्ष्मी मंदिर के पुजारियों के अनुसार है, जिनसे उन्होंने जानकारी लेने की कोशिश की थी क्योंकि सुनने वाले ने पहले पूछा था। लोग या तो मुख्य रूप से नारायण के साथ पूजते हैं, और बहुत से स्थानों पर इसे गणपति मानते हैं, क्योंकि मंडप के द्वार पूजन में द्वार पर पूजन भैरव जी के रूप में होना चाहिए।
मंडप पूजन में द्वार पर किसकी पूजा होती है?
देवी मंडप के द्वार पर गणपति और भैरव दोनों
वक्ता कहते हैं कि किसी के भी, किसी भी देवी के मंडप पूजन में वहाँ गणपति और भैरव दोनों पूजे जाते हैं। महालक्ष्मी मंदिर में दोनों ओर दो गणपतियों का पूजन होता है; वे दोनों नाम नहीं बता सकते, पर वहाँ भैरव के रूप में गणपति ही स्थापित हैं।
किसी के भी, किसी भी देवी के मंडप पूजन में, वक्ता कहते हैं, वहाँ गणपति और भैरव दोनों पूजे जाते हैं। महालक्ष्मी मंदिर में दोनों ओर दो गणपतियों का पूजन होता है। वे कहते हैं कि वे दोनों के नाम नहीं बता सकते। तो वहाँ भैरव के रूप में गणपति ही स्थापित हैं।
क्या शास्त्र गणपति के भैरव के स्थान पर होने का समर्थन करते हैं?
देवी लोकों के वर्णन में द्वार पर गणपति
वक्ता कहते हैं कि जब भी आप किसी ग्रंथ या पुराण में देवी के लोक का वर्णन पढ़ें, तो वहाँ भी यह बात दिखती है: भगवती के अनगिनत स्वरूप और अनगिनत लोक हैं, और जिस भी लोक का वर्णन पढ़ें, बहुत बार द्वार पर भैरव की जगह गणपति विराजमान दिखते हैं। वे कहते हैं कि इससे उनकी पहले कही बात की पुष्टि होती है — कि ज़रूरी नहीं कि भैरव के रूप में केवल भैरव जी ही हों; हनुमान जी हो सकते हैं, गणपति हो सकते हैं।
और जब भी आप देवी के लोक का वर्णन पढ़ें, वक्ता कहते हैं, किसी भी ग्रंथ में, किसी भी पुराण में, वहाँ भी यह बात दिखती है। भगवती के अनगिनत स्वरूप और अनगिनत लोक हैं; जिस भी लोक का वर्णन पढ़ें, बहुत बार द्वार पर, भैरव की जगह, गणपति भी विराजमान दिखाई देते हैं। तो कहीं न कहीं इससे उनकी आज पहले कही बात की पुष्टि होती है: ज़रूरी नहीं कि भैरव के स्वरूप में केवल भैरव जी ही हों। हनुमान जी हो सकते हैं, गणपति हो सकते हैं।
जो खंडोबा को पूजते हैं, क्या उनके कुल भैरव खंडोबा हैं?
भैरव जी के रूप में खंडोबा
वक्ता कहते हैं कि तुलजा भवानी की बात बताई जा चुकी है; और खंडोबा सच में कुल भैरव हैं — भैरव जी के रूप में खंडोबा ही पूजे जाते हैं, क्योंकि खंडोबा स्वयं भैरव जी का एक रूप हैं।
तुलजा भवानी का, वक्ता कहते हैं, बताया जा चुका है। खंडोबा कुल भैरव हैं ही। भैरव जी के रूप में खंडोबा ही पूजे जाते हैं। खंडोबा, वक्ता कहते हैं, स्वयं भैरव जी का एक रूप हैं।
महाभैरव मंत्र में क्या-क्या आता है?
कुल, बटुक, काल और कपाल भैरव के लिए एक मंत्र
वक्ता कहते हैं कि चैनल पर डाला गया महाभैरव मंत्र ठीक इसी काम के लिए है: महाभैरव मंत्र से कुल भैरव, बटुक भैरव, काल भैरव और कपाल का पूजन सब पूरा हो जाता है, और इससे आप किसी भी भैरव की, भैरव जी के किसी भी स्वरूप की पूजा कर सकते हैं।
ज़रूर, वक्ता कहते हैं — महाभैरव मंत्र देखिए; वे एक बात साफ़ कहते हैं। चैनल पर डाला गया महाभैरव मंत्र ठीक इसी के लिए है। महाभैरव मंत्र से आपका कुल भैरव, बटुक भैरव, काल भैरव और कपाल का पूजन सब उसी में पूरा हो जाता है। इससे आप किसी भी भैरव की, भैरव जी के किसी भी स्वरूप की पूजा कर सकते हैं। जैसे जब आप महागणपति का पूजन करते हैं, तो अष्टविनायक और गणपति के बाकी सब स्वरूपों का पूजन पूरा हो जाता है; और जब आप महाशिव का पूजन करते हैं, तो ग्यारह रुद्रों सहित शिव जी के सभी अवतारों का पूजन पूरा हो जाता है। ठीक उसी तरह आप महाभैरव मंत्र से भैरव जी का पूजन भी कर सकते हैं।
क्या तिल के तेल का दीपक लंबे समय तक जलाने से बीमार होते हैं?
एक दावा जिसे वक्ता बिना प्रमाण का मानकर नकारते हैं
यह पूछे जाने पर कि क्या यह सच है कि तिल के तेल का दीपक लंबे समय तक जलाने से बीमार पड़ते हैं, वक्ता कहते हैं कि उन्होंने अब तक ऐसी बात न कहीं सुनी है न पढ़ी है, और उन्हें इसका कोई शास्त्रीय आधार नहीं पता। अगर ऐसा है, तो यह उनकी जानकारी में नहीं है और उन्हें पता करना होगा; पर ऐसा होना नहीं चाहिए। तिल के तेल से कोई बीमार क्यों पड़ेगा? अशुद्धि हो, तभी बीमार पड़ सकते हैं।
ऐसी बात, वक्ता कहते हैं, उन्होंने अब तक न कहीं सुनी है न पढ़ी है, और इसका कोई शास्त्रोक्त आधार भी उन्होंने अब तक नहीं सुना। अगर ऐसा है, तो यह उनकी जानकारी में नहीं है; इसे देखना पड़ेगा। ऐसा होना नहीं चाहिए। तिल के तेल से कोई बीमार क्यों पड़ेगा? अगर अशुद्धि हो, तभी बीमार पड़ सकते हैं।
सरसों के तेल और लाल बट के तेल के बारे में भी ऐसे ही प्रचार वाले दावे किए जाते हैं, जिनके पीछे कोई स्रोत नहीं।
सरसों के तेल और लाल बट के तेल पर प्रचार वाले दावे
वक्ता कहते हैं कि कुछ दिन पहले एक टिप्पणी आई थी कि सरसों के तेल का दीपक जलाने से शरीर दुखता है, और भगवान जाने ये सब कहाँ से आ रहा है। उससे कुछ दिन पहले लोग लाल बट के तेल का प्रचार करने के लिए कह रहे थे कि और कुछ मत जलाइए — जबकि लोगों को शायद पता भी न हो कि लाल बट के तेल की ज़रूरत कब और कहाँ पड़ती है। वे कहते हैं कि प्रचार के लिए लोग कुछ भी कहेंगे।
अभी कुछ ही दिन पहले, वक्ता कहते हैं, कोई टिप्पणी आई थी कि सरसों के तेल का दीपक जलाने से शरीर दुखता है। अब ये सब कहाँ से आ रहा है, भगवान जाने। और कुछ दिन पहले, लाल बट के तेल का प्रचार करने के लिए, वे कह रहे थे: किसी और चीज़ में मत कीजिए, केवल लाल बट का तेल जलाइए। लाल बट के तेल की ज़रूरत कब और कहाँ पड़ती है, वक्ता कहते हैं, पता नहीं लोगों को पता भी है या नहीं। पर प्रचार के लिए वे कुछ भी कहेंगे।
विंध्य क्षेत्र के बहुत से घरों में पीढ़ियों से तिल के तेल पर अखंड ज्योति जल रही है।
विंध्य क्षेत्र में तिल के तेल पर जलती अखंड ज्योति
वक्ता कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि यह कहीं लिखा है, और उन्होंने ऐसी बात कभी नहीं सुनी; और जहाँ तक तिल का तेल जलाने की बात है, विंध्य क्षेत्र में जाइए — बहुत से घरों में लंबे समय से अखंड ज्योति जल रही है, और वह तिल के तेल पर ही जल रही है। उन्हें वहाँ कोई बीमार पड़ता नहीं दिखता।
वक्ता कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि ऐसी बात कहीं लिखी है या ऐसा कुछ होता है; आज तक उन्होंने कहीं नहीं सुना। और जहाँ तक तिल का तेल जलाने की बात है — विंध्य क्षेत्र में जाइए। बहुत से घरों में लंबे समय से अखंड ज्योति जल रही है, और वह केवल तिल के तेल पर जल रही है। उन्हें कोई बीमार पड़ता नहीं दिखता। वहाँ अखंड ज्योति जल रही है। इसलिए, उनके अनुसार, ऐसी कोई बात नहीं है।
सिद्ध चानो बाबा बली कौन हैं?
रजकों के प्रमुख लोक देवता
लोक देव सिद्ध चानो बाबा बली कौन हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि ये मुख्य रूप से उन लोगों के प्रमुख देवता हैं जो रजक हैं, और उनके घरों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कुल देवता के रूप में इन्हीं की पूजा होती है।
मुख्य रूप से, वक्ता कहते हैं, जो रजक हैं — ये उनके प्रमुख देवता हैं। उनके घरों में कुल देवता के रूप में, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, इन्हीं की पूजा होती है। सिद्धो चानो बाबा बली। (वे बाद में समझाते हैं कि रजक वे हैं जो कपड़े धोते हैं।)
माता बामती कौन हैं, और बामत कैसे बनती है?
गर्भ में या कुँवारी अवस्था में मरने वाली लड़कियाँ; 52 ब्रह्म का समकक्ष
वक्ता कहते हैं कि जैसे ब्रह्म बावन प्रकार के होते हैं — ब्राह्मण परिवारों के लड़के ब्रह्म बने — वैसे ही जो लड़कियाँ किसी कारण से गर्भ में मर जाती हैं, या कुँवारी अवस्था में मर जाती हैं, वे दो तरह की योनि में जाती हैं; और उन दो में से एक बामत है।
माता बामती, बामत, वक्ता कहते हैं — हालाँकि उन्होंने यह चैनल पर डाला है, वे एक बार फिर बताते हैं। जैसे ब्रह्म बावन प्रकार के होते हैं: ब्राह्मणों में जो लड़के थे, वे ब्रह्म बने। अब लड़कियाँ, जो किसी कारण से गर्भ में मर जाती हैं, या जो कुँवारी अवस्था में मर जाती हैं — वे दो तरह की योनि में जाती हैं। उनमें से एक बामत है।
बामत क्या कर सकती है, और क्या घर में उसकी पूजा करनी चाहिए?
ब्रह्म तक को बाँधना, और सबसे पहले लक्ष्मी को बाँधना
वक्ता कहते हैं कि बामत में इतनी क्षमता होती है कि वह ब्रह्म को भी बाँध देती है, और ये बरकत में बहुत बाधा डालती हैं; नाराज़ होने पर, क्योंकि वह बेटी के रूप में रहती है, सबसे पहले लक्ष्मी को बाँधती है। उनके अनुसार, अगर आप मजबूरी में ऐसी शक्तियों को घर में पूज भी रहे हैं, तो उन्हें मुक्त करने की कोशिश होनी चाहिए — पूजा देकर आप उन्हें केवल बाँधते हैं, और लोग मजबूरी में उन्हें घर में बिठा लेते हैं।
बामत में, वक्ता कहते हैं, इतना सामर्थ्य होता है कि वे ब्रह्म को भी बाँध देती हैं। और ये बरकत में बहुत बाधा डालती हैं। अगर वे नाराज़ हो जाएँ — क्योंकि वे बेटी के रूप में रहती हैं — तो सबसे पहले लक्ष्मी को ही बाँधती हैं। और उनके अनुसार, अगर आप मजबूरी में घर में इन सब चीज़ों का पूजन कर भी रहे हैं, तो उन्हें मुक्त करने की कोशिश होनी चाहिए। पूजा देकर आप उन्हें केवल बाँधते हैं; मजबूरी में लोग उन्हें घर में बिठा लेते हैं।
क्या भगवान का नाम लेने से बुरे कर्म कट सकते हैं?
महाकाल स्तोत्र और कर्मों का कटना
महाकाल स्तोत्र के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि इसे ज़रूर किया जा सकता है, और अगर आप भगवान का नाम लेंगे तो बुरे कर्म ज़रूर कटेंगे।
ज़रूर, वक्ता कहते हैं, आप महाकाल स्तोत्र कर सकते हैं। बुरे कर्म — अगर आप भगवान का नाम लेंगे, तो कर्म ज़रूर कटेंगे।
घर के ब्रह्म स्थान का क्या महत्व है?
वास्तु पुरुष की नाभि के रूप में ब्रह्म स्थान
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्म स्थान का बहुत बड़ा महत्व है — उस स्थान का नाम ही ब्रह्म स्थान है। वास्तु पुरुष के चित्र में ब्रह्म स्थान नाभि वाला भाग है; और जैसे किसी भी शरीर की नाभि उसका सबसे महत्वपूर्ण अंग है, जिससे भरण-पोषण होता है, वैसे ही ब्रह्म स्थान आपके घर की नाभि है। अगर इसका पोषण ठीक से हो, तो घर का विकास ठीक से होगा।
ब्रह्म स्थान का महत्व बहुत बड़ा है, वक्ता कहते हैं; उस स्थान का नाम ही ब्रह्म स्थान है। वे वास्तु पुरुष के उस चित्र का ज़िक्र करते हैं जो उन्होंने एक बार चैनल के एक लाइव में दिखाया था — घर का बंधन कैसे करना चाहिए, क्या और कैसे होता है, पूरी जानकारी उस लाइव में दी गई थी; लाइव में खोजिए, और पहले चार-पाँच वीडियो में उन्होंने एक लाइव में बताया था कि घर का मंदिर कहाँ होना चाहिए। वहाँ उन्होंने वास्तु पुरुष से दिखाया था कि क्या कहाँ है। ब्रह्म स्थान वास्तु पुरुष का नाभि वाला भाग है; उस स्थान पर वह नाभि है। और जैसे किसी भी शरीर की नाभि सबसे महत्वपूर्ण अंग है, जिससे भरण-पोषण होता है, ठीक वैसे ही आपके घर का ब्रह्म स्थान उसकी नाभि है। अगर इसका भरण-पोषण ठीक से हो, तो घर का विकास भी ठीक होगा।
क्या केवल ब्रह्म स्थान को अच्छा रखना काफ़ी है?
घर के कोने, और वास्तु उपाय की सीमा
नहीं। वक्ता कहते हैं कि आप ब्रह्म स्थान को बहुत अच्छा रखें — वहाँ तुलसी का पौधा हो, पुराने घरों की तरह वहाँ हनुमान जी की पूजा हो — और ईशान कोण में गंदगी रखें और अग्नि कोण में वॉशरूम बना दें, तो फिर भी परेशानी होगी। वास्तु के अनुसार हर चीज़ अपने सही स्थान पर होनी चाहिए; और उसके बाद भी अगर आप जानबूझकर झगड़ा करें, तो उसका कोई उपाय नहीं।
अब ऐसा नहीं हो सकता, वक्ता कहते हैं, कि हम ब्रह्म स्थान को बहुत बढ़िया रखें — वहाँ तुलसी जी का पौधा रखें, वहाँ हनुमान जी की पूजा हो, जैसे पहले के समय में पुराने घरों में होता था। और ईशान कोण में आपने गंदगी रखी है, और अग्नि कोण में वॉशरूम बना दिया है — तो भी कठिनाई होगी। अगर आप वास्तु के अनुसार चलें, तो हर चीज़ अपने उचित स्थान के अनुसार ठीक होनी चाहिए। ठीक है, आपने उसके अनुसार ठीक कर लिया; पर उसके बाद अगर आप जानबूझकर लड़ाई-झगड़ा करें, तो उसका कोई निवारण नहीं है। सीधी बात है: अगर आपका ब्रह्म स्थान ठीक रहा, तो उस घर में सात्विक ऊर्जा का प्रवाह ठीक रहेगा, क्योंकि नाभि वाले क्षेत्र का पोषण हमेशा होना चाहिए।
क्या मंत्र अनुष्ठान का जप एक ही बैठक में करना ज़रूरी है?
दिन का जप सुबह और शाम में बाँटना
वक्ता कहते हैं कि आप कर सकते हैं — दस माला पाँच और पाँच करके की जा सकती हैं। पर अगर आप कोई विशेष अनुष्ठान कर रहे हैं, तो आपके खाने-पानी की व्यवस्था क्या होगी? सुबह आप उपवास में कर सकते हैं; शाम को खाना खाकर, नमक खाकर, जप कैसे करेंगे? वे कहते हैं कि यह काम केवल नवरात्रि में हो सकता है; बाकी समय में भी हो सकता है, पर तब संकल्प उसी के अनुसार होना चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि मंत्र अनुष्ठान के काल में जप दिन में एक ही बैठक में करना होता है, या सुबह-शाम आधा-आधा किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं: मान लीजिए दस माला जप — आप पाँच और पाँच करके कर सकते हैं। कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं, पर फिर अगर आप कोई विशेष अनुष्ठान कर रहे हैं, तो आपके खाने-पानी की व्यवस्था क्या होगी? सुबह, ठीक है, आप उपवास में करेंगे। शाम को खाना खाकर जप कैसे करेंगे? नमक खाकर? यह काम केवल नवरात्रि में हो सकता है। बाकी समय में भी हो सकता है, पर तब सकाम व निष्काम संकल्प उसी के अनुसार हो।
क्या जिन स्थानीय देवियों को पुए का भोग दिया जाता है, वे कुलदेवी के ही रूप हैं?
क्षेत्रीय प्रचलन के अनुसार चलना
एक घर के बारे में पूछा गया जहाँ भ्रामरी और महिषासुर मर्दिनी के अलावा दिवाली, होली पर, और जब बच्चा गर्भ में हो, बाहर की बाहरली को, चौक-चौराहे की शक्ति को और बसंती माता को पुए का भोग दिया जाता है — क्या ये देवियाँ कुलदेवी के ही रूप हैं। वक्ता कहते हैं कि यह चीज़ क्षेत्र के अनुसार चलती है, और वहाँ जो प्रचलन में है, उसी के अनुसार करना चाहिए।
सुनने वाले पूछते हैं कि क्या ये देवियाँ कुलदेवी की ही शक्ति हैं, क्योंकि भ्रामरी और महिषासुरमर्दिनी के अलावा दिवाली पर, होली पर, और जब बच्चा गर्भ में हो, बाहर की बाहरली को, चौक-चौराहे की शक्ति को और बसंती माता को पुए का भोग चढ़ाया जाता है। देखिए, वक्ता कहते हैं, यह चीज़ क्षेत्र के अनुसार चलती है। वहाँ जैसा प्रचलन में है, उसी तरह करना चाहिए।
माता शाकंभरी के भैरव कौन हैं, और क्या नाहर सिंह भैरव हैं?
भैरव के रूप में सदाशिव; रक्षक और वीर के रूप में नाहर सिंह
वक्ता कहते हैं कि अगर शाकंभरी माता कुलदेवी हैं, तो उनके भैरव केवल सदाशिव होंगे; वह महादेव का एक स्वरूप होगा। वे कहते हैं कि नाहर सिंह भैरव के रूप में नहीं हैं, पर अगर वे घर में रक्षक और वीर के रूप में पूजे जाते हैं — कोई लोक देवता जिसे बाद में किसी कारण से वहाँ बिठाया गया — तो वह अलग बात है।
सुनने वाले बताते हैं कि कुलदेवी माता शाकंभरी हैं और पूछते हैं कि उनके भैरव कौन होंगे, और जोड़ते हैं कि कुल देवता नाहर सिंह हैं पर उनकी विधि पता नहीं। अगर शाकंभरी माता हैं, वक्ता कहते हैं, तो उनके भैरव केवल सदाशिव होंगे। वह महादेव का एक स्वरूप होगा। नाहर सिंह भैरव के रूप में नहीं हैं; पर रक्षक के रूप में और वीर के रूप में, अगर वे घर में पूजे जाते हैं — अगर किसी कारण से आप लोगों ने बाद में घर में किसी लोक देवता की पूजा शुरू करवाई — तो वह दूसरी बात है। वे पूछते हैं कि क्या सुनने वाले राजस्थान की तरफ़ से हैं, कहते हैं कि वहाँ के लोगों को यह सब जानकारी होती है, और प्रस्ताव देते हैं कि अगर सुनने वाले को बिल्कुल जानकारी नहीं है, तो वे उन्हें उस क्षेत्र के सही साधकों से संपर्क करवा देंगे ताकि पूरी जानकारी मिल जाए।
क्या किसी देवता की शक्ति शरीर पर आए बिना भी काम करती है?
