श्रावण की तैयारी — रुद्राभिषेक, 64 योगिनी बलि और संकट में घिरे घर के लिए तंत्रोक्त विधान
अलग-अलग संकटों के लिए श्रावण के तंत्रोक्त विधान।
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तंत्र के दो भाग कौन-से हैं?
तंत्र दर्शन और क्रिया वाला पक्ष
तंत्र के दो भाग हैं। एक दार्शनिक भाग है, जिसे तंत्र दर्शन कहते हैं। इसमें हर प्रकार की शक्ति को एक सैद्धांतिक आधार पर समझाया जाता है। दूसरा तांत्रिक या क्रिया वाला भाग है। इसमें दर्शन नहीं है। इसमें षट्कर्म, मंत्र सिद्धियाँ, पुरश्चरण और अपने आराध्य का दर्शन है।
वक्ता कहते हैं कि एक बात हमेशा याद रखनी है, जिसे वे बार-बार स्पष्ट करते हैं। हम दो चीज़ों को एक जगह मिला देते हैं। तंत्र के दो भाग हैं। एक दार्शनिक भाग है, जिसे तंत्र दर्शन कहते हैं। इसमें हर प्रकार की शक्ति को एक सैद्धांतिक आधार पर समझाया जाता है। जैसे भगवती काली को लेकर जब तंत्रोक्त दार्शनिक व्याख्या बनती है, तो वह भगवती ऐसी हैं कि पूरी सृष्टि उनमें समा सकती है, जहाँ कुछ भी नहीं है। यह दार्शनिक व्याख्या है। पर इसका दूसरा पक्ष, दूसरा भाग, तांत्रिक व्याख्या है। उसमें दर्शन नहीं है। उसमें षट्कर्म है, मंत्र सिद्धियाँ हैं, पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। है, अपने आराध्य का दर्शन है। वे कहते हैं कि वहाँ हम उस दूसरे ढंग से नहीं बोल सकते। वहाँ साधक का भाव अलग होता है। दर्शन का सिद्धांत अलग बात है। तंत्र के षट्कर्म आदि का विषय, यानी क्रिया वाला पक्ष, अलग बात है।
दस महाविद्याओं को शरीर की नाड़ियाँ बताना गलत क्यों है?
दर्शन और क्रिया वाले पक्ष को मिला देना
वक्ता कहते हैं कि एक वीडियो बहुत वायरल हुआ। उसमें 52 या 56 कलवों को शरीर की अलग-अलग गाँठें और नाड़ियाँ बताया गया। वे कहते हैं कि यह दार्शनिक सिद्धांत है, क्रिया वाला पक्ष नहीं। इसे पकड़कर यह ज़िद करना कि ऐसी कोई चीज़ है ही नहीं, ये बस हमारी नाड़ियों के नाम हैं, उनके शब्दों में हद दर्जे की मूर्खता है।
वे कहते हैं कि ज़्यादातर लोग सीधे पूछेंगे कि दस महाविद्याएँ क्या हैं। एक वीडियो बहुत वायरल हुआ। उसमें 52 कलवों के बारे में, 56 कलवों के बारे में बताया गया कि ये शरीर की अलग-अलग गाँठें और नाड़ियाँ हैं। यही ये हैं। वे कहते हैं कि वह एक दार्शनिक सिद्धांत बन गया। वह क्रिया वाला पक्ष नहीं है। अब अगर कोई इसे पकड़कर ज़िद में बैठ जाए और कहे कि तुम मूर्ख हो, ऐसी कोई चीज़ नहीं होती, ये तो बस हमारे शरीर की अलग-अलग नाड़ियों के नाम हैं, तो यह हद दर्जे की मूर्खता हो जाती है। वे कहते हैं कि दोनों विषय अपनी-अपनी जगह सही हैं। पर दर्शन को दर्शन की जगह रहने दीजिए, दर्शन को दर्शन रहने दीजिए। उसे क्रिया वाले पक्ष में ठूँसने की कोशिश मत कीजिए।
आलोचक तांत्रिक साधना को नकारने के लिए दर्शन का सहारा कैसे लेते हैं?
दर्शन दिखाकर क्रिया वाले पक्ष को काट देना
वक्ता कहते हैं कि आजकल जब भी किसी को किसी सिद्धांत या शक्ति का खंडन करना होता है, वे दार्शनिक सिद्धांत आगे कर देते हैं। इससे वे क्रिया वाले पक्ष को सीधे नकार देते हैं। फिर ऐसे लोग माँग करते हैं कि अगर सिद्धि है, तो उनके सामने करके दिखाओ।
वक्ता कहते हैं कि आजकल जब किसी को किसी सिद्धांत या किसी शक्ति का खंडन करना होता है, तो वे सीधे दार्शनिक सिद्धांत आगे कर देते हैं। और क्रिया वाले पक्ष को नकार देते हैं। फिर ऐसे लोग सीधे सवाल करते हैं: ठीक है, अगर इस तरह की सिद्धि है, तो हमारे सामने यहीं करके दिखाओ, अगर तुम्हारे पास है। पर वे कहते हैं कि जो भुगत रहा है, वही जानता है। जिसके शरीर पर पड़ती है, जिसका परिवार उस कष्ट से गुज़र रहा है, वह जानता है कि जब इन चीज़ों का असर होता है, तो सारा दर्शन किनारे हो जाता है।
एक पूरे वीडियो में दावा है कि अनघा लक्ष्मी नाम की कोई शक्ति नहीं और शंकराचार्य नाम का कोई पद नहीं
सार्वजनिक दावा कि अनघा लक्ष्मी कोई शक्ति नहीं
वक्ता कहते हैं कि एक सज्जन ने पूरा वीडियो डाला है। उसमें दावा है कि अनघा लक्ष्मी नाम की कोई शक्ति नहीं है, शंकराचार्य नाम का कोई पद नहीं है, और किसी को शंकराचार्य कहलाने का अधिकार नहीं है।
वे कहते हैं कि ऐसे विवादों की वजह से, अगर कोई विषय बहुत विवादित हो जाए, तो कुछ समय बाद वे कमेंट भी बंद कर देते हैं। उदाहरण के लिए, भगवती अनघा लक्ष्मी को लेकर एक सज्जन ने पूरा वीडियो डाला है। उसमें कहा है कि अनघा लक्ष्मी नाम की कोई शक्ति नहीं है। शंकराचार्य नाम का कोई पद नहीं है। किसी को शंकराचार्य कहलाने का अधिकार नहीं है।
क्या सूखी तुलसी दीपदान और हवन में ली जा सकती है?
सूखी तुलसी समिधा और दीपदान के लिए, और प्रक्षिप्त कहकर बचना
एक करीबी व्यक्ति ने उन्हीं सज्जन से पूछा कि बहुत लोग सूखी तुलसी से दीपदान की विधि बताते हैं, क्या यह ठीक है। उन्होंने साफ़ कह दिया कि यह मूर्खता है, ऐसा नहीं करना चाहिए। वक्ता जवाब देते हैं कि जिन्होंने सूखी तुलसी को हवन की समिधा या दीपदान के लिए लेने पर वीडियो बनाए, उन्होंने स्कंद पुराण आदि का संदर्भ दिया था। कम से कम वह संदर्भ देखा जा सकता था।
उनके बहुत करीबी एक व्यक्ति ने उन सज्जन से सवाल पूछा: बहुत लोग सूखी तुलसी से दीपदान करने की विधि बताते हैं, क्या ऐसा करना ठीक है? उन्होंने सीधे स्पष्ट कर दिया कि यह मूर्खता है, ऐसा नहीं करना चाहिए। वक्ता जवाब देते हैं कि अगर आपको शास्त्रों का इतना ज्ञान है, तो कम से कम पढ़ लेते। जिन लोगों ने वीडियो बनाए कि सूखी तुलसी हवन में समिधा के रूप में, या दीपदान के लिए ली जा सकती है, उन्होंने स्कंद पुराण आदि से संदर्भ दिया था। तो कम से कम वह संदर्भ देखा जा सकता था। वे कहते हैं कि जब कोई इन विषयों को प्रमाण के साथ स्थापित करता है, तो ऐसे लोग बस कह देते हैं कि यह प्रक्षिप्त है, यानी बाद में जोड़ा गया है। जो उनकी बात न माने, जहाँ कोई पुराण उनकी बात को गलत कहे, वहाँ वे सीधे कह देंगे कि यह प्रक्षिप्त है, और हाथ झाड़ लेंगे।
बाती में फूल बनने को लेकर क्या विवाद हुआ था?
बाती में फूल बनने पर देवताओं का आना
वक्ता कहते हैं कि उन पर सबसे ज़्यादा नकारात्मक प्रतिक्रिया दीपक और बाती वाले विषय पर आई। विषय था कि बाती में फूल बनने से देवता आते हैं। कई नियमित दर्शक, जो उनके बाकी विषय मानते हैं, खुलकर बोले कि यह वाला नहीं मानेंगे। उनका जवाब है कि किसी से मनवाना उनका काम नहीं है।
वे कहते हैं कि चैनल के नियमित श्रोता कमेंट में लिखते हैं कि वे इस या उस बात से सहमत नहीं हैं। सबसे बड़ा नकारात्मक विषय दीपक और बाती वाला रहा, कि बाती में फूल बनने से देवता आते हैं। कई लोग, जो नियमित दर्शक हैं और उनके विषय मानते हैं, बोले कि यह वाला नहीं मानेंगे। वे जवाब देते हैं कि तो मत मानिए। किसी से कुछ मनवाना उनका काम नहीं है। वह आपका विषय है, आपकी बुद्धि है, आपका विचार है। वे कहते हैं कि कमी यह है कि अंधविश्वास और साधना के क्रिया वाले पक्ष में भेद करने की क्षमता नहीं है। यह कमी एक सनातनी व्यक्ति में निम्न स्तर की क्षमता है। इसका मतलब है कि बुद्धि का सही उपयोग ही नहीं हो रहा।
नया साधक अपने पूजन का स्तर किस क्रम में बढ़ाए?
नमो मंत्र से पौराणिक मंत्र, फिर श्री सूक्त और पुरुष सूक्त
कोई व्यक्ति अचानक पुरुष सूक्त से षोडशोपचार नहीं करेगा। पहले वह अपने ढंग से, धीरे-धीरे साधारण नमो मंत्र से करेगा। फिर पौराणिक मंत्र से। और जब श्री सूक्त और पुरुष सूक्त का अभ्यास हो जाएगा, तब उनसे करेगा। जो सच में करता है, उसकी चीज़ें धीरे-धीरे बढ़ती हैं।
वे कहते हैं कि जो करना चाहता है, उसका स्तर ठीक इसी तरह धीरे-धीरे बढ़ेगा। ऐसा व्यक्ति अचानक पुरुष सूक्त से षोडशोपचार नहीं करेगा। पहले वह अपने ढंग से करेगा। धीरे-धीरे पहले साधारण नमो मंत्र से करेगा। फिर पौराणिक मंत्र से। फिर जब श्री सूक्त और पुरुष सूक्त का अभ्यास हो जाएगा, तब उनसे करेगा। फिर धीरे-धीरे उसकी चीज़ें बढ़ेंगी। पर बढ़ता वही है जो करता है। जो बहाने बनाकर भागता रहता है, उसके लिए कोई विषय ही नहीं है। और अगर वे सीधे कह दें कि केवल पुरुष सूक्त से ही करना है, अधिकार का सारा सवाल छोड़कर, तो सामने वाला तुरंत भाग जाएगा कि यह पंडित तो हमें पंडित बनाने पर तुला है। इसलिए वे कहते हैं कि वे श्रोताओं पर कोई बेवजह दबाव नहीं डालते, न ऐसा विषय रखते हैं जिसमें वे फँसकर भाग जाएँ। और जहाँ विषय बहुत कठिन हो, वहाँ वे विकल्प रखते हैं: यह नहीं कर सकते, तो यह कर लीजिए।
श्रावण का विधान हर कष्ट के लिए है — भौतिक, आध्यात्मिक या दैविक, कोई भी रोग, शोक या दोष
हर प्रकार का कष्ट इस विधान का आधार है
वे जिस विषय से शुरू करते हैं, वह यह है: आपके जीवन में जो भी कष्ट हो — भौतिक, आध्यात्मिक या दैविक, कोई भी पीड़ा, कोई रोग या शोक, कोई भी दोष — श्रावण का विधान इसी के लिए है।
श्रावण मास में पहले क्या करना चाहिए, इस पर आते हुए वक्ता कहते हैं कि वे इस विषय से शुरू करते हैं: आपके जीवन में जिस भी तरह की परेशानियाँ हों — चाहे भौतिक हों, आध्यात्मिक हों, दैविक हों, कोई भी कष्ट हो, कोई रोग या शोक हो, कोई भी दोष हो।
64 योगिनी मंदिर कहाँ हैं, और किसकी परंपरा में बने?
शंकराचार्य परंपरा के 64 योगिनी मंदिर
64 योगिनी मंदिर, जहाँ भी हैं, आदि गुरु शंकराचार्य की परंपरा में बने हैं। वे कोलकाता क्षेत्र में हैं, और मध्य प्रदेश में भोपाल क्षेत्र में, जबलपुर के आसपास। इन सभी जगहों पर विशेष पूजन होता है।
वे बताते हैं कि इस गुप्त नवरात्रि में भगवती की 64 योगिनीयों का योगिनी अनुष्ठान चल रहा है। उसकी पूर्णाहुति कल होगी। योगिनी अनुष्ठान होने के कारण इसमें सब कुछ विशेष तंत्रोक्त विधि विधान से होता है। 64 योगिनियों के मंदिर, जहाँ भी हैं, आदि गुरु शंकराचार्य जी की परंपरा में बने हैं। वे कोलकाता क्षेत्र में हैं। मध्य प्रदेश में भोपाल क्षेत्र में, जबलपुर के आसपास भी हैं। इन सभी जगहों पर उनका विशेष पूजन होता है। वे कहते हैं कि पूरा विधि विधान कभी पोस्ट करना बहुत कठिन है। इसीलिए उन्होंने इसका कोई वीडियो नहीं डाला। केवल टेलीग्राम ग्रुप में एक-दो दिन का हल्का पूजन साझा किया। कुछ अंश साझा किए जाएँगे, क्योंकि अगर ये विधान खुलकर पोस्ट हों, तो कहीं न कहीं उन्हें स्वयं हानि होगी।
पूरा तंत्रोक्त 64 योगिनी विधान कौन देख सकता है?
केवल दीक्षित साधक ही बैठकर पूरा विधान देखे
योगिनियों का साधारण अर्चन-पूजन करने में किसी के लिए कोई दोष या कठिनाई नहीं है। पर जहाँ हर योगिनी का पूरा तंत्रोक्त विधान हो रहा हो — जैसे भगवती ललिता त्रिपुर सुंदरी की 64 योगिनियों का — वहाँ कहा गया है कि केवल देखने का अधिकार भी सिर्फ़ दीक्षित साधक का है। वही वहाँ बैठकर देखे।
वक्ता कहते हैं कि अगर कोई साधारण ढंग से उनका अर्चन-पूजन कर रहा है, तो उसमें कोई दोष नहीं, कोई कठिनाई नहीं। पर जहाँ पूरे तंत्रोक्त विधान होते हैं — कम से कम जहाँ हर योगिनी की पूजा होती है, जैसे भगवती ललिता त्रिपुर सुंदरी की 64 योगिनियों की पूजा होती है, जहाँ विधान हो रहा है — वहाँ कहा गया है कि केवल देखने का अधिकार भी ऐसा है कि अगर सामने पूरा विधान चल रहा हो, तो केवल दीक्षा लिया हुआ साधक ही वहाँ बैठकर देखे। वे कहते हैं कि श्रोताओं के संतोष के लिए वे कुछ अंश ज़रूर पोस्ट करेंगे। पर केवल भरोसा दिलाने के लिए, या यह दिखाने के लिए कि बड़ा आयोजन हो रहा है, वे पूरा वीडियो कभी पोस्ट नहीं करेंगे। इसके लिए वे क्षमा माँगते हैं।
क्या श्मशान साधना और दीक्षा लाइव वीडियो में दिखानी चाहिए?
चिता पर बैठकर श्मशान साधना और दीक्षा का वीडियो बनाना
वक्ता कहते हैं कि आजकल लोग अघोर के नाम पर चिता पर बैठकर एक-एक श्मशान साधना के लाइव वीडियो करते हैं, दीक्षा तक देते हैं। वे कहते हैं कि यह उनका अपना मामला है, वे उन पर उँगली नहीं उठाते। पर ऐसी चीज़ें वे स्वयं नहीं दिखा सकते।
वे कहते हैं कि आजकल लोग अघोर के नाम पर चिता पर बैठकर एक-एक श्मशान साधना के लाइव वीडियो करते हैं, और दीक्षा देने के भी। यह उनका अपना निजी मामला है। वे किसी पर उँगली नहीं उठा रहे। वे जैसा करते हैं, करें। पर अगर तर्क यह हो कि जब श्मशान की चीज़ें लाइव हो सकती हैं, जब लोग मणिकर्णिका में चिता पर खड़े होकर विपरीत प्रत्यंगिरा का पाठ करते हुए आपके देखने के लिए अपना वीडियो बना सकते हैं, तो उससे बड़ी कौन-सी साधना या विधि है जो दिखाई नहीं जा सकती — ऐसे लोगों से वे क्षमा माँगते हैं। वे इसे नहीं दिखा सकते।
दर्शक किसी विधान का असल में कितना हिस्सा देखता है?
चक्रार्चन का दस प्रतिशत, और एक भी मुद्रा नहीं
वक्ता कहते हैं कि वे एक मुद्रा भी दिखाने में सक्षम नहीं हैं, एक मुद्रा दिखाने में भी कंजूसी करते हैं। दर्शकों को दिखाए जाने वाले विषय बहुत कम हैं। आप केवल दस प्रतिशत देखते हैं, बाकी विधान पूरा रोक लिया जाता है। बड़ी चक्रार्चन विधि में दिखाई गई थोड़ी-सी चीज़ से कहीं अधिक होता है।
वक्ता कहते हैं कि वे एक भी मुद्रा दिखाने में सक्षम नहीं हैं। एक मुद्रा दिखाने में भी वे कंजूसी करते हैं। आपको दिखाए जाने वाले विषय बहुत कम हैं, बहुत थोड़े। आप केवल दस प्रतिशत देख पाते हैं। बाकी पूरा विषय निगल लिया जाता है, मानिए या न मानिए। क्या आपको लगता है कि चक्रार्चन की पूरी बड़ी चक्र विधि में बस इतनी ही विधि है? उसमें बहुत कुछ है। वह दिखाया नहीं जा सकता, और दिखाया जाना भी नहीं चाहिए। वे कहते हैं कि जो किया जाता है, वह केवल आपको प्रेरित करने के लिए है। यह दिखाने के लिए कि यह चीज़ हो रही है, आपका अनुष्ठान हो रहा है, सबका अनुष्ठान हो रहा है। पर आपके भीतर एक जिज्ञासा होनी चाहिए, इस विषय के प्रति आकर्षण होना चाहिए, कि आप भी इस मार्ग पर कदम-कदम आगे बढ़ेंगे और ये सब चीज़ें सीखेंगे।
कुष्मांडी की बलि कैसे करनी चाहिए?
लाल वस्त्र, खड्ग का एक वार, और आँखें बंद
कई जगह कहा गया है कि जहाँ कुष्मांडी की बलि भी दी जा रही हो, वहाँ काटते समय नहीं देखना चाहिए। रखी हुई कुष्मांडी पर लाल वस्त्र डालिए, फिर काटिए — खड्ग का एक तेज़ वार, कि वह दो भागों में हो जाए। और काटते समय आपकी आँखें बंद होनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि कई जगह बात यहाँ तक जाती है कि अगर कुष्मांडी की बलि भी दी जा रही हो, तो छेदन के समय उसे नहीं देखना चाहिए। रखी हुई कुष्मांडी पर लाल वस्त्र डाल दीजिए, उसके बाद काटिए। एक तेज़ वार, और खड्ग उसे दो भागों में कर दे। और काटते समय आपकी आँखें बंद होनी चाहिए। वे जोड़ते हैं कि इसका उनके पास कोई विशेष प्रमाण नहीं है। उन्होंने इसे एक-दो जगह पढ़ा है, पर वे हाल के समय में रचे गए ग्रंथ हैं, और उनमें इसका कोई संदर्भ नहीं दिया गया। फिर भी उनका मानना है कि यह किसी विशेष सोच से लिखा गया होगा।
क्या मुद्रा और बलि कभी कैमरे पर दिखानी चाहिए?
मुद्रा और बलि कभी दिखाने की चीज़ नहीं
वक्ता कहते हैं, कभी नहीं। ये चीज़ें कभी दिखाने के लिए नहीं हैं। फिर भी महिष की बलि लाइव दिखाई जाती है, यह घोषणा करके कि अघोर काली की पूजा हो रही है, श्मशान काली को बलि दी जा रही है। उन्हें डर है कि खुद को तांत्रिक साबित करने वाले लोग आगे पंचमकार की मुद्रा और अपनी भैरवी को भी लाइव दिखाने लगेंगे।
वे कहते हैं कि एक ओर कहा जाता है कि कुष्मांडी का काटना भी नहीं देखना चाहिए, और दूसरी ओर महिष की बलि लाइव दिखाई जाती है — देखिए, यह बलि दी जा रही है, अघोर काली की पूजा चल रही है, श्मशान काली को बलि दी जा रही है। हर चीज़ आपके सामने रख दी जाती है। वे कहते हैं कि यह सोचने की बात है। क्या मुद्रा और बलि कभी दिखाई जा सकती हैं? कभी नहीं दिखाई जा सकतीं। वे कहते हैं कि उन्हें लगता है कि आने वाले समय में, खुद को तांत्रिक साबित करने के लिए, लोग पंचमकार में मुद्रा तो दिखा ही चुके हैं, बलि तो दिखा ही रहे हैं — और वे श्रोता पर छोड़ते हैं कि समझें वे किधर इशारा कर रहे हैं — कि वे वह भी लाइव दिखाने लगें, कि देखिए, हम ही तांत्रिक हैं, हम भैरवी के साथ बैठे हैं। वे कहते हैं कि बड़ा अजीब धंधा चल रहा है, इससे बचना चाहिए। निर्णय केवल आपका अपना विवेक ले सकता है।
साधक अपनी साधना को कितना गुप्त रखे?
कुलवधू की तरह सँभालकर
वक्ता कहते हैं कि तंत्र का विषय अत्यंत गुप्त है। कहा गया है कि अपने इष्ट और आराध्य के विधान — चाहे मुद्रा हो, बलि विधान हो, मंत्र हो या आपकी माला — कुलवधू की तरह छिपाकर रखने चाहिए। जैसे कुलवधू को छिपाकर रखा जाता है, जैसे गुप्तांग छिपाकर रखे जाते हैं कि सब कुछ दिखे पर वे न दिखें, वैसे ही ये सब चीज़ें गुप्त रखी जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि अगर कोई तंत्र क्षेत्र में है, तो आप सब पहले से जानते हैं कि तंत्र का विषय अत्यंत गुप्त है। ये चीज़ें कभी दिखावे का विषय नहीं हैं। कहा गया है कि आपके इष्ट और आराध्य के विधान — चाहे मुद्रा हो, चाहे बलि विधान हो, मंत्र हो, या आपकी माला — कुलवधू की तरह गुप्त रखने चाहिए। जैसे अपनी कुलवधू को छिपाकर रखा जाता है, जैसे गुप्तांग छिपाकर रखे जाते हैं कि सब कुछ दिखे पर वे न दिखें, ठीक वैसे ही ये सब चीज़ें गुप्त रखी जाती हैं। वे कहते हैं कि लोग अब ढिंढोरा पीटते हैं: देखो, मेरे पास यह है, मेरे पास यह माला है, हम यह साधना कर रहे हैं। अगर दिखावा सिद्धि के बाद आता, तो भी चर्चा हो सकती थी। यहाँ तो वह साधना के बीच में ही आ जाता है। और अगर आप सिद्ध हो गए हैं, तो वह बिल्कुल अलग बात है: एक सिद्ध का यूट्यूब पर क्या काम?
विज्ञापन अब भी 24 घंटे में वशीकरण, तलाक या साथी की वापसी का वादा करते हैं, क्योंकि लोग अब भी फँसते हैं
24 घंटे में नतीजे का धंधा
वक्ता कहते हैं कि पहले भी और अब भी यह चलता है कि हमसे मिलिए, 24 घंटे में वशीकरण होगा, तलाक होगा, आपकी पत्नी या गर्लफ्रेंड 24 घंटे में लौट आएगी। ऐसे विज्ञापन अब भी चल रहे हैं, इसका मतलब लोग अब भी जा रहे हैं, और कहीं न कहीं बात गलत है।
वक्ता कहते हैं कि पहले भी, और आज भी, यह चलता है: आइए, हमसे मिलिए, 24 घंटे में वशीकरण हो जाएगा, तलाक हो जाएगा, पत्नी वापस पाइए, गर्लफ्रेंड वापस पाइए, वह 24 घंटे में लौट आएगी। अगर इस तरह के विज्ञापन अब भी चल रहे हैं, तो कहीं न कहीं बात गलत है। कुछ लोग अब भी जा रहे होंगे, इसीलिए धंधा चल रहा है। वे कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति को बैठाकर श्रावण का माहात्म्य और यह सब समझाइए, तो वह दो थप्पड़ मारकर भगा देगा और कहेगा, चलो, मेरा काम करो। पर वह पैसा उड़ाता जाएगा। और जब पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा, तो सबको गाली देने लगेगा कि सब फ्रॉड हैं, कोई कुछ नहीं कर सकता।
"मेरे लिए वशीकरण करो, फलाने पर मारण करो" जैसे अनुरोध न कभी लिए जाते हैं, न कभी किए जाते हैं
"मेरा यह काम कर दो" वाला अनुरोध कभी नहीं लिया जाता
वे बहुत साफ़ कहते हैं कि "मेरा काम कर दो" वाला यह धंधा — मेरे लिए वशीकरण करो, फलाने पर मारण करो — न कभी लिया जाता है, न कभी किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि काम करवाने का यह धंधा — मेरा यह काम कर दो — बहुत अजीब धंधा है। और यह बात वे बहुत स्पष्टता से कहते हैं: मेरे लिए वशीकरण करो, फलाने पर मारण प्रयोग करो — यह बात न कभी ली जाती है, न कभी की जाती है।
जब कहीं और आपके लिए अनुष्ठान हो रहा हो, तब घर पर क्या करें?
