साधना वास्तव में कहाँ फलती है, और क्यों — शिव पुराण का अपना दस-दस गुना स्थान-तारतम्य, शुद्ध घर से लेकर पर्वत-शिखर तक; शक्तिपीठ, सिद्धपीठ, बलिपीठ और महाश्मशान क्या हैं और किसे कहाँ बैठने का अधिकार है; कामाख्या, काशी, प्रयाग, विंध्याचल, गिरनार और तारापीठ की पूरी विधि — घर से निकलने के क्षण से लौटकर सोने की रात तक; वे भूलें जो परेशानी साथ ले आती हैं; और जब जाना संभव ही न हो तब उसके स्थान पर क्या करना है। हर कथन उस प्रवचन से जुड़ा है जहाँ से वह आया, और जहाँ ग्रंथ बोलता है, वहाँ उस श्लोक से भी।
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Updated 28 August 2026
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स्थान साधना को क्यों बदल देता है
अधिकांश लोग इस विषय में गलत सिरे से प्रवेश करते हैं। वर्षों से घर पर साधना चल रही है, कुछ हिला नहीं, और कोई कह देता है कि किसी शक्ति पीठ में जाइए। तब प्रश्न यह बन जाता है कि सबसे प्रभावशाली स्थान कौन सा है — जबकि परंपरा जिस प्रश्न का उत्तर वास्तव में देती है वह है: स्थान करता क्या है, और उसकी कीमत क्या है।
शिव महापुराण इसका उत्तर एक ही अध्याय में, क्रम-सूची के रूप में, बिना घुमाए देता है। विद्येश्वर संहिता का पंद्रहवाँ अध्याय ऋषियों के इसी प्रश्न से आरंभ होता है कि सूत जी देश आदि का क्रमशः वर्णन करें — और वे करते हैं। शुद्ध घर मूल फल देता है; गोशाला उससे दस गुना; जलाशय का तट उससे दस गुना; बेल, तुलसी अथवा पीपल का मूल उससे भी दस गुना; फिर देवालय, तीर्थ का तट, नदी का तीर्थ, तीर्थ-नदी का तीर्थ, सप्तगंगा, समुद्र का तट, और मापे गए क्रम के सबसे ऊपर पर्वत का शिखर। ग्यारह सोपान, प्रत्येक पिछले से दस गुना। और फिर वह श्लोक जो इस पूरी सीढ़ी के अभिमान को एक पंक्ति में उतार देता है — सर्वस्मादधिकं ज्ञेयं यत्र वा रोचते मनः, इन सबसे भी अधिक वह स्थान जानना चाहिए जहाँ मन को रुचि हो।
जिन प्रवचनों से यह मार्गदर्शिका संकलित है वे यही तारतम्य साधक की ओर से सिखाते हैं, और उसमें वह आधा जोड़ देते हैं जिसे ग्रंथ अनकहा छोड़ता है: गुणक दोनों दिशाओं में चलता है। बारहवाँ अध्याय इसे एक ही पंक्ति में कहता है — पुण्यक्षेत्रे कृतं पुण्यं बहुधा ऋद्धिमृच्छति, पुण्यक्षेत्रे कृतं पापं महदण्वपि जायते। पुण्यक्षेत्र में किया गया पुण्य अनेक प्रकार से बढ़ता है; पुण्यक्षेत्र में किया गया थोड़ा-सा भी पाप बड़ा हो जाता है। यही कारण है कि आगे जो कुछ है उसका लगभग आधा विधि के विषय में नहीं, आचरण के विषय में है। काशी में पंक्ति में खड़े होकर पंडा से किया गया झगड़ा वैसा छोटा नहीं होता जैसा घर पर होता है, और जिस गणित से सत्ताईस माला वहाँ जाने योग्य बनती है, उसी गणित से वह झगड़ा महँगा पड़ता है।
यह मार्गदर्शिका उस पाठक के लिए है जिसने जाने का निश्चय कर लिया है, अथवा जो जा नहीं सकता और जानना चाहता है कि उसके स्थान पर क्या रखा जाए। इसमें है — पवित्र भूमि कितने प्रकार की होती है और किसे कहाँ बैठने का अधिकार है, वे नामित क्षेत्र जिन्हें यह प्रवचन वास्तव में सिखाता है (कामाख्या, काशी, प्रयाग, विंध्याचल, गिरनार, तारापीठ), घर का द्वार छोड़ने से लौटकर सोने की रात तक की पूरी विधि, और वे विशिष्ट भूलें जो तीर्थ को समस्या में बदल देती हैं। जहाँ ग्रंथ बोलता है, वहाँ कथन के साथ श्लोक है। और जहाँ कोई व्यापक रूप से प्रचलित प्रथा उस ग्रंथ में है ही नहीं, वह भी उसी प्रसंग के साथ अंकित है जिससे उसे मिलाकर देखा गया।
तीर्थ क्षेत्र में अनुशासन अति अनिवार्य होता है। और तीर्थ क्षेत्र में किया गया कोई भी पाप नष्ट नहीं होता, जैसे वहां के पुण्य नष्ट नहीं होते, वहां के पाप भी नष्ट नहीं होते हैं।
यही एक निर्देश तीर्थ को यात्रा से अलग करता है। इन प्रवचनों की न्यूनतम सीमा है सत्ताईस माला — लगभग आधा घंटा — दर्शन के पश्चात अपने आसन पर बैठकर, उसी मंत्र की जो आप पहले कर चुके हैं। इससे कम पर प्रवचन का अपना निर्णय स्पष्ट है: अगर आप आधा घंटा बैठ के जाप नहीं किए तो तीर्थ जाकर के लाभ ही क्या हुआ? ग्रंथ 12.5 में अपनी ओर से यही कहता है — तीर्थ और क्षेत्र में स्नान, दान और जप सदा करने चाहिए।
02
गुणक दोनों ओर चलता है
उस भूमि पर आप जो भी करते हैं वह बढ़ता है — वह भी जिसे आप बढ़ाना नहीं चाहते। 12.36 इसे बिना किसी रियायत के कहता है, और 12.7 जोड़ता है कि क्षेत्र में किया पाप और भी दृढ़ हो जाता है। व्यवहार में: पंक्ति में झगड़ा नहीं, पंडा से मोल-भाव नहीं, ज़मीन से कुछ उठाना नहीं, घाट के पास थूकना या निवृत्ति नहीं। इस मार्गदर्शिका का आधा भाग यही एक नियम है, लागू किया हुआ।
03
न जा पाना अपराध नहीं है
जो संहिता ग्यारह श्रेणियों में स्थान बाँटती है, वही चार मार्ग उस क्रम के बाहर भी देती है: संसार के समस्त प्रसिद्ध तीर्थ बिल्व के मूल में निवास करते हैं (22.23), भस्मस्नान परम तीर्थ कहा गया है (24.78), जो मुख “शिव” कहता है वही तीर्थ बन जाता है (23.7), और सभी मापे गए स्थानों से ऊपर वह है जहाँ मन को रुचि हो (15.6)। यहाँ आरंभ करने के लिए किसी टिकट की आवश्यकता नहीं।
स्थान का तारतम्य
विद्येश्वर संहिता 15.1-15.6, उसी क्रम में जिसमें सूत जी देते हैं, और साथ में वह जो यह प्रवचन प्रत्येक सोपान के विषय में साधक की ओर से जोड़ता है। इसे पवित्रता की नहीं, क्षमता की क्रम-सूची की तरह पढ़िए: सूची का अभिप्राय यही है कि प्रत्येक सोपान अपने नीचे वाले का दस गुना प्रभाव सघन करता है — और इसीलिए अंतिम श्लोक, जहाँ मन को रुचि हो, क्रम के भीतर नहीं बल्कि हर मापे गए सोपान के ऊपर रखा गया है।
सोपान
ग्रंथ क्या कहता है
व्यवहार में इसका अर्थ
Source
1× — शुद्ध घर
शुद्धं गृहं समफलं देवयज्ञादिकर्मसु — देवयज्ञ आदि कर्मों में अपना शुद्ध घर समान, अघटित फल देने वाला है (15.1)।
आधार शून्य नहीं है। आपका अपना पूजन-स्थान वैध स्थान है और पूरी सीढ़ी उसी से मापी गई है। ऊपर का सब कुछ उस साधना पर गुणक है जो आप पहले से कर रहे हैं — उसका विकल्प नहीं जो आप कर ही नहीं रहे।
10× — गोशाला
ततो दशगुणं गोष्ठम् (15.2)।
वह एक सोपान जिसका प्रयोग लगभग कोई नहीं करता और गाँव में लगभग हर कोई कर सकता है। चलती हुई गोशाला गिनी जाती है।
100× — जलाशय का तट
जलतीरं ततो दश (15.2) — किसी भी जल का किनारा, इससे पहले कि तीर्थ, नदी और तीर्थ-नदी का भेद आरंभ हो।
तालाब, पोखर, नहर का किनारा। प्रवचन स्थिर जल को बहते जल से नीचे रखता है और यह कहता भी है — जो इस बात से मेल खाता है कि ग्रंथ नदी के तीर्थ को चार सोपान ऊपर रखता है।
1,000× — बेल, तुलसी या पीपल का मूल
बिल्वतुलस्यश्वत्थमूलकम् (15.2)। बाईसवाँ अध्याय और आगे जाता है: संसार में जितने भी प्रसिद्ध तीर्थ हैं, वे सब बिल्व के मूल में निवास करते हैं (22.23)।
इस पूरे विषय का सबसे कम प्रयोग किया गया निर्देश, और यही कारण है कि इस मार्गदर्शिका में “जा नहीं सकते” वाला भाग है। प्रवचन एक उपवन-कसौटी भी जोड़ता है: जिस स्थान पर आँवला, बेल और तुलसी साथ हों उसे वह साक्षात काशी के समान कहता है।
15.4-5 में नामतः: गंगा, गोदावरी, कावेरी, ताम्रपर्णी, सिन्धु, सरयू और रेवा (नर्मदा)।
सात नदियाँ, नाम सहित, ग्रंथ में। और बारहवाँ अध्याय फिर प्रत्येक को उसका अपना मास-राशि काल और अपना फल देता है।
10⁹× — समुद्र का तट
ततोऽब्धितीरे दश (15.5)।
गंगासागर, पुरी, रामेश्वरम्, सोमनाथ। क्रम ध्यान से पढ़िए — तट अगले सोपान से नीचे है, ऊपर नहीं। भ्रांतियों वाला भाग देखिए।
10¹⁰× — पर्वत का शिखर
पर्वताग्रे ततो दश (15.5) — अध्याय का सर्वोच्च मापा गया सोपान।
विंध्याचल का त्रिकोण, गिरनार का दत्त शिखर, कामाख्या का नीलांचल, केदार। इसीलिए प्रवचन बार-बार पहाड़ पर भेजता है, और इसीलिए शिखर की परिक्रमा को टहलना नहीं, साधना माना जाता है।
यह सांत्वना-वाक्य नहीं है। स्थान पर अध्याय का यही अंतिम वचन है, यह दस-अरब गुने सोपान के भी ऊपर बैठा है, और जिस दिन यात्रा संभव न हो उस दिन यही श्लोक पकड़ने योग्य है।
स्थान, नियम और विधान
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क्षेत्र किसे कहते हैं
यहाँ से आरंभ
विद्येश्वर संहिता पवित्र भूमि को न इतिहास का संयोग मानती है, न भीड़ का परिणाम। 12.3 में वह कहती है कि शिव जहाँ-जहाँ क्षेत्र की रचना करते हैं, वह जान-बूझकर, वहाँ के निवासियों के मोक्ष के लिए करते हैं — मोक्षार्थं कृपया देवः क्षेत्रं कल्पितवान् प्रभुः। और 12.4 में वह चार प्रकार गिनाती है जिनसे ऐसा क्षेत्र बनता है: ऋषियों के परिग्रह से, देवताओं के परिग्रह से, स्वयम्भू, अथवा अन्यथा उत्पन्न। यह काम की वर्गीकरण-सूची है, और इसी कारण कुछ श्लोक आगे स्वयम्भू लिंग का क्षेत्र मानुष लिंग के क्षेत्र से दस गुना बड़ा मापा गया है।
एक कठोर शर्त 9.46 में है: लिंगाभावे न तत्क्षेत्रं सवेरमपि सर्वतः — लिंग के अभाव में वह भूमि, मूर्ति सहित होने पर भी, सब प्रकार से क्षेत्र नहीं है। यही उस व्यावहारिक चेतावनी का शास्त्रीय रूप है जो यह प्रवचन किसी सड़क किनारे पिछले वर्ष बने थाने के विषय में देता है: प्रश्न यह नहीं कि वहाँ कितने लोग जाते हैं, प्रश्न यह है कि वहाँ स्थापित क्या है।
पुण्यक्षेत्र भूगोल का संयोग नहीं है — शिव वहाँ के निवासियों के मोक्ष के लिए कृपापूर्वक क्षेत्र की रचना करते हैं, और क्षेत्र चार प्रकार से बनते हैं: ऋषि-परिग्रह, देव-परिग्रह, स्वयम्भू, अथवा अन्यथा उत्पन्न।
क्षेत्र की सीमा नापी हुई है — और उसके भीतर के कुएँ गंगा हैं
स्थान के विषय में ग्रंथ जो सबसे ठोस बात कहता है वही सबसे कम उद्धृत होती है। 11.55-56 क्षेत्र को नापता है: मानुष लिंग के चारों ओर सौ हाथ; ऋषिकृत अथवा दैव लिंग के चारों ओर पाँच सौ हाथ; और स्वयम्भू लिंग के चारों ओर एक हजार धनुष। क्षेत्र एक त्रिज्या है, द्वार नहीं — और वह त्रिज्या इस बात से तय होती है कि उसके केंद्र में किस प्रकार का लिंग है।
11.57 फिर बताता है कि वह त्रिज्या भीतर के साधारण जल के साथ क्या करती है: पुण्यक्षेत्र में स्थित बावड़ी, कुआँ और पुष्कर शिवगंगा जानने चाहिए। 11.58 निर्देश पूरा करता है — वहाँ स्नान, दान और जप करके मनुष्य शिव को प्राप्त होता है। तो जिस मंदिर के कुंड के पास से आप निकल आए वह दृश्य नहीं था। कामाख्या में दर्शन से पहले कुंड में स्नान के आग्रह के नीचे यही शास्त्रीय आधार है, और क्षेत्र में कुंड-स्नान की पूरी परंपरा के नीचे भी।
इससे उस प्रश्न का उत्तर भी मिलता है जो लोग वास्तव में पूछते हैं — नदी से कितनी दूर तक प्रभाव रहता है? नदी के विषय में प्रवचन का उत्तर है “जहाँ तक उस नदी का अपना क्षेत्र माना गया हो”, और वह आपसे किनारे पर बहस करने के बजाय जल में उतरने को कहता है। लिंग-क्षेत्र के विषय में ग्रंथ का उत्तर एक संख्या है।
शक्तिपीठ, सिद्धपीठ, जागृत पीठ — इन शब्दों का काम क्या है
तीन शब्द जो एक-दूसरे की जगह चला दिए जाते हैं और जिनका अर्थ एक नहीं है। शक्ति पीठ वह स्थान है जिसे देवी-साहित्य भगवती सती के किसी अंग के गिरने से जोड़ता है; संख्याएँ ग्रंथ-भेद से भिन्न हैं (51, 52, 108) और यह मार्गदर्शिका उनमें निर्णय नहीं करती, क्योंकि व्यवहार में उससे कुछ नहीं बदलता। सिद्ध पीठ वह स्थान है जहाँ साधना बार-बार सफल हुई है — यह दावा उत्पत्ति का नहीं, परिणाम का है, इसीलिए परंपराओं की सूचियाँ अलग हैं और इसीलिए एक अकेला वृक्ष या गुफा भी सिद्धपीठ हो सकती है। जाग्रत पीठ इनमें से कोई श्रेणी नहीं, एक निर्णय है: कि वहाँ अधिष्ठात्री शक्ति वास्तव में उत्तर दे रही है।
इस उलझन को काटने का प्रवचन का अपना तरीका यह है कि प्रश्न ही बदल दिया जाए — वह आसन भरा हुआ है या नहीं, और किससे। वह स्पष्ट कहता है कि किसी कुल या गाँव में भैरव का पद देवी के किसी पूर्व सेवक को उठाकर दिया जा सकता है, और यह वैध है; और वही पद कोई मसान या पिशाच भी घेर सकता है जिसे किसी ने घर शांत करने के लिए बैठा दिया हो। किसी छोटे सड़क-किनारे स्थान के विषय में भी यही सच है। वहाँ जाइए जहाँ विधि पुरानी हो और सेवा अटूट; बोर्ड पर लिखा नाम उस स्थान की सबसे कम भरोसेमंद बात है।
विंध्याचल को यह प्रवचन अपनी अलग श्रेणी में रखता है और यहाँ उसका नाम लेना उचित है: उसके विषय में दावा यह नहीं कि वहाँ कोई अंग गिरा, बल्कि यह कि वहाँ भगवती अपने संपूर्ण स्वरूप में विराजमान हैं।
शक्तिपीठ वे स्थान हैं जहाँ भगवती सती के अंग गिरे थे।
परम्परा में सत्य, और इस संहिता में अनुपस्थित। विद्येश्वर संहिता का अपना विवरण 12.3-4 का चतुर्विध विवरण है, और सती की कथा यहाँ कही ही नहीं गई — वह रुद्र संहिता के सती खण्ड और देवी-साहित्य का विषय है, जहाँ संख्याएँ स्वयं ग्रंथ-भेद से भिन्न हैं (51, 52, 108)। इस पृष्ठ का कोई कथन इस पर निर्भर नहीं है; विद्येश्वर संहिता जो देती है वह पवित्र भूमि की ऐसी परिभाषा है जिसे उस कथा की आवश्यकता ही नहीं।
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2
पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा सशैलवनकानना ।शिवाज्ञया हि पृथिवी लोकं धृत्वा च तिष्ठति ॥
पचास करोड़ योजन विस्तृत, पर्वत-वन-कानन सहित यह पृथ्वी शिव की आज्ञा से लोक को धारण करके स्थित है।
जिस भी क्षेत्र में बलि चढ़ती है वहाँ बलि-वेदी होती है, और प्रवचन स्पष्ट है कि वही उस स्थल की सबसे सघन भूमि है। उसके पास बैठने के विषय में दो दावे किए जाते हैं: कि वहाँ किया गया जप मंत्र को अन्यत्र से शीघ्र जगाता है, और कि व्यक्ति पर पड़ा श्राप — बड़े से बड़े जो श्राप होते हैं — तुरंत जलकर भस्म होता है। कामाख्या में यही निर्देश भीतरी और बाहरी दोनों बलिपीठों के लिए दिया गया है, इस जोड़ के साथ कि पीठ के अपने जल का स्पर्श करके दस बार भी जप कर लेने से दोषयुक्त मंत्र शुद्ध हो जाता है।
अब शर्तें, जो प्रवचन उसी साँस में कहता है और जिनके कारण इस पत्रक पर बैज लगा है। आप वेदी पर नहीं बैठते; उसके पास, जहाँ से वह दिखे, बैठते हैं। यह किसी उग्र मंत्र के दीक्षित साधक के लिए है, पहली यात्रा के लिए नहीं। और प्रवचन इसके साथ स्पष्ट पात्रता-कसौटी और अस्वीकरण जोड़ता है: दस माला के बाद यदि लगे कि ऊर्जा आपकी क्षमता से ऊपर उठ रही है, बेचैनी है, भय है, अथवा हृदय का रोग है — तो रुक जाइए, उठिए, और अपना जप क्षेत्र में कहीं और कीजिए। वक्ता के अपने शब्दों में टर्म कंडीशन अप्लाई, उत्तरदायित्व साधक पर।
ग्रंथ इस विषय में क्या कहता है — कुछ नहीं। नीचे की श्रेणीबद्ध टिप्पणी देखिए: जो अध्याय स्थानों का तारतम्य देता है उसमें बलिपीठ का नाम ही नहीं है, और यह विधान शाक्त तथा कौल परंपरा का है, विद्येश्वर संहिता का नहीं।
शक्तिपीठ की बलि-वेदी के पास बैठकर जप करने से बड़े से बड़ा श्राप भी भस्म होता है और मंत्र अन्यत्र से शीघ्र सिद्ध होता है।
स्थान के विषय में इन प्रवचनों का सबसे प्रभावशाली निर्देश यही है, और जिस अध्याय में स्थानों का तारतम्य दिया गया है उसमें इसका कोई आधार नहीं है। वह सूची है — घर, गोशाला, जलतीर, वृक्षमूल, देवालय, तीर्थतट, नदी, तीर्थनदी, सप्तगंगा, समुद्रतट, पर्वतशिखर, और फिर जहाँ मन रुचे। बलि-पीठ, शक्तिपीठ अथवा श्मशान उसमें कहीं नहीं हैं। यह विधान शाक्त तथा कौल परम्परा का है, जिसका अपना स्वतंत्र आधार है — प्रवचन स्वयं इसके साथ स्पष्ट चेतावनी और पात्रता की कसौटी जोड़ता है — और यह संहिता न इसका विधान करती है, न निषेध।
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1
शुद्धं गृहं समफलं देवयज्ञादिकर्मसु ॥
देवयज्ञ आदि कर्मों में अपना शुद्ध घर समान फल देने वाला होता है।
2
ततो दशगुणं गोष्ठं जलतीरं ततो दश ।ततो दशगुणं बिल्वतुलस्यश्वत्थमूलकम् ॥
गोशाला घर से दस गुना फल देती है, जलाशय का तट उससे दस गुना, और बेल-तुलसी-पीपल का मूल उससे भी दस गुना अधिक फलदायी है।
3
ततो देवालयं विद्यात्तीर्थतीरं ततो दश ।ततो दशगुणं नद्यास्तीर्थनद्यास्ततो दश ॥
उससे भी दस गुना देवालय है, उससे दस गुना तीर्थ का तट है, उससे दस गुना नदी का तीर्थ है, और उससे भी दस गुना तीर्थ-नदी का तीर्थ है।
महाश्मशान और आपके नगर का श्मशान एक श्रेणी नहीं हैं
सबसे बड़ी उलझन
यहाँ प्रवचन वह रेखा खींचता है जिसे लगभग हर लोकप्रिय विवरण धुँधला कर देता है। किसी तीर्थ का महाश्मशान — काशी का मणिकर्णिका, उज्जैन का चक्रतीर्थ श्मशान, तारापीठ का श्मशान — उस क्षेत्र का ही अंग है और निषेध के अंतर्गत नहीं आता। आपके अपने नगर या गाँव के पास का सामान्य श्मशान आता है, और प्रवचन वर्जनाएँ नाम लेकर बताता है: तीन मास से अधिक की गर्भवती स्त्री उसमें प्रवेश न करे, न वह पुरुष जिसके यहाँ संतान होने वाली है, और गृहस्थ को ऐसे भैरव या काली मंदिर में नित्य जाने की आदत नहीं डालनी चाहिए जो उस सीमा के भीतर हो। सीमा आरंभ होने से पहले खड़े मंदिर की नित्य सेवा में कोई दोष नहीं।
पञ्चमुण्डी आसन और शव-साधना पर प्रवचन की स्थिति न अस्पष्ट है, न संकोच भरी: वह इन्हें सिखाता नहीं, और यह कहता भी है — हम यहां कोई पंचमुंडी आसन नहीं बताते हैं कि भैया ऐसे करना, श्मशान में जा के ये कर लेना — कभी नहीं। उसकी आपत्ति नाजुकता नहीं है; उसकी आपत्ति यह है कि लोग बिना नियम, बिना काल और बिना गुरु के यह कर रहे हैं, परिणाम सार्वजनिक कर रहे हैं, और अपने पीछे दस और लोगों को खींच रहे हैं।
ग्रंथ क्या कहता है: जो अध्याय पुण्यक्षेत्र की परिभाषा और वहाँ के उचित कर्म बताता है (12.3-5), उसमें श्मशान, शव-आसन अथवा पंचमुंडी कहीं नहीं है। यह customary के रूप में अंकित है, खंडन के रूप में नहीं — श्मशान साधना प्राचीन और परंपरा-सिद्ध है। वह बस इस संहिता का विषय नहीं है।
श्मशान तांत्रिक साधना का स्वाभाविक आसन है, और गंभीर साधक को वहीं बैठना चाहिए।
उसी अध्याय से मिलाकर देखा गया जो बताता है कि पुण्यक्षेत्र क्या है और वहाँ क्या किया जाता है। 12.3-4 क्षेत्र की उत्पत्ति के चार प्रकार देता है — ऋषि-परिग्रह, देव-परिग्रह, स्वयम्भू, अन्यथा उत्पन्न — और इनमें श्मशान कहीं नहीं है; 12.5 क्षेत्र के उचित कर्म स्नान, दान और जप बताता है। इस संहिता में श्मशान, पंचमुंडी आसन अथवा शव-आसन का कोई उल्लेख ही नहीं है। श्मशान साधना वास्तविक, प्राचीन और परम्परा-सिद्ध है; वह केवल इस ग्रंथ का विषय नहीं है — और प्रवचन भी उतनी ही स्पष्टता से कहता है कि गृहस्थ का वहाँ कोई काम नहीं।
