भय हरने वाले, जिनसे भय सिखाया गया
अगर और कुछ न पढ़ें
  1. घर में बटुक, मंदिर में काल भैरव
  2. क्रम, तीव्रता से अधिक महत्वपूर्ण है
  3. एक दीपक भी पूर्ण अर्पण है
भैरव के स्वरूप, एक दृष्टि में
साधना विधान
  1. भैरव शब्द का वास्तविक अर्थ स्वरूप व तत्व
  2. काल भैरव का प्राकट्य, और हाथ में वह कपाल स्वरूप व तत्व
  3. वे प्रकट होते हैं, जन्म नहीं लेते स्वरूप व तत्व
  4. भैरव आज्ञा से चलते हैं — इसलिए साथ में शिव पूजन स्वरूप व तत्व
  5. काशी के तीन अधिकार: कोतवाल, न्यायाधीश और द्वारपाल स्वरूप व तत्व
  6. देवी बटुक से पहले नैवेद्य ग्रहण नहीं करतीं स्वरूप व तत्व
  7. अष्ट भैरव और अष्टमातृकाएँ — जोड़ी हुई सूची स्वरूप व तत्व
  8. चौंसठ योगिनी, चौंसठ भैरव — और महादुर्गा से ब्रह्म-राक्षस दोष क्यों शांत होता है स्वरूप व तत्व
  9. बटुक तीन हैं, और खंडोबा ही मार्तंड भैरव हैं स्वरूप व तत्व
  10. महाभैरव अर्थात् श्मशान भैरव — कालिका पुराण से स्वरूप व तत्व
  11. अंग विद्या — देवी के किसी भी मंत्र से पहले भैरव क्यों स्वरूप व तत्व
  12. घर में काल भैरव का विग्रह नहीं — बटुक की स्थापना कीजिए घर में स्थापना व नित्य पूजन
  13. त्रिशूल ही पूर्ण भैरव स्थापना है घर में स्थापना व नित्य पूजन
  14. पूजन स्थान में भैरव जी का स्थान कहाँ घर में स्थापना व नित्य पूजन
  15. नित्य पूजन का क्रम, और शिव सबसे अंत में क्यों घर में स्थापना व नित्य पूजन
  16. दो दीपक पूरे गृहस्थ पंचायतन के लिए पर्याप्त हैं घर में स्थापना व नित्य पूजन
  17. पर्व के दिन का श्रृंगार — और आठ की संख्या घर में स्थापना व नित्य पूजन
  18. नित्य नैवेद्य — और सात्विक मदिरा घर में स्थापना व नित्य पूजन
  19. अनुष्ठान के दौरान अलग सेवा, उसके बाद सामूहिक घर में स्थापना व नित्य पूजन
  20. लहसुन-प्याज का भोग नहीं — बाल भैरव को भी नहीं घर में स्थापना व नित्य पूजन
  21. छह इंच का नियम, और उसका कारण घर में स्थापना व नित्य पूजन
  22. हर कुल के भैरव होते हैं — “हमारे नहीं हैं” एक भ्रम है कुल भैरव व क्षेत्रपाल
  23. कुल भैरव ज्ञात न हों तो उसी स्थान पर बटुक कुल भैरव व क्षेत्रपाल
  24. मसान या पिशाच को भैरव का स्थान कभी नहीं कुल भैरव व क्षेत्रपाल
  25. क्षेत्रपाल “भूत भेजते हैं” — इस वाक्य का वास्तविक अर्थ कुल भैरव व क्षेत्रपाल
  26. क्षेत्रपाल निकारी — पूर्ण विधि कुल भैरव व क्षेत्रपाल
  27. निकारी कब और कैसे — समय, दिशा, और स्त्रियों का प्रश्न कुल भैरव व क्षेत्रपाल
  28. चौखट का दीपक — सबसे पहले, और सबसे तीक्ष्ण अभिचार से रक्षण
  29. आठ लौंग, क्षेत्रपाल स्तुति और खैर की धूनी अभिचार से रक्षण
  30. बारह घंटे का नियम — और चौखट-विधान क्या भीतर बंद कर देता है अभिचार से रक्षण
  31. चाँदी की कटोरी में दो लौंग — उस घर के लिए जहाँ पूजन की अनुमति नहीं अभिचार से रक्षण
  32. उन लौंगों की राख का क्या करना है अभिचार से रक्षण
  33. मंदिर का इकतालीस दिन का नियम — और हर चीज एक क्यों अभिचार से रक्षण
  34. भैरव जी का मंदिर न हो तो देवी मंदिर का द्वार अभिचार से रक्षण
  35. फल का खप्पर — बटुक के लिए आठ, काल भैरव के लिए नौ अभिचार से रक्षण
  36. महाभैरव मंत्र में सभी भैरव आ जाते हैं — और बँधी हुई कुलदेवी खुलती हैं अभिचार से रक्षण
  37. आरंभ अष्टोत्तर सतनाम से — मंत्र से नहीं मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  38. चालीस हजार का महापुरश्चरण मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  39. बटुक भैरव हृदय — पूरा अनुष्ठान, आरंभ से हवन तक मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  40. हृदय अनुष्ठान का हवन — तिल के लड्डू, मधु में डुबोकर मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  41. खैर की लकड़ी — दो निर्देश, और दोनों यहाँ हैं मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  42. आपदुद्धारण मंत्र श्रापित है — बिना दीक्षा नहीं मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  43. बिना कवच के चिटकी मंत्र क्यों उल्टा पड़ता है मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  44. अष्टोत्तर सतनाम का हवन — सामग्री और संख्या मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  45. 108 नामों का तर्पण-मार्जन कैसे मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  46. स्तोत्र और नामावली में अंतर क्या है मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  47. संस्कृत बाधा हो तो बटुक भैरव का साबर मंत्र मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  48. महाभैरव का तीन-मंडल क्रम मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  49. भैरव जप बिना रुद्राक्ष के कभी नहीं मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  50. साधना काल का आचरण — ब्रह्मचर्य, आहार, और भाव मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  51. कोई भी अनुष्ठान तीन से पाँच बार दोहराया जाता है मंत्र, स्तोत्र व अनुष्ठान
  52. कालाष्टमी हर मास, भैरव अष्टमी वर्ष में एक बार तिथि व काल
  53. अष्टमी का व्रत — नियम, और वह एक घर जिसे नहीं करना चाहिए तिथि व काल
  54. चतुर्दशी महाभैरव की तिथि है — विशेषतः चैत्र शुक्ल तिथि व काल
  55. बटुक भैरव जयंती, और गंगा से लाया हुआ त्रिशूल तिथि व काल
  56. आरंभ कब, और कितने दिन तिथि व काल
  57. सुबह श्रृंगार, रात्रि में मुख्य पूजन तिथि व काल
  58. दीपदान ही न्यूनतम है — और ग्रंथ भी वहीं उतरता है नैवेद्य, बलि व दीपदान
  59. दीपदान की संख्या — और बीच वाला दीपक पहले नैवेद्य, बलि व दीपदान
  60. दीपदान के दीपकों का विसर्जन कब नैवेद्य, बलि व दीपदान
  61. अपने भोजन से पहले श्वान को — वह बलि जो बलि नहीं है नैवेद्य, बलि व दीपदान
  62. भैंसे को बाजरे की आठ रोटियाँ नैवेद्य, बलि व दीपदान
  63. नींबू की बलि, और वह परिवार जो उससे डरता है नैवेद्य, बलि व दीपदान
  64. लौंग की बलि जोड़े में — और अपवाद नैवेद्य, बलि व दीपदान
  65. किसी भी भैरव हवन के बाद क्षेत्रपाल और दस दिक्पाल की बलि नैवेद्य, बलि व दीपदान
  66. किसका प्रसाद कौन ले सकता है नैवेद्य, बलि व दीपदान
  67. पीना किसी के लिए अनिवार्य नहीं है मर्यादा व अधिकार
  68. खप्पर भरना आपका अधिकार तब तक नहीं मर्यादा व अधिकार
  69. किस मंदिर में — और वे भैरव जो “माँगने लगते हैं” मर्यादा व अधिकार
  70. आवश्यकता न हो तो महाभैरव का प्रयोग मत कीजिए मर्यादा व अधिकार
  71. उग्र स्वरूप चौखट के बाहर पूजित होते हैं, भीतर नहीं मर्यादा व अधिकार
  72. कष्ट पूजन आरंभ करने के बाद बढ़े तो मर्यादा व अधिकार
  73. गणपति प्रथम — सदा, और कारण सहित मर्यादा व अधिकार
  74. घर में मृत्यु हुई हो तो इस अनुष्ठान में सम्मिलित न हों मर्यादा व अधिकार
  75. साधना गुप्त रखिए मर्यादा व अधिकार
  76. “हर किसी के लिए हर भैरव नहीं होते” मर्यादा व अधिकार
  77. घर में काल भैरव पहले से पूजित हों तो क्या करें मर्यादा व अधिकार
जो प्रश्न वास्तव में पूछे जाते हैं
  1. क्या काल भैरव की पूजा घर में की जा सकती है?
  2. क्या भैरव पूजन “तांत्रिक” है, और क्या वह संकटपूर्ण है?
  3. क्या भैरव साधना के लिए गुरु अथवा दीक्षा आवश्यक है?
  4. क्या भैरव जी को मदिरा चढ़ाना अनिवार्य है?
  5. क्या स्त्रियाँ भैरव पूजन कर सकती हैं, और क्या प्रसाद ले सकती हैं?
  6. अपने कुल भैरव को कैसे जानें?
  7. घर वाले भैरव पूजन का विरोध करते हैं, तब क्या करें?
  8. काल भैरव, बटुक भैरव और महाभैरव में अंतर क्या है?
  9. आरंभ किस दिन से करें और कितने दिन करें?
  10. क्या काल भैरव अथवा किसी सिद्ध पीठ के भैरव का छायाचित्र रख सकते हैं?
  11. क्या यह सच है कि एक बार भैरव को चढ़ा देने पर वे बार-बार माँगने लगते हैं?
  12. कुत्ते को खिलाना क्यों आवश्यक बताया जाता है?
  13. आसपास भैरव जी का कोई मंदिर नहीं है, तब?
  14. क्या तंत्र मार्ग में जाने से डिप्रेशन या एंग्जायटी होती है?
  15. संस्कृत नहीं आती। कौन सा मंत्र करें?
  16. जिस शक्ति की मेरा कुल पूजा करता है वह देव है या कुछ और — यह कैसे जानें?
  17. मैं विष्णु / कृष्ण / हनुमान जी का उपासक हूँ। क्या भैरव पूजन से टकराव होगा?
  18. जीवन में कोई समस्या ही न हो तो क्या भैरव साधना करनी चाहिए?
  19. क्या राशि या नक्षत्र के अनुसार किसी का अपना कोई विशेष भैरव होता है?
नौ प्रचलित भ्रांतियाँ
  1. भैरव भूत नहीं हैं, और उनके पूजन से घर में भूत नहीं आते
  2. भैरव पूजन “केवल तांत्रिक है, पौराणिक आधार नहीं” — यह गलत है
  3. भैरव को मदिरा चढ़ाना अनिवार्य नहीं है
  4. भैरव अनियंत्रित नहीं हैं, और वे अपने उपासक पर नहीं पलटते
  5. घर में बटुक की मूर्ति परंपरा का विधान है, इस पुराण का नहीं
  6. “भैरव” का अर्थ “भयंकर” नहीं है
  7. दुर्गा कवच की “भैरव पलायन कर जाते हैं” वाली पंक्ति इन भैरव की नहीं है
  8. हर वह “भैरव” भैरव नहीं है जिसे कोई ओझा बैठा दे
  9. सरसों और तिल के तेल के दीपक से कोई बीमार नहीं पड़ता
जाँच-सूची
Deity

भैरव साधना — पूर्ण मार्गदर्शिका

गृहस्थ को भैरव उपासना के लिए वास्तव में जो कुछ चाहिए — कौन से स्वरूप हैं और घर में किनका स्थान है, अपने कुल भैरव को कैसे जानें, चौखट और क्षेत्रपाल के वे विधान जो चलते हुए अभिचार को रोकते हैं, बटुक भैरव अष्टोत्तर सतनाम तथा हृदय का पूरा अनुष्ठान, कौन सा नैवेद्य वास्तविक है और कौन सा उधार लिया हुआ, और वे प्रश्न जिन्हें पूछने में लोग संकोच करते हैं। हर कथन उस प्रवचन से जुड़ा है जहाँ से वह आया, और जहाँ ग्रंथ बोलता है, वहाँ उस श्लोक से भी।

· 90 min read · 116 practices
157 sources analyzed 9 cited Updated 28 August 2026
एक अनुक्रमणिका, राय नहीं
यह पृष्ठ एक अनुक्रमणिका है, जो विश्वसनीय स्रोतों के गहन अध्ययन के बाद तैयार की गई है — न यह OccultGuide की अपनी टिप्पणी है, न ही किसी व्यापक परंपरा के मत का दावा। नीचे दी गई प्रत्येक बात उन्हीं स्रोतों में कही गई है, और उसी वीडियो या संदेश से सीधे जुड़ी हुई है जहाँ से वह ली गई है — ताकि आप हमारे सारांश पर भरोसा करने के बजाय स्वयं जाँच सकें।

भय हरने वाले, जिनसे भय सिखाया गया

भैरव संभवतः एकमात्र ऐसे देवता हैं जिनका नाम आज उसका ठीक उल्टा अर्थ देने लगा है जो वह वास्तव में कहता है। प्रवचन-परंपरा में भैरव का अर्थ लिया जाता है भरण-पोषण करने वाले, रक्षा करने वाले — और उसी परंपरा ने इस विडंबना को खुलकर पकड़ा है: जिनकी उपासना ही भय दूर करने के लिए है, उन्हीं का नाम सुनकर आज लोग काँपते हैं। कहीं यह कह दीजिए कि आपके घर में भैरव का स्थान है, और एक विशेष प्रकार का श्रोता तुरंत मान लेगा कि आप भूत पूज रहे हैं।

यह भय न पुराना है, न शास्त्रीय। शिव महापुराण अपनी पहली ही संहिता में भैरव का नाम लेता है, और दो बार ऐसे स्थानों पर लेता है जो प्रश्न को वहीं समाप्त कर देते हैं। आठवें अध्याय में भैरव को स्वयं महादेव अपनी दोनों भौंहों के मध्य से उत्पन्न करते हैं — न आवाहन, न प्रसन्न करना, न शमन: उत्पन्न। और अठारहवें अध्याय में, नित्य आचार और वार्षिक शांति-यज्ञ की एक साधारण आचार-प्रक्रिया के बीच, ग्रंथ स्वयं विधान देता है — भैरवस्य महापूजां कुर्याद्भूतादिशान्तये, भूत आदि की शांति के लिए भैरव की महापूजा करे। भैरव वह हैं जो भूतों के विषय में किए जाते हैं। वे भूत नहीं हैं।

इस मार्गदर्शिका को सूचियों से जो चीज अलग करती है वह यह है कि जिस संग्रह से यह संकलित है वह साधक का संग्रह है, भक्ति-साहित्य नहीं। वह अधिकार के विषय में स्पष्टवादी है: वह सीधे कहेगा कि काल भैरव का उग्र विग्रह घर में स्थापित नहीं होता, कि खप्पर भरना आपका अधिकार तब तक नहीं जब तक आप दीक्षित न हों अथवा मंदिर का अपना सेवक आपके नाम से न भरे, कि आपदुद्धारण मंत्र श्रापित मंत्र है जिसे गुरु के शाप विमोचनएक प्रारंभिक शाप-निवारण अनुष्ठान — इसके बिना, या बिगड़ी हुई लय में दुर्गा सप्तशती जैसे ग्रंथों का पाठ करने से आध्यात्मिक अनुभव सुसंगत के बजाय विसंगत रूप से प्रकट हो सकते हैं। के बिना छूना नहीं चाहिए, और कि यदि आप पर कोई अभिचार चल ही नहीं रहा तो महाभैरव का प्रयोग करने का आपको कोई कारण नहीं है। और वह उतनी ही स्पष्टता दूसरी दिशा में भी रखता है: बटुक भैरव प्रत्येक गृहस्थ के पूजन-स्थान में होने चाहिए, स्त्री-पुरुष दोनों समान रूप से उनका पूजन करते हैं, और इस विधान का सबसे छोटा रूप — एक दीपक — वही है जिस पर स्वयं पुराण भी उतरता है जब व्यक्ति के पास और कुछ न बचे।

नीचे सब कुछ उसी क्रम में रखा है जिस क्रम में व्यक्ति को वास्तव में उसकी आवश्यकता पड़ती है: स्वरूप कौन-कौन से हैं, आपके अपने कौन हैं, नित्य क्या करना है, घर पर आघात हो तो क्या करना है, तिथियों पर क्या, और सीमा कहाँ है। जहाँ ग्रंथ बोलता है, वहाँ कथन के साथ श्लोक है। और जहाँ कोई व्यापक रूप से प्रचलित प्रथा उस ग्रंथ में है ही नहीं, वह भी उसी प्रसंग के साथ अंकित है जिससे उसे मिलाकर देखा गया।

जिन भैरवों की उपासना ही भय को दूर करने के लिए होता है, उन भैरवों के नाम को सुनकर के अच्छे-अच्छे लोगों की फटी पड़ी रहती है, पता नहीं क्यों। भैरव जी का कोई अगर पुजारी हो, सेवक हो, कोई भैरव जी का नाम लेने वाला हो तो उससे लोग अजीब तरीके से आतंकित हो जाते हैं जैसे कि वह भैरव जी को नहीं भूत को पूज रहा हो।

काल भैरव जयंती महाअष्टमी । इन आठ सरल … →

अगर और कुछ न पढ़ें

०१

घर में बटुक, मंदिर में काल भैरव

यही एक नियम अधिकांश समस्याओं को पहले ही रोक देता है। काल भैरव का विग्रह घर में स्थापित नहीं किया जाता — काशी और उज्जैन के अपने पंचकोशी क्षेत्र को छोड़कर, जहाँ वहाँ के निवासियों से उनकी सेवा अपेक्षित है। स्वरूप अति उग्र है और तामसिक विधि से पूजित होता है; गृहस्थ का पूजन उसे वहन नहीं कर पाता। बटुक भैरव, बाल स्वरूप, वही हैं जिनकी स्थापना प्रत्येक गृहस्थ के लिए कही गई है — और यदि विग्रह उपलब्ध न हो तो केवल एक त्रिशूल ही पूर्ण स्थापना है।

०२

क्रम, तीव्रता से अधिक महत्वपूर्ण है

गुरु → गणपति → भैरव → हनुमान → लक्ष्मी-नारायण → देवी → शिव। भैरव तीसरे स्थान पर इसलिए हैं कि वे रक्षण हैं: आगे आप जिस भी शक्ति का आवाहन करेंगे, जो नहीं आना चाहिए उसे रोकने का कार्य इन्हीं का है। बिना अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। और कवच के सीधे किसी उग्र स्वरूप या चिटकी मंत्र पर कूद जाना — यही वह भूल है जिसकी चेतावनी संग्रह में सबसे अधिक बार आती है।

०३

एक दीपक भी पूर्ण अर्पण है

यहाँ का हर विधान नीचे तक उतरता है। संग्रह का न्यूनतम है चौखट पर सरसों तेल का चौमुख दीपकचार बत्तियों वाला चार-मुखी तेल का दीपक, भैरव व अन्य समान शक्तिशाली देवताओं के प्रयोग-अनुष्ठानों में जोड़े में या घर के कई स्थानों पर प्रयुक्त होता है। आटे का दीपकगेहूं के आटे से बना एक छोटा दीपक (धातु या मिट्टी के स्थान पर), जिसमें सरसों का तेल भरकर रक्षक या कुल देवता के समक्ष जलाया जाता है — इसे कभी सीधे भूमि पर नहीं रखा जाता।, दोनों संध्याओं में। और विद्येश्वर संहिता का अपना न्यूनतम भी वही है — 18.131 पर, जब सब साधनों का अभाव हो, तब दरिद्र व्यक्ति दीपदान करे। इस पृष्ठ पर कुछ भी ऐसा नहीं है जिसके लिए आपके पास न होने वाला धन चाहिए।

भैरव के स्वरूप, एक दृष्टि में

“भैरव” एक श्रेणी है, एक देवता का नाम नहीं। जो संख्याएँ सबसे अधिक उद्धृत होती हैं उन्हें दो ग्रंथ तय करते हैं: रुद्रयामल तंत्र, जो चौंसठ योगिनियों के साथ चौंसठ भैरव रखता है, और आदि शंकराचार्य को आरोपित प्रपंचसार, जो अष्ट भैरव कुछ भिन्न नामों से देता है। शब्द स्वयं एक पद है — किसी क्षेत्र, किसी कुल अथवा किसी मंडल का रक्षक — और इसीलिए कई जीवित परंपराओं में वह पद धारण करने वाले भैरव हैं ही नहीं।

स्वरूप कौन हैं साधना में स्थान Source
काल भैरव अग्नि स्तंभ के प्रसंग में शिव की भृकुटि से प्रकट होने वाले प्रथम भैरव, मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को; काशी के कोतवाल। ये जन्म नहीं लेते — जहाँ उग्र पद की आवश्यकता हो, वहाँ पूर्ण सामर्थ्य के साथ क्षण भर में प्रकट होते हैं। मंदिर का पूजन, दीपदान और व्रत। काशी-उज्जैन के पंचकोशी को छोड़कर घर में स्थापित नहीं। काल भैरव जयंती महाअष्टमी । इन आठ सरल …
कपाल (लाट) भैरव काशी के कपालमोचन तीर्थ पर जहाँ ब्रह्म-कपाल गिरा, वहीं से प्रकट — समान सामर्थ्य वाले पृथक् देवता, और काल भैरव के कोतवाल-पद के सामने काशी के न्यायाधीश। काशी में दर्शन। काशी-यात्रा में सबसे अधिक छूट जाने वाला दर्शन यही है। काल भैरव जयंती महाअष्टमी । इन आठ सरल …
बटुक भैरव बाल स्वरूप, और देवी के अपने प्रिय पुत्र — काली, तारा और छिन्नमस्तिका तीनों ने इन्हें अस्त्र दिए हैं। तंत्रों में इनके भी तीन भेद हैं: स्कंद, चित्र और विरंचि बटुक। गृहस्थ का स्वरूप। पूजन-स्थान में स्थापित, नित्य सेवित, और कुल भैरव अज्ञात हो तो उसी पद पर पूजित। मां गंगा व बटुक भैरव बाबा जयंती का …
महाभैरव / श्मशान भैरव कालिका पुराण का 53वाँ अध्याय इनकी उत्पत्ति वहाँ से बताता है जहाँ शिव के शरभ स्वरूप ने अपनी आठ मूर्तियों को छोड़ा और जो शेष रहा; अठारह भुजाएँ। इनके मंत्र को मंत्रराज कहा गया है। तंत्र-काट — जब कोई अभिचार वास्तव में चल रहा हो। शिव मंदिर से आवाहन, घर में स्थापना कभी नहीं। महाभैरव तंत्र साधना व सिद्धि गृहस्थ साधक हेतु।
कुल भैरव आपके अपने कुल से जुड़े रक्षक — या तो आपकी कुलदेवी के अपने भैरव, अथवा आपके ही वंश का कोई पूर्व सेवक जिसे वह पद प्राप्त हुआ हो। हर कुल के होते हैं। यह स्थान कभी रिक्त नहीं रखा जाता; नाम ज्ञात न हो तो उसी में बटुक पूजित होते हैं। कुलभैरव कौन हैं आपके घर के।कालभैरव अष्टमी
क्षेत्रपाल भैरव व्यक्ति के नहीं, स्थान के भैरव — गाँव, सीमा, चौखट। उस भूमि की प्रत्येक अशांत शक्ति उनके आसन के नीचे रहती है, और इसीलिए उनका पूजन विकल्प नहीं, विधान है। चौखट का विधान, निकारी, और किसी भी भैरव-हवन के पश्चात अनिवार्य बलि। मां गंगा व बटुक भैरव बाबा जयंती का …
अष्ट भैरव आठ मातृकाओं के साथ आठ: ब्राह्मी के असितांग, माहेश्वरी के रुरु, कौमारी के चंड, वैष्णवी के क्रोध, वाराही के उन्मत्त, इंद्राणी के कपाल, चामुंडा के भीषण, महालक्ष्मी के संहार। जिस भी यंत्र-मंडल में अष्टमातृकाएँ हैं — अर्थात् लगभग सभी में — वहाँ ये भी हैं। आवरण पूजन में, गुरु आदेश से। मां गंगा व बटुक भैरव बाबा जयंती का …
चौंसठ भैरव रुद्रयामल के अनुसार चौंसठ योगिनियों में से प्रत्येक के साथ एक। इन्हीं में एक का नाम ब्रह्मराक्षस है — और यही वास्तविक कारण है कि महादुर्गा के पूजन से ब्रह्म-राक्षस दोष तत्काल शांत होता है। चौंसठ योगिनियों का आवरण पूजन। लगभग कभी नहीं बताया जाता; मूल साधना स्थिर हो जाने पर गुरु से माँगने योग्य। मां गंगा व बटुक भैरव बाबा जयंती का …
दस वीर भैरव सृष्टि, स्थिति, संहार, रक्त, यम, मृत्यु, भद्र आदि — बंगाल आदि क्षेत्रों में दशभुजा महिषासुरमर्दिनी के तांत्रोक्त पूजन में इनका विशेष पूजन होता है। श्मशान तथा वीर साधना, और दशभुजा दुर्गा का आवरण। स्वतंत्र रूप से बहुत कम। मां गंगा व बटुक भैरव बाबा जयंती का …
भूत / भीषण भैरव, कंकाल भैरव वास्तविक स्वरूप, वास्तविक पूजन — और वे जिनका नाम साधक समाज में नहीं लेता; संग्रह सूखे स्वर में कहता है कि इनका नाम लेते ही आपको भूत-पूजक मान लिया जाएगा। कुल परंपरा और दीक्षित साधना। यहाँ केवल पहचान के लिए हैं, आरंभ करने के लिए नहीं। काल भैरव जयंती महाअष्टमी । इन आठ सरल …
हनुमान, गणपति, खंडोबा आदि भैरव-पद पर भैरव एक पद है। कोल्हापुर की महालक्ष्मी के यहाँ द्वारपाल का पद गणपति के पास है; दशभुजा तुलजा भवानी के तांत्रिक भैरव नीलकंठ हैं; दक्षिण में खंडोबा स्वयं मार्तंड भैरव हैं; असंख्य घरों में हनुमान जी। यही तय करता है कि आपके कुल भैरव वास्तव में कौन हैं। यदि आपके घर में सदा हनुमान जी ही रक्षक रहे हैं, तो उत्तर मिल चुका। कुलभैरव कौन हैं आपके घर के।कालभैरव अष्टमी

साधना विधान

shown
Nothing matches that.

