शरद पूर्णिमा की रात — मंत्र सिद्धि, महालक्ष्मी अर्चन और दीपदान
शरद पूर्णिमा की रात: मंत्र सिद्धि और लक्ष्मी पूजा।
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जप से बनी ऊर्जा हम तक कैसे पहुँचती है?
जप की ऊर्जा, देवता का पिंड और सूक्ष्म शरीरों तक लौटता प्रवाह
वक्ता कहते हैं कि जब हम किसी भी प्रकार के मंत्र का जप करते हैं, तो उससे बनी ऊर्जा किसी देव तत्व को आकर्षित करती है। देवता के पिंड में पिछले युगों से सहेजी ऊर्जा होती है। जहाँ विधि-विधान से पूरा पूजन और पाठ होता है, वहाँ यह ऊर्जा बढ़ती है। उसी पुण्य से ऊर्जा बहकर हमारे सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर आदि तक पहुँचती है।
पिछले लाइव की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए वक्ता मंत्र की क्षमता और ऊर्जा पर आते हैं। वे कहते हैं कि जब भी हम किसी भी प्रकार का मंत्र जप करते हैं, तो उससे बनी ऊर्जा किसी देव तत्व को आकर्षित करती है। देवता के पिंड में पिछले युगों से सहेजी ऊर्जा होती है। जहाँ ठीक विधि-विधान से पूजन और पाठ होते हैं, वहाँ वह ऊर्जा बढ़ती है। और उसी पुण्य से ऊर्जा बहकर हमारे सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर आदि तक पहुँचती है।
मंत्र-ऊर्जा के संचार का स्वामी कौन-सा ग्रह है?
आकर्षण और संचार का मुख्य कारक चंद्रमा
वक्ता कहते हैं कि संचार और आकर्षण के इस पूरे माध्यम में चंद्रमा का सबसे विशेष प्रभाव है, और वही इनमें मुख्य कारक है। इसी कारण जन्म कुंडली में चंद्रमा कहाँ बैठा है, इससे तय होता है कि मंत्र की सिद्धि कैसे होगी। बाद में मंत्र का प्रभाव कमजोर पड़े, तो उसकी जानकारी भी चंद्रमा से ही ली जाती है।
वक्ता कहते हैं कि प्रसार के इस पूरे माध्यम में, आकर्षण के इस माध्यम में, चंद्रमा का सबसे विशेष प्रभाव है, और चंद्रमा ही इनमें मुख्य कारक है। इसी कारण हमारी जन्म कुंडली में चंद्रमा कहाँ स्थित है, इससे तय होता है कि मंत्र की सिद्धि किस प्रकार होगी। और जब कोई मंत्र सिद्ध होकर अपना प्रभाव देने लगे, और कभी वह प्रभाव कमजोर पड़ जाए, तो उसकी जानकारी भी कुंडली के चंद्रमा से ही तय होती है।
जब शिष्य की सिद्धि काम करना बंद कर दे, तो समर्थ गुरु क्या करते हैं?
सिद्धि की हानि, प्रायश्चित्त विधान और फिर से प्रभुत्व
समर्थ गुरु जब देखते हैं कि शिष्य को बार-बार हानि हो रही है और पहले मिली सिद्धि अब काम नहीं कर रही, तो वे समझते हैं कि जो देव तत्व उपस्थित था, वह या तो बाँध दिया गया है या चला गया है। कारण जो भी हो, पहले उस हानि के लिए प्रायश्चित्त विधान होता है, और उसके बाद ही फिर से उस पर प्रभुत्व पाने का प्रयास होता है। इन सब में चंद्रमा का बहुत बड़ा महत्व है।
वक्ता कहते हैं कि जो गुरु समर्थ होते हैं, वे देखते हैं कि उनके शिष्य को बार-बार हानि हो रही है, और जो सिद्धि किसी तरह मिली थी, वह अब काम नहीं कर रही। वे कहते हैं कि इसका अर्थ है कि जो देव तत्व उपस्थित था, उसे कहीं बाँध दिया गया है, या वह चला गया है। कारण जो भी निकले, सिद्धि चली गई है। इसलिए पहले उस हानि के लिए प्रायश्चित्त विधान किया जाता है, और प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। के बाद फिर से उस पर प्रभुत्व जमाने और उन तत्वों को वापस पाने का नया प्रयास होता है। इन सभी बातों में चंद्रमा का बहुत बड़ा महत्व है।
उग्र और सौम्य मंत्रों का जप किस पक्ष में करना चाहिए?
उग्र मंत्र कृष्ण पक्ष में, पौष्टिक मंत्र पूर्णिमा के आसपास
वक्ता अपनी पिछली चर्चा याद दिलाते हैं: उग्रता देने वाले मंत्रों का जप कृष्ण पक्ष में अष्टमी से चतुर्दशी तक खूब किया जाए, तो वे अपना प्रभाव देते हैं। और सौम्य व पौष्टिक मंत्रों का जप शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा तिथि के आसपास किया जाए, तो बहुत अधिक प्रभाव मिलता है।
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ यह भी चर्चा हुई थी कि उग्रता देने वाले मंत्रों का जप, उनके प्रभाव के लिए, कृष्ण पक्ष में अष्टमी से चतुर्दशी तक बड़ी मात्रा में करना चाहिए। और सौम्य व पौष्टिक मंत्रों का जप यदि शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा तिथि के आसपास किया जाए, तो बहुत अधिक प्रभाव मिलता है।
क्या दिव्य शक्तियाँ पुराने मंदिरों और तंत्र पीठों में आती हैं?
सौ वर्ष से पुराने मंदिर जहाँ नित्य आरती अखंड होती है
वक्ता कहते हैं कि तंत्र पीठों में, और ऐसे किसी भी मंदिर में जिसकी स्थापना को सौ वर्ष से अधिक हो गए हों और जहाँ सुबह-शाम की आरती अखंड नियम से रोज होती हो, यदि उस क्षेत्र में किसी देव शक्ति की उपस्थिति बन जाए, तो वहाँ उनका आना-जाना रोज अवश्य होता है। और पर्व काल के समय दिव्य लोक से आने वाली शक्तियाँ भी वहाँ अवश्य जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी तरह, जहाँ-जहाँ तंत्र पीठ हैं, या ऐसा कोई भी मंदिर है जिसकी स्थापना को सौ वर्ष बीत चुके हैं और जहाँ सुबह-शाम की आरती अखंड नियम से रोज होती है — यदि उस क्षेत्र में किसी देव शक्ति की उपस्थिति बन जाए, तो उन मंदिरों में उनका आना-जाना अवश्य होता है। और पर्व काल के समय भी दिव्य लोक से आने वाली शक्तियाँ वहाँ अवश्य जाती हैं।
कौन-सी रातें ऊर्जाओं को धरती पर उतारती हैं?
श्रावण पूर्णिमा, दीपावली की रात और शरद पूर्णिमा की रात
वक्ता कहते हैं कि यह सर्वविदित है कि श्रावण पूर्णिमा, दीपावली की रात या शरद पूर्णिमा की रात को जितनी भी ऊर्जाएँ हैं — उपदेव हों या देवता — सबका आगमन पृथ्वी लोक पर अवश्य होता है।
वक्ता कहते हैं कि जहाँ तक श्रावण पूर्णिमा, दीपावली की रात या शरद पूर्णिमा की रात की बात है, यह सर्वविदित है कि इस समय जितनी भी ऊर्जाएँ हैं, जितने भी उपदेव हैं, जितने भी देवता हैं — उन सबका आगमन पृथ्वी लोक पर अवश्य होता है।
क्या ऐसे स्थान हैं जहाँ उस रात नहीं रुकना चाहिए?
हिमाचल और उत्तराखंड के मंदिर, जोशीमठ और कालीमठ
वक्ता कहते हैं कि हिमाचल और उत्तराखंड क्षेत्र में कई मंदिर ऐसे हैं जहाँ यह प्रचलित है कि इस रात एक निश्चित समय के बाद कोई सामान्य मनुष्य उस स्थान पर न रुके। जोशीमठ और कालीमठ के बारे में ऐसी बहुत-सी बातें प्रसिद्ध हैं। उस समय वहाँ ऐसे देव तत्व आते हैं जिन्हें देखकर सामान्य व्यक्ति डर जाएगा, क्योंकि उन्हें देख पाना भी हमारी क्षमता से बाहर है।
वक्ता कहते हैं कि हिमाचल और उत्तराखंड क्षेत्र में कई मंदिर ऐसे हैं जहाँ यह प्रचलित है कि इस रात अमुक समय के बाद कोई सामान्य मनुष्य उस स्थान पर न रुके। वे कहते हैं कि ज्योतिर्मठ और कालीमठ के बारे में ऐसी बहुत-सी बातें प्रसिद्ध हैं और सुनने को मिलेंगी। क्योंकि उन स्थानों पर उस समय ऐसे देव तत्व आते हैं कि सामान्य मनुष्य उन्हें देख ले तो डर जाएगा — क्योंकि उन्हें देख पाना भी आपकी और हमारी क्षमता से बाहर की बात हो जाती है।
यदि कोई अचानक ऐसी सत्ता को देख ले, तो क्या होता है?
बिना तैयारी के दर्शन से होने वाली परेशानी
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई अचानक ऐसी सत्ता को देख ले जिसका उसने कभी सामना नहीं किया, तो परेशानी होगी — शरीर में कष्ट अवश्य होगा। ऐसा नहीं कि वे हानि पहुँचाएँगे, पर केवल देखने से ही हमारे भीतर भय की उपस्थिति बन जाएगी। यह कहना बहुत आसान है कि हम यह करेंगे, वह करेंगे। आमने-सामने होना, और तब जानना कि यह कितनी शक्तिशाली शक्ति है, बिल्कुल अलग बात है।
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई अचानक ऐसी चीज़ देख ले, ऐसी सत्ता जिसका हमने कभी सामना नहीं किया, तो परेशानी होगी। शरीर में कष्ट अवश्य होगा। वे कहते हैं कि ऐसा नहीं कि वे हानि पहुँचाएँगे, पर केवल देखने से ही हमारे भीतर भय की उपस्थिति बन जाएगी। कहना बहुत आसान है — हम यह करेंगे, हम वह करेंगे। पर आमने-सामने होना, और बाद में पता चलना कि यह कैसी शक्तिशाली शक्ति है, बिल्कुल अलग बात हो जाती है।
क्या ऐसा दर्शन कभी आशीर्वाद भी बन सकता है?
देव कृपा में मिलने वाला दर्शन
वक्ता कहते हैं कि यदि आपने किसी मंत्र का खूब जप किया है और आप पर देव कृपा है, तो उस कृपा के साथ ऐसी शक्ति का दर्शन होने का अर्थ है कि आपके आराध्य चाहते थे कि आप इस शक्ति को देखें। ऐसे समय न भय की उपस्थिति होगी, न कोई और कठिनाई। वे आपको आशीर्वाद भी अवश्य देंगे, और आपको कुछ दिव्य भी प्राप्त होगा।
वक्ता कहते हैं कि यह अवश्य होता है कि यदि आपने किसी मंत्र का खूब जप किया है और आप पर देव कृपा है, और उस कृपा के साथ ऐसी शक्ति का दर्शन भी हो जाए — तो कहीं न कहीं आपके आराध्य चाहते थे कि आपको इस शक्ति का दर्शन हो। उस समय न भय की उपस्थिति होगी, न कोई और बात। वे आपको आशीर्वाद भी अवश्य देंगे, और आपको कुछ दिव्य भी प्राप्त होगा। वे कहते हैं कि यह बिल्कुल अलग बात हो जाती है।
यदि कोई इस रात मणिकर्णिका पर दत्त के एकाक्षरी का जप करे, तो क्या होता है?
मणिकर्णिका, दत्त पादुका मंदिर और योग शक्तियाँ
भगवान दत्त के एकाक्षरी का करोड़ों में जप कर चुके व्यक्ति का उदाहरण लेकर वक्ता कहते हैं कि यदि वह शरद पूर्णिमा की रात मणिकर्णिका के आसपास रुके, या वहाँ के दत्त पादुका मंदिरों के पास जप करे, तो बहुत संभव है कि बहुत-सी योग शक्तियाँ और बहुत-सी योगिनियाँ आएँगी, क्योंकि वह दिव्य क्षेत्र है। भगवान दत्त की पूजा के लिए हर तरह की शक्ति आती है — वहाँ की मसानिक शक्तियाँ, उग्र शक्तियाँ और देव शक्तियाँ भी।
वक्ता कहते हैं कि इस तरह की साधना का उदाहरण लीजिए: किसी ने भगवान दत्तात्रेय के एकाक्षरी का करोड़ों में जप किया है। अब यदि वह शरद पूर्णिमा की रात मणिकर्णिका के आसपास कहीं रुके, या वहाँ के दत्त पादुका मंदिरों के पास जप कर रहा हो, तो बहुत संभव है कि वहाँ बहुत-सी योग शक्तियाँ आएँगी, बहुत-सी योगिनी आएँगी — क्योंकि वह दिव्य क्षेत्र है। भगवान दत्त की पूजा के लिए हर तरह की शक्ति आती है: वहाँ की मसानिक शक्तियाँ हों, उग्र शक्तियाँ हों या देव शक्तियाँ।
आभामंडल में स्थित दत्त तत्व ही ऐसे साधक को अनुभूति दिलाता है
आभामंडल में दत्त तत्व और उससे मिलने वाली अनुभूति
वक्ता कहते हैं कि इनमें से कोई भी प्रसन्न होकर उस साधक को दर्शन दे सकती है जिसने पहले ही इतना जप किया है, क्योंकि उसके आभामंडल में भगवान महागुरु दत्तात्रेय का तत्व उपस्थित होगा। इसलिए उनमें अपने-आप आकर्षण बनता है कि यह परम भक्त है, इस पर कृपा करनी चाहिए। वे जाने से पहले अपनी उपस्थिति का अनुभव करा देंगी, और वही अनुभूति साधक को मार्ग पर आगे ले जाती है।
वक्ता कहते हैं कि इनमें से कोई भी प्रसन्न होकर उस साधक को दर्शन दे सकती है जिसने पहले ही इतना जप किया है। क्योंकि उसके आभामंडल में भगवान महागुरु दत्तात्रेय का तत्व उपस्थित होगा, इसलिए उनमें अपने-आप आकर्षण बनेगा — कि यह परम भक्त है, इस पर कृपा करनी चाहिए। इसलिए वे जाने से पहले अनुभव करा देंगी कि देखो, यह एक उपस्थिति है। और वही अनुभूति साधक को साधना के मार्ग पर आगे ले जाएगी, यह दिखाते हुए कि वहाँ किया गया जप इस प्रकार की शक्तियों का दर्शन कराता है।
एकाक्षरी बीज के करोड़ों जप का बताया गया प्रभाव क्या है?
आकाशचारी सिद्धों का दर्शन
वक्ता कहते हैं कि एकाक्षरी बीज के जप का यह प्रभाव माना गया है कि जप करोड़ों तक पहुँच जाए, तो आकाशचारी सिद्धों का दर्शन सुलभ हो जाता है। वे जोड़ते हैं कि हम वह पात्रता पाते हैं या नहीं, यह अलग बात है — यह इस पर निर्भर है कि हमारा प्रारब्ध कितना घिसा और हमने अपना कितना बुरा प्रारब्ध नष्ट किया।
वक्ता कहते हैं कि एकाक्षरी बीज के जप का यह प्रभाव माना गया है कि यदि जप करोड़ों में किया जाए, तो आकाशचारी सिद्धों का दर्शन सुलभ हो जाता है। अब हम वह पात्रता पा सकते हैं या नहीं, यह अलग बात है। हमारा प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। कितना घिसा, हमने अपना कितना बुरा प्रारब्ध नष्ट किया — प्रश्न यही है।
क्या ऐसी शक्ति को पहचानना उसे देखने से अलग बात है?
दर्शन से अलग है पहचान
वक्ता कहते हैं कि एकाक्षरी मंत्र, वज्र कवच आदि के प्रभाव से पहचानना या न पहचानना अलग बात है — क्योंकि यह भी सच है कि वे हमारे सामने आ भी जाएँ, तो हम उन्हें कैसे पहचानेंगे? वे अपना काम और अपना कर्तव्य करके चली जाएँगी, और हमें पता भी नहीं चलेगा।
वक्ता कहते हैं कि पर एकाक्षरी मंत्र आदि के प्रभाव से, वज्र कवच आदि के प्रभाव से, पहचानना और न पहचानना बिल्कुल अलग विषय है। क्योंकि यह भी सच है: वे हमारे सामने आ भी जाएँ, तो हम उन्हें कैसे पहचानेंगे? वे अपना काम और अपना कर्तव्य करके चली जाएँगी, पर हमें इसका पता नहीं चलेगा।
क्या साधक ऐसी शक्तियों को देखने की बात बताते हैं?
दिव्य चक्षु और श्रोताओं के भेजे अनुभव
वक्ता कहते हैं कि अक्सर बहुत अधिक जप करने वाले साधकों को ऐसे दर्शनों के लिए दिव्य चक्षु मिलने लगते हैं — चाहे आकाशचारी सिद्धों के हों या जो भी आकाशचारी शक्तियाँ हैं। बहुत-से लोग उन्हें इस बारे में संदेश भेजते हैं — वे कहते हैं ऐसे कोई आठ-दस संदेश होंगे जिनके स्क्रीनशॉट वे रखते हैं — पर उन्हें डालना उन्हें ठीक नहीं लगता, क्योंकि लोग उनका मज़ाक ही ज़्यादा बनाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि अक्सर यह भी होता है कि जो साधक अधिक से अधिक जप करते हैं, उन्हें जब दिव्य चक्षु मिलने लगते हैं, तो वह इसी प्रकार की शक्तियों के दर्शन के लिए होता है — चाहे आकाशचारी सिद्ध हों या जो भी आकाशचारी शक्तियाँ हैं। कई बार ऐसा होगा कि आपने भी अपने जीवन में ऐसी शक्तियों को देखा होगा। वे कहते हैं कि इस बारे में बहुत-से लोग संदेश भेजते हैं; ऐसे कोई आठ-दस संदेश होंगे, जिनके स्क्रीनशॉट वे रखते हैं। पर इन बातों को सामने रखना कुछ ठीक नहीं लगता, क्योंकि लोग इनका मज़ाक ही ज़्यादा बनाएँगे।
आकाशचारी चीज़ें सबसे आसानी से कहाँ दिखती हैं?
कम बिजली वाले गाँव, खुले में सोना
वक्ता कहते हैं कि जो लोग ऐसे क्षेत्रों में रहे हैं या रहते हैं जहाँ बिजली के उपकरण और रोशनी कम हैं, वे इसे देखेंगे। गाँव के इलाकों में, जहाँ आज भी बिजली कम है, यदि आप शाम सात-आठ बजे के बाद बाहर खटिया पर या खुली जगह में सोएँ, तो कई बार आपको आकाशचारी चीज़ों का दर्शन होगा।
वक्ता कहते हैं कि फिर भी, विशेषकर वे लोग जो ऐसे क्षेत्र में रहे हैं या रहते हैं जहाँ बिजली के उपकरण कम हैं और रोशनी आदि कम है — वे इसे देखेंगे। गाँव के इलाकों में, जहाँ आज भी बिजली आदि कम है, यदि शाम सात-आठ बजे आप बाहर अपनी खटिया पर सोएँ या खुली जगह में सोएँ, तो कई बार आपको आकाशचारी चीज़ों का दर्शन होगा।
ये दृश्य कैसे दिखते हैं, और कितनी बार होते हैं?
तारे का टूटता-सा लगना, घर में प्रकाश का घुसना और बड़ों की मनाही
वक्ता कहते हैं कि आपको लगेगा जैसे कोई तारा टूटकर जा रहा है, या कोई पूरा प्रकाश अचानक किसी के घर में घुस गया। पुराने समय में यह बहुत होता था; अब बिजली की व्यवस्था के कारण पता नहीं चलता, क्योंकि रोशनी हर तरफ फैली है, पर अंधेरे में ये चीज़ें अवश्य दिखती हैं। यह रोज नहीं होता — पर साल में, दो साल में, बहुत बार होता है। और बड़े-बुज़ुर्ग बच्चों को उसकी ओर इशारा करके पुकारने से मना करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि आपको लगेगा जैसे कोई तारा टूटकर जा रहा है, जैसे कोई पूरा तेज अचानक किसी के घर में घुस गया। पुराने समय में यह सब बहुत होता था; अब बिजली की व्यवस्था है, इसलिए पता नहीं चलता — हर तरफ यह रोशनी और प्रकाश फैला होगा, इसलिए वे आएँ भी तो पता नहीं चलेगा। पर अंधेरे में ये चीज़ें अवश्य दिखती हैं। ऐसा कई बार होता है। ऐसा नहीं कि रोज हो रहा है, पर साल में, एक-दो साल में, बहुत बार होता है। और आपने बड़े-बुज़ुर्गों से भी सुना होगा कि वे मना करते हैं — पुकारो मत। बच्चे तो बच्चे हैं: अरे, अरे, यह क्या जा रहा है, यह क्या उड़ता जा रहा है।
क्या यह केवल पिछले दशकों में लोगों ने देखा था?
अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मे लोग, और अब यह दुर्लभ क्यों है
वक्ता '89, '90 और '95 तक के लोगों से याद करने को कहते हैं — जिनके समय में गाँवों में ऐसी रोशनी नहीं आई थी, उन सबने इसे अवश्य देखा होगा। लोगों ने इसे बचपन में देखा हो, जवानी में या बुढ़ापे में, ऐसा नहीं कि वर्तमान समय में ये चीज़ें नहीं हो रहीं। बात बस इतनी है कि आज के समय में इसे देख पाना दुर्लभ है।
वक्ता कहते हैं कि याद कीजिए, जो लोग '89, '90, '95 तक के हैं, जिनके समय में गाँव-देहात में ऐसी रोशनी नहीं आई थी — उन सबने इसे अवश्य देखा होगा। तो ये चीज़ें जो हमने आम तौर पर देखी हैं, चाहे लोगों ने बचपन में देखी हों, जवानी में या बुढ़ापे में — ऐसा नहीं कि ये चीज़ें वर्तमान समय में नहीं हो रहीं। बात बस इतनी है कि आज के समय में दर्शन हो पाना दुर्लभ है।
ऐसे अनुभवों के लिए किस तरह का स्थान बताया गया है?
एकांतवास, अरण्यवास और ऐसा शिव मंदिर जिसके बारह कोस में दूसरा न हो
वक्ता कहते हैं कि ऐसे अनुभवों के लिए एकांतवास और अरण्यवास करने को कहा गया है — ऐसे शिव मंदिर पर जिसके बारह कोस के भीतर कोई दूसरा शिव मंदिर न हो, किसी एक-लिंग क्षेत्र में, या पर्वत की चोटी पर। पर अब, वे कहते हैं, चोटी पर करने कहाँ जाएँगे? किसी भी तीर्थ क्षेत्र की मुख्य चोटी के आसपास घर, दुकानें और होटल बन गए हैं, इसलिए कोई एकांत क्षेत्र नहीं बचा; वह वहाँ से दूर जाकर ही मिलेगा।
वक्ता कहते हैं कि इस प्रकार की अनुभूतियों के लिए कहा जाता है: एकांतवास करो, अरण्यवास करो। ऐसा शिव मंदिर हो जिसके बारह कोस के भीतर कोई दूसरा शिव मंदिर न हो, एक-लिंग क्षेत्र आदि हो — वहाँ करो, पर्वत की चोटी पर करो। पर वे पूछते हैं कि अब चोटी पर करने कहाँ जाएँगे? चोटी पर भी, यदि वह किसी तीर्थ क्षेत्र की मुख्य चोटी है, तो उसके आसपास घर, दुकानें और होटल सब बन गए हैं, इसलिए कोई एकांत क्षेत्र नहीं बचा। एकांत क्षेत्र अब वहाँ से दूर जाकर ही मिलेगा। और इसलिए इन स्थानों पर भी प्रत्यक्ष दर्शन और अनुभूति संभव नहीं है।
जब दिव्य दृष्टि खुलने लगती है, तो क्या खतरा होता है?
भ्रम का बढ़ना और सच-झूठ में भेद न कर पाना
वक्ता कहते हैं कि जब साधक अधिक से अधिक जप, तप, हवन आदि कर रहा हो, तीर्थ क्षेत्रों की यात्रा कर रहा हो, और उसे दिव्य चक्षु मिलने लगें, तो उसकी भ्रम की क्षमता बहुत बढ़ने लगती है। वह भेद नहीं कर पाता कि क्या सच है और क्या झूठ। मन की अवस्था आधे में अटक जाती है — उसे हमेशा लगेगा कि वह आधी नींद में है — और शुरू में यह जानना बहुत कठिन होता है कि उसके सामने कौन आया, कौन गया, उनमें कौन मनुष्य था और कौन देव शक्ति से युक्त था।
वक्ता कहते हैं कि सब कुछ हो रहा होगा, पर आप और हम उसे उस तरह देख नहीं पाएँगे। और जब कोई साधक अधिक से अधिक जप और तप कर रहा हो, हवन आदि कर रहा हो, तीर्थ क्षेत्रों की यात्रा कर रहा हो, और उसे दिव्यदृष्टि मिलने लगे, तो उसकी भ्रम की क्षमता बहुत बढ़ने लगती है। वह भेद नहीं कर पाता कि क्या सच है और क्या झूठ। एक तो मन की अवस्था आधे में अटक जाएगी। उसे हमेशा लगेगा कि वह आधी नींद में है। उसके सामने कौन आया, कौन गया, उनमें कौन मनुष्य था और कौन देव शक्ति से युक्त था — यह जानना शुरू में बहुत कठिन हो जाता है।
दिव्य दृष्टि के खुलने को कौन संतुलित करता है?
देव कृपा, गुरु कृपा, मंत्र कृपा — और सबसे बढ़कर न्यास
वक्ता कहते हैं कि इसे संतुलित करने के लिए देव कृपा, गुरु कृपा और मंत्र कृपा सब अनिवार्य और आवश्यक हैं — और इसमें सबसे बड़ा कारण बनने वाली चीज़ मंत्र का न्यास है। इसी कारण गुरु न्यास की प्रक्रिया, मुद्रा के साथ किया जाने वाला न्यास, सबसे अंत में सिखाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस चीज़ को संतुलित करने के लिए भी देव कृपा, गुरु कृपा और मंत्र कृपा सब अनिवार्य और आवश्यक हैं। और इसमें सबसे बड़ा कारण बनने वाली चीज़ मंत्र का न्यास है। न्यास की प्रक्रिया, मुद्रापूजा या प्रतिमा-विज्ञान में प्रयुक्त एक प्रतीकात्मक हस्त-मुद्रा — जैसे वरद (वरदान देने वाली) या अभय (निर्भयता प्रदान करने वाली) — प्रत्येक का अपना विशिष्ट अर्थ होता है। के साथ न्यास करना — इसी कारण गुरु इसे अंत में सिखाते हैं।
शिष्य को शुरू में ही सब कुछ क्यों नहीं दिया जाता?
ऊर्जा को नियंत्रित करने वाली मुद्रा, और त्वष्टा का उदाहरण
वक्ता कहते हैं कि शुरू में सब कुछ एक साथ कभी नहीं दिया जाता। जब क्षमता आने लगती है, तब मुद्रा से ऊर्जा का नियंत्रण आता है — कौन-सी ऊर्जा ग्रहण करनी है और कौन-सी हटानी है। वे उदाहरण देते हैं कि भगवान सूर्यनारायण का ताप बहुत अधिक था, और भगवान विश्वकर्मा के रूप त्वष्टा ने अपनी खराद पर उसे काटकर सूर्य की ऊर्जा और उनका ताप कम किया, ऐसा कहा जाता है।
वक्ता कहते हैं कि शुरू में सब कुछ एक साथ कभी नहीं दिया जाता। जब वह क्षमता आने लगती है, तब मुद्रा से ऊर्जा को नियंत्रित किया जाता है — कौन-सी ऊर्जा ग्रहण करनी है, कौन-सी ऊर्जा हटानी है। वे कहते हैं कि जैसे भगवान सूर्यनारायण का ताप बहुत अधिक था, तो त्वष्टा ने क्या किया — त्वष्टा भगवान विश्वकर्मा का ही एक रूप हैं। कहा जाता है कि उन्होंने काटकर सूर्य की ऊर्जा कम की; अपनी खराद से थोड़ा काटकर उनका ताप कम किया। यह एक बात बताई गई है।
न्यास कितने प्रकार के होते हैं?
व्यक्ति की प्रकृति और आम्नाय के अनुसार बदलता न्यास
वक्ता कहते हैं कि मुद्राओं में वह प्रभाव होता है जो गुरु अपनी परंपरा से सिखाते हैं — कि इस मुद्रा के साथ यह बीज मंत्र बोलोगे, तो इतनी ऊर्जा घटेगी और इतनी बढ़ेगी। न्यास भी हर व्यक्ति के लिए उसकी प्रकृति के अनुसार अलग होता है; कम से कम चार प्रकार हैं, और उसके आगे न्यास की प्रक्रिया इस पर निर्भर है कि आपकी दीक्षा छह आम्नायों में से किस आम्नाय में हुई।
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी तरह इन मुद्राओं में वह प्रभाव होता है जो गुरु अपनी परंपरा से सिखाते हैं: कि इस मुद्रा के साथ यह बीज मंत्र बोलोगे, तो इतनी ऊर्जा कम होगी और इतनी बढ़ेगी। तो न्यास भी हर व्यक्ति के लिए उसकी प्रकृति के अनुसार अलग-अलग होता है। कम से कम चार प्रकार हैं। उसके आगे छह आम्नाय हैं, और आपकी दीक्षा किस आम्नाय में हुई — न्यास की प्रक्रिया इस पर भी निर्भर करती है।
यदि ऊर्जा संतुलित न हो, तो क्या होता है?