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1
शृणुध्वमृषयः प्राज्ञाः शिवक्षेत्रं विमुक्तिदम् ।तदागमांस्ततो वक्ष्ये लोकरक्षार्थमेव हि ॥
हे बुद्धिमान् ऋषियो, शिव के उस क्षेत्र को सुनिए, जो विमुक्ति देने वाला है; फिर मैं उसके आगमों को भी लोकरक्षा के लिए ही कहूँगा।
2
पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा सशैलवनकानना ।शिवाज्ञया हि पृथिवी लोकं धृत्वा च तिष्ठति ॥
पचास करोड़ योजन विस्तृत, पर्वत-वन-कानन सहित यह पृथ्वी शिव की आज्ञा से लोक को धारण करके स्थित है।
हे भूसुरो, उस क्षेत्र में पाप करना और भी दृढ़ हो जाता है; पुण्यक्षेत्र में निवास करते हुए अणुमात्र भी पाप न करे। जिस किसी भी उपाय से मनुष्य को पुण्यक्षेत्र में निवास करना चाहिए।
वह तीर्थ जहाँ आप आज शाम पैदल जा सकते हैं — एक वृक्ष का मूल
यात्रा की आवश्यकता नहीं
सीढ़ी का चौथा सोपान, और वही जो अधिकांश पाठकों के लिए संभव को बदल देता है। 15.2 बेल, तुलसी अथवा पीपल के मूल को शुद्ध घर से एक हजार गुना ऊपर रखता है — आपके पूजन-स्थान से तीन सोपान ऊपर और देवालय से एक सोपान नीचे। 22.23 यही बात दूसरी ओर से और अधिक बल से कहता है: संसार में जितने भी प्रसिद्ध पुण्यतीर्थ हैं, वे सब बिल्व के मूल में निवास करते हैं; और 22.25 में, जो वहाँ जल से शिव का अभिषेक करता है वह समस्त तीर्थों में स्नात हो जाता है।
प्रवचन इसी सोपान पर काम करता है और उसे आगे बढ़ाता है। तीन या अधिक तुलसी के उपवन के बीच बैठकर किसी भी देवता के मंत्र का जप करने को वह नामतः बताता है। जिस स्थान पर आँवला, बेल और तुलसी साथ हों उसे वह साक्षात काशी के समान कहता है। इसमें अप्राजिता की लता और पारिजात भी जोड़ता है, और यदि वृक्ष मंदिर के प्रांगण में हो तो फल फिर से गुणित होता है। और वह इस पूरे विषय की सबसे सरल न्यूनतम सीमा भी रखता है: पीपल के नीचे, अथवा उसके नीचे के शिवलिंग पर, दीपदानअति उत्तम है और उसमें एक पैसा नहीं लगता।
यह सांत्वना-पुरस्कार नहीं है। ये ग्रंथ की अपनी सीढ़ी के चार जाँचे जा सकने वाले सोपान हैं, चारों पैदल पहुँच के भीतर, उस देश में जहाँ बेल, तुलसी और पीपल दुर्लभ नहीं हैं।
संसार में जितने भी प्रसिद्ध पुण्यतीर्थ हैं वे सब बिल्व के मूल में निवास करते हैं; और जो वहाँ जल से शिव का अभिषेक करता है वह समस्त तीर्थों में स्नात हो जाता है।
नया थाना तीर्थ नहीं है, और सच्चा प्रश्न यह है कि उसमें कौन है
कहाँ अर्पण करना है, इसके नियम के रूप में कहा गया: किसी पुरानी, प्रतिष्ठित, विधिपूर्वक सेवित देवालय में जाइए, अथवा जहाँ आपके गुरु निर्देश करें — हाल में बने किसी स्थान पर नहीं, जहाँ सच्चा प्रश्न यही है कि वहाँ वास्तव में कौन बैठा है। प्रवचन जिस प्रक्रिया से चिंतित है उसे वह नाम लेकर बताता है, क्योंकि वह वही प्रक्रिया है जो ज़मीन पर पड़े सिक्के के पीछे है: स्थानों पर चीज़ें बैठाई जाती हैं, जान-बूझकर, उन लोगों द्वारा जो जानते हैं कि कैसे।
ग्रंथ इसी सावधानी का ढाँचागत रूप दो बार देता है। 12.4 के चारों प्रकार धीमे हैं — ऋषि, देव, स्वयम्भू — और 9.46 उस भूमि को “क्षेत्र” कहने से ही इनकार कर देता है जिसके केंद्र में लिंग न हो। पिछले मौसम में खड़ा हुआ कोई स्थान इनमें से एक भी कसौटी पूरी नहीं कर सकता।
इन प्रवचनों में इसे कलिकाल का सबसे जागृत और सबसे उग्र शक्तिपीठ कहा गया है, और यही एकमात्र स्थान है जिसके लिए वह पूरा स्थान-दर-स्थान क्रम देता है। इसी क्रम से कीजिए, और तीन रात्रि दीजिए, एक नहीं।
पर्वत से पहले। पहले गुवाहाटी में रुकिए। उर्वशी कुंड में अक्षत और पुष्प अर्पित कीजिए — वह द्वीप अब ब्रह्मपुत्र में विलीन है, भस्माञ्चलकामरूप की वह पहाड़ी जहाँ योनि-मंडल गिरा बताया जाता है; कामाख्या मंदिर इसी स्थान पर है। से दो धनुष की दूरी पर, और अर्पण उसी दिशा में किया जाता है। ब्रह्मपुत्र नद को प्रणाम कीजिए। फिर भस्मकूट पर उमानन्द भैरवकामाख्या स्थल पर शिव की उपस्थिति, देवी के भैरव के रूप में।, जहाँ कामदेव भस्म हुए और पुनः जीवित किए गए: यहीं आप नीलांचल पर आरोहण और भगवती के दर्शन की आज्ञा माँगते हैं, और शब्दों में माँगते हैं। ब्रह्म कुंड और पांडुनाथ के नाम से भी अक्षत-पुष्प वहीं छोड़िए।
आरोहण। पैदल, पूर्व अथवा ईशान मार्ग से — प्रवचन गृहस्थों को विशेष रूप से यही मार्ग बताता है, अन्य नहीं। उस मार्ग के द्वारपाल हैं गणपति, मनोहर अग्नि बैताल, घंटाकर्ण, हनुमान और नंदी; पर्वत पर पहली पूजा द्वारपाल की है और उसे छोड़कर आगे नहीं बढ़ना। ऊपर तक अपना जप चलता रहे।
पर्वत पर, गर्भगृह से पहले। पहले सौभाग्य कुंड — वहाँ संकल्प के साथ स्नान, गंगा जी में प्रवेश की तरह (पहले जल मस्तक पर, फिर उतरना)। कमलेश्वर महादेव का दर्शन, फिर कुंड के विनायक, फिर कुंड की एक परिक्रमा। तब गर्भगृह।
भीतर। पात्र साथ रखिए। यहाँ कोई विग्रह नहीं है; योनि-मंडलसती के शरीर का वह अंश — जिसे उनकी योनि माना जाता है । एक शिला है, और जो आप लेकर लौटते हैं वह जल है। मंडप में कामेश्वर शिव से भीतर जाने की आज्ञा लीजिए, फिर दर्शन, स्पर्श, और अपने मंत्र से उस जल के तीन आचमन।
कामाख्या के दस पीठ, और वे दस जप जो मंत्र साफ़ कर देते हैं
नीलांचल पर्वत पर दश महाविद्या के पीठ
· गुवाहाटी, असम
दस में से तीन स्वयं मुख्य गर्भगृह में हैं — मातंगी (नवम), कमला (दशम), और षोडशी, जो ललिता त्रिपुरसुंदरी हैं और यहाँ कामाख्या के रूप में ही विराजमान हैं। शेष सात अलग-अलग मंदिर हैं, और प्रवचन जो चलने का क्रम देता है वह है: तारा → काली → छिन्नमस्तिका → नीचे उतरकर त्रिपुर भैरवी (उनके पीछे राजराजेश्वरी, और वहीं कच्छप कुंड) → ऊपर चढ़कर धूमावती → और फिर कामाख्या पर वापस। बगलामुखी और भुवनेश्वरी दूसरे भाग में हैं। जो भी कामाख्या कवच का पाठ करता है वह, प्रवचन की टिप्पणी के अनुसार, वास्तव में यही मानचित्र पढ़ रहा होता है: कवच में जिस दिशा में जिस शक्ति का वर्णन है, वे उसी दिशा में खड़ी हैं।
काम का निर्देश छोटा है और आसानी से छूट जाता है। इन सभी पीठों में अपना-अपना भूमिगत जलस्रोत उठता है — केवल कामाख्या में नहीं। उस जल का स्पर्श करके वहाँ अपने गुरु-प्रदत्त मंत्र का दस बार जप कर लीजिए, और प्रवचन कहता है कि दीक्षा में रही किसी त्रुटि से अथवा अन्यत्र से आया मंत्र-दोष शुद्ध हो जाता है। दस बार। एक माला नहीं। वह यह भी कहता है कि पंक्ति में लगने से लेकर परिक्रमा पूरी होने तक उपवास रखिए, और जप बीच में न टूटे।
एक और बात, जो शाक्तों के लिए नहीं बल्कि हर संप्रदाय के लिए कही गई है: इस पीठ पर किया गया अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। का जप — आप भगवती के जिस भी स्वरूप की सेवा करते हों — तत्काल मंत्र-सिद्धि देने वाला कहा गया है।
अंबुवाची — वे चार दिन जिन पर तांत्रिक वर्ष घूमता है
प्रवचन का आकलन यह है कि पूरे वर्ष को एक साथ देखें तो कामाख्या के अम्बुबाची के चार दिन तांत्रिकों का महाकुंभ हैं — वह केंद्र-काल जिसमें जो भी शक्ति कोई साध रहा है उसे सबसे प्रभावी, सबसे जागृत और सबसे उग्र बनाया जाता है। यह वातावरण के रूप में नहीं, इस पर्व के होने के व्यावहारिक कारण के रूप में कहा गया है।
जो गृहस्थ वहाँ नहीं जा रहा वह उन चार दिनों का क्या करे — यही भाग ले जाने योग्य है। एक दिन पहले तैयारी: घर में आप जिस भी स्वरूप को रखते हैं, जिसके प्रति आपकी शुद्ध भावना है, उसका पूरा पूजन अंबुवाची आरंभ होने से एक दिन पहले, नई सामग्री के साथ, व्यवस्थित कर लीजिए। फिर अपने चल रहे पाठ और जप को इन चार दिनों में जितना निभा सकें उतनी मात्रा में चलाइए — प्रवचन ऐसे लोगों की चर्चा करता है जो पर्व में प्रतिदिन सौ माला करते हैं और चार-पाँच सौ तक पहुँचते हैं। वह यह भी स्पष्ट कहता है कि इस विशेष पर्व के साथ काम्य कामनाएँ न जोड़ें।
इस स्थान की प्रतिष्ठा के विषय में: प्रवचन का अपना ढाँचा यह है कि कामाख्या के तंत्र पर गोपनीयता का एक वास्तविक कारण था — अप्रशिक्षित लोगों को उग्र साधना से दूर रखना — किन्तु उससे बचे अर्ध-सत्य अब उस गोपनीयता से अधिक हानि कर रहे हैं, और इसीलिए वह इस पर बात करता ही है।
विंध्यवासिनी देवी मंदिर, विंध्याचल
· मिर्ज़ापुर, उत्तर प्रदेश
विंध्यवासिनी के विषय में यह प्रवचन जो दावा करता है वह अन्य पीठों के दावों से प्रकार में ही भिन्न है: यह नहीं कि यहाँ कोई अंग गिरा, बल्कि यह कि भगवती यहाँ अपने संपूर्ण स्वरूप में निवास करती हैं, त्रिकोण की तीनों देवियों और उनके साथ की शक्तियों सहित — स्थापित मूर्तियों के रूप में नहीं, जीवित उपस्थिति के रूप में। और तदनुसार यही वह क्षेत्र है जहाँ वह सबसे अधिक भेजता है।
त्रिकोण तीनों कोणों की पूरी यात्रा है — स्वयं विंध्यवासिनी, काली खोह की महाकाली, और नंदजा पहाड़ी पर अष्टभुजा के रूप में महासरस्वती — और उसका आधे से अधिक भाग 7-8 किलोमीटर पहाड़ है। ग्रंथ के अर्थ में यह पर्वत-शिखर की साधना है (15.5) और यह पैदल की जाती है, परंपरा से लगभग 3-4 बजे भोर से आरंभ करके। पहले मुख्य मंदिर में ऊपर नौ परिक्रमाएँ कर लीजिए, फिर निकलिए।
लघु त्रिकोण उस शरीर के लिए है जो पहाड़ नहीं चढ़ सकता, और उसे दूसरे दर्जे का नहीं माना जाता: विंध्यवासिनी का दर्शन, बाहर निकलकर महाकाली, फिर घूमकर महासरस्वती, वापस भैरव जी का दर्शन, और कुंड का जल ग्रहण। पाँच से दस मिनट, मंदिर परिसर के भीतर, अपने आप में पूर्ण।
इस पहाड़ की दो विशेष सावधानियाँ, जो किसी भी परिक्रमा मार्ग पर ले जाने योग्य हैं: प्रवचन पूरे पर्वत को उन चीज़ों से भरा हुआ बताता है जिन्हें लोग लाकर छोड़ गए हैं — फलदार वृक्षों पर, गेरुआ तालाब के आसपास बने मन्नत-घरों में, स्वयं मार्ग पर — और वह आपसे कहता है कि अपनी रेखा पर चलिए, कुछ तोड़िए मत, कुछ उठाइए मत।
भाद्रपद अमावस्या — तारा चतुर्दशी/अमावस्या का काल — वह समय है जब पूरे पूर्वी क्षेत्र के साधक, बंगाल से असम और नेपाल-बांग्लादेश की सीमाओं तक, तारापीठ आते हैं। अक्षोभ्य भैरव इस आसन के भैरव हैं, और तारा के नाम से जो खप्पर भरा जाता है वह उन्हीं के नाम से भरा जाता है।
इस स्थान के साथ जुड़ा सामान्य नियम हर शक्तिपीठ पर लागू होता है और सहज ही छूट जाता है: जप रात्रि का काम है। तारापीठ में या कोई भी शक्तिपीठ में जब आप जप करते हैं तो उसका समय रात्रि कालीन ही होता है। और इसीलिए प्रस्थान का नियम वैसा है जैसा है — यदि आपका अनुष्ठान रात दो बजे पूरा होता है तो आप तीन बजे की गाड़ी पकड़ने नहीं दौड़ते। सूर्योदय तक रुकिए।
और इस विशेष परिक्षेत्र के विषय में प्रवचन जो चेतावनी दोहराता है, क्योंकि लोग इसी की ओर गलत कारण से खिंचते हैं: यहाँ वाम पद्धति की अपनी मर्यादा है, जिसमें कुछ ऐसा भी है जिसे देखने की अनुमति आगंतुक को नहीं होती। यह घोषित करना कि आप तारापीठ में श्मशान साधना कर रहे हैं, प्रवचन में ठीक ग़लत संगति को बुलाने का तरीका बताया गया है।
प्रयाग — अर्घ्य का वह क्रम जो लगभग किसी को नहीं बताया जाता
प्रयागराज संगम — गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम
· प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
प्रयाग वह क्षेत्र है जिसकी विधि असामान्य रूप से पूरी है और जिसका एक अंश भी अधिकांश आगंतुक नहीं करते। जिले में पैर रखते ही क्षमा माँगिए — स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर, घाट पर नहीं। फिर वेणी माधव को प्रणाम कीजिए, जो इस क्षेत्र के नगर देवता और रक्षक हैं; प्रवचन का अपना विवरण यह है कि त्रिवेणी को उठा ले जाने के प्रयास को रोकने के लिए उन्होंने यहाँ रूप धारण किया, और जो प्रयाग यात्रा उन्हें छोड़ देती है वह अपने मेज़बान को ही छोड़ देती है।
जल पर अर्घ्य नामित क्रम से, एक के बाद एक, फट-फट दिया जाता है: गणेशाय नमः · भैरवाय नमः · भव भैरवाय नमः (भव भैरव इस क्षेत्र के अपने भैरव हैं) · कुल भैरवाय नमः · श्री आलोपशंकरी देव्यै नमः · श्री ललितायै नमः · श्री कल्याण्यै नमः — फिर द्वादश माधवाय अथवा वेणी माधवाय नमः, और फिर स्वयं प्रयागराज को। आलोपशंकरी, ललिता और कल्याणी इस क्षेत्र के शक्तिपीठ आसन हैं; यदि केवल एक ही संभव हो तो प्रवचन आलोपशंकरी का नाम लेता है। संगम के पास एक ओर नागराज वासुकी और दूसरी ओर वेणी माधव हैं।
कुंभ का गणित, जैसा प्रवचन देता है: प्रयाग कुंभ का एक स्नान कार्तिक में गंगा के हज़ार स्नान, माघ के सौ स्नान और वैशाख में नर्मदा के एक करोड़ स्नान के बराबर माना गया है। बारहवाँ अध्याय इसी दावे का अपना, अधिक संयत रूप देता है — माघ में कुंभराशि के सूर्य में गंगा में श्राद्ध अथवा तिलोदक भी दोनों वंशों के करोड़ों पितृ-कुलों का उद्धार करता है (12.29-30)।
माघ मास में कुम्भराशि के सूर्य में गंगा में किया गया श्राद्ध, पिण्डदान अथवा तिलोदक भी दोनों वंशों के करोड़ों पितृ-कुलों का उद्धार करने वाला कहा गया है।
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29
गङ्गायां माघमासे तु तथा कुम्भगते रवौ ।श्राद्धं वा पिण्डदानं वा तिलोदकमथापि वा ॥
गंगा में, माघ मास में, तथा कुम्भराशि के सूर्य में — श्राद्ध, या पिण्डदान, या तिलोदक भी,
30
वंशद्वयपितॄणां च कुलकोट्युद्धरं विदुः ।कृष्णावेण्यां प्रशंसन्ति मीनगे च गुरौ रवौ ॥
— वंश-द्वय के पितरों के करोड़ों कुलों का उद्धार करने वाला जाना जाता है। मीनराशि के सूर्य और बृहस्पति में कृष्णावेणी में [ऐसे कर्मों] की प्रशंसा की जाती है।
भैरवी–दामोदर संगम पर रजरप्पा मंदिर
· रामगढ़, झारखंड
नाम लेने योग्य इसलिए कि यहाँ एक ही स्थल पर सीढ़ी के दो सोपान चढ़े हुए हैं: एक उग्र देवी-आसन, और एक नदी-संगम — भैरवी का दामोदर में गिरना — जिसके नीचे तांत्रिक घाट है। कामाख्या में छिन्नमस्तिका का गर्भगृह इन प्रवचनों में उस पर्वत का सबसे गहरा और सबसे उग्र अवतरण बताया गया है; रजरप्पा उनका सबसे अधिक जाने वाला स्वतंत्र आसन है।
इस घाट से प्रवचन की अपनी टिप्पणी विधान नहीं, चेतावनी है — और इसीलिए यह पत्रक यहाँ है। रुद्राक्ष और बाजूबंद पहने एक व्यक्ति, तांत्रिक घाट पर, दिन के ग्यारह बजे, जल में कुल्ला कर रहा था; पूछने पर उत्तर था कि सब करते हैं। वरुण देवता का कोप इन प्रवचनों में सबसे तीव्र बताया गया है, और हर घाट के अपने यक्ष रक्षक होते हैं। संगम पर आप और जो कुछ भी करें, उसे हाथ धोने की जगह मत समझिए।
काशी — क्षेत्र, उसकी द्वारपालिका, और प्रवेश से पहले ही जलने का कारण
काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी
· वाराणसी, उत्तर प्रदेश
काशी का तांत्रिक पाठ इन प्रवचनों में यह है कि क्षेत्र को धारण करने वाली सबसे प्रचंड शक्ति भगवती वाराही हैं — पीतांबरा, वाराही के स्वरूप में — और आगंतुक के संचित पाप का एक अंश सीमा पर ही भस्म हो जाता है, प्रवेश से पहले; यही उस परिचित वाक्य के पीछे की प्रक्रिया है कि अपने पुण्य का उदय हुए बिना कोई काशी में प्रवेश नहीं कर पाता। इससे जो व्यावहारिक निष्कर्ष वह निकालता है वह संयत है: जिस व्यक्ति ने स्कंद, शिव अथवा लिंग पुराण में इस क्षेत्र का माहात्म्य पढ़ लिया है और वही मन में लेकर भीतर चला जाता है, उसे विधान से मिलने वाला अधिकांश मिल जाता है, क्योंकि जो बढ़ाया जा रहा है वह भाव ही है।
बारहवाँ अध्याय काशी को ग्रंथ में साफ़ रख देता है: गंगा सौ मुखों वाली हैं और उनके तट पर काशी आदि अनेक पुण्यक्षेत्र हैं (12.10)।
तीन व्यावहारिक बातें। मणिकर्णिका महाश्मशान है और क्षेत्र का ही अंग है — अपने नगर के श्मशान पर लगने वाला निषेध वहाँ तक नहीं पहुँचता, और वहाँ देव-दीक्षा ली जाती है। काल भैरव का दर्शन काशी के क्रम का अंग है, वैसा वैकल्पिक नहीं जैसा लोग समझते हैं। और काशी के लिए प्रवचन का प्रिय प्रयोग छोटा है: विश्वनाथ जी की पंक्ति में एक कमल का पुष्प हाथ में रखिए, भीतर तक शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ करते जाइए, और वही एक पुष्प लिंग पर चढ़ जाए — इसे किसी पुराने, ठंडे पड़े पुरश्चरण को पुनः जगाने का उपाय बताया गया है।
उज्जैन — महाकाल, और वह दूसरा स्थान जहाँ श्मशान क्षेत्र है
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, उज्जैन
· उज्जैन, मध्य प्रदेश
काशी के साथ इसे उस दूसरे क्षेत्र के रूप में नाम दिया गया है जिसकी अपनी पंचक्रोशी उसके भीतर रहने वालों पर दायित्व डालती है, और जिसके चक्रतीर्थ श्मशान को प्रवचन “श्मशान में प्रवेश न करें” वाले नियम से स्पष्ट रूप से बाहर रखता है — वह क्षेत्र का ही अंग है, और वह निषेध आपके अपने नगर के सामान्य श्मशान के विषय में है।
इस जोड़ी से जो नियम निकलता है और जिसे प्रवचन दोहराता है: काशी के पाँच कोस के क्षेत्र में, उज्जैन की पंचक्रोशी में, और अष्ट भैरवों के क्षेत्रों में वहाँ के निवासियों से अपेक्षा है कि वे उस क्षेत्र के भैरव की सेवा करें। बाकी सब जगह आगंतुक दर्शन और दीपदान करता है, उस स्वरूप को घर लाने का प्रयास नहीं करता।
गिरनार — तीन शिखर, और वह परिक्रमा जो स्वयं साधना है
गुरु दत्तात्रेय पादुका, गिरनार पर्वत
· जूनागढ़, गुजरात
दत्तात्रेय का अपना पर्वत, और ग्रंथ के सर्वोच्च मापे गए सोपान का सबसे स्पष्ट जीवित उदाहरण। प्रवचन गिरनार की तीन श्रृंखलाओं को बैठने योग्य बताता है — उनमें अंबाजी और दत्त शिखर — और कहता है कि उस शिखर पर दस मिनट का जप भी अनंत माना गया है। महाशिवरात्रि पर पर्वत की परिक्रमा ही साधना है: यही वह दिन है जब दत्त के साधक उनके स्थानों में बँट जाते हैं — पहले गिरनार, फिर विंध्य क्षेत्र, फिर काशी की चक्र पुष्करिणी — और उस रात्रि के विषय में प्रवचन कहता है कि वे वहाँ प्रत्यक्ष उपस्थित रहते हैं।
जो पाठक नहीं जा रहा उसके लिए वह दो बातें जोड़ता है। देव-दीक्षा गिरनार में उतनी ही वैध है जितनी काशी में, विंध्याचल में, किसी भी शक्तिपीठ या ज्योतिर्लिंग में, सिद्धपीठ में, मंदिर में, गुरु के घर में — अथवा अपने घर में; स्थान वैधता तय नहीं करता। और यदि वहाँ पहुँचना संभव ही न हो, तो निकालिए कि आपके निवास से गिरनार किस दिशा में पड़ता है, उस ओर मुख कीजिए, और जप कीजिए। यह निर्देश ठीक इसी देवता और इसी पर्वत के लिए साफ़ शब्दों में दिया गया है।
अरुणाचल — वह एक क्षेत्र जिसे ग्रंथ स्वयं सबसे बड़ा कहता है
