मार्गशीर्ष पूर्णिमा — एक तिथि पर तीन जयंतियाँ, देव दीक्षा, दीपदान और लंबा प्रश्नोत्तर

दत्तात्रेय, अन्नपूर्णा और भैरवी की साझा जयंती पर नोट्स।

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01

मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर तीन जयंतियाँ

एक ही तिथि पर दत्तात्रेय, अन्नपूर्णा और त्रिपुर भैरवी

· 00:58–01:40

वक्ता कहते हैं कि इस सत्र के एक दिन बाद मार्गशीर्ष पूर्णिमा है। उस दिन एक साथ तीन महाशक्तियों की जयंती है: भगवान दत्तात्रेय, भगवती अन्नपूर्णा और भगवती त्रिपुर भैरवी, जो महाविद्या हैं। ये तीनों जयंतियाँ हर वर्ष एक ही दिन पड़ती हैं।

02

गुरुवार को पड़ने वाली मार्गशीर्ष पूर्णिमा

तीन जयंतियों के साथ बृहस्पतिवार का पड़ना

· 01:41–01:58

वक्ता कहते हैं कि इस वर्ष विशेष बात यह है कि उस दिन बृहस्पतिवार है। वह दिन वैसे भी गुरु शक्तियों को समर्पित है।

वक्ता कहते हैं कि इस वर्ष सबसे विशेष बात यह है कि तीन जयंतियों के साथ उस दिन बृहस्पतिवार भी है। वह दिन वैसे भी गुरु शक्तियों को समर्पित है, इसलिए उसका महत्व और बढ़ जाता है।

03

बृहस्पति को पृथ्वी का रक्षक क्यों कहा जाता है?

आकाशीय विपत्तियों को पृथ्वी से दूर खींचते बृहस्पति

· 01:59–02:43 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि बृहस्पति देव ऐसे ग्रह हैं जिनमें आकर्षण की क्षमता है। पृथ्वी की ओर आने वाली हर आकाशीय विपत्ति को वे अपनी ओर खींचकर पृथ्वी के आभामंडल से दूर कर देते हैं। उनके कारण आकाशीय पिंड कभी पृथ्वी तक नहीं पहुँचते, इसलिए प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी की सबसे बड़ी रक्षक शक्ति वही हैं। वे जोड़ते हैं कि यह केवल परा विज्ञान का विषय नहीं है, आधुनिक विज्ञान भी यही कहता है और श्रोता ऑनलाइन खोजकर देख सकते हैं।

04

गुरु तत्व के स्वरूप भगवान दत्त

गुरु तत्व के अवतरण के रूप में भगवान दत्त

· 02:44–03:25

वक्ता कहते हैं कि तंत्र के क्षेत्र में, या सनातन में, एक विशिष्ट शक्ति और विशिष्ट स्वरूप है जो केवल गुरु तत्व को समर्पित है। उनका ध्येय, उनका अवतरण ही केवल गुरु शब्द को परिभाषित करने के लिए, गुरुत्व के लिए हुआ — वे भगवान दत्त हैं। उनकी जयंती इसी दिन है, इसलिए यह दिन और विशेष हो जाता है।

05

साधारण गृहस्थ जीवन में भगवान दत्त

गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु — एक स्वरूप में तीन महाशक्तियाँ

· 03:26–04:06

वक्ता कहते हैं कि उनकी कृपा के बिना गुरु शक्ति हमारे जीवन में उपस्थित ही नहीं हो सकती। गुरु महिमा का पहला श्लोक — गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः — तीन महाशक्तियों का नाम लेता है, और ये तीनों भगवान दत्त के स्वरूप में एक साथ एक जगह उपस्थित हैं। हम किसी भी पंथ या संप्रदाय के हों, उनकी पूजा अवश्य होती है, इसलिए इस स्वरूप की महिमा अनंत है।

06

गुरु स्वरूप दक्षिणामूर्ति शिव और उनकी शक्ति

दक्षिणामूर्ति शिव और भगवती त्रिपुर भैरवी

· 04:07–04:31

वक्ता कहते हैं कि गुरु स्वरूप में दूसरी महाशक्ति भगवान दक्षिणामूर्ति शिव हैं, और उनकी शक्ति भगवती त्रिपुर भैरवी हैं। भगवती त्रिपुर भैरवी और भगवान दत्त की जयंती एक ही तिथि को है, और वे श्रोताओं से इस रहस्य को समझने को कहते हैं।

07

त्रिपुर भैरवी को वह शक्ति क्यों कहा जाता है जिनके बिना कुछ नया नहीं रचा जाता?

समस्त सृजन के आधार के रूप में त्रिपुर भैरवी

· 04:32–05:02 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि त्रिपुर भैरवी वह शक्ति हैं जिनके बिना पूरे ब्रह्मांड में कोई नया सृजन नहीं हो सकता। किसी भी चीज़ को आधार देने की जो क्षमता जगदंबा ने, प्रकृति ने, किसी स्वरूप को दी है, वह भगवती त्रिपुर भैरवी के स्वरूप में उपस्थित है।

वक्ता कहते हैं कि त्रिपुर भैरवी वह शक्ति हैं जिनके बिना समग्र ब्रह्मांड में नूतन सृजन नहीं हो सकता। कुछ भी नया नहीं रचा जा सकता। किसी भी चीज़ को आधार देने की जो क्षमता उस स्वरूप ने अपने पास रखी है, या जो जगदंबा ने, प्रकृति ने उस स्वरूप को दी है, वह भगवती त्रिपुर भैरवी के स्वरूप में उपस्थित है।

08

कामाख्या के नीलाचल पर दस महाविद्याओं का क्रम

कामाख्या में दस महाविद्याओं का भूगोल

· 05:03–05:48

कामाख्या में। वक्ता उन श्रोताओं से, जो वहाँ गए हैं या जिन्होंने पूरे कामाख्या में दस महाविद्याओं की भौगोलिक स्थिति पर चैनल का वीडियो देखा है, और जो कामाख्या कवच का पाठ करते हैं, इन सबको जोड़कर देखने को कहते हैं। वे कहते हैं कि जब अध्ययन, साधना, निर्मल मन साथ चलें और मन में द्वेष या कुंठा न हो, तो ऐसे बहुत से रहस्य खुलते हैं।

09

कामाख्या में सबसे ऊँचा और सबसे नीचा महाविद्या स्थान

सबसे ऊपर भुवनेश्वरी, सबसे नीचे त्रिपुर भैरवी

· 05:49–06:31

वक्ता कहते हैं कि नीलांचल पर्वत पर सबसे ऊँचा स्थान, जहाँ भगवती का स्वरूप विराजता है, भगवती भुवनेश्वरी का है। और वहाँ भगवती के सभी स्वरूपों में जो सबसे नीचे विराजमान है, वह कोई और नहीं, भगवती त्रिपुर भैरवी का स्थान है। यह वहाँ जाकर प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

10

कामाख्या पहाड़ी पर चढ़ते हुए महाविद्या मंदिरों का क्रम

त्रिपुर भैरवी से भुवनेश्वरी तक का क्रम

· 06:32–07:03

बीच में भगवती कामाख्या हैं। त्रिपुर भैरवी से क्रम से ऊपर जाने पर भगवती धूमावती हैं, और लगभग उनके सामने, दूसरी ओर, भगवती छिन्नमस्तिका हैं; उसके बाद भगवती काली, फिर भगवती तारा, फिर भगवती कामाख्या; साथ में भगवती मातंगी और कमला; उसके बाद भगवती बगलामुखी; और सबसे ऊपर भगवती भुवनेश्वरी।

11

प्रचलित कामाख्या कवच और मूल कवच का अंतर

बृहद कामाख्या कवच और गुरु परंपरा

· 07:04–07:39

वक्ता कहते हैं कि सबके सामने जो कामाख्या कवच प्रचलित है, वह मूल कवच का केवल एक अंश है। शक्तिपीठ और दस महाविद्याओं की उपस्थिति के साथ पढ़ा जाने वाला बृहद कवच संभवतः बिना गुरु परंपरा के ऐसे ही नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसमें भगवती के मूल तांत्रिक स्वरूप का पूरा वर्णन है।

12

मूल कामाख्या कवच में स्वरूपों का आवाहन

बीज मंत्रों का संपुट, और नीचे से रक्षा करती त्रिपुर भैरवी

· 07:40–07:59

वक्ता कहते हैं कि मूल बीज मंत्रों से संपुट करके हर स्वरूप का आवाहन होता है, कि वह स्वरूप हमारे स्वरूप की रक्षा करे। जैसे भगवती त्रिपुर भैरवी से पाताल की ओर से, नीचे से रक्षा करने को कहा जाता है — और वे वहाँ अकेली नहीं होंगी: उनका त्रिकूट मंत्र और षट्कूट मंत्र बीजाक्षर के साथ वहाँ रहेगा।

13

कामाख्या कवच में बताई गई सहचरी शक्तियाँ

अपरा डाकिनी और परा डाकिनी, जया और विजया, राकिनी और लाकिनी

· 08:00–08:35

वक्ता कहते हैं कि बीज संपुट के बाद हर स्वरूप की प्रमुख शक्तियाँ भी वहाँ रहती हैं। पूरे तांत्रिक स्वरूप में जाने पर भगवती छिन्नमस्तिका परा डाकिनी हो जाती हैं और भगवती त्रिपुर भैरवी अपरा डाकिनी; उनके साथ जया और विजया के रूप में दो और मूल स्वरूप उपस्थित रहते हैं, और उनकी राकिनी और लाकिनी के बीज मंत्रों से संपुट करके इन अंगों से रक्षा माँगी जाती है।

14

गुरु कृपा से मिले सूक्ष्मतम विषय केवल वर्चस्व जताने के लिए Facebook पर बाँटे जा रहे हैं।

वर्चस्व के लिए सोशल मीडिया पर बाँटी जा रही सूक्ष्म सामग्री

· 08:36–09:06

वक्ता कहते हैं कि आज यह प्रचलन में हो सकता है, क्योंकि Facebook पर लोग सूक्ष्मतम विषय बाँटते जा रहे हैं — जो संभवतः उन्हें गुरु कृपा से ही मिले होंगे — केवल वर्चस्व बनाने के लिए, यह दिखाने के लिए कि उनके पास कितनी जानकारी है। वे कहते हैं, जानकारी ले लीजिए, पर फिर भी वे यही कहेंगे कि बिना गुरु आदेश के यह सब नहीं करना चाहिए।

15

गुरु आदेश के बिना उग्र शक्तियों के आवाहन का खतरा

इस तरह आवाहन करने पर उग्र स्वरूप की ऊर्जा का स्तर

· 09:07–09:31

वक्ता कहते हैं कि ऐसी उग्रतम शक्तियाँ वही मातृ शक्ति हैं, पर जब आप इस प्रकार उनका आवाहन करते हैं तो उनका स्वरूप और उनकी ऊर्जा का स्तर काफी अलग होता है। और जब आप मूल विषय नहीं जानेंगे और सीधे ऐसी शक्तियों का आवाहन कर देंगे, तो समस्या होगी।

वक्ता कहते हैं कि इस प्रकार की उग्रतम शक्तियाँ वही मातृ शक्ति हैं, पर जब आप इस तरह उनका आवाहन करते हैं, तो उनका स्वरूप और उनकी ऊर्जा, उसका स्तर, काफी अलग होता है। और जब आपको मूल विषय पता नहीं होगा और आप सीधे ऐसी शक्तियों का आवाहन कर देंगे, तो समस्या हो जाएगी।

16

कवचों में ही लिखी पात्रता की शर्तें

बताई गई शर्त: वीराभिषेक और गुरु का वीर आदेश

· 09:32–09:49

वक्ता कहते हैं कि कई कवचों में स्पष्ट लिखा है कि उन्हें किसे नहीं देना है, और कई स्तोत्रों में स्पष्ट लिखा है कि केवल वही उनका पाठ करें जिनका वीराभिषेक हो चुका हो — कम से कम शाक्त अभिषेक के बाद जिन्हें गुरु ने वीर आदेश दिया हो कि वे वीर साधनाएँ कर सकते हैं और वीराचार्य भाव से आगे बढ़ सकते हैं, और जिन्हें इसका उपदेश मिल चुका हो। सभी उनका पाठ नहीं कर सकते।

17

प्रतिबंधित तंत्र ग्रंथ पढ़ना पर प्रयोग न करना

खुलकर अध्ययन करें, पर प्रयोग से पहले हज़ार बार सोचें

· 09:50–10:03

हाँ — वक्ता कहते हैं कि अध्ययन की सामग्री अब इंटरनेट पर बहुत प्रचुरता से उपलब्ध है, तो अध्ययन कीजिए। पर प्रयोग करने से पहले हज़ार बार सोचिए, क्योंकि तंत्र ऐसा ही क्षेत्र है।

वक्ता कहते हैं कि अध्ययन के लिए सामग्री अब इंटरनेट पर बहुत प्रचुरता से उपलब्ध हो रही है, तो अध्ययन कीजिए। पर प्रयोग करने से पहले हज़ार बार सोच लीजिए, क्योंकि तंत्र ऐसा ही क्षेत्र है।

18

भगवती को तंत्र देते समय शिव की शर्त

शिव को गुरु मानने पर पति-पत्नी का संबंध स्थगित

· 10:04–10:24

वक्ता Telegram ग्रुप में साझा की गई एक क्लिप का उल्लेख करते हैं, जिसमें भगवान शिव मां भगवती को तंत्र का ज्ञान देते हुए कहते हैं: मुझे गुरु के रूप में स्वीकार करो — पर जैसे ही तुम मुझे गुरु मानोगी, हमारा पति-पत्नी का संबंध स्थगित हो जाएगा। उसके बाद हम पति-पत्नी नहीं रहेंगे। भगवान महादेव इस विषय पर आगे बढ़ते हैं और यह शर्त स्वीकार करते हैं।

19

आज तंत्र का अति सरलीकरण

जिस मार्ग को उसके दाता ने सीमित रखा, उसे सरल बनाना

· 10:25–10:56

वक्ता श्रोताओं से कहते हैं कि चारों ओर देखिए, आज दुनिया में तंत्र के बारे में कौन-सा ज्ञान दिया जा रहा है। जहाँ शिव कह रहे हैं कि यह मार्ग सबके लिए नहीं है, इस पर चलने वालों के नियम बहुत स्पष्ट होने चाहिए और बहुत कठोरता से पालन होना चाहिए — यहाँ तंत्र को एकदम से सबके लिए सरल बनाया जा रहा है, मानो नियम और अनुशासन की ज़रूरत ही नहीं। वे कहते हैं, तंत्र ऐसा नहीं है; तंत्र सच में विकट नहीं है, पर हर तंत्र हर किसी के लिए नहीं है।

20

क्या चौंसठ तंत्र सबके लिए खुले हैं?

व्यक्ति की योग्यता के अनुसार गुरु का देना

· 10:57–11:02 · Also a question

नहीं। वक्ता कहते हैं कि चौंसठ तंत्रों में हर तंत्र हर किसी के लिए नहीं है। गुरु को हर व्यक्ति की योग्यता के अनुसार देना चाहिए, और हर चीज़ को सरल नहीं बनाया जा सकता।

वक्ता कहते हैं कि चौंसठ तंत्रों में हर तंत्र हर किसी के लिए नहीं है। गुरु को हर व्यक्ति की योग्यता के अनुसार देना चाहिए। और आप हर चीज़ को सरल नहीं बना सकते।

21

गृहस्थ के लिए कौन-सा तंत्र सबसे अच्छा है?

गृहस्थ के लिए कामाख्या तंत्र, उसके मूल रूप में प्राप्त

· 11:03–11:14 · Also a question

वक्ता मानते हैं कि गृहस्थ के लिए भगवती कामाख्या का तंत्र सर्वश्रेष्ठ है — पर पहले वही कामाख्या तंत्र उसके मूल रूप में प्राप्त तो कीजिए। जिसे मूल का पता नहीं, वह सीधे अमूल्य देना शुरू कर देता है, और लेने वाले को कठिनाई होती है।

वक्ता कहते हैं कि गृहस्थ के लिए सर्वश्रेष्ठ भगवती कामाख्या का तंत्र है — यह सही बात है। पर पहले वही कामाख्या तंत्र मूल में प्राप्त तो कीजिए। जिसे मूल का पता ही नहीं, वह सीधे अमूल्य देना शुरू कर देता है, और फिर सामने वाले को कठिनाई हो जाती है।

22

वे तंत्र जो सबके लिए नहीं हैं

भैरव तंत्र और तारा तंत्र सीमित

· 11:15–11:24

वक्ता कहते हैं कि भैरव तंत्र सबके लिए नहीं है, और भगवती तारा का तंत्र सबके लिए नहीं है। इसी कारण वे भगवती कामाख्या के मूल स्वरूप को गृहस्थों के लिए सर्वश्रेष्ठ कहते हैं।

वक्ता कहते हैं, पर अब भैरव तंत्र सबके लिए नहीं है; भगवती तारा का तंत्र सबके लिए नहीं है। इसी कारण हम गृहस्थों के लिए भगवती कामाख्या के मूल स्वरूप को सर्वश्रेष्ठ कहते हैं — उन सबके लिए यह बहुत अच्छी बात है।

23

गृहस्थ के लिए उपयुक्त देवी के मूल स्वरूप

मूल के रूप में ललिता, दुर्गा, कामाख्या और त्रिपुर सुंदरी

· 11:25–11:46

वक्ता कहते हैं, वही कीजिए, या भगवती दुर्गा का कीजिए — इन दो स्वरूपों में दसों महाविद्याएँ आ जाती हैं। भगवती ललिता, भगवती दुर्गा, भगवती कामाख्या, मां त्रिपुर सुंदरी का मूल कीजिए। पर जब पूरे विधिवत, क्रम से, सही तरीके से करना हो, तो दीक्षित होकर कीजिए।

24

भ्रम: धूमावती और तारा की साधना सरल बनानी चाहिए

लोगों को तंत्र से डराकर दूर करना, फिर गलत चीज़ों को सरल बनाना

· 11:47–12:04

वक्ता कहते हैं कि आज धूमावती को भी सरल बनाया जा रहा है, भगवती तारा को भी, सबको — यह कहकर कि यह बिल्कुल आसान है और घर पर किया जा सकता है। वे कहते हैं, ये सब भ्रामक बातें हैं। ऐसे बोलकर और डराकर लोगों को तंत्र से दूर रखा गया है; और जिसके पास उन्हें लाना चाहिए, उसकी चर्चा करने कोई जाएगा ही नहीं।

वक्ता कहते हैं कि आज धूमावती को भी सरल बनाया जा रहा है, भगवती तारा को भी, सबको — भैया, यह बिल्कुल आसान है, घर पर कर सकते हो। इसमें कुछ नहीं है, ये सब भ्रामक बातें हैं। ऐसे बोलकर और लोगों को डराकर उन्हें तंत्र से दूर रखा गया है। और जिसके पास उन्हें लाना चाहिए, उसकी चर्चा करने लोग जाएँगे ही नहीं।

25

जिस साधक की अपनी क्षमता बढ़ गई हो, वही कठिन तंत्र तक पहुँच पाएगा।

साधना को नीचे लाने के बजाय साधक की क्षमता बढ़ाना

· 12:05–12:19

वक्ता कहते हैं कि असली सरलीकरण यह होना चाहिए कि जो चीज़ आपको कठिन लग रही है, उसके लिए आपकी अपनी क्षमता बढ़े। तभी आप कठिन तंत्र तक जाएँगे; नहीं तो आप उसे नहीं कर पाएँगे।

वक्ता पूछते हैं, सरलीकरण किसका होना चाहिए? जो चीज़ आपको कठिन लग रही है: मूल सरलीकरण यह है कि आपके भीतर की क्षमता बढ़े। तब आप कठिन तंत्र तक जाएँगे। नहीं तो आप नहीं कर पाएँगे।

26

जिस चौथी कक्षा के छात्र ने पहले अंक, जोड़ और भाग नहीं सीखे, उसे दसवीं का गणित समझ नहीं आता।

सांख्यिकी से पहले अंकगणित सीखना

· 12:20–13:00

वक्ता कहते हैं कि यदि आप चौथी या पाँचवीं में होते, तो दसवीं का गणित आपको बहुत कठिन लगता — समझ नहीं आता। पहले आपने अंक सीखे, फिर रेखाएँ खींचकर जोड़ना-घटाना, फिर भाग, फिर गुणा, फिर लघुत्तम और महत्तम। जब सारा मूल गणित आ गया, तभी आगे चलकर आप सांख्यिकी जैसी जटिल प्रक्रियाएँ कर पाए। अभ्यास के पहले-दूसरे दिन जो कठिन लगता था, वह बाद में बाएँ हाथ का खेल बन गया।

27

तंत्र के लिए बुध का बलवान होना क्यों ज़रूरी है?