विक्षिप्त अवस्था की ओर बढ़ना
वक्ता इसे बिल्कुल अंत का विषय बताते हैं, जो तब आता है जब आप उस तरह की ऊर्जाओं से व्यवहार करने लगते हैं और ऐसे अनुभव होने लगते हैं। यदि यह न किया जाए — आप समझ रहे हों कि क्षमता आ रही है, पर संतुलन की कला न हो — तो व्यक्ति विक्षिप्त अवस्था की ओर बढ़ने लगता है, उसे समझ नहीं आता, और धीरे-धीरे उसका दिमाग कम काम करने लगता है।
वक्ता कहते हैं कि तो यह एक अलग विषय हो गया, बिल्कुल अंत का विषय — जो तब आता है जब आप उस तरह की ऊर्जाओं से व्यवहार करने लगते हैं, जब उस तरह का अनुभव होने लगता है। और यदि यह न किया जाए, तो आप समझ रहे हैं कि हाँ, आपमें क्षमता आ रही है, पर उसे संतुलित करने की कला नहीं है — तो व्यक्ति विक्षिप्त अवस्था की ओर बढ़ने लगता है। उसे समझ नहीं आता, और फिर धीरे-धीरे उसका दिमाग कम काम करने लगता है।
मुद्रा और न्यास अलग-अलग क्या करते हैं?
मुद्रा से ऊर्जा का नियंत्रण, न्यास से उसकी स्थापना
वक्ता कहते हैं कि उसी चीज़ को संतुलित करना होता है, और इसी में मुद्रा और न्यास का प्रभाव है। मुद्रा से ऊर्जा घटाने-बढ़ाने की क्षमता आती है — किसे ग्रहण करना है और किसे हटाना है — और न्यास से उसे अपने शरीर में स्थापित करना, देवता के समान हो जाना, ताकि देवता को देवता ही पहचान सके।
वक्ता कहते हैं कि उसी चीज़ को संतुलित करना होता है, और इसी में मुद्रा और न्यास आदि का प्रभाव है। मुद्रा से ऊर्जा को कम या अधिक करने की क्षमता — हाँ भाई, किसे ग्रहण करना है और किसे हटाना है। और न्यास से उसे अपने ही शरीर में स्थापित करना, देवता के समान हो जाना, ताकि देवता को देवता ही पहचान सके।
शरीर के मंत्रमय होने का क्या अर्थ है?
देवता को देखने के लिए स्वयं देवता बनना
वक्ता कहते हैं कि जब मुद्रा और न्यास से आप पूरा मंत्र अपने शरीर में स्थापित करते हैं, तो आपका शरीर मंत्रमय हो जाता है — और मंत्र देवता का ही रूप है। अर्थात आप स्वयं देवता बनकर उस देवता का जप करते हैं। और देवता बनकर, उस मंत्र की सिद्धि के बाद, जब आप मुद्रा के साथ न्यास करते हैं, तो उस देवता को अपने शरीर में बिठाते हैं और स्वयं देवता होकर उस देवता का, उनके गणों का और आकाशचारी सिद्धों का दर्शन कर पाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब मुद्रा और न्यास से आप पूरा मंत्र अपने शरीर में स्थापित करते हैं, तब आपका शरीर मंत्रमय हो जाता है। और मंत्र देवता का ही रूप है — अर्थात आप स्वयं देवता बनकर उस देवता का जप करते हैं। और देवता बनकर, उस मंत्र की सिद्धि के बाद, जब आप मुद्रा के साथ न्यास कर रहे होते हैं, तो उस देवता को अपने ही शरीर में बिठाते हैं और स्वयं देवता होकर उनका दर्शन, उनके गण का दर्शन और आकाशचारी सिद्धों का दर्शन कर पाते हैं।
बलवान या पीड़ित चंद्रमा इसमें क्या बदलता है?
उच्च का चंद्रमा बनाम ग्रहण दोष और विष दोष
वक्ता कहते हैं कि इनमें भी जिनका चंद्रमा बहुत बलवान है, किसी ग्रहण दोष से ग्रस्त नहीं और उच्च का है, उन्हें ये प्रभाव और ये बातें जल्दी मिलने लगती हैं। जहाँ ग्रहण दोष हो, या जन्म कुंडली में विष दोष की उपस्थिति बने, वहाँ भी ये चीज़ें मिलती हैं, पर बात बिल्कुल अलग हो जाती है; उनके लिए चीज़ें सामान्य ढंग से नहीं होतीं, और यह एक तरह की उथल-पुथल बन जाती है।
वक्ता कहते हैं कि इनमें भी जिनका चंद्रमा बहुत अधिक बलवान है, किसी भी प्रकार के ग्रहण दोष से ग्रस्त नहीं है, और उच्च का है — ऐसे में ये प्रभाव, या इस प्रकार की बातें, जल्दी मिलने लगती हैं। और जहाँ ग्रहण दोष आदि है, जहाँ जन्म कुंडली में विष दोष आदि की उपस्थिति बनती है, वहाँ भी ये सब चीज़ें मिलती तो हैं, पर बात बिल्कुल अलग हो जाती है। उनके लिए चीज़ें सामान्य ढंग से नहीं होतीं। उनके लिए यह, एक तरह से कहें तो, उथल-पुथल की बात बन जाती है।
क्या ग्रहण दोष साधक के लिए केवल श्राप है?
ग्रहण दोष और विष योग में छिपा वरदान
वक्ता कहते हैं कि जब दिखता नहीं, तो नहीं दिखता; पर जहाँ पता चलने लगता है, वहाँ बहुत बड़ी मात्रा में आता है। यदि कोई ग्रहण दोष को श्राप कहे, तो उसके साथ एक बहुत बड़ा वरदान भी है। और विष योग, जिसे दुख देने वाला कहा जाता है, उसी दुख के भीतर एक बहुत बड़ा मार्ग भी निकालता है — यदि व्यक्ति ठीक से साधना करे। वे कहते हैं कि यह स्थायी होता है; साधना के क्षेत्र में यह जो देता है, बहुत अच्छा देता है।
वक्ता कहते हैं कि जब उन्हें नहीं दिखता, तो नहीं दिखता — पता नहीं चल रहा, पता नहीं चल रहा — पर जहाँ पता चलना शुरू होता है, वहाँ काफ़ी बड़ी मात्रा में आता है। यदि कोई कहे कि ग्रहण दोष श्राप है, तो उसके साथ एक बहुत बड़ा वरदान भी है। विष योग, जिसे दुख देने वाला कहा जाता है, उसी दुख के भीतर एक बहुत बड़ा मार्ग निकालता है — यदि व्यक्ति सही तरीके से साधना करे। और यह स्थायी होता है। साधना के क्षेत्र में यह जो देता है, बहुत अच्छा देता है।
साधारण प्राप्ति और दोष पर जीतकर मिली प्राप्ति में क्या अंतर है?
अनुभव का अंतर और सुरक्षा का अंतर
वक्ता कहते हैं कि ये योग — ग्रहण, विष योग आदि — जो देते हैं, यदि उससे कोई साधनात्मक प्राप्ति होती है, तो वह बहुत लंबे समय तक चलती है और आपका जीवन बदलने की क्षमता रखती है। सामान्य चंद्र बल वाला व्यक्ति, जिसके लिए सब पहले से ठीक था, जो पाता है — और जो व्यक्ति ग्रहण दोष को नष्ट करके या अपने तप के बल पर उस पर विजय पाकर पाता है — उन दोनों में बहुत बड़ा अंतर होता है: अनुभव का अंतर, और सुरक्षा का भी अंतर।
वक्ता कहते हैं कि इन योगों से जो दिया जाता है, चाहे ग्रहण हो या विष योग आदि — यदि कोई साधनात्मक प्राप्ति होती है, तो वह बहुत लंबे और विस्तृत समय तक चलती है और आपका जीवन बदलने की क्षमता रखती है। सामान्य परिस्थिति में व्यक्ति जो पाता है, सामान्य चंद्र बल के साथ, जिसके साथ सब पहले से ठीक था — और ग्रहण दोष आदि के बाद, उस दोष को नष्ट करके या अपने तप के बल पर उस दोष पर विजय पाकर वह जो पाता है — उन दोनों में बहुत बड़ा अंतर होता है। अनुभव का अंतर होता है। सुरक्षा का भी अंतर होता है। वे कहते हैं कि यह भी आपको समझना चाहिए।
कौन-सी पूर्णिमाएँ दिव्य कहलाती हैं, और उन पर क्या करना चाहिए?
शरद, श्रावण, कार्तिक देव दीपावली और मार्गशीर्ष पूर्णिमा
वक्ता दिव्य काल की पूर्णिमाओं के नाम लेते हैं — शरद पूर्णिमा, श्रावण, आने वाली कार्तिक पूर्णिमा जो देव दीपावली है, और मार्गशीर्ष की पूर्णिमा। कोई पूर्णिमा जिस देवता को समर्पित है, यदि आप उनसे जुड़े मंत्रों का जप कर रहे हैं, या उनसे जुड़े शक्ति पीठ या मंदिर में हैं, या ऐसे स्थान पर उपस्थित हैं और समर्पित साधक हैं, तो आपको दिव्य अनुभव अवश्य हो सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसके आगे यह बात आती है कि जब भी हम पूर्णिमा के समय किसी मंत्र का जप कर रहे हों, तो पहले दिव्य काल की सभी पूर्णिमाएँ हैं — शरद पूर्णिमा, श्रावण, या अब कार्तिक की पूर्णिमा, देव दीपावली आ गई, मार्गशीर्ष की पूर्णिमा। वह पूर्णिमा जिस देवता को समर्पित है — यदि आप उनसे जुड़े शक्ति पीठ पर, या उनसे जुड़े मंदिर में, या उनसे जुड़े मंत्र का जप कर रहे हैं, या बस ऐसे स्थान पर उपस्थित हैं — और यदि आप समर्पित साधक हैं, तो आपको दिव्य अनुभूतियाँ अवश्य हो सकती हैं।
यदि कोई अनुभव न भी हो, तो क्या जप को लाभ मिलता है?
इन दिनों मंत्र की क्षमता में वृद्धि
वक्ता कहते हैं कि अनुभूति हो या न हो, आप जो मंत्र जप कर रहे हैं, उसकी क्षमता में वृद्धि सामान्य दिनों की तुलना में बहुत अधिक होती है।
वक्ता कहते हैं कि अनुभूति हो या न हो। आप जो यह मंत्र जप कर रहे हैं — उसकी क्षमता में वृद्धि सामान्य दिनों की तुलना में बहुत अधिक हो जाती है।
शरद पूर्णिमा की रात के लिए कौन-से मंत्र बताए गए हैं?
कृष्ण, लक्ष्मी और जगदंबा के सौम्य रूप
कल रात, शरद पूर्णिमा के लिए, वक्ता भगवान कृष्ण से जुड़े मंत्र, भगवती लक्ष्मी से जुड़े मंत्र, और भगवती जगदंबा के सौम्य रूपों से जुड़े मंत्र बताते हैं — अष्टोत्तर शतनाम, माला मंत्र, चाहे धनदा लक्ष्मी का हो, श्री लक्ष्मी का, महालक्ष्मी अष्टकम आदि।
वक्ता कहते हैं कि उदाहरण के लिए, कल रात, शरद पूर्णिमा पर, यदि कोई भगवान कृष्ण से जुड़े मंत्र का, भगवती लक्ष्मी से जुड़े मंत्र का, या भगवती जगदंबा के उन रूपों से जुड़े मंत्रों का जप कर रहा है जो सौम्य हैं — चाहे अष्टोत्तर शतनाम हो, चाहे माला मंत्र हो, धनदा लक्ष्मी का हो या श्री लक्ष्मी का, महालक्ष्मी अष्टकम् आदि — तो ये सब आप लक्ष्मी तत्व से युक्त होकर कर रहे होंगे।
क्या महाकाली और अघोर काली में श्री तत्व होता है?
श्री तत्व से अलग अघोर तत्व
मानो यह पूछे जाने पर कि क्या भगवती महाकाली या अघोर काली जैसी कोई अन्य शक्ति श्री तत्व से रहित है, वक्ता उत्तर देते हैं कि नहीं, उनका तत्व अलग प्रकार का है — वह अघोर तत्व से युक्त है। उनका विषय अलग है, और वे साफ़ कहते हैं कि एक सामान्य गृहस्थ व्यक्ति उन तत्वों को स्वीकार नहीं कर सकता।
वक्ता कहते हैं कि तो यदि आप भगवती के बारे में यह चाहें — भगवती महाकाली या कोई अन्य शक्ति, अघोर काली आदि, कि वे श्री तत्व से रहित हैं — नहीं। उनका तत्व अलग प्रकार का है। वह अघोर तत्व से, अघोर तत्व से युक्त है। उनका विषय अलग है। वे कहते हैं कि इसे इस तरह समझिए: एक सामान्य गृहस्थ व्यक्ति उन तत्वों को स्वीकार नहीं कर सकता।
इस रात पूजने पर सौम्य रूप क्या देते हैं?
पुष्टि, तुष्टि, दरिद्रता का नाश और स्थायी समृद्धि
जो रूप सौम्य हैं, पौष्टिक हैं, धन-धान्य देने वाले हैं, जिन्हें देखते ही लगे कि यह रूप शांति देने वाला है — वक्ता कहते हैं कि कल ऐसे रूपों से जुड़े मंत्रों का जप किया जाए, तो वे हमारी पुष्टि और तुष्टि बढ़ाते हैं, धन-धान्य देते हैं, दरिद्रता हटाते हैं और समृद्धि को स्थायी बनाते हैं। इस कारण से भी शरद पूर्णिमा की रात अपने-आप में बहुत विशेष हो जाती है।
पर जो रूप सौम्य हैं, जो पौष्टिक हैं, जो हमें धन-धान्य देने वाले रूप ही हैं — जिन्हें देखकर लगे कि यह रूप शांति देने वाला है — वक्ता कहते हैं कि यदि कल के दिन ऐसे रूप से जुड़े मंत्रों का जप किया जाए, तो वे हमारे लिए पुष्टि बढ़ाने वाले, तुष्टि बढ़ाने वाले, धन-धान्य देने वाले, दरिद्रता हटाने वाले और समृद्धि को स्थायी बनाने वाले होते हैं। तो इस कारण से भी शरद पूर्णिमा की रात अपने-आप में बहुत विशेष हो जाती है।
इस रात चंद्रमा के अमृत बरसाने का क्या अर्थ है?
खुले आकाश के नीचे जप से मंत्र का अमृत-तुल्य होना
वक्ता कहते हैं कि जहाँ कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अमृत बरसाता है, वहाँ यह जानिए: यदि किसी दिव्य स्थान पर, मंडप-विहीन स्थान पर — अर्थात जहाँ छत न हो — बैठकर आप अपने इष्ट मंत्र का जप करें, तो वह मंत्र भी अमृत के समान हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि और जहाँ कहा जाता है कि इस रात, पूर्णिमा की रात, शरद पूर्णिमा की रात, चंद्रमा अमृत बरसाता है — तो यह जानिए। यदि किसी दिव्य स्थान पर, मंडप-विहीन स्थान पर, जहाँ भी छत न हो — मंडप-विहीन का अर्थ है जहाँ छत न हो — यदि आप ऐसे स्थान पर बैठकर अपने इष्ट देवता के मंत्र का जप करें, तो वह मंत्र भी अमृत के समान हो जाता है।
क्या हर मंत्र में चंद्रमा की आकर्षण ऊर्जा होती है?
चंद्र रस और किसी भी मंत्र का बल बढ़ना
वक्ता कहते हैं कि ऐसा कोई मंत्र है ही नहीं जिसमें चंद्रदेव की आकर्षण ऊर्जा न हो — हर मंत्र में आकर्षण ऊर्जा है, आकर्षण अवश्य होता है। और यदि उस मंत्र का जप चंद्रदेव को देखते हुए किया जाए, या ऐसे स्थान पर बैठकर जहाँ उनका चंद्र रस बरसता हो, तो आपका मंत्र भी बहुत बलवान हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि अब ऐसा कोई मंत्र है ही नहीं जिसमें चंद्रदेव की आकर्षण ऊर्जा न हो। हर मंत्र में आकर्षण ऊर्जा है; आकर्षण अवश्य होता है। और यदि उस मंत्र का जप चंद्रदेव को देखते हुए किया जाए, या ऐसे स्थान पर बैठकर जहाँ उनका चंद्र रस बरसता हो, तो आपका मंत्र भी बहुत बलवान हो जाता है।
शरद पूर्णिमा पर बाहर रखी खीर की विधि क्या है?
गाय के दूध की खीर, छत पर, चाँदी के कटोरे में, लाल कपड़े से ढकी
वक्ता प्रचलित मान्यता बताते हैं कि रात को गाय के दूध से बनी खीर चाँदी के कटोरे में छत पर रखनी चाहिए, लाल कपड़े से ढककर; और सुबह भोर में स्नान-पूजन के बाद सबको प्रसाद के रूप में खानी चाहिए। वे कहते हैं कि यदि आप साधक हैं और ऐसा करते हैं, तो यह और भी उत्तम है, क्योंकि यह विशेष है।
वक्ता कहते हैं कि और इसके साथ यह मान्यता है, यह बात बताई गई है: कि रात के समय गाय के दूध से बनी खीर चाँदी के कटोरे में छत पर रखनी चाहिए। लाल कपड़े से ढककर। और सुबह के समय, भोर के समय, स्नान-पूजन आदि करके सबको प्रसाद के रूप में खानी चाहिए। तो यदि आप साधक हैं और ऐसा करते हैं, तो यह और भी उत्तम है, क्योंकि यह विशेष है।
खीर को ढका क्यों जाता है?
ढकने वाले कपड़े का कारण
वक्ता कहते हैं कि ढकना केवल इस कारण है कि उसमें कोई कीड़ा-मकोड़ा या पतंगा आदि न गिरे। यह भी अपने-आप में बहुत विशेष हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि ढकना केवल इस कारण है कि उसमें किसी भी प्रकार का कीड़ा या पतंगा आदि न गिरे। तो यह भी अपने-आप में बहुत विशेष हो जाता है।
शरद चंद्र की रात खप्परों के साथ क्या किया जाता है?
दैविक और सात्विक खप्परों की खप्पर सिद्धि
वक्ता कहते हैं कि हमेशा याद रखिए कि तंत्र पद्धति में खप्पर चढ़ाने की एक कला है, साधारण खप्पर से लेकर विशेष खप्पर तक। शरद चंद्र की रात — कल शरद पूर्णिमा है — सभी दैविक और सात्विक खप्परों के लिए, और विशेषकर क्षेत्र और भगतवाल आदि से जुड़े कामों में, लोग खप्पर सिद्धि का विषय अवश्य उठाते हैं। कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ आप पाएँगे कि इसी रात खप्पर सिद्धि की जाती है।
वक्ता कहते हैं कि और एक बात हमेशा याद रखिए: तंत्र पद्धति में जो खप्पर चढ़ाने की कला है, साधारण खप्पर से लेकर विशेष खप्पर तक। शरद चंद्र की रात — कल शरद पूर्णिमा है — सभी दैविक खप्परों के लिए, या जितने भी सात्विक खप्पर हैं, और विशेषकर उन कामों में जो किसी क्षेत्र से और भगतवाल आदि से जुड़े हैं, लोग इसमें खप्पर सिद्धि की बात अवश्य उठाते हैं। कई क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें आप पाएँगे कि वे इसी रात खप्पर सिद्धि करेंगे। यह उनका विशेष काम है।
इस समय की खप्पर सिद्धि किस काम आती है?
रोग हटाना और बीमार व्यक्ति को बल देना
वक्ता कहते हैं कि इस समय की जाने वाली खप्पर सिद्धि विशेषकर किसी भी प्रकार के रोग को उतारने, बीमार व्यक्ति को बल देने और रोग हटाने की क्षमता के लिए होती है।
वक्ता कहते हैं कि और इस समय जो यह खप्पर सिद्धि की जाती है, वह विशेषकर किसी भी प्रकार के रोग को उतारने के लिए, और बीमार व्यक्ति को बल देने के लिए होती है — रोग-हरण की, यानी रोग हटाने की क्षमता के लिए।
इस काम में सबसे अधिक कौन-से मंत्र प्रयोग होते हैं?
भगतवाल में शाबर महामृत्युंजय और नाथपंथी मंत्र
वक्ता कहते हैं कि इसमें सबसे अधिक प्रयोग भगतवाल में चलने वाले महामृत्युंजय मंत्र का होता है — शाबर में, शाबर महामृत्युंजय, जिसे वे बिल्कुल अलग बात कहते हैं। इसमें नाथपंथी मंत्र भी आते हैं, और लोग उनका जागरण करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसमें सबसे अधिक प्रयोग उस मंत्र आदि का होता है जो महामृत्युंजय भगतवाल में चलता है — आप देखेंगे कि वह शाबर में है, शाबर महामृत्युंजय। तो वह बिल्कुल अलग बात है। इसमें नाथपंथी मंत्र भी आते हैं, और लोग इसमें उनका जागरण करते हैं।
धरन मंत्र क्या है, और उसे सिद्ध कैसे किया जाता है?
नाभि खिसकने पर धरन बिठाना
वक्ता कहते हैं कि गाँव के लोगों में रोग-हरण से जुड़ा एक बहुत प्रचलित मंत्र है, जिसे धरन बिठाना कहते हैं — जब किसी की नाभि खिसक जाए। शरद पूर्णिमा की रात लोग इसे मिट्टी के छोटे सकोरों पर, या फूल (एक धातु) के कटोरे पर सिद्ध करते हैं। फिर बस उस कटोरे पर पढ़कर, जैसे ही धरन यानी नाभि खिसकी हो, वहाँ बैठकर मंत्र फूँकते हैं, और धरन अपने-आप बैठ जाती है।
क्या ये प्रयोग केवल इसी एक रात तक सीमित हैं?
एक रात की सिद्धि, और पशुओं के रोगों के मंत्र
वक्ता कहते हैं कि इस तरह के प्रयोग इसी रात किए जाएँगे — केवल शरद पूर्णिमा की रात; एक ही रात में उनके लिए यह सिद्ध हो जाता है। ऐसे कई मंत्र भी हैं जिनमें पशुओं को कोई रोग हो, तो उन्हें ठीक करने के लिए ऐसे मंत्र प्रयोग होते हैं। और ऊँचे स्तर की साधना करने वालों में भी रोग-हरण से जुड़े मंत्र विशेष हैं।
वक्ता कहते हैं कि तो इस तरह का प्रयोग इसी रात किया जाएगा। केवल शरद पूर्णिमा की रात किया जाएगा। एक ही रात में उनके लिए यह सिद्ध हो जाता है। और ऐसे कई मंत्र भी हैं जिनमें यदि पशु — जो पालतू मवेशी हैं — किसी रोग आदि से पीड़ित हों, तो उन्हें ठीक करने के लिए इस तरह के मंत्र प्रयोग होते हैं। और ऊँचे स्तर की साधना करने वालों में भी रोग-हरण आदि से जुड़े मंत्र विशेष हैं।
वैद्यनाथ और महामृत्युंजय के माला मंत्र कहाँ सिद्ध करने चाहिए?
किसी पुराने बिना छत वाले शिव मंदिर में नंदी के पास बैठकर
वक्ता कहते हैं कि बाबा वैद्यनाथ का माला मंत्र और भगवान महामृत्युंजय का माला मंत्र इस रात किसी शिव मंदिर के पास बैठकर सिद्ध किए जाते हैं — विशेषकर ऐसे शिव मंदिर में जहाँ नंदी जी बाहर मंडप-विहीन क्षेत्र में हों, विशेषकर यदि मंदिर पुराना हो। कला यह है कि नंदी जी के पास बैठकर इन्हें सिद्ध किया जाए।
वक्ता कहते हैं कि बाबा वैद्यनाथ का माला मंत्र आदि, भगवान महामृत्युंजय का माला मंत्र आदि — ये इस रात किसी शिव मंदिर के पास बैठकर सिद्ध किए जाते हैं। और विशेषकर ऐसा शिव मंदिर जहाँ नंदी जी बाहर, मंडप-विहीन क्षेत्र में हों, और विशेषकर यदि मंदिर पुराना हो। कला यह है कि नंदी जी के पास बैठकर इन्हें सिद्ध किया जाए।
ग्रंथ बताते हैं कि कितने धनुष की दूरी पर बैठना है और शिव पर त्राटक कैसे करना है
बैठने की दूरी और शिव पर त्राटक के बारे में ग्रंथ
वक्ता कहते हैं कि यह सब आपको ग्रंथों का अध्ययन करने पर भी पता चलेगा — विधि किस तरह बताई गई थी, कितने धनुष के भीतर बैठना है, और शिव जी को देखते हुए त्राटक करके इसे किस तरह करना है।
वक्ता कहते हैं कि यह सब आपको ग्रंथों का अध्ययन करने पर भी पता चलेगा। विधि किस तरह बताई गई थी: कितने धनुष के भीतर बैठना है, और शिव जी को देखते हुए, त्राटक करते हुए, इसे किस तरह करना है।
जब कोई मंत्र सिद्ध न हो, तो क्या किया जाता है?
मंत्र दोष निवारण के दस विधान
वक्ता कहते हैं कि जब मंत्र सिद्धि नहीं हो रही हो, तो उसके लिए दस प्रकार के विधान बताए गए हैं — श्रोताओं ने कई ग्रंथों में इनके बारे में पढ़ा और सुना भी होगा — कि अमुक विधान करने से मंत्र दोष का निवारण होता है, और उससे मंत्र सिद्ध होता है।
वक्ता कहते हैं कि इसके अलावा, जब हम आगे जाते हैं — जैसे जब मंत्र सिद्धि नहीं हो रही हो — तो उस संबंध में दस प्रकार के विधान बताए गए होंगे। आपने बहुत-से ग्रंथों में भी इनके बारे में पढ़ा होगा और सुना भी होगा, कि अमुक विधान करने से मंत्र दोष का निवारण होता है, और उससे मंत्र सिद्ध होता है।
जब कुछ भी काम न कर रहा हो, तो क्या उपाय है?
मंत्र को शिव को अर्पित करना और फिर चंद्रमा पर त्राटक
वक्ता कहते हैं कि मान लीजिए हमारा दुर्भाग्य बहुत ही प्रबल है — हो नहीं रहा, हम कर रहे हैं पर हो नहीं रहा — तो ऐसी स्थिति में शरद पूर्णिमा की रात शिव जी के मंदिर के पास बैठिए, पहले वह मंत्र शिव जी को अर्पित कीजिए, और फिर चंद्रदेव का दर्शन करते हुए, एक तरह से त्राटक करते हुए, इसे कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि मान लीजिए हमारा दुर्भाग्य बहुत ही प्रबल है। हो नहीं रहा। हम कर रहे हैं, पर हो नहीं रहा। तो ऐसी स्थिति में शरद पूर्णिमा की रात शिव जी के मंदिर के पास बैठकर आप पहले वह मंत्र आदि शिव जी को अर्पित करेंगे। और फिर चंद्रदेव का दर्शन करते हुए, एक त्राटक करते हुए — एक तरह से कहें तो।
भावना यह है कि मंत्र चंद्रदेव के भीतर लिखा है, जो रात भर में जाग उठता है
चंद्रदेव के भीतर लिखा मंत्र, जो रात भर में जागता है
वक्ता कहते हैं कि उस मंत्र में भावना यह है कि चंद्रदेव के भीतर, उनके अंदर, वह मंत्र लिखा हुआ है। और जब तक चंद्रदेव दिखाई दें, तब तक उस मंत्र का जप किया जाए, तो वह मंत्र रात भर में जागृत होकर तुरंत फल देने वाला बन जाता है।
वक्ता कहते हैं कि और उस मंत्र की भावना यह है: कि चंद्रदेव के अंदर, उनके भीतर, वह मंत्र लिखा हुआ है। और जब तक चंद्रदेव दिखाई दें, तब तक यदि उस मंत्र का जप किया जाए, तो वह मंत्र पूरी रात में जागृत होकर तुरंत फल देने वाला बन जाता है।
संतुलन की क्षमता के बिना ऐसा त्राटक-जप काम, क्रोध और भूख के विकार बढ़ाता है
काम, क्रोध और भूख के विकारों का बढ़ना
वक्ता चेतावनी देते हैं कि इसमें एक बात और होती है: जब इस तरह त्राटक करते हुए मंत्र का जप किया जाए और संतुलन की क्षमता न हो, तो व्यक्ति के काम और क्रोध से जुड़े विकार, या भूख से जुड़े विकार, बहुत बढ़ जाते हैं। वे इसे साइड इफ़ेक्ट कहते हैं। इसी कारण इसे अधिकतर वही लोग करते हैं जिनका पहले से योग अभ्यास आदि है, या जो पहले से जानते हैं कि यह होगा और इसे कैसे नियंत्रित करना है।
वक्ता कहते हैं कि पर इसमें एक बात और होती है: कि जब इस तरह त्राटक करते हुए मंत्र का जप किया जाए, और संतुलन की क्षमता न हो — तो व्यक्ति का काम और क्रोध से जुड़ा विकार, या भूख से जुड़ा विकार, बहुत बढ़ जाता है। यह एक साइड इफ़ेक्ट है। इसी कारण इसे अधिकतर वही लोग करते हैं जिनका पहले से योग अभ्यास आदि है, या जो बात जानते हैं — कि हाँ भाई, हम करेंगे तो यह होगा, तो इसे किस तरह नियंत्रित करना है।
विंध्य क्षेत्र और गंगा का किनारा वे स्थान हैं जहाँ यह आम तौर पर किया जाता है
विंध्य क्षेत्र और गंगा का किनारा
वक्ता कहते हैं कि विंध्य क्षेत्र इससे पूरा भरा है — वहाँ खाली ज़मीन खूब मिलती है, इसलिए लोग आराम से करते हैं, और बाद में बहुत बातें भी होती हैं, लोग कहते हैं कि हमने किया और ऐसा हुआ, तो छोड़ना पड़ा। वे इसे अनुभव की बात कहते हैं। गंगा के किनारे बैठकर भी यह किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि विंध्याचल क्षेत्र में यह पूरा भरा है। वहाँ खाली ज़मीन खूब मिलती है। लोग आराम से करते हैं, और फिर बहुत-सी बातें भी होती हैं। वे कहते हैं: अरे भाई, हमने किया और ऐसा हुआ, तो बाद में छोड़ना पड़ा। यह भी अनुभव की बात है। गंगा जी के किनारे बैठकर भी यह किया जाता है।
इन रातों में उपदेव श्रेणी की शक्तियों के साथ क्या किया जाता है?