भैरव शब्द का वास्तविक अर्थ

यहाँ से आरंभ

प्रवचन एक ही व्युत्पत्ति देता है और वर्षों से उसी को दोहराता है — भैरव का अर्थ है भरण पोषण करने वाले, रक्षा करने वाले। भयंकर नहीं। और उसी के साथ वह विडंबना खुलकर रखता है: भैरव का नाम है कि भय का हरण करने वाला भैरव है; उसी भैरव जी के नाम से भय भागना चाहिए, यहाँ लोग भयभीत हो जाते हैं

यह केवल शब्द-विचार नहीं है, इसका व्यावहारिक परिणाम है। क्योंकि भैरव व्यक्तित्व नहीं बल्कि रक्षण का पद हैं, इसीलिए किसी परंपरा में जो भी उस पद को धारण करता है वह “भैरव” कहलाता है — और इसी कारण हनुमान जी, गणपति और खंडोबा तीनों अलग-अलग शक्तियों अथवा कुलों के भैरव हो सकते हैं, बिना किसी विरोधाभास के।

काल भैरव का प्राकट्य, और हाथ में वह कपाल

प्रसंग विद्येश्वर संहिता का अग्नि स्तंभ है: ब्रह्मा और विष्णु में श्रेष्ठता का विवाद, शिव का असीम स्तंभ रूप में प्रकट होना, और ब्रह्मा का केतकी पुष्प से झूठी गवाही दिलवाना। पुराण की अपनी पंक्ति है — “तब महादेव ने ब्रह्मा के गर्व को नष्ट करने की इच्छा से अपनी दोनों भौंहों के मध्य से भैरव नामक एक अद्भुत पुरुष को उत्पन्न किया।” भैरव उसी पाँचवें, ऊर्ध्वमुख शीश को — जिसने झूठ कहा था — अपने नख से काट देते हैं; इसीलिए ब्रह्मा के चार शीश शेष हैं और इसीलिए भैरव के हाथ का कपाल वही ब्रह्म-कपाल है।

प्रवचन इस प्राकट्य को मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी पर रखता है, जो काल भैरव अष्टमी के रूप में मनाई जाती है। वही कपाल काशी के कपालमोचन तीर्थ पर गिरा, और वहीं से एक और भैरव प्रकट हुए — कपाल भैरव, जिन्हें वहाँ लाट भैरव कहा जाता है।

वे प्रकट होते हैं, जन्म नहीं लेते

यह भेद संग्रह बार-बार आग्रह से रखता है और अधिकांश कथाएँ इसे धुँधला कर देती हैं। काल भैरव का कोई बचपन नहीं, कोई लीला-चक्र नहीं, कोई जीवनी नहीं — वो सीधे प्रकट होते हैं, पूरे सामर्थ्य वेग ऊर्जा के साथ क्षण भर में। जहाँ भी उस उग्र पद की आवश्यकता होती है, वह स्वरूप वहीं पूर्ण रूप में उपस्थित हो जाता है।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि भैरव साधना में कथात्मक देवताओं जैसी “धीरे-धीरे परिचय” वाली अवधि अंतर्निहित नहीं है। जो चीज इस संपर्क को संयत रखती है वह आपकी अपनी तैयारी है — और इसीलिए नीचे का क्रम मंत्र से नहीं, स्तोत्र और कवच से आरंभ होता है।

भैरव आज्ञा से चलते हैं — इसलिए साथ में शिव पूजन

आठवाँ अध्याय अधिकार की शृंखला दो बार स्पष्ट करता है। भैरव का पहला कार्य ही प्रणाम करके आज्ञा माँगना है — “यहाँ मैं क्या कार्य करूँ? हे प्रभो, शीघ्र आज्ञा दीजिए।” और जब विष्णु ब्रह्मा के लिए प्रार्थना करते हैं, तब “देवगणों के समक्ष प्रसन्न हुए ईश्वर ने तब भैरव को ब्रह्मा को दण्डित करने से रोक दिया।” जिसने उन्हें उत्पन्न किया, वही उन्हें कार्य के मध्य में रोक देता है।

प्रवचन इसी पर एक कार्यसिद्ध नियम खड़ा करता है: काशी विश्वनाथ का नियंत्रण काल भैरव पर भी है, इसलिए जो पूर्ण भैरव उपासना लेता है उसे साथ में शिव की सेवा अवश्य चलानी चाहिए। कारण भक्तिपरक नहीं, ऊर्जापरक दिया गया है — भैरव साधना से जो ऊर्जा निर्मित होती है उसे संभालने का सामर्थ्य शिव कृपा से ही आता है।

ग्रंथ इसके विपरीत कहता है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 8.8

भैरव अनियंत्रित हैं और अपने उपासक पर पलट सकते हैं।

आठ ही श्लोकों में अध्याय इसका उल्टा दो बार दिखाता है। भैरव आज्ञा मिलने तक कुछ नहीं करते (8.2-8.3), और कार्य के मध्य में रोक दिए जाते हैं: विष्णु की प्रार्थना पर “देवगणों के समक्ष प्रसन्न हुए ईश्वर ने तब भैरव को ब्रह्मा को दण्डित करने से रोक दिया” (8.8)। वे न अपनी पहल पर आरंभ करते हैं, न रोके जाने पर आगे बढ़ते हैं। संग्रह अपना कार्यसिद्ध नियम ठीक इसी पर खड़ा करता है — कि गंभीर भैरव उपासना के साथ शिव की सेवा चलती रहनी चाहिए, क्योंकि उस साधना से बनी ऊर्जा को संभालने का सामर्थ्य उन्हीं से आता है।

मूल पाठ पढ़ें →
8

इत्यर्थितोऽच्युतेनेशस्तुष्टः सुरगणाग्रणे । निवर्तयामास तदा भैरवं ब्रह्मदण्डतः ॥

अच्युत द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर देवगणों के समक्ष प्रसन्न हुए ईश्वर ने तब भैरव को ब्रह्मा को दण्डित करने से रोक दिया।

काशी के तीन अधिकार: कोतवाल, न्यायाधीश और द्वारपाल

काशी जाने से पहले जान लेने योग्य, क्योंकि तीनों को प्रायः एक कर दिया जाता है। काल भैरव कोतवाल हैं — पद रक्षण का है, और भैरव अष्टमी उन्हीं की तिथि है। कपाल (लाट) भैरव, जो कपालमोचन पर गिरे ब्रह्म-कपाल से प्रकट हुए, वह न्याय का अधिकार रखते हैं जो विश्वनाथ ने उन्हें दिया। और दण्डपाणि के पास तीसरा, बिल्कुल अलग अधिकार है: उस क्षेत्र में किसे निवास करने देना है, किसे उसके दुष्कर्मों के कारण बाहर करना है, और वहाँ रहने वाले भक्तों-साधकों का निर्वहन कैसे होगा — उनकी आज्ञा के बिना उस क्षेत्र में न कोई प्रवेश कर सकता है, न निकल सकता है।

व्यावहारिक निर्देश केवल इतना है कि तीनों का दर्शन बनता है, और छूटते सबसे अधिक लाट भैरव हैं।

देवी बटुक से पहले नैवेद्य ग्रहण नहीं करतीं

संग्रह इसी को वह कारण बताता है कि जिन घरों में भैरव अनुपस्थित हैं वहाँ देवी साधना अटक जाती है। बटुक भैरव देवी के अपने पुत्र हैं — काली, तारा और छिन्नमस्तिका तीनों ने उन्हें अपने अस्त्र दिए बताए जाते हैं — और देवी का अपना कहा हुआ यह है कि जब तक कुमार बटुक का पूजन न हो, वे अपने भक्त के हाथ का नैवेद्य ग्रहण नहीं करेंगी। पहले बटुक लेंगे, तब माता लेंगी।

जो निष्कर्ष प्रवचन इससे निकालता है वह असुविधाजनक है और विचारणीय भी: जो व्यक्ति भैरव का नाम लेने में ही सकुचाता है, वह माता से प्रसन्नता माँग रहा है और उनके पुत्र को अस्वीकार कर रहा है।

अष्ट भैरव और अष्टमातृकाएँ — जोड़ी हुई सूची

जहाँ भी आठ मातृकाएँ पूजित होती हैं — अर्थात् किसी भी देवी-देवता के लगभग हर यंत्र और मंडल में, शैव हो, शाक्त हो या वैष्णव — वहाँ अष्टदल के अग्र भाग पर आठ भैरव भी पूजित होते हैं। जोड़ी इस प्रकार दी गई है: ब्राह्मी के साथ असितांग, माहेश्वरी के साथ रुरु, कौमारी के साथ चंड, वैष्णवी के साथ क्रोध (वही क्रोध भैरव जो छिन्नमस्तिका के साथ भी पूजित हैं), वाराही के साथ उन्मत्त, इंद्राणी के साथ कपाल, चामुंडा के साथ भीषण, और महालक्ष्मी के साथ संहार।

प्रपंचसार वही समुच्चय कुछ भिन्न नामों से देता है — दो के स्थान पर कालराज और भूतनाथ आते हैं। इस कार्ड का मूल सूची नहीं, नियम है: यदि आप अष्टमातृका पूजन बिना अष्ट भैरवों के कर रहे हैं तो संग्रह कहता है कि फल आधा-अधूरा रहेगा, और अधिकांश प्रकाशित आवरण-विधियों में इनका छूट जाना भेद नहीं, चूक है।

चौंसठ योगिनी, चौंसठ भैरव — और महादुर्गा से ब्रह्म-राक्षस दोष क्यों शांत होता है

रुद्रयामल तंत्र के अनुसार चौंसठ योगिनियों में से प्रत्येक के साथ एक भैरव चलते हैं। यह समुच्चय लगभग कभी नहीं बताया जाता — प्रवचन की शिकायत यही है कि पंद्रह-पंद्रह वर्ष से साधना कर रहे लोग भी कहते हैं कि उन्हें कभी नहीं बताया गया — और यह वह बात स्पष्ट कर देता है जो अन्यथा अस्पष्ट रह जाती है: उन चौंसठ में से एक का नाम ही ब्रह्मराक्षस है, इसीलिए महादुर्गा का पूजन, जो चौंसठ योगिनियों के बिना हो ही नहीं सकता, ब्रह्म-राक्षस दोष को तत्काल शांत करता है।

इसी प्रसंग में उन नामों की भी बात है जिनसे लोग चौंक जाते हैं। प्रेतभक्षिणी और नरभोजिका उन्हीं चौंसठ में हैं; यहाँ भक्षण सप्तशती का अपना मुहावरा है — दुष्टों का भक्षण — भूख का वर्णन नहीं।

बटुक तीन हैं, और खंडोबा ही मार्तंड भैरव हैं

दो बातें जो बहुत सारा क्षेत्रीय भ्रम एक साथ हल कर देती हैं। पहली — तंत्रों में स्वयं बटुक भैरव तीन हैं: स्कंद बटुक, चित्र बटुक और विरंचि बटुक। इसलिए यदि कोई वर्णन आपके देखे हुए स्वरूप से नहीं मिलता, तो प्रायः वह दूसरा बटुक है, त्रुटि नहीं।

दूसरी — दक्षिण के खंडोबा भैरव के निकट का कोई लोक-देवता नहीं हैं; वे स्वयं भैरव हैं, महालसा के साथ मार्तंड भैरव के रूप में पूजित, और मल्ल-मणि की जो कथा उनसे जुड़ी है वह भैरव की ही कथा है। जिस कुल में खंडोबा कुल देवता हैं, उनके लिए कुल-भैरव का प्रश्न पहले ही उत्तरित है।

महाभैरव अर्थात् श्मशान भैरव — कालिका पुराण से

वृत्तांत कालिका पुराण के 53वें अध्याय में है। वाराह अवतार के साथ हुए प्रसंग के पश्चात, जब शिव ने शरभ स्वरूप में समाहित की हुई आठ मूर्तियों को उनके अपने स्थानों पर लौटाना आरंभ किया, तब जो मूल स्वरूप शेष रहा उसी से श्मशान भैरव प्रकट हुए — अठारह भुजाओं वाले, जो अठारह भुजा दुर्गा की ही संख्या है, और यह समानता आकस्मिक नहीं है।

इसी स्वरूप को संग्रह महाभैरव कहता है। इनका अपना पूजन वामाचार है और दीक्षित श्मशान परंपराओं का विषय है; किंतु वही प्रवचन यह भी आग्रह करता है कि गृहस्थ को भी उचित पर्वकाल पर यथाशक्ति सात्विक दक्षिणाचार विधि से इनका आवाहन-पूजन करके अपने कुल-वंश की रक्षा करनी चाहिए। इनके मंत्र को मंत्रराज कहा गया है, और संग्रह सावधानी से जोड़ता है कि यह उपाधि किसी भी मंत्र को नहीं दी जाती।

अंग विद्या — देवी के किसी भी मंत्र से पहले भैरव क्यों

यह संग्रह का सबसे संरचनात्मक तर्क है और इसे जान लेने पर बाकी सारा क्रम अपने आप समझ में आता है। किसी भी अधिष्ठात्री शक्ति का अनुष्ठान पंचांग सेवन के साथ होता है, और उसमें मंडल पूजन तथा अंग पूजन आते हैं — अर्थात् उस शक्ति के परिवार की अन्य शक्तियों का भी अनुष्ठान।

इसी विधान के अंतर्गत भैरव पूजन अनिवार्य हो जाता है, और उसके तीन कारण दिए गए हैं। एक — बिना भैरव पूजन के देवी से संबंधित मंत्र पूर्ण फल नहीं देता। दो — अथवा उसकी ऊर्जा इतनी तीव्र हो जाती है जिसे संभालने की शक्ति शरीर में नहीं होती। तीन — मंत्र जप से पूर्व भैरव की आज्ञा अनिवार्य रूप से ली जाती है, जो सामान्यतः गुरु परंपरा से प्राप्त होती है। यही कारण है कि केवल एक ही देवता का मंत्र लंबे समय तक जपते रहने पर व्यक्ति को ऐसे प्रभाव मिलने लगते हैं जिनसे वह विचलित होता है — अंग विद्याओं का यथाशक्ति अनुष्ठान इसीलिए बीच-बीच में करना चाहिए।

घर में काल भैरव का विग्रह नहीं — बटुक की स्थापना कीजिए

स्पष्ट नियम

स्पष्ट और बार-बार कहा गया: काल भैरव जी का उग्र विग्रह आदि घर पर स्थापित ना करें, बटुक भैरव जी का करें। कारण भय नहीं, क्षमता है — वह स्वरूप अति उग्र है और विशेष रूप से तामसिक विधि विधान से पूजित होता है, जिसे गृहस्थ का पूजन वहन नहीं कर पाता। संग्रह यह भी जोड़ता है कि अघोर संप्रदाय के लोग भी इसी बात से मना करते हैं।

एक भौगोलिक अपवाद है और उसे अपवाद कहकर ही रखा गया है: काशी के पंचकोश और उज्जैन के अपने पंचकोशी क्षेत्र में, तथा अष्ट भैरवों के क्षेत्रों में, वहाँ के निवासियों से उस क्षेत्र के भैरव की सेवा अपेक्षित है। अन्यत्र काल भैरव का पूजन तभी जब वे वास्तव में आपके कुल देवता हों अथवा आपको अधिकार प्राप्त हो। दो बातें सबके लिए सदा खुली हैं — उनका दीपदान, जो बिल्कुल पृथक् विषय है, और छायाचित्र, जिसमें कोई दोष नहीं।

त्रिशूल ही पूर्ण भैरव स्थापना है

यदि विग्रह उपलब्ध न हो — और अधिकांश के लिए नहीं होगा — तो त्रिशूल कोई समझौता नहीं है। लोहा, पीतल या चाँदी; छह इंच, बारह इंच, या पूरे एक हाथ तक — सब स्वीकार्य है। संग्रह उस बहुप्रचारित ज्योतिषीय सलाह को सीधे अस्वीकार करता है कि घर में बड़ा शस्त्र नहीं रखना चाहिए, और उसी स्वर में उत्तर देता है: शस्त्र और शास्त्र दोनों सनातनियों के घर में होना चाहिए

स्थान दो बताए गए हैं — पूजन स्थान, अथवा मुख्य द्वार के पास ऐसे कि प्रवेश करने वाले को दिखे; आँगन में भी किसी शुभ स्थान पर लगाया जा सकता है। जो लोग वक्ताई करते हैं अथवा जिनके यहाँ किसी पर सवारी आती है, उनके लिए विशेष रूप से लोहे का त्रिशूल मुख्य द्वार के आसपास कहा गया है, ताकि जो भी प्रवेश करे वह रुके। स्थापना का अधिकार सभी को है, और रात्रि में भी की जा सकती है।

पूजन स्थान में भैरव जी का स्थान कहाँ

दो निर्देश प्रचलित हैं और तब तक विरोधी दिखते हैं जब तक यह तय न हो कि दायाँ किसका। एक लाइव में कहा गया कि भगवती के विग्रह के बाईं ओर बटुक भैरव को स्थान दीजिए; दूसरे में कि भैरव जी का स्थान भगवती के दाहिने ओर होता है; और चाँदी की कटोरी वाला विधान भी “भगवती के दाहिने हाथ की तरफ” रखा गया है। दोनों एक ही स्थान को विपरीत दृष्टि से कह रहे हैं, और मंदिर स्वयं परीक्षा दे देता है: देवी के मंदिर से बाहर निकलते समय द्वार के पास जिधर आपका बायाँ हाथ पड़े — वही देवी का अपना दायाँ है, और वही भैरव का स्थान है।

अथवा जो शिव पंचायतन आप पहले से रखते हैं, उसी में उन्हें स्थान दीजिए। बाहर हनुमान जी की ध्वजा के पास अथवा गमले आदि में भी प्रतीक रूप में स्थान दे सकते हैं — और यदि अलग से स्थान दिया है तो वहाँ सुबह-शाम सरसों तेल का एक दीपक उनके नाम से अवश्य जले।

नित्य पूजन का क्रम, और शिव सबसे अंत में क्यों

यहाँ से आरंभ

क्रम सीधे पूछे जाने पर उत्तर यही दिया गया: गुरु → गणपति → भैरव → हनुमान → लक्ष्मी-नारायण → देवी (कुलदेवी, दुर्गा, अथवा जिस महाविद्या की आप सेवा करते हैं) → शिव।

हर स्थान का कारण है। गुरु से आरंभ। गणपति वरदान से प्रथम पूज्य। भैरव तीसरे इसलिए कि वे रक्षण हैं — उनके बाद आप जिसका भी आवाहन करें, जो नहीं आना चाहिए उसे रोकने का कार्य इन्हीं का है। और शिव सबसे अंत में इसलिए कि उनका पूजन उन समस्त शक्तियों को तृप्त करता है जो छूट गई हों — वे बैठक को पूर्ण करते हैं, इसलिए उन्हें पहले रखने से वही रिक्ति रह जाती है जिसे भरने के लिए वे हैं।

पितृ-स्मरण जान-बूझकर उसी आसन से नहीं किया जाता; उसे सूर्य को अर्घ्य देते समय अथवा तुलसी जी के पूजन में कीजिए।

दो दीपक पूरे गृहस्थ पंचायतन के लिए पर्याप्त हैं

एक ऐसे प्रश्न का व्यावहारिक उत्तर जिस पर बहुत लोग अटक जाते हैं: प्रत्येक देवता के लिए अलग दीपक आवश्यक नहीं है। एक घी का दीपक और एक सरसों तेल का दीपक — इतने से गृहस्थ के समस्त देवी-देवताओं का पूजन हो जाता है। भैरव जी के लिए सरसों तेल का दीपक अति उत्तम कहा गया है। समय और साधन हों तो प्रत्येक के लिए अलग जलाइए, इसमें कोई दोष नहीं।

इसके साथ चलने वाला क्रम-नियम ध्यान देने योग्य है: दीपक को धोकर, चंदन-रोली-कुंकुम लगाकर, पुष्प चढ़ाकर सबसे पहले प्रज्वलित किया जाता है — विग्रह के स्नान से पहले, नैवेद्य से पहले, आरती से पहले। ज्योति ही कर्म-साक्षी हैं, और उन्हें शिव-पार्वती की पुत्री कहा गया है; उनके समक्ष किया गया प्रत्येक कार्य आराध्य को स्वीकार होता है।

पर्व के दिन का श्रृंगार — और आठ की संख्या

पर्व के दिन का पूरा विधान इतना सरल है कि छूटना नहीं चाहिए। फोटो पर पूजन करते हैं तो उसे अच्छे से पोंछकर सुंदर तिलक कीजिए, नया वस्त्र पहनाइए, और श्वेत तथा रक्त पुष्पों की मिली हुई माला से श्रृंगार कीजिए। सामने यथाशक्ति बूंदी का लड्डू, जलेबी और मधु का भोग रखिए।

और फिर संख्या का नियम: भगवान भैरव को अष्ट की संख्या, आठ की संख्या अति प्रिय है। आठ स्थानों पर भोग लगाइए, आठ लड्डू चढ़ाइए, आठ दीपक प्रज्वलित कीजिए। हो सके तो हर भोग के ऊपर एक-एक बेलपत्र रखिए, और भैरव जी का भी बेलपत्र से श्रृंगार कीजिए — दो बेलपत्र हों तो एक भोग में और एक स्वयं भैरव जी के ऊपर।

जो वाक्य इस पूरे कार्ड को अर्थ देता है वह यह है: जितना उनका आप श्रृंगार कीजिएगा, वह आपके जीवन में भी उतना ही श्रृंगार करेंगे

नित्य नैवेद्य — और सात्विक मदिरा

नित्य पूजन में: बूंदी का लड्डू, अथवा काजू-किशमिश-पंचमेवा — जो भी भाव से अर्पित हो। इकतालीस दिन के अनुष्ठान में सुबह-शाम दोनों समय नैवेद्य दीजिए, और उसमें एक वस्तु और जोड़िए — एक पात्र में अदरक कूटकर उसमें जल और गुड़ मिलाकर, चाहें तो दो लौंग और इलायची डालकर। यही गृहस्थ के लिए भैरव जी की सात्विक मदिरा है।

निष्कासन का नियम कठोर है और सरलता से भूल जाता है। नैवेद्य प्रसाद है और उसे सब ग्रहण कर सकते हैं; मदिरा नहीं। पूजन के पश्चात उसे किसी दिव्य वृक्ष की जड़ में डाल दीजिए — आप स्वयं पीने की इच्छा मत करिएगा

अनुष्ठान के दौरान अलग सेवा, उसके बाद सामूहिक

एक भेद जो बहुत सारा अनावश्यक श्रम बचा देता है। जब तक भैरव जी का इकतालीस दिन का अनुष्ठान चल रहा है — अष्टोत्तर सतनाम, कोई स्तोत्र, अथवा महाभैरव जप — तब तक उनके निमित्त अलग से दीपक और अलग से नैवेद्य दीजिए।

जैसे ही वह पूर्ण हो जाए और आप सामान्य नित्य कर्म पर लौटें, यह बंद कर दीजिए। अब अलग से धूप, दीप या नैवेद्य देने की आवश्यकता नहीं है; वे पंचायतन में सबके साथ सामूहिक रूप से पूजित होंगे। रविवार, मंगलवार, अष्टमी, अमावस्या और चतुर्दशी को इच्छा हो तो बूंदी के लड्डू का भोग, नया श्रृंगार, और चाहें तो निंबू बलि अलग से जोड़ दीजिए।

लहसुन-प्याज का भोग नहीं — बाल भैरव को भी नहीं

सीधे पूछे जाने पर कि घर में रखे बाल भैरव को लहसुन-प्याज युक्त भोजन अर्पित किया जा सकता है या नहीं, उत्तर नहीं है — घर में जो सात्विक भोजन बने वही भोग लगेगा, और कारण भावुक नहीं संरचनात्मक दिया गया है: केवल भैरव जी तो नहीं होंगे ना आपके घर में। वह थाली उसी आसन पर बैठे शेष सभी के साथ साझा है।

इसके साथ चलने वाला वैष्णव नियम यह है कि नारायण और हनुमान जी के नैवेद्य में तुलसी पत्र अनिवार्य है और शैव-शाक्त थाली में नहीं — इसलिए जहाँ भाव के कारण एक ही थाली असुविधाजनक लगे, वहाँ दो लगा दीजिए।

छह इंच का नियम, और उसका कारण

घर की मूर्ति पर छह इंच की सीमा सजावटी नहीं है। उससे बड़ी मूर्ति के साथ शास्त्र में वर्णित पूर्ण नित्य-पूजन के नियम भी आ जाते हैं — नित्य स्नान, नित्य श्रृंगार, वह सब जो मंदिर निभा सकता है और घर नहीं। छह इंच से छोटी मूर्ति का नित्य स्नान आवश्यक नहीं; पर्वकाल में — पूर्णिमा, अमावस्या, दीवाली, होली — अथवा सप्ताह में किसी एक निश्चित दिन कराइए।

इसी प्रसंग का यंत्र-नियम भी साथ पढ़ने योग्य है: यंत्र केवल अपने प्रमुख आराध्य का रखिए, और वह विधिवत बना हुआ हो — बीस रुपये वाला छपा हुआ यंत्र नहीं जिसका रंग पहले स्नान में ही उतर जाए।

हर कुल के भैरव होते हैं — “हमारे नहीं हैं” एक भ्रम है

सुधार

यह मान लेना कि किसी कुल के भैरव हो ही नहीं सकते, एक व्यापक भूल बताई गई है: संभव ही नहीं है। जब भी किसी शक्ति की सेवा करने वाले घर पर कोई विशेष कष्ट आने वाला होता है, रक्षण के लिए सबसे पहले तत्पर होने वाली शक्ति कुल के अपने भैरव होते हैं — जो, संग्रह के अनुसार, उसी तत्व के अंशात्मक रूप हैं जो काल, बटुक अथवा बाल भैरव के रूप में है।

परंपरागत पहचान जो दी गई है वह सवारी की अवस्था से है: जब वास्तव में घर की कोई शक्ति किसी पर आती है, तो सबसे पहले जो आता है वह कुल का रक्षक होता है — आते ही जयकारा लगाता है — और वह शरीर को इस योग्य बनाता है कि देवी स्वयं आ सकें और शरीर को कष्ट न हो। इसे प्रमाण मानें या न मानें, व्यावहारिक निष्कर्ष एक ही है: वह स्थान है, इसलिए उसे रिक्त मत छोड़िए।

कुल भैरव ज्ञात न हों तो उसी स्थान पर बटुक

निर्देश स्पष्ट है और उसके लिए किसी खोज की आवश्यकता नहीं: अगर देवी पूजित हैं आपको नहीं पता कि भैरव जी कौन हैं तो कुल भैरव के रूप में बटुक भैरव जी की पूजा कीजिए — पूजा जिन्हें मिलनी है, उन्हीं को प्राप्त होगी।

तीन परिष्कार दिए गए हैं। यदि आपके घर में सदा हनुमान जी ही रक्षक देवता रहे हैं और अन्य कोई नहीं, तो कुल देवता वही हैं और भैरव का स्थान भरा हुआ है — साथ में प्रतीकात्मक रूप से बटुक का पूजन कीजिए, क्योंकि चौकी में सब होते हैं। यदि किसी पर वास्तविक कुल-शक्ति की सवारी आती है, तो सीधे पूछिए कि भैरव के रूप में किनका पूजन करना है; और यदि उत्तर मिले कि अभी तक किसी को वह पद नहीं दिया गया, तो बटुक की स्थापना कीजिए। और यदि कुलदेवी ज्ञात हैं तो उनके भैरव ही आपके हैं — कामाख्या के उमानन्द भैरवकामाख्या स्थल पर शिव की उपस्थिति, देवी के भैरव के रूप में।, शाकंभरी के सदाशिव, दशभुजा तुलजा भवानी के तंत्र-अनुसार नीलकंठ यद्यपि वहाँ प्रमुखता से काल भैरव ही पूजित हैं।

मसान या पिशाच को भैरव का स्थान कभी नहीं

स्पष्ट नियम

भैरव का पद देवी देती हैं, वह स्वयं ले नहीं लिया जाता। आपके ही वंश का कोई पूर्व सेवक उस पद तक उठाया जा सकता है — यह वैध है और सामान्य भी; कवचों की फलश्रुतियाँ इसी प्रकार के उन्नयन का वर्णन करती हैं। परंतु मसान, पिशाच अथवा राक्षस-प्रवृत्ति का कोई ब्रह्म, जिसे किसी ने शांत करने के लिए बैठा दिया हो, नहीं — और संग्रह सीधे कहता है कि उसे भैरव मानना स्पष्ट भूल है।

पहचान की कसौटी आचरण की दी गई है, रहस्य की नहीं। वास्तविक देव-श्रेणी की कुल-शक्ति गायत्री से और जनेऊ से पुष्ट होती है, सात्विक आचरण रखती है, वचन की पक्की होती है, कभी गलत कार्य को बढ़ावा नहीं देती, और आपको शिव-दुर्गा के पूजन के लिए, शिखा और जनेऊ के नियम के लिए बार-बार कहती है; गलत मार्ग पर जाएँ तो रोकती है। क्रोध शीघ्र आ जाना स्वभाव है, श्रेणी नहीं। नकारात्मक शक्ति ठीक विपरीत चलती है, और एक बार स्वतंत्र रूप से — किसी देवता के नीचे नहीं — बैठा दी जाए तो फिर घर को अपनी इच्छा से चलाती है; संग्रह के अनुसार उसे मन से मानने पर केवल जगदंबा महादुर्गा की कृपा ही विवश करती है। जहाँ ऐसा पहले से स्थापित है, वहाँ छोटा-सा शिव मंदिर बनवाकर उसे उसके नीचे स्थान दीजिए, स्वतंत्र नहीं।

क्षेत्रपाल “भूत भेजते हैं” — इस वाक्य का वास्तविक अर्थ

जो धमकी लोग दोहराते हैं — क्षेत्रपाल का पूजन नहीं दोगे तो वे घर में भूत भेजेंगे, साँप भेजेंगे, बिच्छू भेजेंगे — वह एक साफ बात का बिगड़ा हुआ रूप है। जब किसी भूमि पर क्षेत्रपाल की स्थापना होती है, डेही अथवा ग्राम देवताकिसी गांव या क्षेत्र के रक्षक देवता — देवता ज्ञात न हो तो प्रायः उस क्षेत्र के सबसे प्राचीन मंदिर के रूप में पहचाने जाते हैं — क्षेत्रीय सुरक्षा हेतु क्षेत्रपाल के साथ आवाहित। के रूप में, तो उस स्थान की समस्त अशांत शक्तियाँ — जितनी डाकिनी-शाकिनी, प्रेत-पिशाच, जिनकी अपमृत्यु हुई या जिन्होंने आत्महत्या की — उन्हीं के आसन के नीचे रहती हैं। वे नियंत्रित हैं, आज्ञाकारी नहीं।

