भाद्रपद तिथि दर तिथि — देवी जयंती, हल षष्ठी, जन्माष्टमी, अघोर चतुर्दशी
भाद्रपद की तिथियों का कैलेंडर, और उसके बाद विस्तृत प्रश्नोत्तर।
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भाद्रपद किस दिन से शुरू होता है?
भाद्रपद कृष्ण द्वितीया — देवी जयंती
हल षष्ठी आ रही है। और आज ही योग माया जयंती है, भगवती माँ विंध्यवासिनी की जयंती। यह अनादि काल से विराजमान आदि शक्ति विंध्यवासिनी की नहीं, बल्कि उनके अवतरण की जयंती है। कुछ विशेष स्थानों पर इसे भाद्रपद कृष्ण द्वितीया को देवी जयंती के रूप में मनाया जाता है।
वक्ता पहले दो दिनों के नाम बताते हैं। हल षष्ठी आ रही है — बलराम जी का जन्मदिन। और आज योग माया जयंती है, भगवती माँ विंध्यवासिनी की जयंती। वे तुरंत भेद स्पष्ट करते हैं: यह विंध्य में विराजमान आदि शक्ति विंध्यवासिनी की जयंती नहीं है, क्योंकि वे तो अनादि काल से हैं। शास्त्रीय आधार के लिए वे श्रोता को दुर्गा सप्तशती की ओर भेजते हैं। उसके ग्यारहवें अध्याय में यह आता है: नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा, ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी।
वे माँ यशोदा के गर्भ से जन्म लेंगी, विंध्याचल पर्वत पर निवास करेंगी और असुरों का नाश करेंगी।
यशोदा से जन्म और विंध्य पर निवास की भविष्यवाणी
कि वैवस्वत मन्वंतर में मैं माँ यशोदा के गर्भ से जन्म लूँगी, विंध्याचल पर्वत पर निवास करूँगी और असुरों का नाश करूँगी। कौन से असुर, यह पढ़ने पर आप समझ जाएँगे। यानी यह पहले से तय था।
वक्ता कहते हैं, जब आप इस मंत्र का अर्थ विस्तार से देखेंगे, तो इसमें यह आता है: कि वैवस्वत मन्वंतर में, उस मन्वंतर में मैं माँ यशोदा के गर्भ से जन्म लूँगी, विंध्याचल पर्वत पर निवास करूँगी और असुरों का नाश करूँगी। किन असुरों का नाश करूँगी — एक बार पढ़ लीजिए, समझ जाएँगे। यानी यह पहले से निर्धारित था।
जो देवी अनादि काल से हैं, उनकी जयंती क्यों होती है?
हज़ारवाँ अंश अवतरित हुआ, नौ में से तीन भागों में बँटा
क्योंकि कहा जाता है कि वे अंश रूप में प्रकट हुईं। उनकी हज़ार कलाओं में से एक कला, इतने अंश में वे अवतरित हुईं, और उसे भी तीन भागों में बाँटा। असल में वे नौ भागों में बँटी हैं। उस हज़ारवें अंश के बाकी छह भाग आम तौर पर लोग नहीं जानते।
वक्ता पूछते हैं, अगर भगवती विंध्यवासिनी अनादि काल से विंध्य पर्वत पर विराजमान हैं, तो उन्हें इसकी क्या ज़रूरत थी — उनकी जयंती और जन्मोत्सव कैसे? कहा जाता है कि वे हज़ारवें अंश से प्रकट हुईं। जैसे कहें, उनकी हज़ार कलाओं में से एक कला — इतने अंश में वे अवतरित हुईं, और उसे भी तीन भागों में बाँटा। वे कहते हैं, हालाँकि असल में वे पूरे नौ भागों में बँटी हैं। प्रचलित लोक-मान्यता तीन की है। उस हज़ारवें अंश के बाकी छह भाग सबको पूरी तरह पता नहीं हैं। विंध्य क्षेत्र के जो साधक कौल संप्रदाय, शाक्त संप्रदाय या विंध्य संप्रदाय के हैं, उनकी परंपरा में इस विषय की पूरी जानकारी है — कि भगवती विंध्यवासिनी के नौ रूप कौन से हैं।
यशोदा से जन्मी भगवती अष्टभुजा, कंस के पटकने पर आकाश मार्ग से विंध्याचल चली गईं।
यशोदा से जन्मा अष्टभुजा रूप, जिस पर कंस ने प्रहार किया
भगवती अष्टभुजा — जिनका जन्म माँ यशोदा के गर्भ से हुआ। जब कंस उन्हें पटकने गया, तो वे कृष्ण के जन्म की भविष्यवाणी करके आकाश मार्ग से विंध्याचल में अपने आदि शक्ति रूप में चली गईं।
वक्ता कहते हैं, नौ में से वे बार-बार उन तीन की चर्चा करते हैं जो प्रकट हैं। पहला रूप भगवती अष्टभुजा का है, जिनका जन्म माँ यशोदा के गर्भ से हुआ। यह वह रूप है जिसमें, जब कंस उन्हें पटकने गया, तो वे कृष्ण जी के जन्म की भविष्यवाणी करके आकाश मार्ग से विंध्याचल में अपने आदि शक्ति रूप में चली गईं। यही लोग टेलीविज़न पर देखते और पढ़ते हैं।
उनका जन्म भाद्रपद कृष्ण द्वितीया को हुआ, और बाकी दो रूप हैं जगन्नाथ पुरी में सुभद्रा और दिल्ली में योग माया।
भाद्रपद कृष्ण द्वितीया, और पुरी व दिल्ली के रूप
उनका जन्म भाद्रपद कृष्ण द्वितीया को, यानी आज, हुआ — भगवान कृष्ण की बड़ी बहन के रूप में, अष्टभुजा रूप में। दूसरा रूप जगन्नाथ पुरी में भगवती सुभद्रा का है, विमला शक्तिपीठ के पास। तीसरा भगवती योग माया का है, जिनका मंदिर दिल्ली में है।
वक्ता कहते हैं, उनका जन्म भाद्रपद कृष्ण द्वितीया को, यानी आज, हुआ — भगवान कृष्ण की बड़ी बहन के रूप में, इसी अष्टभुजा रूप में। वही रूप फिर अंश रूप में भगवती सुभद्रा हैं, जो जगन्नाथ पुरी में भगवती रूप में विराजमान हैं। वहाँ स्थापित शक्ति पीठ विमला, जहाँ भगवती का अंग गिरा था, जगन्नाथ पुरी में भगवान जगन्नाथ के मंदिर के ठीक पीछे है। वह भी भगवती विंध्य का, माँ पार्वती के रूप का, अंश रूप है। और तीसरा वह है जिसके बारे में लोग दिल्ली में सुनते हैं, भगवती योग माया का मंदिर। तो योग माया, भगवती अष्टभुजा और भगवती सुभद्रा — ये भगवती विंध्यवासिनी के वे तीन रूप हैं जिनकी जानकारी सार्वजनिक है। कुछ विशेष स्थानों पर आज, भाद्रपद कृष्ण द्वितीया को, इनकी जयंती देवी जयंती के रूप में मनाई जाती है। तो आज से यह शुरू होता है।
हल षष्ठी क्या है, और उस दिन गुरु के बिना क्या लिया जा सकता है?
जहाँ गुरु न मिले, वहाँ हल षष्ठी पर स्वयं ली जाने वाली दीक्षाएँ
हल षष्ठी बलराम जी का जन्म है, कृष्ण के जन्म से दो दिन पहले — शेष अवतार, अपने उग्र रूप में। उस दिन जिन्हें गुरु नहीं मिले, वे स्वयं सौर दीक्षा, देव दीक्षा, वेणी दीक्षा और ग्रंथ दीक्षा ले सकते हैं।
द्वितीया के बाद आती है हल षष्ठी, जिस दिन बलराम जी का जन्म हुआ — कृष्ण जी के जन्मोत्सव से दो दिन पहले, वासुकि नागभगवान शिव के आभूषण-स्वरूप सर्पराज, तथा पाताल लोक में नागों के अधिपति। शेष अवतार, भगवान श्री बलराम अपने उग्र रूप में। वक्ता कहते हैं, उस दिन का बहुत बड़ा महत्व है। उस दिन विशेष रूप से, जिन्हें गुरु नहीं मिले — उनके लिए अलग साधनाएँ दी जाती हैं — आप स्वयं सौर दीक्षा, देव दीक्षा, वेणी दीक्षा और ग्रंथ दीक्षा ले और ग्रहण कर सकते हैं। जहाँ प्रारब्ध के कारण आपको गुरु या मार्गदर्शक भी नहीं मिल रहा, वहाँ यही करना चाहिए।
ग्रामीण भगतवाल धारा क्या है, और इस दिन वह क्या करती है?
तंत्र की ग्रामीण भगतवाल धारा, और उसका उपदेश द्वारा संचार
तंत्र में चली परंपराओं का एक हिस्सा ग्रामीण भगतवाल रहा है — एक सच्ची पर छोटे स्तर की शाखा। इसमें ज़्यादातर साबर विद्याएँ और देवता-संबंधी साधनाएँ हैं, जो सूक्ष्म और सीमित रूप में चलती हैं। हल षष्ठी पर इसके गुरु केवल उपदेश से विद्याएँ देते हैं।
वक्ता एक भेद बताते हैं, जो वे कहते हैं कि पहले के वीडियो में कर चुके हैं और यहाँ दोहराते हैं। तंत्र में जितनी परंपराएँ चली हैं, उनका एक हिस्सा ग्रामीण भगतवाल रहा है — गाँव के साधकों की धारा। तंत्र का बड़ा भंडार है, पर छोटे स्तर पर ऐसे साधक हैं जो ग्रामीण क्षेत्र में रहे हैं। वे विशेष रूप से शाबरी विद्या से, या देवताओं से, और वाल्मीकि समाज में भी प्रचलित कुछ तंत्र साधनाओं से जुड़े रहे हैं। ये सब सूक्ष्म या छोटे रूप में, छोटे स्तर पर चलती हैं, और एक चरण और एक स्तर तक ले जाई जाती हैं; बहुत बड़े रूप में नहीं ले जाई जातीं। ऐसे साधक, और उस तरह के पारंपरिक गुरु, इस हल षष्ठी के दिन अपना काम करते हैं — और विशेष रूप से उपदेश में, जिसमें जो भी विद्याएँ सिद्ध करनी हों, वे दी जाती हैं। वे समझाते हैं कि यहाँ उपदेश का अर्थ क्या है: मेरे पास कोई सिद्धि है, कोई विद्या है; अगर मुझे किसी को देनी है, तो मैं केवल उसके बारे में बताऊँगा, और जो संकल्प मैंने खुद लिया था वह उन्हें दोहराऊँगा — और शक्ति उन्हें मिल जाएगी। ऐसी शक्तियों में, हालाँकि शक्तियों का अपना महत्व है और वे पारंपरिक हैं, ये विशेष रूप से छोटी उपदेवता श्रेणी की शक्तियाँ हैं, और क्षुद्र विद्या की शक्तियाँ भी। इसलिए ये योग्य शिष्यों को तुरंत दे दी जाती हैं, या जैसे हर एक की अपनी परंपरा चली हो।
षष्ठी का अखाड़ा क्या है?
गुप्त षष्ठी अखाड़ा, और पहलवान बाबा के थान
कई क्षेत्रों में षष्ठी को अखाड़ा लगता है, हमेशा गुप्त रूप से। इसमें केवल जानकार साधक, नए साधक और दीक्षा लेने वाले किसी तंत्र पीठ पर इकट्ठा होते हैं। वहाँ विधि से दीक्षा दी जाती है। और जो विद्याओं में पक चुके हैं, उनसे गुरु आपस में शक्ति-परीक्षा करवाते हैं।
वक्ता कहते हैं, चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि में अखाड़ा खुले में लगता है। लेकिन षष्ठी का जो अखाड़ा लगता है, वह हमेशा गुप्त रूप से लगता है। इसमें केवल जानकार साधक, नए साधक और जो दीक्षा लेने वाले हैं, वे किसी तंत्र क्षेत्र या तंत्र पीठ पर इकट्ठा होते हैं, और उन्हें विधि से दीक्षा दी जाती है। और जो विद्याएँ सीखकर पक चुके हैं, उनसे गुरु आपस में शक्ति-परीक्षा करवाते हैं। वे कहते हैं, जैसे पहलवानी का अखाड़ा होता है, वैसे ही इन विद्याओं का भी अखाड़ा होता है। प्रयागराज के क्षेत्र में जाइए, या गंगा किनारे ऐसे स्थानों में, तीर्थ स्थानों में जाइए, तो आपको पेड़ के नीचे या नदी के किनारे बने कई छोटे-छोटे थान मिलेंगे, जिन पर पहलवान बाबा लिखा होता है। वे विशेष रूप से ऐसे साधक हैं जो जीवित अवस्था में अखाड़े में कोई शक्ति सिद्ध करके लड़ते थे, और हमेशा जीतते थे। मृत्यु के बाद उन्हें उस तरह की स्थिति मिली, और उस रूप में भी उनकी पूजा होती है — उनका परिवार पूजा कर सकता है, या जिस परंपरा में उन्होंने दीक्षा ली थी उसमें पूजा होती है। और फिर वे वहाँ उस सिद्ध शक्ति के गण बनकर रहते हैं।
हल दीक्षा खुद क्या है?
संचार के माध्यम के रूप में हल और छान
जैसे बलि पीठ बनता है, वैसे ही कुल देवता या परंपरा के देवता के स्थान के सामने हल पीठ बनाया जाता है। उस पर हल की पूजा छान के साथ होती है — छान यानी वह रस्सी जिससे दुहते समय एक रंग की गाय के पैर बाँधे जाते हैं। इन्हीं दोनों के माध्यम से गुरु संकल्प और व्रत के साथ अपना सब कुछ देते हैं।
वक्ता एक दीक्षा बताते हैं जिसे वे बहुत विशेष कहते हैं, जो ग्रामीण भगतवाल में हमेशा चलती रही है — हल के माध्यम से दी जाने वाली दीक्षा, जिससे गुरु किसी नए शिष्य को, या जिसे उनकी गद्दी मिलनी हो उसे, देते हैं। किसी विशेष स्थान पर, उनके कुल देवताओं के या उनकी परंपरा के प्रधान देवता के स्थान के सामने, जैसे बलि पीठ बनता है, वैसे ही हल पीठ बनाया जाता है। हल पीठ पर एक रंग की गाय की छान रखी जाती है — छान वह रस्सी है जिससे दुहते समय गाय के पैर बाँधे जाते हैं। हल के पास, उस छान और उस हल की पूजा होती है। और उसी माध्यम से गुरु अपनी सारी शक्तियाँ देते हैं, जो कुछ उन्होंने परंपरा में पाया है — चाहे खुद सिद्ध किया हो या उनके पहले के गुरुओं ने सिद्ध किया हो। इन दोनों के द्वारा संकल्प करवाकर और व्रत लेकर: कि वे कभी इसका दुरुपयोग नहीं करेंगे; इसे अपने तक सीमित नहीं रखेंगे; योग्य व्यक्ति को देंगे; परंपरा को आगे बढ़ाएँगे; धर्म का काम करेंगे। ये सब व्रत और संकल्प के रूप में लेकर, केवल हल और छान के द्वारा, नए शिष्य को या जो शिष्य योग्य हो उसे, यह दिया जाता है। उसके बाद उसी हल के पास दूध लावा का भोग लगता है, जिसे सात्विक खप्पर कहते हैं। इस तरह षष्ठी के दिन, हल षष्ठी के दिन, जिसे ललही छठ कहते हैं, भगतवाल पूजा होती है।
षष्ठी देवी कौन हैं, और उनका अधिकार क्या है?
संतान देने और रक्षा करने वाली षष्ठी देवी के रूप में विंध्यवासिनी
भगवती विंध्यवासिनी का कात्यायनी या षष्ठी देवी रूप — पूरे संसार में ऐसा रूप केवल उन्हीं का है। वे पुत्र देती हैं, उसकी रक्षा करती हैं, संतान को दीर्घायु बनाती हैं। गर्भ में बीज देने के बाद कम से कम बारह वर्ष की आयु तक उसकी रक्षा का अधिकार उनके पास है।
वक्ता कहते हैं, जिन सबको संतान की इच्छा है, उनके लिए हल षष्ठी के दिन से और आगे हर षष्ठी को, आराधना के लिए कुलदेवी रूप है भगवती विंध्यवासिनी का कात्यायनी या षष्ठी देवी रूप — पूरे संसार में ऐसा रूप केवल उन्हीं का है। अलग-अलग जगह उनका रूप अलग ढंग से दर्शाया जाता है: वैदिक रूप में एक है, तंत्रोक्त रूप में दूसरा। विंध्य पर्वत पर रहने वाली भगवती विंध्यवासिनी षष्ठी रूप में पुत्र देने वाली हैं। वे पुत्र की रक्षक हैं, संतान देने वाली हैं, संतान को दीर्घायु बनाने वाली हैं। और गर्भ में बीज देने के बाद एक तय अवधि तक — कम से कम बारह वर्ष की आयु तक — संतान की रक्षा की क्षमता या अधिकार भगवती षष्ठी देवी को दिया गया है। वे विंध्य क्षेत्र में विराजमान हैं, जहाँ उनका अलग मंदिर भी है। और बाद के समय में वहाँ के सब ब्राह्मण, पंडे और सभी लोग पुत्र प्राप्ति की इच्छा से विशेष ढंग से षष्ठी पूजा करते हैं।
संतान के लिए षष्ठी से क्या करना चाहिए?
सप्तशती के चारों ओर संतान गोपाल मंत्र का संपुट
षष्ठी को वहाँ जाकर पूजा करना सबसे अच्छा है। नहीं तो षष्ठी तिथि से भगवान कृष्ण के संतान गोपाल मंत्र के संपुट के साथ सप्तशती का पाठ करवाइए, संतान और वंश वृद्धि का संकल्प लेकर।
वक्ता कहते हैं, अगर आप षष्ठी को वहाँ जाकर पूजा करें, तो यह उत्तम है। नहीं तो — और वे कहते हैं कि इस पर अलग वीडियो बनाकर डालेंगे, पर लाइव में वैसे भी बता देते हैं — षष्ठी तिथि से भगवान कृष्ण के संतान गोपाल मंत्र का संपुट लगवाकर दुर्गा सप्तशती का संपुट पाठ करवाइए, संतान प्राप्ति और वंश वृद्धि की इच्छा वाले संकल्प के साथ। ऐसा करने से उत्तम होता है। लेकिन वे स्पष्ट करते हैं कि इसमें मुख्य रूप से जिन देवी की पूजा होगी, या भगवती दुर्गा के सामने मानसिक संकल्प जिनके लिए जाएगा, वे हैं विंध्य पर्वत पर विराजमान भगवती कात्यायनी, षष्ठी देवी — उन्हीं के नाम से।
अगर पूरी सप्तशती का संपुट न हो सके तो?
केवल ग्यारहवें अध्याय का संपुट
तब केवल ग्यारहवें अध्याय का संपुट पाठ कीजिए — संपुट की विधि सीखकर षष्ठी तिथि को ऐसे कीजिए। या तो षष्ठी से शुरू करके लंबे समय तक रोज़ कीजिए, या फिर हर षष्ठी तिथि को ज़रूर कीजिए।
वक्ता कहते हैं, अगर कोई करवा नहीं पा रहा, या खुद योग्य है और पाठ करना चाहता है पर पूरी सप्तशती का संपुट नहीं कर पा रहा — तो संपुट की विधि सीखकर, षष्ठी तिथि को ग्यारहवें अध्याय का संपुट पाठ करना चाहिए। या तो षष्ठी से शुरू करके लंबे समय तक रोज़ कीजिए, या फिर हर षष्ठी तिथि को ज़रूर कीजिए। ऐसे करना चाहिए।
अपने क्षेत्र के अनुसार देवी के किस रूप की पूजा करनी चाहिए?
