साधना शुरू होते ही धन क्यों घटता है — अभिचार, उग्र मंत्र और लक्ष्मी का बंधन
अभिचार और ग़लत मंत्र घर की लक्ष्मी को कैसे बाँधते हैं।
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गृहस्थ का धन ठीक साधना शुरू करते ही क्यों घटने लगता है?
साधना शुरू करने के बाद आया धन अभाव
वक्ता कहते हैं कि खास मुश्किल यह है कि हम साधना भी करना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि धन की कमी न हो। अक्सर ऐसा होता है कि पहले व्यक्ति की हालत अच्छी होती है, और साधना शुरू करते ही उसके जीवन में धन अभाव आने लगता है। वे कहते हैं कि पूरा विषय एक-एक करके समझाया जाएगा।
विषय फिर से शुरू करते हुए वक्ता कहते हैं कि आज का विषय बहुत ज़रूरी है। धन अभाव की सबसे खास बात यह है कि हम साधना भी करना चाहते हैं, और यह भी चाहते हैं कि पैसे की कमी न हो। वे कहते हैं कि बहुत बार ऐसा होता है कि पहले हमारी हालत बहुत अच्छी होती है, पर जब हम साधना शुरू करते हैं, तब हमारे जीवन में धन अभाव दिखने लगता है। वे कहते हैं कि आज यह पूरा विषय लिया जाएगा और हर एक बात समझी जाएगी, क्योंकि पैसा नहीं होगा तो आप साधना भी नहीं कर पाएँगे — यही सच है।
साधना के लिए भी पैसा क्यों चाहिए?
हवन और साधना सामग्री का ख़र्च
हवन के लिए उसकी सामग्री चाहिए और साधना के लिए उसका सामान। वक्ता कहते हैं कि साधना के क्षेत्र में भी महँगाई आसमान छू रही है। साधनाओं पर लाखों रुपये ख़र्च होते हैं, इसलिए पैसे के बिना यह नहीं हो सकती — और गृहस्थ सकाम होते हैं, उनकी इच्छाएँ साधना से पूरी होनी होती हैं।
हवन करना है तो उसकी सामग्री चाहिए; साधना करनी है तो उसका सामान चाहिए। वक्ता कहते हैं कि आज के समय में साधना के क्षेत्र में भी महँगाई आसमान छू रही है, इसमें दो राय नहीं। वे कहते हैं कि साधनाओं में लाखों रुपये लग जाते हैं, तो पैसे के बिना यह कैसे होगा। कारण वे यह बताते हैं कि हम सकाम हैं। हमारे जीवन में काम है, और उस काम के साथ कोई न कोई इच्छा भी है जो साधना के माध्यम से पूरी होनी है। इसीलिए वे इस विषय को ज़रूरी कहते हैं।
शत्रु किसी घर पर अभिचार असल में कैसे करता है?
दो साधन: मंत्र या सिद्ध की हुई क्षुद्र शक्तियाँ
वक्ता कहते हैं कि शत्रु जब भी अभिचार करता है — चाहे वह बड़ा तांत्रिक हो या छोटा — उसकी क्रिया दो में से एक होती है: या तो वह मंत्रों का प्रयोग करेगा, या अपनी सिद्ध की हुई क्षुद्र शक्तियों का, जैसे भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल, ब्रह्म या मसान।
गृहस्थ जीवन में शत्रु के अभिचार से लक्ष्मी का बंधन कैसे होता है, इस चर्चा को संक्षेप में दोहराते हुए वक्ता पहली बात रखते हैं। शत्रु जब भी अभिचार करता है, तो उसकी क्रिया — वह कितना भी बड़ा या छोटा तांत्रिक हो — दो तरह की होती है। या तो वह मंत्रों का प्रयोग करेगा, या अपनी सिद्ध करके रखी हुई क्षुद्र शक्तियों का: भूत बाधा, प्रेत, पिशाच, बैताल, ब्रह्म, मसान आदि।
कैसे पता चले कि कौन आपके घर में अभिचारिक प्रयोग लेकर आ रहा है?
वह आगंतुक जिसके आते ही झगड़ा होता है
वक्ता कहते हैं कि अगर आप अभिचार से पीड़ित हैं और आपका घर अभी रक्षा में नहीं आया है, तो सबसे पहले यह देखें कि किस व्यक्ति के घर आने के बाद झगड़ा शुरू होता है। वे कहते हैं, मान लीजिए, उस व्यक्ति ने कुछ करवाया है और उसे पहुँचाने के लिए साथ लेकर आया है।
वक्ता कहते हैं कि आप सब पहले यह देखिए: अगर आप अभिचार से पीड़ित हैं और आपका घर अभी रक्षा में नहीं आया है, तो सबसे पहले यह देखना है कि वह कौन व्यक्ति है जिसके आपके घर आने पर झगड़ा शुरू हो जाता है। वे कहते हैं, मान लीजिए, उस व्यक्ति ने कुछ करवाया है और उसे पहुँचाने के लिए अपने साथ लेकर आया है। वह आपके घर आएगा और बिना बात के झगड़ा हो जाएगा। हो सकता है आप उसके लिए पानी लेने गए, रसोई में गिलास हाथ से छूट गया, और पानी कैसे गिरा इस पर घर में भाई-बहनों में या पति-पत्नी में लड़ाई शुरू हो जाए — इतनी छोटी बात पर झगड़ा।
घर का झगड़ा लक्ष्मी की बढ़ोतरी को कैसे रोकता है?
कलह और खीज का काम और व्यापार तक पहुँचना
वक्ता कहते हैं कि जो खीज और आपसी झगड़ा शुरू होता है, और जो कलह बनती है, उसका असर मन पर होकर काम की जगह, व्यापार, हर जगह पड़ता है — और इसी से आपकी लक्ष्मी की बढ़ोतरी रुक जाती है। जहाँ बार-बार कलह और क्लेश होता है, वहाँ घर में लक्ष्मी की बढ़ोतरी यूँ ही रुक जाती है।
वक्ता कहते हैं कि यही कारण बनता है। जो खीज शुरू होती है, आपस का झगड़ा, जो कलह बनती है — उसका असर मन पर होकर काम की जगह पर, व्यापार पर, हर जगह पड़ता है। इसी वजह से आपकी लक्ष्मी की बढ़ोतरी रुक जाती है। अगर बार-बार कलह और क्लेश होता रहे, तो आपके घर में लक्ष्मी की बढ़ोतरी यूँ ही रुक जाएगी।
उच्चाटन गृहस्थ की आमदनी पर कैसे वार करता है?
उच्चाटन — मन का एक जगह न टिकना
दूसरी चीज़ उच्चाटन है, जिसमें मन एक जगह टिकता नहीं। आप जानते हैं कि ग्राहक से अच्छे से बात करेंगे तो सौदा पक्का होगा, और आप जानते हैं कि अपने नीचे के लोगों से काम कैसे लेना है, फिर भी आप ठीक से बोल नहीं पाएँगे, क्योंकि मन उच्चाटित रहता है और आप इधर-उधर भागते रहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसमें दूसरी चीज़ जो होती है वह है उच्चाटन — यानी मन एक जगह टिका नहीं रहेगा। आप जानते हैं कि सामने वाले ग्राहक से अच्छे से बात करेंगे तो वह सौदा पक्का कर देगा। आप अपने काम के क्षेत्र में जानते हैं कि अपने नीचे के कर्मचारियों से काम कैसे लेना है। फिर भी आप ठीक से बोल नहीं पाएँगे। क्योंकि मन एक जगह नहीं टिकेगा, वह उच्चाटित होता रहेगा, और आप इधर-उधर भागते रहेंगे।
अभिचारिक उच्चाटन के बाहरी लक्षण क्या हैं?
रूखापन, बोलने से घबराहट और अकेले रहने की इच्छा
आपका किसी से सीधे मुँह बात करने का मन नहीं करेगा, और करेंगे भी तो आपका तरीका काफ़ी रूखा होगा, जिससे लोग आपसे दूर भागेंगे। वक्ता लक्षण गिनाते हैं: मन का न टिकना, किसी से बात करने में घबराहट, लोगों से दूर भागने का मन, और एकांत में जाने की इच्छा।
वक्ता कहते हैं कि आपका किसी से सीधे मुँह बात करने का मन नहीं करेगा, और बात करेंगे भी तो आपका तरीका काफ़ी रूखा होगा, जिससे लोग आपसे दूर भागेंगे। वे कहते हैं कि यह तंत्र का असर है — यह बिल्कुल होता है। वे ये लक्षण गिनाते हैं: मन का स्थिर न होना, किसी से भी बात करने में घबराहट, लोगों से दूर भागने का मन, और एकांत में जाने की इच्छा।
क्या ऊँचा साधक उच्चाटन के लक्षणों को अपने ऊपर हमला मान ले?
चेतावनी: यह केवल निचले स्तर का असर है
वक्ता साफ़ कहते हैं कि यह तंत्र का ऊँचे स्तर का असर नहीं है; वे खास तौर पर उस असर की बात कर रहे हैं जो अभिचारिक प्रयोग से होता है। अगर आप ऊँचे स्तर के साधक हैं, तो वे कहते हैं कि इन बातों को अपने ऊपर न लें।
वक्ता कहते हैं कि तंत्र का यह असर ऊँचे स्तर का नहीं है। वे इस समय खास तौर पर उस असर की बात कर रहे हैं जो अभिचारिक प्रयोग से होता है, जो एक अलग बात है। वे कहते हैं कि अगर आप ऊँचे स्तर के साधक हैं, तो कृपया इन बातों को अपने ऊपर न लें।
धन की कमी के लिए कुंडली के कौन-से भाव देखे जाते हैं?
दूसरा और ग्यारहवाँ भाव और लग्नेश से उनका संबंध
वक्ता कहते हैं कि इन सबके अलावा कुंडली में दूसरा और ग्यारहवाँ भाव देखना होता है — वहाँ कौन-सा ग्रह और कौन-सी राशि बैठी है, और वे ग्रह लग्न और लग्नेश से क्या संबंध बनाते हैं। ये सब बातें देखना ज़रूरी हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि इन सबके अलावा सवाल यह है कि कुंडली से इसे कैसे देखें। वे लोगों को यह बताते हैं कि कुंडली में दूसरा और ग्यारहवाँ भाव देखना है, और उनमें कौन-सा ग्रह बैठा है, कौन-सी राशि है, कौन-सा ग्रह है, और वे लग्न और लग्नेश के साथ मिलकर क्या स्थिति बनाते हैं। वे कहते हैं कि ये सब बातें देखना ज़रूरी हो जाता है।
चर्चा की गई कुंडली के दूसरे भाव में ग्रहण दोष, पितृ दोष और अंगारक योग एक साथ
दूसरे भाव में ग्रहण दोष, पितृ दोष और अंगारक योग
उस दिन जिस कुंडली पर उन्होंने चर्चा की थी, उसके दूसरे भाव में ही ग्रहण दोष, पितृ दोष और अंगारक योग एक साथ थे। जहाँ दूसरे भाव में ऐसा दोष हो — वहाँ राहु बैठा हो — और दूसरे भाव का स्वामी और लग्नेश आपस में ठीक न हों, वहाँ धन का काफ़ी नुकसान होता है।
जैसा वे कह रहे थे, उस दिन जिस कुंडली का विश्लेषण उन्होंने किया था, उसमें दूसरे भाव में ही ग्रहण दोष था, पितृ दोष भी था, और अंगारक योग भी था। वे कहते हैं कि इसलिए अगर आपके दूसरे भाव में कोई ग्रहण दोष आदि है, उस जगह राहु बैठा है, तो बहुत बार — अगर लग्नेश के साथ उसकी स्थिति ठीक नहीं रही, दूसरे भाव का स्वामी ग्रह ठीक स्थिति में नहीं है, और लग्नेश से उनका संबंध ठीक नहीं है, कोई मित्रता आदि नहीं है — तो इस वजह से आपको धन से जुड़ा काफ़ी नुकसान होता है।
क्या दूसरे भाव के दोष में पुरखों से मिली संपत्ति नष्ट होती है?
पैतृक संपत्ति का क्षय, और दूसरे के नाम से फ़र्म शुरू करना
वक्ता कहते हैं कि पुरखों से मिली संपत्ति का तो क्षय ज़रूर होता है, और उसे जिस भी तरह लगाएँ, क्षय शुरू हो जाता है। अगर पहले विश्लेषण करवा लें और उससे जुड़ा दान या जप करवा लें, और फिर व्यापार अपने नाम के बजाय पत्नी या बहन के नाम से शुरू करें, तो जोखिम कुछ कम हो जाता है।
वे कहते हैं कि खास तौर पर पुरखों से मिली संपत्ति का क्षय तो ज़रूर होता है। आप उसे जिस भी तरह लगाएँ, वह नष्ट होने लगती है। पर अगर आप पहले इसका विश्लेषण करवा लें, और उससे जुड़ा दान या जप आदि करवा लें, और फिर व्यापार करना चाहें — मान लीजिए आपने कोई फ़र्म या कोई धंधा शुरू किया — तो वे कहते हैं कि अगर उसे अपने नाम से शुरू करने के बजाय पत्नी के नाम या बहन के नाम से शुरू करें, तो ये बातें कुछ कम जोखिम वाली हो जाती हैं और इतना बड़ा असर नहीं देंगी। लेकिन जब आप ये सब अपने नाम से करते हैं, तो यह असर आप पर आएगा।
ग्यारहवें भाव में दोष क्या करता है?
लाभ और आय का भाव, और उसके शमन की ज़रूरत
ग्यारहवाँ भाव लाभ का भाव और आय का भाव है, इसलिए अगर वहाँ कोई दोष बैठा है और हम उसका शमन नहीं करते, तो लंबे समय तक धन नहीं मिल पाता। वक्ता कहते हैं कि ज्योतिष के अनुसार यही स्थिति है।
वे कहते हैं कि दूसरी बात आती है ग्यारहवें भाव की स्थिति। क्योंकि ग्यारहवाँ भाव लाभ का भाव, आय का भाव है, अगर उसमें भी कोई दोष बैठा है, और हम उसका शमन नहीं करते, तो लंबे समय तक धन की प्राप्ति नहीं हो पाती। वे बताते हैं कि इतना ज्योतिष के अनुसार है।
साधना की तुलना में कुंडली आपको कहाँ तक ले जा सकती है?
एक तरफ़ कुंडली, दूसरी तरफ़ साधना का असर
बहुत से लोगों का जीवन देखकर वक्ता कहते हैं कि कुंडली एक सीमा तक ही साथ दे सकती है। वे मानते हैं कि शायद वे इसे बहुत गहराई से देखना न जानते हों, पर कहते हैं कि जो अच्छे ज्योतिषी भक्ति और तंत्र साधना के रास्ते पर चलते हैं, वे कहते हैं कि एक तरफ़ कुंडली है और दूसरी तरफ़ आपकी साधना का असर।
पर अपने जीवन के अनुभव से, बहुत सारे लोगों को देखकर, वक्ता यह कहते हैं: कुंडली एक सीमा तक ही आपका साथ दे सकती है। वे मानते हैं कि हो सकता है वे खुद इस विषय को बहुत गहराई तक देखना न जानते हों, और यह वे स्वीकार कर सकते हैं। पर अच्छे, जानकार ज्योतिषी जब भक्ति के रास्ते पर चलते हैं, तंत्र साधना के रास्ते पर चलते हैं, अपने इष्ट और आराध्य के प्रति बहुत समर्पित हो जाते हैं, तो यह कहते हैं: एक तरफ़ कुंडली, और दूसरी तरफ़ आपकी साधना का असर। वे कहते हैं कि वे भी अपने जीवन में यह मानते हैं, और इसलिए आपको मुख्य रूप से साधना करनी है।
बिना जानकारी के उग्र या अस्त्र मंत्र पढ़ने से धन की कमी क्यों होती है?
उग्र और अस्त्र मंत्रों को बिना उनका प्रयोग जाने पढ़ना
वक्ता कहते हैं कि पहला और सबसे खास कारण यह है कि अभिचार से पीड़ित व्यक्ति किसी उग्र मंत्र के बारे में सुनता है — कोई शताक्षरी, कोई अस्त्र मंत्र, कोई प्रत्यंगिरा या बगला प्रत्यंगिरा मंत्र, जिसकी संस्कृत में कहा गया है कि शत्रु को खा जाओ, पी जाओ, फाड़ दो, बाँध दो, पटक दो, यहाँ मारो वहाँ मारो — और बिना यह जाने कि ऐसी विद्याओं का प्रयोग कैसे होता है, उसे शुरू कर देता है।
वे कहते हैं कि अब सवाल यह है कि तंत्र साधना हो रही है, और अगर तंत्र साधना की वजह से धन अभाव होता है, तो उसके पीछे क्या कारण हैं। पहली और सबसे खास बात: आप अभिचार से कितने भी पीड़ित हों, आप किसी उग्र मंत्र के बारे में सुनते हैं और उसे शुरू कर देते हैं — कोई शताक्षरी, कोई अस्त्र मंत्र आदि, जिसमें कहा गया होगा कि शत्रु को खा जाओ, पी जाओ, चीर दो, बाँध दो, उठाकर पटक दो, यहाँ मारो, वहाँ मारो — ये संस्कृत के मंत्र होते हैं। उसे क्षुब्ध करो, मोहित करो, स्तंभित करो — जैसे महाप्रत्यंगिरा से जुड़े मंत्र, बगला प्रत्यंगिरा आदि।
उग्र विद्या का पाठ करने से पहले क्या जानना ज़रूरी है?
सावधानियाँ, किस भैरव से आज्ञा ली जाती है, और भोग कहाँ दिया जाता है
वक्ता पूछते हैं कि क्या आप जानते हैं कि इन विद्याओं का प्रयोग कैसे होता है, पाठ से पहले क्या सावधानियाँ रखनी हैं, पाठ करने से पहले किस भैरव से आज्ञा ली जाती है, और आम तौर पर भोग कहाँ और कैसे देना चाहिए, और कौन-सी शक्ति आती है और कौन-सी नहीं।
वक्ता कहते हैं कि अगर आपको यह जानकारी ही नहीं है कि इन विद्याओं का प्रयोग कैसे होता है — पाठ से पहले क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए, पाठ करने से पहले किस भैरव से आज्ञा ली जाती है — और आम तौर पर भी यह जानकारी नहीं है कि भोग कहाँ और कैसे देना चाहिए, और कौन-सी शक्ति आती है और कौन-सी नहीं, तो वे कहते हैं, भाई, वे किसी को डरा नहीं रहे। करके देख लीजिए: आपके अपने घर की लक्ष्मी खुद बँध जाएगी।
बिना मार्गदर्शन के उग्र मंत्र का जप आमदनी पर क्या असर करता है?
आमदनी का आधा रह जाना या पूरी तरह रुक जाना
वक्ता कहते हैं कि जो चार पैसे आ रहे थे, वे आने बंद हो जाएँगे। और अगर आना बंद न भी हो, तो ऐसे मंत्रों का जप करने पर हालत इतनी बिगड़ेगी कि जहाँ कोई धन का स्रोत बना था, जहाँ आप दस रुपये कमाते थे वहाँ सीधे पाँच पर आ जाएँगे, और आपकी स्थिति पूरी तरह डगमगा जाएगी।
वे कहते हैं कि जो थोड़ा-बहुत पैसा आ रहा था, वह आना बंद हो जाएगा। यही सच्चाई है। और अगर आना बंद न हो, तो इस तरह के मंत्रों का जप करने पर हालत इतनी बिगड़ने लगेगी कि जहाँ कोई धन का स्रोत बना था, जहाँ आप दस रुपये कमाते थे, वहाँ सीधे पाँच पर आ जाएँगे। आपकी हालत पूरी तरह डगमगा जाएगी। वे कहते हैं कि कारण बस यह है कि आपको यह जानकारी नहीं है कि कौन-से मंत्र किस तरह प्रयोग किए या पढ़े जाते हैं; और यह जानकारी न होने से, जब आप मंत्र पढ़ते हैं तो आपकी अपनी शक्तियाँ बनती हैं। इसीलिए आपकी अपनी साधना से ही लक्ष्मी का बंधन होता है।
छोटा भाई बड़े भाई के अभिचार का जवाब बिना गुरु और बिना जानकारी के बगला प्रत्यंगिरा प्रयोग से देता है
दो भाई, और उनमें से एक पर बगला प्रत्यंगिरा का प्रयोग
वे एक परिवार के दो सगे भाइयों का उदाहरण लेते हैं, बड़ा और छोटा। बड़े ने छोटे पर अभिचार किया है, और अब छोटा बिना किसी गुरु और बिना किसी जानकारी के बगलामुखी, यानी बगला प्रत्यंगिरा का प्रयोग करता है — भगवती की शरण में दीपक जलाकर एक बार पाठ करना नहीं, बल्कि 1100, 1100, 1100 पाठ करने बैठ जाता है, क्योंकि उसने पढ़ा है कि इतने पाठ से शत्रु नष्ट होता है।
एक उदाहरण लेकर वक्ता एक परिवार के दो लोग रखते हैं — सगे भाई, बड़ा और छोटा। बड़े भाई ने छोटे पर अभिचारिक प्रयोग किया है, या इस तरह की कोई स्थिति बनी है; हो सकता है वे अलग रहते हों, पर यह पता है कि बड़े भाई ने किया है। अब, वे कहते हैं, आप वहाँ बगलामुखी का, बगला प्रत्यंगिरा का प्रयोग कर रहे हैं, बिना किसी गुरु के, बिना किसी की जानकारी के — और ऐसा भी नहीं कि आपने बस भगवती की शरण ली, दीपक जलाया और एक बार पाठ किया। आप बैठकर 1100, 1100, 1100 करते हैं, क्योंकि आपने पढ़ा-सुना है कि इतने पाठ से भगवती शत्रु का नाश करती हैं। पर वे पूछते हैं, शत्रु कौन है? वह आपका अपना भाई है।
अपने ही भाई पर किया प्रयोग उल्टा क्यों पड़ता है?
एक ही कुलदेवी और घर की एक ही लक्ष्मी
क्योंकि दोनों की कुलदेवी एक है, और घर में पूजी गई लक्ष्मी — जो कभी कुलदेवी के माध्यम से पूजी गई — दोनों के लिए एक ही है। वे कहते हैं, पहले यह सीखिए कि उन्हें किस तरह अलग किया जाता है; जहाँ यह जानकारी नहीं है और आप ये प्रयोग चला देते हैं, वहाँ भी लक्ष्मी का बंधन शुरू हो जाता है।
एक ही कुल के भीतर के प्रयोग को जानकार व्यक्ति कैसे सँभालता है?
सिद्ध पीठ पर आवाहन, और ज़बरदस्ती नहीं, विनती
वक्ता कहते हैं कि जब ऐसा प्रयोग किसी जानकार व्यक्ति से करवाया जाता है और अपने घर की शक्तियाँ बंधन में आने लगती हैं — क्योंकि दोनों एक ही कुल के लोग हैं — तो शक्ति का उसके सिद्ध पीठ, सिद्ध स्थान या तंत्र पीठ पर आवाहन होता है, उन्हें जो धार, पूजा और भोग देना है वह दिया जाता है, और इस काम के लिए उनसे विनती की जाती है।
वक्ता कहते हैं कि वहाँ तरीके अलग हो जाते हैं। जब इस तरह का प्रयोग किसी जानकार व्यक्ति से करवाया जाता है, और इन प्रयोगों की वजह से अपने घर की शक्तियाँ बंधन में आने लगती हैं — क्योंकि दोनों एक ही कुल के लोग हैं — तो एक तरह से शक्ति का उसके सिद्ध पीठ पर, किसी सिद्ध स्थान पर, या किसी तंत्र पीठ पर आवाहन किया जाता है। उन्हें जो धार, पूजा, भोग आदि देना है वह दिया जाता है, और फिर इस बात के लिए उनसे विनती की जाती है। वे ज़ोर देकर कहते हैं कि उन्हें मजबूर नहीं किया जाता। विनती की जाती है।
सिद्ध पीठ पर प्रयोग करते समय कुल शक्ति से क्या माँगा जाता है?