रक्षा, जानकारी और शांति के लिए सौम्य उपदेवों को जगाना
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी तरह उपदेव श्रेणी की शक्तियों के लिए दीपावली की रात और ये सभी रातें उन उपदेवों को जगाने के काम आती हैं जो कुछ सौम्य हैं — जिनका प्रयोग रक्षा आदि के लिए होगा, किसी के बारे में जानकारी लेने के लिए होगा, या किसी उग्र शक्ति को शांत करने के लिए होगा।
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी तरह, जहाँ तक उपदेवता श्रेणी की शक्तियों की बात है — उनके लिए दीपावली की रात और जितनी भी ये रातें हैं। विशेषकर उन उपदेवों को जगाने के लिए जो कुछ सौम्य हैं। जिनका प्रयोग रक्षा आदि के लिए होगा, या किसी के बारे में जानकारी लेने के लिए होगा, या किसी उग्र शक्ति को शांत करने के लिए होगा।
क्या घर में पूजी जाने वाली किसी उग्र शक्ति को सौम्य बनाया जा सकता है?
गंगा घाट पर सौगंध देकर कुल शक्ति को मनाना
वक्ता कहते हैं कि बहुत-से लोग कहते हैं कि उनके घर में अमुक शक्ति पूजी जाती है और वे उसे उस तरह की पूजा नहीं देना चाहते, बल्कि चाहते हैं कि वह सौम्य हो जाए। इस रात गंगा जी के घाट पर उन्हें सौगंध देकर मनाने का प्रयास किया जाता है। वे कहते हैं कि यह पूरा भगतवाल का विषय है; प्रयास किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि बहुत-से लोग कहते हैं न कि हमारे घर में अमुक शक्ति पूजी जाती है। हम उसे इस तरह की पूजा नहीं देना चाहते; हम चाहते हैं कि वह सौम्य हो जाए। तो इस रात गंगा जी के घाट पर उन्हें सौगंध आदि देकर मनाने का प्रयास किया जाता है। यह पूरा भगतवाल का विषय है। यह प्रयास किया जाता है।
ऐसा मनाना किन महीनों में किया जाता है?
श्रावण, आषाढ़ और शरद — पर कार्तिक नहीं
वक्ता कहते हैं कि श्रावण, आषाढ़, और तीसरा शरद। कार्तिक में यह नहीं किया जाएगा — कार्तिक में मनाने की बात नहीं बन पाती। इन सभी समयों का अच्छा उपयोग किया जाता है, और इन सभी समयों में ये चीज़ें इसी तरह चलती हैं।
वक्ता कहते हैं कि श्रावण, आषाढ़, और तीसरा शरद। कार्तिक में वे नहीं करेंगे। कार्तिक में मनाने की बात नहीं बन पाती। तो इन सभी समयों का अच्छा उपयोग किया जाता है। इन सभी समयों में ये चीज़ें इसी तरह चलती हैं।
अभी कोई पौष्टिक मंत्र सिद्ध करते समय कौन-सा नैवेद्य चढ़ाना अनिवार्य है?
तंत्रोक्त पर्व काल में गाय के दूध की खीर का नैवेद्य
वक्ता कहते हैं कि आप किसी भी प्रकार की मंत्र सिद्धि कर रहे हों, सबसे अधिक ध्यान इस बात का रखना है: यदि मंत्र पुष्टिकर है और आप शरद पूर्णिमा जैसे दिव्य तंत्रोक्त पर्व काल में उसकी सिद्धि कर रहे हैं, तो संबंधित देवता को गाय के दूध से बनी खीर का नैवेद्य अवश्य चढ़ाइए।
वक्ता कहते हैं कि अब इनमें एक बात और आती है: कि आप किसी भी प्रकार के मंत्र की सिद्धि कर रहे हों, उनमें सबसे अधिक ध्यान इस बात का रखना है — यदि मंत्र पुष्टिकर है, और आप शरद पूर्णिमा जैसे दिव्य तंत्रोक्त पर्व काल में उसकी सिद्धि कर रहे हैं, तो संबंधित देवता को गाय के दूध से बनी खीर का नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। अवश्य चढ़ाइए।
इष्ट को सफ़ेद कमल की माला चढ़ाई जाती है, देवता कोई भी हो — लक्ष्मी की बात अलग है
इष्ट को चढ़ाई जाने वाली सफ़ेद कमल की माला
वक्ता कहते हैं कि यदि आप यह करें, चाहे शिव जी के लिए कर रहे हों, हनुमान जी के लिए, या किसी अन्य देवता के लिए — और यदि लक्ष्मी जी के लिए, तो वह बिल्कुल अलग बात है। एक और विशेष बात: जिस इष्ट आराध्य के मंत्र का आप जप कर रहे हैं, उनके लिए सफ़ेद कमल की माला मिल सके, और न मिले तो कमल के फूलों की जो भी माला मिल सके, और आप उसे चढ़ाएँ, तो उस देवता की कृपा आपको अवश्य मिलती है।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप यह करें, चाहे शिव जी के लिए कर रहे हों, हनुमान जी के लिए कर रहे हों, या किसी अन्य देवता के लिए कर रहे हों — और यदि आप लक्ष्मी जी के लिए कर रहे हैं, तो बात बिल्कुल अलग है। अब इसमें एक और विशेष बात: यदि आपके इष्ट देवता और आराध्य के लिए, जिनके मंत्र का आप जप कर रहे हैं, सफ़ेद कमल की माला मिल सके — और न मिले, तो कमल के फूलों की जो भी माला मिल सके — यदि आप वह उन्हें चढ़ाएँ, तो उस देवता की कृपा आपको अवश्य मिलती है।
यदि मंत्र सिद्धि न भी हो, तो क्या होता है?
देवता की कृपा, मार्ग का खुलना और स्वप्न में मार्गदर्शन
वक्ता कहते हैं कि मंत्र सिद्धि हो या न हो, उस देवता की कृपा अवश्य होती है; आपके लिए आगे का मार्ग खुलता है। और यदि उस सिद्धि में आपसे कोई जाना-अनजाना अपराध हो रहा है — संभव है आप कोई अपराध कर रहे हों — तो उस दोष को हटाने के लिए भी वे स्वप्न आदि से मार्ग दिखाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि मंत्र सिद्धि हो या न हो, पर उस देवता की कृपा अवश्य होती है। आपके लिए आगे का मार्ग खुल जाता है। और यदि आपसे कोई जाना-अनजाना अपराध हो रहा है — संभव है उस सिद्धि में आप कोई अपराध कर रहे हों — तो उस दोष को हटाने के लिए भी वे स्वप्न आदि से मार्ग दिखाते हैं।
क्या यह रात स्वप्न वाराही और स्वप्नेश्वरी दुर्गा के लिए अच्छी है?
स्वप्न से जुड़े मंत्र और इस रात उनकी शीघ्र सिद्धि
स्वप्न के विषय पर वक्ता कहते हैं कि जो लोग स्वप्न वाराही, स्वप्नेश्वरी दुर्गा आदि के मंत्रों का जप करते हैं या उन्हें सिद्ध करना चाहते हैं, उनके लिए यह दिव्य काल है। विधि का ठीक ज्ञान होना चाहिए। यदि ऐसे मंत्रों का जप रात में किया जाए, तो इन मंत्रों की सिद्धि भी इस रात सबसे जल्दी होती है।
वक्ता कहते हैं कि स्वप्न से जुड़ी एक बात और: जो लोग स्वप्न वाराही, स्वप्नेश्वरी दुर्गा आदि के मंत्रों का जप करते हैं, या उन्हें सिद्ध करना चाहते हैं — उनके लिए यह दिव्य काल है। हाँ, विधि का ठीक ज्ञान होना चाहिए। तो यदि रात के समय इस तरह के मंत्रों का जप हो रहा है, तो इन मंत्रों की सिद्धि भी इस रात सबसे जल्दी होती है।
क्या इस रात मंत्र सिद्धि के लिए जागना अनिवार्य है?
पूरी रात का जागरण
वक्ता कहते हैं कि यदि आप मंत्र सिद्धि के लिए आगे बढ़ रहे हैं, तो इसमें एक बात बहुत अनिवार्य है: जागरण करना है, यानी पूरी रात जागना है। कौन जाग रहा है — यह पूरी रात जागकर ही होगा; यदि आप सो गए, तो गया।
वक्ता कहते हैं कि पर इसमें एक बात बहुत अनिवार्य है, यदि आप मंत्र सिद्धि के संबंध में आगे बढ़ रहे हैं। और वह यह है कि जागरण करना है, यानी पूरी रात जागते रहना है। कौन जाग रहा है? यह पूरी रात जागकर ही होगा। यदि आप सो गए, तो गया।
इस रात श्री कुल में सबसे श्रेष्ठ क्या है?
श्री विद्या अर्चन और श्री यंत्र का चक्रार्चन
कौन-सी शक्तियाँ सबसे जल्दी चलती हैं, इस पर आते हुए और काली कुल से पहले श्री कुल को देखते हुए, वक्ता कहते हैं कि श्री विद्या में भगवती और श्री यंत्र का अर्चन सबसे श्रेष्ठ है। चाहे आप भगवती बाला के हों, भगवती की पंचदशी के हों या भगवती की षोडशी के — जिसमें भी आपकी दीक्षा हुई हो — यदि आप दीक्षित हैं और चक्रार्चन की विधि ठीक से जानते हैं।
वक्ता कहते हैं कि अब वे इस पर आते हैं कि कौन-सी शक्तियाँ बहुत जल्दी चलती हैं, यह केवल जानकारी के लिए बताते हुए। तो श्री विद्या से जुड़ी बात में कहा गया है: काली कुल से पहले श्री कुल को देखें, तो उसमें श्री विद्या अर्चन, श्री यंत्र का अर्चन, सबसे श्रेष्ठ है। तो चाहे आप भगवती बाला के हों, या भगवती की पंचदशी के, या भगवती की षोडशी के — जिसमें भी आपकी दीक्षा हुई हो, यदि आप दीक्षित हैं और चक्रार्चन की विधि ठीक से जानते हैं।
चक्रार्चन कहाँ करना चाहिए?
घर, छत, चंद्रमा दिखने वाला एकांत स्थान, या चोटी
वक्ता कहते हैं कि चक्रार्चन घर में, घर की छत पर, किसी ऐसे एकांत क्षेत्र में जहाँ चंद्रदेव का दर्शन हो रहा हो, या पर्वत की चोटी पर कीजिए। कहा गया है कि बहुत-सी शक्तियाँ वहाँ उपस्थित होकर भगवती के उस अर्चन में सहायता करती हैं, उसमें भाग लेती हैं, और सूक्ष्म रूप में आपको दर्शन भी देती हैं।
तो उसमें, यदि आप चक्रार्चन घर में करें, घर की छत पर करें, किसी एकांत क्षेत्र में करें जहाँ चंद्रदेव का दर्शन हो रहा हो, या पर्वत की चोटी आदि पर करें — तो कहा गया है कि बहुत-सी शक्तियाँ वहाँ उपस्थित होकर भगवती के उस अर्चन में सहायता करती हैं और उसमें भाग लेती हैं, और सूक्ष्म रूप में आपको दर्शन भी देती हैं।
श्री विद्या की अंग विद्याओं के अर्चन से भी यही प्रभाव मिलता है
अंग विद्याएँ और उनका अर्चन
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी तरह, उनसे जुड़ी, श्री विद्या से जुड़ी सभी अंग विद्याओं के अर्चन और पूजन का भी यही प्रभाव मिलता है।
वक्ता कहते हैं कि और ठीक इसी तरह, उनकी जितनी भी अंग विद्याएँ हैं, जो श्री विद्या से जुड़ी हैं — उनके अर्चन और पूजन से भी यही प्रभाव मिलता है।
इस रात काली कुल का काम कहाँ किया जाता है?
श्मशान के पास या गंगा किनारे का शिव मंदिर
वक्ता कहते हैं कि जब आप काली कुल से जुड़े काम की ओर जाते हैं, तो शिव जी का मंदिर आता है — श्मशान के पास का शिव मंदिर, गंगा जी के किनारे का शिव मंदिर, या भगवती देवी का मंदिर। इनमें से किसी भी स्थान पर किया जाए, तो उन दिव्यताओं की अनुभूति होती है।
और जब आप काली कुल से जुड़े काम की ओर जाते हैं, जब काली कुल से जुड़ा काम करते हैं, तब शिव जी का मंदिर आता है। श्मशान के पास का शिव जी का मंदिर, गंगा जी के किनारे का शिव मंदिर, या भगवती देवी का मंदिर। इन सभी स्थानों पर किया जाए, तो उन दिव्यताओं की अनुभूति होती है।
रुद्रगण साधना के बारे में क्या कहा गया है?
एक सामान्य मंत्र और एक विशेष मंत्र, दोनों चैनल पर दिए गए
रुद्रगण साधना करने वालों का उदाहरण लेकर — जिन्होंने की है, जो करते हैं, जो मंत्रों का जप करते हैं — वक्ता कहते हैं कि एक सामान्य मंत्र है और एक विशेष मंत्र, और दोनों चैनल पर दिए गए हैं। इनमें किसी भी प्रकार के दोष की उपस्थिति नहीं है कि यह मंत्र करने से कोई दोष पैदा हो।
वक्ता कहते हैं कि अब इसमें और भी बहुत-सी बातें आपकी जानकारी में आएँगी। उदाहरण के लिए, मान लीजिए हम उन लोगों को लें जो रुद्रगण साधना करते हैं — जिन्होंने रुद्रगणों की साधना की है, जो करते हैं, जो मंत्रों का जप करते हैं। एक सामान्य मंत्र है, एक विशेष मंत्र है। दोनों तरह की बात चैनल पर दी गई है। इनमें किसी भी प्रकार के दोष की उपस्थिति नहीं है कि यह मंत्र करोगे तो कोई दोष पैदा होगा।
रुद्रगण मंत्र की उग्रता कैसे देखी जाती है?
ऐसी रात शिव मंदिर के पास जप, और दर्शन के बाद की स्थिति
वक्ता कहते हैं कि यदि उस मंत्र की उग्रता बहुत बड़ी मात्रा में देखने की इच्छा हो — बिल्कुल उग्र रूप में देखने और जानने की — तो ठीक से संकल्प लेकर ऐसी रात शिव जी के मंदिर के पास उन मंत्रों का जप किया जाए, तो रात भर में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में वह दर्शन होने लगता है। पर दर्शन हो जाने के बाद की स्थिति आप कैसे संभालेंगे, यह आपका अपना विषय है।
वक्ता कहते हैं कि पर यदि उस मंत्र की उग्रता बहुत बड़ी मात्रा में देखने की इच्छा हो — कि उसे बिल्कुल उग्र रूप में देखा और जाना जाए — तो उसमें ठीक से संकल्प लेकर, ऐसी रात शिव जी के मंदिर के पास उन मंत्रों का जप किया जाए, तो रात भर में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में वह दर्शन होने लगता है। पर दर्शन हो जाने के बाद की स्थिति, आप उसे फिर कैसे संभालेंगे, यह आपका अपना विषय है।
दर्शन दो सेकंड का भी हो सकता है और पंद्रह मिनट का भी, और हो सकता है पहचाना ही न जाए
दो सेकंड या पंद्रह मिनट — और पहचान होती है या नहीं
वक्ता कहते हैं कि हो सकता है हम जप करें और हमें केवल दो-चार सेकंड का दर्शन हो, वे गायब हो जाएँ, और हम उतने से ही प्रसन्न हो जाएँ — या बहुत विचलित हो जाएँ, और डर भी जाएँ। यह हमारा निजी विषय है। यह भी हो सकता है कि वे दस-पंद्रह मिनट दर्शन दें; हो सकता है आप उन्हें न पहचानें, या पहचान लें। यह सबके लिए अलग हो सकता है।
वक्ता कहते हैं कि पर दर्शन दिए जाने के बाद की अवस्था — आप उसे फिर कैसे संभालेंगे — वह आपकी अपनी है। हो सकता है हम जप करें और हमें केवल दो-चार सेकंड का दर्शन हो, वे गायब हो जाएँ, और हम उतने से ही प्रसन्न हो जाएँ; या हम बहुत ही विचलित हो जाएँ। हम डर भी सकते हैं। यह हमारा निजी विषय है। हो सकता है वे आपको दस-पंद्रह मिनट दर्शन दें। यह भी हो सकता है कि आप उन्हें न पहचानें, या यह भी कि आप उन्हें पहचान लें। यह विषय सबके लिए अलग हो सकता है।
क्या ऐसी शक्ति साधक को कुछ दे सकती है?
शक्ति द्वारा दी गई प्रसादी, और गुरु का पहले से पोषण
वक्ता कहते हैं कि यदि आपका पुण्य बल बहुत अधिक है, तो हो सकता है वे किसी रूप में आकर आपको कुछ देने लगें, कहें कि यह चीज़ लो; वे प्रसादी के रूप में कुछ देने लगें। ऐसी कई अनुभूतियाँ होती हैं। तो यह साधक का निजी विषय बन जाता है — गुरु ने उसका किस तरह पोषण किया है, क्या ज्ञान दिया है, कैसे पहचानना है, क्या जानना है।
वक्ता कहते हैं कि यदि आपका पुण्य बल बहुत अधिक है, तो हो सकता है वे किसी रूप में आपके पास आएँ और आपको कुछ देने भी लगें — कि आप अमुक चीज़ ले लो। वे प्रसादी के रूप में कुछ देने लगें। ऐसी कई अनुभूतियाँ होती हैं। तो यह साधक का निजी विषय बन जाता है। गुरु ने उसका किस तरह पोषण किया है, क्या ज्ञान दिया है, कैसे पहचानना है, क्या जानना है — पूरा विषय यही बन जाता है।
इस रात शक्ति पीठ पर कितना जप किया जाता है?
सौ या दो सौ माला, या बिना गिने पूरी रात
पहचानने का एक छोटा उदाहरण लेते हुए वक्ता अपनी पिछली बात याद दिलाते हैं कि शरद पूर्णिमा की रात सभी दिव्य शक्ति पीठों और ऐसे प्राचीन मंदिरों में शक्तियाँ अवश्य आती हैं। तो यदि हम ऐसे क्षेत्र में जाकर मंत्र जप करें — सौ माला, दो सौ माला, या बिना माला गिने पूरी रात बैठें, रात नौ बजे से या आठ बजे से, और भोर के तीन-चार बजे तक जप करते रहें, पैर दुखें, उठें और फिर बैठ जाएँ।
वक्ता कहते हैं कि अब पहचानना और जानना कैसे है, इसका एक छोटा उदाहरण लीजिए। जब भी देव शक्तियाँ — जैसा अभी हमने चर्चा की कि शरद पूर्णिमा की रात जितने भी दिव्य शक्ति पीठ हैं, ऐसे प्राचीन मंदिरों में, शक्तियाँ अवश्य ही आती हैं। तो यदि हम उस क्षेत्र में जाकर मंत्र जप करें — सौ माला, दो सौ माला — या पूरी रात बैठकर बिना माला गिने करें, कि भाई, पूरी रात करना है: रात नौ बजे बैठ गए, आठ बजे बैठ गए, और भोर के तीन-चार बजे तक जप करते रहना है। ठीक है — पैर दुख रहे हैं, उठते हैं, फिर बैठ जाते हैं, जप करते हैं।
साधक को कैसे पता चलेगा कि कोई शक्ति पास आई है?
गंध से पहचान
वक्ता कहते हैं कि वे अवश्य आएँगी, और आप उनकी नज़र में आ जाएँगे — कि यह जप कर रहा है। पर आप पहचानेंगे कैसे? पहचानने के लिए यह है: यदि वे आकर आपके पास बैठें, तो गंध से। वे कैसी गंध देंगी यह उन पर निर्भर है, पर गंध अवश्य आएगी।
वक्ता कहते हैं कि जब वे आएँगी, तो आप उनकी नज़र में आ ही जाएँगे — अच्छा, ठीक है, यह जप कर रहा है। पर आप पहचानेंगे कैसे? पहचानने के लिए यह है: कि यदि वे आकर आपके पास बैठें, तो यह गंध से होगा। अब वे कैसी गंध देंगी, यह उन पर निर्भर है। पर गंध अवश्य आएगी।
क्या गंध अप्रिय भी हो सकती है?
सुंदर उपस्थिति से दुर्गंध, एक परीक्षा के रूप में
वक्ता कहते हैं कि हो सकता है वे आपको बहुत बुरी तरह की दुर्गंध देने लगें — देखने में वे बहुत सुंदर हैं, बहुत अच्छे लग रहे हैं, पर दुर्गंध भी आ रही है। वे कहते हैं कि यह भी आपकी परीक्षा की बात है।
वक्ता कहते हैं कि गंध अवश्य आएगी। हो सकता है वे आपको बहुत बुरी तरह की दुर्गंध देने लगें। देखने में वे बहुत सुंदर हैं, बहुत अच्छे लग रहे हैं, पर दुर्गंध भी आ रही है। यह भी आपकी परीक्षा की बात है।
यदि कोई बहुत विकृत रूप आकर पास बैठ जाए, तो क्या?
चिढ़, भ्रमित बुद्धि, और गुरु की पहले दी गई समझ
वक्ता कहते हैं कि इस पर आप चिढ़ें या प्रसन्न हों, यह अब आपका अपना अनुभव और आपके गुरु का ज्ञान है। कई बार ऐसा होता है कि बहुत विकृत चेहरों वाली, देखने में असुंदर चीज़ें उसी असुंदरता में आकर बैठ जाएँगी। तब आप चिढ़ जाते हैं — यह यहाँ आकर क्यों बैठ गया। उस समय बुद्धि पहले ही भ्रमित हो चुकी होती है। पर यदि गुरु ने पहले समझाया हो, तो कुछ क्षणों बाद आपके ध्यान में अवश्य आएगा कि यह कोई संबंधित शक्ति हो सकती है।
वक्ता कहते हैं कि फिर आप इस बात पर चिढ़ें या प्रसन्न हों, यह अब आपका अपना अनुभव है, आपके गुरु का ज्ञान है। कई बार ऐसा होता है कि बहुत विकृत चेहरों वाली चीज़ें, देखने में असुंदर चीज़ें, उसी असुंदरता में आकर बैठ जाएँगी। अब आप चिढ़ जाते हैं — अरे, यह यहाँ आकर क्यों बैठ गया। उस समय बुद्धि पहले ही भ्रमित हो चुकी होती है। पर यदि गुरु ने पहले से समझाया हो, तो कुछ क्षणों बाद आपके ध्यान में अवश्य आएगा कि अच्छा, यह कोई संबंधित शक्ति हो सकती है।
ऐसी उपस्थिति का संदेह होते ही क्या करना चाहिए?
उन्हें देखते हुए जप जारी रखना
वक्ता कहते हैं कि फिर मंत्र जप करते हुए उन्हें देखिए, देखते रहिए, और वे आपको अवश्य अनुभव करा देंगी कि हाँ, ऐसा ही है।
वक्ता कहते हैं कि फिर मंत्र जप करते हुए उन्हें देखिए; देखिए, देखिए। और वे आपको अवश्य अनुभव करा देंगी — कि हाँ, ठीक है।
आम तौर पर किस श्रेणी की शक्ति साधक के साथ घर आती है?
दिव्य नहीं, उपदेव श्रेणी की शक्तियाँ
वक्ता कहते हैं कि बहुत-से लोग ऐसे हैं जो इस तरह के क्षेत्र में जाकर साधना करते हैं और पाते हैं कि शक्तियाँ उनके साथ आती हैं — पर अधिक से अधिक ये उपदेव श्रेणी की शक्तियाँ होती हैं। दिव्य शक्तियाँ उस हद तक कभी साथ नहीं आएँगी। यदि किसी में वैसी क्षमता हो तो बात अलग होगी, लोकाचार के विषय से ऊपर, और ऐसा साधक दिव्य श्रेणी में होगा। पर जो शक्तियाँ घर आती हैं, वे अधिकतर यही होती हैं।
वक्ता कहते हैं कि बहुत-से लोग ऐसे हैं जो इस तरह के क्षेत्र में जाकर साधना करते हैं और पाते हैं कि शक्तियाँ उनके साथ आती हैं — पर अधिक से अधिक ये उपदेवता श्रेणी की शक्तियाँ होती हैं। इसमें दिव्य शक्तियाँ उस हद तक कभी साथ नहीं आएँगी। यदि उस तरह की क्षमता हो, तो बात बिल्कुल अलग होगी; वह लोकाचार के विषय से ऊपर की बात है। तब आप दिव्य श्रेणी में आते हैं, यदि आप उस तरह के साधक हैं। पर जो शक्तियाँ घर आती हैं, वे अधिकतर यही होती हैं।
इस तरह की साधना में बंधन का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता?
दिशा बंधन और आसन बंधन से दर्शन का रुकना
वक्ता कहते हैं कि कारण यह है कि इस काल में आप जो भी साधना करें, उसमें कोई बंधन प्रयोग नहीं करेंगे। यदि बंधन लगाकर करेंगे, तो वह दर्शन आपको होगा ही नहीं — यह भी जानिए। यदि आप दिशा बंधन करके, आसन बंधन करके बैठे रुद्रगण साधना कर रहे हैं ताकि कोई नकारात्मक शक्ति न आए, तो आप अपनी जगह सही हैं, गलत नहीं — पर तब कुछ दिखेगा नहीं, और अनुभव की बात हट जाती है।
वक्ता कहते हैं कि कारण क्या है: कि इस काल में आप जो भी साधना करें, उसमें कोई बंधन प्रयोग नहीं करेंगे। यदि बंधन लगाकर करेंगे, तो वह दर्शन आपको होगा ही नहीं। यह भी जानिए। अब आप दिशा बंधन करके बैठे, आसन बंधन करके बैठे रुद्रगण साधना कर रहे हैं, ताकि कोई नकारात्मक शक्ति न आए। आप अपनी जगह सही हैं, आप गलत नहीं हैं — पर तब कुछ दिखेगा नहीं। तब अनुभव की बात हटा दीजिए।
इसके लिए साक्षात गुरु क्यों आवश्यक है?
