मंत्र चालीस दिन का क्यों दिया जाता है — और साधनाओं का क्रम

जीवन भर की महाकाली साधना के लिए गुरु का बताया हुआ क्रम।

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01

जलते समय लौंग का फटना क्या कोई संकेत है?

जलते समय लौंग का फटना कोई शकुन नहीं है

· 00:51–01:18 · Also a question

नहीं। यह बिल्कुल सामान्य बात है। इसमें शुभ या अशुभ का कोई संकेत नहीं देखना चाहिए। वक्ता एक ही छूट देते हैं: अगर उस समय कोई खास बीमारी या शरीर में कष्ट हो, तो उछली हुई लौंग को प्रसाद मानकर खाया जा सकता है।

02

हर मंत्र के लिए चालीस दिन क्यों बताए जाते हैं?

विषय: किसी भी मंत्र के लिए चालीस दिन क्यों बताए जाते हैं

· 01:48–02:34 · Also a question

क्योंकि यही न्यूनतम मंडल है। यह सत्र बताता है कि कोई भी मंत्र — दत्तात्रेय, शाबर, पौराणिक या तंत्रोक्त — चालीस दिन क्यों किया जाता है, और इन दिनों में कौन-से प्रभाव मिलने लगते हैं।

03

मंडल क्या है, और क्या यह हर देवता पर लागू होता है?

एक मंडल चालीस से इकतालीस दिन का होता है, और यह हर देवता के लिए कहा गया है

· 02:35–03:04 · Also a question

मंडल का अर्थ है चालीस से इकतालीस दिन। हर देवता के लिए कहा गया है कि कम से कम एक मंडल ज़रूर करना है। यह किसी भी मंत्र के जप, किसी भी यंत्र की अर्चना और आवरण पूजा, और सिद्धि के लिए किसी भी सूक्त या कवच के अधिक पाठ पर लागू होता है।

04

क्या नियम अनुष्ठान के पहले दिन से शुरू होते हैं?

मंडल से पहले दो दिन और बाद में दो दिन संयम

· 03:05–03:41 · Also a question

नहीं — इसे एक-दो दिन पहले से शुरू मानिए। अगर अनुष्ठान मंगलवार से शुरू है, तो रविवार और सोमवार को भी पूरा ब्रह्मचर्य और खान-पान में सही आचरण चाहिए। इकतालीस दिन पूरे होने के बाद भी कम से कम दो दिन वही नियम रखने हैं।

05

क्या लंबे अनुष्ठान के बीच में नियम थोड़े ढीले किए जा सकते हैं?

इकतालीस दिनों के भीतर कहीं कोई ढिलाई नहीं

· 03:42–04:44 · Also a question

नहीं। जो आपसे कहे कि कलियुग में मानसिक चूक माफ़ है, या बीच में एक-दो बार अपनी विवाहित पत्नी से संपर्क रखने में दोष नहीं लगता — वक्ता के शब्दों में, वह आपके पूरे विनाश का कारण बन रहा है। ऐसा कभी नहीं होता।

06

जो गृहस्थ चालीस दिन नहीं निभा सकता, वह क्या करे?

पाँच दिन से ग्यारह दिन, फिर पखवाड़े तक बढ़ना

· 04:45–05:44 · Also a question

नियम नहीं, दिन कम कीजिए। पाँच दिन कीजिए — सोमवार से शुक्रवार, या मंगलवार से शनिवार — फिर दो दिन का अंतर, फिर दोहराइए। जब पाँच दिन की आदत हो जाए, तो ग्यारह दिन, फिर प्रतिपदा से पूर्णिमा तक पूरा पखवाड़ा। एक साल में चालीस दिन का नियम आराम से निभ जाएगा।

07

सुविधा के लिए संध्या का समय बदलने से क्या होता है?

संध्या का समय, और उससे समझौता करने की कीमत

· 05:45–07:04 · Also a question

तब फल की कोई खास इच्छा मत कीजिए। नियम है सूर्योदय से पहले उठना, ताकि सुबह की संध्या तारे दिखते रहते ही पूरी हो, और शाम की संध्या गोधूलि बेला में शुरू हो। ठंड या बिजली की रोशनी के कारण इन्हें आगे खिसकाया, तो आपने हर जगह समझौता कर लिया।

08

जो नियम पर ज़ोर देते हैं, लोग उन्हें गाली क्यों देते हैं?

नियम बताने वाले हर व्यक्ति पर गालियाँ

· 07:05–09:04 · Also a question

क्योंकि नियम सुविधा में रुकावट है। वक्ता कहते हैं कि जहाँ भी अनुशासन, नियम या मर्यादा की बात होती है, कहने वाले को गालियों से ढक दिया जाता है — और यह सिर्फ़ उनके साथ नहीं होता। उन्होंने फेसबुक ग्रुपों में अच्छे सुझाव देने वाले अच्छे साधकों को भी ऐसी ही गालियों से ढका देखा है।

09

अगर दिन में समय न मिले, तो साधना कब करें?

रात्रि साधना, और क्यों आधी रात उसके भीतर आनी चाहिए

· 09:05–10:09 · Also a question

रात्रि साधना कीजिए: लगभग दस या साढ़े दस बजे शुरू करके साढ़े बारह तक, या ग्यारह से साढ़े बारह या एक बजे तक — दो घंटे, और आधी रात बैठक के भीतर आए। यही नियम है। शिव जी की पूजा भी इसी समय होती है, और सामान्य स्तोत्र रूप में दस महाविद्याओं की भी।

10

अगर इतनी आरंभिक साधनाएँ ज़रूरी हैं, तो क्या फल बँट नहीं जाता?

यह भ्रम कि आरंभिक साधनाएँ फल को बाँट देती हैं

· 10:10–11:03 · Also a question

साधकों में यही बड़ा भ्रम है: पहले गुरु रूप, फिर गणपति, फिर भैरव, फिर हनुमान, फिर कुल देवता, फिर जन्मकुंडली के ग्रह — इतना सब कौन करेगा, और मुख्य साधना तक पहुँचते-पहुँचते क्या फल इन सब में बँट नहीं गया?

11

गुरु वे कदम क्यों ज़रूरी बताते हैं जो शिष्य को बोझ लगते हैं?

शिक्षक की मिसाल — आप भी इसे नहीं टाल पाएँगे

· 11:04–12:51 · Also a question

क्योंकि वे आपको दूसरी ओर से देख रहे हैं। वक्ता की तुलना: बचपन में आप अपने शिक्षकों से चिढ़ते थे और चाहते थे कि वे बीमार पड़ जाएँ; आपमें से कई अब ख़ुद शिक्षक हैं और जानते हैं कि छात्र को क्या चाहिए, उसे टाल नहीं सकते। पूर्णाभिषेक होने और अधिकार मिलने पर आप भी इसे नहीं टाल पाएँगे।

12

सालों के अभ्यास से फल न मिले तो क्या करें?

जो करते हैं उसे बदलने के बजाय अपनी चूकें परखिए

· 12:52–13:52 · Also a question

ख़ुद को परखिए। सोचिए कि कितने दिन की साधना आपने नियम से नहीं, अपनी मर्ज़ी से की। और नियमित संपर्क वालों को वक्ता की अपनी सलाह है कि अभ्यास मत बदलिए — वही कीजिए, साथ में कोई दीपदान या तीर्थयात्रा जोड़ दीजिए।

13

इकट्ठा पुण्य दिखने में कितना समय लेता है?

