पहली साधना के रूप में अष्टोत्तर शतनाम — मंत्र चयन, गुरु-गणपति-भैरव का क्रम और नक्षत्र न्यास
नए साधकों के लिए अष्टोत्तर शतनाम साधना पर एक लाइव।
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साधना मार्ग में यह भ्रम फैला है कि इच्छाएँ किसी खास कर्म या खास मंत्र से ही पूरी होती हैं
साधना मार्ग में फैला भ्रम
नए साधकों के कारण, और साधना मार्ग में फैले एक भ्रम के कारण — कि जब तक हम कोई खास कर्म नहीं करेंगे, कुछ खास मंत्रों का जप नहीं करेंगे, तब तक शायद हमारी इच्छाएँ पूरी नहीं होंगी। ऐसी सोच नए साधकों के मन में बैठी रहती है। और उनके मन में भी, जिन्हें किसी माध्यम से सही मार्गदर्शन नहीं मिलता।
वक्ता कहते हैं कि आज यह विषय सबके सामने इसलिए रखा जा रहा है, क्योंकि नए साधक आते हैं। और क्योंकि साधना मार्ग में एक भ्रम फैला हुआ है। वह भ्रम यह है कि जब तक हम कोई खास काम नहीं करेंगे, कुछ खास मंत्रों का जप नहीं करेंगे, तब तक शायद हमारी इच्छाएँ पूरी नहीं हो सकतीं। ऐसी सोच उनके मन में रहती है जो नए साधक हैं, या जिन्हें किसी माध्यम से सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता।
सत्संग नाम की महिमा सिखाता है, पर तंत्र क्षेत्र षट्कर्म से मोक्ष और उन्नति का वादा करता है
भगवान के नाम की महिमा सब जानते हैं, पर तंत्र इससे अधिक का वादा करता है
सत्संग से, बड़ों से और संतों से सब भगवान नाम की महिमा जानते हैं। पर तंत्र के क्षेत्र में कहा गया है कि यहाँ, खासकर अगर आप षट्कर्म करें, तो तंत्र से मोक्ष संभव है। तंत्र से आध्यात्मिक उन्नति संभव है। और इस मार्ग से अप्राप्त वस्तु भी मिल सकती है। इसमें सामर्थ्य है; आपमें सामर्थ्य है या नहीं, यह आपको देखना है।
वक्ता कहते हैं कि भगवान नाम की महिमा से सब परिचित हैं — सत्संग आदि से, बड़ों से, संतों से। पर तंत्र के क्षेत्र में कहा गया है कि यहाँ अगर आप खासकर षट्कर्म करें, तो तंत्र से मोक्ष संभव है। तंत्र से आध्यात्मिक उन्नति संभव है। इस मार्ग से अप्राप्त वस्तु भी मिल सकती है। बहुत कुछ किया जा सकता है। इसमें सामर्थ्य है। आपमें सामर्थ्य है या नहीं — यह आपको खुद देखना है।
नया व्यक्ति ढेरों विविधताओं में कोई ऐसी वस्तु, साधना या मंत्र खोजता है जिससे लाभ मिले
इतनी विविधताएँ कि मन तय नहीं कर पाता क्या अपनाएँ
जब हम इस क्षेत्र में आते हैं, तो ढेरों विविधताएँ दिखती हैं। मन में कहीं लगता है कि पता नहीं क्या अपनाकर आगे बढ़ें। फिर हम उनमें कोई ऐसी वस्तु, कोई ऐसी साधना, कोई ऐसा मंत्र खोजते हैं, जिससे जल्दी से जल्दी लाभ मिले।
वक्ता कहते हैं कि जब हम इस क्षेत्र में आते हैं, तो बहुत सारी विविधताएँ दिखती हैं, भरपूर मात्रा में। उन्हें देखकर मन में कहीं न कहीं लगता है कि पता नहीं कौन सी चीज़ अपनाकर हम आगे बढ़ें। फिर हम उनमें कोई ऐसी वस्तु खोजते हैं, कोई ऐसी साधना, कोई ऐसा मंत्र, जिससे हमें जल्दी से जल्दी लाभ मिल सके।
जल्दी धन चाहने पर लोग किन मंत्रों की ओर भागते हैं?
स्वर्णाकर्षण भैरव, आकाश भैरव, और बगलामुखी में मंदार विद्या
जैसे, अगर जल्दी से जल्दी धन चाहिए, तो स्वर्णाकर्षण भैरव या आकाश भैरव जैसे मंत्र — प्रकट हो स्वर्ण देहि देहि स्वर्ण प्रदाने प्रदाय — और महालक्ष्मी आसुरी लक्ष्मी धनं देहि देहि जैसे मंत्र। और अगर लोग भगवती बगलामुखी में जाते हैं, तो उनमें मंदार विद्या का सीधा प्रयोग। वे इनसे इतने आकर्षित होते हैं कि वही मंत्र करना चाहते हैं।
वक्ता उदाहरण देते हैं: अगर कोई लक्ष्मी की प्राप्ति चाहता है, कि हमें जल्दी से जल्दी लक्ष्मी मिले, तो स्वर्णाकर्षण भैरव या आकाश भैरव होंगे — प्रकट हो स्वर्ण देहि देहि स्वर्ण प्रदाने प्रदाय — इस तरह के मंत्र। महालक्ष्मी आसुरी लक्ष्मी धनं देहि देहि, इस तरह के मंत्र। और अगर भगवती बगलामुखी में जाएँगे, तो उनमें मंदार विद्या का सीधा प्रयोग। और वे इससे इतने आकर्षित हो जाते हैं कि वही मंत्र करना चाहते हैं। इसे कैसे करना है, क्या करना है — वह अपना अलग विषय है।
शत्रु और अभिचारिक क्रिया से पीड़ित होने पर लोग किसकी ओर भागते हैं?
हर उग्र मंत्र का जप और अनुष्ठान करने की इच्छा
ठीक इसी तरह, जब हम शत्रुओं से और अभिचारिक क्रिया से पीड़ित होते हैं, तो मन में विचार आता है कि जितने भी उग्र मंत्र हैं, उनका जितना हो सके जप कर लें, उनका अनुष्ठान कर लें। तब हमें शत्रु से मुक्ति मिलेगी, या शत्रु को सही दंड मिलेगा।
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी तरह, जब हम शत्रु आदि से पीड़ित होते हैं, जब अभिचारिक क्रिया से पीड़ित होते हैं, तब यह बात हमारे मन में आती है। कि जितने भी उग्र मंत्र हैं, उनका जितना हो सके जप करें, उनका अनुष्ठान आदि करें, तो हमें शत्रु से मुक्ति मिलेगी, या शत्रु को सही तरह से दंड मिलेगा।
ब्रह्मास्त्र और प्रत्यंगिरा मंत्र अपना ही नुकसान क्यों कर सकते हैं?
ब्रह्मास्त्र माला मंत्र और प्रत्यंगिरा — और हमारा अपना नुकसान
ब्रह्मास्त्र माला मंत्र और प्रत्यंगिरा मंत्र जैसे मंत्र, जिनमें शत्रु के लिए दह दह पच पच मथ मथ हन हन, दग्ध दग्ध जैसे शब्द आते हैं। यह देखकर कि इनमें ऐसे शब्द चुने गए हैं, मन को एक शांति मिलती है। लगता है कि शत्रु का नुकसान ज़रूर होगा। और बहुत बार इस चक्कर में हमारा अपना ही नुकसान हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि हम ऐसे मंत्र देखते हैं — ब्रह्मास्त्र माला मंत्र, प्रत्यंगिरा मंत्र — जिनमें शत्रु के लिए इस तरह के शब्द आते हैं: दह दह पच पच मथ मथ हन हन, दग्ध दग्ध। तब लगता है कि शांति है — यानी मन में शांति मिलती है कि हाँ, इस तरह के मंत्र हैं, इसमें ऐसे शब्द चुने गए हैं। यह योगात्मक मंत्र है। इससे शत्रु का नुकसान ज़रूर होगा। और बहुत बार इस चक्कर में हमारा अपना ही नुकसान हो जाता है।
उनका काम है सही मंत्र को सही तरह चुनकर सुनने वाले को बचाते हुए एक स्तर तक ले जाना
सही मंत्र चुनकर सुनने वाले को बचाते हुए एक स्तर तक ले जाना
क्योंकि, वे कहते हैं, जैसा वे बार-बार कहते हैं, उनका काम है आपको बचाते हुए एक स्तर तक ले जाना — सही मंत्र को सही तरह चुनकर। यह ऐसा क्षेत्र है, और जिस माध्यम से वे बोल रहे हैं, उसमें वे किसी को नहीं जानते। वे नहीं जानते कि सुनने वाला अपना जीवन कैसे जीता है।
वक्ता पूछते हैं कि हम बार-बार शुरुआती साधना के क्षेत्र में क्यों आते हैं — क्योंकि भाई, जैसा वे बार-बार कहते हैं, हमारा काम है आपको बचाते हुए एक स्तर तक ले जाना। सही मंत्र को सही तरह चुनकर। क्योंकि यह ऐसा क्षेत्र है, और जिस माध्यम से हम अभी बोल रहे हैं, बता रहे हैं, उसमें हम किसी को नहीं जानते — कि भाई, आप किस तरह अपना जीवन जीते हैं।
मंत्र के नियम जाति, वर्ण और धर्म के अनुसार क्यों नहीं बताए जाते?
बहुत नियम हों तो सामने वाला करेगा ही नहीं
क्योंकि, वे कहते हैं, आज के समय में अगर नियम से चलने की बात करें — कि यह नियम है, और इसके अनुसार जाति, वर्ण, धर्म के हिसाब से आपको ऐसे मंत्र करने हैं या नहीं करने हैं — तो बहुत नियम-नीति बनाने पर सामने वाला कहेगा कि वह करेगा ही नहीं। अच्छा है कि जो सबके योग्य है, जो सब कर सकते हैं, वह बताया जाए। ताकि वह किया जाए और उससे लाभ मिले।
वक्ता कहते हैं कि आज के समय में अगर नियम और निष्ठा से चलने की बात करें — कि यह नियम है, और इस नियम के अनुसार, जाति के अनुसार, वर्ण के अनुसार, धर्म के अनुसार आपको इस तरह के मंत्र करने हैं या नहीं करने हैं — अगर बहुत सारे नियम-नीति बनाएँगे, तो सामने वाला कहेगा कि वह करेगा ही नहीं। बात इतनी सीधी हो जाएगी। वह नहीं करेगा। इसलिए अच्छा है कि जो सबके योग्य है, जो सब कर सकते हैं, वह बताया जाए; वह कीजिए, और उससे लाभ हो।
हर किसी को किस साधना से शुरुआत करनी चाहिए?
किसी भी महाशक्ति का अष्टोत्तर शतनाम
किसी भी महाशक्ति का अष्टोत्तर शतनाम। आप किसी भी स्थिति में हों, आपकी कोई भी परेशानी हो, जब किसी भी साधना की शुरुआत में जाएँ, तो अष्टोत्तर शतनाम से ही करनी चाहिए — चाहे मुख्य रूप से आप भगवती की ही साधना करना चाहते हों।
वक्ता कहते हैं: किसी भी महाशक्ति का अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त।। आप किसी भी परिस्थिति में हों, आपकी कोई भी परेशानी हो, जब किसी भी साधना की शुरुआत में जाएँ, तो अष्टोत्तर शतनाम से ही करनी चाहिए। चाहे मुख्य रूप से आप भगवती की ही साधना करना चाहते हों।
नए साधक को सबसे पहले क्या करना चाहिए — गुरु हों तो, और न हों तो?
पहले गुरु साधना; नहीं तो जन्म कुंडली दिखवाएँ
वे कहते हैं, हम बार-बार कहते हैं कि जब नए साधक साधना शुरू करने जाएँ, तो अगर गुरु साधना कर सकें, तो वही सबसे अच्छा है। अगर गुरु हैं ही नहीं, तो किसी ज्योतिषी से अपनी जन्म कुंडली दिखवाइए — किसी ज्योतिषी से कहिए कि मेरी कुंडली देखकर इस तरह बताइए।
वक्ता कहते हैं कि हम बार-बार कहते हैं कि जब भी नए साधक साधना करने जाएँ, जब शुरुआत करें — अगर गुरु साधना कर सकें, तो गुरु साधना सबसे अच्छी है। अगर गुरु हैं ही नहीं, तो किसी ज्योतिषी से अपनी जन्म कुंडली का विश्लेषण करवाइए। किसी ज्योतिषी से कहिए कि मेरी कुंडली देखकर मुझे इस तरह बताइए।
अगर किसी की पहले से किसी खास रूप में श्रद्धा हो, तो?
देव दीक्षा विधान से उसी देवता को गुरु मानना
अगर आपकी किसी रूप में श्रद्धा है — जैसे वे खुद शिव जी में श्रद्धा रखते हैं — तो आँखें बंद करके उन महान भगवान को गुरु रूप में स्वीकार कीजिए। विधि-विधान से स्वीकार कीजिए; और अगर चाहें, तो चैनल पर दीक्षा विधि दी गई है, उस देव दीक्षा विधान से उन्हें गुरु रूप में स्वीकार कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर आपकी श्रद्धा किसी खास रूप में है — जैसे हमारी श्रद्धा है कि हम शिव जी में श्रद्धा रखते हैं — तो आँखें बंद करके उन महान भगवान का गुरु रूप में वर्णन कीजिए। उन्हें स्वीकार करते हुए, विधि-विधान से, और अगर चाहें तो चैनल पर दीक्षा विधि भी दी गई है — उस देव दीक्षा विधान से उन्हें गुरु रूप में स्वीकार कीजिए।
क्या शिव किसी को अपना शिष्य बना सकते हैं?
आपत्ति, और 51,000 रुपये की दीक्षा
वे कहते हैं, ये बातें फैलाई जाती हैं — कि आपने शिव जी को गुरु बना लिया, पर शिव जी आपको शिष्य बनाएँ, इसके लिए वे आपको ऐसे-ऐसे बाँध सकते हैं। भाई, वे क्यों नहीं स्वीकार करेंगे? आप जो दीक्षा दे रहे हैं, किसी को बुलाकर कहते हैं कि 51,000 रुपये दो, तब दीक्षा देंगे — आपकी दीक्षा की क्या गारंटी है? यह पैसे वाली दीक्षा कहाँ से आएगी?
वक्ता कहते हैं कि ये बातें जो फैलाई जाती हैं — कि आपने शिव जी को गुरु बना लिया, पर शिव जी आपको शिष्य बनाएँ, वे आपको ऐसे-ऐसे बाँध सकते हैं। भाई, वे क्यों नहीं स्वीकार करेंगे? आप जो किसी को दीक्षासक्षम गुरु द्वारा किसी मंत्र या साधना में औपचारिक दीक्षा। दे रहे हैं, उन्हें बुलाकर कहते हैं कि 51,000 रुपये दो, तब हम दीक्षा देंगे। उसकी क्या गारंटी है — आपकी दीक्षा, यह पैसे वाली दीक्षा, कहाँ से आएगी?
लौकिक गुरु में सच में क्या होना चाहिए?
आपकी जिज्ञासा शांत करने का ज्ञान, समय और सामर्थ्य
पंचभूतात्मक रूप में, लौकिक रूप में जो गुरु हमें चाहिए, उनके पास हमारी जिज्ञासा शांत करने का ज्ञान होना चाहिए, समय भी और सामर्थ्य भी। अगर ऐसे गुरु न मिलें, और आप सिर्फ धन, मान, यश या सिद्धि पाने के लिए गुरु बनाते हैं, तो इसी में आप ठगे जाते हैं, धोखा खाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि गुरु की प्राप्ति — पंचभूतात्मक रूप में, लौकिक रूप में जो गुरु हमें चाहिए — ऐसे गुरु होने चाहिए कि उनके पास हमारी जिज्ञासा शांत करने का ज्ञान भी हो, समय भी हो, और सामर्थ्य भी। और जब ऐसे गुरु नहीं मिलते, और आप सिर्फ धन, मान, यश या सिद्धि पाने के लिए गुरु बनाते हैं — इसी में आप ठगे जाते हैं, धोखा खाते हैं। मार्गदर्शक बनाइए। किसी के मार्गदर्शन में साधनाएँ कीजिए। जो विमुक्त हो चुके हैं, उन्हें गुरु बनाइए। गुरु बनाने का मतलब है कि जब आपको क्रियात्मक चीज़ें करनी हों, तभी गुरु बनाइए। गुरु पर वे पहले ही एक लाइव में विस्तार से बोल चुके हैं — आओ मित्र लालटेन लेकर गुरु खोजते — और कहते हैं कि उसे सुनिए, क्योंकि सबने नहीं सुना होगा। उससे यह बात साफ होती है कि गुरु की ज़रूरत कब और कहाँ पड़ती है।
किसी से दीक्षा लेने के बाद लोगों के साथ क्या होता है?
दो-तीन दिन से फोन, पहले से दीक्षित लोगों के
अगर आप किसी से दीक्षित हो भी जाते हैं, तो उसके बाद परेशान होने लगते हैं — जैसे, वे कहते हैं, दो-तीन दिन से फोन आ रहे थे। वे कहते हैं कि वे नाम लेकर बताएँगे — साधुओं के नहीं, बल्कि उनके, जिनसे इन लोगों ने दीक्षा ली थी।
वक्ता कहते हैं कि इसका पूरा विधि-विधान है। अगर आप किसी से दीक्षित हो भी जाते हैं, तो उसके बाद परेशान होने लगते हैं — जैसे दो-तीन दिन से फोन आ रहे थे। वे कहते हैं कि वे नाम लेकर बताएँगे — साधु का नहीं, बल्कि उनका जिनसे उन लोगों की दीक्षा हुई थी।
एक शिष्य ने बताया कि अवधूत शिवानंद जी महाराज कह रहे हैं कि राधा नहीं हैं
एक शिष्य की खबर कि "राधा नहीं हैं"
अवधूत शिवानंद जी महाराज के बारे में, जो एक समय श्री विद्या को लेकर बहुत चर्चा में थे, वक्ता कहते हैं कि आज उनके किसी शिष्य ने कहा — और पहले भी कहा गया था — कि अवधूत शिवानंद महाराज कह रहे हैं कि राधा नहीं हैं, राधा हैं ही नहीं, और वे हलेलुया गा रहे हैं।
वक्ता कहते हैं: जो एक समय श्री विद्या को लेकर बहुत चर्चा में थे — अवधूत शिवानंद जी महाराज। आज उनके किसी शिष्य ने कहा, और पहले भी कहा गया था: कि अवधूत शिवानंद महाराज कह रहे हैं कि राधा नहीं हैं, राधा हैं ही नहीं। और वे हलेलुया गा रहे हैं। वे कहते हैं कि उन्हें इन सब की इतनी जानकारी नहीं थी; जब बताया गया, तब उन्होंने खोजा। सुनने वाले से उनकी बात यह है: आपने उनकी श्री विद्या सुनी, उस पर प्रवचन सुने, प्रभावित हुए। आपको लगा कि हाँ, आपके भीतर जो ज्ञान की जिज्ञासा जाग रही है, जो चैतन्यता आ रही है, यह व्यक्ति उसे सही तरह पूरा कर सकता है, आपको संतुष्ट कर सकता है, इन्हें गुरु बनाना चाहिए — पर जब वहाँ ऐसे कार्य होंगे, तो आप मार्ग से भटक जाएँगे। आपका मन इसे नहीं मानेगा; और छोड़ने में भी डर लगेगा कि ऐसी हालत में किसी को छोड़कर कहीं गुरु-द्रोही न बन जाएँ।
एक व्यक्ति ने फोन पर कहा कि शुल्क इतना बढ़ गया है कि आम आदमी न शिविर में जा सकता है, न ज्ञान पा सकता है
आम आदमी के लिए बहुत अधिक शुल्क, और विदेश में बसना
उसी व्यक्ति को लेकर पहले एक व्यक्ति का फोन आया था। उसने कहा कि आज के समय में उनका शुल्क इतना बढ़ रहा है कि आम आदमी उसे उठा ही नहीं सकता — हम उनके शिविरों में कैसे जाएँ, ज्ञान कैसे पाएँ? ज्ञान पाने के लिए शुल्क। और, वक्ता जोड़ते हैं, एक व्यक्ति विदेश छोड़कर भारत जैसी पवित्र भूमि में आकर बसना चाहता है, जबकि वे महाराज जी यहाँ से जाकर अमेरिका में बस गए हैं।
वक्ता कहते हैं कि उसी व्यक्ति को लेकर पहले एक व्यक्ति का फोन आया था। उसने कहा कि आज के समय में उनका शुल्क इतना बढ़ रहा है कि आम आदमी उसे उठा ही नहीं सकता। हम उनके शिविरों में कैसे जाएँ, ज्ञान कैसे पाएँ? ज्ञान पाने के लिए शुल्क, वक्ता दोहराते हैं। एक व्यक्ति विदेश छोड़कर भारत जैसी पवित्र भूमि में आकर बसना चाहता है। लोग तीर्थ क्षेत्रों में जगह खोजते हैं, कि किसी तरह हमारे भगवान ऐसी कृपा करें कि हम यहीं बस जाएँ। वे महाराज जी यहाँ से जाकर अमेरिका में बस गए हैं। तो अपनी खुद की समझ होनी चाहिए। भगवती ने कुछ तो मेधा शक्ति दी है; अच्छे-बुरे की, उचित-अनुचित की समझ आपके भीतर ज़रूर होगी। कम से कम इतना तो समझिए कि क्या चल रहा है।
जो भी अच्छा मिल रहा है — उनसे या कहीं से भी — ले लीजिए और अपना काम कीजिए
जो अच्छा मिल रहा है, लीजिए और अपना काम कीजिए
इसी कारण वे बार-बार कहते हैं: जहाँ से भी कुछ अच्छा मिल रहा है — और अगर मुझसे भी कुछ अच्छा मिल रहा है — ले लीजिए। हमारे बारे में प्रेम, घृणा, गाली या कुछ अच्छा बोलने की ज़रूरत नहीं। मुझे भैया कहिए, गुरुजी कहिए, भाई, बेटा, बाबू, सोना कहिए, जो कहना है कहिए, और अपना काम करके निकल जाइए। यहाँ रुकना-अटकना नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण हम बोलते हैं, बार-बार बोलते हैं: भाई, जहाँ से भी कुछ अच्छा मिल रहा है — और अगर हमसे भी आपको कुछ अच्छा मिल रहा है — ले लीजिए। हमारे बारे में प्रेम, घृणा, गाली या कुछ अच्छा बोलने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। हमसे जो अच्छा मिल रहा है, जो अच्छा लग रहा है, ले लीजिए। भैया कहिए, गुरुजी कहिए, भाई कहिए, बेटा कहिए, बाबू कहिए, सोना कहिए — जो कहना है कहिए, और अपना काम करके निकल जाइए। यहाँ रुकना-अटकना नहीं है।
किसी व्यक्ति पर आशा और अपेक्षा क्यों नहीं टिकानी चाहिए?
कल उनकी अपनी बुद्धि भी भ्रमित हो सकती है
क्योंकि जब आप किसी पर आशा और अपेक्षा टिकाते हैं, तो — कौन जाने, कल मेरी अपनी बुद्धि भी भ्रमित हो जाए। आपको लगे कि वे गलत बोल रहे हैं। कौन जाने, कल भगवती हमारी बुद्धि भ्रष्ट कर दें और हम हलेलुया गाने लगें, तब जितनी मेहनत की गई है, सब भ्रष्ट हो जाएगी। इसलिए किसी से सीधा लगाव उतना ही रखिए, जितना आपको सही लगे।
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि जब आप किसी पर आशा और अपेक्षा टिकाते हैं, तो सामने वाला — कौन जाने, कल मेरी अपनी बुद्धि भी भ्रमित हो जाए। आपको लगे कि वे अनुचित बोल रहे हैं। हम खुद, कल, कौन जाने, भगवती बुद्धि भ्रष्ट कर दें और हम हलेलुया गाने लगें। तब जितनी मेहनत की गई है, सब भ्रष्ट हो जाएगी, है न। इसलिए किसी के साथ सीधा लगाव उतना ही रखिए, जितना आपको सही लगे। समर्पण का भाव रखना सही है; पर जहाँ आपको लगे कि कुछ गलत चल रहा है, वहाँ से हटना और कटना शुरू कर दीजिए।
श्री रामकृष्ण परमहंस की साधनाएँ और सामर्थ्य, और बाद में आए शिष्यों का जीवन
दिव्य संतों का जीवन, और उनके बाद के शिष्यों का जीवन
वे कहते हैं, जितने भी दिव्य संत, मुनि और गुरु हुए हैं, उनका जीवन देखिए, और फिर उनके बाद आए शिष्यों का जीवन देखिए। श्री रामकृष्ण परमहंस जी महाराज का जीवन, उनकी साधनाएँ, उनका सामर्थ्य देखिए — और आज उनके नाम पर जो चल रहा है, रामकृष्ण मिशन, और उसमें जो होता है, वह देखिए। आपको ज़मीन-आसमान का अंतर दिखेगा।
वक्ता कहते हैं कि जितने भी दिव्य संत हुए, जितने भी दिव्य मुनि, जितने भी ऐसे दिव्य गुरु — उनका जीवन देखिए, और उनके बाद आए शिष्यों का जीवन देखिए। श्री रामकृष्ण परमहंस जी महाराज का जीवन देखिए, उनकी साधनाएँ देखिए, उनका सामर्थ्य देखिए, और आज उनके नाम पर जो चल रहा है, रामकृष्ण मिशन, और उसमें जो होता है, वह देखिए। आपको ज़मीन-आसमान का अंतर दिखेगा। आपको लगेगा कि नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है। ऐसी बहुत सी बातें हैं जो बिल्कुल वैसी नहीं लगतीं। इसमें अच्छी बातें हैं, इसमें शक नहीं, पर बहुत सी बातें आपको ऐसी लगेंगी — वहाँ ऐसा कैसे हो सकता है। वे कहते हैं, क्योंकि वहाँ ईसाइयत आ गई है। अब वहाँ कृष्ण जी को सांता क्लॉज़ की तरह सजाया जाता है। भगवती को भी सजाया जाता है, मदर मैरी की तरह सजाया जाता है। बेलूर मठ में 25 दिसंबर की रात ऐसी प्रक्रियाएँ होती हैं कि उन्हें देखकर आपको लगेगा कि यह सर्व धर्म समभाव नहीं है, यह कहीं न कहीं हमारे अपने सनातन का पतन है।
तो गुरु की खोज कैसे करनी चाहिए?