ग़लत करने वाले के बजाय धर्म के साथ खड़े होने की विनती
वक्ता जो विनती बताते हैं वह यह है: आप धर्म का साथ दीजिए। अगर बड़ा भाई ज़मीन-जायदाद लूट रहा है, तो आप उसका साथ क्यों दे रही हैं? उसे भी धर्म के रास्ते पर लाइए। मैं आपसे यही विनती करता हूँ — इस तरफ़ रहिए। वे कहते हैं कि इसकी एक विधि और एक विधान है।
वक्ता कहते हैं कि उनसे इन शब्दों में विनती की जाती है: कृपया धर्म का साथ दीजिए। अगर बड़ा भाई ज़मीन-जायदाद लूट रहा है, तो आप उसका साथ क्यों दे रही हैं? उसे भी धर्म के रास्ते पर लाइए। मैं आपसे यही विनती करता हूँ — कि आप इनकी तरफ़ रहें। वे कहते हैं कि इस चीज़ की एक विधि है, और एक विधान है।
दो भाइयों की कुल शक्तियाँ कैसे अलग की जाती हैं?
दो पिंड, और विवाह में होने वाले जोड़ का उल्टा
अगर वे कहें कि वे दोनों तरफ़ रहेंगी पर आप अलगाव कर सकते हैं, तो वक्ता कहते हैं कि यह विवाह का उल्टा करके किया जाता है: शादी में क्रियाएँ दो परिवारों को जोड़ती हैं, पितरों का, देवी-देवताओं का और कुलदेवी-देवताओं का मिलन होता है। यहाँ दो पिंड बनाए जाते हैं; जैसे प्रेत पिंड और पितृ पिंड जोड़े जाते हैं, वैसे ही तंत्र के क्षेत्र में यह जुड़ाव काटकर अलग किया जाता है।
अगर वे कहें कि अपनी इच्छा से वे दोनों तरफ़ रहेंगी, पर आप अलगाव कर सकते हैं, तो वक्ता कहते हैं कि यह उसी तरह किया जाता है जैसा विवाह में दो परिवारों के साथ होता है। विवाह में वे क्रियाएँ होती हैं जिनमें दो परिवार जोड़े जाते हैं — पितरों का, देवी-देवताओं का, कुलदेवी और कुल देवताओं का मिलन होता है। ठीक उसी तरह यहाँ अलगाव किया जाता है। इसमें दो पिंड बनाए जाते हैं। जैसे प्रेत पिंड और पितरों का पिंड जोड़ा जाता है, तंत्र के क्षेत्र में इसे काटकर अलग करना होता है। वे जोड़ते हैं कि इसे काटना-अलग करना कहना ठीक नहीं; बेहतर है कहें कि अलगाव किया जाता है — आप अपना रखिए, और आप अपना रखिए।
संयुक्त परिवार से अलग होने वाला परिवार पुराने पूजा स्थान की मिट्टी उठाकर शुभ मुहूर्त में नए घर में स्थापित करता है
पुराने पूजा स्थान की मिट्टी नए घर में ले जाना
वक्ता बताते हैं कि गाँव में क्या होता है जब कोई परिवार बड़े संयुक्त परिवार से अलग होकर अपना घर बनाता है: वे पुराने घर के पूजा स्थान से ही मिट्टी उठाते हैं और शुभ मुहूर्त में ले जाकर नए घर में देवता का नया स्थान बनाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह चीज़ गाँव में जाकर देखिए। जब कोई परिवार बड़े परिवार से अलग होता है — परिवार बहुत बड़ा हो गया, और वे अलग होकर अपना अलग घर बनाते हैं — तो जहाँ उनकी पूजा का स्थान है, वहाँ से वे मिट्टी उठाते हैं, और शुभ मुहूर्त में ले जाकर अपने नए घर में देवता का नया स्थान बनाते हैं। वे कहते हैं, वहाँ यह चीज़ देखिए। वह गाँव का तरीका बन गया है, और तंत्र के क्षेत्र में यही चीज़ पूरी विधि-विधान से की जाती है। तभी प्रयोग करने पर वह उन लोगों पर असर देना शुरू करता है जो दुष्ट हैं और ग़लत कर रहे हैं।
इस जानकारी के बिना प्रत्यंगिरा प्रयोग करते रहें तो क्या होता है?
अस्त्र जप के ऊपर महाविपरीत, बगला और तारा प्रत्यंगिरा
जब इन बातों की जानकारी नहीं है और आप प्रत्यंगिरा, महाविपरीत प्रत्यंगिरा, बगला प्रत्यंगिरा, तारा प्रत्यंगिरा और अस्त्र मंत्रों का जप पर जप करते जाते हैं, तो वक्ता कहते हैं कि आपकी परेशानी और भी बढ़ेगी।
वक्ता कहते हैं कि जब इन विषयों की जानकारी नहीं है, और आप प्रत्यंगिरा करेंगे, महाविपरीत प्रत्यंगिरा करेंगे, बगला प्रत्यंगिरा करेंगे, तारा प्रत्यंगिरा करेंगे, और अस्त्र मंत्रों का जप पर जप करते रहेंगे — तो आपकी मुश्किल और भी बड़ी होगी।
तंत्र को दोधारी तलवार क्यों कहा जाता है?
बृहद् मंत्रों के प्रयोग पर लगी सीमा
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी कारण तंत्र को दोधारी तलवार कहा जाता है। वे कहते हैं कि बृहद् मंत्रों के प्रयोग के लिए हमेशा एक सीमा बताई जाती है — इतना करो, इस तरह करो — और तब समझ आने लगता है कि असर क्या है और क्या नहीं।
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए कहा जाता है, और यही कारण है कि कहा जाता है कि तंत्र दोधारी तलवार है। बृहद् मंत्रों के प्रयोग के लिए दोनों तरफ़ की सीमा हमेशा दी जाती है: इतना करो, इस तरह करो। तब समझ आने लगता है कि असर क्या है और क्या नहीं।
जब एक से ज़्यादा शक्तियों का प्रयोग करना पड़े तो क्या होता है?
भक्त प्रह्लाद और नरसिंह का आवाहन
वक्ता कहते हैं कि अगर एक शक्ति काम नहीं कर रही, तो दूसरी का प्रयोग लीजिए। वे भक्त प्रह्लाद से शुरू करते हैं: जब हिरण्यकश्यप ने अपना अत्याचार बहुत बढ़ा दिया, तो प्रह्लाद ने भक्ति भाव से जप, साधना और पूजा करते हुए वहाँ भगवान नरसिंह को प्रकट करवाया।
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा उस समय जो चर्चा चल रही थी वह यह थी कि एक से ज़्यादा शक्तियों का प्रयोग हो तो क्या होता है। अगर एक शक्ति काम नहीं कर रही, तो दूसरी शक्ति का प्रयोग लीजिए। वे भक्त प्रह्लाद के बारे में कही बात से शुरू करते हैं — साथ में बताते हैं कि एक ही दिन तीन-चार शक्तियों की जयंती थी। पहले क्या हुआ: जब हिरण्यकश्यप ने अपना अत्याचार बहुत बढ़ा दिया, तब भक्ति भाव से जप, साधना और पूजा करते हुए — एक तरह से यह भक्त प्रह्लाद का भक्ति भाव था — वहाँ भगवान नरसिंह प्रकट हुए। वे कहते हैं, इसे अपने जीवन से जोड़िए: आपके शत्रु हैं और उनका पूरा नाश करवाना है, तो आप ऐसी शक्ति का आवाहन करते हैं जिससे शत्रु नष्ट हों। आपने नरसिंह का आवाहन किया।
क्या नरसिंह सौम्य शक्ति हैं?
परम वैष्णव शक्ति जो फिर भी महा उग्र हैं
वक्ता कहते हैं कि नरसिंह परम वैष्णव शक्ति होते हुए भी उनकी उग्रता देखिए — उन्होंने खून से स्नान किया और हिरण्यकश्यप की आँतें माला बनाकर गले में पहनीं, इतना क्रोध था उन्हें। वे पूछते हैं, क्या आपको लगता है कि वे सौम्य और शांत शक्ति हैं? वे उग्र नरसिंह हैं, महा उग्र शक्ति।
वक्ता कहते हैं कि नरसिंह के आवाहन की वजह से — क्योंकि नरसिंह परम वैष्णव शक्ति होते हुए भी इतनी उग्रता दिखाते हैं: उन्होंने खून से स्नान किया, और हिरण्यकश्यप की आँतें माला के रूप में गले में पहनीं, उस पर इतना क्रोध था उन्हें। तो वे पूछते हैं, क्या आपको लगता है कि वे सौम्य और शांत शक्ति हैं? वे उग्र नरसिंह हैं, महा उग्र शक्ति। और उनकी शांति उस तरह नहीं हुई जैसे आम तौर पर बताया जाता है।
तंत्र के अनुसार नरसिंह असल में शांत कैसे हुए?
सर्वेश्वर भैरव, प्रत्यंगिरा, छिन्नमस्तिका और गंडभेरुंड
वक्ता कहते हैं कि विष्णु पुराण में आप पढ़ते हैं कि भक्त प्रह्लाद ने स्तुति की और नरसिंह शांत हो गए; तंत्र के क्षेत्र में सच्चाई कुछ अलग है। नरसिंह अवतार से जुड़ी जिन और शक्तियों का प्राकट्य हुआ वे हैं सर्वेश्वर भैरव, भगवती प्रत्यंगिरा और छिन्नमस्तिका, और गंडभेरुंड जैसे रूप धारण किए गए।
वक्ता कहते हैं कि विष्णु पुराण में पढ़िए कि भक्त प्रह्लाद ने स्तुति की और वे शांत हो गए। तंत्र के क्षेत्र में सच्चाई कुछ अलग है। बाकी जिन शक्तियों का प्राकट्य हुआ वे नरसिंह अवतार से जुड़ी हैं — भले वे पहले से तय रही हों, पर किसी तरह यह उसका मौका बना, जिसमें सर्वेश्वर भैरव, भगवती प्रत्यंगिरा और छिन्नमस्तिका सबका अवतरण हुआ, और गंडभेरुंड जैसे रूप धारण किए गए। वे यह वर्णन पुराण की कथा के बजाय तंत्र के क्षेत्र का बताते हैं।
प्रयोग को समेटना जानने का नियम क्या है?
उपसंहार — और उसे न जानने का ब्रह्महत्या जैसा दोष
वक्ता कहते हैं कि अगर शत्रु के नाश के लिए शक्ति का आवाहन करने के बाद आपको अपना प्रयोग शांत करना नहीं आता, तो आपसे बड़ा दोषी कोई नहीं। अगर आप किसी पर मारण विद्या चलाना जानते हैं, तो उसे निष्क्रिय करने की विधि भी जाननी होगी; अगर आप उपसंहार की विधि नहीं जानते, तो आपको बहुत बड़ा दोष लगता है, ब्रह्महत्या के बराबर दोष।
जब भक्त प्रह्लाद ने स्तुति की, और आपने अपने शत्रु के नाश के लिए नरसिंह का आवाहन किया, और उन्होंने उसका नाश कर दिया — तो वक्ता पूछते हैं, उसके बाद क्या? अगर उसके बाद आपको अपना प्रयोग शांत करना नहीं आता, तो आपसे बड़ा दोषी कोई नहीं। वे आगे कहते हैं, इसीलिए कहा जाता है: भाई, अगर आप तंत्र का प्रयोग करना जानते हैं, अगर आप किसी पर मारण प्रयोग करना जानते हैं, तो उसे निष्क्रिय करने की विधि भी आपको जाननी चाहिए। अगर आप उपसंहार की विधि नहीं जानते, तो आपको बहुत बड़ा दोष लगता है — ब्रह्महत्या के बराबर दोष। नरसिंह का आवाहन किया है, तो उन्हें शांत करने की प्रक्रिया भी आपको जाननी होगी।
जब प्रह्लाद की स्तुति से नरसिंह शांत नहीं हुए तो क्या हुआ?
सर्वेश्वर रूप में सदाशिव और गंडभेरुंड रूप में विष्णु
वक्ता कहते हैं कि जब भक्त प्रह्लाद से नरसिंह शांत नहीं हुए, तो भगवान सदाशिव ने सर्वेश्वर अवतार लिया; सर्वेश्वर अवतार के बाद भगवान विष्णु ने गंडभेरुंड अवतार लिया। तब भी दोनों में युद्ध चला, क्योंकि दोनों शक्तियाँ बहुत तेज़ और बहुत ऊर्जा से भरी थीं।
वक्ता कहते हैं कि जब भक्त प्रह्लाद से वे शांत नहीं हुए, तब भगवान सदाशिव ने सर्वेश्वर अवतार लिया। सर्वेश्वर अवतार के बाद भगवान विष्णु ने गंडभेरुंड अवतार लिया। उस समय भी दोनों में युद्ध चला। दोनों की शक्तियाँ परम थीं — यानी बहुत तेज़ चलने वाली, बहुत ऊर्जा से भरी।
शत्रु के नाश के लिए बुलाई गई शक्ति शांत नहीं हुई, तो दूसरी शक्ति का प्रयोग करना पड़ा
एक शक्ति शांत न हो तो दूसरी का प्रयोग करना होता है
वक्ता कहते हैं, यह देखिए: आपने शत्रु के नाश के लिए एक शक्ति बुलाई, और जब वह शांत नहीं हुई तो दूसरी शक्ति का प्रयोग करना पड़ा। आप यह नहीं कह सकते कि आप तंत्र के क्षेत्र में हैं इसलिए उसी शक्ति की सेवा करके ही उसे शांत करेंगे — जब वह शांत नहीं होगी, तो दूसरी शक्ति का प्रयोग करना पड़ेगा।
वक्ता कहते हैं, यानी देखिए: आप शत्रु के नाश के लिए एक शक्ति बुलाते हैं, और जब वह शांत नहीं हुई, तो दूसरी शक्ति का प्रयोग करना पड़ा। आप यह नहीं कह सकते कि आप तंत्र के क्षेत्र में हैं और उसी शक्ति की सेवा करके ही उसे शांत करेंगे। जब वह शांत नहीं होगी, तो दूसरी शक्ति का प्रयोग करना पड़ेगा। जब दूसरी शक्ति का प्रयोग हुआ, तो उन्होंने अपना रूप बदला। जब सर्वेश्वर का प्रयोग हुआ, तो उन्होंने अपना रूप बदलकर गंडभेरुंड अवतार लिया।
नरसिंह और गंडभेरुंड अपने मूल रूप में कैसे लौटे?
प्रत्यंगिरा, और दोनों का अपने मूल रूप में लौटना
वक्ता कहते हैं कि जब वह शक्ति भी शांत नहीं हुई, तो भगवती प्रत्यंगिरा रूप में प्रकट हुईं। प्रत्यंगिरा रूप के बेहद विस्फोटक असर से दोनों अपने मूल रूप में आ गए; दोनों के बीच एक तरह का समझौता हुआ, और फिर सारी शक्तियाँ शांत हो गईं।
जब वह शक्ति भी शांत नहीं हुई, तब भगवती महाप्रत्यंगिरा रूप में प्रकट हुईं। और प्रत्यंगिरा रूप के महा — यानी, जैसा वे कहते हैं, बेहद विस्फोटक — असर से दोनों वहाँ अपने मूल रूप में आ गए। वहाँ दोनों के बीच एक तरह का समझौता हुआ। फिर सारी शक्तियाँ शांत हो गईं।
क्या एक ही प्रयोग आप पर किए गए सारे तंत्र एक बार में काट सकता है?
देव कोटि को भी कई प्रयोग लगे, तो मनुष्य एक की उम्मीद नहीं कर सकता
वक्ता पूछते हैं कि जब देव स्तर पर इतने प्रयोग हो रहे हैं, तो आप मनुष्य होकर कैसे सोच सकते हैं कि आप बस एक शक्ति का प्रयोग करेंगे और एक ही कोशिश में, लाखों ख़र्च करके, अपने ऊपर किए गए सारे तंत्र काट देंगे और फिर बहुत सुखी जीवन जिएँगे?
वक्ता पूछते हैं कि जब देव कोटि में इतने प्रयोग हो रहे हैं, तो आप मनुष्य होकर कैसे सोच सकते हैं कि आप बस एक शक्ति का प्रयोग करेंगे, और एक ही कोशिश में, लाखों रुपये ख़र्च करके, अपने ख़िलाफ़ किए गए सारे तंत्र काट देंगे और फिर बहुत सुखी जीवन बिताएँगे? वे कहते हैं, यह गृहस्थ जीवन है, साधारण जीवन।
समस्या एक बार में हमेशा के लिए क्यों नहीं सुलझ सकती?
जब तक शत्रु जीवित है, वह तंत्र करता रहेगा
वक्ता कहते हैं कि जब तक शत्रु जीवित है, वह तंत्र करेगा। आज अपने सारे प्रयोग कटवा लीजिए; यह भी जान लीजिए कि कोई तांत्रिक पूरी ज़िंदगी आपके लिए खड़ा होकर जप नहीं करेगा। आपने एक बार, किसी समय, पैसा ख़र्च किया, और कोई भी एक हद तक ही साथ देता है।
वक्ता कहते हैं कि जब तक शत्रु जीवित है, वह तंत्र करेगा। आज अपने सारे प्रयोग कटवा लीजिए — और यह भी जान लीजिए कि कोई तांत्रिक पूरी ज़िंदगी आपके लिए खड़ा होकर जप नहीं करता रहेगा। आपने एक बार, किसी समय, पैसा ख़र्च किया; कोई भी एक समय तक ही आपका साथ देगा।
सहारा आपके अनुष्ठान और पुण्य को मज़बूत कर सकता है, पर फिर आपको अपने बल पर खड़ा होना है
सहारा लीजिए, पर खुद सक्षम बनिए
वक्ता कहते हैं, हाँ, किसी ने आपके अनुष्ठानों और पुण्य को मज़बूत किया और पीछे से आपको खड़ा किया — पर उसके बाद आपको भी मज़बूती से खड़ा होना है। अगर जीवन भर मज़बूत रहना चाहते हैं, तो सहारा लेकर खुद सक्षम बनिए, और जिस पर भरोसा है उस पर पूरा भरोसा रखिए। कुछ भी एक ही कोशिश में नहीं होता।
वे कहते हैं, हाँ, किसी ने आपके अनुष्ठान मज़बूत किए, आपका पुण्य मज़बूत किया, पीछे से आपको खड़ा किया — पर उसके बाद आपको भी मज़बूती से खड़ा होना है। इसीलिए वे कहते हैं: अगर आप पूरी ज़िंदगी मज़बूत रहना चाहते हैं, तो सहारा लीजिए और खुद सक्षम बनिए, और जिस पर आपकी आस्था है, उस पर पूरी आस्था रखिए। कुछ भी कभी एक ही कोशिश में नहीं होगा।
निरंतरता का अर्थ है कवच और उसका अनुष्ठान दोहराते रहना और उससे जुड़ी देव शक्ति का हवन करवाना
कवच अनुष्ठान दोहराना, उसका हवन, और शक्ति पीठ पर श्रृंगार
वक्ता कहते हैं कि निरंतरता बनाकर आगे बढ़ना होता है: अगर आपने कोई कवच शुरू किया है, तो वह कवच दोहराते रहिए, उसका अनुष्ठान करते रहिए, उससे जुड़ी देव शक्ति का हवन करवाते रहिए — और अगर करना नहीं आता, तो उनका जो भी शक्ति पीठ हो वहाँ उनका श्रृंगार और पूजा करवाइए।
वक्ता कहते हैं कि इसे निरंतर बनाकर आगे बढ़ते रहना होता है। मान लीजिए आपने कोई कवच शुरू किया है — तो वह कवच बार-बार दोहराते रहिए, उसका अनुष्ठान करते रहिए, उससे जुड़ी देव शक्ति का हवन करवाते रहिए। अगर करना नहीं आता, तो उनका जो भी शक्ति पीठ हो, वहाँ उनका श्रृंगार और पूजा आदि करवाते रहिए। वे कहते हैं कि कृपा एक बार में तुरंत नहीं मिलती: अब तक आप कुछ भी नहीं कर रहे थे, आज आपने पूजा शुरू की, और आप तीन दिन में, ग्यारह दिन में कृपा चाहते हैं। ऐसा नहीं होगा। आपके पितर नाराज़ होंगे, शत्रु का अभिचार प्रयोग होगा, और आपने जान-बूझकर कई बार ग़लतियाँ की होंगी।
कलियुग में शुक्र और चंद्र के महाश्राप से लगभग हर किसी से आचरण के दोष होते हैं
कलियुग में शुक्र और चंद्र का महाश्राप
वक्ता कहते हैं कि कलियुग में आचरण से जुड़े दोष लगभग हर किसी से होते हैं। वे अपने चैनल और वेबसाइट पर पहले की एक पोस्ट बताते हैं, जिसका नाम है शुक्र और चंद्र का महाश्राप, और कहते हैं कि उसे पढ़कर साफ़ हो जाएगा कि दोष कैसे लगता है; वह दोष किसी न किसी कारण से लगभग हर घर में है।
वक्ता कहते हैं कि चरित्र से जुड़े दोष कलियुग में लगभग हर किसी से होते हैं। वे कहते हैं कि वे एक पोस्ट डालेंगे — पहले की एक बहुत अच्छी पोस्ट — जिसे लोगों को पढ़ना चाहिए: शुक्र और चंद्र का महाश्राप। वह चैनल पर है और वेबसाइट पर भी डाली गई है। पढ़िए, तो समझ आ जाएगा कि दोष कैसे लगता है। वे कहते हैं कि वह दोष किसी न किसी कारण से लगभग हर घर में है।
अनुष्ठान का शुरुआती समय कुछ भी देता क्यों नहीं लगता?
पहला जप पूरा पुराने दोष मिटाने में लगना
वक्ता कहते हैं कि उन दोषों का शमन इन्हीं मंत्र जपों से होता है, इसलिए जो अनुष्ठान आप शुरू करते हैं या कर चुके हैं, वे शुरू में पूरे के पूरे उन्हीं चीज़ों को हटाने में लग जाते हैं। पर आप सोचते हैं कि शत्रु ने अभिचार किया, उसे काट दिया, और काम ख़त्म।
वे कहते हैं कि उन दोषों का शमन इन सब मंत्रों के जप से होता है — जो मंत्र जप और अनुष्ठान आप शुरू करते हैं, या कहीं करवा चुके हैं। तो शुरू में वह सब उन्हीं चीज़ों को हटाने में चला जाता है। आप इस बीच सोचते हैं कि शत्रु ने अभिचार किया, उसे काट दिया, और काम हो गया।
ब्रह्म स्थान पर ब्रह्म बैठाने से अक्सर काम क्यों नहीं होता?
कारण बैठाने वाले की नहीं, अपनी ही ग़लती में होना
वक्ता कहते हैं कि बहुत से सुनने वाले जानते होंगे कि कितनी बार लोग ब्रह्म को ब्रह्म स्थान पर बैठाते हैं और काम बस नहीं होता। वे इसका कारण ढूँढते रहते हैं और कहते हैं कि जानकार ने ठीक से नहीं बैठाया; असली कारण कुछ और होता है, और उतनी गहराई में जाकर ही समझ आएगा कि आप खुद क्या ग़लती कर रहे हैं।
वे कहते हैं कि वे सच बता रहे हैं, जो असल है वह बता रहे हैं: लाइव सुनने वालों में बहुत से होंगे जो जानते हैं कि कितनी बार लोग ब्रह्म को ब्रह्म स्थान पर ले जाकर बैठाते हैं, और काम बस नहीं होता। वे इसका कारण ढूँढते रहते हैं और कहते हैं कि जानकार ने ठीक से नहीं बैठाया। इसके पीछे का कारण कुछ और है। जब आप उतना अंदर जाकर देखेंगे, तब ग़लती समझ आएगी — कि आप खुद क्या ग़लती कर रहे हैं।
गृहस्थ जीवन में धन की कमी का पहला उपाय क्या है?