बुरे प्रारब्ध का घटना, और वह दिन जब इकट्ठा पुण्य फूटता है

· 13:53–14:59 · Also a question

जितना भी लगे — पर जिस दिन वह फूटता है, आप बहुत आगे निकल जाते हैं और पीछे मुड़कर नहीं देखते। ऊर्जा एक जगह इकट्ठी होती है; जब बुरा प्रारब्ध घटता है, तो इष्ट के प्रति थोड़ा समर्पण और थोड़ा अच्छा भाव ही चाहिए। मुश्किल यह है कि हम एक चीज़ पर टिक नहीं पाते।

14

दत्तात्रेय की सेवा ज़रूरी क्यों मानी जाती है?

महागुरु दत्तात्रेय, और कुल-दोष पर उनकी दृष्टि

· 15:00–15:55 · Also a question

क्योंकि वे महागुरु हैं — सिद्धों के सिद्ध, जिनके आगे हर परंपरा के आचार्य और सिद्ध झुकते हैं। उनकी सेवा वहाँ ज़रूरी मानी जाती है जहाँ कोई श्राप लगा हो, या कुल-पितृ या कुल-दोष काम कर रहा हो। वक्ता कहते हैं, एक बार वे दृष्टि डाल दें, तो किसी की हैसियत नहीं कि आपके घर को नुकसान पहुँचाए।

15

अपनी साधना के बारे में किसे बताना चाहिए?

साधना गुप्त रखिए, बस ज़रूरतमंद अपनों को बताइए

· 15:56–16:41 · Also a question

सिर्फ़ उन करीबियों को जो कष्ट में हैं। लोग आपको ठीक उसी जगह परेशान करते हैं जहाँ आपके भीतर भरोसा बनने लगता है और आप किसी से इसके बारे में पूछते हैं — वे आपको कहीं अटका देंगे, कहेंगे इससे कुछ नहीं होता। मार्गदर्शन सिर्फ़ उससे लीजिए जो आपका भला चाहता हो।

16

कितनी शक्तियों की पूजा मुख्य रूप से करनी चाहिए?

एक मुख्य शक्ति; आरंभिक साधनाएँ बस कुछ दिनों के लिए

· 16:42–17:23 · Also a question

एक। वक्ता कहते हैं कि हर दस लाइव में से पाँच में वे यही बात रखते हैं: हम मुख्य रूप से एक ही शक्ति की पूजा करेंगे, और आरंभिक साधनाएँ बस कुछ दिन करनी होती हैं। साधक ठीक यहीं अटके रहते हैं, एक चीज़ से दूसरी पर भटकते रहते हैं, इससे निकल नहीं पाते।

17

जो जीवन भर महाकाली साधना करना चाहे, उसका पहला कदम क्या है?

गुरु रूप चुनना, फिर चुने हुए मुहूर्त पर देव दीक्षा

· 17:24–18:41 · Also a question

पहले गुरु विधि चुनिए — भगवान दत्तात्रेय, नवनाथ, अपने क्षेत्र का कोई प्रसिद्ध गुरु रूप, या तीन शक्तियों में से एक। फिर सही मुहूर्त पर देव दीक्षा विधान कीजिए; वक्ता आने वाली 26 दिसंबर, या 15 जनवरी की मकर संक्रांति बताते हैं।

18

एक महीना या इकतालीस दिन रोज़ 108 माला एकाक्षरी, फिर ग्यारह दिन माला मंत्र — लगभग दो महीने का आरंभिक काम।

इकतालीस दिन एकाक्षरी, फिर ग्यारह दिन माला मंत्र

· 18:42–19:39

कम से कम एक महीना, या जहाँ तक हो सके इकतालीस दिन, रोज़ 108 माला एकाक्षरी मंत्र। वह पूरा हो जाए, तो कम से कम ग्यारह दिन माला मंत्र, रोज़ 108। इसमें लगभग दो महीने की आरंभिक साधना हो जाती है, और पूरे समय खान-पान के नियम रखे जाते हैं।

19

चतुर्थी से चतुर्दशी तक दस दिन, 108 पाठों में हर पाठ पर एक दूर्वा, पहले और आखिरी दिन अभिषेक और अर्चना के साथ।

रोज़ 108 दूर्वा के साथ संकट नाशन गणेश स्तोत्र

· 19:40–20:49

दस दिन, किसी भी पक्ष में चतुर्थी से चतुर्दशी तक। रोज़ 108 दूर्वा चाहिए: संकट नाशन गणेश स्तोत्र के हर पाठ पर गणपति को एक दूर्वा चढ़ाइए। पहले और आखिरी दिन दूध से अभिषेक, श्रृंगार, पंचोपचार और 108 नामों से अर्चना जोड़िए, फिर 108 पाठ।

20

मंत्र कितनी संख्या पर जागता है, और उसके बाद रोज़ कम से कम कितना करें?

चार लाख जप से मंत्र जागता है; रोज़ का न्यूनतम उसे बनाए रखता है

· 20:50–21:37 · Also a question

वक्ता कहते हैं, चार लाख पर। उनकी अपनी दत्तात्रेय मंत्र साधना में इकतालीस दिन रोज़ 100 माला से लगभग चार लाख ग्यारह हज़ार जप हुआ, और चार लाख पर मंत्र जागृत होता है। उसके बाद रोज़ कम से कम 27 माला, या न्यूनतम 11 — अभ्यास हो जाने पर ज़्यादा से ज़्यादा पाँच मिनट।

21

नए साधक को रोज़ की संख्या ज़्यादा क्यों रखनी चाहिए?

नए साधक को पहले पुण्य-बल और तपो-बल चाहिए

· 21:38–22:22 · Also a question

क्योंकि नए साधक को पुण्य-बल और तपो-बल चाहिए। संख्या कम की जा सकती है, पर अभी रोज़ आठ पाठ रखे जाते हैं। और गणपति साधना के दौरान दत्त जप साथ-साथ चलता है — हर बैठक की शुरुआत में एकाक्षरी की 11 माला और माला मंत्र के पाँच पाठ।

22

आपदा उद्धारक बटुक भैरव अष्टोत्तर सतनाम शुरुआती साधक के लिए सबसे उपयुक्त है — शुरुआत में इसकी दो-तीन न्यास विधियाँ छोड़कर।

बटुक भैरव अष्टोत्तर सतनाम, शुरुआत में न्यास छोड़कर

· 22:23–23:19

शुरुआती साधक के लिए आपदा उद्धारक बटुक भैरव अष्टोत्तर सतनाम स्तोत्र सबसे सटीक है। इसमें दो-तीन न्यास विधियाँ हैं — शुरुआत में इन्हें मत कीजिए। सामान्य रूप से विनियोग करके 108 नाम पढ़िए, स्थापित त्रिशूल या बटुक भैरव के चित्र के आगे।

23

बटुक भैरव अनुष्ठान कब करें, और किस संकल्प के साथ?

कृष्ण अष्टमी से, जीवन भर की रक्षा के संकल्प के साथ

· 23:20–24:04 · Also a question

कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से, या मार्च-अप्रैल में पड़ने वाली नवरात्रि में। संकल्प है बटुक भैरव की पूरी कृपा के लिए, आगे की जीवन भर की साधना पर उनकी कृपा बनी रहे, किसी भी साधना में कोई बाधा न आए, और हर साधना उनकी रक्षा में पूरी हो।

24

क्या हर साधना के अंत में हवन ज़रूरी है, और क्या स्त्री आहुति दे सकती है?

आखिरी दिन हवन, और तंत्रोक्त विधि में स्त्रियों का आहुति देना

· 24:05–24:49 · Also a question

हाँ, हर साधना के आखिरी दिन हवन होना ही चाहिए — कम से कम एकाक्षरी से 11 माला आहुति। पुरुष गुग्गुल मिला घी लें; स्त्रियाँ गुग्गुल ज़्यादा और घी कम रखें। क्योंकि यह तंत्रोक्त विधि है, जिस स्त्री को पहले से संतान है, वह आहुति दे सकती है।

25

क्या तंत्रोक्त हवन के लिए भी वैदिक हवन जैसा अधिकार चाहिए?

