चैत्र नवरात्र की तैयारी — शनिचरी अमावस्या, संधि पूजा और विंध्याचल का त्रिकोण
चैत्र नवरात्र और विंध्याचल की तैयारी पर एक लाइव वार्ता।
110 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
91 also answer a common question
Questions this answers
91 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
इस चैत्र नवरात्रि से ठीक पहले शनिचरी अमावस्या क्यों पड़ रही है?
चैत्र नवरात्रि से पहले शनिवार को शनिचरी अमावस्या
वक्ता कहते हैं कि चैत्र नवरात्रि में अब दो-तीन दिन ही बचे हैं। शनिवार को शनिचरी अमावस्या पड़ रही है। यह रात्रि कालीन, निषिद्ध कालीन अमावस्या है। जहाँ भगवती काली की पूजा होती है, या जिस तंत्र पीठ में निषिद्ध काल का पूजन होता है, और जहाँ श्मशान आदि में बलि का विधान है, वहाँ यह अमावस्या मानी जाती है।
अमावस्या का पूजन शुक्रवार की रात करें या शनिवार को?
शुक्रवार की रात निषिद्ध व्यापिनी, शनिवार को उदया व्यापिनी
जो लोग निषिद्ध काल की पूजा करते हैं, वे अमावस्या का पूजन शुक्रवार की रात को ही करेंगे। क्योंकि निषिद्ध व्यापिनी उसी दिन पड़ रही है। पर शनिवार को शाम लगभग सवा चार बजे तक अमावस्या है। इसलिए उदया व्यापिनी अमावस्या, यानी शनिचरी अमावस्या, भी उस पूरे दिन और रात मान्य है।
वक्ता कहते हैं कि वे लोग अमावस्या का पूजन शुक्रवार की रात को ही करेंगे। क्योंकि निषिद्ध व्यापिनी उसी दिन पड़ रही है। पर शनिवार को शाम लगभग सवा चार बजे तक अमावस्या है। इसलिए उदया व्यापिनी अमावस्या, शनिचरी अमावस्या, भी उस पूरे दिन और रात मान्य है। वे कहते हैं, इसी कारण शनिचरी अमावस्या अपने आप में विशिष्ट है।
इस ग्रंथ में हर बात के साथ उस तंत्र ग्रंथ का संदर्भ दिया गया है जिससे वह ली गई है।
आचार्य शिवदत्त मिश्र शास्त्री की श्री दुर्गा अर्चन पद्धति
वे श्री श्री आचार्य शिवदत्त मिश्र शास्त्री की लिखी श्री दुर्गा अर्चन पद्धति और उनके कई दूसरे ग्रंथों की ओर संकेत करते हैं। उनमें यह विषय संदर्भ के साथ बताया गया है, कि हर बात किस तंत्र ग्रंथ से ली गई है। बात यह है कि वार के अनुसार भगवती श्री जगदंबा का सप्तशती पाठ, या उनसे जुड़ा कोई भी अनुष्ठान, विशेष महत्व रखता है।
चंडी पाठ के लिए शनिवार को सबसे बड़ा दिन क्यों माना जाता है?
सप्ताह के क्रम का अंतिम दिन शनिवार
वे कहते हैं, एक सामान्य मत यह है कि रविवार से शनिवार तक के क्रम में, जब हम पहले दिन से आरंभ करते हैं, तो शनिवार का चंडी पाठ सबसे अधिक महत्व का माना गया है। पर इसके पीछे भी एक विशेष कारण है।
वक्ता कहते हैं, सामान्य रूप से एक मत यह है: रविवार से शनिवार तक के क्रम में, जब हम पहले दिन से आरंभ करते हैं, तो शनिवार को किया गया चंडी पाठ बहुत बड़े महत्व का माना गया है। पर वे कहते हैं, इसके पीछे देखें तो इसका भी एक विशेष कारण है।
मंगलवार और शनिवार को विशेष दिन क्यों माना जाता है?
वीर रात्रि और क्रूर रात्रि
मंगलवार और शनिवार दो विशेष दिन हैं। इनकी निषिद्ध काल की रात को विशेष रूप से वीर और क्रूर से जुड़ा कहा गया है — वीर रात्रि और क्रूर रात्रि। जब इनके साथ नक्षत्र और तिथि का योग भी बन जाए, तो यह विशेष, और फिर अति विशेष हो जाता है।
वे कहते हैं, मंगलवार और शनिवार दो विशेष दिन हैं। इनका निषिद्ध काल, खासकर रात, वीर और क्रूर से जुड़ा बताया गया है। वीर रात्रि और क्रूर रात्रि। पर उसमें भी अगर नक्षत्र और तिथि का योग बन जाए, तो वह विशेष हो जाता है, और उससे आगे अति विशेष। इसी तरह शनिचरी अमावस्या का महत्व है।
कौन-से वार और तिथि के योग पूजा का फल कई गुना बढ़ाते हैं?
फल बढ़ाने वाले वार-तिथि के योगों की सूची
रविवार को सप्तमी पड़े तो बहुत महत्व होता है। सोमवार को श्लोष या अमावस्या पड़े तो महत्व बहुत बढ़ जाता है। मंगलवार को अमावस्या, चतुर्दशी या अष्टमी पड़े तो विशेष महत्व है। बुधवार को अष्टमी बहुत विशेष है। और गुरुवार को पुष्य नक्षत्र या एकादशी तिथि हो तो बड़ा दिव्य महत्व हो जाता है।
वे योग गिनाते हैं। रविवार को सप्तमी पड़े तो उसका महत्व बहुत बड़ा हो जाता है। सोमवार को श्लोष पड़े, या अमावस्या पड़े, तो उसका महत्व बहुत बढ़ जाता है। मंगलवार को अमावस्या पड़े, चतुर्दशी पड़े, अष्टमी पड़े, तो विशेष महत्व है। बुधवार को अष्टमी पड़े तो वह बहुत विशेष महत्व रखती है। और गुरुवार को पुष्य नक्षत्र हो, या एकादशी तिथि हो, तो उसका बड़ा दिव्य महत्व हो जाता है। इन विशेष तिथियों में आप जो भी अनुष्ठान खुद करते हैं, जो भी मंत्र जप करते हैं, वह ऐसे समय में होता है।
अनुष्ठान शब्द में असल में क्या-क्या आता है?
अनुष्ठान का पूरा विधान, एक दिन का भी
भगवती या भगवान के जिस भी रूप की पूजा करनी है, उसका षोडशोपचार पूजन। फिर स्तुति, जप, कवच आदि के पाठ। तय संख्या में जप, जैसे एक सौ आठ माला या कुछ माला। फिर दशांश हवन। और हवन के बाद तर्पण और मार्जन।
वे पूछते हैं, अनुष्ठान शब्द का अर्थ क्या हो गया है — और एक दिन के अनुष्ठान का भी क्या अर्थ है, जब उसमें पूरा विधान आता है? हम अपने आराध्य का, भगवती या भगवान के जिस रूप की हम पूजा करने वाले हैं, उसका षोडशोपचार पूजन करते हैं। उसके बाद उनकी स्तुति, जप, कवच आदि का पाठ करते हैं। जो जप करना है, उसकी संख्या तय होती है — यहाँ एक सौ आठ माला की जा रही है, या कुछ माला का जप हो रहा है। और उसके बाद, जप आदि के बाद, आप उनका हवन करेंगे, दशांश। और हवन के बाद तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। और मार्जन। अनुष्ठान में इन विधानों का ऐसा महत्व है।
एक दिन का अनुष्ठान पूरा होने के बाद क्या करना चाहिए?
व्रत, दान, और उसके बाद ही भोजन
जब आप इसे एक ही दिन में करते हैं, तो उस दिन व्रत रखते हैं। या अनुष्ठान पूरा होने पर दान करते हैं, और उसके बाद ही भोजन और अन्न ग्रहण करते हैं। वे कहते हैं, इससे कर्म का महत्व बहुत बढ़ जाता है।
वे कहते हैं, इसी तरह जब आप इसे एक दिन में भी करते हैं, तो उसके बाद उस दिन व्रत रखते हैं। या अनुष्ठान पूरा होने के बाद दान आदि करते हैं, और फिर भोजन करते हैं, अन्न ग्रहण करते हैं। इससे इसका महत्व बहुत बढ़ जाता है।
उस दिन शनि राशि बदलते हैं और ढाई साल मीन में रहते हैं।
बृहस्पति की राशि मीन में शनि का गोचर
उसी दिन से शनि देव का गोचर भगवान बृहस्पति देव की राशि, मीन राशि में आरंभ हो रहा है — उस दिन वे राशि बदलते हैं। वक्ता कहते हैं, वहाँ उनके ढाई साल के समय में, अपने जीवन में आपका जो भी कर्तव्य और जिम्मेदारी है, उसे जितनी ईमानदारी से हो सके निभाइए। और पूरे अनुशासन से अनुष्ठान कीजिए। फल अवश्य मिलेगा।
वे कहते हैं, उस दिन को सबको अवश्य मानना चाहिए। उसी दिन से भगवान बृहस्पति देव की राशि, मीन राशि में शनि देव का गोचर आरंभ हो रहा है। उस दिन वे राशि बदलते हैं। तो उस राशि में उनका जो ढाई साल का समय रहेगा, उसमें अपना कर्म प्रधान कर्तव्य, अपने जीवन की अपनी जिम्मेदारी, जितनी ईमानदारी से हो सके निभाइए। पूरे अनुशासन से अपना अनुष्ठान कीजिए। उसका फल अवश्य मिलेगा।
शनि देव फल कैसे देते हैं?
धीरा ग्रह का धीमा, सूक्ष्म आकलन
वक्ता कहते हैं, शनि देव उस श्रेणी के दिव्य ग्रह हैं जो धीरा हैं। वे बहुत बारीकी और सूक्ष्मता से आकलन करते हैं, अवलोकन करते हैं, और उसके बाद ही फल देते हैं। वे बहुत धीरे देते हैं। यह धैर्य की चरम परीक्षा बन जाती है।
वे कहते हैं, शनि देव धीरा हैं — जो बहुत महीनता और सूक्ष्मता से आकलन करते हैं, अवलोकन करते हैं, और उसके बाद ही परिणाम देते हैं। वक्ता कहते हैं, शनि देव उसी श्रेणी के दिव्य ग्रह हैं। वे बहुत धीरे-धीरे देते हैं। यह धैर्य की पराकाष्ठा बन जाती है, उसकी परीक्षा।
परीक्षा के समय अनुष्ठान पर अनुष्ठान करने पर भी फल न दिखे, ऐसा हो सकता है।
अनुष्ठान जो बिल्कुल फलते नहीं दिखे
इतनी परीक्षा होती है, और परीक्षा में इतना धैर्य चाहिए, कि अनुष्ठान पर अनुष्ठान करते हुए आप थक जाएँगे। वे कहते हैं, यह भगवान शनि देव की महादशा में उनके अपने जीवन का अनुभव है। उनके आसपास के साधक और गुरु भाइयों के अनुष्ठान बड़ी तेजी से फलते थे, पर एक समय उनके अपने अनुष्ठान फल ही नहीं रहे थे। वे कहते हैं, आपके और हमारे लिए नियम अलग नहीं हैं।
वे कहते हैं, इतनी परीक्षा, और परीक्षा में इतना धैर्य रखना, कि आप थक जाएँगे — अनुष्ठान करते-करते, बार-बार करते हुए। यह उनके अपने जीवन का अनुभव है। भगवान शनि देव की महादशा में उनके अपने जीवन का अनुभव है कि उनके साथ के साधक भाई और गुरु भाई अपने अनुष्ठान इतनी तीव्रता से फलते देखते थे, पर एक समय उनके अपने अनुष्ठान बिल्कुल फल ही नहीं रहे थे। यह उनके अपने जीवन का अनुभव है, और आपके साथ भी ऐसा होगा। आपके और हमारे लिए नियम अलग नहीं हैं।
शनि कमाया हुआ फल कब देना शुरू करते हैं?
शनि के गोचर का अंतिम चरण, जब वे देना शुरू करते हैं
जब उनके जाने का समय आता है, जब वे अंतिम चरण में होते हैं, तब आपने जो भी अच्छे कर्म किए, जो भी अनुष्ठान और पुरश्चरण किए, वे देना शुरू करते हैं। और जब वे देना शुरू करते हैं, तो आपको हैरानी होगी कि इतनी आसानी से प्राप्ति कैसे हो रही है।
पर जब उनके जाने का समय आता है, जब वे अपने अंतिम चरण में होते हैं, तब आपने जो भी अच्छे कर्म किए, जो भी अनुष्ठान किए, जो भी पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। किए — वे देना शुरू करते हैं। और जब वे देना शुरू करते हैं, तो आपको लगेगा: यह इतनी आसानी से कैसे मिल रहा है?
भौतिक फल भी समय आने पर मिलता है; यहाँ केवल आध्यात्मिक क्षेत्र की बात हो रही है।
भौतिक फल भी मिलता है, जब मिलना हो
वे कहते हैं कि वे खास तौर पर आध्यात्मिक क्षेत्र की बात कर रहे हैं, भौतिक की नहीं — भौतिक अलग विषय है। पर अगर उस श्रेणी में देना हो, तो वे अवश्य देंगे। ऐसा नहीं कि वहाँ नहीं देते।
वे कहते हैं, हम विशेष रूप से आध्यात्मिक क्षेत्र की बात करें, भौतिकता की नहीं — भौतिकता अलग विषय है। अगर उन्हें उस श्रेणी में देना हो, तो वे अवश्य देंगे। ऐसा नहीं कि वे उसमें नहीं देते; अवश्य देते हैं।
अगर अनुष्ठान पूरी तरह भौतिक कामना से किया जाए तो क्या होता है?
बिना विश्वासघात या देवघात के निष्ठा से अनुष्ठान
अगर पूरा अनुष्ठान भौतिकता के लिए हो रहा है — धन और दान, भरपूर संपत्ति, ऐश्वर्य, वाहन, घर का सुख — तो समय आने पर, अगर आपने अपने अनुष्ठान निष्ठा और अनुशासन से किए हैं, बिना किसी विश्वासघात के, बिना देवघात के, देवताओं के प्रति बिना किसी प्रमाद के, तो वे ऐसा देंगे कि मिट्टी में भी हाथ डालेंगे तो सोना हो जाएगा।
वे कहते हैं, यह इस पर निर्भर है कि आप किस मार्ग की ओर प्रयास कर रहे हैं। अगर आप पूरा अनुष्ठान भौतिकता के लिए कर रहे हैं — कि धन और दान हो, भरपूर संपदा हो, ऐश्वर्य हो, वाहन हो, घर का सुख हो आदि — तो समय आने पर, अगर आप अपना अनुष्ठान आदि निष्ठा और अनुशासन से करते रहे हैं, बिना किसी तरह का विश्वासघात किए, बिना देवघात के, देवताओं के प्रति बिना किसी प्रमाद के, तो यह जान लीजिए: बात अवश्य फलेगी, ऐसे कि मिट्टी में भी हाथ रखेंगे तो सोना हो जाएगा। पर इतना भी समझ लीजिए: दस में से साढ़े सात या आठ — यानी अस्सी प्रतिशत समय — आपको हर बार लगेगा कि कुछ नहीं हो रहा, एक प्रतिशत भी नहीं हो रहा।
नए साधकों को किस तरह के अनुभव होते हैं?
घटनाएँ जिन्हें नया साधक समझ पाए या न पाए
अनुभव से बोलते हुए वे कहते हैं कि सामान्य नए साधकों के साथ ऐसे अनुभव होते हैं, ऐसी घटनाएँ होती हैं। वे उन्हें समझ पाते हैं या नहीं, यह अलग विषय है।
वे कहते हैं, अनुभव की बात ही देखें: सामान्य नए साधकों के साथ ऐसे अनुभव होते हैं, ऐसी घटनाएँ घटती हैं। वे उन्हें समझ पाते हैं या नहीं, यह बिल्कुल अलग विषय है। अनुभव में ऐसी बहुत सी बातें हैं।
क्या साधक के अनुभवों में स्वयं भगवती प्रकट होती हैं?
स्थान पर बैठी लोक योगिनियाँ प्रकट होती हैं
भगवती का अंतिम अनुभव यह है कि जगदंबा वहाँ अपने साक्षात रूप में नहीं आ रहीं। पर उस स्थान पर जो भी लोक योगिनी बैठी है, वह कहीं न कहीं वहाँ प्रकट हो रही है। वे कहते हैं, लोक शक्तियाँ जीवन में किसी न किसी तरह हस्तक्षेप अवश्य करती हैं।
वे कहते हैं, भगवती का अंतिम अनुभव यह है: जगदंबा वहाँ अपने साक्षात रूप में नहीं आ रहीं। पर उस स्थान पर जो भी लोक योगिनी बैठी है, वह कहीं न कहीं वहाँ प्रकट हो रही है। लोक शक्तियाँ, एक तरह से कहें तो, जीवन में कहीं न कहीं हस्तक्षेप अवश्य करती हैं।
लोक शक्तियाँ साधक की मदद कब कर पाती हैं?
लोक शक्तियाँ प्रारंभिक परीक्षा पास होने के बाद ही मदद करती हैं
उनके हस्तक्षेप के पहले चरण में, हमारे प्रारब्ध से जो भी कर्म बना हो, और उस समय जीवन में जो भी कठिनाई चल रही हो, उसमें वे तभी सहायता कर पाती हैं जब आप उनकी प्रारंभिक परीक्षा में सफल हो जाते हैं। वे कहते हैं, बिना परीक्षा के इस क्षेत्र में कोई आपको कुछ नहीं देने वाला।
वे कहते हैं, उस हस्तक्षेप का पहला चरण यह है। हमारे प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। से जो भी कर्म बना हो, उस समय जीवन में जो भी कठिनाई चल रही हो — उसमें वे तभी सहायता कर पाती हैं जब आप उनकी प्रारंभिक परीक्षा में सफल हो जाते हैं। बिना परीक्षा के इस क्षेत्र में कोई आपको कुछ नहीं देने वाला। इसलिए यह परीक्षा पास करने के लिए समय बहुत महत्व का हो जाता है।
शनिवार की अमावस्या पर अर्चन कितना अधिक फलदायी है?