अपने इष्ट का मीठे जल से अभिषेक
वक्ता कहते हैं कि पहली बात यह है कि आपके इष्ट जो भी हों — आप जिनकी भी सेवा-पूजा कर रहे हैं, जिनकी भी तंत्र साधना कर रहे हैं — महीने में एक बार, या कम से कम हर पक्ष में एक बार, उनका मीठे जल से अभिषेक ज़रूर करना चाहिए। आप जिस भी शक्ति की साधना कर रहे हैं, पहले उन्हें शांत और सौम्य करना सीखिए।
वक्ता कहते हैं कि तो जब गृहस्थ जीवन में धन अभाव है और उसे दूर करना है, तो पहली बात यह है। आपके इष्ट जो भी हों, आप जिनकी भी सेवा और पूजा कर रहे हैं, जिनकी भी तंत्र से जुड़ी साधना कर रहे हैं — महीने में एक बार, या कम से कम दोनों पक्षों में एक-एक बार, उनका मीठे जल से अभिषेक ज़रूर करना चाहिए। लक्ष्मी प्राप्ति के लिए भगवान नरसिंह का करते हैं तो वह कीजिए; भगवती का करते हैं तो वह कीजिए; महादेव की साधना कर रहे हैं तो वह कीजिए। आप जिस भी शक्ति की साधना कर रहे हैं, सबसे पहले उन्हें शांत और सौम्य करना सीखिए।
अभिषेक के जल में कौन-सी चीज़ें डाली जा सकती हैं, और किसके लिए?
भगवती और नारायण के लिए हरिद्रा ठीक, महादेव के लिए नहीं
अगर देवता को हरिद्रा चढ़ती है तो उसका प्रयोग किया जा सकता है — पर महादेव को हरिद्रा उस तरह नहीं चढ़ती, इसलिए उन्हें हरिद्रा मिले जल से स्नान नहीं कराएँगे, जबकि भगवती के रूपों को और भगवान नारायण को चढ़ा सकते हैं। जल में तरह-तरह की दिव्य सुगंधित चीज़ें मिलाकर एक दिन अभिषेक किया जाता है; एकादशी को कीजिए, पूर्णिमा को कीजिए, जैसी इच्छा हो।
वक्ता कहते हैं कि अगर उन्हें हरिद्रा चढ़ती है — जैसे महादेव को हरिद्रा उस तरह नहीं चढ़ती — तो उन्हें हरिद्रा मिले जल से स्नान नहीं कराएँगे; पर भगवती के रूपों को चढ़ा सकते हैं, और भगवान नारायण को चढ़ा सकते हैं। तो जल में तरह-तरह की दिव्य सुगंधित चीज़ें मिलाकर, एक दिन उससे उनका अभिषेक करना चाहिए। एकादशी को कीजिए, पूर्णिमा को कीजिए — अपनी जो इच्छा हो उसके अनुसार कीजिए।
इष्ट के धन अभिषेक में कौन-सा संकल्प लिया जाता है?
देवता की शांति और प्रसन्नता, और लक्ष्मी प्राप्ति के लिए
वक्ता कहते हैं कि इसमें संकल्प लीजिए — उनकी शांति के लिए, उनकी प्रसन्नता के लिए, और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए। आप कोई भी साधना कर रहे हों, लक्ष्मी के लिए सबसे पहले यही काम करना चाहिए।
वे कहते हैं कि इससे, इसमें संकल्प लीजिए — उनकी शांति के लिए, उनकी प्रसन्नता के लिए, और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए। आप कोई भी साधना कर रहे हों, लक्ष्मी के लिए सबसे पहले यही काम करना चाहिए।
दान किसे कभी नहीं देना चाहिए?
अपात्र को कभी दान नहीं
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि दान देते समय खास ध्यान रखना होता है। अपात्र को कभी भी, कभी भी दान न दें।
दूसरी बात यह है कि दान देते समय आपको खास ध्यान रखना है। वे कहते हैं, अपात्र को कभी दान न दें — कभी भी नहीं।
कुंडली की जानकारी न हो तो क्या दान करना चाहिए?
सोना, चाँदी या बड़ी नकदी के बजाय साधारण दान
दान देते समय ध्यान रखिए कि आप कौन-सी वस्तु दान कर रहे हैं; कुंडली की जानकारी हो तो उसके अनुसार दान कीजिए, और न हो तो साधारण दान कीजिए, विशेष दान नहीं। विशेष दान का मतलब है सोना दान करना, चाँदी दान करना, या सीधे नकद में बहुत बड़ी रकम दान करना — और अगर उसके बाद और बड़ा नुकसान हो, तो वहीं मुश्किल है।
वक्ता कहते हैं कि दान देते समय ध्यान रखिए कि आप कौन-सी वस्तु दान कर रहे हैं। कुंडली की जानकारी हो, तो उसके अनुसार दान कीजिए; वह जानकारी न हो, तो साधारण दान कीजिए और विशेष दान आदि मत कीजिए। वे समझाते हैं कि विशेष दान का मतलब है कि आप सोना दान कर रहे हैं, चाँदी दान कर रहे हैं, सीधे नकद में बहुत बड़ी रकम दान कर रहे हैं — और उसके बाद आपको और बड़ा नुकसान होता रहता है। वे कहते हैं, परेशानी वहीं है। ये सब बातें करने से पहले देखनी चाहिए।
अपने ही लाभेश की वस्तु दान करने से दान करने वाले पर मुश्किल आती है
अपने लाभेश की वस्तु का दान
वक्ता कहते हैं कि अगर शुक्र आपका लाभेश है, लाभ भाव में बैठा है, और आप वही चीज़ दान करते रहते हैं — यानी पैसा दान करते रहते हैं — तो कहीं न कहीं आपको इससे मुश्किल होगी।
वक्ता कहते हैं, जैसे अगर आपकी कुंडली में लाभेश — लाभ भाव का स्वामी — शुक्र है, और आप वही चीज़ दान करते रहते हैं, पैसा दान करते रहते हैं, तो कहीं न कहीं वहाँ आपको मुश्किल होगी।
किस तरह का दान धन अभाव को कम करता है?
सामग्री का दान — अनाज, कंबल, कपड़ा
वक्ता कहते हैं कि सामग्री का दान करना चाहिए — अनाज आदि, कंबल, या वस्त्र और कपड़े का दान। कुंडली के अनुसार दान करें तो अच्छा है, और उससे धन अभाव कम होता है।
वे कहते हैं कि इससे जुड़ी सामग्रियों का दान करना चाहिए — कि आप अनाज आदि का दान कर रहे हैं, या कंबल, या वस्त्रों का, कपड़े का दान कर रहे हैं। कुंडली के अनुसार दान करें, तो अच्छा है; उससे धन अभाव कम होता है। वे कहते हैं, इन विषयों को देखना चाहिए।
जो मंत्र पहले ही असर दिखा चुका है, उसे फिर-फिर चलाना क्या हानिकारक है?
जागृत मंत्र का बार-बार प्रयोग दुरुपयोग कहलाता है
वक्ता कहते हैं कि मंत्र का बार-बार प्रयोग तो प्रयोग भी नहीं कहलाता — उसे दुरुपयोग कहना चाहिए। एक बार आपने मंत्र का प्रयोग किया और समझ गए कि वह जागृत है और पूरा असर देता है, तो उसे बार-बार प्रयोग करने से परेशानी होती है, और उससे भी धन अभाव होता है।
मंत्र का बार-बार प्रयोग करना — और वे कहते हैं, यह प्रयोग भी नहीं: इसे दुरुपयोग कहना चाहिए। एक बार आपने मंत्र का प्रयोग कर लिया और आपको साफ़ हो गया कि मंत्र जागृत है और पूरा असर देने वाला है, तो ऐसी स्थिति में अगर आप मंत्र का बार-बार प्रयोग कर रहे हैं, तो उससे भी मुश्किल होती है, और उससे भी धन अभाव होता है।
अन्न और धन की कमी का रोज़ का सबसे बड़ा कारण क्या है?
जो खाना खाते हैं उसका भोग न लगाना
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद सबसे प्रमुख बात यह आती है: आप जो भी खाते-पीते हैं, अगर उसका भोग नहीं लगाते, तो अन्न की कमी और लक्ष्मी की कमी होती है।
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद सबसे प्रमुख बात आती है। आप जो भी खाते-पीते हैं — अगर उसका भोग नहीं लगाते, तो वह अन्न की कमी है, लक्ष्मी की कमी है।
रोज़ का भोग कैसे लगाना चाहिए?
दिन में एक बार इष्ट के आगे साफ़, ताज़ा बना खाना
वक्ता कहते हैं कि दिन में कम से कम एक बार, आप जो भी खाना खा रहे हैं — पूरी सफ़ाई से बना, रात का रखा हुआ नहीं — उसका भोग अपने इष्ट और आराध्य के आगे ज़रूर लगाना और उन्हें अर्पित करना चाहिए, ताकि वे तृप्त हों और आपके अन्न में बढ़ोतरी हो।
वे कहते हैं कि दिन में कम से कम एक बार, अपने इष्ट और आराध्य के आगे, आप जो भी खाना खा रहे हैं — पूरी सफ़ाई से बना खाना, रात का रखा हुआ नहीं — उसका भोग उन्हें ज़रूर लगाना चाहिए, उन्हें अर्पित करना चाहिए, ताकि वे तृप्त हों और आपके अन्न में बढ़ोतरी हो। वे कहते हैं कि इन सब विषयों को ध्यान में रखकर फिर आपको अपनी साधना करनी चाहिए।
क्या हर देवता का कोई रूप पैसे की परेशानी दूर करता है?
सबसे बड़े गृहस्थ, सबसे बड़े वैरागी और सबसे धनी सदाशिव
वक्ता कहते हैं कि आप जिस भी शक्ति की साधना करें, उनका एक रूप ज़रूर होगा जो धन से जुड़ी हर मुश्किल दूर करने में मदद करे — उनका कोई स्तोत्र, कोई मंत्र, कोई रूप होगा। वे भगवान शिव का उदाहरण देते हैं: वे सबसे बड़े गृहस्थ भी हैं और सबसे बड़े वैरागी भी, और सबसे धनी भी।
वक्ता कहते हैं कि आप जिस भी शक्ति की साधना करें, उनका एक रूप ज़रूर होगा जो धन से जुड़ी हर मुश्किल दूर करने में आपकी मदद करेगा। उनका कोई स्तोत्र होगा, कोई मंत्र, कोई रूप। खुद भगवान शिव को लीजिए: उन्हें देखिए — वे सबसे बड़े गृहस्थ हैं और सबसे बड़े वैरागी भी, दोनों वे ही हैं, और सबसे धनी भी वे ही हैं। तो अगर आप सदाशिव की उपासना कर रहे हैं और आपको पैसे से जुड़ी परेशानी है, तो आपको शिववास देखकर खुद गन्ने के रस से अभिषेक करना चाहिए।
दुर्गा उपासक के लिए धन का अभिषेक क्या है?
तंत्रोक्त देवी सूक्तम् या चौथे अध्याय के साथ अष्टमी का अभिषेक
वक्ता कहते हैं कि अगर आप भगवती दुर्गा की साधना और उपासना करते हैं, तो अष्टमी तिथि के दिन या तो तंत्रोक्त देवी सूक्तम् का पाठ करते हुए, या चौथे अध्याय का पाठ करते हुए उनका अभिषेक कीजिए। उनका अभिषेक भी आपको सुगंधित जल आदि से करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप भगवती दुर्गा की साधना और उपासना करते हैं, तो अष्टमी तिथि के दिन — चाहे तंत्रोक्त देवी सूक्तम् का पाठ करते हुए उनका अभिषेक करें, या चौथे अध्याय का पाठ करते हुए उनका अभिषेक करें — उनका अभिषेक भी आपको सुगंधित जल आदि से करना चाहिए।
अपने आराध्य का श्रृंगार क्यों करवाना चाहिए?
दिवाली या पंचमी पर आराध्य का श्रृंगार
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा दिवाली के समय या पंचमी के समय किसी मंदिर में अपने आराध्य का श्रृंगार करवाना चाहिए। कहा जाता है कि जब आप अपने आराध्य का श्रृंगार करते हैं, तो वे आपके जीवन का श्रृंगार करते हैं; श्रृंगार करवाने से बहुत से दोषों का शमन होता है।
वे कहते हैं कि इसके अलावा, खास तौर पर मंदिरों आदि में, दीपावली के समय या पंचमी के समय, आपको अपने आराध्य का श्रृंगार करवाना चाहिए। कहा जाता है कि जब आप अपने आराध्य का श्रृंगार करते हैं, तब वे आपके जीवन का श्रृंगार करते हैं। श्रृंगार करवाने से बहुत से दोषों का शमन होता है। इसलिए समय-समय पर अपने आराध्य का, अपने इष्ट का श्रृंगार भी करवाते रहना चाहिए।
आपके अपने ग़लत कामों को आपसे बेहतर कोई नहीं जान सकता
अपने ग़लत कामों को आपसे बेहतर कोई नहीं जानता
एक और बात आती है, चरित्र से जुड़ी। वक्ता कहते हैं कि जब हम अपना जीवन जाँचते हैं, तो देखते हैं कि हमने कितने ग़लत काम किए हैं — और इस बारे में आपसे ज़्यादा कोई नहीं जान सकता।
वे कहते हैं कि अब एक और बात आती है, चरित्र से जुड़ी। जब हम अपने जीवन को पलटकर देखते और जाँचते हैं, तो दिखता है कि हमने ऐसे कितने ग़लत काम किए हैं। इस बारे में आपसे ज़्यादा आपके बारे में कोई नहीं जान सकता।
क्या विवाह से पहले के संबंध चरित्र दोष हैं?
विवाह से पहले के संबंध, पच्चीस या अट्ठाईस की उम्र तक
वक्ता कहते हैं कि पच्चीस की उम्र तक, या पच्चीस से अट्ठाईस तक, व्यक्ति बहुत घूमता-फिरता है और बहुत से लोगों से संबंध बनाता है — पुरुष स्त्रियों से, स्त्रियाँ पुरुषों से — और आजकल ये सामान्य बातें हैं। इससे मंत्रों का जो दोष बनता है, उसकी वे आगे चर्चा करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि अब इस वजह से मंत्रों का जो भी दोष है — पच्चीस की उम्र तक, जब तक आपकी उम्र पच्चीस, अट्ठाईस साल होती है, आप इधर-उधर बहुत घूमे हैं, आपने बहुत से लोगों से संबंध बनाए हैं: पुरुष हैं तो स्त्रियों से; स्त्री हैं तो पुरुषों से। वे कहते हैं, आजकल ये सामान्य बातें हैं।
जब प्रारब्ध पहले ही बन चुका हो तो मंत्र असर क्यों नहीं देता?
बन चुका प्रारब्ध भोगना ही पड़ता है
जब आपको जीवन का सच समझ आया और विवाह हुआ, और फिर परेशानियाँ शुरू हुईं, तो जो प्रारब्ध पहले ही बन चुका है वह भोगना पड़ता है — और उस समय मंत्र आपको अपना असर नहीं देगा। वक्ता कहते हैं कि आप अपना सच कभी नहीं बताएँगे, कोई नहीं बताता; पर जो बीत गया उसके सच और उसके प्रारब्ध को स्वीकार करना सीखिए।
जब आपको जीवन का सच समझ आया, जब विवाह हुआ, और उसके बाद आपके जीवन में परेशानियाँ आने लगीं — तो जो प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। पहले ही बन चुका है, वह भोगना पड़ता है। वक्ता कहते हैं कि उस समय मंत्र आपको अपना असर नहीं देगा। आप अपना सच कभी नहीं बताएँगे; कोई नहीं बताता, और यह अपनी जगह ठीक है, अपनी इज़्ज़त अपनी जगह है। पर जो बीत गया उसके सच को, उसकी सच्चाई को और उसके प्रारब्ध को भी स्वीकार करना सीखिए — और एक देव, एक शक्ति, एक मंत्र पर आस्था रखकर लंबे समय तक उसी पर टिके रहिए।
एक मंत्र कितने समय तक और कितने जप के साथ पकड़ना चाहिए?
एक मंत्र पर तीन साल, पाँच-पाँच लाख के पुरश्चरण के साथ
वक्ता बताते हैं कि कहा जाता है कि एक मंत्र की साधना कम से कम तीन साल करनी चाहिए। बीच में आप अलग-अलग रूपों की एक दिन या तीन दिन की साधना कर सकते हैं, पर एक मंत्र ऐसा होना चाहिए जिसमें आप दीक्षित हों, या जिसमें आपकी बहुत गहरी आस्था हो, जिसके आप पाँच-पाँच लाख के अनुष्ठान और पुरश्चरण करते रहें।
वक्ता बताते हैं कि कहा जाता है कि आपको एक मंत्र की साधना कम से कम तीन साल करनी चाहिए। बीच में आप अलग-अलग रूपों की एक दिन या तीन दिन की साधना और उपासना कर सकते हैं; पर एक मंत्र ऐसा होना चाहिए जिसमें आप दीक्षित हों, या जिसमें आपकी बहुत गहरी आस्था हो, जिसका आप पाँच लाख, पाँच लाख का अनुसरण, अनुष्ठान, पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। आदि करते रहें।
जब प्रारब्ध सच में कट जाता है तो क्या होता है?
जीवन की व्यथा का अंत
वक्ता कहते हैं कि तब प्रारब्ध सच्चे अर्थ में कटेगा; और जब वह कटेगा, तो आपके जीवन की पीड़ा भी ख़त्म हो जाएगी।
वे कहते हैं कि तब प्रारब्ध शब्द के सच्चे अर्थ में कटेगा। और जब वह कटेगा, तो आपके जीवन की व्यथा भी ख़त्म हो जाएगी।
कवच के अलावा कामाख्या का कौन-सा स्तोत्र पढ़ा जा सकता है?
कामाख्या के दूसरे स्तोत्र केवल विवाहित पुरुषों के लिए
जब पूछा गया कि कवच के अलावा कामाख्या माई का कौन-सा स्तोत्र पढ़ना चाहिए, तो वक्ता जवाब देते हैं कि उन्हें नहीं पता कि पूछने वाला स्त्री है या पुरुष, इसलिए नियम यह है: अगर आप पुरुष हैं, तो उनके दूसरे स्तोत्र तभी पढ़ें जब आप विवाहित हों। नहीं तो कवच पढ़ें, और उसके अलावा कुछ नहीं।
जब पूछा गया कि कवच को छोड़कर कामाख्या माई का कौन-सा स्तोत्र पढ़ना चाहिए, तो वक्ता जवाब देते हैं। अगर आप कामाख्या माई के किसी स्तोत्र का पाठ करना चाहते हैं, तो पहली बात यह है — और क्योंकि उन्हें नहीं पता कि पूछने वाला स्त्री है या पुरुष, वे इसे शर्त के साथ कहते हैं: अगर आप पुरुष हैं, तो उनके दूसरे स्तोत्रों का पाठ तभी करें जब आप विवाहित हों। नहीं तो कवच का पाठ कीजिए; उसके अलावा और कुछ नहीं करना चाहिए।
दुर्गा कवच कैसे जागृत किया जाता है?
चैनल पर दो विधियाँ — पूरा मंडल, या सबसे सरल रूप
दुर्गा कवच जागृत करने के सवाल पर वक्ता कहते हैं कि इस विषय पर चैनल पर दो वीडियो हैं — "दुर्गा कवच गृहस्थ तंत्र" खोजिए, दोनों आ जाएँगे। एक विधि में पूरा मंडल बनाकर बताया गया है कि इसे सिद्ध कैसे करना है; दूसरी सबसे सरल, सबसे आसान विधि है। किसी एक का पालन करके इस गुप्त नवरात्रि में इसे जागृत कीजिए।
दुर्गा कवच कैसे जागृत करें, इस सवाल पर वक्ता जवाब देते हैं कि इससे जुड़े दो वीडियो चैनल पर हैं। वे कहते हैं, "दुर्गा कवच गृहस्थ तंत्र" लिखिए — इतना खोजिए, दोनों वीडियो आ जाएँगे। एक विधि ऐसी है जिसमें पूरी मंडल विधि बनाई जाती है और बताया जाता है कि इसे सिद्ध कैसे करना है; दूसरी बिल्कुल सरल विधि है, एकदम आसान विधि। दोनों में से किसी एक का पालन करके इस गुप्त नवरात्रि में इसे जागृत कीजिए।
लड़की के जल्दी विवाह के लिए क्या उपाय है?
कात्यायनी, तुलसी, या तीन पक्ष तक पार्वती सप्ताक्षरी
लड़कियों के जल्दी विवाह के लिए उपाय या अनुष्ठान पूछे जाने पर वक्ता भगवती कात्यायनी, या भगवती तुलसी, या भगवती पार्वती से जुड़ी साधना बताते हैं। वे चैनल पर शिव जी के साथ दिए गए भगवती पार्वती के सप्ताक्षरी साधना विधान की ओर इशारा करते हैं, और कहते हैं कि वह अनुष्ठान कम से कम तीन पक्ष तक कीजिए।
जल्दी विवाह के लिए, लड़कियों के लिए, कोई उपाय या अनुष्ठान पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: भगवती कात्यायनी से जुड़ा कुछ, या भगवती तुलसी से जुड़ा, या भगवती पार्वती से जुड़ा। इस चैनल पर भगवती पार्वती का सप्ताक्षरी साधना विधान शिव जी के साथ दिया गया है। अगर आप उस विधान से उस मंत्र का जप करते हैं, तो यह अनुष्ठान कम से कम तीन पक्ष तक कीजिए, और आपका रास्ता बहुत जल्दी खुल जाएगा। वे जोड़ते हैं कि अगर कुंडली में उससे जुड़ा कोई दोष है, तो उसे जितनी जल्दी हो सके दूर करवाइए।
बटुक भैरव के रोज़ के दही-बड़े के भोग का क्या करना चाहिए?
भोग साधक स्वयं ग्रहण करे
जब पूछा गया कि बटुक भैरव जी के जप में रोज़ भोग लगाए गए दही-बड़े का क्या करें, तो वक्ता जवाब देते हैं कि बटुक भैरव जी को जो भी दही-बड़े का भोग लगता है, वह आपको खुद ग्रहण करना चाहिए — मज़े से खाइए।
जब पूछा गया कि बटुक भैरव जी के जप में रोज़ भोग लगाए गए दही-बड़े का क्या करना चाहिए, तो वक्ता जवाब देते हैं कि बटुक भैरव जी को जो भी दही-बड़े का भोग लगता है, वह आपको खुद ग्रहण करना चाहिए। वे कहते हैं, मज़े से खाइए।
भगवान नरसिंह की मूल शक्ति कौन हैं?
नरसिंही, आठ शक्तियाँ, और लक्ष्मी-नरसिंह की एक साथ पूजा
वक्ता जवाब देते हैं कि भगवान नरसिंह की मूल शक्ति नरसिंही ही कहलाती हैं। भगवान नरसिंह में और आगे जाएँ, तो उनकी आठ शक्तियों की बात होती है, और आठ तरह के नरसिंह रूप भी बताए गए हैं। जिन नरसिंह को हम आम तौर पर देखते हैं, उनकी पूजा लक्ष्मी-नरसिंह के रूप में साथ करनी चाहिए।
भगवान नरसिंह की मूल शक्ति कौन हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि भगवान नरसिंह की मूल शक्ति नरसिंही ही कहलाती हैं। वैसे भगवान नरसिंह में जाएँ, तो उनकी आठ शक्तियों की बात होती है। आठ शक्तियाँ हैं, और आठ तरह के नरसिंह रूप भी बताए गए हैं। जिन नरसिंह भगवान को हम आम तौर पर देखते हैं — लक्ष्मी-नरसिंह की पूजा साथ करनी चाहिए, और लक्ष्मी-नरसिंह को साथ लेकर चलना चाहिए।
लगातार पूजा के बाद भी मन उच्चाट क्यों हो जाता है?