तंत्रोक्त और शाबरोक्त हवन के लिए वैदिक अधिकार की ज़रूरत नहीं

· 24:50–25:27 · Also a question

नहीं। वेदोक्त हवन सिर्फ़ उसके अधिकारी ही करें, पर तंत्रोक्त या शाबरोक्त हवन में आपके लिए कोई रुकावट नहीं — कीजिए। वे जोड़ते हैं, जो नहीं छोड़नी हैं वे मर्यादाएँ हैं; हर समय सब कुछ नहीं निभ सकता, पर वे नहीं।

26

हनुमान साधना कब शुरू होती है, और कौन-सा कवच लें?

चैत्र पूर्णिमा से हनुमान, एकमुखी या पंचमुखी कवच

· 25:28–26:24 · Also a question

चैत्र में पड़ने वाली पूर्णिमा तिथि — हनुमान जयंती — से, पूर्णिमा से पूर्णिमा तक, कम से कम एक महीना। एकमुखी या पंचमुखी हनुमान कवच लीजिए; जहाँ घर में प्रेत या पिशाच से जुड़ा दोष हो, वहाँ पंचमुखी।

27

कुल देवी-देवता की साधना कम से कम ग्यारह दिन, और जहाँ उनका स्थान स्थापित है, वहाँ यह हर दूसरी साधना के साथ-साथ चलती है।

कुल देवता, कम से कम ग्यारह दिन, और जहाँ उनका स्थान है

· 26:25–27:09

बुनियादी साधनाओं के बाद। अपने कुल देवी-देवता के रूप के अनुसार कम से कम ग्यारह दिन साधना कीजिए। अगर उनका स्थान या थान बना है, तो उनकी पूजा हर दूसरी साधना के साथ-साथ चलती है। जहाँ कुल देवता का पता न हो, वहाँ वक्ता आवाहन के बजाय बात साफ़ रखना पसंद करते हैं।

28

क्या कोई रोज़ का जप है जो हर किसी को करना चाहिए?

रोज़ एक मंत्र की दस माला, सबके लिए अनिवार्य

· 27:10–28:34 · Also a question

हाँ — रोज़ किसी एक मंत्र की दस माला, स्त्री हो या पुरुष, और उसमें किसी खास काम के पूरा होने का कोई संकल्प नहीं। जो वैदिक संध्या के अधिकारी हैं, उन्हें गायत्री की दस माला; जो नहीं कर सकते, उन्हें पंचाक्षरी। वक्ता कहते हैं, यह सबके लिए अनिवार्य है।

29

जन्मकुंडली के दोषों का क्या करें?

कुंडली के दोष, दशा के उपाय और सात-सात दिन की ग्रह साधनाएँ

· 28:35–29:29 · Also a question

अगर पहली तीन-चार साधनाओं के बाद भी कुंडली का कोई दोष असर करता लगे, तो या उसकी शांति करवाइए, या चल रही दशा और अंतर्दशा के अनुसार दान और धारण कीजिए — या अपने पंचमेश, लग्नेश और नवमेश की सात-सात दिन की साधनाएँ कीजिए। एक महीने में यह भी हो जाता है।

30

क्या किसी महीने के पर्व की पूजा अपनी साधना की जगह ले लेती है?

सावन: शिव का अभिषेक अनिवार्य, आपका अनुष्ठान साथ-साथ

· 29:30–30:54 · Also a question

नहीं, दोनों चलते हैं। पूरे सावन शिव का रोज़ का अभिषेक अनिवार्य है, जो सुबह होता है। फिर दस-पंद्रह मिनट अंगों को आराम देकर आप फिर अपने आसन पर बैठें। अपनी दस माला या अपना अनुष्ठान करें। सुबह, शाम या रात, जैसा ठीक लगे।

31

क्या साधनाएँ बढ़ने के साथ रोज़ का बैठना भी बढ़ता जाता है?

पाँच महीने की साधना रोज़ के पाँच मिनट में सिमटी

· 30:55–31:59 · Also a question

नहीं। हर साधना सिद्ध हो जाने पर उसकी संख्या घटा दी जाती है। दत्त एकाक्षरी की एक माला, माला मंत्र पाँच बार या एक बार, संकट नाशन एक बार, बटुक अष्टोत्तर शतनाम एक बार, हनुमान कवच एक बार। नौ ग्रह एक ही नवग्रह स्तोत्र में आ जाते हैं। कुल पाँच मिनट।

32

सबसे पहले कवच सिद्ध किया जाता है, 1100 जप और उसका हवन, और उसके बाद ही भगवती के वे मंत्र जिनका अधिकार हो।

सबसे पहले, और किसी चीज़ से पहले, कवच सिद्ध होता है

· 32:00–32:49

कवच। वक्ता इसे सबसे ज़रूरी चीज़ कहते हैं। पहले कवच सिद्ध करो। उदाहरण में, कवच का 1100 जप, फिर उसकी हवन विधि सीखी। उसके बाद ही भगवती के वे मंत्र जिनका साधक को अधिकार है, या स्तुति, स्तोत्र, सहस्रनाम और शतनाम।

33

आषाढ़ पूर्णिमा पर दत्त माला मंत्र के 108 पाठ के साथ हवन से पहली साधना फिर से जाग्रत होती है।

गुरु पूर्णिमा पहली साधना को फिर जगाती है; पंचांग का क्रम

· 32:50–34:30

पहली साधना, दत्तात्रेय की। आषाढ़ पूर्णिमा, यानी गुरु पूर्णिमा पर हवन से सब कुछ फिर जाग्रत किया जाता है। साथ में दत्त माला मंत्र के 108 पाठ। पंचांग पूजा का अर्थ है मुख्य देवता के हर पाठ को बारी-बारी पूरा करना। उसके बाद रोज़ हर एक का सिर्फ़ एक पाठ रहता है।

34

साधारण आवरण भाद्रपद से लगभग पंद्रह महीनों में, चालीस-चालीस दिन के मंडलों में सीखा जाता है; नया साधक आठों शक्तियों का तर्पण एक ही मंत्र से करता है।

भाद्रपद से आवरण पूजा, चालीस दिन के मंडलों में, हर छह महीने में निखारी जाती

· 34:31–35:29

भाद्रपद से, कालिका और तारा जयंती के समय, साधक को आवरण सीखने में लगाया जाता है। पहले साधारण आवरण सीखा जाता है, लगभग पंद्रह महीने, चालीस-चालीस दिन के मंडलों में। जिस आवरण में आठ शक्तियाँ हों, वहाँ नया साधक सबका तर्पण और मार्जन एक ही मंत्र से साथ में कर सकता है।

35

लगभग अठारह महीने पर तैयार नींव के कारण गुरु सीधे पंचाक्षरी दे सकते हैं, शुरू की चार साधनाएँ छोड़कर।

लगभग अठारह महीने पर विधिवत दीक्षा, बुनियादी काम पहले से पूरा

· 35:30–36:49

लगभग सवा साल से दो साल पर। वक्ता ज़िम्मेदारी लेते हैं कि किसी योग्य अधिकारी से उस व्यक्ति की परख कराएँगे और सही परंपरा में विधिवत दीक्षा दिलाएँगे। नींव पहले से तैयार है, इसलिए गुरु एकाक्षरी की जगह सीधे पंचाक्षरी दे सकते हैं। शुरू की चार साधनाएँ छूट जाती हैं।

36

लोग इसकी जगह फ़ोन पर दीक्षा और तुरंत बाद सिद्धि चाहते हैं, या फिर यह कि किसी और की सिद्धि उन्हें ट्रांसफर कर दी जाए।

तुरंत दीक्षा और ट्रांसफर की हुई सिद्धि

· 36:50–38:09

आज ही दीक्षा, फ़ोन पर, और उसके तुरंत बाद सिद्धि। और जब कुछ नहीं होता, तो माँग कि सिद्धि सीधे ट्रांसफर कर दी जाए। वक्ता का उत्तर है: अपना बीता जीवन उठाकर देखिए। सब कुछ एक साथ चाहने में पाँच-दस साल निकल गए होंगे, और एक तिनका भी नहीं हिला होगा।

37

चालीस दिनों में व्यक्ति के भीतर असल में क्या बदलता है?

