कार्तिक दीप दान और धूप-दीप रक्षा प्रयोग — किए हुए अनुष्ठान को घर की रक्षा में बदलना

दीप दान और रक्षा प्रयोग पर कार्तिक मास का लाइव।

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01

तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए कार्तिक की कौन-सी रातें मायने रखती हैं?

पाँच दिन की महारात्रि, जिन्हें अति उग्र रात्रियाँ कहते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:33–01:50 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए पाँच दिन की महारात्रि कार्तिक में आती है। इन्हें अति उग्र रात्रियों के नाम से जाना जाता है। दीवाली का पर्व भी इन्हीं में है। इन सबकी तैयारी अभी से शुरू करनी है।

वक्ता कहते हैं कि तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए पाँच दिन की महारात्रि होगी। इन्हें अति उग्र रात्रियों के नाम से जाना जाता है, यानी बहुत उग्र रातें। दीपावली का पर्व भी इन्हीं में आता है, इसी कार्तिक महीने में। इसलिए इन सब चीज़ों की तैयारी अभी से शुरू कर देनी है।

02

कार्तिक की तैयारी के साथ, घर में जो उत्पात पहले से है, उस पर नियंत्रण भी शुरू करना चाहिए।

घर में मौजूद उत्पात पर नियंत्रण करना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:51–02:16

वक्ता कहते हैं कि तैयारी के साथ एक काम और करना है। अपने घर में समस्या से जुड़ा जो भी उत्पात है, उस पर नियंत्रण शुरू करना है। यह बात वे नए लोगों से नहीं कहते। यह उनके लिए है जो कम से कम चैत्र नवरात्रि से चैनल के साथ हैं और खुद अनुष्ठान कर रहे हैं।

03

काशी, विंध्य, प्रयाग और कामाख्या क्षेत्रों का प्रसाद और भस्म, सँभालकर रखा हो तो, श्रोता के अपने अनुष्ठानों के साथ काम आ सकता है।

अपने अनुष्ठान, और क्षेत्रों से मिला प्रसाद और भस्म

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:17–02:54

वक्ता कहते हैं कि काशी क्षेत्र, विंध्य क्षेत्र, प्रयाग क्षेत्र और कामाख्या क्षेत्र में यहाँ से जो होता है, वह बोनस है। उससे मिला प्रसाद और भस्म अगर सँभालकर रखा है, तो श्रोता के अपने अनुष्ठानों के साथ उसका उपयोग हो सकता है। आज वे ऐसे सरल प्रयोग बताएँगे जो कोई भी कर सके, श्रोता मौजूद हो या न हो।

04

प्रयोग की ताकत इस पर निर्भर है कि मंत्र का जप कितने समय से हुआ और नियम कितना दृढ़ रहा, पर जो लंबे समय से अपने आराध्य को समर्पित है, उसे एक अनुष्ठान से भी बहुत मिलता है।

साधना का समय, नियम और दृढ़ता, पर एक अनुष्ठान भी काफ़ी हो सकता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:55–03:29

वक्ता कहते हैं कि कुछ हद तक नियंत्रण ज़रूर शुरू होगा। कितना होगा, यह इस पर निर्भर है कि आप कितने समय से मंत्र की साधना और जप कर रहे हैं। जितना ज़्यादा समय, जितना नियम-संयम, जितनी दृढ़ता, उतना ज़्यादा असर। पर वे यह भी कहते हैं कि बहुत लंबा समय ज़रूरी नहीं। जिसका मन लंबे समय से अपने आराध्य को समर्पित है, उसे एक अनुष्ठान से भी बहुत सामर्थ्य मिलता है।

05

पूरे कार्तिक महीने दीपदान की अपील इस साल फिर है, जो अनुष्ठानों की व्यस्तता के कारण देर से की गई।

पिछले साल की दीपदान अपील फिर से

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:30–03:52

वक्ता कहते हैं कि पिछले साल कार्तिक महीने में दीपदान का विशेष निवेदन रखा गया था, और इस साल भी वही है। वे देर से बताने के लिए माफ़ी माँगते हैं। अब ज़्यादा समय नहीं बचा। यह पहले बताना चाहिए था, पर अनुष्ठानों की व्यस्तता के कारण नहीं बता पाए।

वक्ता कहते हैं कि एक खास काम वे चाहते थे कि सब इस कार्तिक महीने से करें, और उसके लिए अब ज़्यादा समय नहीं बचा। वे कहते हैं कि यह पहले बताना चाहिए था, पर अनुष्ठानों आदि की व्यस्तता के कारण नहीं बता पाए। पिछले साल कार्तिक महीने में सबके सामने दीपदान का विशेष निवेदन रखा गया था। इस साल भी वही है।

06

दीपदान शरद पूर्णिमा से शुरू होकर रोज़ होता है, केवल दीवाली पर नहीं, और हर शाम घर में कम से कम पाँच दीपक जलें।

शरद पूर्णिमा से रोज़ दीपदान, शाम को कम से कम पाँच दीपक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:53–04:10

वक्ता कहते हैं कि दीपदान प्रतिपदा से शुरू करना है, पर वे तो शरद पूर्णिमा से ही शुरू करवाना चाहेंगे। यह रोज़ करना है, केवल दीवाली पर नहीं। शाम को घर में कम से कम पाँच दीपक ज़रूर जलने चाहिए।

दीपदान प्रतिपदा से शुरू करना है। पर वक्ता कहते हैं कि वे तो शरद पूर्णिमा से ही शुरू करवाएँगे। यह रोज़ करना है, केवल दीवाली पर नहीं। रोज़ दीपदान करें। दीपदान में शाम को घर में कम से कम पाँच दीपक ज़रूर जलाने चाहिए।

07

आकाश दीप क्या है और उससे क्या होता है?

दस-बारह फ़ुट के बाँस पर जलती लालटेन, पितरों की सद्गति के लिए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:11–04:36 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आकाश दीप का मतलब उड़ने वाली लालटेन नहीं है। इसका मतलब है घर के आँगन में कम से कम दस-बारह फ़ुट का बाँस या कोई पेड़, जिसके ऊपर लालटेन जले। उनके अनुसार इससे पितरों की सद्गति होती है और उनकी बहुत विशेष कृपा मिलती है। कार्तिक में इसका माहात्म्य दिव्य है।

08

आकाश दीप कहाँ से लें?

ऑनलाइन खरीदें या पास के बाँस का काम करने वाले से बनवाएँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:37–05:17 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अमेज़न पर कई आकाश दीप मिलते हैं और ग्रुप में कुछ लिंक दिए जाएँगे। पर अगर पास में बाँस का काम करने वाले रहते हैं, तो वे बना देंगे और यह बहुत सस्ता पड़ेगा, सौ रुपये के अंदर, या सौ-दो सौ में बन जाएगा। ऑनलाइन मँगाना बहुत महँगा है। वे अभी देख रहे थे, वहाँ दो हज़ार, तीन हज़ार लिखा है, और क्वालिटी कैसी होगी, पता नहीं।

09

सत्र में आकाश दीप की वह साधारण विधि ली गई है जो कोई भी कर सके, और यह कि धूप और दीप का उपयोग कैसे करें कि देवताओं का आकर्षण भी हो।

धूप और दीप का ऐसा उपयोग जिससे देवताओं का आकर्षण हो

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:18–05:40

वक्ता कहते हैं कि आकाश दीप जलाने की दो-तीन विधियाँ हैं, और चर्चा साधारण विधि पर होगी जो कोई भी कर सके। जैसा आज का वीडियो भी है, विषय यह है कि धूप और दीप का उपयोग किस तरह करें कि देवताओं का आकर्षण भी हो।

उसमें दीपक कैसे जलाना है और पूरा विधि-विधान क्या है, इसकी दो-तीन प्रक्रियाएँ हैं, वक्ता कहते हैं। पर चर्चा साधारण प्रक्रिया पर होगी, जिसे कोई भी कर सके। जैसा आज का वीडियो भी है, विषय यह है कि हम धूप का और दीप का उपयोग किस तरह करें जिससे देवताओं का आकर्षण भी हो। अब ये सब बातें साथ लेंगे।

10

प्रयोग में केवल वही कवच खर्च होता है जो पहले सिद्ध हो चुका है; मंत्र पूँजी है, और इस बार दुर्गा एकाक्षरी, दुर्गा प्रणव और चौंसठ योगिनी पर ज़ोर दिया गया था।

प्रयोग के लिए कवच और स्तोत्र; मंत्र पूँजी हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:41–06:02

वक्ता कहते हैं कि पहली चीज़ वह कवच है जिसका अनुष्ठान श्रोता ने अब तक किया है। बाकी मंत्रों के लिए वे प्रयोग की बात नहीं करेंगे, क्योंकि मंत्र हमारी पूँजी है। वे बताते हैं कि इस बार उन्होंने दुर्गा एकाक्षरी मंत्र, दुर्गा प्रणव और चौंसठ योगिनी पर बहुत ज़ोर दिया था।

11

खास ध्यान रखा जाता है कि श्रोता के पास ऐसा कोई विषय न जाए जिसका वह अधिकारी नहीं है; नवरात्रि में भेजे गए एकाक्षरी के अनुभवों से वक्ता बहुत उत्साहित हो गए थे।

ध्यान कि श्रोता के पास ऐसा कुछ न जाए जिसका वह अधिकारी नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:03–06:36

वक्ता कहते हैं कि नवरात्रि में श्रोताओं ने एकाक्षरी के ऐसे अनुभव भेजे कि वे बहुत उत्साहित हो गए। वे कहते हैं कि जगदम्बा उन्हें माध्यम बनाकर ये बातें सबके सामने रख रही हैं। वे खास ध्यान रखते हैं कि श्रोता के पास ऐसा कोई विषय न जाए जिसका वह अधिकारी नहीं और जिसे फिर उसे करना पड़े।

12

उपयोग कवच, स्तोत्र या शतनाम का होता है; एकाक्षरी, पंचाक्षरी और सप्ताक्षरी पुण्य के खाते में रहते हैं और बहुत कम खर्च होते हैं।

कवच और स्तोत्र या शतनाम, मंत्र सुरक्षित रखे जाएँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:07–07:33

वक्ता कहते हैं कि उपयोग कवच और स्तोत्र या शतनाम का होगा, यहाँ वही ज़्यादा उचित रहेगा। एकाक्षरी, पंचाक्षरी और सप्ताक्षरी मंत्र अपने बैंक में, पुण्य के खाते में सुरक्षित रखने हैं। इनका उपयोग बहुत सावधानी से और कम करना है। वे कहते हैं कि इनका उपयोग भी होगा, पर बहुत कम।

13

केवल आम, आसानी से मिलने वाली सामग्री लगती है, और हर व्यक्ति इन्हें कर सकता है, किसी भी वर्ण या जाति का, पुरुष, स्त्री या बच्चा।

आम सामग्री, और वर्ण, जाति, लिंग या उम्र की कोई रोक नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:34–07:54

वक्ता कहते हैं कि वे केवल ऐसी आम चीज़ें बताएँगे जिनकी सामग्री आसानी से मिल जाए और जिन्हें हर व्यक्ति कर सके, किसी भी वर्ण का, किसी भी जाति का, स्त्री हो या पुरुष, और बच्चा भी। जो कोई भी कर सके, वही वे बताएँगे।

14

क्रम गुरु रूप भगवान दत्तात्रेय से शुरू होता है, उनके वज्र पंजर कवच, माला मंत्र या द्वादश स्तंभ के साथ।

गुरु भगवान दत्तात्रेय, और उनकी तीन उपयोगी रचनाएँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:55–08:14

वक्ता गुरु भगवान दत्तात्रेय से शुरू करते हैं, क्योंकि उनका पूरा क्रम शुरू से चलता है। चर्चा तीन चीज़ों पर होगी: अगर श्रोता ने कभी भगवान दत्त के वज्र पंजर कवच का अनुष्ठान किया है, या उनके माला मंत्र का, या तीसरा, उनका द्वादश स्तंभ, जो चैनल पर दिया गया है।

15

दत्त साधना मुख्य रूप से महाराष्ट्र के साधक और नवनाथ परंपरा या दत्त परंपरा वाले करते हैं; बिहार, यूपी और पूर्वोत्तर में कम।

महाराष्ट्र, नवनाथ परंपरा और दत्त परंपरा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:15–08:36

वक्ता कहते हैं कि महाराष्ट्र क्षेत्र के ज़्यादातर साधक भगवान दत्त की साधना ज़रूर करते हैं। चैनल से जुड़े जो साधक नवनाथ परंपरा में हैं, या भगवान दत्त की परंपरा में, या उनके अवतारों से जुड़ी परंपरा में, वे ज़रूर करते हैं। बिहार, यूपी और पूर्वोत्तर के साधक शायद कम करें, पर उस तरफ़ के साधक ज़रूर करते हैं।

16

जिस कुल में एक-दो पीढ़ी से श्राद्ध या पितृ कर्म नहीं हुआ, और पितरों की गति के लिए लगभग होता ही नहीं, वहाँ परेशानी आती है।

पीढ़ियों से श्राद्ध न होने पर पितृ-संबंधी परेशानी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:37–09:05

वक्ता पहली समस्या पितरों से जुड़ी लेते हैं। वे कहते हैं कि वे पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं: अगर हमारे कुल में एक-दो पीढ़ी से पितरों के लिए कभी श्राद्ध या कोई कर्म नहीं हुआ। और पितरों की गति के लिए यह लगभग होता ही नहीं, देख लीजिए, लोग करते नहीं।

17

पितृ दोष को नकारने वाले वीडियो का सीधा जवाब: जहाँ कर्म नहीं होता, वहाँ एक-दो पीढ़ी बाद कठिनाई आती है।

उन वीडियो की आलोचना जो कहते हैं कि पितृ दोष जैसा कुछ नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:06–09:22

वक्ता उनकी आलोचना करते हैं जो आजकल वीडियो बनाकर कहते हैं कि पितृ दोष जैसा कुछ नहीं है, कि यह सबके साथ थोड़े ही होगा। वे जवाब देते हैं कि जब यह नहीं किया जाएगा, तो एक-दो पीढ़ी बाद कठिनाई ज़रूर होगी।

जो लोग यह नहीं करते, और जो आजकल वीडियो बनाकर पितृ दोष आदि के बारे में कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है, और ऐसी बातें कहते हैं कि यह सबके साथ क्यों होगा, उन्हें वक्ता सीधा जवाब देते हैं। जब यह नहीं किया जाएगा, तो एक-दो पीढ़ी बाद कठिनाई ज़रूर होगी।

18

जो कोई बड़ा अनुष्ठान नहीं कर सकता, उसके लिए श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ है, और पितरों के लिए भगवान दत्तात्रेय सबसे दिव्य देवता हैं।

भगवद्गीता का पाठ, और पितरों के देवता के रूप में दत्त

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:23–09:37

जो कोई बड़ा अनुष्ठान नहीं कर सकते, संस्कृत पाठ नहीं कर सकते और कुछ करना नहीं चाहते, उनके लिए वक्ता श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ की बात बताते हैं, जो वे पहले दे चुके हैं। यह कोई भी कर सकता है, यह साधारण है। वे कहते हैं कि उसमें भी अगर आप भगवान दत्तात्रेय का अनुष्ठान करें, तो पितरों के लिए वे सबसे दिव्य देवता हैं।

