साठ दिन का सावन — पंचाक्षरी अनुष्ठान, अभिषेक के नियम, और इस महीने प्रयोग क्यों मना है
सावन में शिव अभिषेक और पंचाक्षरी जप के नियम।
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दिव्य सावन की शुरुआत में गुरु पूर्णिमा पर दीक्षाधारी क्या करें?
गुरु पूर्णिमा से शुरू होने वाला दिव्य सावन
वक्ता कहते हैं कि आज का विषय गुरु पूर्णिमा से शुरू होने वाला दिव्य सावन है। आषाढ़ पूर्णिमा, यानी गुरु पूर्णिमा के दिन, जो दीक्षाधारी हैं वे कम से कम अपने गुरु का पूजन करें। वे श्रोताओं को स्पष्टता देना चाहते हैं कि सावन में क्या-क्या किया जा सकता है, क्योंकि स्पष्टता हो तो करना आसान होता है।
लाइव की शुरुआत में वक्ता दिन का विषय बताते हैं: दिव्य सावन जो गुरु पूर्णिमा से शुरू हो रहा है। वे कहते हैं कि आषाढ़ पूर्णिमा से, गुरु पूर्णिमा के दिन, जो लोग दीक्षाधारी हैं वे कम से कम अपने गुरु जी का पूजन करें। वे बताते हैं कि यह सब क्यों कर रहे हैं: अगर श्रोताओं को पूरी स्पष्टता होगी, तो करने में आसानी होगी। इसलिए वे थोड़ा अंदाज़ा देना चाहते हैं कि सावन में और क्या-क्या किया जा सकता है।
सावन में पूरे परिवार के लिए घर में शिव स्थान कैसे बनाएँ?
अलग पाटा, थाली, शिवलिंग और एक साझा कलश
अलग पाटे पर भगवान शिव का छोटा सा स्थान बनाएँ, उस पर थाली रखें और उसमें शिवलिंग स्थापित करें। सुबह पहले खुद अभिषेक करें, फिर बाकी परिवार के लिए वहीं व्यवस्था छोड़ दें और उन्हें कहें कि नहाकर आएँ। कपूर, रोली और अक्षत मिला पानी एक बड़े कलश में रखें, जिससे वे लोटे में लेकर चढ़ाएँ। दूध की व्यवस्था हो तो दूध से अभिषेक भी करें, और सबके लिए बेलपत्र रखें।
पहले की बात संक्षेप में यह थी कि सावन के समय हमें रोज़ अपने घर के सदस्यों के लिए भी भगवान शिव का छोटा सा स्थान बनाना चाहिए — अलग पाटे पर, थाली रखकर, और उसमें शिव का शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। स्थापित करके। पहले सुबह खुद अभिषेक करें। फिर वहीं बाकी परिवार के सदस्यों के लिए भी व्यवस्था करें और उन्हें कहें: नहाकर आओ और शिव जी का अभिषेक करो। एक बड़े कलश में पानी में कपूर, रोली, अक्षत आदि मिलाकर वहाँ रख दें। उसमें से वे लोटे में थोड़ा-थोड़ा लेकर जल चढ़ाएँ। दूध की व्यवस्था हो तो दूध से अभिषेक करें। और सबके लिए बेलपत्र रखा रहे, जिसे वे शिव जी के सिर पर रखते जाएँ।
शिवलिंग का सिर कभी खाली क्यों नहीं छोड़ना चाहिए?
ब्रह्मांड के राजा का सिर कभी खाली नहीं छोड़ा जाता
वे कहते हैं कि हर सदस्य को बताया जाए कि शिव जी का सिर खाली नहीं रहना चाहिए। वे इस ब्रह्मांड के राजा हैं, और राजा का सिर कभी खाली नहीं छोड़ा जाता। जिस घर में शिवलिंग का सिर खाली रहता है, वहाँ कभी न कभी अकाल और दरिद्रता आती है, और शाप पूरी तरह लग जाता है। या तो उनके लिए मुकुट की व्यवस्था करें, या उनके सिर पर बेलपत्र या एक साबुत चावल का दाना रखें।
वे कहते हैं, यह ध्यान रखें और सब सदस्यों को बताएँ: शिव जी का सिर खाली नहीं रहना चाहिए। वे इस ब्रह्मांड के राजा हैं, और राजा का सिर कभी खाली नहीं छोड़ा जाता। जिस घर में शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। का सिर खाली रहता है, वहाँ कभी न कभी अकाल और दरिद्रता आती है, और शाप पूरी तरह लग जाता है। वे बताते हैं कि यह बात वे कई लाइव में कह चुके हैं। इसलिए या तो उनके लिए मुकुट की व्यवस्था करें — कान्हा जी के लिए जो बड़े सजावटी मुकुट मिलते हैं, वह भी लाकर शिवलिंग पर रखा जा सकता है, उन्हें राजा की तरह सजाकर। या उनके सिर पर बेलपत्र रखें, या एक साबुत चावल का दाना रखें। पर उन्हें ऐसे ही, बिना कुछ रखे, नहीं छोड़ना चाहिए।
अभिषेक से चढ़ावा हट जाए तो परिवार के सदस्य क्या करें?
हर अभिषेक के बाद अक्षत फिर से रखना
जब परिवार का हर सदस्य अभिषेक करेगा, तो सिर पर चढ़ाया चावल या बेलपत्र धुल जाएगा। जैसे ही वह हटे, उन्हें बताएँ कि अभिषेक के बाद फिर से उन पर अक्षत आदि रखें। उन्हें पहले से बता देना चाहिए कि ऐसा करना है।
वे कहते हैं कि परिवार के जो भी सदस्य अभिषेक करेंगे, उनके करने पर सिर पर चढ़ा चावल और बेलपत्र हट जाएगा। जैसे ही वह हटे, उन्हें बताएँ कि अभिषेक करने के बाद फिर से उन पर अक्षत आदि रखें। इसके लिए उन्हें पहले से बता देना चाहिए कि ऐसा करना है।
अभिषेक के बाद शिवलिंग पर शहद या घी लगा छोड़ देना क्या ठीक है?
मधु और घी को जल से धोना ज़रूरी है
नहीं। वे कहते हैं कि कुछ लोग मंदिर जाकर शिव जी पर शहद चढ़ाते हैं, उन पर लपेट देते हैं और बिना जल डाले वैसे ही छोड़ देते हैं। शहद लगाकर छोड़ा नहीं जाता। उसे रगड़कर हटाएँ और भाव से ठीक से स्नान कराएँ, फिर कम से कम चार-पाँच लोटे जल से दोबारा अभिषेक करके साफ़ करें। उसके बाद ही गंध लेपन या त्रिपुंड करें। घी के लेप पर भी यही नियम है, और घर में भी यही मानना है।
वे कहते हैं कि अगर कुछ लोग पंचामृत से, मधु या घी आदि से अच्छे से अभिषेक कर रहे हैं, तो उन्हें यह न कहें कि शहद डालकर छोड़ दो। कुछ लोग मंदिर जाते हैं, शिव जी पर शहद चढ़ाते हैं, उन पर लपेट देते हैं, और बिना जल डाले वैसे ही छोड़ देते हैं। शहद लगाकर छोड़ा नहीं जाता। उसे अच्छे से रगड़कर हटाएँ और भाव से अच्छी तरह स्नान कराएँ। उसके बाद कम से कम चार-पाँच लोटे जल से फिर अभिषेक करें और साफ़ करके ठीक से स्नान कराएँ। फिर गंध लेपन आदि करके छोड़ सकते हैं — त्रिपुंड बनाया जा सकता है, गंध लेपन किया जा सकता है। वे दोहराते हैं कि उन्हें ऐसे शहद डालकर नहीं छोड़ना चाहिए। घी का लेप करें तो उसके बाद भी जल से अभिषेक करना चाहिए। घर में भी यही बात माननी है।
क्या ताँबे के लोटे से शिव को दूध चढ़ाया जा सकता है?
ताम्र लोटे से दूध नहीं
वे साफ़ कहते हैं: ताँबे के लोटे से दूध न चढ़ाएँ। यह ध्यान रखें। मंदिर में करने वाले किसी विशेष विधि विधान से जो करते हैं, या जैसा किसी पंडित जी ने कहा है, वह अलग बात है।
वे कहते हैं, ताँबे के लोटे से दूध न चढ़ाएँ — यह ध्यान रखें। वे इसे उससे अलग बताते हैं जो मंदिर में किसी विशेष विधि विधान से होता है — करने वाले जो करते हैं, जैसे करते हैं, जो भी विधि विधान हो और जिस पंडित जी ने जो कहा हो।
बिहार के पंडित घर में शिवलिंग या काली मूर्ति रखने के बारे में क्या कहते हैं?
सासाराम की मनाही, जिसे वे नहीं मानते
वे बताते हैं कि बिहार के सासाराम के एक श्रोता, रविकांत राय जी ने फ़ोन पर बताया कि उनके इलाके के पंडित जी कहते हैं कि घर में शिवलिंग और नर्मदा शालिग्राम शिला नहीं रखनी चाहिए, और काली जी की मूर्ति नहीं रखनी चाहिए। वे कहते हैं कि जिसके घर में शिवलिंग है उसे परेशानी ज़रूर होगी। वक्ता कहते हैं कि बिहार के इलाकों में यह स्थिति अब भी चल रही है और पंडित जी अब भी ऐसा बोल रहे हैं, और वे इसे नहीं मानते।
बिहार के सासाराम के एक श्रोता, रविकांत राय जी ने उन्हें फ़ोन पर बताया कि उनके इलाके के पंडित जी कहते हैं कि घर में शिवलिंग और नर्मदा शालिग्राम शिला नहीं रखनी चाहिए, और काली जी की मूर्ति नहीं रखनी चाहिए। वे कहते हैं, अब भी यह बात चल रही है — सोचिए, बिहार के इलाकों में लोगों को घर में शिवलिंग की पूजा नहीं करने दे रहे। कह रहे हैं कि जिनके घर में शिवलिंग है उन्हें परेशानी ज़रूर होगी। अब भी यह स्थिति है, और पंडित जी ऐसा बोल रहे हैं। उनका उत्तर है कि कौन क्या कह रहा है, इस पर नहीं चलना चाहिए। वे कहते हैं, इसीलिए वे बोलते हैं — क्योंकि कोई आपको कहेगा कि इसमें कोई दोष नहीं, कुछ नहीं हो सकता, आराम से करो।
ताँबे के बर्तन में दूध को विष के समान क्यों माना जाता है?
ताँबा और दूध, और चाँदी का विकल्प
वे कहते हैं कि ताँबे के लोटे में दूध डालकर चढ़ाएँ तो वह विष के बराबर है। ताँबे के लोटे में दूध नहीं चढ़ाया जाता। यह गलती न करें। सामर्थ्य हो तो चाँदी में चढ़ाएँ। अगर कोई पंडित जी फिर भी चढ़ा रहे हैं, तो उनके पास इसके पीछे कोई विशेष ज्ञान है — जैसे नीलकंठ अघोरास्त्र जैसे अस्त्र मंत्रों का प्रयोग।
वे कहते हैं कि अगर आप ताँबे के लोटे में दूध डालकर चढ़ाते हैं, तो वह विष के बराबर है। ताँबे के लोटे में दूध नहीं चढ़ाया जाता। यह ध्यान रखें, यह गलती न करें। सामर्थ्य हो तो चाँदी में चढ़ाएँ। अब अगर कोई पंडित जी चढ़ा रहे हैं, तो उनके पास कोई विशेष ज्ञान है, इसलिए वे चढ़ा रहे हैं। कुछ मंत्र होते हैं जो काम में आते हैं — जैसे अस्त्र मंत्र, जैसे नीलकंठ अघोरास्त्र। अगर कोई उसका प्रयोग कर रहा है, तो वह अलग बात है।
शिव अभिषेक के लिए ताँबे का लोटा कौन इस्तेमाल कर सकता है?
मंदिर में अस्त्र मंत्र के साधक, आम गृहस्थ नहीं
वे अपने कोर ग्रुप की बात करते हैं — दस-पंद्रह लोग जो यूट्यूब चैनल बनने से भी पहले से उनके साथ हैं, और जो बृहद विधि से अघोरास्त्र जैसे मंत्रों की साधना करते आ रहे हैं। जब वे उन मंत्रों से मंदिर में अभिषेक करते हैं, तो ताँबे का लोटा इस्तेमाल कर सकते हैं। पर आम गृहस्थ साधक, या आम व्यक्ति जो केवल भक्ति से अपनी इच्छा पूरी करने के लिए शिव की सेवा-पूजा करने जाता है, उसे ताँबे के लोटे में दूध भरकर, शहद डालकर अभिषेक नहीं करना चाहिए।
उदाहरण के लिए वे अपने कोर ग्रुप के सदस्यों का नाम लेते हैं — जो बिल्कुल शुरुआत से जुड़े, उस समय से जब उनका यूट्यूब चैनल भी नहीं था; ऐसे दस-पंद्रह लोग हैं। वे सब बृहद विधि से अघोरास्त्र मंत्र आदि की साधना करते आ रहे हैं, इस बार भी करेंगे, और उन मंत्रों से अभिषेक करेंगे। जब वे मंदिर में ऐसा करेंगे, तो उसमें ताँबे का लोटा इस्तेमाल कर सकते हैं। वे बताते हैं कि उन मंत्रों में हर एक की अपनी अलग विधि है, और वे बस एक उदाहरण दे रहे हैं। पर आम गृहस्थ साधक, या आम व्यक्ति जो बस भक्ति से भगवान शिव की सेवा-पूजा करने जाता है और अपनी इच्छाएँ पूरी होने की माँग करता है — अगर वह ताँबे के लोटे में दूध भरे, उसमें शहद डाले, सब ले जाए और उससे अभिषेक करे, तो यही गलती है। वे आपत्ति की कल्पना करते हैं: पर ताम्रपात्र की तो बड़ी महिमा है, यहाँ लिखा है, आप कैसे मना कर सकते हैं?
आम भक्त कौन सी धातु इस्तेमाल करे, और सुहागन स्त्रियों के लिए क्या नियम है?
पीतल सबसे अच्छा; सुहागन स्त्रियाँ ताँबे से बचें
वे उत्तर देते हैं कि मंदिर सार्वजनिक चीज़ है — आपको यह निजी तौर पर नहीं करना है। जहाँ कोई विशेष कामना है और लिखा है कि उस कामना के लिए ऐसा करें, वहाँ करें। सामान्य रूप से, सब इच्छाओं की पूर्ति के लिए पीतल का लोटा इस्तेमाल करें; वह सबसे अच्छा है। और वे वह मनाही दोहराते हैं जो वे बार-बार कहते हैं: सुहागन स्त्रियाँ भगवान सूर्यनारायण और भगवान शिव को जल चढ़ाते समय ताँबा इस्तेमाल न करें, उसकी जगह पीतल लें।
ताम्र पात्र, यानी ताँबे का लोटा — वे उत्तर देते हैं कि मंदिर में वह सार्वजनिक चीज़ है, और आपको यह निजी तौर पर नहीं करना है। जहाँ कोई विशेष कामना है, जहाँ लिखा है कि इस कामना के लिए ऐसा करें, वहाँ आप कर सकते हैं। सामान्य रूप से, सब इच्छाओं की पूर्ति के लिए पीतल का लोटा इस्तेमाल करें — वह सबसे अच्छा है। और वे कहते हैं कि वे बार-बार बताते हैं कि सुहागन स्त्रियाँ ऐसा न करें। मानना या न मानना आपकी मर्ज़ी है, वे जोड़ते हैं; वे किसी पर ज़ोर नहीं डाल सकते। सुहागन स्त्रियाँ भगवान सूर्यनारायण को जल और भगवान शिव को जल चढ़ाते समय ताँबा इस्तेमाल न करें, उसकी जगह पीतल इस्तेमाल करें।
तंत्र में गुड़ और जल वाला ताँबे का बर्तन असल में कहाँ इस्तेमाल होता है?
रुद्रगण साधना और कच्चे कलवे
वे कहते हैं कि ताँबे में शहद डालेंगे तो वह वैसे भी विष बन जाएगा। जब रुद्रगण साधना होती है, रुद्र के विशेष गणों का कोई प्रयोग होता है, और उनकी विधि में कच्चे कलवे इस्तेमाल होते हैं, तब उन्हें जो प्रसादी या धार दी जाती है वह ताँबे के लोटे में ही, गुड़ और पानी डालकर, बाँधी जाती है — और वही विष है। वे कहते हैं कि तंत्रोक्त विधान में भी यह साफ़ लिखा है।
वे कहते हैं कि अगर आप ताँबे में कोई शहद डालेंगे, तो वैसे भी वह विष बन जाएगा। जब हम रुद्रगण साधना करते हैं, और रुद्र के विशेष गणों का कोई प्रयोग होता है, जब उनकी विधि में कच्चे कलवे — कच्चे कलवे — इस्तेमाल होते हैं, तब हम उन्हें जो प्रसादी देते हैं, या जो धार देते हैं, वह ताँबे के लोटे में ही, गुड़ और पानी डालकर, बाँधी जाती है। वही चीज़ विष है। वे कहते हैं कि तंत्रोक्त विधान में भी साफ़ बताया गया है कि यह यही है।
कौन सा विधान साफ़ तौर पर ताँबे का बर्तन माँगता है?
अष्ट भैरव पूजन और ताम्र पात्र शोधन
जब भैरव जी को दिया जाता है, जब अष्ट भैरवों का पूजन होता है, तब वहाँ साफ़ लिखा है कि केवल ताँबे का लोटा इस्तेमाल करना है — ताँबे का बर्तन, ताम्र पात्र शोधन के साथ। उसके बाद एक विशेष मुद्रा दिखाकर एक विशेष तरीके से जल डालना है। वे पूरी बात बताने से मना करते हैं। जहाँ ऐसा विधान नहीं है, वहाँ पीतल या मिट्टी का बर्तन इस्तेमाल होता है।
वे कहते हैं, जब भैरव जी को दिया जाता है, जब अष्ट भैरवों का पूजन होता है, तब वहाँ साफ़ बताया गया है कि केवल ताँबे का लोटा इस्तेमाल करना है — ताँबे का बर्तन, ताम्र पात्र शोधन। और उसके बाद — वे कहते हैं कि पूरी बात नहीं बता सकते — उसके बाद यह मुद्रा दिखाकर इस तरह जल डालना है। वहाँ वह चीज़ होगी। जहाँ ऐसा नहीं है, वहाँ या तो पीतल इस्तेमाल होता है, या मिट्टी का बर्तन। वे जोड़ते हैं कि अधूरी जानकारी बताकर यह नतीजा नहीं निकालना चाहिए कि वे मनमर्ज़ी से बोल रहे हैं; ऐसा नहीं है।
ताँबे की प्रथा पर ज़ोर देने वालों का कुछ नहीं जाता; नुकसान उसका होता है जो उनके पीछे चलता है।
ज़ोर देने वाले का कुछ नहीं जाता; नुकसान आपका है
वे कहते हैं कि जो इस पर ज़ोर देते हैं, या इसके लिए शास्त्र के बहुत से तर्क देते हैं, उनका खुद कुछ नहीं जाता। साफ़ बात है, उनका कुछ नहीं जाएगा; आपका जाएगा। गलती न करें, इससे बचें। जो कहते हैं कि वे बचपन से कर रहे हैं और कुछ नहीं हुआ, उनसे वे कहते हैं: करो भाई, मेरा काम बताना था।
वे कहते हैं, जो इस पर ज़ोर देते हैं, या इसके लिए शास्त्र से बहुत सारे तर्क देते हैं — उनका कुछ नहीं जाता। सीधी बात है: उनका कुछ नहीं जाएगा; आपका जाएगा। गलती न करें। इससे बचें। अब वे कहेंगे कि बचपन से कर रहे हैं और कुछ नहीं हुआ, यह हुआ, वह हुआ। वे कहते हैं, करो भाई — मुझे क्या, मेरा काम आपको बताना था।
पंचाक्षरी मंत्र पर किसका अधिकार है?