बिना बंधन बैठना, और मनोबल की दृढ़ता
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण साक्षात गुरु आवश्यक हो जाते हैं — ताकि गुरु आपको समझाएँ कि आसन पर बैठे हों तो हमारे पास वह कला हो कि बिना बंधन बैठने पर भी कोई नकारात्मक ऊर्जा हमारा कुछ बिगाड़ न सके। वह डरा सकती है, भयभीत कर सकती है, भ्रम पैदा कर सकती है, पर हानि नहीं पहुँचा सकती। अब आपका मनोबल इतना दृढ़ हो कि वे डराने का प्रयास करें तो आप पर कोई फ़र्क न पड़े।
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण इसमें साक्षात गुरु का होना आवश्यक हो जाता है — कि गुरु आपको समझाएँ और बताएँ: हाँ भाई, देखो, यदि हम आसन पर बैठे हैं, तो हमारे पास वह कला होनी चाहिए कि बिना बंधन बैठने पर भी कोई नकारात्मक ऊर्जा हमारा कुछ न बिगाड़ सके। वह डरा सकती है, भयभीत कर सकती है, भ्रम पैदा कर सकती है — पर हानि नहीं पहुँचा सकती। अब आपका मनोबल इतना दृढ़ हो कि यदि वे आपको डराने का प्रयास करें, तो आप पर कोई फ़र्क न पड़े। वे जो करें, करें, पर आप पर कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए। और यह होगा कैसे? यह आपके गुरु की कृपा से संभव है।
केवल प्रेरणा के बल पर ऐसी साधना में उतरना ठीक नहीं; अपने अनुभव वाले प्रत्यक्ष गुरु चाहिए
केवल सुनकर ऐसी साधना में उतरना
वक्ता कहते हैं कि यह अपने-आप पूरी तरह संभव नहीं है; यहाँ प्रत्यक्ष गुरु की आवश्यकता आती है, जिनका अपना अनुभव हो कि ऐसा हो सकता है। यदि आप केवल सुनकर और प्रेरित होकर सीधे इस तरह की साधना में उतर जाएँ, तो वहाँ बहुत कुछ हो सकता है — आदमी विक्षिप्त भी हो सकता है। इसलिए इसे केवल जानकारी के रूप में रखिए, और जब योग्य गुरु मिलें, तब इस तरह की साधना का प्रयास कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि यह अपने-आप पूरी तरह संभव नहीं है। तो यहाँ प्रत्यक्ष गुरु की आवश्यकता आती है — जिनका अपना अनुभव हो कि ऐसा हो सकता है। अब यदि केवल सुनकर और प्रेरित होकर आप सीधे इस तरह की साधना करने उतर जाएँ, तो वहाँ बहुत-सी बातें हो सकती हैं; आदमी विक्षिप्त भी हो सकता है। इसलिए इसे केवल जानकारी के रूप में रखिए, और जब योग्य गुरु मिलें, तब इस तरह की साधना करने का प्रयास कीजिए।
तो इस रात गृहस्थ को घर पर क्या करना चाहिए?
घर पर लक्ष्मी साधना — माला मंत्र, धनदा कवच, जप या हवन
वक्ता कहते हैं कि बाकी, क्योंकि घर में बात श्री तत्व से जुड़ी है, भगवती लक्ष्मी से जुड़ी साधना अवश्य कीजिए। चाहे उनका माला मंत्र करें, धनदा लक्ष्मी का कवच करें, धनदा लक्ष्मी का जप करें, या हवन आदि करें। पूर्णिमा के दिन, और विशेषकर शरद पूर्णिमा पर, पौष्टिक सामग्री से किया गया हवन बहुत उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि बाकी, क्योंकि घर में बात श्री तत्व से जुड़ी है, भगवती लक्ष्मी से जुड़ी साधना आदि अवश्य कीजिए। चाहे उनका माला मंत्र करें, धनदा लक्ष्मी का कवच करें, धनदा लक्ष्मी का जप करें, या हवन आदि करें। पूर्णिमा के दिन, और विशेषकर शरद पूर्णिमा पर, पौष्टिक सामग्री से किया गया हवन बहुत उत्तम है।
रात की पूर्णिमा का पूजन एक रात पड़ता है और सुबह की पूजा उसके अगले दिन
रात की पूर्णिमा कल, सुबह की पूजा परसों
वक्ता कहते हैं कि जो लोग व्रत के साथ पूजन करना चाहते हैं, रात की पूजा करना चाहते हैं, या रात की पूजा के बाद प्रसाद लेना चाहते हैं, वे कल ही करेंगे, क्योंकि रात की पूर्णिमा कल ही मिलेगी। जिन्हें सुबह की पूजा करनी है — भगवान सत्यनारायण की पूजा, दिन में सहस्रार्चन आदि, सुबह हवन — वे परसों कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि अब जो लोग व्रत के साथ पूजन करना चाहते हैं, रात की पूजा करना चाहते हैं, या रात की पूजा के बाद प्रसाद आदि खाना चाहते हैं या दूसरी चीज़ें ग्रहण करना चाहते हैं — वे कल ही करेंगे। क्योंकि रात की पूर्णिमा कल ही मिलेगी। बाकी, जिन्हें सुबह की पूजा करनी है, भगवान सत्यनारायण की पूजा, दिन में सहस्रार्चन आदि, सुबह के समय हवन आदि — वे परसों कर सकते हैं। आप इस बात को इस तरह आगे बढ़ा सकते हैं।
घर में पहले से स्थापित लक्ष्मी यंत्रों और विग्रहों का क्या?
कामाख्या की गुप्त लक्ष्मी, जो साल में एक बार निकलती हैं
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ एक और बात आती है: आपके घर में भगवती लक्ष्मी से जुड़े किसी भी प्रकार के यंत्र की पहले से स्थापना, कलश की स्थापना, श्री विग्रह की स्थापना — ज़रूरी नहीं कि आपने गृहस्थ तंत्र के माध्यम से स्वयं की हो, आपके माता-पिता ने पहले से रखा हो। वे उदाहरण देते हैं कि कामाख्या क्षेत्र में गुप्त लक्ष्मी की पूजा करने वाले लोग हैं: दीपावली की रात, लक्ष्मी जी पूरे साल में केवल एक बार बाहर आती हैं।
वक्ता कहते हैं कि अब इसके साथ एक और बात आती है: आपके अपने घर में पहले से भगवती लक्ष्मी से जुड़े किसी भी प्रकार के यंत्र की स्थापना, कलश आदि की स्थापना, श्री विग्रह की स्थापना — केवल ऐसी नहीं जो आपने स्वयं गृहस्थ तंत्र के माध्यम से की हो; आपके माता-पिता ने पहले से रखी हो। जैसे कामाख्या क्षेत्र में गुप्त लक्ष्मी की पूजा करने वाले लोग — यह दीपावली की रात होता है; लक्ष्मी जी पूरे साल में केवल एक बार बाहर आती हैं।
क्या अष्ट लक्ष्मी के अलावा भी लक्ष्मी के रूप हैं?
क्षेत्रीय लक्ष्मियाँ, और इस रात विग्रह का अभिषेक
वक्ता कहते हैं कि इसी तरह अन्य क्षेत्रों में अन्य प्रकार की लक्ष्मियों का पूजन भी होता है; अष्ट लक्ष्मी के अलावा अन्य लक्ष्मियों के रूप भी हैं, और उनका पूजन क्षेत्र के अनुसार होता है। क्योंकि यह श्री तत्व से जुड़ी रात है, इस रात लक्ष्मी जी का विग्रह — चाँदी का, सोने का, या जो भी आपने रखा हो, गुटका आदि — रात या संध्या को पूजन स्थान पर बिठाना चाहिए, और उनका अभिषेक अवश्य करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि इसी तरह अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार की लक्ष्मियों का पूजन भी होता है। अष्ट लक्ष्मी के अलावा अन्य लक्ष्मियों के रूप भी हैं। उनका पूजन भी क्षेत्र के अनुसार होता है। तो क्योंकि यह श्री तत्व से जुड़ी रात है, इस रात लक्ष्मी जी का विग्रह — चाँदी का, सोने का, या जो भी आपने रखा हो, यदि गुटका आदि रखा हो — रात को या संध्या के समय बिठाकर उपस्थित करना चाहिए, और पूजन स्थान पर उनका अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। अवश्य करना चाहिए।
श्री सूक्त का पाठ करें या महालक्ष्मी अष्टकम का?
यज्ञोपवीत ही विभाजन रेखा
वक्ता कहते हैं कि यदि आप यज्ञोपवीत धारण करते हैं, तो श्री सूक्त आदि का पाठ कीजिए; और यदि नहीं, तो महालक्ष्मी अष्टकम — इंद्र-कृत महालक्ष्मी अष्टक, जिसका माहात्म्य वे अद्भुत बताते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करते हैं, तो श्री सूक्त आदि का पाठ करके — और यदि नहीं, तो महालक्ष्मी अष्टकम्। इंद्र-कृत महालक्ष्मी अष्टक का माहात्म्य अद्भुत है।
इंद्र-कृत महालक्ष्मी अष्टक किसके लिए बताया गया है?
जिनकी लक्ष्मी छिन गई हो, उनके लिए इंद्र की स्तुति
वक्ता बताते हैं कि कहा गया है कि जिनका धन-संपत्ति हर ली गई हो, जिनकी लक्ष्मी छीन ली गई हो, जिन्हें लक्ष्मी जी छोड़कर चली गई हों, उनके लिए भगवान इंद्र ने अष्टक के रूप में यह स्तुति की थी। वे इसे इस तरह उद्धृत करते हैं: "नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते। शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥"। ये आठ श्लोक हैं; यह एक श्लोक था, और यदि इन आठ से भगवती की स्तुति की जाए, तो ये श्लोक दिव्यता से भरे हैं।
वक्ता बताते हैं कि यदि कहा गया है कि जिसका धन-संपत्ति हर ली गई हो, जिसकी लक्ष्मी छीन ली गई हो — जिसे लक्ष्मी जी छोड़कर चली गई हों — उनके लिए भगवान इंद्र द्वारा अष्टक के रूप में की गई स्तुति है: "नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते। शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥"। ये जो आठ श्लोक हैं — वह एक श्लोक था; आठ श्लोक हैं — यदि इन आठ श्लोकों से भगवती की स्तुति की जाए, तो ये श्लोक दिव्यता से भरपूर हैं।
अष्टक की कितनी आवृत्तियाँ बताई गई हैं?
एक सौ आठ आवृत्तियाँ, फलश्रुति छोड़कर
वक्ता कहते हैं कि भगवती अतुलनीय कृपा करती हैं; आपको बहुत कुछ करने की ज़रूरत नहीं। आठ श्लोकों की एक सौ आठ आवृत्तियाँ कीजिए। अंत में दो-चार श्लोक होंगे — वास्तव में केवल दो — जो फलश्रुति हैं; उन्हें छोड़ दीजिए। मूल अष्टक के आठ श्लोकों का एक सौ आठ बार पाठ कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि भगवती अतुलनीय कृपा करती हैं। आपको बहुत कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। आठ श्लोकों की एक सौ आठ आवृत्तियाँ कीजिए। अंत में चार या दो श्लोक होंगे — वास्तव में केवल दो ही होंगे — जो आपकी फलश्रुति हैं; उन्हें छोड़ दीजिए। मूल अष्टक, जो आठ श्लोक हैं, उनका एक सौ आठ बार पाठ कीजिए।
अधिक दिव्य रूप में एक सौ आठ कमल, गुलाब, सफ़ेद फूल या बिल्व पत्र चढ़ाए जाते हैं
एक सौ आठ कमल, गुलाब, सफ़ेद फूल या बिल्व पत्र
वक्ता कहते हैं कि यदि आप इसे बहुत दिव्य ढंग से करना चाहें, तो घर में स्थापित भगवती लक्ष्मी के श्री विग्रहों को लेकर उनका स्नान, अभिषेक और शृंगार कीजिए, और फिर — सामर्थ्य हो तो — एक सौ आठ कमल के फूलों से अर्पण कीजिए; वह न हो तो एक सौ आठ गुलाब; वह भी न हो तो एक सौ आठ सफ़ेद फूल; और वह भी न हो तो एक सौ आठ बिल्व पत्र, भगवती के एक सौ आठ पाठ करते हुए हर पाठ के साथ अर्पण कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप इसे बहुत दिव्य ढंग से करना चाहें, तो भगवती लक्ष्मी से जुड़े जो भी श्री विग्रह आपने घर में स्थापित करके रखे हैं — उनका स्नान, अभिषेक और शृंगार आदि कीजिए। और फिर, यदि सामर्थ्य हो, तो एक सौ आठ कमल के फूलों से अर्पण कीजिए; उसका सामर्थ्य न हो, तो एक सौ आठ गुलाबों से; उसका भी सामर्थ्य न हो, तो एक सौ आठ सफ़ेद फूलों से। और उसका भी सामर्थ्य न हो, तो एक सौ आठ बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। पत्र आदि से — भगवती के एक सौ आठ पाठ करते हुए उन्हें अर्पित कीजिए।
एक सौ आठ पाठों के दौरान हर अर्पण कैसे किया जाता है?
हाथ में एक फूल, एक पाठ, एक अर्पण
वक्ता कहते हैं कि हाथ में एक कमल का फूल लीजिए, और फिर महालक्ष्मी अष्टक का एक पाठ करके उसे उन्हें अर्पित कीजिए; या बिल्व पत्र लेकर अर्पित कीजिए, या कमल के फूल से कीजिए, या गुलाब की पंखुड़ी लेकर अर्पित कीजिए, या गुलाब चढ़ाइए। इस तरह एक सौ आठ पाठ कीजिए — भगवती विशेष कृपा करती हैं।
वक्ता कहते हैं कि हाथ में एक कमल का फूल लीजिए, और उसके बाद महालक्ष्मी अष्टक का एक पाठ करके उसे उन्हें अर्पित कीजिए। या बिल्व पत्र लेकर अर्पित कीजिए, या कमल का फूल लेकर कीजिए, या गुलाब की पंखुड़ी लेकर अर्पित कीजिए, या गुलाब चढ़ाइए। इस तरह करते हुए एक सौ आठ पाठ कीजिए। भगवती विशेष कृपा करती हैं।
यह पाठ किस समय करना चाहिए?
चंद्रोदय के बाद, कम से कम आठ-नौ बजे के बाद
वक्ता कहते हैं कि यह काम चंद्रमा के उदय के बाद करना है — चंद्रोदय शाम को ही हो रहा है, फिर भी कम से कम आठ-नौ बजे के बाद कीजिए। यदि आधी रात को करने की इच्छा हो, तो तब कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि यह काम आपको चंद्रमा के उदय के बाद करना है। यद्यपि चंद्रोदय शाम के समय ही हो रहा है, फिर भी कम से कम आठ-नौ बजे के बाद कीजिए। यदि आधी रात को करने की इच्छा हो, तो तब कीजिए।
क्या रात में पूजा करने में खतरा है?
महानिशा पर भूत-प्रेत का डर, और उसका उत्तर
वक्ता उस डर की बात करते हैं जो लोग मन में बिठाए रखते हैं — कि रात में पूजा करेंगे तो कोई भूत-प्रेत पूजा ले लेगा। वे कहते हैं कि यह दिव्य रात है; ये महानिशा हैं, और इन सभी महारात्रियों में पूजन करने पर किसी भूत-प्रेत में आपकी पूजा लेने की क्षमता नहीं है। निजी बात अलग है — यदि आपके घर में पहले से कोई भूत बैठा है और आप वहाँ जो पूजा करते हैं वह ले रहा है, तो वह दूसरी बात है। पर इन दिव्य रातों में पूजन करने में कोई दोष नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि यह एक और डर आप मन में बिठाए रखते हैं: कि भाई, रात में पूजा करेंगे तो भूत-प्रेत पूजा ले लेगा। महोदय, यह दिव्य रात है। ये महानिशा हैं। इन सबमें, महारात्रि में पूजन करने पर किसी भूत-प्रेत में आपकी पूजा लेने की क्षमता नहीं है। निजी बात अलग है — कि आपके घर में पहले से भूत बैठा है और आप घर में पूजा कर रहे हैं और भूत ले रहा है; वह बात अलग है। पर यह डर जो आप मन में बिठाए रखते हैं कि नहीं, रात की पूजा नहीं करनी — भाई, इन दिव्य रातों में पूजन करने में कोई दोष नहीं है।
रात की पूजा के सामान्य होने का वे क्या उदाहरण देते हैं?
बंगाल की लखी पूजा और दीपावली की रात की लक्ष्मी पूजा
वक्ता कहते हैं कि महत्व तो रात की पूजा का ही है। बंगाल क्षेत्र में कल की लखी पूजा — वहाँ लक्ष्मी जी अपभ्रंश होकर लखी कहलाती हैं — रात की ही पूजा होगी, घर-घर में; अधिकतम लोग करते हैं, सौ में से अट्ठानवे घरों में, शायद दो की कोई अपनी मजबूरी हो। बाकी क्षेत्रों में लक्ष्मी पूजा दीपावली की रात, सुलोस बेला में होती है।
वक्ता कहते हैं कि महत्व तो रात की पूजा का ही है न। बंगाल क्षेत्र में कल जो लखी पूजा होगी — लक्ष्मी जी अपभ्रंश होकर वहाँ लखी कहलाती हैं — वह जो लखी पूजा होने वाली है, वह रात की ही पूजा होगी। उसमें घर-घर में पूजा होगी। अधिकतम लोग करते हैं: सौ में से अट्ठानवे के घरों में होती है; दो लोगों की कोई अपनी मजबूरी हो सकती है कि न करें। नहीं तो घर-घर में — जबकि बाकी क्षेत्रों में लक्ष्मी पूजा कब होगी? दीपावली की रात, सुलोस बेला में।
कोजागरी ठीक कब है और काली पूजा कब?
कोजागरी कल रात, काली पूजा दीपावली की रात
वक्ता कहते हैं कि उस समय ये लोग काली पूजा करेंगे, और पूरे बंगाल क्षेत्र में कल जो कोजागरी होगी, लखी पूजा, वह रात में ही होगी। कल ही होगी; परसों नहीं होने वाली, क्योंकि परसों रात में पूर्णिमा नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि तो उस समय ये लोग काली पूजा करेंगे। और बाकी, पूरे बंगाल क्षेत्र में कल जो कोजागरी होगी, जो लखी पूजा होगी, वह रात में ही होगी। कल ही होगी। परसों नहीं होने वाली — परसों रात में पूर्णिमा नहीं है।
क्या रात की पूजा के लिए व्रत रखना अनिवार्य है?
खाना-पीना ठीक, पर पूजन से पहले स्नान
वक्ता कहते हैं कि आपको भी कल ही और रात में ही करना है। अब यदि आप इसमें व्रत नहीं रख सकते, तो कोई कठिनाई नहीं — जाइए, खाइए। शाम को स्नान कीजिए; पूजन से पहले स्नान आदि करके शुद्ध और पवित्र हो जाइए।
वक्ता कहते हैं कि तो आपको भी जो करना है, कल ही करना है। परसों नहीं करना है, और रात में ही कीजिए। अब इसमें आप व्रत नहीं रख सकते — कोई कठिनाई नहीं; जाइए, खाइए। शाम के समय स्नान कीजिए। पूजन करने से पहले स्नान आदि कीजिए, शुद्ध हो जाइए, पवित्र हो जाइए।
बैठने से पहले स्वयं को पवित्र करने के लिए कौन-सा श्लोक प्रयोग होता है?
पुंडरीकाक्ष श्लोक और जल छिड़कना
वक्ता श्लोक इस तरह देते हैं: "ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥"। वे समझाते हैं कि इससे हम भगवान पुंडरीकाक्ष का स्मरण करते हैं, जिनके केवल स्मरण से हम भीतर और बाहर दोनों ओर से शुद्धि पाएँ और अशुद्धि दूर हो। उन पुंडरीकाक्ष, उन भगवान नारायण के नाम में श्रद्धा रखिए; उस मंत्र का माहात्म्य समझिए; उसे पढ़कर जल छिड़किए, और फिर बैठकर कीजिए।
वक्ता जो श्लोक देते हैं वह है: "ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥"। वे समझाते हैं कि हम भगवान पुंडरीकाक्ष का स्मरण करते हैं, जिनके केवल स्मरण से हम भीतर और बाहर दोनों तरह से शुद्धि पाएँ और अशुद्धि दूर हो। तो उन पुंडरीकाक्ष के नाम में, उन भगवान नारायण के नाम में श्रद्धा रखिए; उस मंत्र का माहात्म्य समझिए; वह मंत्र पढ़कर जल छिड़किए, और फिर बैठकर कीजिए। यहाँ भाव की प्रधानता लाइए — पर करिए अवश्य, छोड़िए मत।
महालक्ष्मी अष्टक कहाँ मिल सकता है?
पाठ के लिए चैनल और इंटरनेट पर खोजना
वक्ता कहते हैं कि अष्टक अवश्य कीजिए, अष्टक मत छोड़िए; यह सर्वत्र उपलब्ध है और इसकी संस्कृत बहुत आसान है। चैनल पर खोजिए — YouTube पर "इंद्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र" और "महालक्ष्मी अष्टकम गृहस्थ तंत्र" इस तरह लिखकर खोजिए, आ जाएगा; इसकी PDF भी मिल जाएगी, या इंटरनेट पर कहीं से भी डाउनलोड कर लीजिए। इसके एक सौ आठ पाठ अवश्य कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि और यदि आप कुछ विशेष करना चाहते हैं, तो महालक्ष्मी अष्टक के साथ — अष्टक अवश्य कीजिए। अष्टक मत छोड़िए। यह सर्वत्र उपलब्ध है और इसकी संस्कृत बहुत आसान है। इसे खोजिए। चैनल पर भी दिया गया है — चैनल पर भी खोजिए: YouTube पर "इंद्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र" और "महालक्ष्मी अष्टकम गृहस्थ तंत्र" लिखकर खोजिए, आ जाएगा; इसकी PDF भी मिल जाएगी। या इंटरनेट पर कहीं से भी डाउनलोड कर लीजिए। इसके एक सौ आठ पाठ अवश्य कीजिए।
पूरा परिवार मिलकर यह पूजन कैसे करे?
स्नान, शुभ वस्त्र, चौकी और सहस्रनाम अर्चन
वक्ता कहते हैं कि यदि आपका पूरा परिवार मिलकर, कल शाम या रात को, सब स्नान करके शुभ वस्त्र पहनें — लाल, सफ़ेद या पीला, सब पहनें — तो भगवती लक्ष्मी का श्री विग्रह चौकी पर स्थापित कीजिए और सहस्रनाम से उनका अर्चन कीजिए।
यदि आपका परिवार, पूरा परिवार मिलकर, कल शाम के समय या रात के समय सब स्नान आदि करके शुभ वस्त्र पहनें — लाल, सफ़ेद या पीला वस्त्र, सब पहनें — तो भगवती लक्ष्मी का श्री विग्रह चौकी पर स्थापित कीजिए, और सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। से उनकी अर्चना कीजिए।
परिवार को कैसे बैठना चाहिए, और विग्रह को स्नान कैसे कराया जाता है?
किसी का मुख दक्षिण की ओर नहीं, और अष्टक पढ़ते हुए स्नान
वक्ता कहते हैं कि मान लीजिए परिवार में पाँच लोग हैं — पाँचों आराम से बैठ सकते हैं; बस इतना ध्यान रखना है कि किसी का मुख दक्षिण दिशा की ओर न हो। पहले भगवती को स्नान कराइए और उनका शृंगार कीजिए। यदि मंत्र नहीं आते तो कोई कठिनाई नहीं: महालक्ष्मी अष्टक पढ़ते हुए उन्हें स्नान कराइए।
वक्ता कहते हैं कि अब उदाहरण के लिए मान लीजिए परिवार में पाँच व्यक्ति हैं; पाँचों आराम से बैठ सकते हैं। बस इतना ध्यान रखना है कि किसी का मुख दक्षिण दिशा की ओर न हो। पहले आपने भगवती को स्नान कराया और उनका शृंगार किया। यदि मंत्र नहीं आता, तो कोई कठिनाई नहीं — महालक्ष्मी अष्टक पढ़ते हुए उन्हें स्नान कराइए।
उपस्थित लोगों में अर्चन कैसे बाँटा जाता है?
पाँच द्रव्य, पाँच पुस्तकें या एक पाठ करने वाला
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद उन्हें ऊँचे सिंहासन पर बिठाकर वस्त्र पहनाइए। अब पाँच व्यक्ति हैं, तो पाँच अलग-अलग द्रव्यों से उनका अर्चन कीजिए: सहस्र अर्चन के लिए पाँच पुस्तकें लाइए, या पाँच जगह PDF के प्रिंटआउट निकालिए — या केवल एक निकालिए, एक व्यक्ति पढ़े और बाकी अर्चन करें।
वक्ता कहते हैं कि और उसके बाद उन्हें ऊँचे सिंहासन पर बिठाइए, और उन्हें वस्त्र आदि पहनाइए। अब पाँच व्यक्ति हैं, तो पाँच अलग-अलग द्रव्यों से उनका अर्चन कीजिए। सहस्र अर्चन के लिए पाँच पुस्तकें लाइए, या पाँच जगह PDF के प्रिंटआउट निकालिए; या केवल एक निकालिए, एक व्यक्ति पढ़े और बाकी अर्चन करें।
अर्चन के लिए कौन-से पाँच द्रव्य प्रयोग होते हैं?
गुलाब की पंखुड़ियाँ, मेवा, कुमकुम, हल्दी, कमल की पंखुड़ियाँ या बिल्व
वक्ता कहते हैं कि एक व्यक्ति गुलाब की पंखुड़ियाँ इकट्ठी करे — चाहे गुलाबों पर आपकी जेब से पाँच सौ रुपये चले जाएँ। दूसरा किसी तरह के मेवे से उनका अर्चन करे, एक कुमकुम से, एक व्यक्ति हल्दी से, और एक व्यक्ति कमल की पंखुड़ियों से, कमल के फूलों से, या बिल्व से।
वक्ता कहते हैं कि तो एक व्यक्ति गुलाब की पंखुड़ियाँ निकाले। यदि गुलाबों पर बहुत पैसा जाता है, तो हो सकता है आपकी जेब से पाँच सौ रुपये चले जाएँ। पाँच सौ रुपये के गुलाब आप अपने प्रियजन को तो दे ही सकते हैं — एक बार लक्ष्मी जी को देकर देखिए: जीवन भर भगवती आपके कुल में स्थापित रहेंगी और कृपा करेंगी; आपका पूरा जीवन सँवर जाएगा। तो गुलाब की पंखुड़ियाँ इकट्ठी कीजिए। एक व्यक्ति किसी तरह के मेवे से उनका अर्चन करे; एक कुमकुम से करे; एक व्यक्ति हल्दी से करे; एक व्यक्ति कमल की पंखुड़ियों से, कमल के फूलों से, या बिल्व से करे।
सहस्रनाम अर्चन वास्तव में कैसे पढ़ा जाता है?
एक पढ़ने वाला, सब मिलकर नमः कहते और अर्पण करते
वक्ता कहते हैं कि अब एक व्यक्ति पाठ कर रहा है — "श्री महालक्ष्मी" — और सब मिलकर "नमः" बोलेंगे और जिसने जो द्रव्य लेकर बैठा है, उससे उनका अर्चन करेंगे। "श्री विष्णुप्रियायै नमः" — सब मिलकर "नमः" बोलते हैं और फिर अर्पण करते हैं। इस तरह भगवती का अर्चन कीजिए। भगवती लक्ष्मी जी का सहस्र अर्चन करें तो यह दिव्य हो जाता है, क्योंकि भगवती को अर्चन प्रिय है; जगदंबा के सभी रूपों को अर्चन बहुत प्रिय है।
वक्ता कहते हैं कि अब एक व्यक्ति पाठ कर रहा है — "श्री महालक्ष्मी" — और सब मिलकर "नमः" बोलेंगे, और जिसने जो द्रव्य लेकर बैठा है, उससे उनका अर्चन करेंगे। "श्री विष्णुप्रियायै नमः" — सब मिलकर बोलते हैं और फिर अर्पण करते हैं। इस तरह भगवती का अर्चन कीजिए। यदि आप भगवती लक्ष्मी जी का सहस्र अर्चन करें तो यह दिव्य हो जाएगा, क्योंकि भगवती को अर्चन प्रिय है; जगदंबा के जितने भी रूप हैं, सबको अर्चन बहुत प्रिय है।
यदि अर्चन से पहले भोजन कर लिया हो, तो क्या?
स्नान, धुला आसन, संकल्प और गुरु-गणपति का स्मरण
वक्ता कहते हैं कि यदि आप कल रात अर्चन करें और खा-पी लिया हो — वे फिर कहते हैं, कोई कठिनाई नहीं। खा-पी लिया था; स्नान आदि कीजिए, शुभ वस्त्र पहनिए, आसन धुला हो और सब ठीक-ठाक हो; अब संकल्प कीजिए और इस तरह अर्चन कीजिए, गुरु और गणपति का स्मरण करके, फिर साहित्य अर्चन कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि तो यदि कल रात आप अर्चन करें — आपने खा-पी लिया था; वे फिर कहते हैं, कोई कठिनाई नहीं। आपने खा-पी लिया था। स्नान आदि कीजिए, शुभ वस्त्र पहनिए, आसन धुला हो, सब कुछ बढ़िया हो। अब संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। कीजिए, और इस तरह अर्चन कीजिए: गुरु और गणपति का स्मरण करके, फिर साहित्य अर्चन कीजिए।
पाँच लोगों में एक सौ आठ पाठ कैसे बाँटे जाते हैं?
हर एक के बीस, और बाकी आठ
वक्ता कहते हैं कि अब महालक्ष्मी अष्टक के एक सौ आठ पाठ करने हैं, और आप पाँच व्यक्ति हैं — तो एक सौ आठ को पाँच से बाँटिए। हर एक बीस बार पढ़े तो सौ हो जाते हैं; फिर बाकी आठ के लिए हर एक एक बार और पढ़े, या कोई तीन बार पढ़े, कोई अधिक — और एक सौ आठ पाठ पूरे हो जाते हैं। पाठ कम करना पड़ा और समय कम लगा, पर जब पाठ सामूहिक होता है, तो उसकी क्षमता बढ़ जाती है।
वक्ता कहते हैं कि अब महालक्ष्मी अष्टक के एक सौ आठ पाठ करने हैं। आप पाँच व्यक्ति हैं, तो एक सौ आठ को पाँच से बाँटिए। हर एक बीस पाठ करे तो सौ हो जाएँगे; फिर आठ बार और, हर एक एक पाठ और करे, कोई तीन पाठ करे, कोई अधिक पाठ करे — और एक सौ आठ पाठ हो गए। पाठ कम करना पड़ा और समय कम लगा; पर जब पाठ सामूहिक होता है, तो उसकी क्षमता बढ़ जाती है।
अर्चन के बाद मुख्य चीज़ क्या आती है?
