वैशाख शुक्ल पक्ष — तीन महाविद्या जयंतियाँ, जल, दीपक और पंद्रह दिन का पुरश्चरण
वैशाख की महाविद्या जयंतियों के लिए साधना मार्गदर्शन।
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वैशाख शुक्ल पक्ष दिव्य पर्व काल क्यों है?
कई महाशक्तियों की जयंती वाला पखवाड़ा
वक्ता कहते हैं कि वैशाख का शुक्ल पक्ष आने वाला है और यह दिव्यतम पर्व काल रहेगा, क्योंकि इस पक्ष में ऐसी महाशक्तियों की जयंती है जिनकी कृपा के लिए लोग तरसते हैं। वे कहते हैं कि किसी का भी अवतरण दिवस हो, उस दिन उस शक्ति की ऊर्जा प्रचंड अवस्था में रहती है।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि वैशाख मास का शुक्ल पक्ष आने वाला है और यह दिव्यतम पर्व काल रहेगा। वे कहते हैं कि इससे जुड़ी आवश्यक जानकारी सबके सामने आनी चाहिए, क्योंकि इस पक्ष में ऐसी महाशक्तियों की जयंती है जिनकी कृपा पाने के लिए लोग तरसते हैं। जिसका भी अवतरण दिवस हो — जो भी वह विशेष तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। हो — उस समय उस शक्ति की ऊर्जा प्रचंड अवस्था में रहती है। वे कहते हैं कि एक सीमा तक ये बातें केवल साधक वर्ग तक सीमित रखी गई थीं। आज के समय में वे इसे आवश्यक मानते हैं कि यह जानकारी सही समय पर उसी माध्यम से श्रोताओं तक पहुँचे जिससे वे पहले से कुछ पा रहे हैं, ताकि वे इन पर्व कालों का लाभ ले सकें।
यह पालन वैशाख शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक चलता है, और अमावस्या से भी आरंभ किया जा सकता है।
प्रतिपदा से पूर्णिमा तक, और उससे पहले की अमावस्या
वैशाख शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक। अमावस्या अगले दिन लग रही है, और वक्ता कहते हैं कि जो अमावस्या से आरंभ करना चाहे वह अवश्य करे। पहला काम यह देखना है कि किसकी जयंती कब पड़ रही है।
वे कहते हैं कि सबसे पहला विषय यह है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक जो समय चल रहा है, उसका उपयोग किया जाए — इन सभी तिथियों, इन सभी दिनों में इस दिव्यतम अवस्था का लाभ लें। कल से अमावस्या लग जाएगी। वे कहते हैं कि यदि कोई अमावस्या से आरंभ करना चाहे, तो अवश्य आरंभ करे। पहला काम यह देखना है कि किसकी जयंती कब पड़ रही है।
रोहिणी नक्षत्र से युक्त अक्षय तृतीया विशेष रूप से अद्भुत क्यों है?
रोहिणी नक्षत्र से युक्त अक्षय तृतीया, और परशुराम जयंती
क्योंकि यह रोहिणी नक्षत्र से युक्त है, जिसे वक्ता अपने आप में अद्भुत कहते हैं, और इससे वह दिन विशेष पर्व काल बन जाता है। उसी दिन भगवान परशुराम की जयंती भी है; मध्याह्न व्यापिनी के कारण कुछ लोग इसे एक दिन पहले मना रहे हैं, पर वे कहते हैं कि 30 तारीख ही लें, क्योंकि उस दिन उदया से भी और मध्याह्न व्यापिनी से भी दोनों बातें बनती हैं।
वक्ता कहते हैं कि अक्षय तृतीया अपने आप में अत्यंत अद्भुत है, क्योंकि यह रोहिणी नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। से युक्त है। इससे वह दिन विशेष पर्व काल बन जाता है। उसी दिन भगवान परशुराम की जयंती है। मध्याह्न व्यापिनी के कारण कुछ लोग इसे एक दिन पहले भी मना रहे हैं। वे कहते हैं कि इसमें कोई बात नहीं — 30 तारीख ही लें। उस दिन उदया के अनुसार अक्षय तृतीया का मुख्य पर्व रहेगा, और मध्याह्न व्यापिनी भी उसी दिन रहेगी।
भगवती मातंगी कौन हैं, और एक गृहस्थ उनकी साधना में कहाँ तक जा सकता है?
अक्षय तृतीया पर मातंगी जयंती, और महाविद्या साधना पर दीक्षा की सीमा
अक्षय तृतीया पर महाविद्या मातंगी की जयंती है, जिनके बारे में लोक में पहली बात यही कही जाती है कि वे तांत्रिकों की सरस्वती हैं। वक्ता कहते हैं कि वे महाविद्या हैं, इसलिए बिना दीक्षा का गृहस्थ उनका बृहद अनुष्ठान या पुरश्चरण न करे, केवल उनके सौम्य, मूल स्वरूपों का ही करे।
वक्ता कहते हैं कि अक्षय तृतीया का दिन भगवती महाविद्या मातंगी की जयंती भी है। आज लोक में उनके बारे में पहला वाक्य यही आता है कि वे तांत्रिकों की सरस्वती हैं — और वे कहते हैं कि यह अपने आप में एक पूरा विषय बन जाता है, क्योंकि सरस्वती की कृपा के बिना कोई भी सिद्धि संभव ही नहीं। भगवती के इस स्वरूप के रहस्य सर्वोच्च कोटि के हैं। पर गृहस्थ के लिए, क्योंकि वे महाविद्या स्वरूपा हैं, वे साधना को सीमित करते हैं: बिना दीक्षा के उनका बृहद अनुष्ठान या पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। न करें; केवल वही सौम्य स्वरूप, वही मूल स्वरूप करें जिनका पुरश्चरण हम सब कर सकते हैं। वे कहते हैं कि इसमें दीक्षा का विधान है, इसलिए वे इस पर बड़ी चर्चा नहीं करते — क्योंकि सुनने और चर्चा करने पर उस स्वरूप के प्रति आकर्षण अपने आप पैदा हो जाता है, और कई बार उसी आकर्षण में लोग बिना नीति-नियम के सब कुछ करने लगते हैं, जो अनुचित है।
बिना दीक्षा के किसी महाविद्या की साधना में कहाँ तक जाया जा सकता है?
अष्टोत्तर शतनामावली, और पहले फलश्रुति पढ़ना
वक्ता कहते हैं कि अष्टोत्तर शतनामावली तक — पर केवल वह जिसकी फलश्रुति में यह न लिखा हो कि वीराचार पद्धति के लोग इसे दीक्षित होकर ही करें। यदि उसमें यह लिखा है, तो उसे नहीं करना चाहिए। कई अष्टोत्तर शतनाम उपलब्ध हैं।
वक्ता कहते हैं कि आप अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। तक जा सकते हैं — वह जिसकी फलश्रुति में यह न लिखा हो कि वीराचार की, वीराचार पद्धति के लोग इसे दीक्षा लेकर ही करें। यदि उसमें यह लिखा है, तो उसे नहीं करना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि कई अष्टोत्तर शतनाम उपलब्ध हैं।
मातंगी और परशुराम जयंती 30 अप्रैल को है, और भगवती पीतांबरा की 5 मई को।
30 अप्रैल और 5 मई
30 अप्रैल को महाविद्या भगवती मातंगी और भगवान परशुराम की जयंती है। उसके बाद 5 मई को भगवती पीतांबरा — ब्रह्मास्त्र विद्या बगलामुखी — की जयंती है।
अलग-अलग परंपराएँ बगलामुखी जयंती अलग-अलग तिथियों पर क्यों मनाती हैं?
कल्प भेद, और दतिया शक्तिपीठ की गणना
क्योंकि कल्प भेद से वैशाख में तीन तिथियाँ मिलती हैं — चतुर्थी, चतुर्दशी और अष्टमी। दतिया शक्तिपीठ मुख्यतः चतुर्थी मानता है क्योंकि उसी दिन स्वामी जी महाराज ने वहाँ भगवती की स्थापना की थी; वक्ता कहते हैं कि उस क्षेत्र और उस परंपरा के साधक उसी का पालन करें, पर सबसे अधिक प्रचलन अष्टमी का है।
वक्ता कहते हैं कि लोक व्यवहार में भगवती पीतांबरा का दतिया शक्तिपीठ बगलामुखी जयंती चतुर्थी तिथि को मनाता है। पर वास्तव में कल्प भेद के अनुसार तीन तिथियाँ मिलेंगी: वैशाख मास में चतुर्थी, चतुर्दशी और अष्टमी भी मिलती है। दतिया शक्तिपीठ का अपना दिन मानने का मुख्य कारण यह है कि उसी दिन स्वामी जी महाराज ने वहाँ भगवती की स्थापना की थी। इसलिए वहाँ उनकी जयंती अधिक विशेष रूप से मनाई जाती है। वे कहते हैं कि इसलिए उस क्षेत्र के और उस परंपरा के साधक उसी के अनुसार मनाएँ — पर अष्टमी का प्रचलन सबसे अधिक है।
एक ही देवी के इतने अलग-अलग स्वरूप और जयंतियाँ क्यों हैं?
द्विभुजा से सहस्रभुजा तक, और कल्प भेद
क्योंकि हर देवी के असंख्य स्वरूप हैं। दुर्गा रहस्य में भगवती द्विभुजा, चतुर्भुजा, अष्टभुजा, दशभुजा, षोडशभुजा, अष्टादशभुजा, बीस भुजा से लेकर सहस्र भुजा तक हैं; पीतांबरा के भी द्विभुजा, चतुर्भुजा, अष्टभुजा, षोडशभुजा और अष्टादशभुजा स्वरूप हैं। उपासना अनंत कल्पों से चली आ रही है, और उसी कल्प भेद से जयंती भी अलग होती है।
वक्ता कहते हैं कि जब आप रहस्य में प्रवेश करते हैं — जैसे भगवती काली के साथ, या भगवती दुर्गा के साथ, जहाँ दुर्गा रहस्य उन्हें द्विभुजा, चतुर्भुजा, अष्टभुजा, दशभुजा, षोडशभुजा, अष्टादशभुजा, बीस भुजा और आगे सहस्र भुजा तक दिखाता है — तो उनके स्वरूप अनेक और अनंत हैं। तंत्र में लोक व्यवहार में ऐसे कई स्वरूपों की जानकारी भी मिलेगी। ठीक इसी तरह भगवती पीतांबरा के भी कई स्वरूप हैं, जिनमें द्विभुजा, चतुर्भुजा, अष्टभुजा, षोडशभुजा और अष्टादशभुजा प्रसिद्ध हैं। कल्प भेद के अनुसार उनकी उपासना भी अनेक अनंत कल्पों से चली आ रही है, और उसी से जयंती भी अलग हो जाती है।
तंत्र मार्ग पर कैसा भाव रखना चाहिए?
विद्यार्थी और जिज्ञासु बने रहना
यह कभी न मानें कि सब कुछ जान लिया है। वक्ता कहते हैं कि तंत्र मार्ग ऐसा है कि कितना भी सीख लें, ऐसे विषय आते रहेंगे कि लगेगा अभी कुछ नहीं जानते; इसलिए जब तक संसार में हैं, शिष्य की तरह, विद्यार्थी की तरह चलें और जिज्ञासु की जिज्ञासा बनाए रखें।
वक्ता कहते हैं कि आप किसी भी मार्ग पर चल रहे हों, यह कभी न मानें कि आपने सब कुछ जान लिया है। तंत्र मार्ग ऐसा है कि आप कितना भी सीख लें, ऐसे-ऐसे विषय आते रहेंगे कि लगेगा अभी कुछ भी नहीं जानते। इस मार्ग पर जब तक हम सामान्य रूप से संसार में हैं, हमें शिष्य की तरह, विद्यार्थी की तरह चलते हुए बातें सीखनी चाहिए। ये विद्याएँ विद्यार्थी के भाव से ग्रहण करनी चाहिए, और इन मार्गों पर जिज्ञासु की तरह जिज्ञासा सदा जीवित रखनी चाहिए। ऐसा नहीं कि हमने सब जान लिया, संतुष्ट हो गए, और अब आगे जानने-सुनने को कुछ नहीं बचा।
गुरु बनने की जल्दी क्यों नहीं करनी चाहिए?
मौन — इस बात का संकेत कि कृपा पूरी आ गई है
क्योंकि, वक्ता कहते हैं, किसी दैवी शक्ति की कृपा मिल जाए तब भी ज्ञान की कमी रह सकती है। जब तक दिव्य ज्ञान प्राप्त न हो और व्यक्ति मौन न हो जाए, तब तक इसका अर्थ है कि भीतर अभी ज्ञान की कमी है और शक्ति की पूरी कृपा नहीं आई है।
वक्ता कहते हैं कि स्वयं को गुरु बनाने की जल्दी कभी नहीं करनी चाहिए। आपको किसी दैवी शक्ति की कृपा भी मिल सकती है; पर जब तक दिव्यतम ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, जब तक आप मौन नहीं हो जाते, तब तक इसका अर्थ है कि आपके भीतर अभी ज्ञान की कमी है और शक्ति की पूरी कृपा आपको नहीं मिली है। प्रचलित दस महाविद्या स्वरूपों — भगवती महाविद्या तारा, भगवती महाविद्या मातंगी आदि — के अलावा तंत्र भेद के अनुसार और भी कई महाविद्याओं की उपस्थिति मानी गई है, और कई महाशक्तियाँ हैं। जब उनमें से किसी एक शक्ति की कृपा विशेष रूप से आती है, तो वह सक्षमता का स्तर मिलता है, व्यक्ति ये रहस्य जान लेता है, और उसके बाद वह मौन हो जाता है। वे कहते हैं कि यह सच्ची बात है: उसके बाद वह चाहकर भी संसार में बहुत अधिक बोल नहीं पाता।
पाई हुई सिद्धि का अभिमान करने पर क्या होता है?
अभिमान, और संसार में हँसी का पात्र बनना
वक्ता कहते हैं कि यदि गुरुत्व का भाव आ जाए — कि हमने बहुत सीख लिया, लाखों के पुरश्चरण किए, करोड़ों जप किए, यह सिद्धि पा ली और अब कुछ जानने की जरूरत नहीं — और भूल से उसका अभिमान हो जाए, तो शक्ति और सिद्धि भले आपको न छोड़ें, पर संसार में आप सदा हँसी के पात्र बनाए जाएँगे।
वक्ता दोहराते हैं कि जब तक हम और आप मौन नहीं हो जाते, हमें शिष्य की तरह, विद्यार्थी की तरह सीखना है — भीतर कभी गुरुत्व का भाव न रखें: कि हमने बहुत कुछ जान लिया, मंत्रों के लाखों के पुरश्चरण कर लिए, करोड़ों में जप कर लिया, भगवती की कृपा आ गई और इस प्रकार की सिद्धि मिल गई, इसलिए अब कुछ और जानने की जरूरत नहीं। वे कहते हैं कि यदि आप ऐसा करते हैं, और भूल से उस बात का अभिमान हो जाता है, तो वह शक्ति और सिद्धि भले आपके साथ खड़ी रहे और आपको न छोड़े, पर संसार में आप सदा हँसी के पात्र बनाए जाएँगे — और यह प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। कई बार सिद्धि पाए हुए व्यक्ति का उपहास होता है, और वे गलतियाँ करते हैं।
कैसे जानें कि किसी महाशक्ति की कृपा सच में है?
अपने क्षेत्र के बाहर भी साथ जाने वाली सक्षमता
वक्ता कहते हैं कि कई सिद्ध साधकों के पास बड़ी सक्षमता और शक्ति होती है, पर जब वे ऐसे क्षेत्र में उतरते हैं जो उनका नहीं है, तो उनका उपहास होता है, क्योंकि वहाँ वे वास्तव में काम नहीं कर पाते। जहाँ किसी महाविद्या या महाशक्ति की कृपा आ गई हो, वहाँ किसी भी क्षेत्र में बहुत कम प्रयास से वह सक्षमता मिल जाती है — वे कहते हैं कि इससे भी समझा जा सकता है कि कृपा है या नहीं।
वक्ता उदाहरण देते हैं कि कई सिद्ध साधक हैं जिनके पास बड़ी सक्षमता और कई शक्तियाँ हैं; पर जब वे ऐसे क्षेत्र में उतरते हैं जो उनका अपना नहीं है, तो उनका उपहास होता है। वे कहते हैं कि कारण यह है कि लोगों का साथ पाकर वे सोचते हैं कि इस क्षेत्र में भी उनकी वाहवाही होगी — पर फिर वे मूल रूप से वह काम कर ही नहीं पाते, उसे सँभाल नहीं पाते। पर यदि उसी स्थिति में महाविद्याओं की कृपा आ गई हो, किसी महाशक्ति की कृपा विशेष रूप से आ गई हो, तो वे जहाँ भी जाएँगे, बहुत कम प्रयास से वह सक्षमता उन्हें मिल जाएगी। वे कहते हैं कि इससे भी आप समझ सकते हैं कि महाशक्ति की कृपा है या नहीं। इसलिए यह ऐसी बात है जो हमें कभी नहीं करनी चाहिए।
भगवती पीतांबरा के अनेक स्वरूपों से कौन से रहस्य जुड़े हैं?
क्रमागत मंत्र, एकाक्षरी के भेद और सहस्राक्षरी माला मंत्र
वक्ता कहते हैं कि पीतांबरा के कई स्वरूप हैं, इसलिए क्रमागत मंत्र कहा जाने वाला विषय है, और उनकी एकाक्षरी में भी भेद है, और ये सब आपस में जुड़े हैं। उच्च कोटि के गुरु बताएँगे कि षोडशभुजा या अष्टादशभुजा स्वरूप के साथ किस प्रकार की एकाक्षरी का संपुट लगता है, उनके छत्तीस अक्षर कौन से हैं, और सहस्राक्षरी ब्रह्मास्त्र विद्या माला मंत्र किस स्वरूप के ध्यान के साथ जपना चाहिए।
भगवती के विभिन्न स्वरूपों की बात करते हुए वक्ता कहते हैं कि भगवती पीतांबरा के इतने स्वरूप हैं, इसी कारण क्रमागत मंत्र कहा जाने वाला विषय भी है, और इसी कारण उनकी एकाक्षरी में भी भेद आता है — और ये सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब ऐसा उच्च कोटि का साधक आपके जीवन में आएगा, जब ऐसे योग्य उच्च कोटि के गुरु आपके जीवन में आएँगे, तो वे आपको यह भेद अवश्य बताएँगे: षोडशभुजा भगवती के साथ या अष्टादशभुजा के साथ किस प्रकार की एकाक्षरी का संपुट लगता है, उनके छत्तीस अक्षर कौन से हैं और कैसे, और ऐसी कई बातें। भगवती की ब्रह्मास्त्र विद्या का सहस्राक्षरी माला मंत्र आदि — किस स्वरूप के ध्यान के साथ इसका जप करना चाहिए; लोक प्रचलन में क्या बताया गया है, और वास्तविकता क्या है। वे कहते हैं कि दतिया शक्तिपीठ के भी कई साधक हैं जो इस विषय को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। पर बात यही है कि जो जानते हैं वे मौन रहते हैं, या केवल उन विषयों के योग्य लोगों के सामने किसी सभा में बोलते हैं। फिर कोई व्यक्ति उसे सुनकर किसी को समझाने का प्रयास करे, यह अलग बात है।
वैशाख शुक्ल चतुर्दशी तंत्र में सबसे विशेष रात्रि क्यों है?