चारों वर्ण, प्रणव के साथ और बिना
शिव महापुराण की कथा से, जिसमें भगवान शिव के दिए पंचाक्षरी मंत्र की महिमा और विधि विधान विस्तार से बताए गए, वे दोहराते हैं: पंचाक्षरी पर चारों वर्णों के लोगों का अधिकार है, कोई भी इसका जप कर सकता है। जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ वे प्रणव के बिना करेंगे; जिनका यज्ञोपवीत हुआ है वे अपने गुरु का आदेश लेकर प्रणव के साथ कर सकते हैं। चौथा वर्ण और स्त्रियाँ नमः बाद में लगाकर जप करेंगे।
वे कहते हैं कि जो शिव महापुराण की कथा चल रही थी, उसमें भगवान शिव के दिए पंचाक्षरी मंत्र की महिमा और उसका विधि विधान बहुत विस्तार से बताया गया। लाइव में बहुत अच्छे से चर्चा हुई कि पंचाक्षरी पर चारों वर्णों के लोगों का अधिकार है। कोई भी इसका जप कर सकता है। जिनका यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। नहीं हुआ है वे प्रणव के बिना करेंगे। और जिनका यज्ञोपवीत हुआ है वे प्रणव के साथ कर सकते हैं — अपने गुरु का आदेश लेकर कर सकते हैं। चौथा वर्ण और स्त्रियाँ नमः बाद में लगाकर जप करेंगे।
शास्त्र क्या कहता है
The text instructs the twice-born (those for whom the sacred-thread rite has been performed) to prefix the Śiva-pañcākṣara with the praṇava (Oṃ) when reciting it.
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जपयोगमथो वक्ष्ये गदतः शृणुत द्विजाः। तपःकर्तुर्जपः प्रोक्तो यज्जपन्परिमार्जते॥ ३२
हे द्विजो! अब मैं जपयोगके बारेमें कहूँगा, मेरी बात सुनो। तप करनेवालेके लिये जप बताया गया है। जप करते-करते वह अपनेको पूरी तरह शुद्ध कर लेता है।
शिवनाम नमःपूर्वं चतुर्थ्यां पञ्चतत्त्वकम्। स्थूलप्रणवरूपं हि शिवपञ्चाक्षरं द्विजाः॥ ३३
हे द्विजो! 'नमः' पहले लगाकर चतुर्थी विभक्तिमें शिवका नाम पाँच तत्त्वोंवाला है। यही शिवका पंचाक्षर मन्त्र है, जो स्थूल प्रणवका रूप है।
पञ्चाक्षरजपेनैव सर्वसिद्धिं लभेन्नरः। प्रणवेनादिसंयुक्तं सदा पञ्चाक्षरं जपेत्॥ ३४
केवल पंचाक्षर मन्त्रके जपसे मनुष्य सब सिद्धियाँ पा लेता है। उसे पंचाक्षरके आरम्भमें प्रणव जोड़कर सदा उसका जप करना चाहिये।
The chapter sets out pañcākṣara-japa counts in turn for brahmins, kṣatriyas, vaiśyas and śūdras, with śūdras (v.127) and, per the guru's judgment, women (v.129) reciting the mantra in its "namaḥ"-ending form.
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गुरूपदेशाज्जाप्यं वै ब्राह्मणानां नमोऽन्तकम्। पञ्चाक्षरं पञ्चलक्षमायुष्यं प्रजपेद्विधिः॥ १२२
ब्राह्मणोंके लिये गुरुके उपदेशके अनुसार जपने योग्य मन्त्र 'नमः'से अन्त होता है। आयुके लिये विधिपूर्वक पंचाक्षरका पाँच लाख जप करना चाहिये।
स्त्रीत्वापनयनार्थं तु पञ्चलक्षं जपेत्पुनः। मन्त्रेण पुरुषो भूत्वा क्रमान्मुक्तो भवेद् बुधः॥ १२३
स्त्रीत्वसे छूटनेके लिये फिर पाँच लाख जप करे। मन्त्रके प्रभावसे पुरुष होकर वह ज्ञानी क्रमसे मुक्त हो जाता है।
क्षत्रियः पञ्चलक्षेण क्षत्रत्वमपनेष्यति। पुनश्च पञ्चलक्षेण क्षत्रियो ब्राह्मणो भवेत्॥ १२४
पाँच लाख जपसे क्षत्रिय अपना क्षत्रियपन छोड़ देता है। फिर पाँच लाख जपसे वह क्षत्रिय ब्राह्मण हो जाता है।
मन्त्रसिद्धिर्जपाच्चैव क्रमान्मुक्तो भवेन्नरः। वैश्यस्तु पञ्चलक्षेण वैश्यत्वमपनेष्यति॥ १२५
जपसे उसे मन्त्रकी सिद्धि मिलती है और वह मनुष्य क्रमसे मुक्त हो जाता है। पाँच लाख जपसे वैश्य अपना वैश्यपन छोड़ देता है।
पुनश्च पञ्चलक्षेण मन्त्रक्षत्रिय उच्यते। पुनश्च पञ्चलक्षेण क्षत्रत्वमपनेष्यति॥ १२६
फिर पाँच लाख जपसे वह मन्त्र-क्षत्रिय कहलाता है। फिर पाँच लाख जपसे वह क्षत्रियपन भी छोड़ देता है।
पुनश्च पञ्चलक्षेण मन्त्रब्राह्मण उच्यते। शूद्रश्चैव नमोऽन्तेन पञ्चविंशतिलक्षतः॥ १२७
फिर पाँच लाख जपसे वह मन्त्र-ब्राह्मण कहलाता है। शूद्र भी 'नमः'से अन्त होनेवाले मन्त्रका पचीस लाख जप करके,
मन्त्रविप्रत्वमापद्य पश्चाच्छुद्धो भवेद् द्विजः। नारी वाथ नरो वाथ ब्राह्मणो वान्य एव वा॥ १२८
मन्त्र-ब्राह्मण बन जाता है, और फिर शुद्ध होकर द्विज हो जाता है। स्त्री हो या पुरुष, ब्राह्मण हो या कोई और,
नमोऽन्तं वा नमः पूर्वमातुरः सर्वदा जपेत्। तत्र स्त्रीणां तथैवोह्य गुरुर्निर्देशयेत्क्रमात्॥ १२९
जिसे आवश्यकता हो, वह 'नमः' अन्तमें या 'नमः' आरम्भमें लगाकर सदा जप करे। स्त्रियोंके लिये भी गुरु इसी प्रकार सोचकर क्रमसे मार्ग बताये।
क्या पंचाक्षरी में बीज मंत्र या अतिरिक्त प्रणव जोड़ना ठीक है?
ये मंत्र कीलित हैं; छेड़छाड़ न करें
वे कहते हैं कि इसके अलावा, जो अपनी मर्ज़ी से या कहीं से सुनकर इसमें बीज मंत्र या प्रणव आदि लगाते हैं — उनकी दृष्टि में यह उचित नहीं है। इन मंत्रों से छेड़छाड़ उचित नहीं है। इस दावे पर कि मंत्र कीलित है और आगे पाँच बार और पीछे पाँच बार प्रणव बोलने से दस गुना असर होगा और इसकी सिद्धियाँ मिलेंगी, वे कहते हैं: पहले बताने वाले की हालत देखो।
वे कहते हैं, इसके अलावा जो अपनी इच्छा से, या कहीं से सुनकर, इसमें बीज मंत्र लगा रहे हैं, प्रणव आदि लगा रहे हैं — उनकी दृष्टि में यह उचित नहीं है। इन सब मंत्रों से छेड़छाड़ करना उचित नहीं है। वे जो बात बताई जाती है उसे बताते हैं: यह मंत्र कीलित है — उत्कीलन में है, इसका दस गुना ज़्यादा असर होगा, आगे पाँच बार और पीछे पाँच बार प्रणव बोलो — यानी ॐ बोलो — और यह होगा, मंत्र की सिद्धियाँ मिलेंगी। वे कहते हैं, पहले बताने वाले की हालत देखो। हो सकता है वह करोड़पति आदमी हो, पर वह आपके करोड़ों में आग लगा देगा — यह वे साफ़ कहते हैं।
कोई विधान देने से पहले पात्र और अपात्र को परखना चाहिए; एक ही चीज़ सबको नहीं दी जा सकती।
विधान देने से पहले पात्र और अपात्र परखना
जो कहते हैं कि ये सब विधान बताकर वे उन्हें डराते हैं, और भगवान भाव से प्रसन्न होते हैं इस तरह नहीं, उनसे वे कहते हैं कि यह भी जानना चाहिए कि मनमाने ढंग से काम करके सबको एक जैसा अधिकार नहीं दिया जा सकता। जो सामान्य है वह कोई भी सामान्य रूप से कर सकता है। पर अगर मनमानी करनी है, तो कम से कम कोई भी विधि विधान पात्र और अपात्र को सोचकर ही दें।
वे कहते हैं, जो कहते हैं कि ये सब विधान बताकर वे उन्हें डरा रहे हैं, और भगवान भाव से प्रसन्न होने वाले हैं, इस तरह से नहीं — उन्हें यह भी जानना चाहिए कि इस तरह मनमाने ढंग से काम करके सबको एक जैसा अधिकार नहीं दिया जा सकता। जो सामान्य चीज़ है वह कोई भी सामान्य रूप से कर सकता है। अगर मनमानी करनी है, तो कम से कम कोई भी विधि विधान पात्र और अपात्र को सोचकर ही दें। वे कहते हैं कि चैनल पर जो सामान्य मंत्र विधान डाला जाता है वह अलग विषय है — वह सबके लिए है। वे कहते हैं कि वे अपने चैनल के लिए भी और दूसरे चैनलों के लिए भी बोल रहे हैं।
पंचाक्षरी और गायत्री मंत्र में कौन से बदलाव गलत हैं?
पंचाक्षरी से पहले दस ॐ, गायत्री से पहले अग्नि बीज
वे इन्हें गिनाते हैं: कि पंचाक्षरी से पहले दस बार ॐ लगाओ; कि गायत्री से पहले पाँच ॐ लगाओ; कि गायत्री से पहले पाँच बार अग्नि बीज लगाओ; कि पाँच बार माया बीज लगवाया जाता है; और दूसरे बीज भी। वे पूछते हैं, क्या आप जानते भी हैं कि अग्नि बीज लगाने के बाद उस व्यक्ति की क्या हालत होगी, और वह किस उद्देश्य से उसे लगा रहा है?
वे कहते हैं, आप ऐसी बातें बोलते हैं — कि पंचाक्षरी से पहले दस बार ॐ लगाओ; कि गायत्री से पहले पाँच बार ॐ लगाओ; कि गायत्री से पहले पाँच बार अग्नि बीज लगाओ। क्या आप जानते भी हैं भाई, कि अग्नि बीज के प्रयोग के बाद सामने वाले की क्या हालत होगी, और वह किस उद्देश्य से उसे लगा रहा है? पाँच बार माया बीज लगवाया जाता है। या जो भी दूसरे बीज आदि लगाए जाते हैं। फिर आप लोगों के अनुभव सुनते हैं — कि इससे इतना अनुभव हुआ, यह हुआ — और सुनकर आप वैसा करने लगते हैं। फिर उसमें कठिनाई होगी। इसलिए ऐसी गलती न करें।
मंत्र का मूल रूप सबसे अच्छा क्यों है?
मूल जितना लाभ और कुछ नहीं देता
वे कहते हैं कि जितना लाभ मूल से होगा, उतना किसी और चीज़ से नहीं होगा। इसलिए जो शिव पुराण में मूल बात बताई गई है, जो शास्त्रोक्त बात है, वही करें। पंचाक्षरी को बताए गए विधि विधान से करें, बहुत लाभ होगा।
वे कहते हैं कि जितना लाभ मूल से हो सकता है, उतना किसी और चीज़ से नहीं होने वाला। इसलिए वह करें जो शिव पुराण में मूल बात के रूप में बताया गया है, शास्त्रोक्त बात। पंचाक्षरी मंत्र को बताए गए विधि विधान से करें। बहुत लाभ होगा। फिर वे इस पर आते हैं कि इस बार इसे कैसे करना है। वे कहते हैं कि आज वे एक साधिका से फ़ोन पर बात कर रहे थे, और उस बातचीत में यह बात उनके मन में आई: कि इस बार लगभग उनसठ से साठ दिन का सावन पड़ रहा है।
सवा लाख जप में कितनी मालाएँ होती हैं, और रोज़ कितनी?
उनसठ दिनों में 1250 मालाओं का हिसाब
वे कहते हैं कि अगर व्यक्ति सामान्य तरीके से भी जप करे, तो सवा लाख जप आराम से हो सकता है। सवा लाख जप के लिए 1250 माला जप करना होता है; 1250 माला करें तो सवा लाख जप आराम से पूरा हो जाता है। अगर उनसठ दिनों में 1250 माला करें, तो रोज़ लगभग इक्कीस-बाईस माला बनती हैं।
वे कहते हैं, अगर व्यक्ति सामान्य तरीके से भी जप करे, तो सवा लाख जप आराम से हो सकता है। सवा लाख जप करने के लिए हमें 1250 माला जप करना होता है। 1250 माला करें तो सवा लाख जप आराम से पूरा हो जाएगा। अब 1250 माला अगर उनसठ दिनों में करें, तो रोज़ लगभग इक्कीस-बाईस माला बनती हैं। वे कहते हैं, और एक साधक या साधिका पंचाक्षरी का कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं — वे कम से कम रोज़ सत्ताईस माला कर लेंगे; इक्कीस माला आराम से हो जाएँगी।
एक सावन में दो सवा लाख के अनुष्ठान कैसे पूरे हो सकते हैं?
सुबह सत्ताईस माला और शाम सत्ताईस माला
वे कहते हैं, कितना अच्छा हो अगर सुबह सत्ताईस माला और शाम सत्ताईस माला की जाएँ — दोनों समय सत्ताईस-सत्ताईस। तब कम से कम सवा-सवा लाख के दो अनुष्ठान पूरे हो जाएँगे। वे इस सावन को ज़बरदस्त कहते हैं — उन्नीस साल बाद आया है, पूरे साठ दिन का, और लगभग इतना समय मिला है।
वे कहते हैं, कितना अच्छा हो अगर आप सुबह सत्ताईस माला और शाम सत्ताईस माला करने लगें — दोनों समय सत्ताईस और सत्ताईस। तब होगा यह कि आपके कम से कम सवा-सवा लाख के दो अनुष्ठान पूरे हो जाएँगे। वे कहते हैं, समझिए यह सावन कितना ज़बरदस्त है — इसीलिए कहा गया कि उन्नीस साल बाद यह ज़बरदस्त सावन आया है, साठ दिन का; लगभग इतना समय मिला है।
हर नाराज़गी छोड़कर ये साठ दिन भगवान शिव की शरण में लगाएँ।
झगड़ा छोड़कर साठ दिन शिव को दें
वे श्रोताओं से कहते हैं कि इस बार उनसे जो भी झगड़ा या नाराज़गी है उसे छोड़ दें, और उनकी एक ही विनती है कि भगवान शिव की शरण लें और ये साठ दिन अपने जीवन में लगाएँ। सत्ताईस माला में ज़्यादा से ज़्यादा पंद्रह-बीस मिनट लगते हैं, यानी सुबह आधा घंटा और शाम आधा घंटा।
वे कहते हैं, इस बार जो भी झगड़ा या नाराज़गी है उसे छोड़ दें। उनकी एक ही विनती है कि आप भगवान शिव की शरणागति लें और ये साठ दिन अपने जीवन में लगाएँ। वे कहते हैं, सत्ताईस माला में ज़्यादा से ज़्यादा पंद्रह से बीस मिनट लगेंगे, तो सुबह आधा घंटा जाएगा और शाम आधा घंटा। वे जोड़ते हैं कि जो इतना भी नहीं कर सकता उसे शर्म आनी चाहिए। और अगर माला न हो, तो बिना माला के आधा घंटा जप करें।
जप के लिए पुरुष कैसे वस्त्र पहने और कैसे तैयारी करे?
धोती, बाएँ कंधे पर अंग वस्त्र, और यज्ञोपवीत
नहाएँ — अभी ठंड नहीं है, तो कोई दिक्कत नहीं होगी — और आराम से बैठें। पुरुष हैं तो धोती पहनें और गमछा लें; धोती और अंग वस्त्र होना चाहिए। अंग वस्त्र बाएँ कंधे पर रखें। यज्ञोपवीत है तो न लें तब भी चलेगा, पर लेना चाहिए। सही विधि यह है कि वह बाएँ कंधे के ऊपर से, दाएँ कंधे के नीचे से होकर फिर ऊपर जाता है, क्रॉस बनाते हुए। इतना भी न कर सकें तो कम से कम अंग वस्त्र, यानी गमछा, बाएँ कंधे पर रखें।
वे कहते हैं, नहाएँ — अभी ठंड नहीं है, तो नहाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। आराम से नहाकर बैठें। पुरुष हैं तो धोती पहनें और गमछा लें। धोती और अंग वस्त्र होना चाहिए। अंग वस्त्र बाएँ कंधे पर रखें। अगर यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। है, तो न लें तब भी चलेगा, पर लेना चाहिए। वह बाएँ कंधे के ऊपर से जाता है, दाएँ कंधे के नीचे से निकलता है और फिर ऊपर जाता है — जो क्रॉस बनता है; यही सही विधि है। इतना भी न कर सकें, तो कम से कम अंग वस्त्र बाएँ कंधे पर रखें, यानी गमछा वहाँ रखें।
बैठने के बाद जप से पहले क्या किया जाता है?
गुरु-गणपति स्मरण, धूप दीप, सुबह का अभिषेक, और विनियोग
उसके बाद आराम से बैठकर गुरु-गणपति स्मरण करें, धूप और दीप जलाएँ, और सुबह भगवान शिव का अभिषेक और श्रृंगार ज़रूर करें; बाकी सदस्य अपना बाद में करते रहेंगे। फिर अपना आसन लें। अगर आप पंचाक्षरी के विनियोग और न्यास के अधिकारी हैं — यानी यज्ञोपवीत हुआ है — तो वे करें; नहीं तो केवल विनियोग करें; और वह भी न करना चाहें तो न करें।
उसके बाद आराम से बैठकर गुरु-गणपति स्मरण करें, और धूप, दीप आदि जलाएँ। भगवान शिव का अभिषेक सुबह ही ज़रूर हो जाना चाहिए। उनका श्रृंगार आदि करना है; बाकी सदस्य अपना बाद में करते रहेंगे। आप अपना आसन लें। अगर आप पंचाक्षरी के विनियोग और न्यास करने के अधिकारी हैं — यानी यज्ञोपवीत हुआ है — तो न्यास भी करें; नहीं तो केवल विनियोग करें। और वह भी न करना चाहें, तो न करें।
जप के आधे घंटे में मन क्या करे?
साँस पर शिव, और कुछ नहीं
भगवान शिव के ध्यान से शुरू करें — भक्ति ही चाहिए। आधे घंटे मन में केवल शिव का ध्यान हो, और जो साँस चल रही है उस पर शिव-शिव हो। आपका ध्यान पूरी तरह शिव पर ही टिका रहे; उनके अलावा कुछ नहीं सोचना है।
वे कहते हैं, भगवान शिव का ध्यान करते हुए शुरू करें — भक्ति ही चाहिए। आधे घंटे मन में केवल भगवान शिव का ध्यान; जो साँस चल रही है, उसी साँस पर शिव-शिव हो। आपका ध्यान पूरी तरह केवल शिव पर ही टिका रहे। उनके अलावा कुछ नहीं सोचना है — न यह कि हमारे इतने पैसे चले गए, या प्रेमिका छोड़ गई, या पत्नी भाग गई, या यूक्रेन उड़ा दिया गया। कुछ नहीं सोचना है। उस समय ध्यान केवल महादेव पर टिकाएँ, आधा घंटा जप करें, और उसे समर्पित कर दें।
सावन में कोई प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए?