सौ गुना फल, और कर्म जल्दी कटता है
अगर अमावस्या शनिवार को पड़ रही हो और कोई उस दिन भगवती का अर्चन करे, तो उसे सौ गुना अधिक फलदायी माना गया है। इसी तरह कर्म जल्दी कटता है: जो आठ साल में होना था, वह साढ़े सात या सात साल में हो सकता है।
वे कहते हैं, उदाहरण के लिए अगर अमावस्या शनिवार को पड़ रही हो, और कोई भी व्यक्ति उस दिन भगवती का अर्चन करे, तो उसे सौ गुना अधिक फलदायी माना गया है। तो कर्म जल्दी कैसे कटता है? जो आठ साल में होना था, वह अब साढ़े सात में, सात में हो सकता है। इन विशेष तिथियों में अपना अनुष्ठान और अपना पुरश्चरण करने का यही प्रभाव है। और अगर हवन नहीं कर सकते, तो जप कीजिए। जप नहीं कर सकते, तो अर्चन कीजिए। अर्चन नहीं कर सकते, तो अभिषेक कीजिए। अपने आराध्य की जितनी पूजा आपसे हो सके, कीजिए — इसका बहुत विशेष प्रभाव होता है, मनचाहे फल में तेजी आती है, एक रास्ता खुलने लगता है। वे कहते हैं, यह सच्ची बात है।
यह चैत्र नवरात्रि किस दिन से आरंभ हो रही है?
रविवार को प्रतिपदा, और तृतीया-चतुर्थी एक साथ
चैत्र नवरात्रि रविवार से आरंभ हो रही है, और उस दिन की तिथि प्रतिपदा है। तृतीया और चतुर्थी एक साथ पड़ रही हैं। नवरात्र का अर्थ है नई रातें। और सूर्य वार से आरंभ होना — यानी सप्ताह के पहले दिन से, ग्रहों के राजा सूर्यदेव के दिन से — इस नए वर्ष को अपने आप में बहुत दिव्य बनाता है।
अनुमानित प्राकृतिक उथल-पुथल के साथ प्रकृति रास्ता भी देती है।
उथल-पुथल के साथ प्रकृति का दिया रास्ता
ज्योतिषीय गणना के आधार पर जो प्राकृतिक उथल-पुथल होनी है, और सनातन के विरुद्ध षड्यंत्र रचने वालों का जो विषय दूसरे सम्माननीय साधक लोगों के सामने रख रहे हैं, वक्ता कहते हैं कि उसके सच होने में ज़रा भी संदेह नहीं है। पर प्रकृति साथ-साथ उन बातों से निपटने का रास्ता भी दे रही है।
पर देखिए, वक्ता कहते हैं, प्रकृति साथ में उन बातों से निपटने का रास्ता भी दे रही है। आप उस रास्ते पर चल पाते हैं या नहीं, उस समय का लाभ लेकर खुद को तैयार करते हैं या नहीं, यह आपका कर्तव्य और आपका कर्म है। कर्म में कोई दखल नहीं देगा। आपको निमित्त बनाया जाएगा, ज्ञान आपके पास आएगा, रास्ता मिलेगा, आपको पता चलेगा — पर करना आपको खुद ही होगा। कोई और नहीं करेगा।
जो नौ दिन उपवास नहीं कर सकते, वे क्या करें?
कम से कम प्रतिपदा और अष्टमी या नवमी
इस बार नवरात्रि आठ दिन की है। वक्ता कहते हैं, जो नौ दिन का उपवास नहीं रख सकते, वे कम से कम प्रतिपदा का और अष्टमी या नवमी का उपवास ज़रूर रखें।
उस दिन से जब आप नवरात्रि का अनुष्ठान करेंगे — वक्ता कहते हैं, जो लोग नौ दिन का उपवास नहीं रख सकते, और इस बार तो यह आठ दिन की ही है — वे कम से कम प्रतिपदा का और अष्टमी का, या नवमी का उपवास ज़रूर रखें।
अष्टमी का व्रत किसे नहीं रखना चाहिए?
इकलौते पुत्र वाले के लिए नियम
जिनका एक ही पुत्र है — न कोई और बेटी, न कोई और बेटा, बस एक ही पुत्र — वे अष्टमी का उपवास न रखें, नवमी का रखें। वक्ता कहते हैं कि इसका वर्णन कालिका पुराण और श्रीमद् देवी भागवत महापुराण में है, और जब श्री रामचंद्र जी ने रावण वध के लिए जगदंबा की उपासना की, तब जगदंबा ने यह विषय उनके सामने रखा था।
प्रतिपदा रविवार से शुरू, तृतीया और चतुर्थी मंगलवार को साथ, और अष्टमी शनिवार को।
प्रतिपदा से अष्टमी तक दिन-वार क्रम
प्रतिपदा सूर्य वार से शुरू हो रही है; द्वितीया सोमवार को; तृतीया और चतुर्थी मंगलवार को; पंचमी बुधवार को; षष्ठी गुरुवार को; सप्तमी शुक्रवार को; और अष्टमी शनिवार को पड़ रही है।
वक्ता क्रम बताते हैं: प्रतिपदा के दिन सूर्य वार से शुरुआत हो रही है। द्वितीया सोमवार को है। तृतीया और चतुर्थी मंगलवार को हैं। पंचमी बुधवार को है। षष्ठी गुरुवार को है, और सप्तमी शुक्रवार को। अष्टमी शनिवार को पड़ रही है।
उस अष्टमी को संधि पूजा कब है?
शाम लगभग सात से आठ, चालीस से पचास मिनट
अष्टमी शनिवार को पड़ रही है, और उसी अष्टमी को शाम लगभग सात बजे से — वक्ता कहते हैं कि पूरा समय भी डाला जाएगा — सात से आठ के बीच पचास या चालीस मिनट का संधि काल रहेगा। यानी शनिवार शाम सात से आठ के बीच संधि पूजन होगा।
वक्ता कहते हैं, अष्टमी शनिवार को पड़ रही है, और उसी अष्टमी को शाम लगभग सात बजे से — पूरा समय भी डाला जाएगा — सात से आठ के बीच जो समय है, वह संधि काल रहेगा, पचास मिनट का, चालीस मिनट का। यानी शनिवार शाम सात से आठ के बीच संधि पूजन होगा।
शनिवार की यह संधि पूजा विशेष दिव्य क्यों होगी?
क्रूर दिन और चामुंडा की अष्टमी-नवमी संधि का मेल
क्योंकि एक ओर यह क्रूर दिन है — उग्रता का दिन, उग्र वार — और दूसरी ओर नवमी के साथ अष्टमी तिथि, यानी संधि का समय। उस समय जगदंबा का जो रूप प्रकट होता है, जिसकी ऊर्जा उन चालीस से बयालीस मिनटों में पूरे ब्रह्मांड में फैली रहती है, वह भगवती चामुंडा का है।
वक्ता कहते हैं, शनिवार को जो संधि पूजा पड़ेगी, वह अपने आप में बहुत दिव्य हो जाती है, क्योंकि एक ओर यह क्रूर दिन है — क्रूर यानी उग्रता का दिन, उग्रता वाला वार। और साथ में नवमी के साथ अष्टमी तिथि, यानी संधि का समय। उस समय जगदंबा का जो रूप प्रकट होता है, जिसकी ऊर्जा उन चालीस से बयालीस मिनटों में पूरे ब्रह्मांड में फैली रहती है, वह भगवती चामुंडा का है।
नवार्ण मंत्र में चामुण्डायै बीज क्यों है?
नवार्ण में स्थित चामुण्डायै बीज
वक्ता कहते हैं, भगवती चामुंडा अपने आप में देवियों में सबसे प्रखर, सबसे ओजस्वी, और कह सकते हैं सबसे उग्र हैं। नवार्ण में जो बीज अक्षर चामुण्डायै आया है, वह यूँ ही नहीं आया: जगदंबा का वह रूप उस मंत्र में साक्षात् उपस्थित रहता है।
वक्ता कहते हैं, भगवती चामुंडा अपने आप में देवियों में सबसे प्रखर, सबसे ओजस्वी, और कह सकते हैं सबसे अधिक उग्र हैं। नवार्ण में जो बीज अक्षर आया है — चामुण्डायै — वह यूँ ही नहीं आया। जगदंबा का वह रूप उस मंत्र में साक्षात् उपस्थित रहता है। यह भी एक कारण है कि यह समय अपने आप में बहुत दिव्य है।
नवरात्रि के संधि पूजन में कौन सी बलि दी जा सकती है?
कुष्मांडा, नारियल, नींबू, जायफल, लौंग, खीरा, केला
उस संधि पूजन के समय आप बलि छेदन करेंगे: चाहे कुष्मांडा बलि दें, नारियल बलि, नींबू बलि, जायफल बलि, लौंग बलि, या खीरे की बलि, या कदली फलम — यानी केले की बलि — जिस भी पदार्थ की हो, उस समय एक सौ एक की बलि दी जाती है।
वक्ता कहते हैं, उस दिन उस समय, संधि पूजा के समय, आप बलि छेदन करेंगे। चाहे कुष्मांडा बलि दें, नारियल बलि, नींबू बलि, जायफल बलि, लौंग बलि, या खीरे की बलि। या कदली फलम, यानी केले की बलि आदि — जो भी पदार्थ लें, उस समय उनकी एक सौ एक की बलि।
संधि काल में दी गई बलि से क्या होता है?
शत्रुओं और कष्टों का नाश
वक्ता कहते हैं, वह बलि आपके शत्रुओं के नाश और आपके कष्टों के नाश के लिए अपने आप में पूरी तरह पूर्ण होगी, क्योंकि उस दिन शनिवार के संधि काल में तिथि और वार का अद्भुत संयोग बन रहा है। इसके लिए तैयार रहिए।
वह बलि अपने आप में आपके शत्रुओं के नाश और आपके कष्टों के नाश के लिए बहुत पूर्ण होगी। क्योंकि उस दिन, शनिवार के संधि काल में, तिथि और वार का अद्भुत संयोग बन रहा है। तो तैयार रहिए, वक्ता कहते हैं।
नवमी राम नवमी है, और शाक्तों के लिए तारा नवमी, जिस दिन भगवती तारा का एक रूप प्रकट हुआ।
राम नवमी, और शाक्तों के लिए तारा नवमी
बाद में पड़ने वाली नवमी राम नवमी है, और विशेषकर शाक्तों के लिए यह तारा नवमी है — वह दिन जब एक कल्प भेद के अनुसार भगवती तारा का एक रूप प्रकट हुआ था।
वक्ता कहते हैं, इसके बाद जो नवमी तिथि पड़ रही है: राम नवमी पड़ रही है, और विशेषकर शाक्तों के लिए यह तारा नवमी है — वह दिन जब उस कल्प भेद के अनुसार, एक कल्प में भगवती तारा का एक रूप प्रकट हुआ था।
पुष्य नक्षत्र, रविवार और शुक्ल पक्ष एक साथ पड़ते हैं, और गीता में कृष्ण पुष्य को अपना बताते हैं।
शुक्ल पक्ष में रविवार के साथ पुष्य नक्षत्र
क्योंकि उस दिन पुष्य नक्षत्र है, रविवार है, और शुक्ल पक्ष है। वक्ता गीता के विभूति योग में भगवान श्री कृष्ण का कथन बताते हैं — नक्षत्रों में मैं पुष्य नक्षत्र हूँ।
नवरात्रि के अंतिम दिन क्या किया जाता है?
पूर्णता के समय के रूप में कन्या पूजन और हवन
कन्या पूजन होगा, हवन होगा। एक तरह से यह पूर्णता का समय है: उस दिन हमारे नवरात्र का अंतिम चरण चल रहा होगा, जो इसे अपने आप में बहुत दिव्य और बहुत विशेष बनाता है।
वक्ता कहते हैं, कन्या पूजन होगा, हवन होगा। और वह समय एक तरह से पूर्णता का समय है। उस दिन हमारे नवरात्र का अंतिम चरण चल रहा होगा। इसलिए यह अपने आप में बहुत दिव्य, अपने आप में बहुत विशेष हो जाता है।
तारा नवमी को क्या किया जाता है, और गृहस्थ क्या कर सकता है?
लगभग दो वर्ष से चल रहा अलग एक दिन का अनुष्ठान
तारा नवमी को वे एक अलग एक दिन का अनुष्ठान करते आ रहे हैं — उनके विचार से लगभग दो वर्ष से — और इस बार भी यह अलग से होगा। वक्ता श्रोताओं से कहते हैं कि वे भी अपने घर पर करें, और हो सके तो उस दिन हवन का विधान ज़रूर करें।
क्या भगवती की कृपा से कुंडली का लिखा बदल सकता है?
कुंडली जहाँ की तहाँ पड़ी रह जाती है
वक्ता कहते हैं, ग्रह और नक्षत्र कुंडली में अपनी जगह हैं, पर जगदंबा चाहें तो शिव और शक्ति की कृपा से जन्म कुंडली की बात कुछ और हो जाती है — या यूँ कहें कि आपके जीवन में उसका प्रभाव पूरी तरह शुभ हो जाता है। कुंडली एक ओर पड़ी रह जाएगी, कष्ट और शत्रु दूसरी ओर।
वक्ता कहते हैं, आपके ग्रह और नक्षत्र कुंडली में अपनी जगह हैं, पर जगदंबा चाहें तो शिव और शक्ति की कृपा से जन्म कुंडली की बात कुछ और हो जाएगी। या यूँ कहिए: आपके जीवन में उनका प्रभाव शुभ ही शुभ हो जाएगा। कुंडली जैसी है वैसी पड़ी रह जाएगी। एक ओर कष्ट और दूसरी ओर शत्रु, जैसे हैं वैसे पड़े रह जाएँगे। इसलिए इन दिव्य समयों का लाभ लीजिए; इन्हें यूँ ही न जाने दीजिए।
पहली बार नवरात्रि करने वाले के लिए व्रत का नियम क्या है?
शरीर की क्षमता के अनुसार उपवास
शरीर की क्षमता के अनुसार व्रत रखें। फलाहार पर रहने की कोशिश करें — कुछ भक्त केवल जल पर या जूस पर भी रहते हैं — पर शरीर की क्षमता के अनुसार नवरात्रि का व्रत फलाहार पर या फलाहारी ढंग से रखें।
अगर फलाहार का व्रत भी संभव न हो तो?
एक समय भोजन, और हविष्य अन्न
अगर आप निभा न सकें, तो दिन में एक समय अन्न आदि ग्रहण करें। जो भी हविष्य अन्न संभव हो, वह ले सकते हैं।
वक्ता कहते हैं, अगर आप सह न सकें, तो एक समय अन्न आदि ग्रहण करें। जो भी हविष्य अन्न आदि संभव हो, वह ले सकते हैं; जो भी हो, वह लें।
क्या दस मसालों से बना साबूदाने का व्यंजन सच में व्रत है?
व्रत कहे जाने वाले व्यंजन में दस तरह के मसाले
यह साबूदाना जो लोग पकौड़ी बनाकर खाते हैं, और दस तरह के मसाले डालकर तरह-तरह के व्यंजन और चटनियाँ — तो भाई, वक्ता कहते हैं, व्रत रखिए ही मत। यह पाखंड मत करिए। वे कहते हैं, भाव के नाम पर लोगों ने तबाही मचा दी है।
यह साबूदाना जो लोग पकौड़ी बनाकर खाते हैं, और तरह-तरह के व्यंजन, चटनी और सब कुछ, दस तरह के मसाले डालकर — तो भाई, व्रत रखिए ही मत, वक्ता कहते हैं। यह पाखंड मत करिए। आजकल भाव के नाम पर लोगों ने पूरी तबाही मचा दी है।
कान्हा जी को स्कूल में दाखिला दिलाकर अक्षर सिखाना भाव के नाम पर की गई छेड़छाड़ है।
बाल-देवता का स्कूल में दाखिला और अक्षर-ज्ञान
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने फेसबुक पर एक वीडियो देखा जिसमें एक महिला ने कान्हा जी का स्कूल में दाखिला करा दिया था; उन्हें A B C D सिखाई जा रही है और स्कूल भेजा जा रहा है। वे कहते हैं, भाव के नाम पर आप किसी भी चीज़ से छेड़छाड़ कर सकते हैं, किसी भी चीज़ पर पर्दा डाल सकते हैं।
वक्ता अभी-अभी फेसबुक पर देखे एक वीडियो का ज़िक्र करते हैं, जिसमें किसी ने कान्हा जी का स्कूल में दाखिला करा दिया था। उन्हें A B C D सिखाई जा रही है, और स्कूल भेजा जा रहा है। यानी भाव के नाम पर आप किसी भी चीज़ से छेड़छाड़ कर सकते हैं, किसी भी चीज़ पर पर्दा डाल सकते हैं। वे कहते हैं, भगवान के प्रति आपका बहुत बढ़िया भाव है — यह है आपका भाव।
भगवान कहते हैं वेदोऽहम्, मैं वेद हूँ; अक्षर ही ब्रह्म है, और उसी ब्रह्म को A B C D सिखाई जा रही है।
वेदोऽहम् — अक्षर ब्रह्म को वर्णमाला सिखाना
वक्ता कहते हैं, योगेश नाम के एक टिप्पणीकार ने बहुत अच्छी टिप्पणी की: कि भगवान कहते हैं वेदोऽहम् — मैं स्वयं वेद हूँ; अक्षर ही ब्रह्म है, वही ब्रह्म है। और उन्हें आप A B C D सिखा रहे हैं, और उस पर पैसा खर्च कर रहे हैं।
वक्ता कहते हैं, योगेश जी ने इस पर बहुत बढ़िया टिप्पणी की है: कि भगवान कहते हैं वेदोऽहम् — मैं स्वयं वेद हूँ। अक्षर ब्रह्म — अक्षर ही ब्रह्म है, वही ब्रह्म है। और उन्हें आप A B C D सिखा रहे हैं। यह है आपका भाव। उन पर पैसा खर्च हो रहा है। तो जो दिखावे की यह नकली भक्ति चल रही है, उसका शिकार मत बनिए।
क्या यात्रा में अपने देवता को डोलची में लेकर घूमना ठीक है?