19

त्रिपिंडी श्राद्ध में जिन त्रिगुणात्मक शक्तियों को तृप्त किया जाता है, वे सीधे भगवान दत्त में एक हो जाती हैं, इसलिए इसी एक रूप की उपासना से पितर तृप्त होते हैं।

त्रिपिंडी श्राद्ध की त्रिगुणात्मक शक्तियाँ दत्त में एक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:38–10:05

वक्ता कहते हैं कि पितर तुरंत तृप्त होते हैं। त्रिपिंडी में, जहाँ त्रिगुणात्मक देवताओं को तृप्त किया जाता है, यानी त्रिपिंडी श्राद्ध में तीन प्रकार के प्रेतों के प्रेतत्व को दूर करने के लिए, उन त्रिगुणात्मक शक्तियों का मेल सीधे भगवान दत्त में होता है, केवल इसी एक रूप की उपासना से। वे कहते हैं कि इसीलिए हर परंपरा में गुरु मंडल में किसी न किसी रूप में भगवान दत्त मौजूद रहते हैं।

20

हर घर में, चाहे छोटा ही सही, आदि गुरु मंडल का स्थान होना चाहिए, इसीलिए हर दत्त पूर्णिमा पर अभिमंत्रित दत्त मुद्रिका भेजी जाती है।

गुरु स्वरूप के लिए स्थान, और दत्त पूर्णिमा पर दत्त मुद्रिका

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:06–10:35

वक्ता कहते हैं कि जैसे उनके अपने परिवार की साधना में बटुक भैरव जी का स्थान है, वैसे ही भगवान दत्त का, यानी आदि गुरु मंडल का या गुरु स्वरूप का स्थान, छोटा ही सही, ज़रूर होना चाहिए। इसके लिए वे मार्गशीर्ष महीने में आने वाली पूर्णिमा, दत्त पूर्णिमा, की बात करते हैं। उस पर हर बार कोशिश रही है कि एक छोटी दत्त मुद्रिका कम से कम अभिमंत्रित रूप में सबके पास पहुँचे।

21

श्रोता मुद्रिका खुद भी बनवा सकता है; बस तब प्रतिष्ठा अलग से, मूर्ति प्रतिष्ठा की विधि से करनी होगी।

खुद करना, और विग्रह प्रतिष्ठा की अलग विधि

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:36–11:00

वक्ता को लगता है कि पिछली बार कम से कम पंद्रह-बीस लोगों ने अनुष्ठान में जुड़कर मुद्रिका पाई थी। श्रोता खुद भी कर सकता है। बस बात यह है कि शायद वह प्रतिष्ठा न कर पाए, तब मूर्ति प्रतिष्ठा या विग्रह प्रतिष्ठा की विधि अलग से करनी होगी। वे कहते हैं कि थोड़े धैर्य से यह हो सकता है।

22

प्रतिष्ठा और अभिषेक के बाद इसे रोज़ की सेवा के लिए गुरु मंडल के आसन पर बैठाया जाता है, जैसा त्रयोमुखी रुद्राक्ष के अभिषेक वाले वीडियो में दिखाया गया था।

प्रतिष्ठा, अभिषेक, गुरु मंडल पर आसन और रोज़ की पूजा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:39–12:06

वक्ता कहते हैं कि प्रतिष्ठा की विधि दी जा चुकी है। प्रतिष्ठा करें, अभिषेक आदि करें, और उसे उसके आसन पर, भगवान के गुरु मंडल के आसन पर बैठाएँ और रोज़ उनकी पूजा करें। वे उस वीडियो का ज़िक्र करते हैं जिसमें त्रयोमुखी रुद्राक्ष का अभिषेक डाला गया था। उसमें यह भी दिखाया गया था कि दत्त मुद्रिका का आसन कैसे बनता है और रोज़ उनकी सेवा कैसे होती है।

23

पितृ समस्या, रोग या प्रेतों की उपस्थिति के लिए दो सामग्री काफ़ी हैं; तरीका हर देवता के लिए एक ही रहता है, बस मंत्र बदलता है।

केवल दो सामग्री, हर देवता के लिए समान, बस मंत्र बदलता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 12:07–12:32

मान लीजिए घर में पितृ से जुड़ी समस्या है, या बहुत रोग है, या प्रेत-पिशाच की उपस्थिति है। तब अगर श्रोता ने माला मंत्र किया है, तो वक्ता कहते हैं कि और कोई सामग्री नहीं चाहिए, बस दो सामग्री जुटाएँ। वे कहते हैं कि इन दोनों से जो करना है, वह हर देवता के लिए समान रहेगा। बस मंत्र बदलेंगे, श्रोता के आराध्य के अनुसार।

24

हर साधक सामग्री को अपने आराध्य के मंत्र से अभिमंत्रित करता है, दत्त, गणपति, भैरव, हनुमान, या भगवती का जो भी कवच उसके पास है।

हर कोई अपने आराध्य का मंत्र या कवच लेता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 12:33–12:55

जिनके आराध्य भगवान दत्त हैं, या जिन्होंने खास तौर पर उनका अनुष्ठान किया है, वे उनका लेते हैं। गणपति जी को पूजने वाले गणपति जी का मंत्र लेते हैं। जिन्होंने भैरव जी का अनुष्ठान किया है, वे भैरव जी का मंत्र लेते हैं। इसी तरह हनुमान जी, और भगवती के जो भी रूप हैं, जो भी कवच हो, सबका उपयोग होगा। हर मामले में कुछ सामग्री जोड़नी होगी, और वक्ता साथ-साथ बताते जाएँगे।

25

यह अभिचार, किसी कृत्या या गणंत विद्या के प्रयोग, परिवार के किसी सदस्य पर प्रेतत्व या पिशाचत्व, और वायव्य बाधा के नाश के लिए है।

अभिचार, कृत्या, गणंत विद्या, प्रेतत्व, वायव्य बाधा, और रक्षक ऊर्जा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 12:56–13:21

वक्ता कहते हैं कि यह अभिचार के नाश के लिए है; किए गए किसी कृत्या प्रयोग के नाश के लिए; गणंत विद्या के किसी उपयोग के नाश के लिए; परिवार के किसी सदस्य पर प्रेतत्व या पिशाचत्व की उपस्थिति के नाश के लिए, चाहे ग्रह से हो या किसी और कारण से; किसी भी तरह की वायव्य बाधा के नाश के लिए; और साथ ही इसलिए कि श्रोता के निवास पर रक्षक ऊर्जाओं की उपस्थिति बढ़े।

26

पीली सरसों और लाल चिरमी को अच्छी तरह पीसकर पाउडर बनाएँ, उसमें कपूर का पाउडर मिलाएँ, और सब एक डिब्बे में रखें।

पीली सरसों और लाल चिरमी, कपूर के साथ पिसी हुई

· Reviewed Sep 14, 2026 · 13:33–13:56

पीली सरसों लें और लाल चिरमी लें, ये दो चीज़ें। चिरमी और पीली सरसों को मिक्सर ग्राइंडर में पीसकर अच्छा पाउडर बना लें। उसमें थोड़ा कपूर, कपूर का पाउडर मिलाएँ, और सब एक डिब्बे में रख लें।

27

पूर्णिमा या किसी पर्व काल में, स्नान करके, इससे भरी पीतल या काँसे की कटोरी सामने सफ़ेद आसन पर रखी जाती है।

पूर्णिमा या पर्व काल में सफ़ेद आसन पर पीतल या काँसे की कटोरी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 13:57–14:14

पहले पीतल की या काँसे की एक कटोरी लें और उसमें इसे भर दें। पूर्णिमा पर, या किसी पर्व काल में, इसे आसन पर, अपने सामने सफ़ेद आसन पर बैठाएँ। स्नान करके आसन पर बैठें।

वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले पीतल की या काँसे की एक कटोरी लें। एक कटोरी इससे भर लें। पूर्णिमा पर, या किसी पर्व काल में, इसे आसन पर, अपने सामने सफ़ेद आसन पर बैठाएँ। श्रोता खुद स्नान करके आसन पर बैठे।

28

अभिमंत्रण के लिए पाँच या सात कुश की एक बित्ते की छोटी झाड़ू बनाई जाती है।

पाँच या सात कुश की एक बित्ते की छोटी झाड़ू

· Reviewed Sep 14, 2026 · 14:15–14:30

वक्ता भगवान दत्तात्रेय के प्रयोग के बारे में कहते हैं कि थोड़ा-सा कुश लेना है — पाँच या सात कुश। उसकी झाड़ू जैसी चीज़ बनानी है। छोटी-सी, एक बित्ते की। उसे लेकर अभिमंत्रण करने बैठना है।

वक्ता भगवान दत्तात्रेय के बारे में कहते हैं कि सुनने वाले को थोड़ा-सा कुश आसन घास लेना है — पाँच या सात कुश। उनसे एक छोटी झाड़ू जैसी चीज़ बनानी है। छोटी-सी, एक बित्ते की लंबाई की। और उसे लेकर अभिमंत्रण करने बैठना है।

29

पहले पंचांग, षट्कर्म और आचमन होते हैं, फिर छोटा-सा गणपति और गुरु पूजन, उसके बाद सामग्री को माला मंत्र से 108 बार अभिमंत्रित किया जाता है।

पंचांग, षट्कर्म, आचमन, गणपति पूजन और गुरु पूजन, फिर माला मंत्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 14:31–14:58

वक्ता कहते हैं कि शुरू की क्रियाएँ करें — जो पंचांग करते हैं, षट्कर्म आदि, शुरू में आचमन, वह पूरी विधि। गणपति पूजन और गुरु पूजन छोटे रूप में, साधारण ढंग से करें। मान लीजिए शरद पूर्णिमा को कर रहे हैं, तो पहले यह सब करें। फिर अगर आपने भगवान दत्त के माला मंत्र का अनुष्ठान किया है, चाहे 1100 का ही, तो उसी माला मंत्र से सामग्री को अभिमंत्रित करेंगे। कम से कम 108 बार।

30

माला बाएँ हाथ से गिनी जाती है, दाएँ हाथ से कुश कटोरी पर छुआते रहते हैं, चूर्ण बाहर नहीं गिरना चाहिए।

बाएँ हाथ में माला, दाएँ हाथ में कुश कटोरी पर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 14:59–15:23

वक्ता कहते हैं कि माला फेरने या 108 गिनने के लिए जो भी लें, वह बाएँ हाथ से करें। दाएँ हाथ में कुश पकड़ा हो, उसे कटोरी पर छुआते रहें। अंदर की सामग्री — जो चूर्ण बनाया है — बाहर नहीं गिरनी चाहिए। उसे सँभालें, छुआते रहें और माला मंत्र पढ़ते रहें।

31

पूरा दत्तात्रेय मंत्र मन में नहीं, बोलकर पढ़ा जाता है, क्योंकि वरना अभिचार नाश नहीं होता।

बोलकर पढ़ना, क्योंकि वरना अभिचार नाश नहीं होता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 15:24–15:39

वक्ता कहते हैं कि पूरा दत्तात्रेय मंत्र पढ़ें — “अनुसूया पुत्राय” — पूरा मंत्र पढ़ते हुए। और जब पढ़ें तो बोल सकते हैं। ऐसा नहीं कि मन में ही कहना है। आप बोल सकते हैं। क्योंकि यहाँ बात अभिचार के नाश की है, और वैसे अभिचार नाश नहीं होता।

वक्ता कहते हैं कि दत्तात्रेय मंत्र पूरा पढ़ना है — “अनुसूया पुत्राय” — पूरा। और मंत्र पढ़ते समय बोलकर पढ़ सकते हैं। ऐसा नहीं कि मन के अंदर ही कहना है। आप बोल सकते हैं। क्योंकि यहाँ बात अभिचार के नाश की है, और उस तरह अभिचार नाश नहीं होता।

32

अभिचार नाश का मतलब है कि उस कृत्या में गए देवता — भूत, प्रेत, वैताल या कोई और शक्ति — को रोका, बाँधा और भगाया जाए, इसके लिए पढ़ने वाले में उग्रता चाहिए।

जो चलाया गया है उसे रोकना, बाँधना और हटाना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 15:40–15:59

वक्ता कहते हैं कि अभिचार नाश का मतलब है कि उस अभिचार में, उस कृत्या में जो देवता गया है — कोई भी आभिचारिक देवता हो, भूत, प्रेत या वैताल, या कोई और शक्ति — उसे वहाँ रोका जा रहा है, बाँधा जा रहा है, भगाया जा रहा है। और जब यह हो रहा हो, तब आपके अंदर उग्रता होनी चाहिए।

वक्ता कहते हैं कि अभिचार नाश का मतलब यह है: उस अभिचार में, उस कृत्या में जो देवता गया है — कोई भी आभिचारिक देवता हो, भूत, प्रेत या वैताल, या कोई और शक्ति — उसका वहाँ निग्रह हो रहा है, उसे बाँधा जा रहा है। उसे भगाया जा रहा है। और जब यह हो रहा हो, तब आपके अंदर उग्रता होनी चाहिए।

33

यहाँ प्रेम भाव नहीं चलेगा: पाठ में वीर भाव हो, ताकि अभिमंत्रित होती सामग्री में प्रचंडता आए।

कोमल प्रेम भाव नहीं, वीर भाव और प्रचंडता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 16:00–16:20

वक्ता कहते हैं कि आराम से मत पढ़ें। बिल्कुल सौम्य भाव में नहीं — “दत्तात्रेयाय अनघाय”। वह प्रेम भाव वहाँ नहीं चलेगा। आपकी ऊर्जा इतनी प्रचंड हो, आप इतने वीर भाव से पढ़ें, कि अभिमंत्रित होती सामग्री में प्रचंडता आ जाए। मंत्र में आपका वह भाव होना चाहिए।

वक्ता कहते हैं कि आराम से मत पढ़ें। बिल्कुल सौम्य भाव में नहीं — “दत्तात्रेयाय अनघाय”। वह प्रेम भाव वहाँ नहीं चलेगा। आपकी ऊर्जा इतनी प्रचंड हो, आप इतने वीर भाव से पाठ करें, कि जो सामग्री अभिमंत्रित हो रही है उसमें प्रचंडता आ जाए। मंत्र में आपका वह भाव होना चाहिए।

34

108 बार अभिमंत्रित करके सामग्री को डिब्बे में सँभालकर रखा जाता है।

108 बार, फिर डिब्बे में रखना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 16:21–16:32

वक्ता कहते हैं कि ऐसा करके पहले इसे अभिमंत्रित करें। कितनी बार? 108 बार करें और डिब्बे में सँभालकर रख लें — 108 बार करके।

वक्ता कहते हैं कि ऐसा करके सुनने वाला पहले इसे अभिमंत्रित करे। कितनी बार? 108 बार करें और डिब्बे में सँभालकर रख लें। 108 बार करके।

35

वही अभिमंत्रित सामग्री धूप और दीप दोनों में जाती है — दो आकाश दीप जलते हैं, जिनमें एक पितरों का साधारण दीप होता है।

धूप और दीप दोनों में, दो आकाश दीप जलाकर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 16:33–16:43

फिर वही सामग्री धूप और दीप दोनों में लगानी है। दीप में, अगर आकाश दीप जला रहे हैं, तो प्रयोग करते समय दो आकाश दीप जलाने हैं। एक साधारण वाला होगा जो सब जलाते हैं, जो पितरों के लिए करना है।

वक्ता कहते हैं कि अब वही सामग्री दोनों में लगानी है — धूप में भी और दीप में भी। दीप में: जब सुनने वाला आकाश दीप जलाए, तो दो आकाश दीप जलाने हैं। अगर प्रयोग कर रहे हैं, तो उनमें एक साधारण वाला होगा जो सब जलाते हैं, जो पितृ के लिए करना है।

36

आकाश दीप किस तरह के बाँस का होना चाहिए?

