ग्रहण के इतने नियम क्यों — उसके बाद के दिन, और संपुटित हनुमान चालीसा
ग्रहण के नियमों और हनुमान चालीसा पर एक ग्रहण लाइव।
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ग्रहण काल में इतने नियम क्यों लगाए गए हैं?
नियम इसलिए हैं क्योंकि ग्रहण में जो होता है वह दिखता नहीं
वक्ता कहते हैं कि पूजन करने वाला व्यक्ति सबको दिखता है। पर तंत्र का काम करने वाले को कोई नहीं जानता। खासकर निकृष्ट तंत्र वाले को — जो मंत्र शक्ति से दूसरों पर आघात करते हैं, कष्ट देते हैं, प्राणघात करते हैं, क्षुद्र शक्तियाँ सिद्ध करके किसी पर आजमाते हैं। इस पर कोई विश्वास भी नहीं करता। नियम उसी के लिए हैं जो सीधे नहीं दिखता।
वक्ता शुरू में कहते हैं कि जो चीज़ सीधे न दिखे, उसे न मानना सोचने में भी मूर्खता है और मानने में भी। वे प्रश्न रखते हैं: ग्रहण काल के लिए इतने नियम क्यों बने हैं, और व्यक्ति को इतने नियम मानने पर क्यों विवश किया जाता है? उत्तर में कहते हैं कि आमतौर पर जो व्यक्ति पूजा करता है, साधना अनुष्ठान करता है, वह सबकी नज़रों में और सबके सामने रहता है। सब जानते हैं कि यह पूजन-पाठ करने वाला है। अपने घर में ही देख लीजिए कि परिवार के कौन लोग नियम मानते हैं — या यूँ कहें, वे सुधारते हैं, कि जितनी शरीर की सामर्थ्य है उतना सनातन के अनुसार जीने की कोशिश करते हैं। पर जो लोग तंत्र से जुड़ा कोई भी काम करते हैं, खासकर निकृष्ट तंत्र — दूसरों पर आघात करना, मंत्र शक्ति से या किसी और तरह से कष्ट देना, प्राणघात करना, क्षुद्र विद्या शक्तियाँ सिद्ध करके किसी पर आजमाना कि सिद्धि आई या नहीं — इन सबकी किसी को ठीक से जानकारी नहीं होती। और कोई इस पर विश्वास भी नहीं कर पाता।
क्षुद्र शक्तियों का प्रयोग करने वालों के लिए ग्रहण का समय इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
सूर्य और चंद्र — जिनके माध्यम से सारी शक्तियाँ चलती हैं
वक्ता कहते हैं कि भगवान सूर्य और भगवान चंद्र दो प्रत्यक्ष देव हैं। इन्हीं के माध्यम से हर तरह की शक्ति पृथ्वी लोक पर विचरण करती है। जब दोनों ग्रहण की स्थिति में जाते हैं, तो सभी सकारात्मक और शुभ शक्तियों के लिए बाधा खड़ी हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि जो लोग ग्रहण काल में साधारण पूजन-पाठ करते हैं, वे सबकी नज़र में रहते हैं। पर जो क्षुद्र शक्तियाँ सिद्ध करते हैं और उनका प्रयोग करते हैं, उनके लिए ग्रहण का समय — चाहे चंद्र ग्रहण हो या सूर्य ग्रहण — खास तौर पर महत्वपूर्ण होता है। वे कहते हैं, यह बात साफ़ जान लीजिए: भगवान सूर्य और भगवान चंद्र दोनों प्रत्यक्ष देव हैं। इन्हीं के माध्यम से होकर हर प्रकार की शक्ति पृथ्वी लोक पर विचरण करती है। यह चंद्र और सूर्य के कारण ही है। और जब ये दोनों ग्रहण की स्थिति में जाते हैं, तो सभी सकारात्मक और शुभ शक्तियों के लिए किसी न किसी तरह की बाधा आ जाती है। वे यह भी जोड़ते हैं कि कहा जाता है, सभी देव शक्तियाँ सूर्य और चंद्र के तत्व से ही इस मृत्यु लोक में उपस्थित हैं, इन्हीं के माध्यम से आती हैं।
देवता क्या चाहते हैं, और उनका पोषण कैसे होता है?
मंत्र ही देवों का पोषण
मंत्र। वक्ता कहते हैं कि अगर हम मंत्र पाठ ठीक से करें, शुद्ध उच्चारण से और अधिक से अधिक मात्रा में, तो देवों का पोषण होता है। मंत्र के बिना कोई यज्ञ कभी नहीं हो सकता, और कोई विशेष विधि-क्रिया भी नहीं हो सकती। भाव का संसार अलग है — महाशक्तियों की भक्ति भाव से होती है।
वक्ता पूछते हैं कि देवता किससे प्रसन्न होते हैं, देवताओं और शुभ शक्तियों को क्या चाहिए। उत्तर देते हैं: मंत्र। अगर हम मंत्र पाठ ठीक से करें, उच्चारण शुद्ध हो और अधिक से अधिक मात्रा में हो, तो देवों का पोषण होगा। मंत्र के बिना यज्ञ कभी नहीं हो सकता, और मंत्र के बिना कोई विशेष विधि या क्रिया भी नहीं हो सकती। वे कहते हैं कि भाव का संसार अलग विषय है: महाशक्तियों की भक्ति हम भाव से करते हैं।
क्या देवत्व भी एक योनि है, और इसका क्या अर्थ है?
देव भोग योनि है; केवल मनुष्य कर्म योनि है
वक्ता कहते हैं कि देवता भी एक योनि है, और वह भोग योनि है। कर्म योनि केवल मनुष्य की योनि है। देवता किसी का कितना भी भला या बुरा करें, उनका कोई खास पतन या उत्थान नहीं होता। उनका कर्म उस भोग योनि में जाने से पहले ही तय हो चुका था। जब उनका समय पूरा होता है, तो वे फिर मृत्यु लोक में जन्म लेते हैं — उसी हिसाब से मनुष्य, जड़ या पशु बनकर।
वक्ता कहते हैं, यह विषय समझिए: देवता भी एक योनि है। यह भोग योनि है। कर्मयोनि केवल मनुष्य की योनि है। देवता किसी का कितना भी उपकार या अपकार करें, उनका कोई खास अनिष्ट या उत्थान नहीं होता। उनका अपना कर्म पहले से तय है — उसी के कारण वे उस भोग योनि में गए थे। जब उनका समय पूरा होता है, तो वे फिर मृत्यु लोक में जन्म लेते हैं, उसी के अनुसार — चाहे मनुष्य की योनि में जाएँ, जड़ की या पशु की। और हमारे साथ भी यही बात है: यहाँ मनुष्य योनि में हम जो कर्म करते हैं, वही भोगना पड़ता है।
भगवद गीता के तीसरे अध्याय में कहा है कि मनुष्य मंत्र से देवताओं को संतुष्ट करें
भगवद गीता का तीसरा अध्याय
श्रीमद् भगवद गीता में। वक्ता कहते हैं कि भगवान श्री कृष्ण तीसरे अध्याय में कहते हैं कि मनुष्य मंत्र से देवताओं को संतुष्ट करें, और देवता संतुष्ट होकर मनुष्यों की उन्नति करें।
वक्ता कहते हैं कि महाशक्तियों को छोड़ दें, तो जितनी भी देव शक्तियाँ हैं वे चंद्र और सूर्य को निमित्त बनाती हैं। इन्हीं दोनों के माध्यम से, इन दोनों के तत्व से, सबका पोषण होता है। और उनके पोषण का माध्यम मंत्र हैं। वे कहते हैं, जब आप श्रीमद् भगवद गीता पढ़ते हैं, तो उसमें यह बात लिखी है। भगवान श्री कृष्ण ने तीसरे अध्याय में कहा है कि मनुष्य मंत्र से देवताओं को संतुष्ट करें, और देवता संतुष्ट होकर मनुष्यों की उन्नति करें।
जो शिक्षक मंत्र पाठ को छोड़कर सब कुछ मानते हैं, उन्होंने कभी परंपरा में ज्ञान नहीं पाया
आचार्य प्रशांत और तर्कवादी वक्ताओं पर उनका प्रहार
वक्ता आचार्य प्रशांत का नाम लेते हैं। उन्हें महानुभाव और महादुष्ट कहते हैं, जो सब कुछ मानते हैं पर ये बातें नहीं मानते। वे कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति ने कभी गुरुकुल में या गुरु से ज्ञान नहीं पाया — बस किताबें पढ़ीं और अपनी व्याख्या रख दी। वे पूछते हैं कि जब कृष्ण तीसरे अध्याय में मंत्र से देवताओं के संतुष्ट होने की बात करते हैं, तो आप मंत्र पाठ से क्यों रोकते हैं? क्यों कहते हैं कि पौराणिक मंत्रों और पुराणों से कोई लाभ नहीं, जबकि पुराणों में ही सबका वर्णन है?
वक्ता सीधे आचार्य प्रशांत का नाम लेते हैं। उन्हें महानुभाव और महादुष्ट व्यक्ति कहते हैं, जो सब कुछ मानते हैं पर ये चीज़ें नहीं मानते। वे कहते हैं कि कोई उनसे पूछे: आप तो किसी गुरुकुल में जाकर ज्ञान नहीं पाए, किसी गुरु से गुरु ज्ञान नहीं पाया। आपने बस किताबें पढ़ी हैं, और जो व्याख्या आपको ठीक लगी, उसे अपने हिसाब से अर्थ बनाकर रख दिया। तीसरे अध्याय के होते हुए, वे पूछते हैं, आप फिर क्यों मना कर रहे हैं? क्यों कहते हैं कि मंत्र पाठ नहीं करना चाहिए, पौराणिक मंत्र पढ़ने से कोई लाभ नहीं, पुराण पढ़ने से कोई लाभ नहीं — जबकि सबका वर्णन पुराणों में ही है? वे कहते हैं, ऐसे दुष्ट लोगों की बात मत सुनिए। भले वे सौ बातें बता रहे हों और उनमें से पचास आपके फ़ायदे की हों, तो भी फ़ायदे वाली बातें भी मत सुनिए। क्योंकि आखिर में आपको उनकी बातों की लत लग जाएगी और फिर आप अपने ही सनातन के विरोधी हो जाएँगे। ये लोग बहुत धीमा ज़हर देते हैं, इसलिए सावधान रहिए।
रिकॉर्डिंग पर चलाया गया मंत्र फल क्यों नहीं देता?
मंत्र मन से चलता है, टेप से नहीं
क्योंकि मंत्र मन से चलता है। वक्ता कहते हैं कि अगर आपका मन आधा-अधूरा है, तो मंत्र भी काम नहीं करेगा। लोग शिकायत करते हैं कि इतने दिन बैठकर सवा लाख जप किया और कुछ नहीं हुआ। वे व्यंग्य से कहते हैं कि टेप रिकॉर्डर चला दीजिए या YouTube पर मंत्र लगा दीजिए — एक दिन में दस लाख करवा लीजिए, सवा लाख पर सवा लाख पूरे कर लीजिए, पर कोई फल नहीं मिलेगा।
वक्ता कहते हैं, बात यह है कि देवता मंत्र से पोषित होते हैं — और मंत्र मन से चलता है। अगर आपका मन आधा और अधूरा रहता है, तो मंत्र भी काम नहीं करेगा। लोग कहते हैं कि हमने सवा लाख किया, सवा लाख किया, इतने दिन बैठकर जप किया और कुछ नहीं हुआ। वे जवाब देते हैं, बैठकर जप क्यों किया — टेप रिकॉर्डर चला दीजिए, YouTube पर मंत्र लगा दीजिए। आजकल हर मंत्र YouTube पर मिलता है; कौन सा मंत्र है जो YouTube पर नहीं है? सवा लाख चाहिए तो दस लाख करवा लीजिए, एक ही दिन में सवा लाख पर सवा लाख पूरे करवा लीजिए। उसका कोई फल नहीं मिलेगा।
कौन से मंत्र खुलकर नहीं बोलने चाहिए?
वैदिक मंत्र, प्रणव, गायत्री और महामृत्युंजय
वक्ता कहते हैं कि वैदिक मंत्रों का उच्चारण न करने को कहा गया है। प्रणव मना है, प्रणव का अधिकार होना चाहिए। गायत्री का भी अधिकार होना चाहिए, उसके नियम हैं। वे कहते हैं कि स्त्रियों को गायत्री नहीं करनी चाहिए — इस पर लोग लड़ाई करते हैं, जैसे स्त्रियों के यज्ञोपवीत पहनने पर करते हैं, और लोग पहनवा भी रहे हैं। वे जोड़ते हैं कि महामृत्युंजय मंत्र हमेशा नहीं बोलना चाहिए, फिर भी लोग नकारात्मकता भगाने के लिए घर में दिन-रात चलाते हैं। यह सब दोष का कारण बनता है।
वक्ता कहते हैं कि YouTube पर हर तरह के मंत्र मिलेंगे — वे मंत्र भी जिनका उच्चारण मना है। सबसे पहले तो वही मिलेंगे। वे कहते हैं कि वैदिक मंत्रों का उच्चारण न करने को कहा गया है। प्रणव का उच्चारण मना किया गया है: प्रणव का अधिकार होना चाहिए, और लोग इस पर झगड़ते हैं। गायत्री मंत्र का अधिकार होना चाहिए, गायत्री के नियम हैं, और लोग उन्हें नहीं मानते। स्त्रियों को गायत्री नहीं करनी चाहिए — और इस पर लोग युद्ध छेड़ते हैं कि क्यों नहीं करनी चाहिए। यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। पर तो युद्ध चल ही रहा है कि स्त्री क्यों न पहने, और लोग पहनवा भी रहे हैं। इसके बाद, वे कहते हैं, सभी वैदिक मंत्रों में महामृत्युंजय मंत्र है, जिसे हमेशा नहीं बोलना चाहिए। लोग इसे गाने की तरह घर में दिन-रात चलाते हैं, यह मानकर कि इससे नकारात्मकता भागेगी — और इसलिए महामृत्युंजय मंत्र बजता रहता है। ये सब बातें किसी न किसी तरह दोष का कारण बनती हैं। जब आप चीज़ें ठीक से नहीं जानते, तभी आपके लिए कठिनाई और परेशानी शुरू होती है।
चंद्र ग्रहण जप करने वाले व्यक्ति पर कैसे असर डालता है?
चंद्र — मन और मंत्र दोनों का कारक
वक्ता कहते हैं कि हमारे मन का कारक चंद्र है, और मंत्र के कारक देव और शास्त्र भी चंद्र हैं। इसलिए जब चंद्र ही ग्रहण में हो और आपका मन पूरी तरह समर्पित न हो, तो कठिनाई होगी। जो लोग गलत तरीके से मंत्र जप करते हैं, उन्हें ठीक से प्रभाव नहीं मिलता, चाहे कितने भी सवा लाख पूरे कर लें।
वक्ता कहते हैं कि ग्रहण के समय — क्योंकि हमारे मन का कारक चंद्र है, और मंत्र के कारक देव और शास्त्र भी चंद्र हैं — जब चंद्र ही ग्रहण में हो और आपका मन पूरी तरह समर्पित न हो, तो कठिनाई होगी। जो लोग मंत्र जप कर रहे हैं, और खासकर गलत तरीके से, उन्हें ठीक से प्रभाव नहीं मिलता, चाहे वे सवा लाख पर सवा लाख पूरे कर लें। अगर आपका मन ठीक से लगता है, तो देवता आपसे संतुष्ट होते हैं और आपको उनकी सिद्धि, उनकी कृपा और उनका आशीर्वाद मिलता है।
क्या जप, पाठ या पूजा कभी व्यर्थ जा सकती है?
गलत विधि से प्रभाव नगण्य होता है, पर कभी व्यर्थ नहीं
वक्ता कहते हैं कि आपका जप, पाठ, पूजा कभी व्यर्थ नहीं जाती। हो सकता है आप मानें कि आप बहुत अच्छा जप करते हैं, पर आपकी विधि गलत हो और आपको पता न हो कि ऐसे नहीं करना चाहिए — तब प्रभाव नगण्य हो जाता है। गलत करेंगे तो अनिष्ट होगा, वह अलग बात है, पर वह व्यर्थ नहीं जाता।
वक्ता कहते हैं कि आप मानते हैं कि आप बहुत अच्छा जप करते हैं, पर आपकी विधि गलत है। आपको जानकारी नहीं है कि आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। तब वहाँ प्रभाव नगण्य हो जाता है। पर आपका जप, आपका पाठ, आपकी पूजा कभी व्यर्थ नहीं जाती। गलत करेंगे तो अनिष्ट होगा — वह अलग बात है — पर वह बेकार नहीं जाता। आप जिस भी देवता की आराधना और उपासना में लगे हैं, उस देवता तक यह बात ज़रूर पहुँचती है: कि यह व्यक्ति आपकी तपस्या, आपकी पूजा, आपको सिद्ध करने या आपको प्रसन्न करने का प्रयास कर रहा है।
जब मंत्र ही गलत हो जाए, तब क्या होता है?
देव ऐसा प्रारब्ध रचते हैं कि सही मार्ग सामने आ जाए
वक्ता कहते हैं कि मंत्र गलत होने से जीवन में अनिश्चितता आएगी। पर देव यह कृपा ज़रूर करते हैं: वे आपके जीवन में ऐसा प्रारब्ध रचते हैं कि सही मार्ग ज़रूर आपके पास आता है। वे सामने से सही मार्ग देंगे। उस मार्ग पर चलना या न चलना आपकी अपनी मर्ज़ी है — इसके लिए वे आपको विवश नहीं करेंगे। कोई देव कभी विवश नहीं करता।
वक्ता कहते हैं कि अगर मंत्र गलत हो गया है, तो इस कारण जीवन में अनिश्चितता आएगी। पर वे देव यह कृपा ज़रूर करते हैं: वे आपके जीवन में ऐसा प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। रचते हैं कि सही मार्ग ज़रूर आपके पास आता है। मार्ग वे सामने से ज़रूर देंगे। उस मार्ग पर चलना या न चलना आपकी अपनी इच्छा है। उस बात के लिए वे आपको विवश नहीं करेंगे। वे कहते हैं, कोई देव कभी विवश नहीं करता।
ग्रहण के समय देवताओं और पितरों के साथ क्या होता है?
ग्रहण में पड़े सूर्य-चंद्र का कष्ट देव और पितर दोनों महसूस करते हैं
वक्ता कहते हैं कि देवता चंद्र और सूर्य के माध्यम से संतुष्ट होते हैं, और वे ग्रहण में हैं। इसलिए चंद्र जो कष्ट भोगते हैं, वही कष्ट उन दोनों तत्वों से युक्त सभी देवता भी महसूस करते हैं। चंद्र पितरों के भी कारक हैं, और सूर्य में भी पितृ कारकत्व है, इसलिए उस समय पितरों की गति रुक जाती है। सभी शुभ शक्तियाँ तब खुद को शक्तिहीन महसूस करती हैं और कष्ट में होती हैं।
वक्ता कहते हैं कि चंद्र ग्रहण के समय जब लोग मंत्र जप आदि कर रहे होते हैं, तब — क्योंकि देवता चंद्र और सूर्य के माध्यम से संतुष्ट होते हैं, और वे ग्रहण में हैं — चंद्र जो कष्ट भोगते हैं, वही कष्ट उन दोनों तत्वों से युक्त सभी देवता भी उसी तरह भोगते हैं। पितर भी: चंद्र पितृ के कारक हैं, और सूर्य में भी पितरों का कारकत्व है, इसलिए उस समय पितरों की गति रुक गई होती है। इसलिए पितर और देवता दोनों, और किसी न किसी तरह सभी शुभ शक्तियाँ, उस समय खुद को शक्तिहीन महसूस करती हैं, और उस समय वे कष्ट में होती हैं।
ग्रहण में जप को सौ गुना फल देने वाला क्यों कहा जाता है?
ग्रहण की स्थिति में जप, और लोग सौ गुने का गलत अर्थ कैसे लगाते हैं
वक्ता कहते हैं कि उस स्थिति में जब आप किसी भी देवता के मंत्र का जप करते हैं, तो वह सौ गुना अधिक फल देता है। पर लोग हिसाब लगाने बैठ जाते हैं — कि सौ माला हज़ार के बराबर हो गई, तो लाख जप हो गया मान लिया, इसलिए मंत्र सिद्ध होकर प्रभाव देना चाहिए। वे कहते हैं, यह अलग विषय है: साधारण दिन में भी जप प्रभाव देगा, अगर आपके भीतर वैसी स्थिरता और समर्पण हो।
वक्ता कहते हैं कि उसी स्थिति के कारण, जब आप किसी भी देवता के मंत्र का जप करते हैं, तो वह सौ गुना अधिक फल देने वाला होता है। अब उस सौ गुने को लेकर लोग बैठ जाते हैं: अगर ऐसा है, तो हमने सौ माला जप की तो वह हज़ार के बराबर हो गई, यानी लाख जप हुआ मान लिया, तो उस लाख में मेरा मंत्र सिद्ध हो जाना चाहिए और प्रभाव देना चाहिए। वे कहते हैं, यह अलग विषय है। साधारण दिन में भी जप करेंगे तो प्रभाव देगा — बस आपके भीतर वैसी स्थिरता और वैसा समर्पण होना चाहिए।
ग्रहण में जप वास्तव में क्या करता है, और कोई जप न करे तो क्या?
दोषों का शमन — और कुछ न करने वालों के लिए सुरक्षा का अभाव
वक्ता कहते हैं कि चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण में मंत्रों का जप ज़रूर अधिकतम फल देता है। यह आपके कई दोषों और बहुत सी अनिष्टकारी चीज़ों का शमन करता है। जो व्यक्ति जप-तप नहीं करता, उसका अपने आप में कोई खास नुकसान नहीं होता — पर अगर ऐसे समय किसी नकारात्मक चीज़ का असर आप पर पड़े, तो आप उससे बच नहीं पाएँगे।
फिर भी, वक्ता कहते हैं, जब आप चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण में मंत्रों का जप करते हैं, तो वह ज़रूर अधिकतम फल देता है। यह आपके कई दोष का शमन करता है, और बहुत सी अनिष्टकारी चीज़ों का शमन करता है। चंद्र ग्रहण में यह चीज़ ज़रूरी है। पर जब कोई नहीं कर रहा, जब आप जप-तप नहीं कर रहे, तो उसमें भी ऐसा कुछ नहीं कि कोई खास नुकसान हो रहा हो। बस इतना: अगर ऐसे समय किसी नकारात्मक चीज़ का असर आप पर पड़े, तो आप उससे बच नहीं पाएँगे।
ग्रहण के समय नकारात्मक शक्तियाँ ताकतवर क्यों हो जाती हैं?
सूर्य और चंद्र का दबाव हट जाता है
वक्ता कहते हैं कि नकारात्मक शक्तियों के कारक तत्व भी यही दोनों हैं। पर वे शक्तियाँ नकारात्मकता से भरी होती हैं, इसलिए चंद्र और सूर्य आमतौर पर उन्हें पीड़ा देते हैं: जब शुभ शक्तियाँ प्रबल होती हैं, तो उनकी अशुभता घटती है। ग्रहण में शुभ शक्तियाँ काफ़ी कमज़ोर हो जाती हैं, इसलिए नकारात्मक शक्तियों का बल काफ़ी बढ़ जाता है।
वक्ता कहते हैं, अब आते हैं उन लोगों पर जो निकृष्ट और क्षुद्र शक्तियों का प्रयोग करते हैं। सभी नकारात्मक शक्तियों के कारक तत्व भी यही हैं। पर क्योंकि ये नकारात्मकता से भरी हैं, चंद्र और सूर्य इन्हें किसी न किसी तरह पीड़ा देते हैं। जब शुभ शक्तियाँ प्रबल होती हैं, तो इनकी अशुभता में कमी आती है। और उस समय, क्योंकि ग्रहण में शुभ शक्तियाँ काफ़ी कमज़ोर हो जाती हैं, इनका बल काफ़ी बढ़ जाता है — चाहे वह प्रेत हो, पिशाच हो, ब्रह्म हो, या जितने भी प्रकार के निकृष्ट हों।
ग्रहण के समय कौन सी नकारात्मक सत्ताएँ बंधी रहती हैं और कौन सी नहीं?
देव कोटि का ब्रह्म बंधा रहता है; पूरी तरह नकारात्मक शक्ति नहीं
वक्ता कहते हैं कि अगर ब्रह्म में देव है, तो उसकी शक्ति बंधी रहती है। पर अगर वह राक्षस है, पूरी तरह नकारात्मक शक्ति है, नकारात्मक तत्व से संपन्न है, तो उसी समय इस तरह का तंत्र-मंत्र करने वाले लोग जितना हो सके इन शक्तियों को जागृत और सिद्ध करते हैं।
वक्ता कहते हैं, ब्रह्म में भी अगर देव होंगे, तो उनकी शक्ति बंधी रहती है। पर अगर वह राक्षस है, अगर वह पूरी तरह नकारात्मक शक्ति है, नकारात्मक तत्व से संपन्न है — तो उसी समय, उस तरह के तंत्र और उस तरह के मंत्र से, जितना हो सके, इस तरह के लोग इन शक्तियों को जागृत करते हैं और सिद्ध करते हैं। और इतना ही नहीं: इसी ग्रहण काल में वे आप पर उनका प्रयोग भी करते हैं।
नकारात्मक शक्तियाँ जगाने वाले साधक ग्रहण में ही उनका प्रयोग क्यों करते हैं?
नकारात्मक शक्तियाँ जगाने वालों की ऊर्जा भी ग्रहण में उसी मात्रा में बढ़ती है
वक्ता कहते हैं कि इस तरह की शक्ति जगाने वालों की ऊर्जा भी इस समय काफ़ी बढ़ जाती है। जैसे आपको जप करने से अधिक पुण्य मिलेगा, वैसे ही उनके भोग-पूजन या मंत्र जप को भी उसी तरह बल मिलता है — और उनका मंत्र, वे बताते हैं, काफ़ी छोटा होता है।
वक्ता कहते हैं, ग्रहण काल में प्रयोग करने के पीछे का कारण साफ़ कर दूँ: इस तरह की शक्ति जगाने वाले लोगों की ऊर्जा भी इस समय काफ़ी बढ़ जाती है। जैसे आप जप करेंगे तो आपको अधिक पुण्य मिलेगा, उसी तरह जब उनकी शक्तियों का भोग-पूजन होता है, या उनका मंत्र जप होता है — और उनका मंत्र काफ़ी छोटा होता है — तो उसे भी उसी तरह बल मिलता है।
दुर्गा कवच उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाली शक्तियों के बारे में क्या कहता है?
कवच की फलश्रुति, जो उपदेश-सिद्ध शक्तियों को बाँधती है
वक्ता श्री दुर्गा सप्तशती में पढ़े जाने वाले दुर्गा कवच की फलश्रुति की ओर इशारा करते हैं। उसमें लिखा है कि जो शक्तियाँ उपदेश मात्र से सिद्ध होती हैं, वे इस कवच के पाठ से बंध जाती हैं और नष्ट हो जाती हैं। वे कहते हैं, वही क्षुद्र शक्तियाँ हैं: वे उपदेश मात्र से सिद्ध हो जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब आप श्री दुर्गा सप्तशती में वर्णित दुर्गा कवच का पाठ करते हैं, तो उसमें लिखा है — आपने फलश्रुति में पढ़ा होगा — कि जो शक्तियाँ उपदेश मात्र से सिद्ध होती हैं, वे भी इस कवच के पाठ से बंध जाती हैं, और नष्ट हो जाती हैं। वे कहते हैं, वे इसी तरह की शक्तियाँ हैं: क्षुद्र शक्तियाँ, जो उपदेश मात्र से सिद्ध होती हैं। गुरु बस शिष्य को उपदेश में दे देंगे। भगतवाल का साधक इसी तरह दूसरे साधक को अपना चेला बनाकर दे देगा, और फिर वे शक्तियाँ पूरी तरह जागृत होकर तुरंत असर देने लगती हैं।
जब नकारात्मक क्षुद्र शक्ति जगाने वाला उसे संभाल न पाए, तब क्या होता है?