चालीस दिन बुद्धि, आत्म तत्व और आभामंडल पर क्या करते हैं

· 38:10–39:31 · Also a question

गिनती का हिसाब सिर्फ़ ऊपरी बात है। उसके बीच आपकी बुद्धि, आपके विचार, आपके आत्म तत्व और आपके आभामंडल में ऊर्जाओं का इतना जुड़ाव और आवागमन होगा कि आपके विचार बदल जाएँगे। साधना और परलोक की ओर आपका नज़रिया चलते-चलते बदलता जाएगा।

38

क्या चालीस दिन की साधना के दौरान बाल और दाढ़ी कटवानी चाहिए?

क्षौर कर्म साधना से पहले और बाद में, बीच में नहीं

· 39:32–41:09 · Also a question

क्षौर कर्म साधना शुरू होने से दो दिन पहले करना चाहिए, और समर्पण के दो दिन बाद फिर से। बीच में नहीं। दोबारा करते समय कोई खास तिथि न हो: न एकादशी, न ग्रहण, न संक्रांति। वार से कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

39

किसी और की राय को बरसों की साधना खत्म क्यों नहीं करने देनी चाहिए?

किसी और के कहने पर आध्यात्मिक धन नाली में बहा देना

· 41:10–42:49 · Also a question

क्योंकि यह आपकी संपत्ति है। दो, चार, पाँच साल की तपस्या से जमा ऊर्जा और पुण्य बल आध्यात्मिक धन है। और जिसका आपके पुण्य से कोई लेना-देना नहीं, उसके कहने पर आप सारा नाली में बहा देते हैं। वक्ता कहते हैं यह गलती कभी नहीं करनी चाहिए।

40

तंत्रोक्त अनुष्ठान में आहुति कौन दे सकता है, और पूजा बिल्कुल कौन नहीं कर सकता?

भैरवी स्वरूपा स्त्रियाँ आहुति दे सकती हैं; रजस्वला स्त्री पूजा नहीं कर सकती

· 42:50–43:39 · Also a question

तंत्रोक्त पूजा में भैरवी भी करती हैं। सभी स्त्रियाँ भैरवी स्वरूपा हैं, सभी माता तुल्य हैं, और वे आहुति देंगी, घी से नहीं, सामग्री से। पर जो कहे कि रजस्वला स्त्री जाकर पूजा या हवन करे, या नवरात्रि में इससे फ़र्क नहीं पड़ता, वह आपका नाश कर देगा।

41

क्या किसी सवार शक्ति को व्यक्ति को चप्पल से मारकर भगाया जाता है?

चप्पल वाला किस्सा, और यह सार्वजनिक तरीका क्यों नहीं होना चाहिए

· 43:40–45:59 · Also a question

वक्ता कहते हैं, नहीं। वे टेलीविज़न की एक जानी-मानी हस्ती का किस्सा सुनाते हैं, जिसने शेखी बघारी कि खुद को काली बताने वाली एक स्त्री पर उसने चप्पल उठाई और सवारी चली गई। मारना एक विधि के रूप में मौजूद है, अपने नियम और तरीके के साथ। पर वक्ता मानते हैं कि इसे इस रूप में सबके सामने नहीं कहना चाहिए।

42

असल में शरीर पर क्या आता है?

स्वयं देवी नहीं, बल्कि योगिनी या अंश रूप शक्ति

· 46:00–47:09 · Also a question

स्वयं काली जी या दुर्गा जी नहीं। सब जानते हैं कि वे किसी पर नहीं आ सकतीं और नहीं आएँगी। ये योगिनी शक्तियाँ हैं, अंश रूप में पूर्ण। अगर वे पूरे रूप में आएँ, तो कोई साधारण व्यक्ति उनका तेज़ सह नहीं सकता, शरीर जलने लगेगा। और जिसने उसे सहा, उसके परिवार का नाश निश्चित है।

43

सवारी के मामले में दूर से कुछ करना उचित नहीं, खासकर लड़की के शरीर पर; परिवार ऐसा व्यक्ति ढूँढे जिसके पास वे रह सकें।

वे सवारी के मामले में दूर से कुछ क्यों नहीं करते

· 47:10–50:09

वे मना कर देते हैं। हर दो महीने में ऐसे चार-पाँच मामले उनके पास आते हैं। उनका उत्तर है कि इन चीज़ों में दूर से दखल देना उचित नहीं। खासकर लड़की के शरीर पर, जहाँ कुछ करने से परेशानी होगी। वे कहते हैं, सामने कोई ऐसा व्यक्ति ढूँढिए जिसके पास आप रह सकें।

44

जिनके पास सच में सिद्धि है, वे उसे दिखाते क्यों नहीं?

सक्षम लोग छिपे क्यों रहते हैं: उपहास, और पूर्वजों का पुण्य

· 50:10–51:49 · Also a question

हर जगह इंतज़ार कर रही निंदा और उपहास के कारण। जहाँ किसी ने साफ़ तौर पर कुछ जाग्रत किया है, वहाँ भी उसके विरोधी उसे सिद्धि नहीं मानते। और सम्मानित संत चमत्कारों को पूरी तरह खारिज कर देते हैं। वक्ता की आपत्ति: उन्हीं के पूर्वजों ने उपवास और पाठ करके अपने शरीर घिसे, और आज वही सिद्धि और पुण्य भोगा जा रहा है।

45

व्यक्ति के पीछे चलने के बजाय सिद्धांत पर चलने का क्या अर्थ है?

व्यक्तिवादी नहीं, सिद्धांतवादी बनिए

· 51:50–52:34 · Also a question

कि आप सिद्धांत और शास्त्र के प्रमाण पर चलें, किसी व्यक्ति के पीछे नहीं। किसी की लोकप्रियता के कारण अंधे होकर उसके पीछे भागना, सच और झूठ में फ़र्क न कर पाना, आपको कहीं का नहीं छोड़ेगा। विरोध कीजिए, अपने भीतर बदलाव लाइए, और सही रास्ते पर चलने की कोशिश कीजिए। पर विरोध सही ढंग से कीजिए।

46

प्रभाव के साथ कौन-सी ज़िम्मेदारी आती है?

प्रभाव देने वाले के पास ही लौटता है

· 53:50–55:11 · Also a question

कि समाज वही अपनाएगा जो आप में देखेगा। वक्ता कहते हैं, अगर आपका आचरण, विवेक और समाज में रहने का ढंग सनातन का भला करे, तभी आपकी तपस्या का फल देना सही है। गलत ढंग से दिया गया प्रभाव आप पर ही लौटता है, आपकी अपनी बुद्धि भ्रष्ट करता है, और ज़्यादा दिन नहीं चलता।

47

कुछ गुरुओं के पीछे लोग चलते हैं और कुछ के पीछे नहीं, ऐसा क्यों?

