मंत्र चालीस दिन का क्यों दिया जाता है — और साधनाओं का क्रम
जीवन भर की महाकाली साधना के लिए गुरु का बताया हुआ क्रम।
85 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
69 also answer a common question
Questions this answers
69 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
जलते समय लौंग का फटना क्या कोई संकेत है?
जलते समय लौंग का फटना कोई शकुन नहीं है
नहीं। यह बिल्कुल सामान्य बात है। इसमें शुभ या अशुभ का कोई संकेत नहीं देखना चाहिए। वक्ता एक ही छूट देते हैं: अगर उस समय कोई खास बीमारी या शरीर में कष्ट हो, तो उछली हुई लौंग को प्रसाद मानकर खाया जा सकता है।
सत्र की शुरुआत में ही एक श्रोता को जवाब देते हुए वक्ता कहते हैं कि लौंग और कपूर जलाते समय लौंग का फटना बिल्कुल सामान्य घटना है। इसमें शुभ या अशुभ का कोई संकेत नहीं देखना चाहिए। वे एक बात जोड़ते हैं। अगर कोई खास स्थिति हो — कोई बीमारी, शरीर में कोई कष्ट — और उसी समय लौंग उछल जाए, तो उस लौंग को प्रसाद मानकर खाया जा सकता है। इसमें कोई अशुभ नहीं है।
हर मंत्र के लिए चालीस दिन क्यों बताए जाते हैं?
विषय: किसी भी मंत्र के लिए चालीस दिन क्यों बताए जाते हैं
क्योंकि यही न्यूनतम मंडल है। यह सत्र बताता है कि कोई भी मंत्र — दत्तात्रेय, शाबर, पौराणिक या तंत्रोक्त — चालीस दिन क्यों किया जाता है, और इन दिनों में कौन-से प्रभाव मिलने लगते हैं।
वक्ता शुरुआत में बताते हैं कि आने वाले मंगलवार को भगवान दत्तात्रेय की जयंती, मार्गशीर्ष पूर्णिमा है। फिर वे सत्र का विषय बताते हैं। खासकर जो लोग तंत्रोक्त साधनाएँ करते हैं, उनके लिए यह क्यों कहा जाता है कि कोई भी मंत्र — खासकर भगवान दत्त से जुड़े मंत्र, शाबर मंत्र, या पौराणिक और तंत्रोक्त मंत्र — चालीस दिन करना चाहिए। और इन चालीस दिनों में कौन-से प्रभाव मिलने लगते हैं।
मंडल क्या है, और क्या यह हर देवता पर लागू होता है?
एक मंडल चालीस से इकतालीस दिन का होता है, और यह हर देवता के लिए कहा गया है
मंडल का अर्थ है चालीस से इकतालीस दिन। हर देवता के लिए कहा गया है कि कम से कम एक मंडल ज़रूर करना है। यह किसी भी मंत्र के जप, किसी भी यंत्र की अर्चना और आवरण पूजा, और सिद्धि के लिए किसी भी सूक्त या कवच के अधिक पाठ पर लागू होता है।
वक्ता सबसे पहले याद रखने वाला नियम बताते हैं। किसी भी मंत्र का जप, किसी भी यंत्र की अर्चना और उसकी आवरण पूजा, सिद्धि के लिए किसी भी सूक्त का अधिक जप, या सिद्धि के लिए किसी भी कवच का जप — हर देवता के लिए कहा गया है कि कम से कम एक मंडल ज़रूर करना है। वे कहते हैं, मंडल का अर्थ है चालीस से इकतालीस दिन। इसे इकतालीस मानिए।
क्या नियम अनुष्ठान के पहले दिन से शुरू होते हैं?
मंडल से पहले दो दिन और बाद में दो दिन संयम
नहीं — इसे एक-दो दिन पहले से शुरू मानिए। अगर अनुष्ठान मंगलवार से शुरू है, तो रविवार और सोमवार को भी पूरा ब्रह्मचर्य और खान-पान में सही आचरण चाहिए। इकतालीस दिन पूरे होने के बाद भी कम से कम दो दिन वही नियम रखने हैं।
वक्ता मंडल को दोनों ओर बढ़ाते हैं। पूरी इकतालीस दिन की प्रक्रिया पहले दिन से आखिरी दिन तक चलती है। जब अनुष्ठान शुरू होने वाला हो, तो उसे एक-दो दिन पहले से शुरू मानिए। उदाहरण: अगर आप मंगलवार से अनुष्ठान शुरू करने वाले हैं, तो कम से कम रविवार और सोमवार को भी आपको पूरा ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। रखना है और खान-पान ठीक रखना है। और जब इकतालीस दिन का अनुष्ठान पूरा हो जाए, तो अगले कम से कम दो दिन भी अपने नियम ठीक से रखने हैं — खान-पान, नींद, ब्रह्मचर्य आदि।
क्या लंबे अनुष्ठान के बीच में नियम थोड़े ढीले किए जा सकते हैं?
इकतालीस दिनों के भीतर कहीं कोई ढिलाई नहीं
नहीं। जो आपसे कहे कि कलियुग में मानसिक चूक माफ़ है, या बीच में एक-दो बार अपनी विवाहित पत्नी से संपर्क रखने में दोष नहीं लगता — वक्ता के शब्दों में, वह आपके पूरे विनाश का कारण बन रहा है। ऐसा कभी नहीं होता।
वक्ता वे बहाने गिनाते हैं जो आम तौर पर दिए जाते हैं। पूरे इकतालीस दिन के मंडल में ज़रा भी लापरवाही नहीं होगी: न यह कि भूख सहन नहीं हुई तो थोड़ा खा लिया; न यह कि मन से ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। नहीं रख पाए तो थोड़ा विचार आ जाना कोई बड़ी बुराई नहीं; न यह कि कलियुग में मानसिक पाप नहीं लगते; न यह कि अनुष्ठान बहुत लंबा है और ज़माना ऐसा है, तो अपनी सुविधा से एक-दो बार विवाहित पत्नी का संग कर लें, उसमें दोष नहीं लगता। वे कहते हैं, जो आपसे ऐसे काम बताए और आपके मन के और अपने मन के हिसाब से साधनाएँ करवाए — जान लीजिए, वह आपके पूरे विनाश का कारण बनता है। ऐसा कभी नहीं होता। वे यह आपत्ति आजकल शुरू हो रही नई परंपराओं पर भी लागू करते हैं। उनमें साधकों से कहा जाता है कि इकतालीस दिन का मंडल सबसे ज़रूरी है, पर पहले उसका अभ्यास करो क्योंकि तुम्हारे पास बहुत कम समय है।
जो गृहस्थ चालीस दिन नहीं निभा सकता, वह क्या करे?
पाँच दिन से ग्यारह दिन, फिर पखवाड़े तक बढ़ना
नियम नहीं, दिन कम कीजिए। पाँच दिन कीजिए — सोमवार से शुक्रवार, या मंगलवार से शनिवार — फिर दो दिन का अंतर, फिर दोहराइए। जब पाँच दिन की आदत हो जाए, तो ग्यारह दिन, फिर प्रतिपदा से पूर्णिमा तक पूरा पखवाड़ा। एक साल में चालीस दिन का नियम आराम से निभ जाएगा।
वक्ता यह मजबूरी सीधे मानते हैं: गृहस्थ के लिए बहुत लंबी साधनाएँ करना या बहुत समय देना संभव नहीं है। वे कहते हैं, इसमें कोई दिक्कत नहीं — और यही वे लोगों से हमेशा कहते हैं। कम दिन कीजिए। पाँच दिन कीजिए। सोमवार से शुक्रवार, या मंगलवार से शनिवार। दो दिन का अंतर लीजिए, फिर से कीजिए, फिर दो दिन का अंतर। ऐसे पाँच-पाँच दिन के संकल्प रखिए। जब पाँच दिन की आदत हो जाए, तो बढ़ाइए। एक बार में ग्यारह दिन कीजिए। फिर पखवाड़ा कीजिए — कि शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से पूर्णिमा तक अपना अनुष्ठान करेंगे, और पूरे पंद्रह दिन अपना खान-पान, आचरण और व्यवहार मन और शरीर दोनों से शुद्ध रखेंगे। जब आप ऐसे अभ्यास बढ़ाने लगेंगे, तो तीन महीने, छह महीने, एक साल में इतना अभ्यास बन जाएगा कि चालीस दिन का नियम भी आराम से पार कर लेंगे।
सुविधा के लिए संध्या का समय बदलने से क्या होता है?
संध्या का समय, और उससे समझौता करने की कीमत
तब फल की कोई खास इच्छा मत कीजिए। नियम है सूर्योदय से पहले उठना, ताकि सुबह की संध्या तारे दिखते रहते ही पूरी हो, और शाम की संध्या गोधूलि बेला में शुरू हो। ठंड या बिजली की रोशनी के कारण इन्हें आगे खिसकाया, तो आपने हर जगह समझौता कर लिया।
वक्ता पहले सिद्धांत रखते हैं: कहा गया है कि अगर साधक को सुविधाएँ दी जाएँ और वह उन सुविधाओं के हिसाब से साधना करना चाहे, तो उसे फल पाने की कोई खास इच्छा नहीं करनी चाहिए। लोग कहते हैं, गुरु जी, हमने इतना-इतना किया, हमारा कहाँ कुछ हुआ। वे पूछते हैं, कैसे होगा? हो ही नहीं सकता। नियम जैसा है वैसे चलिए; अपनी बनाई विधि से करेंगे तो नहीं होगा। फिर वे कदम-कदम पर यह फिसलन दिखाते हैं। नियम है सूर्योदय से पहले उठना, ताकि सुबह की संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। आकाश में तारा दिखते रहते ही पूरी हो जाए। उसमें हम सुविधा ढूँढते हैं — सुबह ठंड होगी, थोड़ा देर से उठेंगे। तो फल की इच्छा मत कीजिए। फिर हो जाता है, साढ़े सात से पहले कर लो। फिर ठंड बहुत है और दूसरी परेशानियाँ हैं, तो साढ़े आठ। अब आप सुबह की संध्या साढ़े आठ-नौ बजे कर रहे हैं और वह दस बजे तक चल रही है। शाम का नियम है कि जब अंधेरा बस शुरू हो रहा हो, सूरज पूरा डूब चुका हो पर उसकी लालिमा बाकी हो, यानी गोधूलि बेलासांयकाल का गोधूलि समय — परंपरागत रूप से आकर्षण प्रयोगों हेतु उपयुक्त माना जाता है।, तब संध्या शुरू होनी चाहिए। पर उस समय तो अभी बहुत रोशनी है, और अब बिजली की रोशनी है, तो जब तक पूरी रात न हो जाए, नहीं होगी। वहाँ भी आपने समझौता किया। और जब आप अपनी साधना की हर एक चीज़ में समझौता कर रहे हैं और हर जगह यही जवाब ढूँढ रहे हैं कि भाव से किया जप काफ़ी है — तो वे कहते हैं, भगवान का भाव भी वैसा ही है, और वे फल भी वैसा ही देंगे।
जो नियम पर ज़ोर देते हैं, लोग उन्हें गाली क्यों देते हैं?
नियम बताने वाले हर व्यक्ति पर गालियाँ
क्योंकि नियम सुविधा में रुकावट है। वक्ता कहते हैं कि जहाँ भी अनुशासन, नियम या मर्यादा की बात होती है, कहने वाले को गालियों से ढक दिया जाता है — और यह सिर्फ़ उनके साथ नहीं होता। उन्होंने फेसबुक ग्रुपों में अच्छे सुझाव देने वाले अच्छे साधकों को भी ऐसी ही गालियों से ढका देखा है।
वक्ता सिर्फ़ अपनी बात नहीं, एक ढर्रा बताते हैं। वे कहते हैं, मैं अपने चैनल की बात नहीं कर रहा: दस अलग-अलग जगह एक जैसे कमेंट चलते दिखते हैं। दूसरे लोग जो सही रास्ता बताते हैं, फेसबुक के अच्छे ग्रुप जहाँ लोग बहुत अच्छे सुझाव देते हैं, सच्चे साधक — उन्हें गालियों से ढक दिया जाता है। जहाँ भी कोई नियम, अनुशासन या मर्यादा की बात करे, जवाब आता है कि इसे चप्पलों से खूब पीटना चाहिए, बड़ा आया बोलने वाला, कलियुग में ऐसा कोई नहीं करता। और जो मर्यादा के बिना बोलता है, वही कहता है कि इसकी कोई ज़रूरत नहीं — यहाँ खाओ-पियो, क्या दिक्कत है; भगवती को बलि तो चढ़ती ही है, तो थोड़ा ख़ुद भी खा लो, अंडा खा लो, क्या होगा, आजकल शरीर को चाहिए; भैरव जी को शराब तो चढ़ती ही है, तो थोड़ी पी लो।
अगर दिन में समय न मिले, तो साधना कब करें?
रात्रि साधना, और क्यों आधी रात उसके भीतर आनी चाहिए
रात्रि साधना कीजिए: लगभग दस या साढ़े दस बजे शुरू करके साढ़े बारह तक, या ग्यारह से साढ़े बारह या एक बजे तक — दो घंटे, और आधी रात बैठक के भीतर आए। यही नियम है। शिव जी की पूजा भी इसी समय होती है, और सामान्य स्तोत्र रूप में दस महाविद्याओं की भी।
सुविधा के हिसाब से खिसकाई गई सुबह-शाम की संध्या को नकारने के बाद वक्ता बचा हुआ रास्ता बताते हैं। अगर आप दिन में, भोर में या शाम की संध्या में नहीं कर सकते, तो रात्रि साधना कीजिए। कितनी? दस या साढ़े दस बजे शुरू करके साढ़े बारह तक, या ग्यारह से साढ़े बारह या एक बजे तक — दो घंटे की साधना। आधी रात उसके भीतर आनी चाहिए। यही उसका नियम है। आपको कोई सिद्धि पूरी नहीं करनी; भगवान शिव की पूजा भी इसी समय होती है, और दस महाविद्या में से जिनकी भी सेवा आपको सामान्य रूप से स्तोत्रों से करने को कहा गया है, उनकी भी। वे कहते हैं, वहाँ भी दिक्कत है — कि यह तो आसुरी साधना हो गई, यह राक्षसों का समय है, इस समय कैसे होगा। तो फिर आपको कौन-सा समय चाहिए? शाम साढ़े सात बजे, नौ या साढ़े नौ तक पूरा। यानी हर जगह आप समय से समझौता कर रहे हैं और अपनी सुविधा से समय चुन रहे हैं। तब चालीस दिन कीजिए या चार सौ, कुछ नहीं होगा।
अगर इतनी आरंभिक साधनाएँ ज़रूरी हैं, तो क्या फल बँट नहीं जाता?
यह भ्रम कि आरंभिक साधनाएँ फल को बाँट देती हैं
साधकों में यही बड़ा भ्रम है: पहले गुरु रूप, फिर गणपति, फिर भैरव, फिर हनुमान, फिर कुल देवता, फिर जन्मकुंडली के ग्रह — इतना सब कौन करेगा, और मुख्य साधना तक पहुँचते-पहुँचते क्या फल इन सब में बँट नहीं गया?
वक्ता सत्र का दूसरा विषय एक भ्रम के रूप में रखते हैं, और उसे साधकों के ही शब्दों में कहते हैं। अगर हम भगवान दत्तात्रेय की साधना कर रहे हैं, तो उसमें पहले गणपति जी की साधना कैसे लें? अगर हम भगवती दुर्गा या काली जी की साधना कर रहे हैं, तो क्रमगत साधना में कहा जाता है कि पहले गुरु रूप की साधना कीजिए। उदाहरण: आपने भगवान दत्त की साधना की, फिर गणपति की, फिर भैरव जी की, और अब हनुमान जी की कर रहे हैं। आप कुल देवताओं की शक्तियाँ कर रहे हैं। अपनी जन्मकुंडली के हिसाब से ग्रह-नक्षत्र कर रहे हैं। इतना कौन करेगा? और यह सब करने के बाद, सबसे आखिर में आप अपनी मुख्य साधना पर आते हैं। और जितनी साधनाएँ हुईं, उन सब में फल बँट गया। यही आपत्ति उठाई जाती है।
गुरु वे कदम क्यों ज़रूरी बताते हैं जो शिष्य को बोझ लगते हैं?
शिक्षक की मिसाल — आप भी इसे नहीं टाल पाएँगे
क्योंकि वे आपको दूसरी ओर से देख रहे हैं। वक्ता की तुलना: बचपन में आप अपने शिक्षकों से चिढ़ते थे और चाहते थे कि वे बीमार पड़ जाएँ; आपमें से कई अब ख़ुद शिक्षक हैं और जानते हैं कि छात्र को क्या चाहिए, उसे टाल नहीं सकते। पूर्णाभिषेक होने और अधिकार मिलने पर आप भी इसे नहीं टाल पाएँगे।
वक्ता आपत्ति का जवाब साधक को दूसरी ओर खड़ा करके देते हैं। जो तंत्र मार्ग में विधिवत, परंपरा से दीक्षित हैं — एक बार आपका पूर्णाभिषेक हो जाए, आप किसी भी परंपरा में जाएँ, और यह अधिकार आपको मिल जाए, तो आप भी अपने शिष्य से बात करते समय इस चीज़ को नहीं टाल पाएँगे। वे कहते हैं, अभी बात करना अच्छा लगता है। बचपन में आपने अपने शिक्षकों को क्या-क्या बुरा कहा होगा — कहाँ से आता है, बीमार क्यों नहीं पड़ता, दिमाग़ ख़राब करता है, सवाल पूछेगा, दिमाग़ चाटेगा — और शिक्षकों के तरह-तरह के नाम रखे होंगे। पर आपमें से कई अब ख़ुद शिक्षक बन गए हैं, और जानते हैं कि अपने छात्रों के लिए क्या सोचना पड़ता है। आप इसे टाल नहीं सकते। आप जानते हैं कि बच्चे के मन में क्या चलता है, कि वह आना नहीं चाहता, कि वह चाहता है शिक्षक बीमार पड़ जाए। पर आप जानते हैं कि बच्चे की अपनी भलाई के लिए यह चीज़ इतने समय में पूरी करवानी है। यह आपकी ज़िम्मेदारी है, क्योंकि अगर वह बच्चा पढ़ेगा, तो आपका अपना नाम और प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी। यहाँ भी बिल्कुल वैसा ही है। जब तक आप साधना के मार्ग में शिष्य के रूप में आगे बढ़ रहे हैं, जब तक आप पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं है, तब तक कोई भी गुरु, विद्वान या मार्गदर्शक जो साधनाएँ बताए, वे आपको कठिन लगेंगी — इतनी कठिनाई, इतना बोझ, इतना विस्तार, दिखावे के लिए इतना कुछ करना। आपके भीतर यह भाव उठना एक बात है। पर आप ख़ुद को उनकी जगह से नहीं देख रहे। वे ऐसे देख रहे हैं: अगर यह तंत्र साधक, अपने भीतर के लगाव और समर्पण के साथ, ये चीज़ें कर ले, तो इसकी बुनियाद साफ़ हो जाएगी, इसका रास्ता खुलेगा, यह आगे बढ़ेगा, और इसे बाद में इनके लिए लौटना नहीं पड़ेगा।
सालों के अभ्यास से फल न मिले तो क्या करें?
जो करते हैं उसे बदलने के बजाय अपनी चूकें परखिए
ख़ुद को परखिए। सोचिए कि कितने दिन की साधना आपने नियम से नहीं, अपनी मर्ज़ी से की। और नियमित संपर्क वालों को वक्ता की अपनी सलाह है कि अभ्यास मत बदलिए — वही कीजिए, साथ में कोई दीपदान या तीर्थयात्रा जोड़ दीजिए।
वक्ता सवाल साधक पर ही लौटा देते हैं। अपना जीवन उठाकर देखिए। अगर आप दो, तीन, चार, पाँच या दस साल से भी इस मार्ग पर चल रहे हैं और चीज़ें फल नहीं दे रहीं, तो देखिए आपने क्या गलतियाँ कीं — कभी ख़ुद इसका विश्लेषण कीजिए। कितने दिन की साधना आपने अपनी मर्ज़ी से की? उन्होंने यूट्यूब या फेसबुक पर जो भी साधना बताई, उसमें कितने दिन अनिवार्य हैं, कैसे, क्या, कब — चुनाव आपका रहा है। फिर वे बताते हैं कि नियमित संपर्क वालों से, जिनसे वे साल-दो साल से बात कर रहे हैं, वे असल में क्या कहते हैं। आप कहते हैं, गुरु जी, यह काम नहीं हो रहा, वह काम नहीं हो रहा — बदल दीजिए, हम क्या करें? पर हम कहते हैं: वही करते रहिए। उससे जुड़ा कुछ जोड़ा जा सकता है — यह दीपदान विधि हो जाए, इस मंदिर चले जाइए, यह तीर्थयात्रा हो जाए — पर आप जो करते हैं, वह वैसा ही रहता है। और जहाँ आप तीर्थ पर जाएँगे, वहाँ उस स्थान से जुड़ी छोटी पूजा करवाएँगे; जो पूजा आप पहले से कर रहे हैं, उसे वहाँ बढ़ाने को कहते हैं। वे करवाते हैं, बदलवाते नहीं, क्योंकि आपमें एक ही देव-शक्ति की ऊर्जा इकट्ठी हो रही है।
इकट्ठा पुण्य दिखने में कितना समय लेता है?