सावन के साथ पुरुषोत्तम मास — इसे प्रयोग में न लगाएँ
वे कहते हैं कि सावन के साठ दिन इसलिए इतने ज़बरदस्त हैं क्योंकि सावन के ऊपर पुरुषोत्तम मास है — हरिहर का अद्भुत समय — और दो सवा लाख जप आराम से पूरे हो जाएँगे। फिर वे बार-बार कहते हैं: इस बार प्रयोग विधि न करें, प्रयोग न करें। यह संकल्प न लें कि फलाँ इच्छा पूरी करने के लिए यह कर रहे हैं।
वे कहते हैं, जान लीजिए कि सावन के साठ दिनों में यह इतना ज़बरदस्त इसलिए है क्योंकि सावन के ऊपर पुरुषोत्तम मास है — हरिहर का अद्भुत समय। आपके दो सवा लाख जप आराम से पूरे हो जाएँगे। उसके बाद, पूरी ज़िंदगी, आपकी जो भी इच्छा हो — वे कहते हैं, इस बार कोई और इच्छा न रखें। इस साल के लिए वे बार-बार दोहराते हैं: प्रयोग विधि न करें। इस बार प्रयोग न करें। इस बार अपनी फलाँ इच्छा पूरी करने का संकल्प लेकर प्रयोग न करें। नहीं।
सावन के जप के लिए कौन सा संकल्प लेना चाहिए?
कि शिव प्रसन्न हों और मंत्र चैतन्य हो
यह संकल्प लें: कि भगवान शिव प्रसन्न हों; कि जिस मंत्र का हम जप कर रहे हैं उससे हमारे जीवन में अद्भुत परिवर्तन हो; कि यह मंत्र चैतन्य हो; और कि सावन के बाद जब भी हम किसी इच्छा से संकल्प लेकर इस मंत्र का जप करें, शिव की पूरी कृपा मिले और हमारा संकल्प पूरा हो। केवल यही इच्छा रखें, फिर जप करें। जो नए हैं और जिन्होंने कभी किसी मंत्र का अनुष्ठान नहीं किया, वे भी कर सकते हैं।
वे कहते हैं, इस बार यह संकल्प लें: भगवान शिव, आप प्रसन्न हों। जिस मंत्र का हम जप कर रहे हैं, उससे हमारे जीवन में अद्भुत परिवर्तन आए। यह मंत्र चैतन्य हो। सावन के बाद जब भी हम किसी भी इच्छा से संकल्प लेकर इस मंत्र का जप करें, तब भगवान शिव, आपकी पूरी कृपा हमें मिले, और हमारा संकल्प पूरा हो। केवल यही इच्छा रखें, और मंत्र का जप करें। जो नए हैं, जिन्होंने आज तक किसी भी मंत्र का अनुष्ठान नहीं किया — वे भी यह कर सकते हैं।
जप से पहले शिव अभिषेक का सबसे छोटा मान्य रूप क्या है?
108 चम्मच दूध की जगह हर ज्योतिर्लिंग नाम पर एक लोटा जल
वे कहते हैं कि शिव अभिषेक की विधि चैनल पर लाइव दिखाई गई है। उसमें उन्होंने बारह ज्योतिर्लिंगों के हर नाम के साथ 108 चम्मच दूध चढ़ाने को कहा था — नियम के लिए चम्मच से दूध। इतना लंबा न करना हो, तो उसी तरह हर नाम के साथ एक लोटा जल चढ़ाएँ। या मंदिर जाएँ; या घर पर चढ़ाएँ और जितना जानते हैं उतना श्रृंगार करें। उसके बाद इस मंत्र का जप शुरू करें।
वे कहते हैं, भगवान शिव के अभिषेक की विधि चैनल पर लाइव दिखाई गई है। अगर उतना लंबा न करना चाहें — उसमें उन्होंने बारह ज्योतिर्लिंग के हर नाम के साथ 108-108 बार दूध चढ़ाने को कहा था। नियम के लिए दूध चम्मच से चढ़ाना है। अगर वह भी न करना चाहें, तो उसी तरह हर नाम के साथ एक लोटा जल चढ़ाएँ। या आप मंदिर जा सकते हैं; घर पर चढ़ाएँ, और जितना जानते हैं उतना उनका श्रृंगार करें। और उसके बाद इस मंत्र का जप शुरू करें।
अभी दो सवा लाख अनुष्ठान आराम से पूरे हो सकते हैं, और यह समय फिर आए तब शायद शरीर साथ न दे।
यह समय फिर आए तब शायद शरीर साथ न दे
वे कहते हैं कि इस बार दो सवा लाख अनुष्ठान बहुत आराम से होंगे, और जीवन बदल जाएगा; महादेव कोई न कोई कृपा ज़रूर करेंगे, कुछ अच्छा ज़रूर होगा, और पता नहीं कौन सा प्रारब्ध कट जाए या कौन सा रास्ता खुल जाए। अगर केवल नफ़ा-नुकसान ही देखना है, तो ऐसे भी देखिए: अभी शरीर में पालथी मारकर बैठने की ताकत है, पर यह समय निकल जाएगा, और पता नहीं यह फिर कब आए या शरीर साथ दे या नहीं।
वे कहते हैं, इस बार सवा-सवा लाख के दो अनुष्ठान बहुत आराम से पूरे हो जाएँगे — कीजिए। जीवन बदल जाएगा; महादेव कोई न कोई कृपा ज़रूर करेंगे, जीवन में कुछ अच्छा ज़रूर होगा। पता नहीं कौन सा प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। कट जाए, पता नहीं कौन सा रास्ता मिल जाए। अगर केवल नफ़ा-नुकसान ही देखना है, तो उसी तरह देखकर कीजिए। अभी शरीर में ताकत है, तो पालथी मारकर बैठकर कर पाएँगे। कल यह समय निकल जाएगा। फिर पता नहीं यह समय दोबारा कब आए, और पता नहीं आपका शरीर साथ दे या नहीं; आप कुछ नहीं कर पाएँगे। चाहे आपका ऑफ़िस बारह घंटे का हो, सुबह आधा घंटा और शाम आधा घंटा निकालें, इस सावन में महादेव के प्रति समर्पित रहें, और पंचाक्षरी करें।
पूजा के समय मन में जो अपराध-बोध उठे, उसका क्या करें?
देवता के सामने विचार-शून्य होना सीखना
वे कहते हैं कि जब आप पूजन में बैठते हैं और आपकी आँखें देवता की आँखों से मिलती हैं, तो कहीं न कहीं यह विचार आता है कि हमने फलाँ को धोखा दिया, यह गलत काम किया, यह गलत सोच रखते हैं, किसी को गलत नज़र से देखा। ऐसे विचार आते रहते हैं और आप देवता से एक नहीं हो पाते। उस समय विचार-शून्य होना सीखें। जो है उसे स्वीकार करें।
वे कहते हैं, यह उन सब लोगों के लिए है जिन्होंने आज तक कुछ नहीं किया — वे शुरुआत करें। जब आप पूजन में बैठते हैं, जब आँखें देवता की आँखों से मिलती हैं, तब यह विचार आता है — कहीं न कहीं यह ध्यान में आता ही होगा — कि हमने फलाँ को धोखा दिया, कि हमने यह गलत काम किया। कि हमारे अंदर यह गलत सोच है, कि हमने किसी को गलत नज़र से देखा। ये सब विचार आते रहते हैं, और देवता से एक नहीं हो पाते। उस समय विचार-शून्य होना सीखें। जो है उसे स्वीकार करें: हाँ भाई, हम हैं, हम बड़े पापी हैं।
जो मन शांत न हो, उसके लिए वे कौन सी प्रार्थना सुझाते हैं?
आधे घंटे की शांति माँगें और दंड बाद में स्वीकार करें
वे जो प्रार्थना बताते हैं वह यह है: प्रभु, अभी आधा घंटा हम अच्छे से पूजा कर लें। उसके बाद आप दंड तो देंगे ही — अपनी लाठी से चार डंडे मारेंगे, और आपकी लाठी में आवाज़ नहीं होती; हम सह लेंगे। पर अभी आधे घंटे के लिए मुझे स्वीकार करें, मेरा मन और चित्त शांत करें, और मेरे हृदय में समा जाएँ। ऐसी प्रार्थना करके भगवान शिव के प्रति समर्पित होकर करें।
वे कहते हैं, जो कुछ भी है, आपके ही पास है। प्रभु, अभी आधा घंटा हम अच्छे से पूजा कर लें। उसके बाद आप दंड तो देंगे ही। फिर भी अपनी लाठी से चार डंडे मार दीजिए — आपकी लाठी में आवाज़ नहीं होती। ठीक है, हम सह लेंगे। पर अभी आधे घंटे के लिए मुझे स्वीकार करें, मेरा मन और मेरा चित्त शांत करें, और अपने आप में, मेरे हृदय में समा जाएँ। ऐसी प्रार्थना करके, भगवान शिव के प्रति समर्पित होकर, कीजिए।
इस जप के लिए कौन सी माला इस्तेमाल करें?
पुरखों की माला, गुरु की दी माला, या तंत्रोक्त रुद्राक्ष माला
जिसके पास अपने पूर्वजों — माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी — की दी कोई रुद्राक्ष या दूसरी माला हो, या कोई पुरानी माला हो, वह इस बार उसी पर जप करे। गुरु से मिली माला हो तो उस पर जप करें। साधक परिवार के जिन लोगों को उनके माध्यम से तंत्रोक्त रुद्राक्ष माला मिली है, जो तीन-चार साल से जुड़े हैं, वे उसी पर कर रहे हैं। जिस माला पर पहले से जप करते आ रहे हैं, उसी पर करें। माला न हो तो कर माला से करें; कर माला भी न आती हो तो आधा घंटा बैठकर करें।
जिसके पास अपने पूर्वजों — माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी — की दी कोई रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । माला या दूसरी माला हो, या कोई पुरानी माला हो, वह इस बार उसी पर जप करे। गुरु से मिली माला हो, तो उस पर जप करें। साधक परिवार के जिन लोगों को उनके माध्यम से तंत्रोक्त रुद्राक्ष माला आदि मिली है — जो अब तीन-चार साल से जुड़े हैं — वे उसी पर कर रहे हैं। उसी पर भगवान शिव का जप करें। अगर आप पहले से अपनी किसी माला पर जप करते आ रहे हैं, तो उसी पर करें। माला न हो, तो कर-माला पर करें। कर माला भी न आती हो, तो आधा घंटा बैठकर करें।
जप कितनी ज़ोर से बोलना चाहिए?
केवल जीभ हिले
जप ज़ोर से बोलकर नहीं करना है। बस इतना बोलें कि केवल जीभ हिले, और आपको पता चले कि आप क्या बोल रहे हैं। बस इतना।
वे कहते हैं, जप कैसे करना है — वह ज़ोर से बोलकर नहीं करना है। बस इतना बोलें — यानी केवल जीभ हिले, और आपको पता चल सके कि आप क्या बोल रहे हैं। बस इतना। वे कहते हैं, यह सब सामान्य लोगों के लिए था।
यहाँ अघोर अस्त्र, महामृत्युंजय अस्त्र, रावण खड्ग माला और खंजन विद्या के साधकों से बात की गई है।
अघोर अस्त्र, महामृत्युंजय अस्त्र, रावण खड्ग माला, खंजन विद्या
वे उन लोगों की ओर मुड़ते हैं जो इस चैनल के माध्यम से या उनके साधक परिवार के माध्यम से दो-तीन साल से खास तौर पर अस्त्र साधना कर रहे हैं — चाहे अघोर अस्त्र हो, महामृत्युंजय अस्त्र हो, रावण खड्ग माला हो, या इन सबकी खंजन विद्या। बहुतों ने इनका जप सावन में और बहुतों ने मार्गशीर्ष में किया था, और इनका ज़बरदस्त असर देखा था।
वे कहते हैं, अब वे जो साधक वर्ग के हैं। खास तौर पर वे लोग जो इस चैनल के माध्यम से या उनके साधक परिवार के वर्ग के माध्यम से अब दो-तीन साल से खास तौर पर अस्त्र साधना आदि कर रहे हैं। चाहे अघोर अस्त्र हो, महामृत्युंजय अस्त्र हो, या रावण खड्ग माला। इन सबकी खंजन विद्या — जो भी जप उन्होंने किया है। बहुत लोगों ने सावन में भी किया था, और बहुतों ने मार्गशीर्ष में, और इसका ज़बरदस्त असर भी देखा था। वे बताते हैं कि संपर्क वालों और केवल सुनने वालों, दोनों के संदेश आते रहते हैं कि प्रयोग करें या नहीं।
अस्त्र मंत्र के साधक सावन में अपने मंत्रों का क्या करें?
उनसे अभिषेक करें, प्रयोग नहीं
वे कहते हैं, सावन में इस समय का लाभ उठाएँ: उन्हीं मंत्रों से अभिषेक करें। जिन्होंने खंजन विद्या का प्रयोग किया है, या इतने समय पाठ करके उसे सिद्ध किया है, वे इस बार भी केवल उस माला मंत्र का पाठ करें, और उसी पाठ से शिव जी का अभिषेक करें।
वे कहते हैं, सावन में इस समय का लाभ उठाएँ। उन्हीं मंत्रों से अभिषेक करें। जिन लोगों ने खंजन विद्या का प्रयोग किया है, या उसे सिद्ध किया है — जिन्होंने इतने समय पाठ किया है — वे इस बार भी केवल उस माला मंत्र का पाठ करें। और उसी पाठ से शिव जी का अभिषेक करना है।
अस्त्र मंत्र का अभिषेक किससे करें, और किस उद्देश्य से?
मंत्र की पुष्टि के लिए मधु अभिषेक
अभिषेक में, अगर संभव हो, तो पाठ करते हुए मधु से करें — उस मंत्र की पुष्टि के लिए, भगवान शिव की पुष्टि के लिए, और इसलिए कि जब भी आप प्रयोग करें उसका असर पूरी तरह फल दे और निष्फल न जाए। रावण माला, खड्ग माला, नीलकंठ अघोर अस्त्र और अघोर अस्त्र — सब इसी तरह करने हैं।
अभिषेक में, अगर आपके लिए संभव हो, तो उस मंत्र की पुष्टि के लिए, भगवान शिव की पुष्टि के लिए, और इसलिए कि जब भी आप प्रयोग करें उसका असर पूरी तरह फल दे और निष्फल न जाए — इन सब उद्देश्यों से, उसका पाठ करते हुए मधु से अभिषेक करें। रावण माला, खड्ग माला इसी तरह करनी हैं। नीलकंठ अघोर अस्त्र इसी तरह करना है। अघोर अस्त्र इसी तरह करना है। जिसने भी अस्त्र विद्याएँ की हैं, शिव जी की अस्त्र विद्या — क्योंकि पुराने लोग, दो-ढाई साल वाले, आप सब करते आ रहे हैं — आप सबने काफ़ी अच्छा किया है। तो प्रयोग विधि न करें; उसकी जगह पुष्टिकारक विधि करें।
घर में अस्त्र मंत्र का अभिषेक किस पर किया जा सकता है?
तंत्रोक्त रुद्राक्ष, नर्मदेश्वर, और स्फटिक की मनाही
अगर घर में अभिषेक विधि कर रहे हैं, तो या तो अपने पास के तंत्रोक्त रुद्राक्ष पर करें — हरिहर का, या भैरव-भैरवी का, जिस पर पहले किया था। अगर शिवलिंग पर करना है, तो वह नर्मदेश्वर जी हो सकते हैं, उन पर कर सकते हैं। पर स्फटिक शिवलिंग पर न करें — स्फटिक शिवलिंग पर किसी भी अस्त्र मंत्र से अभिषेक न करें। उनका अनुभव रहा है कि बर्बादी शुरू हो जाती है। इसलिए गृहस्थी में हैं तो घर में स्फटिक शिवलिंग पर न करें।
वे पूछते हैं, अगर अभिषेक विधि आदि घर में की जा रही है तो क्या ध्यान रखना है? या तो उस तंत्रोक्त रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । पर करें जो आप सबके पास है — हरिहर का, या भैरव-भैरवी का, जिस पर भी पहले किया था; उसी पर करें। अगर शिवलिंग पर करना है, तो वह नर्मदेश्वर जी हो सकते हैं, और आप उन पर कर सकते हैं। पर स्फटिकस्फटिक की माला, जब साधक की कुंडली में शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो, तब रुद्राक्ष के स्थान पर चुनी जाती है। शिवलिंग पर न करें — यह ध्यान रखें। स्फटिक शिवलिंग पर किसी भी अस्त्र मंत्र से अभिषेक न करें। उनका अनुभव रहा है कि बर्बादी शुरू हो जाती है। इसलिए अगर आप गृहस्थी में हैं, तो घर में स्फटिक शिवलिंग पर न करें।
क्या स्फटिक की मनाही मंदिर में भी लागू होती है?
मंदिर का कोई भी लिंग चलता है
नहीं। अगर बाहर किसी मंदिर में स्फटिक महादेव विराजमान हैं, तो उन पर कर सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं। मंदिर में किसी भी तरह के शिवलिंग पर कर सकते हैं — पुराना या नया, नर्मदेश्वर जी, बाणलिंग, या कोई और लिंग; इसमें कोई दिक्कत नहीं। अस्त्र मंत्रों के साधक यह ध्यान रखेंगे।
अगर बाहर किसी मंदिर में स्फटिक महादेव विराजमान हैं, तो आप उन पर कर सकते हैं; कोई दिक्कत नहीं। मंदिर में जिस भी तरह का शिवलिंग हो — पुराना या नया, नर्मदेश्वर जी, बाणलिंग, या कोई और लिंग — इन सब पर आप कर सकते हैं; इसमें कोई दिक्कत नहीं। जो अस्त्र मंत्रों के साधक हैं, वे यह बात ध्यान में रखेंगे।
क्या सावन में तंत्र नाश प्रयोग किया जा सकता है, और उसमें क्या बदलाव करना है?
उतारा छोड़कर वह शिव को समर्पित किया जाता है
वे कहते हैं कि उनकी दृष्टि में इस चैनल के माध्यम से सबसे ज़्यादा इस्तेमाल हुआ प्रयोग भगवान शिव का तंत्र नाश के लिए, और ऐसी सब चीज़ों से मुक्त होने के लिए रहा है। जिनके घर में इस तरह की परेशानी है वे इस सावन में इसे कर सकते हैं। बस प्रयोग की उतारा विधि की जगह उतारा न करें: हाथ में कपूर और लौंग लेकर, जहाँ उतारा करना था, वहाँ उतारा किए बिना उसे भगवान शिव को समर्पित कर दें। फिर अभिषेक विधि आदि करें।
वे कहते हैं, तीसरी बात उन पुराने अनुभवों के वीडियो से जुड़ी है जो उन्होंने चैनल पर डाले हैं। उनकी दृष्टि में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल हुआ प्रयोग इस चैनल के माध्यम से भगवान शिव का रहा है, तंत्र काट के लिए — तंत्र नाश के लिए और ऐसी सब चीज़ों से मुक्त होने के लिए। वे बस यह सुधारते हैं कि वही प्रयोग है। तो जिनके घर में इस तरह की परेशानी है, वे इस सावन में इसे कर सकते हैं। प्रयोग की जगह, केवल उसमें की उतारा विधि के बारे में — उतारा न करें। अपने उतारे की जगह, हाथ में कपूर और लौंग लेकर, जहाँ उतारा करना था, उतारा किए बिना उसे भगवान शिव को समर्पित कर दें। और अभिषेक विधि आदि करें।
तंत्र काटने के लिए वे कौन सा विधान बताते हैं?