दीपदान, जिसे किसी भी दिव्य तिथि पर छोड़ना नहीं है
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद सबसे प्रमुख विषय आता है — दीपदान। दीपदान छोड़ना नहीं है। किसी भी स्थिति में हमेशा याद रखिए कि जीवन में कोई भी दिव्य तिथि आए, तो दीपदान अवश्य करना है, चाहे प्रदोष काल में करें या निशा काल में। तो शरद पूर्णिमा की रात भी दीपदान अवश्य हो।
कितने दीपक जलाने चाहिए, और किससे?
गाय के घी के सोलह दीपक, या काले तिल के तेल के
कितना दीपदान करना है — वक्ता कहते हैं कि सोलह की संख्या भगवती को बहुत प्रिय है: षोडशोपचार उन्हीं का है, और सोलह कलाएँ भगवती को बहुत प्रिय हैं। तो कल, पूर्णिमा की रात, कम से कम सोलह दीपक गाय के घी के जलाइए; और गाय का घी संभव न हो, तो तिल के तेल का — जिसे मीठा तेल कहते हैं, काले तिल का। इन्हें अपने पूजन स्थान पर भगवती लक्ष्मी जी के नाम से अवश्य जलाइए और उन्हें अर्पित कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि तो कितना दीपदान करना है — सोलह की संख्या भगवती को बहुत प्रिय है। षोडशोपचार भगवती का है; सोलह कलाएँ भगवती को बहुत प्रिय हैं। तो कल के समय, पूर्णिमा की रात, कम से कम सोलह दीपक गौ घृत के जलाइए; और गाय का घी संभव न हो, तो तिल के तेल का दीपक — जिसे मीठा तेल कहते हैं, काले तिल का। इन्हें अपने पूजन स्थान पर, भगवती लक्ष्मी जी के नाम से, अवश्य जलाइए और उन्हें अर्पित कीजिए।
दीपदान के समय कौन-सा संकल्प किया जाता है?
कि भगवती प्रसन्न होकर कुल में वास करें
वक्ता कहते हैं कि दीपदान में संकल्प कीजिए: "हे भगवती, सदा प्रसन्न होकर मेरे कुल में वास कीजिए"। संभव हो तो सोलह दीपक जलाकर फिर रात के समय उनका साहित्य अर्चन कीजिए — यह बहुत दिव्य है।
वक्ता कहते हैं कि दीपदान में संकल्प कीजिए कि: हे भगवती, सदा प्रसन्न होकर मेरे कुल में वास कीजिए। संभव हो तो सोलह दीपक जलाकर, तब उनका साहित्य अर्चन कीजिए। रात के समय किया जाए, तो बहुत दिव्य है।
एक-दो घंटे की पूजा से पूरे साल लक्ष्मी की कृपा बताई गई है, और दीपावली पर इसे दोहराना
एक-दो घंटे की पूजा, साल भर की कृपा, और दीपावली पर दोहराव
वक्ता कहते हैं कि यह एक-दो घंटे की पूजा होगी, पर भगवती लक्ष्मी की कृपा आपको पूरे साल मिलती रहेगी। वे इसे सबसे बड़े कर्ज़ के लिए बताते हैं, जहाँ कोई रास्ता नहीं मिल रहा। और यदि यही प्रयोग आप पाँच दिन के दीपावली पर्व में, धनतेरस से द्वितीया तिथि तक, फिर करें, तो यह बहुत उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि यह एक-दो घंटे की पूजा होगी, पर भगवती लक्ष्मी की कृपा आपको पूरे साल मिलती रहेगी। सबसे बड़ा कर्ज़, जिससे निकलने का कोई रास्ता ही नहीं मिल रहा कि हम इससे कैसे निकलेंगे — यह कीजिए। और यदि यही प्रयोग आप आज, यानी शरद पूर्णिमा पर करें, और फिर जब दीपावली का पाँच दिन का पर्व चले, धनतेरस से द्वितीया तिथि तक — उस समय एक बार और करें, तो यह बहुत उत्तम है।
क्या पूरे परिवार को पाँचों दिन करना अनिवार्य है?
एक दिन सब मिलकर, या पाँच दिन एक व्यक्ति
वक्ता कहते हैं कि किसी एक दिन परिवार के साथ कीजिए; सब हर दिन न कर सकें तो कोई कठिनाई नहीं — पर पाँच दिन एक व्यक्ति वहाँ भी करे। तब भगवती की कृपा अवश्य होती है, क्योंकि भगवती अर्चन-प्रिया हैं; अर्चना उन्हें बहुत प्रिय है। वे कृपा करेंगी और रास्ता निकालेंगी; कैसे निकालेंगी, यह उनका विषय है — हमारा काम केवल उनका अर्चन करना है, और यह कोई बहुत महँगी चीज़ भी नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि किसी एक दिन परिवार के साथ कीजिए; सब दिन-दिन न कर सकें तो कोई कठिनाई नहीं। पर बाकी, पाँच दिन एक व्यक्ति वहाँ भी करे। तब भगवती की कृपा अवश्य होती है, क्योंकि भगवती अर्चन-प्रिया हैं; अर्चना उन्हें बहुत प्रिय है। वे कृपा करेंगी और रास्ता निकालेंगी; कैसे निकालेंगी, हम नहीं जानते, वह उनका विषय है। हमारा काम क्या है? कि हमें उनका अर्चन करना है। और यह कोई बहुत महँगी चीज़ भी नहीं है।
जब समस्या कर्ज़ या पैसे की हो, तो क्या अर्पित किया जाए?
दिव्य समय और माँ को प्रिय विधान, खीर और मेवे के साथ
वक्ता कहते हैं कि जब कर्ज़ हो, या पैसे से जुड़ी कोई बहुत बड़ी समस्या हो, तो लोग कुछ बिल्कुल ठोस माँगते हैं ताकि भगवती तुरंत कृपा करें। दो ठोस चीज़ें हैं: पहली, ऐसा समय जो बहुत दिव्य है और भगवती के इसी रूप को समर्पित है; और दूसरी, यह विधान, जो माँ को बहुत प्रिय है। और कुछ और विशेष करना हो, तो काजू, किशमिश और मेवा मिलाकर गाय के दूध की खीर बनाइए और माँ को अर्पित कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि तो यदि कर्ज़ है, यदि पैसे से जुड़ी कोई बहुत बड़ी समस्या चल रही है, तो लोग कहते हैं न कि हमें कुछ बिल्कुल ठोस दीजिए, कि भगवती तुरंत कृपा करें। एक बहुत ठोस चीज़ है: एक तो समय, जो बहुत दिव्य है और भगवती के इसी रूप को समर्पित है। और दूसरा यह विधान, जो माँ को बहुत प्रिय है। और यदि इसमें भी कुछ विशेष करना हो, तो काजू, किशमिश और मेवा आदि मिलाकर गाय के दूध में खीर बनाइए और माँ को अर्पित कीजिए।
रात का पूरा कार्यक्रम किन चीज़ों से बनता है?
नैवेद्य, सोलह दीपक, सहस्र अर्चन, अष्टक और माला मंत्र
वक्ता कहते हैं कि तो नैवेद्य हो गया, सोलह दीपक हो गए, उनका सहस्र अर्चन हो गया, महालक्ष्मी अष्टक का पाठ हो गया — और यदि और करना हो, तो महालक्ष्मी माला मंत्र कीजिए, ज़्यादा नहीं, बस पाँच बार। यदि आप इतना करें, तो पूरा समय भी लीजिए: शाम से रात तक कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि तो एक चीज़ नैवेद्य हो गई, सोलह दीपक एक हो गए, उनका सहस्र अर्चन एक हो गया, महालक्ष्मी अष्टक का पाठ एक हो गया। और यदि और करना हो, तो महालक्ष्मी माला मंत्र कीजिए — ज़्यादा नहीं, बस पाँच बार कीजिए। यदि आप इतना करें, तो पूरा समय भी लीजिए: शाम से लेकर रात तक कीजिए।
क्या बीच में उठ सकते हैं, और क्या दीपक जलते रहने चाहिए?
बैठकों के बीच उठना, और गाय के घी के दो अखंड दीपक
वक्ता कहते हैं कि यदि एक बैठक में न हो रहा हो, तो उठ जाइए — अपना अर्पण करके उठिए, टहलिए, फिर दस-पंद्रह मिनट बाद बैठकर पूजन का अगला भाग कीजिए। बस दीपक जलता रहे: दीपक बुझने न दें, सोलह दीपक लगातार जलते रहें। यदि सोलह लगातार न जला सकें, तो कम से कम दो दीपक लगातार जलें — गाय के घी के।
वक्ता कहते हैं कि यदि एक बैठक में न हो रहा हो, तो उठ जाइए। अपना अर्पण करके उठिए; टहलिए, फिर दस-पंद्रह मिनट बाद बैठिए और अपने पूजन का अगला भाग कीजिए। बस दीपक जलता रहे — दीपक बुझने न दें। सोलह दीपक लगातार जलते रहें। यदि आप सोलह दीपक लगातार नहीं जला सकते, तो कम से कम दो दीपक लगातार जलें; गाय के घी के।
सबको श्री की आवश्यकता क्यों है?
श्री के बिना कोई पूजन या यज्ञ संभव नहीं
वक्ता कहते हैं कि इस तरह यह पूजन कीजिए, क्योंकि सबको लक्ष्मी जी की आवश्यकता है; हर किसी के जीवन में श्री चाहिए। यदि आपको और हमें श्री नहीं मिलेंगी, तो उनके बिना पूजन और यज्ञ कैसे हो पाएँगे? जीवन के सारे काम उन्हीं से पूरे होने हैं। तो कल के समय का इस तरह लाभ उठाइए।
वक्ता कहते हैं कि इस तरह पूजन कीजिए, क्योंकि सबको लक्ष्मी जी की आवश्यकता है; हर किसी के जीवन में श्री चाहिए। यदि आपको और हमें श्री नहीं मिलेंगी, तो उनके बिना पूजन और यज्ञ कैसे हो पाएँगे? जीवन के सारे काम उन्हीं से पूरे होने वाले हैं। तो कल के समय का इस तरह लाभ उठाइए।
अदीक्षित व्यक्ति को क्या करने का प्रयास नहीं करना चाहिए?
स्वर्णाकर्षण भैरव और अधिकार के बिना आकर्षण की सीमा
वक्ता कहते हैं कि यदि आप किसी कुल परंपरा में दीक्षित नहीं हैं, तो विशेष रूपों की ओर आपका आकर्षण हो सकता है — पर यदि आप प्रयोग नहीं जानते, तो मत कीजिए। उदाहरण के लिए वे स्वर्णाकर्षण भैरव का नाम लेते हैं, जिनका प्रयोग वे स्वयं कल कर रहे हैं, और जिसे उन्होंने ग्रुप में पूरा लिखकर दिया है।
वक्ता कहते हैं कि और यदि आप किसी कुल परंपरा में दीक्षित नहीं हैं, तो विशेष रूपों की ओर आपका आकर्षण हो सकता है। पर यदि आप उसका प्रयोग नहीं जानते, तो मत कीजिए। उदाहरण के लिए, स्वर्णाकर्षण भैरव। स्वर्णाकर्षण भैरव का प्रयोग हम स्वयं कल कर रहे हैं, और उसके बारे में आपको पूरा बताया गया है; हमने ग्रुप में भी लिख दिया है कि यह अमुक तरह से किया जाएगा।
क्या इंटरनेट की एक PDF ऐसा प्रयोग करने के लिए काफ़ी है?
छपी पुस्तकों में पूरा विषय क्यों नहीं होता
वक्ता कहते हैं कि यदि आप नहीं जानते, तो इंटरनेट पर आपको पुस्तक या PDF मिल जाती है — पर उसमें भी पूरा विषय नहीं दिया गया होता, या वह विषय करना आपके लिए संभव नहीं होता, कि कैसे, कहाँ और क्या किया जाता है; वहाँ बात बहुत संक्षेप में दी होती है। फिर उसमें क्या और कैसे करना है, पता नहीं चलता। इसलिए मत कीजिए, क्योंकि ये शक्तियाँ सौम्य होने के साथ उग्र भी हैं: उनके साथ उग्र शक्तियाँ चलती हैं, वे महाशक्तियाँ हैं।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप नहीं जानते, तो इंटरनेट पर आपको पुस्तक मिल जाती है, PDF मिल जाती है — पर उसमें भी पूरा विषय नहीं दिया गया है। या वह विषय करना आपके लिए संभव नहीं है: कैसे, कहाँ, क्या किया जाता है। वहाँ बात बहुत संक्षेप में ही दी होती है। फिर उसमें क्या और कैसे करना है, पता नहीं चलता। इसलिए मत कीजिए — क्योंकि ये शक्तियाँ सौम्य होने के साथ उग्र भी हैं। उनके साथ उग्र शक्तियाँ चलती हैं। वे महाशक्तियाँ हैं।
ग्रुप अनुष्ठान में अंग विद्याओं सहित स्वर्णाकर्षण भैरव और स्वर्णाकर्षण गणपति शामिल हैं
अंग विद्याओं सहित स्वर्णाकर्षण भैरव और स्वर्णाकर्षण गणपति
वक्ता कहते हैं कि यदि आपके पास इसका अधिकार नहीं है — यानी आपके गुरु ने यह नहीं सिखाया या बताया — तो ऐसा प्रयोग मत कीजिए। चाहें तो आप अनुष्ठान में जुड़ सकते हैं। स्वर्णाकर्षण भैरव का अनुष्ठान कल रात होगा, पर केवल उन्हीं का नहीं: उनकी सभी अंग विद्याओं के साथ। स्वर्णाकर्षण भैरव तो बस मुख्य रूप में लिखा है; उनके साथ स्वर्णाकर्षण गणपति भी होंगे।
वक्ता कहते हैं कि तो यदि आपको इसका अधिकार नहीं मिला है — यानी आपके गुरु ने आपको यह सिखाया और बताया नहीं है — तो इस तरह का प्रयोग मत कीजिए। यदि आपकी इच्छा हो, तो आप इसमें जुड़ सकते हैं; ऐसा नहीं कि करोड़ों रुपये का अनुष्ठान हो रहा है। स्वर्णाकर्षण भैरव का अनुष्ठान कल रात होगा, पर केवल उन्हीं का नहीं हो रहा — उनकी सभी अंग विद्याओं के साथ। स्वर्णाकर्षण भैरव तो बस मुख्य रूप में लिखा गया है; स्वर्णाकर्षण गणपति, जो भी होते हैं, वे भी उनके साथ होंगे।
साथ में अष्टलक्ष्मी और भगवती धनदा भी शामिल हैं
अष्टलक्ष्मी और भगवती धनदा
वक्ता कहते हैं कि यदि आपने कभी इसके बारे में सुना है तो अच्छा है; नहीं तो खोजिए, PDF अवश्य मिल जाएगी — पर गुरु के आदेश के बिना मुख्य विषय मत कीजिए। उसके साथ अष्टलक्ष्मी हैं, जो प्रमुख हैं, और भगवती धनदा; भगवती धनदा का वह मूल रूप, जिसका अनुष्ठान आदि पिछले युग में भी हुआ था।
वक्ता कहते हैं कि यदि आपने कभी इसके बारे में सुना है, तो अच्छा है; नहीं तो खोजिए, PDF अवश्य मिल जाएगी। पर गुरु के आदेश के बिना मुख्य विषय मत कीजिए। और उसके साथ अष्टलक्ष्मी जो प्रमुख हैं, और भगवती धनदा — भगवती धनदा का वह मूल रूप, जिसका अनुष्ठान आदि पिछले युग में भी हुआ था।
क्या ग्रुप अनुष्ठान में जुड़ना अपनी घरेलू साधना की जगह ले ले?
वह न्यूनतम जो घर पर हर हाल में करना है
वक्ता कहते हैं कि यह सब कल होगा, और चाहें तो आप जुड़ सकते हैं — पर घर पर स्वयं जो करना है, उसे छोड़ना नहीं है। स्वयं महालक्ष्मी अष्टक कीजिए, लक्ष्मी जी का सहस्रार्चन, या लक्ष्मी नारायण का सहस्रार्चन; गणपति जी के साथ कीजिए, या केवल भगवती का स्वतंत्र रूप से। पर सहस्रार्चन कीजिए; और वह भी संभव न हो, तो महालक्ष्मी अष्टक के एक सौ आठ पाठ अवश्य करके उन्हें अर्पित कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि तो यह सब कल होगा; चाहें तो आप इसमें जुड़ सकते हैं, पर घर पर स्वयं जो करना है, उसे छोड़ना नहीं है। स्वयं महालक्ष्मी अष्टक कीजिए, लक्ष्मी जी का सहस्रार्चन कीजिए, या लक्ष्मी नारायण का सहस्रार्चन; गणपति जी के साथ कीजिए, या स्वतंत्र रूप से, केवल भगवती का। पर सहस्रार्चन कीजिए — और वह भी संभव न हो, तो महालक्ष्मी अष्टक के एक सौ आठ पाठ अवश्य करके उन्हें अर्पित कीजिए।
जो पहले से कोई लक्ष्मी पाठ कर रहा है, वह क्या करे?
धनदा कवच या माला मंत्र से बिल्व पत्र के साथ अर्पण
वक्ता कहते हैं कि यदि आप पहले से धनदा लक्ष्मी का पाठ, धनदा कवच का पाठ, या भगवती के माला मंत्र, लक्ष्मी माला मंत्र आदि का पाठ करते आ रहे हैं, तो उससे भी अर्पण कीजिए: एक सौ आठ बिल्व पत्र लाइए और महालक्ष्मी माला मंत्र एक सौ आठ बार कीजिए। कल बुधवार है, तो कोई कठिनाई नहीं — आप आराम से बिल्व पत्र तोड़ सकते हैं। उन पर पढ़कर बिल्व पत्र अर्पित कीजिए, और खीर बनाकर अर्पित कीजिए।
यदि आप पहले से धनदा लक्ष्मी का पाठ, धनदा कवच का पाठ करते आ रहे हैं, या भगवती के माला मंत्र, लक्ष्मी माला मंत्र आदि का पाठ कर रहे हैं — तो वक्ता कहते हैं कि उससे भी अर्पण कीजिए। एक सौ आठ बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। पत्र लाइए; महालक्ष्मी माला मंत्र एक सौ आठ बार। कल बुधवार है, तो कोई कठिनाई नहीं — आप आराम से बिल्व पत्र तोड़ सकते हैं। तो उन पर पढ़कर बिल्व पत्र अर्पित कीजिए। और खीर आदि बनाकर अर्पित कीजिए।
यदि हवन कर रहे हैं, तो क्या व्रत अनिवार्य है?
हवन के लिए व्रत, और अगले दिन पारण
वक्ता कहते हैं कि यदि आप हवन करने वाले हैं, यदि कल व्रत-हवन करना है, तो व्रत रखना ही होगा। हाँ, हवन के बाद आप अन्न ग्रहण कर सकते हैं — वह अलग बात है। पूरा व्रत रखें तो वह भी अच्छा है, कोई हानि नहीं; अगले दिन पारण कीजिए। पर यदि व्रत रखकर हवन करना चाहते हैं, तो व्रत रखिए।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप हवन करने वाले हैं, यदि कल व्रत-हवन करना है, तो व्रत तो रखना ही होगा। हाँ, हवन के बाद आप अन्न ग्रहण कर सकते हैं; वह बात अलग है। यदि पूरा व्रत रखें, तो भी अच्छा है, कोई हानि नहीं; अगले दिन अपना पारण कीजिए। पर यदि व्रत रखकर हवन करना चाहते हैं, तो व्रत रखिए, और फिर हवन कैसे करना है।
लक्ष्मी हवन के लिए कौन-सा मंत्र और कितनी आहुतियाँ?
सतनाम, बीजाक्षर की दस माला, या अष्टक का कोई मंत्र
वक्ता कहते हैं कि भगवती लक्ष्मी जी के पौष्टिक हवन के लिए दो सामग्रियाँ बहुत अद्भुत हैं। चाहे आप माँ का रात का हवन सतनाम से करना चाहें, उनके किसी बीजाक्षर से दस माला का हवन करना चाहें, या भगवती के महालक्ष्मी अष्टक के किसी मंत्र से करना चाहें — सौ आहुतियाँ देनी हों या हज़ार — सामग्री में, पौष्टिक सामग्री में, पंचमेवा रखिए।
वक्ता कहते हैं कि भगवती लक्ष्मी जी के हवन के लिए दो सामग्रियाँ बहुत अद्भुत हैं। पौष्टिक हवन के लिए। यदि आप माँ का रात का हवन सतनाम से करना चाहें, या उनके किसी बीजाक्षर से दस माला का हवन करना चाहें, या भगवती के महालक्ष्मी अष्टक के किसी मंत्र से करना चाहें — उनका हवन, चाहे सौ आहुतियाँ देनी हों या हज़ार आहुतियाँ देनी हों — तो सामग्री में, पौष्टिक सामग्री में, पंचमेवा रखिए।
हवन की पहली बताई गई सामग्री क्या है?
घी सहित खीर में पंचमेवा, बिल्व की लकड़ी और गोबर का कंडा
वक्ता कहते हैं कि खीर में पंचमेवा मिलाकर, घी मिलाकर, गाय का घी मिलाकर, उससे आहुति दीजिए — यह बहुत उत्तम है। यदि बिल्व की लकड़ी, बेल के पेड़ की समिधा, और गोबर का कंडा हो, तो इन्हें समिधा के रूप में प्रयोग कीजिए, और अग्नि का ठीक से आवाहन कीजिए। पूरा विधि-विधान दो साल पहले चैनल पर प्रसारित हो चुका है, और वे नए लोगों के लिए यह याद फिर दिलाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि खीर में पंचमेवा मिलाकर, और घी मिलाकर, गाय का घृत मिलाकर, उससे आहुति दीजिए — यह बहुत उत्तम है। यदि बिल्व की लकड़ी, बेल के पेड़ की समिधा, और गोबर का कंडा हो, तो इसे समिधा के रूप में प्रयोग कीजिए, और अग्नि का ठीक से आवाहन कीजिए। पूरा विधि-विधान चैनल पर पहले ही प्रसारित हो चुका है; दो साल बीत गए, पर वे बार-बार याद दिलाते हैं — भाई, यदि आपको करना है और आप नए हैं और सुन रहे हों, तो उसी चैनल पर मिल जाएगा; उन्होंने लाइव दिखाया है।
आहुतियाँ देने से पहले क्या किया जाता है?
अग्नि स्थापन, पंचभूत संस्कार और क्रव्याद अंश निकालना
वक्ता कहते हैं कि अग्नि स्थापन आदि करके, पंचभूत संस्कार करके, और क्रव्याद अंश को ठीक से निकालकर, जब दिव्य शुभ अग्नि में, वरद अग्नि में, भगवती महालक्ष्मी के नाम से खीर, गाय के घी और गुग्गुल की आहुति देते हैं, तब सबसे दिव्य प्रभाव मिलता है।
वक्ता कहते हैं कि तो अग्नि स्थापन आदि करके, पंचभूत संस्कार करके, और क्रव्याद अंश को ठीक से निकालकर — जब दिव्य शुभ अग्नि में, वरद अग्नि में, आप भगवती महालक्ष्मी के नाम से खीर की, गाय के घृत की, गुग्गुल आदि की आहुति देते हैं — तब सबसे दिव्य प्रभाव मिलता है।
आहुति के लिए मधु किस बर्तन में रखना चाहिए?
स्टील या पीतल, कभी ताँबा नहीं
वक्ता कहते हैं कि यदि आप उससे भी विशेष कुछ करना चाहें, तो मधु रखिए — केवल मधु। मधु स्टील के कटोरे में, या फिर पीतल के कटोरे में रखिए। जब मधु से आहुति करनी हो, तो उसे ताँबे में मत रखिए, इसका ध्यान रखिए।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप उससे भी विशेष कुछ करना चाहें, तो मधु रखिए। केवल मधु। मधु स्टील के कटोरे में, या फिर पीतल के कटोरे में रखिए। ताँबे में मत रखिए — इसका ध्यान रखिए — जब मधु से आहुति करनी हो।
भगवती लक्ष्मी के लिए ताँबे का प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए?
ताँबे का बर्तन अघोर लक्ष्मी का
वक्ता कहते हैं कि और जब भी कोई मीठा पदार्थ बने, खीर आदि, उसे भी भगवती लक्ष्मी की आहुति के लिए ताँबे में नहीं रखना है। जब अघोर लक्ष्मी का हो, तब ताँबे का बर्तन प्रयोग होता है। आहुति के लिए इसका ध्यान रखिए।
और जब भी कोई मीठा पदार्थ बने, खीर आदि भी — वक्ता कहते हैं कि उसे भी ताँबे में रखकर भगवती लक्ष्मी की आहुति के लिए प्रयोग नहीं करना है। जब अघोर लक्ष्मी का हो, तब ताँबे का बर्तन प्रयोग होता है। आहुति के लिए इसका ध्यान रखिए।
पौष्टिक रूपों के लिए कौन-से बर्तन प्रयोग होते हैं?
पीतल, फूल, चाँदी या स्टील — और पलाश के पत्तों की पत्तल
वक्ता कहते हैं कि जिस बर्तन में हम आहुति के लिए संग्रह रखते हैं — ताँबे का बर्तन अघोर लक्ष्मी आदि के लिए होगा, भगवती लक्ष्मी के उन रूपों के लिए जो उग्र हैं। पर पौष्टिक रूपों के लिए पीतल रखिए, फूल रखिए, चाहें तो चाँदी रखिए; स्टील भी चलेगा। और कुछ न हो, तो पत्तों से, पलाश के पत्तों से बनी पत्तल में रखिए; वह चलेगा।
वक्ता कहते हैं कि आहुति के लिए जो बर्तन हमने रखा है — यानी जिसमें हमने संग्रह किया है — ताँबे का बर्तन अघोर लक्ष्मी आदि के लिए होगा। वह भगवती लक्ष्मी के उन रूपों के लिए होगा जो स्वभाव से उग्र हैं। पर जो रूप पौष्टिक है, उसमें पीतल रखिए, फूल रखिए; चाँदी रखना चाहें तो रखिए; स्टील रखिए, चलेगा। और कुछ भी न हो, तो पत्तों से, पलाश के पत्तों से बनी पत्तल में रखिए — वह चलेगा।
स्रुवा किस चीज़ का होना चाहिए?
आहुति के लिए पीतल का स्रुवा
वक्ता कहते हैं कि आहुति करने में जो स्रुवा प्रयोग होता है, उसमें भी संभव हो तो पीतल रखिए — तब यह बहुत उत्तम है। फिर जब आहुति करेंगे, तो घृत से आहुति करेंगे; खीर और घृत मिलाकर आहुति करेंगे। दोनों में यह पहली है।
वक्ता कहते हैं कि आहुति करने में जो स्रुवा प्रयोग होता है, उसमें भी संभव हो तो पीतल रखिए; तब यह बहुत उत्तम है। बाकी, जब आप आहुति करेंगे — फिर घृत से आहुति करेंगे; खीर और घृत मिलाकर आहुति करेंगे। तो यह पहली हो गई।
मधु की आहुति कैसे की जाती है?
मधु में डुबोए बिल्व पत्र, घी में कभी नहीं मिलाया
वक्ता कहते हैं कि जब मधु से आहुति करनी हो, तो मधु अकेले प्रयोग नहीं करना है — केवल मधु से नहीं होगी। एक सौ आठ या एक हज़ार आठ बिल्व पत्र लीजिए, एक-एक करके मधु में डुबोइए, और उनसे एक सौ आठ आहुतियाँ दीजिए। मधु में घी नहीं मिलाना है।
वक्ता कहते हैं कि जब मधु से आहुति करनी हो, तो मधु अकेले नहीं करना है; हम केवल मधु से नहीं करेंगे। एक सौ आठ या एक हज़ार आठ बेल के पत्ते, बिल्व पत्र — उन्हें डुबोकर, मधु में डुबोकर, फिर उनसे एक सौ आठ आहुतियाँ दीजिए। केवल मधु में घी नहीं मिलाना है।
यदि मधु की आहुति के दौरान अग्नि बार-बार बुझे, तो क्या?
