नवरात्र में गृहस्थ की देवी तंत्र साधना — क्रमागत सीढ़ी, सप्तशती और चार वीर
देवी साधना और सप्तशती पर नवरात्र की मार्गदर्शिका।
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क्या हर कोई सशुल्क दश महाविद्या प्रमाणपत्र कोर्स कर सकता है?
प्रमाणित दश महाविद्या साधक
वक्ता कहते हैं कि यह चीज़ हर कोई नहीं कर सकता। आजकल जो तंत्र और दश महाविद्या के कोर्स चलते हैं, उन्हीं चीज़ों को कोर्स बना दिया गया है; पर ये महाविद्या कोर्स हर कोई कर ही नहीं सकता। यदि आप यह सब पाना चाहते हैं तो पढ़ सकते हैं — देख लें कि वहाँ क्या मिलता है। उनकी ओर से कोई कोर्स नहीं है: यह सबके लिए है, अधिकार के अनुसार, आपमें जितनी क्षमता है और आप जितना ले सकते हैं उसके अनुसार।
आजकल जो तंत्र और दस महाविद्या के कोर्स चलते हैं, उन्हीं चीज़ों को कोर्स बना दिया गया है। आइए, वक्ता कहते हैं: यह चीज़ हर कोई नहीं कर सकता। ये महाविद्या कोर्स हर कोई कर ही नहीं सकता। इसलिए यदि आप यह सब पाना चाहते हैं तो पढ़ सकते हैं; देख लें कि वहाँ क्या मिलता है। कोर्स चल रहे हैं। हमारी ओर से कोई कोर्स नहीं है। यह सबके लिए है, अधिकार के अनुसार — आपमें कितनी क्षमता है और आप कितना ले पाते हैं। जो लोग वास्तविकता से जुड़कर, सही ढंग से समय देकर, अनुशासन के साथ, बिना किसी दिखावे और पाखंड के, अपनी शारीरिक क्षमता बढ़ाते हुए और भगवती तथा अपने आराध्य से सामर्थ्य पाते हुए इस मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं — उन्हें समझ है कि वे भौतिक जीवन में भी और आध्यात्मिक जीवन में भी क्या पा रहे हैं। कोई और कोर्स करवाकर आपको प्रमाणपत्र दे दे कि आप प्रमाणित दस महाविद्या साधक हैं — वह बिल्कुल अलग बात है। आजकल प्रमाणित महाविद्या साधक भी आ गए हैं, जिन्हें प्रमाणपत्र मिल रहा है। वक्ता कहते हैं कि यह अद्भुत विषय है; हममें तो किसी को प्रमाणित करने की सामर्थ्य भी नहीं है, न हम ऐसा कर सकते हैं। इसलिए जहाँ उचित समझें, जिस ढंग से उचित समझें, साधना करें।
शक्ति क्षेत्र में प्रवेश कैसे आरंभ होता है?
सदा क्रमागत साधना से
वक्ता कहते हैं कि मुख्य विषय यह है कि जो लोग लंबे समय से साधनाएँ कर रहे हैं, यदि वे शक्ति क्षेत्र में प्रवेश करना चाहें, तो शुरुआत हमेशा क्रमागत साधना से ही होती है।
मुख्य विषय: जो लोग लंबे समय से साधनाएँ कर रहे हैं, यदि वे शक्ति क्षेत्र में प्रवेश करना चाहें — तो शुरुआत हमेशा, हमेशा क्रमागत साधना से ही होती है।
चैनल पर प्रकाशित बीजाक्षर साधना कौन कर सकता है?
जिसने कम से कम देव दीक्षा विधान किया हो
चैनल पर भगवती की जो बीजाक्षर साधना प्रकाशित की गई है, उसे हर वह व्यक्ति कर सकता है जिसने कम से कम देव दीक्षा विधान किया हो। वक्ता कहते हैं कि जिनके गुरु नहीं हैं, उनके लिए उन्होंने उन वीडियो में भी यह बात दोहराई है: जिनके कोई गुरु नहीं, जिन्होंने किसी प्रकार की दीक्षा नहीं ली, और जिन्होंने देव दीक्षा विधान करके भगवान दत्तात्रेय के एकाक्षरी का चार लाख जप पूरा किया है।
चैनल पर भगवती की बीजाक्षर साधना प्रकाशित की गई है। इसे हर वह व्यक्ति कर सकता है जिसने कम से कम देव दीक्षा विधान किया हो। वक्ता कहते हैं कि जिनके गुरु नहीं हैं, उनके लिए उन वीडियो में भी हमने इस विषय पर बार-बार कहा है: जिनके कोई गुरु नहीं, जिन्होंने किसी प्रकार की दीक्षा नहीं ली, और जिन्होंने देव दीक्षा विधान करके भगवान दत्तात्रेय के एकाक्षरी का चार लाख जप पूरा किया है।
दत्त माला मंत्र के पुरश्चरण से क्या होता है?
गुरु मंडल की कृपा, और मंत्र धारण करने की क्षमता
यदि दत्त माला मंत्र का पुरश्चरण पूरा हो गया है, तो गुरु मंडल की कृपा हो गई है और बहुत से बुरे प्रारब्ध नष्ट हो गए हैं। मंत्रात्मक शरीर में, सूक्ष्म शरीर में, जो मंत्र धारण करने की क्षमता होती है, वह गुरु मंडल की कृपा से आप पर प्राप्त होती है — और हमारे शरीर में जो जीवात्मा है, उसके पिछले जन्मों से जो भी गुरु मंडल जुड़े हैं, वे कहीं न कहीं जुड़ जाते हैं, उनकी कृपा आपसे जुड़ जाती है, और आप उस ऊर्जा की सहायता लेकर इस क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं।
यदि दत्त माला मंत्र का पुरश्चरण हो गया है, तो गुरु मंडल की कृपा हो गई है, और जो बहुत से प्रारब्ध थे — बुरे प्रारब्ध — वे नष्ट हो गए हैं। और जो मंत्रात्मक शरीर है — सूक्ष्म शरीर में मंत्र धारण करने की जो क्षमता है — वह गुरु मंडल की कृपा से आप पर प्राप्त होती है। आपके और मेरे शरीर में जो जीवात्मा है, उसके पिछले जन्मों से जो भी गुरु मंडल जुड़े हैं, वे कहीं न कहीं जुड़ जाते हैं; उनकी कृपा आपसे जुड़ जाती है; और फिर इस ऊर्जा की सहायता लेकर आप इस क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं।
गणपति साधना: दो से छह महीने में संकट नाशन गणेश स्तोत्र के ग्यारह सौ से ग्यारह हज़ार पाठ।
गणपति, और संकट नाशन स्तोत्र
भगवान गणपति की साधना — जिसमें और कुछ नहीं तो दो महीने या छह महीने संकट नाशन गणेश स्तोत्र का जप किया हो, ग्यारह सौ, इक्कीस सौ, ग्यारह हज़ार, जितना हो सके। क्योंकि जब आप गणपति की साधना करते हैं, तो वही आपको वह आधार देंगे जिससे आप किसी भी मंत्र की क्षमता अपने भीतर सुरक्षित रख पाएँगे।
दूसरा यह कि वे भगवान गणेश की साधना करें — जिसमें और कुछ नहीं तो दो महीने या छह महीने संकट नाशन स्तोत्र, यानी संकट नाशन गणेश स्तोत्र, का जप किया हो: ग्यारह सौ, इक्कीस सौ, ग्यारह हज़ार, जितना हो सके। क्योंकि जब आप भगवान गणपति की साधना करते हैं, तो वही आपको वह आधार देंगे जिससे आप किसी भी मंत्र की क्षमता अपने भीतर सुरक्षित रख पाएँगे।
जब तक गणपति मूलाधार को दृढ़ नहीं करते, साधक उच्चाटित रहता है और अपनी साधना से भागता रहता है।
मूलाधार दृढ़ होने तक उच्चाटित रहना
जब तक वे आपका मूलाधार दृढ़ नहीं करते, आप उच्चाटित रहेंगे। किसी प्रकार के मंत्र का जप करके उच्चाटित हो जाना, किसी न किसी कारण से साधना से भागना — यह केवल भगवान गणपति की कृपा से ही ठीक हो सकता है। यदि आप उनकी साधना नहीं करते, तो आपके शरीर में वह ऊर्जा और क्षमता आएगी ही नहीं कि आप साधनाओं की ऊर्जा को अपने भीतर समा सकें और उन पुण्यों को अपने पास बचा सकें।
जब तक वे आपका मूलाधार दृढ़ नहीं करते, आप उच्चाटित रहेंगे। किसी प्रकार के मंत्र का जप करके उच्चाटित हो जाना, किसी न किसी कारण से साधना से भाग जाना — यह केवल भगवान गणपति की कृपा से ही ठीक हो सकता है। यदि आप उनकी साधना नहीं करते, तो आपके शरीर में वह ऊर्जा और वह क्षमता आएगी ही नहीं, जिससे आप साधनाओं की ऊर्जा को अपने भीतर समा सकें और उन पुण्यों को अपने पास बचा सकें।
संकट नाशन गणेश स्तोत्र की फलश्रुति क्या कहती है?
विद्यार्थी लभते विद्याम् — जो चाहिए, गणपति देते हैं
जब हम संकट नाशन गणपति स्तोत्र के ग्यारह सौ पाठ भी, या ग्यारह हज़ार तक, पूरे करते हैं, तो फलश्रुति के अनुसार सांसारिक जीवन में जो चाहिए उसे पाने का मार्ग खुल जाता है और वह मिलने लगता है। विद्यार्थी लभते विद्याम्, धनार्थी लभते धनम्, पुत्रार्थी लभते पुत्रान्, मोक्षार्थी लभते गतिम् — छह महीने पाठ किया जाए तो जो चाहिए, भगवान गणपति देते हैं।
तो सामान्य रूप से, जब हम संकट नाशन गणपति स्तोत्र के ग्यारह हज़ार पाठ, या ग्यारह सौ पाठ भी, पूरे करते हैं, तो एक तो फलश्रुति के अनुसार सांसारिक जीवन में जो चाहिए उसे पाने का मार्ग खुल जाता है — और वह मिलने लगता है। विद्यार्थी लभते विद्याम्, धनार्थी लभते धनम्, पुत्रार्थी लभते पुत्रान्, मोक्षार्थी लभते गतिम्। जो चाहिए, भगवान गणपति देते हैं — यदि छह महीने पाठ किया जाए।
बटुक भैरव का स्तोत्र-शतनाम पूरे शरीर की रक्षा करता है और दसों दिशाओं से रक्षा का मार्ग खुलवाता है।
बटुक भैरव, और दसों दिशाएँ सुरक्षित
उसके बाद, आगे चलकर, कम से कम बटुक भैरव जी का स्तोत्र-शतनाम — ताकि हमारा शरीर पूरी तरह सुरक्षित रहे, ताकि दसों दिशाएँ हमारे लिए मार्ग खोलें, रक्षा का मार्ग, ताकि साधना पथ पर आगे बढ़ते हुए जो भी ऊर्जा हमारे पास आए वह केवल हमारा कल्याण करे और किसी प्रकार की हानि न हो।
उसके बाद, आगे चलकर, कम से कम बटुक भैरव जी का स्तोत्र-शतनाम — ताकि हमारा शरीर पूर्ण रूप से सुरक्षित रहे, ताकि दसों दिशाएँ हमारे लिए मार्ग खोलें, रक्षा का मार्ग खोलें, ताकि जब हम साधना के पथ पर आगे बढ़ें तो जो भी ऊर्जा हमारे पास आए वह केवल हमारा कल्याण करे और किसी प्रकार की हानि न हो। और ताकि जब हम इस वातावरण में कोई साधनात्मक प्रक्रिया करें, तो उसके स्पंदन से नकारात्मक ऊर्जाओं का जो आकर्षण होता है उससे रक्षा हो, और वे हमारे शरीर पर हावी न हो सकें। ताकि साधनात्मक पथ पर हमारा शरीर सदा पूरी तरह सुरक्षित रहे — इसके लिए बटुक भैरव जी की उपासना है।
बटुक भैरव के बाद शिव का पंचाक्षरी, भगवती का एक स्तोत्र-शतनाम और उनका कवच आते हैं, और तभी एकाक्षरी।
पंचाक्षरी, भगवती का स्तोत्र-शतनाम, कवच — फिर एकाक्षरी
उसके बाद, आगे चलकर, भगवान शिव का पंचाक्षरी हो, भगवती का स्तोत्र-शतनाम हो, उनका कवच हो — चाहे वह कुब्जिका कवच हो या कामाख्या कवच, या भगवती से जुड़ा जो भी दूसरा कवच आप करते हों। इतनी दूर तक साधना करने के बाद ही एकाक्षरी मंत्र की साधना आती है, जहाँ शक्ति है, क्योंकि हम मूल बीज हैं।
उसके बाद, आगे चलकर, भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र हो; भगवती का स्तोत्र-शतनाम हो; उनका कवच हो — चाहे वह कुब्जिका कवच हो, या कामाख्या कवच, या भगवती से जुड़ा जो भी दूसरा कवच आप करते हों। इतनी दूर तक साधना करने के बाद ही एकाक्षरी मंत्र की साधना आती है, जहाँ शक्ति है, क्योंकि हम मूल बीज हैं।
शरीर पर देव शक्तियों का आवेश कैसे होता है?
शरीर पर देव शक्तियों का आवेश कैसे होता है
वक्ता विस्तार से बताते हैं कि शरीर पर देव शक्तियों का आवेश कैसे होता है — जब हम जप शुरू करते हैं तो देव शक्ति कैसे कृपा करती है और उसकी ऊर्जा धीरे-धीरे किस स्तर पर समाती है, और कब, आवश्यकता पड़ने पर, वह शरीर पर आवेशित भी होती है, और किन परिस्थितियों में।
शरीर पर देव शक्तियों का आवेश कैसे होता है, इस पर विस्तार से चर्चा है। बहुत महत्वपूर्ण विषय बताए गए हैं: जब हम जप करना शुरू करते हैं तो देव शक्ति किस प्रकार कृपा करती है और उसकी ऊर्जा धीरे-धीरे किस स्तर पर समाती है; और कब, आवश्यकता पड़ने पर, वह शरीर पर आवेशित भी होती है, और किन परिस्थितियों में आवेशित होती है। यह आपके या मेरे चाहने से नहीं होगा कि हम अभी बैठें, बुलाएँ और वह आ जाए — वह अलग विषय है। और जब वह आती है, या जब उसका आवेश होता है, तो वास्तव में वह किस स्तर का होता है? क्या वह पूर्ण रूप में आएगी, या वही आती है, या कौन — यह सब अच्छी तरह परखा गया है, जैसा वास्तव में होता है।
क्या यह वह आवेश है जिसमें सिर घूमता है?
भगतवाल का विषय नहीं
नहीं। वक्ता कहते हैं कि यह घूमने वाला नहीं है — इसमें सिर ऐसे नहीं घूमता कि व्यक्ति घूमने लगे, झूमने लगे, खेलने लगे। वह यह विषय नहीं है; यह भगतवाल का विषय नहीं है। यह मंत्रात्मक ऊर्जा है, और वह मंत्रात्मक ऊर्जा कैसी होगी, यही वे सुनने वाले से समझने को कहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह घूमने वाला नहीं है। इसमें सिर ऐसे नहीं घूमता कि व्यक्ति घूमने लगे, झूमने लगे, खेलने लगे। वह विषय नहीं है। यह भगतवाल का विषय नहीं है। जो है, वह मंत्रात्मक ऊर्जा है। मंत्रात्मक ऊर्जा कैसी होगी — यह समझिए।
ध्यान मंत्र का बीज से क्या संबंध है?
विद्युद्दाम-समप्रभाम्, और बीज उस रूप का एक अंश
जिस रूप का ध्यान करना है, वह ध्यान मंत्र बताता है। भगवती दुर्गा का जो एकाक्षरी मंत्र अभी दिया गया, बीज दुर्गा प्रणव, उसके लिए भगवती का ध्यान मंत्र है विद्युद्दाम-समप्रभाम् — जिनकी आभा बिजली जैसी है। तो जब आप एकाक्षरी का जप करते हैं, तो भगवती के उसी रूप का ध्यान करना है; और आप जो बीज मंत्र जप रहे हैं, वह उस विशाल ध्यान रूप का एक बीज, एक छोटा अंश है, जिसमें सारी शक्तियाँ समाई हैं।
कोई भी मंत्र हो — जैसे भगवती दुर्गा का जो एकाक्षरी मंत्र अभी दिया गया, बीज दुर्गा प्रणव — उसमें भगवती का ध्यान मंत्र है: विद्युद्दाम-समप्रभाम्। जिनकी आभा बिजली के समान है। तो जब आप एकाक्षरी का जप करते हैं, तो पूरे ध्यान मंत्र के अनुसार भगवती के उसी रूप का ध्यान करना है। वक्ता कहते हैं कि हम इसे हिंदी में भी डाल देंगे, ताकि उसका ध्यान करना आपके लिए आसान हो। और उसमें जो रूप बताया गया है: जब आप मंत्र का जप करते हैं, तो जो बीज मंत्र है, वह उसी विशाल ध्यान रूप का एक बीज है, उसका एक छोटा अंश — जिसमें सारी शक्तियाँ समाई हैं। उसी बीज को अब आप अपने भीतर समा रहे हैं।
मंत्र के विनियोग और न्यास से क्या होता है?