सवारी के बिना मिलने वाली कृपा
वक्ता कहते हैं कि जब आप भरपूर मात्रा में साधना और पूजा करते हैं, तो ये सब चीज़ें अपने आप आपको रास्ता देती हैं; शरीर पर आना ज़रूरी नहीं। यह उनकी इच्छा है — किसी कारण से वे शरीर पर आएँगे, या प्रसन्न होकर, या अगर आप चाहें, या अगर उन्हें कोई काम पूरा करना हो। उनके अपने विचार में, शरीर पर आए बिना उनकी कृपा पाना सबसे बड़ी बात है।
जब आप और ज़्यादा मात्रा में साधना और पूजा करते हैं, वक्ता कहते हैं, तो ये सब चीज़ें अपने आप आपको रास्ता देती हैं। शरीर पर आना ज़रूरी नहीं है। यह उनकी इच्छा है: किसी कारण से वे शरीर पर आएँगे, या प्रसन्न होकर आएँगे, या अगर आपकी अपनी इच्छा हो, या अगर उन्हें कोई काम पूरा करना हो, तब वे शरीर पर आएँगे। आज के समय में लोग बस यही चाहते हैं: नहीं, हमें शरीर पर सवारी चाहिए, हमें सवारी चाहिए — तब वह अलग बात हो जाती है, और वहाँ, वक्ता कहते हैं, बहुत उलझन है। और उनकी मान्यता यह है: शरीर पर आए बिना उनकी कृपा मिल जाए, यही सबसे बड़ी बात है।
क्या संकल्प से किसी देवता की कृपा अपने लिए चुनी जा सकती है?
संकल्प से चुनना और उसे पूरा करना
यह पूछे जाने पर कि क्या इन चीज़ों को खुद छुआ या चुना जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि आप क्यों नहीं चुन सकते — अपनी इच्छा के अनुसार संकल्प लीजिए और उसे पूरा कीजिए।
और क्या अपने लिए चुना जा सकता है, वक्ता कहते हैं, यह निर्भर करता है। आप क्यों नहीं चुन सकते? जैसी आपकी इच्छा हो, उसी के अनुसार संकल्प लीजिए और उसे पूरा कीजिए।
क्या घर के पूजा स्थान पर मूर्ति रखनी चाहिए या यंत्र?
मूर्तियों की पंचायतन व्यवस्था
वक्ता कहते हैं कि मूर्ति हमेशा पंचायतन में रखनी चाहिए — एक मुख्य देवी-देवता और उनके साथ बाकी शक्तियाँ। जैसे, अगर आप घर में मुख्य रूप से नारायण की पूजा करते हैं, तो नारायण बीच में होंगे और चारों कोनों में एक ओर भगवती, शिव जी, गणपति जी और सूर्य नारायण: यही पंचायतन है।
देखिए, वक्ता कहते हैं, मूर्ति हमेशा पंचायतन में रखनी चाहिए। यानी एक मुख्य देवी-देवता, और उनके साथ बाकी शक्तियाँ। मान लीजिए आप घर में मुख्य रूप से नारायण की पूजा करते हैं: तो नारायण बीच में होंगे, और बाकी चारों कोनों में, नारायण को केंद्र बनाकर, एक ओर भगवती, शिव जी, गणपति जी और सूर्य नारायण — यही पंचायतन है। इसके अलावा, अगर आप चाहें, तो जहाँ एक गणपति रखते हैं वहाँ लक्ष्मी-गणेश साथ रखिए; लक्ष्मी और सरस्वती जी रखिए, इस ओर लक्ष्मी नारायण रखिए। फिर शिव जी का परिवार — आप शिवलिंग रख सकते हैं, नंदी जी, उनका सर्प, उनका त्रिशूल रख सकते हैं, या शिव जी का विग्रह उनके परिवार सहित रख सकते हैं। उसके बाद, अगर चाहें, तो राम दरबार रखिए, अगर आपने लक्ष्मी नारायण नहीं रखे हैं; दोनों में से एक स्वरूप रखिए।
पंचायतन के देवताओं की रोज़ पूजा कैसे करनी चाहिए?
रोज़ एक मुख्य देवता, बाकी सांकेतिक रूप से और अपने-अपने दिन
वक्ता कहते हैं कि सबको पूरा पंचायतन रखना चाहिए, एक देवता की मुख्य रूप से पूजा करते हुए और बाकी की सांकेतिक रूप से, और जब उनका अपना मुख्य दिन आए तब उनका विशेष पूजन करते हुए। हनुमान जी का एकमुखी या पंचमुखी विग्रह भी घर में रखा जा सकता है।
इस तरह, वक्ता कहते हैं, आप सबको पूरा पंचायतन रखना चाहिए। एक देवता का मुख्य रूप से पूजन कीजिए, और बाकी का सांकेतिक रूप से; और उनका प्रधान दिन, उनका मुख्य दिन, जब आए, तब उनका विशेष पूजन कीजिए। इन सबका — हनुमान जी का भी — विग्रह, एकमुखी या पंचमुखी हनुमान जी का विग्रह, घर में रखा जा सकता है।
किसका यंत्र रखना चाहिए, और कैसा?
आराध्य का एक ठीक से बना यंत्र, बीस रुपये वाला नहीं
वक्ता कहते हैं कि मुख्य देवता का यंत्र रखना चाहिए — आपके लिए जो भी देव मुख्य हैं, उनका यंत्र, पूरे विधि-विधान से बना हुआ, ताकि पीढ़ियों तक उसकी पूजा हो सके। बीस रुपये वाला यंत्र नहीं, जो बच्चे की ड्रॉइंग की तरह रंगा हो, और जिस दिन नहलाने ले जाएँ उस दिन रंग उतर जाए। किसी जानकार से अच्छा यंत्र बनवाइए, उसका नियमित अनुष्ठान करवाइए, उसे सिद्ध करवाइए, और केवल उसी एक यंत्र की, अपने आराध्य की, पूजा कीजिए।
मुख्य देवता का यंत्र रखना चाहिए, वक्ता कहते हैं। आपके लिए कौन से देव मुख्य हैं? उन्हीं का यंत्र, पूरे विधि-विधान से बना हुआ, पीढ़ी दर पीढ़ी पूजा जाना चाहिए। ऐसा नहीं कि बीस रुपये का यंत्र ले आए जिस पर बच्चों की ड्रॉइंग जैसी पूरी रंगाई हो, और अगले दिन नहलाने ले जाएँ तो रंग उतर जाए, या किसी दिन कुछ हो जाए। उस तरह का यंत्र, बिल्कुल नहीं। एक अच्छा यंत्र जो विधि-विधान से बना हो: किसी अच्छे जानकार व्यक्ति से बनवाइए, उसका नियमित अनुष्ठान करवाइए, उसे सिद्ध करवाइए, और फिर रखिए — और केवल उसी एक यंत्र का पूजन कीजिए, जो भी आपके आराध्य हों। अगर नारायण हैं तो नारायण का यंत्र, अगर भगवती हैं तो भगवती का यंत्र, अगर हनुमान जी हैं तो हनुमान जी का यंत्र।
घर में रखी जाने वाली मूर्ति कितनी बड़ी हो सकती है?
छह इंच की सीमा और बड़ी मूर्ति के साथ आने वाले नित्य नियम
वक्ता कहते हैं कि मूर्ति की ऊँचाई छह इंच तक होनी चाहिए; घर में छह इंच से बड़ी मूर्ति रखना मना किया गया है, क्योंकि बड़ी मूर्ति के साथ आपका नियम फिर नित्य का हो जाता है, और घर के सब लोग रोज़ का नियम नहीं निभा सकते। मंदिर का नियम मंदिर में ही ठीक रहता है; घर में रखने पर कठिनाई की संभावना है।
और मूर्ति की लंबाई, वक्ता कहते हैं, छह इंच तक होनी चाहिए। घर में छह इंच से बड़ी मूर्ति रखना मना किया गया है, क्योंकि उससे बड़ी मूर्ति रखने पर आपका नियम फिर नित्य का हो जाता है। और रोज़ का नियम घर के सब लोग नहीं निभा सकते। मंदिर का नियम मंदिर में ही ठीक रहता है। अगर आप घर में रखें, तो घर में कठिनाई आने की संभावना है; इसलिए छह इंच से बड़ी मूर्ति घर में नहीं रखनी चाहिए। जैसे, छह इंच से छोटी मूर्ति को रोज़ स्नान कराने की ज़रूरत नहीं — उसे केवल पर्व काल में स्नान कराया जाता है: दिवाली, होली, या महीने में किसी पूर्णिमा या अमावस्या को, या चाहें तो हफ़्ते में एक दिन, मुख्य रूप से उन्हें स्नान कराया जा सकता है।
अगर फिर भी घर में बड़ी मूर्ति रख लें तो क्या होता है?
बड़ी मूर्ति के साथ शास्त्र के सब नियम जुड़ जाते हैं
वक्ता कहते हैं कि अगर आप बड़ी मूर्ति रखते हैं, तो आपको उस मूर्ति के साथ शास्त्र में बताए गए सब नियम मानने होंगे। आजकल मंदिरों में जो दिखता है — कहीं भी मंदिर बन गया, उसका नियम चला गया, शिव जी का मंदिर बना और एक लोटा जल चढ़ाया, एक दीपक जलाया और मान लिया कि पूजा हो गई — वह असलियत नहीं है।
पर अगर आप बड़ी मूर्ति रखते हैं, वक्ता कहते हैं, तो उस मूर्ति के साथ आपको वे सब नियम मानने होंगे जो शास्त्र में उसके लिए बताए गए हैं। आजकल आप मंदिर में जो देखते हैं: कि कहीं भी मंदिर बन गया और उसका नियम जा रहा है — शिव जी का मंदिर बन गया, एक लोटा जल चढ़ाया और चले आए, शिव जी की पूजा हो गई, एक दीपक जला दिया। असलियत कुछ और है।
शिव जी के नित्य पूजन में असल में क्या-क्या होता है?
शिव महापुराण और वायु महापुराण में बताया गया पूरा क्रम
वक्ता कहते हैं कि अगर आप शिव महापुराण, लिंग महापुराण या वायु महापुराण पढ़ें — शिव महापुराण वायु महापुराण का ही एक भाग है — तो वहाँ ये सब बातें बहुत विस्तार से बताई गई हैं: नित्य पूजन कर्म का द्वार पूजन कैसे होगा, मंडप पूजन कैसे, सांकेतिक शिखर पूजन कैसे, पहले नंदी जी का पूजन कैसे, फिर मंदिर में विराजमान शिव जी के सब गणों का पूजन कैसे — रिंगी, भृंगी, नागराज वासुकी, भैरव जी, महाकाल — फिर भगवती पार्वती, स्कंद जी, गणपति जी, उनका त्रिशूल, उनका डमरू, और उनका पंचानन स्वरूप।
असलियत यह है, वक्ता कहते हैं, कि शिव जी के नित्य पूजन के लिए आपको शिव पुराण, या लिंग महापुराण, या वायु महापुराण पढ़ना चाहिए — शिव महापुराण वायु महापुराण का ही एक भाग है। इनमें ये सब बातें बहुत विस्तार से बताई गई हैं: नित्य पूजन कर्म में द्वार पूजन कैसे होगा, मंडप पूजन कैसे होगा, फिर शिखर पूजन का सांकेतिक पूजन कैसे होगा, पहले नंदी जी का पूजन कैसे होगा, फिर मंदिर में विराजमान शिव जी के सब गणों का पूजन कैसे होगा — चाहे रिंगी और भृंगी, चाहे नागराज वासुकी, चाहे भैरव जी, चाहे महाकाल। फिर भगवती पार्वती का, स्कंद जी का, गणपति जी का पूजन कैसे होगा; उनके त्रिशूल का, उनके डमरू का, और फिर उनके पंचानन स्वरूप का पूजन कैसे होगा।
शिव महापुराण में बताया गया शिव का पूरा नित्य पूजन क्रम असल में कहाँ होता है?
केवल ज्योतिर्लिंग क्षेत्रों में
वक्ता कहते हैं कि इतना पूजन नियमित रूप से होना चाहिए — पर यह पूजन हो कहाँ रहा है? यह केवल वहीं होता है जहाँ ज्योतिर्लिंग क्षेत्र है। बाकी सब जगह लोग बस एक लोटा जल चढ़ाते हैं और उसी में समझते हैं कि पूरा पूजन हो गया। वे कहते हैं कि घर की मूर्ति की जो लंबाई तय की गई है, वह ठीक इसीलिए है कि आपको कोई विशेष विधि-विधान वाला पूजन न करना पड़े।
इतना पूजन, नियमित रूप से — पर यह पूजन हो कहाँ रहा है, वक्ता पूछते हैं। यह केवल वहीं होता है जहाँ ज्योतिर्लिंग क्षेत्र है। बाकी सब जगह लोग बस एक लोटा जल चढ़ाते हैं और उसी काम में समझते हैं कि पूरा पूजन हो गया। तो जो लंबाई तय की गई है, वक्ता कहते हैं, वह ठीक इसीलिए है: कि आपको किसी विशेष विधि-विधान से पूजन न करना पड़े।
क्या अकाल मृत्यु कुंडली और कर्मों में लिखी होती है?
अकाल मृत्यु टाला जा सकने वाला योग है, लिखा हुआ फ़ैसला नहीं
वक्ता कहते हैं कि अकाल मृत्यु का एक योग होता है, और वह योग टाला जा सकता है। उसका नाम ही अकाल है — यानी काल नहीं आया, समय अभी पूरा नहीं हुआ, वह अधूरा है। पर अगर आप उसे टाल नहीं पाए, तो वह फलित होता है; और क्योंकि वह अकाल है और उसका समय पूरा नहीं हुआ था, तो जितना समय बचा है, उतने समय आप प्रेत योनि में रहते हैं। जब आपका समय पूरा होगा, तब आप आगे की गति की ओर जाएँगे।
सुनने वाले पूछते हैं कि ऐसा क्यों कहा जाता है कि अकाल मृत्यु से मरने वाले को, कर्म कैसे भी हों, केवल प्रेत योनि मिलेगी, जबकि दुर्घटना या बीमारी से अकाल मृत्यु कुंडली और कर्मों में लिखी होती है। देखिए, वक्ता कहते हैं, अकाल मृत्यु का एक योग होता है। वह योग टाला जा सकता है। उसका नाम ही अकाल है — यानी काल नहीं आया, समय अभी पूरा नहीं हुआ। वह अधूरा है। पर अगर आप उसे टाल नहीं पाए, तो वह फलित होता है; और क्योंकि वह अकाल है और उसका समय पूरा नहीं हुआ था, तो जितना समय बाकी बचा है, उतने समय आप प्रेत योनि में रहते हैं। जब आपका समय पूरा हो जाएगा, तब आप आगे की गति की ओर जाएँगे।
कुंडली में मारक काल दिखता ही क्यों है?
कुंडली एक चेतावनी है, फ़ैसला नहीं
वक्ता कहते हैं कि अकाल मृत्यु कुंडली और कर्म में लिखी नहीं होती — वह एक योग है, और ज़रूरी नहीं कि वह इसी कर्म का, आपके इसी जन्म का हो। जब मारकेश की महादशा चल रही हो और कोई ज्योतिषी कहे कि मृत्यु संभव है या ऐसी दुर्घटना हो सकती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि लिखा है कि यह होगा ही: कुंडली ठीक इसीलिए है कि आप सावधान हो जाएँ और उसे सुधार सकें।
और कुंडली और कर्म में, वक्ता कहते हैं, अकाल मृत्यु लिखी नहीं होती; वह एक योग है। ज़रूरी नहीं कि वह इसी कर्म का, आपके इसी जन्म का हो। जब मारकेश चल रहा हो — आप कहेंगे कि कुंडली के अनुसार अभी चल रही महादशा मारकेश की है, और आप मृत्यु के बराबर कष्ट भोग रहे हैं — उसमें कोई ज्योतिषी आपसे कहेगा कि अब मृत्यु संभव है, कि इस तरह की दुर्घटना हो सकती है, कि ऐसा कुछ हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि लिखकर रखा है कि यह होगा ही होगा। आपके साथ जो भी गलत होने वाला है, कुंडली ठीक यही दिखा रही है: सावधान हो जाइए, इस समय आपके साथ यह गलत हो सकता है, इसे सुधारिए। चाहे आपका चरित्र हो, आपका व्यवहार, आपका जीवन, आपका आचरण — कुंडली में हर चीज़ इसी कारण दिखाई जाती है। प्रेत योनि इसलिए मिली क्योंकि समय पूरा नहीं हुआ था।
क्या स्त्रियाँ हनुमान जी के विग्रह को छू सकती हैं?
दक्षिणमुखी और पंचमुखी हनुमान को छूने पर रोक
सुनने वाले ने मंदिर में एक स्त्री को हनुमान जी के चरणों में तेल लगाते देखा था, इसलिए पूछा। वक्ता कहते हैं कि दक्षिणमुखी हनुमान जी के अलावा पंचमुखी हनुमान जी को छूना भी मना है; और जहाँ मंदिर में हनुमान जी का मुख दक्षिण दिशा की ओर हो, वहाँ छूना मना है। पंचमुखी हनुमान जी की स्थापना में विधि जानने वाले आचार्य उनका आसन, भले सांकेतिक रूप से, प्रेतासन बनाते हैं — और इसी कारण स्त्री का स्पर्श मना है।
दक्षिणमुखी हनुमान जी को छोड़ दें, वक्ता कहते हैं — चाहे हनुमान जी का बाल रूप हो — पंचमुखी हनुमान जी को भी छूना मना है। और जहाँ मंदिर में हनुमान जी का मुख दक्षिण दिशा की ओर देख रहा हो, वहाँ छूना मना है। पंचमुखी हनुमान जी की स्थापना के समय, आचार्य जी, विधि जानने वाले विद्वान, जब उनकी स्थापना करवाते हैं, तो उनका आसन — भले सांकेतिक रूप से — प्रेतासन बनाते हैं। वे कहते हैं कि यह उन्होंने पहले भी बताया है। इसी कारण स्त्री का स्पर्श मना है।
स्त्री हनुमान जी के किन रूपों को छू सकती है?
बाकी स्वरूपों को छूना खुला है
वक्ता कहते हैं कि बाकी — हनुमान जी के दूसरे स्वरूप — स्त्रियाँ छू सकती हैं।
बाकी, वक्ता कहते हैं, जहाँ तक हनुमान जी की बात है, हनुमान जी का जो स्वरूप है — उनमें आप उन्हें छू सकती हैं।
जहाँ कामाख्या देवी कुलदेवी हैं, वहाँ कुल भैरव कौन हैं?
उमानंद भैरव और कामेश्वर महादेव
एक सुनने वाले ने लिखा कि वे सिकरीवाल राजपूत हैं, उनकी कुलदेवी कामाख्या देवी हैं और उनके आँगन में शंकर भगवान पूजे जाते हैं। वक्ता कहते हैं कि अगर भगवती कामाख्या आपकी कुलदेवी हैं, तो आपके भैरव उमानंद भैरव होंगे, और दूसरे, महादेव, कामेश्वर महादेव हैं — तो कामेश्वरी भगवती, कामेश्वर महादेव, और भैरव के रूप में उमानंद।
अगर भगवती कामाख्या आपकी कुलदेवी हैं, वक्ता कहते हैं, तो आपके भैरव उमानंद भैरव होंगे। और दूसरे, महादेव, कामेश्वर महादेव हैं। तो कामेश्वरी भगवती, कामेश्वर महादेव, और भैरव उमानंद हो जाते हैं।
क्या भोग चढ़ाते समय दीपक जलता होना चाहिए?