यात्रा में साथ ले जाए गए देवता, और वह शुद्धता जो रखी नहीं जा सकती
वक्ता कहते हैं कि एक विषय पर वे हमेशा बोलते आए हैं — अपने देवी-देवताओं को डोलची में लेकर घूमना। हमारा शरीर और हमारी यात्रा कभी उस स्तर की शुद्ध नहीं हो सकती, जैसी इसके लिए चाहिए। लोग कान्हा जी को, या अपने आराध्य के किसी भी रूप को, जगह-जगह ले जाते हैं और वहाँ उन्हें स्नान कराते हैं। वे कहते हैं, ऐसा कभी नहीं करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि एक विषय पर वे हमेशा बोलते आए हैं — अपने देवी-देवताओं को डोलची में लेकर घूमना। हमारा यह शरीर और हमारी यात्रा कभी उस स्तर की शुद्ध नहीं हो सकती, जिसमें लोग कान्हा जी को, या अपने आराध्य के किसी भी रूप को, लेकर जगह-जगह घूमते हैं और उन्हें स्नान कराते हैं। ऐसा कभी नहीं करना चाहिए। उनका अपना विषय है, वे अपनी जगह रहें। आप अपनी जगह रहें। पर लोग अपने भाव की प्रधानता में ऐसी बातें इस हद तक, इस स्तर तक कहते हैं कि सुनकर और देखकर अनदेखा करना कठिन हो जाता है। बहुत क्रोध आता है, पर क्या कहें — कम से कम इससे बचा जाए, यह दोष है।
देवता के साथ यात्रा करना अपराध क्यों माना जाता है?
ट्रेन, बस या हवाई जहाज़ की सीट, और उस पर कौन बैठा था
वे कहते हैं कि जब ये अपराध लगेंगे, तो बहुत कठिनाई होगी। जिस ट्रेन, बस या हवाई जहाज़ में आप यात्रा करते हैं, जिस जगह आप उन्हें रखते हैं, वहाँ पता नहीं कौन मुर्गा लेकर आया, कौन मछली लेकर आया, कौन मांस आदि लेकर आ रहा है। किसका शरीर किस स्तर का है, कोई क्या गलत काम करके आ रहा है, किसका शरीर उस सीट को छुएगा, वहाँ कौन बैठा था।
वे कहते हैं कि जब ये अपराध लगेंगे, तो बहुत बड़ी कठिनाई होगी। आप जिस भी ट्रेन, जिस भी बस, जिस भी हवाई जहाज़ में यात्रा कर रहे हैं, और उस यात्रा में उन्हें जिस भी जगह रख रहे हैं — वह जहाँ भी जा रहा है, पता नहीं उसमें कौन मुर्गा लेकर आया, कौन मछली लेकर आया, कौन मांस आदि लेकर आ रहा है। किसका शरीर किस स्तर का है, पता नहीं; कोई क्या गलत काम करके आ रहा है, किसका शरीर उस सीट को छुएगा, वहाँ कौन बैठा होगा।
भाव के नाम पर की गई अशोभनीयता देवताओं के प्रति अक्षम्य अपराध बन जाती है।
अक्षम्य अपराध, और फिर भुगतने वाले की शिकायत
वे कहते हैं, ऐसी अशुद्धि कभी मत रखिए। भाव के नाम पर आप जो यह अशोभनीयता कर रहे हैं, वह देवताओं के प्रति अपराध है, और यह अक्षम्य हो जाता है। फिर लोग इसे भुगतते हैं और कहते हैं — हम इतने समर्पित साधक, इतने समर्पित भक्त थे कि भगवान को डोलची में लेकर घूमे — फिर भी हमारा नुकसान हो गया।
वे कहते हैं, ऐसी अशुद्धि कभी मत रखिए। भाव के नाम पर आप जो यह अशोभनीयता कर रहे हैं, वह देवताओं के प्रति किया जा रहा अपराध है, और यह अक्षम्य हो जाता है। और फिर लोग इसे भुगतते हैं और कहते हैं: हम इतने समर्पित साधक, इतने समर्पित भक्त थे कि भगवान को डोलची में लेकर घूमते रहे — फिर भी हमारा नुकसान हो गया।
देवता के प्रति किए गए अपराध का दंड कौन देता है?
देवता नहीं, उनके गण — योगिनियाँ और भैरव
यह अपराध है, और फिर उनके गण दंड देते हैं। वक्ता कहते हैं, भगवान तो दंड देने आएँगे नहीं — पर उनके गण, जिनकी ज़िम्मेदारी है कि हमारे आराध्य का अपमान न हो, आपको दंड देते हैं; उन्हीं योगिनियों और उन्हीं भैरवों से आपको दंड मिलता है।
वे कहते हैं, यह अपराध है, और फिर उनके गण दंड देते हैं। भगवान तो दंड देने आएँगे नहीं। पर उनके गण, जिनकी यह ज़िम्मेदारी है — कि हमारे आराध्य का अपमान न हो — और जब आप ऐसा करते हैं, तो उन्हीं योगिनियों और उन्हीं भैरवों से आपको दंड मिलता है। वे पहले भी इन बातों पर बोल चुके हैं; इनसे बचा जाए।
नवरात्रि की कलश स्थापना में कौन-से मंडल होते हैं?
नवग्रह, षोडश मातृका, चौंसठ योगिनी, पंच क्षेत्रपाल, दश दिगपाल
वे कहते हैं, कलश स्थापन पहले दिन सही समय पर करना चाहिए — समय पर अलग से चर्चा होगी और लिखकर भी दिया जाएगा। मंडल हैं — नौ ग्रहों का, षोडश मातृकाओं का, चौंसठ योगिनियों का, पाँच क्षेत्रपालों का, और दश दिगपालों का।
अगर कोई कलश स्थापना के मंडल न बना सके तो क्या करे?
कलश स्थापना की सरल विधि
अगर आप इन्हें नहीं बना सकते, तो कोई कठिनाई नहीं, कोई समस्या नहीं। चैनल पर कलश स्थापना की एक बहुत साधारण विधि प्रसारित है; अगर आपको पूरा विधि विधान नहीं आता, तो सरल विधि से कलश स्थापना कीजिए।
वे कहते हैं, अगर आप इन्हें नहीं बना सकते, तो कोई कठिनाई नहीं, कोई समस्या नहीं। चैनल पर कलश स्थापना की एक बहुत साधारण विधि प्रसारित है। अगर आपको पूरा विधि विधान नहीं आता, तो सरल विधि से कलश स्थापना कीजिए।
अलग मंडल बनाए बिना सभी देवताओं का आवाहन कैसे हो?
मुख्य कलश में ही सभी देवताओं का आवाहन
क्योंकि जब कलश का मंत्र पढ़ा जाता है, तो उसमें बताया गया है कि कलश के घट में कौन स्थापित है और उसके कुंभ में किस देवता का कहाँ स्थान है — सब उसमें आ जाते हैं, सबका आवाहन हो जाता है। इसलिए जिस कलश में आप जगदंबा का आवाहन कर रहे हैं, उसी में नवग्रह, षोडश मातृका और चौंसठ योगिनियों को नाम लेकर अक्षत और पुष्प चढ़ाइए।
वे कहते हैं, और उसी कलश पर — क्योंकि जब कलश का मंत्र पढ़ा जाता है, तो पूरे मंत्र में यही है कि कलश के घट में कौन स्थापित है, और उसके कुंभ में किस देवता का कहाँ स्थान है। तो सब उसमें आ जाते हैं। सबका आवाहन हो जाता है। जिस कलश में आप जगदंबा का आवाहन कर रहे हैं, उसी में सभी देवताओं का आवाहन हो जाएगा। और देवताओं के उसी कलश में, यानी मुख्य कलश में ही, नवग्रह को, षोडश मातृका को, और सभी चौंसठ योगिनियों को नाम लेकर अक्षत, पुष्प आदि चढ़ाइए। आपको बहुत परेशान होने की ज़रूरत नहीं। अगर आपको बृहद अनुष्ठान का पूरा विधि विधान नहीं आता, मंडल कैसे बनता है, तो कोई समस्या नहीं — फल में कोई कमी नहीं होगी; आपको बृहद जैसा ही फल मिलेगा। हाँ, पर अगर आपमें सामर्थ्य है, जगह है, और आप जानते हैं कि यह कैसे होता है, तो ज़रूर अलग से बनाइए।
अखंड ज्योत कब तक जलनी चाहिए?
दशमी तिथि के पारण तक
अखंड ज्योत तब तक जलनी चाहिए जब तक आप दशमी तिथि पर पारण न कर लें। वे कहते हैं, इस पूरे विषय पर चैनल पर बहुत विस्तार से चर्चा हो चुकी है।
वे पूछते हैं, अखंड ज्योति कब तक जलनी चाहिए। यह पूरा विषय चैनल पर है और वहाँ बहुत विस्तार से चर्चा हो चुकी है। अखंड ज्योत जलाइए, प्रज्वलित कीजिए। और अखंड ज्योत तब तक जलनी चाहिए जब तक आप दशमी तिथि पर पारण न कर लें।
विसर्जन के समय लोग अखंड ज्योत के साथ क्या गलत करते हैं?
उसे अपने-आप पूरा होने देने के बजाय उस पर पानी डालना
लोग कलश विसर्जन का मंत्र पढ़कर अक्षत छोड़ते हैं, और उसी समय अखंड ज्योत पर पानी डालकर उसे बुझा देते हैं। वे कहते हैं, इसके बजाय उसमें जो घी और तेल है, उसे निकालकर रख लीजिए — वह तिलक लगाने के काम आएगा — और थोड़ा तेल रहने दीजिए, ताकि पारण होते-होते वह अपने-आप पूरी हो जाए।
वे कहते हैं, पर लोग क्या करते हैं कि जैसे ही कलश के विसर्जन का मंत्र पढ़कर अक्षत छोड़ते हैं, उसी समय अखंड ज्योत पर पानी डालकर उसे बुझा देते हैं। उसमें जो भी घी और तेल है, उसे ज़रूर निकालकर रख लीजिए। वह तिलक लगाने के काम आएगा; आप उसे रोज़ रोली में मिलाकर तिलक कर सकते हैं। और थोड़ा तेल रहने दीजिए, ताकि पारण होते-होते वह अपने-आप पूरी हो जाए। यही अपने-आप में ठीक है — पर पानी डालकर बुझाना सबके लिए उचित नहीं। जो लोग उस मत से चल रहे हैं, उनके अनुष्ठानों का विषय अलग है।
जिसका संस्कृत उच्चारण साफ़ नहीं है, वह क्या करे?
सप्तशती का पाठ हिंदी में
वे कहते हैं, अगर संस्कृत नहीं आती, तो हिंदी में कीजिए। हिंदी में पाठ कैसे करें, इसका वीडियो आज फिर से साझा किया गया है; और महाविद्या क्रम भी है, जिससे सप्तशती का पाठ सात दिनों में बहुत आसानी से पूरा हो जाता है।
वे पूछते हैं, हम रोज़ पाठ कैसे करें — पूरा दुर्गा सप्तशती पाठ कैसे करें, दीक्षाधारी क्या करे, जिसकी किसी तरह की दीक्षा नहीं हुई वह क्या करे, और जब संस्कृत का उच्चारण साफ़ न हो तो क्या करें? यह सब चैनल पर विस्तार से है। अगर संस्कृत नहीं आती, तो हिंदी में कीजिए। हिंदी में पाठ कैसे करें, इसका वीडियो आज फिर से साझा किया गया है। और महाविद्या क्रम में पाठ कैसे होता है, वह भी है, जिससे पूरा दुर्गा सप्तशती पाठ सात दिनों में बहुत आसानी से पूरा हो जाता है।
नवरात्रि में सात दिन का सप्तशती पाठ कैसे बाँटा जाता है?
आठवें दिन स्तुति और रहस्य, नौवें दिन हवन
आठवें दिन स्तुति आदि कीजिए, रहस्यों का पाठ कीजिए; नौवें दिन हवन कीजिए। और अगर आठ दिन की हो, तो सात में पूरा करके आठवें दिन हवन आदि कीजिए। किस दिन कौन-सा अध्याय पढ़ा जाए, और सब कैसे हो, यह बताया जा चुका है।
वे कहते हैं, आठवें दिन आपको स्तुति आदि करनी चाहिए, रहस्यों का पाठ करना चाहिए, और नौवें दिन हवन करना चाहिए। और अगर आठ दिन की हो, तो सात दिनों में ही पूरा करके आठवें दिन हवन आदि कीजिए। यह पूरा विषय — किस दिन किस अध्याय का पाठ होगा, सब कैसे होगा — विस्तार से बताया जा चुका है।
क्या बिना दीक्षा वाला व्यक्ति नवार्ण मंत्र का जप कर सकता है?
एक मनाही जिसे वे कभी वापस नहीं लेते
वे कहते हैं, जो दीक्षाधारी नहीं है, उसके लिए वे कभी नवार्ण मंत्र के पक्ष में नहीं बोलते — हमेशा मना करते हैं। भाव की बात करने वाले लोग इसका बहुत विरोध करते हैं: भाव से क्यों नहीं होगा, क्या माँ भाव नहीं देखतीं। वे लोगों से कहते हैं कि भाव के नाम पर छेड़छाड़ बंद कीजिए।
बिना दीक्षा वाले कौन-से मंत्र कभी न जपें, और दीक्षा के बाद क्या बदलता है?
नवार्ण और पंचदशी, और उन्हें कभी ज़ोर से न बोलना
नवार्ण और पंचदशी ऐसे मंत्र हैं जिनका जप बिना दीक्षा वाले लोगों को नहीं करना चाहिए। अगर किसी पाठ के बीच में उच्चारण आ जाए, तो वह अलग बात है। और एक बार दीक्षाधारी हो जाने पर यह मंत्र कभी भी मुँह से नहीं बोलना चाहिए।
वे कहते हैं, नवार्ण, पंचदशी — ये ऐसे मंत्र हैं जिनका जप बिना दीक्षा वाले लोगों को नहीं करना चाहिए। अगर किसी पाठ के बीच में इसका उच्चारण आ रहा है, तो वह विषय अलग है। और जब आप दीक्षाधारी हो गए, तब यह मंत्र कभी भी मुँह से नहीं बोलना चाहिए।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के भीतर का मंत्र कैसे पढ़ें?
मन में पढ़ें, ज़ोर से चिल्लाकर नहीं
जहाँ भी कुंजिका पाठ करना हो, श्री सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के बीच में जो पूरा मंत्र आता है — कुंजिका का महानव मंत्र — उसे केवल मन में पढ़ना चाहिए, बोलकर नहीं, चिल्लाकर नहीं। वे कहते हैं, जो माइक पर इसे पढ़ते हैं, उन्हें छोड़िए; वह उनका विषय है।
वे कहते हैं, जहाँ भी कुंजिका पाठ करने की बात हो, सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् के पाठ के बीच में जो पूरा मंत्र आता है — कुंजिका का महानव मंत्र — उसे केवल मन में पढ़ना चाहिए। उसे ज़ोर से नहीं पढ़ना चाहिए, चिल्लाना नहीं चाहिए। जो माइक पर इसे पढ़ते हैं, जो भी पढ़ रहा है, उन्हें छोड़िए, वह उनका विषय है। आप साधक हैं; आपको यह ज्ञान होना चाहिए कि हमें इसे बोलना नहीं है। हम इसे मन में बोलेंगे, ज़ोर से नहीं बोलेंगे। यह बात ध्यान में रखिए, खासकर जब आपकी दीक्षा हो चुकी हो।
क्या उस सही ज्ञान पर चलना गलत है जो गुरु ने नहीं दिया?
वे गुरु जो अपने नीति नियम से सब कुछ नहीं बताते
वे कहते हैं, दीक्षा देने वाले सभी गुरु ये बातें मन-मुताबिक नहीं बताएँगे; वे अपने आचरण के नियमों से चलते हैं और इतना नहीं कहते। वह अलग मत है। पर अगर कहीं से भी सही ज्ञान आप तक पहुँच रहा है, जो मत के अनुसार है और जिससे हमारा भला होता है, तो उसमें कोई दोष नहीं — ऐसा नहीं कि गुरु कहेंगे तभी करेंगे। अगर संदेह हो, तो अपने गुरु से पूछिए।
वे कहते हैं, यह विषय भी है: दीक्षा देने वाले सभी गुरु ये बातें मन-मुताबिक नहीं बताएँगे, या वे अपने नीति और नियम से चलते हैं और इतना नहीं बताते। वह अलग मत है। पर अगर कहीं से भी आपको सही जानकारी मिल रही है, जो मत के अनुसार है, जिस पर चलना चाहिए, जिससे हमारा भला होता है, तो उसमें कोई दोष नहीं — कि गुरुजी कहेंगे तभी करेंगे। आपको पता चल गया है; कीजिए। अगर संदेह हो, तो गुरुजी से पूछिए।
अगर कोई गुरु द्वेष से सारी साधना को झूठा कह दे तो?
बलाद कृष्ण मोहाय — भगवती ने मोह में बाँध दिया
अगर उसके बाद गुरु द्वेष से कहें कि सब झूठ है, सब पाखंड है, सब बेकार है, कुछ भी सच नहीं, ये लोग बस दिखावा कर रहे हैं — तो वक्ता कहते हैं, इतना ही कहा जा सकता है: बलाद कृष्ण मोहाय, भगवती ने उन्हें बलपूर्वक पकड़कर मोह में डाल दिया है। वे बड़े तपस्वी हों, बड़े तंत्र साधक हों, दिव्य साधनाएँ जानते हों, पर यही सब कारण है कि जगदंबा ने उन्हें ऐसे भ्रम में डाल दिया है कि उन्हें अपने सिवा सब झूठे और पाखंडी लगते हैं।
अगर उसके बाद गुरुजी द्वेष से कहें कि यह सब झूठ है, सब पाखंड है, सब बेकार की बातें हैं, कुछ भी सच नहीं, ये लोग बस नौटंकी कर रहे हैं — तो वे कहते हैं, इतना ही कहा जा सकता है: बलाद कृष्ण मोहाय, भगवती ने उन्हें बलपूर्वक पकड़कर मोह में डाल दिया है। वे बहुत बड़े तपस्वी हों, बहुत बड़े तंत्र साधक हों; दिव्य साधनाएँ जानते हों, वह सब अपनी जगह है। पर ठीक यही सब उनके पास आने के कारण जगदंबा ने उन्हें ऐसे भ्रम में डाल दिया है कि उन्हें अपने सिवा सब झूठे लगते हैं, सब पाखंडी लगते हैं। वे कहते हैं, यह भी सच्ची बात है।
जगदंबा धन के साथ क्या देती हैं, और क्या रोक लेती हैं?