चैनल पर दिया शिव रक्षा कवच विधान
तंत्र काट के लिए भगवान शिव के शिव रक्षा कवच का विधान चैनल पर दिया गया है। आप सब वह विधान कर सकते हैं।
वे कहते हैं, तंत्र काट के लिए भगवान शिव के शिव रक्षा कवच का विधान चैनल पर दिया गया है। आप सब वह विधान कर सकते हैं।
जो राहु से बहुत पीड़ित हो, उसके लिए क्या बताया गया है?
दही और गुड़ से अभिषेक और रुद्राष्टकम
वे स्थिति बताते हैं: राहु ठीक लग्न में बैठा हो, अब मरे-तब मरे जैसा लगे, आत्महत्या के विचार आएँ, दिन-रात बुरे सपने आएँ, मन में गलत विचार उठें, खुद को नीच प्रवृत्ति का समझें। ऐसी हालत में, वे कहते हैं, भगवान शिव का दही और गुड़ से अभिषेक करें। इस उपाय का पहली बार नाम लेते समय, रुद्राष्टकम के पाठ के साथ, उन्होंने घी और गुड़ की बात कही थी; निर्देश देते समय वे दही और गुड़ कहते हैं।
उपाय की शुरुआत करते हुए वे रुद्राष्टकम् के पाठ के साथ घी और गुड़ से भगवान शिव के अभिषेक की बात करते हैं, उन लोगों के लिए जिन्हें राहु से बहुत परेशानी है, बहुत ज़्यादा। वे जो हालत बताते हैं: राहु ठीक लग्न में बैठा है; लगता है कि अब मरे या तब मरे; आत्महत्या करने का विचार, कि हम मर जाएँगे। कि दिन-रात ऐसे बुरे सपने आते रहें, मन में गलत विचार उठें, व्यक्ति खुद को नीच प्रवृत्ति का समझे, ऐसी गलत बातें सोचे — क्या करें? ऐसी स्थिति में, फिर वे कहते हैं, भगवान शिव का दही और गुड़ से अभिषेक करें।
राहु के उपाय में रुद्राष्टकम के कितने पाठ और कितने दीपक?
रोज़ आठ पाठ और शिव मंदिर में घी के दो दीपक
अभिषेक के साथ रुद्राष्टकम का पाठ करें, रोज़ कम से कम आठ। शिव मंदिर में घी के दो दीपक जलाएँ। तब आपको बहुत विशेष कृपा मिलेगी और राहु की शांति सबसे तेज़ी से होगी। साथ में, संभव हो तो, उनकी बताई पंचाक्षरी जप विधि से जप भी करें।
और साथ में रुद्राष्टकम् का पाठ करें — रोज़ कम से कम आठ। शिव मंदिर में घी के दो दीपक जलाएँ। तब आपको बहुत विशिष्ट कृपा मिलेगी। राहु की शांति सबसे ज़्यादा तेज़ी से होगी। इसके साथ, अगर संभव हो, तो बताई गई पंचाक्षरी जप की विधि से जप भी करें।
शिवलिंग के साथ बेल की छाल वाला प्रयोग किसलिए है?
आकर्षण और रुके धन के लिए शिवलिंग को बेल की छाल से घेरना
वे पहले बताई एक विधि याद करते हैं: बेल के पेड़ के ठूँठ से — यानी लकड़ी, छाल — अगर छाल का बहुत बड़ा टुकड़ा मिले, तो उस छाल से शिवलिंग को घेरकर उसके अंदर अभिषेक किया जाता है। कई विधान हैं, जिनमें यह एक है: आकर्षण प्रयोग आदि के लिए, जब किसी मंत्र की सिद्धि नहीं हो रही हो, या धन की प्राप्ति बिल्कुल न हो रही हो। ऐसा बनाकर शिव का मधु से, या दही और गुड़ से, या घी से अभिषेक करें, तो उसका असर सबसे तेज़ी से मिलता है। ऐसी प्रयोग विधियाँ भी इस बार की जा सकती हैं।
वे कहते हैं, इसके अलावा भगवान शिव से जुड़ा वह विशेष प्रयोग है जिसमें बेल का इस्तेमाल होता है — और यह विधि उन्होंने पहले भी बताई थी। बेल के पेड़ का ठूँठ, यानी लकड़ी, छाल — अगर उसकी छाल का बहुत बड़ा टुकड़ा मिल जाए, तो भगवान शिव का शिवलिंग, जो भी हो, उस छाल से घेरा जाता है, और उसके अंदर अभिषेक किया जाता है। कई विधान हैं, जिनमें यह एक है: आकर्षण प्रयोग आदि के लिए, जब किसी मंत्र की सिद्धि नहीं हो रही हो, या धन की प्राप्ति बिल्कुल न हो रही हो। इस तरह बनाकर भगवान शिव का मधु से अभिषेक, या दही और गुड़ से अभिषेक, या घी से अभिषेक करें, तो उसका असर सबसे ज़्यादा तेज़ी से मिलता है। ये सब प्रयोग विधियाँ भी इस बार की जा सकती हैं।
जिस घर में प्रेत, पिशाच और पितृ दोष की परेशानी हो, उसके लिए क्या बताया गया है?
रोज़ की पंचाक्षरी के साथ शिव के पास नारायण को बिठाना
जिनके घर में प्रेत और पिशाचों की, पितरों की बहुत परेशानी है, साथ में पितृ दोष भी — समय हो तो एक काम और किया जा सकता है। रोज़ पंचाक्षरी जप और रोज़ शिव जी का अभिषेक तो आप करेंगे ही। शालिग्राम शिला हो तो उसका भी अभिषेक करें; न हो तो कोई दिक्कत नहीं। भगवान नारायण का जो भी श्री विग्रह या फ़ोटो हो, उन्हें भगवान शिव के साथ बिठाएँ।
वे कहते हैं, इसके साथ, जिनके घर में प्रेत और पिशाचों की, पितरों की बहुत ज़्यादा परेशानी है, साथ में पितृ दोष आदि भी — अगर आपके पास समय है, तो यह एक काम और कर सकते हैं। पंचाक्षरी मंत्र का जप तो आप रोज़ करेंगे ही, और शिव जी का अभिषेक भी करेंगे ही। अगर शालिग्राम शिला है, तो उसका भी अभिषेक करें; न हो तो कोई दिक्कत नहीं। भगवान नारायण का जो भी श्री विग्रह या फ़ोटो हो, उन्हें भगवान शिव के साथ बिठाएँ।
गीता का कौन सा अध्याय रोज़ पढ़ना है, और कितने समय तक?
गुरु पूर्णिमा से सावन पूर्णिमा तक ग्यारहवाँ अध्याय
इसके साथ रोज़ श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का एक पाठ करें। आषाढ़ पूर्णिमा — यानी गुरु पूर्णिमा, जो 3 तारीख को पड़ रही है — से सावन की पूर्णिमा तक यह रोज़ का नियम रहे। संकल्प केवल यह हो: भगवान, आप प्रसन्न हों, और यह विघ्न बाधा, यह देव बाधा, यह पितरों और प्रेतों की बाधा आप शांत करें, और पूरी शांति मिले। दोनों काम साथ-साथ करने हैं।
वे कहते हैं, और इसके साथ रोज़ श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का एक पाठ करें। आषाढ़ पूर्णिमा से — यानी गुरु पूर्णिमा, जो 3 तारीख को पड़ रही है — उस दिन से सावन की पूर्णिमा तक, आपका यह नियम हर दिन चले। इसमें संकल्प केवल यह हो: भगवान, आप प्रसन्न हों, और यह विघ्न बाधा, यह देव बाधा, यह पितरों और प्रेतों की बाधा — इसे शांत करें, पूरी शांति मिले। ये दोनों काम आपको साथ-साथ करने हैं।
प्रेत-पिशाच बाधा वाले घर के लिए छिड़काव का उपाय क्या है?
ताँबे का लोटा, पाँच कुशा, तुलसी पत्र और थोड़ा शहद
वे ध्यान दिलाते हुए कहते हैं कि एक छोटा सा काम और किया जा सकता है: शाम को अपने सामने ताँबे के लोटे में जल रखना है। उसमें पाँच कुशा, एक तुलसी पत्र और थोड़ा शहद डालना है। उसके बाद आप यह पाठ करेंगे, और वही जल घर में छिड़कना है — खास तौर पर और ज़्यादा मात्रा में दरवाज़ों के ऊपर। पर यह केवल वही करें जिनके घर में सच में प्रेत और पिशाच की बाधा है, जहाँ बहुत परेशानी है और कोई रास्ता नहीं मिल रहा।
वे कहते हैं, एक छोटा सा काम आप और कर सकते हैं — और यहाँ वे श्रोताओं से ध्यान देने को कहते हैं। शाम को अपने सामने ताँबे के लोटे में जल रखना है। उसमें पाँच कुशा, एक तुलसी पत्र, और थोड़ा शहद डालना है। उसके बाद आप यह पाठ करेंगे, और वही जल घर में छिड़कना है। दरवाज़े के ऊपर खास तौर पर ज़्यादा मात्रा में किया जाएगा। पर यह केवल वही करें जिनके घर में सच में प्रेत और पिशाच की बाधा है, जहाँ परेशानी बहुत ज़्यादा है और कोई रास्ता नहीं मिल रहा। वे यह प्रयोग कर सकते हैं।
भैरव साधक इस सावन में अपने मंत्रों का क्या करें?
महाभैरव मंत्र की पुष्टि, प्रयोग नहीं, और समय की कोई पाबंदी नहीं
जो अब तक भैरव जी का विधि विधान करते आ रहे हैं, और जो महाभैरव मंत्र कर रहे हैं, उनसे कहा जाता है कि प्रयोग न करें। इस बार महाभैरव मंत्र प्रयोग में नहीं, बल्कि पुष्ट करने में लगाना है। सावन में सब अपने मंत्र पुष्ट करें, जो बेहतर है क्योंकि साथ में पुरुषोत्तम मास है — मंत्र बहुत ज़्यादा फल देगा, और सिद्धियाँ भी तुरंत आएँगी। चाहे भैरव जी का अष्टोत्तर शतनाम हो, बटुक भैरव हृदय हो, महाभैरव स्तोत्र हो या महाभैरव मंत्र, वही विधि विधान करें जो पहले किया था, उसी जगह — शिव मंदिर में किया था तो वहाँ, घर में किया था तो घर में। ये पूरे साठ दिन समर्पित रहेंगे, और सावन में समय की कोई पाबंदी नहीं है।
वे कहते हैं, जो लोग अब तक भैरव जी का विधि विधान करते आ रहे हैं — जो महाभैरव मंत्र कर रहे हैं — भाई, प्रयोग न करें। इस बार महाभैरव मंत्र प्रयोग के लिए नहीं है; उसे पुष्ट करना है। सावन में सब अपने मंत्र पुष्ट करें, जो बहुत बेहतर है, क्योंकि साथ में पुरुषोत्तम मास है: मंत्र बहुत ज़्यादा फल देगा, और सिद्धियाँ भी तुरंत मिलेंगी। भैरव जी का जो भी किया जा रहा है — अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त।, बटुक भैरव हृदय, महाभैरव स्तोत्र, महाभैरव मंत्र — वही विधि विधान करें जो आपने किया था। अगर शिव जी के मंदिर में कर रहे थे, तो शिव जी के मंदिर में करें; घर में कर रहे थे, तो घर में करें। ये पूरे साठ दिन समर्पित रहेंगे। रात में करना चाहें तो रात में करें; सुबह तो सुबह; दोपहर तो दोपहर। इसमें समय की कोई पाबंदी नहीं है — सावन में कोई पाबंदी नहीं, जब चाहें कर सकते हैं।
काँवड़िया यात्रा में क्या ध्यान रखे?
काँवड़ का नियम, ज़्यादा से ज़्यादा जप, और जल और शरीर की शुद्धता
जो ज्योतिर्लिंग क्षेत्र जा रहे हैं, बाबा को जल चढ़ाने काँवड़ ले जा रहे हैं, वे काँवड़ का नियम मानें, और ध्यान रखें कि अब तक जिन मंत्रों की साधना की है उनका ज़्यादा से ज़्यादा जप हो। केवल हुड़दंग न मचाएँ। जहाँ भी अभिषेक करने जाएँ, उस समय जल और आपका शरीर दोनों साफ़ और शुद्ध हों, मन भी शुद्ध हो, और साथ में अभिमंत्रित भी। पुराने साधक, खास तौर पर अस्त्र मंत्रों के, जाते समय यह ध्यान रखेंगे।
जो लोग किसी ज्योतिर्लिंग क्षेत्र जा रहे हैं, जो काँवड़ ले जाने वाले हैं, जो बाबा को जल चढ़ाने जा रहे हैं — काँवड़ का नियम ज़रूर मानें, और यह ध्यान रखें: कि अब तक जिन मंत्रों की आपने साधना की है उनका ज़्यादा से ज़्यादा जप हो। केवल हुड़दंग न मचाएँ। आप बाबा धाम जा रहे हैं, या किसी भी धाम, जहाँ भी अभिषेक करने जाएँ — उस समय जल और आपका शरीर दोनों साफ़ और शुद्ध हों, मन भी शुद्ध हो, और साथ में अभिमंत्रित (अभिमंत्रण)। जो भी मंत्र सिद्धि आप पहले से करते आ रहे हैं, उसका ज़्यादा से ज़्यादा जप करेंगे। जो पुराने साधक हैं, जिन्होंने मंत्रों आदि की, खास तौर पर अस्त्र मंत्रों की साधना की है — वे जाते समय यह ध्यान रखेंगे।
काँवड़िया कौन सा फूल साथ ले जाए, और उसका क्या किया जाता है?
रास्ते में अस्त्र मंत्र से अभिमंत्रित आक का फूल
जो काँवड़ यात्रा पर जल लेकर जा रहे हैं, जिन पर बाबा की खास कृपा है, वे आक का फूल ज़रूर साथ ले जाएँ। काँवड़ के साथ चलते हुए आक का फूल हाथ में लेकर, उसी फूल को अस्त्र मंत्र से अभिमंत्रित करना है — रास्ते में चलते हुए एक बार, ग्यारह बार, या सौ बार। और जहाँ भी जाएँ, वही जल के साथ चढ़ाएँ।
जो अपनी काँवड़ यात्रा आदि करने जा रहे हैं, जो जल ले जाने वाले हैं, जिन पर बाबा की खास कृपा है — आक का फूल ज़रूर साथ ले जाएँ; यह ध्यान रखें। और आक का फूल हाथ में लेकर, काँवड़ के साथ चलते हुए, उसी फूल को अस्त्र मंत्र से अभिमंत्रित करना है। चाहे रास्ते में चलते हुए एक बार करें, ग्यारह बार करें, या सौ बार करें। और जहाँ भी जाएँ, वही जल के साथ चढ़ाना है — यह ध्यान रखें।
महाभैरव और भगवती के साधक यात्रा में क्या चढ़ाएँ?
वही आक का फूल और पुष्प, अपने मंत्रों से अभिमंत्रित
जो महाभैरव की सिद्धि कर रहे हैं, या महाभैरव स्तोत्र और उनके मंत्र का ज़्यादा से ज़्यादा जप कर रहे हैं, वे भी उसी से आक का फूल अभिमंत्रित करके बाबा पर चढ़ाएँगे, जहाँ भी जा रहे हों। जिन्होंने इतने समय भगवती के मंत्रों की साधना की है, वे भगवती के मंत्रों का ही ज़्यादा से ज़्यादा जप करेंगे और फूल आदि अभिमंत्रित करके चढ़ाएँगे। बिल्व पत्र भी अभिमंत्रित किया जा सकता है।
जो लोग महाभैरव की सिद्धि कर रहे हैं, या महाभैरव स्तोत्र, उनके मंत्र आदि का ज़्यादा से ज़्यादा जप कर रहे हैं — वे भी आक के फूल को उससे अभिमंत्रित करेंगे, और बाबा पर चढ़ाएँगे, जिस भी जगह जा रहे हों। वे कहते हैं कि यह खास तौर पर ध्यान में रखें। जिन्होंने इतने दिनों भगवती के मंत्रों की साधना की है, वे भगवती के मंत्रों का ही ज़्यादा से ज़्यादा जप करेंगे, और फूल आदि अभिमंत्रित करके समर्पित करेंगे। बिल्व पत्र भी अभिमंत्रित किया जा सकता है।
बारह ज्योतिर्लिंगों का कौन सा अनुष्ठान घर पर किया जा सकता है?
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र, रोज़ 108 पाठ
बारह ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का, या बारह ज्योतिर्लिंगों के मंत्रों का अनुष्ठान। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र जो शुरू होता है "सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्"। इस स्तोत्र का अनुष्ठान आप रोज़ घर पर भी कर सकते हैं। पूरे सावन सुबह या शाम 108 पाठ, या दोनों समय 54-54 पाठ करें, तो बहुत उत्तम है।
वे कहते हैं, आप बारह ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का, या बारह ज्योतिर्लिंगों के मंत्रों का अनुष्ठान कर सकते हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र वह है जो शुरू होता है: "सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्"। इस स्तोत्र का अनुष्ठान आप रोज़ घर पर भी कर सकते हैं। अगर सुबह 108 पाठ करें, या शाम को, या दोनों समय 54-54, और पूरे सावन ऐसे ही करें, तो बहुत उत्तम है।
जो शिव अभिषेक के लिए दूध या कपूर भी न खरीद सके, वह क्या करे?
सादे जल से अभिषेक और सुबह-शाम स्तोत्र के 108 पाठ
जिनकी हालत बहुत खराब है — जो शिव जी को चढ़ाने के लिए अलग से दूध नहीं ले सकते, न दूध खरीद सकते, और पानी में कपूर भी नहीं डाल सकते — वे सामान्य सादे जल से शिव जी का अभिषेक करें, और सुबह-शाम द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र के 108-108 पाठ करें। दीपक जलाना चाहें तो जला सकते हैं। वे कहते हैं, पूरा सावन यह करके देखिए: आपका अगला सावन खाली नहीं रहेगा; भगवान कम से कम इतना तो करेंगे कि आप ठीक-ठाक अच्छी हालत में होंगे।
वे कहते हैं, जिनकी हालत बहुत खराब है — सबसे बुरी हालत — जो शिव जी को चढ़ाने के लिए अलग से दूध आदि नहीं ले सकते, या दूध नहीं खरीद सकते। अगर पानी में कपूर भी नहीं डाल सकते, तो सामान्य सादे जल से शिव जी का अभिषेक करें, और द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र लें। सुबह-शाम उसके 108-108 पाठ करें। दीपक जलाने की इच्छा हो, तो जला सकते हैं। वे कहते हैं, पूरा सावन यह करके देखिए — आपका अगला सावन खाली नहीं रहेगा। अगले सावन भगवान इतना तो ज़रूर करेंगे कि आप ठीक-ठाक अच्छी हालत में होंगे।
फलश्रुति का उद्देश्य क्या है?
श्रद्धा, फल का वादा नहीं
वे कहते हैं, पर यह लालच में न करें। यह फलश्रुति, यह माहात्म्य केवल इसलिए है कि आपका मन इस श्रद्धा में और उस मंत्र में अच्छे से लगे, और श्रद्धा बढ़े — इसलिए नहीं कि इतना करोगे तो वह होगा, और वह करोगे तो यह होगा। वह तो वैसे भी होगा; उसे दूसरे स्थान पर रखें। पहले यह रखें: कि आपका मन पूरी तरह समर्पित हो जाए।
वे कहते हैं, बस यह लालच में न करें। यह फलश्रुति, यह माहात्म्य, केवल इसलिए है: कि आपका मन आपकी इस श्रद्धा में और उस मंत्र में अच्छे से लगे, और श्रद्धा बढ़े। इसलिए नहीं — कि इतना करोगे तो यह होगा, और वह करोगे तो वह होगा। वह तो वैसे भी होने वाला है; उसे दूसरे स्थान पर रखें। पहले यह रखें: कि आपका मन पूरी तरह समर्पित हो जाए।
सावन में शिव के कौन से माला मंत्र प्रयोग में नहीं लगाने चाहिए?