अपने क्षेत्र के रूप की पूजा करें
पुरुषोत्तम क्षेत्र में रहने वाले भगवती सुभद्रा की पूजा कर सकते हैं; दिल्ली क्षेत्र वाले भगवती योग माया की; उत्तर प्रदेश और बिहार वाले भगवती अष्टभुजा की। कम से कम इतना पता होना चाहिए, ताकि आप अपने बच्चों को बता सकें।
जन्माष्टमी पर जाने से पहले वक्ता द्वितीया पर लौटते हैं। वे कहते हैं कि भगवान कृष्ण की दो मुख्य शक्ति-अवतरणों के बारे में सब जानते हैं, पर द्वितीया तिथि — आज — के बारे में शायद हज़ार में एक जानता है, क्योंकि योग माया रूप गुप्त रखा गया और इसलिए गुप्त ही रह गया। वे कहते हैं, वे केवल तीन रूपों के बारे में बता रहे हैं, और सबको बता ही इसलिए रहे हैं क्योंकि बहुत से लोग इन्हीं क्षेत्रों में रहते हैं: पुरुषोत्तम क्षेत्र में रहने वाले भगवती सुभद्रा की पूजा कर सकते हैं; दिल्ली क्षेत्र वाले भगवती योग माया की; उत्तर प्रदेश और बिहार वाले भगवती अष्टभुजा की। तो कम से कम इतना पता होना चाहिए, ताकि आप अपने बच्चों को यह बात बता सकें। वे कहते हैं, सब कुछ गुप्त नहीं रखना है; एक सीमा तक गुप्त रखना है। मैं सब कुछ प्रकाशित नहीं कर रहा — पर यह बता रहा हूँ कि इससे क्या लाभ हो सकता है।
जन्माष्टमी किस दिन मनानी चाहिए?
अष्टमी व्यापिनी निशा — वह रात जिसमें आधी रात को अष्टमी हो
जिस रात बारह बजे अष्टमी मिले, उसी दिन जन्माष्टमी का व्रत रखिए। वक्ता इसे अपना और विंध्य क्षेत्र का मत बताते हैं: भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी व्यापिनी रात में, आधी रात को हुआ था।
वक्ता कहते हैं, बलराम के जन्म के बाद, जन्माष्टमी को भगवान श्री कृष्ण का जन्म होता है, जिसमें रोहिणी नक्षत्र का मुख्य महत्व है। इस पर बहुत बहस होती है — किस दिन चंद्रमा रोहिणी के साथ है, कृष्ण चंद्रमा की सोलह कलाओं से पूर्ण हैं, और इसके साथ कई ज्योतिषीय बातें आती हैं। उनकी अपनी बात एक ही है। अष्टमी व्यापिनी निशा: जिस रात बारह बजे अष्टमी मिले — उसी दिन जन्माष्टमी का व्रत आदि रखिए। उनके मत में यही मानना चाहिए; बाकी आप जिसे मानते हैं उसे मानने के लिए स्वतंत्र हैं। पर उनके मत से, क्योंकि भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी व्यापिनी रात के समय हुआ, जब आधी रात को अष्टमी तिथि थी। तो जिस दिन आपको वह मुहूर्त मिले, उसी दिन आप जन्माष्टमी का व्रत रखेंगे, और अगले दिन नियम से पारण करेंगे। उस दिन विधि से जो पूजा आप करते आए हैं, वह करने के लिए आप स्वतंत्र हैं।
संतान के लिए जन्माष्टमी पर क्या करना चाहिए?
संतान गोपाल संपुट सप्तशती, या आधी रात को गोपाल सहस्त्रनाम
अष्टमी तिथि से आप संतान गोपाल संपुट सप्तशती करवा सकते हैं — यह वक्ता की अपनी पहली पसंद है, क्योंकि इससे एक साथ इतनी शक्तियों की पूजा होती है और आपके सारे प्रारब्ध कटने का रास्ता खुलता है। अगर यह न हो सके, तो पौने बारह बजे से गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ कीजिए।
वक्ता जन्माष्टमी के लिए इच्छा के अनुसार उपाय बताते हैं, पुत्र की इच्छा से शुरू करके। अष्टमी तिथि से भी आप संतान गोपाल मंत्र के संपुट के साथ सप्तशती पाठ करवा सकते हैं। इसी को वे पहली पसंद देते हैं — क्योंकि जब संतान गोपाल मंत्र के संपुट के साथ सप्तशती होती है, तो एक साथ इतनी शक्तियों की पूजा होती है, और उन सबके सामने प्रार्थना रखने से आपके सारे प्रारब्ध कटने का रास्ता खुलता है। यह सबसे अच्छा होगा। दूसरी बात: अगर यह न हो सके, तो कम से कम, सामर्थ्य भर और भाव से भगवान कृष्ण की पूजा करके, आधी रात को — कम से कम पौने बारह बजे से और जितनी देर आगे हो सके — कृष्ण गोपाल सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। का पाठ करना चाहिए, यह संकल्प लेकर कि पुत्र मिले, संतान मिले, वंश बढ़े।
जहाँ गर्भधारण में ही कठिनाई हो, वहाँ क्या करना चाहिए?
यशोदा की गोद में कृष्ण, और वह चित्र कहाँ रखें
उस रात विशेष रूप से भगवती यशोदा की गोद में बैठे भगवान श्री कृष्ण की पूजा कीजिए। यशोदा की भी षोडशोपचार पूजा और श्रृंगार हो। फिर वह चित्र ऐसी जगह रखिए जहाँ आपकी पत्नी उसे हर समय देख सके, और हर साल अष्टमी तिथि को उसकी विशेष पूजा कीजिए।
वक्ता कहते हैं, जहाँ गर्भधारण में कोई विशेष समस्या आ रही हो, वहाँ उस रात विशेष रूप से घर में भगवती यशोदा की गोद में बैठे भगवान श्री कृष्ण की पूजा करनी चाहिए। भगवती यशोदा मैया की भी षोडशोपचारदेवता हेतु सोलह अंगों वाला पूर्ण पूजा-क्रम, मूल पंचोपचार से अधिक विस्तृत। पूजा होनी चाहिए; उन्हें श्रृंगार और सब कुछ चढ़ाना चाहिए, और भगवान कृष्ण को भी। और भगवती यशोदा का वह चित्र, जिसकी आप पूजा करेंगे — उसे वहाँ लगाइए जहाँ आप सोते हैं, जहाँ भी आपका रहने का स्थान हो, ऐसी जगह जहाँ स्त्री, आपकी विवाहिता पत्नी, उसे हर समय देख सके। हर साल अष्टमी तिथि को उसी चित्र के सामने विशेष ढंग से उनकी पूजा और श्रृंगार होना चाहिए। बड़ा या छोटा, जो भी चित्र आप रख सकें। वे कहते हैं, भाव यह है: कि उस दिन भगवती यशोदा की पूजा हो, और गर्भ की रक्षा के लिए उनसे प्रार्थना की जाए।
यशोदा रूप का वर्णन कहाँ है, और गर्भ चंडी का उपाय क्या है?
गर्भ चंडी और राधा तंत्र — गर्भ के लिए अभिमंत्रित मक्खन
गुप्त गर्भ चंडी में, और राधा तंत्र में, जहाँ भगवती यशोदा के विशेष रूप का वर्णन गर्भ चंडिका के संपुट के साथ है। वहाँ उपाय यह है कि गाय के दूध से बना मक्खन उनके मंत्र से अभिमंत्रित करके गर्भवती स्त्री को खिलाया जाए, ताकि गर्भ की रक्षा हो।
वक्ता कहते हैं, गर्भ चंडी में, गुप्त गर्भ चंडी में, भगवती के यशोदा रूप का वर्णन है। राधा तंत्र पर वे सीधे विवाद का ज़िक्र करते हैं: बहुत से लोग कहते हैं कि यह ठीक अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में लिखा गया ग्रंथ है, जिस पर काफ़ी भ्रम है — कि यह पहले नहीं था, किसी नए व्यक्ति ने बस लिख दिया। उनका उत्तर है कि जो सार्वजनिक रूप से प्रचलित है, वह सबके सामने बहुत छोटे रूप में रखा गया है, और कोई भी अपने आप इतना बड़ा काव्य या इतना बड़ा तंत्र साहित्य नहीं लिख सकता; उसने कहीं से लिया है। तो राधा तंत्र में भी भगवती यशोदा के विशेष रूप का वर्णन आता है, जिसमें गर्भ चंडिका का संपुट है, और उसके द्वारा गर्भ की रक्षा का उपाय दिया गया है — जिसमें विशेष रूप से गाय के दूध से बना मक्खन उनके मंत्र से अभिमंत्रित करके गर्भवती स्त्री को खिलाया जाता है, ताकि गर्भ की रक्षा हो। वे जोड़ते हैं, हालाँकि इन सब बातों में वे मानते हैं कि प्रारब्ध सबसे ऊपर है और भगवती की इच्छा सबसे ऊपर है। उनकी इच्छा हो तभी कुछ काम करेगा। यहाँ चमत्कार की बात कम है और दूसरे विषयों की ज़्यादा, ताकि प्रारब्ध कट सके। जब आपकी प्रेरणा ऊँची रहती है और आपके पास तकनीकी ज्ञान होता है, तब आपका विश्वास बढ़ेगा; और जब विश्वास बढ़ेगा, तब वहाँ श्रद्धा ज़रूर काम करेगी और भगवती की कृपा काम करेगी। इसीलिए वे ये बातें इतनी खुलकर समझाते हैं।
जहाँ धन चला गया हो, वहाँ जन्माष्टमी की रात क्या करना चाहिए?
गोपाल सहस्त्रनाम परदेश गई लक्ष्मी को लौटाता है
उस रात गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ कीजिए। उसकी फलश्रुति कहती है कि परदेश गई लक्ष्मी भी लौट आती है — जो लक्ष्मी जा चुकी है, वह वापस आती है। इसलिए रात के समय सामर्थ्य भर विधि से इसका पाठ कीजिए।
वक्ता जन्माष्टमी का दूसरा उपाय बताते हैं: अगर धन से जुड़ी समस्या है, अगर पहले आपके पास बहुत था और अब आप गरीब हैं — यानी अगर लक्ष्मी आपको छोड़कर चली गई हैं — तो उस रात, जन्माष्टमी की रात, गोपाल सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। का पाठ करना चाहिए। उसकी फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। में यह बात लिखी है: कि परदेश गई लक्ष्मी भी लौट आती है। यानी जो लक्ष्मी जा चुकी है, वह वापस आती है। इसलिए उस दिन, रात के समय, विधि से और सामर्थ्य भर गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए।
कृष्ण की षष्ठी पूजा क्या है, और कैसे करें?
छठे दिन कृष्ण की षष्ठी, जैसे घर में जन्मे बच्चे की होती है
उत्सव के छठे दिन कृष्ण की षष्ठी पूजा करें — जैसे घर में जन्मे बच्चे का छठे दिन षष्ठी संस्कार होता है। सामर्थ्य के अनुसार पाँच, छह या बारह तरह के व्यंजन बनाकर भगवती यशोदा के साथ कृष्ण को भोग लगाएँ। उन्हें फिर से स्नान कराएँ, और नए वस्त्र, मुकुट और कुंडल दें।
वक्ता कहते हैं, जब आप भगवान श्रीकृष्ण का उत्सव मनाते हैं, तो छठे दिन उनकी षष्ठी पूजा होनी चाहिए। जैसे घर में बच्चा जन्म लेता है तो छठे दिन उसका षष्ठी संस्कार होता है, और उस दिन उसकी माँ को खास बना भोजन खिलाया जाता है — वैसे ही आप भी कम से कम पाँच, छह या बारह तरह के व्यंजन, सामर्थ्य के अनुसार, बनाएँ और भगवती यशोदा के साथ भगवान कृष्ण को भोग लगाएँ। उस दिन भगवान कृष्ण को फिर से स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाने चाहिए। उस दिन खास तौर पर उन्हें मुकुट दिया जाता है, और कानों में कुंडल। इसके बाद साल भर उनकी पूजा चलती है। तो अगर आप जन्माष्टमी की पूजा कर रहे हैं, तो यह ज़रूर करें — छह दिन बाद षष्ठी पूजा भी। इसमें बहुत समय नहीं लगेगा। उस दिन खाना तो बनता ही है, तो कुछ खास बना लें। वे जोड़ते हैं — कौन से भगवान आकर खाएँगे, हम इतने बड़े भक्त नहीं हैं; पर भोग लगाइए, अपनी श्रद्धा दिखाइए। कृष्ण कृपा ज़रूर करेंगे।
अघोर चतुर्दशी में क्या करना ठीक है, और क्या नहीं?
अघोर शब्द घर में तामसिक पूजा की छूट नहीं है
अघोर शब्द सुनकर हमें कोई तामसिक पूजा नहीं करनी है, और यह नवरात्रि घर में नहीं मनाई जाती। इसे मनाने का अधिकार उन परंपराओं का है जिनमें यह मनाई जाती है, क्योंकि इसकी कई बातें घर में नहीं की जा सकतीं। हमें बस जिस रात चतुर्दशी हो, उस रात विशेष पूजा करनी चाहिए।
वक्ता अघोर चतुर्दशी और अघोर नवरात्रि की बात उठाते हैं, और पहली बात तय करते हैं: अघोर शब्द सुनकर हमें कोई तामसिक पूजा नहीं करनी है, और यह नवरात्रि घर में नहीं मनाई जाती। वे पूछने वाले की बात बताते हैं — एक व्यक्ति बार-बार पूछ रहे थे कि वे अविवाहित हैं, इसलिए अघोर नवरात्रि भी करना चाहते हैं। देखिए, वे जवाब देते हैं: इस नवरात्रि को मनाने का अधिकार खास तौर पर उन परंपराओं का है जिनमें यह मनाई जाती है, क्योंकि इसमें कई बातें ऐसी हैं जो घर में नहीं की जा सकतीं। हमें बस इतना करना चाहिए: जिस रात अघोर चतुर्दशी हो, उस रात विशेष तरह की पूजा और पाठ करें। ऐसी विशेष पूजा में वे सबसे ज़्यादा यह सुझाते हैं कि उस रात सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। से अर्चना का विधान रखें — चाहे अपनी कुलदेवी का, या भगवती महाकाली का, या भगवती तारा का।
भाद्रपद का कैलेंडर किससे पूरा होता है?
गणपति नवरात्रि, चतुर्थी से चतुर्दशी तक
गणपति नवरात्रि — गणेश चतुर्थी से गणेश चतुर्दशी तक। इसे करने के अलग-अलग विधान हैं, और मूर्ति विसर्जित करनी चाहिए या नहीं, यह विषय अलग से बताया गया है।
वक्ता कहते हैं, अघोर चतुर्दशी के बाद गणपति नवरात्रि आती है — यानी गणेश चतुर्थी से गणेश चतुर्दशी तक। अलग-अलग विधान बताए गए हैं, जिनसे आप इसे किसी न किसी तरह कर सकते हैं। और मूर्ति विसर्जित करनी चाहिए या नहीं, और करने से क्या दिक्कत आती है, ये विषय अलग से बताए गए हैं।
क्या माँ काली को रोज़ दो लौंग चढ़ा सकते हैं?
काली को रोज़ लौंग-कपूर चढ़ाना तामसिक पूजा नहीं है
बिल्कुल चढ़ा सकते हैं, कोई दिक्कत नहीं। यह सवाल इस दावे से आया है कि काली जी को रोज़ लौंग-कपूर चढ़ाना तामसिक पूजा में आता है — इस दावे को वे साफ़ नकारते हैं।
पूछा गया कि क्या माँ काली को रोज़ दो लौंग का भोग लगा सकते हैं। वक्ता कहते हैं, शायद यह सवाल इसलिए पूछा जा रहा है क्योंकि एक बहुत मशहूर यूट्यूबर ने वीडियो डाला कि अगर आप काली जी को रोज़ लौंग और कपूर चढ़ाते हैं, तो वह तामसिक पूजा की श्रेणी में आता है। वे पूछते हैं, ऐसे लोगों को क्या कहें। आप बिल्कुल चढ़ा सकते हैं। इसमें कोई दिक्कत नहीं है।
क्या सप्तशती के केवल एक चरित्र से हवन हो सकता है?
सप्तशती का हवन चंडी याग है, इसमें पूरा मंडल विधान चाहिए
पहले आपको सप्तशती दीक्षा या शाक्त दीक्षा मिली होनी चाहिए। और आप जो बता रहे हैं, वह चंडी याग में आता है — सभी चरित्रों से हवन के लिए आवरण और मंडल पूजा आनी चाहिए: सर्वतोभद्र, नवग्रह, चौंसठ योगिनी, षोडश मातृका, लोकपाल, दिक्पाल, और सारे कलश।
एक चरित्र के हवन के सवाल पर वक्ता पहले शर्त रखते हैं: आपको सप्तशती दीक्षा मिली होनी चाहिए, या फिर शाक्त अभिषेकशाक्त तांत्रिक कुल परंपरा में क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ने हेतु आवश्यक एक औपचारिक अभिषेक व दीक्षा संस्कार। दीक्षा; फिर जैसे चाहें सप्तशती पाठ करें। वे कहते हैं, आप जो बता रहे हैं, वह चंडी याग में आता है। यानी अगर आप सप्तशती के सभी चरित्रों से हवन करना चाहते हैं, तो पहले आपको आवरण पूजा और मंडल पूजा आनी चाहिए — सर्वतोभद्र मंडल, नवग्रह मंडल, चौंसठ योगिनी, सप्त घृत मातृका, सोलह अष्टमातृका मातृकाएँ, पाँच लोकपाल और दिक्पाल; शुरू में गौरी-गणपति; फिर नौ ग्रहों के साथ उनके अधिदेवता और प्रत्यधिदेवता; वरुण देवता का कलश और प्रधान देवता का कलश। ये सारे विधान आपको आने चाहिए। वे कहते हैं, इन सबको छोड़कर सप्तशती हवन करने मत जाइए। उनका कारण: जब आप हवन दे रहे हैं, तो सात सौ शक्तियों का, मुख्य रूप से सात सौ मातृकाओं का आवाहन कर रहे हैं। मातृकाएँ अकेली नहीं आएँगी, उनके साथ सारे देवता आएँगे। तो आप आवाहन कर रहे हैं, पर उनके लिए न पूजा का स्थान है, न मंडल का स्थान — यह कैसे चलेगा?
सप्तशती के कौन से सूक्त अलग से हवन में ले सकते हैं?
रात्रि सूक्त, चौथा अध्याय, देवी सूक्त और ग्यारहवाँ
स्वतंत्र रूप से नहीं कर सकते। पर फिर भी करना चाहें तो: पहले तंत्रोक्त रात्रि सूक्त, केवल घी से या पान के पत्ते पर केले से, क्योंकि आहुति केवल आवाहन के मंत्रों से दी जा सकती है। फिर चौथा अध्याय, खास तौर पर लक्ष्मी के लिए; फिर तंत्रोक्त देवी सूक्त; फिर पूरा ग्यारहवाँ अध्याय।
वक्ता कहते हैं, पहली बात — स्वतंत्र रूप से आप ऐसा हवन नहीं कर सकते। पर मान लीजिए आप साधक हैं, पूजा-पाठ करते हैं, और फिर भी सप्तशती से हवन करना चाहते हैं। पहला है रात्रि सूक्तम्, तंत्रोक्त रात्रि सूक्त — इससे आप हवन कर सकते हैं, पर इसमें आहुति घी की होगी। कारण: जहाँ देवताओं ने भगवती का आवाहन किया है, वहाँ आहुति केवल आवाहन के मंत्रों से दी जा सकती है। जैसे पहले अध्याय में, पहले चरित्र में, तंत्रोक्त रात्रि सूक्त में ब्रह्मा आवाहन कर रहे हैं। तो उन मंत्रों से आप आहुति दे सकते हैं — केवल घी से, या पान के पत्ते पर केला रखकर। इसमें साकल्य से आहुति नहीं होगी। अगला है चौथा अध्याय, जिसमें भगवती की स्तुति है। चौथे अध्याय का हवन भी कर सकते हैं, खास तौर पर लक्ष्मी पाने के लिए। उसके बाद है तांत्रोक्त देवीसूक्तम्। देवी सूक्त से हवन कर सकते हैं — पर आपको तरीका आना चाहिए: हवन कैसे होता है, किस मंत्र के बाद स्वाहा आता है। चार मंत्रों पर एक स्वाहा मत लगाइए। वे कहते हैं, हवन वाला वीडियो देखिए, जिसमें उन्होंने बताया है कि देवी सूक्त से हवन कैसे होता है; लोग गलत करते हैं, जहाँ चार आहुति देनी हैं वहाँ एक ही देते हैं। उसके बाद ग्यारहवाँ अध्याय — इसका पूरा हवन भी कर सकते हैं।
सप्तशती पाठों के हवन में कौन सी सामग्री लें?