केवल मंत्र जप काफ़ी नहीं — स्तोत्र गायन और तीर्थ यात्रा
वक्ता कहते हैं कि यह लगभग हर किसी के जीवन में आता है और सबके साथ होता है, और इसीलिए वे बार-बार कहते हैं कि अगर आप केवल मंत्र जप करेंगे तो परेशानी होगी। मंत्र जप के साथ स्तोत्र भी गाने चाहिए, और समय मिले और सामर्थ्य हो, तो तीर्थ यात्रा करनी चाहिए।
लगातार पूजा के बाद भी मन उच्चाट क्यों हो जाता है — क्या कुछ समय के लिए पूजा छोड़ देनी चाहिए क्योंकि कोई फल नहीं दिखता — इस सवाल पर वक्ता कहते हैं कि यह चीज़ लगभग हर किसी के जीवन में आती है और सबके साथ होती है। इसीलिए वे बार-बार कहते हैं: अगर आप केवल मंत्र जप आदि करेंगे, तो मुश्किल होगी। मंत्र जप के साथ स्तोत्रों का गायन भी करना चाहिए, और समय मिले और सामर्थ्य हो, तो तीर्थ यात्रा करनी चाहिए।
गिरनार जी जाने वाले साधकों का घर लौटने का मन नहीं करता
गिरनार में साधक जो घर लौटना नहीं चाहते
वे अपने साधक परिवार के साधकों — मनोज राज पुरोहित, प्रसाद क्षीरसागर, हितेश गोरी — का नाम लेते हैं, जिनका गिरनार जी जाने पर लौटने का मन नहीं करता। वहाँ से उनका संदेश आता है कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम यहीं रह जाएँ, घर-परिवार छोड़ दें, ये ज़िम्मेदारियाँ छोड़ दें। वे पूछते हैं, वहाँ उच्चाटन क्यों नहीं होता: यह तीर्थ क्षेत्र का असर है।
वक्ता कहते हैं कि हमारे साधक परिवार में मनोज राज पुरोहित जी, प्रसाद क्षीरसागर जी और हितेश गोरी जी ऐसे साधक हैं कि जब वे गिरनार जी जाते हैं, तो वहाँ से लौटने का उनका मन नहीं करता। वहाँ जाकर उनका संदेश आता है: क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम यहीं रह जाएँ, घर-परिवार छूट जाए, ये ज़िम्मेदारियाँ छूट जाएँ। वे पूछते हैं, वहाँ से उच्चाटन क्यों नहीं होता? यह तीर्थ क्षेत्र का असर है; यही तीर्थों की महिमा है।
गृहस्थ को कितनी बार तीर्थ यात्रा करनी चाहिए?
साल में कम से कम एक बार, ताकि उच्चाट जैसे दोष मिटें
वक्ता कहते हैं कि पूजा-पाठ करना बहुत अच्छा है, पर संभव हो तो साल में कम से कम एक बार तीर्थ यात्रा ज़रूर करनी चाहिए, जिससे उच्चाट जैसे दोष अपने आप ख़त्म हो जाते हैं।
वे कहते हैं कि तो पूजा और पाठ करना बहुत अच्छा है, पर संभव हो, तो साल में कम से कम एक बार तीर्थ यात्रा ज़रूर करनी चाहिए। उससे उच्चाट आदि ये दोष अपने आप ख़त्म हो जाते हैं।
क्या साधना का फल साधक के अपने अधिकार में है?
फल का हमारे अधिकार क्षेत्र में न होना
फल न मिलने की शिकायत पर वक्ता जवाब देते हैं कि फल मिल रहा है, पर वह चीज़ आपको अपने जीवन में सीधे दिखाई नहीं देती — और वे कहते हैं कि वह चीज़ हमारे अधिकार क्षेत्र में आती ही नहीं। फल हमारे अपने अधिकार में है ही नहीं।
वे कहते हैं कि दूसरी बात यह कि आपने कहा कोई फल नहीं मिलता। फल तो मिल रहा है, पर वह चीज़ आपको अपने जीवन में सीधे दिखाई नहीं दे रही; और वे कहते हैं कि वह चीज़ कहीं न कहीं हमारे अधिकार क्षेत्र में आती ही नहीं। फल हमारे अपने अधिकार में है ही नहीं। और अगर मान लें — अपने मन से पूछिए — कि आप कहते हैं मन ख़राब हो रहा है इसलिए पूजा-पाठ छोड़ रहे हैं: पर अगर छोड़ देंगे, तो समाधान क्या होगा?
दूसरे मूर्तिकार के पहले ही वार से वह पत्थर टूट गया जो पहले ही सौ वार झेल चुका था
वह पत्थर जो पहले ही सौ वार झेल चुका था
एक मूर्तिकार मूर्ति के लिए पत्थर निकालने एक बड़े पहाड़ पर गया और हथौड़े से मारता रहा, जब तक थककर यह कहकर चला नहीं गया कि पत्थर नहीं टूटेगा। दूसरा मूर्तिकार उसी पहाड़ पर, उसी जगह गया, और पहले ही वार में पत्थर का एक टुकड़ा टूटकर गिर गया।
वक्ता कहते हैं कि इस पर एक कहानी है जो वे बार-बार सुनाते हैं। एक मूर्तिकार था जिसे मूर्ति बनानी थी। वह एक बड़े पहाड़ पर गया और उस पहाड़ से पत्थर निकालने के लिए उसे तोड़ने को हथौड़े से मारने लगा। मारते-मारते वह थक गया और यह कहकर चला गया कि पत्थर नहीं टूटेगा। दूसरा मूर्तिकार उसी पहाड़ पर गया, और उसी जगह, और जैसे ही उसने एक वार किया, पत्थर का एक टुकड़ा टूटकर नीचे गिर गया। वे पूछते हैं, इससे आप क्या समझते हैं? क्या पहले मूर्तिकार के हथौड़े में ताकत नहीं थी, क्या उसमें कला की कमी थी, क्या उसे हथौड़ा चलाना नहीं आता था, क्या उसके हाथों में ताकत नहीं थी? ऐसा कुछ नहीं था। फ़र्क़ बस इतना था कि पहाड़ के पत्थर के जिस हिस्से पर उसने मारा था, वह पहले ही सौ से ज़्यादा वार झेल चुका था। उसे एक-दो वार और चाहिए थे; दूसरा आया, मारा, और वह निकल आया।
उच्चाटन में साधना ठीक तब छोड़ दी जाती है जब व्यक्ति पास पहुँच चुका था और कृपा मिलने वाली थी
कृपा आने से ठीक पहले साधना छोड़ देना
वक्ता कहते हैं कि मतलब यह है कि हो सकता है आप काफ़ी पास पहुँच गए थे, अब कृपा मिलने वाली थी — पर आप वहाँ उच्चाटित हो गए और छोड़ दिया। उच्चाटन एक साधारण बात है जो सबके साथ होती है।
वक्ता समझाते हैं कि यह कहने का मतलब यह है कि हो सकता है आप काफ़ी पास आ गए थे, अब आपको कृपा मिलनी थी — पर आप उस जगह उच्चाटित हो गए और उसे छोड़ दिया। तो उच्चाटित होना एक साधारण बात है; यह सबके साथ होता है।
साधना छोड़ने के बजाय उच्चाटन में क्या करना चाहिए?
संख्या घटाकर एक माला या ग्यारह बार कीजिए, पर कभी न तोड़िए
वक्ता कहते हैं कि गृहस्थ जीवन में उच्चाटन साधारण है और इसके कई कारण हैं, इसलिए इसकी चिंता न करें और अपना पूजा-पाठ न छोड़ें। आप इसे घटा सकते हैं: अगर ग्यारह माला जप करते थे और उच्चाट हो रहा है, तो कुछ समय एक माला कीजिए। अगर एक माला का भी मन न हो, तो उस मंत्र का ग्यारह बार जप कीजिए — पर उसमें बने रहिए, ताकि निरंतरता न टूटे।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप गृहस्थ जीवन में हैं और अपनी रोज़ी-रोटी चला रहे हैं, तो उच्चाटन आदि के कई कारण हैं, और वे आप पर पड़ते हैं। इसलिए इसकी चिंता मत कीजिए, और हमारा पूजा-पाठ मत छोड़िए। आप इसे कम कर सकते हैं — मान लीजिए आप ग्यारह माला जप करते थे और उच्चाट हो रहा है: तो ठीक है, बस एक माला कीजिए, कुछ समय तक एक माला कीजिए। कम से कम निरंतरता बनी रहेगी, ताकि वह टूटे नहीं। इतना ध्यान रखिए। और अगर एक माला जप का भी मन न हो, तो उस मंत्र का ग्यारह बार जप कीजिए। उसमें बने रहिए। फिर जैसे ही आप कहीं कोई वीडियो सुनेंगे, कोई कहानी पढ़ेंगे, आपको फिर प्रेरणा मिलेगी और आप फिर शुरू कर देंगे।
कथाएँ तमाशे की तरह करवाई जाती हैं, ऐसे हाव-भाव के साथ जिनका अनुष्ठान से कोई लेना-देना नहीं
तमाशा बनी कथा, और भगवती का सद्बुद्धि न देना
वक्ता कहते हैं कि शायद भगवती की इच्छा नहीं है, और वे किसी को ऐसी सद्बुद्धि नहीं देतीं। करवाने वाले कथाएँ करवाते हैं — तरह-तरह के हाव-भाव, व्यासपीठ पर स्त्रियाँ बैठी हैं, किसी चीज़ से कोई लेना-देना नहीं, बस मज़े; भागवत कथा चलती है और कुछ नहीं होता। वे दोहराते हैं कि अत्याचारों का प्रतिकार पूरी तरह संभव है; करवाने वाला और करने वाला दोनों सही तरह के होने चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि शायद भगवती की इच्छा नहीं है; वे किसी को ऐसी सद्बुद्धि नहीं देतीं। जो करवाने वाले हैं वे कथाएँ करवाते हैं — तरह-तरह के भाव और हाव-भाव, व्यासपीठ पर स्त्रियाँ बैठी हैं, किसी चीज़ से कोई लेना-देना नहीं, बस मज़े लेते हैं; भागवत कथा, कुछ हो रहा हो या नहीं, बस चलती रहती है। वे दोहराते हैं कि अत्याचारों का प्रतिकार पूरी तरह संभव है। करवाने वाला उस तरह का होना चाहिए, और करने वाले उस तरह के जानकार होने चाहिए, जो इसे उठाएँ और पूरा करें। यह बिल्कुल होता है।
क्या पीढ़ियों में दोहराता आठवें भाव का योग कुछ बताता है?
तीन पीढ़ियों में आठवें भाव में केतु-मंगल, राहु-मंगल और शनि-मंगल
एक श्रोता बताते हैं कि उनके पिता की कुंभ लग्न की कुंडली में आठवें भाव में केतु और मंगल हैं, उनकी अपनी सिंह लग्न की कुंडली में आठवें में राहु और मंगल, और उनके बेटे की कुंडली में आठवें में शनि और मंगल। वक्ता जवाब देते हैं कि यह बिल्कुल संयोग नहीं है; लग्न कुछ भी हो, पर आठवें में केतु-मंगल, फिर राहु-मंगल, फिर शनि-मंगल संयोग नहीं है।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनके पिता की कुंडली में कुंभ लग्न के साथ आठवें भाव में केतु और मंगल हैं; उनकी अपनी कुंडली में सिंह लग्न के साथ आठवें भाव में राहु और मंगल; और उनके बेटे की कुंडली में आठवें भाव में शनि और मंगल। वक्ता जवाब देते हैं कि यह चीज़ बिल्कुल संयोग नहीं है। लग्न कुछ भी हो, पर आठवें भाव में केतु-मंगल, फिर राहु-मंगल, और फिर शनि-मंगल — वे पूछने वाले से कहते हैं कि तीनों कुंडलियाँ एक बार टेलीग्राम पर भेजें, ताकि उनका ठीक से विश्लेषण हो और फिर चर्चा हो। वे कहते हैं कि इसके पीछे आठवें भाव से जुड़ा एक कारण है; वे इस पर अलग से चर्चा करेंगे और हो सके तो विश्लेषण करके वीडियो बनाएँगे, जिससे बहुत से लोगों को मदद मिलेगी।
क्या एक भाई की कुंडली में मिला दोष बाकियों में भी दिखता है?
भाई-बहनों की कुंडलियों में दोहराता पितृ दोष
वक्ता ज्योतिष का अभ्यास या विश्लेषण करने वालों से कहते हैं कि अगर घर में कुंडलियाँ सही बन रही हैं, और तीन-चार भाई हैं, तो अगर उनमें से किसी एक की कुंडली में पितृ दोष निकलता है, तो बाकियों की कुंडली में भी लगभग निकलता है — भले वह युति के बजाय दृष्टि से बना हो।
वक्ता ज्योतिष पर अभ्यास करने वालों या कुंडलियों का विश्लेषण करने वालों से कहते हैं कि आप एक और चीज़ देख सकते हैं। अगर घर में कुंडली सही बन रही है, और तीन-चार भाई हैं, तो अगर उनमें से किसी एक की कुंडली में पितृ दोष निकलता है, तो बाकियों की कुंडली में भी पितृ दोष लगभग निकलता है — भले वह युति के बजाय दृष्टि से बना हो। पर बनता ज़रूर है।
तांत्रिक अक्सर पैसे में कमज़ोर क्यों होते हैं?
शुरू में धन जमा होना, फिर तांत्रिक या उसकी अगली पीढ़ी का बर्बाद होना
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने जितने तांत्रिक देखे सब पैसे में कमज़ोर हैं, उनके पास शक्तियाँ हैं पर धन के स्रोत बहुत कम, और उन्हें हमेशा दूसरों से मदद लेनी पड़ती है। वक्ता इसे बहुत सही अवलोकन कहते हैं, और जोड़ते हैं कि आपने ऐसे तांत्रिक भी देखे होंगे जो शुरू में बहुत तरक्की करते हैं, ढेरों पैसा आता है, जब तक ऐसा समय नहीं आता कि वे, या उनकी अगली पीढ़ी, पूरी तरह बर्बाद हो जाती है।
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्होंने जितने तांत्रिक देखे, सब पैसे के मामले में कमज़ोर हैं; उनके पास शक्तियाँ हैं, पर धन के स्रोत बहुत कम हैं, और उन्हें हमेशा दूसरों से मदद लेनी पड़ती है। वक्ता जवाब देते हैं कि आपने बहुत सही अवलोकन किया है। वे कहते हैं कि तंत्र विद्या से जुड़े मामलों में आपने यह भी देखा होगा: कोई तांत्रिक शुरू में बहुत तरक्की करता है, उसके पास पैसे का ढेर लग जाता है — और एक समय आता है जब वह पूरी तरह, या उसके बाद आने वाली अगली पीढ़ी, पूरी तरह बर्बाद हो जाती है। इसके पीछे का कारण और यह कैसे होता है, इसके लिए वे ग्रामीण भगतवाल प्लेलिस्ट के वीडियो बताते हैं, एक पूरी प्लेलिस्ट जिसमें हर बात समझाई गई है; उसे सुनिए, समझ आ जाएगा कि ऐसा क्यों होता है। और यह चीज़ केवल तांत्रिकों के साथ नहीं, सबके साथ हो सकती है — तांत्रिकों के लिए कहने का कारण यह है कि वहाँ स्थिति और कारण कुछ और बन जाते हैं, जो उन्होंने समझाने की कोशिश की है। वे जोड़ते हैं कि भक्ति भाव से सेवा-पूजा करने वालों की भी भगवान परीक्षा लेते हैं; जीवन में मुश्किलें आती ही हैं।
एक माला पर कितने मंत्र किए जा सकते हैं?
इष्ट मंत्र के लिए एक माला, बाकी सब मंत्रों के लिए दूसरी
वक्ता कहते हैं कि इष्ट मंत्र के जप के लिए, जो भी मुख्य इष्ट हों, एक माला रखनी चाहिए। अगर आप भगवती काली की साधना करते हैं, तो उनका मंत्र जप एक माला पर कीजिए — नौमुखी रुद्राक्ष माला, साधारण रुद्राक्ष माला, साधारण काली हकीक माला, या जो भी माला आप रखते हों। गणपति, भैरव और शिव मंत्र दूसरी माला पर करने चाहिए।
एक माला पर कितने मंत्र किए जा सकते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि इष्ट मंत्र का जप एक माला पर रखना चाहिए, जो भी मुख्य इष्ट हों। मान लीजिए आप भगवती काली की साधना करते हैं: तो भगवती काली का मंत्र जप एक माला पर कीजिए — जैसे नौमुखी रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । माला, या साधारण रुद्राक्ष माला, या साधारण काली हकीक माला, या जो भी माला आप रखते हों। उस पर आप एक जप करेंगे। दूसरा, जो भी गणपति मंत्र है, जो भी भैरव जी का मंत्र, जो भी शिव जी का मंत्र — उनका जप दूसरी माला पर कीजिए।
देवी खड्गमाला स्तोत्र कैसे सिद्ध किया जाता है?
स्वयंसिद्ध चक्र विद्या, 1100 पाठ, हवन नहीं
वक्ता कहते हैं कि खड्गमाला स्तोत्र अपने आप में बहुत अचूक, दिव्य और तुरंत असर देने वाला है, और स्वयंसिद्ध है। उसकी फलश्रुति के अनुसार आप सिद्धि का प्रयास कर सकते हैं: कम से कम 1100 पाठ करने चाहिए, और क्योंकि खड्गमाला अपने आप में एक तरह की चक्र विद्या है, बहुत से नियमों का पालन करना होता है। इसका हवन नहीं करना चाहिए।
देवी खड्गमाला स्तोत्र का सिद्धि अनुष्ठान कितने दिनों में और कितने पाठों से होता है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि खड्गमाला स्तोत्र अपने आप में बहुत अचूक, दिव्य और तुरंत असर देने वाला है। और यह स्वयंसिद्ध है। उसकी फलश्रुति के अनुसार, अगर आप चाहें, तो सिद्धि का प्रयास कर सकते हैं। कम से कम 1100 पाठ करने चाहिए; और क्योंकि खड्गमाला अपने आप में एक तरह की चक्र विद्या है, पाठ करते समय बहुत से नियम मानने होते हैं। इसका अनुष्ठान सारे नियमों का पालन करते हुए ही कीजिए। गुप्त नवरात्रि में, हो सके तो, रोज़ इसके 108 पाठ कीजिए। वे कहते हैं कि इसका हवन नहीं करना चाहिए — साधारण तरीके से।
नवार्ण मंत्र का हवनात्मक प्रयोग करने के पाँच साल बाद एक श्रोता को लक्ष्मी की भारी हानि हुई
ऐसे प्रयोग के पाँच साल बाद एक श्रोता की लक्ष्मी हानि
एक श्रोता लिखते हैं कि लगभग पाँच साल पहले उन्होंने नवार्ण मंत्र का हवनात्मक प्रयोग किया और उन्हें लक्ष्मी की भारी हानि हुई। वक्ता जवाब देते हैं कि अगर वे यहाँ नवार्ण मंत्र को मना करें, तो दस लोग तुरंत लाइव में उन्हें गाली देने लगेंगे कि नवार्ण जप को मना कैसे किया।
दूसरे तंत्र चैनल नवार्ण और पंचाक्षरी मंत्रों में अतिरिक्त बीज ठूँस देते हैं
मंत्रों में डाले गए बीज, और नवार्ण से लोगों के बर्बाद होने पर आने वाला वीडियो
वक्ता कहते हैं कि तंत्र के वीडियो बनाने वाले दूसरे चैनलों ने नवार्ण मंत्र, पंचाक्षरी मंत्र, हर मंत्र ठूँस दिया है — करो, अच्छे से करो, ऐसे करो, ॐ लगाओ, दोनों तरफ़ ॐ लगाओ, बीच में यह बीज डालो, श्रीं बीज डालो। वे कभी नहीं कहते कि नवार्ण जप ऐसे या वैसे करो, क्योंकि नवार्ण अपने आप में महा-विस्फोटक है और बहुत ऊँचे दर्जे तक विज्ञान के अनुरूप है।
वक्ता कहते हैं, पर तंत्र से जुड़े वीडियो बनाने वाले दूसरे चैनलों को देखिए: नवार्ण मंत्र, पंचाक्षरी मंत्र, हर मंत्र उन्होंने ठूँस दिया है — आप करो, अच्छे से करो, इस तरह करो, ॐ लगाकर करो, दोनों तरफ़ ॐ लगाओ। बीच में यह बीज डालो, श्रीं बीज डालो, ऐसे करो, वैसे करो; इस एक अक्षर का जप ऐसे करो, वैसे करो। पर वे कभी क्यों नहीं कहते कि नवार्ण मंत्र का जप करो, या ऐसे करो या वैसे करो? क्योंकि नवार्ण अपने आप में महा-विस्फोटक है और विज्ञान के हिसाब से सबसे ऊँचे दर्जे का मंत्र है। वे कहते हैं कि इसके लिए भी इस हफ़्ते अलग से वीडियो डाले जाएँगे — एक वीडियो कि नवार्ण मंत्र के जप से लोग कैसे बर्बाद होते हैं। वे चेताते हैं कि वह बहुत नकारात्मक वीडियो होगा; दिल पर पत्थर रखकर सुनिए, पर सुनिए ज़रूर।
क्या नवार्ण या सिद्ध कुंजिका बिना दीक्षा के करनी चाहिए?
प्रणव का अधिकार, और उसके बिना देवताओं की हानि
वक्ता कहते हैं कि उनके हिसाब से सिद्ध कुंजिका और नवार्ण जप बिना दीक्षा के नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं कि सुनने वाले सहमत या असहमत होने को आज़ाद हैं; वे अपने अनुभव के अनुसार अपनी राय रख रहे हैं। अगर करें तो सीमा में करें — वे मना नहीं कर रहे — पर अगर आप दीक्षित न होते हुए और प्रणव के अधिकारी न होते हुए असीमित जप करते हैं, और प्रणव लगाकर जप करते हैं, तो देवताओं की हानि होती है।
मंत्रों की गुप्तता लोकप्रियता के लिए नहीं तोड़ी जाएगी, जैसा असुर कुल चलाने वालों ने किया
लोकप्रियता के लिए मंत्रों की गुप्तता तोड़ने से इनकार
वक्ता कहते हैं कि कलियुग है: कोई भी कह देगा कि ऐसा नहीं है। वे एक व्यक्ति को याद करते हैं जो अपना अलग कुल, असुर कुल चला रहा था, जो सारे बीज ठूँसकर एक सौ एक मंत्र देता था, यह कहकर कि पैसा कमाएँगे। वे कहते हैं कि अगर वे चाहें, चैनल पर 30,000 लोगों के साथ, ऐसे वीडियो बनाए जा सकते हैं और व्यूज़ आराम से बढ़ेंगे — पर उनका मन इसे नहीं मानता।
वक्ता कहते हैं कि कलियुग है; कोई भी कुछ भी कहेगा — कि ऐसा नहीं है, हम फलाँ को जानते हैं। एक सज्जन अपना अलग कुल चला रहे थे, असुर कुल चला रहे थे, जो सारे बीज ठूँसकर एक सौ एक मंत्र देते थे, यह कहकर कि पैसा कमाएँगे। वे कहते हैं कि अगर हम चाहें, तो अपने चैनल पर — आप लोग 30,000 हो ही चुके हैं — ऐसे वीडियो एक के बाद एक डाले जा सकते हैं, और भगवती की कृपा से अभी तक उनका मन उस तरह ख़राब नहीं हुआ। ऐसे वीडियो, ऐसे मंत्रों के, डाले जा सकते हैं कि व्यूज़ आराम से बढ़ें। पर क्या करें, मन नहीं मानता; लगता है कि यहाँ कम से कम पाँच लोगों का तो फिर भी भला हो रहा है। उस तरह के ग़लत वीडियो डालना, मंत्रों की गुप्तता तोड़ना, लोगों को ग़लत तरीके से प्रेरणा देना, उन्हें छूट देना कि बिना नियम के कर लो, कोई बात नहीं, भगवती कृपा करेंगी, वे माँ हैं — ऐसी चीज़ें करवाने से, वे कहते हैं, बाद में आपकी बर्बादी आएगी, और किसी दिन उनकी भी आएगी। इसीलिए वे कहते हैं कि वे ग़लत नहीं बोल सकते।
कितना नवार्ण जप ठीक है?
एक-आध माला, सुबह-शाम 108 माला नहीं
वक्ता कहते हैं कि वे अपनी तरफ़ से कोशिश करते हैं: नवार्ण कीजिए, एक माला कीजिए, एक-दो माला कीजिए — इतना करना चाहिए। पर आप बैठकर रोज़ इसकी 108 माला करते हैं, सुबह 108 और शाम 108। क्या आप जानते भी हैं कि नवार्ण जप में मंडल पूजन कैसे होता है, और कितनी शक्तियाँ आएँगी? कम से कम यह तो जानते हैं कि इसमें नवग्रह और नौ शक्तियाँ समाई हैं।
जब केवल एक लोटा जल और पाँच किशमिश चढ़ाई जाएँ, तो क्या भाव काफ़ी है?