ग्रंथ में नामित
अरुणाचलेश्वर मंदिर और अरुणाचल पर्वत, तिरुवण्णामलै
· तिरुवण्णामलै, तमिलनाडु
इसका अपना पत्रक इसलिए कि यह इस विषय की सबसे दुर्लभ वस्तु है: एक नामित स्थान, क्रम सहित, स्वयं ग्रंथ के भीतर — व्याख्या में नहीं। नवें अध्याय में, अग्नि-स्तंभ के रूप में प्रकट होकर, शिव कहते हैं कि यह भूमि अरुणाचल नाम से प्रसिद्ध होगी, कि यहाँ अनेक और महत्तर तीर्थ होंगे, और कि यहाँ प्राणियों की मुक्ति निवास से भी होगी और मरण से भी (9.21-22)। और फिर वह वाक्य जिसका इस संहिता में कोई दूसरा उदाहरण नहीं: मत्क्षेत्रादपि सर्वस्मात् क्षेत्रमेतन्महत्तरम् — अत्र संस्मृतिमात्रेण मुक्तिर्भवति देहिनाम्। मेरे सभी अन्य क्षेत्रों से भी यह क्षेत्र महत्तर है; यहाँ केवल स्मरण मात्र से देहधारियों की मुक्ति हो जाती है (9.24)।
ध्यान दीजिए कि यह श्लोक पूरी सीढ़ी के साथ क्या करता है। पंद्रहवें अध्याय का हर दूसरा सोपान ऐसा स्थान है जहाँ शरीर से खड़ा होना पड़ता है; यह एक स्मरण से पूरा हो जाता है। यही वह द्वार है जिसे 15.6 दूसरी ओर से खोलता है, और ग्रंथ में उस पाठक के लिए यही सबसे बलवान उत्तर है जो यात्रा नहीं कर सकता।
“इसलिए यह क्षेत्र और भी महत्तर, अत्यन्त शोभन, समस्त कल्याण से परिपूर्ण, शुभ, और सब प्रकार की मुक्ति देने वाला है।”
द्वादश ज्योतिर्लिंग — एक ही पर्याप्त है, और स्पर्श का नियम यहाँ भिन्न है
ज्योतिर्लिंग परिक्रमा पर प्रवचन की पंक्ति वह नहीं है जिसकी लोग अपेक्षा करते हैं: बारह को छोड़ दीजिए। जिस भक्त ने माहात्म्य वास्तव में पढ़ा है, उसके लिए एक के क्षेत्र में प्रवेश और क्षणमात्र का दर्शन ही काम कर देता है, क्योंकि जो बढ़ाया जा रहा है वह भाव है जिसे लेकर वह पहुँचा। पूरा सेट इकट्ठा करना साधना नहीं है।
ज्योतिर्लिंग हर दूसरे प्रकार के स्थान से एक बात में भिन्न हैं — स्पर्श। अधिकांश में लिंग को स्पर्श करने और जल चढ़ाने की अनुमति है, और वह उचित है। हर दूसरे प्रकार के विग्रह में नहीं — दर्शन वाला पत्रक देखिए। बैद्यनाथ धाम के विषय में प्रवचन की विशेष आपत्ति हर उस जगह दोहराने योग्य है जहाँ यह होता है: जलहरी स्वयं भगवती पार्वती का स्वरूप है, और लोग मस्तक लिंग तक ले जाने के लिए उसे लाँघते हैं और उस पर पैर रख देते हैं। ऐसा मत कीजिए। और भीतर जाते समय नंदी जी को बिना प्रणाम किए मत निकल जाइए।
बारहवाँ अध्याय इसे सीधे और असामान्य रूप से विशिष्ट ढंग से नाम देता है: कर्कराशि से सिंहराशि में सूर्य के आने पर सिन्धु नदी में स्नान, और केदार का जलपान तथा स्नान, ज्ञानदायक जाने जाते हैं (12.21)। कोई सामान्य आशीर्वाद नहीं — नामित स्थान पर नामित कर्म का नामित फल।
इसे 15.5 के पर्वत-शिखर वाले सोपान के साथ पढ़िए, और उस आदत के साथ भी जिससे यह प्रवचन साधकों को हिमालय, विंध्याचल, गिरनार और सप्तश्रृंगी की ओर उसी कारण भेजता है — क्रम स्पष्ट है: इस व्यवस्था में ऊँचाई दृश्य नहीं, मापी हुई सीढ़ी का शिखर है।
सीधे पूछे जाने पर कि पवित्र नदी के किनारे से कितनी दूर तक प्रभाव रहता है, प्रवचन दो भागों में उत्तर देता है। क्षेत्र वहाँ तक है जहाँ तक उस नदी का अपना क्षेत्र माना गया हो — गंगा के लिए, जहाँ तक उनका बहाव। किन्तु प्रश्न ही गलत है, क्योंकि आपको किनारे पर होना ही नहीं चाहिए: बहता हुआ जल में… नाभि पर्यंत जल में खड़ा होकर के अगर आप जप करते हैं तो सहस्र गुना अधिक — और विशेष तिथियों में लक्ष गुना।
ग्रंथ यही भेद, उसी दिशा में, 15.3 में करता है: तीर्थ का तट एक सोपान है, और नदी का तीर्थ — उतार, स्वयं जल — उससे ऊपर का सोपान, और तीर्थ-नदी का तीर्थ उससे भी ऊपर। प्रवचन एक तीसरा वैध आसन भी जोड़ता है जिसमें कुछ नहीं लगता: गंगा जी की रेत पर बैठना। इनमें से किसी में किया गया जप, वह कहता है, कभी निष्फल नहीं होता।
सप्तगंगा, नाम सहित, और किस तट का क्या फल कहा गया है
15.4-5 इन्हें बिना किसी अस्पष्टता के गिनाता है: गंगा, गोदावरी, कावेरी, ताम्रपर्णी, सिन्धु, सरयू और रेवा (नर्मदा)। ये मिलकर सीढ़ी का दूसरा सर्वोच्च नदी-सोपान बनती हैं, तीर्थ-नदी के तीर्थ से दस गुना।
बारहवाँ अध्याय फिर नदी-दर-नदी फल बताता है: चौबीस मुखों वाली नर्मदा स्नान और निवास से वैष्णवपद देती हैं; इक्कीस मुखों वाली गोदावरी ब्रह्महत्या और गोवध का नाश करती हैं और रुद्रलोक देती हैं; अठारह मुखों वाली कृष्णावेणी सभी पापों का क्षय करती हैं और विष्णुलोक देती हैं; तुंगभद्रा ब्रह्मलोक देती हैं; सत्ताईस मुखों वाली कावेरी सर्वाभीष्ट देती हैं और उनके शैव तट शिवलोक। दस मुखों वाले शोणभद्र को वह अभीष्टफलदायी कहता है, और वहाँ स्नान तथा उपवास से विनायकपद बताता है।
इस सूची का उद्देश्य नदियों को आपस में क्रम देना नहीं है, बल्कि उस प्रश्न का उत्तर देना है जो लोग वास्तव में पूछते हैं — क्या इससे फ़र्क पड़ता है कि कौन सी नदी? ग्रंथ का उत्तर है हाँ, और वह अंतर बताता भी है।
— जिसके सत्ताईस मुख कहे गए हैं, वह सर्वाभीष्ट देने वाली है। उसके तट स्वर्गदायक, तथा ब्रह्म-विष्णु का पद देने वाले हैं; उनमें जो शैव तट हैं, वे शिवलोक देने वाले तथा अभीष्ट फल देने वाले हैं।
11.57 पुण्यक्षेत्र के भीतर की हर बावड़ी, हर कुएँ और हर पुष्कर को शिवगंगा बना देता है, और 11.58 कहता है कि वहाँ स्नान, दान और जप मनुष्य को शिव तक ले जाते हैं। यही उस विधान का नियम है जिसे अधिकांश आगंतुक छोड़ देते हैं।
प्रवचन का सबसे पूरा उदाहरण कामाख्या का सौभाग्य कुंड है, जिसे योगिनी तंत्र में हर कुंड को अपने भीतर रखने वाला कहा गया है — तीनों लोकों के साढ़े तीन करोड़ तीर्थ उसी में स्थित माने गए हैं। वहाँ के निर्देश किसी भी मंदिर-कुंड पर लागू किए जा सकते हैं: पश्चिम तट पर, संकल्प के साथ स्नान; गंगा जी की तरह प्रवेश, पहले जल मस्तक पर; विधि आती हो तो पितरों का तर्पण; ऊपर जाने से पहले कुंड की एक परिक्रमा; और तब गर्भगृह। माघ, वैशाख और कार्तिक की संक्रांतियाँ उसके लिए सर्वोच्च काल बताई गई हैं।
नियम का सामान्य रूप: जहाँ जल हो, वहाँ पहले स्नान और बाद में दर्शन। उल्टा नहीं।
तीर्थ में स्नान की विधि, और वे चार बातें जो उसे व्यर्थ कर देती हैं
प्रायः व्यर्थ
पहले। अपने कमरे में नहा लीजिए, शौचादि वहीं कर लीजिए, और साफ़ शरीर तथा शुद्ध वस्त्र में जल तक जाइए। प्रवचन इस एक निर्देश को इस विषय के किसी भी दूसरे निर्देश से अधिक बार दोहराता है: आप वहाँ धोने नहीं, लेने गए हैं।
प्रवेश। कूदिए मत। बैठिए, जल को प्रणाम कीजिए, थोड़ा जल मस्तक पर लगाइए, फिर धीरे-धीरे, दाहिना पैर पहले। कोलाहल नहीं, तैराकी नहीं, संगम में बच्चों को तैरना सिखाना नहीं — प्रवचन की विशेष आपत्ति यह है कि ऐसा करने वाले उस व्यक्ति के सिर पर जल फेंकते हैं जो धारा में खड़ा जप कर रहा है, उसकी साँस तोड़ते हैं, और हँसते हैं। कम से कम तीन डुबकी, सिर पूरा भीतर; पाँच और अच्छा।
जल में। तर्पण आता हो तो तर्पण। न आता हो तो अपने मंत्र से तीन या पाँच अंजलि जल अर्पित करना वैध विकल्प बताया गया है — प्रवचन स्पष्ट कहता है कि जो विधि सीखी नहीं है उसे ज़बरदस्ती मत कीजिए।
चार व्यर्थ करने वाली बातें। जल में साबुन नहीं, तेल नहीं, उबटन नहीं, कोई सुगंधित द्रव्य नहीं। स्नान-वस्त्र को नदी में मत निचोड़िए, मत रगड़िए — ग्रंथ यही 13.19 में सीधे कहता है: नदी आदि तीर्थ में स्नान-वस्त्र वहीं नहीं धोया जाता; बावड़ी, कुएँ अथवा घर पर ही उसे बाहर ले जाकर धोया जाता है। चप्पल धोने के लिए जल में मत ले जाइए। और गर्मी हो तो तीर्थ का जल शरीर पर ही सूखने दीजिए, पोंछिए मत — प्रवचन का कारण यह है कि पितरों की एक श्रेणी उसी जल से तृप्त होती है जो पहने हुए वस्त्र से टपकता है, और इसीलिए वह वस्त्र धारा में निचोड़ा नहीं जाता।
समुद्र तट और नदी-मुख — ऊँचे, पर क्रम ध्यान से पढ़िए
प्रवचन नदी के समुद्र से मिलन को सबसे ऊपर सिखाता है, इस आधार पर कि समुद्र विष्णु का अंश है और नदियाँ देवी-स्वरूपा हैं, अतः मिलन-स्थल वह है जहाँ वे पहुँचती हैं। गंगासागर, पुरुषोत्तम और विरजा क्षेत्र, कार्तिक पूर्णिमा और संक्रांतियाँ इसके काल के रूप में नामित हैं।
जो अध्याय स्थानों का क्रम देता है वह कुछ भिन्न कहता है, और यात्रा की योजना बनाने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए। 15.5 अब्धितीर, समुद्र-तट, को सप्तगंगा से दस गुना रखता है — अत्यंत ऊँचा, केवल एक सोपान नीचे — और फिर पर्वताग्र, पर्वत-शिखर, को उससे भी दस गुना ऊपर। और 15.6 दोनों से ऊपर उस स्थान को रखता है जहाँ मन को रुचि हो। तट वास्तव में शिखर के निकट है; वह शिखर नहीं है, और अध्याय संगम को अलग श्रेणी के रूप में नाम ही नहीं देता।
दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं: संगम वास्तविक और बहुत ऊँचा सोपान है, और जो क्रम उसके लिए उद्धृत किया जाता है वह अध्याय का दिया हुआ क्रम नहीं है। नीचे की श्रेणीबद्ध टिप्पणी देखिए।
नदी का समुद्र से मिलन शिव पुराण का सर्वोच्च साधना-स्थान है।
प्रवचन नदी-मुख को पुराण की अपनी क्रम-सूची का शिखर बताता है। जो अध्याय वह क्रम-सूची है, वह समुद्र-तट को पर्वत-शिखर से एक सोपान नीचे रखता है (15.5 — "ततोऽब्धितीरे दश च पर्वताग्रे ततो दश"), और दोनों से ऊपर उस स्थान को रखता है जहाँ मन को रुचि हो (15.6)। समुद्र-तट वास्तव में क्रम में है और शिखर के अत्यन्त निकट है; किन्तु अध्याय संगम को अलग श्रेणी के रूप में नाम ही नहीं देता, और तट को सर्वोच्च नहीं कहता।
मूल पाठ पढ़ें →मूल पाठ छिपाएँ
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सिन्धुश्च सरयू रेवा सप्त गङ्गाः प्रकीर्तिताः ।ततोऽब्धितीरे दश च पर्वताग्रे ततो दश ॥
सिन्धु, सरयू और रेवा — ये सात गंगाएँ कही गई हैं। उससे समुद्र का तट दस गुना है, और उससे पर्वत का शिखर दस गुना है।
6
सर्वस्मादधिकं ज्ञेयं यत्र वा रोचते मनः ।कृते पूर्णफलं ज्ञेयं यज्ञदानादिकं तथा ॥
इन सबसे भी अधिक वह स्थान जानना चाहिए, जहाँ मन को रुचि हो। सत्ययुग में यज्ञ, दान आदि को पूर्ण फल देने वाला जानना चाहिए।
पर्वताग्रे ततो दश (15.5) — शिखर समुद्र-तट से दस गुना, और अध्याय का सर्वोच्च मापा गया सोपान। प्रवचन ठीक इसी सोपान पर काम करता है और वह कारण देता है जिससे लोगों को पहाड़ पर भेजा ही जाता है: पर्वत शिखर के ऊपर जाकर के जप करते हो… तो बहुत शीघ्रता से सिद्धि की प्राप्ति होती है। नामित उदाहरण: विंध्य का वह शिखर जहाँ भगवती विराजमान हैं, अष्टभुजा और नंदजा की श्रृंखलाएँ, गिरनार के तीन शिखर, सप्तश्रृंगी, हिमालय, और कामाख्या का नीलांचल।
दो शर्तें वह जोड़ता है। शिखर पर दस मिनट भी गिने जाते हैं — निर्देश वहाँ डेरा डालने का नहीं, वहाँ बैठने का है। और गोवर्धन को वह उस स्थिति के रूप में नाम देता है जहाँ तलहटी का अपना पूरा माहात्म्य है — अर्थात् जिस पहाड़ पर आप चढ़ नहीं सकते, वह पहाड़ आपके काम का नहीं रह जाता, ऐसा नहीं है।
यह आवश्यकता के रूप में कहा गया है, शिष्टाचार के रूप में नहीं: जप और समर्पण के बाद प्रदक्षिणादेवता या मंदिर की दक्षिणावर्त परिक्रमा, जिसमें देवता सदैव दाईं ओर रहते हैं। कीजिए। प्रवचन का ढाँचा यह है कि लोग इसे बस भूल जाते हैं, और संख्या इस तथ्य से कहीं कम महत्त्वपूर्ण है कि परिक्रमा हुई या नहीं — एक परिक्रमा भी परिक्रमा है। जहाँ शिव जी की अरघा नहीं लाँघी जाती, वहाँ आधी परिक्रमा ही पूर्ण विधान है और वही कीजिए।
इसे स्थान और शरीर के अनुसार घटाइए-बढ़ाइए। विंध्याचल का ऊपरी मंडप कुछ मिनटों में पूरा घूम जाता है और वहाँ प्रवचन प्रायः नौ की संख्या देता है; कामाख्या की परिक्रमा लंबी है और बीच-बीच में बलि क्षेत्र बंद होने से टूटती है, इसलिए वह कहता है कि पंक्तियों के बीच से निकलिए और नौ संभव न हो तो एक कीजिए। वह परिक्रमा को सीधे प्रारब्ध से जोड़ता भी है — जितना परिक्रमा करिएगा, जितना चलिएगा, उतना आपका प्रारब्ध कटेगा — और जिस दिन उचाटन न उतरे और कोई तीर्थ पहुँच में न हो, उस दिन घर पर पीपल की परिक्रमा को उसका स्थानापन्न बताता है।
अधूरी मनौती सबसे पहले पूरी कीजिए — योजना बनाने से भी पहले
सबसे अधिक हानिकारक
तीर्थ से जुड़ी परेशानियों की पूरी चर्चा प्रवचन यहीं से आरंभ करता है, और वह कोमल नहीं है। नौकरी लग गई, संतान हो गई, विवाह हो गया — और बदले में जो दर्शन का वचन दिया गया था वह ऋतु-दर-ऋतु टलता रहता है, जबकि जीवन का बाकी सब कुछ सामान्य गति से चलता रहता है। आगे क्या होता है, इसका उसका पाठ सीधा है: यदि आप वास्तव में असमर्थ थे तो आप पर कुछ नहीं आता; यदि आप समर्थ थे और नहीं गए तो उस स्थान की शक्तियाँ वचन को लागू कराती हैं, और वे उसे इस प्रकार लागू कराती हैं कि आपको याद आ जाए। काम में अड़चन, स्वास्थ्य, और जो माँगा था वही संकट में, और वे उपाय जो काम करना बंद कर देते हैं क्योंकि कारण कहीं और है।
वह जिस बात पर ध्यान दिलाना चाहता है वह यह है कि दोष हर दूसरे व्यक्ति पर डाल दिया जाता है — ज्योतिषी, तांत्रिक, डॉक्टर — और उस अधूरे वचन पर कभी नहीं, क्योंकि तब तक व्यक्ति ने दोनों का संबंध ही जोड़ना छोड़ दिया होता है। निर्देश छोटा है: काम पूरा होते ही जाइए। स्लीपर, जनरल, जैसे बन पड़े; वचन आने का था, आराम से आने का नहीं। और आपकी माँ या दादी का किया हुआ वचन भी घर पर वचन ही है।
निकलने से पहले अपने घर के पास वाले पुराने मंदिर में — उसी में जहाँ आप वास्तव में जाते हैं — फूल, ऋतुफल, मिठाई, दक्षिणा और आरती के साथ पूजन कीजिए, और कहिए कि कहाँ और किसलिए जा रहे हैं: हम इस तीर्थ क्षेत्र में जा रहे हैं, वहाँ मेरी साधना पूर्ण रूप से सफल हो, ऐसा आशीर्वाद दीजिए। प्रवचन की अपनी उपमा है घर से निकलते समय माता-पिता के चरण छूना। घर की कुलदेवी और कुल देवता का पूजन तो वह इतना स्वतःसिद्ध मानता है कि उस पर तर्क ही नहीं करता।
जो कारण वह देता है वह भावुक नहीं है। उसका विवरण यह है कि आपकी घर की शक्तियाँ और आपके पितृ आपके साथ चलते हैं, आपके शरीर के माध्यम से, क्योंकि उनके पास और कोई वाहन नहीं — और अगले पत्रक में मार्ग के शुद्धता-नियमों का पूरा आधार यही है। वे इसलिए जा रहे हैं कि उस स्थान पर उनकी अपनी गति और सामर्थ्य बढ़े। बिना बताए निकल जाना, उसके ढाँचे में, परिवार को द्वार पर छोड़ जाना है।
इस विषय की हर चर्चा में प्रवचन जो दो-तीन निर्देश दोहराता है, यह उनमें से एक है। निकलने से एक दिन पहले घर की स्त्रियाँ — माता, पत्नी, बहन, बेटी, कुलवधू — पूजन-स्थान पर छोटे पीले वस्त्र पर स्वच्छ कटोरे में अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। रखें, साथ में एक सिक्का (₹11 की संख्या दी गई है), और प्रार्थना करें: हम यह अक्षत उस क्षेत्र में ले जा रहे हैं, आप स्वीकार कीजिएगा।
दूसरे छोर पर वह अक्षत प्रमुख देवता पर चढ़ता है। एक क्षण भी मिले तो उतना पर्याप्त है। यदि वहाँ अनुमति न हो तो उसे उस क्षेत्र के शक्तिपीठ पर अर्पित कीजिए — प्रयाग में कल्याणी अथवा आलोपशंकरी के स्थान पर — और वह भी न हो तो मानसिक रूप से अर्पित करके पास की गंगा या समुद्र में छोड़ दीजिए, जहाँ के जीव उसे ग्रहण करेंगे। इस अंतिम विकल्प को प्रवचन विफलता नहीं, स्वयं पुण्य मानता है।
रोली, कुमकुम और पुष्प भी इसी क्रम से जाते हैं। और रुकी हुई साधना के लिए विशेष रूप: पंक्ति में एक कमल का पुष्प हाथ में रखिए और उसे लिंग पर चढ़ा दीजिए।
नियम आपके द्वार से आरंभ होते हैं, क्षेत्र के फाटक से नहीं
सीधे कहा गया है: अनुशासन उसी क्षण से आरंभ होता है जब आप तीर्थ के संकल्प के साथ निकलते हैं, वहाँ पहुँचने पर नहीं। उसी क्षण से भोजन का नियम लागू है — जितना बन सके घर का भोजन, न बने तो सादा सात्विक; तीर्थ नगरों में प्रायः हर जगह मारवाड़ी भोजनालय मिल जाते हैं जहाँ सामने ही भोजन बनता है। पान नहीं, तंबाकू नहीं, सिगरेट-बीड़ी नहीं, गाँजा-चरस नहीं, और इस बहाने से तो बिल्कुल नहीं कि मंदिर अभी हज़ार किलोमीटर दूर है। अभी तो थोड़ा सा ड्रिंक कर ही सकते हैं को प्रवचन उस वाक्य के रूप में नाम देता है जो पूरी यात्रा व्यर्थ कर देता है।
प्रवचन का कारण फिर वही है — सवारियाँ: आपके पितृ और घर की शक्तियाँ आपके शरीर में यात्रा कर रहे हैं, दूसरे छोर पर अपनी गति की आशा में, और अशुद्ध वाहन में पहुँचना ही वह चीज़ है जो तीर्थ को मार्ग की बीमारी में बदल देती है। वह एक सरल और प्रभावी अदला-बदली भी माँगता है — यात्रा में फ़िल्म या कॉमेडी के स्थान पर उस क्षेत्र का माहात्म्य पढ़िए या सुनिए, और हर पग पर उस देवता का नाम-जप चलने दीजिए।
और यदि आप घूमने जा रहे हैं, तो वह साफ़ कहता है कि इनमें से कुछ भी आप पर लागू नहीं और आप आनंद कीजिए। नियम संकल्प के पीछे चलते हैं, गंतव्य के पीछे नहीं।
माहात्म्य जानिए, नहीं तो जिसके लिए गए हैं उसी के पास से निकल जाएँगे
यह कारण सहित नियम के रूप में दिया गया है: जब महात्म्य ही नहीं पता है तो फल क्या प्राप्त होगा? अधिकांश आगंतुक मुख्य मंदिर का नाम जानते हैं और उस स्थल की बाकी हर चीज़ के विषय में कुछ नहीं, इसलिए वे उन्हीं स्थानों के सामने से निकल जाते हैं जिनके लिए आना था, और उनसे कुछ नहीं पाते — क्योंकि उनमें कुछ ग्रहण ही नहीं किया गया।
प्रवचन का उदाहरण उसका अपना है। प्रयाग की पहली यात्रा में वक्ता संगम, ललिता और आलोपशंकरी को जानते थे; वेणी माधव के पास ले जाए गए, दर्शन किया, समझा कोई मंदिर होगा — और परिक्रमा करते हुए पुराण-कथा से तब पता चला कि वेणी माधव इस पूरे क्षेत्र के रक्षक हैं और वही कारण हैं कि त्रिवेणी आज भी वहाँ है। यह पाँच मिनट के अध्ययन के अभाव में छूट गया एक रक्षक है।
व्यावहारिक रूप: मार्ग में उस क्षेत्र का माहात्म्य पढ़िए और जानिए कि वहाँ और क्या-क्या है। इसी नियम का पुराना रूप यह था कि यात्रा कीर्तन करते हुए की जाती थी, जो, प्रवचन की टिप्पणी के अनुसार, स्त्रियों के समूह आज भी करते हैं।
इन्हीं शब्दों में कहा गया है: तीर्थ, हवन अथवा दान के लिए ऋण मत लीजिए। प्रवचन जिस प्रकार का वर्णन करता है वह यह है — व्यक्ति पंद्रह-बीस हज़ार उधार लेता है, पूरा क्षेत्र में विधान और दान पर खर्च कर देता है, और लौटकर कर्ज़ और उससे उपजी कड़वाहट में बैठ जाता है — हम तो पूजा किए थे और देखो हम कर्जा में हैं। यह किसकी भूल है, इस पर उसका निर्णय स्पष्ट है।
