चैत्र शुक्ल चतुर्दशी पर महाभैरव और हनुमान जयंती — इन दो दिनों में गृहस्थ क्या करे
महाभैरव चतुर्दशी, हनुमान जयंती और भैरव पर।
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स्वाध्याय की कमी और जिस चीज़ को गाली दी जाए उसे काट देने की आदत, इसी से सनातनी इन विषयों को छोड़ रहे हैं
स्वाध्याय की कमी और पीछे हटना सीखा हुआ समाज
वक्ता कहते हैं कि वे टेलीग्राम ग्रुप और पिछली लाइव में पहले ही बता चुके हैं कि इसमें से कुछ भी छोड़ना नहीं है। अध्ययन और स्वाध्याय की कमी, और यह मानसिकता कि जब कोई हमें गाली दे तो हम उस चीज़ से ही कटने लगते हैं, इसने सनातनियों को, उनके शब्दों में, लगभग पूरी तरह नासमझ बना दिया है।
चैत्र नवरात्र के बाद बात शुरू करते हुए वक्ता कहते हैं कि वे टेलीग्राम ग्रुप और पिछली लाइव में पहले ही कह चुके हैं कि यह पूरा विषय छोड़ना नहीं है। वे कहते हैं कि इसे छोड़ने का कारण कहीं न कहीं अध्ययन और स्वाध्याय की कमी है। साथ में समाज की एक मानसिकता भी है: जब कोई हमें बुरा कहता है, तो हम भी उन चीज़ों से कटने लगते हैं। वे कहते हैं कि आज की हालत में सनातनी लगभग पूरी तरह नासमझ हो गए हैं। खासकर जो लोग हिंदू धर्म में रहते हैं, उन्हें इस बात का बिल्कुल भी पता नहीं है कि उनकी रक्षा करने वाली हर एक चीज़ किस तरह उनके जीवन से हटाई जा रही है।
तंत्र की पूरी व्यवस्था किस लिए है?
रक्षा और उन्नति
वक्ता पूछते हैं कि तंत्र की पूरी व्यवस्था क्या है, और उत्तर देते हैं: रक्षा करना और उन्नति करना। आज के कलिकाल में हम सब के लिए वैदिक विधि-विधान से वैदिक जीवन जीना संभव नहीं है। शायद एक प्रतिशत विप्र और द्विज ही संध्या आदि का पालन करते हैं।
जब पूछा जाता है कि तंत्र की पूरी व्यवस्था क्या है, तो वक्ता दो शब्दों में उत्तर देते हैं: रक्षा करना, और उन्नति करना। वे कहते हैं कि आज के कलिकाल में यह संभव ही नहीं है कि हम सब वैदिक विधि-विधान के अनुसार वैदिक जीवन जी सकें। शायद एक प्रतिशत विप्रगण और द्विजगण ही उस तरह से संध्या आदि का पालन कर रहे होंगे।
शिव ने आगम के विधान क्यों दिए?
उस युग के लिए आगम, जो वैदिक विधि नहीं निभा सकता
वक्ता कहते हैं कि ठीक इसी कारण भगवान शिव ने कहीं न कहीं आगम में कहे गए विधान दिए। बाद में जो अनेक पंथ और संप्रदाय बने, वे भी आगम के ही भीतर के भेद हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस युग में लगभग किसी के लिए वैदिक जीवन चल नहीं सकता, इसलिए भगवान शिव ने कहीं न कहीं आगमतांत्रिक शास्त्रोक्त विधि-विधानों का समूह (जैसे शिवागम), जो पूजा के नियम निर्धारित करता है, यह भी कि बलि कहाँ व कैसे विहित है — मात्र स्वाद या भोग हेतु इसके नियमों का उल्लंघन किसी भी उच्च आध्यात्मिक प्राप्ति को असंभव बना देता है। में कहे गए विधान दिए। बाद में जितने अलग-अलग विषय बने — पंथ, संप्रदाय आदि — वे सब आगम के ही भेदों के भीतर रहे। वे कहते हैं कि आगम का अर्थ ही यह हो गया: तंत्र विधान से तांत्रिकी संध्या आदि करने की विधि।
गृहस्थ की साधारण पूजा वैदिक है या आगमिक?
गृहस्थ की पूजन पद्धति आगमिक है
वक्ता कहते हैं कि आप किसी परंपरा में दीक्षा लेकर पूजा करें या साधारण पौराणिक संध्या करें, पूजन पद्धति का विधि-विधान वैदिक नहीं, आगमिक ही होगा — आगम में कहे गए विधान के अनुसार। इसी को तांत्रिकी विधान कहते हैं।
वक्ता कहते हैं कि आप किसी परंपरा में दीक्षा लेकर पूजा कर सकते हैं, या साधारण पौराणिक संध्या भी कर सकते हैं। दोनों ही तरह से, पूजन पद्धति का जो विधि-विधान बचता है, वह वैदिक नहीं होगा। वह आगमिक होगा — आगम में कहे गए विधान के अनुसार। और वे कहते हैं कि इसी को तांत्रिकी विधान कहा जाने लगा।
लोग तंत्र शब्द से ही क्यों डर जाते हैं?
इस शब्द से ही जुड़ी घृणा, डर और भ्रम
वक्ता कहते हैं कि तंत्र शब्द के आसपास इतनी घृणा, डर और भ्रम फैला दिया गया है कि लोग इसे सुनकर या देखकर ही डर जाते हैं। कई श्रोताओं ने उन्हें कमेंट, मैसेज और मेल करके कहा है कि जो प्रसाद वे भेजते हैं उस पर गृहस्थ तंत्र न लिखा जाए, क्योंकि लोग यह शब्द पढ़कर ही डर जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि तंत्र शब्द से ही समाज में इतनी घृणा, डर और भ्रम पैदा कर दिया गया है कि आज लोग यह शब्द सुनते या लिखा देखते ही डरने लगते हैं। वे कहते हैं कि कई श्रोताओं ने कमेंट, मैसेज और मेल किया है: भैया, जो प्रसाद भेजते हो उस पर गृहस्थ तंत्र मत लिखवाइए। लोग ये शब्द पढ़कर ही डर जाते हैं। वे इसे एक विडंबना कहते हैं। वे पूछते हैं, तंत्र का अर्थ क्या है? सिस्टम। तंत्र यानी सिस्टम, एक प्रणाली। किसी भी इकोसिस्टम को हम क्या कहते हैं? वह एक तंत्र है। सिस्टम का अर्थ ही तंत्र है; तंत्र हर जगह है, जैसे पारिस्थितिक तंत्र।
लोगों की समझ में तंत्र का अर्थ कितना छोटा कर दिया गया है?
तंत्र को मारण और जादू-टोना तक सीमित कर देना
वक्ता कहते हैं कि तंत्र का अर्थ बस यही रह गया — मारण, कि यह किसी को मार देगा, कि यह जादू-टोना करेगा। इसे बस इतने तक ही सीमित कर दिया गया है।
वक्ता कहते हैं कि डर बस तंत्र शब्द से ही पैदा हो गया। इसका अर्थ बस यही रह गया: मारण; यह किसी को मार देगा; यह जादू-टोना करेगा। इसे ठीक इतने तक ही सीमित कर दिया गया।
किन दो देवताओं को सबसे ज़्यादा तांत्रिक माना गया, और उसका क्या नतीजा हुआ?
काली और भैरव, दो सबसे डराए गए नाम
वक्ता कहते हैं कि काली माई और भैरव जी को सबसे बड़े तांत्रिक देवता माना गया। लोग इन दो नामों से ही काँपने लगते थे। गाँवों में अगर कोई आदमी रोज़ काली मंदिर जाता दिखे तो उसकी चर्चा होती है — कि वह कुछ सीख रहा है, कुछ कर देगा — और लोगों से कहा जाता है कि उसके घर मत जाओ, वहाँ मत खाओ।
वक्ता कहते हैं कि सब रूपों में से तांत्रिक देवता के रूप में सबसे ज़्यादा चलने वाली दो शक्तियाँ काली माई और भैरव जी रही हैं। बाकी रूपों को, वे कहते हैं, आदमी ने इंटरनेट के कारण ही जाना है या जानना शुरू किया है। वे रूप तो हमेशा से थे, पर साधकों तक ही सीमित रहे। गृहस्थ ने कभी साधक बनने के बारे में इतना नहीं सोचा जितना आज का श्रोता सोचता है। बस ये दो नाम सुनकर लोग काँपने लगते थे। अगर कोई जय भैरव कहता, तो जवाब होता कि यह तांत्रिक आदमी है, भैरव पूजा करता है। अगर कोई काली जी की पूजा करने लगता, तो कहा जाता कि काली जी की पूजा तांत्रिक है, यह जादू-टोना करता है, कुछ कर देगा। वे कहते हैं कि यह आज भी कई इलाकों में चलता है। गाँवों से फ़ोन आते हैं: एक आदमी कहता है कि वह भगवती काली का पूजन करने मंदिर जाता है तो पूरा गाँव देखता है — यह रोज़ काली जी की पूजा करने जाता है, कुछ सीख रहा है, हमारे साथ कुछ कर देगा, इसके घर मत जाओ, इसके घर मत खाओ।
तंत्र के बारे में फैलाए गए भ्रम से किसका नुकसान होता है?
पक्का हो चुका भ्रम, जिसे विश्वास समझ लिया गया
वक्ता कहते हैं कि एक तरफ़ जो साधना कर रहा है उससे बाकी सब चिढ़ते हैं; दूसरी तरफ़ जो चिढ़ते हैं वे खुद गड्ढे में गिर गए हैं। इस सबका फ़ायदा कौन उठा रहा है, यह हम सब जानते हैं। लोग जिस विश्वास को इतनी मज़बूती से पकड़े हैं, वह विश्वास नहीं, विश्वास बना दिया गया भ्रम है, और यह इतना पक्का हो गया है कि कोई कितना भी समझाए, वे इसे तोड़ना नहीं चाहते।
वक्ता पूछते हैं कि समाज में फैलाई गई इस भ्रमित सोच से किसका नुकसान हो रहा है। एक तरफ़ जो व्यक्ति साधना कर रहा है, उससे बाकी लोग चिढ़ते हैं; दूसरी तरफ़ जो उससे चिढ़ते हैं वे खुद गड्ढे में गिर गए हैं। और वे कहते हैं कि इस सबका फ़ायदा कौन उठा रहा है, यह हम सब जानते हैं। वे कहते हैं कि पहले से जो मान्यता बनाई गई है, वह भ्रमित मान्यता है। वह विश्वास नहीं है — आपने भ्रम को ही विश्वास बना लिया है, और यह इतना कठोर हो गया है कि कोई कितना भी समझाए, आप इसे तोड़ना नहीं चाहते।
रोज़ पंद्रह से बीस अनुभव आते हैं, और जब लोग देखते हैं कि बहुत से लोग इन साधनाओं से आगे बढ़ रहे हैं तो प्रोपेगेंडा शुरू हो जाता है
जो परिणाम बताते हैं उनके खिलाफ़ प्रोपेगेंडा
वक्ता कहते हैं कि उन्हें टेलीग्राम और मेल पर रोज़ कम से कम पंद्रह से बीस अनुभवों के स्क्रीनशॉट मिलते हैं। छोटे वाले वे एक नोट के साथ पोस्ट करते हैं ताकि लोग कुछ सीख सकें। जब दूसरे देखते हैं कि दस, बीस, सौ लोगों का भला हो रहा है, तो कुछ लोग इसे बिगाड़ने के लिए प्रोपेगेंडा चलाते हैं — चैनल पर आकर किसी सच्चे सवाल को नकारात्मक बना देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि टेलीग्राम और मेल पर उन्हें रोज़ कम से कम पंद्रह से बीस अनुभवों के स्क्रीनशॉट मिलते हैं। जहाँ बात छोटी होती है, वहाँ वे स्क्रीनशॉट अपने एक नोट के साथ पोस्ट कर देते हैं, ताकि जो कुछ सकारात्मक है उससे सीखा जा सके। वे कहते हैं कि उनका मुख्य उद्देश्य यही है कि हम कुछ सीख सकें। जब लोग देखते हैं कि दस लोगों का भला हो रहा है, बीस का हो रहा है, सौ का हो रहा है, तो कुछ लोग यह सोचने लगते हैं कि इसे कैसे बिगाड़ा जाए। वे कहते हैं कि इसके लिए भी लोग प्रोपेगेंडा चलाते हैं — चैनल पर जहाँ किसी ने सवाल पूछा हो या कुछ लिखा हो, वहाँ आकर उसे पूरी तरह नकारात्मक बनाने की कोशिश करते हैं। वे कहते हैं कि सही विषयों को हमेशा गलत की ओर मोड़ा गया है; और जो गलत है, या जो विधि-विधान गलत है, उसे हमेशा बढ़ावा दिया गया है। आज के समय में यह पूरी तरह जड़ पकड़ चुका है।
कृष्ण के किस रूप के पूजने वाले लगभग नहीं बचे?
रणछोड़ दास और कृष्ण की वीरता
वक्ता कहते हैं कि भगवान कृष्ण के उस रूप की पूजा बहुत कम लोग, लगभग न के बराबर, करते हैं जो कुरुक्षेत्र में खड़ा है या अपने जीवन के युद्धों में लगा है — जिसे रणछोड़ दास जी के नाम से जाना जाता है। वे कहते हैं कि भगवान की वीरता की कथाएँ आपको बहुत कम सुनने को मिलेंगी।
वक्ता कहते हैं कि आज के समय में आपको भगवान कृष्ण के उस रूप की पूजा करने वाले बहुत कम लोग मिलेंगे, लगभग न के बराबर — जो कुरुक्षेत्र में खड़ा है, या अपने जीवन में लड़े गए सब युद्धों में लगा है, जिसे हम रणछोड़ दास जी के नाम से जानते हैं। वे कहते हैं कि भगवान की वीरता की कहानियाँ और कथाएँ आपको बहुत कम सुनने को मिलेंगी।
केवल रस और श्रृंगार में डूबे रहने से क्या नुकसान है?
माधुर्य को इतना बढ़ाना कि मनुष्य अपने धर्म से मुड़ जाए
वक्ता कहते हैं कि जो कुछ रस, माधुर्य या श्रृंगार का है, वही हर जगह सुनाया जाता है, और यह आपके खून के उबाल को ठंडा कर देता है। इसकी ज़रूरत है, पर जब बात यहाँ तक पहुँचे कि बस इसी रस में डूब जाओ, तो इसका सबसे बड़ा बुरा असर यह होता है कि मनुष्य अपने ही धर्म से मुड़ने लगता है, और सब कुछ ठाकुर जी की इच्छा, श्री जी की इच्छा हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि भगवान के विषयों में से जो रस का, माधुर्य का, श्रृंगार का विषय है, वही चलता है — यानी जो आपके खून के उबाल को पूरी तरह ठंडा कर दे। वे कहते हैं कि इसकी ज़रूरत है, पर इस हद तक: भैया, केवल और केवल इसी रस में डूब जाओ। और इस रस में डूबने का सबसे बड़ा बुरा असर, वे कहते हैं, यह है कि मनुष्य अपने ही धर्म से विमुख होने लगता है। सब कुछ ठाकुर जी की इच्छा, श्री जी की इच्छा हो जाता है — यही सबसे ज़्यादा चलता है।
वायरल रील्स में लड्डू गोपाल जी को स्कूल में दाखिल किया गया, कक्षा में प्रथम बनाया गया और साल दर साल अगली कक्षा में चढ़ाया गया
नारायण को मनुष्य के ढाँचे में बिठाने वाली रील्स
वक्ता कहते हैं कि एक वायरल वीडियो में लड्डू गोपाल जी, बाल गोपाल जी को स्कूल में दाखिल किया गया, कक्षा में प्रथम बनाया गया, उनके लिए रिपोर्ट कार्ड लिया गया, अगली कक्षा में चढ़ाया गया, और अब शायद वे छठी या सातवीं में हैं। एक और वीडियो में उन्हें खाट पर बिठाकर पीछे से पानी डाला गया और कहा गया कि उन्होंने सू-सू कर दी। वे पूछते हैं कि यह कैसी मानसिकता है, जो नारायण को — जिन्हें वेदों का ही रूप कहा गया है — रिपोर्ट कार्ड लेने ले जाती है।
वक्ता एक वीडियो की बात करते हैं जो वायरल हुआ और जिस पर बहुत लोगों ने चर्चा की। लड्डू गोपाल जी, बाल गोपाल जी को स्कूल में दाखिल किया गया, उन्हें कक्षा में प्रथम बनाया गया, उनके लिए रिपोर्ट कार्ड लिया गया, उन्हें अगली कक्षा में चढ़ाया गया, और अब वे शायद छठी या सातवीं कक्षा में चले गए हैं। वे पूछते हैं, यह आपकी कैसी मानसिकता है? जिन नारायण को साक्षात वेद कहा गया है, उन्हें आप सातवीं से आठवीं कक्षा में पढ़वाने जा रहे हैं, रिपोर्ट कार्ड लेने जा रहे हैं। एक और वीडियो वायरल हुआ जिसमें बाल गोपाल जी को खटिया पर बिठाया गया, पीछे से पानी की धार डाली गई, और कहा गया — अरे गोपाल, अरे लाला, तुमने सू-सू कर दी। उन्हें खाना खिलाया जाता है, डोलची में उठाकर घुमाया जाता है। वे कहते हैं, सोचिए आपकी यह नीच और अजीब मानसिकता किस स्तर तक गिर रही है। और लोग इसमें बड़ा आनंद ले रहे हैं, इसे लीला कह रहे हैं, ठाकुर जी की लीला, श्री जी की लीला। आप उन्हें इस स्तर तक मनुष्य के ढाँचे में ढाल रहे हैं।
क्या किसी सिद्ध को भोजन और मल-मूत्र की ज़रूरत होती है?