एक लोटा जल, पाँच किशमिश, दो लौंग और एक कपूर
वक्ता कहते हैं कि आप एक लोटा जल, गिनकर पाँच किशमिश, दो लौंग, एक कपूर रखते हैं — और फिर कहते हैं, वे प्रसन्न कैसे नहीं होंगे, काम कैसे नहीं होगा? फिर पाँच किशमिश में आप कहते हैं, मेरा भाव इतना है। वे पूछते हैं, अगर भाव है, तो इतना सब क्यों कर रहे हैं? भाव से हाथ जोड़िए और स्तुति गाइए।
और आप एक लोटा जल, गिनकर पाँच किशमिश, दो लौंग, एक कपूर रखते हैं — और उसके बाद कहेंगे, वे प्रसन्न कैसे नहीं होंगे, काम कैसे नहीं होगा। तो भाई, पाँच किशमिश में अब आप कहेंगे, मेरा भाव इतना है। हमारा भाव है। तो भाई, अगर भाव है, तो इतना सब क्यों कर रहे हैं? भाव से हाथ जोड़िए और स्तुति गाइए। वे कहते हैं कि अगर बहुत बड़ा संकट है, तो दुर्गा आपदुद्धार स्तोत्र का पाठ कीजिए; "नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे" की स्तुति कीजिए। उससे भगवती आपके जो भी संकट हैं, दूर करेंगी। सबको बुलाकर फिर यह क्यों कहना कि भाव है? तब वे भाव स्वीकार नहीं करेंगी — वे दूसरे तरीके से स्वीकार करेंगी, और तब आपकी लक्ष्मी की हानि होगी, शरीर की हानि होगी; फिर आप कहेंगे, मैंने नवार्ण जप किया और मेरे साथ यह हुआ। भाव है तो भाव के अनुसार चलिए; और साधना कर रहे हैं तो साधना के अनुसार चलिए।
क्या कुंडली से इष्ट जाना जा सकता है?
पाँचवाँ या नौवाँ भाव, और स्वामियों के बीच उलझन
वक्ता जवाब देते हैं, बिल्कुल: पाँचवें या नौवें भाव के अनुसार आप अपना इष्ट चुनकर साधना और पूजा कर सकते हैं। पर वे जोड़ते हैं कि लग्नेश भी ज़रूरी है, पंचमेश भी, भाग्येश भी, लाभेश भी — इसलिए किसकी पूजा करें, इस पर उलझन की स्थिति बन जाती है।
कुंडली के आधार पर इष्ट देवता जाना जा सकता है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: बिल्कुल — पाँचवें या नौवें भाव के अनुसार आप अपना इष्ट चुनकर साधना और पूजा कर सकते हैं। पर वे कहते हैं, देखिए, लग्नेश भी ज़रूरी है, पंचमेश भी ज़रूरी है, भाग्येश भी ज़रूरी है, लाभेश भी ज़रूरी है — तो यह उलझन की स्थिति बन जाती है। वे कहते हैं कि आपको सच में लगेगा कि पता नहीं किसकी पूजा करें।
केवल पंचमेश के पीछे चलने में क्या जोखिम है?
आठवें भाव में बैठा पंचमेश, और ग़लत पहना रत्न
लोग मुख्य रूप से कहते हैं कि पंचमेश को हमेशा प्रसन्न रखना चाहिए और उसकी सेवा-पूजा करनी चाहिए। पर वक्ता कहते हैं, मान लीजिए आपकी कुंडली में पंचमेश आठवें भाव में जाकर बैठ गया है: अब आप उसकी सेवा-पूजा कर रहे हैं, और अगर ग़लती से उससे जुड़ा रत्न पहन लिया, तो कहीं न कहीं वे आपको कष्ट ज़रूर देंगे।
मुख्य रूप से लोग कहते हैं कि पंचमेश को हमेशा प्रसन्न रखना चाहिए और उसकी सेवा और पूजा करनी चाहिए। पर मान लीजिए कुंडली के अनुसार आपका पंचमेश आठवें भाव में जाकर बैठ गया है। अब आप उसकी सेवा और पूजा कर रहे हैं, और कहीं उससे जुड़ा रत्न ग़लती से पहन लिया है — तो कहीं न कहीं वे आपको कष्ट ज़रूर देंगे। इसलिए वे कहते हैं कि अगर आप कुंडली के अनुसार देख रहे हैं, तो किसके साथ आगे बढ़ना है, इसका सही निर्णय कुंडली का विश्लेषण करके ही लेना चाहिए।
अपना इष्ट तय करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
ग्रहों से आगे देवताओं तक जाना, और सबसे अच्छा नक्षत्र से
वक्ता कहते हैं कि ग्रहों को छोड़कर देव शक्तियों तक जाना चाहिए: पाँचवें भाव में जो ग्रह बैठा है, उससे जुड़े देवता की सेवा-पूजा कीजिए। वे खुद कहते हैं कि नक्षत्र से चलना सबसे अच्छा है — अपने नक्षत्र के अधिपति देवता की सेवा और पूजा कीजिए।
वे कहते हैं कि ग्रहों को छोड़कर देव शक्तियों तक जाना चाहिए। पाँचवें भाव में जो भी ग्रह बैठा है, उससे जुड़े देवता की सेवा और पूजा कीजिए। और वे खुद कहते हैं कि नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। के अनुसार करना सबसे अच्छा है। अपने नक्षत्र के अधिपति देवता की सेवा और पूजा कीजिए। जैसे अगर आप पुष्य नक्षत्र में जन्मे हैं, तो भगवान नारायण से जुड़ी। वे जोड़ते हैं कि नारायण अकेले नहीं हैं: नारायण से जुड़ी महाविद्याओं का कुल स्त्री कुल है। अगर आपको लगता है कि आप किसी देवी शक्ति की उपासना करना चाहते हैं, तो उनकी कीजिए — चाहें तो भगवती नारायणी की उपासना कर सकते हैं, भगवान नरसिंह की उपासना कर सकते हैं। आप बिल्कुल इस तरह कर सकते हैं। तो हाँ, इष्ट जाना जा सकता है।
मन शिव मंत्र और सप्तशती के बीच क्यों डोलता रहता है?
महामाया के ज्ञानियों को भी खींच लेने पर सप्तशती का श्लोक
वक्ता कहते हैं कि इसके पीछे कोई कारण है ही नहीं, और सप्तशती का श्लोक कहते हैं: "ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥" — वे महामाया हैं जो ज्ञानियों के मन को भी बलपूर्वक खींचकर माया में डाल देती हैं। ज्ञानी आसानी से माया में नहीं पड़ता, पर वे उसे बलपूर्वक खींच लेती हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि कभी मन शिव मंत्र का जप करना चाहता है, फिर सप्तशती पाठ करना चाहता है, जिससे वह एक साधना में टिकता नहीं — ऐसा क्यों। वक्ता जवाब देते हैं कि जान लीजिए इसके पीछे कोई कारण है ही नहीं, और यह श्लोक कहते हैं: ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥ वे महामाया हैं जो ज्ञानियों के मन को भी बलपूर्वक खींचकर माया में डाल देती हैं। ज्ञानी जल्दी माया में नहीं पड़ता, पर वे उसे बलपूर्वक खींच लेती हैं — ध्यान रखिए कि यह दुर्गा सप्तशती में वहाँ लिखा है, जहाँ ब्रह्मा जी यह बता रहे हैं और वहाँ मार्कण्डेय मुनि ने जो कहा है।
शास्त्र क्या कहता है
Mahāmāyā forcibly drags even the minds of the wise into delusion.
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महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत् । ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ॥ ५५ ॥
यह हरि की महामाया हैं, और इन्हीं से सारा जगत् मोहित होता है। वे भगवती देवी ज्ञानियों के चित्त को भी
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति । तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् ॥ ५६ ॥
बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वही इस सम्पूर्ण चर-अचर जगत् को रचती हैं।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
अपने इष्ट से कैसे कहें कि वे आपको मोहित न करें?
अपने इष्ट से मोहित न करने की विनती
वक्ता कहते हैं कि इस माया से पार पाने के लिए अपने इष्ट से कहिए, जो भी वे हों। अगर भगवान सदाशिव आपके इष्ट हैं, तो उन्हीं से कहिए: प्रभु, कृपया मुझे मोहित न करें, मैया को मना करने को कहिए। वहाँ थोड़ा बच्चे जैसा भाव लाइए, और उनसे कहिए।
वक्ता पूछते हैं कि अब इस माया के पार जाने के लिए आपको क्या करना होगा। आपके इष्ट जो भी हों — अगर भगवान सदाशिव आपके इष्ट हैं, तो उन्हीं से कहिए: प्रभु, कृपया मुझे मोहित न करें, मैया को मना करने को कहिए। वहाँ थोड़ा बच्चे जैसा भाव लाइए, और उनसे कहिए।
गृहस्थ को देवता का जप अकेले करना चाहिए या जोड़े में?
शिव के साथ भगवती की एक माला, और युगल नाम जप
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि आप जिसकी भी साधना करें, अगर शिव की सौ या दस माला करते हैं, तो भगवती की एक माला ज़रूर होनी चाहिए। दोनों होने चाहिए; गृहस्थ जीवन में कभी अकेले नहीं करते — जोड़े में कीजिए। खास तौर पर नाम जप तो जोड़े में ही ज़रूर करना चाहिए: सीताराम, राधे श्याम, शिव-पार्वती, शिव-शक्ति।
वे कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि आप जिसकी भी साधना करें — अगर शिव की कर रहे हैं, और मान लीजिए सौ माला जप या दस माला जप, तो भगवती की एक माला ज़रूर होनी चाहिए। दोनों होने चाहिए। कभी अकेले नहीं करते; आप गृहस्थ जीवन में हैं — जोड़े में कीजिए। अगर भगवती की कर रहे हैं, तो शिव जी की एक माला कीजिए। भगवती की दस माला करें तो एक माला; और अगर भगवती की केवल एक माला कर रहे हैं, तो उसमें शिव जी का जो भी मंत्र आपको मिला है, या जो भी आप करते हैं, या फिर किसी युगल मंत्र का जप करना चाहिए। नाम जप तो ज़रूर जोड़े में करना चाहिए — चाहे सीताराम करें, या राधे श्याम करें, या शिव-पार्वती का नाम जप, या शिव-शक्ति का नाम जप।
भटकते मन को एक साधना में कैसे टिकाएँ?
सप्तशती पाठ को अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा या अमावस्या से बाँधना
वक्ता कहते हैं कि जब मन एक साधना में न टिके, तो नियम बनाइए। अगर आप शिव मंत्र का जप कर रहे हैं, तो शिव मंत्र का जप जारी रखिए; सप्तशती पाठ अष्टमी या चतुर्दशी को कीजिए, या पूर्णिमा या अमावस्या को। इससे आप नियम में बँधेंगे और आपकी स्थिति ठीक हो जाएगी।
दूसरी बात यह है कि जब मन एक साधना में स्थिर न रहे तो क्या करें: वक्ता कहते हैं, नियम बनाइए। जैसे अगर आप शिव मंत्र का जप कर रहे हैं, तो शिव मंत्र का जप जारी रखिए; और दुर्गा सप्तशती का पाठ अष्टमी को या चतुर्दशी को कीजिए, या पूर्णिमा को या अमावस्या को कीजिए। इससे यह होगा कि हम नियम में बँध जाएँगे, और फिर आपकी स्थिति बिल्कुल ठीक हो जाएगी। पर अगर आप इसे नियम में नहीं बाँधेंगे, तो इसी तरह मन ऊपर-नीचे होता रहेगा — कभी आप सप्तशती करेंगे, कभी शिव मंत्र।
क्या रावण की कुलदेवी निकुंभला और प्रत्यंगिरा एक ही हैं?
निकुंभला, भद्रकाली और रावण के कुल की बीस भुजाओं वाली देवी
माता निकुंभला क्या माँ प्रत्यंगिरा हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं, हाँ: भगवती प्रत्यंगिरा को कहीं-कहीं भद्रकाली रूप माना गया है, और निकुंभला रूप भी माना गया है। फिर वे बताते हैं कि तंत्र ग्रंथ रावण के कुल में स्थापित रूप का क्या वर्णन करते हैं।
रावण की कुलदेवी निकुंभला हैं, तो क्या माता निकुंभला माँ महाप्रत्यंगिरा हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: बिल्कुल। भगवती प्रत्यंगिरा को कुछ जगहों पर भद्रकाली रूप माना गया है, और निकुंभला रूप भी माना गया है। वे कहते हैं कि अगर आप तंत्र क्षेत्र में और अंदर जाएँ, तो यहाँ दो बातें आएँगी। रावण के कुल में भगवती का जो रूप स्थापित था, उसका वर्णन तंत्र ग्रंथों में और तंत्र जगत में बीस भुजाओं वाली देवी के रूप में है, जो अपनी योगिनियों के साथ, अपनी सारी योगिनियों के साथ बैठी रहीं — जिन्होंने कहा था कि जब तुम मेरा दूसरा रूप यहाँ लाओगे, तो मैं यह जगह छोड़कर चली जाऊँगी। तो जब भगवती सीता ने वहाँ पैर रखा, तो भगवती उस मंदिर को छोड़कर अपनी योगिनियों के साथ लंका से चली गईं। वे बताते हैं कि ऐसा कहा जाता है: जो तंत्रों में वर्णित है, या जो गुरुओं के मुख से सुना गया है, वही वे बता रहे हैं।
निकुंभला और प्रत्यंगिरा के वर्णन अलग क्यों हैं?
चार भुजाओं वाला ध्यान मंत्र, और एक गुप्तता जिसे वे नहीं खोलेंगे
वक्ता कहते हैं कि भगवती निकुंभला का रूप वहाँ वैसा ही माना जाता है; पर रूप के भेद में जाएँ, तो भगवती प्रत्यंगिरा का साधारण ध्यान मंत्र उन्हें चार भुजाओं वाली बताता है। इसलिए यहाँ थोड़ा मतभेद, या कहें एक गुप्तता, रखी गई है कि असली कौन-सा है — यह शायद गुरु परंपरा के भीतर ही सही से पता चल सकता है। वे कहते हैं कि वे भी इसे पूरा खोलना नहीं चाहेंगे।
वक्ता कहते हैं कि तो भगवती निकुंभला का रूप वहाँ ऐसा माना जाता है; और अगर आप रूप के भेद में जाएँ, तो आगे — भगवती प्रत्यंगिरा का ध्यान मंत्र, जो साधारण ध्यान मंत्र आता है, उन्हें चार भुजाओं वाली बताता है। तो यहाँ थोड़ा मतभेद, या कहें एक गुप्तता, रखी गई है कि असली कौन-सा है। वे कहते हैं कि यह शायद गुरु परंपरा के भीतर ही ठीक से पता चल सकता है। वे जोड़ते हैं कि वे भी इसे पूरा खोलना नहीं चाहेंगे।
अगर घर का मुखिया पाप में डूबा है, तो क्या उसके बेटों को फल भोगना पड़ता है?
विरासत में मिला कष्ट, और बेटे का अपना कर्म जो उसे उस कुल में लाया
वक्ता जवाब देते हैं कि यह बिल्कुल होता है: अगर घर का मुख्य व्यक्ति पाप कर्मों में डूबा है, तो जो भी बेटे हैं, जो भी आगे का कुल है, उन्हें भोगना पड़ता है। पर वे बेटे वह फल अपने कर्म के अनुसार भी भोग रहे होंगे।
पाप कर्म में डूबे घर के मुखिया के बेटों को भी उसका फल भोगना पड़ता है या नहीं, और साधना मार्ग में आने पर पूर्वजों के कौन-से ऋण चुकाने होते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता इसे बहुत अच्छा सवाल कहते हैं और कहते हैं कि यह बिल्कुल होता है। अगर घर का मुख्य व्यक्ति पाप कर्मों में डूबा है, तो जो भी बेटे हैं, जो भी आगे का कुल है, उन्हें भोगना पड़ता है। पर वे जो भी फल भोग रहे हैं, उसके जो भी बेटे हैं, वे अपने कर्म के अनुसार भी भोग रहे होंगे। भले हम कहें कि बेटा वह भोग रहा है जो उसके पिता ने किया — और यह सच भी है, लोग कहते हैं कि जैसा आज करोगे, आने वाला वंश भुगतेगा — फिर भी जो वंश भुगतने आया है, उसने भी कोई ऐसा कर्म किया था कि उसे इस कुल में जन्म लेना पड़ा, इस संदेश के साथ: अपना प्रारब्ध काटो।
राजनीति में जाने के लिए किस देवी को प्रसन्न करना चाहिए?
मुख्य रूप से बगलामुखी, हालाँकि सब देवियाँ सर्वसमर्थ हैं
राजनीति में जाने के लिए किस देवी को प्रसन्न करें, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: भगवती बगलामुखी का कीजिए। वे जोड़ते हैं कि आप किसी का भी कर सकते हैं, क्योंकि सब देवियाँ सर्वसमर्थ हैं, पर मुख्य रूप से भगवती बगला का कीजिए।
राजनीति में जाने के लिए किस देवी को प्रसन्न करना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: भगवती बगलामुखी का कीजिए। वे कहते हैं कि आप किसी का भी कर सकते हैं; सब देवियाँ सर्वसमर्थ हैं। पर मुख्य रूप से भगवती बगला का कीजिए।
भगवान की मानसिक पूजा का फल क्या है?
मानसिक षोडशोपचार पूजन, सबसे ऊँची भक्ति
वक्ता जवाब देते हैं कि यह सबसे उत्तम फल है। हम शरीर से कितने भी साफ़ हो जाएँ, अगर मन साफ़ नहीं और उसमें विचार गंदे हैं, तो ठीक से कोई फल नहीं मिलता। अगर आप मन से भक्ति करते हैं, चौबीस घंटे भगवान मन में बैठे हैं, जब चाहें मन में उनका षोडशोपचार पूजन करते हैं, उनके मंत्र गाते हैं, मन के भीतर ही उनका अभिषेक करते हैं — तो वही सबसे अच्छा है।
ईश्वर की मानसिक भक्ति का फल क्या है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि यह सबसे उत्तम फल है। मानसिक इसलिए, क्योंकि हम शरीर से, बाहर से कितने भी साफ़ हो जाएँ, अगर हमारा मन साफ़ नहीं, अगर मन के विचार गंदे हैं, तो ठीक से कोई फल नहीं मिलता। अगर आप ईश्वर की मानसिक भक्ति करते हैं, चौबीस घंटे ईश्वर आपके मन में बैठे हैं, और मन में ही, जब चाहें, आप उनका षोडशोपचार पूजन कर रहे हैं, उनके मंत्र गा रहे हैं, मन में ही उनका अभिषेक कर रहे हैं — तो वही सबसे अच्छा है। आप इसे हमेशा कर सकते हैं; यह सबसे ऊँचे दर्जे की भक्ति है। वे कहते हैं कि इसके फल का वर्णन नहीं किया जा सकता। सबको यह तो करना ही चाहिए।
मंत्र जप के साथ होने वाले ध्यान के अलावा क्या अलग से ध्यान ज़रूरी है?
त्राटक एक वैकल्पिक जोड़
वक्ता कहते हैं कि अगर आपके पास समय है, तो अलग से त्राटक आदि कर सकते हैं; नहीं तो उनके हिसाब से यह ज़रूरी नहीं है।
मंत्र जप के साथ होने वाले ध्यान के अलावा क्या अलग से ध्यान ज़रूरी है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि अगर समय है तो अलग से त्राटक आदि कर सकते हैं। नहीं तो, उनके हिसाब से, यह ज़रूरी नहीं है।
असली सियार सिंगी और असली हत्था जोड़ी कैसे पहचानें?
जागृत वस्तुएँ जिनके पूरे नियम घर में रखने से पहले जानने चाहिए
वक्ता कहते हैं कि हत्था जोड़ी और सियार सिंगी अपने आप में जागृत वस्तु हैं। इन्हें उनकी पूरी जानकारी लेकर ही घर में रखना चाहिए। वे पूछने वाले से ग्रुप में संदेश भेजने को कहते हैं और कहते हैं कि वे हत्था जोड़ी और सियार सिंगी के नियमों पर अलग से एक पूरा वीडियो बनाएँगे — पाँच मिनट का वीडियो, जिसमें वे इन्हें दिखाने की भी कोशिश करेंगे।
असली सियार सिंगी और असली हत्था जोड़ी कैसे पहचानें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि हत्था जोड़ी और सियार सिंगी अपने आप में जागृत वस्तु हैं। इनकी पूरी जानकारी लेनी चाहिए और तभी इन्हें घर में रखना चाहिए। वे श्रोता से कहते हैं कि हत्था जोड़ी और सियार सिंगी के पूरे नियमों के बारे में एक बार ग्रुप में संदेश भेजें; वे इस पूरे विषय पर अलग वीडियो बनाएँगे, पाँच मिनट का वीडियो, जिसमें वे इन्हें दिखाने की भी कोशिश करेंगे, और समझाएँगे कि कैसे और क्या करना चाहिए।
गृहस्थ को सात्विक प्याला लेना चाहिए या अघोर प्याला?
गृहस्थ के लिए सात्विक; दूसरा केवल गृहस्थ जीवन छोड़ने पर
सात्विक प्याला लें या अघोर प्याला, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि अगर आप गृहस्थ हैं, तो सात्विक लीजिए। अगर आप गृहस्थ जीवन छोड़ रहे हैं, तो जो चाहें लेने के लिए आज़ाद हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि उन्हें सात्विक प्याला लेना चाहिए या अघोर प्याला, और वक्ता से बताने को कहते हैं। वक्ता जवाब देते हैं कि अगर आप गृहस्थ हैं, तो सात्विक लीजिए। अगर आप गृहस्थ जीवन छोड़ रहे हैं, तो आप उसे लेने के लिए आज़ाद हैं।
हनुमान जी का श्रृंगार कैसे किया जाता है?
शनि और मंगलवार को चोला श्रृंगार, नीचे से ऊपर की ओर
वक्ता कहते हैं कि हनुमान जी का मुख्य श्रृंगार चोला श्रृंगार है, जो शनिवार और मंगलवार को करना चाहिए। चोला नीचे से ऊपर की ओर चढ़ाया जाता है: पान के पत्ते पर केसरिया सिंदूर — जिसे भखरा सिंदूर, या नारंगी रंग का हनुमान सिंदूर कहते हैं — चमेली के तेल या देसी घी में भिगोया जाता है, और फिर राम जी या सीताराम जी का नाम लेकर चोला नीचे से ऊपर चढ़ाया जाता है।
हनुमान जी का श्रृंगार कैसे करें, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि उनका मुख्य श्रृंगार चोला श्रृंगार है, जो शनि और मंगलवार को करना चाहिए। श्रृंगार करने की विधि यह है कि चोला नीचे से ऊपर की ओर चढ़ाया जाता है। पान के पत्ते पर केसरिया सिंदूर — वह सिंदूर जिसे भखरा सिंदूर कहते हैं, या नारंगी रंग का सिंदूर जिसे हनुमान सिंदूर कहते हैं — चमेली के तेल में या देसी घी में मिलाकर भिगोया जाता है। उसके बाद राम जी का नाम लेकर, या सीताराम जी का नाम लेकर, नीचे से ऊपर अच्छे से श्रृंगार किया जाता है, और हनुमान जी को चोला चढ़ाया जाता है।
हनुमान जी के श्रृंगार में चोले के बाद क्या चढ़ाया जाता है?