वह जिस क्रम की माँग करता है वह यह है: सामर्थ्यवान बनिए, कमाइए, और जो कमाया उससे धर्म कीजिए। जहाँ वह कोई संख्या देता भी है वह अनुपात है, रकम नहीं — जो वास्तव में कमाते हैं उसका दशांश, त्रिकोण के तीनों मुख्य मंदिरों के लिए। इस मार्गदर्शिका का बाकी सब कुछ जान-बूझकर सस्ता है: एक दीपक, एक फूल, अपनी रसोई का अक्षत, दक्षिणा के लिए दस-दस के नोट, और सत्ताईस माला — जिसमें कुछ भी नहीं लगता।
मुख्य दर्शन के लिए, और क्षेत्र में किसी भी जप या परिक्रमा के लिए: पुरुष धोती में, बाएँ कंधे पर अंग-वस्त्र (ठंड में उसके ऊपर कुर्ता चलेगा); स्त्रियाँ साड़ी में, सीधा पल्लू, और प्रमुख विग्रह के सामने सिर पर। सिर पर टोपी, पगड़ी या हैट नहीं।
प्रवचन जो कारण देता है वह नैतिक नहीं, यांत्रिक है — और यही भाग समझने योग्य है: जहाँ ऊर्जा का प्रक्षेपण होता है वहाँ बिना सिला वस्त्र कहा गया है, जप के समय और स्थापित विग्रह के सामने, ताकि जो दिया जा रहा है वह शरीर पर ठीक से गतिमान हो सके। उसकी आपत्ति जींस पर नहीं है; उसकी आपत्ति यह है कि जो व्यक्ति और कुछ भी किसी अवरोध के पार लेने को तैयार न हो, वही उस एक विग्रह के सामने, जिसके लिए वह हज़ार किलोमीटर चला, अवरोध पहनकर खड़ा होता है।
दो जुड़ी हुई बातें। देवी-आसन पर पुजारी जी जब माला अथवा प्रसाद दें तो स्त्री उसे आँचल में, दाहिनी ओर से ले — विवाहित हो या अविवाहित। और जो आपको मिलता है — चुनरी, चूड़ी, शृंगार की सामग्री — उस देवता का नियम साथ लाता है: यदि आप वह नियम नहीं रखते तो मत पहनिए। पूजन-स्थान पर रख दीजिए, अथवा घर के उस व्यक्ति को दीजिए जो नियम रखता है।
भूमि पर पैर रखने से पहले क्षमा माँगिए — दाहिना पैर पहले
दस सेकंड लगते हैं
क्षेत्र में पैर रखने से पहले — प्लेटफॉर्म पर, हवाई अड्डे पर, जहाँ भी उतरें — वहाँ की रक्षक शक्ति और प्रमुख शक्ति को प्रणाम कीजिए और अनुमति लीजिए। प्रवचन शब्द भी दे देता है: हम मनुष्य हैं, आपके इस दिव्य क्षेत्र में चरण रखना पड़ रहा है; बिना चरण रखे हमें यह पुण्य और आपका दर्शन प्राप्त नहीं हो पाएगा — इसके लिए हमें क्षमा कीजिए। यह वही क्रिया है जो प्रातः उठकर पृथ्वी से पाद-स्पर्श-क्षमस्व कहने की है, उस भूमि पर लागू की गई जो साधारण भूमि नहीं है।
फिर दाहिना पैर पहले, और तब आगे। प्रयाग में यही निर्देश इस जोड़ के साथ दिया गया है कि उसी साँस में नगर देवता का नाम लें — वेणी माधव, उस स्थल पर और किसी चीज़ से पहले।
पादुका वाहन में ही छोड़ दीजिए — और पूजा के थैले में तो कभी नहीं
जिस साधक की किसी क्षेत्र के प्रति वास्तविक श्रद्धा है, उसके लिए निर्देश यह है कि पादुका ट्रेन या बस में ही छोड़ दे और नंगे पैर भीतर जाए। प्रवचन इसे ईमानदारी से नरम भी करता है: यदि पैर सह न पाएँ तो पहनिए — किसी से आत्म-पीड़ा नहीं माँगी जा रही — किन्तु यदि आपकी अवस्था वैसी है तो यही क्षण है। उसका व्यावहारिक सुझाव है कि ₹100 वाली चप्पल पहनकर जाइए, वहीं छोड़ दीजिए, और लौटते समय दूसरी खरीद लीजिए; कोई उसका उपयोग करेगा, और उसमें भी पुण्य है।
वह जिसे वास्तविक अपराध मानता है वह उन्हें रखना नहीं, बल्कि यह है कि वे कहाँ पहुँच जाती हैं: काग़ज़ में लपेटकर उसी थैले में ठूँसी हुई जिसमें आपकी जप की माला है, पूजन की सामग्री है, भागवत है, गर्भगृह में पहनने के वस्त्र हैं। इसे इस क्षेत्र की सबसे बड़ी भूल कहा गया है — एक उच्छिष्टता का दोष जो उस माला को चुपचाप व्यर्थ कर देता है जिस पर आपने लाखों जप किए हैं। ले ही जाना हो तो अलग थैला, और कमर से ऊपर कुछ नहीं: कंधे पर जूता लटकाए बैग को प्रवचन उस फैशन के रूप में नाम देता है जो अपने ही भीतर रखी वस्तु को नष्ट कर देता है।
नहाने-धोने से पहले, पंक्ति से पहले, वहाँ पहुँचिए जहाँ से शिखर दिख जाए और दोनों हाथ ऊपर करके प्रणाम कीजिए — प्रवचन के शब्दों में आप देवता को सूचित कर रहे हैं कि आप उनके क्षेत्र में आ गए हैं, और प्रार्थना कर रहे हैं कि दर्शन का मार्ग सही बन जाए। जगन्नाथ जी में दूर से शिखर, सुदर्शन अथवा गरुड़ स्तंभ का दिख जाना ही पर्याप्त है।
तब जाकर स्नान, वस्त्र बदलना, और विधिवत दर्शन। यही शिखर-दर्शन आगे दो बार और काम आता है: उन दिनों जब पंक्ति में लगना संभव न हो, और अंत में जब आप अपना जप समर्पित करते हैं — तब दूसरे दर्शन की आवश्यकता नहीं, शिखर की ओर देखते हुए समर्पण हो जाता है।
दर्शन का क्रम — गणपति, फिर उस क्षेत्र के अपने भैरव
हर क्षेत्र में विनायक होते हैं, चाहे केवल द्वार पर बैठे गणपति ही क्यों न हों, और वही पहले हैं। यदि वे न मिलें या उनका स्थानीय नाम न पता हो तो क्षेत्र में पैर रखते ही गणपति का स्मरण कर लीजिए और आगे बढ़िए। फिर उस क्षेत्र के भैरव, जहाँ हों; फिर वहाँ की अपनी जो भी प्रोटोकॉल हो; और तब प्रमुख देवता। कामाख्या में यही आठों मार्गों के द्वारपालों के पूरे क्रम में फैला है; प्रयाग में यह अर्घ्य के नामित क्रम का रूप ले लेता है।
प्रवचन जिस बात से सबसे अधिक चिंतित है वह क्रम का सिर नहीं, पूँछ है। मुख्य दर्शन के बाद अंग-शक्तियाँ, द्वारपाल, बाहर के भैरव, अन्य स्वरूप रहते हैं — और ठीक वही छूटते हैं जिस व्यक्ति का अभी-अभी पंक्ति में झगड़ा हुआ है। अरे छोड़ो ना, भैरव जी हैं तो क्या है? इन्हें छोड़ देना ही, वह कहता है, यात्रा को अधूरा छोड़ देता है।
विग्रह का स्पर्श मत कीजिए — और कारण विनम्रता नहीं है
आम भूल
ज्योतिर्लिंग अपवाद हैं: वहाँ स्पर्श और जलाभिषेक प्रायः अनुमत है। बाकी हर जगह — देवी-आसन, भैरव, अन्य विग्रह — प्रवचन साफ़ मना करता है, और उसके पीछे दो तर्क रखता है।
पहला अधिकार का है। ऐसे हर स्थान पर एक शृंगारिया परिवार होता है जिसे विग्रह को स्पर्श करने का अधिकार है, और वह अधिकार इसलिए है कि वह परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन नियमों का पालन करता है और चूकने पर दंड भी पाता है। आपने नहीं किया। वीआईपी मार्ग से पैसा देकर स्पर्श लेने का नाम लेकर प्रवचन पूछता है कि उससे मिलता क्या है — और उत्तर देता है: अच्छा कुछ नहीं, और संभवतः बुरा कुछ, क्योंकि देवता दंड नहीं देते, उनके गण देख लेते हैं।
दूसरा पारस वाला तर्क है, और वही अधिक काम का है। पारस लोहे को सोना बनाता है; एल्युमिनियम को नहीं बनाता। पारस चर नहीं है। तो प्रश्न यह नहीं कि आप विग्रह तक पहुँच सकते हैं या नहीं, प्रश्न यह है कि आपके भीतर वह है क्या जिस पर वह स्पर्श काम करे — और प्रवचन की शुष्क टिप्पणी यह है कि इन विग्रहों को प्रतिदिन, जीवन भर स्पर्श करने वाले बहुत लोग हैं, और उनकी स्थिति देख लीजिए।
इसके स्थान पर क्या: आँख खोलिए, विग्रह के नेत्रों से नेत्र मिलाइए, वहीं आशीर्वाद माँगिए, और अपना पुष्प चरणों में रख दीजिए। और शिव जी की जलहरी लाँघकर मस्तक लिंग तक मत ले जाइए; जलहरी स्वयं पार्वती का स्वरूप है।
दर्शन के बाद पाँच-दस मिनट बैठिए — और मोबाइल रख दीजिए
व्यर्थ हुए दर्शन का सबसे आम रूप, प्रवचन के वर्णन में: गर्भगृह पर पंद्रह सेकंड, तुरंत बाहर, तुरंत गाड़ी। वह माँगता है कि उसके बाद प्रांगण में कहीं पाँच-दस मिनट बैठकर उस स्थान और उस शक्ति का चिंतन कीजिए और संपर्क को बैठने दीजिए। पाँच मिनट की उपस्थिति उसकी न्यूनतम माँग है।
और गर्भगृह में: सेल्फी नहीं, रिकॉर्डिंग नहीं। आप उनको रिकॉर्ड कर लीजिएगा, मोबाइल को मोक्ष प्राप्त हो जाएगा — मोबाइल देख लिया, आप तो नहीं देखे। यदि पर्दे से देखना ही उद्देश्य होता, प्रवचन की टिप्पणी है, तो आप घर बैठे किसी और का डाला हुआ देख लेते।
प्रसाद वहीं ग्रहण कीजिए, और दक्षिणा बिना झगड़े निपटाइए
प्रसाद। शक्तिपीठ में जो भी मिले, तुरंत खा लीजिए। प्रवचन का नियम है कि रोका गया नैवेद्य विलंब के अनुपात में दोष लेता है, इसलिए उसे घंटों स्थल पर घुमाइए मत — लीजिए, खाइए, हाथ धोइए, आगे बढ़िए। जान-बूझकर कुछ घर के लिए ले जाना अलग विषय है और उसमें कोई दोष नहीं।
दक्षिणा। यहीं अधिकांश यात्राएँ आरंभ होने से पहले बिगड़ती हैं। जाने से पहले ₹1,000 के दस-दस और बीस-बीस के नोट करा लीजिए, और जहाँ-जहाँ माँगा जाए बिना तौले देते चलिए। पुजारी कहे कि कम है, तो सहमत हो जाइए, वहीं छोड़िए और आगे बढ़िए — ठीक है पंडित जी, हम रख ले रहे हैं। पंडों के विषय में प्रवचन की स्थिति संतुलित है: उनका व्यवहार सचमुच बुरा हो सकता है और उनकी आजीविका सचमुच यही है, और उस क्षण दोनों बातें आपका विषय नहीं हैं। आपका विषय यह है कि जो क्रोध आप गर्भगृह में ले जाते हैं वही आपको वह माँगने नहीं देता जिसके लिए आप आए थे। ₹50 के झगड़े में दर्शन मत गँवाइए।
और दूसरी भूल भी मत कीजिए — कि हमने बहुत कम दे दिया या बहुत अधिक। दोनों भाव वहाँ के नहीं हैं।
पंक्ति मरा हुआ समय नहीं है — यात्रा का सबसे फलदायी जप वहीं है
इसमें कुछ नहीं लगता
इन स्थानों पर दो, सात, चौबीस घंटे की पंक्ति सामान्य है, और प्रवचन उस समय को यात्रा का सबसे बुरा नहीं, सबसे अच्छा भाग मानता है। माला की आवश्यकता नहीं — उँगली पर या पूर्णतः मानसिक जप वहाँ निर्दोष है। अपने ही मंत्र की भी आवश्यकता नहीं: देवता का नाम, कोई स्तोत्र जो आपको आता हो, कोई पुण्य-श्लोक, युगल-जप। और यदि आप अपना पुरश्चरण-मंत्र ही बिना माला के, मानसिक रूप से करना चाहें, तो वहाँ उसमें भी कोई दोष नहीं — ठीक इसीलिए कि आप कहाँ खड़े हैं।
जो कारण वह देता है वह यह है कि तीर्थ में दर्शन से पहले किया गया जप कई-कई करोड़ गुना माना गया है, और विशेष रूप से यह कि जिनके मंत्र नहीं पक रहे, वे यही बार-बार, वर्षों तक करते रहने से अपने दोष कटते और सिद्धियाँ जागती देखते हैं। इसे व्यर्थ करने वाली चीज़ वही है जो लोग पंक्तियों में करते हैं: धक्का, आरोप, झगड़ा। ऐसे स्थान पर हर पग को अश्वमेध का फल देने वाला कहा गया है; प्रवचन का बिंदु यह है कि वही गणित पग-दर-पग किए गए झगड़े पर भी लागू होता है।
सत्ताईस माला — वह सीमा जिसके नीचे यात्रा गिनी ही नहीं जाती
यही एक नियम
इस पूरे विषय पर प्रवचन का सबसे तीखा वाक्य यही है: अगर आप आधा घंटा बैठ के जाप नहीं किए, तो तीर्थ जाकर के लाभ ही क्या हुआ? तीर्थ जाकर वहाँ बैठकर जप न करना, उसकी दृष्टि में, कोई छोटी चूक नहीं — वही चूक है।
जो लघु पुरश्चरण वह माँगता है वह जान-बूझकर छोटा है: न्यूनतम 27 माला, और यदि मंत्र छोटा हो (एकाक्षर, पंचाक्षर, दशाक्षर, पंचदशी तक) और दिन साथ दे तो 50 या 100। दर्शन के बाद बैठिए, और यदि पंक्ति के कारण संभव न हो तो पहले — इस असंततता में कोई दोष नहीं। और यह आवश्यक नहीं कि मंत्र नया हो: जीवन में किसी भी समय आपने जिस मंत्र का पुरश्चरण किया हो — 11,000 का हो या 11 लाख का, पाँच वर्ष पहले हो या दस — वही यहाँ बैठकर दोहराया जाता है।
ग्रंथ का अपना रूप 12.5 है: तीर्थ और क्षेत्र में स्नान, दान और जप सदा कार्यम्, और उसी श्लोक में विकल्प के रूप में रोग और दरिद्रता नामित हैं। 13.33 यह जोड़ता है कि बैठना कहाँ है: तीर्थ के दक्षिण में, उत्तम मठ में, मन्त्रालय में, देवालय में, अथवा उसके लिए रखे गए किसी नियत स्थान में।
साथ क्या रखना है — आसन, दो पात्र, और जप से लंबा जलने वाला दीप
प्रवचन जो भौतिक व्यवस्था बताता है वह इतनी छोटी है कि ले जाई जा सके। अपना आसन, घर से लाया हुआ या नया लिया हुआ। आचमन के लिए दो पात्र। और एक बड़ा कर्म साक्षी दीप — घी या सरसों तेल का, जो भी वहाँ बन पड़े — इतना कि जितनी देर आप बैठने वाले हैं उतनी देर जले, दो-तीन घंटे यदि वही योजना है। वह दीप कर्म का साक्षी है; वह पहले जलता है और जप के बाद तक जलता है।
आरंभ से पहले आचमन और शिखा-बंधन, यदि जल की व्यवस्था बन जाए; प्रवचन की टिप्पणी है कि थोड़ा खोजने पर जल मिल ही जाता है, और यदि पहला दिन अव्यवस्थित रहे तो भी कुछ जप कर ही लीजिए और पूरी विधि दूसरे दिन से पकड़िए। किसी भी क्षेत्र में पहले दिन के विषय में उसकी सामान्य सलाह यही है: समय ऊँच-नीच रहेगा, दूसरे दिन से समय नियत कर लीजिए और उसी पर टिकिए।
बैठक के भीतर का क्रम — कवच, फिर गणपति, शिव, भैरव, फिर देवता
यदि आपका अभ्यास इतना स्थिर है कि वह इसे उठा सके, तो प्रवचन बैठक के लिए पूरा क्रम देता है: पहले पंचांग — कवच का पाठ, सहस्रनाम अथवा स्तोत्र, स्तुति, और उस देवता की गीता यदि आप पहले से करते आए हों — और फिर गणपति का जप, शिव जी का, भैरव जी का, और तब उस क्षेत्र की प्रमुख शक्ति का। उसके बाद समर्पण।
और यदि नहीं, तो कम से कम जप से पहले कवच। इन प्रवचनों की स्थिति हर विषय में एक जैसी है — स्तोत्र और कवच मंत्र के नीचे जाते हैं, बगल में नहीं — और वह ठीक उन्हीं स्थानों पर इस पर सबसे अधिक बल देता है जहाँ ऊर्जा सबसे अधिक है।
जप वहीं बैठे-बैठे समर्पित कीजिए — दूसरे दर्शन की आवश्यकता नहीं
एक प्रश्न जो लोगों को विधि पूरी नहीं करने देता: जप हो गया, तो क्या अर्पित करने के लिए फिर पंक्ति में लगें? नहीं। दर्शन आप कर चुके हैं, और जहाँ अनुमति थी वहाँ स्पर्श भी। उसी क्षण का स्मरण कीजिए और अपने आसन से ही मानसिक रूप से जप समर्पित कर दीजिए। शिखर की ओर देखते हुए समर्पण करना स्पष्ट रूप से पर्याप्त बताया गया है।
आगे क्या होता है, इसका प्रवचन का वर्णन जैसा है वैसा ही रखने योग्य है: जप और समर्पण के बाद साधक उस क्षेत्र की ऊर्जा से जुड़ जाता है, और वहाँ उपस्थित शक्तियों ने उसे दर्ज कर लिया होता है — यह साधक, यह भक्त आया है — और आगे वह मन से और भौतिक रूप से क्या करता है, उस पर उनकी दृष्टि रहती है। प्रस्थान के नियम इसी कारण हैं।
अधिकांश स्थल किसी आगंतुक को अग्नि जलाने नहीं देते, और प्रवचन इसे समस्या नहीं मानता। यदि आप स्वयं कर सकते हैं और विधि जानते हैं, तो वहाँ जो व्यवस्था हो उसी के अनुसार कर लीजिए। यदि केवल करवाया जा सकता है, तो पहले वास्तविक सीमा देख लीजिए — आप अपना मंत्र किसी वैतनिक पुरोहित को सौंपकर यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि आहुतियाँ उसी की हों।
इसलिए वह जो विकल्प देता है वह संकल्प और दान है: हवन सामग्री, अथवा घी, उस देवता के नाम से दान कर दीजिए, यह कहकर कि किसलिए है — इतना हम इसके निमित्त दान कर रहे हैं; आप प्रसन्न हों, हम पर कृपा करें, मेरा मंत्र जप सफल हो। इसे पूर्ण विकल्प के रूप में रखा गया है, कमी के रूप में नहीं।
दीपदान स्थल — पाँच मिनट खड़े रहना स्वयं एक विधान है
कठिन स्थिति के लिए
यह विशेष रूप से उस पाठक के लिए दिया गया है जिसे बताया गया हो कि कुंडली में पूर्वकृत किसी विशिष्ट पाप के कारण बना योग किसी भी उपाय से नहीं कट रहा। क्षेत्र में वह स्थान खोजिए जहाँ प्रतिदिन सैकड़ों या हज़ारों दीप अर्पित होते हैं — दीपशाला, अग्निकुंड। वहाँ बिना आसन के, पैरों पर खड़े होकर; जगह हो तो एक पैर पर, न हो तो दीवार का टेक लेकर। पाँच मिनट अपने इष्ट-मंत्र का जप।
प्रवचन जो प्रक्रिया बताता है वह आश्वासन नहीं, वास्तविक तर्क है और इसीलिए कहने योग्य है: उन दीपों में से हर एक उसी शक्ति का आवाहन है जिसका वह पीठ है। उनकी उपस्थिति वहाँ अग्नि के रूप में खड़ी है, और अग्नि जिसे स्पर्श कर ले वह भस्म होता है। तो दोष उसके संपर्क में ले आया जाता है। वहाँ क्षणार्ध का जप भी, वह कहता है, पाप को तुरंत जला देता है।
रात्रि ही समय है, और जिस रात अनुष्ठान पूरा हो वही रात रुकनी है
सबसे अधिक छोड़ा गया
दो जुड़े हुए नियम, और प्रवचन कहता है कि दूसरे के बिना तीर्थ पूरा नहीं होता। शक्तिपीठ में जप रात्रि का काम है; पाठ का माहात्म्य रात्रि के घंटों का है। और यात्रा कितनी भी छोटी हो, कम से कम एक रात क्षेत्र में बितानी है: अगर एक रात नहीं उस तीर्थ क्षेत्र में बिताएं तो फिर क्या लाभ हुआ? पुरश्चरण कर रहे हैं तो दो या तीन।
कठोर रूप और भी स्पष्ट है। जिस दिन आपका पुरश्चरण वास्तव में पूर्ण होता है, उस रात रुकिए — भले दोपहर में पूरा हो गया हो। कारण असामान्य रूप से ठोस है: लेखा-जोखा तभी होता है — कौन सा कष्ट काटा जाएगा, आपके साथ क्या भेजा जाएगा — और आपकी उपस्थिति में वह बेहतर बैठता है। और संदेश, यदि आना है, उसी रात की निद्रा में आता है। इसीलिए प्रस्थान का नियम यह है: आधी रात का अनुष्ठान और तीन बजे की गाड़ी नहीं। सूर्योदय, फिर निकलिए।
प्रस्थान से पहले खप्पर भरवाइए — यह अंतिम चोट है, पहली नहीं
प्रवचन इसे अंतिम चोट कहता है और इसके बिना निकल जाने को काम अधूरा छोड़ना मानता है। क्षेत्र चाहे देवी का हो, शिव का हो या नारायण का — वहाँ उपस्थित गणों की तृप्ति जाने से पहले होनी चाहिए। कम से कम भैरव जी के नाम से नारियल की बलि; वह भी न हो तो लौंग और कपूर से खप्पर भर दीजिए। काशी और विंध्य क्षेत्र में, जहाँ अधिकांश भैरव आसनों पर कारण चढ़ता है, वह कहता है कि अपने नाम से कारण से खप्पर भरवा लीजिए।
दो सीमाएँ साथ हैं और दोनों महत्त्वपूर्ण हैं। अर्पण करने वाले आप हैं, ग्रहण करने वाले नहीं — आपको नहीं पीना है, उनको पिलाना है। और जहाँ आप दीक्षित नहीं हैं, वहाँ मंदिर का अपना सेवक आपके नाम से भरता है, आप अपने हाथ से नहीं। वर्ष में एक बार जाने वाले साधक के लिए, जहाँ क्षेत्र में बलि का नियम है, वार्षिक बलि की सलाह दी गई है; और सावधानी यह कि सामर्थ्य से आगे बढ़कर उसे मत कीजिए।
क्षेत्र से जो भी आप घर ले जाते हैं — तीर्थ का जल, प्रमुख देवता का चरणोदक, कामाख्या के कुंड का जल, भस्म, विधिपूर्वक ली गई मिट्टी — वह बिना दक्षिणा अर्पित किए नहीं लिया जाता। ₹1, ₹11, जितना बन पड़े; राशि विषय नहीं है।
और प्रवचन स्पष्ट है कि दक्षिणा किसके लिए है: वह आराध्य को जाती है, पंडित जी को नहीं। पंडित जी को जो देना था वह पूजा-पाठ के समय दे ही चुके होंगे। यह उस वस्तु का मूल्य है जिसे आप क्षेत्र से बाहर ले जा रहे हैं।
सीधे घर। तीर्थ ठीक से करके लौटते समय कहीं रुककर आनंद मनाना स्वयं एक अपराध बताया गया है। प्रवचन का तर्क वही है जो जाते समय था: जो शक्तियाँ और पितृ आपके शरीर में यात्रा कर रहे थे उन्हें आपके अपने पूजन-स्थान पर पुनः प्रतिष्ठित होना है, और उससे पहले वाहन को दूषित कर देना ही वह चीज़ है जो अच्छी यात्रा को अगले सप्ताह की बीमारी में बदलती है। पुरी वाला तर्क — विमला माता को तो चढ़ता है, इसलिए हम भी खा रहे हैं — वह एक प्रश्न में तोड़ देता है: आपने उनका दर्शन किया? एक दीपक जलाया? आप जानते भी हैं वे कौन हैं?