बीच में अलग से घृत की आहुति, मधु में कभी नहीं मिलाई
वक्ता कहते हैं कि ऐसा अवश्य हो सकता है कि एक व्यक्ति घृत की आहुति करे और दूसरा मधु में बिल्व पत्र डालता जाए। और यदि आप अकेले आहुति कर रहे हैं, तो मधु से आहुति करने पर अग्नि बार-बार बुझेगी — इसलिए बीच में घृत आदि से भी आहुति कर सकते हैं, पर वह स्वतंत्र होगी; मधु में मिलाई नहीं जाएगी। भगवती लक्ष्मी जी के विषय में इसका ध्यान रखिए।
वक्ता कहते हैं कि हाँ, ऐसा अवश्य हो सकता है कि दूसरा व्यक्ति घृत की आहुति करे, जबकि एक व्यक्ति मधु में बिल्व पत्र डालता जाए। और यदि आप अकेले आहुति कर रहे हैं — अकेले आहुति करने में, जब मधु से आहुति करेंगे, तो अग्नि बार-बार बुझेगी। तो बीच में आप घृत आदि से भी आहुति कर सकते हैं, पर वह स्वतंत्र होगी; मधु में मिलाकर नहीं की जाएगी। भगवती लक्ष्मी जी के विषय में इस बात का ध्यान रखिए।
और विशेष सामग्रियाँ मंत्र दीक्षा लेने के बाद ही आती हैं
मंत्र दीक्षा और उसके बाद आने वाली विशेष सामग्रियाँ
वक्ता कहते हैं कि यदि आपको कुछ और विशेष करना है, तो उसमें मंत्र दीक्षा आदि आती है; तब उसमें कुछ और विशेष सामग्रियाँ प्रयोग होती हैं। पर ये दोनों अपने-आप में श्रेष्ठ हैं, और इनसे भगवती लक्ष्मी की अतुलनीय कृपा आपको मिलती है। यदि आप हवन आदि कर रहे हैं, तो इसका प्रयोग कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह किया जाता है। और यदि आपको कुछ और विशेष करना है, तो उसमें मंत्र दीक्षा आदि है; तब उसमें कुछ और विशेष सामग्रियाँ प्रयोग होती हैं। पर ये दोनों अपने-आप में श्रेष्ठ हैं; इनसे भगवती लक्ष्मी की अतुलनीय कृपा आपको मिलती है। यदि आप हवन आदि कर रहे हैं, तो इसका प्रयोग कर सकते हैं।
हवन के बाद भस्म का क्या किया जाता है?
ठंडी भस्म को उस कलश में रखना जहाँ पैसा रखा जाता है
वक्ता कहते हैं कि हवन के बाद, जब पूर्णाहुति आदि हो जाए, तो हवन की जो भस्म बचे — अग्नि ठंडी होने के बाद — उसे अपने किसी छोटे कलश में अवश्य इकट्ठा कीजिए और उसी स्थान पर रखिए जहाँ आप अपना पैसा आदि रखते हैं। यह बहुत उत्तम होगा। वे कहते हैं कि इस तरह शरद पूर्णिमा का लाभ लेना चाहिए।
हवन करने के बाद, जब पूर्णाहुति आदि हो जाए, तो हवन की यह भस्म जो रहेगी — हवन पूरा करने के बाद, जब भस्म अग्नि से ठंडी हो जाए — तो उसे अवश्य इकट्ठा करके अपने किसी छोटे कलश में डालिए, और उस स्थान पर इकट्ठा करके रखिए जहाँ आप अपना पैसा आदि रखते हैं। यह बहुत उत्तम होगा। इस तरह आपको करना चाहिए; इस तरह शरद पूर्णिमा का लाभ लेना चाहिए।
परिवार में मृत्यु के बाद कितने समय बाद साधना शुरू कर सकते हैं?
सवा महीना, तेरहवीं के बाद पैंतालीस दिन
यह पूछे जाने पर कि परिवार में मृत्यु हुई हो, तो तेरहवीं समाप्त होने के कितने दिन बाद कोई साधना शुरू करनी चाहिए, वक्ता उत्तर देते हैं: सवा महीने के बाद कीजिए। पैंतालीस दिन बीतने के बाद ही कीजिए — वह अधिक उत्तम है।
प्रश्न लेते हुए वक्ता से पूछा जाता है: यदि परिवार में मृत्यु हुई हो, तो तेरहवीं समाप्त होने के बाद कितने दिन बाद कोई साधना शुरू करनी चाहिए। वे उत्तर देते हैं कि सवा महीने के बाद कीजिए। पैंतालीस दिन बीतने के बाद ही कीजिए। तब यह अधिक उत्तम है।
चतुर्थी का व्रत कैसे रखा जाता है?
गणपति की चतुर्थी पूरे वर्ष, चंद्रमा का ध्यान रखते हुए
चतुर्थी व्रत कैसे रखा जाता है, यह समझाने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि इसे पूरे साल रखना है — चतुर्थी यानी गणपति जी की। वे जोड़ते हैं कि चतुर्थी में चंद्रदेव से जुड़ी बात भी देखनी और ध्यान में रखनी होती है।
चतुर्थी व्रत कैसे रखा जाता है, यह समझाने को कहे जाने पर वक्ता कहते हैं कि इसे पूरे साल रखना है। चतुर्थी, यानी गणपति जी की। वे कहते हैं, ठीक है। तो चतुर्थी में चंद्रदेव से जुड़ी बात भी देखनी और ध्यान में रखनी होती है।
गणपति दोष कैसे लगता है?
विनायक दोष और चोर गणपति वाला वीडियो
यह पूछे जाने पर कि गणपति दोष कैसे लगता है, वक्ता प्रश्नकर्ता को पहले से मौजूद लाइव, चोर गणपति वाले वीडियो की ओर भेजते हैं, जिसमें विनायक दोष से जुड़ा पूरा विषय बताया गया है — विनायक दोष कैसे लगता है और उसका निवारण कैसे होता है। वे कहते हैं कि छोटे बच्चों को भी यह दोष लगता है।
यह पूछे जाने पर कि गणपति दोष कैसे लगता है, वक्ता उत्तर देते हैं कि इसके लिए पहले से एक लाइव है — चोर गणपति वाला वीडियो। उसमें विनायक दोष से जुड़ा पूरा विषय बताया गया है: विनायक दोष कैसे लगता है, और उसका निवारण किस तरह किया जाता है। वे कहते हैं कि छोटे बच्चों को भी यह दोष लगता है।
दक्षिणेश्वरी काली के साथ पंचायतन कैसे बनता है?
पहले कुलदेवी, फिर पिंड-सहित पंचायतन या सामान्य चार
दक्षिणेश्वरी काली जी के रूप पर वक्ता कहते हैं कि पंचायतन के बारे में सबसे पहला प्रश्न यह है कि भगवती दक्षिणेश्वरी आपकी कुलदेवी हैं या नहीं। यदि कुलदेवी हैं, तो उसके अनुसार और कौन पूजे जाते हैं — और फिर उनका पिंड-सहित पंचायतन बनेगा। और यदि ऐसा नहीं है, तो गणपति जी, बटुक भैरव जी, एक शिवलिंग, और उनके साथ नारायण: विशेष रूप से इन सबका स्थान रहेगा।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप फिर दक्षिणेश्वरी काली जी के रूप में जाएँ — देखिए, पंचायतन के बारे में सबसे पहली बात यह है: भगवती दक्षिणेश्वरी आपकी कुलदेवी हैं या नहीं? यदि कुलदेवी हैं, तो उसके अनुसार और कौन पूजे जाते हैं? तब पिंड के साथ उनका पंचायतन बनेगा। और यदि ऐसा नहीं है, तो गणपति जी, बटुक भैरव जी, और एक शिवलिंग, और उनके साथ नारायण — विशेष रूप से इन सबका स्थान रहेगा।
जो सुबह कुल शक्ति पूजन करते हैं, वे कब करें?
सुबह की पूजा परसों
वक्ता कहते हैं कि जो लोग पूर्णिमा पर सुबह के समय कुल शक्तियों का पूजन करते हैं, उन्हें परसों करना है। सुबह की पूजा परसों है।
वक्ता कहते हैं कि जो लोग पूर्णिमा पर सुबह के समय कुल शक्तियों का पूजन करते हैं — उनके लिए कल, यानी परसों है। सुबह की पूजा परसों है।
स्वास्थ्य की समस्या वालों के लिए क्या छूट है?
जहाँ शरीर साथ न दे, वहाँ पूरी छूट
वक्ता कहते हैं कि स्वास्थ्य की समस्या के कारण पूरी छूट है। तब जैसे भी कर सकें, कीजिए; कोई कठिनाई नहीं। यदि आपके हाथ-पैर ठीक से साथ नहीं दे रहे, तो जैसा आपको ठीक लगे, उस तरह अपना जप कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि देखिए, स्वास्थ्य की समस्या के कारण, भाई, पूरी छूट है। तब जैसे भी कर सकें, कीजिए। कोई कठिनाई नहीं है। यदि आपके हाथ-पैर आपको ठीक से साथ नहीं दे पा रहे, तो जिस तरह आपको ठीक लगे, उस तरह आप अपना जप कर सकते हैं।
धनतेरस और दीपावली के लिए महालक्ष्मी कलश और एक नया स्वर्णाकर्षण भैरव कलश तैयार हो रहा है
महालक्ष्मी कलश और नया स्वर्णाकर्षण भैरव कलश
वक्ता कहते हैं कि इस बार धनतेरस और दीपावली के लिए एक और विशेष कलश बनेगा। महालक्ष्मी कलश वे पहले ही चैनल पर दे चुके हैं — जो महालक्ष्मी कलश स्थापित करना चाहें, उसे देख सकते हैं, विधि-विधान बताया गया है और वे स्वयं कर सकते हैं। इस बार स्वर्णाकर्षण कलश, स्वर्णाकर्षण भैरव कलश स्थापित करने का प्रयास हो रहा है; उन्होंने कल से शुरू करने का सोचा था, पर एक-दो सामग्रियाँ तुरंत नहीं मिलेंगी, इसलिए यह धनतेरस से बनेगा।
वक्ता कहते हैं कि इस बार धनतेरस और दीपावली के लिए एक और विशेष कलश बनाया जाएगा। महालक्ष्मी कलश वे पहले ही चैनल पर दे चुके हैं; जो महालक्ष्मी कलश स्थापित करना चाहें, वे उसमें देख सकते हैं कि विधि-विधान बताया गया है — आप स्वयं कर सकते हैं। अब इस बार स्वर्णाकर्षण कलश, स्वर्णाकर्षण भैरव कलश स्थापित करने का प्रयास हो रहा है। इसके लिए, सामग्री के बारे में, उन्होंने कल से ही शुरू करने का सोचा था, पर एक-दो सामग्रियाँ उन्हें तुरंत नहीं मिलेंगी, इसलिए यह धनतेरस से बनेगा; उस समय वे सूचना अवश्य देंगे।
पूरी विधि और सामग्री दिखाई जा चुकी है, इसलिए कलश स्वयं बनाया जा सकता है
स्वयं कीजिए — विधि पूरी दिखाई गई है
वक्ता कहते हैं कि पूरा विषय करके दिखाया गया है, मंत्र विधि से लेकर कौन-सी सामग्री लगेगी तक; खोजिए, ऑनलाइन मँगाइए, बस देखिए कि सामग्री सही हो, और स्वयं स्थापित कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि पूरा विषय करके दिखाया गया है — मंत्र विधि से लेकर कौन-सी सामग्री लगेगी तक। खोजिए, ऑनलाइन मँगाइए। बस देखिए कि सामग्री सही हो, और स्वयं स्थापित कीजिए।
एक ही काली कौड़ी पाँच रुपये में भी बिकती है और तीन सौ में भी
पाँच रुपये और तीन सौ रुपये की काली कौड़ी
वक्ता कहते हैं कि एक काली कौड़ी आपको पाँच रुपये में भी मिल जाती है, और एक काली कौड़ी ढाई सौ से तीन सौ रुपये में भी मिलती है।
वक्ता कहते हैं कि एक काली कौड़ी आपको पाँच रुपये में भी मिल जाती है, और एक काली कौड़ी ढाई सौ से तीन सौ रुपये में भी मिलती है।
सामग्री की गुणवत्ता का अंतर कैसे पता चलता है?
हाथ में लेकर, और उस पर किए जप से जानना
वक्ता कहते हैं कि अंतर आपको तब पता चलेगा जब आप उसे हाथ में लेंगे। अंतर आपको तब पता चलेगा जब आप जप आदि करेंगे — तब देखेंगे कि उसकी दिव्यता कैसे बढ़ती या घटती है, और तब समझ आएगा। अपना कलश देखकर आप स्वयं समझ जाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि अंतर आपको तब पता चलेगा जब आप उसे हाथ में लेंगे। अंतर आपको तब पता चलेगा जब आप जप आदि करेंगे; जब देखेंगे कि उसकी दिव्यता में कैसे वृद्धि या कमी होती है, तब आपको समझ आएगा। अपना कलश देखकर आप स्वयं समझ जाएँगे।
मोरंगी रुद्राक्ष की माला कितने की आती है?
एक सौ आठ मनकों की पूरी माला पच्चीस या चालीस रुपये में
वक्ता कहते हैं कि एक सौ आठ मनकों की पूरी रुद्राक्ष माला केवल चालीस रुपये में मिल जाती है — मोरंगी रुद्राक्ष, बस चालीस रुपये में; और अब यह पच्चीस पर आ गई है, गिर गई है। पच्चीस रुपये में इसके मनके इतने बड़े हैं कि आप कहेंगे, हे भगवान, पच्चीस रुपये में पूरे एक सौ आठ मनके।
वक्ता कहते हैं कि एक सौ आठ मनकों की पूरी रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । माला केवल चालीस रुपये में मिल जाती है — मोरंगी रुद्राक्ष, बस चालीस रुपये में। अब यह पच्चीस रुपये पर आ गई है; गिर गई है। पच्चीस रुपये में इसका मनका इतना बड़ा है कि आप कहेंगे: हे भगवान, पच्चीस रुपये में पूरे के पूरे एक सौ आठ मनके।
तुलना में हिमगिरि रुद्राक्ष कितने का आता है?
एक मनके के ढाई से तीन हज़ार रुपये
वक्ता कहते हैं कि और यदि आप पूरा असली वाला खरीदने जाएँ, पूरा तराई वाला जिसे हिमगिरि रुद्राक्ष कहते हैं, तो उसका एक अकेला रुद्राक्ष ढाई-तीन हज़ार रुपये का आता है — सबसे सामान्य गुणवत्ता का। उसके लिए जो ज़िद करे कि यह ठीक हिमगिरि का ही हो। जैसे-जैसे थोड़ा ऊपर जाते हैं, दाम भी बढ़ता जाता है। मोरंगी पर आएँ, तो यह स्थिति है।
वक्ता कहते हैं कि और वहाँ यदि आप पूरा ठीक असली वाला खरीदने जाएँ — पूरा तराई वाला, जिसे हम हिमगिरि रुद्राक्ष कहते हैं — तो उसमें से एक खरीदने जाइए। उसका एक अकेला रुद्राक्ष ढाई हज़ार, तीन हज़ार रुपये का है, सबसे सामान्य गुणवत्ता का। उसके लिए जो बिल्कुल ऐसा चाहे कि हाँ, यह पूरा हिमगिरि का ही हो। जब आप थोड़ा ऊपर जाने लगते हैं, तो उसका दाम उसी हिसाब से — जितना ऊपर जाएँ, दाम उतना बढ़ता जाता है। मोरंगी पर आएँ, तो यह स्थिति बनती है।
अधिकतर लोग मोरंगी चाहते हैं क्योंकि सम्मानित बाबा उसे पहनते हैं, और कमाई कहीं और लगानी चाहिए
अधिकतर लोगों की पसंद मोरंगी, और कमाई कहाँ जाए
वक्ता कहते हैं कि यह अद्भुत बात है कि लोग मोरंगी ही पसंद करते हैं — सबसे बड़ी बात यह है कि अच्छे-अच्छे सम्मानित बाबा लोग इसे गले में पहनकर घूम रहे हैं, मोरंगी लेकर घूम रहे हैं। कामाख्या जाइए, इन सब क्षेत्रों में जाइए, वे ऐसे ही खरीदते हैं, तुरंत पहन लेते हैं और फ़ोटो खिंचवाते जाते हैं कि बढ़िया है। तो यदि आप लाखों रुपये कमा रहे हैं, तो इन चीज़ों पर खर्च कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि और यह अद्भुत बात है कि लोग मोरंगी ही पसंद करते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वे पूरी गले में पहनकर घूमते हैं — अच्छे-अच्छे, सम्मानित बाबा लोग पहनकर घूमते हैं, मोरंगी लेकर घूमते हैं, ज़रा सोचिए। कामाख्या जाइए, इन सब क्षेत्रों में जाइए, वे ऐसे ही खरीदते हैं, तुरंत पहन लेते हैं और फ़ोटो खिंचवाते जाते हैं कि अहा, बढ़िया है। तो यदि आप लाखों रुपये कमा रहे हैं, तो भाई, इन चीज़ों पर खर्च कीजिए।
पैसे की कमी हो, तो माला कैसे बनानी चाहिए?
साल-दो साल में एक-एक मनका
वक्ता कहते हैं कि यह चीज़ हमेशा स्थायी होनी चाहिए। यदि आप रुद्राक्ष की कोई माला, या ऐसी कोई दिव्य वस्तु ले रहे हैं, या उसकी पूरी प्राण-प्रतिष्ठा ठीक से स्वयं कर रहे हैं, तो समय लीजिए। वे कहते हैं कि उनके पास भी पैसे की कमी है — वे एक बार में माला नहीं बनाते; शुद्ध माला में बहुत समय लगता है, साल में एक मनका लिया, कभी दो मनके, और तब जाकर अपने लिए एक माला बनती है।
वक्ता कहते हैं कि और यह चीज़ हमेशा स्थायी होनी चाहिए। यदि आप रुद्राक्ष की कोई माला ले रहे हैं, या उस तरह की कोई दिव्य वस्तु, या आप स्वयं उसकी पूरी ठीक प्रतिष्ठा आदि कर रहे हैं, तो समय लीजिए। यदि हमारे पास पैसे की कमी है — हमारे पास भी कमी है। क्या हम एक बार में माला बनाते हैं? शुद्ध माला में बहुत समय लगता है: साल भर में, दो साल में, एक मनका लिया, कभी दो मनके लिए। माला बनाने में बहुत समय लगता है; तब जाकर अपने लिए एक माला बनती है।
माला अगली पीढ़ी को क्यों मिलनी चाहिए?
माला जितनी पुरानी, उसकी दिव्यता उतनी अधिक
वक्ता कहते हैं कि तो यह भी कीजिए: यदि पैसे की कमी है, तो मनके धीरे-धीरे लेकर फिर बनाइए; वह स्थायी है। और ऐसे स्थायी हो कि केवल हम तक सीमित न रहे — हमारे बाद हमारी आने वाली पीढ़ी को भी वह दिव्य माला मिले, यह कहकर कि यह तुम्हारे पिता की माला है, इस पर इतना जप हुआ है, इतनी पूजा हुई है। वह माला जितनी पुरानी होगी, उसकी दिव्यता उतनी बढ़ेगी।
वक्ता कहते हैं कि तो आप भी यह कीजिए: यदि पैसे की कमी है — जिनके पास बहुत पैसा है वे एक बार में ले सकते हैं, पर जिनके पास कमी है वे धीरे-धीरे लेकर फिर बनाएँ। वह स्थायी है। और ऐसे स्थायी हो कि केवल हम तक सीमित न रहे; कि हमारे बाद हमारी आने वाली पीढ़ी को भी वह दिव्य माला मिले — कि बेटा, यह तुम्हारे पिता की माला है, इस पर इतना जप हुआ है, इतनी पूजा हुई है; यह लाखों की माला है, और अब करोड़ों में चली गई है; तुम इसे रखो। वह माला जितनी पुरानी होगी, उसकी दिव्यता उतनी बढ़ेगी।
माला टूट जाए, तो क्या उसे बदल देना चाहिए?
माला न बदलना, और व्यर्थ जाने वाला जप
वक्ता कहते हैं कि फिर उसे बदलना नहीं है। पर आप जो यह काम करते हैं — नहीं भाई, यह टूट गई, तो अमुक ले लो, वह ले लो — तब उसका कोई उपयोग नहीं, और तब सारा जप-तप व्यर्थ चला जाता है।
वक्ता कहते हैं कि फिर उसे बदलना नहीं है। पर आप जो यह काम करते हैं — नहीं भाई, यह टूट गई, तो ऐसी ले लो, वैसी ले लो — तब उसका कोई उपयोग ही नहीं। तब सारा जप-तप व्यर्थ चला जाता है।
सरस्वती के ग्यारहवें अध्याय को जगाने के लिए कितने पाठ चाहिए?
पहले से जागृत — सिद्धि का प्रश्न नहीं
यह पूछे जाने पर कि यदि कोई संकल्प लेकर सरस्वती के ग्यारहवें अध्याय से भगवती की प्रार्थना करे, तो उसे जगाने के लिए पहले कितने पाठ आवश्यक हैं, वक्ता उत्तर देते हैं: देखिए, यह पहले से जागृत है। जितना करेंगे, उतना फल मिलेगा। इसमें सिद्धि का कोई प्रश्न नहीं।
पूछा गया: यदि मैं संकल्प लेकर सरस्वती के ग्यारहवें अध्याय से भगवती की प्रार्थना करूँ, तो उससे पहले इसे जगाने के लिए कितने पाठ आवश्यक हैं — वक्ता उत्तर देते हैं कि देखिए, यह जागृत है। जितना आप इसे करेंगे, उतना फल मिलेगा। इसमें सिद्धि की कोई बात नहीं है।
अर्गला के पहले मंत्र के साथ किस पाठ को संपुट के रूप में प्रयोग कर सकते हैं?
सप्तश्लोकी को सिद्ध करके संपुट बनाना
यह पूछे जाने पर कि अर्गला के पहले मंत्र का सरस्वती के किस अध्याय या मंत्र से संपुट किया जाए, वक्ता कहते हैं: धर्म-युक्त इच्छाओं के लिए सप्तश्लोकी को सिद्ध करके उससे संपुट कीजिए — यह वे कई बार बता चुके हैं। केवल सात श्लोक हैं; संपुट कीजिए और तुरंत होगा। और सप्तश्लोकी को अलग से सात सौ पाठ करके सिद्ध कीजिए, या ग्यारह सौ पाठ कीजिए। तब यह अद्भुत हो जाएगा।
यह पूछे जाने पर कि अर्गला स्तोत्र के पहले मंत्र का सरस्वती के किस अध्याय या मंत्र से संपुट किया जाए — वक्ता कहते हैं कि धर्म-युक्त इच्छाओं के लिए सप्तश्लोकी को सिद्ध कीजिए और उससे संपुट कीजिए; यह कई बार बताया जा चुका है। केवल सात श्लोक हैं। संपुट कीजिए और तुरंत होगा। और सप्तश्लोकी को अलग से सिद्ध कीजिए, उसके सात सौ पाठ करके; ग्यारह सौ पाठ कीजिए। तब यह अद्भुत हो जाएगा।
जब घर में तीन महीने के बच्चे की आत्मा उपस्थित हो, तो क्या उपाय है?
दीपावली या काली चौदस पर काली मंदिर में दान
यह पूछे जाने पर कि घर में तीन महीने के बच्चे की आत्मा उपस्थित हो तो क्या उपाय है, और दीपावली या काली चौदस के दिन काली मंदिर में दान के बारे में जो साल भर पहले बताया गया था, वक्ता उत्तर देते हैं कि वह वीडियो चैनल पर उपलब्ध है — उसे देखिए और कीजिए।
यह पूछे जाने पर कि घर में तीन महीने के बच्चे की आत्मा उपस्थित हो तो क्या उपाय है, और दीपावली या काली चौदस के दिन काली मंदिर में दान के बारे में जो लगभग साल भर पहले बताया गया था — वक्ता उत्तर देते हैं कि वह वीडियो चैनल पर उपलब्ध है। उसे देखिए और कीजिए।
अपने-आप प्रकट हुए उस शिवलिंग का क्या, जिसका आकार शिवलिंग जैसा नहीं है?
ओडिशा का पाताल-फूटा शिवलिंग और नर्मदेश्वर का नियम
एक प्रश्नकर्ता ऐसे शिवलिंग के बारे में पूछते हैं जो अपने-आप प्रकट हुआ पर जिसका आकार शिवलिंग जैसा नहीं — जिसे ओडिशा में पाताल-फूटा शिवलिंग कहते हैं। यह पूछते हुए कि वह कहाँ से प्रकट हुआ, वक्ता कहते हैं कि यह बात केवल नर्मदेश्वर जी पर लागू होती है: मूल शिवलिंगों का बहुत आकार नहीं होता। उन्हें घिसकर और रगड़कर आकार दिया जाता है, और उसमें भी कोई विशेष दोष नहीं; पर यदि आप उसे बिल्कुल ठीक प्राकृतिक रूप में रखना चाहें, तो वह आकार और माप में कभी ठीक-ठीक नहीं मिलेगा।
एक प्रश्नकर्ता कहते हैं कि जो शिवलिंग अपने-आप प्रकट हुआ, जिसका आकार शिवलिंग जैसा नहीं — हमारे यहाँ ओडिशा में इन शिवलिंगों को पाताल-फूटा शिवलिंग कहते हैं। वक्ता पूछते हैं कि वह किस स्थान से अपने-आप प्रकट हुआ। यह बात केवल नर्मदेश्वर शिवलिंगम् जी पर लागू होती है: कि मूल शिवलिंगों का बहुत अधिक आकार नहीं होता। उन्हें घिसकर और रगड़कर आकार दिया जाता है, और उसमें भी कोई विशेष दोष नहीं है। पर हाँ, ठीक है — यदि आप उसे बिल्कुल ठीक प्राकृतिक रूप में रखना चाहें, तो वह आकार और माप में कभी ठीक-ठीक नहीं मिलेगा।
ओडिशा के पाताल-फूटा शिवलिंग पर वे बोलने से मना करते हैं, क्योंकि उसके पौराणिक माहात्म्य का उन्हें ज्ञान नहीं
जहाँ ज्ञान नहीं, वहाँ न बोलना
प्रश्नकर्ता जिस ओडिशा के पाताल-फूटा शिवलिंग की बात करते हैं, उसके बारे में वक्ता कहते हैं कि वे नहीं कह सकते कि उनका कोई पौराणिक माहात्म्य या उनका कोई संदर्भ है या नहीं, क्योंकि उन्हें इसका ज्ञान नहीं है। वे केवल नर्मदेश्वर जी के बारे में जानते हैं।
वक्ता कहते हैं कि आप ओडिशा के जिस पाताल-फूटा शिवलिंग की बात करते हैं, उनका कोई पौराणिक माहात्म्य कहीं है या नहीं, उनका कोई संदर्भ — क्योंकि हमें इसका ज्ञान नहीं है, हम नहीं कह सकते कि वहाँ ऐसी कोई बात है। हम केवल नर्मदेश्वर जी के बारे में जानते हैं।
दीपदान पाँच दीपकों का है या सोलह का?
सोलह दीपक, रात आठ बजे के बाद सबसे अच्छा
पंचदीप दान के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि सोलह दीप दान करना है। आप शाम के समय भी कर सकते हैं; रात में करें तो सबसे उत्तम है। आठ बजे के बाद कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि पंचदीप दान — सोलह दीप दान करना है। आप शाम के समय भी कर सकते हैं; यदि रात में करें, तो सबसे उत्तम है। आठ बजे के बाद कीजिए।
अपने बीजाक्षर के बारे में कैसे पता चलता है?
वीडियो में बताया गया बीजाक्षर
यह पूछे जाने पर कि बीजाक्षर के बारे में कैसे पता चलेगा, वक्ता उत्तर देते हैं कि यह वीडियो में बताया गया है — यदि मकर में करना है, तो उन्होंने बताया है।
यह पूछे जाने पर कि बीजाक्षर के बारे में कैसे पता चलेगा, वक्ता उत्तर देते हैं कि यह वीडियो में बताया गया है। यदि उन्हें मकर में करना है, तो बताया गया है।
क्या लोग आज भी आकाश मूर्ति देखते हैं?
बच्चों का अधिक देखना, और अब यह कितना कठिन हो गया है
एक श्रोता के यह कहने पर कि उसने भी देखा है, वक्ता कहते हैं कि बहुत-से लोगों ने देखा होगा। कोई विश्वास करे या न करे, यह अलग बात है; बच्चे अधिक देखते हैं, और अब देख पाना कठिन है।
एक श्रोता आकाश मूर्ति के बारे में कहते हैं कि मैंने भी देखा है, और वक्ता उत्तर देते हैं कि बहुत-से लोगों ने देखा होगा। कोई विश्वास भी नहीं करेगा — विश्वास करना और न करना अलग बात है। बच्चे अधिक देखते हैं। और अब देख पाना कठिन है।
कालीमठ में रात रुका व्यक्ति तब से अशांत क्यों होगा?