अनुष्ठान चलते समय घर में दीपक और प्रार्थना
आप जहाँ भी अनुष्ठान करवा रहे हों — उनके यहाँ या कहीं और — वे हमेशा कहते हैं कि घर पर कम से कम उस देवी या देवता के सामने दीप और बाती जलाइए, और उनसे प्रार्थना कीजिए कि वे आप पर कृपा करें। वहाँ आपके लिए कोई बड़ा निजी व्यक्तिगत अनुष्ठान नहीं हो रहा। उसमें केवल दस-पंद्रह आहुतियाँ हैं।
वे कहते हैं कि लोग इतने दुष्ट हो जाते हैं कि अगर अनुष्ठान हुआ और वे उसमें जुड़ गए — मान लीजिए तंत्र अनुष्ठान — तो फिर उन्हें कोई चिंता नहीं, बस रोगी को कुछ आराम मिल जाए। जब भी कहीं अनुष्ठान हो रहा हो, वे हमेशा यही कहते हैं: घर पर कम से कम उस देवी या देवता के सामने दीप और बाती जलाइए, और उनसे प्रार्थना कीजिए कि वे आप पर कृपा करें। वहाँ आपके लिए कोई बड़ा निजी व्यक्तिगत अनुष्ठान नहीं हो रहा। उसमें केवल दस-पंद्रह आहुति हैं — बड़े नारियल के गोले और ऐसी चीज़ें, अभिमंत्रित करके दी जाती हैं — बस इतना ही। आप भी थोड़ा हाथ जोड़िए। ऐसा नहीं हो सकता कि आप रमी और ड्रीम 11 खेलते रहें, पैसा उड़ाते रहें, इधर-उधर बेकार काम करते रहें, रील देखते रहें, और फिर मैसेज भेजें कि काम क्यों नहीं हुआ। अगर काम होना है, तो उसे आने का रास्ता दीजिए। स्वयं भी प्रयास कीजिए।
जब हवन कोई और कर रहा हो, तब भी आपको स्वयं प्रार्थना क्यों करनी चाहिए?
अपना बनाया हुआ प्रारब्ध
लोग निश्चिंत हो जाते हैं कि कहीं और चल रहा हवन उन्हें ठीक कर देगा। पर वक्ता कहते हैं कि इस कष्ट का कारण वह प्रारब्ध है जो आपने स्वयं बनाया है। कोई दूसरा कितना भी करे, जब तक आप हाथ नहीं जोड़ते, वह चीज़ मुश्किल से ही फल देगी।
वे कहते हैं कि कई बार लोग यह बात कहते हैं और बेफ़िक्र रहते हैं — हवन वहाँ चल रहा है, हम उससे ठीक हो जाएँगे। पर यहाँ आपको हाथ जोड़ने होंगे। जो प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। आपने स्वयं रचा है, जिसकी वजह से यह कष्ट आया है, वही कारण है। और उसके लिए कोई दूसरा कितना भी करे, जब तक आप हाथ नहीं जोड़ते, वह चीज़ मुश्किल से ही फल देगी। वे कहते हैं कि बाद में फिर शुरू हो जाता है: कुछ नहीं हुआ। और होने में जो नतीजा चाहिए, वह यह नहीं कि कुछ आराम मिले — चाहिए यह कि जिसने किया, वह सीधे मर जाए, मुँह से खून की उल्टी करके मरे, इस तरह मरे। वे कहते हैं कि इसीलिए वे मना करते हैं: इन सब विषयों में बहुत सोच-समझकर उतरिए, नहीं तो मत उतरिए।
जिस घर पर संकट हो, उसके लिए श्रावण का मुख्य विधान क्या है?
श्रावण के पहले दिन से श्रावण पूर्णिमा तक रोज़ रुद्राभिषेक
अगर आपके घर में किसी तरह की उथल-पुथल चल रही है, या आप पर कोई अभिचार है जो साधना करते हुए भी नष्ट नहीं हो रहा, तो इस बार श्रावण के पहले दिन से श्रावण पूर्णिमा तक रोज़ भगवान शिव के मंदिर जाइए और रुद्राभिषेक कीजिए। मंत्र पाठ और अष्टाध्यायी पाठ के साथ पूरा विधि विधान करना न आता हो, तो कोई कठिनाई नहीं।
वक्ता कहते हैं कि श्रावण मास का पहला विषय, जो वे आज के लाइव में सबको बता रहे हैं, यह है। अगर आपके घर में किसी तरह की उथल-पुथल चल रही है, अगर आप पर कोई अभिचार है जो साधना करते हुए भी नष्ट नहीं हो रहा, तो इस बार सावन के पहले दिन से सावन की पूर्णिमा तक रोज़ भगवान शिव के मंदिर जाइए और उनका रुद्राभिषेक कीजिए। रुद्राभिषेक कैसे करना है — ध्यान रखिए कि अगर आपको मंत्रों के पाठ और अष्टाध्यायी के पाठ के साथ पूरा विधि विधान करना नहीं आता, तो कोई कठिनाई नहीं।
अगर पूरी रुद्राभिषेक विधि का पाठ न आए, तो कौन-सा मंत्र लें?
बारह ज्योतिर्लिंग स्तोत्र सर्वश्रेष्ठ मंत्र
वे कहते हैं कि बारह ज्योतिर्लिंग सर्वश्रेष्ठ मंत्र हैं। उस स्तोत्र में लिखा है कि केवल बारह ज्योतिर्लिंगों के स्मरण से सात जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। और जब पाप नष्ट होता है, तो भूत, प्रेत और अभिचार भी नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि पाप के कारण ही वे पकड़ते हैं।
वक्ता कहते हैं कि बारह ज्योतिर्लिंग सबसे उत्तम मंत्र हैं। उस स्तोत्र में लिखा है कि साधारण रूप से भी बारह ज्योतिर्लिंग के स्मरण से सात जन्मों में कमाए पाप नष्ट हो जाते हैं। और जब आप यह विधान श्रावण मास में करते हैं, तो पाप के नाश का क्या अर्थ है? अगर पाप नष्ट होगा, तो भूत, प्रेत और अभिचार भी नष्ट होंगे — पाप के कारण ही वे भूत-प्रेत बनकर पकड़े हुए हैं। इसलिए प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। को नष्ट करना है। यह पहली बात है: बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम से भगवान शिव पर अभिषेक।
ताँबे के लोटे से दूध कभी क्यों नहीं चढ़ाना चाहिए?
ताँबे में दूध विष जैसा हो जाता है
वक्ता कहते हैं कि ताँबे के लोटे में दूध डालकर कभी अभिषेक मत कीजिए, चाहे कोई कितना भी ज़ोर देकर कहे कि इससे शिव प्रसन्न होंगे। ताँबे के लोटे में दूध विष जैसा हो जाता है, और भगवान शिव को इस तरह विष नहीं चढ़ा सकते। पीतल का लोटा, फूला लोटा लीजिए और उससे अभिषेक कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि हमेशा याद रखिए: ताँबे के लोटे में दूध आदि डालकर अभिषेक मत कीजिए। कोई कितना भी गरजे कि ताँबे के लोटे में दूध डालकर अभिषेक करो, शिव प्रसन्न होंगे — मत कीजिए। यह पूरी तरह गलत है, मत कीजिए, यह नहीं करना चाहिए। यह सबको नहीं जमेगा। ताँबे के लोटे में दूध विष जैसा हो जाता है, और भगवान शिव को इस तरह विष नहीं चढ़ा सकते। जब विजया अभिषेक होता है, यानी भाँग से अभिषेक, तो वह उनकी शांति और प्रसन्नता के लिए, लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए, विष के नाश के लिए होता है — और उसी समय आप उन्हें ताँबे के लोटे से दूध चढ़ाते हैं। सोचिए आप क्या कर रहे हैं। इसलिए यह काम मत कीजिए: पीतल का लोटा लीजिए, फूला लोटा लीजिए, और उससे उनका अभिषेक कीजिए।
शिव मंदिर में प्रवेश से पहले क्या किया जाता है?
कर्म साक्षी दीपक और द्वारपाल
पहले स्नान करके घर का पूजन पूरा कीजिए। फिर शिव मंदिर जाइए और सबसे पहले कर्म साक्षी दीपक जलाइए, जहाँ भी वहाँ दीपदान होता हो। फिर कीर्तिमुख जी और गणपति जी का स्मरण कीजिए, और द्वार पर बैठी शक्तियों का — महाकाल, कीर्तिमुख, नंदी जी, भृंगी जी, इन सब द्वारपालों का, भैरव जी के साथ — और तभी शिव मंदिर में प्रवेश कीजिए।
वे कहते हैं कि सबसे पहले स्नान करके घर का पूजन पूरा कीजिए। उसके बाद शिव जी के मंदिर जाइए, और सबसे पहले कर्म साक्षी दीपक जलाना चाहिए। शिव जी के स्थान पर जहाँ भी दीपदान होता है, वहाँ कर्म साक्षी दीपक जलाना चाहिए। फिर कीर्तिमुख जी का स्मरण करना चाहिए, गणपति जी का स्मरण करना चाहिए, और द्वार पर बैठी शक्तियों का — महाकाल से लेकर: महाकाल, कीर्तिमुख, नंदी जी, भृंगी जी — इन सब द्वारपाल का, भैरव जी के साथ, सबका स्मरण करना है। और फिर आप शिव मंदिर के भीतर प्रवेश करेंगे।
मंदिर के देवताओं को किस क्रम में स्नान कराया जाता है?
गणपति, नंदी, पार्वती, स्कंद, जलाधारी, फिर शिवलिंग
भीतर पहले नंदी जी को स्नान कराइए — पर अगर गणपति जी का विग्रह स्नान के लिए मिल रहा हो, तो पहले गणपति जी को, फिर नंदी जी को जल से स्नान कराइए। कर्म साक्षी दीपक पहले ही जल चुका होगा। उसके बाद भगवती पार्वती जी, स्कंद जी और कुमार जी को स्नान कराइए। फिर भगवान शिव की जलाधारी को स्नान कराकर शिवलिंग का अभिषेक कीजिए।
वे कहते हैं कि वहाँ आप पहले नंदी जी को स्नान कराएँगे। अगर गणपति जी आदि का विग्रह स्नान के लिए मिल रहा हो, तो पहले गणपति जी को स्नान कराइए, फिर नंदी जी को जल से स्नान कराइए। वे कहते हैं कि कर्म साक्षी दीपक पहले ही जल चुका होगा — यह ध्यान रखिए। उन्हें स्नान कराने के बाद अब भगवती पार्वती जी, स्कंद जी और कुमार जी को स्नान कराइए। फिर भगवान शिव की जलाधारी को स्नान कराते हुए शिवलिंग का अभिषेक कीजिए।
कितना जल साथ ले जाएँ, और शिवलिंग के ऊपर वाले कलश का क्या करें?
दो लोटे, एक बाल्टी, और कलश भरना
दो लोटे साथ ले जाइए। पहले से देख लीजिए कि मंदिर में जल की व्यवस्था है। वहीं से जल लेकर सबका अभिषेक कीजिए — एक बाल्टी जल लीजिए और उससे सबका अभिषेक कीजिए, एक-एक लोटा। और शिवलिंग के ऊपर स्थापित कलश में, जिससे उस पर जल गिर रहा है, जल ज़रूर डालिए।
वे कहते हैं कि अभिषेक के लिए अगर आपके पास एक लोटा दूध है, तो बाकी सबका अभिषेक आप जल से कर ही चुके हैं। इसलिए दो लोटे साथ ले जाइए। पहले से देख लीजिए कि मंदिर में जल की व्यवस्था है। वहीं से जल लेकर सबका अभिषेक कीजिए। एक बाल्टी जल लीजिए और उससे सबका अभिषेक कीजिए, एक-एक लोटा। और भगवान शिव के शिवलिंग के ऊपर जो कलश स्थापित होगा, जिससे शिवलिंग पर जल गिर रहा होगा, उसमें जल ज़रूर डालिए।
शिवलिंग पर जल, दूध और भाँग किस क्रम में चढ़ाए जाते हैं?
जल, फिर ज्योतिर्लिंग नामों के साथ दूध, फिर विजया अभिषेक
पहले शिव जी को एक लोटा जल, उसके बाद दूध से अभिषेक, जिसमें आप बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम लेते जाइए — "सोमनाथाय नमः, मल्लिकार्जुनाय नमः, महाकालेश्वराय नमः" इत्यादि। उसके बाद अगर भाँग लाए हैं, तो भाँग को जल में मिलाकर उससे विजया अभिषेक कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि पहले शिव जी का एक लोटा जल से अभिषेक, और उसके बाद दूध से अभिषेक कीजिए, जिसमें आप बारह ज्योतिर्लिंग के नाम लेते जाइए। सोमनाथाय नमः, मल्लिकार्जुनाय नमः, महाकालेश्वराय नमः — ऐसे बोलते-बोलते आपने उनका अभिषेक कर दिया। उसके बाद, अगर आप भाँग लेकर गए हैं, तो भाँग को जल में मिलाकर उससे विजया अभिषेक कीजिए।
अभिषेक के लिए गंधोदक कैसे बनता है?
रोली, पिसा कपूर और अगरु वाला जल
गंधोदक यानी जल, जिसमें थोड़ी रोली और कपूर का चूर्ण डालें — कपूर हाथ से मसलकर — और अगरु मिलाकर सुगंधित कर दें। अगर गंधोदक बनाकर उससे शिव जी का अभिषेक करें, तो वह सर्वोत्तम है। और दूध न हो, तो यही लेना है।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप गंधोदक बना रहे हैं — यानी जल में थोड़ी रोली और कपूर का चूर्ण डालेंगे, कपूर मसलकर, और अगरु मिलाएँगे कि वह सुगंधित हो जाए — और उससे शिव जी का अभिषेक करते हैं, तो वह सर्वोत्तम है। दूध न होने पर सावन में घर पर रोज़ का रुद्राभिषेक इसी से करना है। वे कहते हैं कि इसकी विधि चैनल पर अलग से बनी हुई है, आप वहाँ देख सकते हैं। उस ढंग से आप नित्य अभिषेक कर सकते हैं।
श्रावण के रोज़ के अभिषेक के साथ कितना जप करें?
कम से कम दस माला
अगर आप जप नहीं कर रहे, और सौ माला का समय नहीं है, तो केवल पाँच माला कीजिए — वे कहते हैं, कम से कम दस माला कीजिए; पाँच माला से क्या होगा, कम से कम दस माला ज़रूर होनी चाहिए। और बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम से अभिषेक अवश्य कीजिए, दूध न हो तो गंधोदक से।
वे कहते हैं कि अगर आप जप नहीं कर रहे, अगर सौ माला जप करने का इतना समय नहीं है, तो केवल पाँच माला कीजिए — कम से कम दस माला ज़रूर कीजिए। पाँच माला से क्या होगा; कम से कम दस तो ज़रूर होनी चाहिए। और बारह ज्योतिर्लिंग के नाम से अभिषेक ज़रूर होना चाहिए। दूध न हो, तो गंधोदक से कीजिए। वे दोहराते हैं कि इसका वीडियो अलग से पहले से है।
अभिषेक के बाद शिव को क्या अर्पित करें?
सिर पर त्रिपुंड, बिल्वपत्र और फूल
फिर शुद्ध जल से उनका अभिषेक करें। त्रिपुंड आदि बनाकर, जो बिल्वपत्र और फूल आप ले गए हैं, वे भगवान शिव के सिर पर चढ़ाएं।
वक्ता कहते हैं, फिर शुद्ध जल से उनका अभिषेक करें। त्रिपुण्ड्र आदि बनाकर, जो बिल्वपत्र, फूल आदि आप साथ ले गए हैं, वे भगवान शिव के मस्तक पर चढ़ाएं।
पूरे श्रावण शिव को कौन सी माला चढ़ाएं?
शिव के लिए नील अपराजिता की माला, और एक पार्वती के लिए
अगर सावन में रोज़ नील अपराजिता की माला मिल जाए — नीले अपराजिता के फूल की माला — तो वह माला भगवान शिव को ज़रूर पहनाएं। अगर आप दो माला ले जाने में आर्थिक रूप से सक्षम हैं, या आपके पास अपराजिता की बेल है, तो माला खुद बनाकर चढ़ाएं: पूरे श्रावण एक माला भगवान शिव को और एक माँ पार्वती को।
वे कहते हैं, अगर सावन में रोज़ नील अपराजिता की माला आपको मिल जाए, नीले अपराजिता के फूल की माला, तो वह माला भगवान शिव को ज़रूर पहनाएं। अगर आपकी आर्थिक क्षमता दो माला ले जाने की है, या आपके घर के पास अपराजिता की बेल है, तो माला खुद बनाकर चढ़ाएं। नहीं तो पूरे श्रावण दो माला चढ़ाएं — एक माला भगवान शिव को और एक माला माँ पार्वती को।
इस श्रावण विधान का संकल्प किन कामनाओं के लिए लिया जा सकता है?
कोई भी धर्मयुक्त कामना
वे कहते हैं, आपकी कोई भी कामना जो धर्मयुक्त हो — कोर्ट केस में जीत, सताने वाले शत्रुओं से रक्षा, प्राणों की रक्षा, धन की प्राप्ति, किसी भी क्षेत्र में विजय, कार्यस्थल की परेशानी, भूत-प्रेत की परेशानी, कोई भी परेशानी। जिस संकल्प से आप पूजन करेंगे, उसमें आपको अत्यधिक सफलता मिलेगी। भगवान शिव ज़रूर कृपा करेंगे।
वक्ता कहते हैं, आपकी जो भी कामना हो, बस वह धर्म से जुड़ी हो। चाहे कोर्ट केस में जीत की हो; चाहे आप शत्रुओं से बहुत परेशान हों और उनसे रक्षा के लिए हो; चाहे प्राणों की रक्षा के लिए हो; धन की प्राप्ति के लिए; किसी भी क्षेत्र में विजय के लिए; कार्यस्थल की परेशानी; भूत-प्रेत की परेशानी — कोई भी परेशानी हो। पूजन करते समय आप जो सकाम व निष्काम संकल्प लेंगे, उसमें आपको अत्यधिक सफलता मिलेगी। भगवान शिव ज़रूर अपनी कृपा करेंगे।
अपराजिता के साथ एक मंडल के संकल्प से सिर्फ़ एक हफ़्ते में मील का पत्थर जैसी सफलता मिली
एक मंडल का संकल्प और एक हफ़्ते में पूरा हुआ काम
वे बताते हैं कि उन्हें जीवन में एक बहुत बड़ी सफलता मिली, जिसे वे मील का पत्थर मानते हैं। उसमें उन्होंने अपराजिता का बहुत दिव्य तरीके से प्रयोग किया, साथ में भगवती के कुछ विशेष प्रयोग भी। उन्होंने एक मंडल का संकल्प लिया था, और सिर्फ़ एक हफ़्ते बाद उनका काम हो गया — प्रतियोगिता के क्षेत्र में उनसे पहले गए लोगों को जो मिला, उसका दोगुना उन्हें मिला।
वक्ता कहते हैं, उन्हें अपने जीवन में एक बहुत बड़ी सफलता मिली, जिसे वे अपने जीवन का मील का पत्थर मानते हैं। उसमें उन्होंने अपराजिता का बहुत दिव्य तरीके से प्रयोग किया, साथ में भगवती के कुछ विशेष प्रयोग भी। लोग जो कहते हैं कि सिर्फ़ संकल्प लेने से सिद्धि होती है, वह उन्होंने अपने जीवन में तभी पहली बार देखा। अपराजिता का प्रयोग फिर भी थोड़ा लंबा था। पर उन्हें लगता है कि इन सबके कारण ही, एक मंडल का संकल्प लेकर, सिर्फ़ एक हफ़्ते बाद उनका काम हो गया। और वह बहुत बड़ा काम था। वे कहते हैं, वह इतना बड़ा था कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्रतियोगिता के क्षेत्र में, जिस चीज़ के लिए वह प्रतियोगिता थी, उनसे पहले गए लोगों को जो मिला, उसका दोगुना उन्हें एक झटके में मिला। पहले से अनुष्ठान चल रहा था, पहले का पुण्य भी रहा होगा, पर भगवती ने कृपा की। वे कहते हैं, अगर आप इन सब चीज़ों का प्रयोग करेंगे — ये अनुभव की बातें हैं — तो भगवान शिव आप पर विशेष कृपा करेंगे।
शिव के श्रृंगार में अपराजिता के कौन से फूल और पत्ते लगा सकते हैं?
नील अपराजिता सबसे श्रेष्ठ, सफ़ेद, गुलाबी और लाल भी चल सकते हैं
आप अपराजिता के फूलों से, बिल्वपत्र से और अपराजिता के पत्तों से भी उनका श्रृंगार कर सकते हैं। अपराजिता के पत्ते, बेल के पत्ते, और खासकर नील अपराजिता। सफ़ेद अपराजिता भी लगा सकते हैं। दूसरे रंग मिलें — गुलाबी, लाल — तो वे भी लगा सकते हैं, पर नील अपराजिता सबसे श्रेष्ठ है।
वे कहते हैं, अगर आप शिव मंदिर में अपराजिता के फूल से उनका श्रृंगार करें, यानी बिल्वपत्र और अपराजिता का फूल, तो इनसे उनका श्रृंगार करें। अपराजिता के पत्तों से भी श्रृंगार कर सकते हैं — अपराजिता के पत्ते, बेल के पत्ते, और खासकर नील अपराजिता। सफ़ेद अपराजिता भी लगा सकते हैं। अगर दूसरे रंग की अपराजिता मिले — गुलाबी, लाल — तो वह भी लगा सकते हैं, पर नील अपराजिता सबसे श्रेष्ठ है।
क्या यह सच है कि अविवाहित पुरुष को शिव पर नील अपराजिता नहीं चढ़ानी चाहिए?
एक रोक जिसे वक्ता प्रमाणहीन मानते हैं
वक्ता कहते हैं कि वे इसे प्रामाणिक नहीं मानते। आज तक किसी तंत्र ग्रंथ में उन्हें यह प्रमाण के रूप में लिखा नहीं मिला, हालाँकि उनके अध्ययन में कमी हो सकती है। कुछ लोगों से सुनने में आता है कि अविवाहित पुरुष को शिव जी पर नील अपराजिता का फूल नहीं चढ़ाना चाहिए, पर वे कहते हैं कि इसका उनके पास कोई आधार नहीं है।
वक्ता कहते हैं, इसमें एक विषय और है, पर वे इसे प्रामाणिक नहीं मानते। आज तक किसी तंत्र ग्रंथ में उन्हें यह कहीं लिखा हुआ, प्रमाण के रूप में, नहीं मिला। हो सकता है उनके अध्ययन में कमी हो — वे यह नहीं कह सकते कि उन्होंने सब पढ़ लिया है और तंत्र के सम्राट बनकर बैठे हैं — पर उन्होंने ऐसे किसी स्रोत से यह सुना, यानी पढ़ा, नहीं। फिर भी कुछ लोगों से यह सुनने में आता है कि अगर पुरुष अविवाहित है, तो उसे शिव जी पर नील अपराजिता का फूल नहीं चढ़ाना चाहिए। उनके पास इसका कोई आधार नहीं है। एक दिन उन्होंने फ़ेसबुक पर भी यह खूब शेयर होते देखा। वे बताते हैं कि इसके पीछे कारण यह दिया जाता है कि नील अपराजिता खुद दो तरह की होती है — पंखुड़ियाँ देखें तो किसी में एक परत होती है, और किसी में दोहरी परत, जो ज़्यादा खिली होती है — और इसी आधार पर चढ़ाना मना किया जा रहा है। वे कहते हैं कि वे यह नहीं मान सकते, क्योंकि इस कारण से तो ऐसे बहुत से फूल मिल जाएंगे। और वे वह कारण यहाँ बताना नहीं चाहते, नहीं तो कहने वालों के शिष्य और चेले-चपाटे शुरू हो जाएंगे।
नील अपराजिता की रोक के लिए शारदा तिलक, श्री विद्यार्णव या कुलार्णव से कोई संदर्भ नहीं दिया गया
शारदा तिलक, श्री विद्यार्णव, कुलार्णव — नील अपराजिता की रोक का कोई संदर्भ नहीं
वे बताते हैं कि उन्होंने तीन-चार दिन इस बात का पीछा किया, ताकि प्रमाण मिले और मेल खाए तो वे खुद भी लोगों को मना करें। उन्होंने शारदा तिलक से, श्री विद्यार्णव से, कुलार्णव से — कहीं से भी प्रमाण माँगा। कहीं से कुछ नहीं दिया गया। बस इतना कहा कि ऐसा नहीं होता, हमारे गुरुजी ने कहा है कि नहीं होता। कोई प्रमाण नहीं मिला।
वक्ता कहते हैं, जहाँ वे शिव महापुराण से प्रमाण देते हैं, वहाँ भी सवाल उठते हैं और लोग अटकाते हैं। लोग बेतुके सवाल पूछते हैं कि हम इसे कैसे मानें, जबकि उनके सामने महापुराण खोलकर अनुवाद के साथ संस्कृत श्लोक दिखाया जाता है। वहाँ जब लोगों ने सवाल पूछे, तो कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। उन्होंने तीन-चार दिन इसका पीछा किया, ताकि प्रमाण मिले और वे भी लोगों को मना करें, और वे उसे मिलाते। शारदा तिलक से दो, या श्री विद्यार्णव से दो, या कुलार्णव से — कहीं से तो दो। कहीं से कुछ नहीं दिया गया। बस इतना कहा कि ऐसा नहीं होता, हमारे गुरुजी ने कहा है कि नहीं होता। उन्होंने कहा कि अपने गुरुजी से भी पूछो, ताकि कोई प्रमाण मिले। कोई प्रमाण नहीं मिला। इसलिए वे कहते हैं, उनके अनुसार यह गलती बिल्कुल मत कीजिए: वह फूल भगवान शिव को चढ़ाइए। वह उनके सबसे प्रिय फूलों में से है।
घर में अपराजिता और पारिजात के पौधों का क्या महत्व है?