जो आपका नहीं है। मंदिर के पुरोहितों का प्रयोग किया हुआ कोई भी पात्र, जल चढ़ाने के लिए दिया गया कोई भी लोटा — वह वहीं रहता है। यदि भूल से घर आ जाए, तो जो सुधार बताया गया है वह यह है कि उसके बदले पाँच का दान कीजिए।
घर लौटकर मन का न लगना, बेचैनी और उदासी सामान्य है — कारण यह है
एक भय का समाधान
इन प्रवचनों को बताए जाने वाले सबसे आम अनुभवों में से एक, और सबसे कम समझाए गए में से एक: यात्रा बहुत अच्छी हुई, और घर पहुँचने के कुछ दिन बाद व्यक्ति सपाट, बेचैन, अकेला, अरुचि से भरा है, और मन कहता है कि वहीं ठीक था। प्रवचन का विवरण रहस्यमय नहीं है। आपने कुछ दिनों में, एक ऐसी भूमि पर जिसकी ऊर्जा-सघनता वह आपके अपने घर से लगभग सौ गुना बताता है, इतनी मात्रा में साधना कर ली जिसका आपका अभ्यास नहीं है। यह ओवरडोज़ है और आप उससे उतर रहे हैं। वह इस अवस्था को उचाटन कहता है और साधक के लिए इसे असामान्य नहीं, सामान्य मानता है।
क्या कीजिए: इसकी अपेक्षा रखिए, घबराइए मत, और उतरने दीजिए। यदि सप्ताह भर में न उतरे, तो वह कहता है कि शरीर से उतारा कीजिए, और चल रही दशा-अंतर्दशा दिखवाइए — चलित कुंडली में चंद्र 6, 8 या 12 में होने पर ठीक यही होता है, यह उसने नाम लेकर कहा है — और उसके अनुसार दान कीजिए। और वह जोड़ता है कि गुरु की वास्तविक आवश्यकता ठीक यहीं है: इतनी सघन ऊर्जा को संतुलित और नियंत्रित करना मंत्र देने से अलग काम है।
दूसरा प्रकार, और प्रवचन इसे सावधानी से रखता है। कभी-कभी तीर्थ के तुरंत बाद कठिनाई आती है और व्यक्ति निष्कर्ष निकाल लेता है कि तीर्थ ने ही किया। उसका पाठ यह है कि यहाँ दो अलग चीज़ें गड्डमड्ड होती हैं। एक यह कि कोई बहुत बड़ा आघात छोटे में बदलकर निपट रहा है — उसका अपना उदाहरण एक दुर्घटना है जिसमें लिगामेंट टूटा जबकि कुंडली में उससे कहीं बड़ा लिखा था — और वह इतना नीचे इसीलिए आया क्योंकि यात्रा हुई थी। दूसरा यह कि क्षेत्र में सचमुच कोई अपराध बन गया और यह उसका सुधार है।
दोनों स्थितियों में निर्देश एक ही है और वह आपकी वाणी के विषय में है: यात्रा को, स्थान को, अथवा देवता को मत कोसिए। प्रवचन कहता है कि यही वह चीज़ है जो छोटे सुधार को लंबी समस्या में बदल देती है। जो हुआ, जैसा भी हो रहा, हमने अपना कर्म कर दिया है — फल आप जो दीजिए। यदि अपराध पहचान में आ जाए तो अगला पत्रक ही उपाय है।
प्रवचन इस पर एकमत है कि जिस रात अनुष्ठान पूर्ण होता है उस रात जो आता है — कोई स्वप्न, कोई दिशा-निर्देश, आने वाले वर्ष के विषय में कोई जानकारी — उसके साथ गोपनीयता का दायित्व आता है। समझ में न आया हो तो अपने योग्य मार्गदर्शक अथवा गुरु से चर्चा कीजिए; स्पष्ट था तो चर्चा की आवश्यकता ही नहीं। पत्नी से नहीं, माता-पिता से नहीं, भाई से नहीं।
इससे जुड़ी चेतावनी उन क्षमताओं के विषय में है जो कभी-कभी साथ आती हैं: लोगों के विषय में कुछ जान जाना, कुछ कह देना जो ठीक वैसा ही हो जाए। वहाँ निर्देश असामान्य रूप से कड़ा है — प्रयोग मत कीजिए। तीन या दस दिन के बाद जो मिला है वह ट्रायल वर्ज़न है, यह देखने के लिए कि आप कितना सँभाल पाते हैं। उसे स्टॉक में रखिए, छह महीने या साल भर बाद जाकर अनुष्ठान दोहराइए, और तब तक दोहराते रहिए जब तक वह क्षमता सुरक्षित न हो जाए और उसका ह्रास न हो। तब प्रयोग कीजिए।
कुंभ के प्रसंग में, उन लोगों के लिए जो प्रयाग नहीं पहुँच सके, यह सीधे कहा गया है: जो गंगा-यमुना के संगम में मानसिक रूप से भी स्नान करता है, वह भी हर प्रकार के पापों से मुक्त होकर सनातन ब्रह्म में लीन हो जाता है। यह छोटा विधान नहीं है — यही दावा, मानसिक रूप के लिए किया गया।
भाव को दृढ़ करने के लिए प्रवचन जो विधि जोड़ता है वह व्यावहारिक है। साधारण जल लीजिए, अथवा गंगाजल हो तो वह, उसे भगवती गंगा, यमुना और सरस्वती के स्तोत्र और सतनाम से अभिमंत्रित कीजिए, अपने स्नान के जल में मिलाइए, और त्रिवेणी का स्मरण करते हुए स्नान कीजिए। यही रूप हस्तांतरित होता है: जिस भी नदी या क्षेत्र का स्तोत्र आपके पास हो, उसके लिए यही किया जा सकता है।
दूसरी ओर से इसके पीछे दो श्लोक खड़े हैं। 15.6 हर मापे गए सोपान के ऊपर उस स्थान को रखता है जहाँ मन को रुचि हो; और 9.24 अरुणाचल के विषय में कहता है कि वहाँ मुक्ति स्मरण मात्र से होती है। मानसिक अनुष्ठान से ग्रंथ को कोई संकोच नहीं है।
ग्रंथ के अपने विकल्पों में यह सबसे बलवान है और बिना किसी शर्त के कहा गया है। 24.78: भस्मस्नानं परं तीर्थं गंगास्नानं दिने दिने — भस्मस्नान परम तीर्थ है, मानो प्रतिदिन गंगास्नान हो। 24.77: समस्त तीर्थों में जो पुण्य है, जो फल है, वह फल भस्मस्नान करने वाला पूर्णतः प्राप्त करता है।
उसी अध्याय के दो और श्लोक इसे कर्म से व्यक्ति तक बढ़ा देते हैं। 24.63: जिसके ललाट पर त्रिपुण्ड्र है वह सर्वत्र इस लोक के समस्त तीर्थों और गंगा आदि नदियों में स्नात हुए के समान होता है। और 24.26, जो तीनों में सबसे विलक्षण है: भूतिशासन से युक्त शिवज्ञानी जिस देश में यदृच्छा से भी चला जाता है, उस देश में समस्त तीर्थ स्वयं आ जाते हैं।
अंतिम को ध्यान से पढ़िए। यात्रा की दिशा उलट गई है। जो पाठक जा नहीं सकता, उसके लिए ग्रंथ का अपना उत्तर यही है।
बिल्व का मूल, फिर से — क्योंकि सूची में सबसे छोटा मार्ग यही है
यात्रा की आवश्यकता नहीं
इस भाग में दोहराने योग्य इसलिए कि अधिकांश पाठक इसी सप्ताह जो कर सकते हैं, उसमें यह सबसे अधिक फल देने वाला है। 22.23: संसार में जितने भी प्रसिद्ध पुण्यतीर्थ हैं, वे सब बिल्व के मूल में निवास करते हैं। 22.25: जो बिल्व के मूल में जल से शिव के मस्तक का अभिषेक करता है, वह समस्त तीर्थों में स्नात हो जाता है, और वही पृथ्वी पर पावन है। 22.24 जोड़ता है कि वहाँ लिंगरूपधारी महादेव का पूजन निश्चय ही शिव तक ले जाता है; और 22.26 कि उस मूल का जल से भरा आलवाल देखकर ही महादेव अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
और यह पंद्रहवें अध्याय की सीढ़ी का चौथा सोपान अपने आप में है — शुद्ध घर से एक हजार गुना, देवालय से एक सोपान नीचे। जिसके मूल में लिंग हो, जिस पर जल चढ़े और दीप जले — ऐसा बिल्वबेल वृक्ष की पवित्र लकड़ी, भगवान शिव हेतु बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त। वृक्ष इस व्यवस्था में तीर्थ का विकल्प नहीं है। वह तीर्थ है, और ग्रंथ यह दो अलग अध्यायों में दो बार कहता है।
संसार में जितने भी प्रसिद्ध पुण्यतीर्थ हैं वे सब बिल्व के मूल में निवास करते हैं; और जो वहाँ जल से शिव का अभिषेक करता है वह समस्त तीर्थों में स्नात हो जाता है।
जिस स्थान तक नहीं पहुँच सकते, उसकी दिशा की ओर मुख कीजिए
गिरनार के लिए साफ़ शब्दों में दिया गया है और किसी भी क्षेत्र पर लागू किया जा सकता है: निकालिए कि आपके निवास से वह पर्वत किस दिशा में पड़ता है, उस ओर मुख कीजिए, और जप कीजिए। आपके निवास स्थान से गिरनार पर्वत का क्षेत्र किस दिशा में पड़ता है… उस दिशा की ओर भी मुख करके आप जप कर सकते हैं।
यह वही तर्क है जो स्वयं क्षेत्र में शिखर-दर्शन का है — दिशा ही संबंध है — और इसे आज़माने में कुछ नहीं लगता।
किसी अपूजित भैरव मंदिर को गोद लीजिए — 90 या 108 दिन
अटकी हुई स्थिति के लिए
उस पाठक के लिए प्रवचन की अपनी सिफ़ारिश जो यात्रा नहीं कर सकता और सचमुच अटका है — कोई मुकदमा जो हिलता नहीं, कोई अभिचार जो कटता नहीं, कोई कष्ट जिस पर कोई उपाय काम नहीं कर रहा। अपने पास कोई ऐसा भैरव मंदिर खोजिए जहाँ नियमित सेवा छूट गई हो: जहाँ रविवार को दीपक जलता हो और बाकी दिनों में नहीं, जहाँ किसी ने दायित्व नहीं उठाया। वह दायित्व उठा लीजिए, नित्य, 90 या 108 दिन।
शर्तें। गृहस्थ के लिए वह मंदिर श्मशान की सीमा के भीतर नहीं होना चाहिए — सीमा आरंभ होने से पहले वाला ठीक है। विग्रह का स्पर्श मत कीजिए, जब तक उस परंपरा में दीक्षित न हों और गुरु से आदेश न हो; पुष्प, भोग, धूप और दीप उनके समक्ष रखिए, वहाँ भैरव सहस्रनाम अथवा काल भैरव अष्टक का पाठ कीजिए, आरती कीजिए, और लौट आइए। स्त्रियाँ यह सब कर सकती हैं; प्रवचन इस आपत्ति को सीधे तोड़ देता है — स्पर्श का निषेध स्त्रियों का नियम नहीं है, वह पुरुषों पर भी उतना ही लागू है।
वे चार सोपान जो आप अपना ज़िला छोड़े बिना चढ़ सकते हैं
पहले यह कीजिए
“कौन सा शक्तिपीठ” वाले प्रश्न से पहले वह प्रश्न है जिसका उत्तर सीढ़ी वास्तव में देती है: उसके कितने सोपान पहले से ही पैदल दूरी पर हैं? अधिकांश पाठकों के लिए चार, और वे मिलकर शुद्ध घर से दस हज़ार गुना बनते हैं।
गोशाला — 10×। चलती हुई गोशाला; इससे जुड़ा प्रवचन का निर्देश यह भी है कि भोजन से पहले गाय को खिलाइए।
किसी भी जल का तट — 100×। तालाब, नहर, पोखर। बहता जल स्थिर से ऊपर।
बेल, तुलसी या पीपल का मूल — 1,000×। अथवा तीन से अधिक तुलसी का उपवन; अथवा आँवला-बेल-तुलसी का वह संयोग जिसे प्रवचन काशी के समान कहता है।
देवालय — 10,000×। वरीयता से शिव मंदिर, और गर्भगृह ही नहीं, पूरा प्रांगण गिना जाता है।
यह जाने के विरुद्ध तर्क नहीं है। यह इस धारणा के विरुद्ध तर्क है कि जब तक आप जा नहीं पाते तब तक साधना रुकी रहेगी। 12.32-34 ग्रंथ की ओर से यही कहता है: रुद्रलोक देने वाले क्षेत्र अनेक स्थानों में हैं, और वहाँ-वहाँ निवास करने वाला वैसा ही फल पाता है।
तीर्थ के विषय में इन प्रवचनों की सबसे ज़ोरदार चेतावनी, दो अलग प्रवचनों में दो बार दी गई। किसी प्रसिद्ध क्षेत्र के परिक्रमा मार्ग पर या किसी स्थान के पास पड़ा सिक्का, नोट, चाँदी या सोने का टुकड़ा, गिरा हुआ रुद्राक्ष, कलावा। भक्त का पाठ यह है कि माता ने कुछ दिया है। प्रवचन का पाठ यह है कि किसी ने उतारा किया, घर का प्रेत, पिशाच अथवा ब्रह्मराक्षस उस वस्तु पर उतारा, और उसे जान-बूझकर वहाँ छोड़ दिया — इस हेतु कि जो उठाए, वह उसके साथ चला जाए।
उसका तर्क सरल है और उसका उत्तर कठिन: पचास हज़ार का सोने का सिक्का कोई मंदिर में गिराकर, खोजे बिना, आगे नहीं बढ़ जाता। जो उठाए, उसके साथ वह जाए।
नियम: उठाइए मत, छूइए मत, लाँघिए मत। बहुत ही इच्छा हो तो वहीं के मंदिर-प्रबंध को दे दीजिए और छोड़ आइए। यही सुंदर पत्थर पर लागू है जिसे आप शालिग्राम कहने वाले थे, छोटे शिवलिंग पर, आभूषण पर — और प्रवचन के सबसे अधिक उद्धृत उदाहरणों पर, अर्थात् उन कई लोगों पर जो ऐसा कुछ घर ले आए और जिन्हें उसके बाद का पूरा वर्ष समझाना पड़ा।
मन्नत का धागा मत बाँधिए — उसके बदले फूल चढ़ाइए और कह दीजिए
दो आपत्तियाँ हैं, और दूसरी गंभीर है। पहली: वृक्षों की हानि हो रही है, प्रकृति की हानि हो रही है, और कई प्रशासनों ने अपने स्थलों पर इसे रोक भी दिया है — जिसका प्रवचन समर्थन करता है। दूसरी, और यही कारण है कि यह सावधानियों में है: आपको पता नहीं कि वहाँ पहले से क्या बँधा है। प्रवचन का विवरण यह है कि बंधन के विधान ठीक इन्हीं वृक्षों और जालियों पर किए जाते हैं, और मन्नत का धागा उनके साथ कुछ और बाँध देने के लिए सुविधाजनक होता है — और अभी-अभी आपने अपना धागा उसी के ऊपर बाँध दिया।
स्वयं इस रूप पर एक तकनीकी आपत्ति भी है। तांत्रिक अर्थ में बंधन नियत अवधि के लिए किया जाता है, और अंत में उसकी मुक्ति होती है; मन्नत का धागा खोलने कोई साल भर बाद नहीं लौटता। इसके स्थान पर प्रवचन जो देता है वह अधिक बलवान और अधिक स्वच्छ है: एक पुष्प या माला लीजिए, उस पर अपनी इच्छा बोलिए, और समर्पित कर दीजिए। वह ज्यादा कार्य करेगा।
परिक्रमा मार्ग पर — कुछ मत तोड़िए, कुछ मत उठाइए, कहीं निवृत्ति मत कीजिए
वास्तविक परिणाम
किसी जागृत क्षेत्र की पहाड़ी परिक्रमा प्रकृति-भ्रमण नहीं है, और विंध्य त्रिकोण के मार्ग का प्रवचन का वर्णन विशिष्ट है: उस पर पड़ने वाले फलदार वृक्ष, आक, नीम, बरगद, पीपल और आम, और गेरुआ तालाब के आसपास लोगों के बनाए छोटे ईंट के “घर” — सब सक्रिय रूप से उतारे के काम आ रहे हैं। किसी का घरेलू पिशाच उस पेड़ पर बैठा है। इसलिए:
परिक्रमा मार्ग पर कोई फल या फूल मत तोड़िए, जब तक कोई जानकार स्थानीय व्यक्ति साथ न हो।
अपनी रेखा के बीच में चलिए; इधर-उधर मत भटकिए।
मार्ग में कहीं भी मल-मूत्र त्याग मत कीजिए — जो व्यवस्था बनी है उसी में जाइए।
मन्नत के घरों पर पत्थर मत मारिए। प्रवचन इसे युवा आगंतुकों के बीच एक वास्तविक शग़ल के रूप में बताता है, और यह भी बताता है कि उसके बाद क्या होता है: उल्टी, दौरे, “सवारी”, और एक परिवार जिसे कारण का पता नहीं। बच्चे साथ हों तो उन्हें समझाइए।
दो दिखने में एक जैसी चीज़ों को अलग कीजिए। प्रसाद — देवता को अर्पित करके बाँटा गया भोजन, गर्भगृह से मिली दो पूरियाँ, किसी वस्तु का टुकड़ा — प्रसाद है, और वह आप ग्रहण करते हैं। बैठाकर खिलाया जाने वाला लंगर, तंबू के नीचे, जो भी बैठ जाए उसके लिए — वह, प्रवचन के पुराने नियम के पाठ में, निर्धनों और साधु-संतों के लिए है, कमाने वाले गृहस्थ के लिए नहीं।
जिस प्रक्रिया का वह नाम लेता है, वही इसे शिष्टाचार नहीं सावधानी बनाती है: बड़े पैमाने पर भोजन कराना उन मानक तरीकों में से एक है जिनसे भार बाँटा जाता है। बहुत काले धन और किसी स्वास्थ्य-समस्या वाले व्यक्ति का उतारा कराकर भोजन कराया जाता है, और जो खाते हैं उनमें जो बँटता है वह वही भार है। उसका निर्णय यह है कि उस अन्न को केवल वही पचा सकता है जिसके भीतर वास्तविक तप हो। और उसका व्यावहारिक रूप सीधा है: आप दो रोटी खरीदकर खा सकते हैं। वही कीजिए।
ये वर्जनाएँ आपके अपने नगर या गाँव के सामान्य श्मशान के लिए हैं — किसी तीर्थ के अपने महाश्मशान के लिए नहीं, जो अलग श्रेणी है (वह पत्रक देखिए)।
तीन मास से अधिक की गर्भवती स्त्री उस भूमि में प्रवेश न करे, न उसकी सीमा के भीतर खड़े मंदिर में।
न वह पुरुष जिसके यहाँ संतान होने वाली है।
गृहस्थ ऐसे भैरव या काली मंदिर में नित्य जाने की आदत न डाले जो सीमा के भीतर हो। सीमा आरंभ होने से पहले वाले की नित्य सेवा में कोई दोष नहीं।
जिनके घर में बाल-बच्चे और माता-पिता हैं, उनसे प्रवचन सामान्य रूप से यही कहता है कि श्मशान से कुछ दूरी बनाए रखें।
और वहाँ जाकर साधना करने के विषय में, गृहस्थ के लिए, उनकी स्थिति कहीं नहीं बदलती: वे इसे न सिखाते हैं, न सुझाते हैं, और आज की इस लहर को — जब मन हुआ तब कर लिया, परिणाम सार्वजनिक कर दिया, दस और लोग पीछे खिंच आए — वे सक्रिय रूप से विनाशकारी मानते हैं।
श्मशान तांत्रिक साधना का स्वाभाविक आसन है, और गंभीर साधक को वहीं बैठना चाहिए।
उसी अध्याय से मिलाकर देखा गया जो बताता है कि पुण्यक्षेत्र क्या है और वहाँ क्या किया जाता है। 12.3-4 क्षेत्र की उत्पत्ति के चार प्रकार देता है — ऋषि-परिग्रह, देव-परिग्रह, स्वयम्भू, अन्यथा उत्पन्न — और इनमें श्मशान कहीं नहीं है; 12.5 क्षेत्र के उचित कर्म स्नान, दान और जप बताता है। इस संहिता में श्मशान, पंचमुंडी आसन अथवा शव-आसन का कोई उल्लेख ही नहीं है। श्मशान साधना वास्तविक, प्राचीन और परम्परा-सिद्ध है; वह केवल इस ग्रंथ का विषय नहीं है — और प्रवचन भी उतनी ही स्पष्टता से कहता है कि गृहस्थ का वहाँ कोई काम नहीं।
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1
शृणुध्वमृषयः प्राज्ञाः शिवक्षेत्रं विमुक्तिदम् ।तदागमांस्ततो वक्ष्ये लोकरक्षार्थमेव हि ॥
हे बुद्धिमान् ऋषियो, शिव के उस क्षेत्र को सुनिए, जो विमुक्ति देने वाला है; फिर मैं उसके आगमों को भी लोकरक्षा के लिए ही कहूँगा।
2
पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा सशैलवनकानना ।शिवाज्ञया हि पृथिवी लोकं धृत्वा च तिष्ठति ॥
पचास करोड़ योजन विस्तृत, पर्वत-वन-कानन सहित यह पृथ्वी शिव की आज्ञा से लोक को धारण करके स्थित है।
हे भूसुरो, उस क्षेत्र में पाप करना और भी दृढ़ हो जाता है; पुण्यक्षेत्र में निवास करते हुए अणुमात्र भी पाप न करे। जिस किसी भी उपाय से मनुष्य को पुण्यक्षेत्र में निवास करना चाहिए।
अपराध बन जाए तो उसी क्षेत्र के भैरव के पास जाइए — हो सके तो उसी दिन
उपाय
प्रवचन आपको केवल चेतावनियों के साथ नहीं छोड़ता। हर क्षेत्र के अपने भैरव हैं, और वही उस व्यक्ति के रक्षक हैं जिससे उनके क्षेत्र में अपराध बना है। यदि यात्रा में, या किसी स्वप्न से, या दो दिन बाद घर पर आपको ध्यान आए कि जाने या अनजाने कुछ हो गया — तो उस क्षेत्र के भैरव के पास जाइए। काशी में हुआ हो तो काशी के; विंध्य क्षेत्र में हुआ हो तो वहाँ के; जिस भूमि पर आप थे उसी को ढँकने वाला आसन।
क्या लेकर: दीपक में ग्यारह या इक्कीस कपूर, लौंग और कपूर, एक लड्डू, नींबू की बलि, और जहाँ उस आसन पर कारण चढ़ता हो वहाँ कारण — पीना नहीं है, चढ़ाना है, खरीदकर अर्पित कीजिए; स्त्री को न आता हो तो किसी से मँगवा लीजिए। फिर बार-बार, अपने ही शब्दों में, क्षमा और रक्षा की प्रार्थना।
यदि आप निकल चुके हैं और लौट नहीं सकते, तो वहाँ के जिस पुरोहित से संपर्क रहा हो, उनसे करवा लीजिए। कोई न हो, तो अपने घर पर ही लौंग-कपूर प्रज्वलित करके वही प्रार्थना कर लीजिए। प्रवचन का आकलन है कि इससे निवृत्ति हो जाती है।
झगड़ा मत कीजिए, घाट पर थूकिए मत — गणित दोनों ओर चलता है
12.36
यह पत्रक वास्तव में एक ही श्लोक है, लागू किया हुआ। 12.36: पुण्यक्षेत्र में किया गया पुण्य अनेक प्रकार से बढ़ता है; पुण्यक्षेत्र में किया गया थोड़ा-सा भी पाप बड़ा हो जाता है। 12.7 जोड़ता है कि वह वहाँ और भी दृढ़ हो जाता है। प्रवचन का अपना रूप यह है कि तीर्थ पुण्य को हज़ार गुना बढ़ाता है और पाप को हज़ार गुना काटता है — और जो आप देनदारी की ओर जोड़ते हैं उसके साथ भी वही करता है।