स्वामी समर्थ और सिद्ध का सामर्थ्य
वक्ता कहते हैं कि इस कलिकाल में भी जो साधक योग सिद्ध हो जाता है — जिस पर भगवती की एक परिचारिका ने भी कृपा की हो, या नारायण के किसी साधारण सेवक या पार्षद ने भी कृपा की हो — उसे भोजन की ज़रूरत नहीं रहती, न उसके शरीर में मल-मूत्र बनता है। और आप नारायण के साथ यह सब कर रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस साधारण कलिकाल में भी जो साधक योग सिद्ध और संपन्न हो जाता है — जिस पर भगवती की एक परिचारिका ने भी कृपा की हो, या उन नारायण, उन परम विष्णु नारायण के किसी साधारण सेवक या पार्षद ने भी कृपा की हो — उसके लिए भी भोजन और मल-मूत्र की ज़रूरत नहीं रहती। वह न भोजन लेता है, न उसके शरीर में मल-मूत्र बनता है। और आप नारायण के साथ यह सब कर रहे हैं। वे स्वामी समर्थ का उदाहरण देते हैं, जिनके बारे में श्रोताओं ने पढ़ा होगा: वे इतने सिद्ध और संपन्न थे कि एक खींची हुई रेखा पर उन्होंने एक साधारण व्यक्ति को, या किसी प्रसंग में एक पशु को, चलवाया और उससे वेद पाठ करवाया। पिछले पाँच-सात सौ सालों के भीतर उन सिद्ध और समर्थ स्वामी में इतना सामर्थ्य था — और आप साक्षात नारायण को किस हालत में ले जा रहे हैं। वे कहते हैं, सोचिए आपकी मानसिकता कितनी विकृत और दूषित हो गई है।
भगवान देवों के देव के रूप में देवत्व की पदवी पर हैं, और झूठा अपनापन भरा भाव उस पद का अपमान करता है
देवत्व की पदवी और उसका उचित सम्मान
वक्ता कहते हैं कि आप अपने ही भगवान के प्रति झूठा और पाखंडी भाव रख रहे हैं, और अगर कोई उस पर उँगली उठाए तो उसे तुरंत पाखंडी और तांत्रिक कह दिया जाता है। वे कहते हैं कि देवत्व की एक पदवी है; भगवान देवों के देव हैं, और उस परम सत्ता का एक पद है जिसका सम्मान हमेशा बना रहना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि आपकी मानसिकता बहुत विकृत और दूषित हो गई है। अपने ही भगवान के प्रति आप जो भाव रखते हैं, वह कहीं न कहीं झूठा भाव है — इसी को पाखंडी भाव कहते हैं। वे पूछते हैं कि उस पाखंडी भाव की पकड़ में आप कितना नीचे गिर रहे हैं; और अगर कोई उँगली उठाकर कहे कि आपका भाव झूठा है, तो तुरंत — भाव झूठा कैसे है, आपने ऐसा कैसे कहा, आप पाखंडी हो, आप तांत्रिक हो। वे तुरंत खड़े हो जाएँगे। वे कहते हैं कि कम से कम यहाँ एक आदमी अपने पौरुष से, अनुशासन से, जितनी भी शक्ति उसमें है उससे चलने की कोशिश कर रहा है। यह भगवान के साथ छल नहीं है। भगवान का अपना एक स्थान है। देवत्व की एक पदवी है, और भगवान देवों के देव हैं। उस परम सत्ता की एक पदवी है, और उसका मान-सम्मान हमेशा बना रहना चाहिए।
पिता और पति दोनों पुरुष हैं, फिर भी दोनों को एक भाव में नहीं रखा जा सकता, और भगवान के रूपों को भी नहीं
पिता और पति, माँ और पत्नी
वक्ता एक बेटी से कहते हैं कि आपके पिता पुरुष हैं और आपके पति भी पुरुष हैं — क्या आप दोनों को एक ही स्थान पर रख सकती हैं? कभी नहीं। क्या आप अपनी माँ और अपनी पत्नी को एक ही भाव में रख सकते हैं? नहीं रख सकते। तो फिर, वे पूछते हैं, आप भगवान नारायण से इस हद तक ऐसे प्रेम कैसे कर सकते हैं मानो वे कोई बच्चा हों?
वक्ता कहते हैं कि आपके पिता पुरुष हैं। आप स्त्री हैं, उनकी बेटी। आपके पिता पुरुष हैं और आपके पति भी पुरुष हैं — क्या आप दोनों को एक जगह, एक ही स्थान पर रख सकती हैं? आप उन्हें वहाँ कभी नहीं रख सकतीं। क्या आप अपनी माँ और अपनी पत्नी को एक जगह, एक जैसा, एक भाव के अनुसार रख सकते हैं? नहीं रख सकते। तो जब आप अपने पति, अपने पिता, अपनी पत्नी और अपनी माँ को एक जैसा नहीं रख सकते, तो फिर उन भगवान नारायण से इस हद तक ऐसे प्रेम कैसे कर सकते हैं मानो वे कोई बच्चा हों?
क्या भगवान के प्रति वात्सल्य भाव को पूरी तरह छोड़ देना चाहिए?
दिव्य भाव, जो भीतर जगाना है, दिखाना नहीं
नहीं। वक्ता इसे कथाओं का दुष्प्रभाव कहते हैं, पर कहते हैं कि कही या लिखी गई कथाएँ सब गढ़ी हुई नहीं हैं — ऐसे सच्चे प्रसंग हैं जिनमें लोगों ने भगवान नारायण के बाल स्वरूप की वात्सल्य भाव से पूजा की, और उन्होंने खुद ये पढ़े हैं। वह भाव दिव्य है और उसे अपने भीतर जगाना है; उसका दिखावा नहीं करना है।
वक्ता कहते हैं कि यह कथाओं का दुष्प्रभाव है। ऐसा नहीं है कि कथा मंच से कही गई या लिखी गई कथाएँ गढ़ी हुई हैं — ऐसा नहीं है। ऐसी सच्ची घटनाएँ हैं जिनमें लोगों ने भगवान नारायण के बाल स्वरूप का वात्सल्य भाव से पूजन किया। ऐसी कई कथाएँ हैं, और वे कहते हैं कि उन्होंने खुद इन्हें पढ़ा है। और उनमें जो भाव है, वह दिव्य है। वे कहते हैं कि वह भाव अपने भीतर पैदा करना है — उसका दिखावा नहीं बनाना है।
बाल गोपाल जी को बेटे जैसा स्नेह देने वाली एक बूढ़ी राजस्थानी सेविका ने पगड़ी बाँधते समय उन्हें थप्पड़ मार दिया
राजस्थानी सेविका और पगड़ी
वक्ता याद करते हैं कि उन्होंने राजस्थान की एक सेविका के बारे में पढ़ा था जिसका कोई बेटा नहीं था और जो बाल गोपाल जी को बेटे जैसा स्नेह देने लगी। वह बूढ़ी हो गई थी; एक दिन उनकी पगड़ी बाँधते समय भगवान बार-बार मुँह इधर-उधर घुमाते रहे, तो उसने उन्हें थप्पड़ मार दिया और कहा कि तुम शरारत कर रहे हो, पगड़ी ठीक से नहीं पहन रहे।
वक्ता कहते हैं कि उनके पास भगवान नारायण की कथाओं की बहुत सारी किताबें हैं, हालाँकि अब यूट्यूब और फ़ेसबुक आदमी का समय ले लेते हैं। शुरुआती दिनों में, जब वे इन्हें पढ़ा करते थे, उन्होंने राजस्थान की किसी सेविका की कथा पढ़ी। उसके कोई बेटा नहीं था, तो वह बाल गोपाल जी को बेटे जैसा स्नेह देने लगी। वह बूढ़ी हो चुकी थी; पति-पत्नी, बस दो ही थे। एक दिन वह उनकी पगड़ी बाँध रही थी। वे कहते हैं कि नारायण ऐसी लीला करते हैं कि पगड़ी बँधते समय भगवान बार-बार मुँह फेर लेते, कभी इधर, कभी उधर। तो उसने भगवान नारायण को एक थप्पड़ मार दिया — तुम शरारत कर रहे हो, पगड़ी ठीक से नहीं पहन रहे। वे कहते हैं कि उस दिव्य भाव के उसके भीतर जगने से पहले वह किस अवस्था तक पहुँची थी, यह लोग नहीं देखेंगे। वे बस यह देखेंगे कि बाल गोपाल ऐसे हैं, ठीक है, अब ये हमारे ठाकुर जी हैं, हमारे बाल गोपाल हैं, हम इन्हें घर लाएँगे और पगड़ी बाँधेंगे। वे पूछते हैं, आप इससे क्या सीख रहे हैं; उस कथा से आपने क्या संदेश लिया? वे कहते हैं कि उस कथा की जड़ यह है कि उसका भाव इस स्तर तक गया कि उसने उस जीवंत उपस्थिति को सहज मान लिया — वे छोटे श्री कृष्ण, बाल गोपाल, लड्डू गोपाल — और वह उस अवस्था तक पहुँची जहाँ उसके भाव और समर्पण ने पत्थर के, धातु के उस श्री विग्रह को जीवंत कर दिया।
भाव की रील्स बनाने से कुछ जीवंत नहीं होता, बस समाज झूठे प्रचार से भर जाता है
भाव को रील्स और झूठे प्रचार में बदलना
वक्ता कहते हैं कि यहाँ आप कुछ भी जीवंत नहीं कर रहे। आप अपने भाव की रील्स बना रहे हैं और समाज को झूठे प्रचार से भर रहे हैं, जहाँ देखो वहाँ हंगामा मचा रहे हैं। वे ऐसे लोगों को आज के सबसे बड़े उपद्रवी और सबसे नीच प्राणी कहते हैं, और कहते हैं कि जो इन्हें बढ़ावा देते हैं — चाहे कितने भी बड़े संत या कथावाचक हों — वे समाज को उसकी जड़ से काट रहे हैं और उसे नष्ट कर रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ आप कुछ भी जीवंत नहीं कर रहे। आप अपने भाव की रील्स बना रहे हैं और समाज को झूठे प्रचार से भर रहे हैं, जहाँ देखो वहाँ हंगामा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि ये लोग आज के सबसे बड़े उपद्रवी और सबसे नीच प्राणी हैं। और जो इन्हें बढ़ावा देते हैं, वे कहते हैं — वे जो भी हों, कितने भी बड़े तथाकथित संत, कथावाचक या कोई और — वे कहीं न कहीं समाज को उस जड़ से काट रहे हैं, और बस उसे नष्ट कर रहे हैं।
अगर यह विकृति समाज में बैठ गई, तो फिर कोई भगवती रणचंडी का आवाहन नहीं कर पाएगा
कोई रणचंडी का आवाहन नहीं कर पाएगा
वक्ता कहते हैं कि जब ऐसी विकृति समाज में आ जाती है, तो यही होगा — फिर कोई भगवती रणचंडी का आवाहन नहीं कर पाएगा। भगवान कृष्ण ने भी, जब रणभूमि में ज़रूरत पड़ी, जगदंबा का आवाहन और आराधना की थी।
वक्ता कहते हैं कि जब इस तरह की विकृति समाज में आ जाती है, तो ठीक यही होगा: उसके बाद कोई भगवती रणचंडी का आवाहन नहीं कर पाएगा। भगवान कृष्ण ने भी, जब रणभूमि में ज़रूरत पड़ी, जगदंबा का आवाहन किया। उन्होंने भी भगवती की आराधना की।
भगवान नारायण का भगवती विंध्यवासिनी से क्या संबंध है?
नारायण का अपनी योग माया को आगे भेजना
वक्ता कहते हैं कि भगवती विंध्यवासिनी का चरित्र सब जानते हैं, और यह भी कि जगदंबा ने भगवान नारायण की रक्षा कैसे की। नारायण ने भी उसी काम के लिए अपनी योग माया, अपनी योग शक्ति को आगे भेजा, और उन्होंने भी जगदंबा के उस रूप को अपने भीतर समा लिया।
वक्ता कहते हैं कि भगवान नारायण और भगवती विंध्यवासिनी का चरित्र श्रोताओं ने कम से कम सुना तो होगा। जगदंबा ने उनकी रक्षा कैसे की, यह आप जानते ही होंगे; इतना तो सब जानते हैं। तो भगवान नारायण ने भी उसी काम के लिए अपनी योग माया, अपनी योग शक्ति को आगे भेजा। उन्होंने भी जगदंबा के उस रूप को अपने भीतर समा लिया। वे कहते हैं, चरित्र पढ़िए, उन्हें जानिए। आप इसे अनदेखा करेंगे, इसे नहीं मानेंगे। आप बस वही मानेंगे जिसमें कोई सार न हो, और जिसमें मेहनत न करनी पड़े।
सच्चे वैष्णव नए वैष्णवों से कैसे अलग हैं?
सच्चे वैष्णवों की निष्ठा, नए वैष्णवों के सामने
वक्ता कहते हैं कि जो वैष्णव जन आज भी सच्चे मार्ग पर चलते हैं, उनका नियम और निष्ठा देखिए — वे कभी इस तरह का झूठा दिखावा, छल और पाखंड नहीं फैलाते। आप उन्हें कभी भगवान को डोलची में घुमाते या स्कूल में दाखिला दिलाते नहीं देखेंगे। पर रोज़ जो नए वैष्णव पैदा हो रहे हैं, उन्होंने हंगामा मचा रखा है, और उन्हें देखकर रोज़ दस और पैदा होते हैं।
कृष्ण के कौन से तांत्रिक रूप लोग पचा नहीं पाते?
कृष्ण पक्ष अष्टमी, कालाष्टमी और उग्र रूप
वक्ता कहते हैं कि लोग वे चरित्र नहीं पचा पाते जिनमें श्री कृष्ण ने दिव्य तांत्रिक रूप धारण किए — ऐसे रूप जो आज लगभग लुप्त हैं, या जिन्हें लोग जानना नहीं चाहते, या जानकर भी अनदेखा करते हैं। खासकर अष्टमी को हम भगवान के काल भैरव रूप का पूजन करते हैं; कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी कहते हैं, और कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर प्रकट हुए ज़्यादातर रूप तांत्रिक उग्र रूप हैं।
वक्ता लगभग दो साल पहले कृष्ण जन्माष्टमी पर की गई अपनी एक पोस्ट याद करते हैं, और कहते हैं कि लोग यह विषय पचा नहीं पाते। वे भगवान श्री कृष्ण के उन चरित्रों को भी नहीं पचा पाते जिनमें उन्होंने ऐसे दिव्य तांत्रिक रूप धारण किए — ऐसे रूप जो आज समाज में कहीं न कहीं लगभग लुप्त हैं, तोड़ दिए गए हैं, या जिनके बारे में लोग जानना भी नहीं चाहते और जानकर भी अनदेखा करते हैं। विषय क्या था? कि खासकर अष्टमी के दिन हम भगवान के काल भैरव रूप का पूजन करते हैं। इसे कालाष्टमी भी कहते हैं; कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी कहते हैं। वे कहते हैं, पूछिए कि कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर किन रूपों का उद्भव हुआ, तो आप देखेंगे कि उनमें से ज़्यादातर खासकर तांत्रिक उग्र रूपों से जुड़े रहे हैं। भगवान कृष्ण को छोड़ दीजिए और खासकर बाकी रूपों को देखिए — पर नहीं, वे कहते हैं, इसे भी तोड़-मरोड़कर कहीं और ले जाया जाएगा।
क्या कृष्ण द्वापर से ही थे?
एक लीला, जो दिखाई गई और फिर समेट ली गई
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि द्वापर में जन्म लेने से पहले वे थे ही नहीं। वे उससे पहले भी थे। पर उन्होंने अपने एक रूप को लीला के रूप में प्रकट किया, लीला दिखाई, और फिर खुद को समेट लिया — यह पूरी बात मनुष्य के कल्याण के लिए रची गई एक लीला थी ताकि हम उनके जीवन से सीख सकें।
वक्ता कहते हैं कि भगवान श्री कृष्ण के इस रूप के साथ ऐसा नहीं है कि द्वापर में जन्म लेने से पहले वे नहीं थे। ऐसा नहीं है; वे उससे पहले से हैं। पर उन्होंने अपने एक रूप को लीला के रूप में प्रकट किया, लीला दिखाई, और फिर खुद को वापस समेट लिया। वे कहते हैं कि यह पूरी बात एक लीला थी जो उन्होंने मनुष्य के कल्याण के लिए रची, ताकि हम उनके जीवन से सीख सकें।
विद्वानों के अनुसार कृष्ण के जीवन का कितना भाग रस चरित्र है?