थोड़ा बड़ा, थोड़ा हरा बाँस — सूखा कभी नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 16:44–17:03 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि आकाश दीप बाँस में मँगवाएँ, और थोड़ा बड़ा मँगवाएँ। ऐसा न हो कि आख़िर में बत्ती जले तो लौ बहुत ऊँची हो जाए और चीज़ जल जाए। बाँस कच्चा हो — थोड़ा हरा। सूखा बाँस बिल्कुल न रखें। कम से कम थोड़ा हरा हो।

वक्ता कहते हैं कि सुनने वाला जो एक आकाश दीप मँगवाए, वह बाँस में मँगवाए, और थोड़ा बड़ा मँगवाए — ताकि ऐसा न हो कि आख़िर में बत्ती जले तो उसकी लौ बहुत तेज़ हो जाए और उससे चीज़ जल जाए। कच्चे बाँस का हो। सूखा बाँस बिल्कुल नहीं रखना है। यानी कम से कम थोड़ा हरा हो।

37

सोई बत्ती लगाई जाती है, खड़ी बत्ती नहीं, जो आजकल हर बने-बनाए दीये में होती है।

सोई (लेटी) बत्ती, खड़ी बत्ती नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 17:04–17:21

एक छोटी फूल माला हो और एक दीया, पीतल का हो या मिट्टी का। वक्ता कहते हैं कि सोई बत्ती लगाएँ। खड़ी बत्ती लगाने से बचें। वे कहते हैं कि आजकल जो भी स्टैंडर्ड दीया मिलता है, और यूट्यूब-इंस्टाग्राम पर जो गुरुजी लोग बता रहे हैं, सब में खड़ी बत्ती ही लगती है।

38

खड़ी बत्ती कब ठीक है और सोई बत्ती कब?

सौम्य काम में सोई बत्ती, उग्र काम में खड़ी बत्ती

· Reviewed Sep 14, 2026 · 17:22–17:52 · Also a question

जब भी कुल पितरों के लिए, सौम्य देवताओं के लिए, देवताओं को प्रसन्न करने के लिए, या अपने कल्याण के लिए दीया जलाएँ, तो दीया सोई बत्ती का हो। खड़ी बत्ती उग्रता में लगती है — जहाँ शत्रु नाश, अभिचार नाश, रोग नाश हो, जहाँ देवता को प्रचंडता से उपस्थित करना हो, जिसे शाबर आदि परंपराओं में चालन विद्या कहते हैं। बाकी सब में सोई बत्ती लगाएँ।

39

घी भी चल सकता है, पर इस समय और इस प्रयोग के लिए सरसों का तेल सबसे अच्छा माना गया है; पितरों का दीया सरसों के तेल का होता है।

इस प्रयोग और इस समय के लिए सरसों का तेल सबसे अच्छा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 17:53–18:13

इसमें सरसों का तेल भी लगा सकते हैं, घी भी। वक्ता कहते हैं कि उनके हिसाब से इस समय और इस प्रयोग के लिए सरसों का तेल सबसे अच्छा है। तो एक दीया हो गया: पितरों वाला, सरसों के तेल का। दूसरा दीया भी जला सकते हैं — या चाहें तो दो लालटेन मँगवा लें, ताकि दो आकाश दीप हों।

वक्ता कहते हैं कि इसमें सुनने वाला सरसों का तेल भी लगा सकता है और घी भी। उनके हिसाब से इस समय, इस प्रयोग के लिए सरसों का तेल सबसे अच्छा है। तो एक हो गया: सरसों के तेल वाला, पितृ के लिए। दूसरा दीया भी इसमें जला सकते हैं; या चाहें तो दो लालटेन मँगवा लें, ताकि दो आकाश दीप हो जाएँ।

40

दूसरे दीये में भी सरसों का तेल होता है, और अभिमंत्रित सामग्री बत्ती पर ही लगाकर जलाई जाती है।

दूसरे दीये की बत्ती पर पूरी सामग्री

· Reviewed Sep 14, 2026 · 18:14–18:34

दूसरा दीया, मिट्टी में जलाएँ या पीतल में, उसमें भी सरसों का तेल होगा। और उसमें वह सामग्री जाएगी जो आपने बनाई और अभिमंत्रित की है। यानी यह पूरी सामग्री वर्तिका पर, बत्ती पर लगाई जाती है, और वह जलती है।

वक्ता कहते हैं कि दूसरा दीया — सुनने वाला मिट्टी में जलाए या पीतल में — उसमें भी सरसों का तेल होगा। और उसमें वह सामग्री डालेगा जो उसने बनाई और अभिमंत्रित की है; उस दीये में डालेगा। यानी पूरी वर्तिका पर, बत्ती पर, यह पूरी सामग्री लगाएगा, और वह जलेगी।

41

इसे गोधूलि संध्या में टाँगा जाता है और एक-दो घंटे जलना चाहिए, इससे ज़्यादा नहीं — बारह घंटे चलने वाला दीया नहीं।

संध्या में टाँगना, केवल एक-दो घंटे जलना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 18:35–18:49

फिर इसे संध्या के समय टाँग दें। संध्या में गोधूलि वेला तक इसे चला देना है, और कम से कम एक-दो घंटे जलना चाहिए — बहुत ज़्यादा नहीं। वक्ता कहते हैं कि दीया इतना बड़ा न हो कि बारह घंटे जलता रहे। एक-दो घंटे काफ़ी हैं।

वक्ता कहते हैं कि फिर इसे संध्या के समय टाँग दें। संध्या के अंदर गोधूलि वेला तक इसे चला देना है, और कम से कम एक-दो घंटे जलना चाहिए — इससे बहुत ज़्यादा नहीं। दीया इतना बड़ा नहीं होना चाहिए कि बारह घंटे जलता रहे। एक-दो घंटे काफ़ी हैं।

42

जहाँ कोई उपस्थिति किसी को सोने न दे — गला दबना, डर से उठ जाना — वहाँ उसके बिस्तर के पास धूप और दीप दोनों जला सकते हैं।

जो सो न पाए या परेशान हो, उसके बिस्तर के पास

· Reviewed Sep 14, 2026 · 18:51–19:14

मान लीजिए घर में ऐसी उपस्थिति हो जाए कि रात को कोई सो न पाए, कोई शक्ति किसी को सीधे परेशान कर रही हो — गला दबाना, या कोई डर से उठ जाना। वक्ता कहते हैं कि ऐसे में उनके सोने के बिस्तर के पास धूप और दीप दोनों जला सकते हैं।

दूसरी बात: यह दीया और कहाँ लगाना है? वक्ता कहते हैं, मान लीजिए सुनने वाले के घर में ऐसी उपस्थिति हो जाए कि रात को कोई सो न पाए, उस शक्ति से किसी को सीधे परेशानी दी जा रही हो — गला दबाना, या कोई डर से उठ जाना। ऐसे में उनके सोने के बिस्तर के पास धूप भी जला सकते हैं और दीप भी।

43

अभिचार नाश की धूप के लिए सूखी अपामार्ग की लकड़ी लगती है, न मिले तो गाय के गोबर का उपला।

सूखी अपामार्ग की लकड़ी, न मिले तो गाय के गोबर का उपला

· Reviewed Sep 14, 2026 · 19:15–19:30

वक्ता कहते हैं कि जब भी अभिचार नाश के लिए धूप करें, अपामार्ग की लकड़ी लगाएँ — सूखी। वे कहते हैं कि अभी हर जगह बहुत बारिश हो रही है, तो थोड़ी सूखी अपामार्ग की लकड़ी का इंतज़ाम कर लें; और वह न मिले तो गाय के गोबर का उपला।

वक्ता कहते हैं कि जब भी अभिचार के नाश के लिए धूप की जाए, तब अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी लगेगी — सूखी लकड़ी। वे बताते हैं कि अभी हर जगह बहुत बारिश हो रही है। तो थोड़ी सूखी अपामार्ग की लकड़ी का इंतज़ाम कर लें; और वह न मिले तो गौ के गोबर का उपला।

44

उपला गाय के गोबर का ही क्यों हो, भैंस का क्यों नहीं?

भैंस के गोबर से उग्रता बढ़ती है और वह सबको नहीं जमता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 19:31–19:45 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भैंस का नहीं होना चाहिए। भैंस वाले में उग्रता बढ़ जाती है, और वह सबको नहीं जमता। यह कुल देवता की शक्ति पर भी निर्भर है, और शुद्धता होनी चाहिए। इसलिए गाय के गोबर का उपला हो। या फिर अपामार्ग की लकड़ी, जो सबसे अच्छी है।

वक्ता कहते हैं कि भैंस का नहीं होना चाहिए। भैंस वाले में उग्रता बढ़ जाती है, और वह सबको नहीं जमता। यह देवता के कुल की शक्ति पर भी निर्भर है; शुद्धता होनी चाहिए। इसलिए गौ के गोबर का उपला हो। या फिर अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी, जो सबसे अच्छी है।

45

कपूर से जलाकर, अच्छी तरह जलने पर ऊपर चूर्ण डालते हैं — इस समय कोई मंत्र नहीं — और धुआँ रोज़ पूरे घर में घुमाते हैं।

कपूर से जलाना, मंत्र की ज़रूरत नहीं, धुआँ पूरे घर में

· Reviewed Sep 14, 2026 · 19:46–20:08

कपूर से जलाएँ, और जब अच्छी तरह जलने लगे, तो ऊपर वह चूर्ण डालें जो आपने बनाया है — इस समय कोई मंत्र पढ़ने की ज़रूरत नहीं। अगर आप घर पर नहीं रहते, तो अभिमंत्रित तो कर ही चुके हैं; घर में जो है उससे कहें कि बस डाल दे। धुआँ उठेगा, वह धुआँ पूरे घर में दिखाना है। जिस धूपदानी में धूना दिया जा रहा है, उसे परेशान व्यक्ति के पास रखें और धुआँ भर जाने दें। इतना रोज़ करना है।

46

गणपति के कवच से प्रयोग करें तो अपामार्ग के साथ सूखी आक की लकड़ी डाली जाती है।

अपामार्ग के साथ आक की समिधा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 20:09–20:30

मान लीजिए सुनने वाले ने भगवान गणपति जी का कवच पूरा किया है और उसका प्रयोग करना चाहता है, तो उसे थोड़ी आक की समिधा लगानी चाहिए। सूखी आक की लकड़ी मिल जाए तो उसे लगाना बहुत अच्छा है। अपामार्ग तो रहेगा ही; आक भी साथ रहे।

वक्ता कहते हैं, अब मान लीजिए सुनने वाले ने भगवान गणेश जी का कवच पूरा किया है और उसका प्रयोग करना चाहता है। तो उसमें वह थोड़ी आक की समिधा लगाए। आक की लकड़ी सूखी मिल जाए, तो उसे लगाना सबसे अच्छा है। अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। तो रहेगा ही; उसके साथ आक भी रहे।

47

भैरव प्रयोग में अपामार्ग के साथ खैर की लकड़ी लगती है, अभिमंत्रण और सामग्री वही रहती है।

समिधा में खैर की लकड़ी, अभिमंत्रण वही

· Reviewed Sep 14, 2026 · 20:31–20:54

ठीक इसी तरह, अगर सुनने वाला भैरव जी का प्रयोग कर रहा है — भैरव जी का अष्टोत्तर शतनाम किया है, या बटुक भैरव ब्रह्म कवच लगा रहा है — तो पूरा अभिमंत्रण इसी विधि से होगा और सामग्री भी वही रहेगी, पर समिधा में खैर की लकड़ी लगाए। वक्ता कहते हैं कि खैर की लकड़ी और अपामार्ग की लकड़ी दोनों लगें, और सुनने वाला यह विधान करे।

48

एक बहुत देखे जाने वाले लाइव में महामृत्युंजय मंत्र में ‘पुष्टिवर्धनम्’ की जगह ‘पति वंदना’ पढ़ा जा रहा था — वक्ता कहते हैं कि ऐसा पाठ उन्हें किसी ग्रंथ से पता नहीं।

वायरल लाइव और महामृत्युंजय मंत्र का गलत पाठ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 20:55–21:39

वक्ता उन बड़े तांत्रिकों की बात करते हैं जो ₹51,000 या ₹1 लाख लेकर हवन करते हैं। वे कहते हैं कि उस सुबह वे एक लाइव देख रहे थे — कोई बहुत वायरल — और वे महामृत्युंजय मंत्र पढ़ रहे थे, पर जहाँ “पुष्टिवर्धनम्” है वहाँ “पति वंदना” बोल रहे थे। वे कहते हैं कि उन्होंने कमेंट भी किया, और तीन-चार और लोगों ने भी, कि क्या बोल रहे हैं। भगवती जाने ऐसा मंत्र कहाँ से होगा, उन्हें तो इसकी जानकारी नहीं।

49

वे वायरल हैं तो सही ही होंगे और मूर्ख वक्ता ही होंगे — तो चतुर लोग ऐसी चीज़ें लगाएँ, उनके जैसे मूर्ख इन्हें छोड़ दें।

खुद को मूर्ख कहकर व्यंग्य, और वे बात आगे क्यों नहीं बढ़ाते

· Reviewed Sep 14, 2026 · 21:40–22:22

वक्ता कहते हैं कि वे वायरल हैं तो सही ही कर रहे होंगे, शायद गलत वे खुद हैं — शायद किसी तंत्र ग्रंथ में “पति वंदनम्” हो और उन्हें जानकारी न हो। तो वे सुनने वालों से कहते हैं कि अगर उनके जैसे मूर्ख हैं, तो ऐसी चीज़ें इस्तेमाल न करें; चतुर लोग करें। वे कहते हैं कि उन्होंने स्क्रीनशॉट रखा है और ग्रुप में डालेंगे, पर फिर उनका कोई शिष्य एक और लड़ाई शुरू कर देगा, इसलिए वे ज़्यादा नहीं बोलते।

50

₹51,000 या ₹1 लाख लेने वाले यही सामग्री लगाते हैं, और आप तक जो असर पहुँचता है वह इन्हीं से आता है — वही चीज़ लाइव में मुफ़्त बताई जा रही है।

वही सामग्री, अगर असर हो ही

· Reviewed Sep 14, 2026 · 22:23–22:46

वक्ता ₹51,000 या ₹1 लाख लेने वालों के बारे में कहते हैं: उनकी सामग्री देखिए। अगर उनके सच में दस शिष्य हैं, तो उनमें एक-दो ऐसे होंगे जिन्होंने ये मंत्र ठीक से किए हैं। वे यही चीज़ें लगाएँगे; और अगर सच में आप तक कोई असर पहुँचना है, तो इन्हीं चीज़ों से आएगा। और वही चीज़, वे कहते हैं, वे लाइव में मुफ़्त बता रहे हैं — और लोगों को मज़ा नहीं आ रहा।