जिन व्यवहारों का वह नाम लेता है, कारण सहित: पंडा, फूल वाले, ऑटो वाले और पंक्ति में पीछे खड़े व्यक्ति से झगड़ा — जिसकी कीमत वही दर्शन है जिसके लिए आप चले थे। घाट पर पान थूकना। तांत्रिक घाट के जल में कुल्ला या दातून। घाट के पास या उस रेत पर निवृत्ति जहाँ तक नदी पहुँचती है। धारा में खड़े होकर जप करने वालों के ऊपर जल फेंकना। जल-अपराधों पर वह सबसे अधिक कहता है: वरुण देवता का कोप सबसे तीव्र माना गया है, और हर घाट के अपने यक्ष रक्षक होते हैं।
और वह तर्क जिसे वह स्वीकार नहीं करता, क्योंकि वही सबसे अधिक दिया जाता है: सब करते हैं। उसका उत्तर है कि सब भुगतेंगे भी — कोई शीघ्र, कोई देर से — और किसी को दस वर्ष तक बचते देख लेना प्रमाण नहीं है।
सिद्ध की स्वतंत्रता की नकल सिद्ध का श्रम किए बिना मत कीजिए
सूक्ष्म भूल
तीर्थ-सामग्री में प्रवचन इस पर किसी भी दूसरी सावधानी से अधिक समय लगाता है, क्योंकि यही वह चूक है जो भक्ति जैसी दिखती है। वामा खेपा भगवती तारा को अपना जूठन खिलाते थे और उन्हें डाँटते थे, और लोग इससे यह निकालते हैं कि केवल भाव चाहिए, विधि नहीं। जो वे छोड़ देते हैं वह जीवनी है: सात वर्ष की अवस्था में महाश्मशान में दीक्षा, पंचमुंडी आसन मिलने से पहले की परीक्षाएँ, ऐसे गुरु के नीचे वर्षों का जप जो डाकिनियों के प्रकट होने पर उन्हें झकझोरकर उठा सके और कह सके कि ये तुम्हारी मौसी लगती हैं, और उस स्वतंत्रता से पहले तारा का प्रत्यक्ष दर्शन। भाव परिणाम था। उसे विधि की तरह उतारा जा रहा है।
इसकी नकल पर उसका निर्णय कोमल नहीं है — कि जो व्यक्ति सिद्ध का अनुशासन छोड़कर सिद्ध की छूट उतारता है वह महा अपराध ले रहा है, और सिखाते समय पचास और लोगों को साथ ले डूबता है। और इसके स्थान पर उसका निर्देश सौम्य है: विधि युक्त पूजा ही स्वीकार होता है, और उसी विधान पर चलते-चलते आगे जाकर के आप फिर उस दिव्य भाव को प्राप्त करते हैं।
इसका जो रूप आपको वास्तव में मिलेगा वह यह है कि लोग आपके जप को पाखंड कहेंगे, आपके अनुशासन को दिखावा, आपके पुरश्चरण को भटकाव, और कहेंगे कि माँ तो केवल “माँ” कहने से प्रसन्न हो जाती हैं। प्रवचन का उत्तर यह है कि सरलता आती अवश्य है — पाँच, दस, पंद्रह लाख जप पर, परिणाम के रूप में — और उसे आरंभ में ओढ़ा नहीं जा सकता।
जो अध्याय स्थानों का क्रम देता है, वही 15.8-15.10 में उन्हीं दस-दस गुने चरणों में काल का क्रम भी देता है — और बारहवाँ अध्याय फिर तीर्थ-दर-तीर्थ मास और राशि की खिड़की तय करता है। दोनों को साथ पढ़िए तो व्यावहारिक नियम अपने आप निकलता है: गुणक स्थान × काल है, और साधना को ऊँचा उठाने का सबसे सस्ता तरीका दोनों में से एक को बदल देना है। 15.7 भी ध्यान में रखिए, जो ग्रंथ का अपना संयमकारी वचन है और स्थान-विषयक नहीं, काल-विषयक है: कलियुग में कर्म सत्ययुग के फल का चौथाई देता है, और कलि का आधा बीत जाने पर उससे भी पादोन।
अवसर
वह कहाँ बैठता है
प्रवचन उसका क्या करता है
Source
साधारण शुद्ध दिन
आधार — शुद्ध अन्तःकरण वाले पुरुष का शुद्ध दिन में किया पुण्य समान, अघटित फल देता है (15.8)।
वह नित्य साधना जिस पर बाकी सब गुणा होता है। इससे नीचे कोई सोपान नहीं है और इसके साथ कोई दंड भी नहीं जुड़ा।
रवि-संक्रमण
साधारण दिन से दस गुना (15.8)।
वर्ष में बारह अवसर। प्रवचन समुद्र तट अथवा नदी-मुख पर स्नान के लिए प्रायः संक्रांति का ही नाम लेता है, और कामाख्या के सौभाग्य कुंड के लिए माघ, वैशाख और कार्तिक की संक्रांतियों का।
विषुव
संक्रमण से दस गुना (15.9)।
वर्ष में दो अवसर।
अयन
विषुव से दस गुना (15.9)।
दो अवसर।
मकर संक्रांति
अयन से दस गुना — बारह संक्रमणों में से इसे नाम लेकर अलग किया गया है (15.9)।
गंगासागर और कुंभ की खिड़की, और वह एक संक्रांति जिसे प्रवचन स्वयं पर्व मानता है।
चन्द्रग्रहण
मकर संक्रांति से दस गुना (15.9)।
ग्रहण इन प्रवचनों में मंत्र की खिड़की के रूप में काम आता है — क्षेत्र में जितना, घर पर भी उतना।
सूर्यग्रहण
सीढ़ी का शिखर: सूर्यग्रहण में उस उत्तम काल को पूर्ण फल देने वाला जाना जाता है (15.10)। श्लोक जो कारण देता है वह यह है कि जगद्रूप सूर्य का विष के साथ योग हुआ है — उन पर आया संकट ही उस समय किए कर्म को इतना फलदायी बनाता है।
सबसे दुर्लभ और सबसे ऊँचा। यदि सूर्यग्रहण और पर्वत-शिखर एक साथ पड़ जाएँ, तो दोनों सीढ़ियाँ एक ही क्षण में अपने शिखर पर हैं।
नदियों की खिड़कियाँ
बारहवाँ अध्याय हर तीर्थ के लिए एक तय करता है: मेष में सूर्य और गुरु होने पर नैमिष व बदरी; कर्क से सिंह में सूर्य आने पर सिन्धु; सिंह में गोदावरी; कन्या में यमुना और शोण; तुला में कावेरी; वृश्चिक में नर्मदा; धनु में सुवर्णमुखरी; मकर में जाह्नवी; माघ में कुंभ के सूर्य के साथ गंगा; मीन में कृष्णावेणी (12.20-31)।
ये क्यों हैं, इसका प्रवचन का पाठ स्पष्ट और संभवतः सही है: छोड़ दिया जाए तो व्यक्ति कभी जाता ही नहीं, इसलिए तिथि तय कर दी गई ताकि वह कम से कम एक बार जाए। कम से कम उसी बहाने जाकर नहा तो लो।
माघ में गंगा, कुंभराशि का सूर्य
12.29-30 में अलग से नामित: तब किया गया श्राद्ध, पिण्डदान अथवा तिलोदक भी दोनों वंशों के करोड़ों पितृ-कुलों का उद्धार करता है।
माघ-स्नान, कल्पवास और कुंभ के पितृ-कर्मों के नीचे यही शास्त्रीय आधार है।
अंबुवाची, चार दिन
इस संहिता में नहीं। कामाख्या का अपना पर्व, आषाढ़ में, लगभग जून के अंत में।
इन प्रवचनों में यह वर्ष का एकमात्र केंद्र-काल माना गया है जिस पर शक्ति-साधना घूमती है, और जो गृहस्थ जा नहीं सकते वे इसे घर से करते हैं: एक दिन पहले पूजन-स्थान तैयार, फिर चारों दिन अपना चल रहा पाठ और जप पूरी शक्ति से।
इस संहिता में नहीं। हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, नासिक; प्रयाग की खिड़की है मेष का बृहस्पति, मकर के सूर्य-चंद्र, और अमावस्या का योग।
कुंभ का एक स्नान कार्तिक में गंगा के हज़ार स्नान, माघ के सौ स्नान और वैशाख में नर्मदा के एक करोड़ स्नान के बराबर माना गया है — और प्रवचन के अपने शब्दों में यह मेला नहीं, पर्वकाल है।
लाइव सत्रों में जो प्रश्न आते हैं और इस विषय पर लोग वास्तव में जो खोजते हैं, उन्हीं से संकलित — वे भी जो धीरे से पूछे जाते हैं।
शिव महापुराण इसका उत्तर नाम के रूप में नहीं, क्रम-सूची के रूप में देता है। विद्येश्वर संहिता 15.1-15.5 मापी हुई सूची के शिखर पर पर्वत का शिखर रखती है — समुद्र-तट से दस गुना, जो सप्तगंगा से दस गुना, और इसी तरह नीचे शुद्ध घर तक; ग्यारह सोपान, प्रत्येक पिछले से दस गुना। और फिर 15.6 हर मापे गए सोपान के ऊपर एक ही वस्तु रखता है: वह स्थान जहाँ मन को रुचि हो।
यह टालना नहीं है। यह बता रहा है कि एक बिंदु के बाद चर पता नहीं रह जाता। प्रवचन का अपना व्यावहारिक रूप यही है: किसी उग्र मंत्र के दीक्षित साधक को सबसे शीघ्र परिणाम किसी उग्र शक्तिपीठ की बलि-वेदी के पास मिलता है, गृहस्थ को उस क्षेत्र में मिलता है जहाँ उसका अपना भाव सबसे प्रबल है, और दोनों को कुछ नहीं मिलता यदि वे पहुँचकर बैठकर जप न करें।
यदि इन प्रवचनों से एक ही नाम चाहिए तो उसका उत्तर विंध्याचल है — इस आधार पर कि भगवती वहाँ किसी गिरे हुए अंग के रूप में नहीं, अपने संपूर्ण स्वरूप में निवास करती हैं — और वही वह क्षेत्र है जहाँ वह सबसे अधिक भेजता है। किन्तु वह पहले यह कहेगा कि प्रश्न पूछने से पहले कहीं न कहीं सत्ताईस माला हो जानी चाहिए थीं।
हाँ, और ग्रंथ इसका अपेक्षा से कहीं अधिक समर्थन करता है। 15.1 शुद्ध घर को सीढ़ी का पूरा सोपान बनाता है — समफलम्, समान, अघटित फल — क्षमा माँगने योग्य कमी नहीं। 15.6 हर मापे गए स्थान के ऊपर उसे रखता है जहाँ मन को रुचि हो। 22.23 कहता है कि हर प्रसिद्ध तीर्थ बिल्व के मूल में निवास करता है। 24.78 भस्मस्नान को परम तीर्थ कहता है। 23.7 उस मुख को तीर्थ बनाता है जो “शिव” कहता है। 21.24 समस्त तीर्थों को एक पलड़े पर और अकेले लिंगार्चन को दूसरे पर रख देता है।
प्रवचन इसमें एक विशिष्ट निदान जोड़ता है — कि घर कब पर्याप्त नहीं। यदि तीन, चार, पाँच वर्ष से साधना चल रही है और कोई प्रभाव जीवन में उतर नहीं रहा, तो उसका पाठ यह है कि या तो प्रारब्ध या कोई चल रहा अभिचार मंत्र को उतरने नहीं दे रहा, और उसी घर में बैठे रहना — जिस घर में वह अवरोध है — इसे ठीक नहीं करेगा। ठीक यही वह स्थिति है जिसमें वह कहता है कि साधक को सदैव तीर्थ जाकर साधना करनी चाहिए। इसलिए नहीं कि घर अवैध है, बल्कि इसलिए कि वह विशेष अवरोध स्थान का है।
कम से कम एक रात — प्रवचन कहता है कि जिस तीर्थ में आप सोए नहीं वह पूरा नहीं हुआ। पुरश्चरण कर रहे हैं तो दो या तीन; कामाख्या के लिए वह विशेष रूप से तीन अहोरात्र माँगता है, और यह भी बताता है कि वहाँ पहला दिन तो केवल दर्शन में ही निकल जाएगा।
कठोर रूप: जिस दिन पुरश्चरण वास्तव में पूर्ण हो, उस रात रुकिए। भले दोपहर में पूरा हो जाए। कारण यह है कि लेखा-जोखा तभी होता है — क्या काटा जाएगा, आपके साथ क्या भेजा जाएगा — और संदेश, यदि आना है, उसी रात की निद्रा में आता है।
यदि सचमुच एक ही दिन है और रात नहीं, तब भी वह पूरा क्रम संक्षेप में माँगता है: स्नान, दर्शन, और फिर ठंड से बची हुई किसी जगह बैठकर जप, तब निकलिए।
नहीं — इस मार्गदर्शिका की दो बातों को छोड़कर बाकी सब के लिए। यात्रा की विधि, स्नान, दर्शन का क्रम, परिक्रमा, पहले से किए हुए मंत्र की सत्ताईस माला, दीपदान, अक्षत और पुष्प का अर्पण, मंदिर के सेवक से लौंग-कपूर का खप्पर भरवाना — इनमें से किसी के लिए दीक्षा नहीं चाहिए, और प्रवचन स्पष्ट कहता है कि स्त्रियाँ और यज्ञोपवीत न धारण करने वाले यह सब करते हैं।
दो अपवाद। बलिपीठ पर बैठकर किसी उग्र मंत्र का जप दीक्षितों के लिए है, और उनके लिए भी प्रवचन स्पष्ट अस्वीकरण और पात्रता-कसौटी जोड़ता है। अपने हाथ से खप्पर भरना अथवा स्वयं कारण अर्पित करना भी वैसा ही है — अन्यथा मंदिर का सेवक आपके नाम से करता है।
यह जोड़ने योग्य है क्योंकि लोग उल्टा मान लेते हैं: देव-दीक्षा स्वयं स्थान से बँधी नहीं है। प्रवचन काशी, गिरनार, विंध्याचल, किसी भी शक्तिपीठ, किसी भी ज्योतिर्लिंग, सिद्धपीठ, मंदिर, गुरु के घर — अथवा अपने घर — को इसके लिए समान रूप से वैध बताता है।
यदि आप गृहस्थ हैं: नहीं, और यह प्रवचन इसे सिखाता ही नहीं। वह सीधे कहता है — हम यहां कोई पंचमुंडी आसन नहीं बताते हैं कि भैया ऐसे करना, श्मशान में जा के ये कर लेना — कभी नहीं। जिनके घर में बाल-बच्चे और माता-पिता हैं उनसे वह सामान्य रूप से श्मशान से दूरी बनाए रखने को कहता है, और कठोर वर्जनाएँ नाम लेकर बताता है: तीन मास से अधिक की गर्भवती स्त्री, और वह पुरुष जिसके यहाँ संतान होने वाली है, उसमें अथवा उसकी सीमा के भीतर के मंदिरों में प्रवेश न करें।
दो भेद महत्त्वपूर्ण हैं। किसी तीर्थ का अपना महाश्मशान — काशी का मणिकर्णिका, उज्जैन का चक्रतीर्थ, तारापीठ का — उस क्षेत्र का अंग है और निषेध का विषय नहीं है। और श्मशान की सीमा आरंभ होने से पहले खड़े भैरव या काली मंदिर की नित्य सेवा में कोई दोष नहीं; भीतर वाले में है।
ग्रंथ क्या कहता है: जो अध्याय पुण्यक्षेत्र की परिभाषा और वहाँ के उचित कर्म देता है (12.3-5), उसमें श्मशान, पंचमुंडी आसन अथवा शव-आसन कहीं नहीं है। यह customary के रूप में अंकित है, खंडन के रूप में नहीं — श्मशान साधना प्राचीन और परंपरा-सिद्ध है, वह बस इस संहिता का विषय नहीं है।
संख्याएँ ग्रंथ-भेद से भिन्न हैं — एक परंपरा में 51, तंत्रचूड़ामणि में 52, देवी भागवत में 108 — और स्थानीय स्थल-पुराण कभी-कभी तीनों से असहमत होते हैं कि कौन सा अंग कहाँ गिरा। इस मार्गदर्शिका का कोई कथन उत्तर पर निर्भर नहीं है, और उस स्रोत पर संदेह कीजिए जो चुपचाप तीनों सूचियाँ मिलाकर एक तालिका बना दे और उसे प्राचीन सर्वसम्मति कहे।
जानने योग्य यह है कि विद्येश्वर संहिता पवित्र भूमि को उस कथा से निकालती ही नहीं। उसका अपना विवरण 12.3-4 में है — कि शिव यहाँ-वहाँ, वहाँ के निवासियों के मोक्ष के लिए, क्षेत्र की रचना करते हैं, और ऐसे क्षेत्र चार प्रकार से बनते हैं: ऋषि-परिग्रह, देव-परिग्रह, स्वयम्भू, अथवा अन्यथा उत्पन्न। इस परिभाषा को किसी गिनती की आवश्यकता नहीं, और यह उस बहुत सारी भूमि को समेटती है जो किसी शक्तिपीठ-सूची में नहीं है।
व्यवहार में प्रवचन की सलाह यही है कि कौन सी सूची सही है यह पूछना छोड़िए और यह पूछिए कि वह आसन भरा हुआ और सेवित है या नहीं — जागृत पीठ वाला पत्रक देखिए।
शक्तिपीठ वे स्थान हैं जहाँ भगवती सती के अंग गिरे थे।
परम्परा में सत्य, और इस संहिता में अनुपस्थित। विद्येश्वर संहिता का अपना विवरण 12.3-4 का चतुर्विध विवरण है, और सती की कथा यहाँ कही ही नहीं गई — वह रुद्र संहिता के सती खण्ड और देवी-साहित्य का विषय है, जहाँ संख्याएँ स्वयं ग्रंथ-भेद से भिन्न हैं (51, 52, 108)। इस पृष्ठ का कोई कथन इस पर निर्भर नहीं है; विद्येश्वर संहिता जो देती है वह पवित्र भूमि की ऐसी परिभाषा है जिसे उस कथा की आवश्यकता ही नहीं।
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2
पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा सशैलवनकानना ।शिवाज्ञया हि पृथिवी लोकं धृत्वा च तिष्ठति ॥
पचास करोड़ योजन विस्तृत, पर्वत-वन-कानन सहित यह पृथ्वी शिव की आज्ञा से लोक को धारण करके स्थित है।
जहाँ-जहाँ शिवक्षेत्र है, वहाँ-वहाँ के निवासियों के मोक्ष के लिए कृपापूर्वक प्रभु देव ने वह क्षेत्र रचा है।
4
परिग्रहाद् ऋषीणां च देवानां च परिग्रहात् ।स्वयम्भूतान्यथान्यानि लोकरक्षार्थमेव हि ॥
ऋषियों के परिग्रह से, और देवताओं के परिग्रह से, या स्वयम्भू, या अन्यथा उत्पन्न — ये सभी केवल लोकरक्षा के लिए हैं।
हाँ, और यह प्रवचन इस आपत्ति को स्थान ही नहीं देता। स्त्रियाँ इन आसनों पर यात्रा, स्नान, जप, परिक्रमा और पाठ करती हैं। माला और प्रसाद आँचल में, दाहिनी ओर से लेने का निर्देश — विवाहित हो या अविवाहित — दर्शन-विधि के अंग के रूप में स्त्रियों को दिया गया है, उन पर प्रतिबंध के रूप में नहीं।
जहाँ स्त्री को कुछ न करने को कहा गया है, वहाँ कारण कभी उसका स्त्री होना नहीं है। प्रमुख विग्रह का स्पर्श पुरुषों पर भी उतना ही वर्जित है और वह अधिकार का विषय है, लिंग का नहीं — भैरव मंदिर की सेवा पर यही आपत्ति उठने पर प्रवचन इसे इन्हीं शब्दों में कहता है। तीन मास से अधिक की गर्भावस्था में श्मशान में प्रवेश का निषेध होने वाले पिता पर भी है। और जहाँ कारण अर्पित करना है और उन्हें विधि नहीं आती, वहाँ उत्तर यह दिया गया है कि किसी से मँगवा लीजिए — छोड़ दीजिए, यह नहीं।
वस्त्र के विषय में उन्हें जो एक बात कही गई है वह वही है जो पुरुषों को दूसरे रूप में कही गई है: सीधा पल्लू और प्रमुख विग्रह के सामने सिर पर आँचल, ठीक उसी कारण से जिस कारण धोती — बिना सिला वस्त्र, ताकि जो दिया जा रहा है वह गतिमान हो सके।
क्योंकि, प्रवचन के सीधे पाठ में, आपने ओवरडोज़ ले लिया है। आपने तीन दिनों में, ऐसी भूमि पर जिसकी ऊर्जा-सघनता वह आपके अपने घर से लगभग सौ गुना बताता है, उतनी साधना कर ली जिसका आपके तंत्र को अभ्यास नहीं। जो उतार आता है — सपाटपन, बेचैनी, अकेलापन, अरे वहीं ठीक था — उसे वह उचाटन कहता है और साधक के लिए सामान्य मानता है, बुरा लक्षण नहीं। अपेक्षा रखिए, घबराइए मत, उतरने दीजिए।
यदि लगभग सप्ताह भर में न उतरे, तो उसके व्यावहारिक चरण हैं: शरीर से उतारा; चल रही दशा-अंतर्दशा दिखवाना और चलित कुंडली में चंद्र की स्थिति — 6, 8 या 12 को वह नाम लेकर बताता है — और उसके अनुसार दान। और यही वह विशेष बिंदु है जहाँ वह कहता है कि गुरु की वास्तविक आवश्यकता है: इतनी सघन ऊर्जा को नियंत्रित करना मंत्र देने से अलग कौशल है।
अलग स्थिति यह है कि यात्रा के बाद सचमुच कोई कष्ट आ जाए। वहाँ प्रवचन का उत्तर यह है कि प्रायः कोई बड़ा आघात छोटे में बदलकर निपट रहा होता है, और जो चीज़ छोटे सुधार को लंबी समस्या में बदल देती है वह है यात्रा, स्थान या देवता को कोसना। यदि कोई वास्तविक अपराध पहचान में आए, तो उस क्षेत्र के भैरव के पास जाइए।
नहीं — और तीर्थ के पूरे विषय में इन प्रवचनों की सबसे ज़ोरदार चेतावनी यही है। किसी प्रसिद्ध क्षेत्र के परिक्रमा मार्ग पर या किसी स्थान के पास पड़ा सिक्का, नोट, चाँदी या सोने का टुकड़ा, गिरा हुआ रुद्राक्ष, कलावा — उसके पाठ में प्रायः उतारा होता है: घर का प्रेत, पिशाच अथवा ब्रह्म उस वस्तु पर उतारकर, जान-बूझकर वहाँ छोड़ा गया, इस हेतु कि जो उठाए उसके साथ चला जाए। जो उठाए, उसके साथ वह जाए।
उसका तर्क कठिन है: सोने का सिक्का कोई मंदिर में गिराकर, बिना खोजे, आगे नहीं बढ़ जाता। नियम है — उठाइए मत, छूइए मत, लाँघिए मत। बहुत ही इच्छा हो तो मंदिर-प्रबंध को दे दीजिए और छोड़ आइए।
यही उस सुंदर पत्थर पर लागू है जिसे आप शालिग्राम कहने वाले थे, किसी छोटे शिवलिंग पर, आभूषण पर, और मंदिर के पुरोहितों के किसी भी पात्र पर। यदि कोई लोटा भूल से घर आ जाए, तो सुधार यह है कि उसके बदले पाँच का दान कीजिए।
प्रवचन का उत्तर है नहीं: शक्तिपीठ में जब जा सकें तब जाइए, और कामाख्या के विषय में वह विशेष रूप से कहता है कि ब्रह्मपुत्र में स्नान के लिए नवरात्रि की प्रतीक्षा मत कीजिए — जब जाइए तब पुण्य ही पुण्य है। पंचांग को वह उन्हीं स्थानों के लिए रखता है जहाँ विशेष काल का विधान दिया गया है।
ग्रंथ आधा इसके साथ है और आधा इसके विरुद्ध, और दोनों भाग जानने योग्य हैं। समर्थन में: 12.5 तीर्थ और क्षेत्र के विषय में स्नान, दान और जप को सदा कार्यम् कहता है, बिना किसी तिथि के। विरुद्ध में: यही अध्याय तीर्थ-दर-तीर्थ मास और राशि की खिड़की तय करता है (12.20-31), और 15.8-10 काल का तारतम्य स्थान जितना ही तीव्र रखता है। ग्रंथ कहीं भी किसी स्थान-वर्ग को काल से मुक्त नहीं करता।