चैतन्यता के साथ खोजिए, और प्रतीक्षा कीजिए
अपनी चैतन्यता बनाए रखिए। सनातन के विरुद्ध मीठेपन से या ज़बरदस्ती जो भी षड्यंत्र दिखाए जाते हैं, उनसे खुद को बचाने की कोशिश कीजिए — किसी भी कारण उसमें डूबना नहीं है। तो सबसे पहले, जब गुरु खोजें, चैतन्यता के साथ खोजें। और प्रतीक्षा करें। गुरु के लिए परेशान मत होइए कि मुझे गुरु कैसे मिलेंगे। जब हमारा तपोबल और पुण्य का उदय होगा, गुरु मिलेंगे — एक नहीं, कई।
वक्ता कहते हैं कि ऐसी बहुत सी बातें होती हैं, इसलिए अपनी चैतन्यता बनाए रखिए। सनातन के विरुद्ध जितने भी षड्यंत्र दिखाए जाते हैं, चाहे मीठेपन से या ज़बरदस्ती, उनसे खुद को बचाने की कोशिश कीजिए। किसी भी कारण उसमें डूबना नहीं है। तो सबसे पहले, जब आप किसी गुरु को खोजें, तो चैतन्यता के साथ खोजना है। नहीं — प्रतीक्षा कीजिए। गुरु के लिए परेशान मत होइए कि मुझे गुरु कैसे मिलेंगे। जब हमारा तपोबल और पुण्य का उदय होगा, वे कहते हैं कि वे बिल्कुल साफ बोल रहे हैं, गुरु मिलेंगे। एक नहीं — कई गुरु मिलेंगे।
उन्होंने कई साधकों को गुरु बनाया; उनके प्रमुख सद्गुरु ब्रह्मलीन हैं, और उनकी कृपा से ऋत्विजों के मंत्रों का जप चलता है
एक गुरु नहीं; ब्रह्मलीन सद्गुरु, और ऋत्विजों के मंत्र
वे कहते हैं, अपने जीवन में उन्हें ऐसे साधक मिले कि उन्होंने उन्हें गुरु बनाया। ऐसा नहीं कि उनके एक ही गुरु रहे — उनके एक गुरु नहीं थे। उनके अपने प्रमुख सद्गुरु जी महाराज ब्रह्मलीन हो गए; पर उनके जाने के बाद भी, उन्हीं की कृपा से, और उनके दिए ऋत्विजों के मंत्रों के जप, अनुष्ठान और अजपा जप से, ऐसे गुरु मिले जिनमें सामर्थ्य की कमी नहीं कही जा सकती।
वक्ता कहते हैं कि अपने जीवन में हमें ऐसे साधक मिले कि हमने उन्हें गुरु बनाया। बाद में — ऐसा नहीं है कि हमारे एक ही गुरु रहे। हमारे खुद एक गुरु नहीं थे। हमारे अपने प्रमुख सद्गुरु जी महाराज ब्रह्मलीन हो गए। पर उनके जाने के बाद भी, उन्हीं की कृपा से, और उनके दिए ऋत्विजों के मंत्रों से — उन सबके मंत्रों के जप से, क्योंकि क्रियात्मक विषयों के लिए भौतिक गुरु तक पहुँचना था, और ताकि गुरु की प्राप्ति हो, उनके मंत्र जप से, जितना अनुष्ठान हो सका, अजपा जप आदि से — उससे ऐसे गुरु मिले, जिनके बारे में आप नहीं कह सकते कि उनमें सामर्थ्य की कोई कमी है। जिसे आप जादू-टोना कहें, कि हाँ, जादू-टोने के माध्यम से क्या सामर्थ्य हो सकता है, कैसी चीज़ें हो सकती हैं — पर प्रदर्शन, कभी नहीं। सिर्फ ज्ञान ही।
ऐसे गुरु विद्याओं का पूरा ज्ञान रखते थे, प्रदर्शन नहीं करते थे, और साधक के सामर्थ्य जितना ही बताते थे
बिना प्रदर्शन का ज्ञान, सच हुई भविष्यवाणियाँ, और माया से मुक्त लोग
ऐसे गुरु मिले जो उन विद्याओं का पूरा ज्ञान रखते हैं जिनके बारे में हम सुनते-जानते हैं; और हमारे भीतर जितना सामर्थ्य है, उसी अनुपात में बताते हैं। नहीं कहा जा सकता कि वे प्रदर्शन करते फिरते हैं। अगर किसी साधना मार्ग पर चलते हुए उन्हें बीच में कहीं जाना पड़ा या उन्होंने छोड़ दिया, तो उन्होंने खुद कुछ बातें बताईं — कि इतने समय बाद आपको ऐसी प्राप्ति होगी — और वह बात फलीभूत हुई। वे कहते हैं कि यह उनका अपना निजी जीवन अनुभव है।
वक्ता कहते हैं कि ऐसे गुरु भी मिले, जो उन विद्याओं की पूरी जानकारी रखते हैं जिनके बारे में हम सुनते-जानते हैं। हाँ — हमारे भीतर जितनी योग्यता होगी, उसी अनुपात में वे बताते हैं। हम नहीं कह सकते कि वे प्रदर्शन करते फिरते हैं। चुनाव और चयन अपना होता है। अगर किसी साधना मार्ग पर चलते हुए, चलने के क्रम में उन्हें किसी कारण कहीं जाना पड़ा, या उन्होंने छोड़ दिया, कि हम आगे नहीं चल सकते — तो उन्होंने खुद ऐसी कुछ बातें बताईं, कि इतने समय बाद आपको ऐसी प्राप्ति होगी। और वह बात फलीभूत हुई। ऐसी चीज़ें आज भी हैं। वे कहते हैं, यह मेरे अपने निजी जीवन का अनुभव है; हम देखते हैं। और जिन्हें माया आदि से मुक्त कहा जाता है — क्या ऐसे लोग आज भी हैं? बिल्कुल हैं; पर वे अपनी इच्छा से घूमते हैं, और अपनी मर्ज़ी से जिसे चाहें दीक्षा आदि देते हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि वे आपसे भी वैसा ही बनने को कहेंगे।
साधक को कैमरे के सामने क्यों नहीं आना चाहिए?
नाम-यश, और साधना का अंत
वे आपसे वह नहीं कहेंगे जो आप लोग कहते हैं — आप सामने क्यों नहीं आते, सामने क्यों नहीं आते। पहली बात यही है: सामने नहीं आना है। जिस दिन आपको लगे कि सामने आकर अपना नाम-यश बनाना है, ये सब करना है, खुद को पूरा दिखाना-बताना है — तो आपमें मान-प्रशंसा की इच्छा जाग गई, ये सब बातें मन में आ गईं, और आप साधना नहीं कर पाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि यानी वे आपसे वह नहीं कहेंगे जो आप लोग कहते हैं — आप सामने क्यों नहीं आते, सामने क्यों नहीं आते। पहली बात यही है: सामने नहीं आना है। जिस दिन आपको लगे कि आपको सामने आकर अपना नाम-यश बनाना है, ये सब करना है, खुद को पूरा दिखाना-बताना है — तब आपमें मान-प्रशंसा की इच्छा जाग गई, ये सब बातें आपके मन में आ गईं, और आप साधना नहीं कर पाएँगे।
अनुयायियों की भीड़ का खतरा क्या है?
अंधे अनुयायी, और विरोध करने वाले अनुयायी
अगर आज दस लोग आपको सुन रहे हैं, तो कल सौ और फिर हज़ार सुनेंगे, क्योंकि उससे लाभ होगा, क्योंकि आप सही बातें बता रहे हैं। फिर लोग आपके पीछे दौड़ेंगे, और अगर कल माया से भ्रमित होकर आप कोई गलत काम करें या गलत बात बोलें, तो लोग उसे भी सही मानेंगे — क्योंकि वे अंधे अनुयायी हैं। इसलिए, वे कहते हैं, सुनने वाले को सब कुछ मान लेने की बजाय, जहाँ शंका हो वहाँ विरोध करने की क्षमता रखनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर आज दस लोग आपकी बात सुन रहे हैं, तो कल सौ, फिर हज़ार लोग सुनेंगे — क्योंकि उससे लाभ होगा, क्योंकि आप सही बातें बता रहे हैं। तो लाभ होगा, और लोग आपके पीछे दौड़ेंगे, और फिर अगर कल माया से भ्रमित होकर आप कोई गलत काम करें, कोई गलत बात बोलें, तो लोग उसे भी सही मानेंगे। क्योंकि वे अंधे अनुयायी हैं। तो: गुरु के लिए परेशान मत होइए। पुण्य बढ़ाना है।
गुरु के कौन से स्तोत्र पढ़ने चाहिए?
गुरु पादुका स्तोत्रम्, गुरु ब्रह्मा, और गुरु गीता का ध्यान मंत्र
दूसरी बात: गुरु के बाद, गुरु का कौन सा स्तोत्र या स्तुति करनी है जो साधारण हो। गुरु पादुका स्तोत्रम् है — उसका पाठ कीजिए। या फिर गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु स्तोत्र का पाठ कीजिए, और गुरु गीता के ध्यान मंत्र आदि का।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि गुरु के बाद, गुरु में कौन सा स्तोत्र और स्तुति करनी है, जो साधारण हो। गुरु पादुका स्तोत्रम् है — उसका पाठ कीजिए। या फिर गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु स्तोत्र आदि, और गुरु गीता के ध्यान मंत्र आदि — उनका पाठ कीजिए।
गणपति साधना आगे क्यों होनी चाहिए, और उसके बिना क्या होता है?
गणपति साधना पूरी किए बिना कोई प्रथम श्रेणी की साधना नहीं हो सकती
गुरु के बाद गणपति साधना आती है। वे कहते हैं, हम बार-बार कहते हैं कि जीवन में जो सबसे प्रथम श्रेणी की साधना है, वह गणपति साधना पूरी किए बिना हो ही नहीं सकती। अगर आप गणपति साधना नहीं करेंगे, तो आगे जो भी साधना आएगी, उसमें बाधा और विघ्न आना तय है — आखिरी चरण में भी बाधा आएगी। इसलिए गणपति साधना बेहद ज़रूरी है।
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद गणपति साधना। गणपति साधना में हम बार-बार कहते हैं कि जीवन में जो प्रथम श्रेणी की साधना है, वह गणेश साधना पूरी किए बिना हो ही नहीं सकती। अगर आप गणपति साधना नहीं करेंगे, तो आगे जो भी साधना आएगी, उसमें बाधा और विघ्न आना तय है, तय है। बिल्कुल आखिरी चरण तक जाकर भी बाधा और विघ्न आएँगे। इसलिए गणपति साधना बेहद ज़रूरी है।
कौन से गणपति की साधना करें?
उच्छिष्ट, मातंग, हरिद्रा — और उत्तर: इनमें से कोई खास नहीं
वे कहते हैं, इसमें भी लोग परेशान होते हैं: कौन से गणपति करें — उच्छिष्ट गणपति, मातंग गणपति, हरिद्रा गणपति? गणपति जी के बहुत सारे रूप हैं। तो उनमें से हम कौन सा करें? कोई नहीं, वे उत्तर देते हैं — साधारण तरीके से लीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अब इसमें भी लोग परेशान होते हैं। इसमें वे अब जाएँगे: कौन से गणपति करने हैं? उच्छिष्ट गणपति करने हैं। मातंग गणपति करने हैं। हरिद्रा गणपति करने हैं। गणपति जी के बहुत सारे रूप हैं। अब उनमें से हम कौन से गणपति जी करें? कोई भी नहीं — साधारण तरीके से अपनाइए।
वे गणपति की सामान्य साधना कौन सी बताते हैं?
अष्टविनायक, या छह महीने संकट नाशन गणेश स्तोत्र
या तो अष्टविनायक की साधना करें, जो चैनल पर दी गई है। अगर वह न कर सकें, तो छह महीने संकट नाशन गणेश स्तोत्र की साधना करते रहें। दो-चार दिन के लिए न करें। छह महीने में आपकी जो भी भौतिक इच्छाएँ हैं, उनके लिए जो बुद्धि और विचार आपके भीतर आने चाहिए, और वाणी व आचरण में जो व्यवहार होना चाहिए — वह सारी व्यावहारिकता आपके भीतर आने लगती है।
वक्ता कहते हैं, इसे सामान्य तरीके से लें: या तो अष्टविनायक की साधना करें, जो चैनल पर दी गई है। अगर वह न कर सकें, तो छह महीने संकट नाशन स्तोत्र की साधना करते रहें। दो-चार दिन के लिए न करें। छह महीने में यह होगा कि आपकी जो भी भौतिक इच्छाएँ हैं, उनके लिए जो बुद्धि आपके भीतर आनी चाहिए, जो विचार बनने चाहिए, वाणी और आचरण में जो व्यवहार होना चाहिए — वह सारी व्यावहारिकता कहीं न कहीं आपके भीतर बनने लगती है। चाहे भौतिक इच्छा के लिए हो या आध्यात्मिक के लिए, गणपति कृपा करते हैं।
मूलाधार पर बैठे गणपति साधना के लिए क्यों ज़रूरी हैं?
पहला चक्र, और पूरे शरीर का नियंत्रण
वे मूलाधार पर, यानी पहले चक्र पर बैठे हैं। सबसे पहले उन्हीं से आपका पूरा शरीर नियंत्रित होता है। अगर वह बिगड़ जाए, तो आप बैठ भी नहीं पाएँगे — और साधना में बैठना पड़ता है।
वक्ता कहते हैं, वे मूलाधार पर, यानी पहले चक्र पर बैठे हैं। सबसे पहले उन्हीं से आपका पूरा शरीर नियंत्रित होता है। अगर वह बिगड़ जाए, तो आप बैठ भी नहीं पाएँगे। और साधना में बैठना पड़ता है।
क्या कोई भी साधक की तरह जप के लिए बैठ सकता है?
बॉडीबिल्डर, पाँच मिनट का जप, और देव कृपा
बॉडीबिल्डर बहुत बॉडीबिल्डिंग करते हैं, जिम में घंटों मेहनत करते हैं, सिक्स पैक बनाते हैं, मांसपेशियाँ पूरी तरह निचोड़ देते हैं — पर क्या हर कोई आपकी तरह साधना कर सकता है? ध्यान वे कर लेंगे; आधुनिकता में ध्यान का एक अलग तरीका बन गया है, वह सब ठीक है। पर जैसे आप बैठकर मंत्र जप करते हैं, क्या उनसे पाँच मिनट का जप भी हो पाएगा? अगर आप पूरी एकाग्रता से भगवान को पाँच मिनट दे रहे हैं, एक माला भी कर रहे हैं, तो समझिए कि यह देव कृपा है।
वक्ता कहते हैं, बॉडीबिल्डर बहुत बॉडीबिल्डिंग करते हैं — जिम में घंटों-घंटों मेहनत करते हैं, सिक्स पैक बनाते हैं, मांसपेशियाँ पूरी तरह निचोड़ देते हैं। कमाल है। क्या हर कोई आपकी तरह साधना कर सकता है? ध्यान वे कर लेंगे; आजकल आधुनिकता में ध्यान का एक अलग तरीका बन गया है, सब ठीक है। पर जैसे आप बैठकर मंत्र जप कर रहे हैं — क्या उनसे पाँच मिनट का जप भी हो पाएगा? यह क्षमता अपने आप में अलग चीज़ है। जिस नकारात्मक माहौल में आप जाकर बैठते हैं और करते हैं, क्या वहाँ यह हो पाएगा? नहीं हो पाएगा। यह साधक से ही हो पाता है। अगर आप भगवान को पाँच मिनट भी दे रहे हैं, पाँच मिनट भी पूरी एकाग्रता से किसी मंत्र का जप कर रहे हैं, एक माला भी कर रहे हैं, तो समझिए कि यह देव कृपा है। यह हर किसी से नहीं हो पाता।
गणपति साधना शरीर की अशुद्धियों पर क्या असर करती है?
मूलाधार ठीक होना, और अशुद्धियाँ निकलने लगना
इसलिए सबसे पहले गणपति, जो मूलाधार को नियंत्रित करें और ठीक करें। आपके शरीर में जितनी भी अशुद्धियाँ हैं, वहीं से वे दूर होने लगेंगी। पाठ एक बार करें, आठ बार करें, 21 बार करें, 27 बार करें।
वक्ता कहते हैं, इसलिए सबसे पहले गणपति, जो मूलाधार को नियंत्रित करें, उसे ठीक करें। आपके शरीर में जितनी भी अशुद्धियाँ होंगी, वहीं से उनकी निवृत्ति शुरू होगी। चाहे पाठ एक बार करें, आठ बार करें, 21 बार करें, 27 बार करें। दूसरी बात — यह गुरु के बाद की बात थी: गणपति।
गणपति के बाद बटुक भैरव की साधना क्यों करनी चाहिए?
घर और परिवार की रक्षा के लिए बटुक भैरव
उसके बाद घर-परिवार की रक्षा के लिए — क्योंकि तंत्र, अभिचार आदि की पूरी एक श्रेणी की प्रक्रियाएँ बन गई हैं — उनके नाश के लिए, और जाने-अनजाने बने दोषों की निवृत्ति के लिए, घर में भैरव जी का, बटुक भैरव जी का अनुष्ठान करें। हर किसी को बटुक भैरव जी की सेवा-पूजा ज़रूर करनी चाहिए। कोई भी रुकावट जो अटक गई हो, जो बिल्कुल हिल नहीं रही हो, वह केवल बटुक भैरव जी की साधना से दूर हो जाती है, और कई तरह के पाप नष्ट होते हैं।
वक्ता कहते हैं, उसके बाद घर-परिवार की रक्षा के लिए: तंत्र, अभिचार आदि एक तरह की प्रक्रिया की श्रेणी बन गए हैं, और उनके नाश के लिए। और कभी भी बने दोषों के लिए, जाने और अनजाने। अजीब तरह के दोष बन जाते हैं। वे जाने-अनजाने बन जाते हैं। उन सब दोषों की निवृत्ति के लिए घर में भैरव जी का, बटुक भैरव जी का अनुष्ठान करें। हर किसी को बटुक भैरव जी की सेवा-पूजा ज़रूर करनी चाहिए। कोई भी रुकावट जो अटक गई होगी, जो बिल्कुल हिल नहीं रही, वह केवल बटुक भैरव जी की साधना से दूर हो जाती है। कई तरह के पाप नष्ट होते हैं।
गुरु, गणपति और भैरव पूरे होने पर इष्ट आराध्य को उनके अष्टोत्तर शतनाम से शुरू करके लिया जाता है
इष्ट आराध्य, और पहले उनका अष्टोत्तर शतनाम
जब गुरु, गणपति और भैरव जी की साधना पूरी हो जाए, उसके बाद अपने इष्ट आराध्य को लेकर चलें। मान लीजिए आप महाकाली के साथ चल रहे हैं — तो महाकाली की कौन सी साधना पहले करेंगे? शुरुआत यहीं से होती है: सबसे पहले उनके अष्टोत्तर शतनाम की साधना करें।
वक्ता कहते हैं, जब गुरु, गणपति और भैरव जी की साधना पूरी हो जाए, तो उसके बाद अपने इष्ट आराध्य को लेकर आगे चलें। अब आप किसके साथ चलना चाहते हैं? जैसे, मान लीजिए आप महाविद्या महाकाली के साथ चल रहे हैं। तो अब महाकाली की पहली साधना कौन सी करेंगे? शुरुआत यहीं से होती है: सबसे पहले उनके अष्टोत्तर शतनाम की साधना करें।
कई अष्टोत्तर शतनामों में से कोई कैसे चुने?
पहले पूर्व पीठिका और फलश्रुति पढ़ें
अष्टोत्तर शतनाम बहुत सारे हैं। सबसे पहले फलश्रुति पढ़ें, और पूर्व पीठिका — शुरू में बताई गई बातें, कि भैरव जी ने पूछा, या माँ भैरवी ने पूछा, कि वह कौन सा साधन है जिससे कलिकाल में जीव आसानी से मुक्त हो सकेंगे। फिर भैरव जी बताते हैं कि अगर कोई व्यक्ति भगवती काली के इन 108 नामों का नित्य पाठ करे, तो उसे हर तरह की सिद्धियाँ बहुत आसानी से मिल जाती हैं। पहले इसका पाठ करके देखें कि क्या कहा जा रहा है; फिर 108 नामों के बाद देखें कि फलश्रुति क्या है।
वक्ता कहते हैं, अब अष्टोत्तर शतनाम में भी बहुत सारे अष्टोत्तर शतनाम हैं। सबसे पहले फलश्रुति पढ़ें। पूर्व पीठिका — यानी शुरू में बातें बताई और दिखाई गई होंगी: कि हाँ, भैरव जी ने पूछा, या माँ भैरवी ने पूछा, कि वह कौन सा साधन है जिससे कलिकाल में जीव आसानी से मुक्त हो सकेंगे। ये सब बातें पूर्व पीठिका में दी होती हैं। फिर भैरव जी बताते हैं कि अगर कोई मनुष्य भगवती काली के इन 108 नामों का नित्य पाठ करे, तो उसे हर तरह की सिद्धियाँ बहुत आसानी से मिल जाती हैं। यह है पूर्व पीठिका। पहले इसका पाठ करके देखें कि क्या कहा जा रहा है। फिर 108 नामों के बाद देखें कि फलश्रुति क्या है — कि इसका पाठ करने से आपको क्या-क्या मिलेगा।
अगर फलश्रुति में बिना दीक्षा वाले के पाठ की मनाही हो तो क्या करें?
अदीक्षित पर मनाही, और शस्त्र से मृत्यु
अगर उसमें कहीं लिखा हो कि बिना दीक्षा वाला व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ न करे, उसे यह न दिया जाए; कि अगर कोई अदीक्षित इसका पाठ करे तो उसकी मृत्यु शस्त्र के प्रहार से होगी, अपघात की स्थिति बनेगी — तो भाई, वह वाला न करें। अगर आप किसी परंपरा में दीक्षित नहीं हैं, तो उसे छोड़ दें।
वक्ता कहते हैं, अगर उसमें कहीं यह बात लिखी हो — कि इस स्तोत्र का पाठ अदीक्षित न करे, उसे यह न दिया जाए; कि अगर कोई अदीक्षित इसका पाठ करे, तो उसकी मृत्यु शस्त्र के प्रहार से होगी, अपघात की स्थिति बनेगी — भाई, वह वाला न करें। अगर आप किसी परंपरा में दीक्षित नहीं हैं, तो उसे छोड़ दें।
क्या देव दीक्षा विधान से वह मनाही हट जाती है?