नरसिंह, शरभ भैरव, प्रत्यंगिरा और छिन्नमस्तिका एक साथ
क्योंकि उसी एक दिन भगवान नरसिंह की जयंती है; भगवान शरभ भैरव की — शरभ शालू राज, भगवान सर्वेश्वर का सबसे प्रचंड, सबसे उग्र स्वरूप, जिन्हें आकाश भैरव भी कहते हैं; भगवती प्रत्यंगिरा की; और महाविद्या भगवती छिन्नमस्तिका की।
वक्ता कहते हैं कि भगवती के स्वरूप के बाद अगला विषय आता है: चतुर्दशी तिथि का, जो तंत्र के क्षेत्र में सबसे विशेष रात्रि बन जाती है। उस दिन भगवान नरसिंह की जयंती है। और नरसिंह कहते ही, उसी दिन भगवान शरभ भैरव की जयंती है — पक्षिराज, शरभ शालू राज, भगवान सर्वेश्वर का सबसे तीव्र और सबसे उग्र स्वरूप; उन्हें आकाश भैरव कहें, या उनके जो भी नाम और स्वरूप हैं। उसके बाद उसी दिन भगवती महाप्रत्यंगिरा की जयंती है, और उसी दिन महाविद्या भगवती छिन्नमस्तिका की जयंती है।
वैशाख शुक्ल पक्ष में कितनी महाविद्या जयंतियाँ पड़ती हैं?
एक ही पक्ष में मातंगी, बगलामुखी और छिन्नमस्तिका
तीन — भगवती मातंगी, भगवती महाविद्या बगलामुखी और भगवती छिन्नमस्तिका — और उनके साथ शरभ, भगवान नरसिंह और भगवती प्रत्यंगिरा, जिनके बारे में वक्ता कहते हैं कि तंत्र क्षेत्र में उनकी उपस्थिति के बिना कुछ भी सोचा तक नहीं जा सकता।
वक्ता कहते हैं कि वैशाख मास, और विशेषकर उसका शुक्ल पक्ष, अपने आप में इतना दिव्य है कि उसके भीतर पूरी तीन महाविद्याओं की जयंती पड़ती है: भगवती मातंगी, भगवती महाविद्या बगलामुखी और भगवती छिन्नमस्तिका। उनके साथ कितनी ही महाशक्तियाँ आती हैं — शरभ भगवान, भगवान नरसिंह, और भगवती महाप्रत्यंगिरा, जिनके बारे में वे कहते हैं कि तंत्र क्षेत्र में उनकी उपस्थिति के बिना, शक्ति के इस स्वरूप के बिना, हम कुछ भी सोच तक नहीं सकते।
वैशाख शुक्ल पखवाड़े के लिए कौन से तीन काम बताए गए हैं?
एक पुरश्चरण, दीपदान, और जल की व्यवस्था
पहला, एक साधना पकड़ें और उसमें पुरश्चरण करें — वक्ता सुझाते हैं कि महाकुंभ के समय पूरे माघ मास में जो साधना की थी उसे दोहराएँ, या कामाख्या कवच का पुरश्चरण करें। दूसरा, दीपदान। तीसरा, जल की व्यवस्था।
वक्ता कहते हैं कि इस शुक्ल पक्ष में इतनी महाविद्या जयंतियाँ पड़ रही हैं, इसलिए अपनी एक साधना पकड़ने का प्रयास करें। वे अपनी पहले की बात दोहराते हैं: महाकुंभ के समय, पूरे माघ मास में जो साधना आपने की थी — उसका पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। यहाँ फिर से करें; या फिर इस अवधि में कामाख्या कवच आदि का पुरश्चरण पूरा करें। इन पंद्रह दिनों में करने का यह पहला काम है। दूसरा है दीपदान, और तीसरा है जल की व्यवस्था।
वैशाख में राहगीरों के लिए जल की व्यवस्था इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
जल सेवा, और श्राप व प्रारब्ध का कटना
वक्ता कहते हैं कि वैशाख में सुबह से दोपहर होते हुए शाम तक राहगीरों के लिए जल की व्यवस्था करने की बड़ी महिमा है: इससे ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों प्रसन्न होते हैं, और यह किसी भी प्रकार के श्राप के विरुद्ध काम करता है — चाहे किसी सिद्ध का दिया श्राप हो, या किसी प्रेत-पिशाच का श्राप दोष। लाल कपड़े में लिपटा जल का घड़ा भरें और पूरे दिन गौ, पशु-पक्षियों और मनुष्यों को पानी पिलाएँ।
वक्ता कहते हैं कि वैशाख मास में दोपहर में, सुबह से लेकर संध्या तक, विशेषकर रास्ते के राहगीरों के लिए जल की व्यवस्था करने की बड़ी महिमा और बड़ा माहात्म्य है। इससे ब्रह्मा, विष्णु और महेश — तीनों देव प्रसन्न होते हैं। आप पर किसी भी प्रकार का शाप लगा हो, चाहे किसी सिद्ध ने श्राप दिया हो, किसी प्रेत-पिशाच का कैसा भी श्राप या दोष हो — जिसे वह दोष है, जिसके जीवन में उस प्रकार का कष्ट है, जो दर-दर की ठोकरें खा रहा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह सोना छुए तो मिट्टी हो जाए, जो धनहीन हो गया है: वह यह एक काम करे, जगह-जगह जल की व्यवस्था करे। एक जल का घड़ा लें, उस पर लाल कपड़ा लपेटें, उसे पूरा पानी से भरें और पूरे दिन पानी पिलाएँ — गौ माता को, लोगों को, पशु-पक्षियों को और मनुष्यों को। वे कहते हैं कि आप जितना पानी पिलाएँगे, उतनी तेजी से आपका प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। नष्ट होगा। वह पानी पीकर वे जितने तृप्त होंगे, उनकी आत्मा जितनी तृप्त होगी, उतनी तेजी से आपके कष्ट मिटने लगेंगे।
यह जल सेवा किसे करनी चाहिए, और इससे क्या दूर होता है?
अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं; जानबूझकर किए पापों से मुक्ति
वक्ता कहते हैं कि सबको — वैशाख मास में इसे कभी न छोड़ें। चाहे आप बड़े घर के हों, अरबपति या करोड़पति हों, या कितने भी गरीब हों, इसमें अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं। वे कहते हैं कि इससे जानबूझकर किए गए पापों के सभी दोषों और श्रापों से मुक्ति मिलती है।
वक्ता कहते हैं कि वैशाख मास में यह सेवा अवश्य करनी चाहिए — इसे कभी न छोड़ें। चाहे आप कितने भी बड़े घर के हों, अरबपति हों, करोड़पति हों, या कितने भी गरीब हों, यहाँ गरीब-अमीर का कोई भेद नहीं; सबको करना चाहिए। जानबूझकर किए गए जो भी पाप हों — वाणी से जानबूझकर किसी को पहुँचाई गई हानि, अपने शरीर से किसी को पहुँचाई गई हानि, किसी के जीवन में जानबूझकर किया गया कोई दुष्कर्म जिससे उस व्यक्ति का पूरा जीवन बर्बाद हो गया — वे कहते हैं कि इस सेवा को करने पर ऐसे सभी प्रकार के दोष और श्राप से मुक्ति मिलती है।
इन पंद्रह दिनों में कितना जप पूरा करना चाहिए?
शिव पंचाक्षरी का सवा लाख, सामर्थ्य हो तो तीन लाख
यदि आप भगवान शिव की पंचाक्षरी का जप करते हैं और उसका पुरश्चरण पहले कर चुके हैं, तो वक्ता कहते हैं कि पंद्रह दिनों में कम से कम सवा लाख पूरा करें — जो वे कहते हैं कि चाहें तो आराम से हो जाता है। अधिक कर सकें तो तीन लाख और भी अच्छा है। जो भगवती की सप्ताक्षरी करते हैं, वे उसका पुरश्चरण करें। मूल बात यह है कि इस पक्ष में एक पुरश्चरण पूरा होना चाहिए।
मंत्रों के पुरश्चरण पर आते हुए वक्ता एक उदाहरण लेते हैं: यदि आप भगवान शिव की पंचाक्षरी का जप करते हैं और उसका पुरश्चरण पहले कर चुके हैं, तो पंद्रह दिनों में कम से कम सवा लाख का पुरश्चरण पूरा करें। वे कहते हैं कि यदि आप चाहें तो पंद्रह दिनों में सवा लाख का पुरश्चरण आराम से हो जाएगा। यदि आप अधिकारपूर्वक अधिक कर सकें, तो बहुत अच्छा — तीन लाख और भी अच्छा रहेगा; इसलिए अपने सामर्थ्य के अनुसार करें। जो भगवती की सप्ताक्षरी करते हैं, वे उसका पुरश्चरण पूरा करें। वे कहते हैं कि मूल बात यह है कि इस पक्ष में एक पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। पूरा होना चाहिए।
वैशाख शुक्ल पक्ष में पुरश्चरण करने से क्या लाभ होते हैं?
अटूट मंत्र, अक्षय पुण्य, और हर जयंती पर अपने आप कृपा
वक्ता कई लाभ गिनाते हैं: जिस मंत्र का एक पुरश्चरण पहले हो चुका है, वह अटूट और परम सिद्ध होता जाता है, जिससे जब किसी और मंत्र को जगाने की जरूरत हो तो वह इस मंत्र की कृपा से तुरंत जाग जाता है; अक्षय तृतीया पर किया जप अक्षय पुण्य और कभी न घटने वाला तपोबल देता है; और मातंगी की कृपा अपने आप आती है, क्योंकि भगवान शिव इस मंत्र के माध्यम से दसों महाविद्याओं की कृपा देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस पुरश्चरण के एक नहीं, कई लाभ होंगे। पहला यह कि आप उस मंत्र का एक पुरश्चरण पहले पूरा कर चुके हैं, उसका पाँच लाख जप कर चुके हैं; अब वह मंत्र आपके लिए अटूट होता जाएगा, परम सिद्ध होता जाएगा। जब भी किसी और मंत्र को जगाने की जरूरत होगी, वह इस मंत्र की कृपा से उसी क्षण जाग जाएगा। यदि आप अक्षय तृतीया पर जप करते हैं, तो अक्षय पुण्य मिलता है — वह कभी नष्ट नहीं होता। आप जो तपोबल कमाएँगे वह नष्ट नहीं होगा, जिसे वे अद्भुत कहते हैं। इसके साथ भगवती मातंगी महाविद्या की कृपा भी अपने आप आएगी, क्योंकि यदि आप इस मंत्र का जप कर रहे हैं तो भगवान शिव इस मंत्र के माध्यम से दसों महाविद्याओं की कृपा देते हैं। ठीक इसी तरह जब आप अष्टमी को करते हैं, तो वह भगवती पीतांबरा की जयंती है — इसलिए भगवान महामृत्युंजय की कृपा अपने आप आती है, और भगवती पीतांबरा की कृपा आती है।
जो साधक कोई विधि नहीं जानता, उसे क्या करना चाहिए?
प्रतिदिन पंचाक्षरी की सौ माला
वक्ता कहते हैं कि जो सामान्य साधक कोई विधि-विधान नहीं जानता और कुछ और नहीं करता, वह इस पूरे मास, इस सप्ताह, इस पक्ष में सामर्थ्य के अनुसार प्रतिदिन कम से कम सौ माला पंचाक्षरी अवश्य करे। वे कहते हैं कि इससे कम करने का कोई खास लाभ नहीं — वे इससे कम के पक्ष में नहीं हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब आप चतुर्दशी को करते हैं, तो एक साथ चार महाशक्तियों की कृपा अपने आप आप पर आती है। इसलिए जो सामान्य साधक कोई विधि-विधान नहीं जानता और कुछ और नहीं करता, वह इस पूरे मास, इस सप्ताह, इस पक्ष में सामर्थ्य के अनुसार प्रतिदिन कम से कम सौ माला पंचाक्षरी करे। वे पूछते हैं कि इससे कम करने का क्या लाभ — वे इससे कम के पक्ष में नहीं हैं; सौ माला अवश्य होनी चाहिए।
सौ माला जप को दिन भर में कैसे बाँटें?
पचास सुबह और पचास शाम
जैसे चाहें — पचास सुबह, पचास शाम, या सब एक ही बार में। वक्ता कहते हैं कि अभ्यास हो जाएगा और एक घंटे में सौ से अधिक हो जाएँगी। दूसरा काम जल की व्यवस्था है, और तीसरा प्रतिदिन रात्रि या संध्या के समय दीपदान।
वक्ता कहते हैं कि जैसे चाहें वैसे करें: पचास सुबह करें, पचास शाम को करें, या एक ही समय में कर लें। अभ्यास हो जाएगा, और फिर एक घंटे में सौ से अधिक हो जाएँगी। तो इतना हाथ में लेना है। इसके अलावा दूसरा काम जल की व्यवस्था है, और उसके बाद तीसरा, प्रतिदिन रात्रि के समय या संध्या के समय दीपदान।
वैशाख शुक्ल पक्ष में कौन सा विशेष दीपदान बताया गया है?
पितृ संबंधी कष्ट के लिए दत्तात्रेय का दीपदान
वक्ता कहते हैं कि दीपदान तो घर में होता ही है, पर जो इस पक्ष में विशेष दीपदान करना चाहे, वह संध्या के समय भगवान दत्तात्रेय का दीपदान करे — पितरों से जुड़ी जो भी समस्या हो, कितना भी नुकसान हो रहा हो, कैसा भी दोष हो। बृहद दीपदान न करना हो तो लघु रूप में करें; भगवान शिव के पंचानन दीपदान की तंत्रोक्त विधि चैनल पर दी जा चुकी है।
वक्ता कहते हैं कि दीपदान तो आप घर में वैसे भी करते ही हैं। पर यदि विशेष दीपदान करना चाहें, तो उसे बृहद रूप में करें। इस पक्ष में विशेषकर भगवान दत्तात्रेय का दीपदान किया जा सकता है। पितरों से जुड़ी कैसी भी समस्या हो, कितना भी नुकसान हो रहा हो, कैसा भी दोष हो — संध्या के समय भगवान दत्तात्रेय का दीपदान करें। यदि आप बृहद रूप में दीपदान नहीं करना चाहते, तो कोई समस्या नहीं; लघु रूप में करें। वे कहते हैं कि भगवान शिव के पंचानन दीपदान की तंत्रोक्त विधि चैनल पर दी गई है, और वह भी की जा सकती है।
वह न्यूनतम दीपदान कौन सा है जिसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए?
चौखट के दीपक, सुबह और शाम
वक्ता कहते हैं कि यदि आप और कुछ नहीं करना चाहते और केवल साधारण दीपदान करना चाहते हैं, तो चौखट का दीपदान कभी न छोड़ें — चौखट का प्रतिदिन पूजन, प्रतिदिन श्रृंगार, और उसके दोनों ओर दीपक, सुबह और शाम दोनों समय अवश्य।
चौखट पर रोज़ के जप के साथ और क्या करना चाहिए?
बटुक भैरव का स्तोत्र और कुल भैरव को नींबू की बलि
आप जिस भी मंत्र का जप कर रहे हों, उसके साथ वक्ता कहते हैं कि घर पर प्रतिदिन भगवान बटुक भैरव का स्तोत्र और शतनाम पढ़ें — एक बार भी चलेगा, पाँच, सात, दस, ग्यारह या सत्ताईस बार हो तो अद्भुत। और अपने द्वार की चौखट पर भगवान बटुक भैरव के नाम से, कुल भैरव के रूप में, एक नींबू की बलि अवश्य दें।
वक्ता कहते हैं कि आप जिस भी मंत्र का जप कर रहे हों, उसके साथ भगवान बटुक भैरव का स्तोत्र और शतनाम भी पढ़ें। एक बार भी ठीक है; पाँच, सात, दस, ग्यारह या सत्ताईस बार करें तो अद्भुत — पर एक बार ही सही, घर पर प्रतिदिन बिना चूके पढ़ें। और अपने द्वार की चौखट पर भगवान बटुक भैरव के नाम से, कुल भैरव के रूप में, एक नींबू की बलि अवश्य दें। वे कारण बताते हैं: जब आप वैशाख मास में ऐसा करते हैं — यह अत्यंत उग्र समय है, अत्यंत उग्र देवताओं का समय है, और अभी विशेषकर भगवान नरसिंह का मास चल रहा है क्योंकि उनकी जयंती पड़ेगी — तो जब आप बटुक भैरव के नाम से चौखट पर देते हैं, तो कुल की जो भी शक्तियाँ हैं, वे उसे तुरंत ग्रहण करती हैं और तुरंत अपनी कृपा देती हैं।
यदि नींबू की बलि देने में डर लगे तो क्या करें?
नींबू का डर, और पिछले दिन का लाइव
वक्ता श्रोताओं को पिछले दिन दोपहर का लाइव सुनने को कहते हैं, जो उनके अनुसार ठीक इसी डर के लिए बनाया गया था कि नींबू काटने से कहीं अपना ही गला न कट जाए। यदि उसे सुनकर भी खून न खौले और लगे कि अब भी नींबू की बलि नहीं देनी चाहिए, तो छोड़ दें — यह काम न करें।
वक्ता कहते हैं कि यदि आपके मन में डर आता है कि नींबू काटने से कहीं अपना ही गला न कट जाए, तो उसके लिए वे पहले ही एक लाइव कर चुके हैं — कल का, दोपहर के समय का। उसे सुनें। उसे सुनने के बाद भी यदि आपके भीतर खून न खौले और फिर भी लगे कि नहीं, अब भी नींबू की बलि नहीं देनी चाहिए, तो छोड़ दें — यह काम न करें।
भगवान नरसिंह के लिए तुलसी का दीपदान क्या है?
