गृहस्थ के घर में बटुक भैरव — अष्टोत्तर शतनाम अनुष्ठान, खैर की लकड़ी का हवन, और महाभैरव का आवाहन कब न करें
बटुक भैरव की उपासना और अभिचार के उपायों पर।
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क्या गृहस्थ के लिए घर में भैरव पूजा अनिवार्य है?
गृहस्थ के कर्तव्य के रूप में भैरव की सेवा पूजा
वक्ता कहते हैं कि घर में भैरव जी की सेवा पूजा अनिवार्य है, और हर गृहस्थ को घर में बटुक भैरव जी की पूजा करनी चाहिए। वे आगे बताते हैं कि इस सत्र में यह भी आएगा कि जप के लिए कौन-से मंत्र लिए जा सकते हैं, और जिस घर पर बहुत भारी अभिचार हो, वह क्या करे।
वे याद दिलाते हैं कि इस विषय पर पहले भी कई बार बात हो चुकी है: घर में भैरव जी की सेवा पूजा अनिवार्य है, और हर गृहस्थ को घर में बटुक भैरव जी की पूजा करनी चाहिए। आज वे यह लेंगे कि साधारण पूजा कैसे की जाए, और जप आदि किन मंत्रों से किया जाए। वे कहते हैं कि मंत्रों को लेकर तरह-तरह के प्रश्न उठते हैं — कि तंत्रोक्त मंत्रों से जप करें तो उनका क्या प्रभाव होगा, और किस प्रकार करें। फिर वे वह भेद बताते हैं जिस पर पूरा सत्र टिका है। एक गृहस्थ का घर ऐसा है जहाँ सब कुछ कमोबेश ठीक चल रहा है, बस छोटे-मोटे उतार-चढ़ाव हैं जो हमेशा रहते हैं — शत्रु तो सबके होते हैं, वे कहते हैं, उतना ठीक है। पर किसी के घर में बहुत तीव्र अभिचार है, बहुत अधिक अभिचार चल रहा है, और घर के लोग उससे त्रस्त हो चुके हैं। ऐसे घर में भैरव जी की पूजा कैसे हो, यह भी आज का विषय है।
हर गृहस्थ को बटुक भैरव की कृपा क्यों पानी चाहिए?
परिवार पालने की सामर्थ्य के रूप में भैरव कृपा
वक्ता कहते हैं कि भैरव के स्वरूपों में बटुक भैरव की कृपा पाना हर गृहस्थ के लिए कुछ न कुछ अनिवार्य होना चाहिए, क्योंकि परिवार के भरण-पोषण की सामर्थ्य केवल भैरव कृपा से ही मिलती है। भैरव कृपा करें तो अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती।
वक्ता कहते हैं कि भैरव के स्वरूपों में बटुक भैरव की कृपा पाना हर गृहस्थ के लिए कहीं न कहीं अनिवार्य होना चाहिए। परिवार का भरण-पोषण करने की सामर्थ्य केवल भैरव कृपा से ही मिलती है। भैरव कृपा करें तो अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती।
भैरव कृपा घर के लिए वास्तव में क्या करती है?
पुरुषार्थ, बल और कुल का रक्षण
शरीर में पुरुषार्थ, बल, परिवार की रक्षा की सामर्थ्य, और जिम्मेदारी उठाना और निभाना। इनके साथ, यदि कोई टेढ़ी नज़र या कोई निकृष्ट या नकारात्मक शक्ति — चाहे जीवित व्यक्ति हो या मृत आत्मा — परिवार को हानि पहुँचाने की कोशिश करे, तो परिवार की रक्षा के लिए वही भैरव तत्त्व काम करता है।
भैरव कृपा शरीर में पुरुषार्थ, बल, परिवार की रक्षा की सामर्थ्य, और अपने दायित्व को उठाना और पूरा करना देती है। वक्ता कहते हैं कि इन सबके साथ, यदि कोई कुटिल या कुदृष्टि, कोई निकृष्ट शक्ति या नकारात्मक शक्ति — चाहे वह जीवित व्यक्ति हो या मृत आत्मा — किसी भी तरह आपके परिवार को कष्ट देने का प्रयास करे, तो उस परिवार के रक्षण के लिए वही भैरव तत्त्व काम करता है। वे रक्षा करते हैं, पालन करते हैं, बढ़ाते हैं। उनका काम है कुल की रक्षा करना और कुल को मज़बूत करना, हर तरह से — आर्थिक, भौतिक या आध्यात्मिक।
भैरव की उपासना करने वाले व्यक्ति में कौन-से गुण आते हैं?
उपासक दूसरों की रक्षा और पालन करने वाला बन जाता है
वक्ता कहते हैं कि भैरव उपासना करने वालों में ऐसे गुण अपने आप आ जाते हैं कि वे दूसरों की रक्षा करते हैं, उन्हें बढ़ाते हैं और पालते हैं। जिस परिवार के मुखिया पर परिवार की जिम्मेदारी है, उस पर भैरव की कृपा हो तो वह अपनी सारी जिम्मेदारियाँ बिना बाधा और प्रसन्नता से उठाता है।
वक्ता कहते हैं कि जो भैरव जी की उपासना करते हैं, उनमें इस तरह के गुण अपने आप आने लगते हैं — कि वे दूसरों का रक्षण और संवर्धन करते हैं, और उनका भरण-पोषण भी। परिवारों के मुखिया, जिन पर परिवार की जिम्मेदारी है, उन पर भैरव की कृपा हो तो वे अपने परिवार के सारे कर्तव्य निष्कंटक और प्रसन्नता से अवश्य उठाएँगे।
किसी देवता की कृपा का वास्तव में क्या अर्थ है?
उपासक में देवता के अपने गुणों का विकास ही कृपा है
वे कहते हैं कि यहाँ भैरव की कृपा का तात्पर्य बस इतना है: उनसे जुड़े गुणों का विकास। वे हनुमान जी का उदाहरण देते हैं, जो सेवक हैं — उनकी उपासना करो तो भीतर स्वामी-भक्ति जागती है; भैरव जी की उपासना करो तो समर्पण का भाव जागता है, अपने आराध्य के प्रति भी और परिवार के कर्तव्यों के प्रति भी।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ भैरव की कृपा का तात्पर्य बस इतना है कि उनसे जुड़े गुण विकसित हों। उदाहरण के लिए वे हनुमान जी को लेते हैं। हनुमान जी सेवक हैं; वे श्री राम जी के दरबार में सेवा भाव में रहते हैं और उनका हर काम पूरा करते हैं। हनुमान जी की सेवा पूजा की जाए तो अपने भीतर कहीं न कहीं स्वामी-भक्ति जागती है। इसी तरह भैरव जी की सेवा पूजा की जाए तो कहीं न कहीं समर्पण का भाव जागता है — अपने आराध्य के प्रति, और अपने परिवार के कर्तव्यों के प्रति भी। वे जोड़ते हैं कि समाज में जो लोग समाज की रक्षा और सनातन के कल्याण के मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं — कि हमें सनातन की रक्षा करनी है और उसका कल्याण करना है — उन्हें भैरव जी की उपासना अवश्य करनी चाहिए।
घर में बटुक भैरव को स्थान कैसे दिया जाता है?
प्रतीकात्मक स्वरूप के रूप में त्रिशूल, और उसका आकार
वक्ता कहते हैं कि किसी परंपरा में दीक्षा लेकर उसके बाद उपासना करें तो बहुत अच्छी बात है। नहीं तो घर में बटुक भैरव को त्रिशूल पर उनके प्रतीकात्मक स्वरूप में स्थान दें। त्रिशूल लोहे का भी हो सकता है; अपनी इच्छा से छह इंच, बारह इंच या एक हाथ तक का रखें, और इस तरह भैरव स्थान बनाया जा सकता है।
वक्ता कहते हैं कि भैरव जी की उपासना के लिए यदि आप किसी परंपरा में दीक्षा आदि लेकर, दीक्षा के बाद करें तो बहुत अच्छी बात है। यदि नहीं, तो घर में बटुक भैरव जी को स्थान देने का तरीका यह है: उन्हें त्रिशूल पर उनके प्रतीकात्मक स्वरूप में स्थान दें। चाहें तो त्रिशूल लोहे का भी रख सकते हैं। 6 इंच का रखें, 12 इंच का रखें; और बड़ा त्रिशूल रखने की इच्छा हो तो एक हाथ तक का ले लें। जैसा त्रिशूल चाहें, रख सकते हैं और उससे भैरव स्थान बना सकते हैं। इसमें किसी प्रकार का संदेह न रखें।
क्या घर में बड़ा शस्त्र रखना गलत है?
सनातनी के घर में शस्त्र और शास्त्र दोनों होने चाहिए
वक्ता पवन सिन्हा का नाम लेते हैं — जिन्हें वे बहुत बड़े मार्गदर्शक और ज्योतिषी कहते हैं — जिनके वीडियो में कहा जाता है कि घर में बड़ा शस्त्र नहीं रखना चाहिए, छोटा रखना चाहिए। वे श्रोताओं से कहते हैं कि ऐसी दकियानूसी बातों पर ध्यान न दें: सनातनी के घर में शस्त्र और शास्त्र दोनों होने चाहिए। अपनी रक्षा करना सीखें, क्योंकि कोई आपकी रक्षा करने नहीं आएगा।
वक्ता कहते हैं कि कोई कह सकता है कि इतना बड़ा त्रिशूल नहीं रखना चाहिए। वे पवन सिन्हा का नाम लेते हैं — जिन्हें वे बहुत बड़े मार्गदर्शक और बहुत बड़े ज्योतिषी कहते हैं — जिनके वीडियो में आपको यह कहा हुआ मिलेगा कि घर में बड़ा शस्त्र नहीं रखना चाहिए, छोटा शस्त्र रखो। वे कहते हैं, ऐसी दकियानूसी बातों पर बिल्कुल ध्यान न दें। सनातनियों के घर में शस्त्र और शास्त्र दोनों होने चाहिए, नहीं तो हालात देख लीजिए कि क्या हो रहा है। वे पूछते हैं कि ऐसे हालात में यदि आप घर में बस एक हाथ या एक बित्ते भर का छोटा शस्त्र रखेंगे, तो सचमुच हमला हो जाए तो उससे क्या कर पाएँगे। अपनी रक्षा करना सीखें। कोई आपकी रक्षा करने नहीं आएगा। इसलिए भैरव जी का स्थान अवश्य रखें। यदि बड़ा त्रिशूल भी रखना चाहें और परिवार के लोग समझ-बूझकर उस पर राज़ी हों — नहीं तो, वे मज़ाक में कहते हैं, इसी पर वहीं युद्ध छिड़ जाएगा कि कितना बड़ा हो — तो रखें। प्रतीक रूप में छोटा रख सकते हैं, और बड़ा रखने की इच्छा हो तो उसमें भी कोई दोष नहीं। वे कहते हैं, रखिए; काम आएगा, कभी न कभी काम आ ही जाएगा।
क्या त्रिशूल या विग्रह की जगह फोटो रखी जा सकती है?
छाया चित्र, और किसी सिद्ध पीठ के भैरव की फोटो
हाँ। दूसरा तरीका है छाया चित्र रखकर उससे पूजा करना। तीसरा है किसी सिद्ध पीठ के भैरव के श्री विग्रह की फोटो — जैसे दिल्ली क्षेत्र के लोग किलकारी भैरव की फोटो रखना चाहें। छाया चित्र रखने में कोई दोष, कोई कठिनाई, कोई परेशानी नहीं है।
वक्ता दोहराते हैं कि भैरव जी की सेवा पूजा के लिए घर में बड़ा त्रिशूल भी बिल्कुल रखें; ऐसी कोई समस्या नहीं है। दूसरा तरीका है छाया चित्र, यानी फोटो रखकर उससे पूजा करना। तीसरा है, यदि कोई रखना चाहे, तो किसी सिद्ध पीठ के भैरव जी के श्री विग्रह की फोटो — जैसे, वे कहते हैं, दिल्ली क्षेत्र के लोग किलकारी भैरव जी की फोटो रखना चाहें और पूछें कि रख सकते हैं या नहीं। छाया चित्र रखने में कोई दोष नहीं, कोई कठिनाई नहीं, कोई परेशानी नहीं, बशर्ते वह सीधे किसी सिद्ध पीठ का हो। इतना रखकर आप पूजा कर सकते हैं; इसमें ज़्यादा उलझने की ज़रूरत नहीं।
क्या काल भैरव का श्री विग्रह घर में स्थापित किया जा सकता है?
काल भैरव का उग्रतम रूप, और फोटो के आगे धातु का प्रतीक
नहीं। वक्ता कहते हैं कि काल भैरव जी का श्री विग्रह घर में रखने की कोई मान्यता नहीं है; उनका स्वरूप घर में स्थापित नहीं होता क्योंकि वह उग्रतम रूप है। इसकी जगह बटुक भैरव जी को स्थापित करें। कोई काल भैरव की ओर खिंचता हो तो उनकी फोटो अवश्य रख सकता है, पर उसके आगे उनका धातु का कोई प्रतीक — त्रिशूल आदि — अवश्य रखना होगा।
फिर भी, वक्ता कहते हैं, घर में बटुक भैरव स्वरूप में पूजन करें तो सबसे उत्तम है। यदि आपकी श्रद्धा किसी और रूप में है — जैसे कुछ लोग काल भैरव जी की ओर खिंचते हैं और काशी के कोतवाल की पूजा करना चाहते हैं — तो उनका श्री विग्रह नहीं; पर उनकी फोटो चाहें तो अवश्य रख सकते हैं। पर यदि श्री विग्रह नहीं रख रहे, तो उसके आगे उनका कोई धातु का प्रतीक, उनका त्रिशूल आदि, अवश्य रखें। वैसे भी काल भैरव जी का श्री विग्रह घर में रखने की कोई मान्यता नहीं है; उनका स्वरूप घर में स्थापित नहीं होता। वह उग्रतम स्वरूप है। बटुक भैरव जी को स्थापित करें।
पूजा स्थान में बटुक भैरव को कहाँ रखना चाहिए?
पंचायतन में भगवती के बाईं ओर, या शिव के साथ
अपने पूजन स्थान में। आपने जिस भी शक्ति का पंचायतन स्थापित किया है, उसमें भगवान शिव और भगवती शक्ति का स्थान अवश्य होगा। बटुक भैरव को भगवती के — दुर्गा जी या काली जी के विग्रह के — बाईं ओर स्थान दें, या फिर शिव जी के पंचायतन के स्थान पर, जहाँ आपने शिवलिंग आदि रखा है।
भैरव जी को स्थान देना है, तो वह स्थान कहाँ हो? वक्ता कहते हैं कि आप अपने पूजन स्थान में दे सकते हैं। और पूजन स्थान में कहाँ? आपने जिस भी शक्ति का पंचायतन स्थापित किया है, उसमें भगवान शिव और भगवती शक्ति का स्थान अवश्य होगा। तो शक्ति रूपी माँ जगदंबा के बाईं ओर — माई के बाएँ भाग में। यानी यदि आप भगवती दुर्गा जी का विग्रह रखते हैं, या भगवती काली जी का श्री विग्रह, तो भगवती के इन रूपों के बाईं ओर बटुक भैरव जी को स्थान दें। या फिर भगवान शिव जी का जो भी पंचायतन आपने रखा है, जहाँ शिवलिंग आदि रखा है, वहाँ भी उन्हें स्थान दे सकते हैं। पूजन कक्ष में इन दो में से किसी एक जगह उन्हें स्थान दें।
क्या भैरव को घर के बाहर स्थान दिया जा सकता है, और कौन-सा दीपक जलता है?
हनुमान ध्वजा के पास बाहर का स्थान, और सरसों के तेल का दीपक
यदि घर के बाहर जगह है, जहाँ आप हनुमान जी की ध्वजा लगाते हैं, तो वहाँ किसी अच्छी जगह या गमले में त्रिशूल के रूप में, प्रतीक के तौर पर, उन्हें स्थान दे सकते हैं। वहाँ अलग स्थान दें तो सुबह-शाम उनके नाम से सरसों के तेल का एक दीपक अवश्य जलाना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि पूजन कक्ष के अलावा, यदि आपके घर के बाहर जगह है — जहाँ आप हनुमान जी की ध्वजा लगाते हैं — तो वहाँ भी किसी अच्छी जगह या गमले आदि में, भगवान के त्रिशूल के स्वरूप में, प्रतीक के तौर पर, उन्हें स्थान दे सकते हैं। वहाँ अलग स्थान दें तो सुबह-शाम उनके नाम से सरसों के तेल का एक दीपक अवश्य जलाना चाहिए। और यदि पूजन स्थान पर स्थान दे रहे हैं, तो वहाँ कितने दीपक जलें, इस पर वीडियो पहले ही आ चुके हैं। मुख्य दो दीपक हैं: एक दीपक घी का और एक दीपक सरसों के तेल का हो।
गृहस्थ को अपने सब देवताओं के लिए कितने दीपक चाहिए?
दो दीपक पर्याप्त हैं, और नैवेद्य का सिद्धांत
इन दो दीपकों से गृहस्थ के सभी देवी-देवताओं का पूजन हो जाएगा। यदि समय और पैसा दोनों हों तो हर देवता के लिए अलग दीपक जलाएँ — उसमें कोई कठिनाई नहीं — पर सामान्यतः दो दीपक अवश्य जलाने चाहिए। नैवेद्य में पहले प्रधान शक्ति का नैवेद्य आता है।
वक्ता कहते हैं कि इन दो दीपकों से ही गृहस्थ के सभी देवी-देवताओं का पूजन संपन्न हो जाएगा। यदि आपके पास समय और पैसा दोनों हैं, तो चाहें तो हर देवता के लिए अलग दीपक जलाएँ; उसमें कोई कठिनाई नहीं। पर सामान्यतः दो दीपक अवश्य जलाने और प्रज्वलित करने चाहिए। नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। का विषय भी वे पहले स्पष्ट कर चुके हैं: पहले प्रधान शक्ति का नैवेद्य आता है। पूरे पंचायतन की सभी शक्तियों के लिए अलग-अलग नैवेद्य लगाना हर किसी के लिए संभव नहीं, न उतना समय होगा, और लोग ऊबने लगते हैं कि इतना नहीं हो पाएगा। इसलिए कोई समस्या नहीं — नैवेद्य दो तरह से लगाया और अर्पित किया जा सकता है।
एक ही जगह रखा नैवेद्य कैसे अर्पित किया जाता है?
सूखे मेवे, पहले कोई पत्ता नहीं, और आचमनी से पाँच बार जल
काजू-किशमिश, या इलायची दाने, या जो भी खाद्य पदार्थ और सूखे मेवे आप चढ़ाते हैं, अपने भाव से अर्पित करें। उसमें पहले न तुलसी पत्र डालें न बिल्व पत्र — पहले कुछ न डालें। पूजन हो जाने के बाद माई को अलग से दिए पीने के जल में से लेकर आचमनी से नैवेद्य के चारों ओर घुमाकर पाँच बार अर्पित करें।
वक्ता कहते हैं कि पहला तरीका यह है कि आपने एक ही जगह नैवेद्य लगाया है। उसमें आप काजू-किशमिश, या इलायची दाने, या जो भी खाद्य पदार्थ वहाँ चढ़ाते हैं, सूखे मेवे आदि रख सकते हैं — अपने भाव से अर्पित करें। उसमें न तुलसी पत्र डालें न बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। पत्र; पहले कुछ न डालें। पहले पूजन आदि पूरा हो जाए, फिर जिन मंत्रों से आप करते हैं उनसे करें — चाहे अन्नपूर्णे सदापूर्णे मंत्र से, या बस यह कहकर कि प्रभु, यह नैवेद्य स्वीकार करें। मान लीजिए भगवती का पंचायतन है, और उनके आगे आपने लोटे में जल और नैवेद्य रखा है। तो पूजन पूरा होने पर माई को अलग से दिए पीने के जल में से लें, और आचमनी से नैवेद्य के चारों ओर घुमाकर उन्हें पाँच बार अर्पित करें। यदि मंत्र छोड़ रहे हैं तो अन्नपूर्णायै नमः कहकर भी अर्पित कर सकते हैं।
तुलसी पत्र और बिल्व पत्र कहाँ जाते हैं?
नारायण के नैवेद्य में तुलसी ज़रूरी; भगवती का अंग परिवार बिल्व लेता है
पाँच बार अर्पण के बाद उसमें एक तुलसी पत्र डालें और नारायण को भी अर्पित करें। यदि मन में यह भाव आए कि यह माई का जूठा हो गया, तो नारायण के लिए शुरू से ही तुलसी पत्र डालकर अलग नैवेद्य रखें, और भगवती तथा उनके अंग परिवार — भैरव जी, शिव जी — का नैवेद्य अलग हो, जिसमें बिल्व पत्र हो।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद उसमें फिर एक तुलसी पत्र डालें और फिर नारायण को भी यह कहकर अर्पित करें कि प्रभु, यह भी स्वीकार करें। यदि भीतर बहुत प्रबल भाव उठे कि नहीं, यह तो माई का जूठा हो गया, तो नारायण के लिए अलग भोग लगाएँ। उनका नैवेद्य अलग हो, जिसमें शुरू से ही तुलसी पत्र हो; और इधर भगवती और उनके पूरे अंग परिवार — भैरव जी, शिव जी — का नैवेद्य अलग हो, और उसमें बिल्व पत्र आदि डालें। बिल्व पत्र न हो तो बिना बिल्व पत्र के भी चल जाएगा; कुछ फूल डाल दें तो चल जाएगा, और कुछ न डालें तो भी कोई बात नहीं। पर नारायण के नैवेद्य में तुलसी पत्र अवश्य डालना चाहिए। तुलसी पत्र के बिना नारायण नैवेद्य स्वीकार नहीं करेंगे, और हनुमान जी नैवेद्य स्वीकार नहीं करेंगे।
किन देवताओं के नैवेद्य में तुलसी पत्र ज़रूरी है?
परम वैष्णवी और नारायणी शक्तियाँ
जितनी भी परम वैष्णवी शक्तियाँ और नारायणी शक्तियाँ हैं, उन्हें उसी तरह — यानी तुलसी पत्र के साथ — नैवेद्य अर्पित करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि जितनी भी परम वैष्णवी शक्तियाँ हैं, और नारायणी शक्तियाँ हैं, उनके लिए वहाँ इसी तरह नैवेद्य अर्पित करना चाहिए।
घर में भैरव अनुष्ठान के दौरान कौन-से अतिरिक्त अर्पण होते हैं?
अनुष्ठान के दिनों के लिए अलग दीपक और अलग नैवेद्य
मान लीजिए आप घर में भैरव जी के अष्टोत्तर शतनाम का, या किसी मंत्र का, या महाभैरव जैसे किसी स्तोत्र का 41 दिन का अनुष्ठान कर रहे हैं। तब जब तक पूजन चले, चालीस दिन, भैरव जी के लिए अलग दीपक और अलग नैवेद्य अवश्य लगाना होगा। पूजन पूरा हो जाए और आप फिर रोज़ के नित्य कर्म पूजन पर लौट आएँ, तो अलग नैवेद्य, धूप या दीपक की ज़रूरत नहीं — सामूहिक पंचायतन में ही उनकी पूजा करें।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप भैरव जी की साधना कर रहे हैं — मान लीजिए आप घर में भैरव जी के अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। आदि का, या किसी मंत्र का, या महाभैरव आदि जैसे किसी स्तोत्र का 41 दिन का अनुष्ठान कर रहे हैं। तो उस समय जब तक आपका पूजन चले, चालीस दिन, भैरव जी के लिए अलग दीपक और उनके लिए अलग नैवेद्य अवश्य लगाएँ। पर जब पूजन पूरा हो जाए और अब आप नित्य नियम से साधारण रोज़ का पूजन, नित्य कर्म पूजन, कर रहे हों, तब अलग नैवेद्य, अलग धूप या अलग दीपक देने की ज़रूरत नहीं। तब सामूहिक पंचायतन में ही उनकी पूजा करें।
किन दिनों भैरव की विशेष पूजा होती है, और क्या अर्पित होता है?
रविवार, मंगलवार, अष्टमी, अमावस्या और चतुर्दशी
रविवार, मंगलवार, अष्टमी, अमावस्या, चतुर्दशी आदि दिनों में यदि आप उनकी विशेष पूजा करना चाहें, तो नैवेद्य में अलग से बूंदी के लड्डू का भोग लगाएँ, उनका श्रृंगार करें, और नींबू आदि की बलि दे सकते हैं।
कौन-से मंत्र बिना दीक्षा के कभी नहीं लेने चाहिए?
आपदुद्धारण मंत्र शापित मंत्र हैं
आपदुद्धारण मंत्र बिना दीक्षा के कभी नहीं करने चाहिए — वे शापित मंत्र हैं। वक्ता कहते हैं कि इसका प्रमाण वे शारदा तिलक आदि से कई बार दे चुके हैं। उनका शाप विमोचन गुरु जी की मंत्र दीक्षा के बाद ही मिलता है, इसलिए उन मंत्रों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं, यह पूरी तरह शास्त्रोक्त मत के अनुसार है।
वक्ता कहते हैं कि मंत्र जप के विषय में, जो आपदुद्धारण मंत्र हैं, उन्हें बिना दीक्षा के कभी नहीं करना चाहिए। वे शापित मंत्र हैं। इसका प्रमाण वे शारदा तिलक आदि से कई बार दे चुके हैं — कि वे शापित मंत्र हैं। उनका शाप विमोचन आपको गुरु जी की मंत्र दीक्षा के बाद ही मिलता है, इसलिए उन मंत्रों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह पूरी तरह शास्त्रोक्त मत के अनुसार है। जब आप वही चीज़ दीक्षित होकर गुरु जी से पाते हैं, और गुरु जी आपको शाप विमोचन की बात बताते हैं, तब उस मंत्र में किसी प्रकार का दोष नहीं रहेगा, और आप उसे कर सकते हैं।
साधारण उपासक के लिए भैरव की पहली सीढ़ी कौन-सी साधना है?
बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनाम का मूल पाठ
भगवान बटुक भैरव का अष्टोत्तर शतनाम अपने आप में अत्यंत प्रचंड और तंत्रोक्त विधान है, जिसमें सृष्टि कर्म और संहार कर्म की अनेक बातें हैं, जिनसे तांत्रिक प्रयोग होते हैं। भैरव जी की पूजा में आपके लिए इसका मूल पाठ ही पहली सीढ़ी है। इसका पुरश्चरण करें: महापुरश्चरण 40000 का होता है।
वक्ता कहते हैं कि सामान्यतः भगवान बटुक भैरव जी का अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। अपने आप में अत्यंत प्रचंड और तंत्रोक्त विधान है। इसका सृष्टि कर्म है, संहार कर्म है और बहुत-सी बातें हैं, जिनसे तंत्र प्रयोग आदि में वे विधान किए जाते हैं। इसलिए इसका सबसे बुनियादी पाठ — बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनाम का केवल मूल पाठ — भैरव जी की पूजा के लिए आपकी पहली सीढ़ी है। इसका पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करें। महापुरश्चरण 40000 में होता है। यदि आप बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनाम के 40000 जप कर लें, तो कहा जाता है कि बटुक भैरव जी प्रत्यक्ष तक हो जाते हैं। वे कहते हैं, यह सिद्ध, ज्ञानी, तांत्रिक और तंत्र शास्त्र कहते हैं।
बटुक भैरव शतनाम के पूरे 40000 पाठ न हो सकें तो क्या करें?