ग्यारह पान के पत्तों या बरगद के पत्ते पर लिखा राम नाम
वक्ता कहते हैं कि चोले के बाद पान के पत्तों पर राम नाम लिखना चाहिए — कम से कम ग्यारह पान के पत्ते — और उनकी माला बनाकर, या बरगद के पत्ते पर लिखकर, हनुमान जी के गले में पहनाना चाहिए। उसके बाद चाहें तो केले के फल या केले के पत्तों से श्रृंगार कर सकते हैं; ये सब चीज़ें हनुमान जी को बहुत प्रिय हैं।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद पान के पत्तों पर राम नाम लिखिए — कम से कम ग्यारह पान के पत्तों पर — और उसकी माला बनाइए, या फिर बरगद के पत्ते पर राम नाम लिखकर हनुमान जी के गले में पहनाइए। यह मुख्य श्रृंगार है। उसके बाद, चाहें तो केले के फल से श्रृंगार कर सकते हैं, और केले के पत्ते से श्रृंगार कर सकते हैं। वे कहते हैं कि ये सब चीज़ें हनुमान जी को बहुत ही प्रिय हैं।
क्या धन के लिए कोई ऐसा स्तोत्र है जिसका केवल पाठ काफ़ी हो, हवन के बिना?
अपने इष्ट का सहस्रनाम
धन के लिए ऐसा स्तोत्र पूछे जाने पर जिसका केवल पाठ काफ़ी हो, हवन, मार्जन आदि की ज़रूरत न हो, वक्ता कहते हैं कि आप अपने इष्ट से जुड़ा स्तोत्र देख सकते हैं — सहस्रनाम का पाठ सबसे अच्छा है।
धन के लिए क्या कोई ऐसा स्तोत्र है जिसका केवल पाठ ही काफ़ी हो, ताकि हवन, मार्जन आदि की ज़रूरत न पड़े, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि आप अपने इष्ट से जुड़ा स्तोत्र देख सकते हैं, जिसका सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। पाठ सबसे अच्छा है।
कमल गट्टे की माला इतनी जल्दी ख़राब क्यों होती है, और उसकी जगह क्या लें?
कमल गट्टे की माला की नाज़ुकता, और लक्ष्मी जप के लिए स्फटिक
वक्ता कहते हैं कि कमल गट्टे की माला सबसे जल्दी ख़राब होती है — उनकी अपनी तीन-चार महीने में ख़राब हो जाती है। या तो भगवती को पहनाकर स्नान कराने से धागा टूट जाता है, या उस पर सफ़ेद परत आ जाती है और दाना खोखला होकर घुन लग जाता है। वे कहते हैं कि भगवती लक्ष्मी के जप के लिए ढंग से स्फटिक माला लीजिए और उस पर जप कीजिए।
जिस श्रोता की दो कमल गट्टे की मालाएँ ख़राब हो गईं, उन्हें वक्ता जवाब देते हैं कि कमल गट्टे की माला सबसे जल्दी ख़राब होती है; उन्हें लगता है कि उनकी अपनी कमल गट्टे की माला भी तीन-चार महीने में ख़राब हो जाती है। ख़राब होने में दो बातें होती हैं। या तो आपने उसे भगवती को पहनाया है और उन्हें स्नान आदि करा रहे हैं, तो माला का धागा टूट जाता है। या फिर उस पर सफ़ेद परत आने लगती है, वह एक तरह से खोखली होने लगती है, और उसमें पूरी तरह घुन लग जाता है। वे कहते हैं, यह एक साधारण बात है। अगर आप जप के लिए लेते हैं, तो अगर भगवती लक्ष्मी का जप कर रहे हैं, तो ढंग से स्फटिकस्फटिक की माला, जब साधक की कुंडली में शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो, तब रुद्राक्ष के स्थान पर चुनी जाती है। माला लीजिए और उस पर जप कीजिए। कमल गट्टे की माला लंबे समय तक नहीं चल सकती; उस पर कितना भी घी लगाइए, उसका धागा टूटेगा, क्योंकि कमल बीज का छेद काफ़ी छोटा होता है और लोग उसमें बहुत पतला धागा डालते हैं, और वह टूट जाता है।
कुलदेवी की सिद्धि कैसे होती है?
चैनल पर दिए ध्यान मंत्र, आवाहन और नित्य पूजा
कुलदेवी की सिद्धि का रास्ता बताने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह पहले ही बताया जा चुका है और श्रोता से कुलदेवी से जुड़ा वीडियो देखने को कहते हैं: ध्यान मंत्र, आवाहन कैसे करना है, नित्य पूजा कैसे करनी है — सब समझाया गया है। वे जोड़ते हैं कि सिद्धि होती है या नहीं, यह उन पर है।
कुलदेवी की सिद्धि का रास्ता बताने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह पहले ही बताया जा चुका है, और श्रोता से कुलदेवी से जुड़ा वीडियो देखने को कहते हैं। कुलदेवी से जुड़ा ध्यान मंत्र, आवाहन कैसे करना है, नित्य पूजा कैसे करनी है — हर बात वहाँ बताई गई है। वे कहते हैं कि सिद्धि होती है या नहीं होती, यह उन पर है।
मंत्र की गिनती में कितनी आवृत्तियाँ मानी जाती हैं, और स्तोत्र की कितनी?
मंत्र के लिए पाँच लाख, और नवरात्रि में स्तोत्र के 1100
वक्ता कहते हैं कि मंत्र के लिए, उसकी गिनती में, पहली बार किसी भी मंत्र का कम से कम पाँच लाख करना चाहिए — साल के भीतर पाँच लाख पूरे कीजिए। स्तोत्र के लिए नवरात्रि आदि में 1100 तक पूरे कीजिए; उसके बाद जितना हो सके उसका नित्य पाठ कीजिए, और समय-समय पर उसका अनुष्ठान दोहराते रहिए।
पाँच लाख की संख्या के सामने स्तोत्र का और 108 नाम पाठ का कितना करना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता पहले मंत्र के बारे में जवाब देते हैं। गिनती में, पहली बार किसी भी मंत्र का कम से कम पाँच लाख करना चाहिए। साल के भीतर पाँच लाख पूरे कीजिए। स्तोत्र आदि के लिए — नवरात्रि आदि में 1100 तक पूरे कीजिए। उसके बाद जितना हो सके उसका नित्य पाठ कीजिए, और बीच-बीच में उसका अनुष्ठान बार-बार दोहराते रहिए।
सुबह तीन से पाँच के बीच आँखें क्यों खुल जाती हैं?
जिस शक्ति की उपासना हो रही है उसके गणों का काल
वक्ता कहते हैं कि इसमें ज़्यादा चिंता की कोई बात नहीं। जब भी आप कोई साधना करते हैं, तो उससे प्रसन्न होने वाले गणों का अपना काल होता है, और उसी समय में उनका आना-जाना होता है, जिससे आपकी आँखें खुल जाती हैं। साधना के क्षेत्र में यह साधारण प्रक्रिया है, और कहीं न कहीं यह उस शक्ति की कृपा भी है।
एक श्रोता कहते हैं कि दो हफ़्ते से लगातार उनकी आँखें सुबह तीन से पाँच के बीच खुल जाती हैं, भले वे डेढ़ बजे सोएँ, और पूछते हैं कि रात में उस स्थिति में क्या करना चाहिए और ऐसा क्यों हो रहा है। वक्ता जवाब देते हैं कि इसमें ज़्यादा चिंता की कोई बात नहीं, जैसा वे पहले भी कह चुके हैं। जब भी आप कोई साधना करते हैं, तो उससे जो भी गण प्रसन्न होते हैं, उनका अपना काल होता है, और उसी समय में उनका आना-जाना होता है, जिससे आपकी आँखें खुल जाती हैं। साधना के क्षेत्र में यह साधारण प्रक्रिया है, और कहीं न कहीं यह उस शक्ति की कृपा भी है। आपको इसे पहचानना और जानना चाहिए, और अपने इष्ट पर भरोसा रखना चाहिए। जब जीवन में आप खुद को अकेला महसूस करते हैं, कि कोई साथ नहीं है, तब ये शक्तियाँ एहसास देती हैं कि मैं तुम्हारे साथ हूँ। आपको बस उन पर आस्था रखनी है।
क्या किसी शक्ति की कृपा का मतलब दुखों का अंत है?
पत्नी खोने की महादेव की अपनी लीला, हमारे प्रारब्ध के सामने
वक्ता कहते हैं कि वे बार-बार कहते हैं कि प्रारब्ध अपनी जगह है; महादेव ने भी अपनी एक पत्नी को खोने की लीला रखी, तो हम क्या हैं कि हमारे जीवन में दुख नहीं आएँगे। यह मत सोचिए कि शक्ति की कृपा है तो आपको कोई दुख नहीं होगा — बिल्कुल होगा। पर यह भरोसा रखिए कि वे हैं।
वक्ता दोहराते हैं कि वे बार-बार कहते हैं कि प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। अपनी जगह है। महादेव का अपना प्रारब्ध — उन्होंने इसे अपनी लीला के रूप में रखा, कि किस तरह उन्हें अपनी एक पत्नी को खोना पड़ा। उससे बड़े आप और हम क्या हैं, कि हमारे जीवन में दुख नहीं आएगा? तो यह नहीं सोचना है कि शक्ति की कृपा है तो आपको कोई दुख नहीं होगा। बिल्कुल होगा। पर हाँ, यह भरोसा रखिए: कि वे हैं।
जब कोई रिश्तेदार बार-बार परिवार पर अभिचार करे तो क्या करना चाहिए?
काली कवच का 1100 जप, भोजपत्र यंत्र, और उसकी प्राण प्रतिष्ठा
माता काली और भगवान शिव की पूजा करने वाले एक श्रोता बताते हैं कि विद्या सीखे हुए एक चाचा बार-बार अभिचार करते हैं — उन पर नहीं, पर उनके पिता बार-बार बीमार पड़ते हैं। वक्ता जवाब देते हैं: पहले गुप्त नवरात्रि में भगवती काली के कवच का कम से कम 1100 जप पूरा करने की कोशिश कीजिए, और उनके बीजाक्षर भोजपत्र पर यंत्र के रूप में लिखिए, किसी विद्वान से बनवाकर या खुद पवित्र अवस्था में पहले ही दिन, अच्छे चौघड़िया में, अमृत काल में, और अगर आती हो तो प्राण प्रतिष्ठा विधि के साथ।
एक श्रोता लिखते हैं कि वे माता काली और भगवान शिव की पूजा करते हैं, और उनके अपने घर में एक चाचा ने विद्या सीखी है और बार-बार अभिचार करते हैं — उन पर नहीं, पर उनके पिता को एक के बाद एक बीमारी लगती रहती है। वक्ता जवाब देते हैं कि सबसे पहले, जिस तरह आप भगवती काली का अनुष्ठान कर रहे हैं, उनके कवच आदि का जप कर रहे हैं, गुप्त नवरात्रि में काली जी के कवच का कम से कम 1100 जप पूरा करने की कोशिश कीजिए। और भगवती काली के बीजाक्षर भोजपत्र पर लिखिए; या हो सके तो किसी विद्वान से यंत्र बनवाइए, या अगर आप खुद अच्छे साधक हैं, तो पहले ही दिन पवित्र अवस्था में, शुभ चौघड़िया में, अच्छे चौघड़िया में, अमृत काल आदि में यंत्र बनाइए, अगर आती हो तो प्राण प्रतिष्ठा की विधि से यह सब करते हुए, और काली कवच का 1100 जप करते हुए।
हवन और सात्विक बलि से काली कवच कैसे जागृत किया जाता है?
काली और सदाशिव के मंत्रों से हवन, सात्विक बलि, और गृह बंधन
वक्ता कहते हैं कि फिर भगवती काली और भगवान सदाशिव के मंत्रों से हवन कीजिए, बलि और भेंट दीजिए — सात्विक बलि, चाहे नींबू की हो या नारियल की — और यह सब करके कवच को पूरी तरह जागृत कीजिए, फिर पिता को पहनाइए। वे जोड़ते हैं कि घर का बंधन आदि भी करना चाहिए।
क्या धन के लिए सुलेमानी मंत्र का प्रयोग किया जा सकता है?
इनकार, और उसकी जगह अष्टलक्ष्मी और महालक्ष्मी अष्टक
धन पाने के लिए सुलेमानी मंत्र करने के सवाल पर वक्ता मना करते हैं। वे पूछते हैं, आप सुलेमानी मंत्र क्यों करना चाहते हैं — क्या हिंदुओं के मंत्र कम पड़ जाएँगे, क्या सनातन संस्कृति में मंत्रों की कमी है? यहाँ करोड़ों-करोड़ों मंत्र सिद्ध किए गए हैं; सुलेमानी में आपको कहाँ जाना है? वे कहते हैं कि यह इच्छा ही दोषपूर्ण है और इसे बिल्कुल नहीं करना चाहिए।
धन पाने के लिए सुलेमानी मंत्र किया जा सकता है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता पूछने वाले से पूछते हैं कि वे सुलेमानी मंत्र क्यों करना चाहते हैं। क्या हिंदुओं का, हिंदू लोगों का मंत्र कम पड़ जाएगा — क्या सनातन संस्कृति में मंत्रों की कमी है? यहाँ करोड़ों-करोड़ों मंत्र सिद्ध किए गए हैं; सुलेमानी में आपको कहाँ जाना है? वे साफ़ कहते हैं कि उनके पास सुलेमानी नहीं है। आपके मन में सुलेमानी करने की जो इच्छा उठ रही है, वह दोषपूर्ण है, और इसे बिल्कुल नहीं करना चाहिए — उनके हिसाब से, बिल्कुल नहीं। अगर आपको मंत्र जप करना है और कुछ और नहीं कर सकते, तो भगवती अष्टलक्ष्मी का जप कीजिए; अष्टलक्ष्मी स्तोत्र आदि का पाठ कीजिए; महालक्ष्मी अष्टकम् का पाठ कीजिए। यहाँ इतनी शक्तियाँ हैं, और उन्हें छोड़कर आप सुलेमानी में पड़ रहे हैं।
पाँच माला जप के साथ हृदय स्तोत्र के कितने पाठ करने चाहिए?
एक पाठ काफ़ी है
रोज़ विधि के अनुसार पाँच माला करने वाले एक श्रोता ने पूछा कि वे कम से कम हृदय स्तोत्र के कितने पाठ करें; वक्ता जवाब देते हैं: एक कीजिए। एक से ज़्यादा करने की ज़रूरत नहीं है।
एक श्रोता कहते हैं कि वे विधि के अनुसार रोज़ पाँच माला कर रहे हैं, और पूछते हैं कि हृदय स्तोत्र के कम से कम कितने पाठ करें। वक्ता जवाब देते हैं, एक कीजिए। एक से ज़्यादा करने की ज़रूरत नहीं है।
क्या गायत्री पाठ के साथ भैरव मंत्र किया जा सकता है?
गायत्री जप की शर्त: यज्ञोपवीत संस्कार
वक्ता जवाब देते हैं कि अगर आपका यज्ञोपवीत संस्कार हो चुका है, तो आप गायत्री जप कर सकते हैं। चाहें तो बटुक भैरव जी की मूर्ति भी रख सकते हैं, और गायत्री के साथ भैरव जी के मंत्र का जप किया जा सकता है — इसमें कोई परेशानी नहीं।
माँ गायत्री के पाठ के साथ भैरव मंत्र किया जा सकता है या नहीं, माँ गायत्री की ताँबे की मूर्ति रखी जा सकती है या नहीं, और वैदिक गायत्री मंत्र के 108 नामों के कितने पाठ करने चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता एक-एक करके जवाब देते हैं। वे कहते हैं कि अगर आपका यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। संस्कार हो चुका है, तो आप गायत्री मंत्र का जप कर सकते हैं। चाहें तो बटुक भैरव जी की मूर्ति भी रख सकते हैं। भैरव जी के मंत्र का जप अभी गायत्री के साथ किया जा सकता है; इसमें कोई परेशानी नहीं।
गायत्री की ताँबे की मूर्ति क्यों नहीं रखनी चाहिए?
ताँबे में मीठी चीज़ों का ज़हर बनना, और अभिचार में उनका प्रयोग
वक्ता कहते हैं कि माँ गायत्री के लिए ताँबे की मूर्ति नहीं रखनी चाहिए; ताँबे के बजाय पंचधातु की मूर्ति या पीतल की मूर्ति रखिए। ताँबा ताम्र है: अगर ताम्र की मूर्ति रखेंगे तो उन्हें कभी मीठे जल से स्नान नहीं करा पाएँगे, क्योंकि ताँबे में गुड़ या कोई भी मीठी चीज़ डालने पर वह ज़हर जैसी हो जाती है, और ऐसी चीज़ों का प्रयोग अभिचार कर्म में होता है।
ताँबे की मूर्ति के बारे में वक्ता कहते हैं: माँ गायत्री के लिए ताँबे की मूर्ति नहीं रखनी चाहिए। वे कहेंगे कि ताँबा रखने के बजाय पंचधातु की मूर्ति या पीतल की मूर्ति रखनी चाहिए। ताँबा आख़िर ताम्र है। अगर आप ताम्र की मूर्ति रखेंगे, तो उन्हें कभी मीठे जल आदि से स्नान नहीं करा पाएँगे। वे कहते हैं कि आपको यह जानकारी होगी कि ताँबे में गुड़ या कोई भी मीठी चीज़ डाली जाए, तो वह ज़हर जैसी हो जाती है। तो कहीं न कहीं अभिचार कर्म आदि में उन सब चीज़ों का प्रयोग होता है। इसलिए ताँबा मत रखिए। वैदिक गायत्री मंत्र के 108 नामों के कितने पाठ करने चाहिए — वे कहते हैं कि जितना ज़्यादा करें, उतना अच्छा; पर एक नियम बनाइए।
क्या सपने में संकेत मिलने पर स्त्री गायत्री जप कर सकती है?
स्त्री के लिए गायत्री जप का अधिकार न होना बताया गया
नवार्ण जप करने वाली एक स्त्री बताती हैं कि उन्हें सपने में गायत्री मंत्र पढ़ने का संकेत मिला, और पूछती हैं कि क्या करें। वक्ता जवाब देते हैं कि अगर आप स्त्री हैं, तो गायत्री जप का अधिकार स्त्री का नहीं है; आपको गायत्री जप नहीं करना चाहिए। नवार्ण के बारे में, अगर आप उसका जप करती हैं और दीक्षित हैं, तो बहुत अच्छा; दीक्षित नहीं हैं, तो उसका जप सीमा में, सीमित मात्रा में करना चाहिए।
एक श्रोता लिखती हैं कि वे नवार्ण मंत्र का जप करती हैं, पर एक दिन उन्हें सपने में गायत्री मंत्र पढ़ने का संकेत मिला, और पूछती हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए। वक्ता जवाब देते हैं कि अगर आप स्त्री हैं, तो गायत्री मंत्र जप का अधिकार स्त्री का नहीं है। आपको गायत्री जप नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि अगर आप नवार्ण मंत्र का जप करती हैं और दीक्षित हैं, तो यह बहुत अच्छी बात है। अगर दीक्षित नहीं हैं, तो उसका जप सीमा में, सीमित मात्रा में करना चाहिए।
क्या पुरुष को पूजा करते समय सिर ढकना या टोपी पहननी चाहिए?
यह क्षेत्रीय परंपरा है, सब जगह का नियम नहीं
वक्ता कहते हैं कि यह चीज़ क्षेत्र के अनुसार जगह-जगह अलग है। कश्मीर की ओर उस इलाके के ब्राह्मण सिर बाँधकर पूजा करते हैं, खास तौर पर उत्तरी इलाकों में; दूसरे इलाकों में ऐसा नहीं दिखेगा। उनकी अपनी जानकारी के अनुसार पूजा करते समय सिर पर कपड़ा या टोपी रखने की कोई ज़रूरत नहीं — अपने क्षेत्र के बड़ों ने जो कहा है, उसका पालन कीजिए।
पूजा करते समय पुरुष को सिर पर कपड़ा और टोपी बाँधनी चाहिए या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह चीज़ क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग जगह अलग हो जाती है। अगर आप कश्मीर की ओर जाएँ, तो वहाँ पूजा करने वाले ब्राह्मण, उस तरफ़ के लोग, उस इलाके में सिर पर बाँधकर पूजा करते हैं — खास तौर पर उत्तरी इलाकों में। पर दूसरे इलाकों में आपको ऐसा नहीं दिखेगा, और उनकी अपनी जानकारी के अनुसार पूजा करते समय सिर पर कपड़ा या टोपी रखने की ऐसी कोई ज़रूरत नहीं है। क्षेत्र के अनुसार, और वहाँ के बड़ों ने जो कहा है उसके अनुसार, आपको पालन करना चाहिए।
अर्गला स्तोत्र की कितनी आवृत्तियाँ सवा लाख के लाभ के बराबर हैं?
गिनने से इनकार, और मन की संतुष्टि ही माप
वक्ता जवाब देते हैं कि जितना करें, जितना ज़्यादा उतना अच्छा — और पूछते हैं कि इसे गिनकर पढ़ना ही क्यों। जब आपका मन संतुष्ट हो जाए, तो समझिए कि आप उस स्तोत्र से जुड़ी सिद्धि पा रहे हैं।
सवा लाख जितना लाभ पाने के लिए अर्गला स्तोत्र का कितना जप करना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि आप जितना करें, जितना ज़्यादा करें, उतना है। वे पूछते हैं, गिनकर पढ़ना ही क्यों? जब आपके मन को संतुष्टि मिल जाए, तो समझिए कि आप उस स्तोत्र से जुड़ी सिद्धि पा रहे हैं।
उपासना के लिए माता लक्ष्मी का कौन-सा रूप सबसे अच्छा है?
ऐरावत के अभिषेक वाली कमला, और तंत्र में जाने वालों के लिए त्रिपुरसुंदरी
माता लक्ष्मी का कौन-सा रूप सबसे अच्छा है — ऐरावत से स्नान करती कमला, हाथी पर बैठी लक्ष्मी, चार भुजाओं वाली सुंदरी — यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि जिसका नाम लिया गया, ऐरावत के अभिषेक वाला कमला रूप, सबसे उत्तम है। वैसे ही हाथी पर बैठी या कमल पर बैठी लक्ष्मी जी। व्यापारी वर्ग को इस रूप में भगवती कमला की उपासना करनी चाहिए; जो तंत्र में जाना चाहते हैं, वे भगवती त्रिपुरसुंदरी, श्री विद्या की।
उपासना के लिए माता लक्ष्मी का कौन-सा रूप सबसे अच्छा है — ऐरावत से अभिषेक पाता कमला रूप, हाथी पर बैठी लक्ष्मी, चार भुजाओं वाली सुंदरी आदि — यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि जिसका नाम लिया गया है, ऐरावत के अभिषेक वाला कमला रूप, वह सबसे उत्तम है। या हाथी पर बैठी लक्ष्मी जी, या कमल पर, कमलासन पर बैठी लक्ष्मी जी। खास तौर पर व्यापारी वर्ग को इस रूप में भगवती कमला की उपासना करनी चाहिए। और जो तंत्र में जाना चाहते हैं, वे भगवती त्रिपुरसुंदरी, श्री विद्या की।
क्या अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र के और प्रयोग हैं?
अर्गला के भीतर ग्यारह प्रयोग, अभी रोके हुए
अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र के और प्रयोग या विधियाँ बताने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि अर्गला में ग्यारह प्रयोग आते हैं। वे कहना शुरू करते हैं कि वे सब बातें किसी कारण से नहीं बताई जातीं, फिर कहते हैं कि ठीक है, बताई जाएँगी — समय आने पर वह भी बताया जाएगा।
अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र के और प्रयोग या विधियाँ बताने का कष्ट करने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि इसमें, अर्गला में, ग्यारह प्रयोग आते हैं। अब, वे सब बातें नहीं बताई जातीं, वे कहना शुरू करते हैं, क्योंकि — और फिर कहते हैं, ठीक है, बताई जाएँगी। वे कहते हैं कि समय आने पर वह भी बताया जाएगा।
कोई भी जप शुरू करने से पहले क्या सोचना ज़रूरी है?