भगवती के फूल जो स्वर्ग से आए
अपराजिता का फूल सीधे भगवती का फूल है — पारिजात और अपराजिता स्वर्ग से आए। जिस घर में ये हों, वहाँ बात ही अलग है: वहाँ शिव और शक्ति के तत्व हमेशा रहते हैं, और योगिनियों का स्थान अपने आप बन जाता है।
वक्ता कहते हैं, अपराजिता का फूल सीधे भगवती का फूल है। पारिजात और अपराजिता स्वर्ग से आए। इसलिए जिनके घर में ये हैं, उनकी बात ही अलग है — अगर पारिजात का पेड़ हो, और घर में अपराजिता के फूल की बेलें लगी हों। तब वहाँ सीधे शिव और शक्ति, उनके तत्व, हमेशा रहते हैं; वहाँ योगिनीयों का स्थान अपने आप बन जाता है।
ऐसे फूलों वाले पौधे उखाड़ने का क्या दोष है?
हरे पेड़ और बेलें उखाड़ने से वंश नष्ट होता है
ये फूल, ये बेलें, इस तरह के पेड़ कभी उखाड़कर नहीं फेंकने चाहिए — हरे-भरे पेड़ कभी उखाड़कर नहीं फेंकने चाहिए। वे कहते हैं, इसका बहुत बड़ा दोष लगता है: व्यक्ति नष्ट होता है, वंश नष्ट होता है, आर्थिक रूप से पूरा विनाश आ जाता है।
वक्ता कहते हैं, ये फूल, ये बेलें, इस तरह के पेड़ कभी उखाड़कर नहीं फेंकने चाहिए — हरे-भरे पेड़ कभी उखाड़कर नहीं फेंकने चाहिए। इसका बहुत बड़ा दोष लगता है। व्यक्ति नष्ट होता है; वंश नष्ट होता है; आर्थिक रूप से पूरा विनाश आ जाता है। यह गलती कभी मत कीजिए। जहाँ भी पारिजात या अपराजिता आदि लगे हों, फूल हो या पौधा — जैसे हम तुलसी जी का आदर करते हैं, वैसे ही तुलसी जी के अलावा इन सबका भी बड़ा महत्व है। वे आगे कहते हैं, संध्या के फूलों से भी भगवान शिव का श्रृंगार कर सकते हैं, पर उन्हें भी उखाड़ना नहीं चाहिए; भगवती के ये फूल पीले और लाल रंग में होते हैं।
अगर मंदिर में और कुछ न कर सकें तो सबसे सरल उपाय क्या है?
रुद्राष्टकम का पाठ, और हो सके तो पंचामृत या दही-गुड़
जब आप श्रृंगार और बाकी सब कर लें, तो वहाँ सबसे सरल और साधारण विधान, अगर और कुछ न करें, रुद्राष्टकम का पाठ है। बाकी, अगर आप पंचामृत से पूरा अभिषेक कर सकें, या दही और गुड़ से अभिषेक कर सकें, तो जितना हो सके उतना कीजिए।
वक्ता कहते हैं, जब आप श्रृंगार और बाकी सब कर लें, तो वहाँ सबसे सरल और साधारण विधान रुद्राष्टकम् का पाठ है, अगर आप और कुछ भी न करें। बाकी, अगर आप पंचामृत से पूरा अभिषेक कर सकें, अगर दही और गुड़ से अभिषेक कर सकें, तो जितना हो सके उतना कीजिए।
एक लोटा जल को सभी समस्याओं का हल बताने वाली फ़ेसबुक पोस्ट को अलौकिक ज्ञान बताया गया
अलौकिक ज्ञान के दावे पर सवाल
वे कहते हैं कि ऐसे ज्ञान देने वाले आते रहते हैं। आज फ़ेसबुक पर एक आए, जिन्होंने पूरा विषय लिखा था कि एक लोटा जल सभी समस्याओं का हल है। इस पर वे यह भी पूछते हैं: अलौकिक ज्ञान से आपका क्या मतलब है — कि शरीर छोड़कर, यह संसार छोड़कर ज्ञान पाना है?
वक्ता कहते हैं, आपको ऐसे ज्ञान बाँटने वाले लोग मिले होंगे। आज फ़ेसबुक पर भी एक आए, जिन्होंने पूरा विषय लिखा है कि एक लोटा जल हर समस्या का हल है, और उसमें ऐसी बातें भी कह दी हैं। वे पूछते हैं, अलौकिक ज्ञान से आपका क्या मतलब है — कि शरीर छोड़कर, यह संसार छोड़कर ज्ञान पाना है? वे कहते हैं, उन्होंने पहले उनकी प्रोफ़ाइल देखी। अगर वे सुन रहे हैं, तो जो भी वे कहेंगे उसका बुरा माना जाएगा, और वह उनका मामला है। वे कहते हैं, अगर आपके पास इतना ज्ञान है, तो उस स्तर के लोगों से चर्चा कीजिए — वे पहले ही कह चुके हैं कि वे विद्या में उनकी बराबरी के नहीं हैं।
विस्तार से पूजा करने पर लोग ताना मारें तो क्या करें?
भक्ति दिखावे की चीज़ नहीं
जब आप श्रावण में पूजा और सेवा करेंगे, तो आपकी फूलों की डलिया भरी होगी, और लोग आपके पात्रों में जल, दूध, दही, शहद और घी देखेंगे। ईर्ष्या में वे पूछेंगे कि इतने दिखावे की क्या ज़रूरत है। इसीलिए कहा गया है कि भक्ति दिखावे की चीज़ नहीं है — इससे लोगों में ईर्ष्या पैदा होती है। इसे अनदेखा कीजिए और अपना काम पूरा कीजिए।
वक्ता कहते हैं, जब आप श्रावण मास में पूजा और सेवा करेंगे, तो आपकी फूलों की डलिया भरी होगी, और लोग आपके पात्र में जल, दूध, दही, मधु, शहद और घी देखेंगे। तब ईर्ष्या में वे कहेंगे, इतने ताम-झाम की क्या ज़रूरत है? शिव जी से क्या माँग लिया, बस इतना ही? वे तरह-तरह की बातें कहेंगे। इसीलिए कहा गया है कि भक्ति दिखावे की चीज़ नहीं है; इससे लोगों में ईर्ष्या पैदा होती है, क्योंकि आप अच्छा काम कर रहे हैं। इसलिए इसे अनदेखा कीजिए, और अपना पूरा काम पूरा कीजिए।
वे 64 योगिनियाँ कौन हैं जिनके स्तोत्र का पाठ करना चाहिए?
भगवती दुर्गा की प्रमुख 64 योगिनियाँ
भगवान शिव का पूजन पूरा करने के बाद भगवती की 64 योगिनियों का पूजन करना चाहिए। वे कहते हैं कि वे 64 योगिनी स्तोत्र PDF के रूप में अपलोड करेंगे, जिसमें भगवती दुर्गा की प्रमुख 64 योगिनियों के नाम होंगे — वही प्रमुख योगिनियाँ जिनका स्वरूप महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती और सभी दश महाविद्याओं में बदलता है।
वक्ता कहते हैं, भगवान शिव का पूजन करने के बाद भगवती की 64 योगिनीयों का पूजन करना चाहिए। 64 योगिनियों में किनका नाम लेना है, कैसे लेना है, उनके नाम क्या हैं, और बिना नाम के कैसे करना है — 64 योगिनी स्तोत्र आदि भी वे अपलोड करेंगे, और आप उस PDF की मदद ले सकते हैं। वे उनके नाम डालेंगे जो प्रमुख रूप से भगवती दुर्गा की 64 योगिनियाँ हैं, ताकि वही योगिनियाँ — वे प्रमुख योगिनियाँ जिनका स्वरूप ही महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती और दसों महाविद्याओं में बदलता है — जिनका नाम आप वहाँ स्मरण करेंगे। यानी आप उस स्तोत्र का, 64 योगिनी स्तोत्र का, पाठ करेंगे।
64 योगिनियों को कितनी लौंग चढ़ाई जाती है, और किसके साथ?
खप्पर में 128 लौंग और कपूर
जीवन में किसी भी दैविक बाधा के लिए, शिव जी के पूजन के बाद 64 योगिनियों का पूजन और स्मरण कीजिए। फिर अगर आप आर्थिक रूप से सक्षम हैं, तो पूरे सावन 64 योगिनियों को दो-दो लौंग चढ़ाइए — यानी 128 लौंग — और जितना हो सके कपूर, नीचे खप्पर में रखकर; कपूर गिनने की ज़रूरत नहीं।
वक्ता कहते हैं, आपके जीवन में जो भी दैविक बाधा हो, अगर शिव जी के पूजन के बाद आपने 64 योगिनीयों का पूजन भी किया और उनका स्मरण किया, तो उस स्मरण के बाद, अगर आप आर्थिक रूप से सक्षम हैं, पूरे सावन गिनती 64 नहीं, ज़्यादा है। 128 लौंग हो जाती हैं, क्योंकि लौंग जोड़े में चढ़ाई जाती हैं। और कपूर जितनी आपकी शक्ति हो — इसमें कपूर गिनने की ज़रूरत नहीं। कपूर नीचे खप्पर में रखिए, और 128 लौंग, 64 योगिनियों को दो-दो लौंग, जो 128 होती हैं।
शिव मंदिर में योगिनियों का अर्पण कहाँ रखें?
सौ धनुष के घेरे में, जो शिव क्षेत्र है
इसे शिव जी के अरघे के ठीक बगल में मत रखिए, जहाँ लोग चिल्लाएंगे कि आप उनके हाथ जला देंगे — इसे दूर, किनारे रखिए। जहाँ शिवलिंग स्थापित है, उसके चारों ओर सौ धनुष का पूरा घेरा शिव क्षेत्र कहलाता है। उस पूरे क्षेत्र में किनारे कहीं भी आप 64 योगिनियों के नाम से यह अर्पण कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं, इसमें 128 लौंग डालकर भगवती की 64 योगिनीयों के नाम से समर्पित कीजिए — पर ऐसे नहीं कि शिव जी के अरघे के ठीक बगल में रख दें और फिर लोग आप पर चिल्लाने लगें कि आप उनके हाथ जला देंगे, शिव जी को जला देंगे। इसे दूर रखिए, किनारे रखिए। शिव जी के पूरे परिसर में, जहाँ शिवलिंग स्थापित है, उसके चारों ओर सौ धनुष का पूरा घेरा शिव क्षेत्र कहलाता है। उस पूरे क्षेत्र में किनारे कहीं भी आप 64 योगिनियों के नाम से यह बलि अर्पण कर सकते हैं।
योगिनियों का स्थान किस दिशा में है?
पूर्व की ओर मुख करें तो दक्षिण
अगर आप मंडल देखें कि किस तरफ़ होना चाहिए, तो वह दक्षिण में होगा। अगर हम पूर्व की ओर मुख करें, तो योगिनियों का स्थान दक्षिण की ओर है। इसलिए दक्षिण दिशा में, अगर वहाँ भगवती की योगिनियों के नाम से कोई स्थान हो, तो वहाँ 128 लौंग और कपूर जलाइए — योगिनियों का पाठ करने के बाद।
वक्ता कहते हैं, अगर आप मंडल देखने जाएं कि किस तरफ़ होना चाहिए, तो वह दक्षिण में होगा। अगर हम पूर्व की ओर मुख करें, तो योगिनीयों का स्थान दक्षिण की ओर है। इसलिए दक्षिण दिशा में, अगर वहाँ भगवती की योगिनियों के नाम से कोई स्थान हो, तो उस जगह 128 लौंग और कपूर आदि जलाइए — योगिनियों का पाठ करने के बाद। किसी को बताने या पूछने की, या कुछ और करने की ज़रूरत नहीं; बस इतना ही कीजिए।
जब समस्या बहुत बड़ी हो और कोई रास्ता न दिखे, तो अष्टमातृकाओं के नाम से आठ जायफल की बलि दी जाती है
अष्टमातृकाओं को आठ जायफल
अगर आपकी समस्या बहुत बड़ी है और कोई रास्ता नहीं दिख रहा, तो बजट बनाइए: आठ महाशक्तियाँ, महादुर्गाएँ, अष्टमातृकाएँ। दुर्गा सप्तशती में दुर्गा कवच पढ़िए, आपको उनके नाम पता चल जाएंगे। उनके नाम से जायफल की बलि देनी है, उसी पात्र में — मिट्टी का बड़ा पात्र, जिसमें 128 लौंग, कपूर और आठ जायफल हों।
वक्ता कहते हैं, अगर आपकी समस्या बहुत बड़ी है, बेहद बड़ी, और कोई रास्ता निकल ही नहीं रहा, तो इसके लिए बजट बनाइए। यहाँ आपको यह करना है: आठ महाशक्तियाँ, जो महादुर्गाएँ हैं, जो अष्टमातृकाएँ हैं। दुर्गा सप्तशती में दुर्गा कवच पढ़िए, आपको अष्टमातृकाओं के नाम पता चल जाएंगे। उनके नाम से बाकी चीज़ों के साथ जायफल की बलि देनी है। उसी पात्र में — मिट्टी का एक बड़ा पात्र रखिए — 128 लौंग, कपूर और आठ जायफल डालिए। जायफल बिना छिलके का हो, और उसे पहले से अच्छी तरह धोकर साथ ले जाइए। फिर उनके नाम से एक-एक जायफल रखिए।
क्या अष्टमातृकाओं के लिए आठ अलग दीपक जला सकते हैं?
आठ दीपक, पर तीस दिन का बजट
वे कहते हैं, चाहें तो आप आठ अलग दीपक भी जला सकते हैं, पर आपका बजट बढ़ जाएगा — पूरा काम तीस दिन करना है। यह मंदिर में कीजिए।
वक्ता कहते हैं, चाहें तो आप उनके लिए आठ अलग दीपक भी जला सकते हैं। पर आपका बजट बढ़ जाएगा, क्योंकि यह सब तीस दिन करना है। यह मंदिर में कीजिए।
क्या यह सच है कि जायफल की बलि देने से नुकसान होता है?
जायफल बलि के ख़िलाफ़ डर फैलाने को नकारना
वक्ता पहले से यह आपत्ति सोचते हैं कि लोगों ने सुना है कि जायफल की बलि देने से नुकसान होता है, अपनी मनगढ़ंत चीज़ें नहीं करनी चाहिए, जायफल की बलि नहीं देनी चाहिए। वे जवाब देते हैं, ऐसे चलेंगे तो चलना ही मुश्किल हो जाएगा। फिर कहेंगे कि घी का दीपक मत जलाओ, सिर्फ़ तेल का; घर में शिव पूजा मत करो; शिवलिंग रखने से पैरों में लकवा हो जाता है। इतना अंधविश्वासी बनने की कोई ज़रूरत नहीं।
वक्ता कहते हैं, इसमें एक सवाल उठेगा: भाई, हमने सुना है कि जायफल की बलि देने से नुकसान होता है, लोग मना करते हैं, कहते हैं कि अपनी मनगढ़ंत चीज़ें नहीं करनी चाहिए, जायफल की बलि नहीं देनी चाहिए। वे जवाब देते हैं, ऐसे चलेंगे तो चलना ही मुश्किल हो जाएगा। फिर कहेंगे कि घी का दीपक मत जलाओ, सिर्फ़ तेल का दीपक जलाओ। कुछ समय यह भी चला कि सिर्फ़ लाल बत्ती वाला दीपक जलाओ और तेल मत लगाओ। जीना दूभर कर दिया जाएगा — कि घर में शिव जी की पूजा मत करो, कि शिवलिंग रखने से आदमी अपाहिज हो जाता है, पैरों में लकवा आ जाता है। तरह-तरह के उलझाने वाले विषय आपके सामने रखे जाएंगे। इतना अंधविश्वासी बनने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। यह ध्यान रखिए।
जो घर अपनी परंपरागत बलि छोड़ देते हैं, उनका क्या होता है?
बारह-पंद्रह साल बाद विनाश
वे कहते हैं, लोग धीरे-धीरे बकरे काटना, छाग बलि और महिष बलि बंद कर रहे हैं। दूसरे अपने घरों में आवाज़ उठाते हैं कि देवी-देवताओं का अपमान हो रहा है। बारह-पंद्रह साल ठीक चलने के बाद वे बर्बाद होने लगते हैं, और फिर दोष देते हैं कि अनुष्ठानों से कोई लाभ नहीं हो रहा।
वक्ता यहाँ कहते हैं, नींबू मत काटो। बकरा काटना, छाग बलि करवाना, महिष बलि करवाना — वैसे भी सब बंद हो रहा है, लोग धीरे-धीरे ऐसा कर रहे हैं। कितने ही लोग अपने घरों में आवाज़ उठाते हैं कि देवी-देवताओं का अपमान हो रहा है — बारह-पंद्रह साल सब ठीक रहने के बाद वे बर्बाद होने लगते हैं, और फिर दोष देते हैं कि अनुष्ठान करने से कोई लाभ ही नहीं हो रहा। कहाँ से होगा? वे एक उदाहरण देते हैं: अपने माता-पिता को लीजिए। उनके कारण आपने जन्म लिया; उन्होंने आपको पाला-पोसा, योग्य बनाया, और आप कमाने लगे। जब उनका समय आया कि उन्हें दो रोटी मिले, तो आपने उन्हें खाना देना ही बंद कर दिया। उनका शाप ही तो लगेगा, है ना? कुल के देवी-देवताओं ने आपको अपने कुल में जन्म दिया, सामर्थ्य दिया, धन-धान्य से भरा, वंश और संतान से भरा — और आपने क्या किया?
बलि बंद होने के बाद कुल की शक्तियाँ कितना इंतज़ार करती हैं?
कम से कम बारह साल की क्षमा
सब कुछ मिल जाने के बाद कोई आपको यह विचार दे देता है कि गला नहीं काटना चाहिए, जीव हत्या नहीं करनी चाहिए, यह दोष लगेगा — जबकि एक व्यक्ति पचास साल से, दो-तीन पीढ़ियों से यह देता आ रहा है। छोड़ने के बाद वे शक्तियाँ बारह-पंद्रह साल इंतज़ार करेंगी; उनकी क्षमा कम से कम बारह साल चलेगी, और क्योंकि दो-तीन पीढ़ियों से आप पूजा करते आए हैं, कुछ पुण्य जमा होगा।
वक्ता कहते हैं, जब सब कुछ मिल गया, तो कोई दोगला व्यक्ति आपको यह विचार दे देता है कि गला नहीं काटना चाहिए, जीव हत्या नहीं करनी चाहिए, यह दोष लगेगा — जबकि यहाँ एक व्यक्ति पचास साल से, दो-तीन पीढ़ियों से यह देता आ रहा है। वे कहते हैं, इससे डरने की कोई ज़रूरत नहीं; यह हिंसा आपसे सिर्फ़ डर पैदा करके छुड़वाई जाती है, यह कहकर कि इसका पाप बहुत बड़ा है। और इसलिए यह छोड़ दी गई। छोड़ने के बाद वे शक्तियाँ बेशक बारह-पंद्रह साल इंतज़ार करेंगी। उनकी क्षमा कम से कम बारह साल चलेगी। और क्योंकि दो-तीन पीढ़ियों से आपकी पूजा होती आई है, कुछ पुण्य जमा होगा। वे कहते हैं, अब आपने उन्हें भूखा छोड़ दिया — वही उनका भोजन है।
क्या इसकी जगह अपने खून की बलि दी जा सकती है?
विधि पता हो तो अपने खून की बलि दीजिए
कुछ लोग कहेंगे, तो अपने खून की बलि दो। अगर आपमें सामर्थ्य है और विधि पता है, तो उन्हें मनाइए और अपने खून की बलि देते रहिए, अपने हृदय से निकालकर दीजिए। वे कहते हैं, खून की बलि कीजिए — इसमें कोई मनाही नहीं है।
वक्ता बताते हैं, कुछ लोग कहेंगे कि अपने खून की बलि दो। अगर सामर्थ्य है, अगर विधि पता है, तो उन्हें मनाइए और अपने खून की बलि देते रहिए; अपने हृदय से निकालकर दीजिए। खून की बलि कीजिए — इसमें कोई मनाही नहीं है।
बलि छोड़ने के बाद जब कुल शक्तियों का रक्षा कवच हट जाता है, तब क्या होता है?
पूर्वजों की शक्तियों की रक्षा हटने पर रोग, और शरीर पर प्रेत-पिशाच
बाद में, जब आप नहीं देते, तो वे खुद आपके खून की बलि लेने लगती हैं। तब आपके घर में रोगों का पूरा आक्रमण होता है, रक्षा कवच पूरी तरह हट जाने पर प्रेत और पिशाच शरीर पर खेलने लगते हैं, और विनाश शुरू हो जाता है। फिर साधना करते रहिए; ओझा, सोखा, पंडित और तांत्रिकों को कोसते रहिए कि उनके पास कोई सिद्धि नहीं।
वक्ता कहते हैं, जब यह होता है, और आप इससे बहुत उत्साहित होते हैं — देखो, हमने जीव हत्या बंद कर दी — तो उसका पूरा विषय अलग है; इसीलिए कहा जाता है कि यह शोर मचाने की बात नहीं है। अगर हम यूट्यूब और फ़ेसबुक पर शोर मचाकर इसे साबित करते रहें, तो सीधा जवाब आएगा: आप जीव हत्या कर रहे हैं, तो अपने बेटे की बलि दो, अपनी बलि दो। यह सब कहकर आपको हतोत्साहित किया जाएगा, और फिर आप इस संशय में फँस जाएंगे कि यह नहीं करना चाहिए क्योंकि इसमें हिंसा है। और बाद में, जब आप नहीं देते, तो वे अपनी ओर से खुद आपके खून की बलि लेने लगती हैं — तब आपके घर में रोगों का पूरा आक्रमण होता है। रक्षा कवच पूरी तरह हट जाने पर प्रेत और पिशाच शरीर पर खेलने लगेंगे, और विनाश शुरू हो जाएगा। फिर साधना करते रहिए, काम करते रहिए, ओझा-सोखा, पंडितों और तांत्रिकों को कोसते रहिए कि आपके पास कोई सिद्धि नहीं, आप भी कुछ नहीं कर सकते। कहीं से कुछ नहीं होगा।
अगर कुल देवताओं को जान-बूझकर छोड़ दिया जाए तो क्या होता है?
आपकी रक्षा में कोई खड़ा नहीं होता
वे कहते हैं, अगर आपके रक्षक आपके पीछे खड़े नहीं हैं — अगर आपने जान-बूझकर अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा और सेवा बंद कर दी, अगर जान-बूझकर उनके रीति-रिवाज बदल दिए — तो आपकी रक्षा में कोई खड़ा नहीं होगा। आप बस बर्बाद हो जाएंगे।
वक्ता कहते हैं, अगर आपके रक्षक आपके पीछे खड़े नहीं हैं; अगर आपने जान-बूझकर अपनी कुलदेवी और कुल देवताओं की पूजा और सेवा बंद कर दी; अगर जान-बूझकर उनके रीति-रिवाज बदल दिए — तो आपकी रक्षा में कोई खड़ा नहीं होगा। आप बस बर्बाद हो जाएंगे।
क्या नींबू की बलि देने से आपके वंश को नुकसान होता है?
नींबू बलि और हिंसा पर दोहरा मापदंड
लोग अब श्मशान जाते हैं, चिता पर बैठकर जप करते हैं, वीडियो बनाते हैं, और वहाँ से कहते हैं कि अगर आप नींबू की बलि देंगे तो आपके वंश को नुकसान होगा। अनुभव वाले वीडियो बनते हैं कि किसी साधक ने रात को दी और सुबह तक उसके घर में किसी की जान चली गई — नींबू की बलि से। वहीं दुनिया मुर्गे और बकरे खरीदकर घर में काटती है, और उस पर कोई दोष नहीं बताया जाता।
वक्ता कहते हैं, इतना तो चल ही रहा था, और अब लोग निंबू बलि को लेकर — खुद श्मशान जाकर, सीधे चिता पर बैठकर जप करते हुए, वीडियो बनाया जाता है, और वहाँ से कहते हैं कि अगर आप नींबू की बलि देंगे तो आपके साथ ऐसा होगा, आपके वंश को नुकसान होगा। प्रामाणिक से लगने वाले, अनुभव वाले वीडियो बनाए जा रहे हैं: कि किसी साधक ने रात को दी और सुबह तक उसके घर में किसी की जान चली गई। नींबू की बलि देने से। ज़रा सोचिए, वे कहते हैं। वहीं जो लोग बिना कोई बलि दिए घर में काटकर खाते हैं, उनकी ज़िंदगी भर जीव हत्या चलती है — दुनिया खा रही है। लोग मुर्गा खरीदते हैं, घर में काटते हैं, खाल उतारकर पूरा पकाते हैं। बकरा लाकर काटते हैं, और बड़ी-बड़ी पार्टियाँ होती हैं। उसमें कुछ नहीं होता; वहाँ की हिंसा से कोई दोष नहीं लगेगा। रात को काटते हैं और सुबह खाते हैं, रात को खाते हैं, और उससे कोई नहीं मरता। पर अगर आप नींबू काटेंगे, तो उससे घर में मौत होगी, जानें जाएंगी, वह कारण बन जाएगा।
इस अभियान का लक्ष्य बलि शब्द को ही बदनाम करना है, जिसके बाद बात ख़त्म
बलि शब्द को ही बदनाम करना
वे कहते हैं, यानी किसी भी तरह बलि शब्द को ही बदनाम कर दो। बलि शब्द को बदनाम कर दो और बात ख़त्म। और जो बड़े यूट्यूबर शास्त्र का प्रमाण देकर इस विषय का पूरा प्रचार करते हैं, वे वही कर रहे हैं जो उन्होंने वीडियो की शुरुआत में कहा था — दर्शन के सिद्धांत को क्रियात्मक सिद्धांत में ठूँसकर खिचड़ी पकाना, और आपको मना लेना कि यह मत करो।
वक्ता कहते हैं, यानी किसी भी तरह बलि शब्द को ही बदनाम कर दो। बलि शब्द को बदनाम कर दो, तो न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी। बात ख़त्म। और जब वह परिवार भुगतता है — जो बड़े यूट्यूबर शास्त्र के प्रमाण देकर इस विषय का पूरा प्रचार करते हैं, वे ठीक वही कर रहे हैं जो उन्होंने इस वीडियो की शुरुआत में कहा था: दर्शन के सिद्धांत को क्रियात्मक सिद्धांत में ठूँसकर, पूरी खिचड़ी पकाकर, आपको मना लेना कि यह नहीं करना चाहिए। उनका कुछ नहीं जाने वाला। वे यह करेंगे नहीं; वह विषय, वह मार्ग उनका है ही नहीं, इसलिए उन्हें कोई दिक्कत नहीं। दिक्कत आपकी है, जिनके माता-पिता, दादा-दादी, परदादा-परदादी यह करते आए थे, और अब आप ऐसे लोगों की बात सुनकर बंद कर रहे हैं — क्योंकि यह सच है कि उनके तर्क का कोई जवाब नहीं, कोई दे नहीं सकता।
जो शास्त्र का हवाला देते हैं, क्या वे खुद शास्त्र की कसौटी पर टिकेंगे?