भगवान दत्तात्रेय को गुरु मानना, और दोष न लगना
बहुत दुर्लभ स्थिति में, जहाँ हालात बहुत खराब हों, यह कवच आदि के लिए है: अगर आपने देव दीक्षा विधान भी किया है, और मन से, जैसे भगवान दत्तात्रेय को गुरु रूप में स्वीकार किया है, और देव दीक्षा विधान से विधि-विधान से खुद को दीक्षित किया है, तो भी दोष नहीं लगेगा। वह चल जाएगा। पर अगर आपने यह बिल्कुल नहीं किया है, तो उसे छोड़ दें, और कोई दूसरा देखें।
वक्ता कहते हैं, बहुत दुर्लभ स्थिति में, जहाँ हालात बहुत खराब हों, यह कवच आदि के लिए है। उसमें, जैसे, अगर आपने देव दीक्षा विधान भी किया है, और मन से, जैसे भगवान दत्तात्रेय को, किसी को गुरु रूप में स्वीकार किया है, और देव दीक्षा विधान से विधि-विधान से खुद को दीक्षित किया है — तो भी दोष नहीं लगेगा। वह चल जाएगा। भगवान दत्त स्मृतिगामी हैं; उन पर बहुत अटल विश्वास रखें, यह जान लें। वे परम तत्त्व से युक्त महायोगी हैं। वे ज़रूर रक्षा करते हैं और पल भर में आते-जाते हैं। तो अगर आपने उन्हें गुरु बनाया है, या उस तरह का देव दीक्षा विधान किया है, तो आप कर सकते हैं। पर अगर आपने यह बिल्कुल नहीं किया है, तो उसे छोड़ दें। फिर कोई दूसरा देखें।
108 की संख्या के पीछे क्या विज्ञान है?
27 नक्षत्र और चार चरण, और अनुष्टुप छंद
हमारा जन्म इन्हीं 27 नक्षत्रों और चार चरणों में हुआ है। माला के मनके भी 108 हैं, और नाम भी 108 हैं। इसके पीछे का विज्ञान बताया गया है: 27 नक्षत्र गुणा चार चरण बराबर 108। आज तक हमने जो भी कर्मकांड किया होगा — अच्छा, बुरा, पाप, पुण्य — वह सब इन्हीं 27 नक्षत्रों के चार चरणों में है, और उसकी निवृत्ति भी इन्हीं 108 से होगी।
वक्ता कहते हैं, हमारा जो जन्म हुआ है, वह इन्हीं 27 नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। और चार चरणों में हुआ है। माला के जो मनके हैं, वे भी 108 हैं। नाम भी 108 हैं। इसके पीछे का विज्ञान बताया गया है: 27 नक्षत्र, चार चरण, बराबर 108। आज तक हमने जितना भी कर्मकांड किया होगा — अच्छा, बुरा, पाप, पुण्य — वह सब इन्हीं 27 नक्षत्रों के चार चरणों में है। उसकी निवृत्ति भी इन्हीं 108 से होगी। हर नाम के पीछे कोई न कोई विज्ञान है। ऋषि-मुनियों ने जो प्रतिपादित किया, जो लय बनाई, जो छंद बनाया — हम जो पढ़ते हैं उसका ज़्यादातर हिस्सा अनुष्टुप छंद में है। उस छंद में कुछ ऐसी विशेषता रही कि जब ऋषि-मुनियों ने अपने हिसाब से उसे लय में बाँधा, और जब हम उसका पाठ करते हैं, तो उससे हमारे जितने भी कर्म हैं, संचित कर्म, पाप कर्म, जिनके कारण प्रारब्ध बना — वह क्षीण होता है, वह हटता है। और जब वह हटता है, तब आपका पुण्य प्रकट होता है।
अष्टोत्तर शतनाम की सबसे सकारात्मक बात क्या है?
इसे कोई भी कर सकता है; बस फलश्रुति देखनी है
अष्टोत्तर शतनाम की सबसे सकारात्मक बात यह है कि इसे कोई भी कर सकता है। बस फलश्रुति देखनी होती है। सामान्य तौर पर, ज़्यादा से ज़्यादा, यह बात अष्टोत्तर शतनाम में नहीं मिलती — यह हृदय और कवच आदि में मिलती है।
वक्ता कहते हैं, तो अष्टोत्तर शतनाम की सबसे सकारात्मक बात यह है कि इसे कोई भी कर सकता है। बस फलश्रुति देखनी होती है। सामान्य तौर पर, ज़्यादा से ज़्यादा, यह बात अष्टोत्तर शतनाम में नहीं मिलती। यह हृदय आदि में, कवच आदि में मिलती है।
शतनाम के कितने पाठ करने चाहिए?
जब तक 11,000 पाठ पूरे न हो जाएँ
अपने इष्ट आराध्य का शतनाम कम से कम तब तक करें जब तक वह 11,000 न हो जाए — यानी जब तक 11,000 पाठ पूरे न हो जाएँ। चाहे आप एक ही नाम 108 बार ले रहे हों, या अपने इष्ट आराध्य के 108 अलग-अलग नाम ले रहे हों, दोनों से आपको उचित फल मिलेगा।
वक्ता कहते हैं, तो अपने इष्ट आराध्य का शतनाम — कितनी बार: कम से कम जब तक वह 11,000 न हो जाए, यानी जब तक 11,000 पाठ पूरे न हो जाएँ, तब तक करना चाहिए। चाहे आप एक ही नाम 108 बार ले रहे हों, या अपने इष्ट आराध्य के 108 अलग-अलग नाम ले रहे हों। दोनों से आपको उचित फल मिलेगा।
माला जप के साथ कौन से नियम आते हैं?
माला जप के साथ नियम, न्यास और विनियोग आते हैं
पर जब आप माला जप करते हैं, तब उसके नियम आ जाते हैं: जप कैसे करना है, विधि-विधान क्या होगा, न्यास करना है या नहीं, विनियोग कैसे होगा, न्यास कितने तरह के होंगे, और न्यास करने के बाद कौन से नियम मानने हैं। अगर आपको यह जानकारी नहीं है, तो अष्टोत्तर शतनाम में जाएँ।
महिलाएँ, और बिना यज्ञोपवीत वाले पुरुष, न्यास के बारे में क्या करें?
विनियोग हाँ, न्यास नहीं
अब अष्टोत्तर शतनाम में भी विनियोग और न्यास होता है। महिलाएँ विनियोग करें। अगर न्यास की बृहद विधियाँ हों, तो वे न करें — वैसे भी महिलाएँ न्यास न करें और केवल विनियोग करें। जो पुरुष यज्ञोपवीत नहीं पहनते, वे भी सामान्य तौर पर न्यास आदि की प्रक्रिया न करें; अगर कोई बृहद विधि हो, उस तरह का कोई अनुष्ठान हो, तो न करें। सामान्य तौर पर कर सकते हैं, पर विधि और नियम मानें तो बेहतर है।
वक्ता कहते हैं, अब अष्टोत्तर शतनाम में भी विनियोग और न्यास होता है। महिलाएँ विनियोग करें। अगर न्यास आदि की बृहद विधियाँ हों, तो वह न करें। वैसे भी महिलाएँ न्यास किए बिना केवल विनियोग करें। पुरुषों में, जो यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। नहीं पहनते, वे भी सामान्य तौर पर न्यास आदि की प्रक्रिया न करें। अगर बृहद विधि हो, उस तरह का कोई अनुष्ठान हो, तो न करें। सामान्य तौर पर वे कर सकते हैं, पर अगर आप विधि और नियम आदि मानें, तो बहुत बेहतर है। और उसके बाद आगे बढ़कर पाठ शुरू करें।
पहले 11,000 पाठों के लिए क्या संकल्प रखें?
बस यह कि पाठ सिद्ध हो और कृपा मिले
जान लें कि केवल अष्टोत्तर शतनाम के प्रभाव से, जब आप उसका पाठ शुरू करें — सबसे पहले, 11,000 पाठ तक बस यही संकल्प रखें: कि यह पाठ सिद्ध हो, और जिन देवता का आप कर रहे हैं उनकी कृपा आपको जल्द से जल्द मिले।
वक्ता कहते हैं, जान लें कि अष्टोत्तर शतनाम के प्रभाव मात्र से, जब आप उसका पाठ करना शुरू करें — सबसे पहले, 11,000 पाठ तक बस यही संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। रखें: कि यह पाठ सिद्ध हो। कि जिन देवता का आप कर रहे हैं उनकी कृपा मिले; कि कृपा आपको जल्द से जल्द मिले।
छह महीने बाद पाठ सिद्ध होने पर किसी खास भौतिक लक्ष्य के लिए 11 दिन में 1,100 पाठ का संकल्प लिया जाता है
किसी खास भौतिक लक्ष्य के लिए 11 दिन में 1,100 पाठ
मान लीजिए आपने छह महीने यह पाठ किया। पाठ सिद्ध हो गया, कृपा भी मिल गई, और आपकी उन्नति के रास्ते खुलेंगे। उसके बाद अगर कोई भौतिक इच्छा भी हो, तो संकल्प लें कि अमुक काम के लिए हम 11 दिन में इस अष्टोत्तर शतनाम के 1,100 पाठ करने का संकल्प लेते हैं। यही उसकी प्रयोग विधि है।
वक्ता कहते हैं, जब आप इतना पूरा कर लें — मान लीजिए आपने छह महीने यह पाठ किया। पाठ भी सिद्ध हो गया, कृपा भी मिल गई, और आपकी उन्नति के रास्ते भी खुलेंगे। उसके बाद अगर कोई भौतिक इच्छा भी हो, तो संकल्प लें: कि अमुक काम के लिए हम 11 दिन में इस अष्टोत्तर शतनाम के 1,100 पाठ करने का संकल्प लेते हैं। तो वह उसकी प्रयोग विधि हो गई।
हर महीने इष्ट के अपने दिनों पर क्या करना चाहिए?
हर महीने का तय हवन
बीच-बीच में अपने इष्ट आराध्य के दिन के अनुसार हवन भी करते रहें — जैसे भगवती दुर्गा के लिए अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा आदि के दिन। मासिक हवन तय रखें। अगर आप यह बात लगातार करते रहें, तो एक साल के भीतर जीवन बदल जाएगा।
रोबोट की तरह करने से फल क्यों नहीं मिलेगा?
यह सिद्धि कर्म है, और इसमें समर्पण चाहिए
अगर आप इसे बस रोबोट की तरह करें, तो इसका भी फल नहीं मिलने वाला। तंत्र का क्रियात्मक पक्ष षट्कर्म में है; आप जो कर रहे हैं वह सिद्धि कर्म है। सिद्धि कर्म में पूरा समर्पण रखना होगा, विश्वास रखना होगा, श्रद्धा रखनी होगी। अगर नहीं रखेंगे और बस रोबोट की तरह करेंगे, तो यह पूरा नहीं होगा, और असर भी उसी अनुपात में होगा — पूरी तरह बेकार नहीं जाएगा, पर जो ठीक-ठीक मिलना चाहिए, वह नहीं मिलेगा।
वक्ता कहते हैं, पर अगर आप इसे बस रोबोट की तरह करें, तो इसका भी फल नहीं मिलने वाला। तंत्र का क्रियात्मक पक्ष षट्कर्म में है। आप जो कर रहे हैं वह सिद्धि कर्म है। सिद्धि कर्म में आपको पूरी तरह समर्पण रखना होगा, विश्वास रखना होगा, श्रद्धा रखनी होगी। अगर नहीं रखेंगे, और बस रोबोट की तरह करेंगे, तो यह पूरा नहीं होगा। असर भी उसी अनुपात में मिलेगा। ऐसे पूरी तरह बेकार नहीं जाएगा, पर जो ठीक-ठीक मिलना चाहिए, उस अनुपात में नहीं मिलेगा। ये बातें जो मूल नियम हैं, उन्हें मानते हुए करनी चाहिए।
शतनाम से पूरी रक्षा मिलती है, घर में धन-धान्य की कमी दूर होती है, और ऋण दोष से राहत मिलती है
रक्षा, और कमी व ऋण दोष का दूर होना
इससे आपको कई-कई तरह के लाभ मिलते हैं। रक्षा के लिए आपको पूरी रक्षा मिलेगी। अगर कोई कमी हो, घर में धन-धान्य की कमी हो, तो उसकी प्राप्ति, और ऋण दोष के लिए भी — वह भी मिलेगा।
वक्ता कहते हैं, इससे आपको कई-कई तरह के लाभ मिलते हैं। रक्षा के लिए आपको पूरी रक्षा मिलेगी। अगर कोई कमी हो — घर में धन-धान्य की कमी हो — तो उसकी प्राप्ति; और ऋण दोष के लिए भी, वह भी मिलेगा।
108 नाम शरीर की रक्षा कैसे करते हैं?
नक्षत्र और चरण, अंगों और षट्चक्र से जुड़े
जहाँ रोग हो, और उसमें अभिचार आदि की रुकावट भी हो — क्योंकि 27 नक्षत्रों और चार चरणों के अनुसार ही शरीर में अलग-अलग अंग हैं, और उन्हीं का प्रभाव हमारे षट्चक्र पर भी है। तो केवल इन 108 नामों के लगातार जप से शरीर हर तरह से सुरक्षित होने लगता है।
वक्ता कहते हैं, जहाँ रोग हो, और उसमें भी अभिचार आदि की रुकावट हो — क्योंकि 27 नक्षत्रों और चार चरणों के अनुसार ही शरीर में अलग-अलग अंग हैं। उन्हीं का प्रभाव हमारे षट्चक्र पर भी है। तो केवल इन 108 नामों के लगातार जप से शरीर हर तरह से सुरक्षित होने लगता है।
क्या शतनाम का पाठ पूजा के समय के बाहर भी हो सकता है?
मूल पाठ, दिन में हज़ारों बार, बिना किसी रोक के
वे कहते हैं, सबसे बड़ी सकारात्मक बात यह है कि आप पूजा के समय अष्टोत्तर शतनाम का पाठ कर सकते हैं — और उसके बाद भी, पूर्व पीठिका, फलश्रुति, न्यास आदि के बिना, चाहें तो दिन में हज़ारों बार मूल पाठ कर सकते हैं। उसके लिए भी कोई रोक नहीं है।
वक्ता कहते हैं, और एक सबसे बड़ी सकारात्मक बात यह है कि आप पूजा के समय अष्टोत्तर शतनाम आदि का पाठ कर सकते हैं। उसके बाद भी, पूर्व पीठिका, फलश्रुति, न्यास आदि के बिना, जो मूल पाठ है उसका पाठ चाहें तो दिन में हज़ारों बार कर सकते हैं। उसके लिए भी किसी तरह की रोक नहीं है।
शतनाम याद हो जाने पर क्या होता है?
अजपा जप, और केवल सोचने से काम बनना
चाहे आप भगवान श्री राम का, दुर्गा जी का, भगवान कृष्ण का, माँ आद्या का, माँ दक्षिणा काली का, माँ कालिका का — किसी का भी अष्टोत्तर शतनाम कर रहे हों — एक बार अष्टोत्तर शतनाम याद हो जाए, तो आप दिन में उसका जप अजपा जप की तरह कर सकते हैं। आप ये नाम हर पल मन के भीतर चलाते रह सकते हैं। जब आप इस तरह करने लगते हैं, तो यह चैतन्यता के उस स्तर तक जाता है जहाँ केवल आपके सोचने से कई काम बनने लगते हैं।
वक्ता कहते हैं, अगर आप भगवान श्री राम का अष्टोत्तर शतनाम कर रहे हैं, दुर्गा जी का कर रहे हैं, भगवान कृष्ण का कर रहे हैं, माँ आद्या का कर रहे हैं, माँ दक्षिणा काली का कर रहे हैं, माँ कालिका का कर रहे हैं — किसी का भी कर रहे हैं। एक बार आपको अष्टोत्तर शतनाम याद हो जाए, तो दिन में जब भी चाहें, आप उसका जप अजपा जप की तरह कर सकते हैं। मन के भीतर ये नाम हर पल चलते रह सकते हैं। जब आप इस तरह करने लगते हैं, तो यह चैतन्यता के उस स्तर तक जाता है जहाँ केवल आपके सोचने से बहुत से काम बनने लगते हैं।
पहले गुरु, गणपति और भैरव, फिर अपने इष्ट आराध्य का स्तोत्र और शतनाम विधि-विधान से
गुरु, गणपति, भैरव, फिर इष्ट का स्तोत्र और शतनाम
नए साधक को हमेशा शुरुआत ऐसे करनी चाहिए: गुरु, गणपति, भैरव, फिर अपने इष्ट आराध्य के स्तोत्र और शतनाम आदि का विधि-विधान से जप। उसके बाद उनके प्रयोग आदि; और जब यह पूरा हो जाए, तब आगे का विधि-विधान करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं, तो यह है उनकी महिमा — हमें किस तरह क्या करना चाहिए, और क्या मिलेगा। नए साधक को हमेशा शुरुआत ऐसे करनी चाहिए। गुरु, गणेश, भैरव, फिर अपने इष्ट आराध्य के स्तोत्र और शतनाम आदि का विधि-विधान से जप। उसके बाद उनके प्रयोग आदि; और जब यह पूरा हो जाए, तब आगे का विधि-विधान करना चाहिए।
क्या इस पूरे क्रम में कहीं गुरु की ज़रूरत है?
इसमें से किसी के लिए गुरु ज़रूरी नहीं
इन सब प्रक्रियाओं में कहीं भी गुरु की ज़रूरत नहीं पड़ती। ऐसा कहीं नहीं है कि गणपति जी का पूजन करने, संकट नाशन आदि करने के लिए हमें गुरु से दीक्षित होना पड़े; या गुरु देंगे तभी हम करेंगे। आज के देश, काल और परिस्थिति के अनुसार, ये बातें उसके लिए नहीं हैं।
वक्ता कहते हैं, इन सारी प्रक्रियाओं में आपको कहीं भी गुरु की ज़रूरत नहीं पड़ती। ऐसा कहीं नहीं है कि गणपति जी का पूजन करने, संकट नाशन आदि करने के लिए हमें गुरु से दीक्षित होने की ज़रूरत हो। या कि गुरु हमें देंगे, तभी हम करेंगे। आज के देश, काल और परिस्थिति के अनुसार, ये बातें उसके लिए नहीं हैं।
तो किन मंत्रों के लिए गुरु ज़रूरी है?
गायत्री और वैदिक मंत्र, जिनमें उच्चारण ठीक होना चाहिए
खास मंत्र — गायत्री आदि, वैदिक मंत्र आदि — जिनमें उच्चारण पर बहुत खास ध्यान रखना होता है और विधि-विधान मानना होता है: उनके लिए यह आपके लिए ज़रूरी है। नहीं तो पौराणिक और तंत्रोक्त मंत्र आदि, प्रणव आदि में कुछ छोड़कर, चाहें तो करें। अपनी क्षमता के अनुसार करें।
वक्ता कहते हैं, जो खास मंत्र हैं — गायत्री आदि, वैदिक मंत्र आदि, जिनमें उच्चारण पर बहुत खास ध्यान रखना होता है, जिनमें विधि-विधान मानना होता है — उसके लिए यह आपके लिए ज़रूरी है। नहीं तो पौराणिक और तंत्रोक्त मंत्र आदि, प्रणव आदि में कुछ छोड़कर, चाहें तो करें। अपनी क्षमता के अनुसार करें। नियम में रहकर, जो बताया जा रहा है उसकी सीमा में उतना करेंगे, तो आपको लाभ ज़रूर मिलेगा। और उसी से पुण्य का उदय होगा; फिर आगे चलकर बृहद विधियों के लिए ये सब चीज़ें भी आपको मिलेंगी।
मारण कर्म मुठकरणी, हांडी चलाने और ऐसे ही साधनों से किया जाता है, जैसे कोई अस्त्र मंत्र चलाया जाता है
मारण कर्म कैसे होता है, और किन साधनों से
जब कोई व्यक्ति, कोई तांत्रिक, किसी खास पर मारण कर्म करता है, तो — जैसे कोई अस्त्र मंत्र आदि चलाया जाता है — वैसे ही सामान्य भगत वाले तरीके में मुठकरणी होती है, हांडी चलाना होता है, इस तरह के प्रयोगों में मिलान भेजना होता है। यह सब किसी की मृत्यु की कोशिश में किया जाता है।
वक्ता कहते हैं, हम आपको मारण प्रयोग आदि से जुड़ा एक खास विषय बताते हैं। जब कोई व्यक्ति, कोई तांत्रिक, खास तौर पर किसी पर मारण कर्म करता है, तो — जैसे कोई अस्त्र मंत्र आदि चलाया जाता है — वैसे ही सामान्य भगत वाले तरीके में मुठकरणी होती थी, हांडी चलाना होता था; इस तरह के प्रयोगों में मिलान भेजना होता था। यह सब करके किसी की मृत्यु की कोशिश की जाती है।
अगर निशाने पर रखा व्यक्ति प्रयोग लौटा सके तो क्या होता है?
प्रेत, पिशाच और वीर शक्तियाँ भेजना, और सुरक्षित निशाना
ऐसी प्रक्रियाओं में जब कोई प्रेत या पिशाच शक्ति, या वीर श्रेणी की खास शक्तियाँ भेजी जाती हैं, तो यह संभावना रहती है: कि जिस पर तांत्रिक काम कर रहा है — जो उसकी ओर से शत्रु है — उसके पास खुद ज्ञान हो, या कोई देवता उसकी रक्षा में समर्थ हो, या उसने कोई सिद्धि पाई हो, या उस पर देवता की कृपा हो, या उसका गुरु ऐसा हो जो आपका अभिचार लौटा दे।
वक्ता कहते हैं, तो ऐसी प्रक्रियाओं में जब कोई प्रेत या पिशाच शक्ति, या वीर श्रेणी की खास शक्तियाँ भेजी जाती हैं — तो यह संभावना रहती है कि कभी-कभी सामने वाला, शत्रु — यानी कोई तांत्रिक किसी पर काम कर रहा है, और जिस पर वह काम कर रहा है वह उसके लिए शत्रु है — उसके पास भी ज्ञान हो, या कोई देवता उसकी रक्षा में समर्थ हो, या उसने कोई सिद्धि पाई हो, या देवता की कृपा उसके साथ हो, या उसका गुरु ऐसा हो जो आपका अभिचार लौटा दे। जो मारण कर्म आदि किए जा रहे हैं, उन्हें लौटा दे।
अभिचार लौटाया जाए तो क्या होता है?
वह पहले से दुगुनी गति से वापस आता है
लौटाने के क्रम में दो बातें हैं। जब भी यह चीज़ चलाई जाती है, प्रक्षेपित की जाती है, और सामने वाला उसे लौटा देता है, तो ज़्यादातर मामलों में यह होता है: अभिचार जब वापस आता है, तो उसका वेग पहले से दुगुना हो जाता है। और अगर आपको उपसंहार और रक्षण की विधि नहीं आती, या आप वहाँ गलती करते हैं, तो आपकी प्राणहानि निश्चित है।
वक्ता कहते हैं कि लौटाने के क्रम में दो बातें हैं। जब भी यह चीज़ चलाई जाती है, प्रक्षेपित की जाती है, और सामने वाला उसे लौटा देता है, तो ज़्यादातर मामलों में यही होता है, यही अधिक कहा जाता है: कि अभिचार जब वापस आता है, तो उसका वेग पहले से दुगुना बढ़ा रहता है। और अगर आपको उपसंहार और रक्षण की विधि नहीं आती, या आप वहाँ गड़बड़ करते हैं, तो आपकी प्राणहानि निश्चित है। क्योंकि आपने चलाया है; अगर आपको उसका कवच आदि नहीं आता, उसकी ढाल नहीं आती, उसकी काट भी नहीं आती, और वह उलटकर आप पर ही आ गिरा — तो वहाँ आपका नाश तय है।
इसमें अति-आत्मविश्वास कैसे आता है?
यह मान लेना कि सामने वाला कुछ नहीं जानता
ऐसी स्थिति में कहा गया है कि अगर आपके पास कोई उपाय नहीं है, अगर आपने ऐसी गलती कर दी है — और बहुत बार यह अति-आत्मविश्वास से भी होता है। लगता है कि सामने वाला कोई बड़ा जानकार तो है नहीं, उस पर चला दो। अब उधर से पलटवार आता है, और वह भी दुगुनी गति से।
वक्ता कहते हैं कि ऐसी स्थिति में कहा गया है कि अगर आपके पास कोई उपाय न हो, अगर आपने ऐसी कोई गलती कर दी हो — बहुत बार यह अति-आत्मविश्वास से भी होता है। लगता है कि सामने वाला कोई बड़ा जानकार तो है नहीं। उस पर चला दो। अब उधर से पलटवार आ गया, और वह भी दुगुने वेग से।
प्रक्षेपित प्रयोग कहाँ लगेगा, यह कैसे तय होता है?
चलाने वाले का देवता, और शरीर के दस द्वार
अब इसमें जब हम प्रक्षेपण करते हैं — यानी जब लोग मारण की प्रक्रिया करते हैं — तो उनके देवता के अनुसार, और हमारे शरीर में जो दस द्वार हैं उनके अनुसार, यह तय रहता है कि सामने वाले शत्रु पर किस क्षेत्र में प्रभाव पड़ेगा। मारण कर्म एक ही क्षेत्र से नहीं होता।
वक्ता कहते हैं कि अब इसमें जब हम प्रक्षेपण करते हैं — यानी जब लोग मारण की प्रक्रिया करते हैं — उनके देवता के अनुसार, और हमारे शरीर में जो दस द्वार हैं उनके अनुसार, यह तय रहता है: किस क्षेत्र में, किस क्षेत्र में, सामने वाले शत्रु पर उसका प्रभाव पड़ेगा। मारण कर्म भी एक ही क्षेत्र से नहीं होता।
धीमा मारण प्रयोग कैसा दिखता है?