समाधान, और संभवतः प्रवचन का वास्तविक आशय, यह है: ऐसे स्थान पर आपको तिथि की प्रतीक्षा नहीं करनी है। यह 12.5 पर ठीक है। इससे यह नहीं निकलता कि तिथि से कोई अंतर नहीं पड़ता — ऊपर काल का तारतम्य देखिए, जहाँ सूर्यग्रहण साधारण दिन से एक करोड़ गुना ऊपर बैठा है।
शक्तिपीठ में तिथि, नक्षत्र या वार देखने की आवश्यकता ही नहीं — वहाँ किसी भी दिन का कोई भी क्षण समान फलदायी है।
आधा समर्थित, आधा विरोध में — और पाठक को दोनों जानने चाहिए। समर्थन में: 12.5 तीर्थ और क्षेत्र के विषय में स्नान, दान और जप को "सदा कार्यम्" कहता है, बिना किसी तिथि के। विरोध में: यही अध्याय तीर्थ-दर-तीर्थ मास और राशि की खिड़की तय करता है (मेष में नैमिष व बदरी, सिंह में गोदावरी, कन्या में यमुना व शोण, तुला में कावेरी, वृश्चिक में नर्मदा, मकर में जाह्नवी, माघ में गंगा), और 15.8-10 काल का तारतम्य स्थान जितना ही तीव्र रखता है। ग्रंथ कहीं भी किसी स्थान-वर्ग को काल से मुक्त नहीं करता। प्रवचन जो वास्तव में कह रहा है वह संकुचित और 12.5 पर ठीक है: ऐसे स्थान पर आपको तिथि की <em>प्रतीक्षा</em> नहीं करनी है।
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20
नैमिषे बदरे स्नायान्मेषगे च गुरौ रवौ ॥
मेषराशि में सूर्य और बृहस्पति दोनों के होने पर नैमिष और बदरी में स्नान करना चाहिए।
21
ब्रह्मलोकप्रदं विद्यात्ततः पूजादिकं तथा ।सिन्धुनद्यां तथा स्नानं सिंहे कर्कटगे रवौ ।केदारोदकपानं च स्नानं च ज्ञानदं विदुः ॥
उसे, और उसके बाद के पूजादि को, ब्रह्मलोक देने वाला जानना चाहिए। वैसे ही कर्कराशि से सिंहराशि में सूर्य के आने पर सिन्धु नदी में स्नान करना चाहिए; और केदार का जलपान तथा स्नान ज्ञानदायक जाना जाता है।
22
गोदावर्यां सिंहमासे स्नायात्सिंहबृहस्पतौ ॥
सिंहराशि के बृहस्पति में, सिंह मास में गोदावरी में स्नान करना चाहिए।
23
शिवलोकप्रदमिति शिवेनोक्तं तथा पुरा ।यमुनाशोणयोः स्नायाद् गुरौ कन्यागते रवौ ॥
“यह शिवलोक देने वाला है” — ऐसा शिव ने स्वयं पूर्वकाल में कहा था। कन्याराशि के बृहस्पति और सूर्य में यमुना और शोण में स्नान करना चाहिए।
24
धर्मलोके दन्तिलोके महाभोगप्रदं विदुः ।कावेर्यां च तथा स्नायात्तुलागे तु रवौ गुरौ ॥
यह धर्मलोक और गणेशलोक में महाभोग देने वाला जाना जाता है। और वैसे ही तुलाराशि के सूर्य और बृहस्पति में कावेरी में स्नान करना चाहिए।
“यह शिवलोक देने वाला है” — ऐसा ब्रह्मा का वचन है। ब्रह्मा और विष्णु के पद को भोगकर, उसके अन्त में ज्ञान प्राप्त होता है।
29
गङ्गायां माघमासे तु तथा कुम्भगते रवौ ।श्राद्धं वा पिण्डदानं वा तिलोदकमथापि वा ॥
गंगा में, माघ मास में, तथा कुम्भराशि के सूर्य में — श्राद्ध, या पिण्डदान, या तिलोदक भी,
30
वंशद्वयपितॄणां च कुलकोट्युद्धरं विदुः ।कृष्णावेण्यां प्रशंसन्ति मीनगे च गुरौ रवौ ॥
— वंश-द्वय के पितरों के करोड़ों कुलों का उद्धार करने वाला जाना जाता है। मीनराशि के सूर्य और बृहस्पति में कृष्णावेणी में [ऐसे कर्मों] की प्रशंसा की जाती है।
31
तत्तत्तीर्थे च तन्मासि स्नानमिन्द्रपदप्रदम् ।गङ्गां वा सह्यजां वापि समाश्रित्य वसेद् बुधः ।तत्कालकृतपापस्य क्षयो भवति निश्चितम् ॥
उस-उस तीर्थ में उस-उस मास में स्नान इन्द्रपद देने वाला है। बुद्धिमान पुरुष गंगा का, या सह्यजा (कावेरी) का आश्रय लेकर निवास करे; तब उस समय तक किया गया पाप निश्चय ही नष्ट हो जाता है।
ये अलग-अलग चीज़ों के अलग-अलग दावे हैं। शक्तिपीठ देवी-साहित्य में भगवती सती के किसी अंग के गिरने से पहचाना जाता है — उत्पत्ति का दावा। सिद्धपीठ वह स्थान है जहाँ साधना बार-बार सफल हुई — परिणाम का दावा, इसीलिए सूचियाँ परंपरा-भेद से भिन्न हैं और इसीलिए एक अकेली गुफा या वृक्ष भी सिद्धपीठ हो सकता है। ज्योतिर्लिंग शिव के बारह स्वयम्भू लिंगों में से एक है — और ध्यान दीजिए कि 11.56 स्वयम्भू लिंग को एक हजार धनुष का क्षेत्र देता है, दैव लिंग से दस गुना और मानुष लिंग के सौ हाथ से कहीं अधिक। जागृत पीठ इनमें से कोई श्रेणी नहीं, यह निर्णय है कि वहाँ अधिष्ठात्री शक्ति वास्तव में उत्तर दे रही है।
व्यावहारिक परिणाम: ज्योतिर्लिंग में स्पर्श प्रायः अनुमत है और अन्यत्र प्रायः नहीं; शक्तिपीठ में जप रात्रि का काम है और वहाँ प्रायः बलि-वेदी होती है, जो उस स्थल की सबसे उग्र भूमि है; और इनमें से किसी में भी क्षेत्र भवन से कहीं आगे तक फैला होता है।
तंत्र का अर्थ है व्यवस्था — वही शब्द जो “ईकोसिस्टम” में है — और प्रवचन की स्थिति यह है कि आगमिक पद्धति रक्षा करने और उन्नति कराने के लिए है, और वह मुख्यतः इसलिए किसी अशुभ चीज़ का पर्याय बन गई क्योंकि दो देवताओं, काली और भैरव, को उसका सार्वजनिक चेहरा बना दिया गया। वह यह मानने में स्पष्ट है कि कामाख्या के तंत्र पर गोपनीयता का एक वास्तविक कारण था: अप्रशिक्षित लोगों को उग्र साधना से दूर रखना। उसका आज का निर्णय यह है कि उस गोपनीयता से बचे अर्ध-सत्य अब उससे अधिक हानि कर रहे हैं जितनी गोपनीयता ने रोकी थी — और इसीलिए वह इस स्थान पर खुलकर बात करता ही है।
जिस बात से सचमुच सावधान रहना है वह विशिष्ट और छोटी है। बलिपीठ उस पर्वत की सबसे सघन भूमि हैं और पहली यात्रा के लिए नहीं हैं। छिन्नमस्तिका का गर्भगृह गहरा, अंधकारमय अवतरण है और अत्यंत उग्र बताया गया है। वहाँ यह देखने के लिए प्रयोग मत कीजिए कि क्या होता है — प्रवचन के अपने शब्द हैं कि यदि आप जाँचने के लिए गए तो जो होगा उसका वह उत्तरदायित्व नहीं लेता। और मंडप में बलि चढ़े महिषों के मुंड देखकर घृणा मत कीजिए; वहाँ जो अर्पित है उससे घृणा करना स्वयं अपराध बताया गया है।
कामाख्या का बाकी सब कुछ — कुंड, आरोहण, दस पीठ, जल — असामान्य रूप से पूरी विधि वाली सामान्य तीर्थयात्रा है, और वह विधि प्रवचन पूरी देता है।
हाँ, दो शर्तों के साथ। पहली, लाने से पहले दक्षिणा — ₹1, ₹11, जितना बन पड़े — और वह आराध्य को अर्पित होती है, पंडित जी को नहीं, जिन्हें जो देना था वह पहले ही दिया जा चुका है। क्षेत्र की कोई वस्तु बिना मूल्य के बाहर नहीं जाती।
दूसरी, केवल वही लीजिए जो लेने योग्य है, और विधि से लीजिए। तीर्थ का जल, प्रमुख देवता का चरणोदक, कामाख्या के कुंड का जल, भस्म, और विधिपूर्वक ली गई मिट्टी — ये सब ठीक हैं। जो नहीं: ज़मीन पर पड़ी कोई भी वस्तु, मंदिर का कोई भी पात्र, और — इस पर प्रवचन विशेष है — लापरवाही से खुरची गई मिट्टी अथवा किसी का बनाकर छोड़ा हुआ पिंड।
उसी का जप कीजिए जो पहले से आपके पास है। प्रवचन का निर्देश स्पष्ट है और लोगों को चौंकाता है: जीवन में किसी भी समय आपने जिस मंत्र का पुरश्चरण किया हो — 11,000 का या 11 लाख का, पाँच वर्ष पहले सावन में, या कठिनाई के एक दशक से पहले — वही आप क्षेत्र में बैठकर दोहराते हैं। अंतराल से कोई अंतर नहीं पड़ता। आप वहाँ जो कर रहे हैं वह है एक चल रही साधना को ऐसी भूमि पर ले आना जो उसे गुणित करती है, नया खाता खोलना नहीं।
यदि कोई मंत्र है ही नहीं, तो प्रवचन के विकल्प हैं — देवता का नाम, कोई स्तोत्र जो आता हो, कोई पुण्य-श्लोक, अथवा पंचाक्षरी, जिसे वह हर जगह सबके लिए कहता है। और देवी-आसन पर विशेष रूप से मंत्र-सिद्धि के लिए वह आपके अपने स्वरूप के अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। का नाम लेता है — हर संप्रदाय के लिए, केवल शाक्तों के लिए नहीं।
जहाँ मंत्र में कोई दोष है — दीक्षा की किसी त्रुटि से या अन्यथा — वहाँ कामाख्या में दिया गया निर्देश यह है कि पीठ में उठते जल का स्पर्श करके वहीं दस बार जप कर लीजिए। दस।
नहीं, और प्रवचन की सलाह है कि योजना बनाना छोड़िए और जाइए। विलंब का उसका पाठ कठोर है पर निराशावादी नहीं: यदि आप सचमुच असमर्थ थे तो आप पर कुछ नहीं; यदि आप समर्थ थे और ऋतु-दर-ऋतु टालते रहे जबकि जीवन का बाकी सब चलता रहा, तो अब जो अनुभव हो रहा है — काम में अड़चन, स्वास्थ्य, जो माँगा था वही संकट में, और उपाय जो चलते नहीं — वही उस वचन का लागू होना है ताकि आपको याद आ जाए। जितना विलंब, उतना संचय।
दो व्यावहारिक बातें वह कहता है। वचन आने का था, आराम से आने का नहीं: जनरल डिब्बा उसे निभाने का पूरा तरीका है, और “जब ठीक से कर सकेंगे तब जाएँगे” — इसी में पाँच वर्ष निकलते हैं। और आपकी माँ या दादी का किया हुआ वचन भी घर पर वचन ही है — प्रवचन की टिप्पणी है कि भूली हुई मनौती की क़ीमत प्रायः वह नहीं चुकाता जिसने वह की थी।
ज्योतिर्लिंग में स्पर्श प्रायः दिया जाता है और उसमें कोई दोष नहीं। बाकी हर जगह प्रवचन मना करता है, और निर्देश के बजाय दो कारण देता है।
पहला अधिकार का है: ऐसे हर स्थान पर एक शृंगारिया परिवार है जिसे विग्रह छूने का अधिकार है, और वह इसलिए है कि वह परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी वे नियम रखता है और चूकने पर उत्तरदायी होता है। वीआईपी मार्ग से खरीदा गया स्पर्श वह अधिकार हस्तांतरित नहीं करता।
दूसरा अधिक काम का है — पारस वाला तर्क। पारस लोहे को सोना बनाता है और एल्युमिनियम को कुछ नहीं करता; पारस चर नहीं है। तो प्रश्न यह है कि आपके भीतर वह गुण है क्या जिस पर वह स्पर्श काम करे — और प्रवचन की शुष्क टिप्पणी है कि बहुत सारे लोग इन विग्रहों को अपने कामकाजी जीवन में प्रतिदिन छूते हैं, और उनकी स्थिति देखी जा सकती है।
इसके स्थान पर: आँख खोलिए, विग्रह के नेत्रों से नेत्र मिलाइए, वहीं माँगिए, और अपना पुष्प चरणों में रख दीजिए। और यदि स्पर्श मिल ही जाए — और वह कहता है कि लाखों जप कर चुके साधक को उससे लाभ हो भी सकता है — तो उसे धन माँगने में मत गँवाइए। यह माँगिए कि भक्ति न छूटे। बाकी सब, वह कहता है, उसी से बनता है।
नहीं। प्रवचन स्पष्ट कहता है कि यदि आप घूमने जा रहे हैं तो इस मार्गदर्शिका का कोई अनुशासन आप पर लागू नहीं है और आपको आनंद करना चाहिए। उसकी आपत्ति तीसरी चीज़ पर है — पर्यटक की तरह जाना और तीर्थ का फल माँगना, और फिर शिकायत करना कि तीर्थ से कुछ नहीं हुआ।
नियम संकल्प के पीछे चलते हैं, गंतव्य के पीछे नहीं। यदि आप घर से तीर्थ के संकल्प के साथ निकले हैं तो भोजन, शुद्धता और जप के नियम आपके अपने द्वार से लागू हैं। यदि नहीं निकले, तो नहीं हैं।
जहाँ वह अधिक तीखा होता है वह उन व्यवहारों पर है जो दूसरों को हानि पहुँचाते हैं: संगम को स्विमिंग पूल बना देना — उन साधकों के सिर के ऊपर जो धारा में खड़े जप कर रहे हैं; घाटों पर थूकना; पहाड़ी मार्ग के मन्नत-स्थानों पर पत्थर मारना। यह पर्यटन नहीं है, और इनके विषय में वह 12.36 का ही उल्लेख करता है।
प्रवचन का अपना उत्तर, जिसे वह गूढ़ मंत्र कहकर देता है और जो स्पष्टतः इस विषय पर उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण बात है: भौतिक माँग नहीं। आप उस शक्ति के सामने खड़े हैं जिसके पीछे मणिद्वीप की संपदा है, और आप एक बाइक माँगने वाले हैं।
उसके स्थान पर सामर्थ्य माँगिए, और यह कि भक्ति न छूटे: हे जगदंबा, आप हमें ऐसी भक्ति प्रदान कीजिए कि जीवन में आप चाहे कितनी भी परीक्षा लें, हमारे हृदय से आपकी भक्ति डिगे नहीं — एक क्षण के लिए भी आप हमारे हृदय से हटे ही ना। उसका तर्क यह है कि यदि वे हृदय में बैठ गईं तो शेष अपने आप बन जाता है; जबकि छोटी वस्तु माँगने पर वह छोटी वस्तु मिल जाती है और आप उसी में उलझे रह जाते हैं।
वह ऐसा क्यों कहता है, इसकी अपनी उपमा भी देता है: मार्गदर्शक पिता तुल्य है, और पिता अपने पुत्र को सौ रुपये के पीछे नहीं दौड़ाता जब सौ करोड़ उपलब्ध हो। उसी के पीछे दौड़िए जिसके मिल जाने पर बाकी सब तुच्छ हो जाए।
प्रवचन दो चीज़ों में भेद करता है। लघु पुरश्चरण — न्यूनतम 27 माला, और मंत्र छोटा हो तो दिन में 50 या 100 — वह सबसे माँगता है, और उसके लिए तीन दिन पर्याप्त से अधिक हैं। पूर्ण पुरश्चरण सवा लाख या पाँच लाख का अलग काम है, और तीन दिन न्यूनतम तथा पूर्ण होने की रात रुकने की बात वह उसी के लिए कहता है।
जो व्यक्ति हर बार आरंभ ही नहीं कर पाता क्योंकि कुछ न कुछ आ जाता है, उसके लिए उसकी सलाह है कि संकल्प घटाइए, ठेलिए मत: तीन दिन, पाँच, सात, अथवा किसी स्वस्थ दिन का एक दिवसीय अनुष्ठान। बड़ा साधना मत उठाइए। क्षेत्र में पूरा किया गया छोटा अनुष्ठान अधूरे छोड़े गए बड़े से अधिक मूल्य का है।
दूसरे दिन से समय नियत कीजिए और उस पर टिकिए। किसी भी क्षेत्र में पहला दिन अव्यवस्थित रहता है — दर्शन की पंक्ति, पहुँचना, जल — और प्रवचन कहता है कि इसके कारण उस दिन कुछ भी जप न करना ठीक नहीं।
प्रवचन वह मत रखता है कि आज दिखने वाला हर तीर्थ छाया है — उसी स्थान पर उपस्थित किसी असली तीर्थ की छाया, जो सामान्य दृष्टि से ओझल है — और यह भी कि मूल का तेज कलियुग का शरीर वैसे भी सह न पाता। वह उसी साँस में यह भी कहता है कि उस छाया का प्रभाव भी कल्पना से कई गुना अधिक है, और कृपा प्राप्त होने पर मूल दृश्य हो जाता है।
इसे ग्रंथ के अपने कथन के साथ रखिए, जो स्थान-विषयक नहीं, काल-विषयक है। 15.7: कलियुग में कर्म सत्ययुग के फल का चौथाई देता है, और कलि का आधा बीत जाने पर उससे भी पादोन। यह कर्म पर छूट है, सर्वत्र समान रूप से लागू — यह दावा नहीं कि स्थान हट गए हैं। और 12.32 कहता है कि रुद्रलोक देने वाले क्षेत्र अनेक स्थानों में हैं, वर्तमान काल में, और वहाँ निवास को एक सहज उपलब्ध कर्म की तरह रखता है।
दोनों में से कुछ भी करने योग्य को नहीं बदलता। दस-अरब गुने सोपान का चौथाई भी दस-अरब गुना सोपान ही है।
इनमें से प्रत्येक को उसी से मिलाकर देखा गया है जिस पर उसे टिकना चाहिए — जहाँ कथन साधना के विषय में है वहाँ प्रवचन से, और जहाँ वह ग्रंथ के विषय में है वहाँ छपे हुए श्लोक से। जहाँ ग्रंथ किसी बात को कहता ही नहीं, वहाँ वही अंकित है, उसे ढँका नहीं गया।
तीर्थ पाप धोता नहीं — वहाँ जो भी किया जाए उसे दोनों दिशाओं में बढ़ाता है
यही भार उठाने वाली भ्रांति है, और इसका सुधार पूरी यात्रा का ढंग बदल देता है। प्रचलित समझ यह है कि तीर्थ एक धुलाई है: जाइए, स्पर्श कीजिए, पाप गया। ग्रंथ इसे उल्टा रखता है और पूरी स्पष्टता से रखता है — पुण्यक्षेत्रे कृतं पुण्यं बहुधा ऋद्धिमृच्छति, पुण्यक्षेत्रे कृतं पापं महदण्वपि जायते (12.36)। और 12.7 इसे और आगे ले जाता है: क्षेत्र में किया गया पाप और भी दृढ़ हो जाता है, इसलिए वहाँ रहते हुए अणुमात्र भी पाप न करे।
प्रवचन ठीक यही कहता है — तीर्थ पुण्य को हज़ार गुना बढ़ाता है और पाप को हज़ार गुना काटता है, और जो आप वहाँ जोड़ते हैं उसके साथ भी वही करता है। इसीलिए पंक्ति का झगड़ा, घाट पर थूकना, ज़मीन से उठाई गई वस्तु, और यात्रा के बाद देवता को कोसना — ये छोटी बातें नहीं रह जातीं। 12.35 शर्त भी जोड़ देता है: सदाचार, सद्वृत्ति और सद्भावना से ही वहाँ निवास करे, अन्यथा वह फल नहीं मिलता।
नदी-मुख पुराण का सर्वोच्च स्थान नहीं है — पर्वत-शिखर है, और उससे ऊपर मन
यह प्रवचन के विरुद्ध जाता है और इसीलिए अंकित है, क्योंकि इसे जाँचा जा सकता है। प्रवचन नदी के समुद्र से मिलन को शिव पुराण की अपनी क्रम-सूची का शिखर बताता है, इस आधार पर कि समुद्र विष्णु का अंश है और नदियाँ देवी-स्वरूपा।
जो अध्याय वही क्रम-सूची है, वह कुछ और कहता है। 15.5: ततोऽब्धितीरे दश च पर्वताग्रे ततो दश — समुद्र-तट सप्तगंगा से दस गुना, और पर्वत-शिखर उससे भी दस गुना। और 15.6 दोनों से ऊपर उस स्थान को रखता है जहाँ मन को रुचि हो। समुद्र-तट वास्तव में क्रम में बहुत ऊँचा है; वह शिखर नहीं है, और अध्याय संगम को अलग श्रेणी के रूप में नाम ही नहीं देता।
यह छोटी बात लग सकती है और है नहीं: यही अंतर तय करता है कि कोई यात्रा गंगासागर की योजना बनाए या विंध्य के त्रिकोण की।
नदी का समुद्र से मिलन शिव पुराण का सर्वोच्च साधना-स्थान है।
प्रवचन नदी-मुख को पुराण की अपनी क्रम-सूची का शिखर बताता है। जो अध्याय वह क्रम-सूची है, वह समुद्र-तट को पर्वत-शिखर से एक सोपान नीचे रखता है (15.5 — "ततोऽब्धितीरे दश च पर्वताग्रे ततो दश"), और दोनों से ऊपर उस स्थान को रखता है जहाँ मन को रुचि हो (15.6)। समुद्र-तट वास्तव में क्रम में है और शिखर के अत्यन्त निकट है; किन्तु अध्याय संगम को अलग श्रेणी के रूप में नाम ही नहीं देता, और तट को सर्वोच्च नहीं कहता।
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5
सिन्धुश्च सरयू रेवा सप्त गङ्गाः प्रकीर्तिताः ।ततोऽब्धितीरे दश च पर्वताग्रे ततो दश ॥
सिन्धु, सरयू और रेवा — ये सात गंगाएँ कही गई हैं। उससे समुद्र का तट दस गुना है, और उससे पर्वत का शिखर दस गुना है।
6
सर्वस्मादधिकं ज्ञेयं यत्र वा रोचते मनः ।कृते पूर्णफलं ज्ञेयं यज्ञदानादिकं तथा ॥
इन सबसे भी अधिक वह स्थान जानना चाहिए, जहाँ मन को रुचि हो। सत्ययुग में यज्ञ, दान आदि को पूर्ण फल देने वाला जानना चाहिए।
बलिपीठ वाला निर्देश परंपरा का है, पुराण का नहीं — और संहिता उसका खंडन भी नहीं करती
स्थान के विषय में इन प्रवचनों का सबसे प्रभावशाली एकल कथन यह है कि किसी शक्तिपीठ की बलि-वेदी के पास बैठकर जप करने से मंत्र अन्यत्र से शीघ्र पकता है और बड़े से बड़ा श्राप भी तत्काल भस्म होता है।
जिस अध्याय में स्थानों का तारतम्य है उसमें इसका कोई आधार नहीं है। वह सूची है — घर, गोशाला, जलतीर, वृक्षमूल, देवालय, तीर्थतट, नदी, तीर्थनदी, सप्तगंगा, समुद्रतट, पर्वतशिखर, और फिर जहाँ मन रुचे। बलिपीठ, शक्तिपीठ अथवा श्मशान उसमें कहीं नहीं।
इसे customary के रूप में अंकित किया गया है, न कि खंडित के रूप में, और यह भेद महत्त्वपूर्ण है। यह विधान शाक्त और कौल परंपरा का है, जिसका अपना स्वतंत्र आधार है, और यह संहिता उसका न विधान करती है न निषेध। प्रवचन स्वयं इसके साथ अस्वीकरण और पात्रता-कसौटी जोड़ता है, जो इस बात का संकेत है कि वह भी इसे किसी और श्रेणी की वस्तु मानता है।