चार-पाँच साल, जो पूरे समाज में फैला दिए गए
वक्ता कहते हैं कि सच्चे विद्वानों से आप सुनेंगे कि यह बहुत लंबा समय नहीं है — चार से पाँच साल। रस और रस चरित्र का जो कुछ हम देखते हैं, वह चार-पाँच साल का है। उस पाँच साल के चरित्र को श्रृंगार और रस में पूरे समाज में फैला दिया गया है, जबकि उनका बाकी जीवन, उनके संघर्ष, उनकी उपलब्धियाँ और उनकी कठोर साधना छोड़ दी जाती है।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप विद्वान जनों द्वारा किया गया भगवान के जीवन का वर्णन देखें — वे सच्चे विद्वान जिन्हें वे भी सुनते और देखते हैं — तो आप उन्हें कहते सुनेंगे कि यह बहुत ज़्यादा समय नहीं है। अगर देखें तो चार, चार से पाँच साल ही वह पूरा विषय है। रस आदि का, रस चरित्र आदि का जो कुछ हम देखते हैं, वह चार से पाँच साल का है। वे कहते हैं, इसे पाँच साल मान लीजिए: वह पूरा पाँच साल का चरित्र श्रृंगार और रस में पूरे समाज में फैला दिया गया है। पर उनका बाकी जीवन, उस पूरे समय की उनकी बाकी लीला, उनके संघर्ष, उनकी उपलब्धियाँ, जिस तरह उन्होंने यह मार्ग चुना, जिस तरह उन्होंने निर्णय लिए, उनकी शिक्षा और दीक्षा क्या थी, जिस तरह उन्होंने कठोर साधना और उपासना करके चीज़ें पाईं — वह सब छोड़ दिया जाता है।
अगर कृष्ण खुद ही देने वाले हैं, तो उन्होंने साधना की ही क्यों?
साधन भी और साध्य भी, फिर भी योग से मनुष्य की सीमाएँ दिखाना
वक्ता कहते हैं कि वे खुद ही सब कुछ देने वाले हैं — वे साधन भी हैं और साध्य भी। पर वे लीला कर रहे हैं और दिखा रहे हैं कि मनुष्य शरीर धारण करने पर मनुष्य की सीमाओं के अनुसार ही काम करना होता है। वे चुटकी बजाकर सब कर सकते थे, फिर भी योग से दिखाते हैं कि शरीर का सामर्थ्य बढ़ाकर ही फिर सिद्धियाँ मिलती हैं।
वक्ता पूछते हैं, उन्हें पाने को क्या है? वे तो यह सब देने वाले हैं। वे खुद ही साधन हैं और खुद ही साध्य। पर वे लीला कर रहे हैं, है न, और दिखा रहे हैं कि जब हमने मनुष्य शरीर धारण किया है, तो मनुष्य होने की जो सीमाएँ हैं उनके अनुसार ही करना होगा। वे चुटकी बजाकर सब कर सकते थे, पर योग से वे दिखा रहे हैं कि योग करके और शरीर का सामर्थ्य बढ़ाकर ही वे फिर सिद्धियाँ पाते जाते हैं। उन्होंने यह करके दिखाया।
कृष्ण ने सांदीपनि के आश्रम में क्या किया, और नर और नारायण कौन हैं?
भगवती तारा की साधना, और नर-नारायण अवतार
वक्ता कहते हैं कि महर्षि के आश्रम में उन्होंने अपनी योग-निष्ठा और सामर्थ्य के अनुसार जितना हो सका उतना पाया, और भगवती तारा — जगदंबा महामाया महाविद्या तारा — की साधना से उन्होंने संसार की शक्ति को धारण करने की लीला रची। इसकी जड़ में उन्होंने यह भी दिखाया कि यह नर और नारायण का अवतार है: कृष्ण नारायण के अवतार हैं, अर्जुन नर के — और नर इंद्र के अंश से उतरते हैं।
वक्ता कहते हैं कि महर्षि के आश्रम में उन्होंने अपनी योग-निष्ठा और सामर्थ्य के अनुसार जितना हो सका उतना पाया। और भगवती तारा — जगदंबा महामाया महाविद्या तारा — की साधना से उन्होंने वहाँ संसार की शक्ति को धारण करने की लीला रची। वे कहते हैं कि इसकी जड़ में भगवान ने यह भी दिखाया कि यह नर और नारायण का अवतार है। नर और नारायण में, कृष्ण जी नारायण के अवतार हैं और अर्जुन जी नर के अवतार हैं। और नर का अवतार किसके अंश से लिया गया है? इंद्र के अंश से। वे कहते हैं, जब आप रहस्य में जाएँगे, तब पता चलेगा कि क्या और कैसे हो रहा है।
महर्षि वशिष्ठ और भगवती तारा का क्या प्रसंग है?
युग बदलने से पहले शुरू हुई साधना, जिससे सिद्धि नहीं मिली
वक्ता कहते हैं कि यह प्रसंग आता है कि सिद्धि न मिलने पर महर्षि वशिष्ठ ने भगवती तारा को शाप दिया। वशिष्ठ त्रेता के हैं या उससे भी पहले के — उनकी भगवती तारा की साधना एक युग के अंत और अगले युग की शुरुआत के बीच के संधि काल से कुछ पल पहले शुरू हुई थी। यह सुप्त प्रलय की अवस्था है जिसे हज़ार दिव्य वर्ष का कहा जाता है; वे कहते हैं कि यह गणना उन्हें याद नहीं आ रही, और इसके लिए क्षमा माँगते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ, जब भगवान इस रूप में हैं और भगवती तारा की कृपा पाने के लिए अपना पूरा अभ्यास या तपस्या कर रहे हैं, तब यह विषय आता है: कि सिद्धि न मिलने के कारण महर्षि वशिष्ठ ने भगवती तारा को शाप दे दिया था। वे कहते हैं कि अगर श्रोता तारा माई के बारे में थोड़ा भी जानते हैं, तो उन्हें पता होगा कि महर्षि वशिष्ठ त्रेता युग के हैं, या त्रेता से भी पहले के समय के। एक युग के समाप्त होने और अगले के शुरू होने के बीच का संधि काल — सुप्त प्रलय की अवस्था, जिसे हम हज़ार दिव्य वर्ष कहते हैं; वे कहते हैं कि यह गणना उन्हें याद नहीं आ रही और इसके लिए क्षमा माँगते हैं — उस काल के शुरू होने से कुछ पल पहले भगवती तारा के लिए उनकी साधना और आराधना शुरू हुई। वे कहते हैं कि युग पर युग बीत गए, और उन्हें भगवती की कृपा नहीं मिली।
वशिष्ठ ने क्या शाप दिया, और भगवती ने क्या उत्तर दिया?
सिद्धि न होने का शाप, और यह उत्तर कि मार्ग गलत था
वक्ता कहते हैं कि जब जगदंबा भगवती महाविद्या तारा की सिद्धि नहीं मिली, तो वशिष्ठ मुनि ने उन्हें शाप दिया: जाओ, तुम भी किसी को सिद्ध नहीं होगी। तब भगवती प्रकट हुईं और बोलीं कि उन्होंने यह गलत तरीके से किया है — इस तरह नहीं होगा, हमें इस मार्ग से नहीं पाया जा सकता।
वक्ता कहते हैं कि जब जगदंबा भगवती महाविद्या तारा की सिद्धि नहीं मिली, तो भगवान वशिष्ठ मुनि ने शाप दिया: जाओ, तुम भी किसी को सिद्ध नहीं होगी। तब भगवती प्रकट हुईं और बोलीं कि आपने यह गलत किया है। इस तरह नहीं होगा; इस मार्ग से हमें सिद्ध नहीं किया जा सकता। तो किस मार्ग से, वे पूछते हैं — और कहते हैं कि यहाँ एक और विषय आता है, जिस पर बहुत से लोगों को परेशानी होती है। यह भगवान बुद्ध के माध्यम से आता है।
बुद्ध अवतार, कलिकाल में जन्मे सिद्धार्थ गौतम से बिल्कुल अलग रूप और अलग विषय है
बुद्ध अवतार, सिद्धार्थ गौतम से अलग विषय
वक्ता कहते हैं कि कलिकाल में जन्मे सिद्धार्थ गौतम की पूरी बात, और यह धारणा कि यही बुद्ध ही बुद्ध हैं, बिल्कुल अलग है। बुद्ध अवतार का विषय बिल्कुल अलग है, बुद्ध का रूप बिल्कुल अलग है, पूरी बात अलग है, और इस पर एक पूरा अलग प्रोपेगेंडा चलाया गया है।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ भगवान बुद्ध इस बात में आते हैं। कलिकाल में जन्मे सिद्धार्थ गौतम का पूरा विषय, और यह धारणा कि यही बुद्ध बुद्ध हैं — वे कहते हैं कि बुद्ध अवतार का विषय भी बिल्कुल अलग है। बुद्ध का रूप भी बिल्कुल अलग है; पूरा विषय अलग है, और इस पर एक पूरा अलग प्रोपेगेंडा चल रहा है।
भगवती तारा पर वशिष्ठ का शाप आखिर कैसे हटा?
तिब्बत में चीनाचार, और कृष्ण द्वारा शाप से मुक्ति
भगवती के निर्देश पर वशिष्ठ चीनाचार क्रम से तिब्बत क्षेत्र के उस स्थान पर गए जहाँ महाविद्या तारा की पहली उपस्थिति स्थापित थी, वहाँ उनका पूरा विषय और पद्धति सीखी, और वामामार्गी साधना से उनकी सिद्धि की। उनका दिया शाप तब कटा जब जगदंबा अपने हज़ारवें अंश से विंध्यवासिनी रूप में सुभद्रा बनकर प्रकट हुईं और वन में महाविद्या तारा के रूप में उपस्थित हुईं — और जब उस अवतार में श्री कृष्ण ने उनकी उपासना की, तो उन्होंने उन्हें शाप से मुक्त किया।
वक्ता कहते हैं कि भगवती का निर्देश पाकर महर्षि वशिष्ठ चीनाचार क्रम से तिब्बत क्षेत्र के उस स्थान पर गए जहाँ भगवती महाविद्या तारा की पहली उपस्थिति स्थापित हुई थी। वहाँ उन्होंने भगवती तारा का पूरा विषय सीखा, पूरी पद्धति सीखी, और वामाचार साधना से उनकी सिद्धि की। पर महर्षि वशिष्ठ ने जो शाप दिया था कि माँ भगवती सिद्ध नहीं होंगी — वह शाप कब कटा? जब जगदंबा अपने हज़ारवें अंश से, विंध्यवासिनी स्वरूप में, सुभद्रा के रूप में प्रकट हुईं। उस समय भगवती अरण्य में गईं और महाविद्या तारा के रूप में उपस्थित हुईं, और जब उस अवतार में भगवान श्री कृष्ण ने भगवती महाविद्या की उपासना की, तो उन्होंने उन्हें शाप से मुक्त किया।
महाविद्या तारा की साधना में किसका शाप विमोचन किया जाता है?
वशिष्ठ और श्री कृष्ण का उत्कीलन और शाप विमोचन
वक्ता कहते हैं कि जब महाविद्या तारा का शाप मोचन होता है, तो केवल महर्षि वशिष्ठ का शाप ही नहीं हटाया जाता। जब आप तीन रूपों — नील सरस्वती, एकजटा और उग्र तारा — की क्रम से साधना करते हैं और उन रूपों के भेदों में जाते हैं, तो जैसे गायत्री शाप विमोचन होता है, या सप्तशती पढ़ने वाले ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र का शाप विमोचन और उत्कीलन करते हैं, वैसे ही यहाँ भगवान श्री कृष्ण के साथ महर्षि वशिष्ठ का उत्कीलन और शाप विमोचन आता है।
वक्ता कहते हैं कि जब भगवती महाविद्या तारा का शाप मोचन होता है, तो इसी कारण केवल महर्षि वशिष्ठ का शाप ही नहीं हटाया जाता। जब आप तीन रूपों — नीलसरस्वती, एकजटा और उग्रतारा — की क्रम से साधना करते हैं और उन रूपों के भेदों में जाते हैं, तो वहाँ यह आता है, ठीक वैसे ही जैसे आप गायत्री शाप विमोचन करते हैं, और जैसे सप्तशती करने वाले ब्रह्मा, वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि का शाप विमोचन और उत्कीलन आदि करते हैं। तो वे कहते हैं कि महाविद्या तारा के लिए महर्षि वशिष्ठ के साथ भगवान श्री कृष्ण के उत्कीलन और शाप विमोचन की बात आती है।
भगवान खुद उपासना क्यों करते हैं?
भगवान का उदाहरण रखना, और आपके भीतर के भगवान
लोग यह नहीं पचाएँगे कि कृष्ण को महाविद्या तारा की पूजा की ज़रूरत पड़ी — वे तो खुद भगवान हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि वे भगवान हैं, पर एक उदाहरण रख रहे हैं; आप भी भगवान हैं। अगर आपके भीतर के भगवान चले जाएँ, तो क्या आपका कुछ बचेगा? आप यह वाणी सुन पा रहे हैं क्योंकि वे भगवान आपके भीतर हैं, और आप उन्हीं के अंश हैं — आप भी शिव हैं, नारायण हैं, ब्रह्मा हैं; पर कहाँ और कैसे, यह देखिए और समझिए।
वक्ता कहते हैं कि अब लोग यह नहीं पचाएँगे: भगवान कृष्ण को भगवती महाविद्या तारा की उपासना करने की क्या ज़रूरत पड़ी, वे ऐसा क्यों करेंगे, वे तो खुद भगवान हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि वे भगवान हैं, पर एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आप भी भगवान हैं। अगर आपके भीतर के भगवान चले जाएँ, तो क्या आपका कुछ बचेगा? आप मेरी यह वाणी सुन पा रहे हैं क्योंकि वे भगवान आपके भीतर हैं; यह उन्हीं का अंश है। तो आप भी भगवान हैं। आप भी शिव हैं, आप खुद नारायण हैं, आप खुद ब्रह्मा हैं — पर कहाँ, और कैसे; देखिए और समझिए। नहीं, वे कहते हैं, लोग नहीं समझेंगे; ये विषय पूरी तरह हटा दिए गए हैं।
क्या बगलामुखी मंत्र ऐसे ही सबको बाँटना चाहिए?
भुने चने की तरह बाँटा गया मंत्र, बिना विनियोग या न्यास
वक्ता कहते हैं कि महाविद्याओं में आज भगवती बगलामुखी का रूप सबसे ज़्यादा चलता है, क्योंकि कहा जाता है कि वे शत्रु को मार देंगी, खत्म कर देंगी। मंत्र भुने चने की तरह बाँटा जाता है — सर्व दुष्ट वाली पंक्ति सबको पता है, पर किसी को इसका विनियोग, न्यास, अक्षरों का भेद, इसमें कौन सा बीज लगता है, भगवती किस आम्नाय में पूजी जाती हैं, कहाँ वे द्विभुजा, चतुर्भुजा या अष्टभुजा हैं — यह पता नहीं होगा।
वक्ता कहते हैं कि लोगों को भगवती महाविद्या तारा के बारे में जानना ही नहीं है। आठ महाविद्याओं में से आज के समय में जिस रूप का चलन सबसे ज़्यादा है, वह महाविद्या बगलामुखी हैं। लोग अभी-अभी माँ भगवती तारा की ओर भी खिंचने लगे हैं; उससे पहले सबसे पहले भगवती बगलामुखी ही थीं। क्यों? क्योंकि कहा जाता है कि वे शत्रु को मार देंगी, शत्रु को खत्म कर देंगी। वे कहते हैं कि मंत्र अब भुने चने की तरह बाँटा जाता है। सबको सर्व दुष्ट वाली पंक्ति दे दी गई है और सब उसे जानते हैं। पर उसे मंत्र का विनियोग पता नहीं होगा, न्यास पता नहीं होगा, अक्षरों का भेद पता नहीं होगा, इसमें कौन सा बीज (बीज मंत्र) लगाना है यह पता नहीं होगा। भगवती किस आम्नाय में पूजी जाती हैं, किसमें उन्हें क्या माना जाता है, किसमें उनका रूप कौन सा होता है, कहाँ वे द्विभुजा, कहाँ चतुर्भुजा, कहाँ अष्टभुजा हैं — इन पर, वे कहते हैं, ज़रा भी जानकारी नहीं होगी; कहो तो वे आपका मुँह बंद कर देंगे। पर मंत्र पता है, और यह पता है कि इस मंत्र से शत्रु का कलेजा फट जाएगा, और यह कि हमसे इस मंत्र की दीक्षा लो — इतना पता है।
श्री कृष्ण को कुरुक्षेत्र में उस महाविद्या की ज़रूरत क्यों पड़ी?