चेकपॉइंट, और चीट कोड
वे पूछते हैं, शास्त्रोक्त दृष्टि से जितने भी प्रामाणिक विषय हैं, आपको क्या लगता है, ठीक उस विषय पर कौन चल रहा है? अगर उस स्तर से प्रतिवाद हो तो झगड़ा हो जाएगा। अगर हर विषय को चेकपॉइंट की तरह पूछा जाए — आप इस संप्रदाय में हैं, क्या यह विषय सिद्ध कर सकते हैं? — तो सिद्ध नहीं होगा। वहाँ वे चीट कोड लगाने लगेंगे, कहेंगे कि इसकी जगह हम यह करते हैं।
वक्ता पूछते हैं, जितने भी प्रामाणिक विषय हैं, शास्त्रोक्त दृष्टि से जो पूरा विषय खड़ा है: आपको क्या लगता है, ठीक उस विषय पर कौन चल रहा है? अगर उस स्तर से प्रतिवाद हो, तो झगड़ा हो जाएगा। आप प्रमाण दे रहे हैं कि शास्त्र के अनुसार यह लिखा है, वह लिखा है — क्या आप खुद शास्त्र के अनुसार चल रहे हैं? अगर हर विषय पूछा जाए, चेकपॉइंट बनाए जाएं, तो उनकी हवा निकल जाएगी: यह बताइए, यह लिखा है, आप इस संप्रदाय में हैं, क्या यह विषय सिद्ध कर सकते हैं? सिद्ध नहीं होगा। फिर वे वहाँ चीट कोड लगाने लगेंगे — नहीं, इसकी जगह हम यह करते हैं। सब पूरी तरह समझ में आ जाएगा।
तंत्र के आलोचक वेदों का बचाव करते हुए तांत्रिक प्रमाण को क्यों नकारते हैं?
वे आलोचक जो वैदिक और पौराणिक प्रमाण मानते हैं पर तांत्रिक प्रमाण नहीं
वे कहते हैं, जब उनसे ऐसे सवाल पूछे जाते हैं, तो वे जवाब देते हैं कि पुराण हर कोई नहीं समझ सकता, वेदों और उपनिषदों के विषय ऐसे नहीं, वैसे हैं। वे यह भी मान लेते हैं — पर फिर वे तांत्रिक बातों को प्रमाण मानते ही नहीं, सीधे कह देते हैं कि यह विषय ठीक नहीं। वे कहते हैं, आगमोक्त विषय समय और परंपरा के साथ बदलते गए, और हटाए जाते रहे।
वक्ता कहते हैं, जब उनसे इस तरह का सवाल पूछा जाता है, तो वे जवाब देते हैं कि पुराण हर कोई नहीं समझ सकता, वेदों और उपनिषदों के विषय ऐसे हैं, वैसे नहीं। वे कहते हैं, ठीक है, यह भी मान लेते हैं। फिर तंत्रात्मक बातें — उन्हें तो आप प्रमाण मानेंगे ही नहीं। आप सीधे कह देते हैं कि यह विषय ठीक नहीं है। आगमोक्त विषय समय के साथ और परंपरा के साथ अलग तरह से बदलते गए। वे हटाए जाते रहे।
क्या आज की प्रथाएँ द्वापर युग में थीं?
सोखा और ओझा का काम बाद में आया
वे बताते हैं कि द्वापर युग में, श्री कृष्ण के समय, कहीं सोखा और ओझा का काम नहीं था। यानी किसी को भूत पकड़ ले और सोखा झाड़-फूंक करके उसे हटाए — ऐसा नहीं था। यह विषय वहाँ था ही नहीं। उस समय के तांत्रिक अलग थे, शक्तिशाली थे। उनकी क्षमता दूसरे स्तर की थी। आज के युग के साथ ये बातें धीरे-धीरे बदलीं।
वक्ता कहते हैं, अब सोचिए कि श्री कृष्ण के समय, द्वापर युग में, कहीं सोखा या ओझा का काम नहीं था। यानी किसी को भूत पकड़ ले और सोखा बाबा झाड़-फूंक करके उसे हटाए — ऐसा नहीं था। यह विषय वहाँ था ही नहीं। उस समय के तांत्रिक दूसरे प्रकार के थे, शक्तिशाली तांत्रिक। उनकी क्षमता अलग स्तर की थी। आज के समय के अनुसार ये बातें धीरे-धीरे बदलीं। उस समय कोई भूत, प्रेत या ब्रह्म को कुल देवी या देवता के रूप में नहीं पूजता होगा। ये बातें बाद के युग में आई हैं। उसी हिसाब से किसी ने कुछ पूजा — किसी के घर में योगिनी शक्ति, डाकिनी, या इसी तरह की कोई शक्ति पूजी जाती रही है।
बहू के घर आने पर चौखट पर बलि क्या है?
बहू का चौखट पर बलि लांघना
विधान यह जानिए: जब विवाह हो जाता है और बहू घर पर उतरती है, तो पहले बलि चढ़ती है। वह उस बलि को, उस रक्त को, चौखट पर लांघती है। वे कहते हैं कि वे तंत्र ग्रंथों से प्रमाण दे सकते हैं कि चौखट पर किन-किन शक्तियों का वास होता है — द्वार पूजन के समय चौखट के पास इतनी शक्तियाँ रहती हैं, हमेशा, रोज़।
वक्ता कहते हैं, यह पूरा विधान जानिए: जब विवाह हो जाता है और बहू घर पर उतरती है, तो पहले बलि चढ़ती है। उस बलि को, उस रक्त को लांघ कर, चौखट पर बलि चढ़ती है। वे कहते हैं कि वे तंत्र ग्रंथों से प्रमाण दे सकते हैं कि चौखट पर किन-किन शक्तियों का वास होता है — द्वार पूजन के समय चौखट के पास इतनी शक्तियाँ रहती हैं। हमेशा, रोज़। इसीलिए कहा जाता है कि दरवाज़े के इस ओर जूते-चप्पल न उतारें, दरवाज़े के सामने जूते-चप्पल न उतारें। पर प्रमाण देने पर भी लोग नहीं मानेंगे। वे कहते हैं कि दरवाज़े पर अलग से एक वीडियो बनाएँगे, तब आपकी बातें और साफ़ होंगी। जब सीधा सवाल आता है कि फिर हम उन्हें कहाँ रखें, तो वे जवाब देते हैं कि यह उनकी समस्या नहीं है। उनका विषय यह बताना है कि इस जगह यह काम इस तरह नहीं करना है।
64 योगिनी पूजन में दी जाने वाली बलि का सार क्या है?
लौंग-कपूर, जायफल, और ज़रूरत हो तो ही नींबू
वहाँ जो लौंग-कपूर आप जलाते हैं, वही बलि है, वही देनी है। अष्ट दुर्गा और अष्ट मातृकाओं के नाम से जायफल की बलि तब देनी है जब परेशानी ज़्यादा हो। और अगर और ज़्यादा असर चाहिए, तो सावन में नींबू की बलि भी दे सकते हैं। पर वे कहते हैं कि केवल जायफल की बलि ही काफ़ी से ज़्यादा है। इस बार सावन जो 29 या 30 दिन चलेगा, उसमें यह प्रयोग आपको उम्मीद से बढ़कर सफलता देगा।
वक्ता कहते हैं, मूल विषय पर लौटते हैं जिस पर बात हो रही थी — 64 योगिनी के पूजन में बलि देना। बलि की बात करें तो वहाँ जो लौंग-कपूर आप जला रहे हैं, वही बलि है। वही देनी है। अष्ट दुर्गा और अष्टमातृका के नाम से जायफल की बलि तब देनी है जब परेशानी ज़्यादा हो। और अगर इससे भी ज़्यादा असर चाहिए, तो सावन में नींबू की बलि भी दे सकते हैं। पर वे कहते हैं कि इतने में केवल जायफल की बलि ही काफ़ी से ज़्यादा है। यह पूरा सावन जो 29 या 30 दिन चलेगा, उसमें अगर आप यह प्रयोग करेंगे, तो आपको उम्मीद से बढ़कर सफलता मिलेगी।
अगर कुल देवता बंधन में हों या नाराज़ हों तो क्या करें?
कर्म साक्षी दीप के साथ कुल देवताओं के लिए दीपक
अगर किसी के कुल देवी-देवता बंधन में हैं, या उसे पता है कि कुल देवता प्रसन्न नहीं, नाराज़ हैं और बार-बार परेशानी आ रही है, या उसे उनके बारे में कुछ पता ही नहीं है — तो जिस समय आप शिव जी के अभिषेक के लिए कर्म साक्षी दीप जलाएँ, उसी समय कुल देवी-देवताओं के नाम से भी एक दीपक जलाएँ और प्रार्थना करें।
वक्ता कहते हैं, एक विषय और है: अगर किसी के कुल देवी-देवता बंधन में हैं, और उसे पता है कि कुलदेवी और कुल देवता प्रसन्न नहीं, नाराज़ हैं, कि बार-बार परेशानी आ रही है — या हमें उनके बारे में कुछ पता ही नहीं है। तो ऐसे समय में, जब शिव जी का अभिषेक करने के लिए कर्म साक्षी दीप जलता है, उसी समय कुल देवी-देवताओं के नाम से भी एक दीपक जलाइए। और इस तरह प्रार्थना कीजिए, क्योंकि जो ज्योत जलती है, उसी में शक्ति आकर विराजमान होती है। वही उनका स्थान है। तो उनके सामने शिव जी का पूजन हो, और शिव जी से प्रार्थना करें कि हमारी कुल देवी और शक्तियाँ, जो भी देवी-देवता हों, प्रसन्न हों, कृपा करें, और जो भी दोष या श्राप लगा हो, वह शांत हो। यह कह कर फिर पूरा पूजन कीजिए और 64 योगिनियों का पूजन भी कीजिए।
सावन में शिव मंदिर में जप इतना ज़्यादा फलदायी क्यों है?
सावन में सभी शक्तियाँ शिवलिंग के पास रहती हैं
सावन के महीने में सभी शक्तियाँ शिव क्षेत्र में वास करती हैं — कोई भी महाशक्ति, कोई भी उपशक्ति, किसी भी प्रकार के उपदेवता, सब शिवलिंग के पास, महाशिव के पास, उनके क्षेत्र के सबसे नज़दीकी हिस्से में रहते हैं। सब उनकी सेवा-पूजा करते हैं। इसीलिए सावन के माहात्म्य में कहा गया है कि सावन में शिव क्षेत्र में किसी भी मंत्र-तंत्र का जप, या किसी मंत्र का पुरश्चरण, दूसरे महीनों से अनंत गुना फल देता है। सिद्धि सबसे जल्दी मिलती है।
वक्ता कहते हैं, जब 64 योगिनी का पूजन और यह पूरा विषय हो जाता है, तो उन सब साधनों से कुल देवताओं तक भी सेवा-पूजा पहुँचती है, और वे धीरे-धीरे प्रसन्न होते हैं। सावन का महीना खाली नहीं जाएगा। सावन के महीने में सभी शक्तियाँ शिव क्षेत्र में वास करती हैं। कोई भी महाशक्ति हो, कोई भी उपशक्ति हो, किसी भी प्रकार के उपदेवता हों — सब शिवलिंग के पास, महाशिव के पास, उनके क्षेत्र के सबसे नज़दीकी हिस्से में रहते हैं, और सब उनकी सेवा-पूजा करते हैं। इसीलिए सावन के माहात्म्य में है कि अगर आप किसी भी मंत्र-तंत्र का जप करें, या किसी मंत्र का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करें, तो दूसरे महीनों की तुलना में सावन के महीने में शिव क्षेत्र में किया गया जप अनंत गुना फल देता है। सिद्धि सबसे जल्दी मिलती है।
किस शिव मंत्र में विनियोग या न्यास की ज़रूरत नहीं?
शांभ शिव का मंत्र
शिव जी के पंचाक्षरी विधान के अलावा, जो चैनल पर पूरे माहात्म्य के साथ है, शांभ शिव का मंत्र है — "श्री शांभ शिवाय नमः" वाला मंत्र। वे कहते हैं कि इसमें आपको विनियोग या न्यास की कोई खास ज़रूरत नहीं है। आप सीधे इसका जप आदि कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं, इसके अलावा, विशेषतम प्रयोगों में, जो दूसरे विधान डाले गए हैं, उनमें शिव जी के पंचाक्षरी मंत्र का पूरा विधान पूरे माहात्म्य के साथ डाला गया है। वे आप कर सकते हैं। शांभ शिव का मंत्र है, श्री शांभ शिवाय नमः वाला मंत्र। इसमें आपको विनियोग या न्यास करने की कोई खास ज़रूरत नहीं है। आप सीधे इसका जप आदि कर सकते हैं।
सावन में पहले पंचाक्षरी मंत्र की सिद्धि, साथ में माला मंत्र भी चलाएँ
पहले पंचाक्षरी मंत्र की सिद्धि, साथ में माला मंत्र
वे दूसरी साधनाओं के लिए दो-तीन वीडियो और डालेंगे। कल माला मंत्र के कुछ विशेष अनुभवों का वीडियो, और माला मंत्र सिद्ध करने का विधान भी डालेंगे। जो पंचाक्षरी का बहुत ज़्यादा जप नहीं कर रहे, वे साथ में माला मंत्र भी चला सकते हैं। पर पहली प्राथमिकता पंचाक्षरी मंत्र को सिद्ध करने की रखें।
वक्ता कहते हैं कि वे दूसरी साधनाओं के लिए दो-तीन वीडियो और डालेंगे — अगर आपको लगे कि यह साधना नहीं करनी, अगर आपका मन और इच्छा इस ओर नहीं है और आप माला मंत्र आदि करना चाहते हैं। इस बार माला मंत्र के कुछ विशेष अनुभव बताए गए हैं, और वह वीडियो वे कल डालेंगे। और कल ही, या परसों तक, माला मंत्र सिद्ध करने का विधान भी डालने की कोशिश करेंगे। तो जो पंचाक्षरी मंत्र का बहुत ज़्यादा जप नहीं कर रहे, वे साथ में माला मंत्र भी चलाएँ। पर पहली प्राथमिकता पंचाक्षरी मंत्र को सिद्ध करने की रखें।
क्या दूसरे देवता की उपासना करने वाले गृहस्थ को भी श्रावण में शिव अभिषेक करना ज़रूरी है?
श्रावण में शिव अभिषेक अनिवार्य है
आप किसी भी महाशक्ति की उपासना करें — भगवान दत्त के एकाक्षरी का जप कर रहे थे तो वह करें, भैरव जी का अनुष्ठान कर रहे थे तो वह करें। पर साथ में भगवान शिव का अभिषेक ज़रूर होना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि अगर कोई गृहस्थ सावन के महीने में भगवान शिव का अभिषेक नहीं करता, तो पूरे संसार में उससे ज़्यादा अभागा प्राणी कोई नहीं।
वक्ता कहते हैं, सावन के महीने में शिव जी की पूजा ज़रूर होनी चाहिए। आप किसी भी महाशक्ति की पूजा करें। भगवान दत्तात्रेय के एकाक्षरी का जप कर रहे थे तो वह करें। भैरव जी का अनुष्ठान कर रहे थे तो वह करें। पर उसके साथ भगवान शिव का अभिषेक ज़रूर होना चाहिए। अगर कोई गृहस्थ सावन के महीने में भगवान शिव का अभिषेक नहीं करता, तो इस पूरे संसार में उससे ज़्यादा अभागा प्राणी कोई नहीं। भगवान शिव का अभिषेक रोज़ होना चाहिए। बस माताओं-बहनों के जो चार दिन का अंतर होता है, उसे छोड़ दें। बाकी दिनों में सबको भगवान शिव का अभिषेक करना चाहिए, और अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका श्रृंगार और जो भी पूजन हो सके, वह करें।
शिवलिंग का शीश कभी खाली क्यों नहीं छोड़ना चाहिए?
ब्रह्मांड का राजा बिना मुकुट के न रहे
वे कहते हैं कि एक मुख्य बात वे हमेशा बताते आए हैं: भगवान शिव का शीश, शिवलिंग का शीश, कभी खाली नहीं रखा जाता। जहाँ घर में शिवलिंग विराजमान है, वहाँ या तो चाँदी का मुकुट बनवा कर रखें, या चाँदी का बेलपत्र, या रोज़ उन पर फूल और बेलपत्र चढ़ाएँ। और कुछ न हो, तो अक्षत — पूजन वाले साबुत चावल — ज़रूर रखें।
वक्ता कहते हैं, एक मुख्य बात वे हमेशा बताते आए हैं कि भगवान शिव का शीश, शिवलिंग का शीश, कभी खाली नहीं रखा जाता। जब भी घर में शिवलिंग विराजमान हो, तो उसके शीश पर या तो चाँदी का मुकुट बनवा कर रखें, या चाँदी का बेलपत्र रखें, या रोज़ उन पर फूल, बेलपत्र आदि चढ़ाएँ। तब उनका शीश कभी खाली नहीं रहेगा। और कुछ न हो, तो उन पर अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। — साबुत चावल, पूजन वाले — वह ज़रूर रखें। पर शीश कभी खाली नहीं रहेगा, क्योंकि वे पूरे ब्रह्मांड के राजा हैं। और अगर राजा का शीश खाली रहे, बिना मुकुट के रहे, तो उससे दोष लगता है, उथल-पुथल आती है, कष्ट आते हैं, परेशानियाँ आती हैं।
क्या अपने आराध्य के सामने टोपी, हैट या पगड़ी पहननी चाहिए?
ज्योतिर्लिंग या शक्ति क्षेत्र में ढका सिर
वे कहते हैं कि उनके विचार में अपने आराध्य के सामने कभी पगड़ी या टोपी पहन कर नहीं जाना चाहिए। अगर आप इस भाव से रुद्राक्ष का मुकुट पहनें कि सिर पर रुद्राक्ष धारण कर रहे हैं, तो वह अलग बात है। पर पगड़ी बाँध कर, टोपी पहन कर, हैट पहन कर जाना — लोग तीर्थ क्षेत्रों में हैट पहनते हैं, कामाख्या में भी हैट पहन कर अंदर दर्शन को चले जाते हैं। कोई रोकता नहीं, पर यह अपराध है।
वक्ता कहते हैं, कोई कहे या न कहे, जब भी आप किसी ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में जाएँ, या भगवान शिव के या अपने आराध्य के किसी ऐसे मंदिर में जाएँ — उनके विचार में अपने आराध्य के सामने कभी पगड़ी या ये टोपियाँ पहन कर नहीं जाना चाहिए। अगर आप रुद्राक्ष का बना मुकुट, जो मिलता है, इस भाव से पहन कर जाएँ कि सिर पर रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । धारण कर रहे हैं, तो वह अलग बात है। पर अगर पगड़ी बाँध कर, टोपी पहन कर, हैट पहन कर जाएँ — लोग तीर्थ क्षेत्रों में हैट पहन कर घूमते हैं। कामाख्या क्षेत्र में भी हैट पहन कर अंदर दर्शन को चले जाते हैं। कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है, पर यह अपराध है। जिनके सामने आप जा रहे हैं, जो पूरे ब्रह्मांड की सारी सामग्री हैं, उनके सामने आप इस तरह मुकुट पहन कर जाएँगे — क्योंकि आज के हिसाब से वह मुकुट ही है। दर्शन को जाते समय सिर हमेशा खुला होना चाहिए।
शिखा क्यों रखनी और बाँधनी चाहिए?
शिखा में गाँठ के बिना पुण्य नहीं रुकता
वे कहते हैं कि शिखा बंधी होनी चाहिए — स्त्री हो या पुरुष, सबकी शिखा बंधी होनी चाहिए। शायद दस प्रतिशत लोग ही शिखा रखते हैं। कहा जाता है कि शिखा के बिना सूक्ष्म व्यवस्था में पुण्य रुकता ही नहीं। आप पुण्य कर रहे हैं, पर उसे रोकने के लिए शिखा में गाँठ होनी चाहिए। अगर आप गाँठ नहीं लगाते और शिखा नहीं रखते, तो आपका पाँच लाख या पच्चीस लाख का अनुष्ठान कहाँ टिकेगा?
वक्ता कहते हैं, शिखा बंधी होनी चाहिए, शिखा बाँधनी चाहिए। स्त्री हो, पुरुष हो — सबकी शिखा बंधी होनी चाहिए। आधे से ज़्यादा लोग तो शिखा रखते ही नहीं — आधे से ज़्यादा, वे खुद को सुधारते हैं, शायद दस प्रतिशत लोग ही रखते हैं। कहा जाता है कि शिखा के बिना सूक्ष्म व्यवस्था में पुण्य रुकता ही नहीं। आप पुण्य कर रहे हैं, पर उसे रोकने के लिए शिखा में गाँठ होनी चाहिए। और शिखा सब रख सकते हैं — ऐसा नहीं कि चौथा वर्ण नहीं रखेगा, या माताएँ नहीं रखेंगी। माताओं के अपने लंबे बाल होते हैं, वे उनमें गाँठ ज़रूर लगा सकती हैं। अगर आप शिखा में गाँठ नहीं लगाते, शिखा नहीं रखते, तो जो पाँच लाख या पच्चीस लाख का अनुष्ठान आप कर रहे हैं, वह कहाँ रुकेगा?
शिखा में कौन-सी शक्ति विराजमान होती हैं?
शिखा में भगवती अपराजिता
वे कहते हैं, शिखा का मंत्र देखिए: उसमें हम भगवती से कहते हैं कि माँ, शिखा में विराजमान हों। तंत्रोक्त रूप में शिखा में जो शक्ति मुख्य रूप से मानी जाती हैं, वे भगवती अपराजिता हैं — माँ अपराजिता शिखा में विराजमान होती हैं। अगर आप शिखा ही नहीं रखते, तो आपके पुण्य की रक्षा किससे होगी?
वक्ता पूछते हैं, शिखा का मंत्र क्या है? वह मंत्र देखिए: उसमें हम भगवती से कहते हैं कि माँ, शिखा में विराजमान हों। अब जिस शक्ति को हम शिखा में विराजमान कर रहे हैं — क्यों कर रहे हैं? तंत्रोक्त रूप में शिखा में जो शक्ति मुख्य रूप से मानी जाती हैं, वे भगवती अपराजिता हैं। माँ अपराजिता शिखा में विराजमान होती हैं। अपराजिता को ही शिखा में विराजमान कराया जाता है — और अगर आप शिखा ही नहीं रखते, तो आपके पुण्य की रक्षा किससे होगी? इसलिए शिखा रखिए, और गर्भगृह आदि में शिखा बाँध कर ही जाइए। सिर पर और कुछ नहीं रखना है।
दर्शन के लिए स्त्रियाँ सिर कैसे ढकें?
सिर पर पल्लू
स्त्रियों, माताओं-बहनों को सिर पर पल्लू रख कर जाना चाहिए। उन्हें खुले सिर नहीं जाना चाहिए। पुरुष के लिए गमछे से सिर ढकना अलग बात है, और वह भी हर जगह ज़रूरी नहीं। पर किसी तरह का मुकुट या ऐसी कोई चीज़, और हैट नहीं पहनना चाहिए।
वक्ता कहते हैं, और स्त्रियों को, माताओं-बहनों को पल्लव रख कर जाना चाहिए। वे अपना पल्लू शीश के ऊपर रखेंगी। उन्हें खाली माथे नहीं जाना चाहिए। पुरुष के लिए उस तरह गमछा रख कर सिर ढकना — वह अलग बात है, पर वह भी हर जगह ज़रूरी नहीं। पर किसी तरह का मुकुट या ऐसी कोई और चीज़ नहीं पहननी चाहिए, न वह हैट जो अब फ़ैशन में आ गया है — गोल, काउबॉय वाला, जो लड़के-लड़कियाँ पहन कर चलते हैं। वे कहते हैं, ऐसे लोग तीर्थ यात्रा पर हैं ही नहीं, वे रील्स यात्रा पर हैं।
कुछ लोग क्यों कहते हैं कि तीर्थ यात्रा से उन्हें नुकसान हुआ?
अपराध लगता है, फिर दोष देवता पर डाला जाता है
वे कहते हैं, यही अपराध लगता है, और बाद में लोग कहते हैं कि हम तीर्थ यात्रा पर गए और फिर यह हुआ, वह हुआ, यह बेकार है, झूठ है, तुम पाखंड फैलाते हो। वे जवाब देते हैं कि पाखंड ऐसे लोग ही फैलाते हैं — जो ठीक से यात्रा नहीं करते, नियम-निषेध नहीं मानते, और बाद में देवी-देवताओं और नियम बताने वालों पर दोष डालते हैं।
वक्ता कहते हैं, यह जो अपराध लगता है, उसके बाद ही शिकायत आती है: हम तीर्थ यात्रा पर गए थे और फिर यह हुआ, वह हुआ, यह बेकार है, यह झूठी बात है, तुम पाखंड फैलाते हो। वे जवाब देते हैं कि वे पाखंड नहीं फैलाते, आप जैसे लोग फैलाते हैं। आप जैसे लोग, जो ठीक तरह से यात्रा नहीं करते, नियम-निषेध नहीं मानते, और बाद में देवी-देवताओं पर और नियम बताने वालों पर दोष डालते हैं। इसलिए इन विषयों पर ठीक से ध्यान देना चाहिए।
पूरे साल के रक्षा वाले शिव प्रयोग, जैसे शिव रक्षा स्तोत्र प्रयोग, सावन में पूरे किए जा सकते हैं
साल के रक्षा प्रयोग सावन में करना
चैनल पर शिव जी से जुड़े कई प्रयोग दिए गए हैं — जैसे शिव रक्षा प्रयोग, शिव रक्षा स्तोत्र का प्रयोग, जो बहुत ज़्यादा परेशानी होने पर शिवलिंग के पास जाकर करना होता है। अगर पूरे साल में रक्षा के लिए वे प्रयोग करने का समय नहीं निकाल पाते, तो सावन के महीने में वह प्रयोग ज़रूर करें।
वक्ता कहते हैं, सावन में शिव जी के पूजन में एक काम और करना है। चैनल पर शिव जी से जुड़े कई प्रयोग दिए गए हैं। तो जो लोग पूरे साल वे सब प्रयोग करते हैं — जैसे शिव रक्षा प्रयोग है, शिव रक्षा स्तोत्र का प्रयोग, कि जहाँ बहुत ज़्यादा परेशानी हो, वहाँ शिव जी के शिवलिंग के पास जाकर वे प्रयोग करने हैं — अगर आप पूरे साल वह प्रयोग करके रक्षा कर्म आदि करने का समय नहीं निकाल पाते, तो सावन के महीने में वह प्रयोग ज़रूर करें।
बटुक भैरव सतनाम के 40,000 जप से क्या मिलता है?