भोग न दे पाने पर वह जगाई शक्ति को किसी के शरीर में भेज देता है
वक्ता कहते हैं कि अगर व्यक्ति उसकी ऊर्जा न संभाल पाए — उसे लगे कि वह बहुत उग्र हो रही है, और वह भोग-प्रसाद देने में असमर्थ हो जाए, क्योंकि पैसा खर्च होगा और वह कितना ही दे पाएगा — तो वह तुरंत उसे किसी के शरीर पर लगा देता है। कहता है, जाओ, इसके शरीर का यह अंग खा जाओ, इसे इस तरह सताओ, यह मेरा शत्रु है।
वक्ता कहते हैं कि अगर व्यक्ति उसकी ऊर्जा न संभाल पाए — अगर उसे लगे कि वह बहुत उग्र हो रही है, और वह ऊर्जा किससे संभालेगा — तो वह भोग और प्रसाद देने में असमर्थ हो जाता है। पैसा तो खर्च होगा ही; कितना पैसा होगा, कितना देगा? तो वह तुरंत उसे किसी के शरीर पर लगा देता है: जाओ, इसके शरीर का यह अंग खा जाओ, इसे इस तरह सताओ, यह मेरा शत्रु है। वे कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे आप बलि देते हैं, जहाँ मंत्र है कि हे भगवती, हे भगवती की योगिनियों, मेरे शत्रु को बलि के रूप में भक्षण कर लो। उसी तरह ये लोग जब कोई शक्ति जगाते हैं, तो इनका भी यही इरादा रहता है: ठीक है, तुम जग गए हो, अब जाओ — यह मेरा शत्रु है, इसी को बलि रूप में ले लो। और अगर आपके पास किसी तरह की रक्षा करने वाली चीज़ नहीं है, तो यह समय आपके लिए काफ़ी कष्ट भरा हो जाता है।
ग्रहण के समय व्यक्ति को कम से कम क्या करना चाहिए?
कम से कम अपने आराध्य का नाम जप
वक्ता कहते हैं कि ग्रहण काल में सबके लिए कहा गया है, व्यक्ति चाहे जिस हालत में हो, कि वह कुछ और करे या न करे, कम से कम अपने आराध्य का नाम जप ज़रूर करे। वे बताते हैं कि ग्रहण के समय दुर्घटनाएँ होती हैं जिनमें कई मौतें होती हैं, और इसके पहले-बाद भी असर पड़ते हैं, जिनमें ऐसी चीज़ों का योगदान होता है।
वक्ता कहते हैं कि ग्रहण के समय दुर्घटनाएँ होती हैं, और उनमें बहुत सी मौतें होती हैं। पहले और बाद में भी ऐसे कई असर होते हैं, और ग्रहण खत्म होने के बाद भी असर पड़ते हैं। किसी न किसी तरह इस तरह की चीज़ों का उसमें योगदान होता है; कोई न कोई कारण बनता है। इसलिए खासकर ग्रहण काल के लिए कहा गया है, और यह सबके लिए है, व्यक्ति चाहे जिस अवस्था में हो: इतना तो ज़रूर कहा गया है कि वह कुछ और करे या न करे, कम से कम अपने आराध्य का नाम जप ज़रूर करे। वे कहते हैं, आपको मंत्र सिद्धि नहीं करनी है; आपके लिए यह ज़रूरी नहीं, कोई लोभ या लालसा नहीं है।
जो कुछ नहीं चाहता, उसे भी ग्रहण में नाम जप क्यों करना चाहिए?
देव कृपा जो संचित रहती है
वक्ता मानते हैं कि आप पूरी तरह तटस्थ हो सकते हैं — न कुछ चाहिए, न कुछ देना है, पाने की कोई इच्छा नहीं। फिर भी, वे कहते हैं, सनातन की मर्यादा है कि ग्रहण काल में आप स्थिर होकर अपने आराध्य का नाम जप करें। इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देव कृपा ज़रूर मिलती है। वह संचित रहती है और जीवन में ज़रूरत पड़ने पर काम आती है। इसमें कोई नुकसान नहीं, बहुत लाभ है।
वक्ता कहते हैं, ठीक है, आप पूरी तरह तटस्थ हैं। आपको न कुछ चाहिए, न कुछ देना है, किसी प्राप्ति की लालसा नहीं। आप सोचते हैं कि सब ऐसे ही मिल जाना चाहिए, और सब अपनी जगह ठीक है। फिर भी सनातन की एक मर्यादा है: कि ग्रहण काल में आप स्थिर होकर अपने आराध्य का नाम जप करें। इसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देव कृपा ज़रूर मिलती है। वे कहते हैं, जब जीवन में ज़रूरत पड़ती है, तो यह किसी न किसी तरह संचित रहती है और उस समय काम आती है — इसलिए लोगों को यह करना चाहिए। इसमें कोई नुकसान नहीं और बहुत लाभ है।
ग्रहण खत्म होने के बाद पहली सावधानी क्या है?
मोक्ष के ठीक बाद घर लाया गया प्रसाद
वक्ता क्रम बताते हैं — ग्रहण काल पूरा हुआ, मोक्ष हुआ, चंद्र दर्शन, स्नान, देवी-देवताओं पर शुद्ध जल, गंगाजल, तुलसी पत्र और कुश छिड़कना, सब शुद्ध करना, फिर पूजन करने बैठना — और फिर कोई आपके घर आकर कहता है कि पूर्णिमा थी, हमारे घर पूजा थी, यह प्रसाद लीजिए, और आप लेकर खा लेते हैं। वे कहते हैं, ग्रहण के बाद कोई किसी भी तरह का प्रसाद लाए, तो थोड़ा सोचिए, रुकिए और ठहरिए।
वक्ता कहते हैं, दूसरी बात। ग्रहण खत्म हो गया, ग्रहण काल पूरा हो गया, मोक्ष हो गया। आपने चंद्र दर्शन किया, स्नान किया, देवी-देवताओं पर शुद्ध जल, गंगाजल, तुलसी पत्र, कुश आदि छिड़के, सब कुछ शुद्ध और पवित्र किया, और उसके बाद अपना पूजन करने बैठे और किया। फिर ऐसा हुआ कि कोई व्यक्ति आपके घर आया और बोला: आज पूर्णिमा थी ना, तो हमारे घर पूजा थी — यह प्रसाद लीजिए। और आपने सोचा, चलो पूर्णिमा थी, और प्रसाद लेकर खा लिया। वे कहते हैं, ध्यान दीजिए: अगर ग्रहण के बाद कोई भी व्यक्ति आपको किसी भी तरह का प्रसाद लाकर दे, तो थोड़ा सोचिए, रुकिए और ठहरिए।
ग्रहण के बाद घर लाए गए संदिग्ध प्रसाद को खाने से पहले उसका क्या करना चाहिए?
पहला भोग गाय, तुलसी या धरती को
वक्ता कहते हैं कि श्रद्धा हो तो भी पहले थोड़ा गाय को खिलाइए, फिर खाइए। या थोड़ा कहीं धरती माता को दे दीजिए, या थोड़ा तुलसी जी के पास रख दीजिए कि भगवती स्वीकार करें। पहला भोग घर में किसी के मुँह में नहीं जाना चाहिए — पहले वनस्पतियों को, देव वृक्षों को, या जो पशु-पक्षी देव स्वरूप हैं उन्हें देना चाहिए, फिर खाना चाहिए। अगर उसमें कुछ नकारात्मक है, तो आप बच जाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि श्रद्धा हो तो भी पहले थोड़ा गौ को खिलाइए, फिर खाइए। या थोड़ा कहीं धरती माता को दे दीजिए, या थोड़ा तुलसी जी के पास रख दीजिए, यह कहकर: हे भगवती, आप स्वीकार करें। पहला भोग न आपके मुँह में जाना चाहिए, न घर में किसी के मुँह में। पहला भोग वनस्पतियों को, देव वृक्षों को, या जो पशु-पक्षी देव स्वरूप हैं उन्हें देना चाहिए, और तब खाना चाहिए। तब अगर कुछ नकारात्मक होगा, तो आप बच जाएँगे। वरना, वे कहते हैं, आप पाएँगे कि ग्रहण काल में जो जगाया गया, वह सीधे आपके पेट में उतार दिया गया, और फिर आप जीवन भर परेशान रहेंगे।
ग्रहण के बाद तीसरी सावधानी क्या है?
ग्रहण के बाद वस्त्र न देना, न लेना
वक्ता कहते हैं कि ग्रहण पूरा होने के बाद, अगर कोई किसी बहाने या किसी तरह आपको पहनने का कोई वस्त्र दे रहा है या माँगने आया है, तो दोनों तरफ़ सावधान रहिए। जो देने आए, उसमें कोई कारण हो सकता है जिससे आपको परेशानी आए। और अगर कोई लेने आया है और आप ऐसी हालत में दे दें, तो कहीं नुकसान हो सकता है। वे कहते हैं, जहाँ घर में गर्भवती स्त्री हो, वहाँ बहुत ज़्यादा सावधान रहने की ज़रूरत है।
वक्ता कहते हैं, तीसरी बात। ग्रहण पूरा हो गया। ग्रहण पूरा होने के बाद, किसी भी बहाने से और किसी भी तरह, अगर कोई आपको पहनने का कोई वस्त्र दे रहा है या माँगने आया है और ले रहा है — दोनों ही हालत में सावधान रहिए। अगर वह देने आए, तो उसमें भी कोई न कोई कारण हो सकता है जिससे आपको परेशानी आए। अगर वह आपसे लेने आया है, तो भी सावधान रहिए: ऐसी हालत में आप दे देंगे, तो वहाँ किसी न किसी तरह नुकसान हो सकता है। खासकर अगर घर में गर्भवती स्त्री है, तो आपको बहुत ज़्यादा सावधान रहने की ज़रूरत है। ग्रहण के समय न कुछ दीजिए, न लीजिए, और ग्रहण के बाद भी न दीजिए, न लीजिए।
क्या ग्रहण के बाद दान देना भी समस्या है?
संकल्प करके सुपात्र को दिया दान ठीक है
नहीं। वक्ता कहते हैं कि वहाँ आप संकल्प करके दान कर रहे हैं। उसमें आपको कोई दिक्कत नहीं है। आप संकल्प करके सुपात्र को दान दे रहे हैं। वह अलग बात है। पर अगर कोई सीधे माँगने आए, आपका हितैषी और मित्र बनकर कहे कि उसे फलाँ चीज़ चाहिए, तो इन सब बातों पर खास ध्यान रखें।
अब आपत्ति आएगी, वक्ता कहते हैं, कि हम यहाँ दान करते हैं, तो क्या दान में भी दिक्कत है? वहाँ भाई, आप संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करके दान कर रहे हैं। उसमें आपको कोई दिक्कत नहीं है। आप संकल्प करके सुपात्र को दान दे रहे हैं। वह अलग बात है। पर जो सीधे माँगने आया है, आपका हितैषी बनकर, आपका मित्र बनकर, कि उसे ऐसी चीज़ चाहिए, इन सब बातों पर खास ध्यान रखें।
ग्रहण के बाद कोई चौखट पर खड़ा रहे तो इसका क्या मतलब है?
चौखट पर बायाँ पैर
चौथी बात: ग्रहण के बाद कोई आपके घर की चौखट पर देर तक खड़ा रहे, चौखट पकड़कर बात करे, या मुख्य द्वार पर खड़े होकर बात करे। अंदर आकर बैठने या चाय पीने के हर न्योते को मना करे, कहे नहीं, यहीं ठीक है, थोड़ी गर्मी लग रही है, थोड़ी ठंड लग रही है। खासकर अगर उसका बायाँ पैर आपकी चौखट पर हो और एक पैर बाहर, तो वक्ता कहते हैं, सौ प्रतिशत जान लें कि वहाँ उसका काम चल रहा है। वे कहते हैं कि नब्बे प्रतिशत संभावना है कि उनकी कोई क्रिया चल रही है।
उसके बाद चौथी बात, वक्ता कहते हैं। ग्रहण के बाद कोई व्यक्ति आता है और आपके घर की चौखट पर देर तक खड़ा रहता है। चौखट के पास खड़ा रहता है, चौखट पकड़कर बात करता है, मुख्य द्वार पर आकर बात करता है। आप उससे कह रहे हैं: आइए, अंदर आइए, बैठिए, बैठिए। नहीं, नहीं, नहीं। चाय पी लीजिए, आकर बैठिए। नहीं, नहीं, यहीं ठीक है, थोड़ी गर्मी लग रही है, थोड़ी ठंड लग रही है। किसी भी कारण से, और खासकर अगर उसका बायाँ पैर आपकी चौखट पर रखा हो और एक पैर बाहर रखा हो, तो सौ प्रतिशत जान लें कि वहाँ उसका काम चल रहा है। वह आपके लिए बहुत ऊँचे दर्जे का व्यक्ति हो सकता है, बहुत अच्छा हो सकता है, पर यहाँ नब्बे प्रतिशत संभावना होगी कि उनकी कोई क्रिया चल रही है।
चौखट के बारे में आम नियम क्या है?
चौखट पर न कोई बैठे, न खड़ा हो, न खड़ा रखा जाए
उन्हें वहाँ देर तक खड़ा न रखें। अंदर बुला लें, कहें आइए अंदर बैठिए, या बाहर निकलकर बात करें। वे कहते हैं, चौखट पर किसी को कभी खड़ा न रखें। न खुद वहाँ बैठें, न किसी को बैठाएँ, न खड़े हों। या तो मुख्य द्वार के अंदर आएँ या मुख्य द्वार के बाहर जाएँ। दोनों में से एक।
वरना उन्हें वहाँ देर तक खड़ा न रखें, वक्ता कहते हैं। अंदर बुला लें: ठीक है, अंदर आकर बैठिए, या बाहर आइए, बात करते हैं। चौखट पर किसी को कभी खड़ा न रखें। न खुद वहाँ बैठें, न किसी को बैठाएँ, न वहाँ खड़े हों। या तो मुख्य द्वार के अंदर आएँ, या मुख्य द्वार के बाहर जाएँ। दोनों में से एक।
ग्रहण के बाद वाले दिन में पाँचवीं किस बात पर ध्यान दें?
चौबीस घंटे में पालतू जानवर, गौवंश और छोटे बच्चे
पाँचवीं बात है घर का कोई पालतू जानवर। गौवंश अलग बात है, पर आजकल लोग घर में कुत्ते, बिल्ली और पक्षी भी पालते हैं। अगर ग्रहण के चौबीस घंटे के अंदर किसी भी कारण से उसकी मृत्यु हो जाए। या गाय, बछड़ा, बछिया जैसा कोई बड़ा जानवर कष्ट पाने लगे। या घर के एक-दो साल तक के छोटे बच्चे कष्ट पाने लगें।
पाँचवीं बात, वक्ता कहते हैं: ग्रहण के तुरंत बाद, अगर आप घर में किसी भी तरह का पालतू जानवर रखते हैं। गौवंश अलग बात है; आजकल लोग कुत्ते भी पालते हैं, बिल्ली पालते हैं, घर में पक्षी पालते हैं। अगर ग्रहण के चौबीस घंटे के अंदर किसी भी कारण से उसकी मृत्यु हो जाए। और अगर कोई बड़ा जानवर हो — गायें, गौ माता, गौवंश हो, कोई छोटा बच्चा, बछड़ा, बछिया — और वे कष्ट पाने लगें; या घर में छोटे बच्चे हों और वे कष्ट पाने लगें, जो एक-दो साल की उम्र के हों।
ग्रहण के एक दिन के अंदर पालतू जानवर, गौवंश या छोटा बच्चा कष्ट पाने लगे तो तुरंत क्या करें?
सबसे पहले घर के देवी-देवता के नाम का उतारा
डॉक्टरी इलाज जो भी करना हो, तुरंत और जल्दी करें। पर वक्ता कहते हैं, उससे भी पहले, घर के जो भी देवी-देवता हैं, जिनमें आपकी श्रद्धा और आस्था है, उनके नाम से घर में तुरंत उतारा करें। अगर बच्चा, गाय या बछिया ज़ोर से रो रहे हों, जीभ ऐंठ रही हो, उछल-कूद कर रहे हों, तो तुरंत करें।
डॉक्टरी इलाज जो भी करना हो, तुरंत और जल्दी करें, वक्ता कहते हैं। पर उससे भी पहले, घर के जो भी देवी-देवता हैं, जिनमें आपकी श्रद्धा और आस्था है, उनके नाम से घर में तुरंत उतारा करें। उस बच्चे के लिए, गाय के लिए, बछिया के लिए, जो भी हो — अगर वह बहुत चिल्ला रही हो, जीभ ऐंठ रही हो, उछल-कूद कर रही हो — तो तुरंत। क्योंकि वे कहते हैं, जो भी तंत्र चलता है, इन सब चीज़ों का असर सबसे पहले गौ पर पड़ता है, खासकर गौ माता और गौवंश पर।
ग्रहण के बाद तुलसी मुरझाए तो इसका क्या संकेत है?
दो-तीन दिन में तुलसी सूखना प्रयोग का संकेत
वक्ता कहते हैं, अगर दो-तीन दिन में तुलसी जी मुरझा जाएँ, तो जान लें कि वहाँ कोई न कोई प्रयोग किया जा रहा है। आपको तुरंत घर में हवन करवाना चाहिए, और हो सके तो खुद भी हवन करें।
अगर तुलसी जी हैं, और दो-तीन दिन में तुलसी जी मुरझा जाएँ, तो जान लें कि वहाँ कोई न कोई प्रयोग चल रहा है, वक्ता कहते हैं। तुरंत आपको घर में हवन करवाना चाहिए, और हो सके तो खुद भी हवन करें। और वे कहते हैं, कुछ नहीं तो हनुमान चालीसा से हवन करना सबको आना चाहिए; और अगर कोई कहे कि उसे हनुमान चालीसा से हवन करना नहीं आता, तो चैनल पर वीडियो डाले गए हैं — उन्हें देखकर करें।
सात-आठ साधक कालिका योगिनी पाठ के अनुभव भेज चुके हैं
कालिका योगिनी पाठ के सात-आठ अनुभव
वे कहते हैं कि हनुमान चालीसा और कालिका योगिनी के इतने अनुभव आ रहे हैं कि अब तक सात-आठ लोग अपने अनुभव भेज चुके हैं। ज़्यादातर लोगों को ऐसी भव्यता से आवाज़ आई, और पूरा सीधा एहसास हुआ कि हाँ, कोई है। मंत्र जाग्रत है और मंत्र शाबर मंत्र भी है। और सबसे बड़ी बात, जिन्होंने इस बार भगवती कालिका की योगिनी का पाठ और साधना की, उनके लिए दिवाली का समय था और उस पर ग्रहण भी।
हनुमान चालीसा के अनुभव और कालीका योगिनी के, इतने अनुभव आ रहे हैं, वक्ता कहते हैं, कि अब तक सात-आठ लोग अपने अनुभव भेज चुके हैं। ज़्यादातर लोगों को ऐसा हुआ कि ऐसी भव्यता से आवाज़ आती है, पूरा सीधा एहसास कि हाँ, कोई है — बहुत अच्छे अनुभव। मंत्र जाग्रत भी है, और मंत्र सबर मंत्र भी है; और उस पर सबसे बड़ी बात, जिन्होंने इस बार भगवती कालिका की योगिनी का पाठ और साधना की, उनके लिए दिवाली का समय था और उस पर ग्रहण।
ग्रहण के बाद बच्चे या गौवंश कष्ट पाएँ तो क्या करें?
इष्ट के नाम से तुरंत नकारी और उतारा
प्रसारण में रुकावट के बाद बात दोहराते हुए वक्ता कहते हैं कि अगर ग्रहण काल के बाद किसी भी तरह का तंत्र हो, तो छोटे बच्चों को परेशानी हो सकती है, और घर में जो भी गौवंश है उसे परेशानी होगी। तब आपके जो भी इष्ट हों, आराध्य हों, घर में जिस भी देव शक्ति की पूजा होती हो, उनके नाम से तुरंत नकारी और उतारा करना चाहिए।
आखिरी बात जो वे बता रहे थे, वक्ता फिर से शुरू करते हैं, वह यह थी कि अगर ग्रहण काल के बाद किसी भी तरह का तंत्र हो, तो छोटे बच्चों को परेशानी हो सकती है। और घर में जो भी गौवंश है, उसे परेशानी होगी। तब आपके जो भी इष्ट हों, आराध्य हों, घर में जिस भी देव शक्ति की पूजा होती हो, उनके नाम से तुरंत नकारी करनी चाहिए, उतारा करना चाहिए।
ग्रहण के बाद कष्ट पाते बच्चे या जानवर का उतारा असल में कैसे होता है?
अपने क्षेत्र का उतारा, अपने देवता के नाम से
वे उदाहरण देते हैं: मान लें आपके घर में मुख्य रूप से हनुमान जी की पूजा होती है। ग्रहण खत्म हुआ और अगले चौबीस घंटे में घर की छोटी बछिया बहुत बीमार पड़ गई। तब आपके क्षेत्र में जिस तरह का उतारा होता है, वह उतारा आप हनुमान जी के नाम से करेंगे, और तुरंत निकालेंगे। उसी से उसे आराम मिल जाएगा। क्योंकि जब भी शत्रु अभिचार तंत्र करता है, असर सबसे पहले गौवंश पर पड़ता है।
जैसे, उदाहरण के लिए, आपके घर में मुख्य रूप से हनुमान जी की पूजा होती है, वक्ता कहते हैं। ग्रहण खत्म हुआ; अगले चौबीस घंटे में आपके घर की गाय — छोटी बछिया — बहुत बीमार पड़ गई। तब आपके क्षेत्र में जिस तरह का उतारा होता है, वह उतारा आप हनुमान जी के नाम से करेंगे। तुरंत निकालें। उसी से उसे आराम मिल जाएगा। क्योंकि जब भी शत्रु अभिचार तंत्र करता है, असर सबसे पहले गौवंश पर पड़ेगा।
ग्रहण के बाद के दिनों में और किन पौधों पर ध्यान दें?
तीन-चार दिन में तुलसी, अपराजिता और शमी का सूखना
अगर तीन-चार दिन में तुलसी जी सूख जाएँ, तो तुरंत जान लें कि अचानक कोई तंत्र इस्तेमाल हुआ है। ग्रहण के बाद तीन-चार दिन में तुलसी जी नहीं सूखनी चाहिए, अपराजिता की बेल नहीं सूखनी चाहिए, शमी जी नहीं सूखनी चाहिए। अगर तीन-चार दिन में ऐसा हो रहा है, तो सावधान हो जाएँ, और घर में तुरंत हवन करना चाहिए।
अगर तीन-चार दिन में तुलसी जी सूख जाएँ, वक्ता कहते हैं, तो तुरंत जान लें कि अचानक कोई न कोई तंत्र इस्तेमाल हुआ है। ग्रहण के बाद तीन-चार दिन में तुलसी जी नहीं सूखनी चाहिए; अप्राजिता की बेल नहीं सूखनी चाहिए; शमी जी नहीं सूखनी चाहिए। अगर तीन-चार दिन में यह हो रहा है, तो सावधान हो जाएँ। घर में तुरंत हवन करना चाहिए।
तंत्र प्रयोग के खिलाफ छोटा-सा हवन भी असरदार क्यों है?
सबसे सूक्ष्म हवन भी सबसे बड़ी तंत्र क्रिया को हिला देता है
वक्ता कहते हैं, हवन ऐसी प्रक्रिया है कि आप सबसे सूक्ष्म हवन भी करें, तो जो भी तंत्र क्रिया की गई है, चाहे कितनी भी बड़ी, नया तंत्र प्रयोग हो या सबसे पुराना, वह ज़रूर हिलती है। और खासकर अगर तंत्र नया हो, तो उसका असर तुरंत फीका पड़ने और कम होने लगता है।
हवन ऐसी प्रक्रिया है, वक्ता कहते हैं, कि अगर आप सबसे सूक्ष्म हवन भी करें, तो जो भी तंत्र क्रिया की गई है, चाहे कितनी भी बड़ी, चाहे बिल्कुल नया तंत्र प्रयोग हो या पुराने से पुराना — वह ज़रूर हिलती है। और खासकर अगर तंत्र नया हो, तो उसका असर तुरंत फीका पड़ने लगता है, कम होने लगता है।
ग्यारह दीपक जलाते समय साथ में क्या करें?
ग्यारह दीपकों के दोनों ओर गीली धूप
वक्ता कहते हैं, जब भी आप ग्यारह दीपक एक साथ जलाएँ, एक काम करें: जहाँ ग्यारह दीपक जले हों, उनके दोनों ओर धूप जलाएँ। गीली धूप लें — जो अगरबत्तियों के बीच आती है, गीली वाली। वे कहते हैं, बाँस वाली नहीं लेनी चाहिए।
जब भी आप ग्यारह दीपक एक साथ जलाएँ, वक्ता कहते हैं, एक काम करें। उनके पास, जहाँ ग्यारह दीपक जलाए गए हैं, उनके दोनों ओर धूप जलाएँ। वह गीली धूप है — अगरबत्तियों में एक धूप आती है जो गीली होती है; वही जलाएँ। वे कहते हैं, बाँस वाली नहीं लेनी चाहिए।
दीपकों के पास धूप का धुआँ क्या करता है?
धुआँ सोखने से बनने वाला खालीपन
वक्ता कहते हैं, धूप से निकलने वाला धुआँ एक साथ जलते ग्यारह दीपक सोख लेंगे। वे उस चीज़ को अपनी ओर खींचते हैं, और वहाँ एक खालीपन बनता है जिसमें आसपास का सारा धुआँ खिंच आता है। जब आप हवन करते हैं, तो यही स्थिति बड़े पैमाने पर बनती है, और सारी नकारात्मक ऊर्जा को अपने असर से हटना पड़ता है।
धूप से जो धुआँ निकलेगा, वक्ता कहते हैं, उसे एक साथ जलते ग्यारह दीपक सोख लेंगे। यानी वे उस चीज़ को अपनी ओर खींचते हैं; वहाँ पूरा खालीपन बनता है, जिसमें आसपास का सारा धुआँ खिंच आता है। जब आप हवन करते हैं, तो इस तरह की स्थिति बड़े पैमाने पर बनती है। जो भी नकारात्मक ऊर्जा है, उसे अपने असर से हटना पड़ता है।
प्रयोग होने का पहला शक होते ही क्या करें?
सुबह-शाम हनुमान चालीसा से हवन
जैसे ही आपको लगे कि घर में ऐसा कोई प्रयोग हुआ है — परेशानी शुरू हो गई, घर में दिक्कतें आने लगीं, गौवंश पर कष्ट है, तुलसी जी सूख रही हैं, सबकी सेहत अचानक बिगड़ने लगी, और यह सब ग्रहण के आसपास ही हुआ — तुरंत हनुमान चालीसा से सुबह-शाम हवन शुरू करें। हो सके तो परिवार के साथ, नहीं तो अकेले। वे कहते हैं, तीन-चार दिन में सब चीज़ें सामान्य हो जाएँगी।
अब आप कहेंगे कि आपके पास हवन का विधि-विधान नहीं है, वक्ता कहते हैं। ऐसा कुछ नहीं — हनुमान चालीसा से हवन करना सबको आना चाहिए, और हनुमान चालीसा से हवन कैसे करें, इस पर पूरा वीडियो बनाकर चैनल पर डाला गया है। जैसे ही आपको लगे कि घर में इस तरह का प्रयोग हुआ है, परेशानी शुरू हो गई है, घर में दिक्कतें आने लगी हैं, गौवंश पर कष्ट है, तुलसी जी सूख रही हैं, सबकी सेहत अचानक बिगड़ने लगी है, और ये सब बातें ग्रहण के आसपास ही हुईं — तुरंत, हो सके तो परिवार के साथ, नहीं तो अकेले बैठकर भी, हनुमान चालीसा से सुबह-शाम हवन शुरू करें। पूरी विधि चैनल पर लाइव दिखाई गई है; उसी तरह हवन करें। अगर आप सुबह-शाम दोनों समय हवन करने लगें, तो तीन-चार दिन में सब चीज़ें सामान्य हो जाएँगी।
सोखा, बैगा या तांत्रिक का इंतज़ार क्यों न करें?