घी, शहद और खीर — साकल्य कभी नहीं, और महिलाओं के लिए घी नहीं
इन चार पाठों का हवन जब भी करें, घी से, शहद से, खीर से करें — खास तौर पर खाद्य पदार्थों से। कृपया साकल्य से हवन मत कीजिए। और अगर महिलाएँ कर रही हैं, तो वे घी से नहीं, उसकी जगह खाद्य पदार्थों से करेंगी।
वक्ता कहते हैं, अभी जो चार पाठ बताए, उनका हवन जब भी करें, घी से, शहद से, खीर से करेंगे — खास तौर पर खाद्य पदार्थों से। कृपया साकल्य से हवन मत कीजिए। अगर महिलाएँ कर रही हैं, तो वे घी से नहीं करेंगी। उसकी जगह वे केवल खाद्य पदार्थों से हवन करेंगी।
साईं बाबा इतने ज़्यादा क्यों पूजे जाने लगे?
दस साल पहले पर्चों से हुआ प्रचार
प्रचार के तरीके की वजह से। वक्ता दस-बारह साल पहले बँटने वाले पर्चे याद दिलाते हैं — इसे दस लोगों को दो, और न दिया तो उस व्यक्ति के साथ कुछ बुरा हुआ — और कहते हैं कि वैभव लक्ष्मी व्रत कथा और संतोषी माता व्रत भी ठीक ऐसे ही बाँटे गए।
पूछा गया कि साईं बाबा ने ऐसा कौन सा काम किया कि कलियुग में इतने पूजे जाने लगे। वक्ता पहले कहते हैं कि आज के समय में लोग इतने भ्रमित हैं कि किसी को भी पूजने लगते हैं। वे कहते हैं, इतना पूजे जाने के पीछे कारण यह है कि इसका एक खास तरह से प्रचार किया गया। आपको याद होगा, जब आप छोटे थे — अभी नहीं, कम से कम दस-बारह साल पहले — पर्चे बाँटे जाते थे: बाबा का यह पर्चा दस लोगों को दो, और न दिया तो उस व्यक्ति के साथ कुछ गलत हुआ। ऐसे ही वैभव लक्ष्मी व्रत कथा बाँटी जाती थी, और ऐसे ही संतोषी माता का व्रत। तो श्रद्धा जो भी हो, वे कहते हैं, इस तरह की चीज़ें करके, बार-बार प्रचार करके इसे फैलाया गया — और फिर यह हुआ।
नांदी मुख श्राद्ध क्यों करना चाहिए?
किसी भी देवी पूजा से पहले पितरों को तृप्त करना
क्योंकि पहले अपने कुल के पितर तृप्त होने चाहिए। इन सबसे पहले — चंडी या सप्तशती से पहले, जैसा पिछले प्रश्नकर्ता ने पूछा — नांदी श्राद्ध करवाना बहुत ज़रूरी है। वे आपके घर के हैं; पहले उन्हें पूरी तरह प्रसन्न करें, फिर देवी पूजा करें। तभी पूरा फल मिलता है।
पूछा गया कि नांदी मुख श्राद्ध क्यों किया जाता है। वक्ता कहते हैं कि यह ज़रूर करना और करवाना चाहिए। जैसे सप्तशती और चंडी — जैसा पिछले प्रश्नकर्ता ने पूछा कि वे कर सकते हैं या नहीं — इन सबसे पहले नांदी श्राद्ध आदि करवाना बहुत ज़रूरी है। सबसे पहले हमारे कुल के पितृ तृप्त होने चाहिए। वैदिक पूजा हो, तंत्रोक्त पूजा और कर्मकांड हो; श्राद्ध आदि करके सबसे पहले पितर, पितृ-कुल प्रसन्न होते हैं, क्योंकि वे आपके घर के हैं। जब वे अच्छी तरह प्रसन्न हो जाएँ, तब देवी पूजा करें। तभी पूरा फल मिलता है। यह ज़रूरी है; यह करवाना चाहिए।
क्या व्रत में मंदिर का प्रसाद खा सकते हैं?
सिर से लगाएँ, शब्द कहें, और अगले दिन खाएँ
प्रसाद मिले तो सिर से लगाएँ और मन में दोहराएँ: हे भगवान, आप जिस भी रूप में हों, आज मेरा उपवास है, इसलिए इसे आदर से स्वीकार करता हूँ और माथे से लगाकर सम्मान करता हूँ — पर मैं व्रत में हूँ, इसका मान रखें, और मुझे कोई दोष न लगे। फिर इसे अगले दिन खाएँ, या घर में किसी को दे दें।
पूछा गया कि व्रत रखते हुए मंदिर में मिला प्रसाद, खास तौर पर चावल का प्रसाद, खाना चाहिए या नहीं। वक्ता बोलने के शब्द बताते हैं। जब प्रसाद मिले, तो उसे सिर से लगाएँ — जिस भी देवता का प्रसाद हो — और मन में यह ज़रूर दोहराएँ: हे भगवान, आप जिस भी रूप में हों, हे देवता, आज मेरा उपवास है, इसलिए आपकी कृपा से इसे स्वीकार करता हूँ, और माथे से लगाकर इसका सम्मान करता हूँ। पर मैं व्रत में हूँ, तो इसका मान रखें, और मुझे कोई दोष न लगे। और वह प्रसाद आप या तो अगले दिन खा लें, या घर में किसी को दे दें।
बेताल कौन हैं?
बेताल शिवलोक के उपदेव, जिनका एक महाभूत पर अधिकार है
शिवलोक के देवता, जो उपदेव श्रेणी में आते हैं। उनके मंदिर खास तौर पर दक्षिण की ओर मिलते हैं। पाँच महाभूतों में से एक पर उनका अधिकार स्थापित है, और उनके दिव्य शरीर में इतनी क्षमता है कि वे उस पर अधिकार करके वैसा काम कर सकें।
एक श्रोता के घर के पास बेताल का मंदिर है — जहाँ शत्रु-नाश के लिए ग्यारह शनिवार बताए जाते हैं, और मूर्ति राक्षस की तरह बंधी है, हाथ में डंडा है। वे पूछते हैं कि ये कौन देवता हैं। वक्ता दो हिस्सों में जवाब देते हैं। पहला, बेताल रूप में माना जाता है कि उनके मंदिर खास तौर पर दक्षिण की ओर होते हैं। दूसरा, जैसे हमारे पाँच महाभूत हैं, कहा जाता है कि किसी एक महाभूत पर उनका अधिकार स्थापित है; और उनके दिव्य शरीर में इतनी क्षमता है कि वे उस पर अधिकार करके वैसा काम कर सकें। वे जोड़ते हैं, तंत्र साहित्य में बैताल का संबंध भगवान श्री भोलेनाथ शिव से बताया गया है; भगवान शिव के गणों में उनका स्थान है। और मुख्य रूप से भगवान शिव और भगवती के साथ — जैसे शाक्त क्रम से भी आप तंत्र क्षेत्र में आते हैं, क्रमबद्ध साधना में, अंग विद्याओं में, जैसे चामुंडा अंग विद्या में जाते हैं, वहाँ उनकी पूजा का विधान दिया गया है। वे कौन देवता हैं: वे शिवलोक से जुड़े देवता हैं। वे उपदेवता श्रेणी में, उपदेव की कोटि में आते हैं। वे पूजे जाते हैं, और जो भी वीर साधनाएँ करते हैं, वे खास तौर पर उनकी साधना करते हैं।
पुराने समय में बेताल साधना किस काम आती थी?
रूप बदलने की विद्या, और उसे सिखाने वाले राज तांत्रिक
कहा जाता है कि बेताल साधना से रूप बदलने की विद्या भी मिलती है। पहले के समय में सैनिकों और सेनापतियों से उनके कुलगुरु या राज तांत्रिक यह साधना करवाते थे — एक शक्तिशाली, वीर भाव श्रेणी की साधना, जिसके बाद युद्ध में जीत बहुत आसान हो जाती थी, और जिससे गुप्तचर सेवा वाले रूप बदलकर अपना काम करते थे।
वक्ता बताते हैं, बैताल साधना के बारे में कहा जाता है कि इससे अपना रूप बदलने की विद्या भी मिलती है। माना जाता है कि पहले के समय में सैनिकों और सेनापतियों से बेताल की साधना उनके कुल के गुरु, या उस राज्य के कुलगुरु, या उस राज्य के राज तांत्रिक करवाते थे। यह वीर भाव श्रेणी की काफ़ी शक्तिशाली साधना थी। उस स्तर की साधना करने के बाद युद्ध में जीत पाना काफ़ी आसान हो जाता था; और जो गुप्तचर सेवा में थे, वे इन विद्याओं से रूप बदलकर अपने बहुत से काम पूरे करते थे। तो ऐसे किसी पुराने इलाके में आपको उनके मंदिर भी मिलेंगे। पर वे पूरी तरह तांत्रिक देवता हैं — तंत्र से जुड़ी एक शक्ति।
क्या घर में भैरव को लगाया भोग परिवार खा सकता है?
घर के भैरव का भोग सब खा सकते हैं
हाँ, बिल्कुल — घर में भैरव जी को लगाया भोग सब खा सकते हैं। और भैरव तांडव और काल भैरव अष्टक घर में सामान्य तरीके से ज़रूर पढ़े जा सकते हैं, और भैरवम् विषम-कष्ट-हरम् और देवराज-सेव्यमान काल भैरवम् भी।
पूछा गया कि क्या घर में बाल भैरव को लगाया भोग परिवार खुद ले सकता है। वक्ता कहते हैं, बिल्कुल हाँ — घर में भैरव जी को लगाया भोग सब खा सकते हैं। आगे पूछा गया कि जिनके घर बटुक बाल भैरव की तस्वीर है, क्या वे भैरव तांडव और काल भैरव अष्टक घर में सामान्य तरीके से पढ़ सकते हैं। वे कहते हैं, बिल्कुल पढ़ सकते हैं। भैरवम् विषम-कष्ट-हरम् पढ़ सकते हैं, और देवराज-सेव्यमान काल भैरवम् — ये सब पढ़े जा सकते हैं।
जप के समय तेज़ कंपन और आज्ञा चक्र पर खिंचाव का क्या अर्थ है?
प्रबल भाव, गुप्त रखें — और इसके पीछे कुल की किसी शक्ति की कृपा
कि आपका भाव बहुत प्रबल है और अनुभव बहुत अच्छा है — इसे गुप्त रखें, सार्वजनिक न करें। और भगवती का नाम पुकारने का मन हो, तो कभी-कभी पुकारें। वक्ता आंशिक रूप से जोड़ते हैं कि आपके कुल में कोई शक्ति विंध्यवासिनी की बड़ी भक्त रही होगी और आप पर कृपा कर रही है।
एक श्रोता बताते हैं कि मंत्र जप के समय शरीर में तेज़ कंपन होता है, आज्ञा चक्र पर खिंचाव होता है, और विंध्यवासिनी का नाम ज़ोर से पुकारने का मन होता है। वक्ता जवाब देते हैं, आपका भाव काफ़ी प्रबल है, और आपका यह अनुभव बहुत अच्छा है। इसे गुप्त रखें; इस तरह सार्वजनिक रूप से मत बताइए। और अगर पुकारने का मन हो, तो कभी-कभी भगवती का नाम पुकारें। भाव काफ़ी प्रबल हो रहे हैं, यह बहुत अच्छी बात है। और वे कहते हैं — यह वे आंशिक रूप से कह सकते हैं — आपके घर के कुल में ऐसी कोई शक्ति भगवती विंध्यवासिनी की परम भक्त या कृपापात्र रही है, या अब भी है; और वे भी आप पर कृपा कर रही हैं।
क्या गृहस्थों को धूमावती साधना करनी चाहिए?
धूमावती गृहस्थों के लिए नहीं, और सबको फल नहीं देती
नहीं — यह गृहस्थों के लिए नहीं है, और सबको फल नहीं देती। जहाँ किसी गृहस्थ को फल देती है, वक्ता कहते हैं उसके पीछे दो बातें होती हैं: उस कुल में कोई साधक जिस पर उनकी विशेष कृपा थी, या उस परिवार में किसी अंश रूप में स्थापित कोई योगिनी।
पूछा गया कि क्या धूमावती साधना गृहस्थों को नहीं करनी चाहिए। वक्ता पहले कहते हैं कि धूमावती साधना हर किसी को फल नहीं देती। यह पहली बात है — यह गृहस्थों के लिए नहीं है। दूसरी: जब आप धूमावती की जड़ में जाते हैं, तो अगर किसी को फल मिल रहा है, तो उसके पीछे दो बातें हैं। पहली: उनके कुल में कभी न कभी कोई साधक रहा होगा जिसे भगवती धूमावती की विशेष कृपा मिली — चाहे सौम्य रूप में ही। या फिर किसी ऐसे अंश रूप में, किसी योगिनी आदि के ज़रिए वे उनके परिवार या कुल में कहीं स्थापित रही होंगी। ज़रूरी नहीं कि उसी घर में जहाँ वे रहते हैं। बाद के समय में जब उस कुल का कोई धूमावती साधना करता है, तो उसे इससे लाभ मिलता है। पर एक बात, वे जोड़ते हैं: उस परिवार में इसका एक संकेत भी मिलेगा — उस परिवार की ज़्यादातर महिलाओं को कोई न कोई कष्ट होगा, या वे जल्दी, पचास-साठ से पहले, विधवा हो जाएँगी; या उनके पति ज़्यादा समय स्वस्थ नहीं रहेंगे। ऐसा कुछ आपको दिखेगा। और उस परिवार में अगर कोई साधक धूमावती साधना करता है, तो वह फल देती है। इसके पीछे यही कारण है।
जिसका मन धूमावती की ओर हो, वह उसकी जगह क्या करे?
उसकी जगह कमला करें — क्या वे आपके शत्रु का नाश नहीं कर सकतीं?
अगर ऐसा कुछ करना ही है, तो कमला की साधना करें। धूमावती क्यों? क्या भगवती कमला आपके शत्रुओं का नाश करने में सक्षम नहीं हैं — और चाहें तो क्या वे खुद भगवती धूमावती से नहीं कह सकतीं कि मेरे बेटे की रक्षा करो?
वक्ता कहते हैं, सबसे पहले, जहाँ आपको जानकारी नहीं है, वहाँ इसे घर में नहीं करना चाहिए। अगर आप गृहस्थ हैं और बाहर करना चाहते हैं, तो शिव मंदिर आदि में साधना कर सकते हैं — पर किसी योग्य साधक से क्रम से दीक्षा लेकर। वे कहते हैं, धूमावती उतनी आसान नहीं जितना आप समझ रहे हैं। अगर आप किसी महाराज का वीडियो सुनकर बहुत प्रेरित हो रहे हैं कि धूमावती साधना करनी ही है, तो उनकी एक सलाह है कि फिर आप गृहस्थ होने का विषय छोड़ दीजिए — गृहस्थ होने के बारे में सोचना भी छोड़ दीजिए, और उसके बाद यह साधना कीजिए। महाविद्या की साधना इतनी आसान नहीं है। अगर कुछ करने की इतनी इच्छा है, तो कमला की साधना कीजिए। धूमावती क्यों? क्या भगवती कमला आपके शत्रुओं का नाश करने में सक्षम नहीं हैं? और अगर वे चाहें — अगर सक्षम न हों — तो क्या वे भगवती धूमावती से नहीं कह सकतीं: हाँ, मेरे बेटे की रक्षा करो?
जब दुर्गा प्रधान देवी हों, तो गणेश और शिव कहाँ रखें?
हनुमान दाएँ, बटुक बाएँ — और उनके बाहर गणपति और शिव
जब भगवती दुर्गा स्थापित हों, तो हनुमान जी दाएँ और बाल भैरव जी बाएँ रहते हैं। गणपति जी फिर हनुमान जी के दाएँ जाते हैं — यानी वे दुर्गा जी के भी दाएँ और हनुमान जी के भी दाएँ। और शिव जी भैरव जी के बाएँ, उनके बगल में। शिवलिंग भी ऐसे ही रखा जाता है।
वक्ता पहले वाली व्यवस्था को वैसा ही रखकर दोनों नए रूपों को उसके बाहर रखते हैं। जब आप भगवती दुर्गा को स्थापित करेंगे, तो हनुमान जी तब भी दाएँ होंगे और बाल भैरव जी बाएँ। अब शिव जी और गणेश जी: गणपति जी को हनुमान जी के दाएँ रखें — यानी वे दुर्गा जी के भी दाएँ होंगे और हनुमान जी के भी दाएँ। वहीं पर। और शिव जी भैरव जी के बाईं ओर होंगे — यानी उनकी स्थापना भैरव जी के बगल में होगी। इस तरह कीजिए। और अगर शिवलिंग भी रखते हैं, तो उसी तरह।
घर में नई मूर्ति की प्रतिष्ठा कैसे करें?
चल प्रतिष्ठा, अचल कभी नहीं — और पाँच जगह अधिवास
अचल प्राण प्रतिष्ठा कभी न करवाएँ; चल प्रतिष्ठा करवाएँ। खुद करें तो: दूध और पंचामृत से अच्छी तरह अभिषेक; फिर चाँदी के चम्मच या कटोरी से देवता के नाम से 108 बार कच्चे दूध से; फिर जल से अभिषेक और अधिवास।
वक्ता क्रम बताते हैं, और पहले नियम रखते हैं: अचल प्रतिष्ठा कभी न करवाएँ — चल प्रकार की विग्रह प्रतिष्ठा करवाएँ। अगर आप खुद करना चाहते हैं, तो पहले मूर्ति को दूध और पञ्चामृतदूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बना पंचामृत, पूजा से पहले मूर्ति को स्नान कराने हेतु प्रयुक्त होता है। आदि से अच्छी तरह स्नान कराएँ। उसके बाद चाँदी के चम्मच या चाँदी की कटोरी से, देवता के नाम से, फिर 108 बार कच्चे दूध से स्नान कराएँ। फिर जल आदि से स्नान कराकर अधिवासकिसी मूर्ति की स्थापना से पूर्व किया जाने वाला प्रारंभिक संस्कार — जैसे पुखराज गणपति की स्थापना में, इसके लिए अथर्वशीर्ष व वैदिक गायत्री में निपुण विद्वान ब्राह्मण आवश्यक है। करें। अधिवास का मतलब है कि मूर्ति को पाँच तरह की जगहों में रखा जाता है — अनाज में, फलों में, मिठाई में, वस्त्रों में, फूलों में। उसे पूरी तरह ढक दिया जाता है, और उसके बाद देवता के नाम से कम से कम पंद्रह मिनट भजन-कीर्तन किया जाता है। ये सब करने के बाद प्राण प्रतिष्ठा की विधि आती है — प्राण प्रतिष्ठा के मंत्र, नेत्रोन्मीलन आदि। वे कहते हैं, आप कितना भी संक्षेप में करें, अगर आप नए हैं तो यह आपके लिए काफ़ी कठिन होगा। तो करवाना हो तो बेहतर है कि किसी योग्य आचार्य से चल प्रतिष्ठा करवाएँ।
क्या बिल्व पत्र की डंडी तोड़नी चाहिए?