ऐसे क्षेत्रों में मंत्र जप से उत्तेजित होने वाली शक्तियाँ
एक श्रोता कहते हैं कि उनका एक रिश्तेदार कालीमठ में रात रुका था और आज तक मानसिक अशांति से पीड़ित है, घर भी नहीं आता और इधर-उधर भटकता है। वक्ता कहते हैं कि वे टिप्पणी करने वाले व्यक्ति को नहीं जानते, और सावधान करते हैं कि लोग यह न सोचें कि श्रोताओं को ऐसी टिप्पणी करने को कहा गया था — और फिर पुष्टि करते हैं: यह बात सच है। यदि आप यात्रा करके ऐसे क्षेत्रों में जाएँ और वहाँ अपनी उपस्थिति बनाएँ, तो जब शक्तियाँ आपके मंत्र जप से प्रभावित होंगी, वे उत्तेजित होंगी और आपको बहुत दिव्यता का अनुभव कराएँगी।
एक श्रोता कहते हैं कि उनका एक रिश्तेदार कालीमठ में रात रुका था और आज तक मानसिक अशांति से पीड़ित है, घर भी नहीं आता, और इधर-उधर भटकता रहता है। वक्ता कहते हैं कि वे टिप्पणी करने वाले इस व्यक्ति को नहीं जानते, और जोड़ते हैं कि ऐसा न हो कि लोग सोचें कि उन्होंने श्रोताओं को ऐसी टिप्पणी करने को कहा था। वे कहते हैं कि तो देखिए, यह बात सच है। यदि आप उस तरह के क्षेत्रों में यात्रा करें, वहाँ जाकर अपनी उपस्थिति बनाएँ, तो जब शक्तियाँ आपके मंत्र जप से प्रभावित होंगी, वे उत्तेजित होंगी और आपको बहुत दिव्यता का अनुभव कराएँगी।
जो गुरु वास्तव में चमत्कारी हैं, उन्हें अपने शिष्यों को समर्थ बनाना चाहिए
चमत्कारी गुरु को शिष्यों को समर्थ बनाना चाहिए
वक्ता कहते हैं कि लोग कहते हैं कि दूसरे कर रहे हैं, कोई और कर रहा है, हमारे अमुक गुरुजी चमत्कारी व्यक्ति हैं, उन्होंने ऐसा किया। यदि आपके गुरुजी इतने चमत्कारी हैं और आप उनके इतने प्रिय शिष्य हैं, तो आपकी अपनी क्षमता में कमी कहाँ से आई? आपको उनसे समर्पण के साथ सीखना चाहिए था। वे केवल चमत्कार दिखाने वाले गुरु नहीं हैं — चमत्कार दिखाने वाले को अपने शिष्यों को महान बनाना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि फिर आपको लगेगा कि दूसरे कर रहे हैं, हम कर रहे हैं, कोई और कर रहा है, तीसरा कर रहा है, हमारे अमुक गुरुजी चमत्कारी व्यक्ति हैं, उन्होंने ऐसा किया। यदि गुरुजी इतने चमत्कारी हैं, और यदि आप उनके इतने प्रिय शिष्य हैं, तो भाई, आपकी क्षमता में कमी कहाँ से आई? आपको उनसे समर्पण के साथ सीखना चाहिए था। वे केवल चमत्कार दिखाने वाले गुरु तो नहीं हैं — भाई, चमत्कार दिखाने वाले को अपने शिष्यों को महान बनाना चाहिए।
शिष्य को कितने समय में योग्य हो जाना चाहिए?
दो-तीन साल, और वह गुरु जो केवल मदारी है
वक्ता कहते हैं कि आपने गुरु से कुछ नहीं सीखा — या तो आपमें योग्यता नहीं थी, और आप भ्रम में रहे, या गुरुजी ने आपको योग्य नहीं समझा और नहीं सिखाया। यदि आप सुन रहे हैं कि अमुक व्यक्ति के गुरु चमत्कारी हैं, या आपके अपने गुरु चमत्कारी हैं, तो कुछ समय बाद, दो-तीन साल बाद, वह समय आना चाहिए जब आप इतने योग्य हो जाएँ कि आपके गुरुजी आपको ऐसी विद्याएँ सिखाएँ। कम से कम यह मदारी का काम नहीं है कि गुरुजी तमाशा दिखा रहे थे — यह चमत्कार दिखाया, वह यंत्र दिखाया। तब लाभ क्या? तब वे केवल मदारी ही रह गए।
वक्ता कहते हैं कि आपने गुरु से कुछ नहीं सीखा; गुरु ने नहीं दिया — या तो आपमें योग्यता नहीं थी। तब आप भ्रम में रहे; या गुरुजी ने आपको योग्य नहीं समझा और नहीं सिखाया। यदि आप किसी के बारे में सुन रहे हैं कि अमुक व्यक्ति के गुरु चमत्कारी हैं, या मेरे गुरु चमत्कारी हैं, तो कुछ समय बाद, एक साल, दो साल, तीन साल बाद, वह समय आना चाहिए। आपको योग्य हो जाना चाहिए था, ताकि आपके गुरुजी आपको ऐसी विद्याएँ सिखाएँ। कम से कम — यह केवल मदारी का काम नहीं है कि गुरुजी तमाशा दिखा रहे थे, यह चमत्कार दिखा रहे थे, वह यंत्र दिखा रहे थे। तब लाभ क्या? तब वे मदारी ही रह गए।
गुरु का ज्ञान और शिष्य का सीखना सार्थक कैसे होता है?
शिष्य में योग्यता पैदा होना, और ज्ञान का आगे जाना
वक्ता कहते हैं कि शिष्य के भीतर योग्यता पैदा होनी चाहिए थी। वे कहते हैं कि उन्हें गर्व है कि उनके गुरुजी ने जो सिखाया, वह आज वे समाज को दे रहे हैं। यदि हमने दीपदान करना सीखा, और हम उसे करके चैनल पर दिखाएँ, और उसे देखकर सौ लोग करें, तो हमारे गुरुजी का ज्ञान और हमारा ज्ञान दोनों सार्थक हो रहे हैं — और कहीं न कहीं हमारे माता-पिता का हमें जन्म देना सार्थक है।
वक्ता कहते हैं कि शिष्य के भीतर योग्यता पैदा होनी चाहिए थी। हमें गर्व है कि हमारे गुरुजी ने जो सिखाया, वह हम आज समाज में दे रहे हैं। यदि हमने दीपदान करना सीखा है, और यदि हम उसे करके चैनल पर दिखाएँ, और उसे देखकर सौ लोग करें — तो हमारे गुरुजी का ज्ञान और हमारा ज्ञान, दोनों सार्थक हो रहे हैं न; कहीं न कहीं हमारे माता-पिता का हमें जन्म देना सार्थक है।
अधिक दीपदान क्यों करना चाहिए?
उसी अनुपात में प्रसन्न होती शक्तियाँ, और देव शक्तियों का जानना कि अनुष्ठान चल रहा है
वक्ता कहते हैं कि जितना अधिक दीपदान होगा, शक्तियाँ उतनी प्रसन्न होंगी और उतनी कृपा करेंगी। यदि आज वे शरद पूर्णिमा के बारे में कह रहे हैं कि शरद पूर्णिमा पर यह करना चाहिए, तो आप क्या सोचते हैं — वे कल बैठकर लाइव करेंगे? जब आप करेंगे, वे भी उस समय करेंगे। देव शक्तियों को पता चलना चाहिए कि हाँ, अनुष्ठान हो रहा है, मंत्रों का जप चल रहा है, और नए लोग इसमें जुड़ रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसीलिए वे आपको यह बताते हैं, ताकि आप भी दूसरों को बताएँ। जितना अधिक दीपदान होगा, शक्तियाँ उतनी प्रसन्न होंगी, उतनी कृपा करेंगी। यदि आज हम शरद पूर्णिमा के बारे में कह रहे हैं कि शरद पूर्णिमा पर यह कीजिए, यह करना है — तो आप क्या सोचते हैं, क्या हम कल बैठकर लाइव करेंगे? जब आप करेंगे, हम भी उस समय करेंगे। हम इसे जाने नहीं देंगे। देव शक्तियों को पता चलना चाहिए कि हाँ, अनुष्ठान हो रहा है, मंत्रों का जप चल रहा है। नए लोग इसमें जुड़ें।
पहले शरद पूर्णिमा को कैसे समझा जाता था?
छत पर खीर, और यह धारणा कि यह बंगाली पर्व है
वक्ता कहते हैं कि पहले ये बातें दब जाती थीं। शरद पूर्णिमा क्या है — बंगाली लोग पूजा कर रहे हैं, यही सुनने में आता था; यह बंगाली लोगों का पर्व है, ये लोग लखी पूजा कहते हैं, कौन जाने। बाकी लोग क्या कर रहे हैं? खीर बनाई और बस छत पर रख दी; सुबह खाएँगे, अमृत मिलेगा, हमारे रोग आदि इससे नष्ट होंगे — और इससे अधिक कोई अर्थ नहीं।
वक्ता कहते हैं कि पहले ये बातें दब जाती थीं। शरद पूर्णिमा क्या है? बंगाली लोग पूजा कर रहे हैं — यही सुनने में आता था। यह बंगाली लोगों का पर्व है, ये लोग लखी पूजा कहते हैं। कौन जाने। बाकी लोग क्या कर रहे हैं? खीर बनाई और बस छत पर रख दी; सुबह खाएँगे, अमृत मिलेगा, हमारे रोग आदि इससे नष्ट होंगे — और इसके अलावा कोई अर्थ नहीं।
हर गृहस्थ और जन्मा हर सनातनी साधक है, कोई एक चुना हुआ व्यक्ति नहीं
हर गृहस्थ और जन्मा हर सनातनी साधक
वक्ता कहते हैं कि आज वह समय है जिसमें हम चर्चा कर रहे हैं कि यह केवल एक साधक के लिए नहीं — हर गृहस्थ साधक है, जन्म लेने वाला हर सनातनी साधक है। उसका जन्म इसी कारण हुआ है कि उसे साधना करनी थी। वह भटक गया है, भाई, भूल गया है; उसे सही राह पर लाना है, जगाना है और कहना है: भाई, याद करो, जन्म साधना के लिए हुआ है, तो करो — सहस्रार्चन करो, महालक्ष्मी चक्र करो।
वक्ता कहते हैं कि आज वह समय है जिसमें हम चर्चा कर रहे हैं कि भाई, यह केवल एक साधक के लिए नहीं है; हर गृहस्थ साधक है। जन्म लेने वाला हर सनातनी साधक है। उसका जन्म इसी कारण हुआ है कि उसे साधना करनी थी। वह भटक गया है, भाई, वह भूल गया है। उसे सही राह पर लाना है न; उसे जगाना है, कहना है: भाई, याद करो। जन्म साधना के लिए हुआ है — करो। सहस्रार्चन करो, महालक्ष्मी चक्र करो, करो।
वैराग्य से पहले इच्छाओं की पूर्ति क्यों आवश्यक है?
श्री तत्व, कामनाओं की पूर्ति और चार पुरुषार्थ
वक्ता कहते हैं कि श्री तत्व मिलेगा, इच्छाएँ पूरी होंगी, और तब आपके भीतर वैराग्य आएगा — कि हाँ, हमें दिव्य मार्ग पर जाना है। यदि इच्छाएँ पूरी ही नहीं हो रहीं, तो हम वैरागी कहाँ से होंगे? यह भी सच है। इसलिए इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी साधना करनी होगी। मंत्र में वह क्षमता है कि वह सब कुछ दे सकता है — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष; चारों पुरुषार्थ उससे मिलेंगे, पर तभी जब कोई करे।
वक्ता कहते हैं कि श्री तत्व मिलेगा, इच्छाएँ पूरी होंगी; तब आपके भीतर वैराग्य आएगा, कि हाँ, हमें दिव्य मार्ग पर जाना है। यदि इच्छाएँ पूरी ही नहीं हो रहीं, तो हम वैरागी कहाँ से होंगे? यह भी सच है। तो इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी साधना करनी होगी न। मंत्र में वह क्षमता है कि वह सब कुछ दे सकता है: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। चारों पुरुषार्थ उससे मिलेंगे — पर तभी जब कोई करे। तो दिव्य काल का लाभ लिया जाए।
क्या ज्ञान और सिद्धि को अपने तक रखना चाहिए?
गुरु की सिखाई बात आगे देना ताकि वह फैले
वक्ता पूछते हैं कि यह सार्थकता कहाँ से आ रही है — गुरु ने जो सिखाया, हमने सीखा, जो हम आपके सामने रख रहे हैं; आप सीखेंगे, अपने बच्चों को सिखाएँगे, और यह बढ़ेगा; जितना बढ़ेगा, जितना फलेगा-फूलेगा, हम सबका उतना कल्याण होगा। इसे अपने तक सीमित क्यों रखना, सिद्धि को अपने तक सीमित क्यों रखना, मानो केवल हम ही सब कुछ जानते हैं। कम से कम इतना दीजिए कि सामने वाले के जीवन में बदलाव आए।
वक्ता पूछते हैं कि तो यह सार्थकता कहाँ से आ रही है। गुरु ने जो सिखाया, हमने सीखा; जो हम आपके सामने रख रहे हैं। आप सीखेंगे, अपने बच्चों को सिखाएँगे। यह बढ़ेगा। जितना बढ़ेगा, जितना फलेगा-फूलेगा, हम सबका उतना कल्याण होगा। इसे अपने तक सीमित क्यों रखना, सिद्धि को अपने तक सीमित क्यों रखना — हर ज्ञान, मानो हम भी कुछ बड़ा जान रहे हैं, मानो हम ही सब कुछ हैं। कम से कम इतना दीजिए कि सामने वाले के जीवन में बदलाव आए।
नवरात्रि में सुबह तीन बजे ऊपर से गुज़रता जलता आग का गोला ऐसा ही दर्शन माना गया
एक श्रोता के नवरात्रि वाले दृश्य की पुष्टि
एक श्रोता कहते हैं कि नवरात्रि में सुबह तीन बजे छत पर नहाते समय जलते आग के गोले जैसा कुछ ऊपर से गुज़र रहा था, और वह बहुत ऊँचा नहीं था, इसलिए विमान नहीं हो सकता था। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह सही है।
एक श्रोता कहते हैं कि हमने नवरात्रि में देखा: सुबह तीन बजे छत पर नहाते समय जलते आग के गोले जैसा कुछ ऊपर से गुज़र रहा था। वह बहुत ऊँचा नहीं था, इसलिए यह संभव नहीं कि वह विमान आदि हो। वक्ता उत्तर देते हैं कि यह सही है।
क्या कमल के आसन पर बैठी काली एक मान्य रूप है?
कमल आसन पर माता काली
कमल के आसन पर बैठी माता काली के बारे में पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि यह बिल्कुल उनका एक रूप है।
कमल के आसन पर बैठी माता काली — वक्ता उत्तर देते हैं कि वह भी बिल्कुल उनका एक रूप है।
संधि काल के बचे नारियलों का क्या करना है?
नौ कन्याओं को या मंदिर में देना
यह पूछे जाने पर कि संधि काल के नारियल बच गए हों और खाना संभव न हो, तो क्या करें, वक्ता कहते हैं कि उन्हें नौ कन्याओं को दे देना चाहिए। वे कहते हैं कि जब संधि काल में पूजन होता है, तो कन्या पूजन के लिए आने वाली नौ कन्याओं को दे देने चाहिए, या मंदिर में दे देने चाहिए। दे दीजिए।
संधि काल के नारियल बच गए हैं और खाना संभव नहीं है; क्या करना चाहिए — वक्ता कहते हैं कि उन्हें नौ कन्याओं को दे देना चाहिए। वे कहते हैं कि जब संधि काल में पूजन होता है, तो कन्या पूजन के लिए जो नौ कन्याएँ आती हैं, उन्हें दे दीजिए; मंदिर में दे दीजिए। उन्हें देते जाइए।
नहीं तो भगवती के भक्तों में बाँट दीजिए, या घर पर चटनी बना लीजिए
भक्तों में बाँटना, और घर पर चटनी बनाना
वक्ता कहते हैं कि अब यदि संभव नहीं हो रहा, तो बाँट दीजिए — और क्या कहा जाए। उन्हें ऐसे लोगों को दीजिए जो भगवती के भक्त हों; हर किसी को मत दीजिए। दे दीजिए। घर-परिवार में बाँटकर खाइए; उनकी चटनी बनाकर खाइए — वे कहते हैं कि वे स्वयं उनकी चटनी बनाकर खाते रहते हैं। वे इसमें एक और बात उठाने लगते हैं और फिर उसे छोड़ देते हैं, कहते हुए कि जो दो-चार नारियल वे रखते हैं, उनकी चटनी बनाकर खाते रहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि अब यदि संभव नहीं हो रहा, तो बाँट दीजिए, और क्या कहा जाए। उन्हें ऐसे लोगों को दीजिए जो भगवती के भक्त हों; यानी हर तरह के लोगों को मत दीजिए। दे दीजिए। घर-परिवार में बाँटकर खाइए; उनकी चटनी बनाकर खाइए — हम चटनी बनाकर खाते रहते हैं। जितने नौ कन्याओं को दिए जाते हैं, देखिए, उसमें भी एक और बात है — ठीक है, उस बात को छोड़ देते हैं, वे कहते हैं; पर जो दो-चार नारियल हम रखते हैं, उनकी चटनी बनाकर खाते रहते हैं।
क्या माँ के स्वास्थ्य के लिए रात्रि सूक्त का पाठ किया जा सकता है?
स्वस्थ होने के लिए रात्रि सूक्त का पाठ
यह पूछे जाने पर कि क्या वह अपनी माँ के स्वास्थ्य के ठीक होने के लिए रात्रि सूक्त का पाठ कर सकती हैं, वक्ता उत्तर देते हैं: हाँ, आप बिल्कुल कर सकती हैं।
एक श्रोता पूछती हैं कि क्या मैं अपनी माँ के स्वास्थ्य के ठीक होने के लिए रात्रि सूक्तम् का पाठ कर सकती हूँ। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल, आप कर सकती हैं।
क्या शिव की आवरण पूजा यंत्र के बजाय शिवलिंग पर की जा सकती है?
शिवलिंग का आवरण पूजन एक अलग विषय
यह पूछे जाने पर कि यंत्र के अलावा क्या शिव जी की आवरण पूजा शिवलिंग पर भी हो सकती है, वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं। शिवलिंग पर आप पूरे संसार की पूजा कर लीजिए — पर आवरण पूजन की बात कुछ अलग है, और उसके लिए अलग बताया गया है। शिवलिंग का आवरण पूजन भी अलग है। और फिर यह भी देखना होगा कि शिवलिंग कौन-सा है: हरिहर शिवलिंग है या शक्ति शिवलिंग — तब आप कैसे करेंगे?
एक श्रोता पूछते हैं कि शिव जी की आवरण पूजा के यंत्र के अलावा, क्या यह शिवलिंग पर भी की जा सकती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि नहीं। शिवलिंग पर आप पूरे संसार की पूजा कर लीजिए, पर आवरण पूजा की बात कुछ उस तरह की है; उसके लिए अलग बताया गया है। शिवलिंग का आवरण पूजन भी अलग है। और फिर शिवलिंग कौन-सा है — यह भी देखना होगा न। हरिहर शिवलिंग है, या शक्ति शिवलिंग है? तब आप कैसे करेंगे?
क्या माँ कमला के मंत्र का जप किया जा सकता है?
शर्त है दस महाविद्याओं में दीक्षा
यह पूछे जाने पर कि क्या माँ कमला के मंत्र का जप किया जा सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं: यदि आप दस महाविद्याओं में दीक्षित हैं, तो कीजिए। नहीं तो सहस्रनाम आदि का पाठ कीजिए, सतनाम कीजिए, महालक्ष्मी अष्टक कीजिए। वह कीजिए जिससे आपको जल्दी लाभ मिले।
क्या माँ कमला के मंत्र का जप किया जा सकता है — वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि आप दस महाविद्या में दीक्षित हैं, तो कीजिए। नहीं तो सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। आदि का पाठ कीजिए, सतनाम कीजिए, महालक्ष्मी अष्टक कीजिए। वह कीजिए जिससे आपको जल्दी लाभ मिले।
अधिकार के बिना दी गई अनुमति से दोष केवल पूछने वाले को लगता है
अधिकार न होने पर लगने वाला दोष
वक्ता कहते हैं कि वह नहीं करना है जिसका अधिकार न हो, ताकि दोष लेकर बैठना पड़े। हम कह देंगे कि हाँ, कीजिए — और उससे क्या होगा? आप प्रसन्न हो जाएँगे कि अरे भाई, उन्होंने मेरी बात मान ली, हाँ कह दिया। पर दोष तो आपको लगेगा न। इसलिए वह कीजिए जिससे दोष न लगे और कल्याण भी हो।
वक्ता कहते हैं कि वह नहीं करना है जिसका अधिकार न हो, जिससे दोष लेकर बैठना पड़े। हम कह देंगे कि हाँ, जाइए, कीजिए। उससे क्या होगा? आप प्रसन्न हो जाएँगे — अरे भाई, उन्होंने मेरी बात मान ली, हाँ कह दिया। पर दोष तो आपको लगेगा न। इसलिए वह कीजिए जिससे दोष न लगे और कल्याण भी हो।
कुलदेवी खप्पर विधान कब किया जा सकता है?
दिव्य पर्व पर पौष्टिक विधि, संध्या से आगे
कुलदेवी खप्पर विधान, पौष्टिक विधि, के बारे में वक्ता कहते हैं कि आप इसे जब भी दिव्य पर्व काल हो, कल के समय, पूर्णिमा आदि पर कर सकते हैं। जप का समय संध्या काल से रखिए; और आठ बजे के बाद किया जाए, तो बहुत उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि कुलदेवी खप्पर विधान, पौष्टिक विधि — आप इसे जब भी दिव्य पर्व काल हो, कल के समय, पूर्णिमा आदि पर कर सकते हैं। जप का समय संध्या काल से रखिए। या यदि आठ बजे के बाद किया जाए, तो बहुत उत्तम है।
खप्पर उतारने की विधि बताने से मना किया गया, क्योंकि यह सिद्धि का विषय है
मना करना — यह सिद्धि का विषय है
रोग और बाधा हटाने के लिए खप्पर उतारने की विधि समझाने को कहे जाने पर वक्ता मना कर देते हैं: भाई, वह सिद्धि का विषय है। सिद्धि के बिना इस तरह रोग उतारने की विधि करना ठीक नहीं — यदि वह उतारने वाले को लग जाए, तो समस्या किसी और पर आ पड़ेगी। जानकार लोग ही करें।
एक श्रोता पूछते हैं कि कृपया रोग और बाधा हटाने के लिए खप्पर उतारने की विधि समझाइए। वक्ता उत्तर देते हैं कि भाई, वह सिद्धि का विषय है। सिद्धि के बिना इस तरह रोग उतारने की विधि करना ठीक नहीं है। यदि वह उतारने वाले को लग जाए, तो समस्या किसी और पर आ पड़ेगी। वह जानकार लोग ही करें।
खप्पर उतारने की विधि के बजाय क्या किया जा सकता है?
जैसा दिया गया वैसा खप्पर चढ़ाना, और क्षेत्रपाल का उतारा
वक्ता कहते हैं कि खप्पर चढ़ाइए — चढ़ाने की विधि उतनी ही रखिए जितनी दी गई है। उतारने की विधि में क्षेत्रपाल आदि का उतारा रखिए, जिससे दोष लगने की जो भी संभावना बने, वह मिट जाए, कट जाए और हट जाए। वह मत कीजिए जिससे दोष लगने की संभावना बने। यदि आप परिपक्व नहीं हैं और कोई जानकार व्यक्ति आपके पास प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं है, तो मत कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि खप्पर चढ़ाइए; चढ़ाने की विधि उतनी ही रखिए जितनी दी गई है। उतारने की विधि में क्षेत्रपाल आदि का उतारा रखिए, जिससे दोष लगने की जो भी संभावना बनती दिखे, उससे दोष मिट जाए, कट जाए और हट जाए। वह मत कीजिए जिससे दोष लगने की संभावना बने। यदि आप परिपक्व नहीं हैं, और कोई जानकार व्यक्ति आपके पास प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं है, तो मत कीजिए।
बाँधने और उतारने की विधियाँ सिद्ध शाबरी विद्या चैनल पर दी गई थीं, और उचित कारण से रोक दी गईं
सिद्ध शाबरी विद्या चैनल, और वक्ता ने बाँधने की विधियाँ सिखाना क्यों रोका
वक्ता कहते हैं कि सिद्ध शाबरी विद्या चैनल पर उन्होंने यह विषय छोटे-छोटे टुकड़ों में बहुत दिया है — कि इस मंत्र से घाट ऐसे बाँधा जाता है, रास्ता बाँधा जाता है, और फिर उतारा जाता है। उन्होंने ये विषय शुरू में इसलिए दिए कि सबको पता चलना चाहिए; बाद में उन्होंने पाया कि ये लोग इसे उठाकर, यह-वह करके, अपना ही नुकसान कर लेंगे, इसलिए आगे जाना रोक दिया। पर शुरू के जो वीडियो उन्होंने डाले थे, वे सब वहाँ हैं।
वक्ता कहते हैं कि सिद्ध शाबरी विद्या चैनल पर हमने यह विषय बहुत दिया है, छोटे-छोटे टुकड़ों में: कि इस मंत्र से घाट ऐसे बाँधा जाता है, रास्ता बाँधा जाता है, और फिर उतारा जाता है। ये सब विषय वहाँ क्यों दिए गए? अब उसे कोई ज़्यादा सुनता नहीं। पर उस चैनल को भी सुनिए, तो पता चलेगा कि हाँ, उसमें खप्पर उतारने में और उसे ले जाने में ये सब विधियाँ कैसे प्रयोग होती हैं। हमने ये सब शुरू में इसलिए दिए थे कि हमें लगा यह सबकी जानकारी में आना चाहिए, और हमने सोचा था आगे और बताएँगे। बाद में पता चला कि ये लोग इसे उठाकर, यह-वह करके, अपना ही नुकसान करेंगे — तो फिर हमने आगे जाना रोक दिया।
सुरक्षा पहले — इस क्षेत्र की हर बड़ी दुर्घटना सावधानी हटने के बाद हुई
सुरक्षा पहले
वक्ता कहते हैं कि सुरक्षा पहले। जहाँ सावधानी हटी है, वहाँ इस क्षेत्र में बहुत बड़ी दुर्घटना हुई है।
वक्ता कहते हैं कि सुरक्षा पहले। जहाँ सावधानी हटी है, वहाँ बहुत बड़ी दुर्घटना हुई है — इस क्षेत्र में।
कृष्ण और राधारानी के लिए क्या बताया गया है?
गोपाल सहस्रनाम, राधा अष्टक और राधा कवच
वक्ता कहते हैं कि भगवान श्री कृष्ण के लिए कृष्ण जी का सहस्रनाम, गोपाल सहस्रनाम, बहुत उत्तम, बहुत अद्भुत है। भगवती राधारानी के लिए जो कर सकें, कीजिए: राधा अष्टक का पाठ कीजिए, राधा कवच का पाठ कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि भगवान श्री कृष्ण के लिए कृष्ण जी का सहस्रनाम, गोपाल सहस्रनाम, बहुत उत्तम, बहुत अद्भुत है। भगवती राधारानी के लिए जो कर सकें, कीजिए। राधा अष्टक का पाठ कीजिए; राधा कवच का पाठ कीजिए।
क्या काली का उपासक इस रात उनकी पूजा कर सकता है?
किसी क्षेत्र के लिए अधिकृत रूप
वक्ता कहते हैं कि आप कर सकते हैं — भगवती लक्ष्मी के एक सौ आठ पाठ कर सकते हैं, अष्टक का पाठ कीजिए। यदि आप भगवती काली की उपासना करते हैं, तो ऐसी कोई बात नहीं कि कल न कर सकें; कल महाकाली भी कर सकते हैं। पर भगवती का वह रूप है जिसे वह क्षेत्र दिया गया है, कि आपका यह रूप इस क्षेत्र के लिए अधिकृत है। तो यदि हम वही करें, तो उस क्षेत्र में ठीक से प्राप्ति होगी। पूरी बात यही है।
वक्ता कहते हैं कि आप कर सकते हैं। आप भगवती लक्ष्मी के एक सौ आठ पाठ कर सकते हैं; अष्टक का पाठ कीजिए। यदि आप भगवती काली का करते हैं, तो ऐसी कोई बात नहीं कि आप कल न कर सकें; कल महाकाली भी कर सकते हैं। पर भगवती का वह रूप है जिसे वह क्षेत्र दिया गया है, कि आपका यह रूप इस क्षेत्र के लिए अधिकृत है। तो यदि हम उनका करें, तो उस क्षेत्र में हमें ठीक से प्राप्ति होगी। बात बस इतनी है।
सप्तचंडी का आवरण पूजन चैनल वाले से कैसे अलग है?
हर आवरण के न्यास मंत्रों सहित विस्तृत पीठ पूजा
सप्तचंडी के समय दुर्गा जी के आवरण पूजन के विधान के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह वही है जो चैनल पर दिया गया है — उसका कुछ विस्तृत रूप; कुछ नहीं, बहुत ही विस्तृत रूप। चैनल पर जो है, वह प्रारंभिक विषय है। और सप्तचंडी आदि में पीठ पूजा बहुत विस्तृत रूप में होती है, न्यास मंत्रों के साथ हर एक आवरण के पूजन का विधान होता है।
वक्ता कहते हैं कि सप्तचंडी के समय दुर्गा जी के आवरण पूजन का विधान वही है जो चैनल पर दिया गया है; यह उसी का कुछ विस्तृत रूप है। कुछ — नहीं, बहुत ही विस्तृत रूप। चैनल पर जो दिया गया है, वह प्रारंभिक विषय है। और सप्तचंडी आदि में जो होता है, उसमें पीठ पूजा बहुत विस्तृत रूप में होती है। न्यास मंत्रों के साथ, हर एक आवरण के पूजन का विधान होता है।
क्या पर्वत की चोटियाँ जंगली जानवरों से भरी नहीं होतीं?