रणभूमि पर काल और स्थान का स्तंभन
वक्ता कहते हैं कि पूरे महाभारत काल में, जब कृष्ण ने स्वयं काल को स्तंभित कर दिया — ताकि केवल वे बोल रहे थे और केवल वही सुन रहा था — और जब उन्होंने कुरुक्षेत्र की रणभूमि के काल और स्थान को स्तंभित किया, तब वहाँ उस शक्ति, उस महाविद्या की ज़रूरत पड़ी।
वक्ता कहते हैं कि अगर इस पर चर्चा भी की जाए, तो फिर परेशानी होगी — नहीं, नहीं, यह कैसे हो सकता है, भगवान श्री कृष्ण ऐसा क्यों करेंगे। वे कहते हैं कि पूरे महाभारत काल में, जब उन्होंने स्वयं काल को स्तंभित कर दिया, ताकि भगवान कृष्ण जो कह रहे थे वह केवल वही एक सुन रहा था; और जब उन्होंने कुरुक्षेत्र की भूमि के काल और स्थान को स्तंभित किया — तो वहाँ उस शक्ति, उस महाविद्या की ज़रूरत पड़ी, है न।
रहस्यों को खोलने के लिए साधक को मूर्ति रहस्य और वैकृत रहस्य का स्वाध्याय ठीक से करना चाहिए
मूर्ति रहस्य और वैकृत रहस्य
वक्ता कहते हैं कि मूर्ति रहस्यम् पढ़िए और गहरे जाइए। रहस्यों को खोलिए, उन्हें आपस में जोड़िए। अगर आप साधक हैं, तो गहरे साधक बनिए, डुबकी लगाइए। मूर्ति रहस्य और वैकृत रहस्य का ठीक से, स्वाध्याय से अध्ययन कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि मूर्ति रहस्यम् पढ़िए, और उसमें गहरे जाइए। रहस्यों को खोलिए; उन्हें एक-दूसरे से जोड़िए। अगर आप साधक हैं, तो गहरे साधक बनिए; डुबकी लगाइए। जब आप मूर्ति रहस्य और वैकृत रहस्य पढ़ें, तो उनका ठीक से स्वाध्याय कीजिए।
प्रकृति ने खुद को तीन रूपों में कैसे बाँटा?
एक कल्प, जिसमें भगवती ने अपनी शक्तियाँ शिव को सौंप दीं
वक्ता कहते हैं कि भगवती प्रकृति ने जब खुद को प्रकट किया, तो खुद को तीन अलग रूपों में बाँट लिया। इसे तंत्र का भेद मानिए या कल्प का — अलग तंत्रों में अलग वर्णन हैं — पर सार यह है कि एक कल्प में भगवती ने भगवान शिव के संदर्भ में अपनी सब शक्तियाँ उन्हें सौंप दीं और खुद एक रूप में उनके नियंत्रण में आ गईं, अपने मूल स्वरूप में नहीं।
वक्ता कहते हैं कि भगवती प्रकृति ने जब खुद को प्रकट किया, तो खुद को तीन अलग रूपों में बाँट लिया। इसे तंत्र का भेद मानिए, कल्प का भेद मानिए — वे कहते हैं कि अलग-अलग तंत्रों में अलग-अलग वर्णन हैं, पर इसमें से एक सार निकालिए। तब पता चलेगा कि एक कल्प में, भगवान शिव के संदर्भ में, बात यह थी: भगवती ने अपनी सब शक्तियाँ भगवान शिव को सौंपकर खुद भी उनके नियंत्रण में आ गईं — एक रूप में, मूल स्वरूप में नहीं; एक रूप में वे उनके नियंत्रण में रहीं।
कौन सी शक्ति किस काम की अध्यक्ष है?
विभाग की प्रमुख वही शक्ति है
वक्ता कहते हैं कि जब महा नारायण, महा विष्णु इस तरह सृष्टि रचते हैं, तो जिस काम के लिए जो विभाग बना है, उस विभाग की प्रमुख वही शक्ति रहेगी। अगर स्तंभन की बात आती है, और अगर भगवती परब्रह्म परमेश्वरी ने किसी ऊर्जा की शक्ति से पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करने के लिए अपना एक रूप स्थापित किया, तो उद्देश्य यह है कि छोटे से बड़े हर काम के लिए आप खासकर उसी रूप का ध्यान करें।
वक्ता कहते हैं कि जब भगवान महा नारायण — महा विष्णु, जैसे चाहें मानिए — इस तरह सृष्टि रच रहे हैं और पूरा काम चला रहे हैं, तो जिस उद्देश्य के लिए जो विभाग बनाया गया है, उस विभाग की प्रमुख वही शक्ति होगी। अगर स्तंभन से जुड़ा कोई विषय आ रहा है, तो अगर वह विभाग किसी ऊर्जा की शक्ति से पूरे के पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करने के लिए बना है, या भगवती परब्रह्म परमेश्वरी ने वह रूप इसी के लिए स्थापित किया है, तो उसका उद्देश्य यह है: छोटे से बड़े हर काम के लिए आप खासकर उसी रूप का ध्यान करेंगे।
भगवान भगवती पीतांबरा की शरण इसीलिए लेते हैं क्योंकि वह रूप स्तंभन की शक्ति है
स्तंभन की शक्ति के रूप में भगवती पीतांबरा
वक्ता कहते हैं कि माँ का वह रूप भगवती पीतांबरा हैं — और ठीक इसी उद्देश्य के लिए भगवान उस रूप की शरण लेते हैं।
वक्ता कहते हैं कि माई का वह रूप भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। का रूप है। ठीक इसी उद्देश्य के लिए भगवान उस रूप का आश्रय ले रहे हैं।
बृहस्पति का कुंभ के बारह साल के चक्र से क्या संबंध है?
बृहस्पति का परिक्रमण और कुंभ का समय
वक्ता कहते हैं कि जब महाकुंभ पर चर्चा हुई थी, तब यह विषय आया था: कुंभ बृहस्पति के पूरे परिक्रमण से तय होता है। बृहस्पति ग्रह की सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा बारह साल में पूरी होती है, और बारह साल बाद कुंभ पड़ता है।
बृहस्पति की धुरी की स्थिरता कहाँ से आती है?
केंद्र और स्थिरता पीतांबरा से है
उन बारह सालों में अपनी धुरी पर घूमते हुए और सूर्य को केंद्र मानकर उसके चारों ओर घूमते हुए जो त्रिज्या बनी है, जिस गति, जिस दूरी और जिस धुरी पर वह स्थिर रहकर घूमता है — वक्ता कहते हैं कि उसे स्थिर रखने वाला सामर्थ्य भगवती पीतांबरा से है। केंद्र उनका है, स्थिरता उनकी है, और जिस धुरी को वे बनाए रखते हैं वह उन्हीं की शक्ति से बनी रहती है।
वक्ता कहते हैं कि उन बारह सालों में अपनी धुरी पर घूमते हुए और सूर्य को अपना केंद्र मानकर उसके चारों ओर घूमते हुए, जो बनता है वह एक तरह से एक त्रिज्या है — किस गति से, किस दूरी पर, और किस धुरी पर वह पूरा स्थिर रहकर घूमता है। वे पूछते हैं, उसे स्थिर रखने वाला सामर्थ्य कहाँ से आता है? वह भगवती पीतांबरा से है। केंद्र और स्थिरता भगवती पीतांबरा से है। जो गति और धुरी वे बनाए हुए हैं, वह भगवती पीतांबरा की शक्ति से बनाए हुए हैं।
बृहस्पति आकाशीय उपद्रवों को अपनी ओर क्यों खींचते हैं?
पीतांबरा की सबसे ऊर्जावान शक्ति बृहस्पति में है
वक्ता कहते हैं कि भगवती पीतांबरा की सबसे ऊर्जा से भरी शक्ति भगवान बृहस्पति देव में है। उसी शक्ति, उस स्तंभन शक्ति के कारण, पृथ्वी पर आने वाले जो भी आकाशीय उपद्रव होते हैं, बृहस्पति उन्हें अपनी ओर खींच लेते हैं — खींचकर स्तंभित कर देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवती पीतांबरा की सबसे ऊर्जा से भरी शक्ति भगवान बृहस्पति देव में है। उसी शक्ति, उस स्तंभन शक्ति के कारण, पृथ्वी पर आने वाले जो भी आकाशीय उपद्रव होते हैं, भगवान बृहस्पति देव उन्हें अपनी ओर आकर्षित करते हैं — खींच लेते हैं, और उन्हें स्तंभित कर देते हैं।
सिद्ध परंपराओं में बृहस्पति के कितने रूप माने जाते हैं?
अठारह महाविद्याओं से मेल खाते अठारह रूप
किसी भी ज्योतिषीय गणना में जब कहा जाता है कि कोई आकाशीय उपद्रव होने वाला है, तो गोचर में सबसे पहले भगवान बृहस्पति देव की स्थिति देखी जाती है। उनके बारह रूप हैं; तंत्र में अठारह हैं। सिद्ध परंपराओं में बृहस्पति ग्रह के अठारह रूप माने जाते हैं, जो तंत्र भेद की अठारह महाविद्याओं से मेल खाते हैं — दस महाविद्याएँ हम सब जानते हैं, पर तंत्र भेद से अठारह हैं, त्वरिता, ज्वाला मालिनी और भगवती के दूसरे रूप भी महाविद्याओं में आते हैं — और इनमें से हर रूप के साथ एक महा बृहस्पति पूजे जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ, जब भी किसी ज्योतिषीय गणना में कहा जाता है कि किसी तरह के आकाशीय नक्षत्र उपद्रव होने वाले हैं, तो गोचर आदि में सबसे पहले भगवान बृहस्पति देव की स्थिति देखी जाती है, और खासकर जो उनसे जुड़ा है। उनके भी बारह रूप हैं; तंत्र में अठारह रूप हैं। अगर आप तंत्र में जाएँ, तो सिद्ध परंपराओं में भगवान बृहस्पति देव के इस ग्रह के अठारह रूप माने जाते हैं। और ये अठारह रूप कैसे माने जाते हैं? उन अठारह महाविद्या के रूप में जिनकी बात की जाती है। वे कहते हैं कि दस महाविद्याएँ हम सब जानते हैं, पर तंत्र भेद से अठारह महाविद्याएँ हैं — त्वरिता, और भगवती का दूसरा रूप ज्वाला मालिनी आदि, सब महाविद्याओं में आते हैं। उन सब रूपों के साथ एक-एक महा बृहस्पति पूजे जाते हैं।
पृथ्वी के क्षेत्र में आने वाले उपद्रवों को रोकने के लिए कौन से दो रूप मुख्य हैं?
पीतांबरा के साथ बृहस्पति, और तारा
वक्ता कहते हैं कि जब आप और भीतर जाकर ठीक से पता करेंगे, तो देखेंगे कि बाहर से पृथ्वी के आभामंडल में आने वाले उपद्रवों को रोकने के लिए दो रूप मुख्य हैं: भगवान बृहस्पति देव का, और उसके साथ भगवती का रूप — भगवती पीतांबरा। और भी रूप हैं; भगवती तारा भी हैं, और तारा के साथ जाने वाला बृहस्पति का रूप पीतांबरा के साथ वाले रूप से अलग है।
वक्ता कहते हैं कि जब आप इसमें और आगे जाकर ठीक से पता करेंगे, तब पता चलेगा कि बाहर से पूरी सृष्टि में, यानी पृथ्वी के आभामंडल में, आने वाले उपद्रवों के निग्रह के लिए दो रूप मुख्य हैं। एक भगवान बृहस्पति देव का है, और उसके साथ भगवती का रूप। वहाँ भगवती पीतांबरा आएँगी। वे कहते हैं कि और भी रूप हैं। भगवती तारा भी हैं। भगवती तारा के साथ जाने वाला भगवान बृहस्पति देव का रूप अलग है, और भगवती पीतांबरा के साथ वाला फिर अलग है।
समाज ऐसे विषयों को कहानी की तरह लेता है, उनसे कुछ नहीं सीखता, और उन्हें भूल जाता है
समाज इन्हें कहानी की तरह सुनता है और भूल जाता है
वक्ता कहते हैं कि ऐसे बहुत से विषय हैं, पर उन पर चर्चा क्यों करें, समाज को देने की क्या ज़रूरत है। समाज उन्हें कहानी की तरह लेगा, उनसे कुछ सीखने की कोशिश नहीं करेगा, सुनेगा और भूल जाएगा। और अगर कोई ऐसा विषय किसी के सामने रखता है, तो तुरंत बेतुकी बातें शुरू हो जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि ऐसे बहुत से विषय हैं, पर अगर इन पर चर्चा करें — क्यों करें, क्यों, समाज को देने की क्या ज़रूरत है? समाज इसे ऐसे लेगा मानो कोई कहानी हो। क्या वह इससे कुछ सीखने की कोशिश करेगा? नहीं करेगा। वह सुनेगा और भूल जाएगा, और पूछेगा कि हमें इससे क्या लेना। वे कहते हैं, बात यही है: अगर कोई ऐसा विषय किसी के सामने रखता है, तो तुरंत उसमें बेतुकी बातें आ जाती हैं। परेशानी यह है कि कहीं न कहीं आप अपनी चीज़ें खो रहे हैं, और उसी नुकसान के कारण आज यह हालत है — कि बहुत से दिव्य रूप देखकर भी आप नहीं जान पाएँगे कि यह देवता कौन हैं, इनका विषय क्या है, ये कैसे और क्या हैं।
जिन सिद्धों ने यह ज्ञान देने की कोशिश की, वे यह कहकर चुपचाप चले गए कि तुम्हारी पीढ़ियाँ भुगतेंगी
वे चुपचाप चले गए, यह कहकर कि तुम्हारी पीढ़ियाँ भुगतेंगी
वक्ता कहते हैं कि योग्यता की कमी के कारण, जानकार लोगों ने इसे देने की कोशिश ज़रूर की। अगर हम जैसे साधारण लोग इसे बड़े पैमाने पर झेलते हैं, तो सोचिए जो अपने समय में सिद्ध थे उन्हें इसे देने की कोशिश में क्या-क्या देखना पड़ा होगा — वे इसे क्यों सहते? उन्होंने कहा, जाओ, तुम्हारी पीढ़ियाँ भुगतेंगी, हमें क्या, और चुपचाप चले गए।
वक्ता कहते हैं कि योग्यता की कमी के कारण, जो जानते थे उन्होंने इसे देने की कोशिश ज़रूर की। वे कहते हैं कि हम छोटे, साधारण लोग हैं, और हम इसे बड़े पैमाने पर झेलते हैं — तो सोचिए जो सिद्ध हैं, जो अपने समय में सिद्ध थे, उन्हें इसे देने की कोशिश में क्या-क्या देखना पड़ा होगा। वे इसे क्यों सहते? जाओ, तुम्हारी पीढ़ियाँ भुगतेंगी, हमें क्या। वे इसे छोड़कर चुपचाप चले गए। वे कहते हैं कि जब कोई विषय या बात रखी जाती है, तो उसके पीछे कारण यह होता है कि उन बातों को सुनकर और समझकर उनसे जितना हो सके उतना लाभ लिया जाए।
घर पर बटुक भैरव की उपासना अब सब जानते और करते हैं, पर भैरव के कई और विषय इसके आगे हैं
घर पर बटुक भैरव अब सब जानते हैं
वक्ता कहते हैं कि भैरव जी का एक रूप है और घर पर बटुक भैरव जी की उपासना करनी चाहिए — इतना अब सब जान गए हैं, और सब इतना कर रहे हैं। पर इसके बाद भी बहुत से विषय हैं।
इन रूपों को लेकर भैरव जी के रूप पर आते हुए वक्ता कहते हैं कि इतना पता है: कि भैरव जी का एक रूप है, और घर पर बटुक भैरव जी की उपासना करनी चाहिए। इतना सब जान गए हैं। इतना सब कर रहे हैं। पर वे कहते हैं कि इसके बाद भी आगे बहुत से विषय हैं।
क्षेत्रपाल कौन हैं, और उनका भैरव से क्या संबंध है?
डीह, भूमिया महाराज और क्षेत्रपाल भैरव ही हैं
जो गाँवों में रहते हैं या गाँव की परंपराएँ जानते हैं, वे भगवान क्षेत्रपाल को, या डीह को, या भूमिया महाराज को जानते होंगे, उनके इलाके में जो भी नाम हो। वक्ता कहते हैं कि भगवान क्षेत्रपाल का रूप भैरव जी का ही है; हर जगह भैरव जी ही क्षेत्रपाल के रूप में स्थापित हैं। दूसरे लोक देवताओं और ब्रह्मा आदि को बाद में जगह दी गई, पर जड़ में वे भी क्षेत्रपाल के अधीन हैं — कोई लोक शक्ति क्षेत्रपाल नहीं हो सकती, और अगर हो, तो उसे अधिकार क्षेत्रपाल से, भैरव जी से लेना होगा।
वक्ता कहते हैं कि जो लोग अभी भी गाँवों में रहते हैं, या जो गाँवों से जुड़ी परंपराएँ जानते हैं, वे एक विषय जानते होंगे: भगवान क्षेत्रपाल का, या डीह का, या भूमिया महाराज का, आपके इलाके में उन्हें जिस भी नाम से पुकारा जाता हो। वे कहते हैं कि भगवान क्षेत्रपाल का रूप स्वयं भैरव जी का रूप है। हर जगह खासकर भैरव जी ही क्षेत्रपाल के रूप में स्थापित हैं। बाद में लोगों ने दूसरे लोक देवताओं और ब्रह्मा आदि को जगह दी; वह अलग बात है। पर जड़ में वे भी कहीं न कहीं क्षेत्रपाल के अधीन हैं। वे कहते हैं कि कोई लोक शक्ति क्षेत्रपाल नहीं हो सकती। अगर कोई हो, तो उसे अधिकार क्षेत्रपाल से, भैरव जी से लेना होगा; मुख्य शक्ति कोई और होगी।
जहाँ कोई लोक देवता रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं, क्या वहाँ जानकार भैरव पूजा छोड़ देता है?