शक्तिमय होना, और चार लाख जिस पर ऊर्जा स्थिर होती है
विनियोग और उसका न्यास करके, उस पूरी शक्ति को अपने शरीर में समाकर, आप स्वयं शक्तिमय हो रहे हैं — और तब उनका ध्यान करते हुए आप उनकी पूजा और उनका जप कर रहे हैं। जब आप इस प्रक्रिया तक जाते हैं और यह बार-बार होने लगता है, तो समझिए कि ऊर्जा धीरे-धीरे आपके सूक्ष्म शरीर में बैठती है, और जब आप चार लाख तक जप पूरा कर लेते हैं, तो वह स्थिर हो जाती है।
विनियोग करके और उसका न्यास करके, उस पूरी शक्ति को अपने शरीर में समाकर, आप स्वयं शक्तिमय हो रहे हैं। तब उनका ध्यान करते हुए आप उनकी पूजा कर रहे हैं। आप उनका जप कर रहे हैं। तो जब आप इस प्रक्रिया तक जाते हैं, और जब यह बार-बार होने लगता है, तो समझिए कि ऊर्जा धीरे-धीरे आपके सूक्ष्म शरीर में बैठती है — और जब आप चार लाख तक जप पूरा कर लेते हैं, तो वह स्थिर हो जाती है।
जप से संचित ऊर्जा का क्षय किससे होता है?
कर्म में दुष्कर्म, मन का विचार नहीं
उसके बाद उसका क्षय दुष्कर्म के बिना नहीं होता — वह दुष्टता भरा कर्म जिससे आपके पुण्य क्षीण हों। जब तक आप शरीर से ऐसा कुकर्म नहीं करते, वे पुण्य क्षीण नहीं होंगे। मन से सोचने की बात हटा दीजिए: मन से सोचना नाम जप करने से शुद्ध हो जाता है, और भगवती गंगा के स्मरण मात्र से शुद्ध हो जाता है। पर यदि आपने इतना सोच लिया कि वह विचार आपके कर्म में आ गया और आप वैसा करने लगे, तो यह चार लाख का जप क्षीण हो जाएगा, और फिर आप पर आवेश नहीं हो सकता।
उसके बाद उसका क्षय दुष्कर्म के बिना नहीं होता। दुष्कर्म का अर्थ है वह दुष्टता भरा कर्म जिससे आपके पुण्य क्षीण हों। जब तक आप शरीर से ऐसा कुकर्म नहीं करते, वे पुण्य क्षीण नहीं होंगे। मन से सोचने की बात हटा दीजिए। मन से सोचना — जब आप नाम जप आदि करते हैं, तो उसकी शुद्धि हो जाएगी। भगवती गंगा के स्मरण मात्र से उसकी शुद्धि हो जाएगी। पर यदि आपने इतना सोच लिया कि वही चीज़ आपके कर्म में आ गई, कि आप वैसा करने लगे, तो यह चार लाख का जप क्षीण हो जाएगा। फिर आप पर आवेश नहीं हो सकता।
जो साधक भ्रम और यथार्थ में अंतर नहीं कर पाता, वह ऊर्जाओं का आवेश शुरू होने पर डर जाता है।
भ्रम और यथार्थ में अंतर
क्योंकि जैसे-जैसे आप साधना के क्षेत्र में धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं, ऊर्जाओं का आवेश होता है; और जब आप उसे नहीं समझते, तो साधक प्रायः डर जाता है — साधिकाएँ जल्दी डर जाती हैं। भ्रम और यथार्थ में अंतर करना सीखिए: कई बार जहाँ कुछ नहीं होता, वहाँ आप मान लेते हैं कि बहुत कुछ है और भूत, प्रेत और पिशाच के पीछे भागते रहते हैं; और कई बार जहाँ ऊर्जा सचमुच उपस्थित है और कृपा कर रही है, आप उसे कोई महत्व नहीं देते, और आपकी अज्ञानता से वह चीज़ चली जाती है।
वक्ता कहते हैं कि उस विषय को थोड़ा सुन लीजिए, यह आपके काम आएगा — क्योंकि जब आप साधना के क्षेत्र में धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगते हैं, तो ऊर्जाओं का आवेश होता है। जब आप इसे नहीं समझते, तो कई बार साधक डर जाता है; साधिकाएँ जल्दी डर जाती हैं। भ्रम और यथार्थ में अंतर करना सीखिए। कई बार, जहाँ कुछ भी नहीं होता, वहाँ आप मान लेते हैं कि बहुत कुछ है, और उस भ्रम के कारण भूत बाधा, प्रेत और पिशाच के पीछे भागते रहते हैं। और कई बार, जहाँ वास्तव में ऊर्जाएँ उपस्थित होती हैं और कृपा भी कर रही होती हैं, आप उन्हें कोई महत्व नहीं देते, और आपकी अज्ञानता के कारण वह चीज़ चली जाती है। इसलिए इस विषय को थोड़ा जान लीजिए — यहाँ यह आवश्यक हो जाता है, यह बात महत्वपूर्ण हो जाती है।
नवरात्र में सबसे पहले क्या करना है?
श्री दुर्गा सप्तशती शक्ति साधना का आधार है
सबसे पहली बात यह कि श्री दुर्गा सप्तशती शक्ति साधना का आधार है। सहस्राक्षरी मंत्र — एक हज़ार आठ बीज मंत्र, जिनमें से एक बीज का आप अब जप करने जा रहे हैं — भगवती चंडिका का सहस्राक्षरी माला मंत्र है, जिसमें वे 1008 बीज एक लय में एक साथ समाए हैं; और वही मूल सप्तशती है।
वक्ता कहते हैं कि आपने इनमें से किसे चुना है, यह आप पर निर्भर है; हम इनमें से कुछ बातें फिर से दोहराने का प्रयास करेंगे। सबसे पहली बात: श्री दुर्गा सप्तशती शक्ति साधना का आधार है। जो सहस्राक्षरी मंत्र है — 1008 बीज मंत्र, जिनमें से एक बीज का आप अब जप करने जा रहे हैं — ऐसे 1008 बीजों का एक लय में एक साथ समावेश, भगवती चंडिका का सहस्राक्षरी माला मंत्र है। वही मूल सप्तशती है।
सहस्राक्षरी सात सौ श्लोक कैसे बना?
भगवती के अपने आदेश से हर बीज अलग किया गया
भगवती के आदेश से उसी मंत्र का एक-एक बीज अलग करके उसका एक श्लोक बनाया गया — जो समय के साथ केवल सात सौ श्लोकों में समाया है, और जिसे हम वर्तमान समय में, इस कलि काल में, श्री दुर्गा सप्तशती के नाम से जानते हैं। इसीलिए शक्ति साधना में यह अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण तंत्रात्मक ग्रंथ बन जाता है, और अपने आप में सबसे उग्र तंत्र।
भगवती के आदेश से उन्हीं में से एक-एक बीज अलग करके उसका एक श्लोक बनाया गया — जो समय के साथ केवल सात सौ श्लोकों में समाया है, और जिसे हम वर्तमान समय में, इस कलि काल में, श्री दुर्गा सप्तशती के नाम से जानते हैं। इसीलिए शक्ति साधना में यह अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण तंत्रात्मक ग्रंथ बन जाता है। अपने आप में यह सबसे उग्र तंत्र बन जाता है। यदि शक्ति का साधक श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ नहीं कर रहा, तो वह कैसा साधक है। इसलिए सबसे पहली बात यह कि नवरात्र के समय में आप श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ अवश्य करें।
यदि संस्कृत का उच्चारण न कर सकें तो क्या करें?
हिंदी में करें — कवच, अर्गला, कीलक, तेरह अध्याय, तीन रहस्य
तो हिंदी में कीजिए। पूरा विधि-विधान चैनल पर प्रकाशित है; पर यदि आपको संस्कृत का उच्चारण नहीं आता, यदि आप उसे पढ़ते नहीं, तो हिंदी में करना सीखिए। और कोई विधि-विधान करने का प्रयास मत कीजिए — कम से कम कवच, अर्गला और कीलक का पाठ हिंदी में कीजिए, और यदि रोज़ पूरे तेरह अध्याय कर सकें तो कीजिए, और तीनों रहस्यों का पाठ कीजिए। इतना कीजिए।
आप कैसे करेंगे? इसमें बात सीधी है: पूरा विधि-विधान चैनल पर प्रकाशित है। पर यदि आपको संस्कृत का उच्चारण करना नहीं आता, यदि आप उसे पढ़ते नहीं — तो हिंदी में कीजिए। हिंदी में करना सीखिए। और कोई विधि-विधान मत कीजिए। कम से कम दुर्गा कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक का पाठ हिंदी में करके, यदि रोज़ पूरे तेरह अध्याय कर सकें, तो कीजिए। तीनों रहस्य त्रय का पाठ कीजिए। इतना कीजिए।
क्या साथ में नवार्ण मंत्र भी करना चाहिए?
नहीं, यदि आप उसे नहीं जानते और कभी माला नहीं पकड़ी
नहीं। नवार्ण मंत्र का जप मत कीजिए। यदि आप उसे नहीं जानते, उसके बारे में नहीं जानते, यदि आज तक आपने माला नहीं पकड़ी — तो मत कीजिए। भगवती का स्मरण करते हुए केवल इतना ही कीजिए। यह निष्फल नहीं जाएगा।
नवार्ण मंत्र का जप मत कीजिए। यदि आपको नहीं आता, यदि आप उसके बारे में नहीं जानते, यदि आज तक आपने माला नहीं पकड़ी — तो मत कीजिए। भगवती का स्मरण करते हुए केवल इतना ही कीजिए। यह निष्फल नहीं जाएगा।
एक नवरात्र में नौ बार हिंदी पाठ से क्या मिलता है?
बैठने की आदत, और ग्रंथ का वास्तविक विषय
आप पाठ संस्कृत में नहीं, हिंदी में कर रहे हैं — तो यदि एक नवरात्र में भी आप हिंदी में दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ नौ बार पूरा करते हैं, तो आपको बैठने की आदत पड़ेगी; आपको दुर्गा सप्तशती का मूल विषय पता चलेगा; और आपको भगवती के रहस्यों के बारे में पता चलेगा।
आप पाठ संस्कृत में तो नहीं कर रहे — हिंदी में कर रहे हैं। यदि एक नवरात्र में भी आप हिंदी में दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ नौ बार पूरा करते हैं: आपको बैठने की आदत पड़ेगी। आपको दुर्गा सप्तशती का मूल विषय पता चलेगा। आपको भगवती के रहस्यों के बारे में पता चलेगा।
महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के तीन चरित्र, उनके तीन अलग ऋषि, और हर एक में भगवती कहाँ प्रकट होती हैं।
तीन चरित्र, तीन ऋषि, और हर स्तुति का फल
महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के तीन चरित्र कैसे हैं; तीनों के ऋषि एक-दूसरे से अलग कैसे होते हैं; किन स्थलों पर भगवती प्रकट हो रही हैं और देवता कैसे स्तुति कर रहे हैं; इन मुख्य स्तुतियों को स्वतंत्र रूप से करने पर क्या मिलेगा; कवच के पाठ से क्या मिलना है; और अर्गला और कीलक के पाठ से क्या होने वाला है।
आपको क्या पता चलने वाला है? आपको पता चलने वाला है कि इन तीनों — महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती — के तीन चरित्र कैसे हैं। तीनों के ऋषि एक-दूसरे से अलग कैसे हो रहे हैं। किन स्थलों पर भगवती प्रकट हो रही हैं, और देवता कैसे स्तुति कर रहे हैं। यदि हम इन मुख्य स्तुतियों को स्वतंत्र रूप से करें तो क्या मिलेगा। कवच का पाठ करने से क्या मिलना है। अर्गला और कीलक का पाठ करने से क्या होने वाला है।
भगवती मन में ऐसा बीज बोती हैं जिससे पाठ करने वाला समय के साथ बहुत अच्छा देवी साधक बन जाता है।
बोया गया बीज जो अच्छा देवी साधक बनाता है
भगवती कहीं न कहीं आपके मन में ऐसा बीज बो देंगी कि समय के साथ आप बहुत अच्छे देवी साधक बन जाएँगे — अवश्य बनेंगे।
कहीं न कहीं आपके मन में भगवती ऐसा बीज बो देंगी कि समय के साथ आप बहुत अच्छे देवी साधक बन जाएँगे। आप अवश्य बनेंगे।
संस्कृत आने तक प्रतीक्षा करने में क्या हानि है?
बैठने की आदत छूट जाती है, और टीका बिना पढ़ने से भाव व्यर्थ जाता है
यदि आप नहीं करते, यदि सोचते हैं कि संस्कृत आ जाएगी तब शुरू करेंगे, तो उस समय आपको बैठने की आदत नहीं होगी। और यदि आप संस्कृत पढ़ रहे हैं पर उसकी टीका नहीं जानते — यानी उसका भावार्थ, शब्दार्थ आदि — तो आपका भाव व्यर्थ जाता है। आप लय में पाठ करेंगे, पर यह भी नहीं जानते कि उसका अर्थ क्या है, क्योंकि जिन्हें संस्कृत पूरी नहीं आती, जिन्होंने केवल पढ़ना और रटना सीखा है, उन्हें पता ही नहीं कि श्लोक का अर्थ क्या है।
पर यदि आप नहीं करते, यदि सोचते हैं कि जब संस्कृत आ जाएगी तब हम इसे शुरू करेंगे, तो उस समय आपको बैठने की आदत नहीं होगी। यदि आप संस्कृत पढ़ रहे हैं और उसकी टीका नहीं जानते — यानी उसका भावार्थ, शब्दार्थ आदि नहीं जानते — तो आपका भाव व्यर्थ जाता है। आप लय में पाठ करेंगे, पर आपको पता ही नहीं कि उसका अर्थ क्या है; क्योंकि जिन्हें संस्कृत पूरी नहीं आती, जो केवल पढ़ना और रटना सीखेंगे, उन्हें श्लोक का अर्थ क्या पता।
हिंदी पाठ अंत में किस ओर ले जाता है?
आसान उच्चारण, और संस्कृत आने पर अर्थ का ज्ञान
यदि आपने अभी हिंदी में इसका नौ बार पाठ कर लिया, और जब तक संस्कृत नहीं आती तब तक हर नवरात्र हिंदी में पाठ करते रहें — तो जिस दिन संस्कृत धीरे-धीरे आने लगेगी, पहला, संस्कृत में उच्चारण आपको आसानी से आएगा; और दूसरा, आप पहले से जानते होंगे कि श्लोक का अर्थ क्या है, और तभी यह फल आप तक पहुँचने वाला है।
पर यदि आपने अभी हिंदी में इसका नौ बार पाठ कर लिया, और जब तक संस्कृत नहीं आ रही तब तक हर नवरात्र हिंदी में पाठ करते रहें, करते रहें — तो जिस दिन संस्कृत धीरे-धीरे आपको आने लगेगी: पहला, संस्कृत में उच्चारण आपको आसानी से आएगा। दूसरा, आप पहले से जानते होंगे कि श्लोक का अर्थ क्या है — और तभी यह फल भी आप तक पहुँचने वाला है। वक्ता कहते हैं कि अब आप गुरुकुल में जाकर नहीं सीख सकते; आपका वह समय नहीं है। पर यदि आप इस ढंग से सीखते हैं, तो यह आपके लिए अत्यंत लाभकारी होने वाला है।
यह हिंदी पाठ कौन कर सकता है?
स्त्री हो या पुरुष, अपने अधिकार के अनुसार
आप स्त्री हों या पुरुष, अपने अधिकार के अनुसार हिंदी में पाठ कीजिए। आपका भाव जगदंबा के श्री चरणों में लगेगा। वक्ता कहते हैं कि यही बात की जड़ बन गई है।
इसलिए, आप स्त्री हों या पुरुष, अपने अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। के अनुसार, हिंदी में पाठ कीजिए। आपका जो भाव है, वह जगदंबा के श्री चरणों में लगेगा। यही इसकी जड़ बन गई है।
नवरात्र के नौ दिन विशेष हैं, क्योंकि जिनके पास कुंडली नहीं है उनके लिए नव दुर्गा रूप नवग्रहों की पीड़ा का उत्तर हैं।
नव दुर्गा रूप, नौ ग्रह, और ग्रहों की माताएँ
भगवती के नव दुर्गा रूपों का पूरा विषय, जो हर नवरात्र दोहराया जाता है: आप नवग्रहों से पीड़ित हैं, कौन सा ग्रह कहाँ है, किसी के पास अपनी कुंडली नहीं है। इसलिए नवरात्र के ये नौ दिन अत्यंत विशेष हो जाते हैं। चैनल पर एक वीडियो है जिसमें भगवती की नौ दुर्गाओं, नौ ग्रहों और नौ ग्रहों की माताओं से जुड़ा पूरा विषय बताया गया है; इच्छा हो तो वह अनुष्ठान रात्रि के समय कीजिए।
साधना के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को पितरों, कुल शक्ति, और लग्नेश तथा अष्टम भाव की प्रसन्नता चाहिए।
पितर, कुल शक्ति, लग्नेश और अष्टम भाव
क्योंकि जिन्हें सचमुच साधना के क्षेत्र में जाना है, उन्हें अपने पितरों की प्रसन्नता, कुल की शक्ति की प्रसन्नता, और लग्न कुंडली के अनुसार अपने लग्नेश, पंचमेश और नवमेश की प्रसन्नता चाहिए; और यदि आप विशेष रूप से तंत्र साधना में प्रवेश करना चाहते हैं, चाहे ज्योतिष हो या तंत्र, तो अष्टम भाव की स्थिति क्या है, और इन सबकी पूर्ण कृपा।
विशेष रूप से जो नए साधक हैं — क्योंकि जिन्हें सचमुच साधना के क्षेत्र में जाना है — उनके लिए अपने पितृ की प्रसन्नता, कुल शक्ति की प्रसन्नता, और लग्न कुंडली के अनुसार आपके लग्नेश, पंचमेश और नवमेश की प्रसन्नता है। और यदि आप विशेष रूप से तंत्र साधना में जाना चाहते हैं, चाहे ज्योतिष हो या तंत्र, तो अष्टम भाव की स्थिति क्या है, और इन सबकी पूर्ण कृपा।
भगवती नवग्रह रूप में स्थित हैं, और ग्रहों का अपना अधिकार है जिसे छोड़ा नहीं जा सकता।
भगवती नवग्रह रूप में हैं और उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता
क्योंकि सब मिलाकर, आप इन्हें अलग-अलग कहाँ करेंगे? नौ ग्रहों की कृपा आवश्यक है। भगवती नवग्रह रूप में हैं; उनका भी अपना अधिकार है, और आप उन्हें छोड़ नहीं सकते। इसलिए वक्ता कहते हैं: जीवन में कम से कम एक बार, एक नवरात्र में, नवग्रहों, नव दुर्गाओं और नवग्रहों की माताओं की सम्यक साधना कीजिए। आपके लिए बहुत कुछ आसान हो जाएगा।
यदि कोई व्यक्ति भारी बाधा में फँसा हो तो क्या करे?