उनकी क्रिया पूरी होने तक हालत बिगड़ चुकी होती है
वे कहते हैं, अगर आप यह नहीं करेंगे, तो किसी सोखा, किसी बैगा, किसी तांत्रिक को दिखाने की आस और उम्मीद में बैठे रहेंगे। जब तक वे लोग अपनी क्रिया करके बताएँगे कि ऐसा करो, वैसा करो, तब तक बात बिगड़ चुकी होगी। इसे जड़ पकड़ने का इतना समय न दें।
अगर आप यह नहीं करेंगे, वक्ता कहते हैं, तो आस और उम्मीद में बैठे रहेंगे — किसी फलाँ सोखा बाबा को दिखा लें, किसी बैगा को दिखा लें, किसी तांत्रिक को दिखा लें। जब तक वे लोग अपनी क्रिया करके बात बताएँगे, ऐसा करो, वैसा करो — तब तक बात बिगड़ चुकी होगी। इसलिए इसे जड़ पकड़ने का इतना समय न दें।
क्या बिना किसी सबूत के भी हवन करना चाहिए?
ग्रहण के अगले दिन हवन, हर हाल में
वक्ता कहते हैं कि शक हो तो करें — और वे आगे कहते हैं कि यह भी न देखें कि किसी ने कुछ किया है या नहीं। ग्रहण बीत गया; ग्रहण के अगले दिन, हो सके तो हनुमान चालीसा से हवन करें। अपने इष्ट और आराध्य के लिए जो भी विधि-विधान आप जानते हैं, उससे घर में साधारण सूक्ष्म हवन करें। यही सबसे सरल तरीका है, और इससे आपकी रक्षा होगी।
शक हो तो करें, वक्ता कहते हैं — और वे आगे कहते हैं: यह भी न देखें कि किसी ने कुछ किया है या नहीं। ग्रहण बीत गया; ग्रहण के अगले दिन, हो सके तो हनुमान चालीसा से हवन करें। आपके इष्ट और आराध्य जो भी हों, जो भी विधि-विधान आप जानते हैं, उससे घर में साधारण, सूक्ष्म हवन करें। तरीका चैनल पर बताया गया है। इससे आपकी रक्षा होगी — यही सबसे सरल तरीका है। विशेष तरीका, विशेष विधि-विधान भी चैनल पर है, और अगर आप उसे अच्छे से जानते हैं तो विशेष विधि-विधान भी कर सकते हैं।
जिसे हवन करना बिल्कुल न आता हो, वह क्या करे?
सात्विक खप्पर, जिसमें मंत्र की ज़रूरत नहीं
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने कालिका योगिनी साधना में खप्पर निकालने की विधि बताई है, और सात्विक खप्पर कैसे दिया जाता है। वह किया जा सकता है, और उसमें किसी मंत्र की ज़रूरत नहीं। वह खप्पर आप भगवती काली के नाम से, हनुमान जी के नाम से, भैरव जी के नाम से दे सकते हैं — ऐसे किसी भी रक्षक स्वभाव के देवता के नाम से जो इन बातों के लिए प्रसिद्ध हों — या आपके घर में जिस शक्ति की पूजा होती है, उसके नाम से। उसमें किसी तरह का दोष नहीं।
ठीक है, आपको हवन करना नहीं आता, वक्ता कहते हैं। कालिका योगिनी साधना में उन्होंने खप्पर निकालने की विधि बताई है — सात्विक खप्पर कैसे दिया जाता है। उतना आप कर सकते हैं, और उसमें किसी तरह के मंत्र की ज़रूरत भी नहीं। वह खप्पर आप भगवती काली के नाम से, हनुमान जी के नाम से, भैरव जी के नाम से दे सकते हैं — किसी भी एक रक्षक स्वभाव के देवता के नाम से, जो इन सब बातों के लिए प्रसिद्ध हैं — या आपके घर में जिस भी शक्ति की पूजा होती है, उसके नाम से। उसमें किसी तरह का दोष नहीं।
खप्पर में जायफल का क्या नियम है?
देवी के लिए जायफल, पर हनुमान जी के लिए नहीं और भैरव के लिए हर जगह नहीं
वे कहते हैं, बस एक बात ध्यान रखनी है: अगर देवी हों, तो जायफल ज़रूर दें। अगर देवी न हों — जैसे आप भैरव जी के लिए कर रहे हों — तो भैरव जी में भी बाल भैरव, बटुक भैरव, काल भैरव हैं, और कुछ जगह जायफल नहीं दिया जाता। इसलिए सिर्फ़ जायफल न रखें। कालिका योगिनी में जायफल है; हनुमान जी के साथ जायफल नहीं होगा।
बस एक बात ध्यान रखनी है, वक्ता कहते हैं: अगर देवी हों, तो जायफल ज़रूर दें। अगर देवी न हों — जैसे आप भैरव जी के लिए कर रहे हों — तो भैरव जी में भी कई हैं, बाल भैरव, बटुक भैरव, काल भैरव, और कुछ जगह जायफल नहीं दिया जाता। इसलिए सिर्फ़ जायफल न रखें। जब आप हनुमान जी के नाम से खप्पर चढ़ाएँ, तो जो एक जायफल डाला गया था, वह नहीं रखना चाहिए: कालिका योगिनी में जायफल है, हनुमान जी के साथ जायफल नहीं होगा। बाकी सब उसी तरह सजाएँ — पूरा खप्पर सजाएँ, और हनुमान चालीसा पढ़ते हुए चढ़ाएँ। कितनी भी बड़ी नकारात्मक ऊर्जा भेजी गई हो, हनुमान चालीसा के असर और खप्पर के असर से वे चीज़ें हट जाएँगी।
आवरण पूजन में देवता को आसन कैसे दिया जाता है?
भगवती का सिंह सोमनंदी, भगवती से पहले आवाहित
वक्ता कहते हैं, आवरण पूजन में जब सब देवताओं का आवाहन होता है, तो आसन दिया जाता है। दुर्गा जी के यंत्र में, सप्तशती के मंडल में, पूजन त्रिकोण पर होता है, त्रिकोण के बीच बिंदु पर, और भगवती का आवाहन बिंदु पर होता है। पर भगवती के आवाहन से पहले सिंह का आवाहन होता है। भगवती के सिंह का नाम सोमनंदी है।
वे कहते हैं, यह तंत्र का विषय है। जब आवरण पूजा में सब देवताओं का आवाहन होता है, तो आसन दिया जाता है। मान लें हम भगवती दुर्गा का आवाहन कर रहे हैं: दुर्गा जी के यंत्र में, मंडल में, सप्तशती के मंडल में, जब पूजन हो रहा होता है, तो त्रिकोण होता है, त्रिकोण के बीच बिंदु होता है, और भगवती का आवाहन बिंदु पर होता है। पर भगवती के आवाहन से पहले सिंह का आवाहन होता है। भगवती के सिंह का नाम सोमनंदी है।
सोमनंदी के स्वरूप में किसका आवाहन होता है?
सिंह के शरीर के अलग-अलग अंगों में बसे सब देवता
वक्ता कहते हैं, जब सोमनंदी जी का आवाहन होता है, तो सोमनंदी के स्वरूप में सबका आवाहन होता है। उसमें काल भी हैं, ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी हैं, भगवती लक्ष्मी भी हैं। उनके शरीर के हर अलग अंग में अलग देवी या देवता का वास माना जाता है। इसलिए पहले उनका, यानी सोमनंदी का आवाहन पूरा होता है; उसके बाद भगवती का आवाहन होता है कि वे आकर उन पर विराजें।
जब सोमनंदी जी का आवाहन होता है, वक्ता कहते हैं, तो जो सोमनंदी का स्वरूप है, उसके अंदर सबका आवाहन होता है। उसमें काल भी हैं, ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी हैं, भगवती लक्ष्मी भी हैं। उनके शरीर के हर अलग अंग में अलग-अलग देवी-देवताओं का वास माना जाता है। इसलिए पहले उनका आवाहन होता है, सोमनंदी का आवाहन; और उसके बाद भगवती का आवाहन, कि वे आकर उन पर विराजें।
सात्विक गृहस्थ प्रयोग में हनुमान जी का आसन क्या है?
पौष्टिक और शांति कर्म में आसन के रूप में वायु का आवाहन
ठीक इसी तरह, जब हनुमान जी का आवाहन होता है, खासकर तंत्रोक्त क्रियाओं में, तो उनसे पहले उनके आसन का आवाहन होता है। सात्विक गृहस्थ प्रयोग में, जहाँ हम साधारण पौष्टिक और शांति कर्म के लिए हनुमान जी का आवाहन करते हैं, वहाँ आसन के रूप में वायु का आवाहन करते हैं। पवन का आवाहन होता है, और वही उनका आसन बनता है — वायु।
ठीक इसी तरह, वक्ता कहते हैं, जब हनुमान जी का आवाहन होता है, खासकर तंत्रोक्त क्रियाओं में, तो हनुमान जी के आवाहन से पहले उनके आसन का आवाहन होता है। सात्विक गृहस्थ प्रयोग में, जहाँ साधारण पौष्टिक कर्म और शांति कर्म के लिए हम हनुमान जी का आवाहन करते हैं, वहाँ आसन के रूप में वायु का आवाहन करते हैं। पवन का आवाहन होता है, और वही उनका आसन बनता है: वायु।
कठिन तंत्र प्रक्रियाओं में हनुमान जी का आसन क्या है?
उस स्थान पर मौजूद प्रेत या पिशाच शक्ति को आसन बनाना
पर जब तंत्र की कठिन प्रक्रियाओं की बात हो — जब अभिचार को नष्ट करना हो, जब घर में उस तरह की नकारात्मक चीज़ें हों — तब वहाँ उस स्थान पर मौजूद प्रेत शक्ति या पिशाच शक्ति का ही आसन के रूप में आवाहन होता है।
पर जब तंत्र की क्लिष्ट प्रक्रियाओं की बात हो, वक्ता कहते हैं — जब अभिचार को नष्ट करना हो, जब घर में उस तरह की नकारात्मक चीज़ें हों — तब वहाँ, आसन के रूप में, उस स्थान पर मौजूद प्रेत शक्ति और पिशाच शक्ति का ही आसन के रूप में आवाहन होता है। वे कहते हैं, यह बात जान लें।
शास्त्र में कहाँ लिखा है कि प्रेत और पिशाच हनुमान जी का आसन हैं?
पंचमुखी हनुमान कवच और हनुमत् सहस्रनाम
वक्ता कहते हैं, अगर आप इसे और अच्छे से जानना चाहें और आपको लगे कि यह गढ़ी हुई बात है, तो पंचमुखी हनुमान कवच का पाठ करें: उसमें इसका प्रतीकात्मक वर्णन है कि हनुमान जी प्रेतासन पर हैं। या हनुमत् सहस्रनाम का पाठ करें, उसमें चार-पाँच जगह यह बात मिलेगी। हनुमान जी प्रेत और पिशाच पर हैं — वही उनका आसन है, और वे उस पर बैठते हैं।
और अगर आप यह बात और अच्छे से जानना चाहें, अगर आपको लगे कि यह गढ़ी हुई है, वक्ता कहते हैं, तो पंचमुखी हनुमान कवच का पाठ करें। पंचमुखी हनुमान के कवच में इस बात का प्रतीकात्मक वर्णन है कि हनुमान जी प्रेतासन पर हैं; या हनुमत् सहस्रनाम का पाठ करें, उसमें आपको चार-पाँच जगह यह बात मिलेगी। हनुमान जी प्रेत और पिशाच पर हैं — वही उनका आसन है, और वे उस पर बैठते हैं।
क्या यह सच है कि मुस्लिम तंत्र के आगे हनुमान जी हट जाते हैं?
हनुमान जी के हट जाने के डर पर उनका जवाब
वक्ता कहते हैं, लोग डरते हैं कि अगर मुस्लिम तंत्र हो जाए तो हनुमान जी हट जाएँगे। वे जवाब देते हैं कि हनुमान जी तो उनसे भी बड़ी चीज़ों पर बैठते हैं, और पूछते हैं कि क्या इनमें से कुछ भी उनकी क्षमता के आगे टिक सकता है। वे कहते हैं, जानकारी की कमी ही लोगों को इस तरह डराती है।
आप लोग डरते हैं, वक्ता कहते हैं, कि अगर मुस्लिम तंत्र हो गया तो हनुमान जी हट जाएँगे। भाई, वे जवाब देते हैं, वे तो उनसे भी आगे की चीज़ों पर बैठते हैं — यह उनकी क्षमता है। क्या ये सब उसके आगे टिकेंगे? तो वे कहते हैं, जो लोग इस तरह डर जाते हैं, उनमें जानकारी की कमी है। और वे इसे व्यवहार में करते ही नहीं: वे प्रेत, पिशाच और मसान को ही बड़ा मान लेते हैं, यह मानते हुए कि मसान बहुत बड़ी शक्ति है।
लोग मसान को इतना बड़ा क्यों मानते हैं?
मशहूर यूट्यूबर प्रेत, पिशाच और मसान को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं
वे कहते हैं कि जो लोग मशहूर हैं, बड़े यूट्यूबर, जिनके ज़रिए आजकल सब तक जानकारी पहुँचती है, वे इन्हीं चीज़ों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते और बताते हैं; इसलिए लोगों में वैसी ही जानकारी जाती है। अगर कोई छोटा चैनल अलग दिखाए और बताए, तो लोग उसे छोटा मानकर बात को महत्व नहीं देते — पर वे कहते हैं, बातों को समझें और जानें कि सच क्या है।
जो लोग मशहूर हैं, बड़े यूट्यूबर, जिनके ज़रिए आजकल सब तक जानकारी पहुँच रही है — वे लोग इन्हीं चीज़ों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते और बताते हैं, वक्ता कहते हैं। इसलिए लोगों में वैसी ही जानकारी जाती है। अगर आज हम दिखा और बता रहे हैं, और चैनल छोटा है, तो लोग सोचेंगे यह छोटी बात है, यह क्या बताएगा। इसलिए लोग उस बात को महत्व नहीं देंगे। पर वे कहते हैं, बातों को समझें और जानें कि सच क्या है।
ऐसे जीव पर हनुमान जी कैसे बैठते हैं?
प्रेत पर सबसे पहले बायां पैर
वक्ता कहते हैं कि वहां जो भी प्रेत, पिशाच या मसान होता है, हनुमान जी सबसे पहले उसी पर अपना बायां पैर रखते हैं। इंटरनेट पर भी ऐसी तस्वीरें मिलेंगी, जो सांकेतिक रूप से ऐसे ही बनी हैं कि वे सबसे पहले उन्हीं पर पैर रखते हैं। फिर दूसरा पैर, और फिर वे तीसरे पर बैठ जाते हैं। एक ही हो, तो उसी पर बैठ जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि वहां जो भी प्रेत, पिशाच या मसान होता है, हनुमान जी सबसे पहले उसी पर अपना बायां पैर रखते हैं। इंटरनेट पर भी ऐसी तस्वीरें मिलेंगी, जो सांकेतिक रूप से ऐसे ही बनी हैं कि वे सबसे पहले उन्हीं पर पैर रखते हैं। फिर दूसरा पैर, और फिर वे तीसरे पर बैठ जाते हैं। एक हो, तो उसी पर बैठ जाते हैं।
क्या दूसरे देवता भी नकारात्मक जीवों को अपना आसन बनाते हैं?
प्रेत और पिशाच पर बैठी काली, प्रत्यंगिरा और बगलामुखी
वक्ता कहते हैं कि जैसे भगवती काली अपने अनेक रूपों में सर्व-वाहना हैं — वे हर किसी को अपना वाहन और हर किसी को अपना आसन बनाती हैं — वैसे ही भगवती प्रत्यंगिरा सीधे पिशाच पर बैठती हैं। जो भी नकारात्मक शक्ति हो, वे सीधे उसी पर बैठ जाती हैं। भगवती बगलामुखी भी साक्षात सब पर बैठती हैं। प्रेत हो, तो प्रेत पर बैठती हैं। यानी वे पहले प्रेत को दबाएंगी, इसलिए पहले उसी पर बैठेंगी। ठीक ऐसे ही हनुमान जी।
वक्ता कहते हैं कि भगवती काली अपने अनेक रूपों में सर्व-वाहना हैं। वे हर किसी को अपना वाहन बनाती हैं, हर किसी को अपना आसन बनाती हैं। जैसे भगवती महाप्रत्यंगिरा सीधे पिशाच पर बैठती हैं। जो भी नकारात्मक शक्ति हो, वे सीधे उसी पर बैठ जाती हैं। भगवती बगलामुखी भी साक्षात सब पर बैठती हैं। यानी प्रेत हो, तो प्रेत पर बैठती हैं — वे पहले प्रेत को दबाएंगी, इसलिए पहले उसी पर बैठेंगी। ठीक इसी तरह हनुमान जी।
मन की कमज़ोरी का ही सामने वाला फ़ायदा उठाता है
मन की कमज़ोरी का ही फ़ायदा उठाया जाता है
वक्ता कहते हैं कि यह मत सोचिए कि आपके घर में तंत्र प्रयोग हो गया है, और फिर खुद को लाचार मानकर मन में हार मत जाइए — कि कोई मुझे मार देगा, मेरे साथ ऐसा हो जाएगा। मन की इसी कमज़ोरी का सब फ़ायदा उठाते हैं। इसकी जगह एक बार हुंकार के साथ हनुमान जी का आवाहन कीजिए। एक बार किलकारी के साथ भैरव जी का आवाहन कीजिए, उसी भाव से जिससे आप चिल्लाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह नहीं सोचना है कि आपके घर में तंत्र प्रयोग हो गया, और आप खुद को लाचार मानकर मन में हार जाएं — कोई मुझे मार देगा, मेरे साथ ऐसा-वैसा हो जाएगा। मन की इसी कमज़ोरी का सब फ़ायदा उठाते हैं। एक बार हुंकार के साथ हनुमान जी का आवाहन कीजिए। एक बार किलकारी के साथ भैरव जी का आवाहन कीजिए, उसी भाव से जिससे आप चिल्लाते हैं। उसी भाव से उनका आवाहन करके देखिए। उनके नाम से आहुति देकर देखिए। उनकी शरण में जाकर देखिए।
पूरी हुंकार से बुलाने पर हनुमान और भैरव कुछ ही झटकों में तंत्र ख़त्म कर देते हैं
हनुमान जी और भैरव जी पूरे वेग से आते हैं और कुछ झटकों में तंत्र ख़त्म कर देते हैं
वक्ता कहते हैं कि कालिका योगिनी की जो विधि दी गई है, उसमें आवाहन की पद्धति बताई गई है — कि उनका आवाहन कैसे करना है। जाइए, आवाहन करके देखिए। पूरी हुंकार से, पूरी किलकारी से, पूरे वेग से वे आते हैं। झटके पर झटके में वे उसे ख़त्म करके चले जाते हैं, तंत्र की जितनी भी नकारात्मक चीज़ें हों। पर वह भाव ही नहीं आता।
वक्ता कहते हैं कि कालिका योगिनी की जो विधि दी गई है, उसमें आवाहन की पद्धति बताई गई है — कि समर्पित भाव से उनका आवाहन कैसे करना है। जाइए, आवाहन करके देखिए। पूरी हुंकार से, पूरी किलकारी से, पूरे वेग से वे आते हैं। झटके पर झटके में वे उसे ख़त्म करके चले जाते हैं, तंत्र की जो भी नकारात्मक चीज़ें हों। वे कहते हैं, पर वह भाव ही नहीं आता। और हम बोलते हैं तो लोग कहेंगे कि आप तो बड़ी आसानी से बोल रहे हैं, ऐसा कुछ नहीं होगा। आप यही मानकर बैठे हैं कि ऐसा कुछ नहीं होगा — इसलिए नहीं हो रहा। हमें पता है, क्योंकि जो लोग मानते हैं, उनके साथ हो रहा है।
यजमान की निराशा उसके लिए काम करने वाले पंडित का विश्वास भी तोड़ देती है
यजमान की निराशा से पंडित का अपना विश्वास टूटता है
आपके चौबीस में से बाईस घंटे यह रोने में जाते हैं कि मेरा बिगड़ गया, मुझ पर तंत्र हो गया — और जो आपके लिए कुछ कर रहा है, उसका भी असर नहीं होता, क्योंकि आप उसे भी नकारात्मक करते रहते हैं। पंडित जी आपके लिए हवन करने जाएंगे और आप उन्हें इतना नकारात्मक कर देंगे — कि फलाने पंडित जी से हवन कराया, कुछ नहीं हुआ; उनको जाकर दिखाया, कुछ नहीं हुआ। फिर पंडित जी के मन में चलने लगता है कि इसका कुछ नहीं होता, तो मुझसे भी नहीं होगा।
वक्ता कहते हैं कि आप करेंगे नहीं, क्योंकि आपके चौबीस में से बाईस घंटे रोने में जाते हैं — मेरा बिगड़ गया, मुझ पर तंत्र हो गया, मुझ पर ऐसा कर दिया गया। और जो आपके लिए कुछ कर रहा है, उसका भी असर क्यों नहीं होता? क्योंकि आप उसे भी नकारात्मक करते रहते हैं। पंडित जी आपके लिए हवन करने जाएंगे और आप पंडित जी को इतना नकारात्मक कर देंगे: पंडित जी, फलाने पंडित जी से हवन कराया, कुछ नहीं हुआ; पंडित जी, उनको जाकर दिखाया, कुछ नहीं हुआ। पंडित जी के मन में सबसे पहले यही चलेगा: इसका कुछ नहीं होता, मुझसे भी नहीं होगा। वे कितने भी समर्पित हों, वे भी कहेंगे कि इसका कुछ नहीं होगा — चलो, काम निपटाओ। जो आया सो आया, जो नहीं आया सो नहीं आया। सकारात्मक रहना सीखिए।
जो जानकारी नहीं है वह लीजिए, पर हर बात में टांग अड़ाने वाले लवणासुर मत बनिए
जानकारी लीजिए, पर लवणासुर मत बनिए
वक्ता कहते हैं कि जानकारी नहीं है तो जानकारी लीजिए — पर लवणासुर मत बनिए, कि हर बात में टांग अड़ा दें और कहें कि यह देवी नहीं है, फलां देवी नहीं है, ऐसा नहीं है। आप लोगों को तो अपने ही घर में पूजे जाने वाले देवी-देवताओं की भी जानकारी नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि जानकारी नहीं है तो जानकारी लीजिए। पर लवणासुर मत बनिए — कि हर एक बात में आकर टांग अड़ा दें और कहें कि नहीं, यह देवी नहीं है, फलां देवी नहीं है, ऐसा नहीं है। आप लोगों को तो यह भी जानकारी नहीं है कि आपके अपने घर में कौन-से देवी-देवता पूजे जाते हैं।
अगर ब्रह्म बाबा और शिव जी दोनों पूजे जाते हैं, तो देवता किसे मानें?
दोनों को — जिसे एक बार सम्मान से स्थान दिया, उसे वापस नहीं लिया जाता
प्रश्न आता है: ब्रह्म बाबा पूजे जाते हैं, पर हम मुख्य रूप से शिव जी की पूजा करते हैं और ब्रह्म बाबा उनके नीचे पूजे जाते हैं — तो देवता किसे मानें? वे उत्तर देते हैं: दोनों को मानिए। अगर आपने कभी किसी को सम्मान से स्थान दिया है, तो उन्हें मानना पड़ेगा — उन्हें हटाएंगे क्यों?
वक्ता कहते हैं कि आप बताते हैं कि घर में ब्रह्म बाबा पूजे जाते हैं। पर फिर यह बात सामने आती है: ब्रह्म बाबा पूजे जाते हैं, पर हम मुख्य रूप से शिव जी की पूजा करते हैं और ब्रह्म बाबा उनके नीचे पूजे जाते हैं — तो अब बताइए, देवता किसे मानें, ब्रह्म बाबा को या शिव जी को। हमने कहा, दोनों को मानिए। अगर आपने कभी किसी को सम्मान देकर स्थान दिया है, तो उन्हें मानना ही पड़ेगा न? उन्हें हटाएंगे क्यों?
लोग दोनों तरह से झगड़ते हैं, क्योंकि ज्ञान ही नहीं है
ज्ञान न होने से लोग दोनों तरह से झगड़ते हैं
वक्ता कहते हैं कि अगर हम उन्हें बताएं कि नहीं भाई, ब्रह्म तो भूत-प्रेत-पिशाच है, उसकी पूजा नहीं करनी चाहिए — तो वे झगड़ेंगे कि आप गलत बोल रहे हैं, यह देवता है, हमारे इलाके में घर-घर पूजे जाते हैं। इसलिए, वे कहते हैं, आपके ज्ञान में कमी है: कौन देवता है, कौन पिशाच है, कौन क्या है — आपको ज्ञान नहीं है। आपकी जानकारी आधी-अधूरी है, और आप जानकारी लेना भी नहीं चाहते।
वक्ता कहते हैं कि अगर हम उनसे कहें, नहीं भाई, ब्रह्म तो भूत है, प्रेत है, पिशाच है, उसकी पूजा नहीं करनी चाहिए — तो वे झगड़ेंगे: आप गलत बोल रहे हैं, यह देवता है, हमारे इलाके में घर-घर पूजे जाते हैं। तो आपके ज्ञान में कमी है: कौन देवता है, कौन पिशाच है, कौन क्या है — आपको ज्ञान नहीं है। आपकी जानकारी आधी-अधूरी है, और आप जानकारी लेना भी नहीं चाहते। लोग हनुमान जी को लेकर इतने उलझे हैं कि उन्हें बिल्कुल नहीं समझते — कहते हैं, हनुमान जी से क्या होगा, हनुमान चालीसा से क्या होगा, इनसे भूत-प्रेत का कुछ नहीं होता।
हनुमान चालीसा की कौन-सी चौपाई संपुट के रूप में लगाई जाती है?
भूत पिसाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावे
वक्ता कहते हैं कि हनुमान चालीसा में एक चौपाई है: भूत पिसाच निकट नहिं आवै हनुमान जब नाम सुनावे — महावीर जब नाम सुनावे. इसका संपुट लगाकर हनुमान चालीसा का पाठ कीजिए। थोड़ा समय लगेगा: चालीस की जगह एक सौ बीस दोहा-चौपाई हो जाएंगी।
वक्ता कहते हैं कि हनुमान चालीसा में एक चौपाई है, और वे उसे सुनाते हैं: भूत पिसाच निकट नहिं आवै हनुमान जब नाम सुनावे — महावीर जब नाम सुनावे. इसका संपुट लगाकर हनुमान चालीसा का पाठ कीजिए। थोड़ा समय लगेगा: चालीस की जगह एक सौ बीस दोहा-चौपाई हो जाएंगी।
हर चौपाई के साथ संपुट असल में कैसे लगाया जाता है?