चढ़ाने से पहले गाँठ वाली डंडी तोड़ दें
डंडी तोड़ देनी चाहिए। जिस पर गाँठ होती है, वह डंडी तोड़कर फिर पत्र चढ़ाएँ।
पूछा गया कि शिवलिंग पर बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। पत्र चढ़ाने से पहले उसके पीछे की डंडी तोड़नी चाहिए या नहीं, और क्या तोड़ने से पत्र खंडित होकर अयोग्य हो जाता है। वक्ता कहते हैं कि डंडी तोड़ देनी चाहिए। जिस पर गाँठ है, वह डंडी तोड़कर फिर पत्र चढ़ाना चाहिए।
बिना दीक्षा के भगवती विंध्यवासिनी की कौन-सी साधना की जा सकती है?
चालीसा, या ग्यारहवाँ अध्याय और देवी सूक्त
उनकी चालीसा की साधना बताई जा चुकी है। कुछ विशेष करना हो तो विंध्य धाम के किसी सक्षम साधक से दीक्षा लें। नहीं तो भगवती विंध्यवासिनी के नाम से संकल्प लेकर सामर्थ्य भर दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करें, और तंत्रोक्त देवी सूक्त का। इतना पर्याप्त है।
वक्ता कहते हैं कि भगवती विंध्यवासिनी के जिस रूप की चाहें, साधना करें। खास तौर पर उनकी चालीसा की एक साधना बताई जा चुकी है। और अगर कोई और साधना करनी है, तो उनका एक ही निवेदन है कि विंध्य धाम के किसी सक्षम साधक से दीक्षा लेकर करें — अगर उस तरह की कोई विशेष साधना चाहिए। नहीं तो भगवती विंध्यवासिनी के नाम से संकल्प लें और अपनी सामर्थ्य भर दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करें। तांत्रोक्त देवीसूक्तम्, यानी तंत्रोक्त देवी सूक्त का पाठ करें। इतना पर्याप्त है। पूछा गया कि वे उनकी गुप्त विद्या पर और प्रकाश क्यों नहीं डालते। वे कहते हैं: जब वह गुप्त है, तो हम उस पर प्रकाश क्यों डालें। भगवती विंध्यवासिनी का जितना एक सीमा में दिया जा सकता है, उतना वे देते हैं। जो इसे खोलते हैं, वे अपनी बात समझेंगे। मुझे एक सीमा तक ही बताना है। विंध्य क्षेत्र के कई साधक हैं जिनके चैनल हैं और जो बहुत कुछ बताते हैं; उतना बताने की चीज़ नहीं है। सब कुछ बताया नहीं जा सकता।
जिन्हें वैदिक मंत्रों का अधिकार नहीं, क्या उनके लिए पौराणिक मंत्रों की कोई पुस्तक है?
बिना अधिकार वालों के लिए वे जो पुस्तकें लिखना चाहते हैं
अभी नहीं — हर मौजूदा पुस्तक में कुछ न कुछ ऐसा है जिसके लिए कहा जाएगा कि आपको अधिकार नहीं। वे अगली दुर्गा पूजा से पहले कम से कम दो-तीन ऐसी पुस्तकें लिखने का वचन देते हैं, जिनमें ये विधान ऐसे मंत्रों के साथ होंगे जिन्हें कोई भी कर सके, और यह भी बताया जाएगा कि स्त्रियाँ कैसे करें और पुरुष कैसे।
पूछा गया कि वैदिक मंत्रों का अधिकार न रखने वाले के लिए पूजा के आरंभिक कर्मों और रक्षा विधानों के पौराणिक मंत्रों की कोई पुस्तक है क्या। वक्ता कहते हैं कि वे इसे जल्द लाने की आशा रखते हैं। इस साल नहीं, पर अगली दुर्गा पूजा से पहले वे ज़रूर कम से कम दो-तीन ऐसी पुस्तकें लिखकर प्रसारित करेंगे, जिनमें ये सारे विधान होंगे और जिन्हें कोई भी कर सकेगा — वह भी जिसके पास कोई अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। नहीं — ऐसे मंत्रों से बनी हुई। उनका प्रयास है कि इसे जितना जल्दी हो सके, सबके सामने लाएँ। क्योंकि वे कहते हैं, अब तक ऐसी कोई पुस्तक नहीं है। सबमें कुछ न कुछ मिलेगा जिसके लिए कहा जाएगा कि आपको अधिकार नहीं है। इसलिए वे वे विषय भी बताएँगे, और यह भी कि कैसे करना है — स्त्रियाँ कैसे करें और पुरुष कैसे।
गृहस्थ के लिए गणपति का कौन-सा रूप उचित है?
सिद्धि विनायक रूप, जिनके दोनों ओर ऋद्धि-सिद्धि हैं
अष्टविनायक के किसी भी रूप की पूजा की जा सकती है, और महागणपति की भी। वक्ता के मत से हर गृहस्थ को विशेष रूप से सिद्धि विनायक रूप की सेवा-पूजा करनी चाहिए — जो अष्टविनायक में से एक है, जिसमें दोनों ओर ऋद्धि और सिद्धि खड़ी हैं।
पूछा गया कि गृहस्थ जीवन में भगवान गणपति के कौन-से रूप श्रेष्ठ हैं और शुरू में किनसे बचना चाहिए। वक्ता कहते हैं कि अष्टविनायक के किसी भी रूप की उपासना कर सकते हैं। महागणपति की भी कर सकते हैं। उनके अपने मत से सिद्धि विनायक रूप — जो अष्टविनायक में से एक है, जिसमें ऋद्धि-सिद्धिगणेश जी की दो अर्धांगिनी, समृद्धि व सिद्धि की प्रतीक। दोनों ओर खड़ी हैं — की सेवा-पूजा हर गृहस्थ को विशेष रूप से करनी चाहिए। उन्हें स्थापित करें, या उनका चित्र रखें, और उसके बाद श्रीविग्रह की स्थापना करनी चाहिए।
क्या साधना के अंत में माला टूटने का अर्थ है कि देवी नाराज़ हैं?
ज़्यादा जप से कमज़ोर हुआ धागा, नाराज़गी नहीं
ऐसा नहीं माना जा सकता। जब आप बहुत जप करते हैं तो कभी-कभी धागा कमज़ोर होकर टूट जाता है। इसे देवयोग मानकर समर्पित कर दें। भगवती नाराज़ नहीं हैं। अगर माला बार-बार टूटने लगे, तो वह कठिनाई की बात है।
एक व्यक्ति की माला आख़िरी दिन दो-तीन माला जप बाकी रहते टूट गई। उन्होंने पूछा कि क्या माँ लक्ष्मी उनसे नाराज़ हैं। वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं माना जा सकता। क्योंकि जब आप बहुत जप करते हैं, तो कभी-कभी धागा कमज़ोर हो जाता है; आप बहुत जप कर रहे हैं, इसलिए वह टूट जाता है। इसे देवयोग मानकर समर्पित कर दें। भगवती नाराज़ नहीं हैं। हाँ — अगर माला बार-बार टूटने लगे, तो वह कठिनाई की बात है।
क्या षष्ठी देवी और छठी मैया एक ही हैं?
छठी मैया की कई पहचानें, और मुख्य पहचान
हाँ। गंगा मैया को भी छठी मैया कहा जाता है; सूर्य की पत्नी उषा को भी वही माना जाता है; कार्तिकेय की माताएँ छह कृत्तिकाएँ षष्ठी देवी मानी जाती हैं; और कार्तिकेय की पत्नी देवसेना को भी छठी मैया कहा जाता है। पर मुख्य रूप से विंध्य पर बसने वाली माँ ही हैं, जिनकी वैदिक काल से षष्ठी देवी के रूप में पूजा होती है।
पूछा गया कि क्या षष्ठी देवी और छठी मैया एक हैं। वक्ता कहते हैं, बिलकुल। गंगा मैया को भी छठी मैया कहा जाता है। भगवान सूर्य की पत्नी उषा को भी वही माना जाता है। भगवान कार्तिकेय की माताएँ छह कृत्तिकाएँ भी षष्ठी देवी मानी जाती हैं। और कार्तिकेय की पत्नी भगवती देवसेना को भी छठी मैया कहा जाता है। इनके साथ, विंध्य पर्वत पर बसने वाली माँ ही मुख्य रूप से, वैदिक काल से और उसके बाद भी, षष्ठी देवी के रूप में पूजी जाती हैं। मुख्य रूप से उन्हीं को षष्ठी देवी या छठी देवी कहा जाता है। बाकी, बिहार की परंपरा की छठी मैया — इतने रूप माने गए हैं। इसमें उलझने की ज़रूरत नहीं है।
ज़मीन में दबी पुरानी मानव खोपड़ी के लिए क्या करना चाहिए?
पहले उसकी गति के लिए त्रिपिंडी, फिर वाराही या महाविद्या हवन
पहले उस जगह त्रिपिंडी श्राद्ध करवाएँ ताकि उसे गति मिले, या संकल्प के साथ गीता पाठ — पहले उसकी मुक्ति का प्रयास करें। अगर वह न माने, या परेशान कर रही हो, तब तंत्रोक्त क्रियाओं में जाएँ: वहाँ वराह या वाराही हवन, या सात, नौ या ग्यारह दिन का महाविद्या हवन।
एक व्यक्ति बताते हैं कि ज़मीन में कहीं बहुत पुरानी, शायद तीन सौ साल पुरानी, मानव खोपड़ी दबी है, जिसकी जगह का पता नहीं चल रहा। वक्ता पहले कहते हैं कि इतने सालों बाद उन्हें नहीं लगता कि अब भी परेशानी हो रही होगी; अगर ऐसी खोपड़ी वैसा असर देती, तो वंश की बढ़ोतरी में बड़ी कठिनाई आई होती। पर अगर फिर भी कठिनाई आ रही है और पता नहीं चल रहा: तो वहाँ भगवान वराह या भगवती वाराही के पूरे तंत्रोक्त विधान से हवन करवाना चाहिए। या कम से कम सात, नौ या ग्यारह दिन का महाविद्या हवन करवाना चाहिए। और हवन कुंड सीधे घर के ब्रह्मस्थान में बनाना है, या जहाँ भी वह जगह हो — वहाँ खोदकर, भगवान विश्वकर्मा की विधिवत पूजा करके, फिर वहाँ यज्ञ कुंड स्थापित करके पूरे विधान से हवन करना है। तब उस जगह जो भी नकारात्मक शक्ति स्थापित या मौजूद है, उसे या तो हटना पड़ेगा; या अगर उसका कुछ अंश बचा रहे, तो वह निष्क्रिय हो जाएगा और वहाँ से उसकी मुक्ति भी हो जाएगी। पर वे कहते हैं, पहली बात यह है कि अगर उस जगह ऐसी कोई चीज़ है, तो पहले वहाँ त्रिपिंडी श्राद्ध करवाएँ ताकि उसे गति मिले — या संकल्प के साथ श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ। पहले उसकी मुक्ति का प्रयास करें। अगर उसे गति मिल जाए, तो तनाव खत्म और उसकी सद्गति भी हो जाती है। अगर वह न माने, या उस तरह परेशान करे, तभी तंत्रोक्त क्रियाओं में जाएँ।
चंडी कवच और रुद्र चंडी कवच में क्या अंतर है?
चंडी कवच ब्रह्मा जी का है और बहुत तीक्ष्ण है; रुद्र चंडी सबके लिए नहीं
सप्तशती का चंडी कवच स्वयं ब्रह्मा जी के मुख से कहा गया है और बहुत तीक्ष्ण है — पाठ करेंगे तो समझ जाएँगे। रुद्र चंडी कवच सबके लिए नहीं है: अगर आप शुरुआती साधक हैं तो वक्ता मना करेंगे। चंडी कवच करें।
पूछा गया कि दोनों में क्या अंतर है, और जिनकी कुलदेवी माँ चंडी हैं, क्या वे रुद्र चंडी की सेवा कर सकते हैं। वक्ता साधक के स्तर के हिसाब से उत्तर देते हैं। वे कहते हैं, शुरू में सबको अपने आराध्य के कवच पर बहुत भरोसा होता है — कि यह हमारे आराध्य का कवच है, यह हमारी रक्षा करेगा। और ऐसा होना भी चाहिए। सप्तशती में जो चंडी कवच है, वह स्वयं ब्रह्मा जी के मुख से कहा गया है, और वह कवच बहुत तीक्ष्ण है। पाठ करेंगे तो समझ जाएँगे। रुद्र चंडी कवच सबके लिए नहीं है। सीधी और साफ़ बात है: रुद्र चंडी अपने आप में जो हैं, वो हैं, और अगर आप शुरुआती स्तर के साधक हैं तो वे आपको रुद्र चंडी आदि में जाने से मना करेंगे। चंडी कवच करें। अलग से पूछा गया कि तंत्रोक्त दुर्गा कवच का पाठ कैसे करें। वे कहते हैं कि इसके पाठ की कोई अलग विशेष विधि नहीं है; इसे सिद्ध करने का विधान अलग हो सकता है।
शुद्ध घी न मिले तो कौन-सा घी इस्तेमाल करें?
हवन के लिए ब्रांडेड घी चल सकता है
अच्छा घी पाने का प्रयास करें। वक्ता के मत से अमूल जैसे ब्रांडेड घी में वैसी कठिनाई नहीं है, और उसे हवन आदि में इस्तेमाल किया जा सकता है।
एक व्यक्ति लिखते हैं कि उनके यहाँ शुद्ध घी नहीं मिलता, और बाज़ार के घी में पशु चर्बी हो सकती है; दीपक में वे तिल का तेल जला सकते हैं, पर हवन के लिए क्या करें। वक्ता कहते हैं कि अच्छा घी पाने का प्रयास करें। उनके मत से ब्रांडेड घी — जैसे अमूल का — में वैसी कठिनाई नहीं है। उसे हवन आदि में इस्तेमाल किया जा सकता है।
क्या किसी देवता के लिए तिल के तेल का दीपक वर्जित है?
शिव के लिए त्रयोदशी की सावधानी, और बाकी सरसों का तेल
सामान्य रूप से इसका प्रयोग हो सकता है। कुछ जगह वर्णन मिलता है कि भगवान शिव के लिए तिल के तेल का दीपक नहीं जलाना चाहिए — वक्ता ने बड़ों से सुना है कि त्रयोदशी तिथि को शिव के आगे तिल के तेल का दीपक न जलाएँ, और कहते हैं कि इसका कारण उनके पास नहीं है।
पूछा गया कि क्या किसी देवता के लिए तिल के तेल का दीपदान वर्जित है। वक्ता कहते हैं कि किया जा सकता है। कुछ जगह वर्णन मिलता है कि भगवान शिव के लिए तिल के तेल का दीपक नहीं जलाना चाहिए। वे कहते हैं, इसके पीछे कारण यह है कि तिल का तेल विशेष रूप से लक्ष्मी से जुड़ा है। उन्होंने बड़ों से यह सुना है कि त्रयोदशी तिथि को शिव जी के आगे तिल के तेल का दीपक नहीं जलाना चाहिए। इसके पीछे का कारण उनके पास नहीं है, इसलिए वे और कुछ नहीं कह सकते। पर उन्होंने कहीं नहीं सुना कि किसी शक्ति के लिए तिल का तेल विशेष रूप से वर्जित है। वे आगे कहते हैं, सरसों के तेल का जलाएँ — शुद्ध सरसों का तेल; सिर्फ़ शत्रु नाश के लिए सरसों का तेल नहीं जलाया जाता। अगर सामने मशीन से ताज़ा निकला तेल मिल सके, तो एक बार में पाँच लीटर निकलवा लें और उसी से आराम से दीपदान करते रहें।
गुरु मंत्र और इष्ट अलग हों तो कौन-सा मंत्र ज़्यादा जपें?
गुरु मंत्र कभी न छोड़ें, और इष्ट का नाम लेते रहें
गुरु मंत्र कभी नहीं छोड़ना चाहिए, और भगवती विंध्यवासिनी का नाम हमेशा लेते रहें। इसी क्रम में वक्ता यह भी कहते हैं कि रोग हमारे प्रारब्ध से आते हैं और कष्ट पूरा होकर प्रारब्ध कटने पर चले जाते हैं — हम उनसे बच नहीं सकते; उन्हें काटना ही पड़ेगा।
पूछा गया कि जिनका गुरु मंत्र नारायण का है और इष्ट विंध्यवासिनी हैं, वे कौन-सा मंत्र ज़्यादा जपें। वक्ता कहते हैं कि गुरु मंत्र कभी नहीं छोड़ना चाहिए, और भगवती विंध्यवासिनी का नाम हमेशा लेते रहना चाहिए। फिर पूछा गया कि किसी भी रोग से कैसे बचा जा सकता है। वे कहते हैं: रोग हमारे प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। के कारण आते हैं, और कष्ट पूरा करके, प्रारब्ध काटकर, फिर चले जाते हैं। हम उनसे बच नहीं सकते। उन्हें काटना ही पड़ेगा।
क्या वेदों के गणेश और जिन गणेश की हम पूजा करते हैं, वे अलग हैं?
एक टीवी पौराणिक कथाकार के ढंग पर उनकी आपत्ति
आपत्ति दावे पर नहीं, ढंग पर है: कि देवताओं का सम्मान नहीं किया जाता और उनके बारे में जैसा मन आए वैसा बोला जाता है। दावा मान भी लें — ठीक है, अलग हैं — फिर भी सनातन से जुड़े विषयों पर ढंग से, आदरसूचक शब्दों के साथ बोलना चाहिए।
एक व्यक्ति एक टीवी धारावाहिक में किए गए दावे के बारे में पूछते हैं कि वेदों के गणेश और जिन गणेश की लोग पूजा करते हैं, वे अलग हैं। वक्ता का उत्तर लगभग पूरा ढंग के बारे में है, विषय के बारे में नहीं। वे कहते हैं, बहुत कुछ जान लेना ही सब कुछ नहीं है; किसी भी चीज़ को ठीक से प्रस्तुत करना आना चाहिए। जो मन आए, बस बोल देना नहीं चलेगा। दावे पर: वेदों के गणेश अलग हैं और जिनकी हम पूजा करते हैं वे अलग हैं — ठीक है, मान लेते हैं कि अलग हैं। वे फिर उसी बात पर, और तीखेपन से, लौटते हैं: अगर आप सनातन से जुड़े विषयों पर बोल रहे हैं, तो कुछ ढंग से बोलिए। उनकी खास शिकायत 'तू-तड़ाक' वाली भाषा और आदरसूचक शब्द हटा देने की है — आप शिव जी को बस शिव कह रहे हैं, 'जी' नहीं लगा रहे; शिव का उद्देश्य यह था, गणेश वह थे — उन्हें साधारण मनुष्यों की तरह पेश कर रहे हैं। वे उद्धरण देते हैं: काली एक तरह की देवी थी जिसके पास बहुत शक्ति थी — और आप उन्हें 'तू' कहकर बुला रहे हैं। हमारे लिए वे भगवती हैं।
सपने में किसी बुज़ुर्ग का सिर पर हाथ रखना क्या दर्शाता है?
पितृ प्रसन्न हैं और आशीर्वाद दे रहे हैं
अगर बुज़ुर्ग सिर पर हाथ रखें, तो पितृ प्रसन्न हैं और आपको आशीर्वाद दे रहे हैं।
पूछा गया कि अगर सपने में कोई बुज़ुर्ग आकर सिर पर हाथ रखें तो इसका क्या अर्थ है। वक्ता कहते हैं कि अगर बुज़ुर्ग सिर पर हाथ रखें, तो पितृ प्रसन्न हैं और आपको आशीर्वाद दे रहे हैं। इसी क्रम में पूछा गया कि किसी महाविद्या के प्रत्यक्ष दर्शन के लिए कितने दिन या महीने साधना चाहिए। वे कहते हैं कि इसमें जन्म लग जाते हैं। यह प्राप्ति कई जन्मों की कृपा से आती है; और जब ऐसे योग्य गुरु मिल जाते हैं, तो आप जिस भी जन्म में आएँ, अगले जन्म में भी वही गुरु, वही विद्या और वही मंत्र मिलेगा। ऐसे चलते-चलते होता है। दिनों और महीनों में नहीं होता।
क्या घर से गणपति का विसर्जन करना चाहिए?