इसीलिए उनका पूजन विकल्प नहीं, विधान है। आप किसी धमकाने वाले देवता से सौदा नहीं कर रहे; आप उस व्यवस्था को बनाए रख रहे हैं जो आपकी अपनी भूमि की नकारात्मक ऊर्जा को किसी के पाँव के नीचे रखती है। प्रवचन का वाक्य यही है कि भैरव जी के पास किसी चीज की कमी नहीं है — वे संसार का भरण-पोषण कर रहे हैं; अर्पण आपकी श्रद्धा का प्रकटीकरण है, उनका शुल्क नहीं।

क्षेत्रपाल निकारी — पूर्ण विधि

दो शोधन-विधानों में बड़ा, और वही जो घर पर वास्तविक अभिचार होने पर किया जाता है। साल के पत्तों से बने पत्तल पर दो व्यक्तियों के बराबर बिना उबाला चावल, 250 ग्राम उड़द, 100 ग्राम दही और लाल सिंदूर मिलाइए। ऊपर चौमुख दीपकचार बत्तियों वाला चार-मुखी तेल का दीपक, भैरव व अन्य समान शक्तिशाली देवताओं के प्रयोग-अनुष्ठानों में जोड़े में या घर के कई स्थानों पर प्रयुक्त होता है। दीपक रखकर जलाइए, तिलक कीजिए, पाँच प्रकार की मिठाई और दक्षिणा रखिए। पूरे घर में घुमाइए, घर के प्रत्येक सदस्य के सिर के ऊपर से स्पर्श कराइए — एक घर से एक ही बलि निकलती है, प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग नहीं — और फिर घर से बाहर निकलकर यह प्रार्थना कीजिए कि हे क्षेत्रपाल भैरव, इस घर की समस्त विपत्ति, तंत्र, विचार, भूत-प्रेत-पिशाच आपके नियंत्रण में हों, और शत्रु कभी किसी प्रकार का षट्कर्म अथवा कृत्या-प्रयोग करे तो आप उसे अपने स्थान से ही रोक दें।

छोटी निकारी, जब किसी पर तत्काल आवेश हो: स्वच्छ मिट्टी के पात्र में साधारण उबला भात, ऊपर कुछ मीठा, उस पर कपूर प्रज्वलित; जिस पर शक्ति आई है उस पर और जिन स्थानों पर उपस्थिति बनी हुई है वहाँ से घुमाकर बाहर ले जाइए और चौक-चौराहे पर छोड़ दीजिए — कोई पशु खा ले तो कोई समस्या नहीं। दो व्यक्ति चाहिए: एक बाहर ले जाए, दूसरा तुरंत घर में गंगाजल और गोमूत्र छिड़के।

निकारी कब और कैसे — समय, दिशा, और स्त्रियों का प्रश्न

व्यवहार के वे विवरण जो विधि से अलग बताए गए हैं। निकारी पूजन के पश्चात होती है, और सबके स्नान कर लेने के बाद — इसलिए यदि सुबह अँधेरे में करना है तो घर के सब लोग स्नान कर चुके हों और पूजा हो चुकी हो। दीपक जलता हुआ ही बाहर ले जाया जाता है (नहीं तो जाएगा कैसे); लोग देखें नहीं इसके लिए उसे किसी पात्र से ढककर ले जाइए, अथवा रात्रि में थोड़ा देर से कीजिए। बाहर उसे दक्षिण दिशा की ओर रखा जाता है।

स्त्रियों के लिए जो सामान्य मनाही चलती है, संग्रह उसका कारण भय बताता है, अशुद्धि नहीं — और उसी पर एक तीखा प्रतिप्रश्न रखता है: जो सौ में पचहत्तर घरों में मुर्गा काटकर, साफ करके, पकाकर परोसा जाता है वहाँ भय नहीं लगता, और यहाँ एक दीपक घर से बाहर निकालने में लगता है। तर्क यह है — घर में यदि प्रेत है तो वह कटे हुए रक्त का भक्षण करेगा; क्षेत्रपाल के नाम से निकालने पर उस भूत-प्रेत का भक्षण क्षेत्रपाल करेंगे। फिर भी यदि मन में शंका बनी रहे तो न कीजिए; संग्रह जोड़ता है कि यही भय किसी न किसी माध्यम से पुण्य की वृद्धि रोक देता है।

चौखट का दीपक — सबसे पहले, और सबसे तीक्ष्ण

पहले यही

आठ उपायों में सबसे पहला और सबसे तीक्ष्ण यही बताया गया है। स्नान के पश्चात आटे का चार मुँह वाला दीपक बनाइए, उसमें सरसों का तेल डालिए, और बटुक भैरव जी के नाम से अपनी चौखट पर प्रज्वलित कीजिए — सुबह और शाम दोनों समय। दीपक कभी सीधे भूमि या चौखट पर नहीं रखा जाता; पुष्प, रोली अथवा हल्दी का आसन देकर ही रखिए।

कारण: चौखट उन थोड़े-से स्थानों में है जहाँ तंत्र का प्रभाव नहीं पड़ता, और जिस चौखट पर दीपदान तथा सात्विक बलि — नींबू, जायफल, लौंग, कपूर — आरंभ हो जाए, उसे आता हुआ अभिचार लाँघना छोड़ देता है। संग्रह का अपना अनुमान यह है कि उसका वेग वहीं आधा रह जाता है। यदि बनी हुई चौखट नहीं है तो बनवा लीजिए; वह भी संभव न हो तो उसी स्थान पर कीजिए। भगवान नरसिंह, कुल के देवी-देवता और बटुक भैरव — इन तीनों की उपस्थिति ही चौखट को मजबूत बनाती है।

आठ लौंग, क्षेत्रपाल स्तुति और खैर की धूनी

चौखट के साधारण दीपक के बाद का चरण, उस घर के लिए जिस पर आघात तीव्र है। आठ लौंग लीजिए। उन्हें क्षेत्रपाल भैरव की स्तुति से एक बार अभिमंत्रित कीजिए — वह जो क्षेत्रपाल अष्टक के नाम से मिलती है, जिसका आरंभ यं यं यं यक्ष रूपम् से होता है, और जिसका एक प्रचलित नाम तीक्ष्ण-दंष्ट्र काल भैरव अष्टकम् भी है — और उन्हें कपूर के साथ चौखट के पास प्रज्वलित कर दीजिए। कहा गया प्रभाव यह है कि क्षेत्रपाल की उपस्थिति उसी क्षण रक्षा के निमित्त बन जाती है।

इससे भी आगे: सूखी खैर (कत्थे) की लकड़ी छोटे-छोटे टुकड़ों में, मिट्टी की धूपदानी में कपूर के साथ प्रज्वलित — यहाँ न अग्नि आवाहन है, न पंचभूत संस्कार; यह धूना है, यज्ञ नहीं। घी में गुग्गल और लौंग डुबोकर आठ छोटी आहुतियाँ दीजिए, स्तुति के प्रत्येक श्लोक पर एक, फलश्रुति की आवश्यकता नहीं। आरंभ में दो आहुतियाँ पहले — एक गुरु के नाम, एक गणपति के नाम। संस्कृत न आए तो श्री क्षेत्रपाल भैरवाय नमः कहकर आहुति दीजिए; स्वाहा न भी कहें तो चलेगा। विकट स्थिति हो तो अंत में एक छोटी कच्चे नींबू की बलि काटकर उसमें रख दीजिए।

बारह घंटे का नियम — और चौखट-विधान क्या भीतर बंद कर देता है

विधि के तुरंत बाद दी गई ईमानदार सीमा, जिस पर ध्यान कम जाता है। चौखट का विधान एक संध्या से दूसरी संध्या तक — लगभग बारह घंटे — टिकता है, और इसीलिए इसे दोनों संध्याओं में निरंतर दोहराया जाता है, एक बार नहीं।

और वह चेतावनी जो महत्वपूर्ण है: यह जितना बाहर वाले को भीतर आने से रोकता है, उतना ही जो भीतर है उसे भीतर भी रोक देता है। यदि घर के किसी सदस्य पर सक्रिय आवेश है तो पहले निकारी करके उसे बाहर कीजिए, तब बंधन कीजिए। और यदि अभिचार की सामग्री घर की भूमि में कहीं गाड़ी गई है — प्रवचन में एक साधक का वृत्तांत है जिनके यहाँ पौधा उखाड़ने पर नींबू और श्मशान की हड्डी निकली — तो चौखट-विधान से आने-जाने का वेग टूटेगा, पर आना-जाना तब तक नहीं छूटेगा जब तक वह सामग्री स्वयं सामर्थ्यविहीन न हो जाए; और वह एक-दो दिन का काम नहीं, निरंतर देव-पूजन का है।

चाँदी की कटोरी में दो लौंग — उस घर के लिए जहाँ पूजन की अनुमति नहीं

सबसे मौन विकल्प

यह विधान स्पष्ट रूप से उसी स्थिति के लिए दिया गया है जहाँ खुलकर भैरव पूजन नहीं होने दिया जाएगा — जहाँ घर वाले उसे तांत्रिक पूजन कहकर चौखट पर ही रोक देंगे। हर घर में भगवती का स्थान होता है, कोई विग्रह या छायाचित्र; इतना पर्याप्त है।

जितनी छोटी मिल जाए उतनी छोटी चाँदी की कटोरी लीजिए, जिसमें दो लौंग और थोड़ा कपूर आ जाए। रात्रि आठ बजे के पश्चात, शुद्ध वस्त्र में, भगवती के दाहिनी ओर उन दोनों लौंगों को (सदैव जोड़े में) कपूर के साथ प्रज्वलित कीजिए, और बटुक भैरव का नाम ग्यारह या इक्कीस बार जपिए — स्तोत्र-सतनाम आता हो तो वह, न आता हो तो केवल नाम; अष्टोत्तर सतनाम अथवा ब्रह्म कवच से अभिमंत्रित करके करें तो प्रभाव कई गुना कहा गया है। जब तक पूरा जल न जाए तब तक वहीं खड़े होकर नाम जपते रहिए — लौंग में तेल होता है और वह जलता हुआ छिटकता है, इसलिए आसपास वस्त्र या चुनरी न हो।

उन लौंगों की राख का क्या करना है

चाँदी की कटोरी वाले विधान का अगला चरण, और संग्रह के अधिक विशिष्ट निर्देशों में से एक। जली हुई लौंग की जो राख बचे उसे रख लीजिए। घर में जिसे भी समस्या है उसका उसी से तिलक कर दीजिए, अथवा थोड़ी-सी उसके भोजन में मिला दीजिए।

दो स्थितियाँ विशेष रूप से नामित हैं। जहाँ परिवार को लगता है कि किसी को वशीकरण में डाल दिया गया है — वही सामान्य शिकायत कि “पति वशीकृत हो गए हैं” — वहाँ यदि वास्तव में वशीकरण का कोई विषय होगा तो पहले दिन से प्रभाव समझ में आने लगेगा। और जहाँ यह कहा जाता है कि कुछ खिला-पिला दिया गया है और पेट से निकल नहीं रहा, वहाँ भी। दो शर्तें साथ हैं: यह रात्रि काल में ही करना है, और काल भैरव अष्टमी तथा मासिक कालाष्टमी पर विशेष रूप से। लौंग दो ही पर्याप्त हैं; प्रभाव को बढ़ाने वाली वस्तु यह है कि उन पर कितना जप हुआ।

मंदिर का इकतालीस दिन का नियम — और हर चीज एक क्यों

किसी एक अटकी हुई समस्या के लिए — कोर्ट केस, रोग, शत्रु, ऋण। आसपास भैरव जी का कोई मंदिर हो तो संध्या के बाद, जब थोड़ा अँधेरा हो जाए, जाइए और केवल दो कार्य कीजिए: नैवेद्य समर्पित कीजिए, और आटे का चौमुख दीपक सरसों तेल का, हल्दी-रोली अथवा पुष्प के आसन पर प्रज्वलित कीजिए। नैवेद्य एक नमकीन और एक मीठा — उड़द का छोटा बड़ा, घर का जमा हुआ थोड़ा दही, और एक लड्डू।

फिर जो भी विपत्ति है उसे प्रार्थना के रूप में स्पष्ट कह दीजिए। आठ दिन में भी प्रभाव आ सकता है यदि उनकी इच्छा हो; संग्रह का अपना मानक एक मंडल, इकतालीस दिन है।

और वह शर्त जिस पर पूरा विधान टिका है: व्यक्ति एक हो, समय एक हो, सामग्री प्रतिदिन का एक हो, मंदिर प्रतिदिन का एक हो। जो वचन दिया गया है वह परिणाम का नहीं, मार्गदर्शन का है — कि निकलने का मार्ग स्वयं दिखने लगेगा।

भैरव जी का मंदिर न हो तो देवी मंदिर का द्वार

हर देवी मंदिर में भैरव का स्थान होता है, चाहे वहाँ किसी ने कुछ बनवाया हो या नहीं। मंदिर से बाहर निकलते समय जिधर आपका बायाँ हाथ पड़े, द्वार के पास — वही स्थान है। वहाँ साफ-सफाई कीजिए, आसन देकर दीपक प्रज्वलित कीजिए, और निवेदन कीजिए। भैरव जी की कृपा प्राप्त होने के लिए इतना पर्याप्त कहा गया है।

दो शिष्टाचार साथ जुड़े हैं: जिनका मंदिर है उन प्रमुख देवी को भी पुष्प, दीप और कपूर समर्पित कर दीजिए; और इतना संकोच से कीजिए कि कोई यह कहना न आरंभ कर दे कि आप तांत्रिक बन गए हैं। काली जी, दुर्गा जी, दस महाविद्याओं में से किसी का भी मंदिर — कोई भी माई का मंदिर चलेगा।

फल का खप्पर — बटुक के लिए आठ, काल भैरव के लिए नौ

खप्पर अपने आप में एक पूरा तंत्र है, पर उसका फल-रूप गृहस्थ के लिए खुला है। अनार, नारियल (सूखी गड़ी अथवा पानी वाला — एक नारियल से दो खप्पर आराम से होते हैं, और दोनों भरने होते हैं) अथवा बड़ा देसी नींबू लीजिए। बटुक या काल भैरव के नाम से तिलक कीजिए, फिर कपूर, फिर मखाना, पंचमेवा, थोड़ा अनार, कम से कम एक जायफल — जायफल विशेष रूप से भगवती का है — और लौंग। कपूर से भरकर संकल्प कीजिए कि किसलिए कर रहे हैं, और पान के पत्ते पर अथवा बने हुए त्रिकोण पर रखकर प्रज्वलित कीजिए।

संख्या का नियम वही है जो सबसे अधिक भूला जाता है: बटुक भैरव जी के लिए हर वस्तु आठ, काल भैरव जी के लिए नौ। साथ में अपनी प्रमुख शक्ति के लिए दूसरा खप्पर रखिए, उनके अनुरूप रंग में — पीतांबरा के लिए पीला, इत्यादि।

कब: मंत्र सिद्धि के निमित्त; किसी अभिचारिक विद्या के विनाश के निमित्त; और किसी आकस्मिक विकट कष्ट में, जिसमें बाहर रह रहे किसी परिजन पर आया संकट भी सम्मिलित है। और जब हवन संभव न हो, तब खप्पर उतना ही देता है जितना हवन देता — पर यह आपात-प्रावधान है, वरीयता नहीं; हवन से देवता तृप्त और प्रसन्न होते हैं।

महाभैरव मंत्र में सभी भैरव आ जाते हैं — और बँधी हुई कुलदेवी खुलती हैं

दो गुण इसे उस गृहस्थ के लिए संग्रह की स्वाभाविक अनुशंसा बना देते हैं जो अनेक के बजाय एक मंत्र चाहता है। पहला, व्याप्ति: महाभैरव मंत्र के भीतर काल भैरव, बटुक भैरव, भूत भैरव और महाभैरव — सब नामित हैं, इसलिए कुल भैरव, बटुक, काल और कपाल सबका पूजन इसी से हो जाता है — ठीक उसी तर्क से जिससे महागणपति के पूजन में अष्टविनायक आ जाते हैं।

दूसरा, उसकी अपनी विशेषता: जहाँ किसी घर की अपनी कुलदेवी को किसी ने बाँध लिया हो — ले जाकर कहीं पूज लिया हो, वचन में डाल दिया हो — वहाँ बंधन खोलने के लिए यही विधान नामित है। संकल्प स्पष्ट रूप से कुलदेवी की बंधन-मुक्ति का कीजिए; मंत्र में इतने भैरव नामित हैं कि जो भी गण आएँगे उन्हें ज्ञात होगा कि आवाहन किसलिए हुआ है।

आरंभ अष्टोत्तर सतनाम से — मंत्र से नहीं

यहाँ से आरंभ

भैरव पूजन के लिए प्रथम श्रेणी का विधान यही बताया गया है और बिना दीक्षा वाले के लिए यही सही आरंभ है: उसका सबसे मूल पाठ ही आपके लिए प्रथम श्रेणी है। यह स्वयं एक तांत्रोक्त रचना है जिसमें सृष्टि-क्रम और संहार-क्रम के प्रयोग अंतर्निहित हैं, परंतु नए साधक के लिए मूल पाठ ही है — 108 नाम, हर बार फलश्रुति नहीं।

सामर्थ्य अनुसार प्रतिदिन 21, 27 अथवा 100 पाठ; कंठस्थ हो जाने पर सौ पाठ में लगभग डेढ़ घंटा लगता है। जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं वे विनियोग-न्यास जोड़ें, शेष सब बटुक भैरव का ध्यान करके सीधे मूल पाठ पर आएँ। और संख्या पहले से मत बाँधिए — “बस सौ ही करेंगे, बस तीन महीने ही करेंगे” को स्पष्ट रूप से गलत दृष्टि कहा गया है।

कहा गया क्षेत्र: भूत, प्रेत, पिशाच, नजर, दृष्टि और शत्रु-बाधा से मुक्ति; रुका हुआ धन और नौकरी; राहु, केतु, शनि तथा अन्य क्रूर ग्रहों का दुष्प्रभाव; मारकेशज्योतिष में एक कठिन ग्रह-दशा — यह अकेले दुर्भाग्य का कारण नहीं बनती, अपना पूर्ण प्रभाव तभी दिखाती है जब पूर्व के अनसुलझे कर्म भी उसी समय फलित होने वाले हों। का दुर्योग। और हर प्रकार का शाप — देव, पितृ, यहाँ तक कि हृदय से दिया हुआ शाप — प्रायश्चित के साथ की गई बटुक उपासना से मुक्त होना कहा गया है।

चालीस हजार का महापुरश्चरण

पूर्ण माप जानना हो तो संख्या यह है। बटुक भैरव अष्टोत्तर सतनाम के चालीस हजार पाठ का महापुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। होता है, और सिद्धों तथा तंत्र-शास्त्रों का कहना है कि उसकी पूर्णता पर बटुक भैरव प्रत्यक्ष हो जाते हैं।

संग्रह इस दावे को गंभीर मुद्रा के बजाय हल्के हाथ से सँभालता है। प्रत्यक्षीकरण में छह महीने लगते हैं क्या — इस प्रश्न का उत्तर यही मिला कि जैसे ही आप एक सौ आठवाँ नाम पढ़ेंगे वे प्रत्यक्ष हो जाएँगे, और आपको सुनाई देगा या दिखाई देगा यह पूरी तरह आपके सामर्थ्य का प्रश्न है, उनका नहीं। यही ईमानदार ढाँचा है: संख्या अनुशासन है, कोई मशीन नहीं।

बटुक भैरव हृदय — पूरा अनुष्ठान, आरंभ से हवन तक

पूर्ण विधान

अष्टोत्तर सतनाम के बाद का अगला चरण, और संग्रह में इसका विधान पूरा दिया गया है। हृदय का अर्थ ही है देवता का हृदय; इसके पाठ से हर प्रकार का रक्षण मिलता है — मंत्रों में कोई त्रुटि रह गई हो, अनुष्ठान काल में कोई दोष लग गया हो, किसी शत्रु ने वैचारिक प्रयोग कर दिया हो जिससे साधना खंडित होती हो — उन सबसे।

आरंभ: किसी भी मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी से, अथवा नवरात्र, शिवरात्रि जैसे किसी पर्वकाल से। आसन पीला, लाल अथवा श्वेत; दिशा पूर्व या उत्तर। स्वरूप वही जो पहले से स्थापित है — फोटो, श्री विग्रह अथवा त्रिशूल; न हो तो महादेव के समक्ष भी कर सकते हैं, अथवा चावल पर सुपारी में मौली लपेटकर, अथवा स्थापित तांत्रोक्त रुद्राक्ष पर।

पाठ: प्रतिदिन कम से कम 27, अधिकतम 108। विनियोग-न्यास एक ही बार। इसमें चौदह श्लोक हैं; पाठ के अंत में फलश्रुति का एक श्लोक। एक हाथ में लाल या पीला पुष्प (अथवा गुलाब) लेकर पाठ कीजिए, और गिनती दूसरे हाथ से — करमाला, सुपारी अथवा माला से। पाठ के पश्चात वही पुष्प समर्पित कीजिए, फिर हाथ में जल लेकर समर्पण, फिर कपूर पर दो लौंग रखकर कम से कम पाँच बार आरती। समय सुबह, शाम अथवा रात्रि — रात्रि सर्वोत्तम। डेढ़ से दो घंटे लगते हैं।

समापन: चतुर्दशी अथवा अमावस्या तक चलाइए, और अंतिम दिन हवन कीजिए।

हृदय अनुष्ठान का हवन — तिल के लड्डू, मधु में डुबोकर

हृदय अनुष्ठान के अंतिम दिन का हवन, पूरी सामग्री सहित। मुख्य सामग्री: काला तिल में गुड़ और थोड़ा देसी घी मिलाकर। 108 आहुतियों के लिए लगभग आधा किलो काला तिल, 250 ग्राम गुड़ और 125 ग्राम घी — तीनों को थोड़ा गंगाजल डालकर अच्छे से मिला दीजिए।

आहुति का मंत्र वही रहेगा जो मूल है — महाभैरव मंत्र, और कम से कम 108 आहुति। चाहें तो इसी मिश्रण के 108 तिल-लड्डू स्वयं बना लीजिए और एक-एक को मधु में डुबोकर अग्नि में अर्पित कीजिए। आरंभिक आहुतियाँ गुरु, गणपति, नवग्रह आदि की सामान्य विधि से।

समिधा: गाय के गोबर के उपले, आम की लकड़ी, नवग्रह लकड़ी। और स्त्री साधिकाएँ घी से आहुति नहीं देंगी — उनके लिए अलग हवन सामग्री का विधान पहले से बताया गया है।

खैर की लकड़ी — दो निर्देश, और दोनों यहाँ हैं

मत छोड़िए

संग्रह में इस पर दो स्थान अलग-अलग बात कहते हैं, और उन्हें मिलाकर एक कर देना बेईमानी होगी, इसलिए दोनों यहाँ हैं।

एक ओर, बटुक भैरव अष्टोत्तर सतनाम के हवन का विधान बताते हुए कहा गया है कि भैरव जी के हवन के लिए सर्वश्रेष्ठ समिधा अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। अथवा खैर की लकड़ी है, और खैर की समिधा पर किया गया हवन दिव्यतम प्रभाव देता है।

दूसरी ओर, हृदय अनुष्ठान का विधान देते समय इसी प्रश्न पर स्पष्ट मना है: नए साधक हैं तो खैर की लकड़ी से हवन ऐसे नहीं किए जाते हैं — पहले जो दंड होते हैं उन्हें शुद्ध करना होता है, समर्पण की एक अलग विधि होती है, तब वह किया जाता है; सीधे-सीधे नहीं।

दोनों को साथ पढ़ने पर जो निकलता है वह यह है: खैर भैरव की अपनी समिधा है, और वह प्रवेश-स्तर की समिधा नहीं है। नए साधक गोबर के उपले, आम और नवग्रह लकड़ी से आरंभ करें; खैर तब, जब उसकी अपनी विधि गुरु से प्राप्त हो जाए। और चौखट वाली धूनी इससे अलग विषय है — वहाँ खैर के छोटे टुकड़े धूपदानी में बताए गए हैं, यज्ञ के रूप में नहीं।

आपदुद्धारण मंत्र श्रापित है — बिना दीक्षा नहीं

स्पष्ट नियम

इंटरनेट पर सबसे अधिक प्रचारित भैरव मंत्र वही है जिसे संग्रह विशेष रूप से बिना तैयारी उठाने से मना करता है। आपदुद्धारण मंत्र श्रापित मंत्र है — प्रमाण के रूप में शारदा तिलक का उल्लेख दिया गया है — और उसका शाप विमोचनएक प्रारंभिक शाप-निवारण अनुष्ठान — इसके बिना, या बिगड़ी हुई लय में दुर्गा सप्तशती जैसे ग्रंथों का पाठ करने से आध्यात्मिक अनुभव सुसंगत के बजाय विसंगत रूप से प्रकट हो सकते हैं। गुरु मंत्र-दीक्षा के साथ ही देते हैं। उस विमोचन के बिना, कितना भी जप कीजिए, मंत्र वह नहीं देता जो उसके विषय में कहा जाता है।

यही सिद्धांत संग्रह में अन्य देवताओं पर भी दोहराया गया है: कामाख्या का बीज वशिष्ठ द्वारा श्रापित है; सप्तशती अपना ब्रह्मा-वशिष्ठ-विश्वामित्र शाप विमोचन स्वयं रखती है। बात यह नहीं कि मंत्र बोलना संकटपूर्ण है — बात यह है कि कीलित मंत्र कीलित रहता है, और चाबी परंपरा के साथ आती है।

बिना कवच के चिटकी मंत्र क्यों उल्टा पड़ता है

संग्रह जो क्रियाविधि बताता है वह केवल आज्ञा मानने से अधिक समझने योग्य है। भैरव के मंत्रों से वह उत्पन्न होता है जिसे काल भैरव अष्टकम् विचित्र पुण्य-वर्धनम् कहता है — एक विचित्र प्रकार का पुण्य। जितनी भी निकृष्ट शक्तियाँ और पतित जीवात्माएँ हैं, जो फँसी हुई हैं और निकलने का मार्ग खोज रही हैं, वे ठीक उसी की ओर आकर्षित होती हैं। संग्रह का सीधा वाक्य: कौन सी शक्ति नहीं आपके पास आना चाहेगी?