तुलसी की सूखी लकड़ी, और पद्म पुराण का हरिचंदन
दूसरा काम संध्या के समय भगवान नरसिंह के नाम से तुलसी से दीपदान की व्यवस्था है। पद्म पुराण का हवाला देते हुए वक्ता कहते हैं कि पूरी तरह सूख चुके तुलसी के पौधे की लकड़ी से विशेषकर दो काम किए जा सकते हैं: हरिचंदन बनाना, और यह दीपक।
वक्ता कहते हैं कि दूसरा काम संध्या के समय भगवान नरसिंह के नाम से तुलसी के दीपदान की व्यवस्था है। तुलसी जी के दीपदान के लिए पद्म पुराण में वर्णन है: जो तुलसी का पौधा सूख जाता है, जिसकी डंडियाँ पूरी तरह सूख जाती हैं — उन डंडियों से विशेषकर दो काम किए जा सकते हैं। एक है हरिचंदन जो बनाया जाता है। यदि कोई बनाए तो हरिचंदन कैसे बनता है? तुलसी जी की सूखी लकड़ी चौकी पर घिसी जाती है, और घिसने के लिए गंगाजल लिया जाता है; उसमें इत्र आदि, हल्दी और रोली मिलाकर सुंदर चंदन बनाया जाता है। यह भगवान नारायण के मस्तक पर लगाया जाता है, और फिर जो चंदन उतरता है, वह उतारा चंदन अपने मस्तक पर लगाया जाता है। वे बताते हैं कि कहा जाता है कि भगवान जीते जी एक बार दर्शन देते हैं — यही इसका माहात्म्य है।
क्या तुलसी और नारायण की यह साधना केवल वैष्णवों के लिए है?
सभी गृहस्थ स्मार्त हैं
वक्ता कहते हैं कि यदि आप विशेषकर वैष्णव हैं तो अवश्य करें — पर शाक्त और शैव कुछ और न सोचें। वे कहते हैं कि न कोई शाक्त है, न कोई शैव: सब स्मार्त हैं। गृहस्थ अवस्था में सब स्मार्त हैं।
नारायण के नैवेद्य में तुलसी क्यों रखनी ही चाहिए?
तुलसी शक्ति का स्वरूप, और एक समकालीन व्यक्ति की आलोचना
वक्ता कहते हैं कि जब तक तुलसी जी का पत्ता नैवेद्य में नहीं पड़ता, भगवान नारायण नैवेद्य स्वीकार ही नहीं करते, और तुलसी जी शक्ति का स्वरूप हैं। वे कहते हैं कि उन्हें यह देखकर दुख हुआ कि कुछ वीडियो में वर्तमान समय के एक तथाकथित अत्यंत प्रसिद्ध व्यक्ति ने कहा कि तुलसी नारायण के चरणों की दासी हैं और उनकी परंपरा में नैवेद्य में नहीं रखी जातीं।
वक्ता कहते हैं कि उस समय यह समझें: जब तक तुलसी जी का पत्ता भगवान नारायण के नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। में नहीं पड़ता, वे नैवेद्य स्वीकार ही नहीं करते। तुलसी जी स्वयं शक्ति का स्वरूप हैं। वे कहते हैं कि अभी उन्होंने एक-दो वीडियो देखकर अपना सिर पीट लिया, जिनमें वर्तमान समय के एक तथाकथित अत्यंत प्रसिद्ध व्यक्ति ने कहा कि तुलसी उनके चरणों की दासी हैं, और उनकी परंपरा में उन्हें नैवेद्य में नहीं रखा जाता। तो, वे कहते हैं, आप शास्त्रों और पुराणों में जो वर्णित है उससे भी ऊपर उठ गए।
सौ-दो सौ साल की एक परंपरा यहाँ तक पहुँच गई है कि शास्त्रोक्त कथन को भी झूठा सिद्ध कर रही है।
शास्त्रोक्त कथनों को झुठलाती दो सौ साल की परंपरा
वे कहते हैं कि सौ या दो सौ साल पुरानी एक परंपरा यहाँ तक पहुँच गई है कि शास्त्रोक्त कथन को भी झूठा सिद्ध कर रही है — कि भगवती उनके चरणों की दासी हैं और नैवेद्य में नहीं रखी जा सकतीं। उनके विचार में, जब ऐसे तथाकथित विश्व प्रसिद्ध लोग, जिनकी बहुत लोग पूजा करने लगते हैं, ऐसा करते हैं, तो वे सिर काटने वाला सिर बन जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि सौ या दो सौ साल पुरानी एक परंपरा इस हद तक पहुँच गई है कि वह शास्त्रोक्त कथन को भी झूठा सिद्ध कर रही है — कि भगवती उनकी दासी हैं, कि उन्हें नैवेद्य में नहीं रखा जा सकता। वे कहते हैं कि उनके अपने विचार में, जब ऐसे तथाकथित विश्व प्रसिद्ध लोग, जिनकी बहुत सारे लोग पूजा करने लगते हैं, इस तरह करते हैं, तो वे सिर काटने का काम करने वाला सिर बन जाते हैं।
यदि कोई परंपरा सच में तुलसी नहीं चढ़ाती, तो क्या यह सार्वजनिक रूप से कहना चाहिए?
लोकहित, और अपना अंत कभी प्रकट न करने का शाक्त नियम
वक्ता कहते हैं: नहीं। यदि सच में आपके नैवेद्य में तुलसी नहीं चढ़ाई जाती, तब भी लोकाचार का भाव रखते हुए और लोकहित के लिए यह विषय नहीं बताना चाहिए। वे कहते हैं कि शाक्तों की सबसे अच्छी बात यह है कि वे अपना अंत कभी नहीं देते; उसे गुप्त रखते हैं, क्योंकि उससे लोक परंपरा दूषित होगी।
वक्ता कहते हैं कि अब जो मूर्ख हिंदू इस विषय को नहीं समझते, वे भी यह काम करने लगे हैं — कहते हैं कि नहीं, हम नैवेद्य में नहीं चढ़ाएँगे। फिर, यदि सच में आपकी परंपरा में नैवेद्य में नहीं चढ़ाया जाता, तो लोकाचार का भाव रखते हुए, लोकहित के लिए, यह विषय बताना ही नहीं चाहिए। वे कहते हैं कि शाक्तों की सबसे अच्छी बात यह है कि वे अपना अंत कभी नहीं देते; वे उसे इस आधार पर गुप्त रखते हैं कि इससे लोक परंपरा दूषित होगी। यहाँ हमारी यही परंपरा है, इसीलिए कहा जाता है कि इसे कुलवधू की तरह गुप्त रखा जाता है। वे कहते हैं कि यह दिखावे का विषय नहीं है।
मुद्रा और आवरण पूजन की विधि कभी खुले में नहीं करनी होती, फिर भी अब यह खुलेआम दिखाई जा रही है।
यह नियम कि विधि कभी बिना ढके नहीं की जाती
वे कहते हैं कि तथाकथित शाक्त और दूसरे लोग अब सब कुछ ज़ोर-शोर से दिखा रहे हैं — मुद्रा, आवरण पूजन का विधि-विधान आदि — जबकि दीक्षा के समय, जब गुरु पादुका मंत्र दिया जाता है, विद्वान गुरु हज़ार बार कहते हैं कि यह विधि कभी बिना ढके नहीं करनी, स्वयं गुरु के सामने भी नहीं। वे कहते हैं कि उस नियम की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं।
वक्ता कहते हैं कि आजकल लोग दिखावा कर रहे हैं — तथाकथित शाक्त लोग, और दूसरे भी, एक-एक चीज़ ज़ोर-शोर से दिखा रहे हैं: मुद्रापूजा या प्रतिमा-विज्ञान में प्रयुक्त एक प्रतीकात्मक हस्त-मुद्रा — जैसे वरद (वरदान देने वाली) या अभय (निर्भयता प्रदान करने वाली) — प्रत्येक का अपना विशिष्ट अर्थ होता है। हो, आवरण पूजा का विधि-विधान हो, यह हो, वह हो, सब कुछ दिखाया जा रहा है। जबकि कई बार दीक्षा में, और ठीक गुरु पादुका मंत्र मिलने के समय, गुरुजनों द्वारा, बड़े विद्वान गुरुजनों द्वारा यह हज़ार बार कहा जाता है: यहाँ तक कहा गया है कि "मैं तुम्हारा गुरु हूँ — मेरे सामने भी जब यह विधि करनी हो, तो बिना ढके नहीं करनी है।" वे कहते हैं कि यही नियम है; कई परंपराओं में यही विधि है। पर लोग अब इसे YouTube पर दिखा रहे हैं, तो इसी से समझ लें कि नियम की कितनी अवहेलना हो रही है। किसकी संगति में आपको जलना है, किसके साथ अपना उत्थान या पूर्ण पतन करना है, यह आपके अपने विवेक पर निर्भर है।
नरसिंह के लिए तुलसी की लकड़ी का दीपक वास्तव में कैसे बनाया जाता है?
सूखी तुलसी की लकड़ी बत्ती में लपेटकर, घी के साथ
तुलसी जी की पूरी सूखी लकड़ी लें और उसे दीपक की रुई की बत्ती के साथ लपेटें, घी डालें, और भगवान नरसिंह का मंत्र पढ़ते हुए या उनका स्मरण करते हुए — और कुछ नहीं तो "नरसिंहाय नमः" कहते हुए — दीपक जलाएँ। वक्ता कहते हैं कि कोई भी, पुरुष हो या स्त्री, यह कर सकता है, और इसमें प्रणव लगाने की भी जरूरत नहीं।
वक्ता कहते हैं कि तुलसी जी की सूखी लकड़ी, पूरी सूखी डंडी लें, और दीपक में जो रुई की बत्ती है उसके साथ लपेट दें; घी डालें। फिर भगवान नरसिंह का मंत्र पढ़ते हुए, या भगवान नरसिंह का स्मरण करते हुए, और कुछ नहीं तो "नरसिंहाय नमः" कहते हुए — यह कहते हुए, भगवान को याद करते हुए वहाँ दीपक जलाएँ। वे कहते हैं कि यह कोई भी कर सकता है: पुरुष हो या स्त्री, सब। इसमें प्रणव लगाने की भी जरूरत नहीं।
नरसिंह का तुलसी दीपदान किसे नहीं करना चाहिए?
नियम से न जीने वालों पर रोक
वक्ता इसे उनके लिए बताते हैं जो महाविद्याओं का पाठ करते हैं, जो भगवान नरसिंह के या अन्य मंत्रों में दीक्षित हैं, और उन माताओं-बहनों के लिए जो अपनी मर्ज़ी से नहीं, नियम से जीती हैं। वे कहते हैं कि जो हाथ में पिल्ला लेकर घूमते हैं, उन्हें यह काम करने की जरूरत नहीं — न करें, वरना चार और झंझट गले पड़ जाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि जो महाविद्याओं का पाठ करते हैं — और वे बताते हैं कि श्रोताओं के अपने प्रश्नों से वे जानते हैं कि वे ऐसे पाठ करते हैं — या जो भगवान नरसिंह के मंत्रों में या भगवान के मंत्रों में दीक्षित हैं, या वे माताएँ-बहनें जो नियम के अनुसार जीती हैं और अपनी मर्ज़ी से नहीं चलतीं: वे इसे करें। वे कहते हैं कि जो अब हाथ में पिल्ला लेकर घूमते हैं, उन्हें यह काम करने की जरूरत नहीं। माताजी, न करें, और न वे भाई-बहन करें जो ऐसा करते हैं — हाथ में कुत्ता लेकर घूमना और फिर दीपदान करना, और वह भी भगवान नरसिंह का। वे पूछते हैं कि अपना काम क्यों बिगाड़ना; बेकार में चार और झंझट गले पड़ जाएँगे। न करना ही अच्छा है — भगवान आप पर जैसे हैं वैसे ही प्रसन्न रहें, और आपको सद्बुद्धि मिले, यही उनकी एकमात्र प्रार्थना है।
नरसिंह के लिए तुलसी की लकड़ी के दीपदान के समय कौन सा मंत्र पढ़ा जा सकता है?
उग्र वीरम माला मंत्र
वक्ता कहते हैं कि जो थोड़ा नीति-नियम से चलते हैं वे सभी यह करें, और चाहें तो उग्र वीरम माला मंत्र पढ़ते हुए दीपदान करें: "उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥"
वक्ता कहते हैं कि जो लोग थोड़ा नीति-नियम से चलते हैं, वे सभी यह करें। और यदि वे चाहें, तो विशेषकर उग्र वीरम माला मंत्र पढ़ते हुए दीपदान करें, "उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥" — यह पूरा मंत्र।
दीपक कहाँ कभी नहीं रखना चाहिए?
कभी नंगी ज़मीन पर नहीं — दोष और उपाय
वक्ता कहते हैं कि दीपक कभी नंगी धरती पर नहीं रखना चाहिए: बहुत बड़ा दोष लगता है, धन की हानि होती है, और लक्ष्मी रुष्ट होती हैं। उसके नीचे हमेशा कुछ रखें — फूल, अलग थाली, अखंड अक्षत, रंगोली, थोड़ा अबीर-गुलाल, रोली या हल्दी। फिर उसे भगवान नरसिंह के नाम से चौखट के पास रखें।
वक्ता कहते हैं कि चौखट पर दीपक जलाते समय यह बात कई बार ध्यान में रखें: दीपक नंगी ज़मीन पर नहीं रखना चाहिए। बहुत बड़ा दोष लगता है, धन की हानि होती है, और लक्ष्मी रुष्ट होती हैं। दीपक के नीचे हमेशा फूल आदि रखें; या दूसरी थाली रखें; या चावल, अक्षत, अखंड अक्षत रखें; या छोटी सी रंगोली बना लें; या अबीर-गुलाल, या रोली, या हल्दी रखें। वे कहते हैं कि दीपक किसी चीज़ पर तो रखना ही है — और फिर भगवान नरसिंह के नाम से चौखट के पास।
नरसिंह दीपदान को और विशेष कैसे बनाया जा सकता है?
लक्ष्मी-नरसिंह के लिए दो दीपक, और उसके बाद माला मंत्र
दो दीपक जलाएँ, लक्ष्मी और नरसिंह के नाम से — भगवान श्री लक्ष्मी नरसिंह के। और विशेष करना हो तो प्रतिपदा से चतुर्दशी या पूर्णिमा तक प्रतिदिन इसी तरह दीपक जलाएँ, और उसके बाद नरसिंह माला मंत्र का जप करें, जो वक्ता कहते हैं कि चैनल पर बहुत पहले से दिया हुआ है।
वक्ता कहते हैं कि यदि थोड़ा और अच्छा करना चाहें, तो लक्ष्मी और नरसिंह के नाम से — भगवान श्री लक्ष्मी नरसिंह के नाम से — दो दीपक जलाएँ। यदि केवल भगवान नरसिंह के लिए और भी विशेष कुछ करना चाहें, तो प्रतिपदा से चतुर्दशी तक, या पूर्णिमा तक, जब आप प्रतिदिन इस तरह दीपक जलाएँ, तो उसके बाद नरसिंह माला मंत्र का जप करें। नरसिंह माला मंत्र चैनल पर बहुत पहले से दिए हुए हैं। वे कहते हैं कि बस एक पाठ करें, पर करें। अधिक करना चाहें तो अधिक करें — पर उसी स्थान पर।
अभिचार से पीड़ित घर के लिए चौखट क्या करती है?
देहरी — रक्षा की रेखा
जो अभिचार से पीड़ित हैं, जिनके घर में तंत्र-मंत्र और भूत-प्रेत की बड़ी बाधा आ गई है, उनसे वक्ता कहते हैं: चौखट बची रहेगी तभी आप बचेंगे। यदि आप चौखट की पूरी सेवा-पूजा करने लगें, तो वे कहते हैं कि भगवान नरसिंह आपके शत्रुओं की छाती चीर देंगे, और आपके पितरों को इतना सक्षम बना देंगे कि तंत्र-मंत्र करने वालों पर ही वह उलट जाएगा।
जो विशेषकर अभिचार से पीड़ित हैं, जिनके घर में पहले से तंत्र-मंत्र और भूत-प्रेत की बहुत बड़ी बाधा आ चुकी है — वक्ता सीधे उनसे कहते हैं: चौखट बची रहेगी तभी आप बचेंगे। चौखट को बचाए रखें। यदि आप चौखट की पूरी सेवा और पूजा करने लगें, तो भगवान नरसिंह आपके शत्रुओं की छाती चीर देंगे। वे कहते हैं कि वे आपके पितृों को इतना सक्षम बना देंगे कि जो लोग तंत्र-मंत्र करते हैं, उनका वह तंत्र-मंत्र उन्हीं के ठिकाने पर वापस धकेल दिया जाएगा। यह जान लें — वे कहते हैं कि वे खोखली बातें नहीं कर रहे।
क्या जप से सच में अपनी कुलदेवी का ज्ञान हो सकता है?
जयंती मंगला जप के बाद विंध्यवासिनी मंदिर का स्वप्न
वक्ता टेलीग्राम चैनल पर डाले एक स्क्रीनशॉट का उल्लेख करते हैं: एक व्यक्ति अपनी कुलदेवी के बारे में पूरा जानने के लिए अर्गला के पहले मंत्र "जयंती मंगला" का जप कर रहा था, और उसने स्वप्न में विंध्य क्षेत्र में भगवती विंध्यवासिनी का मुख्य मंदिर देखा, और उसे किसी विशेष कमरे में जाकर विशेष तरीके से पूजा करने का निर्देश मिल रहा था। वे कहते हैं कि उन्होंने पुष्टि की कि ऐसा मंदिर है।
वक्ता कहते हैं कि पर क्योंकि आप लोगों में श्रद्धा और विश्वास ही नहीं है, इसलिए वह होगा भी नहीं — और फिर एक उदाहरण देते हैं। आज उन्होंने टेलीग्राम चैनल पर एक स्क्रीनशॉट डाला था। उसमें उस व्यक्ति ने लिखा कि वह अर्गला के पहले मंत्र, जयंती मंगला काली, का जप कर रहा था। वह जानता था कि उसकी कुलदेवी कौन हैं — उसने लिखा था कि उनके घर में उनकी पूजा होती है — पर मन में कहीं कुलदेवी के मूल स्थान के दर्शन की इच्छा थी, इसलिए वह कुलदेवी का पूरा ज्ञान पाने के लिए जप कर रहा था। क्या दर्शन हुए: स्वप्न में वह विंध्य क्षेत्र में भगवती विंध्यवासिनी का पूरा मुख्य मंदिर देख रहा था, और उसे निर्देश मिल रहा था कि इस कमरे में जाओ, यहाँ आओ, और इस विशेष तरीके से उनकी पूजा करो। उसने वक्ता से पूछा कि क्या ऐसा कोई मंदिर है, क्योंकि स्वप्न में ऐसा दर्शन हुआ था। वक्ता कहते हैं कि पूरा स्क्रीनशॉट जैसा का तैसा डाला गया है, और उन्होंने उत्तर दिया: हाँ भाई, है।
लोग अभिचार पर तो विश्वास करते हैं, पर अपनी साधना पर क्यों नहीं?