चालीसों चौपाइयों में हर चौपाई के पहले और बाद वही चौपाई
वे बोलकर दिखाते हैं: भूत पिसाच निकट नहिं आवै महावीर जब नाम सुनावे — जय हनुमान ज्ञान गुण सागर जय कपि तिहु लोक उजागर — भूत पिसाच निकट नहिं आवै महावीर जब नाम सुनावे. वे कहते हैं, इसी तरह चालीसों चौपाइयों का संपुटीकरण कीजिए।
वक्ता संपुट बोलकर दिखाते हैं, पहली चौपाई के दोनों ओर रक्षा वाली चौपाई लगाकर: भूत पिसाच निकट नहिं आवै महावीर जब नाम सुनावे। जय हनुमान ज्ञान गुण सागर जय कपि तिहु लोक उजागर। भूत पिसाच निकट नहिं आवै महावीर जब नाम सुनावे। इसी तरह संपुट लगाकर चालीसों चौपाइयों का संपुटीकरण कीजिए। जिनके घर में प्रेत, पिशाच, मुसलमानी सैयद, लेमड़ा-तेमड़ा — जो भी बैठा है — वे संकल्प लेकर यह करें।
संपुटित पाठ से पहले कौन-सा संकल्प लेना चाहिए?
घर और उसमें बैठी हर चीज़ का नाम लेकर संकल्प
वे कहते हैं, संकल्प में यह लीजिए: इस घर में जिस भी तरह का तंत्र है, इस घर में जो भी प्रेत-पिशाच हैं, वे कितने भी शक्तिशाली हों — हे हनुमान जी, हे पवनपुत्र, हे अंजनी के लाल, आपके परम भक्त गोस्वामी तुलसी जी महाराज की रची एक चौपाई, भूत पिसाच निकट नहिं आवै महावीर जब नाम सुनावे, के संपुटीकरण के साथ पूरी हनुमान चालीसा के पाठ का मैं संकल्प लेता हूं। मेरे घर, परिवार, स्थान और निवास के सारे प्रेत-पिशाचों का नाश कीजिए, उन्हें यहां से हटाइए। इसी के लिए मैं आपके पाठ का संकल्प लेता हूं।
वक्ता संकल्प बोलकर बताते हैं: संकल्प में यह लीजिए — कि इस घर में जिस भी तरह का तंत्र-विचार है, इस घर में जो भी प्रेत-पिशाच हैं, वे कितने भी शक्तिशाली हों। हे हनुमान जी, हे पवनपुत्र, हे अंजनी के लाल — आपके परम भक्त गोस्वामी तुलसी जी महाराज की रची हनुमान चालीसा की एक चौपाई, भूत पिसाच निकट नहिं आवै महावीर जब नाम सुनावे, के संपुटीकरण के साथ मैं पूरी हनुमान चालीसा के पाठ का संकल्प लेता हूं। मेरे घर-परिवार में, मेरे इस स्थान में, मेरे इस निवास में जिस भी तरह के प्रेत-पिशाच हैं — उन सबका नाश कीजिए, उन्हें यहां से हटाइए। इसी के लिए मैं आपके पाठ का संकल्प लेता हूं। वे कहते हैं, यह बोलिए और पाठ शुरू कीजिए। और फिर पहले ही दिन से देखिए, हनुमान जी वहां क्या खेल दिखाते हैं।
ज़्यादातर लोगों में पहले दिन के बाद असर क्यों नहीं टिकता?
पाठ में ऊर्जा बढ़ती है और नियम न निभाने पर घट जाती है
वे कहते हैं, कारण यह है कि आपका मनोबल उतना नहीं बढ़ता। एक दिन आप पाठ करेंगे, और जब तक करेंगे आपकी ऊर्जा काफ़ी ऊंची रहेगी और प्रेत-पिशाचों पर डंडा पड़ेगा। उसके बाद ऊर्जा घट जाएगी — क्योंकि आपने पहला दिन कर लिया और नीति-नियम तो निभाने ही नहीं हैं।
वे बताते हैं कि संपुट के बारे में उन्होंने अब तक नहीं बताया था, अभी लाइव बता रहे हैं, और बाद में बनाकर भी दिखाएंगे। वे कहते हैं, कारण यह है कि आपका मनोबल उतना नहीं बढ़ता। एक दिन आप पाठ करेंगे, और जब तक पाठ करेंगे आपकी ऊर्जा काफ़ी ज़्यादा रहेगी; प्रेत-पिशाचों पर डंडा पड़ेगा। उसके बाद ऊर्जा कम हो जाएगी — क्योंकि आपने पहला दिन कर लिया, और नीति-नियम तो आपको निभाने ही नहीं हैं।
संपुटित हनुमान चालीसा पाठ के लिए वक्ता खान-पान के कौन-से नियम ज़रूरी बताते हैं?
लहसुन-प्याज़ नहीं, मांस-मछली नहीं, वैष्णव भोजन
वे कहते हैं, आप लहसुन-प्याज़ खाए बिना नहीं रह पाएंगे; मांस-मछली खाए बिना नहीं रह पाएंगे; वैष्णव भोजन नहीं करेंगे। और फिर उस पर बहस करेंगे — मिथिलांचल के लोग कहेंगे कि हमारे यहां तो बिना दही-मछली के कुछ होता ही नहीं, तो फिर हमारे इलाके से प्रेत-पिशाच कैसे भागेंगे? वे उत्तर देते हैं, नियम तो नियम है।
वक्ता कहते हैं कि आपने पहला दिन कर लिया, और नीति-नियम तो आपको निभाने ही नहीं हैं। आप लहसुन-प्याज़ खाए बिना नहीं रह पाएंगे। मांस-मछली खाए बिना नहीं रह पाएंगे। वैष्णव भोजन नहीं करेंगे। और फिर उस पर बहस करेंगे। मिथिलांचल के लोग कहेंगे कि हमारे यहां तो बिना दही-मछली के कुछ होता ही नहीं — तो फिर भाई, हमारे इलाके से प्रेत-पिशाच कैसे भागेंगे? वे उत्तर देते हैं, नियम तो नियम है।
मिथिला की भगवती जानकी परम वैष्णव हैं, और उनके हृदयेश्वर श्री राम भी
परम वैष्णव जानकी और श्री राम
वक्ता कहते हैं कि मिथिला की भगवती जानकी परम वैष्णव हैं। जब आप उनकी बात नहीं मान रहे, और उनके हृदयेश्वर श्री राम परम वैष्णव हैं, साक्षात वैष्णव रूप हैं — अगर आप उनका नियम नहीं मानेंगे, और फिर यहां बड़ी-बड़ी बातें करेंगे कि यह जा नहीं रहा, तो भाई, जाएगा कैसे?
मांस खाने से नकारात्मक शक्ति टिकी क्यों रहती है?
वह आपकी जीभ में घुसकर आपके ज़रिए स्वाद लेती है
वक्ता कहते हैं कि वे आपके शरीर में और आपकी जीभ में घुसकर वह स्वाद ले रहे हैं — तो वे जाएंगे कहां से? जब तुलसी पत्र आपकी जीभ पर विराजे, जब आप तुलसी के बिना कोई भोग न लगाएं, जब बेल पत्र के बिना कोई भोग न बने, जब भगवान और देवता उसे ग्रहण करें और आप उसे वापस ग्रहण करें, शुद्ध और सात्विक होकर — तब कुछ मिलता है।
वक्ता कहते हैं कि वे आपके शरीर में और आपकी जिह्वा में घुसकर वह स्वाद ले रहे हैं। तो वे जाएंगे कहां से? जब तुलसी पत्र आपकी जीभ पर विराजमान हो, जब आप तुलसी के बिना भोग न लगाएं, जब बेल पत्र के बिना कोई भोग न बने, जब भगवान और देवता उसे ग्रहण करें और आप शुद्ध और सात्विक होकर उसे ग्रहण करें — तब कुछ मिलता है। और अगर आपके घर में उग्र देव विराजमान हैं, तो भाई, वहां प्रेत-पिशाच चल ही कैसे रहा है? फिर कुछ गड़बड़ है; आप किसी चीज़ में कमी कर रहे हैं।
देवता साल भर मांस नहीं मांगते — यह आपकी अपनी जीभ का लालच है
देवता साल भर नहीं मांगते — यह आपकी अपनी जीभ है
वे कहते हैं, जीभ के लालच में आप देवता को चढ़ा रहे हैं, पर देवता साल भर यह नहीं मांगते। वे मानते हैं कि उन्हें भी पता है कि वार्षिक पूजन चलता है और दशमी की बलि चलती है। पर आप हमेशा लाकर चढ़ाते रहते हैं, और उन्हीं देवताओं को: आप उन देवताओं को कुछ नहीं दे रहे, अपनी जीभ का लालच शांत कर रहे हैं और फिर नाम देवता पर डाल देते हैं — और जब परेशानी बढ़ती है तो दोष भी देवता को देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जिह्वा के लालच में आप देवता को चढ़ा रहे हैं, पर भाई, देवता साल भर नहीं मांगते। हमें भी पता है कि वार्षिक पूजन चलता है, दशमी की बलि चलती है। आप हमेशा लाकर चढ़ाते रहते हैं, और उन्हीं देवताओं को चढ़ाते हैं। आप उन देवताओं को कुछ नहीं दे रहे; अपनी जीभ का लालच शांत कर रहे हैं, और फिर नाम देवता पर डाल देते हैं, और जब परेशानी बढ़ती है तो उसका दोष भी देवता को देते हैं। आप लोगों की यही परेशानी है: नियम भी नहीं निभाना, और सब कुछ चाहिए भी। तो थोड़ा सावधान हो जाइए — अगर ये चीज़ें ख़त्म करनी हैं, तो थोड़ी तकलीफ़ होगी।
हनुमान जी के उपायों की बढ़ती सीढ़ी क्या है?
चालीसा, संपुट, बजरंग बाण, हनुमान जंजीरा
पहले दिन परेशानी उन्नीस-बीस होगी, दूसरे दिन उन्नीस-बीस; फिर एक समय आएगा जब दस-पंद्रह दिन बाद वह हनुमान जी के आगे नहीं चलेगी। वे कहते हैं, संपुटित हनुमान चालीसा से आगे, अगर तंत्रोक्त बजरंग बाण का संपुट किया जाए, तो वह शत्रुओं को नचाएगा और प्रेत-पिशाचों को नचाएगा। फिर हनुमान जंजीरा है, जिसके पाठ में कम से कम पांच-छह घंटे लगते हैं।
वक्ता कहते हैं कि पहले दिन आप करेंगे और परेशानी उन्नीस-बीस होगी; दूसरे दिन उन्नीस-बीस। दस-पंद्रह दिन करने के बाद एक समय आएगा जब वह हनुमान जी के आगे नहीं चलेगी। उन्होंने संपुट हनुमान चालीसा उस तरह बताया है; और अगर तंत्रोक्त बजरंग बाण का भी उसी तरह संपुटीकरण कर दिया जाए, तो वह शत्रुओं को कैसा नाच नचाएगा, प्रेत-पिशाचों को कैसा नाच नचाएगा। फिर हनुमान जंजीरा है। वे कहते हैं, सोचिए, हनुमान जंजीरा के पाठ में कम से कम पांच-छह घंटे लगेंगे। अगर वह किया जाए, तो क्या हालत होगी? जो भी प्रेत-पिशाच हो, जो भी ब्रह्म हो, कितना भी बड़ा हो — वह रहने वाला नहीं है।
हनुमान जी की पूजा के लिए कैसा पहनावा ज़रूरी है?
धोती पर बंधा पोंछटा, और मर्यादित वस्त्र
वक्ता पूछते हैं, धोती का पोंछटा बांधना आता है — कभी बांधा है? धोती खरीदिए, पोंछटा बांधना सीखिए। हनुमान जी की पूजा बिना पोंछटा बांधे नहीं होती। आप लोग जींस-टॉप में बैठ जाते हैं; रेकी वाले लोग जींस-टॉप पहनकर पूजा करेंगे। वे कहते हैं, कम से कम मर्यादित वस्त्र पहनिए: सिर पर दुपट्टा रखिए और कम से कम सूट पहनिए। पुरुषों के पास भी समय नहीं है, वे शर्ट-पैंट में बैठ जाएंगे, हाफ़ पैंट में बैठ जाएंगे, और बहुत खुश हुए तो लाल गमछा लपेट लेंगे, या पिताजी की पुरानी लुंगी पहनकर बैठ जाएंगे।
वक्ता पूछते हैं, धोती का पोंछटा बांधना आता है? कभी बांधा है? धोती खरीदिए, पोंछटा बांधना सीखिए। हनुमान जी की पूजा बिना पोंछटा बांधे नहीं होती। आप लोग जींस-टॉप में बैठ जाते हैं; रेकी वाले लोग जींस-टॉप पहनकर पूजा करेंगे। भाई, कम से कम मर्यादित वस्त्र पहनिए: सिर पर दुपट्टा रखिए, कम से कम सूट पहनिए। पुरुषों के पास भी समय नहीं है — वे शर्ट-पैंट पहनकर बैठ जाएंगे, हाफ़ पैंट पहनकर बैठ जाएंगे, और बहुत खुश हुए तो लाल गमछा लपेट लेंगे, ऐसा लगेगा जैसे थान से अभी कटवाकर लाए हों, या पिताजी की पुरानी लुंगी पहनकर बैठ जाएंगे। कहां से होगा? तो पोंछटा बांधकर बैठिए, और फिर हनुमान चालीसा का प्रभाव देखिए।
अगर साधारण हनुमान चालीसा से फल न मिले तो?
क्रम से संपुट, बजरंग बाण और जंजीरा
आप साधारण हनुमान चालीसा कर रहे हैं और कुछ नहीं हो रहा — संपुट कीजिए। उससे नहीं हो रहा — बजरंग बाण के साथ संपुट कीजिए। उससे नहीं हो रहा — हनुमान जंजीरा के साथ संपुट कीजिए। वक्ता कहते हैं, यह संभव ही नहीं कि प्रेत-पिशाच की इतनी हैसियत रहे कि वह वहां बैठा रहे।
वक्ता कहते हैं कि आप साधारण हनुमान चालीसा कर रहे हैं और कुछ नहीं हो रहा — संपुट लगाइए। उससे नहीं हो रहा — बजरंग बाण के साथ संपुट कीजिए। उससे नहीं हो रहा — हनुमान जंजीरा के साथ संपुट कीजिए। यह संभव ही नहीं कि प्रेत-पिशाच की हैसियत ऐसी रहे कि वह वहां बैठा रहे। यह हो ही नहीं सकता।
घर के ही लोगों का किया तंत्र हनुमान जंजीरा से पलट गया
घर के ही लोगों का किया तंत्र, पलट गया
वे कहते हैं कि वे एक सच्ची घटना बता रहे हैं: इसी तरह कई घरों में अपने ही घर के लोग, साथ रहने वाले लोग, कभी-कभी तंत्र-मंत्र करते हैं। हनुमान जंजीरा का असर ऐसा हुआ कि वे घर में ही बैठे-बैठे रो रहे थे, घर में ही लात-घूंसे खा रहे थे। पाठ चल रहा है, और उधर जो कर रहे थे वे रो रहे हैं।
वक्ता कहते हैं, और वह छोड़िए — वे एक सच्ची घटना, एक अनुभव बता रहे हैं। इसी तरह कई घरों में अपने ही घर के लोग, साथ रहने वाले लोग, कभी-कभी तंत्र-मंत्र करते हैं। हनुमान जंजीरा का असर ऐसा हुआ कि वे घर में ही बैठे हैं और घर में ही रो रहे हैं, घर में ही लात-घूंसे खा रहे हैं। पाठ चल रहा है, और उधर जो कर रहे थे वे रो रहे हैं। वे कहते हैं, ये सब असर होते हैं, और आपको देखने को मिलेगा।
अगर कोई दस-पंद्रह साल से पीड़ित हो तो?
फिर भी असर होगा, भले शुरू में न हो
आप एक साल से पीड़ित हैं, दस साल से, पंद्रह साल से — पीड़ा कितनी भी बड़ी हो, करेंगे तो असर मिलेगा। शुरू में हो सकता है न मिले; थोड़े समय बाद मिले, पर मिलेगा। अगर शरीर में तकलीफ़ है और खुद नहीं कर सकते, तो किसी से करवाइए। घर में नहीं कर सकते, तो मंदिर में कीजिए, और मंदिर से घर आइए। दूसरों को दोष मत दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि आप एक साल से पीड़ित हैं, दस साल से पीड़ित हैं, पंद्रह साल से पीड़ित हैं — पीड़ा कितनी भी बड़ी हो, करेंगे तो असर मिलेगा। शुरू में हो सकता है न मिले; कुछ समय बाद मिले, पर मिलेगा। अगर शरीर में तकलीफ़ है और खुद नहीं कर सकते, तो किसी से करवाइए। घर में नहीं कर सकते, तो मंदिर में कीजिए, और मंदिर से घर आइए। दूसरों को दोष मत दीजिए।
प्रेत अपना हिसाब चुका रहा है, कर्म योनि तो केवल मनुष्य जन्म है
प्रेत भी अपना हिसाब चुका रहा है
वक्ता कहते हैं कि वह प्रेत-पिशाच भी अपना हिसाब चुका रहा है, जैसा उन्होंने पहले बताया था: मनुष्य की योनि कर्म योनि है, जबकि प्रेत, पिशाच और देवता सब भोग योनियां हैं — वे भोग रहे हैं। हम अभी जो कर्म करते हैं, मरने के बाद वैसी योनि पाएंगे और उसे भोगेंगे; वहां जो भी अच्छा-बुरा करेंगे, उसका कोई फल नहीं मिलेगा। वे कहते हैं, यह भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है, मैंने नहीं।
वक्ता कहते हैं कि वह प्रेत-पिशाच भी बराबर अपना हिसाब चुका रहा है — यह हम पहले कह चुके हैं। मनुष्य की योनि कर्म योनि है। प्रेत, पिशाच और देवता सब भोग योनियां हैं; वे भोग रहे हैं। आप अभी जो कर्म कर रहे हैं, हम अभी जो कर्म कर रहे हैं, मरने के बाद हमें वैसी योनि मिलेगी और हम उसे भोगेंगे। वहां जो भी अच्छा-बुरा करेंगे, उसका कोई फल नहीं मिलेगा। वे कहते हैं, यह भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है; हमने नहीं कहा।
कुलदेवी और कुलदेवता की दृष्टि सात समंदर पार तक पहुंचती है, आप उन्हें जानें या न जानें
उनकी दृष्टि सात समंदर पार तक पहुंचती है
अगले दिन के सत्र — कुलदेवी, कुलदेवता, क्षेत्र देवता और स्थानीय देवताओं — की घोषणा करते हुए वे इस शंका का उत्तर देते हैं कि हम उन्हें जानते नहीं। वे कहते हैं, आप नहीं जानते — हो सकता है आप अपने माता-पिता को भी न जानते हों। पर उनकी दृष्टि इतनी अथाह है कि वे सात समंदर पार भी हों, तो वहीं से देख रहे हैं कि यह मेरा बच्चा है। आप क्या कर रहे हैं, उन्हें दिखता है।
वक्ता कहते हैं कि हर तरह की शंका है: कि हम उन्हें जानते नहीं, तो क्या होगा। वे कहते हैं, आप नहीं जानते। हो सकता है आप अपने माता-पिता को भी न जानते हों। उनकी दृष्टि इतनी अथाह है कि वे सात समंदर पार भी हों, तो वहीं से देख रहे हैं कि यह मेरा बच्चा है। आप क्या कर रहे हैं, उन्हें दिख रहा है। अब आप ऐसा क्या करें कि वे आपके साथ आ जाएं और आपका कल्याण करें — वे कहते हैं, यही अगले सत्र का मुख्य विषय होगा।
गायों में लंपी महामारी के विरुद्ध गोवर्धन पर्वत पर नवचंडी महायज्ञ शुरू हुआ है
गायों की लंपी महामारी के लिए गोवर्धन पर्वत पर नवचंडी
वे बताते हैं कि गायों में फैली लंपी नाम की महामारी के नाश के लिए उस दिन गोवर्धन पर्वत पर भगवती नव दुर्गा का नवचंडी महायज्ञ शुरू हुआ है — ताकि महामारी का नाश हो और गौ माता ठीक से सुरक्षित रहें और बचें। वे कहते हैं, इतनी मौतें हुई हैं कि आपके आसपास गौ माता का शुद्ध घी नहीं मिल रहा। यह सुनने वालों के सहयोग से ही संभव हुआ है।
नवचंडी महायज्ञ कितने दिन चलता है और कैसे पूरा होता है?
चंडी याग और पूर्णाहुति के साथ दो दिन का अनुष्ठान
वे कहते हैं कि वह पूरा अनुष्ठान दो दिन चल रहा है, आज और कल। कल पूरे दिन चंडी याग होगा। कल ब्राह्मणों और साधु-संतों के भोजन के बाद पूर्णाहुति भी कल ही होनी है।
वक्ता कहते हैं कि आज और कल, दो दिन, वह पूरा अनुष्ठान चल रहा है। कल पूरे दिन चंडी याग होगा। कल ब्राह्मणों और साधु-संतों आदि के भोजन के बाद पूर्णाहुति भी कल ही होनी है।
क्या बच्चे की कुंडलिनी जागृत हो जाए तो मारण का असर खत्म हो जाता है?
कुंडलिनी जागरण और मारण अलग-अलग विषय हैं
पूछा गया कि बच्चे की कुंडलिनी जागृत हो जाए तो क्या मारण का असर खत्म हो जाता है। वक्ता कहते हैं कि कुंडलिनी जागृत होना और मारण दो अलग विषय हैं। जिनकी कुंडलिनी जागृत है, उन पर तंत्र-मंत्र का क्या विशेष असर होगा, यह निर्भर करेगा। ऐसा हो भी सकता है, नहीं भी।
प्रश्नों को लेते हुए वक्ता से पूछा गया कि अगर बच्चे की कुण्डलिनी जागृत हो गई हो, तो क्या मारण का असर खत्म हो जाता है। वे कहते हैं कि कुंडलिनी जागृत होना और मारण, ये दो अलग विषय हैं। जिनकी कुंडलिनी जागृत होगी, उन पर तंत्र-मंत्र का क्या विशेष असर पड़ेगा, यह निर्भर करेगा। और यह हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता है।
क्या भैरव जी और माता जी को एक ही पात्र में बलि दी जा सकती है?
दोनों के लिए एक पात्र ठीक है
गजर में दी जाने वाली बलि के बारे में पूछा गया, जहाँ भैरव जी और माता जी का एक ही पात्र है। वक्ता कहते हैं: हाँ, एक ही पात्र में दे सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं है।
गजर में दी जाने वाली बलि के बारे में पूछा गया, जहाँ भैरव जी और माता जी का एक ही पात्र है। वक्ता कहते हैं कि हाँ, एक ही पात्र में दे सकते हैं; इसमें कोई दिक्कत नहीं है।
क्या ग्रहण में अर्गला का पहला मंत्र जपा जा सकता है?
अर्गला का पहला मंत्र, मन में, किसी भी अवस्था में
वक्ता कहते हैं: बिल्कुल, अर्गला के पहले मंत्र का जप ग्रहण काल में कर सकते हैं। जहाँ भी रहें, जिस भी अवस्था में रहें, मन में इस तरह कर सकते हैं।
पूछा गया कि क्या अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र का जप ग्रहण काल में हो सकता है। वक्ता कहते हैं: बिल्कुल। जहाँ रहें, जिस अवस्था में रहें, वैसे ही मन में कर सकते हैं।
क्या भैरव बाबा को बलि में लौंग और कपूर दिया जा सकता है?
भैरव के लिए बलि में लौंग और कपूर
वक्ता कहते हैं: बिल्कुल, भैरव बाबा को बलि में लौंग और कपूर जरूर दिया जा सकता है।
इस बारे में पूछने पर वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल, भैरव बाबा को बलि में लौंग और कपूर जरूर दिया जा सकता है।
क्या भगवती बगलामुखी की खप्पर पूजा की जा सकती है?
उनका नाम खप्पर प्रिया है और खप्पर चढ़ता है
वक्ता कहते हैं: बिल्कुल, खप्पर प्रिया उनका नाम है और खप्पर चढ़ता है। भगवती के सभी रूपों को चढ़ता है; सबका अपना-अपना तरीका है।
पूछा गया कि क्या भगवती बगलामुखी की खप्पर पूजा की जा सकती है। वक्ता कहते हैं: बिल्कुल। खप्पर प्रिया उनका नाम है, और खप्पर चढ़ता है। भगवती के सभी रूपों को चढ़ता है। सबका अपना-अपना तरीका है।
तीन घंटे लगातार ध्यान करने से क्या होता है?
उत्तर में रामकृष्ण परमहंस और तोतापुरी का उदाहरण
वक्ता कहते हैं कि बहुत कुछ होगा। लोग घंटों और माला की संख्या से क्यों डरते हैं या क्यों पूछते हैं? करिए और देखिए। तीन घंटे क्या, तीन मिनट में हो सकता है। वे श्री रामकृष्ण परमहंस और उनके गुरु तोतापुरी का उदाहरण देते हैं: तोतापुरी को निर्विघ्न निर्विकल्प समाधि में चालीस साल लगे, और वही रामकृष्ण परमहंस को तीन दिन लगे। समाधि में जाने के बाद वे तीन दिन तक बाहर ही नहीं आए।
पूछा गया कि तीन घंटे लगातार ध्यान करने से क्या होगा। वक्ता कहते हैं: अरे, बहुत कुछ होगा भाई। आप लोग घंटों और माला की संख्या से क्यों डरते हैं, या क्यों पूछते हैं? करिए, और देखिए। तीन घंटे क्या, तीन मिनट में हो जाएगा। इसका एक उदाहरण है: श्री रामकृष्ण परमहंस और उनके गुरु तोतापुरी। तोतापुरी को निर्विघ्न निर्विकल्प समाधि लेने में चालीस साल लगे, और वही रामकृष्ण परमहंस गए तो तीन दिन लगे। समाधि में गए तो तीन दिन तक बाहर ही नहीं आए। तो तीन घंटे और तीन मिनट क्या हैं, देव कृपा और गुरु कृपा से यह तुरंत संभव है।
क्या प्रत्यंगिरा कवच का मानसिक जप किया जा सकता है?
उस कवच के मानसिक पाठ की साफ मनाही
पूछा गया कि क्या प्रत्यंगिरा कवच का मानसिक जप कर सकते हैं। वक्ता साफ कहते हैं: नहीं करना चाहिए।
एक श्रोता ने पूछा कि क्या प्रत्यंगिरा कवच का मानसिक जप कर सकते हैं। वक्ता साफ कहते हैं कि नहीं करना चाहिए।
क्या जंजीरा पढ़ते समय महिलाएँ कंडे पर चोला रख सकती हैं?
चोला नहीं; तंत्रोक्त हवन हाँ, वैदिक हवन नहीं
पूछा गया कि क्या जंजीरा पढ़ते समय महिलाएँ कंडे पर चोला रख सकती हैं। वक्ता कहते हैं कि चोला तो नहीं रखना चाहिए, अगर आपने चोला लिखा है तो। हवन तो कर ही सकती हैं; तंत्रोक्त हवन कर सकती हैं, वैदिक हवन नहीं कर सकतीं।
पूछा गया कि क्या जंजीरा पढ़ते समय महिलाएँ भी कंडे पर चोला रख सकती हैं। वक्ता कहते हैं कि चोला तो नहीं रखना चाहिए, अगर आपने चोला लिखा है तो। हवन तो कर ही सकती हैं। तंत्रोक्त हवन कर सकती हैं; वैदिक हवन नहीं कर सकतीं।
हनुमान जी की पीतल की मूर्ति पर चोला कैसे चढ़ाया जाता है?