रोज़ इक्कीस या सौ पाठ, बटुक भैरव जयंती से आरंभ
40000 न कर सकें तो रोज़ 21 पाठ, या 100 पाठ करें — जितनी सामर्थ्य हो। शतनाम का आरंभ बटुक भैरव जयंती के दिन से ही कर सकते हैं। इसकी महिमा अनंत है, और भैरव उपासना की शुरुआत यहीं से है: सबसे पहला प्रयोग इसी से करना होता है।
वक्ता कहते हैं कि अब यदि आप 40000 न कर सकें, तो इसके रोज़ 21 पाठ, या 100 पाठ करें — जितनी आपकी सामर्थ्य, उतने पाठ कर सकते हैं। चाहें तो इस शतनाम का आरंभ बटुक भैरव जयंती के दिन से ही कर सकते हैं। इसकी महिमा अनंत है। भैरव जी से जुड़ा जो भी तंत्रोक्त ग्रंथ आपको मिले, भैरव जी का जो भी उपासक या साधक आपको मिले, उस ग्रंथ में भी आपको यह लिखा मिलेगा, और उस साधक का इसमें अपना निजी अनुभव अवश्य रहा होगा। शुरुआत यहीं से है। सबसे पहला प्रयोग इसी से करना होता है, इसलिए बटुक भैरव जी के अष्टोत्तर शतनाम के पाठ से ही अपनी शुरुआत अवश्य करें।
क्या पाठों की कोई ऊपरी सीमा तय करनी चाहिए?
कोई तय सीमा नहीं, और शतनाम किन बातों से मुक्त करता है
यह नियम कभी न लगाएँ कि हम केवल 100 पाठ करेंगे, केवल 1000, केवल 11000, केवल तीन महीने — नहीं। जितना हो सके करें। यदि केवल इसी को साध लें, तो इसमें भूत, प्रेत, पिशाच, नज़र, दृष्टि और शत्रु बाधा से, और धन की रुकावट, नौकरी न लगने, राहु, केतु, शनि और क्रूर ग्रहों के दुष्प्रभाव, और मारकेश के दुर्योग से छुटकारे का मार्ग है।
वक्ता कहते हैं कि इस पर यह नियम कभी न लगाएँ: कि हम केवल 100 पाठ करेंगे, केवल 1000 पाठ करेंगे, केवल 11000 करेंगे, केवल तीन महीने करेंगे — नहीं। जितना हो सके उतना करें। यदि केवल इतना ही साध लें, तो इसमें भूत, प्रेत, पिशाच से, नज़र और दृष्टि और शत्रु बाधा से, इन सबसे मुक्ति का मार्ग है। धन की प्राप्ति में जो भी रुकावटें आ रही हैं, नौकरी नहीं लग रही, राहु, केतु, शनि आदि या क्रूर ग्रहों का दुष्प्रभाव, मारकेश का दुर्योग — यह सब इन्हीं के द्वारा, इनकी सेवा पूजा करके, इनकी कृपा से पाया जा सकता है।
राहु की माया के विरुद्ध भैरव क्या करते हैं?
मायावी ग्रह राहु, और भ्रम का नाश करने वाले भैरव
राहु सबसे बड़ा मायावी ग्रह माना जाता है; राहु देव क्रोधित हो जाएँ या माया फैलाने लगें, तो उस माया में फँसा व्यक्ति इतना भ्रमित हो जाता है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसे सब भ्रमों का नाश करने के लिए भैरव जी सबसे श्रेष्ठ हैं — उनकी कृपा से मायावी शक्तियाँ तुरंत नष्ट होकर नियंत्रण में आ जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि राहु को सबसे बड़ा मायावी ग्रह माना जाता है। राहु देव क्रोधित हो जाएँ, या माया फैलाने लगें, तो जो व्यक्ति उनकी माया की चपेट में आ गया, वह भीतर कहीं इतना भ्रमित हो जाता है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। इन सब भ्रमों का नाश करने के लिए भैरव जी सबसे श्रेष्ठ हैं। भैरव जी की, भैरव जी के विग्रह की सेवा की जाए, तो भैरव जी की कृपा से ये मायावी शक्तियाँ तुरंत नष्ट होकर नियंत्रण में आ जाती हैं। इसलिए, वे कहते हैं, घर में बटुक भैरव जी का पूजन अवश्य करें।
अनुष्ठान किस दिन शुरू करें, और कितने दिन का हो?
आरंभ की तिथियाँ, और 11 दिन व 41 दिन की अवधि
जब अनुष्ठान करने जा रहे हों, तो विशेष रूप से किसी भी कृष्ण पक्ष की अष्टमी से; बटुक भैरव जयंती से; चतुर्दशी या अमावस्या से आरंभ कर सकते हैं। या बहुत बड़ी आपात स्थिति हो तो रविवार या मंगलवार से, या शनिवार से भी उनकी साधना शुरू कर सकते हैं। कम से कम 11 दिन की साधना होनी चाहिए, या संभव हो तो एक मंडल, यानी 41 दिन की साधना।
वक्ता पूछते हैं कि अब जब हम पूजन करें, तो न्यूनतम तरीका क्या है और यह कितने दिन का हो। जब अनुष्ठान करने जा रहे हों, तो विशेष रूप से किसी भी कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरंभ कर सकते हैं। बटुक भैरव जयंती आदि से आरंभ कर सकते हैं। चतुर्दशी या अमावस्या से आरंभ कर सकते हैं। या यदि आप बहुत बड़ी आपात स्थिति में हैं, तो रविवार या मंगलवार से, या शनिवार से भी उनकी साधना शुरू कर सकते हैं। कम से कम 11 दिन की साधना अवश्य होनी चाहिए; या संभव हो तो एक मंडल, यानी 41 दिन की साधना अवश्य करें।
41 दिन की साधना में रोज़ क्या अर्पित होता है?
बूंदी के लड्डू, और अदरक, जल व गुड़ की सात्विक मदिरा
41 दिन की साधना में सुबह-शाम दोनों समय नैवेद्य लगाएँ। संभव हो तो घर में बूंदी के लड्डू का नैवेद्य अवश्य लगाएँ। और एक पात्र में अदरक कूटकर उसमें जल और गुड़ मिलाकर पेय के रूप में रखें — यह भैरव जी के लिए सात्विक मदिरा है। पूजन समाप्त होने पर इसे किसी दिव्य वृक्ष की जड़ में डाल दें। चाहें तो दो लौंग और इलायची डाल सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि 41 दिन की साधना में सुबह और शाम, दोनों समय नैवेद्य लगाएँ। संभव हो तो घर में उन्हें बूंदी के लड्डू का नैवेद्य अवश्य लगाएँ। और एक पात्र में अदरक कूटकर, उसमें जल और गुड़ मिलाकर, पीने योग्य पदार्थ के रूप में रखें। यह भैरव जी के लिए सात्विक मदिरा है। और जब पूजन आदि हो जाए, तो इसे किसी दिव्य वृक्ष की जड़ में डाल दें। इसे स्वयं पीने की इच्छा न करें। चाहें तो इसमें दो लौंग और इलायची भी डाल सकते हैं।
क्या अर्पित मदिरा प्रसाद के रूप में ली जा सकती है, और श्वान सेवा क्या है?
मदिरा कभी ग्रहण नहीं होती; अपने से पहले कुत्तों को खिलाया जाता है
वहाँ जो नैवेद्य अर्पित हुआ है उसे कोई भी प्रसाद के रूप में ले सकता है, पर मदिरा कभी ग्रहण न करें — मदिरा केवल भैरव जी के लिए ही उड़ेली जानी चाहिए। और जब चालीस दिन की भैरव सेवा चल रही हो, तब श्वान सेवा, यानी कुत्तों की सेवा, विशेष रूप से करनी चाहिए: जहाँ तक हो सके, स्वयं खाने से पहले कुत्तों को खिलाएँ।
वक्ता कहते हैं कि वहाँ जो भी नैवेद्य अर्पित हुआ है, उसे कोई भी प्रसाद के रूप में ग्रहण कर सकता है, पर मदिरा कभी ग्रहण न करें। मदिरा केवल भैरव जी के लिए ही उड़ेली जानी चाहिए। जब भैरव जी की चालीस दिन की सेवा चल रही हो, उस समय विशेष रूप से श्वान सेवा — यानी कुत्तों की सेवा — आपको अवश्य करनी चाहिए। जहाँ तक हो सके, अपना भोजन करने से पहले कुत्तों को खिलाएँ: उन्हें नमकीन बिस्कुट खिलाएँ, नमकीन या मीठी रोटी और गुड़ खिलाएँ, दूध और ब्रेड खिलाएँ, जो भी आपके लिए संभव हो।
क्या भैरव साधना व्यक्ति को शाप से छुड़ा सकती है?
देव श्राप, पितृ श्राप और आत्माओं के शाप से शाप विमोचन
वक्ता कहते हैं कि भैरव जी की साधना में हर प्रकार के शाप का विमोचन करने की सामर्थ्य है — अनेक अनिष्टकारक ग्रह और शक्तियाँ, देव श्राप, पितृ श्राप, भूत-प्रेत के शाप, कोई भी कैसा भी शाप दे। यदि किसी का बहुत अहित करने के कारण आप पर ऐसा शाप पड़ा है जो नष्ट ही नहीं होता, तो प्रायश्चित्त करते हुए बटुक भैरव की उपासना करने से वे हर विपत्ति और उस शाप से मुक्त कर देते हैं।
अनेक अनिष्टकारक ग्रह, अनेक अनिष्टकारक शक्तियाँ, देव श्राप, पितृ श्राप, भूत और प्रेत का श्राप — कोई भी कैसा भी शाप दे, भैरव जी की साधना में हर प्रकार के शाप का विमोचन करने की सामर्थ्य है। यदि आप पर कोई ऐसा शाप पड़ा है जो नष्ट ही नहीं हो रहा, यदि किसी ने आपको दिल से शाप दिया है क्योंकि आपने उसका बहुत अहित किया था, तो यदि आप प्रायश्चित्त करते हुए बटुक भैरव जी की उपासना करें, तो वे आपको हर विपत्ति और दुर्भाग्य से, और उस शाप से मुक्त कर देते हैं। वे हर तरह के और अजीब से अजीब शापों से भी मुक्त कर देते हैं।
डिप्रेशन और अन्य मानसिक कष्टों के लिए क्या करना चाहिए?
मानसिक कष्ट में कलियुग के जाग्रत देवता भैरव
जो भी मानसिक रोग हैं — डिप्रेशन, एंग्जायटी, बहुत भारी मानसिक कष्ट में होना, या कोई समस्या न होते हुए भी परेशान रहना — ऐसे समय भैरव जी की शरणागति लेनी चाहिए। उनमें इन चीज़ों को पल भर में हर लेने की सामर्थ्य है, और कलियुग के जाग्रत देवता होने के कारण वे तुरंत प्रसन्न होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जो भी मानसिक व्याधियाँ हैं — डिप्रेशन है, एंग्जायटी है, कोई बहुत भारी मानसिक क्लेश में है, या कोई समस्या ही नहीं फिर भी बहुत परेशान है — ऐसे समय भैरव जी की शरणागति लेनी चाहिए। उनमें इन चीज़ों को पल भर में हर लेने की सामर्थ्य है, और वे जाग्रत देवता हैं; कलियुग के, कलिकाल के, वे तुरंत प्रसन्न होते हैं।
बिना दीक्षा के बटुक भैरव के चिटकी मंत्रों के प्रयोग में क्या ख़तरा है?
सुरक्षा न होने से भैरव ग्रह साधक की ओर खिंचते हैं
बटुक भैरव के पंचाक्षरी और चिटकी मंत्रों की बात करते हुए, जिनका लोग बिना दीक्षा के प्रयोग करते हैं, वे कहते हैं कि पहली समस्या यह है कि स्तोत्र और शतनाम के बिना आपके पास सुरक्षा का कोई माध्यम ही नहीं, आपने कवच सिद्ध नहीं किया, और सीधे चिटकी मंत्रों का प्रयोग कर रहे हैं। दुर्गा सप्तशती जिन भैरवों को अनिष्टकारक कहती है वे भाग जाते हैं, और चिटकी के प्रभाव से भैरव ग्रह आपकी ओर आकर्षित हो जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि उनके अपने मत में, जब लोग बटुक भैरव जी के — शिव जी के नहीं — पंचाक्षरी मंत्र और चिटकी मंत्र का बिना दीक्षा के प्रयोग करते हैं, तो चिटकी के प्रभाव में सबसे पहली बात यह आती है: स्तोत्र और शतनाम के बिना आपके पास सुरक्षा का कोई माध्यम ही नहीं, आपने कवच आदि सिद्ध नहीं किया, और आप सीधे चिटकी मंत्रों का प्रयोग कर रहे हैं। तब दुर्गा सप्तशती में जिन्हें अनिष्टकारक भैरव आदि कहा गया है, वे भी दूर भाग जाते हैं। एक ही दिन में सिद्ध होने वाले भैरव कौन-से हैं, इस पर वे कहते हैं कि विषय चैनल पर पहले से है और समझने के लिए उसे सुनना चाहिए। इसलिए जो भैरव ग्रह हैं, वे चिटकी के प्रभाव से आपकी ओर आकर्षित हो जाते हैं।
बिना सुरक्षा के भैरव मंत्रों का प्रयोग हो तो सबसे पहले कौन आता है?
गण प्रेत जिन्हें भी भैरव कहा जाता है, और उनकी परीक्षा
भैरव जी के स्वयं आने में तो अभी समय है; पहले उनके गण प्रेत आएँगे, और उन्हें भी भैरव ही कहा जाएगा। यदि आपने कवच नहीं किया, और वे आपकी परीक्षा लें और आप उसमें पास न हो सकें और माया में बँध जाएँ, तो वे बातें आपके लिए अलग विषय बन जाती हैं। वे कहते हैं, उनका तात्पर्य आपको इस साधना से दूर करना नहीं, बल्कि चिटकी मंत्रों के सीधे प्रयोग से बचते हुए सही साधना के लिए प्रेरित करना है।
वक्ता कहते हैं कि उसमें भैरव जी के आने में तो अभी समय है; पहले उनके गण प्रेत ही आएँगे, और उन्हें भी भैरव ही कहा जाएगा। और यदि आपने कवच आदि नहीं किया, और यदि उन्होंने आपकी परीक्षा भी ले ली और आप उसमें पास न हो सके और माया में बँध गए, तो वे बातें आपके लिए अलग विषय बन जाती हैं। वे कहते हैं, उनका तात्पर्य कहीं भी आपको इस साधना से दूर करना नहीं है। उनका विषय आपको सही साधना के लिए प्रेरित करना है — कि चिटकी जैसे मंत्रों के सीधे प्रयोग से हमेशा बचना चाहिए।
महाशक्तियों की कृपा के लिए शॉर्टकट से क्यों बचना चाहिए?
पुण्य बल, आभामंडल की ओर खिंचती पतित जीवात्माएँ, और साधना का क्रम
अपनी और अपने परिवार की रक्षा करें, और महाशक्तियों की कृपा पाने के लिए कभी शॉर्टकट न अपनाएँ। उनकी सेवा पूजा और जप-तप से कमाए पुण्य बल में बड़ी शक्ति होती है, इसलिए निकृष्ट शक्तियाँ और पतित जीवात्माएँ अपनी गति की तलाश में आपके आभामंडल से जुड़ने लगती हैं। इसे नियंत्रण में रखने के लिए पहले स्तोत्र और शतनाम का, और कवच का जप करें, और हवन भी इसी सतनामावली से करें।
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं कि कोई कह रहा है कि तुरंत चिटकी मंत्र करो तो आप कर लें। अपनी रक्षा करें, अपने परिवार की रक्षा करें, और महाशक्तियों की कृपा पाने के लिए कभी शॉर्टकट न अपनाएँ। महाशक्तियों की सेवा पूजा से जो जप, तप और पुण्य — जो पुण्य बल — कमाया जाता है, उसमें बहुत बड़ी सामर्थ्य होती है। जितनी भी निकृष्ट शक्तियाँ हैं, जितनी भी पतित जीवात्माएँ हैं, वे सब उन ऊर्जाओं के कारण आकर आपके आभामंडल से जुड़ने लगती हैं, और अपनी गति चाहती हैं। वे कहीं अटकी हुई हैं, और अटकी होने के कारण बाहर निकलने का रास्ता खोजेंगी; और वह रास्ता पुण्य के मार्ग से ही होकर जाने वाला है। और आप ऐसे मंत्रों का जप कर रहे हैं जिनमें भगवान भैरव के अद्भुत पुण्य पाने की सामर्थ्य है — तो, वे पूछते हैं, कौन-सी शक्ति आपके पास नहीं आना चाहेगी। यह नियंत्रण में रहे, इसके लिए पहले स्तोत्र और शतनाम का जप करना चाहिए, कवच आदि का जप करना चाहिए, और हवन भी इन्हीं स्तोत्रों और सतनामावली से करना चाहिए।
भैरव हवन के लिए कौन-सी समिधा सबसे अच्छी है, और कितनी आहुतियाँ?
अपामार्ग या खैर की लकड़ी, और हर नाम से दस आहुतियाँ
सबसे उत्तम समिधा अपामार्ग की लकड़ी है, या फिर खैर की लकड़ी; खैर की लकड़ी पर किया भैरव हवन सबसे दिव्य प्रभाव देता है। खैर की समिधा पर कुंड में विधि से अग्नि देवता को स्थापित करें, और यदि आपने स्तोत्र शतनाम के 100 पाठ किए हैं, तो हर नाम से दस आहुतियाँ दें — यानी हज़ार आहुतियाँ। 108 नामों से यह लगभग 1188 आहुतियाँ बनती हैं।
वक्ता कहते हैं कि हवन करने के लिए यदि कोई सबसे उत्तम लकड़ी, कोई समिधा है, तो वह अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी है, या फिर खैर की लकड़ी। यदि आप खैर की लकड़ी पर भगवान भैरव जी का हवन करें, तो प्रभाव सबसे दिव्य होता है। खैर की समिधा पर कुंड में विधि से अग्नि देवता को स्थापित करें, और खैर की लकड़ी की समिधा अच्छी तरह सजाएँ; फिर अग्नि देवता की स्थापना के बाद की पूरी विधि के साथ, यदि आपने उनके स्तोत्र शतनाम के 100 पाठ किए हैं, तो हर नाम से दस आहुतियाँ देना शुरू करें — यानी आपको हज़ार आहुतियाँ देनी हैं। क्योंकि 108 नाम हैं, तो यह लगभग 1188 आहुति होंगी। इतनी आहुतियाँ दें।
ये आहुतियाँ कौन दे सकता है, और कौन-सी सामग्री लगती है?
स्त्री, पुरुष और अनुपवीत सभी अधिकारी; काले तिल, गुग्गुल और घी
वक्ता कहते हैं कि यह पूरी तरह तंत्रोक्त विषय है: निश्चिंत रहें, चाहे आप स्त्री हों या पुरुष, और चाहे अनुपवीत हों — यानी यज्ञोपवीत नहीं पहनते — आप सब ये आहुतियाँ दे सकते हैं। सामग्री है काले तिल, गुग्गुल और घी, आपस में मिलाकर, और घी की मात्रा ज़्यादा न रखें; काले तिल धोकर सुखा लें, या अच्छे तिल ले आएँ, तो सबसे उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि आहुति में कौन-सी सामग्री रखें, और यहाँ स्त्री-पुरुष की क्या बात है, और अनुपवीत की क्या बात है — यह पूरी तरह तंत्रोक्त विषय है। निश्चिंत रहें: चाहे आप स्त्री हों या पुरुष, और चाहे आप अनुपवीत हों, यानी यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। नहीं पहनते — आप सब ये आहुतियाँ कर सकते हैं। आहुति में कौन-सी सामग्री लें: काले तिल, गुग्गुल और घी लेकर आपस में मिला लें। घी की मात्रा ज़्यादा न रखें। यदि काले तिल धोकर सुखा लें, अच्छी तरह साफ़ कर लें, या ऐसे अच्छे तिल ले आएँ, तो सबसे उत्तम है।
हवन सामग्री का ठीक-ठीक अनुपात क्या है?
एक किलो काले तिल पर 250 ग्राम गुग्गुल, 100 ग्राम और 100 ग्राम घी, भय के लिए काली मिर्च
काले तिल, गुग्गुल और थोड़ा घी मिलाने के बाद, यदि आपको भय से जुड़ी बहुत परेशानी है और आप भैरव साधना कर रहे हैं, तो इसी सामग्री में थोड़ी काली मिर्च मिला दें। उदाहरण के लिए: यदि आपने 1 किलो काले तिल लिए हैं, तो उसमें कम से कम 250 ग्राम गुग्गुल, और कम से कम 100 ग्राम काले तिल, और 100 ग्राम घी मिलाएँ।
वक्ता कहते हैं कि काले तिल, गुग्गुल और थोड़ा घी आपस में मिलाने के बाद, यदि आपको भय से जुड़ी बहुत परेशानी है — आप बहुत डर जाते हैं — और आप भैरव जी की साधना कर रहे हैं, तो इसी सामग्री में थोड़ी काली मिर्च मिला दें। उदाहरण के लिए: यदि आपने 1 किलो काले तिल लिए हैं, तो उसमें कम से कम 250 ग्राम गुग्गुल मिलाएँ, और उसमें कम से कम 100 ग्राम काले तिल मिलाएँ, और 100 ग्राम घी मिलाएँ। पूरा मिश्रण बन जाने के बाद, शुरू की आहुतियों के लिए वह दूसरी पौष्टिक सामग्री लें जो चैनल पर बताई गई है, जिसमें बाकी सब चीज़ें मिली होती हैं।
इस हवन की शुरू की आहुतियों में क्या अर्पित होता है?
गुरु-गणपति आहुतियों के लिए पौष्टिक सामग्री और घी
गुरु और गणपति की शुरू की आहुतियाँ पौष्टिक सामग्री से, और यदि आप पुरुष हैं तो घी से, दें। मुख्य मंत्र आहुतियों के लिए काले तिल, गुग्गुल, घी वाला मिश्रण लें। वक्ता कहते हैं कि भैरव तत्त्व इतनी तीव्रता से आपकी ओर खिंचेगा, और भैरव की कृपा मिलेगी, कि आप विश्वास नहीं कर पाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि पौष्टिक सामग्री से — और यदि आप पुरुष हैं तो घी से — गुरु, गणपति आदि की शुरू की आहुतियाँ दें। और मंत्रों की जो मुख्य आहुतियाँ देनी हैं, उनके लिए ये सामग्रियाँ लें। वे कहते हैं, इससे भैरव जी का तत्त्व इतनी तीव्रता से आपकी ओर आकर्षित होगा, और भैरव जी की कृपा आपको मिलेगी, कि आप विश्वास नहीं कर पाएँगे।
किसी असाध्य समस्या के लिए नित्य हवन का नियम क्या है?
चालीस दिन रोज़ एक तय घंटा, भोर से पहले आरंभ
यदि जीवन में सबसे कठिन समस्याएँ हैं जिनका कोई रास्ता नहीं खुल रहा, कुंडली फेल हो गई, ग्रह-नक्षत्र का कोई उपाय काम नहीं कर रहा और कोई काम बन ही नहीं रहा, तो नित्य नियम से रोज़ एक घंटा तय करें और 40 दिन का नियम बनाएँ — बहुत असाध्य काम पाँच-दस दिन में नहीं होगा। गंगा दशहरा जैसे किसी दिव्य दिन, या किसी अष्टमी, या रविवार या मंगलवार से, रात 2:30 या 3:00 बजे उठकर आरंभ करें।
वक्ता कहते हैं कि नित्य हवन कैसे करना है, इस पर तीन-चार दिन पहले का एक लाइव वीडियो है। उसके अनुसार, यदि जीवन में ऐसी अत्यंत कठिन समस्याएँ हैं कि कोई रास्ता ही नहीं खुल रहा, आप विचारों से त्रस्त हैं, कुंडली फेल हो गई, ग्रह-नक्षत्र के कितने ही उपाय आपके लिए काम नहीं कर रहे, और जीवन में कोई असाध्य काम है जो बन ही नहीं रहा — तो नित्य नियम से एक घंटे का समय तय करें और पूरा नियम 40 दिन का बनाएँ। यदि आपका काम बहुत असाध्य है, तो वह पाँच-दस दिन में होने वाला नहीं। पूरी सख़्ती से, गंगा दशहरा जैसे किसी दिव्य दिन, या किसी अष्टमी आदि को, या रविवार या मंगलवार से शुरू करें; और रोज़ सुबह, भोर में जितनी जल्दी हो सके, रात 2:30 या 3:00 बजे उठ जाएँ। स्नान करें, तरोताज़ा हों, सारी तैयारी करें, भगवान बटुक भैरव जी का आरंभिक पूजन करें, उन्हें नैवेद्य आदि अर्पित करें, और वहाँ बूंदी के लड्डू का भोग लगाएँ।
इस साधना के लिए कौन-से वस्त्र, आसन और दिशा बताए गए हैं?
लाल, पीला या सफ़ेद वस्त्र; ऊन, कंबल या कुश; पूर्व, पश्चिम या उत्तर
तीनों में से कोई एक पहनें — लाल, पीला या सफ़ेद वस्त्र; सफ़ेद या पीला पहनें तो सबसे उत्तम। आसन ऊन का, कंबल का, या कुश का रखें। दिशा पूर्व, पश्चिम या उत्तर में से कोई भी हो, अपनी सुविधा से चुनें। फिर उस असाध्य काम के लिए संकल्प लें — केवल वही संकल्प, केवल उसी काम के लिए।
वक्ता कहते हैं कि तीन में से कोई एक वस्त्र पहनें — लाल, पीला या सफ़ेद। सफ़ेद या पीला वस्त्र पहनें तो सबसे उत्तम है। अपना आसन ऊन का रखें, कंबल का रखें, या कुश आसन रखें। और दिशा तीन में से कोई एक हो — पूर्व, पश्चिम या उत्तर; अपनी सुविधा के अनुसार चुनें। और उस असाध्य काम के लिए संकल्प लें। केवल वही संकल्प लेना है, केवल उसी काम के लिए।
संकल्प के शब्द कैसे हों?
धर्मयुक्त काम, किसी का अहित नहीं, और उसकी बाधाओं का नाश
वे ये शब्द देते हैं: प्रभु, यह काम असाध्य है, यह काम पूरा हो, यह धर्मयुक्त काम है, इससे किसी का अहित होने वाला नहीं, मेरा यह काम नहीं बन रहा। हम पर ऐसी कृपा करें कि यह काम शीघ्र पूरा हो, और इस काम के मार्ग में जितनी बाधाएँ हैं वे सब नष्ट हों।
वक्ता जो संकल्प देते हैं वह यह है: प्रभु, यह काम असाध्य है; यह काम पूरा हो; यह काम धर्मयुक्त है; इससे किसी का किसी प्रकार का अहित होने वाला नहीं; मेरा यह काम नहीं बन रहा। हम पर ऐसी कृपा करें कि यह काम जल्दी, बहुत शीघ्र पूरा हो। इस काम के मार्ग में जो भी बाधा और रुकावट है — वे सब बाधाएँ नष्ट हों। ऐसा संकल्प लेकर — जैसे किसी को UPSC परीक्षा में टॉप करना है, या किसी की ऐसी ही कोई बात है। प्रारब्ध अपनी जगह है, कुंडली अपनी जगह है, दशम भाव और नवम भाव की बात अपनी जगह है, और पंचमेश की बात, जिससे सरकारी नौकरी देखी जाती है, अपनी जगह है। वहाँ यह पूरा संकल्प लेकर यह करें।
क्या हवन अपने प्रयास की जगह ले लेता है?