वह कलेजा जो हर साधक को नहीं मिलता
जब जगदंबा आपको किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ाने लगेंगी, तो धन, मान और प्रतिष्ठा देंगी — पर वक्ता कहते हैं, याद रखिए कि क्या उसके साथ वे आपको कलेजा भी दे रही हैं: गरीबों और दुखियों की मदद करने का, अपने से कम जानने वालों के पीछे खड़े होकर उन्हें आगे बढ़ाने का, जिसने आपसे द्वेष रखा उसके भी कल्याण की बात करने का, धन से, वाणी से या शरीर से सहायता करने का। यह कलेजा जगदंबा हर साधक को नहीं देतीं।
वे कहते हैं, जब जगदंबा किसी भी तरह आपको आगे बढ़ाने लगेंगी, आप जिस भी क्षेत्र में आगे जाएँ, वे आपको धन, मान, प्रतिष्ठा, सब कुछ देंगी। तो एक बात हमेशा याद रखिए, और आज की बात गाँठ बाँध लीजिए: क्या उसके साथ वे आपको कलेजा भी दे रही हैं — कि आप गरीबों और दुखियों की मदद करें, अपने से कम जानने वालों के पीछे खड़े होकर उन्हें आगे लाने का प्रयास करें, इस मार्ग पर सहायता करें, द्वेष रखे बिना उस व्यक्ति के भी कल्याण की बात करें जिसने आपसे द्वेष रखा, और जो भी मदद कर सकें करें, चाहे धन से, अपनी वाणी से, या अपने शरीर से मदद करके। यह कलेजा जगदंबा हर साधक को नहीं देतीं। जगदंबा सबको कलेजा नहीं देतीं; यह याद रखिए।
जिसे धन तो मिले पर वह कलेजा न मिले, उसका क्या होता है?
जितना धन आता है, उतना वह कंजूस होता जाता है
जितना धन उसके पास आता है, उतना वह कंजूस होता जाता है — कम खर्च करो, बचाओ, इसे एक लाख करो, दस लाख करो, पचास लाख करो। वे देती जाती हैं, और वह और कंजूस होता जाता है। वक्ता कहते हैं, यही माया है; वे उसे बाँध देती हैं।
वे कहते हैं, जितना धन उसके पास आएगा, उतना वह कंजूस होता जाएगा। कम खर्च करें, बचाएँ; इसे एक लाख करें, दस लाख करें, पचास लाख करें। वे दे रही हैं, और ज़्यादा दे रही हैं, और वह और कंजूस होता जा रहा है। यही माया है; वे उसे बाँध देती हैं।
साधक किन चरणों की परीक्षा से गुज़रता है?
पहले बढ़े हुए दुख से, फिर सुख से परीक्षा
वे पिछले एक लाइव का ज़िक्र करते हैं, जिसमें उन्होंने परीक्षा के स्तर बताए थे: पहले, जब हम कष्ट में होते हैं, तो कष्ट और बढ़ाया जाता है और वही परीक्षा होती है; जब हम उससे निकलते हैं, तो सुख दिया जाता है, और फिर सुख की माया से परीक्षा होती है। ऐसे सुख दिए जाते हैं कि आपको लगेगा किसी भी तरह साधना छोड़ दी जाए।
वे कहते हैं, इससे पहले उन्होंने एक पूरा लाइव किया था, जिसमें बताया था कि परीक्षा किन स्तरों पर होती है। पहले, जब हमें कष्ट होता है, तो कष्ट और बढ़ाया जाएगा और वही परीक्षा होगी। जब हम उससे निकलेंगे, तो सुख दिया जाएगा, और फिर वे सुख की माया से परीक्षा लेंगी। ऐसे सुख दिए जाएँगे कि आपको लगेगा: किसी भी तरह साधना छोड़ दो। साम, दाम, दंड, भेद — दुख देकर छुड़वा दो, या सुख की माया में बाँध दो, ऐसी चीज़ें दे दो कि उसमें बँधकर वह साधना छोड़ दे। जब कोई इसे भी पार कर लेता है, तभी जीवन में दिव्य और ऊँचे स्तर की शक्तियाँ जागती हैं। तो वे पूछते हैं, यह सब क्या है — यह उन्हीं की माया है। कोई झगड़ा करता है, कोई लालच देता है।
शक्तिपीठ पर भक्त का अपमान हो तो क्या होता है?
जो आया है, वह भगवती में समाया है
आप जिस जगदंबा के पास गए हैं, उनके प्रति आपकी श्रद्धा को परखा जाता है। चोट उसी पर पड़ती है। अपमान करने वाले लोग कहीं न कहीं भ्रम में हैं। ऐसा नहीं कि उन्हें दंड नहीं मिलता। क्योंकि वहाँ पहुँचा सेवक स्वयं भगवती में समाया है। वह उन्हीं का रूप बनकर पहुँचा है।
वक्ता कहते हैं, आप जिस जगदंबा के पास गए हैं, उनके प्रति आपकी श्रद्धा को परखा जाता है। चोट उसी पर पड़ती है। जो लोग अपमान करते हैं, वे कहीं न कहीं भ्रम में हैं। और ऐसा नहीं कि उन्हें दंड नहीं मिलता। क्योंकि वहाँ पहुँचा सेवक स्वयं भगवती में समाया है। वह भगवती का रूप बनकर पहुँचा है। उन्हीं को ज़िम्मेदारी दी गई है — जो भी मेरे घर आए। आप कहते हैं कि आप उनके सेवक हैं, वे आपकी मालकिन हैं, आपकी स्वामिनी हैं।
मंदिर में काम करने वाले सेवक की स्थिति क्या है?
स्वामिनी के घर में वेतन पाने वाला सेवक, मालिक नहीं
वक्ता कहते हैं, आप स्वामिनी के घर में सेवक हैं और आपको वेतन मिल रहा है। आपकी मज़दूरी, आपका पारिश्रमिक जगदंबा दे रही हैं। आप करोड़पति हों या अरबपति, सोने-चाँदी में खेल रहे हों — उन्होंने आपकी क्षमता और योग्यता के अनुसार दिया है। पर आप फिर भी उनके सेवक हैं। आप खुद को सेवक कहते हैं। जब आप उस जगह खुद को मालिक मान लेते हैं और उसे हथियाने का काम शुरू करते हैं, तब मुसीबत शुरू होती है।
वक्ता कहते हैं, स्वामिनी के घर में आप सेवक हैं और आपको वेतन मिल रहा है। आपको मज़दूरी मिल रही है। आपका पारिश्रमिक जगदंबा दे रही हैं। आप करोड़पति हों, अरबपति हों। हो सकता है आप सोने-चाँदी में खेल रहे हों — उन्होंने आपको आपकी क्षमता और योग्यता के अनुसार दिया है। पर आप उनके सेवक ही हैं न। आप खुद को सेवक कहते हैं — छोटा सेवक, बड़ा सेवक, मैं यह सेवक, मैं वह सेवक, मैं प्रमुख सेवक, मैं यह-वह। आप वह सेवक हैं, मालिक नहीं। पर जब उस जगह आप खुद को मालिक मान लेते हैं, तो वहाँ विराजी स्वामिनी के, जिस भी मंदिर के स्वामी-स्वामिनी वहाँ विराजे हैं, उनके सेवक होकर आप अब जगह हड़पने का काम कर रहे हैं।
दिल्ली के प्राचीन बटुक भैरव मंदिर के सेवक मंदिर को अपना कहने लगे।
दिल्ली का प्राचीन बटुक भैरव मंदिर
वक्ता याद करते हैं कि पिछले लाइव में उन्होंने बताया था कि दिल्ली के प्राचीन बटुक भैरव मंदिर के सेवक क्या करते हैं। वे कहने लगे: यह मेरा मंदिर है, जो मैं चाहूँगा वही होगा, बस। वे कहते हैं, जब कोई ऐसी बात कहे, तो समझिए कि उसका वह समय शुरू हो गया है जो नहीं आना चाहिए था। उसके पतन की शुरुआत हो चुकी है।
वक्ता कहते हैं, जैसे बटुक भैरव मंदिर, वह प्राचीन मंदिर, जो दिल्ली में है — उसके बारे में उन्होंने पिछले लाइव में एक बात बताई थी कि वहाँ के सेवक किस तरह की बातें करते हैं। और वे कहने लगे: यह मेरा मंदिर है, जो मैं चाहूँगा वही होगा, बस। जब कोई ऐसी बात कहे — यह मेरा मंदिर है, यहाँ मैं ही हूँ, जहाँ भी मैं आया हूँ — तो समझिए कि उसका वह समय शुरू हो रहा है जो नहीं आना चाहिए था। उसके पतन की शुरुआत हो चुकी है।
जमा धन रातों-रात नहीं जलता; घटने का क्रम शुरू होते ही वह रिसने लगता है।
अचानक जलना नहीं, धीरे-धीरे रिसना
वक्ता कहते हैं, जिसने इतना धन जमा किया है, वह कल ही जलकर राख नहीं होगा। वह बैंक में पड़ा है, और बैंक बंद नहीं होगा। पर वह रिसेगा। उसके घटने का क्रम बना रहेगा, और शुरू हो जाएगा। वाणी ही बता देगी कि उनके पतन का समय आ गया है। और माध्यम किसे बनाया गया? आपको, भक्त को। भक्त भगवान का रूप है। भक्त को, यानी खुद को ही, माध्यम बनाकर वे उनका विनाश शुरू करती हैं।
वक्ता कहते हैं, पर जिसने इतना धन जमा किया है — ऐसा तो नहीं कि कल ही वह जलकर राख हो जाएगा। वह बैंक में पड़ा है, और बैंक बंद नहीं होगा। तो वह रिसता जाएगा। उसके घटने का क्रम बना रहेगा, और फिर शुरू हो जाएगा। वाणी ही बता देगी कि अब उनके पतन का समय आ गया है। माध्यम किसे बनाया गया? माध्यम आप थे, भक्त। भक्त भगवान का रूप है। आपको माध्यम बनाकर — यानी खुद को ही माध्यम बनाकर — वे उनका विनाश शुरू करती हैं, उनका पतन और बर्बादी शुरू करती हैं। वे कहते हैं, यह भी यहाँ बार-बार का अनुभव है।
भक्त का अपमान असल में किस पर पड़ता है?
उँगली स्वयं स्वामिनी पर उठती है
वे स्वामिनी हैं, वे स्वामी हैं। आप उनके सेवक हैं। जो व्यक्ति आया है, वह स्वामिनी के घर आया है, आपके घर नहीं। जब आप उसका अपमान करते हैं, तो दुखी कौन होता है, पीड़ा किसे होती है, अपमान किसका होता है, उँगली किस पर उठती है? उस स्वामिनी पर उठती है।
वक्ता कहते हैं, वे स्वामिनी हैं, वे स्वामी हैं। आप उनके सेवक हैं। जो व्यक्ति उस स्वामिनी के घर आया है, वह स्वामिनी के घर आया है। वह आपके घर नहीं आया। जब आप उसका अपमान करते हैं, तो वहाँ दुखी कौन होता है, पीड़ा किसे होती है, अपमान किसका होता है, उँगली किस पर उठती है? उस स्वामिनी पर उठती है। माँ, मैं आपके घर आया था, और मेरा ऐसे अपमान हुआ; हे भैरव जी, मैं आपके घर आया था, आपका दरबार मानकर आया था, और आपके द्वार पर बिना कारण मेरा अपमान हो रहा है — इस तरह भक्त दुखी होकर बोलता है।
दुख में की गई पुकार जल्दी क्यों पहुँचती है?
दुख में एकाग्रता सुख से कहीं अधिक
सुख में भाव शायद उस स्तर पर उनके चरणों तक न पहुँचे। पर जब आप कष्ट में हों, दुखी हों, उदास हों, तब आपका सीधा जुड़ाव उनके चरणों से हो जाता है। जब आप कष्ट में भगवान या जगदंबा को पुकारते हैं, तो आपकी एकाग्रता सुख की एकाग्रता से कई गुना अधिक होती है।
वक्ता कहते हैं, जब भक्त दुखी होकर बोलता है, तो देखिए: सुख में भाव शायद उस स्तर पर उनके चरणों तक न पहुँचे। पर जब आप कष्ट में पड़ते हैं, दुखी होते हैं, उदास होते हैं, तब आपका सीधा जुड़ाव उनके श्री चरणों से हो जाता है। यह आप देखेंगे, और यह आपके जीवन का अनुभव होगा। जब कष्ट में आप प्रभु को पुकारते हैं, जब कष्ट में आप जगदंबा को पुकारते हैं, तब आपकी एकाग्रता सुख की एकाग्रता से कई गुना अधिक होती है। तो किसी ने आपका अपमान किया और आप उनके चरणों की ओर एकाग्र हो गए। जितनी एकाग्रता से आपने बात उन तक पहुँचाई, बाकी बात भी पहुँच गई। उन्होंने आपको देखा, और उसके बाद उनका काम शुरू हुआ। उनकी योगिनियाँ, उनके सेवक जो सूक्ष्म रूप में मौजूद हैं, फिर उथल-पुथल शुरू करेंगे। अब हमें नहीं पता कि उस व्यक्ति के जीवन में क्या उथल-पुथल मची है। वे बैठे सोचते हैं कि यह मेरा है — पर कहाँ मेरा और कहाँ तुम्हारा, यह वे फिर से शुरू करेंगे — और फिर वे आपसे दोबारा क्षमा भी नहीं माँग पाते। वे वहाँ सिर पटकते रह जाएँगे; कोई सुनवाई नहीं होती।
जो देवता के सबसे निकट हैं, क्या उन्हें क्षमा मिलती है?
जितना बड़ा पद, उतनी बड़ी ज़िम्मेदारी
जितना बड़ा पद, जितनी उनसे निकटता, उतनी बड़ी ज़िम्मेदारी। और जहाँ गलती होती है, वहाँ क्षमा नहीं होती। वक्ता कहते हैं, वह मिलती नहीं। यह अनुभव की बात है, पर लोग सोचते हैं कि यह-वह कर लेने से बात निपट जाएगी।
वक्ता कहते हैं, जितना बड़ा पद, उनसे जितनी अधिक निकटता, उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी। और जहाँ दोष हुआ है, वहाँ क्षमा नहीं होती। वह मिलती नहीं। यह अनुभव की बात है, पर लोग सोचते हैं कि यह कर लेंगे तो निपट जाएगा। ऐसा नहीं; दोनों विषय हैं। भाई, देव प्रशासनिक व्यवस्था का भी अपना महत्व है। बिना कारण तो यह मंडप इतनी दूरी पर नहीं खड़ा होगा, इतनी सीढ़ियों पर बैठने का यह माहात्म्य नहीं होगा, दर्शन का यह माहात्म्य नहीं होगा। जब यह सब माहात्म्य है, तो उसमें भी एक प्रशासनिक व्यवस्था है — किस भक्त को क्या देना है, और क्या लेना है। तो जब आप वहाँ ऐसी गड़बड़ी करते हैं, तो इतिहास बनने में देर नहीं लगती।
सेवक से अपमानित अतिथि अपनी शिकायत घर के मालिक तक ले जाता है।
अतिथि, सेवक और घर का मालिक
आप जिसके घर अतिथि बनकर जाएँ, अगर उस घर का सेवक आपका अपमान करे, तो दुनिया में हँसी किसकी होती है, अपमान किसका होता है? अतिथि कहेगा: मैं आपके घर आया था, देखिए आपका सेवक मेरा अपमान करता है। तब मालिक उस सेवक का क्या करेगा? उसे नौकरी से निकालेगा, बर्बाद करेगा, जितना हो सके दंड देगा।
वक्ता कहते हैं, आप जिसके घर मेहमान बनकर जाएँ, जिसके घर अतिथि बनकर जाएँ, और उस घर का सेवक आपका, अतिथि का, अपमान करे — तो वहाँ असल में हँसी किसकी होती है, अपमान किसका होता है? अतिथि कहेगा: हम आपके घर आए थे, देखिए आपका सेवक किस तरह हमारा अपमान करता है। तब मालिक उस सेवक का क्या करेगा? वह स्वामी क्या करेगा? वह अपने सेवक को नौकरी से निकालेगा, बर्बाद करेगा, जितना हो सके दंड देगा। वे जोड़ते हैं, इस संदर्भ में 'बर्बाद करेगा' हम इस अर्थ में कहते हैं कि वह कुछ न कुछ ज़रूर करेगा; गुस्से में आकर वह कुछ भी कर सकता है।
शरणागत भक्त का अपमान देवी के अपने रूप का अपमान क्यों है?
शरणागत के रोम-रोम में उनकी शक्तियाँ
जब आप अतिथि, भक्त, दर्शनार्थी बनकर शरण लेकर जाते हैं, तो आपके रोम-रोम में जगदंबा का जितना भाव है, हर रोम से उनका जितना नाम निकलता है, आप जितना समर्पण लेकर जाते हैं — उस समर्पण में उनकी सारी शक्तियाँ उन रोमों में मौजूद रहती हैं। तो उन रोमों से निकलता उनका अपना रूप ही अपमानित होता है। अपमान उनका है, इसलिए स्वामिनी दंड देंगी। वक्ता कहते हैं, वे समझेंगी; यह आपको या मुझे नहीं समझना।
वक्ता कहते हैं, यहाँ भी यही बात है। जब आप अतिथि, भक्त, दर्शनार्थी बनकर शरण लेकर जाते हैं — तो आपके रोम-रोम में उस जगदंबा का जितना भाव है, आपके हर रोम से उनका जितना नाम निकलता है, जितने समर्पण से आप वहाँ जा रहे हैं, उस समर्पण में उनकी सारी शक्तियाँ उन रोमों में मौजूद रहती हैं। तब अपमान किसका होता है? उस रोम से निकलते उनके अपने रूप का अपमान होता है। और जब अपमान उनका है, तो आप चिंता क्यों करते हैं? वे स्वामिनी हैं, आप अतिथि हैं, और यह सेवक है। सेवक अपमान कर रहा है, तो यह स्वामिनी का कर्तव्य है — वे दंड देंगी। वे समझेंगी; हमें नहीं समझना। यह ध्यान में रखिए।
नवरात्रि में साधक तीर्थ पर अपने साथ क्या ले जाए?
घर पर की गई साधना और जप साथ जाते हैं
जब आप नवरात्रि में किसी भी तरह साधना या अनुष्ठान करते हैं, जो समर्पण लेते हैं और जो भी जप-तप करते हैं — समझिए कि जब आप तीर्थ स्थान पर, उन दिव्य क्षेत्रों में जाते हैं, तो वह आपके साथ जाता है। और वहाँ उसे ठीक उसी तरह अर्पित करना है।
वक्ता कहते हैं, यह पूरा विषय पकड़ लीजिए। जब आप नवरात्रि में किसी भी तरह साधना और अनुष्ठान करते हैं, जो समर्पण लेते हैं, जो जप-तप करते हैं — तो जब आप तीर्थ स्थान पर जाते हैं, उन दिव्य क्षेत्रों में जाते हैं, तो समझिए वह आपके साथ जा रहा है। और वहाँ उसे ठीक उसी तरह अर्पित करना है।
क्या नवरात्रि में साधना रात को करनी चाहिए?