छाया रूप में बटुक भैरव का प्रकट होना
जिन्होंने भगवान बटुक भैरव जी के स्तोत्र और सतनाम को सिद्ध किया है, उसका पुरश्चरण किया है: माना गया है कि 40,000 पुरश्चरण से, 40,000 जप से, बटुक भैरव जी छाया रूप में प्रकट होते हैं। और वह दृष्टि देते हैं जिससे उनके उस रूप को देखने की क्षमता मिलती है जिसका तेज हम सह सकें। पर वे कहते हैं, केवल तभी जब ठीक से किया जाए।
वक्ता कहते हैं, जिन्होंने भगवान बटुक भैरव जी के स्तोत्र और सतनाम को सिद्ध किया है, जिन्होंने उसका पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। किया है: माना गया है कि 40,000 पुरश्चरण करने से, 40,000 जप करने से, बटुक भैरव जी छाया रूप में साक्षात प्रकट होते हैं। और वे वह दृष्टि देते हैं जिससे उनके उस रूप को देखने की क्षमता मिलती है जिसका तेज हम सह सकें। पर वे कहते हैं, केवल तभी जब आप ठीक से करें। अगर जैसे-तैसे करके कहें कि 40,000 हो गया, तो ऐसा नहीं होगा। केवल तभी जब ठीक से करें।
जिन्होंने पाँच या ग्यारह हज़ार जप कर लिया है, वे पूरे सावन शिव मंदिर के पास रोज़ 108 करें
पूरे सावन शिव मंदिर के पास रोज़ 108
अगर आप 5,000 या 11,000 जप कर चुके हैं, तो सावन के महीने में शिव मंदिर के पास उनके नाम से दीपक आदि जला कर अपनी इच्छा के साथ वह जप करें — जो भी आपकी इच्छा हो: रक्षा के लिए कर रहे थे, शत्रु नाश के लिए, किसी जगह जीत के लिए। पूरे सावन रोज़ 108 करते जाइए, जिस भी समय — सुबह, शाम या रात — वहाँ आपका होना बन सके।
वक्ता कहते हैं, अगर इतना नहीं, पर अगर आप 5,000 या 11,000 जप भी कर चुके हैं — तो सावन के महीने में शिव जी के मंदिर के पास उनके नाम से दीपक आदि जला कर अपनी इच्छा के साथ वह जप करें, जो भी आपकी इच्छा हो। आप रक्षा के लिए कर रहे थे, शत्रु नाश के लिए कर रहे थे, किसी जगह जीत के लिए कर रहे थे — अपनी इच्छा के साथ उसका जप पूरे सावन, रोज़ 108 करते हुए कर सकते हैं। समय सुबह रखें, शाम रखें, रात रखें — जैसे वहाँ आपका होना बन सके। महादेव वहाँ चौबीसों घंटे विराजमान हैं।
क्या घर में सजावट वाले शिवलिंग की भी सावन में पूजा करनी चाहिए?
शिवलिंग के आकार की कोई वस्तु बिना पूजा के न रहे
सावन के महीने में घर में शिवलिंग के आकार की कोई भी वस्तु बिना पूजा के नहीं रहनी चाहिए। किसी भी वस्तु से उनका मतलब है कि अगर आपने सजावट के लिए शिवलिंग रखा है और उसकी पूजा नहीं करते, तो कम से कम उसे धूप-दीप दिखाएँ। महाशिवरात्रि और सावन का बहुत बड़ा माहात्म्य है, इन्हें कभी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।
वक्ता कहते हैं, सावन के महीने में घर में शिवलिंग के आकार की कोई भी वस्तु बिना पूजा के नहीं रहनी चाहिए। किसी भी वस्तु से उनका मतलब यह है: आपने सजावट के रूप में शिवलिंग रखा है, और वह शिवलिंग है, पर आप उसकी पूजा नहीं करते। कम से कम उसे धूप-दीप दिखाइए। महाशिवरात्रि और सावन का बहुत बड़ा माहात्म्य है, इसलिए इन्हें कभी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।
शनि महादशा जैसी ग्रह की समस्या में क्या करें?
शिव मंदिर में शनि का माला मंत्र या शनि अष्टक
अगर ग्रह से जुड़ी कोई समस्या चल रही है — आपको पता है कि शनि की महादशा चल रही है, वे मारकेश हैं और आपकी स्थिति बिगड़ने वाली है या बिगड़ चुकी है — तो ऐसे समय सावन में भगवान शिव के पूजन के साथ, उनकी प्रसन्नता के लिए शिव मंदिर में ही शनि देव के माला मंत्र या शनि अष्टक का जप करें।
वक्ता कहते हैं, दूसरे विशेषतम मंत्रों में, अगर किसी की ग्रह से जुड़ी कोई समस्या चल रही है — खास कर ग्रह से जुड़ी, और आपको पता है कि शनि की महादशा चल रही है, कि वे मारकेश हैं और हमारी स्थिति खराब होने वाली है, या खराब हो चुकी है — तो ऐसे समय सावन के महीने में भगवान शिव का पूजन ज़रूर करें। और उसके साथ, उनकी प्रसन्नता के लिए शिव मंदिर में ही शनि देव के माला मंत्र या शनि अष्टक का जप करें।
शिव मंदिर में किए जप से शनि क्यों प्रसन्न होते हैं?
शनि शिव के शिष्य और महाकाल का रूप
वक्ता कहते हैं कि भगवान शनि देव भगवान शिव के शिष्य हैं। उन्हें भी महाकाल का रूप माना गया है — कि काल ही शनि के रूप में है। इसलिए शिव मंदिर में किया गया आपका जप उनकी प्रसन्नता का कारण बनेगा। वे बहुत जल्दी अपनी क्रूर दृष्टि को सौम्य दृष्टि में बदल देंगे।
किसी भी ग्रह की बाधा के लिए श्रावण में क्या कर सकते हैं?
किसी भी ग्रह का कवच, स्तुति, सहस्रनाम और सतनाम
इसी तरह, अगर किसी और ग्रह की कोई बाधा है — मंगल देव की, शुक्र की, या किसी और ग्रह की — तो आप अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार उनके कवच, स्तुति, सहस्रनाम या सतनाम का, या चैनल पर पहले से प्रसारित उन ग्रहों के पौराणिक और तंत्रोक्त मंत्रों का जप कर सकते हैं। रोज़ 10 या 100 माला करना ज़रूरी नहीं। कम से कम पाँच या दस माला रखें, और वह भी न हो सके तो पूरे श्रावण कम से कम एक माला करें।
वक्ता कहते हैं, इसी तरह, अगर किसी और ग्रह की कोई बाधा है — चाहे मंगल देव की हो, शुक्र की हो, या किसी भी और ग्रह की — तो आप अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार उनके कवच, स्तुति, सहस्रनाम या सतनाम का जप कर सकते हैं, या उन ग्रहों के पौराणिक और तंत्रोक्त मंत्रों का, जो वे पहले ही चैनल पर प्रसारित कर चुके हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप रोज़ उनके जप की 10 माला या 100 माला करें। पर कम से कम इतना रखें कि पाँच माला या दस माला करें। सौ माला न हो, तो कोई दिक्कत नहीं। और अगर इतना भी न हो सके, तो पूरे श्रावण कम से कम एक माला करें।
आठवें भाव में राहु के साथ चल रही राहु महादशा बहुत ज़्यादा भ्रम की स्थिति बनाती है
आठवें भाव में राहु और उससे होने वाला भ्रम
वे एक व्यक्ति के बारे में बताते हैं जिससे उस दिन बात हो रही थी: राहु आठवें भाव में था, और जहाँ तक उन्हें याद है, कुंडली शायद सिंह लग्न की थी। स्थिति बहुत ज़्यादा भ्रम की थी। ऐसी स्थिति में, जहाँ राहु की महादशा चल रही हो और वह भ्रम दे रही हो, शिव जी की पूजा अनिवार्य है — करनी ही है।
वक्ता कहते हैं, वे यह भी मान कर चलते हैं कि अगर आपकी स्थिति बहुत दयनीय है — जैसे एक व्यक्ति से उस दिन बात हो रही थी, जिसकी कुंडली में राहु आठवें भाव में था, और जहाँ तक उन्हें याद है, कुंडली शायद सिंह लग्न की थी। स्थिति बहुत ज़्यादा भ्रम की थी। वे इतने ज़्यादा भ्रमित थे कि उसके बारे में कुछ कहा ही नहीं जा सकता। तो बहुत ज़्यादा भ्रम की स्थिति में, अगर राहु की महादशा चल रही है और वह भ्रम दे रही है, तो ऐसी परिस्थिति में शिव जी की पूजा अनिवार्य है। शिव जी की पूजा करनी ही है।
राहु को प्रसन्न करने के लिए किस शक्ति की पूजा होती है?
राहु की माता भगवती सिंहिका
राहु देव की प्रसन्नता के लिए, राहु की माता कही गई भगवती सिंहिका के मंत्र का विधान चैनल पर है। चाहें तो दोनों के मंत्रों का जप, एक-एक माला भी, शिव मंदिर में करें, और प्रार्थना करें कि उनकी दृष्टि सौम्य हो, उनकी शुभ कृपा मिले और यह भारी भ्रम दूर हो।
वक्ता कहते हैं, राहु देव की प्रसन्नता के लिए, राहु की माता जो भगवती सिंहिका कही गई हैं, उनके मंत्र का विधान चैनल पर है। चाहें तो इन दोनों के मंत्रों का जप, एक-एक माला भी, शिव मंदिर में करें, और प्रार्थना करें कि आपकी दृष्टि सौम्य हो, आपकी शुभ कृपा हमें मिले, और यह जो इतना बड़ा भ्रम है, वह दूर हो। वे भी तुरंत कृपा करेंगे।
ग्रह की पूजा उनकी माता या पत्नी के साथ क्यों करें?
दस गुना असर
अगर आप किसी ग्रह की सेवा-पूजा उनकी माताओं के साथ, उनकी पत्नियों के साथ करते हैं, तो वे कहीं ज़्यादा जल्दी प्रसन्न होते हैं। वे कहते हैं, मान लीजिए कि वे दस गुना असर देंगे: जो असर दस माला में आना था, वह एक-एक माला में आने लगेगा। यह प्रयोग भी आप श्रावण के समय कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं, अगर आप किसी ग्रह की सेवा-पूजा उनकी माताओं के साथ, उनकी पत्नियों के साथ करते हैं, तो वे कहीं ज़्यादा जल्दी प्रसन्न होते हैं। मान लीजिए कि वे दस गुना असर देंगे। जो असर दस माला में मिलना था, वह एक-एक माला में मिलने लगेगा। तो यह प्रयोग भी आप श्रावण के समय कर सकते हैं।
अगर घर में पूजी जाने वाली कोई उग्र शक्ति नाराज़ हो तो क्या करें?
नाराज़ शक्ति को शांत करने के लिए दही-गुड़ अभिषेक और ज्योत
अगर आपके घर में कोई उग्र शक्ति पूजी जाती है और आपसे कोई अपराध हो गया है जिससे वे नाराज़ हैं और मान नहीं रहीं — तो श्रावण में भी दही और गुड़ से शिव जी का अभिषेक करके, बाकी सारा विधान करके, और ज्योत जला कर, आप उनके नाम मंत्र का जप, या जो भी जप-तप करते हैं, वह कर सकते हैं। उससे भी वे सौम्य होती हैं, उनकी उग्रता खत्म होती है, और वे प्रसन्न होती हैं।
वक्ता कहते हैं, इसके अलावा, अगर आपके घर में कोई उग्र शक्ति पूजी जाती है और आपसे कोई अपराध हो गया है जिससे वे नाराज़ हैं और मान नहीं रहीं — तो श्रावण में भी दही और गुड़ से शिव जी का अभिषेक करके, बाकी सारा विधान करके, और ज्योत जला कर, आप उनके नाम मंत्र का जप, या जो भी जप-तप करते हैं, वह कर सकते हैं। उससे भी वे सौम्य होती हैं, उनकी उग्रता खत्म होती है, और वे प्रसन्न होती हैं।
नाग पंचमी और श्रावण सप्तमी के पूजन से पहले ही शिव जी के पूजन से उन्हें मना लेने पर समय रहते उनकी कृपा मिलती है
शिव पूजन से पहले ही उन्हें मना लेना
वे कहते हैं कि नाग पंचमी, श्रावण सप्तमी आदि के पूजन आएँगे, और उनमें विशेष पूजन ज़रूर देना है। पर अगर उससे पहले शिव जी का पूजन करके इन्हें मना लिया जाए, तो कोई काम बिगड़ रहा हो तो समय रहते उनकी कृपा भी मिल जाती है।
वक्ता कहते हैं, अब नाग पंचमी, श्रावण सप्तमी आदि के पूजन आएँगे, और उनमें विशेष पूजन ज़रूर देना है। पर अगर उससे पहले शिव जी का पूजन करके इन्हें मना लिया जाए, तो कोई काम बिगड़ रहा हो तो समय रहते उनकी कृपा भी मिल जाती है।
क्या बड़े अनुष्ठान के बाद रोज़ की सेवा-पूजा छोड़ देनी चाहिए?
बड़े अनुष्ठान के बाद नित्य पूजन कभी न छोड़ें
वे कहते हैं, कोई भी अनुष्ठान करवाने के बाद अपनी सेवा-पूजा कभी न छोड़ें। कभी यह नहीं कहना चाहिए कि अब तो महामृत्युंजय का सवा लाख जप करवा लिया, अब रोज़ शिव जी का अभिषेक करने की क्या ज़रूरत। यह गलती मत कीजिए। बड़े अनुष्ठान ने आपकी बड़ी विपत्तियाँ काट दीं, पर अगर आप नित्य पूजन छोड़ देंगे, तो आपके लिए बनी रक्षा की पूरी ऊर्जा को चलने का रास्ता नहीं मिलेगा।
वक्ता कहते हैं, जब भी आप कोई अनुष्ठान करें या करवाएँ, उसके बाद अपनी सेवा-पूजा कभी न छोड़ें। कभी ऐसा नहीं करना चाहिए कि अब तो हमने महामृत्युंजय मंत्र का सवा लाख जप करवा लिया, तो रोज़ शिव जी का अभिषेक करने की क्या ज़रूरत। यह गलती मत कीजिए। जो बड़ा अनुष्ठान हुआ, उसने आपकी बड़ी विपत्तियाँ और दुर्भाग्य काट दिए। पर अगर आप नित्य पूजन छोड़ देंगे, तो आपके लिए जो रक्षा की पूरी ऊर्जा बनी थी, वह किस तरह चलेगी? उसे चलने का रास्ता ही नहीं मिलेगा।
रोज़ की पूजा छोड़ने पर आभामंडल का क्या होता है?
सूक्ष्म शरीर में शुभ ऊर्जा ही शुभ को खींचती है
आपके सूक्ष्म शरीर में शुभ ऊर्जाएँ होने से ही शुभ, शुभ को खींचता है। अगर आप पूजन-पाठ छोड़ देंगे, तो विचार अशुद्ध होने में देर नहीं लगती। फिर आपका आभामंडल नकारात्मक ऊर्जाओं से भर जाएगा, और आपने जो कुछ किया और करवाया, वह सब खत्म हो जाता है।
वक्ता कहते हैं, आपके सूक्ष्म शरीर में शुभ ऊर्जाएँ होने से ही शुभ, शुभ को खींचेगा। अगर आप पूजन-पाठ छोड़ देंगे, तो विचार अशुद्ध होने में बिल्कुल देर नहीं लगती। फिर आपका आभामंडल नकारात्मक ऊर्जाओं से भर जाएगा। अब आपने जो कुछ किया और करवाया, वह सब खत्म। इसलिए यह गलती कभी नहीं करनी है, यह ध्यान रखिए।
बटुक भैरव के त्रिशूल पर नींबू कैसे लगाएँ?
खड़ा लगाएँ, लिटाकर नहीं
पूछा गया कि क्या बटुक भैरव के त्रिशूल पर नींबू खड़ा लगाना है। वक्ता कहते हैं कि हाँ, खड़ा ही लगेगा। उन पर इसे लिटाकर नहीं लगाया जा सकता।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या बटुक भैरव के त्रिशूल पर नींबू खड़ा करके लगाना है। वक्ता कहते हैं कि हाँ, खड़ा ही लगेगा। उन पर इसे लिटाकर नहीं लगाया जा सकता।
क्या सरकारी आरक्षण की श्रेणी से किसी का वर्ण तय होता है?
वर्ण जन्म से पता होता है, सरकार तय नहीं करती
एक जाति राजस्थान में SC, मध्य प्रदेश में OBC और महाराष्ट्र में सामान्य है; क्या वे शूद्रों में गिने जाएँगे? वक्ता कहते हैं कि जिसके बारे में पूछ रहे हैं, उसे खुद पता होगा कि वह किस जाति में है। सरकार थोड़े ही तय करेगी कि आप ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय हैं, वैश्य हैं या शूद्र। आप जन्म से जानते हैं कि आप किस जाति के हैं।
एक श्रोता एक ऐसी जाति के बारे में पूछते हैं जो राजस्थान में SC में, मध्य प्रदेश में OBC में और महाराष्ट्र में सामान्य में है। क्या वे शूद्रों में गिने जाएँगे? वक्ता पूछते हैं कि वह कौन-सी जाति होगी; पर वे कहते हैं कि विषय बस इतना है। जाति-पाति सच्ची बात है। कृष्ण जी ने कभी यादव नहीं लगाया, राम जी ने कभी सिंह नहीं लगाया। उनका विषय अलग था। जिसके बारे में आप पूछ रहे हैं, आपको पता होना चाहिए कि वे किस जाति में हैं; उन्हें खुद पता होगा। सरकार थोड़े ही तय करेगी कि आप ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय हैं, वैश्य हैं, शूद्र हैं। आप जन्म से जानते हैं कि आप किस जाति के हैं। SC-ST एक्ट इसलिए बना है कि समाज में किसी का अपमान न हो। वह अलग विषय है। उसका लाभ लेना चाहिए और उसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।
सेवा और पूजा में वर्ण क्यों मायने रखता है?
कौन-सा मंत्र, कौन-सी विधि — अपने ही लिए
वक्ता कहते हैं कि जो सेवा-पूजा की जाती है, वह वर्ण के अनुसार होती है — कौन-सा मंत्र हो, क्या विधि हो — ताकि हमें लाभ मिले और दोष न लगे। यह अपने ही लिए है। अगर आप उल्लंघन करें तो कोई आपको रोकने नहीं जाएगा। कोई गला नहीं दबाएगा कि यह मंत्र मत करो। खूब कीजिए। पर जब शास्त्रोक्त विधान की मर्यादाओं का इतना खुला अपमान होता है और आप उन मर्यादाओं की सीमा लाँघते हैं, तो उसका बुरा फल भी उसी तरह आएगा।
वक्ता कहते हैं कि जो सेवा-पूजा की जा रही है, वह वर्णाश्रम के अनुसार होती है — कैसे हो, कौन-सा मंत्र हो, क्या विधि हो — ताकि हमें लाभ मिले और कोई दोष आदि न लगे। यह अपने ही लिए है। अगर आप उल्लंघन करें तो कोई आपको रोकने नहीं आएगा। कोई गला नहीं दबाएगा कि नहीं, यह मंत्र मत करो, इस मंत्र का जप नहीं कर सकते। खूब कीजिए। पर जब शास्त्रोक्त विधान की मर्यादाओं का इतना खुला अपमान होता है, जब आप उन मर्यादाओं की सीमा लाँघते हैं, तो उसका बुरा फल भी वैसा ही होगा। इसलिए यह खुद जानना चाहिए। कोई और यह नहीं बता पाएगा। वे जोड़ते हैं कि क्षत्रियों से जुड़ी कई जातियाँ आरक्षण की आशा में OBC श्रेणी में गईं, पहले के समय में भी। जो अपनी पुरानी मूल पहचान जानते हैं — कि वे क्षत्रिय हैं पर इस कारण अब OBC में हैं — वे उसी के अनुसार चलते हैं। और जो केवल OBC से अपना फायदा लेना चाहते हैं, वे उसके अनुसार चलते हैं।
श्रावण में दरिद्रता नाश के लिए कौन-सी साधना करें?
अखंड लक्ष्मी के लिए पंचाक्षरी का पुरश्चरण
पूछा गया कि श्रावण में दरिद्रता के नाश के लिए कौन-सी साधना करें। वक्ता कहते हैं: पंचाक्षरी का पुरश्चरण कीजिए। अखंड लक्ष्मी मिलती है। वे कहते हैं कि अगर महादेव प्रसन्न हों तो सोचिए — उनकी कृपा से कुबेर जी धन के स्वामी और देवताओं के वित्त मंत्री बने। उनकी प्रसन्नता से क्या असंभव हो सकता है?
एक श्रोता पूछते हैं कि श्रावण में दरिद्रता के नाश के लिए कौन-सी साधना करनी चाहिए। वक्ता कहते हैं कि पंचाक्षरी मंत्र का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। कीजिए। अखंड लक्ष्मी मिलती है। अगर महादेव प्रसन्न हो जाएँ तो सोचिए: कुबेर जी, जो उनकी कृपा से धन के स्वामी बने, देवताओं के वित्त मंत्री बने — तो उनकी प्रसन्नता से कौन-सी चीज़ असंभव हो सकती है? वे कहते हैं कि तरह-तरह की साधनाएँ करने के बजाय अच्छा है कि जिनका यह पूरा विषय है, उन्हीं की पूजा करके उन्हें प्रसन्न किया जाए। विधान वे चैनल पर पहले ही डाल चुके हैं।
घर में स्थापित शिवलिंग किस चीज़ का होना उचित है?
स्फटिक और नर्मदेश्वर, काँच नहीं
वक्ता कहते हैं कि स्फटिक का शिवलिंग स्थापित कर सकते हैं। काँच का तो स्थापित करना ही नहीं चाहिए — काँच का स्थापित मत कीजिए। स्फटिक का कर सकते हैं, नर्मदेश्वर जी कर सकते हैं।
एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि स्फटिकस्फटिक की माला, जब साधक की कुंडली में शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो, तब रुद्राक्ष के स्थान पर चुनी जाती है। का शिवलिंग स्थापित कर सकते हैं। काँच का तो स्थापित ही नहीं करना चाहिए। काँच का स्थापित मत कीजिए। स्फटिक का कर सकते हैं, नर्मदेश्वर कर सकते हैं।
देवता का तर्पण विग्रह पर करें या यंत्र पर?
यंत्र या सुपारी पर तर्पण
पूछा गया कि देवी-देवताओं की शांति के लिए जो तर्पण होता है, क्या वह उसी देवता की प्रतिमा या विग्रह पर होता है। वक्ता कहते हैं कि यंत्र पर भी होता है — यंत्र पर तर्पण कीजिए, या सुपारी पर कीजिए। विग्रह पर करें तो नियम अलग हो जाता है, और यह सवाल आता है कि विग्रह कितना बड़ा हो।
एक श्रोता पूछते हैं कि देवी-देवताओं की शांति के लिए जो तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। किया जाता है, क्या वह संबंधित देवता की प्रतिमा या विग्रह पर होता है। वक्ता कहते हैं कि यंत्र पर भी होता है। यंत्र पर तर्पण कीजिए, या सुपारी पर कीजिए। अगर विग्रह पर करें तो, क्योंकि विग्रहों के बारे में इतनी सीधी बात नहीं कह सकते, उनका नियम अलग हो जाता है — उनका माप कितना बड़ा हो। छोटी प्रतिमाओं और विग्रहों को रोज़ स्नान नहीं कराना होता। तर्पण में सारा पानी उन पर जाएगा, और उनका स्थान भी हिलेगा। वे कहते हैं कि आम गृहस्थ, जिनके घर में वे हैं, उनके लिए भी यही नियम के अनुसार है।
अगर छिन्नमस्तिका का शक्तिपीठ पास में हो तो क्या करें?
उनका स्तोत्र, सतनाम, स्तुति और सहस्रनाम
अगर छिन्नमस्तिका माँ का शक्तिपीठ पास में है, तो उनके स्तोत्र, सतनाम और स्तुति का उपयोग कीजिए, सहस्रनाम का उपयोग कीजिए, और पाठ करके उन्हें प्रसन्न कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि अगर छिन्नमस्तिका माँ का शक्ति पीठ पास में है, तो उस स्थिति में उनके स्तोत्र, सतनाम, स्तुति आदि का उपयोग कीजिए, सहस्रनाम का उपयोग कीजिए, और पाठ करके उन्हें प्रसन्न कीजिए।
पंचाक्षरी के लिए किस रंग का आसन हो?
पीला, सफ़ेद या कुश का आसन; लाल भगवती के लिए
पूछा गया कि क्या पंचाक्षरी जप के लिए सफ़ेद आसन ज़रूरी है, और क्या वह लाल आसन चल सकता है जिस पर वे दूसरी दिव्य साधनाएँ करते हैं। वक्ता कहते हैं कि रंग के अनुसार साधना चुनने का विषय पहले से चला आ रहा है। इसलिए पीला आसन, सफ़ेद आसन या कुश का आसन ही लीजिए। लाल आसन भगवती के लिए है, और भगवती में भी उनके रूपों के भेद से रंग बदल जाते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या पंचाक्षरी मंत्र के जप और साधना के लिए आसन सफ़ेद ही होना चाहिए, और क्या उस लाल आसन पर नहीं हो सकता जिस पर वे दूसरी दिव्य साधनाएँ करते आ रहे हैं। वक्ता कहते हैं, देखिए, रंग के अनुसार साधना चुनने का विषय पहले से चला आ रहा है। इसलिए पीला आसन, सफ़ेद आसन या कुश आसन ही लीजिए। लाल आसन भगवती के लिए है; और भगवती में भी उनके रूपों के भेद से रंग बदल जाते हैं।
रुद्रगण की साधना कब करें?