क्षेत्रपाल के भीतर भैरव की पूजा हमेशा अलग से होती है
वक्ता कहते हैं, कभी नहीं। चाहे उस जगह के कोई लोक देवता क्षेत्रपाल के रूप में, रक्षक के रूप में पूजन ले रहे हों, जानकार आदमी भैरव की पूजा कभी नहीं छोड़ता; क्षेत्रपाल के भीतर वह भैरव जी का पूजन अलग से ज़रूर करेगा। क्योंकि वह जानता है कि जिस दिन कोई उग्र तांत्रिक उस तरह का प्रयोग करेगा, वे शक्तियाँ उसे कभी नहीं रोक पाएँगी।
वक्ता कहते हैं कि कहीं न कहीं जानकार आदमी — चाहे उस जगह के कोई लोक देवता क्षेत्रपाल के रूप में, रक्षक के रूप में पूजन ले रहे हों — भैरव की पूजा कभी नहीं छोड़ता। क्षेत्रपाल के भीतर वह भैरव जी का पूजन अलग से ज़रूर करेगा। क्योंकि यह पता है कि जिस दिन कोई उग्र तांत्रिक उस तरह का प्रयोग करेगा, ये शक्तियाँ उसे कभी नहीं रोक पाएँगी। तब वहाँ क्षेत्रपाल के मूल स्वरूप का, मूल देवता का पूजन अनिवार्य होगा।
जब कोई लाग काटी जाती है, तो विधि किसके नाम से होती है?
लाग काटना हमेशा भैरव के लिए होता है
वक्ता कहते हैं कि जब भी कोई लाग काटी जाती है, और ताकि काटने के बाद वह फिर से न घुसे, तो पूरी कार्यवाही कभी किसी लोक देवता के लिए नहीं होगी। वहाँ वह निश्चित रूप से और हमेशा भैरव जी के लिए ही होगी।
वक्ता कहते हैं कि जब भी कोई लाग काटी जाती है, और ताकि काटने के बाद वह फिर से न घुसे — तो वह पूरी कार्यवाही कभी किसी लोक देवता के लिए नहीं होगी। वहाँ वह निश्चित, निश्चित रूप से भैरव जी के लिए ही होगी।
कोई कस्बा या गाँव ऐसा नहीं जिसके पास श्मशान न हो, और श्मशान का अपना नियम है जिसके अनुसार उसका विधि-विधान होना चाहिए
श्मशान के अपने नियम हैं
वक्ता कहते हैं कि कहीं भी ऐसा कोई कस्बा या गाँव नहीं जिसके पास श्मशान न हो — श्मशान की बात हमेशा रहती है। पर श्मशान का अपना एक खास नियम है, और उसका पालन और विधि-विधान उसी नियम के अनुसार होना चाहिए, क्योंकि अगर कोई छेड़छाड़ हुई और आपको विधि-विधान पता नहीं है, तो परेशानी होगी।
वक्ता कहते हैं कि जब आप श्मशान क्षेत्र के विषय को देखते हैं, तो कहीं भी ऐसा कोई कस्बा या गाँव नहीं जिसके आसपास श्मशान न हो। श्मशान की बात हमेशा रहती है। पर श्मशान का अपना एक खास नियम है। उसका पालन और विधि-विधान उसी नियम के अनुसार होना चाहिए। क्योंकि अगर इसमें किसी तरह की छेड़छाड़ हुई, और आपको विधि-विधान पता नहीं है, तो परेशानी होगी।
श्मशान के मुख्य रूप कौन से हैं?
महाकाल, तारा, महाकाली, श्मशान काली और श्मशान भैरव
वक्ता कहते हैं कि वहाँ के मुख्य रूपों में भगवान महाकाल, भगवती तारा, भगवती महाकाली, भगवती श्मशान काली, और श्मशान से जुड़ी सब शक्तियाँ हैं। इनमें जिन्हें सबसे आगे कहा जाता है, वे हैं जिन्हें हम श्मशान भैरव कहते हैं — जिसका अर्थ बस इतना है: श्मशान के भैरव।
वक्ता कहते हैं कि श्मशान के मुख्य रूपों में, चाहे भगवान महाकाल का हो, भगवती तारा का, भगवती महाकाली का, भगवती श्मशान काली का, या श्मशान से जुड़ी जो भी शक्तियाँ हों — इनमें जिन्हें सबसे आगे कहा जाता है, वे हैं जिन्हें हम श्मशान भैरव कहते हैं। श्मशान भैरव का अर्थ बस इतना है कि वे श्मशान के भैरव बन गए हैं।
श्मशान भैरव रूप की उत्पत्ति का वर्णन कहाँ है, और आज उनकी पूजा कौन कर सकता है?
कालिका पुराण का वर्णन, और गृहस्थ के लिए सात्विक विकल्प
वक्ता कहते हैं कि श्मशान भैरवों का मुख्य और मूल रूप वही है जिसका नाम हम प्रमाण के साथ ले सकते हैं, क्योंकि पुराणों में उसका वर्णन है। शिव महापुराण की जो कथाएँ उन्होंने सुनी हैं, उनमें यह विषय आता है कि युद्ध के समय श्मशान भैरव ज़रूर आए, और भैरवों के कई रूप भगवान शिव की ओर से लड़ने आए। पर कालिका पुराण में बहुत विस्तार से वर्णन है कि भगवान का श्मशान भैरव रूप कैसे उत्पन्न हुआ और उसका उद्देश्य क्या है। आज इस रूप का पूजन कुल परंपराओं में बचे तांत्रिक परंपरा के आचार्यों तक सीमित है — और यह ठीक भी है — पर साधारण साधकों को दिव्य समयों पर अपनी क्षमता के अनुसार सात्विक दक्षिणाचार विधि से भी इसका आवाहन और पूजन करना चाहिए, ताकि हमारी रक्षा हो।
वक्ता कहते हैं कि श्मशान भैरवों में मुख्य और मूल रूप वही है जिसके बारे में हम प्रमाण के साथ बोल सकते हैं, क्योंकि पुराणों में भी उस रूप का वर्णन है। शिव महापुराण में, जो भी कथा उन्होंने सुनी है, उसमें यह विषय भी आया: कि युद्ध के समय श्मशान भैरव ज़रूर आए, और भैरवों के कई रूप भगवान शिव की ओर से युद्ध करने आए। पर वे कहते हैं कि कालिका पुराण में बहुत विस्तार से वर्णन है कि भगवान का श्मशान भैरव रूप किस तरह उत्पन्न हुआ, और उसका उद्देश्य क्या है। वे कहते हैं कि आज के समय में इस रूप का पूजन केवल और केवल उन तांत्रिक परंपरा के आचार्यों तक सीमित है जो कुल परंपराओं में बचे हैं — और यह ठीक भी है। पर साधारण साधकों को, जो उनके समय हैं, दिव्य कालों में, अपनी शक्ति और क्षमता के अनुसार, सात्विक दक्षिणाचार विधि से भी उस रूप का आवाहन और पूजन करना चाहिए, ताकि हमारी रक्षा हो सके।
क्या श्मशान भैरव और महाभैरव एक ही हैं?
महाकाल भैरव और महाभैरव, और मंत्रराज
वक्ता कहते हैं कि भगवान के श्मशान भैरव रूप को ही महाभैरव रूप कहा जाता है — महाकाल भैरव, महाभैरव। तंत्र भेद से दोनों रूप अलग ज़रूर हैं, पर मूल स्वरूप में बहुत समानताएँ हैं, और दोनों में से हर एक का मंत्र मंत्रराज कहलाता है।
वक्ता कहते हैं कि भगवान के श्मशान भैरव रूप को ही महाभैरव रूप कहा जाता है। महाकाल भैरव, महाभैरव। तंत्र भेद से, अगर इसमें जाएँ, तो दोनों रूप अलग ज़रूर हैं; पर मूल स्वरूप में बहुत सारी समानताएँ हैं। और दोनों में से हर एक का जो अपना मंत्र है, उसे मंत्रराज कहा जाता है।
मंत्रराज का क्या अर्थ है, और किसे राजराजेश्वरी कहा जा सकता है?
हर मंत्र मंत्रराज नहीं, हर देवी राजराजेश्वरी नहीं
वक्ता कहते हैं कि हर मंत्र को मंत्रराज नहीं कहा जाता, और हर देवी को राजराजेश्वरी नहीं कहा जा सकता। लोग लोक देवियों के आगे भी, श्मशान की शक्तियों के आगे भी राजराजेश्वरी लिख देते हैं। जब भगवती या भगवान के किसी रूप को कोई खास शब्द दिया गया है, तो उसके पीछे कारण है।
वक्ता कहते हैं कि आज की लाइव में यह भी समझिए कि मंत्रराज का क्या अर्थ है। हर मंत्र को मंत्रराज नहीं कहा जाता। हर देवी को राजराजेश्वरी नहीं कहा जा सकता। लोग लोक देवियों के आगे भी राजराजेश्वरी लिख देते हैं। श्मशान की शक्तियों के आगे भी राजराजेश्वरी लिख देते हैं। वे कहते हैं कि जब भगवती के किसी रूप या भगवान के किसी रूप को कोई खास शब्द से सजाया गया है, तो उसके पीछे कारण होता है।
क्या हर देवता को महादेव, क्षेत्रपाल या अंबा कहा जा सकता है?
उपाधियाँ जो यूँ ही नहीं लगाई जा सकतीं
वक्ता कहते हैं कि हम किसी को भी महादेव नहीं कह सकते; हर देवता को महादेव नहीं कहा जा सकता। महादेव, महादेव हैं। इसी तरह हम हर शक्ति को क्षेत्रपाल के रूप में पूजकर यह नहीं कह सकते कि हाँ, यह क्षेत्रपाल है। और अंबा, जो पूरे संसार की माँ हैं, सब देवियों के लिए नहीं कहा जा सकता।
वक्ता कहते हैं कि हम यूँ ही सबको महादेव नहीं कह सकते। सब देवताओं को महादेव नहीं कहा जा सकता। महादेव, महादेव हैं। इसी तरह हम हर शक्ति को क्षेत्रपाल के रूप में लेकर यह कहकर नहीं पूज सकते कि हाँ, यह क्षेत्रपाल है। और जो पूरे संसार की माँ हैं, अंबा, वह सब देवियों के लिए नहीं कहा जा सकता। वे कहते हैं कि जितने भी रूप प्रकट हुए हैं, उनकी एक जड़ है, और उस मूल स्वरूप के पूजन का भी अपना विषय है, जो उन्होंने पहले भी और आज की लाइव में भी स्पष्ट किया है, और उसके पीछे कारण है।
शांति और पौष्टिक कर्म में हमेशा किसका पूजन होता है?
पौष्टिक कर्म में भगवती रति
वक्ता कहते हैं कि अगर कभी तंत्र के विषय में किसी आचार्य द्वारा शांति या पौष्टिक कर्म किया जाता है, तो अगर आप केवल तंत्र ग्रंथों के वर्णन भी पढ़ें — परंपरा श्रुति को और अपनी कुल परंपरा के ज्ञान को छोड़ भी दें — तो देखेंगे कि पौष्टिक कर्म और शांति कर्म में भगवती रति का पूजन ज़रूर होता है।
वक्ता कहते हैं कि अगर कभी तंत्र के विषय में, किसी आचार्य द्वारा, शांति या पौष्टिक कर्म किया जाता है, तो देखिए वहाँ क्या लिखा है। अगर आप केवल तंत्र ग्रंथों के वर्णन भी पढ़ें — परंपरा श्रुति को छोड़ दीजिए, कुल परंपरा में जो बताया जा रहा है उसे और अपनी परंपरा का जितना ज्ञान आपको है उसे छोड़ दीजिए — तो लिखी हुई और प्रचलित सामग्री में भी आप देखेंगे कि पौष्टिक कर्म में, शांति कर्म में भगवती रति का पूजन ज़रूर होता है।
भगवती रति की जड़ कहाँ है?
रति को कामदेव की शक्ति माना जाता है, पर जड़ कामाख्या में है
वक्ता कहते हैं कि उनका मूल स्वरूप और उद्गम क्या है, इसे छोड़ दीजिए। आप भगवती रति को कामदेव की शक्ति के रूप में देखते हैं, उसी रूप में देखते हैं। पर भगवती रति की जड़ भगवती कामाख्या के पास है।
वक्ता कहते हैं कि अब यह सवाल भी छोड़ दीजिए कि भगवती रति का मूल स्वरूप और उद्गम क्या है। आप भगवती रति का विषय कहाँ देखते हैं? आप देखते हैं कि वे कामदेव की शक्ति हैं। आप उन्हें उसी रूप में देखते हैं। पर भगवती रति की जड़ कहाँ है? वह भगवान के पास, भगवती कामाख्या के पास है।
हर घर में कामाख्या की पूजा क्यों होनी चाहिए?
कामाख्या के बिना गृहस्थ जीवन संभव नहीं
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण पौष्टिक कर्म में या घर के शांति कर्म में हम इतना ज़ोर देते हैं कि हर घर में भगवती कामाख्या का पूजन ज़रूर हो। स्त्रियाँ करें; पुरुषों को ज़रूरत नहीं। यह ज़रूरी है, क्योंकि आपके घर का जीवन, गृहस्थ का जीवन, भगवती कामाख्या के बिना हो ही नहीं सकता।
वक्ता कहते हैं कि इसलिए कहीं न कहीं पौष्टिक कर्म में या घर के शांति कर्म में हम इसे इतनी मज़बूती से जोड़ते हैं: भैया, हर घर में भगवती कामाख्या का पूजन ज़रूर हो। स्त्रियाँ करें; पुरुषों को ज़रूरत नहीं। क्योंकि यह ज़रूरी है। आपका घर का जीवन, गृहस्थ का जीवन, भगवती कामाख्या के बिना हो ही नहीं सकता। वे कहते हैं, मत कीजिए; कहिए कि ऐसा नहीं है — यह आपकी परेशानी है, आपकी मूर्खता है, कि आप कहते हैं हम कामाख्या के बिना काम चला रहे हैं। कामाख्या के बिना आपका कोई जीवन ही नहीं है।
क्या कामाख्या केवल एक तांत्रिक देवी हैं?
उनकी कृपा के बिना आपकी माँ आपको जन्म नहीं दे पातीं
वक्ता कहते हैं कि अगर आपकी माँ के शरीर में भगवती कामाख्या की कृपा न होती, तो वे आपको जन्म ही नहीं दे पातीं। भगवती उस रूप में साफ़ उपस्थित हैं, और आप उन्हें यह कहकर हटा रहे हैं कि नहीं, कामाख्या तो तांत्रिक देवी हैं, हम कामाख्या माई की पूजा कैसे करें, उन्हें कैसे याद करें।
वक्ता कहते हैं कि अगर आपकी माँ के शरीर में भगवती कामाख्या की कृपा न होती, तो वे आपको जन्म ही नहीं दे पातीं। और भगवती उस रूप में साफ़ उपस्थित हैं, और आप उन्हें हटा रहे हैं — नहीं, नहीं, नहीं, कामाख्या तांत्रिक देवी हैं। हम कामाख्या माई की पूजा कैसे करें? उन्हें कैसे याद करें?
वक्ता रूपों के बीच भेद पर क्या सीमा रखते हैं?
द्वैत में रहते हुए भेद, पर सम्मान और स्मरण हमेशा
वक्ता कहते हैं कि सीमाएँ अपनी जगह हैं और उन्हें हमेशा याद रखना चाहिए। जब तक हम द्वैत अवस्था में हैं और अद्वैत की ओर बढ़ रहे हैं, तब तक रूप का भेद ज़रूर है; द्वैत अवस्था में भेद होता है, और यह ठीक है। पर रूपों का ज्ञान और उनका सम्मान ज़रूर होना चाहिए, स्मरण हमेशा रहना चाहिए, और उनका अपमान नहीं करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि सीमा अपनी जगह है, और हमें उसे हमेशा याद रखना चाहिए। जब तक हम द्वैत अवस्था में हैं, जब तक हम अद्वैत की ओर बढ़ रहे हैं, तब तक रूप का भेद ज़रूर है। द्वैत अवस्था में रहते हुए भेद होता है; यह ठीक है। पर रूपों के बारे में ज्ञान ज़रूर होना चाहिए, और उनका सम्मान भी। स्मरण हमेशा रहना चाहिए। उनका अपमान मत कीजिए।
जब संतान नहीं हो रही हो, तो क्या बताया गया है?
संतान गोपाल, और उससे संपुटित चंडी पाठ
वक्ता कहते हैं कि जब संतान प्राप्ति नहीं होती, तो इसके लिए सबसे तीव्र प्रयोग संतान गोपाल का माना जाता है। उस रूप को तांत्रिक, पौराणिक, शास्त्रोक्त, जैसे चाहें मानिए; उसका मंत्र उसके विधि-विधान के साथ लीजिए और उसका पूरा असर देखिए। वे कहते हैं कि भगवती विंध्यवासिनी और माँ षष्ठी के पास संतान गोपाल से संपुटित चंडी पाठ के कई अच्छे परिणाम देखे गए हैं।
वक्ता कहते हैं कि जब संतान प्राप्ति नहीं होती, जब किसी को संतान नहीं मिल रही, तो सब में से इसके लिए सबसे तीव्र प्रयोग संतान गोपाल का माना जाता है। उस रूप को — तांत्रिक रूप मानिए, पौराणिक रूप मानिए, शास्त्रोक्त रूप मानिए; उसका मंत्र पूरे विधि-विधान के साथ लीजिए, और उसका पूरा असर भी देखिए। वे कहते हैं कि उनकी अपनी जानकारी में भगवती विंध्यवासिनी और माँ षष्ठी माई के पास ऐसे कई प्रयोग किए गए हैं, और संतान गोपाल से संपुटित चंडी पाठ के बहुत अच्छे परिणाम देखे गए हैं। जहाँ लगता था कि कुछ नहीं होगा, वहाँ बहुत कुछ हुआ। इस पर उन्होंने पहले की एक लाइव में भी विस्तार से बात की है।
क्या भगवती का उपासक बाल कृष्ण की भी पूजा कर सकता है?