पूजा में सबसे पहले दीपक जलाना
बिल्कुल, वक्ता कहते हैं। जब आप पहली बार पूजन स्थान पर जाते हैं और उसे धोकर सब ठीक करके पूजन शुरू करने वाले होते हैं, तो पहले दीपक को धोइए, उस पर चंदन-तिलक कीजिए, रोली और कुमकुम लगाइए, फूल चढ़ाइए, और फिर दीपक जलाइए — पंचोपचार पूजन करके फिर जलाइए। दीपक जलने के बाद ही देव विग्रह को स्नान कराइए, उनका श्रृंगार कीजिए, और उनके लिए दीपक जलाइए।
बिल्कुल, वक्ता कहते हैं। जब आप पहली बार पूजन स्थान पर जाते हैं, जो भी काम करें — पूजा स्थान को धोकर सब ठीक कर लिया, अब आपको पूजन शुरू करना है। सबसे पहले वहाँ दीपक को धोइए, दीपक पर चंदन-तिलक आदि कीजिए, रोली और कुमकुम लगाइए, फूल चढ़ाइए, और उसके बाद दीपक जलाइए। पंचोपचार पूजन करके दीपक जलाइए; और दीपक जलने के बाद ही, चाहे आप देव विग्रह को स्नान कराएँ, उनका श्रृंगार करें, या उनके लिए दीपक जलाएँ। कर्म साक्षी के रूप में एक दीपक ज़रूर होना चाहिए।
हर पूजा कर्म का साक्षी दीपक क्यों होना चाहिए?
शिव और पार्वती की पुत्री के रूप में ज्योति
वक्ता कहते हैं कि जो ज्योति जलती है, उसे भगवती पार्वती और भगवान शिव की पुत्री कहा जाता है। तो ज्योति के रूप में वहाँ उसी को साक्षी होने का अधिकार और आशीर्वाद मिला है — कि वह हर कर्म की साक्षी होगी, कि उसके सामने किया हर काम शिव को और आराध्य को स्वीकार होगा, और यह उनकी जानकारी में रहेगा: हाँ, तुमने यह काम मेरी बेटी के सामने किया।
यानी जो दीपक जलता है, जो ज्योति जलती है — ज्योति को भगवती पार्वती और भगवान शिव की पुत्री कहा जाता है। तो ज्योति के रूप में वहाँ उसी को साक्षी बनने का अधिकार मिला है, आशीर्वाद मिला है, कि वह हर कर्म की साक्षी होगी। उसके सामने किया हर काम शिव को स्वीकार होगा, आराध्य को स्वीकार होगा, और यह उनकी जानकारी में रहेगा — हाँ, तुमने यह काम मेरी बेटी के सामने किया। तो उसे जलाकर और उसका आवाहन करके, फिर हर कर्म कीजिए। चाहे भोग चढ़ाएँ, चाहे आरती करें, जो भी करें — पर पहले दीपक जलता होना चाहिए।
क्या आहुति देते समय स्त्रियों को बीज मंत्रों में प्रणव लगाना चाहिए?
स्त्रियों के लिए प्रणव नहीं; उसकी जगह माया बीज या लक्ष्मी बीज
यह पूछे जाने पर कि क्या स्त्रियों को नवग्रहों के बीज मंत्रों, अर्गला के पहले मंत्र और देवताओं के अष्टोत्तर शतनाम से आहुति देते समय प्रणव लगाना चाहिए, वक्ता कहते हैं कि नहीं लगाना चाहिए। अगर बहुत इच्छा हो तो माया बीज लगाया जा सकता है।
इत्र से कालिका पूजन का विधान क्या है?
एक प्रश्न जिसका उत्तर वक्ता सार्वजनिक रूप से नहीं देते
यह पूछे जाने पर कि इत्र से कालिका के पूजन का विधान क्या है, वक्ता कहते हैं कि पूछने वाले अब दूसरी लाइन में जा रहे हैं, और उन्हें भी पता है कि इत्र से किस कालिका का पूजन होता है — और वे इसे खोलकर नहीं बताते।
अब आप दूसरी लाइन में जा रहे हैं, वक्ता पूछने वाले से कहते हैं। आपको भी पता है कि इत्र से किस कालिका का पूजन होता है। वे बात वहीं छोड़ देते हैं।
प्रत्यंगिरा क्या हैं, और क्या हर शक्ति की अपनी प्रत्यंगिरा होती है?
हर शक्ति की अपनी क्रम विद्या के रूप में प्रत्यंगिरा
वक्ता कहते हैं कि प्रत्यंगिरा एक क्रम विद्या है, और हर शक्ति की अपनी प्रत्यंगिरा होती है। इंटरनेट पर खोजेंगे तो भगवती बगला और भगवती तारा की प्रत्यंगिरा मिलेगी, और ज़्यादा से ज़्यादा भगवती काली की; भगवती दुर्गा का मूल मंत्र आपको मिल जाएगा। भगवती कामाख्या की भी अपनी प्रत्यंगिरा है, और भगवान शिव की भी अपनी।
देखिए, वक्ता कहते हैं, महाप्रत्यंगिरा एक क्रम विद्या है। हर शक्ति की अपनी प्रत्यंगिरा होती है। अगर आप इंटरनेट पर खोजेंगे, तो भगवती बगला और भगवती तारा की प्रत्यंगिरा मिलेगी, और ज़्यादा से ज़्यादा भगवती काली की — इन तीनों की। भगवती दुर्गा का मूल मंत्र आपको मिल जाएगा। अगर आप किसी गुरु परंपरा के साधक के पास जाएँ, पुराने समय वाले के, तो वे इस विषय में आपको बता सकते हैं — अगर आप योग्य हैं। भगवती कामाख्या की भी अपनी प्रत्यंगिरा है; भगवान शिव की भी अपनी प्रत्यंगिरा है। वक्ता कहते हैं कि प्रत्यंगिरा का अर्थ ही है उनका उग्र, क्रोध तत्व से युक्त स्वरूप।
प्रत्यंगिरा कितनी हैं?
मूल, विपरीत और महाविपरीत प्रत्यंगिरा, और अपराजिता
वक्ता कहते हैं कि मूल प्रत्यंगिरा है, फिर प्रत्यंगिरा, फिर विपरीत प्रत्यंगिरा, फिर महाविपरीत प्रत्यंगिरा — चार हैं। वे कहते हैं कि अपराजिता भी एक तरह से प्रत्यंगिरा की ही शक्ति हैं, बाद के समय के तंत्र-भेद से।
मूल प्रत्यंगिरा है, वक्ता कहते हैं, फिर प्रत्यंगिरा। फिर विपरीत प्रत्यंगिरा, फिर महाविपरीत प्रत्यंगिरा। चार हैं। अप्राजिता भी एक तरह से प्रत्यंगिरा की ही शक्ति हैं — बाद के समय के तंत्र-भेद से।
प्रत्यंगिरा के शुरुआती कवच से ऊँचे स्तर पर कैसे जाएँ?
दीक्षा, और पहले काली के मूल स्वरूप की उपासना
वक्ता कहते हैं कि कवच की शुरुआती साधना को ऊँचे स्तर पर ले जाने के लिए क्रम-भेद से चलना चाहिए: दीक्षा लेकर फिर क्रम से आगे बढ़ना, जिस भी प्रत्यंगिरा की साधना आप करने जा रहे हैं। अगर प्रत्यंगिरा का अर्थ सीधे कहें तो वह भगवती काली का स्वरूप बन जाता है, क्योंकि क्रोध तत्व से पहली महाविद्या का स्वरूप उन्हीं का है — इसलिए पहले उनके मूल स्वरूप की साधना करनी होगी, और तभी मुख्य स्वरूपों की साधना होगी।
कवच की शुरुआती साधना को ऊँचे स्तर पर ले जाने के लिए, वक्ता कहते हैं, आपको क्रम-भेद से चलना चाहिए। अगर आप शुरुआती साधना कर रहे हैं, तो इसमें आपको दीक्षा लेकर फिर क्रम से चलना होगा, जिस भी प्रत्यंगिरा की साधना आप करने जा रहे हैं। अगर प्रत्यंगिरा का अर्थ सीधे कहें, तो वह भगवती काली का स्वरूप बन जाता है। क्योंकि क्रोध तत्व से पहली महाविद्या का स्वरूप उन्हीं का है — प्रत्यंगिरा। इसलिए पहले उनके मूल स्वरूप की साधना करनी होगी, और तभी मुख्य स्वरूपों की साधना होगी।
घर में कितनी शालिग्राम शिलाएँ रखनी चाहिए?
एक शालिग्राम, और परम वैष्णव का नियम
यह पूछे जाने पर कि क्या जितने तुलसी के गमले हों उतने शालिग्राम होने चाहिए, वक्ता कहते हैं कि तुलसी के गमलों जितने शालिग्राम उन्होंने नहीं सुने; परम वैष्णव लोग जो इतनी सेवा कर सकते हैं, वे रखते हैं। एक शालिग्राम शिला होनी चाहिए — सबसे पहले यह। और नियम परम वैष्णव की तरह रहने का है: जैसे शिवलिंग को रोज़ स्नान कराना चाहिए, वैसे ही शालिग्राम शिला का नित्य अभिषेक होना चाहिए।
देखिए, वक्ता कहते हैं, जितने तुलसी के गमले उतने शालिग्राम — यह उन्होंने नहीं सुना। जो परम वैष्णव लोग हैं, जो इतनी सेवा कर सकते हैं, वे रखते हैं। एक शालिग्राम शिला होनी चाहिए; यह पहली बात है। और नियम परम वैष्णव के साथ रहने का है। यानी जिस तरह शिवलिंग को रोज़ स्नान कराना चाहिए, उसी तरह शालिग्राम शिला का नित्य अभिषेक होना चाहिए।
शालिग्राम पर तुलसी का क्या नियम है, और किन दिनों तुलसी तोड़ना मना है?
एकादशी, रविवार, द्वादशी, ग्रहण और अमावस्या के लिए पहले से तुलसी तोड़ना
वक्ता कहते हैं कि तुलसी जी रोज़ चढ़ानी चाहिए; और जिन दिनों तुलसी जी का पत्ता तोड़ना मना है — एकादशी, रविवार, द्वादशी, ग्रहण, अमावस्या — उनके लिए पहले से तोड़कर रख लेना चाहिए। अगर ताज़ा न मिले, तो पुराने पत्ते ही धोकर उन पर ज़रूर चढ़ाने चाहिए। शालिग्राम शिला को कभी बिना तुलसी के नहीं रखना चाहिए: यही मुख्य नियम है।
और तुलसी जी, वक्ता कहते हैं, रोज़ चढ़ानी चाहिए। एकादशी, रविवार, द्वादशी, ग्रहण, अमावस्या — जिन भी दिनों तुलसी जी का पत्ता तोड़ना मना है, उनके लिए पहले से तोड़कर रख लेना चाहिए। अगर नया न मिले, तो पुराने पत्ते ही धोकर उन पर ज़रूर चढ़ाने चाहिए। शालिग्राम शिला को कभी बिना तुलसी के नहीं रखना चाहिए। यही मुख्य नियम है। शिवलिंग का मुख्य नियम नित्य अभिषेक और स्नान है, और शालिग्राम का भी यही है।
जहाँ शीतला माता कुलदेवी हैं, वहाँ कुल भैरव कौन हैं?
शीतला माता के लिए काल भैरव
वक्ता कहते हैं कि शीतला माता के साथ कुल भैरव काल भैरव हैं। अगर गुड़गांव वाली हैं, तो आप उस स्थान का अपना देख सकते हैं; जब आप किसी शक्तिपीठ से लेते हैं, तो फिर उसी के अनुसार चलना चाहिए।
हाँ, वक्ता कहते हैं, शीतला माता के साथ कुल भैरव काल भैरव हैं। अगर गुड़गांव वाली हैं, तो आप देख सकते हैं कि उस स्थान का क्या है। जब आप किसी शक्तिपीठ से लेते हैं, तो फिर उसी के अनुसार चलना चाहिए।
जब भैरव स्पष्ट न हों, तो कुल देवता के हवन के लिए कौन सा मंत्र लें?
महाभैरव मंत्र, बिना प्रणव के, सबके लिए खुला
कुल देवता और कुलदेवी के लिए सत्ताईस दिन का हवन करना चाहने वाले एक व्यक्ति के पूछने पर वक्ता कहते हैं कि अगर कुलदेवी भगवती शीतला हैं तो उनका कीजिए; और जहाँ लगे कि कुल भैरव ठीक से पहचाने नहीं जा रहे, वहाँ चैनल पर दिया गया महाभैरव मंत्र लीजिए। इसमें प्रणव नहीं लगा है, और इसमें भैरव जी का बीज मंत्र है — इसलिए स्त्री-पुरुष सब कर सकते हैं, जनेऊ पहनते हों या नहीं, किसी तरह की कोई कठिनाई नहीं।
और आप कुल देवता और कुलदेवी के लिए सत्ताईस दिन का हवन करना चाहते हैं, वक्ता कहते हैं। तो अगर आपकी कुलदेवी भगवती शीतला हैं, तो उनका कीजिए। और कुल भैरव के रूप में, जहाँ आपको लगे कि ठीक से पता नहीं चल रहा, तो जो महाभैरव मंत्र चैनल पर दिया गया है — उन्होंने पहले कहा है कि महाभैरव मंत्र हर शक्ति के लिए और भैरव जी के हर स्वरूप के लिए है। आप उससे हवन कर सकते हैं। उसमें प्रणव भी नहीं लगा है। उसमें भैरव जी का बीज मंत्र भी दिया गया है। तो क्योंकि यह भैरव जी का बीज मंत्र है, स्त्री-पुरुष, कोई भी इसे कर सकता है; इसमें किसी तरह की कोई कठिनाई नहीं, चाहे कोई जनेऊ पहनता हो या न पहनता हो।
घर से पुराने, ज़िद्दी, खूनी ब्रह्म को हटाने के लिए सबसे अच्छा क्या है?
प्रत्यंगिरा, महाविद्या और बगलामुखी सभी सक्षम हैं
यह पूछे जाने पर कि अभिचार से घर में बिठाए गए पुराने, ज़िद्दी, खूनी ब्रह्म को हटाने के लिए प्रत्यंगिरा, महाविद्या या माता बगलामुखी में से कौन बेहतर है, वक्ता कहते हैं कि अगर पूछने वाली यह खुद करने जा रही हैं, तो बेहतर उन्हें होना चाहिए। "बेहतर" छोड़िए, वे कहते हैं: उन्हें हटाने के लिए तो एक साधारण लोक देवता भी बेहतर होगा — कितने भी शक्तिशाली हों, वे केवल ब्रह्म हैं। पर अगर आप खुद कोशिश करने जा रही हैं, तो आपको बेहतर होना होगा। प्रत्यंगिरा सक्षम हैं, महाविद्या सक्षम हैं, और भगवती बगला सक्षम हैं; तीनों सक्षम हैं और तीनों बेहतर हैं।
अगर आप यह काम करने जा रही हैं, वक्ता पूछने वाली से कहते हैं, तो बेहतर आपको होना चाहिए। "बेहतर" छोड़िए — उन्हें हटाने के लिए तो एक साधारण लोक देवता भी बेहतर होगा। कितने भी सामर्थ्य वाले हों, हैं तो केवल ब्रह्म ही। पर अगर आप खुद कोशिश करने जा रही हैं, तो आपको बेहतर होना होगा। दूसरी बात: प्रत्यंगिरा भी सक्षम हैं, महाविद्या भी सक्षम हैं, और भगवती बगलामुखी भी सक्षम हैं। तीनों सक्षम हैं। और तीनों बेहतर हैं।
खूनी ब्रह्म को हटाने में क्या खतरा है?
एक साधक की सच्ची घटना जो घर नहीं पहुँचे
वक्ता कहते हैं कि जहाँ खूनी ब्रह्म की बात हो, वहाँ किसी को भी इतना बड़ा काम पूरी सावधानी से ही करना चाहिए, क्योंकि वहाँ थोड़ी सी चूक पर भी उसकी माया बहुत चलती है — थोड़ी सी चूक और जान गई। वे एक सच्ची घटना बताते हैं: इस साधक परिवार के एक बहुत पुराने साधक ने बताया कि उनके परिवार के एक करीबी सदस्य, जो ब्राह्मण और साधक थे, ने कहा कि वे दिल्ली के एक घर से ऐसे खूनी ब्रह्म को हटाएँगे; वे गए और हटाया, और घर नहीं पहुँच पाए, या उस स्थान तक नहीं पहुँच पाए जहाँ उसे ले जाना था, और रास्ते में ही पूरी कहानी खत्म हो गई।
जहाँ खूनी ब्रह्म हो, वक्ता कहते हैं, वहाँ किसी को भी बड़ा काम पूरी सावधानी से ही करना चाहिए। क्योंकि वहाँ ज़रा सी चूक पर भी उसकी माया बहुत दूर तक चलेगी। थोड़ी सी चूक, और जान गई। फिर वे एक घटना बताते हैं। इस साधक परिवार के एक बहुत पुराने साधक — जिनकी टिप्पणी हमेशा आती है, और जो आज भी सुन रहे होंगे — ने खुद उन्हें बताया कि उनके अपने परिवार के एक करीबी सदस्य, जो ब्राह्मण और साधक भी थे, की बात है। दिल्ली के एक घर में ठीक इसी तरह का एक खूनी ब्रह्म था। उन्होंने कहा कि वे इसे हटाएँगे; वे अच्छे साधक थे। उनका निजी कारण जो भी रहा हो, वे उसे हटाने गए, और हटा दिया। वे घर नहीं पहुँच पाए, या उस स्थान पर नहीं जा पाए जहाँ उसे ले जाना था; रास्ते में ही पूरी कहानी खत्म हो गई। वक्ता कहते हैं कि यह सच्ची घटना है, और वे साधक भी सुन रहे होंगे।
कुंडली की आठ योगिनियों की रोज़ की पूजा कैसे होती है?
जिस योगिनी की महादशा चल रही हो, उसकी पूजा
वक्ता कहते हैं कि कुंडली के अनुसार चलने वाली आठों योगिनियों की रोज़ पूजा करने की कोई ज़रूरत नहीं। केवल उसी की पूजा करें जिसकी महादशा आप पर चल रही है, तो वह ठीक है।
देखिए, वक्ता कहते हैं, कुंडली के अनुसार चलने वाली आठों योगिनीयों की रोज़ पूजा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। अगर आप केवल उसी की पूजा करें जिसकी महादशा आप पर चल रही है, तो वह ठीक है।
कुल देवता और कुल भैरव में क्या अंतर है?
कुल देवता ही कुल भैरव हो सकते हैं, या अलग भी
वक्ता कहते हैं कि कुल देवता ही कुल भैरव हो सकते हैं, और कुल भैरव और कुल देवता अलग भी हो सकते हैं — यह निर्भर करता है, और उन्होंने शुरुआत में ही बता दिया है कि इसे कैसे देखना है। वे जोड़ते हैं कि जहाँ एक सुनने वाले लिखते हैं कि कुलदेवी माँ मनसा हैं और उनके साथ के भैरव मकरध्वज हैं, वे बिल्कुल हो सकते हैं: जो पहला पूजन कर रहे हैं, वे जिस शक्ति को स्थान देते हैं, वही पूजित हो जाती है।
कुल देवता ही कुल भैरव हो सकते हैं, वक्ता कहते हैं; और कुल भैरव और कुल देवता अलग भी हो सकते हैं। यह निर्भर करता है — उन्होंने शुरुआत में ही बता दिया है कि इसे कैसे देखना है। एक सुनने वाले लिखते हैं कि उनकी कुलदेवी माँ मनसा हैं और उनके साथ के भैरव मकरध्वज हैं। बिल्कुल हो सकते हैं। जो पहला पूजन, प्रथम पूजन कर रहे हैं — वे जिस शक्ति को स्थान देते हैं, वही पूजित हो जाती है।
अजपा और योग का क्या संबंध है?
योग के साथ अजपा जप सौ गुना फल देता है
वक्ता कहते हैं कि अजपा जप हमेशा चलने वाली चीज़ है; और अगर आप योग के साथ अजपा जप करें, तो वह सौ गुना ज़्यादा फल देने वाला हो जाता है।
अजपा जप जप, वक्ता कहते हैं, हमेशा चलने वाली चीज़ है। अगर आप योग के साथ अजपा जप करें, तो वह सौ गुना ज़्यादा फल देने वाला हो जाता है।
अगर एक ही हो सके, तो हवन और जप में कौन ज़्यादा तीव्र है?
जप का पूरा फल हवन से मिलता है
वक्ता कहते हैं कि दोनों का अपना महत्व है, और जप का पूरा फल हवन से मिलता है। अगर एक ही हो सके, तो अपने देश, काल और परिस्थिति के अनुसार चुनिए; हवन कर सकते हैं, जप कर सकते हैं — दोनों का अपना महत्व है।
दोनों का, वक्ता कहते हैं, अपना महत्व है, हवन का भी और जप का भी। जप का पूरा फल हवन से मिलता है। अगर एक ही हो सके, तो जैसी देश, काल और परिस्थिति हो, उसके अनुसार चुनिए। आप हवन भी कर सकते हैं, जब चाहें कर सकते हैं; दोनों का अपना महत्व है।
क्या योग्य और आध्यात्मिक पत्नी पाने के लिए कोई साधना है?