शिव माला मंत्र, महामृत्युंजय माला मंत्र, मृत्युंजय माला मंत्र
जिन्होंने भगवान शिव के माला मंत्र का जप किया है, या उसका अनुष्ठान करते हैं — शिव माला मंत्र, महामृत्युंजय माला मंत्र, मृत्युंजय माला मंत्र — वे सावन के महीने में इन्हें इस्तेमाल करने से बचें। प्रयोग आदि न करें। वे देखते हैं कि जो माला मंत्र सिद्ध करते हैं उन्हें असर बहुत दिव्य और तुरंत दिखता है; और साधक परिवार के जिन लोगों ने तंत्रोक्त रुद्राक्ष पहनने और उससे अभिषेक करने का आठ पटल वाला पूरा विधि विधान सीखा है, वे प्रयोग करने में देर नहीं करते। वे कहते हैं, यह एक गलत बात है।
जिन लोगों ने भगवान शिव के माला मंत्र का जप किया है, या उसका अनुष्ठान करते हैं — शिव माला मंत्र, महामृत्युंजय माला मंत्र, मृत्युंजय माला मंत्र — सावन के महीने में इन्हें इस्तेमाल करने से बचें। प्रयोग आदि न करें। वे कहते हैं, उन्होंने यह भी देखा है: कि जो माला मंत्र सिद्ध करते हैं — क्योंकि असर बहुत दिव्य, तुरंत होता है। और खास तौर पर साधक परिवार के वे लोग जिन्होंने आठ पटलों वाला पूरा विधि विधान सीखा है, तंत्रोक्त रुद्राक्ष पहनने और उसके माध्यम से अभिषेक करने का — आप लोग प्रयोग करने में देर नहीं करते। यह एक गलत बात है। थोड़ा रुकना सीखें, धैर्य रखना सीखें।
दूसरों के लिए किए प्रयोग क्यों चलते हैं पर अपने लिए नहीं?
बिना परखे दूसरे के प्रारब्ध में दखल देना
आम शिकायत — कि दूसरे के लिए करें तो तुरंत होता है, पर अपने लिए नहीं — पर वे कहते हैं कि यही असली कारण है। दूसरे के लिए करने से पहले, उसके प्रारब्ध में दखल देने से पहले, कम से कम यह देखें कि वह सही है या गलत, किस हालत में है, उसके साथ क्या हुआ है। आठों पटल सीख लेने का मतलब यह नहीं कि आप सब कुछ तुरंत, कहीं भी कर दें। पूरा माला मंत्र सीख लेने का मतलब यह नहीं कि आपको पूरा विधि विधान मिल गया और आप अच्छे साधक हैं। तुरंत प्रयोग करने से बचें; पहले सामने वाले की हालत देखें।
वे कहते हैं, प्रयोग होता है और असर तुरंत पड़ता है; पर आप जो शिकायत करते हैं — कि दूसरे के लिए तुरंत होता है और अपने लिए नहीं — यही असली कारण है। दूसरे के लिए करने से पहले, उसके प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। में दखल देने से पहले, कम से कम कुछ देखें: कि वह सही है या गलत, किस हालत में है, उसके साथ क्या हुआ है, या नहीं हुआ। आपने आठों पटल सीख लिए — इसका मतलब यह नहीं कि आप सब कुछ तुरंत, जल्दबाज़ी में, कहीं भी कर दें। पूरा माला मंत्र सीख लेने का मतलब यह नहीं कि आपको पूरा विधि विधान मिल गया और आप अच्छे साधक हैं। अब आप तुरंत, कहीं भी प्रयोग कर देते हैं। तुरंत प्रयोग करने से बचें। पहले सामने वाले व्यक्ति की हालत देखें।
किसी व्यक्ति पर सीधे प्रयोग क्यों कभी नहीं करना चाहिए?
हो सकता है सामने वाला अपने कर्म भोग रहा हो
वे कहते हैं कि वह व्यक्ति गलत भी हो सकता है; उसके अपने कर्म ही कारण हो सकते हैं कि उसे ऐसी सज़ा मिल रही है। सीधे प्रयोग न करें — वे हमेशा मना करते हैं। जिनके अपने तरीके हैं वे वैसे करेंगे, इस पर कोई विवाद नहीं। पर अगर आप उनके रास्ते और विधि विधान पर चल रहे हैं, तो वे हमेशा इससे मना करेंगे, क्योंकि वे आपका नुकसान नहीं चाहते: आपने मेहनत की है, साल-दर-साल रात और सुबह पाँच-छह घंटे बैठकर, पैसा और समय लगाया है — और जब वह निष्फल होने लगेगा, तो उन्हें आपसे ज़्यादा बुरा लगेगा।
वे कहते हैं, वह गलत भी हो सकता है; उसके अपने कर्म हो सकते हैं, जिनकी वजह से उसे ऐसी सज़ा मिल रही है। सीधे प्रयोग न करें। वे कहते हैं कि वे हमेशा इससे मना करते हैं। जहाँ तक सीधे करने की बात है — जिनका अपना तरीका है वे उसी तरह करेंगे, कोई विवाद नहीं। अगर आप उनके रास्ते पर, उनके विधि विधान पर चल रहे हैं, तो वे इसमें आपको हमेशा मना करेंगे, क्योंकि वे आपका नुकसान नहीं चाहेंगे। वे कहते हैं, आपने मेहनत की है। साल-दर-साल आप रात में, सुबह, इधर-उधर कम से कम पाँच-छह घंटे बैठे हैं। बहुत सी विधियाँ कीं, पैसा खर्च किया; आपका समय और पैसा सब उसमें गया है। और जब वह निष्फल होने लगेगा, तो उन्हें आपसे ज़्यादा बुरा लगेगा — उन्होंने भी आपके पीछे मेहनत की है।
प्रयोग शरीर पर करने की बजाय मंदिर में इष्ट के माध्यम से क्यों करना चाहिए?
शरीर पर प्रयोग से दूसरे का प्रारब्ध आप पर आ जाता है
जब सामने वाला सही हालत में हो, तब करें; जब न हो, तो उससे क्षमा याचना करवाएँ। फिर मंदिर आदि में इष्ट के माध्यम से प्रयोग करें — शरीर पर प्रयोग न करें। शरीर पर प्रयोग करने से होता यह है कि सामने वाले का प्रारब्ध सीधे आप पर आ जाता है और उसकी गति आप में शुरू हो जाती है। जब आप मंदिर में प्रयोग विधान करते हैं, तो वह महादेव के माध्यम से होता है; वहाँ हम यह कहकर संकल्प लेते हैं: प्रभु, आपकी इच्छा। अगर आप चाहें — बस। यह काम पूरा हो; इसके लिए हम यहाँ अपनी बनाई सिद्धि का जप कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वहाँ वे प्रयोग शब्द नहीं बोलते।
वे कहते हैं, सामने वाले की हालत देखें; जब वह सही हो, तब करें। जब सही न हो, तो उससे क्षमा याचना करवाकर — मंदिर आदि में इष्ट के माध्यम से प्रयोग करें। शरीर पर प्रयोग न करें। शरीर पर प्रयोग करने में होता यह है कि सामने वाले का प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। सीधे आप पर आ जाता है, और उसकी गति आप में बनने लगती है। जब आप मंदिर आदि में प्रयोग विधान करते हैं, तब वह महादेव के माध्यम से होता है। वहाँ हम संकल्प लेते हैं: प्रभु, आपकी इच्छा। अगर आप चाहें, तो — बस। यह काम पूरा हो; इसके लिए हम यहाँ उस सिद्धि का जप कर रहे हैं जो हमने बनाई थी। वे कहते हैं, वहाँ वे प्रयोग नहीं बोलते; यह नहीं कहते कि हम इसके लिए कर रहे हैं।
अशुद्ध शरीर पर मंत्र इस्तेमाल करने से क्या होता है?
मंत्र दोष और देव दोष दोनों लगते हैं
वे कहते हैं कि देवता के माध्यम से, परोक्ष रूप से करने का मतलब है कि देवता चाहें तो पल में ठीक हो जाएगा, न चाहें तो नहीं — और आप भी सुरक्षित रहते हैं, जबकि सामने वाले का कम से कम कुछ भला होता है। उसका भला करने की कोशिश में आप अपना नुकसान कर लेते हैं, और बाद में जब आपकी अपनी हालत बिगड़ती है और आप प्रयोग करते हैं, तो कुछ नहीं होता: यही मंत्र का कीलित होना है। सामने बैठी स्त्री की शारीरिक या मानसिक हालत आपको पता नहीं, और आप सीधे उस पर मंत्र चला देते हैं। कम से कम पूछ तो सकते हैं। जब शरीर अशुद्ध हो और मंत्र इस्तेमाल हों, तो मंत्र निष्फल जाता है और आपको दोष लगता है — मंत्र दोष और देव दोष दोनों।
वे श्रोताओं से कहते हैं कि वे हमेशा कहते हैं, जब आप उनके माध्यम से, परोक्ष रूप से उनके माध्यम से प्रयोग करते हैं, तो उनकी इच्छा हुई तो पल में ठीक हो जाएगा; और नहीं हुई तो नहीं होगा। आपका अपना भी बचा रहेगा, और सामने वाले का वहाँ कम से कम कुछ भला होगा। उसका भला करने की कोशिश में आप अपना नुकसान कर लेते हैं; और बाद में, जब कभी आपकी अपनी हालत बिगड़ती है और आप वहाँ प्रयोग करते हैं, तो कुछ नहीं होता। यही कारण है — मंत्र का कीलित होना (उत्कीलन)। आपको पता नहीं कि सामने बैठी स्त्री की शारीरिक हालत और मानसिक हालत क्या है, और आप सीधे उस पर मंत्र चला देते हैं। सामने वाला बताने वाला नहीं है; आप पूछते नहीं कि उनकी हालत क्या है। कम से कम उनसे कहें — चाहे जितनी अस्वस्थता हो, जो भी स्थिति हो। कम से कम आप पूछ तो सकते हैं। वे कहते हैं कि इससे गहराई में वे नहीं जा सकते, और सब स्थिति समझ सकते हैं। जब शरीर अशुद्ध हो और उस समय मंत्र आदि इस्तेमाल हों, तब आपका मंत्र भी निष्फल जाता है, और आपको भी दोष लगता है — मंत्र दोष और देव दोष दोनों लगते हैं। उसके बाद भी मंत्र का असर नहीं मिल रहा होता।
सावन में प्रयोग करने का क्या परिणाम होता है?
मंत्र हमेशा के लिए कीलित और साधक शापित
वे कहते हैं, खास तौर पर सावन में, अगर आपने ऐसी प्रयोग विधि की है, तो वह मंत्र हमेशा के लिए कीलित हो गया; वह आपके लिए फिर कभी काम नहीं करेगा, और ऊपर से आप शापित भी हो जाएँगे। अब शाप विमोचन विधि शुरू से करें। जब शाप विमोचन फल देने लगेगा, तभी इस मंत्र की सिद्धि फिर होगी, और तभी वह असर देगा।
वे कहते हैं, खास तौर पर सावन में, अगर आपने ऐसी प्रयोग विधि की है, तो वह मंत्र हमेशा के लिए कीलित (उत्कीलन) हो गया। वह आपके लिए फिर कभी काम नहीं करेगा, और उल्टा आप शापित भी हो जाएँगे। अब शाप विमोचन विधि शुरू से करें। जब शाप विमोचन फल देने लगेगा, तभी इस मंत्र की सिद्धि फिर होगी, और तभी वह अपना असर देगा।
साधना के नियम धीरे-धीरे क्यों मानने चाहिए?
स्थायी इलाज, और पाँच साल का शाकाहारी
जो ये नियम नहीं मानते और कहते हैं कि वे अपने तरीके से करते हैं और यह होता है, वह होता है — आप जाकर देखते नहीं कि सच में हो रहा है या नहीं। जो नियम से नहीं चलते उन्हें समय के साथ बड़ा दुख और कष्ट भोगना पड़ता है। वे नियमों पर ज़ोर इसलिए देते हैं कि जो हो वह स्थायी हो, चाहे धीरे हो — ऐसा इलाज कि हम फिर उसी पाप में न फँसें। वे कहते हैं, जिन्हें तुरंत फल मिलता है वे तुरंत रास्ता भी बदल सकते हैं: कहेंगे कि काम था इसलिए शुद्ध शाकाहारी बन गए, और परसों काम हो जाने पर फिर मांसाहारी बन जाएँगे। पर जिसे पाँच साल शाकाहार रखना पड़ा, और पाँच साल बाद जिसका काम पूरे से ज़्यादा हुआ, वह फिर मांसाहारी बनने से पहले सोचेगा।
वे कहते हैं, जो ये सब नियम नहीं मानते, और कहते हैं कि वे अपने तरीके से करते हैं और यह होता है, वह होता है — आप जाकर देखने वाले नहीं कि वैसा हो रहा है या नहीं। जो नियम से नहीं चलते, उन्हें समय के साथ बड़ा दुख और कष्ट भोगना पड़ता है। इसीलिए वे ज़ोर देते हैं: नियम से चलें, ताकि जो भी चीज़ हो, वह स्थायी हो — चाहे धीरे हो, क्यों न हो? इलाज ऐसा हो कि हम फिर उसी पाप में न पड़ें। जिन्हें तुरंत फल मिलता है, वे तुरंत रास्ता भी बदल सकते हैं। अब वे कहेंगे कि उन्हें यह-यह काम था, इसलिए शुद्ध शाकाहारी बन गए; कल काम पूरा हुआ, और परसों से फिर मांसाहारी बन जाएँगे। पर जिन्हें पाँच साल शाकाहारी आचरण रखना पड़ा, जिनका काम पाँच साल बाद पूरे से ज़्यादा हुआ — वे फिर मांसाहारी बनने से पहले सोचेंगे। वे कहेंगे, नहीं, हमने इतनी मेहनत की है। भगवान चाहते थे कि वे हर तरह से सुधर जाएँ; इतने जीवों की हत्या भी प्रारब्ध बनाती है।
सावन की जगह प्रयोग कब करने चाहिए?
भदवारी — भाद्रपद की तारा चतुर्दशी और अमावस्या
वे आशा करते हैं कि श्रोता अपने किए विधि विधान सही तरीके से करेंगे, गलत तरीके से प्रयोग नहीं करेंगे, और सावन में प्रयोग करने से बचेंगे। प्रयोग भदवारी में करें — भाद्रपद महीने में तारा चतुर्दशी और अमावस्या है, और तब बहुत सी प्रयोग विधियाँ होंगी। जो निजी संपर्क में हैं, जिनका काम चल रहा है, उन सबसे वे प्रयोग विधि करवाएँगे। पर जल्दबाज़ी में यह सावन — बहुत दिव्य सावन — बर्बाद न होने दें। इसे प्रयोग में न लगाएँ; इस समय माँ भगवती जगदंबा के साथ महादेव और प्रभु विष्णु की जितनी हो सके सेवा, पूजा, अर्चन, जप, हवन और दान-पुण्य हो, ताकि हमारे मंत्रों की शक्ति बढ़े, हमारे देवता प्रसन्न हों, कुल के पितर और पूर्वज प्रसन्न हों, और हमारा भौतिक और आध्यात्मिक जीवन दोनों आगे बढ़ें।
वे कहते हैं, उन्हें आशा है कि श्रोताओं ने जो भी विधि विधान किए हैं, वे उन्हें सही तरीके से करेंगे। गलत तरीके से प्रयोग न करें, और सावन में प्रयोग करने से बचें। प्रयोग भदवारी में करें। भाद्रपद मास में तारा चतुर्दशी और अमावस्या है; उसमें बहुत सी प्रयोग विधियाँ होंगी। जो लोग निजी संपर्क में हैं, जिनका सब काम चल रहा है — उन सबसे वे प्रयोग विधि करवाएँगे। पर जल्दबाज़ी में यह सावन ऐसे बर्बाद न होने दें; यह बहुत दिव्य सावन है। इसे इस तरह प्रयोग में न लगाएँ। इस समय माँ भगवती जगदंबा के साथ भगवान महादेव और प्रभु विष्णु की जितनी हो सके सेवा, पूजा, अर्चन, जप, हवन आदि, और दान-पुण्य हो — जिससे हमारे मंत्रों की शक्ति बढ़े, हमारे देवी-देवता प्रसन्न हों, कुल के पितर और पूर्वज प्रसन्न हों, और हमारा भौतिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन सब उन्नति की ओर आगे बढ़ें।
सावन खत्म होने पर साधक को कैसा लगना चाहिए?
रक्षाबंधन के बाद एक दिव्य आभा
जब सावन पूरा हो, रक्षाबंधन के बाद, हमारे अंदर एक दिव्य आभा होनी चाहिए, और लगना चाहिए कि हाँ, यह सावन बेकार नहीं गया — हमने पंचाक्षरी का सवा लाख किया, अष्टोत्तर शतनाम किया, उनके माला मंत्रों का इतना किया। तब आपके अंदर एक शांति होगी; आप पहले से कहीं ज़्यादा शांत हो जाएँगे, और आपकी बुद्धि कहीं ज़्यादा तेज़ हो जाएगी। इतना करने की खुशी मन में रहेगी, और उसी से रास्ता बनेगा। जल्दबाज़ी से रास्ता नहीं बनने वाला।
जब सावन पूरा हो, रक्षाबंधन के बाद, तब हमारे अंदर एक दिव्य आभा होनी चाहिए — लगना चाहिए कि हाँ, यह सावन बेकार नहीं गया। हमने पंचाक्षरी मंत्र का सवा लाख किया है। हमने अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। किया है; उनके माला मंत्रों में से जो भी कोई कर रहा है — कि इतना हो गया। तब आपके अंदर एक शांति होगी। आप पहले से कहीं ज़्यादा शांत हो जाएँगे। आपकी बुद्धि कहीं ज़्यादा तेज़ हो जाएगी। कि हमने इतना किया है — इसका अच्छा असर होता है; आपके मन में एक खुशी रहेगी। और उसी से रास्ता बनेगा। इस जल्दबाज़ी से रास्ता नहीं बनने वाला।
क्या स्फटिक शिवलिंग स्थापित करने से पहले प्राण प्रतिष्ठा ज़रूरी है?
खास ज़रूरी नहीं; अथर्वशीर्ष पाठ काफ़ी है
स्फटिक शिवलिंग स्थापित करने के लिए प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए या नहीं, इस पर वे कहते हैं कि विधि विधान से चाहें तो प्रतिष्ठा करवा सकते हैं — हालाँकि उनकी दृष्टि में इसकी खास ज़रूरत नहीं है। पंडित जी को बुलाकर अथर्वशीर्ष का पाठ करवा लें, तो वह भी काफ़ी है।
श्रोताओं के प्रश्नों पर आते हुए, वे एक प्रश्न लेते हैं कि स्फटिकस्फटिक की माला, जब साधक की कुंडली में शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो, तब रुद्राक्ष के स्थान पर चुनी जाती है। शिवलिंग स्थापित करने के लिए प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए या नहीं। वे कहते हैं, विधि विधान से चाहें तो प्रतिष्ठा करवा सकते हैं — हालाँकि उनकी दृष्टि में इसकी कोई खास ज़रूरत नहीं है। अगर पंडित जी को बुलाकर अथर्वशीर्ष (अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है।) का पाठ करवा लें, तो वह भी काफ़ी है।
क्या किसी स्तोत्र की सिद्धि के पीछे भागना चाहिए?