नीचे से ऊपर की ओर, पान के पत्ते से
वक्ता कहते हैं कि चोला हमेशा नीचे से ऊपर की ओर चढ़ाना चाहिए। हनुमान जी का नारंगी सिंदूर शुद्ध घी या चमेली के तेल में पान के पत्ते पर बनाएँ, और उसी पान के पत्ते से नीचे से ऊपर की ओर चढ़ाना सबसे उत्तम है।
पूछा गया कि हनुमान जी की पीतल की मूर्ति पर चोला कैसे चढ़ाया जाता है। वक्ता कहते हैं कि चोला हमेशा नीचे से ऊपर की ओर चढ़ाना चाहिए। हनुमान जी का जो नारंगी सिंदूरसिंदूर चूर्ण, यहाँ भैरव को अर्पण हेतु उल्टे त्रिकोण मंडल को बनाने में प्रयुक्त, देवी हेतु बनाए जाने वाले रोली-अष्टगंध त्रिकोण के स्थान पर। होता है, उसे शुद्ध घी या चमेली के तेल में पान के पत्ते पर बनाना चाहिए। और उसी पान के पत्ते से नीचे से ऊपर की ओर चढ़ाना सबसे उत्तम है।
क्या साबर मंत्र का असर अस्थायी होता है?
जल्दी सिद्ध, जल्दी असर खत्म
पूछा गया कि क्या साबर मंत्र का असर अस्थायी होता है या कुछ ही दिन रहता है। वक्ता कहते हैं: साबर मंत्र बहुत जल्दी सिद्ध होता है, और उसका असर भी बहुत जल्दी खत्म हो जाता है।
पूछा गया कि क्या सबर मंत्र का असर अस्थायी होता है, या कुछ ही दिनों के लिए होता है। वक्ता कहते हैं कि साबर मंत्र बहुत जल्दी सिद्ध होता है, और उसका असर भी बहुत जल्दी खत्म हो जाता है।
पंचमुखी हनुमान कवच के पाँच स्वरूपों से हवन का विधान क्या है?
पाँचों स्वरूपों के अलग मंत्र, ध्यान मंत्र के बाद दिए गए हैं
वक्ता कहते हैं कि सबका अलग-अलग स्वरूप और मंत्र होगा। ध्यान मंत्र के आगे पाँचों स्वरूपों के मंत्र दिए गए हैं, उनसे आप हवन कर सकते हैं।
पूछा गया कि पंचमुखी हनुमान कवच के पाँच स्वरूपों के मंत्रों से हवन का विधान क्या है। वक्ता कहते हैं कि सबका अलग-अलग स्वरूप और अपना मंत्र होगा। और उनके ध्यान मंत्र के आगे पाँचों स्वरूपों के मंत्र दिए गए हैं; उनसे आप हवन कर सकते हैं।
हरि-मरकट मंत्र के बारे में क्या चेतावनी है?
यह मसानी मंत्र है, जहाँ पैशाचिक शक्ति पूजित हो वहाँ खतरनाक
वक्ता चेताते हैं कि हरि-मरकट मंत्र मसानी मंत्र है, ध्यान रहे। ध्यान रखिए कि आपके घर में कौन देवी-देवता पूजित हैं। अगर पैशाचिक रूप की कोई शक्ति पूजित है और आप हनुमान जी के पंचमुखी स्वरूप का हवन करके उस मरकट मंत्र से आहुति दे रहे हैं, तो पिशाच, प्रेत या मसानी रूप में कोई पूजित होने से उन्हें दिक्कत होगी, और आपकी परेशानी बढ़ जाएगी। फिर आप कहेंगे कि हनुमान जी का हवन किया और परेशानी बढ़ गई। वे कहते हैं, सोच-समझकर हवन करें।
वक्ता कहते हैं: लेकिन हरि-मरकट मंत्र, भैया, मसानी मंत्र है, ध्यान रहे। वे उसे बोलते नहीं, कहते हैं कि पढ़ेंगे तो समझ जाएँगे। ध्यान रखिए कि आपके घर में कौन देवी-देवता पूजित हैं। वे फिर कहते हैं, अगर ब्रह्म पूजित हैं, तो यहीं गुरु की आवश्यकता पड़ती है। अगर पैशाचिक रूप की कोई शक्ति पूजित है, और आप हनुमान जी के पंचमुखी स्वरूप का हवन करने जा रहे हैं और उस मरकट मंत्र से आहुति दे रहे हैं, तो पिशाच, प्रेत, मसानी आदि रूप में कोई पूजित होने से उन्हें दिक्कत होगी। आपकी परेशानी बढ़ जाएगी, और फिर आप कहेंगे कि हमने हनुमान जी का हवन किया और परेशानी बढ़ गई। सोच-समझकर हवन करें।
नींद में डर लगे तो कौन सा मंत्र जपें?
रात के डर के लिए नवार्ण मंत्र
वक्ता कहते हैं कि नींद में डर लगे तो नवार्ण मंत्र का ही जप होता है। वे जोड़ते हैं, अच्छा है कि जप हो रहा है।
पूछा गया कि नींद में डर लगे तो क्या करें। वक्ता कहते हैं कि ऐसे में नवार्ण मंत्र का ही जप होता है। वे जोड़ते हैं, अच्छा है कि जप हो रहा है।
क्या देवता की सेवा भाई या बच्चे के भाव से करना ठीक है?
देव को परिवार मानें, पर मर्यादा न भूलें
एक श्रोता कहते हैं कि वे घर में काले पत्थर को भैरव रूप में पूजते हैं और लड्डू गोपाल की तरह सेवा करते हैं, जैसे वे उनके छोटे भाई हों। वक्ता कहते हैं कि यह बहुत सुंदर, अच्छा भाव है: देव शक्ति को अपने किसी रिश्ते में, भाई-बहन या माता-पिता के रूप में पूजने से अच्छा क्या होगा? लेकिन अति आत्ममुग्धता में लोग उल्टे-सीधे काम करने लगते हैं, ऐसा नहीं करना चाहिए। भाव से उन्हें भाई बनाइए, भाव से माता-पिता बनाइए, पर देव की मर्यादा कभी न भूलिए।
एक श्रोता लिखते हैं कि वे घर में काले पत्थर को भैरव रूप में पूजते हैं, और लड्डू गोपाल की तरह उसकी सेवा करते हैं, ऐसा लगता है जैसे वे उनके छोटे भाई हों। वक्ता कहते हैं, बहुत सुंदर, अच्छा भाव है। अगर कोई देव शक्ति को अपने किसी रूप में, भाई-बहन के रूप में, माता-पिता के रूप में पूजता है, तो इससे अच्छा क्या होगा? अगर हम शिव-शक्ति को अपने माता-पिता मानें, कोई गणपति को अपना भाई माने, कोई भैरव जी को अपना भाई माने, तो इसमें कोई बात नहीं। लेकिन अति आत्ममुग्धता में, एक बहुत पुराने महाराज जी हैं जिनका नाम वे नहीं लेंगे, वे अगड़म-तिगड़म उल्टा-सीधा काम करने लगते हैं; ऐसा नहीं करना चाहिए। भाई हैं, पर मर्यादा में रहकर; वे देव हैं, महाशक्ति हैं, उनकी अपनी मर्यादा है। भाव से उन्हें भाई बनाइए, भाव से माता-पिता बनाइए, लेकिन देव की मर्यादा कभी न भूलिए।
अगर पति हवन न करें तो क्या स्त्री अकेले हवन कर सकती है?
अकेली स्त्री के लिए नित्य धूनी और तंत्रोक्त साबर हवन
पूछा गया कि पति हवन न करें तो घर में रोज हवन और धूनी की विधि क्या है। वक्ता कहते हैं कि धूनी रोज कर सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं; और हवन में तंत्रोक्त साबर मंत्रों से हवन कर सकते हैं। विशेष परिस्थिति में, कलिकाल है, पति नहीं कर रहे तो कोई ऐसी बात नहीं, आप कर सकती हैं।
पूछा गया कि पति हवन न करें तो स्त्री अकेले हवन नहीं कर सकती, तो घर में रोज हवन और धूनीविशेष लकड़ियों व बीजों को जलाकर घर या स्थान से नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा दूर करने हेतु की जाने वाली धूनी। की विधि क्या है। वक्ता कहते हैं कि धूनी रोज कर सकते हैं; कोई दिक्कत नहीं है। और हवन में तंत्रोक्त सबर मंत्र से हवन आदि कर सकते हैं। विशेष परिस्थिति में, कलिकाल है, पति अगर नहीं कर रहे तो कोई ऐसी बात नहीं, आप कर सकती हैं।
क्या बाल भैरव को जायफल की बलि दी जा सकती है?
बाल भैरव के लिए साफ मना
पूछा गया कि क्या बाल भैरव को जायफल की बलि दे सकते हैं। वक्ता कहते हैं: नहीं, बाल भैरव को नहीं देना चाहिए।
पूछा गया कि क्या बाल भैरव को जायफल की बलि दे सकते हैं। वक्ता साफ कहते हैं कि नहीं, बाल भैरव को नहीं देना चाहिए।
हनुमान जी की भक्ति के लिए ऊर्जा कैसे बढ़ाएँ और डर कैसे खत्म करें?
हनुमान जी की पूजा में डर बिल्कुल नहीं होना चाहिए
पूछा गया कि हनुमान जी की भक्ति के लिए अपनी ऊर्जा कैसे बढ़ाएँ और मन का डर कैसे खत्म करें। वक्ता कहते हैं: हनुमान जी के भक्त, और डर? आज उन्होंने हनुमान जी के विशेष प्रयोगों के बारे में सब बता दिया। इसलिए हनुमान जी की पूजा में डर और भय बिल्कुल होना ही नहीं चाहिए।
पूछा गया कि हनुमान जी की भक्ति के लिए अपनी ऊर्जा कैसे बढ़ाएँ, और अपने मन का डर कैसे खत्म करें। वक्ता कहते हैं: हनुमान जी के भक्त, और डर? वे कहते हैं कि आज उन्होंने हनुमान जी के विषय में जो भी विशेष प्रयोग हैं, सब बता दिए। इसलिए हनुमान जी की पूजा में डर और भय बिल्कुल होना ही नहीं चाहिए।
क्या हनुमान और भोलेनाथ को दूध चढ़ाने से चंद्र देव प्रसन्न होते हैं?
उन्हें चढ़ाया दूध चंद्र को प्रसन्न और मजबूत करता है
पूछा गया कि क्या हनुमान और भोलेनाथ को दूध चढ़ाने से चंद्र देव प्रसन्न होते हैं। वक्ता कहते हैं: बिल्कुल होते हैं, और मजबूत भी होते हैं। यह बिल्कुल सही है।
पूछा गया कि क्या हनुमान और भोलेनाथ को दूध चढ़ाने से चंद्र देव प्रसन्न होते हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल होते हैं, और मजबूत भी होते हैं। यह बिल्कुल सही है।
क्या त्रिशूल न हो तो भैरव पाषाण को जागृत किया जा सकता है?
हाँ, पर भैरव पाषाण बिना सिंदूर के कभी नहीं रखा जाता
पूछा गया कि जैसे भैरव त्रिशूल जागृत करते हैं, क्या त्रिशूल न हो तो भैरव पाषाण भी जागृत कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं, हाँ बिल्कुल कर सकते हैं। लेकिन भैरव पाषाण जब भी रखें, बिना सिंदूर लगाए नहीं रखा जाता। अगर घर में पाषाण रूप में भैरव जी स्थापित किए हैं, काला पत्थर, त्रिकोण, जैसे भी रखा है, उसे हमेशा सिंदूर का चोला चढ़ाकर, लेपकर रखें, जैसे हनुमान जी को रखा जाता है।
पूछा गया कि त्रिशूल न हो तो क्या भैरव पाषाण को उसी तरह जागृत कर सकते हैं जैसे भैरव त्रिशूल को। वक्ता कहते हैं: हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं। लेकिन भैरव पाषाण जब भी रखेंगे, उन्हें बिना सिंदूर लगाए नहीं रखा जाता। वे प्रश्नकर्ता का नाम लेकर बाकी लोगों से भी ध्यान रखने को कहते हैं: अगर घर में पाषाण के रूप में भैरव जी को स्थापित किया है, काला पाषाण, त्रिकोण, जैसे भी रखा है, उन्हें हमेशा सिंदूर का चोला चढ़ाकर, यानी लेप करके रखें, जैसे हनुमान जी को रखा जाता है। जैसे बाहर मंदिर आदि में होता है, वैसे घर में भी चोला चढ़ाकर रखें।
पीतल का विग्रह या त्रिशूल रूप सामान्य या विशेष श्रृंगार करके, मुकुट के साथ रखा जाता है
सामान्य या विशेष श्रृंगार, मुकुट के साथ
वक्ता कहते हैं कि बाकी, अगर पीतल का श्री विग्रह हो, या त्रिशूल रूप में हो, तो सामान्य श्रृंगार या विशेष श्रृंगार करके, मुकुट आदि लगाकर रख सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि बाकी, अगर पीतल का श्री विग्रह हो, अगर त्रिशूल रूप में हो, तो सामान्य श्रृंगार करके, या विशेष श्रृंगार करके, मुकुट आदि लगाकर रख सकते हैं।
गुरुवार अमावस्या को जन्मी लड़की के लिए क्या करें?
पहले जन्म कुंडली दिखाए बिना कुछ नहीं
एक श्रोता बताते हैं कि उनके घर गुरुवार अमावस्या को जन्म हुआ, लड़की अब डेढ़ साल की है, और पूछते हैं कि उसके लिए क्या विधि कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि उसी समय दिखाना चाहिए था; अब वह डेढ़ साल की है, तो अमावस्या का जन्म होने के कारण जन्म कुंडली दिखाकर ही निर्णय करें। बिना देखे-सुने ऐसे नहीं।
पूर्णिया-कटिहार से एक श्रोता बताते हैं कि उनके घर गुरुवार अमावस्या को जन्म हुआ, लड़की अब डेढ़ साल की हो रही है, और पूछते हैं कि लड़की के लिए क्या विधि कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले तो उसी समय दिखाना चाहिए था। अब वह डेढ़ साल की हो रही है, तो अमावस्या का जन्म होने के कारण उसकी जन्म कुंडली दिखाकर ही कोई निर्णय करें। वे कहते हैं, बिना देखे-सुने ऐसे नहीं।
क्या तामसिक भोजन करने वाला और जनेऊ न पहनने वाला प्रणव सहित शिव पंचाक्षरी जप सकता है?
प्रणव सहित पंचाक्षरी पर रोक
वक्ता कहते हैं कि जो तामसिक भोजन करते हैं और जनेऊ नहीं पहनते, उन्हें प्रणव सहित शिव पंचाक्षरी मंत्र का जप नहीं करना चाहिए: दिक्कत होगी।
वक्ता कहते हैं कि जो तामसिक भोजन करते हैं और यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। नहीं पहनते, उन्हें प्रणव सहित शिव पंचाक्षरी मंत्र का जप नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं, दिक्कत होगी।
कड़े धाम की शीतला भवानी के साथ भैरव के कौन से रूप चलते हैं?
बटुक भैरव और काल भैरव
पूछा गया कि कड़े धाम वाली मां शीतला भवानी के साथ भगवान भैरव के कौन से रूप चलते हैं। वक्ता कहते हैं कि भगवती शीतला के साथ बटुक भैरव और काल भैरव, दोनों का स्वरूप है। यही दो मुख्य रूप से उनके साथ चलते हैं।
पूछा गया कि कड़े धाम वाली मां शीतला भवानी के साथ भगवान भैरव के कौन से रूप चलते हैं। वक्ता कहते हैं कि भगवती शीतला माता के साथ बटुक भैरव और काल भैरव, दोनों का स्वरूप है। यही दो मुख्य रूप से उनके साथ चलते हैं।
पुराने घर में छूट गए देवता के थान का क्या करें?
थान को ऐसे ही नहीं छोड़ा जा सकता, ले जाने का विधान है
एक श्रोता बताते हैं कि वे सरकारी क्वार्टर में रहते थे, जहाँ साठ साल से भैरव और सती माता का थान था; घर छोड़ा तो वे वहीं रह गए, और अब वे उनके नाम से धूप-ध्यान करते हैं। वक्ता कहते हैं, बहुत खराब है, जन-धन की हानि हुई है। वे पूछते हैं कि साठ साल वहाँ रहकर पूजन किया, तो छोड़कर क्यों आए। अगर पत्थर पर भी कुछ स्थापित है और आप उन्हें वैसे नहीं ला सकते, तो सबसे पहले उनका विसर्जन करना चाहिए। उन्हें ऐसे जैसे-तैसे नहीं छोड़ना चाहिए।
एक श्रोता बताते हैं कि वे पहले सरकारी क्वार्टर में रहते थे, जहाँ साठ साल से भैरव और सती माता का थान बना था; घर छोड़ा तो वे वहीं रह गए, और अब वे उनके नाम से धूप-ध्यान करते हैं। वक्ता कहते हैं, बहुत खराब है; जन-धन की हानि हो गई है। वे प्रश्नकर्ता का नाम लेकर पूछते हैं: साठ साल आप वहाँ रहे और पूजन किया, तो छोड़कर क्यों आए? और देखिए, जो थान बना था वह कैसा बना था। अगर पत्थर पर भी कुछ स्थापित है, और आप उन्हें वैसे नहीं ला सकते, तो सबसे पहले उनका विसर्जन कर देना चाहिए। उन्हें ऐसे जैसे-तैसे नहीं छोड़ना चाहिए। और उसका विधान होता है, ले जाने का तरीका होता है; किसी जानकार व्यक्ति से, किसी पंडित जी से पूछ लेते, पंडित जी लोग भी बता देते हैं। ऐसा नहीं कि बहुत खर्चा लगेगा; तरीका होता है, और भाव से ही उन्हें ले जाया जाता है, क्योंकि देवता भाव से ही जाते हैं।
हनुमान जंजीरा को कितना शक्तिशाली माना जाता है?
अमोघ और अभेद्य, संपुट की सीढ़ी का आखिरी कदम
पूछा गया कि क्या जंजीरा अभेद्य है। वक्ता कहते हैं: बिल्कुल, जंजीरा अमोघ और अभेद्य है। जैसा उन्होंने कहा, अगर हनुमान जंजीरा से संपुट किया जाए, बहुत ज्यादा परेशानी हो तो जंजीरा से संपुट कीजिए, तो प्रेत-पिशाच की क्या बात, स्थिति कहाँ से कहाँ पहुँच जाएगी।
पूछा गया कि क्या जंजीरा अभेद्य है। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल, जंजीरा अमोघ और अभेद्य है। जंजीरा, यही तो उन्होंने कहा था, कि अगर हनुमान जंजीरा से संपुट कर दिया जाए। बहुत ज्यादा परेशानी हो तो जंजीरा से संपुट कर दीजिए। वे कहते हैं, फिर प्रेत-पिशाच की क्या बात, स्थिति कहाँ से कहाँ पहुँच जाएगी।
क्या पहले योगिनियों की पूजा गोत्र के अनुसार होती थी?
गोत्र के अनुसार योगिनियाँ, और अभी पूजी जाने वाली शक्ति
वक्ता कहते हैं कि पहले के समय में योगिनियों की पूजा गोत्र के अनुसार, कुल गोत्र के अनुसार होती थी। समय के साथ लोग भूलते गए, या किसी कारण से दूसरी शक्तियों को स्थान दिया और मुख्य रूप से उन्हीं की पूजा की। अगर आपको अपने गोत्र के अनुसार पूजी जाने वाली देवी की जानकारी है, तो आप उनके नाम से पूजन कर सकते हैं। पर जो शक्ति अभी पूजी जा रही है, उसे आप छोड़ नहीं सकते।
वक्ता कहते हैं कि पहले के समय में योगिनी की पूजा गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है। के अनुसार, कुल गोत्र के अनुसार होती थी। समय के साथ लोग भूलते गए, या किसी कारण से दूसरी शक्तियों को भी स्थान दिया और मुख्य रूप से उन्हीं की पूजा की। अगर आपको गोत्र के अनुसार पूजी जाने वाली देवी की जानकारी है, तो आप उनके नाम से पूजन कर सकते हैं। पर जो शक्ति अभी पूजी जा रही है, उसे आप छोड़ नहीं सकते।
अभी पूजी जा रही शक्ति को क्यों नहीं छोड़ा जा सकता?
उन्हें कुल में स्थान दिया गया, डर से या खुशी से
वक्ता कहते हैं कि वे अपने आप नहीं आई होंगी। और अगर आई भी हों, तो आपके कुल में उन्हें किसी न किसी तरह स्थान दिया गया होगा, चाहे डर से दिया हो या खुशी से। इसलिए जब आपने स्थान दिया है और उनकी पूजा की है, तो उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता।
वक्ता कहते हैं कि वे अपने आप नहीं आई होंगी। और अगर आई भी हों, तो आपके कुल में उन्हें किसी न किसी तरह स्थान दिया गया होगा, चाहे आपने डर से दिया हो या खुशी से। इसलिए जब आपने स्थान दिया है और उनकी पूजा करवाई है, तो उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता।
क्या कृष्ण की बाल लीला के प्रत्यक्ष दर्शन संभव हैं?
देव कृपा से क्या संभव माना जाता है
भगवान कृष्ण की बाल लीला के प्रत्यक्ष दर्शन के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि वे बिल्कुल नहीं कह सकते कि यह संभव नहीं है। यह उनके अपने जीवन का अनुभव है, हालाँकि उनकी अपनी क्षमता इतनी पीछे तक नहीं जाती। पर साधक परिवार के कुछ सदस्यों से कम से कम अस्सी-नब्बे साल पुराने समय की जानकारी मिलती है। जब वे बातें बिल्कुल सही निकलती हैं, तो समझ आता है कि देवता कृपा करते हैं, शक्तियाँ कृपा करती हैं, इसलिए यह संभव है।
भगवान कृष्ण की बाल लीला के प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहें तो क्या हो सकता है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि वे बिल्कुल नहीं कह सकते कि यह संभव नहीं है। यह उनके अपने जीवन का अनुभव है, हालाँकि उनकी क्षमता इतनी पीछे तक नहीं पहुँचती। पर साधक परिवार के कुछ सदस्यों से ऐसे समय की जानकारी मिलती है: कम से कम अस्सी-नब्बे साल पुरानी बातें, अगर उससे ज़्यादा नहीं। जब वे बातें बिल्कुल सही निकलती हैं, तो इतना समझ आता है कि देवता कृपा करते हैं, शक्तियाँ कृपा करती हैं, इसलिए यह संभव है। और जब एक साधारण शक्ति, साधारण लोक की देवलोक शक्ति, घर के पितर ऐसी कृपा कर सकते हैं, तो महाशक्तियाँ अपनी कृपा से क्या नहीं कर सकतीं?
पोंछटा बाँधना कहाँ से सीखें?
धोती पहनने वाले वीडियो से सीखें
पोंछटा कैसे बाँधते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि YouTube पर देखिए कि धोती कैसे पहनते हैं। उसमें दिखाया गया है कि पोंछटा कैसे बाँधते हैं।
पोंछटा कैसे बाँधते हैं, यह समझाने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि YouTube पर देखिए कि धोती कैसे पहनते हैं। उसमें बताया गया है कि पोंछटा कैसे बाँधते हैं।
पीड़ित महिला को उपाय अपने हाथों से क्यों नहीं करना चाहिए?
जहाँ महिला खुद पीड़ित हो, वहाँ किसी पुरुष से करवाएँ
एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि कम से कम जो उन्होंने बताया था, वह करवा लीजिए। अगर कोई पुरुष नहीं है, तो आसपास का कोई व्यक्ति करे तो बेहतर है, क्योंकि वहाँ महिला पहले से पीड़ित है। उसके हाथों से करवाया जाएगा तो ठीक नहीं होगा। इसलिए किसी पुरुष से करवाकर एक बार देखिए। उसके बाद ग्रहण पूरा होने दीजिए, फिर वे देखकर बताएँगे कि क्या निकल रहा है।
एक श्रोता को नाम लेकर उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि उन्होंने अभी उनकी बात नहीं देखी है। वे बुधवार को देखेंगे, बुधवार से पहले नहीं देख पाएँगे। वे कहते हैं, पर कम से कम जो हमने बताया है, वह करवा लीजिए। अगर कोई पुरुष नहीं है, तो आसपास का कोई व्यक्ति करे तो बेहतर है, क्योंकि वहाँ महिला पहले से पीड़ित है। उसके हाथों से करवाया जाएगा तो ठीक नहीं होगा। इसलिए किसी पुरुष से करवाकर एक बार देखिए। उसके बाद हम देखते हैं; पूरा होने दीजिए, ग्रहण खत्म होने दीजिए, फिर हम आपकी बात देखकर बताएँगे कि क्या निकल रहा है।
क्या असली कुलदेवी और अभी पूजी जा रही शक्ति, दोनों की पूजा हो सकती है?
दोनों की पूजा हो सकती है; अभी वाली को नहीं छोड़ना
वक्ता कहते हैं कि हमने असली कुलदेवी बता दी है, कुलदेवी वही हैं। पर जो अभी पूजी जा रही हैं, उनका पूजन नहीं छोड़ना चाहिए। आप दोनों की पूजा कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि हमने असली कुलदेवी बता दी है, कुलदेवी वही हैं। पर जो अभी पूजी जा रही हैं, उनका पूजन नहीं छोड़ना चाहिए। आप दोनों की पूजा कर सकते हैं।
पूर्णिमा कितने बजे शुरू होगी, और वैकुंठ चतुर्दशी कब मनाई जाए?
आज शाम 4:15 से चतुर्दशी, और कल सुबह स्नान वाला पालन
पूर्णिमा कितने बजे शुरू होगी, यह पूछे जाने पर वक्ता पहले आपत्ति करते हैं कि आजकल ऐसी स्थिति बनाई जा रही है कि लोग सब कुछ एक दिन पहले ही कर लेते हैं। आज ही हरिहर मिलन और वैकुंठ चतुर्दशी मना दी गई, क्योंकि आज प्रदोष काल में चतुर्दशी थी। पर प्रामाणिक रूप से देखें तो सुबह स्नान का महत्व ज़्यादा है, और चतुर्दशी आज शाम 4:15 बजे ही शुरू हुई है। इसलिए कल सुबह स्नान करके हरिहर जन्मोत्सव, हरिहर मिलन और वैकुंठ चतुर्दशी के निमित्त जो भी दान-पुण्य करना है, वह होगा।
पूर्णिमा कितने बजे शुरू होगी, यह पूछे जाने पर वक्ता पहले कहते हैं कि आजकल ऐसी स्थिति बनाई जा रही है कि लोग सब कुछ एक दिन पहले ही कर लेते हैं। आज ही हरिहर मिलन और वैकुंठ चतुर्दशी मना दी गई, क्योंकि आज प्रदोष काल में चतुर्दशी थी। पर प्रामाणिक रूप से देखें तो सुबह स्नान का महत्व ज़्यादा है, और चतुर्दशी आज शाम 4:15 बजे ही शुरू हुई है। इसलिए कल सुबह स्नान करके हरिहर जन्मोत्सव, हरिहर मिलन और वैकुंठ चतुर्दशी के निमित्त जो भी दान-पुण्य करना है, वह कल किया जाएगा।
पूर्णिमा शाम 4:15 से शुरू होती है, इसलिए देव दीपावली उसी दिन के प्रदोष काल में पड़ती है
कल शाम 4:15 से पूर्णिमा, और प्रदोष काल में देव दीपावली
वक्ता कहते हैं कि कल शाम 4:15 के बाद पूर्णिमा शुरू होती है। इसलिए इतना ज़रूर हो सकता है कि देव दीपावली कल मनानी है, क्योंकि प्रदोष काल में देव दीपावली कल ही रहेगी। काशी विश्वनाथ की नगरी में जो देव दीपावली मनाई जाती है, वह वहाँ कब मनाई जा रही है, यह उधर देखना होगा, कल मना रहे हैं या परसों।
वक्ता कहते हैं कि कल शाम 4:15 के बाद पूर्णिमा शुरू हो रही है। इसलिए इतना ज़रूर हो सकता है कि देव दीपावली कल मनानी है, क्योंकि प्रदोष काल में देव दीपावली कल ही रहेगी। काशी विश्वनाथ की नगरी में जो देव दीपावली मनाई जाती है, वह वहाँ कब मनाई जा रही है, यह उधर देखना होगा, कल मना रहे हैं या परसों।
पूर्णिमा ठीक ग्रहण के समय पूरी होती है, इसी से रात की पूजा तय होती है
ग्रहण चलते समय पूर्णिमा पूरी होती है
वक्ता कहते हैं कि यह कल भी मनाई जा सकती है और परसों भी। परसों इसलिए, क्योंकि पूर्णिमा ठीक उसी समय पूरी होगी जब ग्रहण चल रहा होगा। इसलिए रात वाली पूर्णिमा न कल रहेगी, न परसों 8 तारीख को। पूर्णिमा का रात का जो मुख्य पूजन है, वह सब कल ही, 7 तारीख को होगा।
वक्ता कहते हैं कि इस तरह यह कल भी मनाई जा सकती है और परसों भी। परसों इसलिए, क्योंकि पूर्णिमा ठीक उसी समय पूरी होगी जब ग्रहण चल रहा होगा। इसलिए रात वाली पूर्णिमा न कल रहेगी, न परसों 8 तारीख को। इसलिए 7 तारीख को ही, पूर्णिमा का रात का जो भी मुख्य पूजन है, वह सब कल ही होगा।
सूतक कब शुरू होता है, और कब तक विग्रह को नहीं छूना चाहिए?