बुरे प्रारब्ध का घटना, और वह दिन जब इकट्ठा पुण्य फूटता है
जितना भी लगे — पर जिस दिन वह फूटता है, आप बहुत आगे निकल जाते हैं और पीछे मुड़कर नहीं देखते। ऊर्जा एक जगह इकट्ठी होती है; जब बुरा प्रारब्ध घटता है, तो इष्ट के प्रति थोड़ा समर्पण और थोड़ा अच्छा भाव ही चाहिए। मुश्किल यह है कि हम एक चीज़ पर टिक नहीं पाते।
वक्ता बताते हैं कि यह जमा होना असल में क्या करता है। हमारा प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। कब तक बुरा रहेगा — एक, दो, तीन, चार, पाँच साल? पर जैसे ही हमारा बुरा प्रारब्ध घटता है, और एक जगह इकट्ठी हो रही पुण्य वाली ऊर्जा मौजूद है, साथ में अपने इष्ट देवता के प्रति थोड़ा समर्पण, थोड़ा अच्छा भाव और उन पर भरोसा — जिस दिन वह फूटेगा, आप बहुत आगे निकल जाएँगे। फिर आपको पीछे मुड़कर यह नहीं सोचना पड़ेगा कि वह हमारी समस्या थी, हमें इस बात की चिंता करनी पड़ती थी। जीवन में यह समय आता है। ऐसा नहीं कि नहीं आता। आपके लिए दस दिन में आ सकता है या दस साल बाद। पर धैर्य नहीं है। वे कहते हैं, धैर्य इसलिए नहीं बन रहा क्योंकि हम एक जगह एक चीज़ पर टिक नहीं पा रहे। वे अपने त्योहार वाले निर्देशों का उदाहरण देते हैं कि लोग क्या गलत समझते हैं: भगवान दत्तात्रेय की पूर्णिमा पर उनके लिए दीपदान, दिवाली और धनतेरस पर कुल शक्तियों और यमराज के लिए दीपदान। वे किसी खास देवता के लिए किसी खास पर्व काल पर बताए गए थे। पर उन्होंने कभी एक बार भी नहीं कहा कि सिर्फ़ उसी को पकड़कर चलो।
दत्तात्रेय की सेवा ज़रूरी क्यों मानी जाती है?
महागुरु दत्तात्रेय, और कुल-दोष पर उनकी दृष्टि
क्योंकि वे महागुरु हैं — सिद्धों के सिद्ध, जिनके आगे हर परंपरा के आचार्य और सिद्ध झुकते हैं। उनकी सेवा वहाँ ज़रूरी मानी जाती है जहाँ कोई श्राप लगा हो, या कुल-पितृ या कुल-दोष काम कर रहा हो। वक्ता कहते हैं, एक बार वे दृष्टि डाल दें, तो किसी की हैसियत नहीं कि आपके घर को नुकसान पहुँचाए।
वक्ता भगवान दत्तात्रेय को पहले रखने का कारण बताते हैं। भगवान दत्तात्रेय महागुरु हैं — हर परंपरा के आचार्य कहिए, सिद्ध कहिए, महासिद्ध कहिए, सारे सिद्ध उनके आगे झुके रहते हैं; वे सिद्धों के सिद्ध, महासिद्ध हैं — इसलिए उनकी सेवा और पूजा ज़रूरी है। वे कहते हैं, यह ज़रूरी है अगर हम पर किसी तरह का श्राप लगा हो, अगर कोई कुल-पितृ की बात हो या कुल शक्ति का दोष हो। वे एक पत्र लिखने वाले को याद करते हैं, जिनका नाम उन्हें याद नहीं आ रहा, जिनके घर में हर सात साल में कोई मर जाता है। वे कहते हैं, इसका कोई अनसोचा कारण हो सकता है, या कुल का कोई दोष। भगवान दत्त की कृपा से, एक बार उन्होंने दृष्टि डाल दी, तो किसी की हिम्मत या हैसियत नहीं कि आपके घर में नुकसान कर सके।
अपनी साधना के बारे में किसे बताना चाहिए?
साधना गुप्त रखिए, बस ज़रूरतमंद अपनों को बताइए
सिर्फ़ उन करीबियों को जो कष्ट में हैं। लोग आपको ठीक उसी जगह परेशान करते हैं जहाँ आपके भीतर भरोसा बनने लगता है और आप किसी से इसके बारे में पूछते हैं — वे आपको कहीं अटका देंगे, कहेंगे इससे कुछ नहीं होता। मार्गदर्शन सिर्फ़ उससे लीजिए जो आपका भला चाहता हो।
वक्ता बताते हैं कि नुकसान असल में कहाँ से आता है। जानते हैं लोग आपको कहाँ परेशान करते हैं? उस जगह जहाँ आपके भीतर अपने अभ्यास को लेकर भरोसा बनने लगता है, और आप किसी से इसके बारे में पूछते हैं। आपने कहा, हम यह कर रहे हैं — और सामने वाला आपको कहीं अटका देगा। कहेगा इससे कुछ नहीं होता, बड़े-बड़े आए और चले गए। वे कहते हैं, इसीलिए वे बार-बार कहते हैं कि ये बातें गुप्त रखिए। कीजिए, और गुप्त रखिए। अपने जो प्रियजन कष्ट में हैं, उन्हें बताइए — उनसे भी करने को कहिए। पर जो आपसे बैर रखते हैं, उन्हें बताने की क्या ज़रूरत? वे सिर्फ़ नुकसान करेंगे। और अगर मार्गदर्शन लेना हो, तो सही तरह के व्यक्ति से लीजिए, जो आपका भला चाहे और भला सोचे। वरना अपने स्वार्थ में वे आपका बुरा भी कर देंगे।
कितनी शक्तियों की पूजा मुख्य रूप से करनी चाहिए?
एक मुख्य शक्ति; आरंभिक साधनाएँ बस कुछ दिनों के लिए
एक। वक्ता कहते हैं कि हर दस लाइव में से पाँच में वे यही बात रखते हैं: हम मुख्य रूप से एक ही शक्ति की पूजा करेंगे, और आरंभिक साधनाएँ बस कुछ दिन करनी होती हैं। साधक ठीक यहीं अटके रहते हैं, एक चीज़ से दूसरी पर भटकते रहते हैं, इससे निकल नहीं पाते।
वक्ता वह सिद्धांत रखते हैं जिस पर पूरा रोडमैप टिका है। सबसे ज़रूरी बात पर — जब हम किसी शक्ति की साधना कर रहे हैं, तो क्या बदलाव करें और कितनी बार — वे कहते हैं कि लगभग हर दस में से पाँच लाइव में वे यही बात रखते हैं: हम हमेशा एक ही शक्ति की मुख्य रूप से पूजा करेंगे। आरंभिक साधनाएँ हमें बस कुछ दिन करनी होती हैं। वे कहते हैं, यही आप समझ नहीं पा रहे। आप यहीं अटके रहते हैं। इससे निकल नहीं पाते। कितना भी समझाया जाए, आपका मन आपको निकलने नहीं देता। आप भटकते रहते हैं — ऐसे नहीं, वहाँ कुछ करो; वहाँ नहीं, यह करो। उनका निर्देश है कि अपना पूरा रोडमैप तैयार कीजिए, और वे उदाहरण के रूप में उसे पूरा करके दिखाने की बात कहते हैं।
जो जीवन भर महाकाली साधना करना चाहे, उसका पहला कदम क्या है?
गुरु रूप चुनना, फिर चुने हुए मुहूर्त पर देव दीक्षा
पहले गुरु विधि चुनिए — भगवान दत्तात्रेय, नवनाथ, अपने क्षेत्र का कोई प्रसिद्ध गुरु रूप, या तीन शक्तियों में से एक। फिर सही मुहूर्त पर देव दीक्षा विधान कीजिए; वक्ता आने वाली 26 दिसंबर, या 15 जनवरी की मकर संक्रांति बताते हैं।
वक्ता पूरा रोडमैप एक श्रोता, अनिल जी, के नाम से समझाते हैं। वे उन्हें एक नए व्यक्ति के रूप में लेते हैं जो जीवन भर महाकाली — माँ दक्षिणा काली — की साधना करना चाहते हैं, और जिन्होंने शुरू से पूरी विधि बताने को कहा है। उनका पहला सुझाव है गुरु विधि का चुनाव। आप किस रूप की पूजा करना चाहते हैं? क्या आप भगवान दत्तात्रेय की पूजा करना चाहते हैं? क्या आपकी आस्था नवनाथ में है? क्या आपके अपने क्षेत्र का कोई प्रसिद्ध गुरु रूप है? उसे लेकर चुनिए। या फिर आप तीन शक्तियों में से कोई एक चाहें। इस उदाहरण में श्रोता कहते हैं कि उनका झुकाव पूरी तरह भगवान दत्तात्रेय की ओर है — उनके स्वभाव, उनकी विधि, और उनमें तीनों रूपों — ब्रह्मा, विष्णु और महेश — के होने के कारण। तो वक्ता पहली साधना यह देते हैं: सही मुहूर्त पर देव दीक्षा विधान कीजिए। 26 दिसंबर आ रही है, उस दिन कीजिए; या इस बार मकर संक्रांति 15 जनवरी को है, तो 15 को दीक्षा विधान कीजिए। देव दीक्षा विधान का वीडियो बार-बार देखिए, सारी तैयारी कीजिए, और उसे कीजिए।
एक महीना या इकतालीस दिन रोज़ 108 माला एकाक्षरी, फिर ग्यारह दिन माला मंत्र — लगभग दो महीने का आरंभिक काम।
इकतालीस दिन एकाक्षरी, फिर ग्यारह दिन माला मंत्र
कम से कम एक महीना, या जहाँ तक हो सके इकतालीस दिन, रोज़ 108 माला एकाक्षरी मंत्र। वह पूरा हो जाए, तो कम से कम ग्यारह दिन माला मंत्र, रोज़ 108। इसमें लगभग दो महीने की आरंभिक साधना हो जाती है, और पूरे समय खान-पान के नियम रखे जाते हैं।
देव दीक्षा विधान के बाद वक्ता जप बताते हैं। कम से कम एक महीना, या जहाँ तक हो सके इकतालीस दिन, एकाक्षरी मंत्र का रोज़ 108 माला जप कीजिए। वह पूरा हो जाए, तो कम से कम ग्यारह दिन रोज़ 108 बार माला मंत्र का जप कीजिए। इसके साथ आपकी लगभग दो महीने की आरंभिक साधना बीत गई। इन दो महीनों में खान-पान के नियम पर ज़रूर ध्यान रखना है — वे जोड़ते हैं, साधक के लिए तो यह रोज़ की बात है। वे एक छूट देते हैं और उसे छूट ही कहते हैं। अगर आप ऐसे पेशे में हैं जिसमें यात्रा करनी पड़ती है, तो व्यक्तिगत बातचीत के बाद — यह सुविधा या यह असुविधा आ रही है — इकतालीस दिन को ग्यारह करके पूरा किया जा सकता है, और बाद में फिर संकल्प लिया जा सकता है। यह छूट दी जाएगी। इस तरह जनवरी, फरवरी और मार्च तक इन श्रोता की भगवान दत्तात्रेय साधना, यानी गुरु साधना, पूरी हो गई।
चतुर्थी से चतुर्दशी तक दस दिन, 108 पाठों में हर पाठ पर एक दूर्वा, पहले और आखिरी दिन अभिषेक और अर्चना के साथ।
रोज़ 108 दूर्वा के साथ संकट नाशन गणेश स्तोत्र
दस दिन, किसी भी पक्ष में चतुर्थी से चतुर्दशी तक। रोज़ 108 दूर्वा चाहिए: संकट नाशन गणेश स्तोत्र के हर पाठ पर गणपति को एक दूर्वा चढ़ाइए। पहले और आखिरी दिन दूध से अभिषेक, श्रृंगार, पंचोपचार और 108 नामों से अर्चना जोड़िए, फिर 108 पाठ।
दूसरी साधना गणपति की है। वक्ता पहले समय चुनते हैं — कोई चतुर्थी, या कोई भी पुण्य दिन — और वहीं से शुरू करते हैं। जहाँ किसी गुरु परंपरा में दीक्षा नहीं है, पर भगवान दत्तात्रेय से देव दीक्षा विधान हुआ है, वहाँ महा गणपति की साधना की जा सकती है। अनुष्ठान ख़ुद संकट नाशन स्तोत्र का है: किसी भी पक्ष में चतुर्थी से चतुर्दशी तक दस दिन की साधना कीजिए। रोज़ आपको 108 दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। चाहिए। दूर्वा लाइए और संकट नाशन गणेश स्तोत्र के हर पाठ पर गणपति को एक दूर्वा चढ़ाइए। हो सके तो दस दिनों में भगवान श्री गणपति का दूध से अभिषेक, फिर जल आदि से, फिर गंध आदि से कीजिए; अगर शुद्ध वस्त्र रखते हैं तो उन्हें पहनाइए, नहीं तो उनके आगे रख दीजिए; अपनी सामर्थ्य भर उनका श्रृंगार और पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है। पूजा कीजिए, और फिर 108 नामों से अर्चना कीजिए। फिर संकट नाशन के 108 पाठ पूरे कीजिए। पहला और आखिरी दिन पूरा करना है; बीच के दिनों में बस पाठ करते जाइए और समर्पित करते जाइए। दीपदान रोज़ होगा। इसके साथ दस दिन की गणपति साधना पूरी — इस उदाहरण में मार्च में।
मंत्र कितनी संख्या पर जागता है, और उसके बाद रोज़ कम से कम कितना करें?
चार लाख जप से मंत्र जागता है; रोज़ का न्यूनतम उसे बनाए रखता है
वक्ता कहते हैं, चार लाख पर। उनकी अपनी दत्तात्रेय मंत्र साधना में इकतालीस दिन रोज़ 100 माला से लगभग चार लाख ग्यारह हज़ार जप हुआ, और चार लाख पर मंत्र जागृत होता है। उसके बाद रोज़ कम से कम 27 माला, या न्यूनतम 11 — अभ्यास हो जाने पर ज़्यादा से ज़्यादा पाँच मिनट।
वक्ता पूरी हो चुकी दत्तात्रेय साधना का हिसाब लगाते हैं। रोज़ 100 माला जप, इकतालीस दिन, कम से कम चार लाख दस हज़ार, चार लाख ग्यारह हज़ार मंत्र होते हैं। और चार लाख पर मंत्र का जागरण होता है। वे कहते हैं, उसके बाद हमें उस मंत्र का रोज़ कम से कम 27 माला, या उससे भी कम — न्यूनतम 11 माला — रोज़ ज़रूर करते रहना है। 100 या 108 माला करने का अभ्यास तो पहले से है; 11 में कितना समय लगेगा? पाँच मिनट भी नहीं। अभ्यास बन जाने पर एकाक्षरी मंत्र में एक मिनट में आराम से डेढ़-दो माला हो जाती हैं, तो पाँच-दस मिनट भी नहीं लगेंगे। तो वह जप चल रहा है, और दस दिन की 108 पाठ वाली संकट नाशन साधना पूरी होने पर रोज़ आठ पाठ जारी रहेंगे।
नए साधक को रोज़ की संख्या ज़्यादा क्यों रखनी चाहिए?
नए साधक को पहले पुण्य-बल और तपो-बल चाहिए
क्योंकि नए साधक को पुण्य-बल और तपो-बल चाहिए। संख्या कम की जा सकती है, पर अभी रोज़ आठ पाठ रखे जाते हैं। और गणपति साधना के दौरान दत्त जप साथ-साथ चलता है — हर बैठक की शुरुआत में एकाक्षरी की 11 माला और माला मंत्र के पाँच पाठ।
वक्ता बताते हैं कि रोज़ की संख्या वहीं क्यों रखी है: इसे कम किया जा सकता है, पर यह नया साधक है, इसलिए पुण्य का बल चाहिए और तपोबल चाहिए, तो रोज़ आठ पाठ जारी रहेंगे। फिर वे साथ-साथ वाले सवाल का जवाब देते हैं। गणपति साधना चलते हुए क्या दत्तात्रेय का माला मंत्र आदि भी पढ़ा जाएगा? हाँ, पढ़ा जाएगा — क्योंकि उसकी सिद्धि और उसका विधान पूरा हो चुका है, भले ग्यारह दिन का ही। तो रोज़ गणपति साधना की बिल्कुल शुरुआत में भगवान दत्त का स्मरण होता है, मन से पूजा होती है, सामने फूल चढ़ाए जाते हैं; फिर दत्त एकाक्षरी मंत्र की 11 माला और दत्त माला मंत्र के पाँच पाठ बोलकर होते हैं; और उसके बाद गणपति साधना करके आरती आदि के साथ समर्पित की जाती है। गणपति की पूरी हो जाने पर वह भी रोज़ की बैठक में शामिल हो जाती है।
आपदा उद्धारक बटुक भैरव अष्टोत्तर सतनाम शुरुआती साधक के लिए सबसे उपयुक्त है — शुरुआत में इसकी दो-तीन न्यास विधियाँ छोड़कर।
बटुक भैरव अष्टोत्तर सतनाम, शुरुआत में न्यास छोड़कर
शुरुआती साधक के लिए आपदा उद्धारक बटुक भैरव अष्टोत्तर सतनाम स्तोत्र सबसे सटीक है। इसमें दो-तीन न्यास विधियाँ हैं — शुरुआत में इन्हें मत कीजिए। सामान्य रूप से विनियोग करके 108 नाम पढ़िए, स्थापित त्रिशूल या बटुक भैरव के चित्र के आगे।
तीसरी साधना भैरव जी की है। वक्ता पहले पूछते हैं कि साधक कौन-सा पाठ चाहता है: घर में बटुक भैरव का होगा। अगर शत्रु से जुड़ी समस्या हो, तब भी पहले बटुक भैरव का कीजिए, उसके बाद ही महाभैरव पर जाइए। वे कहते हैं, आरंभिक साधना के लिए सबसे सटीक है आपदा उद्धारक बटुक भैरव अष्टोत्तर सतनाम स्तोत्र। इसमें कम से कम दो-तीन न्यास विधियाँ हैं — शुरुआत में इन्हें मत कीजिए, इतनी कठिनाई में मत जाइए। सामान्य रूप से उनका विनियोग कीजिए और पूरे 108 नामों का जप कीजिए, जो भैरव भूतनाथ से शुरू होते हैं। इसके लिए या तो भगवान भैरव जी के नाम से एक त्रिशूल स्थापित कीजिए, या घर में बटुक भैरव जी का चित्र स्थापित कीजिए। उनके आगे रोज़ दीपक जलाइए और जो भोग बताया गया है उससे शुरू कीजिए — लड्डू भोग आदि, या जो भोग आपको मिल सके।
बटुक भैरव अनुष्ठान कब करें, और किस संकल्प के साथ?
कृष्ण अष्टमी से, जीवन भर की रक्षा के संकल्प के साथ
कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से, या मार्च-अप्रैल में पड़ने वाली नवरात्रि में। संकल्प है बटुक भैरव की पूरी कृपा के लिए, आगे की जीवन भर की साधना पर उनकी कृपा बनी रहे, किसी भी साधना में कोई बाधा न आए, और हर साधना उनकी रक्षा में पूरी हो।
वक्ता समय और शब्द तय करते हैं। कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू कीजिए, या मार्च या अप्रैल में पड़ने वाली नवरात्रि में सिद्ध विधि कीजिए। संकल्प इन शब्दों में होता है: बटुक भैरव की पूरी कृपा और आशीर्वाद के लिए; और आगे जीवन भर जो पूरी साधना हम करेंगे, उसमें भगवान भैरव जी की कृपा हम पर बनी रहे; किसी भी साधना में किसी तरह की बाधा या रुकावट न आए; और उनकी सही रक्षा में हमारी हर साधना पूरी हो। यह संकल्प करके उनकी साधना फिर शुरू की जाती है। अवधि: अष्टमी से चतुर्दशी या अमावस्या तक, या चाहें तो कृष्ण पक्ष से शुक्ल पक्ष तक, अष्टमी से षष्ठी, अपने हिसाब से पंद्रह दिन, उनका अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। करते हुए। कम से कम अष्टमी से चतुर्दशी के बीच 1100 जप पूरे कीजिए।
क्या हर साधना के अंत में हवन ज़रूरी है, और क्या स्त्री आहुति दे सकती है?
आखिरी दिन हवन, और तंत्रोक्त विधि में स्त्रियों का आहुति देना
हाँ, हर साधना के आखिरी दिन हवन होना ही चाहिए — कम से कम एकाक्षरी से 11 माला आहुति। पुरुष गुग्गुल मिला घी लें; स्त्रियाँ गुग्गुल ज़्यादा और घी कम रखें। क्योंकि यह तंत्रोक्त विधि है, जिस स्त्री को पहले से संतान है, वह आहुति दे सकती है।
वक्ता अंतिम हवन को विकल्प नहीं, नियम का हिस्सा बनाते हैं। हर साधना के आखिरी दिन विधि से हवन ज़रूर होना चाहिए। भगवान दत्तात्रेय की साधना में भी आखिरी दिन एकाक्षरी मंत्र से कम से कम 11 माला आहुति दीजिए। सामग्री: पुरुष हो तो गुग्गुल मिला घी; स्त्री हो तो गुग्गुल की मात्रा ज़्यादा और घी की मात्रा कुछ कम रखिए। अधिकार पर वे नियम और कारण साथ बताते हैं। यह प्रावधान है कि जिन्हें पहले से संतान प्राप्त है, वे आहुति दे सकती हैं, क्योंकि यह तंत्रोक्त विधि है। वैदिक विधियों में स्त्रियों के आहुति निषेध जैसी कई प्रक्रियाएँ हैं; तंत्र क्षेत्र में आज के समय में इस बारे में सोचने की ज़रूरत नहीं। वे कहते हैं, कुछ चीज़ों में आपको बदलाव करना चाहिए।
क्या तंत्रोक्त हवन के लिए भी वैदिक हवन जैसा अधिकार चाहिए?
तंत्रोक्त और शाबरोक्त हवन के लिए वैदिक अधिकार की ज़रूरत नहीं
नहीं। वेदोक्त हवन सिर्फ़ उसके अधिकारी ही करें, पर तंत्रोक्त या शाबरोक्त हवन में आपके लिए कोई रुकावट नहीं — कीजिए। वे जोड़ते हैं, जो नहीं छोड़नी हैं वे मर्यादाएँ हैं; हर समय सब कुछ नहीं निभ सकता, पर वे नहीं।
वक्ता हवन के दोनों प्रकार अलग करते हैं। वे कहते हैं, हर समय सब कुछ निभाना संभव नहीं, पर इसका अर्थ मर्यादाएँ छोड़ देना नहीं है। तंत्रोक्त और पौराणिक विधियों में आपके लिए कहीं कोई रुकावट नहीं बनेगी। वेदोक्त हवन वे लोग करें जो उसके अधिकारी हैं। पर हम तंत्रोक्त कर रहे हैं, या शाबरोक्त — तो उसमें आपको कोई दिक्कत नहीं; कीजिए। फिर वे तीनों आरंभिक साधनाओं को उनके आखिरी दिन के हवन के साथ पूरा करते हैं। दत्तात्रेय साधना के आखिरी दिन 11 माला हवन, या पाँच, या जितना हो सका। गणपति जी की पूरी हुई, तो आखिरी दिन फिर उनके 108 नामों से हवन हुआ। और भैरव जी की में आखिरी दिन 108 नामों की साधना थी, हर नाम पर 11 आहुतियाँ — जिससे एक हज़ार आहुतियाँ भी पूरी हुईं और उनकी साधना पूरी हुई। इसके साथ तीन बुनियादी साधनाएँ पूरी हो गईं।
हनुमान साधना कब शुरू होती है, और कौन-सा कवच लें?
चैत्र पूर्णिमा से हनुमान, एकमुखी या पंचमुखी कवच
चैत्र में पड़ने वाली पूर्णिमा तिथि — हनुमान जयंती — से, पूर्णिमा से पूर्णिमा तक, कम से कम एक महीना। एकमुखी या पंचमुखी हनुमान कवच लीजिए; जहाँ घर में प्रेत या पिशाच से जुड़ा दोष हो, वहाँ पंचमुखी।
चौथी साधना हनुमान जी की है। उसी चैत्र में जो पूर्णिमा तिथि पड़ती है, उस दिन हनुमान जयंती मनाई जाती है, और उसी दिन से हनुमान साधना शुरू होगी, पूर्णिमा से पूर्णिमा तक कम से कम एक महीना। कौन-सी करें: उनका एकमुखी हनुमान कवच कीजिए, इससे ज़्यादा नहीं, या पंचमुखी हनुमान वाला। वे कहते हैं, दोनों अपनी जगह बहुत प्रभावी हैं। पर अगर आप जिस जगह, जिस घर में रहते हैं, वहाँ प्रेत या पिशाच से कोई दोष है, कोई परेशानी है, तो पंचमुखी हनुमान जी का कीजिए। कवच का जप रोज़ होना चाहिए; और साथ में, अगर समस्या गंभीर हो, तो हनुमान चालीसा से रोज़ हवन भी कर सकते हैं। यहाँ पंचमुखी या एकमुखी कवच का कम से कम एक महीने का अनुष्ठान पूरा होने पर बुनियादी साधनाएँ लगभग पूरी हो जाती हैं, और अब आपको मुख्य साधना पर आना है।
कुल देवी-देवता की साधना कम से कम ग्यारह दिन, और जहाँ उनका स्थान स्थापित है, वहाँ यह हर दूसरी साधना के साथ-साथ चलती है।
कुल देवता, कम से कम ग्यारह दिन, और जहाँ उनका स्थान है
बुनियादी साधनाओं के बाद। अपने कुल देवी-देवता के रूप के अनुसार कम से कम ग्यारह दिन साधना कीजिए। अगर उनका स्थान या थान बना है, तो उनकी पूजा हर दूसरी साधना के साथ-साथ चलती है। जहाँ कुल देवता का पता न हो, वहाँ वक्ता आवाहन के बजाय बात साफ़ रखना पसंद करते हैं।
वक्ता कहते हैं, चैत्र आते-आते ज़्यादातर बुनियादी साधनाएँ पूरी हो जाती हैं। अब बची हैं आपकी कुलदेवी और कुल देवताओं से जुड़ी साधनाएँ। उनके रूप के बारे में जो भी जानकारी आपके पास है, उसके अनुसार उनकी साधना कीजिए — कम से कम ग्यारह दिन। अगर उनका स्थान या थान बना है, तो वह पूजा सारी साधनाओं के साथ-साथ चलेगी। अगर हमें जानकारी नहीं है कि कुल देवता कौन हैं, तो आवाहन आदि की एक विधि बताई गई है — पर वे कहते हैं, हम तो यही कहेंगे: बात साफ़ रखिए।
क्या कोई रोज़ का जप है जो हर किसी को करना चाहिए?
रोज़ एक मंत्र की दस माला, सबके लिए अनिवार्य
हाँ — रोज़ किसी एक मंत्र की दस माला, स्त्री हो या पुरुष, और उसमें किसी खास काम के पूरा होने का कोई संकल्प नहीं। जो वैदिक संध्या के अधिकारी हैं, उन्हें गायत्री की दस माला; जो नहीं कर सकते, उन्हें पंचाक्षरी। वक्ता कहते हैं, यह सबके लिए अनिवार्य है।
वक्ता इसे एक चरण नहीं, कर्तव्य के रूप में रखते हैं। बुनियादी साधनाओं के बाद यहाँ से दो चीज़ें चुननी हैं — और पहली यह कि आप स्त्री हों या पुरुष, रोज़ किसी एक मंत्र की दस माला का जप रखना चाहिए। और उसमें यह संकल्प नहीं होना चाहिए कि मेरा कोई खास काम पूरा हो, या यह अटका मामला सुलझ जाए; यह उस उद्देश्य के लिए हो जिसके लिए हमारा जन्म हुआ। जो वैदिक संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। के अधिकारी हैं, उन्हें गायत्री मंत्र की दस माला बताई जाती है। जो गायत्री नहीं कर सकते, उन्हें पंचाक्षरी मंत्र, शिव जी का पाँच अक्षर वाला मंत्र, दिया जाता है। जिन्हें प्रणव का अधिकार नहीं, वे प्रणव के बिना करें — प्रणव के बिना षडक्षरी नहीं — और विधान के अनुसार स्त्रियाँ और जो यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। नहीं पहनते, वे अंत में नमः जोड़कर उस मंत्र की रोज़ दस माला जप करेंगे। वे कहते हैं, यह सबके लिए अनिवार्य हो गया है। सबके लिए अनिवार्य है। शूद्र हों तब भी करना है — भले आप ख़ुद को शूद्र मानते और कहते हों, आपको भी करना है; और अगर कोई आपको रोक रहा है, तो उससे बड़ा मूर्ख कोई नहीं। बस ध्यान रखिए कि प्रणव को लेकर आपका अधिकार क्या है, ताकि आपको कोई दोष न लगे और किसी तरह का श्राप आपकी उन्नति या समृद्धि को न छुए। बस इतना। सबको करना है।
जन्मकुंडली के दोषों का क्या करें?
कुंडली के दोष, दशा के उपाय और सात-सात दिन की ग्रह साधनाएँ
अगर पहली तीन-चार साधनाओं के बाद भी कुंडली का कोई दोष असर करता लगे, तो या उसकी शांति करवाइए, या चल रही दशा और अंतर्दशा के अनुसार दान और धारण कीजिए — या अपने पंचमेश, लग्नेश और नवमेश की सात-सात दिन की साधनाएँ कीजिए। एक महीने में यह भी हो जाता है।
वक्ता कुंडली वाला काम भी उसी साल में बिठाते हैं। अगले महीने, आषाढ़ आदि में, फिर गुप्त नवरात्रि आएगी, और दूसरे समय आएँगे; तब से आपके चुने हुए देवता की मुख्य साधना शुरू होती है। पर अगर शुरुआती तीन-चार साधनाओं के बाद लगे कि जन्मकुंडली से जुड़ा कोई दोष अब भी बाकी है और इस व्यक्ति पर असर कर रहा है, या कोई ऐसा दोष है जिसकी शांति ज़रूरी है, तो या उसकी शांति करवाइए; या जो दशा और अंतर्दशा चल रही है, उसके अनुसार उस समय उससे जुड़ा दान या कुछ धारण किया जाए; या फिर अपने पंचमेश, लग्नेश और नवमेश से जुड़ी साधनाएँ सात-सात दिन की जाएँ। यानी एक महीने में वह भी पूरा हो जाता है। बुनियादी बातें साफ़ हैं।
क्या किसी महीने के पर्व की पूजा अपनी साधना की जगह ले लेती है?
सावन: शिव का अभिषेक अनिवार्य, आपका अनुष्ठान साथ-साथ
नहीं, दोनों चलते हैं। पूरे सावन शिव का रोज़ का अभिषेक अनिवार्य है, जो सुबह होता है। फिर दस-पंद्रह मिनट अंगों को आराम देकर आप फिर अपने आसन पर बैठें। अपनी दस माला या अपना अनुष्ठान करें। सुबह, शाम या रात, जैसा ठीक लगे।
वक्ता सावन के उदाहरण से बताते हैं कि पर्व का महीना और अपना अनुष्ठान साथ कैसे चलते हैं। सावन आने तक छोटी-बड़ी सारी आरंभिक चीज़ें पूरी हो चुकी होती हैं। पहले की हर साधना की संख्या भी तय हो चुकी होती है। किसी की पाँच माला, किसी की दस। अब मुख्य साधना पर पहुँच गए हैं, सावन महीने की प्रतिपदा से। सावन है, तो शिव जी की पूजा ज़रूर होगी, उनका अभिषेक ज़रूर होगा। यह अनिवार्य हो गया है और साथ-साथ चलेगा। जिस भी पर्व की पूजा का समय हो, वह पूजा होगी। पर उसके साथ आप अपनी साधना करेंगे। वे अपना उदाहरण देते हैं। जब भगवती विंध्यवासिनी की सेवा करनी होती है, तब सावन में भी सुबह भगवान शिव का रुद्राभिषेक पूरा करते हैं। वह डेढ़-दो घंटे पूरा होने के बाद थोड़ा आराम करें। पाँच, दस या पंद्रह मिनट अंग सीधे करें। फिर आसन पर बैठकर भगवती के मंत्र का वह जप करें जो आपका नियम है, दस माला। या जो अनुष्ठान करना चाहें, सावन के महीने में उस मंत्र का चार-पाँच लाख। वह जप साथ-साथ चलेगा, सुबह हो, शाम हो या रात। पर शिव जी की पूजा अनिवार्य है। यह रोज़ करनी है, एक तय समय पर, सुबह जितनी जल्दी हो सके।
क्या साधनाएँ बढ़ने के साथ रोज़ का बैठना भी बढ़ता जाता है?
पाँच महीने की साधना रोज़ के पाँच मिनट में सिमटी
नहीं। हर साधना सिद्ध हो जाने पर उसकी संख्या घटा दी जाती है। दत्त एकाक्षरी की एक माला, माला मंत्र पाँच बार या एक बार, संकट नाशन एक बार, बटुक अष्टोत्तर शतनाम एक बार, हनुमान कवच एक बार। नौ ग्रह एक ही नवग्रह स्तोत्र में आ जाते हैं। कुल पाँच मिनट।
वक्ता अब सारे जमा हुए को समेट देते हैं। जब यह सारी साधना हो जाएगी, तब हम हर संख्या घटा देंगे। जो भी प्रारंभिक साधना थी, जो भी मूल साधना थी, अब उसकी सारी संख्याएँ काट देंगे। यहाँ भगवान दत्तात्रेय का एकाक्षरी मंत्र सिर्फ़ एक माला रह जाता है, जो शुरू में उनका ध्यान करते हुए होता है। माला मंत्र सिर्फ़ पाँच बार या एक बार। संकट नाशन एक बार, गणपति जी को याद करते हुए। भैरव जी का अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। एक बार। हनुमान जी का कवच, या अष्टोत्तर शतनाम, या चालीसा, या बजरंग बाण, जो भी हमने सिद्ध किया था, हर एक एक बार। इससे हमारी पूरी आरंभिक पूजा पूरी हो जाती है। नवग्रह की साधनाएँ, पंचमेश, नवमेश, लग्नेश, लाभेश, जो भी चार-पाँच हमने उस शुरुआती दौर में की थीं, अब अलग-अलग नहीं करनी हैं। एक ही बार में नवग्रह स्तोत्र पढ़ लेंगे, या उनके पौराणिक मंत्र पढ़ लेंगे, या तंत्रोक्त बीज मंत्र पढ़कर नौ ग्रहों को याद कर लेंगे। ज़्यादा से ज़्यादा पाँच मिनट लगेंगे। पाँच महीने की साधना का पूरा सार रोज़ की पूजा के पाँच मिनट में हो जाएगा। पर वे ज़ोर देते हैं कि उन पूरे पाँच महीनों में हमने नियम निभाए। ब्रह्मचर्य रखा, खान-पान का ध्यान रखा, जितनी सामर्थ्य थी सब निभाया।
सबसे पहले कवच सिद्ध किया जाता है, 1100 जप और उसका हवन, और उसके बाद ही भगवती के वे मंत्र जिनका अधिकार हो।
सबसे पहले, और किसी चीज़ से पहले, कवच सिद्ध होता है
कवच। वक्ता इसे सबसे ज़रूरी चीज़ कहते हैं। पहले कवच सिद्ध करो। उदाहरण में, कवच का 1100 जप, फिर उसकी हवन विधि सीखी। उसके बाद ही भगवती के वे मंत्र जिनका साधक को अधिकार है, या स्तुति, स्तोत्र, सहस्रनाम और शतनाम।
वक्ता कहते हैं कि अब जीवन भर की मुख्य साधना करनी है। उदाहरण में सुनने वाला महाकाली की साधना करता है। तो श्रावण महीने से भगवती महाकाली की साधना शुरू होगी। उसकी सबसे पहली साधना क्या होगी? कवच की साधना। यह सबसे ज़रूरी है, सबसे आवश्यक है। पहले कवच सिद्ध करो। तो उसने 1100 कवच की सिद्धि की, जप किया, और उसके बाद उसकी हवन विधि सीखी। कवच आदि हो जाने के बाद भगवती से जुड़े वे मंत्र पढ़े जा सकते हैं जिनका उसे अधिकार है। या उसके बाद की स्तुति और स्तोत्र। या सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। और शतनाम, जिनसे उस पर तुरंत असर पहुँचता है। तब उसे कहा जाता है, अब यह शुरू करो।
आषाढ़ पूर्णिमा पर दत्त माला मंत्र के 108 पाठ के साथ हवन से पहली साधना फिर से जाग्रत होती है।
गुरु पूर्णिमा पहली साधना को फिर जगाती है; पंचांग का क्रम
पहली साधना, दत्तात्रेय की। आषाढ़ पूर्णिमा, यानी गुरु पूर्णिमा पर हवन से सब कुछ फिर जाग्रत किया जाता है। साथ में दत्त माला मंत्र के 108 पाठ। पंचांग पूजा का अर्थ है मुख्य देवता के हर पाठ को बारी-बारी पूरा करना। उसके बाद रोज़ हर एक का सिर्फ़ एक पाठ रहता है।
वक्ता दिखाते हैं कि यह क्रम पंचांग के साथ-साथ चलता है। अगर मुख्य साधना श्रावण में शुरू हो रही है, तो सही समय से चलते हुए आप आषाढ़ पूर्णिमा और उसमें गुरु पूर्णिमा तक पहुँचेंगे। आपकी पहली साधना भगवान दत्तात्रेय की थी। तो गुरु पूर्णिमा पर आप हवन आदि करेंगे और पूरी चीज़ को फिर जाग्रत करेंगे। दत्त माला मंत्र का 108 बार पाठ करेंगे। ये चीज़ें अपने-अपने समय पर साथ-साथ चलती रहती हैं। भगवती महाकाली के लिए फिर आरंभिक साधना धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। पहले उनका अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। पूरा, 11000 या कम से कम 1100। फिर उनका कवच। कवच हो जाने पर सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। का पाठ। वे समझाते हैं कि पंचांग पूजा का अर्थ है कि आप मुख्य देवता के सारे पाठ करेंगे। बाकी सब में पाँच-दस मिनट लगते हैं। शुरू में हर एक को एक-एक करके पूरा किया जा रहा है, और रोज़ के पाठ में हर एक का सिर्फ़ एक पाठ बचता है। जब अनुष्ठान कर रहे थे, तब रोज़ 108 पाठ करते थे। अनुष्ठान पूरा हुआ, अब सिर्फ़ एक करना है। आगे और चीज़ें भी घटती जाती हैं। आखिर में शुरू के दो मिनट में सिर्फ़ एक स्तोत्र और एक ध्यान मंत्र रहता है, और सिर्फ़ मुख्य देवता की साधना चलती है। पर शुरू में ये सब करने और पूरे करने ज़रूरी हैं। वे कहते हैं कि यह पहला चरण है, जो जीवन में एक बार पूरा करना है।
साधारण आवरण भाद्रपद से लगभग पंद्रह महीनों में, चालीस-चालीस दिन के मंडलों में सीखा जाता है; नया साधक आठों शक्तियों का तर्पण एक ही मंत्र से करता है।
भाद्रपद से आवरण पूजा, चालीस दिन के मंडलों में, हर छह महीने में निखारी जाती
भाद्रपद से, कालिका और तारा जयंती के समय, साधक को आवरण सीखने में लगाया जाता है। पहले साधारण आवरण सीखा जाता है, लगभग पंद्रह महीने, चालीस-चालीस दिन के मंडलों में। जिस आवरण में आठ शक्तियाँ हों, वहाँ नया साधक सबका तर्पण और मार्जन एक ही मंत्र से साथ में कर सकता है।
वक्ता अगला चरण बताते हैं। इसके बाद जब हम आगे बढ़ रहे हैं, तो सही समय पर आवरण पूजा आदि शुरू होती है। भाद्रपद के महीने में, जब कालिका और तारा जयंती आदि आती हैं, उस समय से हम इस व्यक्ति को शुरू कराते हैं: अब आवरण सीखो। आवरण में भी पहले साधारण आवरण सीखा जाता है, और कम से कम लगभग पंद्रह महीने। एक मंडल चालीस दिन का होता है। मंडल पूरा न हो पाए तो अलग बात है, पर आवरण पूजा चालीस-चालीस दिन के हिस्सों में करें, बिल्कुल सीधे-सादे ढंग से। उदाहरण के लिए, मान लीजिए तीसरे आवरण में आठ शक्तियाँ हैं। तो या तो हम आठों का अलग-अलग तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। और मार्जन करें। या, क्योंकि आप नए हैं, सबका मंत्र एक साथ पढ़कर तर्पण और मार्जन कर लें। इस तरह धीरे-धीरे प्रक्रिया सीखें। छह महीने बीतें, तो थोड़ा आगे बढ़ें और उसे निखारें। फिर छह महीने बीतें, फिर निखारें। धीरे-धीरे निखारते रहें और गहरे जाते रहें। और आवरण पूजा के साथ-साथ आप कवच साधना, अष्टोत्तर शतनाम आदि कर रहे हैं। धीरे-धीरे आगे बढ़ें।
लगभग अठारह महीने पर तैयार नींव के कारण गुरु सीधे पंचाक्षरी दे सकते हैं, शुरू की चार साधनाएँ छोड़कर।
लगभग अठारह महीने पर विधिवत दीक्षा, बुनियादी काम पहले से पूरा
लगभग सवा साल से दो साल पर। वक्ता ज़िम्मेदारी लेते हैं कि किसी योग्य अधिकारी से उस व्यक्ति की परख कराएँगे और सही परंपरा में विधिवत दीक्षा दिलाएँगे। नींव पहले से तैयार है, इसलिए गुरु एकाक्षरी की जगह सीधे पंचाक्षरी दे सकते हैं। शुरू की चार साधनाएँ छूट जाती हैं।
वक्ता वह समय बताते हैं जब उनकी अपनी ज़िम्मेदारी बनती है। एक समय आएगा, साल से सवा साल पर। उनके हिसाब से लगभग डेढ़ साल की साधना, सब कुछ आराम से करते हुए, बीच में दीपावली की साधना और दीपदान सब के साथ। डेढ़ से दो साल तक आप सही ढंग से दीक्षा के लिए तैयार हो जाते हैं। वे कहते हैं, अगर आप इतनी दूर उनके साथ चले हैं, तो यह उनकी ज़िम्मेदारी बनती है कि आपकी दीक्षा सही परंपरा में विधिवत हो, और उसके बाद आपकी क्रमबद्ध साधना शुरू हो। वे किसी योग्य व्यक्ति से कहेंगे: इसे आप खुद परख लीजिए, यह अधिकारी हो गया है। और तैयार नींव से यह भी बदलता है कि आपको क्या मिलता है। दीक्षा देने वाले गुरु पूछेंगे कि अब तक क्या किया है। आप बताएँगे कि ये साधनाएँ इस तरह पूरी की हैं। तब अगर आप क्रम विद्या में जा रहे हैं, तो वे एकाक्षरी देने की जगह पंचाक्षरी मंत्र दे सकते हैं। वे कहेंगे कि आपको शुरू की चार साधनाओं की ज़रूरत नहीं है। जिसमें पाँच-सात साल लगते हैं, उसकी ज़रूरत नहीं। आपने शुरुआत कर ली है। यह लीजिए, इस मंत्र से अनुष्ठान शुरू कीजिए, आपको पाँच लाख जप करना है, यह विधि है। और आप पहले ही बता चुके हैं कि आपको आवरण पूजा आती है। तो वे कहेंगे: इस पंचाक्षरी मंत्र के लिए ये बदलाव और ये न्यास लगते हैं, आप इसे इस तरह करेंगे। उस समय आपको आवरण पूजा या न्यास सीखने के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ेगा।
लोग इसकी जगह फ़ोन पर दीक्षा और तुरंत बाद सिद्धि चाहते हैं, या फिर यह कि किसी और की सिद्धि उन्हें ट्रांसफर कर दी जाए।
तुरंत दीक्षा और ट्रांसफर की हुई सिद्धि
आज ही दीक्षा, फ़ोन पर, और उसके तुरंत बाद सिद्धि। और जब कुछ नहीं होता, तो माँग कि सिद्धि सीधे ट्रांसफर कर दी जाए। वक्ता का उत्तर है: अपना बीता जीवन उठाकर देखिए। सब कुछ एक साथ चाहने में पाँच-दस साल निकल गए होंगे, और एक तिनका भी नहीं हिला होगा।
वक्ता बताते हैं कि लोग असल में क्या माँगते हैं। आप इतना करना नहीं चाहते। आप चाहते हैं कि सीधे दीक्षा दे दी जाए। फ़ोन पर आइए, दीक्षा लीजिए, दीक्षा लीजिए। और लेते ही तुरंत सिद्धि मिल जाए। फिर: हमने दीक्षा ले ली और कुछ नहीं हो रहा, तो ऐसा कीजिए, सिद्धि सीधे ट्रांसफर कर दीजिए। वे कहते हैं, आजकल सब कुछ बहुत तेज़ हो रहा है, सब तुरंत चाहिए। और जितनी भी तुरंत-चाहिए वाली बातें हैं, उनमें अपना बीता जीवन उठाकर देखिए। सब कुछ तुरंत करते-करते पाँच साल, दस साल निकल गए होंगे, और एक तिनका भी नहीं हिल पाया होगा। वे कहते हैं कि आज उन्होंने सबसे बुनियादी बातें रखी हैं। चालीस दिन की साधना कहाँ असर करती है, कैसे असर करती है, और यह कि चालीस दिन की साधना से पहले तैयारी होनी चाहिए। और अगर आपने यह किया है, तो ऐसा संभव नहीं कि कुछ न हो। चालीस दिन में बहुत कुछ होता है। आप अच्छे अभ्यासों और प्रयोगों के लिए तैयार हो गए हैं।
चालीस दिनों में व्यक्ति के भीतर असल में क्या बदलता है?
चालीस दिन बुद्धि, आत्म तत्व और आभामंडल पर क्या करते हैं
गिनती का हिसाब सिर्फ़ ऊपरी बात है। उसके बीच आपकी बुद्धि, आपके विचार, आपके आत्म तत्व और आपके आभामंडल में ऊर्जाओं का इतना जुड़ाव और आवागमन होगा कि आपके विचार बदल जाएँगे। साधना और परलोक की ओर आपका नज़रिया चलते-चलते बदलता जाएगा।
वक्ता हिसाब-किताब और असर को अलग करते हैं। वे कहते हैं, इतना किया, इतना किया, यह सब जोड़-घटाव है। पर इस जोड़-घटाव के बीच आपकी बुद्धि में, आपके विचार में, आपके भीतर के आत्म तत्व में, आपके आभामंडल में ऊर्जाओं का इतना जुड़ाव होगा, इतना आवागमन होगा कि आपके विचार बदल जाएँगे। साधना और लौकिक व परलौकिक जगत की ओर आपका नज़रिया बदलता जाएगा। और जब आप उन शक्तियों के संपर्क में आ गए, और आपके आचरण और आपके भीतर चल रहे आत्मचिंतन के अनुसार किसी शक्ति ने कृपा कर दी, तो क्या हो जाए, यह कहीं लिखा नहीं है। वे शर्त भी जोड़ते हैं। कब, कहाँ और किसके छल से आप बचकर निकलेंगे, बुद्धि और विवेक लगाकर, यही तय करता है। किसी को सुनकर-देखकर भटक न जाना। और इस दावे पर कि साधारण आदमी संत की वाणी नहीं समझ सकता, उनकी राय है: ऐसे संत की वाणी का क्या लाभ, जो साधारण आदमी के किसी काम की न हो। कम से कम उससे साधारण आदमी का नुकसान तो नहीं होना चाहिए।
क्या चालीस दिन की साधना के दौरान बाल और दाढ़ी कटवानी चाहिए?
क्षौर कर्म साधना से पहले और बाद में, बीच में नहीं
क्षौर कर्म साधना शुरू होने से दो दिन पहले करना चाहिए, और समर्पण के दो दिन बाद फिर से। बीच में नहीं। दोबारा करते समय कोई खास तिथि न हो: न एकादशी, न ग्रहण, न संक्रांति। वार से कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
वक्ता दूसरों का यह दावा उठाते हैं कि साधना में चालीस दिन दाढ़ी न बनाने से कुछ नहीं होता। तो दाढ़ी बनाओ, साफ़ रहो, रोज़ शेव करो, मेकअप करो, साधना में कोई दिक्कत नहीं। वे इसे इसी रूप में दोहराते हैं, फिर विधि बताते हैं। यहाँ कहा गया है कि क्षौर कर्म आदि साधना शुरू करने से दो दिन पहले पूरा कर लेना चाहिए। और साधना पूरी होने के बाद, समर्पण के दो दिन बाद, फिर क्षौर कर्म करना चाहिए। या अगर अगली साधना शुरू करने वाले हैं, तो उसके लिए दिन और तिथि देख लें कि कोई खास तिथि न पड़ रही हो, और कर लें। वार नहीं गिना जाता, गुरुवार हो या शनिवार। बस ऐसी कोई तिथि न हो, न एकादशी, न ग्रहण, न संक्रांति, और अपना क्षौर कर्म कर लें। पर यहाँ, वे कहते हैं, लोग साफ़ कह रहे हैं कि इसकी कोई ज़रूरत नहीं, मानो भगवान बाल-दाढ़ी देखने बैठे हों। बाल-दाढ़ी का नियम आपने-हमने तय नहीं किया। जिन्होंने साधना की विधि बताई, खुद भगवान ने, उस रूप में आकर, ऋषियों-मुनियों के रूप में इन चीज़ों का ज्ञान देकर, उन्होंने यह नियम बनाया।
किसी और की राय को बरसों की साधना खत्म क्यों नहीं करने देनी चाहिए?
किसी और के कहने पर आध्यात्मिक धन नाली में बहा देना
क्योंकि यह आपकी संपत्ति है। दो, चार, पाँच साल की तपस्या से जमा ऊर्जा और पुण्य बल आध्यात्मिक धन है। और जिसका आपके पुण्य से कोई लेना-देना नहीं, उसके कहने पर आप सारा नाली में बहा देते हैं। वक्ता कहते हैं यह गलती कभी नहीं करनी चाहिए।
वक्ता बताते हैं कि असल में दाँव पर क्या है। वे कहते हैं, इन मूर्खताओं से बचिए, क्योंकि यह आपकी संपत्ति है। आध्यात्मिक संपत्ति, जो आप दो, चार, पाँच साल तपस्या करके, ऊर्जा जमा करके और पुण्य बल जमा करके इकट्ठा करते हैं। और फिर कोई व्यक्ति, जिसका आपके पुण्य से कोई लेना-देना नहीं, कुछ कह देता है। आप उसकी बात मान लेते हैं और सारा नाली में बहाकर आ जाते हैं। यह काम, यह गलती कभी मत कीजिए। और यह बात आप खुद जानते हैं, वे जोड़ते हैं। आप जानते हैं कि यह व्यक्ति गलत बोल रहा है। फिर भी आप कहते हैं: नहीं, हम तो बस किसी संत-महात्मा की वाणी सुनने का इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने कह दिया, तो यह भगवान की वाणी हो गई। शास्त्र किनारे रखो, सिद्धांत किनारे रखो। यह व्यक्ति प्रसिद्ध है, पूरी दुनिया इसे मानती है, उसके ऊपर शास्त्र क्या हैं। प्रक्षिप्त वाले तर्क पर उनकी सीमा साफ़ है। किसी चीज़ को उतना ही प्रक्षिप्त मानिए जितने से काम चल जाए। इस बात पर प्रक्षिप्तता कहिए कि वैदिक हवन में स्त्री नहीं बैठ सकती, घी की आहुति नहीं दे सकती। ठीक है, वह नहीं, पर तांत्रिक हवन में वह करेगी।
तंत्रोक्त अनुष्ठान में आहुति कौन दे सकता है, और पूजा बिल्कुल कौन नहीं कर सकता?
भैरवी स्वरूपा स्त्रियाँ आहुति दे सकती हैं; रजस्वला स्त्री पूजा नहीं कर सकती
तंत्रोक्त पूजा में भैरवी भी करती हैं। सभी स्त्रियाँ भैरवी स्वरूपा हैं, सभी माता तुल्य हैं, और वे आहुति देंगी, घी से नहीं, सामग्री से। पर जो कहे कि रजस्वला स्त्री जाकर पूजा या हवन करे, या नवरात्रि में इससे फ़र्क नहीं पड़ता, वह आपका नाश कर देगा।
वक्ता दोनों ओर रेखा खींचते हैं। तंत्रोक्त पूजा में भैरवी भी करती हैं। सभी स्त्रियाँ भैरवी स्वरूपा हैं, सभी माता तुल्य हैं, सभी देंगी। वे घी से आहुति नहीं देंगी, हम उनसे सामग्री से दिलवाएँगे। इतनी प्रक्षिप्तता मान लीजिए। और वहाँ, वे कहते हैं, आप मना कर देते हैं। आप कहते हैं कि स्त्री को घी की आहुति का निषेध है, स्त्री को तो हवन ही नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं, गलतियाँ दोनों तरफ़ से हैं। अपनी बात मनवाने के लिए आप आधी बात बोलते हैं, और जो मनवाना है सिर्फ़ उसी का प्रमाण देते हैं। जो नहीं मनवाना, उसके लिए कह देते हैं कि शास्त्र प्रक्षिप्त है, समय के साथ बदलाव ज़रूरी है। बदलाव हर जगह ज़रूरी है, पर इतना ही जिससे हमारा भला हो और बुरा न होने लगे। स्त्री की आहुति कहाँ ज़रूरी है? तंत्रोक्त हवन और कर्म में वह कर सकती है। वहाँ वेदोक्त विधि से नहीं हो रहा। पर अगर कोई कहे कि रजस्वला स्त्री जाकर पूजा या हवन करे, तो वह व्यक्ति पूरी तरह दुष्ट है। जो ऐसा कहे, वह आपका नाश करके ही छोड़ेगा। जो कहे कि नवरात्रि में रजस्वला हो गईं तो कोई बात नहीं, जाकर भगवती की पूजा करो, बिल्कुल नहीं।
क्या किसी सवार शक्ति को व्यक्ति को चप्पल से मारकर भगाया जाता है?
चप्पल वाला किस्सा, और यह सार्वजनिक तरीका क्यों नहीं होना चाहिए
वक्ता कहते हैं, नहीं। वे टेलीविज़न की एक जानी-मानी हस्ती का किस्सा सुनाते हैं, जिसने शेखी बघारी कि खुद को काली बताने वाली एक स्त्री पर उसने चप्पल उठाई और सवारी चली गई। मारना एक विधि के रूप में मौजूद है, अपने नियम और तरीके के साथ। पर वक्ता मानते हैं कि इसे इस रूप में सबके सामने नहीं कहना चाहिए।
वक्ता एक बहुत प्रसिद्ध, पुरानी हस्ती का ज़िक्र करते हैं जो टेलीविज़न पर आती है। उनकी बातें वे खुद देखते थे, और वे बहुत अच्छी बातें कहते थे। उन्होंने उनका एक वीडियो देखा, शरीरों पर आने वाली सवारी के बारे में। जो कहा गया, उसका आधा वक्ता मानते हैं। कि ऐसे लोग कुछ हद तक मानसिक रूप से परेशान और मन से कमज़ोर होते हैं। और जिन स्त्रियों का परिवार में कोई स्थान नहीं, जो दबी रहती हैं, वे इन चीज़ों का सहारा लेकर नाटक करती हैं। वे कहते हैं, यह पहलू भी है, वे इसे मानते हैं। उन्हें आपत्ति दूसरे आधे पर है। कि ऐसी कोई चीज़ होती ही नहीं, क्योंकि ऐसी शक्तियाँ आ ही नहीं सकतीं। और इसे साबित करने का किस्सा: एक स्त्री को लाया गया, उस पर माता आने लगीं, वह कहने लगी मैं काली हूँ। मैंने तुरंत चप्पल उतारी, तुम्हें दिखाता हूँ कि तुम काली हो। चप्पल देखते ही उनकी काली जी चली गईं। लोग उस पर ज़ोर से हँसे। वक्ता कहते हैं, बस इतना याद रखिए। उन गुरु जी का क्या होता है, इससे आपको कोई फ़र्क नहीं पड़ता। पर अगर शरीर पर कोई प्रेत या पिशाच भी खेल रहा है, कोई नकारात्मक शक्ति आ रही है, तो उसकी अपनी कोई मजबूरी है। वह चार में बँधा हो सकता है, अपनी गति नहीं ले पा रहा। या वह आपके साथ बँध चुका है, चाहे शरीर को भोग रहा हो या आपके माध्यम से अपने भोग भोग रहा हो। किसी को चप्पल से मारकर नहीं भगाना चाहिए। और अगर आप कहें कि तंत्रोक्त विधियों में इसकी अनुमति है, तो वे कहते हैं, हाँ, ऐसे विधान हैं, चप्पल से मारकर भगाना आदि। यह एक विधान है, उसका नियम और तरीका है। ऐसी बातें समाज में हर जगह कोई नहीं कहता। आप हर जगह कहेंगे, और आपको यह विषय पता भी नहीं। आप कह रहे हैं कि ऐसी कोई चीज़ होती ही नहीं।
असल में शरीर पर क्या आता है?
स्वयं देवी नहीं, बल्कि योगिनी या अंश रूप शक्ति
स्वयं काली जी या दुर्गा जी नहीं। सब जानते हैं कि वे किसी पर नहीं आ सकतीं और नहीं आएँगी। ये योगिनी शक्तियाँ हैं, अंश रूप में पूर्ण। अगर वे पूरे रूप में आएँ, तो कोई साधारण व्यक्ति उनका तेज़ सह नहीं सकता, शरीर जलने लगेगा। और जिसने उसे सहा, उसके परिवार का नाश निश्चित है।
वक्ता श्रेणी को ठीक करते हैं। मान लीजिए किसी भूल से उस घर की कुल शक्ति का एक अंश किसी के शरीर पर है। आज के समय में सब जानते हैं कि स्वयं काली जी या दुर्गा जी किसी पर नहीं आ सकतीं और नहीं आएँगी। ये योगिनी शक्तियाँ हैं, अंश रूप में पूर्ण। पर अगर वे पूरे रूप में आएँ, तो कोई साधारण व्यक्ति उनका तेज़ सह नहीं सकता। शरीर जलता है, व्यक्ति यही कहता है। अगर ब्रह्म आएगा, तो पेट में जलन होगी। अगर अवायात्मक या पैशाचिक शक्ति है, तो बहुत ज़्यादा खेलेगी, बहुत ज़्यादा। और देव शक्तियों में भी अगर कोई वायात्मक शक्ति है, उपदेवता श्रेणी से ऊपर की शक्ति, दूसरे लोक में विचरने की सामर्थ्य वाली योगिनी, तो वह जब शरीर पर आएगी, तो शरीर इतना घूमेगा, इतना झूमेगा कि व्यक्ति की हालत बहुत खराब हो जाएगी। वे कहते हैं, ये चीज़ें एक के बाद एक होती हैं। और अगर ऐसी शक्ति शरीर पर है और आप उसे चप्पल से मार रहे हैं, थप्पड़ मार रहे हैं या गालियाँ दे रहे हैं, तो आपको यह भी नहीं पता कि उस पर क्या है और क्या नहीं। आपका क्या होगा, छोड़िए। पर जिसके शरीर पर वह थी, उसके परिवार का नाश निश्चित है। वे यह भी मानते हैं कि आज के समय में ज़्यादातर धोखा चल रहा है। पर आपको उस धोखे की जानकारी होनी चाहिए। सच और झूठ में फ़र्क करना सीखिए।
सवारी के मामले में दूर से कुछ करना उचित नहीं, खासकर लड़की के शरीर पर; परिवार ऐसा व्यक्ति ढूँढे जिसके पास वे रह सकें।
वे सवारी के मामले में दूर से कुछ क्यों नहीं करते
वे मना कर देते हैं। हर दो महीने में ऐसे चार-पाँच मामले उनके पास आते हैं। उनका उत्तर है कि इन चीज़ों में दूर से दखल देना उचित नहीं। खासकर लड़की के शरीर पर, जहाँ कुछ करने से परेशानी होगी। वे कहते हैं, सामने कोई ऐसा व्यक्ति ढूँढिए जिसके पास आप रह सकें।
वक्ता बताते हैं कि अपने पास आने वाले मामलों को वे कैसे संभालते हैं। लोग वीडियो भेजते हैं। कोई लड़की खेल रही है, सिर पर कोई शक्ति ज़ोर से खेल रही है। दो महीने में चार-पाँच बार ऐसा होता है। भेजने वाले बिल्कुल नए होते हैं, इन चीज़ों की ज़्यादा जानकारी नहीं होती। उन्होंने कोई वीडियो देखा, या किसी ने रेफ़रेंस दिया। उनका उत्तर बस यहीं तक जाता है कि इन बातों में दूर से दखल देना उचित नहीं। खासकर लड़की के शरीर पर बात ऐसी है कि कुछ किया तो दिक्कत होगी। सामने कोई व्यक्ति ढूँढिए, जिसके पास आप रह सकें, वहाँ कुछ होना ठीक रहेगा। दूर से करने पर न पूरी जानकारी होगी, न पूरी बातचीत। इसलिए वे छोड़ देते हैं और कुछ नहीं करते। किसी को परेशान क्यों करना। इसकी तुलना वे उस सलाह से करते हैं जो इसकी जगह दी जाती है। कि यह नाटक कर रहा है, दो थप्पड़ मारो, तुरंत ठीक हो जाएगा, हम भूत भगाते हैं। पहले डॉक्टर के पास ले जाओ, इसे फलाँ समस्या है। वे कहते हैं, समस्या यहीं आएगी। एक के साथ हुआ, दो के साथ होगा, चार के साथ होगा। जो सच में इन चीज़ों से पीड़ित हैं, वे और भटकाए जाते हैं और गड्ढे में उतार दिए जाते हैं। और सौ सुनने वालों के सामने यह विषय रखने का उनका मतलब यह नहीं कि सबका अपमान हो, न यह कि ऐसे हर व्यक्ति का सम्मान हो। परखना सीखिए। क्या सही है और क्या गलत, आपको साफ़ हो जाएगा।
व्यक्ति के पीछे चलने के बजाय सिद्धांत पर चलने का क्या अर्थ है?
व्यक्तिवादी नहीं, सिद्धांतवादी बनिए
कि आप सिद्धांत और शास्त्र के प्रमाण पर चलें, किसी व्यक्ति के पीछे नहीं। किसी की लोकप्रियता के कारण अंधे होकर उसके पीछे भागना, सच और झूठ में फ़र्क न कर पाना, आपको कहीं का नहीं छोड़ेगा। विरोध कीजिए, अपने भीतर बदलाव लाइए, और सही रास्ते पर चलने की कोशिश कीजिए। पर विरोध सही ढंग से कीजिए।
वक्ता वह बात दोहराते हैं जो वे अक्सर कहते हैं: व्यक्तिवादी मत बनिए, सिद्धांतवादी बनिए। वे कहते हैं, शास्त्र के प्रमाण से आइए। भारत में कोई इतना मूर्ख नहीं कि समझ न सके कि क्या सही है और क्या गलत। उनके अनुसार चूक यह है कि आप सच और झूठ में फ़र्क नहीं कर पाते। किसी व्यक्ति के पीछे अंधे होकर चलने की कोशिश में आप उसके पीछे भागते हैं। यह व्यक्तिवाद आपको कहीं का नहीं छोड़ेगा। सिद्धांतवादी बनिए। चीज़ों का विरोध कीजिए, और अपने भीतर बदलाव लाकर सही रास्ते पर चलने की कोशिश कीजिए। वे खुद को भी अलग नहीं रखते। वे कहते हैं, हम कभी नहीं कहते कि हम जो बताते हैं उसका विरोध नहीं होता। पर विरोध का तरीका गलत होगा। लोग ऐसी बातें कहते हैं कि उत्तर देने का मन ही नहीं करता। ठीक से बोलिए, कहिए कि यह बात मुझे ठीक नहीं लगी, तो हम उत्तर देंगे। टेढ़ा बोलिए, तो हम आपसे ज़्यादा टेढ़ा बोलेंगे।
प्रभाव के साथ कौन-सी ज़िम्मेदारी आती है?
प्रभाव देने वाले के पास ही लौटता है
कि समाज वही अपनाएगा जो आप में देखेगा। वक्ता कहते हैं, अगर आपका आचरण, विवेक और समाज में रहने का ढंग सनातन का भला करे, तभी आपकी तपस्या का फल देना सही है। गलत ढंग से दिया गया प्रभाव आप पर ही लौटता है, आपकी अपनी बुद्धि भ्रष्ट करता है, और ज़्यादा दिन नहीं चलता।
वक्ता लोगों को भगवान दत्त का अवतार कहे जाने के चलन को उठाते हैं। ठीक है, वे कहते हैं, हम-आप सब परमेश्वर के अंश हैं। जैसे-जैसे हम अपना तपोबल बढ़ाते हैं, पुण्य बढ़ने से भगवान की कृपा से हमारे पास ऐसी ऊर्जाएँ बनती हैं। पर उचित यही है कि आपकी तपस्या और आपके विचार तभी फल दें, जब आपके आचरण, विचार, व्यवहार, अच्छे कामों, कर्मकांड, ज्ञान-विवेक और समाज में रहने के ढंग से सनातन का भला हो। आपको देखकर समाज को कुछ अपनाना है। वे कहते हैं, अगर आप बहुत बड़े इन्फ़्लुएंसर बन गए हैं और समाज पर असर डाल रहे हैं, तो एक जानी-मानी हस्ती का मामला देखिए। वही जिसकी अब सब चर्चा कर रहे हैं, एक स्पूफ़ के वायरल होने और उसके बाद के विवाद के कारण। जिसने खुद कभी एक एंटरटेनर को समाज पर बुरा असर डालने के लिए गालियाँ दी थीं। और देखिए अब उसकी अपनी हालत क्या हो गई है। गलत ढंग से प्रभाव देंगे, तो वह लौटकर आप पर ही गिरेगा, और आपकी अपनी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी। गलत तरह का प्रभाव ज़्यादा दिन नहीं चलेगा। अगर आप दूसरे मज़हब वालों की भाषा बोल रहे हैं और लोग आपके पीछे चलना चाहते हैं, तो आपके साथ उन सबका भी नुकसान होगा।
कुछ गुरुओं के पीछे लोग चलते हैं और कुछ के पीछे नहीं, ऐसा क्यों?
आप उसी के पीछे चलते हैं जो कुछ भी करने की छूट दे
क्योंकि वे छूट देते हैं। वक्ता पूछते हैं कि तलंग स्वामी, देवराहा बाबा या तुलसी बाबा के पीछे कोई क्यों नहीं चलता। क्योंकि उनकी कठिन उपासना, उनका योग अभ्यास, उनकी कठिन भक्ति कोई नहीं कर सकता। इसकी जगह उसके पीछे चला जाता है जो कहे कि एकादशी पर खाओ, ब्रह्मचर्य ज़रूरी नहीं, माला ज़रूरी नहीं।
वक्ता सवाल को चुनौती की तरह रखते हैं। आप जाकर तलंग स्वामी को क्यों नहीं फ़ॉलो करते? उन्हें फ़ॉलो करने से क्यों डरते हैं? क्योंकि उनके जैसी कठिन उपासना आप नहीं कर पाएँगे। आप देवराहा बाबा को क्यों नहीं फ़ॉलो करते? क्योंकि उनके जैसा योग अभ्यास आप नहीं कर पाएँगे। आप तुलसी बाबा को क्यों नहीं फ़ॉलो करते? क्योंकि उनके जैसी कठिन भक्ति आपसे नहीं होगी। तो आप किसके पीछे चलते हैं? आप उनके पीछे चलते हैं जो आपको मनगढ़ंत ढंग से कुछ भी करने की छूट देते हैं। जो कहते हैं: एकादशी पर खाओ-पियो और मस्त रहो, सेवा करो, कोई दिक्कत नहीं। आप उनके पीछे चलना चाहते हैं जो कहते हैं कि चालीस दिन की साधना में ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। रखना ज़रूरी नहीं। आप उनके पीछे चलते हैं जो कहते हैं कि माला से मंत्र जपने की ज़रूरत नहीं। वे कहते हैं, आप मनगढ़ंत उपासनाएँ करना चाहते हैं, मनगढ़ंत रास्ते पर चलना चाहते हैं। फिर जब कुछ नहीं होता, या दो, चार, पाँच साल बाद बिगड़ता है, तो आप हम जैसे लोगों पर आरोप लगाने आते हैं, जो कहते हैं सिद्धांत पर चलो। तब आप कहते हैं, चोर, पाखंडी, कहाँ कुछ हुआ, हमने पाँच साल किया। वे उत्तर देते हैं: ठीक से देखिए कि आपने किसे फ़ॉलो किया।
क्या गीता पाने के बाद अर्जुन ने कोई पंथ बनाया?
अर्जुन ने मिले उपदेश पर अपना पंथ नहीं बनाया
नहीं। वक्ता का तर्क: कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता दी, उनसे अनुष्ठान करवाए, उन्हें सिद्धि और विजय दी। फिर अर्जुन ने अपना धर्म घोषित नहीं किया, न लोगों से कहा कि मेरे पीछे चलो क्योंकि मैं भगवान का सखा हूँ। वे कहते हैं, यही फ़र्क समझना है।
वक्ता यह तर्क उस बात से बनाते हैं जो वे दो दिन पहले गीता जयंती पर पढ़ रहे थे। कि भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में पैंतालीस मिनट में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। तो, वे पूछते हैं, क्या अर्जुन ने युद्ध जीतने के बाद अपना एक धर्म बना लिया? क्या लोगों से कहने लगे कि कृष्ण जी ने हमें उपदेश दिया है, तो हमें फ़ॉलो करो, वे भगवान हैं और हम भगवान के सखा हैं? वे बताते हैं कि अर्जुन को सखा कहा जाता था। श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश छोड़िए, महाभारत देखिए, तो उन्हें सखा कहा गया है, पुत्र या बेटा नहीं। वे इसे एक चलन पर लागू करते हैं, जो उनके अनुसार सुनने वालों ने देखा होगा, और इसी कारण वे खुलकर बोल रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि कृष्ण जी ने उन्हें उपदेश दिया और योग का मार्ग सिखाया। वे पूछते हैं, यह कैसी बात है कि जिन्होंने हमें योग या तंत्र विद्या सिखाई, उन्हीं से उपदेश लें, और फिर अपने धर्म में जाकर उन्हीं के लोगों को बदलें और कहें कि हमें मानो। अर्जुन ने ऐसा नहीं किया। कृष्ण ने उन्हें योग मार्ग का उपदेश दिया, इतने अनुष्ठान करवाए, उन्हें इतनी सिद्धि मिली, युद्ध में विजय दी गई। अर्जुन ने ऐसा नहीं किया।
वेब सीरीज़ के लिए तय घंटा निभ जाता है, पर जप के लिए क्यों नहीं?
मनोरंजन के लिए चालीस दिन हैं, पर चार माला के लिए नहीं
वक्ता का कहना है कि सामर्थ्य है, बस कहीं और खर्च होती है। एपिसोड और रियलिटी शो के लिए आप चालीस या सौ दिन एक तय समय पर बैठ सकते हैं। एक सीरीज़ के आखिरी भाग के लिए कंपनियों ने छुट्टी दी। पर जिस आत्म-उन्नति के लिए आप जन्मे हैं, उसके लिए चालीस माला, या चार भी, आपके बस में नहीं।
वक्ता डिप्रेशन वाले तर्क को नहीं मानते। साधना और अनुष्ठान करना बिल्कुल ज़रूरी है, विधि से चलना बिल्कुल ज़रूरी है। नियम से करने पर डिप्रेशन में नहीं जाना चाहिए। वे कहते हैं, इसका कारण यह है कि कुछ भी अभ्यास करने की आपकी सामर्थ्य पहले ही खत्म कर दी गई है। और दूसरे मज़हब वाले चाहते हैं कि आपका अभ्यास कभी बने ही नहीं। उनका उदाहरण तय घंटे का है। चालीस दिन आप एक समय पर बैठकर किसी भी तरह के एपिसोड देख सकते हैं, बिग बॉस, स्प्लिट विला, और जो भी आ रहा है। बिल्कुल तय समय पर। वे नकाबपोश लुटेरों वाली एक वेब सीरीज़ याद करते हैं जो इंटरनेट पर खूब चली। जब उसका आखिरी सीज़न आया, तो कॉर्पोरेट और आईटी कंपनियों ने लोगों को देखने के लिए दो दिन की वीकेंड छुट्टी दी। ऐसा क्रेज़ है। तो अपने मनोरंजन के लिए आप चालीस दिन, या सौ दिन भी, एक तय समय पर बैठकर लगातार देख सकते हैं। पर अपनी उन्नति के लिए, जिसके लिए आप जन्मे हैं, आपमें इतनी बुद्धि नहीं कि बैठकर चालीस माला जप पूरा करें, या चार। और अगर कोई करने को कहे, तो वह पाखंडी है, आपसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं, भगवान भाव से प्रसन्न होते हैं, माला से नहीं। वे कहते हैं, जो यह आपके दिमाग में डाल रहा है, वह कभी आपकी उन्नति नहीं चाहता।
साधना गुप्त रखें, पर असल में किससे?
विरोधियों से गुप्त, अपनों में जिन्हें ज़रूरत है उनमें फैलाएँ
अपनी साधना और उपासना गुप्त रखिए, पर लोगों में जागरूकता ज़रूर फैलाइए। ज़बरदस्ती नहीं। जो आपको प्रिय हैं, जो आपको मानते हैं, जिन्हें ज़रूरत है या जो किसी संकट में हैं, उनमें। वे कहते हैं, लोग इतने गुप्त हो जाते हैं कि अपने ही परिवार के ज़रूरतमंद सदस्यों को भी नहीं बताते।
वक्ता ज़रूरत से ज़्यादा सुधार को ठीक करते हैं। वे कहते हैं, अपनी साधना और उपासना गुप्त रखिए, पर लोगों में जागरूकता ज़रूर फैलाइए। और वहाँ भी ज़बरदस्ती मत कीजिए। उनसे करवाइए जो आपको प्रिय हैं, जो आपको मानते हैं, या जिन्हें ज़रूरत है और जो किसी संकट में हैं। वे पूछते हैं, यहाँ गुप्त रखने का क्या अर्थ है? लोग ऐसे और इतने गुप्त हो जाते हैं कि अपने ही परिवार के ज़रूरतमंद सदस्यों को भी नहीं बताते। अगर किसी को ज़रूरत है, तो आप स्त्री हैं तो मायके में करवाइए। पुरुष हैं तो ससुराल में करवाइए। दामाद हैं तो कहिए कि यह करना पड़ेगा, नहीं तो आपकी बेटी अब मायके नहीं आएगी। साम, दाम, दंड, भेद से, किसी भी तरह। वे कहते हैं, ठीक उसी तरह जैसे दूसरे मज़हब वाले साम, दाम, दंड, भेद लगाकर सनातन का नुकसान कर रहे हैं।
माला जप और हवन को दिखावा कहने के पीछे क्या उद्देश्य है?
मानसिकता तोड़ना ताकि घर की ऊर्जाओं को पोषण मिलना बंद हो
घर को उसकी अपनी ऊर्जाओं से काट देना। उनका कहना है: जैसे ही आप उस प्रभाव में टूटते हैं, आपके घर की शक्तियाँ, आपके घर की ऊर्जाएँ, आपके कुल देवता और आपके क्षेत्र रक्षक को ये ऊर्जाएँ मिलना बंद हो जाती हैं। और तब आपका सुरक्षा कवच टूट जाता है।
वक्ता बताते हैं कि उनके अनुसार यह अभियान किसलिए है। इच्छा यह है कि हमारी संस्कृति में जो ऊर्जाएँ अभी ज़मीन पर खड़ी हैं, उन्हें किसी तरह सोखकर हटा दिया जाए। एक जगह बलि रुकवाओ, दूसरी जगह यह रुकवाओ। और जब आप इन सब चीज़ों से दूर हो जाएँ, तो उन्हें गलत कहना शुरू करो। कि माला जप पाखंडियों का काम है, कि यह धोखा है, कि हवन करना धोखा है और उससे कुछ नहीं होता। वे कहते हैं, ये लोग किसी भी तरह आपकी मानसिकता तोड़ते हैं। और जैसे ही आप उनके प्रभाव में आकर टूटते हैं, आपके घर की शक्तियाँ, आपके घर की ऊर्जाएँ, आपकी अपनी कुलदेवी और कुल देवता, आपके क्षेत्रपाल, सबको ये ऊर्जाएँ मिलना बंद हो जाएँगी। और तब आपका सुरक्षा कवच टूटेगा, संरक्षण टूटेगा। प्रमाण के लिए वे सुनने वाले को श्रीमद् भगवद्गीता की ओर भेजते हैं, दूसरे अध्याय के अंत से तीसरे अध्याय तक। वे कहते हैं, वहाँ आपको लिखा मिलेगा कि भगवान कृष्ण कहते हैं: मनुष्यों की रक्षा का दायित्व देवताओं पर है। मनुष्य यज्ञ करें, देवताओं की पूजा करें, उन्हें तृप्त करें और पोषित करें। और देवता पोषित होकर मनुष्यों की रक्षा करें, उनका संरक्षण करें और उनकी इच्छाएँ पूरी करें।
क्या खरमास में तीर्थ यात्रा की जा सकती है?
खरमास में तीर्थ यात्रा की अनुमति है
हाँ। खरमास में वृंदावन जैसे तीर्थ स्थलों पर ज़रूर जा सकते हैं, इसमें कोई दिक्कत नहीं। इसी बातचीत में, संकट नाशन गणेश स्तोत्र का अनुष्ठान किसी चतुर्थी से शुरू किया जा सकता है।
प्रश्नोत्तर की शुरुआत दो छोटे उत्तरों से होती है। जो संकट नाशन स्तोत्र करना चाहता है, उसे चतुर्थी से शुरू करने को कहा जाता है। खरमास पर: खरमास में वृंदावन जैसे तीर्थ स्थलों पर बिल्कुल जा सकते हैं। खरमास में तीर्थ दर्शन ज़रूर कीजिए, उसमें कोई दिक्कत नहीं।
क्या दत्तात्रेय के पीछे गाय की दिशा से स्वरूप में भेद होता है?
दत्तात्रेय के पीछे की गाय स्वरूप भेद नहीं है
वक्ता ने ऐसा कोई स्वरूप भेद न सुना है, न देखा है। उन्होंने जो चित्र इस्तेमाल किए, वे बस एडिट करके लगाए गए थे। भगवान दत्त के बारे में मुख्य परंपरा में गाय का मुख दाहिनी ओर रहता है, जैसे हर जगह आम तौर पर उनकी पूजा होती है। बेहतर है कि इसमें न पड़ें।
एक श्रोता पूछते हैं कि एक वीडियो में भगवान दत्त के पीछे की गाय एक ओर मुँह किए है और दूसरे में दूसरी ओर। वे इस स्वरूप भेद को समझाने का अनुरोध करते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि उन्होंने ऐसा कोई स्वरूप भेद न सुना है, न देखा है। वीडियो में जो चित्र लगे, वे बस जो मिला वही लगा दिया गया, फ़्रेम में एडिट करके। उन्हें इसमें कुछ खास नहीं लगा। फिर भी, भगवान दत्त के बारे में मुख्य बात यह है कि गाय का मुख दाहिनी ओर रहता है, जैसे हर जगह आम तौर पर उनकी पूजा होती है। इसमें भेद के रूप में कुछ खास नहीं है। वे कहते हैं, बेहतर है कि इसमें न पड़ें। ऐसी चीज़ मिलेगी भी नहीं, और ऐसा श्री विग्रह नगण्य है।
क्या दत्तात्रेय कवच भोजपत्र पर लिखकर धारण किया जा सकता है?
लिखकर धारण करने से पहले कवच सिद्ध होना चाहिए
पहले आपका कवच सिद्ध होना चाहिए। सिद्धि के बिना उसे लिखने का कोई लाभ नहीं। वक्ता यह भी कहते हैं कि बिना देखे वे नहीं बता सकते कि वह कौन-सा दत्तात्रेय कवच है, इसलिए प्राण प्रतिष्ठा का उत्तर हवा में नहीं दिया जा सकता।
एक श्रोता पूछते हैं कि भोजपत्रभोजपत्र, अनार की टहनी की कलम व लाल चंदन की स्याही से मंत्र या नाम लिखने हेतु प्रयुक्त — जैसे शिवलिंग के अर्घे पर नाम रखकर मधु-अभिषेक करने में। पर लिखकर पहने गए दत्तात्रेय कवच की प्राण प्रतिष्ठा कैसे करें। वक्ता का उत्तर शर्त के साथ है। अगर आप ऐसा करना चाहते हैं, तो पहले आपका कवच सिद्ध होना चाहिए। सिद्धि के बिना उसे लिखने का कोई लाभ नहीं। और वह भगवान दत्तात्रेय का कौन-सा कवच है, यह बिना देखे बताना संभव नहीं, वे कहते हैं।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर क्या करना चाहिए, और बच्चों को इसमें कैसे जोड़ें?
मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर दीपदान और गुरुवार की दत्त पूजा
मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर दीपदान को बहुत ज़रूरी बताया गया है। और गुरुवार की गाँठ बाँध लीजिए: उस दिन घर पर भगवान दत्तात्रेय का माला मंत्र पढ़िए, हो सके तो सत्ताईस बार। इसमें अधिकार का कोई प्रश्न नहीं। बच्चों को बचपन से दत्त को गुरु रूप में जानने दीजिए।
वक्ता आने वाली पूर्णिमा और हर हफ़्ते के अभ्यास के लिए कुछ निर्देश देते हैं। मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर दीपदान ज़रूर करवाइए। यह बहुत ज़रूरी है। और गुरुवार की गाँठ बाँध लीजिए, वे कहते हैं। अगर गुरुवार को भगवान दत्तात्रेय की पूजा करनी है, तो करनी है। उनका माला मंत्र पढ़िए। इसमें कौन अधिकारी है और कौन नहीं, यह प्रश्न ही नहीं। उस दिन घर पर भगवान दत्तात्रेय के माला मंत्र का पाठ कीजिए, हो सके तो सत्ताईस बार। दीक्षा विधान न भी किया हो, तो भी घर के बच्चों का परिचय भगवान दत्त से कराइए। उन सबसे बचपन से गुरु रूप में उनकी पूजा करवाइए। गुरुवार को भगवान दत्त की, या भगवान बृहस्पति या नारायण की पूजा हो, और किसी दूसरे मज़हब की नहीं। वे कहते हैं, यह अभी डाल दीजिए, नहीं तो बाद में बच्चे नहीं सुनेंगे, और समाज में जाकर बेतुके काम करेंगे।
अगर भगवती के सभी मंत्रों के लिए एक ही माला रखनी हो, तो कौन-सी रखें?
भगवती के सभी मंत्रों के लिए एक माला: नौमुखी भैरवी रुद्राक्ष
भैरवी माला, यानी भैरवी रुद्राक्ष का प्रयोग कीजिए। इसके लिए नौमुखी भैरवी रुद्राक्ष सबसे अच्छा रहेगा। इसी हिस्से में वक्ता यह भी बताते हैं कि दत्तात्रेय जयंती पर शिव जी का पंचाक्षरी पढ़ा जा सकता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि अगर भगवती के सभी मंत्रों का जप एक ही माला से करना हो, तो कौन-सी माला रखें। वक्ता उत्तर देते हैं कि तब भैरवी माला, भैरवी रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । का प्रयोग कीजिए। नौमुखी भैरवी रुद्राक्ष सबसे अच्छा रहेगा। इससे ठीक पहले वे यह भी उत्तर देते हैं कि दत्तात्रेय जयंती पर शिव पंचाक्षरी मंत्र ज़रूर पढ़ा जा सकता है।
शास्त्र क्या कहता है
A nine-mukhi rudraksha is the traditionally correct bead for reciting the Devi/Bhagavati mantras generally.
Verse 74 gives the nine-faced rudraksha's presiding deities as Bhairava/Kapila or Durga-as-Maheshvari-of-nine-forms. The text never says "Bhairavi," nor calls it the mala for all Bhagavati mantras — that framing is the speaker's own.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
भैरवो नववक्त्रश्च कपिलश्च मुनिः स्मृतः। दुर्गा वा तदधिष्ठात्री नवरूपा महेश्वरी॥ ७४
नौ मुखवाला रुद्राक्ष भैरव और कपिल मुनि माना गया है। अथवा नौ रूपोंवाली महेश्वरी दुर्गा उसकी अधिष्ठात्री हैं।
जप के बीच मंत्र भूल जाने का क्या अर्थ है?
माला के बीच मंत्र भूलना सामान्य बात है
कुछ नहीं। यह सामान्य बात है और सोचने का विषय नहीं। मंत्र लंबा हो तो थोड़ा भूल जाते हैं। वैदिक मंत्रों के पाठ करने वाले भी भूलते हैं, ऐसा अक्सर होता है। इससे परेशान होने की ज़रूरत नहीं। न ही हाथ से लौंग-कपूर गिरने से।
एक श्रोता बताते हैं कि महाभैरव मंत्र के जप में तीसरी माला में वे मंत्र भूल गए और बहुत कोशिश करने पर भी याद नहीं आया। और जलता कपूर और लौंग उनके हाथ से गिर गए। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह सामान्य बात है और इसमें सोचने को कुछ नहीं। ऐसा क्यों हुआ, यह कोई विषय नहीं। बहुत बार होता है कि मंत्र लंबा हो तो थोड़ा भूल जाते हैं। वैदिक मंत्रों के पाठ करने वाले भी भूलते हैं, ऐसा कई बार होता है। इसलिए इससे परेशान नहीं होना है। इसी हिस्से में वे जोड़ते हैं कि दत्त माला मंत्र का मानसिक जप ज़रूर किया जा सकता है, पर चलते-फिरते नहीं।
क्या दीपदान के लिए पीतल का दीया और थाली, और बीच से कटा नारियल इस्तेमाल हो सकता है?
पीतल का दीया और थाली चलेगी, और बीच से कटा नारियल भी
तीनों के लिए हाँ। मिट्टी के दीये की जगह पीतल का दीया, दोने की जगह पीतल की थाली, और पहले से बीच से कटा नारियल चलेगा। वक्ता बताते हैं कि उनके अपने नारियल कुल भैरव और भगवान दत्त के लिए कुछ छोटे कटे थे। वे साफ़ कटाई की कोशिश करने की सलाह देते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या मिट्टी के दीये की जगह पीतल का दीया, दो दोनों की जगह पीतल की थाली इस्तेमाल हो सकती है। और क्या ऐसा नारियल चल सकता है जो सिर्फ़ बीच से कटा मिलता हो। वक्ता उत्तर देते हैं कि पीतल का दीया बिल्कुल इस्तेमाल हो सकता है, और पीतल की थाली भी। बीच से कटा मिला नारियल भी चलेगा। वे अपने अभ्यास से एक बात जोड़ते हैं। उन्होंने जो नारियल काटे, उनमें भैरव जी, यानी कुल भैरव, के लिए और भगवान दत्त के लिए, दोनों आकार में थोड़े छोटे कटे। थोड़ी कोशिश कीजिए कि बीच से कटे, तो साफ़ कटेगा। नहीं तो, उनके अपने अलग तरह से आड़े कटे थे, पहले से बीच से कटा हुआ भी उतना ही चलेगा, और उसमें भी दीया जलाया जा सकता है।
क्या बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनाम के लिए न्यास करना चाहिए?
केवल विनियोग, न्यास 1100 पूरे होने के बाद
शुरू में केवल विनियोग करें। पूरा विधान पूर्व पीठिका में दिया है, पर न्यास 1100 पूरे करने के बाद ही करें। वक्ता यह भी कहते हैं कि न्यास हर किसी के लिए ज़रूरी नहीं है।
भगवान बटुक भैरव के अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। का विनियोग और न्यास बताने को कहा गया। वक्ता बताते हैं कि पूरा विधान पहले से मौजूद है: पूर्व पीठिका में सब कुछ दिया हुआ है। पर इसे केवल विनियोग के साथ करें। न्यास आदि 1100 पूरे करने के बाद ही करें। वक्ता कहते हैं कि न्यास हर किसी के लिए ज़रूरी नहीं है। इसी दौरान वे यह भी कहते हैं कि रोज़ की आरती ज़रूर करनी चाहिए।
क्या गांजा पीना भोलेनाथ का प्रसाद कहकर सही ठहराया जा सकता है?
शरीर तपाने वाला योगी और केवल गांजा पीने वाला व्यक्ति
वक्ता योगी की बात मानते हैं, आपकी नहीं। अगर कोई योगी गांजा पीता है और सच में योग साधना करता है, तो ठीक है — वह अपना शरीर तपा रहा है, आप नहीं जानते वह उसमें कौन सी जड़ी-बूटी डालता है, और उसकी साधना वामाचार की है। आपकी नहीं। आप इसे अपनी इच्छाओं का साधन बनाकर प्रसाद कह रहे हैं।
एक श्रोता लिखते हैं कि वे गांजा पीते हैं, भोले बाबा के भक्त हैं और उनका प्रसाद लेते हैं। वक्ता पहले सामान्य सिद्धांत मानते हैं — कौन सी चीज़ कहाँ और किसके लिए ज़रूरी है; इसीलिए कहा गया है कि ऐसी सब चीज़ें सीमित होनी चाहिए। आप गांजा पीते हैं, ठीक है। फिर वे दोनों बातें अलग करते हैं। अगर कोई योगी पी रहा है और योग साधना कर रहा है, और आप कहते हैं कि महादेव के भक्त पीते हैं, महादेव पीते हैं — ठीक है, मान लिया। अब बताइए, क्या आप उस योगी जैसे हैं जो पीकर योग करता है, जो सच में योग करता है, पीकर ध्यान में बैठता है? ठीक है। आप क्या कर रहे हैं? आप केवल पी रहे हैं। वह तप में अपना शरीर तपा रहा है; वह उसमें कौन सी जड़ी-बूटी डाल रहा है, आप नहीं जानते। उसकी साधना वामाचार की है; आपकी साधना वामाचारी साधना नहीं है। वह इन चीज़ों को साधना की क्रियाओं के लिए उपयोग कर रहा है। आप इन चीज़ों को अपनी इच्छाएँ पूरी करने का साधन बना रहे हैं और कहते हैं कि यह भोले बाबा का प्रसाद है।
कुश का आसन कैसे बनता है, और कुश कब लाना चाहिए?
कुश भादों की कुशोत्पाटिनी अमावस्या को निकाला जाता है
कुश का बना-बनाया आसन मिलता है — वही उपयोग करें। कुश स्वयं कुशोत्पाटिनी अमावस्या, यानी भादों अमावस्या के दिन निकाला जाता है। अगर आपसे इतना विधान हो सके तो वह भी करें; और इसमें विवाहित और अविवाहित के लिए अलग नियम भी है।
एक श्रोता पूछते हैं कि कुश आसन कैसे बनाएँ और कुश कब लाना होता है। वक्ता कहते हैं कि कुश का बना-बनाया आसन मिल जाता है, वही उपयोग करें। कुश लाने के बारे में: कुश कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन, यानी भादों की अमावस्या को निकाला जाता है। अगर आपसे इतना विधान हो सके, तो वह भी करें। वे यह भी जोड़ते हैं कि इसमें विवाहित और अविवाहित को लेकर एक नियम भी है।
क्या दत्तात्रेय के चित्र या मूर्ति के बिना दीपदान हो सकता है?
बिना चित्र के दीपदान, और अभी मूर्ति क्यों न लाएँ
हाँ — करें, चित्र या मूर्ति न होने में कोई दिक्कत नहीं है। और अभी कोई चित्र न लाएँ। जब ठीक से साधना करके उनके प्रति आपका भाव बन जाए, तब उन्हें स्थान दें। अभी केवल दीपदान करें। जल्दबाज़ी न करें।
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्होंने भगवान दत्त का दीक्षा विधान या जप नहीं किया है, पर वक्ता ने जो दीपदान बताया है वह करना चाहते हैं। वक्ता कहते हैं कि ज़रूर करें। न चित्र है, न मूर्ति — कोई दिक्कत नहीं। जिसके पास भगवान दत्तात्रेय का चित्र नहीं है और रखने की जगह भी नहीं है, उसे यह करने से पहले भगवान दत्तात्रेय का श्री विग्रह या चित्र लाने की कोई ज़रूरत नहीं है। वक्ता कहते हैं, अभी मत लाइए। जब विधि से उनकी साधना हो जाए और उनके प्रति आपका भाव बन जाए — वे महाशक्तियों में से एक हैं — तब उन्हें उनका स्थान दें। अभी केवल दीपदान करें। जल्दबाज़ी न करें। इससे ठीक पहले वे एक और श्रोता से, जो कहते हैं कि उन्हें फल नहीं मिलता और कमी शायद उन्हीं में है, कहते हैं: हाँ, ठीक यही करें — आत्म-विश्लेषण करें और विधि को देखें।
क्या दतिया पीठ से दीक्षित व्यक्ति के लिए दत्तात्रेय साधना मना है?
दूसरी जगह दीक्षा के बाद भी दत्त साधना मना नहीं
नहीं, भगवान दत्त की साधना पर कोई रोक नहीं है; वह ज़रूर की जा सकती है। पर यंत्र आदि के बारे में वक्ता प्रश्नकर्ता को वापस भेजते हैं: आप दतिया पीठ से दीक्षित हैं, तो पूरा विधान अपने गुरु से पूछें — किस तरफ़ से, क्या बनाना है, कैसे करना है।
दतिया पीठ से दीक्षित एक श्रोता पूछते हैं कि क्या दत्तात्रेय साधना की अनुमति है। वक्ता कहते हैं कि अगर आप दतिया पीठ से दीक्षित हैं, तो दत्तात्रेय साधना आदि पर कोई रोक नहीं है। भगवान दत्त की साधना पर कोई रोक नहीं है; आप बिल्कुल कर सकते हैं। पर यंत्र और उससे जुड़ी बातों के लिए, क्योंकि आप दतिया पीठ से दीक्षित हैं, कृपया पूरा विधान अपने गुरु जी से पूछें — किस तरफ़ से, क्या बनाना है, कैसे होगा। इसी दौरान वे एक और श्रोता से कहते हैं कि कवच दोबारा नहीं बनाना है; केवल माला मंत्र का अनुष्ठान एक बार फिर करना है।
यह मार्गदर्शन केवल दीक्षा तक है; दीक्षा के बाद अपने गुरु के प्रति पूरा समर्पण चाहिए — इसीलिए दीक्षा जल्दबाज़ी में नहीं ली जाती।
दीक्षा तक यह मार्गदर्शन मानें; दीक्षा के बाद पूरा समर्पण
जब तक किसी से आपकी दीक्षा नहीं हुई है, यह मार्गदर्शन मानें। दीक्षा हो जाने पर वक्ता की अपनी सलाह है कि आपका समर्पण सौ प्रतिशत अपने गुरु के प्रति होना चाहिए। वक्ता कहते हैं, इसीलिए गुरु दीक्षा जल्दबाज़ी में नहीं लेनी चाहिए।
एक श्रोता कहते हैं कि यहाँ बताई गई आरंभिक साधनाएँ उन्हें दतिया पीठ पर नहीं दी गईं, जहाँ उन्हें क्रम से साधना का निर्देश मिला। वे पूछते हैं कि क्या वे सही चल रहे हैं या शुरू से यह प्रक्रिया अपनाएँ। वक्ता सभी सुनने वालों से एक बात याद रखने को कहते हैं। वे केवल अपनी बात करते हैं; बाकी दुनिया क्या बताती है या नहीं बताती, उससे उनका लेना-देना नहीं। जब तक किसी से आपकी दीक्षा नहीं हुई है, वक्ता जो मार्गदर्शन देने की कोशिश करते हैं — जो ख़ासकर किसी भी गृहस्थ के लिए सामान्य रूप से है — उसके अनुसार साधना करें। उनके साथ चलें; आपके लिए जो हो सकेगा, वह किया और बताया जाएगा, आप उसी अनुसार चलें। दीक्षा हो जाने पर वे आपसे केवल इतना कहेंगे कि आपका समर्पण सौ प्रतिशत अपने गुरु के प्रति हो जाना चाहिए। और वक्ता कहते हैं, इसीलिए गुरु दीक्षा जल्दबाज़ी में नहीं लेनी चाहिए। क्योंकि दीक्षा लेने के बाद अगर बातें आपके मन के अनुसार नहीं चलीं और आपने अपनी पूरी जिज्ञासा उनके सामने नहीं रखी, तो दिक्कत होगी। फिर आप कहीं और से सुनेंगे कि ऐसा होना चाहिए था, और वहाँ गुरु कहेंगे कि इसका कोई मतलब नहीं, इसकी ज़रूरत नहीं; आप कारण पूछेंगे और संतोषजनक उत्तर नहीं मिलेगा; फिर आपका भाव घटेगा, और फिर साधना फल नहीं देगी। विषयों को समझें, सुनें — सुनने पर कोई रोक नहीं है — पर भाव और समर्पण अपने गुरु के प्रति होना चाहिए।
उन्हें अब भी टोका जाता है कि संकल्प कैसे लें, हाथ की मुद्रा कैसे बनाएँ, और स्वस्तिवाचन का मंत्र कैसे बोलें।
अब भी गाँठ, मुद्रा और उच्चारण पर टोका जाना
नहीं। वक्ता कहते हैं कि लोग टिप्पणी करते हैं कि वे बहुत विद्वान हैं — और वे अब भी बैठकर सुनते हैं कि संकल्प ऐसे नहीं, ऐसे लेते हैं; हाथ की मुद्रा ऐसे बनाओ; चुटैया में एक गाँठ और लगाओ; ठीक से उच्चारण करो; स्वस्तिवाचन में यह मंत्र ऐसे बोला जाता है।
वक्ता समर्पण का उदाहरण ख़ुद को बनाते हैं। वे कहते हैं, आज भी जब आप उन्हें सुनते हैं तो लगता है कि कोई बहुत विद्वान व्यक्ति है; ऐसी टिप्पणियाँ भी आती हैं। आज भी वे इन छोटी बातों के लिए बैठते हैं। तुम्हारा संकल्प ऐसा नहीं है — संकल्प ऐसे लिया जाता है। हाथ की मुद्रापूजा या प्रतिमा-विज्ञान में प्रयुक्त एक प्रतीकात्मक हस्त-मुद्रा — जैसे वरद (वरदान देने वाली) या अभय (निर्भयता प्रदान करने वाली) — प्रत्येक का अपना विशिष्ट अर्थ होता है। ऐसे बनाओ; और फिर वैसे ही बनाई जाती है। तुमने चुटैया में सवा गाँठ लगाई, एक गाँठ और लगाओ; ठीक है, जाओ। ठीक से उच्चारण करो। स्वस्तिवाचन के समय यह मंत्र ऐसे नहीं, ऐसे बोला जाता है। रुद्री में यह चीज़ ऐसी नहीं है, ऐसे करना है। जो अक्षर लिखा है, वही बोलो। और संपुट पाठ पर: तुम्हारा मन बड़ा संपुट पाठ करने का है — जैसा बताया जा रहा है वैसा करो, दिन में दो पाठ, सुबह भी करो और शाम को भी, बैठो। महाराज, मुझे साथ ले लीजिए, आज हृदय का पाठ करना चाहता हूँ। ठीक है, हृदय का पाठ करो, एक करो। कितने करने थे? हमने सोचा था 108 पुरश्चरण करेंगे। नहीं, नहीं, नहीं। अभी तुम यह करो। वक्ता कहते हैं, समर्पण ऐसा होना चाहिए: जो अक्षर बोला गया, वही अक्षर किया गया। आपका अपना अभ्यास सब कुछ करने में कितना भी अच्छा हो, अगर गुरु जी कह रहे हैं कि ऐसे करना है, तो हमारे लिए हमारे सामने बैठे गुरु स्वयं विंध्यवासिनी हैं, उनकी वाणी उनकी वाणी है, उनकी जिह्वा उनकी है।
गुरु बनाने से पहले कितना सोचना चाहिए?
शिष्य के अपराध का छठा भाग गुरु पर पड़ता है
हज़ार बार सोचें। गुरु मान लेने के बाद उनकी कही बात पत्थर की लकीर है — और बाद में गुरु बदलना या विसर्जन करना दिक्कत लाता है। गुरु की ओर से, दीक्षा देने से ज़िम्मेदारी बनती है, और अगर शिष्य अपराध करे तो उसका छठा भाग गुरु पर पड़ता है।
वक्ता दोनों तरफ़ का भार बताते हैं। जब तक आपकी दीक्षा नहीं हुई है, सही मार्ग चुनें और समर्पण से चलें; पर गुरु बनाने से पहले हज़ार बार सोचें। बाद में पछताने से कोई लाभ नहीं, और बाद में गुरु बदलना, या विसर्जन करना, या जो भी विधि हो, आपको दिक्कत देगा। अगर आप उनसे आज्ञा लेते हैं और वे सक्षम गुरु हैं, तो वे आज्ञा देंगे और ठीक है। पर अगर वे कड़वाहट वाले गुरु निकले — अगर आपने उन्हें बताया कि आप एक यूट्यूब चैनल से मार्गदर्शन लेते हैं, और वे कहें, ये यूट्यूब वाले गुरु, और उनके मन में कड़वाहट आ जाए, या विचार सुनकर वे मन में बात रख लें — वे भी इंसान हैं, और फिर आप दोनों के बीच पिस जाएँगे। इसलिए वक्ता कहते हैं, गुरु मान लेने के बाद गुरु की कही बात पत्थर की लकीर है, और आपको उसी अनुसार चलना चाहिए। जल्दबाज़ी में ली गई दीक्षा, जहाँ ज्ञान के कारण समर्पण नहीं बन पाता, बहुत बार नुकसान करती है। वे कहते हैं कि वे दतिया में दीक्षा देने वाले कुछ नामों को अच्छी तरह जानते हैं, और उसके बाद शिष्यों के जीवन में हुई उथल-पुथल को भी — और कहते हैं कि इसे किसी के मन में शंका डालना न समझा जाए। उनका कारण: दीक्षा देने पर एक ज़िम्मेदारी बनती है। दीक्षित शिष्य को पुत्र की तरह देखना होता है। इतना ही नहीं — अगर शिष्य अपराध करता है, तो उसका छठा भाग गुरु पर पड़ेगा। इसीलिए गुरु कितने भी प्रखर और पूर्ण अभिषिक्त हों, सच्चे मार्ग पर चलने वाले इस मार्ग पर आगे बढ़ने से पहले हज़ार बार सोचते हैं। केवल दीक्षा दे देना अंत नहीं है — न ही शिष्य की जिज्ञासाओं को अनसुलझा छोड़ना ठीक है।
एक सक्षम गुरु कितना समय देते हैं, और उनके सामने कैसे बैठना चाहिए?
अकेले में दो से चार घंटे, और सीखने के लिए अनजान बनकर बैठना
वक्ता के अपने गुरु बहुत व्यस्त होते हुए भी, जब भी वे जाते हैं, अकेले में दो से चार घंटे देते हैं — तुरंत नहीं, तीसरे दिन। और साधक के लिए उनका निर्देश: मूर्ख बनकर बैठो, तब ज्ञान की बातें आएँगी। जो ज़्यादा विद्वान बनते हैं, वे आपको कुछ नहीं समझेंगे।
वक्ता शिष्य के रूप में अपनी स्थिति बताते हैं। उनके बड़े गुरु जी ब्रह्मलीन हो चुके हैं। उनके बाद आए गुरु, जो पूर्ण अभिषिक्त हैं, इतने व्यस्त हैं कि उनके पास समय की कमी है — पर जब भी वक्ता जाते हैं, वे समय देते हैं, दो घंटे या चार, अकेले में, आमने-सामने। और वे जोड़ते हैं, इसलिए नहीं कि हमने ख़ुद को वीआईपी बताया: जब समय आता है। हाँ बेटा, दो दिन रुको, तीसरे दिन तुम्हारा है। उस समय हर विषय लिया जाता है — यह मंत्र, यह उत्कीलन, यह बात और वह, यह चार्ट समझ नहीं आया, बताइए, आगे यह करना है। हर चीज़ समझाई जाती है। जिस भी विषय में जो भी शंका हो, सारी शंकाएँ दूर होती हैं। और ऐसा कभी नहीं हुआ कि वे न पूछें कि हमारे पास क्या है और किस स्थिति में है; वे अनजान बनकर पूछते हैं — इस विषय पर कुछ पढ़ा, इसका कुछ अध्ययन हुआ — और जब हम आधे तक पहुँचते हैं, बाकी वे पूरा कर देते हैं। जो वे पूछते हैं उसकी जानकारी उनके पास पहले से है, पर वे परखते हैं कि कितना पता है, और फिर बताते हैं कि कैसे करना है — चाहे तंत्र मार्ग की वामाचार विधि हो या दक्षिणाचार विधि, दोनों परंपराओं से। वे यह भी बताते हैं कि यहाँ तक पहुँचने में क्या लगा। वे कहते हैं, यह मत सोचिए कि हम बस चल पड़े और गुरु मिल गए और सिद्धि आ गई। संकल्प कैसे लेते हैं — हमें पता नहीं था। न्यास किसे कहते हैं? तब यूट्यूब नहीं था। न्यास बहुत सारे हैं, और उनमें मुद्राएँ हैं; आप हर मुद्रा नहीं सीख सकते। आपने चौबीस मुद्राएँ सीखीं और अभी और भी हैं। कौन बताएगा? उनके पास जानकारी है, पर क्या वे बताएँगे? और साधक के लिए उनका निर्देश: गुरु के सामने यही ग़लती होती है। अगर आप जानकार बनकर आगे आएँगे, तो वे मान लेंगे कि इसे तो सब पहले से पता है। मूर्ख बनकर बैठो, तब ज्ञान की बातें आएँगी। उनमें भी जो ज़्यादा विद्वान बनते हैं, वे आपको कुछ नहीं समझेंगे — कहेंगे कि इन सब बातों में कुछ नहीं रखा, माँ की सेवा करो, हो गया। पर जिनमें सच में क्षमता है, उनसे एक बात पूछो तो वे दस खोलकर रख देंगे।
क्या रविवार भी महादेव को समर्पित दिन है?
रविवार और सोमवार दोनों शिव को समर्पित
हाँ, आपने सही पढ़ा। सूर्य का दिन भगवान शिव को समर्पित बताया गया है, और चंद्रमा का दिन, सोमवार, भी उन्हीं को समर्पित है।
एक श्रोता लिखते हैं कि सोमवार को महादेव का दिन माना जाता है, पर उन्होंने कहीं पढ़ा कि रविवार को महादेव को समर्पित दिन बताया गया है, और इसके बारे में पूछते हैं। वक्ता इसकी पुष्टि करते हैं। सूर्य का दिन सच में भगवान शिव को समर्पित बताया गया है; आपने बिल्कुल सही पढ़ा। और चंद्रमा का दिन, सोमवार, भी भगवान शिव को समर्पित है।
शास्त्र क्या कहता है
The Shiv Mahapuran assigns Sunday and Monday, as days of the week, to Shiva in particular.
Vidyeshwar Samhita 14:28-29 assigns Sunday to the Sun and Monday to Lakshmi and her retinue, not to Shiva. The only weekday this chapter assigns to a form of Shiva is Saturday, to Rudra (14:34).
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
पापशान्तिर्विशेषेण ह्यादिवारे निवेदयेत्। आदित्यस्यैव देवानां ब्राह्मणानां विशिष्टदम्॥ २८
रविवारको सूर्यके लिये, अन्य देवताओंके लिये और ब्राह्मणोंके लिये विशिष्ट वस्तु अर्पित करे। यह विशिष्ट फल देता है और इससे विशेषरूपसे पापोंकी शान्ति होती है।
सोमवारे च लक्ष्म्यादीन्सम्पदर्थं यजेद् बुधः। आज्यान्नेन तथा विप्रान्सपत्नीकांश्च भोजयेत्॥ २९
सोमवारको विद्वान् पुरुष सम्पत्तिके लिये लक्ष्मी आदिकी पूजा करे। वह पत्नीसहित ब्राह्मणोंको घीमें पके अन्नका भोजन कराये।
क्या एक ही पूजा के अलग-अलग वार पर अलग फल मिलते हैं?
शिव पूजा के वार के अनुसार फल
हाँ। विवाह में रुकावट और पैसे की दिक्कत के लिए गुरुवार — क़र्ज़ से छुटकारा, धन-धान्य की प्राप्ति, और शृंगार व अभिषेक से पीलिया में राहत। संतान से जुड़े कष्टों के लिए, और ख़ासकर पुरुष के विवाह की दिक्कत के लिए शुक्रवार। शत्रु की बाधा के लिए मंगलवार।
वक्ता महादेव की पूजा के लिए वार का क्रम बताते हैं। अगर गुरुवार है, और विवाह में रुकावट है या पैसे की समस्या है, तो उस दिन महादेव की पूजा, सेवा या दर्शन आपको उससे छुटकारा देगा — क़र्ज़ से मुक्ति मिलेगी, और धन-धान्य प्राप्त होगा। और अगर पीलिया हुआ है, तो गुरुवार को महादेव का शृंगार और अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करने से राहत मिलेगी। अगर शुक्रवार है, तो संतान से जुड़े सारे कष्ट इस श्रेणी में आते हैं, और ख़ासकर पुरुष के लिए; और अगर किसी पुरुष के विवाह में कोई ख़ास दिक्कत आ रही है, तो उस दिन महादेव की सेवा और पूजा आपको फल देगी। अगर शत्रु से बाधा है, तो मंगलवार। वे समझाते हैं कि दिन का नियम कहीं न कहीं देवता से, और उस देवता से जुड़े फल से जुड़ा है। ऐसा नहीं है कि केवल सोमवार को शिव जी की पूजा करने से ही सब मिलेगा, और मंगलवार को करने से कुछ नहीं होगा, या उसका महत्व घटता-बढ़ता है। दिन और तिथि के अनुसार अलग-अलग फल बताए गए हैं।
शास्त्र क्या कहता है
The Shiv Mahapuran assigns specific worldly fruits to worshipping Shiva on Thursday (marriage/money/debt/jaundice), Friday (children/marriage for men), and Tuesday (overcoming an enemy).
The actual scheme is: Monday-Lakshmi/prosperity, Tuesday-Kali/disease-pacification, Wednesday-Vishnu/family, Thursday-the gods/long life, Friday-the gods/enjoyment, Saturday-Rudra/averting untimely death. It never names Tuesday for enemies, Thursday for marriage/debt, or Friday for children, and no deity but Saturday's is a form of Shiva.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
सोमवारे च लक्ष्म्यादीन्सम्पदर्थं यजेद् बुधः। आज्यान्नेन तथा विप्रान्सपत्नीकांश्च भोजयेत्॥ २९
सोमवारको विद्वान् पुरुष सम्पत्तिके लिये लक्ष्मी आदिकी पूजा करे। वह पत्नीसहित ब्राह्मणोंको घीमें पके अन्नका भोजन कराये।
काल्यादीन्भौमवारे तु यजेद् रोगप्रशान्तये। माषमुद्गाढकान्नेन ब्राह्मणांश्चैव भोजयेत्॥ ३०
मंगलवारको रोगोंकी शान्तिके लिये काली आदिकी पूजा करे। उड़द, मूँग और अरहरकी दालसे युक्त अन्नसे ब्राह्मणोंको भोजन कराये।
सौम्यवारे तथा विष्णुं दध्यन्नेन यजेद् बुधः। पुत्रमित्रकलत्रादिपुष्टिर्भवति सर्वदा॥ ३१
बुधवारको विद्वान् पुरुष दहीभातसे विष्णुकी पूजा करे। इससे पुत्र, मित्र और स्त्री आदिकी सदा पुष्टि होती है।
आयुष्कामो गुरोर्वारे देवानां पुष्टिसिद्धये। उपवीतेन वस्त्रेण क्षीराज्येन यजेद् बुधः॥ ३२
दीर्घायुकी इच्छावाला विद्वान् पुरुष गुरुवारको देवताओंकी पुष्टिके लिये पूजा करे। वह यज्ञोपवीत, वस्त्र और दूध-घीसे पूजा करे।
भोगार्थं भृगुवारे तु यजेद् देवान्समाहितः। षड्रसोपेतमन्नं च दद्याद् ब्राह्मणतृप्तये॥ ३३
भोगकी प्राप्तिके लिये शुक्रवारको एकाग्रचित्त होकर देवताओंकी पूजा करे। ब्राह्मणोंकी तृप्तिके लिये छहों रसोंसे युक्त अन्न दे।
स्त्रीणां च तृप्तये तद्वद् देयं वस्त्रादिकं शुभम्। अपमृत्युहरे मन्दे रुद्रादींश्च यजेद् बुधः॥ ३४
वैसे ही स्त्रियोंकी प्रसन्नताके लिये सुन्दर वस्त्र आदि देने चाहिये। शनिवार अकालमृत्युको दूर करनेवाला है। उस दिन विद्वान् पुरुष रुद्र आदिकी पूजा करे।
पुष्य नक्षत्र का ख़ास महत्व क्यों है?
पुष्य नक्षत्र और उसके दो स्वामी, शनि और बृहस्पति
क्योंकि भगवान नारायण गीता में कहते हैं कि नक्षत्रों में वे पुष्य हैं, नक्षत्रों के राजा। इसके देवता और स्वामी के रूप में शनि देव और देव गुरु बृहस्पति दोनों आते हैं, इसलिए वहाँ दोनों का महत्व है — रवि पुष्य में पूजा से केवल बृहस्पति ही नहीं, शनि देव भी प्रसन्न होते हैं।
वक्ता तिथि और दिन के महत्व के उदाहरण के रूप में रवि पुष्य और गुरु पुष्य लेते हैं। वे कहते हैं, पुष्य नक्षत्र की एक ख़ास महिमा है। भगवान नारायण ने गीता में कहा है कि नक्षत्रों में वे पुष्य नक्षत्र हैं — नक्षत्रों के राजा। तो पुष्य नक्षत्र के देवता कौन हैं और उसके स्वामी कौन हैं? उसमें शनि देव और देव गुरु बृहस्पति दोनों आते हैं। इसलिए वहाँ दोनों का महत्व बनता है। वे कहते हैं, ऐसा नहीं है कि अगर आप रवि पुष्य में पूजा करेंगे तो केवल बृहस्पति देव प्रसन्न होंगे। शनि देव भी प्रसन्न होंगे।
जब दीक्षा देने से मना कर दिया जाए और बदले में केवल गायत्री बताई जाए, तब क्या होता है?
मना की गई दीक्षा, बदले में गायत्री, और बाद में मिले गुरु
वक्ता का अपना अनुभव: बहुत पहले उन्होंने विंध्याचल के एक साधक से पीताम्बरा दीक्षा माँगी और बात टाल दी गई — तुम पागल हो जाओगे, यह होगा, वह होगा — और बदले में गायत्री करने को कहा गया। उन्होंने की, भगवती की कृपा आई, और तपोबल की वृद्धि हुई।
वक्ता बताते हैं कि वे बार-बार तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। की वृद्धि की बात इसलिए कहते हैं — यह खोखली बात नहीं है। वे याद करते हैं कि जिन शास्त्री जी से वे मार्गदर्शन लेते थे, साधना के बारे में कुछ भी पूछने पर वे बात टाल देते थे: यह सब करके क्या करोगे, कुछ मत करो, भजन करो, बालाजी की कृपा तुम पर है, क्या करोगे, पीताम्बरा जाकर दीक्षा ले लो। वक्ता कहते हैं, ज़्यादातर लोग ठीक ऐसा ही करते हैं। विंध्याचल में एक बहुत अच्छे साधक थे, अब भी हैं। बहुत पहले उनसे पीताम्बरा दीक्षा माँगी गई। उन्होंने बात बहुत घुमाई — ऐसा है, वैसा है, तुम पागल हो जाओगे, ऐसा-ऐसा होगा। ठीक है, नहीं लेंगे। गायत्री करो, गायत्री करो। ठीक है भाई, केवल गायत्री करेंगे। और भगवती की कृपा आई। वे कहते हैं, जब योग्य तंत्र दीक्षा नहीं मिल रही हो, और इच्छा हो, और भगवती के प्रति समर्पण हो, तो वे हैं। वे अपने योग्य साधक, अपने योग्य पुत्र को समय आने पर प्रकट करती हैं। पहले वे आपका पुण्य बल बढ़ाएँगी और आपको योग्य बनाएँगी, सक्षम बनाएँगी — और फिर आपके जीवन में योग्य व्यक्ति, योग्य गुरु को लाएँगी, उनकी शरण दिलाएँगी और उन्हें आपका माध्यम बनाएँगी।
सक्षम गुरु और बात टालने वाले में फ़र्क़ कैसे पहचानें?
एक प्रश्न पूछें और दस उत्तर मिलें, साथ में नया अध्ययन बताया जाए
जो लौटकर मिलता है, उससे। सक्षम गुरु से एक प्रश्न पूछें, वे ठीक से दस का उत्तर देंगे, नई बातें बताएँगे, और ख़ुद बताएँगे कि आगे आपको क्या पढ़ना चाहिए। जिसने ख़ुद कुछ नहीं किया, वह आपसे भी कुछ न करने को कहेगा।
वक्ता कहते हैं कि यह सच है कि जो दस साल में नहीं मिलता, वह गुरु मिलने पर आ जाता है — और जब गुरु चाहें, और देखें कि लगन है, समर्पण है, और यह अधिकारी व्यक्ति है जिसमें क्षमता है, तो वे देने में संकोच नहीं करेंगे। ऐसे व्यक्ति से एक प्रश्न पूछें, वे ठीक से दस उत्तर बताएँगे; नई बातें बताएँगे; ख़ुद कहेंगे कि आपको यह चीज़ पढ़नी चाहिए, वह पढ़ो, इन विषयों पर अपने विचार रखो। और जिसने ख़ुद कुछ नहीं चखा, वह आपके लिए भी कुछ नहीं चखेगा; जिसने ख़ुद कुछ नहीं किया, वह आपसे भी कुछ न करने को कहेगा। फिर वे निष्पक्ष होकर दूसरा पक्ष भी रखते हैं। वे कहते हैं, यहाँ एक विषय यह आ सकता है: हम कठिन मार्ग पर चले और लक्ष्य पाया, और हम जानते हैं कि आसान मार्ग कौन सा है, इसलिए आसान मार्ग पर ज़ोर दे रहे हैं — इधर से जाओ, इस कठिन से मत जाओ, हमें पता है। दूसरा विषय वह व्यक्ति है जो आसान मार्ग पर चलने लायक ही नहीं है और कठिन मार्ग पर चलना चाहता है; उसकी इच्छा है कि वह इसी रास्ते से आनंद लेगा, और वह उस पर प्रोत्साहन भी माँग रहा है। और आप उससे कहते हैं: नहीं, नहीं, यह ग़लत है, इधर मत जाओ। वह पूछता है, क्या कठिनाइयाँ हैं, बताइए। अगर आप उस रास्ते से आए हैं तो कठिनाइयाँ बताएँगे न — हाँ देखो, ऐसी-ऐसी दिक्कत आ सकती है। फिर आओ। तो अनुभव काम आएगा। पर व्यक्ति सीधे मना कर देता है: नहीं, वहाँ नहीं जाना, आना है तो इधर से आओ, इधर-उधर मत भटको। वक्ता कहते हैं, यह ग़लत है। हर किसी की जिज्ञासा एक ही तरीक़े से नहीं सुलझाई जा सकती।
क्या शाम 7:30 से 8 बजे के बीच पूजा करना ग़लत है?
किसी भी समय पूजा की जा सकती है, पर चारों संध्याएँ बेहतर हैं
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि नहीं करनी चाहिए। उनकी बात संध्या के समय की थी, जब गोधूलि बेला पड़ती है। पर अगर चारों संध्याओं के मुख्य समय पर की जाए, तो बहुत बेहतर होगा।
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्हें समझ नहीं आता कि 7:30 से 8 के बीच पूजा क्यों नहीं करनी चाहिए, क्योंकि लंबे समय से उनके पास शाम 7 से 11 का ही समय है। वक्ता कहते हैं: पूजा करें। हम नहीं कह रहे कि नहीं करनी चाहिए। पर संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। का समय तब है जब गोधूलि बेलासांयकाल का गोधूलि समय — परंपरागत रूप से आकर्षण प्रयोगों हेतु उपयुक्त माना जाता है। पड़ती है — हम यह विषय रख रहे थे; हमने नहीं कहा कि नहीं करनी चाहिए। अगर मुख्य समय पर, चारों संध्याओं में की जाए, तो बहुत बेहतर होगा। इसी दौरान वे दो और उत्तर देते हैं: जिस धागे में दत्तात्रेय कवच पहना जाता है, उसमें रुद्राक्ष या स्फटिक पिरोया जा सकता है, कोई दिक्कत नहीं; और एक बार देव दीक्षा हो जाने पर उसे दोबारा करने की ज़रूरत नहीं है।
हवन किस दिन करें, और क्या दत्त दीक्षा के बाद मांसाहार छोड़ना ज़रूरी है?
इकतालीसवें दिन हवन; दीक्षा हो या न हो, मांसाहार मना
इकतालीसवें दिन के जप के बाद बयालीसवें दिन हवन किया जा सकता है, पर हो सके तो इकतालीसवें दिन करें। भोजन पर, वक्ता मांसाहार के लिए मना करते हैं, चाहे आप दीक्षा लें या न लें — और कहते हैं कि बलि और खाने को एक विषय बनाकर न मिलाएँ।
क्रम से दो उत्तर। हवन पर: इकतालीसवें दिन के जप के बाद बयालीसवें दिन किया जा सकता है, पर हो सके तो इकतालीसवें दिन ही करें। भोजन पर: पूछा गया कि क्या भगवान दत्तात्रेय की दीक्षा लेने के बाद मांसाहार हमेशा के लिए छोड़ना होगा। वक्ता कहते हैं कि आप दीक्षा लें या न लें, हम खाने के लिए मांसाहार को वैसे भी मना करेंगे — मत खाइए। और वे कहते हैं कि दो चीज़ें आपस में न मिलाएँ: बलि और खाना। बलि बलि है; बलि का तरीक़ा एक विषय है, और आप खाने वाले हैं और चढ़ाया हुआ खाते हैं या नहीं, यह अलग विषय है। वे जोड़ते हैं कि उसके लिए भी बहुत सी चीज़ें आप पहले ही छोड़ चुके हैं। पर मांसाहार के बारे में — दीक्षा लें या न लें, अगर नहीं खाएँगे तो आपकी ही भलाई है।
अगर बीच में माला का धागा टूट जाए तो क्या साधना खंडित हो जाती है?
टूटा माला का धागा, और प्रायश्चित्त की इक्यावन माला
नहीं — मन में शंका न रखें, क्योंकि आपने साधना पूरी कर ली। बीच में माला टूटने पर सही विधि है कि उसे पूरा दोबारा पिरोएँ, उसकी प्रतिष्ठा विधि फिर से करें, और फिर दोष दूर करने के लिए उसी मंत्र की कम से कम 51 माला अलग से करके आगे बढ़ें।
एक श्रोता बताते हैं कि पाँच लाख जप के दौरान चार या साढ़े चार लाख के बाद माला का धागा टूट गया; उन्होंने धागा बाँधकर जप जारी रखा, और साधना पूरी की। वे पूछते हैं कि क्या साधना खंडित हो गई। वक्ता कहते हैं कि जब आपने पूरी कर ली है, तो मन में शंका न रखें। फिर वे सही विधि बताते हैं। अगर माला बीच में टूट जाए, तो उसे पूरा दोबारा पिरोना चाहिए और उसकी प्राण प्रतिष्ठा विधि आदि फिर से करनी चाहिए; और जितना जप हुआ था — इस मामले में साढ़े चार लाख — उसके लिए दोष दूर करने हेतु उसी मंत्र की कम से कम 51 माला अलग से करें, और फिर आगे बढ़ें।
यथार्थवादी और सिद्धांतवादी मत कभी गढ़े हुए मत से मेल नहीं खाएगा — जो सत्य है, वह सत्य है।
यथार्थवादी और सिद्धांतवादी मत गढ़े हुए मत से मेल क्यों नहीं खाएगा
वक्ता कहते हैं, मेल नहीं खाएगा। जो भी यथार्थवादी और सिद्धांतवादी है, वह उनसे सहमत नहीं होगा। जो सत्य है, वह सत्य है; अगर चीज़ें गढ़े हुए तरीक़े से चलाई जाएँ, तो वह अलग बात है।
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्होंने दतिया में किसी से दीक्षा ली है जिन्हें वक्ता भी जानते हैं, कि उनका मन वहाँ नहीं लग रहा, और शास्त्र पर उनके विचार वक्ता से अलग हैं — सरसों का तेल एक उदाहरण है — कुल मिलाकर उनके मत कहीं मेल नहीं खाते। वक्ता कहते हैं कि मेल नहीं खाएँगे। जहाँ यथार्थवादी और सिद्धांतवादी व्यक्ति बनता है, वहाँ हमारे और उनके विचार नहीं मिलेंगे। जो सत्य है, वह सत्य है। अगर चीज़ें गढ़े हुए तरीक़े से चलाई जाएँ, तो विषय अलग है।
क्या बटुक भैरव अष्टोत्तर शतनाम के आरंभ और अंत में प्रणव बोला जा सकता है?
आरंभ और अंत में प्रणव की अनुमति; विनियोग के शब्द
हाँ, करें। और दत्त माला मंत्र के विनियोग में "दत्त देवता प्रीत्यर्थे कृपा प्राप्ति" बोलना ज़रूरी नहीं है — इसे संकल्प में बोलें।
काल भैरव को मदिरा क्यों चढ़ाई जाती है?
काल भैरव को मदिरा क्यों चढ़ती है — प्रमाण सहित अलग वीडियो के लिए टाला गया
वक्ता यहाँ उत्तर देने से मना करते हैं। वे कहते हैं, तर्कपूर्ण उत्तर देना और प्रश्नकर्ता को संतुष्ट करना दो अलग बातें हैं — उत्तर है और दूसरे लोग पहले ही समझा चुके हैं, पर यह विषय हर किसी के पचाने लायक नहीं है। वे इसे अलग से, प्रमाण सहित रखेंगे।
एक श्रोता पूछते हैं कि काल भैरव को ख़ासकर मदिरा ही क्यों चढ़ाई जाती है। वक्ता कहते हैं कि तर्कपूर्ण उत्तर दे पाना और संतुष्ट कर पाना दो अलग विषय हैं। असल में यह वही प्रश्न है जैसे काली माई को बकरे की बलि क्यों दी जाती है: लोगों में इस विषय को समझने की क्षमता बनाना बहुत कठिन है। वे कहते हैं, इसमें सत्य है, और उत्तर बिल्कुल दिया जा सकता है — लोग पहले ही दे चुके हैं और यह विषय समझा चुके हैं। पर इसे पचाना हर किसी के बस में नहीं है, तो अब क्या कहें। वे यह विषय अलग से, प्रमाण सहित लेने के लिए छोड़ देते हैं — क्यों, क्या और कैसे।
जो तुरंत मांसाहार नहीं छोड़ पा रहा, वह क्या करे?
धीरे-धीरे कम करें, और पूजा का स्थान अलग रखें
छोड़ने की कोशिश करें; सीमित रखें और धीरे-धीरे छूटने दें। नियम यह नहीं है कि देव दीक्षा विधान के बाद आप इसे नहीं खा सकते — पर जो आप खाते हैं, वह अपनी श्रद्धा को नैवेद्य के रूप में चढ़ाया हुआ होना चाहिए। अगर घर में खाते हैं, तो पूजा का स्थान शुद्ध और दूर रखें, और बिना नहाए वहाँ न जाएँ।
एक श्रोता कहते हैं कि मांसाहार एकदम से नहीं छूटेगा, और नियम पूछते हैं। वक्ता कहते हैं कि अगर एकदम से नहीं छूटेगा, तो छोड़ने की कोशिश करें। वे साफ़ कहते हैं कि नियम यह नहीं है कि देव दीक्षा विधान करने के बाद आप इसे नहीं खा सकते। पर अगर खाते हैं, तो जो हम खाते हैं वह अपनी श्रद्धा को नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। के रूप में चढ़ाकर खाया जाता है — घर में भगवान दत्त की पूजा होती है, या कोई भी देवता पूजे जा रहे हैं। इसलिए घर के देवताओं की पूजा के समय मांस आदि की बलि — अगर आप बंगाल के निवासी हैं तो वहाँ का क्षेत्रीय नियम अलग है, पर वरना ऐसे नियम नहीं लगाने चाहिए। अगर आप शाकाहारी हो जाएँ और शाकाहार का नियम मानें, तो बहुत अच्छा है। मांसाहार सीमित रखें, कोशिश करें, और धीरे-धीरे छूटने दें; छोड़ देंगे तो अच्छा होगा। और अगर घर में मांस खा रहे हैं, तो उस स्थिति में आपका पूजा स्थान शुद्ध और दूर होना चाहिए; ध्यान रखें कि खा-पीकर वहाँ न जाएँ। बिना नहाए वहाँ नहीं जाना है — और यह ठंड जैसा नहीं है, जहाँ हाथ-पैर धोकर, कपड़े बदलकर पूजा कर ली जाती है; मांसाहार के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं हो सकता।
किसी अनुमत विकल्प के साथ लोग सबसे बड़ी ग़लती क्या करते हैं?
कठिन समय का विकल्प मुख्य धारा में ले आना
उसे मुख्य धारा में ले आना। वक्ता इसे हिंदुओं की सबसे बड़ी विडंबना कहते हैं। कठिन समय के लिए दिया गया विकल्प — पानी न होने पर केवल अंगूठा धोना, या पूरी पूजा संभव न होने पर केवल अभिषेक, नैवेद्य और आरती — पूरा अभ्यास ही बन जाता है।
वक्ता सामान्य दोष बताते हैं: जब हम किसी भी चीज़ के विकल्प को मुख्य धारा में ले आते हैं, तो सबसे बड़ी ग़लती करते हैं। वे कहते हैं, यह हिंदुओं की सबसे बड़ी विडंबना है। उनका उदाहरण वह है जो उन्हें स्वर्गीय शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के एक प्रिय शिष्य के माध्यम से बताया गया: अगर आप किसी ऐसी स्थिति या जगह पर हैं जहाँ नहा नहीं सकते, या पानी की सुविधा नहीं है, तो माना गया है कि कम से कम पैर, या अंगूठा ही धो लें, और उसे भी शुद्ध माना जाता है — उस स्थिति में आप पूजा कर सकते हैं, या मन में स्मरण कर सकते हैं। पर कम से कम इतनी शुद्धि तक पहुँचना चाहिए। वक्ता कहते हैं, और अगर लोग ये बातें सुनेंगे, तो बस अंगूठा धोने लगेंगे: उन्होंने अंगूठा कहा। बाकी विषय भूल जाएँगे, कि किस परिस्थिति में कहा और किस परिस्थिति में क्या करना है। रोज़ की पूजा में भी यही रूप दिखता है। अलग-अलग परंपराओं में मिलता है कि अगर आप पूरी विधि से रोज़ की पूजा नहीं कर सकते, तो कम से कम तीन चीज़ें होनी चाहिए — अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना।, यानी शिव जी का अभिषेक, नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं।, और आरती। और अगर इतना भी न हो सके, तो जो भी मौजूद हो उसका थोड़ा नैवेद्य चढ़ाकर केवल आरती कर लें, तो पूजा पूरी मानी जाएगी। और वक्ता कहते हैं, आप लोग बाकी सब छोड़ देते हैं — गायत्री करो, यह करो, सुबह-शाम आरती करो और टेंशन ख़त्म। जो कठिन समय के लिए विकल्प रखा गया था, उसे मुख्य धारा में ले आया गया। यही सबसे बड़ी विडंबना है। बार-बार ऐसा करते-करते मुख्य चीज़ें छूटती गईं, छूटती गईं, और आज यह स्थिति आ गई।
एक विद्वान के पोते ने दक्षिणेश्वर में धूप उल्टी दिशा में दिखाई: विकल्प को नियम मान लेने से तीन पीढ़ियों का नुकसान।
दक्षिणेश्वर की धूप — विद्वान परिवार का पोता जो जानता नहीं था
एक धनी ब्राह्मण परिवार के युवक ने, जिसके दादा बड़े विद्वान थे, दक्षिणेश्वर काली मंदिर में देवी को धूप उल्टी दिशा में दिखाई। बंगाली पुजारी उस पर चिल्लाए। वक्ता की बात यह है कि विकल्प को नियम मान लेने से नुकसान तीन पीढ़ियों तक चला।
वक्ता यह घटना पीढ़ियों में इस बहाव की क़ीमत दिखाने के लिए सुनाते हैं, और ध्यान से कहते हैं कि वे ख़ुद कोई बाहरी चिह्न नहीं रखते — हम बाहर से सामान्य रहते हैं, आप मुश्किल से पहचानेंगे, हम कोई बड़े बाबा बनकर मुंडमाला पहनकर नहीं घूमते। वह युवक बहुत धनी परिवार से था और नहीं जानता था कि वक्ता कौन हैं। उसका जन्मदिन था और उसने चलने का सुझाव दिया। वह पहली बार मंदिर गया था या पहली बार धूप जलाई थी, भगवान जाने। उसने एक साथ पाँच मोटी सुगंधित बत्तियाँ जलाईं — ऐसी जिनमें बाँस नहीं होता और अच्छी ख़ुशबू आती है। वक्ता ने जाने दिया: वह लाया है, पाँचों जलाने दो। फिर युवक माँ को धूप दिखाने लगा — और वहाँ के बंगाली पुजारी चिल्ला पड़े, लड़के को पागल कहकर। वक्ता ने पूछा क्या हुआ। पुजारी बोले, इसे देखो, यह धूप उल्टी दिखा रहा है, उल्टी दिशा में। वक्ता ने कहा कि यह बहुत बड़ा भक्त है, काली माँ का उतारा कर रहा है, काली माँ को नज़र लग गई है — लोग दिन भर उनके दर्शन करते हैं और उनकी दिव्यता को निहारते हैं। इस पर पुजारी भी हँसने लगे, और बोले, ठीक है भाई, ऐसे दिखाना है। उनकी बात यह है कि दोष कहाँ है। उस युवक के दादा बहुत बड़े विद्वान थे; आज भी उनके घर में ऐसे ग्रंथ मिलते हैं, हालाँकि ऐसी हालत में कि खोले नहीं जा सकते, और परिवार न उन्हें देता है, न छूने देता है। और उसके पिता ठीक वही मामला थे जिसकी बात हो रही है — जो विकल्प बनाया गया था, उसे मुख्य धारा मान लिया। और बेटे ने मुख्य धारा को इतना पूरा अपना लिया कि आज उसे यह भी नहीं पता कि धूप-दीप और अगरबत्ती कैसे दिखाई जाती है। समाज में ऐसे लोग हैं: देवता की पूजा करने जाते हैं, और बिना जाने देवता का उतारा कर देते हैं। बात आगे बढ़ने पर वे जोड़ते हैं कि उन्होंने अपनी माँ को भी धूप उल्टी दिखाते देखा है — और जब उन्होंने टोका, तो उनसे चुप रहने को कहा गया।
पूजा का अहंकार व्यक्ति के साथ क्या करता है?
पूजा का अहंकार आगे सीखने की संभावना ख़त्म कर देता है
सीखना ख़त्म कर देता है। अपनी सेवा और पूजा का भी घमंड होता है — मैं भक्त हूँ, मैं रोज़ सौ माला जप करता हूँ — और जब यह घमंड सिर चढ़ जाता है, तो आगे कुछ भी सीखने की संभावना ख़त्म हो जाती है। वक्ता इस अहंकार को इतना बुरा कहते हैं कि यह व्यक्ति को कहीं का नहीं छोड़ता।
वक्ता यह गुण साफ़ बताते हैं: कुछ लोग इतने विद्वान होते हैं कि — देखिए — सेवा और पूजा का भी घमंड होता है। वे कहते हैं, यह सच्ची बात है। यह अहंकार इतना बुरा है कि आदमी को कहीं का नहीं छोड़ता। मैं भक्त हूँ; मैं रोज़ सौ माला जप करता हूँ। जब इसका घमंड सिर पर चढ़ जाता है, तो आगे कुछ भी सीखने की संभावना ही ख़त्म हो जाती है। वे कहते हैं, जब लोग बहुत प्रसिद्ध हो जाते हैं, तो अहंकार ऐसा हो जाता है कि कोई उन पर उँगली उठाए तो पचता नहीं।
हवन में आहुति देते समय माला कैसे सँभालनी चाहिए?
हवन में उल्टी माला, और दाने किस ओर खींचे जाते हैं
अगर आप हवन में अकेले हैं तो उल्टे हाथ से जप कर सकते हैं — पर बहुत से साधक, वक्ता भी, इसके लिए कभी जप माला उपयोग नहीं करते। वे अपनी पहनी हुई 108 दानों की कंठी माला उपयोग करते हैं, उसे अंग वस्त्र से ढककर, और उल्टे हाथ से जप करते हुए आहुति देते हैं।
वक्ता पहले विधि और फिर देखा हुआ दोष बताते हैं। हवन के समय अगर हम अकेले आहुति दे रहे हैं, तो आप उल्टे हाथ से माला का जप कर सकते हैं। पर इसमें बहुत से साधक, और वे ख़ुद, कभी जप माला उपयोग नहीं करते। अगर 108 दानों की कंठी माला पहनी है, तो उसे ऊपर के वस्त्र, अंग वस्त्र, से ढककर और उल्टे हाथ से जप करते हुए हम आहुति देते हैं। जो ग़लती उन्होंने देखी, वह ऐसे ही हवन में थी। यह किसी षट्कर्म मंत्र की आहुति नहीं थी; व्यक्ति जानता था कि किस मंत्र से आहुति दे रहा है, गायत्री से जुड़ा किसी देवता का मंत्र। और वह माला उल्टी चला रहा था। माला फेरने का तरीक़ा है कि दाने अपनी ओर खींचे जाते हैं; वह उन्हें आगे धकेल रहा था, और ढका भी नहीं था, जबकि तीन-चार ब्राह्मण और साधक बैठकर उसे देख रहे थे। उन्होंने पूछा कि वह माला आगे क्यों चला रहा है। वक्ता ने उसकी ओर से बहाना दिया — शायद उस हाथ से अभ्यास नहीं है, और अगर केवल गिनती के लिए है तो वह बस आहुतियाँ दे रहा है। फिर भी वह ग़लत है, उन्होंने कहा; ग़लत है। जब सब ख़त्म हुआ और उससे ठीक से, विनम्रता से पूछा गया कि उसने उल्टा क्यों किया जबकि ऐसा नहीं करते, और सब देख रहे थे, और उसने ढका भी नहीं — तो उत्तर था: तुम्हें इससे क्या, मैं कर रहा हूँ। वक्ता कहते हैं, दिक्कत यह नहीं है कि ग़लत करने पर टोका गया और आप नाराज़ हो गए। दिक्कत छवि की है — कि मैं इतना बड़ा व्यक्ति हूँ और तुम मुझे टोक रहे हो। और फिर विनम्रता चली जाती है।
चौबीस दीपक और एक कर्म साक्षी दीपक, तीनों तेलों में घी सबसे अच्छा — और विनियोग बीच में कभी नहीं बदलते।
चौबीस दीपक, घी सबसे अच्छा, और विनियोग बीच में न बदलें
चौबीस, और एक कर्म साक्षी दीपक। घी, सरसों या तिल में से कोई भी उपयोग हो सकता है — घी उनमें सबसे अच्छा है, और तिल भी चलेगा। और विनियोग में: सब सिद्ध होने के बाद बोलना चाहिए; सिद्ध करते समय विनियोग न बदलें।
दो अंतिम विधि संबंधी उत्तर। संख्या और तेल पर: 24 दीपक, और उनके साथ एक कर्म साक्षी दीपक — 24 ही करें। जो चाहें उपयोग कर सकते हैं; घी से करें तो सबसे अच्छा, या सरसों, या तिल; तिल से भी करें। विनियोग पर: सब कुछ सिद्ध होने के बाद बोलना चाहिए। सिद्ध करते समय विनियोग न बदलें।
हवन वाला अनुष्ठान और गौ सेवा मंगलवार को होगी; घर पर दत्त पूजा, इच्छा हो तो दीक्षा विधान, और उसी दिन हवन।
पूर्णिमा का कार्यक्रम — रूप, घर पर हवन, दीक्षा विधान
हवन वाला अनुष्ठान और गौ सेवा मंगलवार को होगी। अपने घर पर भगवान दत्तात्रेय की सेवा और पूजा करें, इच्छा हो तो दीक्षा विधान करें, और उस दिन घर पर हवन करने की कोशिश करें।
वक्ता भगवान दत्तात्रेय के अनुष्ठान की व्यवस्था बताकर सत्र समाप्त करते हैं। उस दिन वहाँ हवन वाला अनुष्ठान और पूरा अनुष्ठान होगा, साथ में गौ सेवा, मंगलवार को। अपने घर पर भी उस दिन भगवान की सेवा और पूजा करें। जिन्हें दीक्षा विधान करना है, वे दीक्षा विधान करें। और कोशिश करें कि उस दिन घर में हवन ज़रूर हो — पूर्णिमा पर।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।