तांत्रिक बंधन — स्तंभन, उच्चाटन और गृहस्थ उसका विमोचन कैसे करे
तांत्रिक बंधन, उसके कारण और उपाय समझाते हैं।
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बंधन यानी स्तंभन — स्तंभित कर दिया जाना
क्या बंधन का अर्थ केवल किसी चीज को बांध देना ही है?
नहीं। वक्ता कहते हैं कि बंधन का अर्थ केवल और केवल किसी चीज को बांध देना ही नहीं होता। यहाँ बांध देने का तात्पर्य सीधे स्तंभन से है — स्तंभित कर दिया जाना।
सर्वप्रथम, वक्ता कहते हैं, बंधन का अर्थ केवल और केवल किसी चीज को बांध देना ही नहीं होता। बांध देने का तात्पर्य यहाँ सीधे स्तंभन से है — स्तंभित कर दिया जाना। वे इस क्षेत्र में प्रचलित शब्द गिनाते हैं: किस्मत बांध दी गई, भाग्य बांध दिया गया; किसी ने हमारे सौभाग्य को बंधित कर दिया; किसी ने हमारे काम, रोजगार, व्यवसाय को बंधित कर दिया; किसी का कोख बंधन हो गया; किसी की उन्नति बंधित हो गई। ये ही, वे कहते हैं, वे प्रचलित शब्द हैं जिनमें कहा जाता है कि बंधित हो गए।
स्तंभन की मूल शक्ति के रूप में भगवती पीतांबरा
जगत में स्तंभन का मूल सामर्थ्य भगवती पीतांबरा का है
वक्ता कहते हैं कि स्तंभन करने का सामर्थ्य जगत में जो सबसे मूल शक्ति को है, वह भगवती पीतांबरा को है। बंधन शब्द से श्रोता अनभिज्ञ नहीं होंगे, पर इसके पीछे का पूरा विधि विधान और सिस्टम क्या है — वही समझाना है।
इस विषय से आप सभी अनभिज्ञ नहीं होंगे, वक्ता कहते हैं; कहीं न कहीं जानकारी होगी कि इस प्रकार का विषय कहा जाता है। लेकिन वास्तव में इसके पीछे का पूरा विधि विधान क्या है, पूरा सिस्टम कैसे चलता है, किस प्रकार से होता है और क्या किया जाता है — यही वे बताना चाहते हैं। और उसमें सबसे पहला विषय यह है: स्तंभन करने का सामर्थ्य जगत में जो सबसे मूल शक्ति को है, वह भगवती पीतांबरा को है।
महाविद्या से स्तंभन सामर्थ्य प्राप्त करने वाली उपशक्तियाँ
अन्य सभी उपशक्तियाँ बांधने का सामर्थ्य महाविद्या से ही प्राप्त करती हैं
वक्ता भगवती के तत्व को स्तंभन शक्ति को एकत्रित करके बना ऊर्जा का एक प्रबल समूह बताते हैं, जिनके सामर्थ्य के कारण ही हर चीज अपने स्थान पर स्तंभित होती है, रुकती है। अन्य सभी उपशक्तियाँ इसी महाविद्या से सामर्थ्य प्राप्त करके ही स्तंभन से संबंधित कार्य पूर्ण करती हैं।
भगवती का यह तत्व, वक्ता कहते हैं, एक तरीके से कहा जाए तो स्तंभन शक्ति को एकत्रित करके बना ऊर्जा का ऐसा प्रबल समूह है कि इनके सामर्थ्य के कारण ही हर चीज अपने स्थान पर स्तंभित होती है, रुकती है। यह मूल हो गई। लेकिन इन्हीं महाविद्या स्वरूपों से, जो भगवती ने धारण किए हैं, सामर्थ्य प्राप्त करके ही अन्य सभी उपशक्तियाँ स्तंभन से संबंधित कार्य को पूर्ण करती हैं।
पीतांबरा की स्तंभन और निग्रह शक्ति के धारक बृहस्पति
बृहस्पति देव पीतांबरा की उसी स्तंभन और निग्रह शक्ति से पृथ्वी को संतुलित रखते हैं
वक्ता कहते हैं कि जिस संतुलन के कारण हम खड़े होकर गिरते नहीं, और जो पृथ्वी का संतुलन है, वह इसी पर टिका है। भगवान बृहस्पति देव अपने अक्ष पर घूमते हुए पूरे ब्रह्मांड में परिक्रमा करते हुए पृथ्वी को संतुलित रखते हैं, और पृथ्वी की ओर आने वाले किसी भी आकाशीय पिंड या उल्का को उसके आभा मंडल में पहुँचने से पहले नष्ट कर देने का सामर्थ्य रखते हैं — और वे भगवती पीतांबरा की उन्हीं स्तंभन महाशक्ति और निग्रह शक्ति से युक्त हैं।
वक्ता श्रोताओं से कहते हैं कि इसे अपने भीतर के संतुलन से रिलेट करें — जिस संतुलन के कारण हम खड़े होते हैं तो गिरते नहीं — और पृथ्वी के सामान्य संतुलन से। भगवान बृहस्पति देव, वे कहते हैं, अपने अक्ष पर घूमते हुए, पृथ्वी की ओर पूरे ब्रह्मांड में परिक्रमा करते हुए पृथ्वी को संतुलित करके रखते हैं। पृथ्वी की ओर आने वाला कोई भी आकाशीय उपग्रह, कोई प्रक्षेपण, उल्का पिंड आदि — उन सभी को पृथ्वी के आभा मंडल में पहुँचने से पहले ही नष्ट कर देने का सामर्थ्य वे रखते हैं। और बृहस्पति देव, वक्ता कहते हैं, भगवती पीतांबरा की उन्हीं स्तंभन महाशक्ति और निग्रह शक्ति से युक्त हैं।
पीत वर्ण का संबंध
पीतांबरा और बृहस्पति दोनों को पीला रंग ही क्यों प्रिय है?
वक्ता दोनों को रिलेट करने को कहते हैं: जहाँ भगवती पीतांबरा को साक्षात पीतांबरा, पीत वर्ण की देवी कहा गया है, वहीं भगवान बृहस्पति को भी देखिए तो उन्हें भी पीत ही पसंद है, पीला ही पसंद है।
इसी कारण से, वक्ता कहते हैं, दोनों चीजों को रिलेट कर लीजिए। जहाँ भगवती पीतांबरा को साक्षात पीतांबरा, पीत वर्ण की देवी ही कहा गया है, वहीं भगवान बृहस्पति को भी आप देखिएगा तो उनको भी पीत ही पसंद है, पीला ही पसंद है।
नकारात्मक और सकारात्मक प्रयोग के मूल में एक ही तत्व
शक्ति का प्रयोग नकारात्मक हो या सकारात्मक, स्तंभन की यही ऊर्जा उसमें उपस्थित रहती है
हाँ। वक्ता कहते हैं कि चाहे कोई इन शक्तियों का नकारात्मक प्रयोग करने का प्रयत्न करे या सकारात्मक, उसमें मूल रूप से यह ऊर्जा उपस्थित होती ही होती है।
मूल रूप से, वक्ता कहते हैं, चाहे कोई नकारात्मक रूप से चाहे सकारात्मक रूप से, किसी भी प्रकार से इन शक्तियों का प्रयोग करने का प्रयत्न करे, उसमें मूल रूप से यह ऊर्जा उपस्थित होती ही होती है।
बंधन के लिए शिव से वरदान लेने वाले असुरों की उपमा
जैसे असुर शिव के वरदान से शक्तिशाली होते हैं, वैसे ही हर स्तंभनी प्रक्रिया में यह तत्व रहता है, मूल स्वरूप कोई भी हो
वक्ता उपमा देते हैं कि भगवान शिव से ही वरदान प्राप्त करके असुर भी शक्तिशाली होते हैं और इंद्रत्व प्राप्त करने का प्रयास करते हैं या छीन लेते हैं। ठीक उसी प्रकार हर स्तंभनी और बंधन की प्रक्रिया में यह तत्व उपस्थित होता ही है — चाहे वहाँ भगवती का मूल स्वरूप दश महाविद्याओं में से कोई हो या कोई अन्य।
भगवान शिव से ही वरदान प्राप्त करके, वक्ता कहते हैं, असुर भी शक्तिशाली होते हैं और इंद्रत्व को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं या छीन लेते हैं। ठीक उसी प्रकार से, जितनी भी स्तंभनी प्रक्रियाएँ हैं, बंधन की प्रक्रियाएँ हैं, उनमें यह तत्व उपस्थित होता ही होता है — चाहे भगवती का मूल स्वरूप वहाँ दश महाविद्याओं में से कोई हो या कोई अन्य हो।
परिवार की उन्नति का बंधन
बंधन का पहला प्रकार — खुशहाल परिवार के आय के स्रोत को बंधित कर देना
पहला प्रकार जो वे लेते हैं वह है किसी भी परिवार की उन्नति का बंधन — जहाँ परिवार पहले बहुत खुशहाल था, धन धान्य से संपन्न था, लेकिन आय का स्रोत बंधित हो गया।
विषय के आरंभ पर आते हुए वक्ता कहते हैं कि बंधन के प्रकार में कई प्रकार के बंधन और स्तंभन आते हैं। सबसे पहले वे लेते हैं किसी भी परिवार की उन्नति का बंधन कर देना। विषय इस तरह आता है: पहले परिवार बहुत खुशहाल था, धन धान्य से संपन्न था, लेकिन आय का स्रोत बंधित हो गया।
आय के स्रोत यानी ग्राहकों को रोक देना
किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान को व्यवहार में कैसे बांधा जाता है?
वक्ता कहते हैं कि केवल बंधित हो जाने भर से काम नहीं होता। व्यापारिक प्रतिष्ठान का उदाहरण लें: जब वहाँ बंधन से संबंधित कोई तांत्रिक क्रिया की जाएगी, तो सबसे पहले जो भी ग्राहक वहाँ आते होंगे, जिनके कारण आय का स्रोत होगा, उन्हें रोका गया होगा।
केवल बंधित होने भर से वह काम नहीं होता, वक्ता कहते हैं। उदाहरण के लिए किसी का व्यापार है, व्यापारिक प्रतिष्ठान है — वहाँ वह बंधित कैसे होगा? जब बंधन से संबंधित कोई तांत्रिक क्रिया वहाँ की जाएगी तो सबसे पहला विषय है कि जो भी ग्राहक वहाँ आते होंगे, जिनके कारण आय का स्रोत होगा, उन्हें रोका गया होगा। तो बंधन अपने भीतर केवल बंधन ही नहीं समेटे है; उसमें बहुत सारी चीजें हैं।
दुकान की लक्ष्मी पर लगाया गया सिद्ध देवता और मंत्र
प्रयोग करने वाला अपने सिद्ध देवता या मंत्र को दुकान की लक्ष्मी पर लगाता है, और स्वयं वहाँ जाता है
वक्ता कहते हैं कि प्रयोग करने वाला अपने सिद्ध किए गए देवताओं का — उनके मंत्र की प्रक्रिया, या नाम का प्रभाव, या जिस भी प्रकार उसने मंत्र या देवता को जागृत किया है — उस स्थान पर प्रयोग करता है कि वहाँ की लक्ष्मी बंधित हो जाए, उन्नति बंधित हो जाए। और वह उस प्रतिष्ठान में स्वयं जाएगा अवश्य।
अगर किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान के ऊपर प्रयोग करने वाले के जो भी सिद्ध किए गए देवता हैं — उनके मंत्र आदि की जो प्रक्रिया है, या नाम का प्रभाव है, या जिस भी प्रकार से अगले व्यक्ति ने मंत्र या देवता को जागृत किया है और उसका प्रयोग कर रहा है — इस उद्देश्य से लगाए जाएँ कि वहाँ की लक्ष्मी बंधित हो जाए, उन्नति बंधित हो जाए, तो, वक्ता कहते हैं, वह उस प्रतिष्ठान में जाएगा अवश्य।
ग्राहक बनकर जाना, या अभिमंत्रित सामग्री भेजना
वह ग्राहक या मित्र बनकर आता है, या अभिमंत्रित सामग्री भिजवाता है — और सारी प्रक्रिया चौखट पर होती है
वक्ता कहते हैं कि चाहे वह ग्राहक बनकर जाए, मित्र बनकर जाए, किसी भी प्रकार से जाए — वह वहाँ जाएगा, क्योंकि उसे अपनी प्रक्रिया पूर्ण करनी है; या अपनी सामग्री अभिमंत्रित करवाकर किसी को भेजेगा। और इसमें, वे कहते हैं, चौखट सदैव अति महत्वपूर्ण होती है।
चाहे वह ग्राहक बनकर जाए, चाहे मित्र बनकर जाए, चाहे किसी और प्रकार से जाए — वहाँ वह जाएगा, वक्ता कहते हैं, क्योंकि उसे अपनी प्रक्रिया पूर्ण करनी है। या किसी को भेजेगा, अपनी सामग्री को अभिमंत्रित करवा करके। और इसमें भी, वे कहते हैं, महत्वपूर्ण यह है कि सदैव इसीलिए कहते हैं कि चौखट अति महत्वपूर्ण है। उसी दहलीज पर, चौखट पर ही सारी प्रक्रिया हो रही होगी। वही सबसे विशिष्ट महत्व वाला स्थान होता है।
प्रतिष्ठान के देवताओं को रुक जाने की शपथ देना
चौखट पर खड़े होकर प्रयोग करने वाला उस प्रतिष्ठान के सहयोगी देवी-देवताओं को स्तंभित होने की शपथ देता है
उस प्रतिष्ठान की चौखट पर खड़े होकर, वहाँ पैर रखकर, और अपने जागृत मंत्रों और देवताओं के माध्यम से जो प्रक्रियाएँ वह चलाता है, उनके द्वारा वह उस स्थान के देवताओं को — और उसके स्वामी का साथ देने वाले, लक्ष्मी और सामर्थ्य देने वाले सभी देवी-देवताओं को — कहीं न कहीं शपथ देगा कि वे स्तंभित हो जाएँ, रुक जाएँ।
उसी प्रतिष्ठान की चौखट पर खड़े होकर, वहाँ पैर रखकर, या जो प्रक्रियाएँ होती हैं उनके द्वारा, प्रयोग करने वाला इन जागृत मंत्रों और देवताओं के माध्यम से काम करता है। इनके द्वारा, वक्ता कहते हैं, उस स्थान के या उस स्थान के स्वामी के जो भी देवी-देवता साथ-सहयोग देने वाले हैं, लक्ष्मी और सामर्थ्य आदि प्रदान करने वाले हैं — उन सभी को स्तंभित हो जाने के लिए, रुक जाने के लिए कहीं न कहीं शपथ दी जाएगी। पहला तो, वे कहते हैं, यही विषय हो जाता है।
ग्राहकों का उच्चाटन
शपथ के बाद उच्चाटन आता है — किसी ग्राहक का मन दुकान में नहीं लगता और वे बिना लिए चले जाते हैं
दूसरा विषय, वक्ता कहते हैं, उच्चाटन का है: वहाँ जो भी ग्राहक आएगा, कोई पुरुष या स्त्री कुछ लेने, उनका मन वहाँ नहीं लगेगा और ग्राहक भागेंगे। उन्हें अच्छा नहीं लगेगा, लगेगा चलो कहीं और चलते हैं, बाहर से ही भाग जाएँगे, भीतर नहीं आएँगे, और भीतर आएँगे तो रुकेंगे नहीं।
जब उन शक्तियों को शपथ दी गई, स्तंभित किया गया, रोका गया, तो वक्ता कहते हैं कि उसके बाद दूसरा विषय होगा उच्चाटन का। वहाँ कोई भी ग्राहक आएगा, कोई भी पुरुष, कोई स्त्री, कुछ लेने के लिए — उनका मन वहाँ नहीं लगेगा, ग्राहक भागेंगे। उन्हें अच्छा नहीं लगेगा। उन्हें लगेगा अरे चलो कहीं और चलते हैं। बाहर से ही भाग जाएँगे, भीतर ही नहीं आएँगे; भीतर आएँगे तो रुकेंगे नहीं, चले जाएँगे।
श्री का जाना और चेहरे की आकर्षक कांति का हटना
जिस स्थान से श्री हटती हैं, वहाँ के लोग भी श्री-कांति विहीन हो जाते हैं और आकर्षण चेहरे से हट जाता है
वक्ता कहते हैं कि जब कोई स्थान श्री विहीन होता है — चाहे तांत्रिक प्रक्रिया से, चाहे किसी अपने दोष से — तो वहाँ उपस्थित लोग भी श्री-कांति विहीन हो जाते हैं। गद्दी पर बैठने वाले स्वामी और वहाँ काम करने वालों के भीतर की आकर्षण क्षमता भी स्तंभित हो जाती है और उनके शरीर और चेहरे के आभा मंडल को छोड़कर हट जाती है।
जब कोई स्थान श्री विहीन होता है, जब श्री छोड़ती हैं — चाहे तांत्रिक प्रक्रिया के कारण, चाहे किसी अपने दोष से — तो, वक्ता कहते हैं, उसमें एक विषय आता है कि जिस स्थान से श्री हटती हैं वहाँ उपस्थित जो लोग हैं, वे भी श्री-कांति विहीन हो जाते हैं। तो जो स्वामी उस गद्दी पर बैठने वाले होंगे, जो वहाँ कार्य करने वाले होंगे — उनके भीतर की आकर्षण क्षमता भी स्तंभित हो जाएगी; वह भी कहीं न कहीं उनके शरीर को, उनके चेहरे के आभा मंडल को छोड़कर हट जाएगी।
चलते प्रतिष्ठान के आकर्षक विक्रेता और सम्मोहन
खूब चलने वाली दुकान में देखने में अच्छे, बातचीत में चतुर विक्रेता होते हैं और एक सम्मोहन ग्राहक को रोके रखता है
वक्ता कहते हैं कि बहुत चलने वाली दुकान में दो चीजें देखने को मिलती हैं। पहली — वहाँ के सेल्समैन या सेल्स लड़कियाँ देखने में बहुत अच्छे, बात करने वाले, वाक् चातुर्य से युक्त और आकर्षक व्यक्तित्व वाले होते हैं; आप स्वतः सम्मोहित होकर उनकी बात मान लेते हैं, और कई बार जो सामान लेने की इच्छा भी नहीं थी वह भी वे कन्विंस कर देते हैं, क्योंकि उनके पास अपनी टेक्निक है।
इस चीज को देखिए और रिलेट कीजिए, वक्ता कहते हैं। जो दुकान बहुत अधिक चलने वाली होगी, वहाँ आपको दो चीजें देखने को मिलेंगी। पहली — वहाँ के जो विक्रय करने वाले सेल्समैन या सेल्स लड़कियाँ होती हैं, वे बहुत देखने में अच्छे, बात करने वाले, वाक् चातुर्य से युक्त, और कहा जाए तो आकर्षक व्यक्तित्व वाले होंगे। आप स्वतः ही सम्मोहित होकर उनकी बातों को मान लेंगे। कई बार ऐसा होगा कि जो सामान लेने की इच्छा नहीं भी है, वह कन्विंस कर देंगे — उनके पास अपनी टेक्निक है — और आप ले लेंगे। यह, वे कहते हैं, पहला फेज हुआ।
पुण्य बल, अनुष्ठान का प्रभाव, या किसी देवता की उपस्थिति
जहाँ दुकानदार रूखा व्यवहार करता है, वहाँ भी ग्राहक सामान क्यों ले लेते हैं?