धन, परिवार, उग्र अभिचार, षड्यंत्र, झूठा मुकदमा
वक्ता स्थिति को साफ़-साफ़ बताते हैं: धन से जुड़ी ऐसी बाधा कि कोई रास्ता न सूझे, और आप रो रहे हों, आँखों से खून के आँसू आ रहे हों; घर-परिवार के लोग सहयोग न कर रहे हों; किसी विपत्ति से बहुत बुरी तरह जूझ रहे हों; किसी शत्रु का उग्र अभिचार आप पर चल रहा हो; किसी षड्यंत्र में फँस गए हों; किसी झूठे मुकदमे में फँसा दिए गए हों।
इसके बाद अगला विषय आता है: यदि आप किसी बहुत भयानक बाधा में फँसे और अटके हुए हैं, भाई। यदि धन से जुड़ी ऐसी बाधा है कि कोई रास्ता सूझ ही नहीं रहा — आप रो रहे हैं, आँखों से खून के आँसू आ रहे हैं। घर-परिवार के लोग सहयोग नहीं कर रहे। आप किसी विपत्ति से बहुत बुरी तरह जूझ रहे हैं। किसी शत्रु का उग्र अभिचार आप पर चल रहा है; आप किसी षड्यंत्र में फँस गए हैं; आपको किसी झूठे मुकदमे में फँसा दिया गया है। यदि ऐसी स्थिति आ गई है और बनी हुई है।
रोज़ कम से कम 108 पाठ दुर्गा 32 नामावली के, शाम छह से रात दस के बीच आरंभ करके।
दुर्गा 32 नामावली, रोज़ 108, शाम छह से रात दस के बीच
संध्या समय और रात्रि समय के बीच रोज़ कम से कम 108 पाठ भगवती दुर्गा की 32 नामावली के। शाम छह बजे से रात दस बजे के बीच आरंभ कीजिए, 108 पाठ पूरे होने में जितना भी समय लगे। और 108 पाठ पूरे होने के बाद कपूर पर नौ लौंग रखकर भगवती को बलि के रूप में अर्पित कीजिए।
यदि आप ऐसी भयानक परिस्थिति में फँसे हैं, तो संध्या समय और रात्रि समय के बीच रोज़ भगवती दुर्गा के durga-32-names के कम से कम 108 पाठ करने चाहिए। शाम छह बजे से रात दस बजे के बीच आरंभ कीजिए, 108 पाठ पूरे होने तक जितना भी समय लगे। और 108 पाठ पूरे होने के बाद कपूर पर नौ लौंग रखकर भगवती को बलि के रूप में अर्पित कीजिए।
पाठ नवमी की रात तक चलता है, नवरात्र व्रत रखें या न रखें।
नवमी की रात तक, व्रत के साथ या बिना
आपको यह नवमी की रात तक करना होगा। यदि आप नवरात्र का व्रत रखते हैं तो यह बहुत आसानी से हो जाएगा; और यदि व्रत नहीं रखते, तो अपनी सुविधा के अनुसार सुबह, शाम या रात में पाठ कर सकते हैं।
आपको यह नवमी की रात तक करना होगा। यदि आप नवरात्र का व्रत रखते हैं, तो यह बहुत आसानी से हो जाएगा। यदि आप व्रत नहीं रखते, तो अपनी सुविधा के अनुसार सुबह, शाम या रात में पाठ कर सकते हैं।
यदि पीड़ा शत्रुओं के समूह से हो और न्याय की आशा हो तो क्या करें?
32 नामावली, या बगलामुखी का अष्टोत्तर शतनाम
यदि आप शत्रुओं के समूह से बहुत अधिक पीड़ित हैं और न्याय की आशा रखते हैं, तो आप या तो 32 नामावली की, या भगवती बगलामुखी के अष्टोत्तर शतनाम की शरण ले सकते हैं। यदि आप बगलामुखी का कर रहे हैं, तो एक और काम किया जा सकता है — और सबसे पहले, जब आप भगवती का जप करें, तो पीला वस्त्र और पीला आसन अवश्य होना चाहिए। यह आवश्यक है।
यदि आप शत्रुओं के समूह से बहुत अधिक पीड़ित हैं, यदि न्याय की आशा रखते हैं, तो या तो 32 नामावली, या आप भगवती बगलामुखी के अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। की शरण भी ले सकते हैं। अष्टोत्तर शतनाम में आप एक और काम भी कर सकते हैं, यदि आप भगवती बगलामुखी का कर रहे हैं। इसमें, जब भी आप भगवती का जप करें, सबसे पहले पीला वस्त्र और पीला आसन अवश्य होना चाहिए। यह आवश्यक है।
भगवती पीतांबरा के लिए कौन सा अलग दीपक रखा जाता है?
पाठ की अवधि तक घी का हरिद्रा दीपक
जब आप अष्टोत्तर शतनाम का पाठ करते हैं, तो वह केवल पाठ नहीं होता — आसन बिछा है, धूप-दीप जला है, और आप दीपक के सामने बैठकर जप कर रहे हैं। इसके अलावा, भगवती पीतांबरा के लिए जितनी देर पाठ करें उतनी देर एक अलग दीपक रखिए, जिसमें हरिद्रा अवश्य डाली गई हो; और नवरात्र में वह घी का दीपक हो।
दूसरा: जब आप अष्टोत्तर शतनाम का पाठ करते हैं, तो केवल पाठ नहीं होता — आसन बिछा है, आपका धूप-दीप जला है, और आप दीपक आदि के सामने बैठकर जप कर रहे हैं। भगवती पीतांबरा के लिए, जितनी देर आप पाठ करेंगे, उतनी देर एक अलग दीपक रखिए, जिसमें हरिद्रा अवश्य डाली गई हो — और नवरात्र में वह घृत का दीपक हो।
बगलामुखी अष्टोत्तर शतनाम पाठ में पीले फूलों का उपयोग कैसे होता है?
ग्यारह फूल, हर एक पर दस या ग्यारह पाठ
जब आप भगवती पीतांबरा का जप करें — यदि आप अष्टोत्तर शतनाम के 108 पाठ करने वाले हैं — तो अपने पास कम से कम ग्यारह पीले फूल रखिए। और हर फूल पर ग्यारह बार, या दस बार, अष्टोत्तर शतनाम का पाठ करके उसे कलश पर, या भगवती के विग्रह पर, जहाँ चाहें, अर्पित कीजिए।
दूसरा, जब आप भगवती पीतांबरा का जप करें: यदि आप अष्टोत्तर शतनाम के 108 पाठ करने वाले हैं, तो अपने पास कम से कम ग्यारह पीले फूल रखिए। और हर फूल पर ग्यारह-ग्यारह बार, या दस-दस बार, अष्टोत्तर शतनाम का पाठ करके, उसे कलश पर, या भगवती के विग्रह पर — जहाँ चाहें — अर्पित कीजिए। ऐसा करने पर आपका हृदय उनसे बहुत जुड़ेगा; आपका मन संतुष्ट होगा। और आपने जो संकल्प लिया है, वह भी बहुत जल्दी फल देने लगेगा।
बगलामुखी पाठ में संध्या की बलि में क्या मिलाया जाता है?
नौ लौंग के साथ थोड़ी पीली सरसों
एक और काम: यदि आप भगवती पीतांबरा बगलामुखी का कर रहे हैं, और संध्या के समय उनका पाठ कर रहे हैं, तो उस संध्या समय जो बलि देते हैं उसमें थोड़ी पीली सरसों मिलाइए — पीली सरसों, फिर नौ लौंग — और उसे कपूर पर जलाइए।
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ एक और काम आपको करना चाहिए, यदि आप भगवती पीतांबरा बगलामुखी का कर रहे हैं। इसमें, यदि आप संध्या के समय उनका पाठ कर रहे हैं, तो संध्या समय जो बलि आदि देंगे, उसमें थोड़ी पीली सरसों मिलाकर — पीली सरसों, फिर नौ लौंग — कपूर पर जलाइए।
भगवती के चार प्रमुख वीर कौन हैं?
गणपति, बटुक भैरव, महावीर हनुमान और नरसिंह
नवरात्र में बटुक भैरव जी की पूजा अत्यंत आवश्यक है; और मुख्य रूप से, वक्ता कहते हैं, भगवती के चार गण, प्रमुख वीर — पहले भगवान श्री गणपति जी, दूसरे भगवान श्री बटुक भैरव जी, तीसरे भगवान श्री महावीर हनुमान जी, और चौथे भगवान श्री नरसिंह जी। इन चारों की पूजा अनिवार्य है।
चारों में से हर एक की पूजा कहाँ होती है?
मुख्य द्वार, कलश, ध्वजा और देहली
भगवान गणपति का पूजन आपके मुख्य द्वार पर, और पूजा स्थान पर कलश के पास; भगवान श्री बटुक भैरव जी का पूजन भी द्वार के पास, और भगवती के पास; हनुमान जी का पूजन हनुमान जी की ध्वजा के पास और कलश के पास; और भगवान नरसिंह की पूजा घर के मुख्य द्वार की देहली पर, चौखट पर — और भगवती के पास।
चारों भगवती के चारों ओर कैसे स्थित हैं?
विनायक सामने, हनुमान दाएँ, बटुक भैरव बाएँ, नरसिंह पीछे
यदि भगवती खड़ी होकर आपकी ओर देख रही हैं, तो आपके और भगवती के बीच की जगह में भगवान श्री विनायक विराजमान हैं। भगवती के दाईं ओर भगवान श्री हनुमान जी विराजमान हैं; भगवती के बाईं ओर भगवान श्री बटुक भैरव जी विराजमान हैं; और पीछे के भाग में भगवान श्री नरसिंह जी उपस्थित हैं। चारों दिशाओं में चार प्रमुख महावीर उपस्थित हैं।
यदि भगवती खड़ी होकर आपकी ओर देख रही हैं, तो आपके और भगवती के बीच जो जगह है — वहाँ भगवान श्री विनायक विराजमान हैं। भगवती के दाईं ओर भगवान श्री हनुमान जी विराजमान हैं। भगवती के बाईं ओर भगवान श्री बटुक भैरव जी विराजमान हैं। और भगवती के पीछे के भाग में भगवान श्री नरसिंह जी उपस्थित हैं। तो चारों दिशाओं में चार प्रमुख महावीर उपस्थित हैं, और इन चारों की प्रसन्नता अनिवार्य है। यदि ये चारों प्रसन्न हो जाएँ, तो आपके लौकिक और दैविक दोनों काम जल्दी से जल्दी सफल होने लगते हैं, और मंत्र सिद्धि भी शीघ्रता से प्राप्त होती है।
देहली चारों का स्थान क्यों है?
भगवती भीतर स्थापित होने पर इनका मूल स्थान द्वार पर रहता है
यदि आप इन सबका सम्यक पूजन बहुत विशेष ढंग से करना चाहते हैं, तो चारों का पूजन देहली पर होगा — क्योंकि कलश स्थापना हो जाने पर भगवती आपके घर के भीतर विराजमान होंगी, और उस समय इन चारों का मूल स्थान केवल द्वार पर ही रहेगा। देहरी होना, चौखट होना अत्यंत आवश्यक है; और यदि आप नवरात्र में रोज़ चौखट पूजन कर रहे हैं, तो आप बहुत सी शक्तियों को संतुष्ट कर रहे हैं।
यदि आप इन सबका सम्यक पूजन बहुत विशेष ढंग से करना चाहते हैं, तो चारों का पूजन देहली पर होगा। क्योंकि जब घटस्थापना हो जाएगी, तो भगवती आपके घर के भीतर विराजमान होंगी — और उस समय इन चारों का मूल स्थान केवल द्वार पर ही रहेगा। देहरी होना, चौखट होना अत्यंत आवश्यक है। यदि आप नवरात्र में रोज़ चौखट पूजन कर रहे हैं, तो मोटे तौर पर आप बहुत सी शक्तियों को संतुष्ट कर रहे हैं। इसलिए यह आवश्यक है।
यदि नवरात्र में साधिका का मासिक धर्म आ जाए तो क्या करे?
वे जिस नियम पर टिके हैं, उनके विरुद्ध जो कहते हैं कोई नियम नहीं
वक्ता मानते हैं कि यह प्रतिबंध वास्तविक है और सुनने वालों से कहते हैं कि इसे स्वीकार करें, बहकावे में आकर अपराध न करें। जो लोग YouTube पर कहते हैं कि रजस्वला स्त्री को पूजन करने से कोई नहीं रोक सकता, उसे पूजन करना चाहिए, नवरात्र का व्रत रखना चाहिए और सब कुछ करना चाहिए — उन्हें वे उत्तर देते हैं: भाई, कीजिए, पर थोड़ी नीति और नियम के साथ कीजिए।
रजस्वला साधिका पूजा स्थान पर नहीं जाती, कलश नहीं छूती, और न आरती करती है न पूजन।
न पूजा स्थान, न छूना, न कलश, न आरती
पूजन स्थान पर नहीं जाना चाहिए; छूना आदि नहीं चाहिए। कि उस समय आप जाकर कलश आदि छुएँ, आरती करें, पूजन करें — यह सब मत कीजिए। और यदि करते हैं, वक्ता कहते हैं, तो उसमें हानि केवल आपकी है; उनके कहने से क्या होने वाला है, यह आपकी अपनी इच्छा है।
पूजन स्थान पर नहीं जाना चाहिए। छूना आदि नहीं चाहिए। यह गलत बात है — कि उस समय आप जाकर कलश आदि छुएँ, आरती करें, पूजन करें। यह सब मत कीजिए। और यदि आप करती हैं, तब भी उसमें हानि केवल आपकी है। हमारे कहने से क्या होने वाला है — यह आपकी अपनी इच्छा है। यदि आपको अपना परिवार बिगाड़ना है, अपना बच्चा बिगाड़ना है, अपना पति बिगाड़ना है, अपना मायका बिगाड़ना है, तो प्रसन्नता से कीजिए; इसमें हमारा क्या जा रहा है। आप करेंगी तो मेरा कुछ नहीं जाएगा; नहीं करेंगी तो भी मेरा कुछ नहीं जाएगा। इसलिए यह आपकी इच्छा है।
रजस्वला स्त्रियों को पूजा से रोकने पर शिक्षक पर क्या आरोप लगाया गया?
चंद्र ग्रहण पर यह दावा कि शिक्षक पुरुष है जो स्त्रियों को रोकता है
कि वे इसलिए मना करते हैं क्योंकि वे पुरुष हैं। हाल के चंद्र ग्रहण के समय एक रजस्वला साधिका ने इस बारे में पूछा, जबकि उन्होंने हर जगह लिख दिया था कि उस अवस्था में कुछ नहीं करना है। उत्तर यह दिया गया कि वे आखिर पुरुष हैं, और पुरुष कभी नहीं चाहेगा कि स्त्री आगे बढ़े — इस तरह एक तथाकथित सिद्ध साधिका ने उन्हें ऐसे पुरुष की श्रेणी में डाल दिया, जो चाहता है कि स्त्रियाँ आगे न बढ़ें और इसी कारण चंद्र ग्रहण में रजस्वला स्त्री को जप से मना करता है।
पर यदि आप नीति और नियम से चलने वाली साधिका हैं, और आप जानती हैं — एक साधिका ने कहा: कि हम चाहते हैं कि स्त्रियाँ आगे न बढ़ें, और इसी कारण हम उन्हें रजस्वला अवस्था में पूजन करने से मना करते हैं। और यह विषय कब उठा? अभी जो चंद्र ग्रहण हुआ, उसके समय। एक साधिका रजस्वला थी; उसने पूछा। हमने हर जगह पूरा लिख दिया था कि रजस्वला अवस्था में कुछ नहीं करना है। तब कहा गया कि वे आखिर पुरुष हैं — तो पुरुष कभी नहीं चाहेगा कि स्त्री आगे बढ़े। तो एक तथाकथित सिद्ध साधिका के कहे अनुसार हम ऐसे पुरुष की श्रेणी में आ गए हैं: कि हम चाहते हैं कि स्त्रियाँ आगे न बढ़ें, और इसी कारण हमने चंद्र ग्रहण में रजस्वला स्त्री को जप आदि से रोका है। लोगों के ऐसे ऊँचे विचार हैं।
सूतक में विग्रह छूना क्यों वर्जित है, जबकि देवता स्वयं अछूत नहीं होते?
सूतक हमारे शरीर को लगता है, देवताओं को नहीं
वे कहते हैं, विचार कीजिए कि ग्रहण पड़ने से नौ-दस घंटे पहले सूतक लग जाता है — और सूतक के समय श्री विग्रहों को छूना वर्जित रहता है। सूतक के समय देवता अछूत नहीं होते; सूतक हमारे शरीर में लगता है। हम योग्य नहीं रहते; मल-मूत्र का यह शरीर इस योग्य नहीं रहता कि देव विग्रह को छुए। यह हमारे अपने कल्याण के लिए है, क्योंकि वह अनगिनत तत्वों से युक्त महा-ऊर्जा है, और ऐसी अवस्था में छूने पर कठिनाई हमें ही होगी।
अब विचार कीजिए, वक्ता कहते हैं। ग्रहण पड़ने से नौ घंटे पहले, दस घंटे पहले, सूतक लग गया। सूतक के समय श्री विग्रहों को छूना वर्जित रहता है। सूतक के समय देवता अछूत नहीं होते, भाई — सूतक हमारे शरीर में लगता है। हम उसके योग्य नहीं रहते; मल-मूत्र का यह शरीर इस योग्य नहीं रहता कि हम देव विग्रह को छुएँ, देवताओं को छुएँ। इसलिए यह हमारे अपने कल्याण के लिए है — क्योंकि वह अनगिनत तत्वों से युक्त महा-ऊर्जा है। ऐसी अवस्था में यदि हम छुएँ, तो कठिनाई हमें होगी।
सूतक का तर्क रजस्वला साधिका पर क्यों लागू होता है, और उसके प्रवाह को कौन संतुलित करता है?