सिद्धि उस पर छोड़ दें जिसका स्तोत्र है
मंत्र और पूजन पाठ के समय हल्दी और पुदीना खा सकते हैं या नहीं, इस पर वे बस इतना कहते हैं कि कोई इतना लंबा व्रत रख सके तो अलग बात है। हज़ार पाठ के बाद कुछ सिद्ध हुआ या नहीं, इस पर वे प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि वह विषय छोड़ दें: सिद्ध होगा या नहीं, वह उस पर छोड़ दें जिसका स्तोत्र है। अपना काम करते रहें; सिद्धि के पीछे न पड़ें — वे बार-बार इससे मना करते हैं। जो पूरा होना चाहिए वह आपका काम है।
मंत्र के समय और पूजन पाठ के समय हल्दी और पुदीना खा सकते हैं या नहीं, इस पर वे बस इतना कहते हैं कि कोई इतना लंबा व्रत ले सके, तो अलग बात है। एक प्रश्नकर्ता जो पूछ रहा है कि सिद्ध हुआ या नहीं, उससे वे कहते हैं: वह विषय छोड़ दो। हज़ार बार पाठ करने से सिद्ध होगा या नहीं — वह उस पर छोड़ दो जिसका स्तोत्र है। अपना काम करते रहो। सिद्धि के पीछे न पड़ो; वे बार-बार इससे मना करते हैं। वे कहते हैं, जो पूरा होना चाहिए, वह आपका काम है।
क्या पार्थिव पूजन की सच में कोई आसान विधि है?
सबसे आसान रूप में भी प्राण प्रतिष्ठा और वज्र विधि रहती है
वे कहते हैं, पार्थिव पूजन की विधि कितनी भी आसान बना दी जाए, उसमें प्राण प्रतिष्ठा, वज्र विधि और ऐसी सब चीज़ें रहेंगी। इसलिए किसी को बुलाकर सीखना बेहतर है।
वे कहते हैं, पार्थिव पूजन (पार्थिव शिवलिंग) की विधि कितनी भी आसान बना दी जाए, उसमें प्राण प्रतिष्ठा विधि, वज्र विधि, ये सब तो रहेंगी ही। इसलिए किसी को बुलाकर सीखना बेहतर है।
दर्शन पाने के लिए सावन में महादेव की साधना कैसे करें?
एक सवा लाख की जगह पाँच लाख पंचाक्षरी
सावन में महादेव की साधना कैसे करें कि दर्शन मिलें, इस पर वे कहते हैं कि वे पहले ही बता चुके हैं — वही चीज़ ज़्यादा से ज़्यादा करें; यह साठ दिन का सावन है। संभव हो तो एक सवा लाख की जगह पाँच करें: पाँच लाख का जप करें। पंचाक्षरी का पाँच लाख जप हो जाए तो ज़बरदस्त है। काम पूरा होगा; भगवान चाहेंगे तो दर्शन भी देंगे। अगर ऐसी स्थिति बने, तो यह सच्ची बात है — इतना करें और वे कुछ अच्छा ज़रूर देंगे।
सावन में महादेव की साधना कैसे करें कि दर्शन मिल सकें, इस पर वे कहते हैं कि वे पहले ही बता चुके हैं; वही चीज़ ज़्यादा से ज़्यादा करें — यह साठ दिन का सावन है। अगर आपके लिए संभव हो, तो एक सवा लाख की जगह पाँच करें — पाँच लाख का जप करें। अगर पंचाक्षरी मंत्र का पाँच लाख जप हो जाए, तो ज़बरदस्त है। काम पूरा होगा; भगवान की इच्छा हुई, तो वे दर्शन भी देंगे। अगर ऐसी स्थिति बने, तो यह सच्ची बात है — इतना करें और वे कुछ अच्छा ज़रूर देंगे।
क्या सावन में बाल, दाढ़ी और नाखून काटना मना है?
सिद्धांत में मना, पर पेशे के हिसाब से छूट
वे कहते हैं कि सावन में दाढ़ी कटवाना, बाल बनवाना और नाखून काटना मना तो रहता है, पर अपनी स्थिति देखें: अगर आप नौकरी में हैं, किसी पेशे में हैं, और आपकी प्रोफ़ाइल ऐसी है कि वहाँ इसकी अनुमति नहीं, तो कोई दिक्कत नहीं। जो दूसरी साधनाएँ करते हैं, लंबी वाली जो पूरे सावन चलती हैं, वे दाढ़ी, बाल, नाखून आदि न कटवाएँ।
वे कहते हैं, सावन में दाढ़ी कटवाना, बाल बनवाना और नाखून काटना मना तो रहता है। पर अपनी स्थिति देखें। अगर आप नौकरी में हैं, किसी पेशे में हैं, और आपकी प्रोफ़ाइल ऐसी है कि वहाँ इसकी अनुमति नहीं, तो कोई दिक्कत नहीं। जहाँ तक लोगों की दूसरी साधनाओं की बात है, लंबी वाली जो पूरे सावन चलती हैं — उनके लिए दाढ़ी, बाल, नाखून आदि नहीं कटवाने चाहिए।
नदी न हो तो पार्थिव शिवलिंग का विसर्जन कहाँ करें?
बेल के पेड़ की जड़ में
अगर पार्थिव शिवलिंग के विसर्जन के लिए नदी, झील या तालाब न हो, तो बेल के पेड़ की जड़ में विसर्जन करें।
वे कहते हैं, अगर पार्थिव शिवलिंग का विसर्जन करने के लिए नदी, झील या तालाब न हो, तो बेल के पेड़ की जड़ में विसर्जन करें।
जो खुद कवच नहीं बना सकते, उनके लिए कवच कैसे बनता है?
बेल की लकड़ी की लेखनी, अष्टगंध और भोजपत्र
वे कहते हैं कि कवच बनाने की विधि चैनल पर बताई गई है, उनके लिए जो खुद नहीं बना सकते और जिन्हें बिल्कुल नहीं पता कि कलम कैसे बनानी है। यंत्र और कवच लिखने के लिए बेल के पेड़ की लकड़ी से लेखनी बनाई जाती है। पहले शुभ मुहूर्त में पेड़ को निमंत्रण दिया जाता है, और अगले दिन उसे लाया जाता है। उसके बाद अष्टगंध आदि तैयार करके भोजपत्र पर लिखा जाता है। लिखने के बाद उनकी प्रतिष्ठा होती है।
जो खुद कवच नहीं बना सकते — वे कहते हैं कि कवच बनाने की विधि चैनल पर बताई गई है, उनके लिए जिन्हें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं कि अब कलम कैसे बनानी है। यंत्र और कवच लिखने के लिए बेल के पेड़ की लकड़ी से लेखनी बनाई जाती है। तो पहले शुभ मुहूर्त आदि में उन्हें निमंत्रण दिया जाता है, और फिर अगले दिन उन्हें लाया जाता है। और उसके बाद अष्टगंध आदि तैयार किया जाता है, और भोजपत्र पर लिखा जाता है। लिखने के बाद उनकी प्रतिष्ठा होती है।
कवच या यंत्र लिखने के बाद क्या होता है?
प्राण प्रतिष्ठा, निष्कीलन, और फिर जप
जैसा वह है — यंत्र के रूप में, कवच के रूप में — उसके हिसाब से फिर उनकी प्राण प्रतिष्ठा आदि होती है, निष्कीलन आदि होता है, और उसके बाद उनका जप शुरू होता है।
और जैसे वे हैं — जैसा यंत्र है, जैसा कवच है — उसके हिसाब से फिर उनकी प्राण प्रतिष्ठा आदि की जाती है। निष्कीलन आदि करके, फिर उनका जप शुरू होता है।
सावन में बने कवच के पीछे दो सवा लाख जप और पूरे साठ दिन का रुद्राभिषेक होता है।
कवच के पीछे दो सवा लाख जप और साठ दिन का रुद्राभिषेक
वे कहते हैं, क्योंकि इस बार सावन है, जिन सबका कवच बनना है उनके लिए लगभग दो सवा लाख जप आराम से हो जाएँगे, और रुद्राभिषेक पूरे साठ दिन का होगा। तो इस बार कवचों के लिए बहुत बड़ी व्यवस्था बन गई है। आप खुद भी जो करेंगे, उतनी वे चीज़ें और मज़बूत होंगी; और उसके बाद उसे पहनें।
वे कहते हैं, अब मान लीजिए कि इस बार सावन है। तो जिन सब लोगों का कवच आदि बनना है, उनके लिए लगभग दो सवा लाख जप आराम से हो जाएँगे, और रुद्राभिषेक पूरे साठ दिन का होगा। तो इस बार कवच आदि के लिए बहुत बड़ी व्यवस्था बन गई है, उन सबके लिए जिनका कवच बन रहा है। और आप खुद भी जो करेंगे, उतनी वे चीज़ें और मज़बूत होंगी। और उसके बाद उसे पहनें।
कौन सा कवच सबसे आम तौर पर पहना जा सकता है?
ताँबे का खोल, और उनके लिए कवच जो मांस या शराब नहीं छोड़ सकते
वे कहते हैं, सबसे सामान्य ताँबे का कवच है — ताँबे का खोल — क्योंकि उसकी ज़रूरतें सबसे कम होंगी और कोई भी उसे पहन सकता है। बाकी के लिए, वे कहते हैं कि पूरा विषय इस वीडियो के विवरण में लिखा है: कवच क्या है और किसे पहनना है। जो मांस-मछली खाना और शराब पीना नहीं छोड़ सकते, पर जिनकी हालत खराब है और जो पहनकर कुछ लाभ पाना चाहते हैं, उनके लिए उसी तरह के स्वरूप मंत्रों से कवच बनाया जाएगा।
वे कहते हैं, उसमें जो बिल्कुल सबसे सामान्य है — इसी कारण उन्होंने ताँबे का कवच, ताँबे का खोल कहा है — क्योंकि उसकी माँग सबसे कम होगी, और कोई भी उसे पहन सकता है। बाकी, हर व्यक्ति की स्थिति के हिसाब से, वे कहते हैं कि पूरा विषय इस वीडियो के विवरण में भी लिखा है: कवच क्या है, किसे पहनना है। जो कभी मांस-मछली खाना नहीं छोड़ सकते, शराब पीना नहीं छोड़ सकते, पर जिनकी हालत खराब है और जो पहनना चाहते हैं ताकि कुछ लाभ हो — उनके लिए उसी तरह के स्वरूप मंत्र आदि इस्तेमाल करके फिर वैसा कवच बनाया जाएगा।
क्या परिवार के हर सदस्य के लिए कवच बन सकता है?
अलग स्वभाव के लिए अलग कवच
आप सबके लिए, परिवार के हर सदस्य के लिए बनवा सकते हैं; कोई दिक्कत नहीं। अगर परिवार में कोई एक व्यक्ति अलग प्रवृत्ति का है, तो चाहें तो अलग कवच बनवाए जा सकते हैं, इसमें भी कोई दिक्कत नहीं।
वे कहते हैं, आप सबके लिए, परिवार के सब सदस्यों के लिए बनवा सकते हैं; कोई दिक्कत नहीं। अगर परिवार में कोई एक व्यक्ति अलग प्रवृत्ति का है, तो अलग कवच बनवाने हों, तो वे भी बन सकते हैं; इसमें भी कोई दिक्कत नहीं।
शिव सहस्रनाम स्तोत्र के पाठ की विधि क्या है?
आचमन, आसन, संकल्प, फिर पाठ
शिव सहस्रनाम स्तोत्र पाठ की विधि पूछे जाने पर वे कहते हैं कि सहस्रनाम पाठ की विधि ठीक वैसी ही है जैसे हम पूजन पाठ करते हैं: आचमन आदि करके, अपने आसन पर बैठकर, फिर संकल्प लेकर उनके सहस्रनाम का पाठ करें।
शिव सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ करने की विधि क्या है, यह पूछे जाने पर वे उत्तर देते हैं कि सहस्रनाम पाठ की विधि ठीक वैसी ही है जैसे हम पूजन पाठ करते हैं। आचमन आदि करके, अपने आसन पर बैठकर, फिर संकल्प लेकर, उनके सहस्रनाम का पाठ करें।
क्या टूटे हुए संगमरमर के शिवलिंग की पूजा जारी रखनी चाहिए?
शिवलिंग खंडित नहीं माना जाता, पर मन का टिकना ज़रूरी है
टूटे संगमरमर के शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए या नहीं, इस पर वे कहते हैं कि शिवलिंग को खंडित नहीं माना गया है — बहुत से विद्वानों और शास्त्रों से ऐसा प्रमाण दिया गया है। पर अगर आपका मन वहाँ नहीं टिक रहा, तो उनकी दृष्टि में टूट जाने पर नया शिवलिंग स्थापित करना चाहिए, क्योंकि उन्हें खुद इससे संतोष नहीं होता, तो वे और कैसे कहें। शास्त्र का प्रमाण अपनी जगह है, पर यहाँ आपका मन भी टिकना चाहिए; ऐसी हालत में टूट गया है और मन नहीं टिक रहा, तो वह अलग बात है।
संगमरमर का शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। जो टूट गया हो, उसकी पूजा करनी चाहिए या नहीं, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं कि शिवलिंग को खंडित नहीं माना गया है; बहुत से विद्वानों और शास्त्रों से ऐसा प्रमाण भी दिया गया है। पर अगर आपका मन वहाँ नहीं टिक रहा, तो उनकी दृष्टि में यह है: अगर टूट गया है, तो आपको नया शिवलिंग स्थापित करना चाहिए। वे कहते हैं, क्योंकि उन्हें खुद इससे संतोष नहीं होता, तो वे और कैसे कहें। शास्त्र का प्रमाण अपनी जगह है, पर यहाँ आपका मन भी टिकना चाहिए। इस जगह, इस हालत में, वह टूट गया है और मन नहीं टिक रहा — तब वह अलग बात है।
विंध्य क्षेत्र का केंद्र बिंदु माना जाने वाला रामेश्वर ज्योतिर्लिंग टूटा हुआ है, फिर भी पूजा जाता है।
विंध्य क्षेत्र का रामेश्वर ज्योतिर्लिंग
वे कहते हैं, विंध्याचल क्षेत्र जाइए, जहाँ भगवान रामेश्वर का ज्योतिर्लिंग है — रामेश्वर ज्योतिर्लिंग, जिसे विंध्य क्षेत्र का केंद्र बिंदु माना जाता है। वहाँ गिरि पुजारी पूजन करते हैं, और वह शिवलिंग पूरी तरह टूटा हुआ है; देखते ही साफ़ पता चलता है। पर पूरे विंध्याचल क्षेत्र में इतना बड़ा शिवलिंग नहीं है। वह दिव्य शिवलिंग है। बाहर से लगेगा कि वहाँ क्या होगा, पर मंदिर में घुसते ही उसे देखकर आपका मन बिल्कुल शून्य हो जाएगा कि कितनी अद्भुत जगह है। तो यह निर्भर करता है।
वे कहते हैं, अब विंध्याचल क्षेत्र जाइए, जहाँ भगवान रामेश्वर का ज्योतिर्लिंग है — रामेश्वर ज्योतिर्लिंग, जिसे विंध्य क्षेत्र का केंद्र बिंदु माना गया है। वहाँ गिरि पुजारी पूजन करते हैं। वह शिवलिंग पूरी तरह टूटा हुआ है; देखते ही बिल्कुल साफ़ पता चल जाएगा। पर पूरे विंध्याचल क्षेत्र में इतना बड़ा शिवलिंग नहीं है। वह दिव्य शिवलिंग है। बाहर से आपको लगेगा कि वहाँ कुछ खास नहीं होगा; पर जैसे ही मंदिर में घुसेंगे, उसे देखकर आपका मन बिल्कुल शून्य हो जाएगा — कितनी अद्भुत जगह है। तो, वे कहते हैं, यह निर्भर करता है।
क्या अपनी परंपरा के ऋषियों से बात की जा सकती है?
दिव्य साधनाएँ, और विंध्य क्षेत्र के महर्षि अगस्त्य
तंत्र में क्या नहीं है, यह पूछे जाने पर वे उत्तर देते हैं कि चाहे वशिष्ठ जी से बात हो या विश्वामित्र जी से, या किसी और से जिनकी गुरु परंपरा रही हो, अपनी दिव्य साधनाओं के माध्यम से अपने प्रमुख गुरुओं से बात ज़रूर की जा सकती है। विंध्य क्षेत्र के, कुल परंपरा में सबसे प्रमुख ऋषि महर्षि अगस्त्य हैं।
तंत्र में क्या नहीं है, इस प्रश्न पर वे उत्तर देते हैं: चाहे वशिष्ठ जी (वशिष्ठ) से बात हो, या विश्वामित्र जी (विश्वामित्र) से, या किसी और से जिनकी गुरु परंपरा रही हो — अपनी दिव्य साधनाओं के माध्यम से अपने प्रमुख गुरुओं से बात ज़रूर की जा सकती है। विंध्य क्षेत्र के जो प्रमुख ऋषि हैं, कुल परंपरा में सबसे प्रमुख, वे महर्षि अगस्त्य हैं।
शिष्य की पात्रता की तुलना में गुरु कितना मायने रखता है?
गुरु सबके लिए एक; पात्रता तय करती है
वे कहते हैं कि बहुत से दिव्य साधक हैं जो कहते हैं कि उन्हें उनसे मार्गदर्शन मिला है। ऐसे साधकों से जो उन्होंने सुना है और वे जिस हालत में हैं, उससे लगता है कि हाँ, कोशिश की जाए तो संभव है। वे जोड़ते हैं कि ऐसे बहुत से विषय हैं जिन पर यहाँ बोलना केवल मज़ाक बनवाना है, इसलिए वे सब पर नहीं बोल सकते, पर पूछे गए प्रश्न पर वे सकारात्मक बोलेंगे। और यह बहाने की बात नहीं कि शक्तिशाली गुरु मिले, गुरु ऐसा हो या वैसा: यह कहीं ज़्यादा इस पर निर्भर करेगा कि आपमें कितनी पात्रता है। गुरु सबके लिए एक ही है।
वे कहते हैं, ऐसे बहुत से दिव्य साधक हैं जिनका कहना है कि उन्हें उनसे दिशा और मार्गदर्शन मिला है। तो उनकी दृष्टि में, ऐसे साधकों से जितना उन्होंने सुना है, और वे जिस तरह की हालत में हैं, उससे लगता है कि हाँ भाई, कोशिश की जाए तो संभव है। वे जोड़ते हैं कि ऐसे बहुत से विषय हैं जिन पर यहाँ बोलना बस अपना मज़ाक बनवाने वाली स्थिति बन जाती है, इसलिए वे सब विषय नहीं बोल सकते। पर जो प्रश्न पूछा गया है, उस पर वे सकारात्मक बोलेंगे। यह बहाने वाली बात नहीं है — कि शक्तिशाली गुरु मिलेगा, कि गुरु ऐसा हो या वैसा। यह कहीं ज़्यादा इस पर निर्भर करेगा कि आपमें कितनी पात्रता है। गुरु सबके लिए एक ही है।
क्या कुलदेवी आवाहन के लिए हर बार नई सुपारी लेनी चाहिए?
सुपारी एक बार स्थापित होती है और हटाई नहीं जाती
नहीं — रोज़ नई सुपारी नहीं। सुपारी एक बार स्थापित होगी, और उसी पर आवाहन होगा; उसके बाद उसे हटाना नहीं है।
सुपारी पर कुलदेवी का आवाहन करने के बारे में पूछा गया — क्या रोज़ नई सुपारी चाहिए — वे उत्तर देते हैं: नहीं, नहीं, नहीं। सुपारी एक बार स्थापित होगी, और उसी पर आवाहन होगा। उसके बाद उसे हटाना नहीं है।
गायत्री दीक्षा वालों के लिए आगे कौन सी साधना है?
ब्रह्म गायत्री और चौबीस लाख
गायत्री दीक्षा पाए साधकों को अलग से कौन सी साधना बतानी है, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं: गायत्री — ब्रह्म गायत्री — की साधना जितनी हो सके करते रहें। चौबीस लाख की साधना करना सबसे ज़रूरी है; कम से कम इतना तो करना ही चाहिए।
गायत्री दीक्षा (गायत्री मंत्र) पाए साधकों को आगे अलग से कौन सी साधना बतानी है, यह पूछे जाने पर वे उत्तर देते हैं: गायत्री — ब्रह्म गायत्री — की साधना जितनी हो सके करते रहें। चौबीस लाख की साधना करना सबसे ज़रूरी है। कम से कम इतना तो ज़रूर करना चाहिए।
जो एक साल तक न जाने की पारिवारिक प्रथा से बँधा हो, वह क्या करे?