बुध, साधना का हिसाब, और उनकी जगह रखा गया राहु

· 13:01–13:50 · Also a question

वक्ता कहते हैं, क्योंकि यदि बुध देव बलवान हों, तो सबसे पहले व्यक्ति अपना हिसाब मज़बूत रखता है: वह पहले से आँक लेता है कि यदि वह किसी मंत्र का पाँच लाख जप नहीं करेगा, उसे छोड़कर बिना नीति-नियम के करेगा, तो उसे यह दोष लग सकता है, यह समस्या आ सकती है। वह बुद्धि वहाँ आएगी। वे कहते हैं कि बुध की जगह इस तरह राहु दिया जा रहा है — और राहु का अपना कुछ नहीं है।

28

मंत्रों पर बुध देव का अधिकार

हर मंत्र के भीतर की नियंत्रक शक्ति बुध को सौंपी गई

· 13:51–14:12

वक्ता कहते हैं कि बुध देव को भगवान महादेव ने यह क्षमता दी है: सभी मंत्रों के भीतर जो नियंत्रक शक्ति है, उसका स्तर, उसकी ऊर्जा, उसे खींचने की पूरी क्षमता, और उस पर पूरा अधिकार बुध देव, बुध महाग्रह को दिया गया है।

वक्ता कहते हैं, और बुध देव कौन हैं — यह विषय भी ध्यान में रखिए। बुध देव को भगवान महादेव ने वह सामर्थ्य दिया है: सभी मंत्रों के भीतर जो नियंत्रक शक्ति है, उसका जो स्तर है, जो ऊर्जा है, उसे खींचने की पूरी क्षमता, उस पर पूरा अधिकार बुध देव को दिया गया है। वे बुध महाग्रह हैं।

29

विधि से किए गए जप का पहला फल

मेधा शक्ति और आगे का रास्ता दिखना

· 14:13–14:50

वक्ता कहते हैं कि जब आप मंत्रों का जप शुरू करते हैं, यदि विधि-विधान से किया, तो वही मंत्र आपको मेधा शक्ति देता है — सबसे पहले आपकी बुद्धि बढ़ाता है। आपको निकलने का रास्ता नहीं मिल रहा था, पर साधना शुरू करते ही रास्ता मिलने लगा: ऐसा नहीं कि कोई सड़क प्रकट हो गई, बल्कि यह बुद्धि आई कि यह निर्णय लेना चाहिए, यह कर्म इस तरह करना चाहिए, तब काम बन जाएगा।

30

साधक और नवग्रह

सप्तशती हृदय में भगवती का कहना कि वे ही नवग्रह हैं

· 14:51–15:12

नहीं। वक्ता कहते हैं कि ईश्वर ही ग्रहों के रूप में प्रकट हुए हैं। जब आप भगवती का माला मंत्र करते हैं, या सप्तशती हृदय पढ़ते हैं, तो भगवती स्वयं कहती हैं कि वे नवग्रह के रूप में हैं। तो जो स्वयं को नवग्रह रूप बताती हैं, उनका सम्मान नवग्रह को किनारे रखकर नहीं हो सकता। आप यह नहीं कह सकते कि हम नवग्रह से नहीं माँगेंगे, सीधे भगवती से माँगेंगे।

31

साधक ग्रहों से ऊपर क्यों नहीं हो सकता

बनाई हुई व्यवस्था को उसका बनाने वाला भी नहीं तोड़ता

· 15:13–15:46

वक्ता कहते हैं कि सारा अधिकार, आशीर्वाद, आदेश और नियंत्रण की क्षमता स्वयं जगदंबा और महादेव ने दी है — तो वे अपनी ही बनाई सृष्टि का उल्लंघन कैसे करेंगे? वे व्यंग्य से पूछते हैं: क्या आप इतने प्रिय हो गए कि आपका महत्व सब देवताओं से बड़ा हो गया, कि मंगल की क्रूर दृष्टि आप पर नहीं पड़ेगी, कि इतने तप और तपस्या से आप ग्रहों से भी प्रिय हो गए? उन्हें ग्रह का पद दिया गया है। इस तरह धोखे में आकर ग्रहों का अपमान मत कीजिए।

32

वर्तमान अनुष्ठान से अगले अनुष्ठान की प्रेरणा

अनुष्ठान से ही अगले अनुष्ठान की प्रेरणा मिलना

· 15:47–15:58

वक्ता कहते हैं कि जब आप किसी भी मंत्र का अनुष्ठान बार-बार करते हैं, तो जिस मार्ग की आपको ज़रूरत है, उसके लिए कौन सा अनुष्ठान करना है — यह प्रेरणा भी उसी अनुष्ठान से आपको मिल जाती है।

वक्ता कहते हैं कि जब आप किसी भी मंत्र का अनुष्ठान बार-बार करते हैं, और कोई मार्ग आपको खोजना है, तो उस मार्ग के लिए कौन सा अनुष्ठान करना है, इसकी प्रेरणा भी इसी अनुष्ठान से आपको मिल जाती है।

33

एक साधना का किसी दूसरे देवता की ओर संकेत

जप के दौरान किसी देवता से जुड़े ऋण दोष का सामने आना

· 15:59–16:23

आप भगवान शिव की पंचाक्षरी कर रहे हों, और ये सब अपने आप में पूर्ण हैं, फिर भी कहीं आपका ऋण दोष हो सकता है — उस देवता से आपका कोई काम पूरा होना था और आपने छोड़ दिया था, या कोई अपराध बन गया था। तब किसी न किसी माध्यम से आपकी मेधा और बुद्धि में यह विचार उठेगा कि आपको इस जगह जाना है, या यह साधना करनी चाहिए। वक्ता कहते हैं कि वह स्वयं कीजिए; उसकी पूरी प्रेरणा भी अपने आप मिलेगी।

34

पाँच लाख जप पूरा करने का प्रभाव

पूरे पुरश्चरण से आया आत्मविश्वास

· 16:24–16:36

वक्ता कहते हैं कि एक बार कोई पाँच लाख का जप कर लेता है, तो उसके भीतर आत्मविश्वास इतना जग जाता है और वह इतना दृढ़ मन का हो जाता है कि फिर अगली साधना करने से उसे कोई रोक नहीं सकता। पर कोई सवा लाख का जप करने वाला पचास हज़ार पर छोड़ दे — वे पूछते हैं, ऐसा व्यक्ति कैसे छोड़ देता है।

वक्ता कहते हैं कि एक बार कोई पाँच लाख का जप पूरा कर लेता है, तो उसके भीतर आत्मविश्वास इतना जग जाता है, वह इतना दृढ़ मन का हो जाता है, कि फिर अगली साधना करने से उसे कोई रोक नहीं सकता। पर कोई सवा लाख का जप करने वाला पचास हज़ार पर छोड़ दे — वह कैसे छोड़ देता है, वे पूछते हैं।

35

साधना के समय भोग की वस्तुओं से दूरी

भोग से दूरी, और आज के समय में फ़ोन से होने वाली चूक

· 16:37–17:00

वक्ता कहते हैं कि इसी कारण कहा गया है कि साधना के समय उपभोग और भोग की वस्तुओं से दूरी रखनी चाहिए। वे फ़ोन का उदाहरण देते हैं: आप दिन भर अच्छी बातें सुन रहे हों, यहाँ बैठकर पंचाक्षरी भी कर रहे हों, पर मंत्रों की महिमा का कोई वीडियो शुरू हो जाता है, कोई तांत्रिक बाबा आकर कहते हैं कि त्रिपुर भैरवी का मंत्र करेंगे तो ऐसा हो जाएगा, या भगवती काली का मंत्र करेंगे तो ऐसा हो जाएगा।

36

शिव उनके चरणों के नीचे हैं, इस कारण पंचाक्षरी की तुलना काली मंत्र से करना साधक को त्रिशंकु की तरह लटका देता है।

पंचाक्षरी की काली से तुलना और त्रिशंकु जैसा लटक जाना

· 17:01–17:35

वक्ता कहते हैं कि बीच में एक संशय शुरू हो जाता है: पंचाक्षरी की महिमा क्या है? काली जी का मंत्र पंचाक्षरी से अधिक शक्तिशाली होगा, क्योंकि जिनका यह मंत्र है वे शिव जी काली जी के चरणों के नीचे हैं — तो अधिक सामर्थ्यवान कौन निकलीं? काली जी। किसी की बात सुनकर आप अपनी मुख्य साधना से दूर हो जाते हैं, बुद्धि वहाँ से उचट जाती है, और करते रहें तो भी अब सोचते हैं: पंचाक्षरी के पाँच लाख जल्दी पूरे हों तो काली जी का करें, क्योंकि पंचाक्षरी में तो कोई शक्ति ही नहीं है।

37

क्या कोई देवता अपूर्ण है?

कोई देवता अपूर्ण नहीं, और संशय ही सिद्धि रोकता है

· 17:36–17:54 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि कोई देवता अपूर्ण नहीं है। वे देवता बनते ही तब हैं जब पूर्ण होते हैं: उनका सामर्थ्य उनका है, उनका अधिकार उनका है, उन्हें मिला है। आप जो कर रहे हैं वह पूरा होगा — पर आपके मन में संशय आ गया है। चिंतन किसी और का नहीं होना चाहिए; और यदि होने लगा, तो काम भी सिद्ध नहीं होगा, और आप त्रिशंकु की तरह बीच में लटके रह जाएँगे।

38

कामाख्या में त्रिपुर भैरवी के सबसे नीचे स्थान का अर्थ

सबसे नीचे का स्थान, यानी शिव के नीचे का आधार

· 17:55–18:15

वे कहते हैं, इस विषय को उठाकर देखिए: जब आप कमलज कामाख्या की भौगोलिक स्थिति और तंत्र के क्षेत्र में जाते हैं, तो देखिए कि भगवती त्रिपुर भैरवी ने अपना स्थान सबसे नीचे रखा है। और सबसे नीचे का अर्थ हुआ कि वे आधार हैं — उनके बिना भगवान शिव खड़े नहीं हैं।

तो इस विषय को उठाकर देखिए, वक्ता कहते हैं: जब आप कामाख्या, कमलज कामाख्या की भौगोलिक स्थिति और तंत्र के क्षेत्र में जाते हैं, तो देखेंगे कि भगवती त्रिपुर भैरवी का स्थान वह है जिसे उन्होंने सबसे नीचे रखा है। और सबसे नीचे का अर्थ हुआ कि वे आधार हैं। उनके बिना भगवान शिव खड़े नहीं हैं।

39

शिवलिंग की अर्घी में त्रिपुर भैरवी

जलधारी में शिव के नीचे त्रिपुर भैरवी

· 18:16–18:44

जिस अर्घी में हम भगवान शिव का पूजन करते हैं, जिसमें शिवलिंग स्थापित होता है, उसमें शिव जी के चारों ओर दसों दिशाओं में दस महाविद्याएँ उपस्थित हैं — और उनमें भगवती त्रिपुर भैरवी भगवान शिव के नीचे की ओर प्रकट हैं। वहाँ से वे आधार देती हैं। जिस अर्घी को आप मूल रूप से भगवती पार्वती के रूप में पूजते हैं, वह दस महाविद्याओं में भगवती त्रिपुर भैरवी के रूप में उपस्थित है।

40

दत्त और दक्षिणामूर्ति की एक ही तिथि

एक ही दिन प्रकट होने का प्रश्न

· 18:45–19:02

वे पूछते हैं, इनके अस्त्र कौन हैं — भगवान दक्षिणामूर्ति शिव, जो स्वयं गुरु स्वरूप हैं; और जिस दिन इनकी जयंती पड़ी, उसी दिन भगवान दत्त की जयंती भी पड़ी। तो क्या कोई कारण था कि दोनों एक ही तिथि में, उसी समय प्रकट हुए? और भगवती त्रिपुर भैरवी ने भगवान दत्त को किस प्रकार पूर्णता दी है?

तो इनके अस्त्र कौन हैं, वक्ता पूछते हैं। भगवान दक्षिणामूर्ति शिव, जो स्वयं गुरु स्वरूप हैं। और जिस दिन इनकी जयंती पड़ी, उसी दिन भगवान दत्त की भी। तो क्या कोई कारण था कि दोनों एक ही तिथि में, उसी समय प्रकट हुए? भगवती त्रिपुर भैरवी ने भगवान दत्त को किस प्रकार पूर्णता दी है?

41

भगवान दत्तात्रेय को सृष्टि का भार

नारायण का निगला जाना, और दत्त को सृष्टि का संचालन मिलना

· 19:03–19:38

जब भगवान श्री हरि नारायण को पकड़कर पेट में निगल लिया गया था, और सृष्टि की पूरी संचालन व्यवस्था रुक गई थी, तब भगवान दत्तात्रेय का आवाहन किया गया और उन्हें सृष्टि चलाने का अधिकार दिया गया — कि जब तक भगवान विष्णु अपना यह कर्म पूरा करके लौटते नहीं, तब तक आप नियंत्रण करें, आप चलाएँ, आप सृष्टि का पालन करें।

42

भगवान दत्त की शक्ति त्रिपुर भैरवी

दसों दिशाओं में दस रूपों में त्रिपुर भैरवी

· 19:39–20:03

वक्ता कहते हैं, यह जानकर आपको आश्चर्य होगा: उस समय भगवती त्रिपुर भैरवी दस रूपों में दसों दिशाओं में भगवान दत्त के साथ उपस्थित थीं। टेलीग्राम में डाले गए संदेशों में लिखा है कि भगवती का कौन सा रूप किस कारण से उपस्थित था; उसमें नौ रूप सत्त्व, रज और तम के अनुसार बँटे हैं, और एक मूल रूप — भगवती त्रिपुर भैरवी, जो पाँचवीं महाविद्या हैं — साक्षात भगवान दत्त के साथ उपस्थित रहीं। वे कहते हैं, यही रहस्य है।

43

मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर भगवती अन्नपूर्णा

इसी मार्गशीर्ष पूर्णिमा को अन्नपूर्णा का प्रकट होना

· 20:04–20:32

वक्ता कहते हैं कि पूरे संसार को अन्न देने वाली भगवती अन्नपूर्णा मार्गशीर्ष की इसी पूर्णिमा को प्रकट हुईं। अन्नपूर्णा के बिना न आपको अन्न मिलने वाला है, न हमें; गुरुत्व के बिना हम पृथ्वी पर उपस्थित ही नहीं हो सकते, पृथ्वी की रक्षा ही नहीं हो सकती। वे सब शक्तियाँ इस दिन प्रकट हो रही हैं — वे कहते हैं, आधार देने वाली हर शक्ति मार्गशीर्ष पूर्णिमा को प्रकट हुई है, इसलिए यह दिन अपने आप में अत्यंत विशेष हो जाता है।

44

दक्षिण भारत में मार्गशीर्ष पूर्णिमा के पर्व

कार्तिक पूर्णिमा का दीपदान और अरुणाचलेश्वर महादेव

· 20:33–21:11

वक्ता कहते हैं कि दक्षिण भारत में अभी कार्तिक का महीना चल रहा है, तो वहाँ कार्तिक पूर्णिमा की तिथि पड़ेगी — इसलिए वहाँ कार्तिक पूर्णिमा का दीपदान हो रहा है। दक्षिण भारत के एक भाई ने उन्हें शिव महापुराण के अनुसार भगवान शिव के बारे में लिखकर भेजा: जैसे वहाँ आर्द्रा में पूजन होता है, और जैसे भगवान मार्गशीर्ष के महीने में आर्द्रा नक्षत्र में ज्योति स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे, जिसके बाद उनका सकल स्वरूप अरुणाचलेश्वर महादेव के रूप में स्थापित हुआ।

शास्त्र क्या कहता है

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 9.15–21

Śiva's jyotirliṅga first appeared in the form of a pillar in the month of Mārgaśīrṣa under the Ārdrā nakṣatra, and the place where that fiery liṅga rose was to become known as Aruṇācala.

The chapter itself says the place "will come to fame under the name Aruṇācala" (9.21); it does not use the specific epithet "Arunachaleshwar Mahadev" for the resulting mūrti, which is the later, common temple name for the deity there. The Mārgaśīrṣa/Ārdrā dating and the naming of Aruṇācala are both directly stated.