51

₹1 लाख की पूजा ठीक लगती है क्योंकि पैसा अपनी जेब से गया; वही काम ₹1000 में ढोंग कहलाता है। आदमी को मज़ा वहीं आता है जहाँ पैसा लगे।

लोगों को वही अच्छा लगता है जिसमें पैसा लगे

· Reviewed Sep 14, 2026 · 22:47–23:11

लोग कहते हैं कि यह तो बस लाइव है, वीडियो बनाने के लिए ऐसे बोलते हैं; और कहते हैं कि वे दूसरे लोग अच्छा काम कर रहे हैं, क्योंकि वहाँ ₹1 लाख अपनी जेब से जाता है, तो ठीक लगता है। जब वक्ता कहते हैं कि पूरी पूजा ₹1000 में हो रही है, तो लोग इसे ढोंग और पाखंड कहते हैं। वक्ता कहते हैं कि आदमी को मज़ा वहीं आता है जहाँ पैसा लगे।

52

17 प्रो मैक्स में हर कोई अच्छा दिखता है और ₹15,000 के फ़ोन में कोई नहीं — ₹1.5 लाख खर्च करो तो ‘पति वंदनम्’ से किया हवन भी मुर्दे को ज़िंदा कर दे।

महँगे फ़ोन का कैमरा और ज़िंदा हुआ मुर्दा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 23:12–23:33

वक्ता कहते हैं कि 17 प्रो मैक्स से फ़ोटो बहुत बढ़िया आएगी, चाहे कोई कितना भी काला हो। सादे ₹15,000 के फ़ोन की फ़ोटो, गोरे व्यक्ति की भी हो, अच्छी नहीं लगती। प्रो मैक्स में काला भी पूरा गोरा दिखता है, क्योंकि ₹1.5 या ₹2 लाख खर्च हुए। यही बात है: वहाँ “पति वंदनम्” से किया हवन भी मुर्दे को ज़िंदा कर देगा, क्योंकि ₹1.5 लाख खर्च हुए, तो मुर्दे को ज़िंदा होना ही पड़ेगा।

53

जो पास है उसी से करने को कहा जाए, बिना पैसा खर्च किए, तो ज़िंदा आदमी कहता है कि उसे कुछ भी नहीं हो रहा।

ज़िंदा आदमी जो कहता है कि कुछ नहीं हो रहा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 23:34–23:54

वक्ता कहते हैं कि यहाँ वे लोगों से कह रहे हैं कि जो आपने पहले से किया है, उसी से यह-यह करो — और इससे कोई मुर्दा ज़िंदा नहीं होगा, क्योंकि पैसा खर्च नहीं हुआ। तो ज़िंदा आदमी कहेगा कि कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा, उसे कुछ भी नहीं हो रहा। वे कहते हैं कि यही असलियत है, यही सच है, और लोग इसे नहीं समझते।

वक्ता कहते हैं कि यहाँ वे उनसे कह रहे हैं: भाई, जो आपने पहले से किया है, उसी से यह-यह करो। इससे कोई मुर्दा ज़िंदा नहीं होगा, क्योंकि पैसा खर्च नहीं हुआ। तो ज़िंदा आदमी कहेगा कि कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा, उसे कुछ भी नहीं हो रहा। यही असलियत है, यही सच है। लोग यह बात नहीं समझते।

54

कोई हवन नहीं: लाल चिरमी और पीली सरसों का चूर्ण पीतल की कटोरी में, अष्टोत्तर शतनाम से 108 बार अभिमंत्रित, पूरे समय मूँज का कुश छुआते हुए।

खैर की लकड़ी के साथ पूरा दोहराव, धूप के लिए, हवन के लिए नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 23:55–24:31

वक्ता कहते हैं कि अगर आपने बटुक भैरव जी का मंत्र लगाया है और खैर की लकड़ी लगाई है, तो वह धूप के लिए है — वे किसी हवन की बात नहीं कर रहे, कुछ ख़ास नहीं, बस सीधी-सी बात। लाल चिरमी और पीली सरसों का चूर्ण बनाया, पीतल की थाली या कटोरी में रखा, और अपने आसन पर बैठकर, सब विधि से करके, बटुक भैरव जी के अष्टोत्तर शतनाम से अभिमंत्रित किया — मूँज का कुश लेकर पाठ करते हुए छुआते रहे, 108 बार।

55

एक उपयोग दीपक है, सामग्री बाती पर लगाकर जलाएँ, कोई और मंत्र नहीं; दूसरा अपामार्ग और खैर पर कपूर से जलाई धूनी है।

दीपक की बाती, और कपूर से जलाई अपामार्ग व खैर की धूनी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 24:32–24:56

अभिमंत्रित करने के बाद एक उपयोग दीपक वाला है। दीपक में इसे बस वर्तिका यानी बाती पर लगाकर जलाना है। कोई मंत्र या और प्रयोग नहीं चाहिए। दूसरे उपयोग में अपामार्ग और खैर की लकड़ी की समिधा होगी। उसे कपूर से जलाएँ। जब वह जलने लगे, तो उस पर इस सामग्री की धूनी दें।

56

कोई दूसरा, जो कुछ नहीं जानता, धूनी दे सकता है, बस वह शुद्ध हो — ऐसी माँ नहीं जो बच्चे को साफ़ करके बिना नहाए, बिना कपड़े बदले भाव का दावा करे।

हाँ, अगर शुद्ध हो — और भाव को लेकर चालाकी से सावधान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 24:57–25:24

बटुक भैरव जी का नाम लेना ही काफ़ी है। अगर पूरा पाठ याद है, तो पाठ करते हुए करें। अगर कोई दूसरा व्यक्ति है जो कुछ नहीं जानता, तो उसे बस शुद्ध होकर धूनी देने को कहें। वक्ता कहते हैं, चालाकी न दिखाएँ कि अशुद्ध शरीर से भाव में कर लेंगे। वे सीधा उदाहरण देते हैं: एक साल के बच्चे की माँ, जिसने बच्चे का मल-मूत्र साफ़ किया, और बिना कपड़े बदले, बिना नहाए, बिना हाथ धोए यह करे — ऐसा न करें।

57

शुद्धता से करें या न करें: जो घमंड पूछे कि इतना क्यों करना, वह बर्बादी बुलाने के बजाय यह साधना छोड़ दे।

शुद्धता से करें, नहीं तो बिल्कुल न करें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 25:25–25:52

वे कहते हैं, इसे पकड़ने की ज़रूरत नहीं। वे ख़ास तौर पर माताओं से कहते हैं: इसे न लें। अगर आपमें इतना घमंड और अहंकार है कि पूछें इतना क्यों करें, तो भगवान पर और ख़ुद पर इतना उपकार करें — न करें। करना है तो शुद्धता से करें। नहीं करना, तो यह सब करके बर्बादी न बुलाएँ।

58

जिसके गुरुजी कुछ और कहते हैं, वह उनकी माने; यहाँ बात बस इतनी है — शुद्ध होकर करें, या हाथ जोड़ लें।

चाहें तो उनकी मानें; उनकी अपनी बात पक्की है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 25:53–26:08

वे कहते हैं, जिनके गुरुजी ऐसी बातें कहते हैं, वे उनकी सुनें और वैसा करें। वे जहाँ चाहें जाएँ, आपको जहाँ चाहें ले जाएँ; इससे उनका कोई लेना-देना नहीं। उनकी अपनी बात साफ़ है: शुद्ध होकर करें, या शुद्ध नहीं तो हाथ जोड़ लें।

वक्ता कहते हैं, जिनके गुरुजी ऐसा कहते हैं — उनकी सुनें और वैसा करें। वे जहाँ चाहें जाएँ, आपको जहाँ चाहें ले जाएँ; इससे उनका कोई लेना-देना नहीं। उनका अपना विषय साफ़ है: शुद्ध होकर फिर करें; शुद्ध नहीं, तो हाथ जोड़ लें।

59

अशुद्ध शरीर से खैर की लकड़ी पर दिया धूना तुरंत असर देता है, स्त्री हो या पुरुष।

तुरंत बुरा असर, स्त्री हो या पुरुष

· Reviewed Sep 14, 2026 · 26:57–27:20

वे कहते हैं, अगर आपको लगता है कि आप धनी हैं और जो चाहें कर सकते हैं, तो उनका तरीक़ा बिल्कुल न अपनाएँ — किसी और की सुनें और वैसा करें। क्योंकि अगर आपने अशुद्ध शरीर से खैर की लकड़ी और इन चीज़ों पर आहुति, यानी धूना दिया, तो यह आपको तुरंत असर देगा, चाहे आप स्त्री हों या पुरुष।

60

चालाकी को आदमी को गिराने में चौबीस घंटे भी नहीं लगते — फिर दोष सिखाने वाले पर डाला जाता है, करने के तरीक़े पर कभी नहीं।

एक दिन में गिरना, और फिर दोष दूसरे पर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 27:21–27:47

वे कहते हैं, चालाकी में चौबीस घंटे भी नहीं लगेंगे, आप गिर जाएँगे। फिर आप कहेंगे कि उन्होंने कहा था इसलिए किया, और इसी से बर्बादी हुई। लोग कहते हैं — मेरे पिता की ऐसी हालत हो गई, मेरी माँ की ऐसी हालत हो गई। वे पलटकर पूछते हैं, आपसे उस तरह करने को किसने कहा? वह हिस्सा आप नहीं बताएँगे।

61

नहाएँ, शरीर को शुद्ध करें, जनेऊ पहनते हों तो बदलें, और तभी देवताओं के मुख में प्रवेश करें।

नहाएँ, शरीर शुद्ध करें, जनेऊ बदलें — तंत्र मज़ाक नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 27:48–28:12

शरीर को शुद्ध करें, नहाएँ, शरीर में शुद्धता लाएँ। जनेऊ पहनते हों तो जनेऊ बदलें। शुद्ध हों, फिर देवताओं के मुख में प्रवेश करें। वे कहते हैं, तंत्र मज़ाक नहीं है। आप यह देखने नहीं जाते कि आपके दुश्मन का तांत्रिक बैठकर क्या कर रहा है, पर आहुति से पहले बस शुद्ध होना भूल जाते हैं — और फिर कहते हैं कि भाव से देंगे।

62

हनुमान जी का बड़वानल, जंजीरा, चालीसा या बजरंग बाण — हर एक से प्रयोग हो सकता है, पर बहुत सोच-समझकर।

हनुमान जी — बड़वानल, जंजीरा, चालीसा या बजरंग बाण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 28:14–28:30

तीसरे हैं हनुमान जी: अगर सुनने वाले ने उनका प्रयोग किया है, चाहे वह हनुमान जी का बड़वानल, या हनुमान जी का जंजीरा, या चालीसा, या बजरंग बाण इस्तेमाल करने वाला हो। वे कहते हैं, प्रयोग बहुत सोच-समझकर करें।

वक्ता कहते हैं, तो यह ध्यान में रखें। तीसरे हैं हनुमान जी: अगर सुनने वाले ने उनका प्रयोग किया है — चाहे वह हनुमान जी का बड़वानल स्तोत्र, या हनुमान जी का जंजीरा, या हनुमान चालीसा, या बजरंग बाण इस्तेमाल करने वाला हो। प्रयोग बहुत सोच-समझकर करें।

63

दिव्य काल — नवरात्रि, महाशिवरात्रि, ग्रहण — में एक पुरश्चरण पूरा हो जाए, तो मंत्र जाग्रत है, हम समझें या न समझें।

नवरात्रि, महाशिवरात्रि, ग्रहण या किसी दिव्य काल में एक पुरश्चरण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 28:31–28:50

वे कहते हैं, यह बिल्कुल साधारण प्रयोग है: आप स्तुति करते हैं, पाठ करते हैं। अगर आपने एक बार भी पुरश्चरण किया है — चाहे नवरात्रि में, महाशिवरात्रि जैसे समय में, किसी दिव्य काल में, ग्रहण में — तो मंत्र जाग्रत है। यह साफ़ है। हम समझें या न समझें, वह जाग्रत है।

वक्ता कहते हैं, यह बिल्कुल साधारण प्रयोग है: आप स्तुति करते हैं, पाठ करते हैं। अगर आपने एक बार भी पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। किया है — चाहे नवरात्रि में, महाशिवरात्रि जैसे समय में, किसी दिव्य काल में, ग्रहण में — तो मंत्र जाग्रत है। यह साफ़ है। हम समझें या न समझें, वह जाग्रत हो चुका है।

64

धूना देते समय ब्रह्मचर्य का मतलब बस इतना है: देते समय शरीर शुद्ध हो।

पूरा ब्रह्मचर्य, यानी उस समय शुद्ध शरीर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 28:51–29:04

सुनने वाला इसे दीप में लगाए या धूप में: अभिमंत्रण करते समय वह शुद्ध रहेगा, और धूना देते समय भी पूरा ब्रह्मचर्य रखेगा। वे समझाते हैं, ब्रह्मचर्य रखने का मतलब बस इतना है कि धूना देते समय शरीर शुद्ध हो। किसी भी तरह के शरीर से नहीं।

65

हनुमान जी के प्रयोग में अपामार्ग के साथ गाय के गोबर के उपले ख़ास तौर पर लगते हैं।

अपामार्ग के साथ गाय के गोबर के उपले

· Reviewed Sep 14, 2026 · 29:05–29:27

वे कहते हैं, जब हनुमान जी का प्रयोग करने जाएँ, तब गाय के गोबर के उपलों का ख़ास उपयोग करें। अपामार्ग की लकड़ी तो होगी ही; उसके साथ गाय के गोबर का उपला भी ज़रूर लगाएँ।

वक्ता कहते हैं, और जब हम हनुमान जी वाला प्रयोग करने जाएँ — उस समय गौ के गोबर के उपले का ख़ास उपयोग करें। अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी तो होगी ही; उसके साथ इसमें गाय के गोबर का उपला भी ज़रूर लगाना है।

66

बजट हो तो लाल चंदन का बुरादा हनुमान जी की अभिमंत्रित धूनी सामग्री में मिलाएँ।

अभिमंत्रित सामग्री में लाल चंदन का चूर्ण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 29:28–29:57

वे कहते हैं, अगर थोड़ा पैसे का बजट हो, तो लाल चंदन का चूर्ण लें — यह सबसे आसानी से मिलता है, बुरादे जैसा। अगर हनुमान जी का कर रहे हैं, तो वह थोड़ा लाल चंदन चूर्ण अपनी अभिमंत्रित धूनी सामग्री में मिलाएँ और इस्तेमाल करें। कपूर तो होगा ही। फिर, वे कहते हैं, असर देखें।

67

पीताम्बरा के मंत्रों के लिए सूखी हल्दी — मिले तो काली, नहीं तो पीली — पीसकर सरसों और चिरमी में मिलाएँ।

मिले तो सूखी काली हल्दी, नहीं तो पीली हल्दी का चूर्ण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 29:58–30:29

अगर सुनने वाला भगवती पीताम्बरा के मंत्र कर रहा है, तो उनके प्रयोग में सूखी हल्दी लगती है। अगर सौभाग्य से काली हल्दी मिल जाए — अपने यहाँ उगाई हो या सीधे लाई हो — तो उसे सुखाकर चूर्ण बनाएँ। नहीं तो पीली हल्दी सुखाकर उसका चूर्ण बनाएँ। उसे भी पीली सरसों और लाल चिरमी के चूर्ण में मिलाएँ।