रोम कूप, त्वचा की एलर्जी, और फिर आखिरी वार
कभी आप देखेंगे कि रोम कूपों में प्रभाव पड़ता है। सबसे पहले शरीर में त्वचा की एलर्जी शुरू होगी। त्वचा की एलर्जी ठीक ही नहीं हो रही, बहुत समय तक रहती है। यह बहुत धीरे-धीरे किया जा रहा है; और जब यह आपकी त्वचा बिगाड़ने लगे, तब मारण तंत्र का ऐसा प्रक्षेपण होगा जो उसका आखिरी वार होगा। शरीर में कोई भयंकर रोग होगा, सँभलने का मौका नहीं — दो, चार, दस दिन में खत्म।
वक्ता कहते हैं कि कभी आप देखेंगे कि रोम कूपों में प्रभाव पड़ता है। सबसे पहले शरीर में त्वचा की एलर्जी होने लगेगी। त्वचा की एलर्जी ठीक ही नहीं हो रही; बहुत लंबे समय तक रहती है। यह बहुत धीरे-धीरे किया जा रहा है। और जब यह आपकी त्वचा बिगाड़ने लगे, तब मारण तंत्र का ऐसा प्रक्षेपण होगा जो उसका आखिरी वार होगा। आपके शरीर में कोई भयंकर रोग होगा; सँभलने का भी मौका नहीं मिलेगा। दो, चार, दस दिन में खत्म — यह उसकी अपनी टाइमिंग है कि कितने दिन में शत्रु खत्म होगा।
दस द्वारों में से सबसे पहले किस पर वार होता है?
पित्त, और मणिपूरक चक्र
दूसरी प्रक्रिया यह है कि दस द्वारों में देखा जाता है कि प्रभाव सबसे पहले किस द्वार में डाला जा रहा है। इनमें सबसे अधिक प्रभाव वाला क्षेत्र है हमारा पित्त, हमारा मणिपूरक चक्र। किसी भी तंत्र का प्रभाव सबसे पहले मणिपूरक चक्र पर ही पड़ता है।
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद दूसरी प्रक्रिया यह है: जो दस द्वार देखे जाते हैं — दस द्वारों में से किस द्वार में प्रभाव सबसे पहले डाला जा रहा है। इसमें सबसे अधिक प्रभाव वाले क्षेत्र हैं हमारा पित्त, हमारा मणिपूरक चक्र। किसी भी तंत्र का प्रभाव सबसे पहले मणिपूरक चक्र पर ही पड़ता है।
प्रयोग सबसे पहले मणिपूरक चक्र पर ही क्यों लगता है?
नाभि जन्म का आधार, और सुषुम्ना की शुरुआत
क्योंकि मणिपूरक चक्र हमारी नाभि है, और हमारे जन्म का, उत्पन्न होने का आधार, जहाँ से हमें सब कुछ मिलता है, वह मणिपूरक है। हमारी सुषुम्ना नाड़ी मणिपूरक से ही शुरू होती है, और उसी पर सबसे पहले प्रभाव पड़ता है। जब भी किसी चीज़ का प्रक्षेपण होता है, तो सबसे अधिक वहीं होता है।
वक्ता कहते हैं कि मणिपूरक चक्र, जो हमारी नाभि है — चूँकि हमारे जन्म का, उत्पन्न होने का आधार, जहाँ से हमें सब कुछ मिलता है, वह मणिपूरक है। हमारी सुषुम्ना नाड़ी मणिपूरक से ही शुरू होती है। और उसी पर सबसे पहले प्रभाव पड़ता है। जब भी किसी चीज़ का प्रक्षेपण होता है, तो सबसे अधिक मात्रा में वहीं होता है।
वार पहले शरीर में अत्यधिक गर्मी और ऊर्जा फेंकता है, और सुरक्षा प्रणाली न हो तो बाद का रोग व्यक्ति को खत्म कर देता है
शरीर में फेंकी गई गर्मी, और लौटने पर उसी जगह वार
जब वहाँ प्रभाव पड़ता है, तो सबसे पहले शरीर में गर्मी फेंकी जाती है — अत्यधिक ऊर्जा; पहले ऊर्जा बढ़ेगी। उसके बाद जो रोग होना है, वह होता है और व्यक्ति खत्म हो जाता है, अगर उसके पास कोई सुरक्षा प्रणाली नहीं। ठीक इसी तरह, जब अभिचार लौटा दिया जाता है और उसका वेग दुगुना हो जाता है, तो वह प्रक्षेपण करने वाले पर ठीक उसी जगह असर करेगा; और अगर वह समय रहते उपसंहार विधि नहीं करता, तो उसकी मृत्यु निश्चित है।
वक्ता कहते हैं कि और जब वहाँ प्रभाव पड़ता है, तो सबसे पहली चीज़ होती है शरीर में गर्मी का फेंकना। अत्यधिक ऊर्जा — पहले ऊर्जा बढ़ेगी। उसके बाद जो रोग होना है, वह होता है, और व्यक्ति खत्म होता है। अगर उसके पास कोई सुरक्षा प्रणाली नहीं है, तो खत्म। ठीक इसी तरह, जब अभिचार लौटा दिया जाएगा और उसका वेग दुगुना हो जाएगा, तो सामने वाला व्यक्ति जिसने प्रक्षेपण किया, उस पर ठीक उसी जगह वह असर देगा। अगर उसने समय रहते उपसंहार विधि नहीं की, तो उसकी मृत्यु निश्चित है।
अभिचार भेजने वाले पर लौट आए तो उपाय क्या है?
इष्ट के स्तोत्र और शतनाम का जप तुरंत शुरू करें
ऐसे समय में कहा गया है कि सबसे पहले, आप जिस इष्ट आराध्य की सेवा-पूजा करते हैं, उनके स्तोत्र और शतनाम का जप बिना देर किए शुरू कीजिए। अष्टोत्तर शतनाम का जप रुकना नहीं चाहिए। अगर आपने कोई नाम जप मंत्र सिद्ध किया है, तो मंत्र; नहीं तो अष्टोत्तर शतनाम की बहुत बड़ी महिमा है।
वक्ता कहते हैं कि ऐसे समय में कहा गया है कि सबसे पहले, आप जिस इष्ट आराध्य की सेवा-पूजा करते हैं, उनके स्तोत्र और शतनाम का जप बिना देर किए शुरू कीजिए। अष्टोत्तर शतनाम का जप रुकना नहीं चाहिए। अगर आपने कोई नाम जप मंत्र सिद्ध किया है, तो मंत्र; नहीं तो अष्टोत्तर शतनाम की बहुत बड़ी महिमा है।
मारण कर्म करने वाले सहस्रनाम कंठस्थ क्यों रखते हैं?
क्योंकि कोई भी कभी भी उसे लौटा सकता है
जो लोग मारण कर्म जैसी चीज़ें बहुत करते हैं — आप देखेंगे कि उन्हें सहस्रनाम और शतनाम पूरा कंठस्थ रहता है। वे लगातार करते रहेंगे। माला मंत्र आदि पूरा कंठस्थ रखते हैं — सहस्रनामावली, सहस्र माला मंत्र, शत माला मंत्र, जो भी है, अपने इष्ट आराध्य का पूरा, चाहे भैरव जी हों या भगवती भैरवी — पूरा कंठस्थ रखते हैं और तेज़ी से जपते रहते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि कोई भी कभी भी उसे लौटा सकता है।
वक्ता कहते हैं कि जो मारण कर्म आदि करते हैं — देखिए, जो ये सब बहुत करते हैं, उन्हें सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। और शतनाम पूरा कंठस्थ रहता है। वे लगातार करते रहेंगे। माला मंत्र आदि पूरा कंठस्थ रखेंगे। सहस्रनामावली, सहस्र माला मंत्र, शत माला मंत्र, जितना भी है — अपने इष्ट आराध्य का पूरा; अगर भैरव जी का कर रहे हैं तो भैरव जी का, या भगवती भैरवी का — पूरा का पूरा कंठस्थ रखते हैं और तेज़ी से जपते रहते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि कोई भी कभी भी उसे लौटा सकता है। जो लोग पेशे से इसी काम में हैं — वे कहीं भी बैठेंगे, और उनका चलता रहेगा।
उपसंहार विधि हमेशा क्यों नहीं की जा सकती?
शरीर पूरा तैयार और शुद्ध होना चाहिए — और हो सकता है व्यक्ति ट्रेन में हो
क्योंकि उपसंहार की विधि करने के लिए आपका पूरा शरीर एकदम तैयार और शुद्ध होना चाहिए। मान लीजिए कोई ट्रेन में सफर कर रहा है — उसने कल अभिचार किया, आज बेफिक्र निकल पड़ा, और सामने वाले ने 24 घंटे में उसे पलट दिया। वह अब अपने तंत्र क्षेत्र से दूर जा रहा है, ट्रेन में है, या कहीं ऐसी जगह जहाँ पूरी शुद्धता नहीं रख सकता।
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि उपसंहार की विधि करने के लिए आपका पूरा शरीर एकदम तैयार होना चाहिए, शुद्ध होना चाहिए। अब मान लीजिए कोई ट्रेन में सफर कर रहा है। उसने कल अभिचार किया था। आज बेफिक्र होकर निकल पड़ा। सामने वाले ने अब 24 घंटे के भीतर उसे पलट दिया। अब वह यहाँ से बेफिक्र जा रहा है, अपना तंत्र क्षेत्र छोड़कर कहीं और जा रहा है। वह ट्रेन में है, या कहीं ऐसी जगह जहाँ आप पूरी तरह शुद्धता नहीं रख सकते। पूरी शुद्धता रखना संभव नहीं।
जब कोई उपसंहार विधि न हो सके, तो सिर्फ नाम जप बचता है, और अष्टोत्तर शतनाम सबसे तीक्ष्ण है क्योंकि उसका पूरा विधान 27 नक्षत्रों पर है
सिर्फ नाम जप — और उसके पीछे 27 नक्षत्रों की रचना
ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे? उस समय वहाँ कौन सी उपसंहार विधि करेंगे? सिर्फ नाम जप। और नाम जप में भी अष्टोत्तर शतनाम इतना तीक्ष्ण इसलिए है कि अष्टोत्तर शतनाम की पूरी व्यवस्था — छंद के अनुसार उसका पूरा विधान, या जिस ऋषि ने जिस तंत्र में उसे रखा उसके अनुसार — 27 नक्षत्रों और चार चरणों के अनुसार रखी गई है।
वक्ता पूछते हैं कि ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे? उस समय वहाँ कौन सी उपसंहार विधि करेंगे? सिर्फ नाम जप। अब नाम जप में भी अष्टोत्तर शतनाम इतना तीक्ष्ण क्यों है — क्योंकि अष्टोत्तर शतनाम की पूरी व्यवस्था, जैसा शुरू में बताया गया, छंद के अनुसार उसका पूरा विधान, या जिस ऋषि ने जिस तंत्र में उसे रखा उसके अनुसार, 27 नक्षत्रों और चार चरणों के अनुसार रखी गई है।
बृहत न्यास विधियाँ असल में कहाँ मिलती हैं?
काशी से छपी संस्कृत तंत्र पुस्तकें, बिना भाषा टीका के
जब आप बृहत न्यास करने जाएँ — तंत्र के ऐसे ग्रंथों में, अगर कभी मिलें। आज जो उपलब्ध है, वह भाषा टीका में उस तरह नहीं मिलता। पर चौखंभा से, या काशी के संस्कृत विश्वविद्यालय या ऐसे किसी से — वे कहते हैं कि उन्हें ठीक से याद नहीं — तंत्र से जुड़ी कुछ पुस्तकें पूरी संस्कृत में छपती हैं। उनमें आपको यह विधि-विधान मिलेगा, पर भाषा टीका नहीं है, इसलिए अर्थ खुद निकालना होगा, जब तक कोई योग्य आचार्य न मिलें।
वक्ता कहते हैं कि जब आप बृहत न्यास करने जाएँ — तंत्र के ऐसे ग्रंथ, अगर कभी आपको मिलें। आज के समय में जो उपलब्ध है, वह भाषा टीका में उस तरह नहीं मिलता। हाँ, चौखंभा से, या जो संस्कृत विश्वविद्यालय है, या काशी में आपका ऐसा ही कुछ — वे कहते हैं कि उन्हें ठीक से याद नहीं — उनके यहाँ से तंत्र से जुड़ी कुछ पुस्तकें पूरी संस्कृत में छपती हैं। वे पूरी संस्कृत में रहती हैं। उनमें आपको यह विधि-विधान मिलेगा, पर उसकी भाषा टीका नहीं है, तो अर्थ आपको निकालना होगा, अगर ऐसे कोई योग्य आचार्य न मिलें। वे सही तरह समझाते हैं, क्योंकि वे मूल रखते हैं, मूल टीका; वे लोग टीका नहीं बनाते। वे सीधे संस्कृत का मूल विषय ही रखते हैं।
अष्टोत्तर शतनाम की बृहत विधि क्या है?
हर एक नाम का न्यास
उनमें ये सब बातें बताई गई हैं: कि जब हम अष्टोत्तर शतनाम की पूरी बृहत विधि करते हैं, तो बृहत विधि में हर एक नाम का न्यास होता है। न्यास कैसे होता है? आपकी लग्न कुंडली के अनुसार, आपका जन्म किस नक्षत्र में हुआ, आपका कौन सा नक्षत्र बनता है, और उस नक्षत्र के किस चरण में है — उस चरण से शुरू करके 27 नक्षत्र क्रम से लिखे जाते हैं, और फिर वहाँ गिना जाता है कि कौन सा नाम किस नक्षत्र के किस चरण में पड़ रहा है।
वक्ता कहते हैं कि उनमें ये सब बातें बताई गई हैं: कि जब हम अष्टोत्तर शतनाम की भी पूरी बृहत विधि करते हैं, तो बृहत विधि में हर एक नाम का न्यास होता है। न्यास कैसे होता है? आपकी लग्न कुंडली के अनुसार — आपका जन्म किस नक्षत्र में हुआ, आपका कौन सा नक्षत्र बनता है, और उस नक्षत्र के किस चरण में है। उस चरण से शुरू करके 27 नक्षत्र क्रम से लिखे जाते हैं। और फिर वहाँ यह गिना जाएगा: किस नक्षत्र के, किस चरण में, उस चरण में कौन सा नाम आ रहा है।
न्यास की गिनती के लिए उदाहरण में मृगशिरा नक्षत्र और उसके पहले चरण में जन्म लिया गया है
मृगशिरा नक्षत्र, पहला चरण
साधारण रूप से मान लीजिए कि आपका नक्षत्र मृगशिरा है। मृगशिरा नक्षत्र के चार चरण हैं, और चार चरणों में से आपका जन्म पहले चरण में हुआ — उदाहरण के लिए। तो अब मृगशिरा नक्षत्र किस नंबर पर है? उसमें पहला चरण किस नंबर पर आ रहा है? उससे पहले कितने नक्षत्र हैं, यह पूरी गिनती करके, अष्टोत्तर शतनाम में वही नाम निकाला जाता है — कि हाँ, फलाँ नंबर वाला नाम, जब इस नाम से जोड़ते हैं, तो यह नाम बनता है। वहाँ से शुरू करके हर एक नाम में न्यास किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि उदाहरण के लिए, साधारण रूप से मान लें कि आपका नक्षत्र मृगशिरा है। उदाहरण के लिए: अब मृगशिरा नक्षत्र के चार चरण हैं, तो चार चरणों में से आपका जन्म पहले चरण में हुआ। उदाहरण के लिए। तो अब मृगशिरा नक्षत्र किस नंबर पर है? उसमें पहला चरण किस नंबर पर आ रहा है? उससे पहले कितने नक्षत्र हैं, यह पूरी गिनती करके, अष्टोत्तर शतनाम में भी वही नाम निकाला जाता है — कि हाँ, फलाँ नंबर पर जो नाम है, जब हम उसे इस नाम से जोड़ते हैं, तब यह नाम बनता है। वहाँ से शुरू करके हर एक नाम में न्यास किया जाता है।
नक्षत्र चरण न्यास विधि मूल मंत्रों की न्यास पद्धति और कवच न्यास में भी मिलती है
नक्षत्र चरण न्यास विधि, मूल मंत्र और कवच न्यास में भी
अष्टोत्तर शतनाम में इसे हम नक्षत्र न्यास विधि, नक्षत्र चरण न्यास विधि कहते हैं। यह आपको मूल मंत्रों की न्यास पद्धति में भी मिलेगी — मूल मंत्रों के न्यास के विधान में भी। और जब कवच का न्यास होता है, उनमें भी, और बृहत विधियों में, और भूत लिपि विधान में जिसकी वे बार-बार बात करते हैं, न्यास आदि में बहुत समय लगता है।
वक्ता कहते हैं कि अष्टोत्तर शतनाम में इसे हम नक्षत्र न्यास विधि, नक्षत्र चरण न्यास विधि कहते हैं। यह आपको मूल मंत्रों की न्यास पद्धति में भी मिलेगी, मूल मंत्रों के न्यास आदि के विधान में। और जब कवच का न्यास किया जाता है, उनमें भी; जो बृहत विधि में जाते हैं, और, जैसा हम बार-बार कहते हैं, भूत लिपि विधान में — जब वे उनमें जाते हैं, तो न्यास आदि में बहुत समय लगता है। यह पूरी चीज़ बृहत विधि है। तो ऐसे साधक हैं जो ये सब विधियाँ करते हैं।
श्मशान की विधियाँ कहीं लिखी नहीं मिलतीं, और वे अनुरोध करते हैं कि इसे यूट्यूब से न जोड़ा जाए
गूगल पर सब कुछ नहीं मिलता
जैसे, जो लोग श्मशान की क्रियाओं में हैं — वे कहते हैं कि वे अभी जो चल रहा है उसके बारे में नहीं बोल रहे, और अनुरोध करते हैं कि लोग यूट्यूब को इससे बाहर रखें, यूट्यूब से न जोड़ें, यह कहकर कि यह कहीं लिखा नहीं मिलता। वे कहते हैं, ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जो लिखी तो मिलेंगी, पर ऐसे ग्रंथों और ऐसी जगहों से मिल सकती हैं। गूगल पर सब कुछ उपलब्ध नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि जैसे, जो लोग श्मशान आदि की क्रिया में हैं — अभी जो चल रहा है उसके बारे में, वे कहते हैं कि वे उस पर नहीं बोल रहे, और अनुरोध करते हैं कि लोग यूट्यूब को इससे बाहर रखें। वे कहते हैं, इसे यूट्यूब से मत जोड़िए, यह कहकर कि फिर यह तो कहीं लिखा नहीं मिलता। भाई, ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जो लिखी तो मिलेंगी, पर जो आप ऐसे ग्रंथों से और ऐसी जगहों से पा सकते हैं। हर चीज़ गूगल पर उपलब्ध नहीं है।
श्मशान साधक के उदाहरण में मणिकर्णिका के भैरव के साधक बसंत विजय महाराज जी का नाम आता है
मणिकर्णिका के भैरव के साधक बसंत विजय महाराज जी
जो श्मशान साधनाएँ करते हैं — जैसे मान लीजिए, जो मणिकर्णिका के भैरव की साधना करते हैं। ऐसे विधि-विधान हैं, और वहाँ आपको यह चीज़ सुनने को मिलेगी। वे बताते हैं कि पहले बसंत विजय महाराज जी का वीडियो बहुत वायरल होता था: वे मणिकर्णिका के भैरव जी के साधक रहे हैं, उन्हें बहुत सी सिद्धियाँ प्राप्त हैं, और बहुत लोगों ने उसका प्रत्यक्ष उदाहरण देखा है — हालाँकि जैन मुनि होने के कारण उन्होंने प्रदर्शन छोड़ दिया।
वक्ता कहते हैं कि जो लोग श्मशान की साधनाएँ करते हैं — जैसे मान लीजिए, जो मणिकर्णिका के भैरव की साधना करते हैं। तो ऐसे विधि-विधान हैं; वहाँ आपको यह चीज़ सुनने को मिलेगी। पहले बसंत विजय महाराज जी का वीडियो बहुत वायरल होता था। वे मणिकर्णिका के भैरव जी के साधक रहे हैं। उन्हें बहुत सी सिद्धियाँ प्राप्त हैं, और बहुत लोगों ने उसका प्रत्यक्ष उदाहरण देखा है — हालाँकि उन्होंने प्रदर्शन छोड़ दिया; वे जैन मुनि हैं।
श्मशान में भैरव पूजन से पहले क्या किया जाता है?
पहले शिव जी का पूरा विधि-विधान
उनके यहाँ भी यह बात थोड़ी सी किसी प्रवचन में थी: कि जब श्मशानिक क्रियाएँ या उस तरह के विधान किए जा रहे हों, तो न्यास विधि में हमारे लिए सबसे ज़रूरी यह है कि हम पहले से जिसकी सेवा-पूजा करते आ रहे हैं। भैरव पूजन सीधे नहीं होता — श्मशान में भैरव जी सीधे नहीं किए जाते; उससे पहले शिव जी का पूरा विधि-विधान होता है।
वक्ता कहते हैं कि उनके यहाँ भी यह बात थी — किसी प्रवचन में थोड़ी सी ही थी — यह विधि-विधान। कि जब श्मशानिक क्रियाएँ, या उस तरह के विधान किए जा रहे हों, तो न्यास विधि में हम जैसे लोगों के लिए सबसे ज़रूरी यह है: हम पहले से जिसकी भी सेवा-पूजा करते आ रहे हों। भैरव पूजन सीधे नहीं होता। श्मशान में भैरव जी सीधे नहीं किए जाते। उससे पहले शिव जी का पूरा विधि-विधान होता है।
पंचाक्षर, षडक्षर और अष्टाक्षर के अलग-अलग कवच हैं, और न्यास मंत्र के अक्षरों की संख्या के अनुसार होता है
पंचाक्षर, षडक्षर, अष्टाक्षर — हर एक का अपना कवच
शिव जी के जिन मंत्रों के पुरश्चरण की विधि आपको बताई गई है — पंचाक्षर, षडक्षर, अष्टाक्षर — उसके अनुसार, मंत्र कितने अक्षरों का है उसके अनुसार, अलग-अलग कवच हैं; और उस कवच का और उस मंत्र का न्यास पूरी बृहत विधि से शरीर पर किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि तो शिव जी के उन मंत्रों में से, जिनके पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। आदि करने की विधि आपको बताई गई है — चाहे पंचाक्षर, चाहे षडक्षर, चाहे अष्टाक्षर। उसके अनुसार, मंत्र कितने अक्षरों का है उसके अनुसार, अलग-अलग कवच हैं। और उस कवच का, और उस मंत्र का, न्यास पूरी बृहत विधि से शरीर में किया जाता है।
विसर्जन से पहले एक न्यास कितने समय तक रहता है?
एक पक्ष, और फिर नदी में विसर्जन
एक बार न्यास हो गया, तो एक पक्ष तक दोबारा न्यास नहीं होता। और एक पक्ष के बाद, जब विसर्जन विधि होती है, तो पास में जो भी नदी हो — अगर गंगा जी हैं, तो गंगा जी में उसके विसर्जन की विधि होती है।
वक्ता कहते हैं कि एक बार न्यास हो गया, तो एक पक्ष तक दोबारा न्यास नहीं होता। और एक पक्ष के बाद, जब विसर्जन विधि होती है, तो पास में जो भी नदी हो — यानी अगर गंगा जी हैं, तो गंगा जी में उसके विसर्जन की विधि होती है।
न्यास के बाद बहुत कड़ाई से नियम पालन होता है, ऐसे तप का मज़ाक उड़ाने वाले चाहे जो कहें
"तो क्या हुआ अगर मैंने वह नहीं खाया, पैसा नहीं छुआ?"