अनगिनत तत्व, और वह प्रवाह जिसे केवल कामाख्या संतुलित करती हैं
वे कहते हैं, ठीक इसी प्रकार, देव विग्रह के बाद, पुरुषों से पहले स्त्रियाँ आती हैं। रजस्वला अवस्था में उनके भीतर अनगिनत तत्वों की मात्रा सबसे अधिक होती है; उस समय उनकी ऊर्जा का प्रवाह पूरी तरह असंतुलित होता है; और उसे केवल और केवल भगवती कामाख्या ही संतुलित करती हैं। स्त्रियों का संबंध सृष्टि की सर्वोच्च शक्ति से है।
ठीक इसी प्रकार, देव विग्रह के बाद, पुरुषों से पहले, स्त्रियाँ आती हैं। रजस्वला अवस्था में उनके भीतर अनगिनत तत्वों की मात्रा सबसे अधिक होती है। उस समय उनकी ऊर्जा का जो प्रवाह होता है, वह पूरी तरह असंतुलित होता है। और उसे केवल और केवल भगवती कामाख्या ही संतुलित करती हैं। स्त्रियों का संबंध सृष्टि की सर्वोच्च शक्ति से है।
स्वयं कामाख्या में क्या अंतर है?
वहाँ कोई नहीं रोकेगा; और कहीं छू नहीं सकते
वक्ता कहते हैं, इसीलिए हम हमेशा कामाख्या कवच करने को कहते हैं। यदि आप कामाख्या जी में हैं, तो जाइए — वहाँ आपको कोई नहीं रोकेगा, और यदि कोई दुष्ट व्यक्ति वहाँ रोके, तो कहिए कि यहाँ यह गलत है। पर किसी और क्षेत्र में आप छू नहीं सकतीं। वहाँ जगदंबा अपने उस मूल रूप में, सृष्टि के रूप में हैं, इसलिए वहाँ का विषय अलग है; किसी और क्षेत्र में यदि आप छू रही हैं और कोई आपको बढ़ावा दे रहा है, तो वह व्यक्ति केवल आपका विनाश चाहता है।
वक्ता आगे कहते हैं, इसीलिए हम हमेशा कहते हैं कि आप कामाख्या कवच अवश्य करें। यदि आप कामाख्या जी में हैं, तो जाइए — वहाँ आपको कोई नहीं रोकेगा। और यदि कोई दुष्ट व्यक्ति वहाँ रोके, तो वहाँ कहिए कि यहाँ यह गलत है; वहाँ आपको कोई समस्या नहीं। पर किसी और क्षेत्र में आप छू नहीं सकतीं। वहाँ जगदंबा अपने उस मूल रूप में हैं, सृष्टि के रूप में हैं, इसलिए उस स्थान का विषय अलग है। पर किसी और क्षेत्र में, यदि आप छू रही हैं और कोई आपको बढ़ावा दे रहा है कि नहीं, कर लो — तो वह केवल आपका विनाश चाहने वाला व्यक्ति है।
वे अपने विषय पर पूरी तरह स्पष्ट हैं, और पूछते हैं कि रजस्वला स्त्री के विरुद्ध ऐसी सलाह मानने वाली स्त्री कहाँ पहुँचती है।
स्पष्ट स्थिति, और ऐसी सलाह कहाँ ले जाती है इस पर एक नज़र
कि वे अपने विषय पर पूरी तरह स्पष्ट हैं। यदि वह व्यक्ति किसी से कह रही है कि रुद्रांश जी चाहते हैं कि स्त्री आगे न बढ़े, इसलिए रजस्वला स्त्री को जप से मना करते हैं — तो वह ऐसी स्त्री है जो आपका भी विनाश चाहती है, और साथ में उनका नाम घसीट रही है ताकि उनकी भी बदनामी हो। यदि आप सोचती हैं कि रजस्वला अवस्था में जप करने से आपको उग्र ऊर्जा मिलेगी, तो जिसने यह कहा वह स्वयं देख ले कि उसका अपना जीवन कैसे घिसट रहा है।
और यदि वह व्यक्ति किसी से कह रही है कि नहीं, रुद्रांश जी चाहते हैं कि स्त्री आगे न बढ़े, और इसी कारण वे रजस्वला स्त्री को जप करने से मना करते हैं, ऐसे मना करते हैं — तो वह ऐसी स्त्री है जो चाह रही है कि आप भी बर्बाद हों, और साथ में हमारा नाम भी अच्छी तरह घसीट रही है, ताकि हमारी भी बदनामी हो। इसलिए हम अपने विषय पर बहुत स्पष्ट हैं, वक्ता कहते हैं। यदि आप सोचती हैं कि रजस्वला अवस्था में जप करने से आपको उग्र ऊर्जा मिलेगी, तो जिन्होंने यह कहा है वे स्वयं देख लें कि उनका अपना जीवन कैसे घिसट रहा है। हम यह सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं, क्योंकि अब यह बड़ी बात बन गई है। अपना आरोप लगाइए, पर यदि इस तरह लगाएँगे, तो हम सार्वजनिक रूप से बोलेंगे। ध्यान रखिए।
नवरात्र में रजस्वला साधिका को वास्तव में क्या करना है?
व्रत रखें, फलाहार अच्छे से करें, पूजा कक्ष से बाहर रहें
यदि नवरात्र के आरंभ से ही आप रजस्वला हो गई हैं, तो व्रत रखिए — आप बिल्कुल रख सकती हैं — पर फलाहार अच्छे से कीजिए, क्योंकि उस समय शरीर को उसकी आवश्यकता होती है। श्री विग्रह आदि मत छुइए। कलश स्थापना और पूजन के लिए बने कक्ष में मत जाइए। आरती के समय आप पूजन कक्ष के बाहर खड़ी होकर आरती देख सकती हैं, आरती गा सकती हैं; पर किसी प्रकार का बर्तन मत छुइए, आरती मत लीजिए, और आरती के पास मत जाइए।
रजस्वला अवस्था में, यदि नवरात्र आदि में आप आरंभ से ही रजस्वला हो गई हैं: व्रत रखिए — आप बिल्कुल रख सकती हैं। पर फलाहार अच्छे से कीजिए, क्योंकि उस समय शरीर को उसकी आवश्यकता होती है। श्री विग्रह आदि मत छुइए। कलश की स्थापना और पूजन के लिए जो कक्ष बनाया गया है, उसमें मत जाइए। आरती के समय, पूजन कक्ष के बाहर खड़ी होकर, आप आरती देख सकती हैं; आरती गा सकती हैं। पर किसी प्रकार का बर्तन मत छुइए, आरती मत लीजिए, आरती के पास मत जाइए। यह आपको अपने परिवार के कल्याण के लिए करना चाहिए।
यदि अनुष्ठान के बीच में साधिका रजस्वला हो जाए तो क्या करे?
व्रत पूरा करें; केवल जाना और करना रुकता है
यदि आपने अनुष्ठान शुरू किया था और बीच में रजस्वला हो गईं, तब भी अपना व्रत पूरा कीजिए। व्रत रखना मत छोड़िए; फलाहार पर रहिए। उस समय केवल यही नियम होगा कि आपको न जाना है, न कुछ करना है।
यदि आपने अनुष्ठान शुरू किया था और उसके बीच में रजस्वला हो गईं, तब भी अपना व्रत पूरा कीजिए। व्रत रखना मत छोड़िए। फलाहारी रहिए। उस समय केवल यही नियम होगा: कि आपको न जाना है, और न कुछ करना है।
कामाख्या कवच का जप बिस्तर पर होता है, बिना आसन, बिना पात्र और बिना रंगीन वस्त्र के।
बिस्तर पर कामाख्या कवच — न आसन, न पात्र, न रंगीन वस्त्र
किसी भी अवस्था में सबसे बड़ा है कामाख्या कवच — वक्ता कहते हैं, माताओं के लिए सबसे श्रेष्ठ। जो अनुष्ठान आप भगवती के कलश के पास, भगवती के पास अपने आसन पर बैठकर कर रही थीं, रजस्वला अवस्था में वह जप अपने बिस्तर पर बैठकर कीजिए। कोई पात्र नहीं चाहिए, कोई साधन नहीं चाहिए, कोई आसन नहीं चाहिए, वस्त्र के रंग का कोई महत्व नहीं। आपका शरीर पूरी तरह ऊर्जा से भरा है: भगवती कामाख्या का स्मरण कीजिए और कवच का जप कीजिए।
सबसे बड़ी बात यह कि किसी भी अवस्था में हम हमेशा कहते हैं — भाई, माताओं के लिए सबसे बड़ा है कामाख्या कवच। जो अनुष्ठान आप भगवती के कलश के पास अपने आसन पर बैठकर, भगवती के निकट बैठकर, जप करते हुए कर रही थीं — रजस्वला अवस्था में वह जप अपने बिस्तर पर बैठकर कीजिए। कोई पात्र नहीं चाहिए। कोई साधन नहीं चाहिए। कोई आसन नहीं चाहिए। वस्त्र के रंग का कोई महत्व नहीं। आपका शरीर पूरी तरह ऊर्जा से भरा है। भगवती कामाख्या का स्मरण कीजिए। कवच का जप कीजिए — उनका दश-भाव-विद्यात्मक कामाख्या कवच।
नवरात्र में ऐसा होने को साधिका कैसे देखे?
हानि नहीं, एक बड़ा अवसर
उसे उद्विग्न नहीं होना है। वक्ता कहते हैं, जानिए कि आपको बहुत बड़ा अवसर मिला है — कि नवरात्र में आप रजस्वला हुई हैं। केवल थोड़ा संतुलन रखना है, और उस समय जो उद्विग्नता की अवस्था आती है उसे नियंत्रित करना है। आप साधिका हैं; आप कर सकती हैं। यह सामान्य लोगों के बस की बात नहीं, जिनके मूड स्विंग पूरे घर का मूड बिगाड़ देते हैं — उन्हें छोड़िए; वे साधिका की बात कर रहे हैं।
यदि यह नवरात्रों के समय में हो, तो आपको उद्विग्न नहीं होना है। जानिए कि आपको बहुत बड़ा अवसर मिला है: कि नवरात्र में आप रजस्वला हुई हैं। केवल थोड़ा संतुलन रखना है। उस समय जो उद्विग्नता की अवस्था आती है, उसे नियंत्रित करना है। आप साधिका हैं। आप कर सकती हैं। यह सामान्य लोगों के बस की बात नहीं; सामान्य लोगों के मूड स्विंग ऐसे होते हैं कि पूरे घर का मूड बिगाड़ देते हैं। उन्हें छोड़िए। आप साधिका हैं। हम आपकी बात कर रहे हैं — उनकी जो स्वयं को साधिका मानती हैं, कि हम साधिका हैं। तो वह कैसी साधिका जो नियंत्रण न कर सके? जो पूरी सृष्टि को संतुलित कर सकती है, जो पूरी सृष्टि को जन्म दे सकती है — क्या वह चार दिन स्वयं को नियंत्रित नहीं कर सकती? उनमें क्षमता है, भाई: वे अपने साथ चालीस और लोगों को भी नियंत्रित कर लेंगी।
उन दिनों कामाख्या कवच केवल जप के लिए है, प्रयोग के लिए कभी नहीं, और भगवती कामाख्या कामनाएँ पूरी करती हैं।
केवल जप, कोई प्रयोग नहीं — वे कामनाओं की देवी हैं
केवल जप। बिस्तर पर बैठकर अपना जप कीजिए, रात को या दिन में, और फिर उस कवच की उग्रता देखिए। प्रयोग मत कीजिए — केवल जप कीजिए, और वे कामनाएँ पूरी करेंगी, क्योंकि भगवती कामाख्या कामनाओं की देवी हैं। आपको यह कहकर हाथ-पैर नहीं मारने हैं कि मेरी यह कामना पूरी करो; आपको केवल कवच करते रहना है।
यदि ये चार दिन, या पाँच दिन की अवधि, नवरात्र के बीच में आ गई है — तो जो साधिकाएँ नहीं हैं, जो किसी प्रकार के जुगाड़ में पड़ गई हैं, जिन्हें बहकाया जा रहा है, उनके लिए हर ओर से रास्ते बंद हैं। पर आप देवी उपासक हैं; आप भगवती कामाख्या कवच का निरंतर जप करती रहती हैं — तो आपके लिए यह अवसर है। बिस्तर पर बैठिए। अपना जप कीजिए। रात को कीजिए, दिन में कीजिए, और फिर उस कवच की उग्रता देखिए। प्रयोग मत कीजिए। केवल जप कीजिए। वे कामनाएँ पूरी करेंगी; भगवती कामाख्या कामनाओं की देवी हैं, वे पूरी करेंगी। आपको यह कहकर हाथ-पैर नहीं मारने हैं कि मेरी यह कामना पूरी करो। आपको केवल कवच करते रहना है।
यदि कोई शत्रु तंत्र कर रहा हो तो रजस्वला साधिका क्या करे?
बिस्तर पर बैठकर कामाख्या कीजिए — केवल उसी शक्ति पर निर्भर रहिए
यदि कोई शत्रु आपके पीछे पड़ा है और बहुत तंत्र-मंत्र का जुगाड़ कर रहा है, और नवरात्र के समय आप रजस्वला हो जाती हैं — तो बस बिस्तर पर बैठकर अपना कामाख्या कीजिए। उस शत्रु को पता भी नहीं चलेगा; वह जो भी था, उसकी सारी तंत्र विद्या जहाँ की तहाँ पड़ी रह जाएगी। चिंता मुक्त रहिए। जिस शक्ति के बारे में यह कहा जा रहा है उस पर निर्भर रहिए; उस पर विश्वास रखिए, और किसी पर नहीं।
यदि कोई शत्रु आपके पीछे पड़ा है और बहुत तंत्र-मंत्र का जुगाड़ कर रहा है, और नवरात्र के समय आप रजस्वला हों — तो बस बिस्तर पर बैठकर अपना कामाख्या कीजिए। उस शत्रु को पता भी नहीं चलेगा। वह बहुत बड़ा तांत्रिक था; उसकी सारी तंत्र विद्या जहाँ पड़ी है वहीं पड़ी रह जाएगी। चिंता मुक्त रहिए। जो कहा जा रहा है, जिस शक्ति के बारे में कहा जा रहा है — उस पर निर्भर हो जाइए; उस पर विश्वास रखिए। किसी और पर मत रखिए।
शिक्षक इसे केवल योग्य साधिकाओं के लिए रखने के बजाय खुलकर क्यों बताते हैं?
जो विषय योग्य को जाने चाहिए, माताओं के लिए खुलकर कहे गए
क्योंकि जो कौल और शाक्त साधक हैं वे जानते हैं कि कुछ विषय सार्वजनिक रूप से नहीं कहे जा सकते — और सच्चे विषयों पर भी लोग नकारात्मक टिप्पणियाँ करते हैं, जिससे अजीब स्थिति बनती है और मन खराब होता है, इसलिए उन्हें किसी योग्य और अधिकारी को बताना बेहतर है। पर यहाँ यह संभव नहीं; वे इसे सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं ताकि साधिकाएँ, साधना करने वाली माताएँ, लाभ पा सकें। जिसे जो कहना है कहे और उनके पाप अपने सिर ढोए; उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
वक्ता कहते हैं कि यह स्त्रियों के लिए विशेष हो गया। और देखिए, ये विषय ज्ञात हैं — जो कौल और शाक्त साधक हैं: एक विषय होता है, और कई बार हम बोलते-बोलते छोड़ देते हैं, ऐसे विषय जो सार्वजनिक रूप से नहीं कहे जा सकते। जो विषय सच्चे हैं उन पर भी लोग नकारात्मक टिप्पणियाँ करते हैं; एक अजीब सी स्थिति बन जाती है, और उसे देखकर मन खराब हो जाता है। इसीलिए नहीं कहा जाता — बेहतर है कि हम उसे जो योग्य और अधिकारी हो उसे कहें। पर अब, किसी के साथ भी, वह बात हमारे लिए संभव नहीं। इसलिए हम इसे सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं, ताकि जो साधिकाएँ हैं, साधना करने वाली माताएँ, वे लाभ पा सकें। बाकी, जिसे कुछ कहना है वह कहे और हमारे पाप अपने सिर ढोए; हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
फिटकरी और काली मिर्च की पोटली क्या है?
जप के समय हाथ में ली जाने वाली फिटकरी और काली मिर्च
उन दिनों के लिए कामाख्या कवच में जोड़ी गई एक छोटी सी चीज़। फिटकरी क्या है, सब जानते हैं: यदि साधना करने वाली कोई माता रजस्वला है, तो थोड़ी काली मिर्च और थोड़ी फिटकरी लेकर लाल कपड़े में बाँधें, और बिस्तर पर अपने पास रखें — तकिये के बगल में, सिर के नीचे नहीं। जब जप करें, तो बस उसे हाथ में लें, जप पूरा करें, और वापस रख दें। जो स्त्री जीवन में पहली बार साधना करने बैठी है, वह यह न करे।
वक्ता कहते हैं कि इसी कामाख्या कवच में एक और चीज़ जुड़ती है, जो उस समय आप यह भी करें तो अत्यंत श्रेष्ठ होगी। पर उसे बताना मुझे सार्वजनिक रूप से उचित नहीं लगता, इसलिए उसे रहने दें — क्योंकि आधे लोग उस पर पागल हो जाएँगे कि अरे, यह तो तांत्रिक विधि हो गई। फिर भी, इतना समझ लीजिए। फिटकरी क्या है, सब जानते हैं। जब साधना करने वाली कोई माता रजस्वला हो — जो जीवन में पहली बार साधना करने बैठी है, वह यह न करे। पर यदि आप साधना करती हैं, तो फिटकरी और काली मिर्च ऐसी दो चीज़ें हैं जिन्हें आप अपने बिस्तर पर अपने बगल में रखेंगी — यानी तकिये के बगल में। वे आपके नीचे न आएँ, सिर के नीचे न आएँ; केवल बगल में रहें। उन्हें लाल कपड़े में बाँधकर रखिए: थोड़ी काली मिर्च और थोड़ी फिटकरी। जब जप करें, तो बस उसे हाथ में लेकर जप पूरा करें, और फिर वापस रख दें।
बार-बार गर्भपात के क्या कारण हैं?