गणपति विसर्जन के ढंग पर उनकी आपत्ति
वक्ता कहते हैं, बिलकुल उचित नहीं। उनकी आपत्ति वीडियो में दिखने वाली बातों पर है: दस दिन प्राण प्रतिष्ठित और पूजित प्रतिमा को फेंका जाता है, उस पर चढ़ा जाता है, जैसे-तैसे तोड़ा जाता है, बिलकुल सम्मान नहीं — जबकि अपने पिता और दादा की अस्थियों का सम्मान होता है और उन्हें गंगा तक ले जाया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि घर से विसर्जन उचित नहीं है, और वह दृश्य बताते हैं जिस पर उन्हें आपत्ति है: आजकल लोग सेल्फ़ी और रील के लिए घर-घर गणपति की पूजा करते हैं, डीजे पर नाचते हैं, भोग लेते हैं, और भोग को लेकर झगड़ते-लड़ते हैं — इनमें से कुछ भी हमारी आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा नहीं है। विसर्जन के बारे में: देखिए कितने वीडियो वायरल होते हैं — जिन गणपति की पूरे दस दिन प्राण प्रतिष्ठा और पूजा हुई, उन्हें उठाकर फेंका जा रहा है, लोग उन पर चढ़ रहे हैं, प्रतिमा जैसे-तैसे टूट रही है। उनका कोई सम्मान नहीं है। वे कहते हैं, जब आपके अपने पिता और दादा का देहांत होता है, तो उनके शरीर का सम्मान होता है; अंतिम संस्कार के बाद आप उनकी अस्थियाँ गंगा ले जाकर वहाँ प्रवाहित करते हैं। और यहाँ आप गणपति का विसर्जन कर रहे हैं, उन्हें विदाई दे रहे हैं — और इसलिए दे रहे हैं क्योंकि विदाई में लोग कहते हैं कि गणपति जाते समय घर का सारा दुख और दरिद्रता अपने साथ ले जाएँगे। इसीलिए लोग विसर्जन कर रहे हैं। और विसर्जन करके उसके बाद उनका उनसे कोई लेना-देना नहीं रहता।
क्या चौरासी खाता वीडियो से सीखा जा सकता है?
आमने-सामने सीखें या न सीखें — और ज़्यादातर वहाँ तक पहुँचते ही नहीं
जानकारी दी जा सकती है, पर अगर ये विद्याएँ व्यवहार में सीखनी हैं, तो उस तरह के साधक से संपर्क करके आमने-सामने सीखें। यूट्यूब देखकर चौरासी खाता विद्या न सीखें। लोग इसे कर भी नहीं पाते — शुरू में जो थोड़ा आता है उसी से खेलने लगते हैं, और उसी में बहुत कुछ हो जाता है।
मसानी मेलडी के चौरासी खाता के बारे में पूछा गया। वक्ता कहते हैं कि इस विषय की जानकारी दी जा सकती है — पर अगर ये विद्याएँ व्यावहारिक रूप में सीखनी हैं, तो उस तरह के साधक से संपर्क करके उनसे आमने-सामने सीखें। यूट्यूब देखकर चौरासी खाता विद्या आदि के बारे में न सीखें। वे कहते हैं, लोग चौरासी खाता सिद्ध भी नहीं कर पाते। शुरू में जो थोड़ा-बहुत आता है, उसी से खेलने लगते हैं, और उसी में बहुत कुछ हो जाता है। चौरासी खाता बहुत बड़ी बात है, बहुत दूर की बात है। कहना आसान है। और वे आगे कहते हैं, जब मसानी मेलडी या कोई और शक्ति शुरू होती है, तो वह केवल एक अंश देती है — और उसी में लोग घमंड से पागल हो जाते हैं; आगे की तो बात ही छोड़िए।
क्या शाबर या महाविद्या साधना से पहले बटुक भैरव साधना ज़रूरी है?
भैरव साधना हर घर में और हर शक्ति के साथ ज़रूरी है
बटुक भैरव की साधना हर घर में और हर शक्ति के साथ ज़रूरी है। माँ के किसी भी रूप की पूजा करें, बटुक भैरव की पूजा अत्यंत आवश्यक है — गुरु साधना के बाद गणपति, गणपति के बाद बटुक भैरव या भैरव का कोई रूप या कुल भैरव, और उसके बाद ही आपकी कुंडली के ग्रह।
एक पंक्ति के आधार पर कि शाबर बटुक के योग से फल देता है, पूछा गया कि क्या किसी भी महाविद्या या शाबर साधना से पहले बटुक भैरव की साधना ज़रूरी है। वक्ता बात को और बड़ा करते हैं। बटुक भैरव की साधना हर घर में, और हर शक्ति के साथ ज़रूरी है। माँ के जिस भी रूप की आप उपासना और साधना करें, बटुक भैरव की पूजा अत्यंत आवश्यक है। वे यह क्रम बताते हैं: गुरु साधना के बाद गणपति; गणपति साधना के बाद बटुक भैरव या भैरव जी का कोई रूप, या कुल भैरव; और उसके बाद ही आपके ग्रहों की साधना होगी, जो भी ग्रह आपकी कुंडली में उचित हों। वे कहते हैं, भैरव साधना के बिना आगे की साधना नहीं कर सकते। भैरव ही सबसे रक्षा करते हैं; वही संभालेंगे। उनकी साधना ज़रूरी है — और आजकल लोग ठीक इसी को छोड़ देते हैं।
सप्तशती या शाक्त दीक्षा कहाँ से लें?
शंकराचार्य परंपरा, गृहस्थों के लिए सबसे अच्छी
शंकराचार्य परंपरा में शंकराचार्य जी से निवेदन करें — उनके यहाँ दीक्षाएँ होती हैं, और देने का अधिकार उस पद पर जो विराजमान हैं उन्हीं का है। गृहस्थों के लिए यह सबसे अच्छा है, और इसमें कोई अजीब रकम नहीं लगेगी। किसी शक्तिपीठ के सक्षम साधकों से भी ले सकते हैं।
एक व्यक्ति सप्तशती दीक्षा लेना चाहते हैं और किसी योग्य व्यक्ति को नहीं जानते। उन्हें बताया जाता है: आप जहाँ भी रहते हों, आपके लिए सबसे अच्छा है कि शंकराचार्य परंपरा में जाकर शंकराचार्य जी से निवेदन करें। उनकी पीठ पर दीक्षा आदि होती है। उनसे निवेदन करें कि आपको भगवती की शाक्त अभिषेकशाक्त तांत्रिक कुल परंपरा में क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ने हेतु आवश्यक एक औपचारिक अभिषेक व दीक्षा संस्कार। दीक्षा चाहिए; शंकराचार्य परंपरा में यह दीक्षा देने का अधिकार उस पद पर जो विराजमान हैं, उन्हीं का है। उनसे दीक्षा प्राप्त करें। वे कहते हैं, गृहस्थों के लिए यह सबसे अच्छा है। मार्गदर्शन तो कई जगह से मिलेगा। ऐसे कुल में दीक्षा लें जिससे आपका कल्याण हो। वहाँ कोई अजीब रकम भी नहीं लगेगी। बाकी, वे आगे कहते हैं, किसी शक्ति पीठ के सक्षम साधकों से भी दीक्षा ले सकते हैं।
रक्षा के लिए ताँबे का कड़ा कैसे सिद्ध करें?
बारह दिन गंगोत्री के जल में, फिर मंत्र
पहले देखें कि ताँबे का कड़ा आपको सूट करता भी है या नहीं। फिर उसे कम से कम बारह दिन त्रिवेणी संगम के जल में या गंगाजल में डुबोकर रखें — सबसे बढ़कर गंगोत्री के जल में, क्योंकि केवल उसी से कड़े पर परत नहीं जमती — और जल भी ताँबे के बर्तन में रखें। फिर उसे किसी मंत्र से सिद्ध करें।
वक्ता दो तरीके और एक पहली शर्त बताते हैं। पहले: ताँबे का कड़ा आपके लिए उचित है भी या नहीं, यह देख लेना चाहिए। और अगर पहनने वाले हैं, तो मांस, मछली और शराब नहीं — यह ध्यान रखें। पहला तरीका: कड़े को कम से कम बारह दिन त्रिवेणी संगमप्रयागराज में गंगा, यमुना व अदृश्य सरस्वती का संगम — जप के दौरान अशुद्ध विचार आने पर इसका स्मरण, अथवा गंगा-नर्मदा का मानसिक आवाहन, चित्त को तत्काल शुद्ध करने हेतु विहित है। के जल में, या गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। में, किसी भी दिव्य नदी के जल में डुबोकर रखा जाता है। कड़े पर आप देखेंगे कि उस जल के कारण एक अलग परत जम जाती है। गंगोत्री के जल में कड़ा डुबोने पर वह परत नहीं जमती। इसलिए पहले उसे बारह दिन गंगोत्री के जल में डुबोएँ, और जो भी सामान्य पूजा-पाठ कर रहे हैं, करते रहें। और जल भी ताँबे के बर्तन में रखा जाएगा। दूसरी बात यह कि बाद में आप जिस मंत्र से चाहें उसे सिद्ध करें: एक शाबर में है — शाबर में जो भी रक्षा मंत्र है, उस रक्षा मंत्र से कड़े को सिद्ध करें। दूसरा है, तंत्रोक्त विधान में कड़े की प्राण प्रतिष्ठा करके उसमें एक शक्ति का आवाहन और स्थापना करना — पर उसके बाद आपको पूजा में ही नहीं, रोज़मर्रा के जीवन में भी बहुत संयम रखना होगा, स्त्री-स्पर्श आदि से बचना होगा।
तांबे के कड़े को सिद्ध करने के लिए कौन-से मंत्र लिए जा सकते हैं?
मंगल, सूर्य, कार्तिकेय, पीतांबरा — या अपने इष्ट का अस्त्र मंत्र
रक्षा के लिए मंगल का जप, या सूर्य का जप। सूर्य कवच, मंगल कवच या कार्तिकेय जी का कवच ले सकते हैं। शक्तियों में जाना हो तो भगवती पीतांबरा के मंत्र, या उनकी साबर विद्याओं से जुड़े मंत्र। या अपने इष्ट के किसी भी अस्त्र मंत्र से सिद्ध करें।
वक्ता मंत्र के विकल्प बताते हैं। रक्षा के लिए भगवान मंगल, यानी मंगल ग्रह से जुड़ा जप करें, तो वह एक जप है; दूसरा सूर्य ग्रह का जप है। सूर्य कवच से कर सकते हैं, या मंगल कवच से। कार्तिकेय जी के कवच से कर सकते हैं। या शक्तियों में जाना चाहें, तो भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। के मंत्रों से, या उनकी साबर विद्याओं से जुड़े मंत्रों से कर सकते हैं। अपने इष्ट और आराध्य के किसी भी अस्त्र मंत्र से भी सिद्ध कर सकते हैं। वे कहते हैं, सबसे ज़रूरी बात यह रहेगी कि जब भी कड़ा पहनेंगे, उसके बाद नियम रखना होगा।
बिना सिद्ध किए तांबे के कड़े के साथ भी कौन-से नियम लगते हैं?
किसी भी तांबे के कड़े पर लागू चार नियम
वक्ता कहते हैं, चार नियम तो लगेंगे ही। इसे पहनकर शराब न पिएँ। किसी मीठी चीज़ का रस इस पर लगे और उसे चाट लें, ऐसा न हो — वह ज़हर जैसा हो जाता है। मांस, मछली, अंडा न खाएँ। और स्त्री का स्पर्श, चाहे अपनी विवाहित पत्नी ही हो, कड़ा उतारकर करें।
वक्ता कहते हैं, अगर बिना बड़े विधान के बस रक्षा के लिए तांबे का कड़ा पहनना है, तो ध्यान रखें कि तीन-चार नियम तो लगेंगे ही। मानना न मानना लोगों की अपनी बात है; उनका काम सही बात बताना है। पहला: तांबा पहनकर शराब न पिएँ। दूसरा: कुछ मीठा खा रहे हों, तो ऐसा न हो कि कड़ा हाथ से छू जाए, उस पर रस लग जाए और आप उसे भी चाट लें — वह ज़हर के बराबर हो जाएगा। तीसरा: मांस-मछली नहीं खाना होगा; अंडा आदि न खाएँ। चौथा: स्त्री का स्पर्श — चाहे अपनी विवाहित पत्नी ही क्यों न हो — कड़ा उतारकर ही करें। साधारण कड़े में भी इतना ध्यान रखना होगा। और जब सिद्ध करवा लें, तो इन सबके साथ बाकी नियम भी मानें।
जहाँ पितरों को बाँध दिया गया हो, वहाँ क्या किया जा सकता है?
पहले काट करवाएँ; नहीं तो हनुमान चालीसा संपुट या गीता का ग्यारहवाँ अध्याय
अगर अभिचार के कारण पितर बँधे हैं, तो पहले किसी जानकार को घर बुलाएँ, क्रियाएँ दिखवाएँ, उसकी काट करवाएँ, फिर आगे बढ़ें। खुद करना हो और कोई खास विधि न आती हो, तो हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का संपुट पाठ करें, या गीता का ग्यारहवाँ अध्याय पढ़ें।
बालाजी का सेवक बँधे पितरों को कैसे छुड़ाए, यह पूछने पर वक्ता अलग-अलग स्थितियाँ बताते हैं। अगर मामला अभिचार का है — अगर अभिचार के कारण पितृ बँधे हैं — तो सबसे पहले किसी खास जानकार व्यक्ति को घर बुलाएँ, क्रियाएँ दिखवाएँ, उसकी काट करवाएँ, फिर आगे बढ़ें। अगर साधारण तरीके से खुद करना है, और कोई खास विधि या विद्या नहीं आती, तो हनुमान चालीसा का संपुट पाठ करें, या सुंदरकांड का संपुट पाठ करें, या हनुमान चालीसा का साधारण पाठ करें। वे कहते हैं, इसके अलावा श्रीमद्भगवद्गीता का ग्यारहवाँ अध्याय पढ़ेंगे, तो उससे भी खास लाभ मिलेगा।
पितृ पक्ष में पितरों के लिए दान कहाँ दिया जा सकता है?
कोई भी तीर्थ, और सबसे बढ़कर गंगा क्षेत्र
किसी भी तीर्थ क्षेत्र में जाएँ — खासकर गंगा क्षेत्र ज़्यादा मान्य है। गया जा सकते हैं, विंध्य क्षेत्र, काशी, पुष्कर क्षेत्र जा सकते हैं। जहाँ चाहें, जाकर करें।
पितृ पक्ष में तीर्थ पर पितरों के नाम से दान-पुण्य दे सकते हैं या नहीं, और कौन-सी जगह मान्य है — यह पूछने पर वक्ता कहते हैं: किसी भी तीर्थ क्षेत्र में जाएँ; खासकर गंगा क्षेत्र ज़्यादा मान्य है। उन क्षेत्रों में जाकर तीर्थ पर दान-पुण्य करें। गया श्राद्ध के लिए जा सकते हैं। विंध्य क्षेत्र, काशी, पुष्कर क्षेत्र जा सकते हैं। जहाँ चाहें, जाकर करें।
क्या कवच के मंत्रों से हवन हो सकता है?
कवच मंत्रों का हवन नहीं होता
नहीं। सप्तशती के कवच से हवन हो सकता है या नहीं, इस पर वक्ता कहते हैं नहीं; कवच मंत्रों से हवन पर भी वे फिर कहते हैं नहीं — कवच मंत्रों का हवन नहीं किया जाता।
सप्तशती के कवच से हवन हो सकता है या नहीं, यह पूछने पर वक्ता कहते हैं: नहीं। कवच मंत्रों से हवन हो सकता है या नहीं, इस पर भी वे कहते हैं: नहीं। कवच मंत्रों का हवन नहीं किया जाता।
आँखें बंद करने पर अनजान स्त्रियाँ और बच्चे दिखें तो क्या करें?
कृष्ण चतुर्दशी को भैरव याग और क्षेत्रपाल निकारी
घर पर भैरव याग करवाएँ और क्षेत्रपाल निकारी करवाएँ — कम से कम इतना। किसी थोड़े जानकार ब्राह्मण को ढूँढें जो काली मंदिर में पूजा करता हो और सप्तशती चंडी पाठ जानता हो; एक दिन, कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को करवाएँ।
जिस श्रोता को आँखें बंद करने पर अनजान स्त्रियाँ और बच्चे दिखते हैं, उनसे वक्ता कहते हैं: अगर बार-बार दिख रहे हैं, तो एक बार घर पर भैरव याग करवाएँ, और क्षेत्रपाल निकारीक्षेत्रपाल को अर्पित एक विसर्जन-अनुष्ठान — सुरक्षा तथा क्षेत्र में निवास करने वाली दुष्ट शक्तियों (डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल) की शांति हेतु प्रार्थना, जो घर की देहरी पर व्याप्त दुष्ट ऊर्जाओं को कम-से-कम 24 घंटे हेतु शुद्ध कर देती है। करवाएँ। कम से कम इतना करवाएँ। कोई थोड़ा जानकार ब्राह्मण, जो भगवती काली के मंदिर में पूजा करता हो, जो सप्तशती चंडी पाठ वगैरह जानता हो, वह जानता होगा कि निकारी कैसे होती है। उससे एक ही दिन, अष्टमी या चतुर्दशी को करवाएँ — अष्टमी नहीं, वे सुधारते हैं: कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को। भगवती महाकाली का साधारण पूजन करवाएँ, या उनसे कहें कि पूजन करके सप्तशती पाठ करें, और क्षेत्रपाल निकारी भी करवाएँ। भैरव जी के नाम से हवन भी करवाएँ। वे कहते हैं, एक ही बार करवाएँ। बात साफ़ हो जाएगी। वहाँ कोई बाधा होगी तो हटेगी, और जो बार-बार दिखता है, वह कम होगा।
क्या घोड़े की नाल सनातन परंपरा का हिस्सा है?
यह तंत्र और आगम में है, और लाल किताब के उपायों में
सनातन परंपरा में, तंत्र में और आगम में इन विषयों का उल्लेख रहा है। और आजकल जो लोकप्रिय हुई है — लाल किताब के उपाय — उनमें ये सब विषय खास तौर पर बताए गए हैं।
सनातन परंपरा में घोड़े की नाल मान्य है या नहीं, और हो तो विधि क्या है — यह पूछने पर वक्ता कहते हैं कि सनातन परंपरा में, तंत्र में और आगमतांत्रिक शास्त्रोक्त विधि-विधानों का समूह (जैसे शिवागम), जो पूजा के नियम निर्धारित करता है, यह भी कि बलि कहाँ व कैसे विहित है — मात्र स्वाद या भोग हेतु इसके नियमों का उल्लंघन किसी भी उच्च आध्यात्मिक प्राप्ति को असंभव बना देता है। में इन विषयों का उल्लेख रहा है। और खासकर आजकल जो लोकप्रिय हुई है — लाल किताब के उपाय — उनमें ये सब विषय खास तौर पर बताए गए हैं।
सुदर्शन चक्र नारायण पाठ किसलिए किया जाता है?