सुबह 8:20 से सूतक; 8 तारीख को शाम 6:20 तक स्पर्श नहीं
वक्ता कहते हैं कि सुबह का जो पूजन होना है, उसके लिए सूतक 8:20 से शुरू हो रहा है। इसलिए जो भी पूजन-पाठ है, वह 8:20 से पहले पूरा कर लेना चाहिए। 8 तारीख को 8:20 के बाद देव विग्रह का स्पर्श नहीं होना चाहिए। आपका पूर्णिमा का ग्रहण पूरा होने के बाद, शाम 6:20 के बाद ही फिर स्पर्श करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि सुबह का जो पूजन होना है, उसके लिए सूतक 8:20 से शुरू हो रहा है। इसलिए जो भी पूजन-पाठ है, वह 8:20 से पहले पूरा कर लेना चाहिए। 8 तारीख को 8:20 के बाद देव विग्रह का स्पर्श नहीं होना चाहिए। आपका पूर्णिमा का ग्रहण पूरा होने के बाद, शाम 6:20 के बाद आप फिर स्पर्श करेंगे।
कैसे पता चले कि मंत्र जागृत हो गया है?
चैनल के एक विस्तृत वीडियो की ओर इशारा
मंत्र जागृत हो गया है, यह कैसे पता चलता है, यह पूछे जाने पर वक्ता पूछने वाले को चैनल के एक वीडियो की ओर भेजते हैं। वे कहते हैं कि उसमें पूरे विस्तार से समझाया गया है, एक बार देख लीजिए।
मंत्र जागृत हो गया है, यह कैसे पता चलता है, यह पूछे जाने पर वक्ता पूछने वाले का नाम लेकर कहते हैं कि चैनल पर एक वीडियो है। वे कहते हैं, उसमें पूरे विस्तार से बताया गया है, एक बार देख लीजिए।
दूसरे घर से लाए गए कुलदेवता का क्या करें?
इस तरह लाए गए देवता को निकाला नहीं जा सकता
एक श्रोता कहते हैं कि उनके कुलदेवता शिव जी हैं, जो सात्विक हैं। पर उनके परदादा दूसरे घर के कुलदेवता को चोरी से ले आए थे, जो तामसिक भोग लेते हैं। वे पूछते हैं कि उस देवता को कैसे बाहर करें। वक्ता नाम लेकर उत्तर देते हैं कि वे बाहर नहीं जाएँगे। वे कहते हैं कि वे बात समझते हैं, पूछने वाला बिल्कुल सही कह रहा है, यह उनकी जानकारी में है, और उसी क्षेत्र के होने से वे अच्छी तरह जानते हैं कि दूसरों के देवता कैसे लाए जाते हैं और क्या किया जाता है। अब आप उन्हें हटा नहीं सकते।
एक श्रोता कहते हैं कि उनके कुलदेवता शिव जी हैं, जो सात्विक हैं। पर उनके परदादा दूसरे घर के कुलदेवता को चोरी से ले आए थे, जो तामसिक भोग लेते हैं। वे पूछते हैं कि उस देवता को कैसे बाहर किया जाए। वक्ता उनका नाम लेकर उत्तर देते हैं कि वे बाहर नहीं जाएँगे। वे कहते हैं, इस तरह जो देवी-देवता लाए जाते हैं, हम समझते हैं; आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। यह मेरी जानकारी में है, और इसी क्षेत्र का होने से मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि दूसरों के देवता कैसे लाए जाते हैं और क्या किया जाता है। अब आप उन्हें हटा नहीं सकते।
क्या चोरी से लाए गए दूसरे घर के कुलदेवता को विदा करने का कोई उपाय है?
केवल उनकी अपनी सहमति, फिर विसर्जन
वक्ता कहते हैं कि उन्हें लाया गया और सामने से सम्मान दिया गया, इसलिए अब उन्हें हटाना कठिन बात है। ऐसी स्थिति में कोई शक्ति आपका साथ नहीं देगी। हाँ, उनसे विनती और प्रार्थना करके, किसी माध्यम से उनसे बात करके कि हम ऐसा चाहते हैं, अगर वे प्रसन्न होकर कहें कि ठीक है, हम तुम्हें छोड़ रहे हैं, इस तरह मेरा विसर्जन करो, तो यह संभव है। किसी और तरीके से, किसी और के द्वारा यह संभव नहीं होगा।
वक्ता कहते हैं कि उन्हें लाया गया और सामने से सम्मान दिया गया। अब अगर आप उन्हें हटाएँ, तो यह कठिन बात है। ऐसी स्थिति में कोई शक्ति आपका साथ नहीं देगी। हाँ, उनसे विनती और प्रार्थना करके, किसी माध्यम से उनसे बात करके कि भाई, हम ऐसा चाहते हैं: अगर वे प्रसन्न होकर कहें कि ठीक है, हम तुम्हें छोड़ रहे हैं, और इस तरह मेरा विसर्जन करो, तो यह संभव है। और किसी दूसरे माध्यम से, किसी और के द्वारा यह संभव नहीं होगा।
एक मामला केवल एक ही घर में चलता था — पति के लोगों के पास रहते कुछ नहीं होता था
केवल एक घर में सक्रिय तंत्र
एक श्रोता बताती हैं कि कुछ छाती पर बैठता है, और शादी के समय से जब तक वे पति के लोगों के पास रहीं, उन्हें कुछ नहीं हुआ, पर मायके जाते ही समस्या फिर शुरू हो गई। वक्ता कहते हैं कि अगले दिन चैनल पर ठीक इसी तरह का एक वीडियो आएगा। उसमें उन्होंने एक लड़की के बारे में बताया है, जिसे शादी के बाद जब तक पति पास रहे, कोई परेशानी नहीं हुई, पर जैसे ही वे काम से बाहर गए, उसकी हालत बहुत खराब हो गई। उसमें यह भी है कि वह किस तरह का तंत्र था और वह उससे कैसे छूटी।
एक श्रोता बताती हैं कि कुछ छाती पर बैठता है। वे कहती हैं कि शादी के समय से जब तक वे उनके पास रहीं, उन्हें कुछ नहीं हुआ, और जब मायके चली जातीं, तो समस्या फिर शुरू हो जाती। वक्ता कहते हैं कि कल चैनल पर ठीक इसी तरह का एक वीडियो आएगा। उसमें उन्होंने एक लड़की के बारे में बताया है जिसकी शादी हुई। शादी के बाद घर आने पर जब तक उसके पति उसके पास रहे, उसे कोई परेशानी नहीं हुई और वह बिल्कुल ठीक रही। पर जैसे ही वे काम से कहीं बाहर गए, उसकी हालत बहुत खराब हो गई। वे कहते हैं कि वह किस तरह का तंत्र था और वह उससे कैसे छूटी, यह सारा अनुभव कल चैनल के वीडियो में मिलेगा; सब तैयार है और अपलोड हो जाएगा।
क्या ग्रहण में त्रिकाल ज्ञान और पूछा की साधना की जा सकती है?
बिना गुरु के चक्रों में न पड़ें
ग्रहण के समय त्रिकाल ज्ञान और पूछा की साधना के बारे में पूछे जाने पर वक्ता पूछने वाले का नाम लेकर कहते हैं कि इनसे बिना गुरु के चक्रों में नहीं पड़ना चाहिए।
ग्रहण के समय और त्रिकाल ज्ञान व पूछा की साधना के बारे में पूछे जाने पर वक्ता पूछने वाले का नाम लेकर कहते हैं कि इनसे भी बिना गुरु के चक्रों में नहीं पड़ना चाहिए।
घर में रहने वाले ब्रह्म हनुमान चालीसा से कमज़ोर पड़ गए, ऐसा बताया गया
हनुमान चालीसा से ब्रह्म के कमज़ोर पड़ने का वर्णन
एक श्रोता लिखती हैं कि बाद में पता चला कि उनके पति भी, और ब्रह्म जो उनके घर में रहने से कमज़ोर पड़ गए थे; अब उनके पति बिल्कुल ठीक हैं, और यह हनुमान चालीसा का प्रभाव है। वक्ता कहते हैं कि यहाँ आप सबके सामने एक प्रत्यक्ष अनुभव साझा हुआ है, जो इन श्रोता ने बताया है। आप सबको इससे सीख लेनी चाहिए।
एक श्रोता लिखती हैं कि बाद में पता चला कि उनके पति भी, और ब्रह्म जो उनके घर में रहने से कमज़ोर पड़ गए थे; अब उनके पति बिल्कुल ठीक हैं, और यह हनुमान चालीसा का प्रभाव है। वक्ता कहते हैं कि यहाँ आप सबके सामने एक प्रत्यक्ष अनुभव साझा हुआ है, उन श्रोता का, जिनका वे नाम लेते हैं, जिन्होंने अपना अनुभव बताया है। आप सबको इससे सीख लेनी चाहिए।
अगर हनुमान जी की तीव्र साधना से मन में गलत विचार आएँ तो?
हनुमान जी के तीव्र पाठ में ब्रह्मचर्य का टूटना
एक श्रोता कहते हैं कि जब वे हनुमान जी का पूजा-पाठ तीव्रता से करते हैं, या जंजीरा या बजरंग बाण करते हैं, तो मन में गलत बातें आने लगती हैं और मन से ब्रह्मचर्य नहीं रहता। वक्ता कहते हैं, हाँ, यह दिक्कत वाली बात है।
एक श्रोता कहते हैं कि जब हनुमान जी का पूजा-पाठ तीव्रता से करते हैं, या जंजीरा या बजरंग बाण करते हैं, तो मन में गलत बातें आने लगती हैं, और मन से ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। नहीं रहता। वक्ता कहते हैं, हाँ, यह दिक्कत वाली बात है।
गलत आचरण करने वालों को फल क्यों नहीं मिलता?
आचरण, और फिर भी हनुमान जी से काम की उम्मीद
लोग कहते हैं कि हनुमान जी ने किसी का काम नहीं किया, हमने ऐसे पूजा की और कुछ नहीं हुआ। वक्ता कड़ाई से उत्तर देते हैं कि आप दूसरों की बहन-बेटियों को उल्टी नज़र से देखते हो और चाहते हो कि हनुमान जी आपका काम कर दें। और काम नहीं होगा तो जाकर अधर्मियों से जुड़ जाओगे, हनुमान जी को उल्टा-सीधा बोलोगे, और फिर भी सोचोगे कि काम हो जाए। वे पूछते हैं, क्या यह संभव है?
वक्ता कहते हैं कि लोग बैठकर कहते हैं कि हनुमान जी ने किसी का काम नहीं किया, हमने ऐसे पूजा की और हमारा कुछ नहीं हुआ। आप दूसरों की बहन-बेटियों को उल्टी नज़र से देखते हो, और चाहते हो कि हनुमान जी आपका काम कर दें। काम नहीं होगा तो जाकर धर्म के विरोधियों से जुड़ जाओगे, हनुमान जी को उल्टा-सीधा बोलोगे, और फिर भी सोचोगे कि आपका काम हो जाए। क्या यह संभव है?
ललिता सहस्रनामावली के हवन में आहुति किसकी दें?
दीक्षा न हो तो घी और मधु
ललिता सहस्रनामावली के हवन में किसकी आहुति दें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि अगर आप दीक्षित हैं तो बेहतर रहेगा। और नहीं, तो आप घी और मधु से कर सकते हैं।
सवारी खुलकर क्यों नहीं आती?
ऊर्जा की कमी, या वचन बंधन
वक्ता कहते हैं कि ऊर्जा की कमी से, या किसी तरह के वचन बंधन के कारण सवारी खुलकर नहीं आती। या तो आपकी ऊर्जा का स्तर अभी ऐसा नहीं हुआ है कि वे खुलकर आएँ। अगर वे खुलकर आ जाएँ, तो आपके शरीर में विकार आने लगेंगे। इसलिए कहीं न कहीं यह उनकी कृपा ही है कि वे खुलकर नहीं आतीं। या अगर वे किसी तरह के वचन में बँधी हों, किसी ने उन्हें रोक रखा हो, कोई बंधन लगा दिया गया हो कि नहीं आना है, तो दिक्कत होगी।
सवारी खुलकर क्यों नहीं आती, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि ऊर्जा की कमी से, या किसी तरह के वचनबद्ध बंधन के कारण सवारी खुलकर नहीं आती। या तो आपकी ऊर्जा का स्तर अभी ऐसा नहीं हुआ है कि वे खुलकर आएँ। अगर वे खुलकर आ जाएँ, तो आपके शरीर में विकार आने लगेंगे। इसलिए कहीं न कहीं यह उनकी कृपा ही है कि वे खुलकर नहीं आतीं। दूसरा: अगर वे किसी तरह के वचन में बँधी हों, किसी ने उन्हें रोक रखा हो, कोई बंधन लगा दिया गया हो कि नहीं आना है, तो दिक्कत होगी।
गृहस्थ तंत्रोक्त हनुमान पंच और बड़वानल स्तोत्र की योजना है, इस मौसम के अनुष्ठानों के कारण टली हुई
लिखी हुई योजना, इस मौसम के अनुष्ठानों से टली
एक श्रोता कहते हैं कि उनकी प्रबल इच्छा है कि चंद्र ग्रहण में गृहस्थ तंत्रोक्त विधि से हनुमान पंच स्तोत्र और हनुमान बड़वानल स्तोत्र किए जाएँ। वक्ता कहते हैं कि उन्होंने आज ही सब लिखकर रखा है, बस अनुभव वाले वीडियो बहुत हैं। वे बताते हैं कि यहाँ छठ था, फिर दीपावली, और अभी नवचंडी अनुष्ठान चल रहा है, इसलिए यह सब पूरा होने के बाद ही थोड़ा समय मिलेगा। पर वे डालने का प्रयास करेंगे।
एक श्रोता अपनी प्रबल इच्छा लिखते हैं कि चंद्र ग्रहण में गृहस्थ तंत्रोक्त विधि से हनुमान पंच स्तोत्र और हनुमान बड़वानल स्तोत्र किए जाएँ। वक्ता कहते हैं कि उन्होंने आज ही सब लिखकर रखा है; बस अनुभव वाले वीडियो बहुत हैं। वे कहते हैं, देखिए, यहाँ छठ था, दीपावली थी, और अभी नवचंडी अनुष्ठान चल रहा है, इसलिए यह सब पूरा होने के बाद ही थोड़ा समय मिल पाएगा। वे डालने का प्रयास करेंगे।
जिस घर में ब्रह्म पूजे जाते हैं, क्या वहाँ पंचमुखी हनुमान कवच हानिकारक है?
बावन तरह के ब्रह्म, और उनमें से कौन पूजे जाते हैं
घर में ब्रह्म पूजे जाते हों तो क्या पंचमुखी हनुमान कवच का पाठ भी हानिकारक है, यह पूछे जाने पर वक्ता उल्टा प्रश्न करते हैं: कौन से ब्रह्म पूजे जाते हैं? ब्रह्म बावन तरह के होते हैं। वे पूछने वाले से पूछते हैं कि वे किस क्षेत्र के हैं, और उनके घर में ब्रह्म किस वचन के तहत पूजे जाते हैं।
घर में ब्रह्म पूजे जाते हों तो क्या पंचमुखी हनुमान कवच का पाठ हानिकारक है, यह पूछे जाने पर वक्ता उल्टा पूछते हैं: नहीं, कौन से ब्रह्म पूजे जाते हैं? वे पूछने वाले का नाम लेकर कहते हैं कि ब्रह्म बावन तरह के होते हैं, और पूछते हैं कि वे किस क्षेत्र के हैं। और आपके घर में ब्रह्म किस वचन के तहत पूजे जाते हैं?
ऐसे घर में हनुमान जी की पूजा कब हानिकारक होती है?
सात्विक ब्रह्म अनुमति देते हैं; रोक लगाने वाले हों तो हानिकारक
अगर वे ब्रह्म देव कोटि में हैं, शुद्ध सात्विक ब्रह्म हैं, धर्म पर चलने वाले हैं, और खुद कहते हैं कि आप भगवती की सेवा-पूजा करो, हनुमान जी की सेवा-पूजा करो, तो उनकी अनुमति लेकर कीजिए, कोई दिक्कत नहीं। पर अगर देवताओं की पूजा पर ही रोक लगाई गई हो कि यह पूजा नहीं करनी है, इस तरह नहीं करनी है, तो यह हानिकारक है।
वक्ता कहते हैं कि अगर वे ब्रह्म देव कोटि में हैं, शुद्ध सात्विक ब्रह्म हैं, धर्म पर चलने वाले हैं, और खुद कहते हैं कि आप भगवती की सेवा-पूजा करो, हनुमान जी की सेवा-पूजा करो, तो उनकी अनुमति लेकर कीजिए। कोई दिक्कत नहीं है। पर अगर देवताओं की पूजा पर ही रोक लगाई गई हो कि यह पूजा नहीं करनी है, इस तरह नहीं करनी है, तो यह हानिकारक है।
अगर अनुष्ठान करवाया हो पर दशांग हवन न हो सके तो?
दशांग हवन की जगह जप
अगर अनुष्ठान करवाया हो पर दशांग हवन न हो पाए तो क्या करें, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि जप किया जा सकता है। हाँ, जप किया जा सकता है।
अनुष्ठान करवाया हो पर दशांग हवन न हो पाए तो क्या करना चाहिए, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि जप किया जा सकता है। हाँ, जप किया जा सकता है।
क्या साधना का पूरा फल रात के एकांत में ही मिलता है?
रात का एकांत, और दिन में या मंदिर के प्रांगण में साधना
एक श्रोता कहते हैं कि साधना का पूरा फल रात के एकांत में ही मिलता है। वे पिछले बीस साल से वहाँ रुद्र स्थान में साधना करना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं, ज़रूर कीजिए, बहुत अच्छी बात है। दिन में भी कर सकते हैं। रात में मंदिर के प्रांगण में कर सकते हैं। अगर वहाँ जगह हो, तो ज़रूरी नहीं कि आप ठीक उनके सामने बैठें।
एक श्रोता लिखते हैं कि साधना का पूरा फल रात के एकांत में ही मिलता है। वे पिछले बीस साल से वहाँ रुद्र स्थान में साधना करना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं, ज़रूर कीजिए। बहुत अच्छी बात है। दिन में भी कर सकते हैं। वे कहते हैं, रात में मंदिर के प्रांगण में कर सकते हैं। अगर वहाँ जगह हो, तो ज़रूरी नहीं कि आप ठीक उनके सामने बैठें।
नित्य पूजा का क्रम ठीक है, बस उसमें शिव जी को फिर से जोड़ें
नित्य पूजा का क्रम ठीक, उसमें शिव जी को फिर से जोड़ना
एक श्रोता अपना नित्य पूजन का क्रम बताते हैं: गणपति अथर्वशीर्ष, बड़वानल, भैरव नामावली, नवार्ण मंत्र, सर्वश्लोकी, फिर नवार्ण मंत्र, और अंत में अर्गला का पहला मंत्र। वक्ता कहते हैं, क्रम बिल्कुल ठीक है। पर आप शिव जी का कुछ नहीं कर रहे। कम से कम उनके बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम तो लीजिए। आपने शिव जी को छोड़ ही दिया, यह सोचकर कि भैरव ही शिव हैं, तो भैरव जी का कर रहे हैं। यह ठीक है, पर शिव जी का भी कीजिए।
एक श्रोता अपना नित्य पूजन का क्रम बताते हैं: गणपति अथर्वशीर्ष, बड़वानल, भैरव नामावली, नवार्ण मंत्र, सर्वश्लोकी, फिर नवार्ण मंत्र, और अंत में अर्गला का पहला मंत्र। वक्ता कहते हैं, क्रम बिल्कुल ठीक है। पर आप शिव जी का कुछ नहीं कर रहे। वे प्रश्नकर्ता का नाम लेकर कहते हैं, कम से कम बारह ज्योतिर्लिंग के नाम तो लीजिए। आपने शिव जी को छोड़ ही दिया, यह सोचकर कि भैरव ही शिव हैं, तो भैरव जी का कर रहे हैं। यह ठीक है, पर शिव जी का भी कीजिए।
जायफल और नींबू किन देवताओं को दे सकते हैं?
उग्र रूपों को; देव शक्तियों में मुख्य रूप से देवियों को
पूछा गया कि जायफल और नींबू किन देवताओं को दे सकते हैं। वक्ता कहते हैं, सभी उग्र शक्तियों को, सभी उग्र रूपों को दे सकते हैं। पर देव शक्तियों में जायफल बहुतों को नहीं दिया जाता। जो देवियाँ हैं, उन्हें दिया जाता है।
पूछा गया कि जायफल और नींबू किन देवताओं को दे सकते हैं। वक्ता कहते हैं, सभी उग्र शक्तियों को, सभी उग्र स्वरूपों को दे सकते हैं। पर देव शक्ति में जायफल बहुतों को नहीं दिया जाता। जो देवियाँ हैं, उन्हें दिया जाता है।
अगर साधना गुप्त न रख पाए तो क्या?
पता चल जाना दोष नहीं; दिखावा दोष है
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने अनुष्ठान पूरा किया, पर साधना गुप्त नहीं रख पाए। वक्ता कहते हैं, कोई बात नहीं। पता चल गया, तो ठीक है, कोई दिक्कत नहीं। ऐसी दिक्कत नहीं आएगी। पर इसका दिखावा मत कीजिए कि हम यह मार्ग करते हैं। वे बताते हैं कि जितने अनुभव वे रखते हैं, उनमें कभी किसी का नाम नहीं बताते। अनुभव इसलिए रखते हैं कि लोग प्रेरित हों।
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने अनुष्ठान पूरा किया, पर साधना गुप्त नहीं रख पाए। वक्ता कहते हैं, कोई बात नहीं। पता चल गया, तो ठीक है, कोई दिक्कत नहीं। ऐसी दिक्कत नहीं आएगी। पर इसका दिखावा मत कीजिए। लोगों का एक तरीका होता है कहने का कि अरे, हम तो यह मार्ग करते हैं। वे कहते हैं, जितने अनुभव हम रखते हैं, उनमें कभी किसी का नाम नहीं बताते। अनुभव सिर्फ़ इसलिए रखते हैं कि आप लोग प्रेरित हों।
उन्हें भी सबकी तरह प्रेरणा चाहिए — वे हिमालय के कोई परम सिद्ध नहीं
वे हिमालय के कोई परम सिद्ध नहीं हैं
वक्ता कहते हैं, हम भी प्रेरित होते हैं। क्या हम मंगल ग्रह से आए हैं कि हमें प्रेरणा न चाहिए? जब कोई बताता है कि आपके बताए तरीके और पाठ से हमने हनुमान जी का ऐसा हवन किया और ऐसा अनुभव हुआ, तो उनका अपना मनोबल भी बढ़ता है। वे सोचते हैं, जब उनके साथ हुआ, तो मुझे और सेवा-पूजा करनी चाहिए। वे कहते हैं, हम हिमालय के कोई परम सिद्ध नहीं हैं कि हमारे मन में इच्छा न जागे।
वक्ता कहते हैं, हम भी प्रेरित होते हैं। क्या हम मंगल ग्रह से आए हैं कि हमें प्रेरणा न चाहिए? कोई बताता है: भाई, आपने यह तरीका बताया, यह पाठ बताया, हमने हनुमान जी का ऐसा हवन किया और हमें यह अनुभव हुआ। तब मेरा भी मनोबल बढ़ता है कि जब उनके साथ हुआ, तो मुझे और सेवा-पूजा करनी चाहिए। वे कहते हैं, हम हिमालय के कोई परम सिद्ध नहीं हैं कि हमारे मन में इच्छा न जागे।
ग्रहण के हिसाब से दीपदान कब करें?
कल शाम पूर्णिमा पर, या ग्रहण के मोक्ष के बाद
पूछा गया कि क्या दीपदान ग्रहण के बाद करें। वक्ता कहते हैं, हाँ। इस पूर्णिमा का, कार्तिक पूर्णिमा का दीपदान — पूर्णिमा कल से लग रही है, तो चाहें तो कल शाम कर लें। या चाहें तो परसों, ग्रहण खत्म होने के बाद करें। नहा-धोकर, मोक्ष के बाद, चंद्र देव के दर्शन करके, पूजा स्थान को शुद्ध करके, यानी सब देवताओं पर गंगाजल आदि छिड़ककर, फिर दीपदान करें।
पूछा गया कि क्या दीपदान ग्रहण के बाद करें। वक्ता कहते हैं: हाँ। इस पूर्णिमा का, कार्तिक पूर्णिमा का दीपदान — पूर्णिमा कल से लग रही है, तो चाहें तो कल शाम भी कर सकते हैं। और चाहें तो परसों, ग्रहण खत्म होने के बाद करें: नहा-धोकर, मोक्ष के बाद, चंद्र देव के दर्शन करके, स्नान करके, पूजा स्थान को शुद्ध करके — यानी सब देवताओं पर गंगाजल आदि छिड़ककर — फिर दीपदान करें।
क्या पूजा घर में साईं बाबा की मूर्ति रखनी चाहिए?
साफ़ निर्देश कि न रखें
एक श्रोता पूछते हैं कि साईं बाबा की मूर्ति पहले पूजा घर में रखी थी, अब नहीं है। क्या पहले के समय में देवी-देवता वह पूजा स्वीकार करते थे या नहीं? वक्ता कहते हैं, यह अलग विषय हो गया। बाकी, उन्हें मत रखिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि साईं बाबा की मूर्ति की पूजा पहले पूजा घर में रखनी थी, अब नहीं। क्या पहले के समय में देवी-देवता वह पूजा स्वीकार करते थे या नहीं? वक्ता कहते हैं, यह अलग विषय हो गया। बाकी, उन्हें मत रखिए।
क्या वेबसाइट पर बनी कुंडली भरोसे लायक है?