अर्गला का अंतिम मंत्र — पत्नीं मनोरमां देहि
वक्ता कहते हैं कि ज़रूर कर सकते हैं — मुख्य रूप से अपनी मैया दुर्गा की, अर्गला के अंतिम मंत्र से, "पत्नीं मनोरमां देहि" से। वे बताते हैं कि यह उन्होंने पिछले लाइव में कहा था, अगर पूछने वाले ने नहीं सुना।
बिल्कुल कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं — मुख्य रूप से अपनी मैया दुर्गा की। अर्गला स्तोत्र के अंतिम मंत्र से। "पत्नीं मनोरमां देहि" से। वे जोड़ते हैं कि यह उन्होंने पिछले लाइव में बताया था, अगर पूछने वाले ने नहीं सुना।
जो माँ दुर्गा की कृपा पाना चाहे, वह शुरुआत कैसे करे?
पहले सतनाम साधना, फिर चक्र विधि से 32 नामावली
वक्ता कहते हैं कि भगवती दुर्गा की सेवा शुरू कीजिए, और अगर पहले कोई साधना नहीं की है तो सतनाम साधना से शुरू कीजिए। पहले 1100 सतनाम कीजिए, और उसके बाद चक्र विधि से 32 नामावली शुरू कीजिए। अगर अभी संस्कृत पढ़ने में कठिनाई है, तो चालीसा से शुरू कीजिए, जिसकी विधि भी उन्होंने दी है। इतने से ही आपकी शुरुआती ऊर्जा ऐसी हो जाएगी कि आगे बढ़ने का रास्ता खुलने लगेगा।
बिल्कुल पा सकते हैं, वक्ता कहते हैं। भगवती दुर्गा की सेवा शुरू कीजिए। उनकी सेवा सतनाम साधना से ही शुरू कीजिए, अगर आपने पहले कोई साधना नहीं की है। पहले 1100 सतनाम कीजिए; उसके बाद चक्र विधि से दुर्गा की 32 नामावली शुरू कीजिए। और अगर अभी संस्कृत पढ़ने में कठिनाई है, तो चालीसा से शुरू कीजिए — उसकी विधि भी बताई गई है, कैसे करनी है। इतने से ही आपकी शुरुआती ऊर्जा ऐसी हो जाएगी कि आगे जाने का रास्ता मिलने लगेगा। और वही साधना बार-बार दोहराइए: भगवती की कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव होने लगेगा।
घर में माँ दुर्गा को स्थायी रूप से कौन सी माला चढ़ाई जा सकती है?
जो भी माला ठीक लगे — मोती, मूंगा, रुद्राक्ष, स्फटिक
वक्ता कहते हैं कि जो भी आपको सबसे अच्छा लगे — मोती, मूंगा, रुद्राक्ष, स्फटिक, जो भी चाहें — उसकी माला चढ़ाई जा सकती है। वे खुद जो माला सुंदर और अच्छी लगे, उसे चाँदी में बनवाकर भगवती को चढ़ाते हैं, हमेशा उनका कोई नया श्रृंगार करते रहते हैं। एक से ज़्यादा चढ़ाइए; कभी मोती से कीजिए, कभी रुद्राक्ष, कभी स्फटिक। इसमें कोई कठिनाई नहीं।
घर के श्री विग्रह में, वक्ता कहते हैं, जो भी आपको सबसे अच्छा लगे। आप मोती की, मूंगे की, रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की, स्फटिक की माला चढ़ा सकते हैं — जिसकी भी इच्छा हो। उन्हें जो माला सुंदर और अच्छी लगती है, वे उसे चाँदी में बनवाकर भगवती को चढ़ाते हैं; वे हमेशा उनका कोई नया श्रृंगार करते रहते हैं। एक से ज़्यादा चढ़ाइए। कभी मोती से कीजिए, कभी रुद्राक्ष से, कभी स्फटिक से — जिस पर मन जाए, उससे कीजिए। भगवती का श्रृंगार: इसमें कोई कठिनाई नहीं।
क्या देवता को चढ़ाई माला का रत्न पूजने वाले की कुंडली पर असर करता है?
ज्योतिषी का एक दावा जिसे वक्ता सीधे नकारते हैं
वक्ता कहते हैं कि अगर आप तथाकथित बहुत बड़े ज्योतिषियों के चक्कर में पड़ें, तो जब उनके पास विषय खत्म हो जाते हैं तो वे इस तरह की बातें डालते हैं — कि अगर आपने घर की मूर्ति पर मूंगे की माला चढ़ाई है और आपका लग्न मकर है, तो शनि आपसे नाराज़ होंगे क्योंकि आपने मंगल की माला चढ़ाई है। भाई, वे कहते हैं, हमने नहीं पहनी; हमने माई को पहनाई है। शनि और मंगल माई का कुछ नहीं कर सकते — शनि देव भागते फिरते थे, वे माई से भागते हैं। उन्होंने उन्हें वह अधिकार दिया, यह अलग बात है। पर ऐसा नहीं है: भगवती को जो चाहें चढ़ाइए; ऐसा नहीं कि हर चीज़ आपको खुद पहननी है।
देखिए, वक्ता कहते हैं, अगर आप तथाकथित बहुत बड़े ज्योतिषियों के चक्कर में पड़ें, तो जब उनके पास कोई विषय नहीं बचता, तो वे इस तरह की बातें डालते हैं। कि अगर आपने घर की मूर्ति पर मूंगे की माला चढ़ाई है और आपका लग्न ऐसा है — आपका लग्न मकर है, तो शनि आपसे नाराज़ होंगे, क्योंकि आपने मंगल की माला चढ़ाई है। अरे भाई, हमने नहीं पहनी; हमने माई को पहनाई है। शनि और मंगल माई का कुछ नहीं कर सकते। शनि देव भागते फिरते थे; वे माई से भागते हैं। उन्होंने उन्हें वह अधिकार दिया, यह अलग बात है। पर ऐसा होता नहीं है। भगवती को जो चाहें चढ़ाइए। ऐसा नहीं कि हर चीज़ आपको खुद पहननी है।
पुरी की माता विमला के भैरव कौन हैं?
पुरी क्षेत्र के भैरव के रूप में बंदी हनुमान
वक्ता कहते हैं कि माता विमला के भैरव — उस क्षेत्र के भैरव — बंदी हनुमान जी हैं, वे हनुमान जी जिन्हें वहाँ बीड़ी वाले हनुमान जी कहा जाता है; वहाँ भैरव के रूप में मुख्य पूजन उन्हीं का है। चाहे विमला माता हों या भगवान जगन्नाथ, उस स्थान की पूरी ज़िम्मेदारी हनुमान जी पर है, इसलिए वहाँ भैरव के रूप में मुख्य रूप से उन्हीं की पूजा होगी।
माता विमला के भैरव के बारे में जानकर, वक्ता कहते हैं, आपको हैरानी होगी। वे पूछने वाली से पूछते हैं कि क्या वे ओडिशा से और पुरी से ही हैं, और बताते हैं कि जब वे पुरी की माता विमला के दर्शन के लिए गए थे, तब उनके जीवन में उनकी बहुत विशेष कृपा और बहुत अद्भुत माया रही। और उनके भैरव, उस क्षेत्र के भैरव, बंदी हनुमान जी हैं — आप उन्हें जानती होंगी, वहाँ के बीड़ी वाले हनुमान जी। तो वहाँ भैरव के रूप में मुख्य पूजन उन्हीं का है। चाहे विमला माता हों या भगवान जगन्नाथ, उस स्थान की पूरी ज़िम्मेदारी हनुमान जी पर है। इसलिए वहाँ भैरव के रूप में मुख्य रूप से हनुमान जी की ही पूजा होगी।
खंडोबा और महालसा की पूजा उस क्षेत्र के साधकों पर छोड़ी गई है, और इसके लिए अलग वीडियो का वादा है।
अपनी जानकारी से बाहर बोलने के बजाय क्षेत्र के साधकों पर छोड़ना
कुल देवता खंडोबा की पूजा पर प्रकाश डालने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि वे खंडोबा और महालसा पर अलग वीडियो बनाएँगे। वे कहते हैं कि वे उस क्षेत्र के नहीं हैं, इसलिए उस क्षेत्र का जो भी विधि-विधान है, उसके लिए साधक परिवार में उस क्षेत्र के बहुत अच्छे साधक हैं जिन्होंने पूरी बात समझाई थी और जिनका पूरा संदेश उनके पास है; वे उनसे फिर बात करके पूरी जानकारी के साथ वीडियो बनाएँगे। वे कहते हैं कि जो उनकी जानकारी में नहीं है, उसके बारे में वे कुछ भी नहीं बताएँगे।
ठीक है, वक्ता कहते हैं: खंडोबा और महालसा पर वे अलग वीडियो बनाएँगे। आप जिस भी क्षेत्र के हैं, वक्ता कहते हैं, वे उस क्षेत्र के नहीं हैं; तो जब आपने उनसे पूछा है, उस क्षेत्र का जो भी विधि-विधान है — साधक परिवार में उस क्षेत्र के बहुत अच्छे साधक हैं। उन्होंने पूरी बात समझाई थी; उनका पूरा संदेश उनके पास होगा। वे उनसे एक बार फिर चर्चा करके पूरी जानकारी के साथ वीडियो बनाएँगे। जो उनकी जानकारी में नहीं है, वक्ता कहते हैं, उसके बारे में वे आपको कुछ भी नहीं बताएँगे।
घर के लिए धूनी कितने प्रकार की होती है?
एक शांति-पौष्टिक के लिए, एक तंत्र प्रयोग काटने के लिए
हनुमान बाबा के लिए धूनी कैसे होती है और कितने प्रकार की होती है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि घर में करने के लिए धूनी मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है: पहली शांति और पौष्टिक काम के लिए, और दूसरी काटने के लिए, जहाँ घर में कोई तंत्र विचार चलाया गया हो।
देखिए, वक्ता कहते हैं, मुख्य रूप से धूनीविशेष लकड़ियों व बीजों को जलाकर घर या स्थान से नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा दूर करने हेतु की जाने वाली धूनी। दो प्रकार की होती है। घर में करने के लिए। पहली, शांति और पौष्टिक काम के लिए धूनी। दूसरी, जहाँ घर में कोई तंत्र विचार चलाया गया हो — तो उसे काटने के लिए।
तंत्र प्रयोग काटने वाली धूनी में क्या-क्या सामग्री जाती है?
काली मिर्च, पीली सरसों, काली राई, चिरमी, गुग्गुल, गंधक
तंत्र विचार काटने के लिए, वक्ता कहते हैं, मुख्य रूप से काली मिर्च, पीली सरसों, वह काली वाली जिसे काली राई कहते हैं, चिरमी, गुग्गुल और गंधक लेते हैं — ये सब चीज़ें एक खास मात्रा में ली जाती हैं, और कुछ और चीज़ें भी मिलाई जाती हैं। वे बताते हैं कि यह उन्होंने एक-दो वीडियो में भी बताया है।
तंत्र विचार में काटने के लिए, वक्ता कहते हैं, मुख्य रूप से आपको काली मिर्च, पीली सरसों, वह काली वाली जिसे काली राई कहते हैं, चिरमी, गुग्गुल, गंधक चाहिए। ये सब चीज़ें एक खास मात्रा में लगाई जाती हैं, और कुछ और चीज़ें भी मिलाई जाती हैं। वे जोड़ते हैं कि यह उन्होंने एक-दो वीडियो में भी समझाया है।
शांति के लिए किए जाने वाले धूने में क्या लगता है?
कूटा हुआ गंधक, उसमें गुग्गुल मिलाकर
वक्ता कहते हैं कि अगर दूसरा, यानी शांति वाला काम करना है, तो गंधक से धूना बना सकते हैं — गंधक को कूटकर उससे धूना बनाइए, और उसमें गुग्गुल मिलाइए। यह पौष्टिक है, शांति देने वाला है, और दिव्यता बढ़ाता है।
दूसरा, अगर आपको शांति के लिए करना है, वक्ता कहते हैं, तो आप गंधक से धूना बना सकते हैं। गंधक को कूटकर उससे धूना बनाइए। उसमें गुग्गुल मिलाइए। यह पौष्टिक है, शांति देने वाला है, और दिव्यता बढ़ाता है।
क्या जौनपुर के बाबा करार वीर कुल भैरव की श्रेणी में आते हैं?
एक मामला जो वे नहीं जानते, और पहले से बताया गया तरीका
वक्ता कहते हैं कि यह उनकी जानकारी में नहीं है — जौनपुर की इस बात के बारे में उन्हें पूछना पड़ेगा। वे जोड़ते हैं कि तरीका क्या है, यह वे पहले ही बता चुके हैं, और अच्छा होता अगर पूछने वाले ने उसी के अनुसार देखा होता।
यह उनकी जानकारी में नहीं है, वक्ता कहते हैं; जौनपुर की इस बात के बारे में उन्हें पूछना पड़ेगा। और तरीका क्या है, यह वे पहले ही बता चुके हैं। अच्छा होता, वक्ता कहते हैं, अगर आप उसी के अनुसार देखते।
आठ भुजा और दस भुजा वाली दुर्गा के भैरव कौन हैं?
नीलकंठ भैरव, और जहाँ कुछ पता न हो वहाँ स्वयं शिव
वक्ता कहते हैं कि अगर भगवती दुर्गा आठ भुजा वाली हैं तो नीलकंठ भैरव, और अगर दस भुजा वाली हैं तो भी नीलकंठ भैरव। और अगर इस तरह पता न हो, तो स्वयं शिव जी भैरव हैं — शिव साक्षात भैरव हैं।
अगर भगवती दुर्गा अष्टभुजा हैं, वक्ता कहते हैं, तो नीलकंठ भैरव; अगर दशभुजा हैं, तो भी नीलकंठ भैरव। और अगर आपको इस तरह पता नहीं है, तो स्वयं शिव भैरव हैं। शिव साक्षात भैरव हैं।
क्या सोखा बाबा और श्रृंगी दोनों की पूजा साथ करनी चाहिए?
भैरव अष्टमी पर वीरभद्र और श्रृंगी की साथ पूजा
वक्ता कहते हैं कि दोनों की पूजा करनी पड़ेगी: सोखा बाबा वीरभद्र होंगे और ये श्रृंगी होंगे, इसलिए दोनों की पूजा साथ होगी। भैरव अष्टमी पर, वे कहते हैं, मुख्य रूप से सोखा बाबा की पूजा कीजिए।
दोनों की पूजा करनी पड़ेगी, वक्ता कहते हैं। सोखा बाबा वीरभद्र होंगे, और ये श्रृंगी होंगे, इसलिए दोनों की पूजा साथ होगी। भैरव अष्टमी पर मुख्य रूप से सोखा बाबा की पूजा कीजिए।
क्या पहले से पूजे जा रहे विग्रह का अधिवास दोबारा हो सकता है?
अग्नि तारण विधि के बाद अधिवास केवल एक बार होता है
नहीं। यह पूछे जाने पर कि अगर पहली बार अधिवास की प्रक्रिया ठीक से नहीं हुई, तो क्या दूसरी बार करवाई जा सकती है, वक्ता कहते हैं कि नहीं — अधिवास जब भी होता है, पहली बार ही होता है। सबसे पहले अग्नि तारण विधि होती है: विग्रह को शुद्ध गाय के घी में अच्छी तरह डुबोकर, पान के पत्ते पर रखकर, फिर गाय के कच्चे दूध से या पंचामृत से अभिषेक करते हुए पाठ होता है। उसके बाद पाँच, सात या नौ — जितना सामर्थ्य हो — अधिवास होता है। दूसरा अधिवास नहीं होता।
नहीं, वक्ता कहते हैं। अधिवास जब भी होता है, पहली बार ही होता है। अग्नि तारण विधि करके — सबसे पहले अग्नि तारण विधि ही होती है — पंचगव्य, विग्रह को शुद्ध गाय के घी में अच्छी तरह डुबोकर, पान के पत्ते पर रखकर, और फिर गाय के कच्चे दूध से, गाय के बिना उबले दूध से, या पंचामृत से उनका अभिषेक करते हुए पाठ होता है। और उसके बाद अधिवास करवाया जाता है: पाँच, सात, नौ, जितना आपका सामर्थ्य हो। दूसरा अधिवास नहीं करवाया जाता।
जहाँ डीह की पूजा होती है, वहाँ क्षेत्रपाल कौन हैं?
क्षेत्रपाल के रूप में डीह
वक्ता कहते हैं कि जहाँ वहाँ डीह ही पूजे जाते हैं, तो क्षेत्रपाल के रूप में जो पूजे जाते हैं, वे वही होंगे।
जहाँ यहाँ डीह ही पूजे जाते हैं, वक्ता कहते हैं, तो क्षेत्रपाल के रूप में जो पूजे जाते हैं, वे वही होंगे।
शिव जी के अभिषेक के साथ नंदी जी की पूजा कैसे करनी चाहिए?
पहले नंदी, जैसे भगवती के आगे भैरव और लंगूर वीर चलते हैं
वक्ता कहते हैं कि जब भी शिव जी की पूजा हो, सबसे पहले नंदी जी का पूजन होना चाहिए — जैसे भगवती के आगे सबसे पहले भैरव जी और लंगूर वीर चलते हैं। वे कहते हैं कि भगवती के दाईं ओर हनुमान जी हैं; बाईं ओर कुल भैरव या बटुक भैरव; और आगे और पीछे दो और वीर हैं। उसी तरह शिव जी के आगे पहले नंदी जी चलते हैं, इसलिए पहले नंदी जी का पूजन और अभिषेक होना चाहिए और तभी शिव जी का।
सबसे पहले, वक्ता कहते हैं, जब भी शिव जी की पूजा की जाए, सबसे पहले नंदी जी का पूजन होना चाहिए। जिस तरह भगवती के आगे सबसे पहले भैरव जी, लंगूर वीर, चलते हैं। यानी भगवती के दाईं ओर हनुमान जी हैं; बाईं ओर कुल भैरव या बटुक भैरव हैं। आगे और पीछे दो और वीर हैं — यह उन्होंने एक वीडियो में बताया है जिसे वे अपलोड करेंगे। ठीक उसी तरह शिव जी के आगे आपके नंदी जी पहले चलते हैं। इसलिए पहले नंदी जी का पूजन और अभिषेक होना चाहिए, और फिर शिव जी का।
अगर उस दिन समस्या हो, तो स्त्री काल भैरव अष्टक कैसे करे?
अपने नाम से किसी और से करवाना
यह पूछे जाने पर कि अगर किसी स्त्री को वह समस्या हो तो काल भैरव अष्टमी के दिन काल भैरव अष्टक कैसे करें, वक्ता कहते हैं कि अगर ऐसी स्थिति आए, तो आप अपने नाम से किसी और से पूजन करवा सकती हैं। खुद मत कीजिए।
अगर ऐसी स्थिति आए, वक्ता कहते हैं, तो आप अपने नाम से किसी और से पूजन करवा सकती हैं। खुद मत कीजिए।
घर में किन देवताओं की पूजा अनिवार्य है?
गणपति, नारायण, शिव, भगवती, हनुमान, तुलसी, ध्वजा — और भैरव
यह पूछे जाने पर कि क्या पंच देवों और कुलदेवी के साथ हनुमान जी का पूजन भी अनिवार्य है, वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल — घर में हनुमान जी की ध्वजा के बिना क्या होने वाला है। गणपति जी की पूजा पूरी तरह अनिवार्य है; आप लक्ष्मी-गणेश की पूजा करेंगे; नारायण के किसी एक स्वरूप की पूजा ज़रूर करेंगे; शिव जी की पूजा, भगवती की पूजा, हनुमान जी की पूजा ज़रूर करेंगे; तुलसी का पौधा और हनुमान जी की ध्वजा ज़रूर होनी चाहिए।
बिल्कुल, वक्ता कहते हैं — घर में हनुमान जी की ध्वजा के बिना कुछ कहाँ होने वाला है। घर में किसकी पूजा अनिवार्य हो जाती है? गणपति जी की पूजा पूरी तरह अनिवार्य है। आप लक्ष्मी-गणेश की पूजा करेंगे। नारायण के स्वरूपों में से किसी एक स्वरूप की पूजा ज़रूर करेंगे। शिव जी की पूजा ज़रूर करेंगे। भगवती की पूजा ज़रूर करेंगे। हनुमान जी की पूजा ज़रूर होगी। तुलसी जी का पौधा ज़रूर होना चाहिए। हनुमान जी की ध्वजा ज़रूर होनी चाहिए। और जो चीज़ लोग छोड़ रहे थे, हटा रहे थे, वह भैरव जी हैं। शिव जी के पूजन में भैरव जी का पूजन पूरा हो जाता है; पर अभी जिस तरह की कठिनाइयाँ हैं, या कहिए कि लोगों को जानकारी नहीं है, भैरव जी का पूजन भी अनिवार्य है — बटुक भैरव का पूजन भी होना चाहिए।
कुल देवता के रूप में हर्षु ब्रह्म बाबा की पूजा कैसे होती है?