आप उसी के पीछे चलते हैं जो कुछ भी करने की छूट दे

· 55:12–57:04 · Also a question

क्योंकि वे छूट देते हैं। वक्ता पूछते हैं कि तलंग स्वामी, देवराहा बाबा या तुलसी बाबा के पीछे कोई क्यों नहीं चलता। क्योंकि उनकी कठिन उपासना, उनका योग अभ्यास, उनकी कठिन भक्ति कोई नहीं कर सकता। इसकी जगह उसके पीछे चला जाता है जो कहे कि एकादशी पर खाओ, ब्रह्मचर्य ज़रूरी नहीं, माला ज़रूरी नहीं।

48

क्या गीता पाने के बाद अर्जुन ने कोई पंथ बनाया?

अर्जुन ने मिले उपदेश पर अपना पंथ नहीं बनाया

· 57:05–58:59 · Also a question

नहीं। वक्ता का तर्क: कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता दी, उनसे अनुष्ठान करवाए, उन्हें सिद्धि और विजय दी। फिर अर्जुन ने अपना धर्म घोषित नहीं किया, न लोगों से कहा कि मेरे पीछे चलो क्योंकि मैं भगवान का सखा हूँ। वे कहते हैं, यही फ़र्क समझना है।

49

वेब सीरीज़ के लिए तय घंटा निभ जाता है, पर जप के लिए क्यों नहीं?

मनोरंजन के लिए चालीस दिन हैं, पर चार माला के लिए नहीं

· 59:00–1:00:37 · Also a question

वक्ता का कहना है कि सामर्थ्य है, बस कहीं और खर्च होती है। एपिसोड और रियलिटी शो के लिए आप चालीस या सौ दिन एक तय समय पर बैठ सकते हैं। एक सीरीज़ के आखिरी भाग के लिए कंपनियों ने छुट्टी दी। पर जिस आत्म-उन्नति के लिए आप जन्मे हैं, उसके लिए चालीस माला, या चार भी, आपके बस में नहीं।

50

साधना गुप्त रखें, पर असल में किससे?

विरोधियों से गुप्त, अपनों में जिन्हें ज़रूरत है उनमें फैलाएँ

· 1:01:46–1:03:19 · Also a question

अपनी साधना और उपासना गुप्त रखिए, पर लोगों में जागरूकता ज़रूर फैलाइए। ज़बरदस्ती नहीं। जो आपको प्रिय हैं, जो आपको मानते हैं, जिन्हें ज़रूरत है या जो किसी संकट में हैं, उनमें। वे कहते हैं, लोग इतने गुप्त हो जाते हैं कि अपने ही परिवार के ज़रूरतमंद सदस्यों को भी नहीं बताते।

51

माला जप और हवन को दिखावा कहने के पीछे क्या उद्देश्य है?

मानसिकता तोड़ना ताकि घर की ऊर्जाओं को पोषण मिलना बंद हो

· 1:03:20–1:04:19 · Also a question

घर को उसकी अपनी ऊर्जाओं से काट देना। उनका कहना है: जैसे ही आप उस प्रभाव में टूटते हैं, आपके घर की शक्तियाँ, आपके घर की ऊर्जाएँ, आपके कुल देवता और आपके क्षेत्र रक्षक को ये ऊर्जाएँ मिलना बंद हो जाती हैं। और तब आपका सुरक्षा कवच टूट जाता है।

52

क्या खरमास में तीर्थ यात्रा की जा सकती है?

खरमास में तीर्थ यात्रा की अनुमति है

· 1:06:30–1:06:57 · Also a question

हाँ। खरमास में वृंदावन जैसे तीर्थ स्थलों पर ज़रूर जा सकते हैं, इसमें कोई दिक्कत नहीं। इसी बातचीत में, संकट नाशन गणेश स्तोत्र का अनुष्ठान किसी चतुर्थी से शुरू किया जा सकता है।

प्रश्नोत्तर की शुरुआत दो छोटे उत्तरों से होती है। जो संकट नाशन स्तोत्र करना चाहता है, उसे चतुर्थी से शुरू करने को कहा जाता है। खरमास पर: खरमास में वृंदावन जैसे तीर्थ स्थलों पर बिल्कुल जा सकते हैं। खरमास में तीर्थ दर्शन ज़रूर कीजिए, उसमें कोई दिक्कत नहीं।

53

क्या दत्तात्रेय के पीछे गाय की दिशा से स्वरूप में भेद होता है?

दत्तात्रेय के पीछे की गाय स्वरूप भेद नहीं है

· 1:06:58–1:07:44 · Also a question

वक्ता ने ऐसा कोई स्वरूप भेद न सुना है, न देखा है। उन्होंने जो चित्र इस्तेमाल किए, वे बस एडिट करके लगाए गए थे। भगवान दत्त के बारे में मुख्य परंपरा में गाय का मुख दाहिनी ओर रहता है, जैसे हर जगह आम तौर पर उनकी पूजा होती है। बेहतर है कि इसमें न पड़ें।

54

क्या दत्तात्रेय कवच भोजपत्र पर लिखकर धारण किया जा सकता है?

लिखकर धारण करने से पहले कवच सिद्ध होना चाहिए

· 1:07:45–1:08:12 · Also a question

पहले आपका कवच सिद्ध होना चाहिए। सिद्धि के बिना उसे लिखने का कोई लाभ नहीं। वक्ता यह भी कहते हैं कि बिना देखे वे नहीं बता सकते कि वह कौन-सा दत्तात्रेय कवच है, इसलिए प्राण प्रतिष्ठा का उत्तर हवा में नहीं दिया जा सकता।

55

मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर क्या करना चाहिए, और बच्चों को इसमें कैसे जोड़ें?

मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर दीपदान और गुरुवार की दत्त पूजा

· 1:08:50–1:09:39 · Also a question

मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर दीपदान को बहुत ज़रूरी बताया गया है। और गुरुवार की गाँठ बाँध लीजिए: उस दिन घर पर भगवान दत्तात्रेय का माला मंत्र पढ़िए, हो सके तो सत्ताईस बार। इसमें अधिकार का कोई प्रश्न नहीं। बच्चों को बचपन से दत्त को गुरु रूप में जानने दीजिए।

56

अगर भगवती के सभी मंत्रों के लिए एक ही माला रखनी हो, तो कौन-सी रखें?

भगवती के सभी मंत्रों के लिए एक माला: नौमुखी भैरवी रुद्राक्ष

· 1:09:40–1:10:06 · Also a question

भैरवी माला, यानी भैरवी रुद्राक्ष का प्रयोग कीजिए। इसके लिए नौमुखी भैरवी रुद्राक्ष सबसे अच्छा रहेगा। इसी हिस्से में वक्ता यह भी बताते हैं कि दत्तात्रेय जयंती पर शिव जी का पंचाक्षरी पढ़ा जा सकता है।

शास्त्र क्या कहता है

A nine-mukhi rudraksha is the traditionally correct bead for reciting the Devi/Bhagavati mantras generally.

Verse 74 gives the nine-faced rudraksha's presiding deities as Bhairava/Kapila or Durga-as-Maheshvari-of-nine-forms. The text never says "Bhairavi," nor calls it the mala for all Bhagavati mantras — that framing is the speaker's own.

मूल पाठ पढ़ें →
74

भैरवो नववक्त्रश्च कपिलश्च मुनिः स्मृतः। दुर्गा वा तदधिष्ठात्री नवरूपा महेश्वरी॥ ७४

नौ मुखवाला रुद्राक्ष भैरव और कपिल मुनि माना गया है। अथवा नौ रूपोंवाली महेश्वरी दुर्गा उसकी अधिष्ठात्री हैं।

57

जप के बीच मंत्र भूल जाने का क्या अर्थ है?