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15

यत्पुनः स्तम्भरूपेण स्वाविरासमहं पुरा। स कालो मार्गशीर्षे तु स्यादार्द्राऋक्षमर्भकौ॥ १५

हे पुत्रो! जब मैं पहले स्तम्भके रूपमें स्वयं प्रकट हुआ था, वह समय मार्गशीर्ष मासमें आर्द्रा नक्षत्रका था।

16

आर्द्रायां मार्गशीर्षे तु यः पश्येन्मामुमासखम्। मद्वेरमपि वा लिङ्गं स गुहादपि मे प्रियः॥ १६

मार्गशीर्षमें आर्द्रा नक्षत्रके दिन जो उमासहित मेरा, मेरी मूर्तिका अथवा लिंगका दर्शन करे, वह मुझे गुहसे भी अधिक प्रिय है।

17

अलं दर्शनमात्रेण फलं तस्मिन् दिने शुभे। अभ्यर्चनं चेदधिकं फलं वाचामगोचरम्॥ १७

उस शुभ दिन केवल दर्शनसे ही पूरा फल मिलता है। यदि पूजा भी करे, तो फल इतना अधिक है कि वाणी उसे कह नहीं सकती।

18

रणरङ्गतलेऽमुष्मिन् यदहं लिङ्गवर्ष्मणा। जृम्भितो लिङ्गवत्तस्माल्लिङ्गस्थानमिदं भवेत्॥ १८

इस युद्धभूमिमें मैं लिंगके आकारमें बढ़ा था। इसलिये यह स्थान लिंगस्थान कहलायेगा।

19

अनाद्यन्तमिदं स्तम्भमणुमात्रं भविष्यति। दर्शनार्थं हि जगतां पूजनार्थं हि पुत्रकौ॥ १९

हे पुत्रो! इस स्तम्भका न आदि है, न अन्त। फिर भी यह बहुत छोटा हो जायगा, ताकि जगत्‌के लोग इसका दर्शन और पूजा कर सकें।

20

भोगावहमिदं लिङ्गं भुक्तिमुक्त्येकसाधनम्। दर्शनस्पर्शनध्यानाज्जन्तूनां जन्ममोचनम्॥ २०

यह लिंग भोग देनेवाला है। यह भोग और मोक्षका एकमात्र साधन है। इसके दर्शन, स्पर्श और ध्यानसे प्राणी जन्मसे छूट जाते हैं।

21

अनलाचलसङ्काशं यदिदं लिङ्गमुत्थितम्। अरुणाचलमित्येव तदिदं ख्यातिमेष्यति॥ २१

यह लिंग अग्निके पर्वत-जैसा प्रकट हुआ। इसलिये यह स्थान अरुणाचलके नामसे प्रसिद्ध होगा।

45

अरुणाचलेश्वर महादेव का विशेष पूजन और दीपदान इसी मार्गशीर्ष पूर्णिमा को बहुत बड़े रूप में होता है।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा को दीपदान अवश्य

· 21:12–21:28

वक्ता बताते हैं कि अरुणाचलेश्वर महादेव का विशेष पूजन और उनका दीपदान भी इसी मार्गशीर्ष पूर्णिमा को बहुत बड़े रूप में होता है, और उस श्रोता ने उनसे कहा कि लोगों को बताइए कि इस दिन दीपदान अवश्य करें — चाहे भगवान शिव के नाम से, चाहे पंचानन महादेव का, चाहे भगवान दत्त का, पर दीपदान अवश्य हो। उस दिन जितना दीपदान होगा, उतनी महिमा है।

46

मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर दीपदान एक कर्तव्य

कार्तिक की महिमा, मार्गशीर्ष का दीपदान, और पहला कर्तव्य

· 21:29–21:55

वक्ता कहते हैं कि कार्तिक की महिमा तो ऐसी थी ही, और मार्गशीर्ष के दीपदान की महिमा भी अनंत है। चूँकि उस दिन बृहस्पतिवार है, साथ में तीन महाशक्तियों की जयंती है, और भगवान शिव का एक प्रमुख स्वरूप भी उस दिन वहाँ उपस्थित है, इसलिए उस दिन दीपदान अवश्य करना है। वे कहते हैं, इसे सबसे पहला कर्तव्य मानिए: उस दिन सबके द्वारा दीपदान हो।

47

तंत्रोक्त दीपदान विधि

चैनल पर तंत्रोक्त दीपदान की पूरी विधि

· 21:56–22:03

वक्ता कहते हैं कि तंत्रोक्त दीपदान की पूरी विधि चैनल पर विस्तार से उपस्थित है, और लिंक पूरी तरह शेयर करके ग्रुप में डाल दिए गए हैं। वे कहते हैं, यह कर लीजिए।

वक्ता कहते हैं कि तंत्रोक्त दीपदान की पूरी विधि चैनल पर विस्तार से उपस्थित है। लिंक पूरी तरह शेयर करके ग्रुप में डाल दिए गए हैं। इतना कर लीजिए, वे कहते हैं।

48

गुरु वाले साधक के लिए मार्गशीर्ष पूर्णिमा पूजन

गुरु के आदेश और गुरु की बताई विधि से पूजन

· 22:04–22:14

वक्ता कहते हैं, दूसरा विषय: यदि आपके अपने गुरु जी हैं, तो उनसे आदेश लीजिए, या यदि उन्होंने बताया है कि पूजन किस प्रकार करना है, तो उनकी बताई विधि से पूजन कीजिए।

दूसरा विषय, वे कहते हैं, यह है कि यदि आपके अपने गुरु जी हैं, तो उनसे आदेश लीजिए। या यदि उन्होंने आपको बताया है कि पूजन किस प्रकार करना है, तो उनकी बताई विधि से पूजन कीजिए।

49

बिना गुरु वाले के लिए मार्गशीर्ष पूर्णिमा पूजन

देव दीक्षा विधान और भगवान दत्त से निवेदन

· 22:15–22:29

तीसरा विषय: यदि आपके गुरु नहीं हैं और आप दीक्षा विधान करना चाहते हैं, तो देव दीक्षा विधान कीजिए, और भगवान दत्त से निवेदन कीजिए — यदि आपको प्रत्यक्ष गुरु चाहिए — कि भगवान दत्त आपके जीवन में गुरु के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट हों, मानव रूप में आएँ, और आपको ज्ञान दें।

तीसरा विषय, वक्ता कहते हैं: यदि आपके गुरु नहीं हैं, और आप दीक्षा विधान करना चाहते हैं, तो देव दीक्षा विधान पूरा कर लीजिए। और भगवान दत्त से निवेदन कीजिए — यदि आपको प्रत्यक्ष गुरु की ज़रूरत है — कि भगवान दत्त आपके जीवन में गुरु के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट हों, मानव रूप में आएँ और आपको ज्ञान दें।

50

गिरनार पर बाबा कीनाराम और भगवान दत्त

दत्त का रोज़ गिरनार से मणिकर्णिका आना

· 22:30–23:14

वक्ता कहते हैं कि जब आप अघोराचार्य बाबा कीनाराम की कथा पढ़ेंगे या उनका जीवन देखेंगे, तो गिरनार पर्वत के बीच का तंत्रोक्त रहस्य जानेंगे, और यह भी कि भगवान दत्त रोज़ गिरनार पर्वत से काशी के क्षेत्र में, मणिकर्णिका, चक्र पुष्करिणी तीर्थ पर कैसे आते हैं, और उसके बाद एक अंश से कैसे अघोराचार्य बाबा कीनाराम के साथ उपस्थित रह गए और वहाँ तांत्रिक रूप में अनेक लीलाएँ कीं।

51

अनेक शक्तियों का एक ही तिथि पर सम्मान

तिथि को पहचानना और उसकी अनदेखी न करना

· 23:15–23:43

वक्ता कहते हैं कि यह कोई सामान्य बात नहीं कि ये सब शक्तियाँ इस तरह एक तिथि और एक स्थान को इतना महत्व देकर अपनी लीला प्रकट करती हैं। कहीं न कहीं आपका और हमारा कल्याण इससे जुड़ा है — और यदि आप इसे पहचानकर भी अनदेखा करते हैं, तो वह आपका और हमारा दुर्भाग्य है, उससे अधिक कुछ नहीं।

तो यह कोई सामान्य बात नहीं है, वक्ता कहते हैं — कि सब शक्तियाँ इस तरह एक तिथि को, एक स्थान को इतना महत्व देकर अपनी लीला प्रकट करती हैं। कहीं न कहीं हमारा और आपका कल्याण उससे जुड़ा है। और यदि पहचानकर भी आप उसे अनदेखा कर रहे हैं, तो वह आपका और हमारा दुर्भाग्य है। उससे अधिक कुछ नहीं।

52

देव दीक्षा विधान का समय

इसी पूर्णिमा को देव दीक्षा विधान पूरा करना

· 23:44–23:59

वक्ता कहते हैं कि यदि देव दीक्षा विधान करना हो, यदि गुरु नहीं हैं और देव दीक्षा विधान करने की इच्छा है, तो उस दिन देव दीक्षा विधान अवश्य पूरा कर लीजिए। देव दीक्षा विधान का पूरा विषय वीडियो बनाकर दिखाया गया है और चैनल पर उपस्थित है; आप वहाँ से कर सकते हैं।

तो यदि देव दीक्षा विधान करना हो, यदि गुरु नहीं हैं और देव दीक्षा विधान करने की इच्छा है, तो उस दिन देव दीक्षा विधान अवश्य पूरा कर लीजिए, वक्ता कहते हैं। देव दीक्षा विधान का पूरा विषय वीडियो बनाकर दिखाया गया है और चैनल पर उपस्थित है; आप वहाँ से कर सकते हैं।

53

देव दीक्षा के बाद आरंभ करने का जप

इकतालीस दिन तक एकाक्षरी मंत्र का जप

· 24:00–24:21

वक्ता कहते हैं कि यदि उस दिन आपके लिए संभव हो, तो देव दीक्षा विधान कर लेने के बाद उसी दिन से एकाक्षरी मंत्र का जप शुरू कीजिए और इकतालीस दिन तक, या माघ की पूर्णिमा तक ले जाइए; पौष की पूर्णिमा तक पूरा कीजिए। कम से कम माघ की अमावस्या तक, या मकर संक्रांति तक पूरा कीजिए — वह बहुत उत्तम रहेगा। और उसमें कोई संशय मत रखिए।

54

देव दीक्षा विधान की शंकाएँ स्वयं सुलझाना

चैनल पर खोजना और अपना आत्मबल बढ़ाना

· 24:22–24:50

वक्ता कहते हैं कि उस सारे संशय को दूर करने के लिए बस दत्तात्रेय गृहस्थ तंत्र खोजिए: जितने वीडियो आएँ, जो भी प्रश्न उठें उनके लिए सुनिए — कि यह मंत्र करेंगे तो ऐसा होगा, कलश रखना है या क्या करना है। आपका बहुत सा कॉन्सेप्ट साफ़ हो जाएगा, और आपका आत्मबल इतना दृढ़ होगा कि आप बहुत आसानी से साधना कर सकेंगे और किसी की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। वे कहते हैं, ये सब आधारभूत साधनाएँ हैं; आप भगवान की साधना कर रहे हैं, किसी भूत-प्रेत की साधना नहीं, इसलिए निश्चिंत रहिए।

55

मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर भगवती अन्नपूर्णा की पूजा

कम से कम स्तुति, और जिनकी वे कुलदेवी हैं उनके लिए कवच

· 24:51–25:23

वक्ता कहते हैं कि भगवती अन्नपूर्णा का पूजन विशेष रूप से पूर्णिमा के दिन करना है: यदि विस्तार से कुछ नहीं करना चाहते, तो कम से कम उनकी स्तुति अवश्य कीजिए। उनका कवच भी चैनल पर है, और जिनकी कुलदेवी भगवती अन्नपूर्णा हैं, उन्हें उनका कवच अवश्य करना चाहिए। और यदि घर में ऐसी कोई विपदा आ गई है कि खाने पर ही आफ़त हो गई है, तो उन्हें भी भगवती अन्नपूर्णा की शरणागति लेनी चाहिए।

56

काशी महात्म्य में अन्नपूर्णा और काशी

कलियुग में विश्वनाथ का काशी अन्नपूर्णा को सौंपना

· 25:24–25:47

वक्ता कहते हैं कि उन्होंने ग्रुप में इस बारे में लिखा था: यह काशी महात्म्य में लिखा है, जो गीता प्रेस से अलग से प्रकाशित है, और वे श्रोताओं से उसे मँगाकर पढ़ने को कहते हैं। उसमें और बातों के साथ यह कहा गया है कि इस चौथे युग, कलिकाल में, भगवान विश्वनाथ काशी नगरी का दायित्व भगवती अन्नपूर्णा को दे देते हैं।

57

अन्नपूर्णा की नगरी काशी

महाश्मशान की उग्रता का सौम्यता में बदलना

· 25:48–26:17

वक्ता कहते हैं कि जब काशी भगवती अन्नपूर्णा की नगरी हो जाती है, तो भगवती महाश्मशान की उग्रता को सौम्यता में बदल देती हैं। यह एक विशेष कारण है कि काशी क्षेत्र में कहीं भी साधना करने पर जगदंबा अशांति की स्थिति नहीं आने देतीं — जबकि तारापीठ में जाकर कोई गलती करें, तो वहाँ क्षमा जल्दी नहीं मिलती। फिर भी अपना अधिकार समझना और जानना चाहिए: जानबूझकर गलती की जाए, तो वह अलग विषय हो जाता है।

58

मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर काशी की भीमा चंडी

नंदी द्वारा स्थापित चंडिकाओं में भीम चंडी

· 26:18–26:46

वक्ता कहते हैं कि नंदी जी द्वारा काशी क्षेत्र में स्थापित नौ सौ करोड़ चंडिकाओं में भगवती भीम चंडी, भगवती अन्नपूर्णा की प्रमुख चंडिकाओं में से एक हैं। उनका विशेष पूजन भी मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन ही होता है। इसी कारण यह पूर्णिमा अपने आप में अत्यंत विशेष हो जाती है, और वे श्रोताओं से कहते हैं कि इस पर्व काल में यथासंभव अपनी साधना और पूजा कीजिए।

59

वज्र पंजर कवच का एक सच्चा प्रसंग

अभिचारिक घात से पीड़ित लड़का और आवेश द्वारा उसकी रक्षा

· 28:59–29:51

वक्ता कहते हैं कि कुछ दिन पहले गृहस्थ तंत्र की वेबसाइट पर भगवान दत्त के वज्र पंजर कवच से जुड़ी एक सच्ची घटना दो भागों में डाली गई है; इसे पढ़ने में दस मिनट लगते हैं। उसका पूरा सार यह है: पंद्रह-सोलह साल का एक लड़का, जिस पर अभिचारिक स्थिति बनाई गई और घात हुआ — फिर उसकी रक्षा के लिए काशी क्षेत्र की एक शक्ति का आवेश उस पर हुआ, जो भगवान दत्त के गणों में आती है। पर पहले वहाँ एक पिशाच था।

60

मणिकर्णिका घाट के पास भगवान दत्त के स्थान पर किया गया जप, काशी में जप का उदाहरण

मणिकर्णिका के पास भगवान दत्त के स्थान पर जप

· 29:52–30:25

वक्ता कहते हैं, इसे शुरू से समझिए। मान लीजिए हम काशी क्षेत्र में गए — पर्व काल हो या न हो — और मणिकर्णिका घाट के पास जहाँ भगवान दत्त का स्थान है, वहाँ बैठकर मंत्र जप किया, भगवान दत्त के वज्र पंजर कवच का पाठ किया, उनके माला मंत्र का पाठ और जप किया। एक दिन, दो दिन, दस दिन, इकतालीस दिन, जितना हमारी सामर्थ्य थी, एक तय संख्या में — कि यहाँ हम कम से कम कवच के ही एक सौ आठ पाठ कर रहे हैं। हमने अपना कर्म किया।

61

काशी में जप की महिमा

काशी में सुबह से दोपहर तक जप और मंत्र सिद्धि

· 30:26–30:43

वक्ता कहते हैं, कौन जाने उस दिन वहाँ कौन सी तिथि थी, कौन सा योग था — और वैसे भी काशी की सामान्य महिमा यह है कि यदि कोई व्यक्ति रोज सुबह से दोपहर के समय तक जप करने लगे, तो संसार में ऐसा कोई मंत्र नहीं जो काशी क्षेत्र में सिद्ध न हो जाए।

वक्ता कहते हैं, वहाँ कौन जाने कौन सी तिथि थी, और कौन जाने उस दिन कौन सा योग था। और सामान्य रूप से काशी की महिमा यह है कि यदि कोई व्यक्ति रोज सुबह के समय से दोपहर के समय तक जप करने लगे, तो संसार में ऐसा कोई मंत्र नहीं जो काशी क्षेत्र में सिद्ध न हो जाए।

62

जप का फल तुरंत क्यों नहीं मिलता?

आने वाले देवता की अपनी महिमा और अपना स्वाभिमान

· 30:44–31:12 · Also a question

वक्ता कहते हैं, दो बातें अच्छी तरह समझिए: जप शुरू करते ही हमें सबसे ज्यादा चिंता तुरंत फल की होती है, कि फल तुरंत कैसे मिले। पर नियम यह है कि जब भी कोई देवता हमारे जीवन में प्रवेश करता है, और यदि वह प्रत्यक्ष होता है, तो उसकी भी अपनी महिमा है, कह सकते हैं उसका भी अपना स्वाभिमान है। वह आएगा तो हमारे दुख और विपत्तियाँ अवश्य दूर करेगा — पर हम स्वयं चाहते क्या हैं?

63

काशी के सिद्धों और तुलसी घाट के तुलसी बाबा का जीवन, जिन्हें हनुमान जी के बार-बार दर्शन हुए, देवताओं के प्रत्यक्ष होने को दिखाता है

तुलसी घाट के तुलसी बाबा और हनुमान जी के बार-बार दर्शन

· 31:13–31:46

वक्ता कहते हैं, यदि हमें वही चाहिए, तो उन महापुरुषों का जीवन देखना चाहिए जिनके जीवन में देवता प्रत्यक्ष हुए। काशी क्षेत्र के सिद्धों का जीवन देखिए; तुलसी घाट के तुलसी बाबा का जीवन देखिए। हनुमान जी ने तुलसीदास जी को कई बार प्रत्यक्ष दर्शन दिए और उनके साथ रहे — तो क्या हनुमान जी के प्रत्यक्ष होने के बाद उनके जीवन में दुख नहीं रहा? क्या वे अरबपति, राजा बन गए? क्या उन्होंने यह चाहा, या ऐसा किया?

64

तुलसीदास को हनुमान जी की सहायता

दिव्य उद्देश्य को दिव्य सहायता

· 31:47–32:08

वक्ता कहते हैं, उनके जीवन का जो उद्देश्य था — उसी में हनुमान जी ने उनका साथ दिया। वह दिव्य उद्देश्य था; भाव दिव्य थे; वे भगवान श्री रामचंद्र जी महाराज को प्रसन्न करना चाहते थे, और उसी के अनुसार भगवान हनुमान जी ने उनका साथ दिया। आपके जीवन में जो भाव रहेगा, उसी तरह देव शक्तियाँ वहाँ आपका सहयोग करेंगी।

65

देवता और केवल भौतिक भाव

भौतिक धन के लिए कोई देव शक्ति अंग संग नहीं रहती

· 32:09–32:42

वक्ता कहते हैं, यदि हमारा भाव केवल भौतिक धन है, तो भौतिक धन के लिए कोई देव शक्ति उस तरह प्रत्यक्ष होकर अंग संग नहीं रहती, जैसे भगवान तुलसीदास जी के साथ रहते थे। किसी भी भक्त के जीवन में ऐसा कहीं नहीं हुआ — सिवाय उसके जो अपने देवता, अपने इष्ट आराध्य के प्रति समर्पित रहा।

और यदि हमारा भाव केवल भौतिक धन है, वक्ता कहते हैं, तो भौतिक धन के लिए कोई देव शक्ति इस तरह प्रत्यक्ष होकर अंग संग नहीं रहती, जैसे भगवान तुलसीदास जी के साथ रहते थे। और किसी भी भक्त के जीवन में कहीं ऐसा नहीं हुआ — सिवाय उसके जो अपने देवता, अपने इष्ट देवता, अपने आराध्य के प्रति समर्पित रहा।

66

देवता के शीघ्र दर्शन और कष्टों का अंत

कलि काल में दुख कटते हैं, मिटते नहीं

· 32:43–33:00

वक्ता कहते हैं, समय से पहले — यानी जितना कर्म बचा है, जितना प्रारब्ध बचा है, उसके अनुसार — देवता प्रकट भी हो जाएँ, तो वे साथ रहकर उसके दुख काटते हैं; उन्हें खत्म नहीं करते, कि हम प्रकट हो गए तो अब तुम्हें कोई दुख नहीं होगा। कलि काल में इस पर ध्यान दीजिए, वे कहते हैं; इस भ्रम में मत रहिए।

67

एक ही तीर्थ पर जप के अलग अलग फल

आचरण तय करता है कि एक ही पाठ क्या फल देगा

· 33:01–33:37

नहीं। वक्ता कहते हैं कि इसमें समय की भी विशेषता है और हमारे अपने कर्मों की भी। यदि आप मांस-मछली खाने वाले हैं, जीव हत्या करने वाले हैं, दूसरों को सताने वाले हैं, दूसरों का धन, आयु, बेटे-पोते देखकर जलने वाले हैं, द्वेष और कुंठा पालने वाले हैं — तो किसी मुसीबत में पड़कर, या कहीं से सुनकर, जाकर पाठ करेंगे तो आपको वह फल नहीं मिलेगा जो उस दूसरे व्यक्ति को मिलेगा जो दूसरों का भला चाहता है, किसी को देखकर ईर्ष्या नहीं करता, अपना धन दान करता है, और धन आने पर जीवों के बारे में सोचता है।