शक्तिपीठ की बलि-वेदी के पास बैठकर जप करने से बड़े से बड़ा श्राप भी भस्म होता है और मंत्र अन्यत्र से शीघ्र सिद्ध होता है।
स्थान के विषय में इन प्रवचनों का सबसे प्रभावशाली निर्देश यही है, और जिस अध्याय में स्थानों का तारतम्य दिया गया है उसमें इसका कोई आधार नहीं है। वह सूची है — घर, गोशाला, जलतीर, वृक्षमूल, देवालय, तीर्थतट, नदी, तीर्थनदी, सप्तगंगा, समुद्रतट, पर्वतशिखर, और फिर जहाँ मन रुचे। बलि-पीठ, शक्तिपीठ अथवा श्मशान उसमें कहीं नहीं हैं। यह विधान शाक्त तथा कौल परम्परा का है, जिसका अपना स्वतंत्र आधार है — प्रवचन स्वयं इसके साथ स्पष्ट चेतावनी और पात्रता की कसौटी जोड़ता है — और यह संहिता न इसका विधान करती है, न निषेध।
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1
शुद्धं गृहं समफलं देवयज्ञादिकर्मसु ॥
देवयज्ञ आदि कर्मों में अपना शुद्ध घर समान फल देने वाला होता है।
2
ततो दशगुणं गोष्ठं जलतीरं ततो दश ।ततो दशगुणं बिल्वतुलस्यश्वत्थमूलकम् ॥
गोशाला घर से दस गुना फल देती है, जलाशय का तट उससे दस गुना, और बेल-तुलसी-पीपल का मूल उससे भी दस गुना अधिक फलदायी है।
3
ततो देवालयं विद्यात्तीर्थतीरं ततो दश ।ततो दशगुणं नद्यास्तीर्थनद्यास्ततो दश ॥
उससे भी दस गुना देवालय है, उससे दस गुना तीर्थ का तट है, उससे दस गुना नदी का तीर्थ है, और उससे भी दस गुना तीर्थ-नदी का तीर्थ है।
“शक्तिपीठ में तिथि नहीं देखनी” आधा सही है, और दूसरा आधा जानने योग्य है
प्रवचन कहता है कि शक्तिपीठ में तिथि, नक्षत्र या वार देखने की आवश्यकता ही नहीं, और कामाख्या के विषय में वह कहता है कि ब्रह्मपुत्र में स्नान के लिए नवरात्रि की प्रतीक्षा मत कीजिए।
समर्थन में ग्रंथ का अपना वचन है: 12.5 तीर्थ और क्षेत्र के विषय में स्नान, दान और जप को सदा कार्यम् कहता है, बिना किसी कैलेंडर के, और न करने का परिणाम रोग और दरिद्रता बताता है।
विरुद्ध में उसी अध्याय का शेष भाग है। 12.20-31 तीर्थ-दर-तीर्थ मास और राशि तय करता है — मेष में नैमिष और बदरी, सिंह में गोदावरी, कन्या में यमुना और शोण, तुला में कावेरी, वृश्चिक में नर्मदा, मकर में जाह्नवी, माघ में गंगा — और 15.8-10 काल का तारतम्य स्थान जितना ही तीव्र रखता है, साधारण दिन से सूर्यग्रहण तक एक करोड़ गुना। ग्रंथ कहीं भी किसी स्थान-वर्ग को काल से मुक्त नहीं करता।
ईमानदार समाधान संकुचित है और 12.5 पर ठीक बैठता है: ऐसे स्थान पर आपको तिथि की प्रतीक्षा नहीं करनी है। इससे यह नहीं निकलता कि तिथि निरर्थक है।
शक्तिपीठ में तिथि, नक्षत्र या वार देखने की आवश्यकता ही नहीं — वहाँ किसी भी दिन का कोई भी क्षण समान फलदायी है।
आधा समर्थित, आधा विरोध में — और पाठक को दोनों जानने चाहिए। समर्थन में: 12.5 तीर्थ और क्षेत्र के विषय में स्नान, दान और जप को "सदा कार्यम्" कहता है, बिना किसी तिथि के। विरोध में: यही अध्याय तीर्थ-दर-तीर्थ मास और राशि की खिड़की तय करता है (मेष में नैमिष व बदरी, सिंह में गोदावरी, कन्या में यमुना व शोण, तुला में कावेरी, वृश्चिक में नर्मदा, मकर में जाह्नवी, माघ में गंगा), और 15.8-10 काल का तारतम्य स्थान जितना ही तीव्र रखता है। ग्रंथ कहीं भी किसी स्थान-वर्ग को काल से मुक्त नहीं करता। प्रवचन जो वास्तव में कह रहा है वह संकुचित और 12.5 पर ठीक है: ऐसे स्थान पर आपको तिथि की <em>प्रतीक्षा</em> नहीं करनी है।
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20
नैमिषे बदरे स्नायान्मेषगे च गुरौ रवौ ॥
मेषराशि में सूर्य और बृहस्पति दोनों के होने पर नैमिष और बदरी में स्नान करना चाहिए।
21
ब्रह्मलोकप्रदं विद्यात्ततः पूजादिकं तथा ।सिन्धुनद्यां तथा स्नानं सिंहे कर्कटगे रवौ ।केदारोदकपानं च स्नानं च ज्ञानदं विदुः ॥
उसे, और उसके बाद के पूजादि को, ब्रह्मलोक देने वाला जानना चाहिए। वैसे ही कर्कराशि से सिंहराशि में सूर्य के आने पर सिन्धु नदी में स्नान करना चाहिए; और केदार का जलपान तथा स्नान ज्ञानदायक जाना जाता है।
22
गोदावर्यां सिंहमासे स्नायात्सिंहबृहस्पतौ ॥
सिंहराशि के बृहस्पति में, सिंह मास में गोदावरी में स्नान करना चाहिए।
23
शिवलोकप्रदमिति शिवेनोक्तं तथा पुरा ।यमुनाशोणयोः स्नायाद् गुरौ कन्यागते रवौ ॥
“यह शिवलोक देने वाला है” — ऐसा शिव ने स्वयं पूर्वकाल में कहा था। कन्याराशि के बृहस्पति और सूर्य में यमुना और शोण में स्नान करना चाहिए।
24
धर्मलोके दन्तिलोके महाभोगप्रदं विदुः ।कावेर्यां च तथा स्नायात्तुलागे तु रवौ गुरौ ॥
यह धर्मलोक और गणेशलोक में महाभोग देने वाला जाना जाता है। और वैसे ही तुलाराशि के सूर्य और बृहस्पति में कावेरी में स्नान करना चाहिए।
“यह शिवलोक देने वाला है” — ऐसा ब्रह्मा का वचन है। ब्रह्मा और विष्णु के पद को भोगकर, उसके अन्त में ज्ञान प्राप्त होता है।
29
गङ्गायां माघमासे तु तथा कुम्भगते रवौ ।श्राद्धं वा पिण्डदानं वा तिलोदकमथापि वा ॥
गंगा में, माघ मास में, तथा कुम्भराशि के सूर्य में — श्राद्ध, या पिण्डदान, या तिलोदक भी,
30
वंशद्वयपितॄणां च कुलकोट्युद्धरं विदुः ।कृष्णावेण्यां प्रशंसन्ति मीनगे च गुरौ रवौ ॥
— वंश-द्वय के पितरों के करोड़ों कुलों का उद्धार करने वाला जाना जाता है। मीनराशि के सूर्य और बृहस्पति में कृष्णावेणी में [ऐसे कर्मों] की प्रशंसा की जाती है।
31
तत्तत्तीर्थे च तन्मासि स्नानमिन्द्रपदप्रदम् ।गङ्गां वा सह्यजां वापि समाश्रित्य वसेद् बुधः ।तत्कालकृतपापस्य क्षयो भवति निश्चितम् ॥
उस-उस तीर्थ में उस-उस मास में स्नान इन्द्रपद देने वाला है। बुद्धिमान पुरुष गंगा का, या सह्यजा (कावेरी) का आश्रय लेकर निवास करे; तब उस समय तक किया गया पाप निश्चय ही नष्ट हो जाता है।
श्मशान विद्येश्वर संहिता की दृष्टि में साधना का स्थान नहीं है
तांत्रिक साधना का लोकप्रिय चित्र उसे स्वतः श्मशान में रख देता है, और कामाख्या तथा तारापीठ के विषय में जो कुछ चलता है उसका बड़ा भाग यही मानकर चलता है।
जो अध्याय पुण्यक्षेत्र की परिभाषा देता है वह इससे मेल नहीं खाता। 12.3-4 क्षेत्र की उत्पत्ति के चार प्रकार बताता है — ऋषि-परिग्रह, देव-परिग्रह, स्वयम्भू, अन्यथा उत्पन्न — और इनमें श्मशान नहीं है; 12.5 क्षेत्र के उचित कर्म स्नान, दान और जप बताता है। इस पूरी संहिता में श्मशान, पंचमुंडी आसन अथवा शव-आसन का कोई उल्लेख नहीं है।
यह customary है, खंडन नहीं: श्मशान साधना प्राचीन, वास्तविक और परंपरा-सिद्ध है। प्रवचन की अपनी स्थिति दो हिस्सों में है और दोनों साथ रखने योग्य हैं — किसी तीर्थ का महाश्मशान उस क्षेत्र का अंग है और निषेध से बाहर, जबकि आपके नगर के श्मशान में गृहस्थ का कोई काम नहीं, और पंचमुंडी वह सिखाता ही नहीं।
श्मशान तांत्रिक साधना का स्वाभाविक आसन है, और गंभीर साधक को वहीं बैठना चाहिए।
उसी अध्याय से मिलाकर देखा गया जो बताता है कि पुण्यक्षेत्र क्या है और वहाँ क्या किया जाता है। 12.3-4 क्षेत्र की उत्पत्ति के चार प्रकार देता है — ऋषि-परिग्रह, देव-परिग्रह, स्वयम्भू, अन्यथा उत्पन्न — और इनमें श्मशान कहीं नहीं है; 12.5 क्षेत्र के उचित कर्म स्नान, दान और जप बताता है। इस संहिता में श्मशान, पंचमुंडी आसन अथवा शव-आसन का कोई उल्लेख ही नहीं है। श्मशान साधना वास्तविक, प्राचीन और परम्परा-सिद्ध है; वह केवल इस ग्रंथ का विषय नहीं है — और प्रवचन भी उतनी ही स्पष्टता से कहता है कि गृहस्थ का वहाँ कोई काम नहीं।
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1
शृणुध्वमृषयः प्राज्ञाः शिवक्षेत्रं विमुक्तिदम् ।तदागमांस्ततो वक्ष्ये लोकरक्षार्थमेव हि ॥
हे बुद्धिमान् ऋषियो, शिव के उस क्षेत्र को सुनिए, जो विमुक्ति देने वाला है; फिर मैं उसके आगमों को भी लोकरक्षा के लिए ही कहूँगा।
2
पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा सशैलवनकानना ।शिवाज्ञया हि पृथिवी लोकं धृत्वा च तिष्ठति ॥
पचास करोड़ योजन विस्तृत, पर्वत-वन-कानन सहित यह पृथ्वी शिव की आज्ञा से लोक को धारण करके स्थित है।
हे भूसुरो, उस क्षेत्र में पाप करना और भी दृढ़ हो जाता है; पुण्यक्षेत्र में निवास करते हुए अणुमात्र भी पाप न करे। जिस किसी भी उपाय से मनुष्य को पुण्यक्षेत्र में निवास करना चाहिए।
शक्तिपीठों की संख्या तय नहीं है, और यह संहिता पवित्र भूमि को सती से निकालती ही नहीं
51, 52 और 108 — तीनों के पीछे अलग-अलग ग्रंथ हैं, और स्थानीय स्थल-पुराण कभी-कभी तीनों से असहमत होते हैं कि कौन सा अंग कहाँ गिरा। किसी भी सूची को “प्राचीन सर्वसम्मति” कहकर प्रस्तुत करना ईमानदार नहीं है।
अधिक उपयोगी बात यह है कि विद्येश्वर संहिता में सती की कथा है ही नहीं — वह रुद्र संहिता के सती खण्ड और देवी-साहित्य का विषय है। इस संहिता का अपना विवरण 12.3-4 का चतुर्विध विवरण है, जिसमें विच्छेद कहीं नहीं आता।
व्यावहारिक परिणाम यह है कि संख्या पर कुछ निर्भर ही नहीं करता। जो परिभाषा यह संहिता देती है उसे किसी गिनती की आवश्यकता नहीं, और वह उस बहुत सारी भूमि को समेटती है जो किसी शक्तिपीठ-सूची में नहीं आती — जिसमें, प्रवचन के अनुसार, विंध्याचल भी है, जिसका दावा ही यह है कि वहाँ भगवती संपूर्ण स्वरूप में हैं।
शक्तिपीठ वे स्थान हैं जहाँ भगवती सती के अंग गिरे थे।
परम्परा में सत्य, और इस संहिता में अनुपस्थित। विद्येश्वर संहिता का अपना विवरण 12.3-4 का चतुर्विध विवरण है, और सती की कथा यहाँ कही ही नहीं गई — वह रुद्र संहिता के सती खण्ड और देवी-साहित्य का विषय है, जहाँ संख्याएँ स्वयं ग्रंथ-भेद से भिन्न हैं (51, 52, 108)। इस पृष्ठ का कोई कथन इस पर निर्भर नहीं है; विद्येश्वर संहिता जो देती है वह पवित्र भूमि की ऐसी परिभाषा है जिसे उस कथा की आवश्यकता ही नहीं।
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2
पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा सशैलवनकानना ।शिवाज्ञया हि पृथिवी लोकं धृत्वा च तिष्ठति ॥
पचास करोड़ योजन विस्तृत, पर्वत-वन-कानन सहित यह पृथ्वी शिव की आज्ञा से लोक को धारण करके स्थित है।
जहाँ-जहाँ शिवक्षेत्र है, वहाँ-वहाँ के निवासियों के मोक्ष के लिए कृपापूर्वक प्रभु देव ने वह क्षेत्र रचा है।
4
परिग्रहाद् ऋषीणां च देवानां च परिग्रहात् ।स्वयम्भूतान्यथान्यानि लोकरक्षार्थमेव हि ॥
ऋषियों के परिग्रह से, और देवताओं के परिग्रह से, या स्वयम्भू, या अन्यथा उत्पन्न — ये सभी केवल लोकरक्षा के लिए हैं।
स्पर्श ही लेन-देन नहीं है, और जो प्रतिदिन छूते हैं वही इसका प्रमाण हैं
यह धारणा कि प्रमुख विग्रह को शरीर से छुए बिना तीर्थ अधूरा है, इस क्षेत्र के अधिकांश पैसे, धक्का-मुक्की और झगड़े की जड़ है। प्रवचन इसे दो तरह से तोड़ता है।
अधिकार वाला तर्क: हर ऐसे स्थान पर एक शृंगारिया परिवार है जिसने वह अधिकार पीढ़ियों के नियम-पालन से पाया है और जो चूकने पर उत्तरदायी है। वीआईपी मार्ग से खरीदा गया स्पर्श उसे हस्तांतरित नहीं करता, और प्रवचन कहता है कि देवता दंड नहीं देते, उनके गण देख लेते हैं।
और पारस वाला तर्क, जो अधिक निर्णायक है: पारस लोहे को सोना बनाता है, एल्युमिनियम को कुछ नहीं करता। पारस चर नहीं है। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि आप विग्रह तक पहुँच सकते हैं या नहीं। इसका सबसे शुष्क प्रमाण प्रवचन स्वयं देता है: इन्हीं विग्रहों को प्रतिदिन, जीवन भर छूने वाले बहुत लोग हैं।
तीर्थ के बाद उदासी इस बात का लक्षण नहीं है कि तीर्थ विफल हुआ
अत्यंत सामान्य, लगभग कभी समझाया नहीं गया, और समझ साधारण है। आपने तीन दिनों में, ऐसी भूमि पर जिसकी ऊर्जा-सघनता प्रवचन आपके घर से लगभग सौ गुना बताता है, उतनी साधना कर ली जिसका अभ्यास नहीं है — और अब उससे उतर रहे हैं। वह इसे उचाटन कहता है और साधक के लिए सामान्य मानता है।
व्यावहारिक चरण: अपेक्षा रखिए, घबराइए मत, उतरने दीजिए; सप्ताह भर में न उतरे तो शरीर से उतारा कीजिए, चल रही दशा-अंतर्दशा दिखवाइए, और चलित में चंद्र 6, 8 या 12 में हो तो उसका दान कीजिए।
दूसरा रूप यह है कि यात्रा के बाद कोई वास्तविक कष्ट आ जाए। वहाँ प्रवचन का पाठ यह है कि प्रायः कोई बड़ा आघात छोटे में बदलकर निपट रहा होता है — और जो चीज़ छोटे सुधार को लंबी समस्या बना देती है वह है यात्रा, स्थान अथवा देवता को कोसना। यदि अपराध पहचान में आए, तो उस क्षेत्र के भैरव उसका उपाय हैं।
मुफ़्त का भंडारा उपहार नहीं है, और गर्भगृह का प्रसाद वही चीज़ नहीं है
इतना उल्टा लगता है कि अधिकांश पाठक इसका विरोध करेंगे, इसलिए प्रवचन की दोनों श्रेणियाँ अलग रखनी चाहिए। देवता को अर्पित करके बाँटा गया भोजन प्रसाद है और वह ग्रहण किया जाता है। तंबू के नीचे बैठाकर सबको खिलाया जाने वाला लंगर, पुराने नियम के उसके पाठ में, निर्धनों और साधु-संतों के लिए है — कमाने वाले गृहस्थ के लिए नहीं।
यह सावधानी इसलिए है कि जिस प्रक्रिया का वह नाम लेता है वह वास्तविक है: बड़े पैमाने पर भोजन कराना भार बाँटने के मानक तरीकों में से एक है, और जो खाते हैं उनमें वही भार बँटता है। उसका निर्णय यह है कि उस अन्न को केवल वही पचा सकता है जिसके भीतर वास्तविक तप हो।
व्यावहारिक रूप कठोर नहीं है: आप दो रोटी खरीद सकते हैं, तो वही कीजिए। गर्भगृह का प्रसाद इससे अलग है और उसे तुरंत ग्रहण कर लेना चाहिए।
“भाव ही काफ़ी है, विधि की आवश्यकता नहीं” — लोग वामा खेपा से यही निकालते हैं, और यह ठीक उल्टा है
इन प्रवचनों की तीर्थ-सामग्री का सबसे लंबा और सबसे कड़ा सुधार, क्योंकि यह चूक भक्ति जैसी दिखती है। वामा खेपा भगवती तारा को अपना जूठन खिलाते थे और उन्हें डाँटते थे — और इससे यह निकाल लिया जाता है कि विधि व्यर्थ है।
जो छोड़ दिया जाता है वह जीवनी है: सात वर्ष में महाश्मशान में दीक्षा, पंचमुंडी आसन से पहले की परीक्षाएँ, ऐसे गुरु के नीचे वर्षों का जप जो डाकिनियों के प्रकट होने पर झकझोरकर उठा सकें, और उस स्वतंत्रता से पहले तारा का प्रत्यक्ष दर्शन। भाव परिणाम था; उसे विधि की तरह उतारा जा रहा है।
प्रवचन का निर्णय कड़ा है — कि यह महा अपराध है और सिखाने वाला अपने साथ पचास और लोगों को ले डूबता है — और उसका निर्देश सौम्य: विधि युक्त पूजा ही स्वीकार होता है, और उसी विधान पर चलते-चलते आगे जाकर के आप फिर उस दिव्य भाव को प्राप्त करते हैं। सरलता आती अवश्य है, परिणाम के रूप में, लाखों जप पर — ओढ़ी नहीं जा सकती।
यात्रा करना अनिवार्य नहीं है, और ग्रंथ यह चार अलग तरीक़ों से कहता है
यह उसी संहिता में लिखा है जो एक पूरा अध्याय स्थान की ग्यारह श्रेणियाँ बनाने में लगाती है — और यही इसे विश्वसनीय बनाता है, सांत्वना नहीं।
बिल्व का मूल: संसार के समस्त प्रसिद्ध तीर्थ वहाँ निवास करते हैं, और जो वहाँ जल से शिव का अभिषेक करता है वह समस्त तीर्थों में स्नात हो जाता है (22.23, 22.25)। भस्म: भस्मस्नान परम तीर्थ है, मानो प्रतिदिन गंगास्नान (24.78); और भूतिशासन से युक्त शिवज्ञानी जिस देश में यदृच्छा से भी चला जाए, वहाँ समस्त तीर्थ स्वयं आ जाते हैं (24.26) — यहाँ यात्रा की दिशा ही उलट गई है। नाम: जो मुख “श्रीशिवाय नमस्तुभ्यम्” कहता है वही पावन तीर्थ बन जाता है (23.7)। लिंगार्चन: एक ओर समस्त दान, व्रत, तीर्थ, नियम और यज्ञ, और दूसरी ओर अकेला लिंगार्चन (21.24)। और 17.49 इसमें भक्तों के चरणोदक को जोड़ देता है — छत्तीस करोड़ तीर्थों का फल, तत्काल।
इनमें से कोई भी स्थान की सीढ़ी को रद्द नहीं करता। ये उसके समानांतर चलते हैं, और वही उस पाठक का उत्तर हैं जिसकी यात्रा इस वर्ष संभव नहीं।
भीड़ वाला नया स्थान क्षेत्र नहीं है, और ग्रंथ के पास उसकी दो कसौटियाँ हैं
यह जाँचने के लिए कि कोई भूमि पुण्यक्षेत्र है या नहीं, भीड़ सबसे बुरी कसौटी है — और वही सबसे अधिक प्रयोग होती है। प्रवचन की अपनी सावधानी व्यावहारिक है: पुरानी, विधिपूर्वक सेवित जगह पर जाइए, अथवा जहाँ गुरु कहें; हाल में बने थाने पर नहीं, जहाँ सच्चा प्रश्न यही है कि वहाँ बैठा कौन है — क्योंकि स्थानों पर चीज़ें जान-बूझकर बैठाई जाती हैं।
ग्रंथ इसके दो ढाँचागत रूप देता है। 12.4 के चारों प्रकार धीमे हैं — ऋषि-परिग्रह, देव-परिग्रह, स्वयम्भू, अन्यथा उत्पन्न। और 9.46 उस भूमि को “क्षेत्र” कहने से ही इनकार कर देता है जिसके केंद्र में लिंग न हो, चाहे उस पर मूर्ति खड़ी हो।
11.55-56 इसमें तीसरी, मापने योग्य कसौटी जोड़ देता है: क्षेत्र की त्रिज्या केंद्र में स्थित लिंग के प्रकार से तय होती है — मानुष सौ हाथ, ऋषिकृत और दैव पाँच सौ, स्वयम्भू एक हजार धनुष। पिछले मौसम में खड़ा हुआ स्थान इनमें से एक भी कसौटी पर नहीं उतरता।
जहाँ आपके अपने कुल अथवा गुरु-परंपरा में किसी विशेष क्षेत्र के लिए पहले से कोई नियम है — कोई मार्ग, कोई अर्पण, कोई दिन, कोई स्वरूप जिसके पास आपको जाना है या नहीं जाना है — पहले उसी का पालन कीजिए। यह मार्गदर्शिका उन पाठकों के लिए है जिनके पास अपनी कोई जीवित परंपरा बची नहीं है, और यह हर कथन को उस प्रवचन से जोड़ती है जहाँ से वह आया और, जहाँ ग्रंथ बोलता है, उस श्लोक से भी। और जिस दिन यात्रा संभव न हो, उस दिन सीढ़ी का अंतिम श्लोक सामने रखिए: गोशाला, जलाशय का तट, वृक्ष का मूल, देवालय, तीर्थ, नदी, सप्तगंगा, समुद्र-तट और पर्वत-शिखर — इन सबसे ऊपर शिव पुराण उस स्थान को रखता है जहाँ मन को रुचि हो। बिल्व का मूल, एक दीपक, और सत्ताईस माला — यह पूर्ण साधना है, और ग्रंथ इसे घर पर कुछ न करने से एक हजार गुना ऊपर रखता है।
स्रोत
ऊपर दी गई प्रत्येक बात विश्वसनीय स्रोतों से ली गई है।
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