माला के बीच मंत्र भूलना सामान्य बात है

· 1:10:07–1:10:56 · Also a question

कुछ नहीं। यह सामान्य बात है और सोचने का विषय नहीं। मंत्र लंबा हो तो थोड़ा भूल जाते हैं। वैदिक मंत्रों के पाठ करने वाले भी भूलते हैं, ऐसा अक्सर होता है। इससे परेशान होने की ज़रूरत नहीं। न ही हाथ से लौंग-कपूर गिरने से।

58

क्या दीपदान के लिए पीतल का दीया और थाली, और बीच से कटा नारियल इस्तेमाल हो सकता है?

पीतल का दीया और थाली चलेगी, और बीच से कटा नारियल भी

· 1:10:57–1:11:50 · Also a question

तीनों के लिए हाँ। मिट्टी के दीये की जगह पीतल का दीया, दोने की जगह पीतल की थाली, और पहले से बीच से कटा नारियल चलेगा। वक्ता बताते हैं कि उनके अपने नारियल कुल भैरव और भगवान दत्त के लिए कुछ छोटे कटे थे। वे साफ़ कटाई की कोशिश करने की सलाह देते हैं।

59

क्या बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनाम के लिए न्यास करना चाहिए?

केवल विनियोग, न्यास 1100 पूरे होने के बाद

· 1:12:05–1:12:34 · Also a question

शुरू में केवल विनियोग करें। पूरा विधान पूर्व पीठिका में दिया है, पर न्यास 1100 पूरे करने के बाद ही करें। वक्ता यह भी कहते हैं कि न्यास हर किसी के लिए ज़रूरी नहीं है।

60

क्या गांजा पीना भोलेनाथ का प्रसाद कहकर सही ठहराया जा सकता है?

शरीर तपाने वाला योगी और केवल गांजा पीने वाला व्यक्ति

· 1:12:35–1:13:45 · Also a question

वक्ता योगी की बात मानते हैं, आपकी नहीं। अगर कोई योगी गांजा पीता है और सच में योग साधना करता है, तो ठीक है — वह अपना शरीर तपा रहा है, आप नहीं जानते वह उसमें कौन सी जड़ी-बूटी डालता है, और उसकी साधना वामाचार की है। आपकी नहीं। आप इसे अपनी इच्छाओं का साधन बनाकर प्रसाद कह रहे हैं।

61

कुश का आसन कैसे बनता है, और कुश कब लाना चाहिए?

कुश भादों की कुशोत्पाटिनी अमावस्या को निकाला जाता है

· 1:14:58–1:15:24 · Also a question

कुश का बना-बनाया आसन मिलता है — वही उपयोग करें। कुश स्वयं कुशोत्पाटिनी अमावस्या, यानी भादों अमावस्या के दिन निकाला जाता है। अगर आपसे इतना विधान हो सके तो वह भी करें; और इसमें विवाहित और अविवाहित के लिए अलग नियम भी है।

62

क्या दत्तात्रेय के चित्र या मूर्ति के बिना दीपदान हो सकता है?

बिना चित्र के दीपदान, और अभी मूर्ति क्यों न लाएँ

· 1:15:25–1:16:29 · Also a question

हाँ — करें, चित्र या मूर्ति न होने में कोई दिक्कत नहीं है। और अभी कोई चित्र न लाएँ। जब ठीक से साधना करके उनके प्रति आपका भाव बन जाए, तब उन्हें स्थान दें। अभी केवल दीपदान करें। जल्दबाज़ी न करें।

63

क्या दतिया पीठ से दीक्षित व्यक्ति के लिए दत्तात्रेय साधना मना है?

दूसरी जगह दीक्षा के बाद भी दत्त साधना मना नहीं

· 1:16:30–1:17:25 · Also a question

नहीं, भगवान दत्त की साधना पर कोई रोक नहीं है; वह ज़रूर की जा सकती है। पर यंत्र आदि के बारे में वक्ता प्रश्नकर्ता को वापस भेजते हैं: आप दतिया पीठ से दीक्षित हैं, तो पूरा विधान अपने गुरु से पूछें — किस तरफ़ से, क्या बनाना है, कैसे करना है।

64

यह मार्गदर्शन केवल दीक्षा तक है; दीक्षा के बाद अपने गुरु के प्रति पूरा समर्पण चाहिए — इसीलिए दीक्षा जल्दबाज़ी में नहीं ली जाती।

दीक्षा तक यह मार्गदर्शन मानें; दीक्षा के बाद पूरा समर्पण

· 1:21:38–1:22:59

जब तक किसी से आपकी दीक्षा नहीं हुई है, यह मार्गदर्शन मानें। दीक्षा हो जाने पर वक्ता की अपनी सलाह है कि आपका समर्पण सौ प्रतिशत अपने गुरु के प्रति होना चाहिए। वक्ता कहते हैं, इसीलिए गुरु दीक्षा जल्दबाज़ी में नहीं लेनी चाहिए।

65

उन्हें अब भी टोका जाता है कि संकल्प कैसे लें, हाथ की मुद्रा कैसे बनाएँ, और स्वस्तिवाचन का मंत्र कैसे बोलें।

अब भी गाँठ, मुद्रा और उच्चारण पर टोका जाना

· 1:23:00–1:24:59

नहीं। वक्ता कहते हैं कि लोग टिप्पणी करते हैं कि वे बहुत विद्वान हैं — और वे अब भी बैठकर सुनते हैं कि संकल्प ऐसे नहीं, ऐसे लेते हैं; हाथ की मुद्रा ऐसे बनाओ; चुटैया में एक गाँठ और लगाओ; ठीक से उच्चारण करो; स्वस्तिवाचन में यह मंत्र ऐसे बोला जाता है।

66

गुरु बनाने से पहले कितना सोचना चाहिए?

शिष्य के अपराध का छठा भाग गुरु पर पड़ता है

· 1:25:00–1:27:09 · Also a question

हज़ार बार सोचें। गुरु मान लेने के बाद उनकी कही बात पत्थर की लकीर है — और बाद में गुरु बदलना या विसर्जन करना दिक्कत लाता है। गुरु की ओर से, दीक्षा देने से ज़िम्मेदारी बनती है, और अगर शिष्य अपराध करे तो उसका छठा भाग गुरु पर पड़ता है।

67

एक सक्षम गुरु कितना समय देते हैं, और उनके सामने कैसे बैठना चाहिए?

अकेले में दो से चार घंटे, और सीखने के लिए अनजान बनकर बैठना

· 1:27:10–1:30:00 · Also a question

वक्ता के अपने गुरु बहुत व्यस्त होते हुए भी, जब भी वे जाते हैं, अकेले में दो से चार घंटे देते हैं — तुरंत नहीं, तीसरे दिन। और साधक के लिए उनका निर्देश: मूर्ख बनकर बैठो, तब ज्ञान की बातें आएँगी। जो ज़्यादा विद्वान बनते हैं, वे आपको कुछ नहीं समझेंगे।

68

क्या रविवार भी महादेव को समर्पित दिन है?

रविवार और सोमवार दोनों शिव को समर्पित

· 1:31:20–1:32:00 · Also a question

हाँ, आपने सही पढ़ा। सूर्य का दिन भगवान शिव को समर्पित बताया गया है, और चंद्रमा का दिन, सोमवार, भी उन्हीं को समर्पित है।

शास्त्र क्या कहता है

The Shiv Mahapuran assigns Sunday and Monday, as days of the week, to Shiva in particular.

Vidyeshwar Samhita 14:28-29 assigns Sunday to the Sun and Monday to Lakshmi and her retinue, not to Shiva. The only weekday this chapter assigns to a form of Shiva is Saturday, to Rudra (14:34).