मारण प्रयोग पर विश्वास, पर अपने जप पर नहीं
वक्ता कहते हैं कि लोग मानते हैं कि शत्रु उन पर भूत-प्रेत छोड़ सकते हैं, कि मारण प्रयोग से घर में किसी की मृत्यु हो सकती है, कि राख फेंककर किसी को पागल किया जा सकता है — पर स्वयं पर बिल्कुल विश्वास नहीं करते कि यदि वे साधना करेंगे तो देवी उनसे प्रसन्न होकर कृपा करेंगी।
वक्ता कहते हैं कि देवी स्वयं आपको दिखाएँगी — देखो, यह मेरा स्थान है — पर पहले आपको उनसे पूछना होगा। आप मानते हैं कि आपके शत्रु तंत्र-मंत्र करके आप पर भूत-प्रेत छोड़ देंगे। आप मानते हैं कि मारण प्रयोग से आपके घर में किसी की मृत्यु होती है, कि तंत्र से यह संभव है। आप मानते हैं कि राख फेंककर किसी को पागल किया जा सकता है। वे कहते हैं कि पर आपको अपने आप पर बिल्कुल विश्वास नहीं है। आप यह नहीं मानते कि जब हम करेंगे, तो देवी हमसे प्रसन्न होंगी और हम पर अपनी कृपा करेंगी।
अपने पाठ की राख का क्या उपयोग हो सकता है?
कवच पाठ की धूप से बनी अभिमंत्रित भस्म
वक्ता कहते हैं कि लोग यह नहीं मानते कि यदि हम नरसिंह माला मंत्र या कोई और कवच पढ़ें और पढ़ते समय धूप जले, तो उस धूप से बनी राख को अभिमंत्रित करके उस व्यक्ति पर डाला जा सकता है जिस पर पहले से कोई विचार चल रहा है — और वह विचार कट जाएगा। वे कहते हैं कि यह काम इसलिए नहीं करता कि आप जप करेंगे ही नहीं; आपके भीतर समर्पण नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि आप यह नहीं मानते कि यदि हम नरसिंह माला मंत्र या किसी और कवच का पाठ कर रहे हैं, और पढ़ते समय धूप जल रही है, तो उस धूप से जो राख बनती है उसे अभिमंत्रण से अभिमंत्रित करके उस व्यक्ति पर डाला जा सकता है जिस पर पहले से कोई विचार चल रहा है — और विचार कट जाएगा। ऐसा क्यों नहीं होता? क्योंकि आप जप करेंगे ही नहीं; आपके भीतर समर्पण नहीं है। आप दस जप करेंगे और फिर कहेंगे कि दस बार से यह सिद्ध नहीं होगा, ग्यारह दिन में सिद्ध नहीं होगा।
श्मशान साधक का काम गृहस्थ के काम पर भारी क्यों पड़ता है?
वर्षों का कमाया तपोबल बनाम कुछ दिनों का जप
क्योंकि, वक्ता कहते हैं, वह वर्षों तक श्मशान में बैठकर जप-तप करता है, कई प्रकार की वामाचारी क्रियाएँ करता है, बलि देता है, शव के मुख में या बकरे के मुख में सिद्धि करता है, और उसे जगाकर ही प्रयोग चलाता है। इसीलिए आपके देवी-देवता पीछे हटते हैं — उसका तपोबल उसके साथ है, जबकि आप दो-चार दिन करके कहते हैं कि देवताओं में शक्ति नहीं।
वक्ता कहते हैं कि वहाँ वह श्मशान में वर्षों-वर्षों तक बैठकर जप और तप करता है। वह कई प्रकार की वामाचार क्रियाएँ करता है, बलि देता है, शव के मुख में सिद्धि करता है, या बकरे के मुख में करता है। कई प्रकार की क्रियाएँ करके, उन्हें जगाकर ही वह प्रयोग चलाता है — और इसीलिए आपके देवी-देवता पीछे हट रहे हैं। और आप यहाँ दो दिन या चार दिन करके सोचते हैं कि उसे काट देंगे। जब नहीं होता, तो कहते हैं कि देवताओं में शक्ति नहीं है। वे कहते हैं कि पर भाई, तपोबल उसके साथ है — उसे उसका श्मशानी पुण्य कहें, उसकी श्मशानी सक्षमता कहें, जो भी वह चीज़ है। यहाँ भी होगा, पर आप करना नहीं चाहते। जब आप करेंगे, तो परिणाम आएगा।
घर में चौखट का पूजन किसे करना चाहिए?
कुलवधू, और विवाहित बेटी पर रोक
वक्ता कहते हैं कि विशेषकर कुलवधू। घर की बेटी भी कर सकती है — पर केवल अपने विवाह तक। विवाह के बाद बेटी को अपने मायके की चौखट की पूजा नहीं करनी चाहिए; उसका सम्मान अवश्य करे, पर पूजा नहीं।
वक्ता कहते हैं कि यदि आपके घर में अभिचार है या इस प्रकार का दोष या कठिनाई है, और यदि आप चौखट का पूजन करें और स्वयं को पूरी तरह चौखट के नियम को सौंप दें, विशेषकर सुबह — और यह जान लें: सबसे अच्छा है कि कुलवधू इसे करे। वे कहते हैं कि घर की बेटी भी कर सकती है; ऐसा नहीं कि वह नहीं कर सकती। पर केवल अपने विवाह तक। विवाह हो जाने के बाद बेटी को अपने मायके की चौखट की पूजा नहीं करनी चाहिए। वह उसका सम्मान अवश्य करे — पर उसकी पूजा न करे।
कुलवधू को चौखट का पूजन कैसे करना चाहिए?
स्नान करके, उचित वस्त्र में, सिर पर पल्लू रखकर
बताया गया विधान करके, फिर स्नान करके उस प्रकार के वस्त्र पहनकर, और सिर व माथे पर पल्लू रखकर वह चौखट का पूजन करे। वक्ता कहते हैं कि इससे बड़ा प्रभाव मिलता है, और कुलवधू के पूजन से घर के देवी-देवता अत्यंत प्रसन्न होते हैं। यदि वह न करे, तो घर का जो बेटा या सदस्य करे — वह, वे कहते हैं, अलग बात है।
वक्ता कहते हैं कि यदि घर की कुलवधुएँ अपने माथे और सिर पर पल्लू रखकर करें — जो विधान बताया गया है वह करके, फिर स्नान आदि के बाद उस प्रकार के वस्त्र पहनकर, और सिर पर पल्लू रखकर — वे चौखट का पूजन करें। वे कहते हैं कि इससे बड़ा प्रभाव मिलता है। कुलवधू के पूजन से घर के देवी-देवता अत्यंत प्रसन्न होते हैं। और एक विकल्प भी है: यदि वह न करे, तो घर का जो भी लड़का, जो भी सदस्य करे — वह अलग बात है। वे आशा करते हैं कि सब यह विषय समझेंगे, और दोहराते हैं कि चौखट को महत्व देना चाहिए।
तुलसी के पौधे के पास क्या रखना चाहिए, और कब से?
मेष संक्रांति से भाद्रपद संक्रांति तक मिट्टी का कलश
वक्ता कहते हैं कि घर में तुलसी का पौधा होना चाहिए और उसकी सेवा होनी चाहिए; और अभी लगी मेष संक्रांति से भाद्रपद संक्रांति तक वहाँ कम से कम एक मिट्टी का कलश रखें, लाल कपड़े में लिपटा और पानी से भरा। तुलसी के पेड़ के पास कई पितर और देव-पितर रहते हैं; वे नारायण और भगवती तुलसी के माध्यम से तृप्त होते हैं, और उनका आशीर्वाद घर को धन-धान्य से भर देता है।
वक्ता कहते हैं कि घर में तुलसी का पौधा अवश्य होना चाहिए और उसकी सेवा होनी चाहिए। और वैशाख मास में — अभी लगी मेष संक्रांति से भाद्रपद संक्रांति तक — वहाँ कम से कम एक मिट्टी का कलश रखें, उसके चारों ओर लाल कपड़ा लपेटकर, पानी से भरा हुआ। कई पितर, देव-पितर हैं जो तुलसी के पेड़ के ठीक पास रहते हैं। वे नारायण और भगवती तुलसी के माध्यम से तृप्त होते हैं, और उनका आशीर्वाद आपको धन-धान्य से भर देता है। जिन्हें कहीं पानी नहीं मिलता — ऐसी अतृप्त शक्तियाँ भगवती तुलसी के माध्यम से तृप्ति पाती हैं। वे उन्हें तृप्त करती हैं, और उनका आशीर्वाद पाकर वे कभी हानि नहीं पहुँचातीं।
रोहिणी से युक्त अक्षय तृतीया पर हवन शत्रुओं का नाश क्यों करता है?
मूल के साथ पौष अमावस्या, और रोहिणी के साथ अक्षय तृतीया
वक्ता इसे शास्त्रीय प्रमाण के रूप में बताते हैं: यदि पौष अमावस्या के समय मूल नक्षत्र पड़े, और अक्षय तृतीया के दिन रोहिणी नक्षत्र पड़े, तो शत्रुओं का — और विशेषकर जो दुष्ट और नीच हैं उनका — नाश होता है, और उनकी शक्ति क्षीण होती है। इसलिए यदि आप सही हैं और आपके शत्रु गलत, तो इस दिन किया या करवाया गया अनुष्ठान या पूजन अवश्य प्रभावी होगा।
वक्ता कहते हैं कि इन तीन-चार दिनों में विशेष अनुष्ठान करें; पर रोज़ के जप के साथ इस पूरे पक्ष में एक महापुरश्चरण अवश्य पूरा करें। यदि आप अक्षय तृतीया पर हवन करें तो अति उत्तम है। अकेले अक्षय तृतीया का रोहिणी नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। से युक्त होना विशेषकर शत्रुओं और दुष्टों का नाश है — और वे कहते हैं कि यह शास्त्रीय प्रमाण के साथ आता है। जैसा वे प्रमाण बताते हैं: यदि पौष अमावस्या के समय मूल नक्षत्र पड़े, और अक्षय तृतीया के दिन रोहिणी नक्षत्र पड़े, तो शत्रुओं का — या विशेषकर इसे दुष्ट और नीच लोगों के रूप में समझें — नाश होता है, और उनकी शक्ति क्षीण होती है। इसलिए यदि आप सही हैं और आपके शत्रु गलत, तो इस दिन आप अनुष्ठान और पूजन करें या करवाएँ, तो वह अवश्य प्रभावी होगा। वे कहते हैं कि यह करें।
भगवती पीतांबरा का स्वरूप क्या है?
लौकिक जगत में शत्रुनाशिनी, वास्तव में परब्रह्म परमेश्वरी
वक्ता कहते हैं कि भगवती पीतांबरा अपने आप में शत्रुनाशिनी हैं, उनका स्वरूप ही शत्रुओं के नाश के लिए है। वे परब्रह्म परमेश्वरी हैं, पर लोग उन्हें विशेषकर लौकिक जगत में जानते हैं, और उनके मंत्र सबसे अधिक शत्रु नाश के लिए प्रयोग होते हैं। वे कहते हैं कि यदि आपने केवल किसी लौकिक इच्छा के लिए भी उनकी शरण ली हो, तो वे आपको भौतिकता से हटाकर परब्रह्म की ओर अवश्य ले जाएँगी।
वक्ता कहते हैं कि फिर भगवती पीतांबरा की जयंती आती है, जो अपने आप में शत्रुनाशिनी हैं — जिनका स्वरूप ही विशेषकर शत्रुओं के नाश के लिए है। वे परब्रह्म परमेश्वरी हैं; फिर भी लोग उन्हें विशेषकर लौकिक जगत में जानते हैं, और उन्हीं के मंत्र सबसे अधिक शत्रु नाश के लिए प्रयोग होते हैं। वे कहते हैं कि यदि आपने केवल किसी लौकिक इच्छा के लिए भी उनकी शरण ली हो, तो वे फिर आपको भौतिकता से अवश्य हटाएँगी और परब्रह्म की ओर ले जाएँगी। ऐसा नहीं कि वे आपको केवल तंत्र-मंत्र के प्रयोजनों तक सीमित रखेंगी। इसलिए उस दिन उनकी सेवा-पूजा करें, और उस दिन हवन आदि करें।
जयंती पर बिना किसी अधिकार के कोई भी क्या कर सकता है?
श्रृंगार पूजा और शतार्चन, धूप-दीप-नैवेद्य
वक्ता कहते हैं कि जिस दिन जिस स्वरूप की जयंती हो, उस दिन उनका श्रृंगार पूजन और शतार्चन करें — इतना होना चाहिए। वह न हो सके, तो बस उनके नाम से धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें; उससे कोई दोष नहीं लगेगा। वे कहते हैं कि परेशानी तभी आती है जब आप वह करते हैं जो वर्जित है, जिसका आपको अधिकार नहीं।
वक्ता कहते हैं कि विधि-विधान चैनल पर है और उसे कोई भी कर सकता है; और वे पहले ही कह चुके हैं कि पहले अपने मंत्रों का पाठ करना चाहिए। जिस दिन जिस स्वरूप की जयंती हो, उस दिन उनका श्रृंगार पूजन, शतार्चन आदि होना चाहिए। और यदि अधिक न हो सके, तो बस उनके नाम से धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें — उससे कोई दोष नहीं लगेगा। वे कहते हैं कि परेशानी तब आती है जब आप वे मंत्र आदि करते हैं जो वर्जित हैं, जिनका आपको अधिकार नहीं। स्वरूपों की पूजा में कोई कठिनाई नहीं, चाहे आप मंदिर में करें या घर पर; एक दिन का पूजन, उनका श्रृंगार पूजन — वह ठीक है।
भगवान शरभ की पूजा कहाँ करनी चाहिए, और कहाँ नहीं?
शरभ और नरसिंह एक स्थान पर नहीं होने चाहिए
वक्ता कहते हैं कि यदि आप घर पर भगवान शरभ की पूजा करते हैं, तो वहाँ भगवान नरसिंह का स्थान नहीं होना चाहिए। सर्वेश्वर भैरव की पूजा विशेषकर शिव मंदिर में ही होनी चाहिए। इसलिए चतुर्दशी को भगवान सर्वेश्वर के लिए शिव मंदिर में पंचानन महादेव का दीपदान करें।
एक दिन के अनुष्ठान में जुड़ने के बजाय पंद्रह दिन का पुरश्चरण क्यों करें?
एक दिन का सामूहिक अनुष्ठान बनाम अपना पखवाड़ा
वक्ता कहते हैं कि इन तीन मुख्य दिनों में सबकी ओर से होने वाला अनुष्ठान ग्रुप में डाला जाएगा और संभव हुआ तो YouTube पर भी प्रकाशित होगा, और श्रोता अपना संकल्प करवा सकते हैं। पर वह अनुष्ठान एक-एक दिन का है; अपने कल्याण के लिए आपको पूरे पंद्रह दिन करने चाहिए, क्योंकि इस पुरश्चरण में इतनी महाविद्याएँ और महाशक्तियाँ आ रही हैं कि यह कई गुना अधिक लाभ देगा।
वक्ता कहते हैं कि इन तीन मुख्य दिनों में हम सबकी ओर से जो अनुष्ठान होगा, वह ग्रुप में डाला जाता रहेगा; और संभव हुआ तो YouTube पर भी अवश्य प्रकाशित होगा, ताकि श्रोता अपना संकल्प करवा सकें। पर वह अनुष्ठान एक-एक दिन का है। वे कहते हैं कि आपको पूरे पंद्रह दिन करने चाहिए। अपने कल्याण के लिए एक पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करें — क्योंकि जब आप यह पुरश्चरण करेंगे, तो इसमें इतनी महाविद्याएँ और इतनी महाशक्तियाँ आ रही हैं कि यह चीज़ आपको कई गुना अधिक लाभ देने वाली है।
सक्षम साधक के लिए कौन सा अतिरिक्त अनुशासन बताया गया है?
दिन में एक बार भोजन, और जप के समय सात्विकता
सक्षम साधक — यानी जिसका शरीर समर्थ है — दिन में एक बार भोजन करे और रात या दिन में जप करे। जो गर्मी, ऑफिस और काम के कारण न कर सकें, वे जितना शरीर साथ दे उतना करें। पर वक्ता कहते हैं कि सात्विकता में रहकर किया जाए तो अच्छा रहेगा, क्योंकि भारी भोजन करने से देर तक बैठना कठिन होता है।
वक्ता कहते हैं कि सक्षम साधक के लिए बहुत कुछ है। यहाँ सक्षम का अर्थ है कि यदि शरीर समर्थ है, तो एक समय भोजन करें और जप करें — रात के समय, या दिन में। यदि न कर सकें — इतना गर्म मौसम है, ऑफिस जाना है, काम है — तो जितना शरीर साथ दे। पर सात्विकता में रहकर करें तो अच्छा रहेगा। क्यों? क्योंकि यदि आप तरह-तरह का बहुत अधिक खाकर करने बैठेंगे, तो जब अधिक जप करना हो और देर तक बैठना पड़े, तो पेट में कठिनाई होगी। इसलिए सोच-समझकर भोजन करें।
पंद्रह दिन के अनुष्ठान में किसका भोजन नहीं खाना चाहिए?
