वैकुंठ चतुर्दशी और कार्तिक पूर्णिमा से पहले की लाइव — सप्तशती सीखना, दीपदान और गृहस्थों के प्रश्नोत्तर

सप्तशती सीखने और अकाल मृत्यु के उपाय पर एक लाइव।

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Questions this answers

91 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.

The notes
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01

क्या सप्तशती में दिए मंत्रों से आचमन करना सही है?

सप्तशती मंत्रों से एक साल से आचमन करते श्रोता

· 00:51–01:12 · Also a question

वक्ता प्रश्न पढ़ते हैं। एक श्रोता एक साल से सप्तशती में दिए मंत्रों से आचमन कर रहे हैं। वे पूछते हैं कि यह सही है या इसमें सुधार चाहिए। वक्ता उलटा पूछते हैं कि ठीक-ठीक कौन से मंत्र? तत्त्व शोधन के लिए दिए चार मंत्र, या कोई और?

एक श्रोता लिखते हैं कि वे एक साल से पूजा के समय श्री दुर्गा सप्तशती में दिए मंत्रों से आचमन कर रहे हैं। वे पूछते हैं कि यह सही है या इसमें कोई सुधार चाहिए। वक्ता कहते हैं कि साफ़ बताइए, आप कौन से मंत्र ले रहे हैं? क्या वे तत्त्व शोधन के लिए दिए चार मंत्र हैं, या कोई और मंत्र?

02

बटुक भैरव के चित्र पर कौन सा तिलक लगा सकते हैं?

बटुक भैरव के चित्र पर चंदन, रोली या भस्म

· 01:13–01:34 · Also a question

बटुक भैरव के चित्र पर कौन सा तिलक लगे, इस पर वक्ता कहते हैं कि चंदन का तिलक लगा सकते हैं, रोली का तिलक लगा सकते हैं और भस्म का तिलक भी लगा सकते हैं।

एक श्रोता पूछते हैं कि बटुक भैरव जी के चित्र पर कौन सा और किसका तिलक लगा सकते हैं। वक्ता सीधा उत्तर देते हैं: चंदन का तिलक लगा सकते हैं, रोली का तिलक लगा सकते हैं और भस्म का तिलक भी लगा सकते हैं।

03

क्या गृहस्थ ऐसी फ़ोटो की पूजा कर सकता है जिसमें महिषासुरमर्दिनी के साथ दसों महाविद्याएँ हों?

मिले-जुले महाविद्या चित्र और गृहस्थ

· 01:35–02:29 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि वे गृहस्थों को ऐसे सब रूपों की एक साथ पूजा करने को नहीं कहते। ऐसे चित्र में भगवती धूमावती और भगवती त्रिपुर भैरवी की उपस्थिति होती है। ऐसे रूप दीक्षित साधकों और विशेष उपदेश पाए लोगों के लिए हैं।

04

गृहस्थ को घर में कौन से रूप रखने चाहिए?

घर में सौम्य और पौष्टिक रूप, बाहर उग्र रूप

· 02:30–02:44 · Also a question

परिवार के साथ रहने वाले गृहस्थ रूपों को लेकर बहुत सावधान रहें। घर में ख़ास तौर पर सौम्य और पौष्टिक रूपों की सेवा-पूजा करें। घर से बाहर हों तो चाहें तो इन दूसरे रूपों की पूजा कर सकते हैं।

05

क्या गायत्री जप में स्वर लगाना चाहिए?

गायत्री पर अपने गुरु का उपदेश मानें

· 02:45–03:18 · Also a question

प्रश्न है कि क्या गायत्री जप में स्वर लगाना ज़रूरी है, क्योंकि स्वर से एक माला में पंद्रह-बीस मिनट लगते हैं। वक्ता कहते हैं कि उपदेश के समय आपके गुरु ने जैसा बताया, वैसा ही करें: स्वर के साथ या बिना, कितना प्रणव लगाना है, आगे-पीछे संपुट है या नहीं।

06

क्या अस्पताल से घर लौटते समय मंदिर में दर्शन-पूजन कर सकते हैं?

अस्पताल जाने के बाद दर्शन, बिना स्पर्श के

· 03:19–04:03 · Also a question

वक्ता कहते हैं, क्यों नहीं। साधारण रूप से अस्पताल होकर आने में कोई दिक़्क़त नहीं, पूजन कर सकते हैं। उस समय बस प्रसाद और माला चढ़ाने से बचें। और अगर व्यक्ति ख़ुद बीमार था और लौट रहा है, तो बाहर से भाव से प्रणाम करे। विग्रहों को न छुए, गर्भगृह में न जाए, पर प्रांगण में जा सकता है।

07

क्या भगवती के किसी भी रूप के साथ देवी प्रणव से जप हो सकता है?

देवी प्रणव भगवती का मुख्य बीज

· 04:04–04:37 · Also a question

वक्ता कहते हैं, बिल्कुल। देवी प्रणव वह प्रणव है जो भगवती का सबसे प्रमुख प्रणव है, उनके प्रमुख रूप का बीज है। इसलिए किसी भी भगवती के किसी भी रूप के साथ इसका जप-पूजन कर सकते हैं, गुरु आदेश हो तो ज़रूर। और जिस मंत्र में वैदिक प्रणव हो, वहाँ उसकी जगह देवी प्रणव लगा सकते हैं।

08

संपुटित महालक्ष्मी अष्टकम पाठ — दुर्गा को अर्पित करें या महालक्ष्मी को?

दोहरे संपुटित पाठ का अर्पण

· 04:38–04:51 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि दोनों को अर्पित करें। श्रोता बताते हैं कि वे महालक्ष्मी अष्टकम को चक्र विधि बत्तीस नामावली, चौथे अध्याय से संपुटित करते हैं, फिर चक्रधर स्तोत्र से भी संपुटित करते हैं, और पूछते हैं कि समर्पण किसे करें।

एक श्रोता अपनी साधना बताते हैं: महालक्ष्मी अष्टकम् को चक्र विधि बत्तीस नामावली, चौथे अध्याय से संपुटित करना, और फिर चक्रधर स्तोत्र से एक बार और संपुटित करना। वे पूछते हैं कि इसका समर्पण किसे करें — माँ दुर्गा को या महालक्ष्मी को? वक्ता उत्तर देते हैं, दोनों को कीजिए।

09

शाक्त को दुर्गा सप्तशती का अध्ययन क्यों करना चाहिए, भले वह पाठ न करे?

मूर्ति रहस्यम और तीन चरित्र

· 04:52–05:36 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ न करें, तब भी कम से कम उसका अध्ययन करें। जब आप मूर्ति रहस्यम पढ़ेंगे और तीन रहस्य और तीन चरित्र देखेंगे, तब जानेंगे कि महालक्ष्मी स्वरूप कौन हैं।

10

सप्तशती में महालक्ष्मी की पहचान कहाँ साफ़ होती है?

दूसरा, तीसरा और चौथा अध्याय

· 05:37–06:10 · Also a question

अगर आप भगवती दुर्गा को अर्पित कर रहे हैं तो महालक्ष्मी वहाँ हैं ही — वे महालक्ष्मी ही हैं। महिषासुरमर्दिनी के दूसरे और तीसरे अध्याय पढ़ने से यह दिखेगा, और दूसरे, तीसरे और चौथे अध्याय में यह साफ़ हो जाता है।

11

ख़ुद को बड़ा विद्वान बताने वाले भी कहते हैं कि कुछ नहीं होता, वे माँ हैं, कोई भी पाठ कर सकता है।

"कुछ नहीं होता, वे माँ हैं" वाला दावा

· 06:11–06:40

वक्ता कहते हैं कि ख़ुद को बड़ा विद्वान बताने वाले भी यह कहने लगते हैं कि कोई दिक़्क़त नहीं, वे माँ हैं, कोई भी कर सकता है, कोई कष्ट नहीं आएगा। वे दोहराते हैं कि यह व्यक्ति-व्यक्ति पर अलग हो सकता है, और श्रोताओं से कहते हैं कि यह अपराध न करें, सीखें।

12

मंत्र के ग़लत उच्चारण से दोष क्यों लगता है?

मंत्र देवता का ही स्वरूप है

· 06:41–07:13 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि मंत्रों को तोड़ने और ग़लत बोलने से उनकी विकृति होती है। मंत्र क्या है? देवता का स्वरूप। अगर देवता का स्वरूप विकृत होगा तो क्या दोष नहीं लगेगा? सप्तश्लोकी और सप्तशती का हर एक श्लोक मंत्र है।

13

जो लोगों को इस तरह भटकाते हैं, उन्हें बल्कि सीखने को कहना चाहिए, क्योंकि सामग्री और सिखाने वाले आसानी से मिलते हैं।

लोगों से सीखने को कहें — सामग्री उपलब्ध है

· 07:14–07:40

वक्ता कहते हैं कि जो बार-बार ऐसा बोलकर लोगों को भटकाते हैं, उन्हें बल्कि सीखने को कहना चाहिए। यूट्यूब पर सामग्री है; बहुत लोग सिखाते हैं, कुछ अब पैसे लेकर क्लास लेते हैं, कुछ मुफ़्त सिखाते हैं, और कुछ यूट्यूब पर बहुत अच्छा सिखा रहे हैं। तो क्या आप उच्चारण नहीं सीख सकते?

14

ग़लत पाठ को सही ठहराने वाले शिक्षक बस प्रिय बनना क्यों चाहते हैं?

किसी की अपनी माँ का नाम बिगाड़ने की कसौटी

· 07:41–08:12 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर हमें आपका प्रिय बनना होता, तो हम वही रास्ता बताते जिससे प्रिय बनें — मत सीखो, ग़लत करो, देवी माँ हैं, प्रसन्न होंगी। फिर वे एक कसौटी रखते हैं: कोई आपकी अपनी माँ का नाम बार-बार ग़लत बोले, तो देखिए, सबसे पहले बुरा आपको लगेगा या नहीं।

15

जो सीखने से रोकता है, वह चाहता है कि सुनने वाला किसी भी उम्र में जीवन भर जाहिल रहे।

"वे चाहते हैं कि आप जीवन भर अनजान रहें"

· 08:13–08:50

वक्ता कहते हैं कि उन्हें एक ही बात समझ आती है — सामने वाला चाहता है कि आप जीवन भर जाहिल रहें। आपने संस्कृत कभी पढ़ी नहीं, और अब पढ़ना भी न सीखें। आपकी उम्र कुछ भी हो, पंद्रह-बीस, तीस, पचास या सत्तर, अगर जगदंबा ने किसी पुण्य से आपके मन में अपनी भक्ति जगाई है, तो एक-एक अध्याय, दस-दस श्लोक करके सीखिए।

16

सप्तशती सीखने के लिए कैसे बैठें?

सीखने का संकल्प नहीं; साफ़ आसन और हेडफ़ोन

· 08:51–09:30 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि सीखने वाला सीखने के लिए कभी संकल्प न ले। किसी साफ़ जगह पर शुद्धता से अलग बैठें; बिस्तर पर भी बैठ सकते हैं अगर साफ़ हो और धुली चादर बिछी हो — पर जिस पर खाते हैं उस पर न बैठें। जिस कुर्सी पर बैठें उसे पोंछें, साफ़ करें, फिर आराम से बैठकर मोबाइल में हेडफ़ोन लगाकर एक-एक श्लोक सीखें।

17

सात सौ श्लोक सीखने में कितना समय लगता है?

रोज़ दस श्लोक, एक से डेढ़ महीना

· 09:31–09:59 · Also a question

अगर व्यक्ति रोज़ दस श्लोक सीखे, तो दस दिन में सौ श्लोक आराम से हो जाते हैं। सात सौ श्लोक हैं, तो एक या डेढ़ महीने में पूरा हो जाएगा, और फिर वह बार-बार दोहराता रहे।

18

क्या दीक्षा से सीखने की ज़रूरत ख़त्म हो जाती है?

ध्रुव, शंख, और गुरु असल में क्या दे सकते हैं

· 10:00–10:20 · Also a question

नहीं। दीक्षा में ऐसा नहीं होगा कि गुरु आपको ऐसी विद्या दे दें कि बिना पढ़े सब आ जाए। भक्तराज ध्रुव को स्तुति करनी नहीं आती थी, तो भगवान नारायण ने शंख से उनके गाल छुए और चारों वेद अपने आप आ गए — पर आपके गुरु में यह सामर्थ्य नहीं होगा कि छूकर आपको सात सौ श्लोक दे दें।

19

क्या बिना सीखे दीक्षा पूरा फल देती है?

बिना सीखे दीक्षा पूरा फल नहीं देती

· 10:21–11:00 · Also a question

ऐसा शायद ही होगा कि दीक्षा मिलने से बिना सीखे, कैसे भी करें, पूरा फल मिल जाए। ऐसा नहीं हो सकता। इस धोखे और बहलावे में आकर, कि सिर्फ़ भाव से पार हो जाएँगे, अपना जीवन बेकार न करें — आपको मूर्ख बनाया जा रहा है।

20

लंबी व्याख्या पर ख़ूब व्यूज़, लाइक्स और गुरुजी की उपाधि मिलती है, जबकि विधि की जाँच कोई नहीं करता।

विधि की जगह लोकप्रियता

· 11:01–11:40

वक्ता कहते हैं कि लंबी व्याख्या डाली जाती है और सामने वाला उसे ज़रूर करेगा — ख़ूब व्यूज़ जा रहे हैं, ख़ूब लाइक्स जा रहे हैं, फ़ेसबुक पर है और लोग गुरुजी कहते हैं। पर उसका परिणाम भी देखिए। वे कहते हैं कि लोग इसमें अपना विवेक बिल्कुल नहीं लगाते।

21

जो चैनल सचमुच सही पाठ सिखाने की कोशिश करते हैं, उनके साथ क्या होता है?

उच्चारण सुधारने वालों को गालियाँ

· 11:41–12:14 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अगर वे सिखाने की कोशिश करें तो लोग उन्हें चार बातें सुनाकर चले जाते हैं — क्योंकि कोई इतनी बारीक बात सिखाए कि उच्चारण ऐसे करना है, वैसे नहीं, छंद में ऐसे बोलते हैं, वैसे नहीं, तो लोग उसे चार गालियाँ देकर आ जाते हैं। जो सचमुच सही करने की कोशिश कर रहा है, उसे बस गालियाँ मिलती हैं।

22

क्या स्त्री रजस्वला अवस्था में शाबरी कवच कर सकती है?

देवी साधिका के लिए "अशुद्ध" शब्द अस्वीकार

· 12:34–12:52 · Also a question

श्रोता के प्रश्न में लिखा है कि स्त्रियाँ "अशुद्ध" रजस्वला अवस्था में शाबरी कवच नहीं कर सकतीं। वक्ता कहते हैं कि अच्छा है कि उस अवस्था को अशुद्ध कहा ही न जाए — वहाँ विषय अशुद्धि का नहीं, कुछ और है। ख़ासकर देवी साधक के लिए अशुद्धि की बात कभी नहीं की जाएगी।

एक श्रोता लिखते हैं कि स्त्रियाँ अशुद्ध, रजस्वला अवस्था में शाबरी विद्या कवच नहीं कर सकतीं। वक्ता कहते हैं, देखिए, अच्छा है कि उसे अशुद्ध अवस्था न कहा जाए। वहाँ अशुद्धि का विषय नहीं आता; वहाँ विषय कुछ और हो जाता है। ख़ासकर जो देवी साधक है, उसके लिए अशुद्धि की बात कभी नहीं की जाएगी।

23

शक्तिपीठ के बलि स्थान से मिट्टी लेने का क्या नियम है?

बलि स्थान की मिट्टी हर किसी के लिए नहीं

· 12:53–13:08 · Also a question

तुषार नाम के श्रोता से वक्ता कहते हैं कि शक्तिपीठ के बलि स्थान से मिट्टी लेना हर किसी का विषय नहीं है। अगर कोई प्रयोग करना ही है, तो उसे वहीं मौके पर करना कहीं ज़्यादा ठीक होगा।

तुषार नाम के एक श्रोता पूछते हैं कि शक्तिपीठ के बलि स्थान से मिट्टी लेने का क्या विधान है। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह विषय हर किसी के लिए नहीं है। और अगर कोई प्रयोग करना ही है, तो उसे वहीं करना ज़्यादा उचित होगा।

24

अगर ऑपरेशन में मांसाहारी व्यक्ति का ख़ून चढ़ा हो, तो क्या साधक को दोष लगता है?