मूल कुंडली लगभग सही; फलादेश पर ध्यान न दें
वक्ता कहते हैं, हाँ, वेबसाइट से बनी कुंडली लगभग सही रहती है। फलादेश वगैरह पर ध्यान मत दीजिए। मूल कुंडली वे लगभग सही बताते हैं।
वक्ता कहते हैं, हाँ, वेबसाइट से बनी कुंडली लगभग सही रहती है। फलादेश वगैरह पर ध्यान मत दीजिए। मूल कुंडली वे लगभग सही बताते हैं।
सवारी क्यों नहीं आती, यह देवता जानकर ही कहा जा सकता है
यह तभी कहा जा सकता है जब पता हो कि कौन से देवता हैं
सवारी खुलकर न आने पर वक्ता कहते हैं कि कौन से देवी-देवता हैं, ये सब बातें जानने के बाद ही इस पर कुछ कहा जा सकता है।
सवारी खुलकर न आने के सवाल पर वक्ता कहते हैं कि कौन से देवी-देवता हैं — ये सब बातें जानने के बाद ही इस पर कुछ कहा जा सकता है।
क्या अप्सरा साधना करना ठीक है, और प्रेमिका के रूप में?
प्रेमिका वाले रूप से उनका इनकार
पूछा गया कि क्या अप्सरा साधना करना ठीक है, और क्या इसे प्रेमिका के रूप में कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं, अब इस पर क्या ही कहें। प्रेमिका तो आपको यहीं मिल जाएगी। अप्सरा को प्रेमिका के रूप में सिद्ध करने की क्या ज़रूरत है? वे कहते हैं, फलश्रुति पढ़िए, पता चल जाएगा कि लाभ क्या है।
पूछा गया कि क्या अप्सरा साधना करना ठीक है, और फिर क्या इसे प्रेमिका के रूप में कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं, अब इस पर क्या ही कहें। प्रेमिका तो आपको यहीं मिल जाएगी। अप्सरा को प्रेमिका के रूप में सिद्ध करने की क्या ज़रूरत है? वे कहते हैं, फलश्रुति पढ़िए, उसमें पता चल जाएगा कि लाभ क्या है।
महामारी में धूमावती के बजाय विंध्यवासिनी की उपासना क्यों?
जिस रूप में आस्था हो, वह रूप नहीं बदलते
पूछा गया कि महामारी में वे माँ धूमावती से गुहार क्यों नहीं लगाते। वक्ता कहते हैं, हम उसी रूप से गुहार लगाएँगे जिसमें हमारी आस्था है। हमारी पूरी आस्था विंध्यवासिनी में है। दस महाविद्याएँ उन्हीं के रूप में स्थित हैं; वे मूल प्रकृति हैं। हम उन्हीं से गुहार लगाएँगे। आपकी आस्था धूमावती में है, तो आप उनके लिए कीजिए। हमारे लिए वे खुद धूमावती का रूप ले लेंगी, अगर उन्हें हमारी भक्ति, हमारी श्रद्धा, हमारे समर्पण पर भरोसा है।
पूछा गया कि महामारी में वे माँ धूमावती से गुहार क्यों नहीं लगाते। वक्ता कहते हैं: हम उसी रूप से गुहार लगाएँगे जिसमें हमारी आस्था है। हमारी पूरी आस्था विंध्यवासिनी में है। दस महाविद्या उन्हीं के रूप में स्थित हैं; वे मूल प्रकृति हैं। हम उन्हीं से गुहार लगाएँगे। आपकी आस्था धूमावती में है — आप उनसे गुहार लगाइए। हमारे लिए वे खुद धूमावती का रूप ले लेंगी, अगर उन्हें हमारी भक्ति, हमारी श्रद्धा, हमारे समर्पण पर भरोसा है। जिस रूप में हमारी आस्था है, जिस रूप में हमारा विश्वास है, उसी रूप की शरण में जाकर हम जो करते हैं, करते हैं। हम रूप नहीं बदलते।
क्या गुरु मंत्र से किसी का झाड़ा लगा सकते हैं?
तभी, जब गुरु ने आदेश दिया हो
पूछा गया कि क्या गुरु मंत्र से किसी का झाड़ा लगा सकते हैं। वक्ता कहते हैं, अगर आपके गुरु जी ने आदेश दिया है, तो लगा सकते हैं।
तंत्र काट के संदर्भ में पूछा गया कि क्या गुरु मंत्र से किसी का झाड़ा लगा सकते हैं। वक्ता कहते हैं, अगर आपके गुरु जी ने आपको आदेश दिया है, तो लगा सकते हैं।
झाड़ा लगाने में क्या खतरा है?
ताकतवर चीज़ पलटकर हमला करेगी, इसलिए पहले अपनी रक्षा करें
वक्ता कहते हैं, गुरु की अनुमति के बिना गुरु मंत्र से झाड़ा मत लगाइए। और अगर झाड़ा लगाते हैं, तो यह हो सकता है: अगर कोई ताकतवर चीज़ है, तो वह हमला भी करेगी और परेशानी भी बढ़ाएगी। इसलिए अपनी, अपने परिवार की और अपने स्थान की रक्षा करके ही झाड़ा वगैरह लगाना चाहिए।
वक्ता कहते हैं, गुरु की अनुमति के बिना गुरु मंत्र से झाड़ा मत लगाइए। और अगर झाड़ा लगाते हैं, तो यह हो सकता है: अगर कोई ताकतवर चीज़ है, तो वह हमला भी करेगी और परेशानी भी बढ़ाएगी। इसलिए अपनी, अपने परिवार की और अपने स्थान की रक्षा करने के बाद ही झाड़ा वगैरह लगाना चाहिए।
क्या हनुमान चालीसा को सिद्ध करना पड़ता है?
चालीसा खुद सिद्ध है — सिद्ध आपको होना है
वक्ता प्रश्नकर्ता से कहते हैं, हनुमान चालीसा अपने आप में सिद्ध है। आपको सिद्ध होना है, चालीसा को सिद्ध नहीं होना है। जब हम कहते हैं कि चालीसा सिद्ध करनी है, तो हम गलत बोलते हैं। वे कहते हैं, लोगों को समझाने के लिए ऐसा बोलना पड़ता है, पर वह अपने आप सिद्ध है।
वक्ता प्रश्नकर्ता का नाम लेकर कहते हैं, हनुमान चालीसा अपने आप में सिद्ध है। आपको सिद्ध होना है। चालीसा को सिद्ध नहीं होना है। जब हम कहते हैं कि चालीसा सिद्ध करनी है, तो हम गलत बोलते हैं। अब लोगों को समझाने के लिए ऐसा बोलना पड़ता है कि चालीसा सिद्ध करो — पर वह स्वयं सिद्ध है।
तुलसीदास ने शंकर जी को साक्षी बनाया: जो यह पढ़े हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा
वे उद्धृत करते हैं: जो यह पढ़े हनुमान चालीसा हो सिद्धि साखी गौरीसा. वे कहते हैं, तुलसीदास जी ने कहा है कि जो हनुमान चालीसा पढ़ेगा, उसका हर काम सिद्ध होगा। तो चालीसा भी सिद्ध ही होगी, और शंकर जी को इसका प्रमाण, इसका साक्षी बनाया गया है। तो फिर आप कैसे कह सकते हैं कि सिद्ध नहीं होगी? वे कहते हैं, प्रयास कीजिए, ज़रूर होगा।
वक्ता पूछते हैं, शिव जी ने क्या कहा है, और उद्धृत करते हैं: जो यह पढ़े हनुमान चालीसा हो सिद्धि साखी गौरीसा. वे कहते हैं, हाँ, तुलसीदास जी ने कहा है कि जो हनुमान चालीसा पढ़ेगा, उसका हर काम सिद्ध होगा — तो चालीसा भी सिद्ध ही होगी, और शंकर जी को इसका प्रमाण, इसका साक्षी बनाया गया है। तो फिर आप कैसे कह सकते हैं कि सिद्ध नहीं होगी? प्रयास कीजिए, ज़रूर होगा।
क्या उँगलियों पर जप गिनना सही तरीका है?
कर माला
हाथ पर गिनकर जप करने की विधि पूछी गई। वक्ता कहते हैं: अच्छा, आप कर माला की बात कर रहे हैं। ठीक है, यह भी सही है।
हाथ पर गिनकर जप करने की विधि पूछी गई। वक्ता कहते हैं: अच्छा, आप कर-माला की बात कर रहे हैं। ठीक है — यह भी सही है।
गंधर्वराज विश्वावसु की साधना कैसे करें?
पहले तीन साधनाएँ, और दीक्षा
वक्ता कहते हैं, गंधर्वों की साधना कर सकते हैं, पर उसके लिए पहले मुख्य रूप से तीन साधनाएँ करें, और दीक्षित होकर करें: शिव जी की साधना, यक्षराज कुबेर की साधना, और फिर गंधर्वराज की साधना। इसमें गणपति की साधना भी ज़रूरी होगी।
क्या चाँदी के त्रिशूल पर सिंदूर लगाना चाहिए?
भैरव के त्रिशूल पर सिंदूर, शिव के त्रिशूल पर भस्म और चंदन
वक्ता कहते हैं, भैरव जी के त्रिशूल पर लगा सकते हैं। शिव जी के त्रिशूल पर भस्म और चंदन लगा सकते हैं।
पूछा गया कि क्या चाँदी के त्रिशूल पर सिंदूर लगाकर रखना चाहिए। वक्ता कहते हैं, भैरव जी के त्रिशूल पर लगा सकते हैं। शिव जी के त्रिशूल पर भस्म और चंदन लगा सकते हैं।
गंदी शक्ति और चौकियाँ कैसे काटी जाती हैं?
आम लोगों के लिए हनुमान चालीसा और बजरंग बाण
वक्ता कहते हैं, इसकी पूरी एक विधि है। आम लोगों के लिए यह हनुमान चालीसा और बजरंग बाण के प्रयोग से होता है।
पूछा गया कि गंदी शक्ति और चौकी कैसे काटी जाती हैं। वक्ता कहते हैं, इसकी पूरी एक विधि है। आम लोगों के लिए यह हनुमान चालीसा और बजरंग बाण के प्रयोग से होता है।
अगर घर के खाने में शराब और मांस हो तो क्या करें?
जिस देव रूप की उपासना करते हैं, वह रूप बदलें
एक श्रोता पूछते हैं कि अगर खाने में मदिरा और मांस का उपयोग होता है, तो क्या सात्विक पूजा में दिक्कत होती है। वक्ता कहते हैं: चिंता मत कीजिए। अपने इष्ट और आराध्य से प्रार्थना करके रूप बदल लीजिए। आप भगवान नरसिंह की उपासना कर सकते हैं। काल भैरव या बटुक भैरव की उपासना भी इस तरह कर सकते हैं कि कोई दोष न लगे। भगवती काली के रूप की उपासना कीजिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि अगर खाने में मदिरा और मांस का उपयोग होता है, तो क्या सात्विक पूजा में दिक्कत होती है। वक्ता कहते हैं: चिंता मत कीजिए। अपने इष्ट और आराध्य से प्रार्थना करके स्वरूप बदल लीजिए। आप भगवान नरसिंह की उपासना कर सकते हैं। काल भैरव या बटुक भैरव की उपासना भी ऐसे कर सकते हैं कि कोई दोष न लगे। भगवती काली के रूप की उपासना कीजिए।
क्या बटुक भैरव मंत्र के जप से गर्भ को नुकसान होता है?
कोई बुरा असर नहीं — भैरव बच्चे की रक्षा करते हैं
एक श्रोता बताती हैं कि उन्होंने अनजाने में नवरात्रि में बटुक भैरव मंत्र का जप किया। वक्ता उनका नाम लेकर कहते हैं, ऐसी कोई गलती नहीं है। बटुक भैरव मंत्र के जप से या भगवती के मंत्र के जप से गर्भ पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता। अगर किसी ने यह बताया है, तो गलत बताया है। भैरव जी महाशक्ति हैं और खुद इन सबकी रक्षा के लिए तैयार रहते हैं।
एक श्रोता बताती हैं कि उन्होंने नवरात्रि में बटुक भैरव मंत्र का जप किया, यह जाने बिना कि वे गर्भवती हैं। वक्ता उनका नाम लेकर कहते हैं, नहीं, ऐसी कोई गलती नहीं है। बटुक भैरव मंत्र के जप से, या भगवती के मंत्र के जप से, गर्भ पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता। अगर किसी ने यह बताया है, तो गलत बताया है। भैरव जी महाशक्ति हैं; वे खुद इन सबकी रक्षा के लिए तैयार रहते हैं।
गर्भ के समय बच्चे की रक्षा कौन करता है?
भगवती षष्ठी, साथ में आठ बाल भैरव और सोलह बटुक भैरव
वक्ता कहते हैं, जब भी गर्भ का समय होता है — जैसा उन्होंने पहले एक लाइव में भी बताया था — सबसे पहले भगवती षष्ठी होती हैं, जो देव सेना हैं। बच्चे की रक्षा के लिए उनके साथ बाल भैरव और बटुक भैरव चलते हैं, सबसे तीव्र। आठ बाल भैरव, सोलह बटुक भैरव: इस तरह वे चलते हैं और रक्षा करते हैं। वे कहते हैं, यह हो ही नहीं सकता कि कवच पाठ की वजह से ऐसा कुछ हुआ हो। यह बात अपने दिल से और मन से निकाल दीजिए। कोई गलती नहीं है।
वक्ता कहते हैं, जब भी गर्भ का समय होता है — और यह उन्होंने पहले एक लाइव में भी बताया है — सबसे पहले भगवती षष्ठी होती हैं, जो देवी षष्ठी हैं, देव सेना हैं। बच्चे की रक्षा के लिए उनके साथ बाल भैरव चलते हैं, बटुक भैरव चलते हैं, सबसे तीव्र। आठ बाल भैरव, सोलह बटुक भैरव। इस तरह वे चलते हैं और रक्षा करते हैं। यह हो ही नहीं सकता कि कवच पाठ की वजह से ऐसा कुछ हुआ हो। यह बात अपने दिल से, अपने मन से निकाल दीजिए। कोई गलती है ही नहीं। दैव योग और बाकी सब माना जा सकता है, पर आपकी तरफ़ से इस वजह से कोई गलती नहीं हुई।
प्रणव क्या है, और जो जनेऊ नहीं पहनते वे क्या करें?
यज्ञोपवीत न पहनने वालों के लिए बिना प्रणव का जप
पूछा गया कि प्रणव क्या है और जो जनेऊ नहीं पहनते वे क्या करें। वक्ता कहते हैं, जो जनेऊ नहीं पहनते, वे बिना प्रणव के, इसके बिना जप करें।
पूछा गया कि प्रणव क्या है, और जो जनेऊ नहीं पहनते वे क्या करें। वक्ता कहते हैं, जो जनेऊ नहीं पहनते, वे बिना प्रणव के, इसके बिना जप करें। एक अलग सवाल पर वे जोड़ते हैं कि दीक्षित हों तो बाला त्रिपुरसुंदरी की साधना ले सकते हैं।
एक अविवाहित कन्या सती हुई थी और पूजी जाती थी, पर कोई नहीं जानता वह कौन थी — तब क्या करें?
किसी शक्तिपीठ का सहारा लें
एक श्रोता बताते हैं कि एक अविवाहित कन्या सती हुई थी और पूजी जाती थी, पर अब उन्हें नहीं पता कि सती माता कौन हैं या कहाँ हैं, तो उनकी पूजा और ध्यान कैसे करें। वक्ता नाम लेकर कहते हैं, यह तो पता होगा कि वे कौन हैं, उनका कोई स्थान तो होगा। अगर बिल्कुल नहीं पता, तो किसी शक्तिपीठ का सहारा लीजिए।
एक श्रोता बताते हैं कि एक अविवाहित कन्या सती हुई थी और पूजी जाती थी, और अब उन्हें नहीं पता कि वे कौन हैं या सती माता कहाँ हैं, तो उनकी पूजा और ध्यान कैसे करें। वक्ता नाम लेकर कहते हैं, इतना तो पता होगा कि वे कौन हैं; उनका कोई स्थान तो होगा। अगर बिल्कुल नहीं पता, तो किसी शक्ति पीठ का सहारा लीजिए।
पूजा के बाद आसन से उठने का तरीका क्या है?
आसन उठाना, इन्द्राय नमः कहकर माथे पर तीन बार जल
वक्ता कहते हैं, आम तरीका यह है कि आसन से पीछे की ओर उठना होता है। और उठते समय पूरी तरह हटना नहीं है, यानी आसन छोड़ना नहीं है। आसन को थोड़ा सा उठाइए, जल डालिए, फिर इन्द्राय नमः कहकर माथे पर तीन बार जल लगाइए, और तभी आसन हटाइए।
एक श्रोता का नाम लेकर वक्ता कहते हैं, आम तरीका वही है: आसन से पीछे की ओर उठना होता है। और उठते समय पूरी तरह हटना नहीं है, यानी आसन छोड़ना नहीं है। आसन को थोड़ा उठाइए, जल डालिए, फिर इन्द्राय नमः कहकर माथे पर तीन बार जल लगाइए, और तभी आसन हटाइए।
क्या कपूर पर इलायची चढ़ानी चाहिए?
कपूर पर लौंग, इलायची नहीं
वक्ता कहते हैं कि कपूर पर इलायची नहीं चढ़ानी चाहिए। सत्र में आगे वे एक और प्रश्नकर्ता का नाम लेकर कहते हैं कि कपूर पर इलायची नहीं, लौंग चढ़ानी है।
पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि कपूर पर इलायची नहीं घुमानी या चढ़ानी चाहिए। अलग से, एक और श्रोता का नाम लेकर वे फिर कहते हैं कि कपूर पर इलायची नहीं चढ़ानी है; लौंग चढ़ानी है। वे यहाँ एक और प्रश्न का उत्तर भी देते हैं: नहीं, इनमें से एक ही होगा — या तो काली जी का या तारा माँ का।
क्या ग्रहण में चण्डी कवच का पाठ हो सकता है?
ग्रहण में अनुमति है
वक्ता कहते हैं: बिल्कुल, ग्रहण में आप चण्डी कवच कर सकते हैं।
पूछा गया कि क्या ग्रहण में चण्डी कवच किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल, आप कर सकते हैं।
क्या भैरव जी पर काले काजल का लेप लगाना ठीक है?
अगर आपके क्षेत्र में ऐसा होता है तो ठीक है
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने भैरव जी पर काले काजल का लेप लगाया है। वक्ता उनका नाम लेकर मज़ाक में कहते हैं कि अच्छा, आपने तो भैरव जी को पूरा काला कर दिया। वे कहते हैं, ठीक है — अगर आपके क्षेत्र में ऐसा होता है तो ठीक है।
एक श्रोता पूछते हैं कि उन्होंने भैरव जी पर काले काजल का लेप लगाया है, क्या यह ठीक है। वक्ता उनका नाम लेकर कहते हैं कि आपने तो भैरव जी को पूरा काला कर दिया। ठीक है: अगर आपके क्षेत्र में ऐसा होता है तो ठीक है।
नौ साल से लापता भाई के लिए क्या उपाय है?
सम्पूर्ण हनुमान चालीसा, माँगने पर भेजी जाएगी
एक श्रोता कहते हैं कि उनका छोटा भाई नौ साल से लापता है। वक्ता कहते हैं कि टेलीग्राम पर एक बार संदेश करें, वे सम्पूर्ण हनुमान चालीसा भेज देंगे; उसी से करें, और वे चाहेंगे तो ज़रूर होगा।
एक श्रोता कहते हैं कि नौ साल से उनका छोटा भाई लापता है। वक्ता हनुमान जी का नाम लेकर कहते हैं — टेलीग्राम पर एक बार संदेश करें, हम आपको सम्पूर्ण हनुमान चालीसा भेज देंगे। उसी से करें; और वे चाहेंगे तो ज़रूर होगा।
घर में ऐसी बातें हो रही हों तो क्या करें?
किसी साधक से हवनात्मक प्रयोग करवाएँ
वक्ता प्रश्नकर्ता का नाम लेकर कहते हैं कि अगर घर में इस तरह की बातें हो रही हैं, तो किसी साधक से हवनात्मक प्रयोग करवा लें।
वक्ता श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि अगर घर में इस तरह की बातें हो रही हैं, तो किसी साधक से हवनात्मक प्रयोग करवा लें।
अकेले हवन में धारा देने में क्या कोई दोष है?
धारा दी जा सकती है
पूछा गया कि अकेले हवन करते समय पहले घृत से आहुतियाँ और फिर साकल्य से प्रधान आहुति देने के बाद धारा देने में कोई दोष है क्या। वक्ता कहते हैं: आप धारा दे सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं।
एक श्रोता अकेले हवन करने के बारे में पूछते हैं: पहले घृत से आहुति देकर, फिर साकल्य से प्रधान आहुति देने के बाद, धारा देने में कोई दोष है क्या। वक्ता उत्तर देते हैं कि आप धारा दे सकते हैं; कोई दिक्कत नहीं है।
ग्रहण शाम 5:10 से 6:20 तक है
शाम 5:10 से 6:20 तक
वक्ता कहते हैं कि ग्रहण का समय शाम 5:10 से 6:20 तक है।
वक्ता कहते हैं कि ग्रहण का समय शाम 5:10 से 6:20 तक है। एक और श्रोता को उत्तर में वे जोड़ते हैं कि वे ज़रूर मोक्ष देने वाले हैं।
क्या ग्रहण काल में सिद्धियाँ मिल सकती हैं?
सिद्धि यूट्यूब पर नहीं मिलती — गुरु और अपनी पात्रता चाहिए
एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें ग्रहण काल में सिद्धियाँ चाहिए, वे कैसे मिलें। वक्ता कहते हैं कि सब कुछ पहले ही बताया जा चुका है। एक और प्रश्नकर्ता का नाम लेकर वे कहते हैं: आपको सिद्धि चाहिए — सिद्धि यूट्यूब पर नहीं मिलती। अच्छे गुरु चाहिए होंगे। अपनी पात्रता बढ़ाइए, गुरु प्राप्त कीजिए, और उनके माध्यम से जैसे-जैसे आपकी पात्रता बढ़ती जाएगी, जो आप खोज रहे हैं वह अपने आप मिलता जाएगा।
पूछा गया कि ग्रहण काल में सिद्धियाँ कैसे मिलें। वक्ता कहते हैं कि सब कुछ बताया जा चुका है; अब और क्या कहना। एक और प्रश्नकर्ता का नाम लेकर वे कहते हैं: आपको सिद्धियाँ प्राप्त करनी हैं — इसके लिए आपको सिद्धि चाहिए न, और सिद्धि यूट्यूब पर नहीं मिलती। अच्छे गुरु चाहिए होंगे। अपनी पात्रता बढ़ाइए, गुरु प्राप्त कीजिए, और उनके माध्यम से जैसे-जैसे आपकी पात्रता बढ़ती जाएगी, जो आप चाहते हैं वह अपने आप मिलता जाएगा।
ग्रहण का उपवास किस दिन रखना है?
8 तारीख को ग्रहण का उपवास
पूछा गया कि उपवास किसके लिए रखना है। वक्ता कहते हैं कि ग्रहण वाला उपवास 8 तारीख को होगा।
पूछा गया कि उपवास किसके लिए रखना है। वक्ता उत्तर देते हैं कि ग्रहण के लिए, ग्रहण वाला, उपवास 8 तारीख को होगा।
हवन में घी और गुग्गुल कैसे दें?
पहले घृत की तीन आहुतियाँ, फिर गुग्गुल मिली हुई
पूछा गया कि गुग्गुल मिलाकर हवन करते समय क्या पहले घृत से आहुतियाँ दे सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि पहले घृत की तीन आहुतियाँ दें, उसके बाद गुग्गुल मिली हुई।
गुग्गुल मिलाकर हवन करने के संदर्भ में पूछा गया कि क्या पहले घृत से आहुतियाँ दी जा सकती हैं। वक्ता कहते हैं कि पहले घृत की तीन आहुतियाँ देनी चाहिए। उसके बाद गुग्गुल मिली हुई।
भेजा गया मंत्र तंत्रोक्त देवी सूक्तम् का है, और इसे साधारण रूप से ज़्यादा नहीं करना चाहिए
साधारण रूप से बहुत ज़्यादा नहीं करना चाहिए
एक श्रोता एक मंत्र लिखकर भेजते हैं, और वक्ता बताते हैं कि यह तंत्रोक्त देवी सूक्तम् का मंत्र है। वे कहते हैं कि उनके अनुसार साधारण रूप से इसे बहुत ज़्यादा नहीं करना चाहिए।
एक श्रोता का नाम लेकर, उनके लिखे मंत्र के बारे में वक्ता कहते हैं कि यह तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का मंत्र है। वे कहते हैं कि उनके अनुसार साधारण रूप से इसे बहुत ज़्यादा नहीं करना चाहिए। अलग से, एक और प्रश्नकर्ता से वे कहते हैं कि उन्हें शालिग्राम का जल पिलवाना बहुत अच्छा रहेगा।
क्या ग्रहण में मंदिर में सुरक्षा घेरा ज़रूरी है?
मंदिर में सुरक्षा घेरे की ज़रूरत नहीं
वक्ता कहते हैं: नहीं, ग्रहण काल में मंदिर में सुरक्षा घेरा लगाने की कोई ज़रूरत नहीं है।
पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि नहीं, ग्रहण काल में मंदिर में सुरक्षा घेरा लगाने की कोई ज़रूरत नहीं है। सूर्य अर्घ्य की विधि पर वे कहते हैं कि लोग अपनी-अपनी विधि से कर सकते हैं, इसमें वे क्या कहें — उनके मना करने या कहने से सब नहीं चलेंगे।
क्या माला जप के लिए हनुमान जी को गुरु मान सकते हैं?
हाँ, बिना किसी शर्त के
पूछा गया कि क्या माला जप के लिए हनुमान जी को गुरु मान सकते हैं। वक्ता कहते हैं: क्यों नहीं — बिल्कुल मानिए।
पूछा गया कि क्या माला जप के लिए हनुमान जी को गुरु मान सकते हैं। वक्ता कहते हैं: क्यों नहीं मान सकते? बिल्कुल मानिए। बाद में वही प्रश्न फिर आने पर वे कहते हैं: कितनी बार पूछेंगे।
क्या जनेऊ पहनने वाले को भूत पकड़ सकता है?
नौ धागे और उनमें आवाहित देवता
वक्ता कहते हैं कि सच कहा जाए तो जो जनेऊ के नियम मानकर उसे धारण करते हैं, उन्हें कोई वायवीय शक्ति, कोई प्रेत, पिशाच या नकारात्मक शक्ति छू भी नहीं सकती। कारण यह है कि इसके नौ धागों में कौन-कौन से देवता आवाहित होते हैं — जनेऊ पहनेंगे तो आप जानेंगे। उनकी कोई महाशक्ति नहीं छूटती: सभी महाशक्तियों का आवाहन होता है। जनेऊ में प्रणव के साथ सभी आपके लिए प्रतिष्ठित होते हैं। इसलिए यह संभव ही नहीं है।
पूछा गया कि क्या जनेऊ पहनने वाले को भी भूत पकड़ सकते हैं। वक्ता कहते हैं: अगर वास्तविकता कही जाए, तो जो जनेऊ के नियम मानकर उसे धारण करते हैं, उन्हें कोई वायवीय शक्ति, कोई प्रेत, पिशाच या नकारात्मक शक्ति छू भी नहीं सकती। कारण यह है कि इसके नौ तंतुओं में कौन-कौन से देवता आवाहित होते हैं — जनेऊ पहनते होंगे तो आप यह जानते होंगे। उनकी ऐसी कोई महाशक्ति नहीं जो छूट जाए; सभी महाशक्तियों का आवाहन होता है। जनेऊ में प्रणव के साथ सभी आपके लिए वहाँ प्रतिष्ठित होते हैं। इसलिए यह संभव ही नहीं है।
ऊँची योनि वाली शक्तियों पर जनेऊ का क्या असर होता है?
ऊँची योनि के प्रेत-पिशाच भी शांत होते हैं
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण उस तरह की योनि वाले प्रेत और पिशाच — जो ऊँची योनि के हैं — वे भी जनेऊ से शांत हो जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण जनेऊ से उस तरह की योनि वाले प्रेत और पिशाच, जो ऊँची योनि के हैं, वे भी शांत हो जाते हैं।
मनुष्य कर्म-प्रधान हो या भक्ति-प्रधान?