मूल पाठ पढ़ें →
28

पापशान्तिर्विशेषेण ह्यादिवारे निवेदयेत्। आदित्यस्यैव देवानां ब्राह्मणानां विशिष्टदम्॥ २८

रविवारको सूर्यके लिये, अन्य देवताओंके लिये और ब्राह्मणोंके लिये विशिष्ट वस्तु अर्पित करे। यह विशिष्ट फल देता है और इससे विशेषरूपसे पापोंकी शान्ति होती है।

29

सोमवारे च लक्ष्म्यादीन्सम्पदर्थं यजेद् बुधः। आज्यान्नेन तथा विप्रान्सपत्नीकांश्च भोजयेत्॥ २९

सोमवारको विद्वान् पुरुष सम्पत्तिके लिये लक्ष्मी आदिकी पूजा करे। वह पत्नीसहित ब्राह्मणोंको घीमें पके अन्नका भोजन कराये।

69

क्या एक ही पूजा के अलग-अलग वार पर अलग फल मिलते हैं?

शिव पूजा के वार के अनुसार फल

· 1:34:00–1:35:13 · Also a question

हाँ। विवाह में रुकावट और पैसे की दिक्कत के लिए गुरुवार — क़र्ज़ से छुटकारा, धन-धान्य की प्राप्ति, और शृंगार व अभिषेक से पीलिया में राहत। संतान से जुड़े कष्टों के लिए, और ख़ासकर पुरुष के विवाह की दिक्कत के लिए शुक्रवार। शत्रु की बाधा के लिए मंगलवार।

शास्त्र क्या कहता है

The Shiv Mahapuran assigns specific worldly fruits to worshipping Shiva on Thursday (marriage/money/debt/jaundice), Friday (children/marriage for men), and Tuesday (overcoming an enemy).

The actual scheme is: Monday-Lakshmi/prosperity, Tuesday-Kali/disease-pacification, Wednesday-Vishnu/family, Thursday-the gods/long life, Friday-the gods/enjoyment, Saturday-Rudra/averting untimely death. It never names Tuesday for enemies, Thursday for marriage/debt, or Friday for children, and no deity but Saturday's is a form of Shiva.

मूल पाठ पढ़ें →
29

सोमवारे च लक्ष्म्यादीन्सम्पदर्थं यजेद् बुधः। आज्यान्नेन तथा विप्रान्सपत्नीकांश्च भोजयेत्॥ २९

सोमवारको विद्वान् पुरुष सम्पत्तिके लिये लक्ष्मी आदिकी पूजा करे। वह पत्नीसहित ब्राह्मणोंको घीमें पके अन्नका भोजन कराये।

30

काल्यादीन्भौमवारे तु यजेद् रोगप्रशान्तये। माषमुद्गाढकान्नेन ब्राह्मणांश्चैव भोजयेत्॥ ३०

मंगलवारको रोगोंकी शान्तिके लिये काली आदिकी पूजा करे। उड़द, मूँग और अरहरकी दालसे युक्त अन्नसे ब्राह्मणोंको भोजन कराये।

31

सौम्यवारे तथा विष्णुं दध्यन्नेन यजेद् बुधः। पुत्रमित्रकलत्रादिपुष्टिर्भवति सर्वदा॥ ३१

बुधवारको विद्वान् पुरुष दहीभातसे विष्णुकी पूजा करे। इससे पुत्र, मित्र और स्त्री आदिकी सदा पुष्टि होती है।

32

आयुष्कामो गुरोर्वारे देवानां पुष्टिसिद्धये। उपवीतेन वस्त्रेण क्षीराज्येन यजेद् बुधः॥ ३२

दीर्घायुकी इच्छावाला विद्वान् पुरुष गुरुवारको देवताओंकी पुष्टिके लिये पूजा करे। वह यज्ञोपवीत, वस्त्र और दूध-घीसे पूजा करे।

33

भोगार्थं भृगुवारे तु यजेद् देवान्समाहितः। षड्रसोपेतमन्नं च दद्याद् ब्राह्मणतृप्तये॥ ३३

भोगकी प्राप्तिके लिये शुक्रवारको एकाग्रचित्त होकर देवताओंकी पूजा करे। ब्राह्मणोंकी तृप्तिके लिये छहों रसोंसे युक्त अन्न दे।

34

स्त्रीणां च तृप्तये तद्वद् देयं वस्त्रादिकं शुभम्। अपमृत्युहरे मन्दे रुद्रादींश्च यजेद् बुधः॥ ३४

वैसे ही स्त्रियोंकी प्रसन्नताके लिये सुन्दर वस्त्र आदि देने चाहिये। शनिवार अकालमृत्युको दूर करनेवाला है। उस दिन विद्वान् पुरुष रुद्र आदिकी पूजा करे।

70

पुष्य नक्षत्र का ख़ास महत्व क्यों है?

पुष्य नक्षत्र और उसके दो स्वामी, शनि और बृहस्पति

· 1:35:14–1:35:55 · Also a question

क्योंकि भगवान नारायण गीता में कहते हैं कि नक्षत्रों में वे पुष्य हैं, नक्षत्रों के राजा। इसके देवता और स्वामी के रूप में शनि देव और देव गुरु बृहस्पति दोनों आते हैं, इसलिए वहाँ दोनों का महत्व है — रवि पुष्य में पूजा से केवल बृहस्पति ही नहीं, शनि देव भी प्रसन्न होते हैं।

71

जब दीक्षा देने से मना कर दिया जाए और बदले में केवल गायत्री बताई जाए, तब क्या होता है?

मना की गई दीक्षा, बदले में गायत्री, और बाद में मिले गुरु

· 1:35:56–1:37:10 · Also a question

वक्ता का अपना अनुभव: बहुत पहले उन्होंने विंध्याचल के एक साधक से पीताम्बरा दीक्षा माँगी और बात टाल दी गई — तुम पागल हो जाओगे, यह होगा, वह होगा — और बदले में गायत्री करने को कहा गया। उन्होंने की, भगवती की कृपा आई, और तपोबल की वृद्धि हुई।

72

सक्षम गुरु और बात टालने वाले में फ़र्क़ कैसे पहचानें?

एक प्रश्न पूछें और दस उत्तर मिलें, साथ में नया अध्ययन बताया जाए

· 1:37:11–1:39:00 · Also a question

जो लौटकर मिलता है, उससे। सक्षम गुरु से एक प्रश्न पूछें, वे ठीक से दस का उत्तर देंगे, नई बातें बताएँगे, और ख़ुद बताएँगे कि आगे आपको क्या पढ़ना चाहिए। जिसने ख़ुद कुछ नहीं किया, वह आपसे भी कुछ न करने को कहेगा।

73

क्या शाम 7:30 से 8 बजे के बीच पूजा करना ग़लत है?

किसी भी समय पूजा की जा सकती है, पर चारों संध्याएँ बेहतर हैं

· 1:39:50–1:40:35 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि नहीं करनी चाहिए। उनकी बात संध्या के समय की थी, जब गोधूलि बेला पड़ती है। पर अगर चारों संध्याओं के मुख्य समय पर की जाए, तो बहुत बेहतर होगा।

74

हवन किस दिन करें, और क्या दत्त दीक्षा के बाद मांसाहार छोड़ना ज़रूरी है?

इकतालीसवें दिन हवन; दीक्षा हो या न हो, मांसाहार मना

· 1:41:30–1:42:14 · Also a question

इकतालीसवें दिन के जप के बाद बयालीसवें दिन हवन किया जा सकता है, पर हो सके तो इकतालीसवें दिन करें। भोजन पर, वक्ता मांसाहार के लिए मना करते हैं, चाहे आप दीक्षा लें या न लें — और कहते हैं कि बलि और खाने को एक विषय बनाकर न मिलाएँ।

75

अगर बीच में माला का धागा टूट जाए तो क्या साधना खंडित हो जाती है?