वक्ता कहते हैं कि कई जगह दुकानदार को कोई मतलब नहीं होता, बहुत रूड बिहेव करते हैं, फिर भी आप सामान ले लेते हैं और पता नहीं चलता क्यों — और दुकान भरी पड़ी है, सेल चल रही है। यह, वे कहते हैं, कहीं न कहीं पुण्य बल है, या अनुष्ठान का प्रभाव, या उस देवता और शक्ति की उपस्थिति जो बांधकर रख रही है: उनकी ऊर्जा वहाँ उपस्थित ग्राहकों की ऊर्जाओं पर प्रबल पड़ रही है, और दबने के कारण ग्राहक उसकी बात मान ले रहे हैं।
दूसरा, वक्ता कहते हैं, कई जगह आप देखेंगे कि उन्हें आपसे मतलब नहीं है, बहुत रूड बिहेव करेंगे, लेकिन फिर भी आप सामान ले लेंगे। वे कुछ ऐसा बोलेंगे कि आपको पता नहीं चलेगा क्यों लेना पड़ रहा है, पर लेंगे — कि यहाँ लेना था, जरूरत थी, ले लिया। और सेल उसी तरह चल रही है, दुकान पूरी भरी पड़ी है। मालिक भी ठीक से बात नहीं कर रहा, उसे कोई खास मतलब नहीं, थोड़ा-बहुत सम्मान दे रहा है, बहुत रूडली बिहेव कर रहा है, फिर भी ग्राहक भरे पड़े हैं। हालाँकि, वे मानते हैं, वह टेंपरेरी है: जब इतना करेंगे तो वह अहंकार उसे लेकर डूबेगा ही। लेकिन है। तो कहीं न कहीं, वे कहते हैं, उसे पुण्य बल बोलिए, अनुष्ठान का प्रभाव बोलिए, या उस देवता की, उस शक्ति की उपस्थिति बोलिए जो बांधकर रख रही है — उनकी ऊर्जा वहाँ उपस्थित ग्राहकों की ऊर्जाओं के ऊपर प्रबल पड़ रही है, और दबने के कारण वे उसकी बातों को मान ले रहे हैं।
नकारात्मक को भी शांत कर देने वाली सौम्य, आकर्षक, शुभ्र ऊर्जा
दूसरी ओर सौम्य, आकर्षक, शुभ्र ऊर्जा नकारात्मक व्यक्तियों को भी शांत करके अपनी ओर खींच लेती है
दूसरी ओर, वक्ता कहते हैं, सौम्य ऊर्जा है, आकर्षक ऊर्जा है, शुभ्र ऊर्जा है, बहुत अधिक सकारात्मक ऊर्जा है। वह नकारात्मक व्यक्तियों पर भी प्रभाव डालती है, उन्हें शांत कर देती है, अपनी ओर सम्मोहित और आकर्षित कर लेती है, और फिर अपना कार्य सिद्ध कर देती है।
दूसरी ओर, वक्ता कहते हैं, सौम्य ऊर्जा है, आकर्षक ऊर्जा है, शुभ्र ऊर्जा है, बहुत अधिक सकारात्मक ऊर्जा है। वह नकारात्मक व्यक्तियों के ऊपर भी प्रभाव डाल रही है, उन्हें भी शांत कर दे रही है, उन्हें अपनी ओर बहुत सम्मोहित कर ले रही है, आकर्षित कर ले रही है, और फिर अपने कार्य को सिद्ध कर दे रही है।
लोक संभाषणी या समूह वशीकरण की ऊर्जा
लोक संभाषणी या समूह वशीकरण की ऊर्जा — बंधन प्रयोग असल में इसी को बांधता है
इसे लोक संभाषणी ऊर्जा कहिए, समूह वशीकरण की ऊर्जा कहिए, या समूह आकर्षणीय ऊर्जा — वक्ता कहते हैं कि भगवती का यह तत्व वहाँ इस प्रकार प्रकाशित होकर, मंत्र बल और तंत्र बल से युक्त होकर, कार्य सिद्ध करवा रहा है। जब बंधन की प्रक्रिया होगी और कोई मंत्र बल का प्रयोग करेगा, तो वह इन्हीं चीजों को बांधेगा।
इसे लोक संभाषणी ऊर्जा कहिए, वक्ता कहते हैं, या समूह वशीकरण की ऊर्जा बोलिए, या समूह आकर्षणीय ऊर्जा बोलिए: भगवती का यह तत्व वहाँ इस प्रकार प्रकाशित होकर कार्य को सिद्ध करवा रहा है — मंत्र बल, तंत्र बल आदि से युक्त होकर। तो जब बंधन की प्रक्रिया होगी, जब कोई मंत्र बल का प्रयोग करेगा, तो वह इन्हीं चीजों को बांधेगा।
उच्चाटन का मिश्रण पहले स्थापित देव शक्ति को हटाता है
ऐसे प्रयोगों में श्मशान की भस्म क्यों छिड़की जाती है?
वक्ता कहते हैं कि लोग कहते हैं श्मशान की भस्म छिड़क दी — वह भस्म ऐसे ही नहीं है। उच्चाटन की प्रक्रिया में जिन-जिन चीजों को मिलाकर करना है, जब प्रयोग करने वाला उन्हें मिलाकर करेगा, तो जो देव शक्ति समूह वहाँ समूह वशीकरण के निमित्त स्थापित है — चाहे कोई भी हो — उसे वह सबसे पहले उच्चाटित करेगा।
प्रयोग करने वाला वहाँ जाकर ऐसे ही कुछ नहीं कर देता कि शरीर के सभी तेज का हरण हो जाए, वक्ता कहते हैं। जो कहते हैं न कि श्मशान की भस्म छिड़क दी — वह भस्म ऐसे ही नहीं है। उच्चाटन की जो प्रक्रिया है, उसमें जिन-जिन चीजों को मिलाकर करना है, जब वह उन्हें मिलाकर करेगा तो जो देव शक्ति समूह वहाँ समूह वशीकरण के निमित्त स्थापित किया गया, रखा गया, उपस्थित है — चाहे वह कोई भी हो — उसे वह सबसे पहले उच्चाटित करेगा। तो वह तत्व, वह देव समूह, वह ऊर्जा सबसे पहले वहाँ से उच्चाटित होगी, हटेगी।
स्वामी के अधिकार की सीमा, और उसकी जगह क्या स्थापित होता है
जहाँ तक स्वामी का अधिकार था वहाँ तक की शक्ति हट जाती है, और उसकी जगह दूसरी ऊर्जा स्थापित कर दी जाती है
वक्ता कहते हैं कि उस पूरे स्थान पर जहाँ तक बैठे स्वामी का अधिकार था, वहाँ तक उस शक्ति और ऊर्जा का प्रभाव भी था। अब वहाँ तक वह ऊर्जा उपस्थित नहीं है, और उसकी जगह उसके विपरीत स्थापित कर दिया गया है — उच्चाटनी ऊर्जा, श्मशानी ऊर्जा, ऐसी ऊर्जा कि जो भी आए वह स्वयं भाग जाए, उसकी बुद्धि-विवेक डिस्टर्ब हो, वह चिड़चिड़ा हो जाए और झगड़ा होने लगे।
उस पूरे स्थान पर, जितनी दूर तक वह स्वामी, वह व्यक्ति बैठा था, जहाँ तक उसका अधिकार था, वहाँ तक उस शक्ति की, उस ऊर्जा का भी प्रभाव था, वक्ता कहते हैं। अब वहाँ तक वह ऊर्जा उपस्थित नहीं है, और वहाँ उसके विपरीत स्थापित कर दिया गया — उच्चाटनी ऊर्जा बोलिए, श्मशानी ऊर्जा बोलिए, या वह ऊर्जा जो इसलिए स्थापित की गई है कि यहाँ जो भी आए वह स्वयं भाग जाए, उसकी बुद्धि-विवेक बहुत अधिक डिस्टर्ब हो, वह चिड़चिड़ा बन जाए, झगड़ा होने लगे। इस प्रकार की प्रक्रिया होने लगी। तो बंधन यहाँ कहाँ हुआ, वे पूछते हैं। यहाँ बंधन से ज्यादा तो उच्चाटन का प्रयोग किया गया।
संकल्प और सौगंध से भेजी गई प्रयोगकर्ता की अपनी सिद्ध ऊर्जा
जिसे बंधन कहते हैं वह असल में उच्चाटनी प्रक्रिया है — अपनी सिद्ध ऊर्जा को संकल्पित करके सौगंध देकर भेजना
वक्ता कहते हैं कि हम बोले तो बंधन, लेकिन वहाँ विशेषतः उच्चाटनी प्रक्रिया की गई। बंधन की जगह होता यह है कि किसी शक्ति को सिद्ध करने के बाद उसके प्रयोग से — जिस पर प्रभाव डालना है या जिसे बांधना है — अपनी सिद्ध की हुई ऊर्जा को संकल्पित करके, सौगंध देकर, पूरे विधि विधान से सामने वाले के स्थान से उन चीजों को हटाया जाता है।
विषय इस प्रकार रहा, वक्ता कहते हैं: हम लोग बोले तो अवश्य कि बंधन, लेकिन यहाँ विशेष रूप से उच्चाटनी प्रक्रिया की गई। बंधित यहाँ कौन हुआ? बंधन की जगह यहाँ होता यह है कि किसी शक्ति को सिद्ध करने के पश्चात उसके प्रयोग के द्वारा — जिसके ऊपर प्रभाव डालना है, या जिसका बंधन करना है — अपनी सिद्ध की हुई ऊर्जा को संकल्पित करके, सौगंध देकर, पूरे विधि विधान से सामने वाले के स्थान से उन चीजों को हटाया जाता है। तो इस प्रकार से, वे कहते हैं, यह पूरी प्रक्रिया हुई।
परिवार में कलह, क्लेश और विद्वेषण के लिए क्षुद्र प्रक्रियाएँ
द्वेषी अपना ही व्यक्ति खुशहाल घर में कलह, क्लेश और विद्वेषण के लिए क्षुद्र प्रक्रियाएँ करता है
वक्ता कहते हैं कि सेम इसी प्रकार, जब किसी के घर में बहुत सुख, संपदा, ऐश्वर्य, वैभव है और सब मिलजुल कर रहते हैं, और कोई द्वेषी व्यक्ति — अक्सर अपना ही कोई — ऐसे परिवार से द्वेष कर बैठता है, तो परिवार में कलह-क्लेश हो जाए, विद्वेषण हो जाए, इसके लिए वह अनेक प्रकार की क्षुद्र प्रक्रियाएँ करता है।
सेम इसी प्रकार से, वक्ता कहते हैं: जब किसी के घर में बहुत अधिक सुख है, संपदा है, ऐश्वर्य है, वैभव है, घर में सब बहुत अच्छे से मिलजुल कर रहते हैं, और कोई द्वेषी व्यक्ति ऐसे परिवार से द्वेष कर बैठता है — अपना ही कोई द्वेष कर बैठता है — तो परिवार में आपस में कलह-क्लेश हो जाए, विद्वेषण हो जाए, उसके लिए वह अनेक प्रकार की क्षुद्र प्रक्रियाएँ करता है।
देव कृपा और पितृ कृपा पर जीना, सुरक्षा का प्रबंध न होना
सबसे बड़ी नकारात्मक चीज — देव कृपा और पितरों की कृपा से रहना पर सुरक्षा का कोई प्रबंध न करना
वक्ता कहते हैं कि सबसे बड़ी नकारात्मक चीज यह है कि आप देव कृपा और पितरों की कृपा से बहुत अच्छे से रह रहे थे, लेकिन सुरक्षा का प्रबंध नहीं कर रखा था। जब तक लोगों पर इस प्रकार की दुविधा और दुख नहीं आते, वे इसको लेकर सचेत नहीं होते।
जब प्रक्रिया होगी, वक्ता कहते हैं, तो आप हँसी-खुशी देव कृपा और पितरों की कृपा से बहुत अच्छे से रह रहे थे — लेकिन सुरक्षा का प्रबंध नहीं कर रखे थे। यही, वे कहते हैं, सबसे बड़ी नकारात्मक चीज है। जब तक लोगों पर इस प्रकार की दुविधा, दुख नहीं आते, तब तक वे इसको लेकर सचेत नहीं होते। यह भी, वे कहते हैं, एक विषय है।
वशिष्ठ, विश्वामित्र का प्रयोग, और उग्रतारा, एकजटा, कामाख्या
ऋषि वशिष्ठ तंत्र के क्षेत्र में क्यों उतरे?
वक्ता इसे अपना स्थायी पौराणिक उदाहरण बताते हैं: ऋषि वशिष्ठ, जो पहले केवल वैदिक मार्ग में थे, भगवती उग्रतारा, तारा, एकजटा और भगवती कामरूप कामाख्या की साधना के लिए तंत्र के क्षेत्र में उतरे। तंत्र की प्रक्रिया में उतरने का सबसे बड़ा कारण था ऋषि विश्वामित्र के द्वारा किए गए तांत्रिक प्रयोग और उनसे हुई हानि; उसके बाद प्रतिकार के निमित्त वे इस क्षेत्र में आए।
इसका बहुत अच्छा पौराणिक उदाहरण है, वक्ता कहते हैं, जो वे पहले भी देते रहे हैं। ऋषि वशिष्ठ तंत्र के क्षेत्र में क्यों उतरे? भगवती उग्रतारा, तारा, एकजटा और भगवती कामरूप कामाख्या की साधना के लिए — और कब? पहले वे वैदिक मार्ग में ही थे। तंत्र की प्रक्रिया में उतरने के पीछे सबसे बड़ा कारण रहा ऋषि विश्वामित्र के द्वारा किए गए तांत्रिक प्रयोग आदि और उनसे उनकी जो हानि हुई। उसके पश्चात प्रतिकार के निमित्त वे विशेष करके इस क्षेत्र में उतरे। यह भी, वे कहते हैं, एक कथा है — चलिए लीला मात्र ही सही। लेकिन यह उदाहरण हमारे लिए है: हमें सदैव सचेत रहना है, शक्तियों को सदैव जागृत रखना है।
नशे से बर्बाद होते सभ्य बच्चे
सभ्य परिवार पर आभिचारिक प्रयोग — सभ्य बच्चे बिना नशे के रह नहीं पाते
वक्ता कहते हैं कि पहले कोई ध्यान नहीं देता; जब कलह-क्लेश और फूट पड़ जाती है, बर्बादी हो जाती है, तब देखते हैं कि यहाँ क्या हुआ। वे ऐसे परिवारों की ओर इशारा करते हैं जहाँ बहुत सभ्य बच्चे थे, कभी कोई नशा-पानी नहीं, और परिवार पर ऐसा प्रयोग हो जाता है कि बच्चे बिना नशा किए रह नहीं सकते और परिवार बर्बाद, पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है। यह, वे कहते हैं, आभिचारिक प्रयोग है।
पहले तो, वक्ता कहते हैं, कोई इस पर ध्यान ही नहीं देता। जब परिवार में कलह-क्लेश, आपसी फूट पड़ जाएगी, बर्बादी हो जाएगी, जब पूरी तरह सब कुछ खत्म हो गया, तब जाकर देखते हैं कि हाँ, यहाँ क्या हुआ — कुछ ऊपर से करवाया गया है, कोई दिक्कत हो गई है। आप ऐसे-ऐसे परिवार देखिएगा, वे कहते हैं, जहाँ बहुत सभ्य बच्चे रहा करते थे, कभी कोई नशा-पत्ती नहीं, कोई नशा-पानी नहीं। लेकिन परिवार पर ऐसा प्रयोग हो जाता है कि बच्चे बिना नशा किए रह नहीं सकते, और वह परिवार बर्बाद भी हो जाता है। पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है। यह, वे कहते हैं, आभिचारिक प्रयोग है।
मानसिक उच्चाटन, विद्वेषण, श्मशानी शक्तियाँ और असंतुष्ट देव शक्ति
मानसिक उच्चाटन, विद्वेषण और श्मशानी या असंतुष्ट देव शक्तियाँ क्षुद्र शक्ति के साथ मिला दी जाती हैं
मानसिक उच्चाटन, मन का उच्चाटन, दो बहुत प्रेम करने वालों के बीच विद्वेषण — और इन प्रक्रियाओं के साथ-साथ बाह्य शक्तियाँ: कोई श्मशानी शक्ति, आपके घर की कोई शत्रु शक्ति, या घर में उपस्थित कोई असंतुष्ट देव शक्ति। इन्हें प्रयोगकर्ता की सिद्ध की हुई क्षुद्र शक्ति के साथ मिलाकर आपकी ही चीज आपके विपरीत प्रयोग कर दी जाती है।
मानसिक उच्चाटन, वक्ता कहते हैं — मन का उच्चाटन; दो लोगों के बीच विद्वेषण, जो आपस में बहुत प्रेम करने वाले हैं। और इन सभी प्रक्रियाओं के साथ-साथ बाह्य शक्तियाँ होती हैं। कहीं कोई श्मशानी शक्ति हो, और आपके घर की कोई शत्रु शक्ति अगर कहीं हो, और कोई असंतुष्ट देव शक्ति आपके घर में उपस्थित हो, तो उनको मिलाकर — श्मशानी ऊर्जाओं के साथ, जिस क्षुद्र शक्ति को सिद्ध किया है उसके साथ — आपकी ही चीज आपके ही विपरीत प्रयोग कर दी जाएगी।
देर से मानना, और हल्के प्रयोगों का असफल होना
जब तक लोग मानते हैं कि ऐसा हो सकता है, तबाही इतनी हो चुकी होती है कि छोटे-मोटे प्रयोग काम नहीं करते
वक्ता कहते हैं कि जब तक आप इस पूरे विधान को, तंत्र को समझेंगे और मानेंगे कि हाँ ऐसा हो सकता है, और प्रतिकार का सोचेंगे, तब तक वह इस स्तर तक तबाही दे चुकी होगी कि आप फिर उठ नहीं पाएँगे। हानि बहुत ऊँचे स्तर पर पहुँच जाए तो छोटे-मोटे या हल्के-फुल्के प्रयोगों से नहीं होता, और व्यक्ति और नकारात्मक होता जाता है — कि ऐसी चीजें होती नहीं, और होती हैं तो हम कर रहे हैं तो क्यों नहीं हो रहा।
जब तक आप इस पूरे विधान को, तंत्र को समझेंगे — या कहें मानेंगे; जब आप मानेंगे, समझेंगे कि हाँ भाई ऐसा हो सकता है, ऐसा हुआ है, और उसका प्रतिकार करने का सोचेंगे — तब तक, वक्ता कहते हैं, वह इस स्तर तक आपको तबाही दे चुकी होगी कि आप फिर उठने में सक्षम नहीं हो पाएँगे। और जब यह हानि बहुत ऊँचे स्तर तक पहुँच जाती है, उसके बाद जब कोई चाहता है कि हम भी प्रयोग करके इसे नष्ट कर दें, तो छोटे-मोटे या हल्के-फुल्के प्रयोगों से होता नहीं है। तो व्यक्ति और नकारात्मक होता जाता है: कि इस प्रकार की चीजें होती ही नहीं, और अगर होती हैं तो हम कर रहे हैं तो क्यों नहीं हो रहा। तो दोनों चीजें हैं, वे कहते हैं।
विवाह के समय कोख का बंधन
कोख बंधन सबसे अधिक कब किया जाता है?
घर पर लगाए गए तांत्रिक बंधन के बाद आता है कोख बंधन, जो वंश वृद्धि के निमित्त कोख को ही स्तंभित कर देना है। इसमें सबसे अधिक जो प्रयोग होता है, वक्ता कहते हैं, वह लोग विवाह के समय ही कर देते हैं। कुँवारी लड़कियों पर भी करते हैं, विवाह के समय भी करते हैं; इसीलिए कहा जाता है कि दूल्हा-दुल्हन को बहुत सचेत रहना चाहिए।
गृह पर लगाए गए तांत्रिक बंधन के पश्चात, वक्ता कहते हैं, आता है वंश वृद्धि के निमित्त जिसे कोख बंधन कहा जाता है: कोख को ही स्तंभित कर देना। इसमें सबसे अधिक जो प्रयोग होता है, वह लोग विवाह के समय ही कर देते हैं। कुँवारी लड़कियों पर भी करते हैं, विवाह के समय भी करते हैं। विवाह के समय में इसीलिए, वे कहते हैं, कहा जाता है कि दूल्हा-दुल्हन को बहुत सचेत रहना चाहिए।
यह भ्रांति कि केवल स्त्री की कोख बांधी जाती है
क्या केवल स्त्री का ही बंधन किया जाता है?
वक्ता इसे भ्रांति कहते हैं कि केवल स्त्री का ही बंधन किया जाता है, उसकी ही कोख बंधित होती है। ऐसा नहीं है — कई बार पुरुष का बंधन कर दिया जाता है। तब पुरुष सक्षम होते हुए भी, जब तक उसके भीतर देव कृपा नहीं होगी, संतान उत्पत्ति नहीं हो सकती।
एक भ्रांति है, वक्ता कहते हैं, कि केवल स्त्री का ही बंधन किया जाता है, उसकी ही कोख बंधित होती है। ऐसा नहीं है। कई बार होता है कि पुरुष का बंधन कर दिया जाए। तब पुरुष सक्षम होते हुए भी, जब तक उसके भीतर देव कृपा नहीं होगी, संतान उत्पत्ति हो नहीं सकती। दोनों का सही होना बहुत आवश्यक है, वे कहते हैं। किसी एक में भी कमी आएगी, कोई गड़बड़ी हो जाएगी, तो दिक्कत हो जाएगी।
साध्य रोग — घर बना चुका तांत्रिक रोग
अगर तांत्रिक प्रयोग से देह में रोग उत्पन्न हो जाए तो क्या होता है?