68

अभिमंत्रण के लिए शुक्ल पक्ष का गुरु पुष्य सबसे अच्छा नक्षत्र है — पर बगलामुखी प्रयोग से पहले देखें कि आपके घर के देवता ख़ुद बँधे तो नहीं।

शुक्ल पक्ष का गुरु पुष्य, और क्या आपके अपने देवता ख़ुद बँधे हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 30:30–30:52

अगर शुक्ल पक्ष का गुरु पुष्य नक्षत्र मिल जाए, और उसमें अभिमंत्रण का काम हो — भगवती पीताम्बरा के अष्टोत्तर शतनाम से या उनके कवच से — तो सबसे अच्छा। पर बगलामुखी प्रयोग से पहले, वे कहते हैं, अपने घर के देवी-देवताओं को देखें। वे कहते हैं, उन्होंने कई वीडियो और लाइव में बार-बार कहा है: आपके देवी-देवता ऐसे न हों जो ख़ुद बँधे हों।

69

जो यह सामग्री आगे सिखाते हैं, वे इससे कमा सकते हैं, पर ऊपर से डाला मसाला हद में रखें और बताएँ कि बात किस स्तर पर सिखाई जा रही है।

नक़ल करनी है तो करें, पर मसाला हद में

· Reviewed Sep 14, 2026 · 30:53–31:32

वे कहते हैं, बहुत लोग इस चैनल को सुनकर थ्रेड्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर वीडियो डालते हैं — ख़ासकर कुछ दीदी लोग — और अपने ढंग से कॉपी-पेस्ट करते हैं। उन्हें कोई आपत्ति नहीं: कमाओ और खाओ। पर मसाला डालो तो हद में डालो। अगर लोगों को बताओ कि बात किस स्तर पर, किस हालत में सिखाई जा रही है, तो ठीक रहेगा।

70

ऊपर से डाली लाल मिर्च सामने वाले को बर्बाद करेगी, फिर डालने वाले को — क्योंकि यहाँ कुल शक्तियों को प्रसन्न करना है।

डाली हुई लाल मिर्च साधक को, फिर बताने वाले को बर्बाद करती है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 31:33–32:00

नहीं तो, वे कहते हैं, आज आपको मज़ा आएगा, और कल जब सामने वाले का नुक़सान होगा, तो आपका डाला हुआ ज़्यादा मसाला बोलेगा। लोग कहते हैं यह भी डालो, वह भी डालो, लाल मिर्च भी डालो। वे कहते हैं, वह मिर्च उन्हें ज़रूर बर्बाद करेगी और फिर आपको भी — क्योंकि यहाँ कुल शक्तियों को प्रसन्न करना है, और हम बस माध्यम बनते हैं।

71

हर बलि दीपक में नौ सिक्के और नौ कौड़ियाँ किसी ने नहीं बताईं: बलि दीपक सादा रहता है, चौमुख दीपक सामान्य रखा जाता है।

बलि दीपक सादा रहता है — वे चीज़ें विधान से नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 32:33–32:58

वे कहते हैं, जो चार, नौ या तेरह दीपक ये लोग रखवाते हैं, उन हर एक में नौ सिक्के और नौ कौड़ियाँ डलवा रहे हैं। वे पूछते हैं, यह किसके लिए बताया गया? बलि के दीपक में ऐसी चीज़ें कब से डलने लगीं? लोग ऊपर से चीज़ें डालते हैं, क्योंकि दिखाना चाहते हैं कि वे ज़्यादा जानते हैं। बलि दीपक सादा रहता है; उसमें चौमुख दीपक बताया गया है, और उसे सामान्य रखना है।

72

चामुंडा की असली तंत्रोक्त बलि में दीपक कच्ची मिट्टी का होता है और बस बलि पूरी होने तक जलता है; ग्यारह या तेरह बलि दीपक होते हैं।

कच्ची मिट्टी का दीपक, जो बस बलि पूरी होने तक जलता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 32:59–33:25

वे कहते हैं, चामुंडा की असली तंत्रोक्त बलि में जो दीपक बनता है, वह कच्ची मिट्टी का होता है। वह इतनी देर ही जलाया जाता है कि बस बलि पूरी होने तक जले और फिर ख़त्म हो जाए। मुख्य कर्म साक्षी और एक स्वात दीपदान — वे बलि दीपक हैं, जो ग्यारह या तेरह जलते हैं। पर वहाँ आम लोगों के लिए, सबके लिए बताया गया है, इसलिए एक हद तक आपको लगता है जैसे यूँ ही कह दिया गया।

73

विषय बिना दुश्मनी के ले जाएँ, पर उनमें नमक-मिर्च न लगाएँ — और अगर बहुत जानते हैं, तो आधा-अधूरा बिल्कुल न सिखाएँ।

दुश्मनी नहीं — और इतना जानते हैं तो ये बातें न सिखाएँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 34:13–34:43

वे कहते हैं, उनकी बस इतनी बात है: लोग इस चैनल से विषय ले जाएँ तो दुश्मनी न रखें — न स्ट्राइक दी जाएगी, न केस होगा। पर जब वे सामने वाले के भले के लिए बताते हैं, और आप उसमें नमक-मिर्च लगाकर उसे और बड़ी शरारत बना देते हैं, तो ऐसा न करें। अगर लगता है कि आप बहुत जानते हैं, तो ये बातें सिखाएँ ही नहीं: यहाँ से चार बातें उठाकर अपनी चार न जोड़ें।

74

दुर्गा कल्पद्रुम और भूत डामर तंत्र में चामुंडा बलि का विधान लगभग अस्सी प्रतिशत मिलता है, और बीस प्रतिशत फिर भी अलग है।

दुर्गा कल्पद्रुम और भूत डामर तंत्र — अस्सी प्रतिशत एक जैसे

· Reviewed Sep 14, 2026 · 34:44–35:07

वे और साफ़ करते हैं। अगर भगवती चामुंडा का बलि विधान दुर्गा कल्पद्रुम के अनुसार बताया जा रहा है, और वही बात भूत डामर तंत्र के अंतर्गत बताई जाए — जो महात्मा रावण का है, जिन्हें भगवान शिव से तंत्र विज्ञान मिला — तो दोनों में अस्सी प्रतिशत समानता आए, तब भी बीस प्रतिशत अंतर रहेगा।

75

बीस प्रतिशत अंतर चामुंडा के स्वरूप से आता है — यही बात अश्वक्रांता, रथक्रांता और त्रिकोण बलि में भी आती है।

चामुंडा के स्वरूप के कारण — जैसे अश्वक्रांता और त्रिकोण बलि की चर्चा में

· Reviewed Sep 14, 2026 · 35:08–35:39

वे कहते हैं, वह बीस प्रतिशत अंतर भगवती चामुंडा के स्वरूप के कारण आता है। वे पहले की अश्वक्रांता, रथक्रांता आदि और त्रिकोण बलि की चर्चा याद करते हैं, जहाँ उन्होंने पूछने वालों को बताया था कि यह उल्टा क्यों है: वहाँ भी यही बात आती है। जो तांत्रिक यह न जानकर इसे ग़लत कहते हैं, उनसे वे कहते हैं, पढ़ो। वे संदर्भ नहीं देते फिरेंगे — सब बता दें, और फिर लोग समझदार होकर उन्हीं पर चढ़ जाएँ। यह वे नहीं कर सकते।

76

विंध्य के दक्षिण में बताया गया विधान अलग है, क्योंकि इसी कारण वहाँ भगवती का स्वरूप अलग हो गया।

अलग विधान, क्योंकि वहाँ भगवती का स्वरूप अलग है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 35:41–36:07

वे कहते हैं, विंध्य क्षेत्र से दक्षिणी भाग की ओर जाएँ, तो हम नहीं जानते वहाँ क्या कैसे है। पर दक्षिणी भाग में कौन-सी लंका थी, और वह किस ओर थी, यह अलग विषय है। वहाँ जो विधान बताया गया है, वह उनके अनुसार कहीं न कहीं अलग है। वहाँ भी विंध्य क्षेत्र के दक्षिण में होने के कारण भगवती का स्वरूप अलग हो गया।

77

विंध्य क्षेत्र में चामुंडा के प्रकट होने का स्थान कहाँ है?

सप्तशती के सातवें अध्याय में ललाट से, और विंध्यवासिनी के सहस्रांश से

· Reviewed Sep 14, 2026 · 36:08–36:41 · Also a question

वे दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाले से पूछते हैं: सातवें अध्याय में चामुंडा कैसे प्रकट हुईं, और किसके ललाट से? और मूल में वह रूप क्या है? वह भगवती अष्टभुजा हैं, जो भगवती विंध्यवासिनी के सहस्रांश से जन्मी हैं। और उन अष्टभुजा जगदंबा, भगवती कौशिकी, भगवती ब्राह्मणी-स्वरूपा के शरीर से कई शक्तियाँ प्रकट हुईं — अष्टमातृकाएँ, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, 64 योगिनियाँ और कई शस्त्र योगिनियाँ।

78

हर स्वरूप का स्थान उसका विधि-विधान तय करता है — वाम भाग की पूजा एक तरह, दक्षिण भाग की दूसरी तरह — इसलिए शिक्षा को सरल करके वही दिया जाता है जिसका सबको अधिकार है।

हर एक का अपना स्थान और स्वरूप, इसलिए अपनी विधि

· Reviewed Sep 14, 2026 · 36:42–37:11

वे कहते हैं, हर एक को जो स्थान दिया गया है, उसी स्वरूप और उसी स्थान के अनुसार उनकी पूजा का विधि-विधान भी अलग है। वे बताते हैं कि उसी सुबह उन्होंने इसका कुछ हिस्सा चैनल और टेलीग्राम पर लिखा था — वाम भाग की पूजा कैसे होती है और दक्षिण भाग की पूजा कैसे। वे कहते हैं, बातें थोड़ी उलझी हैं, इसलिए सरल करके दी जाती हैं, ताकि जिसका सबको अधिकार है वह कहीं भी, दक्षिण, पूर्व या उत्तर में, आम तौर पर किया जा सके।

79

मसाला डालो तो सामने वाला कुछ ग़लत करता है; जब उस पर मुसीबत आती है, तो उसके पास दोष देने को कोई नहीं बचता।

सुनने वाला ग़लती करता है, नुक़सान उठाता है, और किसी को गाली देता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 37:12–37:30

वे कहते हैं, कोई दिक़्क़त नहीं, जब तक आप उसमें मसाला न डालें — फिर सामने वाला कुछ ग़लत करेगा, और अगर उस पर मुसीबत आई, तो वह फिर किसे गाली देगा? इसलिए ऐसा न करें। वे कहते हैं, लोगों पर कृपा करें; आप तो सिद्ध हैं ही, पर लोगों पर कृपा करें।

वक्ता कहते हैं, कोई दिक़्क़त नहीं, जब तक आप उसमें मसाला न डालें। सामने वाला कुछ गड़बड़ करेगा; और अगर उस पर मुसीबत आई, तो वह फिर किसे गाली देगा? इसलिए ऐसा न करें। लोगों पर कृपा करें। आप तो सिद्ध हैं ही; पर वे विनम्रता से कहते हैं, लोगों पर कृपा करें।

80

पीताम्बरा का प्रयोग प्रचंड है: पहले घर के देवी-देवताओं को देखें, और हरिद्रा चूर्ण सामग्री का हिस्सा है।

प्रचंड प्रयोग — उससे पहले घर के देवताओं को देखें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 37:31–37:57

वे कहते हैं, भगवती पीताम्बरा का प्रयोग करते समय ध्यान रखें कि आपके घर के देवी-देवता कौन हैं, और तभी प्रयोग करें — क्योंकि यह प्रचंड प्रयोग होगा। हरिद्रा चूर्ण सामग्री के हिस्से के रूप में बताया गया है। फिर वे इस पर आते हैं कि अगर शुरू करने के बाद किसी पर, जिस पर आवेश आता था, उसकी परेशानी बढ़ती लगे तो क्या हो।

81

जब प्रयोग से परेशानी बढ़े — जैसा सामने वाली चीज़ अक्सर करती है — तो तुरंत शिव की शरणागति लें और 'क्षान्तिरूपेण संस्थिता' का जप करें।

तुरंत शिव की शरणागति लें और क्षान्तिरूपेण मंत्र का जप करें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 37:58–38:22

वे कहते हैं, कोई भी प्रयोग करें, अगर परेशानी बढ़े — और उसके बढ़ने की संभावना अक्सर होती है, सीधे प्रयोग करने पर सामने वाली चीज़ परेशानी करेगी — तो हमें तुरंत भगवान शिव की शरणागति लेनी चाहिए। तुरंत दोष परिहार: तुरंत "क्षान्तिरूपेण संस्थिता" मंत्र का जप। तब किसी तांत्रिक बाबा को, इसको या उसको, गाली देने जाने से कुछ नहीं होगा।

82

गुड़ और दही से शिव का अभिषेक करने पर तुरंत क्षमा मिलती है, भले ही तंत्र का कोई दोष लग गया हो।

गुड़ और दही से शिव का अभिषेक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 38:23–38:43

वक्ता कहते हैं कि भगवान शिव का अभिषेक गुड़ और दही से शुरू करें। भले ही तंत्र के कुछ दोष लग गए हों — ऐसी बातों में इसकी संभावना बहुत कम होती है, पर ऐसे कई मामले हैं जिनमें दिक्कत आती है — आपको तुरंत क्षमा मिल जाएगी। आपको इतना हल्ला नहीं करना पड़ेगा। विचलित मत होइए। यह बहुत धैर्य की बात है। यह मज़ाक नहीं है।

83

चौखट पर जलाया या रखा गया सरसों का दाना कुछ नहीं लगता, पर बहुत बड़ी चीज़ है — यह बात इन विषयों को सामान्य बताने वाले पॉडकास्ट छोड़ देते हैं।

चौखट पर सरसों का दाना बहुत बड़ी चीज़ है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 38:44–39:14

वक्ता कहते हैं कि तंत्र मज़ाक नहीं है। आप सोच सकते हैं कि यह तो बस सरसों है; जल गई तो क्या होगा, चौखट पर ऐसे रख दी तो क्या होगा — यह कुछ नहीं है। पर यह बहुत बड़ी चीज़ है। आपके लिए यह साधारण हो सकती है, मज़ाक का विषय हो सकती है। आजकल सेलिब्रिटी और इंस्टाग्राम पॉडकास्ट इन विषयों को सामान्य बना रहे हैं, कहते हैं कि इनसे कुछ नहीं होता; जबकि इससे लोगों का कल्याण होना चाहिए था। वे कहते हैं, तब यह आपकी समस्या है।

84

शिव का माला मंत्र, पंचानन मंत्र या शिव रक्षा कवच इसे निभा सकते हैं; वैसे ही वीरभद्र, रेणुका, सोखा बाबा या बन्नी माता भी, जिनके वे कुल देवता हैं।

शिव का माला मंत्र, पंचानन मंत्र, शिव रक्षा कवच, वीरभद्र और रेणुका

· Reviewed Sep 14, 2026 · 39:22–39:51

अगर श्रोता भगवान शिव का प्रयोग कर रहा है — उनका माला मंत्र, या उनके पंचानन स्वरूप से जुड़े मंत्र जिनका उसने जप किया है, या शिव रक्षा कवच — तो वह कर सकता है। इसके साथ, चैनल पर भगवान वीरभद्र का विषय रखा गया है, भगवती रेणुका का भी। और जिनके कुल देवी-देवता सोखा बाबा या बन्नी माता हैं, वे भी उनका ठीक से प्रयोग कर सकते हैं।