बार-बार गर्भपात, और उसके तीन कारण
वह स्थिति जहाँ किसी स्त्री का गर्भ बार-बार गिर जाता है। वक्ता तीन कारण बताते हैं: कि उस परिवार में कोई दोष है, पितरों की कोई बात है; कि कोई आभिचारिक स्थिति बाँधी गई है कि जब स्त्री गर्भ धारण करेगी तो सपने में किसी को देखेगी और गर्भ गिर जाएगा; और तीसरा, चाहे कोई चिकित्सीय कारण हो या कुछ और, कि वह गर्भ धारण नहीं कर पाती, या करती है पर वह टिकता नहीं और गिर जाता है।
यदि किसी स्त्री का गर्भ बार-बार गिरता रहता है। या जैसा कई बार होता है, कि जब गर्भ ठहरता है तो सपने में किसी प्रकार का कुछ दिखता है, और उसके बाद गर्भ गिर जाता है। तो यह एक दोष है: कि उस परिवार में कोई दोष है, पितृ की कोई बात है। और दूसरा यह कि कोई आभिचारिक अवस्था बाँधी गई है — कि जब स्त्री गर्भ धारण करेगी, तब वह सपने में किसी को देखेगी और उसका गर्भ गिर जाएगा। ऐसी स्थिति कई बार होती है। और तीसरा यह कि, इनमें से कुछ हो या न हो, कोई चिकित्सीय कारण हो या कुछ और, वह गर्भ धारण नहीं कर पाती; या यदि हो रहा है, गर्भ ठहर रहा है पर टिकता नहीं और गिर जाता है।
रजस्वला दिनों में अभिमंत्रित रखी गई वस्तु दशमी तिथि पर कमर में बाँधी जाती है।
दशमी तिथि पर कमर में बाँधना
यदि कामाख्या कवच करने वाली साधिका ने नवरात्र के बीच रजस्वला होने के समय यह वस्तु अभिमंत्रित करके रखी है, तो केवल इतना करना है: संबंधित स्त्री की कमर में दशमी तिथि पर बँधवा दें — चाहे कृष्ण पक्ष की हो या शुक्ल पक्ष की, दशमी तिथि पर।
ऐसी अवस्था में, यह — कि आप, कामाख्या कवच करने वाली साधिका, नवरात्र के बीच जिस समय रजस्वला हुईं, यदि उन्होंने यह वस्तु अभिमंत्रित करके रखी है: तो केवल इतना करना है। संबंधित स्त्री की कमर में दशमी तिथि पर बँधवा दीजिए — चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो या शुक्ल पक्ष की, दशमी तिथि पर बँधवा दीजिए।
काले धतूरे की जड़ कैसे लाई जाती है?
काले धतूरे की जड़, और पुष्य नक्षत्र का निमंत्रण
काले धतूरे की जड़, यदि मिल सके, तो यह श्रेष्ठ हो जाता है — पर उसे लाने की अपनी विधि है। विधि यह है कि जब पुष्य नक्षत्र पड़े, तो पुष्य नक्षत्र से एक दिन पहले उसे निमंत्रण दें; और नक्षत्र में यह नहीं देखना कि गुरु पुष्य है या रवि पुष्य, केवल यह कि पुष्य नक्षत्र से एक दिन पहले। अगले दिन जाकर वह जड़ खोदकर लाइए, और उसे इसमें रखा जाता है। फिर जिसे कठिनाई है उसकी कमर में बाँधने पर, वक्ता कहते हैं, 99% संभावना है कि गर्भ टिकेगा — 1% देवी की इच्छा और आपके अपने कर्म हैं।
एक और बात: यदि मिल सके, तो बहुत श्रेष्ठ है — काले धतूरे की जड़। पर उसे लाने का पूरा विधि-विधान है। लाने की विधि यह है कि जब पुष्य नक्षत्र पड़े, तो उससे एक दिन पहले आप उन्हें निमंत्रण दें। और नक्षत्र में यह नहीं देखना कि गुरु पुष्य है या रवि पुष्य — केवल पुष्य नक्षत्र से एक दिन पहले आप उन्हें निमंत्रण देंगे। और अगले दिन जाकर वह जड़ खोदकर लानी है, और उसे इसमें रखा जाता है। और फिर, जब यह चीज़ उसकी कमर में बाँधी जाती है जिसे यह कठिनाई है — तो 99% संभावना है कि गर्भ टिकेगा। एक प्रतिशत देवी की इच्छा और आपके अपने कर्म हैं।
यह किस प्रकार की स्त्री के लिए है?
शुभ विचार वाली, दूसरों का कल्याण चाहने वाली, द्वेष रहित
इस अवस्था वाली स्त्री, और विशेष रूप से शुभ विचारों वाली माता, जो गलत विचार नहीं रखती, जो दूसरों के कल्याण की इच्छा रखती है, जो द्वेष नहीं रखती। यदि ऐसी साधिका नवरात्र के समय रजस्वला हो गई है और कामाख्या कवच का जप कर रही है — तो यदि वह रोज़ एक सौ आठ करे, तो चार दिन में एक सौ आठ आराम से हो जाएँगे; और यदि उसके पास तब समय ही समय है, क्योंकि और कुछ करना नहीं है, तो वह उन चार दिनों में अपना जप एक हज़ार तक, ग्यारह सौ तक ले जाए।
जो स्त्री इस अवस्था में है — विशेष रूप से शुभ विचारों वाली माता, जो गलत विचार नहीं रखती, जो दूसरों के कल्याण की इच्छा रखती है, जो द्वेष नहीं रखती। यदि ऐसी साधिका नवरात्र के समय रजस्वला हो गई है, और वह कामाख्या कवच का जप कर रही है: कितना जप? चार दिन में एक सौ आठ आराम से हो जाएँगे, यदि वह रोज़ एक सौ आठ कर रही है। या यदि उसके पास समय ही समय है — क्योंकि उस समय और कुछ करना नहीं है — तो वह उन चार दिनों में अपना जप एक हज़ार तक, ग्यारह सौ तक ले जाए।
बाद में कामाख्या कवच का जप कहाँ अर्पित करना चाहिए?
कामाख्या, विंध्याचल, या गया में मंगला गौरी
पूरा नवरात्र पूरा हो जाने पर, वह एक बार कामाख्या जी जाए — देवी कृपा करके उसे बुलाएँ — या फिर विंध्याचल आए। दोनों में से कम से कम एक स्थान: या तो विंध्याचल आए या भगवती कामाख्या जी जाए। तीसरा है गया जी में मंगला गौरी, अठारह प्रमुख शक्ति पीठों में से एक।
तो इस प्रकार किया गया जप, विशेष रूप से इन साधिकाओं द्वारा — जब पूरा नवरात्र पूरा हो जाए: वह एक बार कामाख्या जी जाए, देवी कृपा करके उसे वहाँ बुलाएँ। या फिर वह विंध्याचल आए। दोनों में से कम से कम कोई एक स्थान: या तो विंध्याचल आए, या भगवती कामाख्या जी जाए। तीसरा है मंगला गौरी — कहाँ? गया जी में। अठारह प्रमुख शक्ति पीठों में से एक।
कामाख्या कवच के एक सौ आठ पाठ कमल के फूल पर करके मुख्य विग्रह पर अर्पित किए जाते हैं।
कमल पर एक सौ आठ पाठ, विग्रह पर अर्पित
वह एक बार उन तीन स्थानों में से किसी एक पर जाए और वहाँ, यदि संभव हो, कमल के फूल पर कामाख्या कवच के 108 पाठ करे, और उसे मुख्य विग्रह पर अर्पित करवाए। वक्ता कहते हैं, ऐसी देवी साधिका के लिए वह कवच फिर जीवन भर के लिए है — कामाख्या स्वयं वहाँ विराजमान होंगी और कृपा करेंगी। पर स्वभाव वैसा ही हो जैसा पहले बताया: स्वभाव से उदार, द्वेष न रखने वाली, छल न करने वाली; तब उसे देवी-स्वरूपा बनने में देर नहीं लगेगी, और ऐसी अवस्था में वाक् सिद्धि बहुत जल्दी प्राप्त होती है।
वह एक बार इन तीनों में से किसी एक स्थान पर जाए, और वहाँ कम से कम 108 पाठ कामाख्या कवच के, यदि संभव हो तो कमल के फूल पर, करे, और उसे मुख्य विग्रह पर अर्पित करवाए। ऐसी देवी साधिका के लिए वह कवच फिर जीवन भर के लिए है — यहाँ कहा जा सकता है कि कामाख्या स्वयं वहाँ विराजमान होंगी और अपनी कृपा करेंगी। पर आरंभ में जो कहा गया उसे ध्यान में रखिए: स्वभाव कैसा होना चाहिए। स्वभाव से उदार, द्वेष न रखने वाली, छल न करने वाली। तब उसे देवी-स्वरूपा बनने में देर नहीं लगेगी। ऐसी अवस्था में, यदि इस प्रकार साधना की जाए, तो वाक् सिद्धि बहुत शीघ्रता से प्राप्त होती है।
इन सबमें केवल कामाख्या कवच ही क्यों?
क्योंकि आप सब इसे कर सकते हैं — यह ब्रह्मास्त्र है
वक्ता कहते हैं कि इसमें बहुत सी चीज़ें हैं, फिर भी हम केवल भगवती कामाख्या कवच को लेकर चल रहे हैं, क्योंकि उसे आप सब कर सकते हैं। और आप सबके लिए यह जान लीजिए — कि यह ब्रह्मास्त्र है।
वक्ता कहते हैं कि यद्यपि इसमें बहुत सी चीज़ें हैं, हम केवल भगवती कामाख्या कवच को लेकर चल रहे हैं, क्योंकि आप सब इसे कर सकते हैं। और आप सबके लिए — भाई, इतना जान लीजिए: कि यह ब्रह्मास्त्र है।
स्वयं कामाख्या में क्या विधि है?
सौभाग्य कुंड, कमल, और गर्भगृह
या तो इसे भगवती कामाख्या के गर्भगृह में अर्पित कीजिए: लाल वस्त्र पहनकर, लाल आसन पर बैठकर, सौभाग्य कुंड के पास दक्षिण की ओर मुख करके बैठिए, जहाँ से कामाख्या जी का मंदिर दिखे। वहाँ बैठकर हाथ में कमल का फूल लेकर कवच का जप कीजिए। उसे लाल कपड़े में लपेटकर रखिए; और यदि उस दिन गर्भगृह में जा सकें, तो उसी दिन जाकर अर्पित कीजिए — गर्भगृह में मुख्य पीठ पर कुंड में उसे गिरने दीजिए, बस जाने दीजिए, और उसके बाद जल पीजिए।
या तो इसे भगवती कामाख्या के गर्भगृह में अर्पित कीजिए। लाल वस्त्र आदि पहनकर, लाल आसन पर बैठकर, सौभाग्य कुंड के पास बैठिए; आपका मुख दक्षिण की ओर होगा, जहाँ से आप कामाख्या जी का मंदिर देख पाएँगे। वहाँ बैठकर, हाथ में कमल का फूल लेकर, कवच का जप कीजिए। उसे लाल कपड़े में लपेटकर रखिए। यदि उस दिन गर्भगृह में जा सकें, यदि संभव हो, तो उसी दिन जाकर अर्पित कीजिए। गर्भगृह में, मुख्य पीठ पर, उसे कुंड में गिरने दीजिए — बस जाने दीजिए — और उसके बाद जल पीजिए।
कभी श्राप नहीं देना चाहिए, क्योंकि भीतर देवी के वचन के समान सामर्थ्य आ जाता है, और उसका दुरुपयोग करने वाले को योगिनियाँ उत्तर देती हैं।
कभी श्राप न दें; दुरुपयोग करने जाने वाले को योगिनियाँ उत्तर देती हैं
केवल इतना: जीवन में कभी किसी को श्राप मत दीजिए। आपके भीतर ऐसा सामर्थ्य आ जाएगा जो देवी के अपने वचन के समान प्रभाव देता है। और यदि कोई इसे इसलिए करना चाहे कि बाद में फलाने को बर्बाद करेंगे, और इसी नीयत से करने जाए, तो योगिनियाँ ऐसी साधिका के साथ ऐसी अवस्था उत्पन्न करती हैं कि वह किसी काम की नहीं रहती। आपको उसके लिए नहीं जाना है; आपको निष्कल्याण और देवी की कृपा के लिए जाना है।
केवल इतना: जीवन में कभी किसी को श्राप मत दीजिए। आपके भीतर ऐसा सामर्थ्य आ जाएगा जो देवी के वचन के समान प्रभाव देता है। और यदि कोई यह सोचकर चाहे कि हम यह करेंगे और बाद में फलाने को बर्बाद करेंगे — यदि वह ऐसा करने जाती है, तो योगिनी ऐसी साधिका के साथ ऐसी अवस्था उत्पन्न करती हैं कि वह किसी काम की नहीं रहती। इसलिए ध्यान रखिए। आपको यह करने के लिए नहीं जाना है। आपको निष्कल्याण और देवी की कृपा के लिए जाना है। वक्ता कहते हैं कि भौतिक जीवन में आपको क्या मिलेगा और क्या नहीं, यह हम तय नहीं कर सकते। पर इस प्रकार जो अवसर मिलता है, यदि आप उसका एक बार भी अच्छा उपयोग करें और जीवन में जाएँ — तो भगवती बहुत कुछ देती हैं।
यदि वह विंध्याचल या मंगला गौरी जाए तो?
वही कृपा, कामाख्या में सबसे उग्र
यदि आप विंध्य क्षेत्र में आएँ और वहाँ भी जप करके भगवती के चरणों में अर्पित करें, तो यह कृपा मिलती है। और मंगला गौरी में, जहाँ भगवती का स्तन गिरा, उनका वक्ष गिरा — उस स्थान पर भी यदि आप जप करके गर्भगृह में अर्पित करें, तो वहाँ भी वही कृपा मिलती है। सबसे उग्र रूप से यह कामाख्या में है, क्योंकि इस रूप से जुड़ा मूल स्थान भगवती कामाख्या का है, इसलिए वहाँ मुख्य पीठ में।
यदि आप विंध्य क्षेत्र में आएँ, और विंध्य क्षेत्र में भी जप आदि करके भगवती के चरणों में अर्पित करें, तो यह कृपा मिलती है। और मंगला गौरी में, जहाँ भगवती का स्तन गिरा, जहाँ वक्ष गिरा — उस स्थान पर भी यदि आप जप करके गर्भगृह में अर्पित करें, तो वहाँ भी वही कृपा मिलती है। सबसे उग्र रूप से, क्योंकि इस रूप से जुड़ा मूल स्थान भगवती कामाख्या का है, वहाँ मुख्य पीठ में।
क्या दूसरी महाविद्याओं के लिए भी ऐसी विधियाँ हैं?
छिन्नमस्तिका और तारा, जिन पर सार्वजनिक चर्चा नहीं की गई
हाँ — इसी प्रकार भगवती छिन्नमस्तिका और तारा के लिए भी कुछ विधि-विधान है, विशेष रूप से स्त्री साधिकाओं के लिए, मातृ साधिकाओं के लिए। पर वक्ता कहते हैं कि उन्हें ये सब बातें सार्वजनिक रूप से बताना उचित नहीं लगता, क्योंकि लोग न दीक्षा लेंगे न कुछ, और सीधे करने लगेंगे, और फिर कठिनाई होगी। सामान्य प्रकार का इतना किया जा सकता है, पर यह केवल उन साधिकाओं के लिए है जो इन चीज़ों को सुरक्षित और ठीक ढंग से कर सकें।
अब इसी प्रकार भगवती छिन्नमस्तिका और तारा के लिए भी कुछ विधि-विधान है, विशेष रूप से स्त्री साधिकाओं के लिए, मातृ साधिकाओं के लिए। पर, वक्ता कहते हैं, मुझे नहीं लगता कि ये सब बातें सार्वजनिक रूप से बताना उचित होगा — क्योंकि वे न दीक्षा लेंगे न कुछ, और सीधे करने लगेंगे, और फिर कठिनाई होगी। इसलिए सामान्य प्रकार का इतना किया जा सकता है; पर यह केवल उन साधिकाओं के लिए है जो इन चीज़ों को सुरक्षित और ठीक ढंग से कर सकें। अच्छा है कि शरारती लोग इसे न करें।
ऐसी साधिका को परेशान करने वाले भाई, बेटे या पति की सबसे अधिक हानि होती है।
दोधारी तलवार, और पहले किसकी हानि होती है
कि यदि ऐसी साधिका का भाई, बेटा या पति किसी प्रकार के उपद्रव को बुलाता है, किसी प्रकार की परेशानी खड़ी करने लगता है, या कोई कठिनाई देता है — तो जान लीजिए कि सबसे बड़ी हानि स्वयं आप तक पहुँचने वाली है। इस प्रकार के साधकों का जीवन दोधारी तलवार बन जाता है।
अब ऐसी साधिका के साथ — यदि उसका भाई, उसका बेटा, उसका पति किसी प्रकार के उपद्रव को बुलाता है, यदि वे किसी प्रकार का उपद्रव करने लगें, या कोई कठिनाई दें — तो भाई, यह जान लीजिए: कि सबसे बड़ी हानि स्वयं आप तक पहुँचने वाली है। इस प्रकार के साधकों का जीवन दोधारी तलवार बन जाता है।
शक्तिशाली साधक का जीवन दोधारी तलवार क्यों होता है?