68

पवित्र क्षेत्र में एक दिन की साधना

क्षेत्र की महिमा और एक ही दिन में कृपा

· 33:38–34:00

वक्ता कहते हैं, क्योंकि महिमा क्षेत्र की है, इसलिए एक दिन की साधना में भी किसी देव ने अपनी कृपा दी हो और अंग संग हो गया हो। वह प्रत्यक्ष साथ चले या न चले, हमारे पास उसे देखने की दृष्टि नहीं है — पर हमारे कर्म सुधर गए, विचार बदल गए, हम अच्छे हो गए, देव जिस रूप में चाहता है उसके अनुसार चलने लगे।

69

दैवी कृपा के दिखने वाले लक्षण

घर में सेवा पूजा शुरू होना और घर का सात्विक होना

· 34:01–34:26

वक्ता कहते हैं, घर में सेवा पूजा शुरू हो गई; घर का विधि विधान सात्विक हो गया, हमारी सोच सात्विक हो गई। और जब कभी आपका शत्रु प्रबल हुआ, या आपका प्रारब्ध — गलत प्रारब्ध — उदय हो रहा है और आप पर दुख आने वाला है, तब उसने इस पर विचार किया, और वह एक दिन की साधना भी वहाँ काम आएगी।

घर में सेवा पूजा शुरू हो गई, वक्ता कहते हैं। घर का विधि विधान सात्विक हो गया; हमारी सोच सात्विक हो गई। कभी आपका शत्रु प्रबल हुआ, आपका प्रारब्ध — गलत प्रारब्ध — उदय हो रहा है, और अब आप पर दुख आने वाला है। उसने इस पर विचार किया, और इसलिए यह एक दिन की साधना भी वहाँ काम आएगी।

70

संकट के समय देवताओं का आवेश

विपत्ति के समय आवेश, विशेषकर निष्कपट साधकों पर

· 34:27–34:55

वक्ता कहते हैं, जो देवता अंग संग चला था, वह प्रत्यक्ष होगा: चाहे आपके शरीर पर आवेश हो या प्रत्यक्ष रक्षा करे, वह रक्षा अवश्य करेगा। आपके आस-पास ऐसे बहुत से अनुभव मिलेंगे। विपत्ति के समय देवताओं का आवेश शरीर पर होता है — विशेषकर उन लोगों पर जो पूरी तरह निष्कपट भाव से, समर्पित भाव से साधना करते हैं।

71

माता पिता के पुण्य से संतान की रक्षा

पिता या दादा के पुण्य से पुत्र पर आवेश

· 34:56–35:18

हाँ। वक्ता कहते हैं कि कई बार ऐसा भी होता है कि साधना पिता ने की थी; विपत्ति पुत्र पर आई, और पुत्र का जीवन कैसा है यह हमें नहीं पता, फिर भी उस पर आवेश आया — क्योंकि पुण्य पिता का था, दादा का था, माँ का था। उससे भी ऐसा होता है।

और कई बार ऐसा भी होता है, वक्ता कहते हैं: साधना पिता ने की थी। विपत्ति पुत्र पर आई। पुत्र का जीवन कैसा है, यह पता नहीं — पर उस पर भी आवेश आया, क्योंकि पिता का पुण्य था, दादा का पुण्य था। माँ का पुण्य था — उससे भी ऐसा होता है।

72

जब आवश्यकता आती है और समर्पण दृढ़ रहता है, तो शक्तियाँ उसी अनुपात में साधक का साथ देती हैं और कभी पीछे नहीं हटतीं

साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती

· 35:19–35:40

वक्ता कहते हैं, साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती। जब आवश्यकता आती है, जब आपका समर्पण उतना दृढ़ रहता है, तब शक्तियाँ भी उसी अनुपात में आपका साथ देंगी। ऐसा नहीं कि वे पीछे हट जाएँगी।

वे कहते हैं कि उन्होंने वहाँ यह विषय आपके सामने रखने का प्रयास किया है: इसे सच्ची घटना से समझिए। साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती। जब आवश्यकता आती है, जब आपका समर्पण उतना ही अडिग रहता है, तब शक्तियाँ भी उसी अनुपात में आपका साथ देंगी। ऐसा नहीं कि वे पीछे हट जाएँगी।

73

ऐसा क्यों लगता है कि साधना से कुछ नहीं हुआ?

मोटा प्रारब्ध पहले काटकर पतला किया जाता है

· 35:41–35:57 · Also a question

वक्ता कहते हैं, यदि आप सोच रहे हैं कि साधना की और कुछ नहीं हुआ, वे हमारी ओर देख भी नहीं रहे — तो ऐसा नहीं है। हमारा प्रारब्ध जितना भी मोटा हो, वे पहले उसे काटकर पतला करेंगे, नष्ट करेंगे, ताकि हमारे पास पाप की कोई गठरी न बचे और हम योग्य बन जाएँ।

यदि साधना करके आप सोच रहे हैं कि हमने साधना की और हमें कुछ नहीं हुआ, वे हमारी ओर देख ही नहीं रहे — तो नहीं, वक्ता कहते हैं। हमारा प्रारब्ध जितना भी मोटा हो, सबसे पहले वे उसे काटकर पतला करेंगे; उसे नष्ट करेंगे। ताकि हमारे पास पाप की कोई गठरी न बचे, ताकि हम योग्य बन जाएँ।

74

दर्शन से पहले इच्छाओं की पूर्ति

चार पुरुषार्थ और वे कामनाएँ जो पहले पूरी होती हैं

· 35:58–36:04

वक्ता कहते हैं, माँग चारों पुरुषार्थों की है। आप सीधे मोक्ष नहीं माँगेंगे; और माँगें भी तो चिंतन यही चलेगा कि घर हो, गाड़ी हो, बेटे का यह हो, बेटी का वह हो। जब तक वह चिंतन है, आप अभी इच्छाओं में हैं — इसलिए प्रत्यक्ष होने से पहले इच्छाएँ पूरी होंगी। और जब भौतिक इच्छाएँ बनी रहती हैं, तब देवता कभी उस रूप में प्रत्यक्ष नहीं होंगे जो आपके पढ़े जाने वाले ध्यान मंत्र में बताया गया है।

75

बामाखेपा को भगवती तारा के दर्शन

माँगा गया ध्यान रूप और उसमें निहित ऊर्जा

· 36:05–36:45

वक्ता कहते हैं, बामाखेपा जी की जीवनी पढ़ें तो भगवती तारा उन्हें प्रत्यक्ष थीं — पर कभी उस रूप में नहीं जो उनके ध्यान मंत्र में है: चार हाथ, हाथ में कैंची, मुंडमाला, शवासन पर। उन्होंने उसी रूप में दर्शन माँगे; माँ ने कहा कि हम उस रूप में प्रकट हुए तो तुम वह ऊर्जा सह नहीं पाओगे। उन्होंने नहीं माना, और जब माँ वह रूप धारण करने लगीं तो उनकी हालत बिगड़ गई, वे बेहोश होने लगे; माँ फिर माँ के रूप में आईं और उनकी रक्षा की, उन्हें ठीक किया।

76

पार्वती गीता के पहले अध्याय में दिव्य दृष्टि

दिव्य रूप दिखाने से पहले दिव्य दृष्टि देना

· 36:46–37:31

वक्ता कहते हैं, यदि आपने पार्वती गीता का पाठ किया है, तो देखिए उसके पहले ही अध्याय में क्या होता है। यह सतयुग है, सृष्टि का आरंभ: जगदंबा एक छोटी कन्या के रूप में हैं, और जब पता चला कि भगवती राजा हिमवान के सामने आठ भुजाओं और तीन नेत्रों के साथ प्रकट हुई हैं, तो प्रार्थना करके वह दिव्य रूप देखने का निवेदन किया गया। भगवती ने पहले दिव्य दृष्टि दी, वह दिव्य रूप देखने की सामर्थ्य दी। फिर शिव की शक्ति के रूप में दर्शन दिए, फिर नारायणी या वैष्णवी शक्ति के रूप में, फिर ब्राह्मणी शक्ति के रूप में, और फिर अपने मूल रूप में — और फिर कन्या के रूप में लौट आईं।

77

सच्चे दर्शन के लक्षण

मूल दर्शन के बाद मौन

· 37:32–37:52

वक्ता बताते हैं कि हमेशा कहा जाता है, दर्शन के बाद व्यक्ति मौन हो जाता है। जो दर्शन के बाद बहुत बोलता है, बयान देता फिरता है — बयान देने का अर्थ ही यह हो गया कि उसे मूल दर्शन नहीं हुआ। यदि सिद्धि मिली और उसके साथ भौतिकता का विषय बना रहा, तो मूल दर्शन नहीं हुआ: यह जान लीजिए। यदि हम बक-बक कर रहे हैं, तो मूल दर्शन नहीं हुआ; कृपा हुई हो सकती है।

78

छोटी कृपा या सिद्धि का फल

संसार में स्थापित होने और पाने की सामर्थ्य

· 37:53–38:22

पर जब दूसरे दर्शन, दूसरी कृपाएँ, दूसरे अनुभव, दूसरी सिद्धियाँ होती हैं — सामान्य कृपा भी — तो उनमें व्यक्ति को हर बात की सामर्थ्य मिलती है: संसार के बीच अपना काम स्थापित करने की, जो बनाता है उसे पाने की। वक्ता कहते हैं कि वे वर्तमान के हिसाब से बोल रहे हैं, और श्रोताओं से कहते हैं कि सुरथ और समाधि में मत चले जाइए।

79

सुरथ और समाधि की प्रसिद्ध कथा के पीछे एक अलग तांत्रिक विषय छिपा है

प्रसिद्ध कथा से आगे का तांत्रिक विषय

· 38:23–38:49

वक्ता कहते हैं, सुरथ और समाधि के विषय में भी जब भीतर जाएँगे, तंत्र विषय में जाएँगे, तो वह बहुत अलग है। आपने केवल कथा देखी है; मूल विषय, जो उसके बाद है, वह अलग बात है। कभी उसे खोजकर जानने का प्रयास कीजिए, तो पता चलेगा कि आगे क्या हुआ — और फिर सावर्णि नाम के मनु की पूरी कथा आगे जानने का प्रयास कीजिए।

80

पूर्णिमा पर मूल शक्तियों की पूजा, भगवान दत्त का दीपदान और गुरु स्वरूप की पूजा करनी है

मूल शक्तियों और गुरु स्वरूप की पूजा

· 38:50–39:09

वक्ता कहते हैं, पूर्णिमा के दिन अपनी मूल शक्तियों का पूजन कीजिए। उस दिन भगवान दत्त का दीपदान आदि अवश्य कीजिए। आप किसी भी देव शक्ति की उपासना करते हों, उस दिन गुरु स्वरूप की पूजा अवश्य कीजिए — भगवान दत्त की पूजा अवश्य कीजिए, क्योंकि गुरु की आद्य शक्ति, मूल शक्ति, भगवान दत्त हैं।

तो पूर्णिमा के दिन अपनी मूल शक्तियों का पूजन कीजिए, वे कहते हैं। उस दिन भगवान दत्त का दीपदान आदि अवश्य कीजिए। आप किसी भी देव शक्ति की उपासना करते हों, उस दिन गुरु स्वरूप की पूजा अवश्य कीजिए। भगवान दत्त की पूजा अवश्य कीजिए, क्योंकि गुरु की आद्य शक्ति, मूल शक्ति, भगवान दत्त हैं।

81

आज इन स्वरूपों का भी विरोध ऐसी प्रोफाइलें करती हैं जिनके मालिक अज्ञात हैं, जो बातें जोड़कर अजीब विषय पेश करती हैं

स्वरूपों का विरोध, और अज्ञात मालिकों वाली प्रोफाइलें

· 39:10–40:00

वे कहते हैं कि आज लोगों ने इन स्वरूपों को भी नहीं छोड़ा और इनका विरोध करने लगते हैं, बातें जोड़कर अजीब विषय पेश करते हैं। जो भी हो, वे कहते हैं, आपकी सामर्थ्य उनके बराबर नहीं — हम भी इतना जानते हैं कि वे भगवान हैं, और आपमें भी इतनी बुद्धि होनी चाहिए। ऐसी चर्चा करने वालों का प्रचार क्या है, भगवती जानें; वे सनातनी हैं भी या नहीं, पता नहीं। प्रोफाइल किसके नाम है और उसके पीछे कौन व्यक्ति है, न आप जानते हैं न हम: वह देवताओं के बारे में लिख रहा है, पर सारी सामग्री उपलब्ध है, इसलिए कहीं से भी पढ़कर बोल सकता है।

82

हर पर्व और त्योहार पर शुरू होने वाले हर शक्ति और स्वरूप के विरोध के पीछे नकारात्मक और अराजक तत्व खड़े हैं

झगड़ों के पीछे नकारात्मक या अराजक तत्व

· 40:01–40:31

वक्ता कहते हैं, हर पर्व और त्योहार पर हर शक्ति और हर स्वरूप का विरोध शुरू हो जाता है, और उसके पीछे कौन सी नकारात्मक शक्तियाँ, कौन से अराजक तत्व, कौन लोग हैं, यह आप-हम जान नहीं पाते। और हिंदू आपस में लड़ते हैं — कि यह शक्ति ऐसी नहीं होनी चाहिए, वैसी नहीं होनी चाहिए। इससे बचिए, इससे सावधान रहिए; ऐसा मत कीजिए, वे कहते हैं, आप अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं।

83

भ्रम: अनुष्ठान तीर्थ पर ही करवाना चाहिए

कोई बाध्यता नहीं — स्वयं करने की सामर्थ्य

· 40:32–41:00

नहीं। वक्ता कहते हैं कि तीर्थ क्षेत्रों आदि में जो अनुष्ठान होते हैं — आप बाध्य नहीं हैं। आपके भीतर सामर्थ्य है, तो स्वयं कीजिए। ऐसा कौन सा विषय, कौन सा पर्व काल है जिस पर चैनल पर विस्तृत वीडियो, चर्चा न हो? स्वयं कीजिए। क्यों परेशान हैं कि क्यों दें या न दें — मत दीजिए, स्वयं कीजिए।

84

भगवान दत्त के दीपदान की विधि, देव दीक्षा विधान और बारह नामों की महिमा पहले ही दी जा चुकी है

दीपदान विधि, देव दीक्षा विधान और बारह नाम

· 41:01–41:24

वक्ता कहते हैं, स्वयं बैठिए: भगवान दत्त का दीपदान करने की पूरी विधि आप जानते हैं। भगवान दत्त का देव दीक्षा विधान आप जानते हैं। उनके बारह नामों की महिमा क्या है, उनका जप किस तरह होता है, उनका प्राशन कैसे होता है, यह आप जानते हैं।

स्वयं बैठिए, वक्ता कहते हैं। भगवान दत्त का दीपदान करने की पूरी विधि आप जानते हैं। भगवान दत्त का देव दीक्षा विधान आप जानते हैं। उनके बारह नामों की महिमा क्या है, उनका जप आदि किस तरह होता है, उनका प्राशन कैसे होता है — यह आप जानते हैं।

85

वज्र पंजर कवच और दत्तात्रेय माला मंत्र, उनके विधि विधान और बहुत से डाले गए अनुभवों सहित, पहले से उपलब्ध हैं

वज्र पंजर कवच और दत्तात्रेय माला मंत्र

· 41:25–41:43

वक्ता कहते हैं, वज्र पंजर कवच — भगवान दत्त का वज्र कवच — आप जानते हैं, और उसकी महिमा भी जानते हैं। दत्तात्रेय माला मंत्र आप जानते हैं, उसका विधि विधान जानते हैं; और उसके बहुत से अनुभव चैनल पर डले पड़े हैं — यह भी आप जानते हैं।

वज्र पंजर कवच, जो भगवान दत्त का वज्र कवच है, आप जानते हैं; उसकी महिमा जानते हैं, वक्ता कहते हैं। दत्तात्रेय माला मंत्र आप जानते हैं, उसका विधि विधान जानते हैं। उसके बहुत से अनुभव चैनल पर डले पड़े हैं — यह आप जानते हैं।

86

भगवती का कौन सा मंत्र बिना दीक्षा के किया जा सकता है?

पूर्ण विनियोग और न्यास सहित जयंती मंगला काली

· 41:44–42:08 · Also a question

वक्ता कहते हैं, भगवती के सभी स्वरूपों के लिए बिना दीक्षा के किया जा सकने वाला मूल मंत्र, पूरे विनियोग और न्यास सहित — जयंती मंगला काली — वह मंत्र उपलब्ध है। भगवती त्रिपुर भैरवी के निमित्त इस मंत्र से आहुति दे सकते हैं, इससे जप कर सकते हैं। यह आप जानते हैं। बीजाक्षर एकाक्षरी मंत्र का पूरा विधि विधान आप जानते हैं, और भगवती अन्नपूर्णा का कवच भी जानते हैं।

88

मरते समय मनुष्य सच में अपने साथ क्या ले जाता है?

पर्व काल में स्नान, दान, जप और तप

· 45:20–45:36 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि वे तीर्थ के महत्व पर कई बार गला फाड़कर चिल्ला चुके हैं। जब हम मरेंगे, तो न हम करोड़ रुपया ले जाएंगे, न आप दस करोड़ ले जाएंगे। तीर्थ क्षेत्र में, पर्व काल में जो स्नान आप कर रहे हैं, जो दान कर रहे हैं, जो जप कर रहे हैं, जो तप कर रहे हैं — वही आप साथ ले जाएंगे।

89

तीर्थ पर करवाई गई पूजा और अपनी पूजा

करवाई गई पूजा अपने हाथ की पूजा की जगह नहीं ले सकती

· 45:37–45:53

नहीं। वक्ता कहते हैं कि वे हमेशा इस होशियारी की ओर इशारा करते हैं — पैसा बहुत है, दस हज़ार रुपये भेजकर अपने लिए पूजा करवा लेते हैं। और इधर मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर चादर तानकर सोते रहते हैं। दोपहर बारह बजे उठते हैं, घूमते-फिरते हैं, चाउमीन खाते हैं और फिर आकर सो जाते हैं — पूजा तो हो ही गई। वे कहते हैं: इधर मत करवाओ, खुद करो।

90

विंध्याचल या काशी में आपकी ओर से पाठ

गुणा फल पाने के लिए अपने हाथ से भी होना चाहिए

· 45:54–46:37

वक्ता कहते हैं कि अगर आप सोच रहे हैं कि तीर्थ में, विंध्याचल में मेरे लिए पाठ हो रहा है, काशी में मेरे लिए हो रहा है, तो हम विमान पर चढ़कर स्वर्ग जाएंगे — तो आप नहीं जाएंगे। आपके हाथ से भी होना चाहिए। वहां होगा, तभी जो दस गुना, हज़ार गुना, करोड़ गुना फल मिलना है, वह मिलेगा; नहीं तो नहीं मिलेगा।

91

शोषण करने वाले गुरु और गुरु मंत्र का त्याग

मानसिक, आर्थिक या शारीरिक शोषण में गुरु मंत्र त्याग

· 46:38–47:25

प्रश्न है कि जब स्त्री-पुरुष साधकों का उनके ही गुरु मानसिक, आर्थिक या शारीरिक शोषण करें, तो गुरु और गुरु मंत्र के त्याग की विधि क्या है। वक्ता उत्तर देते हैं कि गुरु मंत्र त्याग की विधि चैनल पर है, उसी विधान से त्याग किया जा सकता है। दोष निवृत्ति का भी विधान है। और अगर ऐसी स्थिति बनती है, तो वह गुरु तो नरकगामी है ही; ऐसे गुरु का साथ नहीं देना चाहिए। शोषण हो रहा हो, खासकर जान-बूझकर, तो गुरु को छोड़ ही देना चाहिए।

92

दत्तात्रेय का विग्रह न हो तो क्या फोटो पर देव दीक्षा हो सकती है?