न्यास करने के बाद बहुत कड़ाई से नियम पालन आता है। इसीलिए, वे कहते हैं, आप भक्ति वाले लोगों को क्षमा माँगते देखेंगे — और वे उन संत महाराज जी से क्षमा माँगते हैं जो कहते हैं, तो क्या हुआ, मैंने इतने दिन यह भोजन नहीं खाया, इतने दिन पैसा नहीं छुआ, आपने क्या किया? यह बात सबके लिए नहीं है; लोग सामने आकर अपना वह अहंकार दिखाते हैं कि हमने नहीं किया। भाई, यह नहीं कहना है कि हमने नहीं किया।
वक्ता कहते हैं कि न्यास करने के बाद नियमों का पालन बहुत कड़ाई से आता है। ठीक इसी कारण, देखिए — वे भक्ति वाले लोग जो कहते हैं, जो क्षमा माँगते हैं। वे कहते हैं कि वे उन संत महाराज जी से क्षमा माँगते हैं जो कहते हैं: तो क्या हुआ, हमने इतने दिन यह भोजन नहीं खाया, इतने दिन पैसा नहीं छुआ — आपने क्या किया? यह बात सबके लिए नहीं है। होता यह है कि लोग सामने आकर अपना वह अहंकार दिखाते हैं, कि हमने नहीं किया। भाई, यह नहीं कहना है कि हमने नहीं किया।
जो न्यास की पूरी बृहत विधि कर रहे हैं, वे नियम रखते हैं, क्योंकि उस विधि में द्रव्य छूना मना है
न्यास की पूरी बृहत विधि करने वाले, जिन्हें द्रव्य छूना मना है
पर असल में कौन लोग ये काम नहीं करते? जो न्यास की पूरी बृहत विधि कर रहे हैं। वे नहीं करेंगे, क्योंकि उसमें इस चीज़ की मनाही है: अगर आपने न्यास पद्धति की है, तो द्रव्य नहीं छूना है। वे याद करते हैं कि बसंत विजय महाराज जी के कुछ वीडियो में द्रव्य को लेकर ही यह बताया गया था — कि आज हम आप लोगों को यह उपाय करो, वह उपाय करो बता रहे हैं, पर वहाँ तो द्रव्य छूना ही मना है।
वक्ता पूछते हैं कि पर असल में क्या है — कौन लोग यह काम नहीं करते? जो न्यास की पूरी बृहत विधि कर रहे हैं। वे यह काम नहीं करेंगे। वे क्यों नहीं करेंगे? क्योंकि उसमें इस चीज़ की मनाही है: अगर आपने न्यास पद्धति की है, तो द्रव्य नहीं छूना है। बसंत विजय महाराज जी के कुछ वीडियो में ऐसी बातें थीं, जिनमें द्रव्य को लेकर ही यह बताया गया था — कि आज हम आप लोगों को बता रहे हैं कि यह उपाय करो, वह उपाय करो; पर वहाँ तो द्रव्य छूना ही मना है।
चांद्रायण की गिनती से कपाल में भोजन कैसे लिया जाता है?
चांद्रायण व्रत की गिनती से कपाल में भोजन
सिर्फ भोजन मिलना है; और अगर आपको कपाल मिला है, तो कपाल में ही खाना होगा। और कपाल में मिले भोजन में भी — जैसे हम चांद्रायण व्रत के बारे में सुनते हैं, जिसमें विधि है कि तिथि के अनुसार कौर की गिनती होती है: प्रतिपदा को एक कौर खाया जाएगा, द्वितीया को दो कौर — ठीक इसी तरह, पूर्णिमा के बाद घटते क्रम में चलेगा।
वक्ता कहते हैं कि सिर्फ भोजन मिलना है। अगर आपको कपाल मिला है, तो कपाल में ही खाना होगा। और कपाल में मिल रहे भोजन में भी — जैसे हम चांद्रायण व्रत के बारे में सुनते हैं, जिसमें किस तरह की विधि है, कि तिथि के अनुसार भोजन का कौर, कौरों की गिनती होती है: प्रतिपदा को एक कौर खाया जाएगा, द्वितीया को दो कौर खाए जाएँगे। ठीक इसी तरह, पूर्णिमा के बाद घटते क्रम में चलेगा। चांद्रायण व्रत में आपको ऐसी विधि मिलेगी।
न्यास प्रतिपदा से अमावस्या तक बढ़ते क्रम में, और शुक्ल पक्ष में ठीक उलटी विधि से चलता है
प्रतिपदा से अमावस्या, फिर शुक्ल पक्ष में उलटा
उनकी न्यास पद्धति में भी दो विधियाँ चलती हैं। पहली विधि प्रतिपदा से अमावस्या तक चलती है, जिसमें न्यास उसी बढ़त से क्रम से होगा; बाद में, अमावस्या के बाद, शुक्ल पक्ष में ठीक उलटी विधि से होगा। और कपाल भोजन भी फिर उसी तरह रहेगा। ऐसा नहीं कि किसी ने भर दिया तो आप पूरा खा रहे हैं — वे पूरा खा भी नहीं सकते।
वक्ता कहते हैं कि तो उनकी न्यास पद्धति भी — इसमें भी दो विधियाँ चलती हैं। पहली विधि जो चलती है, प्रतिपदा से अमावस्या तक, उसमें न्यास उसी बढ़त से क्रम से होगा; बाद में, फिर अमावस्या के बाद, शुक्ल पक्ष में ठीक उलटी विधि से होगा। और कपाल भोजन भी फिर उसी तरह रहेगा। आपके साथ ऐसा नहीं है कि किसी ने उसमें भर दिया, तो आप पूरा खा रहे हैं। वे पूरा खा भी नहीं सकते।
कठिनाई से मिली सिद्धि के बाद अहंकार क्यों आता है?
भगवान परीक्षा के लिए अहंकार देते हैं, फिर जीवन सिखाता है
ऐसी कड़ाई से रहने के बाद ही सिद्धि मिलती है। और जब सिद्धि मिलती है, तो थोड़ी माया आएगी, थोड़ा अहंकार — हम इतनी कड़ाई से रहे। पर भाई, अगर उस थोड़े से अहंकार को अलग रखें: तो उन्हें कुछ मिला तो। अगर किसी योगी या साधक को कुछ मिलता है और भगवान उसे अहंकार देकर उसकी परीक्षा लेते हैं, तो कहीं न कहीं उसे इसी चीज़ के लिए फिर से कड़ा बनाते हैं; और बाद में जीवन से ऐसी सीख मिलती है कि वे अपना वह अहंकार पूरी तरह छोड़ देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इतनी कड़ाई से रहने के बाद ही सिद्धि मिलती है। तो जब सिद्धि मिलती है, तो थोड़ी माया आएगी, थोड़ा अहंकार — हम इतनी कड़ाई से रहे। पर भाई, वह अहंकार जो थोड़ा आया — अगर उसे अलग रखें — तो उन्हें कुछ मिला तो। अगर किसी योगी को, किसी साधक को मिलता है, और भगवान अहंकार देकर उनकी परीक्षा लेते हैं, तो कहीं न कहीं वे उन्हें इस चीज़ के लिए फिर से कड़ा बनाते हैं। अहंकार देकर, बाद में उन्हें जीवन से ऐसी सीख मिलती है कि वे फिर अपनी कड़ाई, अपना वह अहंकार पूरी तरह छोड़ देते हैं। पर आज के समय में उस चीज़ का मज़ाक बना दिया गया है, खासकर ऐसे लोगों द्वारा जो सीधे कहते हैं: तो क्या हुआ?
टूटे नियम के पीछे एक बड़ा रहस्य है: सिर्फ फल का नुकसान नहीं, बल्कि उसके बाद मिलने वाला दंड
एक बड़ा रहस्य, और टूटे नियम के बाद मिलने वाला दंड
तो क्या नहीं हुआ — इसके पीछे बहुत बड़ा रहस्य है। न्यास विधान आदि के बाद आपको बहुत नियम से चलना होता है; नहीं तो बात सिर्फ इतनी नहीं कि फल नहीं मिलेगा, वह तो दूर की बात है — उस समय जो दंड मिलेगा, वह अलग चीज़ है। दंड के डर से ही लोग नियम से चलेंगे।
वक्ता कहते हैं कि तो क्या नहीं हुआ — इसके पीछे बहुत बड़ा रहस्य है। न्यास विधान आदि के बाद आपको बहुत नियम से चलना होता है। नहीं तो बात सिर्फ यह नहीं होगी कि आपको फल नहीं मिलेगा — वह तो दूर की बात है। उस समय जो दंड मिलेगा, वह अलग चीज़ है। दंड के डर से लोग नियम से चलेंगे।
जानकार साधक आपके लिए साधना करने से मना क्यों करते हैं?
वे आपका शरीर, भाव और आभामंडल पढ़कर मना कर देते हैं
इसी कारण कहा गया है, भाई, कि इन साधनाओं में सोच-समझकर जाइए। और जिन साधकों को जानकारी है — जब आप उनसे कहते हैं कि यह साधना करवा दीजिए, वह करवा दीजिए — तो वे मना क्यों करते हैं? कारण है: जब वे आपकी हालत देखते हैं, तो उनमें इतना सामर्थ्य है कि वे आपका शरीर पढ़ते हैं, आपके मन के भाव पढ़ते हैं, आपका आभामंडल देखने का सामर्थ्य रखते हैं। वे मना कर देते हैं कि नहीं बाबू, छोड़िए, ये सब मत कीजिए; जाकर भगवती का भजन कीजिए, दर्शन-पूजन कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण कहा गया है, भाई, कि सोच-समझकर इन साधनाओं में जाइए। और जिन साधकों को जानकारी है — जब आप उनसे कहते हैं कि यह साधना करवा दीजिए, यह करवा दीजिए — तो वे मना क्यों करते हैं? कारण है। जब वे आपकी हालत देखते हैं, तो उनमें इतना सामर्थ्य है कि वे आपका शरीर पढ़ते हैं, आपके मन के भाव पढ़ते हैं। उनमें आपका आभामंडल देखने का सामर्थ्य है; ऐसी चीज़ें उनके पास हैं। वे मना कर देते हैं कि नहीं बाबू, छोड़िए, ये सब मत कीजिए; आप जाकर भगवती का भजन कीजिए, जाकर दर्शन-पूजन कीजिए। वे प्रेम देंगे, सहयोग करेंगे, आपकी विपत्ति के लिए रास्ता बताएँगे — पर मना कर देंगे।
वे नहीं जान सकते कि दिया गया समय सफल होगा या नहीं, या साधक वह समर्पण देगा या नहीं जो सबसे पहला कदम है
पहला कदम समर्पण है, और वे नहीं जान सकते कि आप उसे देंगे या नहीं
इसके पीछे कारण है कि अगर वे आपको समय दें, तो उन्हें लगेगा कि इसे तैयार करने में इतना समय देकर, पता नहीं यह सफल होगा या नहीं, और इतना समर्पण दे पाएगा या नहीं। सबसे पहली बात, सबसे पहला कदम, समर्पण का है। समर्पण के लिए कभी-कभी गुरु खुद अपनी ओर से आपको पकड़ लेते हैं कि तुम्हें मेरा शिष्य बनना है — और कहीं आप अपनी ओर से जाएँ, तो वे भगा देते हैं कि मेरे शिष्य मत बनो।
वक्ता कहते हैं, इसके पीछे एक कारण है: कि अगर वे आपको समय दें, तो उन्हें लगेगा कि इसे तैयार करने में इतना समय देकर, पता नहीं यह सफल होगा या नहीं, और इतना समर्पण दे पाएगा या नहीं। सबसे पहली बात, पहला कदम, समर्पण का है। समर्पण के लिए, देखिए — कभी-कभी गुरु लोग खुद अपनी ओर से आपको पकड़ लेते हैं कि तुम्हें मेरा शिष्य बनना है। वह एक अलग विषय हो जाता है: उन्होंने अपनी ओर से कैसे पकड़ा; उनकी अपनी कोई क्षमता थी। और कहीं आप अपनी ओर से जाएँ, तो वे भगा देते हैं — कि मेरे शिष्य मत बनो। यह उनका अपना है; ऐसा नहीं कि उन्होंने आपको यूँ ही भगा दिया, कि मन में आया तो रख लिया, मन में आया तो भगा दिया। कुछ बातें होती हैं जिन्हें देखकर वे कहते हैं कि हाँ, इन लोगों के साथ हम नहीं चल पाएँगे।
अगर कोई समर्थ गुरु आपसे कठोर या बेतुकी बात कहें तो क्या?
परीक्षा, और यह सवाल कि आप कितना सह सकते हैं
अगर गुस्से में, या बस परीक्षा लेने की अपनी इच्छा से, वे आपसे कुछ बेतुका कह दें — उनमें क्षमता है; यहाँ समर्थ गुरुओं की बात हो रही है, इधर-उधर की बात नहीं, जिनमें सच में क्षमता है और सच में ज्ञान है। तो आप उसमें से कितना सह पाएँगे? जब आप सहना सीख जाएँगे, तब आपको सही व्यवस्था मिलेगी — उसी तरह वे आपको आगे बढ़ाएँगे, शून्य भाव में ले जाएँगे, और समाधि में स्थित करेंगे।
वक्ता कहते हैं, अगर गुस्से में, या बस परीक्षा लेने की अपनी इच्छा से, वे आपसे कुछ बेतुका कह दें — उनमें क्षमता है। समर्थ गुरु, उन्हीं की यहाँ बात हो रही है; यह इधर-उधर की बात नहीं है। जिनमें सच में क्षमता है, जिनके पास सच में ज्ञान है। तो वहाँ आप उनकी कितनी बात सह पाएँगे? जब आप सहना सीख जाएँगे, तब आपको सही तरह की व्यवस्था मिलेगी। उसी तरह वे आपको आगे बढ़ाएँगे, उसी तरह शून्य भाव में ले जाएँगे, उसी तरह समाधि में स्थित करेंगे।
जहाँ अहं की वृत्ति खत्म न हो और एक डाँट भी न पचे, वहाँ शिष्यत्व शुरू नहीं हो सकता
अहं की वृत्ति जो खत्म नहीं होती
अगर आप उनकी बात बिल्कुल नहीं सह पाते — यानी आपके मन के भीतर से अहं की वृत्ति बिल्कुल खत्म नहीं हो रही, एक बात भी नहीं पचा पा रहे, एक डाँट नहीं पचा पा रहे — तो आप उनके शिष्य कहाँ से बन पाएँगे, और वे आपको वे सब चीज़ें क्यों देंगे?
वक्ता कहते हैं, अगर आप उनकी बात बिल्कुल नहीं सह पाते — यानी आपके मन के भीतर से अहं की वृत्ति बिल्कुल खत्म नहीं हो रही। आप एक बात भी नहीं पचा पा रहे, एक डाँट नहीं पचा पा रहे। तो फिर आप उनके शिष्य कहाँ से बन पाएँगे? वे आपको वे सब चीज़ें क्यों देंगे?
क्या चौर गणपति विधान बिना आदेश के किया जा सकता है?
द्वार और कोष जहाँ गणपति विराजमान हैं — और बिना आदेश के करना
चौर गणपति विधान में हम पढ़ते हैं कि हमारे शरीर के हर द्वार पर, हर कोष में गणपति विराजमान हैं, और मंत्र जप करने से वे जम्हाई लेते हैं। अब हर कोई कहीं चौर गणपति पढ़कर कहता है, हाँ, चौर गणपति करो। भाई, नियम है — किन मंत्रों में करना है, किनमें नहीं, कहाँ आदेश है, कहाँ नहीं। यह अतिक्रमण है कि बस कर लो। लाभ ज़रूर होगा, पर जो दोष लग रहा है वह साथ-साथ लगेगा।
वक्ता कहते हैं, चौर गणपति विधान में हम पढ़ते हैं कि हमारे शरीर के हर द्वार पर, हर ऐसे कोष में गणपति विराजमान हैं, और मंत्र जप करने से वे जम्हाई लेते हैं और ये सब चीज़ें ग्रहण करते हैं। अब इस बारे में हर कोई कहीं चौर गणपति पढ़कर — हाँ, चौर गणपति करो। भाई, नियम है। किन मंत्रों में करना है, नहीं करना है; कहाँ आदेश है, कहाँ नहीं। यह अतिक्रमण है कि बस कर लो। लाभ ज़रूर होगा, पर जो दोष लग रहा है वह साथ-साथ लगता जाएगा। आप इधर से कर रहे हैं और उधर से दोष लग रहा है; लाभ तो आपको आ ही रहा है।
क्या सिद्ध कुंजिका और भैरव मंत्र सबके सामने बाँट देने चाहिए?
"राज्यं देयं शिरो देयं न देयं भैरवाक्षरम्"
जैसे सिद्ध कुंजिका में — यह कुंजिका, वह कुंजिका, लोगों ने आज पूरी कुंजिका खोलकर रख दी है। मिली तो ज़रूर थी। गुरु बड़े भरोसे से देते हैं: भाई, इसे गुप्त रखना। राज्यं देयं शिरो देयं न देयं भैरवाक्षरम् — राज्य दे दो, सिर दे दो, पर भैरव का अक्षर मत दो। यहाँ लोग भैरव का अक्षर पूरा जलेबी की तरह बाँट रहे हैं; भैरव मंत्र 251 रुपये में बँट रहा है।
वक्ता कहते हैं, जैसे सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् में — यह कुंजिका, वह कुंजिका, लोगों ने आज पूरी कुंजिका खोलकर रख दी है। मिली तो ज़रूर थी। गुरु बड़े भरोसे से देते हैं: भाई, इसे गुप्त रखना। राज्यं देयं शिरो देयं न देयं भैरवाक्षरम्। राज्य दे दो, सिर दे दो, पर भैरव का अक्षर मत दो। यहाँ लोग भैरव का अक्षर पूरा जलेबी की तरह बाँट रहे हैं। भैरव मंत्र 251 रुपये में बँट रहा है, है ना। कुंजिका के कई विधान हैं। जो सच में अच्छे विधान हैं, पूरी तरह साफ़, वे उन्हें दिए जा रहे हैं जो सच में सही हैं; उनमें बहुत कम बातें छिपाई जा रही हैं।
ऐसे मंत्र देने की मनाही क्यों थी?
सिर्फ़ गोपनीयता नहीं — शरीर शायद सह न पाए
आप नहीं जानते कि मनाही क्यों थी। भाई, मनाही सिर्फ़ इस अर्थ में नहीं थी कि इसे गुप्त रखने को कहा गया ताकि अनधिकारी के हाथ न लगे। मनाही इसलिए भी थी कि नुकसान होगा। आप बहुत सज्जन व्यक्ति हैं, बहुत अच्छे व्यक्ति हैं — पर शरीर की क्षमता एक बार में ऐसी नहीं होगी कि आप ये मंत्र कर सकें। कर लेंगे तो निकल जाएँगे, भोग लग जाएगा, और उसके बाद जीवन भर उस मंत्र के देवता को बुरा-भला कहेंगे, और देने वाले को बुरा-भला कहेंगे।
वक्ता कहते हैं, आप नहीं जानते कि मनाही क्यों थी। भाई, मनाही सिर्फ़ इस अर्थ में नहीं थी कि इसे गुप्त रखने को कहा गया, ताकि यह अनधिकारियों के हाथ न लगे। मनाही इसलिए भी थी कि नुकसान होगा। आप बहुत सज्जन व्यक्ति हैं, बहुत अच्छे व्यक्ति हैं। शरीर की क्षमता एक बार में ऐसी नहीं होगी कि आप ये मंत्र कर सकें। कर लेंगे तो निकल जाएँगे, भोग लग जाएगा; उसके बाद जीवन भर उस मंत्र के देवता के बारे में उल्टा-सीधा बोलेंगे, और देने वाले के बारे में उल्टा-सीधा बोलेंगे। इस कारण से भी मनाही है।
उपदेश देने का तरीका फल तय करता है, और जूते, कोट और टाई पहनकर मंत्र पढ़ना गलत है
सिखाने का तरीका फल तय करता है
वे कहते हैं, आजकल एक व्यक्ति बहुत वायरल हो रहा है, जो जूते, कोट और टाई पहनकर मंत्र पढ़ता है और मंत्रों के बारे में बताता है। यह बहुत गलत है। आप कितना भी ज्ञान पा लें — अगर इन सब विषयों पर उपदेश देने का आपका तरीका गलत है, तो फल भी उसी तरह मिलेगा।
वक्ता कहते हैं, आजकल एक व्यक्ति बहुत वायरल हो रहा है। वह जूते, कोट और टाई पहनकर मंत्र पढ़ता है; मंत्रों के बारे में बताता है। यह बहुत गलत है। आप कितना भी ज्ञान पा लें — पर अगर इन सब विषयों पर आपका उपदेश देने का तरीका गलत है, तो वह फल भी उसी तरह मिलेगा।
साधना में सिले कपड़ों का क्या नियम है?
सिले हुए कपड़े पहनकर साधना न करें
जब आप साधना के क्षेत्र में जाते हैं, तो यह बात हमेशा कही जाती है: सिले कपड़े पहनकर साधना न करें। जब आप ऐसे कपड़ों में उपदेश देते हैं, तो कहाँ लिखा है, कैसे लिखा है, किसने कहा, कैसे कहा — पढ़िए। पढ़ा होता तो आपको यह बात पता होती और आप कभी ऐसी गलत दिशा न देते।
वक्ता बताते हैं, जब आप साधना के क्षेत्र में जाते हैं, तो यह बात हमेशा कही जाती है: सिले कपड़े पहनकर साधना न करें। जब आप ऐसे वस्त्रों में उपदेश देंगे, तो — कहाँ लिखा है, कैसे लिखा है, किसने कहा, कैसे कहा। पढ़िए। पढ़ा होता तो आपको यह बात पता होती; आप कभी ऐसी गलत दिशा न देते। हम हमेशा कहते हैं: बिना सिला कपड़ा पहनने की कोशिश करें।
साधना के समय कपड़ों के बारे में वे महिलाओं से क्या कहते हैं?
साधना के समय साड़ी, बाकी समय जो भी पहनें
वे माताओं-बहनों से बार-बार कहते हैं कि अगर आप साड़ी नहीं पहनतीं, तो कम से कम साधना के समय वही पहनें। बाद में जो पहनती हैं पहनें — जींस, टॉप, सूट आदि, अपनी सुविधा के अनुसार; पर साधना में कम से कम साड़ी पहनें। एक वस्त्र का विधान रहा है, पर लोगों ने उसे भी गलत तरीके से पेश किया है।
वक्ता कहते हैं, माताओं-बहनों से हम बार-बार कहते हैं: अगर आप साड़ी नहीं पहनतीं, तो साधना के समय कम से कम वही पहनें। बाद में जो पहनती हैं पहनें — जींस, टॉप, सूट आदि, अपनी सुविधा के अनुसार। पर साधना में कम से कम साड़ी पहनें। एक वस्त्र का विधान रहा है, पर लोगों ने उसे भी गलत तरीके से पेश किया है।
शुरू करने से पहले क्या करना चाहिए?
पहले मूल बातें जानें और सुनें
इसलिए जितनी भी मूल बातें हैं, उन्हें जानकर और सुनकर ही करना चाहिए। वे आगे कहते हैं कि अगर आप समर्थ साधकों से कुछ लेने की कोशिश कर रहे हैं, चाहे किसी भी क्षेत्र में रहते हों, और आपकी शिकायत है कि अमुक के पास जानकारी है पर दे नहीं रहे — वहीं दिक्कत है।
वक्ता कहते हैं, इसलिए जो भी बातें मूल हैं, उन सबको जानकर और सुनकर ही करना चाहिए। जो समर्थ साधक हैं — अगर आप उनसे कुछ लेने की कोशिश कर रहे हैं, चाहे किसी भी क्षेत्र में रहते हों — और आपकी शिकायत बनी रहती है कि अमुक के पास जानकारी तो है पर दे नहीं रहे, कि यही परेशानी है।
मारण प्रयोग का उतारा करने में क्या खतरा है?
अपने ही लोगों द्वारा किए मारण प्रयोग का उतारा
किसी पर उसके अपने ही लोगों ने मारण प्रयोग कर दिया। तंत्र के ऐसे बहुत से प्रयोग होते हैं। उसमें यह विषय आता है कि लोग कहते हैं, हाँ ठीक है, यह मारण तंत्र प्रयोग हुआ है, इस तरह के विषय, और इसे उतारना चाहिए — उतारा किया जाता है। उतारा करने में भी, क्षेत्रपाल आदि का बहुत सामान्य उतारा एक अलग विधि है; पर जब किसी प्रयोग का उतारा किया जाता है, तब उस समय सावधानी रखना बहुत ज़रूरी है।
वक्ता कहते हैं, दूसरी बात — अष्टोत्तर शतनाम के बारे में मुख्य विषय वह था; कुछ और विषय भी वे अब सबके सामने रखते हैं। किसी पर उसके अपने किसी व्यक्ति ने मारण प्रयोग कर दिया। तंत्र के ऐसे बहुत से प्रयोग होते हैं। उसमें एक विषय आता है, कि लोग कहते हैं, हाँ ठीक है, यह मारण तंत्र प्रयोग किया गया है, इस तरह के विषय, और इसे उतारना चाहिए। उतारा ही किया जाता है। उतारा करने में भी, जो बहुत सामान्य उतारा है, क्षेत्रपाल आदि का, वह एक अलग विधि है। पर जब किसी प्रयोग का उतारा किया जाता है, तब उस समय सावधानी रखना बहुत ज़रूरी हो जाता है।
उतारा करने पर किसे कष्ट होता है?