रात्रि की साधनाएँ, और दिन में सोना
वक्ता कहते हैं, पहला विषय समय का था। नवरात्रि में जितनी हो सके उतनी रात्रिकालीन साधनाएँ करनी चाहिए। इसका मतलब बिल्कुल नहीं कि आप दिन में न सोएँ। दिन में पूरी तरह शरीर की सुविधा के अनुसार सोइए — दो, चार या पाँच घंटे, जितनी ज़रूरत हो।
देवी पूजन अधिकतर किस समय मान्य है?
निशीथ-व्यापिनी पूजन, या ब्रह्म मुहूर्त
वक्ता कहते हैं, राम नवमी का विशेष पूजन दोपहर को होता है, तो वह अलग बात है। पर जगदंबा के रूपों की उपासना, देवी पूजन आदि के लिए अधिकतर निशीथ-व्यापिनी पूजन ही मान्य है, या फिर ब्रह्म मुहूर्त।
वक्ता कहते हैं, और राम नवमी का विशेष पूजन दोपहर के समय होता है, तो वह बात अलग है। पर जहाँ तक जगदंबा के रूपों के पूजन, देवी पूजन आदि की बात है, मुख्य रूप से निशीथ-व्यापिनी पूजन ही मान्य है। या फिर ब्रह्म मुहूर्त।
सिंह साधना या वीर साधना से उनका क्या अर्थ है?
सिंह की तरह साधना, फैलाए गए डरों से निडर
अगर आप साधक हैं, और खासकर जगदंबा के साधक हैं, तो आपको सिंह साधना करनी है — यानी सिंह की तरह साधना कीजिए, वीर साधना कीजिए। वीर का मतलब है कि फैलाए गए इन सब भ्रमों से आप ज़रा-ज़रा सी बात पर न डरें।
वक्ता कहते हैं, अगर आप साधक हैं, और खासकर जगदंबा के साधक हैं, तो आपको सिंह साधना अवश्य करनी है — यानी सिंह की तरह साधना कीजिए; वीर साधना कीजिए। वीर का मतलब क्या है? वीर का मतलब है कि हर छोटी बात पर, फैलाए गए इन सब भ्रमों पर, आप डरें नहीं। लोग कहते हैं, अगर रात को करेंगे तो भूतों का समय है, प्रेतों का समय है — कहाँ, भाई? भूत-प्रेत को अधिकार कहाँ दिया गया है? भूत-प्रेत का अपना स्थान है, उनका अधिकार वहीं तक है — तो क्या वे स्वतंत्र हैं? क्या वह योनि स्वतंत्र है? उपदेव श्रेणी की वे सारी शक्तियाँ स्वतंत्र तो नहीं हैं: वे श्मशान के देवता के अधीन हैं, क्षेत्रपाल के अधीन हैं। और श्मशान में और क्षेत्रपालों में कौन रहता है? वे भगवती के ही रूप हैं, भगवान शिव के ही रूप हैं — तो वे स्वतंत्र कैसे हो गए, और समय उनका कैसे हो गया?
क्या पत्नी या प्रेमिका देवी का साक्षात रूप है, जैसा कौल मार्ग दावा करता है?
देवी स्वयं माँग रही हैं, यह दावा और उसका खंडन
वक्ता उदाहरण देते हैं उस नौटंकी का, जो कौल मार्ग के साधकों में चल रही है। वे बार-बार यह बात उठाते हैं कि नवरात्रि हो या कोई और समय, अगर आपकी पत्नी या प्रेमिका है, तो वह देवी का साक्षात रूप है। तो अगर वह उस समय शय्या-सुख माँगे, तो आपको देना चाहिए, क्योंकि देवी कह रही हैं। वे पूछते हैं, इससे बड़ी नीचता क्या होगी? ऐसा अनाचार करने वाला, ऐसी नीच मानसिकता से नवरात्रि में साधना करने वाला, रात को करे या दिन में — अगर उसे दंड न मिले, तो और क्या मिलेगा?
जो नवार्ण मंत्र का जप नहीं कर सकता, उसके लिए क्या दिया गया है?
अर्गला का पहला मंत्र, पूरे विनियोग और न्यास के साथ
अगर दीक्षा न होने से आप नवार्ण आदि का जप नहीं कर सकते, तो अर्गला का पहला मंत्र पूरी विधि के साथ चैनल पर प्रसारित है — पूरे विनियोग और न्यास के साथ। वक्ता कहते हैं, ऐसा न्यास उन्हें आज तक शायद ही किसी ग्रंथ में मिला है।
वक्ता कहते हैं, दीक्षा से जुड़ी बातों पर: अगर आप नवार्ण आदि का जप नहीं कर सकते, अगर दीक्षा नहीं है — तो भाई, अर्गला स्तोत्र का पहला मंत्र पूरी विधि के साथ चैनल पर प्रसारित है। पूरे विनियोग और न्यास के साथ — वे कहते हैं, उन्हें आज तक शायद ही कोई ग्रंथ मिला है जिसमें उन मंत्रों का न्यास दिया हो।
वे न्यास कहाँ से आए, और उनका उपयोग कौन कर सकता है?
अप्रकाशित पांडुलिपियाँ, गृहस्थ तंत्र परिवार के लिए दी गईं
दुर्गा सप्तशती के तंत्रोक्त ग्रंथों में सातवें और तेरहवें अध्याय का न्यास मिलता है, पर कवच, अर्गला और कीलक के मंत्रों का नहीं। भगवती की कृपा से, ऐसी प्राचीन पुस्तकें और ग्रंथ रखने वाले समर्थ साधकों ने, जो अभी अप्रकाशित हैं, चर्चा के बाद जो उनके पास था वह गृहस्थ तंत्र परिवार के सदस्यों के कल्याण के लिए दिया। वक्ता कहते हैं, आप दीक्षित हों या नहीं, स्त्री हों या पुरुष, जनेऊ पहनते हों या नहीं — कोई कठिनाई नहीं।
वक्ता कहते हैं, दुर्गा सप्तशती के तंत्रोक्त ग्रंथों में आपको सातवें और तेरहवें अध्याय का न्यास मिलेगा, पर उन मंत्रों का — कवच, अर्गला और कीलक के मंत्रों का — न्यास नहीं दिया गया है। तो भगवती की कृपा से, ऐसे समर्थ साधक जिनके पास उस तरह की प्राचीन पुस्तकें और ग्रंथ उपलब्ध हैं, जो अभी अप्रकाशित हैं — उनसे जो मिला, वह इस चर्चा के बाद दिया जा रहा है कि हम चाहते हैं कि हमारे गृहस्थ तंत्र परिवार के सदस्य भगवती की उपासना करें और यह मंत्र उन्हें फल दे। तो वह दे दिया गया है; उसका लाभ लीजिए, उसका जप कीजिए। विधि-विधान के साथ: आप दीक्षित हों या नहीं, स्त्री हों या पुरुष, जनेऊ पहनते हों या नहीं, कोई कठिनाई नहीं। हर बात उस PDF में भी लिखी है — कि अगर आप उपवीत नहीं पहनते, तो आपको केवल देवी प्रणव या तांत्रिक प्रणव लगाना है; बाकी लोग प्रणव बोलकर जप करें।
भगवती की बत्तीस नामावली की चक्र विधि क्या है?
भगवती के बत्तीस नामों की चक्र विधि, उसकी PDF के साथ
भगवती की बत्तीस नामावली की चक्र विधि से साधना करने का तरीका चैनल पर प्रसारित है। YouTube पर "32 namavali chakra vidhi grihastha tantra" खोजिए, मिल जाएगा। पूरी PDF भी अपलोड है, ताकि आपको चक्र विधि खुद न बनानी पड़े। उसमें बत्तीस मंत्रों में से हर एक का अपना अलग अनुच्छेद बनाया गया है।
वक्ता कहते हैं, भगवती की बत्तीस नामावली की चक्र विधि से साधना करने का तरीका चैनल पर प्रसारित है। उसे खोजिए — "32 namavali chakra vidhi grihastha tantra" लिखिए, YouTube पर मिल जाएगा। उसकी पूरी PDF भी अपलोड है, ताकि पाठ करने के लिए आपको चक्र विधि खुद न बनानी पड़े। उसमें बत्तीस मंत्रों में से हर एक को अलग पूरे अनुच्छेद के रूप में रखा गया है। इसमें साधकों ने मदद की — आप श्रोताओं में से कुछ ने मदद की, यह कहकर कि वे इसे पूरी तरह विधि के अनुसार बनाएँगे ताकि लोग वह साधना आसानी से और अच्छी तरह कर सकें। और इतने के बाद भी अगर आप नहीं करेंगे, मुँह नहीं खोलेंगे, अपनी जीभ को भगवती का नाम लेने के लिए प्रेरित नहीं करेंगे, तो आपके लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा।
विंध्याचल त्रिकोण में पहली बार शत चंडी पाठ हो रहा है।
विंध्याचल त्रिकोण में पहली बार शत चंडी पाठ
वक्ता कहते हैं, सप्तशती से जुड़ी कई साधनाएँ चैनल पर प्रसारित हैं, जिन्हें आप स्वतंत्र रूप से कर सकते हैं, और उनसे जुड़े अनुभव भी वहाँ हैं। अपने आराध्य के प्रति अपने समर्पण को और गति दीजिए। और इस वर्ष, इस चैत्र नवरात्रि में, पहली बार विंध्याचल त्रिकोण में भगवती के शत चंडी पाठ का आयोजन हो रहा है।
वक्ता कहते हैं, श्री दुर्गा सप्तशती से जुड़ी ऐसी कई साधनाएँ चैनल पर प्रसारित हैं, जिनकी उपासना आप स्वतंत्र रूप से कर सकते हैं। अनुभव भी चैनल पर, संबंधित वीडियो में मौजूद हैं, और बहुत सारे हैं। उन्हें देखिए और प्रेरणा लीजिए। अपने आराध्य के प्रति जो समर्पण है, उसे और गति दीजिए, और आगे बढ़िए। तो नवरात्रि के दिव्य काल और विधि-विधान में से सही चुनाव कीजिए, और सही तरह से लग जाइए। और इस वर्ष, इस चैत्र नवरात्रि में, पहली बार विंध्याचल के त्रिकोण में भगवती के शत चंडी पाठ का आयोजन हो रहा है।
विंध्याचल को महाशक्तिपीठ और मणि द्वीप क्यों कहा जाता है?
एक महाशक्तिपीठ और मणि द्वीप
वक्ता कहते हैं, जो लोग नवरात्रि में विंध्याचल के त्रिकोण की परिक्रमा करने जा रहे हैं, वे अपने जीवन का सबसे विशेष काम करने जा रहे हैं — इससे विशेष कुछ नहीं हो सकता। विंध्याचल को महाशक्तिपीठ कहा गया है। यह भगवती का साक्षात रूप है, मणि द्वीप है, जहाँ माँ जगदंबा सृष्टि के आरंभ से नित्य विराजती हैं।
वक्ता कहते हैं, जो लोग खासकर नवरात्रि में विंध्याचल के त्रिकोण परिक्रमा की परिक्रमा करने जा रहे हैं — भाई, आप अपने जीवन का सबसे विशेष काम करने जा रहे हैं; इससे विशेष कुछ नहीं हो सकता। एक तो विंध्याचल और बाकी सभी शक्ति पीठ का अपना विशेष माहात्म्य है; पर विंध्याचल को महाशक्तिपीठ कहा गया है। यह भगवती का साक्षात रूप है, मणि द्वीप है, जहाँ माँ जगदंबा सृष्टि के आरंभ से नित्य विराजती हैं। तो उस स्थान का महत्व बहुत विशेष है। भगवती के केवल नित्य दर्शन से ही श्री दुर्गा सप्तशती के संपुट पाठ का पूरा फल मिल जाता है।
भगवती विन्ध्यवासिनी के केवल दर्शन से क्या मिलता है?
हर योनि से छुटकारा, और नित्य पार्षद बनना
वक्ता कहते हैं कि केवल दर्शन से हर योनि से छुटकारा मिल जाता है — बस भगवती विन्ध्यवासिनी के दर्शन हो जाएँ। इसका वर्णन दुर्गा कल्पद्रुम जैसे शाक्त मत के ग्रंथों में मिलेगा, और सिद्धों व साधकों के प्रवचनों में भी। जगदम्बा विन्ध्यवासिनी के केवल दर्शन से जीव किसी भी योनि में हो, उसे हर तरह की योनि से मुक्ति मिलती है। वह दुर्गा का नित्य पार्षद बन जाता है।
वक्ता कहते हैं कि केवल दर्शन से हर योनि से छुटकारा मिल जाता है — बस भगवती विन्ध्यवासिनी के दर्शन हो जाएँ। दुर्गा कल्पद्रुम तंत्र जैसे शाक्त मत के ग्रंथों में इसका वर्णन है। सिद्धों और साधकों के कई प्रवचनों में भी यह मिलेगा। जगदम्बा विन्ध्यवासिनी के केवल दर्शन से जीव किसी भी योनि में हो, उसे हर तरह की योनि से मुक्ति मिलती है। वह दुर्गा का नित्य पार्षद बन जाता है। पर अगर आप रोज़ दर्शन कर रहे हैं और उपद्रव भी कर रहे हैं, तो नहीं।
देवी के दर्शन का असली अर्थ क्या है?
उनका दर्शन और उनका दर्शन-भाव आपके भीतर उतरना
जब आप दर्शन करेंगे, तो वे आपके भीतर उतरेंगी। उनका दर्शन, उनका दर्शन-भाव आपके भीतर उतरेगा। आप स्वयं उस रूप को धारण करेंगे — तभी छुटकारा मिलेगा। वक्ता कहते हैं कि ऊपर-ऊपर से देखकर यह कहना कि हमने दर्शन कर लिए, मुक्ति मिल जाएगी — तो वहाँ से यही उत्तर आएगा: अब हम तुम्हें ख़ास तौर पर देखेंगे कि तुम क्या करते हो।
वक्ता पूछते हैं कि दर्शन करने का अर्थ क्या है। जब आप दर्शन करेंगे, तो वे आपके भीतर उतरेंगी। उनका दर्शन, उनका दर्शन-भाव आपके भीतर उतरेगा। आप स्वयं उस रूप को धारण करेंगे। तभी उससे छुटकारा मिलेगा। और केवल ऊपर से देखकर कहना कि अच्छा, दर्शन कर लिए, मुक्ति मिल जाएगी — तो वहाँ से वे कहेंगी: अब हम तुम्हें ख़ास तौर पर देखेंगे कि तुम क्या करते हो। और ऐसी दृष्टि वे रखती हैं — देखिए, भगवती विन्ध्यवासिनी की आँखें कितनी बड़ी हैं; सबसे बड़ी आँखें उन्हीं की हैं। उन्हीं आँखों से वे देखती रहती हैं। और जगदम्बा की विशेष रूप से मूल नासिका के ही दर्शन हो पाते हैं; बाकी रूप ढका रहता है।
एक बार उनके धाम में पैर रखने से क्या होता है?
सदा के लिए उनकी दृष्टि में आ जाना
एक बार आप वहाँ चले गए, तो समझ लीजिए कि उनकी दृष्टि सदा आप पर है। आप देखें या न देखें, आपने उनके धाम में पैर रखा है, यानी आप उनकी नज़र में आ गए हैं। अगर आप नियम, निष्ठा और संयम से आगे बढ़ रहे हैं, धर्म के अनुसार आचरण कर रहे हैं, तो वे कभी आपका अहित नहीं होने देंगी।
वक्ता कहते हैं कि वे देखेंगी कि अब आप क्या करते हैं। एक बार आप वहाँ चले गए, तो समझ लीजिए कि अब उनकी दृष्टि सदा आप पर है। आप देखें या न देखें, आपने उनके धाम में पैर रखा है — यानी अब आप उनकी नज़र में आ गए हैं। और अगर आप नियम, निष्ठा और संयम से आगे बढ़ रहे हैं, धर्म के अनुसार आचरण कर रहे हैं, तो वे कभी आपका अहित नहीं होने देंगी। यह सदा याद रखिए।
लघु त्रिकोण क्या है, और उसका क्या फल बताया गया है?
मंदिर के भीतर ही तीन कोने
वक्ता कहते हैं कि नवरात्र में त्रिकोण करने वालों को साधारण दिनों से हज़ार गुना फल मिलता है। लघु त्रिकोण मंदिर के भीतर ही होता है। तीन कोनों पर एक जगह भगवती विन्ध्यवासिनी हैं, और बाकी जगहों पर भगवती महाकाली और महासरस्वती। विन्ध्यवासिनी के दर्शन कीजिए। फिर सामने बलिपीठ पर भगवती काली के दर्शन कीजिए। फिर उस पार जाकर भगवती महासरस्वती के दर्शन कीजिए। लौटकर भगवती के दर्शन कीजिए और उनके कुंड का जल पीजिए — आपका त्रिकोण हो गया।
वक्ता कहते हैं कि जो लोग नवरात्र के समय त्रिकोण करने जा रहे हैं, उन्हें साधारण दिनों के फल से हज़ार गुना फल मिलता है। भगवती के केवल दर्शन में ऐसा फल है। और अगर लघु त्रिकोण किया जाए, जो मंदिर के भीतर ही है — लघु त्रिकोण का अर्थ क्या है? त्रिकोण के तीन कोनों पर एक जगह भगवती विन्ध्यवासिनी हैं, और बाकी जगहों पर भगवती महाकाली और महासरस्वती विराजमान हैं। तो मंदिर के भीतर ही तीनों के अपने-अपने स्थान हैं। आप वहाँ घूमे, भगवती विन्ध्यवासिनी के दर्शन किए। फिर ठीक सामने बलिपीठ है, जहाँ भगवती काली का स्थान है, उनके दर्शन किए। फिर उस पार जाकर भगवती महासरस्वती के दर्शन किए। फिर लौटकर भगवती के दर्शन किए और भगवती के कुंड का जल पिया — आपका त्रिकोण पूरा हो गया।
विन्ध्याचल के लघु त्रिकोण से क्या फल मिलता है?