फोटो, पांच लाख एकाक्षरी और माला मंत्र के 5100

· 47:26–47:36 · Also a question

एक श्रोता का मंदिर छोटा है, इसलिए वे भगवान दत्तात्रेय का विग्रह नहीं रख पाते। वक्ता कहते हैं कि कोई बात नहीं: देव दीक्षा विधान के लिए फोटो पर एकाक्षरी मंत्र का पांच लाख जप और दत्त माला मंत्र का 5100 जप कर सकते हैं। बिल्कुल कर सकते हैं।

एक श्रोता लिखते हैं कि उनका मंदिर छोटा है, इसलिए वे भगवान दत्तात्रेय का विग्रह नहीं रख पा रहे। वक्ता कहते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। देव दीक्षा विधान के लिए आप फोटो पर एकाक्षरी मंत्र का पांच लाख जप और दत्त माला मंत्र का 5100 जप कर सकते हैं। बिल्कुल कर सकते हैं।

93

दत्त मुद्रिका क्या है?

भगवान दत्त का एकाक्षरी बीज लिखा छोटा सिक्का

· 47:37–47:55 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि पिछले दो साल से भगवान दत्तात्रेय की मुद्रा, यानी मुद्रिका है — एक छोटा सिक्का, जिसे दत्त मुद्रिका कहते हैं। उस पर भगवान का एकाक्षरी बीज लिखा होता है, और जप करते समय पूरा मंत्र उसी पर अर्पित किया जाता है। वे कहते हैं कि जो आपने करवाया है, वही उन्होंने खुद भी किया है; फर्क बस इतना है कि उनका काफी पुराना है और आपका साल भर नया होगा।

94

सोमवार को शिवालय में कवच पाठ

सोमवार को शिवालय में शिव कवच का पाठ

· 49:40–49:48

सोमवार को शिवालय में एक शिव कवच के पाठ के बारे में पूछने पर वक्ता सीधे कहते हैं: बिल्कुल कीजिए।

सोमवार को शिवालय में एक शिव कवच के पाठ के बारे में पूछने पर वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल करना चाहिए।

95

त्रिपुरसुंदरी महामंत्र की दीक्षा की आयु

आठ वर्ष से पहले त्रिपुरसुंदरी महामंत्र की दीक्षा

· 49:49–50:10

राहुल शर्मा जी पूछते हैं कि अगर वे वक्ता के पुत्र होते और मां भगवती से केवल मोक्ष पाना चाहते, तो वक्ता क्या मार्गदर्शन देते। वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले, आठ वर्ष से कम आयु में ही वे उन्हें भगवती त्रिपुरसुंदरी के महामंत्र की दीक्षा दिलवाते। वे खुद नहीं दे सकते, इसलिए दिलवाते।

96

पहली दीक्षा के बाद पुरश्चरण, फिर उपनयन संस्कार और विधि से संध्या, और सोलह वर्ष पर तांत्रिक दीक्षा।

पुरश्चरण, उपनयन और संध्या, फिर सोलह पर तांत्रिक दीक्षा

· 50:11–50:30

वक्ता कहते हैं कि वह दीक्षा हो जाने पर, उचित समय आने पर वे उसका पुरश्चरण शुरू करवाते। उसके बाद उसका उपनयन संस्कार होता और उसे विधि से संध्या सिखाई जाती। फिर सोलह वर्ष का होने पर, आगे की साधना के लिए वे तांत्रिक संध्या और तांत्रिक दीक्षा का विधान शुरू करवाते।

वक्ता कहते हैं कि जब वह दीक्षा हो जाती, तब उचित समय आने पर वे उसका पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। शुरू करवाते। उसके बाद उसका उपनयन संस्कार होता, और उसे विधि से संध्या सिखाई जाती। उसके बाद, जब वह सोलह वर्ष का हो जाता, तब आगे की साधना के लिए वे उसके लिए तांत्रिक संध्या और तांत्रिक दीक्षा का विधान शुरू करवाते।

97

कवच पुरश्चरण कुंडली देखकर चुना जाता है — पंचम बली हो या नवम बली — और जितनी जल्दी हो, शुरू किया जाता है।

कुंडली के अनुसार चुना गया कवच पुरश्चरण

· 50:31–50:50

वक्ता कहते हैं कि जितनी जल्दी हो सके, छोटी उम्र में ही वे एक के बाद एक कवच का पुरश्चरण शुरू करवाते। कुंडली के अनुसार — पंचम बली हो या नवम बली, चंद्र कुंडली और लग्न कुंडली से देखकर — शुरू से ही उचित मार्गदर्शन के अनुसार उसकी साधना शुरू हो जाती।

वक्ता कहते हैं कि जितनी जल्दी हो सके, छोटी उम्र में ही वे एक के बाद एक कवच का पुरश्चरण शुरू करवाते। आपकी कुंडली के अनुसार, पंचम बली है या नवम बली, चंद्र कुंडली और लग्न कुंडली के अनुसार देखकर — उसे देखते हुए, बिल्कुल शुरुआत से ही उचित मार्गदर्शन के अनुसार आपकी साधना शुरू हो जाती।

98

भगवती विंध्यवासिनी के मूल कवच का पुरश्चरण, और बाईस वर्ष की उम्र तक 1008 त्रिकोण पूरे।

विंध्यवासिनी का मूल कवच, और बाईस की उम्र तक 1008 त्रिकोण

· 50:51–51:17

वक्ता कहते हैं कि कम से कम एक कवच — भगवती का, या उस समय जिसमें उसकी श्रद्धा हो। अगर वह उनका पुत्र होता, तो वे उसकी श्रद्धा भगवती विंध्यवासिनी में रखते, इसलिए शुरू से ही भगवती विंध्यवासिनी के मूल कवच का पुरश्चरण करवाते। दस वर्ष की उम्र तक शारीरिक फिटनेस पर पूरा ध्यान होता — दौड़ो, बैठना नहीं है, क्योंकि त्रिकोण करना है। और जैसे ही उसके पैर चलने लगते, सबसे पहले उससे त्रिकोण करवाते, ताकि जीवन में कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा त्रिकोण पूरे हों: बीस-बाईस वर्ष की उम्र तक पहले 1008 त्रिकोण पूरे कर लो।

99

क्या किसी भी तरह का दीपदान ग्रहों को शांत करता है?

यज्ञ का फल देने वाला दीपदान

· 51:31–52:05 · Also a question

पूछा गया कि क्या किसी भी तरह के दीपदान से ग्रहों की शांति होती है। वक्ता कहते हैं कि ग्रहों की शांति अवश्य होती है। दीप, यानी किसी भी देवता का दीपदान, ऐसी चीज़ है कि — जैसा कार्तिक माहात्म्य आदि में कहा गया है, जिसे वे पढ़ने को कहते हैं — अगर कोई व्यक्ति यज्ञ आदि करने में समर्थ न हो, तो केवल दीपदान करके, बस इतना करके, उसे वह फल मिल जाता है जो यज्ञ से मिलता है। दीपदान सभी ग्रहों को शांत करने में अवश्य समर्थ है।

100

क्या बिना दीक्षा ललिता सहस्रनाम का पाठ हो सकता है?

विनियोग-न्यास का प्रश्न और पहले क्या पूरा करें

· 52:06–52:45 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि बिना दीक्षा ललिता सहस्रनाम पर बहुत विवाद है। उनके अनुसार भी इसमें विनियोग और न्यास का विषय आ जाता है, क्योंकि यह तंत्रोक्त विषय है; और भगवती ललिता की दीक्षा के विषय में शंकराचार्य महाराज ने भी इसमें दीक्षा के पक्ष में कहा है। फिर भी अगर आप इतना ज़ोर देते हैं, तो पहले कम से कम पंचाक्षरी का पांच लाख जप कर लीजिए; उसके बाद देव दीक्षा आदि कीजिए — या पहले देव दीक्षा करके, पांच लाख जप पूरा करने के बाद कीजिए। और विनियोग-न्यास अच्छे से सीख लीजिए, या ललिता सहस्रनाम के लिए किसी पाठ करने वाले से उपदेश ले लीजिए।

101

राहु महादशा में प्रतियोगी परीक्षा

परीक्षार्थी पर राहु के अच्छे-बुरे प्रभाव, और उपाय

· 52:46–54:05

वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है, पर पहले यह देखना होगा कि राहु किस भाव में है और लग्न क्या है। अगर राहु अच्छा प्रभाव देने वाले हैं, तो एकाग्रता बनाएंगे और बहुत कम भटकाएंगे। अगर थोड़ा नकारात्मक प्रभाव देने वाले हैं, तो व्यक्ति परीक्षा की तैयारी कम करेगा और परिणाम की कल्पना बहुत करेगा — कि IAS बन गए तो यहां DC बनेंगे, वहां मजिस्ट्रेट बनेंगे — और पढ़ाई नहीं करेगा। यही राहु का बुरा प्रभाव है: व्यक्ति बहुत कल्पना करता है। राहु सबसे बड़े देवी उपासक हैं, इसलिए भगवती के स्तोत्र और शतनाम का पाठ कीजिए, जो सबसे अच्छा है, और भगवान शिव का अभिषेक कीजिए। अगर कष्ट बहुत ज़्यादा हो, तो कीर्तिमुख श्री महाराज उसे सीधे पकड़ लेंगे, पर उनका तरीका कुछ तांत्रिक हो जाता है।

102

क्या घर में रोज़ के दीपदान के लिए धातु का दीया इस्तेमाल हो सकता है?

धातु का दीया धोकर दोबारा, और दीये की चमक

· 54:06–54:43 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि हां, बिल्कुल: उन्हें धोकर वही दीये बार-बार इस्तेमाल करने चाहिए। धातु का दीया टूटे नहीं, तब तक बदलना भी नहीं चाहिए। रोज़ धोइए और चमकाइए; पीतल का हो तो इतना घिसिए और चमकाइए कि सोने जैसा लगे, और उसी में दीपदान कीजिए — आपका दीया जितना चमकेगा, आपका भाग्य उतना ही निखरेगा और चमकेगा।

103

साधना के पुराने, फटे कपड़ों का क्या करें?

फेंकने के बजाय घर में पहनना

· 54:56–55:06 · Also a question

पूछा गया कि साधना में पहने कपड़े फट जाएं तो उनका क्या करें। वक्ता कहते हैं: भैया, घर में पहन लीजिए — और क्या करना है? धोती पहनिए और बम बम महादेव कहते हुए घर में घूमिए।

पूछा गया कि साधना में पहने कपड़े फट जाएं तो उनका निपटारा कैसे करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि उन्हें घर में पहन लीजिए; और क्या करना है? धोती पहनिए और बम बम महादेव कहते हुए घर में घूमिए।

104

क्या ट्रेन में लेटे-लेटे नामावली का पाठ हो सकता है?

नामावली के पाठ में दोष नहीं, क्योंकि यह नाम मंत्र का जप है

· 55:20–55:41 · Also a question

पूछा गया कि ट्रेन में खाली बैठे या लेटे हुए देवी-देवताओं की नामावली का पांच सौ या हज़ार बार पाठ किया जा सकता है क्या, और शुद्धता, मर्यादा और आध्यात्मिकता की दृष्टि से क्या उचित होगा। वक्ता कहते हैं कि नामावली के पाठ में कोई दोष नहीं है — आप नाम मंत्र का ही जप कर रहे हैं। अगर केवल नाम का पाठ कर रहे हैं, तो कोई दिक्कत नहीं; कर सकते हैं।

105

अगर नींद में रोज़ रात कोई डराए, तो इसका क्या अर्थ है?

नींद में बार-बार डराया जाना किसी उपस्थिति का संकेत

· 55:42–55:52 · Also a question

पूछा गया कि नींद में कोई वैसे डराए जैसे बच्चों को डराया जाता है, और दस दिन से यह रोज़ हो रहा है, तो इसका क्या अर्थ है। वक्ता कहते हैं कि अगर यह बार-बार हो रहा है, तो कोई विषय ज़रूर मौजूद है।

एक श्रोता पूछते हैं कि नींद की अवस्था में कोई वैसे डराए जैसे बच्चों को डराया जाता है, तो इसका क्या अर्थ है; वे बताते हैं कि दस दिन हो गए और यह रोज़ हो रहा है। वक्ता उत्तर देते हैं कि अगर यह बार-बार हो रहा है, तो कोई विषय ज़रूर मौजूद है।

106

शाबरी कवच और सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र

दोनों सही — श्रद्धा तय करती है

· 55:53–56:39

वक्ता कहते हैं कि दोनों सही हैं: जिसमें आपकी श्रद्धा हो, वह कीजिए।

पूछा गया कि कौन सा कवच सही है, शाबरी कवच या सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र। वक्ता कहते हैं कि भैया, दोनों सही हैं। जिसमें आपकी श्रद्धा हो — वही कीजिए।

107

सरकारी नौकरी के लिए आध्यात्मिक सहारा

सूर्यनारायण और गणपति, और सूर्य-शनि का विश्लेषण

· 56:40–57:07

एक श्रोता कहते हैं कि वे सरकारी नौकरी के लिए पूरी मेहनत कर रहे हैं, पर कुछ उपाय भी चाहते हैं। वक्ता कहते हैं कि जिसे खास तौर पर सरकारी नौकरी चाहिए, उसके लिए चैनल पर भगवान सूर्यनारायण और भगवान गणपति जी की सामग्री है। और जन्म कुंडली के अनुसार, लग्नेश के अनुसार, सूर्य देव और शनि देव की स्थिति का एक बार विश्लेषण ज़रूर करवाइए; उसके अनुसार कोई प्रयोग या विधान बने, तो वह भी कीजिए, ताकि इसमें भी लाभ मिले।

108

गृहस्थों का मणिकर्णिका पर स्नान

मणिकर्णिका, चक्र पुष्करिणी और महाश्मशान की सीमा

· 57:08–57:43

वक्ता कहते हैं कि मणिकर्णिका जाने में कोई दोष नहीं — क्यों नहीं जा सकते? बिल्कुल जा सकते हैं। वहां भगवती मणिकर्णिका का मंदिर है, भगवती वहां विराजमान हैं; उनके दर्शन कीजिए, और चक्र पुष्करिणी तीर्थ में स्नान कीजिए, जो मणिकर्णिका में ही है। पर जहां अंतिम संस्कार आदि होते हैं, जो महाश्मशान का मूल श्मशान क्षेत्र है, वहां प्रवेश मत कीजिए। बिना कारण वहां नहीं जाना चाहिए — हालांकि, वे जोड़ते हैं, जो ऐसा करते हैं वे तो मसान में होली भी खेल रहे हैं।

109

बगलामुखी अनुष्ठान और संकट नाशन एक साथ

तलाक के मामले में दोनों एक साथ करना

· 57:44–57:55

एक श्रोता बताते हैं कि उन्होंने तलाक के बारे में पूछा था और उन्हें संकट नाशन बताया गया था, पर पुराने वीडियो देखकर उन्होंने मां बगलामुखी का अनुष्ठान और संकट नाशन दोनों किए हैं। वक्ता कहते हैं कि तो दोनों कीजिए, कोई समस्या नहीं; अगर दोनों साथ कर सकते हैं, तो और भी अच्छा।

एक श्रोता बताते हैं कि उन्होंने तलाक के बारे में पूछा था और उन्हें संकट नाशन बताया गया था, पर पुराने वीडियो देखकर उन्होंने माता बगलामुखी का अनुष्ठान और संकट नाशन, दोनों किए हैं। वक्ता कहते हैं: हां भैया, तो दोनों कीजिए, कोई समस्या नहीं है। अगर दोनों साथ कर सकते हैं, तो वह भी ठीक है।

110

नित्य पूजा में आसन विनियोग और पंचाक्षरी की माला

नित्य पूजा में आसन विनियोग, और पंचमुखी माला

· 57:56–58:10

पूछा गया कि रोज़ की पूजा में आसन का विनियोग हो सकता है क्या; वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल हो सकता है। पंचाक्षरी के लिए कौन सी माला लें, यह पूछने पर वे कहते हैं कि वही लेनी है — पंचाक्षरी के लिए पंचमुखी लेंगे।

पूछा गया कि रोज़ की पूजा में आसन का विनियोग किया जा सकता है क्या; वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल किया जा सकता है। पंचाक्षरी के लिए कौन सी माला लेनी है, यह पूछने पर वे कहते हैं कि वही लेनी है। पंचाक्षरी के लिए आप पंचमुखी लेंगे।

111

क्या गलत गुरु से बेहतर है कि गुरु ही न हो?

उत्तम गुरु न मिले तो चलेगा, गलत गुरु नहीं

· 58:11–58:52 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें दत्तात्रेय के बारे में और एक-एक साधना कदम-दर-कदम करने के बारे में बताया गया था, जिसमें मुख्य साधना अंत में हो; इसलिए उन्हें उत्तम गुरु और उत्तम मार्गदर्शन ज़रूर खोजना चाहिए, और वे यह कृपा मांगते हैं। वक्ता कहते हैं कि प्रयत्न ज़रूर रहेगा — पर यहां ध्यान रहे: उत्तम गुरु न मिले तो चलेगा, गलत गुरु नहीं मिलना चाहिए। उनके अनुसार अगर आप विधि से साधना कर रहे हैं तो आगे बढ़ते रहिए; हम भी प्रयत्न करेंगे कि आपको मिल जाए — पर कुछ चीज़ें देवताओं पर भी छोड़ देनी चाहिए।

112

किन परिस्थितियों में स्त्री भैरव का प्रसाद ले सकती है?

जहां भैरव अपनी शक्ति के साथ हैं, वहां स्त्री पूजन और प्रसाद दोनों कर सकती है

· 58:53–59:37 · Also a question

पूछा गया कि किन परिस्थितियों में स्त्री भैरव का प्रसाद ले सकती है; प्रश्नकर्ता यह भी कहते हैं कि काशी के मंदिर में भी नहीं लेना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है। देखा जाए तो काशी क्षेत्र के अलावा दूसरे क्षेत्रों में, या जहां वहां के साधक और पुजारी कहें कि स्त्री नहीं ले सकती, वहां नहीं लेना चाहिए। बाकी घर में भैरव जी का, बटुक भैरव जी आदि का पूजन होता है, वह ले सकती हैं; और जिन मंदिरों में सबको प्रसाद दिया जाता है, वहां सब ले सकते हैं। जहां भगवान भैरव जी अपनी शक्ति के साथ साक्षात विराजमान हैं, जहां भैरवी उपस्थित हैं, वहां स्त्री पूजन और प्रसाद दोनों कर सकती है — जैसे विंध्य क्षेत्र में, जहां भगवान बटुक भैरव जी भगवती भैरवी के साथ विराजमान हैं; वहां सेवा-पूजा भी कर सकती हैं और प्रसाद भी ले सकती हैं।

113

दीपदान का प्रचार करने का पुण्य

दूसरों को बताने से बढ़ता पुण्य, तंत्र के विषय से अलग

· 1:01:56–1:03:18

वक्ता कहते हैं कि दीपदान ज़रूर कीजिए और दूसरों से भी करवाइए। यह विषय समझिए: भगवान के नाम का और उनके दीपदान का जितना प्रचार करेंगे, उतना पुण्य बिना कारण आपके पास आएगा। अकेले दीपदान करना और किसी को न बताना, चुपचाप मणिकर्णिका घाट जाकर दीपदान करके गायब हो जाना, भगवान को चोरी-छिपे अपनी पूजा देना और किसी को न बताना — यह तंत्र का विषय हो गया। पर अगर पुण्य कमाना है, तो वह साधनात्मक विषय है: पुण्य में हम सबको बताएंगे, हां, आप भी कीजिए।

114

क्या पूजन या बलि को लाइव दिखाना चाहिए?