वक्ता कहते हैं कि जब किसी पर तांत्रिक बंधन या प्रयोग हो और वह भौतिक रूप से देह के भीतर रोग उत्पन्न कर दे, तब उसे नष्ट कर पाना बहुत मुश्किल विषय होता है। अगर आरंभिक चरण में है और कोई दैहिक रोग नहीं हुआ है, तो काट करके निवृत्त हो गए, देव कृपा से रोग भी नष्ट हो जाएगा। लेकिन दो-चार-पाँच-दस साल हो गए और रोग अपना घर बना चुका है, तो वह तांत्रिक रोग जल्दी नष्ट नहीं होगा, क्योंकि वह साध्य रोग हो जाएगा।
जब किसी के ऊपर तांत्रिक बंधन या प्रयोग होते हैं, वक्ता कहते हैं, अगर वह भौतिक रूप से देह के भीतर कोई रोग उत्पन्न कर दे, तब उसे नष्ट कर पाना बहुत मुश्किल वाला विषय होता है। अगर वह आरंभिक चरण में है, कोई दैहिक रोग नहीं हुआ है, तब तक आप उसका काट कर लिए, उससे निवृत्त हो गए; देव कृपा से सुरक्षित हो गए तो वह रोग भी नष्ट हो जाएगा। लेकिन दो-चार-पाँच-दस साल हो चुके हैं, रोग अपना घर बना चुका है, तो वह तांत्रिक रोग फिर जल्दी नष्ट नहीं हो पाएगा। और इसलिए नहीं हो पाएगा, वे कहते हैं, क्योंकि वह साध्य रोग हो जाएगा। उसमें यह विषय भी है।
मिसकैरेज, गर्भ न ठहरना, और द्वेष के कारण
गर्भ न ठहरना या मिसकैरेज जो दवा से ठीक न हो, और द्वेष अच्छाई देखकर ही क्यों उगता है
वक्ता कहते हैं कि स्त्री या तो गर्भ धारण ही नहीं कर पाएगी, या करेगी तो मिसकैरेज हो जाएगा; और कितनी भी दवा करा लीजिए, ठीक नहीं होगा। द्वेष किससे होता है — कुछ अच्छाई होगी तो ही द्वेष होगा: आप किसी भी कारण से ऊँचे बढ़ रहे हैं, आगे हैं, धन-धान्य संपन्न हैं। और जिसका कोई पुत्र-पुत्री नहीं, जो निसंतान है, वह भी द्वेष करके कुछ करा देता है।
ऐसी जगहों पर दिक्कतें हो जाती हैं, वक्ता कहते हैं: जो स्त्री हैं वे संतान या तो गर्भ में धारण ही नहीं कर पाएँगी, या धारण करेंगी भी तो मिसकैरेज हो जाएगा। उसके निमित्त कितनी भी दवा करा लीजिए, ठीक नहीं हो पाएगा। इस विषय को सभी जानते हैं, वे कहते हैं; ऐसा अधिकतर हो जाता है। इस प्रक्रिया में, लड़की का चरित्र बहुत अच्छा है — पर द्वेष किससे होता है? कुछ अच्छाई होगी तो ही द्वेष होगा। चाहे किसी भी कारण से आप ऊँचे बढ़ रहे हैं, आगे हैं, धन-धान्य संपन्न हैं — किसी भी कारण से लोगों को द्वेष उगता है। और किसी का कोई पुत्र-पुत्री ही नहीं है, निसंतान है, तो वह भी द्वेष करके कुछ करा देता है। ऐसे अनेक विषय हैं, वे कहते हैं।
खिलाकर, स्पर्श से, या बैठाकर बंधन
कुँवारी कन्या का बंधन उसे पता चले बिना कैसे हो सकता है?
वक्ता कहते हैं कि द्वेष के कारण अगर किसी कुँवारी कन्या का भी बंधन करा दिया गया तो उसे पता नहीं चलेगा। खिलाकर भी हो सकता है, स्पर्श के माध्यम से हो सकता है, बैठाकर हो सकता है — अनेक विधान हैं।
तो द्वेष के कारण, वक्ता कहते हैं, अगर किसी कुँवारी कन्या का भी बंधन करा दिया गया, तो उसे पता नहीं चला होगा। खिला-पिलाकर भी हो सकता है, स्पर्श के माध्यम से हो सकता है, बैठाकर भी हो सकता है। अनेक विधान हैं।
मासिक धर्म के समय के प्रतिबंधों के पीछे का कारण
रजस्वला कन्या को एकांत में रहने को क्यों कहा जाता है?
वक्ता पूछते हैं कि रजस्वला कन्या को क्यों कहा जाता है कि एकांत में रहे, किसी से मिले नहीं, स्पर्श आदि से बचे — यहाँ तक कि चरण स्पर्श तक की मनाही होती है। इसके पीछे कारण है, वे कहते हैं: द्वेष करने वाले को पता चल ही जाता है कि इस समय मासिक धर्म में है, इतना तो सबको सेंस है, और ऐसे समय में इस प्रकार की प्रक्रियाएँ करवाकर उसके शरीर से स्पर्श मात्र करा दिया जाता है।
रजस्वला कन्या को क्यों कहा जाता है कि एकांत में रहे, किसी से मिले नहीं, स्पर्श आदि से बचे — चरण स्पर्श तक की मनाही होती है? इसके पीछे कारण है, वक्ता कहते हैं। मान लीजिए कोई बहुत अच्छी कन्या है, पढ़ने-लिखने में बहुत अच्छी है, लग रहा है कि भविष्य बहुत अच्छा होगा, और कोई द्वेष करने वाला व्यक्ति है। उसे पता तो चल ही जाता है कि हाँ, इस समय मासिक धर्म में है; इतना तो सबको सेंस है। ऐसे समय में इस प्रकार की प्रक्रियाओं को करवाकर उसके शरीर से स्पर्श मात्र करा दिया जाएगा, या वह जहाँ बैठ रही है वहाँ उस चीज को लगा दिया जाएगा, ताकि शरीर से स्पर्श मात्र हो जाए।
विवाह के बाद गर्भ न ठहरना, और विवाह मंडप में बंधन
ऐसे बांधी गई कन्या को विवाह के बाद गर्भ नहीं ठहरता, और विवाह मंडप में भी यही बंधन फिर लगाया जाता है
वक्ता कहते हैं कि आगे चलकर उसे ऐसी दिक्कत हो जाएगी कि विवाह के पश्चात गर्भ ठहरेगा ही नहीं। और उसके बाद विवाह के समय, विवाह मंडप में, शुरू से अंत तक की पूरी विवाह प्रक्रिया के दौरान भी इस अशुद्ध तंत्र में ऐसे कई विधान हैं जिनमें कन्या के गर्भ का स्तंभन, बंधन कर दिया जाता है।
आगे चलकर, वक्ता कहते हैं, उसे ऐसी दिक्कत हो जाएगी कि विवाह के पश्चात गर्भ ठहरेगा ही नहीं। ये सब, वे कहते हैं, प्रक्रियाएँ हैं। इसके पश्चात आता है विवाह का समय: विवाह मंडप में, विवाह की जो पूरी प्रक्रिया शुरू से अंत तक होती है, उस दौरान भी ऐसे कई विधान ये लोग इस अशुद्ध तंत्र में करते हैं, जिनमें कन्या के गर्भ का स्तंभन कर दिया जाता है, बंधन कर दिया जाता है। यह भी, वे कहते हैं, बंधन का एक विषय है।
मस्तिष्क, विवेक और बुद्धि का स्तंभन
बुद्धि का बंधन क्या होता है?
वक्ता कहते हैं कि मस्तिष्क, विवेक और बुद्धि को बांधने और स्तंभित करने की एक विद्या होती है, जिससे व्यक्ति विक्षिप्त हो जाता है। वह भी, वे कहते हैं, अपने आप में एक उच्च स्तर का उच्चाटनी प्रयोग ही है: व्यक्ति की बुद्धि इतनी डिस्टर्ब हो जाती है कि वह जरा भी एकाग्र नहीं हो पाता, स्थिर ही नहीं हो पाता — तो विचार क्या करेगा?
मस्तिष्क, विवेक, बुद्धि का जो बंधन है, वक्ता कहते हैं — स्तंभन करने की एक विद्या होती है, जिसमें व्यक्ति विक्षिप्त हो जाता है। वह भी अपने आप में एक उच्चाटनी प्रयोग ही है, उच्च स्तर का। जिसमें व्यक्ति की बुद्धि इतनी डिस्टर्ब हो जाती है कि वह जरा भी एकाग्र नहीं हो पाता, स्थिर ही नहीं हो पाता — तो वह विचार क्या करेगा?
सेंटर में न रहने वाली पुतलियाँ, और उच्चाटित रहती निद्रा
इस प्रकार के बंधन वाले व्यक्ति की आँखों में क्या लक्षण दिखता है?
वक्ता कहते हैं कि अस्थिरता इतनी बढ़ जाती है कि ऐसे व्यक्ति की आँखों की काली पुतलियाँ कभी सेंटर में नहीं होंगी। सामान्य व्यक्ति की पुतली बिल्कुल सेंटर में होती है, आँख से आँख मिलाइए तो लगता है एक-दूसरे के नेत्र में देख रहे हैं। लेकिन जो ऐसी उच्चाटनी प्रक्रिया से मानसिक रूप से विक्षिप्त होने लगता है, उसकी पुतलियाँ सेंटर में नहीं रहेंगी — भेंगा जैसा लगेगा, टेढ़ी हो जाएँगी, बिना चोट लगे।
धीरे-धीरे अस्थिरता इतनी बढ़ जाती है, वक्ता कहते हैं, कि ऐसे व्यक्ति को देखिएगा तो उसकी आँखों की काली-काली पुतलियाँ कभी भी बीच में, सेंटर में नहीं होंगी। सामान्य व्यक्ति की पुतली देखिए: बिल्कुल सेंटर में है, आँख से आँख मिलाइएगा तो एकदम लगेगा कि एक-दूसरे के नेत्र में देख रहे हैं। लेकिन जो व्यक्ति इस प्रकार की उच्चाटनी प्रक्रिया से मानसिक रूप से विक्षिप्त होने लगेगा, उसकी पुतलियाँ सेंटर में नहीं रहेंगी; भेंगा जैसा लगेगा, टेढ़ी हो जाएँगी, बिना चोट लगे। यह पूछे जाने पर कि सिर पर चोट लगने से ऐसा होता है या तांत्रिक प्रक्रिया से, वे कहते हैं: बिल्कुल सही बात है — उसकी निद्रा भी उच्चाटित रहेगी, निद्रा कभी पूरी नहीं होगी, और आँख की पुतलियाँ टेढ़ी लगेंगी। इसमें मेडिकली बहुत अधिक प्रभाव डालेंगे, वे कहते हैं, तो व्यक्ति बहुत अधिक सोएगा — लेकिन वह चीज कहाँ से ठीक हो सकती है? वह ऐसे ठीक होगी नहीं।
पूरे कुनबे में पुत्र नहीं, संतान नहीं, सारे विवाह रुके
जब कुनबे के किसी भाई को पुत्र न हो और सबका विवाह रुका हो, तो प्रयोग पिता या दादा के समय का है
वक्ता पूरे परिवार पर बंधन का वर्णन करते हैं — चार भाइयों का परिवार है तो किसी को पुत्र ही नहीं हो रहा, केवल पुत्रियाँ हो रही हैं; या कई बार संतान ही नहीं; या पूरे कुनबे में विवाह ही रुक गया है, चार भाई और चारों का विवाह रुका, सारे मांगलिक कार्य रुके। जब चारों-पाँचों का रुक गया हो, वे कहते हैं, तो जान लीजिए कि यह इस पीढ़ी के तंत्र प्रयोग का असर नहीं, बल्कि पिता या दादा के समय का प्रभाव है जो अब किसी कारण बहुत प्रबल हो गया है और चरम पर चल रहा है।
इसके पश्चात अगला विषय, वक्ता कहते हैं, परिवार में इस प्रकार का बंधन हो जाना: अगर चार व्यक्तियों का परिवार है, चार भाई थे, तो किसी को भी पुत्र ही नहीं हो रहा है, केवल पुत्रियाँ हो रही हैं। या कई बार ऐसा हो जाता है कि किसी की संतान ही नहीं हो रही। या किसी के पूरे कुनबे में पूरा विवाह ही रुक गया है: चार भाई हैं, चारों का विवाह रुक गया, पूरे के पूरे मांगलिक कार्य रुक गए। तो यह जान लीजिए, वे कहते हैं: जब चारों-पाँचों का रुक गया है तो इसका मतलब है कि यह इस वंश पीढ़ी के तंत्र प्रयोग का असर नहीं है — इससे पहले जो पिता हों या दादा हों, उनके समय का प्रभाव है, जो अब किसी कारणवश बहुत अधिक प्रभाव देने वाला हो गया है। अब इसका प्रभाव चरम पर चल रहा है।
कुल देवताओं के स्थान पर लगाया गया समग्र बंधन
मूल देवताओं के स्थान पर किया गया बंधन समग्र रूप से हर चीज बांध देता है, और इसे घर के भीतर के लोग करते हैं
अगली प्रक्रिया, वक्ता कहते हैं, आपके मूल देवताओं के स्थान पर ही ऐसा बंधन कर देना कि समग्र रूप से हर चीज का बंधन हो जाए। और यह प्रक्रिया करने वाले लोग, वे कहते हैं, बिल्कुल परिवार के भीतर के ऐसे लोग होते हैं जिनका आपके घर में आना-जाना, उठना-बैठना सब कुछ हो। अति विद्वेषी लोग।
इसके पश्चात अगली प्रक्रिया आती है, वक्ता कहते हैं: आपके मूल देवताओं का जो स्थान है, उसी स्थान पर इस प्रकार का बंधन कर देना कि समग्र रूप से हर चीज का बंधन हो जाए। और यह प्रक्रिया करने वाले लोग, वे कहते हैं, बिल्कुल परिवार के भीतर के ऐसे लोग होते हैं जिनका आपके घर में आना-जाना, उठना-बैठना, सब कुछ हो। अति विद्वेषी लोग।
जीवित शव — मृत्यु नहीं, पर पूर्ण आर्थिक और मानसिक क्षय
क्या बंधन प्रयोग से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है?
नहीं। वक्ता कहते हैं कि यह ध्यान रखिए: बंधन चाहे किसी भी प्रकार का हो, तांत्रिक घात हो चुका हो, बंधन की प्रक्रिया में किसी की मृत्यु नहीं होती — मृत्यु से संबंधित विषय इसमें कभी नहीं होगा। सबसे बड़ा विषय यह होगा कि व्यक्ति मृत्यु के स्तर तक पहुँच जाएगा: आर्थिक हानि इतनी, मानसिक क्षय इतना कि वह स्वयं को जीवित शव के समान मानेगा, और सामर्थ्य, बुद्धि-विवेक होते हुए भी उनका सदुपयोग नहीं कर पाएगा। शरीर में अति आलस्य बना रहना इन चीजों का प्रतीक हो जाता है।
अब किसी भी प्रकार का बंधन हो, तांत्रिक घात हो चुका है — यह ध्यान रखिए, वक्ता कहते हैं: बंधन की प्रक्रिया में किसी की मृत्यु नहीं होती। मृत्यु से संबंधित विषय इसमें कभी नहीं होगा। उसमें सबसे बड़ा विषय होगा कि व्यक्ति मृत्यु के स्तर तक पहुँच जाएगा। उसकी आर्थिक हानि इतनी हो जाएगी, मानसिक क्षय इतना हो जाएगा कि वह स्वतः ही अपने आप को बस जीवित शव के समान मानेगा। सामर्थ्य और बुद्धि-विवेक होने के बाद भी, चाह कर भी, उनका सदुपयोग नहीं कर पाएगा। शरीर में अति आलस्य का बना रहना — यह सब चीजें, वे कहते हैं, इनका प्रतीक हो जाती हैं।
भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी की सेना पर विघ्नासुर का यंत्र
ललिता की सेना पर विघ्नासुर का विघ्नराज गणपति यंत्र — प्रयोग से आए आलस्य का पौराणिक उदाहरण
वक्ता मानते हैं कि ग्रह-नक्षत्रों का भी अपना प्रभाव है, लेकिन तांत्रिक प्रयोग के लिए वे यह उदाहरण देते हैं: विघ्नासुर ने भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी की सेना के ऊपर भगवान विघ्नराज गणपति का यंत्र बनाकर रख दिया, जिससे पूरी सेना में आलस्य उपस्थित हो गया — और ऐसे ही तांत्रिक प्रयोग के कारण भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी को महागणपति का आवाहन करना पड़ा।
हालाँकि इसमें, वक्ता कहते हैं, ग्रह-नक्षत्र आदि का भी अपना प्रभाव है, वह अपना विषय है, लेकिन अगर तांत्रिक प्रयोग हो जाता है तो ये चीजें होती हैं। इसका उदाहरण वे सीधे देते हैं। विघ्नासुर ने भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी की सेना के ऊपर भगवान विघ्नराज गणपति जी का यंत्र निर्माण करके रख दिया, जिसके कारण पूरी सेना में ही आलस्य की उपस्थिति हो गई। ठीक ऐसे ही तांत्रिक प्रयोग के कारण, वे कहते हैं, भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी को महागणपति जी का आवाहन करना पड़ा।
चौखट के पास, ब्रह्म स्थान पर, तुलसी जी के पास
घर में ऐसी चीजें कहाँ रखी जाती हैं?
वक्ता यह नहीं कह रहे कि आज के प्रयोग इतने उच्च कोटि के होंगे, लेकिन इस प्रकार की प्रक्रियाएँ हैं, जो किसी की चौखट के पास, चौखट के भीतर, ब्रह्म स्थान पर, तुलसी जी के पास या ऐसे देव स्थानों पर कर दी जाती हैं। क्योंकि हमारे शरीर के भीतर की दैवीय ऊर्जा के कारण ही हम चलते-बोलते, हँसते-खेलते हैं — और उस ऊर्जा का जितना क्षय होगा, हम उतना ही झुकते जाएँगे, विवेक उतना ही कमजोर होगा, और भीतर से उतने ही नकारात्मक होते जाएँगे।
वक्ता स्पष्ट करते हैं कि वे यह नहीं कह रहे कि आज भी चीज इतने उच्च कोटि की होगी। लेकिन इस प्रकार की प्रक्रियाएँ हैं, जो अगर किसी की चौखट के पास, चौखट के भीतर, ब्रह्म स्थान पर, तुलसी जी के पास या इस प्रकार के देव स्थानों पर कर दी जाएँ, तो — क्योंकि हमारे शरीर के भीतर जो दैवीय ऊर्जा है, जो सकारात्मक ऊर्जा है, उसी के कारण हम चलते-बोलते हैं, हँसते हैं, खेलते हैं — उस ऊर्जा का जितना क्षय होगा, हम उतना ही झुकते जाएँगे, हमारा विवेक उतना ही कमजोर होता जाएगा, हम उतना ही अंदर से नकारात्मक रहने लगेंगे। और पूरा परिवार ही घोर नकारात्मक होने लग जाएगा, वे कहते हैं, अगर सामूहिक प्रयोग हो।
जो जप, कवच प्रसारण और हवन नहीं करते
जो जप-तप, कवच का प्रसारण और हवन नहीं करते, उन पर ये चीजें सबसे आसानी से असर करती हैं
विशेष करके, वक्ता कहते हैं, अगर कोई जप-तप नहीं करता, कवच का प्रसारण नहीं करता, कोई विशेष हवन-पूजन-पाठ नहीं कर रहा, तब ये चीजें उस पर बड़ी आसानी से प्रभाव देने लगती हैं। और यह, वे कहते हैं, आजकल का बिल्कुल सामान्य विषय है।
विशेष करके, वक्ता कहते हैं, अगर कोई जप-तप नहीं करने वाला है, कवच का प्रसारण नहीं करता, कोई विशेष हवन-पूजन-पाठ नहीं कर रहा है, तब ये चीजें बड़ी आसानी से किसी के ऊपर प्रभाव देने लगती हैं। जो कि, वे कहते हैं, आजकल का बिल्कुल सामान्य सा विषय है। तो इस प्रकार से ये सभी प्रयोग हैं; ये सब इस प्रकार के विषय चलते हैं।
भगवान शिव की शरणागति, और कच्चे दूध से अभिषेक
बंधन विमोचन के लिए सबसे पहला काम क्या करना चाहिए?