सप्तशती के सौ सम्पुट पाठों का फल
वक्ता कहते हैं कि इसका भी पूरा फल है: केवल इतने से सप्तशती के सौ सम्पुट पाठों का फल मिलता है। और सोचिए कितना पाप है — कई पीढ़ियों से लोग अपराध करते आए हैं। आपके माता-पिता, भाई, पत्नी, प्रेमी, बेटे और बेटी का बोझ आप पर है। उसे काटना है, इसलिए समय लगेगा।
वक्ता कहते हैं कि भाई, इसका भी पूरा फल है: केवल इतना करने से सप्तशती के सौ संपुट पाठों का फल मिलता है। अब जीवन में न जाने कितना है — कई पीढ़ियों से लोग अपराध और पाप करते आए हैं, और उन सबका बोझ आप पर है: आपके माता-पिता का, भाई-बंधुओं का, पत्नी का, प्रेमी का, बेटे का, बेटी का। उसे काटना है न। सोचिए, वह पाप किस स्तर का होगा। समय लगेगा। ऐसा नहीं कि आप पापरहित होकर वहाँ गए और उसी स्तर पर गए, तो तुरंत अनुभव होगा। समय लगेगा, यह जन्म-जन्मांतर की बात है। पर अनुभव होने लगता है।
विन्ध्याचल का मूल त्रिकोण क्या है?
काली खोह में महाकाली, अष्टभुजा, और महाश्मशान में तारा
जब आप मूल त्रिकोण करते हैं, तो यह चार मुख्य मंदिरों के दर्शन हैं। विन्ध्याचल से निकलकर आप सीधे काली खोह पहुँचते हैं — बाकी छोटे स्थान भी सब प्रधान स्थान हैं, पर मान लीजिए आप उन्हें छोड़ देते हैं। आप काली खोह में भगवती महाकाली के दर्शन करते हैं, अष्टभुजा के दर्शन करते हैं, और श्मशान में, महाश्मशान में विराजमान भगवती तारा के दर्शन करते हैं। फिर भगवती विन्ध्यवासिनी के मंदिर लौटकर वहाँ उनके दर्शन करते हैं। यही मूल त्रिकोण है।
वक्ता कहते हैं कि जब आप मूल त्रिकोण करते हैं, तो यह चार प्रधान मंदिरों के दर्शन हैं: आप विन्ध्याचल से निकलें और सीधे काली खोह पहुँचें। बाकी छोटे स्थान भी सब प्रधान स्थान हैं, पर मान लीजिए आप उन सबको छोड़ देते हैं — आप सीधे गए, काली खोह में भगवती महाकाली के दर्शन किए, अष्टभुजा के दर्शन किए, और श्मशान में, महाश्मशान में विराजमान भगवती तारा के दर्शन करके भगवती विन्ध्यवासिनी के मंदिर लौट आए और वहाँ उनके दर्शन किए। तो यह मूल त्रिकोण हुआ। और बृहद् त्रिकोण करने के लिए आपने विन्ध्याचल से लाल भैरव जी के स्थान तक पूरी यात्रा की। वहाँ से लौटते हुए, बीच में बनवा महावीर और बाकी सबके दर्शन करते हुए, अष्टभुजा पहाड़ी पहुँचे, और काली खोह पहाड़ी पहुँचे।
बृहद् त्रिकोण में कितना समय लगता है, और यह कहाँ से होकर जाता है?
गिरवा तालाब, मुक्तेश्वर महादेव, और बजरंग तंत्र स्थान
काली खोह से ऊपर चढ़कर, गिरवा तालाब पर भगवान श्री कृष्ण और साक्षी गोपाल जी के दर्शन करके, आप मुक्तेश्वर महादेव जाते हैं। ऋण मुक्तेश्वर महादेव के पास से विन्ध्य पर्वत पर बजरंग तंत्र स्थान का रास्ता है, जहाँ प्राचीन काल से श्री हनुमान जी साक्षात् रूप में विराजमान हैं। अभ्यास वालों को कम से कम बारह घंटे लगते हैं, नए लोगों को सोलह, और कुछ को चौबीस तक। आज भोर में शुरू करें, तो बृहद् त्रिकोण कल भोर में पूरा होता है।
वक्ता कहते हैं कि काली खोह से ऊपर चढ़कर, गिरवा तालाब पर भगवान श्री कृष्ण के दर्शन और साक्षी गोपाल जी के दर्शन करके, अब आप वहाँ से मुक्तेश्वर महादेव जाते हैं। मुक्तेश्वर महादेव के पास से, विन्ध्य पर्वत पर, वह स्थान है जहाँ प्राचीन काल से भगवान श्री हनुमान जी साक्षात् रूप में विराजमान हैं। वह आज भी बजरंग तंत्र स्थान है। उसका रास्ता भी ऋण मुक्तेश्वर, महा मुक्तेश्वर महादेव के पास से जाता है। बृहद् त्रिकोण करने वाले वहाँ से महावीर जी तक जाते हैं। इसमें लगभग पूरा दिन लगता है। जिन्हें अभ्यास हो गया है, उन्हें कम से कम बारह घंटे लगते हैं। जो नए हैं, उन्हें सोलह, और कुछ को चौबीस घंटे भी लगते हैं। आज भोर में शुरू करें, तो बृहद् त्रिकोण कल भोर में पूरा होता है। और उस रास्ते पर जाना हर किसी के लिए संभव नहीं है — ख़ास तौर पर तंत्र अनुष्ठान करने वाले, भगवती की कृपा पाए हुए साधक ही उस स्तर पर बृहद् त्रिकोण करते हैं।
नंदजा पर्वत और अष्टभुजा के रास्ते में क्या-क्या है?
तंत्रात्मक स्थान, सीताकुंड, भैरव कुंड, मच्छिंद्र कुंड
वक्ता कहते हैं कि उस रास्ते पर और भी कई विशेष तंत्रात्मक स्थान हैं, जिनका वर्णन कोई साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता। उनके दर्शन करके आगे नंदजा पर्वत जाते हैं। वह बहुत दूर है, और पैदल जाने में हालत ख़राब हो जाती है। नंदजा से लौटकर अष्टभुजा आते हैं। फिर मुक्तेश्वर महादेव वाले रास्ते पर थोड़ा आगे जाते हैं। सीताकुंड के रास्ते ऊपर चढ़कर अष्टभुजा माई के दर्शन करते हैं, फिर भैरव कुंड और मच्छिंद्र कुंड।
वक्ता कहते हैं कि वहाँ से महावीर जी के स्थान पर जाएँगे। रास्ते में आपके और भी कई विशेष स्थान हैं, तंत्रात्मक स्थान, जिनका वर्णन कोई भी साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता। उन स्थानों के दर्शन करके वहाँ से नंदजा पर्वत जाते हैं। केवल नंदजा पर्वत जाने में ही पैदल हालत ख़राब हो जाती है; वह बहुत दूर पड़ता है। इतनी दूर जाकर, फिर नंदजा पर्वत से इधर लौटकर फिर अष्टभुजा पहुँचते हैं — बृहद् त्रिकोण में नंदजा पर्वत से वापस अष्टभुजा आना पड़ता है। और अष्टभुजा पहुँचकर उसी मुक्तेश्वर महादेव वाले रास्ते पर थोड़ा आगे जाते हैं। वहाँ से सीताकुंड के रास्ते अष्टभुजा माई के दर्शन कीजिए, फिर भैरव कुंड जाइए, भैरव कुंड और मच्छिंद्र कुंड के दर्शन कीजिए। फिर षष्ठी देवी, भगवती बगलामुखी, आनंदमयी स्थान और बाकी के दर्शन के लिए अष्टभुजा पहाड़ी से फिर वापस जाना पड़ता है — यानी सीताकुंड से ऊपर चढ़कर भगवती अष्टभुजा के दर्शन करके, दूसरा रास्ता पकड़कर, ऊपर से उस पार जाकर वहाँ दर्शन करते हैं।
बृहद् त्रिकोण के श्मशान घाट वाले हिस्से में क्या है?
श्मशानेश्वर महादेव, महाश्मशान भैरव और तारा
वहाँ से लौटकर, भैरव कुंड, मच्छिंद्र कुंड और मंगला गौरी होते हुए श्मशान घाट पहुँचते हैं। श्मशान घाट पर श्मशानेश्वर महादेव हैं, श्मशानेश्वर के महाश्मशान भैरव हैं, और वहाँ विराजमान देवता हैं। भगवती जगदम्बा महामाई तारा का पूजन करके लौटते हैं। फिर संकटा माँ, शीतला माँ और बड़े हनुमान जी के दर्शन करते हुए विन्ध्य पर्वत के शिखर पर भगवती विन्ध्यवासिनी के पास आते हैं।
वक्ता कहते हैं कि वहाँ से लौटकर, फिर भैरव कुंड, मच्छिंद्र कुंड और मंगला गौरी होते हुए श्मशान घाट पहुँचिए। श्मशान घाट पर श्मशानेश्वर महादेव हैं, श्मशानेश्वर के महाश्मशान भैरव हैं। वहाँ विराजमान देवताओं का और भगवती जगदम्बा महामाई तारा का पूजन करके फिर लौटते हैं। संकटा माँ, शीतला माता और बड़े हनुमान जी के दर्शन करते हुए विन्ध्य पर्वत के शिखर पर भगवती विन्ध्यवासिनी के पास आते हैं। और भगवती विन्ध्यवासिनी के दर्शन के बाद, ठीक सामने, माई के पीछे, पुरिया गली में भगवान विंध्येश्वर महादेव हैं, जिनकी स्थापना रावण ने की थी। रावण से जुड़े मत के अनुसार कहा जाता है कि रावण ने उस स्थान को पृथ्वी का मध्य मानकर विंध्येश्वर महादेव की स्थापना की — वहाँ उस स्थान को पृथ्वी का मध्य माना गया है। इसलिए विंध्येश्वर महादेव का अपने आप में बहुत विशेष माहात्म्य है। श्री गंगेश्वर महादेव हैं, और रामशिला आदि हैं, जो गंगा जी का जल उतरने पर दिखते हैं।
विन्ध्याचल में कितने तंत्र स्थान हैं, और वे किसके सामने प्रकट होते हैं?
साठ-पैंसठ स्थान, जो कुछ ही साधकों के लिए खुलते हैं
वक्ता कहते हैं कि इनके अलावा लगभग साठ-पैंसठ दिव्य स्थान हैं, जो पूरी तरह तंत्र पीठ, तंत्र स्थान हैं। वे अपने आप केवल उसी को पता चलते हैं जो जगदम्बा के मंत्रों का पुरश्चरण कर रहा है या एक स्तर तक कर चुका है — जिसका जप एक तरह से करोड़ों में पहुँच गया हो। जिसने एक सौ आठ से अधिक त्रिकोण पूरे किए हों, जिसका मन शांत हो गया हो, जो अपने गुरु और मार्गदर्शक के प्रति समर्पित हो, और जिसमें द्वेष, जलन और ईर्ष्या न हो। वे कहते हैं कि काम और क्रोध तो निकल सकते हैं, पर द्वेष बहुत विनाशकारी है।
वक्ता कहते हैं कि इनके अलावा लगभग साठ-पैंसठ ऐसे दिव्य स्थान हैं, जो पूरी तरह तंत्र पीठ, तंत्र स्थान हैं। वे केवल उसी के लिए हैं जो जगदम्बा के मंत्रों का पुरश्चरण कर रहा है या एक स्तर तक कर चुका है — जिसका जप एक तरह से करोड़ों में पहुँचा माना जा सके। जिसने एक सौ आठ से अधिक त्रिकोण पूरे किए हों, जिसका मन शांत हो गया हो, जो अपने गुरु और मार्गदर्शक के प्रति समर्पित हो, जिसमें द्वेष का भाव न हो, जलन का, ईर्ष्या का और ख़ास तौर पर द्वेष का भाव न हो। वे कहते हैं कि काम और क्रोध तो निकल सकते हैं, पर द्वेष बहुत विनाशकारी है। ऐसे साधकों को, जो द्वेष से मुक्त हो गए हैं, अपने आप ऐसा होता है कि आँखों के सामने खड़ा कोई स्थान, जिसे वे वह स्थान नहीं जानते थे, उन्हें बता दिया जाता है। यह बृहद् त्रिकोण में होता है।
पहाड़ी पर चढ़ने का बीच वाला रास्ता, जिस पर तांत्रिक रात में जाते थे, अब मोड़ दिया गया है।
मोड़ा गया रास्ता, जिस पर तांत्रिक रात में जाते थे
मुक्तेश्वर महादेव को छोड़ दें तो यह मूल त्रिकोण बन जाता है। उसके बाद अगर लोग कंकाल काली के दर्शन को जाते हैं — कई लोग नंदजा पर्वत से लौटते हुए कंकाल काली होकर अष्टभुजा जाते हैं — तो वह भी ठीक है। गंगा जी के घाट से पहाड़ी चढ़ने वाला बीच का रास्ता अब हर किसी के लिए संभव नहीं है। बहुत तोड़-फोड़ हुई है और लोगों ने रास्ता मोड़ दिया है, क्योंकि वह मुख्य रास्ता नहीं, साधकों का रास्ता था। उस ओर की यात्रा ज़्यादातर रात में होती थी, और अब भी होती है; बस रास्ता थोड़ा बदल गया है।
आप लघु करें, या मूल, या बृहद् में वह साधारण बृहद् जो साधक आमतौर पर करते हैं — ऋण मुक्तेश्वर महादेव तक जाना और उसके बाद अष्टभुजा पहाड़ी — वक्ता कहते हैं कि मुक्तेश्वर महादेव को छोड़ने से यह मूल त्रिकोण बन जाता है। और अगर उसे जोड़ लें, तो उसके बाद अगर लोग कंकाल काली के दर्शन को जाते हैं — कई लोग नंदजा पर्वत से लौटते हुए कंकाल काली होकर अष्टभुजा जाते हैं; वह भी ठीक है। किसी भी रास्ते से जाएँ, ऊपर-नीचे तो जाना ही पड़ता है। गंगा जी के घाट से पहाड़ चढ़ने वाला बीच का रास्ता अब हर किसी के लिए संभव नहीं है। बहुत तोड़-फोड़ हुई है। तीन-चार साल पहले यह संभव था, पर अब लोगों ने रास्ता काफ़ी मोड़ दिया है, क्योंकि वह मुख्य रास्ता नहीं था। वह केवल साधकों का रास्ता था। उस पर केवल साधक और तांत्रिक लोग जाते थे, जो विन्ध्य पर्वत पर इस तरह की साधना करते हैं। ज़्यादातर लोगों की उस ओर की यात्रा रात में होती थी। अब भी होती है; बस रास्ता थोड़ा बदल गया है।
नवरात्र में एक त्रिकोण करने से क्या फल मिलता है?
श्री दुर्गा सप्तशती के हज़ार सम्पुट पाठ
वक्ता कहते हैं कि आप कोई भी त्रिकोण करें, यह समझ लीजिए: नवरात्र के दिनों में एक त्रिकोण करने का सीधा अर्थ है कि आपको श्री दुर्गा सप्तशती के हज़ार सम्पुट पाठों का फल मिलता है।
शिखर पर सोने की पताका और सिंह ध्वज के दर्शन से भगवती के दर्शन का पूरा फल मिलता है।
स्वर्ण ध्वजा, और एक स्थान जो अभी तय होना है
अगर शिखर पर लगी सोने की पताका, स्वर्ण पताका, वहाँ लगे सिंह ध्वज के दर्शन हो जाएँ, तो भगवती के दर्शन का पूरा फल मिलता है। और ऐसे समय में, इस त्रिकोण के बीच के क्षेत्र में, एक विशेष स्थान पर, एक तंत्र पीठ पर — स्थान अभी सौ प्रतिशत तय नहीं हुआ, कल-परसों तक तय होगा — विन्ध्याचल के उन्हीं स्थानों में से एक पर पहली बार श्री भगवती का सम्पुट शत चंडी हो रहा है।
वक्ता कहते हैं कि अगर शिखर पर लगी सोने की पताका, स्वर्ण पताका, वहाँ लगे सिंह ध्वज के दर्शन हो जाएँ, तो भगवती के दर्शन का पूरा फल मिलता है। तो ऐसे समय में, और इस त्रिकोण के बीच में, बीच के क्षेत्र में, एक विशेष स्थान पर, एक तंत्र पीठ पर — स्थान अभी सौ प्रतिशत तय नहीं हुआ है; कल-परसों तक तय होगा कि किस स्थान पर करना है। तो विन्ध्याचल के उन्हीं स्थानों में से एक पर पहली बार श्री भगवती का सम्पुट शत चंडी हो रहा है। यह अपने आप में बहुत दिव्य है, हम सबके लिए भी। किसी भी तरह, किसी भी साधन से, जीवन में जब भी आप त्रिकोण आदि करें, उसका लाभ लीजिए; वह अपने आप में दिव्य होगा।
हृदय त्रिकोण क्या है, जिसे सबसे बड़ा कहा गया है?
विन्ध्याचल, कामरूप कामाख्या और कन्याकुमारी
वक्ता कहते हैं कि शाक्त परंपरा के अनुसार भारत का सबसे बड़ा त्रिकोण हृदय त्रिकोण कहलाता है। इसे केवल परम शाक्त कर सकते हैं — जिन्हें भगवती की अनन्य कृपा पूरी तरह मिल चुकी है, वही यह त्रिकोण पैदल कर सकते हैं। यह भगवती विन्ध्यवासिनी के स्थान से कामरूप कामाख्या, कामरूप कामाख्या से कन्याकुमारी, और कन्याकुमारी से फिर विन्ध्याचल पीठ तक है। इसे आप ट्रेन से, बस से या अपने वाहनों से कर सकते हैं। वे कहते हैं कि इसके फल का वर्णन नहीं हो सकता।
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने पहले भी यह बताया है: शाक्त परंपरा के अनुसार जिसे भारत का सबसे बड़ा त्रिकोण माना गया है, वह हृदय त्रिकोण कहलाता है। इसे केवल परम शाक्त कर सकते हैं — जिन्हें भगवती की अनन्य कृपा पूरी तरह मिल चुकी है; वही यह त्रिकोण पैदल कर सकते हैं। आपके और हमारे लिए इसे पैदल करना शायद कभी संभव नहीं। जो मूल हृदय त्रिकोण माना गया है, वह है: भगवती विन्ध्यवासिनी के स्थान से कामरूप कामाख्या; कामरूप कामाख्या से कन्याकुमारी; और कन्याकुमारी से फिर विन्ध्याचल पीठ। इसे आप ट्रेन से, बस से या अपने वाहनों से कर सकते हैं। तो इस हृदय त्रिकोण को सबसे बड़ा त्रिकोण माना गया है। इसका फल अनंत है, इसके फल का वर्णन भी नहीं हो सकता। वे कहते हैं कि माना जाता है कि रजरप्पा का छिन्नमस्तिका धाम — जहाँ भगवती के वज्र वैरोचनीय मंत्र आदि के ऋषि हैं, और जिनसे विषय सिद्धि और कृपा सिद्धि मिलती है, जो उच्च कोटि के दिव्य साधकों की है, आप-हम जैसे नहीं, दिव्य साधकों की —
खेचर सिद्धि क्या है, और यह काली खोह वाले रूप से कैसे जुड़ी है?