बार-बार दोहराए जा रहे अभिचार को भेदना
इसका अनुष्ठान खासकर शत्रु नाश, अभिचार से रक्षा, अभिचार के नाश और दूसरे की विद्या भेदने के लिए होता है। अगर कोई आप पर बार-बार अभिचार कर रहा हो, तो उसे भेदने और रोकने के लिए किया जाता है।
सुदर्शन चक्र नारायण पाठ से क्या लाभ मिलते हैं, यह पूछने पर वक्ता चैनल की ओर इशारा करते हैं, जहाँ पूरा विधान दिया है — क्या करना है और कैसे — और फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। की ओर, जहाँ लाभ बताए गए हैं। वे कहते हैं, खासकर सुदर्शन चक्रभगवान विष्णु/नारायण का सुदर्शन चक्र अस्त्र, शास्त्रों में एकादशी जैसे व्रतों का दृढ़तापूर्वक पालन करने वाले भक्तों के रक्षक रूप में वर्णित। नारायण पाठ का अनुष्ठान शत्रु नाश के लिए, अभिचार से रक्षा के लिए और अभिचार के नाश के लिए किया जाता है; और दूसरे की विद्या भेदने के लिए। अगर कोई आप पर बार-बार अभिचार कर रहा हो, तो उसे भेदने और रोकने के लिए किया जाता है।
क्या सपने में बेल का मतलब ब्रह्मराक्षस है?
बेल श्रीफल है — लक्ष्मी का रूप, ब्रह्मराक्षस नहीं
नहीं — वक्ता इस अर्थ को सीधे नकारते हैं। बेल श्रीफल है, साक्षात् भगवती लक्ष्मी का रूप; शिव और सारे देवता बेल के वृक्ष के पास हैं; पूरे सावन हमने बेल चढ़ाया। सपने में बेल देखना बहुत शुभ है, और कमल की तरह यह लक्ष्मी का प्रतीक है।
एक श्रोता अपना सपना बताती हैं और खुद उसका अर्थ करती हैं — बेल यानी ब्रह्मराक्षस, कमल यानी लक्ष्मी जी। वक्ता पूछते हैं, बेल ब्रह्मराक्षस कैसे हो गया? बेल बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। है, श्रीफल है। वह साक्षात् भगवती लक्ष्मी का रूप है। भगवान शिव और सारे देवता बेल के वृक्ष के पास हैं; पूरे सावन हमने बेल चढ़ाया — तो क्या ब्रह्मराक्षस को चढ़ाया? वे कहते हैं, सपने में बेल देखना बहुत शुभ है। जैसे आपने कमल देखा और बेल देखा, दोनों लक्ष्मी के प्रतीक हैं। वे पूछते हैं, बेल किस पर नहीं चढ़ता? गणपति जी पर चढ़ता है, भैरव जी पर चढ़ता है, भगवती के सब रूपों पर चढ़ता है। (बाद में सत्र में श्रोता बताती हैं कि उनके मामले में एक ब्रह्म पिशाच बेल माँगता था — इस पर वे कहते हैं कि अगर बेल माँगता था, तो वह सात्त्विक ब्रह्म रहा होगा, ब्रह्म देव की श्रेणी का।)
हवन में बेल फल का प्रयोग कैसे होता है?
गूदा शहद, शक्कर और घी के साथ — लक्ष्मी के लिए, और आकर्षण के लिए
बेल फल, यानी श्रीफल, का गूदा निकालकर उसमें शहद, मिश्री और शुद्ध घी मिलाया जाता है; इससे आहुति देना लक्ष्मी प्राप्ति का हवन है। षट्कर्म में आकर्षण के लिए यही सामग्री ली जाती है; इसमें सरसों मिलाने से यह शत्रु का स्तंभन बन जाता है।
वक्ता सामग्री बताते हैं। बेल फल से — वह बेल जो श्रीफल है — अंदर का पूरा गूदा निकाल लिया जाता है। उसमें शहद, और शर्करा खांड यानी मिश्री, और शुद्ध घी मिलाया जाता है। उससे आहुति दें, तो वह लक्ष्मी प्राप्ति का हवन बन जाता है। षट्कर्म में भी आकर्षण के लिए इसी सामग्री से हवन होता है। और शत्रु के स्तंभन के लिए इसी सामग्री में सरसों मिलाई जाती है।
साधक के जीवन का पहला अनुष्ठान क्या होना चाहिए?
एक कवच के ग्यारह सौ पाठ, फिर एक साल रोज़ पाठ
हर साधक के जीवन में किसी कवच के ग्यारह सौ पाठ होने चाहिए। जब भी यह साधना करने चलें, अपने आराध्य का, जिन पर आस्था हो, एक कवच लें, उसके कम से कम ग्यारह सौ पाठ करें, फिर एक साल रोज़ की पूजा में उसका पाठ करते रहें।
वक्ता कहते हैं कि वे यह बार-बार कहते हैं: हर साधक के जीवन में किसी कवच के ग्यारह सौ पाठ होने चाहिए। जब भी यह साधना करने जाएँ, एक कवच लें — अपने आराध्य का, जिन पर आस्था हो — और उसके कम से कम ग्यारह सौ पाठ करें। फिर रोज़ की पूजा में कम से कम एक साल उसका पाठ चलता रहे। उसके बाद ही कोई खास मंत्र, या दूसरे स्तोत्र, हृदय आदि लेने चाहिए। अलग से पूछने पर कि बेल की जड़ पहनने से क्या होता है, वे कहते हैं कि यह ग्रहों से जुड़ा उपाय है — बेल की जड़ मुख्य रूप से बृहस्पति ग्रह से जुड़े किसी मामले के लिए है।
मंत्र जप से होने वाले कंपन को कैसे संतुलित करें?
सात्त्विक शक्तियाँ जाग रही हैं पर असंतुलित — कवच पाठ और अष्टमी का हवन
इसका मतलब है कि मंत्र असर कर रहा है और शरीर में सात्त्विक शक्तियाँ जाग रही हैं — पर यह अनियंत्रित है, संतुलित नहीं। इसके लिए कवच का पाठ करें, और हो सके तो अष्टमी के दिन हवन भी करें।
उस श्रोता की बात पर लौटते हुए, जिन्होंने उनके कहने पर अर्गला मंत्र का जप शुरू किया और अब तेज़ कंपन होता है, आज्ञा चक्र पर खिंचाव होता है और विंध्यवासिनी का नाम पुकारने का मन होता है — वक्ता अर्थ और उपाय बताते हैं। भगवती का नाम पुकारने की इच्छा और तेज़ कंपन का मतलब है कि मंत्र शरीर में असर कर रहा है और वहाँ सात्त्विक शक्तियाँ जाग रही हैं। पर यह अनियंत्रित है। संतुलित नहीं है; संतुलन से बाहर जा रहा है। इसके लिए कवच का पाठ करें, और हो सके तो अष्टमी के दिन हवन भी करें।
क्या किसी को इसलिए गुरु बनाना चाहिए कि देवता की सवारी आए?
धन, मान या सवारी के लिए कभी गुरु न बनाएँ
धन, मान या यश के लिए किसी को गुरु न बनाएँ। सेवा और पूजा करनी हो, तो गुरु बनाएँ। यह सोचकर कि सवारी आएगी — फिर सवारी का करेंगे क्या?
क्या किसी को गुरु बनाने से माता किसी पर सवारी दे सकती हैं, यह पूछने पर वक्ता इस खास सवाल को टाल देते हैं — यह उनका विषय है, उनसे पूछें; सवारी आती है या दी जाती है, या किसकी है, एक बार उनसे बात करें। मैं कैसे कहूँ कि वे देंगी या नहीं। आम सवाल पर वे साफ़ बोलते हैं। धन, मान और यश के लिए किसी को गुरु न बनाएँ। सेवा और पूजा करनी हो, तो गुरु बनाएँ। यह सोचकर कि सवारी आएगी — फिर सवारी का करेंगे क्या?
सपने में माला देने वाला रूप किसका है?
उस अवस्था में केवल कामाख्या की योगिनियाँ देती हैं
वक्ता पहले कहते हैं कि ऐसा सपना सबके सामने नहीं बताना चाहिए। वे कहते हैं, बताया गया रूप असल में योगिनी रूप में भगवती कामाख्या हैं — और उनका आपको देना मतलब वे आपसे प्रसन्न हैं। उस अवस्था में केवल कामाख्या की योगिनियाँ देती हैं; और कोई नहीं देता।
एक श्रोता बताती हैं कि सपने में माँ काली की छवि दिखी, जो फूलों की माला दे रही थीं। वक्ता पहले कहते हैं, ऐसा सपना सबके सामने नहीं बताना चाहिए। आप भगवती कालिका का जो रूप बता रही हैं, वह असल में योगिनी रूप में भगवती कामाख्या हैं। और उनका आपको देना मतलब वे आपसे प्रसन्न हैं। उस अवस्था में केवल कामाख्या की योगिनियाँ देती हैं। और कोई नहीं देता।
सालभर का व्रत चलते हुए क्या गणेश चतुर्थी की साधना शुरू कर सकते हैं?
सँभाल सकें तो दोनों साथ चल सकती हैं
हाँ। हल षष्ठी से सालभर की साधना शुरू की हो, और वह चलते हुए गणेश चतुर्थी से महीने की साधना भी शुरू कर सकते हैं या नहीं — वक्ता कहते हैं हाँ; सँभाल सकें तो कोई दिक्कत नहीं; दोनों साधनाएँ कर सकते हैं।
हल षष्ठी से सालभर की साधना शुरू करने वाले एक श्रोता पूछते हैं कि वह चलते हुए क्या महीने की गणेश चतुर्थी की साधना भी शुरू कर सकते हैं। वक्ता कहते हैं, हाँ, कर सकते हैं। सँभाल सकें तो कोई दिक्कत नहीं। दोनों साधनाएँ कर सकते हैं।
क्या शल्य दोष वाले घर में साधना की जा सकती है?
पहले वास्तु पुरुष; महाशक्तियों पर जगह का दोष नहीं लगता
दिक्कत हो सकती है। जहाँ शल्य दोष या वेध दोष हो, वहाँ पहले वास्तु पुरुष की साधना करवाएँ, या विधान से वास्तु यंत्र सिद्ध करवाएँ, या शास्त्र प्रमाण से जो उपाय हो, वह करवाएँ। महाशक्तियों की साधना पर किसी जगह का दोष नहीं लगता — दिक्कत अंग विद्याओं में आती है।
जिस घर में शल्य दोष हो और वह सच में असर कर रहा हो, वहाँ साधना करना ठीक होगा या नहीं — यह पूछने पर वक्ता कहते हैं कि दिक्कत हो सकती है। जहाँ शल्य दोष या वेध दोष आदि हो, वहाँ पहले वास्तु पुरुष की साधना करवाएँ, या विधान से वास्तु यंत्र सिद्ध करवाएँ — या शास्त्र प्रमाण के अनुसार जो उपाय हो, वह करवाएँ। वे कहते हैं, महाशक्तियों की साधना पर किसी जगह का दोष नहीं लगता। दिक्कत षडंग अंग विद्याओं की उपासना में आती है। शिव जी की उपासना में कोई दिक्कत नहीं। अलग बात के रूप में वे जोड़ते हैं कि उच्छिष्ट गणपति की साधना घर में नहीं करनी चाहिए — उच्छिष्ट चांडालिनी या उच्छिष्ट गणपति की साधना इस तरह, सीधे नहीं की जाती।
कुलदेवी या पितरों का बंधन किससे खुलता है?
अर्गला के मंत्रों से हवन
अर्गला के मंत्रों से हवन। अर्गला मंत्रों में कुलदेवी हैं, पितर हैं — वहाँ भगवती का स्वधा रूप में भी वर्णन है — इसलिए जो भी बंधन हो, खुल जाएगा।
जहाँ कुलदेवी या पितरों को बाँध दिया गया हो, वहाँ क्या करें — यह पूछने पर वक्ता चैनल पर दिए कई विधानों की ओर इशारा करते हैं जो खुद किए जा सकते हैं, और खासकर हवन वाले बताते हैं: अर्गला स्तोत्र के मंत्रों से हवन। वे कहते हैं, अर्गला मंत्रों में कुलदेवी हैं और पितृ हैं; वहाँ भगवती का स्वधा रूप में भी वर्णन है। इसलिए जो भी बंधन हो, खुल जाएगा। हवन वाले जो प्रयोग बताए गए हैं, वे इसी चैनल पर हैं — वे करें। इसी दौरान वे एक और श्रोता से कहते हैं कि हालत ऐसी हो तो अपने इष्ट को बिना गिने आहुति बिल्कुल दी जा सकती है; और भैरव जी को प्रसन्न करने के लिए पहले अष्टोत्तर नामावली का ग्यारह बार पाठ करें।
संकेत के रूप में बार-बार त्रिकोण दिखे तो इसका क्या मतलब है?
ऊपर की ओर त्रिकोण बार-बार — भैरव की उपासना करें
जिस श्रोता को बार-बार ऊपर की ओर नोक वाला त्रिकोण बनता दिखता है — हाथ से गिरी चीज़ में, गिरे खून के सैंपल के इंजेक्शन में — उन्हें वक्ता एक ही बात कहते हैं: भैरव जी की उपासना करें।
एक श्रोता बताते हैं कि संकेत के रूप में बार-बार ऊपर की ओर त्रिकोण दिखता है: हाथ से जो गिरता है, त्रिकोण बनाता है; खून के सैंपल का इंजेक्शन गिरा और त्रिकोण का निशान बना। वक्ता का जवाब एक पंक्ति का है: भैरव जी की उपासना करें। इसी दौरान वे बजरंग बाण पर जवाब देते हैं: बजरंग बाण का एक-आध बार नियम से पाठ ज़रूर कर सकते हैं। इसका पूरा विधान इसी चैनल पर है — पाठ करें, सिद्ध रखें, और ज़रूरत पड़ने पर प्रयोग करें। नियम से साधारण एक पाठ किया जा सकता है।
गोमती चक्र किस काम आता है?
विष्णु चक्र, और जीवित व मृत प्रकार
इसे विष्णु चक्र भी कहते हैं। यह समुद्र से मिलता है। इसका प्रयोग खास तौर पर लक्ष्मी से जुड़े कामों में होता है — जहाँ बार-बार गर्भ गिरता हो, वहाँ गर्भ की रक्षा और उसे टिकाने के लिए, और जहाँ बार-बार अभिचार कर्म हो रहा हो। यह दो तरह का मिलता है: जीवित और मृत।
वक्ता कहते हैं कि गोमती चक्र को विष्णु चक्र भी कहते हैं। यह समुद्र से मिलने वाली चीज़ है। इसका प्रयोग खास तौर पर लक्ष्मी से जुड़े कामों में होता है: जहाँ बार-बार गर्भ गिर रहा हो, वहाँ गर्भ की रक्षा और उसे टिकाने के लिए। जहाँ बार-बार अभिचार कर्म हो रहा हो, वहाँ इसका प्रयोग होता है। गोमती चक्र दो तरह के मिलते हैं, एक जीवित और एक मृत। वे समझाते हैं कि मृत का मतलब यह है: असर उसी के अनुसार होता है — जैसे-जैसे अभिचार चलता है, जीवित गोमती चक्र टूट जाएगा, खराब हो जाएगा या बढ़ना रुक जाएगा। यह बढ़ता है। ऐसा बहुत कम मिलता है। दूसरा साधारण गोमती चक्र है, जो आसानी से मिल जाता है।
देवी के लिए प्रसाद चढ़ाया हो तो उसे कहाँ बाँटें?
भगवती के लिए, भगवती के मंदिर में बाँटें
हनुमान मंदिर में बाँट सकते हैं — पर अगर भगवती के लिए करना है, तो भगवती के मंदिर में करें; वह बहुत अच्छा रहेगा। अगर हनुमान जी ही कुल देवता हैं, तो वहाँ कर सकते हैं।
एक श्रोता की कुलदेवी दुर्गा घर में जाग्रत रूप में विराजमान हैं। वे पूछते हैं कि क्या माँ के लिए हर पूर्णिमा को हनुमान मंदिर में प्रसाद और भोग बाँट सकते हैं। वक्ता कहते हैं, हाँ, बाँट सकते हैं — पर अगर भगवती के लिए करना है, तो भगवती के मंदिर में करें। वह बहुत अच्छा रहेगा। वे आगे कहते हैं कि अगर हनुमान जी भी कुल देवता हैं, तो हाँ, वहाँ कर सकते हैं।
शीतला माता की कृपा कैसे मिलती है?
शीतला अष्टक, या कुल की अपनी परंपरा
अगर वे कुलदेवी हैं, तो कुल की जो परंपरा है, उसी से करें। अगर नहीं हैं, तो खास तौर पर भगवती शीतला का अष्टक पढ़ें। इसी क्रम में वक्ता जोड़ते हैं कि सब रूपों में भगवती पार्वती ही प्रधान रूप हैं — उन्हीं को मूल शक्ति कहते हैं।
माता शीतला माता की कृपा पाने का उपाय पूछने पर वक्ता कहते हैं कि अगर वे कुलदेवी के रूप में विराजमान हैं, तो कुल की परंपरा के अनुसार करें। और अगर नहीं हैं, तो खास तौर पर भगवती शीतला का अष्टकम्किसी देवता की स्तुति में आठ श्लोकों से रचित एक भक्ति स्तोत्र, जिसे प्रायः दैनिक पूजा के बजाय संकट के समय पाठ हेतु सुरक्षित रखा जाता है। पढ़ें। इसी क्रम में बताई गई प्रधान शक्ति के बारे में पूछने पर वे कहते हैं कि सब रूपों में भगवती पार्वती ही प्रधान रूप हैं — उन्हीं को मूल शक्ति कहते हैं।
क्या किन्नर को गुरु बनाना चाहिए?
उनकी नब्बे प्रतिशत साधनाएँ वामाचार की — गृहस्थ के लिए कठिनाई
वक्ता उनकी परंपराओं के बारे में एक बात कहने से मना करते हैं। वे कहते हैं कि उनकी मानसिकता हर जगह एक जैसी नहीं होती। पर वे बताते हैं कि जो किन्नर साधना करते हैं, उनमें लगभग नब्बे प्रतिशत वाम विद्या से, वामाचार से करते हैं — और वामाचार में जाने के बाद गृहस्थ के रूप में आपको कठिनाई होगी।
एक श्रोता, जो कम उम्र का लगता है, पूछता है कि क्या नाथ परंपरा से जुड़े किसी किन्नर को गुरु बना सकते हैं, और क्या वे उसे भी किन्नर बना देंगे। वक्ता पहले कहते हैं कि अगर घर में माता-पिता या अभिभावक हैं, तो उनसे बात करो। दूसरी बात, वे कहते हैं, किन्नरों की मानसिकता हर जगह एक जैसी नहीं होती; अलग-अलग तरह से अलग होती है। इसलिए वे नहीं कह सकते कि उनकी परंपरा क्या है या वे किस विधि से आगे बढ़ेंगे। वे इतना कहते हैं: खास तौर पर किन्नरों में, जो साधना करते हैं, उनमें लगभग नब्बे प्रतिशत वाम विद्या से, वामाचार से करते हैं। और वे कहते हैं, वामाचार में जाने के बाद गृहस्थ के रूप में आपको कठिनाई होगी।
दुर्गा के साथ गणेश किस ओर होते हैं — दाएँ या बाएँ?