लाठी, जनेऊ, खड़ाऊँ, सफ़ेद धोती और गमछा चढ़ाना, पहले दुर्गा की पूजा
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि हर्षु ब्रह्म बाबा ब्रह्म स्थान के देवता हैं और ब्रह्म हैं, उन्हें क्षेत्र के अनुसार वहाँ आने-जाने के नियम पता हैं, पर घर में उनकी पूजा कैसे होगी, यह वही बता सकते हैं जो उनकी सेवा-पूजा करते हैं। आमतौर पर, जो भी लोक देवता या लोक ब्रह्म हों, साल में एक बार उनकी तिथि या दिन पर वहाँ जाना चाहिए; और घर की पूजा में उन्हें लाठी, जनेऊ, खड़ाऊँ, सफ़ेद धोती और गमछा चढ़ाया जाता है। क्योंकि वे भगवती दुर्गा के सेवक थे, इसलिए मुख्य रूप से उनसे पहले दुर्गा का पूजन होता है।
हर्षु ब्रह्म बाबा, वक्ता कहते हैं, क्योंकि वे ब्रह्म स्थान के देवता हैं और ब्रह्म हैं — उनका पूजन विधि-विधान लोक क्षेत्र के अनुसार है; उन्हें वहाँ आने-जाने के सब नियमों की जानकारी है। घर में उनकी पूजा कैसे होगी, यह वही बता पाएँगे जो उनकी सेवा-पूजा करते हैं। आमतौर पर, जो भी देवता, लोक देवता या लोक ब्रह्म हों, मुख्य रूप से उनकी जो तिथि पड़ती है, जो उनका दिन है, उस दिन या साल में एक बार वहाँ जाना चाहिए; और घर में होने वाले पूजन में लाठी, जनेऊ, खड़ाऊँ, सफ़ेद धोती और गमछा — ये सब चीज़ें उन्हें चढ़ाई जाती हैं। और क्योंकि वे भगवती दुर्गा के सेवक थे, इसलिए मुख्य रूप से उनसे पहले भगवती दुर्गा का पूजन होता है।
जीवन में एक बार कौन से अनुष्ठान करने चाहिए, और किस क्रम में?
दत्तात्रेय या गणपति, फिर भैरव, फिर हनुमान, फिर भगवती
वक्ता कहते हैं कि उनके दिए मंत्र का अनुष्ठान भैरव अष्टमी के दिन ज़रूर किया जा सकता है, और वे सबको महामंत्र का अनुष्ठान करने को कह रहे हैं। जहाँ तक भगवान दत्तात्रेय की बात है: अगर उनमें श्रद्धा है और आप महाराष्ट्र या गुजरात की तरफ़ के हैं और मुख्य रूप से उनकी सेवा-पूजा करते हैं, तो जीवन में उन्हें पकड़िए। उसके बाद गणपति जी — गणपति की जो साधनाएँ दी गई हैं, और कुछ न हो तो संकट हरण गणेश स्तोत्र का अनुष्ठान। फिर भैरव जी, जिनमें भैरव हृदय सहित दो-तीन चीज़ें दी गई हैं; फिर हनुमान जी, और फिर भगवती या जो भी आपके मुख्य देव-देवता हों।
उनके दिए मंत्र का अनुष्ठान भैरव अष्टमी के दिन बिल्कुल किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं; महामंत्र के अनुष्ठान के लिए वे सबको कह रहे हैं। भगवान दत्तात्रेय का अनुष्ठान — या तो जीवन में उन्हें पकड़िए। अगर आपको लगे कि एक ही करना है, तो वही कीजिए, अगर उनमें आपकी श्रद्धा है; आप महाराष्ट्र की तरफ़ के, गुजरात के निवासी हैं; यह आपकी इच्छा है; आप मुख्य रूप से उनकी सेवा-पूजा करते हैं। भगवान दत्तात्रेय को लीजिए। उसके बाद गणपति जी हैं: गणपति जी की जो साधनाएँ दी गई हैं, और कुछ न हो तो संकट नाशन स्तोत्र का अनुष्ठान कीजिए। फिर भैरव जी — भैरव जी में दो-तीन चीज़ें दी गई हैं, भैरव हृदय दिया गया है। वक्ता कहते हैं कि आप भैरव हृदय को समझते ही नहीं: भैरव हृदय साक्षात हृदय है। उसका अनुष्ठान कीजिए, या फिर महाभैरव मंत्र का कीजिए, या दोनों कीजिए। फिर हनुमान जी का कीजिए, और फिर भगवती का, या जो भी आपके मुख्य देव-देवता हों। जीवन में एक-दो बार इन सबकी साधना करते हुए आगे बढ़ना चाहिए; यह ज़रूरी है। फिर अपनी मुख्य साधना जीवन भर कीजिए।
क्या जीवन में एक से ज़्यादा गुरु हो सकते हैं?
पहले गुरु की अनुमति से, उस मार्ग के साधक से दीक्षा जिसमें आप जाना चाहते हैं
वक्ता कहते हैं कि गुरु करना कभी मना नहीं किया गया। दीक्षा के लिए कहा गया है कि आप जिस भी क्षेत्र में जाना चाहते हैं, उस क्षेत्र के जिन साधकों या सिद्ध पुरुषों से आप प्रभावित हैं और जिनके साथ आगे बढ़ना चाहते हैं, उनसे दीक्षा ले सकते हैं। अगर आपके पहले गुरु, आपके भौतिक गुरु जीवित हैं, तो उनकी अनुमति लेकर आगे बढ़ सकते हैं; अगर नहीं, तो मन ही मन उनसे आज्ञा की प्रार्थना करके, एक पक्ष के बाद आगे बढ़ सकते हैं।
देखिए, वक्ता कहते हैं, जिनकी परंपरा में अभी भी कुल गुरु चलते हैं, यह बहुत अच्छी बात है कि आपके ननिहाल में एक कुल गुरु हैं। और वरना, देखिए: गुरु करना कभी मना नहीं किया गया। दीक्षा के लिए कहा गया है कि आप जिस भी क्षेत्र में जाना चाहते हैं, उस क्षेत्र के जो भी साधक हैं, जो भी सिद्ध पुरुष हैं, जिनकी बातों से आप प्रभावित हैं, जिनके साथ आप उस मार्ग में आगे बढ़ना चाहते हैं — आप उनसे दीक्षा ले सकते हैं। अगर आपके पहले गुरु, आपके भौतिक गुरु जीवित हैं, तो उनकी अनुमति लेकर आप आगे बढ़ सकते हैं। अगर नहीं, तो मन ही मन उनसे आज्ञा की प्रार्थना करके, एक पक्ष के बाद आप आगे बढ़ सकते हैं। ऐसा नहीं है कि आप एक से ज़्यादा गुरु नहीं बना सकते।
दूसरा गुरु कब खोजना चाहिए?
भीतर का असंतोष आपकी गति रोक देता है
वक्ता कहते हैं कि संतोष होना चाहिए। अगर लगे कि आपके अभी के गुरु ज्ञान से या अपनी बातों से आपको संतुष्ट नहीं कर पा रहे, और अगर आपको लगता है कि वे सक्षम हैं, तो कहीं न कहीं हो सकता है कि वे नहीं बल्कि हम खुद अक्षम हों — गुरु को परखना इतना आसान नहीं। पर जहाँ भीतर असंतोष हो, वहाँ गति नहीं होगी; इसलिए उनसे निवेदन और प्रार्थना करके आगे बढ़ना चाहिए। अपने देश, काल और परिस्थिति के अनुसार जीवन में एक से ज़्यादा गुरु चुने जा सकते हैं।
आपको संतोष होना चाहिए, वक्ता कहते हैं। अगर लगे कि अभी जो आपके गुरु हैं, वे ज्ञान से, अपनी बातों से आपको संतुष्ट नहीं कर पा रहे, और अगर आपको लगता है कि वे सक्षम हैं, तो कहीं न कहीं हो सकता है कि वे नहीं बल्कि हम और आप खुद अक्षम हों। गुरु को परखना इतना आसान नहीं है। पर जहाँ भीतर असंतोष है, वहाँ गति नहीं होगी। इसलिए उनसे निवेदन और प्रार्थना करके आपको आगे बढ़ना चाहिए। बाकी — छल-कपट की बातें — अलग चीज़ें हैं, जिन पर उन्होंने अलग से चर्चा की है। तो जीवन में अपने देश, काल और परिस्थिति के अनुसार एक से ज़्यादा गुरु चुने जा सकते हैं।
नई लाई गई शालिग्राम शिला कहाँ रखनी चाहिए, और रोज़ पूजा कैसे करें?
पूजा स्थान पर पीले कपड़े पर, रोज़ अभिषेक और तुलसी के साथ
तुलसी विवाह एकादशी पर शालिग्राम शिला लाने वाले एक व्यक्ति के पूछने पर वक्ता कहते हैं कि उन्हें पूजा स्थान पर ही रखिए। अगर शालिग्राम शिला बाहर रखेंगे और वह छोटी है, तो बहुत बार पक्षी उसे उठाकर ले जाते हैं, और फिर आप विष्णु जी को खोजते रह जाएँगे। उन्हें पूजा स्थान पर पीले कपड़े पर या किसी थाली में रखिए; जैसे शिवलिंग के लिए स्टैंड आता है, वैसे शालिग्राम के लिए भी आता है, आप उन्हें उस पर रख सकते हैं, वरना पीला कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान शालिग्राम को स्थापित कीजिए।
देखिए, वक्ता कहते हैं, उन्हें पूजन स्थान पर ही रखिए। अगर आप शालिग्राम शिला बाहर रखेंगे और वे छोटे हैं, तो बहुत बार पक्षी उन्हें उठाकर ले जाते हैं — और फिर आप विष्णु जी को खोजते रह जाएँगे, कि विष्णु जी कहाँ गए। इसलिए उन्हें पूजन स्थान पर रखिए; आसन के रूप में पीला कपड़ा रखिए, या कोई भी थाली। जैसे शिवलिंग के लिए स्टैंड आता है, वैसे ही शालिग्राम के लिए भी आता है; आप उन्हें उस पर रख सकते हैं। वरना पीला कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान शालिग्राम को स्थापित कीजिए। रोज़, जैसा उन्होंने पहले बताया है, उनका अभिषेक होना चाहिए: शुद्ध जल से अभिषेक करके, गोपी चंदन या अष्टगंध से उनका तिलक करते हुए, अगर आता हो तो सुंदर ऊर्ध्व पुंड्र बनाकर, वरना कुमकुम से साधारण तिलक करके, उन पर तुलसी का पत्ता चढ़ाइए और भोग लगाइए। भोग में भी तुलसी का पत्ता ज़रूर डालना चाहिए। यह साधारण नियम है, और यह आपको रोज़ करना चाहिए।
भुजंग क्या है, और भुजंग विद्या क्या है?
सर्प का पर्याय भुजंग, और पाश विद्या
वक्ता कहते हैं कि सर्प को भुजंग कहते हैं; और अगर आप भुजंग विद्या के बारे में पूछ रहे हैं, तो पाश विद्या को भुजंग विद्या कहते हैं। जैसा आप कथाकारों से इधर-उधर सुनेंगे, जब शिव जी किसी से, किसी देव से या किसी कारण से नाराज़ हुए और उसे बंधन में डाला, तो उसे वासुकी से बाँधा, भुजंग से बाँधा — तो वासुकी भी उनका पाश हैं। वे कहते हैं कि भुजंग सर्प का पर्याय है।
भुजंग, वक्ता कहते हैं — सर्प को भुजंग कहते हैं। और अगर आप भुजंग विद्या के बारे में पूछ रहे हैं, तो पाश विद्या को भुजंग विद्या कहते हैं। जैसा आप कथाकारों से इधर-उधर सुनेंगे: कि शिव जी किसी से, किसी देव से या किसी कारण से किसी से नाराज़ हो गए, और उसे बंधन में डाल दिया — उसे वासुकी से बाँधा, भुजंग से बाँधा। तो वासुकी भी उनका पाश हैं। और भुजंग सर्प का पर्याय है। (वे यह भी समझाते हैं कि रजक वे हैं जो कपड़े धोते हैं।)
क्या घर के नर्मदेश्वर शिवलिंग पर दूसरे देवताओं की पूजा हो सकती है?
शिवलिंग में सब देवता स्थापित हैं
यह पूछे जाने पर कि अगर घर में नर्मदेश्वर शिवलिंग पूजा जाता है, तो क्या लिंग मूर्ति पर भैरव जी और दत्त महाराज के साथ माँ काली की पूजा भी की जा सकती है, वक्ता कहते हैं कि वैसे भी शिवलिंग में सब देवी-देवता स्थापित हैं, तो आप किसी के लिए भी कर सकते हैं; इस तरह की कोई कठिनाई नहीं।
शिवलिंग में, वक्ता कहते हैं, वैसे भी सब देवी-देवता स्थापित हैं, तो आप किसी के लिए भी कर सकते हैं। ऐसी कोई कठिनाई नहीं है।
माँ काली को बीच में रखकर पंचायतन कैसे सजाएँ?
आगे गणपति और सूर्य, दाईं ओर विष्णु और बाईं ओर शिव
वक्ता कहते हैं कि माँ काली बीच में रहेंगी; और उनके चारों ओर, उनके आगे दोनों तरफ़, एक ओर गणपति और दूसरी ओर सूर्य; पीछे दोनों तरफ़ — उनके दाएँ भाग की ओर विष्णु जी और बाएँ भाग की ओर शिव जी। वे पूछने वाले के लिए पंचायतन की एक फ़ोटो बनाकर देने का प्रस्ताव देते हैं।
माँ काली, वक्ता कहते हैं, बीच में रहेंगी। और उनके चारों ओर, उनके आगे दोनों तरफ़, एक ओर गणपति और एक ओर सूर्य। पीछे दोनों तरफ़, उनके दाएँ भाग की ओर विष्णु जी, बाएँ भाग की ओर शिव जी। वे पंचायतन की एक फ़ोटो बनाकर देने का प्रस्ताव देते हैं, और जोड़ते हैं कि वे पूछने वाले के घर की व्यवस्था वैसे भी देख सकते हैं और उन्हें बता देंगे।
उपदेव योनि के प्राणी को पूजने के बजाय मुक्त क्यों करना चाहिए?
भोग योनि, और कैसे भोग ही उन्हें बाँधता है
वक्ता इसे बहुत अच्छा प्रश्न कहते हैं। वे कहते हैं कि उपदेव श्रेणी की सब शक्तियाँ — जो भी उस योनि में जाता है — भोग योनि में हैं, और वे कष्ट भोगती हैं। वे उस योनि के अनुसार माया से बँधी रहती हैं: जैसे जीवित अवस्था में किसी को जलेबी बहुत पसंद थी तो वह जलेबी खा सकता था, वैसे ही मृत्यु के बाद वह सच में नहीं खाएगा, पर उसकी सुगंध से पोषित होगा, इसलिए कहेगा मुझे जलेबी चढ़ाओ। वह वहाँ बँध जाता है।
हाँ, बहुत अच्छा प्रश्न है, वक्ता कहते हैं। देखिए: उपदेवता श्रेणी की सब शक्तियाँ — जो भी उस योनि में जाता है, वह भोग योनि है। वहाँ वे कष्ट भोगते हैं। और वे उस योनि के अनुसार माया से बँधे रहते हैं। जैसे अभी जीवित अवस्था में किसी को जलेबी बहुत पसंद है, तो वह जलेबी खा सकता है; मृत्यु के बाद वह साक्षात नहीं खाएगा, पर उसकी सुगंध से पोषित होगा, इसलिए कहेगा, मुझे जलेबी चढ़ाओ। वह वहाँ बँध जाएगा।
उपदेव श्रेणी की शक्तियों से करवाए जाने वाले काम में भोग कैसे काम करता है?
एक भोग से चले काम को हटाने के लिए दोगुना भोग
वक्ता कहते हैं कि जो भी देव भोग पर काम करता है, वह उस भोग के लिए कुछ भी करेगा। भगतवाल की शक्तियाँ भोग लेकर जाती हैं: जैसे कोई शक्ति भोग लेकर गई और किसी पर मारण हुआ; और अगले आदमी को उतारने के लिए दोगुना भोग देकर शरीर से हटवाते हैं। अगर एक मुर्गा दिया गया, तो दो मुर्गे देकर उसे शरीर से हटाया गया। वे कहते हैं, ये लोग मुर्गा-मुर्गा खेल रहे हैं। इसी कारण वह प्राणी मंत्र से और भीतर जगे लोभ से बँधा है, और इसी कारण उस योनि में गया है।
देखिए, वक्ता कहते हैं, जो भी देव भोग पर काम करता है — क्या वह भोग के लिए कुछ भी नहीं करता। भगतवाल की शक्तियाँ भोग लेकर गईं। देखिए यह किस तरह दिखाया जाता है, या क्रिया किस तरह होती है: कि जिस तरह कोई शक्ति भोग लेकर गई, किसी पर मारण किया गया; और अगर अगले आदमी को उतारना है, तो दोगुना भोग देकर उतारा जाता है। यानी अगर एक मुर्गा दिया गया, तो दो मुर्गे देकर उसे शरीर से हटाया गया। वक्ता कहते हैं, ये मुर्गा-मुर्गा खेल रहे हैं; ये भगतवाल की चीज़ें नहीं हैं। इसी कारण वह वहाँ बँधा है — मंत्र से भी और अपने भीतर जगे लोभ से भी। और इसी कारण वह उस योनि में गया है।
ऐसे प्राणी को असल में मुक्त कैसे किया जाता है?
शिव महापुराण में बिंदु पिशाच का उदाहरण, और मना करने पर क्या करें
वक्ता शिव महापुराण का वह उदाहरण याद करते हैं जो वे पहले दे चुके हैं: बिंदु नाम के पिशाच को मुक्त करने के लिए पहले साधारण प्रयास हुआ, और बाद में, उसे बाँधकर — ऐसा करने का सामर्थ्य रखते हुए — तुंबुरु गंधर्व ने पूरा शिव महापुराण गाकर उसे सुनाया। उसी तरह, या तो जिनकी गति करवानी है वे खुद मान जाएँ कि हाँ, मेरी गति करवाओ; या अगर न मानें, तो कोई पर्याप्त समर्थ साधक अपनी शक्ति से पाश विद्या आदि से उन्हें बाँधकर मनाए; या अगर फिर भी न मानें, तो उन्हें किसी ब्रह्म स्थान, किसी अलग स्थान को दे देना चाहिए। उन्हें घर में कभी स्थान नहीं देना चाहिए।
यह बात वे पहले एक उदाहरण के साथ बता चुके हैं, वक्ता कहते हैं: शिव पुराण में बिंदु नाम के पिशाच को मुक्त करने के लिए पहले साधारण प्रयास हुआ, और बाद में, उसे बाँधकर — इतना सामर्थ्य रखते हुए — तुंबुरु गंधर्व ने पूरा शिव महापुराण गाया और उसे सुनाया। ठीक उसी तरह, जिनकी गति करवानी है, या तो वे खुद बात मान लें, कि हाँ, मेरी गति करवाओ। अगर वे न मानें, तो ऐसी अवस्था में कोई पर्याप्त समर्थ साधक अपनी शक्ति से, पाश विद्या आदि से, उन्हें बाँधकर मनाए। या फिर, अगर वे फिर भी न मानें, तो तरीका यह है कि उन्हें किसी ब्रह्म स्थान में, किसी अलग स्थान में दे दिया जाए। उन्हें घर में कभी, कभी भी स्थान नहीं देना चाहिए।
बँधे हुए पिशाच या उपदेव प्राणी को, जो मान गया हो, मुक्त करने के लिए तीर्थ क्षेत्र में क्या किया जाता है?