85

तंत्रोक्त विधान से कुल देवता अधिक प्रभाव देते हैं — पर उग्र देवता का प्रयोग करते समय उसे विशेष रूप से शांत करना ज़रूरी है।

तंत्रोक्त विधान से कुल देवता, और उग्र देवताओं को शांत करने की ज़रूरत

· Reviewed Sep 14, 2026 · 39:52–40:09

वक्ता कहते हैं कि वे अधिक प्रभाव देंगे, क्योंकि वे कुल के देवता हैं और काम तंत्रोक्त विधान से चल रहा है। पूरा नरसिंह माला मंत्र भी है। पर उग्र देवताओं का प्रयोग करते समय यह ध्यान रखें कि उन्हें विशेष रूप से शांत करना ज़रूरी है।

वक्ता कहते हैं कि वह अधिक प्रभाव भी देगा, क्योंकि वे कुल के देवी-देवता हैं और आप तंत्रोक्त विधान से चल रहे हैं। भगवान का पूरा नरसिंह माला मंत्र भी है, जिसका प्रयोग किया जा रहा है। तो उग्र देवताओं का प्रयोग करते समय यह ध्यान रखें: उन्हें विशेष रूप से शांत करना ज़रूरी है।

86

पूरे समय के लिए देवता के नाम पर एक बड़ी सुपारी स्थापित रखी जाती है, प्राण प्रतिष्ठा के बिना भी, प्रतीक रूप में।

देवता के नाम पर प्रतीक रूप में रखी बड़ी सुपारी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 40:10–40:32

चाहे आप कार्तिक का दीपदान कर रहे हों या धूप-दीप का प्रयोग — धूप, धूना और दीप — तो जिस देवता के नाम पर आप कर रहे हैं, कम से कम एक सुपारी स्थापित रखें, बड़ी वाली; वह बड़ी सुपारी जो पूजा की दुकान पर मिलती है। उसे उनके नाम पर रखें। भले ही उसमें प्राण प्रतिष्ठा न करें, प्रतीक रूप में उनके नाम पर रखें।

87

उसे रोज़ स्नान कराया जाता है — सादा पानी और ग्यारह चम्मच भी चलेंगे, साथ में उसका मंत्र ग्यारह बार — और रोज़ उसकी शांति की जाती है।

ग्यारह चम्मच और ग्यारह बार पाठ से रोज़ का स्नान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 40:33–40:57

वक्ता कहते हैं कि उन्हें रोज़ स्नान कराएँ — और कुछ न हो तो सादे पानी से ही। भले ही केवल उनका अपना मंत्र, उनका नव मंत्र, ग्यारह बार पढ़कर; भले ही केवल ग्यारह चम्मच से; पर स्नान ज़रूर कराएँ, और रोज़ उनकी शांति करें। प्रतीक रूप में। विस्तृत रूप में बहुत कुछ किया जा सकता है, अभिषेक आदि; वे इतना जटिल कुछ करने को नहीं कह रहे। पर कम से कम इतना ज़रूर होना चाहिए।

88

धर्म पर चलने वाले के लिए 64 मातृकाएँ आभिचारिक देवताओं को चीरने में सबसे तेज़ और तीक्ष्ण हैं — इसीलिए इस बार उन्हें सबसे आगे रखा गया।

उनकी सबसे प्रिय — धर्म पर हों तो शत्रु के विरुद्ध सबसे उग्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 40:58–41:31

वक्ता कहते हैं कि भगवती 64 मातृकाएँ सबसे प्रिय हैं। ये शत्रु को पकड़कर मारती हैं — अगर आप धर्म से युक्त हैं। जो आभिचारिक देवताओं को चीर देती हैं, जो प्रयोग और प्रभाव देने में सबसे तेज़, सबसे तीखी और सबसे तीक्ष्ण हैं, उनमें 64 मातृकाएँ, 64 योगिनियाँ आती हैं। वे कहते हैं, इसी कारण इस बार पूरे अनुष्ठान में 64 योगिनियों को सबसे आगे रखा गया, और श्रोताओं से भी करवाया गया, जो ग्रहण काल से चल रहा है।

89

64 योगिनी प्रयोग में दीपक में कम से कम दो लौंग और एक इलायची डाली जाती है; बाकी सामग्री वैसी ही रहती है।

दीपक में कम से कम दो लौंग और एक इलायची

· Reviewed Sep 14, 2026 · 41:32–41:52

उनके प्रयोग के लिए, शुरू से अब तक जो भी सामग्री बताई गई है, उसे वैसे ही रखें। एक चीज़ और मिलानी है: जब भी आप 64 योगिनियों का, मातृकाओं का प्रयोग-विधान करें, तो जो दीपक जलाएँ उसमें कम से कम दो लौंग और एक इलायची ज़रूर डालें।

वक्ता पूछते हैं, अगर श्रोता उनका प्रयोग करना चाहे, तो कैसे करेगा? इसमें शुरू से अब तक जो भी सामग्री बताई गई है, उसे वैसे ही रखें। इसमें एक चीज़ और मिलानी है। जब भी आप 64 योगिनी का, मातृकाओं का प्रयोग-विधान करें, तो दीपक में — जो दीपक आप जलाएँ उसमें — कम से कम दो लौंग और एक इलायची ज़रूर डालें।

90

एक लौंग एक बलि के बराबर मानी जाती है, इसलिए जोड़ा बलि रूप में दिया जाता है; इलायची वह उग्रता शांत करती है जो काम के बाद भी चलती रहती।

लौंग का जोड़ा बलि रूप में; इलायची से शांति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 41:53–42:19

वक्ता कहते हैं कि लौंग और इलायची का महत्व है, और लोग इसका मज़ाक उड़ाते हैं कि लौंग-इलायची से क्या होता है, तांत्रिक हर चीज़ में इन्हें डालते हैं। तांत्रिक कहते हैं कि एक लौंग एक बलि के बराबर है: यहाँ आप लौंग का जोड़ा बलि रूप में दे रहे हैं। इलायची से शांति आएगी — काम पूरा होने के बाद उनकी जो उग्रता होगी, वह शांत होगी; उनकी उग्रता लगातार नहीं चलेगी, और वे वहीं स्थिर हो जाएँगे।

91

जहाँ कोई ताकतवर शत्रु बार-बार अभिचार कर रहा हो, वहाँ 64 योगिनी प्रयोग से एक हफ़्ते के भीतर उसे परेशानी होने लगती है।

एक हफ़्ते में विरोधी की परेशानी शुरू

· Reviewed Sep 14, 2026 · 42:20–42:41

वक्ता कहते हैं, दूसरी बात: अगर आपका शत्रु बहुत ताकतवर है और बार-बार अभिचार कर रहा है, और आपको दिक्कतें हो रही हैं — आपको सच में समस्या है, ऐसा नहीं कि आपकी समस्या ठीक हो रही है — और आप 64 योगिनी प्रयोग करते हैं, तो उसकी दिक्कत शुरू हो जाएगी। एक हफ़्ता नहीं बीतेगा कि सामने वाला परेशानी में आ जाएगा।

92

आधा किलो पीली सरसों में 100 ग्राम लाल चिरमी, और चूर्ण में 100 ग्राम शुद्ध भीमसेनी कपूर मिलाया जाता है।

आधा किलो सरसों, 100 ग्राम चिरमी, 100 ग्राम कपूर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 42:42–43:11

वक्ता कहते हैं, मान लीजिए आपने आधा किलो पीली सरसों ली, तो उस आधा किलो पीली सरसों में कम से कम 100 ग्राम चिरमी रखनी होगी — लाल चिरमी, लाल गुंजा, 100 ग्राम। मिलाइए, चूर्ण बन जाएगा। इसमें कम से कम 100 ग्राम देसी कपूर मिलाइए, या जिसे पीतल कपूर कहते हैं, शुद्ध भीमसेनी कपूर। यह मूल सामग्री आपके पास होनी चाहिए।

93

64 योगिनियों के लिए हर धूने में नौ लौंग जाती हैं, बार-बार घी में डुबोकर — आठ उनके लिए और एक अपनी कुल शक्ति के लिए।

आठ लौंग, और एक कुलदेवी के लिए, तो नौ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 43:12–43:38

जब आप 64 योगिनियों के लिए करें, तो धूना देते समय, हर बार — दीपक में दो लौंग डाली गई थीं; धूने में कम से कम नौ या आठ या नौ लौंग, बार-बार घी में डुबोकर। उनके मत में कम से कम आठ लौंग ज़रूर होनी चाहिए; एक अपनी कुलदेवी के लिए, कुल शक्ति के लिए अलग हो जाती है। तो धूने के समय ही नौ लौंग डालें, और बस धूना दें।

94

तिर्यक प्रयोग के विरुद्ध चौखट पर क्या किया जाता है?

योगिनियों या बटुक भैरव के नाम पर मंगलवार और शनिवार को नींबू बलि

· Reviewed Sep 14, 2026 · 43:39–44:11 · Also a question

जब प्रचंडता थोड़ी और बढ़ गई हो, शत्रु की परेशानी शुरू हो गई हो और आपको पता हो कि चीज़ें पलट रही हैं, आपके रोग नष्ट हो रहे हैं और घर में कुछ शांति बन रही है — तब तिर्यक प्रयोग के लिए, ताकि सामने वाला शत्रु उसे न करे, या करे तो उसका असर न पड़े — जिस चौखट पर आप पूजन करते हैं और धूप-दीप जलाते हैं, वहाँ 64 योगिनी मातृकाओं के नाम पर या बटुक भैरव जी के नाम पर एक नींबू बलि दें। किसी एक नाम पर, कम से कम इन दो दिनों, मंगलवार और शनिवार को, या किसी एक दिन भी।

95

धन साधना के साथ रक्षा के प्रयोग क्यों ज़रूरी हैं?

बढ़ी हुई पौष्टिकता नकारात्मक शक्तियों को खींचती है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 44:47–45:18 · Also a question

जब भी हम लक्ष्मी से जुड़ा कोई प्रयोग करते हैं, या कोई और प्रयोग जिसमें हम पौष्टिकता बढ़ा रहे हैं, तो उस पौष्टिकता के कारण नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव — उनका आकर्षण — भी बढ़ता है। ये सब प्रयोग उसी आकर्षण के नाश के लिए हैं। साथ ही, जो धूना आप देते हैं और जो आकाश दीप जलाते हैं, वे शुभ शक्तियों को आकर्षित करते हैं, और उनके प्रभाव से नकारात्मक शक्तियाँ जल्दी नष्ट होती हैं।

96

धन साधना शुरू करने से पहले क्या करना चाहिए?

पहले स्थान और परिवार को सुरक्षित करें, किसी पर निर्भर न रहें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 45:19–45:38 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अब तक जो भी रक्षा अनुष्ठान आपने किया है, उससे अपने स्थान और परिवार को सुरक्षित करें। आप घर पर रहें या न रहें, कहीं और रहते हों, धूने की सामग्री तैयार करके परिवार को दें ताकि वे धूना कर सकें। किसी पर निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं: खुद बनाइए, खुद कीजिए।

वक्ता कहते हैं, अब तक जो भी रक्षा अनुष्ठान आपने किया है, उससे अपने स्थान और परिवार को सुरक्षित करें। आप घर पर रहें या न रहें, कहीं और रहते हों, वह धूना तैयार करके अपने परिवार को दें, और उनसे धूना करवाएँ। किसी पर निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं है। खुद बनाइए, खुद कीजिए।

97

धूना चलता रहे और घर रक्षा में हो, तब अर्थ का संकल्प लिया जाता है — ताकि अनुष्ठान शुरू होते ही कोई उत्पात न फूटे।

फिर उत्पात फूटे बिना धन का संकल्प लें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 45:39–46:14

धूना दिया जाता रहेगा, चीज़ें प्रचंड होती रहेंगी, घर और परिवार रक्षा में रहेंगे — तब, वक्ता कहते हैं, वहाँ लक्ष्मी जी की, या भगवान भैरव जी की, या किसी और देवी-देवता की साधना करें, पंचाक्षरी या कोई और, अर्थ पाने के उद्देश्य से, अर्थ की प्राप्ति की इच्छा से संकल्प लेकर। तब जो भी विपत्ति या बाधा आएगी, नष्ट होती रहेगी; ऐसा असर नहीं देगी कि अनुष्ठान किया और तुरंत उत्पात फूट पड़ा। वे कहते हैं, रक्षा का भाव लाइए।

98

शरद पूर्णिमा का अनुष्ठान दो स्वरूपों पर टिका है: भगवती अष्टलक्ष्मी और भगवान स्वर्णाकर्षण भैरव।

अष्टलक्ष्मी और भगवान स्वर्णाकर्षण भैरव

· Reviewed Sep 14, 2026 · 46:15–46:33

वक्ता कहते हैं कि शरद पूर्णिमा के दिन गृहस्थ तंत्र के माध्यम से जो अनुष्ठान होना है, उसमें मुख्य रूप से दो स्वरूपों का अनुष्ठान है: अष्टलक्ष्मी का, भगवती अष्टलक्ष्मी का — जो पिछले साल भी हुआ था — और भगवान स्वर्णाकर्षण भैरव का।

वक्ता कहते हैं, शरद पूर्णिमा के दिन गृहस्थ तंत्र के माध्यम से जो अनुष्ठान होना है, उसमें मुख्य रूप से दो स्वरूपों का अनुष्ठान है: अष्टलक्ष्मी से, भगवती अष्टलक्ष्मी — जो उन्होंने पिछले साल भी किया था — और भगवान स्वर्णाकर्षण भैरव।

99

शरद पूर्णिमा की रात गृहस्थ को क्या करने को कहा जाता है?

महापूजा की अष्टमी रात की तरह जागरण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 46:34–46:55 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि शरद पूर्णिमा की रात, संभव हो तो जागना है — पूरी रात जागना। पूर्णिमा की रात, शरद पूर्णिमा की रात जागना चाहिए। इसी तरह अष्टमी की रात भी जागी जाती है, जब महापूजा होती है। इन रातों में जागने का माहात्म्य है।

100

जागना इधर-उधर घूमना नहीं है: पूरी रात इन्द्रकृत महालक्ष्मी अष्टक का पाठ किया जाता है।

इन्द्रकृत महालक्ष्मी अष्टक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 46:56–47:21

वक्ता कहते हैं कि जागने का मतलब भूत की तरह घूमना नहीं है। उस समय, और कुछ न करें तो इन्द्रकृत महालक्ष्मी अष्टक, जो "नमस्तस्तु महामाय श्री पीठे सुर पूजते शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते" है — यह महालक्ष्मी का स्तोत्र है, अष्टक। पूरी रात इसका पाठ करें। वे कहते हैं, इसका संपुट विधि विधान कैसे करना है, यह अगले दिन बताया जाएगा।

101

एक दिव्य रात, फल को किनारे रखकर — महालक्ष्मी जब देंगी, देंगी, और तब पता चलेगा कि वे क्या देती हैं।

एक दिव्य रात, करके फल किनारे रखें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 47:22–47:45

संभव हो तो करें — केवल एक दिव्य रात। वक्ता कहते हैं, आप बहुत कुछ समझ जाएँगे। करें और फल किनारे रख दें: महालक्ष्मी जब देंगी, देंगी, और जब देंगी तब समझ आएगा। जब दे देंगी, तब पता चलेगा कि वे क्या देती हैं। पर यह शरद पूर्णिमा की रात करें, और केवल लक्ष्मी पाने के उद्देश्य से न करें।

102

धन केवल पैसा नहीं है: स्वास्थ्य भी धन है और बुद्धि भी धन है, और वे इनमें भी कृपा करती हैं।

स्वास्थ्य और बुद्धि भी धन हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 47:46–48:07

वक्ता कहते हैं कि धन केवल पैसे को नहीं कहते — यह आप जानते हैं। हमारा स्वास्थ्य भी हमारा धन है; हमारी बुद्धि भी हमारा धन है। किसी का बेटा हो जिसमें बुद्धि न हो, तो बेचारा दिक्कत में रहता है। तो जब आप महालक्ष्मी का प्रयोग, विधान करते हैं, तो वह भी आपका धन है, और उसमें भी वे कृपा करती हैं। ऐसा नहीं कि वे केवल पैसा देती हैं। इसलिए उस रात का महत्व समझें।

103

शरद पूर्णिमा पर खीर के साथ क्या किया जाता है?