अपने पूजन या बलि का लाइव प्रदर्शन नहीं

· 1:03:19–1:04:15 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। उन्हें याद है कि एक चंदन जी ने अपनी बलि का पूरा लाइव वीडियो Facebook पर डाल दिया था, और उन्होंने कमेंट करके कहा था कि लाइव मत कीजिए: बाद में, अगले दिन कुछ डालिए। आप लोग कितने सेकंड का वीडियो डालते हैं — दो सेकंड, तीन सेकंड, ज़्यादा से ज़्यादा दस-पंद्रह, एक छोटा सा क्लिप। कहीं दिखाने के लिए कुछ डालना है, तो उतना डालिए, और खत्म होने के बाद डालिए। तुरंत का मत डालिए कि अभी पूजा चल रही है और हम लाइव दिखा रहे हैं कि दीपदान कर रहे हैं। यह प्रदर्शन मत कीजिए। लोगों को प्रोत्साहित करना है, तो अपने पुराने वीडियो से कीजिए।

115

कुलदेवी मसानी या मसान के लिए दीपदान

कुल देवताओं को दीपदान, देवत्व पा चुके भूत-प्रेत समेत

· 1:04:16–1:04:50

पूछा गया कि भगवान दत्त के दीपदान में क्या कुलदेवी मसानी और निरक्षक देवता मसान के नाम से भी दीपदान किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि अगर आपके कुल के देवता मसान और मसानी हैं — अब कौन से मसान और मसानी हैं, यह भी है — तो भगवान दत्त के दीपदान में उनके लिए दीपदान करने से कोई समस्या नहीं होगी, अगर वे कुल में पूजित हैं। पूजित देवता के लिए यहां कोई विषय नहीं है; आप कर सकते हैं। भूत-प्रेत भी अगर कुल के देवी-देवता के रूप में पूजित हैं और देवत्व पा चुके हैं, तो कोई समस्या नहीं।

116

भैरव जी से मिले त्रिशूल की स्थापना

त्रिशूल पूजा स्थल पर, या सुरक्षा के लिए बाहर

· 1:04:51–1:05:02

एक श्रोता भैरव जी का मिला हुआ त्रिशूल अपने पूजा स्थल पर स्थापित करना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं कि कर सकते हैं। पूजा स्थल पर भी कर सकते हैं। वैसे उसकी विशेषता यह थी कि सुरक्षा की दृष्टि से वह घर के बाहर हो।

एक श्रोता कहते हैं कि वे भैरव जी का मिला हुआ त्रिशूल अपने पूजा स्थल पर स्थापित करना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं कि आप कर सकते हैं। पूजा स्थल पर भी कर सकते हैं। वैसे उसकी विशेषता यह थी कि सुरक्षा की दृष्टि से वह घर के बाहर हो।

117

इस अनुष्ठान में दत्त पादुका के साथ माँ त्रिपुर भैरवी का कवच भी जाता है।

त्रिपुर भैरवी कवच और उसे त्रिशूल पर लगाना

· 1:05:03–1:05:28

वक्ता कहते हैं कि इस अनुष्ठान में दत्त पादुका भी आपके पास जा रही है, और उसके साथ माँ त्रिपुर भैरवी का कवच भी जा रहा है। इस त्रिपुर भैरवी कवच के बारे में उन्होंने लिखा भी है। आप इसे पहन सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं। पर अगर यह कवच भैरव जी के त्रिशूल पर लगा दें, तो और भी अच्छा है। अपना बनाया त्रिशूल हो तो उस पर लगा सकते हैं। यहाँ से जो जा रहा है, उस पर लगाना चाहें तो वह भी कर सकते हैं।

118

काल भैरव, त्रिपुर भैरवी और दक्षिणामूर्ति

भैरवी, काल भैरव की सात्विक शक्ति

· 1:05:29–1:05:54

वक्ता कहते हैं कि भगवती का एक रूप काल भैरव की सात्विक शक्ति है। काल भैरव की भगवती भैरवी, स्वयं त्रिपुर भैरवी की सात्विक शक्ति हैं। और कुछ जगह सीधे कहा गया है कि काल भैरव ही दक्षिणामूर्ति शिव हैं, और दक्षिणामूर्ति शिव ही काल भैरव हैं। इसलिए अगर यह कवच काल भैरव जयंती अनुष्ठान के त्रिशूल पर, या अपने लगाए त्रिशूल पर स्थापित करें, तो यह अति उत्तम है। घर की रक्षा चार गुना बढ़ जाएगी।

119

सूतक और पातक में त्रिशूल की देखभाल

सूतक में न छूना, और बाद में शुद्धि

· 1:05:55–1:06:09

वक्ता कहते हैं कि सूतक-पातक शरीर का विषय है। इसलिए सूतक-पातक में इसे न छुएँ। वह बीत जाए, तो इन्हें गोमूत्र और गंगाजल से स्नान कराएँ, कपूर आदि का दर्शन कराएँ, और छुआएँ। वहाँ रोज़ धूप-धूना करते रहें।

वक्ता कहते हैं कि हाँ, सूतक-पातक तो शरीर का विषय है। सूतक और पातक में इसे न छुएँ। वह बीत जाए, तो इन्हें गौ मूत्र और गंगाजल से स्नान कराएँ, कपूर आदि का दर्शन कराएँ, और छुआएँ। और वहाँ रोज़ धूप-धूना करते रहें।

120

त्रिशूल पर बलि और उसका विसर्जन

त्रिशूल पर नींबू की बलि, और उसका कभी विसर्जन नहीं

· 1:06:10–1:06:30

वक्ता कहते हैं कि त्रिशूल पर नींबू आदि की बलि दें, तो अति उत्तम है। उस पर नींबू लगाकर रखना अति उत्तम है। सूतक हो गया, इसलिए इसे हटाना है, ऐसी कोई बात नहीं। त्रिशूल का विसर्जन कभी नहीं करना है, कभी भी नहीं। वह स्थायी हो गया है। जितना धूप-धूना देंगे, जितनी कपूर आरती करेंगे, जितना तिलक और श्रृंगार करेंगे, उतना अच्छा। वह जितना पुराना होगा, उसकी क्षमता उतनी बढ़ेगी।

121

आए हुए तांत्रिक द्वारा दूषित घर

दूषित चौखट और घर में बैठाई गई चीज़ें

· 1:06:31–1:07:11

वक्ता कहते हैं कि अगर कभी लगे कि वहाँ की ऊर्जा बहुत कम हो रही है, तो एक-एक करके लाइव सुनें। उनमें पूरा विधान बताया है कि चौखट पर, या जहाँ त्रिशूल लगा है, वहाँ नारियल की बलि कैसे देनी है। हो सकता है कोई तांत्रिक व्यक्ति आपके घर आया हो। उसे देखकर उसका मन खराब हो गया कि यह बड़ा ज्ञानी बन रहा है, रुको, इसे दिखाते हैं। उसने घर में कुछ कर दिया, घर को दूषित कर दिया, चौखट को दूषित कर दिया, और फिर अपनी चीज़ें वहाँ बैठा दीं। आपको तुरंत समझ आ जाएगा। अगर आप साधक हैं, तो रात भर में समझ जाएँगे कि कुछ हुआ है। आपको बेचैनी होने लगेगी।

122

गृह बंधन होते हुए भी घर का दूषित होना

जिन बाबा की कथा, और ऐसे लोगों की क्षमता

· 1:07:12–1:08:10

वक्ता कहते हैं कि पूरा विधान बताया है कि क्या करना है, अगर आपने तांत्रिक कलश से, कील से, त्रिशूल से या दूसरी सामग्री से घर का बंधन किया हो, और फिर कोई घर आकर ऐसा कर दे। उसकी पूरी ऊर्जा नहीं चलेगी। फिर भी, क्योंकि उसने चीज़ें सिद्ध करके रखी हैं और वह घर के अंदर घुस गया है, वह कर ही सकता है। ऐसी क्षमता होती है। वे वह उदाहरण देते हैं जो कई बार दिया है, कि एक जिन बाबा आए थे। जहाँ ये लोग थे, वहाँ उनका जिन घुस ही नहीं रहा था। बहुत प्रयत्न हुआ, पता बताया जा रहा था, कि इस पते में। तब ये नए थे, सोचा यह कर क्या रहा है? पता नहीं था कि जिन वाले लोग ऐसा करते हैं।

123

विशेष प्रसंग: घर में बैठाए गए जिन्न को हटाना

गुरु स्थान का धोया वस्त्र, उसका पानी उस जगह डाला गया

· 1:08:11–1:08:33

वक्ता कहते हैं कि यह भी बताया है। गुरु जी का स्थान, जो भगवान दत्त का मूल स्थान है, वहाँ इनका पूजा स्थान था। वहाँ जो वस्त्र था, उसे इनकी माँ ने धोया, और उसी वस्त्र का पानी उस जगह डाल दिया, जहाँ उस आदमी ने जिन बैठाया था और कहा था कि इसी जगह रहो और मुझे खबर दो। जैसे ही पानी डाला गया, पाँच मिनट के अंदर उधर से खबर आई, अरे भाई, क्या कर दिया? कुछ किया क्या? वहाँ कुछ कर रहे थे क्या?

124

दूषित साधना स्थल की शुद्धि

सफ़ाई, गोमूत्र और गंगाजल, कचरा जलाना, क्षेत्रपाल और नारियल की बलि

· 1:08:34–1:09:02

वक्ता कहते हैं कि कोई आपका साधना स्थल कितना भी खराब कर दे, जैसे ही समझ आए, सबसे पहले पूरे घर की अच्छे से सफ़ाई करें। गोमूत्र और गंगाजल छिड़कें। सफ़ाई और झाड़ू से जो कूड़ा-कचरा निकले, उसे घर के बाहर जला दें। क्षेत्रपाल निवारी करें, बलि आदि दें। घर में पानी वाला एक नारियल लें, उस पर कपूर जलाएँ, भैरव जी के नाम से पूरे घर में घुमाएँ, और घर के बाहर उसकी बलि दे दें। यह सब करेंगे, तो धूप-धूना से घर तुरंत फिर ऊर्जावान हो जाएगा। और ज़्यादा परेशानी हो, तो अपामार्ग की लकड़ी पर धूनी करें। जो भी चीज़ हो, वह तुरंत हट जाएगी, उसने कितना भी बैठाया हो।

125

काशी में कितनी चंडिकाएँ हैं?

काशी की रक्षा के लिए नौ सौ करोड़ चंडिकाएँ

· 1:09:03–1:09:28 · Also a question

वक्ता सुधारते हैं कि पाँच सौ या नौ सौ चंडिका देवियाँ नहीं हैं। नौ सौ करोड़ चंडिकाएँ हैं। उनके पास इनकी नामावली नहीं है। इतनी चंडिकाओं में वे बस प्रमुख चंडिकाओं के नाम जानते हैं। और उनकी प्रसन्नता के लिए, जब आप काशी क्षेत्र में सेवा-पूजा करें, तो जानें कि उनकी उपस्थिति काशी की रक्षा के लिए की गई है। वे आपकी रक्षा में भी रहेंगी, और अपने भक्तों की रक्षा भी करेंगी।

126

देवता की आंशिक रूप से अतृप्त योगिनियाँ

योगिनियों का जागृत रहना, और बलि योगिनियों द्वारा लेना

· 1:09:29–1:10:08

वक्ता कहते हैं कि भगवती का प्रमुख रूप हमेशा तृप्त रहता है, पर उनकी योगिनियाँ, महायोगिनियाँ, कहीं न कहीं एक अंश में अतृप्त रहती हैं। कारण यह है कि वे जागृत रहती हैं। अगर वे भी तृप्त हो जाएँ, तो शांत, सौम्य अवस्था में चली जाएँगी। फिर रक्षा कौन करेगा? यह ध्यान रखें। इसी कारण कहा जाता है कि जब हम यह पूजा करते हैं, तो बलि योगिनियाँ लेती हैं। यह ऐसे ही नहीं कहा जाता। इसके पीछे रहस्य है। साधना करेंगे, तो धीरे-धीरे समझ आएगा, जब रूपों के दर्शन होने लगेंगे।

127

कुंडली में दुर्घटना योग

श्रावण वाला महामृत्युंजय अनुष्ठान का वीडियो और पीडीएफ

· 1:10:09–1:10:36

वक्ता कहते हैं कि यह सीधे-सीधे नहीं कहा जा सकता। पर अगर ऐसा विषय है, तो श्रावण महीने में भगवान महामृत्युंजय के निमित्त एक वीडियो डाला गया था। वह वीडियो देखें, सुनें। उसमें महामृत्युंजय की पीडीएफ है। उसे डाउनलोड करें और वह अनुष्ठान करें। पत्नी भी पति के लिए यह कर सकती है।

128

कुंभ में मिले यंत्र के साथ यात्रा

नित्य अभिषेक के लिए यंत्र साथ ले जाना, बिना दिखावे के

· 1:10:37–1:11:11

पूछा गया कि क्या कुंभ में मिला यंत्र नित्य अभिषेक के लिए यात्रा में बैग में ले जा सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि ले जा सकते हैं। पर अभिषेक की जगह वैसी न हो, जैसा वायरल वीडियो है, जिसमें लोग चलती ट्रेन में रुद्राभिषेक कर रहे हैं और लोग कह रहे हैं कि कितना बढ़िया काम है। नहीं भाई, यह प्रदर्शन नहीं करना है। यात्रा में साथ ले जाएँ। जिस शुभ जगह पहुँचें, उस जगह को शुद्ध करें, अपनी सारी चीज़ें वहाँ रखें, और वहीं अभिषेक करें। अभिषेक के जल का विसर्जन भी सही जगह करें, नाली में नहीं।

129

भगवान दत्त के अनुष्ठान पर प्रतिबंध

कोई रोक नहीं, क्योंकि दत्त स्वयं पितृ स्वरूप हैं

· 1:11:12–1:11:36

वक्ता कहते हैं कि अपने मार्ग का फल ज़रूर मिलेगा, क्यों नहीं मिलेगा। भगवान दत्त के अनुष्ठान में रोक वाली कोई बात नहीं हो सकती। दूसरे अनुष्ठानों में ऐसी बात रहती है। भगवान दत्त स्वयं पितृ स्वरूप में हैं, और पितरों की शांति के निमित्त हैं। इसलिए उनके अनुष्ठान में ऐसा कोई विषय नहीं है।

वक्ता कहते हैं कि अपने मार्ग का फल ज़रूर मिलेगा, क्यों नहीं मिलेगा। भगवान दत्त के अनुष्ठान में रोक वाला कोई विषय नहीं हो सकता। दूसरे अनुष्ठानों में यह विषय रहता है। भगवान दत्त स्वयं पितृ स्वरूप में हैं, और पितरों की शांति के निमित्त हैं। इसलिए उनके अनुष्ठान में यह विषय नहीं है।

130

जयंती मंगला मंत्र से हवन

संभव हो तो जयंती मंगला से हवन

· 1:11:37–1:11:57

वक्ता प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि बिल्कुल, अगर जयंती मंगला से हवन करना संभव हो, तो हवन कर लें।

हवन करने के बारे में पूछने पर वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल, अगर जयंती मंगला से संभव हो, तो हवन कर लें।

131

जयंती मंगला काली जप में कन्या के स्वप्न

किसी की उपस्थिति बनना, और कवच, जिसे देवता की आँख कहा गया है

· 1:11:58–1:13:00

एक श्रोता कहते हैं कि वे रोज़ जयंती मंगला काली मंत्र का जप करते हैं और सपने में एक लड़की दिखती है। वक्ता कहते हैं, अंकित जी, अगर आप ऐसा बार-बार देख रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि आपके साथ किसी की उपस्थिति पहले से बन गई है, या बनी है। अब वह परेशानी पैदा कर रही है, ताकि आप यह सब छोड़ दें। क्या करें? साधक के लिए सबसे ज़रूरी विषय कवच है। बिना कवच के साधक, साधक नहीं है। कवच सबसे पहले आता है। इसी कारण कवच को देवता की आँख कहा गया है। आप जिस भी देवता को पूजें, कवच उनकी आँख है। तो जो मंत्र जप कर रहे हैं, वह अपनी जगह श्रेष्ठ है, उसे करें। पर कवच ज़रूर करें, और अपने इष्ट आराध्य जो भी हों, उनके कवच का पुरश्चरण करें।

132

दत्त जयंती हवन की लकड़ी और भस्म

औदुंबर और पलाश की लकड़ी, और भस्म जो भूत-प्रेत के लिए काल है

· 1:13:01–1:13:54

वक्ता कहते हैं कि यह केवल अंकित जी के लिए नहीं, सबके लिए है। जो भी इस दत्त जयंती पर हवन करें, वे संभव हो और औदुंबर की लकड़ी मिल जाए, तो औदुंबर की लकड़ी लें, और पलाश की लकड़ी लें। और उस भस्म का विसर्जन न करें। चाहे भगवान दत्त के एक सौ आठ नामों से हवन करें, या उनके एकाक्षरी मंत्र से एक सौ आठ आहुति दें, कम से कम एक सौ आठ आहुति ज़रूर दें। जो पूरी राख बने, उसे छानकर रख लें। यह भूत-प्रेत के लिए काल है, भूत-प्रेत और तंत्र-मंत्र के मामलों के लिए काल है। यह भस्म अपने पूजन स्थान पर रखें। बिना किसी मंत्र के भी, क्योंकि इसमें पहले से मंत्र है, और यह मार्गशीर्ष पूर्णिमा की बात हो रही है, इसे माथे पर लगाएँ, तो अति दिव्य, अति श्रेष्ठ है। इसे कोई भी लगा सकता है, स्त्री हो या पुरुष।

133

नींद में परेशान साधक के लिए बिस्तर पर उपाय

साफ़ बिस्तर, काले कपड़े में फिटकरी, सोलह कुल्ले, और रात्रि सूक्त

· 1:13:55–1:14:44

वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले अपना बिस्तर साफ़ रखना है। पहली बात, आपका बिस्तर शुद्ध रहे, कोई अशुद्धि न हो। दूसरी, फिटकरी लाएँ, काले कपड़े में लपेटें और सिरहाने ज़रूर रखें। रात को सोने से पहले कम से कम सोलह बार कुल्ला करें, पूरी तरह शुद्ध होकर सोएँ। उसके बाद जहाँ तक हो सके, रात्रि सूक्त का पाठ करें, फिर सोएँ। फिर भी परेशानी हो, तो चाँदी की छोटी कटोरी में कपूर के टुकड़े पर दो लौंग रखें, और अपने इष्ट आराध्य के नाम से सिरहाने के पास जलाएँ। इतना करें। रुक जाए तो ठीक। न रुके, तो आगे की बात घर की बात हो जाती है।

134

मंगलवार या रविवार को माँ की कंघी से टूटा बाल पैर के अंगूठे पर बाँधना ज़बरदस्त टोटका है।

माँ की कंघी से टूटा बाल अंगूठे पर बाँधना

· 1:14:45–1:15:10

वक्ता कहते हैं कि वैसे, अगर आपकी माँ हैं, और मंगलवार या रविवार को वे बाल बनाती हैं, तो जो बाल टूटकर निकले, उसे अपने पैर के अंगूठे पर बाँध लें। यह टोटका ही है, पर ज़बरदस्त चीज़ है। आपकी समस्या में यह रामबाण है। जो भी चीज़ हो, जब तक यह बँधा रहेगा, वह आपको फिर छू नहीं पाएगी।

वक्ता कहते हैं कि वैसे, अगर आपकी माँ हैं, और मंगलवार के दिन या रविवार के दिन वे बाल बनाती हैं, तो जो बाल टूटकर निकले, उस बाल को अपने पैर के अंगूठे पर बाँध लें। यह टोटका ही है, पर ज़बरदस्त चीज़ है। आपकी समस्या में यह रामबाण से कम नहीं। जो भी चीज़ हो, जब तक यह बँधा रहेगा, वह आपको छू नहीं पाएगी।

135

क्या बाणासुर के शिव स्तोत्र को सिद्ध करना पड़ता है?