क्रोध पर नियंत्रण सबसे पहले आता है
क्योंकि जब व्यक्ति तंत्र क्षेत्र में उग्र साधना करके अपनी ऊर्जा बढ़ाता है, तो उसमें क्षमताएँ आती हैं और देव कृपा होती है — और तब सबसे पहला नियंत्रण उसे अपने क्रोध पर करना होता है, नहीं तो आसपास के लोगों का ही विनाश पहले होगा। इसलिए ऐसी साधिकाओं के लिए क्रोध पर नियंत्रण रखना बहुत आवश्यक है: क्योंकि यदि वे कुछ भी न कहें, केवल किसी के प्रति मन में बुरा भाव ले आएँ, तो उस व्यक्ति के बुरे दिन आ जाएँगे, और फिर वह स्वयं भी उसे रोक नहीं सकती।
वक्ता कहते हैं कि यह वही बात है जिस पर भगवती के दुर्गा प्रणव पर पहले से अपलोड चार और वीडियो बात करते हैं; लोग केवल एक देखते हैं और बाकी तीन नहीं देखते, सोचते हैं वे महत्वपूर्ण नहीं। सब महत्वपूर्ण है; हमने पागलों की तरह वीडियो नहीं बनाए। चारों सुनिए, ताकि हमें क्या करना है और कैसे, इस पर आपकी अवधारणा स्पष्ट रहे। उनमें भी यह विषय बताया गया है: कि जब व्यक्ति तंत्र क्षेत्र में उग्र साधना करता है, तो उसका जीवन दोधारी तलवार बन जाता है — क्योंकि जब वह साधना करके अपनी ऊर्जा बढ़ाता है, तो उसमें क्षमताएँ आएँगी, देव कृपा होगी। अब सबसे पहला नियंत्रण उसे अपने क्रोध पर करना होता है; नहीं तो आसपास के लोगों का ही विनाश पहले होगा। इसलिए ऐसी साधिकाओं के लिए बहुत आवश्यक है कि वे क्रोध पर नियंत्रण रखें। नहीं तो, भले वे कुछ भी न कहें, यदि केवल किसी के प्रति मन में बुरा भाव ले आएँ, तो उस व्यक्ति के बुरे दिन आ जाएँगे — और फिर वह स्वयं भी उसे रोक नहीं सकती।
परिवार के पुरुषों को कैसा आचरण करना चाहिए?
देवी भाव में समर्पित रहें
ऐसी साधिका से रक्त संबंध रखने वाले परिवार के पुरुष — पति, बेटा, भाई — उनके प्रति सदा समर्पित रहें, देवी भाव रखें, कि आप स्वयं देवी हैं। आप जितने कृपालु रहेंगे, दिन में उतने दुगुने आगे बढ़ेंगे। और आप उन्हें जितना क्रोधित करेंगे, और यदि उनका क्रोध सचमुच जाग गया, तो संसार की कोई शक्ति, कोई अनुष्ठान, आपको उस श्राप से मुक्ति नहीं दिला सकता।
और ऐसी साधिकाओं के साथ जो पुरुष वर्ग के लोग हैं, जो भी उनसे रक्त संबंध में हैं — चाहे पति हो, बेटा हो या भाई — वे सदा समर्पित रहें, देवी भाव रखें: कि आप स्वयं देवी हैं। आप जितने कृपालु रहेंगे, दिन में उतने दुगुने आगे बढ़ेंगे। और आप उन्हें जितना क्रोधित करेंगे, जितना भड़काएँगे — और यदि उनका क्रोध सचमुच जाग गया — तो संसार की कोई शक्ति, हमारा कोई अनुष्ठान, आपको उस श्राप से मुक्ति नहीं दिला सकता। फिर जब तक उनकी प्रसन्नता नहीं होती, कुछ नहीं होगा; इसलिए यह जोखिम बिल्कुल मत लीजिए। ऐसा नहीं कि आज दिया श्राप कल कृपा से छूट जाएगा; नहीं होगा, आप फँस जाएँगे। यह विषय ध्यान में रखिए।
एकाक्षरी लेने से पहले कौन सा कवच आता है?
कुब्जिका या कामाख्या, कम से कम ग्यारह सौ
कुब्जिका कवच या कामाख्या कवच: इन दोनों में से किसी एक का अनुष्ठान कम से कम ग्यारह सौ तक कीजिए, और उसके बाद एकाक्षरी बीज को अपने जीवन में उतारिए। जब आपको गुरु मिलें, तो उनसे फिर से इसकी दीक्षा लीजिए; और यदि गुरु न मिलें, तो भी इसमें आपको किसी प्रकार की कठिनाई नहीं आने वाली — आप केवल और आगे बढ़ते जाएँगे, साधनात्मक पथ पर भी और भौतिक जीवन में भी।
अब अगला विषय: जब आप भगवती का एकाक्षरी बीज करते हैं। कामाख्या कवच पर चर्चा इसलिए हुई क्योंकि वह बहुत महत्वपूर्ण है। कुब्जिका कवच या कामाख्या कवच — इन दोनों कवचों में से किसी एक का अनुष्ठान कम से कम ग्यारह सौ तक कीजिए, और उसके बाद एकाक्षरी बीज को अपने जीवन में उतारिए। जब आपको कोई गुरु मिलें, तो उनसे फिर से इसकी दीक्षा लीजिए। और यदि गुरु न मिलें, तो भी इसमें आपको किसी प्रकार की कठिनाई नहीं आने वाली। आप केवल और आगे बढ़ते जाएँगे — साधनात्मक पथ पर, और भौतिक जीवन में भी।
एकाक्षरी लेने के बाद उसे कहाँ-कहाँ साथ ले जा सकते हैं?
त्रिकोण, प्रयाग, काशी, और कामाख्या के कुंड
हर जगह। त्रिकोण करने जाइए और बिना माला के मन में एकाक्षरी बीज का जप चलने दीजिए। प्रयाग जी जाइए और जप चलने दीजिए; दर्शन के समय; काशी क्षेत्र में जाइए और जप चलने दीजिए; दश महाविद्याओं के त्रिकोण दर्शन के लिए कामाख्या क्षेत्र में जाइए, और हर जगह जप चलता रहेगा।
त्रिकोण परिक्रमा करने जाइए, और बिना माला के मन में एकाक्षरी बीज का जप चलता रहने दीजिए। प्रयाग जी जाइए, और दर्शन आदि के समय एकाक्षरी बीज का जप चलता रहने दीजिए। काशी क्षेत्र में जाइए, और जप चलता रहने दीजिए। दश महाविद्याओं के त्रिकोण दर्शन के लिए कामाख्या क्षेत्र में जाइए — हर जगह जप चलता रहेगा।
कामाख्या के कुंडों पर क्या किया जाता है?
जल में हाथ, बिना माला जप, एक-दो घंटे
कामाख्या जी में, दश महाविद्याओं के कुंडों में से जिस कुंड में आप उसमें हाथ रखकर जप कर पाएँ। मुख्य कामाख्या कुंड में एक मिनट लगभग असंभव है — केवल दो-चार सेकंड मिलते हैं; पर दूसरे कुंड अधिक खाली होते हैं। धूमावती माँ का कुंड पूरा खाली मिलेगा; माँ भुवनेश्वरी का थोड़ा खाली; भगवती तारा का बहुत समय पूरी तरह खाली रहता है।
कामाख्या जी में, दश महाविद्याओं के कुंडों में से जिस कुंड में आप हाथ डालकर जप कर पाएँ। मुख्य कामाख्या कुंड में एक मिनट, एक तरह से, असंभव है — केवल दो-चार सेकंड मिलते हैं। पर दूसरे कुंडों में, जैसे धूमावती माँ का कुंड, आपको पूरा खाली मिलेगा। माँ भुवनेश्वरी का आपको थोड़ा खाली मिलेगा। दूसरे कुंड — भगवती तारा का बहुत समय पूरी तरह खाली रहता है।
कुंड पर वह जप कितनी देर किया जाता है?
योगिनी तंत्र का लिखित निर्देश, और एक-दो घंटे
ऐसे किसी और समय जाइए जब भीड़ न हो, और जितनी देर हो सके, उस कुंड में हाथ डालिए — योगिनी तंत्र के अनुसार यह लिखित विषय भी है — ताकि आपका शरीर जल को छू रहा हो, और बिना माला के तेज़ी से मंत्र का जप करते रहिए। एक घंटा, दो घंटे, जितना आपसे संभव हो। और फिर उग्रता देखिए।
वहाँ ऐसे किसी और समय जाइए जब भीड़ न हो, और वहाँ जितनी देर हो सके, उस कुंड में हाथ डालिए — योगिनी तंत्र के अनुसार यह भी लिखित विषय है — यानी आपका शरीर जल को छू रहा हो। और बिना माला के तेज़ी से मंत्र का जप करते रहिए। एक घंटा, दो घंटे, जितना आपसे संभव हो। और फिर उग्रता देखिए।
क्षेत्र छोड़ने से पहले वहाँ के भैरव की पूजा क्यों ज़रूरी है?
क्षेत्र छोड़ते ही शुरू होने वाला असंतुलन
क्योंकि जब उस स्तर पर ऊर्जा मिलती है, तो जैसे ही आप उस क्षेत्र को छोड़कर बाहर आते हैं, उसका असंतुलन शुरू हो जाता है। इसलिए जब भी आप किसी तीर्थ क्षेत्र में जाकर जप करें, तो अंत में उस तीर्थ के भैरव का फिर से पूजन अवश्य कीजिए, उनका आदेश लीजिए, और तभी निकलिए — ताकि वे आपके साथ उतनी ही ऊर्जा रखें जितनी आप संभाल सकें, और बाकी उनके पास रहे, जिसे आवश्यकता पड़ने पर आह्वान करके पाया जा सके।
जब उस स्तर पर ऊर्जा मिलती है — तो जब आप उस क्षेत्र को छोड़ते हैं, जब उस क्षेत्र से बाहर आते हैं, उसी समय उसका असंतुलन शुरू होता है। इसीलिए, जब भी आप किसी तीर्थ क्षेत्र में गए हों और वहाँ जप आदि पूरा किया हो, तो अंत में उस तीर्थ के भैरव का फिर से पूजन अवश्य कीजिए, और आदेश आदि लेकर ही निकलिए — ताकि वे आपके साथ उतनी ही ऊर्जा रखें और सौंपें जितनी आप संभाल सकें, और बाकी ऊर्जा उनके पास रहे; और जब भी आपको आवश्यकता हो, आप उसका आह्वान करके उसे पाते रहें। यह विशेष रूप से बिना गुरु वाले साधकों के लिए है; जिनके उस स्तर के ज्ञानी गुरु हैं, वे उनके अपने ढंग से चलाए जाएँगे, और वह अलग विषय है।
कामाख्या में क्रम का नियम क्या है?
पहले उमानंद भैरव, फिर पांडु, फिर नीलाचल की चढ़ाई
कामाख्या क्षेत्र का नियम है कि पहले उमानंद भैरव जी के दर्शन करें, और फिर नीलाचल चढ़कर भगवती के दर्शन करें। उमानंद भैरव, फिर पांडु जी — पांडु, जो भगवान नारायण हैं, जहाँ मधु और कैटभ के वध के बाद सृष्टि आरंभ हुई — और उसके बाद नीलाचल चढ़कर आप भगवती के दर्शन करते हैं।
अब, कामाख्या जी के क्षेत्र में जाकर: वहाँ का नियम है कि आप पहले उमानंद भैरव जी के दर्शन करें, और फिर नीलाचल चढ़कर भगवती आदि के दर्शन करें। उमानंद भैरव; फिर पांडु जी — पांडु, जो भगवान नारायण हैं, जहाँ मधु और कैटभ का वध होने पर सृष्टि आरंभ हुई। और उसके बाद, नीलाचल चढ़कर, आप भगवती के दर्शन करते हैं।
कामाख्या से लौटते समय क्या किया जाता है?
घर जाने से पहले सौभाग्य कुंड पर संकल्प
जब आपने वहाँ इस प्रकार जप कर लिया, तो लौटते समय फिर से उमानंद भैरव जी के पास जाने की आवश्यकता नहीं; पर मुख्य कामाख्या क्षेत्र में सौभाग्य कुंड के पास उपस्थित होकर, उनके नाम से संकल्प कीजिए, दो, चार या पाँच मिनट जप कीजिए, उनके नाम मंत्र का जप कीजिए, इस कुंड में फूल अर्पित कीजिए, और प्रणाम कीजिए — कि प्रभु, हम अब इस क्षेत्र से अपने स्थान जा रहे हैं; कृपा कीजिए कि हमारा जप सफल रहे और जीवन सफल हो। वे उसे संतुलित कर देंगे।
जब आपने वहाँ इस प्रकार जप आदि कर लिया, तो वापस जाते समय आपको फिर से उमानंद भैरव जी के पास जाने की आवश्यकता नहीं। पर मुख्य कामाख्या क्षेत्र में सौभाग्य कुंड आदि के पास उपस्थित होकर, उनके नाम से संकल्प करके, दो मिनट, चार मिनट, पाँच मिनट जप करके, उनके नाम मंत्र का जप करके, इस कुंड में फूल आदि अर्पित करके, प्रणाम कीजिए: कि प्रभु, हम अब इस क्षेत्र से अपने स्थान जा रहे हैं। कृपा कीजिए, कि हमारा जप सफल रहे, कि जीवन सफल हो। वे उसे संतुलित कर देंगे। सामान्य साधकों के लिए, कम से कम इतना अवश्य कीजिए।
एकाक्षरी का पुरश्चरण किसे शुरू करना चाहिए?
चार लाख, और उसके बाद का प्रयोग विधान
जो स्वयं समझते हैं कि हाँ, हम कर सकते हैं, हम योग्य हैं, हम अधिकारी हैं — वे इसका पुरश्चरण शुरू करें। नियम के अनुसार चार लाख जप; और चार लाख के बाद प्रयोग आदि का विधान चैनल पर दिया गया है, प्रयोग करने का विषय और उपसंहार भी।
एकाक्षरी का पूरा विषय चैनल पर डाल दिया गया है। जो स्वयं समझते हैं कि हाँ, हम कर सकते हैं, हम योग्य हैं, हम अधिकारी हैं — वे इसका पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। शुरू करें। नियम के अनुसार चार लाख जप; और चार लाख के बाद प्रयोग आदि का विधान — वह सब आपको चैनल पर दिया गया है। प्रयोग करने का विषय भी है; उपसंहार और सब कुछ बताया गया है।
क्या किसी वर्तमान परेशानी पर सीधे प्रयोग किया जा सकता है?
पहले सिद्ध करें, फिर प्रयोग करें
नहीं। आपके जीवन में जो कष्ट है उसे दूर करने के लिए सीधे प्रयोग नहीं किया जाता। इन विधानों के अनुसार पहले उसे सिद्ध कीजिए, और उसके बाद उसका प्रयोग कीजिए।
तो आपके जीवन में जो कष्ट है, उसे दूर करने के लिए पहले सीधे प्रयोग नहीं किया जाता। इन विधानों के अनुसार पहले उसे सिद्ध कीजिए। उसके बाद उसका प्रयोग कीजिए। नवरात्र का पूरा विषय — कलश कैसे स्थापित होगा, चाहे हवन आदि का विषय हो या कन्या पूजन का विषय — सब कुछ पहले से चैनल पर प्रकाशित है; और कल के लाइव में उसे और विस्तार से फिर दोहराया जाएगा।
यदि कुलदेवी का पता न हो तो क्या करें?
हो सके तो सप्तशती, नहीं तो तंत्रोक्त देवी सूक्तम्
एक श्रोता ने पूछा जो अपनी कुलदेवी नहीं जानता और नवरात्र में किसी मंदिर में उनकी साधना करना चाहता है, और किस स्तोत्र से: सबसे अच्छा यह होगा कि यदि आप पूरा सप्तशती पाठ उचित ढंग से कर सकें — हिंदी में भी ठीक है — तो कीजिए; नहीं तो तंत्रोक्त देवी सूक्त का पाठ कीजिए।
एक श्रोता पूछता है कि उसे अपनी कुलदेवी का पता नहीं, कि वह नवरात्र में किसी मंदिर जाकर कुलदेवी की साधना करे, और किस स्तोत्र से करे। वक्ता उत्तर देते हैं कि सबसे अच्छा यह होगा कि या तो, यदि आप पूरा सप्तशती पाठ उचित ढंग से कर सकें — हिंदी में भी ठीक है — तो कीजिए। नहीं तो तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का पाठ कीजिए। एक और श्रोता को मन ठीक करने के लिए भगवती पीतांबरा बगलामुखी के 108 नामों का अनुष्ठान करने को कहा जाता है।
देवताओं को दीपदान के लिए कौन सा तेल प्रयोग किया जा सकता है?
मूंगफली का तेल और अन्य
देवताओं को मूंगफली के तेल का दीपदान किया जा सकता है। दूसरे तेलों का दीपदान भी किया जा सकता है।
देवताओं को मूंगफली के तेल का दीपदान किया जा सकता है। दूसरे तेल का दीपदान किया जा सकता है।
बटुक भैरव का कौन सा यंत्र खरीदना चाहिए?