घर में हर देवता की मर्यादा
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि अगर आप भगवती की पूजा करते हैं तो भगवान बाल कृष्ण गोपाल की, संतान गोपाल की, लल्ला की पूजा नहीं कर सकते — बिल्कुल कर सकते हैं। पर ऐसा भी नहीं है कि अगर आप भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं तो भगवती कामाख्या को याद भी न करें। सबकी एक मर्यादा है; सबकी मर्यादा रखिए। घर में हर देवता की उपस्थिति होगी, और हर एक की अपनी मर्यादा है।
वक्ता कहते हैं कि उन रूपों का महत्व है; संतान गोपाल का महत्व है। ऐसा नहीं है कि अगर आप भगवती की पूजा करते हैं तो भगवान बाल कृष्ण गोपाल की पूजा नहीं कर सकते, संतान गोपाल की पूजा नहीं कर सकते, लल्ला की पूजा नहीं कर सकते। क्यों नहीं कर सकते? ज़रूर कर सकते हैं। पर ऐसा भी नहीं है कि अगर आप भगवान कृष्ण की पूजा कर रहे हैं तो भगवती कामाख्या को याद भी न करें। सबकी एक मर्यादा है; सबकी मर्यादा रखिए। अगर आप गृहस्थ हैं, तो घर में हर देवता की उपस्थिति होगी, और सबकी अपनी मर्यादा है। अपने इष्ट देवता के लिए प्रेम अटूट रहेगा; जब प्रेम अपने आराध्य के लिए हो, तो आपका सारा समर्पण उन्हीं के लिए होगा और आप हर रूप में उन्हीं का रूप देखेंगे। पर यह भेद तब तक रहेगा जब तक हम वह अवस्था नहीं पा लेते, और उसे पाने के बाद आपको बहस करने की ज़रूरत नहीं होगी — आप जानेंगे कि आप कितने सही हैं।
फ़ेसबुक के एक कमेंट थ्रेड में विंध्यवासिनी पर लगभग पचास चुनौती भरे सवालों का जवाब देने के बजाय बहस से मना कर दिया गया
जवाब देने के बजाय बहस से मना करना
वक्ता बताते हैं कि फ़ेसबुक पर उन्हें एक आदमी मिला जिसने कमेंट्स में लगभग पचास सवाल भर दिए — क्या आप जानते हैं भगवती विंध्यवासिनी कौन सी देवी हैं, वहाँ पूजा कौन लेता है, बलि कौन लेता है। वे कहते हैं कि उनका जवाब था: हम बड़े नहीं हैं सरकार, हम कुछ नहीं जानते, हम जानना भी नहीं चाहते; आप जानते हैं मालिक, आप दिव्य पुरुष हैं, सिद्ध पुरुष हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने वह बातचीत सँभालकर रखी है और ज़रूरत पड़ी तो सार्वजनिक करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि अगर आज कोई आकर कुछ कहे, तो — उन्हें एक बार ऐसा एक व्यक्ति मिला, फ़ेसबुक पर एक लटखोर महाशय, जिन्होंने लगातार कमेंट्स किए: क्या आप जानते हैं भगवती विंध्यवासिनी कौन सी देवी हैं, जिनकी आप इतनी पूजा करने जाते हैं, वहाँ पूजा कौन लेता है, वहाँ बलि कौन लेता है। लगभग पचास तरह के सवाल दागे गए। वे कहते हैं कि उनका जवाब था: हम बड़े नहीं हैं सरकार, हम कुछ नहीं जानते। हम जानना भी नहीं चाहते। आप जानते हैं मालिक; आप दिव्य पुरुष हैं, आप सिद्ध पुरुष हैं। और वे कहते हैं कि उन्होंने वह बातचीत आज तक सँभालकर रखी है, ताकि अगर कभी ज़रूरत पड़े तो उसे सार्वजनिक करें। पर वे पूछते हैं, क्या ऐसी बातों में पड़ने का कोई मतलब है? बस समय बर्बाद होता है, और कुछ नहीं। जिसका जो कर्म है वह अपना कर्म कर रहा है; वह उसमें संतुष्ट है, खुश है, उसे डर नहीं कि वह क्या कर रहा है और उससे क्या होगा — तो हम उसमें क्यों पड़ें। जाओ, तुम करो, तुम भुगतो।
अपने आराध्य से प्रेम करते हुए दूसरे देवताओं के बारे में क्या नियम है?
आराध्य से प्रेम, पर दूसरे रूपों का अपमान नहीं
वक्ता कहते हैं कि अपने आराध्य के लिए जो प्रेम होना चाहिए, वह अलग विषय है, पर हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हम दूसरे रूपों का अपमान न करें।
वक्ता कहते हैं कि यह विषय — अपने आराध्य के प्रति जो प्रेम होना चाहिए — एक अलग बात है। पर यह भी ध्यान रखने की बात है कि हमें दूसरे रूपों का अपमान नहीं करना चाहिए।
हनुमान जी की पूजा किन उद्देश्यों के लिए की जाती है?
ब्रह्मचर्य, शक्ति, शत्रु नाश और जल्दी सिद्धि
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए, शक्ति और सामर्थ्य के लिए, शत्रुओं के नाश के लिए, और दिव्य सिद्धियाँ जल्दी पाने के लिए — इनके लिए भगवान हनुमान जी के पूजन का महत्व है।
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। की रक्षा के लिए; शक्ति और सामर्थ्य के लिए; शत्रुओं के नाश के लिए; इसलिए कि दिव्य सिद्धियाँ जल्दी मिलें — इनके लिए भगवान हनुमान जी के पूजन का अपना महत्व है।
किन बाल स्वरूपों को भी याद करना चाहिए?
गणपति, हनुमान, राम, कृष्ण, बाला और कार्तिकेय के बाल रूप
वक्ता कहते हैं कि भगवान गणपति जी, भगवान हनुमान जी, भगवान श्री रामचंद्र जी महाराज, भगवान कृष्ण जी का बाल स्वरूप देखिए; भगवती बाला त्रिपुरसुंदरी को देखिए; भगवान कार्तिकेय का बाल स्वरूप देखिए। इनका भी स्मरण और पूजन आपको करना चाहिए — जब कोई खास ज़रूरत हो, तो आप इन सब बाल स्वरूपों का पूजन कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि बाल स्वरूप को देखिए — चाहे वह भगवान गणपति जी का बाल स्वरूप हो, भगवान हनुमान जी का, भगवान श्री रामचंद्र जी महाराज का, भगवान कृष्ण जी का। जो भगवती बाला त्रिपुरसुंदरी हैं — उनका रूप देखिए। ये सब रूप जो बाल स्वरूप में स्थित हैं; भगवान कार्तिकेय का बाल स्वरूप देखिए। इनका भी स्मरण और पूजन आपको करना चाहिए। वे कहते हैं कि उनका मतलब यह है कि जब कोई खास ज़रूरत हो, तो आप इन सब बाल स्वरूपों का पूजन ज़रूर कर सकते हैं।
गुजरात के एक साधक हर राम नवमी को राम जी के बाल स्वरूप की बहुत पुरानी पारिवारिक तस्वीर के सामने सहस्रार्चन करते हैं
गुजरात के एक साधक का राम नवमी सहस्रार्चन
वक्ता कहते हैं कि गुजरात के एक साधक के पास भगवान श्री रामचंद्र जी महाराज के बाल स्वरूप की एक बहुत पुरानी तस्वीर है — उन्हें लगता है शायद दादा जी के समय की, बिल्कुल पुरानी तस्वीर — और वे हर साल राम नवमी के दिन बाल राम जी का, राम जी महाराज की बाल छवि का सहस्रार्चन करते हैं। वे कहते हैं कि यह भाव आपके भीतर होना चाहिए; कीजिए, और इसे लेकर अपने भीतर कोई ग्रंथि बनाने की ज़रूरत नहीं है।
भगवती सीता पर आनंद रामायण की बात उस वैमनस्य को हटाने के लिए उठाई गई है जो एक देवता को बड़ा और दूसरे को छोटा दिखाता है
वह वैमनस्य जो अपने ही कुल देवता को छोटा दिखाता है
वक्ता कहते हैं कि वे आनंद रामायण में भगवती सीता के बारे में जो प्रचलित है वह इसलिए बता रहे हैं ताकि आपके भीतर पैदा किया गया वैर भाव हट जाए — यह भाव कि यह देवता बहुत बड़े हैं और वह छोटे, इनके पास यह है उनके पास नहीं, जिसके कारण आपके अपने घर के कुल देवी-देवता और आपके अपने आराध्य आपको छोटे लगने लगते हैं और आप अपना पूजन पाठ छोड़ देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि वे भगवती सीता के बारे में आनंद रामायण में प्रचलित बात बताते हैं, और समझाते हैं कि यह सब क्यों सामने रख रहे हैं। इसलिए कि आपके भीतर जो वैमनस्य भाव पैदा कर दिया गया है वह चला जाए — यह भाव कि ये देवता बहुत बड़े हैं, वे देवता छोटे हैं, इनके पास यह नहीं, उनके पास वह नहीं। इसके कारण आपके घर की कुलदेवी और कुल देवता आपको छोटे लगने लगते हैं; आपके अपने आराध्य छोटे लगने लगते हैं। वे कहते हैं, यह विकृति अपने मन से निकालिए, वरना आप अपना पूजन पाठ छोड़ देते हैं। आपकी यह सरलता, या आपकी मूर्खता, जो चाहे कहिए, यही आपको बर्बाद करेगी; और यह सब कहने वाला क्या भुगतेगा, यह भगवती जानती हैं, या जगदंबा जानती हैं कि वे यह क्यों करवा रही हैं।
त्रिपुर के तीन नगरों की रक्षा किससे होती थी?
त्रिपुर में रोज़ वेद पाठ, हवन और रुद्राभिषेक
वक्ता कहते हैं कि त्रिपुरासुर वध की कथा में — जिसका एक अध्याय चैनल पर पूरा किया गया — त्रिपुर के तीन लोकों में, तीन राक्षसों के यहाँ, हर एक दिन वेद पाठ और हर एक दिन हवन होता था। सब रोज़ रुद्री पाठ और रुद्राभिषेक करते थे, और जब तक वे यह करते रहे, वहाँ कुछ भी नहीं किया जा सका। भगवान विष्णु ने बहुत से भूत भेजे, और वे सब पहुँचते ही भस्म हो गए; वहाँ किसी में कुछ करने का सामर्थ्य नहीं था।
वक्ता कहते हैं कि जब आप त्रिपुरासुर के वध की, त्रिपुर के वध की कथा पढ़ेंगे, तो आपको यह वहाँ मिलेगा; यह चैनल पर भी प्रसारित हुई है, और उसका पूरा अध्याय किया गया था। त्रिपुर के तीन लोकों में, तीन राक्षसों के यहाँ, हर एक दिन वेद पाठ होता था। हर एक दिन हवन होता था। वे सब रोज़ रुद्री पाठ करते थे, रोज़ रुद्राभिषेक करते थे। जब तक ये लोग यह करते रहे, वहाँ कुछ भी नहीं किया जा सका। भगवान विष्णु जी ने बहुत से भूत भेजे — कथा याद कीजिए — और वे सब भूत जाते ही भस्म हो गए। वहाँ किसी में कुछ करने का सामर्थ्य नहीं था।
शास्त्र क्या कहता है
The Tripura demons' unbroken Vedic rites and worship of Śiva (liṅga-worship) made them invulnerable, so that when Viṣṇu sent thousands of weaponed bhūta-hosts against them, the bhūtas were instantly reduced to ash on entering the fiery radiance of Tripura's lord, and only a few fled back to Viṣṇu in terror.
The core narrative is stated plainly (v.35, "like moths in fire"). The specific ritual vocabulary ("Veda path," "havan," "Rudri path," daily "Rudrabhishek") is the speaker's own gloss; the verses speak more generally of vedadharma, śaṅkarārcanam and śucikṛtyāni (v.47).
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
इति सञ्चिन्त्य तत्काले विष्णुना प्रभविष्णुना । ततो यज्ञाः स्मृतास्तेन देवकार्यार्थमक्षयाः॥ २१
ऐसा विचार करके उस समय प्रभावशाली विष्णुने देवकार्यके लिये अक्षय यज्ञोंका स्मरण किया।
तद्विष्णुस्मृतिमात्रेण यज्ञास्ते तत्क्षणं द्रुतम् । आगतास्तत्र यत्रास्ते श्रीपतिः पुरुषोत्तमः॥ २२
विष्णुके उस स्मरणमात्रसे वे यज्ञ उसी क्षण शीघ्रतासे वहाँ आ गये, जहाँ श्रीपति पुरुषोत्तम विराजमान थे।
ततो विष्णुं यज्ञपतिं पुराणं पुरुषं हरिम् । प्रणम्य तुष्टुवुस्ते वै कृताञ्जलिपुटास्तदा॥ २३
तब यज्ञपति, पुराणपुरुष हरि विष्णुको प्रणाम करके उन्होंने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की।
भगवानपि तान्दृष्ट्वा यज्ञान्प्राह सनातनान् । सनातनस्तदा सेन्द्रान्देवानालोक्य चाच्युतः॥ २४
भगवान् भी उन्हें देखकर उन सनातन यज्ञोंसे बोले — सनातन अच्युत उस समय इन्द्रसहित देवताओंकी ओर देखते हुए।
अनेनैव सदा देवा यजध्वं परमेश्वरम् । पुरत्रयविनाशाय जगत्त्रयविभूतये॥ २५
हे देवगण! इसी यज्ञके द्वारा सदा परमेश्वरका पूजन करो — त्रिपुरके विनाशके लिये और त्रिलोकके ऐश्वर्यके लिये।
अच्युतस्य वचः श्रुत्वा देवदेवस्य धीमतः । प्रेम्णा ते प्रणतिं कृत्वा यज्ञेशं तेऽस्तुवन्सुराः॥ २६
बुद्धिमान् देवदेव अच्युतका वचन सुनकर देवताओंने प्रेमपूर्वक प्रणाम करके उन यज्ञेशकी स्तुति की।
एवं स्तुत्वा ततो देवा अयजन्यज्ञपूरुषम् । यज्ञोक्तेन विधानेन सम्पूर्णविधयो मुने॥ २७
हे मुने! इस प्रकार स्तुति करके देवताओंने विधिपूर्वक, यज्ञोक्त विधानसे उन यज्ञपुरुषका पूजन किया।
ततस्तस्माद्यज्ञकुण्डात्समुत्पेतुः सहस्रशः । भूतसङ्घा महाकायाः शूलशक्तिगदायुधाः॥ २८
तब उस यज्ञकुण्डसे सहस्रों की संख्यामें त्रिशूल, शक्ति और गदाधारी विशालकाय भूतगण प्रकट हुए।
ददृशुस्ते सुरास्तान् वै भूतसङ्घान् सहस्रशः । शूलशक्तिगदाहस्तान्दण्डचापशिलायुधान्॥ २९
देवताओंने उन सहस्रों भूतगणोंको देखा, जिनके हाथोंमें त्रिशूल, शक्ति और गदा थी तथा जो दण्ड, धनुष और शिलाओंसे सुसज्जित थे।
नानाप्रहरणोपेतान् नानावेषधराँस्तथा । कालाग्निरुद्रसदृशान्कालसूर्योपमाँस्तदा॥ ३०
वे नाना प्रकारके शस्त्रोंसे सुसज्जित तथा नाना रूप धारण किये हुए थे — कहीं कालाग्निरुद्रके समान तो कहीं प्रलयकालीन सूर्योंके समान जान पड़ते थे।
दृष्ट्वा तानब्रवीद्विष्णुः प्रणिपत्य पुरःस्थितान् । भूतान्यज्ञपतिः श्रीमान् रुद्राज्ञाप्रतिपालकः॥ ३१
उन प्रणतिपूर्वक सामने खड़े भूतोंको देखकर रुद्रकी आज्ञाका पालन करनेवाले श्रीमान् यज्ञपति विष्णुजी उनसे बोले।
भूताः शृणुत मद्वाक्यं देवकार्यार्थमुद्यताः । गच्छन्तु त्रिपुरं सद्यः सर्वे हि बलवत्तराः॥ ३२
हे भूतगण! मेरा वचन सुनो, तुम देवकार्यके लिये उद्यत हो; तुम सब अत्यन्त बलवान् हो, इसलिये तुरन्त त्रिपुर जाओ।
गत्वा दग्ध्वा च भित्त्वा च भङ्क्त्वा दैत्यपुरत्रयम् । पुनर्यथागता भूतागन्तुमर्हथ भूतये॥ ३३
तुम लोग जाकर उस दैत्यत्रिपुरको जलाकर, भेदकर और तोड़कर, हे भूतगण! जिस प्रकार आये हो उसी प्रकार अपने कल्याणके लिये पुनः लौट आना।
तच्छ्रुत्वा भगवद्वाक्यं ततो भूतगणाश्च ते । प्रणम्य देवदेवं तं ययुर्दैत्यपुरत्रयम्॥ ३४
भगवान्का वह वचन सुनकर वे भूतगण उन देवदेवको प्रणाम करके दैत्योंके त्रिपुरकी ओर चले गये।
गत्वा तत्प्रविशन्तश्च त्रिपुराधिपतेजसि । भस्मसादभवन्सद्यः शलभा इव पावके॥ ३५
वहाँ जाकर त्रिपुराधिपतिके तेजमें प्रवेश करते ही वे तुरन्त उसी प्रकार भस्म हो गये, जैसे पतंगे अग्निमें जल जाते हैं।
अवशिष्टाश्च ये केचित्पलायनपरायणाः । निस्सृत्यारं समायाता हरेर्निकटमाकुलाः॥ ३६
और जो कुछ थोड़े-से भूत बच गये, वे भागते हुए वहाँसे निकलकर व्याकुल होकर हरिके निकट आ गये।
तान्दृष्ट्वा स हरिः श्रुत्वा तच्च वृत्तमशेषतः । चिन्तयामास भगवान्मनसा पुरुषोत्तमः॥ ३७
उन्हें देखकर तथा वह सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनकर भगवान् पुरुषोत्तम हरि मनमें विचार करने लगे।
किं कृत्यमधुना कार्यमिति सन्तप्तमानसः । सन्तप्तानमरान्सर्वानाज्ञाय च सवासवान्॥ ३८
"अब क्या करना उचित है" — ऐसा सोचते हुए संतप्त मनवाले तथा इन्द्रसहित समस्त देवताओंको भी संतप्त जानकर...