बाणासुर के शिव स्तोत्र का केवल पाठ

· 1:15:11–1:15:20 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि नहीं, सिद्ध करने की ज़रूरत नहीं है। बाणासुर के शिव स्तोत्र का आपको केवल पाठ करना है।

वक्ता कहते हैं कि सिद्ध करने की ज़रूरत नहीं है। बाणासुर के शिव स्तोत्र का आपको पहले से केवल पाठ ही करना है।

136

पितृ दोष और घर के देवता

पितर कुल देवताओं को कभी नहीं बाँधते, पर नाराज़ हो सकते हैं

· 1:15:21–1:16:37

पूछा गया कि पितृ दोष से बँधे घर के देवताओं को कैसे मुक्त करें। वक्ता कहते हैं कि अगर पितृ दोष से पितर बँधे हैं, तो पितर देवताओं को नहीं बाँधेंगे। पितृ दोष का मामला अलग है। इस पर चैनल पर बहुत विस्तार से वीडियो और एक प्लेलिस्ट है। संक्षेप में, देवता अपने आप नहीं बँधेंगे। पितरों के साथ कोई बाहरी शक्ति मौजूद हो, तभी देवता बँधेंगे। आपके अपने पितर कितने भी नाराज़ हो जाएँ, वे आपके कुल के देवी-देवताओं को नहीं बाँधेंगे। यह ज़रूर हो सकता है कि घर में पितृ दोष हो और आपके पितर नाराज़ हों, तो उसके कारण आपके देवता भी नाराज़ हों, कि आप अपने पितरों के लिए कुछ क्यों नहीं कर रहे। पर बँधेंगे तभी, जब वहाँ कोई बाहरी शक्ति, या कोई आभिचारिक स्थिति, या कुछ न कुछ मौजूद हो। क्योंकि कुल के जो लोग अब पितर बने हैं, दो पीढ़ी के हों या चार पीढ़ी के, उनका जन्म भी उन्हीं कुल देवताओं की कृपा से हुआ। इसलिए वे उन्हें कभी नहीं बाँध सकते। पिता को कोई नहीं बाँध सकता।

137

प्रतिदिन कामाख्या कवच और 64 योगिनी नामावली

अष्टमी और चतुर्दशी को नौ लौंग, बाकी दिन दो

· 1:16:55–1:17:12

एक श्रोता कहती हैं कि वे रोज़ ग्यारह बार कामाख्या कवच और ग्यारह बार 64 योगिनी नामावली का पाठ करती हैं, और दो लौंग व कपूर जलाती हैं। वे पूछती हैं कि क्या यह सही है। वक्ता कहते हैं कि बहुत सही है। वे दो लौंग और कपूर जला रही हैं। अष्टमी तिथि और चतुर्दशी तिथि, इन दो दिनों में नौ-नौ कर दें, और बाकी दिन दो-दो रखें।

138

चंडी कवच के छोटे विकल्प

छोटे विकल्प के रूप में कुब्जिका कवच और कामाख्या कवच

· 1:17:13–1:17:20

वक्ता कहते हैं कि चंडी कवच का छोटा विकल्प कुब्जिका कवच है, और कामाख्या कवच।

चंडी कवच की जगह छोटा कवच पूछने पर वक्ता कहते हैं कि छोटा विकल्प कुब्जिका कवच है। और कामाख्या कवच।

139

दत्तात्रेय को लौंग, जायफल और कपूर का भोग

केवल लौंग, जायफल त्रिपुर भैरवी के लिए

· 1:17:21–1:17:34

वक्ता कहते हैं कि लगा सकते हैं, पर केवल लौंग दें। जायफल, जो भी जायफल हो, भगवती त्रिपुर भैरवी के निमित्त होगा। वे भगवान दत्त की गुप्त शक्ति, गुप्त योगिनी में आती हैं।

पूछा गया कि क्या भगवान दत्तात्रेय को लौंग, जायफल और कपूर का भोग लगा सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि लगा सकते हैं, पर केवल लौंग दें। जायफल, जो भी जायफल होगा, वह भगवती त्रिपुर भैरवी के निमित्त हो जाएगा। वे भगवान दत्त की गुप्त शक्ति, गुप्त योगिनी में आती हैं।

140

क्या अलग-अलग मंत्रों का जप अलग मालाओं पर करना चाहिए?

भगवती के लिए एक अलग माला, बाकी सब एक माला पर

· 1:17:35–1:18:20 · Also a question

पूछा गया कि क्या इन मंत्रों का जप अलग-अलग माला पर करें: दत्तात्रेय एकाक्षरी, बटुक भैरव साबर मंत्र, महाभैरव मंत्र, शिव पंचाक्षरी मंत्र, दुर्गा एकाक्षर बीज मंत्र। वक्ता कहते हैं कि सभी मंत्रों का जप एक साथ कर सकते हैं। केवल भगवती के निमित्त जो मंत्र है, उसके लिए अलग माला रखें, या फिर देखें कि आपके इष्ट कौन हैं। अगर भगवती की प्रमुख साधना करना चाहते हैं, तो उनके लिए केवल एक माला अलग रखें। बाकी सबका जप एक माला पर हो सकता है। और अगर बामती काली का मंत्र है, तो उसका जप इस माला पर नहीं होगा, ध्यान रखें।

141

शाबर और काट पाट मंत्रों की अलग माला

कुछ मंत्रों से तप बल बढ़ता है, कुछ से घटता है

· 1:18:21–1:19:00

वक्ता कहते हैं कि जिन मंत्रों का हम सीधा प्रयोग करते हैं, जैसे साबर, बराटी, काट-पाट के मंत्र, उनका जप उस माला पर न करें, जिस पर आप अपने तप के लिए जप करते हैं। जब आप भैरव जी का जप करेंगे, तो बटुक भैरव जी का साबर मंत्र भी कहीं न कहीं आपका तपोबल बढ़ाएगा। एकाक्षरी मंत्र, शिव पंचाक्षरी मंत्र, महाभैरव मंत्र आपका तपोबल बढ़ाएँगे। पर अगर आप काट-पाट का मंत्र भी चलाएँगे, तो आपका तप कहीं न कहीं घटने लगेगा, क्योंकि उसमें ऐसे विषय आते हैं, इसे बाँधो, उसे काटो। इसलिए उसके लिए अलग माला रखें। अगर साबरी में काट-कटान का मंत्र चला रहे हैं या सिद्ध कर रहे हैं, तो उसके लिए अलग माला रखें। उस एक माला पर हज़ार तरह के साबर, बराटी और काट के मंत्र करें, कोई दिक्कत नहीं। पर उस पर जप नहीं करेंगे, और जप वाली पर साबर नहीं करेंगे।

142

शिव तांडव स्तोत्र किन स्थितियों में पढ़ सकते हैं?

रोज़ पाठ, कोई शर्त नहीं

· 1:19:27–1:19:36 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि इसे रोज़ कर सकते हैं। वे पूछते हैं कि इसमें शर्त देखने की ज़रूरत ही क्यों है।

पूछा गया कि शिव तांडव स्तोत्र किन स्थितियों में कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि इसे रोज़ कर सकते हैं। वे पूछते हैं, इसमें शर्त क्यों देखनी है।

143

गुरुदत्त जयंती पर देव दीक्षा विधान

वह दिन जब देव दीक्षा विधान पहली बार कराया गया

· 1:19:37–1:19:44

वक्ता कहते हैं, भाई, वे शुरू से यही कह रहे हैं। देव दीक्षा विधान उसी दिन के लिए है, और उसी दिन यह पहली बार कराया गया था।

पूछा गया कि क्या गुरुदत्त जयंती पर देव दीक्षा विधान कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि वे शुरू से यही कह रहे हैं। यह उसी दिन के लिए है, और उसी दिन यह पहली बार कराया गया था।

144

साधना के समय डरावने स्वप्न

आवाहन पर मिलने वाले संकेत, और साधना दोहराना

· 1:19:45–1:20:34

एक श्रोता बताते हैं कि उन्होंने कुलदेवी के चाँदी के त्रिशूल वाली साधना की, सपने में कुत्ता दिखा, गुफा में एक काली आकृति निकली जिससे वे डर गए, और जयंती माला कालिका मंत्र शुरू किया तो नींद खुल गई। वक्ता कहते हैं कि एक बार दिखने में कोई बात नहीं। अपनी साधना बार-बार दोहराएँ, एक बार की घटना से इतना परेशान न हों। जब आप किसी का आवाहन करते हैं, तो बहुत सी बातों के लिए वे संकेत देते ही हैं। वह स्थान हो सकता है, योगिनियाँ हो सकती हैं, कोई शक्ति हो सकती है, कोई विषय हो सकता है। इसलिए एक बार में इसे छोड़ना नहीं है।

145

नामावली पाठ में लौंग के भोग का समय

हर चक्र के बाद नहीं, अंत में एक बार

· 1:20:35–1:20:51

एक श्रोता कहते हैं कि वे 32 नामावली के पाठ के बाद हर चक्र के बाद लौंग का भोग देते हैं। वक्ता पूछते हैं, हर चक्र के बाद क्यों दे रहे हैं? एक बार में दें। जब एक चक्र पूरा हो जाए और आगे कोई पाठ नहीं करना हो, तब दें। यह अंत में दिया जाता है।

एक श्रोता कहते हैं कि बत्तीस नामावली के पाठ के बाद वे हर चक्र के बाद लौंग का भोग देते हैं। वक्ता पूछते हैं, हर चक्र के बाद क्यों दे रहे हैं? भाई, एक बार में दें। जब एक चक्र पूरा हो जाए और आगे कोई पाठ नहीं करना हो, तब दें। यह अंत में दिया जाता है।

146

ज्योतिष बड़ी शांति और समय से होता है, प्रश्न-उत्तर सत्र की जल्दबाज़ी में नहीं।

ज्योतिष को शांति और समय चाहिए, जल्दबाज़ी वाला प्रश्न-उत्तर सत्र नहीं

· 1:21:01–1:21:21

वक्ता कहते हैं कि भैया, ऐसे नहीं होता। हम ऐसी बातें इस तरह नहीं बता सकते। इसके लिए बड़ी शांति से, अच्छे से देखकर होता है। यह जल्दबाज़ी का विषय नहीं है। ऐसे प्रश्न-उत्तर सत्र में, इतनी जल्दी में यह नहीं होगा। एक श्रोता मिथुन लग्न बताते हैं — बारहवें में सूर्य, शुक्र और बुध साथ, दूसरे भाव में शनि, वक्री गुरु और केतु। उनसे भी वे यही दोहराते हैं: ऐसे नहीं होता।

147

सवारी लेने वाले कुपित पितृ के लिए क्या करना चाहिए?

नारायण बलि, पंचबलि और तीन महीने गीता पाठ

· 1:21:22–1:22:40 · Also a question

एक श्रोता बताते हैं कि उनके एक पितृ बहुत कुपित हैं। पूर्वजों ने उन्हें मार-पीटकर भगा दिया था। जब गाँव में किसी पर उनकी सवारी आती है, तो वे बहुत रोते हैं। अब घर का कोई देवता नहीं आता। वक्ता कहते हैं कि उनके निमित्त प्रबंध करना चाहिए। सबसे पहले उन्हें मनाने का प्रयत्न करें। अगर उनका नाम आदि पता है, तो उनके लिए नारायण बलि करवाएँ। नारायण बलि के साथ, पहले कम से कम तीन महीने रोज़ पंचबलि हो और उनके नाम से संकल्प करके श्रीमद् भगवद् गीता का पाठ हो। इसके बाद उन्हें पिशाच मोचन तीर्थ, काशी के विमल तीर्थ ले जाएँ। जिन पर सवारी आती है, वे भी साथ जाएँ तो सबसे अच्छा। साथ जाकर वहाँ नारायण बलि करवाएँ, फिर श्रीमद् भागवत का एक मूल पाठ करवाएँ। इतना करने से उनकी शांति और तृप्ति अवश्य होगी, उनकी गति होनी चाहिए। फिर भी न हो, तो पूरे एक वर्ष बाद आगे की प्रक्रिया हो।

148

कर्मकांड हो जाने के बाद भी पितृ के लिए गीता के सातवें, नौवें या ग्यारहवें अध्याय का रोज़ पाठ चलता रहे।

पितृ को समर्पित गीता का रोज़ एक अध्याय

· 1:22:41–1:22:59

वक्ता कहते हैं कि जब ये सब कर्मकांड करवा लें, उसके बाद भी उनके निमित्त रोज़ पाठ होता रहे — श्रीमद् भगवद् गीता का सातवाँ, ग्यारहवाँ या नौवाँ अध्याय, कोई एक अध्याय, हिंदी में ही। या कोई ब्राह्मण शालिग्राम जी की पूजा करते हों, और वे उनके निमित्त संकल्प करके पाठ करें और अर्पित करें, तो यह अति उत्तम है। ये जितने पुराने होंगे, उतना उत्पात मचाएँगे, उतनी दिक्कत करेंगे। स्वतंत्र रूप से करना चाहें, तो चौथा अध्याय करें, या जहाँ तक स्तुति है, ग्यारहवाँ अध्याय करें।

149

मंत्र बल और चंद्र ग्रह

मंत्र, मन और चंद्रमा — एक अलग विषय

· 1:23:00–1:23:10

वक्ता उत्तर देते हैं कि भैया, इसके लिए एक पूरा अलग वीडियो है — मंत्र, मन और चंद्रमा आपस में कैसे जुड़े हैं।

मंत्र बल और चंद्र ग्रह का संबंध समझाने को कहा गया। वक्ता कहते हैं कि इसके लिए एक पूरा अलग वीडियो है। उसमें बताया है कि मंत्र, मन और चंद्रमा आपस में कैसे जुड़े हैं।

150

दत्त कवच के साथ दूसरा कवच पहनना

दाहिनी भुजा पर चौंसठ योगिनी या भैरवी कवच

· 1:23:11–1:23:22

एक श्रोता ने भगवान दत्त का कवच पहना है। वे पूछते हैं कि क्या दाहिनी भुजा पर चौंसठ योगिनी माता या भैरवी माता का कवच पहन सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि भुजा पर, दाहिनी भुजा पर पहन सकते हैं। हाँ, बिल्कुल, कोई दिक्कत नहीं।

एक श्रोता ने भगवान दत्त का कवच पहना है। वे पूछते हैं कि क्या दाहिनी भुजा पर चौंसठ योगिनी माता या भैरवी माता का कवच भी पहनें। वक्ता उत्तर देते हैं कि भुजा पर, दाहिनी भुजा पर पहन सकते हैं। हाँ भैया, बिल्कुल पहन सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं।

151

शुरुआत करने वाले को कितनी मालाएँ रखनी चाहिए?

छोटी शुरुआत, जप ज़्यादा और सामग्री कम, और तीन अवस्थाएँ

· 1:23:23–1:24:15 · Also a question

पूछा गया कि क्या बटुक भैरव शाबर मंत्र पर देव दीक्षा मंत्र कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि कर सकते हैं। जब आप बड़े स्तर पर विशेष साधना शुरू करें, तब इन बातों पर ज़्यादा ध्यान देना होता है। शुरुआत में माला बदलने में ज़्यादा न पड़ें, ज़्यादा मालाएँ न रखें। वे कहते हैं कि कुछ लोग बहुत बड़े स्तर पर करना चाहते हैं। हमेशा कम से शुरू करें: जप ज़्यादा हो, सामग्री कम। बीच की अवस्था वह है जो बढ़ती है। शुरुआत में व्यक्ति कम करता है, बीच में ज़्यादा करता है। और जब पूर्णता मिलती है, जब सब समझ आ जाता है, जब देवता कृपा करते हैं — तब सब कुछ न्यूनतम हो जाता है। वे कहते हैं कि शायद बहुत कम लोग यह समझेंगे, पर जो थोड़ा उस स्तर तक पहुँचते हैं, वे समझेंगे।

152

भगवती की केवल चौंसठ योगिनियाँ करना

केवल चौंसठ योगिनियों का करना

· 1:24:16–1:24:29

वक्ता कहते हैं कि भगवती की केवल चौंसठ योगिनियों का करें, कोई दिक्कत नहीं। वे बताते हैं कि वे किसी को अनदेखा नहीं कर रहे। प्रश्न इतने हैं कि छूटते जाते हैं, और वे सबके प्रश्न ले भी नहीं रहे। इसमें किसी दोष की बात नहीं है।

वक्ता उत्तर देते हैं कि भगवती की केवल चौंसठ योगिनियों का करें, इसमें कोई दिक्कत नहीं। वे कहते हैं कि वे किसी को अनदेखा नहीं कर रहे। प्रश्न इतने हैं कि छूटते जाते हैं, और वे सबके प्रश्न ले भी नहीं रहे। इसमें किसी दोष की बात नहीं है।

153

रक्षा के अलावा अन्य उद्देश्य के लिए कवच

फलश्रुति और कामना के लिए अलग संकल्प

· 1:24:30–1:24:51

पूछा गया कि रक्षा के अलावा किसी और भौतिक कामना के लिए कोई कवच कैसे करें। वक्ता कहते हैं कि फलश्रुति में लिखा है कि सब कामनाएँ भी पूरी होंगी। उस कामना का संकल्प कर लें। हाथ में लौंग लेकर — देखिए, कवच केवल रक्षा के लिए नहीं है, वह हर चीज़ के लिए है। यह फलश्रुति में ही दिया है। तो आप वह संकल्प अलग से भी कर सकते हैं।

154

गणपति अथर्वशीर्ष पाठ का स्वप्न

ऐसी बातें सबके सामने नहीं बताई जातीं

· 1:24:52–1:25:12

एक श्रोता बताते हैं कि उन्हें कई बार स्वप्न में गणपति के दर्शन होते हैं। वे खुद को गणपति अथर्वशीर्ष पढ़ते देखते हैं। वे पूछते हैं कि क्या यह अच्छा है, कोई संकेत है क्या। वक्ता कहते हैं कि भैया, अच्छा तो है ही। पर यह बताने का विषय नहीं है। ये सब बातें सबके सामने नहीं बताई जातीं — कमेंट डिलीट कर दीजिए। सबने सुन तो लिया ही होगा, पर ये बातें बताई नहीं जातीं।