गया या त्र्यंबकेश्वर, गायत्री जप, श्राद्ध, त्रिपिंडी, नारायण बलि और नाग बलि
वक्ता कहते हैं कि अगर वे मान जाएँ, तो उन्हें किसी तीर्थ क्षेत्र में ले जाइए — गया, या त्र्यंबकेश्वर, या जो भी तीर्थ क्षेत्र वे बताएँ — और वहाँ उनकी ओर से ज़रूरत के अनुसार गायत्री जप, श्राद्ध क्रम, त्रिपिंडी, नारायण बलि और नाग बलि करवाकर उन्हें मुक्त कीजिए। बाद में घर में सुंदरकांड का पाठ या अखंड रामायण आदि करवाकर घर को फिर से पूरी तरह शुद्ध करना चाहिए।
और अगर वे मान जाएँ, वक्ता कहते हैं, तो उन्हें किसी तीर्थ क्षेत्र में ले जाकर — गया श्राद्ध, या त्र्यंबकेश्वर, या जो भी तीर्थ क्षेत्र वे बताएँ — वहाँ जाइए। उनकी ओर से, जो भी ज़रूरी हो — गायत्री जप, श्राद्ध क्रम, त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि, नाग बलि — सब उसी के अनुसार करवाइए, और उन्हें मुक्त करवाइए। फिर घर में दोबारा सुंदरकांड का पाठ या अखंड रामायण आदि करवाकर घर को पूरी तरह शुद्ध करना चाहिए।
क्या वास्तु समस्या के लिए घर में अचल प्राण-प्रतिष्ठित बजरंगबली स्थापित करने चाहिए?
वास्तु दोष के लिए घर में अचल प्रतिष्ठा गलत है
एक घर के बारे में पूछा गया जिसके आँगन का दरवाज़ा दक्षिण की ओर है, जहाँ किसी ने वास्तु शास्त्र के लिए प्राण-प्रतिष्ठित अचल बजरंगबली स्थापित किए, और क्या इससे मुख्य मंदिर की पूजा में कोई अंतर पड़ता है। वक्ता पूछते हैं कि इतना बड़ा काम किसने किया। वे कहते हैं कि किसी भी कारण से वास्तु के नियमों के अनुसार घर में कोई कठिनाई थी भी, तो उसकी शुद्धि के लिए घर में अचल प्रतिष्ठा कभी नहीं करनी चाहिए थी।
सुनने वाले बताते हैं कि उनके आँगन का दरवाज़ा दक्षिणमुखी है, और वास्तु शास्त्र के लिए किसी ने वहाँ प्राण-प्रतिष्ठित अचल बजरंगबली स्थापित किए हैं, और उनकी पूजा भी होती है, और पूछते हैं कि क्या इससे मुख्य मंदिर की पूजा में कोई अंतर पड़ता है। घर में अचल प्राण प्रतिष्ठा, वक्ता कहते हैं — आपका मतलब घर के दक्षिणमुखी होने के कारण है — इतना बड़ा काम किसने किया है? घर में, किसी भी कारण से, अगर वास्तु के नियम के अनुसार कोई कठिनाई थी, तो उसकी शुद्धि के लिए भी घर में अचल प्रतिष्ठा कभी नहीं करनी चाहिए थी।
बटुक भैरव के लिए स्थापित त्रिशूल किस धातु का होना चाहिए?
पीतल, चाँदी, सोना, प्लैटिनम तक — पर टिन या स्टील कभी नहीं
एक व्यक्ति ने बटुक भैरव जी के लिए त्रिशूल स्थापित करने वाला उनका वीडियो देखा पर लोहे का नहीं मिला और पीतल का रखा। वक्ता कहते हैं कि कोई कठिनाई नहीं। पीतल का त्रिशूल, चाँदी का त्रिशूल, और अगर सामर्थ्य हो तो सोने का त्रिशूल; और अगर सामर्थ्य हो तो हीरा जड़ा प्लैटिनम का त्रिशूल — जो चाहें रखिए। बस टिन का मत रखिए, और स्टील का मत रखिए।
कोई कठिनाई नहीं है, वक्ता कहते हैं। पीतल का त्रिशूल, चाँदी का त्रिशूल; अगर सामर्थ्य हो, तो सोने का त्रिशूल। और अगर सामर्थ्य हो, तो हीरा जड़ा प्लैटिनम का त्रिशूल — जो चाहें रखिए। बस टिन का मत रखिए। स्टील का मत रखिए।
क्या संकल्प में कहा जा सकता है कि साधना के दौरान प्याज़-लहसुन नहीं छोड़ सकते?
कठिनाई आपके शरीर में है, देवी को नहीं
यह पूछे जाने पर कि जब कोई साधना करे पर उन दिनों प्याज़-लहसुन न छोड़ पाए, तो क्या यह संकल्प में साफ़ कहा जा सकता है, वक्ता कहते हैं कि मैया को प्याज़-लहसुन से कोई कठिनाई नहीं — कठिनाई आपके शरीर में है। मैया तो दूर हैं; उन्हें क्या कठिनाई होगी? आप उनके बेटे हैं। पर जब आप मंत्र जप करेंगे, तो उसकी ऊर्जा आपके शरीर में उस तरह अपना असर नहीं देगी; इसलिए उनके अनुसार तब उसका कोई फ़ायदा नहीं, और ऊपर से यह तामसिकता बढ़ाएगा, क्योंकि ये सब चीज़ें गर्मी बढ़ाती हैं।
देखिए, वक्ता कहते हैं, मैया को प्याज़-लहसुन से कोई कठिनाई नहीं है। कठिनाई आपके शरीर में है। वह होगी। कारण क्या है? मैया तो दूर हैं; उन्हें क्या कठिनाई होगी? आप उनके बेटे हैं, ठीक है। पर जब आप किसी मंत्र का जप करेंगे, तो उसकी ऊर्जा आपके शरीर में उस तरह अपना असर नहीं देगी। इसलिए उनके अनुसार तब उसका कोई फ़ायदा नहीं। उसके ऊपर यह तामसिकता बढ़ाएगा, क्योंकि ये सब चीज़ें गर्मी बढ़ाती हैं। वे जोड़ते हैं कि पूछने वाले जानते हैं कि पुरुषों के भीतर क्या परेशानी उठती है, और उन्हें लगता है कि उनके साथ भी ऐसा हुआ होगा।
साधना के दौरान प्याज़-लहसुन क्यों मना है?
ये शरीर में गर्मी बढ़ाते हैं; केवल दवा के रूप में अनुमति
वक्ता कहते हैं कि लहसुन और प्याज़ खाने से इसलिए मना किया गया है कि सबसे पहले ये शरीर में गर्मी बढ़ाएँगे; बदबू अलग बात है, वह सब छोड़ दीजिए। इन्हें केवल दवा के लिए लेने को कहा गया है — आपको इन्हें केवल दवा के रूप में, दवा के कारण लेना चाहिए, और किसी और कारण से छोड़ देना चाहिए।
पर लहसुन और प्याज़, वक्ता कहते हैं, इसी कारण खाने से मना किए गए हैं। यह शरीर में गर्मी बढ़ाएगा; यह पहली बात है। बदबू अलग बात है — वह सब छोड़ दीजिए। केवल औषधि के लिए इन्हें लेने को कहा गया है। दवा के कारण, आपको इन्हें केवल दवा के रूप में लेना चाहिए। किसी और कारण से इन्हें छोड़ देना चाहिए।
संचित तेज के बिना ऊर्ध्व गति नहीं होती, इसलिए ब्रह्मचर्य को गैर-ज़रूरी नहीं माना जा सकता।
संचित तेज के बिना ऊर्ध्व गति नहीं
वक्ता कहते हैं कि संकल्प में कहने से कोई फ़ायदा नहीं — क्या कहेंगे, कि हम लहसुन-प्याज़ समेत सब खाएँगे पर आपकी पूजा करेंगे? उनके अनुसार यह ठीक नहीं है। वे कहते हैं कि आजकल बहुत से चैनलों पर तथाकथित बड़े लोग यह सब कहते हैं, और उनके अनुसार ब्रह्मचर्य का पालन भी ज़रूरी नहीं — पर जब तेज संचित ही नहीं होगा, तो ऊर्ध्व गति कहाँ से आएगी, और फिर मंत्र जप की ज़रूरत ही क्या है? तो फिर वैसे ही जीजिए, वे कहते हैं; इस पर दाग क्यों लगाते हैं?
संकल्प में कहने से कोई फ़ायदा नहीं, वक्ता कहते हैं। संकल्प में क्या कहेंगे — हम सब खाएँगे, लहसुन-प्याज़ भी खाएँगे, पर आपकी पूजा करेंगे? यह बात, उनके अनुसार, ठीक नहीं है। और आजकल, अगर आप और जगह देखें, तो बहुत से चैनल हैं और तथाकथित बहुत बड़े लोग हैं; वे कहते हैं कि वे उनके नाम भी नहीं लेंगे — वे लोग यह सब कहते हैं। उनके अनुसार ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन भी ज़रूरी नहीं। भाई, जब तेज संचित ही नहीं होगा, तो ऊर्ध्व गति कहाँ से आएगी? फिर आदमी को मंत्र जप करने की क्या ज़रूरत है? तो फिर वैसे ही जीजिए। इस पर दाग क्यों लगा रहे हैं?
पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को कौन सा कवच या रुद्राक्ष पहनना चाहिए?
काल भैरव कवच, चाँदी या सोने में पहना जाए, धागे में कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि परिवार के जो सदस्य पोस्टमार्टम डॉक्टर हैं, उन्हें भैरव जी का कवच, काल भैरव का कवच, विधि से उसका जप ठीक से करवाकर पहनाना चाहिए। उसे कभी धागे में मत पहनवाइए — अपने सामर्थ्य के अनुसार वे जो पहनते हैं, उस चाँदी या सोने में पहनवाइए, ताकि वे जहाँ भी जाएँ, सूतक आदि से कोई कठिनाई न हो।
शायद यह उन्होंने पहले भी बताया है, वक्ता कहते हैं। अगर वे पोस्टमार्टम डॉक्टर हैं, तो भैरव जी का कवच, काल भैरव का कवच, उसका जप ठीक से और विधि से करवाकर उन्हें पहनाना चाहिए। उसे कभी धागे में मत पहनवाइए। चाँदी या सोने में पहनवाइए, जो भी वे पहनते हैं, अपने सामर्थ्य के अनुसार — ताकि सूतक आदि से, वे जहाँ भी जाएँ, किसी तरह की कोई कठिनाई न हो।
पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को कौन सा रुद्राक्ष पहनना चाहिए?
कालाग्नि रुद्राक्ष या भैरव रुद्राक्ष, 27 या 54 मनकों की माला में
वक्ता कहते हैं कि अगर वे रुद्राक्ष पहनना चाहें, तो असली पहनवाइए, डस्टिंग वाला नहीं — अच्छे रुद्राक्षों में कालाग्नि रुद्राक्ष पहनवाइए, जो सबसे उत्तम रहेगा; या फिर काल कालाग्नि रुद्राक्ष, या भैरव रुद्राक्ष। इन दोनों में से एक की, या दोनों की मिलाकर, 27 या 54 मनकों की माला, जैसी वे पहन सकें, और कवच विधि से ठीक से करवाइए: उनकी आध्यात्मिक उन्नति भी होगी, पेशे में भी ये चीज़ें काम करेंगी, और तीसरा, उन्हें प्रेत, भूत, पिशाच आदि से कभी कोई परेशानी नहीं होगी।
अगर वे रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । पहनना चाहें, वक्ता कहते हैं, तो बिल्कुल असली पहनवाइए, यह डस्टिंग वाला नहीं। अच्छे रुद्राक्षों में कालाग्नि रुद्राक्ष पहनवाइए; वह सबसे उत्तम रहेगा। या फिर काल कालाग्नि रुद्राक्ष, या भैरव रुद्राक्ष। इन दोनों में से एक की, या दोनों की माला बनाकर, 27 या 54 मनकों की, जैसी वे पहन सकें, और कवच विधि से ठीक से करवाइए: तो उनकी आध्यात्मिक उन्नति भी होगी, पेशे में भी वे सब चीज़ें काम करेंगी, और तीसरा, उन्हें प्रेत, भूत, पिशाच आदि से किसी तरह की कोई कठिनाई कभी नहीं होगी। वे जोड़ते हैं कि उन्हें लगता है कि जिनका स्पर्श उनके हाथों से होता है, उनकी भी गति होगी, अगर शिव महापुराण के अनुसार चलें — हालाँकि कलियुग है और कुछ भी हो सकता है।
अगर गौरैया बाबा कुल देवता हैं, तो कुल देवी और कुल भैरव कौन हैं?
कुल देवता ही कुल भैरव बने रहते हैं
वक्ता कहते हैं कि अगर कुल देवता गौरैया बाबा हैं, तो कुल भैरव के रूप में वही रहेंगे। कुल देवी को खोजना पड़ेगा, अगर बाद में कोई नहीं बिठाई गईं। वे कहते हैं कि हुआ यह है कि आज के समय में बड़ी शक्तियों के साथ लोक शक्तियाँ बिठा दी गई हैं, तो वे किसी नई के बारे में कैसे बोलें।
अगर कुल देवता गौरैया बाबा हैं, वक्ता कहते हैं, तो कुल भैरव के रूप में वही रहेंगे। कुल देवी को खोजना पड़ेगा, अगर बाद में कोई नहीं बिठाई गईं। कठिनाई यह है कि आज के समय में बड़ी शक्तियों के साथ लोक शक्तियाँ बिठा दी गई हैं, तो फिर वे किसी नई के बारे में कैसे बोलें। अब सोखा बाबा हैं: सोखा बाबा के साथ, कुल देवी के रूप में, बंदी माता — यानी भद्रकाली, वीरभद्र के साथ। पर अगर अब सती माता हैं, तो वे लोक देवी होंगी, बाद में बिठाई गईं; वे घर की कोई स्त्री हो सकती हैं।
क्या स्त्रियाँ पवित्री पहन सकती हैं?
तंत्रोक्त गृहस्थ कर्म में शुद्धि के लिए पहनी जाने वाली पवित्री
वक्ता कहते हैं कि क्यों नहीं — कहाँ मना किया गया है? पवित्री शुद्धि के लिए, पवित्रता के लिए पहनी जाती है, और इसमें कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। वैदिक कर्म में बताए गए कर्मकांड के अनुसार, जो भी हो, तंत्र क्षेत्र में, आप जो भी तंत्रोक्त गृहस्थ काम कर रहे हों, पूजन में इसे पहना जा सकता है।
स्त्रियों को पवित्री पहननी चाहिए, वक्ता कहते हैं। वे क्यों न पहनें? कहाँ मना किया गया है? पवित्री शुद्धि के लिए, पवित्रता के लिए पहनी जाती है; इसमें कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। देखिए: वैदिक कर्म से जिसे कर्मकांड कहते हैं उसके अनुसार, वहाँ जो भी हो — तंत्र क्षेत्र में, आप जो भी तंत्रोक्त गृहस्थ काम कर रहे हों, पूजन में इसे पहना जा सकता है।
योगिनी साधना भी उठाने से कहीं बेहतर है कि एक साधना पकड़कर उसी में चलते रहें।
कई साधनाओं के बजाय एक साधना पकड़ने की सलाह
भगवती दुर्गा की योगिनी साधना समझाने को कहे जाने पर वक्ता पूछने वाले से कहते हैं कि कहीं बेहतर होगा अगर वे एक साधना पकड़कर उसी में चलते रहें। इसमें दो राय नहीं कि वे बहुत साधना करते हैं और बड़ी तीव्रता से करते हैं, पर एक साधना पर टिकते नहीं। वे कहते हैं कि यह वे बार-बार दोहराते हैं: लोग उनके बारे में पूछते हैं, और वे लंबे समय से एक ही साधना कर रहे हैं। वे सब देते हैं ताकि आप चुन सकें — केवल एक चुनिए।
उन्हें लगता है, वक्ता कहते हैं, कि बेहतर होगा अगर पूछने वाले एक साधना पकड़कर उसी के साथ चलें। आप बहुत साधना करते हैं, इसमें दो राय नहीं; आप बड़ी तीव्रता से साधना करते हैं, पर आप एक साधना पर टिकते नहीं। और यह वे बार-बार कहते हैं: आप लोग उनके बारे में पूछते हैं — वे लंबे समय से एक ही साधना कर रहे हैं। वे आप सबको देते हैं ताकि आप चुन सकें। केवल एक चुनिए।
क्या साबर साधना के लिए यंत्र चाहिए?
विग्रह के साथ साबर मंत्र, और विशेष सिद्धि के लिए ज़रूरी यंत्र
वक्ता कहते हैं कि जिनका विग्रह है और जिनके लिए वैदिक मंत्र पढ़े जाते हैं, उन्हें साबर मंत्र बिल्कुल अर्पित किए जा सकते हैं। और अगर आपको कोई विशेष सिद्धि चाहिए, तो विधि-विधान से बना तंत्रोक्त साबर यंत्र, साबरी देवी का यंत्र आदि चाहिए होगा।
क्या साबर मंत्र उन्हें अर्पित किए जा सकते हैं जिनका विग्रह है, जिनके लिए वैदिक मंत्रों का जप होता है — बिल्कुल किए जा सकते हैं, वक्ता कहते हैं। और अगर आपको कोई विशेष सिद्धि चाहिए, तो विधि-विधान से बना तंत्रोक्त सबर मंत्र यंत्र, साबरी देवी का यंत्र आदि चाहिए होगा।
साबर साधना बड़े पैमाने पर नहीं सिखाई जाती क्योंकि यह अत्यंत तेज़ है और लोग इसे केवल परखने के लिए उठाते हैं।
साबर अत्यंत तेज़ है, और लोग इसे परखने के लिए उठाते हैं
वक्ता कहते हैं कि वे ज़्यादा साबर नहीं करवाते, क्योंकि साबर अत्यंत तेज़ है; और अगर वे यंत्र विधान और ये सब बताएँ, तो जिन्हें ज़रूरत है उनके लिए इसका असर ठीक है, पर बहुत से लोग इसे परखने के उद्देश्य से करने लगते हैं। वहीं कठिनाई आती है। अगर आप सच में बहुत समर्पित हैं, तो कर सकते हैं, और इसमें मिलने वाला फल भी अच्छा है।
वे साबर के रूप में ज़्यादा नहीं करवाते, वक्ता कहते हैं, इस कारण: क्योंकि साबर अत्यंत तेज़ है। और अगर इसमें यंत्र विधान और ये सब बताया जाए, तो जिन्हें ज़रूरत है उनके लिए इसका असर ठीक है — पर बहुत से लोग इसे परखने के उद्देश्य से करने लगते हैं। वहीं कठिनाई आती है। अगर आप बहुत समर्पित हैं, ठीक से, तो कर सकते हैं, और इसमें मिलने वाला फल भी अच्छा है।
भैरव अष्टमी पर कौन सी साधना करनी चाहिए?
मुख्य रूप से महाभैरव मंत्र, बाद में आसान विकल्प
वक्ता कहते हैं कि मुख्य रूप से, अगर दिया गया महाभैरव मंत्र लेकर किया जाए, तो वह सबसे उत्तम है। वे दूसरी साधनाएँ भी बताएँगे जो छोटी और आसान होंगी; और अगर कोई साबर से करना चाहे, तो वह भी बताएँगे।
भैरव साधना, वक्ता कहते हैं: मुख्य रूप से, अगर दिया गया महाभैरव मंत्र लेकर किया जाए, तो वह सबसे उत्तम है। दूसरी साधनाएँ भी वे बताएँगे, जो छोटी और आसान भी होंगी। अगर आप साबर से करना चाहें, तो वह भी बताएँगे।
कुंडली में बड़ी दुर्घटना का योग कैसे कटता है?