कवच और स्तोत्र-सतनाम उसी आवागमन को नियंत्रित रखने के लिए हैं। उनके बिना जो पहले आता है वह भैरव नहीं, उनके गण और प्रेत होते हैं — जो भैरव ही कहलाते हैं — और यदि उन्होंने परीक्षा ले ली और आप उसमें उत्तीर्ण न हुए, माया में बँध गए, तो परिणाम आपके ही खाते में है। इसलिए क्रम यही है: पहले स्तोत्र-सतनाम, फिर कवच सिद्ध, तब मंत्र।

अष्टोत्तर सतनाम का हवन — सामग्री और संख्या

अग्नि की विधिवत स्थापना के पश्चात मुख्य आहुतियों की सामग्री: काला तिल, गुग्गल और थोड़ा घी — तिल धोकर सुखा लें तो अति उत्तम। अनुपात: एक किलो काले तिल पर लगभग 250 ग्राम गुग्गल और 100 ग्राम घी; घी की मात्रा अधिक मत रखिए। यदि आपकी विशेष समस्या भय है और आप उसी के लिए भैरव साधना कर रहे हैं, तो इसी में लगभग 100 ग्राम काली मिर्च और मिला दीजिए।

आरंभिक आहुतियाँ सामान्य पौष्टिक सामग्री से (पुरुष घी से); मुख्य आहुतियाँ ऊपर वाले मिश्रण से। संख्या: सौ पाठ किए हों तो प्रत्येक नाम से दस-दस आहुति, लगभग 1,188 — और चालीस दिन तक चलाना हो तो प्रत्येक नाम से एक ही पर्याप्त है। नित्य क्रम में पूर्णाहुति नारियल की गड़ी से नहीं, सुपारी से।

और यह स्पष्ट रूप से तांत्रोक्त विधान बताया गया है, इसलिए स्त्रियाँ और अनुपवीत निश्चिंत होकर ये आहुतियाँ दे सकते हैं। तांत्रोक्त हवन रात्रि में किया जा सकता है।

108 नामों का तर्पण-मार्जन कैसे

एक ऐसा प्रश्न जिस पर लोग रुक जाते हैं: 108 नामों के स्तोत्र का तर्पण कैसे होगा? उत्तर यह है कि 108 तर्पण नहीं होते — केवल प्रथम नाम से होता है। 108 में पहला नाम भैरव ही है, इसलिए श्री भैरवाय तर्पयामि नमः और श्री भैरवाय मार्जयामि नमः — पूरी विधि इतनी ही है।

प्रणव का नियम: जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं वे वैदिक प्रणव लगाएँ; स्त्रियाँ और अनुपवीत देवी प्रणव अथवा श्री बीज लगाएँ — इसे स्पष्ट रूप से निर्दोष कहा गया है। और हवन में यदि दीक्षा प्राप्त नहीं है तो नाम के अंत का नमः हटाकर आहुति दीजिए; गुरु ने मंत्र दिया हो तो उनसे पूछकर।

स्तोत्र और नामावली में अंतर क्या है

छोटा-सा भेद जो बहुत भ्रम मिटा देता है, और जिसे प्रवचन ने एक श्रोता के प्रश्न पर स्पष्ट किया। दोनों में नाम वही 108 हैं। स्तोत्र में वे सब एक साथ जुड़े हुए हैं, और उसे हम एक साथ पाठ करके सिद्ध करते हैं। नामावली में उन्हीं नामों को अलग-अलग करके रखा गया है, और वह इसलिए है कि आपको अर्चन करना हो या हवन

इसलिए यदि आप जप-सिद्धि की ओर बढ़ रहे हैं तो स्तोत्र का क्रम है; और जब पुष्पार्चन या आहुति देनी है तब नामावली का। दोनों में से जो आपके पास है उसी से आरंभ कीजिए — संग्रह इसमें कोई बाधा नहीं मानता।

संस्कृत बाधा हो तो बटुक भैरव का साबर मंत्र

संग्रह में इतनी बार दोहराया गया है कि यह एक स्थायी निर्देश माना जा सकता है: यदि बटुक भैरव का पूजन करना हो, कोई मंत्र न हो, दीक्षा न हो, और संस्कृत में पाठ न कर सकें — तो उनका सबर मंत्र अवश्य कर लीजिए। वह पौष्टिक मंत्र की श्रेणी में आता है और पूर्णतः पर्याप्त बताया गया है।

यह सांत्वना-स्वरूप नहीं दिया गया: जो वृत्तांत साथ आता है वह एक साधक का है जो कामाख्या कवच तो कर लेते थे पर बटुक भैरव ब्रह्म कवच नहीं, और गूगल से अनुवाद कराने पर संशय बना रहता था; उन्हें साबर लेने को कहा गया, और वर्ष भर से अधिक के उसी जप से उन्होंने बाद में अपने घर पर हुए आघात को काटा।

साबर जप का एक अनुशासन साथ चलता है: उसे कभी ऊँचे स्वर में, या ऐसे कि सामने वाले को सुनाई दे, नहीं जपना चाहिए। इतना ही बुदबुदाइए कि आपको समझ आ जाए और शब्द न भूलें।

महाभैरव का तीन-मंडल क्रम

जिसे तंत्र-काट विश्वसनीय रूप से उपलब्ध चाहिए, उसके लिए पूर्ण रूप। यह शिव मंदिर में कीजिए, घर पर नहीं, और संकल्प स्पष्ट कहिए — कि भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर प्रयोग के निमित्त इसे अभी सिद्ध कर रहे हैं।

प्रथम मंडल (41 दिन): महाभैरव मंत्र। आदर्श रूप से प्रतिदिन 41 माला — 21 सुबह, 21 शाम; न हो तो 11-11; न्यूनतम पाँच-पाँच। अंत में समर्पण।

द्वितीय मंडल (41 दिन): महाभैरव स्तोत्र, प्रतिदिन कम से कम 21 पाठ; बैठ सकें तो 21 सुबह और 21 शाम।

तृतीय मंडल (41 दिन): दोनों का संपुट — पहले पाँच माला मंत्र, फिर 21 पाठ स्तोत्र, फिर पाँच माला मंत्र, फिर समर्पण।

तीनों में साथ-साथ हवन कर सकें तो और भी: 41 माला वाले दिन एक माला की आहुति, 21 पाठ वाले दिन एक पाठ की, गुग्गल और घी से — और यहाँ स्त्रियाँ गुग्गल की मात्रा अधिक रखेंगी, पुरुष घी की। अंत में जो कहा गया है वह यह कि फिर आप केवल मंत्र के माध्यम से ही, बिना किसी विशेष वस्तु के, अभिचार काटने में सक्षम हो जाते हैं।

भैरव जप बिना रुद्राक्ष के कभी नहीं

स्पष्ट नियम

यह नियम के रूप में कहा गया है, सुझाव के रूप में नहीं। भैरव की ऊर्जा अपरिमित बताई गई है, और जैसे-जैसे भैरव तत्व शरीर तथा आभामंडल में स्थापित होता है, रक्षात्मक भाव के साथ-साथ उग्रात्मक भाव भी बढ़ता है। आप अपने परिवार के लिए कहीं भी लड़ मरने को तैयार हो जाएँगे — संकट यह है कि वह उग्रता असंतुलित न हो जाए। गले में रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला ही उसे संयत रखती है और मंत्रों के प्रभाव से शरीर में विक्षोभ नहीं होने देती।

पंचमुखी कालाग्नि, भैरव रुद्राक्ष अथवा भैरवी रुद्राक्ष — जो भी आपकी स्थिति हो। और माला पहनकर नहीं, माला पर जप करने से प्रभाव कई गुना कहा गया है। ग्रंथ भी स्वतंत्र रूप से इसी ओर आता है: अष्टमुखी रुद्राक्ष वसुमूर्ति और भैरवस्वरूप है, तथा नवमुखी भैरव एवं कपिल मुनि।

मुंडमाला का प्रश्न जो सदा साथ आता है: वह खरीदी नहीं जाती। वास्तविक हड्डी की होती है, आज की तिथि में बाजार में उपलब्ध नहीं है, और यदि आती है तो वामाचार परंपरा से आती है — दुकान जो बेचती है वह पत्थर है।

साधना काल का आचरण — ब्रह्मचर्य, आहार, और भाव

पूछे जाने पर कि बटुक भैरव की साधना में प्याज-लहसुन और ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है क्या, उत्तर तुरंत और बिना शर्त था — अरे बिल्कुल। और उसके साथ जो तर्क दिया गया वह गृहस्थ के लिए राहत देने वाला है: गृहस्थ व्यक्ति आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर सकता; ये साधना का ही तो समय होता है जिसमें वह इन सब का पालन करके अपनी आत्मिक शक्ति का विकास कर सके। यह जीवन भर का बंधन नहीं, अनुष्ठान की अवधि का अनुशासन है।

इसके साथ जो दूसरी शर्त रखी गई है वह आचरण की है: अन्य जीवों के प्रति, विपरीत लिंगियों तथा स्वलिंगियों के प्रति भी द्वेष अथवा काम का भाव नहीं होना चाहिए — न आसक्ति, न अनासक्ति; एकदम सामान्य और सरल रहने का प्रयास। तभी ये चीजें फलभूत होती हैं, क्योंकि यहाँ क्रिया-प्रधानता से अधिक भाव-प्रधानता का विषय है।

कोई भी अनुष्ठान तीन से पाँच बार दोहराया जाता है

एक ऐसा निर्देश जो प्रायः कहीं नहीं मिलता और जिसे संग्रह दो बार दोहराता है। एक बार कोई अनुष्ठान पूर्ण करके “हो गया, अब अगला क्या” वाली मुद्रा में बैठ जाना गलत बताया गया है — कम से कम किसी भी अनुष्ठान को तीन से पाँच बार जरूर करना चाहिए। जितना अधिक आप उसे दोहराएँगे, उन शक्तियों का सान्निध्य उतना ही बढ़ेगा।

महाभैरव के मूल मंत्र के विषय में तो यह विशेष रूप से कहा गया है: प्रत्येक गृहस्थ को आँख बंद करके कम से कम तीन बार यह साधना कर लेनी चाहिए — 11 दिन की कीजिए या 21 दिन की, पर तीन बार। और जब भी किसी कारणवश नया अनुष्ठान आरंभ करने में विलंब हो रहा हो, तब उसी भैरव अनुष्ठान को पुनः दोहरा लेना चाहिए।

कालाष्टमी हर मास, भैरव अष्टमी वर्ष में एक बार

प्रत्येक कृष्ण पक्ष की अष्टमी कालाष्टमी है और भैरव की है — वर्ष में बारह अवसर, एक नहीं। वार्षिक जयंती मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी है, वही तिथि जिस दिन काल भैरव अग्नि स्तंभ से प्रकट हुए, और वह काशी के कोतवाल का अपना दिन है।

कृष्ण पक्ष अष्टमी के विषय में संग्रह एक और बात जोड़ता है जो जानने योग्य है: इसी तिथि पर उग्र तांत्रिक स्वरूपों का उद्भव असंगत रूप से अधिक बताया गया है — और यही कारण है कि एक विशेष प्रकार की कथा-शैली इस संबंध को चुपचाप टाल जाती है।

यदि रविवार को सप्तमी और बुधवार को अष्टमी पड़ जाए, तो उस दिन किया गया जप, तप, हवन और पुण्य कार्य अक्षय फल देने वाला कहा गया है — ऐसे योग पर विशेष रूप से करना चाहिए।

अष्टमी का व्रत — नियम, और वह एक घर जिसे नहीं करना चाहिए

अपवाद

प्रत्येक साधक को काल भैरव अष्टमी का व्रत करना चाहिए। एक अपवाद प्रलेखित है और संग्रह उसे स्पष्ट रूप से इसीलिए कहता है कि कोई अनजाने में उसमें न पड़े: जिनकी संतान के रूप में केवल एक पुत्र है — न कोई पुत्री, न दूसरा पुत्र — उन्हें अष्टमी का व्रत नहीं करना चाहिए। प्रमाण के रूप में कालिका पुराण, और देवी पुराण का वह प्रसंग जहाँ भगवती राम जी को यह कहती हैं। पुत्र के साथ पुत्री हो या दो पुत्र हों तो व्रत सामान्य रूप से होगा। दीक्षित हों तो गुरु आदेश से; अन्यथा उसके स्थान पर चतुर्दशी — जो महाभैरव की अपनी तिथि है — अथवा नवमी कीजिए।

व्रत की विधि सामान्य है: सुबह उठकर नित्य कर्म; टूथपेस्ट का प्रयोग न करें, दातुन का करें — क्योंकि टूथपेस्ट में नमक होता है और सुबह-सुबह नमक चला गया तो व्रत कैसा। स्नान के पश्चात संकल्प लेकर पूजन, और फलाहार करते हुए दिन पूर्ण कीजिए। शरीर अनुमति न दे — अल्सर, गैस की समस्या — तो पूर्ण निराहार मत रहिए; जितना शरीर सामर्थ्य दे उतना।

चतुर्दशी महाभैरव की तिथि है — विशेषतः चैत्र शुक्ल

कालिका पुराण का अपना विधान यह है कि महाभैरव का पूजन चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को करना चाहिए — हनुमान जयंती की पूर्णिमा से एक दिन पहले। जो इस साधना को रखते हैं उनके लिए वही पर्वकाल है।

गृहस्थ उस दिन क्या करे: पूरा दिन भैरवमय कर दीजिए। बटुक भैरव के विग्रह का स्नान, श्रृंगार, पूजन, दीपदान, आरती, हवन; एक नींबू की बलि। और फिर रात्रि में — मध्यरात्रि अति दिव्य, संध्या न्यूनतम — पुनः दीपदान। शिव जी के मंदिर में जाकर महाभैरव मंत्र का जप कीजिए, कम से कम पाँच माला, चाहे आपके कुल के देवता कोई भी हों। जो पहले से यह उपासना करते आ रहे हैं वे उस दिन से एक, सात अथवा ग्यारह दिन की साधना करें; न हो तो एक दिन की अवश्य, 11 से 21 माला।

और यदि हजार रुपये के दीपक संभव न हों — तो पाँच दीपक। निर्देश करने का है, वैभव से करने का नहीं।

बटुक भैरव जयंती, और गंगा से लाया हुआ त्रिशूल

बटुक भैरव जयंती गंगा दशहरा — ज्येष्ठ शुक्ल दशमी — के दिन पड़ती है, और संग्रह इसे टकराव नहीं, अवसर मानता है; उसके लिए एक विशिष्ट विधि भी देता है।

एक त्रिशूल लेकर (अथवा बटुक भैरव का श्री विग्रह मिल जाए तो और उचित) गंगा जी में जाइए। वहीं उसे स्नान कराइए, बटुक भैरव के मंत्रों का स्मरण कीजिए, और जल में खड़े होकर उन्हें अपने कुल भैरव के रूप में आवाहित कीजिए। फिर घर लाकर स्थापना कीजिए। गंगा जी निकट हों तो स्थापना उसी दिन हो जाएगी; एक-दो दिन बाद पहुँचें तो घर आकर स्थापना करके हवन अवश्य कीजिए — हवन से वह ऊर्जा तुरंत चैतन्य हो जाती है।

जिस घर में कभी भैरव का स्थान रहा ही नहीं और जिसे पता नहीं कि आरंभ कहाँ से करे, उसके लिए वर्ष में यही सबसे स्वच्छ प्रवेश-द्वार है।

आरंभ कब, और कितने दिन

आरंभ के दिन, वरीयता क्रम में: कोई भी कृष्ण पक्ष अष्टमी; बटुक भैरव जयंती; कोई चतुर्दशी अथवा अमावस्या। आपात स्थिति में रविवार, मंगलवार अथवा शनिवार भी चलेगा — घर पर आघात हो रहा हो तो उत्तम तिथि की प्रतीक्षा मत कीजिए।

अवधि: न्यूनतम ग्यारह दिन; हो सके तो इकतालीस दिन, अर्थात् एक मंडल। इकतालीस दिन वाले रूप में सुबह-शाम दोनों समय नैवेद्य दीजिए।

और उस व्यक्ति के लिए जो बार-बार आरंभ ही नहीं कर पाता — हर बार किसी का देहांत, कोई बीमार, कहीं जाना पड़ जाता है — संग्रह का उत्तर अधिक प्रयास नहीं, बल्कि संकल्प छोटा करना है: तीन दिन की कीजिए, पाँच की, सात की। वह भी न हो तो जिस दिन आप ठीक हैं उस दिन एक ही दिन का अनुष्ठान — ग्यारह माला जप, एक माला हवन। बड़ा साधना मत उठाइए।

सुबह श्रृंगार, रात्रि में मुख्य पूजन

भैरव पर्व पर दिन दो भागों में बँटता है। सुबह — आठ-नौ बजे तक पूर्ण — स्नान, अभिषेक, श्रृंगार, नया वस्त्र, दीपक, और यंत्र रखते हों तो उसका अभिषेक तथा यंत्रार्चन। वार्षिक अभिषेक में गौ माता का दूध एक अनिवार्य वस्तु है; दही, घी, शहद न मिलें तो चलेगा, उसके बाद गंगाजल अथवा शुद्ध जल।

जप संध्या तक कभी भी। मुख्य पूजन रात्रि में: चौकी पर विधिवत स्थापना, पूजन, फिर बृहद तांत्रोक्त दीपदान, फिर हवन। संध्या से मध्यरात्रि तक कभी भी; जिनकी साधना स्थिर है और आत्मबल है उन्हें और देर से कहा गया है — नौ, दस, ग्यारह, बारह बजे।

दीपदान में परिवार को साथ लीजिए, अकेले नहीं। और उसके पश्चात दस दिक्पालों सहित क्षेत्रपाल की बलि — भैरव के हवन के बाद अनिवार्य, चाहे आप और किसी हवन के बाद कभी न करें; और इसीलिए भी कि उस दिन का क्षेत्रपाल पूजन वर्ष भर के लिए उन्हें प्रसन्न कर देता है।

दीपदान ही न्यूनतम है — और ग्रंथ भी वहीं उतरता है

पहले यही

काल भैरव के दीपदान के विषय में संग्रह का दावा असामान्य रूप से बड़ा है: कि उसका फल अश्वमेध या किसी और से तौला ही नहीं जा सकता क्योंकि उनका माहात्म्य ही हर चीज से अलग है; कि इस सृष्टि की समस्त शक्तियाँ — उपदेव, देव, महाशक्ति — उससे प्रसन्न हो जाती हैं; और कि जन्म कुंडली का हर ग्रह-दोष उससे शांत होता है — अकाल मृत्यु का दोष, चल रहा मारकेश, गुरु-चांडाल योग, राहु अथवा शनि की पीड़ा, मंगल की अमंगलता, सूर्य का जलाना, चंद्र का शीत करना।

इसे भावुक अतिशयोक्ति मानकर छोड़ न देने का कारण यह है कि प्राप्त ग्रंथ बिल्कुल दूसरी दिशा से चलकर उसी स्थान पर पहुँचता है। विद्येश्वर संहिता 18.131, शांति-यज्ञ की प्रक्रिया समाप्त करते हुए: सब साधनों के अभाव में दीपदानमथाचरेत् — तब दरिद्र व्यक्ति दीपदान करे। पुराण का अपना अंतिम आश्रय वही विधान है जिसे प्रवचन सबसे बड़ा कहता है।

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 18.131

सब साधनों के अभाव में दरिद्र व्यक्ति दीपदान करे — पुराण का अपना अंतिम आश्रय, और वही विधान जिसे प्रवचन-परंपरा भैरव का सबसे बड़ा कहती है।

मूल पाठ पढ़ें →
131

महाव्याधिसमुत्पत्तौ सङ्कल्पं पुनराचरेत् । सर्वाभावे दरिद्रस्तु दीपदानमथाचरेत् ॥

महाव्याधि उत्पन्न होने पर पुनः संकल्प लेकर उसे सम्पन्न करे; सब साधनों के अभाव में दरिद्र व्यक्ति दीपदान करे।

दीपदान की संख्या — और बीच वाला दीपक पहले

संख्या को लेकर संग्रह उदार है और यही उसकी उपयोगिता है। बृहद विधान 108 दीपकों का है; उतना संभव न हो तो शाम को आठ दीपक भी कर सकते हैं, अथवा 27, अथवा 54 — और पूछे जाने पर 11, 21, 51 भी स्वीकार हैं। यथाशक्ति दीपदान कीजिए

यंत्रात्मक रूप में जो नौ दीपक जलाए जाते हैं उसका क्रम पूछा गया तो उत्तर स्पष्ट था: बीच वाला दीपक पहले, उसी से आरंभ, और उसके बाद आठों दिशाओं के दीपक — सबको जलाना है। षट्कोण बनाकर नैवेद्य रखने, उस पर चार मुख का दीपक, और सात्विक खप्पर तथा सात्विक कारण बनाने का पूरा विधान चैनल पर पृथक् उपलब्ध बताया गया है।

और अपने कुल के भैरव के नाम से उस दिन दीप अवश्य प्रज्वलित करना चाहिए — नाम ज्ञात न हो तब भी।

दीपदान के दीपकों का विसर्जन कब

वह छोटा-सा विवरण जो लगभग कहीं नहीं मिलता और जिसके अभाव में लोग दीपक इधर-उधर रख देते हैं। यदि दीपदान रात्रि में किया है, तो अगले दिन बृहस्पतिवार पड़ रहा हो तो उस दिन विसर्जन नहीं करना चाहिए — दीपकों को घर में ही एक स्थान पर एकत्र करके रख लीजिए और शुक्रवार को विसर्जित कीजिए।

और यदि दीपदान सुबह अथवा दोपहर में किया है, तो जब वे पूरी तरह जलकर शांत हो जाएँ तब कहीं भी विसर्जित कर सकते हैं, कोई बाधा नहीं। नियम रात्रि वाले दीपदान पर लागू होता है।

अपने भोजन से पहले श्वान को — वह बलि जो बलि नहीं है

कुत्ता काल भैरव का वाहन है और उसका नाम काल कंटक है; उनके दिन उसे भोजन कराना अर्पण के रूप में कहा गया है। शब्द को लेकर संग्रह सावधान है: बलि का अर्थ होता है अन्न देनापंचबलि का अर्थ पाँच प्रकार के जीवों को भोजन देना है, पाँच की बलि देना नहीं — और इसी पर एक हल्की टिप्पणी भी है कि यदि वैसा अर्थ लगाया जाए तो जनसंख्या नियंत्रण में आ जाएगी।

प्रतिफल असंगत रूप से बड़ा बताया गया है: केवल श्वान को भोजन कराने से तीन महाशक्तियाँ एक साथ प्रसन्न होती हैं — भगवान दत्त, काल भैरव और यम। चालीस दिन की भैरव साधना में प्रतिदिन अपने भोजन से पहले खिलाइए।

और एक शर्त जो प्रायः छूट जाती है: आवारा कुत्ता, पालतू नहीं। यही नियम हर देव-पूजन के अर्पण पर लागू है — गाय को रोटी, कुत्ते को बिस्किट, चींटियों को दाना — पालतू को नहीं; गाय न मिले तो गौशाला की, और वृद्धा गाय विशेष रूप से।

भैंसे को बाजरे की आठ रोटियाँ

उस घर के लिए एक विशिष्ट और असामान्य उपाय जहाँ बार-बार दुर्घटनाएँ, चोट या अकाल मृत्यु का दोष हो। काल भैरव अष्टमी अथवा मासिक कालाष्टमी को बाजरे के आटे की रोटियाँ बनाइए, उन पर सरसों का तेल लगाइए, और कम से कम आठ की संख्या में किसी भैंसे को — भैंसी को नहीं — खिला दीजिए।

कारण यह दिया गया है कि भैंसा यम का वाहन है, और वाहन प्रसन्न हो जाए तो काल भैरव की कृपा अथवा उनके आदेश से यम देवता उस दोष का हरण कर लेते हैं — काल आप तक पहुँच नहीं पाता। इस उपाय की व्यावहारिक विशेषताएँ यह हैं कि इसमें किसी मंत्र की आवश्यकता नहीं, समय की कोई बाध्यता नहीं, और स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं।

नींबू की बलि, और वह परिवार जो उससे डरता है

भैरव के पर्व पर निंबू बलि सामान्य है और उसका कोई बचाव आवश्यक नहीं: नींबू काटिए, अर्पित कीजिए। घरवालों की आपत्ति को संग्रह अपने विशिष्ट शुष्क विनोद से सँभालता है — कि जो सबसे अधिक बक-बक करे उसी के निमित्त ऐसा चाकू लगाइए जिससे नींबू से लाल निकले, और कह दीजिए कि घर पर तंत्र हो गया है।

उसे उसी रूप में पढ़िए जो वह है — भय की निरर्थकता पर व्यंग्य, निर्देश नहीं। साथ का गंभीर वाक्य वही है जो महत्वपूर्ण है: कैसे भी करके साम दाम दंड भेद लगा करके भैरव की शरणागति कीजिए ताकि रक्षा हो। सात्विक बलि की शब्दावली छोटी है और उसमें रक्त कहीं नहीं — नींबू, जायफल, लौंग, कपूर।

लौंग की बलि जोड़े में — और अपवाद

एक छोटा प्रश्न जिसका उत्तर कहीं और नहीं मिलता: बटुक भैरव को कपूर पर लौंग की बलि जोड़े में देनी है या एक ही?

उत्तर यह है कि जब मंत्र साधना चल रही हो तब जोड़े में; और यदि बिना किसी मंत्र साधना के सामान्य रूप से कर रहे हैं तो एक भी दे सकते हैं। परंतु उसी वाक्य में वरीयता भी स्पष्ट रखी गई है — फिर भी हम जोड़े में देना प्रेफर करते हैं; कॉमन रूप से सभी को जोड़े में ही देना चाहिए। चाँदी की कटोरी वाला विधान भी इसी कारण दो लौंग का है।

किसी भी भैरव हवन के बाद क्षेत्रपाल और दस दिक्पाल की बलि

मत छोड़िए

अनिवार्य कहा गया है: काल भैरव के हवन के पश्चात, अथवा घर पर किए गए बटुक भैरव के हवन के पश्चात, दस दिक्पालों सहित क्षेत्रपाल की बलि अवश्य दीजिए। इसके आकार को लेकर जो आश्वासन दिया गया है वह सही है — उसमें रॉकेट साइंस नहीं है: दस दिशाओं के लिए दस स्थानों पर नैवेद्य, और एक स्थान पर क्षेत्रपाल जी को।

ये अतिरिक्त दस मिनट इसलिए सार्थक हैं कि उस दिन का किया गया क्षेत्रपाल पूजन वर्ष भर के लिए उन्हें प्रसन्न कर देता है — इसलिए चाहे और किसी हवन के बाद कभी न कर पाएँ, इसके बाद मत छोड़िए।

किसका प्रसाद कौन ले सकता है

नियम स्वरूप के अनुसार बदलता है, और यही जान लेने से इस विषय की अधिकांश चिंता समाप्त हो जाती है।

बटुक भैरव का नैवेद्य — लड्डू, पंचमेवा, घर पर अर्पित कोई भी वस्तु — सब ग्रहण करते हैं: स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े, बिना भेद। घर पर किए गए महाभैरव पूजन का भोग भी सबके लिए है।

काल भैरव का मंदिर-प्रसाद भिन्न है। संग्रह उस परंपरा को उद्धृत करता है, जिसे उच्च कोटि के साधक भी दोहराते हैं, कि वह प्रमुख रूप से पुरुषों के लिए है, कि उसे दूर तक ले जाने के बजाय मंदिर में ही बाँटकर समाप्त करना चाहिए, और कि स्त्रियों को नहीं दिया जाता। घर पर अर्पित नैवेद्य घर के सब लोग मिल-बाँटकर खाएँगे।

और काल भैरव मंदिर के खप्पर का प्रसाद अपना अलग नियम रखता है — नीचे अधिकार वाला कार्ड देखिए।

पीना किसी के लिए अनिवार्य नहीं है

यह भय समाप्त कीजिए

संग्रह इस विषय को सीधे उठाता है क्योंकि लोगों को इसका उल्टा बहुत बार कहा जाता है। अगर आप भैरव जी की पूजा कर रहे हैं, काल भैरव की पूजा कर रहे हैं, नहीं पीजिएगा तो भैरव जी नाराज हो जाएंगे — ऐसा कहीं नहीं है। ऐसा कोई नियम कहीं नहीं है। यदि आपने जीवन में कभी नहीं पिया, या आप नहीं पीते, तो आप पर कोई अनिवार्यता नहीं है और कोई दबाव वैध नहीं है।

तर्क सैद्धांतिक है: अर्पण देवता को किया जाता है और उसे ग्रहण करने का सामर्थ्य उनमें है। आपका भाग समर्पित करना है, ग्रहण करना नहीं। चाहें तो मधु अर्पित कीजिए — मंदिर में एक पाव मधु सीधा विकल्प बताया गया है — अथवा सात्विक खप्पर, अथवा घर पर अदरक-गुड़ वाली सात्विक मदिरा। और यदि खप्पर से प्रसाद ग्रहण करने का गुरु आदेश नहीं है, तो मत लीजिए, और किसी को यह कहने मत दीजिए कि लेना ही पड़ेगा।

खप्पर भरना आपका अधिकार तब तक नहीं

स्पष्ट नियम

स्पष्ट और दोहराया हुआ। यदि आप दीक्षित नहीं हैं, इस स्वरूप की साधना नहीं करते, और गुरु आदेश नहीं है — तो अपने हाथ से खप्पर भरने की जिद मत कीजिए। वहाँ के सेवक को दे दीजिए; संकल्प फिर भी आपके नाम से होगा और अर्पण आपका ही रहेगा। यही काल भैरव को मदिरा अर्पित करने पर भी लागू है — मंदिर के पुजारी से अपने नाम से चढ़वाइए।

कारण शुद्धि नहीं, उत्तरदायित्व बताया गया है: केवल खप्पर भरने का विषय नहीं होता है, फिर एक ये उत्तरदायित्व का विषय हो जाता है — बहुत सी ऐसी चीजें उससे जुड़ती हैं जो उस समय आपकी जानकारी में नहीं होतीं। और यह एक बार निपटा देने वाला लेन-देन भी नहीं है; “जीवन में एक बार कर लिया, अब जिम्मेदारी खत्म, और भैरव जी कौन — हम नहीं जान रहे” को विशेष रूप से गलत मुद्रा कहा गया है।