चाँद के नीचे मिट्टी के बर्तन में खीर, सुबह खाई जाती है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 48:08–48:29 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि क्योंकि अमृत वर्षा होती है, हम खीर बनाते हैं, उसे मिट्टी के बर्तन में रखकर लाल कपड़े से ढकते हैं, और छत पर वहाँ रखते हैं जहाँ चाँद की रोशनी पड़ती है — यह ज़रूर रखना है, चाँद की किरणों के सामने। सुबह पूजन आदि करके इसे खाया भी जाता है; कुछ जगह इसे बासी मुँह खाना होता है। अपने क्षेत्र का जो नियम हो, उसके अनुसार करें।

104

इस बार पूरी तरह तंत्रोक्त अष्टलक्ष्मी अनुष्ठान और स्वर्णाकर्षण भैरव विधान में सप्तशती का प्रयोग जोड़ा गया है।

तंत्रोक्त अष्टलक्ष्मी याग में जोड़ा गया सप्तशती प्रयोग

· Reviewed Sep 14, 2026 · 48:30–48:52

वक्ता कहते हैं कि इन सब बातों को ध्यान में रखकर इस बार अनुष्ठान के विधान बढ़ाए जा रहे हैं। इसमें सप्तशती का प्रयोग भी रखा जा रहा है। अष्टलक्ष्मी अनुष्ठान तो होगा ही, पूरी तरह तंत्रोक्त, सपरिया के साथ; जो याग होता है वह होगा; और स्वर्णाकर्षण भैरव जी का भी होगा।

वक्ता कहते हैं, और इन सब बातों को ध्यान में रखकर, इस बार अनुष्ठान के विधान और बढ़ाए जा रहे हैं। अब इसमें सप्तशती का प्रयोग भी रखा जा रहा है। अष्टलक्ष्मी अनुष्ठान तो होगा ही, पूरी तरह तंत्रोक्त, सपरिया के साथ; जो याग होता है वह होगा; और भगवान स्वर्णाकर्षण भैरव जी का भी होगा।

105

इस बार अलग साधक, खासकर विंध्य क्षेत्र के, और जया दुर्गा व महालक्ष्मी स्वरूप के लिए मध्यम चरित का चौथा अध्याय नया जोड़ा गया।

विंध्य क्षेत्र के साधक, और मध्यम चरित का चौथा अध्याय

· Reviewed Sep 14, 2026 · 48:53–49:14

वक्ता कहते हैं कि इस बार साधक अलग होंगे — पिछली बार वाले अब नहीं हैं; इस बार दूसरे साधक होंगे, खासकर विंध्य क्षेत्र के। नया जोड़ दुर्गा सप्तशती में भगवती के मध्यम चरित का चौथा अध्याय है, जो खास तौर पर जया दुर्गा और महालक्ष्मी स्वरूप को समर्पित है।

106

उसे संपुट बनाकर आठों लक्ष्मियों में से हर एक का अलग याग और सपरिया होगा — एक तरह से आठ संपुट हवन।

आठों में हर एक का अलग याग, अपने विधान के साथ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 49:15–49:35

वक्ता कहते हैं कि उसे संपुट बनाकर आठों लक्ष्मियों में से हर एक का अलग याग होगा। इस बार इसके लिए एक खास विधान बताया गया है। यानी हर लक्ष्मी — चाहे धन लक्ष्मी हो या संतान लक्ष्मी — का अपना अलग विधान होगा, और यह आठ के ऊपर अतिरिक्त होगा। साथ में उनका सपरिया होगा, ताकि एक तरह से इस बार आठ संपुट हवनों का विधान किया जा रहा है।

107

लक्ष्मी प्रयोगों में भगवती को प्रिय मखाने की खीर या पायस से आठों लक्ष्मियों की आहुतियाँ दी जाती हैं।

मखाना, जो लक्ष्मी के काम में भगवती को खास प्रिय है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 49:36–50:06

वक्ता कहते हैं कि लक्ष्मी हवन की पद्धति में खास तौर पर मखाना — लक्ष्मी से जुड़े प्रयोगों में लक्ष्मी देने वाली भगवती को मखाना बहुत प्रिय है। तो मखाने की खीर, या मखाने के दाने से बना पायस, विधि विधान से तैयार होगा, और उसी से आठों लक्ष्मियों के लिए आहुति की पूरी प्रक्रिया होगी, दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय के संपुट विधान के साथ।

108

इस बार विधान लंबा है और संपुट से अलग है; रजिस्ट्रेशन हमेशा की तरह है, और कोई भी उस रात अपना विस्तृत विधान कर सकता है।

लंबा विधान, रजिस्ट्रेशन हमेशा की तरह

· Reviewed Sep 14, 2026 · 50:07–50:25

वक्ता कहते हैं कि संपुट अलग होगा और यह अलग होगा; इस बार विधान कुछ लंबा हो रहा है, और ज़्यादा, पर इसका उपयोग होगा। यह प्रायोगिक विधान इस बार अलग से होगा, खासकर आठों लक्ष्मियों के लिए। श्रोता इसमें जुड़ सकते हैं, और रजिस्ट्रेशन का विवरण हमेशा जैसा होगा। श्रोता खुद जो भी विस्तृत विधान करना चाहे, उस रात करे; यह भी अगले दिन बताया जाएगा।

109

संस्कृत का ज्ञान बाधा नहीं — महालक्ष्मी अष्टक का पाठ साधारण है, इसे कोई भी कर सकता है।

महालक्ष्मी अष्टक का पाठ कोई भी कर सकता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 50:26–50:45

वक्ता कहते हैं कि उनकी इच्छा यह है: जो लोग संस्कृत पाठ में बहुत जानकार नहीं हैं — कोई बात नहीं। पर महालक्ष्मी अष्टक का पाठ सब कर सकते हैं; यह साधारण पाठ है।

वक्ता कहते हैं कि अब उनकी इच्छा यह है: जिनके बारे में वे इस आधार पर चल रहे हैं कि आप संस्कृत पाठ करने में बहुत जानकार नहीं हैं — तो कोई बात नहीं। पर महालक्ष्मी अष्टकम् का पाठ सब कर सकते हैं। यह साधारण पाठ है।

110

वहाँ आठ रूपों का विधान चलेगा, उसी दिन घर पर महालक्ष्मी अष्टक का संपुट विधान करना है।

घर पर महालक्ष्मी अष्टक का संपुट विधान, टेलीग्राम पर डाला जाएगा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 50:46–51:08

वक्ता कहते हैं कि अगर उनकी ओर से महालक्ष्मी के आठों लक्ष्मी रूपों का इतना बड़ा विधान हो रहा है, तो उसी दिन आप भी अपने घर पर महालक्ष्मी अष्टक का संपुट विधान करें। और अगर वे अगले दिन लाइव नहीं आते, तो इसे लिखकर डाल दिया जाएगा ताकि श्रोता उसके अनुसार कर सकें।

वक्ता कहते हैं कि अगर उनकी ओर से महालक्ष्मी के आठों लक्ष्मी स्वरूपों का इतना बड़ा विधान हो रहा है, तो उसी के साथ उस दिन आप भी अपने घर पर महालक्ष्मी अष्टकम् का संपुट विधान करें। और अगर वे अगले दिन लाइव नहीं आते, तो वे इसे लिखकर डाल देंगे ताकि श्रोता उसके अनुसार कर सकें।

111

हो सके तो पूरी रात, या नौ, 21 या 27 बार — 108 ज़्यादातर से नहीं होगा — हवनात्मक या पाठात्मक, पर करें ज़रूर।

पूरी रात, या कम से कम एक बार — नौ, 21 या 27 बार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 51:09–51:31

वक्ता कहते हैं कि वह विधान या तो पूरी रात करें, या जितना हो सके — चाहे एक ही बार; नौ बार हो, 21 बार हो, 108 बार हो। वे कहते हैं कि 108 नहीं हो पाएगा, इतना वे समझते हैं, पर 27 बार आराम से हो सकता है। हवनात्मक करना हो तो हवनात्मक करें, पाठात्मक करना हो तो पाठात्मक करें — पर करें।

112

जिन्होंने 64 योगिनी और दुर्गा एकाक्षरी किया है, वे खास तौर पर इसे न छोड़ें — यह एक रात का प्रयोग है, और इस साल सोमवार को है।

जिन्होंने 64 योगिनी और दुर्गा एकाक्षरी किया है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 51:32–51:56

वक्ता कहते हैं कि खास तौर पर जिन्होंने 64 योगिनी, दुर्गा एकाक्षरी और ये सब किया है, वे इसे ज़रूर करें — यह केवल एक रात का प्रयोग है। क्योंकि जिस तत्व की आपको, जीवन को, सबको ज़रूरत है: धन सबको चाहिए, ऐसा कोई नहीं जिसे न चाहिए। और धन केवल यही नहीं है: बुद्धि भी धन है, समझ भी हमारा धन है, प्रज्ञा धन है। उस चीज़ का संकल्प लेकर उस रात पाठ या हवन करें, क्योंकि यह खास रात है; और यह सोमवार को है।

113

सामूहिक हवन जागने की जगह नहीं ले सकता — दिन में सोएँ और रात जागें, कम से कम सुबह चार बजे तक।

नहीं — दिन में सोएँ और कम से कम सुबह चार बजे तक जागें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 51:57–52:29

वक्ता कहते हैं कि यह न सोचें कि सब कुछ आपके लिए करवाया जा रहा है, इतना बड़ा हवन हो रहा है, आपने यहाँ संकल्प दे दिया और अब आराम करें — लक्ष्मी जी आ गईं, नैवेद्य तैयार है, दीपक जल रहा है, वे रात भर जागेंगी, हम सो जाते हैं। ऐसा न करें। आप जागेंगे तभी काम होगा। दिन में सोएँ और रात में जागें — कम से कम सुबह चार बजे तक; चार के बाद नहाकर, सुबह का पूजन करके, सूर्य को अर्घ्य देकर सो सकते हैं, पर पूरी रात जागने की कोशिश करें।

114

कामाख्या के बल पर मशहूर एक वैष्णव गुरु ने प्रमाण दिया कि सप्तशती का पाठ रात का नहीं — इसका उत्तर यहाँ इस प्रमाण से कि भगवती रात्रि-स्वरूपा हैं।

यह दावा कि सप्तशती का पाठ रात में नहीं करना चाहिए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 52:41–53:18

वक्ता कहते हैं कि वे साफ़ बोलेंगे और कुछ लोगों को बुरा लगेगा, पर उनका मकसद यह नहीं है। जो लोग वैष्णव परंपरा से बहुत प्रभावित हैं, वे शाक्त मत को, या देवी पूजा को भी, उसी से जोड़ने लगते हैं। आजकल एक नए महाराज जी कामाख्या के बल पर बहुत मशहूर हो रहे हैं — वैष्णव हैं, पर पूरी तरह कामाख्या पर बोलते हैं। वक्ता कहते हैं कि उन महाराज ने प्रमाण दिया है कि सप्तशती का पाठ रात में नहीं करना चाहिए, यह नहीं करना है; और उन्होंने भी ग्रुप में प्रमाण दिया है कि माई भगवती रात्रि-स्वरूपा हैं और उनका पूजन और पाठ रात में ही होगा।

115

वैष्णव परंपरा में हों तो वैष्णव नियम मानें — पर देवी परंपरा में, कौल या शाक्त गुरु के अधीन, खिचड़ी न पकाएँ।

वैष्णव परंपरा या देवी परंपरा, एक को ही ठीक से मानें — दोनों को मिलाकर खिचड़ी न बनाएँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 53:19–53:46

वक्ता कहते हैं कि अगर आपको वैष्णव परंपरा माननी है और उसमें यह है कि रात में नहीं होता — हालाँकि, वे जोड़ते हैं, रात में होता है — तो वहाँ वही मानें। पर अगर आप देवी परंपरा में हैं, और आपके गुरुजी कौल साधक हैं, शाक्त में हैं, तो खिचड़ी न पकाएँ।

वक्ता कहते हैं कि अगर आपको वैष्णव परंपरा माननी है, और उसमें यह है कि रात में नहीं होता — हालाँकि रात में होता है — तो वहाँ का जो है, वही मानें। अगर आप देवी परंपरा में हैं, और आपके गुरुजी कौल (कौल संप्रदाय) साधक हैं, शाक्त में हैं, तो खिचड़ी न पकाएँ।

116

देवी साधक के लिए, गुरु हों या न हों, साधना रात्रि काल की है — यह बहाना न करें कि रात में राक्षसी साधनाएँ होती हैं, वीर साधक बनें।

साधना रात में होनी चाहिए — वीर साधक बनें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 53:47–54:08

वक्ता कहते हैं कि अगर गुरु नहीं हैं, और आपकी कुलदेवी हैं, आप देवी परंपरा में हैं, बिना गुरु के भी देवी साधक होकर कर रहे हैं, इस चैनल को सुनकर कर रहे हैं — तो उन्होंने आपको साफ़ बता दिया है: साधना रात्रि काल में ही होनी चाहिए। साधक बनें, वीर साधक बनें। यह सब न करें कि नहीं, हम रात में सोएँगे, रात में राक्षसी साधनाएँ होती हैं।

117

चामुंडा उन्हीं राक्षसों पर राज करती हैं और आप उनके सेवक हैं; पूरा रात्रि सूक्त जगदंबा को समर्पित है, और भगवती रात्रि-स्वरूपा हैं।

भगवती रात्रि-स्वरूपा हैं और उन राक्षसों पर राज करती हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 54:09–54:23

वक्ता पूछते हैं, कौन से राक्षस? उन राक्षसों पर राज करने वाली भगवती चामुंडा हैं, और आप उनके सेवक हैं। भगवती रात्रि-स्वरूपा हैं। पूरा रात्रि सूक्त जगदंबा को समर्पित है — और आप यहाँ भाग रहे हैं कि नहीं, हम रात में नहीं करेंगे। रात में ही तो होगा।

वक्ता पूछते हैं, कौन से राक्षस, भाई? उन राक्षसों पर राज करने वाली भगवती चामुंडा हैं, और आप उनके सेवक हैं। भगवती रात्रि-स्वरूपा हैं। पूरा रात्रि सूक्तम् जगदंबा को समर्पित है — और आप यहाँ भाग रहे हैं कि नहीं, हम रात में नहीं करेंगे। रात में ही तो होगा।