जब कभी ऐसा विषय हो — कोई बोले या समझ में आए कि बंधन की प्रक्रिया की गई है और आपका या परिवार के किसी सदस्य का उच्चाटन हो रहा है — तो बंधन विमोचन के लिए सबसे पहला काम, वक्ता कहते हैं, भगवान शिव की शरणागति अवश्य लेना है। हर प्रकार के श्राप से विमुक्त करने में जो सर्व समर्थ हैं वे भगवान महादेव सदाशिव हैं। फिर शिव मंदिर में कच्चे दूध से अभिषेक करते हुए, अपने अधिकार के अनुसार पंचाक्षरी का जप करते हुए अभिषेक कीजिए — पहले दिन से ही शरीर का भारीपन हल्का होने लगता है।
जब कभी भी ऐसा विषय उपस्थित हो — कोई आपको बोले या आपको समझ में आए कि हाँ, इस प्रकार की बंधन की प्रक्रिया की गई है और हमारा या परिवार के किसी सदस्य का उच्चाटन हो रहा है — तो बंधन विमोचन के निमित्त सबसे पहला कार्य, वक्ता कहते हैं, यह है कि भगवान शिव की शरणागति अवश्य ले लेनी चाहिए। हर प्रकार के श्राप से विमुक्त करने में जो सर्व समर्थ हैं, वे भगवान महादेव सदाशिव हैं। तो उनकी शरणागति सबसे पहले लेकर, शिव जी के मंदिर में जब आप दूध से, कच्चे दूध से अभिषेक करते हैं, तो अभिषेक के समय पंचाक्षरी का अपने अधिकार के अनुसार जप करते हुए अभिषेक कीजिए। पहले दिन से ही आपके शरीर में जो भारीपन रहता है, या इस प्रकार की जो चीजें होती हैं, वे हल्की होने लगती हैं।
त्रुटियों की क्षमा, और शिव के निर्माल्य से आरंभ होता विमोचन
हर शुरुआत भगवान शिव के अभिषेक से क्यों करनी चाहिए?
जब भी शुरुआत करें — चाहे तंत्र के क्षेत्र में कर रहे हों या कोई विपदा आई हो और कर रहे हों — उसमें भगवान शिव का अभिषेक अवश्य रखिए, वक्ता कहते हैं। क्योंकि आज के समय में संभव नहीं कि आप एकदम नए होकर पूरे विधि विधान से हर चीज कर लेंगे; बहुत सारी त्रुटियाँ होंगी। उन सभी त्रुटियों को भगवान शिव ऐसे भी क्षमा कर देंगे, और विमोचन की जो प्रक्रिया आरंभ होनी है वह भगवान शिव के निर्माल्य से ही होगी।
जब भी शुरुआत करें, वक्ता कहते हैं, चाहे आप तंत्र के क्षेत्र में कर रहे हों या आपके ऊपर कोई विपदा आई हो और आप कर रहे हों, उसमें भगवान शिव का अभिषेक अवश्य रखिए। क्योंकि आज के समय में संभव तो यह है नहीं कि आप एकदम नए-नए में पूरे विधि विधान से हर चीज कर लेंगे; बहुत सारी त्रुटियाँ होंगी। उन सभी त्रुटियों को भगवान शिव ऐसे भी क्षमा कर देंगे, और जो विमोचन की प्रक्रिया आरंभ होनी है वह भगवान शिव के निर्माल्य से ही होगी।
गद्दी पर प्रयोग होने वाली विद्याएँ, अधिकतर श्मशानी
बंधे हुए व्यापारिक प्रतिष्ठान का उपाय क्या है?
व्यापारिक प्रतिष्ठान पर लौटते हुए वक्ता कहते हैं कि पहला विषय है ग्राहकों के आकर्षण का बंद हो जाना — या चौखट पर कोई तांत्रिक प्रक्रिया कर दी गई है, जिससे ग्राहक उच्चाटित होते हैं और नहीं आते। आपकी गद्दी पर भी कुछ किया जा सकता है; ऐसी बहुत सी विद्याएँ हैं, अभी भी हैं, और अधिकतर उनमें श्मशानी होती हैं।
अब वे पुनः व्यापारिक प्रतिष्ठान पर आते हैं, जहाँ से आरंभ किया था: अगर आपके व्यावसायिक प्रतिष्ठान पर इस प्रकार के विषय हुए हैं, तो बंधन विमोचन की प्रक्रिया करनी है तो क्या करना है? सबसे पहला होता है ग्राहकों के आकर्षण का बंद हो जाना। या चौखट के ऊपर किसी प्रकार की तांत्रिक प्रक्रिया कर दी गई है, जिसके कारण ग्राहक उच्चाटित होते हैं, नहीं आते। आपकी गद्दी के ऊपर अगर कुछ कर दिया गया — वैसे बहुत सी विद्याएँ हैं, वे कहते हैं, अभी भी हैं, और अधिकतर उनमें श्मशानी होती हैं।
मुख्य द्वार पर गौ माता को सही भोजन खिलाना
गौ माता को खिलाना सबसे अचूक उपाय क्यों कहा गया है?
ऐसी प्रक्रिया में, वक्ता कहते हैं, सदैव स्मरण रखिए कि इसमें सबसे अचूक होती हैं गौ माता। गौ माता को अपनी चौखट पर खाना खिलाएँ — उनके लिए समय का कोई बंधन नहीं, सुबह, दोपहर, शाम, रात, जब भी। लेकिन संभव हो तो अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर खिलाएँ, और सही भोजन खिलाएँ, अपना जूठन नहीं: मीठी रोटी, खीर या खीर-रोटी जैसी सामग्री, अपने हाथ से, गुड़ मिलाकर।
ऐसी प्रक्रिया में, वक्ता कहते हैं, सदैव स्मरण रखिएगा कि इसमें सबसे अचूक होती हैं गौ माता। अगर गौ माता को आप अपनी चौखट पर खाना खिलाएँ — उनके लिए कभी भी समय का कोई बंधन नहीं है, सुबह, दोपहर, शाम, रात, जब भी। लेकिन अगर संभव हो तो अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान का जो मुख्य द्वार है, वहाँ गौ माता को खिलाएँ, और सही भोजन खिलाना है, अपना जूठन नहीं खिलाना है। मीठी रोटी, खीर या खीर-रोटी — इस प्रकार की सामग्री अपने हाथ से खिलाएँ, गुड़ मिलाकर खिलाएँ।
चौखट पर थाली, और गौ माता का वहीं मूत्र विसर्जन
थाली चौखट पर रखें, और अगर गौ माता स्वतः वहाँ मूत्र विसर्जन कर दें तो 99% कल्याण उसी क्षण हो जाता है
चौखट के ऊपर, या अपने यहाँ उससे संबंधित जो स्थान हो उस पर, थाली रखकर खिलाएँ — वक्ता कहते हैं कि उनकी वहाँ उपस्थिति और खाने मात्र से उस स्थान पर की गई तांत्रिक प्रक्रिया बहुत हद तक नष्ट होने लगती है। और खाना खाने, पानी पीने के बाद अगर गौ माता स्वतः वहाँ मूत्र विसर्जन कर दें, तो जान लीजिए, वे कहते हैं, 99% कल्याण उसी क्षण हो जाता है। न तिथि देखनी, न नक्षत्र, न मुहूर्त — वह सब भी वे कर देती हैं, अगर स्वयं से होने लगे।
चौखट के ऊपर थाली रखकर खिलाएँ, वक्ता कहते हैं, अगर चौखट जैसा है, या उस प्रकार से संबंधित जो आपका स्थान है उस पर रखकर खिलाएँ। उनकी वहाँ उपस्थिति और उसे खाने मात्र से बहुत हद तक उस स्थान पर की गई तांत्रिक प्रक्रिया नष्ट होने लगती है। और खाना खाने और पानी पीने के पश्चात अगर गौ माता स्वतः ही वहाँ मूत्र विसर्जन कर देती हैं, तो जान लीजिए कि 99% कल्याण उसी क्षण हो जाता है। न आपको तिथि देखनी है, न नक्षत्र, न मुहूर्त — वह सब भी वे कर देती हैं, वे कहते हैं, अगर स्वयं से होने लगे।
केवल तब जब पितृ साथ छोड़ देते हैं
तांत्रिक बंधन वास्तव में कब सफल होता है?
वक्ता कहते हैं कि तांत्रिक बंधन आदि सफल तभी होता है जब आपके पितृ साथ नहीं देते। पितृ स्वतः कभी साथ नहीं छोड़ सकते: उनके साथ छोड़ने के लिए आपके द्वारा, या आपके माता-पिता या उनसे बड़े समय के लोगों द्वारा बहुत सारे अपराध किए गए होंगे। पितृ जब साथ छोड़ेंगे तभी आपके ऊपर इन सभी चीजों का प्रभाव आरंभ होगा।
अगर बहुत अधिक विषय है — यह तो, वे कहते हैं, केवल तांत्रिक बंधन का विषय हो रहा है, लेकिन तांत्रिक बंधन आदि सफल भी तभी होता है जब आपके पितृ साथ नहीं देते। पितृ स्वतः कभी भी ऐसे साथ नहीं छोड़ सकते। उनको साथ छोड़ने के लिए आपके द्वारा बहुत सारे अपराध किए गए होंगे। जब तक आपके द्वारा, या आपके माता-पिता या उनसे बड़े समय के लोगों द्वारा अपराध नहीं होगा, तब तक पितृ ऐसे कभी साथ नहीं छोड़ते। पितृ जब साथ छोड़ेंगे, तभी जाकर आपके ऊपर इन सभी चीजों का प्रभाव आरंभ होगा।
पितरों का कल्याण और उनकी उपस्थिति का पुनः बनना
गौ सेवा पितरों के लिए क्या करती है?
वक्ता कहते हैं कि जब आप गौ माता की सेवा-पूजा करेंगे और उस प्रकार का विषय वहाँ उपस्थित होगा, तो उससे इन सभी का कल्याण हो जाएगा और इन सभी की उपस्थिति भी सही प्रकार से बन जाएगी। वे जोड़ते हैं कि यही चीज आप घर पर भी करते हैं, और चौखट इतनी आवश्यक चीज है कि हर लाइव में वे इस विषय को टच करते हैं, ताकि गलती से भी न भूलें।
और गौ माता की जब आप सेवा-पूजा करेंगे, वक्ता कहते हैं, और उस प्रकार का विषय वहाँ उपस्थित होगा, तो उससे इन सभी का कल्याण हो जाएगा, और इन सभी की उपस्थिति भी सही प्रकार से बन जाएगी। इसी चीज को आप घर पर भी करते हैं। चौखट इतनी आवश्यक चीज है, वे कहते हैं, कि हर लाइव में वे इस विषय को इसीलिए टच करते रहते हैं — कि आप गलती से भी न भूलें।
चौखट को स्नान, सुगंध, दीप — फिर अपना जप
घर की चौखट पर नित्य क्या करना चाहिए?
जीवन में और कुछ न कर पाएँ, वक्ता कहते हैं, तो घर की चौखट हो, चौखट की नित्य सेवा-पूजा हो, नित्य स्नान कराइए, सुगंधित रखिए, दीप प्रज्वलित कीजिए — और उसके बाद जो पूजन करते हैं वह कीजिए, चाहे पंचाक्षरी का जप हो, जयंती मंगला का जप, साम्ब शिव का जप, या 32 नामावली का जप। प्रतिदिन का जो नियम उठाएँ, चौखट का पूजन करने के बाद उसे निभाइए। चौखट अगर मजबूत, सुरक्षित, पूजित है तो 50% समस्याएँ वह ऐसे ही सोख लेती है, नष्ट कर देती है; और नहीं करते तो फिर पूरी समस्या आप झेलिए।
जीवन में और कुछ आप कर न पाएँ, वक्ता कहते हैं: घर की चौखट हो, चौखट की नित्य सेवा-पूजा हो, नित्य उनको स्नान कराइए। उनको सुगंधित रखिए, दीप प्रज्वलित करिए, और उसके बाद आप जो पूजन करते हैं वह कीजिए — पंचाक्षरी का जप हो, जयंती मंगला का जप हो, साम्ब शिव का जप हो, 32 नामावली का जप हो। प्रतिदिन का जो नियम उठाएँ, उसे उठाकर रखिए, चौखट का पूजन करने के पश्चात। चौखट अगर मजबूत है, सुरक्षित है, पूजित है, तो 50% समस्याएँ तो ऐसे ही वह सोख लेती है, नष्ट कर देती है। और अगर आप नहीं करते तो फिर पूरी समस्या आप झेलिए। यह भी, वे कहते हैं, एक विषय है।
संकल्प के साथ किया गया महाविद्या पाठ और प्रयोग
कोख बंधन या बुद्धि के बंधन के लिए संकल्प के साथ महाविद्या पाठ और प्रयोग चाहिए
कोख बंधन, बुद्धि का भ्रमित होना, या उस प्रकार का बंधन — उसमें, वक्ता कहते हैं, आपको दैविक ऊर्जाओं का पूरा अच्छे से प्रयोग करना या करवाना होगा: महाविद्याओं से संबंधित पाठ, प्रयोग, महाविद्या का इस प्रकार का काम। जब संकल्प करवाकर ये चीजें करवाएँगे, तो इन चीजों का काट-कटान बहुत जल्दी होगा।
कोख बंधन, या बुद्धि आदि का भ्रमित होना, या उस प्रकार की चीजों का बंधन हो जाना — उसमें, वक्ता कहते हैं, आपको फिर दैविक ऊर्जाओं का पूरा अच्छे प्रकार से प्रयोग करना होगा या करवाना होगा। महाविद्याओं से संबंधित पाठ, प्रयोग, महाविद्या की इस प्रकार की चीजें: जब आप ये करवाएँगे, संकल्प करवाकर, तो इन चीजों का काट-कटान बहुत जल्दी होगा।
साबर मंत्र की विद्याएँ और असंतुलन व पलटने का जोखिम
क्या साबर मंत्रों से ये चीजें काटी जा सकती हैं?
वक्ता कहते हैं कि बहुत सारी साबर मंत्र की विद्याएँ हैं जिनका प्रयोग करके इन चीजों को काटा जा सकता है। लेकिन उसमें एक असंतुलन का विषय आ सकता है: इस प्रकार की चीजों से जब काट-कटान होता है, तो वे पलटकर पुनः आपके ऊपर प्रभाव, दुष्प्रभाव भी डाल सकती हैं।
बहुत सारी साबर मंत्र की विद्याएँ हैं, वक्ता कहते हैं, जिनका प्रयोग करके इन चीजों को काटा जा सकता है। लेकिन उसमें एक असंतुलन का विषय उपस्थित हो सकता है: इस प्रकार की चीजों से जब काट-कटान होता है, तो उनका पलटकर पुनः आपके ऊपर प्रभाव, दुष्प्रभाव भी पड़ सकता है।
हनुमान जी का जंजीरा, और पास कोई कन्या या बालक न हो
काट का कोई भी प्रयोग हो, हनुमान चालीसा ही क्यों न हो, व्यक्ति के पास कोई कन्या या बच्चा खड़ा न हो
वक्ता हनुमान जी के जंजीरे का उदाहरण देते हैं: मान लीजिए किसी की बुद्धि बहुत भ्रमित है, जंजीरा सिद्ध करके आप जल अभिमंत्रित करके प्रयोग कर रहे हैं। तब एक बात ध्यान रखिए — किसी भी प्रकार के बंधन का काट करने के लिए आप संकल्प लेकर प्रयोग करते हैं, चाहे हनुमान चालीसा ही कर रहे हों, तो जिस व्यक्ति पर प्रयोग कर रहे हैं उसके पास कोई कुँवारी कन्या या कोई बालक-बालिका खड़े न हों।
सबसे पहला विषय, वक्ता कहते हैं, कि जब कभी किसी भी बंधन के विमोचन के निमित्त कोई प्रयोग किया जाता है — जैसे हनुमान जी का जंजीरा है। मान लेते हैं किसी की बुद्धि बहुत अधिक भ्रमित है; जंजीरा सिद्ध करके आप जल आदि अभिमंत्रित करके उससे प्रयोग कर रहे हैं। तब एक बात ध्यान रखिएगा। चाहे किसी भी प्रकार के बंधन का काट करने के निमित्त आप संकल्प लेकर प्रयोग करते हैं — चाहे हनुमान चालीसा ही क्यों न कर रहे हों — उस समय इस बात का जरूर ध्यान दीजिए कि जिस व्यक्ति पर आप प्रयोग कर रहे हैं, उसके पास कोई कुँवारी कन्या या कोई भी बालक-बालिका खड़े न हों।
जो कटता है वह पास के संवेदनशील आभामंडल पर चिपकता है — लाग
उतारे के पास कोई संवेदनशील व्यक्ति क्यों नहीं खड़ा होना चाहिए?
वक्ता उदाहरण देते हैं: एक बच्ची को कोई समस्या है, आप उस पर उतारा कर रहे हैं, काट-कटान का मंत्र चला रहे हैं, और बगल में दूसरी बच्ची खड़ी है। कहीं न कहीं उस पर प्रभाव पड़ेगा ही, क्योंकि जब कटेगा, जब वे चीजें बिखरना शुरू होंगी, तो आसपास जिसका भी संवेदनशील आभामंडल मिलेगा उस पर चिपकेंगी। तो ये लोग अकारण प्रभावित हो जाते हैं। इसे भी, वे कहते हैं, लाग लगने से संबंधित विषय समझ लीजिए।
अब मान लीजिए एक बच्ची को कोई समस्या है, वक्ता कहते हैं, उस पर आप उतारा कर रहे हैं, काट-कटान का मंत्र चला रहे हैं, और बगल में एक दूसरी बच्ची खड़ी है। कहीं न कहीं उस पर प्रभाव पड़ेगा ही। जब कटेगा, जब वे चीजें बिखरना शुरू होंगी, तो आसपास जिसका भी संवेदनशील आभामंडल मिलेगा, उसके ऊपर वे चिपकेंगी। तो अकारण ही ये लोग प्रभावित हो जाते हैं। इसे लाग लगने से संबंधित एक विषय समझ लीजिए, वे कहते हैं। यह नहीं होना चाहिए। इस बात का बिल्कुल अच्छे से ध्यान रखिए।
बगल में दूसरी बच्ची बैठाकर कोख पर लात मारना
गाँव में बगल में दूसरी बच्ची बैठाकर कोख पर लात मारने का विधान — बहुत गलत कार्य
कोख से संबंधित किसी भी विषय में, वक्ता कहते हैं, बहुत सारी विद्याएँ हैं, और गाँव में लोग कोख पर लात मारने वाला विधान भी चलाते हैं। बड़ा गलत काम करते हैं: बगल में किसी अच्छी बच्ची को मित्र-सखी कहकर बैठा देते हैं और इधर लात मार देते हैं — दूसरी बच्ची का जीवन बर्बाद हो जाता है। इसका बन गया, उसका चला गया, वे कहते हैं। इन सभी चीजों से बचें, ध्यान रखें।
चाहे किसी की कोख से संबंधित कोई विषय हो, वक्ता कहते हैं, बहुत सारी विद्याएँ हैं, और गाँव में लोग कोख पर लात मारने वाला विधान भी चलाते हैं। बड़ा गलत कार्य करते हैं: बगल में किसी अच्छी बच्ची को मित्र-सखी बोलकर बैठा देते हैं, और इधर लात मार देते हैं — दूसरी बच्ची का जीवन बर्बाद हो जाता है। इसका तो बन गया, उसका चला गया, वे कहते हैं। इन सभी चीजों से बचें, ध्यान रखें। मॉडर्न-मॉडर्न बोलकर कि ये सब कुछ नहीं होता, कुछ नहीं होता — वही लोग, वे कहते हैं, ये सब चीजें करके अपनी चीजें बनाते हैं और सामने वाले को बर्बाद करते हैं, और सामने वाला इसी में रह जाता है कि ऐसा तो कुछ होता ही नहीं। इससे बचें।
बच्चे दूर, और शरीर हर जगह बंद
प्रयोग के समय बच्चों को दूर रखें और प्रयोग करने वाले का शरीर हर जगह बंद हो
घर में ऐसी प्रक्रिया हो रही हो, वक्ता कहते हैं, तो छोटे बच्चों को और विशेष करके कुँवारी कन्याओं को दूर रखें। स्वयं जब ऐसी प्रक्रियाएँ करें तो कवच आदि का पाठ करके सुरक्षित रहें, और शरीर पूरा बंद होना चाहिए: शिखा बंधन हो, गले में बंद हो, माला या कवच हो, मणिबंध हो, हाथ में और कमर में बंद हो। पैर में कम से कम धागा बांधें; कड़ा पहनते हैं तो, लड़की है तो पायल पहनेगी, पुरुष है तो कड़ा आदि पहने तो उत्तम — ताकि ऐसे विषय करते समय आप पर किसी नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव न पड़े।
और घर में भी इस प्रकार की प्रक्रिया हो रही हो, वक्ता कहते हैं, तो छोटे बच्चों को, कुँवारी कन्याओं को विशेष करके दूर रखें। स्वयं भी जब आप इस प्रकार की प्रक्रियाएँ करें, कवच आदि का पाठ करके सुरक्षित रहें, तभी प्रक्रिया करें, और शरीर पूरा बंद होना चाहिए। यानी कि शिखा बंधन हो, गले में बंद हो, माला-कवच आदि हो, मणिबंध हो, हाथ में, कमर में बंद हो। पैर में आप धागा ही बांधें, लेकिन कुछ न कुछ हो। अगर कड़ा पहनते हैं; लड़की है तो पायल पहनेगी; पुरुष है तो कड़ा आदि पहने तो उत्तम है। ताकि जब आप इस प्रकार के विषय कर रहे हों, आपके ऊपर किसी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव न पड़े।
पूर्णिमा या अमावस्या पर हर सदस्य द्वारा गौ माता को खीर
जब परिवार का कलह-क्लेश शांत न हो रहा हो तो क्या करें?