ज़िम्मेदार ग्रह का उपाय, और रक्षक ग्रहों की चीज़ें पहनना
वक्ता इसे सीधी बात कहते हैं: जो भी ग्रह दुर्घटना का योग दिखा रहा है, जिस भी मारकेश की महादशा चल रही है — उसके लिए, उसी के अनुसार, पहले उपाय करना चाहिए। अगर वह मारकेश है, तो दान और जप करवाकर उसे शांत कीजिए। और दूसरा, अगर वह आपका योगकारक भी है और दुर्घटना का कारण भी, तो उससे जुड़ा जप और कवच जप कीजिए और उसे पहनिए भी; और जो ग्रह आपके रक्षक हैं, उनसे जुड़ा रत्न, रुद्राक्ष, यंत्र और कवच पहन सकते हैं।
सीधी बात है, वक्ता कहते हैं। जो भी ग्रह आपकी दुर्घटना का योग दिखा रहा है, जिस भी मारकेश की महादशा चल रही है — उसी के अनुसार पहले उपाय करना चाहिए। अगर वे मारकेश हैं, तो उनका दान और उनका जप आदि करवाकर उन्हें शांत कीजिए। और दूसरा, अगर वे आपके योगकारक हैं और दुर्घटना का कारण भी हैं, अगर उनसे जुड़ा ऐसा योग बन रहा है, तो उनसे जुड़ा जप और कवच जप कीजिए और उसे पहनिए भी। और जो ग्रह आपके रक्षक हैं, उनसे जुड़ा रत्न, रुद्राक्ष, यंत्र, कवच आदि आप पहन सकते हैं।
स्त्री को वैदिक मंत्र छोड़कर अपने इष्ट के तंत्रोक्त या साबर मंत्र का जितना हो सके जप करना चाहिए।
इष्ट के तंत्रोक्त और साबर मंत्र, वैदिक नहीं
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा, क्योंकि आप स्त्री हैं, वैदिक मंत्र छोड़कर अपने इष्ट के, अपने आराध्य के तंत्रोक्त मंत्र या साबर मंत्र का, या उनके कवच का जितना हो सके जप कीजिए — साधारण उदाहरण के रूप में, शिव रक्षा कवच या शिव रक्षा स्तोत्र, और भगवती से जुड़ा कामाख्या कवच। इन सबका जितना हो सके जप कीजिए।
इसके अलावा, वक्ता कहते हैं, आप स्त्री हैं। वैदिक मंत्र छोड़कर अपने इष्ट के, अपने आराध्य के तंत्रोक्त मंत्र या साबर मंत्र का, या उनके कवच का जितना हो सके जप कीजिए। जैसा वे साधारण उदाहरण के रूप में कहेंगे: शिव रक्षा कवच, शिव रक्षा स्तोत्र; और भगवती से जुड़ा कामाख्या कवच है — इन सबका जितना हो सके जप कीजिए।
जप बड़ी चोट को खरोंच में बदल देता है; दुर्घटना को पूरी तरह मिटाता नहीं।
बड़ी चोट खरोंच में बदलती है, मिटती नहीं
वक्ता कहते हैं कि दुर्घटना का योग कितना भी बड़ा हो, वह जितना होना चाहिए था उससे बहुत कम होगा — ऐसा नहीं कि बिल्कुल नहीं होगा; कुछ न कुछ ज़रूर होगा। हो सकता है दुर्घटना से बहुत बड़ी चोट आनी थी, और वहाँ आपको छोटी चोट, एक खरोंच लगे। इतने में वह कट जाएगा, आपका वह ग्रह। वे कहते हैं कि सबसे बड़ी ज़रूरत कवच का ज़्यादा से ज़्यादा जप है।
तो दुर्घटना का योग कितना भी बड़ा हो, वक्ता कहते हैं, वह जितना होना चाहिए था उससे बहुत कम होगा। ऐसा नहीं कि वह नहीं होगा; कुछ न कुछ ज़रूर होगा। हो सकता है दुर्घटना से बहुत बड़ी चोट आनी थी, और वहाँ आपको छोटी चोट, एक खरोंच लगे। इतने में आपका ग्रह कट जाएगा। कवच का ज़्यादा से ज़्यादा जप, वक्ता कहते हैं, वे इसे सबसे ज़रूरी चीज़ कहेंगे।
वाहन खरीदने के लिए अच्छा दिन और समय कैसे चुना जाता है?
चंद्र कुंडली और वर्तमान गोचर से
नई कार खरीदना चाहने वाले भाई के लिए इस महीने अच्छा दिन और समय पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह देखकर ही बताना पड़ेगा — आपके भाई की चंद्र कुंडली के अनुसार, और अभी गोचर क्या है।
यह देखकर बताना पड़ेगा, वक्ता कहते हैं। आपके भाई की चंद्र कुंडली के अनुसार। और अभी गोचर क्या है।
क्या घर में पंचमुखी हनुमान जी की फ़ोटो की पूजा करना ठीक है?
फ़ोटो पूरी तरह स्वीकार्य है
वक्ता कहते हैं कि यह पूरी तरह ठीक है — गलत क्यों होगा। घर में हनुमान चालीसा के हवन की पूरी प्रक्रिया अलग से पूछे जाने पर वे कहते हैं कि जितना पहले दिखाया जा चुका है, उससे पहले वाली शुरुआती प्रक्रिया भी वे डालेंगे।
यह पूरी तरह ठीक है, वक्ता कहते हैं; गलत क्यों है? एक व्यक्ति, जो घर में हनुमान चालीसा का हवन करना चाहते हैं पर पूरी प्रक्रिया नहीं जानते, हवन की पूरी प्रक्रिया पूछते हैं; वक्ता कहते हैं कि जितना दिखाया गया है, उससे पहले की शुरुआती प्रक्रिया भी वे डालेंगे।
जब कुलदेवी का नाम बिल्कुल अनजाना हो, तो भैरव का अंदाज़ा लगाने के बजाय क्षेत्र पूछा जाता है।
अंदाज़ा लगाने के बजाय क्षेत्र पूछना
माँ विष नाम की कुलदेवी के भैरव कौन होंगे, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि उन्हें सबके बारे में पता नहीं — नाम अक्सर ऐसा होता है जो वे पहली बार सुन रहे होते हैं, और उन्हें हर क्षेत्र की जानकारी नहीं है। वे पूछने वाले से पूछते हैं कि वे कहाँ से हैं, और कहते हैं कि अगर वे बताएँ तो वे भी खोजने की कोशिश करेंगे।
देखिए, वक्ता कहते हैं, उन्हें सबके बारे में पता नहीं है। नाम बहुत बार ऐसा होता है जो वे पहली बार सुन रहे होते हैं। उन्हें हर क्षेत्र की जानकारी नहीं है। आप कहाँ से हैं? वह भी बताइए, तो वे भी खोजने की कोशिश करेंगे।
बनारस की माता शीतला के भैरव कौन हैं?
बनारस क्षेत्र के भैरव के रूप में काल भैरव
वक्ता कहते हैं कि बनारस के भैरव केवल काल भैरव ही होंगे।
बनारस के भैरव, वक्ता कहते हैं, केवल काल भैरव ही होंगे।
जब कुंडली में सिद्धा योगिनी चल रही हो तो इसका क्या अर्थ है?
आठ योगिनियाँ और जिसकी महादशा चल रही हो उसका फल
वक्ता कहते हैं कि सिद्धा योगिनी आठ योगिनियों में से है, जिनकी बात ऊपर हुई थी: जिस योगिनी की महादशा चल रही हो, उसी के अनुसार फल आता है। आठों योगिनियों का अपना अलग फल है, और योगिनियों का भी पूरा प्रभाव होता है।
सिद्धा योगिनी, वक्ता कहते हैं — आठ योगिनीयाँ; इसकी बात ऊपर हुई थी। जिसकी महादशा चल रही है, उसी के अनुसार फल मिलता है। आठों योगिनियों का अपना अलग फल है। योगिनियों का भी पूरा प्रभाव होता है।
घर में माता का श्रृंगार और सेवा कैसे होती है?
स्नान, गंधानुलेपन, फिर दिन और उनकी इच्छा के अनुसार श्रृंगार
वक्ता कहते हैं कि जैसे होता है वैसे होता है: भगवती को स्नान कराकर, उसके बाद उनका गंधानुलेपन होता है; फिर जो भी उचित दिन चल रहा हो, उसके अनुसार अलग-अलग तरह से उनका श्रृंगार होता है — कपड़े से, गहनों से, कभी रुद्राक्ष से। जैसी इच्छा वे मन में जगाती हैं, वैसा उनका श्रृंगार होता है; जिस रूप की इच्छा वे जगाती हैं, उसी रूप का श्रृंगार होता है।
जैसे होता है, वैसे किया जाता है, वक्ता कहते हैं। भगवती को स्नान कराकर, उसके बाद उनका गंधानुलेपन होता है। फिर जो भी उचित दिन चल रहा हो, उसके अनुसार अलग-अलग तरह से उनका श्रृंगार होता है। कपड़े से, गहनों से, कभी रुद्राक्ष से। जैसी इच्छा वे मन में जगाती हैं, वैसा उनका श्रृंगार होता है; जिस रूप की इच्छा वे जगाती हैं, उसी रूप का श्रृंगार होता है।
तंत्र प्रयोग कटने से पहले कितने सतनाम पाठ चाहिए?
1100 का संकल्प — ग्यारह दिन, रोज़ 108 पाठ
वक्ता कहते हैं कि जब आप किसी भी चीज़ का पाठ करें, तो 1100 का — यानी ग्यारह दिन का — संकल्प लीजिए और रोज़ 108 पाठ कीजिए। एक बार करने पर असर में कमी ज़रूर आएगी, तंत्र कितना भी बड़ा हो; और अगर आप बार-बार जप करें, तो काट हो जाएगी। ज़रूरी नहीं कि एक बार में हो या दो बार में: यह इस पर निर्भर करेगा कि आप कौन से नियम रख रहे हैं और किस तरह पाठ-पूजा कर रहे हैं। आपके लिए दो बार में हो सकता है, किसी और के लिए तीन बार में। वे जोड़ते हैं कि भैरव के 108 नामों का विधान काल भैरव अष्टमी पर दिया जाएगा।
देखिए, वक्ता कहते हैं, जब आप किसी का भी पाठ करें, तो 1100 का कीजिए — यानी ग्यारह दिन का संकल्प लीजिए, और रोज़ 108 पाठ कीजिए। एक बार करने पर उसके असर में कमी ज़रूर आएगी, तंत्र कितना भी बड़ा हो। और अगर आप बार-बार जप करें, तो तंत्र काट हो जाएगी। ज़रूरी नहीं कि एक बार में हो या दो बार में; यह आप पर निर्भर करेगा, कि आप किन नियमों के साथ चल रहे हैं, किस तरह अपना पाठ और पूजा कर रहे हैं। आपके लिए दो बार में हो सकता है, किसी और के लिए तीन बार में। भैरव के 108 नामों की सिद्धि का विधान पूछे जाने पर वे कहते हैं कि वे इसे काल भैरव अष्टमी पर देंगे।
अगर विग्रह का अधिवास ठीक से नहीं हुआ और अब उसकी पूजा हो रही है तो क्या?
कुछ नहीं किया जा सकता — अधिवास शुरुआत का काम है
वक्ता कहते हैं कि अगर नहीं हो पाया और विग्रह अब पूजित हो गया है, तो दूसरी बार नहीं करवाया जा सकता। यह चीज़ केवल शुरुआत में ही करवाई जाती है।
अगर नहीं हो पाया, वक्ता कहते हैं, और विग्रह अब पूजित हो गया है, तो दूसरी बार नहीं करवाया जा सकता। यह चीज़ केवल शुरुआत में ही करवाई जाती है।
क्या स्त्री शालिग्राम को छू सकती है?
स्त्री के शालिग्राम शिला छूने पर कोई रोक नहीं
वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल छू सकती है — शालिग्राम शिला को क्यों न छुएँ।
वे बिल्कुल छू सकती हैं, वक्ता कहते हैं। शालिग्राम शिला को क्यों न छुएँ?
जब आकर्षण बदल जाए, तो क्या बगलामुखी और काली साथ-साथ की जा सकती हैं?
तीन से छह महीने एक ही साधना पर टिके रहना
एक सुनने वाले ने पूछा, जो लंबे समय से बगलामुखी अष्टोत्तर शतनाम कर रहे थे, फिर काली योगिनी साधना और वैरी नाशन, और अब काली माता की ओर आकर्षण महसूस करते हैं। वक्ता कहते हैं कि अगर आप अब भगवती काली का कर रहे हैं, तो केवल उन्हीं का करते रहिए। कुछ समय उनका कीजिए — तीन महीने, छह महीने। ऐसा नहीं कि आप नहीं कर सकते, पर एक ही कीजिए; जो आप कर रहे हैं उसे लंबे समय तक करेंगे, तो बेहतर होगा।
अगर आप अब भगवती काली का कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं, तो केवल उन्हीं का करते रहिए। कुछ समय उनका कीजिए — तीन महीने, छह महीने। ऐसा नहीं कि आप नहीं कर सकते, पर एक ही कीजिए। जो आप कर रहे हैं, उसे लंबे समय तक करेंगे, तो बेहतर होगा।
भगवती मदानंद का सार्वजनिक वर्णन गलत सुनने वाले को ऐसी शक्ति की ओर खींचेगा जिसकी सेवा हर कोई नहीं कर सकता।
वर्णन गलत सुनने वाले को ऐसी शक्ति की ओर खींचता है जिसकी सेवा हर कोई नहीं कर सकता
वक्ता कहते हैं कि गृहस्थ के लिए ये ऐसी शक्तियाँ हैं कि अगर इनका पूरा तंत्रोक्त विवरण बताया जाए, तो जिन्हें पहले से जानकारी है उनके लिए ठीक है; पर नए लोग वैसे ही हैं जैसे पहले पूछने वाले थे — अगर वे भगवती मदानंद के स्वरूप पर प्रकाश डालें और उनका वर्णन करें, तो लोग उधर आकर्षित होंगे। भगवती मदानंद की सेवा-पूजा हर कोई नहीं कर सकता, और लोग यह नहीं मानेंगे; अगर वे बिना पूछे बात बता दें, तो लोगों को यहाँ से प्रक्रिया न मिले तो कहीं और से मिल जाएगी, क्योंकि उनका सामर्थ्य ऐसा है, और फिर वे करने लगेंगे और कठिनाई आएगी। वे कहते हैं कि कुछ बातें सीमित मात्रा में ही बतानी चाहिए।
अगर आप उनका पूरा विशेष तंत्रोक्त विवरण जानना चाहते हैं, वक्ता कहते हैं — वह कैसा है और क्या है। तो उनके अनुसार, गृहस्थ के लिए ये ऐसी शक्तियाँ हैं कि अगर इस तरह इन पर चर्चा हो, तो जिन्हें जानकारी है उनके लिए ठीक है; पर नए लोग वैसे हैं जैसा अनुराग सिंह जी ने अभी कहा, कि हम अब भगवती काली की ओर आकर्षित हो रहे हैं। तो अगर वे भगवती मदानंद के स्वरूप पर प्रकाश डालें और उनका वर्णन करें, तो लोग उधर आकर्षित होंगे। तो कहीं न कहीं उन्हें लगता है कि चर्चा ऐसी शक्ति के बारे में होनी चाहिए जिसे कोई भी कर सके। भगवती मदानंद की सेवा-पूजा हर कोई नहीं कर सकता। लोग यह नहीं मानेंगे। हो सकता है अगर वे बिना पूछे बता दें कि यह चीज़ ऐसे-ऐसे होती है, तो लोगों को यहाँ से प्रक्रिया न मिले तो कहीं और से मिल जाएगी, क्योंकि उनका सामर्थ्य ऐसा है — और फिर वे करने लगेंगे, और कठिनाई आएगी। इसलिए कुछ बातें सीमित मात्रा में ही बतानी चाहिए।
अगर स्फटिक शिवलिंग पहले से है, तो क्या नर्मदेश्वर शिवलिंग लाना चाहिए?
जो पहले से स्थापित है, उसी की पूजा तब तक करें जब तक वह खंडित न हो
बिल्कुल नहीं, वक्ता कहते हैं: अगर स्फटिक शिवलिंग पहले से है, तो केवल उसी का पूजन कीजिए। नर्मदेश्वर क्यों लाना? जब तक भगवान उस रूप में विराजमान हैं, जब तक उनकी कृपा है, केवल उन्हीं की सेवा-पूजा होने दीजिए। केवल अगर — भगवान न करे — वे कभी खंडित हो जाएँ, या किसी विशेष ग्रह या नक्षत्र का प्रभाव अपने ऊपर ले लें, तभी कोई और शिवलिंग लाइए।
बिल्कुल नहीं, वक्ता कहते हैं: अगर स्फटिक शिवलिंग पहले से है, तो केवल उसी का पूजन कीजिए। आप नर्मदेश्वर क्यों लाएँगे? जब तक भगवान उस रूप में विराजमान हैं, जब तक उनकी कृपा है, केवल उन्हीं की सेवा-पूजा होने दीजिए। अगर किसी कारण से — भगवान न करे, ईश्वर न करे कि ऐसा कभी हो — पर अगर वे खंडित हो जाएँ, अगर वे किसी विशेष ग्रह या नक्षत्र का प्रभाव अपने ऊपर ले लें, तभी आपको कोई और शिवलिंग लाना चाहिए। वरना केवल उसी की पूजा कीजिए।
क्या विग्रह उम्र के साथ ज़्यादा शक्तिशाली होता जाता है?
विग्रह, यंत्र या अस्त्र जितना पुराना, उतना प्रभावी
वक्ता कहते हैं कि वे जितने पुराने होते जाएँगे, उनका प्रभाव उतना बढ़ता जाएगा। अपने देवी-देवताओं का श्री विग्रह, उनका यंत्र, उनका अस्त्र — जितना पुराना, उतना प्रभावी। घर के दीपक भी, जितने पुराने, उतने प्रभावी। हर चीज़ सिद्ध हो जाती है: चीज़ जितनी पुरानी होती जाती है, उसमें उतनी सिद्धियाँ रहती हैं।
वे जितने पुराने होते जाएँगे, वक्ता कहते हैं, उनका प्रभाव उतना बढ़ता जाएगा। अपने देवी-देवताओं का श्री विग्रह, उनका यंत्र, उनका अस्त्र — जितना पुराना है, उतना प्रभावी है। घर के दीपक भी: जितने पुराने हैं, उतने प्रभावी हैं। हर चीज़ सिद्ध हो जाती है; चीज़ जितनी पुरानी होती जाती है, उसमें उतनी ज़्यादा सिद्धियाँ रहेंगी।
वास्तु समस्या के लिए पहले नक्शा देखना ज़रूरी है, और वास्तु वीडियो 15 दिसंबर को साधना का समय खत्म होने के बाद आएँगे।
वास्तु के लिए नक्शा चाहिए, और साधना का समय 15 दिसंबर के बाद खत्म होता है
वक्ता कहते हैं कि जहाँ वास्तु की समस्या है, उसे पहले देखना होगा — आपका नक्शा देखकर ज़रूर बताया जा सकता है। वे कहते हैं कि चैनल पर वास्तु से जुड़े वीडियो भी डाले जाएँगे, पर अभी नहीं, जब तक कुछ साधना पूरी न हो: 15 दिसंबर के बाद साधना का मुख्य समय फिर साधारण हो जाता है, और उस समय कोई विशेष साधना नहीं करनी होगी, इसलिए तब वे सुनने वालों से इन सब विषयों पर चर्चा करेंगे, और सब नए अनुभव भी डालेंगे।
जहाँ वास्तु की समस्या है, वक्ता कहते हैं, उसे पहले देखना होगा। आपका नक्शा देखकर ज़रूर बताया जा सकता है। वास्तु से जुड़े वीडियो भी चैनल पर डाले जाएँगे; अभी नहीं डाले जा रहे, जब तक कुछ साधना आदि पूरी न हो। अभी स्थिति यह है कि 15 दिसंबर के बाद साधना का मुख्य समय फिर साधारण हो जाता है; उस समय कोई विशेष साधना नहीं करनी होगी। तो उस समय वे आप लोगों से इन सब विषयों पर चर्चा करेंगे, और जितने भी नए अनुभव हैं, वे भी डालेंगे।
विशेष कृपा के लिए सोखा बाबा जैसे लोक देवता की पूजा कैसे होती है?