यदि आप दीक्षित हैं, अथवा इस स्वरूप की सेवा करते हैं, अथवा गुरु का आदेश है — तो अपने हाथ से भरिए।

किस मंदिर में — और वे भैरव जो “माँगने लगते हैं”

यह शिकायत निरंतर चलती है: किसी ने एक बार भैरव को कुछ चढ़ा दिया और अब भैरव बार-बार आकर माँगने लगते हैं। संग्रह का उत्तर यह नहीं कि अनुभव काल्पनिक है, बल्कि यह कि प्रश्न कहाँ गए थे का है।

यह केवल ऐसे मंदिर में कीजिए जो मान्य हो, पुरातन हो, जहाँ विधि-विधान से सेवा होती हो — किसी ओझा-सोखा-गुनिया के नए-नए स्थापित किए हुए थान पर नहीं — अथवा जहाँ आपके अपने गुरु ने आदेश दिया हो। नए थान पर ईमानदार प्रश्न यही है कि वहाँ भैरव कौन से हैं। संग्रह दो सूत्र पकड़ाता है: वे भैरव जो तांत्रिकों द्वारा एक ही रात्रि में प्रत्यक्ष सिद्ध हो जाते हैं, और देवी कवच की वह पंक्ति — जिसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने रचा है — कि उसके पाठ से भैरव आदि पलायन कर जाते हैं। दोनों जिस श्रेणी की बात कर रहे हैं वह उस देवता से भिन्न है जिसका पूजन आप करना चाहते हैं। यह भेद स्पष्ट होते ही भ्रम समाप्त हो जाता है।

आवश्यकता न हो तो महाभैरव का प्रयोग मत कीजिए

स्पष्ट नियम

पूरे संग्रह की सबसे तीखी चेतावनियों में से एक, और उसका तर्क रहस्यात्मक नहीं, यांत्रिक है। महाभैरव के मंत्र निग्रह के मंत्र हैं — जो ऊर्जा आवाहित होती है वह शत्रुओं का, नकारात्मक शक्तियों का, प्रेत-पिशाचों का भक्षण करती है। मंत्र स्वयं यही कहता है। इसलिए यदि आप पर कोई अभिचार नहीं, कोई तंत्र नहीं चल रहा, कोई शत्रु आपके प्राण पर नहीं है, और फिर भी आप किसी का अनुभव सुनकर इसे उठा लेते हैं — तो वह किसको खाएंगे भाई? संग्रह स्पष्ट कहता है कि तब साधक तक ही हानि पहुँचने लगती है।

यदि भविष्य के लिए उपलब्ध रखना है तो वह वैध है — पर शिव मंदिर में, संकल्प ठीक यही कहकर कि आवश्यकता पड़ने पर प्रयोग करेंगे; घर में नहीं, और प्रयोग करके देखने के लिए नहीं।

उग्र स्वरूप चौखट के बाहर पूजित होते हैं, भीतर नहीं

विशिष्ट नियमों के पीछे का सामान्य सिद्धांत। गृहस्थ का पूजन ऐसी उपस्थिति स्थापित नहीं कर सकता जो परिवार के अन्य लोगों को हानि पहुँचाए। उग्र देवताओं की पूरी सेवा दी जाए — कोई रोकने को नहीं कह रहा — पर मंदिर में, चौखट के बाहर। संग्रह का उदाहरण निर्मम है: घर में बैठा के श्मशान काली की पूजा नहीं होती है, और जो किसी गृहस्थ से यह करवाता है उसने उस घर की बर्बादी निश्चित कर दी है।

इसी नियम का एक कम स्पष्ट रूप और है, और वही अधिक घरों पर लागू होता है। यदि आपके घर में पहले से कोई ब्रह्म अथवा प्रेत-योनि की शक्ति देव-स्वरूप में पूजित है — जो अनेक घरों में बिना जाने ही होता है — तो बगलामुखी का पूजन, सर्वेश्वर का, बटुक भैरव का उग्र पूजन, महाभैरव का, अथवा हनुमान जी के बड़वानल का जाप, इनमें से हर एक उस शक्ति को कष्ट देगा। और काल भैरव के मंत्र के प्रभाव से आपकी अपनी कुलदेवी के साथ चलने वाले वीर तक बँध सकते हैं। ऐसे घर में ये साधनाएँ शिव मंदिर में कीजिए, घर पर नहीं।

कष्ट पूजन आरंभ करने के बाद बढ़े तो

एक पाठक ने ठीक यही लिखा: 108 नाम और ब्रह्म कवच का पाठ आरंभ किया, घर में बहुत क्लेश होने लगा, और पाठ के समय शरीर में बहुत भारीपन लगता था। जो उत्तर दिया गया वह पहले से जान लेने योग्य है, क्योंकि अधिकांश लोग ठीक इसी मोड़ पर छोड़ देते हैं।

यदि घर में कोई नकारात्मक वस्तु पहले से बैठकर खा रही है, तो भैरव की सेवा आरंभ करने पर उसे परेशानी होगी और वह आपको छोड़ेगी नहीं। पूजन छोड़ दीजिए तो वह पुनः शांत हो जाएगी — और इसीलिए छोड़ना काम करता हुआ लगता है। पाठ के समय शरीर का भारीपन भी इसी रूप में बताया गया: कोई चीज उपस्थित है जो शरीर छोड़ना नहीं चाहती।

साथ में जो ईमानदार सीमाएँ रखी गईं: यह विधि की चूक भी हो सकती है — केवल मंत्र चलाना और चौमुख दीपक तथा बलि का विधान न करना; प्रवेश-द्वार का ठीक न होना; रसोई में जूठे बर्तन पड़े रहना। और ब्रह्म कवच से आरंभ करने की अनुशंसा संग्रह ने कभी नहीं की — उसमें बंधन वाली चीजें हैं। जो अनुशंसा है वही इस पृष्ठ का क्रम है: पहले स्तोत्र-सतनाम, फिर मंत्र, और नीचे चौखट का विधान चलता रहे।

गणपति प्रथम — सदा, और कारण सहित

केवल भैरव पूजन से नहीं होगा। गणपति का पूजन पहले है और उसे अत्यंत अनिवार्य कहा गया है, एक विशिष्ट क्रियाविधि के साथ: भैरव की ऊर्जा को संभालने का सामर्थ्य मूलाधार से आता है, और जब तक गणपति कृपा न करें तब तक भैरव की कृपा प्राप्त होना संभव ही नहीं बताया गया।

शून्य से साधना खड़ी करने वाले के लिए पूरा क्रम यह दिया गया है: अपने गुरु, अथवा गुरु न हों तो गुरु-मंडल की अधिष्ठात्री शक्ति भगवान दत्त → गणपति → भैरव → तब भगवती का वह स्वरूप जिसका आप पूजन करना चाहते हैं। भैरव की सेवा किए बिना सीधे भगवती की साधना करने को स्पष्ट रूप से यह कहा गया है कि हमारे भीतर वह क्षमता ही नहीं है।

घर में मृत्यु हुई हो तो इस अनुष्ठान में सम्मिलित न हों

जिनकी माता जी का देहांत हुआ था, उन्होंने पूछा कि क्या वे काल भैरव के अनुष्ठान में सम्मिलित हो सकते हैं — उत्तर था नहीं, इसमें नहीं। उसी अवधि में रुद्राभिषेक में कोई विषय नहीं था, और भगवान दत्त के याग में सम्मिलित हो सकते थे; काल भैरव के लिए मना किया गया।

उसके स्थान पर, दिवंगत के निमित्त, जो कहा गया वह यह: श्रीमद् भगवद्गीता के सप्तम अध्याय का पाठ कीजिए — हिंदी में करते हों तो हिंदी में — उनके नाम का संकल्प करके। और साथ में यह कि इस कार्य में भाव की प्रधानता है, विधि की नहीं।

साधना गुप्त रखिए

यह भक्ति के रूप में नहीं, कार्यसिद्ध निर्देश के रूप में दिया गया है, और एक वृत्तांत के साथ। गुवाहाटी में रहने वाले एक साधक वर्ष भर से अधिक कामाख्या कवच और बटुक भैरव का साबर जप चुपचाप करते रहे। अपने गाँव लौटने पर वहाँ के एक नए-नए सीखे हुए व्यक्ति ने, एक छोटी-सी बात पर अहंकार आहत होने से, उन पर प्रयोग किया। उन्होंने अपने पास जो था उसी से एक ही प्रयोग किया — सामान्य हिंदी में, सीधा संकल्प करके। कुछ ही दिनों में सामने वाले की अपनी सिद्धि उसी पर हावी हो गई।

इससे जो निष्कर्ष निकाला गया वह दो शब्दों का है: गुप्तता और कंसिस्टेंसी। यह मत दिखाइए कि आप साधक हैं, यह मत दिखाइए कि आप जानते हैं, और समाज को अपने को साधारण ही समझने दीजिए — मूर्ख बन के रहिए समाज के समक्ष

और उसके साथ वह वाक्य जो इस पूरे संग्रह की नीति है: सीधे प्रयोग के हम पक्षधर ही नहीं हैं कि मारण कर दो, यह कर दो। आप जप कीजिए, अपने देवता को समर्पित कीजिए, और कहिए — भैरव जी, आप देखिए; प्रभु, हमको नहीं पता।

“हर किसी के लिए हर भैरव नहीं होते”

मत छोड़िए

एक ऐसी चेतावनी जो सार्वजनिक मंच पर मिलने वाली हर सलाह पर लागू होती है, इस पृष्ठ पर मिलने वाली सलाह सहित। कोई व्यक्ति अपने “रिसर्च एंड डेवलपमेंट” से किसी नए प्रकार का भैरव बता देता है — फलाँ भैरव की पूजा घर में कीजिए, चिलाँ भैरव की कीजिए। संग्रह इस पर सीधा है: हर किसी के लिए हर भैरव नहीं होते हैं। और किसी भी सोशल मीडिया मंच पर, जहाँ सब सुन रहे हैं, वही बताया जाना चाहिए जो सामान्य रूप से सब पर लागू हो और जिसका शुभ फल सबको मिले — न कि ऐसा कुछ जो एक के लिए सही और दूसरे के लिए हानिकारक हो।

उदाहरण भी वहीं दिया गया है, और यह कार्ड इसीलिए यहाँ है: यदि आप घर में काल भैरव अथवा किसी अत्यधिक उग्र भैरव स्वरूप का पूजन करते हैं, और आपके घर की कुलदेवी एक भिन्न प्रकार की — लोक देवी — शक्ति हैं, तो उनके साथ चलने वाले वीर अथवा शक्तियाँ, जिनकी वृत्ति अलग है, उस मंत्र के प्रभाव से बँध सकती हैं। और यह अनुभव की बात है, किताबों में पढ़कर नहीं होगा

घर में काल भैरव पहले से पूजित हों तो क्या करें

यह प्रश्न प्रायः तब आता है जब जानकारी के अभाव में, अथवा किसी तथाकथित विद्वान के कहने पर, घर में काल भैरव का पूजन आरंभ हो चुका होता है। उत्तर व्यावहारिक और सम्मानपूर्ण है, त्याग का नहीं।

कल से बटुक भैरव के स्वरूप का पूजन आरंभ कीजिए। और काल भैरव के जिस स्वरूप का पूजन चल रहा था उसे ससम्मान विदा कीजिए — जो विदाई का विधान हमारे यहाँ है, उसी से — और वह विसर्जन शनिवार के दिन कीजिए, पहले उनका पूजन करके।

ध्यान रखिए कि यह विग्रह पर लागू है, छायाचित्र पर नहीं, और न ही दीपदान पर — वह सदा और सबके लिए खुला है।

जो प्रश्न वास्तव में पूछे जाते हैं

ये वही प्रश्न हैं जो लाइव सत्रों में और सामान्य खोज में वास्तव में आते हैं — वे भी सम्मिलित हैं जिन्हें पूछने में लोग सबसे अधिक संकोच करते हैं।

काल भैरव का सामान्य पूजन घर में — छायाचित्र, दीपक, उनका नाम — पूरी तरह निर्दोष है। उनके विग्रह की स्थापना करके विधिवत तांत्रोक्त पूजन घर में करना नहीं। संग्रह की पंक्ति यह है: घर में काल भैरव की पूजा तभी कीजिए जब वे वास्तव में आपके कुल देवता हों अथवा आपको अधिकार प्राप्त हो; अन्यथा उनके स्थान पर बटुक भैरव का पूजन कीजिए — और यह अवनति नहीं है, बटुक वही तो हैं।

एक भौगोलिक अपवाद है और उसे अपवाद कहकर ही रखा गया है। काशी के पंचकोश में, उज्जैन के अपने पंचकोशी में, तथा अष्ट भैरवों के क्षेत्रों में, वहाँ के निवासियों से उस क्षेत्र के भैरव की सेवा अपेक्षित है। शेष सब स्थानों पर ऊपर वाला नियम लागू है।

और सर्वदा खुला रहने वाला विषय: काल भैरव का दीपदान, घर पर हो या मंदिर में। वह स्थापना से बिल्कुल अलग बात है।

वह आगमोक्त है, और “तांत्रिक” का वास्तविक अर्थ भी यही है — एक प्रणाली, एक पद्धति। संग्रह व्युत्पत्ति सीधे रखता है: तंत्र का अर्थ ही सिस्टम है, वही शब्द जो “पारिस्थितिक तंत्र” में है; और आगमोक्त पद्धति का पूरा प्रयोजन है रक्षा करना, उन्नति करना। शिव ने आगमोक्त विधान इसीलिए दिए क्योंकि इस काल में पूर्णतः वैदिक जीवनयापन अधिकांश के लिए संभव नहीं है।

जो हुआ वह यह कि दो स्वरूप — काली और भैरव — “तांत्रिक” शब्द के निंदात्मक अर्थ के पर्याय बना दिए गए, यहाँ तक कि गाँव में जो व्यक्ति नियमित काली मंदिर जाता है उससे लोग दूरी बनाने लगते हैं। इस भय से किसका लाभ है, इस पर संग्रह की टिप्पणी कठोर है — और उत्तर आश्वासन नहीं, जानकारी है: जान लीजिए कि कौन सा स्वरूप किसलिए है।

आरंभिक विधानों के लिए नहीं। बटुक भैरव बटुक भैरव अष्टोत्तरशतनाम का मूल पाठ, सबर मंत्र, चौखट का दीपक, दीपदान, मंदिर का नियम, श्वान सेवा — इनमें से किसी के लिए दीक्षा आवश्यक नहीं है। स्त्रियाँ और जो यज्ञोपवीत धारण नहीं करते, वे जप, पाठ और हवन की आहुतियाँ निश्चिंत होकर कर सकते हैं, वैदिक प्रणव के स्थान पर देवी प्रणव अथवा श्री बीज लगाकर।

तीन बातों के लिए आवश्यक है। आपदुद्धारण मंत्र, जो श्रापित है और जिसका शाप विमोचनएक प्रारंभिक शाप-निवारण अनुष्ठान — इसके बिना, या बिगड़ी हुई लय में दुर्गा सप्तशती जैसे ग्रंथों का पाठ करने से आध्यात्मिक अनुभव सुसंगत के बजाय विसंगत रूप से प्रकट हो सकते हैं। गुरु के साथ आता है। अपने हाथ से खप्पर भरना अथवा स्वयं मदिरा अर्पित करना। और अष्ट भैरव तथा चौंसठ भैरव का आवरण पूजन, जो परंपरा से आता है।

संग्रह की अपनी दृष्टि यह है कि दीक्षा से सब कुछ और अच्छा होता है, और उसका अभाव इस स्तर की किसी भी आवश्यक बात को नहीं रोकता।

नहीं। ऐसा कोई नियम कहीं नहीं है कि न पीने वाले से भैरव नाराज होते हैं — संग्रह यह दो बार स्पष्ट रूप से कहता है। आपका भाग अर्पण करना है, ग्रहण करना नहीं; ग्रहण करने का सामर्थ्य देवता में है।

जहाँ यह प्रथा है, वह मंदिर की प्रथा है — ऐसे मंदिर में जहाँ परंपरा से कारण चढ़ता है — और वहाँ भी, यदि आप दीक्षित नहीं हैं तो मंदिर का अपना सेवक आपके नाम से चढ़ाता है। जो विकल्प नामित हैं और पूर्णतः वैध माने गए हैं: एक पाव मधु; सात्विक खप्पर; और घर पर अदरक-गुड़-जल की सात्विक मदिरा, जो पूजन के पश्चात किसी वृक्ष की जड़ में डाल दी जाती है, कभी पी नहीं जाती।

प्राप्त ग्रंथ इस पर कुछ कहता ही नहीं। नीचे भ्रांतियों वाले खंड में देखिए कि क्या-क्या और कहाँ-कहाँ मिलाकर देखा गया।

पूजन में हाँ, बिना किसी शर्त के। स्त्रियाँ पाठ, जप और हवन की आहुतियाँ करती हैं; संग्रह स्पष्ट कहता है — निश्चिंत होकर के स्त्री हो पुरुष हो आप अनुपवीत हो, आप सभी को ये आहुति कर सकते हैं — और जहाँ यज्ञोपवीत धारण करने वाला वैदिक प्रणव लगाता है वहाँ स्त्रियाँ देवी प्रणव अथवा श्री बीज लगाती हैं। महाभैरव के हवन में एकमात्र समायोजन अनुपात का है: स्त्रियाँ गुग्गल अधिक रखें, पुरुष घी अधिक। हृदय अनुष्ठान के हवन में स्त्री साधिकाएँ घी से आहुति नहीं देतीं; उनके लिए अलग सामग्री का विधान है। और चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चे भी बटुक भैरव का पूजन कर सकते हैं।

प्रसाद स्वरूप के अनुसार बँटता है। बटुक भैरव का नैवेद्य — और घर पर अर्पित कोई भी भैरव भोग — स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े सब ग्रहण करते हैं। काल भैरव का मंदिर-प्रसाद वही है जिसे परंपरा पुरुषों के लिए रखती है, और जिसे घर लाने के बजाय मंदिर में ही समाप्त करना कहा गया है।

चार मार्ग, निश्चितता के घटते क्रम में। एक: कुलदेवी ज्ञात हों तो उनके भैरव आपके हैं — कामाख्या के उमानन्द भैरवकामाख्या स्थल पर शिव की उपस्थिति, देवी के भैरव के रूप में।, शाकंभरी के सदाशिव, और जिन कुलों में खंडोबा हैं उनके लिए खंडोबा स्वयं मार्तंड भैरव हैं। दो: घर के किसी सदस्य पर वास्तविक कुल-शक्ति की सवारी आती हो तो सीधे पूछिए कि भैरव के रूप में किनका पूजन करना है। तीन: यदि आपके घर में सदा हनुमान जी ही रक्षक देवता रहे हैं और अन्य कोई नहीं, तो वह स्थान उन्हीं का है। चार: इनमें से कुछ भी न सुलझे तो उस स्थान पर बटुक भैरव का पूजन कीजिए — पूजा जिन्हें मिलनी है उन्हीं को प्राप्त होगी।

जो नहीं करना है वह यह कि किसी मसान, पिशाच अथवा नकारात्मक ब्रह्म को इसलिए वहाँ बैठा दें कि किसी ने कहा इससे शांति हो जाएगी। इस पूरे विषय में वास्तविक परिणाम वाली भूल यही एक है।

संग्रह इसे पराजय नहीं, एक सामान्य और हल हो सकने वाली स्थिति मानता है, और ठीक इसी के लिए एक विधान देता है। हर घर में भगवती कहीं न कहीं हैं — कोई विग्रह, कोई छायाचित्र, कोई छोटा स्थान; इतना पर्याप्त है। जितनी छोटी मिल जाए उतनी छोटी चाँदी की कटोरी लीजिए, और रात्रि आठ बजे के पश्चात, शुद्ध वस्त्र में, उनके पास दो लौंग और थोड़ा कपूर जलाकर बटुक भैरव का नाम ग्यारह या इक्कीस बार जपिए। इसमें देखने को कुछ भी नहीं है।

यदि त्रिशूल स्वीकार्य है पर बड़ा नहीं, तो प्रतीकात्मक छोटा रखिए — यह घर की बातचीत है, नियम नहीं। और यदि आपत्ति विशेष रूप से इस पर है कि चौखट वाला विधान “तांत्रिक लगता है”, तो चाँदी की कटोरी वाला विधान उसी के लिए दिया गया था।

तत्व एक, पद तीन, और तीव्रता के तीन स्तर। काल भैरव प्रथम भैरव हैं, अग्नि स्तंभ के प्रसंग में शिव की भृकुटि से प्रकट; काशी के कोतवाल; पूर्ण वेग में दंड और रक्षण का पद। बटुक भैरव बाल स्वरूप हैं, देवी के अपने पुत्र, तंत्रों में त्रिविध — और उनकी कार्यक्षमता का कारण संग्रह ठीक उनका बालपन बताता है: छोटे बच्चे को कहीं भी आने-जाने से कोई नहीं रोकता, वह जहाँ चाहे जाएगा; इसीलिए जो कार्य असाध्य हैं वे भी उस स्वरूप से सिद्ध हो जाते हैं। महाभैरव श्मशान भैरव हैं, अठारह भुजा, कालिका पुराण के 53वें अध्याय से — चलते हुए आघात के विरुद्ध प्रतिशक्ति, और वह मंत्र जिसमें शेष सब समाहित हैं।

गृहस्थ के लिए: बटुक आपके साथ रहते हैं, काल भैरव के दर्शन को जाया जाता है, और महाभैरव तब आवाहित होते हैं जब वास्तव में कुछ आप पर चल रहा हो।

सर्वोत्तम दिन: कोई भी कृष्ण पक्ष अष्टमी, बटुक भैरव जयंती, कोई चतुर्दशी अथवा अमावस्या। आपात स्थिति में रविवार, मंगलवार अथवा शनिवार — घर पर आघात हो रहा हो तो उत्तम तिथि की प्रतीक्षा मत कीजिए। और यदि रविवार को सप्तमी तथा बुधवार को अष्टमी का योग बन रहा हो, तो उस दिन का जप-तप-हवन अक्षय फल देने वाला कहा गया है।

अवधि: न्यूनतम ग्यारह दिन; मानक इकतालीस दिन, अर्थात् एक मंडल। और यदि हर बार कुछ न कुछ आ जाने से आरंभ ही नहीं हो पाता, तो निर्देश और अधिक प्रयास का नहीं, संकल्प छोटा करने का है — तीन, पाँच, सात दिन, अथवा किसी एक स्वस्थ दिन का एक दिवसीय अनुष्ठान: ग्यारह माला जप, एक माला हवन। बड़ा साधना मत उठाइए।

हाँ। छायाचित्र रखने में न कोई दोष है, न कोई कठिनाई — इसमें किसी सिद्ध पीठ के अपने भैरव का चित्र भी सम्मिलित है, जैसे दिल्ली के पाठकों के लिए किलकारी भैरव। संग्रह स्पष्ट कहता है कि इस विषय में भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है।

दो शर्तें साथ हैं। यदि विग्रह के बजाय काल भैरव का छायाचित्र रखते हैं तो उसके समक्ष उनका कोई धातु का प्रतीक चिह्न — त्रिशूल — अवश्य रखिए। और अनुशंसा यही बनी रहती है कि घर में वास्तविक पूजन बटुक भैरव का ही हो।

संग्रह इस अनुभव को नकारता नहीं, उसका स्थान बदल देता है। भैया सबके साथ में ऐसा विषय नहीं होता है — यह सबके साथ नहीं होता, और जो चर वस्तु बदलती है वह यह कि आप गए कहाँ थे। यह मान्य, पुरातन मंदिर में कीजिए जहाँ विधि-विधान से सेवा होती हो, अथवा जहाँ आपके अपने गुरु ने आदेश दिया हो। किसी ओझा-सोखा के हाल में स्थापित किए हुए थान पर वास्तविक प्रश्न यह है कि वहाँ भैरव कौन से हैं।

दो बातें साथ समझने योग्य हैं: कुछ भैरव ऐसे हैं जिन्हें तांत्रिक एक ही रात्रि में प्रत्यक्ष सिद्ध कर लेते हैं; और देवी कवच — जिसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने रचा — कहता है कि उसके पाठ से भैरव आदि पलायन कर जाते हैं। ये दोनों उस श्रेणी की बात कर रहे हैं जो इस मार्गदर्शिका के देवता से भिन्न है। यह भेद स्पष्ट होते ही भय समाप्त हो जाता है।

कुत्ता काल भैरव का वाहन है और उसका नाम काल कंटक है। उसे भोजन कराना शब्दशः अर्पण माना गया है — संग्रह सावधान है कि इस शब्दावली में बलि का अर्थ अन्न देना है, और पंचबलि का अर्थ पाँच प्रकार के जीवों को भोजन देना है, पाँच की बलि देना नहीं।

प्रतिफल असंगत रूप से बड़ा बताया गया है: केवल कुत्ते को भोजन कराने से भगवान दत्त, काल भैरव और यम — तीनों प्रसन्न होते हैं। भैरव साधना के दिनों में स्वयं भोजन करने से पहले, प्रतिदिन। और यह अवश्य ध्यान रखिए कि आवारा कुत्ता हो, पालतू नहीं — यह नियम हर देव-पूजन के अर्पण पर लागू है।

देवी के मंदिर का प्रयोग कीजिए — काली, दुर्गा, कोई भी महाविद्या, कोई भी माई का मंदिर। मंदिर से बाहर निकलते समय जिधर आपका बायाँ हाथ पड़े, द्वार के पास — वहीं भैरव का स्थान है, चाहे वहाँ कुछ बनाया गया हो या नहीं। उस स्थान की साफ-सफाई कीजिए, हल्दी, रोली अथवा पुष्प के आसन पर दीपक प्रज्वलित कीजिए, और अपना निवेदन रखिए।

जिनका मंदिर है उन प्रमुख देवी को भी पुष्प, दीप और कपूर समर्पित कर दीजिए। और यह इतनी सहजता से कीजिए कि कोई यह घोषित करना न आरंभ कर दे कि आप तांत्रिक बन गए हैं।

ठीक यही पूछे जाने पर उत्तर छोटा और खारिज करने वाला था: कहां कौन है तंत्र मार्ग में, क्यों डिप्रेशन की स्थिति होएगी — इसे बकवास कथन कहा गया।

दूसरे सत्र में संग्रह इसका ठीक उल्टा दावा करता है, और विशेष रूप से करता है: हर प्रकार की मानसिक व्याधि के लिए — डिप्रेशन, एंग्जायटी, अत्यधिक मानसिक क्लेश, बिना किसी पहचाने कारण के उचाट — बटुक भैरव की शरणागति लेने को कहा गया है, इस वर्णन के साथ कि वे कलिकाल के जागृत देवता हैं और इन अवस्थाओं को क्षण भर में हरने का सामर्थ्य रखते हैं।

यह चिकित्सकीय परामर्श नहीं है और संग्रह भी उसे वैसा नहीं मानता — एक समरूप प्रकरण में उसका अपना निर्देश यही था कि पहले ठीक से मेडिकल ट्रीटमेंट करवाइए, अन्य स्तर उसके बाद देखिए।

बटुक भैरव का सबर मंत्र। ठीक इसी स्थिति के लिए — कोई मंत्र नहीं, कोई दीक्षा नहीं, संस्कृत नहीं — संग्रह का यह स्थायी उत्तर है, और वह इसे सांत्वना के रूप में नहीं देता: साबर पौष्टिक मंत्र की श्रेणी में आता है और पूर्णतः पर्याप्त बताया गया है।

एक अनुशासन इसके साथ है: साबर मंत्र कभी ऊँचे स्वर में अथवा ऐसे न जपिए कि सामने वाले को सुनाई दे। इतना ही बुदबुदाइए कि आपको समझ आ जाए और शब्द न छूटें।

अनुवाद अथवा लिप्यंतरण वह विकल्प है जिसकी ओर लोग सामान्यतः जाते हैं; एक वास्तविक प्रकरण में परामर्श यही था कि गूगल से किए गए अनुवाद वाले कवच के बजाय साबर लीजिए, जिसकी शुद्धता पर आप स्वयं संदेह न कर रहे हों।

संग्रह रहस्यात्मक नहीं, आचरण की कसौटी देता है, और वह प्रयोग करने योग्य है। वास्तविक देव-श्रेणी की कुल-शक्ति गायत्री से और जनेऊ से पुष्ट होती है; सात्विक आचरण रखती है; वचन की अत्यंत पक्की होती है; कभी किसी गलत कृत्य को बढ़ावा नहीं देती; और शिव-दुर्गा के पूजन के लिए, शिखा तथा जनेऊ के नियम के लिए आपको बार-बार कहती है, तथा गलत मार्ग पर जाने से रोकती है। इनमें कोप और क्रोध अधिक होता है — वह स्वभाव है, श्रेणी नहीं।