अगर परिवार में बहुत अधिक कलह-क्लेश है जहाँ पहले प्रेम था, और ठीक करने का प्रयास कर रहे हैं पर हो नहीं रहा, हवन-पूजन का भी प्रयोग कर रहे हैं पर नहीं हो रहा — तब ऐसी अवस्था में, वक्ता कहते हैं, उस परिवार का प्रत्येक सदस्य पूर्णिमा के दिन या अमावस्या के दिन खीर बनाए, और सभी सदस्य अपने हाथ से गौ माता को खीर खिलाएँ, बहुत प्रेम से खिलाएँ।
इसमें एक विषय और है, वक्ता कहते हैं। मान लीजिए परिवार में बहुत अधिक कलह-क्लेश है — पहले प्रेम था, अब कलह-क्लेश बहुत अधिक हो चुका है — और इसे ठीक करने का प्रयास कर रहे हैं, हो नहीं रहा; हवन-पूजन आदि का भी प्रयोग कर रहे हैं, नहीं हो रहा। तब ऐसी अवस्था में उस परिवार के प्रत्येक सदस्य के द्वारा: मान लीजिए पूर्णिमा के दिन या अमावस्या के दिन खीर बनाएँ, और सभी सदस्य अपने हाथ से खीर गौ माता को खिलाएँ, और बहुत प्रेम से खिलाएँ।
अपने दरवाजे पर खिलाएँ, पर पशु घर का अपना न हो
संभव हो तो अपने दरवाजे पर खिलाएँ, लेकिन पशु अपने घर का नहीं होना चाहिए
संभव हो तो अपने दरवाजे पर खिलाएँ, वक्ता कहते हैं — लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना है कि पशु अपने घर का नहीं होना चाहिए। अमावस्या पर यह करने से बहुत शीघ्र लाभ होगा।
संभव हो तो अपने दरवाजे पर खिलाएँ, वक्ता कहते हैं — लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना है कि पशु अपने घर का नहीं होना चाहिए। तो भी अमावस्या पर यह करने से बहुत शीघ्र ही लाभ होगा।
सप्तम, नवम या एकादश अध्याय का सामूहिक पाठ
घर के कलह के लिए गीता का कौन सा पाठ बताया गया है?
और साथ में, वक्ता कहते हैं, अगर श्रीमद्भगवद्गीता के सप्तम, नवम या एकादश — इन तीनों में से किसी एक अध्याय का सामूहिक पाठ होने लगे, तो पहले दिन से प्रभाव दिख जाएगा और यह कलह-क्लेश तुरंत मिटने लगेगा। अगर 10 सदस्य हैं और उनमें से कोई पाँच यह करना शुरू कर दें, तो बाकी पाँच की बुद्धि भी स्वतः सही हो जाती है और इन सभी चीजों का प्रभाव नष्ट हो जाता है।
और साथ में, वक्ता कहते हैं, अगर श्रीमद्भगवद्गीता के सप्तम, नवम या एकादश — इन तीनों में से किसी भी एक अध्याय का सामूहिक पाठ होने लगे, तो भैया पहले दिन से आपको प्रभाव दिख जाएगा — यह कलह-क्लेश तुरंत मिटने लगेगा। अगर 10 सदस्य हैं और उनमें से कोई भी पाँच यह करना शुरू कर देते हैं, तो बाकी पाँच की बुद्धि भी स्वतः सही हो जाती है, और इन सभी चीजों का प्रभाव भी नष्ट हो जाता है। जो चीजें आपके-हमारे लिए बहुत बड़ी हो सकती हैं, वे कहते हैं, वे श्रीमद्भगवद्गीता जी के पाठ के प्रभाव से बहुत कमजोर हो जाती हैं। यह भी याद रखिएगा।
विश्वरूप का अध्याय अपने आप में ब्रह्मास्त्र
गीता का एकादश अध्याय अपने आप में ब्रह्मास्त्र क्यों कहा गया है?
एकादश अध्याय, वक्ता कहते हैं, अपने आप में ब्रह्मास्त्र है — भगवान के विश्वरूप का अध्याय। जीवन की कितनी भी बड़ी जटिल समस्या हो और हल न हो रही हो, उसका पाठ आरंभ कर दीजिए, कंठस्थ कर लीजिए। जो विषय कठिन और असंभव लग रहा हो, उसे भी भगवान स्वयं सिद्ध कर देते हैं।
एकादश अध्याय, वक्ता कहते हैं, अपने आप में ब्रह्मास्त्र है। भगवान के विश्वरूप का जो अध्याय है। जीवन की कितनी भी बड़ी, जटिल समस्या हो और हल न हो रही हो, उसका पाठ आप आरंभ कर दीजिए, कंठस्थ कर लीजिए। भगवान स्वयं आपके उस विषय को भी, जो लग रहा हो कि कठिन है, नहीं हो सकता, सिद्ध कर देते हैं।
घर के बाहर शांति और चौखट लांघते ही अशांति
घर पर लगे उच्चाटन के लक्षण क्या हैं?
अगर घर की चौखट आदि का बंधन कर दिया गया है, वक्ता कहते हैं, तो उच्चाटन लगता है: सबको लगता है कहीं भाग जाओ। घर में रहने का मन नहीं करता। बाहर — मित्र के घर, स्कूल-कॉलेज, ऑफिस, मार्केट में — मन बहुत अच्छा, शांत, खुश, तबीयत भी ठीक; लेकिन घर के भीतर आते ही, चौखट लांघते ही लगता है बाप रे क्या हो गया। बिना मतलब की मारपीट, गाली-गलौज, एक-दूसरे पर टोंटिंग; घर से भागते रहते हैं, कोई शांति नहीं, अजीब सा उच्चाटन बना रहता है।
अब इसमें एक विषय और आता है, वक्ता कहते हैं: अगर घर में चौखट आदि का बंधन कर दिया गया है, तो उच्चाटन लगता है। सबको लगता है — यार, कहीं भाग जाओ। होता है न? घर में रहने का मन नहीं है, मन नहीं करता। बाहर बड़े अच्छे से रहते हैं: मित्र के घर, स्कूल-कॉलेज में, ऑफिस में, मार्केट में मन बहुत अच्छा है, शांत है, खुश हैं, तबीयत भी ठीक-ठाक है। लेकिन घर के भीतर जैसे ही आते हैं, चौखट जैसे ही लांघते हैं, लगता है बाप रे बाप, क्या हो गया। बिना मतलब की आपस में मारपीट, बिना मतलब की गाली-गलौज, बिना मतलब की एक-दूसरे पर टोंटिंग — तुम ऐसे, तुम ऐसे। घर से भागते रहते हैं। कोई शांति नहीं है। अजीब सा उच्चाटन बना रहता है।
शिव या भगवती के मंदिर में जागृत किए गए उग्र देवता
उच्चाटन वाले घर के लिए किन देवताओं का मंत्र बताया गया है?
जब विषय इस अवस्था तक पहुँच जाए, वक्ता कहते हैं, तो उग्रात्मक देवताओं का मंत्र लीजिए — चाहे हनुमान जी का बटवानर हो, पंचमुखी हनुमान जी का कवच, बटुक भैरव जी का स्तोत्र या सतनाम, या महाभैरव जी के पाठ की प्रक्रिया — किसी एक चीज को, चाहे सप्ताह भर के लिए ही सही, पहले शिव मंदिर या भगवती के मंदिर में बैठकर जागृत कीजिए या सिद्ध कीजिए।
ऐसी हालत में, जब इस अवस्था तक का विषय हो, वक्ता कहते हैं, तो उग्रात्मक देवताओं का मंत्र लीजिए। चाहे हनुमान जी का बटवानर हो, पंचमुखी हनुमान जी का कवच आदि हो, बटुक भैरव जी का स्तोत्र, सतनाम हो, चाहे महाभैरव जी के पाठ आदि की प्रक्रिया हो — किसी एक चीज को, चाहे सप्ताह भर के लिए ही सही। बल्कि पहले शिव मंदिर में या भगवती के मंदिर में बैठकर उसे जागृत कीजिए या सिद्ध कीजिए।
सिद्धि के लिए बताई गई न्यूनतम संख्या
पाठ सिद्ध करने के लिए एक न्यूनतम संख्या कही गई है, पर वाक्य से संख्या स्पष्ट नहीं होती
सामान्य रूप से सिद्ध करने में, वक्ता कहते हैं, कम से कम "एक स्वार्थ पाठ" तो कीजिएगा — उससे कम क्या ही होगा। ट्रांसक्रिप्ट में वाक्य इसी रूप में है और अभिप्रेत संख्या स्पष्ट नहीं है, इसलिए यहाँ कोई संख्या नहीं दी गई है।
ऐसे पाठ को सिद्ध करने में क्या लगता है, इस पर वक्ता कहते हैं कि सामान्य रूप से सिद्ध करने में कम से कम आप एक — ट्रांसक्रिप्ट यहाँ "एक स्वार्थ पाठ भी तो कीजिएगा" पढ़ता है — और पूछते हैं कि उससे कम क्या ही होगा। जैसा लिखा गया है, यह वाक्य किसी निश्चित संख्या में नहीं बदलता, इसलिए यहाँ कोई संख्या नहीं दी गई है।
क्षेत्रपाल निकासी, कपूर के साथ अभिमंत्रित नारियल, और चौखट पर बलि
घर में क्षेत्रपाल निकासी कैसे की जाती है?
उतना करने के बाद, वक्ता कहते हैं, घर में से क्षेत्रपाल निकासी करनी है: नारियल को अभिमंत्रित करके, कपूर जलाकर उसके साथ पूरे घर से निकालना — और सबसे विशेष, चौखट पर नींबू-नारियल की बलि देना।
उतना करने के बाद, वक्ता कहते हैं, उसके पश्चात घर में से क्षेत्रपाल निकासी करना: नारियल को अभिमंत्रित करके, कपूर जलाकर उसके साथ पूरे घर से निकालना। और सबसे विशेष, चौखट पर नींबू-नारियल की बलि देना।
उलटंत भेद पलटंत काया, और उसका ऐसे ही प्रयोग क्यों नहीं होता
प्रयोग को पलटने का प्रचलित मंत्र कौन सा है?
वक्ता कहते हैं कि घात को पलटने की सामान्य प्रक्रिया का एक बहुत प्रचलित मंत्र है: "उलटंत भेद पलटंत काया" — सब लोग जानते हैं, जो तंत्र के क्षेत्र में थोड़ी भी रुचि रखते हैं वे पढ़े होंगे। लेकिन इन चीजों का प्रयोग ऐसे नहीं होता, वे कहते हैं; यह बात ध्यान में रखिए।
घात को पलटने की जो सामान्य प्रक्रिया है, वक्ता कहते हैं, उसका एक बहुत प्रचलित मंत्र है। वे इसे "उलटंत भेद पलटंत काया" वाला बताते हैं — सब लोग जानते हैं, जो तंत्र के क्षेत्र में थोड़ी भी रुचि रखते हैं वे सब पढ़े होंगे। बट इन चीजों का प्रयोग ऐसे नहीं होता, वे कहते हैं। यह बात ध्यान में रखिएगा।
पलटने से पहले तपोबल बढ़ाना
सामूहिक उच्चाटन को एक-एक व्यक्ति का उतारा करके पलटना आसान नहीं — पहले तपोबल बढ़ाइए, और एक सुरक्षित व्यक्ति परिवार के लिए खड़ा हो
जब सामूहिक उच्चाटन कर दिया गया हो, पूरे घर का उच्चाटन हो, और आप हर व्यक्ति का उतारा करके काटने और उलटने के मंत्र चला रहे हों कि उलट देंगे — यह प्रक्रिया, वक्ता कहते हैं, इतनी आसान नहीं है। करेंगे और कहीं कुछ गड़बड़ हो गई, तो फिर लेने के देने पड़ जाएँगे। इसलिए पहले तपोबल की वृद्धि कीजिए, उसके बाद ऐसे प्रयोगों में आगे बढ़ने का प्रयत्न कीजिए।
जब सामूहिक उच्चाटन कर दिया गया हो, गृह का ही उच्चाटन कर दिया गया हो, और आप प्रत्येक व्यक्ति का उतारा करके काटने और उलटने के मंत्र का प्रयोग कर रहे हैं, सोच रहे हैं कि उलट देंगे — तो यह प्रक्रिया, वक्ता कहते हैं, इस प्रकार से आसान भी नहीं है। करेंगे, और अगर कहीं कुछ गड़बड़ हो गई, तो फिर लेने के देने पड़ जाएँगे। तो सबसे पहले तपोबल की वृद्धि कीजिए, उसके बाद इस प्रकार के प्रयोगों में आगे बढ़ने का प्रयत्न कीजिए। अगर आपको कष्ट है भी, प्रत्यक्ष रूप से देख रहे हैं कि कष्ट है, तो भी सबसे पहले पूरे परिवार के सहयोग के लिए एक व्यक्ति को खड़ा होना होगा — और कवच आदि का प्रसारण करके, अपने आत्म तत्व और आभामंडल को पुष्ट करके, मजबूत करके खड़ा होना होगा। तब जाकर, वे कहते हैं, जब वह किसी अन्य का सहयोग या मार्गदर्शन करेगा तो उसमें वह सामर्थ्य रहेगा कि ये चीजें आसपास नहीं आएँगी।
12 राशि, 12 गणपति, 12 भाव और द्वादश नाम
संकट नाशन का पाठ छह महीने क्यों बताया जाता है?
एक श्रोता के प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि वे तो संकट नाशन के लिए बोलते हैं, और इसलिए बोलते हैं: 12 राशियाँ हैं और संकट नाशन के 12 गणपति हैं, प्रत्येक राशि में एक-एक गणपति; और आपके 12 भाव हैं, हर भाव का एक अधिपति। तो अगर आप गणपति जी के द्वादश नाम का पाठ कर रहे हैं, इसीलिए उसमें छह महीना कहा गया है — छह महीने 12 नाम का पाठ अधिकाधिक करना है। तब जाकर वे प्रभाव देते हैं; उससे बड़ा कोई विषय नहीं, बहुत तगड़ा प्रभाव देने वाली चीज है।
एक श्रोता के प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि वे तो संकट नाशन के लिए बोलते हैं; और संकट नाशन के लिए इसलिए बोलते हैं, यह बात ध्यान रखिएगा। 12 राशियाँ हैं और संकट नाशन के 12 गणपति हैं। प्रत्येक राशि में एक-एक गणपति हैं। अब आपके 12 भाव हैं, हर भाव का एक अधिपति। अगर आप गणपति जी के द्वादश नाम का पाठ कर रहे हैं, तो इसीलिए उसमें छह महीना कहा गया है: छह महीने 12 नाम का पाठ आपको अधिकाधिक करना है। तब जाकर वे प्रभाव देते हैं। उससे बड़ा कोई विषय नहीं है, वे कहते हैं। एक बात ध्यान रखिएगा: बहुत तगड़ा प्रभाव देने वाली चीज है।
पंचोपचार और दशोपचार में दीपक का प्रयोग
क्या कर्म साक्षी दीपक से ही देवता को दीप दिखाया जा सकता है?
पंचोपचार, दशोपचार के प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि अगर आप कर्म साक्षी दीपक से ही दिखाना चाहते हैं तो दिखा सकते हैं। लेकिन अच्छा होगा, वे कहते हैं, कि दीपक अलग से रखें और देवता को बाद में अलग दीप दिखाएँ।
पंचोपचार, दशोपचार में, वक्ता कहते हैं, अगर आप कर्म साक्षी दीपक से ही दिखाना चाहते हैं तो भी दिखा सकते हैं। लेकिन अच्छा होगा कि दीपक अलग से रखें और देवता को बाद में अलग दीप दिखाएँ।
सत्य, स्नान, सोना और शौच
तुलसी माला धारण करने के नियम क्या हैं?
तुलसी माला कैसे धारण करें, इस पर वक्ता कहते हैं कि गले में धारण करनी है। माला धारण करने के बाद का सामान्य नियम है कि झूठ नहीं बोलना, असत्य आचरण नहीं करना, असत्य संभाषण नहीं करना; अगर असत्य बोलने की आवश्यकता पड़ ही रही है तो माला हटा देना उत्तम रहेगा, और प्रयास करें कि धारण करके न बोलना पड़े। स्नान के समय उतारकर रख दीजिए; स्नान के बाद उसे अलग से स्नान कराकर धारण कर लीजिए। पहनकर सोना है तो सो सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं — लेकिन शौच आदि की क्रिया से पहले उतार देना चाहिए।
तुलसी माला कैसे धारण करें, इस प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि तुलसी माला गले में धारण करनी है। धारण करने के पश्चात का जो सामान्य नियम होता है: झूठ नहीं बोलना है, असत्य आचरण नहीं करना है, असत्य संभाषण नहीं करना है। अगर आपको असत्य बोलने की कोई आवश्यकता पड़ भी रही है तो माला को हटा दीजिए तो उत्तम रहेगा; प्रयास करें कि धारण करके न बोलना पड़े। स्नान आदि के समय उसे उतारकर रख दीजिए। स्नान करने के बाद उसे अलग से स्नान कराइए और उसके बाद धारण कर लीजिए। पहनकर अगर सोना है, सो सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन शौच आदि की क्रिया से पहले उन्हें उतार देना चाहिए।
ललिता सहस्रनाम, न्यास और दीक्षा का प्रश्न
ललिता सहस्रनाम के न्यास और दीक्षा पर पुरी के शंकराचार्य का मत, यूट्यूब के परस्पर विरोधी दावों के सामने
वक्ता कहते हैं कि यूट्यूब पर बहुत कुछ बोला जा रहा है, किस-किस चीज को गलत साबित करेंगे — सबके पास अपना-अपना मनोमुखी प्रमाण है। वे पुरी के शंकराचार्य महाराज का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने कहा — और उनके अनुसार सत्य ही कहा — कि भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी के सहस्रनाम के विषय में अगर पूरे विधान में जाएँ, शोधन की प्रक्रिया, न्यास, बृहद न्यास आदि के साथ, तो अनधिकृत व्यक्ति वे प्रक्रियाएँ कैसे कर सकता है? त्रिकूट से संबंधित मंत्रों का न्यास — बिना आपकी दीक्षा हुए आप उनका न्यास कैसे कर सकते हैं, पता कैसे चलेगा?
यूट्यूब पर तो बहुत कुछ बोला जा रहा है, वक्ता कहते हैं; किस-किस चीज को आप गलत साबित करेंगे? सबके पास अपना-अपना मनोमुखी प्रमाण भी उपस्थित है, और उस पर बोलेंगे तो फिर कितना युद्ध ही हो जाएगा। वे उदाहरण देते हैं पुरी के शंकराचार्य महाराज जी का। उन्होंने कहा है — और वक्ता के अनुसार सत्य ही कहा है — कि भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी के सहस्रनाम का जो विषय है, उसमें अगर पूरे विधान में जाइएगा, शोधन आदि की प्रक्रिया के साथ, न्यास, बृहद न्यास आदि के साथ, तो उन प्रक्रियाओं को अनधिकृत व्यक्ति कैसे कर सकता है? त्रिकूट से संबंधित उसमें जो मंत्र आदि का न्यास है — बिना आपकी दीक्षा हुए उनका न्यास आप कर कैसे सकते हैं? पता कैसे चलेगा?
बिना न्यास के पाठ पर उनका अपना सशर्त मत
क्या ललिता सहस्रनाम बिना न्यास के पढ़ा जा सकता है?