जप का उद्देश्य, और क्या उसे निभाया जा सकता है
वक्ता कहते हैं कि बहुत सारी बातें सोचनी होती हैं। सबसे पहले, जप करने में आपका उद्देश्य क्या है — देवता की कृपा पाना, या कुछ और? इसके अलावा बाकी सब भी देखिए: क्या आप लंबे समय तक जप पूरा कर पाएँगे या नहीं। मुख्य बात यह है कि आपकी ज़रूरत क्या है; उसी के अनुसार जप पर विचार कीजिए।
कोई भी जप शुरू करने से पहले किन बातों पर विचार ज़रूरी है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि बहुत सारे विचार करने होते हैं। सबसे पहले, आप जो जप कर रहे हैं उसमें आपका उद्देश्य क्या है? क्या यह देवता की कृपा पाना है, या कुछ और? इसके अलावा बाकी सब भी देखिए: क्या आप लंबे समय तक पूरा जप कर पाएँगे या नहीं कर पाएँगे। ये सब बातें देखिए। वे कहते हैं कि सबसे प्रमुख बात यह है कि आपकी ज़रूरत क्या है। उसी के अनुसार जप पर विचार कीजिए।
कथा का अपना स्थान है, पर केवल कथा से सद्गति नहीं होती
कथा का अपना स्थान, पर केवल कथा से सद्गति नहीं
एक श्रोता कहते हैं कि व्यासपीठ पर बैठे लोग कृष्ण जी का चरित्र बुरा दिखाते हैं, जबकि महाभारत में ऐसा कहीं नहीं है, और लोग ऐसी हरकतों से खुश होते हैं। वक्ता जवाब देते हैं कि आप सही कह रहे हैं; इसमें और क्या कहना, सब जानते हैं। कथा अपनी जगह सही है और उसका अपना मंच है, आपके और हमारे लिए ज़रूरी — पर केवल कथा सुनने से, जिस तरह आजकल चल रही है, सद्गति हो जाए, यह वे बिल्कुल नहीं मानते।
एक श्रोता लिखते हैं कि व्यासपीठ पर बैठे लोग सब कृष्ण जी का चरित्र बुरा दिखाते हैं, जबकि महाभारत में ऐसा कहीं नहीं है, और लोग इन हरकतों से खुश होते हैं; वे चाहते हैं कि लोग धर्म के रास्ते पर चलें। वक्ता जवाब देते हैं कि आप सही कह रहे हैं। इसमें और क्या कहना — सब जानते हैं। एक समय आता है जब बुद्धि खुलती है; जिनकी बुद्धि नहीं खुलती, उनके बारे में क्या कहें। कथा अपनी जगह सही है। उसका अपना मंच है; वह आपके और हमारे लिए भी ज़रूरी है। पर केवल कथा सुनने से सद्गति हो जाए, और आजकल जिस ढंग से कथा चल रही है उस ढंग से सुनने से — यह, वे कहते हैं, वे बिल्कुल नहीं मानते।
कृष्ण अपनी निंदा करने वालों पर कुछ क्यों नहीं करते?
रणछोड़, कलियुग, और पार्वती मंगल विवाह गीत
वक्ता जवाब देते हैं कि कृष्ण कुछ नहीं करेंगे; कृष्ण खुद वही हैं जिन्हें रणछोड़ कहते हैं, और कलियुग चल रहा है। भगवान के लिए क्या असंभव है? वे जब चाहें कर सकते हैं, पर वे लीला का आनंद ले रहे हैं — और हमें और आपको उनके साथ लीला का आनंद लेना चाहिए।
ये लोग कृष्ण के चरित्र के बारे में ओछी बातें क्यों कहते रहते हैं और कृष्ण उनका कुछ क्यों नहीं करते, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: कृष्ण कुछ नहीं करेंगे। वे कहते हैं, कृष्ण खुद वही हैं जिन्हें रणछोड़ कहते हैं — आपने सुना है। और कलियुग चल रहा है। भगवान के लिए क्या असंभव है? वे जब चाहें कर सकते हैं, पर वे लीला का आनंद ले रहे हैं। हमें और आपको भी उनके साथ लीला का आनंद लेना चाहिए। वे भगवान सदाशिव के विवाह गीत की ओर इशारा करते हैं, जोगियों द्वारा गाया जाने वाला पार्वती मंगल या विवाह गीत, जिसमें पूरा वर्णन है: एक ब्राह्मण पार्वती जी का प्रस्ताव लेकर गया, और महादेव उसके साथ बहुत लीला करते हैं। अंत में जब उसकी आँखें खुलती हैं कि महादेव क्या हैं, तो महादेव उसे अपने पास बैठाकर कहते हैं, चुपचाप बैठो और लीला देखो, सब कैसे होता है। वे कहते हैं कि यही हमें और आपको भी करना है — जब कुछ न किया जा सके, तो चुपचाप बैठकर लीला देखनी है। वे मानते हैं कि कभी-कभी वे भी गुस्से में बोल जाते हैं, पर कहते हैं कि जो जो करना चाहे, करने दीजिए; हमें अपने क्षेत्र और अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रयास करते रहना है, और हम दूसरों को जगाने का माध्यम बन रहे हैं। वे जागें या नहीं, यह उनका प्रारब्ध और भगवती की इच्छा है।
इस युग में किसकी उपासना अष्ट सिद्धि और महासिद्धि देती है?
कमला, दीक्षा के साथ, पंचांग और फिर जीवन भर दशांग सेवन
सौ महामंत्रों में से किसकी उपासना इस युग में अष्ट सिद्धि और महासिद्धि दे सकती है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: भगवती महाविद्या कमला की उपासना कीजिए। विधि से दीक्षित होकर उनका पंचांग सेवन और उसके बाद दशांग सेवन आदि कीजिए, और जीवन भर उनकी उपासना जारी रखिए।
सौ महामंत्रों में से किसकी उपासना इस युग में अष्ट सिद्धि और महासिद्धि ला सकती है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: भगवती महाविद्या कमला की उपासना कीजिए। विधि के अनुसार दीक्षित होकर उनका पंचांग सेवन और उसके बाद दशांग सेवन आदि कीजिए। जीवन भर उनकी उपासना जारी रखिए। इस लोक में आपकी सारी इच्छाएँ पूरी होती हैं, और उसके आगे भी सब कुछ मिलता है। वे कहते हैं कि अष्ट सिद्धि और महासिद्धि तो शब्द हैं, और उसके अनुसार अपना चरित्र बनाना होता है। पर हाँ, यह ज़रूर होता है: जब आप साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं और पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक।, महापुरश्चरण और यह सब करने लगते हैं, तब ये सब चीज़ें हाथ में आती हैं।
क्या इस युग में शक्तियाँ सच में साकार रूप में आती हैं?
वामा खेपा की ज़िद, और तारा का वैदिक रूप
वक्ता जवाब देते हैं कि इस युग में वे बिल्कुल साकार रूप में आती हैं, पर रूप अक्सर वैदिक वर्णन के अनुसार नहीं होता, क्योंकि इस युग में हम में से किसी में वैदिक रूप का तेज सहने की क्षमता नहीं है। वे बताते हैं कि वामा खेपा ने भगवती तारा से ज़िद की थी कि अगर वैदिक ध्यान मंत्र में कल्पित रूप उनका असली रूप है, तो वे उन्हें वही दिखाएँ।
इस युग में साधना करने पर क्या शक्तियाँ सच में साकार रूप में आती हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: इस युग में वे बिल्कुल साकार रूप में आती हैं। पर बहुत बार रूप वैदिक वर्णन के अनुसार नहीं होता। न आप में, न हम में, न इस युग में किसी में वैदिक रूप का तेज सहने की क्षमता है। वे कहते हैं कि वर्णन मिलता है कि एक बार वामा खेपा ने भगवती तारा से ज़िद की: मैया, आप रोज़ दर्शन देती हैं, मेरे हाथ से भोग खाती हैं — अगर मेरे पढ़े जाने वाले वैदिक ध्यान मंत्र में कल्पित रूप आपका असली रूप है, तो मुझे उसी में दिखाइए। भगवती कहती हैं कि इस युग में तुम उस रूप की ऊर्जा सह नहीं पाओगे, इसलिए कृपया उन्हें जैसी हैं वैसे ही देखो। पर वे ज़िद करते हैं कि उन्हें देखना ही है, और खाना-पीना छोड़ देते हैं। तो माई उन्हें क्षमता देती हैं और अपने उस वैदिक रूप के दर्शन कराती हैं — और तब भी वामा खेपा बेहोश हो जाते हैं।
तो साधारण साधक को शक्तियाँ किस रूप में दर्शन देंगी?
साधारण मानव रूप में दर्शन, जिसका तेज सहा जा सके
वक्ता कहते हैं कि वे साकार रूप में आएँगी और ज़रूर ठीक से आएँगी, और बहुत लोगों को इसका अनुभव है — पर आपको पता नहीं चलेगा; या पता चल भी जाए, तो वे साधारण मानव रूप में ही दर्शन देंगी, जिसका तेज हम सह सकें।
तो वे पूछते हैं, शक्तियाँ किस रूप में आएँगी? वे साकार रूप में आएँगी, और ज़रूर ठीक से आएँगी। कितने लोगों को अनुभव है — पर आपको पता नहीं चलेगा। या पता चल भी जाए, तो वे साधारण मानव रूप में ही दर्शन देंगी, जिसका तेज हम सह सकें।
क्या दत्तात्रेय की उपासना करते हुए देवी की उपासना करना ठीक है?
भगवान दत्तात्रेय के साथ भगवती की पूजा
वक्ता जवाब देते हैं, बिल्कुल: भगवान दत्तात्रेय के साथ भगवती की उपासना करनी चाहिए।
भगवान दत्तात्रेय की उपासना करते हुए देवी की उपासना करना ठीक है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: बिल्कुल। भगवान दत्तात्रेय के साथ भगवती की उपासना करनी चाहिए।
एक नामित मसान साधना की विधि चैनल पर साफ़ मना कर दी जाती है
चैनल पर ऐसी जानकारी देने से साफ़ इनकार
खुद को माँ काली का भक्त बताने वाले और यह कहने वाले एक श्रोता कि माता के सात गण उनसे प्रसन्न हुए हैं, आने वाले नवरात्र में एक नामित मसान साधना करने के बारे में पूछते हैं। वक्ता पूछते हैं कि अगर भगवती काली के गण और सेवक उनसे प्रसन्न हैं, तो वह सिद्धि चाहिए ही क्यों — और साफ़ कहते हैं कि वे यहाँ इस तरह की कोई जानकारी नहीं देते, नाम तक नहीं लेते, और श्रोता जो चाहें करें।
एक श्रोता लिखते हैं कि वे इस नवरात्र में एक खास नाम वाली साधना करना चाहते हैं, कि वे माँ काली के भक्त हैं, और माता के कुछ गण, सात देवियाँ, उनसे प्रसन्न हुई हैं। वक्ता जवाब देते हैं कि जब भगवती काली के गण और सेवक आपसे प्रसन्न हो गए हैं, तो भाई, वह सिद्धि आप क्यों करना चाहते हैं? वे कहते हैं, देखिए, वे यहाँ इस तरह की जानकारी बिल्कुल नहीं देते। चाहे आप वह करना चाहें या कोई और — आप उनका मसान करना चाहते हैं। वे कहते हैं कि वे उसका नाम तक नहीं लेते। आप जो चाहें आराम से कीजिए; यहाँ वे उस तरह की कोई जानकारी नहीं देते।
योग विद्या में शुरुआत कैसे करें?
यूट्यूब से कभी नहीं, केवल किसी जानकार के सान्निध्य में
योग विद्या में जाने के लिए क्या करें और कैसे शुरू करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि योग विद्या आपको कभी यूट्यूब पर नहीं सीखनी चाहिए। इसे किसी सही जानकार के पास, उसके सान्निध्य में रहकर सीखना चाहिए।
योग विद्या में जाने के लिए क्या करना चाहिए, और इसे कैसे शुरू करें, यह पूछे जाने पर वक्ता साफ़ जवाब देते हैं। योग विद्या आपको कभी यूट्यूब पर नहीं सीखनी चाहिए। इसे किसी सही जानकार व्यक्ति की उपस्थिति में, उसके सान्निध्य में रहकर सीखना चाहिए।
क्या वही साधना अगली गुप्त नवरात्रि में दोहराई जा सकती है?
एक ही साधना को साल भर की नवरात्रियों में दोहराना
श्री काली चालीसा की सिद्धि आने वाली गुप्त नवरात्रि में फिर से दोहराई जा सकती है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: बहुत अच्छा, बिल्कुल कीजिए। वे कहते हैं कि कम से कम एक साल तक एक ही साधना बार-बार दोहरानी चाहिए — यानी चारों नवरात्रियाँ, और हो सके तो शाकंभरी और घोर नवरात्रि में भी — और उसके बाद ही अगले साल दूसरी साधना शुरू करनी चाहिए।
जब ब्रह्म बाबा की सवारी आती है पर काम नहीं बनता, तो क्या करना चाहिए?
विंध्य कुंड, त्रिकोण यात्रा, और काली खोह गुफा के पास भैरव मंदिर
वक्ता पूछने वाले से कहते हैं कि पहले विंध्य क्षेत्र जाने की कोशिश कीजिए: वहाँ जाकर विंध्य कुंड से स्नान करवाइए — भगवती के स्थान का कुंड, जो भैरव जी के पास है, जिन पर भी सवारी आती है — त्रिकोण यात्रा कीजिए, और काली खोह की गुफा के पास भैरव बाबा के मंदिर जाइए, जहाँ सभी ब्रह्मों का स्थान दिया गया है।
एक श्रोता लिखते हैं कि वाम बाबा और ब्रह्म बाबा की सवारी आती है, कि काम नहीं बनता, और वे माँ विंध्यवासिनी का जयकारा बहुत लगाते हैं। वक्ता जवाब देते हैं कि अगर ब्रह्म बाबा की सवारी आती है और आप माँ विंध्यवासिनी का जयकारा लगाते हैं और काम नहीं बन रहा, तो एक काम कीजिए। सबसे पहले विंध्य क्षेत्र जाने की कोशिश कीजिए। विंध्य क्षेत्र में जाकर विंध्य कुंड से उनका स्नान आदि करवाइए — यानी भगवती के स्थान का कुंड, जो भैरव जी के पास है, जिन पर भी सवारी आती है — त्रिकोण यात्रा कीजिए, और काली खोह की गुफा के पास भैरव बाबा का मंदिर है, जहाँ सभी ब्रह्मों का स्थान दिया गया है। तो इस बात के लिए उन भैरव बाबा से गुहार लगाइए; और अगर कोई जानकार व्यक्ति आपके साथ जाए, तो वहाँ पता कर सकते हैं कि मुश्किल क्या है और काम क्यों नहीं बन रहा।
जब कोई ब्रह्म विंध्यवासिनी का जयकारा लगाता है तो इसका क्या अर्थ है?
ऐसा ब्रह्म जो अपने समय में ऊँचा साधक या भक्त था
वक्ता कहते हैं कि अगर ब्रह्म विंध्यवासिनी का जयकारा लगा रहा है, तो इसका अर्थ है कि अपने समय में वह विंध्यवासिनी का बहुत ऊँचे दर्जे का भक्त या साधक रहा होगा। नहीं तो कोई ब्रह्म विंध्यवासिनी का नाम तक नहीं लेता — इतना डर होता है। तो वह धर्म पर चलने वाला ऊँचे दर्जे का सात्विक ब्रह्म है: उसका ठीक से सम्मान कीजिए, और विंध्याचल जाइए, जहाँ अगर वह गति चाहता है तो उसका भी कल्याण हो सकता है।
वक्ता कहते हैं कि अगर ब्रह्म विंध्यवासिनी का जयकारा लगा रहा है, तो इसका अर्थ है कि अपने समय में वह विंध्यवासिनी का बहुत ऊँचे दर्जे का भक्त, या साधक रहा होगा। नहीं तो कोई ब्रह्म विंध्यवासिनी का नाम तक नहीं लेता — इतना डर होता है। तो वह ऊँचे दर्जे का सात्विक ब्रह्म है, धर्म पर चलने वाला। उसका ठीक से सम्मान कीजिए, और विंध्याचल जाइए; वहाँ, ठीक से करने पर, अगर वह गति चाहता है तो उसका कल्याण भी हो सकता है। तो किसी जानकार व्यक्ति के ज़रिए वहाँ इस बात का निवारण ठीक से करवाइए।
क्या धन पाने के लिए रुद्राष्टकम् का प्रयोग किया जा सकता है?
नागकेसर पर पाठ, सात दिन शिवलिंग पर चढ़ाना
वक्ता जवाब देते हैं, बिल्कुल। नागकेसर पर रुद्राष्टक का पाठ करके वह नागकेसर शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है। यह धन पाने के अचूक उपायों में से है — पर यह काम कम से कम सात दिन लगातार करना चाहिए, शुक्ल पक्ष की तृतीया या पंचमी तिथि से शुरू करके।
क्या धन की प्राप्ति के लिए रुद्राष्टकम् का प्रयोग किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: बिल्कुल, किया जा सकता है। नागकेसर पर रुद्राष्टक का पाठ करके वह नागकेसर शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। पर चढ़ाया जाता है। वे कहते हैं कि यह धन पाने के अचूक उपायों में से है। पर यह काम आपको कम से कम सात दिन लगातार करना चाहिए, शुक्ल पक्ष की तृतीया या पंचमी तिथि से शुरू करके।
मंत्र जप में शरीर भारी क्यों लगता है और काँपता क्यों है?
तीन संभावित कारण — असंतुलित ऊर्जा, प्रबल भाव, या बाधा
वक्ता कहते हैं कि दो कारण संभव हैं: पहला, मंत्र जप की ऊर्जा असंतुलित हो रही है; दूसरा, आपका भाव बहुत प्रबल हो रहा है, आपका मन इष्ट और आराध्य में टिक रहा है, और उनकी कृपा से उनकी अंश शक्तियों की कृपा आप पर ठीक से आ रही है। तीसरा कारण यह हो सकता है कि अगर कोई अभिचारिक प्रयोग है, या किसी तरह की वायु बाधा या भूत-प्रेत से जुड़ी बाधा है, तो तब भी शरीर काँपता है।
मंत्र जप के दौरान शरीर भारी क्यों हो जाता है और काँपता क्यों है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि मंत्र जप की ऊर्जा असंतुलित हो रही है। दूसरा यह कि आपका भाव बहुत प्रबल हो रहा है; आपका मन इष्ट में, आराध्य में टिक रहा है, और उनकी कृपा से उनकी अंश शक्तियों की कृपा आप पर ठीक से आ रही है — तब भी ऐसा होता है। तीसरा कारण यह हो सकता है: कि अगर कोई अभिचारिक प्रयोग है, या किसी तरह की वायु बाधा, भूत बाधा से जुड़ी बाधा है, तो तब भी शरीर काँपता है। तो यह जाँच का विषय बन जाता है कि आख़िर असल कारण क्या है।
गृहस्थ को कौन-सा शिवलिंग रखना चाहिए, और क्या उसे हिलाने से दोष लगता है?
नर्मदेश्वर या रत्न का शिवलिंग, अरघी अलग
वक्ता कहते हैं कि अगर गृहस्थ के लिए घर में शिवलिंग ठीक है, तो रत्नों का बना शिवलिंग रखिए, या नर्मदेश्वर शिवलिंग रखिए। रत्न का रखें तो भी अरघी अलग होनी चाहिए और शिव जी का रूप, शिवलिंग का रूप, अलग होना चाहिए। दूसरा, शिवलिंग को हिलाने या खिसकाने से कोई दोष नहीं लगता।
शिवलिंग का संस्कार और पूजा कैसे करें, क्या उसे एक जगह स्थिर रखना ज़रूरी है, और क्या बार-बार हिलाने से दोष लगता है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं। अगर गृहस्थ के लिए घर में शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। ठीक है, तो रत्नों का बना शिवलिंग रखिए, या नर्मदेश्वर शिवलिंगम् शिवलिंग रखिए। रत्न का बना शिवलिंग रखें, तो भी उसमें अरघी अलग होनी चाहिए, और शिव जी का रूप, शिवलिंग का रूप, अलग होना चाहिए। पहले यह ध्यान रखिए। दूसरा, शिवलिंग को हिलाने या खिसकाने से कोई दोष नहीं लगता।
क्या घर में रखे शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए?
शिवलिंग स्वयं दिव्य है, उसे विस्तृत प्रतिष्ठा की ज़रूरत नहीं
वक्ता कहते हैं कि घर में शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा नहीं करनी चाहिए, और होती भी नहीं: किसी भी तरह के शिवलिंग का रूप, अचल हो या और, अपने भीतर ही दिव्य शक्तियाँ रखता है। साधारण प्रतिष्ठा आप करवा सकते हैं, पर उनके हिसाब से इसकी बहुत विस्तृत विधि बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। नर्मदेश्वर सबसे अच्छा है, और उसे प्राण प्रतिष्ठा की कोई ज़रूरत नहीं।
वक्ता कहते हैं कि घर में शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा नहीं करनी चाहिए, और होती भी नहीं। किसी भी तरह के शिवलिंग का रूप, अचल हो या और, अपने भीतर ही दिव्य शक्तियाँ रखता है। साधारण प्रतिष्ठा, ठीक है, आप करवा सकते हैं; पर उसकी बहुत विस्तृत विधि नहीं करनी चाहिए, उनके हिसाब से बिल्कुल नहीं। नर्मदेश्वर सबसे उत्तम है, और उसमें प्राण प्रतिष्ठा करने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। तो घर में नर्मदेश्वर शिवलिंगम् शिवलिंग रखिए और उसका पूजन कीजिए, और रोज़ उसका स्नान और अभिषेक आदि होना चाहिए। उसे हिलाने से कोई दोष नहीं लगता — आप रोज़ अच्छे से उसका अभिषेक कर सकते हैं, ठीक से हिला-खिसका सकते हैं; उसे स्थिर रखने की ज़रूरत नहीं, घर में स्थिर रखने की कोई ज़रूरत नहीं।
क्या चल रही साधना के बीच किसी दूसरे देवता की चालीसा या स्तोत्र पढ़ सकते हैं?
एक साधना के भीतर दूसरे देवता की कृपा चाहने का दोष
वक्ता कहते हैं कि एक समय में एक साधना कीजिए। यह एक तरह का दोष है, और अपने आप में बहुत बड़ा दोष: कि आप साधना किसी एक की कर रहे हैं और उसके भीतर कृपा किसी और की चाहते हैं। तब इसका मतलब है कि आपको अपने आराध्य पर, अपने इष्ट पर, या जिस मंत्र का जप कर रहे हैं उसके देवता पर भरोसा नहीं — तो वे आपका काम कहाँ से करेंगे।
अगर कोई साधना चल रही हो, तो उस पूजा के भीतर किसी दूसरे देवता की कृपा के लिए चालीसा या स्तोत्र पढ़ने में कोई दोष है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: एक समय में एक साधना कीजिए। वे कहते हैं कि इसका मतलब है कि यह एक तरह का दोष है। यह अपने आप में बहुत बड़ा दोष है, कि आप किसी की साधना कर रहे हैं और उसके भीतर किसी और की कृपा पाना चाहते हैं। भाई, तब इसका मतलब है कि आप जो साधना कर रहे हैं, उसमें आपको अपने आराध्य पर, अपने इष्ट पर, या जिस मंत्र का जप कर रहे हैं उसके देवता पर बिल्कुल भरोसा नहीं है। तो वे आपका काम कहाँ से करेंगे? यहाँ आपको हनुमान जी से बहुत प्रेम है और आपको हनुमान जी की शक्ति के बारे में जानकारी मिली; ठीक है, आज आपने पाँच दिन हनुमान जी का किया, और छठे दिन किसी से भैरव जी के बारे में सुना, और उसी चीज़ के भीतर आप भैरव जी की कृपा पाना चाहते हैं। तब आपको कुछ भी नहीं मिलेगा।
अगर किसी के पास सिद्धि है, तो उससे काम कैसे लिया जाता है?