सीमित विधि, पुरुष सूक्त और श्री सूक्त, या मूल वीरभद्र-भद्रकाली स्वरूप
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने ऊपर बताया था और फिर बताते हैं कि मुख्य रूप से वीरभद्र और भद्रकाली पूजे जाते हैं। अगर आपको विशेष कृपा और विशेष पूजन चाहिए, तो जैसा उन्होंने पहले कहा है, लोक देवी-देवताओं की पूजा का तरीका सीमित मात्रा में है — वहाँ कोई विशेष मंत्र नहीं होते। पंडित जी बहुत प्रसन्न होकर पुरुष सूक्त और श्री सूक्त से पूजन करवाते हैं; और अगर आप अपने स्थान के किसी अच्छे पंडित जी से, यानी जानकार कुल पुरोहित से करवाएँ। पर अगर आपको कुछ विशेष चाहिए, तो उनके मूल स्वरूप में जाना होगा — सोखा बाबा यानी वीरभद्र, और उनकी परमेश्वरी यानी भगवती भद्रकाली।
उन्होंने ऊपर बताया था, वक्ता कहते हैं, और फिर बताते हैं: मुख्य रूप से वीरभद्र और भद्रकाली पूजे जाते हैं। अगर आपको विशेष कृपा और विशेष पूजन चाहिए, तो देखिए — उन्होंने पहले कहा है कि लोक देवी-देवताओं के पूजन का तरीका सीमित मात्रा में है। वहाँ कोई विशेष मंत्र नहीं होते। पंडित जी बहुत प्रसन्न होकर श्री सूक्त और पुरुष सूक्त से पूजन करवाते हैं। अगर आप किसी पंडित जी से करवा रहे हैं, अगर पंडित जी आपके ही स्थान के लोग हैं — यानी कुल पुरोहित, अगर कोई जानकार हों। पर अगर आपको कुछ विशेष चाहिए, तो आपको उनके मूल स्वरूप में जाना होगा: सोखा बाबा यानी वीरभद्र, और उनकी परमेश्वरी यानी भगवती भद्रकाली।
क्या अपनी कुंडली सबको दिखानी चाहिए?
सबसे पहले बृहस्पति नाराज़ होते हैं
वक्ता पूरी तरह सहमत हैं कि कुंडली सबको नहीं दिखानी चाहिए, और कहते हैं कि इससे सबसे पहले बृहस्पति देव नाराज़ होते हैं। वे बताते हैं कि फ़ेसबुक पर क्या दिखता है: कोई लिखता है कि अगर बृहस्पति देव लग्न में हैं तो आपका जीवन देवता जैसा बीतेगा और आप विद्वान होंगे, या अगर राहु लग्न में है तो आप शेयर बाज़ार में बहुत कमाएँगे — और फिर लोग नीचे अपनी कुंडली डालकर पूछते हैं, देखिए, मेरे तीसरे घर में राहु है, मैं क्या कमाऊँगा।
कुंडली सबको नहीं दिखानी चाहिए, वक्ता कहते हैं; हर किसी को नहीं दिखानी चाहिए। यह ठीक है, बिल्कुल ठीक है। हर किसी को अपनी कुंडली दिखाने से सबसे पहले बृहस्पति ही नाराज़ होते हैं। आजकल, वक्ता कहते हैं, फ़ेसबुक पर इतनी हँसी आती है; वहाँ ऐसी टिप्पणियाँ पढ़ने को मिलती हैं। किसी ने लिखा कि अगर बृहस्पति देव लग्न में हैं तो आपका जीवन देवता जैसा चलेगा, कि आप विद्वान होंगे; या किसी ने इसी तरह लिखा कि अगर राहु लग्न में है तो आप शेयर बाज़ार में बहुत कमाएँगे। अब लोग वहाँ नीचे अपनी कुंडली डालेंगे: देखिए, मेरे तीसरे घर में राहु है, हम क्या कमाएँगे? कोई वहाँ पूछेगा, और अगर ग्यारहवें घर में है तो क्या? ऐसे प्रश्न सब पूछते हैं। भाई, अपनी कुंडली हर किसी को नहीं दिखानी चाहिए।
मुफ़्त ज्योतिष परामर्श दोनों पक्षों के लिए नुकसानदेह क्यों है?
दक्षिणा, और केवल देवज्ञ के सामने दिखाने का नियम
वक्ता कहते हैं कि यह मना है और इसे गुप्त रखना चाहिए; कहा गया है कि इसे देवज्ञ के सामने, देवज्ञ ज्योतिषी के सामने दिखाया जाए। जब कोई कहता है कि वह विवरण भेज रहा है, तो वे कहते हैं: निजी रूप से, कभी सार्वजनिक रूप से नहीं। अगर आपमें श्रद्धा और विश्वास है, तो इसका एक नियम है। डॉक्टर के पास जाते हैं तो फ़ीस देते हैं। यहाँ बात इतनी खुली हो गई है कि लोग फ़ीस लेते ही नहीं और अपनी प्रैक्टिस के लिए कहते हैं भेजिए, हम देखेंगे — और दोनों का बुरा होता है: पढ़ने वाले को शायद परवाह न हो, पर दिखाने वाला बर्बाद हो जाता है।
मुफ़्त में ज्योतिषी तो बताएगा ही, वक्ता कहते हैं, क्योंकि उसे अपना R&D करना है; वह ज़रूर बताएगा, क्योंकि वह कुछ नया सीखना चाहता है। पर नुकसान में आप रहने वाले हैं। आपका बृहस्पति खराब होगा; धन की हानि होगी। इसलिए यह मना है; इसे गुप्त रखना चाहिए। देवज्ञ के सामने कहा जाता है — उन ज्योतिषियों के सामने जो देवज्ञ हैं। जब कोई उनसे कहता है कि वह विवरण भेज रहा है, तो वे कहते हैं: निजी रूप से, कभी सार्वजनिक रूप से नहीं। अगर आपमें श्रद्धा और विश्वास है, तो इसका एक नियम है। जब आप डॉक्टर के पास जाते हैं तो फ़ीस देते हैं; आप उसके पेशे का उपयोग करते हैं। यहाँ बात इतनी खुली हो गई है कि लोग फ़ीस लेते ही नहीं; अपनी प्रैक्टिस के लिए कहते हैं, हाँ, भेजिए, हम देखेंगे। दोनों का बुरा होता है। पढ़ने वाले का बुरा होगा, और उसे इसकी परवाह नहीं; पर दिखाने वाला ज़रूर बर्बाद होता है। गाँवों में यह अभी भी बचा है — कि हम यात्रा का मुहूर्त दिखाने पंडित जी के पास जाते हैं, और कहते हैं, पत्रिका देखकर बताइए; और उनके लिए ग्यारह रुपये की दक्षिणा रखी जाती है ताकि कोई दोष, कोई ऋण-दोष न लगे। और जो लोग अपनी कुंडली दिखाते फिरते हैं, वे उसे क्या दे रहे हैं? अगर कोई ज्योतिषी कह भी दे कि ठीक है भाई, दक्षिणा दीजिए, तो वे उसे दक्षिणा के रूप में दस गालियाँ देकर आ जाएँगे। इसमें वे अपने साथ ही गलत कर रहे हैं; किसी और के साथ क्या करेंगे?
कन्या लग्न किस तत्व का है?
पृथ्वी तत्व, और पूरा प्रश्न पूछने की माँग
यह पूछे जाने पर कि कन्या लग्न वायु, जल, पृथ्वी आदि में से क्या है, वक्ता कहते हैं कि प्रश्न अधूरा है — अगर कन्या लग्न का तत्व जानने का कोई खास कारण है, तो बताइए और वे उत्तर देंगे; तत्व का आप क्या करेंगे? पूरा प्रश्न पूछिए। वे जोड़ते हैं कि वैसे भी तत्व पृथ्वी तत्व से जुड़ा है।
अगर कन्या लग्न में तत्व जानने का कोई खास कारण है, वक्ता कहते हैं, तो बताइए और वे बताएँगे। क्योंकि यह प्रश्न अधूरा है: तत्व का आप क्या करेंगे? पूरा प्रश्न पूछिए। वैसे भी, वक्ता कहते हैं, तत्व पृथ्वी तत्त्व से जुड़ा है।
नई साधना उठाने के बजाय एक पुरानी साधना ही क्यों दोहरानी चाहिए?
कालिका योगिनी के परिणाम उन्हें मिले जिनका जप पहले से मज़बूत था
वक्ता कहते हैं कि वे बार-बार कहते हैं कि एक साधना पकड़कर उसे बार-बार दोहराना चाहिए। वे कहते हैं कि वे जो भी अनुभव डालते हैं, वे किसी के तुरंत के अनुभव नहीं हैं: कालिका योगिनी साधना के जो अनुभव वे डाल रहे हैं, उनमें भी, क्योंकि परिणाम उन्हें अभी आया, वे लोग वह साधना पहले से कर रहे थे। चैनल पर डाले तीन वीडियो में से किसी में भी ऐसा कोई नहीं जिसने आज वीडियो देखा, कल साधना की और परसों कालिका योगिनी उसके सामने प्रकट हो गईं। कुछ एक साल या उससे ज़्यादा से जुड़े हैं, कुछ जनवरी या फ़रवरी से; उन्होंने तय मात्रा में कई साधनाएँ की हैं, और फल उन्हें अभी आया — उनका जप और पूजा पहले से मज़बूत थे, उनका तपोबल पहले से बढ़ा हुआ था, और इस साधना ने उन्हें तुरंत फल दिया।
बिल्कुल, वक्ता कहते हैं: वे बार-बार बताते हैं कि एक साधना पकड़कर उसे बार-बार दोहराना चाहिए। वे जो भी अनुभव डालते हैं — देखिए, उनमें से कोई भी किसी का तुरंत का अनुभव नहीं है। कालिका योगिनी साधना के अनुभव में भी वे इसलिए डाल रहे हैं क्योंकि परिणाम उन्हें अभी आया; पर वे वह साधना पहले से कर रहे थे। चैनल पर उन्होंने जो तीन वीडियो के रूप में डाले हैं, तीनों में ऐसा कोई नहीं जिसने आज वीडियो देखा, कल साधना की, और परसों जिसके सामने कालिका योगिनी साक्षात प्रकट होकर सारा काम कर गईं। वे लोग — कुछ एक साल या उससे ज़्यादा से जुड़े हैं, कुछ जनवरी या फ़रवरी से। उन्होंने तय मात्रा में बहुत सी साधनाएँ की हैं, पर फल उन्हें अभी आया। इस साधना ने उन्हें तुरंत फल दिया; तो उनका जप और पूजा पहले से मज़बूत थे, उनका तपोबल पहले से बढ़ा हुआ था, और इस साधना ने उन्हें तुरंत फल दिया। और इसी कारण, वक्ता कहते हैं, वे कहते हैं कि कोई भी साधना लगातार करते रहना चाहिए — जब भी उसका समय आएगा वह फल देगी, और कोई न कोई देवी शक्ति ज़रूर आपसे करवा लेगी।
व्यूज़ के लिए गढ़ी गई दर्शन की कहानियाँ ऐसे स्टंट हैं जो वे करने से मना करते हैं।
वे स्टंट जो वे करने से मना करते हैं
वक्ता कहते हैं कि अगर उन्हें व्यूज़ बढ़ाने होते, अगर उन्हें वैसे करना होता, अगर यह सब स्टंटबाज़ी करनी होती, तो वे कहते कि दिन में कालिका योगिनी साक्षात प्रकट होकर उनके सामने आईं और बोलीं, खप्पर लो, तुम मुझे मेवे, काजू और किशमिश खिला रहे हो, अब तुम खाओ, हम दोनों खाते हैं और तुम्हें भी खिलाते हैं। वे कहते हैं कि लोग ऐसे वीडियो डालेंगे।
और अगर उन्हें व्यूज़ बढ़ाने होते, वक्ता कहते हैं, अगर उन्हें ऐसा करना होता, अगर यह सब स्टंटबाज़ी करनी होती, तो वे यह कहते। कि दिन में कालिका योगिनी साक्षात प्रकट होकर उनके सामने आईं और बोलीं: खप्पर लो — जो मेवे, काजू और किशमिश तुम मुझे खिला रहे हो, अब तुम खाओ; हम दोनों खाते हैं, और तुम्हें भी खिलाते हैं। लोग ऐसे वीडियो डालेंगे।
वाम देवी का एक वीडियो व्यूज़ चाहने वाले चैनलों ने मंत्रों सहित कॉपी कर लिया, जबकि वह लोक देवी साधना हर कोई नहीं कर सकता।
मंत्रों सहित कॉपी की गई एक लोक देवी साधना, जिसे हर कोई नहीं कर सकता
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने वाम देवी का एक वीडियो डाला था। लोक देवी की साधना इस तरह हर कोई नहीं कर सकता। अब इसे मना भी नहीं किया जा सकता; लोगों को व्यूज़ चाहिए और वे कुछ भी करेंगे।
वाम देवी का एक वीडियो उन्होंने डाला है, वक्ता कहते हैं। लोक देवी की साधना इस तरह हर कोई नहीं कर सकता। अब इसे मना भी नहीं किया जा सकता। लोगों को व्यूज़ चाहिए; वे कुछ भी करेंगे।
बड़े चैनलों से कहा गया है कि वे आम साधनाएँ दें और इन सामग्रियों का उपयोग लोक कल्याण के लिए करें।
आम साधनाएँ दें, और इन सामग्रियों का उपयोग लोक कल्याण के लिए करें
वक्ता कहते हैं कि चैनल पर हमेशा आम साधना दी जानी चाहिए। उन्होंने जो अनुभव डाले हैं — हनुमान जी के हवन के, झंझीरा के और बाकी सब के — उनमें उन्होंने खुलकर कहा है कि वे जानते हैं कि दूसरे चैनलों के लोग, बड़े चैनल वाले, उन्हें सुनते हैं: कृपया इन चीज़ों का उपयोग लोक कल्याण के लिए कीजिए। अगर ऐसे लोग इस तरह की कठिनाई लेकर आपके पास आएँ, तो उनसे ये सामग्रियाँ इस्तेमाल करवाइए, फ़ायदा होगा।
आम साधना, वक्ता कहते हैं, चैनल पर हमेशा दी जानी चाहिए। उन्होंने अब जो भी अनुभव डाले हैं — हनुमान जी के हवन के, झंझीरा के और बाकी सब के — उनमें उन्होंने खुलकर कहा है: कि वे जानते हैं कि दूसरे चैनलों के लोग, बड़े चैनलों के लोग, उन्हें सुनते हैं। कृपया, लोक कल्याण के लिए, इन चीज़ों का उपयोग कीजिए। अगर लोग ऐसे प्रश्न लेकर आपके पास आएँ, कि यह कठिनाई है, तो उनसे ये सामग्रियाँ इस्तेमाल करवाइए; फ़ायदा होगा। वे कहते हैं कि उन्होंने खुलकर भी कहा है — भाई, अगर आप सुन रहे हैं, तो करवाइए, अच्छा है।
क्या नाड़ी दोष से संतान होने में कठिनाई होती है?
अष्टकूट मिलान में नाड़ी दोष
वक्ता कहते हैं कि अगर अष्टकूट मिलान में नाड़ी दोष है — और वह दोनों का होगा, इसलिए दोनों का है — तो संतान होने में कठिनाई होती है। वे कहते हैं कि केवल उसी को लेकर यह नहीं कहा जा सकता; फिर भी, अगर एक शब्द में कहें, तो मुख्य कठिनाई ठीक वहीं है। क्या करना चाहिए, यह पूरी कुंडली देखकर ही बताया जा सकता है।
नाड़ी दोष से संतान होने में कठिनाई होती है, वक्ता कहते हैं। अगर अष्टकूट मिलान में नाड़ी दोष है, और वह दोनों का है, तो वह दोनों का बराबर होगा; तब संतान होने में परेशानी होती है। हालाँकि केवल उसी को लेकर यह नहीं कहा जा सकता, फिर भी, अगर एक शब्द में कहें, तो मुख्य कठिनाई इसी बिंदु पर है। क्या करना चाहिए — यह पूरी कुंडली देखकर ही बताया जा सकता है।
माता मदानंद जैसी लोक शक्तियों के भोग और भेंट के तरीके इसलिए नहीं बताए जाते क्योंकि गलत सुनने वाला बाकी उपाय के बिना केवल भोग की नकल करेगा।
गलत सुनने वाला बाकी उपाय के बिना माता मदानंद के भोग की नकल करेगा
एक सुनने वाले लिखते हैं कि उनसे मिलने से पहले वे माँ काली के साथ माता मदानंद को गोबर के कंडे पर केवल गुड़ का भोग दे रहे थे, क्योंकि पड़ोसी दिन-रात तंत्र करते हैं, और उस भोग से काफ़ी राहत मिली। वक्ता कहते हैं कि ठीक इसीलिए वे ऐसी बातें नहीं बताते: अगर वे अभी यह बताएँ, तो लोग पूछेंगे। आप उस क्षेत्र के हैं और पहले से देखते-सुनते-करते आए हैं; पर एक नया व्यक्ति, जिसके घर में पता नहीं कौन सी शक्ति है, यह पढ़-सुनकर खुद करेगा। अगर उसे तंत्र बाधा है, तो वक्ता उसे हनुमान जी की धूनी करने को कहेंगे, कि यह तरीका है, झंझीरा कीजिए — और वह नहीं करेगा। वह कहेगा, नहीं, रानू कुमार साहू ने कहा था कि गोबर के कंडे पर हमने केवल गुड़ का भोग दिया और वे ठीक हो गए, तो हम भी माता मदानंद को देंगे। और वहीं कठिनाई आएगी।
ठीक इसी कारण वे नहीं बताते, वक्ता कहते हैं। अगर वे अभी यही बात बताएँ, तो लोग पूछेंगे। आप उस क्षेत्र के हैं, या आप पहले से जानते हैं, आप देखते, सुनते और करते आए हैं। एक नया व्यक्ति, जिसके घर में पता नहीं कौन सी शक्ति है — वह यह पढ़ेगा, सुनेगा, और खुद करेगा। अगर उसे तंत्र बाधा है, तो वे उसे हनुमान जी की धूनीविशेष लकड़ियों व बीजों को जलाकर घर या स्थान से नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा दूर करने हेतु की जाने वाली धूनी। करने को कहेंगे; यह तरीका है, झंझीरा कीजिए। और वह नहीं करेगा। वह कहेगा: नहीं, रानू कुमार साहू ने कहा था कि गोबर के कंडे पर हमने केवल गुड़ का भोग दिया और उससे वे ठीक हो गए; हम भी माता मदानंद को देंगे। और वहीं कठिनाई आएगी। वक्ता कहते हैं कि इसी कारण भगतवाल से जुड़ी चीज़ें और ये सब — जिस तरह की चीज़ों में भोग और भेंट होता है — वे नहीं बताते। क्योंकि उससे वे किसी का भला नहीं कर पाएँगे।
ऐसे वीडियो से लाखों व्यूज़ आएँगे, पर हर दस में से आठ सुनने वालों का नुकसान होगा।
लाखों व्यूज़ बनाम दस में से आठ सुनने वालों का नुकसान
वक्ता कहते हैं कि वे जानते हैं कि इससे उन्हें बहुत व्यूज़ मिलेंगे — कि अगर वे इस तरह के वीडियो बनाएँ तो रातों-रात लाखों पार कर जाएँगे। पर सुनने वालों में से दस में से आठ का नुकसान होगा, और यह वे कभी नहीं चाहते। वे पूछने वाले से कहते हैं: आपको राहत मिल रही है, आप कर रहे हैं; इसे बिल्कुल अपने तक सीमित रखिए, यही अच्छा है।
वे जानते हैं, वक्ता कहते हैं, कि इससे उन्हें बहुत ज़्यादा व्यूज़ मिलेंगे; रातों-रात वे लाखों पार कर जाएँगे, अगर वे इस तरह के वीडियो बनाएँ। पर सुनने वालों में से दस में से आठ लोगों का नुकसान होगा। यह वे कभी नहीं चाहते। आपको राहत मिल रही है, आप कर रहे हैं। इसे बिल्कुल अपने तक सीमित रखिए; यही अच्छा है।
क्या हर क्षेत्र में लोग लोक शक्तियों से परेशान होते हैं?
देहरादून में मदानंद, और दूसरे क्षेत्रों के उनके समकक्ष
एक सुनने वाले लिखते हैं कि उनके यहाँ, उत्तराखंड के देहरादून में, माता मदानंद का इस्तेमाल होता है, और साफ़ कहें तो इन्हीं से लोग परेशान होते हैं। वक्ता सहमत होते हैं: बाबा का नाम लिया जाए — कहीं लोग इनसे परेशान हैं, कहीं चानन बली से, कहीं लोग गूंगड़ से परेशान हैं, कहीं मेलोडी से। वे कहते हैं कि हर क्षेत्र में लोग किसी न किसी ऐसे अजीब प्राणी से परेशान होते हैं।
उनके यहाँ, उत्तराखंड के देहरादून में, सुनने वाले लिखते हैं, माता मदानंद का इस्तेमाल होता है; और साफ़ कहें, तो इन्हीं से लोग परेशान होते हैं। बाबा का नाम लिया जाए, वक्ता उत्तर देते हैं — कहीं लोग इनसे परेशान हैं, कहीं चानन बली से परेशान हैं। कहीं लोग गूंगड़ से परेशान हैं, कहीं लोग मेलोडी से परेशान हैं। वक्ता कहते हैं कि हर क्षेत्र में कोई न कोई इन अजीब प्राणियों से ज़रूर परेशान होता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।