वक्ता के अनुसार शंकराचार्य जी ने गलत नहीं कहा है। लेकिन फिर भी, अगर बिना न्यास आदि की प्रक्रिया के आप उतना सामर्थ्य रखते हैं और नियम आदि का पालन अनुशासन के साथ करते हैं, तो पाठ कीजिए।
तो उनके अनुसार, वक्ता कहते हैं, वे गलत नहीं कहे हैं। लेकिन फिर भी, बिना न्यास आदि की प्रक्रिया के अगर आप उतना सामर्थ्य रखते हैं, नियम आदि का पालन अनुशासन के साथ करते हैं, तो पाठ कीजिए।
भगवती तारा का स्वरूप श्मशान में क्यों बैठा है
क्या भगवती तारा की साधना किसी और साधना की तरह घर में की जा सकती है?
वक्ता कहते हैं कि अब भगवती तारा की साधना भी लोग ऐसे पूछते हैं जैसे कितनी आसान हो; सबको पता है कि नहीं करनी चाहिए, लेकिन कन्विंस किया जा रहा है कि भगवती तो बहुत सौम्य हैं, ममतामयी हैं, तो घर में क्यों नहीं कर सकते। उनका उत्तर: अगर ऐसा ही होता कि सब कोई इस स्वरूप को घर में कर सकते, तो भगवती फिर क्यों जाकर श्मशान में बैठतीं? उनका वह स्वरूप श्मशान से संबंधित क्यों रखा है? तब पार्वती जी क्यों नहीं श्मशान में बैठतीं, दुर्गा जी क्यों नहीं, तारामयी ही क्यों श्मशान में बैठी हैं?
अब तो भगवती तारा की साधना भी लोग इस प्रकार पूछते हैं, वक्ता कहते हैं, जैसे कितनी आसान हो — भाई, आप करो। इसमें सबको पता है कि नहीं करनी चाहिए। लेकिन अब कन्विंस किया जा रहा है कि भगवती तो बहुत सौम्य हैं, भगवती तो ममतामयी हैं, तो घर में क्यों नहीं कर सकते? अरे भाई, वे उत्तर देते हैं: अगर ऐसा ही होता कि सब कोई इस स्वरूप को कर सकते थे, घर में कर सकते थे, तो भगवती फिर क्यों जाकर श्मशान में बैठतीं? प्रॉपर्ली उनका वह स्वरूप श्मशान से संबंधित क्यों रखा है? तब पार्वती जी क्यों नहीं जाकर श्मशान में बैठतीं? तब दुर्गा जी भी क्यों नहीं श्मशान में बैठतीं? क्यों तारामयी श्मशान में बैठी हुई हैं? उनका स्वरूप शव के ऊपर क्यों है? फिर दुर्गा जी को भी शव के ऊपर होना चाहिए।
शव आसन, कमल बने ब्रह्मा, और द्व्यक्षरी-त्र्यक्षरी मंत्र
हर स्वरूप के पीछे कोई न कोई कारण है, और तंत्र की हर चीज को फिलॉसफी में डालकर सही साबित नहीं किया जा सकता
कारण है, वक्ता कहते हैं: शव आसन शिव आसन कैसे बन जाता है? ब्रह्मा जी कमल कैसे बन जाते हैं, कब बनते हैं, भगवती किनके लिए कब बनाती हैं, और इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? जगदंबा दो अक्षरी, त्रय अक्षरी की ओर क्यों गई हैं? इसके पीछे कारण है, और हर चीज को केवल यह फिलॉसफी देकर सही साबित नहीं कर सकते। तंत्र की हर चीज को फिलॉसफी में डाल देना — कि नहीं, यह तंत्र फिलॉसफी है, इसके अनुसार यह, इसके अनुसार वह — यह, वे कहते हैं, सही नहीं है। हर स्वरूप के पीछे कुछ न कुछ कारण है।
कारण है न, वक्ता कहते हैं। शव आसन कैसे शिव आसन बन जाता है? ब्रह्मा जी कमल कैसे बन जाते हैं? कब बनते हैं? भगवती किनके लिए कब बनाती हैं? फिर इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? जगदंबा दो अक्षरी, त्रय अक्षरी मंत्र की ओर क्यों गई हैं? इसके पीछे कारण है। आप हर चीज को केवल और केवल यह फिलॉसफी देकर सही साबित नहीं कर सकते। तंत्र की हर चीज को फिलॉसफी में डाल दीजिएगा — कि नहीं, यह तंत्र फिलॉसफी है, इसके अनुसार यह, इसके अनुसार वह नहीं होगा — वह सही नहीं है। हर स्वरूप के पीछे कुछ न कुछ कारण है।
महल या रत्न सिंहासन नहीं, श्मशान
जगदंबा अक्षोभ्य शिव को गोद में लेकर चिता पर क्यों बैठी हैं?
जगदंबा जब अक्षोभ्य शिव को गोद में ली हैं, वक्ता पूछते हैं, तो श्मशान में बैठकर क्यों ली हैं? महल में, रत्न सिंहासन पर बैठकर क्यों नहीं? चिता के पास ही जाकर क्यों बैठी हैं, चिता पर ही क्यों बैठी हैं? इस स्वरूप के पीछे कारण है, इसलिए उसे नहीं किया जा सकता। जो नहीं मानेंगे, वे अपना प्रचुर प्रमाण ला सकते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं — तो बिल्कुल कीजिए, वे कहते हैं।
जगदंबा जब अक्षोभ्य शिव को अपनी गोद में ली हैं, वक्ता पूछते हैं, तो श्मशान में बैठकर क्यों ली हैं? महल में बैठकर, रत्न सिंहासन पर बैठकर क्यों नहीं ली हैं? चिता के पास ही जाकर क्यों बैठी हैं? चिता पर ही क्यों बैठी हैं? इस स्वरूप के पीछे कारण है — तो फिर उसे नहीं किया जा सकता। जो नहीं मानेंगे, वे अपना प्रचुर प्रमाण ला सकते हैं कि नहीं, बिल्कुल कर सकते हैं। तो बिल्कुल कीजिए, वे कहते हैं। और जिन स्वरूपों का सामान्य पूजन करने से सब कुछ प्राप्त हो सकता है, जिन पर सबका अधिकार है — उन स्वरूपों पर, वे कहते हैं, कोई कभी चर्चा नहीं करता, और उन्हें महत्व ही नहीं देते।
हर स्तोत्र, मंत्र और कवच अपने आप में सक्षम है
ब्रह्मांड के सभी रहस्य जानने के लिए कौन सा स्तोत्र या अनुष्ठान है?
इस प्रश्न पर कि ऐसा कौन सा स्तोत्र या अनुष्ठान है जिससे ब्रह्मांड के सभी रहस्य जान सकें, वक्ता कहते हैं कि इसके लिए जितने भी स्तोत्र, मंत्र, कवच हैं, सभी अपने आप में सक्षम हैं। सदैव स्मरण रखिए: जब आपके आराध्य को आपको योग्य बनाना होता है, तो क्या देना है, कहाँ देना है, कैसे देना है — यह उनका अपना तरीका है। रहस्य के उद्बोधन के लिए आपको अलग से कुछ विशेष करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
एक बात याद रखिएगा, वक्ता कहते हैं, इस प्रश्न पर कि ऐसा कौन सा स्तोत्र या अनुष्ठान है जिससे हम ब्रह्मांड के सभी रहस्यों को जान सकें। इसके लिए जितने भी स्तोत्र, मंत्र, कवच हैं, सभी अपने आप में सक्षम हैं। यह सदैव स्मरण रखिएगा। जब आपके आराध्य को आपको योग्य बनाना होता है, तो क्या देना है, कहाँ देना है, कैसे देना है — यह उनका अपना तरीका है। यह बिल्कुल स्मरण में रखिएगा। रहस्य के उद्बोधन के लिए आपको अलग-अलग कोई विशेष कुछ करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
एकाक्षरी जप, तपोबल और देवताओं की अपनी परीक्षा
क्या एक अक्षर का मंत्र भी सब कुछ प्रकट कर सकता है?
अगर आप एकाक्षरी का भी जप कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं, तो जितना बढ़ाते जाएँगे, जितना तपोबल बढ़ता जाएगा, और जब तक सत्कर्म करते रहेंगे, अनुशासन में रहेंगे, किसी का अपमान नहीं करेंगे — देवता परीक्षा लेते जाएँगे और आपको देते जाएँगे। रहस्य का उद्बोधन मात्र एक अक्षर के मंत्र से भी हो जाएगा — लेकिन आप अड़े रहेंगे तो धैर्य रखना पड़ेगा।
अगर आप एकाक्षरी का भी जप कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं, तो जितना बढ़ाते जाइएगा, जितना आपका तपोबल बढ़ता जाएगा, और जितना सत्कर्म करते रहिएगा, अनुशासन में रहिएगा, किसी का अपमान नहीं कीजिएगा — देवता परीक्षा लेते जाएँगे, आपको देते जाएँगे। रहस्य का उद्बोधन मात्र एक अक्षर के मंत्र से भी हो जाएगा। लेकिन आप अड़े रहेंगे तो धैर्य तो रखना पड़ेगा।
प्रयोग से पहले 12 वर्ष का पुष्टिकरण
पहले गुरु सिद्धि के बाद 12 वर्ष की शपथ देते थे — सामर्थ्य पुष्ट होने तक कोई प्रयोग नहीं
साल-दो साल पहले के समय में, वक्ता कहते हैं, सिद्धि पूर्ण होने के उपरांत गुरुओं द्वारा 12-12 वर्षों के लिए शपथ दे दी जाती थी कि आप किसी को न देखेंगे, न सुनेंगे, न कोई तांत्रिक प्रयोग करेंगे। 12-12 सालों तक सामर्थ्य पुष्ट करवाते थे — जो भी मंत्र बल के कारण सिद्धि प्राप्त हुई है, उसे 12 वर्ष पुष्ट कराते थे। तब जाकर वे चीजें प्रयोग में आती थीं, इसलिए उनका प्रभाव अकाट्य होता था, और वे अकारण जहाँ-तहाँ प्रयोग नहीं करते थे।
साल-दो साल पहले के समय में, वक्ता कहते हैं, सिद्धि पूर्ण होने के उपरांत 12-12 वर्षों के लिए गुरुओं के द्वारा शपथ दे दी जाती थी: कि आप किसी को न देखेंगे, न सुनेंगे, न कोई तांत्रिक प्रयोग करेंगे। 12-12 सालों तक पुष्ट करवाते थे — जो सामर्थ्य उन्हें अर्जित हुआ है, जो भी मंत्र बल के कारण सिद्धि प्राप्त हुई है, उसे 12-12 वर्षों तक पुष्ट कराते थे। तब जाकर वे चीजें प्रयोग में आती थीं, तो उनका प्रभाव भी अकाट्य होता था, और वे अकारण जहाँ-तहाँ प्रयोग नहीं किया करते थे।
आगे का मार्ग खोलते एकाक्षरी के देवता
एक अक्षर के देवता ही एक से तीन और तीन से पाँच तक का मार्ग निकाल देते हैं
तो आप एक अक्षर के मंत्र से भी सारे रहस्य प्राप्त कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं। एक से तीन पर कैसे ले जाना है, तीन से पाँच में कैसे — यह आपके देवता का अपना विषय है; आपके उस एक अक्षर के जो देवता होंगे वही मार्ग निकाल देंगे, और उसी से आपको रहस्यादि की जानकारी भी हो जाएगी।
तो आप एक अक्षर के मंत्र से भी सारे रहस्यों को प्राप्त कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं। अब एक से तीन पर कैसे ले जाना है, तीन से पाँच में कैसे ले जाना है — वह आपके देवता ही तय करेंगे। आपके उस एक अक्षर के जो देवता होंगे, वही मार्ग निकाल देंगे। और उसी से आपको रहस्यादि की जानकारी भी हो जाएगी।
कवच का धागा बदलना, और माला फिर से गुथवाने के बजाय अग्नि स्पर्श
सूतक-पातक के बाद रुद्राक्ष की माला को शुद्ध कैसे करें?
सूतक-पातक पड़ने पर, वक्ता कहते हैं, किसी भी कवच का धागा बदलिए। पूरी रुद्राक्ष की माला — 109, 108, 107, 54 दाने, जो भी हो — का हर दाना फिर से नई माला में गुथवाना नहीं पड़ेगा। सूतक-पातक पूर्ण होने, शुद्धिकरण और घर में पूजन-पाठ होने के बाद एक-आध दिन और रुककर माला को गाय के कच्चे दूध से अच्छे से धोना है, भगवान शिव से संबंधित या तांत्रोक्त देवी सूक्त का पाठ करते हुए अभिषेक कराना है, फिर कपूर की अग्नि प्रज्वलित करके माला को तेजी से अग्नि से पार करा देना है। अग्नि स्पर्श से वह शुद्ध हो जाती है; जलाना नहीं है। माला काटकर फिर से गुथवाना, वे कहते हैं, कभी करना भी नहीं चाहिए।
सूतक-पातक आदि जब पड़ता है, वक्ता कहते हैं, तो धागा किसी भी कवच का हो, उसे बदलिए। लेकिन जो पूरी रुद्राक्ष की माला है — 109 दाने की, 108 की, 107 की, 100 से ऊपर या कम, 54 की, जो भी है — सूतक-पातक पड़ा है तो उसका हर दाना फिर से नई माला में गुथवाना नहीं पड़ेगा। उसके लिए अग्नि स्पर्श की विधि है, जो वे कई बार बता चुके हैं। जब सूतक-पातक पूर्ण हो जाए, शुद्धिकरण की प्रक्रिया हो जाए, घर में पूजन-पाठ हो जाए, उसके एक-आध दिन और रुककर गाय के कच्चे दूध से अपनी माला को अच्छे से धोना है। भगवान शिव से संबंधित या तांत्रोक्त देवी सूक्त आदि का पाठ करते हुए पूरी माला का अभिषेक कराना है, और उसके बाद कपूर की अग्नि प्रज्वलित करके अग्नि से स्पर्श करा देना है। अग्नि स्पर्श से वह शुद्ध हो जाएगी। जलाना नहीं है, बस बहुत तेजी से माला को अग्नि में से पार कर देना है। उससे शुद्धिकरण की प्रक्रिया हो जाएगी; माला काटकर फिर से गुथवाने की आवश्यकता नहीं है, और ऐसा, वे कहते हैं, कभी करना भी नहीं चाहिए।
पशु-पक्षियों की आत्माओं को जप और गीता पाठ का अर्पण
क्या पशु-पक्षियों की आत्माओं को जप या गीता पाठ अर्पण किया जा सकता है?
बिल्कुल कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं — उसमें कोई मनाही ही नहीं है। जीव-जंतु को भी जप आदि अर्पण कर सकते हैं, और उस अर्पण के प्रभाव से वे बहुत दिव्य स्वरूप धारण कर सकते हैं। गीता पाठ भी बिल्कुल कर सकते हैं और अर्पित कर सकते हैं।
यह पूछे जाने पर कि पशु-पक्षियों की आत्माओं को जप आदि अर्पण कर सकते हैं या नहीं, वक्ता कहते हैं बिल्कुल कर सकते हैं — उसमें कोई मनाही ही नहीं है। जीव-जंतु को भी आप अर्पण कर सकते हैं। और उस अर्पण के प्रभाव से, वे कहते हैं, वे बहुत ही दिव्य स्वरूप को धारण कर सकते हैं। गीता पाठ भी बिल्कुल कर सकते हैं और अर्पित कर सकते हैं।
औरस पुत्र का अर्थ
औरस पुत्र का अर्थ है स्वयं के वीर्य से उत्पन्न पुत्र
वक्ता समझाते हैं कि औरस पुत्र का अर्थ हुआ स्वयं के वीर्य से उत्पन्न पुत्र — औरस वीर्य को कहा जाता है।
औरस पुत्र का अर्थ पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि इसका अर्थ हुआ स्वयं के वीर्य से उत्पन्न पुत्र। औरस, वे कहते हैं, वीर्य को कहा जाता है।
दीक्षा से पहले सवा लाख से दस लाख तक पंचाक्षरी जप
शैव परंपरा में दीक्षा लेने से पहले क्या करना चाहिए?
शिव संप्रदाय में दीक्षा लेने जा रहे 17 वर्ष के श्रोता से वक्ता कहते हैं कि अगर दीक्षा देने वाले गुरु उस परंपरा के दीक्षा देने वाले हैं, तो अधिकार के अनुसार पंचाक्षरी का पहले से अधिकारिक जप कर लें तो बहुत अच्छा है। कम से कम सवा लाख जप कीजिए; अधिक से अधिक 5 लाख, 10 लाख, जितना हो सके।
एक 17 वर्ष के श्रोता कहते हैं कि वे योग गुरु से शिव संप्रदाय में दीक्षा लेने वाले हैं, उनके कुल देवता उज्जैन के महाकाल, महाभैरव और हनुमान जी हैं, और पूछते हैं कि दीक्षा से पहले क्या करना चाहिए जिससे मदद हो। दीक्षा से पहले, वक्ता कहते हैं, अगर दीक्षा देने वाले गुरु उस परंपरा के दीक्षा देने वाले हैं, तो अधिकार के अनुसार पंचाक्षरी का पहले से अधिकारिक जप कर लेंगे तो बहुत अच्छा है। सवा लाख जप कम से कम करिए, वे कहते हैं; अधिक से अधिक 5 लाख, 10 लाख — जितना हो सके।
स्तर के अनुसार पितृ दोष, और योगिनी मातृका के नाम से आहुति
पितृ दोष का उपाय उसके स्तर के अनुसार होता है, और हवन में योगिनी मातृकाओं के नाम से आहुति दी जाती है
कुलदेवी के रक्षण-कृपा और पितृ दोष शांति के प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि पितृ दोष के निमित्त पहले देखना होगा कि किस स्तर का पितृ दोष है, फिर वैसी प्रक्रिया करें। एक अन्य प्रश्न पर वे पुष्टि करते हैं कि हवन में योगिनी मातृका के नाम से बिल्कुल आहुति दी जाती है।
एक श्रोता कुलदेवी के रक्षण-कृपा और पितृ दोष शांति के बारे में पूछते हैं। पितृ दोष के निमित्त, वक्ता कहते हैं, यह देखना है कि किस स्तर का पितृ दोष है — फिर वैसी प्रक्रिया आदि करें। एक अलग प्रश्न पर वे कहते हैं कि हवन में योगिनी मातृका के नाम से बिल्कुल आहुति दी जाती है।
ग्रहों की स्थिति चाहे जो हो, छह महीने लगातार संकट नाशन पाठ
नौकरी न मिल रही हो और शनि या नीच के गुरु को कारण बताया जा रहा हो तो क्या करें?
एक श्रोता कहते हैं कि नौकरी नहीं मिल रही, शनि की दिक्कत है और गुरु नीच का है। वक्ता कहते हैं कि कोई भी ग्रह किसी भी स्थिति में हो, वह एक अलग विषय है। सबसे पहले संकट नाशन का 6 महीने तक लगातार पाठ कीजिए, जितनी शक्ति-सामर्थ्य हो और जितना अधिकाधिक हो।
एक श्रोता लिखते हैं कि नौकरी नहीं मिल रही है, शनि की दिक्कत है, गुरु नीच का है। कोई भी ग्रह किसी भी स्थिति में हो, वक्ता कहते हैं, वह तो एक अलग विषय है। लेकिन सबसे पहले संकट नाशन का 6 महीने तक लगातार पाठ कीजिए — जितनी शक्ति-सामर्थ्य हो, और जितना अधिकाधिक हो।
बिना गुरु के बड़वानल
अगर हनुमान बड़वानल करने को बताया गया है तो बिना गुरु के भी कर सकते हैं
जिस श्रोता को हनुमान बड़वानल करने को बताया गया है और उनके कोई गुरु नहीं हैं, उनसे वक्ता कहते हैं कि कर सकते हैं — कोई समस्या नहीं है।
एक श्रोता कहते हैं कि उन्हें हनुमान बड़वानल करने को बताया गया है पर उनके कोई गुरु नहीं हैं। अगर आपको करने के लिए बताया गया है, वक्ता कहते हैं, और आपके कोई गुरु नहीं हैं, तो आप कर सकते हैं — कोई समस्या नहीं है।
एक मंत्र की संख्या पूरी करके समर्पित करना, फिर दूसरा शुरू करना
एक देवता के एक से अधिक मंत्रों का जप करें तो क्या हर जप अलग से समर्पित करें?