टूटा माला का धागा, और प्रायश्चित्त की इक्यावन माला

· 1:42:15–1:42:59 · Also a question

नहीं — मन में शंका न रखें, क्योंकि आपने साधना पूरी कर ली। बीच में माला टूटने पर सही विधि है कि उसे पूरा दोबारा पिरोएँ, उसकी प्रतिष्ठा विधि फिर से करें, और फिर दोष दूर करने के लिए उसी मंत्र की कम से कम 51 माला अलग से करके आगे बढ़ें।

76

यथार्थवादी और सिद्धांतवादी मत कभी गढ़े हुए मत से मेल नहीं खाएगा — जो सत्य है, वह सत्य है।

यथार्थवादी और सिद्धांतवादी मत गढ़े हुए मत से मेल क्यों नहीं खाएगा

· 1:43:00–1:43:35

वक्ता कहते हैं, मेल नहीं खाएगा। जो भी यथार्थवादी और सिद्धांतवादी है, वह उनसे सहमत नहीं होगा। जो सत्य है, वह सत्य है; अगर चीज़ें गढ़े हुए तरीक़े से चलाई जाएँ, तो वह अलग बात है।

77

क्या बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनाम के आरंभ और अंत में प्रणव बोला जा सकता है?

आरंभ और अंत में प्रणव की अनुमति; विनियोग के शब्द

· 1:46:03–1:46:32 · Also a question

हाँ, करें। और दत्त माला मंत्र के विनियोग में "दत्त देवता प्रीत्यर्थे कृपा प्राप्ति" बोलना ज़रूरी नहीं है — इसे संकल्प में बोलें।

78

काल भैरव को मदिरा क्यों चढ़ाई जाती है?

काल भैरव को मदिरा क्यों चढ़ती है — प्रमाण सहित अलग वीडियो के लिए टाला गया

· 1:46:38–1:47:20 · Also a question

वक्ता यहाँ उत्तर देने से मना करते हैं। वे कहते हैं, तर्कपूर्ण उत्तर देना और प्रश्नकर्ता को संतुष्ट करना दो अलग बातें हैं — उत्तर है और दूसरे लोग पहले ही समझा चुके हैं, पर यह विषय हर किसी के पचाने लायक नहीं है। वे इसे अलग से, प्रमाण सहित रखेंगे।

79

जो तुरंत मांसाहार नहीं छोड़ पा रहा, वह क्या करे?

धीरे-धीरे कम करें, और पूजा का स्थान अलग रखें

· 1:48:40–1:49:59 · Also a question

छोड़ने की कोशिश करें; सीमित रखें और धीरे-धीरे छूटने दें। नियम यह नहीं है कि देव दीक्षा विधान के बाद आप इसे नहीं खा सकते — पर जो आप खाते हैं, वह अपनी श्रद्धा को नैवेद्य के रूप में चढ़ाया हुआ होना चाहिए। अगर घर में खाते हैं, तो पूजा का स्थान शुद्ध और दूर रखें, और बिना नहाए वहाँ न जाएँ।

80

किसी अनुमत विकल्प के साथ लोग सबसे बड़ी ग़लती क्या करते हैं?

कठिन समय का विकल्प मुख्य धारा में ले आना

· 1:50:00–1:51:51 · Also a question

उसे मुख्य धारा में ले आना। वक्ता इसे हिंदुओं की सबसे बड़ी विडंबना कहते हैं। कठिन समय के लिए दिया गया विकल्प — पानी न होने पर केवल अंगूठा धोना, या पूरी पूजा संभव न होने पर केवल अभिषेक, नैवेद्य और आरती — पूरा अभ्यास ही बन जाता है।

81

एक विद्वान के पोते ने दक्षिणेश्वर में धूप उल्टी दिशा में दिखाई: विकल्प को नियम मान लेने से तीन पीढ़ियों का नुकसान।

दक्षिणेश्वर की धूप — विद्वान परिवार का पोता जो जानता नहीं था

· 1:51:52–1:55:19

एक धनी ब्राह्मण परिवार के युवक ने, जिसके दादा बड़े विद्वान थे, दक्षिणेश्वर काली मंदिर में देवी को धूप उल्टी दिशा में दिखाई। बंगाली पुजारी उस पर चिल्लाए। वक्ता की बात यह है कि विकल्प को नियम मान लेने से नुकसान तीन पीढ़ियों तक चला।

82

पूजा का अहंकार व्यक्ति के साथ क्या करता है?

पूजा का अहंकार आगे सीखने की संभावना ख़त्म कर देता है

· 1:55:20–1:56:19 · Also a question

सीखना ख़त्म कर देता है। अपनी सेवा और पूजा का भी घमंड होता है — मैं भक्त हूँ, मैं रोज़ सौ माला जप करता हूँ — और जब यह घमंड सिर चढ़ जाता है, तो आगे कुछ भी सीखने की संभावना ख़त्म हो जाती है। वक्ता इस अहंकार को इतना बुरा कहते हैं कि यह व्यक्ति को कहीं का नहीं छोड़ता।

83

हवन में आहुति देते समय माला कैसे सँभालनी चाहिए?

हवन में उल्टी माला, और दाने किस ओर खींचे जाते हैं

· 1:56:20–1:58:19 · Also a question

अगर आप हवन में अकेले हैं तो उल्टे हाथ से जप कर सकते हैं — पर बहुत से साधक, वक्ता भी, इसके लिए कभी जप माला उपयोग नहीं करते। वे अपनी पहनी हुई 108 दानों की कंठी माला उपयोग करते हैं, उसे अंग वस्त्र से ढककर, और उल्टे हाथ से जप करते हुए आहुति देते हैं।

84

चौबीस दीपक और एक कर्म साक्षी दीपक, तीनों तेलों में घी सबसे अच्छा — और विनियोग बीच में कभी नहीं बदलते।

चौबीस दीपक, घी सबसे अच्छा, और विनियोग बीच में न बदलें

· 1:58:20–1:59:09

चौबीस, और एक कर्म साक्षी दीपक। घी, सरसों या तिल में से कोई भी उपयोग हो सकता है — घी उनमें सबसे अच्छा है, और तिल भी चलेगा। और विनियोग में: सब सिद्ध होने के बाद बोलना चाहिए; सिद्ध करते समय विनियोग न बदलें।

दो अंतिम विधि संबंधी उत्तर। संख्या और तेल पर: 24 दीपक, और उनके साथ एक कर्म साक्षी दीपक — 24 ही करें। जो चाहें उपयोग कर सकते हैं; घी से करें तो सबसे अच्छा, या सरसों, या तिल; तिल से भी करें। विनियोग पर: सब कुछ सिद्ध होने के बाद बोलना चाहिए। सिद्ध करते समय विनियोग न बदलें।

85

हवन वाला अनुष्ठान और गौ सेवा मंगलवार को होगी; घर पर दत्त पूजा, इच्छा हो तो दीक्षा विधान, और उसी दिन हवन।

पूर्णिमा का कार्यक्रम — रूप, घर पर हवन, दीक्षा विधान

· 1:59:10–2:00:09

हवन वाला अनुष्ठान और गौ सेवा मंगलवार को होगी। अपने घर पर भगवान दत्तात्रेय की सेवा और पूजा करें, इच्छा हो तो दीक्षा विधान करें, और उस दिन घर पर हवन करने की कोशिश करें।

Indexed, not endorsed as instruction

यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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