उतारने वाले का भी नाश होता है
ऐसा होता है कि प्रयोग हमने खुद किया और हम खुद वह चीज़ नहीं उतार सकते। जो भी उसे उतारेगा, उसका भी नाश होगा। इसी कारण से भी बहुत से प्रयोग ऐसे हैं जिन्हें वर्जित किया जाता है।
वक्ता कहते हैं, ऐसा होता है कि प्रयोग हमने खुद किया है, और हम खुद वह चीज़ नहीं उतार सकते। जो भी उसे उतारेगा, उसका भी नाश होगा। इसी कारण से भी बहुत से ऐसे प्रयोग हैं जिन्हें वर्जित किया जाता है।
उतारे में अष्टोत्तर शतनाम का उपयोग कैसे होता है?
पात्र इससे अभिमंत्रित होता है, और पहले और बाद में संकल्प लिया जाता है
ऐसी स्थिति में, जब उतारा किया जाता है, तो जिस पात्र पर हम उतारा करते हैं, उसे भी अभिमंत्रित किया जाता है — अष्टोत्तर शतनाम से ही। और उतारा करने के बाद भी, और करने से पहले भी, अपनी रक्षा के लिए, अष्टोत्तर शतनाम का ही पाठ इस संकल्प के साथ करना चाहिए कि हमारी रक्षा हो; और उतारे के विसर्जन के बाद भी फिर से संकल्प लेकर अष्टोत्तर शतनाम का विधि-विधान करना चाहिए। इससे इन दोषों का कुछ हद तक परिहार होता है — 100 प्रतिशत नहीं।
वक्ता कहते हैं, ऐसी स्थिति में, जब उतारा किया जाता है, तो जिस पात्र पर हम उतारा करते हैं, उसे भी अभिमंत्रित किया जाता है — अष्टोत्तर शतनाम से ही। और उतारा करने के बाद भी, और उतारा करने से पहले भी, अपनी रक्षा के लिए, अष्टोत्तर शतनाम का ही पाठ करके यह संकल्प लेना — कि हमारी रक्षा हो। और उतारे का विसर्जन करने के बाद भी, फिर से संकल्प लेकर अष्टोत्तर शतनाम का विधि-विधान करना चाहिए। तब इन दोषों का कुछ हद तक परिहार होता है। 100 प्रतिशत नहीं।
अष्टोत्तर शतनाम को पहले से जीवन में लाना होगा, वरना आज माँगे गए उतारे के लिए ऊर्जा नहीं होगी
इसे जीवन में लाएँ; पंचांग सेवन में इसका बड़ा महत्व है
कुछ ऐसे विनाशकारी प्रयोग हैं कि अगर आपकी ऊर्जा ही उतनी नहीं है — अगर आपने जीवन में कभी अष्टोत्तर शतनाम नहीं पढ़ा, और आज उतारा करने की स्थिति आई और किसी ने आपसे करने को कहा — तो असर भी उसी अनुपात में मिलेगा। ऐसा नहीं होगा कि आप पूरी तरह सुरक्षित हो जाएँ; असर पड़ेगा। इसलिए अष्टोत्तर शतनाम को अपने जीवन में लाएँ; यह हर जगह काम आने वाला है, आप जिनकी भी साधना और उपासना करें, और किसी देवता के पंचांग सेवन में इसका बहुत बड़ा महत्व है।
वक्ता कहते हैं, कुछ ऐसे विनाशकारी प्रयोग हैं जिनमें, अगर आपकी ऊर्जा ही उतनी नहीं है — आपने जीवन में कभी अष्टोत्तर शतनाम नहीं पढ़ा, और आज जब आप पर उतारा करने की स्थिति आई, किसी ने आपसे कहा कि हाँ, यह करो — तो असर भी उसी अनुपात में मिलेगा। ऐसा नहीं होगा कि आप पूरी तरह सुरक्षित हो जाएँ। असर तो पड़ेगा ही। इसलिए अष्टोत्तर शतनाम को अपने जीवन में उतारें। यह हर जगह काम आने वाला है। आप जिनकी भी साधना और उपासना करें, उसमें यह आपके काम आएगा। किसी देवता के पंचांग सेवन में अष्टोत्तर शतनाम का बहुत बड़ा महत्व है।
क्या एक साथ दो अनुष्ठान करना ठीक है?
एक ही देवता की दो साधनाएँ साथ में
पूछा गया कि क्या दो अनुष्ठान साथ करना ठीक है: हाँ — अगर दोनों भैरव जी से जुड़े हैं, तो किए जा सकते हैं। ऐसे में एक ही देवता की दो तरह की साधना भी की जा सकती है। अगर इतना समय हो, तो इस तरह के मंत्र आदि न करें; स्तोत्र और स्तुति हैं, वे किए जा सकते हैं।
वक्ता अब श्रोताओं के सवाल लेना शुरू करते हैं। पूछा गया कि क्या एक समय में दो अनुष्ठान करना ठीक है: हाँ — वे दोनों भैरव जी से जुड़े कर रहे हैं, तो किए जा सकते हैं। ऐसे में एक ही देवता की दो तरह की साधना भी की जा सकती है। अगर इतना समय हो, तो इस तरह के मंत्र आदि न करें; स्तोत्र और स्तुति हैं — वे किए जा सकते हैं।
अगर ऊँची आवाज़ का जप पड़ोसियों को परेशान करे तो क्या?
स्फटिक माला पर अर्गला के पहले मंत्र की एक माला, और मोहल्ले में झगड़े
एक श्रोता कहते हैं कि वे स्फटिक माला पर अर्गला के पहले मंत्र की एक माला ऊँची आवाज़ में जपते हैं, और मोहल्ले के लोगों ने उन्हें बहुत परेशान किया है, आए दिन बहस होती है। वक्ता जवाब देते हैं, अगर आपके मंत्र जप से लोग परेशान हो रहे हैं, तो इसके दो कारण हो सकते हैं — वे प्रेत से पीड़ित हो सकते हैं, इसलिए उन्हें दिक्कत हो रही है।
एक श्रोता कहते हैं कि वे स्फटिक माला पर अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र की एक माला ऊँची आवाज़ में जपते हैं, और मोहल्ले के लोगों ने उन्हें बहुत परेशान किया है; आए दिन बहस होती है। वक्ता जवाब देते हैं, अगर आपके मंत्र जप से लोग परेशान हो रहे हैं, तो इसके दो कारण हो सकते हैं। वे प्रेत से पीड़ित होंगे, इसलिए उन्हें दिक्कत हो रही होगी।
भद्रकाली नाम से हलचल क्यों होगी?
भद्रकाली कपालिनी और प्रेत आत्माएँ — इसलिए धीरे पढ़ें
यह भगवती का नाम है, कोई ऐसा मंत्र नहीं — पर भाई, भद्रकाली नाम सुनकर प्रेत आत्माओं में बड़ी हलचल मच जाती है। जैसे ही आप भद्रकाली कपालिनी कहेंगे, सब डर जाएँगे कि यह आदमी कपालिनी का नाम क्यों ले रहा है। इसलिए धीमी आवाज़ में पाठ करें; आराम से पाठ करें, ज़ोर से न करें। और दूसरी बात, लोगों को आपकी साधना का पता चल रहा है और वे उसमें दखल दे रहे हैं, और झगड़े हो रहे हैं — जो ठीक नहीं है।
वक्ता कहते हैं, यह भगवती का नाम है; यह कोई ऐसा मंत्र नहीं है — पर भाई, भद्रकाली नाम सुनकर प्रेत आत्माओं में बहुत बड़ी हलचल मच जाती है। जैसे ही आप भद्रकाली कपालिनी कहेंगे, सब डर जाएँगे: यह आदमी कपालिनी का नाम क्यों ले रहा है। इसलिए धीमी आवाज़ में पाठ करें। फिर आराम से पाठ करें; ज़ोर से न करें, क्योंकि परेशानी होती है। और दूसरी बात, आपकी साधना लोगों की जानकारी में आ रही है, और वे आकर उसमें दखल दे रहे हैं, और झगड़ा हो रहा है। यह ठीक नहीं है।
बटुक भैरव की स्थापना के लिए त्रिशूल किस धातु का हो?
पीतल या चाँदी, छह इंच या लगभग एक हाथ तक
पूछा गया कि अगर बटुक भैरव की स्थापना त्रिशूल के रूप में करनी हो, तो त्रिशूल किस धातु का हो: त्रिशूल पीतल का रखें; चाँदी का रख सकते हैं। छह इंच तक भी रख सकते हैं; अगर बाहर, आँगन आदि में रखना हो, तो बड़ा भी रख सकते हैं, लगभग एक हाथ तक का। चावल की छोटी डिब्बी में — हाँ, हो सकता है, खड़ा करके, लाल और पीले चावल मिलाकर।
पूछा गया कि अगर बटुक भैरव की स्थापना त्रिशूल के रूप में करनी हो, तो त्रिशूल किस धातु का हो: वक्ता जवाब देते हैं, त्रिशूल पीतल का रखें; चाँदी का रख सकते हैं। छह इंच तक भी रख सकते हैं। अगर बाहर, आँगन आदि में रखना हो, तो बड़ा भी रख सकते हैं, लगभग एक हाथ तक का। चावल की छोटी डिब्बी में — हाँ, हो सकता है, खड़ा करके। लाल और पीले चावल मिलाकर।
देवी अर्चन कैसे करना चाहिए?
फूल, किशमिश, पत्ते और बेलपत्र, इस्तेमाल की गई नामावली के अनुपात में
पूछा गया कि देवी अर्चन कैसे करें: अर्चन आप फूलों से, किशमिश से, पत्तों से, बेलपत्र आदि से कर सकते हैं। चाहे आप अष्टोत्तर से कर रहे हों या सहस्रनाम से, सब कुछ उसी अनुपात में रखें और उसी से करें।
पूछा गया कि देवी अर्चन कैसे करना चाहिए: वक्ता जवाब देते हैं, अर्चन करने के लिए आप फूलों से, किशमिश से, पत्तों से, बेलपत्र आदि से अर्चन कर सकते हैं। चाहे आप अष्टोत्तर से कर रहे हों या सहस्रनाम से — सब कुछ उसी अनुपात में रखकर, उसी से करें।
संगीत के क्षेत्र वाले के लिए क्या सलाह है?
चैनल पर दिया गया भगवती सरस्वती का विधान
संगीत की दुनिया के लिए भगवती सरस्वती का एक विधान है जो चैनल पर दिया गया है; उसी में संकल्प लेकर करें, और आपको बहुत कृपा मिलेगी।
वक्ता जवाब देते हैं, संगीत के जगत के लिए भगवती सरस्वती का एक विधान है जो चैनल पर दिया गया है। उसी में संकल्प लेकर करें, तो आपको बहुत कृपा मिलेगी।
जप रुद्राक्ष माला पर किया जा सकता है, और रुद्राक्ष सेवा-पूजा और अभिषेक के वीडियो चैनल पर हैं
हाँ — और चैनल पर रुद्राक्ष सेवा के वीडियो
वक्ता जवाब देते हैं, बिल्कुल रुद्राक्ष पर किया जा सकता है, और जोड़ते हैं कि उन्होंने रुद्राक्ष के वीडियो भी डाले हैं जिनमें उनकी सेवा-पूजा, अभिषेक और बाकी सब हो रहा है।
वक्ता जवाब देते हैं, बिल्कुल, रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । पर किया जा सकता है। वे कहते हैं, हमने रुद्राक्ष के वीडियो भी डाले हैं, जिनमें उनकी सेवा-पूजा, अभिषेक और बाकी सब हो रहा है।
दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम का कौन सा पाठ-रूप इस्तेमाल करें?
विश्वसार तंत्र वाला, या प्रचलित सिद्धेश्वर तंत्र वाला
विश्वसार तंत्र का जो दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र है — अगर मिल सके, तो उसका पाठ करें; या सिद्धेश्वर तंत्र वाला जो प्रचलित है। वह भी मिल जाएगा, और विश्वसार तंत्र वाला भी मिल जाएगा। गीता प्रेस गोरखपुर में।
वक्ता जवाब देते हैं, विश्वसार तंत्र का जो दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र है — अगर वह मिल सके, तो उसका पाठ करें। या सिद्धेश्वर तंत्र वाला, जो प्रचलित है। वह भी मिल जाएगा; विश्वसार तंत्र वाला भी मिल जाएगा। गीता प्रेस गोरखपुर में।
क्या दुर्गा के 32 नामों से पार्वती की पूजा हो सकती है?
32 नाम, और वीरभद्र का अष्टोत्तर
बिल्कुल, दुर्गा जी के 32 नामों से भगवती पार्वती का अर्चन किया जा सकता है। मिथिलेश पांडे जी से वे कहते हैं कि जब भगवती और भगवान वीरभद्र हैं, तो उनके अष्टोत्तर शतनाम से करें — यहीं से शुरू करें।
वक्ता जवाब देते हैं, बिल्कुल, दुर्गा जी के 32 नामों से भगवती पार्वती का अर्चन किया जा सकता है। मिथिलेश पांडे जी से: क्योंकि भगवती और भगवान वीरभद्र हैं, तो उनके अष्टोत्तर शतनाम से करें। यहीं से शुरू करें।
क्या उग्र मंत्र से गुस्सा बढ़ता है?
यह मंत्र, देवता, विधि और दी गई दिशा पर निर्भर है
पूछा गया कि क्या उग्र मंत्र में गुस्सा बढ़ता है: तो यह इस पर निर्भर है कि कौन सा मंत्र है, किस देवी-देवता का है, आप क्या विधि-विधान करते हैं, किससे मिला, दिशा क्या है — सब देखकर ही कहा जा सकता है। थोड़े से नहीं बढ़ेगा।
पूछा गया कि क्या उग्र मंत्र में गुस्सा बढ़ता है: वक्ता जवाब देते हैं, तो — कौन सा मंत्र है, किस देवी-देवता का है, आप क्या विधि-विधान करते हैं, किससे मिला, दिशा क्या है: सब देखकर ही कहा जा सकता है। बस थोड़े से नहीं बढ़ेगा।
दीपक जलने के बाद परिवार का कोई और सदस्य पूजा करने आए तो क्या?
अलग चिरागी, या खत्म हो चुकी को फिर जलाना
पूछा गया कि अगर पूजा के लिए दो दीपक जलाए गए हों और बाद में घर का कोई और सदस्य पूजा करने आए, तो क्या वह अलग चिरागी करे, या पहले वाली चिरागी खत्म हो गई हो तो उसी में फिर से करे: अगर खत्म हो गई हो, तो उसे धोकर फिर जलाया जा सकता है।
पूछा गया कि अगर हमने पूजा के लिए दो दीपक जलाए हैं और उसके बाद घर का कोई और सदस्य पूजा करने आए, तो क्या वह अलग चिरागी करेगा, या पहले वाली चिरागी खत्म हो गई हो तो उसी में फिर से करे: वक्ता जवाब देते हैं, अगर खत्म हो गई हो, तो उसे धोकर जलाया जा सकता है।
अग्निहोत्र कौन कर सकता है?
केवल वही जिसका यज्ञोपवीत हो चुका हो
अग्निहोत्र केवल वही कर सकता है जिसका यज्ञोपवीत हो चुका है।
जहाँ तक अग्निहोत्र की बात है — केवल वही कर सकता है जिसका यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। हो चुका है।
अगर कोई अनजाने में ज़बरदस्ती पूजा करवाने वाली शक्तियों का प्रसाद खा ले तो क्या?
प्रसाद खाने का मतलब लाग लगना
पूछा गया कि अगर ऐसी शक्तियाँ हों जो ज़बरदस्ती अपनी पूजा करवाती हैं, और कोई अनजाने में उनका प्रसाद खा ले, तो अपनी रक्षा कैसे करें: प्रसाद खाने का मतलब है कि लाग लग जाती है। जब भी ऐसी स्थिति बने और आपको इसकी जानकारी मिले, तो कवच मंत्र आदि से, आपने जिनका भी सिद्ध किया हो।
पूछा गया कि अगर ऐसी शक्तियाँ हों जो ज़बरदस्ती अपनी पूजा करवाती हैं, और कोई अनजाने में उनका प्रसाद खा ले, तो अपनी रक्षा कैसे करें: वक्ता जवाब देते हैं, प्रसाद खाने का मतलब है कि लाग लग जाती है। जब भी ऐसी स्थिति बने और आपको जानकारी मिले, तो कवच मंत्र आदि से, आपने जिनका भी सिद्ध किया हो।
उस दोष को दूर करने के लिए ठीक-ठीक क्या करना चाहिए?
कवच पाठ, जल का प्रोक्षण, अभिमंत्रित पंचामृत और रुद्राष्टकम के साथ अभिषेक
घर में तुरंत कवच आदि का पाठ करना, जल छिड़ककर अपने ऊपर प्रोक्षण करना; भगवान के नामों से जल को अभिमंत्रित करना और पंचामृत को अभिमंत्रित करके खाना-पीना; और यथाशक्ति रुद्राष्टकम का पाठ करते हुए भगवान शिव का अभिषेक आदि करना — इससे इस दोष का परिहार तुरंत हो जाता है। अगर इसे रोककर रखेंगे और नहीं करेंगे, तो दिक्कत होनी शुरू हो जाती है।
कवच आदि का — घर में तुरंत उसका पाठ आदि करना, जल छिड़ककर अपने ऊपर प्रोक्षण करना, वक्ता कहते हैं। भगवान के नामों से जल को अभिमंत्रित करना, पंचामृत को अभिमंत्रित करना, और उसे खाना-पीना। और यथाशक्ति रुद्राष्टकम् का पाठ करते हुए भगवान शिव का अभिषेक आदि करना — इससे इस दोष का परिहार तुरंत हो जाता है। अगर इसे रोककर रखेंगे और नहीं करेंगे, तो दिक्कत होनी शुरू हो जाती है।
लौंग, इलायची, कपूर, बताशा, सुपारी, जायफल, गोला और नींबू का भोग कब दिया जा सकता है?
ऐसा भोग तंत्रोक्त है और हमेशा नहीं देना चाहिए
पूछा गया कि लौंग, इलायची, कपूर, बताशा, सुपारी, जायफल, गोला और नींबू का भोग कब दिया जाता है, और देवी-देवताओं को किस तरह दिया जा सकता है: नित्य पूजा में सामान्य भोग दीजिए। इस तरह के भोग और भेंट देने का विधि विधान तंत्रोक्त है, अलग तरह का है। ऐसा भोग हमेशा नहीं देना चाहिए।
पूछा गया कि लौंग, इलायची, कपूर, बताशा, सुपारी, जायफल, गोला और नींबू का भोग कब दिया जाता है, और देवी-देवताओं को किस तरह दिया जा सकता है: नित्य पूजा में सामान्य भोग दीजिए, वक्ता उत्तर देते हैं। इस तरह के भोग और भेंट देने का विधि विधान तंत्रोक्त है; यह अलग तरह का है। ऐसा भोग हमेशा नहीं देना चाहिए।
काली और कामाख्या के चरणों के नीचे लेटे शिव क्या संदेश देते हैं?
पुरुष कितना भी समर्थ हो, उसे सदा अपनी पत्नी के वश में रहना चाहिए
पूछा गया कि माँ काली और माँ कामाख्या, दोनों के चरणों के नीचे शिव जी हैं, इन दोनों में क्या संदेश दिया गया है: दोनों में यही संदेश दिया गया है कि पुरुष चाहे कितना भी समर्थ हो, उसे हमेशा अपनी अर्धांगिनी के वश में रहना चाहिए। गृहस्थ के लिए यही संदेश है।
क्या पूजा घर में छिपकली का रहना ठीक है?
आप दोनों उस घर में बस किराएदार हैं
पूछा गया कि क्या कवच का संपुटित पाठ कर सकते हैं: हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं। पूछा गया कि क्या पूजा घर में छिपकली का रहना ठीक है: छिपकली को भी लगता है कि वह उसका घर है। आपको भी लगता है कि वह आपका घर है। और आप दोनों को पता होना चाहिए कि यह घर आप दोनों में से किसी का नहीं है। एक दिन आप भी इस घर से जाएँगे, और वह भी उस घर से जाएगी। रहने दीजिए — सही-गलत की बात ही खत्म हो जाती है।
पूछा गया कि क्या कवच का संपुटित पाठ कर सकते हैं: हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं। पूछा गया कि क्या पूजा घर में छिपकली का रहना ठीक है: छिपकली को भी लगता है कि वह उसका घर है। आपको भी लगता है कि वह आपका घर है। और आप दोनों को पता होना चाहिए कि यह घर आप दोनों में से किसी का नहीं है। एक दिन आप भी इस घर से जाएँगे; वह भी उस घर से जाएगी। रहने दीजिए। सही-गलत की बात ही खत्म हो जाती है। वह घर आपका नहीं है। वह घर छिपकली का भी नहीं है। दोनों वहाँ कुछ समय के किराएदार भर हैं। जिस दिन शरीर छूटेगा, बाबू, आप यहाँ से चले जाएँगे।
क्या महाकाली, महालक्ष्मी और सरस्वती की सेवा अलग-अलग करनी जरूरी है?
भगवती विंध्यवासिनी तीनों स्वरूप धारण करती हैं
आपको महाकाली, महालक्ष्मी और सरस्वती की सेवा पूजा अलग-अलग करने की जरूरत नहीं है। अगर आप भगवती विंध्यवासिनी की कर रहे हैं, तो केवल भगवती विंध्यवासिनी की सेवा कीजिए। वे इन तीनों स्वरूपों को धारण करने वाली हैं; सब कुछ एक साथ मिल जाएगा। वे भगवती महादुर्गा हैं, और उनके भीतर सभी स्वरूपों का वास है।
आपको महाकाली, महालक्ष्मी और सरस्वती की सेवा पूजा अलग-अलग करने की जरूरत नहीं है, वक्ता उत्तर देते हैं। अगर आप भगवती विंध्यवासिनी की कर रहे हैं, तो केवल भगवती विंध्यवासिनी की सेवा कीजिए। वे ही इन तीनों स्वरूपों को धारण करने वाली हैं। सब कुछ एक साथ मिल जाएगा। वे भगवती महादुर्गा हैं। उनके भीतर सभी स्वरूपों का वास है।
भगवती के चरणों से निकलने वाला जल क्या करता है?
ब्रह्मा, विष्णु और महेश का अभिषेक
वे कहते हैं कि एक पोस्ट डाली जाएगी, दैनिक भास्कर की, उसे पढ़िएगा। कहा गया है कि जब भगवती का अभिषेक होता है, तो भगवती के नखों से, उन्हीं चरणों से जो जल निकलता है, उससे ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों का अभिषेक होता है। केवल भगवती विंध्यवासिनी की पूजा करने से हर तरह की शक्ति का पूजन हो जाता है। इसलिए आप जो कह रहे हैं, उसे अलग से करने की जरूरत नहीं है।
हम एक पोस्ट डालेंगे, पढ़िएगा — वह दैनिक भास्कर की है, वक्ता कहते हैं। कहा गया है कि जब भगवती का अभिषेक होता है, तो भगवती के नखों से, उन्हीं चरणों से — जो जल निकलता है, उससे ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों का अभिषेक होता है। केवल भगवती विंध्यवासिनी की पूजा करने से हर तरह की शक्ति का पूजन हो जाता है। इसलिए आप जो कह रहे हैं, उसे अलग से करने की जरूरत नहीं है।
इष्ट का निर्धारण किस भाव से करना चाहिए?
पाँचवाँ और नौवाँ — और हृदय किसके लिए अधीर है
पूछा गया कि इष्ट का निर्धारण पाँचवें भाव से करें या नौवें से, और क्या दोनों में इष्ट देखना चाहिए: मूल रूप से ये दो तरह के मत हैं, यह सच है — कुछ पाँचवाँ कहते हैं, कुछ नौवाँ। वे उत्तर देते हैं, मेरे अनुसार दोनों का आकलन करें, और जो मजबूत और ऊँची स्थिति में मिले, उसी के अनुसार अपना इष्ट तय करें। और उससे भी बड़ी बात यह है: आपका हृदय किस स्वरूप के लिए अधीर है।
पूछा गया कि इष्ट का निर्धारण किस भाव से करें, पाँचवें से या नौवें से, और क्या दोनों में इष्ट देखना चाहिए: देखिए, मूल रूप से ये दो तरह के मत हैं; यह सच बात है, वक्ता उत्तर देते हैं। कुछ पाँचवाँ कहते हैं, कुछ नौवाँ। मेरे अनुसार दोनों का आकलन करें। जो आपको मजबूत और ऊँची स्थिति में मिले, उसी के अनुसार आपको अपना इष्ट देवता तय करना चाहिए। और उससे भी बड़ी बात यह है: आपका हृदय किस स्वरूप के लिए अधीर है।
जब परिवार पूजा करने से रोके, तो क्या करना चाहिए?