श्री विग्रह वाला ही अपने आप में पर्याप्त है
एक श्रोता पूछता है कि तंत्रोक्त माला वाला यंत्र लें या बटुक भैरव जी की तंत्रोक्त मूर्ति के साथ आने वाला यंत्र, क्योंकि दोनों अलग हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि एक पर्याप्त है — वह जो श्री विग्रह के साथ आता है; वही बहुत है, उसी में सब होगा, और अलग से कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी। यदि आप सब अलग-अलग चाहते हैं, और बटुक भैरव जी का पूरा क्रम से करना चाहते हैं, तो अवश्य ले सकते हैं।
एक श्रोता यंत्र और तंत्रोक्त माला के बारे में, और बटुक भैरव जी की तंत्रोक्त मूर्ति के साथ आने वाले यंत्र के बारे में पूछता है, कहता है कि दोनों अलग हैं और दोनों लिए जा सकते हैं — कौन सा लेना चाहिए। वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि उनकी साधना क्रम से करनी है — यानी यदि आपको बटुक भैरव जी का पूरा करना है — तो आप अवश्य ले सकते हैं, यदि आप इस तरह सब कुछ अलग-अलग चाहते हैं। एक पर्याप्त है। यानी आप वह लेंगे जो श्री विग्रह के साथ है; वही बहुत है। उसी में सब होगा। अलग से कोई नहीं चाहिए।
अलग यंत्र की आवश्यकता कब पड़ेगी?
मंत्रात्मक अर्चन और आवरण पूजन के लिए
अलग से तब चाहिए होगा जब आप मंत्रात्मक अर्चन करेंगे, जब आवरण पूजन करेंगे — बटुक भैरव जी का अठारह अक्षरी, छब्बीस अक्षरी, बीस अक्षरी। जब आपकी दीक्षा हो जाए और गुरु जी आदेश दे दें, तो या तो गुरु जी स्वयं आपको उपलब्ध करा देंगे, या तब आपको बृहद वाले की आवश्यकता होगी; नहीं तो पीठ यंत्र पर्याप्त है।
अलग से उस समय चाहिए होगा जब आप मंत्रात्मक अर्चन करेंगे, जब आवरण पूजा करेंगे — तब आपको उसकी आवश्यकता होगी। बटुक भैरव जी का अठारह अक्षरी, छब्बीस अक्षरी, बीस अक्षरी। अब जब आपकी दीक्षा हो गई और गुरु जी ने बस आदेश दे दिया, तो या तो गुरु जी स्वयं आपको उपलब्ध करा देंगे, या तब आपको बृहद वाले की आवश्यकता होगी। नहीं तो पीठ यंत्र पर्याप्त है।
क्या पीठ यंत्र शिक्षक से ही लेना होगा, या स्वयं बनवाया जा सकता है?
नहीं — वीडियो बताता है कि किस नक्षत्र में बनवाना है
नहीं। पीठ यंत्र पर एक वीडियो सबके लिए पहले ही डाला जा चुका है। वक्ता कहते हैं, आपको पीठ यंत्र हमसे लेने की कोई आवश्यकता नहीं — आप स्वयं बनवा सकते हैं। पूरा ग्रह और नक्षत्र बताया गया है: इस नक्षत्र में बनवाइए, इसमें यह लिखा होगा, इस ढंग से बनवाइए, इस ढंग से स्थापित कीजिए। सब बताया गया है; स्वयं कीजिए।
और मेरे अनुसार, वक्ता कहते हैं, हमने पीठ यंत्र पर सबके लिए एक वीडियो पहले ही डाल दिया है। आपको पीठ यंत्र हमसे लेने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं। आप स्वयं बनवा सकते हैं। पूरा ग्रह और नक्षत्र बताया गया है: इस नक्षत्र में बनवाइए; इसमें यह लिखा होगा; इस ढंग से बनवाइए; इस ढंग से स्थापित कीजिए। सब कुछ बताया गया है। स्वयं कीजिए।
क्या घर से दूर काम करते हुए नौ दिन का व्रत रखा जा सकता है?
अमावस्या पर काशी में, दोपहर को घर
एक श्रोता कहता है कि वह अमावस्या पर काशी में होगा और नवरात्र पर दोपहर बारह बजे घर आएगा, और पूछता है कि क्या वह नौ दिन का व्रत रख सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं, हाँ, क्यों नहीं — बिल्कुल रख सकता है।
एक श्रोता लिखता है कि वह अमावस्या पर काशी में होगा और नवरात्र पर दिन में बारह बजे घर आएगा, और पूछता है कि क्या नौ दिन का व्रत रखा जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं, हाँ, क्यों नहीं रखा जा सकता। बिल्कुल रखा जा सकता है।
मणिकर्णिका घाट पर देव दीक्षा विधान करने के लिए क्या चाहिए?
घाट पर जाना, जहाँ दत्तात्रेय का मंदिर पहले से है
आपको घाट पर जाना होगा। भगवान दत्तात्रेय का मंदिर वहाँ है ही। और भगवान दत्तात्रेय का जो यंत्र आपने लिया है उसकी सहायता से देव दीक्षा विधान किया जा सकता है; इसमें कोई कठिनाई नहीं।
पूछा गया कि मणिकर्णिका घाट पर देव दीक्षा विधान पूरा करने के लिए क्या करना होगा: आपको घाट पर जाना होगा। भगवान दत्तात्रेय का मंदिर वहाँ है ही। और भगवान दत्तात्रेय का जो यंत्र आपने लिया है उसकी सहायता से देव दीक्षा विधान किया जा सकता है; इसमें कोई कठिनाई नहीं।
यदि घाट पर जप करते समय किसी के धोने के छींटे आप पर पड़ें तो?
दोष उसे लगता है जिसने यह किया
एक श्रोता दक्षिणेश्वर से लिखता है कि वह गंगा में जप कर रहा था और एक व्यक्ति अपनी चप्पल और कपड़े धोने लगा, और उसके छींटे उस पर पड़े। वक्ता उत्तर देते हैं, आपको क्या दोष लगेगा — इसमें आपका कोई अपराध नहीं। जिसने किया, उसका दोष उसे लगेगा।
एक श्रोता दक्षिणेश्वर के बारे में लिखता है: कि वह गंगा जी में जप कर रहा था और एक व्यक्ति अपनी चप्पल धोने लगा, अपने कपड़े धोने लगा, और उसके छींटे उस पर पड़े। वक्ता उत्तर देते हैं, आपको क्या दोष लगेगा। इसमें आपका कोई अपराध नहीं। जिसने किया है — उसका दोष उसे लगेगा।
लंबे जप में हाथ दुखे तो क्या करें?
योग दंड, और कुछ मिनट बिना माला
योग दंड की आवश्यकता ठीक इसी के लिए है। यदि उसे रखा जाए तो घर के लोग कहेंगे कि पूरे बाबा जी या माता जी बन गए — पर उसे रखना पड़ता है, क्योंकि जब आप बहुत लंबा जप करते हैं और बाँह साथ नहीं देती, तो योग दंड उसमें भी काम आता है। एक तो हम उससे अपनी नाड़ी स्थिर करते हैं; और दूसरी बात, उसमें यह सहायता भी मिलती है।
पूछा गया कि यदि जप करते समय हाथ दुखने लगे, तो क्या जप माला और गोमुखी नीचे रखकर बिना माला के मंत्र पढ़ा जा सकता है: देखिए, वक्ता उत्तर देते हैं, योग दंड की आवश्यकता ठीक इसी के लिए है। अब यदि उसे रखा जाए, तो घर-परिवार के लोग कहेंगे कि पूरे बाबा जी बन गए, माता जी बन गईं। पर उसे रखना पड़ता है, क्योंकि जब आप बहुत लंबा जप करते हैं और बाँह साथ नहीं देती, तो योग दंड उसमें भी काम आता है। एक तो हम उससे अपनी नाड़ी स्थिर करते हैं; और दूसरी बात यह कि उसमें यह सहायता भी मिलती है।
क्या जप के दौरान कुछ देर माला नीचे रखी जा सकती है?
दो-चार मिनट ठीक है, पर मनका छूट जाता है
श्रोता ने जो लिखा, कि माला और गोमुखी नीचे रखकर फिर बिना माला के जप किया जाए — दो-चार मिनट के लिए आप ऐसा कर सकते हैं, कोई कठिनाई नहीं। पर माला के साथ फिर कठिनाई यह है: मनका कहाँ छूटा, और उसे फिर कैसे उठाएँ।
पर आपने जो लिखा है — कि माला और गोमुखी नीचे रखकर फिर बिना माला के जप किया जाए — दो-चार मिनट के लिए आप यह कर सकते हैं; कोई कठिनाई नहीं। पर माला के साथ फिर वही बात है: मनका कहाँ छूटा, और उसे कैसे उठाना है। वही कठिनाई होगी।
यदि पीठ दुखे और देर तक बैठा न जा सके तो?
जितनी क्षमता है उतना ही; शरीर पर ज़ोर नहीं
यदि आप देर तक नहीं बैठ सकते, तो उतनी ही देर कीजिए जितनी आपकी क्षमता है। शरीर पर ज़ोर नहीं डालना है।
एक श्रोता लिखता है कि रीढ़ में दर्द है और वे बहुत देर तक नहीं बैठ पाते। वक्ता उत्तर देते हैं, यदि आप बहुत देर तक नहीं बैठ सकते, तो उतनी ही देर कीजिए जितनी आपकी क्षमता है। शरीर पर ज़ोर नहीं डालना है। एक और को, जो लिखते हैं कि वे दीक्षित होना चाहते हैं: जब आपको उचित गुरु मिलें, तो अवश्य दीक्षित होइए।
क्या अभिषेक के लिए शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग क्षेत्र ले जाया जा सकता है?
घर का शिवलिंग लेकर घूमना उचित नहीं
शिवलिंग को किसी ज्योतिर्लिंग क्षेत्र ले जाकर वहाँ उसका अभिषेक करने, और उसके नियमों के बारे में पूछा गया: भाई, घर का शिवलिंग दूसरे क्षेत्रों में ले जाकर उसे लेकर घूमना, मेरे अनुसार, उचित नहीं। यदि आप उस क्षेत्र में जा रहे हैं, तो वहाँ जो शिवलिंग और मंदिर हैं, वहीं कीजिए।
पूछा गया कि क्या शिवलिंग को किसी ज्योतिर्लिंग क्षेत्र ले जाकर वहाँ उसका अभिषेक कार्य किया जा सकता है, और नियम क्या होंगे: देखिए भाई, वक्ता उत्तर देते हैं — घर का शिवलिंग दूसरे क्षेत्रों में ले जाकर उसे लेकर घूमना, मेरे अनुसार, उचित नहीं। यदि आप उस क्षेत्र में जा रहे हैं, तो वहाँ जो भी शिवलिंग और मंदिर उपस्थित हैं, वहीं कीजिए। एक और श्रोता को वे पुष्टि करते हैं कि जयंती मंगला का पंद्रह हज़ार जप हो जाने पर दुर्गा की साधना बिल्कुल ली जा सकती है।
क्या भारत में न दिखने वाले ग्रहण पर रुद्रगण साधना की जा सकती है?
21 तारीख का सूर्य ग्रहण
एक श्रोता बताता है कि 21 तारीख को सूर्य ग्रहण है जो भारत में नहीं दिखेगा, और रुद्रगण साधना के बारे में पूछता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल की जा सकती है।
एक श्रोता बताता है कि 21 तारीख को सूर्य ग्रहण है जो भारत में नहीं दिखेगा, और रुद्रगण साधना के बारे में पूछता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल की जा सकती है।
नीराजन के बाद जल क्यों डाला जाता है?
कर्मकांड की एक प्रक्रिया
यह कर्मकांड की एक प्रक्रिया है।
पूछा गया कि नीराजन के बाद जल क्यों डाला जाता है: यह कर्मकांड की एक प्रक्रिया है।
क्या अमावस्या की रात नदी घाट पर खुले में साधना की जा सकती है?
पूछने वाले की स्थिति न जानते हुए, वे कहते हैं उचित नहीं होगा
वक्ता उत्तर देते हैं, भाई, मुझे नहीं पता आपकी स्थिति क्या है — पर सामान्य रूप से ऐसा करना उचित नहीं होगा।
पूछा गया कि क्या अमावस्या की रात नदी घाट पर खुले में बैठकर साधना की जा सकती है: वक्ता उत्तर देते हैं, भाई, मुझे नहीं पता आपकी स्थिति क्या है। सामान्य रूप से ऐसा करना उचित नहीं होगा। पूछा गया कि जन्माष्टमी की रात के लिए बताया गया वट वृक्ष वाला क्या नवरात्रों में रोज़ शुरू किया जा सकता है — बिल्कुल किया जा सकता है।
क्या चौंसठ योगिनी नाम रोज़ पढ़े जा सकते हैं?
हाँ, और कुलदेवी की कृपा के लिए सप्तशती का ग्यारहवाँ अध्याय
चौंसठ योगिनी नाम हर दिन बिल्कुल पढ़े जा सकते हैं। और दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय के 108 पाठ करके देवी की कृपा के लिए, कुलदेवी की कृपा के लिए अर्पित करना बहुत अच्छा है — बिल्कुल कीजिए। वक्ता कहते हैं कि इस पर एक अलग वीडियो बनाया जाएगा कि यह कैसे करना है, और उसमें विशेष मंत्रों के साथ क्या अर्पित करना है।
एक श्रोता पाँच हज़ार वर्ष पुराने भगवती मंदिर के बारे में पूछता है जहाँ बहुत से बंदर आते हैं; वक्ता कहते हैं कि बंदरों से स्वयं को सुरक्षित करके करना चाहिए, और वे इस पर अधिक नहीं कह सकते। चौंसठ योगिनी नाम हर दिन बिल्कुल पढ़े जा सकते हैं। और दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय के 108 पाठ करके देवी की कृपा के लिए, कुलदेवी की कृपा के लिए अर्पित करना बहुत अच्छा है — बिल्कुल कीजिए। वक्ता कहते हैं कि इस पर भी एक अलग वीडियो बनाया जाएगा: यह किस ढंग से करना है, और उसमें विशेष मंत्रों के साथ क्या अर्पित करना है।
भविष्य की साधनाओं में कृपा के लिए संकल्प कैसे बोला जाता है?
आज के अनुष्ठान में आने वाले नवरात्र का नाम लेना
वही विषय बोलिए। जैसे, उदाहरण के लिए: अभी नवरात्र आ रहा है, और इस समय आप भगवान नारायण की उपासना कर रहे हैं और गीता का पाठ कर रहे हैं। यदि आप भविष्य में की जाने वाली साधना में कृपा चाहते हैं, तो कहिए — मैं आज का अनुष्ठान इस उद्देश्य से कर रहा हूँ कि आने वाले नवरात्र में की जाने वाली साधना के लिए मुझे क्षमता मिले, और आपकी कृपा मिले।
पूछा गया कि अनुष्ठान संकल्प में यह कैसे कहें कि भविष्य में मैं जो भी साधना करूँ उसमें आपकी कृपा मिले: वक्ता उत्तर देते हैं, यह संकल्प इस ढंग से कीजिए। जैसे: अभी नवरात्र आ रहा है, और इस समय आप भगवान नारायण की उपासना कर रहे हैं और गीता का पाठ कर रहे हैं। यदि आप भविष्य में की जाने वाली साधना में कृपा की प्राप्ति चाहते हैं, तो यही विषय बोलिए — कि आने वाले नवरात्र में जो साधना की जानी है, उसके लिए मुझे क्षमता मिले और आपकी कृपा मिले; इस उद्देश्य से मैं आज का अनुष्ठान कर रहा हूँ। वे यह भी पुष्टि करते हैं कि श्री देवी भागवत के श्लोक बिल्कुल सुने जा सकते हैं।
क्या पितर घर की बेटी को परेशानी दे सकते हैं?
हाँ, और विशेष रूप से अविवाहित कन्या को
पूछा गया कि क्या पितर घर की लड़की को भी शारीरिक परेशानी दे सकते हैं: हाँ, बिल्कुल दे सकते हैं। विशेष रूप से जब वह अविवाहित हो, कुँवारी हो।
पूछा गया कि क्या पितर घर की लड़की को भी शारीरिक परेशानी दे सकते हैं: हाँ, बिल्कुल दे सकते हैं। विशेष रूप से जब वह अविवाहित हो, जब वह कुँवारी हो। पूछा गया कि गुरु दत्तात्रेय की साधना करते हुए माता की कौन सी साधना करें — भगवती अनघा लक्ष्मी की या अनसूया की — और काली जी के किसी मंत्र के बारे में, जैसे दुर्गा जी का बताया गया था: वे कहते हैं कि यदि गुरु का आदेश मिला तो भविष्य में प्रयास करेंगे।
क्या देव दीक्षा से पहले दत्त माला मंत्र पढ़ा जा सकता है?
पढ़ना और जप वर्जित नहीं
हाँ। इसे पढ़ने पर बिल्कुल कोई रोक नहीं, और इसका जप करने पर भी कोई रोक नहीं। दीक्षा विधान पूरा कीजिए; या यदि आप पहले से अपने किसी गुरु जी से दीक्षित हैं, तो यह अत्यंत श्रेष्ठ है।
पूछा गया कि क्या दत्तात्रेय देव दीक्षा से पहले दत्त माला मंत्र पढ़ा जा सकता है: हाँ, पढ़ा जा सकता है। इसे पढ़ने पर बिल्कुल कोई रोक नहीं। इसका जप करने पर भी कोई रोक नहीं। दीक्षा विधान पूरा कीजिए; या यदि आप पहले से अपने किसी गुरु जी से दीक्षित हैं, तो यह अत्यंत श्रेष्ठ है।
परेशान करने वाले पितर का स्थायी समाधान क्या है?