किसी और घर का भोजन नहीं, बेटी के घर का भी नहीं
वक्ता कहते हैं कि पंद्रह-सोलह दिन के अनुष्ठान में एक नियम अवश्य रखें: किसी और के घर का भोजन न खाएँ। पुरश्चरण करते समय कभी दूसरे के घर का भोजन नहीं खाना चाहिए। बेटी के घर का भी नहीं, विवाहित बहन के घर का भी नहीं — वहाँ जाना भी नहीं चाहिए, खाना तो दूर की बात।
वक्ता कहते हैं कि जब आप पंद्रह या सोलह दिन का अनुष्ठान करें, तो एक नियम अवश्य रखें: किसी और के घर का भोजन न खाएँ। पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करते समय कभी दूसरे व्यक्ति के घर का भोजन नहीं खाना चाहिए। आप अपनी बेटी के घर का भोजन भी नहीं खा सकते; विवाहित बहन के घर का भोजन भी नहीं खाना चाहिए। वे कहते हैं कि जाना भी नहीं चाहिए — खाना तो अलग बात है, और वहाँ से खाना भी नहीं चाहिए। वे जोड़ते हैं कि सामान्य दिनों में उनका सम्मान अवश्य करें, पर खाना नहीं चाहिए। इन सब बातों को ध्यान में रखना चाहिए।
क्या भोजन का यह नियम प्रेमी या ससुराल के घर पर भी लागू होता है?
पाणि ग्रहण तक दोनों में से किसी का भोजन नहीं
हाँ। वक्ता कहते हैं कि यदि आप प्रेमी-प्रेमिका हैं, तो अपनी जगह आप बहुत नियमबद्ध हों, पर पुरश्चरण के बीच में उस समय आप एक-दूसरे के घर का भोजन नहीं खाएँगे जब तक आपका पाणि ग्रहण न हो गया हो; और ससुराल के घर का भोजन भी नहीं खाना चाहिए। वे कहते हैं कि जो न माने, वह न माने।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप प्रेमी-प्रेमिका हैं, तो अपनी जगह आप बहुत नियमबद्ध हो सकते हैं; पर पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। के बीच में उस समय आप उनके घर का, एक-दूसरे के घर का भोजन नहीं खाएँगे — जब तक आपका पाणि ग्रहण न हो गया हो। और ससुराल के घर का भोजन भी नहीं खाना चाहिए। वे कहते हैं कि इन बातों को अवश्य ध्यान में रखें। यदि आप नहीं मानेंगे, तो न मानें — वे इस पर बहस करने वाले नहीं। आपकी इच्छा।
यदि अनुष्ठान के बीच कोई जयंती पड़े, तो क्या मुख्य जप बदलना चाहिए?
मुख्य जप वही रहता है; जयंती का अलग पूजन
नहीं। उदाहरण के रूप में वक्ता ऐसे व्यक्ति को लेते हैं जो प्रतिदिन 108 करके कामाख्या कवच का पुरश्चरण कर रहा है — जो पंद्रह दिन में 1500 होता है — और कहते हैं कि यदि बीच में भगवती पीतांबरा की जयंती पड़े, तो मुख्य रूप से जो जप करना है वह वही रहता है जो आप करते आ रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि अगला मुख्य विषय यह है कि जब इस तरह का पंद्रह या सोलह दिन का अनुष्ठान चल रहा हो, तब क्या करें। उनका उदाहरण लें: आप भगवती कामाख्या कवच का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। कर रहे हैं, रोज़ 108, जिससे पंद्रह दिन में 1500 होता है — वह ठीक है; पर आपका रोज़ सौ का जप चल रहा है। अब बीच में भगवती पीतांबरा की जयंती पड़ती है, और प्रश्न है कि उस दिन उनका विशेष अनुष्ठान करें या पहले से जो चल रहा था वही जारी रखें। वे कहते हैं कि वे यह पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं: नहीं — मुख्य रूप से जो जप आपको करना है, वह वही रहता है जो आप करते आ रहे हैं।
यदि घर में किसी देवी का स्थान न हो, तो उनकी जयंती कैसे मनाएँ?
पीतांबरा के लिए पीले वस्त्र के साथ दुर्गा के विग्रह का उपयोग
वक्ता कहते हैं कि जहाँ आपने भगवती पीतांबरा को स्थान दिया है, वहाँ घर पर उनका श्रृंगार, पूजन और अभिषेक कर सकते हैं। यदि नहीं, तो आपके पास भगवती का जो भी विग्रह हो — उदाहरण के लिए भगवती दुर्गा का — उस दिन पीले वस्त्र से उनका अभिषेक और श्रृंगार करें। वे कहते हैं कि भगवती इसे अवश्य स्वीकार करेंगी, क्योंकि मूल रूप से यह जगदंबा का ही स्वरूप है।
वक्ता कहते हैं कि जहाँ आपने भगवती पीतांबरा को स्थान दिया है, वहाँ घर पर उनका श्रृंगार, पूजन, अभिषेक आदि अवश्य कर सकते हैं। यदि नहीं, तो भगवती का जो भी विग्रह हो — उदाहरण के लिए यदि भगवती दुर्गा का विग्रह है — तो उस दिन पीले वस्त्र आदि से उनका अभिषेक, श्रृंगार आदि करें। वे कहते हैं कि वह भी भगवती अवश्य स्वीकार करेंगी, क्योंकि मूल रूप से यह जगदंबा का ही स्वरूप है। इसी तरह सब कुछ करना है।
क्या कामाख्या अर्चन अलग से करवाने की जरूरत है?
सब कुछ पक्ष के अनुष्ठानों में शामिल
कामाख्या माई के अर्चन और सनातन सेवा के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं: अक्षय तृतीया पर, भगवती पीतांबरा की जयंती पर, और उसके साथ भगवती प्रत्यंगिरा और छिन्नमस्तिका के लिए जो भी किया जाएगा — सब उसी में शामिल होगा। कोई अलग से कुछ करना चाहे तो वे मना नहीं करेंगे, पर कोई अनिवार्य बोझ भी नहीं डालेंगे।
कामाख्या माई के अर्चन और सनातन सेवा के बारे में एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं। अक्षय तृतीया पर जो किया जाएगा, भगवती पीतांबरा की जयंती के लिए जो किया जाएगा, और उसके साथ भगवती महाप्रत्यंगिरा और छिन्नमस्तिका के लिए — वह सब उसी में शामिल होगा। वे कहते हैं कि यदि आप अलग से कुछ और करना चाहें, तो कर सकते हैं; वे मना नहीं करेंगे, और "इसके लिए अलग दो, उसके लिए अलग दो" जैसा कोई अनिवार्य बोझ नहीं डालेंगे। सब कुछ एक में शामिल है, और आपका हिस्सा भी उसमें होगा — ऐसा नहीं कि वह केवल उनके अपने लिए होगा। वे कहते हैं कि वह सबका होगा; इस बात की चिंता से मुक्त रहें।
क्या युवकों का कोई ग्रुप सनातन के विरुद्ध उग्र प्रयोग कर सकता है?
किसी भी प्रयोग से पहले सक्षमता, दीक्षा और तपोबल
उग्रतम प्रयोग सीखकर सनातन को मिटाना चाहने वाले युवकों के एक ग्रुप के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह हो सकता है और कई लोग प्रयास भी कर रहे हैं। इस क्षेत्र में प्रयोग करने वाले सब युवक हैं, अधिकतर अविवाहित, और सबने काफी पुरश्चरण किए हैं। वे कहते हैं कि अधिकतर श्रोता तो किसी कुल परंपरा में दीक्षित भी नहीं, इसलिए जब तक वह सक्षमता न आए, वे अपना तपोबल बढ़ाएँ।
उग्रतम प्रयोग सीखकर सनातन को मिटाना चाहने वाले युवकों के एक ग्रुप के बारे में पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि यह बिल्कुल सही है — यह हो सकता है, और कई लोग प्रयास भी कर रहे हैं। ये सारी बातें उसी ढाँचे के भीतर की जा रही हैं। वे कहते हैं कि इसी क्षेत्र में जो प्रयोग करते हैं, वे सब युवक हैं, और उनमें से अधिकतर अविवाहित हैं। सबने काफी पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। आदि किए हैं, इसलिए वे कर रहे हैं। वे जोड़ते हैं कि ये लोग पुराने समय से हैं — यह कोई नई बात नहीं। यदि आप भी उस स्तर का प्रयोग करना चाहते हैं, तो उनका मत यह है: आप में से अधिकतर तो अभी किसी कुल परंपरा में दीक्षित भी नहीं होंगे, इसलिए जब तक उस प्रकार की सक्षमता प्राप्त न हो, आपको अपना तपोबल बढ़ाना चाहिए। जब ऐसी दीक्षा होगी और सक्षमता प्राप्त होगी, तो प्रयोग करने में अधिक समय नहीं लगेगा। और यदि कोई अभी-अभी दीक्षित हुआ है, तो गुरु का और गुरु परंपरा का बल मिलता है — वह ठीक है। पर कम से कम एक पुरश्चरण तो करना होगा; और यदि आपने अपने भीतर उस तरह का विकास नहीं रखा और अयोग्य बने रहे, तो गुरु से मिला पुण्य भी बहुत दिन नहीं टिकेगा। इसलिए स्वयं को पहले से योग्य और सक्षम रखें, ताकि कोई प्रत्यक्ष गुरु न भी मिले तो भी काम करने की सक्षमता रहे।
क्या स्वप्न में मिली विधि वाले मंत्र का अनुष्ठान किया जा सकता है?
पहले मंत्र को पूरी तरह जानें
यह पूछे जाने पर कि क्या ऐसे मंत्र का अनुष्ठान कर सकते हैं जिसकी विधि स्वप्न में बताई गई हो, वक्ता कहते हैं कि पहले पता करें कि कौन सा मंत्र है, क्या है और कैसा है — पूरा विषय जानें, तभी करें। चैनल पर इससे जुड़ा एक वीडियो है।
यह पूछे जाने पर कि क्या ऐसे मंत्र का अनुष्ठान किया जा सकता है जिसकी विधि स्वप्न में बताई गई हो, वक्ता उत्तर देते हैं: पहले, कौन सा मंत्र है, क्या है, कैसा है — पूरा विषय जानकर ही करें। वे कहते हैं कि चैनल पर इससे जुड़ा एक वीडियो है; उसे सुनें।
क्या पूरा परिवार मिलकर दीपदान कर सकता है?
चक्र विधि में बत्तीस नामों के साथ सामूहिक दीपदान
हाँ — वक्ता कहते हैं कि सब मिलकर करें तो अति उत्तम है। यदि परिवार में पाँच या दस सदस्य हैं, तो सब मिलकर दीप धारण करें और एक साथ बैठकर उग्र भाव से, वीर भाव से भगवती की बत्तीस नामावली का जप करें — एक चक्र विधि, यानी तैंतीस बार, चक्र विधि से। तब, वे कहते हैं, उस परिवार की ओर किसी की आँख उठाने की हैसियत नहीं रहती।
यह पूछे जाने पर कि क्या पूरा परिवार अक्षय तृतीया से पाँच दिन तक मिलकर दीपदान कर सकता है, और क्या सबको एक साथ संकल्प लेना होगा या एक व्यक्ति कर सकता है, वक्ता उत्तर देते हैं: जैसा चाहें वैसा करें; यदि सब मिलकर करें तो अति उत्तम है — यदि पूरा परिवार मिलकर दीपदान करे। वे कहते हैं कि वे अक्सर यह कहते हैं: यदि परिवार में पाँच या दस सदस्य हैं, तो सब मिलकर दीप धारण करें, और एक साथ बैठकर उग्र भाव से, वीर भाव से भगवती की बत्तीस नामावली का जप करें — एक चक्र विधि, यानी तैंतीस बार, बस चक्र विधि से। तब, वे कहते हैं, उस घर में किसी की हैसियत नहीं कि उस परिवार की ओर आँख उठाकर उसे हानि पहुँचाने के लिए कुछ करे।
यदि कोई सच में हमला करे, तो संयुक्त परिवार क्या कर सकता है?
दस सदस्य, एक सामूहिक संकल्प और एक बलि
वक्ता कहते हैं कि यदि दस सदस्य हैं, पूरा परिवार साथ रहता है और बँटवारा नहीं हुआ है, तो किसी ने आँख उठाई भी हो, तो दसों एक साथ बैठकर सामूहिक संकल्प करें — पहले से एक पुरश्चरण किया हुआ हो — और भगवती को बलि अर्पित करें; वे कहते हैं कि सामने वाला समाप्त हो जाएगा। संयुक्त रहने में बड़ी सक्षमता है।
वक्ता कहते हैं कि मान लीजिए किसी ने कुछ किया है — घर में दस सदस्य हैं, पूरा परिवार साथ रहता है, कोई बँटवारा नहीं हुआ। किसी ने आँख उठाई भी हो, तो यदि दस लोग एक साथ बैठकर एक साथ संकल्प करें, पहले से एक पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। पूरा किया हुआ हो, और एक साथ बैठकर संकल्प करके भगवती को बलि अर्पित करें, तो सामने वाला समाप्त हो जाएगा। वे कहते हैं कि यही सक्षमता है: संयुक्त रहने में बड़ी सक्षमता है।
जो सात्विक भोजन नहीं करता और लक्ष्मी माला मंत्र नहीं कर सकता, वह क्या करे?
पहले स्नान और पूजा; और मांस खाते हुए बलि को नकारने का दोष
एक श्रोता ने कहा कि उसका भोजन सात्विक नहीं है और वह लक्ष्मी माला मंत्र पुरश्चरण के बजाय वीराचार मार्ग में धनदा कवच स्तोत्र करना चाहता है; वक्ता उत्तर देते हैं कि सुबह उठते ही कोई मांस नहीं खाता — उठकर स्नान करके पूजा की जा सकती है, वही करें। फिर वे उन लोगों की आलोचना करते हैं जो मांस खाते हैं पर कहते हैं कि उनके देवता को बलि नहीं चढ़ती: जब वह घर लाया जाता है, तो देवता को उसका अंश वैसे भी मिलता है, और दोष लगता है।
एक श्रोता लिखता है कि वह लक्ष्मी माला मंत्र का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। नहीं कर सकता क्योंकि उसका भोजन सात्विक नहीं है, और पूछता है कि क्या वह वीराचार्य मार्ग में धनदा कवच स्तोत्र कर सकता है, और उसकी विधि क्या है। वक्ता उत्तर देते हैं: यदि आपका भोजन सात्विक नहीं है — तो आप सुबह उठते ही सीधे चिकन तो नहीं खाते। आप उठकर नहा-धोकर पूजा कर सकते हैं, है ना? तो वही करें। वे कहते हैं कि भगवती के ऐसे कई स्वरूप हैं। फिर वे एक ऐसी बात जोड़ते हैं जो कई लोगों को बुरी लगेगी: लोग चिकन खाते हैं, बकरा खाते हैं, सब कुछ खाते हैं — पर जब बलि चढ़ाने की बात आती है, तो कहते हैं कि हमारे देवता को बलि नहीं चढ़ती, उनके देवता को चढ़ती है। पर जब बलि चढ़ेगी, जब आप उसे घर लाते हैं, तो उस देवता को उसका अंश वैसे भी मिलना ही है। और वे कहते हैं कि यहाँ दोष भी लगता है।
क्या वीराचार दीक्षा खुलकर खाने-पीने की छूट है?
हर मार्ग में इंद्रियों पर संयम
नहीं। वक्ता कहते हैं कि यदि आप इस मार्ग में हैं और खाना ही है, तो उसी प्रकार का देवता स्वरूप चुनें और उसी प्रकार की दीक्षा लें — पर विधि-विधान जाने बिना और नियंत्रित हुए बिना आगे नहीं बढ़ सकते। वे कहते हैं कि वीराचारी साधक भी यदि नीति-नियम से न चलें तो कुछ समय बाद उनका पतन निश्चित है। वीराचार कोई लाइसेंस का प्रमाणपत्र नहीं, और जहाँ इंद्रियों पर संयम नहीं वहाँ साधना ही नहीं।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप इस मार्ग में हैं और आपको खाना-पीना ही है, तो उसी के अनुसार देवता का स्वरूप चुनें, उसी के अनुसार उस प्रकार की दीक्षा लें — पर विधि-विधान जाने बिना और नियंत्रित हुए बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते। वे कहते हैं कि वास्तविकता को देखिए: जो साधक वीराचार्य हैं, वे भी यदि नीति-नियम से न चलें, तो कुछ समय बाद उनका पतन निश्चित हो जाता है। शुरुआत में बहुत आनंद आएगा; बाद में पतन होगा। ऐसा नहीं कि वहाँ नियम नहीं हैं — नियम हर जगह हैं। यह न सोचें कि वीराचार्य बनने से आपको लाइसेंस का पूरा प्रमाणपत्र मिल जाता है, कि आपको खाने की भी छूट मिलेगी और साधना भी करेंगे। ऐसा नहीं है। यदि आप किसी चीज़ में संयम नहीं रख सकते, यदि आपकी इंद्रियों पर कभी वीराचार का संयम नहीं आता, तो वह कैसी साधना — स्वच्छंदता में साधना शायद ही होती है।
रक्तबीज की कथा तांत्रिक साधना के बारे में क्या दिखाती है?
असुरों ने भी तांत्रिक साधना की — और स्वयं चामुंडा ने उसका वध किया
वक्ता कहते हैं कि असुरों ने भी तांत्रिक साधना की — मेघनाथ को लें, या रक्तबीज को, जिसने भगवती की कृपा से ही अपनी शक्ति पाई। भगवती ने दी और भगवती ने ही वापस ले ली: स्वयं चामुंडा माई ने उसका वध किया। वे कहते हैं कि आपको आश्चर्य होगा कि रक्तबीज ने जो साधना की थी, वह स्वयं भगवती चामुंडा की थी। जिसने दिया, उसी ने लिया।
वक्ता कहते हैं कि असुरों ने भी तांत्रिक साधना की है। मेघनाथ को लें, या रक्तबीज को लें — उसने भी तांत्रिक साधना की, और भगवती की कृपा से ही उसे वह शक्ति मिली। भगवती ने दी, और भगवती ने ही वापस ले ली: स्वयं चामुंडा माई ने उसका वध किया। वे कहते हैं कि यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि रक्तबीज ने जो साधना की थी, वह स्वयं भगवती चामुंडा की थी। तो जिसने दिया, उसी ने लिया — स्वरूप अलग था। वे कहते हैं कि इस विषय पर बहुत कुछ है। जब आप तंत्र में जाएँगे, तो काली खो के संबंध में — त्रिकोण की देवी, भगवती काली खो — चामुंडा का, जगदंबा का यह खिचड़ी मुद्रा वाला स्वरूप, संसार में अपनी तरह का एकमात्र: इसके पीछे का रहस्य रक्तबीज से जुड़ा है और इसी कारण है। जैसे-जैसे आप त्रिकोण आदि करते रहेंगे, जगदंबा वहीं से आपको यह भेद अवश्य देंगी और आप इसे समझ और जान जाएँगे।
क्या रक्तबीज की वामाचारी उपासना वेद से बाहर थी?