पुरुषार्थ फिर भी ज़रूरी है; हवन उसकी रुकावटें हटाता है
नहीं। आपको अपनी तैयारी भी करनी होगी — हवन एक-दो घंटे की बात है, और 24 घंटों में से आप केवल दो घंटे पुण्य कमाने और रुकावटें नष्ट करने में लगा रहे हैं। ऐसा न करें कि 40 दिन हवन करें, परीक्षा की कोई तैयारी न करें, और पास होने की उम्मीद रखें। ऐसा नहीं होगा; पुरुषार्थ तो करना होगा।
वक्ता कहते हैं कि आपको अपनी तैयारी भी करनी है। ऐसा नहीं कि केवल हवन करना है और हम दिन भर हवन ही करेंगे। यह एक-दो घंटे की बात है। 24 घंटों में से आप केवल दो घंटे अपना पुण्य कमाने और जो भी रुकावटें आ रही हैं उन्हें नष्ट करने में लगा रहे हैं। बाकी सारा काम आपकी तैयारी पर निर्भर है। वे कहते हैं, ऐसा न करें: कि हमने 40 दिन हवन किया और परीक्षा की कोई तैयारी नहीं की, और मेरी परीक्षा निकल जानी चाहिए। ऐसा नहीं होगा। पुरुषार्थ तो आपको करना होगा।
ऐसे प्रयोग में भैरव की विशेष भूमिका क्या है, और रोज़ कितना पाठ?
अनिष्टकारक शक्तियों का नाश, और रोज़ 27 या 100 पाठ
यहाँ भैरव जी का काम उन सब अनिष्टकारक शक्तियों का नाश करना है जो आपके पीछे लगी हैं और चाहती हैं कि आपकी उन्नति न हो, ताकि आपके पुरुषार्थ के मार्ग में दैवी सहयोग मिले। रोज़ बटुक भैरव के स्तोत्र शतनाम के कम से कम 27 पाठ करें, और यदि समय है, बैठ सकते हैं और कंठस्थ है, तो आराम से कम से कम 100 करें — अधिकतम डेढ़ घंटा।
वक्ता कहते हैं कि पुरुषार्थ के मार्ग में दैवी सहयोग होना चाहिए; और यहाँ भैरव जी का काम उन सब अनिष्टकारक शक्तियों का नाश करना है जो आपके पीछे लगी हैं, जो चाहती हैं कि आपका कोई कल्याण न हो। और रोज़ बटुक भैरव जी के स्तोत्र शतनाम के कम से कम 27 पाठ करें; और यदि आपके पास समय है, बैठ सकते हैं, और यह कंठस्थ हो गया है, तो आराम से कम से कम 100 पाठ करें। ज़्यादा से ज़्यादा लगे तो डेढ़ घंटा लगेगा।
क्या शतनाम पाठ के साथ विनियोग और न्यास करना चाहिए?
केवल यज्ञोपवीत धारण करने वालों के लिए; बाकी केवल मूल पाठ
केवल मूल पाठ करना है। जो यज्ञोपवीत पहनते हैं वे विनियोग, न्यास आदि की प्रक्रिया कर सकते हैं; नहीं तो सीधे मूल पाठ करें। बटुक भैरव का ध्यान करके मूल पाठ शुरू करें। मूल पाठ 108 नामों तक चलता है — बस उतना; फलश्रुति हर बार नहीं पढ़नी है।
वक्ता कहते हैं कि केवल मूल पाठ करना है। उसमें विनियोग, न्यास आदि की जो प्रक्रिया है — उसे वे करें जो यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। पहनते हैं; नहीं तो सीधे मूल पाठ करें। बटुक भैरव जी का ध्यान करें और मूल पाठ शुरू करें। मूल पाठ वह है जो 108 नामों तक चलता है — बस उतना। फलश्रुति भी हर बार नहीं पढ़नी है।
रोज़ के छोटे हवन कुंड में शुरू की कौन-सी आहुतियाँ दी जाती हैं?
गुरु, गणपति, भैरव, अंबिका, नवग्रह आदि के लिए एक-एक आहुति
100 पाठ पूरे करके अर्पित करने के बाद, एक छोटे हवन कुंड में शुरू की आहुतियाँ एक-एक करके दें: गुरु जी के नाम से एक आहुति — गुरवे नमः, या ऐं ह्रीं श्रीं गुरवे नमः, या जिन भी मंत्रों से आप देते हैं; गणपति जी की एक आहुति; वहाँ भैरव जी की भी एक आहुति; अंबिका की एक आहुति; नवग्रह आदि की एक-एक; हनुमान जी, भगवती जी के स्वरूपों, लक्ष्मी नारायण जी की — सबकी एक-एक।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद, जब 100 पाठ पूरे हो जाएँ, तो समर्पण करने के बाद हवन कुंड में — एक छोटे हवन कुंड में — शुरू की आहुतियाँ एक-एक करके दें। गुरु जी के नाम से केवल एक आहुति — गुरवे नमः, या जिन भी मंत्रों से आप देते हैं, ऐं ह्रीं श्रीं गुरवे नमः और ऐसे मंत्र जिनसे आप आहुति देते हैं। गणपति जी की एक आहुति; वहाँ भैरव जी की भी एक आहुति; अंबिका की एक आहुति; नवग्रह आदि की एक-एक आहुति; हनुमान जी की, भगवती जी के स्वरूपों की, लक्ष्मी नारायण जी की — सबकी एक-एक दें।
मुख्य आहुतियाँ कितनी हों, और पूर्णाहुति किससे हो?
हर नाम से दस या एक-एक; नारियल की जगह सुपारी
उसके बाद, बटुक भैरव के जो 100 पाठ आपने किए, उनके लिए हर नाम से दस आहुतियाँ दें; या न चाहें तो केवल एक — 108 नामों से मुख्य आहुतियाँ। आहुति की सामग्री वही रहती है। और अब क्योंकि यह 40 दिन करना है, नारियल गरी से पूर्णाहुति देने की ज़रूरत नहीं; सुपारी से पूर्णाहुति करें।
वक्ता कहते हैं कि और उसके बाद, बटुक भैरव जी के जो 100 पाठ आपने किए, उनके लिए हर नाम से दस आहुतियाँ दें; और न चाहें तो केवल एक आहुति दें। 108 नामों से मुख्य आहुति। और आहुति की सामग्री यही सब सामग्री रहे। और पूर्णाहुति के लिए — क्योंकि अब यह 40 दिन करना है, नारियल गरी से देने की ज़रूरत नहीं; सुपारी से ही पूर्णाहुति करें।
108 नामों के लिए तर्पण और मार्जन कैसे होते हैं?
केवल पहला नाम, भैरवाय नमः, लिया जाता है
केवल और केवल उनका पहला नाम लें। पहला मंत्र भैरवाय नमः था — भैरव का पहला नाम भैरव ही है — तो उसी मंत्र से तर्पण और मार्जन शुरू करें। यज्ञोपवीत पहनने वाले प्रणव के साथ लें; जो नहीं पहनते, और स्त्रियाँ, देवी प्रणव या श्री बीज के साथ कर सकती हैं, कोई दोष नहीं। रूप ये हैं: श्री भैरवाय तर्पयामि नमः, श्री भैरवाय मार्जयामि नमः।
वक्ता कहते हैं कि इन 108 नामों के लिए तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। और मार्जन कैसे होंगे — इसके लिए केवल और केवल उनका पहला नाम लें। भैरवाय नमः पहला मंत्र था; भैरव का पहला नाम भैरव ही है। तो उसी मंत्र से तर्पण और मार्जन करना शुरू करें। यदि आप यज्ञोपवीत पहनते हैं तो प्रणव के साथ; यदि यज्ञोपवीत नहीं पहनते, और यदि आप स्त्री हैं, तो चाहें तो देवी प्रणव या श्री बीज के साथ भी कर सकते हैं — कोई दोष नहीं, कोई कठिनाई नहीं; निश्चिंत होकर कर सकते हैं। श्री भैरवाय तर्पयामि नमः, श्री भैरवाय मार्जयामि नमः — इस तरह तर्पण और मार्जन होंगे।
भैरव अनुष्ठान में पंचबलि का क्या अर्थ है?
पाँच तरह के जीवों को खिलाना, पाँच बलि देना नहीं
40 दिनों के साथ पंचबलि या जीव सेवा चलती है। पंचबलि का अर्थ है पाँच तरह के जीवों को भोजन देना। वे ज़ोर देकर कहते हैं कि इसका अर्थ यह नहीं कि हमें पाँच बलि देनी हैं — पाँच चौके बीस, और आपको कम से कम 200 जीवों की बलि देनी पड़ती, जिससे तो जनसंख्या नियंत्रण में आ जाती।
वक्ता कहते हैं कि तर्पण, मार्जन और हवन की पूरी विधि चैनल पर अलग लाइव वीडियो में है, उनके लिए जो पहली बार सुन रहे हैं — कि हवन कैसे होता है — और उनमें सारी PDF दी गई हैं, शुरू के मंत्रों की संख्या के साथ। घर में संख्या पाँच-पाँच लिखी गई है, पर जिसे नित्य हवन करना है वह केवल एक-एक आहुति दे। यदि आपने इस तरह करना शुरू किया है और 40 दिन किया है, तो उसके साथ पंचबलि, या जीव सेवा, चलती है। पंचबलि का क्या अर्थ है? पाँच तरह के जीवों को भोजन देना। वे कहते हैं, हमें पाँच बलि नहीं देनी हैं — यदि ऐसा कहा जाता तो मुश्किल हो जाती: पाँच चौके बीस, आपको कम से कम 200 जीवों की बलि देनी पड़ती, और वह कैसे चलता, जनसंख्या नियंत्रण में आ जाती।
किस कुत्ते को खिलाना चाहिए, और प्रेत की समस्या बनी रहे तो क्या जोड़ें?
आवारा कुत्ता, और रविवार व मंगलवार को क्षेत्रपाल निकारी
स्वयं खाने से पहले जीव को खिलाएँ; सबसे अच्छा है पालतू कुत्ते की जगह आवारा कुत्ता। और यदि प्रेत और पिशाच से जुड़ी कोई आभिचारिक समस्या है जो नष्ट नहीं हो रही, तो इस प्रयोग के साथ 40 दिनों में पड़ने वाले हर रविवार और मंगलवार को क्षेत्रपाल निकारी भी करते रहें।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि जीव को अपना भोजन करने से पहले खिलाना है। हमारे मुँह में अन्न जाने से पहले जीव के मुँह में भोजन जाए, तो सबसे उत्तम है। इसमें सबसे सही यह है कि वह आवारा कुत्ता हो — पालतू कुत्ते को खिलाकर नहीं। आवारा कुत्ते को जो भी नैवेद्य आदि खिलाना चाहें, खिलाएँ। और यदि प्रेत और पिशाच से जुड़ी कोई आभिचारिक समस्या है जो नष्ट नहीं हो रही, तो इस प्रयोग के साथ रविवार और मंगलवार को क्षेत्रपाल निकारी भी करते रहें — इन 40 दिनों में जितने भी रविवार और जितने भी मंगलवार पड़ें। तब, वे कहते हैं, आपको अद्भुत प्रभाव देखने को मिलेगा; 40 दिनों में ऐसा हो ही नहीं सकता कि भैरव कृपा के बिना पत्ता भी हिले।
अनुष्ठान चलते समय कैसा आचरण ज़रूरी है?
नियम, निष्ठा और समर्पण, और द्वेष व काम से मुक्ति
तीन चीज़ें होनी चाहिए — नियम, निष्ठा और समर्पण। यदि समर्पण न रखें और बस किसी तरह कर दें, तो भाव नहीं रहता और यहाँ बात नहीं बनेगी, क्योंकि यहाँ क्रिया-प्रधानता से भाव-प्रधानता ज़्यादा भारी है। दूसरी बात, दूसरे जीवों के प्रति, और विपरीत लिंग व अपने लिंग के प्रति, अपना विचार और आचरण द्वेष और काम से मुक्त हो — न आसक्ति, न विरक्ति। पूरी तरह सामान्य और सरल रहने की कोशिश करें।
वक्ता कहते हैं कि पर नियम, निष्ठा और समर्पण — ये तीन चीज़ें होनी चाहिए। यदि आपने समर्पण नहीं रखा, और बस किसी तरह करके निपटाने की बात है, तो भाव नहीं है, और यहाँ बात नहीं बनेगी; यहाँ भाव भी प्रधान होना चाहिए, क्योंकि क्रिया-प्रधानता से भाव-प्रधानता ज़्यादा भारी बात हो जाती है। दूसरी बात यह है कि दूसरे जीवों के प्रति, और विपरीत लिंग के और अपने लिंग के लोगों के प्रति भी, अपने विचार और व्यवहार में द्वेष, काम और ऐसे विषय नहीं होने चाहिए। इसमें न किसी के प्रति द्वेष रखना है, न किसी के प्रति विरक्त या आसक्त होना है — दोनों में से कुछ भी नहीं होना चाहिए। पूरी तरह सामान्य और सरल रहने की कोशिश करनी है।
चालीस दिन की भैरव साधना से कौन-सा स्थायी फल मिलता है?
काम्य प्रयोग से भी जीवन भर का लाभ
वे कहते हैं कि तब ये बातें फल देती हैं, और एक बार भैरव जी की कृपा मिल गई — भैरव जी ने कृपा कर दी और आपने यह काम कर लिया — तो इन 40 दिनों की साधना का लाभ आपको पूरे जीवन मिलेगा। भले आपने सीधे काम्य प्रयोग किया हो, फिर भी उसमें भैरव जी की अनेक कृपाएँ मिलती हैं। कोई भी व्यक्ति यह सेवा पूजा कर सकता है।
वक्ता कहते हैं कि तभी ये बातें फल देती हैं; और एक बार भैरव जी की कृपा मिल गई, भैरव जी ने कृपा कर दी और आपने यह काम कर लिया, तो इन 40 दिनों की साधना से आपको पूरे जीवन लाभ मिलेगा। भले आपने यह काम्य प्रयोग सीधे किया हो, फिर भी उसमें आपको भैरव जी की अनेक कृपाएँ मिलती हैं। इस तरह कोई भी व्यक्ति सेवा पूजा आदि कर सकता है।
बटुक भैरव को वन दुर्गा और शूलिनी दुर्गा के साथ क्यों रखा जाता है?
वह बाल रूप जिसे कोई रोक नहीं सकता
वन दुर्गा भगवती विंध्यवासिनी का एक स्वरूप और भगवती का सबसे प्रचंड स्वरूप है; जहाँ उन्हें महाविद्या वन दुर्गा कहा जाता है, वहाँ वे ऐसी शक्ति हैं कि उनके आगे सब शक्तियाँ नगण्य हो जाती हैं, क्योंकि सब शक्तियाँ कहीं न कहीं उस स्वरूप में समाई हैं। वैसे ही भगवती शूलिनी दुर्गा। और बटुक भैरव एक छोटे बच्चे जैसे हैं जिन्हें कहीं भी जाने से कोई नहीं रोक सकता — माता-पिता कभी नहीं कहते कि तुम वहाँ नहीं जा सकते।
वक्ता कहते हैं कि आप सबने नाम सुने होंगे; यह विषय कई बार आता है। भगवती विंध्यवासिनी का एक स्वरूप है जिसे हम वन दुर्गा कहते हैं। वन दुर्गा भगवती का सबसे प्रचंड स्वरूप है। वे कहते हैं, यह अतिशयोक्ति नहीं, पर जहाँ वन दुर्गा को महाविद्या वन दुर्गा कहा जाता है, वहाँ वे ऐसी शक्ति हैं कि उनके आगे बाकी सब शक्तियाँ नगण्य हो जाती हैं — ऐसा नहीं कि कोई शक्ति छोटी या बड़ी है, बल्कि सब शक्तियाँ कहीं न कहीं उस स्वरूप में समाई हैं। इसी तरह भगवती शूलिनी दुर्गा हैं। और ठीक वैसे ही बताए जा रहे बटुक भैरव प्रयोग में: समझिए कि बटुक भैरव एक छोटे बच्चे जैसी शक्ति हैं, जिन्हें कहीं भी आने-जाने से कोई नहीं रोक सकता। वे जहाँ चाहेंगे जाएँगे; माता-पिता उन्हें कभी रोककर नहीं कहेंगे कि नहीं, तुम वहाँ नहीं जा सकते।
मसान क्या है, और वह घर में क्यों घुसता है?
छोटे बच्चे की आत्मा, और बटुक भैरव का बाल रूप
बटुक भैरव में ऐसी सामर्थ्य, ऐसी ऊर्जा और कृपा है कि जो काम असाध्य होने वाले हैं, उन्हें वे अपने बटुक रूप में ही पूरा कर देते हैं, क्योंकि वे बाल रूप में हैं। और मसानिक शक्तियों की बात — मसान किसी छोटे बच्चे की आत्मा होती है, और इसी कारण वह घर में घुस जाता है।
वक्ता कहते हैं कि बटुक भैरव जी में ऐसी सामर्थ्य है, ऐसी ऊर्जा, ऐसी कृपा, कि आपके जो काम असाध्य होने वाले थे, उन्हें वे अपने बटुक स्वरूप से ही पूरा कर देते हैं, क्योंकि वे बाल स्वरूप में हैं। इसलिए आपको निश्चिंत होकर उनकी सेवा पूजा करनी चाहिए। और जितनी भी मसानिक शक्तियाँ हैं — मसानिक शक्ति का क्या अर्थ है? मसान किसी छोटे बच्चे की आत्मा होती है, और इसी कारण वह घर में घुस जाता है।
लोग किसी घर की जानकारी जुटाने के लिए मसान का प्रयोग क्यों करते हैं?
घर के न पितृ उसे रोक पाते हैं, न देव शक्तियाँ
ताकि उस घर के पितृ भी उसे न रोक सकें और उस घर की देव शक्तियाँ भी न रोक सकें। कौन-सी शक्तियाँ उसे रोक सकती हैं? यदि उस घर में कोई पूजित देव पुत्र है, यानी उस घर का कोई मसान, तो वह उसे रोकेगा — काल मृत्यु से मरा कोई बच्चा, जिसकी पूजा हुई है, जो किसी शक्ति के अधीन आ गया है और जिसके पास शक्ति है, वह रोक सकता है; नहीं तो नहीं।
वक्ता पूछते हैं कि कोई व्यक्ति किसी की जानकारी जुटाने के लिए मसान का प्रयोग क्यों करता है। ताकि उस घर के पितृ भी उसे न रोक सकें, और उस घर की देव शक्तियाँ भी उसे न रोक सकें। कौन-सी शक्तियाँ हैं जो उसे रोक सकती हैं? यदि उस घर में कोई पूजित देव पुत्र है — यानी उस घर का कोई मसान — तो वह उसे रोकेगा। यदि किसी बच्चे की अकाल मृत्यु हुई है और उसकी पूजा हुई है, वह किसी शक्ति के अधीन आ गया है, और उसके साथ शक्ति है, तो वह उसे रोक सकता है; नहीं तो नहीं।
घर में ऐसे प्रवेश को और क्या रोक सकता है?
उस घर में पूजित बाल हनुमान या बटुक भैरव
दूसरी बात यह है कि वहाँ या तो बाल हनुमान जी या बटुक भैरव जी की पूजा हो, ताकि उनसे जुड़ा तत्त्व उपस्थित रहे। यदि कोई करोड़पति है पर उसने कभी एक बार भी बटुक भैरव के नाम से आहुति नहीं दी, कभी उनका नाम नहीं लिया, और श्री विग्रह या मंदिर की तो बात ही छोड़िए — तो, वक्ता पूछते हैं, ये चीज़ें कहाँ से रुकेंगी? नहीं रुकेंगी। हर चीज़ का अपना विज्ञान है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि वहाँ या तो बाल हनुमान जी हों या बटुक भैरव जी की पूजा होती हो — ताकि उनसे जुड़ा तत्त्व उपस्थित रहे। अब आप जीवन में करोड़पति हो सकते हैं, पर यदि आपने एक बार भी बटुक भैरव जी के नाम से आहुति नहीं दी, उनका नाम तक नहीं लिया, और उनके श्री विग्रह या मंदिर की तो बात ही छोड़ दीजिए — तो ये सब चीज़ें कहाँ से रुकेंगी? नहीं रुकेंगी। हर चीज़ का अपना विज्ञान है; वे इसे नहीं रोकेंगे। इसके पीछे उनकी अपनी थ्योरी है, इसे विज्ञान कहिए, जो चाहे कहिए। और यदि आप झुँझलाए हुए हैं, तो उनका अपमान कीजिए — वह, वे कहते हैं, आपकी बात है, हमारी नहीं। पर जो वास्तविक है वह बस इतना है: नहीं।
क्या भैरव उन पितरों को गति दे सकते हैं जो आगे नहीं बढ़ते?
वायव्य योनि, आसक्ति, और शिव महापुराण का उदाहरण
वे कहते हैं कि ऐसे प्रवेश रोकने में और उनकी गति और मुक्ति कराने में भी इन स्वरूपों का बहुत बड़ा योगदान है। कई बार यह चर्चा उठती है कि नारायण बलि हो गई, त्रिपिंडी हो गई, फिर भी पितर गति नहीं ले रहे; ये काड़ पितर बहुत उथल-पुथल मचा रहे हैं। ऐसे जीव भी एक योनि हैं — वायव्य योनि, वायु-प्रधान शरीर — और उनकी आसक्ति भोजन पर या किसी शरीर पर हो सकती है।
वक्ता कहते हैं कि इन स्वरूपों को रोकने में, और इन स्वरूपों की गति और मुक्ति कराने में, उनका योगदान बहुत बड़ा है। कई बार हम यह चर्चा करते हैं: नारायण बलि हो गई, त्रिपिंडी श्राद्ध हो गई, फिर भी ये पितर गति नहीं ले रहे। ये काड़ पितर बहुत उथल-पुथल मचा रहे हैं। उनकी गति और मुक्ति के लिए — चाहे वे किसी विचार से बँधे हों, या उनकी अपनी आसक्ति जाग गई हो। जीव भी एक तरह की योनि हैं, वायव्य योनि, वायु-प्रधान शरीर। उनकी आसक्ति किसी चीज़ पर, भोजन पर, किसी शरीर पर पड़ गई है, और वे गति ले ही नहीं रहे। वे कहते हैं, जैसे शिव पुराण में आया है, बिंदुग नाम का पिशाच — पुष्पदंत गंधर्व ने उसे बाँधा और फिर उसकी गति के लिए उसे पूरा शिव महापुराण सुनाया।
शास्त्र क्या कहता है
A piśāca who could find no gati was freed from his ghost-state by being bound and made to hear the entire Śiva Purāṇa recited to him.
Mahātmya ch. 5 tells this of a piśāca named Bindhuga (a former brahmin), bound with nooses and made to hear the whole Śiva Purāṇa, then freed and carried to Śiva's world.
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पुराभवे पिशाचः स बिन्दुगाह्वोऽभवद् द्विजः । अस्या नार्याः पतिर्दुष्टो मत्सख्या वृषलीपतिः ॥
पूर्वजन्म में वह पिशाच बिन्दुग नामक ब्राह्मण था — मेरी इस सखी का दुष्ट पति, और एक नीच स्त्री का पति।
स्नानसन्ध्याक्रियाहीनोऽशौचः क्रोधविमूढधीः । दुर्भक्षी सज्जनद्वेषी दुष्परिग्रहकारकः ॥
स्नान, सन्ध्या और नित्यकर्म से रहित, अपवित्र, क्रोध से मूढ़ बुद्धि वाला, अभक्ष्य खाने वाला, सज्जनों से द्वेष करने वाला, दूषित दान लेने वाला;
हिंसकः शस्त्रधारी च सव्यहस्तेन भोजनी । दीनानां पीडकः क्रूरः परवेश्मप्रदीपकः ॥
— हिंसक, शस्त्रधारी, बाएँ हाथ से खाने वाला, दीनों को सताने वाला, क्रूर, पराए घरों में आग लगाने वाला;
चाण्डालाभिरतो नित्यं वेश्याभोगी महाखलः । स्वपत्नीत्यागकृत् पापी दुष्टसङ्गरतस्तदा ॥
— सदा चाण्डालों में रत, वेश्यागामी, महा दुष्ट; अपनी पत्नी को त्यागने वाला पापी, दुष्टों के संग में लगा हुआ।
तेन वेश्याकुसङ्गेन सुकृतं नाशितं महत् । वित्तलोभेन महिषी निर्भया जारिणी कृता ॥
उस वेश्या के कुसंग से बड़ा पुण्य नष्ट हो गया; धन के लोभ से उसने अपनी पत्नी को निर्भय, व्यभिचारिणी बना दिया।
आमृत्योः स दुराचारी कालेन निधनं गतः । ययौ यमपुरं घोरं भोगस्थानं हि पापिनाम् ॥
मृत्यु तक दुराचार में लगा हुआ वह समय आने पर मर गया और पापियों के भोगस्थान, घोर यमपुर को गया।
तत्र भुक्त्वा स दुष्टात्मा नरकानि बहूनि च । इदानीं स पिशाचोऽस्ति विन्ध्येऽद्रौ पापभुक् खलः ॥
वहाँ उस दुष्टात्मा ने बहुत-से नरक भोगे, और अब वह विन्ध्य पर्वत पर पिशाच है — अपना पाप भोगता हुआ दुष्ट।
तस्याग्रे परमां पुण्यां सर्वपापविनाशिनीम् । दिव्यां शिवपुराणस्य कथां कथय यत्नतः ॥
उसके आगे यत्नपूर्वक शिवपुराण की उस परम पुण्यमयी, सर्वपापनाशिनी, दिव्य कथा का प्रवचन करो।
द्रुतं शिवपुराणस्य कथाश्रवणतः परात् । सर्वपापविशुद्धात्मा हास्यति प्रेततां च सः ॥
शिवपुराण की उस परम कथा के श्रवण से शीघ्र ही, समस्त पाप से शुद्ध आत्मा वाला होकर वह प्रेत-योनि को त्याग देगा।
मुक्तं च दुर्गतेस्तं वै बिन्दुगं त्वं पिशाचकम् । मदाज्ञया विमानेन समानय शिवान्तिकम् ॥
और दुर्गति से मुक्त हुए उस बिन्दुग पिशाच को मेरी आज्ञा से विमान पर बिठाकर तुम शिव के समीप ले आओ।
इत्यादिष्टो महेशान्या गन्धर्वेन्द्रश्च तुम्बुरुः । मुमुदेऽतीव मनसि भाग्यं निजमवर्णयत् ॥
महेशी के इस प्रकार आदेश देने पर गन्धर्वराज तुम्बुरु मन में बहुत प्रसन्न हुए और अपने भाग्य की सराहना की।
आरुह्य सुविमानं स सत्या तत्प्रियया सह । ययौ विन्ध्याचले सोऽरं यत्रास्ते नारदप्रियः ॥
अपनी सती प्रिया के साथ सुन्दर विमान पर चढ़कर नारद के प्रिय मित्र तुम्बुरु शीघ्र ही विन्ध्याचल गए, जहाँ वह पिशाच रहता था।
तत्रापश्यत् पिशाचं तं महाकायं महाहनुम् । प्रहसन्तं रुदन्तं च वल्गन्तं विकटाकृतिम् ॥
वहाँ उसने उस पिशाच को देखा — विशाल काय, बड़ी ठोड़ी वाला, कभी हँसता, कभी रोता, कभी उछलता, विकराल आकृति का।
बलाज्जग्राह तं पाशैः पिशाचं चातिभीकरम् । तुम्बुरुश्शिवसत्कीर्तिगायकश्च महाबली ॥
शिव की सत्कीर्ति के गायक महाबली तुम्बुरु ने उस अत्यन्त भयंकर पिशाच को बलपूर्वक पाशों से बाँध लिया।
अथो शिवपुराणस्य वाचनार्थं स तुम्बुरुः । निश्चित्य रचनां चक्रे महोत्सवसमन्विताम् ॥
फिर शिवपुराण की कथा बाँचने का निश्चय कर तुम्बुरु ने महोत्सव से युक्त व्यवस्था की।
पिशाचं तारितुं देव्याः शासनात्तुम्बुरुर्गतः । विन्ध्यं शिवपुराणं स ह्यद्रिं श्रावयितुं परम् ॥
“देवी की आज्ञा से तुम्बुरु एक पिशाच का उद्धार करने विन्ध्य पर्वत पर गए हैं, उसे परम शिवपुराण सुनाने” —
इति कोलाहलो जातः सर्वलोकेषु वै महान् । तत्र तच्छ्रवणार्थाय ययुर्देवर्षयो द्रुतम् ॥
— ऐसा बड़ा कोलाहल सब लोकों में मच गया; और उसे सुनने के लिए देवता और ऋषि शीघ्र वहाँ पहुँचे।
समाजस्तत्र परमोऽद्भुतश्चासीच्छुभावहः । तेषां शिवपुराणस्यागतानां श्रोतुमादरात् ॥
वहाँ एक परम अद्भुत, कल्याणकारी सभा जुट गई — उन लोगों की जो आदरपूर्वक शिवपुराण सुनने आए थे।
पिशाचमथ तं पाशैर्बद्ध्वा समुपवेश्य च । तुम्बुरुर्वल्लकीहस्तो जगौ गौरीपतेः कथाम् ॥
फिर उस पिशाच को पाशों से बाँधकर, आसन पर बिठाकर, हाथ में वीणा लिए तुम्बुरु ने गौरीपति की कथा का गान किया।
The gandharva who bound the piśāca and recited the Śiva Purāṇa to him was Puṣpadanta.