विंध्याचल की चोटी, आसपास होटल, फिर भी पूरा फल
एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि नहीं, ऐसा नहीं कि पर्वत की चोटी पर जंगली जानवर आते-जाते रहते हैं। विंध्याचल जाइए — माँ विंध्यवासिनी विंध्याचल की सबसे ऊँची चोटी पर विराजमान हैं, तो अब वहाँ जंगल कहाँ बचा; दोनों ओर होटल बन गए हैं। तो विंध्याचल परिसर में भगवती के मंदिर के आसपास कहीं भी बैठकर कीजिए; वह पर्वत की चोटी ही है। एकांत नहीं मिलेगा, पर दिव्यता है, और जो पूरा फल मिलना है, वह अवश्य मिलेगा।
वक्ता उत्तर देते हैं कि नहीं, ऐसा नहीं कि पर्वत की चोटी पर जंगली जानवर आते-जाते रहते हैं। विंध्याचल जाइए। माँ विंध्यवासिनी विंध्याचल की सबसे ऊँची चोटी पर विराजमान हैं। तो अब वहाँ जंगल कहाँ बचा — दोनों ओर होटल बन गए हैं। तो विंध्याचल के परिसर में, भगवती के मंदिर के आसपास कहीं भी बैठकर कीजिए। वह पर्वत की चोटी ही है। एकांत नहीं मिलेगा, पर दिव्यता है, और जो पूरा फल मिलना है, वह अवश्य मिलेगा।
क्या तीर्थ में होटल के कमरे में रात का जप करना ठीक है?
कठिनाई से सहमति, पर मंदिर परिसर में बैठने का निर्देश
एक श्रोता कहते हैं कि पर्व काल में वे तीर्थ क्षेत्र के होटल में कमरा लेकर रात को जप करते हैं, और कोई दूसरा विकल्प नहीं दिखता। वक्ता कहते हैं कि वे इससे सहमत हैं, पर आपको मंदिर के परिसर में ही जाकर जप करना चाहिए; होटल में नहीं करना चाहिए।
एक श्रोता कहते हैं कि पर्व काल में मैं तीर्थ क्षेत्र में होटल में कमरा लेकर रात को जप करता हूँ; इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प दिखता भी नहीं। वक्ता उत्तर देते हैं कि इस बात से हम सहमत हैं। पर आपको मंदिर के परिसर में ही जाकर जप करना चाहिए; होटल में नहीं करना चाहिए।
क्या रामचरितमानस की चौपाई से रुद्रगण साधना की जा सकती है?
चौपाई, और आसन बंधन के भीतर पढ़ा गया कवच
यह पूछे जाने पर कि क्या रामचरितमानस की चौपाई से रुद्रगण साधना की जा सकती है, वक्ता कहते हैं हाँ, बिल्कुल की जा सकती है। यह पूछे जाने पर कि क्या आसन बंधन के भीतर पढ़ा गया कवच प्रयोग किया जा सकता है, वे कहते हैं हाँ, बिल्कुल — बंधन केवल आसन बाँधने के लिए नहीं है; जैसे ही आप कवच पढ़ेंगे, उसमें बंधन की जो भी बात है, वह सब पूरी हो जाएगी।
क्या रामचरितमानस की चौपाई से रुद्रगण साधना की जा सकती है — वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल की जा सकती है। क्या आसन बंधन के भीतर पढ़ा गया कवच प्रयोग किया जा सकता है — हाँ, बिल्कुल प्रयोग किया जा सकता है। बंधन केवल आसन बाँधने के लिए नहीं है। जैसे ही आप कवच पढ़ेंगे, उसमें बंधन की जो भी बात है, वह सब पूरी हो जाएगी।
एकाक्षी नारियल को कब जगाया जा सकता है?
इस रात, या मार्गशीर्ष अष्टमी
वक्ता कहते हैं कि दिशा, आसन और शरीर सब सुरक्षित हो जाएँगे। ऐसे एकाक्षी नारियल के बारे में पूछे जाने पर जिसका कोई विधान नहीं हुआ, कि क्या उसे इस रात या मार्गशीर्ष अष्टमी पर जगाया जा सकता है, वे उत्तर देते हैं: हाँ, बिल्कुल, जाइए और कीजिए — यह बहुत उत्तम है।
वक्ता कहते हैं कि दिशा, आसन, शरीर — सब सुरक्षित हो जाएँगे। एक एकाक्षी नारियल है और उसका कोई विधान नहीं हुआ; क्या उसे इस रात, मार्गशीर्ष अष्टमी पर, जगाया जा सकता है — वे उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल, जाइए और कीजिए; यह बहुत उत्तम है।
क्या सिंहवाहिनी अंबा का विग्रह मार्गशीर्ष अर्चन के लिए प्रयोग हो सकता है?
दुर्गा अर्चन, और मध्यम चरित्र का महालक्ष्मी ध्यान
यह पूछे जाने पर कि घर में रखे सिंहवाहिनी अंबाजी माँ के विग्रह को मार्गशीर्ष के अर्चन के लिए प्रयोग किया जा सकता है या नहीं, वक्ता कम करने को कहते हैं — दुर्गा अर्चन ही कीजिए। वे श्री दुर्गा सप्तशती की ओर ध्यान दिलाते हैं: मध्यम चरित्र में कौन-सा ध्यान मंत्र है? वह भगवती महालक्ष्मी का ध्यान मंत्र है — और उसमें भगवती कौन-सी महालक्ष्मी हैं? जो अष्टादश भुजा धारण करती हैं, अठारह भुजाओं वाली भगवती, उन्हें वहाँ महालक्ष्मी का रूप कहा गया है।
एक श्रोता पूछते हैं कि घर में सिंह वाहिनी अंबाजी माँ का विग्रह है; क्या उसे मार्गशीर्ष के अर्चन के लिए प्रयोग किया जा सकता है। वक्ता कहते हैं कि कम कीजिए। दुर्गा अर्चन ही कीजिए। देखिए, भगवती दुर्गा जी के बारे में: जब हम श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं, तो मध्यम चरित्र में कौन-सा ध्यान मंत्र है? उसमें भगवती महालक्ष्मी का ध्यान मंत्र है। और उसमें भगवती कौन-सी महालक्ष्मी हैं? जो अष्टादश भुजा धारण करती हैं, अठारह भुजाओं वाली भगवती — उन्हें वहाँ महालक्ष्मी का रूप कहा गया है।
सिंहवाहिनी दुर्गा पर कौन-सा सहस्रनाम प्रयोग किया जा सकता है?
दुर्गा सहस्रनाम या महालक्ष्मी सहस्रनाम, दोनों फलदायी
वक्ता कहते हैं कि तो यदि आप भगवती की सिंहवाहिनी दुर्गा जी पर दुर्गा सहस्रनाम से, या महालक्ष्मी सहस्रनाम से अर्चन करें, तो वह भी फलदायी होगा। बिल्कुल, आप कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि तो यदि आप भगवती की सिंह वाहिनी दुर्गा जी पर दुर्गा सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। से, या महालक्ष्मी सहस्रनाम से भी, अर्चन आदि करें, तो वह भी फलदायी होगा। बिल्कुल, आप कर सकते हैं।
महालक्ष्मी अष्टक को कैसे खोजना चाहिए?
पाठ खोजने के लिए शब्द
वक्ता कहते हैं कि महालक्ष्मी अष्टक खोजिए — "महालक्ष्मी अष्टक गृहस्थ तंत्र" लिखने पर आ जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि महालक्ष्मी अष्टक खोजिए। "महालक्ष्मी अष्टक गृहस्थ तंत्र" लिखने पर आ जाएगा।
अर्चन पंचाक्षरी यंत्र पर करें या विग्रह पर?
अभी श्री विग्रह पर, जब तक रूप आपके नित्य जप से मेल न खाए
यह पूछे जाने पर कि भगवती का अर्चन पंचाक्षरी यंत्र पर करें या उनके श्री विग्रह पर, वक्ता कहते हैं: श्री विग्रह पर कीजिए; अभी श्री विग्रह पर कीजिए। यदि आप जिस रूप का नित्य जप आदि करते हैं, उसी से जुड़े पंचाक्षरी यंत्र पर अर्चन करना चाहते हैं, तो उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है।
भगवती का अर्चन पंचाक्षरी यंत्र पर करें या उनके श्री विग्रह पर — वक्ता कहते हैं कि श्री विग्रह पर कीजिए। अभी श्री विग्रह पर कीजिए। यदि आप जिस रूप का नित्य जप आदि करते हैं, उससे जुड़े पंचाक्षरी मंत्र यंत्र पर अर्चन करना चाहते हैं, तो उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है।
क्या परिवार में मृत्यु के बाद अनुष्ठान में जुड़ सकते हैं?
सूतक के कारण भागीदारी नहीं
एक श्रोता के यह बताने पर कि दशहरे के दिन उनके चाचा का देहांत हुआ, वक्ता कहते हैं: तब तो आप अभी सूतक में हैं न — अभी अनुष्ठान में भाग कैसे लेंगे? अभी भाग मत लीजिए।
एक श्रोता कहते हैं कि दशहरे के दिन मेरे चाचा का देहांत हो गया। वक्ता उत्तर देते हैं कि तब तो आप अभी सूतक में हैं न। अब आप अनुष्ठान में भाग कैसे लेंगे? अभी मत लीजिए।
क्या ब्राह्मण द्वारा स्थापित श्री यंत्र पर दुर्गा का आवरण पूजन हो सकता है?
श्री विद्या दीक्षा और ललितांबा का अर्चन
यह पूछे जाने पर कि जिस श्री यंत्र का पूजन और स्थापना किसी ब्राह्मण ने की, क्या उस पर माँ दुर्गा जी का आवरण पूजन हो सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं। जब वहाँ भगवती का श्री यंत्र विराजमान है, तो आप श्री विद्या में दीक्षित होकर केवल उन्हीं का अर्चन और पूजन करेंगे — आप भगवती ललितांबा का करेंगे।
पूजन और स्थापना एक ब्राह्मण ने की थी; क्या उस श्री यंत्र पर माँ दुर्गा जी का आवरण पूजन हो सकता है — वक्ता उत्तर देते हैं कि नहीं। जब वहाँ भगवती का श्री यंत्र विराजमान है, तो श्री विद्या में दीक्षित होकर आप केवल उन्हीं का अर्चन और पूजन करेंगे न। आप भगवती ललितांबा का करेंगे।
उस पर किसी भी देवी का सहस्रनाम अर्चन हो सकता है, पर आवरण पूजन केवल यंत्र के अपने देवता का
किसी भी देवी का सहस्र अर्चन, पर आवरण पूजन केवल यंत्र के अपने देवता का
वक्ता कहते हैं कि इस तरह आप दुर्गा जी का सहस्रनाम अर्चन कर सकते हैं, पर आवरण पूजन नहीं कर पाएँगे — उसमें आवरण कैसे करेंगे। आप दुर्गा जी का सहस्र अर्चन कर सकते हैं; काली जी का करने की इच्छा हो, तो काली जी का सहस्र अर्चन कीजिए; उस पर किसी भी देवी का अर्चन कीजिए, अर्चन करने में कोई समस्या नहीं, सबकी उपस्थिति वहाँ मानी गई है। पर आवरण पूजन आप केवल उसी देवता का करेंगे जिसका वह यंत्र है।
वक्ता कहते हैं कि इस तरह आप दुर्गा जी का सहस्रनाम अर्चन कर सकते हैं, पर आवरण पूजन नहीं कर पाएँगे; उसमें आवरण कैसे करेंगे। आप दुर्गा जी का सहस्र अर्चन कर सकते हैं; यदि काली जी का करने की इच्छा हो, तो काली जी का सहस्र अर्चन कीजिए। उस पर किसी भी देवी का अर्चन कीजिए — अर्चन करने में कोई समस्या नहीं; सबकी उपस्थिति वहाँ मानी गई है। पर आवरण पूजन आप केवल उसी देवता का करेंगे जिसका वह यंत्र है।
महालक्ष्मी का जप किस माला पर करना चाहिए?
नौमुखी माला, पंचमुखी भी संभव
यह पूछे जाने पर कि क्या महालक्ष्मी माई का जप नौमुखी माला पर किया जा सकता है, वक्ता कहते हैं हाँ, और पंचमुखी पर भी किया जा सकता है। जो भी आपके पास हो — नौमुखी पर कीजिए।
क्या महालक्ष्मी माई का जप नौमुखी माला पर किया जा सकता है — वक्ता कहते हैं कि किया जा सकता है, और पंचमुखी पर भी किया जा सकता है। जो भी आपके पास हो। नौमुखी पर कीजिए।
जो जीवन भर पाप करते हैं और काशी में मरते हैं, वे कहाँ जाते हैं?
भैरवी यातना, और उसके बाद की पोस्टिंग
यह पूछे जाने पर कि जो जीवन भर पाप करते हैं और अंतिम क्षणों में काशी यात्रा पर प्राण त्यागते हैं, वे कहाँ जाते हैं, वक्ता कहते हैं कि भैरव जी उन्हें पीटकर, काटकर बराबर कर देते हैं — उन्हें भैरव यातना, भैरवी यातना दी जाती है, जो यम यातना से हज़ारों गुना भयंकर मानी गई है। भैरव जी उन्हें नरक नहीं भेजते; काशी में मृत्यु पर यदि ऐसी बात आए, तो वह अकाल मृत्यु की नहीं, पूर्णायु की बात है। तो यदि पूरी आयु पर मृत्यु हुई, तो वहाँ भैरव जी उन्हें भैरवी यातना का लक्ष्य बनाकर दंड देते हैं — सोटे से पीटकर लाल चमड़ी उधेड़ते हैं: जीवन भर पाप करके क्या ऐसे ही छूट जाएँगे?
एक श्रोता पूछते हैं कि जो लोग जीवन भर पाप करते हैं और अंतिम क्षणों में काशी यात्रा पर प्राण त्यागते हैं — वे कहाँ जाते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि भैरव जी उन्हें पीटकर, काटकर बराबर कर देते हैं। उन्हें भैरव यातना, भैरवी यातना दी जाती है, जो यम यातना से हज़ारों गुना भयंकर मानी गई है। तो भैरव जी उन्हें नरक नहीं भेजते। काशी में मृत्यु होने पर यदि इस तरह की बात आए — यह अकाल मृत्यु की बात नहीं है; यह पूर्णायु की बात है। तो यदि पूरी आयु पर मृत्यु हुई, तो वहाँ भैरव जी उन्हें भैरवी यातना का लक्ष्य बनाते हैं; भैरव जी उन्हें दंड देते हैं। सोटे से पीटकर लाल चमड़ी उधेड़ना — जीवन भर पाप करके क्या ऐसे ही छूट जाएँगे? वहाँ भैरवी यातना होती है। और उसके बाद जहाँ जाना हो, वहाँ उनकी पोस्टिंग होती है: हाँ भाई, तुम शिव लोक जाओ, तुम देवी लोक जाओ, या काशी में ही रहो।
क्या वार के अनुसार नवग्रहों और उनकी माताओं का जप अच्छा है?
दुर्गा पूजा में नवदुर्गा, नवग्रह और उनकी माताएँ
एक श्रोता कहती हैं कि उन्होंने दुर्गा पूजा में नवदुर्गा, नवग्रह और उनकी माताओं का जप किया, और पूछती हैं कि क्या वार के अनुसार नवग्रहों और उनकी माताओं का जप ठीक है। वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल दिव्य, बहुत दिव्य। यदि आप यह करें, तो बहुत विशेष कृपा मिलेगी — हर ग्रह का अच्छी तरह कीजिए।
एक श्रोता पूछती हैं कि दुर्गा पूजा में मैंने नवदुर्गा, नवग्रह और उनकी माताओं का जप किया; क्या वार के अनुसार नवग्रह और उनकी माताओं का जप ठीक है। वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल दिव्य, बहुत दिव्य। यदि आप यह करें, तो बहुत विशेष कृपा मिलेगी। हर ग्रह का अच्छी तरह कीजिए।
दिव्य कृपा शुरू होने से पहले कितना जप चाहिए?
तय नहीं — पर किसी सहस्रनाम के ग्यारह सौ पाठ
वक्ता कहते हैं कि यह चीज़ आपके जप और तप पर निर्भर है; यह तय नहीं कि कितना करेंगे और हो जाएगा। पर यह अवश्य है कि जब सहस्रनाम आदि के ग्यारह सौ पाठ होने लगें, जब ग्यारह सौ से अधिक पाठ हो जाएँ, तब दिव्य कृपा अवश्य शुरू होती है।
वक्ता कहते हैं कि यह चीज़ आपके जप और तप पर निर्भर है। यह चीज़ तय नहीं है। कितना करेंगे, और हो जाएगा। पर यह अवश्य है कि जब सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। आदि के ग्यारह सौ पाठ होने लगें — जब ग्यारह सौ से अधिक पाठ हो जाएँ — तब दिव्य कृपा अवश्य शुरू होती है।
क्या मौली के धागे को बाती के रूप में प्रयोग किया जा सकता है?
पूरी मौली, लाल और पीली दोनों
यह पूछे जाने पर कि क्या मौली के धागे का पीला हिस्सा बाती है, वक्ता कहते हैं: बिल्कुल, आप प्रयोग कर सकते हैं; और केवल पीला ही क्यों — आप पूरी मौली का धागा, लाल और पीला, पूरा प्रयोग कर सकते हैं। कोई समस्या नहीं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या मौली के धागे का पीला हिस्सा बाती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल, आप प्रयोग कर सकते हैं। और केवल पीला ही क्यों — आप मौली का पूरा धागा, लाल और पीला, पूरा का पूरा प्रयोग कर सकते हैं। कोई समस्या नहीं है।
स्वर्णाकर्षण धनदा कलश में क्या विशेष है?
लक्ष्मी और कुबेर को भी धन देने वाले स्वर्णाकर्षण भैरव
वक्ता कहते हैं कि इस बार दीपावली के समय महालक्ष्मी कलश और स्वर्णाकर्षण धनदा कलश बनेगा, और तैयारी इसे महालक्ष्मी कलश से अधिक विशेष बनाने की है, क्योंकि इसकी सामग्री बहुत अलग है — सामग्री महालक्ष्मी कलश से जुड़ी होगी, पर इसमें स्वर्णाकर्षण भैरव जी से जुड़ी बातें भी होंगी। और, जैसा सब जानते हैं, स्वर्णाकर्षण भैरव वह शक्ति हैं जो भगवती लक्ष्मी और कुबेर जी को भी धन देती है।
वक्ता कहते हैं कि इस बार दीपावली के समय महालक्ष्मी कलश, स्वर्णाकर्षण धनदा कलश बनेगा, और तैयारी इसे महालक्ष्मी कलश से अधिक विशेष बनाने की है — क्योंकि इसमें सामग्री ही बहुत अलग है। सामग्री उससे जुड़ी होगी जो महालक्ष्मी कलश से जुड़ी है, पर इसमें स्वर्णाकर्षण भैरव जी से जुड़ी बातें भी होंगी। और आप सब जानते हैं कि स्वर्णाकर्षण भैरव वह शक्ति हैं जो भगवती लक्ष्मी और कुबेर जी को भी धन देती है।
उस पूजन की सारी व्यवस्था साधक महाराज जी करेंगे
व्यवस्था करने वाले साधक महाराज
वक्ता कहते हैं कि यह बहुत दिव्य है, क्योंकि इस समय साधक महाराज जी उनके साथ होंगे; उन्होंने कहा है कि वे उन साधकों के लिए सारी व्यवस्था करेंगे जो चाहते हैं कि इस तरह की बातें उपस्थित हों। उन्हीं के माध्यम से वे यह सारा पूजन करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि तो यह बहुत दिव्य है, क्योंकि इस समय साधक महाराज जी हमारे साथ होंगे। उन्होंने कहा है कि भाई, जो साधक चाहते हैं कि इस तरह की बातें उपस्थित हों, उनके लिए हम सारी व्यवस्था करेंगे। उन्हीं के माध्यम से हम यह सारा पूजन करेंगे।
गृह बंधन से पहले कवच का कितना जप चाहिए?
कवच का पाँच हज़ार या ग्यारह हज़ार जप
वक्ता कहते हैं कि गृह बंधन के लिए पहले कम से कम कवच का पाँच हज़ार या ग्यारह हज़ार जप होना चाहिए; तभी उसका प्रयोग करना चाहिए, और तब पूरा घर दृढ़ता से बँधता है। स्वयं करने में काफ़ी खर्च आता है — वे कहते हैं कि खर्च स्वयं करने का लगभग दसवाँ हिस्सा आता है, तो आप स्वयं ही कर लीजिए।
धनतेरस पर फ़ॉर्म वेबसाइट पर आएँगे, उसके बाद होने वाले पाँच दिन के अनुष्ठान के लिए
धनतेरस, और तब का पाँच दिन का अनुष्ठान
वक्ता कहते हैं कि धनतेरस के समय वे सब कुछ वेबसाइट पर डाल देंगे, इसलिए उस समय आप सब उन सबको बताइए जिन्हें आवश्यकता हो; वहाँ भर दीजिए और सबको अवश्य मिलेगा। उस समय पाँच दिन का अनुष्ठान भी होगा, तो और अच्छा होगा। अभी केवल एक दिन का होने वाला है, और वह उसी समय किया जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि धनतेरस के समय हम सब कुछ वेबसाइट पर डाल देंगे, इसलिए उस समय आप सब उन सबको बताइए जिन्हें इसकी आवश्यकता होगी। वहाँ भर दीजिए; सबको अवश्य मिलेगा। उस समय पाँच दिन का अनुष्ठान भी होगा, तो और भी अच्छा होगा। अभी केवल एक दिन का होने वाला है। तो हम उसे उसी समय करेंगे।
क्या नर्मदा के पत्थर को आकार देकर बनाया शिवलिंग स्वीकार्य है?
कंकर-कंकर शंकर
यह पूछे जाने पर कि क्या नर्मदा जी के पत्थरों को आकार देकर शिवलिंग जैसा बनाना ठीक है, वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल, आप स्वीकार कर सकते हैं। हर कंकर को शंकर माना गया है, तो बिल्कुल आप स्वीकार कर सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि वे नर्मदा जी के पत्थरों को आकार देकर शिवलिंग जैसा बनाते हैं — क्या यह ठीक है। वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल, आप स्वीकार कर सकते हैं। हर कंकर को शंकर माना गया है, तो बिल्कुल आप स्वीकार कर सकते हैं।
यदि चाटन की स्थिति बहुत बढ़ जाए, तो क्या करना चाहिए?
जन्म कुंडली में चंद्रमा देखना और चंद्र उपाय करना
वक्ता कहते हैं कि यदि चाटन की स्थिति बहुत बढ़ जाए, तो सबसे पहला काम यह देखना है कि आपकी जन्म कुंडली में चंद्रमा की स्थिति क्या है। किसी ज्योतिष जी महाराज से दिखवाकर चंद्र के लिए ग्रह उपाय कीजिए, या दान आदि क्या हैं यह जानकर वह कीजिए। उससे पहले चाटन कम होगा।
वक्ता कहते हैं कि यदि चाटन की स्थिति बहुत बढ़ जाए, तो सबसे पहला काम यह देखना है कि आपकी जन्म कुंडली में चंद्रमा की स्थिति क्या है। किसी ज्योतिष जी महाराज से दिखवाकर चंद्र के लिए जो ग्रह उपाय हैं, वे कीजिए; या दान आदि क्या हैं, यह जानकर वह कीजिए। उससे पहले चाटन कम होगा।
कम से कम दही और गुड़ सिर से उतारकर किसी सुनसान जगह रख दिया जाता है
दही और गुड़ सिर से उतारकर सुनसान जगह रखना
वक्ता कहते हैं कि नहीं तो, यदि और कुछ न हो, तो कम से कम दही और गुड़ सिर के ऊपर से उतारकर किसी सुनसान जगह ले जाकर रखना शुरू कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि नहीं तो, यदि और कुछ भी न हो, तो कम से कम दही और गुड़ सिर के ऊपर से उतारना शुरू कीजिए, और उन्हें किसी सुनसान जगह ले जाकर रख दीजिए।
नवरात्रि में प्रयोग किए मिट्टी के दीयों का क्या किया जा सकता है?
पान लगाने के लिए मिट्टी में प्रयोग
यह पूछे जाने पर कि क्या नवरात्रि में प्रयोग किए मिट्टी के दीये मिट्टी में डालकर पान के पौधे उगाए जा सकते हैं, वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल, आप लगा सकते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि नवरात्रि में हमने जो मिट्टी के दीये प्रयोग किए, क्या उन्हें मिट्टी में डालकर पान के पौधे उगाए जा सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल, आप लगा सकते हैं।
क्या घी साधना की पूर्णाहुति मंदिर में की जा सकती है?
मंदिर में पूर्णाहुति की अनुमति
यह पूछे जाने पर कि क्या गर्म घी साधना की पूर्णाहुति मंदिर में की जा सकती है, वक्ता उत्तर देते हैं: आप कर सकते हैं, कोई कठिनाई नहीं।
एक श्रोता पूछते हैं कि क्या गर्म घी साधना की पूर्णाहुति मंदिर में की जा सकती है। वक्ता उत्तर देते हैं कि आप कर सकते हैं, कोई कठिनाई नहीं।
क्या सिंदूरदानी पकड़े बंगाल की लक्ष्मी एक अलग रूप हैं?
सब लक्ष्मी माँ के ही रूप, और कोजागरी पूजा
एक श्रोता के यह बताने पर कि बंगाल में एक लक्ष्मी जी हैं जो हाथ में सिंदूरदानी पकड़ती हैं, वक्ता कहते हैं हाँ, बिल्कुल। इन्हीं को लक्ष्मी माँ कहा जाता है; सब लक्ष्मी माँ का ही रूप हैं — और अभी कोजागरी में माई की पूजा होगी।
एक श्रोता कहते हैं कि बंगाल में एक लक्ष्मी जी हैं जो हाथ में सिंदूरदानी पकड़ती हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि हाँ, बिल्कुल। इन्हीं को लक्ष्मी माँ कहा जाता है न; सब लक्ष्मी माँ का ही रूप हैं — जिनमें, अभी, कोजागरी में माई की पूजा होगी।
क्या काशी के अन्नपूर्णा और विशालाक्षी मंदिर एक ही हैं?
दो अलग मंदिर, और अठारह महाशक्ति पीठों में विशालाक्षी
वक्ता कहते हैं कि नहीं, दोनों अलग हैं। अन्नपूर्णा मंदिर काशी विश्वनाथ जी के परिसर में, ठीक बगल में है। और विशालाक्षी मंदिर पीछे है, भगवती के शक्ति पीठों में: काशी विशालाक्षी अठारह प्रमुख महाशक्ति पीठों में से एक हैं, और थोड़ा बाहर, पाँच मिनट की दूरी पर पड़ती हैं। दोनों अलग हैं।
वक्ता कहते हैं कि नहीं, दोनों अलग हैं। अन्नपूर्णा मंदिर काशी विश्वनाथ जी के परिसर में, ठीक बगल में है। और विशालाक्षी मंदिर पीछे है, शक्ति पीठों में — भगवती का। अठारह प्रमुख महाशक्ति पीठों में काशी विशालाक्षी एक हैं, और वे थोड़ा बाहर, पाँच मिनट की दूरी पर पड़ती हैं। दोनों अलग हैं।
इंद्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र की फलश्रुति क्या वचन देती है?
शत्रु नाश, अभिचार नाश, लक्ष्मी प्राप्ति और विजय
यह पूछे जाने पर कि क्या वे कल इंद्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र करें, वक्ता कहते हैं: बिल्कुल कीजिए — और उसकी फलश्रुति पढ़िए। एक पाठ करने से क्या मिलता है, दो से क्या मिलेगा, तीन से क्या होगा। भाई, इसमें शत्रुओं का नाश भी है। अभिचार का नाश भी है। लक्ष्मी की प्राप्ति भी है। विजय भी है। इंद्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र में सब कुछ है।
क्या मैं कल इंद्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र करूँ — वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल कीजिए। और इंद्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र की फलश्रुति पढ़िए: एक पाठ करने से क्या मिलता है, दो से क्या मिलेगा, तीन से क्या होगा। भाई, इसमें शत्रुओं का नाश भी है। अभिचार का नाश भी है। लक्ष्मी की प्राप्ति भी है। विजय भी है। इंद्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र में सब कुछ है।
क्या यह स्तोत्र केवल लक्ष्मी की कृपा के लिए पढ़ा जाता है?
शत्रुओं पर विजय भी, और कल का दिन महालक्ष्मी का
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं कि केवल लक्ष्मी जी की कृपा आएगी — शत्रुओं पर विजय भी मिलेगी। और क्योंकि कल का दिन भगवती महालक्ष्मी के लिए है, इसे अवश्य कीजिए। वे एक श्रोता से कहते हैं कि अच्छी बात है कि दो साल पहले वे इसे केवल खीर पूर्णिमा समझते थे, और अब समझ गए हैं कि कुछ मिलने वाला है।
वक्ता कहते हैं कि ऐसा ही नहीं कि केवल लक्ष्मी जी की कृपा आएगी। शत्रुओं पर विजय भी मिलेगी। और क्योंकि कल का दिन भगवती महालक्ष्मी के लिए है, इसलिए इसे अवश्य कीजिए। वे एक श्रोता से कहते हैं कि अच्छी बात है कि दो साल पहले आप इसे केवल खीर पूर्णिमा समझते थे, और अब आप समझ गए हैं कि कुछ मिलने वाला है। अवश्य कीजिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।