155

तीन भागों में खुलने वाला त्रिशूल

त्रिशूल को एक बार फिक्स करें, बार-बार न खोलें

· 1:25:20–1:25:47

एक श्रोता एक बड़े त्रिशूल को भैरव बाबा मानकर पूजती हैं। वह त्रिशूल तीन हिस्सों में खुलता है। वे पूछती हैं कि क्या उसे पूजन में रखें या नया त्रिशूल स्थापित करें। वक्ता कहते हैं कि ऐसा कोई विषय नहीं है, बस उसे खोलिए मत। एक बार में सब अच्छे से फिक्स कर दीजिए और फिक्स रखिए। उस पर कपड़ा लपेटिए, अच्छे से बाँधिए, सुगंधित करके रखिए, ताकि बार-बार खोलना न पड़े। साल में एक-दो बार कभी खोलिए, सफ़ाई कीजिए, जो करना हो कीजिए, और फिर वापस रख दीजिए।

156

विशेष प्रसंग: पुत्र को दौरे और मारण प्रयोग की शंका

कुंडली में राहु और बृहस्पति, और बड़े भाई की कुंडली में केतु का योग

· 1:25:48–1:27:16

एक श्रोता के बेटे को झटके की बीमारी हो गई है। वे पूछते हैं कि क्या यह आकस्मिक मारण है, और मार्गदर्शन चाहते हैं। वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले, अगर उसकी जन्म कुंडली है, तो उसका विश्लेषण करवाएँ — वहाँ राहु की क्या बात है, खासकर बृहस्पति देव की दशा-अंतर्दशा आ रही है क्या, राहु की दशा-अंतर्दशा आ रही है या बीत चुकी है, और उनकी स्थिति क्या है। और अगर बेटे का कोई बड़ा भाई है — वे ज़ोर देकर कहते हैं कि यह उनके अपने अनुभव की बात है, जो उन्होंने अभी तक कहीं लिखा नहीं देखा — अगर बड़े भाई की जन्म कुंडली में ग्यारहवें भाव में केतु हो, और चंद्र-केतु का ग्रहण योग बन रहा हो, तो संभावना बनती है कि छोटे भाई को जीवन में कभी कुछ समय ऐसी स्थिति हो। खासकर तब, जब बृहस्पति देव के साथ राहु या केतु की दशा-अंतर्दशा आने वाली हो।

157

ज्योतिष उपायों के साथ चिकित्सा उपचार

विश्लेषण, शांति, और जल्दी डॉक्टरी इलाज

· 1:27:17–1:27:34

वक्ता कहते हैं कि इस पूरे विषय को एक बार देखिए। अगर पास में ज्योतिष के कोई अच्छे जानकार हों, तो उनसे विश्लेषण करवाइए, फिर उससे जुड़ी शांति आदि करवाइए। अगर अभी शुरुआत ही है, तो तुरंत ठीक हो जाएगा। अगर बीमारी पुरानी हो जाए, तो झटके की समस्या कठिन हो जाती है। देखिए कि दाँत न भिंचें, जीभ न कटे। अगर यह सब हो रहा है, तो डॉक्टरी इलाज भी अच्छे से करवाइए।

158

परिवार को नष्ट करने की धमकी देने वाला पितर

जन्मों तक चलने वाला मोह, और कर्म चक्र

· 1:27:35–1:28:31

एक श्रोता बताते हैं कि जब सवारी आती है, तो कहती है कि तुम सबको बर्बाद कर देंगे। वक्ता कहते हैं कि भैया, इसे ऐसे समझिए — अगर जीवित अवस्था में किसी को कष्ट दिया गया हो, तो ऐसा होता है। आप सबने सुना होगा कि पिता ही पुत्र के रूप में जन्म लेता है। यह सत्य है। अगर हमने दस करोड़ रुपये कमाए, खर्च नहीं किए, और उस धन में मेरा मोह रह गया — पहले सोना-चाँदी होता था — कि हमारे पास इतना धन है और खर्च नहीं किया, तो उसका मोह खत्म नहीं हुआ। तब हम तीसरी-चौथी पीढ़ी में फिर जन्म लेंगे और जो धन बचा है, उसे उड़ाकर खत्म कर देंगे। यही कर्म चक्र है। इसीलिए कहा गया है कि अंत समय में विरक्त हो जाना चाहिए।

159

अशांत आत्मा की अंतिम शांति

सूक्ष्म शरीर में देवत्व, और त्रिकाल संध्या करने वाले ब्राह्मण

· 1:28:32–1:29:20

वक्ता कहते हैं कि जिस व्यक्ति को उस तरह मारा-सताया गया, वह या तो जन्म लेकर वह प्रारब्ध पूरा करेगा, या अगर उसकी गति नहीं हुई और मृत्यु उस तरह हुई, तो अब भूत-प्रेत के रूप में हिसाब चुकाएगा। वह व्यक्ति अटका हुआ है, ऐसे ही नहीं मानेगा। आपको देवताओं के प्रति थोड़ा अपना समर्पण दिखाना होगा। जब आपके सूक्ष्म शरीर में वह सामर्थ्य आएगा, तो वह व्यक्ति अपने आप शांत होगा, वह आत्मा अपने आप शांत होगी। देवत्व आना चाहिए। इसीलिए कहा जाता है कि ऐसा काम किसी साधक से, या त्रिकाल संध्या करने वाले ब्राह्मण से करवाएँ। जो त्रिकाल संध्या करता है, जिसने अनुष्ठान, जप, हवन किया है, जो अग्निहोत्री है, रोज़ हवन करता है, किसी महाविद्या का साधक है — उसके शरीर के आभामंडल में, उसके सूक्ष्म शरीर में उन शक्तियों की उपस्थिति रहती है। इसी कारण ये कहीं न कहीं शांत होते हैं और फिर बात मान लेते हैं।

160

देव वीरों को नए स्थान पर स्थापित करना

पूर्णिमा को स्थापना, चैनल पर बताई विधि से

· 1:29:34–1:29:51

एक श्रोता बताते हैं कि बीस दिन अस्पताल में रहने से वे पूजा-पाठ नहीं कर पाए। वे पूछते हैं कि अब अपने देवता और वीरों को दूसरी जगह कैसे स्थापित करें। वक्ता कहते हैं कि पूर्णिमा के दिन स्थापित कर लीजिए। देव-वीरों को दूसरी जगह कैसे ले जाते हैं, इस पर एक पूरा वीडियो है — उनकी विदाई कैसे करते हैं, नई जगह कैसे ले जाते हैं।

161

क्या पूजा के समय महाकाली सहस्रनाम सुनने से कोई हानि है?

माँ का नाम सुनने में कोई हानि नहीं

· 1:29:52–1:30:05 · Also a question

एक श्रोता सुबह-शाम पूजा के समय महाकाली सहस्रनाम सुनते हैं। वे पूछते हैं कि क्या इससे कोई हानि होगी। वक्ता कहते हैं कि नहीं, सुनने से क्यों हानि होगी? माँ का नाम सुनने में कोई हानि नहीं है।

एक श्रोता पूछते हैं कि सुबह-शाम पूजा के समय महाकाली सहस्रनाम सुनने से क्या कोई हानि होगी। वक्ता उत्तर देते हैं कि नहीं भैया, सुनने से क्यों कोई हानि होगी? माँ का नाम सुनने में क्या हानि है; ऐसा कुछ नहीं है।

162

पितरों के लिए कुरुक्षेत्र की महिमा

कुरुक्षेत्र में तर्पण और पिंडदान

· 1:30:06–1:30:23

वक्ता कहते हैं कि कुरुक्षेत्र की महिमा अनंत है। वहाँ की सबसे बड़ी महिमा यह है कि अगर वहाँ अपने पितरों के निमित्त तर्पण करें, या पिंडदान करें, तो उन्हें अवश्य स्वर्ग मिलता है। वहाँ भगवान का ऐसा वरदान है।

वक्ता कहते हैं कि भैया, कुरुक्षेत्र की महिमा अनंत है। वहाँ की सबसे बड़ी महिमा यह है कि अगर आप वहाँ अपने पितरों के निमित्त तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। करें, या पिंड दान करें, तो उन्हें अवश्य स्वर्ग मिलता है। वहाँ भगवान का ऐसा वरदान है।

163

क्या दिवंगत परिजन की फोटो घर में रखकर पूजी जा सकती है?

फोटो रखें, पर उनकी पूजा की जगह गीता पाठ अर्पित करें

· 1:30:24–1:31:09 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह अपनी भावना की बात है। अगर आपकी भावना उनसे जुड़ी है, तो रख सकते हैं। उनके विचार में पूजन एक सीमा में हो — जिससे प्रेम है, पिता, माता, दादा, नाना, उनकी फोटो रखें। पूजा-पाठ की बात करें, तो उनकी उस तरह पूजा करने की जगह भगवान का, गीता आदि का पाठ करें और उनके निमित्त अर्पित करें। यही सबसे उत्तम पूजा है। नहीं तो, अगर आप उनकी पूजा करेंगे, तो उनकी आत्मा बँध जाएगी, फिर गति नहीं लेगी, और मोह में फँस जाएगी।

164

स्त्री द्वारा साँप का फन काटने का स्वप्न

किसी देवी शक्ति ने संकट टाल दिया

· 1:31:10–1:31:43

एक श्रोता बताते हैं कि स्वप्न में एक साँप फन उठाए उनकी ओर आ रहा था। अचानक एक सुंदर सुहागिन स्त्री ने उस साँप का फन काट दिया। स्वप्न में वे सोच रहे थे कि उसने यह क्या किया। वक्ता कहते हैं कि इसका सीधा निष्कर्ष यह है कि सर्प का अर्थ है — कोई कष्ट, कोई दुख आपकी ओर आ रहा था, और किसी देवी शक्ति ने उसे खत्म कर दिया। तो उस देवी शक्ति के प्रति कृतज्ञ रहें। आपके जो भी इष्ट-आराध्य हैं, उन्हें धन्यवाद दें।

165

हिंदी या संस्कृत में गीता पाठ और पितर की फोटो की दिशा

फोटो दक्षिण में, मुख उत्तर की ओर, और हिंदी से संस्कृत की ओर बढ़ना

· 1:32:01–1:32:45

पहली बात पर वक्ता कहते हैं कि अगर फोटो रखें, तो वे दक्षिण दिशा में हों और उनका मुख उत्तर की ओर हो, ताकि उन्हें प्रणाम करते समय आपका मुख दक्षिण की ओर हो। फल की बात करें, तो जब आप हिंदी में पाठ करेंगे, तो भाव से समर्पित रहेंगे और विषय समझेंगे, इसलिए फल अवश्य मिलेगा। और जब दो, चार, छह महीने हिंदी में पाठ कर लें, तो धीरे-धीरे संस्कृत में शुरू करें। तब आपका भाव भी बना रहेगा, संस्कृत में पढ़ने का आनंद अलग होगा, और देववाणी होने से उसका फल कई गुना बढ़ जाता है।

166

सहस्रनाम कितने पाठ से सिद्ध होता है?

एक हज़ार पाठ, या 1008 अति उत्तम

· 1:32:46–1:33:02 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर सहस्रनाम सिद्ध करना है, तो कितना पुरश्चरण होगा — तो एक हज़ार बार होगा। अगर 1008 बार पाठ करें, तो अति उत्तम हो जाता है। वे कहते हैं कि सामान्य रूप से चार सौ ही होता है, पर आप एक हज़ार भी निकाल सकते हैं।

वक्ता कहते हैं कि अगर सहस्रनाम सिद्ध करना है, तो कितना पुरश्चरण होगा — तो एक हज़ार बार ही होगा। अगर 1008 बार पाठ करें, तो अति उत्तम हो जाएगा। वे कहते हैं कि वैसे चार सौ ही होता है, पर आप एक हज़ार भी निकाल सकते हैं।

167

चौखट से पूर्णिमा पूजन का आरंभ

नारियल की बलि, चौखट पूजन और भैरव जी को नींबू की बलि

· 1:33:03–1:33:19

वक्ता कहते हैं कि नितेश जी, कोई अपराध नहीं लगेगा। आराम से पूर्णिमा से उनका पूजन शुरू कर दीजिए। उन्हें बलिहारी दीजिए — नारियल की बलि दीजिए, चौखट आदि का पूजन कीजिए। चौखट पूजन अवश्य हो, और भैरव जी आदि का पूजन करके नींबू की बलि, नारियल की बलि आदि अवश्य दीजिए।

वक्ता कहते हैं कि नितेश जी, कोई अपराध नहीं लगेगा। आराम से पूर्णिमा से उनका पूजन शुरू कर दीजिए। उन्हें बलिहारी दीजिए; नारियल की बलि दीजिए, चौखट आदि का पूजन कीजिए। चौखट पूजन अवश्य हो, और भैरव जी आदि का पूजन करके निंबू बलि, नारियल की बलि आदि अवश्य दीजिए।

168

विग्रह को नए घर में ले जाना

पुरानी जगह बलि, गृह देवताओं से निवेदन, और नई जगह पूजन

· 1:33:20–1:34:21

वक्ता कहते हैं कि जब भी विग्रह को नई जगह फिर से स्थापित करना हो — जैसे हम किराए के घर में रहते हैं और एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं — तो पुरानी जगह छोड़ते समय वहाँ भी बलि अवश्य करें, चाहे एक नारियल या एक नींबू ही हो। और वहाँ निवेदन अवश्य करें: प्रभु, हम अब नई जगह जा रहे हैं, आप सब साथ चलें और वहाँ फिर स्थापित हों। और इस जगह के स्थान देवी-देवताओं और गृह देवी-देवताओं के निमित्त हम अपनी शक्ति, सामर्थ्य और बुद्धि के अनुसार यह पूजन अलग से दे रहे हैं। इसमें कपूर जलाएँ, नैवेद्य आदि चढ़ाएँ, और उनसे भी प्रार्थना करें कि वे हम पर सदा कृपा रखें। और ऐसा आशीर्वाद दें कि हमारी अपनी ज़मीन हो, अपना घर हो, जिसमें हम आप सबकी पूजा करें। ऐसा निवेदन करके प्रसन्नता से आना चाहिए। नई जगह पर भी आप पूजन देंगे, बलि देंगे, और वहाँ के नए गृह देवताओं, नए स्थान देवताओं के लिए अलग से संक्षिप्त, सरल, छोटा पूजन और बलि दें। वे कहते हैं कि इससे बड़ा कल्याण होता है। चीज़ें छोटी हैं, पर इनका प्रभाव आपको जीवन भर मिलेगा।

169

छोटे जंगल के पास नई साधना स्थली में हनुमान झंडे के पास एक पत्थर था, और स्वप्न में एक देवी उसे उखाड़ती दिखीं।

हनुमान झंडे के पास पत्थर, और देवी द्वारा उसे उखाड़ने का स्वप्न

· 1:34:22–1:35:20

वक्ता लगभग पंद्रह-सोलह साल पहले का एक अनुभव बताते हैं। उन्हें कुछ समय के लिए एक नई जगह जाना हुआ, जहाँ साधना करनी थी — एक छोटे जंगल के पास। जो लोग वहाँ पहले रहते थे, वे जा चुके थे। छोटा घर, साधना स्थली, साफ़ किया गया। वहाँ हनुमान जी के लिए, झंडे के लिए एक जगह बनी थी — झंडा था, हनुमान जी थे, और झंडे के पास एक छोटा पत्थर रखा था। सामान्य रूप से समझा गया कि हनुमान जी के नाम से उसकी पूजा होती होगी। एक-दो दिन बीते, और यही विधान जो वे बता रहे हैं, वहाँ किया गया। उनके सब विग्रह स्थापित हुए, मंडल बना, और बस मुहूर्त की प्रतीक्षा थी — उन्हें अब भी याद है, अक्षय तृतीया का दिन था, जिससे साधना शुरू होनी थी। दो-तीन दिन पहले रात को स्वप्न आया कि एक देवी, जिनके स्वरूप के बारे में वे ज़्यादा नहीं कह सकते, उस पत्थर को उखाड़कर बाहर फेंक रही हैं।

170

किसी जगह के स्थान देवता आपके पक्ष में हों, तो वहाँ की आधी बाधाएँ वैसे ही दूर हो जाती हैं।

स्थान देवता आपके पक्ष में, और आधी बाधाएँ दूर

· 1:35:21–1:36:37

वक्ता कहते हैं कि स्वप्न देखने के बाद चर्चा होने लगी कि क्या करें। वहाँ और लोग भी थे, जो पास में अपनी कुटिया में रहकर साधना करते थे। उनमें से एक ने सुनकर कहा कि उस आदमी से पूछो — यह मुसलमानी चीज़ है, वह वहाँ मुसलमानी साधना करता था। पूछा गया कि कैसे पता, तो उसने कहा कि उसके बैठने के ढंग से समझ आता था कि सनातन संस्कृति में ऐसा नहीं होता। वह चीज़ घिरी हुई थी और कोई देखता नहीं था, पर आते-जाते नज़र पड़ गई थी। वह उसके सामने बैठकर उल्टे हाथ से जप करता था। उससे कहा गया कि इसे खोदकर ले जाओ, और उस आदमी ने बिना कोई जवाब दिए उसे उठाया और ले गया। वक्ता इससे बस यही संदेश देना चाहते हैं: अगर किसी जगह के देवी-देवता आपके पक्ष में आ जाएँ, तो आप वैसे ही पचास प्रतिशत बाधाओं से मुक्त हो गए। वे उस नई जगह कोई बाधा नहीं आने देंगे। इसलिए जब नई जगह जाएँ, तो स्थानीय देवी-देवताओं का पूजन दें।

171

मार्गशीर्ष पूर्णिमा — दत्त, त्रिपुर भैरवी और अन्नपूर्णा की जयंती — पर घर में दीपदान करें, और बचा हुआ देव दीक्षा विधान पूरा करें।

घर में दीपदान और बचा हुआ देव दीक्षा विधान

· 1:36:48–1:37:16

अंत में वक्ता कहते हैं कि परसों मार्गशीर्ष पूर्णिमा है — भगवान दत्त, भगवती त्रिपुर भैरवी और भगवती अन्नपूर्णा की जयंती। आप सब अपने घरों में दीपदान अवश्य करें। जिनका देव दीक्षा विधान बाकी है, वे उसे पूरा करें। और जिन्हें साधना आदि के लिए अपना विवरण देना है — पूरा विषय विस्तार से लिखकर टेलीग्राम पर डाला है, और इस वीडियो के विवरण में भी दिया है, उसे पढ़ें। और वेबसाइट पर अपना विवरण दें। अनुष्ठान आदि पूरा होगा, और उसके बाद सामग्री आप तक पहुँचेगी।

172

रोज़ की पूजा में कितने दीपक रखने चाहिए?

नित्य पूजा में कम से कम दो दीपक

· 1:37:29–1:37:38 · Also a question

पूछा गया कि नित्य पूजा में कितने दीपक रखें। वक्ता कहते हैं: भैया, कम से कम दो दीपक रखें।

पूछा गया कि रोज़ की पूजा में कितने दीपक रखें। वक्ता उत्तर देते हैं कि कम से कम दो दीपक अवश्य रखें।

173

क्या मृत्यु के ग्यारह साल बाद भी पिंडदान हो सकता है?

बहुत समय बाद भी तीर्थ क्षेत्र में पिंडदान

· 1:37:39–1:38:08 · Also a question

एक श्रोता बताते हैं कि उनके पिता ग्यारह साल पहले गुज़र गए और पिंडदान नहीं हुआ। वक्ता कहते हैं कि भैया, बिल्कुल हो सकता है — किसी तीर्थ क्षेत्र में करवाइए। तीर्थ क्षेत्र जाकर वहाँ करवाइए।

एक श्रोता लिखते हैं कि उनके पिता ग्यारह साल पहले गुज़र गए और पिंडदान हुआ ही नहीं। वक्ता उत्तर देते हैं कि भैया, बिल्कुल हो सकता है। किसी तीर्थ क्षेत्र में करवाइए। तीर्थ क्षेत्र जाकर वहाँ करवाइए।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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