पहले दिन शिव मंदिर में, या सभी दिन
रुद्रगणों की साधना पहले दिन ही शिव मंदिर में कीजिए; और अगर सभी दिन करें तो सबसे उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि रुद्रगणों की साधना पहले दिन ही शिव मंदिर में कीजिए। और अगर सभी दिन, सभी दिन करें, तो सबसे उत्तम है।
क्या पंचाक्षरी विधि में काली का त्रिलोक विजयी कवच जोड़ सकते हैं?
पंचाक्षरी साधना में काली का कवच और 108 नामावली
पूछा गया कि माँ काली में अधिक श्रद्धा होने के कारण क्या पंचाक्षरी विधि के साथ रात में माँ काली के त्रिलोक विजयी कवच का जप कर सकते हैं, और क्या पंचाक्षरी साधना में माँ दुर्गा की जगह माँ काली की 108 नामावली पढ़ सकते हैं। वक्ता कहते हैं: बिल्कुल कीजिए। माँ काली के त्रिलोक विजयी कवच का जप कर सकते हैं, और 108 नामावली भी पढ़ सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या पंचाक्षरी मंत्र की विधि के साथ रात में माँ काली के त्रिलोक विजयी कवच का जप हो सकता है, क्योंकि उनकी माँ काली में श्रद्धा अधिक है; और क्या पंचाक्षरी साधना में माँ दुर्गा की जगह माँ काली की 108 नामावली पढ़ सकते हैं। वक्ता कहते हैं, बिल्कुल कीजिए। माँ काली के त्रिलोक विजयी कवच का भी जप कर सकते हैं, और 108 नामावली भी पढ़ सकते हैं।
क्या देवता का तर्पण उनके नामों से कर सकते हैं?
अष्टोत्तर शतनाम से तर्पण
पूछा गया कि क्या किसी देवता की शांति के लिए उनके नामों से, जैसे अष्टोत्तर सतनाम से, तर्पण हो सकता है। वक्ता कहते हैं: हाँ, बिल्कुल हो सकता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या किसी देवता की शांति के लिए उनके नामों से, जैसे अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। से, तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। हो सकता है। वक्ता कहते हैं, हाँ, बिल्कुल हो सकता है।
क्या जप के बाद जप माला गले में पहन सकते हैं?
पहनी हुई जप माला जूठन हो जाती है
पूछा गया कि क्या जप के बाद आसन पर बैठे-बैठे पाँच-दस मिनट माला गले में पहनकर दूसरा पाठ करें, फिर सुमेरु को पानी से धोकर वापस रख दें। वक्ता कहते हैं कि जीवन में यह गलती कभी मत कीजिए। जिसने यह सलाह दी, और इस पर जो वीडियो वायरल होते हैं — उन लोगों को इन बातों का कोई ज्ञान नहीं है।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या जप के बाद आसन पर बैठे-बैठे पाँच-दस मिनट माला गले में पहनकर दूसरा पाठ करें, और फिर माला के सुमेरु को पानी से धोकर वापस रख दें — क्या ऐसा करना चाहिए? वक्ता कहते हैं कि जिसने भी आपको यह बताया, वे जानते हैं कि इस तरह के वीडियो यूट्यूब पर वायरल होते हैं। उन लोगों को इन बातों का बिल्कुल ज्ञान नहीं है; यही सीधी सच्चाई है। जीवन में यह गलती कभी मत कीजिए। माला गले में डालना केवल कुछ विधानों में होता है — जैसे महाकाल और महाभैरव विधान में, और वहाँ भी केवल बिल्कुल आखिरी दिन। अगर एक बार माला गले में पहन ली, तो फिर उसका उपयोग केवल अपने लिए, अपने शरीर के लिए ही हो सकता है।
पहनी हुई माला पर जप करके अर्पण करने का क्या दोष है?
अपना जूठा अर्पण करने जैसा ही दोष
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद उस माला पर जप करके देवताओं को समर्पित नहीं कर सकते। वह माला जूठन हो गई; वह जूठी माला है। अगर आप देवता की प्रसन्नता के लिए, अपने देवता की सेवा के लिए जप कर रहे हैं, तो जप माला कभी गले में नहीं पहननी चाहिए। अगर पहन ली, तो आगे उसका उपयोग केवल पहनने के लिए ही होगा।
वक्ता कहते हैं कि बाद में उस माला पर जप करके देवताओं को समर्पित नहीं कर सकते। वह माला जूठन हो गई। वह जूठी माला है। यह काम कभी नहीं करना चाहिए। अगर आप देवता की प्रसन्नता के लिए, अपने देवता की सेवा के लिए जप कर रहे हैं, तो जप माला कभी गले में नहीं पहननी चाहिए। अगर माला पहन ली, तो आगे उसका उपयोग केवल पहनने में ही होगा। वे कहते हैं कि देवता उसे स्वीकार नहीं करेंगे; और अगर फिर उस पर जप करके देवताओं को समर्पित करेंगे, तो उसका दोष आपको लगेगा — वही दोष जो अपने आराध्य को अपना उच्छिष्ट समर्पित करने से लगता है। यह ध्यान रखिए, और भूलकर भी यह गलती कभी मत कीजिए।
पहनी हुई माला की ऊर्जा कहाँ जाती है?
अपने सूक्ष्म शरीर को, रक्षा के लिए
वक्ता कहते हैं कि यह आप ज़रूर कर सकते हैं: एक माला या दस माला जप करके फिर वह माला पहन लें। तब उसकी ऊर्जा देवता को समर्पित नहीं हो रही; उसकी ऊर्जा आपके अपने सूक्ष्म शरीर को, आपकी अपनी आत्मा को समर्पित हो रही है। वह रक्षा के लिए हो सकती है।
वक्ता कहते हैं कि यह आप ज़रूर कर सकते हैं: कि आपने एक माला या दस माला जप किया और फिर वह माला पहन ली। तब उसकी ऊर्जा देवता को समर्पित नहीं हो रही। उसकी ऊर्जा आपके अपने सूक्ष्म शरीर को, आपकी अपनी आत्मा को समर्पित हो रही है। वह रक्षा के लिए हो सकती है।
पूरे हुए अस्त्र मंत्र पुरश्चरण की माला का क्या करें?
अष्टाक्षरी सुदर्शन की माला वंशजों के लिए सँभालकर रखें
वक्ता कहते हैं, अस्त्र मंत्रों को लीजिए, जैसे सुदर्शन चक्र का मंत्र — अष्टाक्षरी सुदर्शन मंत्र। किसी ने उसका महापुरश्चरण, आठ लाख, पूरा किया। जिस तुलसी की माला पर वह जप हुआ, वह अत्यंत दिव्य हो गई है। उसे बचाकर सुरक्षित रखना चाहिए, ताकि आगे आप और आपके वंश के लोग उसी माला पर जप करें। तुरंत सिद्धि मिलेगी, तुरंत कृपा मिलेगी।
वक्ता कहते हैं, अस्त्र मंत्रों को लीजिए, जैसे सुदर्शन चक्र का मंत्र। किसी ने उसका महापुरश्चरण पूरा किया — अष्टाक्षरी सुदर्शन मंत्र, आठ लाख का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक।। अब वह माला, तुलसी की वह माला जिस पर वह जप हुआ — पर उस माला के बारे में हम यह नहीं कहेंगे कि उस पर आठ लाख जप हुआ है। वह माला अत्यंत दिव्य हो गई है। उसे बचाकर सुरक्षित रखना चाहिए, ताकि आगे आप और आपके वंश के लोग उसी माला पर जप करें। तुरंत सिद्धि मिलेगी, तुरंत कृपा मिलेगी।
रक्षा के लिए पहनने वाली माला कैसे तैयार करें और पहनें?
दूसरी माला, 5,000 या 11,000 जप, फिर रोज़ पहनें
तो किसी दूसरी माला पर फिर से 5,000 या 11,000 जप करके वह माला पहनिए, और रोज़ एक माला जप करते और पहनते रहिए। तब वह ऊर्जा आपके शरीर की रक्षा के लिए होगी, और जो मंत्र सिद्ध किया गया था वह माला को भी चैतन्य और सिद्ध कर देगा। वे कहते हैं कि इसका कुछ वर्णन राधा तंत्र में है।
वक्ता कहते हैं, तो किसी दूसरी माला पर फिर से 5,000 या 11,000 जप करके वह माला पहनिए, और रोज़ एक माला जप करते और पहनते रहिए। तब वह ऊर्जा आपके शरीर की रक्षा के लिए होगी। जो मंत्र सिद्ध किया गया था, वह माला को भी चैतन्य और सिद्ध कर देगा। वे कहते हैं कि राधा तंत्र में इसका कुछ-कुछ वर्णन है; किसी दिन जब वे उस विषय पर चर्चा करेंगे तो यह और स्पष्ट होगा।
अगर यंत्र हो तो जप कहाँ समर्पित करें?
प्रतिष्ठित यंत्र पर जप समर्पित करें
वक्ता कहते हैं कि आप यंत्र पर समर्पण कर सकते हैं। जब भी कोई यंत्र आपके पास हो और प्रतिष्ठित हो, और आप उन पर जप आदि समर्पित करते हों, तो उन्हीं पर कीजिए।
वक्ता एक श्रोता से कहते हैं कि आप यंत्र पर समर्पण कर सकते हैं। जब भी कोई यंत्र आपके पास हो और प्रतिष्ठित हो, और आप उन पर जप आदि समर्पित करते हों, तो उन्हीं पर कीजिए।
क्या भगवान दत्तात्रेय की भी गीता है?
दत्त पुराण
पूछा गया कि क्या भगवान दत्तात्रेय की भी गीता है, और इसकी जानकारी किस पुराण में है। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल है, और भगवान दत्तात्रेय का अपना दत्त पुराण है।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या भगवान दत्तात्रेय की भी गीता है, और इसकी जानकारी किस पुराण में है। वक्ता कहते हैं, बिल्कुल है। भगवान दत्तात्रेय का अपना दत्त पुराण है।
अपने आप की गई क्रोध भैरव साधना बिगड़ जाए तो क्या प्रायश्चित्त है?
सबसे ऊँचे स्तर की उग्र साधनाएँ और उनके लिए ज़रूरी तपोबल
एक श्रोता लिखते हैं कि उनकी एक मित्र ने इंटरनेट पर देखकर क्रोध भैरव साधना और सिद्ध कुंजिका की साधना की, और अब उन्हें बहुत मानसिक परेशानी है; साधना रुकवा दी गई है, अब प्रायश्चित्त के लिए क्या करें? वक्ता कहते हैं कि क्रोध भैरव साधना और दूसरी उग्र साधनाएँ क्रमागत साधनाओं में और अंग विद्याओं में सबसे ऊँचे स्तर की हैं। इन्हें सीधे किया ही नहीं जा सकता: तपोबल के बिना किसी व्यक्ति में इनकी ऊर्जा सहने की क्षमता नहीं होती, क्योंकि ये सबसे उग्र शक्तियाँ हैं।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनकी एक मित्र ने इंटरनेट पर देखकर क्रोध भैरव साधना और सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् की साधना की थी, और अब उन्हें बहुत मानसिक परेशानी हो रही है। उन्होंने समझाया और उसने साधना छोड़ दी — अब प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। के लिए क्या कर सकते हैं? वक्ता कहते हैं, देखिए, क्रोध भैरव साधना और जो भी दूसरी उग्र साधनाएँ हैं — क्रमागत साधनाओं में ये सबसे ऊँचे स्तर की हैं, और अंग विद्याओं में भी सबसे ऊँचे स्तर की हैं। इन्हें सीधे किया ही नहीं जा सकता। अगर तपोबल नहीं है, तो किसी व्यक्ति में इनकी ऊर्जा सहने की क्षमता नहीं होती। ये सबसे उग्र शक्तियाँ हैं।
मंत्र श्राप या देव श्राप का क्या उपाय है?
क्षमा के संकल्प के साथ रुद्री पाठ और रुद्राभिषेक
सबसे पहले, अगर समस्या बहुत बड़ी है, तो संकल्प लेकर रुद्री पाठ के साथ रुद्राभिषेक करवाइए। संकल्प यह हो कि जो भी मंत्र या देव श्राप या दोष लगा है, जो भी अपराध हुआ है, उसकी क्षमा मिले और क्रोध शांत हो। फिर रोज़ कर्म साक्षी दीप जलाकर दही और गुड़ से भगवान शिव का अभिषेक कीजिए, और उनसे क्षमा माँगते हुए रुद्राष्टकम का पाठ कीजिए।
वक्ता कहते हैं, सबसे पहले, अगर परेशानी बहुत बड़ी है, तो संकल्प करके रुद्री पाठ के साथ भगवान शिव का रुद्राभिषेक करवाइए। संकल्प यह हो कि जो भी मंत्र या देव शाप या दोष लगा है, जो भी अपराध हुआ है, उसकी क्षमा मिले और क्रोध शांत हो — इसी के लिए। और फिर सबसे बुनियादी बात, जो वे कई बार बताते हैं: रोज़ दही और गुड़ से भगवान शिव का अच्छे से अभिषेक कीजिए, कर्म साक्षी दीप आदि जलाकर, और उनसे क्षमा माँगते हुए रुद्राष्टकम् का पाठ कीजिए। यह सब भगवान शिव का ही स्वरूप है, इसलिए इससे तुरंत शांति आएगी।
शिव माला मंत्र में क्या है?
भैरव के सभी मुख्य रूप, और उन्हें सौम्य करने वाले बीज
लोग जिस शिव माला मंत्र का पाठ और जप करते हैं, उसमें भगवान शिव के सभी मुख्य भैरव रूपों का वर्णन है। यह सबसे उग्र माला मंत्रों में से है। पर उस माला मंत्र में भगवान शिव के ऐसे बीज और मंत्र भी दिए गए हैं जिनसे वे सब सौम्य हो जाते हैं, और जब परिस्थिति सबसे कठिन हो तब इसका जप और पाठ करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि लोग जिस शिव माला मंत्र का पाठ और जप करते हैं, उसमें भगवान शिव के सभी मुख्य भैरव रूपों का वर्णन है। यह सबसे उग्र माला मंत्रों में से है। पर उस माला मंत्र में भगवान शिव के ऐसे बीज और मंत्र भी दिए गए हैं जिनसे उन सबकी सौम्यता आती है, और जब परिस्थिति सबसे कठिन हो तब इसका जप, पाठ आदि करना चाहिए। सामान्य रूप से एक पाठ या पाँच पाठ करें तो उसमें कोई दोष या दिक्कत नहीं; वह कर सकते हैं। पर अगर आप सीधे मंत्रों का उपयोग करें — कपाल भैरव, क्रोध भैरव, महाकाल भैरव, जिनमें बीजाक्षर हैं और शक्तियाँ उग्र हैं — तो बात केवल मंत्र जप की नहीं रहेगी; तब परेशानी होगी।
क्या शालिग्राम या शिवलिंग गमले या बगीचे में रख सकते हैं?
पूजा स्थान में उचित जगह
एक श्रोता पूछते हैं कि कुछ लोग घर में शालिग्राम जी और शिवलिंग को गमले में जगह देते हैं, क्या यह उचित है। वक्ता कहते हैं कि यह बिल्कुल अनुचित है। हद यह है कि लोग शिवलिंग या शालिग्राम जी को बाहर बगीचे में, किनारे, झाड़-झंखाड़ में रख देते हैं और वहीं पानी डालते रहते हैं। यह पूरी तरह अनुचित है, नहीं करना चाहिए — उनकी जगह विधि से पूजन स्थान में होनी चाहिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि कुछ लोग घर में शालिग्राम जी और शिवलिंग को गमले में जगह देते हैं, क्या यह उचित है। वक्ता कहते हैं, यह बिल्कुल अनुचित है। हद यह है कि लोग शिवलिंग को बाहर बगीचे में या किनारे रख देते हैं, और शालिग्राम जी को वहाँ रख देते हैं — झाड़ है, झंखाड़ है, जो भी है — और वहीं पानी डालते रहते हैं। यह पूरी तरह अनुचित है; नहीं करना चाहिए। उनकी जगह विधि के अनुसार पूजन स्थान में होनी चाहिए।
मासिक धर्म के बीच स्त्री तीस दिन की पंचाक्षरी साधना कैसे पूरी करे?
चार दिन के अंतर के लिए अलग उपाय की ज़रूरत नहीं
पूछा गया कि पंचाक्षरी साधना के बीच रजस्वला हो जाएँ तो तीस दिन कैसे पूरे करें, और बीच के अंतराल में क्या करें। वक्ता कहते हैं कि जो चार-पाँच दिन पड़ेंगे, उनमें कोई दिक्कत नहीं। उस समय वही सामान्य नियम है — छूना नहीं, पूजा नहीं करनी। जो चार दिन छूटेंगे, उनकी चिंता मत कीजिए; थोड़ा कम होगा, पर और कुछ करने की ज़रूरत नहीं। अगर बहुत इच्छा हो तो साधना चार दिन और बढ़ा सकते हैं, वह और भी अच्छा होगा।
एक श्रोता पूछती हैं कि पंचाक्षरी मंत्र साधना के बीच रजस्वला हो जाएँ तो तीस दिन कैसे पूरे करें, और बीच के अंतराल में क्या करें। वक्ता कहते हैं, देखिए, जो चार-पाँच दिन बीच में पड़ेंगे, उनमें कोई दिक्कत नहीं। उस समय जो नियम लागू होता है — छूना नहीं, पूजा नहीं करनी — वही नियम निभाया जाएगा। जो चार दिन छूटेंगे, उनकी चिंता मत कीजिए। थोड़ा कम होगा, पर उसमें और कुछ करने की ज़रूरत नहीं। अगर बहुत इच्छा हो, तो साधना चार दिन और बढ़ा भी सकती हैं। वह और भी अच्छा होगा।
शिव महापुराण पंचाक्षरी पुरश्चरण के लिए कौन-से महीने बताता है?
भाद्रपद और माघ, सत्रहवें अध्याय में
भादो के महीने में और आषाढ़ के महीने में भी शिव जी का पूजन और पंचाक्षरी का जप होता है; और पंचाक्षरी पुरश्चरण के लिए भाद्रपद का मास और माघ का मास — ये दो मास — शिव महापुराण के सत्रहवें अध्याय में बताए गए हैं। वे कहते हैं कि विद्येश्वर संहिता का सत्रहवाँ अध्याय पढ़िए, वहाँ मिल जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि भादो के महीने का माहात्म्य वे वीडियो में भी दिखा और बता चुके हैं। भादो के महीने में और आषाढ़ के महीने में भी शिव जी का पूजन और पंचाक्षरी मंत्र का जप होता है; और पंचाक्षरी पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। के लिए भाद्रपद का मास और माघ का मास — ये दो मास — शिव पुराण में, सत्रहवें अध्याय में बताए गए हैं। वे कहते हैं कि विद्येश्वर संहिताशिव महापुराण का वह खंड जिसमें अग्नि स्तंभ प्रसंग वर्णित है — सदाशिव का प्रथम अग्नि-स्तंभ प्राकट्य, कालभैरव की उत्पत्ति, तथा पंचाक्षरी मंत्र का जन्म। का सत्रहवाँ अध्याय पढ़िए, वहाँ आपको पता चल जाएगा। इसलिए अगर उसमें साधना चार दिन बढ़ा दें, तो कोई दिक्कत नहीं; यह उत्तम ही है।
शास्त्र क्या कहता है
The Vidyeshwar Samhita names Māgha and Bhādrapada as the two most excellent months for undertaking the Panchakshari mantra's purashcharan.
Verse reads "māghaṃ bhādraṃ viśiṣṭaṃ tu sarvakālottamottamam" inside chapter 17, whose subject is exactly the japa/purashcharan of the Panchakshari.
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गुरूपदेशं सङ्गम्य सुखवासे सुभूतले। पूर्वपक्षे समारभ्य कृष्णाभूतावधि द्विजाः॥ ३५
हे द्विजो! गुरुसे उपदेश पाकर वह किसी सुखद स्थानमें, अच्छी भूमिपर रहे। शुक्ल पक्षमें आरम्भ करके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशीतक जप करे।
कृष्ण पक्ष के प्रदोष पर शिववास देखकर, उचित हो तो रुद्राभिषेक यज्ञ करवा सकते हैं
शिववास देखना
वक्ता कहते हैं कि 30 अगस्त को कृष्ण पक्ष का प्रदोष रहेगा। अगर शिववास उचित है तो आप करवा सकते हैं — शिववास के दिन देखकर करवा सकते हैं। पर अगर आप किसी ज्योतिर्लिंग क्षेत्र के आसपास हैं, तो शिववास देखने की ज़रूरत नहीं।
प्रदोष व्रत रखने वाली एक श्रोता पूछती हैं कि क्या 30 अगस्त को, जो भादो मास की प्रदोष तिथि है, रुद्राभिषेक यज्ञ करवाया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि 30 अगस्त को कृष्ण पक्ष का प्रदोष रहेगा। अगर शिववास उचित है तो आप करवा सकती हैं। शिववास के दिन देखकर करवा सकती हैं। पर अगर किसी ज्योतिर्लिंग क्षेत्र के आसपास है, तो शिववास देखने की ज़रूरत नहीं।
क्या स्तोत्र स्पीकर पर सुन सकते हैं, और क्या बिना दीपक के पाठ अनुचित है?
सुनना ठीक है, पर रुद्री पाठ स्पीकर पर नहीं
पूछा गया कि क्या सुबह उठकर बटुक भैरव स्तोत्रम, रुद्री पाठ और महिषासुर मर्दिनी स्पीकर पर सुन सकते हैं, और क्या बिना दीपक के केवल पाठ करना अनुचित है। वक्ता कहते हैं कि स्पीकर पर सुन सकते हैं — लोग सुन ही रहे हैं, और सुनने में कोई दोष नहीं। पर रुद्री पाठ के लिए स्पीकर उचित नहीं होगा।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या सुबह उठकर बटुक भैरव स्तोत्रम, रुद्री पाठ और महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र स्पीकर पर सुन सकते हैं, और क्या बिना दीपक के केवल पाठ करना अनुचित है। वक्ता कहते हैं, देखिए, स्पीकर पर सुन सकते हैं; कुछ लोग सुन ही रहे हैं। सुनिए — उसे सुनने में कोई दोष नहीं। पर रुद्री पाठ के लिए स्पीकर उचित नहीं होगा।
क्या क्षेत्रपाल निकारी का विधान कर सकते हैं?
क्षेत्रपाल निकारी
क्षेत्रपाल निकारी के लिए दिए गए विधान के बारे में पूछा गया कि क्या उसका पाठ करके क्षेत्रपाल निकारी कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं: बिल्कुल कीजिए।
एक श्रोता क्षेत्रपाल निकारी के लिए दिए गए विधान के बारे में पूछते हैं — क्या उसका पाठ करके क्षेत्रपाल निकारी कर सकते हैं? वक्ता कहते हैं, बिल्कुल कीजिए।
क्या बटुक भैरव का साबर मंत्र ध्यान मंत्र की तरह ले सकते हैं?
"करकलित कपाला" से शुरू होने वाला सात्विक ध्यान मंत्र
पूछा गया कि क्या बटुक भैरव साबर मंत्र को ध्यान मंत्र की तरह ले सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि ऐसा भी कर सकते हैं, उसमें कोई दिक्कत नहीं। पर ध्यान मंत्र का अपना ध्यान मंत्र होता है: "करकलित कपाला" वाला जो ध्यान मंत्र है, बटुक भैरव जी का सात्विक ध्यान मंत्र — वह कीजिए, वह बेहतर होगा।
मंदिर में पंचाक्षर मंत्र कितनी ज़ोर से बोलें?
उपांशु जप — केवल होंठ हिलें
वक्ता कहते हैं कि सावन के महीने में रोज़ रात को शिव मंदिर में पंचाक्षर मंत्र सिद्धि का विधान बिल्कुल कर सकते हैं। और जप करते समय मंत्र बिल्कुल सुनाई नहीं देना चाहिए — सब यह ध्यान रखें। किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि आप किस मंत्र का जप कर रहे हैं। मंत्रों का जप ज़ोर से मत कीजिए; केवल होंठ हिलें, थोड़ा बुदबुदाते हुए, उपांशु जप की तरह। बहुत ज़ोर से या तेज़ी से नहीं करना है।
पूछा गया कि क्या सावन के महीने में रोज़ रात को शिव मंदिर में पंचाक्षर मंत्र सिद्धि का विधान कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं: बिल्कुल कर सकते हैं। और जप करते समय मंत्र बिल्कुल सुनाई नहीं देना चाहिए; सब यह ध्यान रखें। किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि आप किस मंत्र का जप कर रहे हैं। मंत्रों का जप ज़ोर से नहीं करना है। केवल होंठ हिलें; होंठों से थोड़ा बुदबुदाते हुए जो जप होता है — उस उपांशु जप की तरह कीजिए। बहुत ज़ोर से और तेज़ी से नहीं करना है।
कौन-सा पेशा धर्म से जुड़ा है?
हर काम धर्म-संगत है; उसे वैसा रखना आप पर है
धर्मशास्त्र में गहरी रुचि रखने वाले एक श्रोता ने पूछा कि कौन-सा काम करें। वक्ता कहते हैं कि अपनी रुचि के अनुसार चुनिए। सभी काम धर्म के अनुकूल हैं; कोई काम ऐसा नहीं जो न हो। अगर कोई पेशे से डॉक्टर बनता है तो वह वैद्य बन रहा है, और वैद्य के रूप में भगवान धन्वंतरि, भगवान वैद्यनाथ, भगवान पशुपतिनाथ महादेव और अश्विनी कुमार उपस्थित हैं।
एक श्रोता लिखते हैं कि वे ऐसा काम करना चाहते हैं जिसमें धर्म शामिल हो, क्योंकि धर्मशास्त्र में उनकी रुचि बहुत है, और पूछते हैं कि कौन-सा काम करें। वक्ता कहते हैं, अपनी रुचि के अनुसार काम चुनिए। देखा जाए तो सभी काम धर्म के अनुकूल हैं; कोई काम ऐसा नहीं जो धर्म-संगत न हो। अगर कोई पेशे से डॉक्टर बनता है, तो वह वैद्य बन रहा है। धन्वंतरिआयुर्वेद से संबद्ध भगवान विष्णु के अवतार, दिव्य वैद्य धन्वंतरि — स्वप्न में उनका दर्शन खिले हुए कमल या पूर्ण कलश जैसे प्रतीकों के समान शुभ कृपा का संकेत माना जाता है। के रूप में, भगवान वैद्यनाथ के रूप में, भगवान पशुपतिनाथ महादेव के रूप में, और उनके सिवाय अश्विनी कुमार के रूप में महाशक्तियाँ और दिव्य शक्तियाँ वैद्य के रूप में उपस्थित हैं। और अगर वह जीवन की रक्षा करेगा, तो उससे बड़ा काम क्या हो सकता है? पर वे कहते हैं कि आज के समय में निन्यानवे प्रतिशत ऐसे हैं जो लाश पर से भी पैसे निकाल लेते हैं। इसलिए यह अपने ऊपर है कि आप धर्म के अनुकूल चल रहे हैं या नहीं।
इंजीनियर के काम के पीछे कौन-से देवता हैं?