कथं तेषां च दैत्यानां बलाद्धत्वा पुरत्रयम् । देवकार्यं करिष्यामीत्यासीच्चिन्तासमाकुलः॥ ३९
"उन दैत्योंके त्रिपुरको बलपूर्वक नष्ट करके मैं देवकार्य कैसे सम्पन्न करूँ" — इस प्रकार वे चिन्तासे व्याकुल हो गये।
नाशोऽभिचारतो नास्ति धर्मिष्ठानां न संशयः । इति प्राह स्वयं चेशः श्रुत्याचारप्रमाणकृत्॥ ४०
"धर्मात्माओंका अभिचारसे नाश नहीं होता, इसमें संशय नहीं" — श्रुति और आचारको ही प्रमाण माननेवाले स्वयं ईश-ने पहले यही कहा था।
दैत्याश्च ते हि धर्मिष्ठाःसर्वे त्रिपुरवासिनः । तस्मादवध्यतां प्राप्ता नान्यथासुरपुङ्गवाः॥ ४१
वे सम्पूर्ण त्रिपुरवासी दैत्य निश्चय ही धर्मात्मा हैं; इसीलिये वे असुरश्रेष्ठ अवध्यताको प्राप्त हुए हैं, अन्य किसी कारणसे नहीं।
कृत्वा तु सुमहत्पापं रुद्रमभ्यर्चयन्ति ते । मुच्यन्ते पातकैः सर्वैः पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ ४२
यदि वे कोई अत्यन्त बड़ा पाप भी कर बैठें, तो भी रुद्रका पूजन करनेसे वे उन समस्त पापोंसे उसी प्रकार मुक्त हो जाते हैं, जैसे कमलपत्र जलसे लिप्त नहीं होता।
रुद्राभ्यर्चनतो देवाः सर्वे कामा भवन्ति हि । नानोपभोगसम्पत्तिर्वश्यतां याति वै भुवि॥ ४३
हे देवगण! रुद्रके पूजनसे सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और पृथ्वीपर नाना प्रकारका भोग-वैभव वशमें आ जाता है।
तस्मात्तद्भोगिनो दैत्या लिङ्गार्चनपरायणाः । अनेकविधसम्पत्तेर्मोक्षस्यापि परत्र च॥ ४४
इसीलिये लिङ्गार्चनमें तत्पर वे दैत्य उस भोगके भोक्ता हैं, तथा अनेक प्रकारकी सम्पत्ति और परलोकमें मोक्ष भी पाते हैं।
ततः कृत्वा धर्मविघ्नं तेषामेवात्ममायया । दैत्यानां देवकार्यार्थं हरिष्ये त्रिपुरं क्षणात्॥ ४५
अतः अपनी ही मायासे उन दैत्योंके धर्ममें विघ्न डालकर देवकार्यके लिये मैं क्षणभरमें त्रिपुरका नाश कर दूँगा।
विचार्येत्थं ततस्तेषां भगवान्पुरुषोत्तमः । कर्तुं व्यवस्थितः पश्चाद्धर्मविघ्नं सुरारिणाम्॥ ४६
ऐसा विचार करके भगवान् पुरुषोत्तमने तत्पश्चात् उन देवताओंके शत्रु दैत्योंके धर्ममें विघ्न डालनेका निश्चय किया।
यावच्च वेदधर्मास्तु यावद्वै शङ्करार्चनम् । यावच्च शुचिकृत्यानि तावन्नाशो भवेन्न हि॥ ४७
जबतक वेदधर्म, शङ्करकी अर्चना और पवित्र कर्म बने रहेंगे, तबतक इनका नाश कदापि नहीं हो सकता।
त्रिपुर के खिलाफ़ कौन सी युक्ति लगाई गई, और मुंडी कौन हैं?
पहले भ्रष्ट करना, और उसके लिए भेजे गए मुंडी
वक्ता कहते हैं कि वहाँ एक युक्ति लगाई गई: पहले उन्हें भ्रष्ट किया गया, पहले उन्हें उनके पूजा पाठ से हटाया गया। मुंडियों को भेजा गया — और वे कहते हैं कि मुंडी आज फिर से उत्पन्न हो गए हैं, क्योंकि भगवान नारायण ने उन्हें वरदान दिया था कि कलिकाल में जाकर यह सब फैलाना।
वक्ता कहते हैं कि तो वहाँ एक युक्ति लगाई गई। पहले उन्हें भ्रष्ट किया गया। पहले उन्हें उनके पूजा पाठ से हटाया गया। मुंडियों को भेजा गया — अगर आपको मुंडी की कथा याद हो। और वे कहते हैं कि ये मुंडी आज भी उत्पन्न हो गए हैं। भगवान नारायण ने उन्हें वरदान दिया था न — कि कलिकाल में तुम जाकर यह सब फैलाना।
आज मुंडी क्या करते हैं?
आपको आपके मूल देवता और कुल देवी-देवता से हटाना
वक्ता कहते हैं कि ये वही मुंडी हैं जो आपको अपने पूजन पाठ से विरक्त कर रहे हैं, आपसे कह रहे हैं कि आपके देवता छोटे हैं, और किसी भी तरह आपको आपके मूल पूजन से, आपके मूल देवता से, घर और कुल के देवी-देवता से हटा रहे हैं। अगर आपके कुल देवता भगवान हनुमान जी हैं, अगर आपके कुल की देवी परमेश्वरी माता हैं, तो भैया, वही आपके लिए सब कुछ हैं, और उनकी इच्छा के खिलाफ़ आप कुछ नहीं पा सकते।
वक्ता कहते हैं कि ये वही मुंडी हैं जो आपको अपने पूजन पाठ से विमुख कर रहे हैं। वे आपसे कह रहे हैं कि आपके देवता छोटे हैं। किसी भी तरह वे आपको आपके मूल पूजन से, आपके मूल देवता से, घर और कुल के देवी-देवता से हटा रहे हैं। अगर आपके कुल के देवता भगवान हनुमान जी हैं, अगर आपके कुल की देवी परमेश्वरी माता हैं, तो भैया, वही आपके लिए सब कुछ हैं। वे कहते हैं कि उनकी इच्छा के खिलाफ़ आप कुछ भी नहीं पा सकते।
जगदंबा आपके सामने प्रकट होंगी तो सबसे पहले क्या देखेंगी?
आप अपने घर के देवताओं को किस हालत में रखते हैं
वक्ता कहते हैं कि जिस दिन जगदंबा आपके सामने प्रकट होंगी, वे सबसे पहले यह देखेंगी — बल्कि पहले ही देख चुकी होंगी — कि आपने अपने घर के देवी-देवता को किस हालत में रखा है। अगर आप कुल देवी का पूजन नहीं करते, कुल देवता को नहीं जानते, तो कम से कम उनके निमित्त कुछ तो करते। अगर आप उनके लिए कुछ भी नहीं करते, जानबूझकर उन्हें अनदेखा करते हैं — और कुछ लोग, वे कहते हैं, जानने के बाद भी नहीं जानते — तो वह पूरी सोच हटा दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि जिस दिन जगदंबा भी आपके सामने प्रकट होंगी, तो वहाँ सबसे पहले वे यह देखेंगी — और वे इसे पहले ही ज़रूर देख चुकी होंगी — कि भैया, आप अपने घर के देवी-देवता को किस हालत में रख रहे हैं? अगर आप कुल देवी का पूजन नहीं करते, अगर आप अपने कुल देवता को नहीं जानते, तो कम से कम उनके निमित्त कुछ तो करते। अगर आप उनके लिए कुछ भी नहीं करते, जानबूझकर उन्हें अनदेखा करते हैं — और वे कहते हैं कि कुछ लोग तो खासकर जान लेने के बाद भी नहीं जानते — तो वह सारी बात हटा दीजिए। यह सोच कि नहीं, ये हमारे देवता छोटे हैं, हम बड़े देवताओं की पूजा करेंगे; कि जो ज़्यादा प्रचलित है और जो अपनी शक्ति दिखाता है वही हमारा देवता है — इसे हटा दीजिए।
आनंद रामायण भद्रकाली और भगवती सीता के बारे में क्या कहती है?
सतानंद के वध के लिए सीता के केश-पाश से भद्रकाली का प्रकट होना
वक्ता कहते हैं कि आनंद रामायण के अनुसार सतानंद है — दशानन दस मुख वाला था, सतानंद वह है जिसे हज़ार मुखों वाला रावण कहा गया है; सहस्रानन, सतानंद, और फिर सतानंद छह मुखों वाला रावण होगा। उसके वध के लिए भगवती भद्रकाली प्रकट हुईं, और वहाँ उनके प्रकट होने का स्थान भगवती सीता का केश-पाश बताया गया है।
वक्ता कहते हैं कि आनंद रामायण के अनुसार सतानंद है। दशानन दस मुख वाला था; सतानंद वह है जिसे हज़ार मुखों वाला रावण कहा गया है। सहस्रानन, सतानंद — तो फिर सतानंद छह मुखों वाला रावण होगा। उसके वध के लिए भगवती भद्रकाली प्रकट हुईं। और वहाँ भद्रकाली के प्रकट होने का स्थान क्या बताया गया है? कि वे भगवती सीता के केश-पाश से प्रकट हुईं।
एक वक्ता ने भगवती सीता के रूप को उठाकर भगवती राधा जी में मिला दिया, और एक श्रोता ने वीडियो भेजकर बताया कि इससे उसका भाव डगमगा गया
एक वक्ता का सीता के रूप को राधा में मिलाना, और श्रोता की शंका
वक्ता कहते हैं कि एक व्यक्ति ने भगवती सीता को — जगदंबा के उस रूप को — प्रस्तुत करके उसे उठाकर भगवती राधा जी में मिला दिया, यह कहकर कि यह भगवती राधा जी का रूप है। एक श्रोता ने उन्हें पूरा वीडियो भेजा और कहा कि अब उसके मन में भाव उठ रहा है कि घर पर क्या करें; जो श्री रामचंद्र जी और सीता के भक्त हैं, जिनके कुल देवता स्वयं राम हैं, वे अब सोचते हैं कि उन्हें वह दूसरा रूप भी स्थापित करके पूजना चाहिए। वे उनसे कहते हैं कि आपकी बुद्धि को मुंडी भ्रमित कर रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि भगवती सीता के केश-पाश से भगवती प्रकट हुईं, और भगवती सीता जगदंबा का वही रूप हैं। और हमने देखा कि जिस एक व्यक्ति ने यह प्रस्तुत किया, उसने इसे उठाकर भगवती राधा जी में मिला दिया — क्यों? क्योंकि यह भगवती राधा जी का रूप है। वे कहते हैं कि अब यह पूरा विषय उन लोगों से जुड़ा है जो भगवान श्री रामचंद्र जी महाराज और भगवती सीता की सेवा-पूजा करते हैं, उनके भक्त साधक, जिनके कुल देवता ही भगवान श्री राम हैं और जिनके लिए माई सीता सब कुछ हैं। सवाल कहाँ से आया? किसी ने उन्हें पूरा वीडियो भेजा और कहा, भैया, अब मन में भाव उठ रहा है कि हमें घर में क्या करना चाहिए। उनके यहाँ सब पहले जैसा था, पर इतना सुनकर अब उन्हें लगता है कि उन्हें भगवती राधा की ओर मुड़ना चाहिए और वह रूप भी रखना और पूजना चाहिए, वह रूप स्थापित करना चाहिए। वे कहते हैं कि कहीं न कहीं आपकी बुद्धि को ये मुंडी भ्रमित कर रहे हैं।
क्या सीता, राधा और लक्ष्मी जड़ में एक ही हैं?
जड़ एक है — सीता, राधा, लक्ष्मी
वक्ता पूछते हैं कि आप यह क्यों नहीं सोच रहे कि जड़ एक ही है? चाहे भगवती सीता हों, या भगवती राधा, या भगवती लक्ष्मी — क्या वह एक ही नहीं है? वे नारायण की संगिनी हैं, उनकी शक्ति हैं। वे कहते हैं कि उन्हें समझ नहीं आता कि उस रूप का इस घुमावदार तरीके से गुणगान क्यों किया जा रहा है, और क्या साबित करने की कोशिश हो रही है।
वक्ता पूछते हैं कि आप कैसे — आप यह क्यों नहीं सोच रहे कि जड़ बिल्कुल एक ही है? चाहे भगवती सीता हों या भगवती राधा या भगवती लक्ष्मी, वह एक ही है न। वे नारायण की संगिनी हैं; वे उनकी शक्ति हैं। तो फिर यह आपके मन में कैसे आता है — क्योंकि उस रूप का ऐसे घुमावदार तरीके से गुणगान किया जा रहा है कि व्यक्ति कहीं न कहीं। और वे कहते हैं कि यह क्यों किया जा रहा है, हमें भी समझ नहीं आता। वे क्या साबित करना चाहते हैं, पता नहीं।
वृंदावन के पुराने और प्रसिद्ध संतों के वीडियो घुमा-फिराकर भगवान शिव का अपमान करते हैं, जबकि उसी परंपरा में रोज़ रुद्राभिषेक होता है
रोज़ रुद्राभिषेक करने वाली परंपरा से शिव का अप्रत्यक्ष अपमान
वक्ता कहते हैं कि उनके पास घर पर पूरा प्रमाण है: वृंदावन के बहुत पुराने और प्रसिद्ध संत हैं, जिनके पूर्वज भी शायद वहीं के थे, और उनके कई वीडियो हैं जिनमें घुमा-फिराकर, कुछ न कुछ कहकर भगवान शिव का अपमान किया जा रहा है। और अंदर की बात, वे कहते हैं, यह है कि उसी घर में, या उसी परंपरा में, रोज़ रुद्राभिषेक होता है; रुद्राभिषेक के बिना वे अन्न का एक दाना मुँह में नहीं डाल सकते — और वे स्वयं शिव जी के बारे में समाज में भ्रम फैला रहे हैं।
वक्ता कहते हैं कि उनके पास घर पर पूरा प्रमाण है। वृंदावन के बहुत पुराने और प्रसिद्ध संत हैं; उनके पूर्वज भी शायद वहीं के थे। वे कहते हैं कि उनके कई वीडियो हैं जिनमें घुमा-फिराकर भगवान शिव का अपमान किया जा रहा है, जिनमें बार-बार कुछ न कुछ कहा जा रहा है। वे कहते हैं कि यह अजीब स्थिति है — कि भगवान महादेव महादेव नहीं हैं, कि वे शिव हैं, शंकर हैं, कि ये उनके अपने रूप हैं; अजीब तरीके से किया गया। शास्त्रीय दृष्टि से यह पूछना ठीक है कि ग्यारह रुद्रों का रूप क्या है और भगवान शिव के दूसरे रूप क्या हैं, पर वे उस विषय पर चर्चा नहीं कर रहे; उसमें वे कह रहे हैं कि यह ऐसा नहीं है और वह ऐसा नहीं है। और अंदर की बात, वे कहते हैं, यह है कि उन्हीं लोगों के घर में, या कहिए उसी परंपरा में, रोज़ रुद्राभिषेक होता है। रुद्राभिषेक के बिना वे अन्न का एक दाना मुँह में नहीं डाल सकते। और वे स्वयं शिव जी के बारे में समाज में भ्रम फैला रहे हैं। यह आश्चर्य की बात है।
गृहस्थ के लिए रोज़ रुद्राभिषेक का क्या नियम है?