काली खोह में खेचरी मुद्रा में विराजमान जगदम्बा
और विन्ध्याचल में, काली खोह में, जगदम्बा का रूप खेचरी मुद्रा में विराजमान है। इन दोनों रूपों की कृपा से जो साधक खेचर सिद्धि पाते हैं, वे सिद्धों की, महासिद्धों की श्रेणी के होते हैं, जो यह त्रिकोण रोज़ करते हैं। और जब आप एक सौ आठ त्रिकोण पूरे करते हैं, चाहे मूल त्रिकोण ही, तब यह होता है।
वक्ता कहते हैं कि और विन्ध्याचल में, काली खोह में, जगदम्बा का रूप खेचरी मुद्रा में विराजमान है। इन दोनों रूपों की कृपा से जो साधक खेचर सिद्धि पाते हैं, वे सिद्धों की, महासिद्धओं की श्रेणी के होते हैं, जो यह त्रिकोण रोज़ करते हैं। और जब आप एक सौ आठ त्रिकोण पूरे करते हैं — चाहे मूल त्रिकोण ही — तब उसके बाद यही होता है।
ऐसे साधक दिव्य कृपा दिखाने लगते हैं; उनकी माया आगे-पीछे चलकर अनुभव कराने लगती है।
दिव्य कृपा का प्रकट होने लगना
यही वे साधक हैं जो ख़ास तौर पर अपनी दिव्य कृपा दिखाने लगते हैं — या वक्ता कहते हैं, ऐसे कहिए: फिर उनकी माया आपके आगे-पीछे चलने लगती है और आपको अनुभव कराने लगती है।
वक्ता कहते हैं कि यही वे साधक बनते हैं जो ख़ास तौर पर अपनी दिव्य कृपा दिखाने लगते हैं। या ऐसे कहिए: फिर उनकी माया आपके साथ आगे-पीछे घूमने लगती है, और आपको अनुभव कराने लगती है।
पहले ही त्रिकोण में दिव्य अनुभव किसे होता है?
जो साधना में पहले से घिस चुके हैं, और यह भ्रम क्यों नहीं है
जो पहले से साधनाएँ कर रहे हैं, जिन्होंने साधना में ख़ुद को पहले ही घिस दिया है — अपना तन, अपना मन, और अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार अपनी गरीबी भी प्रसाद के रूप में अर्पित कर दी है — ऐसे समर्पित साधकों को पहले ही त्रिकोण में दिव्य अनुभव होगा। पहले ही त्रिकोण में वे समझ जाएँगे कि पूरे त्रिकोण में क्या व्यवस्था है, क्या प्रणाली है, और कहाँ कौन-सी शक्ति किस तरह कृपा कर सकती है।
वक्ता कहते हैं कि जो पहले से साधनाएँ कर रहे हैं, जिन्होंने अपनी साधनाओं में ख़ुद को पहले ही घिस दिया है — अपना तन, अपना मन, और अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार अपना अभाव भी घिसकर प्रसाद के रूप में अर्पित कर दिया है — जो समर्पित साधक हैं: उन्हें पहले ही त्रिकोण में दिव्य अनुभव होगा। पहले ही त्रिकोण में वे समझ जाएँगे कि पूरे त्रिकोण में क्या व्यवस्था है, क्या प्रणाली है, और किन स्थानों पर कौन-सी शक्ति किस तरह कृपा कर सकती है। यह भ्रम की स्थिति नहीं है, यह ध्यान रखिए। वे कहते हैं कि वे ख़ुद इसके बड़े विरोधी हैं: जब लोग भ्रम की स्थिति की बात करते हैं, तो सुनने भर से यह समझ लिया जाता है कि यह केवल मन की उपज है, बड़ी चालाकी है। तो ऐसी बातों पर वे या तो बस कह देते हैं, भाई, ठीक है — नहीं; इन क्षेत्रों के दिव्य कृपा अनुभव अपनी वास्तविकता में, अपनी प्रत्यक्षता में, अपने प्रकट रूप में बहुत दिव्य हैं।
क्या नवरात्र में अखंड ज्योत जलाना ज़रूरी है?
अनुष्ठान के समय तक कर्म साक्षी दीप
नवरात्र में अखंड ज्योत जलाना ज़रूरी है या नहीं, इस प्रश्न पर वक्ता उत्तर देते हैं कि अगर आप नहीं जला सकते तो कोई दिक्कत नहीं। बस कर्म साक्षी दीप जलाइए, और जितने समय आप अनुष्ठान करेंगे, उतने समय अखंड ज्योत जलाए रखिए।
वक्ता कहते हैं कि एक प्रश्न यह है: क्या नवरात्र में अखंड ज्योत जलाना ज़रूरी है? अगर आप नहीं जला सकते, तो कोई दिक्कत नहीं। बस कर्म साक्षी दीप जलाइए। जितने समय आप अनुष्ठान करेंगे, उतने समय अखंड ज्योत जलाइए।
अखंड ज्योत किसे बिल्कुल नहीं जलानी चाहिए?
नियम कि इसे कभी अकेला न छोड़ा जाए
ख़ास तौर पर वे लोग जो अकेले रहते हैं और जिन्हें अपना स्थान छोड़कर अलग-अलग जगह जाना पड़ता है — अखंड ज्योत का यह भी नियम है कि उसे कभी अकेला न छोड़ें। यह जगदम्बा का साक्षात् रूप है; उन्हें अकेला छोड़कर घर से, स्थान से नहीं जाना है। घर पर कोई न कोई रहेगा। इसलिए जो अकेले हैं, उन्हें इस तरह यह नहीं करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि ख़ास तौर पर वे लोग जो अकेले रहते हैं और जिन्हें अपना स्थान छोड़कर अलग-अलग जगह जाना पड़ता है — अखंड ज्योत का ऐसा भी नियम है, कि अखंड ज्योत को वे कभी भी अकेला न छोड़ें। यह जगदम्बा का साक्षात् रूप है; उन्हें अकेला छोड़कर घर से, स्थान से नहीं जाना है। घर पर कोई न कोई रहेगा। इसलिए जो अकेले हैं, उन्हें इस तरह यह नहीं करना चाहिए। और वे पूछते हैं कि सिद्ध कुंजिका स्तोत्र तो अपने आप में सिद्ध है — उसमें आप क्या सिद्ध करेंगे; वह उसकी दीक्षा आदि मिल जाने के बाद की बात है।
तंत्र का विषय पूरी तरह पुस्तकों में क्यों नहीं मिलता?
तंत्र आगम है, श्रुति और स्मृति है, परंपरा में सुनकर दिया जाता है
एक बात वे हमेशा देखते हैं: जो पूरी तरह व्यवस्थित किताबी तांत्रिक हैं, जो पुस्तक के एक-एक अक्षर पर चलते हैं। श्रुति और स्मृति की जो बात कही गई है — तंत्र का विषय, आगमोक्त विषय, श्रुति और स्मृति का विषय है, अपनी परंपरा में सुनने और देने का विषय है। लिखित बाद में आया। हजारों बातें लिखित में नहीं हैं, और जो लिखित में हैं, वे भी अपनी परंपरा में ही सुरक्षित हैं।
वे कहते हैं कि एक और विषय हम हमेशा देखते हैं: जो पूरी तरह व्यवस्थित किताबी तांत्रिक हैं, जो तंत्र के अनुसार, अपने अनुसार, पुस्तक के एक-एक अक्षर पर चलते हैं। श्रुति और स्मृति की जो बात कही गई है — तंत्र का विषय, आगमोक्त विषय, श्रुति और स्मृति का विषय है: सुनने का, और अपनी परंपरा में देने का। लिखित तो बाद में आया, है न। तो हजारों बातें ऐसी हैं जो लिखित में नहीं हैं, और जो लिखित में हैं, वे भी अपनी परंपरा के भीतर ही सुरक्षित हैं। अगर उनमें से कोई एक संदर्भ किसी ने लिख दिया और किसी ने उसे प्रकाशित कर दिया, तो जैसा हम YouTube पर बहुतों में देखते हैं, लोग कहते हैं: इसका कहीं वर्णन नहीं है; यह किस तंत्र ग्रंथ का है, कहाँ से है, इसका कोई आधार नहीं, यह बेकार की बात है। और ऐसे लोग स्वयं को परम तांत्रिक मानते हैं। ऐसे लोगों में आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा हो गई है।
रजस्वला के प्रश्न पर पराशर सूत्र क्या कहता है?
एक लिखित सिद्धांत, जिसके होने से लोग इनकार करते हैं
वे रजस्वला के विषय को उदाहरण बनाते हैं: YouTube पर ऐसे लोगों के बहुत वीडियो मिलते हैं जो स्वयं को जबरदस्त, परम, सिद्ध तांत्रिक मानते हैं। इसी से पता चलता है कि उनकी मानसिकता किस स्तर की है और उनके पास कितनी सिद्धि होगी। वे कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति अनुशासन से चल रहे व्यक्ति की नाव भी डुबा देगा। ऐसे लोग कहते हैं कि रजस्वला के बारे में कहीं कोई लिखित सिद्धांत नहीं है — पर लोगों ने कई जगह प्रमाण दिया है कि लिखा है: व्यास मुनि के पिता पराशर मुनि जी के पराशर सूत्र आदि में पूरा वर्णन है कि जब स्त्री रजस्वला हो, उस समय वह पूजन और पाठ नहीं करेगी।
वे कहते हैं कि ऐसे लोग हर बात पर इसी तरह फैसला सुनाएँगे — जैसे अभी रजस्वला का विषय है। YouTube पर आपको बहुत वीडियो मिलेंगे जिनमें लोग स्वयं को जबरदस्त, परम, सिद्ध तांत्रिक मानते हैं; और इसी से साफ हो जाता है कि उनकी मानसिकता किस स्तर की है और उनके पास कितनी सिद्धि होगी। वे कहते हैं कि उनके सामने हम छोटे लोग कुछ नहीं, और हम छोटे हैं भी; भगवती की कृपा से हम जितना हो सके उतना सही मार्गदर्शन देने का प्रयास करते हैं, ताकि लोग सही करें और फल पाएँ। पर ऐसे लोग तो अनुशासन से चल रहे व्यक्ति की भी नाव डुबा देंगे। वे क्या करते हैं? एक बात यह कहते हैं कि रजस्वला के बारे में कहीं कोई लिखित सिद्धांत नहीं है। वे कहते हैं कि लोगों ने कई जगह प्रमाण दिया है कि लिखा है: व्यास मुनि के पिता पराशर मुनि जी के पराशर सूत्र आदि में पूरा वर्णन है कि जब स्त्री रजस्वला हो, उस समय वह पूजन और पाठ नहीं करेगी। पर लोग सीधे कह देते हैं कि कहीं नहीं लिखा। यह लोगों के मन की बात है — कि स्त्री तो भगवती कामाख्या का ही स्वरूप है, स्त्री स्वयं कामाख्या है, तो वह पूजन क्यों न करे? तो वे उससे विग्रह भी छूने को कहते हैं, सप्तशती भी छूने को कहते हैं, और पूजा स्थान में बैठकर पढ़ने को भी कहते हैं, यह कहकर कि पहले लोग साफ-सफाई नहीं रख पाते थे — यानी अब लोग साफ-सुथरे रहते हैं और तब नहीं रह पाते थे। वे कहते हैं, अद्भुत विषय है।
रजस्वला अवस्था में पाठ करने का क्या परिणाम होता है?
वह दोष जो स्त्री और उसके वंशज भोगते हैं
वे कहते हैं कि यह बात कोई भी संत, सिद्ध या महात्मा कह रहा हो, उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका विनाश किस तरह होगा। जब आप रजस्वला होकर पाठ करती हैं, तो सभी पितरों को कष्ट होगा, लोक-देव शक्तियों को कष्ट होगा; आप स्वयं अग्नि स्वरूप हैं, और वहाँ वायु स्वरूप और जल तत्त्व की शक्तियाँ भी हैं — उस स्पर्श से इन सबको जो कष्ट होता है, वह दोष बनकर लगता है। वह दोष आपको भोगना पड़ता है, आपके वंशजों को भोगना पड़ता है, आपके बेटों-पोतों को भोगना पड़ता है। वे कहते हैं कि फिर यही भुगतने वाले टिप्पणियों में चिल्लाने लगते हैं कि हमने तो कोई अपराध किया ही नहीं, फिर हम क्यों भुगत रहे हैं।
वे कहते हैं कि अब जो स्त्री रजस्वला अवस्था में बैठती है — इस विषय पर कोई भी संत, सिद्ध या महात्मा बोल रहा हो, भाई, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका विनाश किस तरह आएगा। जब आप रजस्वला होकर पाठ करती हैं, तो सभी पितरों को जो कष्ट होगा, लोक-देव शक्तियों को जो कष्ट होगा; और चूँकि आप स्वयं अग्नि स्वरूप हैं, और वहाँ वायु स्वरूप शक्तियाँ और जल तत्त्वों की शक्तियाँ भी हैं — आपके स्पर्श के कारण इन सबको जो कष्ट होगा, उससे जो दोष लगता है, वह आपको भोगना पड़ता है, आपके वंशजों को भोगना पड़ता है, आपके बेटों-पोतों को भोगना पड़ता है। फिर ये भुगतने वाले चिल्लाने लगते हैं — हर जगह वीडियो की टिप्पणियाँ देख लीजिए: हमने आज तक कोई अपराध नहीं किया, फिर हम क्यों भुगत रहे हैं, यह कैसा कष्ट है, ये सब बेकार की बातें हैं। वे कहते हैं कि ये वही लोग हैं; ऐसे ही लोगों के जन्म हैं जो चिल्लाते हैं कि हमने कोई अपराध किया ही नहीं — ये उन्हीं की संतानें हैं जो रजस्वला अवस्था में पाठ करते हैं और बात नहीं मानते। और जिन्होंने कहा कि रजस्वला होकर भी पाठ कर सकती है, उन्हें क्या फर्क पड़ता है? उनका तो कुछ भी नहीं जाने वाला।
स्त्री के रजस्वला होने पर घर की सारी पूजा रोक देना दूसरी अति है।
पूरे घर का पूजा ऐसे बंद कर देना मानो सूतक लगा हो
वे कहते हैं कि ठीक इसी तरह कुछ लोगों ने रजस्वला के लिए बिल्कुल अलग ही स्थिति बना दी है: कि आप रजस्वला हैं तो आपके घर में कोई पूजा होगी ही नहीं। या तो इस तरफ रहो या उस तरफ, पर मूल विषय पर मत रहो। उस घर की एक माँ या एक बहन रजस्वला हुई है — एक व्यक्ति, एक स्त्री। उसका पति तो रजस्वला नहीं हुआ; वह पूजन-पाठ क्यों छोड़े, और पूरा परिवार सारी पूजा ऐसे क्यों बंद कर दे मानो सूतक लग गया हो?
वे कहते हैं कि ठीक इसी तरह कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने रजस्वला के लिए बिल्कुल अलग ही स्थिति बना दी है: कि आप रजस्वला हैं तो आपके घर में कोई पूजा होगी ही नहीं। वे इस स्तर की स्थिति बना रहे हैं। यानी या तो इस तरफ रहो या उस तरफ रहो; मूल विषय में मत रहो। अब उनका कहना यह है: रजस्वला उस घर की कोई एक माँ है, कोई एक बहन हुई है — ठीक है, वह एक व्यक्ति है, एक स्त्री है। उनका पति तो रजस्वला नहीं हुआ, भाई। वह पूजन-पाठ क्यों छोड़े — पूरा परिवार सारा पूजन-पाठ बंद कर दे, मानो सूतक लग गया हो? यह एक अलग ही स्थिति चल रही है: कोई स्त्री रजस्वला हो गई तो घर की सारी पूजा और पाठ बंद।
स्त्री के रजस्वला होने पर घर को किन नियमों का पालन करना चाहिए?
स्पर्श नहीं, उसके हाथ का भोजन नहीं, नैवेद्य दूर से अर्पित
वे कहते हैं कि उस हिसाब से तो अगर घर में एक सास और दो-चार बहुएँ हों, तो भगवान को हमेशा के लिए विदा करना पड़ेगा। जहाँ चार-पाँच स्त्रियाँ हों, वहाँ हर सप्ताह कोई न कोई रजस्वला होगी, तो पूजा कहाँ से होगी? उनके नियम: उसका स्पर्श न हो; उसके हाथ का भोजन खाए बिना सेवा-पूजा करें, और अगर खा रहे हैं तो स्नान करके, शुद्ध होकर, साफ वस्त्र पहनकर करें; पूजा स्थान की कोई वस्तु वह न छुए; उसका दिया जल या फूल इस्तेमाल न करें; अगर वह भोजन बना रही है, तो नैवेद्य भगवान के सामने ले जाएँ पर हाथ में थमाने के बजाय दूर से अर्पित करें। और अगर आपको मत्स्य मुद्रा दिखाना और अमृतीकरण की विधि आती हो, और प्राणायाम का पूरा विधि-विधान आता हो, तो दोष का निवारण भी हो जाता है।
वे कहते हैं कि उस हिसाब से तो अगर उस घर में एक सास और दो-चार बहुएँ हो जाएँ, तो भगवान को वहाँ से हमेशा के लिए विदा कर देना चाहिए — जाओ भगवान, अपने स्थान पर जाओ और वहीं से हमारी रक्षा करो, जैसे विसर्जन में कहते हैं: वहीं से रक्षा करो, और हम मन में, हृदय से, आपके नाम का जप करके आपको याद करेंगे। जप नाम, जप नाम। क्योंकि जहाँ चार-पाँच स्त्रियाँ हैं, वहाँ हर सप्ताह कोई न कोई रजस्वला होती रहेगी, तो पूजा कहाँ से होगी? तो हम जप नाम, जप नाम करते हैं — भगवान, आप भी मौज करो। बात ही खत्म। वे ये नियम बताते हैं: जो रजस्वला हैं, उनका स्पर्श न हो; उनके हाथ का अन्न खाए बिना अपनी सेवा-पूजा करें, और अगर खा रहे हैं तो स्नान करके, शुद्ध होकर, साफ वस्त्र पहनकर करें। स्नान आदि के बाद पूजा स्थान की कोई वस्तु उनसे न छुई जाए; उनका दिया जल, फूल आदि इस्तेमाल न करें। अगर वह भोजन बना रही है, तो नैवेद्य भगवान के सामने ले जाएँ और उनके हाथ में देने के बजाय दूर से अर्पित करें। और अगर आपको मुद्रा दिखाना आता है — मत्स्य मुद्रा और अमृतीकरण की विधि — और प्राणायाम का पूरा विधि-विधान आता है, तो उस दोष का निवारण भी हो जाता है। वे कहते हैं कि वे शाक्त की बात करते हैं; वैष्णव आदि की बात नहीं करेंगे — वहाँ बहुत उथल-पुथल है, भाई; वे जो भी करेंगे, उनकी अपनी अलग व्यवस्था है। पर ये कार्य भगवती की उपासना के लिए हैं।
साधना के दौरान कोई बच्चा या लड़की पुकारे तो इसका क्या अर्थ है?