देवी के रूप के साथ स्थान बदलता है
भगवती दुर्गा चतुर्भुजी, द्विभुजी, अष्टभुजी, दशभुजी, षोडशभुजी, अष्टादशभुजी और सहस्रभुजी रूपों में हैं, और रूप के साथ स्थान बदलता है। गौरी-गणपति की स्थापना में भगवती गणपति के दाईं ओर होती हैं; अष्टभुजी दुर्गा के साथ गणपति उनके दाईं ओर आते हैं; दशभुजी के साथ वे बाईं ओर चले जाते हैं।
लोग कहते हैं कि गणेश दुर्गा जी के बाईं ओर होते हैं, और गौरी-गणेश की स्थापना में गणेश बाईं ओर होते हैं, जबकि पति के रूप में शिव जी दुर्गा जी के दाईं ओर होते हैं। इस उलझन को सुलझाने को कहने पर वक्ता पंचायतन स्थापना की बात करते हैं, जिसमें हर किसी का अपना स्थान है। भगवती दुर्गा चतुर्भुजी रूप में हैं, द्विभुजी रूप में, अष्टभुजी, दशभुजी, षोडशभुजी, अष्टादशभुजी, सहस्रभुजी — अनेक रूपों में। और उनके रूप के अनुसार उनका स्थान भी बदलता रहता है। जब गौरी-गणपति की स्थापना होती है, तो वे माता के रूप में होती हैं, इसलिए गणपति जी भगवती गौरी के दाईं ओर होते हैं — यानी भगवती गणपति के दाईं ओर होती हैं। और जब वे ऋद्धि-सिद्धिगणेश जी की दो अर्धांगिनी, समृद्धि व सिद्धि की प्रतीक। के रूप में स्थापित होती हैं, तो वे दोनों ओर होती हैं, फिर भी उस रूप की पूजा में वे उनके दाईं ओर आती हैं। जब अष्टभुजी दुर्गा जी की स्थापना होती है, तो भगवान श्री गणपति की स्थापना दुर्गा जी के दाईं ओर होगी — हालाँकि वहाँ हनुमान जी होंगे और फिर गणपति; और अगर वे दशभुजी हैं, तो वे बाईं ओर चले जाते हैं। तो स्थापना उसी के अनुसार होती है।
पितरों के उपाय में बार-बार बाधा आए तो क्या करें?
अमावस्या को गीता के ग्यारहवें अध्याय के ग्यारह पाठ
अमावस्या तिथि को संकल्प के साथ गीता के ग्यारहवें अध्याय के ग्यारह पाठ करवाएँ। बाधा का मतलब है कि पितरों में कोई क्षुद्र शक्ति घुस गई है, या कोई अभिचार घुस गया है, और काम पूरा नहीं होने दे रहा — पहले उसे बँधवाएँ, या भगवाएँ।
जहाँ पितृ के लिए उपाय हो रहे हों पर बार-बार बाधा आ रही हो, वहाँ वक्ता कहते हैं: सबसे पहले अमावस्या तिथि को संकल्प के साथ गीता के ग्यारहवें अध्याय के ग्यारह पाठ करें या करवाएँ। बाधा आने का मतलब है कि पितरों में कोई क्षुद्र विद्या शक्ति घुस गई है, या कोई अभिचार घुस गया है, और वह काम पूरा ही नहीं होने दे रहा। पहले उसे बँधवाएँ; नहीं तो उसे भगवाएँ। वे कहते हैं, यह काम कोई भी कर सकता है। दो लौंग, दो फूल वाली लौंग — लोग इतने में ही कर देंगे। आपके घर लाएँगे, आपकी देहरी पर डालकर चले जाएँगे; चौखट से छुआकर वहीं तोड़ देंगे। आप सोचेंगे, इतनी छोटी चीज़ क्या करेगी — और वह बहुत बड़ी हो जाती है। पितरों के साथ पूरी कहानी इतने में ही निपट जाती है। जिन्हें करना होता है, वे कर देते हैं।
क्या गुरु मंत्र पर दोष लग सकता है?
गुरु मंत्र पर दोष नहीं लगता; दोष बताने में है
गुरु मंत्र ऐसा मंत्र है जिस पर कभी किसी तरह का दोष नहीं लगता। अगर आपको लगता है कि लगा है, तो वक्ता के हिसाब से आपने उसे किसी को बता दिया है — और बताने से जो दोष लगता है, वह लग चुका; यह भूल जाइए कि रुद्राष्टकम् के पाठ से वह हट जाएगा।
पूछा गया कि क्या संकल्प के साथ रुद्राष्टकम् का पाठ गुरु मंत्र पर लगे दोष को हटा सकता है। वक्ता इस बात को ही नहीं मानते। वे पूछते हैं, गुरु मंत्र पर दोष कैसे लगेगा? उलझिए मत। गुरु मंत्र पर दोष लग ही कैसे सकता है? यह पहली बात है। गुरु मंत्र ऐसा मंत्र है जिस पर कभी किसी तरह का दोष नहीं लगता। दूसरी बात, अगर आप यह इसलिए कह रहे हैं कि आपने गुरु मंत्र किसी को बता दिया है — तो बताने से जो दोष लगता है, वह लग चुका, और अब यह भूल जाइए कि रुद्राष्टकम् के पाठ से वह हट जाएगा। गुरु मंत्र को गुप्त रखने को ठीक इसी कारण से कहा गया है। गुरु मंत्र किसी को नहीं बताना चाहिए — चाहे वह केवल नाम मंत्र ही क्यों न हो। आपके और मेरे गुरु एक ही हो सकते हैं, हमें एक ही मंत्र मिला हो सकता है, फिर भी कहा जाता है: मत बताओ। कुछ लोग कहते हैं कि लिखकर बताने में दोष नहीं है, केवल बोलने में है। उनके अपने मत से इसे पूरी तरह गुप्त रखना चाहिए। गुरु मंत्र कभी किसी को नहीं बताना चाहिए। और अगर बताने से दोष लग गया है, तो अगर आपके गुरु जीवित हैं, तो वे प्रायश्चित करेंगे और बताएँगे कि प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। की विधि कैसे करनी है — और प्रायश्चित करके उस मंत्र का अनुष्ठान फिर से करें।
कुल भैरव की पहचान कैसे होती है?
कुलदेवी जानने से कुल भैरव का पता चलता है
अगर आप अपनी कुलदेवी जानते हैं, तो आपको कुल भैरव का पता चल जाएगा। और इसी क्रम में वक्ता जोड़ते हैं कि भगवान श्री राम की कुलदेवी भगवती विंध्यवासिनी हैं।
कुल भैरव के बारे में पूछने पर वक्ता कहते हैं कि अगर आप अपनी कुलदेवी जानते हैं, तो आपको कुल भैरव का पता चल जाएगा। साधक परिवार से जुड़ने पर वे कहते हैं कि जो भी चाहे, जुड़कर साधना कर सकता है। जब आप क्रम से साधना शुरू करते हैं, तो आपको सब विधानों की जानकारी दी जाती है और साथ लेकर चला जाता है; फिर यह जीवन भर के लिए है। हम आराम से एक-एक साधना करते हुए आगे बढ़ते हैं — जीवन में कोई कठिनाई हो तो उससे जुड़ी साधना, और साधना के मार्ग पर चलना हो तो उससे जुड़ी साधना। अयोध्या से साठ किलोमीटर पूर्व में रहने वाले का शक्तिपीठ कौन-सा है, विंध्यवासिनी या माँ पाटन देवी — यह पूछने पर वे कहते हैं: जो पास हो, उसे मानिए — पर अगर अयोध्या में है, तो मुख्य रूप से भगवती विंध्यवासिनी हैं। भगवान श्री राम की कुलदेवी भगवती विंध्यवासिनी हैं।
चौंतीसा यंत्र की विधि असल में कैसे चलती है?
एक सौ आठ लिखे जाते हैं, आटे की गोलियों में बहाए जाते हैं — ताबीज में एक भी नहीं
उन एक सौ आठ में से कोई भी ताबीज में नहीं जाता। भोजपत्र पर एक सौ आठ बार लिखें, यंत्रों को गेहूँ के आटे में भरकर एक सौ आठ गोलियाँ बनाएँ और बहती नदी या तालाब में डालें ताकि वे मछलियों तक पहुँचें — यह जल तत्व का विषय है, वरुण के आशीर्वाद से सिद्ध होता है। फिर पहनने के लिए नया यंत्र बनाएँ।
वक्ता मानते हैं कि श्रोता ने जो विधान भेजा है, वह पूरी तरह सही है, और उसमें यह नहीं लिखा कि एक सौ आठ यंत्र रखने हैं। पर उसमें एक रूप — यंत्र को धोबी की नाद में डालना — आज के समय के लिए ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा करना ताड़न विधि में आता है, और सीधे किसी को सताना, यानी पीड़ा देकर कुछ सिद्ध करना, सही नहीं है। उस तांत्रिक स्वभाव वाले, या ऐसी गुरु परंपरा वाले लोग वह करें। सब कुछ नहीं किया जा सकता। लिखने के बारे में: एक विधान कहता है कि भोजपत्रभोजपत्र, अनार की टहनी की कलम व लाल चंदन की स्याही से मंत्र या नाम लिखने हेतु प्रयुक्त — जैसे शिवलिंग के अर्घे पर नाम रखकर मधु-अभिषेक करने में। पर एक सौ आठ बार लिखें। बड़ा भोजपत्र मिले तो उसी पर एक सौ आठ बार लिखें; भोजपत्र छोटे हों तो छोटों पर एक सौ आठ लिखें। ग्रंथ सीधे बहाने को ही कहता है, और सीधे बहाना भी ठीक है। पर जो दिया गया है — और वे कहते हैं कि स्वामी जी पर वे प्रश्नचिह्न नहीं लगा सकते — वह यह है कि यंत्र को गेहूँ के आटे में भरकर, एक सौ आठ गोलियाँ बनाकर, बहती नदी या तालाब में डाला जाता है ताकि वह मछलियों के पेट में जाए। यह खास तौर पर जल तत्व से जुड़ा विषय है, और उस स्थान के वरुण देव देवता के आशीर्वाद से सिद्ध होता है। उसके बाद जब आप इसे बनाकर प्रयोग में लाएँगे, तो यह काम करेगा। तो: उन एक सौ आठ यंत्रों में से कोई भी ताबीज में नहीं रखा जाएगा। जब एक सौ आठ वाली पूरी विधि कर लें, तब जो यंत्र नए सिरे से बनाना है, वह बनाएँ, और उसके बाद उसे पहनें। और अगर आप उसे गीता के मंत्र से अभिमंत्रित करना चाहें, तो कर सकते हैं — ग्यारहवें अध्याय का कम से कम ग्यारह बार पाठ करके।
ब्रह्म को स्थान कहाँ दिया जाता है?
ब्रह्म क्षेत्र, पीपल का पेड़, तालाब का किनारा या तीर्थ
ब्रह्म क्षेत्र में, ब्रह्म धाम में, या पीपल के पेड़ पर — पर दो तरह से। या तो तांत्रिक प्रयोग से बाँधकर किसी सुनसान जगह छोड़ दिया जाता है ताकि वे लौट न सकें, और अगर कभी छूट गए तो बहुत परेशान करते हैं; या विधि-विधान से पीपल पर स्थान दिया जाता है, और फिर नियम से पूजा होती है।
ब्रह्म को स्थान कहाँ दिया जाता है, यह पूछने पर वक्ता जगहें बताते हैं: ब्रह्म क्षेत्र, ब्रह्म धाम, या पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। का पेड़। पर यह दो तरह से होता है। एक: किसी सुनसान जगह पीपल पर स्थान देकर, तांत्रिक प्रयोग से बाँधकर वहीं छोड़ दिया जाता है — वैसे यह सब तांत्रिक प्रयोग में ही आता है — ताकि वे लौट न सकें; और उनकी फिर कभी खोज-खबर नहीं ली जाती। पर अगर वे कभी छूट गए, तो बहुत परेशान करेंगे। दो: विधि-विधान से पीपल के पेड़ पर स्थान दिया जाता है, जिसके बाद लोग नियम से उनकी पूजा करते हैं और करते रहते हैं। वह अलग तरह का स्थान है। तालाब के किनारे जैसी जगहों पर ज़मीन भी खरीदी जाती है और वहाँ स्थान दिया जाता है। तीर्थ क्षेत्र में भी कुछ जगहों पर स्थान बनाया जाता है; वहाँ भी ज़मीन खरीदकर उनका थान बनाया जाता है और पूजा दी जाती है।
साधना के दौरान क्रोध और नींद क्यों बढ़ते हैं?
जप से अस्थिर हुए चक्र, और शक्ति के मंत्र का दशांश
क्योंकि जब जप से मूलाधार पर स्पंदन होता है, तो कहीं न कहीं चक्र अस्थिर हो जाते हैं, जिससे क्रोध और काम दोनों बहुत बढ़ते हैं। एक उपाय कर सकते हैं: साथी शक्ति के मंत्र का दशांश जप करें — पुरुष देवता की उपासना हो तो स्त्री शक्ति का, और उलटा — और उसी से तर्पण और मार्जन करें।
वक्ता कहते हैं कि साधना के दौरान क्रोध बहुत बढ़ना साधारण बात है — क्रोध चढ़ना-उतरना, और बहुत नींद आना। इसका कोई खास उपाय नहीं है; खुद पर नियंत्रण करके ही चलना होगा। हर चीज़ का उपाय नहीं होता। पर वे कारण और एक उपाय बताते हैं। जब मंत्र जप से मूलाधार पर स्पंदन होता है, तो कहीं न कहीं चक्र अस्थिर हो जाते हैं — जिससे काम और क्रोध दोनों बढ़ते हैं। इच्छाएँ भी बहुत बढ़ेंगी; क्रोध भी काफी बढ़ेगा। इसके लिए एक काम कर सकते हैं: आप जिस देवता का जप कर रहे हैं, उनकी साथी शक्ति के मंत्र का दसवाँ भाग — दशांशसाधना के चरणों को जोड़ने वाला दशमांश (एक-दसवां) अनुपात नियम — कुल जप संख्या के दसवें भाग जितना हवन, हवन के दसवें भाग जितना तर्पण, और तर्पण के दसवें भाग जितना मार्जन किया जाता है। — जप करें: देवता पुरुष हों तो स्त्री शक्ति का मंत्र, और स्त्री हों तो पुरुष का। उनके मंत्र से मार्जन और तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। करने से भी शांति मिलती है। और अगर जन उद्धारण हो रहा हो, तो गायत्री जप।
तंत्र का काम सफल होने के बाद आए अहंकार से कैसे निपटें?
काम देवता की कृपा से हुआ; आप निमित्त थे
तंत्र का काम देवता की कृपा से सफल हुआ; आप और हम केवल निमित्त बनते हैं। अगर आप इस पर अहंकार करेंगे, तो अगली बार वह काम होगा ही नहीं। पश्चाताप के लिए, आपने जो प्रयोग किया, उससे जुड़े देवता से क्षमा माँगें, और उनके नाम से हवन, जप और प्रायश्चित करें।
तंत्र का काम सफल होने के बाद सपने में भी अहंकार आ जाए, तो उससे कैसे बचें या उसका पश्चाताप कैसे करें — इस पर वक्ता कहते हैं कि यह बहुत बड़ी बात है। वे कहते हैं, तंत्र का काम देवता की कृपा से सफल हुआ। आप और हम केवल निमित्त बनते हैं। और अगर आप इस पर अहंकार करेंगे, तो अगली बार वह काम कभी होगा ही नहीं। पश्चाताप के लिए: आपने जो तंत्र प्रक्रिया की, उससे जुड़े देवता से क्षमा माँगें, और उनके नाम से हवन और जप करें, और प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। करें। इससे ठीक पहले वे सोने-चाँदी के सपने के बारे में बताते हैं: तब देखें कि आस-पास कहीं गड़ा धन तो नहीं — पर अगर चाँदी दिख रही है, तो उसे पितृ की कृपा माना जा सकता है।
जो बच्चे हकलाते हैं और धीरे सीखते हैं, उनके लिए क्या देखना चाहिए?
बुध, दूसरा भाव, और माता का कुल
बुध देव की उपासना। पर पहले अपनी और दोनों बच्चों की कुंडली किसी अच्छे ज्योतिषी से दिखवाएँ, ताकि बुद्धि की स्थिति पता चले — दूसरा भाव वाणी का भाव है। और तीसरा: अपने कुल में और माता के कुल में कोई कठिनाई देखें, या अपनी बहन या बुआ से जुड़ी, और उसका उपाय करने की कोशिश करें।
एक श्रोता बताते हैं कि उनके दोनों बच्चे हकलाने लगे हैं, पढ़ाई में मन नहीं लगता और सीखने में बहुत धीमे हैं। वक्ता का पहला उत्तर है बुध देव की उपासना। पर सबसे पहले, वे कहते हैं — वैसे बारह-तेरह साल की उम्र तक कुंडली की ज़रूरत नहीं होती — श्रोता ने जो उम्र बताई है, उसे देखते हुए अपनी और दोनों बच्चों की कुंडली एक साथ किसी अच्छे ज्योतिषी से दिखवाएँ, या उन्हें दिखाएँ, ताकि पता चले कि बुद्धि की स्थिति क्या है। यह पहला काम है। दूसरा, दूसरे भाव से जुड़ी बात — दूसरा भाव वाणी का भाव है। तीसरा यह: अपने कुल में, और अपनी माता के कुल में देखें कि उनसे जुड़ी कोई कठिनाई तो नहीं। या अगर आपकी बहन या बुआ से जुड़ी कोई परेशानी या कठिनाई हो, तो उसका उपाय करने की कोशिश करें।
वीर गणपति बैताल क्यों धारण करते हैं?
प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, जोड़ी वाले रूपों पर सामान्य बात
वक्ता इसे बहुत अच्छा प्रश्न कहते हैं और उत्तर देने से मना कर देते हैं — क्योंकि इन रूपों की चर्चा से सब उसी ओर भागेंगे। वे केवल सामान्य बात बताते हैं: हर विद्या के साथ भगवान गणपति के ऐसे रूप हैं, और हर एक के साथ गणपति और भैरव दोनों अलग-अलग रूप लेते हैं।
वक्ता कहते हैं, बहुत अच्छा प्रश्न है — और फिर मना कर देते हैं: हम इसका उत्तर नहीं देंगे। प्रश्न इतना अच्छा है कि अगर हम इन सब रूपों की चर्चा शुरू करें, तो सब उसी ओर भागेंगे; आकर्षण बढ़ेगा, और फिर होगा कि इनके बारे में भी बताइए। इसकी जगह वे सामान्य बात बताते हैं। हर विद्या के साथ भगवान गणपति के ऐसे रूप हैं। सभी महाविद्या में, हर एक के साथ अलग-अलग रूप हैं; और कभी-कभी ऐसा भी हुआ है कि भगवती के एक ही रूप के साथ भगवान गणपति के तीन-चार रूप प्रकट हुए हैं। उनकी कई विद्याएँ प्रकट हुईं, और उनके साथ गणपति और भैरव के रूप भी हर बार अलग रहे। अष्ट भैरव के अलावा भी बहुत सारे भैरव हैं, जिनके वर्णन आपको पढ़ने और जानने को मिलेंगे। तो यह रूप उन्हीं में से एक है। यह अस्त्र मंत्र विद्या से जुड़ा है — और इससे आगे हम क्या कहें।
जहाँ साधना से उस स्थान पर कुछ भड़क जाए, वहाँ क्या करें?
उस स्थान पर दत्त माला मंत्र से धूनी
तब जिस स्थान पर आप हैं, वहाँ कुछ न कुछ आपकी साधना के असर से पीड़ित हुआ होगा, और उसी माध्यम से आपको कष्ट देने की कोशिश कर रहा है। आप अभी भगवान दत्तात्रेय की साधना कर रहे हैं, इसलिए वहाँ माला मंत्र से धूनी करें।
एक श्रोता बताते हैं कि सपने में उन्हें चोट लगी और जागने पर निशान मिला — एक बड़ा नीला-लाल निशान, हल्के दर्द के साथ। तब, वक्ता कहते हैं, जिस स्थान पर आप हैं, वहाँ कुछ न कुछ आपकी साधना के असर से पीड़ित हुआ होगा, और उसी माध्यम से आपको कष्ट देने की कोशिश कर रहा है। आप अभी भगवान दत्तात्रेय की साधना कर रहे हैं, इसलिए वहाँ माला मंत्र से धूनीविशेष लकड़ियों व बीजों को जलाकर घर या स्थान से नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा दूर करने हेतु की जाने वाली धूनी। करें।
ठीक से पूजा शुरू करते ही सपने क्यों बंद हो जाते हैं?