प्रारब्ध, और हिरण्यकश्यप के घर जन्मे भक्त प्रह्लाद
अभय झा जी से वे कहते हैं कि दोष आपका नहीं है; हमें आपकी स्थिति का पता है। यह भी हमारा प्रारब्ध है। भक्त प्रह्लाद ने हिरण्यकश्यप के घर जन्म लिया था, और उनके माता-पिता भी उन्हें पूजा पाठ नहीं करने देते थे। और शायद आज के समय में भी ऐसी ही स्थिति बन रही है। वह सतयुग का समय था; अब यह कलियुग में हो रहा है — तो इसमें कौन-सी बड़ी बात है? किसी हिरण्यकश्यप को ढूँढने की जरूरत नहीं है।
अभय झा जी से वक्ता कहते हैं: दोष आपका नहीं है। हमें आपकी स्थिति का पता है। यह भी हमारा प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। है। भक्त प्रह्लाद ने हिरण्यकश्यप के घर जन्म लिया था। उनके माता-पिता भी उन्हें पूजा पाठ नहीं करने देते थे। और शायद आज के समय में भी ऐसी ही स्थिति बन रही है। वह सतयुग का समय था; अब यह कलियुग में हो रहा है, तो इसमें कौन-सी बड़ी बात है? किसी हिरण्यकश्यप को ढूँढने की जरूरत नहीं है।
जब माता-पिता किसी की पूजा को लेकर झगड़ें, तो बात कितनी गंभीर है?
घर छोड़ने को कहना — और धर्म का ज्ञान न देने की चूक
अगर ऐसी स्थिति बन जाए कि पूजा पाठ के कारण माता-पिता झगड़ने लगें, मंत्र जप के कारण कहें कि पूजा पाठ करना है तो घर छोड़ दो, तो भैया, स्थिति बहुत गंभीर है। उनका मूल कहना यह है कि ऐसी स्थितियाँ वहाँ बनती हैं जहाँ माता-पिता ने बच्चे को अपने ही धर्म के बारे में कभी कोई ज्ञान नहीं दिया।
मान लीजिए ऐसी स्थिति बन जाए कि पूजा पाठ करने के कारण माता-पिता झगड़ने लगें, मंत्र उच्चारण के कारण कहें कि पूजा पाठ करना है तो घर छोड़ दो — तो भैया, स्थिति बहुत गंभीर है, वक्ता कहते हैं। वे पूछते हैं, ऐसी स्थिति क्यों बनती है — क्योंकि माता-पिता ने अपने धर्म के बारे में कभी कोई ज्ञान दिया ही नहीं। वे कहते हैं, इसी बात का फायदा उठाया जाता है।
माता-पिता ताना मारते हैं कि पूजा और गीता तुम्हें साधु बना देंगी, और यह समय किसी काम की चीज में लगाना बेहतर है
पूजा क्यों, क्या साधु बनना है, कुछ काम का करो
माता-पिता कहते हैं: तुम पूजा क्यों करोगे, क्या साधु बनना है? गीता क्यों पढ़ रहे हो, क्या साधु बनना है? इतना पाठ कौन करता है? इतना ड्रामा मत करो, थोड़ा करो, दो मिनट का टाइमपास। जितनी देर तुम पूजा पाठ करते हो, उतनी देर कोई काम की चीज नहीं करोगे — पढ़ाई करो, IAS बनो या जो भी; यह सब क्यों बन रहे हो, क्या पुजारी बनना है?
माता-पिता कहते हैं, वक्ता बताते हैं: तुम पूजा क्यों करोगे? क्या साधु बनना है? गीता क्यों पढ़ रहे हो? क्या साधु बनना है? इतना पाठ कौन करता है? यह सब ड्रामा मत करो। थोड़ा करो — दो मिनट का टाइमपास। जितनी देर तुम पूजा पाठ करते हो, उतनी देर में कोई काम की चीज नहीं करोगे? पढ़ाई करो; IAS बनो, जो भी हो; यह सब क्यों बन रहे हो? क्या पुजारी बनना है?
जिन बेटे-बेटियों को अपने धर्म में कभी दृढ़ नहीं किया गया, वे अंत में माता-पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ देते हैं
अपने धर्म में कभी दृढ़ न किए गए बच्चे, और वृद्धाश्रम
बेटों के साथ भी यही है और बेटियों के साथ भी। कल को जब बेटा या बेटी — आपने उन्हें कोई ज्ञान दिया ही नहीं, उस तरह का ज्ञान दिया ही नहीं, उन्हें अपने धर्म के प्रति दृढ़ नहीं किया, खुद ही उन्हें देवी-देवताओं से दूर रखा — कल को जब वे आपको नहीं पूछेंगे, बुढ़ापे में आपको ले जाकर वृद्धाश्रम की सैर कराएँगे; तब बैठकर रोइए। वे वही करेंगे जो आपके लायक है।
बेटों के साथ भी यही है, बेटियों के साथ भी, वक्ता कहते हैं। कल को जब बेटा या बेटी — आपने उन्हें कोई ज्ञान दिया ही नहीं, उस तरह का ज्ञान दिया ही नहीं। आपने उन्हें अपने धर्म के प्रति दृढ़ किया ही नहीं। आपने खुद ही उन्हें देवी-देवताओं से दूर रखा। कल को जब वे आपको नहीं पूछेंगे, बुढ़ापे में आपको ले जाकर वृद्धाश्रम की सैर कराएँगे। तब बैठकर रोइए। वे सही ही करेंगे। वे वही करेंगे जो आपके लायक है।
कौन-सा स्तोत्र रोज पूरे होश में पढ़ना चाहिए?
आदि गुरु शंकराचार्य का भवानी अष्टकम
वे सुनने वाले सभी से कहते हैं, एक बात हमेशा याद रखिए — थोड़ी चुभेगी, पर यही सच है। आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित जो भवानी अष्टकम हम पढ़ते हैं: उसे जरूर पढ़िए, रोज पढ़िए, पूरे होश में पढ़िए। यह आठ पंक्तियों वाला आपका अष्टकम है — भवानी अष्टकम।
एक बात हमेशा याद रखिए, वक्ता कहते हैं — जितने भी लोग सुन रहे हैं, थोड़ी चुभेगी, पर यही सच है। आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित जो भवानी अष्टकम हम पढ़ते हैं — उसे जरूर पढ़िए, रोज पढ़िए, पूरे होश में पढ़िए। आठ पंक्तियों वाला जो आपका अष्टक है — यही अष्टकम है, भवानी अष्टकम।
जो श्लोक पढ़ा गया, वह "गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि" पर समाप्त होता है
न तातो न माता न बन्धुर्न दाता
वे पढ़ते हैं: न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता। न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥
वक्ता यह श्लोक पढ़ते हैं: न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता। न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥
"गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि" पर समाप्त होने वाले श्लोक का अर्थ क्या है?
कोई साथ नहीं जाता — केवल तुम ही गति हो
इस मंत्र में कहा जा रहा है: न माता, न पिता, न मित्र, न बंधु, न आपकी विद्या, न आपकी वृत्ति, न आपकी जीवन संगिनी, न आपका जीवन साथी — इनमें से कोई आपके साथ नहीं जाने वाला। कोई आपका साथ नहीं देने वाला। गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि — केवल तुम्हीं में एकमात्र गति है। इस सच को भी मान लीजिए; समय-समय पर यह पता चल जाता है।
इस मंत्र में कहा जा रहा है, वक्ता समझाते हैं: न माता-पिता, न मित्र, न बंधु, न आपकी विद्या, न आपकी वृत्ति; न आपकी जीवन संगिनी, न आपका जीवन साथी — इनमें से कोई आपके साथ नहीं जाने वाला। कोई आपका साथ नहीं देने वाला। गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि — केवल तुम्हीं में एकमात्र गति है; इसीलिए उन्होंने यह कहा। केवल तुम्हीं में गति है। यह जान लीजिए, और इस सच को भी मान लीजिए। समय-समय पर यह पता चल जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हम जीवन के इन सभी रिश्तों को छोड़ दें या उन्हें न निभाएँ — पर होश में रहें। जो यह मानकर बैठ जाते हैं कि जीवन बस इतना ही है, वे यही गलती करते हैं। जीवन बस इतना ही नहीं है।
अगर जीवन साथी या माता-पिता पूजा न करने दें, तो क्या करें?
उन्हें छोड़ें नहीं; जितना हालात अनुमति दें, उतना करें
अगर आपका जीवन साथी आपका साथ नहीं दे रहा — कि नहीं, तुम्हें पूजा पाठ नहीं करना, या तो पूजा पाठ छोड़ो या मुझे छोड़ो — तो आप उन्हें छोड़ नहीं सकते, इसमें कोई दिक्कत नहीं। पर हालात के अनुसार जितना हो सके, उतना कीजिए, क्योंकि गति इसी से आने वाली है। उनसे नहीं आएगी। अगर आपका जीवन साथी ऊँचे कुल का, ऊँचे स्तर का साधक रहा हो, या कोई ऐसी परीक्षा ले रहा हो, तो वह अलग विषय हो जाता है; वह सबके लिए नहीं है, और आजकल ऐसा होता भी नहीं।
अगर आपका जीवन साथी आपका साथ नहीं दे रहा, वक्ता कहते हैं — कि नहीं, तुम्हें पूजा पाठ नहीं करना; या तो पूजा पाठ छोड़ो या हमें छोड़ो। आप उन्हें छोड़ नहीं सकते। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। पर हालात के अनुसार जितना संभव हो, उतना कीजिए, क्योंकि गति इसी से आने वाली है। उनसे नहीं आएगी। अगर आपका जीवन साथी ऐसी स्थिति का है कि ऊँचे कुल का, ऊँचे स्तर का साधक रहा हो, या कोई ऐसी परीक्षा ले रहा हो, तो वह अलग विषय हो जाता है। वह सबके लिए नहीं है। आजकल ऐसा होता नहीं; वह पहले का समय नहीं है। और अगर माता-पिता कह रहे हैं कि नहीं करना है, तो ठीक है — आप माता-पिता के शरणागत हैं; आपने उन्हीं के शरीर से जन्म लिया है। कोई बात नहीं। इस उद्देश्य से प्रार्थना कीजिए कि उनकी जो बुद्धि वैसी हो गई है, वह ठीक हो जाए। पर जितना नाम जप आदि कर सकें, उसे करना मत छोड़िए।
लोग आपसे नहीं, आपके हालात से प्रेम करते हैं; हालात बिगड़ते हैं तो आदमी वही रहता है और सब छोड़कर चले जाते हैं
लोग आपसे नहीं, आपके हालात से प्रेम करते हैं
वे कहते हैं, यह भी याद रखिए: सब आपके हालात से प्रेम करते हैं। अगर आप अच्छी स्थिति में हैं, तो लोग आपसे प्रेम रखेंगे। जब आपकी स्थिति बिगड़ेगी, आदमी वही रहेगा और सब छोड़कर चले जाएँगे। आपके माता-पिता आपसे उम्मीदें और अपेक्षाएँ रखते हैं — अच्छे कर्म कीजिए, उनका साथ दीजिए। उनके मन में यह भाव है कि पूजा पाठ करके आप शायद गृहस्थी में न जा पाएँ, गृहस्थी का काम ठीक से न चला पाएँ।
सब आपके हालात से प्रेम करते हैं — यह भी याद रखिए, वक्ता कहते हैं। अगर आप अच्छे हालात में हैं, तो लोग आपसे प्रेम रखेंगे। जब आपके हालात बिगड़ेंगे, आदमी वही रहेगा और सब छोड़कर चले जाएँगे। आपके माता-पिता आपसे उम्मीद रखते हैं, अपेक्षा रखते हैं। अच्छे कर्म कीजिए; उनका साथ दीजिए। उनके मन में यह भाव है कि पूजा पाठ करके आप शायद उस गृहस्थी में न जा पाएँ जो एक घर होता है, गृहस्थी का काम सहज रूप से न चला पाएँ।
यही डर कि व्यक्ति निवृत्ति मार्ग पर चला जाएगा, परिवार को उसे पूजा से दूर खींचने पर मजबूर करता है
कि आप निवृत्ति मार्ग पर न चले जाएँ
कि आप निवृत्ति मार्ग पर न चले जाएँ — इसी डर के कारण वे आपको उससे दूर खींच रहे हैं, और फिर वह अलग विषय हो जाता है। अपना जीवन जीते हुए, और जो नित्य कर्म हैं उन्हें जीते हुए पूजन पाठ करना बहुत बड़ा विषय है; और वे उसमें बाधा डालेंगे।
कि आप निवृत्ति मार्ग पर न चले जाएँ — इसी डर के कारण वे आपको उससे हटा रहे हैं, वक्ता कहते हैं। फिर वह अलग विषय हो जाता है। अपना जीवन जीते हुए, जो नित्य कर्म हैं उन्हें जीते हुए पूजन पाठ करना — यह बहुत बड़ा विषय है। और वे उसमें बाधा डालेंगे।
कलियुग के राक्षस कहाँ हैं?
वे लंका से नहीं आएँगे; वे घर में बैठे हैं
यह कलिकाल है — इसमें राक्षस लंका से नहीं आएँगे; वे हमारे अपने घर में बैठे हैं। एक से बढ़कर एक मिलेंगे। क्या सुबाहु और सुमाली आकर यज्ञ कुंड में हड्डी और रक्त डालते थे? यहाँ वे आपसे ऐसी बातें कहेंगे कि लगेगा जैसे हड्डी और रक्त की ही बारिश हो रही है।
वे उसमें बाधा डालेंगे — यह कलिकाल है, वक्ता कहते हैं। इसमें राक्षस लंका से नहीं आएँगे; वे हमारे अपने घर में बैठे हैं। एक से बढ़कर एक मिलेंगे। क्या सुबाहु और सुमाली आकर यज्ञ कुंड में हड्डी और रक्त डालते थे? यहाँ वे आपसे ऐसी बातें कहेंगे कि आपको लगेगा जैसे हड्डी और रक्त की ही बारिश हो रही है।
देवता का कोई प्रतीक धारण करने की इच्छा कब जागती है?
बड़ी मुश्किल से, जब पुण्य उदय होता है
बड़ी मुश्किल से, जब पुण्य उदय होता है, तब आपके हृदय में भगवती की, भगवान की भक्ति करने की इच्छा आती है — उनका कोई प्रतीक शरीर पर धारण करने की इच्छा: चाहे माला हो, यंत्र हो, कवच हो, रुद्राक्ष हो, या कहीं उनका नाम लिखवाना हो।
अगर मन से माना जा सकता है, तो बाहरी प्रतीक की जरूरत क्यों है?
हृदय पर लिखा नाम, और उससे मिलने वाला बल
लोग कहते हैं, बाहरी दिखावा क्यों जरूरी है, मन से मानो। वे उत्तर देते हैं कि हर कोई उस तरह मन से नहीं मान सकता। अगर आपने अपने हृदय पर भगवती का नाम लिखवाया है, तो जब भी आप अपने हृदय को देखेंगे, आपको बिल्कुल अलग तरह का बल मिलेगा। आपने हृदय पर भगवती का नाम लिखवाया है; वहाँ से आपको बल मिलेगा, और आप सेल्फ मोटिवेटेड हो जाएँगे।
लोग यह कहते हैं: बाहरी दिखावा क्यों जरूरी है, मन से मानो, वक्ता बताते हैं। मन से मानने वाले लोग — हर कोई उस तरह नहीं मान सकता। अगर आपने अपने हृदय पर भगवती का नाम लिखवाया है, तो जब-जब आप अपने हृदय को देखेंगे, आपको बिल्कुल अलग तरह का बल मिलेगा। आपने हृदय पर भगवती का नाम लिखवाया है। वहाँ से आपको बल मिलेगा। आप सेल्फ मोटिवेटेड हो जाएँगे।
जैसे गजनी अपने सिर पर लिखे से सेल्फ मोटिवेटेड होता था, वैसे ही शरीर पर लिखा नाम साधक को उसके उद्देश्य पर लौटा लाता है
गजनी, और कपड़ा उतारते ही दिखने वाला नाम
आपने गजनी देखी थी न — वह कैसे सेल्फ मोटिवेटेड होता था: सिर मुँड़ाते-मुँड़ाते उसे कल्पना की पूरी याद आ जाती थी, और फिर वह मारने के लिए दौड़ने लगता था कि गजनी को मारना है। ठीक वैसे ही, जैसे ही आप अपना कपड़ा-वस्त्र उतारेंगे — वे कहते हैं कि वे पुरुषों से बोल रहे हैं, और माताएँ इसे गलत न समझें — वे अपने हृदय पर देखेंगे कि भगवती का नाम लिखा है, और तुरंत भगवती पुकार उठेंगे; तुरंत समर्पण हो जाएगा, त्राहिमाम शरणागतम। भैया, ऐसा होना चाहिए।
आपने गजनी देखी थी न, वक्ता कहते हैं — वह कैसे सेल्फ मोटिवेटेड होता था। सिर मुँड़ाते-मुँड़ाते उसे कल्पना की पूरी याद आ जाती थी, पूरी की पूरी। फिर वह मारने के लिए दौड़ने लगता था — कि गजनी को मारना है। तो ठीक वैसे ही, जैसे ही आप अपना कपड़ा-वस्त्र उतारेंगे — वे कहते हैं कि वे पुरुषों से बोल रहे हैं, और माताओं से निवेदन करते हैं कि गलत न समझें — वे अपने हृदय पर देखेंगे कि भगवती के नाम लिखे हैं, और तुरंत भगवती पुकार उठेंगे। तुरंत समर्पण हो जाएगा — त्राहिमाम शरणागतम। भैया, ऐसा होना चाहिए। यहीं लिखवाइए। वहाँ कविता और कल्पना लिखवाकर देखिए — कल को कल्पना कल्पना में खो गई, कविता कविता सुनाकर चली गई, और फिर आप उसके ऊपर मेकओवर टैटू बनवाते रहिए।
क्या तर्पण में तेल डाला जा सकता है?
तर्पण में काला तेल
तर्पण के उन वीडियो के बारे में पूछा गया जिनमें से कुछ में तेल डाला गया है और कुछ में नहीं: डाल सकते हैं — काला तेल डालकर कर सकते हैं।
तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। के बारे में पूछा गया कि कुछ वीडियो में तेल डाला गया है और कुछ में नहीं: डाल सकते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं। काला तेल डालकर कर सकते हैं।
आसपास के वाल्मीकि तंत्र करने वालों से सुरक्षित कैसे रहें?
कवच मंत्रों को सिद्ध करें, खासकर भगवान नरसिंह के
पूछा गया कि जब आसपास वाल्मीकि तंत्र के तांत्रिक हों जो बहुत अधिक तंत्रोक्त क्रिया करते हैं, तो सुरक्षित कैसे रहें: सबसे पहले कवच आदि के मंत्रों को सिद्ध करके — खासकर भगवान नरसिंह के मंत्र, क्योंकि वे ज्यादातर वीर श्रेणी की शक्तियाँ चलाते हैं, उस तरह की शक्तियाँ। नरसिंह तंत्र का प्रयोग करके स्थान को पूरी तरह सुरक्षित करके रखें।
पूछा गया कि जब आसपास वाल्मीकि तंत्र के तांत्रिक हों जो बहुत अधिक तंत्रोक्त क्रिया करते हैं, तो सुरक्षित कैसे रहें: सबसे पहले कवच आदि के मंत्रों को सिद्ध करके — खासकर भगवान नरसिंह के मंत्र, वक्ता उत्तर देते हैं। क्योंकि उनमें वे ज्यादातर वीर श्रेणी की शक्तियाँ चलाते हैं; ऐसी शक्तियाँ उसी तरह की होती हैं। नरसिंह तंत्र का प्रयोग करके स्थान को पूरी तरह सुरक्षित करके रखें।
घर को सुरक्षित करने के लिए और क्या करना चाहिए?
स्थान को बाँधें, कवच धारण करें, और हवन व क्षेत्रपाल पूजन करते रहें
अपने घर और स्थान को बाँधकर रखें। कवच आदि सब धारण किए रहें, और उसके बाद ही पूजन पाठ आदि करें। बीच-बीच में हवनात्मक क्रिया, क्षेत्रपाल पूजन आदि करते रहें।
ठीक है — अपने घर और स्थान को बाँधकर रखें, वक्ता कहते हैं। कवच आदि सब धारण किए रहें, और उसके बाद ही पूजन पाठ आदि करें। बीच-बीच में हवनात्मक क्रिया, क्षेत्रपाल पूजन आदि करते रहें।
वाल्मीकि तंत्र असल में किस पर चलता है?
मंत्र के बजाय भोग पर, और देवताओं के बजाय लोक शक्तियों पर
वे कहते हैं कि इनमें सबसे खास बात यह है कि वाल्मीकि तंत्र में — या जितने भी भगत वाल्मीकि तंत्र हैं — मंत्र ज्यादा नहीं होता; इनमें देवता भोग की प्रधानता पर, भोग और भेंट देकर चलते हैं। और वे देवता नहीं हैं; कहीं न कहीं वे लोक शक्तियाँ हैं: किसी समय जीवित थे, मंत्र अनुष्ठान आदि किए, किसी देवता की कृपा मिली, फिर मृत्यु हुई, आकस्मिक मृत्यु, प्रेत योनि में चले गए, और बाद में पूजित होकर देवता बन गए।
इनमें सबसे ज्यादा — वे सबको सबसे खास बात बताते हैं, वक्ता कहते हैं: वाल्मीकि तंत्र, या जितने भी भगत वाल्मीकि तंत्र हैं। इनमें मंत्र ज्यादा नहीं होता। इनमें देवता भोग की प्रधानता पर, भोग और भेंट देकर चलते हैं। और वे देवता नहीं हैं; कहीं न कहीं वे लोक शक्तियाँ हैं। किसी समय जीवित थे; मंत्र अनुष्ठान आदि किए; किसी देवता की कृपा मिली; मृत्यु हुई, आकस्मिक मृत्यु, प्रेत योनि में चले गए, और बाद में पूजित होकर देवता बन गए। वे कहते हैं, देव यही है। ये जो 360 क्षणिया चलती हैं, फलाना-ढिमकाना देवता चलते हैं — असल में ये सब लोक देवता हैं। और अब तंत्र के क्षेत्र में इन्हें इतना बड़ा बना दिया गया है।
वाल्मीकि तंत्र के बजाय मूल तंत्र क्या करता है?
कपाल तंत्र और कापालिक, जो मंत्र सिद्धि से शक्तियों को बाँधते हैं
आज के समय में जो असली तंत्र है, वह मूल तंत्र जिससे इस तरह की क्रिया की जाती है — वह सच बात है। कपाल क्रिया आदि, कपाल तंत्र आदि; कापालिक लोग; या जो इस तरह की क्रियाएँ करते हैं। वे उस तंत्र की विद्याओं से शक्तियों को ही सिद्ध करते हैं, और मंत्र की सिद्धियों से ऐसी शक्तियों को बाँधकर किसी पर प्रक्षेपित करते हैं।
तंत्र के क्षेत्र में आज के समय में जो असली तंत्र है, वक्ता कहते हैं। वह मूल तंत्र, जिससे हाँ, इस तरह की क्रिया की जाती है — वह सच बात है। कपाल क्रिया आदि, जो कापालिक तंत्र आदि है, जो कापालिक लोग होते हैं। या जो इस तरह की क्रियाएँ करने वाले होते हैं — वे उस तंत्र की विद्याओं से शक्तियों को ही सिद्ध करते हैं। ऐसी ही चीजें, मंत्र की सिद्धियों से, ऐसी शक्तियों को बाँधकर किसी पर प्रक्षेपित करते हैं।
मंत्र से शक्तियाँ जगाने का सामर्थ्य न होने से लोग मसान पूजते हैं, मसान के मंदिर बनाते हैं, और घर-घर प्रेत-पिशाच पूजते हैं
मसान पूजे जा रहे हैं, मसान के मंदिर बन रहे हैं, घर-घर प्रेत-पिशाच पूजे जा रहे हैं
आज के समय में इतना सामर्थ्य भी नहीं है कि ऐसे मंत्रों से उन्हें जगा सकें, सिद्ध कर सकें, किसी शक्ति को पकड़कर ऐसी क्रिया कर सकें। स्वतंत्र रूप से ऐसी ही लोक शक्तियों को बार-बार पूजकर मसान पूजे जा रहे हैं और मसान के मंदिर बन रहे हैं — साफ देखिए। मसान को "बाबा" कहकर — घर में मरी मसानी पूजी जा रही है, यह देवी, वह देवी। कह दीजिए तो तुरंत दस लोग आपसे लड़ने आ जाएँगे। तो भैया, भगवान ने जो कहा है वह सच है: आज के समय में घर-घर प्रेत और पिशाच ही पूजे जा रहे हैं।
आज के समय में वे क्या कर रहे हैं — इतना सामर्थ्य भी नहीं है कि चराद के द्वारा ऐसे मंत्रों को जगा सकें, सिद्ध कर सकें, कि किसी शक्ति को पकड़कर ऐसी क्रिया कर सकें, वक्ता कहते हैं। स्वतंत्र रूप से ऐसी ही लोक शक्तियों को पूज-पूजकर मसान पूजे जा रहे हैं; मसान के मंदिर बन रहे हैं। साफ देखिए। मसान को बाबा कहकर — घर में मरी मसानी पूजी जा रही है, यह देवी, वह देवी। कह दीजिए, तो तुरंत दस लोग आपसे लड़ने आ जाएँगे: आपको कुछ नहीं पता, ऐसा हो गया, वैसा हो गया। तो भैया, भगवान ने जो कहा है वह सच है। आज के समय में घर-घर प्रेत और पिशाच ही पूजे जा रहे हैं। साफ जान लीजिए।
वे तर्क देते हैं कि इतनी भक्ति पर भी भगवान ने कुछ नहीं दिया, जबकि मसान बाबा देते हैं
"भगवान कुछ नहीं देते, मसान बाबा देते हैं"
ऐसे लोगों से भगवान की भक्ति करने को कहो तो वे सीधे कह देंगे: भगवान तुम्हें क्या देंगे, कुछ नहीं देंगे। हमने इतनी भक्ति की, कुछ नहीं दिया; हनुमान जी क्या देते हैं, कुछ नहीं देते। पर तुम्हारे मसान बाबा तो दे रहे हैं — तो भैया, हम उन्हीं की पूजा करेंगे।
वक्ता बताते हैं कि ऐसे लोगों से भगवान की भक्ति करने को कहो तो वे सीधे कह देंगे: भगवान तुम्हें क्या देंगे, कुछ नहीं देंगे। हमने इतनी भक्ति की, कुछ नहीं दिया। हनुमान जी क्या देते हैं? कुछ नहीं देते। पर तुम्हारे मसान बाबा तो दे रहे हैं — तो भैया, हम उन्हीं की पूजा करेंगे।
भोग और भेंट पर चलने वाली चीजों की सीमा क्या है?