विश्वकर्मा, और कामाख्या में उनका स्थान
वक्ता कहते हैं कि जो इंजीनियर हैं, वे भगवान विश्वकर्मा जी का पूजन करते हैं। कामाख्या में जाने पर सौभाग्य कुंड वाले मार्ग में दूसरे द्वार के पास विश्वकर्मा जी स्थापित हैं; कामदेव ने विश्वकर्मा जी को बुलाकर मंदिर बनवाया था। माना जाता है कि उन्हीं की कृपा से कोई सफल इंजीनियर बनता है और काम में महारत पाता है।
वक्ता कहते हैं कि जो इंजीनियर हैं, वे भगवान विश्वकर्मा जी का पूजन करते हैं। कामाख्या में जाने पर सौभाग्य कुंड वाले मार्ग में दूसरे द्वार के पास विश्वकर्मा जी स्थापित हैं। कामदेव ने विश्वकर्मा जी को बुलाकर मंदिर बनवाया था। और माना जाता है कि उन्हीं की कृपा से कोई सफल इंजीनियर बनता है और काम में महारत पाता है। अब अगर वह रिश्वत ले, और बिहार में या कहीं और जो पुल गिर रहे हैं वे गिरें, तो उसमें उसका भी हिस्सा है। व्यवस्था उसे मजबूर करती है, यह अलग विषय है। काम तो फिर भी धर्म-युक्त था; वह सृजन का काम था। ब्रह्मा जी की सृष्टि में उनके स्वरूप से उत्पन्न त्वष्टा भगवान विश्वकर्मा हैं, और उन्हीं की कृपा, बुद्धि और आशीर्वाद से मनुष्य इंजीनियर बनता है और इस सृष्टि के निर्माण में अपना योगदान देता है — और उसमें वह गलत काम करता है। काम धर्म-संगत था, फिर भी उसने अधार्मिक काम किया है।
अधर्म के मामले में सबसे ज़्यादा बदनाम कौन है?
तांत्रिक और पंडित बदनाम, जबकि हर क्षेत्र वैसा ही है
वक्ता कहते हैं कि अधर्म के मामले में सबसे ज़्यादा बदनाम तांत्रिक, पंडित, इस पेशे के लोग हैं, जिन्हें पाखंडी कहा जाता है। पर दूसरी तरह से देखिए: किसी भी क्षेत्र में चले जाइए, हर जगह हाल वैसा ही है।
वक्ता कहते हैं कि अधर्म के मामले में केवल और केवल सबसे ज़्यादा बदनाम तांत्रिक और पंडित हैं, इस पेशे के लोग, जिन्हें पाखंडी कहा जाता है। पर एक तरह से देखिए: किसी भी क्षेत्र में चले जाइए, हर क्षेत्र में गिरावट का हाल वैसा ही है। न्याय के क्षेत्र में न्याय शास्त्र प्रसिद्ध हैं, और यह धर्म से जुड़ा काम है — किसी पीड़ित को न्याय दिलाना। पर अगर रिश्वत खाई जाए और पीड़ित को ही जेल में डाल दिया जाए, तो कौन-सा न्याय बचा, और कौन-सा धर्मशास्त्र रहा? शिक्षा देने के बारे में कहा गया है कि गुरु को पैसा लेना ही नहीं चाहिए — विषय यहाँ तक जाता है। आज के समय में पैसा लिया जाता है और शिक्षा नहीं दी जाती। पूरे भारत में शिक्षा का बहुत बड़ा व्यापार फैल गया है — एक-एक किताब हज़ार-पंद्रह सौ की, और महीने की फ़ीस दस हज़ार।
भैरव और प्रशासनिक पद का क्या संबंध है?
काशी के कोतवाल, और हर क्षेत्र का रक्षक
वक्ता कहते हैं कि भगवान भैरव काशी के कोतवाल, रक्षक हैं, और हर प्रशासन में हर प्रशासनिक अधिकारी का कर्तव्य है कि वह भगवान भैरव के रूप में रक्षा करे। अपने क्षेत्र की रक्षा करने वाले क्षेत्रपाल भगवान भैरव हैं, और सभी प्रशासनिक अधिकारी, चाहे इंस्पेक्टर हों या कोई और, उनके अनुयायी हैं; अगर वे अपने क्षेत्र की रक्षा कर रहे हैं तो वह भैरव जी का रूप है, और वह भी धर्म से जुड़ा काम है।
वक्ता कहते हैं कि भगवान भैरव काशी के कोतवाल हैं, रक्षक हैं। और हर प्रशासन में, सभी प्रशासनिक अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे भगवान भैरव के रूप में रक्षा करें। क्षेत्रपाल भगवान भैरव, जो अपने क्षेत्र की रक्षा करते हैं — प्रशासन के सभी अधिकारी उनके अनुयायी हैं, चाहे इंस्पेक्टर हों या कोई और। अगर वे अपने क्षेत्र की रक्षा कर रहे हैं तो वह भैरव जी का रूप है, और वह भी धर्म से जुड़ा काम है। पर वह काम उस तरह नहीं हो रहा। डॉक्टर, वकील, पुलिस — जेब गरम हो रही है। आप पीड़ित और परेशान हैं, इससे उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता; दिल ही नहीं है। इसलिए हर काम धर्म से जुड़ा है; आप उसे वैसे निभा रहे हैं या नहीं, यह आप पर है। वे जोड़ते हैं कि अगर धर्मशास्त्र में रुचि है, और उपदेशक बनना चाहते हैं, तो लेक्चरर बन सकते हैं — डिग्री हो तो किसी संस्कृत विश्वविद्यालय में आवेदन करके प्रोफ़ेसर बनिए; उसमें आनंद आएगा।
क्या पूजन की गलती और प्रयोग की गलती एक जैसी मानी जाती हैं?
पूजन में क्षमा, प्रयोग में बड़ी परेशानी
वक्ता कहते हैं कि पूजन-पाठ करते हुए कोई चूक हो जाए तो क्षमा माँगने से क्षमा मिल जाती है। पर अगर कोई प्रयोग करता है, तो उसमें परेशानी ज़्यादा होती है। और जहाँ पूजन में जान-बूझकर अपराध किए जाते हैं, वहाँ परेशानी होती है।
एक श्रोता लिखते हैं कि अच्छे से पूजा करना रसायन विज्ञान के किसी खतरनाक प्रयोग जैसा है और इसे सावधानी से करना चाहिए, इसलिए उन्होंने गुरु पूर्णिमा से अपना अनुष्ठान शुरू करने का सोचा है। वक्ता उन्हें अद्भुत कहते हैं और बहुत अच्छे से करने को कहते हैं। वक्ता कहते हैं कि पूजन-पाठ करते हुए कोई चूक हो जाए, तो क्षमा प्रार्थना करने से क्षमा मिल जाती है। पर अगर कोई प्रयोग करता है, तो उसमें परेशानी ज़्यादा होती है। और अगर पूजन में जान-बूझकर अपराध किए जाएँ, तो परेशानी होती है।
क्या परिवार में मृत्यु वाले वर्ष में सावन का अनुष्ठान कर सकते हैं?
पहले वार्षिक श्राद्ध होना चाहिए
एक श्रोता बताते हैं कि उनके पिता का देहांत मई 2024 में हुआ। नया संवत्सर तब तक शुरू हो चुका था, इसलिए मृत्यु इसी संवत्सर में हुई। वक्ता कहते हैं कि उनका वार्षिक श्राद्ध हो गया हो, तभी सावन का अनुष्ठान कीजिए; वरना शिव जी के अभिषेक पर कोई रोक नहीं — शिव जी का अभिषेक कीजिए, सूर्य भगवान को अर्घ्य दीजिए, और सहस्रनाम आदि का पाठ कीजिए।
एक श्रोता बताते हैं कि उनके पिता का देहांत 2024 में मई के महीने में हुआ। वक्ता कहते हैं कि नया संवत्सर तब तक शुरू हो चुका था, यानी देहांत इसी संवत्सर में हुआ। इसलिए अगर उनका वार्षिकी श्राद्ध हो गया है, तभी सावन का अनुष्ठान कीजिए। वरना शिव जी के अभिषेक पर कोई रोक नहीं — शिव जी का अभिषेक कीजिए। सूर्य भगवान को अर्घ्य आदि दीजिए, और सहस्रनाम आदि का पाठ कीजिए।
पंचाक्षरी के साथ प्रणव कौन बोल सकता है?
प्रणव संन्यासियों के लिए, षडक्षरी दीक्षितों के लिए
एक श्रोता लिखते हैं कि प्रणव के साथ पंचाक्षरी जप के बारे में कहा गया है कि प्रणव का उच्चारण केवल संन्यासी करें, इसलिए उन्हें केवल पंचाक्षरी करनी चाहिए। वक्ता सहमत हैं: षडक्षरी का जप तभी कीजिए जब कोई गुरु दीक्षा दे और दीक्षा व उपदेश देकर जप करने की आज्ञा दे। वरना अगर आप दीक्षित नहीं हैं तो केवल पंचाक्षरी का जप कीजिए — और उसमें भी, अगर यज्ञोपवीत नहीं पहनते, तो नमः बाद में रखकर जप कीजिए।
घर में स्थापित शिवलिंग के साथ क्या होना चाहिए?
शिवलिंग के साथ शिव परिवार
वक्ता कहते हैं कि घर में स्थापित शिवलिंग में शिव परिवार होना चाहिए: शिवलिंग, उसकी अरघी, त्रिशूल, नंदी जी, सर्प वासुकी जी। इसके सिवाय आप शिव परिवार का ऐसा श्री विग्रह भी रख सकते हैं जिसमें स्कंद जी और गणपति जी भी हों; और अगर उनकी मूर्तियाँ पहले से अलग हैं, तो दोबारा रखने की ज़रूरत नहीं।
वक्ता कहते हैं कि घर में स्थापित शिवलिंग में शिव परिवार होना चाहिए। शिवलिंग है, उसकी अरघी है, त्रिशूल है, नंदी जी हैं, सर्प हैं, वासुकी जी। इसके सिवाय उनके साथ आप शिव परिवार का ऐसा श्री विग्रह भी रख सकते हैं जिसमें स्कंद जी और गणपति जी भी हों। और अगर उनकी मूर्ति पहले से अलग है, तो दोबारा रखने की ज़रूरत नहीं।
महीनों की यात्रा पर जाते समय घर के शिवलिंग का क्या करें?
लौटने तक जलने वाली अखंड ज्योत कभी न जलाएँ
पूछा गया कि अगर सात महीने घर से बाहर रहना हो और घर में नर्मदेश्वर शिवलिंग हो तो नित्य सेवा का क्या करें। वक्ता कहते हैं: अगर नर्मदेश्वर जी, शालिग्राम जी, देवी शिला, सोनभद्र शिला, चक्रार्चन के लिए स्फटिक शिला आदि हैं, तो जाने से पहले जो दीपक चल रहा है, उसे पूरा कर देना चाहिए। कई लोग अखंड ज्योत जला देते हैं कि लौटने तक जलती रहे — यह गलती मत कीजिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि अगर सात महीने घर से बाहर जाना पड़े और घर में नर्मदेश्वर शिवलिंग हो, तो क्या कोई दोष लगता है, और सेवा का उचित विधान क्या होगा। वक्ता कहते हैं, देखिए, अगर नर्मदेश्वर जी हैं, शालिग्राम जी हैं, देवी शिला है, सोनभद्र शिला है, चक्रार्चन के लिए स्फटिक शिलाएँ आदि हैं — आप कहीं भी जा रहे हों, गृहस्थ की अपनी मर्यादा होती है। जाने से पहले जो दीपक चल रहा है, उसे पूरा कर देना चाहिए। कई लोग अखंड ज्योति जला देते हैं, बड़ी-सी, कि लौटने तक ज्योत जलती रहे। नहीं — यह गलती नहीं करनी है।
क्या यात्रा पर जाने पर पूजित शक्तियाँ पीछे रह जाती हैं?
वे साथ जाती हैं; कलियुग में अपूज्य का विषय नहीं
वक्ता कहते हैं कि अगर आप जा रहे हैं, तो आपकी पूजित शक्तियाँ भी सब आपके साथ जाएँगी। आप वहाँ प्रणाम करेंगे, उन्हें सूक्ष्म रूप से बताएँगे, और वे जाएँगी; आपके साथ चलेंगी। कलियुग में, आज के समय में, यहाँ अपूज्य का कोई विषय नहीं।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप जा रहे हैं, तो आपकी पूजित शक्तियाँ भी सब आपके साथ जाएँगी। आप वहाँ प्रणाम करेंगे, उन्हें सूक्ष्म रूप से बताएँगे, और वे जाएँगी; आपके साथ-साथ चलेंगी। कलियुग में, आज के समय में, यहाँ अपूज्य का कोई विषय नहीं। वे कहते हैं कि सही विधान यह होता था: जब कोई व्यक्ति कहीं जाता था और नर्मदेश्वर जी, शालिग्राम जी, देवी शिला आदि स्थापित होते थे, तो वह उन्हें अपने पड़ोस के किसी साधक को, पूजन-पाठ करने वाले किसी श्रद्धालु को दे देता था, कि जब तक हम लौटें, आप इनकी सेवा और शृंगार कीजिए। आज के समय में हालत ऐसी है कि किसी को दे दें तो वह उनके साथ कोई शर्मनाक काम करके आपको लौटा देगा; और यह कहना अतिशयोक्ति नहीं, कुछ भी हो सकता है, हर तरह के लोग हैं।
लंबी यात्रा पर जाने से पहले सेवा का विधान क्या है?
नैवेद्य, सूखे मेवे का भोग, ढकना, प्रणाम और निवेदन
वक्ता कहते हैं कि कोई दोष नहीं लगेगा। अगर आप कहीं जा रहे हैं, तो नैवेद्य अर्पित करके, सूखे मेवे का भोग लगाकर, ढककर, प्रणाम करके भगवान से निवेदन कीजिए: कि हम इस जगह जा रहे हैं और इतने दिनों में लौटेंगे, इसलिए निवेदन है कि हम मानसिक रूप से आपका स्मरण और पूजन करेंगे, आप हमारा वही पूजन स्वीकार करें और प्रसन्न हों; और आप भी हमारे साथ चलें, हमारे काम में सहायता करें, और लौटते समय हमारे साथ वापस आएँ। यह कहकर जाइए — सेवा विधान बस इतना रखिए।
वक्ता कहते हैं, तो इसमें आपको कोई दोष नहीं लगेगा। अगर आप कहीं जा रहे हैं, तो नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। आदि अर्पित करके, सूखे मेवे का भोग लगाकर, ढककर, प्रणाम करके, भगवान से यह निवेदन करके — कि भगवान, हम इस जगह जा रहे हैं और इतने दिनों में लौट आएँगे; इसलिए हमारा निवेदन है कि हम मानसिक रूप से आपका स्मरण और पूजन करेंगे, और आप हमारा वही पूजन स्वीकार करें और प्रसन्न हों; और आप भी हमारे साथ चलें और हमारे काम में सहायता करें, और जब हम लौटें तो हमारे साथ वापस आएँ। यह कहकर जाइए — इसमें कोई दोष नहीं लगता। सेवा विधान बस इतना रखिए।
क्या पार्वती का सप्ताक्षरी मंत्र जीवन भर कर सकते हैं?
सप्ताक्षरी का आजीवन जप
एक श्रोता लिखते हैं कि उनकी प्रीति माँ दुर्गा के स्वरूप में है, और पूछते हैं कि क्या वे माँ पार्वती के सप्ताक्षरी मंत्र का जप आजीवन कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं: बिल्कुल कर सकते हैं।
एक श्रोता लिखते हैं कि उनकी प्रीति माँ दुर्गा के स्वरूप में है, और पूछते हैं कि क्या वे माँ पार्वती के सप्ताक्षरी मंत्र का जप आजीवन कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं, बिल्कुल कर सकते हैं।
क्या श्रावण में हनुमान जी का अभिषेक कर सकते हैं?
हनुमान जी का अभिषेक, पर शिव को छोड़ना नहीं
पूछा गया कि हनुमान जी रुद्र अवतार हैं, तो क्या श्रावण मास में उनका अभिषेक कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि इसमें कोई संदेह रखना ही नहीं: हनुमान जी का अभिषेक, पूजा, शृंगार सब बिल्कुल कर सकते हैं, चोला चढ़ाना आदि भी। पर एक बात ध्यान रखिए — साथ में शिव जी का अभिषेक और पूजन ज़रूर होना चाहिए। श्रावण मास में शिव जी को कभी मत छोड़िए; उनकी जगह किसी को मत रखिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि हनुमान जी रुद्र अवतार हैं, तो क्या श्रावण मास में उनका अभिषेक कर सकते हैं; और संदेह दूर करने को कहते हैं। वक्ता कहते हैं कि संदेह का कोई विषय रखना ही नहीं। हनुमान जी का अभिषेक, पूजा और शृंगार, सब कुछ बिल्कुल कर सकते हैं; चोला चढ़ाना और बाकी सब भी कर सकते हैं। पर एक बात ध्यान रखिए: साथ में शिव जी का अभिषेक और पूजन ज़रूर होना चाहिए। श्रावण मास में शिव जी को कभी मत छोड़िए; उनकी जगह किसी को मत रखिए।
गाणपत्य, सौर, शाक्त या वैष्णव — हर संप्रदाय और पंथ को श्रावण में शिव अभिषेक करना है
गाणपत्य, सौर, शाक्त या वैष्णव — सबको अभिषेक करना है
जैसे कहा जाता है कि आप शैव हों, शाक्त हों, वैष्णव हों या किसी भी संप्रदाय या पंथ के, सबको नवरात्रि का व्रत रखना चाहिए और भगवती की पूजा करनी चाहिए, और सबको उनके दर्शन-पूजन के लिए कामाख्या क्षेत्र और विंध्य क्षेत्र जाना चाहिए — ठीक उसी तरह श्रावण मास में, आप गाणपत्य हों, सौर हों, शाक्त हों या वैष्णव, भगवान शिव के शिवलिंग का अभिषेक और शृंगार ज़रूर कीजिए। इसे छोड़ना नहीं है, और एक दिन भी नहीं छूटना चाहिए।
जैसे कहा गया है कि आप शैव हों, शाक्त हों, वैष्णव हों या किसी भी संप्रदाय या पंथ के, सबको नवरात्रि का व्रत रखना चाहिए, सबको भगवती की पूजा करनी चाहिए, सबको कामाख्या क्षेत्र और विंध्य क्षेत्र जाकर उनके दर्शन और पूजन करने चाहिए — ठीक उसी तरह श्रावण मास में, आप गाणपत्य हों, सौर हों, शाक्त हों या वैष्णव, भगवान शिव के शिवलिंग का अभिषेक और शृंगार ज़रूर कीजिए। इसे छूटने नहीं देना है, और एक दिन भी नहीं छूटना चाहिए। केवल माताएँ-बहनें, जिन चार-पाँच दिनों में अशुद्ध रहती हैं, उनमें नहीं छुएँगी आदि; बाकी सब समय वे जल आदि चढ़ाएँगी। वे कहते हैं कि ये विषय शिव महापुराण में, और पहले से अपलोड की गई लाइव शृंखला में, और भी स्पष्ट देखे-सुने जा सकते हैं।
पर्व काल में पहले किसकी पूजा हो?
अपने आराध्य की, और पर्व के देवता की भी
वक्ता कहते हैं कि सच यह है कि पर्व काल में हमें हमेशा अपने मुख्य आराध्य की पूजा करनी चाहिए, जिनकी जीवन भर सेवा की है; और साथ में, जिनका समय है, जिनका पर्व काल है, उनकी भी पूजा करनी चाहिए। शिव-शक्ति ऐसी महाशक्ति हैं जिनकी पूजा छोड़ी नहीं जा सकती: श्रावण मास में मुख्य रूप से उनका पूजन होगा, और साथ में चलने वाला आराध्य का पूजन भी चलेगा — पर उन्हें छोड़ना नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि सच यह है कि पर्व काल में हमें हमेशा अपने मुख्य आराध्य की पूजा करनी चाहिए, जिनकी हमने जीवन भर सेवा की है। और साथ में, जिनका समय है, जिनका पर्व काल है, उनकी भी पूजा करनी चाहिए। तो शिव-शक्ति ऐसी महाशक्ति हैं जिनकी पूजा छोड़ी नहीं जा सकती। श्रावण मास में मुख्य रूप से उनका पूजन होगा, और साथ में चलने वाला आराध्य का पूजन भी चलता रहेगा। पर उन्हें छोड़ना नहीं है।
भगवान शिव को कौन-सी चीज़ें अर्पित नहीं करनी चाहिए?
केवल केतकी का फूल वर्जित है
वक्ता कहते हैं कि भगवान शिव को आप केवल केतकी का फूल अर्पित नहीं कर सकते। इसके सिवाय दूर्वा ज़रूर चढ़ा सकते हैं, बिल्व पत्र ज़रूर चढ़ा सकते हैं, फल, फूल और मिठाई चढ़ा सकते हैं।
पूछा गया कि भगवान शिव को कौन-सी चीज़ें अर्पित नहीं करनी चाहिए। वक्ता कहते हैं कि भगवान शिव को आप केवल केतकी का फूल अर्पित नहीं कर सकते। इसके सिवाय दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। ज़रूर चढ़ा सकते हैं, बिल्व पत्र ज़रूर चढ़ा सकते हैं, फल, फूल और मिठाई चढ़ा सकते हैं।
शास्त्र क्या कहता है
Shiva himself curses and permanently bars the ketakī flower from his own worship, which is why it alone is withheld from Shiva puja even though other flowers are offered freely.
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रे रे केतक दुष्टस्त्वं शठ दूरमितो व्रज। ममापि प्रेम ते पुष्पे माभूत्पूजास्वितः परम्॥ १५
अरे दुष्ट केतक! हे शठ! यहाँसे दूर चले जाओ। अबसे आगे मेरी पूजामें तुम्हारे फूलमें मेरा प्रेम भी न रहे।
क्या शिवलिंग के ऊपर फल और मिठाई रख सकते हैं?
उनके सिर पर रखी चीज़ वे स्वीकार नहीं कर सकते
वक्ता कहते हैं कि अगर आप उनके सिर पर फल रखें, शिवलिंग पर मिठाई रखें, तो वे उसे स्वीकार नहीं कर सकते — यह ध्यान रखना है।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप उनके सिर पर फल रखें, शिवलिंग के ऊपर मिठाई रखें, तो वे उसे स्वीकार नहीं कर सकते। यह ध्यान रखना है।
स्तोत्र संग्रह से षट गायत्री मंत्र क्यों हटाया गया?
बीजों वाला तांत्रिक मंत्र, सबके लिए नहीं
वक्ता कहते हैं कि श्रोता जिस षट गायत्री मंत्र की बात कर रहे हैं, उसे उन्होंने हटा दिया है, क्योंकि वह मंत्र बीजों से जुड़ा तांत्रिक मंत्र है और हर कोई उसका जप नहीं कर सकता; इसी कारण उन्होंने उसे स्तोत्र संग्रह में नहीं डाला। यह सबसे ज़रूरी मंत्रों में से है और अलग विषय है: उपदेश और आदेश के बिना इसे बिल्कुल नहीं करना चाहिए। जब किसी की आयु क्षीण हो रही हो, तब विधि से पुरश्चरण करके इसका उपयोग होता है।
वक्ता एक श्रोता से कहते हैं कि आप जिस षट गायत्री मंत्र आदि की बात कर रहे हैं, उसे उन्होंने हटा दिया है। क्योंकि वह मंत्र तांत्रिक मंत्र है और बीजों से जुड़ा है, और हर कोई उसका जप नहीं कर सकता; इसी कारण उन्होंने उसे स्तोत्रों में से स्तोत्र संग्रह में नहीं डाला। यह सबसे ज़रूरी मंत्रों में से है, अलग विषय है। उपदेश और आदेश के बिना वह मंत्र बिल्कुल नहीं करना चाहिए। जब किसी की आयु क्षीण हो रही हो, तब विधि से पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करके उन मंत्रों का उपयोग होता है।
भगवान शिव के हवन के लिए कौन-सी लकड़ी सबसे अच्छी है?
सूखी बिल्व की लकड़ी
भगवान शिव के हवन के लिए बिल्व की लकड़ी सबसे उत्तम है — सूखी बेल की लकड़ी।
वक्ता कहते हैं कि भगवान शिव के हवन के लिए बिल्व की लकड़ी सबसे उत्तम है — सूखी बेल की लकड़ी।
मँगवाया हुआ कवच कब पहनें?
श्रावण में कभी भी, गुप्त नवरात्रि में, या पूर्णिमा पर
पूछा गया कि मँगवाया हुआ कवच कब पहनना है। वक्ता कहते हैं: श्रावण मास में कभी भी पहनिए। अभी गुप्त नवरात्रि चल रही है, तो उसमें कभी भी पहनिए। पूर्णिमा पर पहनिए — समय ही समय है।
एक श्रोता पूछते हैं कि उन्होंने जो कवच मँगवाया है, उसे कब पहनना है। वक्ता कहते हैं, श्रावण मास में कभी भी पहनिए। अभी गुप्त नवरात्रि चल रही है, तो कभी भी पहनिए। पूर्णिमा पर पहनिए — समय ही समय है।
क्या भीमसेनी कपूर दीपक में डाल सकते हैं?
दीपक में भीमसेनी कपूर
पूछा गया कि क्या भीमसेनी कपूर दीपक में डाल सकते हैं। वक्ता कहते हैं: बिल्कुल डाल सकते हैं।
पूछा गया कि क्या भीमसेनी कपूर दीपक में डाल सकते हैं। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल डाल सकते हैं।
क्या पंचाक्षरी साधना शिव मंदिर में करना बेहतर है?