कर्म का फल अपने आराध्य को अर्पित करें
वक्ता कहते हैं कि भगवद्गीता में कर्म योग और भक्ति योग दोनों पढ़िए, और जो आपको उचित लगे उसके अनुसार चलिए। उनके अपने मत में, कर्म करना चाहिए और उस कर्म का फल अपने आराध्य को समर्पित कर देना चाहिए — यही सबसे बड़ी भक्ति है और यही सबसे बड़ा कर्म।
पूछा गया कि मनुष्य कर्म-प्रधान हो या भक्ति-प्रधान। वक्ता कहते हैं: श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म योग और भक्ति योग दोनों पढ़िए; कर्म योग या भक्ति योग, जो आपको उचित लगे, उसके अनुसार चलिए। वे कहते हैं, मेरे मत में, कर्म करते हुए उस कर्म का फल अपने आराध्य को समर्पित कर देना चाहिए। यही सबसे बड़ी भक्ति है, और यही सबसे बड़ा कर्म है।
गोवर्धन में नवचण्डी जगदम्बा की इच्छा से हुई, और उसका फल उन्हीं को समर्पित है
जगदम्बा की इच्छा थी; फल उन्हीं को समर्पित
वक्ता कहते हैं कि अभी हम जो कुछ कर रहे हैं — जैसे हम लाइव आए हैं, जैसे आज आप सबके कारण और हमारे माध्यम से गोवर्धन पर्वत पर नवचण्डी हो रही है — हमें यह नहीं कहना चाहिए कि हम करवा रहे हैं, हमने किया। ऐसा नहीं होना चाहिए। ऐसा हुआ तो दिक्कत है। मन में यही भाव होना चाहिए और हम कहते भी हैं: हमारे अंदर कोई सामर्थ्य नहीं है; जगदम्बा की इच्छा थी, उन्होंने करवाया, और उन्हीं को वह फल समर्पित है, उन्हीं को वह कार्य समर्पित है।
ग्रहण में गुरु मंत्र की कितनी मालाएँ करें?
माला नहीं — शुरू से अंत तक लगातार जप
वक्ता कहते हैं कि माला मत कीजिए: ग्रहण शुरू होने से ख़त्म होने तक लगातार जप।
पूछा गया कि गुरु मंत्र की कितनी मालाएँ करनी होंगी। वक्ता कहते हैं: माला मत कीजिए। ग्रहण शुरू होने से लेकर जब तक ख़त्म न हो — लगातार जप।
क्या शाबर मंत्र के जप से तपोबल बढ़ता है?
कौन-सा शाबर मंत्र है, इस पर निर्भर; पर मंत्र बल ज़रूर बढ़ता है
वक्ता कहते हैं कि यह इस पर भी निर्भर है कि शाबर में कौन-सा मंत्र है; तपोबल और मंत्र बल ज़रूर बढ़ते हैं।
पूछा गया कि क्या शाबर मंत्र के जप से तपोबल बढ़ता है। वक्ता कहते हैं कि यह इस पर भी निर्भर है कि शाबर में कौन-सा मंत्र है। तपोबल और मंत्र बल ज़रूर बढ़ते हैं।
कपूर पर इलायची कब दी जाती है?
केवल गन्धर्वों की सेवा-पूजा में
वक्ता फिर कहते हैं कि कपूर पर इलायची नहीं, लौंग चढ़ानी है। कपूर पर इलायची तब दी जाती है जब गन्धर्वों की सेवा-पूजा होती है — वैसे नहीं। अगर किसी के मण्डल पूजन में गन्धर्व हों, तो दी जाती है।
वक्ता श्रोता का नाम लेकर कहते हैं कि कपूर पर इलायची नहीं चढ़ानी है: लौंग चढ़ानी है। सूर्य ग्रहण में कपूर पर इलायची तब दी जाती है जब गन्धर्वों की सेवा-पूजा होती है — ऐसे ही नहीं। अगर किसी के मंडल पूजन में गन्धर्व हों, तो दी जाती है।
एक श्रोता को सूर्य ग्रहण में आँखें बंद करने पर देवी दिखीं — क्या मंत्र सिद्ध हो गया?
देवी कृपा मिली, और अनुष्ठान दोहराना है
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने सूर्य ग्रहण में जप किया और आँखें बंद करने पर देवी के दर्शन हुए और आशीर्वाद मिला, और पूछते हैं कि क्या मंत्र सिद्ध हो गया। वक्ता उनका नाम लेकर कहते हैं कि मंत्र की क्या बात — आपको देवी कृपा मिल गई है। अब वह अनुष्ठान बार-बार दोहराइए।
एक श्रोता कहते हैं कि सूर्य ग्रहण में उन्होंने जप किया, और आँखें बंद होने पर उन्हें उनके दर्शन हुए और आशीर्वाद मिला; वे पूछते हैं कि क्या मंत्र सिद्ध हो गया। वक्ता उनका नाम लेकर कहते हैं कि मंत्र की क्या बात — आपको देवी कृपा मिल गई है। अब वह अनुष्ठान बार-बार दोहराइए।
क्या वसंत पंचमी पर तंत्रोक्त लक्ष्मी कलश स्थापित कर सकते हैं?
पूरे विधि-विधान से, अनुमति है
पूछा गया कि क्या वसंत पंचमी पर विधि-विधान से तंत्रोक्त लक्ष्मी कलश स्थापित कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं: हाँ, कीजिए।
पूछा गया कि क्या वसंत पंचमी पर विधि-विधान से तंत्रोक्त लक्ष्मी कलश स्थापित कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं: हाँ, कीजिए।
तपोबल कितनी जल्दी ख़त्म हो सकता है?
जल्दी बनता है, एक अपराध से ख़त्म
वक्ता कहते हैं कि तपोबल बहुत जल्दी बनता है और बहुत जल्दी ख़त्म होता है — एक ही अपराध में ख़त्म हो जाएगा।
एक श्रोता की बात को उनका नाम लेकर सही बताते हुए वक्ता कहते हैं: तपोबल बहुत जल्दी बनता है और बहुत जल्दी ख़त्म होता है। एक अपराध में भी ख़त्म हो जाएगा।
सिद्ध किए शाबर मंत्र का असर किससे नष्ट होता है?
सभा में बताने से, और समुद्र पार करने से
वक्ता कहते हैं कि अगर आपने शाबर सिद्धि की है और उसे सभा में बता दिया, तो यह आप हर जगह पढ़ेंगे भी: शाबर मंत्र सभा में बोलने से उसका असर चला जाता है। समुद्र पार करने से भी। वे उदाहरण देते हैं: आपने शाबर मंत्र सिद्ध किया, मंत्र के प्रभाव से बहुत धन पाया, और उसी धन से मॉरीशस या स्विट्ज़रलैंड घूमने चले गए — लौटकर आएँगे तो मंत्र काम नहीं करेगा।
वक्ता कहते हैं कि आपने शाबर सिद्धि की और उसे सभा में बता दिया। यह आपको हर जगह पढ़ने को भी मिलेगा: शाबर मंत्र सभा में बोलने से उसका असर चला जाता है। और समुद्र पार करने से भी। अब मान लीजिए आपने यहाँ शाबर मंत्र सिद्ध किया; मंत्र के प्रभाव से बहुत धन आदि पाया, और उसी धन से मॉरीशस घूमने, स्विट्ज़रलैंड घूमने चले गए। लौटकर आएँगे तो मंत्र काम नहीं करेगा।
क्या हनुमान चालीसा के अनुष्ठान से सवारी खुल सकती है?
हाँ, खुल सकती है
वक्ता नाम लेकर कहते हैं: हाँ, बिल्कुल, हनुमान चालीसा के अनुष्ठान से सवारी खुल सकती है।
एक श्रोता का नाम लेकर वक्ता कहते हैं कि हाँ, बिल्कुल, हनुमान चालीसा के अनुष्ठान से सवारी खुल सकती है। एक और श्रोता से वे कहते हैं कि आज बताई गई विधियों में से जो आपको ठीक लगे, वह कीजिए; उन्होंने उन्हें पहले भी बताया था। करके देखिए।
किए गए प्रयोग को हटाने में कितना समय लगता है?
सौ किलो के बोझ का उदाहरण
वक्ता कहते हैं कि समय इस पर निर्भर करता है कि प्रयोग कैसा किया गया है, और आप उसे कैसे हटा रहे हैं। मान लीजिए आपके ऊपर सौ किलो का बोझ रख दिया गया है, पर आपमें इतना सामर्थ्य है कि आपने उस बोझ को रोक लिया है। अब उसे हटाना है। चाहें और उतना सामर्थ्य हो तो एक बार में हटा लें, या पाँच-पाँच किलो करके, या दस-दस किलो करके हटाएँ। समय लगेगा, पर हटा तो लेंगे ही।
वक्ता कहते हैं कि समय इस पर निर्भर करता है कि प्रयोग कैसा किया गया है, और आप उसे कैसे हटा रहे हैं। मान लीजिए आपके ऊपर सौ किलो का बोझ रख दिया गया है, पर आपमें इतना सामर्थ्य है कि आपने उस बोझ को रोक लिया है। अब उसे हटाना है। चाहें और उतना सामर्थ्य हो तो एक बार में हटा लें; या पाँच-पाँच किलो करके हटाएँ; या दस-दस किलो करके हटाएँ। समय लगेगा, पर हटा तो लेंगे ही।
क्या पाठ के साथ हवन भी करना चाहिए?
पाठ के साथ हवनात्मक प्रयोग से जल्दी काम होता है
वक्ता कहते हैं कि बहुत अच्छा है कि वे पाठ कर रही हैं, उन्हें करने दीजिए। साथ में किसी और व्यक्ति का सहयोग लेकर घर पर हवनात्मक प्रयोग भी करवाइए। थोड़ा हवन होगा तो ये चीज़ें जल्दी से जल्दी खत्म होंगी।
वक्ता कहते हैं कि बहुत अच्छा है कि वे पाठ कर रही हैं; उन्हें करने दीजिए। वे प्रश्न पूछने वाली को नाम लेकर कहते हैं कि साथ में किसी और व्यक्ति का सहयोग लेकर घर पर हवनात्मक प्रयोग भी करवाइए। थोड़ा हवन होगा तो ये चीज़ें जल्दी से जल्दी खत्म होंगी।
अगर पवित्र अवस्था न हो तो क्या प्रणव के साथ जप हो सकता है?
अपवित्र अवस्था में प्रणव जप नहीं; स्तोत्र पाठ की बात अलग
वक्ता कहते हैं: नहीं, जब वह पवित्रता न हो तो प्रणव के साथ जप नहीं होगा। मंत्र जप नहीं होगा। अगर आप किसी स्तोत्र का पाठ कर रहे हैं, सहस्रनाम पढ़ रहे हैं और बीच में कुछ आ जाए, या साबर कर रहे हैं — तो वह बात अलग है।
वक्ता कहते हैं: नहीं, जब वह पवित्रता न हो तो प्रणव के साथ जप नहीं होगा। देखिए, मंत्र जप नहीं होगा। अगर आप किसी स्तोत्र का पाठ करते हैं, सहस्रनाम पढ़ रहे हैं और बीच में कुछ आ जाए, या साबर कर रहे हैं — तो फिर वह बात अलग है।
लांगुलास्त्र को लेकर क्या चेतावनी है?
प्रयोग से पहले हज़ार बार सोचें
वक्ता कहते हैं कि लांगुलास्त्र का प्रयोग करने से पहले हज़ार बार सोच लीजिए; ज्योतिष में वह बुरा है। लांगुलास्त्र भगवती बगलामुखी के ब्रह्मास्त्र जैसा है — जैसे छत्तीस अक्षरी लोग जब-तब कर लेते हैं और परेशान होते रहते हैं। छत्तीस अक्षरी में हो सकता है क्षमा मिल जाए, पर लांगुलास्त्र में क्षमा नहीं मिलती। जहाँ आपकी ओर से गलती हुई, वहाँ पहला नाश प्रयोग करने वाले का ही होता है।
वक्ता कहते हैं कि लांगुलास्त्र का प्रयोग करने से पहले हज़ार बार सोच लीजिए: ज्योतिष में वह बुरा है। लांगुलास्त्र भगवती बगलामुखी का ब्रह्मास्त्र है — जैसे छत्तीस अक्षरी लोग जब-तब कर लेते हैं और परेशान होते रहते हैं। छत्तीस अक्षरी में हो सकता है आपको क्षमादान मिल जाए। पर लांगुलास्त्र में क्षमा नहीं मिलती। जहाँ आपकी ओर से गलती हुई, वहाँ पहला नाश प्रयोग करने वाले का ही होता है। इसलिए लांगुलास्त्र का प्रयोग सोच-समझकर ही करें।
लांगुलास्त्र का प्रयोग कब उचित है, और हनुमान जी के अस्त्रों में इसका स्थान क्या है?
पाँच प्रमुख अस्त्रों में सबसे तीव्र
वक्ता कहते हैं कि इसका प्रयोग तब हो जब वास्तव में आपके ऊपर तंत्र बाधा हो, शत्रु गलत हो, और आपको लांगुलास्त्र की विधि सही तरीके से आती हो। हनुमान जी के जितने अस्त्र हैं, उनमें लांगुलास्त्र सबसे तीव्र है। हनुमान जी के पाँच प्रमुख अस्त्रों में वे वज्रास्त्र, कपिनखास्त्र और लांगुलास्त्र का नाम लेते हैं, और कहते हैं कि दो और हैं जिनका पूरा नाम उन्हें याद नहीं आ रहा। इनमें लांगुलास्त्र को सबसे तीव्र माना गया है।
वक्ता कहते हैं कि वास्तव में आपके ऊपर तंत्र बाधा हो, शत्रु गलत हो, और आपको लांगुलास्त्र की विधि सही तरीके से आती हो। हनुमान जी के जितने भी अस्त्र हैं, उनमें लांगुलास्त्र सबसे तीव्र है। हनुमान जी के पाँच प्रमुख अस्त्रों में वे वज्रास्त्र, कपिनखास्त्र और लांगुलास्त्र का नाम लेते हैं, और कहते हैं कि दो और हैं जिनका पूरा नाम उन्हें याद नहीं आ रहा। उनमें लांगुलास्त्र को सबसे तीव्र माना गया है।
देवताओं को जायफल किन तरीकों से चढ़ाया जाता है?
क्षेत्र के अनुसार दो तरीके — काटकर, या लौंग और कपूर के साथ आहुति में
वक्ता कहते हैं कि लोग देवी-देवताओं को जायफल दो प्रकार से देते हैं, और यह क्षेत्र के अनुसार भी होता है। कुछ लोग इसे काटकर भी चढ़ा देते हैं। वे कहते हैं कि हमारी तरफ़ इसे आहुति में दिया जाता है; या फिर लौंग के ऊपर, कपूर के ऊपर — पाँच कपूर के ऊपर एक जायफल।
वक्ता कहते हैं कि लोग देवी-देवताओं को जायफल दो प्रकार से देते हैं, और यह क्षेत्र के अनुसार भी होता है। कुछ लोग इसे काटकर भी चढ़ा देते हैं। और वे कहते हैं कि हमारी तरफ़ इसे आहुति में दिया जाता है; या फिर लौंग के ऊपर, कपूर के ऊपर — पाँच कपूर के ऊपर एक जायफल।
शाकंभरी और अघोर नवरात्रि किस हिंदी महीने में आती हैं?
शाकंभरी दिसंबर-जनवरी के बीच; अघोर भादो, भाद्रपद के आसपास
जब पूछा गया कि शाकंभरी और अघोर नवरात्रि किस हिंदी महीने में आती हैं, तो वक्ता कहते हैं कि शाकंभरी अभी आएगी, दिसंबर-जनवरी के बीच; और अघोर आपका भादो, भाद्रपद के आसपास है।
जब पूछा गया कि शाकंभरी और अघोर नवरात्रि किस हिंदी महीने में आती हैं, तो वक्ता उत्तर देते हैं कि शाकंभरी अभी आएगी, दिसंबर-जनवरी के बीच। और अघोर आपका भादो, भाद्रपद मास के आसपास है।
क्या ग्रहण में धूप और दीपक जलाना चाहिए?
कभी नहीं — बिना धूप-दीप के केवल जप
वक्ता कहते हैं: नहीं, ग्रहण में कभी भी धूप-दीपक नहीं जलाना है। बिना धूप-दीप के केवल जप।
वक्ता कहते हैं: नहीं, ग्रहण में कभी भी धूप-दीपक नहीं जलाना है। बिना धूप-दीप के — केवल जप।
क्या जंजीरा या अस्त्र मंत्र से हवन किया जा सकता है?
अस्त्र मंत्र से धूनी; हवन केवल घी और गुग्गल से
एक श्रोता याद दिलाते हैं कि उन्होंने एक बार किसी भी जंजीरा या अस्त्र मंत्र से हवन के लिए मना किया था, और पूछते हैं कि क्या इसका मतलब है कि हनुमान जंजीरा मंत्र का हवन नहीं करना है। वक्ता साफ़ करते हैं: यह धूनी करने के लिए कहा था। अस्त्र मंत्र से, जंजीरा से धूनी करनी चाहिए; और हवन कैसे करना है — केवल और केवल घी और गुग्गल से। धूनी में दूसरी चीज़ों का प्रयोग होता है।
एक श्रोता याद दिलाते हैं कि उन्होंने एक बार किसी भी जंजीरा या अस्त्र मंत्र से हवन के लिए मना किया था, और पूछते हैं कि क्या उनका मतलब था कि हनुमान जंजीरा मंत्र का हवन नहीं करना है। वक्ता उत्तर देते हैं कि अस्त्र मंत्र से, जंजीरा से धूनी करनी चाहिए। और हवन कैसे करना है: केवल और केवल घी और गुग्गल से। धूनीविशेष लकड़ियों व बीजों को जलाकर घर या स्थान से नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा दूर करने हेतु की जाने वाली धूनी। में दूसरी चीज़ों का प्रयोग होता है।
जहाँ भूत-प्रेत भरे हों, क्या वहाँ हवन का तरीका बदल जाता है?
जगह के अनुसार और व्यक्ति-व्यक्ति में तरीका बदलता है
वक्ता कहते हैं कि जिस जगह तकलीफ़ है, जहाँ उस तरह से भूत-प्रेत भरे पड़े हैं, जहाँ कष्ट है — उस जगह हवन का तरीका बदलेगा। और इसमें व्यक्ति-व्यक्ति में अंतर हो सकता है।
वक्ता कहते हैं: देखिए, जिस जगह तकलीफ़ है, जहाँ उस तरह से भूत-प्रेत भरे पड़े हैं, जहाँ कष्ट है — उस जगह हवन का तरीका बदलेगा। और इसमें व्यक्ति-व्यक्ति में अंतर हो सकता है।
क्या किसी चीज़ को सिद्ध करने के लिए हवन ज़रूरी है?
जिनका जंजीरा सिद्ध किया, उनके नाम से आहुति
वक्ता कहते हैं कि सामान्यतः अगर हवन करना है — यानी कुछ सिद्ध करना है — तो उसके लिए उससे हवन करने की भी ज़रूरत नहीं है। आपने जिनका जंजीरा सिद्ध किया है, उनके नाम से, उनके नाम-मंत्र आदि से आहुति दे सकते हैं; उससे हो जाएगा। और उससे आप धूनी कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि सामान्यतः अगर हवन करना है — यानी कुछ सिद्ध करना है — तो उसके लिए उससे हवन करने की भी ज़रूरत नहीं है। आपने जिनका जंजीरा सिद्ध किया है, उनके नाम से, उनके नाम-मंत्र आदि से आहुति दे सकते हैं; उससे हो जाएगा। धूनी आप उससे कर सकते हैं।
डायबिटीज़ वाले व्यक्ति साधना में क्या भोग लगाएँ?
जो खुद खाते हैं वही अन्नपूर्णा रूप में भोग लगाएँ
वक्ता कहते हैं कि हमारे यहाँ पूरा सात्विक भोजन बनता है, और यहाँ जो भोजन बनता है उसे हम भगवती विंध्यवासिनी को भोग लगाए बिना खाते ही नहीं। इसलिए आप जो खाते हैं, वही भोग लगाइए: जो शुद्ध सात्विक भोजन आप खाते हैं, उसी का भोग लगाकर खाइए। अन्नपूर्णा रूप में उन्हीं को भोग लगाया जाता है।
जब पूछा गया कि डायबिटीज़ हो तो साधना में क्या भोग लगाएँ, तो वक्ता कहते हैं कि हमारे यहाँ पूरा सात्विक भोजन बनता है, और यहाँ जो भोजन बनता है उसे हम भगवती विंध्यवासिनी को भोग लगाए बिना खाते ही नहीं। इसलिए आप जो खाते हैं, वही भोग लगाइए। जो शुद्ध सात्विक भोजन आप खाते हैं, उसी का भोग लगाकर खाइए। अन्नपूर्णा रूप में उन्हीं को भोग लगाया जाता है; भोग लगाए बिना हम खाते नहीं। वे आगे कहते हैं कि कृष्णा कॉन्शियस वाले लोग भी, जो किसी भी तरह भगवान की शरण में हैं, इस बात को बढ़ावा देते हैं और बताते हैं कि हम कोई भी चीज़ भोग लगाए बिना नहीं खाते — तो यह कोई नई बात नहीं है। जो भोजन बना है उसका भोग लगाइए, और उसे प्रसाद रूप में स्वीकार कीजिए।
क्या गंधर्व साधना में कोई रुकावट होती है?
अलग विषय — रुकावट नहीं, पर सावधानी से करें
वक्ता कहते हैं कि गंधर्व साधना एक अलग चीज़ है, एक अलग विषय है। रुकावट नहीं होगी, पर सोच-संभलकर करें।
वक्ता कहते हैं कि गंधर्व साधना एक अलग चीज़ है, एक अलग विषय है। प्रतिरोध नहीं होगा, पर सोचकर और संभलकर करें।
क्या वक्ता गुरु दीक्षा देते हैं?
दीक्षा नहीं देते, पर मार्गदर्शन करेंगे और दीक्षा करवा सकते हैं
एक श्रोता कहते हैं कि वे डिसेबल व्यक्ति हैं, उन तक नहीं पहुँच सकते, पर गुरु दीक्षा लेना चाहते हैं, तो कैसे लें। वक्ता नाम लेकर कहते हैं कि टेलीग्राम पर संपर्क कीजिए। वे कहते हैं कि हम किसी को दीक्षा नहीं देते, पर यथासंभव आपका मार्गदर्शन कर सकते हैं; और किसी योग्य, उचित साधक से या आपके आसपास उपलब्ध गुरु से अगर संभव हो, और मुझसे बन पड़े, तो हम आपकी दीक्षा करवा देंगे — अगर आप उस अवस्था में हैं कि दीक्षा लेकर आपको आगे बढ़ना है।
एक श्रोता लिखते हैं कि वे डिसेबल व्यक्ति हैं, उन तक नहीं आ पाएँगे, पर उनसे गुरु दीक्षा लेना चाहते हैं, और पूछते हैं कि वे उनसे दीक्षा कैसे ले पाएँगे। वक्ता उनका नाम लेकर कहते हैं कि टेलीग्राम पर संपर्क कीजिए। वे कहते हैं कि हम किसी को दीक्षा नहीं देते, पर यथासंभव आपका मार्गदर्शन कर सकते हैं; और जो भी संभव हो, जो भी बन पड़े — किसी योग्य, उचित साधक से, या आपके आसपास उपलब्ध गुरु से — तो अगर मुझसे बन पड़ेगा, हम आपकी दीक्षा करवा देंगे, अगर आप उस अवस्था में हैं कि दीक्षा लेकर आपको आगे बढ़ना है।
अगर किसी भक्त ने अपना देवता खींच लिया हो तो क्या करें?
आपके आराध्य को कोई नहीं खींच सकता — उनकी सहायता लें
एक श्रोता कहते हैं कि एक भक्त ने उनके देवता को उनसे खींच लिया है। वक्ता नाम लेकर उत्तर देते हैं कि खींचकर वापस ले आइए। उसने आपके देवता को खींचा है — आपके आराध्य, आपके इष्ट को वह नहीं खींच सकता। उनकी सहायता लीजिए।
एक श्रोता कहते हैं कि एक भक्त ने हमारे देवता को हमसे खींच लिया है। वक्ता उनका नाम लेकर उत्तर देते हैं कि आप खींचकर फिर वापस ले आइए। उसने आपके देवता को खींचा है ना — आपके आराध्य, आपके इष्ट को वह नहीं खींच सकता। उनकी सहायता लीजिए।
पाताल में हनुमान, मकरध्वज और सीता जी की खोज ही उदाहरण हैं
पाताल में हनुमान जी, मकरध्वज, और सीता जी की खोज
वक्ता पूछते हैं कि जब रावण राम जी को ही लेकर पाताल में चला गया था, तब उन दोनों को मार-पीटकर वापस कौन लाया था? उनकी देवी को पाताल में किसने भेजा, और बाद में पाताल का राजा मकरध्वज कौन बना? उनकी सहायता लीजिए, उनसे बोलिए। जब भाई भूले थे, तब सीता जी को किसने खोजा — हनुमान जी ने ही खोजा ना? तो उनसे बोलिए कि मेरे भाई भूले हैं; वे खोजकर ले आएँगे।
वक्ता पूछते हैं कि जब रावण राम जी को ही लेकर पाताल में चला गया था, तब उन दोनों को मार-पीटकर वापस कौन लाया था? उनकी देवी को पाताल में किसने भेजा? बाद में पाताल का राजा मकरध्वज कौन बना? उनकी सहायता लीजिए, उनसे बोलिए। जब भाई भूले थे — सीता जी को किसने खोजा? हनुमान जी ने ही खोजा ना? तो उनसे बोलिए कि मेरे भाई भूले हैं; वे खोजकर ले आएँगे। जो भी आपके देवता को ले गया है, हनुमान जी की शरण में जाइए, उनसे बोलिए, उनकी साधना कीजिए। उनके देवता तो आएँगे; जो ले गया है उसे छोड़िए — स्थान विशेष में तार डालकर मुँह से निकाल दिया जाएगा। आप लोग प्रयास तो कीजिए।
शक से देवता पीछे हट जाते हैं; समर्पण से उनका सामर्थ्य सामने आता है
शक से देवता पीछे हटते हैं; समर्पण से उनका सामर्थ्य प्रकट होता है
वक्ता कहते हैं कि आप अपने आराध्य पर शक करते हैं — कि उनके पास सामर्थ्य नहीं है, ताकत नहीं है। जब आप ऐसा करते हैं, तो वे भी कहते हैं: ठीक है बिटवा, मेरे पास कुछ नहीं है, तुम अपना खुद ही देख लो। अगर आप उन पर आस्था रखें, उनके प्रति समर्पित हो जाएँ, तो वे बहुत कुछ करने में सक्षम हैं।
सत्र समाप्त करते हुए वक्ता कहते हैं कि कल का विषय बहुत अद्भुत रहेगा, और आज श्रोताओं को हनुमान जी को लेकर जो मोटिवेशन मिला है, कल उसमें दस गुना वृद्धि हो जाएगी — जो मोटिवेशन हनुमान जी के लिए था, वह आपके अपने देवी-देवताओं के लिए मिल जाएगा, और वह शक से ही मिट जाएगा। वे कहते हैं कि आप अपने आराध्य पर शक करते हैं: कि उनके पास सामर्थ्य नहीं है, ताकत नहीं है। जब आप ऐसा करते हैं, तो वे भी कहते हैं: ठीक है बिटवा, मेरे पास कुछ नहीं है, तुम अपना खुद ही देख लो। उन पर आस्था रखिए, उनके प्रति समर्पित हो जाइए, तो वे बहुत कुछ करने में सक्षम हैं।
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