नकारात्मक शक्ति ठीक विपरीत चलती है। और एक बार स्वतंत्र रूप से बैठा दी जाए, जिसके ऊपर कोई देवता न हो, तो वह घर को अपनी शर्तों पर चलाती है: प्रवचन उस प्रतिरूप का वर्णन करता है जिसमें एक परिवार वर्षों मनाता रहता है, और किसी एक सदस्य की एक भूल पर अनिश्चित काल तक दंड भोगता है, क्योंकि मानना पूरी तरह उसकी इच्छा पर है। जहाँ ऐसी शक्ति पहले से स्थापित हो, वहाँ छोटा-सा शिव मंदिर बनवाकर उसे उसके नीचे स्थान दीजिए, स्वतंत्र नहीं।

नहीं। संग्रह की स्थिति यह है कि भैरव पूजन वैष्णव साधना में भी उपस्थित है — नारायण के अपने स्वरूपों और अवतारों के मंडल पूजन में भी भैरवों का वर्णन है, और जहाँ भी आठ मातृकाएँ पूजित होती हैं, अर्थात् लगभग सर्वत्र, वहाँ आठ भैरव भी।

जिस ढाँचे पर वह आग्रह करता है वह अनन्यता का नहीं, मर्यादा का है: गृहस्थ हैं तो गृहस्थ में हर देवता की उपस्थिति होगी, सबकी मर्यादा। अपने इष्ट के प्रति प्रेम अखंड रहता है; शेष स्वरूपों का अपमान अथवा त्याग नहीं होता। व्यवहार में, ऊपर दिया गया नित्य क्रम — गुरु, गणपति, भैरव, हनुमान, लक्ष्मी-नारायण, देवी, शिव — एक ही बैठक है और उसमें सबके लिए स्थान है। नैवेद्य का प्रश्न दो थालियों से हल हो जाता है: नारायण और हनुमान जी की थाली में तुलसी, शैव-शाक्त थाली में नहीं।

दो भिन्न उत्तर, दो भिन्न साधनाओं के लिए — और यही भेद पूरा विषय है।

बटुक भैरव का नित्य पूजन: हाँ, सदैव। वह किसी संकट का उपाय नहीं है; वह वह स्थायी रक्षक उपस्थिति है जो एक गृहस्थ के घर में होनी चाहिए। संग्रह आग्रहपूर्वक कहता है कि यह अधिकांश घरों से हट चुकी है और नहीं हटनी चाहिए थी।

महाभैरव: नहीं। स्पष्ट रूप से नहीं। वे निग्रह के मंत्र हैं; जो ऊर्जा आवाहित होती है वह उसका भक्षण करती है जो आप पर चल रहा हो — और यदि कुछ चल ही नहीं रहा तो संग्रह कहता है कि हानि साधक तक पहुँचने लगती है। भविष्य के लिए सिद्ध रखना हो तो शिव मंदिर में, संकल्प ठीक यही कहकर — घर में नहीं, और किसी का अनुभव सुनकर प्रयोग करके देखने के लिए नहीं।

सीधे पूछे जाने पर कि अष्ट भैरवों में से किसी व्यक्ति के लिए राशि, नक्षत्र अथवा लग्न के अनुसार कोई विशेष भैरव होते हैं क्या — उत्तर था हाँ, नक्षत्र अनुसार भी होते हैं, राशि अनुसार भी, लग्न अनुसार भी। और तुरंत उसके बाद: जिनको क्रम भैरव साधना में जाना होता है उनके लिए सब चीज होता है; हर किसी के लिए तो जरूरी नहीं है

अर्थात् यह संगति वास्तविक है और उस क्रम-भैरव साधना की है जो परंपरा से आती है। यह कुंडली देखकर स्वयं तय कर लेने और उस पर चल पड़ने की वस्तु नहीं है। शेष सबके लिए “मेरे भैरव कौन” का उत्तर कुल भैरव वाला प्रश्न है, ज्योतिषीय नहीं।

नौ प्रचलित भ्रांतियाँ

इनमें से हर एक को उसी से मिलाया गया है जिस पर वह टिकी होनी चाहिए — जहाँ बात साधना की है वहाँ प्रवचन से, और जहाँ बात ग्रंथ की है वहाँ मुद्रित श्लोक से। जहाँ ग्रंथ कुछ कहता ही नहीं, वहाँ यह बात दबाई नहीं गई, वैसा ही लिख दिया गया है।

भैरव भूत नहीं हैं, और उनके पूजन से घर में भूत नहीं आते

यही वह भ्रांति है जिस पर सारा भार टिका है — वही जिसने हमारी ही स्मृति में घर-घर से भैरव का स्थान हटा दिया। संग्रह उस प्रक्रिया को स्पष्ट बताता है: यह चर्चा चलाई गई कि भैरव जी का पूजन करने से घर में भूत-प्रेत आएगा और कारण चढ़ाना पड़ेगा, लोग भयभीत होकर पूजन छोड़ने लगे, और परिवार दर परिवार वह परंपरा टूट गई। आज ऐसा परिवार मिलना कठिन है जिसे अपने कुल के भैरव के विषय में जानकारी हो।

विद्येश्वर संहिता इसे एक ही पंक्ति में समाप्त कर देती है, और वह भी नित्य आचार तथा वार्षिक शांति-यज्ञ के एक साधारण अध्याय में, कहीं गूढ़ स्थान पर नहीं: भैरवस्य महापूजां कुर्याद्भूतादिशान्तये — भूत आदि की शांति के लिए भैरव की महापूजा करे। भैरव का पूजन भूतों के निवारण के लिए विहित है। यह कथन ग्रंथ को ठीक उलट देता है।

ग्रंथ इसके विपरीत कहता है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 18.127

भैरव भूत हैं, और उनका पूजन करने से घर में भूत-प्रेत आते हैं।

संहिता भैरव को ठीक उसी का उपाय बताती है जिसका यह कथन उन्हें दोषी ठहराता है: भैरवस्य महापूजां कुर्याद्भूतादिशान्तये — “भूत आदि की शान्ति के लिए भैरव की महापूजा करे” (18.127)। यह किसी गूढ़ प्रसंग में नहीं, बल्कि एक आचार-अध्याय की सामान्य शांति-यज्ञ प्रक्रिया के भीतर, स्वर्ण प्रतिमा के दान और शिव के महाभिषेक के बीच आता है। यह कथन ग्रंथ को ठीक उलट देता है, और संग्रह इस भ्रम के फैलने का काल हमारी ही स्मृति में बताता है — घरों ने भैरव का स्थान इसीलिए छोड़ा क्योंकि उनसे यही कहा गया।

मूल पाठ पढ़ें →
127

भैरवस्य महापूजां कुर्याद्भूतादिशान्तये ॥

भूत आदि की शान्ति के लिए भैरव की महापूजा करे।

भैरव पूजन “केवल तांत्रिक है, पौराणिक आधार नहीं” — यह गलत है

कहा यह जाता है कि भैरव तंत्रों के हैं और शास्त्रीय गृहस्थ साधना में उनका स्थान नहीं। शिव महापुराण की पहली ही संहिता इसे तीन बार खंडित करती है, और वह भी पौराणिक ढाँचे से बाहर गए बिना।

आठवें अध्याय में महादेव स्वयं भैरव को अपनी भौंहों के मध्य से उत्पन्न करते हैं। अठारहवें अध्याय में, आचार और शांति-यज्ञ की सामग्री के बीच, भूत-शांति के लिए उनकी महापूजा और महापाप हो जाने पर उनका पूजन विहित है। और दूसरे अध्याय में, पुराण के अपने माहात्म्य में, भैरव की प्रतिमा के पास किया जाने वाला विधान है — वहाँ मौन रहकर प्रतिदिन तीन बार रुद्रसंहिता का पाठ, और समस्त कामनाओं की प्राप्ति — जो यह मानकर चलता है कि इस ग्रंथ के पाठक के लिए भैरव की प्रतिमा तक पहुँच सामान्य बात है।

ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 18.130

महापाप आदि हो जाने पर संहिता स्वयं भैरव-पूजन का विधान देती है — और वह भी उसी अध्याय में जिसमें नित्य आचार और वार्षिक शांति-यज्ञ हैं।

मूल पाठ पढ़ें →
130

दुर्दर्शनादौ सद्यो वै मासमात्रे समाचरेत् । महापापादिसम्प्राप्तौ कुर्याद्भैरवपूजनम् ॥

अशुभ दर्शन आदि होने पर इसे तुरन्त अथवा अधिक-से-अधिक एक महीने के भीतर करे; महापाप आदि होने पर भैरव-पूजन करे।

भैरव को मदिरा चढ़ाना अनिवार्य नहीं है

इसके दोनों पक्ष कहने आवश्यक हैं, क्योंकि प्रथा वास्तविक है और अनिवार्यता नहीं।

प्रथा है। जिन मंदिरों में परंपरा से कारण चढ़ता है — उज्जैन के काल भैरव सबसे प्रसिद्ध — वहाँ चढ़ता है, और संग्रह उसकी पूरी विधि बिना संकोच के देता है। परंतु वही संग्रह, बिना पूछे और दो बार, यह भी कहता है कि ऐसा कोई नियम कहीं नहीं है कि न पीने वाले से भैरव नाराज होंगे, कि खप्पर-प्रसाद के लिए किसी पर दबाव वैध नहीं, और कि मधु सीधा विकल्प है। इस लेन-देन में आपका भाग अर्पण है, ग्रहण नहीं।

प्राप्त ग्रंथ क्या कहता है: कुछ नहीं। विद्येश्वर संहिता में भैरव का नाम चार स्थानों पर है — 2.35, आठवाँ अध्याय, 18.127 तथा 18.130–131, और 25.73–74 की रुद्राक्ष-संगतियाँ। अठारहवाँ अध्याय उनका पूजन दो बार विहित करता है और दोनों बार कोई द्रव्य नामित नहीं करता; 2.35 प्रतिमा के पास पाठ विहित करता है और वहाँ भी कोई नहीं। मद्य की अपनी परंपरा और अपना स्थान है; वह इस ग्रंथ का विधान नहीं है।

लोकप्रचलित — ग्रंथ में ऐसा नहीं कहा गया श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 18.127–131

भैरव को मदिरा चढ़ाना अनिवार्य है, और जो नहीं पीता उससे वे अप्रसन्न होते हैं।

विद्येश्वर संहिता इस प्रसंग में भैरव का पूजन दो बार विहित करती है — भूत-शांति के लिए महापूजा (18.127) और महापाप हो जाने पर पूजन (18.130) — और दोनों स्थानों पर कोई द्रव्य नामित नहीं करती; 18.131 साधनों के अभाव में दीपदान को आश्रय बताता है, और 2.35 प्रतिमा के पास पाठ विहित करता है, वहाँ भी कोई अर्पण नामित नहीं। इस संहिता में भैरव का उल्लेख इतने ही स्थानों पर है। जिन मंदिरों में परंपरा से कारण चढ़ता है वह प्रथा वास्तविक और पुरानी है, और संग्रह उसकी पूरी विधि भी देता है; परंतु वही संग्रह दो बार, बिना पूछे, यह भी कहता है कि न पीने वाले से भैरव के अप्रसन्न होने का कोई नियम कहीं नहीं है, कि खप्पर-प्रसाद के लिए किसी पर दबाव वैध नहीं, और कि मधु सीधा विकल्प है।

मूल पाठ पढ़ें →
127

भैरवस्य महापूजां कुर्याद्भूतादिशान्तये ॥

भूत आदि की शान्ति के लिए भैरव की महापूजा करे।

128

महाभिषेकं नैवेद्यं शिवस्यान्ते तु कारयेत् । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्भूरिभोजनरूपतः ॥

अन्त में भगवान् शिव का महाभिषेक और नैवेद्य कराए; फिर भूरिभोजनरूप से ब्राह्मणों को भोजन कराए।

129

एवं कृतेन यज्ञेन दोषशान्तिमवाप्नुयात् । शान्तियज्ञमिमं कुर्याद्वर्षे वर्षे तु फाल्गुने ॥

इस प्रकार किए गए यज्ञ से दोष की शान्ति प्राप्त होती है; यह शान्तियज्ञ प्रतिवर्ष फाल्गुन मास में करना चाहिए।

130

दुर्दर्शनादौ सद्यो वै मासमात्रे समाचरेत् । महापापादिसम्प्राप्तौ कुर्याद्भैरवपूजनम् ॥

अशुभ दर्शन आदि होने पर इसे तुरन्त अथवा अधिक-से-अधिक एक महीने के भीतर करे; महापाप आदि होने पर भैरव-पूजन करे।

131

महाव्याधिसमुत्पत्तौ सङ्कल्पं पुनराचरेत् । सर्वाभावे दरिद्रस्तु दीपदानमथाचरेत् ॥

महाव्याधि उत्पन्न होने पर पुनः संकल्प लेकर उसे सम्पन्न करे; सब साधनों के अभाव में दरिद्र व्यक्ति दीपदान करे।

भैरव अनियंत्रित नहीं हैं, और वे अपने उपासक पर नहीं पलटते

आठवाँ अध्याय ध्यान से पढ़ने पर क्रोध का नहीं, संयम का अध्याय है। प्रकट होते ही भैरव का पहला कार्य प्रणाम करके आज्ञा माँगना है — “यहाँ मैं क्या कार्य करूँ? हे प्रभो, शीघ्र आज्ञा दीजिए।” और उसी प्रसंग में उनका अंतिम कार्य रोका जाना है: विष्णु की प्रार्थना पर, देवगणों के समक्ष, प्रहार के मध्य में, “ईश्वर ने तब भैरव को ब्रह्मा को दण्डित करने से रोक दिया।” वे न अपनी पहल पर आरंभ करते हैं, न रोके जाने पर आगे बढ़ते हैं।

संग्रह अपना कार्यसिद्ध नियम ठीक इसी पर खड़ा करता है — कि काशी विश्वनाथ का नियंत्रण काल भैरव पर भी है, इसीलिए गंभीर भैरव उपासना के साथ शिव की सेवा चलती रहनी चाहिए। ऊर्जा वास्तविक है और उसे संयत रखने के निर्देश (रुद्राक्ष, गणपति प्रथम, मंत्र से पहले स्तोत्र) भी वास्तविक हैं। पर यह धारणा कि देवता स्वयं चंचल हैं — ग्रंथ में कहीं नहीं है।

ग्रंथ इसके विपरीत कहता है श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 8.8

भैरव अनियंत्रित हैं और अपने उपासक पर पलट सकते हैं।

आठ ही श्लोकों में अध्याय इसका उल्टा दो बार दिखाता है। भैरव आज्ञा मिलने तक कुछ नहीं करते (8.2-8.3), और कार्य के मध्य में रोक दिए जाते हैं: विष्णु की प्रार्थना पर “देवगणों के समक्ष प्रसन्न हुए ईश्वर ने तब भैरव को ब्रह्मा को दण्डित करने से रोक दिया” (8.8)। वे न अपनी पहल पर आरंभ करते हैं, न रोके जाने पर आगे बढ़ते हैं। संग्रह अपना कार्यसिद्ध नियम ठीक इसी पर खड़ा करता है — कि गंभीर भैरव उपासना के साथ शिव की सेवा चलती रहनी चाहिए, क्योंकि उस साधना से बनी ऊर्जा को संभालने का सामर्थ्य उन्हीं से आता है।

मूल पाठ पढ़ें →
8

इत्यर्थितोऽच्युतेनेशस्तुष्टः सुरगणाग्रणे । निवर्तयामास तदा भैरवं ब्रह्मदण्डतः ॥

अच्युत द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर देवगणों के समक्ष प्रसन्न हुए ईश्वर ने तब भैरव को ब्रह्मा को दण्डित करने से रोक दिया।

घर में बटुक की मूर्ति परंपरा का विधान है, इस पुराण का नहीं

यह भ्रांति हमारी ही दिशा में चलती है और इसीलिए यहाँ अंकित है — जो पृष्ठ केवल दूसरों के कथनों को जाँचे वह अपना काम नहीं कर रहा।

यह निर्देश कि प्रत्येक गृहस्थ बटुक भैरव की स्थापना और नित्य सेवा करे, संग्रह में लगभग अनिवार्यता की तरह कहा गया है, और जो कारण दिया गया है — कि बटुक देवी के अपने पुत्र हैं और उनसे पहले वे नैवेद्य नहीं लेतीं — वह तांत्रिक तथा कुल परंपरा से आता है, विद्येश्वर संहिता से नहीं। वह संहिता कहीं बटुक का नाम नहीं लेती। जो वह देती है वह उसी निर्देश का सामान्य रूप है: 18.127 पर भूत-शांति के लिए भैरव की महापूजा, 18.130 पर महापाप होने पर भैरव-पूजन, 2.35 पर भैरव की प्रतिमा के पास पाठ, और 18.131 पर सब साधनों के अभाव में दरिद्र का दीपदान।

अर्थात् प्रथा का ग्रंथीय आधार है; विशिष्ट रूप और विशिष्ट आग्रह परंपरा से आते हैं। यह जानना उपयोगी है, क्योंकि इसका अर्थ यह भी है कि जो घर केवल दीपक रख पा रहा है वह ग्रंथ के विरुद्ध कुछ नहीं कर रहा।

लोकप्रचलित — ग्रंथ में ऐसा नहीं कहा गया श्रीशिवमहापुराण · विद्येश्वरसंहिता 18

प्रत्येक गृहस्थ को घर में बटुक भैरव का विग्रह स्थापित करके उनकी नित्य सेवा करनी ही चाहिए।

यह पंक्ति इसलिए अंकित है कि यह हमारी ही दिशा में चलती है। यह निर्देश संग्रह में लगभग अनिवार्यता की तरह कहा गया है, और उसका कारण — कि बटुक देवी के अपने पुत्र हैं और उनसे पहले वे नैवेद्य नहीं लेतीं — तांत्रिक तथा कुल परंपरा से आता है। विद्येश्वर संहिता कहीं बटुक का नाम नहीं लेती। जो वह देती है वह उसी निर्देश का सामान्य रूप है: भूत-शांति के लिए भैरव की महापूजा (18.127), महापाप पर भैरव-पूजन (18.130), भैरव की प्रतिमा के पास पाठ (2.35), और सब साधनों के अभाव में दरिद्र का दीपदान (18.131)। अर्थात् प्रथा का ग्रंथीय आधार है; विशिष्ट रूप और विशिष्ट आग्रह परंपरा से आते हैं — और इसका अर्थ यह भी है कि जो घर केवल दीपक रख पा रहा है, वह ग्रंथ के विरुद्ध कुछ नहीं कर रहा।

मूल पाठ पढ़ें →

बन्धमोक्षस्वरूपं हि ब्रूहि सर्वार्थवित्तम ।

हे सर्वार्थवित्तम! बन्धन और मोक्ष का स्वरूप हमें बताइए।

1

बन्धं मोक्षं तथोपायं वक्ष्येऽहं शृणुतादरात् ॥

मैं बन्धन, मोक्ष तथा उसके उपाय का वर्णन करूँगा; आदरपूर्वक सुनिए।

2

प्रकृत्याद्यष्टबन्धेन बद्धो जीवः स उच्यते । प्रकृत्याद्यष्टबन्धेन निर्मुक्तो मुक्त उच्यते ॥

प्रकृति आदि आठ बन्धनों से बँधा हुआ जीव बद्ध कहलाता है; और उन्हीं आठ बन्धनों से मुक्त हुआ जीव मुक्त कहलाता है।

3

प्रकृत्यादिवशीकारो मोक्ष इत्युच्यते स्वतः । बद्धजीवस्तु निर्मुक्तो मुक्तजीवः स कथ्यते ॥

प्रकृति आदि को वश में कर लेना स्वतः मोक्ष कहलाता है; बद्ध जीव जब मुक्त हो जाता है, तब वह मुक्तजीव कहलाता है।

4

प्रकृत्यग्रे ततो बुद्धिरहङ्कारो गुणात्मकः । पञ्चतन्मात्रमित्येतत्प्रकृत्याद्यष्टकं विदुः ॥

पहले प्रकृति, फिर बुद्धि, गुणात्मक अहंकार, और पाँच तन्मात्राएँ — इसे ही प्रकृति आदि अष्टक जानना चाहिए।

5

प्रकृत्याद्यष्टजो देहो देहजं कर्म उच्यते । पुनश्च कर्मजो देहो जन्म कर्म पुनः पुनः ॥

प्रकृति आदि अष्टक से देह उत्पन्न होती है, और देह से कर्म उत्पन्न होता है; फिर कर्म से देह उत्पन्न होती है — इस प्रकार बार-बार जन्म और कर्म होते हैं।

6

शरीरं त्रिविधं ज्ञेयं स्थूलं सूक्ष्मं च कारणम् । स्थूलं व्यापारदं प्रोक्तं सूक्ष्ममिन्द्रियभोगदम् ॥

शरीर को स्थूल, सूक्ष्म और कारण — तीन प्रकार का जानना चाहिए। स्थूल शरीर व्यापार (क्रिया) देने वाला कहा गया है, सूक्ष्म इन्द्रिय-भोग देने वाला है;

7

कारणं त्वात्मभोगार्थं जीवकर्मानुरूपतः । सुखं दुःखं पुण्यपापैः कर्मभिः फलमश्नुते ॥

और कारण शरीर जीव के कर्मों के अनुरूप आत्मभोग के लिए है। पुण्य-पाप रूप कर्मों से सुख-दुःख रूप फल भोगा जाता है।

8

तस्माद्धि कर्मरज्ज्वा हि बद्धो जीवः पुनः पुनः । शरीरत्रयकर्मभ्यां चक्रवद् भ्राम्यते सदा ॥

इसलिए कर्मरूपी रस्सी से बँधा हुआ जीव बार-बार तीनों शरीरों के कर्मों से सदा चक्र की भाँति घुमाया जाता है।

9

चक्रभ्रमनिवृत्त्यर्थं चक्रकर्तारमीडयेत् । प्रकृत्यादिमहाचक्रं प्रकृतेः परतः शिवः ॥

इस चक्र-भ्रमण की निवृत्ति के लिए चक्र के कर्ता की स्तुति करनी चाहिए। प्रकृति आदि ही महाचक्र है, और शिव प्रकृति से परे हैं।

10

चक्रकर्ता महेशो हि प्रकृतेः परतो यतः । पिबति वाथ वमति जीवा बालो जलं यथा ॥

महेश ही चक्र के कर्ता हैं, क्योंकि वे प्रकृति से परे हैं — जैसे बकायन वृक्ष का थाला जल को पीता और उगलता है,

11

शिवस्तथा प्रकृत्यादि वशीकृत्याधितिष्ठति । सर्वं वशीकृतं यस्मात्तस्माच्छिव इति स्मृतः । शिव एव हि सर्वज्ञः परिपूर्णश्च निःस्पृहः ॥

उसी प्रकार शिव प्रकृति आदि को वश में करके अधिष्ठित हैं। सबको वश में करने के कारण ही वे शिव कहे गए हैं। शिव ही सर्वज्ञ, परिपूर्ण और निःस्पृह हैं।

12

सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः । अनन्तशक्तिश्च महेश्वरस्य यन्मानसैश्वर्यमवैति वेदः ॥

सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादिबोध, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त शक्ति, और अनन्त शक्ति — यह महेश्वर का मानसिक ऐश्वर्य है, जिसे केवल वेद ही जानता है।

13

अतः शिवप्रसादेन प्रकृत्यादि वशं भवेत् । शिवप्रसादलाभार्थं शिवमेव प्रपूजयेत् ॥

इसलिए शिव की कृपा से ही प्रकृति आदि वश में होते हैं; शिव की कृपा पाने के लिए शिव का ही पूजन करना चाहिए।

14

निःस्पृहस्य च पूर्णस्य तस्य पूजा कथं भवेत् । शिवोद्देशकृतं कर्म प्रसादजनकं भवेत् ॥

निःस्पृह और पूर्ण उन शिव की पूजा कैसे हो सकती है? [उत्तर यह है कि] शिव के उद्देश्य से किया गया कर्म ही उनकी कृपा का जनक होता है।

15

लिङ्गे वेरे भक्तजने शिवमुद्दिश्य पूजयेत् । कायेन मनसा वाचा धनेनापि प्रपूजयेत् ॥

लिंग में, प्रतिमा में, भक्तजन में शिव का उद्देश्य करके पूजा करे; काया से, मन से, वाणी से और धन से भी पूजन करे।

16

पूजया तु महेशो हि प्रकृतेः परमः शिवः । प्रसादं कुरुते सत्यं पूजकस्य विशेषतः ॥

ऐसी पूजा से प्रकृति से परे महेश्वर शिव सत्य ही, विशेष रूप से, पूजक पर कृपा करते हैं।

17

शिवप्रसादात्कर्माद्यं क्रमेण स्ववशं भवेत् । कर्मारभ्य प्रकृत्यन्तं यदा सर्वं वशं भवेत् ॥

शिव की कृपा से कर्म आदि क्रमशः अपने वश में हो जाते हैं; जब कर्म से लेकर प्रकृतिपर्यन्त सब कुछ वश में हो जाता है,

18

तदा मुक्त इति प्रोक्तः स्वात्मारामो विराजते । प्रसादात्परमेशस्य कर्मदेहो यदा वशः ॥

तब वह मुक्त कहलाता है, और स्वात्माराम रूप में विराजमान होता है। परमेश्वर की कृपा से जब कर्मशरीर वश में हो जाता है,

19

तदा वै शिवलोके तु वासः सालोक्यमुच्यते । सामीप्यं याति साम्बस्य तन्मात्रे च वशं गते ॥

तब शिवलोक में निवास ही सालोक्य कहलाता है। और जब तन्मात्राएँ भी वश में हो जाती हैं, तब साम्ब का सामीप्य प्राप्त होता है;

20

तदा तु शिवसायुज्यमायुधाद्यैः क्रियादिभिः । महाप्रसादलाभे च बुद्धिश्चापि वशा भवेत् ॥

तब आयुध आदि तथा क्रिया आदि सहित शिवसायुज्य प्राप्त होता है; और महाप्रसाद प्राप्त होने पर बुद्धि भी वश में हो जाती है।

21

बुद्धिस्तु कार्यं प्रकृतेस्तत्सार्ष्टिरिति कथ्यते । पुनर्महाप्रसादेन प्रकृतिर्वशमेष्यति ॥

बुद्धि तो प्रकृति का कार्य है; उसका वश में होना सार्ष्टि कहलाता है। और पुनः महाप्रसाद से प्रकृति भी वश में आ जाएगी।

22

शिवस्य मानसैश्वर्यं तदाऽयत्नं भविष्यति । सार्वज्ञाद्यं शिवैश्वर्यं लब्ध्वा स्वात्मनि राजते ॥

तब शिव का मानसिक ऐश्वर्य बिना यत्न के ही प्राप्त हो जाएगा; सर्वज्ञता आदि शिव के ऐश्वर्य को पाकर मनुष्य अपनी आत्मा में ही विराजमान होता है।

23

तत्सायुज्यमिति प्राहुर्वेदागमपरायणाः । एवं क्रमेण मुक्तिः स्याल्लिङ्गादौ पूजया स्वतः ॥

इसी को वेद-आगमपरायण जन सायुज्य कहते हैं। इस प्रकार क्रमशः लिंगादि की पूजा से स्वतः ही मुक्ति प्राप्त होती है।

24

अतः शिवप्रसादार्थं क्रियाद्यैः पूजयेच्छिवम् । शिवक्रिया शिवतपः शिवमन्त्रजपः सदा ॥

इसलिए शिव-प्रसाद के लिए क्रिया आदि से शिव का पूजन करे; सदा शिवक्रिया, शिवतप, शिवमन्त्र-जप,

25

शिवज्ञानं शिवध्यानमुत्तरोत्तरमभ्यसेत् । आसुप्तेरामृतेः कालं नयेद्धै शिवचिन्तया ॥

शिवज्ञान और शिवध्यान का उत्तरोत्तर अभ्यास करे। सोने से लेकर मृत्यु तक का सारा समय शिवचिन्तन में ही बिताए।

25½

सद्यादिभिश्च कुसुमैरर्चयेच्छिवमेष्यति ।

जो सद्योजातादि मन्त्रों तथा पुष्पों से शिव का पूजन करता है, वह शिव को ही प्राप्त होता है।