हाँ। अगर दो प्रकार के मंत्र का जप करना है, वक्ता कहते हैं, तो पहले मंत्र का जप पूरा कीजिए — जितनी माला करनी थी, मान लीजिए 10 माला — और समर्पित कर दीजिए। फिर दूसरे का कीजिए, 10, 15, 20, 100 माला, जो करना है, फिर उसे समर्पित कीजिए। ऐसा नहीं कर सकते कि एक मंत्र की 10 माला, फिर दूसरे की 10 माला, और अंत में एक साथ समर्पण।
एक श्रोता पूछते हैं: यदि किसी देवता के एक से ज्यादा मंत्र का जप करते हैं तो क्या बार-बार जप समर्पित करें या एक ही बार आखिरी में? अगर दो प्रकार के मंत्र का जप करना है, वक्ता कहते हैं, तो पहले मंत्र का जप हो गया — जितनी माला का जप हुआ था, मान लीजिए 10 माला का करना था — 10 माला का जप करके समर्पित कर दीजिए। फिर दूसरे का कीजिए: 10 माला, 15, 20, 100 माला, जो करना है, फिर उसे समर्पित कीजिए। ऐसा नहीं कर सकते, वे कहते हैं, कि एक मंत्र की 10 माला पूरी कर लीं, फिर 10 माला दूसरा मंत्र करेंगे और एक साथ समर्पित करेंगे।
स्वप्न में मिले मंत्र — थोड़ी मानसिक संख्या हाँ, पर बिना परामर्श पुरश्चरण नहीं
स्वप्न में मिले बीज मंत्र या महाविद्या मंत्र का जप किया जा सकता है?
डिपेंड करता है, वक्ता कहते हैं। सामान्यतः जो भी मंत्र स्वप्न में प्राप्त होते हैं, उनका सामान्य जप मानसिक रूप से कुछ हद तक संख्या में अवश्य करना चाहिए — 11, 21 बार तो अवश्य। लेकिन अगर पुरश्चरण करने का विषय आ रहा है, तो वह किसी सामर्थ्यवान व्यक्ति से, जिस पर आप विश्वास करते हों और जिसे जानकारी हो, एक बार चर्चा करने के बाद ही करना चाहिए — क्योंकि कई बार गड़बड़ करने के लिए भी विषय उठाया जाता है।
यह पूछे जाने पर कि स्वप्न में दिखे बीज मंत्र या महाविद्या आदि के मंत्र का जप किया जा सकता है या नहीं, वक्ता कहते हैं डिपेंड करता है। सामान्यतः जो भी मंत्र स्वप्नादि में प्राप्त होते हैं, उनका सामान्य जप मानसिक रूप से कुछ हद तक संख्या में तो अवश्य करना चाहिए — 11, 21 बार तो अवश्य कर लेनी चाहिए। लेकिन पुरश्चरण करने का अगर विषय आ रहा है, तो पुरश्चरण के निमित्त किसी सामर्थ्यवान व्यक्ति से, जिस पर आप विश्वास करते हों और जिन्हें जानकारी हो, एक बार चर्चा करने के बाद ही करना चाहिए। क्योंकि कई बार, वे कहते हैं, गड़बड़ करने के लिए भी विषय उठाया जाता है।
ऐसे जप से पहले पूजित डाकिनी या योगिनी मातृका को संकल्प से मुक्त करना
डाकिनी पूजने वाले घर को बटुक भैरव का जप "दिलवाना" उसी घर की पूजित शक्ति को बिगाड़ सकता है
गड़बड़ करने के लिए उठाए गए विषय का वक्ता का उदाहरण: मान लीजिए किसी के यहाँ डाकिनी पूजित है — गाँव-देहातों में डाकिनी माता के रूप में बिल्कुल पूजित होती है, और वे अपनी पूज रहे हैं। अब अगर किसी को उनका घर भ्रष्ट करना है, तो वह बटुक भैरव जी के मंत्र का विधान बता देता है, "हाँ, तुम बटुक भैरव का जप करो" — और अगर सामने वाला स्वप्न के माध्यम से मिला समझकर वह जप करने लगे, तो पूजित शक्ति की स्थिति खराब हो जाएगी। सही प्रक्रिया, वे कहते हैं, यह है कि जब मंडल पूजन हो, तब जो जानकार मंत्र देंगे वे सबसे पहले उन डाकिनी को, या उन योगिनी रूप मातृका को, संकल्प करके मुक्त करेंगे — कि जो भी यह पूजन करेगा, उसके जप का कोई प्रभाव आप पर नहीं पड़ेगा।
गड़बड़ करने के लिए उठाए गए विषय के उदाहरण में वक्ता कहते हैं: मान लीजिए किसी के यहाँ डाकिनी पूजित है। गाँव-देहातों में डाकिनी माता के रूप में बिल्कुल पूजित होती है; वे अपनी पूज रहे हैं। अब अगर किसी को उनके घर को भ्रष्ट करना है, तो प्रयोग में बटुक भैरव जी के मंत्र का विधान बता दिया — हाँ, तुम बटुक भैरव जी का जप करो। अब पूजित शक्ति की स्थिति खराब हो जाएगी, अगर सामने वाला व्यक्ति स्वप्न के माध्यम से मिला समझकर बटुक भैरव का जप करने लगे। तब उसमें प्रक्रिया यह होती है, वक्ता कहते हैं, कि जब मंडल पूजन आदि हो, तब जो जानकार मंत्र देंगे वे सबसे पहले उन डाकिनी को — या उन्हें योगिनी रूप में, मातृका को — संकल्प करके मुक्त करेंगे: कि हाँ, जो भी यह पूजन करेगा, इसके जप आदि का कोई प्रभाव आप पर नहीं पड़ेगा।
गायत्री और पंचाक्षरी, और प्रणव
गायत्री और पंचाक्षरी अपनी-अपनी जगह हैं, और पंचाक्षरी बिना प्रणव के करना अति उत्तम है
गायत्री दीक्षित हो या न हो, वक्ता कहते हैं, गायत्री अपनी जगह है और पंचाक्षरी अपनी जगह है। पंचाक्षरी बिना प्रणव के करें तो अति उत्तम है; बाकी आपका अपना विवेक जैसा कहे।
गायत्री और पंचाक्षरी के बारे में पूछने वाले श्रोता से वक्ता कहते हैं: गायत्री दीक्षित हो या न हो, गायत्री अपनी जगह में है, पंचाक्षरी अपनी जगह में है। पंचाक्षरी बिना प्रणव के करें तो अति उत्तम है, वे कहते हैं। बाकी आपका अपना विवेक जैसा कहे।
श्रद्धा वाला साधक रक्षा करे; अश्रद्धा वाले चुप बैठें, या पहले उनकी पूजा कर दें
अश्रद्धा वाले घर की रक्षा कैसे करें?
जो श्रद्धा वाले साधक हैं वे घर की रक्षा करेंगे, वक्ता कहते हैं; जो अश्रद्धा रखने वाले सदस्य हैं वे चुपचाप बैठे रहेंगे। ज्यादा टेंटा करेंगे तो पहले उनकी पूजा कर दीजिए, फिर अपनी पूजा कीजिए। अश्रद्धा रखने वालों को भी कष्ट हो ही रहा होगा — ऐसा नहीं कि वे सुखी हों और श्रद्धा वाले साधक को ही कष्ट हो। तो उन्हें समझाइए: अच्छे से शांति से बैठो, तुम्हें कुछ नहीं करना, हम जो कर रहे हैं करने दो, सुरक्षित होगा। न मानें तो पहले उनकी पूजा-आरती कर दीजिए, और क्या किया जाएगा। एक आदमी बचाने का प्रयास कर रहा है, वे बचाने भी नहीं देंगे।
अश्रद्धा वाले घर की रक्षा कैसे करें, इस प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि जो श्रद्धा वाले साधक हैं वे घर की रक्षा करेंगे। जो अश्रद्धा रखने वाले सदस्य हैं वे चुपचाप बैठे रहेंगे। ज्यादा टेंटा करेंगे तो पहले उनकी पूजा कर दीजिए, तब फिर अपनी पूजा कीजिए। क्योंकि जो अश्रद्धा रखने वाले हैं, कष्ट उनका भी तो हो ही रहा होगा; ऐसा तो नहीं कि वे सुखी होंगे और जिसने श्रद्धा रखी है उस साधक को ही कष्ट हो रहा है। कष्ट तो सबको हो रहा होगा। तो उन्हें समझाइए — भाई, अच्छे से बैठो, शांति से, तुमको कुछ करना नहीं है, हम जो कर रहे हैं करने दो, सुरक्षित होगा। नहीं माने तो फिर उनकी पूजा-आरती पहले कर दीजिए, और क्या किया जाएगा। खुद परेशान हो रहे हैं, दूसरा आदमी बचाने का प्रयास कर रहा है, तो उसे बचाने भी नहीं देंगे — तो दिक्कत होगी।
देवताओं में उचित-अनुचित नहीं; प्रश्न है आप किनके प्रति समर्पित हो पाते हैं
दूर से रक्षा के लिए महाभैरव और वामती काली दोनों अपनी-अपनी जगह श्रेष्ठ हैं — तुलना बंद कीजिए
दूर से रक्षा हो तो महाभैरव की जगह वामती काली उचित हैं क्या — इस प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि डिपेंड करता है कि आप किस प्रकार की पूजा-सेवा करते हैं। दोनों अपनी-अपनी जगह श्रेष्ठ हैं; उचित-अनुचित का यहाँ विषय ही नहीं है। तुलना करना बंद कीजिए, वे कहते हैं — तुलना मत किया कीजिए कि कौन उचित है, कौन अनुचित। प्रश्न यह है कि आप किनके प्रति समर्पित हो पा रहे हैं।
एक श्रोता पूछते हैं कि दूर से रक्षा है तो महाभैरव की जगह वामती काली उचित हैं क्या। डिपेंड करता है, वक्ता कहते हैं, कि आप किस प्रकार की पूजा-सेवा आदि करते हैं। दोनों अपनी-अपनी जगह श्रेष्ठ हैं; उचित-अनुचित का यहाँ विषय ही नहीं है। तुलना करना बंद कीजिए। तुलना मत किया कीजिए कि कौन उचित है, कौन अनुचित। प्रश्न यह है, वे कहते हैं, कि आप किनके प्रति समर्पित हो पा रहे हैं।
गति पुण्य और प्रारब्ध तय करते हैं, मेहनत की कमी नहीं
एक ही गुरु से एक ही मंत्र मिलने पर एक शिष्य को जल्दी सिद्धि और दूसरे को देर से क्यों?
वक्ता कहते हैं कि ऐसा सदैव होता है: एक ही गुरु से एक ही मंत्र दो शिष्यों को मिला, एक को जल्दी सिद्धि हो रही है, दूसरे को नहीं। इसका कहीं भी यह तात्पर्य नहीं कि दूसरे ने मेहनत कम की या उसे सिद्धि नहीं मिलेगी। जिसका पुण्य ज्यादा था, जिसके प्रारब्ध पहले से कट चुके थे, जिसने पहले मेहनत की थी, उसे जल्दी प्रभाव मिलेगा; किसी को देर से। सबके लिए सभी मंत्र अलग-अलग प्रभाव देते हैं, इसलिए इतनी चिंता नहीं करनी चाहिए।
जिस श्रोता को लगता है कि वे अटक गए हैं और कोई और आगे बढ़ गया, उनसे वक्ता कहते हैं कि ऐसा सदैव होता है: एक ही प्रकार का मंत्र एक ही गुरु से दो शिष्यों को प्राप्त हुआ — एक शिष्य को जल्दी सिद्धि प्राप्त हो रही है, दूसरे को नहीं। इसका कहीं भी तात्पर्य नहीं बनता कि दूसरे ने मेहनत कम की है या उसे सिद्धि नहीं मिलेगी। जिसका पुण्य ज्यादा था, जिसके प्रारब्ध पहले से कट चुके थे, जिसने पहले मेहनत की थी, उसे जल्दी प्रभाव मिलेगा। किसी को देर से मिलेगा। सबके लिए सभी मंत्र अलग-अलग प्रकार के प्रभाव देने वाले होते हैं, वे कहते हैं। इसलिए इतनी चिंता नहीं करनी चाहिए।
नदी में आसन नहीं चाहिए; मंदिर में चाहिए, नीचे बैठकर जप नहीं हो सकता
मंदिर में या नदी में बैठकर जप करने के लिए आसन जरूरी है?
नदी में बैठने के लिए, वक्ता कहते हैं, आसन की जरूरत नहीं — वहाँ सीधे बैठेंगे। मंदिर के लिए आसन की जरूरत है। अब बहुत से मंदिरों में आसन भी नहीं ले जाने दे रहे, यह, वे कहते हैं, बड़ा सोचनीय विचारणीय विषय है — क्योंकि नीचे बैठकर तो जप नहीं कर सकते।
एक श्रोता पूछते हैं कि मंदिर में या नदी में बैठकर जप करने के लिए आसन पर बैठना जरूरी है, बहुत से मंदिर में अंदर घुसने ही नहीं देते। नदी में बैठने के लिए, वक्ता कहते हैं, आसन की जरूरत नहीं है; वहाँ तो आप सीधे बैठेंगे। मंदिर के लिए आसन की जरूरत है। अब आसन भी नहीं ले जाने दे रहे हैं, तब तो, वे कहते हैं, बड़ा सोचनीय विचारणीय विषय है — क्योंकि नीचे बैठकर तो जप नहीं कर सकते।
धागे के बजाय पैर में धातु
पैर में धागा बांधने के बजाय धातु की चीज पहनिए
वक्ता कहते हैं कि पैर में धातु की चीजें पहनिए तो ज्यादा बढ़िया है; धागा-वागा बांधने वाली प्रक्रिया कम किया करें।
पैर में धातु की चीजों को पहनिए तो ज्यादा बढ़िया है, वक्ता कहते हैं। धागा-वागा बांधने वाली प्रक्रिया कम किया करें।
दांपत्य के लिए भगवती, शिव-शक्ति का पूजन और शांभ शिव का जप
पति-पत्नी का संबंध अच्छा हो इसके लिए क्या पूजन करें?
हस्बैंड-वाइफ का रिलेशनशिप अच्छा हो, इसके लिए, वक्ता कहते हैं, भगवती का पूजन करें, शिव-शक्ति का पूजन करें, शांभ शिव का जप करें — भगवती और शिव जी का जितना पूजन हो सकता है करें।
हस्बैंड-वाइफ का रिलेशनशिप अच्छा हो, उसके लिए, वक्ता कहते हैं, भगवती का पूजन करें, शिव-शक्ति का पूजन करें, शांभ शिव का जप करें। भगवती और शिव जी का जितना पूजन हो सकता है, करें।
पहले मुख्य द्वार ठीक करें, फिर सहस्रनाम, अभिमंत्रित जल और शांति मंत्र
घर में चिड़चिड़ापन और अकारण क्रोध हो गया हो तो क्या करें?
अगर बहुत चिड़चिड़ापन हो गया है, अकारण ही क्रोध आदि बन रहा है, तो, वक्ता कहते हैं, घर में सबसे पहला काम यह कीजिए कि मुख्य द्वार की स्थिति क्या है वह देखिए। मुख्य द्वार गंदा न हो, आसपास जूता-चप्पल न खोला जाता हो — इन सब चीजों को पहले ठीक कीजिए। फिर घर में आप जिस देवता का पूजन-पाठ करते हैं उनका सहस्रनाम आदि का पाठ कीजिए, अभिमंत्रित जल घर में छिड़किए, शांति मंत्र का पाठ कर सकते हैं तो कीजिए। धीरे-धीरे, वे कहते हैं, अवश्य रिलीफ होगा।
एक श्रोता बताते हैं कि बहुत चिड़चिड़ापन हो गया है, अकारण ही क्रोध आदि बन रहा है। अगर इस प्रकार का विषय है, वक्ता कहते हैं, तो घर में सबसे पहला कार्य यह कीजिए कि मुख्य द्वार की स्थिति क्या है, वह देखिए। मुख्य द्वार गंदा न हो, आसपास जूता-चप्पल न खोला जाता हो। उन सभी चीजों को पहले ठीक कीजिए। उसके पश्चात घर में आप जो पूजन-पाठ करते हैं, जिस देवता का, उनका सहस्रनाम आदि का पाठ कीजिए। अभिमंत्रित जल घर में छिड़किए, शांति मंत्र का पाठ कर सकते हैं तो वह कीजिए। तो धीरे-धीरे, वे कहते हैं, आपको अवश्य रिलीफ होगा।
बिना बीज मंत्र के पंचमुखी हनुमान कभी नहीं
बीज मंत्र के साथ पंचमुखी हनुमान दीक्षित होकर ही करें — और बिना बीज के कभी नहीं
दीक्षित होकर पंचमुखी हनुमान को बिना बीज मंत्र के कर सकते हैं क्या — इस पर वक्ता कहते हैं कि ऐसा करना ही नहीं है। करना है तो बीज मंत्र के साथ ही करेंगे।
एक श्रोता पूछते हैं कि दीक्षित होकर पंचमुखी हनुमान को बिना बीज मंत्र के कर सकते हैं क्या। ऐसा, वक्ता कहते हैं, करना ही नहीं है। करना है तो बीज मंत्र के साथ ही करेंगे।
ब्राह्मण के लिए भी बिना प्रणव
ब्राह्मण हों, जनेऊ हुआ हो, तब भी प्रणव के साथ नहीं करना चाहिए — शिव महापुराण देखिए
जो श्रोता कहते हैं कि वे ब्राह्मण हैं, जनेऊ हुआ है, उनसे वक्ता कहते हैं कि फिर भी प्रणव के साथ नहीं करना चाहिए। बिना प्रणव के शिव महापुराण का अवलोकन कीजिए, वे कहते हैं, आपको पता चल जाएगा।
एक श्रोता कहते हैं कि वे ब्राह्मण हैं, जनेऊ हुआ है। फिर भी, वक्ता कहते हैं, प्रणव के साथ नहीं करना चाहिए। बिना प्रणव के शिव महापुराण का अवलोकन कीजिए, वे कहते हैं — आपको पता चल जाएगा।
अपने ही घर की अपूज्य उपस्थिति से हानि
घर की अपूज्य उपस्थिति, जिसे न गति मिल रही हो न जगह और कोई दूसरा जिसका दुरुपयोग कर रहा हो, स्वयं कष्ट देगी
वक्ता कहते हैं कि औघड़ स्वयं श्मशान रूप से हानि कर सकता है — और वह आपके अपने ही घर की अपूज्य उपस्थिति के प्रयोग से ही करेगा। अगर आप उसे अपूज्य रखेंगे — घर में उपस्थित है, उसकी गति नहीं हो पा रही, कोई जगह नहीं दी जा रही, और कोई अन्य उसका प्रयोग, दुरुपयोग कर रहा है — तब वह कष्ट देगा।
औघड़ स्वयं श्मशान रूप से हानि कर सकता है, वक्ता कहते हैं, और वह आपके अपने घर की ही अपूज्य उपस्थिति के प्रयोग से ही करेगा। अगर आप उसे अपूज्य रखेंगे — घर में उपस्थित है, उसकी गति भी नहीं हो पा रही, उसे कोई जगह भी नहीं दी जा रही, और कोई अन्य उसका प्रयोग, दुरुपयोग कर रहा है — तब, वे कहते हैं, वह फिर कष्ट देगा।
तपोबल से सवारी का सामर्थ्य इतना बढ़ाना कि कोई बांध न सके
कोई बार-बार सवारी का बंधन करवाने का प्रयास कर रहा हो तो क्या करें?