घर की परंपरा मानें, और गीता और शिव गीता पढ़ें
वे प्रश्नकर्ता से कहते हैं कि उनके घर की परंपरा के हिसाब से अगर पूरे साल नहीं जाना है, तो पूरे साल न जाएँ। अभी श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करें और शिव गीता का पाठ करें।
वे कहते हैं, आपके घर की परंपरा के हिसाब से अगर पूरे साल नहीं जाना है, तो पूरे साल न जाएँ। अभी श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीमद्भगवद्गीता) का पाठ करें, और शिव गीता का पाठ करें। वे पहले वाले प्रश्नकर्ता की पहचान भी बताते हैं: रविकांत राय जी सासाराम, बिहार से हैं — और वे दोहराते हैं कि बिहार के सासाराम के पंडित जी कहते हैं कि घर में शिवलिंग न रखो, और घर में काली जी की पूजा न करो।
क्या सावन में सूर्य और तुलसी के लिए कोई विशेष विधान है?
कुछ खास नहीं, और तुलसी को ज़्यादा पानी नहीं देना
सब पापों और दोषों को दूर करने के लिए सावन में सूर्यदेव और तुलसी जी की विधियों के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि सावन के महीने में सबसे विशेष विधि विधान भगवान शिव का है, और वह सब वे शायद बता चुके हैं। शिव जी के लिए, तुलसी जी के लिए, इस महीने में उन्हें ऐसा कोई विशेष विधि विधान नहीं लगता। सावन के लिए शास्त्र के हिसाब से जो कहा गया है वह ज़्यादा से ज़्यादा जल की व्यवस्था है — पर अगर तुलसी जी को ज़्यादा जल देने की विधि की जाए, तो वह भी समस्या है, क्योंकि उन्हें ज़्यादा जल नहीं देना चाहिए। और भगवान सूर्य के लिए जो पहले से कहा गया है वही करना चाहिए।
सावन के महीने और सूर्यदेव और तुलसी जी की विधियों के बारे में, सब पापों की शुद्धि और दोष दूर करने के लिए, पूछे जाने पर वे कहते हैं कि सावन के महीने में सबसे विशेष विधि विधान भगवान शिव का है, और वह सब उन्होंने शायद आज बता दिया है। शिव जी के लिए, तुलसी जी के लिए, इस महीने में उन्हें नहीं लगता कि उस तरह का कुछ खास है। शास्त्र के हिसाब से जो कहा गया है, अब सावन के महीने में, वह है ज़्यादा से ज़्यादा जल की व्यवस्था करना। पर अगर तुलसी जी को ज़्यादा जल देने वाली कोई विधि की जाए, तो उसमें भी दिक्कत है, क्योंकि उन्हें ज़्यादा जल नहीं देना चाहिए। और भगवान सूर्य के लिए जो पहले से बताया गया है — वही करना चाहिए।
तुलसी के विधान कार्तिक के हैं और सूर्य के विधान मार्गशीर्ष के।
तुलसी के लिए कार्तिक, सूर्य के लिए मार्गशीर्ष
वे कहते हैं कि विशेष विधि विधान के लिए उन्हें देखना पड़ेगा कि बारह महीनों के लिए क्या कहा गया है, और अभी वे इस पर आगे चर्चा नहीं कर पाएँगे, क्योंकि उनका पूरा मन महादेव पर है। सूर्यनारायण और माँ भगवती तुलसी पर वे कार्तिक महीने और मार्गशीर्ष महीने में अलग से बोलेंगे — क्योंकि मार्गशीर्ष महीना भगवान सूर्यनारायण को और कार्तिक महीना माँ भगवती तुलसी को समर्पित है, इसलिए ये सब विधि विधान तब देना ज़्यादा उचित होगा।
वे कहते हैं, विशेष विधि विधान के लिए उन्हें भी देखना पड़ेगा कि बारह महीनों के लिए क्या-क्या कहा गया है। अभी उन्हें नहीं लगता कि वे इस पर आगे चर्चा कर पाएँगे, क्योंकि उनका पूरा मन महादेव पर है। सूर्यनारायण और माँ भगवती तुलसी पर वे कार्तिक मास और मार्गशीर्ष मास में अलग से बोलेंगे — क्योंकि मार्गशीर्ष का महीना भगवान सूर्यनारायण को और कार्तिक का महीना माँ भगवती तुलसी को समर्पित है। ये सब विधि विधान तब बताए जाएँ तो ज़्यादा उचित होगा।
क्या कुलदेवी को प्रत्यक्ष किया जा सकता है?
वे प्रत्यक्ष होती हैं, यह इस पर निर्भर है कि वे कौन हैं
कुलदेवी को प्रत्यक्ष किया जा सकता है या नहीं, इस पर वे कहते हैं कि हाँ भाई, वे प्रत्यक्ष होती हैं — पर यह इस पर भी निर्भर है कि आपकी कुलदेवी कौन हैं। वे जोड़ते हैं कि कौन सी साधना करनी है और कितनी करनी चाहिए, यह सब बताया जा चुका है।
कुलदेवी को प्रत्यक्ष किया जा सकता है या नहीं, यह पूछे जाने पर वे उत्तर देते हैं कि भाई, वे प्रत्यक्ष होती हैं। अब आपकी कुलदेवी कौन हैं — यह इस पर भी निर्भर है। वे कहते हैं, ये सब बातें बताई जा चुकी हैं: कौन सी साधना करनी है, कितनी करनी चाहिए।
क्या जेड ब्लैक नर्मदेश्वर शिवलिंग को घर में चाँदी की अरघी में रखा जा सकता है?
बिना किसी शर्त के अनुमति
जेड ब्लैक नर्मदेश्वर शिवलिंग को चाँदी की अरघी में रखकर घर में पूजा जा सकता है या नहीं, इस पर वे कहते हैं कि बिल्कुल रख सकते हैं।
जेड ब्लैक नर्मदेश्वर शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। को चाँदी की अरघी में रखकर घर में पूजा जा सकता है या नहीं, यह पूछे जाने पर वे उत्तर देते हैं: बिल्कुल, आप कर सकते हैं।
पैसों की परेशानी और बरकत न होने पर क्या बताया गया है?
दरिद्र दहन स्तोत्र के साथ दही और गुड़ से अभिषेक
वे कहते हैं, आर्थिक उन्नति के लिए महादेव का दही और गुड़ से, चीनी मिलाकर, खाँड मिलाकर अभिषेक करें; या पूरे सावन उनका मधु से अभिषेक करें। और रुद्राष्टकम का पाठ करते हुए सावन में दरिद्र दहन स्तोत्र का अनुष्ठान करें। वह सबसे अच्छा होगा।
एक श्रोता जो कह रहा है कि बरकत नहीं है, पैसों की परेशानी है, उसे वे उत्तर देते हैं: आर्थिक उन्नति के लिए महादेव का दही और गुड़ से, चीनी मिलाकर, खाँड मिलाकर अभिषेक करें। या पूरे सावन उनका मधु से अभिषेक करें। रुद्राष्टकम् का पाठ करते हुए, सावन में दरिद्र दहन स्तोत्र का अनुष्ठान करें। वह सबसे अच्छा होगा।
हरिहर के 108 नामों के रोज़ के हवन की पूर्णाहुति किससे होती है?
जिससे पूर्णाहुति सामान्य रूप से होती है
हरिहर के 108 नामों से रोज़ के हवन में पूर्णाहुति किससे करनी चाहिए, इस पर वे कहते हैं कि पूर्णाहुति उसी से होती है जिससे होती है; इसके लिए कुछ अलग नहीं करना है।
हरिहर के 108 नामों से रोज़ हवन करते समय पूर्णाहुति किससे करनी चाहिए, यह पूछे जाने पर वे उत्तर देते हैं: पूर्णाहुति उसी से होती है जिससे होती है। उसके लिए कुछ अलग नहीं करना है।
क्या अंदर से खोखली मूर्ति का अभिषेक किया जा सकता है?
खोखली मूर्ति का पूजन या अभिषेक नहीं
अंदर से खोखली मूर्ति का अभिषेक हो सकता है या नहीं, इस पर वे कहते हैं कि वे प्रश्नकर्ता को पहले ही संदेश दे चुके हैं कि नहीं करना चाहिए। भाई, खोखली मूर्ति का पूजन या अभिषेक न करें — वे कहते हैं कि यह वे शुरू से कहते आ रहे हैं।
अंदर से खोखली मूर्ति का अभिषेक किया जा सकता है या नहीं, यह पूछे जाने पर वे उत्तर देते हैं कि वे प्रश्नकर्ता को पहले ही संदेश दे चुके हैं कि नहीं करना चाहिए। भाई, खोखली मूर्ति का पूजन या अभिषेक न करें। वे कहते हैं कि यह वे बिल्कुल शुरू से कहते आ रहे हैं।
क्या दत्तात्रेय माला मंत्र में ॐ लगाया जा सकता है?
अनुमति है, क्योंकि यह उसके साथ पहले से दिया गया है
दत्तात्रेय माला मंत्र में ॐ के साथ जप पर वे कहते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं — यह उसके साथ दिया गया है, तो जो चाहें कर सकते हैं। शताक्षरी में, सहस्राक्षरी में, उन सबमें इतनी परेशानी नहीं है, और यह पहले से दिया गया है। वे कहते हैं, अगर यह न होता तो वे पहले ही हटा देते।
दत्तात्रेय माला मंत्र के जप में ॐ की बात पर वे कहते हैं: बिल्कुल, आप कर सकते हैं; कोई दिक्कत नहीं। वह उसके साथ पहले से दिया गया है, तो जो चाहें कर सकते हैं। चाहे शताक्षरी हो या सहस्राक्षरी, उन सबमें इतनी परेशानी नहीं है, और यह पहले से दिया गया है। वे कहते हैं, अगर यह न होता, तो वे पहले ही हटा देते।
क्या वे गुरु पूर्णिमा पर गुरु सेवा स्वीकार करते हैं?
उन्होंने कोई शिष्य नहीं बनाया और कोई गुरु सेवा नहीं माँगते
एक श्रोता कहता है कि वह देखना चाहता है कि इस गुरु पूर्णिमा पर कितने लोग उनकी गुरु सेवा करते हैं और कैसे; वे उत्तर देते हैं: इसमें देखना क्या है? उन्होंने किसी को शिष्य बनाया ही नहीं, तो कोई उन्हें गुरु सेवा दे या न दे, वे कभी नहीं माँगते। लोग वहाँ करें जहाँ उनके अपने गुरु हैं, या जिसे उन्होंने गुरु माना है। एक मार्गदर्शक के रूप में वे भी अपने लिए अपने गुरु से प्रार्थना करते हैं।
एक श्रोता जो कहता है कि वह देखना चाहता है कि इस गुरु पूर्णिमा पर कितने लोग उनकी गुरु सेवा करते हैं और किस तरह, उसे वे उत्तर देते हैं: भाई, इसमें देखना क्या है? उन्होंने किसी को शिष्य बनाया ही नहीं, तो कोई उन्हें गुरु सेवा दे या न दे, वे कभी नहीं माँगते। जहाँ हर व्यक्ति के गुरु हैं, या जिसे उन्होंने अपना गुरु माना है, वे उनके लिए करें। एक मार्गदर्शक के रूप में वे भी अपने लिए अपने गुरु से प्रार्थना करते हैं।
देव दीक्षा में चढ़ाई गई धोती का क्या करें?
किसी सेवक ब्राह्मण को दान दें, पर खैनी खाने वाले को नहीं
देव दीक्षा के बाद जो धोती चढ़ाई गई है उसे किसी सेवक ब्राह्मण को दान कर देना चाहिए। बस खैनी खाने वाले ब्राह्मण को न दें।
वे कहते हैं, देव दीक्षा (देव दीक्षा) के बाद जो धोतियाँ चढ़ाई गई हैं उन्हें किसी सेवक ब्राह्मण को दान कर देना चाहिए। बस, खैनी खाने वाले ब्राह्मण को न दें।
क्या गौरी-गणेश पूजा के लिए वही सुपारी स्वरूप फिर इस्तेमाल हो सकता है?
पूजा लगातार चल रही हो तो जारी रखें, नहीं तो विसर्जन
पूजा के समय जिस सुपारी स्वरूप पर माँ गौरी और गणेश जी की पूजा होती है, क्या उस पर फिर पूजा हो सकती है, इस पर वे कहते हैं कि अगर पूजा जारी रखी जा रही है तो हो सकती है; नहीं तो बाद में उनका विसर्जन करें, या उन्हें वहाँ भी रखा जा सकता है जहाँ लक्ष्मी और गणेश जी हैं।
पूजा के समय जिस सुपारी स्वरूप पर माँ गौरी और गणेश जी की पूजा होती है, क्या उसी पर फिर पूजा हो सकती है, यह पूछे जाने पर वे उत्तर देते हैं: अगर इसे जारी रखा जा रहा है, तो हो सकती है। नहीं तो बाद में उनका विसर्जन करें; या फिर जहाँ लक्ष्मी और गणेश जी हैं, उन्हें वहाँ भी रखा जा सकता है।
कलश स्थापना के बाद नारियल और पूर्ण पात्र का क्या करें?
नारियल का विसर्जन; पूर्ण पात्र दान या उसका चावल भंडार में
कलश स्थापना के बाद जब विसर्जन होता है, तो नारियल का विसर्जन करना है। पूर्ण पात्र या तो उसी तरह दान किया जाता है, या आप उसका चावल अपने भंडार घर में भी रख सकते हैं।
वे कहते हैं, कलश स्थापना के बाद जब विसर्जन होता है, तो नारियल का विसर्जन करना है। पूर्ण पात्र उसी तरह दान किया जाता है; या आप उसका चावल अपने भंडार घर में भी रख सकते हैं।
क्या माँ काली को लौंग और इलायची चढ़ाई जा सकती है?
अनुमति है, और छूटे अंबुबाची हवन के लिए 108 लौंग की आहुति
माँ काली को लौंग और इलायची चढ़ती है या नहीं, इस पर वे कहते हैं: बिल्कुल चढ़ाएँ। अंबुबाची के समय हवन न हो पाने पर 108 लौंग की आहुति देना ठीक था या नहीं, इस पर वे कहते हैं हाँ, यह किया जा सकता है।
पुत्र की इच्छा के लिए क्या बताया गया है?
महाशास्ता प्रयोग, ऐसे शिव साधक से जो उसे कर सके
पुत्र प्राप्ति के लिए वे एक श्रोता से, जो शायद दक्षिण में है — वे कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कहाँ — कहते हैं कि अगर वहाँ शिव जी का कोई विशेष साधक हो जो महाशास्ता प्रयोग कर सके, तो उससे करवाएँ; लाभ तुरंत होता है। क्योंकि अभी हरिहर का महीना भी है, इसमें करवाना भी चलेगा। महाशास्ता भगवान शिव और नारायण के पुत्र हैं, और उनकी प्रयोग विधि से आप जल्दी लाभ पा सकते हैं। नहीं तो बाकी विधि विधान आपको बताए गए हैं और चैनल पर हैं।
वे कहते हैं, पुत्र प्राप्ति के लिए, अगर आप दक्षिण की तरफ़ हैं या जहाँ भी — उन्हें नहीं पता — तो अगर वहाँ शिव जी का कोई विशेष साधक हो जो महाशास्ता प्रयोग कर सके, तो उससे करवाएँ; उससे लाभ तुरंत होता है। अभी हरिहर का महीना भी है, तो इसमें करवाना भी चलेगा। महाशास्ता, जो भगवान शिव और नारायण के पुत्र हैं — उनकी प्रयोग विधि से आप जल्दी लाभ पा सकते हैं। नहीं तो, बाकी विधि विधान आपको बताए गए हैं और चैनल पर हैं।
अभिषेक में बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम किस रूप में बोले जाते हैं?
सोमनाथाय नमः, मल्लिकार्जुनाय नमः
बारह ज्योतिर्लिंगों के अभिषेक के बारे में पूछे जाने पर वे पुष्टि करते हैं कि इसे इस तरह करना है: "सोमनाथाय नमः, मल्लिकार्जुनाय नमः"। ठीक इसी तरह करना है।
बारह ज्योतिर्लिंग के अभिषेक के बारे में पूछे जाने पर वे पुष्टि करते हैं कि इसे इस तरह करना है: "सोमनाथाय नमः, मल्लिकार्जुनाय नमः"। वे कहते हैं, हाँ, बिल्कुल; ठीक इसी तरह करना है।
क्या राम रक्षा स्तोत्र भी किया जा सकता है?
हाँ, सतनाम के 1100 के बाद
वे कहते हैं, अगर राम जी का करना चाहते हैं, तो हाँ, राम रक्षा स्तोत्र करें। सतनाम का 1100 करने के बाद आप यह कर सकते हैं।
वे कहते हैं, अगर आप राम जी का करना चाहते हैं, तो हाँ — राम रक्षा स्तोत्र (राम रक्षा स्तोत्र) करें। सतनाम का 1100 करने के बाद आप यह कर सकते हैं।
क्या अविवाहित लड़कियाँ शिवलिंग की पूजा कर सकती हैं?
पार्वती अविवाहित थीं, और सोलह सोमवार व्रत
अविवाहित लड़कियाँ शिवलिंग की पूजा कर सकती हैं या नहीं, इस पर वे कहते हैं कि बिल्कुल कर सकती हैं। पार्वती जी अविवाहित थीं, और तभी उन्होंने शिवलिंग की पूजा की, और इसलिए उन्हें महादेव पति के रूप में मिले। अविवाहित लड़कियाँ ही सोलह सोमवार का व्रत रखती हैं, ताकि योग्य पति मिले। बिल्कुल कर सकती हैं — वे पूछते हैं, अविवाहित लड़कियाँ शिवलिंग का पूजन क्यों नहीं कर सकतीं?
अविवाहित लड़कियाँ शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। की पूजा कर सकती हैं या नहीं, यह पूछे जाने पर वे उत्तर देते हैं: बिल्कुल, कर सकती हैं। पार्वती जी अविवाहित थीं; तभी उन्होंने शिवलिंग की पूजा की, और इसलिए उन्हें महादेव पति के रूप में मिले। अविवाहित लड़कियाँ ही सोलह सोमवार का व्रत रखती हैं, ताकि योग्य पति मिले। बिल्कुल, वे कर सकती हैं। वे पूछते हैं, अविवाहित लड़कियाँ शिवलिंग का पूजन क्यों नहीं कर सकतीं?
शास्त्र क्या कहता है
That Pārvatī, while unmarried, worshipped a śivaliṅga and thereby won Śiva as her husband.
The text's own account (ch. 21: Nārada teaches Pārvatī the pañcākṣara and tells her to meditate on Śiva's form; ch. 22: her multi-thousand-year austerities) never mentions liṅga-pūjā. The claim is the popular/customary telling, not what this text narrates.
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विधे तात महाप्राज्ञ विष्णुशिष्य त्रिलोककृत्। अद्भुतेयं कथा प्रोक्ता शंकरस्य महात्मनः॥ १
हे विधे! हे तात! हे महाप्राज्ञ! हे विष्णुशिष्य! हे त्रिलोककर्ता! आपने महात्मा शंकरकी यह विलक्षण कथा सुनायी।
भस्मीभूते स्मरे शंभुतृतीयनयनाग्निना। तस्मिन्प्रविष्टे जलधौ वद त्वं किमभूत्ततः॥ २
शिवके तृतीय नेत्रकी अग्निसे कामदेवके भस्म हो जानेपर और उस अग्निके समुद्रमें प्रवेश हो जानेपर फिर क्या हुआ?