उपाय नहीं, गति — नारायण बलि या चार बार त्रिपिंडी
पितर बेटी को परेशान करें या बेटे को, समाधान एक ही है — कि वे तृप्त और संतुष्ट हों। अस्थायी उपाय, जल देना, जीव सेवा करना, अस्थायी ही रहेंगे। यदि आप स्थायी रूप से चाहते हैं, तो या तो, यदि आप जानते हैं कि कौन सा पितर है और उनका नाम जानते हैं, तो उनके लिए नारायण बलि करवाइए और उनकी गति होने दीजिए; या फिर चार बार त्रिपिंडी, चार संवत्सर, और घर में रोज़ गीता पाठ। तभी होगा, यदि आप स्थायी समाधान चाहते हैं।
देखिए, वक्ता कहते हैं: पितर बेटी को परेशान करें या बेटे को, समाधान एक ही है — कि उन्हें तृप्ति, संतुष्टि तक पहुँचाया जाए। और जितना अस्थायी उपाय है — जल देना, जीव सेवा करना आदि — वह केवल अस्थायी ही रहेगा। यदि आप स्थायी रूप से चाहते हैं, तो या तो, यदि पता हो कि कौन सा पितर है, यदि उनका नाम आदि पता हो, तो उनके लिए नारायण बलि आदि करवाइए, उनकी गति होने दीजिए। या फिर चार बार त्रिपिंडी श्राद्ध, चार बार, चार संवत्सर — और घर में रोज़ गीता का पाठ। ये सब पहले भी बताए गए हैं। तभी होगा, यदि आप स्थायी समाधान चाहते हैं।
परेशान करने वाले पितर के विरुद्ध अस्थायी उपाय बार-बार विफल क्यों होते हैं?
इधर-उधर धकेलना, और सोखा-ओझा के पास भागना
कि यह अनुभव का विषय है। जितना आप इसे तंत्रात्मक ढंग से ले जाएँगे, उतना ही इधर-उधर धकेलना चलता रहेगा — इस ओर से पकड़ा, बाँधा, छाना, उस ओर धकेल दिया; दो साल या एक साल बाद वह फिर छूट जाता है, फिर लौट आता है, और रोना-धोना शुरू हो जाता है कि हमने तो बाँध दिया था, यह किया था, वह किया था। यदि आप इसी सब में फँसे रहना चाहते हैं, तो सोखा और ओझा के पास भागते रहिए, और यह होता रहेगा। और यदि एक ही बार में समाधान चाहते हैं, तो यह कीजिए।
जो लोग कहते हैं कि इससे नहीं होगा — भाई, यह अनुभव का विषय है। जितना आप इसे तंत्रात्मक ढंग से ले जाएँगे, उतना ही इधर-उधर धकेलना चलता रहेगा: इस ओर से आप पकड़ते हैं, बाँधते हैं, छानते हैं, और उस ओर धकेल देते हैं; दो साल बाद, एक साल बाद, वह फिर छूट जाता है, फिर आ जाता है, और फिर रोना-धोना शुरू होता है कि हमने तो बाँध दिया था, यह किया था, वह किया था। यदि आप इसी सब में पड़े रहना चाहते हैं, तो सोखा बाबा और ओझा के पास भागते रहिए; यह होता रहेगा। और यदि आप एक बार में और सदा के लिए समाधान चाहते हैं, तो यह कीजिए।
दत्तात्रेय देव दीक्षा विधान कहाँ पूरा करना चाहिए?
काशी, विंध्याचल या गिरनार — जहाँ मन हो
काशी, विंध्याचल और गिरनार में से एक मार्ग बताने को कहा गया: जहाँ आपका मन हो वहाँ कीजिए। भगवान दत्त का स्थान हर जगह है, और हर जगह वे सोलह कलाओं से युक्त विराजमान रहते हैं।
पूछा गया कि गुरु दत्तात्रेय देव दीक्षा विधान कहाँ पूरा करें — काशी, या विंध्याचल, या गिरनार — और एक मार्ग बताने को कहा गया: वक्ता उत्तर देते हैं, जहाँ आपका मन हो वहाँ कीजिए। भगवान दत्त का स्थान हर जगह है, और हर जगह वे सोलह कलाओं से युक्त विराजमान रहते हैं।
क्या बगलामुखी के स्तोत्र शतनाम के लिए दीक्षा आवश्यक है?
अष्टोत्तर शतनामावली दोनों तरह से खुली है
कुछ वर्षों से श्री विद्या दीक्षा में एक श्रोता इस नवरात्र में रोज़ बगलामुखी के स्तोत्र शत के 108 पाठ करने के बारे में पूछता है। यदि आप दीक्षित हैं तो अवश्य कर सकते हैं, और इसमें कोई कठिनाई नहीं; और बिना दीक्षा के भी अवश्य कर सकते हैं — स्तोत्र शतनाम में कोई समस्या नहीं।
एक श्रोता लिखता है कि वह कुछ वर्षों से श्री विद्या की दीक्षा में है, और पूछता है कि क्या वह इस नवरात्र में रोज़ बगलामुखी के स्तोत्र शत के 108 पाठ कर सकता है। यदि आप दीक्षित हैं तो बिल्कुल कर सकते हैं; कोई कठिनाई नहीं। और बिना दीक्षा के भी आप बिल्कुल कर सकते हैं। स्तोत्र शतनाम में कोई समस्या नहीं।
क्या लहसुन-प्याज़ खाने के बाद जप किया जा सकता है?
इससे बढ़ने वाली गर्मी, और बिना खाए जप करना
सामान्य रूप से लहसुन-प्याज़ खाकर जप आदि नहीं करना चाहिए — यह पहली बात है। भाई, लहसुन-प्याज़ खाने से शरीर में गर्मी बढ़ेगी और कठिनाइयाँ आएँगी; विशेष रूप से पुरुषों को अलग प्रकार की कठिनाइयाँ होने लगती हैं। जहाँ तक जप का विषय है, बिना खाए करें तो अधिक श्रेष्ठ होगा। रही दिनचर्या की बात, तो वह इस पर भी निर्भर है कि आप क्या काम करते हैं।
पूछा गया कि रात में साधना किस समय शुरू करें, क्या दिनचर्या रखें, और क्या लहसुन-प्याज़ खाकर जप किया जा सकता है: भाई, लहसुन-प्याज़ खाने से शरीर में गर्मी बढ़ेगी और कठिनाइयाँ आएँगी; विशेष रूप से पुरुषों को अलग प्रकार की कठिनाइयाँ होने लगती हैं। और यदि आप नवरात्र की नहीं, सामान्य दिनों की बात पूछ रहे हैं — तो सामान्य रूप से लहसुन-प्याज़ खाकर जप आदि नहीं करना चाहिए। यह पहली बात है। दूसरी बात: दिनचर्या क्या हो। वह इस पर भी निर्भर है कि आप क्या काम करते हैं। जहाँ तक जप आदि का विषय है: यदि आप बिना खाए करें, तो अधिक श्रेष्ठ होगा। समय अपनी सुविधा के अनुसार — रात के समय की बात हो तो नौ बजे के बाद बेहतर है।
क्या नवरात्र में दूसरी अखंड ज्योत रखनी चाहिए?
पहले से साल भर जल रहा दीपक, और एक और जोड़ें या नहीं
एक श्रोता लिखता है कि घर में साल भर से अखंड ज्योत जल रही है और पूछता है कि क्या नवरात्र में अलग से दूसरी रखनी चाहिए। यदि वह ज्योत वैसे भी भगवती को समर्पित है, तो यदि आप अलग से एक और रखेंगे, तो उसे केवल नौ दिन रखना होगा, या फिर आगे चलाना होगा — निर्णय आपका है। वक्ता के अनुसार, यदि घर में सदा अखंड ज्योत जलाए रखनी है, तो जो पहले से जल रही है उसे वैसे ही रहने दीजिए; और यदि नौ दिन के लिए अलग से जलाना चाहें, तो वह भी कर सकते हैं।
माला की प्राण प्रतिष्ठा के लिए पीपल का पत्ता कब तोड़ा जा सकता है?
सामान्यतः किसी भी दिन, पर शनिवार या रविवार नहीं
नवरात्र के पहले दिन अनुष्ठान करना चाहने वाले एक श्रोता ने माला की प्राण प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक पीपल का पत्ता तोड़ने की विधि पूछी: सामान्य रूप से आप जाकर ला सकते हैं, कोई समस्या नहीं। पर रविवार को मत तोड़िए — शनिवार और रविवार छोड़ दीजिए।
नवरात्र के पहले दिन अनुष्ठान करना चाहने वाले एक श्रोता ने माला की प्राण प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। का पत्ता तोड़ने का विधान पूछा: सामान्य रूप से आप जाकर ला सकते हैं; कोई समस्या नहीं। पर रविवार को मत तोड़िए। शनिवार और रविवार छोड़कर।
क्या चौंसठ योगिनी पाठ के बाद भोग देना चाहिए?
नैवेद्य तो वैसे भी हर पूजन में होता है
देखिए, हर पूजन में, सुबह और शाम, नैवेद्य देना चाहिए; अलग से देने की कोई बाध्यता नहीं। पर यदि आप विशेष रूप से उनका अनुष्ठान कर रहे हैं, तो अलग से दे सकते हैं।
पूछा गया कि क्या चौंसठ योगिनी नामावली के पाठ के बाद भोग देना चाहिए: देखिए, हमें हर पूजन में, सुबह और शाम, नैवेद्य देना चाहिए। अलग से देने की कोई बाध्यता नहीं। पर यदि आप विशेष रूप से उनका अनुष्ठान कर रहे हैं, तो आप अलग से दे सकते हैं।
नवरात्र के सभी दिनों में बटुक भैरव की कौन सी साधना करें?
अष्टोत्तर शतनामावली
नवरात्र के आने वाले सभी दिनों में भगवान बटुक भैरव जी की साधना करना चाहने वाले एक श्रोता के पूछने पर: अष्टोत्तर शतनामावली कीजिए।
एक श्रोता लिखता है कि नवरात्र में आने वाले सभी दिनों में उसकी इच्छा भगवान बटुक भैरव जी की साधना करने की है, और पूछता है कि कौन सी साधना करे। वक्ता उत्तर देते हैं, अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। नामावली कीजिए।
क्या नवरात्र में ऐसी अस्पताल ड्यूटी की जा सकती है जहाँ मृत्यु होती है?
हाँ — और कामाख्या कवच का अनुष्ठान कीजिए
एक श्रोता लिखती हैं कि क्या वे नवरात्र में अस्पताल ड्यूटी पर जा सकती हैं, जहाँ किसी रोगी की मृत्यु होती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि वे बिल्कुल जा सकती हैं — और उन्हें कामाख्या कवच का अनुष्ठान करने को कहते हैं।
एक श्रोता लिखती हैं कि क्या वे नवरात्र में अस्पताल ड्यूटी पर जा सकती हैं, जहाँ किसी रोगी की मृत्यु होती है। वक्ता उत्तर देते हैं, बिल्कुल जा सकती हैं। कामाख्या कवच का अनुष्ठान कीजिए।
विवाह से पहले गर्लफ्रेंड के साथ संबंध बनाना अनुचित क्यों है?
कन्या पहले अग्नि को दी जाती है, और कन्यादान का फल
कि विवाह से पहले यह अनुचित है। वक्ता कहते हैं, जब विवाह होता है, तो उस समय कुँवारी कन्या पहले भगवान श्री अग्नि देव को अर्पित की जाती है, और उसके बाद पूरी तरह शुद्ध होकर वह पुरुष को प्राप्त होती है। तो यदि आप चाहते हैं कि लड़की के पिता को कन्यादान का कोई फल न मिले, तो यह सब कीजिए। यह किसी भी प्रकार उचित नहीं — और वे जोड़ते हैं कि यह प्रश्न ही सार्वजनिक रूप से पूछना उचित नहीं था।
एक श्रोता पूछता है कि क्या, दोनों साधना करते हुए, वह अपनी गर्लफ्रेंड के साथ संबंध बना सकता है। वक्ता कहते हैं, मुझे नहीं लगता कि यह प्रश्न आपके लिए सार्वजनिक रूप से पूछना उचित था। विवाह से पहले, भाई, यह अनुचित है। जब विवाह होता है, तो उस समय कुँवारी कन्या पहले भगवान श्री अग्नि देव को अर्पित की जाती है, और उसके बाद पूरी तरह शुद्ध होकर वह पुरुष को प्राप्त होती है। तो यदि आप चाहते हैं कि लड़की के पिता को कन्यादान का कोई फल न मिले, तो यह सब कीजिए। किसी भी प्रकार यह उचित नहीं।
यदि उपनयन कभी नहीं हुआ तो क्या दीक्षा ली जा सकती है?
प्रायश्चित्त सहित करवाइए, फिर दीक्षा लीजिए
क्षत्रिय कुल और करण जाति के सत्ताईस वर्ष के एक श्रोता लिखते हैं कि उनका उपनयन नहीं हुआ है, और पूछते हैं कि क्या वे भविष्य में कभी दीक्षा नहीं ले सकते और आगमोक्त मार्ग में इसका क्या प्रावधान है। यह उपनयन प्रायश्चित्त के साथ करवाइए, और दीक्षा भी लीजिए — कोई समस्या नहीं।
एक श्रोता लिखते हैं कि वे सत्ताईस वर्ष के हैं, क्षत्रिय कुल और करण जाति के हैं, और उनका उपनयन नहीं हुआ है; वे पूछते हैं कि क्या वे भविष्य में कभी भी दीक्षा नहीं ले सकते, और आगमोक्त मार्ग में इसका क्या प्रावधान है। यह उपनयन प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। के साथ करवाइए, और दीक्षा भी लीजिए। कोई समस्या नहीं।
क्या रोज़ पाठ के बिना शाबर मंत्र की ऊर्जा बनी रहती है?
समय-समय पर एक दिन का अनुष्ठान, और साप्ताहिक आहुति
बिल्कुल बनी रहती है। समय-समय पर उसका एक दिन का अनुष्ठान करना चाहिए; और यदि संभव हो, तो सप्ताह में कम से कम एक दिन — शनिवार, या मंगलवार, या रविवार, इन तीनों में से कोई एक दिन — आहुति आदि अवश्य देनी चाहिए।
पूछा गया कि यदि हम सबर मंत्र का रोज़ पाठ न करें तो क्या उसकी ऊर्जा बनी रहती है: वक्ता उत्तर देते हैं, बिल्कुल बनी रहती है। समय-समय पर उसका एक दिन का अनुष्ठान करना चाहिए। और यदि संभव हो, तो सप्ताह में कम से कम एक दिन — शनिवार, या मंगलवार, या रविवार, इन तीनों में से कोई एक दिन — आहुति आदि अवश्य देनी चाहिए।
संकट नाशन में कौन से नाम दोहराए जाते हैं?
बारह मुख्य नाम
संकट नाशन में जो बारह मुख्य नाम हैं — उन्हीं का बार-बार पाठ किया जाता है।
संकट नाशन स्तोत्र में जो बारह मुख्य नाम हैं — उन्हीं का बार-बार पाठ किया जाता है।
क्या धन की समस्या के लिए गृहिणी रोज़ विष्णु और ललिता सहस्रनाम कर सकती है?
इसके बजाय सहस्रनामावली, हर नाम से अर्चन
इक्कीस वर्ष के बेटे वाली और धन की समस्या से जूझ रही एक गृहिणी पूछती हैं कि क्या वे रोज़ विष्णु सहस्रनाम, ललिता सहस्रनाम और कनकधारा स्तोत्र कर सकती हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि विष्णु सहस्रनाम और ललिता सहस्रनाम दोनों में शंकराचार्य महाराज जी का विषय कई बार आता है, और वे कहते हैं कि सबसे अच्छा है कि केवल दीक्षित व्यक्ति ही इसे करे। आप शतनामावली और सहस्रनामावली अवश्य कर सकती हैं, और मेरे अनुसार वह आपको अधिक प्रभाव देगी; और यदि हर एक नाम से अर्चन या स्तुति हो सके, तो अत्यंत श्रेष्ठ है।
एक श्रोता लिखती हैं कि वे गृहिणी हैं, उनका इक्कीस वर्ष का बेटा है और धन की समस्या है, और पूछती हैं कि क्या वे रोज़ विष्णु सहस्रनाम, ललिता सहस्रनाम और कनकधारा स्तोत्र कर सकती हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि विष्णु सहस्रनाम और ललिता सहस्रनाम दोनों में शंकराचार्य महाराज जी का विषय कई बार आता है, जहाँ वे कहते हैं कि सबसे अच्छा है कि केवल दीक्षित व्यक्ति ही इसे करे। आप शतनामावली और सहस्रनामावली अवश्य कर सकती हैं, और मेरे अनुसार वह आपके लिए अधिक प्रभावकारी होगी। यदि हर एक नाम से अर्चन या स्तुति हो सके, तो यह अत्यंत श्रेष्ठ है।
क्या नवरात्र में दिन भर सप्तशती का पाठ किया जा सकता है?
लगातार चलाने के बजाय संख्या तय करें
पूछा गया कि क्या सोने का समय छोड़कर नवरात्र में बाकी समय दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जा सकता है: भाई, संख्या तय कीजिए। ऐसा नहीं कि आप बिना संख्या के लगातार जप करते रहें।
पूछा गया कि क्या सोने का समय छोड़कर नवरात्र में बाकी सारे समय दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जा सकता है: भाई, संख्या तय कीजिए, वक्ता उत्तर देते हैं। ऐसा नहीं कि आप बिना संख्या के लगातार जप करते रहें। वे जोड़ते हैं, भगवती बगलामुखी के लिए दीक्षित होकर कीजिए; नहीं तो अष्टोत्तर शतनामावली कीजिए। और भगवती रेणुका के कवच और अष्टोत्तर शतनाम दोनों का जप आप नवरात्रों में बिल्कुल कर सकते हैं।
जब किसी पर पितर आवेशित हो जाए तो क्या करना है?
उनकी गति करवाइए; उपाय केवल अस्थायी शांति देता है
देखिए — पितर किसी पर भी आवेशित हों, और किसी को भी परेशान करें: उनकी गति करवाइए। वे असंतुष्ट हैं, और केवल इसी कारण कठिनाई दे रहे हैं। यह उपाय से नहीं सँभलेगा; उपाय से केवल शांति हो सकती है, और वह भी अस्थायी।
एक श्रोता इस पर लिखता है, और वक्ता उत्तर देते हैं: देखिए — पितर किसी पर भी आवेशित हों, और किसी को भी परेशान करें। उनकी गति करवाइए। वे असंतुष्ट हैं, और इसी कारण वे कठिनाई दे रहे हैं। और यह उपाय से नहीं सँभलेगा। उपाय से केवल शांति हो सकती है — केवल अस्थायी।
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