The text names the gandharva Tumburu, sent by the goddess — not Puṣpadanta. The core story (a bound piśāca freed by hearing the Purāṇa) is right; the gandharva's name is wrong.
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पुराभवे पिशाचः स बिन्दुगाह्वोऽभवद् द्विजः । अस्या नार्याः पतिर्दुष्टो मत्सख्या वृषलीपतिः ॥
पूर्वजन्म में वह पिशाच बिन्दुग नामक ब्राह्मण था — मेरी इस सखी का दुष्ट पति, और एक नीच स्त्री का पति।
स्नानसन्ध्याक्रियाहीनोऽशौचः क्रोधविमूढधीः । दुर्भक्षी सज्जनद्वेषी दुष्परिग्रहकारकः ॥
स्नान, सन्ध्या और नित्यकर्म से रहित, अपवित्र, क्रोध से मूढ़ बुद्धि वाला, अभक्ष्य खाने वाला, सज्जनों से द्वेष करने वाला, दूषित दान लेने वाला;
हिंसकः शस्त्रधारी च सव्यहस्तेन भोजनी । दीनानां पीडकः क्रूरः परवेश्मप्रदीपकः ॥
— हिंसक, शस्त्रधारी, बाएँ हाथ से खाने वाला, दीनों को सताने वाला, क्रूर, पराए घरों में आग लगाने वाला;
चाण्डालाभिरतो नित्यं वेश्याभोगी महाखलः । स्वपत्नीत्यागकृत् पापी दुष्टसङ्गरतस्तदा ॥
— सदा चाण्डालों में रत, वेश्यागामी, महा दुष्ट; अपनी पत्नी को त्यागने वाला पापी, दुष्टों के संग में लगा हुआ।
तेन वेश्याकुसङ्गेन सुकृतं नाशितं महत् । वित्तलोभेन महिषी निर्भया जारिणी कृता ॥
उस वेश्या के कुसंग से बड़ा पुण्य नष्ट हो गया; धन के लोभ से उसने अपनी पत्नी को निर्भय, व्यभिचारिणी बना दिया।
आमृत्योः स दुराचारी कालेन निधनं गतः । ययौ यमपुरं घोरं भोगस्थानं हि पापिनाम् ॥
मृत्यु तक दुराचार में लगा हुआ वह समय आने पर मर गया और पापियों के भोगस्थान, घोर यमपुर को गया।
तत्र भुक्त्वा स दुष्टात्मा नरकानि बहूनि च । इदानीं स पिशाचोऽस्ति विन्ध्येऽद्रौ पापभुक् खलः ॥
वहाँ उस दुष्टात्मा ने बहुत-से नरक भोगे, और अब वह विन्ध्य पर्वत पर पिशाच है — अपना पाप भोगता हुआ दुष्ट।
तस्याग्रे परमां पुण्यां सर्वपापविनाशिनीम् । दिव्यां शिवपुराणस्य कथां कथय यत्नतः ॥
उसके आगे यत्नपूर्वक शिवपुराण की उस परम पुण्यमयी, सर्वपापनाशिनी, दिव्य कथा का प्रवचन करो।
द्रुतं शिवपुराणस्य कथाश्रवणतः परात् । सर्वपापविशुद्धात्मा हास्यति प्रेततां च सः ॥
शिवपुराण की उस परम कथा के श्रवण से शीघ्र ही, समस्त पाप से शुद्ध आत्मा वाला होकर वह प्रेत-योनि को त्याग देगा।
मुक्तं च दुर्गतेस्तं वै बिन्दुगं त्वं पिशाचकम् । मदाज्ञया विमानेन समानय शिवान्तिकम् ॥
और दुर्गति से मुक्त हुए उस बिन्दुग पिशाच को मेरी आज्ञा से विमान पर बिठाकर तुम शिव के समीप ले आओ।
इत्यादिष्टो महेशान्या गन्धर्वेन्द्रश्च तुम्बुरुः । मुमुदेऽतीव मनसि भाग्यं निजमवर्णयत् ॥
महेशी के इस प्रकार आदेश देने पर गन्धर्वराज तुम्बुरु मन में बहुत प्रसन्न हुए और अपने भाग्य की सराहना की।
आरुह्य सुविमानं स सत्या तत्प्रियया सह । ययौ विन्ध्याचले सोऽरं यत्रास्ते नारदप्रियः ॥
अपनी सती प्रिया के साथ सुन्दर विमान पर चढ़कर नारद के प्रिय मित्र तुम्बुरु शीघ्र ही विन्ध्याचल गए, जहाँ वह पिशाच रहता था।
तत्रापश्यत् पिशाचं तं महाकायं महाहनुम् । प्रहसन्तं रुदन्तं च वल्गन्तं विकटाकृतिम् ॥
वहाँ उसने उस पिशाच को देखा — विशाल काय, बड़ी ठोड़ी वाला, कभी हँसता, कभी रोता, कभी उछलता, विकराल आकृति का।
बलाज्जग्राह तं पाशैः पिशाचं चातिभीकरम् । तुम्बुरुश्शिवसत्कीर्तिगायकश्च महाबली ॥
शिव की सत्कीर्ति के गायक महाबली तुम्बुरु ने उस अत्यन्त भयंकर पिशाच को बलपूर्वक पाशों से बाँध लिया।
अथो शिवपुराणस्य वाचनार्थं स तुम्बुरुः । निश्चित्य रचनां चक्रे महोत्सवसमन्विताम् ॥
फिर शिवपुराण की कथा बाँचने का निश्चय कर तुम्बुरु ने महोत्सव से युक्त व्यवस्था की।
पिशाचं तारितुं देव्याः शासनात्तुम्बुरुर्गतः । विन्ध्यं शिवपुराणं स ह्यद्रिं श्रावयितुं परम् ॥
“देवी की आज्ञा से तुम्बुरु एक पिशाच का उद्धार करने विन्ध्य पर्वत पर गए हैं, उसे परम शिवपुराण सुनाने” —
इति कोलाहलो जातः सर्वलोकेषु वै महान् । तत्र तच्छ्रवणार्थाय ययुर्देवर्षयो द्रुतम् ॥
— ऐसा बड़ा कोलाहल सब लोकों में मच गया; और उसे सुनने के लिए देवता और ऋषि शीघ्र वहाँ पहुँचे।
समाजस्तत्र परमोऽद्भुतश्चासीच्छुभावहः । तेषां शिवपुराणस्यागतानां श्रोतुमादरात् ॥
वहाँ एक परम अद्भुत, कल्याणकारी सभा जुट गई — उन लोगों की जो आदरपूर्वक शिवपुराण सुनने आए थे।
पिशाचमथ तं पाशैर्बद्ध्वा समुपवेश्य च । तुम्बुरुर्वल्लकीहस्तो जगौ गौरीपतेः कथाम् ॥
फिर उस पिशाच को पाशों से बाँधकर, आसन पर बिठाकर, हाथ में वीणा लिए तुम्बुरु ने गौरीपति की कथा का गान किया।
यदि कोई आत्मा गति न ले तो क्या करें?
एक संकल्प, और पहले किए पुरश्चरण का बल
यहाँ भी उसी तरह की बात होगी। यदि आप भैरव जी की सेवा कर रहे हैं और कोई गति नहीं ले रहा, तो पहले इस बात का संकल्प करें; और भैरव की कोई विस्तृत प्रक्रिया न भी हो, तो केवल उनकी पूजा दी जाए और प्रार्थना की जाए। यदि आपने पहले उनका पुरश्चरण अनुष्ठान किया है, तो वे उस आत्मा को बाँधकर ले जाते हैं, और उसकी गति उसी तरह हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ भी उसी तरह की बात होगी। यदि आप भैरव जी की सेवा कर रहे हैं और कोई गति नहीं ले रहा, तो पहले इस बात का संकल्प किया जाए; और भैरव की विस्तृत प्रक्रिया के बिना भी, केवल उनकी पूजा दी जाए और प्रार्थना की जाए। और यदि आपने पहले ही उनका पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। अनुष्ठान किया है, तो वे उसे बाँधकर ले जाते हैं। फिर उसकी गति उसी तरह होती है। वे उसे डंडे की भाषा में बाँधकर ले जाते हैं, और फिर ज़बरदस्ती — अब यह सब सुनो, और फिर अपनी गति लो।
रक्षा के काम में भैरव दूसरे देवताओं से अलग कैसे हैं?
धर्म और अधर्म को तौलने वाले रक्षपाल
दूसरी शक्तियाँ बस भाव में, दया भाव में रहती हैं। पर यह ऐसी शक्ति है जो धर्म और अधर्म की बात पूरी तरह और तत्परता से उठाती है — क्योंकि जो रक्षपाल हैं, जो किसी चीज़ की रक्षा के लिए तैयार हैं, वे धर्म और अधर्म की बात को बहुत बारीकी से देखते हैं। इसलिए हर किसी को घर में उनकी सेवा पूजा अवश्य करनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ केवल भैरव जी ही सहयोग करेंगे। दूसरी शक्तियाँ बस भाव में हैं; दूसरी शक्तियाँ दया भाव में हैं। पर यह ऐसी शक्ति है कि वे धर्म और अधर्म की बात पूरी तरह और तत्परता से उठाते हैं — क्योंकि जो रक्षपाल हैं, जो किसी चीज़ की रक्षा के लिए तैयार हैं, वे धर्म और अधर्म की बात को बहुत बारीकी से देखते हैं। इसलिए घर में उनकी सेवा पूजा अवश्य करनी चाहिए; हर किसी को करनी चाहिए। और अब इसमें यह भी आ जाता है: धन-संपत्ति से जुड़ी कोई बात हो, कोई विवाद, कोई कोर्ट केस, कोई झूठा मुक़दमा — इन सब बातों में आपका यह प्रयोग काम करेगा।
सबसे तीव्र आभिचारिक प्रहार के विरुद्ध क्या प्रयोग होता है?
महाभैरव, और यह नियम कि भैरव की सेवा रुद्राक्ष के बिना नहीं होती
अभिचार के लिए आप इन्हें भी ले सकते हैं, पर प्रभाव पहले ही दिन से आप तक पहुँचना चाहिए। यदि समस्या ऐसी हो गई है कि प्रभाव किसी के शरीर पर ही आ रहा है, तो वहाँ महाभैरव का प्रयोग करें। और जब भी बटुक भैरव की या भैरव के किसी भी रूप की सेवा पूजा करना चाहें, तो एक सबसे सही नियम यह है: रुद्राक्ष के बिना उनकी सेवा पूजा न करें।
वक्ता पूछते हैं कि अब जहाँ सबसे तीव्र आभिचारिक प्रहार है, वहाँ हम प्रयोग कैसे करेंगे। अभिचार आदि के लिए आप इन्हें भी ले सकते हैं, पर प्रभाव पहले ही दिन से आप तक पहुँचना शुरू हो जाना चाहिए। यदि समस्या ऐसी हो गई है कि प्रभाव किसी के शरीर पर ही आ रहा है, तो वहाँ महाभैरव का प्रयोग करें। और जब भी बटुक भैरव जी की, या भैरव जी के किसी भी स्वरूप की सेवा पूजा करना चाहें, तो एक सबसे सही नियम यह है: रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । के बिना उनकी सेवा पूजा न करें।
भैरव उपासना में रुद्राक्ष की माला अनिवार्य क्यों है?
शरीर में भैरव तत्त्व आने पर उग्रता को संतुलित रखना
क्योंकि उनकी ऊर्जा इतनी अपार और असीम है कि जब भैरव तत्त्व शरीर और आभामंडल में उपस्थित होने लगता है, तो रक्षा के भाव के साथ आपके भीतर उग्र भाव भी बढ़ता है। आप अपने परिवार की रक्षा और पालन करने वाले बनेंगे, आपका धैर्य बहुत बढ़ेगा और आप अपने परिवार के लिए मरते दम तक लड़ेंगे — पर उग्रता भी उतनी ही आएगी। उग्रता असंतुलित न हो और मंत्रों के प्रभाव से शरीर में कोई विक्षोभ न उठे, इसके लिए गले में रुद्राक्ष की माला होनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि उनकी ऊर्जा इतनी अपार है, इतनी असीम है, कि जब भैरव तत्त्व शरीर में उपस्थित होने लगता है, जब आभामंडल में उसकी उपस्थिति बनने लगती है, तो आपके भीतर रक्षा के भाव के साथ उग्र भाव भी बढ़ेगा। आप अपने परिवार की रक्षा और पालन करने वाले बन जाएँगे। आपका धैर्य बहुत बढ़ जाएगा। आप अपने परिवार के लिए कहीं भी जाकर मरते दम तक लड़ेंगे — पर उग्रता भी उसी मात्रा में आएगी। उग्रता असंतुलित न हो, और मंत्रों के प्रभाव से शरीर में कोई विक्षोभ न उठे, इसी कारण गले में रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला अवश्य होनी चाहिए।
कौन-सा रुद्राक्ष पहना जा सकता है, और जप किस माला पर होता है?
पंचमुखी कालाग्नि, भैरव या भैरवी रुद्राक्ष; हकीक और मुंडमाला
पंचमुखी कालाग्नि रुद्राक्ष, या भैरव रुद्राक्ष, या भैरवी रुद्राक्ष पहनें — जो चाहें, या जैसी आपकी अपनी स्थिति हो; पर भैरव जी की सेवा पूजा में माला अनिवार्य है। यदि पहनते हुए रुद्राक्ष की माला पर ही जप हो, तो मंत्र जप का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। काले हकीक पर जप और ऐसी अन्य तंत्रोक्त बातें अलग विषय हैं।
वक्ता कहते हैं कि चाहे आप पंचमुखी कालाग्नि रुद्राक्ष पहनें, या भैरव रुद्राक्ष, या भैरवी रुद्राक्ष — जैसा चाहें, जैसे भी पहनना चाहें, या अपनी गति और स्थिति के अनुसार — पर माला अनिवार्य है: भैरव जी की सेवा पूजा में रुद्राक्ष अनिवार्य है। और यदि रुद्राक्ष की माला पहनकर, उनका जप और उनकी सेवा पूजा रुद्राक्ष की माला से ही की जाए, तो मंत्र जप का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। काले हकीक पर जप करना, या ऐसी कोई और तंत्रोक्त बात, अलग विषय बन जाता है।
क्या घर में मुंडमाला पर जप किया जा सकता है?
हड्डी की असली मुंडमाला बिकती नहीं; यह परंपरा की बात है
वक्ता कहते हैं कि यह घर में नहीं होता। असली मुंडमाला, जो हड्डी की होती है और जिस विधि से बनती है उस विधि से बनी, आज की तारीख़ में उपलब्ध नहीं है और किसी दुकान से खरीदी नहीं जा सकती। यह परंपरा की बात है जो आपको दी जा सकती है यदि आपके कोई वामाचार मार्ग के गुरु हों, जो परंपरागत तरीके से ये सब विधान दे सकें। यदि कोई कह रहा है कि यह मुंडमाला है, तो वह पत्थर की है, साफ़ बात है — बाकी आपकी इच्छा। वे कहते हैं, हमारे गृहस्थ तंत्र परिवार में यह विषय है ही नहीं।
वक्ता कहते हैं कि मुंडमाला पर जप करने का प्रश्न पूछा जाता है, और वह घर में नहीं होता। और असली मुंडमाला — हड्डी की बनी, जिस विधि से बनती है उस विधि से — आज की तारीख़ में उपलब्ध नहीं है; आप किसी दुकान से नहीं खरीद सकते। यह परंपरा की बात है जो आपको दी जा सकती है: यदि आपके कोई ऐसे गुरु हैं जो वामाचार मार्ग के हैं, तो वे परंपरागत तरीके से ये सब विधान दे सकते हैं। यदि कोई कह रहा है कि यह मुंडमाला है, तो वह पत्थर की है — यह साफ़ है; बाकी आपकी इच्छा। वे कहते हैं, हमारे गृहस्थ तंत्र परिवार में यह विषय है ही नहीं।
गृहस्थ के घर के भीतर किन देवताओं को नहीं लाना चाहिए?
उग्र देवता बाहर मंदिर में पूजे जाते हैं; श्मशान काली घर में नहीं बिठाई जातीं
वे कहते हैं, गृहस्थी के मार्ग पर चलें, ताकि आपका कल्याण हो और ऐसा कोई तत्त्व या देव शक्ति उपस्थित न हो जो परिवार के दूसरे लोगों का अहित करे। इसलिए उग्र देवता की पूजा बाहर, बाहर के मंदिर में होनी चाहिए, और वह घर के भीतर न आए। उनकी सेवा पूजा देनी है, रोकनी नहीं — जो उनका अधिकार है वह उन तक पहुँचे — पर इस अनुसार कि उनका स्वरूप कहाँ का है। श्मशान काली की पूजा घर में बिठाकर नहीं होती; जो करवाते हैं वे अपना भला-बुरा कर लें, पर जिसके लिए की जाती है उसका नाश निश्चित है।
वक्ता समझाते हैं कि कहने का तात्पर्य यह है कि गृहस्थी की बात आपकी है, इसलिए उसी मार्ग पर चलें जिससे आपका अपना कल्याण हो, और ऐसा कोई तत्त्व उपस्थित न हो, ऐसी कोई देव शक्ति उपस्थित न हो, जो परिवार के दूसरे लोगों का अहित करे। इसलिए उग्र देवता की पूजा घर के बाहर, केवल बाहर के मंदिर में हो; वह घर के भीतर न आए। उनकी सेवा पूजा पूरी तरह देनी है; उसे रोकना नहीं है। जिसका जो अधिकार है, वह पूजा और वह अधिकार उन तक पहुँचना चाहिए — इसी के लिए मनुष्य शरीर मिला है — पर इस अनुसार कि उनका स्वरूप कहाँ का है। अब, श्मशान काली को घर में बिठाकर उनकी पूजा नहीं होती। वे कहते हैं, जो करवाते हैं वे अपना भला या बुरा कर लें, पर जिसके लिए की जा रही है उसका नाश निश्चित है, निश्चित। इसमें दो राय नहीं।
महाभैरव प्रयोग किसे नहीं करना चाहिए?
दो साल से चैनल पर है, पर बिना ज़रूरत वालों के लिए नहीं
महाभैरव के वीडियो दो साल से चैनल पर हैं और बहुतों ने उनसे लाभ लिया है और उनकी समस्याएँ दूर हुई हैं, और वे यह बार-बार कहते हैं। पर एक बात पक्की है: यदि आपको ज़रूरत नहीं, तो इसका प्रयोग न करें। यदि आप अभिचार से पीड़ित नहीं हैं, तो बिल्कुल प्रयोग न करें।
वक्ता कहते हैं कि इसमें आप एक सबसे तीव्र प्रयोग भी कर सकते हैं, महाभैरव का। जब आप महाभैरव का प्रयोग करते हैं, तो उसमें दो बातें होती हैं। वीडियो पहले से, दो साल से चैनल पर हैं; लोग इससे अनंत लाभ ले रहे हैं, बहुत लोगों की समस्याएँ दूर हुई हैं और लोग अब भी इसका प्रयोग कर रहे हैं, और वे कहते हैं कि वे इसके बारे में बार-बार बोलते हैं। पर एक बात यह है: यदि आपको ज़रूरत नहीं, तो इसका प्रयोग न करें। यदि आप अभिचार से पीड़ित नहीं हैं, तो इसका बिल्कुल प्रयोग न करें।
यदि खाने को कोई शत्रु न हो और महाभैरव का आवाहन किया जाए तो क्या होता है?
निग्रह की सामर्थ्य वाली ऊर्जा को कुछ न मिले तो वह हानि की ओर मुड़ती है
यदि आप पर कोई तंत्र-मंत्र नहीं हो रहा और कोई शत्रु आपके जीवन को हानि पहुँचाने की स्थिति में नहीं है, तो इसके प्रयोग की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। देखिए आप किस तरह की ऊर्जा बुला रहे हैं: यदि उस ऊर्जा में निग्रह की सामर्थ्य है, तो वह शत्रुओं को खाएगी, नकारात्मक शक्तियों को खाएगी, प्रेत और पिशाच को खाएगी। और यदि आपके पास कुछ है ही नहीं — न अभिचार, न कोई तंत्र-मंत्र जो हानि कर सके, न ऐसा कोई कष्ट देने वाला शत्रु जिसे नष्ट करना हो — तो ऐसे समय महाभैरव करने पर हानि आप तक पहुँचने लगती है।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप पर कोई तंत्र-मंत्र नहीं कर रहा, और कोई शत्रु आपके जीवन को हानि पहुँचाने की स्थिति में नहीं है, तो आपको इसके प्रयोग की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। देखिए आप किस तरह की ऊर्जा बुला रहे हैं। यदि उस ऊर्जा में निग्रह की सामर्थ्य है, तो वह शत्रुओं को खाएगी, नकारात्मक शक्तियों को खाएगी, प्रेत और पिशाच को खाएगी। और आपके पास कुछ है ही नहीं: न आपके साथ अभिचार की कोई बात है, न तंत्र-मंत्र की कोई बात जो आपको हानि कर सके, न ऐसा कोई शत्रु है जो कष्ट दे रहा हो और जिसे नष्ट करना हो। तो ऐसे समय जब आप महाभैरव आदि करते हैं, तो कहीं न कहीं हानि आप तक पहुँचने लगती है। क्योंकि वे खाएँगे किसे, वे पूछते हैं — और जब आपने उन्हें बुलाया है तो उन मंत्रों में क्या है, पूरी बात शाबर है और ठीक यही कहती है, ऐसे करो, वैसे करो।
महाभैरव कब लिया जा सकता है, और उसे कहाँ सिद्ध करना चाहिए?
केवल सबसे विकट परिस्थिति में, और सिद्धि घर के बाहर
केवल जब आप ऐसी विकट स्थिति में हों, तभी यह प्रयोग करें और इस स्वरूप की पूजा करें। यदि बस यह सुनकर कि किसी को ऐसा अनुभव हुआ, आप इसे सिद्ध करके रखना चाहते हैं, तो इसे घर के बाहर सिद्ध करें — घर के भीतर कभी सिद्ध न करें।
वक्ता कहते हैं कि केवल जब आप ऐसी सबसे कठिन परिस्थिति में हों, तभी यह प्रयोग करें; उनकी पूजा करें, इस स्वरूप की पूजा करें। यदि बस यह सुनकर कि ऐसा अनुभव होता है, ऐसा कुछ हुआ था, आप इसे सिद्ध करके रखना चाहते हैं, तो इसे घर के बाहर सिद्ध करें। घर के भीतर कभी सिद्ध न करें।
मंदिर में महाभैरव कैसे सिद्ध किया जाता है, और कितने मंडलों में?
शिव मंदिर में घोषित उद्देश्य, और तीन मंडल की विधि
शिव जी के मंदिर में करें, और साफ़ कहें: प्रभु, यदि जीवन में कभी, विपत्ति के समय, ऐसी ज़रूरत आई, तो हम इन मंत्रों का प्रयोग करेंगे; इसी उद्देश्य से हम यह विधान सिद्ध कर रहे हैं। इसे मंदिर में सिद्ध करें। सबसे तीव्र रूप है तीन मंडलों में पूजा करना।
वक्ता कहते हैं कि शिव जी के मंदिर में करें, और साफ़ कहें: प्रभु, यदि जीवन में कभी, विपत्ति के समय, ऐसी ज़रूरत आई, तो हम इन मंत्रों का प्रयोग करेंगे; इसी उद्देश्य से हम यह विधान सिद्ध कर रहे हैं। और इसे मंदिर में सिद्ध करें। यदि करें, तो सबसे तीव्र रूप है तीन मंडलों में पूजा करना।
महाभैरव विधान के पहले मंडल में क्या किया जाता है?
वह मंत्र जिसमें चार भैरव हैं, और माला की संख्या
पहले मंडल में महाभैरव मंत्र का जप, जिसमें काल भैरव, बटुक भैरव, भूत भैरव और महाभैरव सबके नाम आते हैं — इसमें मुख्य रूप से चार भैरव उपस्थित हैं। संभव हो तो 41 दिन रोज़ कम से कम 41 माला अद्भुत है; एक बैठक में न हो तो दो में, सुबह-शाम 11 और 11; और वह भी संभव न हो तो कम से कम पाँच और पाँच। यदि कोई दिन में 41 माला — सुबह 21 और शाम 21 — पूरे 41 दिन करे, तो एक मंडल पूरा होता है।
वक्ता कहते हैं कि पहले मंडल में महाभैरव मंत्र है — वह मंत्र जिसमें काल भैरव, बटुक भैरव, भूत भैरव और महाभैरव, सब भैरवों के नाम आते हैं; इसमें मुख्य रूप से चार भैरव उपस्थित हैं। इस मंत्र का जप करना चाहिए। संभव हो तो रोज़ कम से कम 41 माला, और यदि कोई इसे 41 दिन करे तो अद्भुत है। एक बार में न हो, तो दो बार में किया जाए। उतना संभव न हो, तो सुबह-शाम 11 और 11 माला; और उससे कम, कम से कम पाँच और पाँच। पर यदि कोई दिन में 41 माला कर रहा है — सुबह 21 माला और शाम 21 माला — और पूरे 41 दिन करता है, तो एक मंडल पूरा होता है।
इस जप के साथ कौन-सा अनुशासन चलता है, और मंत्र कितना प्रबल है?