26

लिङ्गादौ शिवपूजाया विधानं ब्रूहि सुव्रत ॥

हे सुव्रत! लिंगादि में शिवपूजा का विधान बताइए।

27

लिङ्गानां च क्रमं वक्ष्ये यथावच्छृणुत द्विजाः । तदेव लिङ्गं प्रथमं प्रणवं सार्वकामिकम् ॥

मैं लिंगों का क्रम यथावत् कहूँगा; हे द्विजो, सुनिए। प्रणव ही प्रथम लिंग है, जो सब कामनाओं को सिद्ध करने वाला है।

28

सूक्ष्मप्रणवरूपं हि सूक्ष्मरूपं तु निष्कलम् । स्थूललिङ्गं हि सकलं तत्पञ्चाक्षरमुच्यते ॥

सूक्ष्म प्रणवरूप ही सूक्ष्म और निष्कल रूप है; स्थूललिंग ही सकल है, जिसे पंचाक्षर कहते हैं।

29

तयोः पूजा तपः प्रोक्तं साक्षान्मोक्षप्रदे उभे । पौरुषप्रकृतिभूतानि लिङ्गानि सुबहूनि च ॥

उन दोनों की पूजा को ही तप कहा गया है; दोनों साक्षात् मोक्ष देने वाले हैं। पौरुष और प्रकृति से उत्पन्न बहुत-से लिंग भी हैं।

30

तानि विस्तरतो वक्तुं शिवो वेत्ति न चापरः । भूविकाराणि लिङ्गानि ज्ञातानि प्रब्रवीमि वः ॥

उन्हें विस्तार से कहना केवल शिव ही जानते हैं, दूसरा कोई नहीं; भूमि के विकाररूप जो लिंग ज्ञात हैं, उन्हें मैं आपसे कहता हूँ।

31

स्वयम्भूलिङ्गं प्रथमं बिन्दुलिङ्गं द्वितीयकम् । प्रतिष्ठितं चरं चैव गुरुलिङ्गं तु पञ्चमम् ॥

स्वयम्भू लिंग प्रथम है, बिन्दुलिंग द्वितीय है, प्रतिष्ठित और चरलिंग तीसरा-चौथा हैं, और गुरुलिंग पाँचवाँ है।

32

देवर्षितपसा तुष्टः सानिध्यार्थं तु तत्र वै । पृथिव्यन्तर्गतः शर्वो बीजं वै नादरूपतः ॥

देवताओं और ऋषियों के तप से सन्तुष्ट होकर, वहाँ अपनी सन्निधि के लिए शर्व नादरूप बीज से पृथ्वी में प्रविष्ट होकर,

33

स्थावराङ्कुरवद् भूमिमुद्भिद्य व्यक्त एव सः । स्वयंभूतं जातमिति स्वयम्भूरिति तं विदुः ॥

स्थावर अंकुर की भाँति भूमि को भेदकर स्वयं ही व्यक्त हो जाते हैं; "स्वयं उत्पन्न हुआ" इस अर्थ में उन्हें स्वयम्भू जानते हैं।

34

तल्लिङ्गपूजया ज्ञानं स्वयमेव प्रवर्धते । सुवर्णरजतादौ वा पृथिव्यां स्थण्डिलेऽपि वा ॥

उस लिंग की पूजा से ज्ञान स्वयं ही बढ़ता है। अथवा सुवर्ण-रजत आदि पर, पृथ्वी पर, या स्थण्डिल पर भी,

35

स्वहस्तालिखितं लिङ्गं शुद्धप्रणवमन्त्रकम् । यन्त्रलिङ्गं समालिख्य प्रतिष्ठावाहनं चरेत् ॥

अपने हाथ से लिखा हुआ, शुद्ध प्रणव-मन्त्ररूप, यन्त्रलिंग बनाकर उसकी प्रतिष्ठा और आवाहन करे।

36

बिन्दुनादमयं लिङ्गं स्थावरं जङ्गमं च यत् । भावनामयमेतद्धि शिवदृष्टं न संशयः ॥

बिन्दु-नादमय लिंग, चाहे स्थावर हो या जंगम, यह पूर्णतः भावनामय है; इसमें शिव का दर्शन होता है, इसमें सन्देह नहीं है।

37

यत्र विश्वस्यते शम्भुस्तत्र तस्मै फलप्रदः । स्वहस्तालिखिते यन्त्रे स्थावरादावकृत्रिमे ॥

जहाँ भी शम्भु पर विश्वास किया जाता है, वहीं वे फल देते हैं। अपने हाथ से लिखे यन्त्र में, अथवा अकृत्रिम स्थावर आदि में,

38

आवाह्य पूजयेच्छम्भुं षोडशैरुपचारकैः । स्वयमैश्वर्यमाप्नोति ज्ञानमभ्यासतो भवेत् ॥

शम्भु का आवाहन करके षोडशोपचार से उनकी पूजा करे; इससे साधक स्वयं ऐश्वर्य प्राप्त करता है, और अभ्यास से ज्ञान भी होता है।

39

देवैश्च ऋषिभिश्चापि स्वात्मसिद्ध्यर्थमेव हि । समन्त्रेणात्महस्तेन कृतं यच्छुद्धमण्डले ॥

देवताओं और ऋषियों ने भी अपनी आत्मसिद्धि के लिए ही मन्त्रपूर्वक अपने हाथों से शुद्ध मण्डल में जो लिंग बनाया,

40

शुद्धभावनया चैव स्थापितं लिङ्गमुत्तमम् । तल्लिङ्गं पौरुषं प्राहुस्तत्प्रतिष्ठितमुच्यते ॥

और शुद्ध भावना से जो उत्तम लिंग स्थापित किया, उस लिंग को पौरुष कहते हैं; इसे ही प्रतिष्ठित लिंग कहा जाता है।

41

तल्लिङ्गपूजया नित्यं पौरुषैश्वर्यमाप्नुयात् । महद्भिर्ब्राह्मणैश्चापि राजभिश्च महाधनैः ॥

उस लिंग की पूजा से नित्य पौरुष-ऐश्वर्य प्राप्त होता है। महान् ब्राह्मणों, राजाओं तथा महाधनी पुरुषों द्वारा,

42

शिल्पिना कल्पितं लिङ्गं मन्त्रेण स्थापितं च यत् । प्रतिष्ठितं प्राकृतं हि प्राकृतैश्वर्यभोगदम् ॥

किसी शिल्पी से बनवाकर मन्त्रपूर्वक जो लिंग स्थापित किया जाता है, वह प्राकृत प्रतिष्ठित लिंग है, जो प्राकृत ऐश्वर्य-भोग देने वाला है।

43

यदूर्जितं च नित्यं च तद्धि पौरुषमुच्यते । यद् दुर्बलमनित्यं च तद्धि प्राकृतमुच्यते ॥

जो प्रबल और नित्य है, वह पौरुष कहलाता है; जो दुर्बल और अनित्य है, वह प्राकृत कहलाता है।

44

लिङ्गं नाभिस्तथा जिह्वा नासाग्रं च शिखा क्रमात् । कट्यादिषु त्रिलोकेषु लिङ्गमाध्यात्मिकं चरम् ॥

क्रमशः नाभि, जिह्वा, नासाग्र और शिखा में, तथा कटि आदि तीनों स्थानों में जो लिंग की भावना की जाती है, वही आध्यात्मिक चरलिंग है।

45

पर्वतं पौरुषं प्रोक्तं भूतलं प्राकृतं विदुः । वृक्षादि पौरुषं ज्ञेयं गुल्मादि प्राकृतं विदुः ॥

पर्वत को पौरुष कहा गया है, भूतल को प्राकृत जानना चाहिए। वृक्ष आदि को पौरुष जानना चाहिए, गुल्म आदि को प्राकृत जानना चाहिए।

46

षाष्टिकं प्राकृतं ज्ञेयं शालिगोधूमपौरुषम् । ऐश्वर्यं पौरुषं विद्यादणिमाद्यष्टसिद्धिदम् ॥

साठी धान्य को प्राकृत जानना चाहिए, शालि और गेहूँ पौरुष हैं। अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ देने वाले ऐश्वर्य को पौरुष जानना चाहिए।

46½

सुस्त्रीधनादिविषयं प्राकृतं प्राहुरास्तिकाः ।

सुन्दर स्त्री, धन आदि विषयों को आस्तिक जन प्राकृत कहते हैं।

47

प्रथमं चरलिङ्गेषु रसलिङ्गं प्रकथ्यते ॥

चरलिंगों में सबसे पहले रसलिंग कहा गया है।

48

रसलिङ्गं ब्राह्मणानां सर्वाभीष्टप्रदं भवेत् । बाणलिङ्गं क्षत्रियाणां महाराज्यप्रदं शुभम् ॥

रसलिंग ब्राह्मणों को सब अभीष्ट देने वाला होता है; शुभ बाणलिंग क्षत्रियों को महान् राज्य देने वाला है।

49

स्वर्णलिङ्गं तु वैश्यानां महाधनपतित्वदम् । शिलालिङ्गं तु शूद्राणां महाशुद्धिकरं शुभम् ॥

स्वर्णलिंग वैश्यों को महाधनपतित्व देने वाला है; शुभ शिलालिंग शूद्रों को महाशुद्धि देने वाला है।

50

स्फाटिकं बाणलिङ्गं च सर्वेषां सर्वकामदम् । स्वीयाभावेऽन्यदीयं तु पूजायां न निषिध्यते ॥

स्फटिक और बाणलिंग सभी को सब कामनाएँ देने वाले हैं; अपना न होने पर दूसरे का लिंग पूजा में निषिद्ध नहीं है।

51

स्त्रीणां तु पार्थिवं लिङ्गं सभर्तृणां विशेषतः । विधवानां प्रवृत्तानां स्फाटिकं परिकीर्तितम् ॥

स्त्रियों के लिए, विशेषतः सधवाओं के लिए, पार्थिव लिंग विहित है; प्रवृत्तिमार्ग की विधवाओं के लिए स्फाटिक लिंग कहा गया है।

52

विधवानां निवृत्तानां रसलिङ्गं विशिष्यते । बाल्ये वा यौवने वापि वार्धके वापि सुव्रताः ॥

निवृत्तिमार्ग की विधवाओं के लिए रसलिंग श्रेष्ठ है — चाहे बचपन में हो, युवावस्था में हो, या वृद्धावस्था में हो, हे सुव्रतो,

53

शुद्धस्फटिकलिङ्गं तु स्त्रीणां तत्सर्वभोगदम् । प्रवृत्तानां पीठपूजा सर्वाभीष्टप्रदा भुवि ॥

शुद्ध स्फटिकलिंग स्त्रियों को सब भोग देने वाला है। प्रवृत्तिमार्गी स्त्रियों के लिए पीठपूजा इस भूतल पर सब अभीष्ट देने वाली है।

54

पात्रेणैव प्रवृत्तस्तु सर्वपूजां समाचरेत् । नैवेद्यं चाभिषेकान्ते शाल्यन्नेन समाचरेत् ॥

प्रवृत्तिमार्गी पात्र के द्वारा ही सम्पूर्ण पूजा सम्पन्न करे; तथा अभिषेक के अन्त में शालि चावल से नैवेद्य अर्पित करे।

55

पूजान्ते स्थापयेल्लिङ्गं सम्पुटेषु पृथग्गृहे । करपूजानिवृत्तानां स्वभोज्यं तु निवेदयेत् ॥

पूजा के अन्त में लिंग को पृथक् घर में सम्पुट में स्थापित करे। हस्तपूजा करने वाली निवृत्तिमार्गिणी स्त्रियों को अपने भोजन को ही निवेदित करना चाहिए।

56

निवृत्तानां परं सूक्ष्मं लिङ्गमेव विशिष्यते । विभूत्यभ्यर्चनं कुर्याद्विभूतिं च निवेदयेत् ॥

निवृत्तिमार्गियों के लिए सूक्ष्म लिंग ही श्रेष्ठ है। विभूति से पूजन करे और विभूति को ही निवेदित करे।

56½

पूजां कृत्वाथ तल्लिङ्गं शिरसा धारयेत्सदा ।

पूजा करके फिर उस लिंग को सदा सिर पर धारण करे।

57

विभूतिस्त्रिविधा प्रोक्ता लोकवेदशिवाग्निभिः ॥

विभूति तीन प्रकार की कही गई है — लोकाग्नि, वेदाग्नि और शिवाग्नि से उत्पन्न।

58

लोकाग्निजमथो भस्म द्रव्यशुद्ध्यर्थमावहेत् । मृदारुलोहरूपाणां धान्यानां च तथैव च ॥

साधारण अग्नि से उत्पन्न भस्म को द्रव्यशुद्धि के लिए ले आए — मिट्टी, लकड़ी और लोहे के पात्रों की, धान्य की,

59

तिलादीनां च द्रव्याणां वस्त्रादीनां तथैव च । तथा पर्युषितानां च भस्मना शुद्धिरिष्यते ॥

तथा तिल आदि द्रव्यों की, वस्त्रादि की, और बासी वस्तुओं की भी — भस्म से शुद्धि अभीष्ट है।

60

श्वादिभिर्दूषितानां च भस्मना शुद्धिरिष्यते । सजलं निर्जलं भस्म यथायोग्यं तु योजयेत् ॥

कुत्ते आदि से दूषित वस्तुओं की भी भस्म से शुद्धि होती है; सजल अथवा निर्जल भस्म का यथायोग्य प्रयोग करे।

61

वेदाग्निजं तथा भस्म तत्कर्मान्तेषु धारयेत् । मन्त्रेण क्रियया जन्यं कर्माग्नौ भस्मरूपधृक् ॥

और वेदाग्निजनित भस्म को उन-उन वैदिक कर्मों के अन्त में धारण करे; मन्त्र और क्रिया से उत्पन्न होकर वह कर्माग्नि में भस्मरूप धारण करता है।

62

तद्भस्मधारणात्कर्म स्वात्मन्यारोपितं भवेत् । अघोरेणात्ममन्त्रेण बिल्वकाष्ठं प्रदाहयेत् ॥

उस भस्म को धारण करने से कर्म अपनी आत्मा में आरोपित हो जाता है। अघोर मन्त्र से, जो आत्ममन्त्र है, बिल्वकाष्ठ को जलाए —

63

शिवाग्निरिति सम्प्रोक्तस्तेन दग्धं शिवाग्निजम् । कपिलागोमयं पूर्वं केवलं गव्यमेव वा ॥

उस अग्नि को शिवाग्नि कहते हैं; उससे जलाया हुआ भस्म शिवाग्निजनित है। पहले कपिला गाय का गोबर, अथवा केवल गोमय ही,

64

शम्यश्वत्थपलाशान्वा वटार्कवधबिल्वकान् । शिवाग्निना दहेच्छुद्धं तद्धै भस्म शिवाग्निजम् ॥

अथवा शमी, पीपल, पलाश, वट, आक, अमलतास और बिल्व की लकड़ी को शिवाग्नि से शुद्ध जलाए; वही शिवाग्निजनित भस्म है।

65

दर्भाग्नौ वा दहेत्काष्ठं शिवमन्त्रं समुच्चरन् । सम्यक्संशोध्य वस्त्रेण नवकुम्भे निधापयेत् ॥

अथवा शिवमन्त्र का उच्चारण करते हुए दर्भाग्नि में काष्ठ जलाए; वस्त्र से भलीभाँति शोधकर नए घड़े में रख दे।

65½

दीप्त्यर्थं तत्तु सङ्ग्राह्यं मन्यते पूज्यतेऽपि च ।

उसे कान्ति के लिए संग्रहणीय मानना चाहिए, और वह पूजनीय भी है।

66

भस्मशब्दार्थ एवं हि शिवः पूर्वं तथाकरोत् ॥

इस प्रकार यही भस्म शब्द का अर्थ है, जिसे पूर्वकाल में स्वयं शिव ने ही प्रकट किया था।

67

यथा स्वविषये राजा सारं गृह्णाति यत्करम् । यथा मनुष्याः सस्यादीन्दग्ध्वा सारं भजन्ति वै ॥

जैसे राजा अपने राज्य में जो कर सारभूत होता है, उसे ग्रहण करता है; जैसे मनुष्य फसल आदि को जलाकर उसके सार का सेवन करते हैं;

68

यथा हि जाठराग्निश्च भक्ष्यादीन्विविधान्बहून् । दग्ध्वा सारतरं सारात्स्वदेहं परिपुष्यति ॥

जैसे जठराग्नि नाना प्रकार के बहुत-से भक्ष्यादि पदार्थों को जलाकर उसके सार से भी सारतर तत्त्व से अपने शरीर को पुष्ट करती है —

69

तथा प्रपञ्चकर्तापि स शिवः परमेश्वरः । स्वाधिष्ठेयप्रपञ्चस्य दग्ध्वा सारं गृहीतवान् ॥

उसी प्रकार प्रपंच के कर्ता वे परमेश्वर शिव भी अपने अधीन इस प्रपंच को जलाकर उसका सार ग्रहण करते हैं।

70

दग्ध्वा प्रपञ्चं तद्भस्म स्वात्मन्यारोपयेच्छिवः । उद्धूलनस्य व्याजेन जगत्सारं गृहीतवान् ॥

प्रपंच को जलाकर शिव उस भस्म को अपनी ही आत्मा में लगा लेते हैं; भस्म लगाने के बहाने उन्होंने जगत् के सार को ग्रहण कर लिया है।

71

स्वरत्नं स्थापयामास स्वकीये हि शरीरके । केशमाकाशसारेण वायुसारेण वै मुखम् ॥

उन्होंने अपने ही शरीर पर अपने रत्न स्थापित किए हैं — आकाश के सार से केश, वायु के सार से मुख,

72

हृदयं चाग्निसारेण त्वपां सारेण वै कटिम् । जानुं चावनिसारेण तद्वत्सर्वं तदङ्गकम् ॥

अग्नि के सार से हृदय, जल के सार से कटि, और पृथ्वी के सार से जानु — इसी प्रकार उनके सारे अंग तत्त्वों के सार से बने हैं।

73

ब्रह्मविष्णोश्च रुद्राणां सारं चैव त्रिपुण्ड्रकम् । तथा तिलकरूपेण ललाटान्ते महेश्वरः ॥

और ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र का सार ही त्रिपुण्ड्र है, जिसे महेश्वर ललाट के अग्रभाग में तिलक के रूप में धारण करते हैं।

74

भूवृद्ध्या सर्वमेतद्धि मन्यते स्वयमित्यसौ । प्रपञ्चसारसर्वस्वमनेनैव वशीकृतम् ॥

इस वृद्धि से वे स्वयं यह सब अपना ही मानते हैं; इसी के द्वारा प्रपंच के सारभूत सर्वस्व को वश में किया गया है।

75

तस्मादस्य वशीकर्ता नान्योऽस्ति स शिवः स्मृतः । यथा सर्वमृगाणां च हिंसको मृगहिंसकः ॥

इसलिए इसका वशीकर्ता उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है, वे ही शिव कहलाते हैं। जैसे समस्त मृगों में जो हिंसक है, वह मृगहिंसक है,

75½

अस्य हिंसामृगो नास्ति तस्मात्सिंह इतीरितः ।

उसका हिंसक कोई मृग नहीं है, इसलिए वह सिंह कहा जाता है।

76

शं नित्यं सुखमानन्दमिकारः पुरुषः स्मृतः ॥

"शं" का अर्थ है नित्य सुख और आनन्द; "इ"कार पुरुष माना गया है।

77

वकारः शक्तिरमृतं मेलनं शिव उच्यते । तस्मादेवं स्वमात्मानं शिवं कृत्वार्चयेच्छिवम् ॥

"व"कार अमृतस्वरूपा शक्ति है; इन दोनों के मिलन को शिव कहते हैं। इसलिए अपनी आत्मा को इस प्रकार शिव बनाकर शिव का पूजन करे।

78

तस्माद्धूलनं पूर्वं त्रिपुण्ड्रं धारयेत्परम् । पूजाकाले हि सजलं शुद्ध्यर्थं निर्जलं भवेत् ॥

इसलिए पहले सर्वांग में भस्म लगाए, फिर उत्तम त्रिपुण्ड्र धारण करे। पूजाकाल में सजल भस्म का प्रयोग हो, और शुद्धि के लिए निर्जल का।

79

दिवा वा यदि वा रात्रौ नारी वाथ नरोऽपि वा । पूजार्थं सजलं भस्म त्रिपुण्ड्रेणैव धारयेत् ॥

चाहे दिन हो या रात्रि, स्त्री हो या पुरुष, पूजा के लिए सजल भस्म को त्रिपुण्ड्ररूप में ही धारण करना चाहिए।

80

त्रिपुण्ड्रं सजलं भस्म धृत्वा पूजां करोति यः । शिवपूजाफलं साङ्गं तस्यैव हि सुनिश्चितम् ॥

जो व्यक्ति सजल भस्म का त्रिपुण्ड्र धारण करके पूजा करता है, उसी को निश्चय ही सांग शिवपूजा का फल प्राप्त होता है।

81

भस्म वै शिवमन्त्रेण धृत्वा ह्युच्चाश्रमी भवेत् । शिवाश्रमीति सम्प्रोक्तः शिवैकपरमो यतः ॥

शिवमन्त्र से भस्म धारण करके मनुष्य उच्च आश्रमी हो जाता है; उसे शिवाश्रमी कहा जाता है, क्योंकि वह एकमात्र शिव को ही परम मानता है।

82

शिवव्रतैकनिष्ठस्य नाशौचं न च सूतकम् । ललाटेऽग्रे सितं भस्म तिलकं धारयेन्मृदा ॥

एकमात्र शिवव्रत में निष्ठा रखने वाले को न अशौच लगता है, न सूतक। ललाट के अग्रभाग में श्वेत भस्म का या मिट्टी का तिलक धारण करे।

82½

स्वहस्ताद् गुरुहस्ताद्वा शिवभक्तस्य लक्षणम् ।

अपने हाथ से अथवा गुरु के हाथ से — यही शिवभक्त का लक्षण है।

83

गुणान्रुन्ध इति प्रोक्तो गुरुशब्दस्य विग्रहः ॥

"जो गुणों का अवरोध करता है" — यही गुरु शब्द का विग्रह कहा गया है।

84

सविकारान्राजसादीन्गुणान्रुन्धे व्यपोहति । गुणातीतः परशिवो गुरुरूपं समाश्रितः ॥

वे विकारयुक्त राजस आदि गुणों का अवरोध करके उन्हें दूर हटाते हैं; गुणातीत परशिव गुरुरूप का आश्रय लेते हैं।

85

गुणत्रयं व्यपोह्याग्रे शिवं बोधयतीति सः । विश्वस्तानां तु शिष्याणां गुरुरित्यभिधीयते ॥

तीनों गुणों को पहले दूर करके फिर वे शिव का बोध कराते हैं — इसीलिए विश्वस्त शिष्यों के लिए वे गुरु कहलाते हैं।

86

तस्माद् गुरुशरीरं तु गुरुलिङ्गं भवेद् बुधः । गुरुलिङ्गस्य पूजा तु गुरुशुश्रूषणं भवेत् ॥

इसलिए बुद्धिमान् पुरुष गुरु के शरीर को ही गुरुलिंग मानें; गुरुलिंग की पूजा ही गुरु की शुश्रूषा है।

87

श्रुतं करोति शुश्रूषा कायेन मनसा गिरा । उक्तं यद् गुरुणा पूर्वं शक्यं वाऽशक्यमेव वा ॥

काया, मन और वाणी से की गई शुश्रूषा ही गुरु की बात को सार्थक करती है; गुरु द्वारा पूर्व में कही गई बात, चाहे शक्य हो या अशक्य,

88

करोत्येव हि पूतात्मा प्राणैरपि धनैरपि । तस्माद्धै शासने योग्यः शिष्य इत्यभिधीयते ॥

पवित्रात्मा शिष्य उसे प्राणों से अथवा धन से भी अवश्य पूरा करता है। इसीलिए अनुशासन के योग्य व्यक्ति को शिष्य कहा जाता है।

89

शरीराद्यर्थकं सर्वं गुरोर्दत्त्वा सुशिष्यकः । अग्रपाकं निवेद्याग्रे भुञ्जीयाद् गुर्वनुज्ञया ॥

सुशिष्य शरीरादि के सब साधन गुरु को अर्पित करके, तथा अन्न का प्रथम पाक उन्हें निवेदित करके, गुरु की आज्ञा से ही भोजन करे।

90

शिष्यः पुत्र इति प्रोक्तः सदा शिष्यत्वयोगतः । जिह्वालिङ्गान्मन्त्रशुक्रं कर्णयोनौ निषिच्य वै ॥

शिष्य को सदा शिष्यत्व के सम्बन्ध से पुत्र कहा गया है: जिह्वारूपी लिंग से मन्त्ररूपी शुक्र को कानरूपी योनि में सींचकर,

91

जातः पुत्रो मन्त्रपुत्रः पितरं पूजयेद् गुरुम् । निमज्जयति पुत्रं वै संसारे जनकः पिता ॥

इस प्रकार उत्पन्न पुत्र मन्त्रपुत्र कहलाता है; उसे गुरुरूप पिता का पूजन करना चाहिए। जन्म देने वाला पिता पुत्र को संसार में डुबो देता है;

92

सन्तारयति संसाराद् गुरुर्वै बोधकः पिता । उभयोरन्तरं ज्ञात्वा पितरं गुरुमर्चयेत् ॥

किन्तु बोध देने वाला गुरुरूप पिता उसे संसार से पार कर देता है। इन दोनों पिताओं का अन्तर जानकर गुरुरूप पिता का पूजन करे,

93

अङ्गशुश्रूषया चापि धनाद्यैः स्वार्जितैर्गुरुम् । पादादिकेशपर्यन्तं लिङ्गान्यज्ञानि यद्गुरोः ॥

अंग-शुश्रूषा से तथा अपने अर्जित धनादि से भी गुरु की सेवा करे। पैरों से लेकर केशपर्यन्त जो गुरु के अज्ञात (अनजाने) अंग हैं,

94

धनरूपैः पादुकाद्यैः पादसङ्ग्रहणादिभिः । स्नानाभिषेकनैवेद्यैर्भोजनैश्च प्रपूजयेत् ॥

उन्हें धनरूप पादुका आदि से, पादसंवाहन आदि से, तथा स्नान-अभिषेक-नैवेद्य-भोजन आदि से पूजित करे।

95

गुरुपूजैव पूजा स्याच्छिवस्य परमात्मनः । गुरुसेवा तु यत्सर्वमात्मशुद्धिकरी भवेत् ॥

गुरु की पूजा ही परमात्मा शिव की पूजा है; गुरुसेवा जो कुछ भी है, वह सब आत्मशुद्धि करने वाली है।

96

गुरोः शेषः शिवोच्छिष्टं जलमन्नादिनिर्मितम् । शिष्याणां शिवभक्तानां ग्राह्यं भोज्यं भवेद् द्विजाः ॥

गुरु का शेष, जो शिवोच्छिष्ट है, जल-अन्न आदि से बना हुआ — हे द्विजो, वह शिवभक्त शिष्यों के लिए ग्राह्य और भोज्य होता है।

97

गुर्वनुज्ञाविरहितं चोरवत्सकलं भवेत् । गुरोरपि विशेषज्ञं यत्नाद् गृह्नीत वै गुरुम् ॥

गुरु की आज्ञा के बिना उपभोग किया गया सब कुछ चोरी के समान होता है। गुरु से भी विशेष ज्ञानवान् पुरुष को यत्नपूर्वक गुरु के रूप में ग्रहण करे।

97½

अज्ञानमोचनं साध्यं विशेषज्ञो हि मोचकः ।

अज्ञान से मुक्ति ही साध्य है, और विशेषज्ञ पुरुष ही सच्चा मोचक होता है।

98

आदौ च विघ्नशमनं कर्तव्यं कर्मपूर्तये ॥

और कर्म की पूर्ति के लिए आरम्भ में विघ्नशमन करना चाहिए।

99

निर्विघ्नेन कृतं साङ्गं कर्म वै सफलं भवेत् । तस्मात्सकलकर्मादौ विघ्नेशं पूजयेद् बुधः ॥

बिना विघ्न के सांग किया गया कर्म ही सफल होता है; इसलिए बुद्धिमान् पुरुष सभी कर्मों के आरम्भ में विघ्नेश (गणेश) का पूजन करे।

99½

सर्वबाधानिवृत्त्यर्थं सर्वान्देवान्यजेद् बुधः ।

सब बाधाओं की निवृत्ति के लिए बुद्धिमान् पुरुष सभी देवताओं का यजन करे।

100

ज्वरादिग्रन्थिरोगाश्च बाधा ह्याध्यात्मिकी मता ॥

ज्वर आदि ग्रन्थिरोग आध्यात्मिक बाधा मानी गई है।

101

पिशाचजम्बुकादीनां वल्मीकाद्युद्भवे तथा । अकस्मादेव गोधादिजन्तूनां पतनेऽपि च ॥

पिशाच, सियार आदि का दिखना अथवा बाँबी आदि से उनका निकलना; तथा अकस्मात् ही छिपकली आदि जन्तुओं का गिरना,