118

घरवाले कहेंगे कि तांत्रिक बन गया, यह आपको संभालना है — माई की सेवा में शरीर को नींद आती है, रातभर चैटिंग में बिल्कुल नहीं; जैसी आपकी प्राथमिकता, वैसा शरीर।

परिवार को संभालें; शरीर वही करता है जो आपकी प्राथमिकता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 54:24–54:45

वक्ता कहते हैं कि अब आपके घर-परिवार के लोग डरेंगे — कि यह तांत्रिक बन गया है, रात में जप करता है; यह आपको संभालना है। वे कहते हैं कि गर्लफ्रेंड से चैट करते हुए रात में नींद नहीं आती, सुबह तक चैट करते हैं, पूरे दो दिन चैट करते हैं, और झपकी नहीं आती; पर माई की सेवा में जाते हैं तो झपकी आती है, तबियत खराब होती है, सिर दर्द होता है, कमर दर्द होता है। वे कहते हैं कि जैसी आपकी प्राथमिकता है, वैसा ही आपका शरीर आपके साथ करेगा।

119

जहाँ जगदंबा को प्राथमिकता नहीं दी जाती और कुछ नहीं मिलता, वहाँ कमी अपनी ही है, किसी और की नहीं।

गलती आपकी अपनी है — शरद पूर्णिमा की रात का महत्व समझें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 54:46–54:59

वक्ता कहते हैं कि आप जगदंबा को प्राथमिकता नहीं दे रहे, और यहाँ रोते हैं कि कुछ प्राप्त नहीं हो रहा — इसमें गलती और कमी आपकी है, किसी और की नहीं; यह ध्यान रखें। तो शरद पूर्णिमा की रात का महत्व समझें: रात में जागें।

वक्ता कहते हैं कि आप जगदंबा को प्राथमिकता नहीं दे रहे, और यहाँ रो रहे हैं कि हमें प्राप्त नहीं हो रहा। तो इसमें गलती, कमी आपकी है, किसी और की नहीं। यह ध्यान रखें। तो शरद पूर्णिमा की रात का महत्व समझें। रात में जागें।

120

जब दो-तीन बजे जप आगे न हो सके, तब समर्पण और आरती करके छत पर चंद्रमा की किरणों में टहलें।

समर्पण और आरती, फिर चाँदनी में टहलना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 55:00–55:22

वक्ता कहते हैं कि जागकर जप आदि करें — जितना कर सकें; वे यह नहीं कहते कि पूरी रात करना है। जागना पूरी रात है, पर जप जितना कर सकें उतना करें। जब दो-तीन बजे तक, दो बजे तक जप कर लिया, और लगे कि अब जप नहीं हो पाएगा, शरीर साथ नहीं दे रहा, तो समर्पण करें, आरती करें, और उठ जाएँ। उठकर छत पर चलें, टहलें, और चंद्रमा की किरणें शरीर पर पड़ने दें।

121

पूर्णिमा की रात साधिका पायल पहनकर छत पर चले और पड़ोसी डरें तो डरें — पर जागें, काम हो जाएगा।

पायल पहनकर चलें, पड़ोसी डरें तो डरें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 55:23–55:59

वक्ता कहते हैं कि अगर आप स्त्री हैं, कन्या हैं, तो पायल पहनकर टहलें। आसपास के लोग डरें — कि इसकी छत पर चुड़ैल चल रही है, इससे डरकर रहना है, इसने कोई देवी सिद्ध कर ली है और रात में घूमती है। उन्हें डराएँ, दुनिया पर रौब रखें; हाँ, यह साधिका है, हम साधक हैं, यह लाल टीका लगाती है — पूर्णिमा में रात को टहलकर सबको डराएँ, ताकि उन्हें पता चले कि पूर्णिमा की रात इसके घर में देवी-देवता घूम रहे थे। पर जागें, सोएँ नहीं, आपका काम हो जाएगा; और आपके दुश्मन ऐसे ही डर से मर जाएँगे कि इसकी छत पर रात को चुड़ैल चलती है।

122

किसी से दिन-रात जप करने को नहीं कहा गया: एक-दो घंटे भी, ग्यारह से एक बजे तक, यही मुख्य है।

एक-दो घंटे भी, ग्यारह से एक बजे तक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 56:05–56:35

वक्ता कहते हैं कि कॉर्पोरेट मज़दूर दिन-रात जप नहीं कर सकते, एक-दो घंटे — और उन्होंने दिन-रात करने को कहाँ कहा? वे बस इतना कह रहे हैं: शरद पूर्णिमा की रात जागने की कोशिश करें। एक-दो घंटे भी मुख्य हैं, ग्यारह बजे से एक बजे तक। उन दो घंटों में कम से कम उतना करें जितना हो सके, जितना आपका शरीर साथ दे।

123

बगलामुखी में काली हल्दी, न मिले तो पीली, और देवी को सौम्य रखने के लिए केसर; 64 योगिनी में लौंग और इलायची।

बगलामुखी की हल्दी और केसर, और योगिनियों की लौंग और इलायची

· Reviewed Sep 14, 2026 · 56:36–57:05

वक्ता साफ़ करने के लिए फिर से बताते हैं ताकि खिचड़ी न पके। जब बगलामुखी माँ का प्रयोग बना रहे थे, सामग्री पीली सरसों और लाल चिरमी थी; उसमें काली हल्दी मिली तो वह, नहीं तो पीली हल्दी, और देवी को सौम्य रखने के लिए केसर भी लगा सकते हैं। 64 योगिनी में लौंग और इलायची ली थी।

124

काली के स्तोत्र, शतनाम या कवच में आधा किलो सरसों और 100 ग्राम चिरमी में 50 ग्राम काली मिर्च — यह धूना है, हवन नहीं।

काली मिर्च — और यह धूना है, हवन नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 57:06–57:36

वक्ता कहते हैं कि जब आप रक्षा के लिए भगवती काली के स्तोत्र, शतनाम, कवच आदि का प्रयोग बना रहे हैं — और यहाँ, वे ज़ोर देते हैं, हम धूना कर रहे हैं, हवन नहीं; कवच का हवन नहीं हो रहा, हम उसे चार्ज करके धूना कर रहे हैं — तो इसमें काली मिर्च भी ले सकते हैं। यानी आधा किलो पीली सरसों, 100 ग्राम लाल चिरमी, और उसमें 50 ग्राम काली मिर्च। पीसकर पाउडर बना लें। कपूर वही 100 ग्राम रहेगा।

125

जहाँ काली का कोई उग्र स्वरूप घर की कुलदेवी हो, वहाँ उनकी ऊर्जा नियंत्रण में रखने के लिए 64 योगिनी वाली लौंग और बलि जोड़ी जाती है।

64 योगिनी वाली लौंग जोड़ें, और बलि दी जा सकती है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 57:37–57:55

वक्ता कहते हैं कि अगर आपके घर में भगवती काली का कोई उग्र स्वरूप पूजा जाता है — कुलदेवी के रूप में जगदंबा का उग्र स्वरूप — तो इसमें वही 64 योगिनी वाली लौंग आदि का प्रयोग करना है। उग्रता आदि के लिए बलि आदि दे सकते हैं, ताकि माँ की ऊर्जा नियंत्रण में रहे; क्योंकि, वे याद दिलाते हैं, हम प्रयोग बना रहे हैं।

126

प्रयोग सिद्धि नहीं, किसी चीज़ का सीधा इस्तेमाल है, इसलिए पूरे समय सावधान रहें और देवता को प्रसन्न रखें।

आप सिद्धि नहीं कर रहे — किसी चीज़ का सीधा इस्तेमाल कर रहे हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 57:56–58:10

वक्ता कहते हैं कि आप यहाँ सिद्धि नहीं कर रहे; आप किसी चीज़ का सीधा इस्तेमाल कर रहे हैं। प्रयोग में सावधान रहना पड़ता है और देवता को प्रसन्न रखना पड़ता है। और अगर किसी भी पल लगे कि हाँ, हमसे कोई अपराध हो गया है — जैसे अशुद्ध शरीर से धूना दे दिया, भाव में बहकर कि "मेरा प्रेम शुद्ध है, मैं अशुद्ध शरीर में भी शुद्ध हूँ", और दे दिया —

127

जहाँ अपराध लगे, वहाँ अगले दिन 'क्षान्तिरूपेण संस्थिता' का जप और दूध, दही और गुड़ से शिव का अभिषेक।

क्षान्तिरूपेण मंत्र और दूध, दही, गुड़ से अभिषेक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 58:11–58:25

वक्ता कहते हैं कि फिर देर न करें: अगले दिन चरण पकड़कर "क्षान्तिरूपेण संस्थिता" मंत्र का जप करें। जान-बूझकर गलती न करें — वे कहते हैं कि यह बार-बार कह रहे हैं। और दूध, दही और गुड़ से शिव जी का अभिषेक करें, और बार-बार क्षमा माँगें।

वक्ता कहते हैं कि फिर देर न करें। अगले दिन चरण पकड़कर "क्षान्तिरूपेण संस्थिता" मंत्र का जप करें। जान-बूझकर गलती न करें। वे कहते हैं कि यह बार-बार कह रहे हैं। और दूध, दही और गुड़ से शिव जी का अभिषेक करके बार-बार क्षमा माँगें।

128

आम गलती यह होगी कि कोई दोबारा बताने वाला यह सोचकर काली मिर्च बगलामुखी के प्रयोग में डाल दे कि इससे ऊर्जा बढ़ेगी।

काली की काली मिर्च बगलामुखी के प्रयोग में डालना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 58:26–58:45

वक्ता कहते हैं कि अब जो लोग — जैसे उन्होंने कहा कि भगवती काली के मंत्रों का प्रयोग बनाते समय काली मिर्च — कोई श्रोता इसे अपने चैनल पर बताएगा और भगवती बगलामुखी में काली मिर्च डाल देगा कि हाँ, इससे ऊर्जा और बढ़ेगी। तब वही भ्रम पैदा होगा। वे कहते हैं, खिचड़ी न पकाएँ; यह ध्यान रखें।

वक्ता कहते हैं कि और जो लोग अब, जैसे हमने कहा कि जब भगवती काली के मंत्रों का प्रयोग बनाते हैं, तो काली मिर्च — अब कोई श्रोता जब इसे अपने चैनल पर बताएगा, तो वह भगवती बगलामुखी में ही काली मिर्च डाल देगा कि हाँ, इससे ऊर्जा और बढ़ेगी। तब वही भ्रम पैदा होगा। खिचड़ी न पकाएँ। यह ध्यान रखें।

129

जहाँ देवी पहले से उग्र हों, वहाँ गुग्गुल लगाया जाता है, ताकि उनकी प्रचंड ऊर्जा काम पूरा करे और बाद में सौम्य हो जाए।

धूने में गुग्गुल, ताकि ऊर्जा बाद में सौम्य हो जाए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 58:46–59:07

वक्ता कहते हैं कि अगर कोई देवी पहले से उग्र हैं और आप उनका प्रयोग बना रहे हैं, तो वहाँ धूने के समय गुग्गुल लगेगा। गुग्गुल इसलिए लगता है ताकि भगवती की ऊर्जा, जो पहले से इतनी प्रचंड है, हमारे अनुसार ढलकर हमारा काम पूरा करे — पर बाद में सौम्य और कल्याणकारी हो जाए।

वक्ता कहते हैं कि अगर कोई देवी पहले से ही उग्र हैं, और आप उनका प्रयोग बना रहे हैं, तो वहाँ गुग्गुल लगेगा, धूने के समय। गुग्गुल इसलिए लगेगा ताकि भगवती की ऊर्जा, जो पहले से इतनी प्रचंड है, हमारे हिसाब से ढलकर हमारे काम पूरे करे, पर उसके बाद सौम्य और कल्याणकारी हो जाए।

130

गुग्गुल की पाँच या सात छोटी गोलियाँ, बार-बार घी में डुबोकर, धूने पर रखी जाती हैं — यह हर शक्ति के लिए है, केवल इसी के लिए नहीं।

घी में डुबोई पाँच या सात छोटी गोलियाँ, हर शक्ति के लिए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 59:08–59:23

वक्ता कहते हैं कि इसके लिए जब हम धूना करेंगे, तो गुग्गुल डालेंगे — गुग्गुल की पाँच या सात छोटी गोलियाँ बनाकर, उन्हें बार-बार घी में डुबोकर, उन्हें भी धूने पर रख देंगे। गुग्गुल की खुशबू पूरे घर में फैलेगी। हालाँकि, वे कहते हैं, यह सबके लिए हो सकता है: गुग्गुल का प्रयोग हर शक्ति के लिए किया जा सकता है।

वक्ता कहते हैं कि इसके लिए जब हम धूना करेंगे, तो उसमें गुग्गुल डालेंगे — गुग्गुल की पाँच या सात छोटी गोलियाँ बनाकर, उन्हें बार-बार घी में डुबोकर, उन्हें भी धूने पर रख देंगे। गुग्गुल की खुशबू पूरे घर में फैलेगी। हालाँकि यह सबके लिए हो सकता है: गुग्गुल का प्रयोग हर शक्ति के लिए किया जा सकता है।

131

डायन विद्या के प्रयोग का पूरा तोड़ विधि विधान चैनल पर पहले से है, और सहायता के लिए महाभैरव की शरणागति ली जा सकती है।

तोड़ विधान चैनल पर पहले से है; महाभैरव की शरणागति लें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 59:31–59:47

राहुल कुमार नाम के एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि अगर डायन विद्या का प्रयोग है, तो उसका पूरा तोड़ विधि विधान चैनल पर बताया जा चुका है। पहले थोड़ा धैर्य से सुनें — आपका कॉन्सेप्ट साफ़ हो जाएगा, और फिर आप कर पाएँगे। आप महाभैरव आदि की शरणागति लेकर उनकी सहायता ले सकते हैं।

132

शासन के बिना साधक की बिगड़ी प्रवृत्तियों पर लगाम नहीं लगती — कोई एकदम इतना परिपक्व नहीं होता कि अपना सही-गलत खुद समझ ले।

शासन के बिना मन नियंत्रण में नहीं रहता, और दुष्प्रवृत्तियाँ बेरोक चलती हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 59:48–1:00:33

वक्ता कहते हैं कि महादेव जी ने मन में हिम्मत नहीं हारी है; आपको कोई चाहिए जो सख्ती से थामे। जब आप पर राज करने वाला कोई नहीं होता, तो मन भी नियंत्रण में नहीं आ पाता। आजकल गुरु लोग भी — अगर वे आपको चार बार डाँटें और समझाएँ, तो नियंत्रण आएगा; पर अगर आप दूसरे स्वभाव के हैं, तो उन्हें चार गालियाँ देकर भाग जाएँगे। शासन न होने का मतलब है कि साधक की बिगड़ी प्रवृत्तियों पर लगाम नहीं लग पाती। डाँटने, बोलने और नियंत्रण करने वाला कोई होना चाहिए, तभी आपकी बुरी प्रवृत्तियों पर लगाम लगेगी — क्योंकि कोई साधक एकदम इतना परिपक्व नहीं होता कि अपना सही-गलत समझ ले, कि कब, कहाँ, कैसे और क्या करना है।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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