शुचिता और शुद्धता, और रोज़ मंदिर में सेवा
यह जप करते समय इन सब में नियम, शुचिता और शुद्धता का पालन करें, और भैरव मंदिर में रोज़ उनकी सेवा पूजा दें। वे कहते हैं, यह मंत्र इतना ख़तरनाक मंत्र है कि इसके प्रभाव से आप बड़ी से बड़ी श्मशानी चीज़ को भी तुरंत रोकने में समर्थ हो जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह जप करते समय, इन सब में नियम, शुचिता और शुद्धता का पालन करते हुए, आप भैरव जी के मंदिर में रोज़ उनकी सेवा पूजा दे रहे हैं। यह मंत्र इतना ख़तरनाक मंत्र है कि जो बड़ी से बड़ी श्मशानी चीज़ हो सकती है, उसे आप इस मंत्र के प्रभाव से तुरंत रोकने में समर्थ हो जाएँगे।
महाभैरव कौन हैं, और उनके साथ महाकाल भैरव और क्रोध भैरव, इन पर चैनल पर कभी चर्चा नहीं हुई
चैनल पर कभी चर्चा में न आए रूप, और वे किसके लिए हैं
वे कहते हैं कि महाभैरव कौन हैं, इस विषय पर चैनल पर कभी चर्चा नहीं हुई, और महाकाल भैरव पर कभी कोई चिंतन नहीं हुआ — वे कौन-सा तत्त्व हैं, उनकी क्या सामर्थ्य है, वे कैसे शासन करते हैं। जो बताया गया है वह पर्याप्त से अधिक है। क्रोध भैरव या महाभैरव, एक तरह से, उन परम साधकों के लिए हैं जो शासन करते हैं और ऐसे विषय वहन करते हैं। पर यदि आप महाभैरव की बात लेकर उसे करें, तो आपको तुरंत रक्षा मिलेगी।
वक्ता कहते हैं कि महाभैरव का विषय — महाभैरव कौन हैं — इस पर अब तक चैनल पर चर्चा तक नहीं हुई। हमने केवल बटुक भैरव, काल भैरव और महाभैरव की बात की है; और महाकाल भैरव पर तो कभी कोई चिंतन नहीं हुआ — महाकाल भैरव कौन-सा तत्त्व हैं, उनकी क्या सामर्थ्य है, वे किस तरह शासन करते हैं, इस पर अभी तक कोई चर्चा नहीं हुई। यहाँ जो है वही बहुत है; इतना ही पर्याप्त से अधिक है। वे, एक तरह से, परम साधकों के लिए हैं — उन साधकों के लिए जो शासन करते हैं, जो ऐसे विषय वहन करते हैं — क्रोध भैरव या महाभैरव जैसे तत्त्व। पर यदि आप महाभैरव का विषय लेकर उसे करें, तो आपको तुरंत रक्षण मिलेगा।
कालिका पुराण महाभैरव के लिए क्या बताता है?
चैत्र शुक्ल चतुर्दशी, और कारण व मांस पात्र सहित नैवेद्य
कालिका पुराण में लिखे विशेष शास्त्रोक्त मत के अनुसार, यदि आप चैत्र के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को महाभैरव का पूजन करें, तो जो भी बात आप उनके सामने ले जाएँ और जिस भी उद्देश्य से प्रार्थना करें, वह पूरी होती है। इसके शास्त्रोक्त मत में नैवेद्य में फल, फूल और मिठाई के साथ कारण पात्र और मांस पात्र भी होते हैं; उस दिन का बलि अन्न पूरी तरह शुद्ध मांस का होता है।
वक्ता कहते हैं कि कालिका पुराण के अनुसार — जैसा वे पहले के लाइव में भी कह चुके हैं — कालिका पुराण में लिखा विशेष शास्त्रोक्त मत यह है कि यदि आप चैत्र के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को महाभैरव का पूजन करें, तो जिस बात को लेकर आप उनके सामने जाते हैं, जिस उद्देश्य से उनसे प्रार्थना करते हैं, वह पूरी होती है। और जैसा इसका शास्त्रोक्त मत है, जहाँ नैवेद्य में फल, फूल और मिठाई है, वहीं दूसरी ओर कारण पात्र और मांस पात्र आदि भी हैं। जैसे जब हम क्षेत्रपाल निकारी करते हैं, तो चावल और उड़द लेते हैं, और घी और शहद आदि लगते हैं, जिनके तीन-चार प्रकार होते हैं — उसी तरह उस दिन का बलि अन्न पूरी तरह शुद्ध मांस का होता है।
महाभैरव विधान के दूसरे मंडल में क्या किया जाता है?
इकतालीस दिन महाभैरव स्तोत्र
वे कहते हैं, यदि कोई उस तरह पूजन करे, तो वे फल भी उसी तरह देते हैं — यह शास्त्रोक्त मत है। यदि आप महाभैरव का प्रयोग करने जा रहे हैं, तो कम से कम समझ, जान और देख लें कि आपको वास्तव में उनकी ज़रूरत है। पहला मंडल 40 या 41 दिन का मंत्र जप और उसका समर्पण है; दूसरे मंडल में आप 40 से 41 दिन महाभैरव स्तोत्र का पाठ करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि और यदि कोई उस तरह पूजन करता है, तो वे फल भी उसी तरह देते हैं — यह शास्त्रोक्त मत है, यह बात लिखी और कही गई है। इसलिए यदि आप महाभैरव का प्रयोग करने जा रहे हैं, तो कम से कम इतना समझ लें, जान लें, देख लें — कि आपको उनकी ज़रूरत है। तो पहले मंडल में 40, 41 दिन उनका वह मंत्र जप था, और उसका समर्पण हो चुका है। दूसरे मंडल में आप 40 से 41 दिन महाभैरव स्तोत्र का पाठ करेंगे।
दूसरे मंडल में महाभैरव स्तोत्र के कितने पाठ होते हैं?
रोज़ इक्कीस, मंदिर में नैवेद्य और धूप-दीप के साथ
रोज़ कम से कम 21 पाठ करने हैं, और यदि सामर्थ्य है और बैठ सकते हैं, तो सुबह-शाम 21 और 21 अद्भुत होगा। इस मंडल में भी आप मंदिर में ही भगवान को नैवेद्य अर्पित कर रहे हैं, वहीं धूप-दीप जला रहे हैं और सब कुछ वहीं कर रहे हैं। तीसरा मंडल इन दोनों को साथ लेता है।
कितना पाठ करेंगे? वक्ता कहते हैं कि रोज़ कम से कम 21 पाठ करने हैं। और यदि आपकी सामर्थ्य है और बैठ सकते हैं, तो सुबह-शाम 21 और 21 करें तो अद्भुत होगा। अब 41 दिन का यह दूसरा मंडल पूरा है, और इस दौरान भी आप मंदिर में ही भगवान को नैवेद्य अर्पित कर रहे हैं। वहीं धूप और दीप जला रहे हैं; वहीं सब कुछ कर रहे हैं। और तीसरे मंडल में, इन दोनों को साथ लेकर।
महाभैरव विधान के तीसरे मंडल में संपुटन कैसे होता है?
पाँच माला, इक्कीस पाठ, फिर पाँच माला
महाभैरव मंत्र तो महाभैरव स्तोत्र के भीतर है ही, पर यहाँ इसे पूरे संपुटन के साथ किया जाता है। पहले महाभैरव मंत्र की पाँच माला करें जिसे आप पहले ही जाग्रत कर चुके हैं; उसके बाद महाभैरव स्तोत्र के 21 पाठ; फिर से महाभैरव मंत्र की पाँच माला; और फिर पूरा समर्पण करें। इस तरह, फिर से 41 दिन। तब स्तोत्र और मंत्र इतने जाग्रत हो जाते हैं कि किसी पर जो भी आभिचारिक प्रयोग हुआ हो, जो भी शक्ति भेजी गई हो, आप उसे केवल मंत्र से काटने में समर्थ हो जाते हैं, किसी विशेष वस्तु की ज़रूरत नहीं।
वक्ता कहते हैं कि महाभैरव मंत्र तो महाभैरव स्तोत्र के भीतर है ही, पर यहाँ यह पूरे संपुटन के साथ किया जाता है। संपुट कैसे करेंगे? पहले हमने महाभैरव मंत्र की पाँच माला जप की, जिसे हम पहले ही जाग्रत कर चुके थे; और उसके बाद महाभैरव स्तोत्र के 21 पाठ किए; और फिर से महाभैरव मंत्र की पाँच माला जप की; और फिर पूरा समर्पण किया। इस तरह, फिर से 41 दिन। यह स्तोत्र और मंत्र इतने जाग्रत हो जाएँगे कि किसी पर जो भी आभिचारिक प्रयोग हुआ हो, जो भी शक्ति चलाई गई हो, आप तब उसे केवल मंत्र से काटने में समर्थ हो जाएँगे। तब आपको किसी विशेष वस्तु की ज़रूरत ही नहीं होगी। महाभैरव की कृपा से बातें तुरंत होंगी।
क्या तीनों मंडलों के साथ हवन भी होता है?
एक माला या एक पाठ पर एक आहुति, गुग्गुल और घी से
वे कहते हैं कि अब तक केवल जप की बात हुई है और हवन का ज़िक्र तक नहीं हुआ। यदि साथ-साथ आपने तीनों मंडलों में रोज़ हवन भी किया है — जब 41 माला जप की, तो एक माला की भी आहुति दें; जब 21 पाठ किए, तो एक पाठ की भी आहुति दें, केवल गुग्गुल और घी से।
वक्ता कहते हैं कि जो पाठ करते हैं वे समझ रहे होंगे कि वे यह बात क्यों कह रहे हैं; आप जानते हैं कि उसमें क्या-क्या कहा गया है, किस तरह, और वहाँ कही बातें किस स्तर तक जाती हैं। यदि आपने इसे तीन मंडलों में किया है, तो यह अत्यंत शक्तिशाली चीज़ है। और उन्होंने अभी हवन का ज़िक्र तक नहीं किया; अब तक केवल जप की बात हुई है। यदि साथ-साथ आपने तीनों मंडलों में रोज़ हवन भी किया है — जब आप 41 माला जप कर रहे थे, तो एक माला की भी आहुति दें; जब 21 पाठ कर रहे थे, तो एक पाठ की भी आहुति दें, केवल गुग्गुल और घी से।
स्त्रियों और पुरुषों के लिए हवन सामग्री में क्या अंतर है?
स्त्रियाँ गुग्गुल ज़्यादा रखें, पुरुष घी ज़्यादा रखें
बस इतना ध्यान रखना है: स्त्रियाँ गुग्गुल की मात्रा ज़्यादा रखेंगी, और पुरुष घी की मात्रा ज़्यादा रखेंगे, और आहुतियाँ देते रहें। तब, वे कहते हैं, आपसे बड़ा कोई तांत्रिक नहीं — वह तांत्रिक, स्वयं भैरव, आपके आगे रास्ता खोलेंगे, और इस मंत्र से बहुत-सी बातें होंगी।
वक्ता कहते हैं कि बस इतना ध्यान रखना है: जो स्त्रियाँ हैं वे गुग्गुल की मात्रा ज़्यादा रखेंगी, और जो पुरुष हैं वे घी की मात्रा ज़्यादा रखेंगे; और आहुतियाँ देते रहें। तब, भाई, आपसे बड़ा कोई तांत्रिक नहीं — वह तांत्रिक, स्वयं भैरव, आपके आगे रास्ता खोलेंगे; इस मंत्र से बहुत-सी बातें होंगी। महाभैरव अपने भीतर बहुत-सी चीज़ें समेटे हुए हैं। वह पूरा रहस्य मंत्र के प्रभाव से खुलता है। सामान्यतः जब हम कोई ग्रंथ देखते हैं, तो उसमें कितने ही मंत्र होते हैं, और हमारा ध्यान किसी एक मंत्र पर अटक जाता है क्योंकि उसका माहात्म्य लिखा है, कि इससे यह होगा और वह होगा।
जब एक ही मंत्र की ऊर्जा जगाई जाती है तो क्या होता है?
मंत्र कल्पवृक्ष जैसा हो जाता है
जब आप उस मंत्र की ऊर्जा जगाते हैं, जप करते हैं, और वह मंत्र आपके लिए फल देने लगता है, तो वह कल्पवृक्ष जैसा हो जाता है। एक ही मंत्र आपके लिए अनेक संभावनाओं का द्वार खोल देता है — दिव्य दृष्टि, दिव्य श्रवण शक्ति, शक्तियों का रहस्य जानना, या किसी असाध्य काम को पूरा करने का रास्ता दिखाया जाना। इसे केवल अनुभव किया जा सकता है; वे कितना भी बोलें, जब तक आपका अपना अनुभव नहीं होगा, आप नहीं समझेंगे।
वक्ता कहते हैं कि पर जब आप उस मंत्र की ऊर्जा जगाते हैं, जब जप करते हैं, और जब वह मंत्र आपके लिए फल देने लगता है, तब वह कल्पवृक्ष जैसा हो जाता है। एक ही मंत्र आपके लिए अनेक संभावनाओं का द्वार खोल देता है। चाहे दिव्य दृष्टि हो, चाहे दिव्य श्रवण शक्ति हो, चाहे शक्तियों का रहस्य जानना हो, या उनके द्वारा कुछ असाध्य काम पूरे करने का रास्ता दिखाया जाना हो। यह उनकी कृपा से होगा। जब मंत्र की वह सामर्थ्य आपके भीतर, आपके तंत्र में उपस्थित होगी, तब वे इसे घटित करेंगे। इसे केवल अनुभव किया जा सकता है। हम कितना भी बोलें, जब तक आपका अपना अनुभव नहीं होगा, आप नहीं समझेंगे।
महाभैरव साधना विशेष रूप से किसे करनी चाहिए?
जिन पर सबसे प्रबल अभिचार है या जिनके प्राण संकट में हैं
वे कहते हैं कि यह जीवन व्यर्थ है यदि आप एक भी साधना सिद्ध न कर सकें; 365 दिनों में से आप 41 नहीं दे सकते। महाभैरव साधना और सेवा पूजा विशेष रूप से ऐसे लोगों को करनी चाहिए जिन पर सबसे प्रबल अभिचार है, सबसे प्रबल शत्रु है, और जिन्हें लगता है कि किसी भी क्षण उनके प्राण जा सकते हैं। ऐसे समय उनका सहयोग अवश्य लेना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यह जीवन व्यर्थ है यदि आप एक भी साधना सिद्ध न कर सकें। 365 दिनों में से आप 41 दिन नहीं दे सकते। सोचिए कितने साल, 365 दिनों के कितने दौर बीत गए होंगे; और फिर भी, अपने जीवन पर साधक की मुहर लगाने के लिए और यह कह पाने के लिए कि हाँ, हमने इतने दिन इस शक्ति की साधना की — इतना कहने के लिए जीवन बीत जाता है और व्यक्ति कर नहीं पाता। कोशिश करते रहना चाहिए कि यह हो। इसलिए महाभैरव की साधना और सेवा पूजा विशेष रूप से ऐसे लोगों को करनी चाहिए जिन पर सबसे प्रबल अभिचार है, सबसे प्रबल शत्रु है, और जिन्हें लगता है कि किसी भी क्षण उनके प्राण जा सकते हैं। ऐसे समय उनका सहयोग अवश्य लेना चाहिए।
जिनके जीवन में ऐसी कोई बात नहीं, वे महाभैरव प्रयोग बिल्कुल न करें, क्योंकि तब इसके मंत्र बिना ज़रूरत प्रयोग होंगे और हानि होगी
जिनके जीवन में ऐसी कोई बात नहीं, वे इसे बिल्कुल न करें
जिन दूसरे लोगों के जीवन में ऐसी कोई बात नहीं, उन्हें इस तरह का प्रयोग नहीं करना चाहिए — बस नहीं करना चाहिए। क्योंकि इसमें ऐसे मंत्र हैं कि आप बिना किसी ज़रूरत के उनका प्रयोग करेंगे, और फिर हानि आप तक पहुँचेगी। जब ज़रूरत न हो, न करें; जब ज़रूरत हो, तभी करें। ऐसे स्वरूप का आवाहन और उनकी शक्तियों का प्रक्षेपण तभी करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि जो भी दूसरे लोग हैं जिनके जीवन में ऐसी कोई बात नहीं, वे इस तरह का प्रयोग न करें। बस नहीं करना चाहिए। क्योंकि इसमें ऐसे मंत्र हैं, और आप उनका प्रयोग तब करेंगे जब आपको उनकी कोई ज़रूरत ही नहीं, और फिर हानि आप तक पहुँचेगी। जब ज़रूरत न हो, न करें; जब ज़रूरत हो, तभी करें। इस तरह के स्वरूप का आवाहन और उनकी शक्तियों का प्रक्षेपण केवल उसी स्थिति में होना चाहिए। और अभी तक, वे कहते हैं, केवल एक पूरी तरह सामान्य बात पर चर्चा हो रही है। महाभैरव के साथ कौन-सी सिद्ध शक्तियाँ चलती हैं, और उनके यंत्र की बात, इस पर कभी चर्चा नहीं हुई।
क्या एक साधक इस स्तर पर अनेक शक्तियों की उपासना संभाल सकता है?
केवल एक को साधें; एक ही पर्याप्त कृपा देती है
वे कहते हैं कि यह भी सच है कि एक साधक इस स्तर तक अनेक तरह की शक्तियों की पूजा नहीं कर पाएगा — वह फट जाएगा। यदि हम अभी भैरव जी को कर रहे हैं, तो भैरव जी की जितनी उत्तम साधना संभव हो, कर सकते हैं। पर यह सोचना कि हम बटुक भैरव कर रहे हैं, और महाभैरव भी, और अब महाकाल भैरव भी करें — आप केवल एक को ही साध पाएँगे, और एक ही इतनी कृपा देती है।
वक्ता कहते हैं कि ये अत्यंत दिव्य बातें हैं, और यह भी सच है कि एक साधक इस स्तर तक अनेक तरह की शक्तियों की पूजा नहीं कर पाएगा — वह फट जाएगा; यह भी सच है। महाभैरव महाकाली के साथ कैसे चलते हैं, महाभैरव महाकाल के साथ कैसे चलते हैं, और क्या बातें हैं, उनका अष्टमंडल किस तरह का है, वह कैसे काम करता है, उनके शाबर में और क्या विधान हैं — इनमें से किसी पर कभी चर्चा नहीं हुई; यह पहली बार है कि वे यह भी कह रहे हैं कि ये विषय होते हैं। यदि हम अभी भैरव जी को कर रहे हैं, तो भैरव जी की जितनी उत्तम साधना संभव हो, उतनी कर सकते हैं। पर यदि हम अब सोचें कि बटुक भैरव जी भी कर लें और महाभैरव जी भी, और अब उनके साथ महाकाल भैरव भी कर लें — तो, भाई, आप इनमें से किसी एक को ही साध और वहन कर पाएँगे, और एक ही इतनी कृपा देती है।
पॉडकास्ट में सुनी एक भैरव से दूसरे भैरव को सिद्ध करने की कहानियों से दिमाग़ ख़राब न करें; अपनी सामर्थ्य में और अपने ज़मीनी स्तर पर रहें
अपने ज़मीनी स्तर पर रहना, और काल्पनिक दुनिया से बचना
वे कहते हैं, पॉडकास्ट सुनकर अपना दिमाग़ ख़राब न करें — कि पॉडकास्ट में कहा गया कि किसी ने कपाल भैरव सिद्ध किए और फिर कपाल भैरव से कोई दूसरा भैरव सिद्ध किया; वह कहानी ठीक है। ज़मीनी स्तर पर जो सामर्थ्य वास्तव में है, उसी में रहें और वहीं कृपा के लिए प्रयास करें। वे व्यंग्य करते हैं कि उन पॉडकास्ट बाबाओं को बहुत विशेष कृपा मिलती है, श्री विद्या की राजराजेश्वरी साक्षात उनके सामने खड़ी होती हैं, और उसके बाद भी ये लोग काला जादू करते हैं, भगवान जाने क्यों। इस काल्पनिक दुनिया से बचें।
वक्ता कहते हैं कि पॉडकास्ट सुनकर अपना दिमाग़ ख़राब न करें — कि पॉडकास्ट में बताया गया कि किसी ने कपाल भैरव कैसे सिद्ध किए, और फिर कपाल भैरव से कोई दूसरा भैरव सिद्ध किया; वह कहानी ठीक है। अपनी और हमारी सामर्थ्य में रहें, जैसी वह वास्तव में ज़मीनी स्तर पर है, जिस स्तर पर हम हैं। ज़मीनी स्तर पर प्रयास करें कि कृपा मिले। वे कहते हैं, उन पॉडकास्ट बाबाओं को बहुत विशेष कृपा मिलती है; श्री विद्या की राजराजेश्वरी साक्षात उनके सामने खड़ी होती हैं। और उसके बाद भी ये लोग काला जादू करते हैं, भगवान जाने क्यों। इस काल्पनिक दुनिया से बचें। बस उतना सुनें और अपनी बुद्धि भी लगाएँ। यदि कुछ सीखने को मिल रहा है, तो अवश्य सीखें; पर यदि उस सीखने के बीच बकवास चल रही है, तो उससे भागना भी सीखें। नहीं तो देखिए, दिव्य देवताओं को किस हालत में ला दिया जा रहा है — उसमें हानि आपकी ही है।
साधना की प्रक्रिया छोड़ दी जाए तो क्या होता है?