दूर हों तो बुलाते हैं; पास आएँ तो रुक जाते हैं
वक्ता का उत्तर है कि भगवान भी वैसा ही करते हैं जैसा हम करते हैं। जब हम उनसे प्रेम नहीं कर रहे होते, या उनसे दूर जा रहे होते हैं, तो वे हमें अपने पास बुलाते हैं। जब हम आकर्षित होकर उनकी ओर जाते हैं, तो वे रुक जाते हैं — तुम बहुत समय मुझसे दूर रहे, अब मैं दिखाता हूँ। न सपना, न पास आना, न आकर्षण बढ़ना। विरह में बेचैन रहो।
एक श्रोता लिखती हैं कि जब वे कम पूजा करती थीं, तब उन्हें भगवान के बहुत सपने आते थे, और अब जब वे अच्छी पूजा और अच्छे काम करती हैं, तो सपने नहीं आते। वक्ता उत्तर देते हैं, भगवान ऐसे ही हैं। जब हम उनसे प्रेम नहीं कर रहे होते, या उनसे दूर जा रहे होते हैं, तो वे हमें पास बुलाते हैं। जब हम आकर्षित होकर उनकी ओर जाते हैं, तो वे रुक जाते हैं: तुम बहुत दिन मुझसे दूर रहे, अब मैं दिखाता हूँ — आओ, आओ। अब न सपना दिया जाएगा, न वे पास आएँगे, न आकर्षण बढ़ेगा। विरह में बेचैन रहो।
सपने में मिले मंत्र के अनुष्ठान में बार-बार बाधा आए तो क्या करें?
पहले गणपति के संकट नाशन का अनुष्ठान
सपने में मिले मंत्र के अनुष्ठान से पहले भगवान गणपति के संकट नाशन स्तोत्र का अनुष्ठान करें — चाहे एक दिन का ही। जैसे, अगर मंत्र अनुष्ठान अष्टमी को शुरू करना है, तो चतुर्थी से सप्तमी तक तीन दिन गणपति अनुष्ठान करें।
एक श्रोता बताते हैं कि जब भी वे सपने में मिले मंत्र का अनुष्ठान करने की कोशिश करते हैं, बाधा आ जाती है। वक्ता कहते हैं, सपने में जो भी मंत्र मिला हो — मान लीजिए भगवती का मंत्र है — तो उस मंत्र से पहले, जब भी उसका अनुष्ठान करने जाएँ, पहले भगवान गणपति के संकट नाशन स्तोत्र का अनुष्ठान करें, चाहे केवल एक दिन का ही। उसके बाद अनुष्ठान करें। उदाहरण के लिए: मान लीजिए आप अष्टमी तिथि से मंत्र अनुष्ठान शुरू करने जा रहे हैं; तो चतुर्थी से सप्तमी तक, कम से कम तीन दिन, गणपति अनुष्ठान करें।
रात के हवन में किस दिशा की ओर मुख करें?
पूर्णिमा की रात के हवन में गृहस्थों के लिए पूर्व और उत्तर
हवन करना चाहिए — और गृहस्थों को मुख्य रूप से पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए।
रात के समय किए जाने वाले पूर्णिमा हवन में किस दिशा की ओर मुख करें, यह पूछने पर वक्ता कहते हैं कि हवन करना चाहिए — और गृहस्थों को मुख्य रूप से पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए। इसी क्रम में वे अग्नि देव के बारे में बताते हैं: अग्नि देव प्रत्यक्ष देवता भी हैं और निकट देवता भी। अग्नि देव की साधना वैदिक साधना है — इसलिए अगर आप वैदिक मंत्र आदि जानते हैं, तो अग्नि सूक्त आदि से उनकी विशेष साधना कर सकते हैं।
क्या हर गृहस्थ को अप्सरा और कामदेव की साधना करनी चाहिए?
इस दावे का खंडन — और कामदेव की साधना असल में कब बताई गई है
वक्ता इस दावे को नहीं मानते कि भगवान राम ने अप्सरा साधना की थी और हर गृहस्थ को सौंदर्य और कामदेव की उपासना करनी चाहिए। वे पूछते हैं कि इतना समय कहाँ से लाएँगे। कामदेव की साधना की जगह काम-दहन की साधना कीजिए, भगवान शिव की साधना कीजिए।
दूसरे गुरु की कही एक बात पर वक्ता बोलते हैं। वह बात यह थी कि भगवान राम ने अप्सरा साधना की थी, और हर गृहस्थ को सौंदर्य की उपासना और कामदेव की साधना करनी चाहिए। वक्ता पूछते हैं कि भगवान राम जी को अप्सरा साधना की क्या आवश्यकता थी? मान भी लें तो: तंत्र से जुड़ी साधना भगवान राम जी ने महर्षि वशिष्ठ के द्वारा की थी। हो सकता है उन्होंने की हो। मान भी लें, तो हम अप्सरा साधना इत्यादि कब करें, और कामदेव की कब? क्या आपके पास इतना समय है? वे कहते हैं, कामदेव की साधना की जगह काम-दहन की साधना कीजिए, भगवान शिव की साधना कीजिए। गृहस्थ जीवन में जिसके पास इतना समय हो, वह करे। इसमें कुछ गलत नहीं, वे इसे गलत नहीं कह रहे। पर यह कुछ ज़्यादा हो जाता है, और इस तरह खुलकर बोलना भी ठीक नहीं।
कामदेव की साधना असल में कब करनी चाहिए?
केवल जब शरीर संतान में साथ न दे — वरना अर्गला
केवल तब, जब शरीर में उस तरह के विकार बहुत कष्ट दे रहे हों। यानी धर्म के लिए संतान चाहिए और शरीर साथ नहीं दे रहा, कोई मेडिकल समस्या है। तब करनी चाहिए। योग्य और सुंदर पत्नी के लिए भगवती की साधना कीजिए: पत्नीं मनोरमां देहि।
वक्ता कहते हैं कि शक्ति उपासना सीधे नहीं हो सकती। पहले महाशक्तियों की उपासना कीजिए। जब समर्थ और योग्य गुरु मिल जाएँ, तभी गृहस्थ इस तरह की साधनाओं में उतरे। वे कहते हैं, कामदेव की साधना तभी करनी चाहिए जब शरीर में उस तरह के विकार बहुत कष्ट दे रहे हों। यानी धर्म-कर्म के लिए संतान चाहिए और शरीर साथ नहीं दे रहा, कोई मेडिकल समस्या है। तब करनी चाहिए। और अगर आकर्षण, वशीकरण, योग्य पत्नी की प्राप्ति, सुंदर स्त्री चाहिए — तो भगवती की साधना कीजिए। अर्गला स्तोत्र में लिखा है: पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्, तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्। फिर वे केवल सुंदरता चाहने के विरुद्ध बोलते हैं। वे एक सार्वजनिक उदाहरण देते हैं, एक बहुत सराही गई शादी जो बुरी तरह बिगड़ी। अंत में बताते हैं कि असल में क्या चाहना चाहिए: गृहस्थ को ऐसी पत्नी चाहिए जो साधना-पूजा भी करे, घर की चीज़ों को भी लेकर चले, और आगे कुल का उद्धार भी करे — और जिन्हें हम देवी स्वरूप में पूजें। वे कहते हैं, यही कामना की गई है; सनातन में यही है।
ब्रह्मचर्य कैसे बना रहता है?
यौगिक अभ्यास, कपालभाति, हल्का भोजन और सूर्य उपासना
यौगिक क्रिया का अभ्यास, खासकर कपालभाति; गरिष्ठ भोजन का त्याग; और सुबह के समय सूर्य की उपासना।
ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। बनाए रखने के लिए क्या करें, यह पूछने पर वक्ता बताते हैं: यौगिक क्रिया का अभ्यास, खासकर कपालभाति इत्यादि; गरिष्ठ भोजन का त्याग; और सुबह के समय सूर्य की उपासना। अलग से पूछा गया कि जन्माष्टमी की साधना खास तौर पर कब करें। वे अपनी बात दोहराते हैं: निशीथ काल में जब भी अष्टमी हो, उसी समय करनी है — 11 से 1 के बीच।
माँ की पायल से बने कड़े को अभिमंत्रित कैसे करें?
अभिमंत्रित करने की ज़रूरत नहीं — माँ के शरीर ने ही कर दिया है
अभिमंत्रित करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। कड़ा बनवाइए। फिर शुक्ल पक्ष के सोमवार को गाय के कच्चे दूध से अच्छे से धोइए, और माँ से कहिए कि वे खुद आपको पहनाएँ। उन्होंने इसे इतने दिन अपने शरीर पर रखा है — यह पहले से ही बहुत अभिमंत्रित है।
पूछा गया कि माँ की पहनी पायल की चाँदी से बने कड़े को कैसे अभिमंत्रित करें। वक्ता कहते हैं कि अभिमंत्रित करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। कड़ा बनवाइए। फिर शुक्ल पक्ष के सोमवार को गाय के कच्चे दूध से अच्छे से धोइए, और अपनी माँ से कहिए कि वही आपको पहनाएँ। यही सबसे अच्छा रहेगा। अभिमंत्रित करने की कोई ज़रूरत नहीं। माँ ने इसे इतने दिन अपने शरीर पर रखा है — यह बहुत अभिमंत्रित है। वे पूछते हैं, जन्म देने वाली के चरणों से बड़ा क्या है?
गृहस्थ कौन-सा आसन अपनाए, और रोज़ कवच करें या पूरी सप्तशती?
पहले सुखासन; और दीक्षित हों तभी रोज़ सप्तशती
हर गृहस्थ साधक को सबसे पहले खास तौर पर सुखासन ही अपनाना चाहिए। रोज़ के पाठ पर: आपकी इच्छा है — दीक्षित हैं तो रोज़ सप्तशती कीजिए; दीक्षित नहीं हैं तो केवल कवच कीजिए।
शिव संहिता में शिव के बताए आसनों — पद्मासन, सुखासन, स्वस्तिकासन — के बारे में पूछा गया। वक्ता कहते हैं कि इनमें हर गृहस्थ साधक को सबसे पहले खास तौर पर सुखासन ही अपनाना चाहिए। पूछा गया कि ढाई घंटे के जप के लिए रोज़ दुर्गा कवच के इकतालीस पाठ ठीक रहेंगे या पूरी सप्तशती। वे कहते हैं, यह आपकी अपनी इच्छा है। अगर सप्तशती भी करने की इच्छा है: दीक्षित हैं तो रोज़ सप्तशती कीजिए। दीक्षित नहीं हैं तो केवल कवच कीजिए।
दुर्गा हवन के लिए हवन कुंड में क्या लिख सकते हैं?
ह्रीं, त्रिकोण, देवता का बीज और अग्नि का बीज
हाँ — अगर वक्ता की विधि से कर रहे हैं तो ह्रीं लिखिए। यंत्र बना सकते हैं, त्रिकोण, दोनों त्रिकोण। भगवती के जिस रूप की पूजा कर रहे हैं उसका बीज मंत्र लिख सकते हैं, और अग्नि का बीज मंत्र, जो रं है।
पूछा गया कि माँ दुर्गा का हवन करते समय क्या हवन कुंड में ह्रीं लिखना चाहिए। वक्ता कहते हैं, हाँ, लिखिए — हमारी विधि से करते हैं तो ह्रीं लिख सकते हैं। यंत्र बना सकते हैं, त्रिकोण इत्यादि; दोनों त्रिकोण बना सकते हैं। हवन में भगवती के जिस रूप की पूजा करने वाले हैं, उसका बीज मंत्र (बीज मंत्र) भी लिख सकते हैं। और अग्नि का बीज मंत्र रं है — वह लिख सकते हैं; रं लिख सकते हैं।
धूनी के लिए कौन-सा मंत्र और कौन-सी सामग्री?
अपामार्ग की लकड़ी पर सरसों की धूनी, और शाम का छिड़काव
जैसा पहले बताया, अपामार्ग की लकड़ी पर सरसों वाली धूनी कीजिए। या तो सामग्री को एक बार मंत्र से अभिमंत्रित करके रोज़ धूनी कीजिए, या मंत्र पढ़ते हुए धूनी कीजिए। और हर शाम थोड़ा गोमूत्र गंगाजल में मिलाकर कुश से नृसिंह मंत्र के साथ छिड़किए — या रात में दत्तात्रेय माला मंत्र से।
पूछा गया कि धूनी किस मंत्र से करें और सामग्री क्या हो। वक्ता वही बताते हैं जो पहले कहा था: अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी पर सरसों वाली धूनीविशेष लकड़ियों व बीजों को जलाकर घर या स्थान से नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा दूर करने हेतु की जाने वाली धूनी। — वही कीजिए। मंत्र के बारे में: या तो सामग्री को एक बार मंत्र से अभिमंत्रित करके रख लीजिए और रोज़ धूनी कीजिए; या फिर मंत्र का पाठ करते हुए धूनी कीजिए। साथ में हर शाम थोड़ा गोमूत्रगोमूत्र, पितृ-दोष या अनुष्ठानिक अशुद्धि के उपायों में गंगाजल के साथ शुद्धिकरण-पात्र में थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता है। गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। में मिलाकर कुश आसन घास से नृसिंह मंत्र के साथ छिड़किए। उन्हें लगता है कि सुनने वाले ने किसी साधना में यह मंत्र किया है। नहीं तो रात के समय दत्तात्रेय माला मंत्र से कीजिए। वैदिक हवन विधि पर वे पक्के हैं: वैदिक हवन की विधि किसी वैदिक ब्राह्मण से सीखिए, फिर कीजिए। बताने से नहीं होगा; वैदिक विधि से तो नहीं।
जब आत्मविश्वास टूट गया हो तो क्या करें?
पूरी विधि से ग्यारह दिन का कवच अनुष्ठान
पूरी विधि-विधान से, ठीक से, कवच का ग्यारह दिन का अनुष्ठान कीजिए।
पूछा गया कि आत्मविश्वास बहुत कम हो गया हो तो क्या करें। वक्ता बताते हैं: पूरी विधि-विधान से, ठीक से, कवच का ग्यारह दिन का अनुष्ठान कीजिए। इसी दौरान वे एक बड़ी बात कहते हैं: जब बहुत पैसा और बहुत प्रतिष्ठा मिल जाती है, तो आदमी खुद को सबसे ऊपर मानने लगता है। ऐसा हमेशा से होता आया है। इसी कारण इनमें से कुछ भी नहीं चाहना चाहिए। सीमा में रहिए, भगवती का गुणगान कीजिए, बस। बाकी मैया हमारा जीवन चला लेंगी।
मारण करने वाले को क्या सज़ा मिलती है?
दाने-दाने को मोहताज, और मरने भी नहीं दिया जाता
वक्ता कहते हैं, सज़ा ऐसी मिलती है कि वे दाने-दाने को मोहताज हो जाते हैं — और मरते भी नहीं। ऐसे लोगों को कीड़े पड़ते हैं।
पूछा गया कि मारण प्रयोग करने वाले को भगवान से क्या सज़ा मिलती है। वक्ता बताते हैं कि सज़ा ऐसी मिलती है कि वे दाने-दाने को मोहताज हो जाते हैं, और मरते भी नहीं। ऐसे लोगों को कीड़े पड़ते हैं। इसी दौरान वे पुष्टि करते हैं कि माँ काली की अंग शक्ति में कलवों की भी पूजा होती है — तंत्र विधि में ऐसा होता है, और वे वहीं रहते हैं।
शारीरिक बल के लिए कौन-सी साधना करें?
वीर भाव में पंचमुखी हनुमान और मरकटेश्वर भैरव
ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए भगवान हनुमान जी से जुड़ी वीर भाव साधना कीजिए; पंचमुखी हनुमान की साधना कीजिए; मरकटेश्वर भैरव की साधना कीजिए। दीक्षा लेकर करें तो अति उत्तम है, और संपूर्ण साधना के साथ हनुमान चालीसा का संपुट पाठ भी अति उत्तम है।
पूछा गया कि मेहनत के साथ बाहुबल के लिए कौन-सी मंत्र साधना करें। वक्ता तीन बताते हैं। ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन करते हुए भगवान हनुमान जी से जुड़ी वीर भाव साधना कीजिए। पंचमुखी हनुमान की साधना कीजिए। मरकटेश्वर भैरव की साधना कीजिए। दीक्षा लेकर करें तो अति उत्तम है। और संपूर्ण साधना के साथ हनुमान चालीसा का संपुट पाठ भी अति उत्तम है।
जिस वार को कोई पूर्वज मरा हो, क्या उस दिन शुभ काम टालना चाहिए?
जब तक उस दिन कोई जन्म न हो, यह रीति माननी चाहिए
वक्ता कहते हैं, यह रीति बहुत सारी जगहों में है — कि जब तक उस दिन कोई बच्चा जन्म न ले, उस दिन कोई शुभ कार्य नहीं होता — और उनके हिसाब से इसे मानना और निभाना चाहिए।
एक श्रोता लिखते हैं कि जहाँ कोई पूर्वज मंगलवार को मरा हो, वहाँ उस दिन कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता। कहा जाता है कि जब तक उस दिन कोई बच्चा जन्म न ले, तब तक कोई शुभ कार्य न हो। वक्ता कहते हैं, यह चीज़ बहुत सारी जगहों में है, और उनके हिसाब से इसे मानना चाहिए — यानी करना चाहिए।
अगर कोई भैरव कहें कि वे घर में बँधे हैं, तो क्या करें?
चतुर्दशी को कालिका पूजन और सप्तशती, क्षेत्रपाल निकारी के साथ
अगर भैरव जी बंधन में हैं, तो वे कुल भैरव होंगे, और किसी ने उस तरह की मन्नत या भोग किया होगा। चतुर्दशी को भगवती कालिका का पूजन और सप्तशती पाठ करवाइए, क्षेत्रपाल निकारी के साथ — इतना काफ़ी होगा। और भैरव जी की मुक्ति का संकल्प लें, तो पूरा काम हो जाता है।
एक श्रोता बताते हैं कि एक साल पहले मामा के घर उन्हें सफ़ेद वस्त्र में एक व्यक्ति दिखे। उन्होंने कहा कि वे भैरव जी हैं और इस घर में बँधे हुए हैं। वक्ता कहते हैं, अगर भैरव जी बंधन में हैं, तो वे कुल भैरव होंगे। किसी ने ज़रूर कोई मन्नत या भोग या ऐसा कुछ किया होगा। तो पहली बात, अगर उस घर में कुछ करना है: उनसे कहिए कि चतुर्दशी को भगवती कालिका का पूजन करवाकर सप्तशती पाठ करवाएँ, साथ में क्षेत्रपाल निकारी। इतना काफ़ी होगा। इतने में वे मुक्त हो जाएँगे। और अगर भैरव जी की बंधन से मुक्ति का संकल्प लिया जाए, तो पूरा काम हो जाता है।
अगर कुल देवता मदिरा माँगें तो क्या करें?
पहले पता कीजिए कि उस कुल में किसकी पूजा होती है
पहले अपने मामा के कुल के बड़ों से पूछिए कि वहाँ किस देवता की पूजा होती है — भैरव की या किसी और की। सफ़ेद वस्त्र में बहुत कम देवता मदिरा माँगते हैं। पहले पता कीजिए; बिना जाने कुछ मत कीजिए। सात्त्विक मदिरा दे सकें तो कोई दोष नहीं; नहीं तो किसी जानकार को दिखाकर ही कीजिए।
श्रोता आगे बताते हैं कि उस व्यक्ति ने बस इतना कहा कि जब भी वे आएँ, उन्हें मदिरा दी जाए। वक्ता कहते हैं, ऐसे ही नहीं किया जा सकता। सबसे पहले अपने मामा के कुल के बड़ों से पूछिए कि वहाँ किस देवता की पूजा होती है — भैरव की पूजा होती है या किसी और की। वे बताते हैं कि सफ़ेद वस्त्र में बहुत कम देवता ऐसे हैं जो मदिरा माँगते हैं। पहले पता कीजिए। बिना जाने कुछ मत कीजिए। दूसरी बात: अगर सात्त्विक मदिरा दे सकें, तो उसमें कोई दोष नहीं, कर सकते हैं। और अगर फिर भी मदिरा देनी है, तो किसी जानकार व्यक्ति को दिखाइए और उसके बाद ही कीजिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।