जिस गुरु से सिद्धि मिली, उनसे पूछना
वक्ता जवाब देते हैं कि अगर सिद्धि है, तो उससे काम भी लेना होता है — और सिद्धि आपको बताई गई होगी, नहीं तो सिद्धि यूँ ही कैसे हो जाएगी। अगर आपको उससे काम लेने का तरीका नहीं पता, तो पहले उस गुरु से पता कीजिए जिनके माध्यम से सिद्धि मिली, कि यह किस तरह किया जाता है।
सिद्धि हो तो उससे काम कैसे लिया जाता है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि अगर सिद्धि है तो उससे काम भी लेना होता है — भाई, सिद्धि आपको बताई गई होगी; सिद्धि यूँ ही कैसे हो जाएगी। अगर आपको उससे काम लेने का तरीका नहीं पता, तो पहले उस गुरु से पता कीजिए जिनके माध्यम से सिद्धि मिली, कि यह किस तरह किया जाता है। वे कहते हैं, यह जाँच का विषय है।
जब साधना से कोई लाभ न हो और शरीर दुखे, तो क्या करना चाहिए?
आगे बढ़ने से पहले जन्म कुंडली और तंत्र दोनों पक्ष जाँचना
वक्ता कहते हैं कि अगर साधना के दौरान शरीर दुखता है, तो सबसे पहले कोई दोष है। अगर आप खुद कर रहे हैं और लाभ नहीं मिल रहा, तो दोनों चीज़ें जँचवानी चाहिए — अपनी जन्म कुंडली, और ऊपरी परिवार, यानी तंत्र से जुड़ी चीज़ें। उसका निवारण और उतारा करवाइए; अगर ग्रह दोष है, या छठे, आठवें या बारहवें का कुछ चल रहा है, तो अंतर्दशा या सूक्ष्म दशा के अनुसार उसका जप और दान करवाना चाहिए, और तभी साधना करनी चाहिए।
साधना करने के बाद भी लाभ न हो, नकारात्मकता महसूस हो, और साधना के समय शरीर दुखे तो क्या करें, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं। अगर साधना के समय शरीर दुख रहा है, तो सबसे पहले कोई न कोई दोष है। पहली बात यह कि अगर आप खुद कर रहे हैं और लाभ नहीं मिल रहा, तो पहले दोनों चीज़ें दिखवानी चाहिए — अपनी जन्म कुंडली और ऊपरी परिवार, यानी तंत्र से जुड़ी चीज़ें। उसका निवारण, उतारा आदि करवाना चाहिए। अगर ग्रह दोष आदि है, ठीक है; अगर छह, आठ, बारह का कुछ चल रहा है, तो अंतर्दशा और सूक्ष्म दशा के अनुसार उसका जप और दान करवाकर, उसके बाद आपको साधना करनी चाहिए।
क्या माँ तारा की उपासना का कोई सरल मार्ग है?
कोई सरल मार्ग नहीं; वशिष्ठ और पंचमकार
वक्ता जवाब देते हैं कि माँ तारा की उपासना का कोई सरल मार्ग नहीं है। साधारण धूप-दीप आप कर सकते हैं, या अगर आप उनके क्षेत्र के निवासी हैं तो कर सकते हैं। पर वे पूरी तरह तंत्र की छत्र शक्ति हैं, और उनकी पूरी पूजा तंत्रोक्त विधान से ही होती है। महर्षि वशिष्ठ को भी वैदिक तरीके से सिद्धि नहीं मिली; जब उन्होंने पाँचवें मकार के साथ, यानी तंत्रोक्त तरीके से, उनकी साधना और उपासना की, तभी सिद्धि मिली।
माँ तारा की सरल उपासना का कोई मार्ग बताने को कहे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि माँ तारा की सरल उपासना का कोई मार्ग नहीं है। साधारण धूप और दीप आप ज़रूर कर सकते हैं, या अगर वह उनका क्षेत्र है और आप वहाँ के निवासी हैं, तो कर सकते हैं। पर वे पूरी तरह तंत्र की छत्र शक्ति हैं, और उनकी पूरी पूजा तंत्रोक्त विधान से ही होती है। महर्षि वशिष्ठ को भी वैदिक तरीके से सिद्धि नहीं मिली। फिर पाँचवें मकार के साथ — यानी तंत्रोक्त तरीके से — उन्होंने उनकी साधना और उपासना की, और तभी उन्हें सिद्धि मिली।
रावण संहिता में लिखे मंत्रों तक अभी नहीं पहुँचे हैं
एक विषय जहाँ अभी नहीं पहुँचे
रावण संहिता में लिखे कुछ मंत्रों की जानकारी देने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि वे अभी वहाँ तक नहीं पहुँचे हैं।
रावण संहिता में लिखे कुछ मंत्रों की जानकारी देने को कहे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि वे अभी वहाँ तक बिल्कुल नहीं पहुँचे हैं।
क्या नाग मणि सच में मिलती है?
जो दिखा नहीं सकते, उसकी पुष्टि से इनकार
वक्ता कहते हैं कि मिलती है या नहीं, यह अलग बात है; जो इसकी बात करते और दिखाते हैं, वे दिखा सकते हैं कि यह नाग मणि है, पर उसकी सच्चाई क्या है, यह जानने की बात है। अगर वे कहें कि हाँ, मिलती है, तो आप कहेंगे दिखाइए — और वे कहाँ से दिखाएँगे, उनके पास है ही नहीं। हाँ, उन्होंने ऐसी चीज़ें देखी हैं; वह सच में वही थी या नहीं, यह कहना अलग बात है।
नाग मणि सच में मिलती है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि मिलती है या नहीं, यह अलग बात है। जो इसकी बात करते हैं, जो इसे दिखाते हैं, वे दिखा सकते हैं कि यह नाग मणि है — पर उसकी सच्चाई क्या है, यह जानने की बात है। अगर वे कह भी दें कि हाँ, मिलती है, तो आप कहेंगे, दिखाइए; और वे कहाँ से दिखाएँगे? उनके पास है नहीं, तो कहाँ से दिखाएँगे। हाँ, उन्होंने देखी हैं — वह अलग बात है। वह असल में वही थी या नहीं, यह कहना अलग चीज़ है।
पूजा के दौरान फ़ोन देखने की आदत कैसे छूटे?
फ़ोन बंद करना, और आत्म-संयम की ज़रूरत
पूजन के दौरान मोबाइल देखने की आदत कैसे छोड़ें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: मोबाइल बंद करके अलग रख दीजिए। वे थोड़ी झुंझलाहट में जोड़ते हैं कि चाहें तो मोबाइल ही अपने इष्ट को चढ़ा दीजिए और जैसे नारियल फोड़ते हैं वैसे फोड़ दीजिए, टेंशन ख़त्म। वे इसे बहुत बुरी आदत कहते हैं, कहते हैं कि उन्होंने देखा है कि पाठ चल रहा है और साथ में मोबाइल भी चल रहा है, और इन सब बातों में आत्म-संयम ज़रूरी है।
पूजन के समय मोबाइल देखने की जो आदत बन गई है उसे कैसे ख़त्म करें, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: मोबाइल बंद कीजिए और दूर रख दीजिए। वे पूछते हैं, ऐसी आदत बनी कैसे? दूसरी बात वे यह कहेंगे: मोबाइल लीजिए — किसी दिन मोबाइल ही अपने इष्ट को चढ़ा दीजिए, जैसे नारियल फोड़ा जाता है वैसे मोबाइल फोड़ दीजिए। टेंशन ही ख़त्म हो जाएगी। वे कहते हैं कि यह बहुत बुरी आदत है; उन्होंने यह भी देखा है कि पाठ चल रहा है और उसमें मोबाइल भी चल रहा है, कि मोबाइल पर देखा जा रहा है। इन सब बातों में खुद पर नियंत्रण होना चाहिए।
भगवान काल भैरव का वाहन कुत्ता क्यों है?
दो मुख्य कारण: रक्षक और पाप भक्षण
भगवान काल भैरव का वाहन श्वान क्यों है, यह पूछे जाने पर वक्ता दो मुख्य कारण बताते हैं: रक्षक, और पाप भक्षण — यानी पाप को खा जाना।
भगवान काल भैरव का वाहन श्वान, यानी कुत्ता, क्यों है, यह पूछे जाने पर वक्ता दो शब्दों में जवाब देते हैं: रक्षक, और पाप भक्षण। वे कहते हैं कि ये दो सबसे प्रमुख कारण हैं।
जब घर में किसी का विवाह नहीं हो रहा, तो क्या करना चाहिए?
पहले कुंडली विश्लेषण, फिर पितृ दोष, देव दोष या अभिचारिक बाधा
वक्ता कहते हैं कि चैनल पर विवाह से जुड़ी कुछ साधनाएँ और सिद्ध शाबर विद्याएँ दी गई हैं, पर सबसे पहले कुंडली का विश्लेषण होना चाहिए और जो भी दोष है उसे हटाना चाहिए। पितृ दोष, देव दोष, या अभिचारिक बाधा — जब ये सब ठीक से पता हों, तभी उसके अनुसार कोई उपाय या अनुष्ठान बताया जा सकता है।
एक श्रोता लिखते हैं कि घर में किसी भी बच्चे का विवाह नहीं हो रहा, उम्र बहुत बढ़ गई है, और कुछ समझ नहीं आ रहा। वक्ता जवाब देते हैं कि विवाह से जुड़ी कुछ साधनाएँ, सिद्ध शाबर विद्याएँ, चैनल पर दी गई हैं; पर सबसे पहले कुंडली का विश्लेषण होना चाहिए और जो भी दोष हैं, उन्हें हटाना चाहिए। पितृ दोष, देव दोष, या अभिचारिक बाधा — जब ये सब ठीक से पता हों, तभी उसके अनुसार कोई उपाय या कोई अनुष्ठान बताया जा सकता है।
क्या भोग और बलि देकर महाकाली को किसी के ख़िलाफ़ भेजा जा सकता है?
महाकाली को भेजने की सामर्थ्य किसी में नहीं, और असल में कौन चलता है
वक्ता कहते हैं कि महाकाली को कोई नहीं भेज सकता; किसी में इतनी सामर्थ्य नहीं। यह कहने का ढंग है कि महाकाली चल रही हैं, चौराहे वाली चल रही हैं — वे इतनी खाली नहीं बैठीं कि एक लड्डू या कुछ मांस खाकर चल देंगी। वह अलग चीज़ है, और वे पहले ही वीडियो में यह विषय साफ़ कर चुके हैं कि कौन-सी शक्ति चलती है और वह असल में क्या है।
अगर माँ महाकाली जैसी शक्तिशाली शक्ति, चौराहे वाली माता, को भोग और बलि देकर भेजा गया है, तो क्या हनुमान जी और भैरव जी उन्हें रोक सकते हैं और इसमें सक्षम हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं। किसी को भी भोग देकर भेजा गया हो — देखिए, महाकाली को कोई नहीं भेज सकता; किसी में इतनी सामर्थ्य नहीं है। यह कहने का ढंग है कि महाकाली चल रही हैं, चौराहे वाली चल रही हैं। वे इतनी खाली नहीं बैठीं कि एक लड्डू या कुछ मांस खाकर चल देंगी। वे कहते हैं कि वह अलग चीज़ है; वे यह विषय पहले ही साफ़ कर चुके हैं, और वीडियो हैं कि कौन-सी शक्ति चलती है और आख़िर वह क्या है। तो आप उसे महाकाली का नाम नहीं दे सकते।
क्या हनुमान जी और भैरव जी तांत्रिक प्रयोग रोक सकते हैं?
सब कुछ रोका जा सकता है — यह करने वाले पर निर्भर है
वक्ता कहते हैं कि अधर्म पर जो भी चल रहा है उसे रोकने के लिए बड़ी चीज़ों का प्रयोग किया जा सकता है। वे कहते हैं कि वे किसी को गाली नहीं देना चाहते, पर जो लोग कहते हैं कि हनुमान जी और भैरव जी यह नहीं कर सकते, वह नहीं कर सकते, उन पर उनके मुँह से गाली निकल जाती है। ऐसा कुछ नहीं है: सब रुकता है, सब चलता है — करने वाला उस तरह का होना चाहिए, और अपने इष्ट और आराध्य पर भरोसा होना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि अधर्म पर जो भी चीज़ चल रही है, उसे रोकने के लिए बड़ी चीज़ों का प्रयोग किया जा सकता है। वे कहते हैं कि वे किसी को गाली नहीं देना चाहते, पर उन लोगों पर उनके मुँह से गाली निकल जाती है जो कहते हैं कि हनुमान जी और भैरव जी यह नहीं कर सकते, वह नहीं कर सकते। वे कहते हैं, ऐसा कुछ नहीं होता: सब रुकता है, सब चलता है। करने वाला उस तरह का होना चाहिए। और दूसरी बात यह कि अपने इष्ट और आराध्य पर भरोसा होना चाहिए। और महाकाली इतनी खाली नहीं बैठीं कि एक भोग में जाकर किसी को परेशान करेंगी।
क्या सुंदरकांड केवल शनिवार को पढ़ा जा सकता है?
एक तय दिन की अनुमति
क्या केवल शनिवार को सुंदरकांड का पाठ करने से चलेगा, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: हाँ, बिल्कुल चलेगा।
क्या केवल शनिवार को सुंदरकांड का पाठ करने से चलेगा, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: हाँ, बिल्कुल, चलेगा।
हनुमान चालीसा कितनी बार पढ़ें कि तंत्र प्रयोग असर न करे?
चालीस दिन सुबह-शाम हवनात्मक प्रयोग
वक्ता कहते हैं कि अगर तंत्र का प्रयोग ज़्यादा असर कर रहा है, तो हनुमान चालीसा का सुबह-शाम हवनात्मक प्रयोग कीजिए; विधान दिया गया है। ठीक उन्हीं सामग्रियों के साथ प्रयोग कीजिए जिनके नाम बताए गए हैं, और लगातार चालीस दिन कीजिए।
दिन में हनुमान चालीसा कितनी बार पढ़नी चाहिए ताकि तंत्र प्रयोग असर न करे, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: अगर तंत्र का प्रयोग ज़्यादा असरदार हो रहा है, तो हनुमान चालीसा का सुबह और शाम हवनात्मक प्रयोग कीजिए। विधान दिया गया है। ठीक उन्हीं वस्तुओं के साथ इसका प्रयोग कीजिए जिनके नाम बताए गए हैं। लगातार चालीस दिन कीजिए।
हनुमान चालीसा सिद्ध होने के बाद साधक के जीवन में क्या होता है?
जो तुलसीदास ने उसके भीतर बताया है
वक्ता जवाब देते हैं कि जो-जो बातें बताई गई हैं, वे होती हैं — वे सब बातें जो तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा के भीतर बताई हैं।
हनुमान चालीसा सिद्ध होने के बाद साधक के जीवन में क्या होता है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि जो-जो बातें बताई गई हैं, वे सब बातें होती हैं — जो तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा के भीतर बताई हैं।
ऐसा गुरु कहाँ मिलेगा जिसे पैसे का लालच न हो?
योग्य गुरु के लिए अपने आराध्य से प्रार्थना
वक्ता कहते हैं कि इसके लिए अपने आराध्य से, अपने इष्ट से बार-बार प्रार्थना कीजिए और साधना कीजिए, कि आपको ऐसे योग्य गुरु मिलें। आपको ज़रूर मिलेंगे।
ऐसे सच्चे गुरु कहाँ मिलेंगे जिन्हें पैसे आदि का लालच न हो, और जो बिना किसी स्वार्थ के हमेशा अपने शिष्य के साथ खड़े रहें, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि इसके लिए आपको अपने आराध्य से, अपने इष्ट से बार-बार, बार-बार प्रार्थना करनी चाहिए और साधना करनी चाहिए — कि आपको ऐसे योग्य गुरु मिलें। वे कहते हैं, आपको ज़रूर मिलेंगे।
क्या गृहस्थ पारद शिवलिंग स्थापित कर सकता है?
पारद पर लागू नीति-नियम, और नर्मदेश्वर बेहतर
वक्ता कहते हैं कि अगर गृहस्थ पारद से जुड़ी कोई चीज़ स्थापित करता है, तो नीति और नियम का पालन ज़रूरी हो जाता है। उनकी अपनी राय में, अगर आप तंत्रोक्त साधनाएँ नहीं करते और साधारण गृहस्थ हैं, तो पारद शिवलिंग स्थापित करने से बेहतर नर्मदेश्वर शिवलिंग है; वही स्थापित करना चाहिए।
पारस — यानी पारद — शिवलिंग स्थापित किया जा सकता है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि अगर गृहस्थ पारदसिद्ध किया हुआ पारा, जिससे शिवलिंग (पारद शिवलिंग) जैसी पवित्र वस्तुएँ बनाई जाती हैं — यात्रा के दौरान ऐसे प्रतिष्ठित शिवलिंग को साथ ले जाना उचित नहीं, क्योंकि मार्ग में कठोर शुद्धता बनाए रखना कठिन होता है। से जुड़ी कोई चीज़ स्थापित करता है, तो नीति और नियम का पालन ज़रूरी हो जाता है। उनकी अपनी राय में, अगर आप तंत्रोक्त साधनाएँ नहीं करते और साधारण गृहस्थ हैं, तो पारद शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। की स्थापना से ज़्यादा उत्तम नर्मदेश्वर शिवलिंगम् शिवलिंग है। उसी की स्थापना करनी चाहिए।
क्या 108 नाम वाले स्तोत्र के 1100 पाठ के बाद दशांश हवन और तर्पण ज़रूरी है?
हवन, तर्पण और मार्जन, हर नाम से 108 आहुतियाँ
वक्ता जवाब देते हैं, हाँ, बिल्कुल कीजिए — राजनीति के लिए कीजिए; करेंगे तो बेहतर होगा। आहुतियाँ देना ज़रूरी है; तर्पण, मार्जन सब कीजिए। और जब पूछने वाला इसे हर नाम से 108 आहुतियाँ बताता है, तो वक्ता कहते हैं कि उसने बिल्कुल सही समझा है।
अगर बगला के लिए 108 नामों के 1100 पाठ किए जाएँ, तो क्या उसका दशांश हवन और तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। आदि ज़रूरी है, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: राजनीति के लिए, हाँ, बिल्कुल कीजिए। करेंगे तो बेहतर होगा; आहुतियाँ देना ज़रूरी है। तर्पण, मार्जन और सब कुछ कीजिए। और पूछने वाले के इस हिसाब पर कि हर नाम से 108 आहुतियाँ बनती हैं, वे जवाब देते हैं कि आपने बिल्कुल सही समझा है।
क्या बच्चे माँ दुर्गा के 108 नामों का जप कर सकते हैं?
बच्चों को अनुमति, कोई दोष नहीं
वक्ता जवाब देते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं; बच्चे भगवती के 108 नामों का पाठ बिल्कुल कर सकते हैं, और इसमें कोई दोष नहीं।
क्या बच्चे माँ दुर्गा के 108 नामों का जप कर सकते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं: बिल्कुल कर सकते हैं। बच्चे भगवती के 108 नामों का पाठ बिल्कुल कर सकते हैं; इसमें कोई भी दोष नहीं है।
किसी जगह पर लगी बंदिश कैसे खोली जाती है?
अपने इष्ट के उग्र मंत्र, हवनात्मक प्रयोग और बलि
वक्ता कहते हैं कि अगर किसी जगह पर बंदिश की गई है, तो उस जगह पर अपने इष्ट और आराध्य के उग्र मंत्रों का प्रयोग करना चाहिए — शताक्षरी आदि। हवनात्मक प्रयोग करना चाहिए, और बलि आदि देनी चाहिए।
अगर किसी जगह पर बंदिश की गई हो, तो उसे कैसे खोलें, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं। अगर बंदिश की गई है, तो उस जगह पर अपने इष्ट के, अपने आराध्य के उग्र मंत्रों का प्रयोग करना चाहिए — शताक्षरी आदि। हवनात्मक प्रयोग करना चाहिए। बलि आदि देनी चाहिए।
जब परिवार के किसी सदस्य ने तंत्र किया हो, तो इलाज इतना मुश्किल क्यों होता है?
करने वाला परिवार के भीतर है, इसीलिए मुश्किल बार-बार आती है
जिस श्रोता ने कहा कि उसके बड़े भाई और चाची ने उस पर कुछ किया है और इलाज काम नहीं कर रहा, उसे वक्ता जवाब देते हैं कि जब परिवार के सदस्य करवाते हैं, तो यही मुश्किल आती है — जो आज का चर्चा का विषय है, कि जब एक ही परिवार के लोग एक-दूसरे पर तंत्र का प्रयोग करते हैं तो क्या-क्या होता है।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनके बड़े भाई और उनकी चाची ने उन पर कुछ किया है, पर इलाज नहीं बन रहा। वक्ता जवाब देते हैं कि जब परिवार के सदस्य करवाते हैं, तब यही मुश्किल आती है। वे कहते हैं कि हमने आज इसी विषय पर चर्चा की है: कि गृहस्थ जीवन में, जब एक ही परिवार के लोग एक-दूसरे पर तंत्र का प्रयोग करवाते हैं, तो किस तरह की चीज़ें होती हैं।
क्या बच्चे को माँ दुर्गा के 108 नामों का हवन भी करना होगा?
अभी केवल पाठ, हवन धीरे-धीरे सीखना
वक्ता पूछने वाले से कहते हैं कि अगर आप बहुत छोटे हैं और अभी इन सब विषयों की जानकारी नहीं है, तो केवल पाठ कीजिए। हवन धीरे-धीरे सीखिए; जब आपके लिए संभव हो, तब हवन भी ज़रूर कीजिए। अभी केवल पाठ कीजिए।
माँ दुर्गा के 108 नामों का हवन भी करना होगा या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता जवाब देते हैं कि अगर पूछने वाला बहुत छोटा है और उसे अभी इन सब विषयों की जानकारी नहीं है, तो केवल पाठ कीजिए। हवन धीरे-धीरे सीखिए। जब आपके लिए संभव हो, तब हवन भी ज़रूर कीजिए। अभी बस पाठ कीजिए।
क्या ग्रह मंत्रों का 108 बार जप करने के बाद नवार्ण मंत्र पढ़ सकते हैं?
मंगल, चंद्र, राहु और बुध के मंत्रों के बाद अनुमति
एक श्रोता कहते हैं कि कुंडली दिखाने के बाद एक ज्योतिषी ने उन्हें मंगल, चंद्र, राहु और बुध के मंत्र 108-108 बार जपने को कहा, और पूछते हैं कि क्या उसके बाद नवार्ण मंत्र पढ़ सकते हैं। वक्ता जवाब देते हैं कि हाँ, पढ़ सकते हैं — इतना।
एक श्रोता कहते हैं कि कुंडली दिखाने के बाद ज्योतिषी ने उन्हें मंगल, चंद्र, राहु और बुध का मंत्र 108 बार जपने को कहा, और पूछते हैं कि क्या उसके बाद वे नवार्ण मंत्र पढ़ सकते हैं। वक्ता जवाब देते हैं, ठीक है, आप पढ़ सकते हैं। वे कहते हैं, इतना।
क्या हवन और अनुष्ठान के वीडियो केवल देखने या सुनने से लाभ होता है?
देखने से नकारात्मकता दूर होना, और पाठ न कर पाने वालों के लिए लाभ
सत्र समाप्त करते हुए वक्ता श्रोताओं से कहते हैं कि चैनल पर जो भी हवन और अनुष्ठान होते हुए दिखाए गए हैं — भगवती बगलामुखी के, भगवती प्रत्यंगिरा के, या भगवान नरसिंह के — उनके सारे वीडियो देखिए। वे कहते हैं कि देखने से भी बहुत नकारात्मकता दूर होती है; और वे जल्दी ही ऐसे वीडियो डालेंगे कि जो लोग खुद पाठ नहीं कर सकते, वे केवल सुनकर बहुत बड़ा लाभ ले सकें।
सत्र समाप्त करते हुए वक्ता कहते हैं कि जो भी हवन किए जा रहे हैं, जो भी अनुष्ठान किए जा रहे हैं — चाहे भगवती बगलामुखी के, भगवती महाप्रत्यंगिरा के, या भगवान नरसिंह के — उनसे जुड़े जो भी वीडियो चैनल पर हैं, आप सब उन्हें अच्छे से देखिए और ध्यान से देखिए। वे कहते हैं कि देखने से भी बहुत नकारात्मकता दूर होती है। और बहुत जल्दी चैनल पर ऐसे वीडियो डाले जाएँगे कि जो लोग खुद पाठ आदि नहीं कर सकते, वे केवल उन्हें सुनकर बहुत ही बड़ा लाभ ले सकें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।