टूटी श्रद्धा, और सबको नास्तिक बनाने का अभियान
यदि आप साधना करें और जो प्रक्रिया अपनानी चाहिए उसे छोड़ दें, सीधे चाहें कि यह हो जाए, वह हो जाए, तो हानि आपकी है: आपकी श्रद्धा टूट जाएगी। जब वह चीज़ नहीं मिलती, श्रद्धा टूटती है; और जब श्रद्धा टूटती है, तो व्यक्ति स्वयं पूजा नहीं करता, परिवार को भी नहीं करने देता, और कोई और मिल जाए तो उसे भी नकारात्मक बनाने की कोशिश करता है। उसके जीवन का एक ही लक्ष्य हो जाता है सबको नास्तिक बनाना, यह कहकर कि कुछ नहीं होता, इनकी पूजा मत करो।
वक्ता कहते हैं कि अब आप साधना करेंगे, और जो प्रक्रिया अपनानी चाहिए उसे छोड़ देंगे, और सीधे चाहेंगे कि यह हो जाए और वह हो जाए — हानि आपकी है; आपकी श्रद्धा टूट जाएगी। जब वह चीज़ नहीं मिलेगी, श्रद्धा टूटेगी; और जब श्रद्धा टूटती है, तो व्यक्ति क्या करता है? वह स्वयं पूजा नहीं करता, अपने परिवार को भी पूजा नहीं करने देता, और कोई और मिल जाए, तो नकारात्मक बोलकर उसे भी नकारात्मक बनाने की कोशिश करता है। अब उसके जीवन का एक ही लक्ष्य हो जाता है कि सबको नास्तिक बनाना है, क्योंकि कुछ नहीं होता, इनकी पूजा मत करो। कोई अपनी ग़लती, अपनी कमी नहीं देखने वाला — हमने क्या किया, हमसे क्या अपराध हुआ। काम ठीक हो तो भगवान की जय-जय, और न हो तो दोष हमारा है, है न। वे कहते हैं, दोनों में लीजिए: काम नहीं हो रहा तो भगवान की जय-जय; काम हो रहा है तो भगवान की जय-जय — लोग ऐसा क्यों नहीं करते? नहीं हो रहा तो उनकी इच्छा से; हो रहा है तो वह भी उनकी इच्छा से।
जब हम स्वयं मुसीबत में होते हैं तो कहते हैं भगवान परीक्षा ले रहे हैं, और जब दूसरे मुसीबत में पड़ते हैं तो कहते हैं यह उनके कर्म हैं
अपनी मुसीबत परीक्षा; दूसरे की, कर्मों का दंड
वे कहते हैं कि लोग लक्ष्य के बहुत पास पहुँचकर औंधे मुँह गिरते हैं। वे फ़ेसबुक पर देखी और ग्रुप में साझा की एक बात का ज़िक्र करते हैं: जब हम स्वयं मुसीबत में होते हैं तो कहते हैं भगवान हमारी परीक्षा ले रहे हैं, और जब दूसरे मुसीबत में पड़ते हैं तो कहते हैं उसे अपने कर्मों का दंड मिल रहा है।
वक्ता कहते हैं कि इस विषय को थोड़ा समझने की कोशिश करनी चाहिए; कई बार लोग लक्ष्य के काफ़ी पास पहुँचकर धड़ाम से गिरते हैं। वे एक बात का ज़िक्र करते हैं जो उन्होंने पिछले दिन एक ग्रुप में डाली थी, कहीं फ़ेसबुक पर देखी थी और बहुत अच्छी लिखी थी: जब दूसरे लोग कठिनाई में होते हैं — जब हम स्वयं कठिनाई में होते हैं, तो कहते हैं कि भगवान हमारी परीक्षा ले रहे हैं। और जब दूसरे कठिनाई में पड़ते हैं, तो कहते हैं कि उसे अपने कर्मों का दंड मिल रहा है।
प्रचारक एक-दूसरे को नीचा दिखाते हैं: प्रतिद्वंद्वी प्रचारक की उँगली टूटे तो उसके कर्म, और अपना दुर्भाग्य हो तो परीक्षा
प्रदीप मिश्रा का उदाहरण, और प्रचारकों का एक-दूसरे को नीचा दिखाना
वे श्रोताओं से बुरा न मानने को कहते हैं, यह कहते हुए कि वे एक तुच्छ प्राणी हैं, कोई संत नहीं, और कोई उन्हें गाली दे तो वे दोगुनी गाली देते हैं। उनका उदाहरण: यदि प्रदीप मिश्रा जी की उँगली टूट जाए — जो, वे कहते हैं, ग़लत भी होगा — तो "पीतांबरे बाबा" वाले लोग तुरंत कहेंगे कि इस व्यक्ति को अपने कर्मों का दंड मिला है, राधा रानी श्री जी ने उसे दंड दिया है, वह सीढ़ियाँ नीचे जा रहा है। और जब उनका अपना आदमी डायलिसिस पर है, तो वह कर्मों का दंड नहीं बल्कि परीक्षा है। वे कहते हैं, आप भी वही हैं और हम भी वही; एक-दूसरे को नीचा क्यों दिखाना।
वे श्रोताओं से बुरा न मानने को कहते हैं, यह कहते हुए कि वे एक तुच्छ प्राणी हैं और कोई संत या महात्मा नहीं; कोई उन्हें गाली दे तो वे दोगुनी गाली देते हैं। उनकी बात बस इतनी है: मान लीजिए प्रदीप मिश्रा जी की उँगली टूट जाए — जो, वे कहते हैं, ग़लत भी होगा; वे सही हैं या ग़लत, यह छोड़िए, वह अलग बात है। पर मान लीजिए उनकी उँगली टूट गई। तो तुरंत पीले वस्त्र वाले बाबा, पीतांबरे बाबा, कहेंगे कि इस व्यक्ति को अपने कर्मों का दंड मिला है, राधा रानी श्री जी ने दंड दिया है, वह अब नीचे की सीढ़ी जा रहा है, और कितना मज़ा आ रहा है। और उनके अपने के साथ जो हुआ है — कोई डायलिसिस पर चल रहा है — वह कर्मों का दंड नहीं है। क्या वह परीक्षा है? वे कहते हैं, आप भी वही हैं और हम भी वही हैं; हमें एक-दूसरे को नीचा क्यों दिखाना है। वे इस विषय से बचने को कहते हैं, यह कहते हुए कि वे इस पर ज़्यादा नहीं बोलना चाहते क्योंकि लोगों की आँखें अब थोड़ी-थोड़ी खुल रही हैं।
लोग आख़िरकार शास्त्रों में खोज रहे हैं कि क्या भद्रकाली सच में झाड़ू लगाती हैं, और भद्रकाली वास्तव में कौन हैं
क्या भद्रकाली सच में झाड़ू लगाती हैं, और भद्रकाली कौन हैं
वे कहते हैं कि कम से कम लोग अब जाग रहे हैं और जानने की कोशिश कर रहे हैं: क्या सच में लिखा है कि भद्रकाली जी झाड़ू या पोंछा तक नहीं चला सकतीं; क्या ऐसा है; भद्रकाली वास्तव में कौन हैं; और शास्त्र में प्रमाण क्या है। प्रमाण खोजा जा रहा है और लोग उसे पोस्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं, उनका अपना काम बस उन नए लोगों को रोकना है जो भटकाए जाने वाले हैं।
वक्ता कहते हैं कि कम से कम लोग अब जाग रहे हैं और जानने की कोशिश कर रहे हैं — क्या सच में ऐसा है, क्या सच में लिखा है कि भगवती भद्रकाली झाड़ू या पोंछा तक नहीं चला सकतीं। क्या ऐसा है? आख़िर भद्रकाली कौन हैं? देखा जाए — शास्त्र में क्या प्रमाण है? प्रमाण खोजा जा रहा है; लोग उसे पोस्ट कर रहे हैं। पहले यह कहने पर कुछ अजीब-सा लगता था। वे कहते हैं, जो भी लोग मूर्खता कर रहे हैं और इसे बढ़ावा दे रहे हैं, उनकी चिंता न करें: यह उन पर असर करेगा, हम पर नहीं। हमारा काम बस इतना है कि जो नए लोग भटकाए जाने वाले हैं, उन्हें रोका जाए।
जिस इन्फ़्लुएंसर को पचास या सौ लोग भी सुनते हैं, उस पर उपदेश देने से पहले विषय का अध्ययन करने की ज़िम्मेदारी है
इन्फ़्लुएंसर का कर्तव्य, छिपे रहना, और उपदेश से पहले अध्ययन
वे कहते हैं कि यदि आप इन्फ़्लुएंसर हैं और आपको 50, 100 या 200 लोग सुनते हैं, तो यह आपकी ज़िम्मेदारी बन जाती है, और यह हो रहा है, बहुत अच्छे से हो रहा है — वे अपनी नहीं, अच्छा काम करने वाले दूसरों की बात कर रहे हैं। वे भीड़ के "बाबाजी, बाबाजी, बाबाजी जो कहें सही है" को नकारते हैं, पूछते हुए कि यह कैसे हो सकता है कि उनके हिसाब से दुर्गा जी और काली जी झाड़ू-पोंछा करने वाली हैं; जगदंबा का ऐसा अपमान हो तो हम चुपचाप सुनते हैं, पर कोई और कुछ कह दे तो उसे अपमान मान लेते हैं। वे कहते हैं, संत को क्रोध नहीं करना चाहिए, फिर भी क्रोध में शाप दिए जा रहे हैं — यही संत की परिभाषा है।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप इन्फ़्लुएंसर हैं और आपको 50, 100 या 200 लोग सुनते हैं, तो यह आपकी ज़िम्मेदारी बन जाती है; और यह हो रहा है, बहुत अच्छे से हो रहा है। वे स्पष्ट करते हैं कि वे अपनी नहीं, दूसरों की बात कर रहे हैं — कुछ और लोग हैं जो बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, और उन्हें खुशी होती है कि कम से कम एक आदमी वहाँ खड़ा है; उसे देखकर वे भी प्रेरित होते हैं, और जानते हैं कि वे अकेले नहीं हैं। और बाकी भीड़ जैसे हैं — नहीं, नहीं, बाबाजी, बाबाजी, बाबाजी जो कहें वही सही है। ऐसा नहीं, भाई। यह कैसे हो सकता है कि उनके हिसाब से हमारी दुर्गा जी और काली जी झाड़ू और पोंछा चलाने वाली हैं। जगदंबा का ऐसा अपमान होता है और हम चुपचाप सुनते रहते हैं, और कोई और कुछ कह दे तो आप उसे अपमान मान लेते हैं। वे कहते हैं, संत को क्रोध नहीं दिखाना चाहिए, और फिर भी क्रोध में शाप दिया जा रहा है — यही संत की परिभाषा है। जो पूछते हैं कि वे सामने क्यों नहीं आते, उनसे वे कहते हैं: जो सामने आते हैं उनका हाल देखिए। आप भजन मार्ग पर चले हैं, तो हमेशा ख़ुद को छिपाए रखने की कोशिश करें। और वे जोड़ते हैं कि इस पर प्रमाण के साथ पूरे वीडियो बन सकते हैं: उन्होंने स्वयं कहा है कि उपदेश देने से पहले शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए, फिर उपदेश देना चाहिए, और ग़लत नहीं बोलना चाहिए।
दिया जाने वाला हर उदाहरण ब्रह्मवैवर्त पुराण से आता है, जबकि बात देवी पुराण में खोजी जानी चाहिए
ब्रह्मवैवर्त की जगह देवी पुराण, और राधा व शिव एक
वे कहते हैं कि उन्हें लगता है कि उस व्यक्ति ने अपने ही वैष्णव शास्त्रों का ठीक से अध्ययन नहीं किया; अध्ययन किया होता तो ऐसी बात कभी न कहता। वे जो भी उदाहरण देते हैं वह ब्रह्मवैवर्त पुराण से है, और वह सब अब इकट्ठा कर लिया गया है। वे स्वयं ब्रह्मवैवर्त नहीं पढ़ते बल्कि देवी भागवत, देवी पुराण पढ़ते हैं, क्योंकि वही उनका आराध्य है — और उसमें चर्चा है कि भगवती राधा कैसे प्रकट हुईं। उनके लिए राधा और शिव एक हैं, क्योंकि देवी पुराण यही कहता है, इसलिए सबकी पूजा करने वाले के रूप में उन्हें कोई परेशानी नहीं।
वक्ता कहते हैं कि उन्हें लगता है कि उस व्यक्ति ने स्वयं अपने ही वैष्णव शास्त्रों का ठीक से अध्ययन नहीं किया; यदि अध्ययन किया होता तो यह कभी न कहता। वे ब्रह्मवैवर्त पुराण से जो भी उदाहरण देते हैं, वे सब उदाहरण अब उनके हाथ भी आ गए हैं। उन्होंने स्वयं ब्रह्मवैवर्त पुराण नहीं पढ़ा; वे उसे नहीं पढ़ते — वे देवी भागवत, देवी पुराण पढ़ते हैं, क्योंकि उनका आराध्य वहाँ है, तो वे वहीं देखेंगे। उसमें चर्चा है कि भगवती राधा कैसे प्रकट हुईं। और उनके लिए राधा और शिव एक हैं, क्योंकि देवी पुराण में यही लिखा है; इसलिए सबकी पूजा करने वाले के रूप में उन्हें कोई परेशानी नहीं। पर जब उनका विषय उठा, कि प्रमाण वहाँ से है, तो वहाँ से प्रमाण की जाँच की गई कि वह वास्तव में क्या है। वे कहते हैं, वीडियो बनेंगे, और आपका भ्रम दूर होगा — एक-एक वीडियो में, चाहे दुर्गा जी और काली जी के नाख़ूनों की बात हो, या भद्रकाली के बारे में यह दावा कि उनकी शक्ति ऐसी थी कि आदमी फट जाए, जबकि राधारानी के सेवक नहीं फट सके। इन सब काल्पनिक विषयों का उत्तर प्रमाण के साथ दिया जाएगा, उनके अपने वैष्णव पुराणों से, उसी के अनुसार जिसे वे स्वयं सही मानते हैं।
ऐसे प्रवचन सुनकर मन फिर जाता है और लोग काली को छोटा और राधा को बड़ा मानकर अपने कुल देवी-देवताओं को छोड़ देते हैं
प्रवचन सुनकर लोगों का अपने कुल देवी-देवताओं को छोड़ना
ताकि यह भटकाव आपके मन में न आए — कि काली जी छोटी हैं और राधा जी बड़ी हैं — जिसके कारण मन फिर जाता है। वे कहते हैं कि बहुत लोग बड़े विचित्र हो गए हैं; स्थिति और मानसिकता इतनी गिर गई है कि लोगों ने प्रवचन सुनकर अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा छोड़ दी है। अब सोचिए, वे कहते हैं: ये लोग कुल देवी-देवताओं की पूजा को अंधविश्वास का काम बता रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह इसलिए है कि भटकाव का विषय आपके मन में न आए — कि काली जी छोटी हैं और राधा जी बड़ी हैं, और इसके कारण फिर आपका मन फिर जाए। बहुत लोग अब बड़े विचित्र हो गए हैं। स्थिति इतनी निकृष्ट हो गई है, मानसिकता ऐसी हो गई है, कि लोगों ने घर में अपने कुल के देवी-देवताओं का पूजन छोड़ दिया है। वे कहते हैं कि इस पर भी उन्होंने वीडियो डाले थे, एक-दो अनुभव वाले वीडियो, जिनमें लोगों ने प्रवचन सुन-सुनकर अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा छोड़ दी। अब सोचिए, वे कहते हैं: ये लोग कह रहे हैं कि कुल देवी-देवताओं की पूजा कहीं न कहीं आपका अंधविश्वास वाला काम है।
स्थापित पिंड की पूजा छोड़ दी जाए तो क्या होता है?
पचास या सौ साल की पूजा, भले ब्रह्म पिशाच की हो
जहाँ किसी के घर में सौ साल से, किसी और के घर में पचास साल से पिंड पूजा चल रही है, किसी ने पिंड स्थापित किया है — भले वह ब्रह्म पिशाच की पूजा कर रहा हो — वह उसकी पूजा करता आया है। उसकी उसमें श्रद्धा है। अब आप कहते हैं नहीं, नहीं, भूत-प्रेत की पूजा नहीं करनी। पर वह तो दी जा चुकी है; और उसके भीतर इतना ऊँचा तत्त्व नहीं कि वह उसे यूँ ही छोड़ दे। वह बर्बाद होने लगेगा।
वक्ता कहते हैं कि जहाँ किसी के घर में सौ साल से, किसी और के घर में पचास साल से पिंड पर पूजा चल रही है — किसी ने पिंड स्थापित किया है, भले वह ब्रह्म पिशाच की पूजा कर रहा हो। भाई, उसने उसकी पूजा की है। उसकी उसमें श्रद्धा है। अब आज आप कह रहे हैं नहीं, नहीं, नहीं, भूत और प्रेत की पूजा नहीं करनी। अब वह तो दी जा चुकी है; और उसके भीतर इतना ऊँचा तत्त्व नहीं कि वह उसे यूँ ही छोड़ दे — वह बर्बाद होने लगेगा। वे कहते हैं कि वे उत्तर प्रदेश में ऐसे बहुत लोगों को जानते हैं, गाँवों और ग्रामीण क्षेत्रों के लोग जिनकी बर्बादी चल रही है और जिनके माता-पिता कुछ नहीं कर पा रहे। और वे पूछते हैं, रामपाल जी के शिष्य कहाँ हैं — गाँव-गाँव में रामपाल जी के अनुयायी घुस गए हैं।
जो जीते जी पितृ कर्म का मज़ाक उड़ाते हैं, उन्हें उनके अपने बच्चे पिंड नहीं देंगे
पानी सिर से ऊपर जाने पर ही कुछ करना, और अनुष्ठान व्यर्थ करना
वे कहते हैं, यदि आप अभी नहीं जागे, तो ऐसे विषयों पर खुलकर बोलने वाले उन जैसे लोगों को गालियाँ सुननी पड़ती हैं। आपके बच्चे आपको पिंड नहीं देंगे। जीते जी आप हंगामा करते हैं और कहते हैं कि मरने के बाद कुछ नहीं होता; पर आँखें खोलकर देखिए कि प्रेत और पिशाच घर में कैसी उथल-पुथल मचाते हैं। जब पानी सिर से ऊपर जाता है, तभी आप कुछ करने लगते हैं — चलो भैरव जी की पूजा करें, चलो पितरों के लिए कुछ करें। और तब भी पितरों पर इतना एहसान जताते हैं कि पूरा अनुष्ठान व्यर्थ हो जाता है, दस बार कहते हुए कि हम काम छोड़कर आए, कि ज़िंदगी भर नारायण बलि करनी पड़ेगी, कि त्रिपिंडी लूटने का ढोंग है।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप आज नहीं जागे, तो उन जैसे लोगों को, जो इन सब विषयों पर खुलकर बोलते हैं, गालियाँ सुननी पड़ती हैं — आप लोग उन्हें गालियाँ देते हैं। आपके बच्चे आपको पिंड नहीं देंगे। जब तक आप जीवित हैं, हर तरह का हंगामा करते हैं, यह कहते हुए कि मरने के बाद कुछ नहीं होता क्योंकि ऐसा कहा जा रहा है। पर वास्तविकता क्या है — आँखें खोलकर देखिए। देखिए कि प्रेत और पिशाच घर में कैसी उथल-पुथल मचाते हैं। जब पूरी उथल-पुथल मच जाती है और पानी सिर से ऊपर चला जाता है, तब आप कुछ करने लगते हैं: आओ, भैरव जी की पूजा करें; आओ, पितरों के लिए कुछ करें। और पितरों के लिए करते समय भी आप पितरों पर इतना एहसान जताते हैं कि फिर पूरा अनुष्ठान व्यर्थ हो जाता है। दस बार कहेंगे, हम काम छोड़कर आए; हमने इन दो दिनों के लिए काम छोड़ा। पितरों के लिए नारायण बलि कितनी बार होगी — क्या ज़िंदगी भर नारायण बलि करनी पड़ेगी? वे त्रिपिंडी श्राद्ध करवा रहे हैं — त्रिपिंडी से क्या होता है, त्रिपिंडी करवाओ, दिमाग़ ख़राब हो गया है; जीएँ तो उथल-पुथल, मरें तो उथल-पुथल, यह सब लूटने का ढोंग है, किसी तरह करवा दो ताकि कम से कम आदमी की जान बच जाए।
क्या पितर क्रोध में दिया गया पिंड स्वीकार करेंगे?
पितर हमारे पहले देवता, और क्रोध में बना पिंड
वे पूछते हैं, क्या आपको लगता है कि ऐसे गंदे शब्द बोलने के बाद आपके पितर पिंड लेंगे, उसे स्वीकार करेंगे? वहीं तो भाव सबसे ज़्यादा होना चाहिए। शरीर उन्होंने दिया, धन उन्होंने दिया, वैभव उन्होंने दिया — उनकी कृपा से आपका शरीर चलता है, उनकी कृपा से आपकी साँस चलती है; पितर आपके पहले देवता हैं, और आप बैठकर उन्हें गाली देते हैं और कहते हैं कि आपका कल्याण हो रहा है। यदि पिंड बनाते समय आपके भीतर क्रोध है और आप क्रोध में बनाते हैं — क्या आप वह भोजन खाएँगे जो किसी ने क्रोध में बनाकर दिया हो?
वक्ता पूछते हैं, क्या आपको लगता है कि ऐसे गंदे शब्द बोलने के बाद आपके पितर पिंड लेंगे, उसे स्वीकार करेंगे? वहीं तो भाव सबसे ज़्यादा होना चाहिए। शरीर उन्होंने दिया, धन उन्होंने दिया, वैभव उन्होंने दिया; उनकी कृपा से आपका शरीर चल रहा है, उनकी कृपा से आपकी साँस चल रही है। पितृ आपके पहले देवता हैं, और आप बैठकर उन्हें गाली देते हैं और कहते हैं कि आपका कल्याण हो रहा है। पिंड बनाते समय, यदि आपके भीतर क्रोध है और आप क्रोध में पिंड बनाते हैं — क्या आप वह भोजन खाएँगे जो किसी ने क्रोध में बनाकर आपको दिया हो? महीने के 50 लाख, 15 लाख, 12 लाख रुपये कमाने वाले व्यक्ति को 50000 ख़र्च करना पीड़ादायक लगता है। लोग ऐसी ग़लत बातें कहते हैं कि लगता है अनुष्ठान किसलिए — कितनी व्यर्थ बात है। और ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि वे पहली बार सुन रहे हैं कि नारायण बलि और त्रिपिंडी होते हैं, कि पितरों के लिए ऐसी चीज़ें की जाती हैं; वे कहते हैं, यही विडंबना है।
क्या पितृ कर्म दोबारा करना पड़ता है, और व्यक्ति का कर्तव्य कहाँ तक फैला है?
शास्त्रोक्त मत के अनुसार हर किसी को उसका हिस्सा दें
एक बार नारायण बलि हो गई और त्रिपिंडी हो गई, तो जीवन में कोई फिर से करवाने को कहे तो हंगामा हो जाता है — हमारे पिताजी ने दस साल पहले करवाया था, हमारे पिताजी ने दस साल पहले नवचंडी करवाई थी। वे पलटकर कहते हैं, आपने दस साल पहले भी खाना खाया था; क्या अब भी उसी पर चल रहे हैं? सब समझकर काम करें: जिसका जो हिस्सा है, वह दें। मनुष्य के रूप में आपकी ज़िम्मेदारी पूरी प्रकृति पर है — पेड़-पौधों पर, जीवों पर, देवताओं और ऋषि-मुनियों पर, अपने परिवार, माता-पिता, पति या पत्नी, बच्चों, गुरुजनों, यहाँ तक कि मित्रों पर भी।
वक्ता कहते हैं कि और एक बार नारायण बलि हो गई, एक बार त्रिपिंडी श्राद्ध हो गई, तो उसके बाद जीवन में कोई फिर से करवाने को कहे, तो हंगामा हो जाता है — हमारे पिताजी ने दस साल पहले करवाया था; हमारे पिताजी ने दस साल पहले नवचंडी अनुष्ठान करवाई थी, और वहीं अटके रहते हैं। भाई, आपने दस साल पहले भी खाना खाया था, तो क्या अब भी उसी पर चल रहे हैं? नहीं चल रहे। इसलिए सब समझकर काम करें। जिसका जो हिस्सा है, वह दें; शास्त्रोक्त मत के अनुसार, वह उनका हिस्सा है। आप भी मनुष्य हैं और हम भी मनुष्य हैं; हम जो भी कमा रहे हैं, हमारी ज़िम्मेदारी इस पूरी प्रकृति पर है। हमें उनके लिए भी करना है, पेड़-पौधों के लिए, जीव-जंतुओं के लिए, देवताओं और ऋषि-मुनियों के लिए, अपने परिवार के लिए, माता-पिता के लिए, पति-पत्नी के लिए, बच्चों के लिए — सबके लिए ज़िम्मेदारी आपकी है। गुरुजनों के लिए भी है, और मित्रों के लिए भी।
गीता प्रेस के सप्तशती कवच से कौन-सा श्लोक गायब है?
पुत्र की रक्षा रखी, कन्या की रक्षा गायब
वे पूछते हैं, यदि ऐसा न होता तो भगवती कवच में क्यों कहतीं कि अमुक शक्ति मित्र की रक्षा करे, हमारे गोत्र की रक्षा करे — वे न कहतीं। गीता प्रेस गोरखपुर वाले जो सप्तशती पढ़ते हैं, उसके कवच पाठ में कन्या की रक्षा के लिए नहीं कहा गया। जैसा वे पढ़ते हैं, श्लोक है "धनम धन सुरक्षित कौमारी कन्या काम तथा रक्षण में सर्व गात्रणी दुर्गा दुर्गा पहारिणी" — वह उसमें नहीं है। वे कहते हैं, श्लोक है; उन लोगों ने उसे नहीं दिया। उन्होंने केवल पुत्र की रक्षा रखी है, कि माता पुत्र की रक्षा करें।
वक्ता पूछते हैं, यदि ऐसा न होता, तो भगवती कवच में क्यों कह रही होतीं कि अमुक शक्ति मित्र की रक्षा करे, हमारे गोत्र की रक्षा करे? वे न कहतीं। गीता प्रेस गोरखपुर वाले जो सप्तशती पढ़ते हैं, उसमें जो कवच पाठ होता है, उसमें कन्या की रक्षा के लिए नहीं कहा गया। जैसा वे श्लोक देते हैं: धनम धन सुरक्षित कौमारी कन्या काम तथा रक्षण में सर्व गात्रणी दुर्गा दुर्गा पहारिणी — वह श्लोक वहाँ नहीं है, उसमें से गायब है। वे कहते हैं, इसमें विवाद वाला विषय कहाँ से आ गया; श्लोक है, उन लोगों ने उसे उसमें नहीं दिया। उन्होंने केवल पुत्र की रक्षा के लिए रखा है — कि माता पुत्र की रक्षा करें।
बाद में व्यक्ति के साथ वास्तव में क्या जाता है?
पिंड, दान, माला जप और शास्त्र-निष्ठा
वे कहते हैं, इन विषयों से ऊपर उठिए। दस करोड़ भी कमा लें, बाद में यही जाएगा — जो पिंड दिया जा रहा है, जो दान किया जा रहा है, जो माला फेरी जा रही है, जप; और शास्त्र और निष्ठा से युक्त विषयों को सुनना, जिससे आपका मन स्वस्थ होता है और अपने आराध्य के प्रति समर्पित होता है और आप सेवा पूजा करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि कृपया इन विषयों से ऊपर उठिए। दस करोड़ भी कमा लें, फिर भी बाद में यही जाएगा — यह पिंड जो दिया जा रहा है, यह दान, यह माला जो फेरी जा रही है, यह जप, और शास्त्र और निष्ठा से युक्त उन विषयों को सुनना, जिनसे आपका मन स्वस्थ होता है और अपने आराध्य के प्रति समर्पित होता है, और आप सेवा पूजा करते हैं।
गंगा दशहरा के दिन क्या करना चाहिए?
उस दिन सौ काम छोड़कर गंगा जाना
वे कहते हैं, पुण्य कमाने की कोशिश करें। उन्होंने कल कहा था और फिर कहते हैं: गंगा दशहरा के दिन गंगा जी अवश्य जाएँ। यदि गंगा जी आपके पास हैं, तो सौ काम छोड़कर, हज़ार काम छोड़कर, उस दिन गंगा जी जाएँ। उस दिन ऑफ़िस न जाएँ — बॉस डाँटेगा, वह बीत जाएगा; उस दिन आपके ग्राहक बिगड़ेंगे और आप दस हज़ार रुपये कम कमाएँगे, पर उस दिन मिला पुण्य आपके दस हज़ार रुपयों के बराबर नहीं।
वक्ता कहते हैं कि पुण्य कमाने की कोशिश करें। उन्होंने कल कहा था और आज कहते हैं: गंगा दशहरा के दिन गंगा जी अवश्य जाएँ। यदि गंगा जी आपके आसपास हैं, तो सौ काम छोड़कर, हज़ार काम छोड़कर, उस दिन गंगा जी जाएँ। उस दिन ऑफ़िस न जाएँ; बॉस डाँटेगा, वह बीत जाएगा। उस दिन आपका धंधा बिगड़ेगा और आप दस हज़ार रुपये कम कमाएँगे; पर उस दिन जो पुण्य मिलेगा, वह आपके दस हज़ार रुपयों के बराबर नहीं — यह याद रखें। उस दिन किया पुरुषार्थ, उस दिन की पूजा, आपको अनंत लाभ देने वाली है।
बताई गई तारीख़ केवल 2024 की है; तिथि हर साल लौटती है, और शिक्षा उसी साल लागू है जिस साल सुनी जाए
तारीख़ केवल 2024 की; तिथि हर साल आती है
वे कहते हैं, परसों गंगा दशहरा है — पर आप यह वीडियो जिस भी साल सुन रहे हों, जब भी सुन रहे हों, यह हर बार के लिए है। तारीख़ केवल 2024 की है; यह हर साल आती है। दस साल बाद भी, यदि YouTube बचा रहा और आप यह वीडियो सुन रहे हैं, तो यह आपको आज उतना ही लाभ देगा जितना दस साल पहले देता।
वक्ता कहते हैं कि परसों गंगा दशहरा का दिन है — आप यह वीडियो जिस भी साल सुन रहे हों। जब भी सुन रहे हों, यह हर बार के लिए है। तारीख़ केवल 2024 की है; यह हर साल आएगी। तो दस साल बाद भी, यदि YouTube बचा रहा और आप यह वीडियो सुन रहे हैं, तो यह वीडियो आपको आज उतना ही लाभ देने वाला है जितना दस साल पहले देता। हो सकता है हमारी अगली पीढ़ी यह वीडियो सुन रही हो और हम इस संसार में न हों, कि हम देवी लोक में आनंद ले रहे हों — जो सप्तशती का पाठ करते हैं, जो कवच का पाठ करते हैं, वे यक्ष और गंधर्व बनकर, सब आनंद ले रहे हों। उस समय भी यह वीडियो काम करने वाला है।
क्या बटुक भैरव जयंती पर दीप दान करना चाहिए?
काल भैरव अष्टमी के दीप दान वाली ही विधि
दीप दान बिल्कुल नहीं छोड़ना चाहिए। बटुक भैरव जयंती के दिन भैरव जी का दीप दान अवश्य करना चाहिए। विधि वही रहती है — काल भैरव अष्टमी के दिन की सर्व संकट हरण दीप दान विधि। घर में हज़ार समस्याएँ भी हों, तो घर में ही दीप दान करें; दीप दान का वीडियो चैनल पर उपलब्ध है।
वक्ता कहते हैं कि सामर्थ्य के अनुसार भैरव जी का पूजन, और अब सबसे विशेष बात: दीप दान की विधि। वे कहते हैं कि दीप दान बिल्कुल नहीं छोड़ना चाहिए, चाहे कोई भगवान दत्तात्रेय का दीप दान करने वाला हो या नहीं; वे हमेशा यह नहीं कहते और दूसरे विषयों पर जाते हुए बात छूट जाती है। अब बटुक भैरव जयंती के दिन भैरव जी का दीपदान अवश्य करना चाहिए। विधि वही रहेगी — काल भैरव अष्टमी के दिन की सर्व संकट हरण दीप दान विधि ही लागू होगी। घर में हज़ार समस्याएँ भी हों, तो घर में ही दीप दान करें। दीप दान का वीडियो चैनल पर उपलब्ध है; बटुक भैरव दीप दान, या भैरव दीप दान की विधि लिखें, और पूरा वीडियो आ जाएगा — उसे देखें।
दीप दान कौन करता है, और दिन में किस समय?
पूरा परिवार एक साथ, सुबह या शाम
उसी विधि के अनुसार, घर में पूरे परिवार के साथ, बटुक भैरव जयंती के इस दिन फिर से दीप दान करें — सब लोग, शाम को या सुबह, जब भी आपको सुविधा हो। ऐसा नहीं कि केवल शाम को ही करना है; सुबह समय हो तो तब करें।
वक्ता कहते हैं कि उसी विधि के अनुसार, घर में पूरे परिवार के साथ, बटुक भैरव जयंती के इस दिन, फिर से दीपदान करें — आप में से हर एक, शाम को, या सुबह, जब भी आपके लिए संभव हो। ऐसा नहीं कि केवल शाम को ही करना है; सुबह समय हो तो तब करें।
अंधेरा होने के बाद नदी के घाट पर दीप दान क्यों नहीं करना चाहिए?
दीपकों में मरने वाले कीड़े, और कीचड़ भरा किनारा
जो गंगा जी के घाट जा रहे हैं वे चालाकी से शाम को दीप दान करने न पहुँचें — वे कहते हैं कि यह चालाकी वे स्वयं कर चुके हैं, और जब भी ऐसी चालाकी होती है, कीड़े-पतंगों की बहुत बलि चढ़ती है। गर्मी का मौसम है और इतने कीड़े हैं कि आपके जलाए हर दीपक में दस आकर मर जाते हैं। बेहतर है घर में दीप दान करें। गंगा किनारे करना हो तो साँझ से पहले, अंधेरे से पहले करें, जब कीड़े नहीं होते; और रात को जाएँ तो किनारे पर वहाँ करें जहाँ कीचड़ कम हो।
वक्ता कहते हैं कि दीप दान अवश्य करें। जो गंगा जी के घाट जा रहे हैं वे चालाकी से शाम को दीप दान करने न पहुँचें। वे पहले ही बता देते हैं, क्योंकि यह चालाकी वे स्वयं कर चुके हैं; और जब भी ऐसी चालाकी होती है, बहुत बलि चढ़ती है — कीड़े और पतंगे। इतने कीड़े हैं; गर्मी का मौसम है। फिर शाम को जो दीपक आप जलाएँगे, हर एक में दस कीड़े आकर मरेंगे। इससे बेहतर है घर में दीप दान करें। यदि गंगा जी के किनारे ही करना है, तो साँझ से पहले, अंधेरे से पहले करें; उस समय कीड़े नहीं होंगे। और यदि रात को जाएँ, तो नदी के बीच, यदि कोई ऐसी जगह हो जहाँ कीचड़ कम हो — यानी किनारे पर — उस जगह करें। या यदि घाट से थोड़ी दूरी पर गंगा जी के पास कोई शिव जी का मंदिर है, तो वहाँ करें।
काशी वाले दीप दान कहाँ कर सकते हैं, और प्रसाद कौन खाता है?