केवल नाम से अवैदिक, और भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार फिर भी
वक्ता कहते हैं कि रक्तबीज ने राक्षस होते हुए और वामाचारी विधि से लंबे समय तक भगवती की तपस्या की — जिसे अवैदिक पूजा कहते हैं। पर वे कहते हैं कि अवैदिक केवल नाम से वेद से अलग है; वह वैदिक भी है, उससे बाहर नहीं। फिर भी रक्तबीज ने कुछ भी यूँ ही नहीं ले लिया: प्रसाद को प्रसाद की तरह माना जाता है, और उसके अलावा उसका पूरा आचरण संयम था।
वक्ता कहते हैं कि जब आप रक्तबीज के बारे में जानकारी पाएँगे, तो जानेंगे कि उसने इतने समय तक भगवती की तपस्या की, कि वह स्वयं राक्षस है, और उसने यह वामाचारी विधि से किया। वे कहते हैं कि वामाचार विधि का अर्थ है जिसे अवैदिक पूजा कहते हैं। पर अवैदिक करते हुए भी क्या वह वेद से अलग है? वह वैदिक भी है। वह केवल नाम से अवैदिक है; वह उसी व्यवस्था के भीतर है, उससे बाहर नहीं। फिर भी वह वामाचारी पद्धति से कर रहा है, और उसमें उसने भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार किए बिना कभी कुछ भी नहीं लिया। वे कहते हैं कि प्रसाद तो प्रसाद की तरह है — उसके बारे में कभी नहीं कहा जाता कि कोई उसे ग्रहण न करे। पर उसके अलावा उसका पूरा आचरण संयम है।
वामाचार दीक्षा को पंचमकार की छूट मान लेना गड्ढे में ले जाता है; संयम को छोड़ा नहीं जा सकता।
कल्पित छूट के पीछे का गड्ढा
वक्ता कहते हैं कि संयम से बाहर नहीं जाया जा सकता। जो यह सोचकर वामाचार में दीक्षा लेने की सोचता है कि वह दक्षिणाचार में नहीं रह सकता — कि वहाँ बहुत आनंद होगा, पंचमकार की छूट होगी, शराब, चिकन, अंडे और सिगरेट, और वैसे ही देवता — वह गड्ढे में गिरेगा। वे कहते हैं कि कई गिरते हैं और बर्बाद हो जाते हैं: यह चीज़ उसके लिए है ही नहीं, आप किसी भी वर्ण के हों।
वक्ता कहते हैं कि आप संयम से बाहर नहीं जा सकते। जो यह सोचता है कि वह आगे जाकर वामाचार में दीक्षा लेगा क्योंकि वह दक्षिणाचार में नहीं रह सकता — क्योंकि उसे मछली आदि खानी है — वह गलत है। वे ऐसे व्यक्ति की सोच बताते हैं: वहाँ बहुत आनंद होगा, वहाँ पंचमकार की छूट है, वहाँ मद्य पिएँगे, चिकन खाएँगे, अंडे खाएँगे, वहाँ के देवता भी वैसे ही हैं, सिगरेट-बीड़ी पी सकते हैं, आनंद ही आनंद है। वे कहते हैं कि आनंद नहीं, और फिर परमानंद भी नहीं — आप इस तरह गड्ढे में गिरेंगे। कई लोग गिरते हैं और फिर बर्बाद हो जाते हैं। यह चीज़ उसके लिए है ही नहीं — आप किसी भी वर्ण के हों।
क्या घर में पितरों के लिए जल और दीपक रखने से वे हानि पहुँचाएँगे?
जल स्रोत पर यक्ष और पितरों का अधिकार
बिल्कुल नहीं, वक्ता उत्तर देते हैं। वे कहते हैं कि स्थान का महत्व समझें: जल स्रोत पर दो का अधिकार होता है — पहला यक्षों का, दूसरा पितरों का। जल की हानि से दो देवता सबसे अधिक क्रोधित होते हैं: पहला यक्ष और दूसरा पितर।
यह पूछे जाने पर कि यदि घर में पितरों के नाम से जल रखा जाए और दीपक जलाया जाए, तो क्या कुछ पितर हानि पहुँचाएँगे, वक्ता उत्तर देते हैं: नहीं, बिल्कुल नहीं। वे कहते हैं कि इस स्थान का महत्व समझें, और दोहराते हैं — इस स्थान का महत्व समझें। घर में पानी तो आप वैसे भी रखते हैं। जल स्रोत पर दो का अधिकार होता है: पहला यक्षों का, और दूसरा पितृों का। जल की हानि करने से दो देवता सबसे अधिक क्रोधित होते हैं — पहला यक्ष और दूसरा पितर। इसे ध्यान में रखें।
प्रेत सामने रखा जल भी क्यों नहीं ले सकता?
प्रेत को देना पड़ता है; वह स्वयं नहीं ले सकता
वक्ता कहते हैं कि चीज़ें प्रेत के ठीक सामने रखी हों तब भी वह उन्हें स्वयं नहीं ले सकता, जब तक कोई दे नहीं। गंगा जी हर जगह उपलब्ध हैं, फिर भी उनके तट पर पड़े सभी प्रेत-पिशाच वह जल पीकर तृप्त नहीं हो सकते — वे उसे ले ही नहीं सकते।
वक्ता कहते हैं कि प्रेत के सामने वे वस्तुएँ रखी होंगी और वह उन्हें स्वयं नहीं ले सकता — जब तक कोई उसे दे नहीं। गंगा जी हर जगह उपलब्ध हैं, फिर भी उनके तट पर पड़े सभी प्रेत-पिशाच वह जल पीकर तृप्त नहीं हो सकते। वे उस जल को ले ही नहीं पाएँगे। वे कहते हैं कि यह विघ्नहर्ता श्री गणेश धारावाहिक में बहुत अच्छी तरह दिखाया गया था, जब एक बार पूरी ज्ञानारी की श्रृंखला चली थी — देखने लायक है, और YouTube पर उपलब्ध है। उसमें जब ज्ञानारी प्रेत बन जाता है, तो वह गंगा जी का जल छू भी नहीं पाता; उसे उठाकर पी नहीं पाता। वह प्यासा है, पर प्रेत कभी जल नहीं ले सकता।
क्या कोई नकारात्मक शक्ति चौखट पूजा का चढ़ावा ले सकती है?
देहरी का दूषित होना दुर्लभतम स्थिति, और उसका उपाय
वक्ता कहते हैं कि किसी नकारात्मक शक्ति में चौखट की पूजा लेने की सक्षमता नहीं। यदि कोई तांत्रिक चौखट पर बैठकर कुछ अनुचित करके उसे दूषित करे, तो वह दुर्लभतम स्थिति में होता है, और केवल तब जब आपको जानकारी न हो। उपाय है नरसिंह बेला में, संध्या की गोधूलि में: बलि और निकारी के साथ चौखट का पूरा श्रृंगार पूजन करें, और जो भी प्रक्रिया की गई हो, कितनी भी बड़ी हो, तुरंत नष्ट हो जाएगी।
वक्ता कहते हैं कि और चौखट की पूजा लेने की सक्षमता किसी नकारात्मक शक्ति में नहीं है। यदि कोई चौखट को दूषित करे — कोई तांत्रिक वहाँ बैठकर कुछ अनुचित करे — तो वह दुर्लभतम स्थिति में होता है, और यह चीज़ तभी होगी जब आपको जानकारी न हो। वे कहते हैं कि तब भी एक शर्त है। यदि किसी ने ऐसा किया है, तो नरसिंह बेला में — संध्या के समय, जब ठीक नरसिंह काल होता है, गोधूलि बेला — ठीक उसी समय हम चौखट का पूरा श्रृंगार पूजन करेंगे और बलि देंगे, और निकारी करेंगे। उसने कितनी भी बड़ी प्रक्रिया की हो, वह तुरंत नष्ट हो जाएगी। वे जोड़ते हैं कि यहाँ भी कई बातें हैं: यदि कोई अशुद्ध अवस्था में कर रहा है, या गाली देते हुए कर रहा है, या मजबूरी में कर रहा है, तो वह भाव के अनुसार फल देगा — वह अलग विषय है।
देहरी को वापस पाने के लिए किस नरसिंह का आवाहन किया जाता है?
काशी के कोलाहल नरसिंह और उग्रवीर मंत्र
वक्ता काशी क्षेत्र के भगवान कोलाहल नरसिंह का नाम लेते हैं। उनका स्मरण करते हुए और उग्रवीर मंत्र का जप करते हुए चौखट पर बलि दें और वहाँ जो भी हो उसे हटाएँ — जो भी अधिकार जमाने की सोचकर आएगा, उसकी चीड़फाड़ हो जाएगी। वे कहते हैं कि कोलाहल नरसिंह का साबर बहुत तीव्र चलता है, और बेला सही हो तो उनका स्मरण मात्र भी पर्याप्त है।
काशी क्षेत्र के भगवान नरसिंह, कोलाहल नरसिंह जी महाराज — वक्ता कहते हैं कि भगवान कोलाहल नरसिंह का स्मरण करते हुए यदि आप उग्रवीर मंत्र का जप करके चौखट पर बलि आदि अर्पित करें और वहाँ जो भी हो उसे हटा दें, तो यदि कोई वहाँ अधिकार जमाने की सोचकर आएगा, तो उसकी चीड़फाड़ हो जाएगी। कोलाहल नरसिंह का सबर मंत्र आदि अत्यंत तीव्र चलता है। और साबर छोड़ दीजिए, मंत्र छोड़ दीजिए — केवल उग्रवीर मंत्र, और उनका सामान्य स्मरण भी चलेगा; पर बेला वैसी होनी चाहिए। और यदि सबसे तीव्र रूप करना है, तो वे कहते हैं — किसी की निंदा किए बिना, पर जैसा तांत्रिक विधि में है — गंगा जी की थोड़ी मिट्टी, और गिरनारी गौ माता जैसी एकदम देसी गाय का गोबर प्राप्त करें, और दोनों को मिलाकर दीपक बनाएँ।
कोलाहल नरसिंह के देहरी दीपक में प्रयोग होने वाली हल्दी की क्या शर्तें हैं?
कोलाहल नरसिंह दीपक के लिए हिंदू के अपने खेत की हल्दी, कुंवारी कन्या द्वारा उखाड़ी, सुखाई और पीसी हुई
खड़ी बाती का प्रयोग करें, केवल देसी गाय के दूध से बना घी लें, और उसमें थोड़ी पीली हल्दी मिलाएँ। हल्दी की अपनी तांत्रिक शर्त है: वह किसी हिंदू के अपने घर या खेत की हो; कोई कुंवारी कन्या जो अभी रजस्वला नहीं हुई, उसे उखाड़े और सुखाए; और हल्दी का चूर्ण उसी के हाथों से बने। वक्ता कहते हैं कि इस मंत्र से अभिमंत्रित करने पर यह प्रयोग दूसरी बार नहीं करना पड़ेगा।
वक्ता कहते हैं कि इसमें खड़ी बाती का प्रयोग करें, और घी केवल देसी गाय के दूध से ही बना हो। उसमें थोड़ी पीली हल्दी मिलाएँ। वे कहते हैं कि हल्दी में भी तंत्र में एक शर्त है: जो पीली हल्दी लगाई जाए, वह किसी हिंदू के अपने घर या खेत की हो, उसके अपने खेत की। कोई कुंवारी कन्या जो अभी तक रजस्वला नहीं हुई है, वह उसे उखाड़े और सुखाए, और उस हल्दी का चूर्ण उसी के हाथों से बने। वे कहते हैं कि यदि इसे इस मंत्र से अभिमंत्रित करके किया जाए, तो यह प्रयोग दूसरी बार नहीं करना पड़ेगा — चौखट पर किया गया प्रयोग पहली ही बार में सफल होता है। वे जोड़ते हैं कि इसमें थोड़ी और विधि और नियम है, पर वे मोटे तौर पर बता रहे हैं; बहुत सी बातें हैं, कोई इतना ही पालन कर ले।
घर में किन स्थानों पर पितरों के लिए जल रखना चाहिए?
चौखट, रसोई और तुलसी का स्थान
वक्ता कहते हैं कि तीन: पहला चौखट; दूसरा रसोई — उसका ईशान कोण, या नैऋत्य कोण, या पश्चिम दिशा; और तीसरा तुलसी जी का स्थान। उनका अपना मत है कि जहाँ सुविधा हो वहाँ रखें, क्योंकि दिशा के लिए तोड़-फोड़ नहीं की जा सकती। ऐसे स्थान पर रखा जल स्रोत केवल पितरों का होता है।
वक्ता कहते हैं कि पितरों के लिए इन स्थानों पर जल रखें: पहला चौखट; दूसरा आपके घर की रसोई, चाहे उसके ईशान कोण में, या नैऋत्य कोण में, या पश्चिम दिशा में। वे कहते हैं कि उनका अपना मत है कि जहाँ सुविधा हो वहाँ रखें, क्योंकि दिशा के प्रश्न पर तोड़-फोड़ नहीं की जा सकती। उस स्थान पर रखे जल स्रोत पर अधिकार केवल पितृ का होता है। वे कहते हैं कि प्रेत वहाँ हों भी, तो वे उसे न छू सकते हैं, न उसके साथ कुछ कर सकते हैं। और तीसरा तुलसी जी का स्थान है। यदि आप भगवती तुलसी के पास जल रखें, तो उसे कोई नहीं ले पाएगा।
क्या कोई भी आत्मा पितरों के लिए रखा जल स्वयं ले सकती है?
ब्रह्मराक्षस को भी माँगना पड़ता है
नहीं। वक्ता कहते हैं कि पितर जिसे चाहेंगे उसे देंगे; आप सीधे किसी को नहीं दे रहे, और कोई उसे ले नहीं पाएगा। ब्रह्मराक्षस भी वहाँ बैठकर आपके साथ क्रिकेट खेल रहा हो, आपको दोस्त कह रहा हो, तो जब उसे पानी चाहिए होगा तो उसे आपसे माँगना पड़ेगा — वह स्वयं लेकर पी नहीं सकता।
वक्ता कहते हैं कि पितर जिन्हें देना चाहेंगे, उन्हें देंगे। आप सीधे किसी को नहीं दे रहे, और कोई उसे ले नहीं पाएगा। कोई ब्रह्मराक्षस भी वहाँ बैठकर आपके साथ क्रिकेट खेल रहा हो — आओ दोस्त, खेलते हैं — तो जब उसे पानी चाहिए होगा, वह आपसे कहेगा, दोस्त, पानी पिला दो। वह स्वयं लेकर पी नहीं सकता। वे कहते हैं कि तुलसी जी का प्रसंग याद करें। जैसी कथा लोक में कही जाती है, उसमें तुलसी जी का जल बिना जानकारी के ले जाकर डाल दिया गया; पर जब आप तंत्र मार्ग पर ये बातें पढ़ते हैं, जब ये सारे विषय आते हैं, तो उसका संदर्भ मिलता है। वे कहते हैं कि छोड़िए — अधिक बोलेंगे तो कुछ लोगों को कठिनाई होगी। इसलिए प्रेत इन चीज़ों पर कभी कोई अधिकार नहीं जमा पाएँगे। निश्चिंत रहें।
यदि स्वप्न में कोई चौखट पर भोजन माँगे, तो क्या करना चाहिए?
अमावस्या पर पंचबलि, और किसी द्विज को भोजन
यदि आप विशेषकर देखें कि चौखट पर कोई आपसे अन्न, अक्षत या पानी माँग रहा है, तो वक्ता कहते हैं कि पहला काम पितरों के लिए पंचबलि है, जो अमावस्या तिथि पर अलग से और विशेष रूप से की जाए। और संभव हो तो किसी ऐसे वेदपाठी ब्राह्मण को बुलाएँ जो खैनी, तंबाकू, गुटखा, बीड़ी या शराब का सेवन न करता हो — या क्षत्रिय वर्ण के, या वैश्य वर्ण के किसी को; वह द्विज होना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि एक व्यक्तिगत प्रश्न पूछा गया था, जिसका उत्तर वे नाम बताए बिना दे रहे हैं क्योंकि वह सबके लाभ के लिए है। प्रश्न: यदि आप स्वप्न में विशेषकर देखें कि चौखट पर कोई आपसे अन्न माँग रहा है, या अक्षत माँग रहा है, या पानी माँग रहा है — तो सबसे पहले क्या करना चाहिए? वे कहते हैं कि अमावस्या तिथि पर पितृों के लिए अलग से और विशेष रूप से पंचबलि करनी चाहिए। और संभव हो तो किसी ऐसे वेदपाठी ब्राह्मण को बुलाएँ जो खैनी, तंबाकू, गुटखा, बीड़ी या शराब न खाता-पीता हो — ऐसे ब्राह्मण व्यक्ति को; या क्षत्रिय वर्ण के, या वैश्य वर्ण के किसी को। वह द्विज होना चाहिए।
बुलाए गए ब्राह्मण को क्या खिलाना चाहिए, और इसे किसे नहीं खाना चाहिए?
देहरी पर खीर, और खाने वाले का खर्च होने वाला पुण्य
उन्हें खीर खिलानी चाहिए, और मंदिर में खिलाने के बजाय वे घर आकर चौखट पार करें तो बेहतर है। पर वक्ता कहते हैं कि जानकार लोग उस दिन खीर नहीं खाते, क्योंकि वह भोजन लेने में उनका अपना पुण्य खर्च होगा। जिनके पास पुण्य नहीं, वे बस आएँगे, आपका काम बिगाड़ेंगे और चले जाएँगे — और यदि ऐसा व्यक्ति खाने के बाद खैनी मले, तो वह प्रेत को भी मिलती है।
यदि वह नियम और निष्ठा वाला व्यक्ति है, सात्विक है, भजनानंदी है, तो लोकाचार में ब्राह्मण का महत्व उसी तरह है — यदि ऐसे ब्राह्मण मिल जाएँ, तो अच्छी बात है। नहीं तो मंदिर में करें; पर यदि वे घर आकर चौखट पार करें, तो वह बेहतर है। उन्हें खीर का भोजन देना चाहिए। और वे कहते हैं कि जो जानकार हैं, वे उस दिन खीर नहीं खाते — यह भी जान लें। क्योंकि जब वह भोजन लिया जाता है, तो खर्च होने वाला पुण्य उनका होगा। इसीलिए वे यह कहते हैं: जिनके पास पुण्य ही नहीं, वे क्या खर्च करेंगे? वे आएँगे, आपका काम बिगाड़ेंगे और चले जाएँगे। अब उन्होंने आपके यहाँ खाया और यहीं खैनी भी मल रहे हैं — पितर खैनी नहीं लेंगे। जब पितर उनके शरीर में बैठकर उनके माध्यम से भोजन ग्रहण करने वाले हैं, यदि वे गायत्री करने वाले ब्राह्मण हैं, तो जब वे खैनी मलेंगे तो प्रेत को भी वह मिलेगी।
यदि किसी को ब्राह्मणों से द्वेष हो तो?
दूसरे का पाप अपने सिर न लेना
वक्ता कहते हैं कि यदि इस प्रकार का स्वप्न आए, तो ऐसे लोगों को बुलाएँ जो शुद्ध और सात्विक हों, और उन्हें खीर खिलाएँ; यदि पानी दिख रहा हो, तो गायों को जितना हो सके पानी पिलाएँ। जो ब्राह्मणों से द्वेष रखते हैं, उनसे वे कहते हैं: दुनिया क्या कर रही है यह देखकर अपनी नाव न डुबाएँ। यदि कोई ब्राह्मण गलत करता है, तो वह उसका जीवन है — उसकी आलोचना करके उसका पाप अपने सिर क्यों लें?
वक्ता कहते हैं कि इसलिए यह काम न करें। यदि विशेषकर इस प्रकार का स्वप्न आए, तो ऐसे लोगों को बुलाएँ जो शुद्ध और सात्विक हों और उन्हें खीर खिलाएँ। यदि आपको पानी आदि दिख रहा है, तो गौ माता को जितना हो सके पानी पिलाएँ। यदि आप ब्राह्मणों से द्वेष रखते हैं, या आपको यह बड़ी समस्या है कि नहीं भाई, ब्राह्मण को मत बुलाओ — बहुत लोगों को यह द्वेष है — तो दुनिया क्या कर रही है यह देखकर अपनी नाव न डुबाएँ। वे कहते हैं कि यह हमारा कर्तव्य नहीं: यदि कोई ब्राह्मण गलत काम कर रहा है, तो वह उसका जीवन है, वह जैसा करता है करे। हम बोलकर, टोककर, या उसकी निंदा करके उसका पाप अपने सिर क्यों लें? यदि हम कोई पाप कर रहे हैं, या हमारी किसी बात से आप परेशान होकर हमारी निंदा करते हैं, तो आप हमारा पाप अपने सिर ले लेंगे। बेकार में किसी का पाप सिर पर लेने की क्या जरूरत? वे जोड़ते हैं कि वे स्वयं लोकाचार के उद्देश्य से जो भी करते हैं, उसकी नकल न करें — यह न सोचें कि उन्होंने किसी को गाली दी, तो आप भी देंगे। वे कहते हैं कि उनका विषय अलग है: बहुत लोग हैं जो तब तक नहीं समझते जब तक बात उसी तरह न कही जाए, और उनका उद्देश्य है कि श्रोता सही मार्ग पर आएँ।
चौखट पर अन्न, अक्षत या पानी माँगे जाने के स्वप्न का सार रूप उपाय क्या है?
घर पर ब्राह्मण को दूध की खीर, या गाय को भोजन
वक्ता कहते हैं कि यदि ऐसा स्वप्न आए, तो अपने घर पर ब्राह्मण को बुलाकर दूध से बनी खीर खिलाएँ; या यदि इसमें कठिनाई हो, तो गौ माता को भोजन कराएँ। यह सबसे पहला काम है जो करना चाहिए, और अवश्य करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि इसलिए यदि इस प्रकार का स्वप्न आए, तो अपने घर पर ब्राह्मण को बुलाएँ और उन्हें दूध से बनी खीर खिलाएँ। या फिर, यदि इसमें आपको कठिनाई हो, तो गौ माता को भोजन कराएँ। वे कहते हैं कि यह सबसे पहला करने वाला काम है, और यह अवश्य करना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि यह जल सेवा उनके लिए नहीं है — वे आपके घर पानी पीने नहीं आएँगे, और इसमें उनकी कोई शक्ति नहीं जाती। आपके अपने पितर प्रसन्न होंगे, उन्हें इससे तृप्ति मिलेगी, और वे आपके अपने कुल और वंशजों पर अपनी कृपा करेंगे।
जन्म सूतक में नई माँ में अभिचार के लक्षण क्यों दिखते हैं?
डाकिनी दोष, स्थान उल्लंघन और पहले से मौजूद अभिचार का उग्र होना
वक्ता कहते हैं कि अभिचारिक स्थिति संभव है, पर निन्यानवे प्रतिशत मामलों में होता यह है कि पहले से मौजूद अभिचार उस समय उग्र हो जाता है। स्थान उल्लंघन का दोष लगता है — वह अस्पताल गई है, और ऐसी जगह पचास तरह के विषय होते हैं। पहले से कष्ट में पड़े पितर भी कुछ परेशानी दे सकते हैं। पर वे कहते हैं कि इसमें सबसे बड़ी बात डाकिनी दोष से जुड़ी होती है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरा प्रश्न ऐसा है जो जीवन में किसी के साथ कभी भी हो सकता है: यदि किसी के घर जन्म सूतक लगा है, और नवजात को जन्म देने वाली माँ के शरीर में किसी प्रकार के अभिचारिक लक्षण दिखने लगें, या भूत-प्रेत से ग्रस्त होने के लक्षण दिखने लगें। वे कहते हैं कि इसमें जो दोष लगता है, वह प्रायः इस प्रकार है। अभिचार की स्थिति हो सकती है। पर कई बार, निन्यानवे प्रतिशत मामलों में, यह भी होता है — कि पहले से मौजूद अभिचार उस समय उग्र हो जाता है। स्थान उल्लंघन का दोष लगता है: वह अस्पताल गई है, और उस जगह पचास तरह के विषय होते हैं, और वहाँ भी कठिनाई आती है; और जो पहले से था, वह भी कठिनाई देता है। कई बार यदि पितृ पहले से कष्ट में हैं, अव्यवस्था में हैं, तो वे भी उस समय थोड़ी परेशानी दे सकते हैं। पर इसमें सबसे बड़ी बात डाकिनी दोष से जुड़ी होती है।
अग्नि उतारा क्या है, और इसके लिए क्या प्रयोग किया जा सकता है?
जलते कपूर से किया जाने वाला जीवंत उतारा
वक्ता कहते हैं कि जहाँ यह समस्या आए, वहाँ यदि आपने भगवान बटुक भैरव के किसी मंत्र का, या कामरूप कामाख्या कवच आदि का पुरश्चरण किया है, तो उनसे अग्नि उतारा करना चाहिए। अग्नि उतारा में कुष्मांडी पर कपूर रखकर जलाया जाता है, या नींबू काटकर उस पर जलाया जाता है, या नारियल पर जलाया जाता है। इसे लगातार करना चाहिए — अग्नि उतारा का अर्थ है ज्वलंत, जीवंत उतारा।
वक्ता कहते हैं कि जहाँ यह विषय आए, वहाँ यदि आपने भगवान बटुक भैरव के किसी मंत्र का, या भगवती कामरूप कामाख्या के कामाख्या कवच आदि का पाठ किया है, तो उनसे अग्नि उतारा कैसे करना है, यह वे लाइव में कई बार समझा चुके हैं। वे कहते हैं कि अग्नि उतारा में हम कुष्मांडी पर कपूर रखकर जलाते हैं; या नींबू काटकर उस पर जलाते हैं; या नारियल पर जलाकर उतारा करते हैं। इसका उतारा लगातार करना चाहिए। अग्नि उतारा का अर्थ है ज्वलंत, यानी जीवंत उतारा — इसे इसी तरह समझें।
अग्नि उतारा के लिए नारियल कैसे तैयार किया जाता है?
जटा सहित पानी वाला पूरा नारियल
एक नारियल लें। चाहे आपने भगवान बटुक भैरव के ब्रह्म कवच का जप केवल सौ बार किया हो — हज़ार या दस हज़ार छोड़िए, सौ भी चलेगा — जटा सहित, पानी वाला एक पूरा नारियल लें।
वक्ता पूछते हैं कि कैसे करना है, और उत्तर देते हैं: एक नारियल लें। मान लीजिए आपने भगवान बटुक भैरव जी के ब्रह्म कवच का जप सौ बार भी किया है — हज़ार या दस हज़ार छोड़िए, सौ बार भी किया हो। तो आप एक नारियल लेंगे, पूरा, पानी वाला, जिस पर जटा बनी हुई हो। (इसी हिस्से में वे एक श्रोता को उत्तर देते हैं कि कुंभ से मिली जप माला पर देव दीक्षा अवश्य की जा सकती है।)
उतारा करने से पहले कौन से मंत्र पहले से सिद्ध होने चाहिए?
बटुक भैरव का स्तोत्र, उनका साबर, और आपात मंत्र
नारियल पर एक गोटा कपूर रखें, जो कुछ देर जले। आपको बटुक भैरव के स्तोत्र और शतनाम का, या आप जो बटुक भैरव मंत्र करते हैं उसका, पहले से अभ्यास होना चाहिए; नहीं तो चैनल पर दिया बटुक भैरव साबर। वक्ता कहते हैं कि बामंती कालिका आपात स्थिति के लिए तैयार रखें पर रोज़ पाठ न करें, और जंजीरा भी वैसे ही। वे बताते हैं कि सूतक में कई देवताओं की पूजा नहीं की जा सकती।
वक्ता कहते हैं कि जटा वाला नारियल लें, और उस पर एक गोटा कपूर रखें — जो थोड़ी देर जलता रहे। और आपको अभ्यास होना चाहिए: बटुक भैरव जी के स्तोत्र और शतनाम का अभ्यास, या आप जो बटुक भैरव मंत्र करते हैं उसका। नहीं तो सबर मंत्र में बटुक भैरव साबर दिया गया था; वे कई बार कह चुके हैं कि इसे आपात स्थिति के लिए तैयार रखें, क्योंकि जरूरत कभी भी पड़ सकती है। वे कहते हैं कि बामंती कालिका आपात स्थिति के लिए तैयार रखनी चाहिए — इसका पाठ रोज़ नहीं करना है। जंजीरा आदि आपात स्थिति के लिए तैयार रखें; यही वह समय है जब यह सब काम आता है। अब सूतक में बहुत सारे देवताओं की पूजा नहीं की जा सकती; वह सब नहीं किया जा सकता।
सूतक में कौन सा मंत्र काम करता है, और नारियल को कैसे अभिमंत्रित करें?
सूतक में बामंती कालिका, और लौ जलते समय अभिमंत्रण
वक्ता कहते हैं कि बामंती कालिका काम करेगी — बामंती कालिका मंत्र सूतक में चलेगा, और और भी तेज़ चलेगा। वे बताते हैं कि यह गृहस्थ विषय से थोड़ा हटकर है, पर व्यक्ति को ऐसी चीज़ें तैयार रखनी चाहिए; यदि डर हो, तो न करें। फिर अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन मंत्रों से नारियल को अभिमंत्रित करें, केवल तब तक जब तक आग जल रही हो।
वक्ता कहते हैं कि पर बामंती कालिका होगी — बामंती कालिका मंत्र सूतक में चलेगा, और उसमें और भी तेज़ चलेगा। वे मानते हैं कि यह गृहस्थ से थोड़ा हटकर विषय बन जाता है, पर व्यक्ति को पूरे नीति-नियम के साथ ऐसी बातें तैयार रखनी चाहिए। यदि आपको डर है, यदि आप डरते हैं कि यह हो जाएगा या वह हो जाएगा, तो न करें — ताकि कल यह न कहा जाए कि उन्होंने कहा इसलिए आपने किया। वे कहते हैं कि वे इसे केवल जानकारी के रूप में रख रहे हैं, और क्षमा माँगते हुए कह रहे हैं। फिर उस नारियल को अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन मंत्रों से अभिमंत्रित करें — केवल तब तक जब तक आग जल रही हो, उससे अधिक नहीं। उदाहरण के लिए, यदि बामंती काली मंत्र है, तो नारियल पर कपूर जलते समय पाँच या दस करें; इसीलिए गोटा बड़ा होना चाहिए।
उतारा पीड़ित व्यक्ति पर कैसे किया जाता है और उसका निपटान कैसे होता है?
सिर के ऊपर से उल्टा उतारा, फिर बाहर नारियल फोड़ना
उसके बाद, जिसे समस्या है उस पर सिर के ऊपर से पूरा उल्टा उतारा करें — पाँच बार या सात बार। फिर नारियल को बाहर ले जाकर मुख्य द्वार से थोड़ा बाहर अच्छी तरह फोड़ दें। फोड़ने के बाद या तो उसे आग में डाल दें, या कोई पुरुष उसे उठाकर दूर ले जाए और किसी एकांत स्थान पर रख दे, छोड़ दे या गाड़ दे; फिर हाथ धोकर भीतर आएँ।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद, जिस व्यक्ति पर समस्या है, उस पर सिर के ऊपर से पूरा उल्टा उतारा करें — उल्टा उतारा पाँच बार या सात बार। फिर उस नारियल को बाहर ले जाकर घर से थोड़ा बाहर, यानी मुख्य द्वार से थोड़ा बाहर, अच्छी तरह फोड़ दें। बस इतना ही करना है। फोड़ने के बाद या तो उस नारियल को आग में डाल दें; या कोई पुरुष उसे उठाकर दूर किसी एकांत स्थान पर ले जाए, और रख दे, छोड़ दे या गाड़ दे। फिर हाथ धोकर भीतर आएँ।
उतारा किस समय और किन स्तोत्रों के साथ करना चाहिए?
संध्या, जब दोनों बेला बराबर हों
वक्ता कहते हैं कि यह संध्या के समय किया जाए, जब दोनों बेला बराबर हों, तो अति उत्तम है। यह भगवान नरसिंह के मंत्र से, नरसिंह माला मंत्र आदि से किया जा सकता है; बटुक भैरव जी के स्तोत्र और शतनामावली से, या श्रद्धा की हो तो उनके साबर मंत्र से; या हनुमान जी के जंजीरा से, या उनके अन्य मंत्रों से, या बजरंग बाण से, जिसे वे कहते हैं कि सब सिद्ध रखते हैं और कोई भी कर सकता है।
वक्ता कहते हैं कि यह संध्या के समय किया जाए, जब दोनों बेला बराबर हों, तो अति उत्तम है। यह भगवान नरसिंह के मंत्र से, नरसिंह माला मंत्र आदि से किया जा सकता है। बटुक भैरव जी के स्तोत्र और शतनामावली से करें, या उनके सबर मंत्र से, यदि आपने उसके लिए श्रद्धा की है। या यदि आप हनुमान जी का करते हैं, तो जंजीरा से करें; या हनुमान जी के अन्य मंत्रों से; या यदि बजरंग बाण से करना चाहें — जिसे सब सिद्ध रखते हैं और कोई भी कर सकता है — तो उससे करें।
उतारा कितने दिन तक जारी रखना चाहिए?
शनिवार, मंगलवार या रविवार से लगातार पाँच दिन
किसी भी दिन आरंभ करें — शनिवार, मंगलवार या रविवार — और अगले पाँच दिन तक जारी रखें। यदि उन्हें राहत न मिल रही हो, तो संख्या बढ़ाएँ। साथ में चौखट पर उतारा और बलि शुरू करें, और क्षेत्रपाल निकारी भी करें; वक्ता कहते हैं कि तब तेज़ी से राहत मिलेगी।
वक्ता कहते हैं कि यह लगातार एक क्रम में चलेगा। कब और कितनी बार? किसी भी दिन आरंभ करें — शनिवार, मंगलवार या रविवार — और अगले पाँच दिन तक जारी रखें। यदि उन्हें राहत न मिल रही हो, तो संख्या बढ़ाएँ। चौखट पर उतारा और चौखट पर बलि आरंभ करें, जिसकी बात वे बार-बार करते हैं। और उसके साथ क्षेत्रपाल निकारी भी करें। यह सब करने से उन्हें तेज़ी से राहत मिलेगी। वे कहते हैं कि दूर से की गई प्रक्रियाएँ असर देंगी, पर वह असर तभी प्रचंड होता है जब आप स्वयं सामने से उनके शरीर का पूरा आभामंडल साफ़ करें और उन नकारात्मक ऊर्जाओं को हटाएँ। तभी वह चीज़ हटेगी।
चंडी पाठ का साप्ताहिक क्रम क्या है?
सोमवार से शुक्रवार पाठ, शनिवार हवन, रविवार देवी सूक्त
वक्ता पुष्टि करते हैं कि एक श्रोता सर्व सिद्धि महाविद्या क्रम का रोज़ पाठ कर सकता है, और चंडी पाठ करना चाहने वालों के लिए नियम बताते हैं: सोमवार से शुक्रवार तक करें, और शनिवार को हवन करें। रविवार को आराम करने के बजाय देवी सूक्त आदि का पाठ नौ या ग्यारह बार करें — वे कहते हैं कि यह अवश्य करना चाहिए और इससे और भी अच्छा होगा।
एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि उसने जो बताया है वह अवश्य कर सकता है — सर्व सिद्धि महाविद्या का क्रम में रोज़ पाठ; ठीक यही करना चाहिए। वे कहते हैं कि जो चंडी पाठ करना चाहते हैं, उनके लिए यही नियम है: सोमवार से शुक्रवार तक करें, और शनिवार को हवन करें। रविवार को आराम करने के बजाय — क्योंकि आप चंडी पाठ तो कर ही रहे हैं — देवी सूक्त आदि का पाठ नौ बार या ग्यारह बार करें। वे कहते हैं कि यह अवश्य करना चाहिए, और ऐसा करना और भी अच्छा होगा।
तांत्रिक हमले से पीड़ित व्यक्ति के लिए नरसिंह कवच कैसे आरंभ करें?
नरसिंह माला मंत्र कवच से अधिक प्रचंड है
एक बहन पर लंबे समय से तांत्रिक क्रिया हुई है और कोई तांत्रिक उसे ठीक नहीं कर पाया — उसके लिए नरसिंह जयंती से नरसिंह कवच कैसे आरंभ करें, यह पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि भगवान नरसिंह का ही करना है, तो नरसिंह माला मंत्र कवच से अधिक प्रचंड है। दोनों करें: एक कवच के लिए माला मंत्र पाँच बार। और बहन की समस्या के लिए कामाख्या कवच सबसे अच्छा है।
एक श्रोता लिखता है कि उसकी बहन पर लंबे समय से तांत्रिक क्रिया हुई है, कोई तांत्रिक उसे ठीक नहीं कर पाया, और अब वह नरसिंह जयंती से नरसिंह कवच करवाना चाहता है। वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि भगवान नरसिंह का काम करना है, तो नरसिंह कवच से अधिक प्रचंड नरसिंह माला मंत्र है। वे कहते हैं कि कवच और माला मंत्र दोनों करें: यदि कवच एक बार करें, तो माला मंत्र पाँच बार करें — इस तरह करने से बेहतर होगा। और यदि समस्या बहन की है, तो यदि वह स्वयं कामाख्या कवच करे, तो वह सबसे अच्छा है।
कामाख्या कवच के पाठ के साथ और क्या बताया गया है?
खाली पेट कामाख्या का जल
वक्ता कहते हैं कि किसी से कामाख्या जी का जल मँगवाएँ, उसे रोज़ खाली पेट पीने को कहें, और साथ में कामाख्या कवच का पाठ करने को कहें। वे कहते हैं कि यह अत्यंत अद्भुत असर देने वाला है।
वक्ता कहते हैं कि किसी से कामाख्या जी का जल मँगवा लें। उसे रोज़ खाली पेट पीने को कहें, और साथ में कामाख्या कवच का पाठ करने को कहें। वे कहते हैं कि यह अत्यंत अद्भुत असर देने वाला है।
क्या श्री विद्या में दीक्षित व्यक्ति माया बीज का जप अलग से कर सकता है?
गुरु का एक आदेश पर्याप्त है
एक श्रोता ने श्री विद्या में प्रारंभिक दीक्षा ली है, माया बीज में अलग दीक्षा नहीं है, पर उसका जप करना चाहता है; वक्ता उत्तर देते हैं कि एक बार गुरु का आदेश ले लें। जिन्होंने दीक्षा दी है उनसे एक बार कहें — "गुरुजी, हमें एक बार आदेश दे दीजिए" — और यदि वे बस इतना कह दें, तो अति उत्तम है।
एक श्रोता पूछता है कि श्री विद्या में प्रारंभिक दीक्षा लेने के बाद क्या वह माया बीज का जप अलग से कर सकता है, क्योंकि उसकी केवल माया बीज में अलग दीक्षा नहीं है, पर वह करना चाहता है। वक्ता उत्तर देते हैं: एक बार गुरु का आदेश ले लें। जिन्होंने दीक्षा दी है, जिनसे आपकी दीक्षा हुई है, उनसे एक बार कहें — "गुरुजी, हमें एक बार आदेश दे दीजिए" — और यदि वे बस इतना कह दें, तो अति उत्तम है।
शरीर पर रुद्राक्ष सबसे पहले कहाँ धारण किया जाता है?
शिखा में छिपा बारह मुखी, कानों में सात या आठ मुखी
वक्ता पुष्टि करते हैं कि रुद्राक्ष का जनेऊ होता है। रुद्राक्ष सबसे पहले सिर पर धारण होता है — जटा हो तो जटा के ऊपर, या शिखा में। बारह मुखी, जो द्वादश आदित्य का प्रतीक है, शिखा में छिपाकर धारण किया जाता है। कानों में सात मुखी सबसे अच्छा कहा गया है, या आठ मुखी। पंचमुखी हर जगह धारण किया जा सकता है जहाँ धारण करना उचित हो।
वक्ता पुष्टि करते हैं कि रुद्राक्ष की माला होती है, और रुद्राक्ष का जनेऊ भी होता है — वह अवश्य होता है। रुद्राक्ष हम सबसे पहले अपने सिर पर धारण करते हैं: जटा हो तो जटा के ऊपर, नहीं तो जो शिखा रखी जाती है उसमें। बारह मुखी रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला ।, जो भगवान द्वादश आदित्य का प्रतीक है, शिखा में छिपाकर धारण किया जाता है। वे कहते हैं कि पूरी चीज़ का प्रदर्शन नहीं — देखो, हमने रुद्राक्ष पहना है — नहीं; कम से कम उनमें से एक को हमें छिपाकर रखना चाहिए। दूसरा, उसके बाद कानों में पहने जाने वाले कुंडल में रुद्राक्ष होना चाहिए। कानों में पहने जाने वालों में सात मुखी रुद्राक्ष सबसे अच्छा कहा गया है, या आठ मुखी; कान में सात या आठ मुखी पहना जा सकता है। पंचमुखी तो आप हर जगह पहन सकते हैं — यानी हर उस स्थान पर जहाँ इसे पहनना उचित हो।
गले, कलाई और भुजाओं पर कितने मुखी रुद्राक्ष पहने जाते हैं?
दाएँ छह मुखी, बाएँ नौ मुखी, यज्ञोपवीत के लिए पंचमुखी
तीसरा, गले में कंठी और माला के रूप में सभी रुद्राक्ष पहने जा सकते हैं। मणिबंध और बाहु — बाजू बंद — के लिए वक्ता कहते हैं कि दाएँ हाथ में और मणिबंध में छह मुखी, और बाएँ में नौ मुखी सबसे अच्छा है। यज्ञोपवीत के रूप में पंचमुखी सबसे अच्छे हैं।
वक्ता कहते हैं कि तीसरा, उसके बाद गले में, कंठी के रूप में और माला के रूप में — उसमें सभी रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । पहने जा सकते हैं। जो मणिबंध के रूप में और भुजा पर पहने जाते हैं — बाजू बंद — तो बाजू बंद के रूप में दाएँ हाथ में छह मुखी, मणिबंध में भी छह मुखी, और बाएँ में नौ मुखी पहनना सबसे अच्छा है। उसके बाद यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। आता है; यज्ञोपवीत के रूप में पंचमुखी सबसे अच्छे हैं।
कमर पर पहने जाने वाले रुद्राक्ष का निर्णय किससे होता है?
अपनी कुल दीक्षा से तय होने वाला कमरबंद
वक्ता कहते हैं कि कमरबंद पर सबसे विशेष बात आती है: यदि आप परंपरा के अनुसार चलना चाहते हैं, तो जिस कुल में दीक्षित हैं उसके अनुसार पहनें, क्योंकि सबसे विशेष स्थान यहीं है — नाभि, जिससे हमें सब कुछ मिलता है। उदाहरण के लिए भगवती के कामाख्या कुल में दीक्षित व्यक्ति पूरा पंचमुखी मणिबंध पहनेगा, पर उसमें एक तेरह मुखी या एक तीन मुखी अवश्य होगा।
वक्ता कहते हैं कि उसके बाद कमरबंद आता है, और कमरबंद पर आते ही हम सबसे विशेष बात पर पहुँचते हैं। विषय यह है कि यदि आप परंपरा के अनुसार चलना चाहते हैं, तो आपको जिस कुल में आप दीक्षित हैं उसके अनुसार पहनना चाहिए — क्योंकि अपना सबसे विशेष स्थान यहीं है: नाभि, जिससे हमें सारी चीज़ें मिलती हैं। इसलिए उदाहरण के लिए, भगवती के कामाख्या कुल में दीक्षित व्यक्ति पूरा पंचमुखी मणिबंध पहनेगा, पर उसमें एक तेरह मुखी, या एक तीन मुखी अवश्य होगा। ठीक इसी तरह यह कमर के ऊपर के भाग तक जाता है — यह ठीक कमर पर नहीं, नाभि के पास होगा। इस तरह रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । धारण करने का विषय है।
कितने रुद्राक्ष पहने जा सकते हैं, और इनका माहात्म्य कहाँ वर्णित है?
पाँच सौ, और एक हज़ार आठ और भी अच्छा
वक्ता कहते हैं कि पाँच सौ रुद्राक्ष पहनना मान्य है, और एक हज़ार आठ पहने जाएँ तो और भी अच्छा माना गया है। वे श्रोताओं से कहते हैं कि शिव महापुराण में रुद्राक्ष माहात्म्य एक बार देखें और उसका अध्ययन करें, इससे पूरी अवधारणा स्पष्ट हो जाएगी।
वक्ता कहते हैं कि पाँच सौ रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । पहनना मान्य किया गया है, और यदि एक हज़ार आठ पहने जाएँ तो और भी अच्छा माना गया है। वे कहते हैं कि शिव महापुराण में रुद्राक्ष माहात्म्य एक बार देखें — उसका स्वाध्याय करें। ऐसा करने से आपकी पूरी अवधारणा स्पष्ट हो जाएगी।
शास्त्र क्या कहता है
Wearing large numbers of rudrākṣa is prescribed for various parts of the body — five hundred across the two shoulders (also 550 for a crown), eleven hundred as a complete rule, and a thousand for the fullest effect, at which all the gods bow to the wearer as to Rudra himself.
The chapter gives 500 (shoulders), 550 (crown), 1,100 and 1,000 as its own counts; it does not use the figure "1,008" the speaker names as better than 500, though 108 does appear elsewhere in the same chapter for a separate sacred-thread garland. The general shape of the claim — larger counts prescribed for greater effect, up to a thousand — is what this citation covers.
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रुद्राक्षधारणं प्रोक्तं महापातकनाशनम्। रुद्रसङ्ख्याशतं धृत्वा रुद्ररूपो भवेन्नरः॥ २४
रुद्राक्ष धारण करना महापापोंका नाश करनेवाला कहा गया है। ग्यारह सौ रुद्राक्ष धारण करके मनुष्य रुद्ररूप हो जाता है।
एकादशशतानीह धृत्वा यत्फलमाप्यते। तत्फलं शक्यते नैव वक्तुं वर्षशतैरपि॥ २५
यहाँ ग्यारह सौ रुद्राक्ष धारण करके जो फल मिलता है, वह सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं कहा जा सकता।
शतार्धेन युतैः पञ्चशतैर्वै मुकुटं मतम्। रुद्राक्षैर्विरचेत्सम्यग्भक्तिमान्पुरुषो वरः॥ २६
पाँच सौ पचास रुद्राक्षोंका मुकुट ठीक माना गया है। श्रेष्ठ भक्तिमान् पुरुष उसे भली भाँति बनाये।
त्रिभिः शतैः षष्टियुक्तैस्त्रिरावृत्त्या तथा पुनः। रुद्राक्षैरुपवीतं च निर्मीयाद्भक्तितत्परः॥ २७
फिर भक्तिमें लगा हुआ पुरुष रुद्राक्षोंका यज्ञोपवीत बनाये। उसमें तीन सौ साठ दाने तीन लड़ोंमें हों।
शिखायां च त्रयं प्रोक्तं रुद्राक्षाणां महेश्वरि। कर्णयोः षट् च षट् चैव वामदक्षिणयोस्तथा॥ २८
हे महेश्वरी! शिखामें तीन रुद्राक्ष बताये गये हैं। बायें और दायें कानमें छः-छः।
शतमेकोत्तरं कण्ठे बाह्वोर्वै रुद्रसङ्ख्यया। कूर्परद्वारयोस्तत्र मणिबन्धे तथा पुनः॥ २९
कण्ठमें एक सौ एक। दोनों भुजाओंमें ग्यारह-ग्यारह, और फिर दोनों कुहनियों और कलाइयोंमें भी ग्यारह-ग्यारह।
उपवीते त्रयं धार्यं शिवभक्तिरतैर्नरैः। शेषानुर्वरितान्पञ्च सम्मितान्धारयेत्कटौ॥ ३०
शिवभक्तिमें लगे मनुष्योंको यज्ञोपवीतमें तीन रुद्राक्ष धारण करने चाहिये। बचे हुए पाँच कमरमें धारण करे।
एतत्सङ्ख्या धृता येन रुद्राक्षाः परमेश्वरि। तद्रूपं तु प्रणम्यं हि स्तुत्यं सर्वैर्महेशवत्॥ ३१
हे परमेश्वरी! जिसने इतनी संख्यामें रुद्राक्ष धारण किये हैं, उसका रूप महेशके समान सबके लिये प्रणाम और स्तुतिके योग्य है।
एवंभूतं स्थितं ध्याने यदा कृत्वासने जनम्। शिवेति व्याहरंश्चैव दृष्ट्वा पापैः प्रमुच्यते॥ ३२
ऐसा मनुष्य आसन लगाकर ध्यानमें बैठे और "शिव" कहता रहे। उसे देखकर मनुष्य पापोंसे छूट जाता है।
शताधिकसहस्रस्य विधिरेष प्रकीर्तितः। तदभावे प्रकारोऽन्यः शुभः सम्प्रोच्यते मया॥ ३३
यह ग्यारह सौ रुद्राक्षोंकी विधि कही गयी। उनके न होनेपर मैं दूसरा शुभ प्रकार बताता हूँ।
शिखायामेकरुद्राक्षं शिरसा त्रिंशतं वहेत्। पञ्चाशच्च गले दध्याद् बाह्वोः षोडश षोडश॥ ३४
शिखामें एक रुद्राक्ष और सिरपर तीस धारण करे। गलेमें पचास और दोनों भुजाओंमें सोलह-सोलह पहने।
मणिबन्धे द्वादश द्विस्कन्धे पञ्चशतं वहेत्। अष्टोत्तरशतैर्माल्यमुपवीतं प्रकल्पयेत्॥ ३५
कलाइयोंमें बारह और दोनों कन्धोंपर पाँच सौ धारण करे। एक सौ आठ दानोंकी माला बनाकर यज्ञोपवीतके रूपमें पहने।
एवं सहस्ररुद्राक्षान्धारयेद्यो दृढव्रतः। तं नमन्ति सुराः सर्वे यथा रुद्रस्तथैव सः॥ ३६
जो दृढ़ व्रतवाला इस प्रकार एक हजार रुद्राक्ष धारण करता है, उसको सब देवता नमस्कार करते हैं। जैसे रुद्र हैं, वैसा ही वह है।
रुद्राक्ष को कैसे पिरोएँ और उनकी पूजा कैसे करें?
एक धागा या चाँदी की चेन, अभिषेक और धूप-दीप के साथ
वक्ता कहते हैं कि यदि पहनना हो, तो सबसे अच्छा है कि सभी रुद्राक्ष एक ही धागे में हों, या चाँदी की चेन बनवा लें। यदि पूजा के लिए रखने हों, तो पूजा के स्थान पर उनका अभिषेक करना है, और साथ में धूप और दीप।
वक्ता कहते हैं कि यदि पहनने की इच्छा हो, तो पहनें — सबसे अच्छा है कि सभी रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । एक ही धागे में हों, या चाँदी की चेन बनवाकर उसमें पहनें। यदि उनका प्रयोग पूजा में करना है, तो पूजा के स्थान पर उनका अभिषेक होगा, और उन्हें धूप और दीप अर्पित होंगे।
अभिषेक के बाद रुद्राक्ष को कैसे साफ़ करें?
मुलायम ब्रश, फिर एक दिन सरसों के तेल में, हर एक-दो महीने में दोहराएँ
क्योंकि अभिषेक दूध, दही और घी से होता है, इसलिए साफ़ करने के बाद भी रुद्राक्ष के भीतर कुछ रह जाता है। वक्ता कहते हैं कि इसे मुलायम ब्रश से हल्के से साफ़ करें, फिर एक दिन सरसों के तेल में छोड़ दें, फिर अच्छी तरह पोंछकर, सुगंधित करके पहनें। यह प्रक्रिया हर एक-दो महीने में एक बार दोहरानी चाहिए, जिससे रुद्राक्ष कठोर और मज़बूत रहता है और उसकी शुद्धि होती रहती है।
वक्ता कहते हैं कि रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । के अभिषेक के बारे में एक बात याद रखनी चाहिए: क्योंकि अभिषेक दूध, दही और घी से होता है, इसलिए कई रुद्राक्षों में आप देखेंगे कि जितनी हो सके उतनी सफ़ाई का प्रयास किया गया, फिर भी जो उसमें चिपका है वह रह गया है और पूरी तरह नहीं निकला। इसलिए उसे मुलायम ब्रश से हल्के से साफ़ करें, और फिर एक दिन के लिए सरसों के तेल में छोड़ दें; और फिर अच्छी तरह पोंछकर और सुगंधित करके पहनें। वे कहते हैं कि यह प्रक्रिया हर एक-दो महीने में एक बार दोहरानी चाहिए। इससे रुद्राक्ष सदा कठोर और मज़बूत रहेगा, और उसकी शुद्धि भी होती रहेगी।
अधिक पंखुड़ियों वाला बड़ा यंत्र भगवती का है, और कम वाला भगवान शिव का पंचानन।
भगवती का यंत्र, शिव का पंचानन, और संकल्प की आवश्यकता
वक्ता कहते हैं कि पूरा विवरण डाले जाने तक बस इतना समझें: जो यंत्र सबसे बड़ा दिखता है, जिसके चारों ओर कई पंखुड़ियाँ हैं, वह भगवती का यंत्र है, और कम वाला भगवान शिव का पंचानन है। सबका अभिषेक करते रहें। वे अंत में कहते हैं कि पुरश्चरण सदा संकल्प लेकर करना चाहिए — बिना संकल्प के पुरश्चरण होगा ही कैसे?
वक्ता कहते हैं कि कौन सा यंत्र किस प्रयोजन के लिए है, इसका पूरा विवरण टेलीग्राम ग्रुप पर और यहाँ भी डाला जाएगा, जैसे ही पूजा की व्यवस्था हो सकेगी; वे पूरा विषय एक साथ रखना चाहते थे, और व्यवस्था में एक महीना भी लगे तो भी इसे सार्वजनिक रूप से रखेंगे। तब तक इतना ध्यान में रखें: जो यंत्र आपको सबसे बड़ा दिखता है, जिसमें कई पंखुड़ियाँ बनी हैं, वह भगवती का यंत्र है; और कम वाला भगवान शिव का पंचानन है। अभी बस इतना समझें। बाकी सबका अभिषेक करते रहें; पूरा विषय अवश्य डाला जाएगा, या तो बीच में या बाद में, जब यह पूरा वैशाख शुक्ल पक्ष अनुष्ठान पूरा होगा। और वे अंत में कहते हैं कि पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। सदा संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर करें — बिना संकल्प के पुरश्चरण कैसे होगा? आप पुरश्चरण का संकल्प लेंगे, तभी वह होगा।
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