चढ़ा हुआ ख़ून और दोष को जलाने का सामर्थ्य

· 13:40–14:07 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि वे इसे अधिकार से नहीं कह सकते। वहाँ बात प्राण बचाने की है। दूसरी बात, साधक में यह सामर्थ्य होना चाहिए कि अगर ऐसा ख़ून चढ़ा भी है, तो वह उस दोष को जलाकर राख कर दे — इतना सामर्थ्य साधक में होना चाहिए।

25

दो माला मंत्रों के बीच दत्तात्रेय एकाक्षरी कितनी बार बोलें?

एकाक्षरी के संपुट की जगह

· 14:08–14:24 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि एकाक्षरी में संपुट की बात बस एक बार आगे और एक बार पीछे की है — हर बार, हर माला मंत्र में, एक बार आगे और एक बार पीछे, बस।

26

सपने में दुर्गा सप्तशती यंत्र मिलने का क्या अर्थ है?

सपने में यंत्र मिलना

· 14:25–14:36 · Also a question

अखिलेश नाम के श्रोता बताते हैं कि सपने में उन्हें किसी जगह ले जाकर दुर्गा सप्तशती यंत्र दिया गया, और कहा गया कि यंत्र ही जीवन है। वक्ता कहते हैं कि यह बहुत अच्छा सपना है।

एक श्रोता अपना सपना बताते हैं: उन्हें किसी जगह ले जाया गया, और वहाँ उन्हें दुर्गा सप्तशती यंत्र दिया गया, इन शब्दों के साथ कि यंत्र ही जीवन है। वक्ता कहते हैं, अखिलेश जी, आपका यह बहुत अच्छा सपना है।

27

त्रिपुर सुंदरी किस कुल की हैं, और किसका ध्यान पढ़ें?

श्री कुल की भगवती त्रिपुर सुंदरी ललिता

· 14:37–14:49 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि भगवती त्रिपुर सुंदरी ललिता श्री कुल की हैं। उनका अपना ध्यान मंत्र पढ़िए।

भगवती त्रिपुर सुंदरी किस कुल की हैं, और कौन से कुल देवी का ध्यान पढ़ें, इस पर वक्ता सीधा उत्तर देते हैं। भैया, भगवती त्रिपुरसुंदरी ललिता श्री कुल की हैं। उनका ध्यान मंत्र पढ़िए।

28

क्या गणपति के लिए रोज़ ख़स की जड़ का दीपदान कर सकते हैं?

गणपति को ख़स जड़ का दीपदान, और भाद्रपद का समय

· 14:50–15:25 · Also a question

वक्ता कहते हैं, हाँ, बिल्कुल। विशेष रूप से करना हो तो किसी भी पक्ष में चतुर्थी से चतुर्दशी तक करें, यह सबसे उत्तम है; चाहें तो रोज़ भी कर सकते हैं, यह बहुत अच्छा है। भाद्रपद महीने का दीपदान सबसे उत्तम है, और उस समय भगवान गणपति को ख़स जड़ का दीपदान ज़रूर करना चाहिए।

29

जब किसी के शरीर पर सवारी आई हो, तो क्या जानकारी लेना ठीक है?

सवारी से जानकारी लेना

· 15:26–15:48 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जानकारी लें या न लें, यह आप पर है — ले सकते हैं, इसमें कोई दिक़्क़त की बात नहीं। वे श्रोताओं को चैनल पर पहले से दी गई सवारी विषय की पूरी, गहरी जानकारी की ओर भेजते हैं, जिससे बात और साफ़ होगी।

30

क्या दीपदान के लिए ज़मीन पर एल्युमिनियम फ़ॉयल बिछा सकते हैं?

108 दीपों के नीचे फ़ॉयल की जगह क्या बिछाएँ

· 15:49–16:25 · Also a question

नहीं, वक्ता कहते हैं — एल्युमिनियम फ़ॉयल नहीं लगानी चाहिए। अगर 108 दीप हैं, तो एक माला ले आइए और उसकी पंखुड़ियाँ पूरी ज़मीन पर बिछा दीजिए। या 100-200 ग्राम हल्दी का पैकेट लेकर पूरा फैला दीजिए। रोली पूरी फैला दीजिए। चाहें तो उस पर कोई आकृति बना लीजिए — चौकोर, या अष्टदल कमल जैसी। उस पर फूल बिखेरिए, फिर उसके ऊपर 108 दीप रखिए।

31

क्या नरसिंह साधना को मुख्य रखते हुए साथ में भगवती की साधना कर सकते हैं?

नरसिंह को मुख्य साधना रखने वाले के लिए लक्ष्मी नरसिंह

· 16:26–16:41 · Also a question

हाँ, बिल्कुल, वक्ता कहते हैं। किस रूप की साधना सबसे अच्छी होगी, इस पर वे कहते हैं — अगर भगवान नरसिंह को ही मुख्य रखकर चलना है, तो भगवती लक्ष्मी की साधना सबसे अच्छी होगी। तो भगवान लक्ष्मी नरसिंह की साधना कीजिए।

32

क्या विदेश जाने पर दीक्षा मान्य रहती है?

विदेश में मान्यता, और लौटकर यज्ञोपवीत फिर से

· 16:42–16:57 · Also a question

क्यों मान्य नहीं रहेगी, वक्ता पूछते हैं — सब मान्य रहेगा। जब वापस आएँ, तो यज्ञोपवीत संस्कार फिर से करवा लीजिए। वे कहते हैं, इससे ज़्यादा क्या कहा जाए।

एक श्रोता पूछते हैं कि दीक्षित होने के बाद विदेश चले जाएँ तो क्या दीक्षा मान्य रहती है। भाई देखिए, वक्ता कहते हैं, मान्य क्यों नहीं रहेगी? सब मान्य रहेगा। जब वापस आएँ, तब एक बार फिर यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। संस्कार करवा लीजिए। इससे ज़्यादा क्या कहा जाए।

33

सात शक्तियाँ साथ बताई गई हैं तो कोई शक्ति साथ है; बातों के पीछे भागने के बजाय अनुष्ठान फिर से शुरू करें

बातों के पीछे न भागें, अनुष्ठान फिर शुरू करें

· 16:58–17:36

श्रोता ने डेढ़ साल जप किया, पाँच महीने रुका, अब फिर शुरू किया है। किसी को फ़ोन पर दिखाया तो उसने कहा सात शक्तियाँ हैं। वक्ता कहते हैं — इसका मतलब कोई शक्ति आपके साथ है, सकारात्मक हो या नकारात्मक। है तो है। अपना अनुष्ठान शुरू कीजिए। अब आप जो किसी को दिखा रहे हैं, वहाँ क्या चल रहा है, यह वे नहीं कह सकते।

34

क्या अलग होने वाले स्टैंड वाला दीपक बिना केले के पत्ते या चावल के आसन के रख सकते हैं?

हर दीपक को आसन देना ही है

· 17:37–17:49 · Also a question

नहीं भाई, वक्ता कहते हैं। दीपक कैसा भी हो, उसे आसन तो देना ही पड़ता है।

पूछा गया कि अलग होने वाले स्टैंड वाला दीपक बिना केले के पत्ते या चावल के आसन के ठीक है क्या। वक्ता कहते हैं — नहीं भाई। दीपक कैसा भी हो, उसे आसन तो देना ही पड़ता है।

35

एलर्जी वाले दमे का क्या उपाय बताते हैं?

पहले जन्म कुंडली में चंद्र देखें

· 17:50–18:16 · Also a question

भाई, पहले एक बार जन्म कुंडली का विश्लेषण करवाइए और देखिए चंद्र की स्थिति क्या है, वक्ता कहते हैं — यह देखना ज़रूरी है। क्योंकि दमे का पूरा विषय चंद्र की स्थिति पर टिका है, और उसी के आधार पर दमे का सही उपाय हो सकता है। अगर यह पुराना हो चुका है, तो इसे काबू करना बहुत कठिन है, और पूरी बात आपको ख़ुद सावधानी से संभालनी होगी।

36

क्या कनकधारा स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?

कनकधारा स्तोत्र, ठीक से सीखकर

· 18:17–18:33 · Also a question

हाँ, बिल्कुल, वक्ता कहते हैं। इसे ठीक से सीखिए — सही उच्चारण, और भाव के साथ अच्छे से गाना। ऐसा करेंगे तो बहुत अच्छा होगा।

पूछा गया कि क्या कनकधारा स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं — हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं। इसे ठीक से सीखिए: सही उच्चारण, और गाना अच्छे से, भाव के साथ। इस तरह करेंगे तो बहुत अच्छा होगा।

37

एक श्रोता के पिता का देहांत इकतालीसवें वर्ष में हुआ; चालीस वर्ष 2009 की दिवाली पर पूरे हुए; भूत-प्रेत का असर भी था

भूत-प्रेत के असर के साथ इकतालीस की उम्र में पिता का देहांत

· 18:34–18:56

अतीश दुबे नाम के एक श्रोता लिखते हैं कि उनके पिता चालीस वर्ष पूरे करके इकतालीसवें वर्ष में थे। 2009 में दिवाली के दिन इकतालीस वर्ष पूरे हुए। ज्येष्ठ मास के अंत में कैंसर से उनका देहांत हुआ, और भूत-प्रेत का असर भी सामने आया था। वे वाराणसी के पिशाच मोचन कुंड पर पिता के लिए कुछ करवाना चाहते हैं, और पूछते हैं क्या।

38

जहाँ अभिचारिक स्थिति के साथ अकाल मृत्यु हुई हो, वहाँ सबसे पहले क्या करें?

पैसे देकर कुछ करवाने से पहले पंचबलि और जीव सेवा

· 18:57–19:29 · Also a question

वक्ता अतीश दुबे और बाक़ी सबसे ध्यान देने को कहते हैं: जहाँ अकाल मृत्यु हुई हो और अभिचारिक स्थिति हो, या पता हो कि उस समय ऊपर कोई भूत, प्रेत या पिशाच की स्थिति बनी थी, वहाँ सबसे पहली बात — सीधे जाकर पैसे देकर कुछ न करवाएँ। पहले दिवंगत के लिए पंचबलि करें — गाय, कुत्ते, चींटियों, पक्षियों और मनुष्यों को भोजन कराएँ।

39

उपाय के क्रम में अगला है पीपल, बिल्व, आँवला और तुलसी जी की सेवा, और देवालयों में दीपदान

पीपल, बिल्व, आँवला, तुलसी, और देवालयों में दीपदान

· 19:30–19:50

और वृक्ष देवों की सेवा: पीपल का पेड़ हो, बिल्व का पेड़ हो, आँवले का पेड़ हो — इनकी सेवा, और तुलसी जी की सेवा। और देवालयों में दीपदान करना, जैसे अभी आने वाली दीपावली और देव दीपावली पर।

और वृक्ष देवों की सेवा, वक्ता कहते हैं — पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। का पेड़ हो, बिल्व का पेड़ हो, आँवले का पेड़ हो; इनकी सेवा, और तुलसी जी की सेवा। और देवालयों में दीपदान करना, जैसे अभी आ रही दीपावली और देव दीपावली — इन सबमें।

40

उसके बाद श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय के, या अपने आराध्य के, ग्यारह सौ पाठ

गीता के ग्यारहवें अध्याय के ग्यारह सौ पाठ

· 19:51–20:15

उसके बाद या तो अपने आराध्य का पाठ, या श्रीमद्भगवद्गीता का — और ग्यारहवें अध्याय की शरण लीजिए। श्रोता ख़ुद ब्राह्मण हैं, इसलिए उच्चारण सीखकर कम से कम ग्यारह सौ पाठ करें। पाठ के समय सामने जल रखें ताकि वह अभिमंत्रित हो जाए, और उस जल को कुशा से घर के मुख्य दरवाज़े की चौखट के ऊपरी हिस्से पर छिड़कें।

41

नारायण बलि कब करवाएँ, और उसके बाद क्या?

पिशाच मोचन पर नारायण बलि, फिर भागवत का मूल पाठ

· 20:16–20:53 · Also a question

जब यह काम हो जाए — ग्यारह सौ पाठ पूरे हों, और कम से कम तीन, चार या छह महीने पंचबलि और जीवों व वृक्षों की सेवा हो जाए — तभी पहले काशी पिशाच मोचन पर पिता के लिए नारायण बलि करवाइए। उसके तुरंत बाद, अगले ही दिन से, एक ब्राह्मण से संस्कृत में श्रीमद्भागवत जी का एक मूल पाठ पिता के लिए संकल्प करके करवाइए।

42

ऐसे मामले में सीधे पिंड क्यों नहीं देना चाहिए?

मारने वाली शक्ति दिवंगत को अपने वश में रखती है

· 20:54–21:40 · Also a question

क्योंकि अगर मृत्यु अभिचारिक विद्या से हुई है, तो मारने वाली शक्ति दिवंगत को अपने साथ ले जाती है, और वे उसी के वश में रहते हैं। अगर आप सीधे पिंड देना शुरू करें, या नारायण बलि या कुछ और करवाएँ, तो बहुत हद तक — यह इस पर निर्भर है कि आपमें तपोबल की क्षमता है या नहीं — उस अभिचारिक विद्या के देवता, जिन्होंने उनके प्राण लिए या जो उस समय मौजूद थे, उन्हें पिंड मिलने ही नहीं देंगे।

43

गीता के ग्यारहवें अध्याय का माहात्म्य इस बारे में क्या कहता है?

विश्वरूप दर्शन से प्रेतत्व भस्म

· 21:41–22:27 · Also a question

ग्यारहवें अध्याय के माहात्म्य में, वक्ता कहते हैं, पूरा विषय है: पैशाचिक शक्ति की उपस्थिति कितनी भी बड़ी हो जाए, अगर उसका पाठ हो और अभिमंत्रित जल घर में छिड़का जाए, तो सबसे पहले वे उस शक्ति से मुक्त होंगे। भगवान के विश्वरूप के दर्शन से प्रेतत्व भस्म हो जाता है, वे शुद्ध वर्ण के हो जाते हैं, और दिवंगत आत्मा की शुद्धि भी होती है।

44

क्या शालिग्राम के स्नान का जल और भैरव पूजन से उपाय का असर जल्दी होता है?

शालिग्राम के स्नान का जल, और दीपदान के साथ भैरव पूजन

· 22:28–22:34 · Also a question

अगर शालिग्राम जी की सेवा भी चल रही है और जिस जल से शालिग्राम जी को स्नान कराया गया है वह भी छिड़का जा रहा है, तो सबसे उत्तम है। और साथ में कुछ और कर सकें — भैरव जी का पूजन और दीपदान — तो गहराई और जल्दी आएगी।

साथ में, वक्ता कहते हैं, अगर शालिग्राम जी की सेवा चल रही है, और जिस जल से शालिग्राम जी को स्नान कराया गया है वह भी छिड़का जा रहा है, तो सबसे उत्तम है। और उसके साथ, अगर आप कुछ और भी कर सकें — भैरव जी का पूजन, दीपदान आदि — तो गहराई और भी जल्दी आएगी।

45

जीवों की सेवा से दिवंगत आत्मा कैसे मज़बूत होती है?

चींटियों के लिए मुट्ठी भर गुड़, और जीवों का आशीर्वाद

· 22:35–23:01 · Also a question

मान लीजिए आपने चींटियों की जगह पर बस मुट्ठी भर गुड़ डाल दिया, वक्ता कहते हैं। तो तृप्त होकर उन सब चींटियों की आत्माएँ आपको आशीर्वाद देंगी। गौ माता आशीर्वाद देंगी, कुत्ते का आशीर्वाद मिलेगा, कौए का आशीर्वाद मिलेगा — और इन जीवों के आशीर्वाद से दिवंगत आत्मा में ऐसी क्षमता और शक्ति आती है कि कोई उन्हें बंधन में नहीं रख पाएगा।

46

नारायण बलि के मामले के अलावा और किसे पंचबलि और जीव सेवा करनी चाहिए?

घर में भूत-प्रेत या अभिचार से पीड़ित कोई भी

· 23:02–23:28 · Also a question

यह सिर्फ़ नारायण बलि के लिए नहीं है, वक्ता कहते हैं। सुनने वालों में और कोई भी, जिसके घर में ऐसी स्थिति है, या जो किसी भूत-प्रेत या अभिचार से पीड़ित है — अगर वे ये दो-तीन काम करेंगे, तो कम से कम तीन से छह महीने में बहुत बड़ी राहत होगी, ज़मीन-आसमान का फ़र्क़।

और यह बात सिर्फ़ नारायण बलि के लिए नहीं है, वक्ता कहते हैं। और जो लोग सुन रहे हैं, जिनके घर में ऐसी स्थिति है, या जो किसी भूत-प्रेत या अभिचार से पीड़ित हैं — अगर वे ये दो-तीन काम करेंगे, तो कम से कम तीन से छह महीने में उन्हें बहुत बड़ी राहत होगी; फ़र्क़ ज़मीन-आसमान का होगा।

47

बटुक भैरव और चित्रपाल भैरव की तंत्रोक्त विधियाँ कब शुरू करें, और तुरंत क्यों नहीं?

बटुक भैरव, चित्रपाल भैरव और अपामार्ग की धूनी, बाद में

· 23:29–23:48 · Also a question

साथ में अगर तंत्रोक्त पद्धति भी शुरू की जाए — बटुक भैरव जी का सारा विधि-विधान, चित्रपाल भैरव जी का विधि-विधान — वह सब बाद में होता है। कम से कम महीने भर बाद शुरू करें, अपामार्ग की लकड़ी वाली धूनी के विधान के साथ; तब इन चीज़ों में पूरी कमी आती है। सीधे करने में कुछ दिक़्क़त की संभावना रहती है, यानी सफल न हो।

48

जगदंबा का सबसे प्रिय भोग क्या है?

अहंकार और वासनाएँ अर्पित करना

· 23:49–24:10 · Also a question

माँ जगदंबा का सबसे प्रिय भोग, वक्ता कहते हैं, हमारा अहंकार है। अपना अहंकार और अपनी वासनाएँ अर्पित कीजिए, ख़ाली हो जाइए — जगदंबा बहुत प्रसन्न होती हैं। यही वे और हम नहीं कर पाते। बाक़ी, भौतिक चीज़ों में तो सब कुछ उन्हीं का है।

माँ जगदंबा का सबसे प्रिय भोग हमारा अहंकार है, वक्ता कहते हैं। अपना अहंकार और अपनी वासनाएँ अर्पित कर दीजिए; ख़ाली हो जाइए। जगदंबा बहुत प्रसन्न होती हैं। यही हम और आप नहीं कर पाते। बाक़ी, भौतिकता में तो सब कुछ उन्हीं का है।

49

क्या गृहस्थ के लिए रात ग्यारह से तीन बजे तक साधना ठीक है?

यही समय गृहस्थ सुख का भी है

· 24:20–24:44 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि समय तो साधक के लिए है, पर वह गृहस्थ है — अब अगर वह गृहस्थी से फ़ुर्सत पा सके, तो करे, क्योंकि यही समय गृहस्थ सुख का भी है। अगर आप विवाहित हैं और पत्नी अनुमति दे रही हैं कि हाँ, जाइए, अपनी साधना कीजिए, तो ठीक है; वे इस बात में संतुष्ट हों और सहयोग करने वाली हों।

50

सूर्य अर्घ्य कब देना चाहिए?

साधना के बाद, सूर्योदय पर अर्घ्य

· 24:45–24:57 · Also a question

साधना पूरी होने के बाद, सूर्योदय के समय सूर्य अर्घ्य दिया जाएगा।

पूछा गया कि सूर्य अर्घ्य कब देना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि साधना पूरी होने के बाद, सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।

51

अर्गला के पहले मंत्र का पुरश्चरण कितनी संख्या का है?

ज़्यादातर के लिए दस हज़ार, केवल दुर्गा पाठियों के लिए एक हज़ार

· 24:58–25:20 · Also a question

सामान्य पुरश्चरण कम से कम 10,000 का है, वक्ता कहते हैं। लिखे हुए में 1,000 मिलेगा, पर वह 1,000 दुर्गा पाठियों के लिए है, जो रोज़ नियम से सप्तशती जी का पाठ करते हैं। बाक़ी सब कम से कम 10,000 जप ज़रूर करें, और कलिकाल में इसे 40,000 तक ले जाना चाहिए।

52

जीवन में कौन-सा एक मंत्र सिद्ध करना चाहिए?

एकाक्षरी, जयंती मंगला, या पाँच लाख पर पंचाक्षरी

· 25:21–25:43 · Also a question

एक मंत्र ज़रूर सिद्ध करके रखिए, वक्ता कहते हैं। दुर्गा जी का एकाक्षरी कर सकते हैं; पर जयंती मंगला जैसे मंत्र जीवन में एक बार 40,000 तक करके रख लें, या पंचाक्षरी पाँच लाख पर पूरा कर लें — इनमें से जो भी एक करके रखेंगे, वह पूरे जीवन आपकी रक्षा करेगा।

53

आज त्रयोदशी, कल वैकुंठ चतुर्दशी, फिर कार्तिक पूर्णिमा, देव दीपावली और त्रिपुर पूर्णिमा

आज त्रयोदशी, फिर वैकुंठ चतुर्दशी और कार्तिक पूर्णिमा

· 25:44–26:06

अब आने वाला समय पूर्णिमा और देव दीपावली का है, जिसका माहात्म्य आपको ज़रूर जानना चाहिए। आज त्रयोदशी है; कल वैकुंठ चतुर्दशी है; और उसके बाद कार्तिक पूर्णिमा, देव दीपावली, त्रिपुर पूर्णिमा।

आने वाला समय, वक्ता कहते हैं, पूर्णिमा का, देव दीपावली का है — इसके माहात्म्य के बारे में आपको ज़रूर जानना चाहिए। आज त्रयोदशी है। कल वैकुंठ चतुर्दशी है। और उसके बाद कार्तिक पूर्णिमा, देव दीपावली, त्रिपुर पूर्णिमा।

54

वैकुंठ चतुर्दशी का क्या महत्व है?

कमलापति शिव और हरिहर मिलन

· 26:07–26:42 · Also a question

वैकुंठ चतुर्दशी के दिन का एक विषय ग्रुप में साझा किया गया है, वक्ता कहते हैं — कमलापति भगवान शिव। यह वह दिन है जब भगवान श्री हरि नारायण ने 1008 नामावली से कमलों द्वारा भगवान शिव का अर्चन किया था। उस दिन भगवान प्रकट हुए और हरिहर मिलन हुआ, दोनों का रूप एक-दूसरे का पूरक बना — आधे विष्णु जी, आधे शिव जी, हरिहर।

55

सप्तशती के श्लोक संधि विच्छेद करके पढ़ें, या जैसे लिखे हैं वैसे?

दोनों नहीं — अनुष्टुप छंद के हिसाब से पढ़ें

· 27:22–28:06 · Also a question

भाई, पहले इसे पढ़ना सीखिए, वक्ता कहते हैं। संधि विच्छेद करने से कई बार अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। तो वह भी नहीं, और जैसा है वैसा भी नहीं — छंद के ढंग से पढ़ना सीखिए, कि अनुष्टुप के आठ वर्ण अक्षर कैसे लिए जाते हैं; आधा अक्षर गिना नहीं जाएगा।

56

क्या स्त्री मासिक धर्म के दौरान ललिता सहस्रनाम का पाठ कर सकती है?

कामाख्या कवच के सिवा कुछ नहीं, और वह भी पूजा के आसन पर नहीं

· 28:07–28:52 · Also a question

भगवती कामाख्या के कवच के अलावा वह उस समय कोई और चीज़ नहीं कर सकती, और करनी भी नहीं चाहिए — जब तक उसके पास वह दीक्षा न हो, वह अलग बात है। और कवच भी अपने पूजा के आसन पर नहीं करना चाहिए।

57

अगर दादा ने कभी नहीं चढ़ाया, तो क्या कुल भैरव को कारण चढ़ा सकते हैं?

परंपरा मायने रखती है, पूर्वज का इनकार नहीं

· 28:53–29:46 · Also a question

दादा ने नहीं चढ़ाया, यह एक विषय है, और परंपरा से चढ़ता है, यह दूसरा, वक्ता कहते हैं। अगर परंपरा से चढ़ता है और उन्होंने नहीं चढ़ाया, तो उन्होंने मनमानी की। अगर चढ़ता है, तो आप चढ़ा सकते हैं, इसमें कोई रोक नहीं — पर यह साफ़ होना चाहिए कि हाँ, चढ़ता है।

58

बिना कारण डर और बेचैनी का क्या उपाय है?

राहु की दशा और पीड़ित चंद्र

· 29:47–30:14 · Also a question

आदित्य नाम के श्रोता से वक्ता कहते हैं कि बिना कारण डर के कारण बहुत हैं। राहु की दशा या अंतर्दशा चल रही हो, कुंडली में चंद्र पीड़ित हो, या सूक्ष्म दशा भी चले, तो वह झटका देकर जाती है। बिना कारण डर लगना, जो हुआ नहीं उसे सोचकर डरना — यह सब होने लगता है। इसलिए एक बार कुंडली का विश्लेषण करवाएँ और सही उपाय करें।

59

सास अपनी ही बेटी का घर तोड़े, इससे बड़ी त्रासदी नहीं; आठवाँ भाव देखा जाए और पत्नी को समझाया जाए

पारिवारिक मामला, आठवाँ भाव और पत्नी को तैयार करना

· 30:15–31:25

वक्ता इसे बहुत खतरनाक और दुखद बात कहते हैं — अगर सास अपनी ही बेटी का घर तोड़ रही है, तो इससे बड़ी त्रासदी कुछ नहीं; घर बसना चाहिए, बिगड़ना या टूटना नहीं चाहिए। वे कहते हैं कि पहले किसी विद्वान ज्योतिषी से जन्म कुंडली के आठवें भाव से जुड़ी हर बात का ठीक से विश्लेषण करवाएँ, ताकि पता चले कौन सा दोष है, क्योंकि यही रिश्ते टूटने का बड़ा कारण है; और दूसरा, अगर पता है कि उनके आने पर ऐसा होता है, तो खुद को मन से तैयार करें और पत्नी को समझाएँ।

60

क्या घर में बटुक भैरव की मूर्ति स्थापित कर सकते हैं?

प्रकाशित प्रतिष्ठा विधि से स्थापना, बटुक भैरव की, काल भैरव की नहीं

· 31:26–32:02 · Also a question

हाँ, बिल्कुल, वक्ता कहते हैं। इसे करने की पूरी विधि चैनल पर उसकी पीडीएफ के साथ डाली गई है — श्री विग्रह प्रतिष्ठा की विधि, गृहस्थ तंत्र खोजिए, मिल जाएगी; उसमें कुबेर जी की प्रतिष्ठा करके दिखाई गई है। बटुक भैरव जी की प्रतिष्ठा का अलग वीडियो भी था, पर दोनों में सब कुछ एक जैसा है। पर श्री विग्रह बटुक भैरव जी का ही हो — ध्यान रखें कि काल भैरव जी का न हो।

61

महीने भर बाहर रहने पर शिवलिंग की घर की पूजा रुक जाए तो क्या दोष लगता है?

यात्रा में मन से प्रार्थना और मानसिक सेवा

· 32:03–32:25 · Also a question

वक्ता कहते हैं बात सीधी और साफ है: जब जाएँ, तो मन से प्रार्थना करके जाएँ कि आपके देवता आपके साथ चलें। आप जहाँ भी रहें, मन से उनकी सेवा और पूजा करते रहें। इसमें कोई दोष नहीं लगने वाला।

62

विद्वान लोग बाकी हर जगह भाव को प्रधान कहते हैं, फिर बस इसी एक जगह क्रिया की प्रधानता ले आते हैं

बाकी हर जगह भाव, बस यहीं क्रिया

· 32:26–32:55

वक्ता कहते हैं जिन्हें विद्वान कहा जाता है, वे ठीक इसी जगह भाव भूल जाते हैं। बाकी हर जगह वे कहते हैं कि भाव ही प्रधान है; और इस जगह क्रिया की प्रधानता ले आते हैं, और श्री विग्रह वगैरह लेकर घूमने लगते हैं, जहाँ-तहाँ पूजा करते हैं। यहाँ भाव नहीं चलता — यहाँ उनकी बुद्धि सीधी उलटी हो जाती है।

63

घर का श्री विग्रह कभी देहरी पार क्यों न करे?

देहरी, और इकट्ठी ऊर्जा का नाश

· 32:56–33:29 · Also a question

वक्ता कहते हैं हम उनसे क्षेत्र का उल्लंघन नहीं करवा सकते; अपने घर की चौखट, देहरी का उल्लंघन नहीं करवा सकते। अगर जगदंबा की शिला या नर्मदेश्वर देहरी पार कर जाएँ, तो वहाँ इकट्ठी सारी शुभ्र शक्तियाँ, हमारे जप-तप की इकट्ठी सारी ऊर्जा नष्ट हो जाती है।

64

सेवा में रखा श्री विग्रह कितना गुप्त रखना चाहिए?

इतना गुप्त कि कोई बाहरी कभी न देखे

· 33:30–34:03 · Also a question

आपके घर के देवता कभी आपके घर की देहरी पार न करें, और दूसरे के घर के देवता का श्री विग्रह आपकी देहरी पार न करे — न बाहर से आएँगे, न यहाँ से जाएँगे। और असली बात यह जानिए कि आपके द्वारा सेवित श्री विग्रह इतना गुप्त हो कि कोई बाहरी व्यक्ति उसे कभी न देखे।

65

प्रसिद्ध वैष्णव संत भी सिखाते हैं कि पूरी कृपा तब मिलती है जब सेवा पूरी तरह गुप्त रहे और कोई न देखे

गुप्त सेवा पर एक प्रसिद्ध वैष्णव संत

· 34:04–34:28

मुझे छोड़िए, वक्ता कहते हैं — प्रसिद्ध वैष्णव संत भी कह रहे हैं कि अगर पूरी कृपा चाहिए, तो सेवा पूरी तरह गुप्त रखकर कीजिए कि कोई उन्हें कभी न देखे। वह वीडियो फेसबुक पर वायरल था। वे कहते हैं कि महाराज जी का नाम याद नहीं आ रहा, पर उनके वीडियो अक्सर साझा करते हैं। तो वे भी यह मानते हैं; पर उनके अनुयायी उनकी बात नहीं मानते।

66

देखा-देखी अब शाक्त लोग भी दुर्गा जी को विंध्याचल और नर्मदेश्वर को काशी ले जाते हैं

दुर्गा जी को विंध्याचल, नर्मदेश्वर को काशी ले जाना

· 34:29–34:52

अब उन्हें देखकर यह शाक्त लोगों में भी चल पड़ा है, वक्ता कहते हैं। शाक्त लोग भी घूमने जाते हैं और दुर्गा जी को विंध्याचल ले जाते हैं; वहाँ गंगा में नहलाने को किसने कहा? लोग घर से नर्मदेश्वर जी को ला रहे हैं, काशी जी में नहलाकर वापस ले जा रहे हैं। वे पूछते हैं, ज़रूरत क्या है?

67

जो परिवार अपनी ही देहरी का उल्लंघन करवाता है, वह खुद अपना नाश लाता है, फिर पूछता है कि कौन सा पाप किया

खुद लाया नाश, फिर सवाल "हमने कौन सा पाप किया"

· 34:53–35:12

अपनी ही देहरी का उल्लंघन करवाकर वे खुद परिवार का नाश करवाते हैं, वक्ता कहते हैं। और जब तांडव मचता है, तो कहते हैं कि हमने कौन सा पाप किया जो हमारे साथ ऐसा हो रहा है। भाई, यही पाप है — और वे मानेंगे नहीं।

उनसे अपनी ही देहरी का उल्लंघन करवाकर वे खुद अपने परिवार का नाश करवाते हैं, वक्ता कहते हैं। और जब तांडव मचता है, तब कहते हैं कि हमने ऐसा कौन सा पाप किया जो हमारे साथ यह हो रहा है। भाई, यही अपराध है। वे मानेंगे नहीं। नहीं मानेंगे; भाव प्रधान है, तो भाव में भाव लो। बैठे-बैठे रोते रहो।

68

क्या तलाक टालने के लिए सप्तशती का कोई उपाय है?

सर्व मंगल मांगल्ये मंत्र से संपुट

· 35:37–36:14 · Also a question

वक्ता पहले कहते हैं कि उनका अपना ऐसा कोई अनुभव नहीं कि वे बता सकें। फिर भी, अगर तलाक टालने के लिए सप्तशती से कोई प्रयोग करना ही है, तो इसमें सबसे अच्छा होगा सर्व मंगल मांगल्ये मंत्र का संपुट लगाकर पाठ करना।

तलाक टालने के लिए सप्तशती से उपाय पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि भाई, उनका अपना ऐसा कोई अनुभव नहीं कि वे इस तरह की कोई बात बता सकें। फिर भी, अगर तलाक टालने के लिए सप्तशती से कोई प्रयोग करना ही है — तो इसमें सबसे अच्छा यह होगा कि सर्व मंगल मांगल्ये वाले मंत्र से संपुट लगाकर पाठ करें।

69

क्या सप्तशती का पाठ महाविद्या क्रम से साप्ताहिक किया जा सकता है?

सात दिन का विभाजन और दुर्गार्चन पद्धति

· 36:27–37:01 · Also a question

हाँ, बिल्कुल, वक्ता श्रोता से कहते हैं। वे कहते हैं कि यह विषय चैनल पर पहले ही डाला है — अगर रोज़ सप्तशती पाठ करना हो, तो सात दिनों में सप्तशती कैसे करते हैं — और पूरी विधि आचार्य शिवदत्त मिश्र शास्त्री जी की श्री दुर्गा सप्तशती पद्धति में, दुर्गार्चन पद्धति में दी है।

70

कौन सा कवच सबसे जल्दी जागता है?

हर कवच पहले से जागृत है; हमारा अपना तत्व नहीं जागता

· 37:02–37:33 · Also a question

भाई देखिए, हर कवच जागृत है, वक्ता कहते हैं। सारे मंत्र जागृत हैं; ऐसा कोई मंत्र नहीं जो जागृत न हो। यह ध्यान रखिए: हमारे भीतर का तत्व नहीं जागता। तो यह आप पर है कि आप उसे कितनी जल्दी जगाएँगे।

71

अगर पितृ प्रेत बनकर खून पी रहे हों तो?

श्राद्ध कर्म और पंचबलि, नहीं तो ऐसा चलता रहेगा

· 37:34–38:06 · Also a question

अगर उनका श्राद्ध कर्म विधि विधान से न हो, और उनकी पंचबलि न हो, तो वे पितृ ज़रूर प्रेत बनकर खून पिएँगे, वक्ता कहते हैं। वे प्रश्नकर्ता को थोड़ी देर पहले अतीश दुबे को उनके पिता के बारे में दिए जवाब की ओर इशारा करते हैं — वही बात यहाँ भी लागू है, और वे विधान करने से प्रेत पीना छोड़ देंगे, अपना हक पाएँगे, और उनकी गति होगी।

72

अगर सूतक पड़ गया हो तो?

सूतक खत्म होने तक रुकें; कार्तिक में ही ठीक

· 38:07–38:18 · Also a question

अगर सूतक पड़ गया है, तो सूतक पूरा होने के बाद करें — हालाँकि, वक्ता जोड़ते हैं, कार्तिक में ही करना ठीक रहता है।

पूछा गया कि अगर सूतक पड़ गया हो तो क्या करें, तो वक्ता कहते हैं कि जब सूतक पूरा हो जाए, उसके बाद कीजिए। हालाँकि, वे जोड़ते हैं, कार्तिक में ही करना ठीक रहता है।

73

आठवें भाव में राहु और नौवें में शुक्र बताकर एक ज्योतिषी ने श्रोता से भैरव शक्ति उपासना छोड़ने को कहा

भैरव उपासना छोड़ने की एक ज्योतिषी की सलाह

· 38:19–38:50

रुद्र प्रताप सिंह नाम के एक श्रोता बताते हैं कि एक ज्योतिषी ने आठवें भाव में राहु और नौवें में शुक्र बताकर कहा कि वे बुरे तांत्रिक बनेंगे, इसलिए भैरव शक्ति उपासना छोड़कर राधा नाम जपें। वक्ता यह सलाह नकारते हैं, कहते हैं कि भैरव जी के साधकों के लिए भूत, प्रेत, पिशाच बड़ी बातें नहीं, और पूछते हैं कि इस आधार पर वे बुरे तांत्रिक क्यों बनेंगे।

74

आठवें भाव का राहु असल में क्या बताता है?

गुप्त शक्तियों और श्मशान से जुड़ी शक्तियों का आकर्षण

· 38:51–39:18 · Also a question

राहु तीव्रता की बात है, वक्ता कहते हैं। अष्टम राहु गुप्त शक्तियों को कुछ ज़्यादा जल्दी खींचता है — या ऐसे कहिए कि इन सब जगहों की शक्तियाँ, खासकर प्रेत और मसान से जुड़ी या श्मशान से जुड़ी, बहुत जल्दी आकर्षित होती हैं।

राहु, वक्ता कहते हैं, तीव्रता की बात है। अष्टम राहु गुप्त शक्तियों को थोड़ा ज़्यादा जल्दी खींचता है — या ऐसे कहिए कि उनका प्रभाव, ये जितनी भी शक्तियाँ हैं, खासकर प्रेत और मसान से जुड़ी, या श्मशान से जुड़ी, इन जगहों की शक्तियाँ बहुत जल्दी आकर्षित होती हैं। सीधी सी बात है।

75

असल में कोई बुरा साधक कैसे बनता है?

परिस्थितियाँ और जानबूझकर चुनाव, कोई ग्रह नहीं

· 39:19–39:56 · Also a question

अगर कोई साधना में बैठे और सही ढंग से करने लगे, तो उसकी इंट्यूशन पावर बहुत जल्दी जागेगी और चीज़ों का तेज़ आकर्षण होगा — यह होगा। पर वह बुरा साधक कब बनता है? बुरा साधक कौन नहीं बन सकता, वक्ता पूछते हैं: ऐसा थोड़े है कि आठवें भाव में बृहस्पति हो तो वह नहीं बनेगा। परिस्थितियाँ बुरा साधक बनाती हैं, और कुछ लोग जानबूझकर यह रास्ता चुनते हैं।

76

शक्ति साधना में भूत-प्रेत साधना की जगह क्या है?

पैशाचिक साधनाएँ कभी स्वतंत्र रूप से नहीं होतीं

· 39:57–40:23 · Also a question

शक्ति साधना के भीतर जो भूत-प्रेत साधना होती है, जो पैशाचिक साधनाएँ आती हैं, वे कभी स्वतंत्र रूप से नहीं होतीं, वक्ता कहते हैं। जो ऊँचे वर्ण के, ऊँचे स्तर के साधक हैं, जो शक्ति और महाशक्तियों की साधना करते हैं, वे इनकी साधना क्रम वाली साधना के भीतर करते हैं। उनकी बात अलग है। वे भूत, प्रेत, पिशाच को स्वतंत्र रूप से सिद्ध करके नहीं रखते।

77

क्या अखंड ज्योति वाले छोटे दीये से दीपदान कर सकते हैं?

इसकी जगह सोई-बत्ती वाला दीया लें

· 40:24–40:38 · Also a question

एक श्रोता पूछते हैं कि क्या अखंड ज्योति वाले छोटे दीये में एक साथ 108 लेकर दीपदान कर सकते हैं, क्योंकि उसमें लंबी बत्ती पूरी नहीं जलती। नहीं भाई, वक्ता कहते हैं — सोई बत्ती वाला दीया लीजिए; वह बेहतर रहेगा।

एक श्रोता पूछते हैं कि क्या अखंड ज्योति वाले छोटे दीये से दीपदान कर सकते हैं, और क्या एक साथ 108 लेना ठीक होगा, क्योंकि उसमें लंबी बत्ती पूरी नहीं जलती। नहीं भाई, वक्ता जवाब देते हैं। इसकी जगह सोई बत्ती वाला दीया लीजिए; वह बेहतर रहेगा।

78

क्या बटुक भैरव को किसी भी देवी के साथ स्थापित कर सकते हैं?

किसी भी देवी के साथ बटुक भैरव की स्थापना

· 40:39–41:00 · Also a question

बटुक भैरव जी की स्थापना, देवी कोई भी हों, आप उनके साथ बिल्कुल कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं।

देवी के साथ बटुक भैरव की स्थापना के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि बटुक भैरव जी की स्थापना — देवी कोई भी हों — आप उनके साथ बिल्कुल कर सकते हैं।

79

क्या घी वाले चावल खिलाने में कोई दोष है?

गाय के लिए ठीक; कुत्तों के लिए ध्यान रखें

· 41:01–41:18 · Also a question

घी के साथ चावल खिलाना दोष की बात नहीं, वक्ता कहते हैं। गौ माता के लिए ठीक है; पर अगर कुत्ते को खिला रहे हैं, तो सब उसे नहीं खा पाएँगे और उन्हें तकलीफ हो सकती है — ऐसी चीज़ खिलाइए जिससे उन्हें नुकसान न हो।

अगर आप घी के साथ चावल खिलाते हैं, तो दोष की बात नहीं उठती, वक्ता कहते हैं। गौ माता के लिए ठीक है। पर अगर कुत्ते को खिला रहे हैं, तो सब उसे नहीं खा पाएँगे, और उन्हें परेशानी भी हो सकती है। ऐसी चीज़ खिलाइए जिससे उन्हें नुकसान न हो। यह बात ध्यान में रखिए।

80

मुखौटे को मूल विग्रह से छुआने की पारिवारिक परंपरा का क्या?

जहाँ पद्धति है, वहाँ निषेध लागू नहीं

· 41:50–42:29 · Also a question

जहाँ पद्धति है, जहाँ परंपरा है, वहाँ बात अलग है, वक्ता भगवती उपासक नाम वाले श्रोता से कहते हैं। हम उसे कभी मना नहीं कर रहे; वह करना ही है। अगर आपके यहाँ नियम है कि आपकी कुलदेवी का रूप, मुखौटा या कोई और चीज़, किसी जगह ले जाकर छुआना है, तो उस पर कोई निषेध नहीं।

81

तीर्थ जाने पर असल में क्या करना चाहिए?

केवल दर्शन, अपना विग्रह छुआना या नहलाना नहीं

· 42:30–42:54 · Also a question

ऐसा नहीं कि विंध्य क्षेत्र जाएँ तो भगवती विंध्यवासिनी से बार-बार छुआना ही है, वक्ता कहते हैं। वहाँ जाकर केवल दर्शन करके लौटना है। वहाँ विग्रह छुआना, गंगा जी में नहलाना — भाव के नाम पर यह सब अपनी संतुष्टि नहीं, विकृति को जन्म देता है।

82

रात्रि सूक्त अनुष्ठान में हवन किन मंत्रों से होता है?

अस्त्र मंत्र को छोड़कर बाकी सब मंत्र

· 42:55–43:16 · Also a question

रात्रि सूक्त में उसमें आए अस्त्र मंत्र को छोड़कर बाकी मंत्रों से हवन होगा।

पूछा गया कि रात्रि सूक्तम् अनुष्ठान में हवन किन मंत्रों से होगा, तो वक्ता जवाब देते हैं कि रात्रि सूक्त में उसमें मौजूद अस्त्र मंत्र को छोड़कर बाकी मंत्रों से हवन होगा।

83

क्या जलधारी चाँदी की बनवा सकते हैं?

चाँदी की जलधारी, और पत्थर वाली का विसर्जन

· 43:37–43:47 · Also a question

आप जलधारी बिल्कुल चाँदी की बनवा सकते हैं, वक्ता कहते हैं, और पत्थर वाली का विसर्जन कर दीजिए।

चाँदी की जलधारी के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि आप बिल्कुल चाँदी की बनवा सकते हैं, और जो पत्थर की है उसका विसर्जन कर दीजिए।

84

क्या यह सच है कि पाँचवें भाव का राहु मातृत्व नहीं देता और दुष्ट संतान देता है?

एक भविष्यवाणी जिसे वे सिरे से नकारते हैं

· 43:48–44:20 · Also a question

एक श्रोता बताती हैं कि सब उनसे कहते हैं कि पाँचवें भाव में राहु होने से उन्हें मातृत्व नहीं मिलेगा, और संतान हुई तो दुष्ट निकलेगी। वक्ता कहते हैं कि इसी से समझ लीजिए ऐसे लोगों को ज्योतिष का कितना ज्ञान है: वे यह नहीं देखेंगे कि लग्नेश की स्थिति क्या है, राहु किसके साथ है, या पाँचवें राहु का दोष कट रहा है या नहीं।

85

ऐसी भविष्यवाणियाँ व्यक्ति-व्यक्ति और कुंडली-कुंडली में अलग होती हैं; सौम्य, दीर्घायु संतान दिखाने वाली कुंडलियों में भी उलटा निकलता है

व्यक्ति-व्यक्ति, कुंडली-कुंडली

· 44:21–44:45

यह व्यक्ति-व्यक्ति, कुंडली-कुंडली में अलग होगा, वक्ता कहते हैं। कितने लोगों की कुंडली से पूरा लगता है कि उनकी संतान दीर्घायु, बहुत सौम्य और बहुत सही होगी — और निकलता बिल्कुल उलटा है। पाँचवें राहु को इतना नकारात्मक में ले जाने की ज़रूरत नहीं।

यह व्यक्ति-व्यक्ति, कुंडली-कुंडली में अलग होगा, वक्ता कहते हैं। ऐसा कभी नहीं हो सकता। कितने लोगों की कुंडली ऐसी है जिससे पूरा लगता है कि उनकी आयु बहुत लंबी है, और उनकी संतान बहुत सौम्य और बहुत सही होगी — और निकलता बिल्कुल उलटा है। पाँचवें भाव के राहु को इतना नकारात्मक में ले जाने की ज़रूरत नहीं।

86

क्या राहु को देवता का पद मिला है?

राहु को देवता का पद मिला है

· 44:46–45:06 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि राहु देव को देवता का पद मिला है। सूर्य और चंद्र के बीच देवता के रूप में जो बैठा है, वह देवता नहीं, असुर है — क्या भगवान को यह पता नहीं था? क्या भगवान नारायण नहीं जानते थे? एक बार खुद सोचिए।

वक्ता कहते हैं कि राहु देव को देवता का पद मिला है। सूर्य और चंद्र भगवान के बीच जो देवता के रूप में बैठा है, वह देवता नहीं, बल्कि असुर है — क्या भगवान को इसकी जानकारी नहीं थी? क्या भगवान नारायण नहीं जानते थे? एक बार खुद सोचिए।

87

मोहिनी अवतार की कथा राहु के बारे में क्या बताती है?

नारायण जानते थे, फिर भी अमृत पीने दिया

· 45:07–45:38 · Also a question

वक्ता पूछते हैं — जब मोहिनी रूप लेकर वे देवताओं को अमृत पिला रहे थे, तब क्या वे उसे पहचान नहीं पाए? क्या ऐसा हो सकता है? जो त्रिकालज्ञ हैं, जिन्हें सब पता है, उन्हें नहीं पता था कि यहाँ बैठा दानव है? फिर भी उन्होंने उसे अमृत पिलाया, जब तक सूर्य देव और चंद्र देव ने नहीं कहा कि प्रभु, यह राक्षस है, दैत्य है। भेद खुलने पर ही उन्होंने सिर काटा।

88

राहु को देवत्व इसलिए मिला क्योंकि वह कहीं न कहीं अधिकारी था, इसलिए उसकी शक्तियों को हमेशा नकारात्मक रूप में लेना ज़रूरी नहीं

वह कहीं अधिकारी था, इसलिए देवत्व मिला

· 45:39–45:51

वक्ता कहते हैं कि वह कहीं न कहीं अधिकारी बना, तभी उसे देवत्व मिला। और जब देवत्व मिल गया, तो उसकी शक्तियों को हमेशा नकारात्मक रूप में लेना क्यों ज़रूरी है? वे कहते हैं कि यह बात समझ नहीं आती।

तो वह कहीं न कहीं अधिकारी बना, तभी उसे देवत्व मिला — वक्ता कहते हैं। और जब देवत्व मिल गया, तो उनकी शक्तियों को हमेशा नकारात्मक रूप में लेने की क्या ज़रूरत है? वे कहते हैं कि यह समझ नहीं आता।

89

राहु और केतु की अरिष्टत्र शक्तियाँ कौन सी देवियाँ हैं?

केतु के लिए छिन्नमस्तिका; राहु के लिए काली, मातंगी और महासरस्वती

· 45:52–46:27 · Also a question

जहाँ केतु की अरिष्टत्र शक्ति भगवती छिन्नमस्तिका बनती हैं, वहीं दस महाविद्याओं में राहु देव की अरिष्टत्र शक्ति स्वयं भगवती काली बनती हैं; भगवती मातंगी बनती हैं; और उसी राहु के लिए भगवती सरस्वती, महासरस्वती अरिष्टत्र बनती हैं। तो उस राहु को हमेशा नकारात्मक में क्यों लेना?

90

पंचम भाव के राहु से जुड़ा सर्प दोष क्या है?

पिछले जन्म में सर्प को हानि पहुँचाने से नाग दोष

· 46:28–46:54 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं कि वे केवल भ्रम की स्थितियाँ बनाते हैं — अगर वे भ्रम दे रहे हैं, तो पूरा मौका भी आपके पास है; और एक बात यह भी है कि व्यक्ति जानबूझकर उसमें आनंद लेने लगता है। दूसरी बात, अगर जन्म कुंडली के पंचम भाव में राहु हो, तो एक दोष सर्प दोष बनता है: कि पिछले जन्म में हमने किसी तरह सर्प को हानि पहुँचाई होगी, जिसके कारण पंचम भाव में राहु की उपस्थिति बनी। इसे नाग दोष माना जाता है।

91

पंचम भाव का नाग दोष किस उपासना से दूर होता है?

शिव और मनसा, नारायण के साथ अनंत, प्रयाग में वासुकि

· 46:55–47:16 · Also a question

जहाँ तक हो सके भगवान शिव और भगवती मनसा की उपासना; भगवान श्री हरि नारायण के साथ अनंत की उपासना; भगवान शिव के साथ वासुकि जी की उपासना। और अगर जीवन में एक बार हो सके, तो तीर्थराज प्रयाग जाकर वासुकि जी के दर्शन-पूजन कर लेना काफ़ी है — पंचम भाव में राहु की उपस्थिति का दोष शांत करने के लिए इतना बहुत है।

92

क्या साधक के लिए पंचम भाव के राहु का अशुभ असर बना रहता है?

पंचम भाव के राहु को आराध्य संभालते हैं

· 47:17–47:30 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि दोष नहीं रहेगा। जो साधक नहीं हैं, जो कोई साधना नहीं करते, जिनका इन बातों से कोई लेना-देना नहीं, उनकी बात अलग है। अगर आप साधक या साधिका हैं, तो चिंता की ज़रूरत नहीं — पंचम भाव के राहु का अशुभ असर कैसे नियंत्रित करना है, यह आपके आराध्य देखेंगे।

वक्ता कहते हैं कि दोष नहीं रहेगा। जो साधक नहीं हैं, जो साधना नहीं करते, जिनका इन बातों से कोई लेना-देना नहीं, उनका विषय अलग है। अगर आप साधक हैं, अगर आप साधिका हैं, तो आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं। आपके आराध्य देखेंगे कि पंचम भाव के राहु का अशुभ असर कैसे नियंत्रित करना है।

93

पंचम भाव का राहु वास्तव में क्या दे सकता है?

बहुत विकसित बुद्धि वाली संतान

· 47:31–47:47 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि रोना कायरों का काम है — कि हमारे पंचम में राहु है, कुछ नहीं होगा। पंचम का राहु ऐसा पुत्र या ऐसी पुत्री दे सकता है जिसकी बुद्धि बहुत विकसित होगी; वह वैज्ञानिक तक बन सकता है, उसमें इतनी क्षमता होगी। ऐसा व्यक्ति अलग निकलता है, दूसरों से बहुत अलग सोचने की क्षमता रखता है। वह दुष्ट नहीं होता।

94

पंचम में राहु या सप्तम में सूर्य जैसे एक ही कारक से बनाए गए पैमाने बाकी ग्रहों को अनदेखा कर देते हैं

पंचम में राहु, सप्तम में सूर्य, और बाकी ग्रह

· 47:48–48:25

वक्ता कहते हैं कि लोगों ने पैमाने बना रखे हैं — पंचम में राहु है तो बेटा बिगड़ जाएगा, या गर्भपात होगा, यह होगा, वह होगा; सप्तम में सूर्य देव हैं तो तलाक होना तय है। भाई, और ग्रह भी हैं, बाकी आठ ग्रह हैं, उन्हें भी थोड़ा देखिए। वे भी हेलो कह रहे हैं — उनका क्या अपराध है, क्या दोष है, कि एक ही से भविष्यवाणी हो रही है?

95

काशी में कौन सा स्थान रोज़ भगवान को हरिहर रूप में धारण करता है?

केदार क्षेत्र में गौरी केदारेश्वर

· 48:26–48:58 · Also a question

वक्ता बताते हैं — काशी जी का केदार क्षेत्र: भगवान गौरी केदारेश्वर जी, जो रोज़ इन दोनों रूपों में विराजमान रहते हैं — साक्षात हरिहर रूप में और शिव-शक्ति रूप में। वहाँ पाठ करें तो पूरा फल देता है; भगवान शिव की पूजा या अनुष्ठान करें तो वह भी पूरा फल देता है, और वहाँ साधारण दिनों में सात गुना अधिक फल मिलता है; और भगवान श्री हरि नारायण की उपासना भी वहाँ कई गुना फलदायी होती है।

96

केदार खंड के केदार घाट पर दर्शन से क्या मिलता है?

केवल दर्शन से पल भर में पाप नष्ट

· 48:59–50:11 · Also a question

इन तीनों महाशक्तियों का क्षेत्र केदार खंड में केदार घाट पर मिलता है, जहाँ गौरी केदारेश्वर महादेव आज भी साक्षात अपने मूल रूप में विराजमान हैं। वहाँ केवल दर्शन से जीवन के बहुत से दोष, बहुत से पाप पल भर में नष्ट हो जाते हैं।

वक्ता कहते हैं कि इन तीनों महाशक्तियों का क्षेत्र केदार खंड में मिलता है — गौरी केदारेश्वर महादेव, जो आज भी केदार घाट पर साक्षात अपने मूल रूप में विराजमान हैं। वहाँ केवल दर्शन से ही जीवन के बहुत से दोष, बहुत से पाप पल भर में नष्ट हो जाते हैं।

97

वैकुंठ चतुर्दशी और कार्तिक पूर्णिमा पर मुख्य काम क्या है?

दीपदान, कम से कम ग्यारह दीपक

· 50:12–50:39 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि सबसे पहली बात दीपदान है। भगवान शिव, भगवती दुर्गा और भगवान श्री हरि नारायण के मंदिरों में दीपदान ज़रूर करें। ग्यारह से कम दीपक न जलाएँ — कल और परसों, दोनों दिन, संध्या के समय मंदिर में ग्यारह दीपक ज़रूर जलाएँ।

98

उन दो दिनों में कौन सा जप करना चाहिए?

अपना इष्ट मंत्र, या जो मंत्र आपने सिद्ध किया हो

· 50:40–50:53 · Also a question

दूसरी बात यह कि इन दो दिनों में आपका जो भी इष्ट मंत्र हो — पंचाक्षरी मंत्र, या कोई और एकाक्षरी, कोई भी मंत्र जिसका सिद्धि विधान आपने नवरात्र आदि में किया हो — उसे कल और परसों, संध्या के समय या रात को, जितना हो सके, ज़रूर करें।

वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि इन दो दिनों में आपका जो भी इष्ट मंत्र हो — पंचाक्षरी मंत्र का मंत्र, या कोई और एकाक्षरी मंत्र, कोई भी मंत्र जिसकी मंत्र सिद्धि का विधान आपने नवरात्र आदि में किया हो — उसे कल और परसों, संध्या के समय या रात के समय, जितना हो सके, ज़रूर करें।

99

वैकुंठ चतुर्दशी पर शिव को क्या अर्पित करना चाहिए?

कमल, या 108 नामों के साथ कमल गट्टा

· 50:54–51:29 · Also a question

अगर एक या दो कमल के फूल मिल जाएँ, तो घर में विराजमान भगवान शिव की सेवा-पूजा करके कल एक कमल का फूल ज़रूर चढ़ाएँ, और एक मंदिर ले जाकर वहाँ चढ़ाएँ। जहाँ तक हो सके, वैकुंठ चतुर्दशी के दिन भगवान शिव पर कम से कम एक कमल ज़रूर चढ़ना चाहिए। कमल न मिले, तो कमल गट्टा, यानी कमल का बीज चढ़ाएँ, और उससे 108 नामों से भगवान शिव का अर्चन करें — यह और भी अच्छा है।

100

कार्तिक पूर्णिमा के दिन क्या करना चाहिए?

हवन, और त्रिपुर सुंदरी का बृहद अनुष्ठान

· 51:30–52:17 · Also a question

परसों, जो कार्तिक पूर्णिमा है, जहाँ तक हो सके हवन करें — अपने आराध्य की 108 नामावली से, या जिस मंत्र का जप करते हैं उससे; हो सके तो हवन ज़रूर करें। वक्ता यह भी बताते हैं कि उनके अपने गृहस्थ तंत्र परिवार के अनुष्ठान में, इस बार त्रिपुरा पूर्णिमा होने से, भगवती त्रिपुर सुंदरी का पूरा बृहद अनुष्ठान आयोजित हो रहा है।

101

काशी क्षेत्र और विंध्य क्षेत्र में अलग से और अनुष्ठान होते हैं, जिनका फ़ॉर्म सामग्री साइट पर है

अलग अनुष्ठान, और सामग्री साइट पर फ़ॉर्म

· 52:18–52:59

काशी क्षेत्र और विंध्य क्षेत्र में अलग से और अनुष्ठान होंगे, जिनकी सूचना वे ग्रुप में देंगे। वे कहते हैं कि वहाँ न करवाएँ, तो भी घर पर खुद ज़रूर करें, क्योंकि तीर्थ क्षेत्र में पुण्य करने पर वह कई गुना मिलता है।

102

वैकुंठ चतुर्दशी और कार्तिक पूर्णिमा पर गौशाला में क्या करना चाहिए?

गौशाला में एक दीपक

· 53:00–53:12 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि घर पर दीपदान ज़रूर करें। और अगर आपके पास कोई गौशाला हो, तो गौशाला में, जहाँ गौ माता रखी जाती हैं, एक भी दीपक जला दें तो बहुत उत्तम होगा।

वक्ता कहते हैं कि घर पर दीपदान ज़रूर करें। और अगर आपके आसपास कोई गौशाला हो, तो गौशाला में, जहाँ गौ माता रखी जाती हैं, एक भी दीपक जला दें, तो बहुत ही उत्तम होगा।

103

गौशाला में गाय को धूना देने से क्या होता है?

गौशाला में उपले और सुगंधित द्रव्य

· 53:13–53:49 · Also a question

अगर वैकुंठ चतुर्दशी के दिन गौशाला में उपले जलाकर तरह-तरह के सुगंधित द्रव्यों से धुआँ किया जाए, तो भगवती गौ की कृपा से शरीर के रोग आदि नष्ट होते हैं। जिन्हें तरह-तरह के रोग हों, वे हो सके तो संध्या के समय गौशाला में धूप करें।

104

गौ माता घर पर रखी हों तो वहाँ करना उत्तम है, और बाहर रखी हों तो वहाँ करना भी उतना ही उत्तम है

दोनों जगह उत्तम

· 53:50–53:55

अगर आप गौ माता को घर पर रखते हैं और वहीं कर रहे हैं, तो वह भी उत्तम है; अगर वे बाहर हैं और आप वहाँ करते हैं, तो वह भी उत्तम है।

वक्ता कहते हैं कि अगर आप गौ माता को घर पर रखते हैं और वहीं कर रहे हैं, तो वह भी उत्तम है। अगर वे बाहर हैं और आप वहाँ करते हैं, तो वह भी उत्तम है।

105

वैकुंठ चतुर्दशी और कार्तिक पूर्णिमा पर सुबह का क्रम क्या है?

सूर्योदय से पहले स्नान, सूर्य नारायण, फिर इष्ट और शिव

· 53:56–54:08 · Also a question

इन दो दिनों, वैकुंठ चतुर्दशी और कार्तिक पूर्णिमा पर: सूर्योदय से पहले स्नान, और सूर्य नारायण के पूजन के बाद अपने इष्ट आराध्य का पूजन, भगवान शिव का विशेष पूजन, और कमल का फूल अर्पित करना — सुबह के समय।

वक्ता कहते हैं — इन दो दिनों, वैकुंठ चतुर्दशी और कार्तिक पूर्णिमा पर: सूर्योदय से पहले स्नान, और सूर्य नारायण के पूजन के बाद अपने इष्ट आराध्य का पूजन, भगवान शिव का विशेष पूजन, और कमल का फूल अर्पित करना। सुबह के समय।

106

वैकुंठ चतुर्दशी और कार्तिक पूर्णिमा पर शाम का क्रम क्या है?

घर पर दीपदान, गौशाला में धूना, मंदिरों में ग्यारह दीपक

· 54:09–54:22 · Also a question

संध्या के समय: घर पर दीपदान; गौशाला में धूना और दीपदान; और भगवान शिव के मंदिर, दुर्गा जी के मंदिर, भगवान नारायण के मंदिर और आसपास जो भी मंदिर हों, उनमें कम से कम ग्यारह दीपदान। वक्ता कहते हैं कि ये अनिवार्य काम बन जाते हैं।

वक्ता कहते हैं — संध्या के समय: घर पर दीपदान; गौशाला में धूना और दीपदान; और भगवान शिव के मंदिर, दुर्गा जी के मंदिर, भगवान नारायण के मंदिर, और आसपास जो भी मंदिर हों, उनमें कम से कम ग्यारह दीपदान। ये अनिवार्य विषय बन जाते हैं।

107

साधक वर्ग को दोनों पर्व दिनों में से कम से कम एक दिन अपने मंत्रों का जप और हवन करना चाहिए

दोनों में से कम से कम एक दिन जप और हवन

· 54:23–54:30

इसके अलावा, साधक वर्ग अगर अपने मंत्रों का जप और हवन करे — कल या परसों, दोनों में से कम से कम एक दिन करें — तो यह सबसे उत्तम हो जाता है।

वक्ता कहते हैं — इसके अलावा, जो साधक वर्ग है, वे अगर अपने मंत्रों का जप और हवन करें, तो दोनों में से कम से कम एक दिन, कल या परसों, करें। ऐसा हो, तो यह सबसे उत्तम हो जाता है।

108

ये तिथियाँ पर्व तिथियाँ क्यों हैं?

त्रिपुरासुर, ब्रह्मा का वरदान और तीन उड़ते पुर

· 54:31–55:04 · Also a question

वक्ता कहते हैं — त्रिपुरासुर के कारण, जिसकी कथा हमने शिव महापुराण के लाइव में सुनी है। भगवान ब्रह्मा जी से वरदान पाकर उन्होंने आकाश में स्थित तीन पुरों की रचना की। वरदान यह माँगा कि जब उनके तीनों उड़ते पुर किसी विशेष तिथि और नक्षत्र में एक ही सीध में आएँ और कोई उन्हें एक ही बाण से भेदे, तभी वे नष्ट हों।

शास्त्र क्या कहता है

The three sons of Tārakāsura obtained a boon from Brahmā that their three flying cities could be destroyed only if all three came into a single line at once (a conjunction fated to recur only once in a thousand years) and were struck by a single arrow.

मूल पाठ पढ़ें →
1

श्रुतमस्माभिरानन्दप्रदं चरितमुत्तमम् गृहस्थस्यैव शम्भोश्च गणस्कन्दादिसत्कथम्॥ १

हमने गणेश और स्कन्द आदिकी सत्कथासे युक्त, गृहस्थ शम्भुके आनन्दप्रद उत्तम चरित्रको सुना है।

2

इदानीं ब्रूहि सुप्रीत्या चरितं वरमुत्तमम् शङ्करो हि यथा रुद्रो जघान विहरन् खलान्॥ २

अब अत्यन्त प्रेमपूर्वक वह श्रेष्ठ एवं उत्तम चरित्र कहिये कि विहार करते हुए शंकर रुद्रने किस प्रकार दुष्टोंका वध किया।

3

कथं ददाह भगवान्नगराणि सुरद्विषाम् त्रीण्येकेन च बाणेन युगपत्केन वीर्यवान्॥ ३

बलशाली भगवान्ने देवद्वेषी दैत्योंके तीनों नगरोंको एक ही बाणसे एक साथ किस प्रकार जलाया?

4

एतत्सर्वं समाचक्ष्व चरितं शशिमौलिनः देवर्षिसुखदं शश्वन्मायाविहरतः प्रभोः॥ ४

जो देवताओं और ऋषियोंको सुख देनेवाला है तथा जो अपनी मायासे सदा विहार करनेवाले प्रभुका है, शशिमौलि शिवका वह सम्पूर्ण चरित्र मुझे बतलाइये।

5

एवमेतत्पुरा पृष्टो व्यासेन ऋषिसत्तम सनत्कुमारं प्रोवाच तदेव कथयाम्यहम्॥ ५

हे ऋषिश्रेष्ठ! पूर्वकालमें व्यासजीने सनत्कुमारसे यही बात पूछी थी; तब सनत्कुमारजीने जो कुछ कहा था, वही बात अब मैं आपसे कहता हूँ।

6

शृणु व्यास महाप्राज्ञ चरितं शशिमौलिनः यथा ददाह त्रिपुरं बाणेनैकेन विश्वहृत्॥ ६

हे व्यास! हे महाप्राज्ञ! विश्वको मोहित करनेवाले शिवका वह चरित्र सुनो, जिस प्रकार उन्होंने एक ही बाणसे त्रिपुरको जला दिया।

7

शिवात्मजेन स्कन्देन निहते तारकासुरे तत्पुत्रास्तु त्रयो दैत्याः पर्यतप्यन्मुनीश्वर॥ ७

हे मुनीश्वर! शिवपुत्र स्कन्दके द्वारा तारकासुरका वध हो जानेपर उसके तीनों पुत्र दैत्य अत्यन्त सन्तप्त हुए।

8

तारकाक्षस्तु तज्ज्येष्ठो विद्युन्माली च मध्यमः कमलाक्षः कनीयांश्च सर्वे तुल्यबलाः सदा॥ ८

उनमें तारकाक्ष ज्येष्ठ, विद्युन्माली मध्यम तथा कमलाक्ष कनिष्ठ था; वे सभी सदा समान बलवाले थे।

9

जितेन्द्रियाः सुसन्नद्धाः संयताः सत्यवादिनः दृढचित्ता महावीरा देवद्रोहिण एव च॥ ९

वे जितेन्द्रिय, सुसज्जित, संयमी, सत्यवादी, दृढ़चित्त, महावीर तथा देवताओंके द्रोही थे।

10

ते तु मेरुगुहां गत्वा तपश्चक्रुर्महाद्भुतम् त्रयः सर्वान्सुभोगांश्च विहाय सुमनोहरान्॥ १०

वे तीनों मेरुकी गुफामें जाकर समस्त मनोहर भोगोंको त्यागकर अत्यन्त अद्भुत तप करने लगे।

11

वसन्ते सर्वकामांश्च गीतवादित्रनिस्स्वनम् विहाय सोत्सवं तेपुस्त्रयस्ते तारकात्मजाः॥ ११

तारकाके वे तीनों पुत्र वसन्त-ऋतुमें उत्सव, गीत-वाद्यकी ध्वनि तथा समस्त कामनाओंको त्यागकर तप करते रहे।

12

ग्रीष्मे सूर्यप्रभां जित्वा दिक्षु प्रज्वाल्य पावकम् तन्मध्यसंस्थाः सिद्ध्यर्थं जुहुवुर्हव्यमादरात्॥ १२

ग्रीष्म-ऋतुमें सूर्यके तेजको जीतकर उन्होंने चारों ओर अग्नि प्रज्वलितकर उसके मध्यमें स्थित हो सिद्धिके लिये आदरपूर्वक हव्यकी आहुति दी।

13

महाप्रतापपतिताः सर्वेऽप्यासन् सुमूर्च्छिताः वर्षासु गतसन्त्रासा वृष्टिं मूर्द्धन्यधारयन्॥ १३

अत्यन्त तेजसे सन्तप्त होकर वे सब मूर्च्छित हो जाते थे, और वर्षाकालमें निर्भय होकर सिरपर वृष्टि सहते थे।

14

शरत्काले प्रभूतं तु भोजनं तु बुभुक्षिताः रम्यं स्निग्धं स्थिरं हृद्यं फलं मूलमनुत्तमम्॥ १४

शरत्कालमें भूखे रहते हुए भी उनके पास रम्य, स्निग्ध, स्थिर, हृद्य तथा अत्युत्तम फल-मूलरूप प्रचुर भोजन था,

15

संयमात्क्षुत्तृषो जित्वा पानान्युच्चावचान्यपि बुभुक्षितेभ्यो दत्त्वा तु बभूवुरुपला इव॥ १५

जिसे संयमपूर्वक भूख-प्यासको जीतकर तथा नाना प्रकारके पेय पदार्थ भी भूखोंको दानकर वे मानो पत्थरके समान हो गये।

16

संस्थितास्ते महात्मानो निराधाराश्चतुर्दिशम् हेमन्ते गिरिमाश्रित्य धैर्येण परमेण तु॥ १६

वे महात्मा हेमन्त-ऋतुमें चारों दिशाओंमें निराधार खड़े होकर, परम धैर्यके साथ पर्वतका आश्रय लेकर,

17

तुषारदेहसञ्छन्ना जलक्लिन्नेन वाससा आसाद्य देहं क्षौमेण शिशिरे तोयमध्यगाः॥ १७

तुषारसे आच्छादित शरीरवाले तथा जलसे भीगे वस्त्र धारणकर, शिशिर-ऋतुमें रेशमी वस्त्रसे देहको ढककर जलके बीचमें खड़े रहे।

18

अनिर्विण्णास्ततः सर्वे क्रमशोऽवर्द्धयंस्तपः तेपुस्त्रयस्ते तत्पुत्रा विधिमुद्दिश्य सत्तमाः॥ १८

विषादरहित होकर वे सब क्रमशः अपने तपको बढ़ाते गये; इस प्रकार वे तीनों श्रेष्ठ पुत्र ब्रह्माजीको उद्देश्य करके तप करते रहे।

19

तप उग्रं समास्थाय नियमे परमे स्थिताः तपसा कर्षयामासुर्देहान् स्वान् दानवोत्तमाः॥ १९

उग्र तपमें स्थित होकर परम नियमका पालन करते हुए वे श्रेष्ठ दानव तपस्याके द्वारा अपने शरीरको सुखाने लगे।

20

वर्षाणां शतकं चैव पदमेकं निधाय च भूमौ स्थित्वा परं तत्र तेपुस्ते बलवत्तराः॥ २०

सौ वर्षतक एक पैरके सहारे पृथ्वीपर खड़े होकर वे अति बलवान् दैत्य वहाँ परम तप करते रहे।

21

ते सहस्रं तु वर्षाणां वातभक्षाः सुदारुणाः तपस्तेपुर्दुरात्मानः परं तापमुपागताः॥ २१

वे दारुण एवं दुरात्मा दैत्य हजार वर्षतक वायुका भक्षण करते हुए महान् कष्टसे युक्त होकर तप करते रहे।

22

वर्षाणां तु सहस्रं वै मस्तकेनास्थितास्तथा वर्षाणां तु शतेनैव ऊर्ध्वबाहव आस्थिताः॥ २२

वे एक हजार वर्षतक सिरके बल खड़े रहे, और सौ वर्षतक दोनों भुजाओंको ऊपर उठाये रहे।

23

एवं दुःखं परं प्राप्ता दुराग्रहपरा इमे ईदृक् ते संस्थिता दैत्या दिवारात्रमतन्द्रिता॥ २३

इस प्रकार दुराग्रहमें तत्पर होकर उन्होंने परम दुःख प्राप्त किया; वे दैत्य दिन-रात आलस्यरहित होकर इसी प्रकार स्थित रहे।

24

एवं तेषां गतः कालो महान् सुतपतां मुने ब्रह्मात्मनां तारकाणां धर्मेणेति मतिर्मम॥ २४

हे मुने! इस प्रकार धर्मपूर्वक तप करनेवाले तथा ब्रह्माजीमें मन लगाये उन तारकपुत्रोंका बहुत बड़ा काल बीत गया, ऐसा मेरा विचार है।

25

प्रादुरासीत्ततो ब्रह्मा सुरासुरगुरुर्महान् सन्तुष्टस्तपसा तेषां वरं दातुं महायशाः॥ २५

तब सुर-असुरोंके महान् गुरु, महायशस्वी ब्रह्माजी उनके तपसे सन्तुष्ट होकर वर देनेके लिये प्रकट हुए।

26

मुनिदेवासुरैः सार्द्धं सान्त्वपूर्वमिदं वचः ततस्तानब्रवीत्सर्वान् सर्वभूतपितामहः॥ २६

सर्वभूतोंके पितामह ब्रह्माजीने मुनियों, देवताओं तथा असुरोंके साथ जाकर उन सभीसे यह सान्त्वनापूर्ण वचन कहा—

27

प्रसन्नोऽस्मि महादैत्या युष्माकं तपसा मुने सर्वं दास्यामि युष्मभ्यं वरं ब्रूत यदीप्सितम्॥ २७

"मैं तुमलोगोंके तपसे प्रसन्न हूँ, हे महादैत्यो! मैं तुमलोगोंको सब कुछ दूँगा; जो तुम्हें अभीष्ट हो, वह वर माँगो।"

28

किमर्थं सुतपस्तप्तं कथयध्वं सुरद्विषः सर्वेषां तपसो दाता सर्वकर्तास्मि सर्वदा॥ २८

"हे देवद्वेषियो! बताओ कि तुमने यह कठोर तप किस उद्देश्यसे किया है; मैं सबकी तपस्याका फलदाता तथा सदा सबका रचयिता हूँ।"

29

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शनैस्ते स्वात्मनो गतम् ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे प्रणिपत्य पितामहम्॥ २९

उनका यह वचन सुनकर वे धीरे-धीरे अपनी सुधमें आये, और हाथ जोड़कर पितामहको प्रणाम करके सब बोले—

30

यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरस्त्वया अवध्यत्वं च सर्वेषां सर्वभूतेषु देहिनः॥ ३०

"हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और आप वर देना चाहते हैं, तो सब प्राणियोंमें हमें अवध्यता प्रदान कीजिये।"

31

स्थिरान् कुरु जगन्नाथ पान्तु नः परिपन्थिनः जरारोगादयः सर्वे नास्मान्मृत्युरगात् क्वचित्॥ ३१

"हे जगन्नाथ! हमें अचल कर दीजिये; कोई शत्रु हमें पराजित न कर सके; जरा-रोग आदि हमें कहीं भी प्राप्त न हों, और मृत्यु हमारे पास कभी न आये।"

32

अजराश्चामराः सर्वे भवाम इति नो मतम् समृत्यवः करिष्यामः सर्वानन्यांस्त्रिलोकके॥ ३२

"हमारा यह विचार है कि हम सब अजर-अमर हो जायँ, और त्रिलोकीमें अन्य सभी प्राणियोंको मृत्युके अधीन बना दें।"

33

लक्ष्म्या किं तद्विपुलया किं कार्यं हि पुरोत्तमैः अन्यैश्च विपुलैर्भोगैः स्थानैश्वर्येण वा पुनः॥ ३३

"उस विपुल लक्ष्मीसे क्या प्रयोजन, श्रेष्ठ नगरोंसे अथवा अन्य विपुल भोगों, स्थानों तथा ऐश्वर्यसे भी क्या प्रयोजन—"

34

यत्रैव मृत्युना ग्रस्तो नियतं पञ्चभिर्दिनैः व्यर्थं तस्याखिलं ब्रह्मन् निश्चितं न इतीव हि॥ ३४

"जब पाँच ही दिनोंमें मृत्युके द्वारा ग्रसित हो जानेपर वह सब कुछ व्यर्थ हो जाता है, हे ब्रह्मन्! इसमें कोई सन्देह नहीं है।"

35

इति श्रुत्वा वचस्तेषां दैत्यानां च तपस्विनाम् प्रत्युवाच शिवं स्मृत्वा स्वप्रभुं गिरिशं विधिः॥ ३५

उन तपस्वी दैत्योंकी यह बात सुनकर, अपने स्वामी शिवका स्मरण करते हुए ब्रह्माजीने उत्तर दिया।

36

नास्ति सर्वामरत्वं च निवर्तध्वमतोऽसुराः अन्यं वरं वृणीध्वं वै यादृशो वो हि रोचते॥ ३६

"हे असुरो! पूर्ण अमरत्व सम्भव नहीं है, अतः इस आग्रहसे निवृत्त हो जाओ और तुम्हें जो अच्छा लगे, वह दूसरा वर माँग लो।"

37

जातो हनिष्यते नूनं जन्तुः कोऽप्यसुराः क्वचित् अजरश्चामरो लोके न भविष्यति भूतले॥ ३७

"जो भी प्राणी जन्म लेता है, वह अवश्य ही कहीं-न-कहीं मारा जायेगा; इस भूतलपर कोई भी अजर-अमर नहीं हो सकेगा,"

38

ऋते तु खण्डपरशोः कालकालाद्धरेस्तथा तौ धर्माधर्मपरमावव्यक्तौ व्यक्तरूपिणौ॥ ३८

"सिवाय खण्डपरशु अर्थात् शिवके तथा काल-के-भी-काल हरि अर्थात् विष्णुके; वे दोनों धर्म-अधर्मसे परे, अव्यक्त होते हुए भी व्यक्तरूपमें प्रकट हैं।"

39

सम्पीडनाय जगतो यदि स क्रियते तपः सफलं तद्गतं वेद्यं तस्मात्सुविहितं तपः॥ ३९

"यदि जगत्को पीड़ा पहुँचानेके लिये तप किया जाय, तो उसका फल नष्ट समझना चाहिये; अतः तप सुविहित होना चाहिये।"

40

तद्विचार्य स्वयं बुद्ध्या न शक्यं यत्सुरासुरैः दुर्लभं वा सुदुस्साध्यं मृत्युं वञ्चयतानघाः॥ ४०

"हे अनघो! तुमलोग स्वयं बुद्धिसे विचार करके ऐसी मृत्युको चुनकर उसका अतिक्रमण करो, जो देवताओं और असुरोंसे भी सम्भव न हो, या जो दुर्लभ अथवा अत्यन्त दुःसाध्य हो।"

41

तत्किञ्चिन्मरणे हेतुं वृणीध्वं सत्त्वमाश्रिताः येन मृत्युर्नैव वृतो रक्षतस्तत्पृथक् पृथक्॥ ४१

"अपने सत्त्वका आश्रय लेकर मरणका कोई विशेष कारण चुन लो, और उस कारणसे अपनी-अपनी रक्षा अलग-अलग करते रहो, जिससे मृत्यु सहज न हो।"

42

एतद्विधिवचः श्रुत्वा मुहूर्त्तं ध्यानमास्थिताः प्रोचुस्ते चिन्तयित्वाथ सर्वलोकपितामहम्॥ ४२

ब्रह्माका यह वचन सुनकर वे एक मुहूर्ततक ध्यानमें स्थित रहे, फिर विचार करके सर्वलोकपितामह ब्रह्मासे बोले—

43

भगवन्नास्ति नो वेश्म पराक्रमवतामपि अधृष्याः शात्रवानां तु यन्न वत्स्यामहे सुखम्॥ ४३

"हे भगवन्! हम पराक्रमी होते हुए भी हमारे पास ऐसा कोई निवास नहीं है, जो शत्रुओंसे अधृष्य हो और जिसमें हम सुखसे रह सकें।"

44

पुराणि त्रीणि नो देहि निर्मायात्यद्भुतानि हि सर्वसम्पत्समृद्धान्यप्रधृष्याणि दिवौकसाम्॥ ४४

"आप हमें निर्माण कराकर तीन परम अद्भुत नगर दीजिये, जो सम्पूर्ण सम्पत्तिसे समृद्ध हों और देवताओंके लिये भी अधृष्य हों।"

45

वयं पुराणि त्रीण्येवं समास्थाय महीमिमाम् चरिष्यामो हि लोकेश त्वत्प्रसादाज्जगद्गुरो॥ ४५

"हे लोकेश! हे जगद्गुरो! आपकी कृपासे हम इन तीनों नगरोंमें स्थित होकर इस पृथ्वीपर विचरण करेंगे।"

46

तारकाक्षस्ततः प्राह यदभेद्यं सुरैरपि करोति विश्वकर्मा तन्मम हेममयं पुरम्॥ ४६

तब तारकाक्षने कहा—"विश्वकर्मा मेरे लिये देवताओंसे भी अभेद्य वह स्वर्णमय नगर बनायें।"

47

ययाचे कमलाक्षस्तु राजतं सुमहत्पुरम् विद्युन्माली च संहृष्टो वज्रायसमयं महत्॥ ४७

कमलाक्षने विशाल रजतमय नगरकी याचना की, और विद्युन्मालीने अत्यन्त प्रसन्न होकर वज्रके समान विशाल लौहमय नगर माँगा।

48

पुरेष्वेतेषु भो ब्रह्मन्नेकस्थानस्थितेषु च मध्याह्नाभिजिते काले शीतांशौ पुष्य संस्थिते॥ ४८

"हे ब्रह्मन्! जब ये तीनों नगर एक ही स्थानपर स्थित हों, मध्याह्नकालमें अभिजित् मुहूर्तमें, चन्द्रमा पुष्य नक्षत्रपर हो,"

49

उपर्युपर्यदृष्टेषु व्योम्नि लीलाभ्रसंस्थिते वर्षत्सु कालमेघेषु पुष्करावर्तनामसु॥ ४९

"आकाशमें एक-दूसरेके ऊपर अदृष्ट होकर लीलामय बादलोंपर स्थित हों, तथा पुष्कर और आवर्त नामके कालमेघ वर्षा कर रहे हों,"

50

तथा वर्षसहस्रान्ते समेष्यामः परस्परम् एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येतानि नान्यथा॥ ५०

"उस समय हजार वर्षके अन्तमें हम परस्पर मिलेंगे, और ये तीनों नगर भी एक हो जायँगे, अन्यथा नहीं।"

51

सर्वदेवमयो देवः सर्वेषां मे कुहेलया असम्भवे रथे तिष्ठन् सर्वोपस्करणान्विते॥ ५१

"सम्पूर्ण देवताओंसे युक्त कोई एक देव, हम सबको छलते हुए, समस्त युद्धसामग्रीसे युक्त एक असम्भव रथपर बैठकर,"

52

असम्भाव्यैककाण्डेन भिनत्तु नगराणि नः निर्वैरः कृत्तिवासास्तु योऽस्माकमिति नित्यशः॥ ५२

"एक असम्भाव्य बाणसे हमारे नगरोंको भेद डाले—और वह वही हो, जो हमसे सदा निर्वैर हो तथा मृगचर्मधारी हो,"

53

वन्द्यः पूज्योऽभिवाद्यश्च सोऽस्माकं निर्दहेत्कथम् इति चेतसि सन्धाय तादृशो भुवि दुर्लभः॥ ५३

"जो हमारे लिये सदा वन्दनीय, पूज्य तथा अभिवादनके योग्य है, वह हमें कैसे जला सकेगा—यही मनमें सोचकर उन्होंने यह वर माँगा, क्योंकि पृथ्वीपर ऐसा कोई दुर्लभ ही है।"

54

एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां ब्रह्मा लोकपितामहः एवमस्त्विति तान् प्राह सृष्टिकर्ता स्मरन् शिवम्॥ ५४

उनका यह वचन सुनकर सृष्टिकर्ता, लोकपितामह ब्रह्माजीने शिवका स्मरण करते हुए उनसे कहा—"ऐसा ही हो।"

55

आज्ञां ददौ मयस्यापि कुरु त्वं नगरत्रयम् काञ्चनं राजतं चैव आयसं चेति भो मय॥ ५५

उन्होंने मयको भी आज्ञा दी—"हे मय! तुम सोने, चाँदी तथा लोहेके तीन नगरोंका निर्माण करो।"

56

इत्यादिश्य मयं ब्रह्मा प्रत्यक्षं प्राविशद्दिवम् तेषां तारकपुत्राणां पश्यतां निजधाम हि॥ ५६

इस प्रकार मयको आदेश देकर ब्रह्माजी उन तारकपुत्रोंके देखते-देखते साक्षात् स्वर्गलोकको चले गये।

57

ततो मयश्च तपसा चक्रे धीरः पुराण्यथ काञ्चनं तारकाक्षस्य कमलाक्षस्य राजतम्॥ ५७

तदनन्तर धैर्यशाली मयने अपने तपोबलसे नगरोंका निर्माण किया—तारकाक्षके लिये सुवर्णका, कमलाक्षके लिये रजतका,

58

विद्युन्माल्यायसं चैव त्रिविधं दुर्गमुत्तमम् स्वर्गे व्योम्नि च भूमौ च क्रमाज्ज्ञेयानि तानि वै॥ ५८

तथा विद्युन्मालीके लिये लोहेका—इस प्रकार तीन प्रकारके उत्तम दुर्ग बनाये, जो क्रमशः स्वर्गमें, आकाशमें तथा भूमिपर जानने चाहिये।

59

दत्त्वा तेभ्योऽसुरेभ्यश्च पुराणि त्रीणि वै मयः प्रविवेश स्वयं तत्र हितकामपरायणः॥ ५९

उन असुरोंको तीनों नगर देकर मय स्वयं भी उनके हितकी कामनासे उसी पुरीमें प्रविष्ट हो गया।

60

एवं पुरत्रयं प्राप्य प्रविष्टास्तारकात्मजाः बुभुजुः सकलान्भोगान्महाबलपराक्रमाः॥ ६०

इस प्रकार तीनों नगरोंको प्राप्तकर महाबली तथा पराक्रमी वे तारकपुत्र उनमें प्रविष्ट हुए और सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करने लगे।

61

कल्पद्रुमैश्च सङ्कीर्णं गजवाजिसमाकुलम् नानाप्रासादसङ्कीर्णं मणिजालसमावृतम्॥ ६१

वे नगर कल्पवृक्षोंसे व्याप्त, हाथी-घोड़ोंसे परिपूर्ण, नाना प्रकारके प्रासादोंसे भरे तथा मणियोंके जालसे आच्छादित थे;

62

सूर्यमण्डलसङ्काशैर्विमानैः सर्वतोमुखैः पद्मरागमयैश्चैव शोभितं चन्द्रसन्निभैः॥ ६२

सूर्यमण्डलके समान देदीप्यमान, चारों ओर मुखवाले विमानोंसे शोभित, तथा पद्मरागमणिसे निर्मित एवं चन्द्रमाके समान विमानोंसे सुशोभित थे।

63

प्रासादैर्गोपुरैर्दिव्यैः कैलासशिखरोपमैः दिव्यस्त्रीजनसङ्कीर्णैर्गन्धर्वस्सिद्धचारणैः॥ ६३

उनमें कैलासके शिखरके समान दिव्य प्रासाद तथा गोपुर थे, जो दिव्य स्त्रियों, गन्धर्वों, सिद्धों तथा चारणोंसे परिपूर्ण थे;

64

रुद्रालयैः प्रतिगृहमग्निहोत्रैः प्रतिष्ठितैः द्विजोत्तमैः शास्त्रविज्ञैः शिवभक्तिरतैः सदा॥ ६४

प्रत्येक घरमें रुद्रालय तथा अग्निहोत्र प्रतिष्ठित थे, और वहाँ शास्त्रज्ञ तथा शिवभक्तिपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण सदा निवास करते थे।

65

वापीकूपतडागैश्च दीर्घिकाभिः सुशोभितम् उद्यानवनवृक्षैश्च स्वर्गच्युतगुणोत्तमैः॥ ६५

वे बावली, कुओं, तालाबों तथा सरोवरोंसे सुशोभित थे, और स्वर्गसे उतरे हुए उत्तम गुणोंवाले उद्यानों, वनों तथा वृक्षोंसे युक्त थे।

66

नदीनदसरिन्मुख्यपुष्करैः शोभितं सदा सर्वकामफलाद्यैश्चानेकैर्वृक्षैर्मनोहरम्॥ ६६

वे नदी-नद तथा प्रमुख कमलयुक्त जलाशयोंसे सदा शोभित रहते थे, और सर्वकामनापूर्ण फलोंवाले अनेक वृक्षोंसे मनोहर थे।

67

मत्तमातङ्गयूथैश्च तुरङ्गैश्च सुशोभनैः रथैश्च विविधाकारैः शिबिकाभिरलङ्कृतम्॥ ६७

वे मदमत्त हाथियोंके झुंडों, सुन्दर घोड़ों, नाना आकारके रथों तथा शिविकाओंसे अलंकृत थे।

68

समयादिशिकैश्चैव क्रीडास्थानैः पृथक्पृथक् वेदाध्ययनशालाभिर्विविधाभिः पृथक्पृथक्॥ ६८

उनमें ऋतु-ऋतुके अनुसार अलग-अलग क्रीड़ास्थल तथा वेदाध्ययनकी विविध पाठशालाएँ पृथक्-पृथक् बनी हुई थीं।

69

अदृष्टं मनसा वाचा पापान्वितनरैस्सदा महात्मभिश्शुभाचारैः पुण्यवद्भिः प्रवीक्ष्यते॥ ६९

उसे पापी मनुष्य मन अथवा वाणीसे भी कभी नहीं देख पाते थे; केवल शुभाचारी, पुण्यवान् महात्मा ही उसे देख सकते थे।

70

पतिव्रताभिः सर्वत्र पावितं स्थलमुत्तमम् पतिसेवनशीलाभिर्विमुखाभिः कुधर्मतः॥ ७०

वह उत्तम स्थल सर्वत्र पतिव्रता, पतिसेवापरायण तथा कुधर्मसे विमुख स्त्रियोंके द्वारा पवित्र किया गया था।

71

दैत्यशूरैर्महाभागैः सदारैः ससुतैर्द्विजैः श्रौतस्मार्तार्थतत्त्वज्ञैः स्वधर्मनिरतैर्युतम्॥ ७१

वहाँ पराक्रमी, महाभाग्यशाली दैत्य अपनी पत्नियों, पुत्रों तथा श्रुति-स्मृतिके तत्त्वज्ञ, स्वधर्मनिरत ब्राह्मणोंके साथ निवास करते थे।

72

व्यूढोरस्कैर्वृषस्कन्धैः सामयुद्धधरैः सदा प्रशान्तैः कुपितैश्चैव कुब्जैर्वामनकैस्तथा॥ ७२

वहाँ चौड़ी छातीवाले, बैलके समान कंधोंवाले, सदा साम तथा युद्ध दोनोंमें कुशल, कभी शान्त और कभी क्रुद्ध, तथा कुबड़े और बौने योद्धा भी रहते थे,

73

नीलोत्पलदलप्रख्यैर्नीलकुञ्चितमूर्द्धजैः मयेन रक्षितैः सर्वैः शिक्षितैर्युद्धलालसैः॥ ७३

जो नीलकमलदलके समान वर्णवाले, काले घुँघराले बालोंवाले, मयके द्वारा रक्षित तथा शिक्षित एवं युद्धके लिये उत्सुक थे।

74

वरसमररतैर्युतं समन्तादजशिवपूजनया विशुद्धवीर्यैः रविमरुतमहेन्द्रसन्निकाशैः सुरमथनैः सुदृढैः सुसेवितं यत्॥ ७४

वे नगर चारों ओर श्रेष्ठ युद्धमें रत, ब्रह्मा तथा शिवकी पूजासे विशुद्ध पराक्रमवाले, सूर्य, मरुद्गण तथा महेन्द्रके समान तेजस्वी, देवगणोंका मर्दन करनेवाले तथा अत्यन्त सुदृढ़ वीरोंसे सुसेवित थे।

75

शास्त्रवेदपुराणेषु ये ये धर्माः प्रकीर्तिताः शिवप्रियाः सदा देवास्ते धर्मास्तत्र सर्वतः॥ ७५

शास्त्र, वेद तथा पुराणोंमें जो-जो धर्म कहे गये हैं तथा शिवजीको सदा प्रिय देवता—वे सब वहाँ चारों ओर विद्यमान थे।

76

एवं लब्धवरास्ते तु दैतेयास्तारकात्मजाः शैवं मयमुपाश्रित्य निवसन्ति स्म तत्र ह॥ ७६

इस प्रकार वर प्राप्तकर वे तारकपुत्र दैत्य, शिवभक्त मयका आश्रय लेकर वहाँ निवास करने लगे।

77

सर्वं त्रैलोक्यमुत्सार्य प्रविश्य नगराणि ते कुर्वन्ति स्म महद्राज्यं शिवमार्गरताः सदा॥ ७७

वे उन नगरोंमें प्रवेश करके, सम्पूर्ण त्रिलोकीको दबाकर, सदा शिवमार्गमें रत रहते हुए विशाल राज्य करने लगे।

78

ततो महान् गतः कालो वसतां पुण्यकर्मणाम् यथासुखं यथाजोषं सद्राज्यं कुर्वतां मुने॥ ७८

हे मुने! इस प्रकार पुण्यकर्मा उन दैत्योंका, अपनी इच्छानुसार सुखपूर्वक उत्तम राज्य करते हुए, वहाँ निवास करते बहुत बड़ा काल बीत गया।

109

तीनों पुर कैसे नष्ट हुए?

पाशुपतास्त्र और एक ही बाण

· 55:05–55:23 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि उस कथा में आपने सुना होगा कि भगवान शिव ने किस तरह एक ही बाण से इन तीनों पुरों का वध किया — वह कौन सा बाण था, क्या मंत्र और विधि-विधान था, यह शिव महापुराण में पूरा वर्णित है। भगवान शिव ने पाशुपतास्त्र का प्रयोग कैसे किया, यह उन्होंने अलग लाइव में विस्तार से बताया है, जिसे श्रोता सुन सकते हैं।

शास्त्र क्या कहता है

Once the three cities of Tripura came into alignment, Śiva strung the Pāśupata weapon on his bow and, with a single arrow, burned the three cities and their inhabitants to ash.

मूल पाठ पढ़ें →
1

अथ शम्भुर्महादेवो रथस्थः सर्वसंयुतः । त्रिपुरं सकलं दग्धुमुद्यतोऽभूत्सुरद्विषाम् ॥ १

तदनन्तर महादेव शम्भु अपने समस्त गणोंके साथ रथपर आरूढ़ होकर, देवताओंके शत्रुओंके सम्पूर्ण त्रिपुरको भस्म करनेके लिये उद्यत हुए।

2

शीर्षं स्थानकमास्थाय सन्धाय च शरोत्तमम् । सज्जं तत्कार्मुकं कृत्वा प्रत्यालीढं महाद्भुतम् ॥ २

शीर्षस्थानक मुद्रामें खड़े होकर, उत्तम बाणका संधान करके, तथा अद्भुत प्रत्यालीढ मुद्रामें उस धनुषको सज्ज करके।

3

निवेश्य दृढमुष्टौ च दृष्टिं दृष्टौ निवेश्य च । अतिष्ठन्निश्चलस्तत्र शतं वर्षसहस्रकम् ॥ ३

दृढ़ मुट्ठीमें बाणको स्थिर करके तथा दृष्टिको लक्ष्यपर टिकाकर, वे वहाँ एक लाख वर्षतक निश्चल खड़े रहे।

4

ततोऽङ्गुष्ठे गणाध्यक्षः स तुदत्यनिशं स्थितः । न लक्ष्यं विविशुस्तानि पुराण्यस्य त्रिशूलिनः ॥ ४

तब गणाध्यक्ष गणेशजी उनके अँगूठेपर खड़े होकर निरन्तर उसे कुरेदते रहे; इससे त्रिशूलधारी शिवजीके लक्ष्यमें वे पुर नहीं आये।

5

ततोऽन्तरिक्षादश‍ृणोद्धनुर्बाणधरो हरः । मुञ्जकेशो विरूपाक्षो वाचं परमशोभनाम् ॥ ५

तब धनुष-बाणधारी, मुञ्जके समान जटाओंवाले, त्रिनेत्र हरजीने आकाशसे एक अत्यन्त सुन्दर वाणी सुनी।

6

भो भो न यावद्भगवन्नर्चितोऽसौ विनायकः । पुराणि जगदीशेश साम्प्रतं न हनिष्यति ॥ ६

"अरे, अरे! हे भगवन्! जबतक उस विनायकका पूजन नहीं होगा, हे जगदीश्वर! तबतक आप अभी पुरोंका नाश नहीं कर सकेंगे।"

7

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं गजवक्त्रमपूजयत् । भद्रकालीं समाहूय ततोऽन्धकनिषूदनः ॥ ७

यह वचन सुनकर अन्धकनिषूदन शिवजीने भद्रकालीको बुलाकर गजवदन गणेशजीका पूजन किया।

8

तस्मिन् सम्पूजिते हर्षात्परितुष्टे पुरस्सरे । विनायके ततो व्योम्नि ददर्श भगवान्हरः ॥ ८

उन अग्रगण्य विनायकजीके पूजित होकर हर्षसे परितुष्ट हो जानेपर, तब भगवान् हरने आकाशमें देखा —

9

पुराणि त्रीणि दैत्यानां तारकाणां महात्मनाम् । यथातथं हि युक्तानि केचिदित्थं वदन्ति ह ॥ ९

तारकके महात्मा पुत्र दैत्योंके वे तीनों पुर यथावत् संलग्न हो गये — ऐसा कुछ लोग कहते हैं।

10

परब्रह्मणि देवेश सर्वोपास्ये महेश्वरे । अन्यप्रसादतः कार्यसिद्धिर्घटति नेति हि ॥ १०

कुछ लोग कहते हैं — हे देवेश! सबके उपास्य परब्रह्म महेश्वरमें दूसरेकी कृपासे कार्यकी सिद्धि नहीं होती।

11

स स्वतन्त्रः परं ब्रह्म सगुणो निर्गुणोऽपि ह । अलक्ष्यः सकलैः स्वामी परमात्मा निरञ्जनः ॥ ११

वे स्वतन्त्र, परब्रह्म, सगुण भी हैं और निर्गुण भी; सबके द्वारा अलक्ष्य, स्वामी, परमात्मा तथा निरंजन हैं।

12

पञ्चदेवात्मकः पञ्चदेवोपास्यः परः प्रभुः । तस्योपास्यो न कोऽप्यस्ति स एवोपास्य आलयम् ॥ १२

वे पंचदेवात्मक, पंचदेवोंके उपास्य, परम प्रभु हैं; उनका कोई उपास्य नहीं है — वे स्वयं ही उपास्य आलय हैं।

13

अथवा लीलया तस्य सर्वं सङ्घटते मुने । चरितं देवदेवस्य वरदातुर्महेशितुः ॥ १३

अथवा, हे मुने! यह सब कुछ उन्हींकी लीलासे घटित होता है — यह देवाधिदेव, वरदाता महेशकी लीला है।

14

तस्मिंस्थिते महादेवे पूजयित्वा गणाधिपम् । पुराणि तत्र कालेन जग्मुरेकत्वमाशु वै ॥ १४

महादेवजीके वहाँ स्थित रहते हुए, गणाधिपका पूजन करनेके पश्चात्, वे पुर समयानुसार शीघ्र ही एकत्वको प्राप्त हो गये।

15

एकीभावं मुने तत्र त्रिपुरे समुपागते । बभूव तुमुलो हर्षो देवादीनां महात्मनाम् ॥ १५

हे मुने! त्रिपुरके एकीभावको प्राप्त हो जानेपर, देवगण आदि महात्माओंमें अत्यन्त हर्ष छा गया।

16

ततो देवगणाः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः । जयेति वाचो मुमुचुः स्तुवन्तश्चाष्टमूर्तिकम् ॥ १६

तब समस्त देवगण, सिद्धगण तथा परम ऋषिगण जय-जयकार करते हुए अष्टमूर्ति शिवकी स्तुति करने लगे।

17

अथाहेति तदा ब्रह्मा विष्णुश्च जगतां पतिः । समयोऽपि समायातो दैत्यानां वधकर्मणः ॥ १७

तब ब्रह्माजी और जगत्पति विष्णुजी इस प्रकार बोले — दैत्योंके वधका समय भी अब आ गया है।

18

तेषां तारकपुत्राणां त्रिपुराणां महेश्वर । देवकार्यं कुरु विभो एकत्वमपि चागतम् ॥ १८

हे महेश्वर! तारकके पुत्रोंके उन तीनों पुरोंका देवकार्य कीजिये, हे विभो! उनका एकत्व भी अब हो चुका है।

19

यावन्न यान्ति देवेश विप्रयोगं पुराणि वै । तावद्बाणं विमुञ्चस्व त्रिपुरं भस्मसात्कुरु ॥ १९

हे देवेश! जबतक वे पुर पृथक्-पृथक् नहीं हो जाते, तबतक बाण छोड़िये और त्रिपुरको भस्म कर दीजिये।

20

अथ सज्यं धनुः कृत्वा शर्वः सन्धाय तं शरम् । पूज्यं पाशुपतास्त्रं स त्रिपुरं समचिन्तयत् ॥ २०

तब धनुषको सज्जकर शर्वजीने उस पूज्य पाशुपतास्त्रका संधान करके त्रिपुरपर अपना ध्यान केन्द्रित किया।

21

अथ देवो महादेवो वरलीलाविशारदः । केनापि कारणेनात्र सावज्ञं तदवैक्षत ॥ २१

तब वरदानकी लीलामें कुशल महादेवजीने किसी कारणवश उस कार्यको उपेक्षा-सी दृष्टिसे देखा।

22

पुरत्रयं विरूपाक्षः कर्तुं तद्भस्मसात्क्षणात् । समर्थः परमेशानो जानातु च सतां गतिः ॥ २२

विरूपाक्ष शिवजी क्षणभरमें ही तीनों पुरोंको भस्म करनेमें समर्थ हैं — यह वे सत्पुरुषोंकी गति परमेश्वर स्वयं जानें।

23

दग्धुं समर्थो देवेशो वीक्षणेन जगत्त्रयम् । अस्मद्यशो विवृद्ध्यर्थं शरं मोक्तुमिहार्हसि ॥ २३

देवेश तो एक दृष्टिमात्रसे तीनों लोकोंको भी भस्म करनेमें समर्थ हैं — हमारे यशकी वृद्धिके लिये अब बाण छोड़िये।

24

इति स्तुतोऽमरैः सर्वैर्विष्ण्वादिविधिभिस्तदा । दग्धुं पुरत्रयं तद्वै बाणेनैच्छन्महेश्वरः ॥ २४

इस प्रकार विष्णु आदिके नेतृत्वमें समस्त अमरगणोंसे स्तुत होकर, महेश्वरने उस बाणसे तीनों पुरोंको भस्म करनेका संकल्प किया।

25

मुहूर्तेऽभिजिदाख्ये तु विकृष्य धनुरद्भुतम् । कृत्वा ज्यातलनिर्घोषं नादमत्यन्तदुस्सहम् ॥ २५

अभिजित् नामक मुहूर्तमें अद्भुत धनुषको खींचकर, तथा ज्यातलसे अत्यन्त असह्य निर्घोष उत्पन्न करके —

26

आत्मनो नाम विश्राव्य समाभाष्य महासुरान् । मार्तण्डकोटिवपुषं काण्डमुग्रो मुमोच ह ॥ २६

अपना नाम सुनाकर तथा महादैत्योंको सम्बोधित करके, उन उग्र शिवजीने करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी उस बाणको छोड़ दिया।

27

ददाह त्रिपुरस्थांस्तान्दैत्याँस्त्रीन्विमलापहः । स आशुगो विष्णुमयो वह्निशल्यो महाज्वलन् ॥ २७

विमलताको लानेवाले, विष्णुमय, वह्निशल्ययुक्त तथा प्रचण्ड ज्वालावाले उस शीघ्रगामी बाणने त्रिपुरमें स्थित उन तीनों दैत्योंको भस्म कर दिया।

28

ततः पुराणि दग्धानि चतुर्जलधिमेखलाम् । गतानि युगपद्भूमिं त्रीणि दग्धानि भस्मशः ॥ २८

तब वे दग्ध हुए तीनों पुर चतुःसमुद्रवेष्टित पृथ्वीपर एक साथ गिर पड़े और सर्वथा भस्म हो गये।

29

दैत्यास्तु शतशो दग्धास्तस्य बाणस्थवह्निना । हाहाकारं प्रकुर्वन्तश्शिवपूजाव्यतिक्रमात् ॥ २९

उस बाणमें स्थित अग्निसे सैकड़ों दैत्य दग्ध हो गये और शिवपूजाके उल्लंघनके कारण हाहाकार करने लगे।

30

तारकाक्षस्तु निर्दग्धो भ्रातृभ्यां सहितोऽभवत् । सस्मार स्वप्रभुं देवं शङ्करं भक्तवत्सलम् ॥ ३०

किन्तु तारकाक्ष अपने दोनों भाइयोंके सहित दग्ध होते हुए भी अपने स्वामी, भक्तवत्सल शंकर भगवान्का स्मरण करने लगा।

31

भक्त्या परमया युक्तः प्रलपन् विविधा गिरः । महादेवं समुद्वीक्ष्य मनसा तमुवाच सः ॥ ३१

परम भक्तिसे युक्त होकर, विविध वचन बोलते हुए, महादेवजीको देखकर, उसने मनसे उनसे कहा।

32

भव ज्ञातोऽसि तुष्टोऽसि यद्यस्मान् सह बन्धुभिः । तेन सत्येन भूयोऽपि कदा त्वं प्रदहिष्यसि ॥ ३२

हे भव! आप हमें बन्धुओंसहित इस प्रकार दग्ध करते हुए भी हमपर प्रसन्न हैं, यह हम जानते हैं; उसी सत्यके बलपर, आप हमें पुनः कब दग्ध करेंगे?

33

दुर्लभं लब्धमस्माभिर्यदप्राप्यं सुरासुरैः । त्वद्भावभाविता बुद्धिर्जाते जाते भवत्विति ॥ ३३

हमने वह दुर्लभ पद पा लिया है, जो देवताओं और असुरोंको भी प्राप्त नहीं होता; हमारी बुद्धि जन्म-जन्ममें आपकी भावनासे ही युक्त रहे — ऐसा उसने कहा।

34

इत्येवं विब्रुवन्तस्ते दानवास्तेन वह्निना । शिवाज्ञयाद्भुतं दग्धा भस्मसादभवन्मुने ॥ ३४

हे मुने! ऐसा कहते हुए वे दानव उसी अग्निसे शिवजीकी आज्ञासे अद्भुत रूपसे दग्ध होकर भस्म हो गये।

35

अन्येऽपि बाला वृद्धाश्च दानवास्तेन वह्निना । शिवाज्ञया द्रुतं व्यास निर्दग्धा भस्मसात्कृताः ॥ ३५

हे व्यासजी! अन्य बाल-वृद्ध दानव भी उसी अग्निसे शिवजीकी आज्ञासे शीघ्र ही सर्वथा दग्ध होकर भस्म हो गये।

36

स्त्रियो वा पुरुषा वापि वाहनानि च तत्र ये । सर्वे तेनाग्निना दग्धाः कल्पान्ते तु जगद्यथा ॥ ३६

स्त्रियाँ हों या पुरुष, तथा जो भी वाहन वहाँ थे, वे सब उसी अग्निसे कल्पान्तके समान जल गये।

37

भर्तृन्कण्ठगतान्हित्वा काश्चिद्दग्धा वरस्त्रियः । काश्चित्सुप्ताः प्रमत्ताश्च रतिश्रान्ताश्च योषितः ॥ ३७

कुछ श्रेष्ठ स्त्रियाँ अपने पतियोंको कण्ठसे लगाये हुए ही दग्ध हो गयीं; कुछ स्त्रियाँ सोयी हुई, प्रमादग्रस्त अथवा रतिसे श्रान्त अवस्थामें ही दग्ध हो गयीं।

38

अर्द्धदग्धा विबुद्धाश्च बभ्रमुर्मोहमूर्च्छिताः । तेन नासीत्सुसूक्ष्मोऽपि घोरत्रिपुरवह्निना ॥ ३८

अर्धदग्ध होकर जगी हुई वे स्त्रियाँ मोहसे मूर्च्छित होकर इधर-उधर भटकने लगीं; उस घोर त्रिपुरवह्निसे कोई सूक्ष्मसे सूक्ष्म वस्तु भी नहीं बची।

39

अविदग्धो विनिर्मुक्तः स्थावरो जङ्गमोऽपि वा । वर्जयित्वा मयं दैत्यं विश्वकर्माणमव्ययम् ॥ ३९

चर हो या अचर, कोई भी वस्तु अदग्ध और मुक्त नहीं बची — केवल अविनाशी विश्वकर्मा दैत्य मयको छोड़कर।

40

अविरुद्धं तु देवानां रक्षितं शम्भुतेजसा । विपत्कालेऽपि सद्भक्तं महेशशरणागतम् ॥ ४०

क्योंकि वह देवताओंका विरोधी नहीं था, शम्भुके तेजसे रक्षित था, तथा विपत्तिके समयमें भी महेशकी शरणमें आया हुआ सच्चा भक्त था।

41

सन्निपातो हि येषां नो विद्यते नाशकारकः । दैत्यानामन्यसत्त्वानां भावाभावे कृताकृते ॥ ४१

क्योंकि दैत्यों तथा अन्य प्राणियोंके लिये विनाश करनेवाला संघात भाव-अभावमें तथा कृत-अकृतमें समान रूपसे नहीं होता।

42

तस्माद्यत्नः सुसम्भाव्यः सद्भिः कर्तव्य एव हि । गर्हणात्क्षीयते लोको न तत्कर्म समाचरेत् ॥ ४२

इसलिये सत्पुरुषोंको सदा सुविचारित प्रयत्न ही करना चाहिये; निन्दासे लोक क्षीण होता है, अतः निन्दनीय कर्म कभी नहीं करना चाहिये।

43

न संयोगो यथा तेषां भूयात् त्रिपुरवासिनाम् । मतमेतद्धि सर्वेषां दैवाद्यदि यतो भवेत् ॥ ४३

उन त्रिपुरवासियोंके समान संयोग पुनः न हो — यही सबका मत है, यदि दैववश ऐसा हो सके।

44

ये पूजयन्तस्तत्रापि दैत्या रुद्रं सबान्धवाः । गाणपत्यं ययुः सर्वे शिवपूजाविधेर्बलात् ॥ ४४

जो दैत्य वहाँ भी अपने बन्धु-बान्धवोंसहित रुद्रका पूजन करते रहे, वे सब शिवपूजाकी विधिके बलसे गाणपत्य पदको प्राप्त हुए।

110

कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली क्यों कहते हैं?

वध के बाद देवताओं ने शिव का स्वागत किया

· 55:24–55:45 · Also a question

क्योंकि त्रिपुरासुर का वध करके जब भगवान शिव आए और सब देवताओं ने आनंद से उनका स्वागत किया — वही कार्तिक पूर्णिमा की देव दीपावली है। इसीलिए काशी आदि क्षेत्रों में देव दीपावली बड़े स्तर पर मनाई जाती है; वे कहते हैं कि यह भी एक कल्प का विधान है, एक कल्प की कथा है।

111

देव दीपावली पर मंदिरों में दीपक जलाने से क्या मिलता है?

देवताओं की दिवाली में सहभागी बनना

· 55:46–56:11 · Also a question

देव दीपावली के दिन देवताओं के मंदिरों में दीपक जलाएँ, तो कहीं न कहीं आप भी देवत्व पाते हैं; देवताओं की तरह आप भी वहाँ उनकी दिवाली में सहभागी बनते हैं, और भगवान शिव आप पर ज़रूर कृपा करते हैं।

वक्ता कहते हैं कि अगर देव दीपावली के दिन आप देवताओं के मंदिर में दीपक जलाएँ, तो कहीं न कहीं आप भी देवत्व पाते हैं। देवताओं की तरह आप भी वहाँ उनकी दिवाली में सहभागी बनते हैं। और भगवान शिव आप पर ज़रूर कृपा करते हैं। इसीलिए देव दीपावली के दिन मंदिर में दीपदान ज़रूर करें।

112

दीपकों में कौन सा तेल डाल सकते हैं?

घी, तिल का तेल या सरसों का तेल, जैसी सामर्थ्य हो

· 56:12–56:24 · Also a question

आप घी का दीपक रख सकते हैं, तिल के तेल का भी रख सकते हैं, और सरसों के तेल का भी रख सकते हैं — जैसी आपकी सामर्थ्य हो, वैसा रखें।

वक्ता कहते हैं कि आप घृत का दीपक रख सकते हैं; तिल के तेल का भी रख सकते हैं; सरसों के तेल का भी रख सकते हैं। जैसी आपकी सामर्थ्य हो, वैसा रख सकते हैं।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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