102

गृहे कच्छपसर्पस्त्रीदुर्जनादर्शनेऽपि च । वृक्षनारीगवादीनां प्रसूतिविषयेऽपि च ॥

और घर में कछुआ, सर्प, दुष्ट स्त्री या दुर्जन का दिखना; तथा वृक्ष, स्त्री और गौ आदि की असामान्य प्रसूति में भी,

103

भाविदुःखं समायाति तस्मात्ते भौतिका मताः । अमेध्याशनिपातश्च महामारी तथैव च ॥

आने वाला दुःख निकट आ जाता है, इसलिए ये भौतिक बाधाएँ मानी गई हैं। अमेध्य वस्तु या वज्रपात का गिरना, तथा महामारी,

104

ज्वरमारी विषूचिश्च गोमारी च मसूरिका । जन्मर्क्षग्रहसङ्क्रान्तिग्रहयोगाः स्वराशिके ॥

ज्वरमारी, विषूचिका (हैजा), गोमारी और मसूरिका (चेचक); जन्मनक्षत्र पर ग्रहपीड़ा, संक्रान्ति, अपनी राशि में ग्रहयोग —

104½

दुःस्वप्नदर्शनाद्याश्च मता वै ह्याधिदैविकाः ।

और दुःस्वप्नदर्शन आदि — ये आधिदैविक बाधाएँ मानी गई हैं।

105

शवचाण्डालपतितस्पर्शादन्तर्गृहे गते ॥

और घर के भीतर शव, चाण्डाल अथवा पतित के स्पर्श होने पर —

106

एतादृशे समुत्पन्ने भाविदुःखस्य सूचके । शान्तियज्ञं तु मतिमान्कुर्यात्तद्दोषशान्तये ॥

इस प्रकार आने वाले दुःख का सूचक कोई घटना घटित होने पर बुद्धिमान् पुरुष उस दोष की शान्ति के लिए शान्तियज्ञ करे।

107

देवालयेऽथ गोष्ठे वा चैत्ये वापि गृहाङ्गणे । प्रदेशोन्नतधिष्ण्ये वै द्विहस्ते च स्वलङ्कृते ॥

देवालय में, गोशाला में, चैत्य में, अथवा घर के आंगन में, दो हाथ ऊँचे और भलीभाँति अलंकृत स्थान पर,

108

भारमात्रं व्रीहिधान्यं प्रस्थाप्य परिसृत्य च । मध्ये विलिख्य कमलं तथा दिक्षु विलिख्य वै ॥

एक भार धान्य फैलाकर उसे समतल करे, और उसके मध्य में कमल बनाए, तथा दिशाओं में भी कमल बनाए,

109

तन्तुना वेष्टितं कुम्भं नवगुग्गुलधूपितम् । मध्ये स्थाप्य महाकुम्भं तथा दिक्ष्वपि विन्यसेत् ॥

सूत्र से लिपटा और ताजे गुग्गुल से धूपित महाकुम्भ बीच में स्थापित करके, दिशाओं में भी कलश स्थापित करे।

110

सनालाम्रककूर्चादीन्कलशांश्च तथाष्टसु । पूरयेन्मन्त्रपूतेन पञ्चद्रव्ययुतेन हि ॥

आठों दिशाओं में स्थापित कलशों को नाल, आम्रपल्लव, कुशकूर्च आदि से युक्त करके, मन्त्रपूत तथा पंचद्रव्ययुक्त जल से भरे।

111

प्रक्षिपेन्नवरत्नानि नीलादीन्क्रमशस्तथा । कर्मज्ञं च सपत्नीकमाचार्यं वरयेद् बुधः ॥

उनमें नीलम आदि नवरत्नों को क्रमशः डाले; और बुद्धिमान् व्यक्ति कर्मकाण्ड के ज्ञाता सपत्नीक आचार्य का वरण करे।

112

सुवर्णप्रतिमां विष्णोरिन्द्रादीनां च निक्षिपेत् । सशिरस्के मध्यकुम्भे विष्णुमावाह्य पूजयेत् ॥

विष्णु तथा इन्द्रादि की स्वर्णप्रतिमाएँ उन कलशों में रखे; शिरयुक्त मध्यकुम्भ में विष्णु का आवाहन करके उनका पूजन करे।

113

प्रागादिषु यथामन्त्रमिन्द्रादीन्क्रमशो यजेत् । तत्तन्नाम्ना चतुर्थ्या च नमोऽन्तेन यथाक्रमम् ॥

पूर्व आदि दिशाओं में यथामन्त्र इन्द्रादि का क्रमशः पूजन करे, उन-उन के नाम को चतुर्थी विभक्ति और "नमः"-अन्त में रखते हुए यथाक्रम।

114

आवाहनादिकं सर्वमाचार्येणैव कारयेत् । आचार्यर्त्विजैः सार्धं तन्मन्त्रान्प्रजपेच्छतम् ॥

आवाहनादि सब कार्य आचार्य से ही कराए; आचार्य और ऋत्विजों के साथ उन मन्त्रों का सौ बार जप करे।

115

कुम्भस्य पश्चिमे भागे जपान्ते होममाचरेत् । कोटिं लक्षं सहस्रं वा शतमष्टोत्तरं बुधाः ॥

कलश के पश्चिम भाग में जप के अन्त में होम करे — करोड़, लाख, सहस्र, अथवा एक सौ आठ, हे विद्वज्जनो।

116

एकाहं वा नवाहं वा तथा मण्डलमेव वा । यथायोग्यं प्रकुर्वीत कालदेशानुसारतः ॥

एक दिन, नौ दिन, अथवा पूरे मण्डल तक, काल और देश के अनुसार यथायोग्य इसे सम्पन्न करे।

117

शमीहोमश्च शान्त्यर्थं वृत्त्यर्थं च पलाशकम् । समिदन्नाज्यकैर्द्रव्यैर्नाम्ना मन्त्रेण वा हुनेत् ॥

शान्ति के लिए शमी का होम और वृत्ति (आजीविका) के लिए पलाश का होम करे; समिधा, अन्न और घृत द्रव्यों से नाम अथवा मन्त्र से हवन करे।

118

प्रारम्भे यत्कृतं द्रव्यं तत्क्रियान्तं समाचरेत् । पुण्याहं वाचयित्वान्ते दिने सम्प्रोक्षयेज्जलैः ॥

आरम्भ में जिस द्रव्य का प्रयोग किया हो, उसी को कर्म के अन्त तक जारी रखे; अन्तिम दिन पुण्याहवाचन कराकर जल से प्रोक्षण करे।

119

ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्याऽद्याहुतिसङ्ख्यया । आचार्यश्च हविष्याशी ऋत्विजश्च भवेद् बुधाः ॥

फिर आहुतियों की संख्या के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराए; और हे विद्वज्जनो, आचार्य तथा ऋत्विज हविष्य का भोजन करें।

120

आदित्यादीन्ग्रहानिष्ट्वा सर्वहोमान्त एव हि । ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दद्यान्नवरत्नं यथाक्रमम् ॥

सूर्य आदि नवग्रहों का पूजन करके, सम्पूर्ण होम के अन्त में ही, ऋत्विजों को यथाक्रम नवरत्न दक्षिणा दे।

121

दशदानं ततः कुर्याद् भूरिदानं ततः परम् । बालानामुपनीतानां गृहिणां वनिनां धनम् ॥

फिर दश दान करे, और उसके बाद भूरिदान करे; बालकों, यज्ञोपवीती, गृहस्थों और वानप्रस्थियों को धन दे,

122

कन्यानां च सभर्तृणां विधवानां ततः परम् । तन्त्रोपकरणं सर्वमाचार्याय निवेदयेत् ॥

तथा कन्याओं, सधवाओं और विधवाओं को भी दान दे। समस्त तन्त्रोपकरण आचार्य को समर्पित कर दे।

123

उत्पातानां च मारीणां दुःखस्वामी यमः स्मृतः । तस्माद्यमस्य प्रीत्यर्थं कालदानं प्रदापयेत् ॥

उत्पातों और महामारियों के दुःख का स्वामी यम माना गया है; इसलिए यम की प्रसन्नता के लिए कालदान कराना चाहिए।

124

शतनिष्केण वा कुर्याद्दशनिष्केण वा पुनः । पाशांकुशधरं कालं कुर्यात्पुरुषरूपिणम् ॥

सौ निष्क अथवा दस निष्क सुवर्ण से पाश और अंकुश धारण किए हुए, पुरुष के रूप में कालदेव की प्रतिमा बनाए।

125

तत्स्वर्णप्रतिमादानं कुर्याद्दक्षिणया सह । तिलदानं ततः कुर्यात्पूर्णायुष्यप्रसिद्धये ॥

उस स्वर्णप्रतिमा का दक्षिणा सहित दान करे; फिर पूर्णायु की सिद्धि के लिए तिलदान करे।

126

आज्यावेक्षणदानं च कुर्याद्व्याधिनिवृत्तये । सहस्रं भोजयेद्विप्रान्दरिद्रः शतमेव वा ॥

व्याधिनिवृत्ति के लिए घृत में मुख देखकर उसका दान करे; सहस्र ब्राह्मणों को भोजन कराए, अथवा दरिद्र हो तो सौ को।

126½

वित्ताभावे दरिद्रस्तु यथाशक्ति समाचरेत् ।

धन के अभाव में दरिद्र व्यक्ति यथाशक्ति ही इसे सम्पन्न करे।

127

भैरवस्य महापूजां कुर्याद्भूतादिशान्तये ॥

भूत आदि की शान्ति के लिए भैरव की महापूजा करे।

128

महाभिषेकं नैवेद्यं शिवस्यान्ते तु कारयेत् । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्भूरिभोजनरूपतः ॥

अन्त में भगवान् शिव का महाभिषेक और नैवेद्य कराए; फिर भूरिभोजनरूप से ब्राह्मणों को भोजन कराए।

129

एवं कृतेन यज्ञेन दोषशान्तिमवाप्नुयात् । शान्तियज्ञमिमं कुर्याद्वर्षे वर्षे तु फाल्गुने ॥

इस प्रकार किए गए यज्ञ से दोष की शान्ति प्राप्त होती है; यह शान्तियज्ञ प्रतिवर्ष फाल्गुन मास में करना चाहिए।

130

दुर्दर्शनादौ सद्यो वै मासमात्रे समाचरेत् । महापापादिसम्प्राप्तौ कुर्याद्भैरवपूजनम् ॥

अशुभ दर्शन आदि होने पर इसे तुरन्त अथवा अधिक-से-अधिक एक महीने के भीतर करे; महापाप आदि होने पर भैरव-पूजन करे।

131

महाव्याधिसमुत्पत्तौ सङ्कल्पं पुनराचरेत् । सर्वाभावे दरिद्रस्तु दीपदानमथाचरेत् ॥

महाव्याधि उत्पन्न होने पर पुनः संकल्प लेकर उसे सम्पन्न करे; सब साधनों के अभाव में दरिद्र व्यक्ति दीपदान करे।

132

तदप्यशक्तः स्नात्वा वै यत्किंचिद् दानमाचरेत् । दिवाकरं नमस्कुर्यान्मन्त्रेणाष्टोत्तरं शतम् ॥

यदि उसमें भी असमर्थ हो, तो स्नान करके यत्किंचित् दान करे; तथा मन्त्र से एक सौ आठ बार सूर्य को नमस्कार करे।

133

सहस्रमयुतं लक्षं कोटिं वा कारयेद् बुधः । नमस्कारात्मयज्ञेन तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥

बुद्धिमान् व्यक्ति सहस्र, अयुत, लाख अथवा करोड़ बार यह नमस्कार कराए; इस नमस्कारात्मक यज्ञ से सभी देवता प्रसन्न होते हैं।

134

त्वत्स्वरूपेऽर्पिता बुद्धिर्न तेऽशून्ये च रोचते । या चास्त्यस्मदहन्तेति त्वयि दृष्टे विवर्जिता ॥

"मेरी बुद्धि आपके स्वरूप में अर्पित है; वह आपके अशून्य होने पर अन्यत्र नहीं रमती। जो मेरा अहंकार था, वह आपका दर्शन होते ही दूर हो गया है।

135

नमोऽहं हि स्वदेहेन भो महांस्त्वमसि प्रभो । न शून्यो मत्स्वरूपो वै तव दासोऽस्मि साम्प्रतम् ॥

हे प्रभो, मैं अपने शरीर से आपको नमस्कार करता हूँ; आप महान् हैं। मेरा स्वरूप शून्य नहीं है; अब मैं आपका दास हूँ।"

136

यथायोग्यं स्वात्मयज्ञं नमस्कारं प्रकल्पयेत् । अथात्र शिवनैवेद्यं दत्त्वा ताम्बूलमाहरेत् ॥

इस प्रकार यथायोग्य स्वात्मयज्ञरूप नमस्कार सम्पन्न करे; फिर यहाँ शिवनैवेद्य अर्पित करके ताम्बूल समर्पित करे।

137

शिवप्रदक्षिणं कुर्यात्स्वयमष्टोत्तरं शतम् । सहस्रमयुतं लक्षं कोटिमन्येन कारयेत् ॥

स्वयं शिव की एक सौ आठ बार प्रदक्षिणा करे; सहस्र, अयुत, लाख अथवा करोड़ प्रदक्षिणाएँ दूसरे से कराए।

138

शिवप्रदक्षिणात्सर्वं पातकं नश्यति क्षणात् । दुःखस्य मूलं व्याधिर्हि व्याधेर्मूलं हि पातकम् ॥

शिव की प्रदक्षिणा से सारे पाप क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं; दुःख का मूल व्याधि है, और व्याधि का मूल पाप है।

139

धर्मेणैव हि पापानामपनोदनमीरितम् । शिवोद्देशकृतो धर्मः क्षमः पापविनोदने ॥

धर्म से ही पापों का निवारण कहा गया है; शिव के उद्देश्य से किया गया धर्म ही पापों को दूर करने में समर्थ है।

140

अध्यक्षं शिवधर्मेषु प्रदक्षिणमितीरितम् । क्रियया जपरूपं हि प्रणवं तु प्रदक्षिणम् ॥

शिव के धर्मों में प्रदक्षिणा को प्रधान कहा गया है; क्रिया की दृष्टि से जपरूप प्रणव ही प्रदक्षिणा है।

141

जननं मरणं द्वन्द्वं मायाचक्रमितीरितम् । शिवस्य मायाचक्रं हि बलिपीठं तदुच्यते ॥

जन्म और मरण का द्वन्द्व ही मायाचक्र कहा गया है; शिव का यह मायाचक्र ही बलिपीठ कहलाता है।

142

बलिपीठं समारभ्य प्रादक्षिण्यक्रमेण वै । पदे पदान्तरं गत्वा बलिपीठं समाविशेत् ॥

बलिपीठ से आरम्भ करके प्रदक्षिणा-क्रम से एक-एक पग चलते हुए पुनः बलिपीठ में प्रवेश करे।

143

नमस्कारं ततः कुर्यात्प्रदक्षिणमितीरितम् । निर्गमाज्जननं प्राप्तं नमस्त्वात्मसमर्पणम् ॥

फिर नमस्कार करे — इसी को प्रदक्षिणा कहा गया है। बाहर निकलना जन्म प्राप्त होने के समान है, और नमस्कार आत्मसमर्पण है।

144

जननं मरणं द्वन्द्वं शिवमायासमर्पितम् । शिवमायार्पितद्वन्द्वो न पुनस्त्वात्मभाग्भवेत् ॥

इस प्रकार जन्म-मरण का द्वन्द्व शिवमाया को समर्पित हो जाता है; शिवमाया को समर्पित द्वन्द्व फिर अपना भाग नहीं बनता।

145

यावद्देहं क्रियाधीनः स जीवो बद्ध उच्यते । देहत्रयवशीकारे मोक्ष इत्युच्यते बुधैः ॥

जब तक जीव देह से बँधी क्रिया के अधीन है, तब तक वह बद्ध कहलाता है; तीनों शरीरों के वश में हो जाने को विद्वानों ने मोक्ष कहा है।

146

मायाचक्रप्रणेता हि शिवः परमकारणम् । शिवमायार्पितद्वन्द्वं शिवस्तु परिमार्जति ॥

शिव ही मायाचक्र के प्रवर्तक और परम कारण हैं; शिवमाया को समर्पित द्वन्द्व को शिव ही परिमार्जित करते हैं।

146½

शिवेन कल्पितं द्वन्द्वं तस्मिन्नेव समर्पयेत् ।

शिव द्वारा ही कल्पित द्वन्द्व को उन्हीं में समर्पित कर देना चाहिए।

147

शिवस्यातिप्रियं विद्यात्प्रदक्षिणनमो बुधाः ॥

हे बुधजनो, प्रदक्षिणा और नमस्कार को शिव का अतिप्रिय जानना चाहिए।

148

प्रदक्षिणनमस्कारौ शिवस्य परमात्मनः । षोडशैरुपचारैश्च कृता पूजा फलप्रदा ॥

परमात्मा शिव की प्रदक्षिणा और नमस्कार, तथा षोडशोपचार से की गई पूजा फलदायक होती है।

149

प्रदक्षिणाविनाश्यं हि पातकं नास्ति भूतले । तस्मात्प्रदक्षिणेनैव सर्वपापं विनाशयेत् ॥

इस पृथ्वी पर ऐसा कोई पाप नहीं है जो प्रदक्षिणा से नष्ट न हो सके; इसलिए प्रदक्षिणा से ही सब पापों का नाश करना चाहिए।

150

शिवपूजापरो मौनी सत्यादिगुणसंयुतः । क्रियातपोजपज्ञानध्यानेष्वेककमाचरेत् ॥

शिवपूजापरायण, मौनी, सत्य आदि गुणों से युक्त पुरुष क्रिया, तप, जप, ज्ञान और ध्यान में से एक-एक का क्रमशः अनुष्ठान करे।

151

ऐश्वर्यं दिव्यदेहश्च ज्ञानमज्ञानसङ्क्षयः । शिवसानिध्यमित्येतत्क्रियादीनां फलं भवेत् ॥

ऐश्वर्य, दिव्य देह, ज्ञान, अज्ञान का क्षय, और शिवसामीप्य — क्रमशः यही क्रिया आदि का फल होता है।

152

करणेन फलं याति तमसः परिहापनात् । जन्मनः परिमार्जित्वाज्ज्ञबुद्ध्या जनितानिव ॥

साधन (क्रिया आदि) द्वारा तमस् के ह्रास से फल प्राप्त होता है; जन्म के दोष को शुद्ध करके मानो ज्ञानबुद्धि से नवजात हो जाता है।

153

यथादेशं यथाकालं यथादेहं यथाधनम् । यथायोग्यं प्रकुर्वीत क्रियादीन्शिवभक्तिमान् ॥

देश, काल, शरीर और धन के अनुसार शिवभक्त पुरुष क्रिया आदि का यथायोग्य अनुष्ठान करे।

154

न्यायार्जितसुवित्तेन वसेत्प्राज्ञः शिवस्थले । जीवहिंसादिरहितमतिक्लेशविवर्जितम् ॥

बुद्धिमान् पुरुष न्यायोपार्जित धन से शिवस्थल में निवास करे, जीवहिंसा आदि से रहित और अत्यन्त क्लेश से रहित जीवन बिताते हुए।

155

पञ्चाक्षरेण जप्तं च तोयमन्नं विदुः सुखम् । अथवाहुर्दरिद्रस्य भिक्षान्नं ज्ञानदं भवेत् ॥

पंचाक्षर मन्त्र से अभिमन्त्रित जल और अन्न को सुखकर जानना चाहिए; अथवा कहते हैं कि दरिद्र के लिए भिक्षान्न ज्ञान देने वाला होता है।

156

शिवभक्तस्य भिक्षान्नं शिवभक्तिविवर्धनम् । शम्भुसत्रमिति प्राहुर्भिक्षान्नं शिवयोगिनः ॥

शिवभक्त का भिक्षान्न शिवभक्ति को बढ़ाने वाला है; शिवयोगी भिक्षान्न को "शम्भुसत्र" कहते हैं।

157

येन केनाप्युपायेन यत्र कुत्रापि भूतले । शुद्धान्नभुक्सदा मौनी रहस्यं न प्रकाशयेत् ॥

जिस किसी भी उपाय से, इस पृथ्वी पर जहाँ कहीं भी, शुद्ध अन्न खाते हुए सदा मौनभाव से रहे, और अपने साधन के रहस्य को प्रकट न करे।

158

प्रकाशयेत्तु भक्तानां शिवमाहात्म्यमेव हि । रहस्यं शिवमन्त्रस्य शिवो जानाति नापरः ॥

किन्तु भक्तों के समक्ष शिव के माहात्म्य को ही प्रकट करे; शिवमन्त्र के रहस्य को शिव ही जानते हैं, दूसरा कोई नहीं।

159

शिवभक्तो वसेन्नित्यं शिवलिङ्गं समाश्रितः । स्थाणुलिङ्गाश्रयेणैव स्थाणुर्भवति भूसुराः ॥

शिवभक्त को सदा शिवलिंग के आश्रय में रहना चाहिए; हे भूसुरो, स्थाणुलिंग के आश्रय से ही वह स्वयं स्थाणु (अचल) हो जाता है।

160

पूजया चरलिङ्गस्य क्रमान्मुक्तो भवेद् ध्रुवम् । सर्वमुक्तं समासेन साध्यसाधनमुत्तमम् ॥

चरलिंग की पूजा से मनुष्य क्रमशः निश्चय ही मुक्त हो जाता है। इस प्रकार साध्य और साधन का यह उत्तम विवरण संक्षेप में सब कह दिया गया।

161

व्यासेन यत्पुरा प्रोक्तं यच्छ्रुतं हि मया पुरा । भद्रमस्तु हि वोऽस्माकं शिवभक्तिर्दृढास्तु सा ॥

जो पूर्वकाल में व्यास जी ने कहा था और जो मैंने पहले सुना था — आप सबका और हमारा कल्याण हो, तथा हमारी वह शिवभक्ति दृढ़ बनी रहे।

162

य इमं पठतेऽध्यायं यः शृणोति नरः सदा । शिवज्ञानं स लभते शिवस्य कृपया बुधाः ॥

हे बुधजनो, जो मनुष्य सदा इस अध्याय को पढ़ता है अथवा सुनता है, वह शिव की कृपा से शिवज्ञान को प्राप्त करता है।

“भैरव” का अर्थ “भयंकर” नहीं है

प्रवचन-परंपरा जिस व्युत्पत्ति पर चलती है वह है भरण-पोषण करने वाले, रक्षा करने वाले — और वह परिणाम खुलकर निकालती है: जिनकी उपासना ही भय हरने के लिए है, उन्हीं का नाम भय उत्पन्न करने लगा है। भैरव का नाम है कि भय का हरण करने वाला भैरव है; उसी भैरव जी के नाम से भय भागना चाहिए, यहाँ लोग भयभीत हो जाते हैं।

इसका व्यावहारिक महत्व यह है कि भैरव एक पद हैं, स्वभाव नहीं — और इसीलिए वह पद किसी घर में हनुमान जी के पास हो सकता है, कोल्हापुर की महालक्ष्मी के यहाँ गणपति के पास, दशभुजा तुलजा भवानी के यहाँ नीलकंठ के पास, और पूरे दक्षिण में खंडोबा के पास। “भयंकर” अर्थ वाला शब्द यह कार्य नहीं कर सकता था।

दुर्गा कवच की “भैरव पलायन कर जाते हैं” वाली पंक्ति इन भैरव की नहीं है

एक वास्तव में अच्छी आपत्ति, जो स्वयं सत्रों में उठाई गई: देवी कवच — जिसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने रचा — कहता है कि उसके पाठ से भैरव आदि पलायन कर जाते हैं। तो फिर भैरव को प्रसन्न करने की बात कहाँ से आई?

संग्रह का उत्तर यह है कि उस पंक्ति में “भैरव” एक बिल्कुल भिन्न श्रेणी का नाम है: वे जिन्हें तांत्रिक एक ही रात्रि में प्रत्यक्ष सिद्ध कर लेते हैं, वे जो चिटकी मंत्र से बुलाने पर आ जाते हैं और फिर माँगने लगते हैं। वे गण और प्रेत हैं जो उसी नाम से पुकारे जाते हैं, शिव की भृकुटि से उत्पन्न उनका अपना स्वरूप नहीं। आठवें अध्याय के भैरव महादेव द्वारा उत्पन्न हैं; अठारहवें अध्याय के भैरव वे हैं जिनकी महापूजा भूतों को शांत करती है। दोनों वही नहीं हो सकते जो कवच से भागते हैं — और ग्रंथ भ्रमित नहीं है, पाठक प्रायः होता है।

हर वह “भैरव” भैरव नहीं है जिसे कोई ओझा बैठा दे

ऊपर वाली बात का व्यावहारिक रूप। कुल में भैरव का पद देवी देती हैं। आपके ही वंश का कोई पूर्व सेवक उस तक उठाया जा सकता है — यह वैध है, और कवचों की अपनी फलश्रुतियाँ ठीक इसी प्रकार के उन्नयन का वर्णन करती हैं। परंतु मसान, पिशाच, अथवा राक्षस-प्रवृत्ति का कोई ब्रह्म, जिसे किसी ग्रामीण जानकार ने घर शांत करने के लिए बैठा दिया हो — नहीं; और संग्रह इसे सीधे चिह्नित करता है: अगर मसान हो, और उनको भैरव के रूप में पूजित किए, तो ये गलत हो जाएगा

यही सावधानी इस पर भी लागू है कि आप जाते कहाँ हैं। अर्पण मान्य, पुरातन मंदिर में कीजिए जहाँ विधि से सेवा होती हो, अथवा जहाँ गुरु आदेश दें — किसी हाल में स्थापित थान पर नहीं, जहाँ ईमानदार प्रश्न यही है कि वहाँ भैरव कौन से हैं।

सरसों और तिल के तेल के दीपक से कोई बीमार नहीं पड़ता

छोटी-सी बात, पर यहाँ इसलिए है कि यह इतनी फैली हुई है कि इस पृष्ठ के सबसे अधिक अनुशंसित विधान से ही लोगों को रोक देती है। पूछे जाने पर कि लंबे समय तक तिल तेल का दीपक जलाने से बीमार पड़ते हैं क्या, और अलग से यह भी कि सरसों तेल के दीपक से शरीर में दर्द होता है क्या — उत्तर यह था कि ऐसा शास्त्र में कहीं नहीं है और अनुभव में भी नहीं आया: बिंध्य क्षेत्र में बहुत सारे घरों में अखंड ज्योति एक लंबे समय से जल रही है और तिल तेल का ही जल रही है; हमको तो कोई बीमार नहीं दिखता है।

ऐसे कथनों का स्रोत क्या है, इस पर जो आकलन दिया गया वह सीधा है और संभवतः सही भी — किसी विशेष तेल की मार्केटिंग। तेल में अशुद्धता हो तो व्यक्ति बीमार हो सकता है; तेल स्वयं नहीं करता। इस पूरी मार्गदर्शिका में चौखट वाला चौमुख दीपक सरसों तेल का ही है।

जाँच-सूची

of done

जहाँ आपके कुल अथवा गुरु-परंपरा की अपनी भैरव विधि पहले से हो — कोई विशेष स्वरूप, कोई विशेष अर्पण, कोई विशेष दिन — वहाँ पहले उसी का पालन कीजिए। यह मार्गदर्शिका वह रखती है जो संग्रह उन पाठकों के लिए सिखाता है जिनके पास अपनी कोई जीवित परंपरा शेष नहीं बची, और हर कथन को उस प्रवचन से तथा, जहाँ ग्रंथ बोलता है, उस श्लोक से जोड़ती है। इस पृष्ठ पर आरंभ करने के लिए न धन चाहिए, न दीक्षा, न संस्कृत: अपनी ही चौखट पर सरसों तेल का चार मुँह वाला एक दीपक, सुबह और शाम, अपने आप में पूर्ण साधना है — और वही वह विधान है जिस पर सब साधनों के अभाव में स्वयं पुराण भी उतरता है।

स्रोत

ऊपर दी गई प्रत्येक बात विश्वसनीय स्रोतों से ली गई है। इस पृष्ठ पर 9 स्रोत उद्धृत हैं, उसी क्रम में जिसमें वे पहली बार आए हैं: