सती खंड आगे — नंदा व्रत, शिव-सती विवाह, रुद्र शिर, और शिव श्री राम को प्रणाम क्यों करते हैं
शिव महापुराण: सती का नंदा व्रत और विवाह।
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शिव पूजन का पूरा विधि-विधान बताने वाली विद्येश्वर संहिता इस शृंखला में पहले ही हो चुकी है
विद्येश्वर संहिता और महाशिवरात्रि का जागरण
विद्येश्वर संहिता, जिसमें शिव पूजन का पूरा विधि-विधान है, पहले ही सुनी जा चुकी है। वक्ता कहते हैं कि बहुत से श्रोताओं ने शिवरात्रि पर वे विधान किए और जीवन में पहली बार महाशिवरात्रि का व्रत पूरी रात जागकर, रात्रि जागरण में बिताया।
वक्ता कहते हैं कि इस शृंखला में पहले शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता हो चुकी है — वह भाग जिसमें शिव के पूजन का पूरा विधि-विधान है। वे कहते हैं कि शिवरात्रि माहात्म्य के समय बहुत से लोगों ने वे सारे विधान किए और जीवन में पहली बार महाशिवरात्रि का व्रत पूरी रात जागकर, रात्रि जागरण में बिताया। वे इसका श्रेय केवल शिव कृपा को देते हैं — यह महादेव की कृपा से ही संभव हुआ।
सती खंड की शुरुआत कामदेव की उत्पत्ति, माता अरुंधती, चंद्रभागा के प्रकट होने और माँ संध्या की तपस्या से हुई
कामदेव, अरुंधती, चंद्रभागा और माँ संध्या
कामदेव कैसे उत्पन्न हुए, माता अरुंधती की कथा, महाराष्ट्र में स्थित चंद्रभागा नदी की कथा और वे कैसे प्रकट हुईं, माँ संध्या ने वहाँ कैसे तपस्या की, और प्रातः संध्या व सायं संध्या देवताओं और पितरों को कैसे मिलीं और उनके द्वारा हमारा कल्याण करती हैं।
वक्ता याद दिलाते हैं कि अभी रुद्र संहिता के अंतर्गत सती खंड — सती पर्व — का पूरा वर्णन सुना जा रहा है। शुरुआत के जो विषय हो चुके हैं, वे ये हैं: कामदेव कैसे उत्पन्न हुए; माता अरुंधती की कथा क्या थी; महाराष्ट्र में स्थित चंद्रभागा नदी की कथा और वे कैसे प्रकट हुईं; माँ संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। ने वहाँ अपनी तपस्या कैसे की; और प्रातः संध्या व सायं संध्या देवताओं और पितृ को कैसे प्राप्त हुईं। वे कहते हैं कि उसके द्वारा वे हमारा कल्याण करती हैं। श्रोताओं को कथा में आनंद आया और उन्होंने अपने जीवन की बहुत सी बातें उससे जोड़ीं — हम कहाँ गलती करते हैं, और किस कारण हमारी गति कहीं जाकर रुक जाती है।
सती के जन्म से पहले ब्रह्मा और दक्ष प्रजापति ने क्या-क्या किया?
ब्रह्मा की तपस्या और क्षीर सागर पर दक्ष की तपस्या
ब्रह्मा ने कामदेव, वसंत और रति को उत्पन्न किया, और अनेक देवताओं से पितर उत्पन्न हुए। शिव का भी पाणिग्रहण संस्कार हो, यह चाहकर ब्रह्मा ने भगवती की तपस्या की और वर पाए। फिर दक्ष प्रजापति क्षीर सागर के पास गए, उत्तर दिशा की ओर मुख करके तपस्या की और भगवती आदिशक्ति से भगवती सती को पुत्री रूप में पाने का वर माँगा।
वक्ता कहते हैं कि आगे बढ़ते हुए, भगवान ब्रह्मा कामदेव, वसंत, रति आदि को उत्पन्न करते हैं, और अनेक देवताओं से पितरों की उत्पत्ति का वर्णन पहले हो चुका है। ब्रह्मा के मन में इच्छा हुई कि भगवान शिव का भी विवाह हो, उनका पाणिग्रहण संस्कार हो। इसके लिए उन्होंने भगवती की तपस्या की और उनसे वर प्राप्त किए। इसके बाद दक्ष प्रजापति क्षीर सागर, यानी दूध के सागर, के पास गए, उत्तर दिशा की ओर मुख किया और उन्होंने भी तपस्या की — भगवती आदिशक्ति से भगवती सती को पुत्री के रूप में पाने का वर माँगा।
दक्ष के घर भगवती सती के जन्म लेने के बाद क्या हुआ?
सती की बाल लीलाएँ और उनके जन्म-क्रम में कल्प-भेद
वे स्वयं जगदंबा, आदिशक्ति हैं, फिर भी जन्म लेकर घर में अनेक लीलाएँ करती हैं, माता-पिता की बहुत सेवा करती हैं और उनकी हर बात मानती हैं। वक्ता जोड़ते हैं कि कल्प-भेद के अनुसार किसी कल्प में सती अपनी सब बहनों में सबसे बड़ी थीं, कभी बीच की, और कभी सबसे छोटी, यानी कनिष्ठा।
भगवती जगदंबा जब दक्ष प्रजापति के घर जन्म लेती हैं, तो वहाँ अनेक प्रकार की लीला करती हैं। भगवती सती का जन्म स्वयं जगदंबा, आदिशक्ति का जन्म है — फिर भी जन्म लेकर, कन्या रूप में रहते हुए भी, वे माता-पिता की बहुत सेवा करती हैं और उनकी हर बात स्वीकार करती हैं। वक्ता महायुग व कल्प की गणना की एक बात जोड़ते हैं: कल्प-भेद के अनुसार किसी कल्प में भगवती सती अपनी सब बहनों में सबसे बड़ी रही हैं, कभी बीच की, और कभी सबसे छोटी — कनिष्ठा।
भगवती सती की बहनें कौन हैं?
चंद्रमा, धर्मराज, कश्यप, अंगिरा और कृशाश्व से ब्याही दक्ष की पुत्रियाँ
चंद्रमा की 27 पत्नियाँ सब भगवती सती की बहनें हैं। धर्मराज की 10 पत्नियाँ भी दक्षराज की पुत्रियाँ हैं। महर्षि कश्यप का विवाह 13 कन्याओं से हुआ, वे भी सती की बहनें हैं। ऋषि अंगिरा और कृशाश्व का विवाह भी प्रजापति दक्ष की पुत्रियों से हुआ, और ये सब माता सती की बहनें हैं।
वक्ता पहले दिया गया वर्णन सामने रखते हैं कि भगवती सती की बहनें कौन हैं। चंद्रमा की सत्ताईस पत्नियाँ सब भगवती सती की बहनें हैं। धर्मराज की दस पत्नियाँ भी दक्षराज की पुत्रियाँ हैं। महर्षि कश्यप का विवाह तेरह कन्याओं से हुआ, और वे भी भगवती सती की बहनें हैं। ऋषि अंगिरा और कृशाश्व — इन सबका विवाह प्रजापति दक्ष की पुत्रियों से हुआ, और ये सब माता सती की बहनें हैं।
सती की बहनें कौन थीं, यह क्यों जानना चाहिए?
दक्ष की पुत्रियों से ही पूरी सृष्टि का विस्तार हुआ
क्योंकि चाहे माता कामधेनु के रूप में भगवती का स्वरूप हो, या नाग, राक्षस, असुर — इन सबकी उत्पत्ति भगवती सती की अनेक बहनों से हुई, जो अलग-अलग ऋषियों से संतान उत्पन्न करती हैं। यानी यहाँ सृष्टि का विस्तार दक्ष प्रजापति ने किया।
वक्ता कहते हैं कि यह सब जानना चाहिए। चाहे माता कामधेनु के रूप में भगवती का स्वरूप हो, या नागों, राक्षसों, असुरों का — इन सबका विवाह और इन सबकी उत्पत्ति भगवती सती की अनेक बहनों से हुई, जिनसे अलग-अलग ऋषियों द्वारा संतानें हुईं। यानी यहाँ सृष्टि का विस्तार दक्ष प्रजापति ने किया।
शुरू से ही शिव के प्रति सती का भाव कैसा था?
जन्म से प्रेम भाव, और ब्रह्मा व नारद का आना
भगवती सती के मन में शुरू से ही भगवान शिव के प्रति प्रेम भाव था, और शुरू से ही वे तरह-तरह के भजनों से भगवान शिव का स्मरण करती थीं। जब वे बड़ी हुईं, तो ब्रह्मा दक्ष प्रजापति के घर गए — और नारद भी उनके साथ गए।
वक्ता कहते हैं कि जन्म के बाद भगवती सती के मन में शुरू से ही भगवान शिव के प्रति प्रेम भाव था। शुरू से ही भगवती सती तरह-तरह के भजनों से भगवान शिव का स्मरण करती थीं। जब वे बड़ी होती हैं, तो ब्रह्मा दक्ष प्रजापति के घर जाते हैं — और नारदएक देव-ऋषि, पौराणिक साहित्य में प्रायः प्रश्नकर्ता या श्रोता के रूप में उपस्थित। भी जाते हैं।
सती कथा सुनने से पहले कल्प-भेद क्यों समझना चाहिए?
त्रेता युग में सती-त्याग और यज्ञ में विष्णु की उपस्थिति
क्योंकि हम जानते हैं कि सती का त्याग त्रेता युग में हुआ, जब रामचंद्र वन में थे और भगवती सती उनकी परीक्षा लेने गईं। फिर भी इसी शिव महापुराण में आगे पढ़ते हैं कि कई युगों बाद जब सती अग्नि में स्वयं को भस्म करती हैं, तब विष्णु वहाँ उपस्थित हैं और उस यज्ञ की हर तरह से रक्षा कर रहे हैं। तो श्री रामचंद्र पूर्णावतार कैसे हुए? वक्ता कहते हैं कि ये प्रश्न मन में उठने चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि कल्प-भेद की बात पहले इसलिए स्पष्ट की गई थी क्योंकि यह बार-बार काम आएगी, और सती कथा में भी। हम सब यह प्रश्न सुनते हैं कि भगवान शिव ने सती का त्याग कब और क्यों किया। हम जानते हैं कि महायुग व कल्प की गणना से यह त्याग त्रेता युग में हुआ: रामचंद्र वन में थे और भगवती सती उनकी परीक्षा लेने गईं, और उस समय शिव को उनका त्याग करना पड़ा। वह पूरी कथा इस पाठ में आएगी। पर फिर इसी शिव महापुराण में आगे पढ़ते हैं कि शिव द्वारा सती-त्याग के कई युगों और बहुत समय बाद, जब सती अग्नि में स्वयं को भस्म करती हैं, तब विष्णु वहाँ उपस्थित हैं — स्वयं विष्णु उस यज्ञ की हर तरह से रक्षा कर रहे हैं। तो वक्ता पूछते हैं, यदि विष्णु वहाँ हैं, तो श्री रामचंद्र का पूर्णावतार कैसे हुआ? ये प्रश्न मन में उठने चाहिए। वे कहते हैं कि ठीक ऐसे ही प्रश्नों को दुष्ट और दुराचारी लोग पकड़ लेते हैं, कुतर्क पर कुतर्क देते हैं और उसी से संतुष्ट हो जाते हैं।
क्या भक्त को कल्प-भेद पर दूसरों से बहस करनी चाहिए?
अपना संशय मिटाना, उसका प्रदर्शन नहीं
वक्ता कहते हैं कि इन बातों का दूसरों के सामने प्रदर्शन करने की कोई आवश्यकता नहीं है। पर ये विषय समझने चाहिए ताकि भक्त के अपने मन में संशय न उठे। कल्प की गणना और मनुओं का वर्णन — किस मनु के शासन में कौन सी घटना हुई और वह समय बीत गया — पूरे शिव महापुराण में मिलता है।
वक्ता कहते हैं कि इन बातों का दूसरों के सामने प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं है। पर इन्हें समझना चाहिए, ताकि भक्त के मन में संशय न उठे। वे याद दिलाते हैं कि कल्प की गणना कैसे होती है और उसे कैसे लेकर चलना चाहिए, यह पहले ही समझाया जा चुका है, और कहते हैं कि इसका वर्णन शिव पुराण में जगह-जगह मिलेगा। इसी तरह मनुओं का वर्णन भी मिलेगा — किस मनु के शासन में कौन सी घटना हुई, और वह काल बीत गया। जिस प्रसंग की बात है, उसमें ब्रह्मा नारद से बात कर रहे हैं और रुद्र संहिता का सती खंड सुना रहे हैं, और यह बात बार-बार आएगी: कि पिछले युग में इस तरह की घटनाएँ पहले ही हो चुकी हैं।
दक्ष के घर जाने के बारे में ब्रह्मा ने नारद को क्या याद दिलाया?
ब्रह्मा के कथन की पृष्ठभूमि
ब्रह्मा नारद से कहते हैं: तुम मेरे साथ दक्ष प्रजापति के घर गए थे, और हम वहाँ बैठे, और फिर दक्ष प्रजापति ने हमारा आदर-सत्कार किया। तब सती आईं, और क्योंकि वे बड़ी हो चुकी थीं, ब्रह्मा ने उनसे बात की।
ब्रह्मा नारदएक देव-ऋषि, पौराणिक साहित्य में प्रायः प्रश्नकर्ता या श्रोता के रूप में उपस्थित। से कहते हैं: तुम मेरे साथ दक्ष प्रजापति के घर गए थे। वहाँ हम बैठे, और फिर दक्ष प्रजापति ने आदर-सत्कार किया। तब सती आईं। क्योंकि तब तक सती बड़ी हो चुकी थीं, ब्रह्मा ने सीधे उनसे बात की।
ब्रह्मा ने सती से क्या करने को कहा?
सर्वज्ञ जगदीश्वर को पति रूप में पाना, और उनके लिए तप करना
ब्रह्मा कहते हैं: हे सती, उस सर्वज्ञ जगदीश्वर को पति रूप में पाओ, जो तुम्हें चाहते हैं और जिन्हें तुम चाहती हो। वे तुम्हारे सिवा किसी और का हाथ नहीं थाम सकते, न कभी थामेंगे, और किसी और में इसकी सामर्थ्य भी नहीं है। इसलिए उन्हें पाने के लिए तुम्हें तप करना चाहिए।
वक्ता बताते हैं कि ब्रह्मा ये वचन कहते हैं: हे सती, उस सर्वज्ञ जगदीश्वर को अपने पति रूप में पाओ, जो तुम्हें चाहते हैं और जिन्हें तुम स्वयं चाहती हो। वे तुम्हारे सिवा किसी और का हाथ नहीं थाम सकते, न कभी थामेंगे — और किसी और में इसकी सामर्थ्य भी नहीं है। इसलिए उन्हें पाने के लिए तुम्हें तप करना चाहिए। वक्ता बताते हैं कि यहाँ ब्रह्मा उन्हें तप के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
सती अपनी तपस्या करने कैसे निकलीं?
माता-पिता से आज्ञा लेकर वन की ओर
जब सती बड़ी हुईं, तो शिव को पाने के उद्देश्य से तपस्या करने गईं। उन्होंने माता-पिता की आज्ञा ली, और तप करने के लिए अपने स्थान से वन की ओर चल पड़ीं।
इसके बाद, जब सती बड़ी होती हैं, तो शिव को पाने के उद्देश्य से तपस्या करने जाती हैं। वे अपने माता-पिता की आज्ञा लेती हैं। और तप करने के लिए अपने स्थान से वन की ओर चल पड़ती हैं।
सती की तपस्या का वर्णन किन दो स्थानों पर आता है?
हिमाचल पर्वत, और घर पर रखा नंदा व्रत
दो स्थानों का वर्णन आता है। एक है हिमाचल पर्वत। दूसरा है उनका अपना घर — और भगवती सती ने घर पर जो व्रत रखा, वह नंदा व्रत है।
वक्ता कहते हैं कि जब वे तपस्या करती हैं, तो दो स्थानों का वर्णन आता है। एक है हिमाचल पर्वत। दूसरा है उनका अपना घर। और भगवती सती ने घर पर जो व्रत रखा, वह नंदा व्रत है।
नंदा तिथियों का क्या महत्व है?
नंदा तिथि पर सदाशिव का पूजन
जिन पाँच-छह प्रकार की तिथियों का अध्ययन होता है, उनमें नंदा तिथियाँ एक हैं। वक्ता कहते हैं कि सबको यह जानना चाहिए कि नंदा तिथि पर भगवान सदाशिव का पूजन करने से मनोकामना पूरी होती है। वे तिथियाँ कौन सी हैं, और भगवती सती ने उन पर कैसे पूजन किया, इसका वर्णन शिव महापुराण की रुद्र संहिता के सती खंड में है।
नंदा तिथियाँ कब आती हैं, यह पूछते हुए वक्ता याद दिलाते हैं कि हम पाँच-छह अलग-अलग प्रकार की तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। के बारे में पढ़ते हैं। वे कहते हैं कि नंदा तिथि पर भगवान सदाशिव का पूजन करने से मनोकामना पूरी होती है — यह सबको जानना चाहिए। वे तिथियाँ कौन सी हैं, और भगवती सती ने उन पर किस प्रकार पूजन किया, इसका वर्णन शिव पुराण की रुद्र संहिता के सती खंड में है।
आश्विन और कार्तिक में सती ने कौन सी नंदा तिथियाँ रखीं?
आश्विन की प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी; कार्तिक की चतुर्दशी
आश्विन मास में — अक्टूबर के आसपास शारदीय दुर्गा पूजा का समय — जो नंदा तिथियाँ आती हैं, वे प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी हैं। इन पर उन्होंने गुड़, भात और लवण से भक्तिपूर्वक हर, यानी शिव, का पूजन किया। इसके बाद कार्तिक मास में चतुर्दशी को खीर और अपूप से।
आश्विन मास में — जब हम शरद काल की दुर्गा पूजा करते हैं, अक्टूबर के आसपास — जो नंदा तिथियाँ आती हैं, वे प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी हैं। इन पर उन्होंने गुड़, भात और लवण से भक्तिपूर्वक हर, यानी शिव, का पूजन किया। इसके बाद कार्तिक मास में चतुर्दशी को खीर और अपूप से।
मार्गशीर्ष मास में सती ने क्या अर्पित किया?
मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी पर जौ, तिल और चावल
मार्गशीर्ष मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उन्होंने जौ, तिल और चावल से शिव का पूजन किया, और इसी तरह अपने दिन बिताए। वक्ता बताते हैं कि यहाँ पुराण में पूरा विधान नहीं दिया गया है — पूरा विधान कर्मकांड की पुस्तकों में मिलेगा।
फिर मार्गशीर्ष मास आया। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उन्होंने जौ, तिल और चावल से शिव की पूजा की, और इसी तरह अपने दिन बिताती रहीं। वक्ता बीच में ग्रंथ की एक सीमा बताते हैं: यहाँ पूरा विधान नहीं दिया गया है। वे कहते हैं कि पूरा विधान कर्मकांड के विषयों में मिलेगा।
माघ पूर्णिमा पर सती ने क्या किया?
माघ पूर्णिमा — रात्रि जागरण और भोर में गीले वस्त्रों में नदी तट पर पूजन
फिर माघ मास आया। माघ की पूर्णिमा तिथि को वे पूरी रात जागीं, और सुबह गीले वस्त्र पहनकर नदी के तट पर शिव का पूजन करने लगीं।
फिर माघ मास आया। वक्ता कहते हैं कि माघ की पूर्णिमा तिथि को वे पूरी रात जागीं। और सुबह के समय भीगे वस्त्र पहनकर नदी के तट पर शिव का पूजन करने लगीं।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को सती ने क्या किया?
महाशिवरात्रि — हर प्रहर में बिल्व पत्र और बिल्व फल
फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी वही महाशिवरात्रि है जो अभी बीती है। उस दिन वे पूरी रात जागीं और हर प्रहर में बिल्व पत्र और बिल्व फल से शिव का विशेष पूजन किया।
इसके बाद फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी आती है — वही महाशिवरात्रि जो श्रोताओं ने अभी मनाई है। उस दिन वे पूरी रात जागीं, और सभी प्रहरों में बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। पत्र और बिल्व फल से शिव का विशेष पूजन किया। वक्ता कहते हैं कि महाशिवरात्रि के पर्व के बारे में यही कहा गया है।
चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को सती ने क्या अर्पित किया?
चैत्र पूर्णिमा से एक दिन पहले पलाश के फूल और अन्न
फिर चैत्र शुक्ल चतुर्दशी — यानी चैत्र नवरात्रि बीतने के बाद, पूर्णिमा आने से एक दिन पहले। उस दिन वे पलाश के फूलों और अन्न से शिव का पूजन करती हैं।
वक्ता कहते हैं, फिर चैत्र शुक्ल चतुर्दशी: यानी चैत्र नवरात्रि बीतने के बाद, पूर्णिमा आने से एक दिन पहले। उस दिन वे पलाश पुष्प और अन्न से शिव का पूजन करती हैं।
वैशाख मास में सती ने क्या अर्पित किया?
वैशाख शुक्ल तृतीया, बगलामुखी जयंती का दिन
फिर वैशाख मास, जिसमें हम भगवती बगलामुखी की जयंती मनाते हैं — वह दिन जब जगदंबा का वह स्वरूप प्रकट हुआ। तृतीया तिथि, यानी वैशाख शुक्ल तृतीया को, वे फिर से तिलाहार, जौ और चावल से शिव का पूजन करती हैं।
फिर वैशाख मास आया — वक्ता बताते हैं कि यह वह मास है जिसमें हम भगवती बगलामुखी की जयंती मनाते हैं, जब जगदंबा का वह स्वरूप प्रकट हुआ। इसमें तृतीया तिथि को — वैशाख शुक्ल तृतीया को — वे फिर से तिलाहार, जौ और चावल से शिव का पूजन करती हैं।
ज्येष्ठ पूर्णिमा को सती ने क्या किया?
दिन में निराहार, रात में भटकैया और वट
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन वे निराहार रहीं — बिना भोजन के — और रात में भटकैया, वट आदि से शिव का पूजन किया।
वक्ता कहते हैं कि ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन वे निराहार रहीं। और रात में उन्होंने भटकैया, वट आदि से शिव का पूजन किया।
आषाढ़ और श्रावण में सती ने क्या अर्पित किया?
काले वस्त्र में आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी; श्रावण की सप्तमी, अष्टमी और चतुर्दशी
आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी को काले वस्त्र और भटकैया के फूलों से। श्रावण में कृष्ण सप्तमी और कृष्ण अष्टमी, और शुक्ल सप्तमी और शुक्ल अष्टमी — वक्ता बताते हैं कि कई जगह कुलदेवी पूजन के लिए श्रावण सप्तमी विशेष रूप से मानी जाती है — और फिर श्रावण शुक्ल अष्टमी और चतुर्दशी को उन्होंने यज्ञोपवीत और शुद्ध वस्त्र से शिव का पूजन किया।
फिर आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी को, काले वस्त्र और भटकैया के फूलों से। श्रावण में कृष्ण सप्तमी और कृष्ण अष्टमी, और शुक्ल सप्तमी और शुक्ल अष्टमी आती हैं। वक्ता बीच में बताते हैं कि बहुत सी जगहों पर इसी समय कुलदेवी का पूजन होता है, और श्रावण सप्तमी को विशेष माना जाता है। फिर श्रावण शुक्ल अष्टमी और चतुर्दशी को उन्होंने यज्ञोपवीत और शुद्ध वस्त्र से शिव का पूजन किया।
भादो में नंदा व्रत कैसे पूरा हुआ?
भाद्रपद चतुर्दशी और केवल जल का उपवास
भादो मास में उन्होंने फिर चतुर्दशी के दिन पूजन किया — सभी तिथियों का वर्णन आ गया है। चतुर्दशी तिथि को वे भोजन के रूप में केवल जल लेती थीं। इस प्रकार पूजन करते हुए वे नंदा व्रत को पूर्ण करने लगीं।
भादो मास में चतुर्दशी के दिन उन्होंने फिर पूजन किया; अब सभी तिथियों का वर्णन आ गया है। वक्ता कहते हैं कि चतुर्दशी तिथि को वे आहार के रूप में केवल जल लेती थीं। इस प्रकार पूजन करते हुए वे नंदा व्रत को पूर्ण करने लगीं।
सती का नंदा व्रत पूरा होने पर क्या हुआ?
सती शिव में स्थित हुईं, और देवताओं ने उनकी सिद्धावस्था देखी
व्रत पूरा होने पर वे भगवान शिव में स्थित हो गईं। क्योंकि उन्होंने इतना व्रत और तपस्या की थी, सब देवता आए और उनका दृढ़ व्रत देखा — कि वे इतनी तपस्या कर रही हैं और सिद्धावस्था तक पहुँच गई हैं।
वक्ता कहते हैं कि व्रत पूरा होने पर वे भगवान शिव में स्थित हो गईं। क्योंकि उन्होंने इतना व्रत और तपस्या की थी, सब देवता आए और उनका दृढ़ व्रत देखा: कि वे इतनी अधिक तपस्या कर रही हैं, और सिद्धावस्था तक पहुँच गई हैं।
देवताओं ने कैलाश पर शिव से क्या माँगा?
शिव से वर देने और पाणिग्रहण संस्कार करने की प्रार्थना
विष्णु, ब्रह्मा और बाकी सब कैलाश पर्वत पहुँचे और वहाँ भगवान शिव की तरह-तरह से स्तुति और प्रार्थना की — कि वे जाकर वर दें और पाणिग्रहण संस्कार करें। शिव उत्तर देते हैं: मुझे इन सब बातों से क्या काम? मैं विवाह क्यों करूँ?
फिर विष्णु, ब्रह्मा और बाकी सब कैलाश पर्वत पहुँचे, और वहाँ भगवान शिव की तरह-तरह से स्तुति की और उनसे प्रार्थना की। किसलिए? कि वे जाकर भगवती को वर दें, और पाणिग्रहण संस्कार करें। जब सब इस तरह उनसे कहने और प्रार्थना करने लगे, तो यहाँ शिव कहते हैं: मुझे इन सब बातों से क्या काम? मैं विवाह क्यों करूँ?
विवाह के लिए ब्रह्मा ने शिव को क्या तर्क दिया?
वे असुर जिनका वध केवल शिव के पुत्र कर सकते हैं
ब्रह्मा विस्तार से समझाते हैं कि शिव देवाधिदेव, महादेव हैं, और सब उनके लिए पुत्र समान हैं। आगे जो असुर उत्पन्न होंगे, उनमें कुछ शिव से मारे जाएँगे, कुछ ब्रह्मा से, कुछ अन्य शक्तियों से — पर बहुत से ऐसे होंगे जिनका वध शिव के पुत्र करेंगे। इसलिए, संसार को ऐसी विपत्ति से बचाने और संसार को ठीक रखने के लिए, उन्हें भी पाणिग्रहण संस्कार करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्मा विस्तार से समझाते हैं: आप देवाधिदेव हैं, आप महादेव हैं, और आपके लिए सब पुत्र समान हैं। आगे जो असुर आदि जन्म लेंगे, उनमें कुछ आपसे मारे जाएँगे, कुछ मुझसे, कुछ अन्य शक्तियों से — पर बहुत से ऐसे होंगे जिनका वध आपके पुत्र करेंगे। इसलिए, संसार को ऐसी विपत्ति से बचाने और संसार को ठीक रखने के लिए, आपको भी पाणिग्रहण संस्कार करना चाहिए। यही वे उन्हें समझाते हैं।
ब्रह्मा ने शिव को उनकी कौन सी पुरानी बात याद दिलाई?
कैलाश पर रुद्र के बारे में विश्वेश्वर संहिता की भविष्यवाणी
ब्रह्मा विश्वेश्वर संहिता में वर्णित बात याद दिलाते हैं, जहाँ स्वयं महादेव कहते हैं कि ब्रह्मा के कपाल से, उनके माथे से, एक पुरुष उत्पन्न होगा जो रुद्र नाम से प्रसिद्ध होगा; और वही रुद्र रूप अलकापुरी के राजा यक्षराज कुबेर का मित्र बनेगा और कैलाश पर्वत पर रहेगा। उसका विवाह होगा।
ब्रह्मा कहते हैं: पिछले युग को याद कीजिए। विश्वेश्वर संहिता में वर्णन है कि महादेव कहते हैं, ब्रह्मा के कपाल से, उनके माथे से, एक पुरुष उत्पन्न होगा जो रुद्र नाम से प्रसिद्ध होगा। और वही रुद्र रूप अलकापुरी के राजा यक्षराज कुबेर का मित्र बनेगा, और कैलाश पर्वत पर रहेगा। उसका विवाह होगा। ब्रह्मा कहते हैं, तो आपके इस विवाह के बारे में आपने स्वयं बताया था; इसलिए इस प्रतिज्ञा को पूरा कीजिए।
विवाह के अनुरोध पर शिव का पहला उत्तर क्या था?
विवाह एक बहुत बड़ा बंधन, और अवधूत अवस्था
ब्रह्मा और विष्णु कहते हैं कि उन दोनों का पाणिग्रहण संस्कार हो चुका है, और शिव से अपना संस्कार पूरा करने को कहते हैं ताकि वे त्रिदेवियों सहित त्रिदेव बनें। पर क्योंकि महादेव सदा अवधूत अवस्था में और तप में रहते हैं, वे बार-बार कहते हैं कि वे यह नहीं कर सकते — संसार में विवाह को बहुत बड़ा बंधन समझना चाहिए।
ब्रह्मा कहते हैं, हम दोनों का पाणिग्रहण संस्कार हो चुका है; आप भी अपना यह संस्कार पूरा कीजिए, ताकि हम त्रिदेवियों से युक्त त्रिदेव बनें। वक्ता कहते हैं कि यह सब सुनकर, और क्योंकि महादेव सदा अवधूत अवस्था में और तप में रहने वाले हैं, वे इस बात पर बार-बार कहते हैं: नहीं, हम यह नहीं कर सकते। संसार में विवाह करना बहुत बड़ा बंधन समझना चाहिए — इस तरह वे यहाँ अपनी बात रखते हैं।
अंत में शिव ने पत्नी के लिए क्या शर्त रखी?
उनका तेज धारण करने में समर्थ स्त्री — योगिनी और कामरूपिणी
जब बार-बार उनकी स्तुति की गई और उनसे माँगा गया, तो उन्होंने कहा: किसी ऐसी स्त्री के बारे में बताओ जो मेरे तेज को उचित भाग में धारण करने में समर्थ हो — उस योगिनी और कामरूपिणी स्त्री का नाम बताओ जिसे मेरी पत्नी बनाया जाए।
फिर भी जब ब्रह्मा ने बार-बार स्तुति की और बार-बार माँगा, तो शिव ने कहा: ठीक है। किसी ऐसी स्त्री के बारे में बताओ जो मेरे तेज को उचित भाग में ग्रहण करने में समर्थ हो — उस योगिनी और कामरूपिणी स्त्री का नाम बताओ, ताकि उसे मेरी पत्नी बनाया जाए।
शिव ने कहा कि उनकी हर अवस्था में उनकी पत्नी को कैसा होना होगा?
योग में योगिनी, कामना में कामिनी, और उनकी तपस्या में बाधा न बनने वाली
जब मैं योग में लगा रहूँ, तो उसे भी योगिनी बनकर रहना होगा; और जब मैं कामनाओं के वश में रहूँ, तो उसे भी कामिनी के रूप में रहना होगा। यानी जब मैं गृहस्थ में रहूँ तो वह गृहिणी बनकर घर में सहायक और सहारा बने, और जब मैं योग और ध्यान में जाऊँ तो उसमें भी मेरी सहायता करे। पर कोई ऐसी स्त्री मेरी संगिनी न बने जो मेरे चिंतन और मेरी तपस्या में बाधा डाले।
वक्ता बताते हैं कि शिव यह शर्त रखते हैं: जब मैं योग में लगा रहूँ, तब उसे भी योगिनी बनकर रहना होगा; और जब मैं कामनाओं के वश में रहूँ, तब उसे भी कामिनी के रूप में रहना होगा। यानी जब मैं गृहस्थ में रहूँ तो वह गृहिणी बने और घर में सहारा बने; और जब मैं योग और ध्यान में जाऊँ, तब योग और ध्यान करते समय वह भी मेरी सहायता करे। पर कोई ऐसी स्त्री मेरी संगिनी न बने जो मेरे चिंतन में, मेरी तपस्या में बाधा और रुकावट डाले।
पत्नी की शर्त पर ब्रह्मा ने शिव को क्या उत्तर दिया?
सती का नाम लेना, और लीला रूप में शिव का तथास्तु
ब्रह्मा उन्हें बताते हैं कि स्वयं भगवती ने दक्ष प्रजापति के घर सती के रूप में जन्म लिया है, और उनसे जाकर उन्हें वर देने को कहते हैं, क्योंकि वे उन्हीं के लिए तपस्या कर रही हैं। वक्ता बताते हैं कि भगवान शिव सब पहले से जानते हैं, पर यह लीला है, इसलिए वहाँ सब देवी-देवताओं ने यह कहा। तब शिव मान जाते हैं और तथास्तु कहते हैं।
तब ब्रह्मा उन्हें बताते हैं कि स्वयं भगवती ने दक्ष प्रजापति के घर सती के रूप में जन्म लिया है। वे कहते हैं, तो कृपया जाकर उन्हें वर दीजिए; वे आपकी तपस्या कर रही हैं। वक्ता बताते हैं कि भगवान शिव सब जानते हैं, पर यह लीला है — इसलिए सब देवी-देवताओं ने वहाँ जाकर यह कहा। तब भगवान शिव मान जाते हैं और तथास्तु कहते हैं: ठीक है।
शारदीय नवरात्रि की अष्टमी क्यों महत्वपूर्ण है?
सदाशिव के दर्शन की तिथि
सदाशिव के दर्शन किस दिन हुए, यह पूछते हुए वक्ता नवरात्रि के मास की अष्टमी तिथि बताते हैं — वह शारदीय नवरात्र जो हम मनाते हैं — और कहते हैं कि इसका माहात्म्य हर पुराण में मिलेगा।
वक्ता पूछते हैं कि सदाशिव के दर्शन कब हुए। नवरात्रि के मास में, जो शारदीय नवरात्र हम मनाते हैं, उसकी अष्टमी तिथि को — और वे कहते हैं कि इसका माहात्म्य हर पुराण में मिलेगा। वे जोड़ते हैं कि आगे के बहुत से विषय तंत्र से जुड़े हैं, विशेष रूप से उनके लिए जिनके घरों में सतियों का पूजन होता है और सती के रूप में शक्ति स्थापित है।
कालिका और वीरभद्र रक्षक शक्तियाँ हैं जिनका पूजन घर में होता है
घर में पूजी जाने वाली रक्षक शक्तियाँ — कालिका और वीरभद्र
अगले दिन होने वाली चर्चा, जिसमें समूह कालिका और वीरभद्र के बारे में जानेगा, जो रक्षक शक्तियाँ हैं, और उस तरह की बहुत सी अन्य शक्तियों के बारे में जिनका पूजन घर में होता है, या आवश्यकता पड़ने पर क्या और कैसे होता है।
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद कल होने वाली चर्चा आती है। उसमें समूह कालिका और वीरभद्र के बारे में जानेगा, जो रक्षात्मक शक्तियाँ हैं, और उस तरह की बहुत सी अन्य शक्तियों के बारे में जिनका पूजन घर में होता है — या आवश्यकता पड़ने पर क्या और कैसे किया जाता है। वे कहते हैं कि वह पूरा विषय तब समझ में आएगा।
स्वयं जगदंबा का शिव पूजन करना क्या दिखाता है?
शुक्ल अष्टमी पर स्वयं जगदंबा द्वारा शिव पूजन
आश्विन मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भगवती सती ने पूजन और उपवास रखा और भक्तिपूर्वक शिव की पूजा की। नवरात्रि में हम नौ दिन भगवती की सेवा और पूजा करते हैं — पर वक्ता कहते हैं कि यह प्रसंग विशेष रूप से उनके लिए है जो शिव और पार्वती को अलग मानते हैं: यहाँ स्वयं जगदंबा शुक्ल पक्ष की अष्टमी को शिव का पूजन कर रही हैं। उनका नंदा व्रत नवमी तिथि को पूरा हुआ।
व्रत आदि रख रही भगवती सती ने आश्विन मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को पूजन और उपवास रखा और भक्तिपूर्वक शिव की पूजा की। वक्ता कहते हैं कि नवरात्रि में हम नौ दिन भगवती की सेवा और पूजा करते हैं — और यह विशेष रूप से उनके लिए है जो शिव और पार्वती को अलग मानते हैं। यहाँ स्वयं जगदंबा शुक्ल पक्ष की अष्टमी को शिव का पूजन कर रही हैं। पूरा उपवास करके और भक्तिपूर्वक भगवान शिव की पूजा करके, उनका नंदा व्रत नवमी तिथि को पूरा हुआ।
सती के सामने प्रकट होकर शिव ने क्या वर दिया?
वर कि केवल वही उनकी पत्नी होंगी
व्रत का कुछ भाग बाकी था, तभी शिव प्रकट हुए; ग्रंथ बताता है कि महादेव का रूप कितना दिव्य था। उन्होंने कहा: हे दक्ष नंदिनी, हम तुम्हारे व्रत से बहुत प्रसन्न हैं, जो चाहो माँगो। अपने आराध्य को सामने देखकर वे भाव-विभोर हो गईं और कुछ न कह सकीं — तो भगवान शिव ने स्वयं उनका भाव समझकर कहा, हम तुम्हें वर देते हैं कि तुम स्वयं मेरी पत्नी बनोगी।
व्रत का कुछ भाग अभी बाकी था, तभी शिव प्रकट हुए। शिव के पूरे स्वरूप का वर्णन है — महादेव का रूप कितना दिव्य था। महादेव ने कहा: हे दक्ष नंदिनी, हम तुम्हारे व्रत से बहुत प्रसन्न हैं; जो चाहो माँगो। अपने आराध्य को सामने देखकर वे आनंद से भर गईं और कुछ न कह सकीं। तब भगवान शिव ने स्वयं उनका भाव समझकर — क्योंकि लीला चल रही है — कहा: हम तुम्हें वर देते हैं कि तुम स्वयं मेरी पत्नी बनोगी।
बात लौकिक रूप से पूरी हो, इसके लिए सती ने क्या माँगा?
पिता के सामने वैवाहिक विधि से विवाह की प्रार्थना
भगवती सती कहती हैं: मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि आप मेरे पिता के सामने वैवाहिक विधि से मुझे स्वीकार करें। शिव कहते हैं कि वे ऐसा करेंगे और कैलाश पर्वत लौट जाते हैं। सती पिता के पास जाकर बताती हैं कि उन्हें ऐसा वर मिला है — जिस पर दक्ष प्रजापति इस चिंता से परेशान होने लगते हैं कि यह काम कैसे पूरा होगा।
यह बात लौकिक रूप से पूरी हो, इसलिए भगवती सती कहती हैं: हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप मेरे पिता के सामने वैवाहिक विधि से मुझे स्वीकार करें। जब उन्होंने ऐसा कहा तो वे बोले, ठीक है, मैं ऐसा करूँगा — और फिर अपने कैलाश पर्वत चले गए। सती पिता के पास गईं और बताया कि उन्हें ऐसा वर मिला है। वहाँ दक्ष प्रजापति इस चिंता से व्याकुल होने लगे कि महादेव वर देकर चले गए, पर काम कैसे पूरा होगा? वे विवाह कैसे करेंगे, कैसे आएँगे?
शिव ने कैलाश से विवाह की बात कैसे आगे बढ़ाई?
दक्ष से बात करने के लिए ब्रह्मा और सरस्वती को बुलाना
वर देकर शिव ने कैलाश पर ब्रह्मा, सरस्वती आदि का आवाहन किया और उन्हें पूरी बात बताई — भगवती सती ने तपस्या की है इसलिए मैंने उन्हें यह वर दिया है, तो वैवाहिक विधि का पालन कैसे होगा? तुम सब जाओ और दक्ष प्रजापति से बात करो — क्योंकि प्रजापति ब्रह्मा के ही पुत्र हैं।
जब महादेव कैलाश पर्वत गए, तो क्योंकि वे वर दे चुके थे, उसे पूरा करने के लिए उन्होंने ब्रह्मा, सरस्वती आदि का आवाहन किया। आवाहन करके उन्होंने पूरी बात बताई: भगवती सती ने तपस्या की है, इसलिए मैंने उन्हें यह वर दिया है; तो फिर वैवाहिक विधि का पालन किस प्रकार होगा? तुम सब जाओ, वहाँ जाकर दक्ष प्रजापति से बात करो — क्योंकि प्रजापति ब्रह्मा के ही पुत्र हैं। यही वे यहाँ सरस्वती और ब्रह्मा से कहते हैं।
शिव की सहमति से ब्रह्मा की कौन सी पुरानी इच्छा पूरी हुई?
ब्रह्मा का वचन कि रुद्र भी कामना के वश में आएँगे
जब शिव ने विवाह के लिए हाँ कहा, तो ब्रह्मा का कहा हुआ आशय पूरा हुआ — कि जैसे वे स्वयं उस दिन कामनाओं से भर गए थे, वैसे ही एक दिन रुद्र को भी होना पड़ेगा। शिव ब्रह्मा की कही बात का मान रखते हैं। वक्ता जोड़ते हैं कि किसी भी देवी-देवता का ऐसा सब वर्णन लीला है: किसी में वैसी सामर्थ्य नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि जब शिव ने विवाह के लिए हाँ कहा, तो ब्रह्मा का एक बार कहा हुआ आशय पूरा हुआ — जो उन्होंने रुद्र से कहा था, कि जैसे मैं आज कामनाओं से भर गया हूँ, वैसे ही एक दिन तुम्हें भी होना पड़ेगा। शिव ब्रह्मा के वचनों का मान रखते हैं। वक्ता कहते हैं कि किसी भी देवी-देवता का ऐसा सब वर्णन लीला है। किसी में वह सामर्थ्य नहीं है। जब एक सामान्य मनुष्य तपस्या करने लगता है — जो ग्यारह दिन, इक्कीस दिन, पूरा एक वर्ष तपस्या करता है — तो कोई सामान्य शक्ति, कोई कामिनी उसके चित्त को मोहित नहीं कर सकती, न उसे डिगा सकती है। और यहाँ तो स्वयं ब्रह्मा हैं।
ब्रह्मा की आलोचना को कुतर्क क्यों कहा गया है?
देवताओं का त्याग, और कुतर्क की मूर्खता
वे कहते हैं कि ये बातें यहाँ हमारे लिए लीला के रूप में रखी गई हैं, और ऐसे लोग इसे नहीं समझते। जो पल भर में अनेक ब्रह्मांड रच सकते हैं, जिन्हें विधाता कहा जाता है, उनके बारे में लोग व्यर्थ बकवास करते हैं। यह हमारे देवताओं का त्याग है, जिसे दुष्ट लोग नहीं समझते क्योंकि उनकी बुद्धि पर दुर्बुद्धि का पर्दा पड़ा है। पुराणों को समझना इतना आसान नहीं है, और समझाने का प्रयास करने वाले को कुतर्क देना सबसे बड़ी मूर्खता है।
वक्ता कहते हैं कि ये विषय यहाँ आपके और हमारे लिए लीला के रूप में रखे गए हैं — और ये लोग इसे समझ नहीं पाते। जो पल-पल में कई ब्रह्मांड रच सकते हैं, जिन्हें विधाता कहा गया है: उनके बारे में लोग व्यर्थ बकवास करते हैं। यह हमारे देवताओं का त्याग है, जिसे दुष्ट लोग नहीं समझते, क्योंकि उनकी बुद्धि पर दुर्बुद्धि का पर्दा पड़ गया है। ऐसे लोग इसी तरह का चिंतन करते रहते हैं। वे कहते हैं कि पुराणों को समझना इतनी आसान बात नहीं है, और जो उन्हें समझाने का प्रयास करे उसे कुतर्क देना सबसे बड़ी मूर्खता बन जाती है।
साधक को लीला कथा सुननी ही क्यों चाहिए?
भक्ति और कथा के बिना मंत्र जप फल नहीं दे सकता
वक्ता कहते हैं कि जब तक मन में भक्ति का भाव नहीं रहेगा, मंत्र, शास्त्र और पुराण समझ में नहीं आएँगे। और यदि आप पुराण नहीं समझते, तो जो भी मंत्र जप आप कर रहे हैं, और जिस भी देवी-देवता से आप जुड़े और आकर्षित हैं, आपका समर्पण पूरा नहीं होगा। यदि आप लीला कथा का श्रवण नहीं करेंगे, तो आपके मन में चल रहा चिंतन कैसे फलेगा और पूरी तरह पल्लवित होगा?
वक्ता कहते हैं, इतना समझ और जान लीजिए, यही काफी है: जब तक मन में भक्ति का भाव नहीं रहेगा, मंत्र, शास्त्र और पुराण समझ में नहीं आएँगे। और यदि आप पुराण नहीं समझेंगे, तो जो भी मंत्र जप आदि आप कर रहे हैं, और जिस भी देवी-देवता से आपका लगाव और आकर्षण है, आपका समर्पण पूरा नहीं हो पाएगा। यदि आप लीला कथा का श्रवण नहीं करेंगे, तो आपके मन में चल रहा चिंतन पूरी तरह फलदायी कैसे होगा? वह पूरी तरह पल्लवित कैसे होगा, कैसे लदेगा, उसमें वजन कैसे आएगा? और ब्रह्मा, विधाता, के बारे में जो प्रश्न और संशय उठते हैं, उनके बारे में इस प्रसंग से बस इतना समझ लीजिए: कि ब्रह्मा स्वयं में समर्थ हैं।
सदाशिव से विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र कैसे प्रकट हुए?
बाएँ से विष्णु, दाएँ से ब्रह्मा, हृदय से रुद्र
शिव महापुराण में आगे कहा गया है कि महेश्वर, महामहेश्वर सदाशिव ने अपने बाएँ भाग से विष्णु को, दाएँ भाग से ब्रह्मा को, और अपने हृदय से रुद्र को प्रकट किया। उन्हीं रुद्र को केवल एक अंश से ब्रह्मा के माथे से प्रकट होने को कहा गया, और इसलिए वे ब्रह्मा के माथे से भी प्रकट हुए।
शिव पुराण में आगे कहा गया है कि महेश्वर, महामहेश्वर सदाशिव ने अपने वामांग, यानी बाएँ भाग से विष्णु को; दक्षिण भाग, यानी दाएँ भाग से ब्रह्मा को; और अपने हृदय से रुद्र को प्रकट किया। और उन्हीं रुद्र के बारे में कहा गया है कि केवल एक अंश से उन्हें ब्रह्मा के माथे से प्रकट होने को कहा गया — और इसलिए वे ब्रह्मा के मस्तक से भी प्रकट हुए। वक्ता कहते हैं कि इसीलिए ये वर्णन आते हैं कि महामहेश्वर कौन हैं, शंकर क्यों हैं, शिव कौन हैं — नाम एक होते हुए भी पुराणों में एक भेद बताया जाता है: महामहेश्वर और महाकाल किस प्रकार के हैं। वह शिव का ही अंश है। त्रिदेवों में कभी कोई भेद नहीं है।
त्रिदेवों की लीला गलती और क्षमा के बारे में क्या सिखाती है?
सनातन में विधाता भी गलती करें तो क्षमा नहीं होते
वक्ता कहते हैं कि वे उस रूप में हम मनुष्यों के लिए लीला कर रहे हैं: कि विधाता भी गलती करें, तो सनातन में उन्हें भी क्षमा नहीं किया जाता। और क्षमा कैसे मिली, इसका भी वर्णन है। पर दोनों जगह लोग बात नहीं पकड़ते और आपत्तियाँ और प्रक्षेप की बातें करने लगते हैं, कहते हैं नहीं, यह गलत है। वे उत्तर देते हैं, अपना चरित्र देखो — वे समझते नहीं, और समझाने का प्रयास करने वाले को कभी नहीं समझते।
वक्ता कहते हैं कि वे उस रूप में हम मनुष्यों के लिए लीला कर रहे हैं: कि विधाता भी गलती करें, तो सनातन में उन्हें भी क्षमा नहीं किया जाता। और यदि क्षमा मिली, तो कैसे मिली, इसका भी वर्णन है। पर दोनों जगह लोग बात नहीं समझते और आपत्तियाँ और प्रक्षेप की बातें करने लगते हैं, कहते हैं नहीं, यह गलत है। उन्हें वक्ता सीधा उत्तर देते हैं: अपना चरित्र देखो, अपना लंगोट देखो। वे इसे नहीं समझते, और समझाने का प्रयास करने वाले को कभी नहीं समझते। फिर ब्रह्मा दक्ष प्रजापति के पास गए और कहा, बात ऐसी-ऐसी है; मैं अब शिव की ओर से आया हूँ, और क्या उचित है, और विवाह आदि कब होना चाहिए — और वहाँ चर्चा हुई।
विवाह का मुहूर्त किसने तय किया?
ब्रह्मा और दक्ष की बातचीत, और शिव-ब्रह्मा द्वारा लग्न तय करना
ब्रह्मा और दक्ष प्रजापति ने आपस में बात की। सब तय करके ब्रह्मा शिव के पास लौटे और उनका संशय दूर किया — दक्ष प्रजापति विवाह के लिए पूरी तरह तैयार हैं। शिव ने कहा, तो तिथि तय करो, सब कब और कैसे होना है। क्योंकि ब्रह्मा विधाता हैं, शिव ने कहा, तुम स्वयं तिथि तय करो। फिर शिव और ब्रह्मा ने मिलकर शुभ लग्न और शुभ मुहूर्त पर विचार किया।
ब्रह्मा और दक्ष प्रजापति ने आपस में बात की। बातचीत के बाद ब्रह्मा सब तय करके फिर शिव के पास गए और संशय दूर किया: दक्ष प्रजापति विवाह आदि के लिए पूरी तरह तैयार हैं। तब शिव ने कहा: विवाह आदि कब होना है — तिथि तय करो, कैसे, कब और क्या होना है। इसके लिए, क्योंकि ब्रह्मा विधाता हैं, शिव ने कहा, तुम स्वयं तिथि तय करो। दक्ष प्रजापति तिथि तय करने की बात पहले ही कह चुके थे, और ब्रह्मा ने जाकर शिव से बात की थी। शिव और ब्रह्मा ने आपस में तय करते हुए शुभ लग्न और शुभ मुहूर्त पर विचार किया।
शिव और सती के विवाह का मुहूर्त क्या था?
चैत्र शुक्ल त्रयोदशी, रविवार, पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र
वर्णन है कि चैत्र शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को, रविवार के दिन, पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में महेश्वर ने विवाह के लिए यात्रा शुरू की, और वर्णन है कि इसी दिन विवाह हुआ। वक्ता इस योग पर ज़ोर देते हैं, क्योंकि आगे इसी नक्षत्र, इसी तिथि और इसी वार पर एक वर मिलता है।
वक्ता कहते हैं, वर्णन यह है कि चैत्र शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को, रविवार के दिन, पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। में महेश्वर ने विवाह के लिए यात्रा शुरू की — और वर्णन है कि इसी दिन विवाह हुआ। चैत्र शुक्ल पक्ष त्रयोदशी, रविवार, पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र: वे यह योग दोहराते हैं, क्योंकि कथा में आगे इसी नक्षत्र, इसी तिथि और इसी वार पर एक वर मिलता है। उस दिन भगवान रुद्र ने अपने सब गणों के साथ, और ब्रह्मा, विष्णु और सब सैनिकों के साथ, विवाह के लिए बहुत बड़ी यात्रा की।
दक्ष के घर बारात का स्वागत कैसे हुआ?
सजा हुआ नगर और स्वागत
वे विवाह के लिए दक्ष प्रजापति के घर गए, और वहाँ बहुत आदर-सत्कार हुआ। एक बहुत बड़ा नगर सजाया गया था — महादेव का विवाह है, तो भव्य तो होना ही था।
वे विवाह के लिए दक्ष प्रजापति के घर गए। वहाँ बहुत आदर-सत्कार हुआ, और एक बहुत बड़ा नगर सजाया गया था। वक्ता कहते हैं, महादेव का विवाह है — तो भव्य तो होगा ही।
ब्रह्मा को रुद्र शिर क्यों कहा जाता है?
विवाह में दिखाया गया चरित्र, और वह पाप जिसके लिए यह है
यहाँ एक घटना होती है जिसके कारण भगवान ब्रह्मा को रुद्र शिर कहा जाता है। वक्ता कहते हैं कि ब्रह्मा के माध्यम से एक चरित्र उस दुष्ट मनुष्य के लिए प्रकट किया गया जो पराई स्त्री के प्रति कामना का भाव रखता है या गलत काम करता है। यह उस पतन के लिए प्रकट किया गया जिसमें सामान्य मनुष्य गिर सकते हैं। इसे केवल सुनने और बात समझने से उस पाप से मुक्ति मिलती है — और वह पाप है किसी पतिव्रता स्त्री या किसी और की विवाहिता पत्नी को कुदृष्टि से देखने का पाप।
यहाँ एक घटना होती है जिसके कारण भगवान ब्रह्मा को रुद्र शिर कहा जाता है। वक्ता कहते हैं कि यहाँ ब्रह्मा के माध्यम से एक चरित्र प्रकट किया गया, दुष्ट स्वभाव के उस व्यक्ति के लिए जो इसे सुने और जो पराई स्त्री के प्रति कामना भरे भाव रखता है, या गलत काम करता है। लोग विधाता का त्याग नहीं समझते; वे बस उँगली उठाकर कहते हैं कि ब्रह्मा ऐसे थे — पर विषय को समझिए। यह उस पतन के लिए प्रकट किया गया जिसमें सामान्य मनुष्य गिर सकते हैं। इसे केवल सुनने और केवल बात समझने से उस पाप से मुक्ति मिलती है। और पाप क्या है? किसी पतिव्रता स्त्री या किसी और की विवाहिता पत्नी को कुदृष्टि से देखने से होने वाला पाप — जिसके लिए, वे कहते हैं, बहुत बड़े और बहुत उचित दंड दिए जाते हैं।
शास्त्र क्या कहता है
Brahmā came to be called "Rudra's Head" through a charitra manifested for men liable to the fall of looking at another's wife with desire, hearing which frees a listener from that sin.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
अनेनैव स्वरूपेण मदधिष्ठितकेन हि। तपः कुरु प्रसन्नात्मा मदाराधनतत्परः॥
इसी रूप में, जो मेरे द्वारा अधिष्ठित है, प्रसन्नचित्त होकर तथा मेरी आराधना में तत्पर रहकर आप तप कीजिये।
ख्यातिं यास्यसि सर्वत्र नाम्ना रुद्रशिरः क्षितौ। साधकः सर्वकृत्यानां तेजोभाजां द्विजन्मनाम्॥
आप पृथ्वी पर सर्वत्र "रुद्रशिर" नाम से प्रसिद्धि प्राप्त करेंगे और तेजस्वी ब्राह्मणों के समस्त कार्यों को सिद्ध करनेवाले होंगे।
मनुष्याणामिदं कृत्यं यस्माद्वीर्यं त्वयाधुना। तस्मात्त्वं मानुषो भूत्वा विचरिष्यसि भूतले॥
चूँकि अभी आपने जो वीर्यपात किया है, वह मनुष्यों का कृत्य है, इसलिये आप मनुष्य होकर पृथ्वीतल पर विचरण करेंगे।
यस्त्वां चानेन रूपेण दृष्ट्वा कौ विचरिष्यति। किमेतद् ब्रह्मणो मूर्ध्नि वदन्निति पुरान्तकः॥
और जो कोई तुम्हें इस रूप में देखकर "यह क्या! ब्रह्मा के सिर पर पुरान्तक कैसे हैं" ऐसा कहता हुआ पृथ्वी पर विचरण करेगा —
ततस्ते चेष्टितं सर्वं कौतुकाच्छ्रोष्यतीति यः। परदारकृतात्त्यागान्मुक्तिं सद्यः स यास्यति॥
— और जो कोई कौतुकवश तुम्हारे इस समस्त कृत्य को सुनेगा, वह पराई स्त्री के निमित्त किये गये इस त्याग से शीघ्र ही मुक्त हो जायेगा।
यथा यथा जनश्चैतत्कृत्यं ते कीर्तयिष्यति। तथा तथा विशुद्धिस्ते पापस्यास्य भविष्यति॥
लोग जैसे-जैसे आपके इस कृत्य का कीर्तन करेंगे, वैसे-वैसे आपके इस पाप की शुद्धि होती जायेगी।
वेदी पर विवाह किसने कराया?
विवाह कराने वाले ब्राह्मण के रूप में ब्रह्मा
जब विवाह की सारी तैयारी हो गई और वेदी सज गई, तो ब्रह्मा विवाह कराने वाले ब्राह्मण बने और विवाह आरंभ कराया। सती और भगवान शिव वेदी पर बैठे।
वर्णन यह है कि जब विवाह आदि की सारी तैयारी हो गई और वेदी सज गई, तो ब्रह्मा ने वह स्थान लिया जहाँ विवाह कराने वाला ब्राह्मण बैठता है, और वहाँ विवाह आरंभ कराया। सती और भगवान शिव वेदी पर बैठे। जब विवाह आरंभ हुआ, तो यहाँ विष्णु भगवान शिव से एक प्रार्थना करते हैं।
शास्त्र क्या कहता है
Brahmā conducted the fire-rite of the Śiva-Satī wedding as officiating priest, and Śiva and Satī circled the sacred fire under his direction.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
अहं देवीं समागत्य गृह्योक्तविधिनाखिलम्। अग्निकार्यं यथोद्दिष्टमकार्षं च सुविस्तरम्॥
मैं देवी सती के पास आकर गृह्यसूत्र में वर्णित विधि के अनुसार सम्पूर्ण अग्निकार्य को यथानिर्दिष्ट रूप से विस्तारपूर्वक करने लगा।
ततः शिवा शिवश्चैव यथाविधि प्रहृष्टवत्। अग्नेः प्रदक्षिणं चक्रे मदाचार्यद्विजाज्ञया॥
तत्पश्चात् शिवा और शिव दोनों प्रसन्न होकर मुझ आचार्य तथा ब्राह्मणों की आज्ञा से विधिपूर्वक अग्नि की प्रदक्षिणा करने लगे।
विवाह में विष्णु ने क्या प्रार्थना की?
व्रत कि जो सती की कामना करे, वह मारा जाए
पूरी स्तुति करने के बाद विष्णु कहते हैं: इन सती के साथ रहते हुए देवताओं और सज्जनों की रक्षा कीजिए, ताकि संसार के प्राणियों का सदा कल्याण हो। और हे सर्वभूतेश, हे प्रभु — जो भी इन सती को देखकर या इनके बारे में सुनकर कामना से भर जाए, उसे मार डालिए; यही मेरी प्रार्थना है।
क्योंकि यहाँ पाणिग्रहण संस्कार हो रहा है, विष्णु पूरी स्तुति करने के बाद बोलते हैं। वे क्या कह रहे हैं? कि आप इन सती के साथ रहते हुए देवताओं और सज्जन मनुष्यों की रक्षा कीजिए, ताकि संसार के लोगों का सदा कल्याण हो। और हे सर्वभूतेश, हे प्रभु — वक्ता कहते हैं, जो लिखा है उस पर ध्यान दीजिए — जो भी इन सती को देखकर या इनके बारे में सुनकर कामना से भर जाए, उसे आप मार डालिए; यही मेरी प्रार्थना है। वक्ता जोड़ते हैं कि भगवान विष्णु महादेव के सबसे बड़े भक्त हैं। वही भगवान रुद्र से यह प्रार्थना कर रहे हैं।
शास्त्र क्या कहता है
At the wedding, Viṣṇu prayed that Śiva, together with Satī, protect the gods and the good, and that whoever should look on Satī with desire be slain.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
देवानां वा नृणां रक्षां कुरु सत्यानया सताम्। संसारसारिणां शम्भो मङ्गलं सर्वदा तथा॥
हे शम्भो! इन सती के साथ रहकर देवताओं तथा सज्जन मनुष्यों की रक्षा कीजिये, जिससे संसारी जनों का सदा कल्याण होता रहे।
य एनां साभिलाषो वै दृष्ट्वा श्रुत्वाथवा भवेत्। तं हन्याः सर्वभूतेश विज्ञप्तिरिति मे प्रभो॥
हे सर्वभूतेश! हे प्रभो! जो कोई इन्हें देखकर या इनके विषय में सुनकर कामनायुक्त हो जाये, आप उसका वध कीजिये — यह मेरी प्रार्थना है।
पतिव्रता पर गलत दृष्टि डालने वाले का क्या होता है?
पतिव्रता पर गलत दृष्टि डालने वाले का वध स्वयं शिव करते हैं
वक्ता कहते हैं कि यहाँ अर्थ यह है कि जो भी पति के प्रति समर्पित किसी पतिव्रता स्त्री को गलत दृष्टि से देखे, या उसके चरित्र पर दाग लगाने का प्रयास करे, उसका वध स्वयं शिव करते हैं। यह चरित्र इसी बात से उत्पन्न होता है, और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण भी यहीं दिया गया है। शिव प्रसन्न हुए और कहा कि ऐसा ही होगा।
वक्ता कहते हैं कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं, इस पूरे विषय का यहाँ यही अर्थ है। कोई भी पतिव्रता स्त्री हो, जो अपने पति के प्रति समर्पित है, यदि कोई उसे गलत दृष्टि से देखे, यदि वह उसके चरित्र पर दाग लगाने का प्रयास करे, तो उसका वध स्वयं शिव करते हैं। यह चरित्र यहीं से उत्पन्न होता है, और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण भी यहीं दिया गया है। भगवान विष्णु ने यह वर माँगा, और भगवान शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि ठीक ऐसा ही होगा। बड़ा उत्सव हुआ और सब वहाँ आए।
शास्त्र क्या कहता है
Śiva agreed to Viṣṇu's prayer that he would slay whoever looked on a devoted wife with desire — a vow he later invokes against Brahmā himself.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
य एनां साभिलाषो वै दृष्ट्वा श्रुत्वाथवा भवेत्। तं हन्याः सर्वभूतेश विज्ञप्तिरिति मे प्रभो॥
हे सर्वभूतेश! हे प्रभो! जो कोई इन्हें देखकर या इनके विषय में सुनकर कामनायुक्त हो जाये, आप उसका वध कीजिये — यह मेरी प्रार्थना है।
अग्नि की प्रदक्षिणा के समय क्या हुआ?
सती के पैर दिखना, और ब्रह्मा के मन में प्रतिशोध
जब यज्ञ की, एकाग्नि की, प्रदक्षिणा हो रही थी, तब भगवती सती के पैर वस्त्र से बाहर दिख गए — दुल्हन चलती है तो उसका पैर बाहर से थोड़ा दिखता है, बाकी घूँघट के नीचे होता है। वक्ता कहते हैं कि यह चरित्र इसलिए दिखाया गया क्योंकि यहाँ उनकी आँखों के सामने वे किसी और की वामांगी बनने वाली हैं; और ब्रह्मा के मन में स्वयं रुद्र के प्रति प्रतिशोध था, कि रुद्र में भी कामना जागे और वे गृहस्थ बनें, क्योंकि रुद्र ने उन्हें स्त्री को देखकर किए गए काम के लिए डाँटा था।
उस स्थान पर ब्रह्मा का चरित्र यह था। जब प्रदक्षिणा हो रही थी — यज्ञ की, एकाग्नि की प्रदक्षिणा — उस समय भगवती सती के पैर वस्त्र से बाहर आ रहे थे। दुल्हन चलती है तो उसका पैर बाहर से थोड़ा दिखता है; बाकी घूँघट के नीचे था। वक्ता कहते हैं, समझिए कि यह चरित्र यहाँ क्यों दिखाया गया है। ठीक यहीं, प्रत्यक्ष रूप से, वे किसी और की वामांगी बनने वाली हैं। और ब्रह्मा अपने मन में एक तरह से रुद्र के प्रति प्रतिशोध रखते थे — कि भगवान रुद्र के मन में भी कामनाएँ जागें, वे भी पाणिग्रहण संस्कार करें और गृहस्थी के अधीन हों, क्योंकि रुद्र ने उन्हें डाँटा था कि तुमने स्त्री को देखकर ऐसा काम किया। वक्ता कहते हैं कि यहाँ यही लीला चल रही है।
शास्त्र क्या कहता है
During the fire-circumambulation, Satī's feet became visible from beneath her garment, and Brahmā saw them.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
प्रदक्षिणां प्रकुर्वन्त्या वह्नेः सत्याः पदद्वयम्। आविर्बभूव वसनात्तदद्राक्षमहं मुने॥
हे मुने! सती अग्नि की प्रदक्षिणा कर रही थीं, उस समय उनके दोनों चरण वस्त्र से बाहर निकल आये, उसे मैंने देख लिया।
Brahmā's desire on seeing Satī's feet was driven by a deliberate revenge against Rudra, who had once rebuked him for a similar act.
The text gives a different cause: Brahmā, in his own voice, says he was deluded by Śiva's māyā as poetic justice for once trying to delude Śambhu himself (19:15-16) — not a grudge over a prior rebuke, which does not appear in this chapter.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
प्रदक्षिणां प्रकुर्वन्त्या वह्नेः सत्याः पदद्वयम्। आविर्बभूव वसनात्तदद्राक्षमहं मुने॥
हे मुने! सती अग्नि की प्रदक्षिणा कर रही थीं, उस समय उनके दोनों चरण वस्त्र से बाहर निकल आये, उसे मैंने देख लिया।
मदनाविष्टचेताश्च भूत्वाङ्गानि व्यलोकयम्। अहं सत्या द्विजश्रेष्ठ शिवमायाविमोहितः॥
हे द्विजश्रेष्ठ! शिव जी की माया से मोहित हुआ मैं कामाविष्ट चित्तवाला होकर सती के अंगों को देखने लगा।
यथा यथाहं रम्याणि व्यैक्षमङ्गानि कौतुकात्। सत्या बभूव संहृष्टः कामार्तो हि तथा तथा॥
सती के जितने-जितने रम्य अंगों को मैं कौतुकवश देखता गया, उतना-उतना ही मैं प्रसन्न होकर कामपीड़ित होता गया।
ब्रह्मा का विक्षोभ तप के अहंकार के बारे में क्या दिखाता है?
तप का अहंकार, और विधाता को भी डिगा देने वाली महामाया
सती के पैर देखकर, कहा जाता है कि ब्रह्मा के मन में फिर विक्षोभ उठा — वे महामाया हैं। वक्ता कहते हैं, आपको अहंकार होगा कि मैंने इतनी तपस्या की है, अब मुझमें कामनाओं की कोई गति नहीं, कोई कामिनी मुझे डिगा नहीं सकती, मेरा मन विचलित नहीं हो सकता। लोगों को ऐसा होता है — चाहे धन का अहंकार हो या अपने तप का। तब भगवती ने, महादेव शिव ने, उन्हें फिर मोहित किया, और वे केवल उनके पैर देखकर मोहित हो गए।
सती के पैर देखकर, कहा जाता है कि ब्रह्मा के मन में फिर विक्षोभ उठा। वे महामाया हैं। वक्ता श्रोता से कहते हैं, आपको अहंकार होगा कि मैंने बहुत तपस्या की है, अब मुझमें कामनाओं की कोई गति नहीं, कोई कामिनी मुझे डिगा नहीं सकती, मेरा मन विचलित नहीं हो सकता। लोगों को ऐसा होता है — चाहे धन का अहंकार हो या अपने तप का। तप का अहंकार आने के बारे में, उनकी दशा देखिए जिन्हें ब्रह्मा का पद मिला है, जो विधाता हैं: उनके मन में भी यह भाव उठ रहा है, और वे भी प्रतिशोध लेना चाहते थे। ऐसी दशा में भगवती ने — महादेव शिव ने — उन्हें फिर मोहित किया, और वे केवल उनके पैर देखकर इतने मोहित हो गए कि कहते हैं: किसी तरह सती का मुख देखूँ।
शास्त्र क्या कहता है
Brahmā's fall here is presented as a lesson about the pride even a great tapasvin can take in his own self-control, undone by Mahāmāyā.
The chapter frames it as Śiva's māyā deluding Brahmā rather than explicitly as pride in so many words; a reasonable gloss, not the text's own stated moral.
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प्रदक्षिणां प्रकुर्वन्त्या वह्नेः सत्याः पदद्वयम्। आविर्बभूव वसनात्तदद्राक्षमहं मुने॥
हे मुने! सती अग्नि की प्रदक्षिणा कर रही थीं, उस समय उनके दोनों चरण वस्त्र से बाहर निकल आये, उसे मैंने देख लिया।
मदनाविष्टचेताश्च भूत्वाङ्गानि व्यलोकयम्। अहं सत्या द्विजश्रेष्ठ शिवमायाविमोहितः॥
हे द्विजश्रेष्ठ! शिव जी की माया से मोहित हुआ मैं कामाविष्ट चित्तवाला होकर सती के अंगों को देखने लगा।
यथा यथाहं रम्याणि व्यैक्षमङ्गानि कौतुकात्। सत्या बभूव संहृष्टः कामार्तो हि तथा तथा॥
सती के जितने-जितने रम्य अंगों को मैं कौतुकवश देखता गया, उतना-उतना ही मैं प्रसन्न होकर कामपीड़ित होता गया।
सती का मुख देखने के लिए ब्रह्मा ने क्या किया?
यज्ञ कुंड में गीली लकड़ी, और शिव का त्रिशूल उठाना
उन्होंने यज्ञ कुंड में गीली लकड़ी डाली, जिससे धुआँ उठा, और धुआँ होते ही उन्होंने सती का घूँघट हटाकर उनका मुख देखा। धुआँ था, इसलिए शिव जान गए कि ऐसा काम हुआ है, और तुरंत उन्हें मारने के लिए त्रिशूल उठा लिया।
वक्ता कहते हैं, इसके लिए उन्होंने क्या किया: यज्ञ कुंड में गीली लकड़ी डाली, जिससे धुआँ उठा। और धुआँ होते ही उन्होंने सती का घूँघट हटाया और उनका मुख देखा। धुएँ के कारण शिव तुरंत जान गए कि ऐसा काम हुआ है, और तुरंत उन्हें मारने के लिए त्रिशूल उठा लिया।
शास्त्र क्या कहता है
Brahmā threw wet wood on the fire to raise smoke as cover, and Śiva immediately knew from the smoke itself that something was wrong and picked up his trident to kill him.
The wet-wood/smoke detail matches, but the smoke troubles Śiva's own eyes (19:25) — comic irony rather than a tell. His knowledge of Brahmā's act is by omniscience, not by noticing smoke, and the trident is raised only after Brahmā's desire runs its course, not immediately.
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ततस्तद्दर्शनार्थाय सदुपायं विचारयन्। धूम्रघोरेण कामार्तोऽकार्षं तच्च ततः परम्॥
तब उनके दर्शन के लिये एक उपाय सोचते हुए कामपीड़ित मैंने घोर धुएँ के द्वारा उसके आगे का कार्य किया।
आर्द्रेन्धनानि भूरीणि क्षिप्त्वा तत्र विभावसौ। स्वल्पाज्याहुतिविन्यासादार्द्रद्रव्योद्भवस्तथा॥
वहाँ अग्नि में बहुत-सी गीली लकड़ी डालकर तथा घी की थोड़ी-थोड़ी आहुति देने से गीले पदार्थों के कारण धुआँ उत्पन्न हो गया।
प्रादुर्भूतस्ततो धूमो भूयांस्तत्र समन्ततः। तादृग् येन तमोभूतं वेदीभूमिविनिर्मितम्॥
उससे वहाँ चारों ओर इतना अधिक धुआँ उत्पन्न हो गया, जिससे वेदी के लिये बनायी गयी भूमि अन्धकारमय हो गयी।
ततो धूमाकुले नेत्रे महेशः परमेश्वरः। हस्ताभ्यां छादयामास बहुलीलाकरः प्रभुः॥
तब धुएँ से व्याकुल हुए अपने नेत्रों को अनेक प्रकार की लीला करनेवाले प्रभु महेश्वर ने दोनों हाथों से ढक लिया।
क्या पुरुष को अपनी पत्नी के लिए शस्त्र उठाने में देर करनी चाहिए?
शस्त्र उठाने में एक पल की भी देर नहीं
वक्ता कहते हैं कि यह वर्णन इसलिए दिया गया है कि पुरुष, जैसे ही उसका पाणिग्रहण संस्कार हो और वह अपनी अर्धांगिनी चुन ले, यदि कोई दूसरा पुरुष ऐसा गलत काम करने का प्रयास करे, तो शस्त्र उठाने में देर न करे। यहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं — सनातन के मूल, जिनसे सनातन उत्पन्न हुआ — जिनके माध्यम से यह चित्र रखा गया है: यदि कोई आपकी विवाहिता पत्नी पर कुदृष्टि डाले, तो शस्त्र उठाने में आधे पल की भी देर नहीं करनी है।
वक्ता कहते हैं कि यह वर्णन यहाँ इसलिए किया गया है कि यदि आप, पुरुष होकर, जैसे ही आपका पाणिग्रहण संस्कार हो और आपने अपनी अर्धांगिनी चुन ली हो — यदि फिर कोई दूसरा पुरुष इस तरह का गलत काम करने का प्रयास करे, तो आपको अस्त्र-शस्त्र उठाने में ढील नहीं करनी चाहिए। यहाँ आपको केवल ब्रह्मा, विष्णु और महेश दिखेंगे, जो सनातन के मूल हैं और जिनसे सनातन उत्पन्न हुआ। उन्हीं के माध्यम से यह चित्र रखा गया है। यदि कोई आपकी विवाहिता पत्नी की ओर कुदृष्टि डाले, तो शस्त्र उठाने में आधे पल की भी देर नहीं करनी है। और वक्ता बताते हैं कि यह वर विष्णु ठीक पहले ही पा चुके थे; शिव ने वचन दिया था कि वे यह प्रतिज्ञा पूरी करेंगे, और उन्होंने करके दिखाया — ब्रह्मा को मारने के लिए तुरंत त्रिशूल उठा लिया।
शास्त्र क्या कहता है
Recalling Viṣṇu's own earlier request, Śiva raised his trident at once to slay Brahmā for looking at Satī with desire.
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इत्युक्त्वा प्रियविष्णुर्मा तदा विष्णुवचः स्मरन्। इयेष हन्तुं ब्रह्माणं शूलमुद्यम्य शंकरः॥
ऐसा कहकर विष्णु के प्रिय शंकर ने तब विष्णु के वचन का स्मरण करके शूल उठाकर मुझ ब्रह्मा को मारना चाहा।
जब शिव ने ब्रह्मा पर त्रिशूल उठाया तो बीच में कौन आया?
सप्तर्षि और विष्णु का शिव के चरणों में गिरना
तुरंत सब सप्तर्षि गण उनके चरणों में गिर पड़े और वहाँ हाहाकार मच गया — बहुत बड़ा अपराध हुआ है, कृपया क्षमा करें। फिर विष्णु ने भी उनके चरण पकड़ लिए। महेश्वर ने कहा: अभी थोड़ी देर पहले मेरे परम भक्त विष्णु ने यह प्रतिज्ञा की, करवाई, और मैंने वह प्रतिज्ञा स्वीकार की — कि जो इस तरह कामना से भरकर देखे, वह मारा जाए। तो मैं अब इसे क्यों न मारूँ?
जब उन्होंने यह कहते हुए ब्रह्मा को मारने के लिए त्रिशूल उठाया कि अब मैं इसे मार डालूँगा, तो ऐसी स्थिति बनी। वे ऐसा कैसे कर सकते थे? तुरंत सब सप्तर्षि गण उनके चरणों में गिर पड़े और वहाँ हाहाकार मच गया — बहुत बड़ा अपराध हो गया है, कृपया क्षमा करें। फिर विष्णु ने भी उनके चरण पकड़ लिए। महेश्वर ने कहा: अभी थोड़ी देर पहले मेरे परम भक्त विष्णु ने यह प्रतिज्ञा की और करवाई, और मैंने वह प्रतिज्ञा स्वीकार की — कि जो इस तरह कामना से भरकर देखे, उसे मैं मारूँ। तो मैं अब इसे क्यों न मारूँ?
शास्त्र क्या कहता है
When Śiva raised the trident against Brahmā, the sages headed by Marīci cried out in panic and the gods, along with Viṣṇu, pleaded for his life.
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शंभुनोद्यमिते शूले मां च हन्तुं द्विजोत्तम। मरीचिप्रमुखास्ते वै हाहाकारं च चक्रिरे॥
हे द्विजोत्तम! शम्भु के द्वारा मुझे मारने के लिये त्रिशूल उठाये जाने पर मरीचि आदि उन ऋषियों ने हाहाकार मचा दिया।
ततो देवगणाः सर्वे मुनयश्चाखिलास्तथा। तुष्टुवुः शंकरं तत्र प्रज्वलन्तं भयातुराः॥
तब सभी देवगण तथा समस्त मुनि भयभीत होकर वहाँ क्रोध से प्रज्वलित शंकर जी की स्तुति करने लगे।
देवदेव महादेव शरणागतवत्सल। ब्रह्माणं रक्ष रक्षेश कृपां कुरु महेश्वर॥
हे देवदेव! हे महादेव! हे शरणागतवत्सल! ब्रह्मा जी की रक्षा कीजिये। हे रक्षेश! हे महेश्वर! कृपा कीजिये।
ब्रह्मा के नाश के बारे में शिव ने क्या कहा?
लाख ब्रह्मा, और विष्णु की स्तुतियाँ
जब सबने कहा कि यदि ब्रह्मा का नाश हो गया, तो वे सृष्टि के रचयिता हैं, विधाता हैं, सृष्टि कैसे चलेगी — शिव ने कहा: हम इसी क्षण ऐसे लाख ब्रह्मा प्रकट कर देंगे। इसे मारकर हम नया ब्रह्मा पद बनाएँगे, नया ब्रह्मा उत्पन्न होगा। पर विवाह था, शुभ अवसर था। विष्णु ने स्तुति पर स्तुति की — ऐसा मत कीजिए, ब्रह्मा से अपराध हुआ है, क्षमा कीजिए; पिछले युग में भी इन्होंने बहुत अहंकार दिखाया था, और अब फिर। ऐसी बहुत सी स्तुतियों से शिव शांत हुए और उन्हें नहीं मारा।
शिव ने कहा, और मुझमें ऐसी सामर्थ्य है — जब सबने कहा कि यदि ब्रह्मा का नाश हो गया, तो वे सृष्टि के रचयिता हैं, विधाता हैं, तो फिर सृष्टि कैसे चलेगी? शिव ने कहा: हम इसी क्षण ऐसे लाख ब्रह्मा प्रकट कर देंगे। इसे मारकर हम नया ब्रह्मा पद बनाएँगे; नया ब्रह्मा उत्पन्न होगा। पर उस स्थान पर विवाह था, शुभ कार्य था। वहाँ यह लीला चली। विष्णु ने बहुत-बहुत स्तुतियाँ कीं — इस तरह मत कीजिए; ब्रह्मा से अपराध हुआ है, कृपया क्षमा कीजिए। पिछले युग में भी इन्होंने बहुत अभिमान दिखाया था, और अब फिर किया। ऐसी बहुत सी स्तुतियों से शिव शांत हुए और फिर उन्हें नहीं मारा।
शास्त्र क्या कहता है
When told that killing Brahmā would end creation, Śiva answered that he could simply manifest a lakh of new Brahmās on the spot.
The text has Śiva say only that he will create another maker of creation (19:60) — a single replacement, not a lakh of Brahmās. The gist is right; the number is an embellishment.
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प्रजाः स्रष्टुमयं शंभो प्रादुर्भूतश्चतुर्मुखः। अस्मिन् हते प्रजास्रष्टा नास्त्यन्यः प्राकृतोऽधुना॥
हे शम्भो! ये चतुरानन ब्रह्मा प्रजा की सृष्टि करने के लिये उत्पन्न हुए हैं। इनके मारे जाने पर अभी प्रजा की सृष्टि करनेवाला कोई दूसरा नहीं है।
सृष्टिस्थित्यन्तकर्माणि करिष्यामः पुनः पुनः। त्रयो देवा वयं नाथ शिवरूप त्वदाज्ञया॥
हे नाथ! हे शिवस्वरूप! हम तीनों देवता आपकी आज्ञा से ही सृष्टि, स्थिति और संहार का कार्य बार-बार करेंगे।
एतस्मिन्निहते शम्भो कस्त्वत्कर्म करिष्यति। तस्मान्न वध्यो भवता सृष्टिकृल्लयकृद्विभो॥
हे शम्भो! इनका वध कर देने पर आपका कार्य कौन सम्पन्न करेगा? इसलिये हे लयकर्ता विभो! आप इन सृष्टिकर्ता का वध न करें।
अनेनैव सती कन्या दक्षस्य च शिवा विभो। सदुपायेन वै भार्या भवदर्थे प्रकल्पिता॥
हे विभो! इन्हीं के द्वारा शिवा को उत्तम उपाय से दक्ष की कन्या सती के रूप में आपके लिये पत्नी बनने योग्य बनाया गया है।
इत्याकर्ण्य महेशस्तु विज्ञप्तिं विष्णुना कृताम्। प्रत्युवाचाखिलांस्तांश्च श्रावयंश्च दृढव्रतः॥
विष्णु के द्वारा की गयी इस प्रार्थना को सुनकर दृढ़व्रत महेश्वर ने वहाँ उपस्थित सभी को सुनाते हुए यह उत्तर दिया।
देवदेव रमेशान विष्णो मत्प्राणवल्लभ। न निवारय मां तात वधादस्य खलस्त्वयम्॥
हे देवदेव! हे रमेशान! हे विष्णो! हे मेरे प्राणप्रिय! हे तात! इसे मारने से मुझे मत रोकिये, क्योंकि यह दुष्ट है।
पूरयिष्यामि विज्ञप्तिं पूर्वान्तेऽङ्गीकृतां मया। महापापकरं दुष्टं हन्म्येनं चतुराननम्॥
पूर्वकाल में मेरे द्वारा स्वीकार की गयी उस प्रार्थना को मैं पूर्ण करूँगा। इस महापापी तथा दुष्ट चतुरानन ब्रह्मा का मैं वध करूँगा।
अहमेव प्रजाः स्रक्ष्ये सर्वाः स्थिरचरा अपि। अन्यं स्रक्ष्ये सृष्टिकरमथवाहं स्वतेजसा॥
मैं स्वयं ही समस्त स्थावर-जंगम प्रजाओं की सृष्टि करूँगा, अथवा अपने ही तेज से किसी अन्य सृष्टिकर्ता को उत्पन्न करूँगा।
ब्रह्मा ने अपना सिर छुआ तो क्या हुआ?
ब्रह्मा के चार सिरों के ऊपर नंदी सहित शिव का प्रकट होना
शिव ने ब्रह्मा से अपना सिर छूने को कहा। डर के मारे ब्रह्मा अपना सिर नहीं छू रहे थे; वे हाथ जोड़े शिव के चरणों में पड़े थे। पर जब उनसे सिर छूने को कहा गया, तो जैसे ही उन्होंने छुआ, उसी रूप में भगवान शिव अपने वाहन नंदी के साथ वहाँ स्थित हो गए — यानी ब्रह्मा के चार सिरों के ऊपर शिव उपस्थित और प्रकट हो गए।
क्योंकि यह लीला चल रही थी, ठीक उसी समय शिव ने ब्रह्मा से कहा: अपना सिर छुओ। डर के मारे ब्रह्मा अपना सिर नहीं छू रहे थे; वे हाथ जोड़े शिव के चरणों में पड़े थे। पर जब उनसे सिर छूने को कहा गया, तो जैसे ही उन्होंने छुआ, उसी रूप में और अपने वृष वाहन के साथ भगवान शिव वहाँ स्थित हो गए। यानी ब्रह्मा के चार सिरों के ऊपर शिव उपस्थित और प्रकट हो गए।
शास्त्र क्या कहता है
Once pacified, Śiva told Brahmā to touch his own head; the instant Brahmā did, a bull-mounted form of Śiva appeared in that very place.
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ब्रह्मन् तात प्रसन्नोऽहं निर्भयस्त्वं भवाधुना। स्वशीर्षं स्पृश हस्तेन मदाज्ञां कुर्वसंशयम्॥
हे ब्रह्मन्! हे तात! मैं प्रसन्न हूँ, अब आप निर्भय हो जाइये। अपने हाथ से अपने सिर का स्पर्श करें और संशयरहित होकर मेरी आज्ञा का पालन करें।
इत्याकर्ण्य वचः शम्भोर्बहुलीलाकृतः प्रभोः। स्पृशन्स्वं कं तथा भूत्वा प्राणमं वृषभध्वजम्॥
अनेक प्रकार की लीला करनेवाले प्रभु शम्भु के इस वचन को सुनकर उसी के अनुसार अपने सिर का स्पर्श करते हुए मैंने वृषभध्वज को प्रणाम किया।
यावदेवमहं स्वं कं स्पृशामि निजपाणिना। तावत्तत्र स्थितं सद्यस्तद्रूपवृषवाहनम्॥
जैसे ही मैंने अपने हाथ से अपने सिर का स्पर्श किया, उसी क्षण वहाँ उसी रूप में वृषवाहन शिव का स्वरूप स्थित दिखायी पड़ा।
ब्रह्मा ने कौन सा दंड माँगा, और शिव ने क्या वर दिया?
रुद्र शिर नाम और तेजस्वी ब्राह्मणों की सिद्धि
ब्रह्मा ने पूछा कि आगे यदि कोई ऐसा गलत काम करे तो क्या दंड दिया जाए, और शिव से उन्हें उचित दंड देने को कहा ताकि उनका अपना पाप भी दूर हो। शिव ने कहा: हे ब्राह्मण, इसी रूप में मेरे साथ स्थित रहकर, इसी रूप में स्तुत होकर, आराधना में लगे रहो और तप करो। इससे तुम पृथ्वी पर सब जगह रुद्र शिर नाम से प्रसिद्ध होगे। रुद्र शिर के रूप में तुम तेजस्वी ब्राह्मणों के सब काम सिद्ध करने वाले होगे।
तब ब्रह्मा ने कहा: आगे ऐसे गलत काम के लिए किस प्रकार दंड दिया जाए, और क्या किया जाए — इसके लिए मुझे उचित दंड दीजिए, ताकि मेरा यह पाप भी दूर हो। तब भगवान शिव ने कहा: हे ब्राह्मण, इसी रूप में मेरे साथ स्थित होकर और इसी में स्तुत होकर, आराधना में लगे रहकर तप करो। इससे तुम पृथ्वी पर सब जगह रुद्र शिर नाम से प्रसिद्ध होगे। रुद्र शिर के रूप में तुम तेजस्वी ब्राह्मणों के सब काम सिद्ध करने वाले होगे। यही वर शिव ने वहाँ दिया।
शास्त्र क्या कहता है
As penance, Śiva declared that Brahmā, established in this bull-headed form and devoted to Śiva's worship, would become famous everywhere as "Rudra's Head" and would help radiant brahmins accomplish their undertakings.
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अनेनैव स्वरूपेण मदधिष्ठितकेन हि। तपः कुरु प्रसन्नात्मा मदाराधनतत्परः॥
इसी रूप में, जो मेरे द्वारा अधिष्ठित है, प्रसन्नचित्त होकर तथा मेरी आराधना में तत्पर रहकर आप तप कीजिये।
ख्यातिं यास्यसि सर्वत्र नाम्ना रुद्रशिरः क्षितौ। साधकः सर्वकृत्यानां तेजोभाजां द्विजन्मनाम्॥
आप पृथ्वी पर सर्वत्र "रुद्रशिर" नाम से प्रसिद्धि प्राप्त करेंगे और तेजस्वी ब्राह्मणों के समस्त कार्यों को सिद्ध करनेवाले होंगे।
मनुष्याणामिदं कृत्यं यस्माद्वीर्यं त्वयाधुना। तस्मात्त्वं मानुषो भूत्वा विचरिष्यसि भूतले॥
चूँकि अभी आपने जो वीर्यपात किया है, वह मनुष्यों का कृत्य है, इसलिये आप मनुष्य होकर पृथ्वीतल पर विचरण करेंगे।
रुद्र शिर का चरित्र सुनने का क्या फल है?
पराई स्त्री के कारण हुए दोष से मुक्ति
शिव कहते हैं: जो तुम्हारा यह रूप देखकर पृथ्वी पर घूमते हुए कहेंगे कि ब्रह्मा के सिर पर शिव कैसे आए — और जो तुम्हारा पूरा कृत्य सुनेगा — वह पराई स्त्री के कारण किए गए त्याग से शीघ्र मुक्त होगा। वक्ता कहते हैं कि यदि कोई पराई स्त्री के लिए अपना धर्म छोड़ दे, तो उसे यह चरित्र सुनना चाहिए, जिसमें ब्रह्मा की मृत्यु, ब्रह्महत्या, होने वाली थी।
शिव कहते हैं, और जो तुम्हारा यह रूप देखकर पृथ्वी पर घूमते हुए कहेंगे कि ब्रह्मा के सिर पर शिव कैसे आए — और जो तुम्हारा पूरा कृत्य सुनेगा — वह पराई स्त्री के कारण किए गए त्याग से शीघ्र मुक्त हो जाएगा। वक्ता कहते हैं कि यदि कोई पराई स्त्री के लिए अपना धर्म छोड़ दे, तो उसे यह चरित्र सुनना चाहिए — वह प्रसंग जहाँ ब्रह्मा की मृत्यु होने वाली थी, जहाँ ब्रह्महत्या होने वाली थी।
शास्त्र क्या कहता है
Śiva declared that whoever hears the full account of the "Rudra's Head" episode is swiftly freed from the sin of desiring another man's wife.
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यस्त्वां चानेन रूपेण दृष्ट्वा कौ विचरिष्यति। किमेतद् ब्रह्मणो मूर्ध्नि वदन्निति पुरान्तकः॥
और जो कोई तुम्हें इस रूप में देखकर "यह क्या! ब्रह्मा के सिर पर पुरान्तक कैसे हैं" ऐसा कहता हुआ पृथ्वी पर विचरण करेगा —
ततस्ते चेष्टितं सर्वं कौतुकाच्छ्रोष्यतीति यः। परदारकृतात्त्यागान्मुक्तिं सद्यः स यास्यति॥
— और जो कोई कौतुकवश तुम्हारे इस समस्त कृत्य को सुनेगा, वह पराई स्त्री के निमित्त किये गये इस त्याग से शीघ्र ही मुक्त हो जायेगा।
यथा यथा जनश्चैतत्कृत्यं ते कीर्तयिष्यति। तथा तथा विशुद्धिस्ते पापस्यास्य भविष्यति॥
लोग जैसे-जैसे आपके इस कृत्य का कीर्तन करेंगे, वैसे-वैसे आपके इस पाप की शुद्धि होती जायेगी।
इस कथा को सुनने का वास्तव में क्या अर्थ है?
समझना, मनोरंजन नहीं — धर्म का आचरण कभी न छोड़ना
जो यह पूरा चित्र सुनता और समझता है — और वक्ता कहते हैं कि सुनने का अर्थ अमर चित्र कथा नहीं है, यह समझने की बात है — वह सीखता है कि हमें ऐसे काम नहीं करने हैं और अपने आचरण से कभी नहीं हटना है। धर्म का आचरण नहीं छोड़ना है; नहीं तो स्वयं शिव वध करेंगे। वे कहते हैं कि यहाँ बताए गए रुद्र शिर का यही अर्थ है।
जो यह पूरा चित्र सुनेगा और समझेगा — और वक्ता ज़ोर देते हैं कि सुनने का अर्थ अमर चित्र कथा नहीं है; यह समझने की बात है — वह सीखता है कि हमें इस तरह के काम नहीं करने हैं, और अपने आचरण से कभी नहीं हटना है। धर्म का आचरण नहीं छोड़ना है; नहीं तो स्वयं शिव वध करेंगे। वे कहते हैं कि रुद्र शिर का अर्थ यहाँ बताया गया।
विवाह के आचार्य के रूप में ब्रह्मा ने कौन सी दक्षिणा माँगी?
कि मनुष्यों के पापों की शुद्धि के लिए शिव सदा वेदी पर रहें
शिव ने कहा: तुमने मेरा विवाह कार्य उत्तम रीति से पूरा किया है, हम तुमसे प्रसन्न हैं; तुम आचार्य हो, तुम्हें क्या दक्षिणा दें? ब्रह्मा दक्षिणा में माँगते हैं कि मनुष्यों के पापों की शुद्धि के लिए शिव इसी रूप में सदा इस वेदी पर विराजमान रहें — दक्ष प्रजापति के यहाँ उस स्थान पर जहाँ विवाह हो रहा था — और कहते हैं कि वे स्वयं वहाँ आश्रम बनाकर शिव की तपस्या करेंगे।
इसके बाद ब्रह्मा ने शिव के साथ बाकी सारा विधि-विधान पूरा किया। पूरा होने पर शिव ने कहा: तुमने मेरा वैवाहिक कार्य उत्तम विधि से पूरा किया है, हम तुमसे प्रसन्न हैं। तुम आचार्य हो — तुम्हें क्या दक्षिणा दें? तब ब्रह्मा यह वर माँगते हैं: दक्षिणा में हम आपसे बस इतना माँगते हैं कि मनुष्यों के पापों की शुद्धि के लिए आप इसी रूप में सदा इस वेदी पर विराजमान रहें — दक्ष प्रजापति के यहाँ, जहाँ विवाह हो रहा था। और वे कहते हैं, यहाँ हम आश्रम बनाकर आपकी तपस्या करेंगे।
पूर्वा फाल्गुनी से युक्त चैत्र त्रयोदशी के साथ कौन सा वर जुड़ा है?
रविवार को पूर्वा फाल्गुनी से युक्त चैत्र शुक्ल त्रयोदशी
वक्ता कहते हैं, यह तिथि और यह समय याद रखिए: चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को, पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में, जिस दिन रविवार हो — इस पृथ्वी पर जो भी मनुष्य भक्तिपूर्वक आपके दर्शन करे, हे हर, आपकी कृपा से उसके सब पाप नष्ट होंगे और सब रोग पूरी तरह नष्ट होंगे। और यदि कोई स्त्री बाँझ हो, या काणी हो, या रूपहीन हो, तो आपके दर्शन से उस पर लगा जो भी दोष था, जिसके कारण उसे ऐसा रूप मिला, उससे भी वह मुक्त होगी।
वक्ता कहते हैं, और इसके बाद एक विशेष वर — आप सब यह तिथि और यह समय याद रखिए। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को, पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। में, जिस दिन रविवार पड़े: इस पृथ्वी पर जो भी मनुष्य भक्तिपूर्वक आपके दर्शन करे — हे हर, आपकी कृपा से उसके सब पाप नष्ट होंगे, और उसके सब रोग पूरी तरह नष्ट होंगे। और यदि कोई स्त्री वंध्या हो, काणी हो, रूपहीन हो — वह भी आपके दर्शन से, उस पर जो भी दोष लगा था जिसके कारण उसे ऐसा रूप मिला, उससे भी मुक्त होगी, उससे भी छुटकारा पाएगी।
चैत्र त्रयोदशी कब आती है, और उस दिन क्या करना चाहिए?
चैत्र राम नवमी के बाद चौथा दिन; शिव पूजन और रुद्राभिषेक
शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि हमारी मनाई जाने वाली चैत्र राम नवमी के बाद चौथे दिन आती है। यदि उस दिन कभी पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र पड़े और रविवार हो, तो उस दिन शिव पूजन किया जाए और हो सके तो रुद्राभिषेक आदि किया जाए, तो हमारे बहुत-बहुत पाप-समूह नष्ट होते हैं और शिव कृपा से पुण्य बढ़ता है। वक्ता कहते हैं कि यह सब हमें याद रखना चाहिए।
चैत्र मास में, जब हम अब चैत्र राम नवमी मनाते हैं, तो शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि राम नवमी के बाद चौथे दिन आती है। यदि उस दिन कभी पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र पड़े और वह दिन रविवार हो, तो यदि उस दिन शिव पूजन किया जाए और, हो सके तो, रुद्राभिषेक आदि किया जाए — तो हमारे बहुत-बहुत पाप-समूह नष्ट होते हैं, और शिव कृपा से पुण्य बढ़ता है। वक्ता कहते हैं कि ये सब बातें हमें याद रखनी चाहिए। वह आशीर्वाद और वर देकर शिव वहाँ उपस्थित हो गए, अपने एक रूप में वहाँ स्थित हो गए; और इसके बाद, जब सारा विधि-विधान पूरा हुआ, तो सब देवी-देवताओं के साथ सब कैलाश चले गए।
इस विवाह कथा को सुनने का क्या फल है?
कोई भी विवाह या यज्ञ बिना बाधा के पूरा होना
ब्रह्मा कहते हैं कि उन्होंने वर्णन किया है कि पिछले युग में स्वायंभुव मन्वंतर में भगवान शिव का विवाह कैसे हुआ। वे कहते हैं कि यदि किसी का विवाह होने वाला हो, या यज्ञ, या कोई शुभ कार्य, तो जो वहाँ भगवान शंकर का पूजन करे और शांत मन से यह कथा सुने — उसका पूरा वैवाहिक कर्म बिना किसी बाधा या रुकावट के पूरा होता है, और अन्य शुभ काम भी सदा बिना विघ्न के पूरे होते हैं।
यहाँ ब्रह्मा कहते हैं कि उन्होंने वर्णन किया है कि पिछले युग में, स्वायंभुव मन्वंतर में, भगवान शिव का विवाह कैसे हुआ। वे कहते हैं, विवाह के समय — यदि किसी का विवाह होने वाला हो, यदि यज्ञ होने वाला हो, यदि कोई शुभ कार्य होने वाला हो — तो जो वहाँ भगवान शंकर का पूजन करे और शांत मन से यह कथा सुने, उसका पूरा वैवाहिक कर्म बिना किसी बाधा या रुकावट के पूरा होता है, और अन्य शुभ काम भी सदा बिना विघ्न के पूरे होते हैं।
विवाह के समय कथा सुनना किससे रक्षा करता है?
पड़ोसियों और रिश्तेदारों में बाधा डालने वाले, और विवाह के समय की अनहोनी
घर में जब कोई वैवाहिक कार्य होने वाला हो, तब जो भगवती सती और शिव के विवाह का यह पूरा चरित्र शांति से सुने — वक्ता कहते हैं कि विवाह में बाधा डालने वाले बहुत लोग होते हैं: वे पड़ोसी हो सकते हैं, रिश्तेदार और नातेदार हो सकते हैं। ताकि उनके द्वारा कोई बाधा न उठ सके, या कोई और ऐसी विपत्ति या दुर्भाग्य न आए, इन सबसे रक्षा के लिए यह कथा सुननी चाहिए; विवाह के समय बहुत कठिनाइयाँ आती हैं।
यानी घर में जब कोई वैवाहिक कार्य होने वाला हो, तब जो यह कथा, भगवती सती और शिव के विवाह का यह पूरा चरित्र, शांति से सुने। वक्ता कहते हैं कि विवाह में बाधा डालने वाले बहुत लोग होते हैं। वे पड़ोसी हो सकते हैं; रिश्तेदार और नातेदार हो सकते हैं। ताकि उनके द्वारा किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो सके, या कोई और ऐसी विपत्ति या दुर्भाग्य न आए। विवाह के समय बहुत कठिनाइयाँ आती हैं। इन सबसे रक्षा के लिए यह कथा सुननी चाहिए।
शिव और सती कैलाश पर कितने समय रहे?
पच्चीस देव-वर्ष, 360 वर्ष का एक देव वर्ष
स्वयं वसंत को बुलाया गया और कैलाश पर्वत को पूरा सजाया गया, और शिव और सती दोनों के अमृत पान आदि का वर्णन है। कहा गया है कि देवताओं के वर्षों से गिनें तो यह पच्चीस वर्ष था — और हमारे 360 वर्ष देवताओं का एक वर्ष होते हैं। तो 360 गुणा 5 — इतने समय तक भगवान शिव ने कैलाश पर्वत पर भगवती सती के साथ अपना गृहस्थ जीवन चलाया।
अब कैलाश पर्वत पर भगवती सती के साथ स्थित होकर भगवान शिव ने लंबे समय तक बहुत-बहुत कार्य किए। वक्ता कहते हैं कि गृहस्थ जीवन में नवविवाहिता पत्नी और युवा पुरुष का, और वे एक-दूसरे को किन तरीकों से प्रसन्न करते हैं, इसका पूरा और विस्तृत वर्णन है। वहाँ स्वयं वसंत को बुलाया गया और कैलाश पर्वत को पूरा सजाया गया, और भगवान शिव और भगवती सती दोनों के अमृत पान आदि का वर्णन है — कि यह देवताओं के वर्षों से गिनें तो पच्चीस वर्ष था, क्योंकि 360 वर्ष देवताओं का एक वर्ष होते हैं। तो 360 गुणा 5, इतने समय तक भगवान शिव ने कैलाश पर्वत पर भगवती सती के साथ अपना गृहस्थ जीवन चलाया।
कैलाश पर सती ने किस बात की शिकायत की?
पर्वत पर वर्षा ऋतु — बादल, हवा और बिजली
वे कहती हैं कि जिस स्थान पर वे रहते हैं, वहाँ बहुत कष्ट होता है: वर्षा ऋतु आ गई है और बादल बहुत गरजते हैं, हवा बहुत तेज़ चलती है, बरसात में बिजली इतनी तेज़ चमकती है और ऐसी धाराएँ बनती हैं कि मन बहुत व्याकुल हो जाता है। जहाँ वे रहते हैं, वहाँ यह वर्षा ऋतु बहुत कष्टदायक, बहुत भयानक है। यहाँ दिन-रात का पता ही नहीं चलता — दिन में सूर्य नहीं दिखता, रात में चंद्रमा दिखाई नहीं देता।
इसके बाद भगवती सती के मन में एक विचार आया, और वक्ता कहते हैं कि यहाँ से दूसरा चित्र शुरू होता है। वे कहती हैं कि जहाँ वे रहते हैं, वह ऐसा स्थान है जहाँ बहुत कष्ट होता है। वर्षा ऋतु आ गई है और बादल बहुत गरजते हैं। यहाँ हवा बहुत तेज़ चलती है। वर्षा ऋतु में यहाँ बिजली इतनी तेज़ चमकती है, और पानी की ऐसी धाराएँ बनती हैं, कि इन सबके कारण मन बहुत व्याकुल हो जाता है। जहाँ वे रहते हैं, वहाँ यह वर्षा ऋतु बहुत कष्टदायक, बहुत भयानक है। वे कहती हैं कि यहाँ दिन-रात का भी पता नहीं चलता: दिन में सूर्य नहीं दिखता, रात में चंद्रमा दिखाई नहीं देता। और इतनी तेज़ हवा चलती है कि यह आकाश भी स्थिर नहीं हो पाता। वक्ता अपनी व्याख्या जोड़ते हैं: जब विवाहिता पत्नी कुछ चाहती है, तो वह सीधे यह कहने के बजाय कि उसे ऐसी चीज़ चाहिए, अपनी बात इसी तरह कई तरीकों से समझाती है।
सती की शिकायत पूरी होने पर शिव ने उनसे क्या पूछा?
तुम क्या कहना चाहती हो?
वे कहती हैं कि ऐसा लगता है मानो ये बादल अब हमारे सिर पर गिर पड़ेंगे। भगवती सती यह सब शंकर से कहती हैं। ऐसे बहुत से वर्णन करने पर शिव पूछते हैं: तुम क्या कहना चाहती हो? इतने विस्तार से क्या कह रही हो, क्या कहना चाहती हो, तुम्हारी इच्छा क्या है?
वे कहती हैं, ऐसा लगता है मानो ये बादल अब हमारे सिर पर गिर पड़ेंगे। भगवती सती यह सब शंकर से कह रही हैं। वे इस तरह के बहुत से वर्णन करती हैं, और तब शिव पूछते हैं: तुम क्या कहना चाहती हो? जो तुम इतने विस्तार से कह रही हो — तुम क्या कहना चाहती हो, तुम्हारी इच्छा क्या है?
सती ने शिव से कैसा निवास माँगा?
कैलाश, हिमालय, महाकोशी या पृथ्वी पर निवास
भगवती सती कहती हैं: हे वृषभध्वज, कैलाश पर्वत पर, या हिमालय पर, या महाकोशी पर, या पृथ्वी पर अपने योग्य निवास बनाइए। वक्ता कहते हैं कि यानी भगवती सती चाहती थीं कि उनके लिए एक सुंदर घर, एक महल हो, जबकि भगवान शिव ऊपर पर्वत पर रहते थे; और उन्होंने यह सब विस्तार से रखा।
तब भगवती सती कहती हैं: हे वृषभध्वज, कैलाश पर्वत पर, हिमालय पर, या महाकोशी पर, या पृथ्वी पर अपने लिए योग्य निवास स्थान बनाइए। वक्ता कहते हैं कि यानी भगवती सती चाहती थीं कि उनके लिए कोई सुंदर घर, एक महल हो — और भगवान शिव ऊपर पर्वत पर रहते थे, इसलिए उन्होंने पूरी बात विस्तार से रखी। वे कहते हैं, इस विषय के साथ वर्णन पढ़िए, आपको आनंद आएगा: हमारी जगदंबा ने शिव को कितना परेशान किया और कितनी देर तक बोलीं। वे जोड़ते हैं कि ऐसा चरित्र दिखाया गया है: नई पत्नियाँ कुछ चाहती हैं, और यदि सीधे कहना उन्हें ठीक न लगे, तो वे कई तरीकों से समझाती हैं।
शिव ने कैलाश और हिमालय के बारे में क्या कहा?
कैलाश पर बादल कभी नहीं आते; हिमालय पर आकाशचारी सिद्धों की पत्नियाँ रहती हैं
शिव भी उतने ही विस्तार से उत्तर देते हैं, हर स्थान का अलग-अलग वर्णन करते हुए। वे कहते हैं कि इस कैलाश पर्वत के ऊपर बादल कभी नहीं आ सकते — तुम क्या चाहती हो, यहाँ बनाएँ? या यदि तुम कहो, तो हम हिमालय पर्वत चलेंगे, जहाँ सिद्धों की, आकाशचारी सिद्धों की स्त्रियाँ उस स्थान पर विराजमान और उपस्थित हैं।
वक्ता कहते हैं कि अब शिव भी कम नहीं हैं: वे भी यहाँ बहुत विस्तार से समझाते हैं। ठीक है — कैलाश पर्वत पर, हिमालय पर, या महाकोशी पर या पृथ्वी पर — और उन्होंने हर एक का अलग-अलग वर्णन किया है। वे कहते हैं कि इस कैलाश पर्वत पर बादल कभी नहीं आ सकते। तुम क्या चाहती हो — यहाँ बनाएँ? या यदि तुम कहो, तो हम हिमालय पर्वत चलेंगे। वहाँ सिद्धों की, आकाशचारी सिद्धों की स्त्रियाँ उस स्थान पर विराजमान हैं और वहाँ उपस्थित रहती हैं।
शिव के वर्णन में हिमालय पर और कौन रहता है?
अप्सराएँ, यक्षिणियाँ, किन्नरियाँ, पर्वत और नाग कन्याएँ, और मेना
वहाँ अप्सराएँ, यक्षिणियाँ, किन्नरियाँ, पर्वत कन्याएँ और नाग कन्याएँ कई प्रकार की उपस्थित हैं, और सब तुम्हें देखकर प्रसन्न होंगी। यदि तुम कहो तो हम वहाँ घर बनाएँगे; वहाँ आकर वे सब तुम्हें सुख देने में सहायता करेंगी और तुम्हारी सेवा करेंगी। पर्वतराज हिमालय और उनकी पत्नी मेना, जो अपने रूप और गुणों के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं, वे भी तुम्हारे मन के अनुसार ऐश्वर्य से, आशीर्वाद से और प्रार्थना से तुम्हें प्रसन्न करना चाहेंगे।
इसके बाद वे कहते हैं कि वहाँ अप्सराएँ, यक्षिणियाँ, किन्नरियाँ, पर्वत कन्याएँ और नाग कन्याएँ कई प्रकार की उपस्थित हैं, और वे सब तुम्हें देखकर प्रसन्न होंगी। यदि तुम कहो, तो हम वहाँ घर बनाएँगे। वहाँ आकर वे सब तुम्हें सुख देने में सहायता करेंगी और तुम्हारी सेवा करेंगी। पर्वतराज हिमालय और उनकी पत्नी मेना, जो अपने रूप और गुणों के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं — वे भी तुम्हारे मन के अनुसार ऐश्वर्य से, आशीर्वाद से और प्रार्थना से तुम्हें प्रसन्न करना चाहेंगे। वक्ता कहते हैं कि इस प्रकार उन्होंने हिमालय, मंदराचल आदि का पूरा विस्तार से वर्णन किया — कौन कहाँ रहता है।
ग्रंथ स्वयं हिमालय का क्या वर्णन करता है?
पर्वत की दिव्यता और दिक्पालों की पुरियाँ
हिमालय पर्वत का बहुत विस्तृत वर्णन है: उसकी सारी दिव्यता, कहाँ क्या व्याप्त है, जिसे सामान्य मनुष्य प्रत्यक्ष नहीं देख सकता; वहाँ किस प्रकार की दिव्य वस्तुएँ हैं; इंद्र, कुबेर, यम और वरुण कहाँ रहते हैं; दस दिक्पालों की पुरियाँ कितनी दूरी पर स्थित हैं; और अप्सराएँ किस शिखर पर रहती हैं। यह सब सुनकर भगवती कहती हैं कि हिमालय पर्वत ही ठीक स्थान होगा, और वहीं चलना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि हिमालय पर्वत का बहुत विस्तृत वर्णन है। उसकी सारी दिव्यता — कहाँ क्या व्याप्त है, जिसे सामान्य मनुष्य प्रत्यक्ष नहीं देख सकता — पूरी तरह वर्णित है: वहाँ किस प्रकार की दिव्य वस्तुएँ हैं। इंद्र, कुबेर, यम और वरुण कहाँ रहते हैं; दस दिक्पालों की पुरियाँ कितनी दूरी पर स्थित हैं; और अप्सराएँ किस शिखर पर रहती हैं — सबका वर्णन किया गया है। यह सब सुनकर भगवती कहती हैं: हाँ, हिमालय पर्वत ही ठीक स्थान होगा। वहीं चलें।
हिमालय के शिखर पर क्या हुआ?
दस हज़ार देव-वर्षों का विहार, और वैराग्य का उदय
शंकर बहुत प्रसन्न हुए और वे हिमालय पर्वत के सबसे ऊँचे शिखर पर गए, सबसे सुंदर स्थान पर, जहाँ गण, किन्नर, सिद्ध, अप्सराएँ और विद्याधरों की पत्नियाँ सब उपस्थित हैं और भगवती के साथ तरह-तरह की लीला करती हैं। फिर देवताओं के वर्षों से गिनें तो 10,000 वर्ष — 10,000 गुणा 360 — वे वहाँ विहार करते हैं। इसके बाद भगवती सती कहती हैं कि उनकी कामनाएँ तृप्त हो गई हैं और उनके मन में वैराग्य उठने लगा है।
जब सती ने इस प्रकार कहा, तो शंकर बहुत प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर वे हिमालय पर्वत के ऊँचे शिखर पर गए, जहाँ सबसे सुंदर स्थान है, जहाँ बहुत से गण, किन्नर, सिद्ध, अप्सराएँ और दिव्य विद्याधर और विद्याधरों की पत्नियाँ, वे देवियाँ, सब उपस्थित हैं, और जहाँ वे भगवती के साथ तरह-तरह की लीला करती हैं। फिर देवताओं के वर्षों की गणना से वे वहाँ 10,000 वर्ष — 10,000 गुणा 360 — विहार करते हैं। इतने समय विहार करने के बाद यह होता है कि भगवती सती कहती हैं: हमारी कामनाएँ तृप्त हो गई हैं। अब मेरे मन में वैराग्यसंपूर्ण त्याग व कठोर तपस्या का मार्ग — अधिकांश के लिए दुष्कर, और रस भक्ति के साथ मोक्ष के दो समान रूप से वैध मार्गों में से एक। उठने लगा है।
गृहस्थ के लिए वैराग्य के उदय का क्या अर्थ है?
सनातन में गृहस्थ आश्रम का निश्चित क्रम
वक्ता कहते हैं कि यहाँ यह बताया जा रहा है कि हर किसी का समय निश्चित है। कुछ समय विहार करने के बाद, कामनाएँ पूरी करने के बाद, मन में वैराग्य उठना चाहिए। सनातन में गृहस्थ आश्रम में सदा यही होता आया है; यह प्रसंग उसी का संकेत है।
वक्ता कहते हैं, यह भी समझिए कि यह सब क्यों बताया जा रहा है। यहाँ यह बताया जा रहा है कि हर किसी का समय निश्चित है। कुछ समय विहार आदि करने के बाद, कामनाएँ पूरी करने के बाद, मन में वैराग्यसंपूर्ण त्याग व कठोर तपस्या का मार्ग — अधिकांश के लिए दुष्कर, और रस भक्ति के साथ मोक्ष के दो समान रूप से वैध मार्गों में से एक। उठना चाहिए। सनातन में गृहस्थ आश्रम में सदा यही होता आया है। यह प्रसंग उसी बात का संकेत है।
सती का जीवन धर्म, अर्थ और काम का कौन सा क्रम दिखाता है?
पहले धर्म-युक्त कर्म, फिर अर्थ और कामनाओं की पूर्ति
पहले भगवती सती ने धर्म-युक्त कर्म किया — धर्म के मार्ग पर चलकर तपस्या की, और अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान सदाशिव से विवाह करने को तप किया। फिर उनका विवाह हुआ। धर्म के बाद अर्थ का अर्जन और कामनाओं की पूर्ति आती है: भगवान शिव से विवाह के बाद उन्होंने कई वर्ष विहार किया और अपनी इच्छाएँ पूरी कीं — मुझे घर चाहिए, मुझे यहाँ घूमना है, मुझे वहाँ घूमना है।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ यही बताया जा रहा है: कि भगवती सती ने पहले धर्म-युक्त कर्म किया। धर्म के अनुसार आचरण करते हुए, तपस्या करते हुए, उन्होंने अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान सदाशिव से विवाह करने को तप किया। फिर उनका विवाह हुआ। धर्म के मार्ग पर चलते हुए उन्होंने तपस्या की। धर्म के बाद अर्थ का अर्जन और कामनाओं की पूर्ति आती है — ये दोनों बातें वहाँ हुईं। भगवान शिव से विवाह के बाद कई वर्ष विहार करते हुए उन्होंने अपनी इच्छाएँ पूरी कीं: मुझे घर चाहिए, मुझे यहाँ घूमना है, मुझे वहाँ घूमना है। वे कहते हैं कि इसमें बहुत से चरित्र हैं, और उनका वर्णन अलग-अलग तंत्र कथाओं में भी मिलेगा, थोड़ा सा शिव महापुराण में भी।
क्या जो जीवनसाथी मिला है, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए?
प्रारब्ध से मिला जीवनसाथी, जिसे छोड़ना नहीं है
वे कहते हैं कि सामान्य गृहस्थ के साथ भी यही होना चाहिए: सनातन यही सिखा रहा है। विवाह के बाद पहले धर्म-युक्त कर्म करें; अच्छी तरह तप करते हुए भगवती कृपा करें; और प्रारब्ध से मिले जीवनसाथी से संतुष्ट रहें। अपना प्रारब्ध काटने के लिए किसी भी प्रकार उन्हें छोड़ने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि एक सामान्य गृहस्थ मनुष्य के साथ भी यही होना चाहिए। सनातन यहाँ यही सिखा रहा है: कि विवाह आदि के बाद पहले धर्म-युक्त कर्म करें। तप आदि अच्छी तरह करते हुए, भगवती अपनी कृपा करें। प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। से जो भी जीवन संगी, जो भी जीवनसाथी मिला है, उसी में संतुष्ट रहें। अपना प्रारब्ध काटने के लिए किसी भी प्रकार उन्हें छोड़ने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
जीवनसाथी जैसा व्यवहार करता है, वैसा क्यों करता है?
पिछले जन्मों के कर्म, और घर के पशुओं का उदाहरण
वक्ता कहते हैं कि हमारे पिछले जन्मों के कर्म ऐसे होते हैं, और उन्हीं के अनुसार हमें जीवनसाथी मिलता है। उनका व्यवहार, जो हमें दुख देता है या सुख देता है, हमारा ही पिछले जन्म का कर्म है। वे सीधा उदाहरण देते हैं: यदि ऐसी पत्नी मिली है जो सुबह-शाम डंडे से पीटती है, तो ऐसे ही कर्म रहे होंगे — शायद पिछले जन्म में वह गाय थी और हम उसके मालिक थे और उसे डंडे से पीटते थे, इसलिए इस जन्म में ऐसी पत्नी मिली है।
वक्ता कहते हैं कि हमारे पिछले जन्मों के कर्म ऐसे होते हैं, और उन्हीं के अनुसार हमें अपना जीवनसाथी और जीवन संगी मिलता है। उनका व्यवहार, जो हमें दुख देता है या सुख देता है — वह हमारा ही पिछले जन्म का कर्म है। यदि ऐसी विवाहिता पत्नी मिली है जो सुबह-शाम डंडे से पीटती है, तो हमारे कर्म ऐसे ही रहे होंगे। हो सकता है पिछले जन्म में वह गौ थी और हम उसके मालिक थे और उसे डंडे से पीटते थे — तो इस जन्म में ऐसी डंडा चलाने वाली पत्नी मिलेगी। और यदि पुरुष इस तरह संवेदनहीन हैं, तो हो सकता है पिछले युग में आप किसी घर की मालकिन थीं जिसके घर के पशु — गाय और बैलों के बारे में कहा जाता है कि पशु योनि में उनका वह अंतिम जन्म होता है, और जो मालिक उनकी ठीक से सेवा करते हैं, उसी घर में वे संतान के रूप में जन्म लेते हैं। तो यदि आपने उन्हें ठीक से नहीं पाला, यदि उनका केवल दूध निकाला, यदि उनसे अच्छा व्यवहार नहीं किया, तो अगले जन्म में वे आपके पति या आपकी संतान के रूप में जन्म लेंगे, और आपको उचित दुख देंगे। वे कहते हैं कि ऐसा ही होता है।
यदि कोई शक्ति कहे, तो क्या जीवनसाथी को छोड़ देना चाहिए?
विवाह छोड़ने का कोई समर्थन नहीं — सीधा इनकार
वे कहते हैं कि जहाँ पति ने दुख दिया है, आजकल कहानी बस यही है कि तुरंत छोड़ दो। लोग अपने मन को कई तरह से घुमा लेते हैं — कि कोई देवी शक्ति मुझसे कह रही है कि मैं उनके साथ जाऊँ। यह बहुत कठिन स्थिति है, और ये बातें भी उन्हें सुननी पड़ती हैं। जब लोग उन्हें बताते हैं, तो वे कहते हैं: यह केवल और केवल दुर्बुद्धि है। इसमें उनका कोई समर्थन नहीं है; यह बहुत गलत काम है। पति को भी अंतिम अवस्था तक अपनी ब्याही पत्नी के साथ रहने का प्रयास करना चाहिए, और जो भी दुख आए उसे सहना चाहिए। छोड़ना नहीं चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि जहाँ पति ने दुख दिया है, आजकल कहानी ही अलग है — तुरंत छोड़ दो। लोग अपने मन को कई तरह से घुमा लेते हैं: कि फलानी देवी शक्ति मुझसे कह रही है कि मैं उनके साथ जाऊँ। यह बहुत कठिन स्थिति है, और ये बातें भी उन्हें सुननी पड़ती हैं। जब लोग उन्हें बताते हैं, तो वे कहते हैं: यह केवल और केवल दुर्बुद्धि है। इसमें उनका कोई समर्थन नहीं है। यह बहुत गलत काम है। पति को भी अंतिम अवस्था तक अपनी ब्याही पत्नी के साथ रहने का, और जो भी दुख आए उसे सहने का प्रयास करना चाहिए। छोड़ना नहीं चाहिए। चाहे स्थिति बहुत कठिन हो जाए, वे जो भी गलत करें वह उनका कर्म है — स्वयं छोड़ना नहीं चाहिए।
विवाह से भागने वालों का क्या होता है?
अगले जन्म में ले जाया गया बैलेंस शीट
वक्ता कहते हैं कि सनातन सही पुरुष और सही स्त्री को यह सिखाता है कि किसी भी परिस्थिति में इसी से प्रारब्ध कट रहा है। यदि आप भागेंगे, तो कल फिर भोगना पड़ेगा। इस जन्म में हो सकता है संबंध तोड़कर और फिर से विवाह करके आप सुखी हो जाएँ — यदि लिखा है तो सुखी हो जाएँगे। पर जो बाकी रह गया है, वह अगले जन्म में फिर वही प्रसंग बनाएगा। जब तक बैलेंस शीट बराबर नहीं होती, भोगते रहना पड़ता है; जो भागते हैं, पुरुष और स्त्री दोनों को भोगना पड़ता है।
सही पुरुष और सही स्त्री — सनातन उन्हें यह शिक्षा देता है कि चाहे जो परिस्थिति हो, ठीक इसी से प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। कट रहा है। यदि आप भागेंगे, तो कल आपको निश्चित रूप से फिर भोगना पड़ेगा। इस जन्म में हो सकता है संबंध तोड़कर और फिर से विवाह करके आप सुखी हो जाएँ; यदि लिखा है तो सुखी हो जाएँगे। पर जो यहाँ बाकी रह गया है, अगले जन्म में वही प्रसंग फिर होगा। जब तक बैलेंस शीट बराबर नहीं होती, भोगते रहना पड़ता है। जो भागते हैं, जो बंधन तोड़ते हैं — पुरुष और स्त्री दोनों को भोगना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि पुरुष नहीं भोगेंगे और केवल स्त्रियाँ भोगेंगी, या कोई स्त्री छल का संबंध बनाकर बच जाएगी। ऐसा नहीं होगा।
यामल और तंत्र ग्रंथ कहाँ से आते हैं?
रुद्रयामल, विष्णुयामल, ब्रह्मयामल, भैरवयामल और 64 तंत्र
वक्ता कहते हैं कि यहीं, जहाँ वैराग्य उठा, वहीं से वे सब तंत्र ग्रंथ उत्पन्न होते हैं जो हम पढ़ते हैं — रुद्रयामल, विष्णुयामल, ब्रह्मयामल, भैरवयामल, सब यामल ग्रंथ, और तंत्र से जुड़े सब चौंसठ ग्रंथ, महाग्रंथ। किसी में आप शक्ति उवाच देखेंगे; किसी में पार्वती उवाच; किसी में भैरवी उवाच। ये सब भगवान शिव ही हैं जो अलग-अलग स्वरूपों में भगवती सती, या भगवती पार्वती, या भगवती भैरवी को तंत्र से जुड़ा ज्ञान दे रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि यहीं, जहाँ वैराग्य उठा, वहीं से वे सब तंत्र ग्रंथ आते हैं जो हम पढ़ते हैं — रुद्रयामल, विष्णुयामल, ब्रह्मयामल, भैरवयामल, सब यामल ग्रंथ, और तंत्र से जुड़े सब चौंसठ ग्रंथ, महाग्रंथ — उनकी उत्पत्ति का पूरा विस्तृत वर्णन। उनमें से किसी में आप शक्ति उवाच देखेंगे। किसी में पार्वती उवाच आता है; किसी में भैरवी उवाच आता है। ये सब भगवान शिव ही हैं अलग-अलग स्वरूपों में, जो भगवती सती, या भगवती पार्वती, या भगवती भैरवी को तंत्र से जुड़ा ज्ञान दे रहे हैं।
वैराग्य उठने पर सती ने शिव से क्या पूछा?
वह ज्ञान जिससे वासना में बँधा जीव तुरंत मुक्त हो जाए
भगवती पूछती हैं कि अब जब वैराग्य उठ आया है, तो आगे का जीवन कैसे जिया जाए। वे यह प्रश्न अपने शिव से करती हैं, जो इच्छा से देह धारण करते हैं और जिनका चित्त योग द्वारा भोग से विरक्त है: वह कौन सा ज्ञान है जिससे वासना में बँधा जीव तुरंत मुक्त हो जाता है?
यहाँ भी, जब भगवती कहती हैं कि उनके मन में वैराग्य उठ आया है, और फिर आगे का जीवन किस प्रकार जिया जाए — वे यह प्रश्न अपने स्वामी से, अपने शिव से करती हैं, जो इच्छा से देह धारण करते हैं और जिनका चित्त योग के द्वारा भोग से विरक्त है: वह कौन सा ज्ञान है जिससे वासना में बँधा जीव तुरंत मुक्त हो जाता है?
शिव ने मुक्ति का साधन क्या बताया?
विज्ञान की जननी भक्ति, जो भोग और मोक्ष दोनों देती है
भगवान शिव समझाते हैं कि विज्ञान की जननी केवल उनकी भक्ति है, जो भोग और मोक्ष दोनों फल देती है। वे भक्ति को सबसे ऊँचा बताते हैं, और नौ प्रकार की भक्ति बताते हैं — जिसे हम नवधा भक्ति कहते हैं — कि परमेश्वर की नौ तरह से उपासना की जा सकती है। उस भक्ति के, इन नौ के अलावा, और भी बहुत से प्रकार हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवान शिव इसे बहुत अच्छी तरह समझाते हैं: विज्ञान की जननी केवल मेरी भक्ति है, जो भोग और मोक्ष दोनों फल देती है। वे यहाँ भक्ति को सबसे ऊँचा बताते हैं, और नौ प्रकार की भक्ति बताते हैं — जिसे हम नवधा भक्ति कहते हैं — कि परमपिता परमेश्वर की नौ तरह से उपासना की जा सकती है। उस भक्ति के भी इन नौ के अलावा बहुत से प्रकार हैं, जिनका बहुत विस्तार से वर्णन है। जैसा नवधा भक्ति में कहा गया है: हे दक्ष नंदिनी, नौ अंगों का वर्णन प्रेम से सुनो। वक्ता कहते हैं कि इसी प्रकार हमें अपना भजन और अपने इष्ट और आराध्य का पूजन करना चाहिए।
नवधा भक्ति के नौ अंग कौन से हैं?
श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवन, दास्य, अर्चन, वंदन, सख्य, आत्मसमर्पण
श्रवण — यानी सुनना — कीर्तन, स्मरण, सेवन, दास्य, अर्चन, मेरा निरंतर वंदन, सख्य और आत्मसमर्पण: इन्हें नवधा भक्ति कहा गया है। सरल शब्दों में, नौ अंग माने गए हैं।
श्रवण क्या है?
आसन पर बैठकर अपने कानों से कथा सुनना
जो आसन पर बैठकर, तन और मन से प्रतिदिन मेरी कथा, कीर्तन आदि का आदर करते हुए, उन्हें प्रसन्नता से अपने कानों से सुनता है — उसे श्रवण कहा गया है। वक्ता श्रोताओं से कहते हैं कि उनमें से जो आराम से बैठकर सुन रहे हैं, वे उसी क्षण भगवान की भक्ति कर रहे हैं; यह मनोरंजन नहीं है। भक्ति के नौ अंगों में पहला है सुनना।
श्रवण का अर्थ क्या है? जो आसन पर बैठकर, तन और मन से प्रतिदिन मेरी कथा, कीर्तन आदि का आदर करते हुए, उन्हें प्रसन्नता से अपने कानों से सुनता है — उसे श्रवण कहते हैं। वक्ता कहते हैं कि आपमें से जो इस समय आराम से बैठकर सुन रहे हैं, वे भगवान की भक्ति कर रहे हैं। हम यहाँ मनोरंजन नहीं कर रहे। हम जो कर रहे हैं वह श्रवण है, और इस कथा से आज कम से कम कुछ तो सीखा होगा। कम से कम यह तो समझ में आया होगा कि विधाता का, ब्रह्मा का, त्याग कितना बड़ा था, और वे हमें क्या सिखाना चाहते हैं। भक्ति के नौ अंगों में पहला है सुनना, और कथा को याद रखना। और कितने लोग सुनते हैं? बहुत कम लोग सत्संग और कथा सुनते हैं।
श्मशान काली की सिद्धि का दावा करने वाले एक व्यक्ति ने, जिसने कभी श्रवण नहीं किया था, मंत्र बिगाड़कर पढ़ा
श्मशान काली की सिद्धि का दावा और बिगड़ा हुआ मंत्र
सब भक्ति करना चाहते हैं, पर समस्या यह है कि वे इसका क्या अर्थ लेते हैं — माला उठाओ और जप रट डालो। वक्ता एक समूह के एक व्यक्ति का किस्सा सुनाते हैं जो उन पर गरजा, कि आप नहीं जानते, हमने श्मशान काली सिद्ध की है। उन्होंने उत्तर दिया कि उन्होंने तो सामान्य काली भी सिद्ध नहीं की। उस व्यक्ति का वीडियो देखने को कहा गया, उन्होंने देखा, और वे कहते हैं कि वहाँ पढ़ा गया मंत्र पूरी तरह बिगड़ा हुआ था — काली का मंत्र कुछ भी नहीं रह गया था।
वक्ता कहते हैं कि समस्या इस बात से है कि लोग भक्ति किसे समझते हैं: माला उठाओ, यहाँ जप रट डालो। वे एक व्यक्ति का किस्सा सुनाते हैं जो एक समूह में उन पर गरजा: आप नहीं जानते, हमने श्मशान काली सिद्ध की है। उन्होंने उत्तर दिया: महाराज जी, हमसे तो सामान्य काली भी सिद्ध नहीं हुई, और आप श्मशान काली की बात करते हैं। उस व्यक्ति ने कहा, मेरा वीडियो देखिए। एक और व्यक्ति ने पहले ही उन्हें उस वीडियो का लिंक भेजा था। वे कहते हैं कि वहाँ पढ़ा गया मंत्र सुनकर हँसी रुक नहीं रही थी — क्या कहा जाए। काली का मंत्र टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया था। तो वे कहते हैं, अपने कानों से सुनना पहली बात है।
कीर्तन क्या है?
दिव्य लीलाओं का ऊँचे स्वर में उच्चारण
कीर्तन के बारे में कहा गया है कि जो मेरे दिव्य रूपों और लीलाओं आदि का चिंतन करते हुए, अपनी वाणी से उन्हें ऊँचे स्वर में बोलता है — वही कीर्तन कहा गया है; वह भजन करता है।
कीर्तन कैसे करना है? कीर्तन के बारे में कहा गया है: जो मेरे दिव्य रूपों और मेरी लीलाओं आदि का चिंतन करते हुए, अपनी वाणी से ऊँचे स्वर में उनका उच्चारण करता है — वही कीर्तन कहलाता है, और वह भजन करता है। वक्ता इसे हमारे गाए जाने वाले भजनों से समझाते हैं। यदि हम राम जी का गुणगान कर रहे हैं, तो पहले उनके जन्म की कथा सुनते हैं; जन्म के बहुत सुंदर कीर्तन हैं, और हम उन्हें सुनते हैं। इसके बाद उनकी लीलाओं की कथा, उनके किए वध और राक्षसों के अंत की; और भगवती सीता से उनके विवाह की कथा। यह सब हम भजन में गाते हैं। यही भजन और कीर्तन है।
स्मरण और सेवा क्या हैं?
हर समय स्मरण, और कर्म इंद्रियों को संयम में रखकर सेवा
स्मरण के लिए कहा गया है कि घड़ी देखने की ज़रूरत नहीं — उन्हें सदा याद करते रहो। सूर्य उगने से लेकर सोने तक, अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका ध्यान और स्मरण करते रहो। सेवा का अर्थ है कि अनुकूल समय को ध्यान में रखकर और अपनी इंद्रियों पर संयम रखकर, कर्म इंद्रियों से सेवा की जाए — भगवान की सेवा, दिव्य रूप की सेवा।
इसके बाद स्मरण आता है। स्मरण के लिए कहा गया है कि आपको समय देखने की कोई ज़रूरत नहीं; उन्हें सदा याद करते रहो। इसमें घड़ी देखने की ज़रूरत नहीं। सूर्य उगने से लेकर जब तक आप सो न जाएँ, अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका ध्यान और स्मरण करते रहो। और सेवा का अर्थ क्या है? सेवा का अर्थ है कि जो समय अनुकूल हो उसे ध्यान में रखकर, और अपनी इंद्रियों पर संयम रखकर, कर्म इंद्रियों से सेवा की जाए। भगवान की सेवा हो, दिव्य स्वरूप की सेवा हो — वही सेवा है।
दास्य भाव क्या है, और संत इसे शूद्र भाव क्यों कहते हैं?
दास्य भाव, दिए हुए का भोग, और ब्राह्मण होने का अहंकार
जो भी मिला है, यह समझते हुए कि भगवान हमारे स्वामी हैं और हम उनके दास हैं, और यह केवल उन्हीं का दिया है, और दास होकर हम केवल इसका भोग कर रहे हैं — जो इस समझ से अपनी किसी भी भौतिक वस्तु का भोग करते हैं, उनका दास्य भाव कहा जाता है। वक्ता कहते हैं कि इसी दास्य भाव को हम शूद्र भाव कहते हैं; बहुत से संत इसे शूद्र भाव कहते हैं। शूद्र का अर्थ है सेवा करने वाला — तो जो भी भगवान की सेवा कर रहा है, उसे स्वयं को शूद्र मानना चाहिए और कभी अहंकार नहीं करना चाहिए।
जो भी मिला है, यह समझते हुए कि ये भगवान हमारे स्वामी हैं और हम उनके दास हैं, और यह केवल और केवल उन्हीं का दिया है, और हम दास होकर केवल इसका भोग कर रहे हैं — जो ऐसा समझकर अपनी किसी भी भौतिक वस्तु का भोग करते हैं, उनका दास्य भाव कहा जाता है। वक्ता कहते हैं कि इसी दास्य भाव को हम शूद्र भाव कहते हैं; बहुत से संत इसे शूद्र भाव कहते हैं। कहा जाता है कि जो भक्त शूद्र है वह शूद्र है — पर समझिए कि शूद्र का अर्थ क्या है: सेवा करने वाला। तो जो भी भगवान की सेवा कर रहा है, उसे स्वयं को शूद्र मानना चाहिए और कभी अहंकार नहीं करना चाहिए। इससे अभिमान नहीं उठेगा। जहाँ भीतर अहंकार आता है — ब्राह्मण कहकर व्यक्ति स्वयं पर बहुत गर्व करता है: कि हम ब्रह्म तेज से युक्त हैं, हम गायत्री करने वाले हैं, हम मंत्रों का पुरश्चरण करते हैं, हम बहुत-बहुत तीर्थों का सेवन करते हैं, हम ब्राह्मण हैं।
ब्राह्मण होने का अहंकार उठने पर व्यक्ति की गति का क्या होता है?
सेवक-स्वामी का संबंध और जगदंबा के सेवक
वक्ता कहते हैं कि जहाँ वह भाव आ गया, वहीं आपकी गति रुक गई। पर शूद्र, शूद्र कहने से अपने भीतर हीनता का भाव नहीं आएगा — व्यक्ति जानता है कि वह शूद्र है, सेवक है। किसका सेवक? जगदंबा का सेवक। जब तक यह दास्य भाव रहता है, वे स्वामी हैं: मैं सेवक हूँ, आप स्वामी हैं। और सेवक कौन है? शूद्र, चरणों से उत्पन्न, जो चरणों की सेवा करता है और चरणों की धूल चाहता है — तो हम दास्य हैं।
वक्ता कहते हैं कि जहाँ वह भाव आ गया, वहीं आपकी गति रुक गई। पर शूद्र, शूद्र, शूद्र कहने से अपने भीतर शूद्रता का भाव नहीं आएगा — व्यक्ति जानता है: हम शूद्र हैं, हम सेवक हैं। किसके सेवक? जगदंबा के सेवक। तो जब तक यह दास्य भाव रहता है, तब तक वे स्वामी हैं। मैं सेवक हूँ, आप स्वामी हैं — और फिर सेवक कौन है? शूद्र, चरणों से उत्पन्न, जो चरणों की सेवा करता है, जो चरणों की धूल चाहता है। तो हम दास्य हैं। वे कहते हैं कि यदि शूद्र शब्द आपके भीतर का अहंकार नष्ट कर रहा है, तो यह बहुत अच्छी बात है।
अर्चन और वंदन क्या हैं, और स्त्रियों के लिए क्या निषेध है?
सोलह उपचार, और साष्टांग प्रणाम
इसके बाद, जो स्वयं को सेवक बनाकर सोलह उपचारों से भगवान का पूजन करता है, उसे अर्चन कहा गया है। साष्टांग प्रणाम — जो पुरुष आठ अंगों से भूमि को छूकर साष्टांग प्रणाम करता है — इसे और ऐसे को वंदन कहा गया है। वक्ता निषेध साफ़ बताते हैं: स्त्रियों को अपनी छाती भूमि से नहीं लगानी चाहिए; शास्त्रों में उनके लिए यह वर्जित है। पुरुषों को पूरा साष्टांग प्रणाम करना चाहिए।
इसके बाद, जो स्वयं को सेवक बनाकर सोलह उपचारों से भगवान का पूजन करता है — उसे अर्चन कहा गया है। साष्टांग प्रणाम: जो पुरुष आठ अंगों से भूमि को छूकर साष्टांग प्रणाम करता है — इसे और ऐसे को वंदन कहा गया है। वक्ता कहते हैं कि स्त्रियों को अपनी छाती भूमि से नहीं लगानी चाहिए; शास्त्रों में उनके लिए यह वर्जित किया गया है। पुरुषों को पूरा साष्टांग प्रणाम करना चाहिए।
सख्य भाव और आत्मसमर्पण क्या हैं?
शुभ और अशुभ को समान रूप से स्वीकारना, और एक रुपये के सिवा सब लौटा देना
सख्य भाव है: जो भी हो रहा है, मंगल या अमंगल, अच्छा या बुरा, कोई बात नहीं — हम सबको अच्छा ही ले रहे हैं; आप जो कर रहे हैं, आपकी इच्छा से हो रहा है। आत्मसमर्पण यह है कि यदि भगवान हमें एक करोड़ दें, तो उस करोड़ में से 99 लाख 99 हज़ार 999 रुपये हम उन्हें लौटा दें, और एक रुपया अपने ऊपर। पर वक्ता कहते हैं कि इसका अर्थ मंदिर बनाना और दिन-रात भगवान को सजाना नहीं है — इसका अर्थ है जीव सेवा, भगवान का दिया हुआ वहाँ लगाना जहाँ सनातन के उत्थान और सनातनी जीवों के कल्याण के लिए ज़रूरत हो।
भक्ति में सख्य भाव किसे कहा गया है? कि जो भी मंगल और अमंगल हो रहा है, अच्छा हो या बुरा, कोई बात नहीं — हम सबको अच्छा ही ले रहे हैं। सब ठीक है; आप जो कर रहे हैं, कर रहे हैं, आपकी इच्छा से हो रहा है। यही सख्य भाव है, सखा का भाव। और मुझे जो भी मिल रहा है: यदि भगवान हमें एक करोड़ दे रहे हैं, तो उस करोड़ में से 99 लाख 99 हज़ार 999 रुपये हम उन्हें लौटा दें, और एक रुपया अपने ऊपर। भाव यह है कि सब कुछ आपको समर्पित है; आप जो देते हैं, हम आप पर ही खर्च करते हैं। पर वक्ता कहते हैं कि इसका अर्थ यह नहीं है कि हम मंदिर बनाएँ और दिन-रात भगवान को सजाएँ। नहीं — यह जीव सेवा है: जहाँ भी ज़रूरत हो, हमारे सनातन के उत्थान के लिए और जीवों के, सनातनी जीवों के कल्याण के लिए, वहाँ भगवान का दिया हुआ लगाएँ। यही आत्मसमर्पण है। इसे भक्ति का नौवाँ अंग बताया गया।
सांगोपांग भक्ति का क्या अर्थ है?
नौ के नौ अंग अपने आराध्य की ओर
शिव कहते हैं: हे प्रिये, इस प्रकार मेरी सांगोपांग भक्ति सबसे ऊँची है। सांगोपांग का अर्थ है इन नौ में से हर तरह से अपने आराध्य का चिंतन करना। यदि शिव हैं, तो सब कुछ उन्हीं के बारे में होता है — उन्हीं का विचार, उन्हीं का कीर्तन, उन्हीं के मंत्र का जप, सोलह उपचारों से उन्हीं का पूजन, सब कुछ उन्हीं का दिया मानना, सब कुछ उन्हीं को समर्पित करना, उन्हीं को साष्टांग प्रणाम। पर वक्ता कहते हैं कि इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि यदि हम उनके लिए करेंगे तो गणपति या भगवती के लिए नहीं करेंगे।
ये सब बातें, भोग और मोक्ष, साथ-साथ करनी चाहिए, और इसलिए शिव कहते हैं: हे प्रिये, इस प्रकार मेरी सांगोपांग भक्ति सबसे ऊँची है। तो सांगोपांग का अर्थ क्या है? ये नौ प्रकार की भक्ति, हर तरह से, इसमें अपने आराध्य के चिंतन के साथ। अब यदि शिव हैं, तो इन नौ तरीकों में सब कुछ केवल उन्हीं के बारे में होगा: हम उन्हीं का विचार करेंगे, उन्हीं का कीर्तन करेंगे, उन्हीं के मंत्र का जप करेंगे, सोलह उपचारों से उन्हीं का पूजन करेंगे, सब कुछ उन्हीं का दिया मानेंगे और सब कुछ उन्हीं को समर्पित करेंगे, उन्हीं को साष्टांग प्रणाम करेंगे। इसका अर्थ कहीं भी यह नहीं है कि यदि हम उनके लिए करेंगे तो गणपति जी या भगवती के लिए नहीं करेंगे। यह बात भी समझनी चाहिए।
भौतिक कामनाओं के साथ तंत्र क्षेत्र में कैसे आगे बढ़ना चाहिए?
पंचायतन का क्रम, और पति के समान आराध्य
वक्ता कहते हैं कि जो तंत्र क्षेत्र में जाते हैं, जिन्हें मंत्र जप करना है और जिनकी भौतिक कामनाएँ हैं, उन्हें क्रम से आगे बढ़ना होगा — और ऐसा ही होना चाहिए: देवी पंचायतन या अन्य देवताओं का पंचायतन होता है, और पूजन पंचायत में होता है। उन्होंने पहले स्पष्ट किया है कि हमारा आराध्य हमारे पति के समान है — चाहे आप स्त्री हों या पुरुष — और जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति को हर तरह से सुख देती है।
वक्ता कहते हैं कि जो तंत्र क्षेत्र में जाते हैं, जिन्हें मंत्र जप आदि करना है और जिनकी भौतिक कामना है, वहाँ आपको क्रम से आगे बढ़ना होगा — और ऐसा ही आगे बढ़ना चाहिए। देवी पंचायतन या अन्य देवताओं का पंचायतन होता है; पूजन पंचायत में किया जाता है। वे कहते हैं कि यह बात उन्होंने पहले भी स्पष्ट की है: कि जो हमारा आराध्य है, वह हमारे पति के समान है। चाहे आप स्त्री हों या पुरुष — जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति को हर तरह से सुख देती है। और उसे किन तरीकों से सुख देने वाली कहा गया है? कि जब किसी काम में कुशलता देनी हो, तो उसमें उसकी बुद्धि और समझ हो; जब वह घर में काम करे, तो दासी के समान हो; और जब शय्या पर जाए, तो रंभा के समान हो। इस प्रकार पत्नी के गुणों का वर्णन किया गया है।
कौन सा भाव इष्ट के लिए है और कौन सा अन्य देवताओं के लिए?
आराध्य के लिए दास्य और सख्य, बाकी सबके लिए सामान्य समर्पण
इसी तरह, जब आप अपने आराध्य की सेवा करते हैं, तो जहाँ दास्य भाव रखना है और जहाँ सख्य भाव — ये सब भाव अपने मुख्य आराध्य के प्रति रखने चाहिए, जिनमें आपका मन लगा है। बाकी सबके साथ हम सामान्य समर्पण का भाव रखते हैं और उनका सामान्य पूजन करते हैं, जैसे पति को मुख्य रखकर बाकी सबके साथ — सास-ससुर, देवर, ननद आदि के साथ — ऐसा ही आचरण रखा जाता है। इसलिए कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि हम केवल एक देव की पूजा करेंगे।
इसी तरह, जब आप अपने आराध्य की सेवा करते हैं, तो जहाँ दास्य भाव रखना है और जहाँ सख्य भाव — ये सब भाव मुख्य आराध्य के प्रति रखने चाहिए, जो आपके आराध्य हैं और जिनमें आपका मन लगा है। और बाकी सबके साथ हम किस भाव से व्यवहार करेंगे? बाकी सबके साथ हम सामान्य समर्पण का भाव रखते हैं और उनका सामान्य पूजन करते हैं। जैसे पति को मुख्य रखकर बाकी सबके साथ ऐसा ही विचार और आचरण रखा जाता है — सास-ससुर के साथ, देवर के साथ, ननद के साथ, जो भी हो, उसी तरह। इसलिए कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि हम केवल एक देव की पूजा करेंगे।
केवल एक देव की उपासना कब संभव होती है?
जब कामनाएँ छूट जाएँ, तो आराध्य हर जगह दिखते हैं
वक्ता कहते हैं कि वह आगे आता है। जब यह सब कर्मकांड सामान्य रूप से करते हुए आपके मन से कामनाएँ छूटने लगें, जब आपको कोई फर्क न पड़े कि क्या अच्छा या बुरा हो रहा है, जब आप इन सबसे ऊपर उठ जाएँ — तब हर जगह आपको वही दिखेंगे जिनकी आप उपासना करते हैं। तब आपको कृष्ण या काली की चिंता नहीं करनी पड़ेगी, कि हम केवल कृष्ण की पूजा करेंगे। उन्हें किसी एक रूप में बाँध लीजिए: यदि माँ हैं, तो माँ के रूप में रखिए; पिता, तो पिता के रूप में; सखा, तो सखा के रूप में; गुरु, तो गुरु के रूप में।
यह कैसे होगा? जब आप यह सब कर्मकांड आदि सामान्य रूप से करते हुए पाएँ कि आपके मन से कामनाएँ छूटने लगी हैं, कि आपको कोई फर्क नहीं पड़ता कि क्या अच्छा या बुरा हो रहा है, कि आप इन सबसे ऊपर उठ जाते हैं — तब हर जगह आपको वही दिखेंगे जिनकी आप उपासना करते हैं। तब आपको कृष्ण या काली की चिंता करने की ज़रूरत नहीं होगी, कि हम केवल कृष्ण की पूजा करेंगे। उन्हें किसी एक रूप में बाँध लीजिए: यदि माँ हैं, तो उन्हें माँ के रूप में रखिए; यदि पिता, तो पिता के रूप में रखिए; यदि सखा, तो सखा के रूप में रखिए; यदि गुरु, तो गुरु के रूप में रखिए।
राधा और कृष्ण को किस भाव में रखा जाता है?
राधा शिव का स्वरूप और कृष्ण भगवती का, महाकौल के रूप में
कुछ लोग श्री जी, भगवती या कृष्ण की सेवा दास्य भाव में करते हैं, कुछ सखा भाव में; कुछ भगवती को सखी के भाव में रखते हैं; कुछ पुत्र के रूप में, पुत्र जैसा स्नेह देते हुए। वक्ता कहते हैं कि इसी तरह हम उनकी सेवा गुरु के रूप में करते हैं और उन्हें महाकौल मानते हैं: कि राधा रानी उस स्वरूप में स्वयं शिव हैं, और भगवान कृष्ण भगवती पार्वती का स्वरूप, भगवती का स्वरूप हैं। उस स्वरूप में हम उन्हें महाकौल मानते हैं — इसलिए हमारे लिए वे हमारे गुरुदेव और गुरु माँ बन गए।
वक्ता कहते हैं कि हमारे लिए, जैसे जब आप श्री जी की सेवा करते हैं, या भगवती की सेवा, या कृष्ण जी की सेवा — कोई दास्य भाव में करता है, कोई सखा भाव में। कुछ लोग भगवती को सखी के भाव में रखते हैं। भाव बहुत-बहुत प्रकार के हैं। कुछ उन्हें पुत्र के रूप में रखते हैं और पुत्र जैसा स्नेह देते हैं। इसी तरह हम उनकी सेवा गुरु के रूप में करते हैं, और उन्हें महाकौल मानते हैं — कि राधा रानी स्वयं शिव का स्वरूप हैं, और भगवान कृष्ण भगवती पार्वती का स्वरूप, भगवती का स्वरूप हैं। उस स्वरूप में हम उन्हें महाकौल मानते हैं। इसलिए हमारे लिए वे हमारे गुरुदेव और गुरु माँ बन गए। इसी तरह व्यक्ति को अपना हर एक भाव जोड़ना चाहिए।
भक्ति के अलावा शिव ने सती को और क्या सिखाया?
तंत्र शास्त्र, यंत्र शास्त्र, वैद्य, ज्योतिष और सामुद्रिक शास्त्र
इस प्रकार भगवान शिव ने भगवती सती को पाँचों अंगों सहित, तंत्र शास्त्र और यंत्र शास्त्र के साथ, भक्ति बहुत अच्छी तरह समझाई; और इसके बाद बाकी सब शास्त्र — वैद्य शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र। उन्होंने इन सबका वर्णन किया। वक्ता कहते हैं कि इन्हीं बातों के कारण, जहाँ भी हम इन्हें पढ़ते हैं, वहाँ शिव वच, सती वच, दुर्गा वच, पार्वती वच, या भैरव-भैरवी वच आता है।
इस प्रकार भगवान शिव ने यहाँ भगवती सती को पाँचों अंगों सहित भक्ति, और तंत्र शास्त्र और यंत्र शास्त्र बहुत अच्छी तरह समझाया। इसके बाद बाकी सब वैद्य शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र और सामुद्रिक शास्त्र — उन्होंने इन सबका वर्णन किया। और इन्हीं बातों के कारण, जहाँ भी हम इन्हें पढ़ते हैं, वहाँ शिव वच, सती वच, या दुर्गा वच, पार्वती वच, या भैरव वच, भैरवी वच आता है। इस प्रकार भगवान शिव ने भगवती जगदंबा को योग मार्ग और भक्ति मार्ग आदि में ले जाते हुए ये सब बातें बताईं।
नारद ने वियोग का प्रश्न कैसे उठाया?
ब्रह्मा का उत्तर कि वियोग असंभव है और लोक व्यवहार के अनुसार लीला है
नारद पूछते हैं कि भगवती सती और शिव में वियोग किस प्रकार हुआ। ब्रह्मा कहते हैं कि ऐसा कभी हो ही नहीं सकता कि वे दोनों अलग हों — दोनों एक ही हैं। पर लोक व्यवहार की रीति के अनुसार वहाँ लीला रखी गई है।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ से वह कथा शुरू होती है जिसके बारे में श्रोता बार-बार पूछते हैं: जब राम जी वहाँ प्रकट थे और सती जी ने उनके साथ वैसा किया, तो फिर विष्णु वहाँ कैसे आए? यह पूरा प्रश्न मन में रहता है, तो सुनिए यह कैसे हुआ। जब नारदएक देव-ऋषि, पौराणिक साहित्य में प्रायः प्रश्नकर्ता या श्रोता के रूप में उपस्थित। ने पूछा कि भगवती सती और शिव में वियोग किस प्रकार हुआ — भगवान ब्रह्मा कहते हैं कि ऐसा कभी हो ही नहीं सकता कि वे दोनों अलग हों; दोनों एक ही हैं। पर लोक व्यवहार की रीति के अनुसार वहाँ लीला रखी गई है।
शिव और सती श्री राम से कहाँ मिले?
त्रेता युग में दंडकारण्य
कई स्थानों पर घूमते हुए भगवती सती और भगवान शिव दंडकारण्य नाम के स्थान पर पहुँचे, जहाँ उस समय पृथ्वी पर त्रेता युग चल रहा था, और भगवान श्री हरि विष्णु वहाँ दंडकारण्य में राम अवतार में उपस्थित थे। सीता का हरण हो चुका था, और व्याकुल होकर वे जगह-जगह हे सीता, हे सीता पुकारते घूम रहे थे। भगवान शिव सती के साथ नंदी पर सवार होकर पृथ्वी पर घूम रहे थे।
तब ब्रह्मा ने कहा कि कई स्थानों पर घूमते हुए भगवती सती और भगवान शिव दंडकारण्य नाम के स्थान पर पहुँचे। वहाँ उस समय पृथ्वी पर त्रेता युग चल रहा था, और भगवान श्री हरि विष्णु वहाँ दंडकारण्य में राम अवतार में उपस्थित थे। सीता जी का हरण हो चुका था, और व्याकुल होकर वे जगह-जगह हे सीता, हे सीता कहते घूम रहे थे। तो वे यह कर रहे थे, और भगवान शिव सती जी के साथ वृषभ पर सवार होकर पृथ्वी पर घूम रहे थे।
शिव ने राम को प्रणाम किया तो सती क्यों व्याकुल हुईं?
सती का प्रश्न कि ये दुखी दो पुरुष कौन हैं
जब शिव ने श्री राम को देखा, तो सिर झुकाकर प्रणाम किया। इस पर सती बहुत व्याकुल हो गईं — यह लीला है। उन्होंने कहा: हे देव देव, हे परब्रह्म, हे सर्वेश, हे परमेश्वर, ब्रह्मा और विष्णु आपकी सेवा करते हैं; आप सबके प्रणाम के योग्य हैं, सब आपको प्रणाम करते हैं, सब आपका ध्यान करते हैं; वेदांत शास्त्र से प्रयत्नपूर्वक जानने योग्य निर्विकार और परम प्रभु आप ही हैं। तो ये दोनों कौन हैं? इनका रूप बहुत दुखी दिखता है; दोनों वीर हैं, पर बहुत शोक में लगते हैं। नील कमल जैसे इन बड़े वाले को देखकर आप इतने आनंद से भरकर, ऐसी स्तुति करते हुए, इन्हें प्रणाम क्यों कर रहे हैं?
जब भगवान श्री राम दिखे, तो उन्हें देखकर भगवान शिव ने सिर झुकाकर प्रणाम किया। जब उन्होंने प्रणाम किया, तो यहाँ सती जी बहुत व्याकुल हो गईं। वक्ता बताते हैं कि यह लीला है। उन्होंने कहा: हे देव देव, हे परब्रह्म, हे सर्वेश, हे परमेश्वर — ब्रह्मा और विष्णु आपकी सेवा करते हैं। आप सबके प्रणाम के योग्य हैं; सब आपको प्रणाम करते हैं; सब आपका ध्यान करते हैं। वेदांत शास्त्र से प्रयत्नपूर्वक जानने योग्य निर्विकार और परम प्रभु आप ही हैं। तो ये दोनों कौन हैं? इनका रूप बहुत दुखी दिखता है। ये दोनों वीर हैं, फिर भी बहुत शोक में लगते हैं। पर नील कमल जैसे इन बड़े पुरुष को देखकर आप इतने आनंद से भरकर क्यों उठे, और ऐसी स्तुति करते हुए इन्हें प्रणाम क्यों किया? यहाँ यही कथा आती है।
शिव ने प्रणाम करने का क्या कारण बताया?
वर के प्रभाव से किया गया प्रणाम, और शिव-विष्णु विवाद का समाधान
भगवान शिव ने कहा: हे सती, मैं सच कहता हूँ; इनमें किसी प्रकार का छल नहीं है। वर के प्रभाव से ही मैंने आदरपूर्वक इन्हें प्रणाम किया। वक्ता कहते हैं कि यदि श्रोता आज यह विषय अच्छी तरह समझ लें, तो शिव और विष्णु के बारे में सारी उलटी-सीधी बातें — कौन बड़ा है, शिव या विष्णु — पूरी अवधारणा स्पष्ट हो जाएगी, और वे फिर कभी दोनों में भेद नहीं कर पाएँगे।
तब भगवान शिव ने कहा: हे सती, मैं सच कह रहा हूँ। इनमें किसी प्रकार का छल नहीं है। वर के प्रभाव से ही मैंने आदरपूर्वक इन्हें प्रणाम किया। अब यह वर क्या है, कैसा है? वक्ता कहते हैं कि यदि आप सब जो सुन रहे हैं, आज यह विषय अच्छी तरह समझ लें, तो शिव और विष्णु के बारे में सारी उलटी-सीधी बातें — कौन बड़ा है, शिव या विष्णु, लोग उनके बारे में कैसे पूछते हैं — पूरी अवधारणा स्पष्ट हो जाएगी। वे कहते हैं कि यदि आप शिव पुराण में यह पूरा विषय समझ लें, तो आप कभी दोनों में भेद नहीं कर पाएँगे।
शिव के राम को प्रणाम करने की व्याख्या किसे देनी चाहिए?
केवल सच्चे भक्त को दें, नहीं तो छोड़ दें
वक्ता कहते हैं कि जो अधपढ़े हैं, वे ऐसे प्रश्न उठाते हैं। यदि कोई दुष्ट व्यक्ति ऐसे प्रश्न करे और आपको लगे कि उसे ठीक से समझाने का प्रयास करना चाहिए, कि वह भी भक्त है और उसे सच बताना चाहिए, तो उसके सामने विषय रखिए। नहीं तो छोड़ दीजिए — तब बोलने की कोई ज़रूरत नहीं; भाई, अपने रास्ते जाओ। आपका अपना मन इस पर साफ़ होना चाहिए और आपकी बुद्धि निर्मल।
वक्ता कहते हैं कि जहाँ विषय रखना हो, वहाँ इस बात पर आपका मन साफ़ होना चाहिए और आपकी बुद्धि निर्मल। जो अधपढ़े हैं, वे ये प्रश्न उठाते हैं। पर यदि कोई दुष्ट व्यक्ति ऐसे प्रश्न करे, और आपको लगे कि हाँ, उसे ठीक से समझाने का प्रयास करना चाहिए, कि वह भी भक्त है और उसे सच बताना चाहिए — तो उसके सामने विषय रखिए। नहीं तो रहने दीजिए। तब बोलने की कोई ज़रूरत नहीं: भाई, अपने रास्ते जाओ। फिर भगवान शिव उन्हें बताते हैं कि ये भगवान श्री नारायण इस समय सूर्यवंश में जन्मे हैं: बड़े श्री राम नाम से, छोटे लक्ष्मण। और यह दशा इसलिए हुई है क्योंकि रावण उन्हें ले गया है। साधु पुरुषों की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए उन्होंने अवतार लिया है।
सती श्री राम की परीक्षा लेने कैसे आईं?
वट वृक्ष के नीचे प्रतीक्षा करते हुए शिव उन्हें परीक्षा लेने भेजते हैं
भगवती सती पूरी तरह विश्वास नहीं कर पातीं कि जो सीता, सीता पुकारता घूम रहा है, वह स्वयं नारायण हो सकता है। शिव कहते हैं: यदि तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं, तो अपनी बुद्धि से जाकर श्री राम की परीक्षा लो; इससे तुम्हारा भ्रम दूर होगा। जो ठीक लगे करो — तब तक हम इस वट वृक्ष के नीचे बैठेंगे। तब वे स्वयं सीता का रूप लेकर जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवती सती पूरी तरह विश्वास नहीं कर पातीं कि स्वयं भगवान शिव ऐसी बात कह रहे हैं — और कि जो सीता, सीता पुकारता घूम रहा है, वह कभी स्वयं नारायण हो सकता है। तब शिव ने कहा: यदि तुम्हें मेरे वचन पर, मेरी बात पर विश्वास नहीं, तो अपनी बुद्धि से जाकर श्री राम जी की परीक्षा लो। इससे तुम्हारा भ्रम दूर होगा। जो ठीक लगे करो; तब तक हम इस वट वृक्ष के नीचे बैठे हैं। ऐसा वे कहते हैं। तब भगवती सती सोचने लगती हैं कि किस प्रकार उनकी परीक्षा लें। फिर वे स्वयं सीता जी का रूप लेकर जाती हैं।
श्री राम ने उनका स्वागत कैसे किया?
राम का उन्हें सती माता कहना और पूछना कि उन्होंने अपना रूप क्यों छोड़ा
जब वे परीक्षा लेने राम के सामने प्रकट हुईं, तो रघुकुल श्रेष्ठ श्री राम मुस्कुराए, उन्हें प्रणाम किया और कहा: हे सती माता, आपको नमस्कार। प्रेम से बताइए कि शिव कहाँ गए हैं, और आप उनके बिना अकेली वन में क्यों आई हैं। और आपने अपना रूप क्यों छोड़ दिया है? कृपा करके कारण बताइए। इस पर भगवती सती चकित हो गईं और शिव के वचन याद करके बहुत लज्जित हुईं।
जब भगवती सती राम जी की परीक्षा लेने गईं और उनके सामने प्रकट हुईं, तो रघुकुल श्रेष्ठ भगवान श्री राम मुस्कुराए, उन्हें प्रणाम किया, और कहा: हे सती माता, आपको नमस्कार। प्रेम से बताइए कि शिव कहाँ गए हैं, और आप उनके बिना अकेली वन में क्यों आई हैं? और आपने अपना रूप क्यों छोड़ दिया है? मुझ पर कृपा करके यह कारण बताइए। जब उन्होंने भगवती सती से ऐसा कहा, तो वे चकित हो गईं। उन्हें शिव के वचन याद आने लगे और वे बहुत लज्जित हुईं, कि श्री राम जी स्वयं विष्णु का रूप हैं — और इस पर वे प्रसन्न भी हुईं।
शिव महापुराण का वर्णन मानस से अलग क्यों है?
वैष्णव कथन और पौराणिक कथन
वे राम से कहती हैं कि शिव अपने गणों के साथ पृथ्वी पर घूमते हुए वन में आए, उन्हें लक्ष्मण के साथ सीता की खोज में लगे और वियोग से पीड़ित देखा, उन्हें प्रणाम किया और चले गए; कि उनकी वैष्णवी महिमा की स्तुति करते हुए वे बड़े आनंद से वट वृक्ष के नीचे बैठे हैं, उनका चतुर्भुज विष्णु रूप देखे बिना ही भाव-विभोर होकर; और कि उनकी बात सुनकर उनके मन में संदेह उठा, इसलिए उनकी आज्ञा लेकर वे परीक्षा लेने आई हैं। वक्ता बताते हैं कि रामचरितमानस आदि में विषय अलग है, क्योंकि वहाँ भगवान विष्णु से जुड़ी बातें रखी गई हैं, इसलिए वह कथा अलग है; यह शिव महापुराण है, इसलिए इसके अनुसार लिखा गया है।
उन्होंने बताया कि शिव अपने गणों के साथ पृथ्वी पर घूमते हुए वन में आए। उन्हें लक्ष्मण के साथ, सीता की खोज में लगे, वियोग से पीड़ित और मन से दुखी देखकर, उन्होंने उन्हें प्रणाम किया और चले गए। उनकी वैष्णवी महिमा की स्तुति करते हुए वे परम आनंद से वट वृक्ष के नीचे बैठे हैं। उनका चतुर्भुज विष्णु रूप देखे बिना ही वे आनंद से भर गए, और यह शुद्ध रूप देखकर उन्हें बहुत आनंद मिला। और उनकी बात सुनकर उनके मन में भ्रम उठा, इसलिए उनकी आज्ञा लेकर वे परीक्षा लेने आई हैं। वक्ता कहते हैं कि रामचरितमानस आदि में वहाँ विषय अलग है, क्योंकि वहाँ भगवान विष्णु से जुड़ी बातें रखी गई हैं, इसलिए वहाँ की कथा अलग है। यह शिव महापुराण है, इसलिए यहाँ इसके अनुसार लिखा गया है। लोग यही बात नहीं समझ पाते, और फिर परेशान होते हैं — ऐसा कैसे हो सकता है, वहाँ तो ऐसा कहा गया था।
श्री राम अपने उत्तर में किस अध्याय का उल्लेख करते हैं?
रुद्र संहिता का पच्चीसवाँ अध्याय
सती राम से कहती हैं कि बताइए आप शिव की वंदना के योग्य कैसे हुए, और उन्हें संदेह से मुक्त करें। राम बहुत प्रसन्न हुए, शिव का स्मरण किया, और उनके पास गए बिना मन ही मन उनकी महिमा का वर्णन करके फिर बोले। वक्ता कहते हैं, इसे शिव महापुराण की रुद्र संहिता के पच्चीसवें अध्याय में पढ़िए। जब आप यह विषय जानेंगे, तो जो सारी निंदा फैलाई गई है — कि कृष्ण परम हैं, कि विष्णु का अवतार कृष्ण से हुआ, जो कुछ वैष्णव लोग कहते हैं — सब आपके सामने स्पष्ट हो जाएगा।
भगवती सती पूछती हैं: कृपया बताइए कि आप शिव की वंदना के योग्य कैसे हुए। मुझे इस संदेह से मुक्त कीजिए। यह सुनकर राम जी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने शिव का स्मरण किया, और स्मरण करके भगवान राघव शिव के पास नहीं गए, बल्कि अपने मन में भीतर ही भीतर उनकी महिमा का वर्णन किया, और फिर बोले। वक्ता कहते हैं, इसे शिव महापुराण की रुद्र संहिता के पच्चीसवें अध्याय में पढ़िए। और जब आप यह विषय जान जाएँगे, तो जो सारी निंदा फैलाई गई है — कि कृष्ण परम हैं, कि विष्णु का अवतार कृष्ण से हुआ, और धर्म की इतनी बात करने वाले ये लोग, वैष्णव लोग, जो कहते हैं कि वैष्णव मत ऐसा-ऐसा है — यह सब आपके सामने स्पष्ट हो जाएगा।
शिव ने अपने धाम में विश्वकर्मा से क्या बनवाया?
शिव की गौशाला में भवन, सिंहासन और छत्र
श्री राम कहते हैं कि प्राचीन काल में एक बार भगवान शंभु ने अपने परम धाम में विश्वकर्मा — त्वष्टा ऋषि विश्वकर्मा — को बुलाया। कहाँ बुलाया? वक्ता कहते हैं, बहुत ध्यान से सुनिए: शिव ने उन्हें अपनी गौशाला में, अपने धाम में बुलाया। शिव के लोक में गौशाला है। वहाँ गौशाला में उन्होंने विश्वकर्मा से एक बहुत सुंदर भवन बनाने को कहा, और उसमें एक अत्यंत उत्तम सिंहासन बनवाया; और उस सिंहासन पर, विघ्न दूर करने के लिए, भगवान शंकर ने विश्वकर्मा से एक छत्र बनवाया, जो अत्यंत दिव्य, सदा के लिए उत्तम और परम अद्भुत था।
भगवान श्री राम कहते हैं कि प्राचीन काल में, एक समय, भगवान शंभु ने अपने परम धाम में विश्वकर्मा जी को — त्वष्टा ऋषि विश्वकर्मा को — बुलाया। कहाँ बुलाया? वक्ता कहते हैं, बहुत ध्यान से सुनिए: शिव ने उन्हें अपने धाम में, अपनी गौशाला में बुलाया। शिव के लोक में गौशाला है। वहाँ गौशाला में बुलाकर उन्होंने विश्वकर्मा से एक बहुत सुंदर भवन बनाने को कहा। उन्होंने विश्वकर्मा से बहुत विस्तार से एक बहुत सुंदर भवन बनवाया, और उसमें एक अत्यंत उत्तम सिंहासन का निर्माण करवाया। और उस सिंहासन पर, बाधा दूर करने के लिए, भगवान शंकर ने विश्वकर्मा से एक छत्र बनवाया, जो अत्यंत दिव्य, सदा के लिए उत्तम, और परम अद्भुत था।
उस सभा में किसे आमंत्रित किया गया?
इंद्र, सिद्ध, गंधर्व, नाग, उपदेव, वेद और सोलह कन्याएँ
भगवान शिव ने शीघ्र ही इंद्र, सब सिद्धों, गंधर्वों, नागों और सब उपदेवों को बुलाया — उपदेव यानी पितर और पिशाच, जो सब वहाँ उपस्थित थे। सब वेद, आगम और शास्त्र, ब्रह्मा के सब पुत्र, मुनि, अप्सराएँ, और सब देवियाँ सब वस्तुओं के साथ आमंत्रित की गईं। इनके अलावा देवताओं, ऋषियों, सिद्धों और नागों की शुभ सोलह-सोलह कन्याएँ भी बुलाई गईं।
इसके बाद भगवान शिव ने शीघ्र ही वहाँ इंद्र, सब सिद्धों, गंधर्वों, नागों और सब उपदेवों को बुलाया। उपदेवप्रमुख देवताओं से निम्न श्रेणी के गौण दिव्य प्राणियों की एक श्रेणी — पितरों को इसी श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है। का अर्थ है पितृ और पिशाच — वे सब वहाँ उपस्थित थे। सब वेद, आगम और शास्त्र, ब्रह्मा के सब पुत्र, मुनि, अप्सराएँ और सब देवियाँ, सब वस्तुओं के साथ, आमंत्रित की गईं। इनके अलावा देवताओं, ऋषियों, सिद्धों और नागों की शुभ सोलह-सोलह कन्याएँ भी बुलाई गईं।
षोडश मातृकाएँ कौन हैं?
सोलह मातृकाएँ, महाविद्याएँ और कुल, और विंध्यवासिनी के तीन रूप
ये षोडश मातृकाएँ हैं, जिनकी सामान्यतः एक समूह के रूप में पूजा होती है — गौरी, शची, पद्मा, सावित्री, मेधा, जया आदि की पूजा होती है। पर वक्ता कहते हैं कि इनके अलावा महाविद्याओं के अंतर्गत और कुलों के अंतर्गत सोलह कन्याएँ भी अलग से षोडश मातृकाओं के रूप में स्थापित हैं। वे कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि दूसरे इसका वर्णन करते हैं या नहीं, पर जो थोड़ा वे जानते हैं वह बताएँगे, क्योंकि उन्हें दो-तीन का ज्ञान है: भगवती महाभगवती विंध्यवासिनी का, जिनका पूजन तीन कुलों के अनुसार तीन रूपों में होता है — वे अपना कुल जानते हैं, और दूसरे कुलों का भी थोड़ा ज्ञान रखते हैं।
वक्ता कहते हैं कि ये षोडश मातृकाएँ हैं — जिनकी हम सामान्यतः एक समूह के रूप में पूजा करते हैं। इनके अलावा, जब हम यह विषय उठाते हैं, तो वे कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि दूसरे लोग इसका वर्णन करते हैं या नहीं; इसकी उन्हें जानकारी नहीं है, पर जो थोड़ा वे जानते हैं वह बताएँगे, क्योंकि उन्हें दो-तीन का ज्ञान है। एक हैं भगवती महाभगवती विंध्यवासिनी: उनका पूजन तीन कुलों के अनुसार तीन रूपों में होता है। वे जिस कुल के हैं उसे जानते हैं, और दूसरे कुलों का भी थोड़ा ज्ञान रखते हैं। षोडश मातृकाओं की सामान्यतः सबकी एक रूप में पूजा होती है — गौरी, शची, पद्मा, सावित्री, मेधा, जया: इन सबका पूजन होता है। पर महाविद्याओं के अंतर्गत और कुल के अंतर्गत सोलह कन्याएँ भी अलग से षोडश मातृकाओं के रूप में स्थापित हैं। वे सब, जितनी भी थीं, वहाँ अलग-अलग बुलाई गईं — ऐसा वर्णन है।
अभिषेक की सामग्री कैसे जुटाई गई?
हर तीर्थ के जल से भरे पाँच कलश, और वेद मंत्रों का ऊँचा पाठ
उनके द्वारा तरह-तरह के उत्सव हुए। भगवान शंकर ने अपने गणों से सब औषधियों के साथ राज अभिषेक के योग्य पदार्थ — राज अभिषेक का जो भी द्रव्य होता है — और जितने भी तीर्थ हैं, सबके जल से भरे पाँच-पाँच कलश, और दिव्य सामग्री मँगवाई। वहाँ बहुत ऊँचे स्वर में वेद मंत्रों का पाठ हुआ। इसके बाद शिव ने श्री हरि को वैकुंठ धाम से बुलाया, क्योंकि विष्णु ने महादेव की ऐसी भक्ति की थी कि महादेव उनसे प्रसन्न रहते हैं।
फिर उनके द्वारा तरह-तरह के उत्सव हुए। सब औषधियों के साथ राज अभिषेक के योग्य पदार्थ — राज अभिषेक का जो भी द्रव्य होता है — और जितने भी तीर्थ हैं, सबके जल से भरे पाँच-पाँच कलश, और दिव्य सामग्री: यह सब भगवान शंकर ने अपने गणों से मँगवाया। वहाँ बहुत ऊँचे स्वर में वेद मंत्रों का पाठ हुआ। और इसके बाद, भगवान श्री हरि विष्णु की की हुई उस भक्ति के कारण, जिससे महादेव प्रसन्न हैं, उन्होंने श्री हरि को वैकुंठ धाम से बुलाया — अपनी गौशाला में बुलाया, जहाँ उन्होंने दिव्य लोक का निर्माण करवाया था।
उस सभा में शिव ने श्री हरि के लिए क्या किया?
सिंहासन पर बिठाना, ब्रह्मांड मंडप में अभिषेक, और अपना सारा ऐश्वर्य देना
शुभ मुहूर्त में विष्णु को अत्यंत उत्तम सिंहासन पर बिठाकर स्वयं महादेव ने प्रेम से उन्हें सब प्रकार के आभूषणों से सजाया। उनके सिर पर सुंदर मुकुट बाँधकर और उत्सव और मंगलाचार करके, स्वयं महेश्वर ने ब्रह्मांड मंडप में श्री हरि का अभिषेक किया। और उन्हें वह सारा ऐश्वर्य दिया जो वे दूसरों को नहीं देते — भगवान महामहेश्वर शिव ने अपना सारा ऐश्वर्य नारायण को दे दिया। इसके बाद स्वयं स्वतंत्र भगवान शंभु ने श्री हरि का स्तवन किया और अपनी पराधीनता सब जगह प्रकट की।
शुभ मुहूर्त में विष्णु को अत्यंत उत्तम सिंहासन पर बिठाकर, स्वयं महादेव ने प्रेम से उन्हें सब प्रकार के आभूषणों से सजाया। उनके सिर पर सुंदर मुकुट बाँधकर और उत्सव और मंगलाचार करके, स्वयं महेश्वर ने ब्रह्मांड मंडप में श्री हरि का अभिषेक किया। और उन्हें वह सारा ऐश्वर्य दिया जो वे दूसरों को नहीं देते। भगवान महामहेश्वर शिव ने अपना सारा ऐश्वर्य नारायण को दे दिया। और इसके बाद भगवान शिव ने, भगवान शंभु ने, जो स्वयं स्वतंत्र हैं, श्री हरि का स्तवन किया, और अपनी पराधीनता सब जगह प्रकट की।
यहाँ दिखाई गई भक्त-परवशता क्या है?
शिव का अपने भक्त पर अपनी निर्भरता स्वीकार करना
वक्ता कहते हैं, समझिए यह बात क्या है। भगवान शिव ने पहले भगवान नारायण का अभिषेक किया, और इसके बाद स्वयं अपनी पराधीनता स्वीकार की। भक्त-परवशता — यानी भगवान नारायण ने उनकी इतनी बड़ी भक्ति की। कहा जाता है कि भगवान अपने भक्त के वश में होते हैं; यह भक्ति का फल है। भगवान नारायण ने भगवान शिव के प्रति ऐसी अद्भुत भक्ति की कि नारायण को शिव का सबसे बड़ा भक्त कहा जाता है। और यहाँ भगवान शिव उनकी भक्ति कर रहे हैं।
वक्ता कहते हैं, आप सब समझिए कि यह बात क्या है। भगवान शिव ने पहले भगवान नारायण का अभिषेक किया, और इसके बाद स्वयं अपनी पराधीनता स्वीकार की। भक्त-परवशता: यानी भगवान नारायण ने उनकी इतनी भक्ति की। कहा जाता है कि भगवान अपने भक्त के वश में होते हैं — तो देखिए, यह भक्ति का फल है, कि भगवान नारायण ने भगवान शिव के प्रति अद्भुत भक्ति की, और ऐसी भक्ति के लिए नारायण को भगवान शिव का सबसे बड़ा भक्त कहा जाता है। तो यहाँ भगवान शिव उनकी भक्ति कर रहे हैं। उन्होंने उन्हें इतना बड़ा सम्मान दिया, उनका राज अभिषेक किया, और इसके बाद उनकी भक्ति स्वीकार करके सबके सामने प्रकट की।
विष्णु के बारे में शिव ने ब्रह्मा को क्या आदेश दिया?
शिव के अपने आदेश से हरि वंदनीय बने
भगवान महामहेश्वर शिव ब्रह्मा से कहते हैं — जिनका दूसरा नाम लोकेश है: हे लोकेश, आज से मेरे आदेश से ये विष्णु, हरि, स्वयं मेरे वंदनीय हो गए हैं। सब लोग यह सुनें। हे तात, सब देवताओं आदि के साथ इन श्री हरि को प्रणाम करो; और ये वेद, मेरे आदेश से, इन श्री हरि का वैसा ही वर्णन करें जैसा मेरा करते हैं। वक्ता ज़ोर देते हैं कि यह स्वयं शिव कह रहे हैं, वे नहीं — शिव यहाँ आदेश दे रहे हैं कि जो शिव को मानते हैं, उन सबको विष्णु का पूजन करना होगा, और वे स्वयं भी ऐसा कर रहे हैं।
भगवान महामहेश्वर शिव ने यहाँ क्या कहा? वे ब्रह्मा से बात कर रहे हैं — और ब्रह्मा का एक और नाम लोकेश है। उन्होंने कहा: हे लोकेश, आज से मेरे आदेश के अनुसार ये विष्णु, हरि, स्वयं मेरे वंदनीय हो गए हैं। सब लोग यह बात सुनें। वक्ता ज़ोर देते हैं कि यह शिव कह रहे हैं, हम नहीं। शिव कह रहे हैं: सब लोग यह बात सुनें। हे तात, सब देवताओं आदि के साथ इन श्री हरि को प्रणाम करो, और ये वेद, मेरे आदेश से, इन श्री हरि का वैसा ही वर्णन करें जैसा मेरा करते हैं। भगवान शिव यहाँ यह आदेश देते हैं: कि जो भगवान शिव को मानेंगे, उन सबको भगवान विष्णु का पूजन करना होगा। और वे स्वयं भी ऐसा कर रहे हैं।
शिव के आदेश के बाद श्री हरि को किसने प्रणाम किया?
पहले शिव ने प्रणाम किया, फिर ब्रह्मा और सब देवताओं ने
फिर श्री राम माता सती से कहते हैं कि वर देने वाले, भक्तों पर स्नेह रखने वाले रुद्र देव ने, जिनका मन विष्णु की भक्ति से प्रसन्न था, यह कहकर स्वयं गरुड़ध्वज श्री हरि को प्रणाम किया। इसके बाद ब्रह्मा और सब देवताओं, ऋषियों, मुनियों और सिद्धों ने हरि की वंदना की, और बहुत प्रसन्न होकर भक्त-वत्सल महेश्वर ने देवताओं के सामने श्री हरि को एक बड़ा वर दिया।
तब श्री राम जी ने माता सती से कहा कि वर देने वाले, भक्तों पर स्नेह रखने वाले रुद्र देव ने, जिनका मन विष्णु की भक्ति से प्रसन्न था, यह कहकर स्वयं गरुड़ध्वज श्री हरि को प्रणाम किया। इसके बाद ब्रह्मा और सब देवताओं, ऋषियों, मुनियों और सिद्धों ने हरि की वंदना की। और बहुत प्रसन्न होकर भक्त-वत्सल महेश्वर ने देवताओं के सामने श्री हरि को एक बड़ा वर दिया।
शिव ने श्री हरि को कौन सा वर दिया?
शिव के आदेश से सब लोकों के कर्ता, पालक और संहारक
महेश्वर कहते हैं: मेरे आदेश से तुम सब लोकों के कर्ता, पालक और संहारक होगे, धर्म, अर्थ और काम के दाता, और अन्याय करने वालों को दंड देने वाले। वक्ता कहते हैं कि इन तीन पंक्तियों से समझिए कि विष्णु पुराण में और अन्य वैष्णव पुराणों में जो कहा गया है — कि भगवान विष्णु ही सब कुछ हैं — वह क्यों है: क्योंकि यहाँ महामहेश्वर पहले ही वर दे चुके हैं। इस वर के अनुसार, जब भी दूसरा कल्प आएगा, जितने भी ब्रह्मांड बनेंगे, सबमें भगवान विष्णु परम होंगे।
महेश्वर कह रहे हैं: मेरे आदेश से तुम सब लोकों के कर्ता, पालक और संहारक होगे, धर्म, अर्थ और काम के दाता, और अन्याय करने वालों को दंड देने वाले। वक्ता कहते हैं कि कही गई इन तीन पंक्तियों से समझिए कि विष्णु पुराण में या जो भी अन्य वैष्णव पुराण हैं उनमें क्या कहा गया है — कि भगवान विष्णु ही सब कुछ हैं। ऐसा क्यों है? क्योंकि यहाँ महामहेश्वर पहले ही वर दे चुके हैं। इस वर के अनुसार, जब भी दूसरा कल्प आएगा — एक कल्प बीतता है, दूसरा कल्प बीतता है, जितने भी कल्प हैं, जैसे-जैसे ब्रह्मा की सृष्टि बदलती है — समझिए कि तब जितने भी ब्रह्मांड बनेंगे, उन सबमें भगवान विष्णु परम होंगे।
महाविष्णु पद क्या है?
उन कल्पों में हरि के आदेश से ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का उत्पन्न होना
अब उनके आदेश से ब्रह्मा भी उत्पन्न होंगे, विष्णु भी उत्पन्न होंगे, और रुद्र भी उत्पन्न होंगे। वे अब महाविष्णु हो गए हैं। वक्ता कहते हैं कि जब हम पूछते हैं कि महाविष्णु पद कौन सा पद है, तो यही वह पद है जिसका हम चिंतन करते और बात करते हैं। वे कहते हैं कि वे बीच में रुककर इसे इसलिए समझा रहे हैं ताकि श्रोताओं के मन में जो भेद है वह दूर हो — कि विष्णु पुराण में विष्णु परम कैसे हुए, और विष्णु ने रुद्र को कैसे उत्पन्न किया, जबकि यहाँ रुद्र स्वयं महामहेश्वर हैं।
अब उनके अपने आदेश से ब्रह्मा भी उत्पन्न होंगे, विष्णु भी उत्पन्न होंगे, और रुद्र भी उत्पन्न होंगे। वे अब महाविष्णु हो गए हैं। वक्ता कहते हैं कि जब हम पूछते हैं कि महाविष्णु पद कौन सा पद है, तो यही वह पद है जिसका हम चिंतन करते और जिसके बारे में बात करते हैं। वे कहते हैं कि वे बीच में रुककर इसे इसलिए समझा रहे हैं ताकि श्रोताओं के मन में जो भेद है वह दूर हो — कि विष्णु पुराण में विष्णु परम कैसे हुए, विष्णु ने रुद्र को कैसे उत्पन्न किया, जबकि यहाँ रुद्र स्वयं महामहेश्वर हैं; क्योंकि महामहेश्वर ही इस लीला का आदेश दे रहे हैं, अधिकार दे रहे हैं, और पहले ही आशीर्वाद दे चुके हैं।
वैष्णव कल्पों में महेश्वर और भगवती क्या करेंगे?
नारायण का चिंतन, और हरि का शिव से भी अजेय होना
जब उनका वह कल्प चलेगा, जहाँ भगवान नारायण को अपनी सर्वोच्चता दिखाने का आदेश, आशीर्वाद और वर मिला है, तब वहाँ महेश्वर शिव उनका चिंतन करेंगे; जो रुद्र उत्पन्न होंगे वे उनका चिंतन करेंगे; और भगवती भी, जो परम वैष्णवी महामाया हैं, नारायण को ही सब कुछ मानेंगी — क्योंकि यहाँ भगवान शिव ने आदेश दिया है और उन्हें सब कुछ, अपना सारा ऐश्वर्य दे दिया है। फिर शिव कहते हैं: तुम महान बल और पराक्रम से युक्त, जगत-पूज्य, जगदीश्वर होगे, और कहीं-कहीं मुझसे भी अजेय — यानी हम भी तुम्हें हरा नहीं सकेंगे।
शिव ने विष्णु को कौन सी तीन शक्तियाँ दीं?
इच्छा की सिद्धि, लीलाएँ प्रकट करने की शक्ति, और तीनों लोकों में नित्य स्वतंत्रता
भगवान शिव कहते हैं: मुझसे तीन प्रकार की शक्ति ग्रहण करो जो मैं देता हूँ। वे हैं — इच्छा आदि की सिद्धि; तरह-तरह की लीला प्रकट करने की शक्ति; और तीनों लोकों में नित्य स्वतंत्र रहने की शक्ति। भगवान शिव ने यहाँ ये भगवान श्री नारायण को दीं।
फिर भगवान शिव कहते हैं: मुझसे तीन प्रकार की शक्ति ग्रहण करो जो मैं देता हूँ। भगवान शिव यहाँ कौन सी तीन शक्तियाँ दे रहे हैं? इच्छा आदि की सिद्धि; तरह-तरह की लीला प्रकट करने की शक्ति; और तीनों लोकों में नित्य स्वतंत्र रहने की शक्ति। भगवान शिव ने यहाँ ये भगवान श्री नारायण को दीं।
शिव ने विष्णु से और क्या वचन दिए?
उनके शत्रुओं को दंड, उनके भक्तों को मोक्ष, और माया सौंपना
वे कहते हैं: हे हरे, जो तुमसे शत्रुता रखेंगे, उन्हें मैं प्रयत्नपूर्वक अवश्य दंड दूँगा। हे विष्णु, मैं तुम्हारे भक्तों को परम मोक्ष दूँगा। यह माया भी ग्रहण करो — वह माया जिसे हटाना देवताओं आदि के लिए भी कठिन है, और जिससे मोहित होकर यह संसार जड़ हो जाएगा। वक्ता कहते हैं कि वे अपनी माया भी विष्णु के अधीन कर रहे हैं: भगवान शिव यहाँ भगवान नारायण को सबका सब कुछ बना रहे हैं।
सुनिए वे आगे क्या कहते हैं। हे हरे, जो तुमसे शत्रुता रखेंगे, उन्हें मैं प्रयत्नपूर्वक अवश्य दंड दूँगा। हे विष्णु, मैं तुम्हारे भक्तों को परम मोक्ष दूँगा। यह माया भी ग्रहण करो। वक्ता बताते हैं कि वे अपनी माया भी उनके अधीन कर रहे हैं। यह माया ग्रहण करो, जिसे हटाना देवताओं आदि के लिए भी कठिन है, और जिससे मोहित होकर यह संसार जड़ हो जाएगा। भगवान शिव यहाँ भगवान नारायण को सबका सब कुछ बना रहे हैं।
शिव ने विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र के स्थान का वर्णन कैसे किया?
बायाँ हाथ, दायाँ हाथ, और हृदय
शिव कहते हैं: हे हरे, तुम मेरा बायाँ हाथ हो और विधाता मेरा दायाँ हाथ। तुम इन विधाता के भी उत्पन्न करने वाले और पालने वाले होगे। जो रुद्र मेरे हृदय का रूप है — वह मैं ही हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं; और वह रुद्र तुम्हारे लिए और ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए अवश्य पूजनीय है। यहाँ रहकर तरह-तरह की लीला करो, और अनेक अवतारों से विशेष रूप से पूरे संसार का पालन करो।
अब वे यहाँ क्या कहते हैं: हे हरे, तुम मेरा बायाँ हाथ हो, और विधाता दायाँ हाथ। तुम इन विधाता के भी उत्पन्न करने वाले और पालने वाले होगे। जो रुद्र मेरे हृदय का रूप है, वह मैं ही हूँ; इसमें कोई संदेह नहीं। और वह रुद्र तुम्हारे लिए और ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए अवश्य पूजनीय है। यहाँ रहकर तरह-तरह की लीला करो और अनेक अवतारों के द्वारा विशेष रूप से पूरे जगत का पालन करो। मेरे लोक में तुम्हारा यह परम ऐश्वर्यपूर्ण और अत्यंत तेजस्वी स्थान —
गोलोक धाम क्या है, और उसके बारे में नरसिंह मेहता की कौन सी कथा बताई गई है?
सात दिन का उपवास, वर, और शरद पूर्णिमा का महारास
श्री हरि नारायण के कृष्ण स्वरूप की उपासना करने वाले किस धाम जाते हैं, यह पूछकर वक्ता उत्तर देते हैं: गोलोक धाम। वे गुजरात के प्रसिद्ध संत, भक्त नरसिंह मेहता का चरित्र बताते हैं, जिन्होंने भगवान शिव की उपासना की और सात दिन उपवास रखा। सात दिन बाद शिव प्रकट हुए और पूछा कि कौन सा वर चाहिए। नरसिंह मेहता ने कहा: जो आपको प्रिय है, वह दीजिए। वे शिव के भक्त थे। उन्हें गोद में लेकर भगवान शिव परम धाम गए, जहाँ शरद पूर्णिमा की रात महारास चल रहा था, और उन्होंने नरसिंह मेहता को भगवान नारायण की पीतांबरी में रख दिया।
वक्ता कहते हैं, अब ध्यान से सुनिए: जो भगवान श्री हरि नारायण के कृष्ण स्वरूप की उपासना करते हैं — वे किस धाम जाते हैं? गोलोक धाम। वे वहाँ जाते हैं। भक्त नरसिंह मेहता का चरित्र है, जो गुजरात के प्रसिद्ध संत थे, जिसमें उन्होंने भगवान शिव की उपासना की और सात दिन उपवास में रहे। सात दिन बाद शिव प्रकट हुए और पूछा कि कौन सा वर चाहिए। नरसिंह मेहता ने कहा: जो आपको प्रिय है, वह हमें दीजिए। वे शिव के भक्त थे। इस पर भगवान शिव नरसिंह मेहता को गोद में लेकर परम धाम गए। और परम धाम में जाकर, शरद पूर्णिमा की रात महारास हो रहा था, और उन्होंने नरसिंह मेहता को भगवान नारायण की पीतांबरी में रख दिया।
इस वर्णन में गोलोक की उत्पत्ति क्या है?
विश्वकर्मा द्वारा बनाई गई शिव की अपनी गौशाला
वही लोक, वही धाम जिसे हम गोलोक धाम कहते हैं, भगवान महामहेश्वर शिव की गौशाला है, जिसे उन्होंने विश्वकर्मा से गोलोक धाम के रूप में बनवाया था। और वहाँ उन्होंने भगवान नारायण को अनेक अलग-अलग रूपों में स्थापित किया और वहाँ उन्हें सारा अधिकार दिया। यही कहा जा रहा है: यह परम ऐश्वर्यपूर्ण और अत्यंत तेजस्वी स्थान गोलोक नाम से प्रसिद्ध होगा। और वे कहते हैं: हे हरे, पृथ्वी पर तुम्हारे जो अवतार होंगे, वे सबके रक्षक होंगे और मेरे भक्त होंगे; मैं उनके दर्शन करूँगा, और वे मेरे वर से सदा प्रसन्न रहेंगे।
और वही लोक, वही धाम जिसे हम गोलोक धाम कहते हैं — वही गोलोक धाम भगवान महामहेश्वर शिव की गौशाला है, जिसे उन्होंने विश्वकर्मा जी से गोलोक धाम के रूप में बनवाया था। और वहाँ उन्होंने भगवान नारायण को अनेक अलग-अलग रूपों में स्थापित किया और वहाँ उन्हें सारा अधिकार दिया। यही कहा जा रहा है: कि यह परम ऐश्वर्यपूर्ण और अत्यंत तेजस्वी स्थान गोलोक नाम से प्रसिद्ध होगा। और वे कहते हैं: हे हरे, पृथ्वी पर तुम्हारे जो अवतार होंगे, वे सबके रक्षक होंगे और मेरे भक्त होंगे। पृथ्वी पर जितने भी अवतार हों, वे सब सबके रक्षक होंगे और सब मेरे भक्त होंगे। मैं उनके दर्शन करूँगा, और वे मेरे वर से सदा प्रसन्न रहेंगे।
शिव से वर पाने के बाद विष्णु ने क्या किया?
गोप वेश और गोपों, गोपियों और गायों का स्वामित्व
राम जी सती को बताते हैं कि श्री हरि को अपना अखंड ऐश्वर्य देकर उमापति भगवान हर स्वयं कैलाश पर्वत पर रहे और अपने गणों के साथ स्वच्छंद विहार करने लगे। और उसी समय से भगवान लक्ष्मीपति ने गोप वेश धारण किया और गोपों, गोपियों और गायों के स्वामी बनकर बड़े आनंद से वहाँ रहने लगे।
फिर राम जी सती जी को यह कथा और पूरा पुराना वृत्तांत सुनाते हुए बताते हैं कि इस प्रकार श्री हरि को अपना अखंड ऐश्वर्य देकर उमापति भगवान हर स्वयं कैलाश पर्वत पर रहे और अपने गणों के साथ स्वच्छंद विहार करने लगे। और उसी समय से भगवान लक्ष्मीपति ने गोप वेश धारण किया। और गोपों, गोपियों और गायों के स्वामी बनकर वे बड़े आनंद से वहाँ रहने लगे। वक्ता कहते हैं कि अब उन्हें लगता है श्रोताओं के मन का संदेह स्पष्ट हो गया होगा।
क्या साधकों को शिव और राधा-कृष्ण के बीच भेजना ठीक है?
शिव को कृष्ण सबसे प्रिय, कृष्ण को शिव सबसे प्रिय, और राधा का आधा हृदय
वे कहते हैं कि अब से आपके मन में यह भाव नहीं उठेगा कि श्री कृष्ण और राधा रानी श्रेष्ठ हैं, या भगवान शिव श्रेष्ठ हैं। और जो यह कथा सुनते हैं कि शिव जिससे प्रसन्न होते हैं उसे राधा रानी या कृष्ण के चरणों में भेजते हैं, और कृष्ण और राधा प्रसन्न होकर लोगों को वापस इधर भेजते हैं — ये लोग उन्हें इधर-उधर क्यों भेजते हैं? क्योंकि शिव को कृष्ण सबसे प्रिय हैं, और कृष्ण को शिव सबसे प्रिय हैं। राधा रानी के स्वरूप में कहा जाता है कि आधा हृदय राधा रानी है और आधा हृदय कृष्ण, जो भगवान शिव हैं। वे कहते हैं कि यह पूरी बात इसी तरह समझनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि अब आपमें से जो भी शुरू से यह पूरी कथा सुन रहा है — चाहे आपमें से केवल दस ही सुन रहे हों और बाकी आते-जाते रहें — आपके मन में फिर कभी यह भाव नहीं उठेगा कि श्री कृष्ण और राधा रानी श्रेष्ठ हैं, या भगवान शिव श्रेष्ठ हैं। और जो यह कथा सुनते हैं कि शिव जिससे प्रसन्न होते हैं उसे राधा रानी के चरणों में या कृष्ण के चरणों में भेजते हैं, और कृष्ण और राधा प्रसन्न होकर लोगों को वापस इधर भेजते हैं — ये लोग उन्हें इधर-उधर क्यों भेजते हैं? क्यों भेजते हैं? क्योंकि शिव को कृष्ण सबसे अधिक प्रिय हैं, और कृष्ण को शिव सबसे अधिक प्रिय हैं। राधा रानी के स्वरूप में कहा जाता है कि आधा हृदय राधा रानी है, और आधा हृदय कृष्ण, जो भगवान शिव हैं। वे कहते हैं कि यह पूरी बात इसी तरह समझनी चाहिए — और तब आपके मन में यह संदेह नहीं उठेगा।
श्री हरि राम के रूप में कितने रूपों में अवतरित हुए?
चार रूप — राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न
श्री राम भगवती सती को बताते हैं कि इसके बाद भगवान विष्णु पूरे जगत की रक्षा करने लगे और शिव के आदेश से संसार के पालन के लिए तरह-तरह के अवतार लिए; और इस समय श्री हरि भगवान शंकर के आदेश से चार रूपों में अवतरित हुए हैं। उनमें एक मैं, राम हूँ, और बाकी भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न हैं। मैंने यहाँ चार रूपों में अवतार लिया है।
फिर भगवान श्री राम भगवती सती से कहते हैं कि इसके बाद भगवान विष्णु पूरे जगत की रक्षा करने लगे, और शिव के आदेश से संसार के पालन के लिए तरह-तरह के अवतार लिए। और इस समय श्री हरि भगवान शंकर के आदेश से चार रूपों में अवतरित हुए हैं। उनमें एक मैं, राम हूँ, और बाकी भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न हैं। मैंने यहाँ चार रूपों में अवतार लिया है।
कौमोदगी गदा, सुदर्शन चक्र और शेषनाग ने अवतार कैसे लिया, यह अलग विषय है, जिसे आगे के लिए रखा गया है
आगे के लिए रखा गया एक अलग विषय
वक्ता कहते हैं कि यहाँ यह मत सोचिए कि जिस कौमोदगी गदा ने अवतार लिया, जिस सुदर्शन चक्र ने अवतार लिया, और जिस शेषनाग ने अवतार लिया — जब यहाँ श्री राम ऐसा कह रहे हैं, तो हमें कौमोदगी गदा कैसे मिली, सुदर्शन चक्र कैसे मिला? जब ये सब विषय समझ में आएँगे, तो यह संदेह भी दूर हो जाएगा। वे कहते हैं कि माँ सुदर्शन की चर्चा भी उन्होंने पहले की है, और किसी दिन विस्तार से बताएँगे कि माँ सुदर्शन की सामर्थ्य क्या है और वह बात वास्तविक है या नहीं।
वक्ता कहते हैं कि अब यहाँ यह मत सोचिए कि जिस कौमोदगी गदा ने अवतार लिया था, जिस सुदर्शन चक्र ने अवतार लिया था, और जिस शेषनाग ने अवतार लिया था — जब यहाँ भगवान श्री राम ऐसा कह रहे हैं, तो फिर हमें कौमोदगी गदा कैसे मिली, सुदर्शन चक्र कैसे मिला? जब ये सब विषय समझ में आएँगे, तो यह संदेह भी दूर हो जाएगा। वे कहते हैं, हमारे साथ बने रहिए। वे जोड़ते हैं कि माँ सुदर्शन के बारे में भी उन्होंने पहले चर्चा की है, और किसी दिन विस्तार से बताएँगे कि माँ सुदर्शन की सामर्थ्य क्या है, और वह बात वास्तव में है या नहीं।
राम ने सती को अपना वृत्तांत कैसे समाप्त किया?
उनके दर्शन से सीता को फिर पाने का निश्चय
राम वहाँ पूरा वृत्तांत देते हैं — कि पिता के आदेश से वे वन आए हैं और इस समय दुख में हैं — संक्षेप में अपनी लीला बताते हुए। फिर कहते हैं: हे सती, हे माता। अब मुझे आपके दर्शन मिल गए हैं; आपकी कृपा से मेरा सब कल्याण होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। आपके दर्शन से अब मुझे सीता को पाने का यह वर अवश्य मिल गया है। उस पापी राक्षस को मारकर मैं अवश्य सीता को पाऊँगा, इसमें कोई संदेह नहीं। मेरा बड़ा सौभाग्य है कि आप दोनों ने मुझ पर कृपा की; जिस पुरुष पर आप दोनों दयालु होते हैं, वह धन्य और श्रेष्ठ है।
फिर राम जी ने वहाँ पूरा वृत्तांत दिया: कि पिता के आदेश से वे वन में आए हैं और इस समय दुख में हैं। इस प्रकार उन्होंने संक्षेप में अपनी लीला बताई। अब वे कहते हैं: हे सती, हे माता। उन्होंने यहाँ उन्हें माता कहा, जैसे पहले कहा था और फिर कहते हैं। अब मुझे आपके दर्शन मिल गए हैं; आपकी कृपा से मेरा सब कल्याण होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। आपके दर्शन से अब मुझे सीता को पाने का यह वर अवश्य मिल गया है। उस पापी राक्षस को मारकर मैं अवश्य सीता को पाऊँगा, इसमें कोई संदेह नहीं। मेरा बड़ा सौभाग्य है कि आप दोनों ने मुझ पर कृपा की। जिस पुरुष पर आप दोनों दयालु होते हैं, वह धन्य और श्रेष्ठ है। यह कहकर रघुकुल शिरोमणि श्री राम उनकी आज्ञा लेकर वन में आगे चले गए।
परीक्षा के बाद सती की क्या प्रतिक्रिया हुई?
राम की शिव-भक्ति पर आनंद, और अपने कृत्य पर दुख
शुद्ध हृदय वाले राम जी की शिव के प्रति भक्ति और शिव की स्तुति के उनके वचन सुनकर सती मन में बहुत प्रसन्न हुईं। और फिर अपना कृत्य याद करके उन्हें बहुत दुख हुआ। उनके अंगों की कांति फीकी पड़ गई; वे उदास होकर, तेजहीन होकर, शिव के पास लौटीं।
अब शुद्ध हृदय वाले राम जी की शिव के प्रति भक्ति और शिव की स्तुति के उनके वचन सुनकर सती मन में बहुत प्रसन्न हुईं। और अपना कृत्य याद करके, इसके बाद उन्हें बहुत दुख हुआ। उनके अंगों की कांति फीकी पड़ गई; उदास होकर वे तेजहीन होकर शिव के पास लौटीं।
शिव ने परीक्षा के बारे में पूछा तो सती ने क्या कहा?
उनका मौन, और शिव का सब जान लेना
वे सोचने लगीं कि उन्होंने शिव की आज्ञा नहीं मानी, कि तुच्छ बुद्धि के कारण उन्होंने श्री राम के बारे में ऐसा सोचा और विचारा; और अब यदि शिव पूछेंगे तो वे क्या उत्तर देंगी? सती को उदास, मन में दुख लिए देखकर भगवान शिव ने पूछा कि क्या हुआ — तुमने परीक्षा ली, तो कैसे ली, बताओ क्या हुआ। तब भगवती सती दुख से व्याकुल होकर सिर झुकाए खड़ी रहीं; और भगवान शिव पूरी बात समझ गए और सब जान गए।
वे सोचने लगीं और मन में कहने लगीं कि उन्होंने शिव की बात नहीं मानी, कि तुच्छ बुद्धि के कारण उन्होंने श्री राम जी के बारे में ऐसा सोचा और विचारा। अब यदि शिव पूछेंगे, तो वे क्या उत्तर देंगी? सती को उदास, मन में दुख लिए देखकर भगवान शिव ने पूछा: क्या हुआ? तुमने परीक्षा ली — तो कैसे ली? क्या हुआ, बताओ। तब भगवती सती दुख से व्याकुल होकर सिर झुकाए खड़ी रहीं; दुख पर दुख था। और भगवान शिव पूरी बात समझकर सब जान गए।
सती की परीक्षा के बाद शिव को कौन सा व्रत याद आया?
हरि के आग्रह पर अपने विवाह में लिया गया व्रत
वक्ता कहते हैं, फिर से याद कीजिए कि जब शिव का सती से विवाह हो रहा था, तब विष्णु ने क्या प्रार्थना की थी और शिव ने कौन सी प्रतिज्ञा ली थी। शिव को वही प्रतिज्ञा याद आई, जो मर्यादा की रक्षा करने वाले रुद्र ने पहले हरि के विशेष आग्रह पर ली थी, जब देवताओं ने विवाह के लिए प्रार्थना की थी। उन्होंने क्या लिया था? कि यदि कोई पराई पत्नी के प्रति दुष्ट भाव रखे, तो मैं स्वयं उसे मारूँगा।
वक्ता कहते हैं, अब यहाँ फिर याद कीजिए: जब शिव का सती से विवाह हो रहा था, तो आपको याद होना चाहिए कि विष्णु ने क्या प्रार्थना की थी और शिव ने कौन सी प्रतिज्ञा ली थी। शिव को वही प्रतिज्ञा याद आई, जो मर्यादा की रक्षा करने वाले रुद्र ने पहले हरि के विशेष आग्रह पर ली थी, जब देवताओं ने विवाह के लिए प्रार्थना की थी। उन्होंने क्या लिया था? कि यदि कोई किसी और की पत्नी के प्रति दुष्ट भाव रखे, तो मैं स्वयं उसे मारूँगा।
शिव के व्रत ने उन्हें सती का त्याग करने को विवश क्यों किया?
सीता का रूप लेकर सती पराई पत्नी और राम की माता बन गईं
यहाँ, क्योंकि भगवती सती ने स्वयं सीता का रूप धारण किया था, और सीता का रूप धारण करके वे भगवान श्री राम की पत्नी के रूप में आ गईं, वे उनके लिए माता के समान हो गईं; और पराई पत्नी होकर, शिव अब उन्हें पत्नी के भाव से नहीं देख सकते थे। शिव ने कहा: यदि मैं सती से पहले की तरह प्रेम करूँ, तो संसार की लीला का पालन करने वाले मुझ शिव की महान प्रतिज्ञा ही नष्ट हो जाएगी। मन में कई तरह से विचार करके, वेद और धर्म के रक्षक शंकर ने सती का हृदय से त्याग कर दिया।
और यहाँ, क्योंकि भगवती सती ने स्वयं सीता का रूप धारण किया था, और सीता जी का रूप धारण करके वे भगवान श्री राम की पत्नी के रूप में आ गईं, वे उनके लिए माता के समान हो गईं — और पराई पत्नी होकर, वे अब उन्हें पत्नी के भाव से नहीं देख सकते थे। इसी कारण उन्होंने प्रतिज्ञा ली थी। शिव ने कहा: यदि हम सती से पहले की तरह प्रेम करें, तो संसार की लीला का पालन करने वाले मुझ शिव की महान प्रतिज्ञा ही नष्ट हो जाएगी। मन में कई तरह से विचार करके, वेद और धर्म के रक्षक शंकर जी ने सती का हृदय से त्याग कर दिया। वक्ता कहते हैं कि सतीत्व ऐसे ही चलता है — पर उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा नष्ट नहीं होने दी।
आकाशवाणी ने क्या कहा, और सती को क्या पता चला?
व्रत की प्रशंसा, और सती को उसके बारे में बताया जाना
मन से सती का त्याग करके वे अपना संकल्प बताए बिना कैलाश पर्वत की ओर चल पड़े। रास्ते में आकाशवाणी हुई: हे परमेश्वर, आप धन्य हैं; इन तीनों लोकों में आपके समान कोई नहीं, जिसने आज तक ऐसी प्रतिज्ञा की हो। आप महायोगी, महाप्रभु हैं। यह सुनकर भगवती सती पूछने लगीं कि उन्होंने कौन सी प्रतिज्ञा ली है — बताइए, कृपा कीजिए। तब भगवान शिव ने उन्हें बताया कि यह वही प्रतिज्ञा है जो उन्होंने विवाह के समय ली थी। यह सुनकर वे बहुत उदास हो गईं।
फिर मन से सती का त्याग करके वे कैलाश पर्वत की ओर चल पड़े। उन्होंने अपना संकल्प नहीं बताया। रास्ते में आकाशवाणी हुई: हे परमेश्वर, आप धन्य हैं। इन तीनों लोकों में आपके समान कोई नहीं जिसने आज तक ऐसी प्रतिज्ञा की हो। आप महायोगी हैं, आप महाप्रभु हैं। यह सुनकर भगवती सती पूछने लगीं: आपने कौन सी प्रतिज्ञा ली? कृपा करके मुझे बताइए। तब भगवान शिव ने उन्हें बताया कि यह वही प्रतिज्ञा है जो उन्होंने विवाह के समय ली थी। यह सुनकर वे बहुत उदास हो गईं। इसके बाद बहुत लीला हुई, और आगे चलकर वे विराजमान हो गए।
क्या इसी युग में सती योगाग्नि में भस्म हुईं?
बीता हुआ कल्प, और हर त्रेता में अवतार
वक्ता कहते हैं कि यहाँ महायुग का विषय समझिए, जिसका वर्णन पहले दिया जा चुका है, और कल्प-भेद कैसे काम करता है, जैसा एक पिछले लाइव में बताया गया था। यहाँ वह कल्प बीत चुका है। हर कल्प में, और हर बार जब त्रेता युग आता है, हर बार वे अवतार लेते हैं। उस महायुग में वह युग बीत गया; और उस युग में भगवती सती योगाग्नि में भस्म नहीं हुईं — उनके साथ यह हुआ। हर बार यह अलग होता है; जैसे उस बार भी हुआ होगा, पर वह पिछला होगा। इसीलिए कल्प विधान समझना चाहिए, नहीं तो आप यहाँ उलझ जाएँगे।
वक्ता कहते हैं, और अब यहाँ महायुग व कल्प का विषय समझिए, जिसका वर्णन पहले दिया जा चुका है, और कल्प-भेद कैसे काम करता है, जैसा एक पिछले लाइव में बताया गया था। यहाँ वह कल्प बीत चुका है। हर कल्प में, और जितनी बार भी त्रेता युग आता है, हर बार वे अवतार लेते हैं। तो उस महायुग में वह युग बीत गया है। और उस युग में भगवती सती योगाग्नि में भस्म नहीं हुईं — उनके साथ यह हुआ। हर बार यह अलग होता है; जैसे उस बार भी हुआ होगा, पर वह पिछला होगा। वे कहते हैं कि यहाँ आप उलझ जाएँगे — इसीलिए ठीक यही कल्प विधान समझना चाहिए।
पुराणों को एक समय-सीमा के रूप में कैसे समझना चाहिए?
आज की घटना इस दिन के अगली बार आने तक आगे ले जाई जाती है
वक्ता कहते हैं कि वह किसी और कल्प में चला होगा — जो समय-चक्र चलता है। मान लीजिए आज, जो भी घटना आज होने वाली है, वह या तो पहले से चली आ रही है या अपने अंत तक पहुँचकर पूरी होने वाली है। आज वाली आगे ले जाई गई है। फिर वह अगली बार तब होगी जब यह दिन आएगा। वे कहते हैं कि पुराण का विषय इसी तरह समय-सीमा के साथ समझा जा सकता है; नहीं तो आप उसे नहीं समझेंगे।
वक्ता कहते हैं कि वह किसी और कल्प में चला होगा — जो समय-चक्र चलता है। मान लीजिए आज, जो भी घटना आज होने वाली है, वह या तो पहले से चली आ रही है, या अपने अंत तक पहुँचकर पूरी हो जाने वाली है। आज वाली आगे ले जाई गई है। फिर वह अगली बार तब होगी जब यह दिन आएगा। तो पुराण का विषय इसी तरह समय-सीमा के साथ समझा जा सकता है; नहीं तो आप उसे नहीं समझेंगे।
दक्ष का यज्ञ और संघर्ष, वीरभद्र और महाकाली, और अंधक दैत्य का वर्णन अभी बाकी है
दक्ष का यज्ञ, वीरभद्र और महाकाली, और अंधक दैत्य
दक्ष के यज्ञ और संघर्ष का पूरा वर्णन अगले दिन होगा। उसमें समूह शक्तियों के बारे में जानेगा — कोई शक्ति किस प्रकार प्रकट होती है, और किन मंत्रों से कौन सी शक्ति प्रकट हुई जिसने दक्ष के यज्ञ के विनाश में सहायता की: वीरभद्र, महाकाली और कौन सी अन्य शक्तियाँ कैसे आईं। साथ ही अंधक दैत्य का विषय, जो वक्ता के अनुसार कई कल्पों तक शिव के त्रिशूल पर लटका रहा; आज भी उसका एक रूप लटका हुआ है, और दूसरे रूप में वह शिव के एक गण के रूप में स्थापित हुआ।
वक्ता कहते हैं कि इसके बाद दक्ष के यज्ञ और संघर्ष के पूरे वर्णन पर कल चर्चा होगी, क्योंकि कल का विषय बहुत अद्भुत होगा। उसमें हमें शक्तियों के बारे में जानना है: कोई शक्ति किस प्रकार प्रकट होती है, और किन मंत्रों से कौन सी शक्ति प्रकट हुई जिसने दक्ष के यज्ञ के विनाश में सहायता की — वीरभद्र, महाकाली और कौन सी अन्य शक्तियाँ कैसे आईं। और अंधक दैत्य का विषय। वे कहते हैं कि अंधक दैत्य के बारे में हम जानते हैं कि वह कई कल्पों तक शिव के त्रिशूल पर लटका रहा। आज भी उसका एक रूप वहाँ लटका हुआ है। और दूसरे रूप में, वह शिव के किस गण के रूप में स्थापित हुआ? ये सब विषय कल होंगे।
अस्पताल में भर्ती होते समय कवच का क्या करना चाहिए?
ऑपरेशन से पहले कवच उतारना
वक्ता कहते हैं कि अस्पताल में भर्ती होते समय कवच आदि उतार दीजिए। उसे पहनने की कोई ज़रूरत नहीं; उसे उतार देना चाहिए। क्योंकि यदि आप भर्ती हो रहे हैं तो शायद आपका ऑपरेशन होने वाला है, और वहाँ वैसे भी वे लोग उसे उतार देंगे।
एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि अस्पताल में भर्ती होते समय कवच आदि उतार देना चाहिए। उसे पहनने की कोई ज़रूरत नहीं। उसे उतार देना चाहिए। क्योंकि यदि आप भर्ती हो रहे हैं, तो शायद आपका ऑपरेशन होने वाला है — और वहाँ वैसे भी वे लोग उसे उतार देंगे।
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