मंदिर में पंचाक्षरी उपासना
वक्ता कहते हैं कि अगर आप शिव मंदिर में पंचाक्षरी मंत्र की साधना करें तो सबसे उत्तम है — बिल्कुल कीजिए, इसमें पूछने की कोई बात नहीं। भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र की उपासना शिव मंदिर में बिल्कुल कर सकते हैं।
वक्ता एक श्रोता से कहते हैं कि अगर आप शिव मंदिर में पंचाक्षरी मंत्र की साधना करें तो सबसे उत्तम है; बिल्कुल कीजिए — इसमें पूछने की क्या बात है? भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र की उपासना शिव मंदिर में बिल्कुल कर सकते हैं।
अगर कुल के पितरों के कारण साधना के समय झगड़े बढ़ें तो क्या करें?
कुल के पितरों के लिए त्रिपिंडी
अगर आपके कुल के पितरों के कारण बात ऐसी हो कि बार-बार होती रहे — और खासकर साधना, पूजा या अनुष्ठान के समय यह झगड़ा बढ़ता हो — तो अपने कुल के पितरों के नाम से त्रिपिंडी आदि करवाइए।
वक्ता एक श्रोता से कहते हैं कि अपने कुल के पितृों के कारण, अगर विषय ऐसा है कि बार-बार आता है — और खासकर साधना, पूजा या अनुष्ठान के समय यह झगड़ा बहुत बढ़ जाता है — तो अपने कुल के पितरों के नाम से त्रिपिंडी श्राद्ध आदि करवाइए।
देव दीक्षा और गुरु नाम के बाद कौन-सी साधना करें?
संकट नाशन गणपति स्तोत्रम की PDF, और अभी शिव की
एक श्रोता पूछते हैं कि देव दीक्षा और गुरु नाम के बाद साधना के क्षेत्र में आने के लिए क्या वे गणेश जी की साधना करें; एक पुरश्चरण हो चुका है और दूसरा पूनम को है। वक्ता कहते हैं कि संकट नाशन गणपति स्तोत्रम पहले ही दिया हुआ है — उसकी PDF डाउनलोड कीजिए, जिसमें हर विषय पूरा दिया है, गुरु का, गणपति जी का, भैरव जी का — उसी तरह कीजिए, पर अभी शिव जी का कीजिए।
एक श्रोता लिखते हैं कि देव दीक्षा और गुरु नाम के बाद साधना के क्षेत्र में आने के लिए उन्हें गणेश जी की साधना करनी चाहिए, और मार्गदर्शन माँगते हैं: एक पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। हो चुका है और दूसरा पूनम को होगा — क्या अगले दो महीने यही करें, या गणेश साधना? वक्ता कहते हैं कि गणपति का संकट नाशन स्तोत्र पहले ही दिया हुआ है; उसकी PDF डाउनलोड कीजिए, जिसमें हर विषय पूरा दिया है — गुरु का, गणपति जी का, भैरव जी का। तो उसी तरह कीजिए। अभी के लिए शिव जी का कीजिए।
क्या 64 योगिनी का लौंग-कपूर अर्पण किसी भी देवी मंदिर में कर सकते हैं?
किसी भी देवी मंदिर में अर्पण
पूछा गया कि क्या 64 योगिनियों के लिए लौंग और कपूर का अर्पण किसी भी देवी मंदिर में कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं: बिल्कुल कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या 64 योगिनीयों के लिए लौंग और कपूर का यह अर्पण देवी के किसी भी मंदिर में कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं, बिल्कुल कर सकते हैं।
पति और पत्नी पंचाक्षरी कैसे बोलें?
यज्ञोपवीत के अनुसार नमः और शिवाय का क्रम
अगर पति यज्ञोपवीत पहनते हैं, तो वे पहले नमः और बाद में शिवाय बोलेंगे। और अगर यज्ञोपवीत नहीं पहनते, और पत्नी के लिए, तो वे नमः बाद में और शिवाय पहले बोलेंगे।
पूछा गया कि पति और पत्नी के लिए शिव जी का कौन-सा पंचाक्षरी मंत्र है। वक्ता कहते हैं कि वे पहले ही बता चुके हैं। अगर पति यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। पहनते हैं, तो वे पहले नमः और बाद में शिवाय बोलेंगे। और अगर यज्ञोपवीत नहीं पहनते, और आप, यानी पत्नी — तो वे नमः बाद में और शिवाय पहले बोलेंगी।
जप के समय मन कैसे स्थिर होता है?
मन को अपना काम करने दें; पुरश्चरण से वह शांत होता है
एक श्रोता लिखते हैं कि ज़बरदस्ती रोकने पर भी मन स्थिर नहीं होता, और कुछ देर बाद विचार फिर आ जाते हैं। वक्ता कहते हैं कि कोई दिक्कत नहीं — अपना प्रयास करते रहिए, और मन को अपना काम करने दीजिए। उस पर बहुत लगाम लगाने की कोशिश मत कीजिए, वरना वह स्थिर नहीं होगा। अपने आराध्य की कृपा से, जब मंत्र का जप बार-बार और लगातार चलता है, तो एक पुरश्चरण, फिर दो, फिर तीन के बाद वह अपने आप शांत होने लगेगा।
एक श्रोता लिखते हैं कि ज़बरदस्ती रोकने पर भी मन स्थिर नहीं होता, कुछ देर बाद विचार फिर आ जाते हैं, और कोई विधि हो तो पूछते हैं। वक्ता कहते हैं, कोई दिक्कत नहीं; अपना प्रयास करते रहिए। मन को अपना काम करने दीजिए। अगर उस पर बहुत लगाम लगाने की कोशिश करेंगे, तो वह स्थिर नहीं होगा। अपने आराध्य की कृपा से, जब मंत्र का वह जप बार-बार और लगातार चलता है, जब आप पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। जप करने लगते हैं, तो आप देखेंगे कि एक पुरश्चरण, फिर दो, फिर तीन के बाद वह अपने आप शांत होने लगता है। क्योंकि उसका पहले का विषय — आपके मन का जो अभ्यास है — यह है कि वह कभी एक जगह नहीं टिकता; और आज के समय में रील्स के कारण और भी कम टिकता है। मन बहुत तेज़ भाग रहा है; अब मन की गति पहले से कई गुना ज़्यादा है। तो इसमें अभ्यास ही है: जितना जप और तप करते जाएँगे, उतना धीरे-धीरे वह अभ्यास बनता जाएगा। इसकी चिंता मत कीजिए; अपना काम कीजिए।
पंचाक्षरी जप किस माला पर करें?
पंचाक्षरी के लिए रुद्राक्ष की माला
वक्ता कहते हैं कि पंचाक्षरी का जप केवल रुद्राक्ष की माला पर ही करना है। और रुद्राक्ष पर भैरव और भैरवी का अभिषेक बिल्कुल किया जा सकता है।
वक्ता कहते हैं कि पंचाक्षरी का जप केवल रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला पर ही करना है। रुद्राक्ष पर भैरव और भैरवी के अभिषेक के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि यह बिल्कुल किया जा सकता है।
क्या गंजा व्यक्ति पूजा और दर्शन के समय टोपी पहन सकता है?
महाकाल, वैद्यनाथ और देवी क्षेत्रों में सिर खुलवाया जाता है
एक श्रोता लिखते हैं कि सुबह बाबा का जलाभिषेक करते समय वे अपना गंजापन टोपी में छिपाए रखते हैं और दिन भर उसे पहने रहते हैं। पूछने पर उनके पंडित जी ने कहा कि पूजा के समय सिर ढकना जरूरी है और टोपी को सही बताया। वक्ता कहते हैं कि वे पंडित जी की जय बोलने से ज्यादा कुछ नहीं कहेंगे। पर वे बताते हैं कि ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में, महाकाल में, वैद्यनाथ में सिर तुरंत खुलवा दिया जाता है। और भगवती के क्षेत्रों में तुरंत कहा जाता है कि सिर खुला रखकर जाइए, टोपी पहनकर मत जाइए।
एक श्रोता लिखते हैं कि सुबह बाबा का जलाभिषेक करते समय वे अपना गंजापन टोपी में रखते हैं और फिर दिन भर वही टोपी पहने रहते हैं। शंका होने पर पूछा, तो उनके पंडित जी ने कहा कि पूजा के समय सिर ढकना जरूरी है और टोपी को सही बताया। वक्ता कहते हैं — पंडित जी की जय हो, इससे ज्यादा वे कुछ नहीं कहेंगे। वे कहते हैं, ऐसे ही किसी ज्योतिर्लिंग क्षेत्र में जाइए — महाकाल के क्षेत्र में जाइए, वैद्यनाथ क्षेत्र में जाइए — वहाँ सिर तुरंत खुलवा देते हैं। भगवती के ऐसे क्षेत्रों में जाइए, वहाँ तुरंत कहते हैं कि सिर खोलकर जाइए, टोपी पहनकर मत जाइए। पगड़ी, टोपी — इनमें से कुछ भी पहनकर नहीं जाना है।
क्या योगिनियों की बलि घर पर दी जा सकती है?
शिव मंदिर में देना बेहतर
योगिनियों के नाम की बलि घर पर देने के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि ऐसा करने में कोई दिक्कत नहीं है, पर शिव मंदिर में करें तो बेहतर होगा। शिव मंदिर में करना ज्यादा सही है।
अधूरी रह गई मन्नत का क्या करें?
बाकी मन्नत जल्द से जल्द पूरी करें
वक्ता कहते हैं कि छिन्नमस्तिका माता की जो भी मन्नत बाकी है, और शिव जी की जो भी बाकी है, उसे पूरा कीजिए। मन्नत क्या है, यह वे नहीं जान सकते — पर जैसी भी है, उसे जल्द से जल्द पूरा कीजिए। अगर काम पूरा हो गया है, तो मन्नत बाकी मत छोड़िए।
वक्ता कहते हैं कि इसमें छिन्नमस्तिका माता की जो भी मन्नत बाकी है, और शिव जी की जो भी बाकी है — उसे पूरा कीजिए। मन्नत क्या है, यह वे नहीं जान सकते। जैसी भी है, उसे जल्द से जल्द पूरा कीजिए। अगर काम पूरा हो गया है, तो मन्नत बाकी मत छोड़िए।
क्या पूजा से पहले क्रोध आए तो पूजा टाल देनी चाहिए?
क्रोध में या उपहास में आहुति कभी नहीं दी जाती
वक्ता कहते हैं कि हवन के बारे में कहा गया है कि क्रोध में कभी आहुति नहीं देनी चाहिए। और अगर उस समय उपहास की स्थिति बन रही हो, तो उपहास करते हुए हवन में आहुति नहीं डाली जाती। पर जब आपकी पूजा के समय क्रोध आए, तो थोड़ी देर रुक जाइए — पूजा छोड़ देना जरूरी नहीं है।
एक श्रोता पूछते हैं कि अगर पूजा से पहले क्रोध आ जाए, तो क्या पूजा थोड़ी देर टाल दें या फिर भी करें। वक्ता कहते हैं कि हवन के बारे में कहा गया है कि क्रोध में कभी आहुति नहीं देनी चाहिए। और अगर उस समय उपहास की स्थिति बन रही हो, तो उपहास करते हुए हवन में आहुति नहीं डाली जाती। पर जब आपकी पूजा के समय क्रोध आ रहा हो, तो थोड़ी देर रुक जाइए — पूजा छोड़ देना जरूरी नहीं है।
पारस शिवलिंग के नियम क्या हैं?
गृहस्थ के लिए बिल्कुल अलग विषय
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने लाइव में कई बार बताया है कि पारस शिवलिंग का नियम ऐसा है कि गृहस्थ के लिए पूरा विषय ही अलग हो जाता है। आपने जिससे भी शिवलिंग लिया है, उन्होंने जो विधि और नियम बताए हैं, वैसा ही कीजिए।
वक्ता कहते हैं, देखिए, पारस शिवलिंग का नियम उन्होंने लाइव में और दूसरी जगह कई बार बताया है: गृहस्थ के लिए पारस शिवलिंग का पूरा विषय ही अलग हो जाता है। अब आपने जिससे भी शिवलिंग लिया है — उन्होंने जो विधि और नियम बताए हैं, उसी के अनुसार चलिए।
क्या कर्ण पिशाचिनी करवाई या किसी को ट्रांसफर की जा सकती है?
न सिद्ध की, न करवाते हैं, न ट्रांसफर करते हैं
एक श्रोता कहते हैं कि वे कर्ण पिशाचिनी के बारे में बात करने के लिए कॉल करेंगे। वक्ता कहते हैं, कॉल जरूर कीजिए, पर उन्होंने न कर्ण पिशाचिनी सिद्ध की है, न वे इसे करवाते हैं, न इसका कोई ट्रांसफर दे सकते हैं। इसके अलावा कोई और विषय हो, तो बताइए।
एक श्रोता लिखते हैं कि वे कॉल करेंगे और कर्ण पिशाचिनी से जुड़ी बातें करेंगे। वक्ता कहते हैं, ठीक है, कॉल जरूर कीजिए। पर उन्होंने न कर्ण पिशाचिनी सिद्ध की है, न वे इसे करवाते हैं, न इसका कोई ट्रांसफर दे सकते हैं। इसके अलावा कोई विषय हो, तो बताइए।
शिव जी का अभिषेक कितने बजे तक करना उचित है?
सुबह जितना जल्दी हो सके
शिव जी का अभिषेक कितने बजे तक करना उचित है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: सुबह जितना जल्दी कर सकें, उतना ही उचित है।
शिव जी का अभिषेक कितने बजे तक करना उचित है, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि सुबह जितना जल्दी कर सकें, उतना ही उचित है।
क्या देव दीक्षा वाली रुद्राक्ष माला पर दूसरे मंत्रों का जप हो सकता है?
केवल शिव, गणपति, हनुमान और भैरव
देव दीक्षा में मिली रुद्राक्ष माला पर पंचाक्षरी और दूसरे मंत्रों का जप करने के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि कर सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं है; दूसरी माला न हो तो उसी पर कर सकते हैं। पर उस पर केवल शिव जी, गणपति जी, हनुमान जी और भैरव जी का ही जप कीजिए — उस पर भगवती के मंत्र का जप मत कीजिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या देव दीक्षा में मिली रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । माला पर पंचाक्षरी मंत्र और दूसरे मंत्रों का जप किया जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि कर सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं है; अगर दूसरी माला नहीं है, तो उस पर भी कर सकते हैं। पर उस पर केवल शिव जी, गणपति जी, हनुमान जी और भैरव जी का ही कीजिए। फिर उस पर भगवती के मंत्र का जप मत कीजिए।
महाभैरव अनुष्ठान के बाद माला का क्या करें?
एक माला रोज पहनी जाए, दूसरी माला पर जीवन भर जप
वक्ता कहते हैं कि एक बार महाभैरव का अनुष्ठान करने के बाद, अनुष्ठान पूरा होने पर वह माला पहननी है। रोज उस पर एक माला जप करना है और फिर अपनी रक्षा के लिए उसे गले में पहनना है। जीवन भर का जप दूसरी माला पर करना है, और उसके बाद माला नहीं बदलनी है।
बृहद हवन कौन कर सकता है?
बताई गई विधि से आगे, केवल दीक्षित अधिकारी
वक्ता कहते हैं कि बृहद हवन का वीडियो बन चुका है। अगर आप पूरे अधिकार के साथ, पहले से डाली गई विधि से बड़ा बृहद हवन करना चाहते हैं, तो दीक्षा लीजिए और पूरी विधि सीखिए। बहुत लोगों ने अपने चैनल पर वैदिक विधि डाली है, जिसमें पूजन का हर विधान बताया गया है, मेखला पूजन कैसे होता है यह भी। आप वह देखकर कर सकते हैं — पर केवल तभी, जब आप दीक्षित अधिकारी हों।
वक्ता कहते हैं कि बृहद हवन का वीडियो बन चुका है। अगर आप पूरे अधिकार के साथ बृहद हवन करना चाहते हैं — अगर उनकी डाली गई विधि से ज्यादा विस्तार वाला चाहते हैं — तो दीक्षा लीजिए और उसके बाद पूरी विधि सीखिए। नहीं तो बहुत लोगों ने चैनल पर वैदिक विधि डाली है, जिसमें सब कुछ बताया गया है — पूजन का हर विधान, एक-एक चीज, मेखला पूजन कैसे होता है यह भी। आप वह देखकर कर सकते हैं। पर केवल तभी, जब आप दीक्षा लिए हुए अधिकारी हों।
घर में शालिग्राम पूजा का अधिकार किसे है?
यज्ञोपवीतधारी, और विशेषकर ब्राह्मण
घर में गणपति शालिग्राम की पूजा हो सकती है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि शालिग्राम पूजन का अधिकार यज्ञोपवीत धारण करने वालों का है, और विशेषकर ब्राह्मणों का — यही रहे तो उचित है, वही करें। भगवान शिव के पूजन में कोई दोष नहीं है, पर शालिग्राम पूजन में चूक से दोष लगता है।
घर में गणपति शालिग्राम की पूजा हो सकती है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि शालिग्राम पूजन का अधिकार यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करने वालों का है, और विशेषकर ब्राह्मणों का; यही रहे तो उचित है, वही करें। भगवान शिव के पूजन में कोई दोष नहीं है, पर शालिग्राम पूजन में चूक से दोष लगता है। इसलिए यह बात मन में रखकर पूजन कीजिए। किसी कारण से एक-दो दिन शिव जी का अभिषेक छूट जाए तो कोई दिक्कत नहीं; पर शालिग्राम जी की सेवा-पूजा में कमी से दोष लगता है।
क्या एक ही जप माला गणेश और भगवती दोनों के लिए चल सकती है?
देवताओं के लिए एक माला, भगवती के लिए एक
एक ही जप माला पर गणेश जी और भगवती के मंत्रों का जप करने के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि अगर कोई विकल्प नहीं है, तो कोई बात नहीं, कर लीजिए। पर अगर विकल्प और सामर्थ्य है, तो एक माला केवल देवताओं के लिए रखिए और एक माला भगवती के लिए।
एक ही जप माला पर गणेश जी के मंत्र और भगवती के मंत्र का जप करने के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं: अगर कोई विकल्प नहीं है, तो कोई बात नहीं, कर लीजिए। पर अगर विकल्प है, सामर्थ्य है, तो एक माला केवल देवताओं के लिए रखिए और एक माला भगवती के लिए।
पंचाक्षर और शिव-दुर्गा में कौन सा मंत्र ज्यादा विशेष है?
कोई तुलना नहीं की जा सकती
पंचाक्षर और शिव-दुर्गा में कौन सा मंत्र ज्यादा विशेष है, यह पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि ऐसी तुलना कभी नहीं की जा सकती। दोनों अपनी-अपनी जगह बहुत ही विशेष हैं।
पंचाक्षरी मंत्र और शिव-दुर्गा में कौन सा मंत्र विशेष है, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि ऐसी तुलना कभी नहीं की जा सकती। दोनों अपनी-अपनी जगह बहुत ही विशेष हैं। एक और श्रोता के लिए वे यह भी पुष्टि करते हैं कि देव दीक्षा की माला पर पंचाक्षर का जप किया जा सकता है, और उस पर भैरव जप हो तो सबसे उत्तम है।
क्या शिव जी के अभिषेक में पंचानन मंत्र का प्रयोग हो सकता है?
अभिषेक के समय पंचानन मंत्र
शिव जी का अभिषेक करते समय, अभिषेक के लिए आप पंचानन मंत्र का प्रयोग कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि शिव जी का अभिषेक करते समय, अभिषेक के लिए आप पंचानन मंत्र का प्रयोग कर सकते हैं।
अगर घर में विग्रहों की पूजा करने वाला कोई न हो तो क्या करें?
कम से कम धूप और दीप जलते रहें
वक्ता कहते हैं कि यह सच है कि घर में पूजा करने वाला कोई न हो तो विग्रहों की चिंता होती है — पर विग्रहों की चिंता मत कीजिए। बस इतना होना चाहिए कि कम से कम धूप और दीप जलते रहें।
वक्ता कहते हैं कि यह सच है कि घर में पूजा करने वाला कोई न हो तो विग्रहों की चिंता होती है। विग्रहों की चिंता मत कीजिए। बस इतना होना चाहिए कि कम से कम धूप और दीप जलते रहें।
क्या साधना के दौरान नर्स डिलीवरी करवा सकती है?
पवित्रता रखनी है, रोज स्नान और बाल धोना
एक नर्स पूछती हैं कि क्या यह सच है, जैसा उन्होंने सुना है, कि साधना में रहते हुए मरीजों की डिलीवरी नहीं करवा सकते। वक्ता कहते हैं कि आपका पेशा ही ऐसा है, सेवा के लिए है, तो इससे परेशान मत होइए — वह काम कीजिए। पर पवित्रता रखनी है: रोज स्नान करना होगा, और साधना के समय बाल भी धोने होंगे, रोज-रोज, और यह थोड़ी कठिन बात है।
एक नर्स पूछती हैं कि क्या यह सच है, जैसा उन्होंने सुना है, कि साधना में रहते हुए मरीजों की डिलीवरी नहीं करवा सकते। वक्ता कहते हैं, देखिए, जब आपका पेशा ही ऐसा है, सेवा के लिए, तो इससे परेशान मत होइए; वह काम कीजिए। पर बात यह है कि पवित्रता बनाए रखनी है। रोज स्नान करना होगा, और साधना के समय बाल भी धोने होंगे, रोज-रोज — और यह थोड़ी कठिन बात है।
क्या पहले से पहनी हुई माला पर जप करना चाहिए?
नई माला पर जप, फिर उसे पहनना
वक्ता कहते हैं कि पहले से पहनी हुई माला पर जप करके उसे पहनना नहीं है — नई माला पर जप कीजिए, और फिर उसे पहनिए।
वक्ता कहते हैं कि पहले से पहनी हुई माला पर जप करके उसे पहनना नहीं है। नई माला पर जप कीजिए, और फिर उसी को पहनना है।
क्या बटुक भैरव का ब्रह्म कवच अष्टमी से सिद्ध किया जा सकता है?
अष्टमी से ब्रह्म कवच आरंभ करना
बटुक भैरव जी का ब्रह्म कवच अष्टमी से सिद्ध किया जा सकता है या नहीं, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल, किया जा सकता है।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या बटुक भैरव जी का ब्रह्म कवच अष्टमी से शुरू करके सिद्ध किया जा सकता है। वक्ता उत्तर देते हैं, बिल्कुल किया जा सकता है।
धातु का कवच किसमें पहनना चाहिए?
चाँदी या सोने की चेन, कभी धागा या ताँबा नहीं
अगर आपका कवच चाँदी का है, तो धागे के साथ वह शुद्ध नहीं रहेगा — धागा मत रखिए। तब कवच को चाँदी की चेन या सोने की चेन में पहनिए, अगर आपका कर्तव्य और काम ऐसा है। ताँबे में रखा तो वह तुरंत अशुद्ध हो जाएगा और फिर किसी काम का नहीं रहेगा। अपना कवच चाँदी या सोने में रखिए, और चेन भी चाँदी या सोने की रखिए; किसी भी तरह का धागा पहना तो सब अशुद्ध हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि अगर आपका कवच चाँदी का है, तो धागे के साथ वह शुद्ध नहीं रहेगा। धागा मत रखिए; तब कवच आदि को चाँदी की चेन या सोने की चेन में पहनिए, अगर आपका कर्तव्य और आपका काम ऐसा है। अगर वह ताँबे में रहा, तो तुरंत अशुद्ध हो जाएगा, और फिर वह किसी काम का नहीं। अपना कवच चाँदी या सोने में रखिए, और चेन भी चाँदी या सोने की रखिए। अगर किसी भी तरह का धागा पहना, तो सब अशुद्ध हो जाता है।
जन्म और मृत्यु के बीच काम करने वाले क्या पहनें?
कमर बंद, और गले में धातु का मजबूत कवच
वक्ता कहते हैं कि ऐसी स्थिति में आपको कमर बंद जरूर पहनना चाहिए; कमर खाली नहीं रखनी चाहिए। जो लोग जन्म और मृत्यु की जगह पर काम करते हैं, उनकी कमर और हाथ की कलाई — कलाई पर हर कोई कुछ नहीं पहन सकता, पर कमर बिल्कुल खाली नहीं रहनी चाहिए — और गले में एक अच्छा मजबूत कवच हो, धातु का, सोने या चाँदी का, ताकि उस पर अशुद्धि न लगे।
वक्ता कहते हैं कि ऐसी स्थिति में आपको कमर बंद जरूर पहनना चाहिए; अगर आप ऐसी जगह पर हैं, तो कमर खाली नहीं रखनी चाहिए। जो लोग जन्म और मृत्यु की जगह पर काम करते हैं — उनकी कमर, और हाथ की कलाई; कलाई पर हर कोई कुछ नहीं पहन सकता, पर कमर बिल्कुल खाली नहीं रहनी चाहिए। और गले में एक अच्छा मजबूत कवच हो, और कवच धातु का हो, सोने का या चाँदी का, ताकि उस पर अशुद्धि न लगे।
क्या भगवती मातंगी या सारिका की पूजा बिना दीक्षा के घर पर हो सकती है?
भगवती मातंगी या सारिका की पूजा के लिए दीक्षा और तांत्रिक विधि चाहिए
वक्ता कहते हैं कि बिना दीक्षा लिए ऐसी पूजा घर पर भी नहीं कर सकते — ऐसा पूजन दीक्षा लेने के बाद ही करना चाहिए, क्योंकि भगवती का यह स्वरूप अलग है। और अगर कोई कहे कि भगवती दुर्गा पाँच रूपों में मानी जाती हैं, जिनमें एक भगवती सारिका और भगवती मातंगी हैं, तो वे उत्तर देते हैं कि वह सब पूजन दीक्षा लेने के बाद तांत्रिक विधि से ही होता है।
आखिरी श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि बिना दीक्षा लिए ऐसी पूजा घर पर भी नहीं कर सकते; ऐसा पूजन दीक्षा लेने के बाद ही करना चाहिए, क्योंकि भगवती का यह स्वरूप अलग है। अब अगर कोई कहे कि भगवती दुर्गा पाँच रूपों में मानी जाती हैं, जिनमें एक रूप भगवती सारिका और भगवती मातंगी है, और सभी माने जाते हैं — तो वे उत्तर देते हैं कि वह सब पूजन दीक्षा लेने के बाद तांत्रिक विधि से ही होता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।