किं चकार ततो देवी पार्वती कुधरात्मजा। गता कुत्र सखीभ्यां सा तद्वदाद्य दयानिधे॥ ३
तदनन्तर हिमालयपुत्री पार्वतीदेवीने क्या किया और वे अपनी दोनों सखियोंके साथ कहाँ गयीं? हे दयानिधे! अब आप इसे बताइये।
शृणु तात महाप्राज्ञ चरितं शशिमौलिनः। महोपकारकस्यैव स्वामिनो मम चादरात्॥ ४
हे तात! हे महाप्राज्ञ! आप महान् उपकार करनेवाले मेरे स्वामी चन्द्रशेखरके चरित्रको आदरपूर्वक सुनिये।
यदादहच्छंभुनेत्रोद्भवो हि मदनं शुचिः। महाशब्दोऽद्भुतोऽभूद्वै येनाकाशः प्रपूरितः॥ ५
भगवान् शंकरके नेत्रसे उत्पन्न हुई पवित्र अग्निने जब कामदेवको जला दिया, तब महान् अद्भुत शब्द प्रकट हुआ, जिससे आकाश पूर्णरूपसे भर गया।
तेन शब्देन महता कामं दग्धं समीक्ष्य च। सखीभ्यां सह भीता सा ययौ स्वगृहमाकुला॥ ६
उस महान् शब्दके साथ ही कामदेवको दग्ध हुआ देखकर भयभीत और व्याकुल हुई पार्वती अपनी दोनों सखियोंके साथ अपने घर चली गयीं।
तेन शब्देन हिमवान्परिवारसमन्वितः। विस्मितोऽभूदतिक्लिष्टः सुतां स्मृत्वा गतां ततः॥ ७
उस शब्दसे परिवारसहित हिमवान् भी बड़े आश्चर्यमें पड़ गये और वहाँ गयी हुई अपनी पुत्रीका स्मरण करके उन्हें बड़ा क्लेश हुआ।
जगाम शोकं शैलेशो सुतां दृष्ट्वातिविह्वलाम्। रुदन्तीं शंभुविरहादाससादाचलेश्वरः॥ ८
अपनी पुत्रीको अत्यन्त विह्वल और शम्भुके विरहसे रोती हुई देखकर शैलराज हिमवान्को बड़ा शोक हुआ और वे शीघ्र ही उनके पास पहुँचे।
आसाद्य पाणिना तस्या मार्जयन्नयनद्वयम्। मा बिभीहि शिवेऽरोदीरित्युक्त्वा तां तदाग्रहीत्॥ ९
उनके पास पहुँचकर वे हाथसे उनकी दोनों आँखोंको पोंछते हुए "हे शिवे! डरो मत, रोओ मत" ऐसा कहकर उन्हें पकड़ लिया।
क्रोडे कृत्वा सुतां शीघ्रं हिमवानचलेश्वरः। स्वमालयमथानिन्ये सांत्वयन्नतिविह्वलाम्॥ १०
पर्वतराज हिमवान् अत्यन्त विह्वल हुई पुत्री पार्वतीको शीघ्र ही गोदमें उठा लिया और उन्हें सान्त्वना देते हुए अपने घर ले आये।
अंतर्हिते स्मरं दग्ध्वा हरे तद्विरहाच्छिवा। विकलाभूद् भृशं सा वै लेभे शर्म न कुत्रचित्॥ ११
कामदेवका दाह करके महादेवजीके अन्तर्धान हो जानेपर उनके विरहसे पार्वती अत्यन्त व्याकुल हो गयीं और उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिली।
पितुर्गृहं तदा गत्वा मिलित्वा मातरं शिवा। पुनर्जातं तदा मेने स्वात्मानं सा धरात्मजा॥ १२
पिताके घर जाकर जब वे अपनी माताको मिलीं, उस समय पार्वतीने अपना नया जन्म हुआ माना।
निनिंद च स्वरूपं सा हा हतास्मीत्यथाब्रवीत्। सखीभिर्बोधिता चापि न बुबोध गिरीन्द्रजा॥ १३
वे अपने रूपकी निन्दा करने लगीं और "हाय! मैं मारी गयी" ऐसा कहने लगीं। सखियोंके समझानेपर भी वे गिरिराजकुमारी कुछ समझ नहीं पातीं।
स्वपती च पिबंती च सा स्नाती गच्छती शिवा। तिष्ठन्ती च सखीमध्ये न किंचित्सुखमाप ह॥ १४
वे सोते-जागते, खाते-पीते, नहाते-धोते, चलते-फिरते और सखियोंके बीचमें बैठते समय भी किंचिन्मात्र भी सुखका अनुभव नहीं करती थीं।
धिक्स्वरूपं मदीयं च तथा जन्म च कर्म च। इति ब्रुवंती सततं स्मरन्ती हरचेष्टितम्॥ १५
"मेरे स्वरूप, जन्म तथा कर्मको धिक्कार है" — ऐसा कहती हुई वे सदा महादेवजीकी प्रत्येक चेष्टाका चिन्तन करती रहती थीं।
एवं सा पार्वती शंभुविरहात् क्लिष्टमानसा। सुखं न लेभे किंचिद्वाब्रवीच्छिवशिवेति च॥ १६
इस प्रकार वे पार्वती भगवान् शिवके विरहसे मन-ही-मन अत्यन्त क्लेशका अनुभव करतीं और किंचिन्मात्र भी सुख नहीं पाती थीं, वे सदा शिव-शिव कहा करती थीं।
निवसंती पितुर्गेहे पिनाकिगतचेतना। शुशोचाथ शिवा तात मुमोह च मुहुर्मुहुः॥ १७
पिताके घरमें रहकर भी वे चित्तसे पिनाकपाणि भगवान् शंकरके पास पहुँची रहती थीं। हे तात! शिवा शोकमग्न हो बारंबार मूर्च्छित हो जाती थीं।
शैलाधिराजोऽप्यथ मेनकापि मैनाकमुख्यास्तनयाश्च सर्वे। तां सांत्वयामासुरदीनसत्त्वा हरं विसस्मार तथापि नो सा॥ १८
शैलराज हिमवान्, उनकी पत्नी मेनका तथा उनके मैनाक आदि सभी पुत्र, जो बड़े उदारचित्त थे, उन्हें सदा सान्त्वना देते रहते थे, तथापि वे भगवान् शंकरको भूल न सकीं।
अथ देवमुने धीमन्हिमवत्प्रस्तरे तदा। नियोजितो बलभिदागमस्त्वं कामचारतः॥ १९
हे बुद्धिमान् देवर्षे! तदनन्तर इन्द्रकी प्रेरणासे इच्छानुसार घूमते हुए आप हिमालय-पर्वतपर पहुँचे।
ततस्त्वं पूजितस्तेन भूधरेण महात्मना। कुशलं पृष्टवांस्तं वै तदाविष्टो वरासने॥ २०
उस समय महात्मा हिमवान्ने आपका सत्कार किया। तब आप उनके द्वारा दिये गये उत्तम आसनपर बैठकर उनसे कुशल पूछने लगे।
ततः प्रोवाच शैलेशः कन्याचरितमादितः। हरसेवान्वितं कामदहनं च हरेण ह॥ २१
उसके बाद पर्वतराज हिमवान्ने अपनी कन्याके चरित्रका आरम्भसे वर्णन किया, कि किस तरह उसने महादेवजीकी सेवा की और किस तरह हरके द्वारा कामदेवका दहन हुआ।
श्रुत्वावोचो मुने त्वं तु तं शैलेशं शिवं भज। तमामंत्र्योदतिष्ठस्त्वं संस्मृत्य मनसा शिवम्॥ २२
हे मुने! यह सब सुनकर आपने गिरिराजसे कहा—हे शैलेश्वर! भगवान् शिवका भजन कीजिये। फिर उनसे विदा लेकर आप उठे और मन-ही-मन शिवका स्मरण किया।
तं समुत्सृज्य रहसि कालीं तामगमस्त्वरा। लोकोपकारको ज्ञानी त्वं मुने शिववल्लभः॥ २३
फिर उन्हें छोड़कर शीघ्र ही एकान्तमें आप कालीके पास आ गये। हे मुने! आप लोकोपकारी, ज्ञानी तथा शिवके प्रिय भक्त हैं।
आसाद्य कालीं संबोध्य तद्धिते स्थित आदरात्। अवोचस्त्वं वचस्तथ्यं सर्वेषां ज्ञानिनां वरः॥ २४
कालीके समीप जाकर उसे सम्बोधित करके उसीके हितमें स्थित हो, हे सर्वज्ञानियोंमें श्रेष्ठ! आपने उससे आदरपूर्वक यह सत्य वचन कहा—
शृणु कालि वचो मे हि सत्यं वच्मि दयारतः। सर्वथा ते हितकरं निर्विकारं सुकामदम्॥ २५
हे कालि! तुम मेरी बात सुनो। मैं दयावश यह सत्य बात कह रहा हूँ। मेरा वचन तुम्हारे लिये सर्वथा हितकर, निर्दोष तथा उत्तम वस्तुओंको देनेवाला होगा।
सेवितश्च महादेवस्त्वयेह तपसा विना। गर्ववत्या यदध्वंसीहीनानुग्रहकारकः॥ २६
तुमने यहाँ महादेवजीकी सेवा अवश्य की, परंतु बिना तपस्याके, अभिमानयुक्त होकर की। दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले शिवने तुम्हारे उसी गर्वको नष्ट कर दिया है।
विरक्तश्च स ते स्वामी महायोगी महेश्वरः। विसृष्टवान्स्मरं दग्ध्वा त्वां शिवे भक्तवत्सलः॥ २७
हे शिवे! तुम्हारे स्वामी महायोगी महेश्वर विरक्त हैं; उन भक्तवत्सलने कामदेवको जलाकर तुम्हें सकुशल छोड़ दिया है।
तस्मात्त्वं सुतपोयुक्ता चिरमाराधयेश्वरम्। तपसा संस्कृतां रुद्रः स द्वितीयां करिष्यति॥ २८
इसलिये तुम उत्तम तपस्यामें निरत होकर चिरकालतक महेश्वरकी आराधना करो। तपस्याके द्वारा संस्कारयुक्त हो जानेपर रुद्रदेव तुम्हें अवश्य अपनी भार्या बनायेंगे।
त्वं चापि शंकरं शम्भुं न त्यक्ष्यसि कदाचन। नान्यं पतिं हठाद्देवि ग्रहीष्यसि शिवादृते॥ २९
हे देवि! तुम भी शंकरका परित्याग कभी नहीं करोगी और हठपूर्वक शिवजीके अतिरिक्त किसी दूसरेको पतिरूपमें स्वीकार नहीं करोगी।
इत्याकर्ण्य वचस्ते हि मुने सा भूधरात्मजा। किंचिदुच्छ्वसिता काली प्राहत्वां सांजलिर्मुदा॥ ३०
हे मुने! आपकी यह बात सुनकर गिरिराजकुमारी काली कुछ उच्छ्वास लेती हुई हाथ जोड़कर आपसे प्रसन्नतापूर्वक कहने लगीं—
त्वं तु सर्वज्ञ जगतामुपकारकर प्रभो। रुद्रस्याराधनार्थाय मंत्रं देहि मुने हि मे॥ ३१
हे सर्वज्ञ! जगत्का उपकार करनेवाले हे प्रभो! हे मुने! रुद्रदेवकी आराधनाके लिये मुझे किसी मन्त्रका उपदेश कीजिये।
न सिध्यति क्रिया कापि सर्वेषां सद्गुरुं विना। मया श्रुता पुरा सत्यं श्रुतिरेषा सनातनी॥ ३२
सद्गुरुके बिना किसीकी कोई भी क्रिया सिद्ध नहीं होती—ऐसा मैंने पहले भी सुन रखा है और यही सनातन श्रुति भी है।
इति श्रुत्वा वचस्तस्याः पार्वत्या मुनिसत्तमः। पंचाक्षरं शम्भुमन्त्रं विधिपूर्वमुपादिशः॥ ३३
पार्वतीका यह वचन सुनकर हे मुनिश्रेष्ठ! आपने पंचाक्षर मन्त्र नमः शिवाय का उन्हें विधिपूर्वक उपदेश दिया।
अवोचश्च वचस्तां त्वं श्रद्धामुत्पादयन्मुने। प्रभावं मन्त्रराजस्य तस्य सर्वाधिकं मुने॥ ३४
हे मुने! आपने मन्त्रराजमें श्रद्धा उत्पन्न करनेके लिये उससे यह वचन कहा और उसका सबसे अधिक प्रभाव बताया।
शृणु देवि मनोरस्य प्रभावं परमाद्भुतम्। यस्य श्रवणमात्रेण शंकरः सुप्रसीदति॥ ३५
हे देवि! इस मन्त्रके अत्यन्त अद्भुत प्रभावको सुनो, जिसके सुननेमात्रसे शंकर परम प्रसन्न हो जाते हैं।
मंत्रोऽयं सर्वमंत्राणामधिराजश्च कामदः। भुक्तिमुक्तिप्रदोऽत्यन्तं शंकरस्य महाप्रियः॥ ३६
यह मन्त्रराज सब मन्त्रोंका अधिराज तथा मनोवांछित फल प्रदान करनेवाला है; यह साधकको भोग और मोक्ष देनेवाला तथा शंकरको अत्यन्त प्रिय है।
सुभगे येन जप्तेन विधिना सोऽचिराद् द्रुतम्। आराधितस्ते प्रत्यक्षो भविष्यति शिवो ध्रुवम्॥ ३७
हे सौभाग्यशालिनि! इसका विधिपूर्वक जप करनेसे तुम्हारे द्वारा आराधित हुए भगवान् शिव अवश्य शीघ्र ही तुम्हारी आँखोंके सामने प्रकट हो जायँगे।
चिन्तयन्ती च तद्रूपं नियमस्था शराक्षरम्। जप मन्त्रं शिवे त्वं हि संतुष्यति शिवो द्रुतम्॥ ३८
हे शिवे! नियमोंमें तत्पर रहकर उनके स्वरूपका चिन्तन करती हुई तुम पंचाक्षर मन्त्रका जप करो, इससे शिव शीघ्र ही सन्तुष्ट होंगे।
एवं कुरु तपः साध्वि तपःसाध्यो महेश्वरः। तपस्येव फलं सर्वैः प्राप्यते नान्यथा क्वचित्॥ ३९
हे साध्वि! इस प्रकार तुम तपस्या करो, क्योंकि तपस्यासे ही महेश्वर वशमें हो सकते हैं। तपस्यासे ही सबको मनोनुकूल फलकी प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं।
एवमुक्त्वा तदा कालीं नारद त्वं शिवप्रियः। यादृच्छिकोऽगमस्त्वं तु स्वर्गं देवहिते रतः॥ ४०
हे नारद! कालीसे इस प्रकार कहकर भगवान् शिवके प्रिय भक्त, इच्छानुसार विचरण करनेवाले तथा देवताओंके हितमें तत्पर रहनेवाले आपने स्वर्गलोकको प्रस्थान किया।
पार्वती च तदा श्रुत्वा वचनं तव नारद। सुप्रसन्ना तदा प्राप पंचाक्षरमनूत्तमम्॥ ४१
हे नारद! तब आपकी बातको सुनकर पार्वती बहुत प्रसन्न हुईं, क्योंकि उन्हें परम उत्तम पंचाक्षर मन्त्रराजकी प्राप्ति हो गयी थी।
हर मंत्र के आगे और पीछे ॐ लगाने से क्या लाभ है?
वे सार्वजनिक उत्तर देने से मना करते हैं और इस प्रथा को मना करते हैं
हर मंत्र के आगे और पीछे ॐ लगाने से क्या लाभ है, इस पर वे कहते हैं कि उनके पास जो उत्तर है वह बहुत बढ़िया है, पर यह सार्वजनिक मंच है और वह नहीं देना चाहिए; ऐसे शब्द उन्हें इस्तेमाल नहीं करने चाहिए। वे बस इतना कहेंगे: ऐसा न करें। अपनी मर्ज़ी से इसे नहीं लगाना चाहिए। वे बताते हैं कि शिव तांडव बिल्कुल किया जा सकता है। और वे मानते हैं कि अगर आपके गुरु कोई विशेष विधि विधान बता रहे हैं, निष्कीलन आदि का प्रयोग बता रहे हैं, तो उसमें जो होता है वह अलग बात है — बाकी, खुद ऐसा नहीं करना चाहिए।
वे पहले पुष्टि करते हैं कि शिव तांडव बिल्कुल किया जा सकता है। हर मंत्र के आगे और पीछे ॐ लगाने से क्या लाभ है, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं कि उनके पास जो उत्तर है वह बहुत बढ़िया है, पर क्या करें — यह सार्वजनिक मंच है, और वह नहीं देना चाहिए। ऐसे शब्द उन्हें इस्तेमाल नहीं करने चाहिए। वे बस इतना कहेंगे: ऐसा न करें। अपनी मर्ज़ी से इसे नहीं लगाना चाहिए। अगर आपके गुरु आपको कोई विशेष विधि विधान बता रहे हैं, निष्कीलन आदि का प्रयोग बता रहे हैं, तो उसमें जो होता है वह अलग बात है। बाकी, खुद इस तरह नहीं करना चाहिए।
लगातार चलती शत्रुतापूर्ण बाधा के विरुद्ध क्या करें?
रविवार या मंगलवार को बटुक भैरव हवन, और उनका कवच
वे कहते हैं, अगर यह परेशानी सबको बहुत हो रही है, तो सबसे पहला काम सब यह करें कि रविवार या मंगलवार को घर में बटुक भैरव जी का हवन करें या करवाएँ। और उनका कवच भी पहनना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि शिव महापुराण की कथा ज़रूर शुरू की जाएगी।
इससे कैसे बचें, यह पूछे जाने पर, जब प्रश्नकर्ता कहता है कि वे बहुत परेशान हैं, वे कहते हैं कि अगर यह चीज़ सबको बहुत ज़्यादा परेशान कर रही है, तो सबसे पहला काम सब यह करें: घर में, रविवार या मंगलवार को, बटुक भैरव जी का हवन करना या करवाना चाहिए। और उनका कवच भी पहनना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि शिव पुराण की कथा ज़रूर शुरू की जाएगी।
अपामार्ग के पौधे के कौन से हिस्से, और कैसे, इस्तेमाल हो सकते हैं?
पूरा पंचांग, सुखाकर, हवन के लिए
अपामार्ग में उसका पंचांग इस्तेमाल हो सकता है — उसका फूल, पत्ता, तना और जड़, सब इस्तेमाल हो सकता है। उसे सुखाकर फिर हवन में इस्तेमाल करना चाहिए। एक साथ दो-तीन संकल्पों पर वे जोड़ते हैं कि एक संकल्प लें तो बहुत बेहतर होगा।
वे कहते हैं, अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। में उसका पंचांग इस्तेमाल हो सकता है। उसका फूल, पत्ता, तना और जड़ — सब इस्तेमाल हो सकता है। उसे सुखाकर फिर हवन में इस्तेमाल करना चाहिए। एक साथ दो-तीन संकल्पों के प्रश्न पर वे कहते हैं: एक संकल्प लें, तब बहुत बेहतर होगा।
क्या पंचाक्षरी जप में ब्रह्मचर्य ज़रूरी है?
जप में, सावन में और चातुर्मास में ज़रूरी
वे कहते हैं, पंचाक्षरी जप में ब्रह्मचर्य का पालन बिल्कुल ज़रूरी है। सावन में खान-पान और ब्रह्मचर्य का पालन सब ज़रूरी है। चातुर्मास में ज़रूरी है।
वे कहते हैं, भाई, पंचाक्षरी मंत्र के जप में ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन बिल्कुल ज़रूरी है। सावन में खान-पान और ब्रह्मचर्य का पालन सब ज़रूरी है। चातुर्मास में ज़रूरी है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।