अगर कोई बार-बार सवारी का बंधन करवाने का प्रयास कर रहा है, वक्ता कहते हैं, तो सवारी का सामर्थ्य तपोबल के द्वारा बढ़ाना चाहिए। सामर्थ्य इस स्तर तक ले जाइए कि बंधन करने वाला व्यक्ति फटकर चार हो जाए। वे कहते हैं कि उन्होंने ऐसी-ऐसी साधिकाएँ देखी हैं जिन पर भगवती की प्रचंड शक्तियाँ आ जाती हैं तो अच्छे-अच्छे जानकार, कामाख्या साधक लोग बांधने में फट जाते हैं, बांध नहीं पाते — बाल हाथ में लेकर बोल देते हैं कि हम नहीं बांध पाएँगे, बंध नहीं पा रही है। यह तब होता है जब साधिका या साधक में सामर्थ्य हो, जप-तप करने वाला हो, भगवती में श्रद्धा हो: तब जगदंबा जिस स्वरूप, जिस तत्व के साथ जो योगिनी उपस्थित हैं, उनमें इतना सामर्थ्य रहेगा कि उन्हें कोई बांध नहीं सकेगा।
एक श्रोता कहते हैं कि कोई बार-बार सवारी का बंधन करवाने का प्रयास कर रहा है। तो, वक्ता कहते हैं, सवारी का सामर्थ्य आपको तपोबल के द्वारा बढ़ाना चाहिए। सामर्थ्य इस स्तर तक ले जाइए कि जो बंधन करने वाला व्यक्ति है, वह फटकर चार हो जाए। वे कहते हैं कि उन्होंने ऐसी-ऐसी साधिकाओं को देखा है — जिनके ऊपर जब भगवती की प्रचंड शक्तियाँ आ जाती हैं तो अच्छे-अच्छे जानकार लोग, कामाख्या साधक लोग बांधने में फट जाते हैं, बांध नहीं पाते। बाल हाथ में लेकर बोल देते हैं कि हम नहीं बांध पाएँगे, बंध नहीं पा रही है। यह होता है, वे कहते हैं, जब साधिका में सामर्थ्य रहे, साधक में सामर्थ्य रहे, जप-तप करने वाला व्यक्ति हो, भगवती में श्रद्धा हो: तब जगदंबा जिस स्वरूप के साथ, जिस तत्व के साथ जो योगिनी उपस्थित हैं, उनमें इतना सामर्थ्य रहेगा कि उन्हें कोई बांध नहीं सकेगा।
भगत और सवारी वाली संस्कृति की आलोचना, और शक्ति से एकाकार होने का आदर्श
तपोबल इतना बढ़ाइए कि प्रयोग करने वाले के अपने देवता उसी पर पलटें, और सवारी को आकर बोलना न पड़े
जो बांधने वाले, खिलाने वाले और अहित करने वाले ऊर्जाओं से छेड़छाड़ करते हैं, उनके लिए, वक्ता कहते हैं, बहुत अच्छा "ऑफर" है: जप-तप करके अपना तपोबल इतना कर लीजिए कि जब सामने वाला प्रयास करे तो उसी के देवता उसे फाड़ दें — वह बिना देखे कि सामने कौन है, मरवाने के लिए भेज रहा है। आपके देवता कमजोर हों, आप तपोबल न बढ़ाएँ, केवल खेलने-खिलाने में रहें, तो यही होगा। भगत वाले और सवारी खेलने वाले लोगों की सबसे नकारात्मक चीज उन्हें यह लगती है कि मैक्सिमम लोग कभी बृहद जप नहीं करते; सवारी आ रही है, खेल रही है, जो बोल रही है बोल रही है, और दिन भर उसी में लगे रहकर मजाक बना देते हैं — यूट्यूब पर भी यही सब होता है। आसन शुद्ध कीजिए, आसन पर बैठिए, मंत्रों का जप कीजिए, कवच का पुरश्चरण कीजिए। सवारी आने के समय ऐसी स्थिति हो कि सवारी को आपके शरीर पर आकर बोलना न पड़े: एकाकार हो जाएँ, आँख बंद करें, उनके नेत्र और आपके नेत्र एक हो जाएँ, उनके नेत्र से आप दिव्य चीजें देख सकें। तभी साधक अपनी शक्तियों का प्रॉपर सही यूज कर पाएगा।
ये जो बांधने वाले, खिलाने वाले और अहित करने वाले, ऊर्जाओं के साथ छेड़छाड़ करने वाले हैं, उनके लिए, वक्ता कहते हैं, बहुत अच्छा "ऑफर" रहता है: अपना जप-तप करके तपोबल इतना कर लीजिए कि जब सामने वाला व्यक्ति प्रयास करे तो अपने ही किए में पिस जाए। उसी के देवता उसे फाड़ देंगे — वह मरवाने के लिए भेज रहा है, सामने कौन है दिखाई नहीं दे रहा, बिना जाने-सुने प्रयोग कर लेगा। लेकिन आपके देवता कमजोर हों, आप तपोबल न बढ़ाएँ, केवल खेलने-खिलाने में रहें, तो यही होगा। भगत वाले लोग और सवारी खेलने वाले लोगों की सबसे नकारात्मक चीज उन्हें यह लगती है कि ये अंड-बंड कार्य करते रहते हैं। वे एक श्रोता को नहीं, सभी को बोल रहे हैं; मैक्सिमम लोग इसमें ऐसे होते हैं। कभी बृहद जप नहीं करेंगे। सवारी आ रही है, खेल रही है, जो बोल रही है बोल रही है — नहीं तो दिन भर उसी में लगे रहेंगे, मजाक बनाकर रख देंगे: जप-तप, सवारी आ रही है, ये आ गए, वो आ गए। यूट्यूब पर भी यही सब कांड होते रहते हैं। कहाँ से होगा? बकरफिली करने से नहीं होगा न भाई, ऊर्जा को बढ़ाइए। जप-तप के पूरे विषय दिए गए हैं, वे कहते हैं। आसन शुद्ध कीजिए, आसन पर बैठिए, मंत्रों का जप कीजिए, कवच का पुरश्चरण कीजिए। सवारी आने के समय ऐसी स्थिति हो कि सवारी को आपके शरीर के ऊपर आकर बोलना न पड़े। एकाकार हो जाएँ आप। आँख बंद करें — उनके नेत्र, आपके नेत्र एक हो जाएँ, उनके नेत्र से आप दिव्य चीजों को देख सकें। उनको आकर खेलकर बोलना न पड़े। तब, वे कहते हैं, वह साधक प्रॉपर अपनी शक्तियों का सही यूज कर पाएगा।
किसी भी प्रति-प्रयोग से पहले 5 लाख जप और कवच
जब कन्फर्म हो जाए कि आप पर मसान का प्रयोग हो रहा है तो करने से चूकिए मत — पर पहले सामर्थ्य हो
एक श्रोता कहते हैं कि उन पर मसान का प्रयोग हो रहा है, पता नहीं कौन कर रहा है, महाभैरव कर चुके हैं। जब एकदम कन्फर्म हो जाए, वक्ता कहते हैं, कि तंत्र का प्रयोग किया जा रहा है, बार-बार किया जा रहा है, जब आभास हो जाए — तो भैया करने से चूकिए मत। वे खोलकर इसलिए नहीं बोल सकते क्योंकि द्वेषी लोग तुरंत आपको ही चढ़ाने लगेंगे कि अरे कुछ हो जाएगा; इसलिए ओपनली नहीं बोलते, लेकिन एक बात ध्यान में रखिए: सामर्थ्यवान होने के लिए क्या-क्या होना चाहिए? पंचाक्षरी का, या अपने इष्ट-आराध्य के मंत्रों का 5 लाख तक जप किए हों, और कवच अवश्य किए हों।
एक श्रोता कहते हैं कि उन पर मसान का प्रयोग हो रहा है, कौन कर रहा है पता नहीं, महाभैरव कर चुके हैं, प्रयोग कर दें? जब एकदम कन्फर्म हो जाए, वक्ता कहते हैं, कि तंत्र का प्रयोग किया जा रहा है, बार-बार किया जा रहा है, जब आभास हो जाए — तो भैया, करने से चूकिए मत। वे खोलकर इसलिए नहीं बोल सकते, वे कहते हैं, क्योंकि जो द्वेषी व्यक्ति हैं वे तुरंत आपको ही चढ़ाने लगेंगे कि अरे, कुछ हो जाएगा; ऐसे कई लोग होते हैं, इसलिए वे भी ओपनली नहीं बोलते। लेकिन एक बात ध्यान में रखिए। सामर्थ्यवान होने के लिए क्या-क्या चीज होनी चाहिए? पंचाक्षरी का जप किए हों, या अपने इष्ट-आराध्य के मंत्रों का 5 लाख तक जप किए हों। कवच अवश्य किए हों।
सुरक्षा का बंधन — घर बंधा हुआ, चौखट की सुबह-शाम सेवा, और बलि से मजबूत
तांत्रिक बंधन का सकारात्मक पक्ष क्या है?
अभी तक तांत्रिक बंधन का नकारात्मक पक्ष देखा, वक्ता कहते हैं; सकारात्मक पक्ष का बंधन होता है सुरक्षा का बंधन। आपका घर बंधा हुआ होना चाहिए। चौखट सकारात्मक शक्तियों के द्वारा सुरक्षित होनी चाहिए: सुबह-शाम उनकी सेवा हो, नरसिंह भगवान के निमित्त वहाँ दीप दान हो, कुल भैरव और कुल शक्ति के निमित्त वहाँ दीप दान होता रहे। चौखट पर बलि देने की भी प्रक्रिया है — नींबू-नारियल की बलि देकर मजबूत रखिए, जायफल की बलि देकर मजबूत रखिए। ताकि जब आप पर कोई तंत्र का प्रयोग कर भी दे और आप महाभैरव, वामती काली या जंजीरा के द्वारा उसे पलटें, और सामने वाला तैयार बैठा हो कि आओ तुम पलटो हम भी पलटेंगे, तो उसके पलटने से आप पर कोई दुष्प्रभाव न पड़े।
जो भी प्रयोग करने वाले होते हैं उन्हें क्या-क्या करना चाहिए, वक्ता कहते हैं, क्योंकि आज का विषय तांत्रिक बंधन है। अभी तक इसका नकारात्मक पक्ष देखा; सकारात्मक पक्ष का बंधन क्या होता है? वह बंधन होता है सुरक्षा का बंधन। आपका घर बंधा हुआ होना चाहिए। चौखट सकारात्मक शक्तियों के द्वारा सुरक्षित होनी चाहिए। सुबह-शाम उनकी सेवा हो; नरसिंह भगवान के निमित्त वहाँ दीप दान हो; कुल भैरव के निमित्त, कुल शक्ति के निमित्त वहाँ दीप दान आदि होता रहे। और चौखट पर बलि देने की भी प्रक्रिया है: नींबू-नारियल आदि की बलि देकर उसे मजबूत रखिए, जायफल की बलि देकर मजबूत रखिए। ताकि जब आपके ऊपर कोई तंत्र का प्रयोग कर भी दे, हो भी जाए, तो आप जब उसे पलटें — महाभैरव के द्वारा, वामती काली के द्वारा, जंजीरा आदि के द्वारा — और सामने वाला व्यक्ति तैयार बैठा हो कि आओ तुम पलटो तो हम भी पलटेंगे, तो उसके पलटने से आपके ऊपर कोई दुष्प्रभाव न पड़े।
भौतिक कवच, प्रयोग के समय हवन, और दोष से बचाने वाला पूजन
परिवार के हर सदस्य के गले में भौतिक कवच, हर प्रयोग के साथ हवन, और सफलता के बाद विशेष पूजन
परिवार के प्रत्येक सदस्य के शरीर में कवच होना चाहिए, वक्ता कहते हैं — भौतिक कवच, केवल तांत्रिक विद्या वाला कवच नहीं, क्योंकि उसे किसी ने खंडित कर दिया तो गड़बड़ हो जाएगी। सबके गले में भौतिक कवच हो, सबका शरीर बंधित, सुरक्षित हो; वे लोग पूजन-पाठ भी करें तो अति उत्तम। उसके बाद गृह बंधन हो, चौखट की सुरक्षा हो। पहले मजबूत हों, फिर ये प्रक्रियाएँ करें, और करने के बाद भगवान शिव का पूजन-हवन करें। कभी भी तांत्रिक प्रयोग करें तो हवन अवश्य करें — प्रयोग के समय हवन से शक्तियों का बल हजारों-हजार गुना बढ़ा रहता है। और प्रयोग सफल होने के बाद भी देवता का उस निमित्त विशेष पूजन अवश्य करें; इससे दोष नहीं लगता।
परिवार के प्रत्येक सदस्य के शरीर में कवच होना चाहिए, वक्ता कहते हैं। भौतिक कवच — केवल तांत्रिक विद्या वाला कवच नहीं, वह तो फिर किसी ने खंडित कर दिया, कुछ हो गया, तो गड़बड़ हो जाएगी। तो भौतिक कवच सबके गले में हो; सबका शरीर बंधित हो, सुरक्षित हो। वे लोग पूजन-पाठ भी करें तो अति उत्तम है। उसके पश्चात गृह बंधन हो, चौखट की सुरक्षा आदि हो। आप मजबूत हों, उसके बाद इन प्रक्रियाओं को करें, और करने के बाद भगवान शिव का पूजन-हवन आदि कर लें। कभी भी तांत्रिक प्रयोग करें, वे कहते हैं, तो हवन अवश्य करें। प्रयोग के समय हवन अवश्य करना है — उससे शक्तियों का बल कई गुना, हजारों-हजार गुना बढ़ा रहता है। और प्रयोग सफल होने के पश्चात भी देवता का उस निमित्त विशेष पूजन आदि अवश्य करना चाहिए। इससे, वे कहते हैं, दोष नहीं लगता।
पंचाक्षरी सबके लिए, और बिना यज्ञोपवीत वालों के लिए लघु गायत्री
क्या बिना गुरु के पंचाक्षरी का जप कर सकते हैं?
बिल्कुल, वक्ता कहते हैं — लिखित है कि बिना गुरु के पंचाक्षरी जप कर सकते हैं। चैनल पर बृहद रूप से वीडियो है कि पंचाक्षरी का जप किसको कैसे करना है, चारों वर्ण का कैसे होगा, जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ वे कैसे करेंगे, माताएँ-बहनें कैसे करेंगी, विनियोग-न्यास सहित; उसे अच्छे से देख-सुन लीजिए, फिर कीजिए। पंचाक्षरी सबके लिए है। गायत्री यज्ञोपवीत धारण करने वालों के लिए है; जो यज्ञोपवीत धारण नहीं करते उनके लिए लघु गायत्री पंचाक्षरी ही है। तो या तो 10 माला गायत्री करो, या 10 माला पंचाक्षरी, या 10 माला जिस संप्रदाय-पंथ-परिवार में आपकी दीक्षा हुई है उनका करो।
बिल्कुल, वक्ता कहते हैं — बिना गुरु के पंचाक्षरी जप कर सकते हैं, लिखित है। केवल इससे संबंधित वीडियो चैनल पर बृहद रूप से है: पंचाक्षरी का जप किसको कैसे करना है, चारों वर्ण का कैसे होगा, जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ है वह कैसे होगा, माताएँ-बहनें कैसे करेंगी, विनियोग-न्यास सहित। उसको देखिए, अच्छे से सुन लीजिए, और उसके पश्चात कीजिए। पंचाक्षरी सबके लिए है। गायत्री उनके लिए है जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं; जो यज्ञोपवीत धारण नहीं करते उनके लिए लघु गायत्री पंचाक्षरी ही है — पंचाक्षरी गायत्री ही है। तो या तो 10 माला गायत्री करो, या 10 माला पंचाक्षरी करो, या 10 माला जिस भी संप्रदाय, पंथ, परिवार में आपकी दीक्षा हुई है, उनका करो।
दैनिक न्यूनतम, पर्व काल, और शिव के पाँचों मुखों से उद्भूत पंचाक्षरी
रोज दीक्षा मंत्र की 10 माला, और पंचाक्षरी को गायत्री-समकक्ष पंचाननी विद्या क्यों कहा गया
वे स्वयं महादुर्गा कुल के हैं, वक्ता कहते हैं, तो महादुर्गा मंत्र की प्रतिदिन मिनिमम 10 माला अवश्य करनी चाहिए। दीक्षा हो गई, शुरू में बस माला मिली और अब कुछ कर ही नहीं रहे, तो कुछ होगा नहीं — जो मिला उसे कीजिए, और नहीं मिला तो पंचाक्षरी कीजिए। जहाँ तीन दिन का भी पूजन पूर्ण कर लेते हैं, कई ऐसे पर्व काल होते हैं जिनका पता भी नहीं चलता और उनमें जप-तप हो जाता है, तो वह विद्या बढ़ेगी। पंचाक्षरी विद्या, पंचाननी विद्या, अपने आप में सर्व समर्थ विद्या है, गायत्री की समकक्ष: दोनों एक ही समय एक ही प्रकार से उद्भव हुई हैं, भगवान शिव के पाँचों मुखों से। और सबसे बड़ी बात, इसे करने का अधिकार सबको है — तो निश्चिंत होकर कीजिए।
अब वे स्वयं महादुर्गा कुल के हैं, वक्ता कहते हैं, तो महादुर्गा मंत्र का प्रत्येक दिन मिनिमम 10 माला अवश्य करना चाहिए। दीक्षा हो गई, शुरू में बस माला मिली थी, और अब कर ही नहीं रहे हैं, कुछ हो ही नहीं रहा — तो फिर जब कुछ नहीं होगा तो दिक्कत होगी। जो आपको मिला उसको कीजिए, और नहीं मिला है तो पंचाक्षरी कीजिए। जहाँ तीन दिन का भी आप अपना पूजन पूर्ण कर लेते हैं, कई सारे ऐसे पर्व काल होते हैं — आपको पता भी नहीं चलता — और उसमें आप जप-तप कर लेते हैं; भैया, वह विद्या बढ़ेगी। पंचाक्षरी विद्या, पंचाननी विद्या, अपने आप में सर्व समर्थ विद्या है, गायत्री की समकक्ष है। गायत्री और यह दोनों एक ही समय, एक ही प्रकार से उद्भव हुई हैं — भगवान शिव के पाँचों मुखों से पंचाक्षरी। तो यह कीजिए, और इसमें सबसे बड़ी बात, वे कहते हैं, कि करने का अधिकार सभी को है; हर कोई कर सकता है। तो निश्चिंत होकर कीजिए।
नारायण उपस्थित हों तो उन्हें, नहीं तो शिव को, जिन्होंने पहले गीता सुनाई
पितरों के निमित्त गीता का 11वाँ अध्याय शिव मंदिर में कर सकते हैं, और समर्पित किसे करें?
हाँ, वक्ता कहते हैं: पितरों के निमित्त गीता का 11वाँ अध्याय शिव मंदिर में कर सकते हैं, और वहीं समर्पित कीजिए। लेकिन वहाँ नारायण की उपस्थिति हो तो उन्हें समर्पित करें तो ज्यादा बढ़िया; नहीं है तो शिव जी को समर्पित कीजिए — क्योंकि पूर्व काल में भगवान शिव जी के द्वारा ही श्रीमद्भगवद्गीता सुनाई गई थी। माहात्म्य पढ़िए तो पता चलेगा; तो उन्हें भी बिल्कुल समर्पित कर सकते हैं।
पितरों के निमित्त गीता का 11वाँ अध्याय शिव मंदिर में कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं, और समर्पित कहाँ करें — शिव मंदिर में कीजिए। लेकिन अगर वहाँ नारायण की उपस्थिति हो तो उन पर समर्पित करें तो ज्यादा बढ़िया है; नहीं है तो शिव जी को समर्पित कीजिए। क्योंकि पूर्व काल में, वे कहते हैं, भगवान शिव जी के द्वारा ही श्रीमद्भगवद्गीता सुनाई गई थी। माहात्म्य पढ़िए तो पता चलेगा। तो आप उनको भी बिल्कुल समर्पित कर सकते हैं।
कुंभ की बगला माला
कुंभ में मिली बगला माला पहनने के लिए है, जप के लिए नहीं
कुंभ की बगला माला के बारे में पूछने वाले श्रोता से वक्ता कहते हैं कि जाप के लिए तो नहीं मिली होगी — पहनने के लिए मिली होगी।
एक श्रोता कुंभ में मिली बगला माला के बारे में पूछते हैं। जाप के लिए तो नहीं मिली होगी, वक्ता कहते हैं; पहनने के लिए मिली होगी।
हर बार मानसिक समर्पण, और अंत में एक बार समर्पण
समर्पण के लिए आसन से उठना पड़े, या मंदिर में कई मंत्र कर रहे हों, तो समर्पण कैसे करें?
वक्ता इसे सही प्रश्न कहते हैं: जब समर्पण के लिए आसन से उठना पड़ता है, या मंदिर में या कहीं एक से अधिक मंत्र कर रहे हैं, तो वहाँ हर बार समर्पण कैसे होगा? उसमें मानसिक रूप से समर्पित करते रहिए, वे कहते हैं, और लास्ट में एक बार समर्पित कीजिए।
एक श्रोता पूछते हैं कि समर्पण के लिए आसन से उठना पड़ता है तो ऐसे में समर्पण कैसे करें। हाँ, वक्ता कहते हैं, यह प्रश्न सही है — एक से अधिक मंत्र मंदिर में या कहीं कर रहे हैं, तो वहाँ हर बार समर्पण कैसे होगा? उसमें, वे कहते हैं, आप मानसिक रूप से समर्पित करते रहिए, और लास्ट में एक बार समर्पित कीजिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।