वे तुरंत बहुत तीखा असर देती हैं
वे कहते हैं, एक बात जान लीजिए: भोग और भेंट पर चलने वाली इस चीज की यही सीमा है। ये बहुत तीखा असर देती हैं, इसलिए जब इनका प्रक्षेपण किसी पर किया जाता है, तो अगर आप सक्षम नहीं हैं, तो ये तुरंत असर दिखा देंगी।
तो एक बात जान लीजिए, वक्ता कहते हैं: भोग और भेंट पर चलने वाली इस चीज की यही सीमा है। ये बहुत तीखा असर देती हैं। इसलिए जब इनका प्रक्षेपण किसी पर किया जाता है, तो अगर आप सक्षम नहीं हैं, तो ये तुरंत असर दिखा देंगी।
उग्र लोक शक्तियों की काट क्या है?
भगवान नरसिंह, जिन्हें उग्र भाव में जागृत रखा जाए
पर इनकी काट भी उसी तरह है — जितनी भी उग्र शक्तियाँ हैं, उनके लिए भगवान नरसिंह। भगवान नरसिंह का जो कवच आदि अभी डाला गया है, उसका पाठ करें, तो उन मंत्रों को उग्र भाव में जागृत रखें, उनका पाठ करते रहें, उन्हें सिद्ध करके प्रयोग विधि आदि करते रहें। इनमें सामर्थ्य ही नहीं कि ये घर में घुस सकें; और अगर घुस भी गईं, तो इनका सब कुछ नष्ट हो जाएगा। वे कहते हैं कि ये अनुभव की बातें हैं — ऐसी चीजें इसी विधि विधान से निकाली जाती हैं।
पर इनकी काट भी उसी तरह है — जितनी भी उग्र शक्तियाँ हैं, उनके लिए भगवान नरसिंह, वक्ता कहते हैं। भगवान नरसिंह का जो कवच आदि हमने अभी डाला है — अगर आप उसका पाठ करते हैं, तो उन मंत्रों को उग्र भाव में जागृत रखें; उनका पाठ करते रहें। उन्हें सिद्ध करके प्रयोग विधि आदि करते रहें। इनमें सामर्थ्य ही नहीं कि ये सब चीजें घर में घुस सकें — ऐसा हो ही नहीं सकता। और अगर घुस भी गईं, तो इनका सब कुछ नष्ट हो जाएगा। और ये अनुभव की बातें हैं कि ऐसी चीजें इसी विधि विधान से निकाली जाती हैं।
लोक शक्तियों को भोग देते हुए बीते जीवन का क्या होता है?
दो अंडे के बदले चार, एक मुर्गे के बदले दो — और मरने के बाद क्या होता है
जिंदगी भर भोग देते रहिए, सब उसी में चला जाएगा — आपने दो अंडे दिए, वह चार देगा; उसने एक मुर्गा दिया, आपने दो दिए; दिन भर मुर्गा, मुर्गी, अंडा, आमलेट — इन लोगों का जीवन इसी में कट जाता है। और वे लोग इसे बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताएँगे; वीडियो उपलब्ध हैं, भैया, कि फलाने के साथ ये देवता चलते हैं। वे कहते हैं कि ये सब प्रेत और पिशाच हैं। साफ जान लीजिए। सब गर्त में। जिनकी तुम पूजा कर रहे हो, वे मरने के बाद तुमसे अपना ही चटवाएँगे — बात इतनी सीधी है।
आप जिंदगी भर भोग देते रहिए, सब उसी में मिल जाएगा, वक्ता कहते हैं। आपने दो अंडे दिए, वह चार देगा; उसने एक मुर्गा दिया, आपने दो दिए — दिन भर मुर्गा, मुर्गी, अंडा, आमलेट; इन लोगों का जीवन इसी में कट जाता है। और वे लोग इसे बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताएँगे। वीडियो उपलब्ध हैं, भैया — कि फलाने के साथ ये देवता चलते हैं। वे कहते हैं कि ये सब प्रेत और पिशाच हैं। साफ जान लीजिए। सब गर्त में। जिनकी तुम पूजा कर रहे हो, वे मरने के बाद तुमसे अपना ही चटवाएँगे; बात इतनी सीधी है। फलाने मसान बाबा बनाकर आज तुम पूज रहे हो। ऐसा नहीं हो सकता कि ये धर्म पर चलने वाले हों, ये हों, वो हों। कल को तुम्हारा विनाश आएगा।
क्या पान के पत्ते पर लौंग, इलायची और किशमिश का भोग देना ठीक है?
बहुत बढ़िया — और वे किन घंटों में उपलब्ध रहते हैं
माँ के सामने पान के पत्ते पर लौंग, इलायची और किशमिश का भोग देने के बारे में पूछा गया: बहुत बढ़िया।
माँ के सामने पान के पत्ते पर लौंग, इलायची और किशमिश का भोग देने के बारे में पूछा गया: बहुत बढ़िया, वक्ता उत्तर देते हैं।
क्या शिव कवच और नरसिंह कवच दोनों किए जा सकते हैं?
दोनों करने से कोई दुष्प्रभाव नहीं
पूछा गया कि शिव कवच और नरसिंह कवच दोनों करेंगे तो क्या असर होगा: ऐसा कुछ नहीं है; कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा।
पूछा गया कि शिव कवच और नरसिंह कवच दोनों करेंगे तो क्या असर होगा: ऐसा कुछ नहीं है, वक्ता उत्तर देते हैं। कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा।
पूजा का विरोध पुरुषों के लिए ज्यादा कठिन है या स्त्रियों के लिए?
दोनों के लिए कठिन है — ऐसी पत्नियाँ जो पूजा पाठ के कारण तलाक चाहती हैं
बिल्कुल, मीना जी, दोनों के लिए कठिन है, वे उत्तर देते हैं। कुछ घरों में स्त्रियों के लिए भी कठिन होता है; कुछ घरों में पुरुषों के लिए भी। वे कहते हैं, अब ऐसी पत्नियाँ भी हैं, जिनका नाम वे नहीं ले सकते, पर वे उनके अपने परिवार में हैं, और सब परेशान हैं। वे तलाक चाहती हैं या साथ नहीं रहना चाहतीं, केवल इसलिए कि आप पूजा पाठ करते हैं — आपका जीवन बहुत अच्छा चल रहा है, अच्छे घर में शादी हुई, किसी चीज की कमी नहीं, काम के लिए नौकर हैं, सब कुछ करके दिया जा रहा है; पर आप वह पूजा पाठ क्यों करते हैं, सुबह दो घंटे और शाम दो घंटे क्यों, यह फालतू की पूजा और घंटी बजाना, आप लोग बिल्कुल पुराने ख्यालों के हैं।
बिल्कुल, मीना जी, दोनों के लिए कठिन है, वक्ता उत्तर देते हैं। कुछ घरों में स्त्रियों के लिए भी कठिन होता है; कुछ घरों में पुरुषों के लिए भी। ऐसा नहीं है कि — अब ऐसी पत्नियाँ भी हैं; हम नाम नहीं ले सकते, पर वे हैं, अपने ही परिवार में, और सब परेशान हैं। वे तलाक चाहती हैं या साथ नहीं रहना चाहतीं, केवल इसलिए कि — आप पूजन पाठ क्यों करते हैं? आप बताइए: आपका जीवन बहुत अच्छा चल रहा है। अच्छे घर में शादी हुई। किसी चीज की कमी नहीं है। काम के लिए नौकर है; सब कुछ करके दिया जा रहा है। पर आप वह पूजा पाठ क्यों करते हैं? सुबह दो घंटे, शाम दो घंटे क्यों; यह सब फालतू की पूजा और घंटी बजाना क्यों — आप लोग बिल्कुल पुराने ख्यालों के हैं। वे साथ नहीं रहना चाहतीं। और पुरुषों के साथ भी परेशानी है। गृहस्थी खराब हो रही है — क्यों, पूजा पाठ करने के कारण?
ऐसे महाराज जी लोग घरवालों से बस रुक जाने को कहते हैं, जबकि उन्हें विरोध करने वाले व्यक्ति को सद्बुद्धि मिलने की प्रार्थना करनी चाहिए
रुक जाने को कहने वाले महाराज जी लोग — जहाँ उन्हें सद्बुद्धि की प्रार्थना करनी चाहिए
अब महाराज जी लोग अगर उस तरह के हों, तो कह देंगे: मत करो, नाम जप करो, गृहस्थी — वे यह क्यों नहीं कहेंगे कि दूसरे व्यक्ति को सद्बुद्धि मिले? उन्हें समझाया जा रहा है: नहीं, ऐसा है, वैसा है; नहीं, हम यह नहीं करेंगे। ऐसे लोग अपना जीवन भी खराब करते हैं और दूसरों का भी — जिनके जीवन में वे आते हैं, जिनसे उनका विवाह होता है — पूरी गृहस्थी खराब करके चल देते हैं।
अब महाराज जी लोग अगर उस तरह के हों, तो कह देंगे: मत करो, वक्ता कहते हैं। नाम जप करो। गृहस्थी। वे यह क्यों नहीं कहेंगे कि दूसरे व्यक्ति को सद्बुद्धि मिले? उन्हें समझाया जा रहा है: नहीं, ऐसा है, वैसा है; नहीं, हम यह नहीं करेंगे। ये जो चीजें होती हैं — ऐसे लोग जो ऐसे काम करते हैं, कि नहीं, हम पूजन पाठ नहीं करेंगे, और यह-वह — वे अपना जीवन भी खराब करते हैं, और दूसरों का भी — जिनके जीवन में वे आते हैं, जिनसे उनका विवाह होता है; पूरी गृहस्थी खराब करके चल देते हैं।
विवाह से पहले क्या करना चाहिए?
साफ-साफ पूछ लें — हालाँकि बहुत लोग सीधे झूठ बोल देंगे
इसीलिए ऐसे लोगों से विवाह करने से पहले साफ पूछ लीजिए: देखो, यह मेरी दिनचर्या है। और कितने लोग तो सीधे झूठ बोल देते हैं — आप पूछेंगे भी क्या? वे कहेंगे, हाँ ठीक है, अभी सब नहीं आता, पर सिखा देना, शादी के बाद सब सीख लूँगा। शादी के बाद कुछ नहीं सीखेंगे। कुछ कहोगे तो कहेंगे, वह तो हमने ऐसे ही कहा था; अब तुम भी मत करो, चलो, पब चलते हैं, पीते हैं। बस हो गया। प्रारब्ध वैसा ही रचा होगा और वैसे ही बीतेगा।
इसी कारण ऐसे लोगों से विवाह करने से पहले साफ पूछ लीजिए, वक्ता कहते हैं। कि देखो, यह मेरी दिनचर्या है। और कितने लोग तो सीधे झूठ बोल देते हैं — आप पूछेंगे भी क्या? वे कहेंगे, हाँ ठीक है, अभी सब नहीं आता, पर सिखा देना; शादी के बाद सब सीख लूँगा। शादी के बाद कुछ भी नहीं सीखेंगे। कुछ कहोगे तो कहेंगे, वह तो हमने ऐसे ही कहा था। अब तुम भी मत करो; चलो, पब चलते हैं, पीने चलते हैं — काम हो गया। प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। वैसा ही रचा होगा, और वैसे ही बीतेगा। यह भी एक बात है।
गंगा दशहरा और बटुक भैरव जयंती एक ही दिन पड़ती हैं, और उस दिन सभी को साधना करनी चाहिए
गंगा दशहरा और बटुक भैरव जयंती एक ही दिन
जिस दिन गंगा दशहरा पड़ रहा है, 30 मई को, उसी दिन बटुक भैरव जी की जयंती पड़ती है। गंगा दशहरा और बटुक भैरव जयंती एक ही दिन पड़ती हैं; इस बार यह 30 मई को पड़ रही है। उस दिन सभी को भैरव जी की साधना, पूजा और दीपदान करना चाहिए; वे कहते हैं कि वे अलग से एक वीडियो भी डालेंगे। 30 मई को याद रखिए।
जिस दिन गंगा दशहरा पड़ रहा है — 30 मई को गंगा दशहरा पड़ रहा है — उसी दिन बटुक भैरव जी की जयंती पड़ती है, वक्ता कहते हैं। गंगा दशहरा और बटुक भैरव जयंती एक ही दिन पड़ती हैं; इस बार यह 30 मई को पड़ रही है। उस दिन सभी को भैरव जी की साधना, पूजा, दीपदान आदि करना चाहिए। हम अलग से एक वीडियो भी जरूर डालेंगे। उस दिन सभी याद से करिएगा — 30 मई को।
अगर पूजा घर का प्रसाद छिपकली खा ले तो क्या करना चाहिए?
बस एक-दो दाने छोड़ें, या प्रसाद ढककर रखें
प्रसाद ज्यादा मत छोड़िए। पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद के बस एक-दो दाने छोड़ने चाहिए; बाकी सारा प्रसाद उठा लेना चाहिए, या प्रसाद ढककर रखिए। छिपकली जहरीली होती है, इसलिए या तो उसे ढककर रखिए, या पूजा का सारा प्रसाद उठाकर बस एक-दो दाने छोड़िए।
पूजा घर का प्रसाद छिपकली के खाने के बारे में पूछा गया: प्रसाद ज्यादा मत छोड़िए, वक्ता उत्तर देते हैं। पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद के बस एक-दो दाने छोड़ने चाहिए; बाकी सारा प्रसाद उठा लेना चाहिए। या प्रसाद ढककर रखिए। वे कहते हैं कि जहाँ पूजा के स्थान में तीन-चार जगह भोग लगाया जाता है, वहाँ चूहा भी आ सकता है और छिपकली भी आ सकती है। तो ऐसे में, क्योंकि छिपकली जहरीली होती है, या तो उसे ढककर रखिए; या पूजा का सारा प्रसाद उठाकर बस एक-दो दाने छोड़िए।
महागुरु बनाने के साथ क्या आता है?
महागुरु का अर्थ महापरीक्षा भी है
गुरु बनाने के बारे में कहा गया था कि अगर आपने महागुरु बनाया है, तो महापरीक्षा भी होगी। और साथ भी तो आपको मिल रहा है।
गुरु बनाने के बारे में कहा गया था, वक्ता याद दिलाते हैं: अगर आपने महागुरु बनाया है, तो महापरीक्षा भी होगी। और साथ भी तो आपको मिल रहा है।
क्या किसी सामान्य मंदिर को सिद्ध पीठ बनाया जा सकता है?
बनाने से नहीं — जागृति आने पर वह बनता है
पूछा गया कि क्या सामान्य मंदिर को सिद्ध पीठ बनाया जा सकता है: नहीं भैया। जब उतनी जागृति आती है, तब सिद्ध पीठ बनता है। अगर मंदिर सौ साल पुराना हो, उसमें जरूरत से अधिक चैतन्यता हो, और वहाँ रोज नियम से पूजन आदि होता हो — तब।
पूछा गया कि क्या सामान्य मंदिर को सिद्ध पीठ बनाया जा सकता है: नहीं भैया। जब उतनी जागृति आती है, तब सिद्ध पीठ बनता है। अगर मंदिर सौ साल पुराना हो, उसमें जरूरत से अधिक चैतन्यता हो, और वहाँ रोज नियम से पूजन आदि होता हो — तब।
क्या टीवी सीरियलों में दिखाया जाने वाला तंत्र असली है?
नागिन, नागमणि वगैरह हलवे जैसे दिखाए जाते हैं
एक श्रोता को वे उत्तर देते हैं कि अर्धनारीश्वर कर सकते हैं। सीरियलों में तंत्र, नागिन, नागमणि, ये सब चीजें हलवे जैसी आसान दिखाई जाती हैं, और सबको वैसा ही लगता है।
अर्धनारीश्वर कर सकते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं। हाँ — सीरियलों में तंत्र, नागिन, नागमणि, ये सब चीजें हलवे जैसी आसान दिखाई जाती हैं, और सबको वैसा ही लगता है।
दत्तात्रेय उपासना में पहले क्या करना चाहिए?
अक्षी और माला मंत्र, जितना अधिक हो सके
दत्तात्रेय का अक्षी और माला मंत्र पहले करिए, जितना अधिक हो सके।
दत्तात्रेय का अक्षी और माला मंत्र पहले करिए, जितना अधिक हो सके, वक्ता उत्तर देते हैं।
क्या धूमावती साधना गृहस्थ के लिए है?
घर में धूमावती, मातंगी, तारा और उग्र तारा
धीरज सक्सेना जी से वे कहते हैं कि वे हमेशा यह बात कहते हैं: धूमावती साधना गृहस्थ के लिए है ही नहीं। क्या हम नहीं बताते — हम हमेशा कहते हैं, भैया, कि वह चीज नहीं करनी है। यह बिजनेस गुरुओं की देन है कि घर-घर में ऐसे लोग धूमावती साधना, मातंगी साधना, ये सब कर लेते हैं। मातंगी साधना एक सीमा तक ठीक है; पर उनके अन्य स्वरूप भी — उन सबकी साधना यह नहीं है। भगवती तारा की साधना, उग्र तारा की साधना — ये सब चीजें घर के लिए नहीं हैं, भैया; तो घर में हम कैसे बता सकते हैं, जो हो ही नहीं सकता, उसे करने को कैसे कह सकते हैं?
धीरज सक्सेना जी से: हम हमेशा यह बात कहते हैं, वक्ता कहते हैं — धूमावती साधना गृहस्थ के लिए है ही नहीं। क्या हम नहीं बताते? हम हमेशा कहते हैं, भैया, कि वह चीज नहीं करनी है। यह बिजनेस गुरुओं की देन है कि घर-घर में जैसे लोग हैं, वे धूमावती साधना, मातंगी साधना, ये सब कर लेते हैं। मातंगी साधना एक सीमा तक, चलिए, ठीक भी है। पर उनके अन्य स्वरूप भी — उन सबकी साधना यह नहीं है। भगवती तारा की साधना, उग्रतारा की साधना — ये सब चीजें घर के लिए नहीं हैं, भैया। तो घर में हम कैसे बता सकते हैं? जो हो ही नहीं सकता, उसे करने को किसी से कैसे कह सकते हैं?
क्या पूजा के लिए साईं की मूर्ति रखनी चाहिए?
बुद्धि खत्म करने वाली मूर्ति
साईं की मूर्ति बुद्धि खत्म कर देती है — यही बात है, और इसी कारण वह पूजा करने से मना कर रही है, वे उत्तर देते हैं।
साईं की मूर्ति बुद्धि खत्म कर देती है — यही बात है, वक्ता उत्तर देते हैं। इसी कारण वह पूजा करने से मना कर रही है।
साधना के दौरान संकल्प, विनियोग और न्यास में से कौन-सा रोज करना जरूरी है?
आप जो मंत्र अनुष्ठान कर रहे हैं, उसे जो चाहिए
पूछा गया कि साधना काल में, साधना के हर दिन, संकल्प, विनियोग और न्यास की प्रक्रियाओं में से कौन-कौन सी रोज करनी हैं: आप जो मंत्र अनुष्ठान कर रहे हैं, उसके अनुसार जो-जो चीजें जरूरी हैं, वे सब आपको करनी चाहिए।
क्या नर्मदेश्वर शिवलिंग को सोने के कमरे में रखने में कोई दोष है?
एक पर्दा, ताकि संपर्क न हो
घर के अंदर सोने के कमरे में रखे नर्मदेश्वर शिवलिंग के बारे में पूछा गया, जिस कमरे का उपयोग केवल भोजन और नींद के लिए होता है, कि क्या उस कमरे में कोई दोष है: अगर सोने के कमरे में है, तो भी, अगर छोटा-सा मंदिर है, तो पर्दा आदि लगा दीजिए ताकि वह ढका रहे — यानी हो सके तो ऐसा प्रयास कीजिए कि आपका उससे संपर्क न हो। वे यह भी कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय का मंडल आगे बनाएँगे।
हम आगे बनाएँगे, वक्ता कहते हैं — भगवान दत्तात्रेय का मंडल। घर के अंदर सोने के कमरे में रखे नर्मदेश्वर शिवलिंग के बारे में पूछा गया, जिस कमरे का उपयोग केवल भोजन और नींद के लिए होता है, कि क्या उस कमरे में कोई दोष है: अगर सोने के कमरे में है, तो भी — अगर छोटा-सा मंदिर है, तो पर्दा आदि लगाकर, ताकि वह ढका रहे। यानी हो सके तो ऐसा प्रयास कीजिए कि आपका उससे संपर्क न हो।
भगवती विंध्यवासिनी के लिए क्या करना चाहिए?
केवल अष्टोत्तर शतनाम
भगवती विंध्यवासिनी के लिए केवल अष्टोत्तर शतनाम करिए।
भगवती विंध्यवासिनी के लिए केवल अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। करिए, वक्ता उत्तर देते हैं।
सिद्ध कुंजिका के हवन से किया गया बताया जाने वाला अभिचार कैसे काटा जाए?
किसने कहा कि ऐसे किया गया — और भगवती पीतांबरा
पूछा गया कि अगर किसी ने सिद्ध कुंजिका से हवन करके श्रोता के भाई पर अभिचार करवाया है, तो उसे कैसे काटा जाए: वक्ता पूछते हैं, किसने कहा कि सिद्ध कुंजिका से हवन करवाकर किया गया है? अगर अभिचार के कारण बुद्धि कुंठित है और इस तरह की चीजें हो रही हैं, तो स्वयं भगवती पीतांबरा की सहायता लीजिए, या किसी साधक के माध्यम से लीजिए। अष्टोत्तर शतनाम आदि और भगवान शिव के अभिषेक के माध्यम से इसकी शांति हो जाती है।
पूछा गया कि अगर किसी ने सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् से हवन करके श्रोता के भाई पर अभिचार करवाया है, तो उसे कैसे काटा जाए: वक्ता पूछते हैं, किसने कहा कि सिद्ध कुंजिका से हवन करवाकर किया गया है? अगर अभिचार के कारण बुद्धि कुंठित है और इस तरह की चीजें हो रही हैं, तो स्वयं भगवती पीतांबरा की सहायता लीजिए, या किसी साधक के माध्यम से लीजिए। अष्टोत्तर शतनाम आदि और भगवान शिव के अभिषेक के माध्यम से इसकी शांति हो जाती है।
क्या एक ही देवता के अलग-अलग मंत्रों का जाप एक ही माला पर किया जा सकता है?
हाँ, बिल्कुल
पूछा गया कि क्या एक ही देवता के अलग-अलग मंत्रों का जाप एक ही माला से किया जा सकता है: बिल्कुल किया जा सकता है।
पूछा गया कि क्या एक ही देवता के अलग-अलग मंत्रों का जाप एक ही माला से किया जा सकता है: बिल्कुल किया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।