दत्तात्रेय पादुका मंदिर और भैरव मंदिर; प्रसाद का नियम
काशी क्षेत्र के जो लोग चाहें और जिनकी सामर्थ्य हो, वे भगवान दत्तात्रेय के स्थान पर, दत्तात्रेय पादुका मंदिर में जहाँ दीक्षा विधान हुआ था, दीप दान कर सकते हैं; या बटुक भैरव या काल भैरव के मंदिर में; या गंगा जी के किसी भी घाट पर; या चाहें तो घर में। दीप दान के प्रसाद के बारे में: बटुक भैरव जी का प्रसाद घर के सब लोग खाएँगे। पर यदि आप काल भैरव जी के मंदिर में दीप दान कर रहे हैं और वहाँ नैवेद्य चढ़ा रहे हैं, तो पुरुष उसे खाएँगे और स्त्रियाँ नहीं। यह ध्यान रखना है।
वक्ता कहते हैं कि यदि काशी क्षेत्र के लोग सुन रहे हैं, और उनके मन में इच्छा और सामर्थ्य है, तो वे भगवान दत्तात्रेय के स्थान पर — दत्तात्रेय पादुका मंदिर में जहाँ दीक्षा विधान हुआ था — या बटुक भैरव जी या काल भैरव जी के मंदिर में, या गंगा जी के किसी भी घाट पर, और संभव हो तो घर में, यदि आपकी इच्छा हो, दीपदान कर सकते हैं। पर उस दिन दीप दान अवश्य करें। दीप दान के प्रसाद के बारे में: घर के सब लोग उसे खाएँगे, सब बटुक भैरव जी का प्रसाद खाएँगे। पर जहाँ आप काल भैरव जी के मंदिर जाकर दीप दान कर रहे हैं और वहाँ नैवेद्य आदि चढ़ा रहे हैं, तो ऐसा है कि पुरुष उसे खाएँगे और स्त्रियाँ उसे नहीं खाएँगी। यह ध्यान रखना है।
गहन पूजा वाले दिन के बाद आए सपनों को कैसे लें?
एक दिन की साधना के बाद अवचेतन मन
जब एक दिन की साधना होती है — सुबह जप और हवन, शाम को दीप दान, जप और मंदिर दर्शन — तो इतनी सेवा पूजा के बाद लोगों में अक्सर भ्रम की स्थिति बनती है, क्योंकि वे बातें मन में चल रही होती हैं। वे सोचते हैं कि इतना करने के बाद कम से कम कोई सपना तो आएगा। वे बातें अवचेतन मन में बैठ जाती हैं। पहले दिन के अनुभव को पकड़कर यह हंगामा करने की ज़रूरत नहीं कि भैरव जी आए थे।
वक्ता कहते हैं कि एक बात और। वे अक्सर देखते हैं कि जब एक दिन की साधना होती है — सुबह हमने जप और हवन आदि किया, शाम को दीप दान किया, जप किया, मंदिर में दर्शन किए। तो कई बार ऐसी स्थिति बनती है कि इतनी सेवा पूजा करने के बाद, क्योंकि वे बातें मन में चल रही होती हैं, लोगों के भीतर भ्रम की स्थिति बनती है; वे सोचते हैं कि जब इतना करते हैं तो कम से कम कोई सपना तो आएगा। वे बातें अवचेतन मन में बैठ जाती हैं। पहले दिन के अनुभव को बहुत कसकर पकड़कर उस पर हंगामा करने की ज़रूरत नहीं — कि भैरव जी आए थे। यदि आए थे, तो इसे अपने भीतर रखें। नशा उतरने दें; जब पूजा का यह नशा तीन-चार दिन में उतरे, तब देखें कि वे आते हैं या नहीं।
क्या साधना के अनुभव दूसरों को बताने चाहिए?
अनुभव साधक के अधिकार में नहीं
वे कहते हैं, शक्तियाँ वास्तविकता से आएँ; और यदि वे आपके भाव पर कृपा कर रही हैं तो बिल्कुल आएँगी, आ सकती हैं — जब आप इतना करते हैं, क्या वे शक्तियाँ नहीं आएँगी? बिल्कुल आ सकती हैं। पर इसका ढोल न पीटें, ये अनुभव हर जगह बाँटते न फिरें; इन्हें अपने भीतर पचाना और समेटे रहना सीखें। और यदि अनुभव नहीं हो रहा, तो उस पर कुढ़ना बंद करें। वह आपका अधिकार नहीं — अनुभव आपके और हमारे अधिकार में नहीं आता।
साधक को अनुभव कब और कितना मिलेगा, यह कौन तय करता है?
आराध्य पर छोड़ना, जो पहले ग्रहण करने योग्य बनाते हैं
अनुभव कब होगा, कितना, किस तरह, किस स्तर पर, और हमारे भीतर क्या बदलाव लाएगा — यह हमें अपने आराध्य के हाथों में छोड़ देना चाहिए। उनकी इच्छा हो तो वे साक्षात प्रकट होंगे; उनकी इच्छा हो तो कुछ नहीं करेंगे। हमारी इच्छा उन पर नहीं चलनी चाहिए; यदि हम उन पर ज़ोर डालें, तो वे बस हमें खुश रखने के लिए सीमित मात्रा में थोड़ा दे देंगे। पर यदि हम उनकी इच्छा पर समर्पित हों — प्रभु, जैसी आपकी इच्छा; माई, जैसी आपकी इच्छा — तो वे दिव्य देंगे। वे पहले हमें योग्य बनाएँगे, ताकि जो वे देने वाले हैं उसे स्वीकार करने की सामर्थ्य हममें हो।
वक्ता कहते हैं कि अनुभव कब होगा, कितना होगा, कैसे होगा, किस तरह, किस स्तर से, और हमारे भीतर क्या बदलाव लाएगा — यह हमें अपने आराध्य के हाथों में छोड़ देना चाहिए। उनकी इच्छा हो तो वे सीधे प्रकट होंगे; उनकी इच्छा हो तो कुछ नहीं करेंगे। उनकी इच्छा पर छोड़ें; हमारी इच्छा उन पर नहीं चलनी चाहिए। नहीं तो, यदि हम उन पर ज़ोर डालें, तो वे बस हमें खुश रखने के लिए सीमित मात्रा में थोड़ा दे देंगे। पर यदि हम उनकी इच्छा के अनुसार समर्पित हैं — प्रभु, जो आपकी इच्छा; माई, जो आपकी इच्छा — तो वे दिव्य देंगे। वे पहले हमें योग्य बनाएँगे, ताकि जो भी वे देने वाले हैं, उसे स्वीकार करने की पात्रता हमारे भीतर हो; और फिर जब वे देंगे, तो उसे धारण करने की सामर्थ्य पहले से हमारे पास होगी।
अचानक मिली सिद्धि ख़तरनाक क्यों है?
धारण करने की सामर्थ्य न हो तो धन या सिद्धि पाने वाले को नष्ट कर देती है
यदि एक करोड़ रुपये आ जाएँ और उन्हें सँभालने की सामर्थ्य न हो, तो वे इधर-उधर चले जाते हैं — वे 2003 के घोटाले वाली फ़िल्म का ज़िक्र करते हैं, जिसमें आदमी ने एक रात में इतना पैसा उड़ा दिया कि पूरी दुनिया को पता चल गया। इसलिए धारण करने की सामर्थ्य होनी चाहिए। और जिसे भी जल्दी सिद्धि, तुरंत सिद्धि मिलती है, वह वही 2003 के घोटाले वाला मामला बन जाता है; फिर उसे शास्त्र की बातें नहीं पता होंगी और फिर भी वह शास्त्र की बातें करेगा।
वक्ता कहते हैं कि अब यदि एक करोड़ रुपये आ जाएँ और उन्हें सँभालने की कोई सामर्थ्य ही न हो, तो वे इधर-उधर चले जाते हैं — वे 2003 के घोटाले वाली फ़िल्म याद करते हैं, जिसमें बेचारे ने एक रात में इतना पैसा उड़ा दिया कि पूरी दुनिया को पता चल गया। इसलिए उसे सँभालने की सामर्थ्य होनी चाहिए। और जिसे भी जल्दी सिद्धि, तुरंत सिद्धि मिलती है, वह ठीक वही 2003 के घोटाले वाला मामला बन जाता है। फिर उसे शास्त्र की बातें नहीं पता होंगी, और फिर भी वह शास्त्रीय भाषा में बोलेगा।
क्या अनुष्ठान के दौरान यात्रा करने से सीमा टूटती है?
मंडल पूजन के दौरान सीमा उल्लंघन
सीमा उल्लंघन का प्रश्न उनके लिए उठता है जो बटुक भैरव जयंती से कितने भी दिनों की विशेष पूजा शुरू कर रहे हैं: जब आप मंडल पूजन करते हैं, तो सीमा पार नहीं करनी चाहिए। जब हम 30, 40 या 21 दिन का कोई लंबा अनुष्ठान कर रहे हों और शहर से बाहर या किसी और जगह जाना पड़े, तो सीमा पार हो जाती है। क्या इससे हमें दोष लगता है?
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ एक बात और जाती है: उनके लिए जो बटुक भैरव जी की जयंती के दिन से, कितने भी दिनों के लिए, उनकी विशेष पूजा शुरू कर रहे हैं। सीमा उल्लंघन का विषय उठता है — कि जब आप मंडल पूजन करते हैं, तो सीमा पार नहीं करनी चाहिए। पर, वे कहते हैं, यह ध्यान रखें और परेशान न हों। बहुत लोग जब ये विषय कहीं और सुनते या पढ़ते हैं, तो कहते हैं, भाई, आप इस विषय पर चर्चा नहीं करते। तो जब हम कोई अनुष्ठान कर रहे हैं, 30 दिन, 40 दिन, 21 दिन का लंबा अनुष्ठान, और ऐसे समय हमें शहर से बाहर, किसी और जगह जाना पड़ता है, तो सीमा पार हो जाती है। क्या इससे हमें दोष लगता है या नहीं?
जहाँ साधना गुरु के आदेश से नहीं और केवल अपने आराध्य की प्रसन्नता के लिए की जा रही है, वहाँ सीमा पार करने में कोई दोष नहीं
न गुरु आदेश, न पूरी विधि, केवल आराध्य की प्रसन्नता
पहली बात यह है कि आप यह गुरु के आदेश के अनुसार नहीं कर रहे। आप यह केवल और केवल अपने आराध्य की प्रसन्नता के लिए कर रहे हैं। तीसरी बात यह है कि आप अभी शुरुआती अवस्था में हैं; आपको मंत्र का पूरा विधि विधान नहीं मिला और आप उसे जानते भी नहीं। आप केवल नियम और निष्ठा से उनकी प्रसन्नता के लिए कर रहे हैं — तो करें, और इसमें दोष-अदोष न देखें।
वक्ता कहते हैं कि पहली बात यह है कि आप यह काम गुरु के आदेश के अनुसार नहीं कर रहे। आप यह केवल और केवल अपने आराध्य की प्रसन्नता के लिए कर रहे हैं। तीसरी बात यह है कि आप अभी शुरुआती अवस्था में हैं; आपको मंत्र का पूरा विधि विधान नहीं मिला, और आप उसे जानते भी नहीं। आप केवल नियम और निष्ठा से उनकी प्रसन्नता के लिए कर रहे हैं — तो करें, और इसमें दोष-अदोष न देखें। बहाने भी न खोजें — हालाँकि, वे कहते हैं, यह बहाना नहीं है; पर इसे मन में न बिठाएँ, यह सोचते हुए कि कैसे होगा। निश्चिंत रहें।
साधना के नियम कब कड़े हो जाते हैं?
सिद्धि के लिए विधि से की गई साधना में बिस्तर तक की व्यवस्था चाहिए
वक्ता कहते हैं कि जब आप सिद्धि की प्राप्ति के लिए विधि के अनुसार साधना करते हैं, तब उनमें खाट और बिस्तर तक की व्यवस्था ठीक से करनी होती है। इसलिए निश्चिंत रहें।
वक्ता कहते हैं कि जब आप सिद्धि की प्राप्ति के लिए विधि के अनुसार साधना करते हैं, तब उनमें, भाई, खाट और बिस्तर तक की व्यवस्था ठीक से करनी होती है। इसलिए निश्चिंत रहें।
क्या भैरव कंठी गुरु से लेनी चाहिए?
नाथपंथी विषय, ब्रह्मचर्य, और गुरु से लेना
शास्त्रों के अनुसार बटुक भैरव कंठी पर चर्चा करने को कहे जाने पर वे कहते हैं कि यह विषय आपको अधिकतर नाथपंथियों में मिलेगा, और फिर उसमें ब्रह्मचर्य पालन की बात आती है। कंठी गुरु से ली जाए तो ज़्यादा उचित है: अपने आप पहनने की तुलना में गुरु मर्यादा में चलना और वे जो आदेश-उपदेश दें उसका पालन करना ज़्यादा उचित है।
भैरव कंठी — बटुक भैरव कंठी — के बारे में पूछे जाने पर, और शास्त्रों के मत के अनुसार उस पर चर्चा करने को कहे जाने पर, वक्ता कहते हैं कि यह विषय आपको अधिकतर नाथपंथियों में मिलेगा। और फिर उसमें ब्रह्मचर्य आदि के पालन की बात आती है। और यदि कंठी गुरु से ली जाए, तो ज़्यादा उचित है। अपने आप पहनने की तुलना में, गुरु मर्यादा में रहकर और वे जो आदेश और उपदेश दें उसके अनुसार चलना — वह ज़्यादा उचित है।
क्या पवित्र सामग्री ऊँचे दामों पर बेचना सही है?
3500 रुपये किलो वृंदावन की मिट्टी, और अपनी मर्यादा रखना
उनके एक परिचित ने बताया था कि वृंदावन की मिट्टी ऑनलाइन 3500 रुपये किलो बिक रही है, और वहाँ से शायद 5000 या 7000 रुपये किलो में फिर बेची जा रही है। वे कहते हैं, यदि आप मर्यादा तोड़कर व्यापार की दृष्टि से चलना चाहें, तो करोड़ों-करोड़ों की चीज़ें बेच सकते हैं — यह आपकी इच्छा है। जब कोई आकर कहता है कि हम गंडे-तावीज़ का व्यापार कर रहे हैं, तो वह उसके पीछे की मनःस्थिति, उसके पीछे की मेहनत, और हमारा उद्देश्य क्या है, यह नहीं देख रहा। वह रास्ता नहीं अपनाना है; हमें हमेशा याद रखना है कि हम किस मर्यादा में खड़े हैं और क्या कर रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि उनके एक परिचित ने बताया था कि वृंदावन की मिट्टी ऑनलाइन 3500 रुपये किलो बिक रही है, और वहाँ से लेकर शायद 5000 या 7000 रुपये किलो बेची जा रही है। तो बात यह उठती है: यदि आप मर्यादा तोड़कर व्यापार की दृष्टि से चलना चाहें, तो करोड़ों-करोड़ों की चीज़ें बेच सकते हैं; यह आपकी इच्छा है। और यदि कोई आकर हमसे कहे कि आप गंडे-तावीज़ का व्यापार कर रहे हैं, तो वह उसकी मनःस्थिति है — वह उसके पीछे की मेहनत और हमारा उद्देश्य क्या है, यह नहीं देख रहा। और यदि ऐसे ही करना होता, तो जैसे लोग पूरी टीम खड़ी करके अपना चलाते हैं, आप भी कर सकते थे; बहुत समर्पित साधक हैं, और कहा जा सकता था, आओ, साथ मिलकर करें। वह विषय नहीं अपनाना है। हमें हमेशा याद रखना है कि हम किस मर्यादा में हैं और क्या कर रहे हैं।
क्या दुनिया कभी किसी से प्रसन्न होती है?
शिव, दुर्गा और काली की निंदा
वे कहते हैं, दुनिया किसी से प्रसन्न नहीं होती: जब दुनिया शिव जी से भी प्रसन्न नहीं, तो हमसे कैसे प्रसन्न हो सकती है? यहाँ महादेव को निकृष्ट बनाया जा रहा है, कि वे ऐसे हैं, वैसे हैं; दुर्गा और काली जी को भी नहीं छोड़ा जा रहा। हम और आप कौन हैं।
वक्ता कहते हैं कि बाकी, दुनिया किसी से प्रसन्न नहीं होती। जब दुनिया शिव जी से भी प्रसन्न नहीं, तो हमसे कैसे प्रसन्न हो सकती है? यहाँ महादेव को निकृष्ट बनाया जा रहा है — कि वे ऐसे हैं, कि वे वैसे हैं। दुर्गा और काली जी को भी नहीं छोड़ा जा रहा। हम कौन हैं और आप कौन हैं।
क्या घर के मंदिर का शंख ख़ाली रखना चाहिए?
दक्षिणावर्ती शंख में क्या भरा जाता है
यह पूछे जाने पर कि क्या घर के मंदिर का शंख कभी ख़ाली नहीं रखना चाहिए और उसमें क्या भरें, वे उत्तर देते हैं कि जो शंख बजाया जाता है उसमें कुछ भरने की ऐसी कोई ज़रूरत नहीं। दक्षिणावर्ती और ऐसे शंख चावल से, कमल गट्टे से, श्री से युक्त उन पदार्थों से भरे रखने चाहिए जो श्री के प्रतीक हैं; उसमें सिक्के भरकर रख सकते हैं। धन-धान्य से संपन्न हों तो चाँदी के सिक्कों से भरें; या धनतेरस पर या किसी शुभ तिथि पर जो सिक्के आदि ख़रीदें, उन्हें ख़रीदकर उनसे भरें।
यह पूछे जाने पर कि क्या घर के मंदिर का शंख कभी ख़ाली नहीं रखना चाहिए और उसमें क्या भरना चाहिए, वक्ता उत्तर देते हैं कि जो शंख बजाया जाता है, उसमें कुछ भरा रखने की ऐसी कोई ज़रूरत नहीं। दक्षिणावर्ती और ऐसे शंख चावल से भरे, कमल गट्टे से भरे, श्री से युक्त पदार्थों से भरे रखने चाहिए, जो भी श्री के प्रतीक हैं; उनमें सिक्के भरकर रख सकते हैं। यदि धन-धान्य से संपन्न हैं, तो उसमें चाँदी के सिक्के भरकर रखें। या धनतेरस के दिन, या किसी शुभ तिथि पर, जो भी सिक्के आदि आप ख़रीदें — उन्हें ख़रीदकर उनसे भरें।
शेर के पीछा करने वाले सपने का क्या अर्थ है?
डर के साधारण सपने, और स्वप्न शास्त्र साधक पर क्यों लागू नहीं होता
वे कहते हैं, यह बहुत साधारण बात है: जब व्यक्ति थोड़ा भी डिप्रेशन या चिंता में होता है, तो शेर उसे खाने आता है, साँप उसे काटता है, या वह ख़ुद को पानी में डूबते देखता है। और साधक के लिए बात बिल्कुल अलग हो जाती है — यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए। जो साधक मंत्रों का जप और साधना कर रहे हैं, उनके सपनों में जो हो रहा है वह अक्सर उस विषय पर स्वप्न शास्त्र की बात से मेल नहीं खाता।
बहुत पहले देखे एक सपने के बारे में पूछे जाने पर, जिसमें शेर उसे खाने दौड़ रहा है और वह जान बचाने भाग रहा है, वक्ता कहते हैं कि यह बहुत साधारण बात है। जब व्यक्ति थोड़ा भी डिप्रेशन में, चिंता में होता है, तो शेर उसे खाने आता है, साँप उसे काटता है, वह ख़ुद को पानी में डूबते देखता है। और साधक के लिए बात बिल्कुल अलग हो जाती है — यह हमेशा ध्यान रखें। जो साधक मंत्रों का जप कर रहे हैं और साधना कर रहे हैं, उनके सपनों में जो भी हो रहा है, वह बहुत बार उस विषय पर स्वप्न शास्त्र की मान्यता से मेल नहीं खाता।
देवी भागवत और देवी महाभागवत पुराण में क्या अंतर है?
दो अलग ग्रंथ, और कौन-सा संस्करण ख़रीदें
वे उत्तर देते हैं कि दोनों दो अलग ग्रंथ हैं। किस प्रकाशक का पुराण लें, इस पर वे कहते हैं कि किसी भी प्रकाशक का लें — उनके मत में दोनों ठीक हैं, कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं। चाहे महा देवी भागवत महापुराण पढ़ें, वह उचित है, और चाहे देवी पुराण पढ़ें, वह भी।
यह पूछे जाने पर कि देवी भागवत पुराण और श्रीमद् देवी महाभागवत महापुराण में क्या अंतर है, वक्ता उत्तर देते हैं कि दोनों दो अलग ग्रंथ हैं। किस प्रकाशक का पुराण लेना चाहिए, इस पर — किसी भी प्रकाशक का लें; उनके अपने आकलन में दोनों ठीक हैं, और कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं। चाहे महा देवी भागवत महापुराण पढ़ें तो उचित है, और चाहे देवी पुराण पढ़ें तो भी।
तीन मंज़िला घर में पूजा कक्ष किस मंज़िल पर हो?
सबसे ऊपरी मंज़िल, और भूतल पर गैराज की समस्या
17 से 20 तारीख़ तक यात्रा करने वाले एक श्रोता को वे उत्तर देते हैं कि पूजा कहीं भी की जा सकती है। तीन मंज़िला घर के लिए वे कहते हैं कि पूजा कक्ष सबसे ऊपरी मंज़िल पर होना चाहिए। यदि पूजा स्थान उस जगह बने जो धरती पर, ज़मीन से जुड़ी है, तो ठीक है — पर आजकल ज़मीन पर गैराज बनता है, इमारतों या घरों में लोग नीचे गैराज बनाते हैं, तो ईशान कोण कहाँ, अग्नि कोण कहाँ, सब हवा में रहता है।
एक श्रोता को, जिसे 17 से 20 तारीख़ तक यात्रा करनी है और जो पूछता है कि पूजा कैसे करे, वक्ता उत्तर देते हैं कि आप पूजन कहीं भी कर सकते हैं। तीन मंज़िला घर के बारे में पूछे जाने पर, वे कहते हैं कि पूजा कक्ष सबसे ऊपरी मंज़िल पर होना चाहिए। जो जगह धरती पर है, ज़मीन से जुड़ी है — यदि पूजा स्थान वहाँ बने, तो अच्छा है। पर आजकल ज़मीन पर गैराज बनता है। इमारतों में या घर में लोग नीचे गैराज बनाते हैं; तो ईशान कोण कहाँ से, अग्नि कोण कहाँ से, क्या कहाँ है — सब हवा में रहता है।
क्या 108 नामों के साथ न्यास करना चाहिए?
न्यास केवल यज्ञोपवीत धारण करने वालों के लिए
108 नाम करने वाले एक श्रोता से वे कहते हैं: साथ में न्यास तभी करें जब आप यज्ञोपवीत आदि पहनते हों; नहीं तो जैसा है वैसा ही करें और आपको पूरा लाभ मिलेगा — परेशान न हों। पुण्य सिंह जी से वे कहते हैं कि महाभैरव बिल्कुल किया जा सकता है, और 2:00 के बाद भी उचित होगा; पूरे दिन में किसी भी समय करें, कोई कठिनाई नहीं।
108 नाम करने वाले एक श्रोता से वक्ता कहते हैं: साथ में न्यास तभी करें जब आप यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। आदि पहनते हों। नहीं तो जैसा है वैसा ही करें; आपको पूरा लाभ मिलेगा — परेशान न हों। महाभैरव के बारे में वे पुण्य सिंह जी से कहते हैं कि यह बिल्कुल किया जा सकता है, और 2:00 के बाद भी उचित होगा — पूरे दिन में किसी भी समय करें, कोई कठिनाई नहीं।
यदि कोई भैरव पहले से कुल भैरव हैं, तो क्या बटुक भैरव की पूजा ज़रूरी है?
कुल भैरव के रूप में मार्तंड भैरव, और यह शिक्षा किसके लिए है
मंजूषा जी को वे उत्तर देते हैं कि जब मार्तंड भैरव पहले से आपके कुल के भैरव हैं, तो बटुक भैरव जी के अलग पूजन की कोई बाध्यता या ज़रूरत ही नहीं। वे कहते हैं, यह शिक्षा विशेष रूप से उन 98 प्रतिशत या 95 प्रतिशत लोगों के लिए है जो घर में भैरव जी के किसी भी रूप की पूजा नहीं करते।
मंजूषा जी को वक्ता उत्तर देते हैं कि जब मार्तंड भैरव पहले से आपके कुल के भैरव हैं, तो बटुक भैरव जी के पूजन की कोई अलग बाध्यता नहीं और बिल्कुल ज़रूरत नहीं। वे कहते हैं, यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए है, जो 98 प्रतिशत या 95 प्रतिशत होंगे, जो घर में भैरव जी के किसी भी स्वरूप की पूजा नहीं करते।
क्या घर में शिवलिंग रखने से व्यक्ति को लकवा हो जाता है?
एक दावा जो तब फैला जब लोग जागरूक हो रहे थे
वे कहते हैं कि अभी कम से कम स्थिति यह है कि लोग थोड़े जागरूक हो रहे हैं और इसलिए घर में शिवलिंग आदि रख रहे हैं — नहीं तो बीच में एक विषय यह भी चल रहा था कि शिवलिंग रखने से आदमी को लकवा हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि अभी कम से कम स्थिति ऐसी है कि लोग थोड़े जागरूक हो रहे हैं और इसलिए घर में शिवलिंग आदि रख रहे हैं। नहीं तो, बीच में, एक विषय यह भी चल रहा था कि शिवलिंग रखने से आदमी को लकवा हो जाता है।
किसी देवता के शास्त्रों के अध्ययन और मनन से क्या मिलता है?
अनुभव की बात, वर्णन की नहीं
यह पूछे जाने पर कि किसी देवता से जुड़े शास्त्र पढ़ने, उन्हें समझने और उस ज्ञान पर ध्यान करने से क्या लाभ है, वे उत्तर देते हैं कि यह तभी पता चलेगा जब आप करेंगे — यह अनुभव की बात है।
यह पूछे जाने पर कि किसी देवता से जुड़े शास्त्र पढ़ने, उन्हें समझने, और उस ज्ञान पर ध्यान करने से क्या लाभ होता है, वक्ता उत्तर देते हैं कि यह तभी पता चलेगा जब आप करेंगे। यह अनुभव की बात है।
प्रीमियम रुद्राक्ष माला ख़रीदने में क्या ख़तरा है?
3500-4000 के दाने जो चिपकाए हुए और कीड़े खाए होते हैं
जब काशी क्षेत्र में देव दीक्षा अनुष्ठान होना था और मालाओं की व्यवस्था करनी थी क्योंकि लोगों के पास नहीं थीं, तो वे कहते हैं कि उनसे माला लेने को कहा गया और उस समय उनके पास तंत्रोक्त माला नहीं थी। वे वहाँ ख़रीदने गए: 3500 या 4000 रुपये के प्रीमियम क्वालिटी रुद्राक्ष दाने। देखते ही साफ़ था कि इसमें कुछ प्रीमियम नहीं — हमारा प्रीमियम कटने वाला है। जो नहीं जानते, उनके लिए: प्रीमियम के नाम पर उस पर कुछ चिपकाया जाता है। किसी ने उन्हें फ़ोटो भेजकर कहा कि इसमें एक अतिरिक्त छेद है; वह अतिरिक्त छेद नहीं, कीड़ा लगा है।
ब्रह्म कवच अनुष्ठान के बाद महाभैरव करें या ब्रह्म कवच?