अनदेखा करें और साधना में लगे रहें
किसी ने पूछा कि साधना के दौरान एक बार एक छोटे बच्चे ने पुकारा और आज एक लड़की ने पुकारा, इसका क्या अर्थ है और इसे कैसे समझें। वे कहते हैं: इसका कोई अर्थ मत निकालिए; अनदेखा कीजिए और अपनी साधना में लगे रहिए। जिसे आपके सामने आना है, वह आएगा। बहुत कुछ होता है — आसपास की वायवीय चीज़ें हो सकती हैं, घर की चीज़ें हो सकती हैं; शुभ भी हो सकता है और अशुभ भी, यह ऐसे ही नहीं कहा जा सकता। पर अगर हो रहा है, तो खुश रहिए कि किसी को फर्क पड़ रहा है।
वे प्रश्न पढ़ते हैं: साधना के दौरान एक बार एक छोटे बच्चे ने पुकारा, और आज एक लड़की ने पुकारा — इसका क्या अर्थ है, मैं क्या समझूँ, गुरु जी? वे उत्तर देते हैं कि इसका कोई अर्थ मत निकालिए। अनदेखा कीजिए और अपनी साधना में लगे रहिए। जिसे आपके सामने आना है, वह आएगा; बहुत सारी चीज़ें होती हैं। आसपास की वायवीय चीज़ें हो सकती हैं, घर की चीज़ें हो सकती हैं। शुभ भी हो सकता है और अशुभ भी; यह ऐसे ही नहीं कहा जा सकता। पर ठीक है — अगर हो रहा है, तो बस खुश रहिए कि किसी को फर्क पड़ रहा है।
साधना में आने वाले अनुभवों पर साधक कैसी प्रतिक्रिया दे?
प्रतिक्रिया के बिना अवलोकन
भूत-प्रेत आएँ या देवी-देवता आएँ, आपका अनुभव अच्छा हो या बुरा — अगर होने लगा है, तो समझिए कि आपकी साधना ने कहीं न कहीं पारलौकिक गतिविधियों में दखल दिया है, आप मायने रखते हैं, आप उनकी नज़र में हैं। इसका आनंद लीजिए, घबराइए मत, डरिए मत, भागिए मत। अनदेखा करने का अर्थ ध्यान न देना नहीं है: आप ध्यान देंगे, पर प्रतिक्रिया नहीं देंगे; आपको पूरी तरह तटस्थ रहना है। अनुभव पर कभी प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए — चुपचाप अवलोकन कीजिए, यही अवलोकन आपको आगे ले जाएगा।
भूत-प्रेत आएँ, देवी-देवता आएँ, आपका अनुभव अच्छा हो या बुरा — अगर होने लगा है, तो समझिए कि आपकी साधना ने कहीं न कहीं पारलौकिक गतिविधियों में दखल दिया है, आप मायने रखते हैं, आप उनकी नज़र में हैं; इसीलिए आपके साथ ऐसा हो रहा है। तो निश्चिंत रहिए। इसका आनंद लीजिए, इससे घबराइए मत, डरिए मत, भागिए मत — और बाकी सब अनदेखा कीजिए। पर अनदेखा करने का अर्थ क्या है? अनदेखा करने का अर्थ यह नहीं कि आप ध्यान ही न दें। आप ध्यान देंगे, पर प्रतिक्रिया नहीं देंगे; आपको पूरी तरह तटस्थ रहना है। अनुभव पर कभी प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए — कि अरे, ऐसा हुआ, चलो दस लोगों को बताएँ; या अरे, आज नहीं हुआ। कुछ नहीं करना है। चुपचाप अवलोकन कीजिए। यही अवलोकन आपको आगे ले जाएगा। अगर आपने प्रतिक्रिया दी, कुछ कहा, कुछ पूछा, आवाज़ दी — तो वहाँ कुछ भी हो सकता है।
सपने में पिता की मृत्यु और माँ को बिना सिंदूर देखने का क्या उपाय है?
माता-पिता का, विशेषकर पिता का, तुलादान
किसी ने पूछा कि सपने में पिता की मृत्यु और माँ को बिना सिंदूर देखा हो तो क्या उपाय है। वे उत्तर देते हैं कि सबसे पहले जितनी जल्दी हो सके माता-पिता का, और विशेषकर पिता का, तुलादान करवाना चाहिए।
वे प्रश्न पढ़ते हैं: सपने में अपने पिता की मृत्यु और अपनी माँ को बिना सिंदूर देखने का क्या उपाय है? वे कहते हैं कि अगर सपने में ऐसी बात हुई है, तो पहला काम यह करना चाहिए कि जितनी जल्दी हो सके अपने माता-पिता का तुलादान करवाइए। विशेषकर पिता का तुलादान करवाइए।
उस तुलादान के साथ कौन सा अनुष्ठान बताया गया है?
महामृत्युंजय कवच, हनुमान चालीसा या रुद्राभिषेक
पिता के लिए महामृत्युंजय कवच का, या हनुमान चालीसा का, या जो भी आपके आराध्य हों उनके कवच का अनुष्ठान कीजिए या करवाइए। अगर उस तरह का कोई सक्षम विद्वान मिल जाए, तो महामृत्युंजय का लघु अनुष्ठान ही करवा लीजिए — पर करवाइए ज़रूर। या रुद्राभिषेक करवाइए, ताकि अल्पायु दोष आदि नष्ट हों।
वे कहते हैं कि अपने पिता के लिए महामृत्युंजय कवच का, या हनुमान चालीसा का, या जो भी आपके आराध्य हों उनके कवच का अनुष्ठान कीजिए। या करवाइए: अगर उस तरह का कोई सक्षम विद्वान मिल जाए, तो महामृत्युंजय का लघु अनुष्ठान ही करवा लीजिए — पर करवाइए ज़रूर। या रुद्राभिषेक करवाइए, ताकि अल्पायु दोष आदि नष्ट हो जाएँ। एक और प्रश्न पर, जिनका कमर का ऑपरेशन हुआ है, वे उत्तर देते हैं: बैठकर ही कीजिए; कोई दिक्कत नहीं है, जितना सामान्य रूप से हो सके।
बलि के लिए कौन सा जायफल लें, और उसे कैसे काटें?
छिलका उतरा जायफल, और तेज़ चाकू से एक ही वार
किसी ने पूछा कि बलि में कौन सा जायफल देना है। वे कहते हैं कि बिना छिलके वाला जायफल, जो बड़ी सुपारी जैसा होता है। हरड़ की बात करने वाले से वे कहते हैं: हरड़ की बलि देने के बजाय जायफल की बलि दीजिए। ऊपर का छिलका उतारिए — उसे कूटिए मत। वे एक श्रोता का किस्सा बताते हैं जिसने वीडियो भेजा कि बलि के लिए जायफल कट नहीं रहा: वह धीरे-धीरे रेतता रहा, छिलका लगा होने से कटा नहीं, तो उसने लोढ़े से कूट दिया और पूछा, क्या यह भी बलि नहीं है। उन्होंने कहा, जय हो भगत जी — पहले उसका ऊपर का छिलका तोड़िए, जायफल निकल आएगा।
वे प्रश्न पढ़ते हैं कि बलि में कौन सा जायफल देना है। वे कहते हैं कि जो जायफल बिना छिलके का होता है — जो बड़ी सुपारी जैसा होता है। आप हरड़ की बात कर रहे हैं; हरड़ की बलि देने के बजाय जायफल की बलि दीजिए। ऊपर का छिलका उतारिए — उसे कूटिए मत। वे बताते हैं कि एक सज्जन ने वीडियो भेजा था, कहते हुए: भाई, जायफल बलि देने के लिए था, पर कट नहीं रहा था। वे उसे धीरे-धीरे रेतते रहे और वह कटा नहीं, क्योंकि उस पर छिलका लगा था — तो उन्होंने लोढ़ा लेकर कूट दिया, यह कहते हुए कि क्या यह भी बलि नहीं है, देवी स्वीकार कर लेंगी। और हमने कहा, जय हो भगत जी। अरे — पहले उसके ऊपर का छिलका तोड़िए, जायफल निकल आएगा।
जायफल कैसे काटें, और बलि और किस तरह दी जा सकती है?
तेज़ चाकू का एक पक्का वार, या अग्नि बलि
ज़रूरी नहीं कि जायफल पानी में भिगोने पर ही कटेगा: अगर आपके पास तेज़ चाकू है, तो उसे जायफल पर रखिए और हाथ से ज़ोर से एक ही वार कीजिए, वह दो टुकड़ों में हो जाएगा। बलि वैसे भी त्रिकोण और वैसा मंडल बनाकर दी जा सकती है; और नहीं तो अग्नि जलाकर उसमें जलाकर भी दी जा सकती है — वे कहते हैं कि अग्नि बलि सबसे दिव्य और अद्भुत है।
वे कहते हैं कि अब ज़रूरी नहीं कि जायफल पानी में भिगोने पर ही कटेगा। अगर आपके पास तेज़ चाकू है, तो उसे उस पर रखिए, हाथ से ज़ोर से दबाइए और एक ही वार में मारिए, वह दो टुकड़ों में हो जाएगा। बलि वैसे भी त्रिकोण और वैसा मंडल बनाकर दी जा सकती है। और नहीं तो अग्नि जलाकर उसमें जलाकर भी बलि दी जा सकती है — अग्नि बलि सबसे दिव्य और सबसे अद्भुत रहती है। वे कहते हैं कि भगवती को सब कुछ प्रिय है, यह ध्यान रखिए। आपको जो बातें मिलती हैं — कि गणपति जी को तर्पण प्रिय है, शिव जी को अभिषेक, विष्णु जी को स्तुति, और भगवती को अर्चन — ठीक है, भगवती अर्चना की प्रेमी हैं; पर ध्यान रखिए कि जगदंबा को अभिषेक भी अत्यंत प्रिय है।
जगदंबा के अभिषेक और श्रृंगार से क्या फल मिलता है?
जितना श्रृंगार करेंगे, उतना वे आपका जीवन सँवारेंगी
वे कहते हैं कि जगदंबा का अभिषेक कीजिए: जितना श्रृंगार करेंगे, उतना वे आपका जीवन सँवारेंगी — क्योंकि श्री देवी भागवत महापुराण पढ़ने पर आपको वर्णन मिलेगा कि जगदंबा की सेवा में किए गए हर काम का क्या फल है, चाहे फूलों का श्रृंगार हो, श्रृंगार सामग्री चढ़ाना हो, फूल चढ़ाना हो या वस्त्र चढ़ाना हो। और अर्चन भी कीजिए, चाहे सत्ताईस या अट्ठाईस नामों से, बत्तीस से, एक सौ आठ से या एक हज़ार आठ नामों से; अर्चना जगदंबा को अत्यंत प्रिय है।
वे कहते हैं कि जगदंबा का अभिषेक कीजिए। जितना श्रृंगार करेंगे, उतना वे आपका जीवन सँवारेंगी। क्योंकि जब आप श्री देवी भागवत महापुराण, या देवी भागवत पढ़ेंगे, तो उसमें आपको वर्णन मिलेगा कि जगदंबा की सेवा में किए जाने वाले हर काम का क्या फल है — चाहे फूलों का श्रृंगार हो, या उन्हें श्रृंगार की सामग्री चढ़ाना हो, या फूल चढ़ाना हो, या वस्त्र चढ़ाना हो। जितना श्रृंगार करेंगे, उतना दिव्य फल, और उतने ही आपके कष्ट और परेशानियाँ कटेंगी। तो अभिषेक का भी अपना महत्व है, और श्रृंगार का भी अपना महत्व है। अर्चन कीजिए — उससे भी जगदंबा अत्यंत प्रसन्न होंगी। चाहे आप उनके सत्ताईस या अट्ठाईस नामों से अर्चन करें, बत्तीस नामों से, एक सौ आठ नामों से, या एक हज़ार आठ नामों से: अर्चना जगदंबा को अत्यंत प्रिय है।
एक सामान्य गृहस्थ साधक को किसे पकड़े रहना चाहिए?
सप्तशती, हिंदी में पढ़ी जाए, योग्यता के संकल्प के साथ
स्तुति भी उन्हें प्रिय है: जितना हो सके श्री दुर्गा सप्तशती और श्री चंडी पाठ कीजिए — सप्तशती जगदंबा का हृदय ही है, और माई की सबसे बड़ी प्रसन्नता इसी से होती है। YouTube पर बहुत से बड़े तांत्रिक मिलते हैं जो कहते हैं कि पहले वे सप्तशती करते थे, बाद में छोड़ दी, फिर यह-वह किया, तांत्रिक सिद्धि पाई, फिर श्मशान — वे कहते हैं कि वह उनका निजी मामला हो सकता है। सामान्य गृहस्थ साधक सप्तशती जी को पकड़कर चलते रहें, और हिंदी में ही करें।
वे कहते हैं कि स्तुति भी उन्हें प्रिय है। जितना हो सके श्री दुर्गा सप्तशती और श्री चंडी पाठ कीजिए: सप्तशती जगदंबा का हृदय ही है, और माई की सबसे बड़ी प्रसन्नता सप्तशती से ही होती है। अब YouTube पर आपको बहुत से बड़े तांत्रिक यह कहते मिलेंगे कि शुरू में हम सप्तशती करते थे और बाद में छोड़ दी, फिर यह किया, वह किया, यह हुआ, वह हुआ, हमने तांत्रिक सिद्धि पाई, फिर श्मशान — भाई, वह उनका निजी मामला हो सकता है। जो सामान्य गृहस्थ साधक हैं, वे सप्तशती जी को पकड़कर चलते रहें; हिंदी में ही करें। उनसे प्रार्थना कीजिए: भगवती, हमें संस्कृत में पाठ के योग्य बनाइए। या अगर आप सच्चे भक्त हैं, तो ठीक यही संकल्प करके पाठ कीजिए — कि माँ, हमें ऐसी सामर्थ्य दीजिए कि हम शुद्ध उच्चारण सीख सकें, और शाक्त परंपरा में योग्य दीक्षा जल्द से जल्द हमें मिले, ताकि हमें इसका अधिकार मिले और हम इससे आपको प्रसन्न कर सकें; आप स्वयं ही हमें दीक्षा दीजिए। तब माई ज़रूर बहुत जल्द व्यवस्था करेंगी। बस यही संकल्प करके हिंदी में पाठ कीजिए।
जगदंबा को कौन सी आहुतियाँ सबसे प्रिय हैं?
नवग्रह समिधा, बेल की लकड़ी और गोबर के कंडे, घी या गुग्गल के साथ
वे कहते हैं कि मन में भाव रखिए, माँ ज़रूर सुनेंगी और पूरा भी करेंगी। नवग्रह समिधा, बेल की लकड़ी, और गोबर के कंडे-उपलों पर घी से, या गुग्गल और घी से आहुति जगदंबा को विशेष रूप से प्रिय है। जायफल आदि की आहुति के बारे में वे कहते हैं कि यह तंत्रोक्त विधि-विधान है और जायफल आदि का हवन सामान्यतः बिना आदेश के बहुत नहीं करना चाहिए — पर यह जगदंबा को अत्यंत प्रिय है; जब आहुति अग्नि में पड़ती है, तो भगवती स्वाहा अत्यंत प्रसन्न होती हैं।
वे कहते हैं कि मन में भाव रखिए, माँ ज़रूर सुनेंगी, और पूरा भी करेंगी। तो स्तुति भी उन्हें प्रिय है। नवग्रह समिधा से, बेल की लकड़ी से, गोबर के कंडे और उपलों पर, घी से, या गुग्गल और घी से आहुति जगदंबा को विशेष रूप से प्रिय है। जायफल आदि की आहुति के बारे में — देखिए, यह तंत्रोक्त विधि-विधान है, और जायफल आदि का हवन सामान्यतः बिना आदेश के बहुत नहीं करना चाहिए। पर यह जगदंबा को अत्यंत प्रिय है: आहुति अग्नि में पड़ती है और भगवती स्वाहा अत्यंत प्रसन्न होती हैं।
भगवती का अनन्य प्रिय कौन बनता है?
कोई प्रिय या अप्रिय नहीं, फिर भी इन कर्मों को करने वाला प्रिय है
नवरात्र में आप जो भी कर्म कर रहे हैं, ये सब कर्म जगदंबा को प्रिय हैं, और जो नवरात्र व्रत रखकर ये सब अनुष्ठान करता है, वह उनका अनन्य प्रिय बन जाता है। एक ओर भगवती गीता में कहती हैं कि मुझे न कोई प्रिय है न अप्रिय — पर वे कहते हैं कि जान लीजिए, वही श्रीमद् भागवत में कहती हैं कि जो इस प्रकार मेरी पूजा और अनुष्ठान, श्रृंगार, स्तुति, हवन आदि करता है, वह मेरा अनन्य प्रिय बन जाता है।
वे कहते हैं कि नवरात्र में आप जो भी कर्म कर रहे हैं, ये सब कर्म जगदंबा को प्रिय हैं, और जो नवरात्र व्रत रखकर ये सब अनुष्ठान करता है, वह भगवती का अनन्य प्रिय बन जाता है। एक ओर भगवती कहती हैं — माँ गीता में कहती हैं — कि मुझे न कोई प्रिय है न अप्रिय। पर यहाँ जान लीजिए कि वही श्रीमद् भागवत में कहती हैं कि जो इस प्रकार मेरी पूजा और अनुष्ठान, श्रृंगार, स्तुति, हवन आदि करता है, वह मेरा अनन्य प्रिय बन जाता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।