इच्छा के अनुसार कोई भी लिया जा सकता है
घनश्याम जी को, जिन्होंने ब्रह्म कवच अनुष्ठान पूरा कर लिया है और ब्रह्म धारण करने का फ़ॉर्म भर दिया है, वे उत्तर देते हैं कि आप महाभैरव भी कर सकते हैं, और चाहें तो ब्रह्म कवच भी कर सकते हैं। कोई समस्या नहीं; दोनों में से कोई भी लें और अपनी इच्छा से आगे बढ़ें। ब्रह्म कवच पूरा हो गया है तो महाभैरव कर सकते हैं — और, वे जोड़ते हैं, आपको उसकी ज़रूरत भी है।
यह पूछे जाने पर कि ब्रह्म कवच अनुष्ठान पूरा होने के बाद महाभैरव मंत्र का अनुष्ठान करना चाहिए या ब्रह्म कवच ही करना चाहिए — ब्रह्म धारण करने का फ़ॉर्म भी भरा जा चुका है — वक्ता घनश्याम जी को उत्तर देते हैं कि आप महाभैरव भी कर सकते हैं, और चाहें तो ब्रह्म कवच भी कर सकते हैं। कोई समस्या नहीं। दोनों में से कोई भी लें और अपनी इच्छा के अनुसार आगे बढ़ें। यदि ब्रह्म कवच पूरा हो गया है, तो आप महाभैरव कर सकते हैं। और आपको उसकी ज़रूरत भी है, वे जोड़ते हैं।
यदि घर में प्रेत हो, तो क्या 108 नाम किए जा सकते हैं?
प्रेत के विरुद्ध बटुक भैरव शतनाम का जप
यह पूछे जाने पर कि यदि घर में प्रेत हो तो क्या बटुक भैरव जी के 108 नामों का जप करना चाहिए, वे उत्तर देते हैं: बिल्कुल करें, पूरी ताक़त से करें।
यह पूछे जाने पर कि घर में प्रेत हो तो क्या बटुक भैरव जी के 108 नामों का जप करना चाहिए, वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल करें, पूरी ताक़त से करें।
कौन-सा एक विधान हर देवी को, पौराणिक और लोक दोनों को, प्रसन्न करता है?
अर्गला का पहला मंत्र
यह पूछे जाने पर कि कौन-सा विधान वह विशेष सान्निध्य देता है जो हर तरह की देवियों को — पौराणिक देवियों, लोक देवियों, सबको — प्रसन्न करे, वे इसे अत्यंत उत्तम और सार्थक प्रश्न कहते हैं और बताते हैं कि विधान चैनल पर उपलब्ध है। यह अर्गला का पहला मंत्र है: जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। जो इसका पुरश्चरण करता रहे, जो इसका जप करता रहे, उससे हर तरह की देवी शक्तियाँ प्रसन्न होती हैं, चाहे कोई भी शक्ति हो। यदि वह देवी तत्त्व से युक्त है तो अवश्य प्रसन्न होगी — लोक देवी भी, और नकारात्मक शक्तियाँ भी, क्योंकि इसमें भगवती भद्रकाली भी हैं, और उनके शासन से वे चीज़ें अनुकूल हो जाती हैं, चाहे कितनी भी प्रतिकूल हों।
यह पूछे जाने पर कि ऐसा कौन-सा विधान है जो हर तरह की देवियों को — चाहे पौराणिक देवी हो या लोक देवी, सबको — प्रसन्न करने का विशेष सान्निध्य दे, ताकि सब प्रसन्न हों, वक्ता इसे बहुत उत्तम और सार्थक प्रश्न कहते हैं, और कहते हैं कि इससे सबको लाभ होगा। वह कौन-सा विधान है? वह विधान चैनल पर उपलब्ध है। यह अर्गला स्तोत्र का पहला मंत्र है — जैसा वे पढ़ते हैं: जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। जो इस मंत्र का पुरश्चरण करता रहे, जो इसका जप करता रहे, वह ऐसा हो जाता है कि हर तरह की देवी शक्तियाँ प्रसन्न होती हैं — चाहे वह कोई भी शक्ति हो। यदि वह देवी तत्त्व से युक्त है, तो अवश्य प्रसन्न होगी। चाहे वह लोक देवी हो, या जितनी भी नकारात्मक शक्तियाँ हैं — क्योंकि इसमें भगवती भद्रकाली भी हैं, और उनके शासन के कारण वे चीज़ें अनुकूल हो जाती हैं, चाहे कितनी भी प्रतिकूल हों।
अर्गला के पहले मंत्र के पीछे कौन-सी शक्तियाँ हैं?
अर्गला की छत्र शक्ति महाकाली, और महालक्ष्मी
उनकी छत्र शक्ति महाकाली हैं — यह अर्गला है, इसलिए इस मंत्र की छत्र शक्ति महाकाली हैं। और महालक्ष्मी: महालक्ष्मी की कृपा से आपको वैभव भी मिलता है। सब शक्तियाँ, जितनी भी लोक शक्तियाँ और लोक देवियाँ हैं, उनकी कृपा आपको इसी एक मंत्र से मिलेगी।
वक्ता कहते हैं कि और उनकी छत्र शक्ति महाकाली हैं — यह अर्गला स्तोत्र है, इसलिए इस मंत्र की छत्र शक्ति महाकाली हैं। महालक्ष्मी। तो महालक्ष्मी की कृपा से आपको वैभव भी मिलता है। सब शक्तियाँ, जितनी भी लोक शक्तियाँ हैं, जितनी भी लोक देवियाँ हैं — उन सबकी कृपा आपको इसी एक मंत्र से मिलेगी।
रुद्राष्टकम का पाठ अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया जा सकता है, और अंबुबाची में रोज़ 108 पाठ का प्रयास किया जा सकता है
सामर्थ्य के अनुसार पाठ, और अंबुबाची में 108 पाठ
प्रतिभा जी से वे कहते हैं कि रुद्राष्टकम का पाठ अपनी सामर्थ्य के अनुसार बिल्कुल किया जा सकता है। एक श्रोता को, जिसने लक्ष्मी माला मंत्र जप शुरू किया है, रोज़ 27 पाठ कर रहा है और अंबुबाची पर्व में रोज़ 108 पाठ का प्रयास करना चाहता है, वे कहते हैं: बहुत सुंदर, बिल्कुल करें।
प्रतिभा जी से वक्ता कहते हैं कि रुद्राष्टकम का पाठ अपनी सामर्थ्य के अनुसार बिल्कुल किया जा सकता है। ऑनलाइन आने के बारे में वे बताते हैं कि वे सीधे केवल सोमवार को आ सकते हैं और कल या परसों नहीं आ पाएँगे। एक श्रोता को, जिसने लक्ष्मी माला मंत्र का जप शुरू किया है, रोज़ 27 पाठ कर रहा है और अम्बुबाची पर्व में रोज़ 108 पाठ का प्रयास करना चाहता है, वे कहते हैं: बहुत सुंदर, बिल्कुल करें।
पहले से चल रहे अनुष्ठान के साथ भैरव साधना कैसे बिठाएँ?
सुबह की साधना जारी रखें, शाम को महाभैरव, पर्व काल पर एक दिन
वे कहते हैं कि जो धनदा माई का या लक्ष्मी माला मंत्र का पाठ कर रहे हैं, वे अपना अनुष्ठान जारी रखें। साथ में कोई परेशानी हो तो उसे एक समय पर करें — जैसे सुबह धनदा लक्ष्मी और लक्ष्मी माला मंत्र कर रहे थे, उसे जारी रखें, और शाम को महाभैरव करें। और पर्व काल के दिन केवल पूजन करना चाहिए: यह ज़रूरी नहीं कि भैरव जी का 11 दिन या 41 दिन का अनुष्ठान करें — एक दिन करें। यदि आप भगवती धनदा का मुख्य अनुष्ठान नहीं बल्कि केवल उनका नित्य पूजन कर रहे हैं, तो बीच में जो भी पर्व काल पड़े, संबंधित शक्ति की सेवा पूजा अवश्य करनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि जो भी धनदा माई का पाठ कर रहा है, या लक्ष्मी माला मंत्र आदि कर रहा है, वह अपना अनुष्ठान जारी रखे। और यदि उसके साथ परेशानी और कठिनाई है, तो उसे एक समय पर करें। जैसे सुबह आप धनदा लक्ष्मी कर रहे थे, लक्ष्मी माला मंत्र कर रहे थे — उसे जारी रखें। शाम को आप महाभैरव कर सकते हैं। और पर्व काल के दिन केवल पूजन करना चाहिए। आपके लिए यह ज़रूरी नहीं कि आप भैरव जी का केवल 11 दिन का अनुष्ठान करेंगे, केवल 41 दिन का अनुष्ठान करेंगे — एक दिन करें। यदि आप अभी मुख्य रूप से भगवती धनदा का अनुष्ठान नहीं बल्कि केवल उनका नित्य पूजन कर रहे हैं, तो ऐसी स्थिति में, बीच में जो भी पर्व काल पड़े, संबंधित शक्ति की सेवा पूजा अवश्य करनी चाहिए।
आवारा कुत्तों की देखभाल में सही मर्यादा क्या है?
चौखट के बाहर सेवा
वैष्णवी जी को, जो लिखती हैं कि उन्होंने दो आवारा कुत्तों को अपनाया है जो घर के बाहर रहते हैं और उनके साथ में असीम आनंद है, वे कहते हैं कि यह मर्यादा हमेशा वैसी ही रहनी चाहिए — वे घर के बाहर रहें और उनकी सेवा भी चलती रहे। जीवों से प्रेम करना चाहिए, सामर्थ्य के अनुसार उनकी मदद करनी चाहिए और उनके खाने-पीने की व्यवस्था करनी चाहिए; पर यह मर्यादा कि उन्हें चौखट तक नहीं लाया जाएगा, बहुत उचित है, और उन्होंने बहुत सही किया है।
वैष्णवी जी ने लिखा है कि उन्होंने दो आवारा कुत्तों को अपनाया है जो घर के बाहर बैठे रहते हैं, और उनके साथ में असीम आनंद है; वक्ता कुत्ते के सचमुच शक्ति-रहित होने के बारे में एक टिप्पणी जोड़ते हैं। वे कहते हैं, यह मर्यादा हमेशा वैसी ही रहनी चाहिए जैसी बनाई गई है। वे घर के बाहर रहें, और उनकी सेवा भी होती रहे। जीवों से प्रेम करना है, अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनकी मदद करनी है, उनके खाने-पीने की व्यवस्था करनी है। पर यह मर्यादा कि उन्हें चौखट तक नहीं लाया जाएगा, बहुत उचित है — आपने बहुत सही किया है।
पंढरपुर में वैष्णव कीर्तन में दावा किया जाता है कि तुलजा भवानी वहाँ झाड़ू लगाती हैं, ताकि विट्ठल की श्रेष्ठता दिखाई जा सके
विट्ठल की श्रेष्ठता दिखाने के लिए वैष्णव कीर्तन का एक दावा
एक श्रोता लिखते हैं कि उनके यहाँ भी वैष्णव सांप्रदायिक लोग कीर्तन के समय विट्ठल जी की श्रेष्ठता दिखाने के लिए कहते हैं कि तुलजा भवानी पंढरपुर में झाड़ू लगाती हैं। वक्ता कहते हैं, सब हमारी माई को ही बदनाम करते हैं।
वे वह पढ़कर सुनाते हैं जो लिखा गया है: कि उनके यहाँ भी वैष्णव सांप्रदायिक लोग कीर्तन के समय, विट्ठल जी की श्रेष्ठता दिखाने के लिए, कहते हैं कि तुलजा भवानी पंढरपुर में झाड़ू लगाती हैं। वक्ता कहते हैं, सब हमारी माई को ही बदनाम करते हैं।
क्या कोई दुर्लभ तांत्रिक वस्तु अपने आप में मूल्यवान है?
दिव्यता नक्षत्र, तिथि और मंत्र से भरनी पड़ती है
वे कहते हैं, केवल वस्तु से कुछ नहीं होता — यह हमेशा याद रखें। जब तक उस वस्तु में दिव्यता संचारित न हो, वह दिव्य नहीं होगी। वह नक्षत्र के अनुसार, तिथि के अनुसार, और फिर मंत्र के अनुसार जाग्रत होगी; तभी दिव्य होगी, तभी अमूल्य। भोजपत्र का एक छोटा पन्ना काटकर रखें तो उसकी कीमत पचास पैसे भी नहीं; पाँच-दस रुपये में मिल जाएगा। पर उस पर भगवान दत्त का एक छोटा यंत्र और एक बीजाक्षर लिखें, और उस पर करोड़ों जप करें, तो वह करोड़ों की संपत्ति बन गया।
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई दुर्लभ तांत्रिक वस्तु हाथ आ जाए, तो हर गृहस्थ के लिए — केवल वस्तु से कुछ नहीं होता; यह हमेशा याद रखें। जब तक उस वस्तु में दिव्यता संचारित न हो, वह दिव्य नहीं होगी। वह नक्षत्र के अनुसार, तिथि के अनुसार, और फिर मंत्र के अनुसार जाग्रत होगी; तभी वह दिव्य होगी, तभी अमूल्य होगी। भोजपत्र का एक छोटा पन्ना काटकर रखें, तो उसकी कीमत पचास पैसे भी नहीं; पाँच-दस रुपये में भी मिल जाएगा, कोई यह कहकर दे देगा कि ले लो, इतना छोटा है, इसका क्या करोगे। पर यदि उसी पन्ने पर आपने भगवान दत्त का एक छोटा यंत्र और एक बीजाक्षर लिखा है, और उस पर करोड़ों जप किए हैं, तो वह करोड़ों की संपत्ति बन गया — क्योंकि उससे आप अरबों-खरबों कमा सकते हैं, यदि भौतिक दृष्टि से देखें। वही छोटी चीज़ इतनी अमूल्य हो जाती है। इसलिए तांत्रिक वस्तु केवल ऐसे ही नहीं होती: जब तक आप उसका विशेष नियम और विधि विधान पूरा नहीं करते, वह साधारण है, कोई भी वस्तु है। तो उसे रखकर भी, जब तक उसमें जागृति न आए, आप क्या करेंगे।
ऑनलाइन दीक्षा पर उनका क्या मत है?
छल के रूप में ऑनलाइन दीक्षा, और गुरु का चुनाव
बृजेश जी से वे कहते हैं कि वे कई बार साफ़ कह चुके हैं: ऑनलाइन दीक्षा केवल और केवल छल की बात है। ऑनलाइन दीक्षा से कभी कोई दक्षता नहीं आती। यह उनका निजी मत है, जो उन सब ज्ञानी लोगों को सुनकर और देखकर बना है जो विधान करते हैं — ऑनलाइन दीक्षा आदि से कुछ नहीं होता। दीक्षा भी किसी से सोच-समझकर लें: गुरु कैसे हैं, उनका ज्ञान कैसा है। जब हम आपके सामने ही नहीं आ रहे, तो आपको दीक्षा कैसे देंगे? वह कैसा गुरु है जो सामने तक नहीं आता, चेहरा तक नहीं दिखाता, और कहता है फ़ोन पर हमसे दीक्षा लो — वह दीक्षा कैसे होगी? और इसी तरह जो सामने हैं और कहते हैं ऑनलाइन दीक्षा लो: यह दीक्षा की बात नहीं, यह बस आपको मूर्ख बनाने की बात है।
बृजेश जी से वक्ता कहते हैं कि वे कई बार बिल्कुल साफ़ कह चुके हैं। ऑनलाइन दीक्षा केवल और केवल छल की बात है। ऑनलाइन दीक्षा से कभी कोई दक्षता नहीं आती। आप जहाँ भी ऑनलाइन दीक्षा ले रहे हैं — वे कहते हैं, इसे उनका निजी मत कहिए, उनकी अपनी बात, उन सब ज्ञानी लोगों से जिन्हें उन्होंने सुना और देखा है जो विधान करते हैं: इस ऑनलाइन दीक्षा आदि से कुछ नहीं होता। दीक्षा भी किसी से सोच-समझकर लें। गुरु कैसे हैं, जिनसे भी आप दीक्षा लेने जा रहे हैं, उनका ज्ञान कैसा है। अब जब हम आपके सामने ही नहीं आ रहे, तो आपको दीक्षा कैसे देंगे? क्या हमने कभी कहा कि मेरे पास आओ, हम तुम्हें दीक्षा देंगे, हम ऑनलाइन दीक्षा देते हैं? वह कैसा गुरु है जो सामने तक नहीं आता, चेहरा तक नहीं दिखाता, और कहता है फ़ोन पर हमसे दीक्षा लो — वह दीक्षा कैसे होगी? और ठीक इसी तरह, जो सामने तो हैं और कह रहे हैं कि ऑनलाइन दीक्षा लो: यह दीक्षा की बात नहीं, यह बस आपको मूर्ख बनाने की बात है।
क्या दीक्षा के समय गुरु अपना जप शिष्य को हस्तांतरित करते हैं?
कितनी ऊर्जा हस्तांतरित हो सकती है, और गुरुओं का आत्म-महिमामंडन
इन सब बातों को देखने के लिए आपकी अपनी बुद्धि होनी चाहिए — दीक्षा एक विधान के रूप में क्या है, कैसे होती है। अब लोग कहते हैं कि दीक्षा के समय मानसिक तरंगों का आदान-प्रदान होता है और गुरु में अपनी शक्तियाँ और अपना जप बाँटने और दे देने की सामर्थ्य होती है। तो उस गुरु ने कितने करोड़ जप किए हैं? एक करोड़ जप भी किया हो, तो किसी को कितनी ऊर्जा हस्तांतरित करेगा? क्या वह एक-एक मंत्र की ऊर्जा हस्तांतरित करता है, यह कहकर कि जो मंत्र हमने कभी बोला था उसका पुण्य हम इस व्यक्ति को समर्पित कर रहे हैं? और आजकल जो गुरु की डींग चलती है — कि गुरु की महिमा अनंत है, गुरु यह, गुरु वह। आख़िर कौन-सा गुरु? वेदव्यास जी की स्तुति बनी थी, और अब उन्होंने वह स्तुति लगाकर अपनी स्तुति बना ली है। यह केवल अत्यधिक आत्ममुग्धता है।
वक्ता कहते हैं कि इन सब बातों को देखने के लिए आपकी अपनी बुद्धि होनी चाहिए: दीक्षा एक विधान के रूप में क्या है, कैसे होती है। अब लोग कहते हैं कि दीक्षा के समय मानसिक तरंगों का आदान-प्रदान होता है, और गुरु में अपनी शक्तियाँ और अपना जप बाँटने, दे देने की सामर्थ्य होती है। तो जो गुरु ऐसी बात कह रहे हैं — उन्होंने कितने करोड़ जप किए हैं और उन पर बैठे हैं? एक करोड़ जप भी किया हो, तो किसी को कितनी ऊर्जा हस्तांतरित करेंगे? क्या वे एक-एक मंत्र की ऊर्जा हस्तांतरित करते हैं — कि जो मंत्र हमने कभी बोला था, उसका पुण्य हम इस व्यक्ति को समर्पित कर रहे हैं? क्या ऐसा है। और आजकल गुरु को लेकर जो डींग चलती है, कि गुरु की महिमा अनंत है, गुरु यह, गुरु वह — आख़िर कौन-सा गुरु? यदि गुरु में सामर्थ्य होती, तो हम उस तरह के गुरु के बारे में कुछ क्यों कहते। अब वेदव्यास जी की स्तुति बनी थी, और उन्होंने वह स्तुति लगाकर अपनी स्तुति बना ली है। तो यह केवल अत्यधिक आत्ममुग्धता है।
श्रोताओं को सच और झूठ पहचानने की बुद्धि दी गई है, और उन्हें स्वयं परखना है कि किसे मानें
सच और झूठ पहचानने को दी गई बुद्धि
वे कहते हैं कि वे साफ़ बोलते हैं: जिसे YouTube पर एक-दो लाख लोग मानने लगते हैं — जैसे वे भी YouTube सिद्ध बन गए हैं — वह कम से कम सीमाएँ रखता है। जिससे हज़ार-दो हज़ार लोग पूछ रहे हैं, आप कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं। इसलिए जनता को अपनी बुद्धि लगानी चाहिए। भगवान ने आपको भी बुद्धि दी है; यदि आप मूर्ख बन रहे हैं, तो आपकी ग़लती है। यदि सामने वाला आपको मूर्ख बना रहा है, तो कम से कम देखिए। आपको सच और झूठ का भेद करने के लिए अपनी बुद्धि दी गई है।
वक्ता कहते हैं कि जिसे YouTube पर एक-दो लाख लोग मानने लगते हैं — जैसे वे भी YouTube सिद्ध बन गए हैं — वह कम से कम सीमाएँ रखता है, किसी के पास जो हो या न हो; और लोगों को उससे भी परेशानी है। अब, यदि हज़ार-दो हज़ार लोग आपसे पूछ रहे हैं, तो आप कुछ भी कर सकते हैं; आपको कुछ भी करने का लाइसेंस है। इसलिए, वे कहते हैं, जनता को अपनी बुद्धि लगानी चाहिए। साफ़ बात है। भगवान ने आपको भी बुद्धि दी है; यदि आप मूर्ख बन रहे हैं, तो आपकी ग़लती है। यदि सामने वाला आपको मूर्ख बना रहा है, तो कम से कम देखिए, भाई। आपको सच और झूठ का भेद करने के लिए अपनी बुद्धि दी गई है।
गंगा दशहरा का स्नान और जप कैसे करना चाहिए?
नाभि पानी के नीचे, और मणिपूरक चक्र
काशी क्षेत्र के सब लोग और दूसरे जो गंगा जी के पास, या किसी भी दिव्य नदी के पास रहते हैं, उस दिन उन दिव्य नदियों में अवश्य स्नान करें, और नदी में ही कम से कम नाभि तक पानी में बैठें — यहाँ किनारे का अर्थ है कि पानी में बैठना है। पानी इतना ऊपर आए कि हमारी नाभि डूबी रहे; नाभि पानी के भीतर हो। हमारा जीवन वहीं से है, और उसी को मज़बूत करना है; वहीं से शक्तियाँ पोषित होती हैं। इसलिए उस मणिपूरक चक्र की सामर्थ्य बढ़ाने के लिए और देवी शक्ति की प्राप्ति के लिए, उस दिन नदी में बैठकर जप-तप अवश्य करें।
क्या नदी की जगह किसी छोटे तालाब का उपयोग किया जा सकता है?
केवल साफ़ सरोवर, और कर्मकांड से पहले स्वास्थ्य
यह पूछे जाने पर कि क्या किसी छोटे तालाब पर किया जा सकता है, वे कहते हैं: सरोवर साफ़ हो तो जाएँ — पर जैसी गर्मी है, वहाँ मच्छर आदि काटेंगे; डेंगू या मलेरिया न हो जाए। जहाँ पानी रुका हो वहाँ जाकर यह सब न करें। गंगा जी के किनारे भी, यदि पानी रुका है और घाट मिल ही नहीं रहा, तो अपने स्वास्थ्य को हानि न पहुँचाएँ — बस किसी तरह नहाकर लौट आएँ, और फिर जप करने में न उलझें।
वक्ता कहते हैं कि किसी ने पूछा था कि यदि कोई छोटा सरोवर हो, तो क्या वहाँ किया जा सकता है। यदि सरोवर साफ़ है, तो जाएँ — पर जैसी गर्मी पड़ रही है, वहाँ मच्छर आदि काटेंगे; डेंगू या मलेरिया न हो जाए। जहाँ पानी जमा है, वहाँ जाकर यह सब न करें। गंगा जी के किनारे भी, यदि पानी रुका है और आपको घाट मिल ही नहीं रहा, तो अपने स्वास्थ्य को हानि न पहुँचाएँ। बस किसी तरह नहाकर लौट आएँ। फिर जप आदि करने में न उलझें।
गर्मियों में नदी किनारे की साधना किस समय करनी चाहिए?
भोर में, सात-आठ बजे तक पूरी, दोपहर में नहीं
जहाँ नदी बह रही हो, चारों ओर स्वस्थ और साफ़ हो और वातावरण स्वस्थ हो, वहाँ बैठकर अपना अनुष्ठान करें। गर्मी का मौसम है और धूप इतनी तेज़ है, तापमान 45 या 50 डिग्री तक जा रहा है — दोपहर में जान देने न जाएँ। भोर में जाएँ; जो भी साधना कर सकें 7 या 8 बजे तक पूरी करके घर आ जाएँ। 10 बजे जाएँगे तो स्वास्थ्य बिगड़ेगा, और अगले दिन संदेश आएगा कि आपने बटुक भैरव अनुष्ठान करने को कहा था और अब हमें ग्लूकोज़ चढ़ रहा है।
वक्ता कहते हैं कि जहाँ भी नदी बह रही हो, जहाँ पानी चल रहा हो, जहाँ स्वस्थ हो, जहाँ चारों ओर सब साफ़ हो और वातावरण स्वस्थ हो — वहाँ बैठकर अपना अनुष्ठान और पोषण करें। गर्मी का मौसम है और धूप इतनी तेज़ है, तापमान 45 या 50 डिग्री तक जा रहा है। इसमें दोपहर को जान देने न जाएँ। भोर के समय जाएँ। जो भी साधना कर सकें, 7 या 8 बजे तक पूरी करके घर आ जाएँ। यदि 10 बजे जाएँगे तो स्वास्थ्य बिगड़ेगा, और अगले दिन संदेश आएगा: भाई, आपने बटुक भैरव अनुष्ठान करने को कहा था, हमने अनुष्ठान किया, और अब हमें ग्लूकोज़ चढ़ाया जा रहा है, पानी चढ़ाया जा रहा है। क्यों, भाई, क्या हुआ? कोई ग़लती हुई होगी, किसी भूत या प्रेत ने पकड़ लिया होगा। यह नहीं कहेंगे कि हम दोपहर 12 बजे गए थे और वहाँ माला फेर रहे थे। वे कहते हैं, यह ग़लती न करें; अपना दिमाग़ लगाएँ, अपनी बुद्धि लगाएँ — भगवान ने आपको दी है।
क्या साधना की माला कभी बदली जाती है?
पहली पहनी माला जीवन भर के लिए, और दूसरा देव दीक्षा कवच
दुर्गा प्रसाद जायसवाल जी को वे उत्तर देते हैं: बिल्कुल नहीं। केवल पहली बार — उस साधना में, जब आप पहली बार माला जप करते हैं, और फिर जब दूसरी बार साधना करते हैं, तो पहली बार की माला हमने पहन ली, और वह जीवन भर के लिए हो गई। और दूसरी बार वह माला नहीं बदलनी है। यह रक्षा के लिए है, उस विधान में प्रयोग के लिए; और जैसा उन्होंने पहले कहा था और आज के वीडियो में भी कहा, माला पहनकर जप करें ताकि संतुलन बना रहे। माला कभी नहीं बदलेगी।
दुर्गा प्रसाद जायसवाल जी को वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल नहीं। केवल पहली बार — उस साधना में, जैसा उन्होंने कहा था, जब आप पहली बार माला जप करते हैं, और फिर जब दूसरी बार साधना करते हैं, तो पहली बार की माला हमने पहन ली, और वह जीवन भर के लिए हो गई। और दूसरी बार वह माला नहीं बदलनी है। यह रक्षण के लिए है, उस विधान में प्रयोग के लिए; और जैसा उन्होंने पहले कहा था और आज के वीडियो में कहा है, माला पहनकर जप आदि करें, ताकि संतुलन बना रहे। माला कभी नहीं बदलेगी। बस एक बार — जैसे देव दीक्षा विधान में, जो घर में नव दीक्षा करते हैं वे 40 दिन गले में कवच पहनते हैं। उसके बाद, जब वे गले में दूसरा कवच पहनते हैं, जिस पर 40 दिन जप अर्पित हो रहा है, तो वह जीवन भर के लिए हो जाता है। इसीलिए उसे चाँदी में कहा गया है। वह फिर कभी नहीं — अब उस पर सवा लाख जप हो चुका है; क्या उसे कहीं विसर्जित करने की ज़रूरत है? बिल्कुल नहीं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।