शिव को स्नान कराए बिना मुँह में अन्न नहीं; अँगूठा ही शिवलिंग
वक्ता कहते हैं कि गृहस्थ को रोज़ रुद्राभिषेक करने के बाद ही मुँह में अन्न डालना चाहिए — यानी भगवान शिव को स्नान और अभिषेक कराने के बाद ही; वरना अन्न नहीं जाना चाहिए। अगर आपके पास शिवलिंग नहीं है और पास में मंदिर नहीं है, पर पानी है, तो अँगूठे को ही शिवलिंग मानकर उनका अभिषेक कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने उन वक्ताओं को कहीं यह कहते नहीं देखा कि हाँ, एक रुद्र — यह गृहस्थ की बात है, जो श्रोता जानते होंगे। वे कहते हैं कि गृहस्थ को रोज़ रुद्राभिषेक करने के बाद ही, यानी भगवान शिव को स्नान और अभिषेक कराने के बाद ही, मुँह में अन्न डालना चाहिए। वरना अन्न नहीं जाना चाहिए। और अगर आपके पास शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। नहीं है, अगर आपके पास मंदिर नहीं है पर पानी है, तो अँगूठे को ही शिवलिंग मानकर उनका अभिषेक कीजिए और फिर आगे बढ़िए। वे कहते हैं कि कुंभ के समय हालत ऐसी थी कि शिवलिंग साथ ले जाना संभव नहीं था — इतनी भीड़ थी। तो तब कैसे किया गया? स्नान करके और पंद्रह-बीस मिनट में शरीर जितना कर सकता था वह सब करके, अँगूठे को ही शिवलिंग बनाया और बारह ज्योतिर्लिंग के नामों से जल्दी से कम से कम बारह बार अभिषेक किया। वे कहते हैं कि ऐसा होना चाहिए।
कुंभ में त्रिवेणी के बीच शिव जी का अभिषेक केवल शारीरिक शक्ति और योग शक्ति वाला सिद्ध पुरुष ही कर सकता है
त्रिवेणी पर या वाराणसी में रुद्री पाठ करता समर्थ साधक
कि हाँ, कुंभ में, प्रयाग जी में, त्रिवेणी जी के बीच हमने शिव जी का अभिषेक किया। और अगर आप में से किसी के शरीर में इतनी शक्ति है, वह योग शक्ति से संपन्न है, सिद्ध पुरुष है, और कुंभ या माघ के समय जाकर वहाँ अपने शिवलिंग के साथ बैठकर अभिषेक सहित पूरा रुद्री पाठ करता है, तो वह दिव्य है। जैसे सप्तर्षि आरती में, जहाँ वाराणसी क्षेत्र में भगवान शिव के सेवक हर हाल में रहते हैं, ठंड हो, गर्मी हो या बारिश — अगर हम ऐसी अवस्था पा चुके साधक होते और ऐसा करते, तो यह अद्भुत और दिव्य होता।
वक्ता कहते हैं, कि हाँ, कुंभ में, प्रयाग जी में, त्रिवेणी जी के बीच हमने शिव जी का अभिषेक किया। अगर शरीर में इतना सामर्थ्य है — अगर आप में से कोई योग शक्ति से संपन्न है, सिद्ध पुरुष है, और कुंभ या माघ के समय जाकर वहाँ अपने शिवलिंग के साथ बैठकर अभिषेक सहित पूरा रुद्री पाठ करता है — तो वह दिव्य है। वे कहते हैं, जैसे सप्तर्षि आरती में, जहाँ हालत कैसी भी हो, ठंड या गर्मी या बारिश, वाराणसी क्षेत्र में भगवान शिव के सेवक उसमें बने रहते हैं: अगर हम ऐसी अवस्था पा चुके साधक होते और यह करते, तो यह अद्भुत होता, दिव्य होता।
भगवती षष्ठी और भगवान भैरव जी को सार्वजनिक चर्चा से ठीक वहीं छोड़ दिया जाता है जहाँ देवता की सबसे ज़्यादा उपयोगिता है
षष्ठी और भैरव, सार्वजनिक चर्चा से बाहर
वक्ता कहते हैं कि इस विषय पर चर्चा नहीं होगी; यह बताया नहीं जाएगा। भगवती षष्ठी के बारे में कभी चर्चा नहीं होगी। भगवान भैरव जी के बारे में चर्चा नहीं होगी। जहाँ किसी देवता की उपयोगिता है, जहाँ किसी रूप की महानता है, उस पर कोई चर्चा नहीं होगी।
वक्ता कहते हैं कि इस विषय पर कोई चर्चा नहीं होगी। यह बताया नहीं जाएगा। भगवती षष्ठी के बारे में कभी कोई चर्चा नहीं होगी। भगवान भैरव जी के बारे में कोई चर्चा नहीं होगी। जहाँ किसी देवता की उपयोगिता है, जहाँ किसी रूप का महत्व है, उस पर कोई चर्चा नहीं होगी।
कालाष्टमी और काल भैरव, कृष्ण से उनका संबंध, और शक्ति पीठ के भैरव के रूप में जगन्नाथ — इन पर सार्वजनिक रूप से कभी बात नहीं होती
कालाष्टमी, काल भैरव, और शक्ति पीठ के भैरव के रूप में जगन्नाथ
कृष्ण पक्ष अष्टमी कालाष्टमी के रूप में और भगवान काल भैरव की उपस्थिति; काल भैरव रूप का भगवान कृष्ण से क्या संबंध है; भगवान श्री जगन्नाथ जी का काल भैरव जी से क्या विषय है; भगवान जगन्नाथ स्वामी दो जगह भैरव रूप में कैसे उपस्थित हैं; और जगन्नाथ स्वामी को ही उस शक्ति पीठ का भैरव क्यों कहा जाता है, वे भैरव कैसे बने — वक्ता कहते हैं कि इन पर कोई चर्चा नहीं होगी, क्योंकि अगर होगी तो लोगों का मन दूसरे रूपों की ओर जाएगा।
कृष्ण पक्ष अष्टमी कालाष्टमी के रूप में और भगवान काल भैरव की उपस्थिति; भगवान काल भैरव के रूप का, भैरव रूप का, भगवान कृष्ण जी से क्या संबंध है; भगवान श्री जगन्नाथ जी का भगवान काल भैरव जी से, भैरव जी से क्या विषय है; और भगवान जगन्नाथ स्वामी वहाँ दो जगह भैरव रूप में कैसे उपस्थित हैं। और जगन्नाथ स्वामी को ही उस शक्ति पीठ का भैरव क्यों कहा गया है — वे भैरव कैसे बने? वक्ता कहते हैं कि इस पर कोई चर्चा नहीं होगी। क्योंकि अगर इस पर चर्चा होगी, तो लोगों की बुद्धि दूसरे रूपों की ओर जाएगी।
देवताओं के बीच भेद दिखाने के बाद वक्ता को क्या करना चाहिए?
भेद दिखाइए, फिर श्रोता को उसके अपने आराध्य में फिर से स्थापित कीजिए
वक्ता कहते हैं कि आप अजीब वक्ता हैं, कि भेद पैदा करते हैं और फिर उसे मिटा नहीं पाते। वक्ता ऐसा होना चाहिए जो रूपों का भेद बताए, पर भेद के साथ हर साधक, हर जिज्ञासु, हर श्रोता को उसके अपने आराध्य के रूप में फिर से स्थापित करे, और उसके मन में कोई भ्रम न छोड़े। वे कहते हैं कि यह दिव्य गुण वक्ता के मन में, उसके सामर्थ्य में, उसकी वाणी में होना चाहिए — सामर्थ्य तो ज़रूर है, पर उसका दुरुपयोग क्यों हो रहा है, यह भगवती जानती हैं।
वक्ता कहते हैं कि आप अजीब वक्ता हैं, कि आप भेद पैदा करते हैं और फिर उस भेद को मिटा नहीं पाते। वक्ता ऐसा होना चाहिए जो रूपों का भेद बताए, पर भेद के साथ हर साधक, हर जिज्ञासु, हर श्रोता को उसके अपने आराध्य, जो भी हों, उनके रूप में फिर से स्थापित करे, और उसके मन में भ्रम न छोड़े। वे कहते हैं कि यह दिव्य गुण वक्ता के मन में, उसके सामर्थ्य में, उसकी वाणी में होना चाहिए। सामर्थ्य तो ज़रूर है; ऐसा बिल्कुल नहीं कि उसके भीतर सामर्थ्य नहीं है। पर सामर्थ्य का दुरुपयोग क्यों हो रहा है, यह भगवती जानती हैं।
हनुमान जयंती कितनी हैं, और क्या जयंती सही शब्द है?
तीन जयंतियाँ, एक विवाह वर्षगाँठ, और जयंती शब्द पर आपत्ति
वक्ता कहते हैं कि दो मुख्य पर्व आ रहे हैं। एक हनुमान जी की जयंती है — कल्प भेद से उनकी दो जयंतियाँ मुख्य रूप से मनाई जाती हैं, हालाँकि वास्तव में तीन हैं, और उनकी अपनी विवाह वर्षगाँठ भी है। वे कहते हैं कि अगर इन सब पर चर्चा हो तो अलग हंगामा शुरू हो जाएगा; जयंती शब्द पर ही हंगामा होगा, कि जयंती होती ही नहीं, जयंती मत कहो, यह शब्द मरे हुए व्यक्ति के लिए बोला जाता है।
वक्ता कहते हैं कि अब खासकर दो मुख्य पर्व आ रहे हैं। एक हनुमान जयंती है। कल्प भेद के अनुसार उनकी दो जयंतियाँ मुख्य रूप से मनाई जाती हैं; वास्तव में तीन जयंतियाँ हैं, और उनकी अपनी एक विवाह वर्षगाँठ भी है। वे कहते हैं कि अगर इन सब पर चर्चा हो, तो अलग हंगामा शुरू हो जाएगा — नहीं, आपने ऐसा कैसे कहा। पहले ही जयंती शब्द पर हंगामा शुरू हो जाएगा: कि जयंती होती ही नहीं, जयंती मत कहो, जयंती शब्द मरे हुए व्यक्ति के लिए बोला जाता है। वे कहते हैं कि अब यह सब चलेगा।
जयंती शब्द का वास्तव में क्या अर्थ है?
जयंती यानी विजय देने वाली; देवता जन्म नहीं लेते, प्रकट होते हैं
वक्ता कहते हैं कि इस पर कई बार पोस्ट की गई है: जयंती सही शब्द है। जयंती का अर्थ ही है विजय देने वाली; भगवती का एक जयंती रूप है। मरे हुए लोगों की कोई जयंती-वयंती नहीं होती — लोगों ने बाद में ऐसे लिखना शुरू किया। जयंती सही शब्द है; जन्मोत्सव नहीं, क्योंकि इन्होंने जन्म नहीं लिया, ये देव स्वरूप हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस पर कई बार पोस्ट की गई है: नहीं, जयंती सही शब्द है। जयंती का अर्थ ही है विजय देने वाली; भगवती का एक जयंती स्वरूप है। मरे हुए लोगों की कोई जयंती-वयंती नहीं होती; लोगों ने बाद में ही ऐसे लिखना शुरू किया। वे कहते हैं कि जयंती सही शब्द है। जन्मोत्सव लागू नहीं होता, क्योंकि इन्होंने जन्म नहीं लिया है। ये देव स्वरूप हैं।
क्या भगवान राम गर्भ से जन्मे थे?
चतुर्भुज रूप में प्रकट होना, फिर बालक बनना
वक्ता कहते हैं कि भगवान श्री रामचंद्र जी की स्तुति भए प्रगट कृपाला पढ़िए और पूछिए कि क्या भगवान ने जन्म लिया, क्या वे योनिज हैं, योनि से जन्मे हैं। नहीं; वे प्रकट हुए। वहाँ एक दिव्य प्रकाश आया, गर्भ में कुछ स्पर्श हुआ, और वे सामने चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए। तब माता कौशल्या ने कहा, नहीं, चतुर्भुज रूप छोड़कर बाल रूप में आइए — और वे बालक बन गए।
वक्ता कहते हैं कि भगवान श्री रामचंद्र जी की स्तुति भए प्रगट कृपाला पढ़िए, और देखिए कि क्या वहाँ भगवान ने जन्म लिया। अब यह समझिए — क्या भगवान योनिज हैं, क्या उन्होंने योनि से जन्म लिया है? उन्होंने जन्म नहीं लिया है; वे प्रकट हुए हैं। स्तुति कहती है: भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥ वे कहते हैं कि कहीं न कहीं वे प्रकट हुए हैं: वहाँ एक दिव्य प्रकाश आया, गर्भ में कुछ स्पर्श हुआ, और वे सामने चतुर्भुज स्वरूप में प्रकट हुए। वे कहते हैं कि राम नवमी अभी बीती है, और आप सबने भए प्रगट कृपाला का पाठ किया होगा; यूपी के लोग और बिहार के लोग तो ज़रूर राम नवमी पर यह स्तुति करते होंगे। वे कहते हैं कि इसमें माँ कौशल्या कहती हैं: नहीं, चतुर्भुज रूप छोड़कर बाल रूप में आइए। स्तुति कहती है: सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा — वे बाद में बालक बने, बालक के रूप में।
क्या कृष्ण और सुभद्रा साधारण मनुष्य की तरह जन्मे थे?
गर्भ में उपस्थिति, बिना जन्म और बिना प्रसव पीड़ा
वक्ता पूछते हैं कि क्या भगवान श्री कृष्ण ने साधारण आदमी की तरह जन्म लिया — आप सबने कृष्ण लीला देखी है; उन्होंने जन्म नहीं लिया। और भगवती सुभद्रा, उनकी बहन, क्या वे जन्मीं? गर्भ में उपस्थिति दिखाई और दर्शाई जाती है, और उनका प्रकट होना बहुत अलग बात है। वे गर्भ में आए, पर गर्भ से कोई पैदा नहीं हो रहा। वे कहते हैं कि यहाँ कहीं भी किसी शक्ति की माँ को प्रसव पीड़ा नहीं हुई।
वक्ता पूछते हैं कि क्या भगवान श्री कृष्ण ने साधारण मनुष्य की तरह जन्म लिया? आप सबने कृष्ण लीला देखी होगी; उन्होंने जन्म नहीं लिया। और भगवती जो उनकी बहन हैं, भगवती सुभद्रा — क्या वे जन्मीं? गर्भ में उपस्थिति दिखाई और दर्शाई जाती है, और उनका प्रकट होना उससे बहुत अलग है। वे कहते हैं कि वे गर्भ में आए, पर गर्भ से कोई पैदा नहीं हो रहा। कोई भी गीता या इससे जुड़ा कोई भी विषय पढ़िए — पार्वती गीता में, जहाँ भगवती के प्रकट होने की बात दी गई है, जगदंबा मैना के गर्भ से प्रकट हुईं। वे वहाँ गर्भ से प्रकट हुईं; वहाँ जन्मी नहीं। वहाँ भी उन्हें प्रसव पीड़ा नहीं हुई। यहाँ किसी भी शक्ति की किसी माँ को प्रसव पीड़ा नहीं हुई।
इस विषय में बहुत सी बातें ज़बरदस्ती घुसाई गई हैं, इसलिए प्रसव पीड़ा साबित करने में लगने के बजाय अपनी बुद्धि शुद्ध रखिए
बहस करने के बजाय अपनी बुद्धि शुद्ध रखना
वक्ता कहते हैं कि इस विषय में भी कई तरह की बातें ज़बरदस्ती घुसाई गई हैं, इसलिए इस पर चर्चा बेकार है। कम से कम अपनी बुद्धि शुद्ध रखिए। अब यह साबित करने में मत लगिए कि प्रसव पीड़ा हुई थी, कि ऐसा हुआ — उस दुर्बुद्धि में, वे कहते हैं, हम आपके साथ नहीं हो सकते। इन बातों से बाहर आइए और देवी रूपों की महानता को उसी के अनुसार साथ लेकर चलिए।
वक्ता कहते हैं कि इस विषय में भी कई तरह की बातें ज़बरदस्ती घुसाई गई हैं, इसलिए इस पर चर्चा बेकार है। कम से कम अपनी बुद्धि शुद्ध रखिए। अब यह साबित करने में मत लगिए कि नहीं, प्रसव पीड़ा हुई थी, कि ऐसा हुआ — उस दुर्बुद्धि में, वे कहते हैं, हम आपके साथ नहीं हो सकते। तो कृपया, वे कहते हैं, इन बातों से बाहर आइए। और देवी रूपों की महानता को, जैसी वह है उसके अनुसार, अपने साथ लेकर चलिए।
हनुमान जयंती पर हर सनातनी घर में क्या करना चाहिए?
पूर्णिमा पर हनुमान जी का ध्वज
वक्ता कहते हैं कि हनुमान जी की जयंती के दिन, खासकर पूर्णिमा के दिन, अगर आपने राम नवमी के दिन घर पर झंडा पूजन या ध्वज पूजन नहीं किया और ध्वज को उसका स्थान नहीं दिया, तो अब कीजिए। वे कहते हैं कि हर सनातनी के घर में भगवान हनुमान जी का ध्वज ज़रूर होना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि तो भगवान हनुमान जी की जयंती है। हनुमान जी की जयंती के दिन, खासकर पूर्णिमा के दिन, घर पर — और अगर राम नवमी के दिन आपने झंडा पूजन नहीं किया, ध्वज पूजन नहीं किया, ध्वज को उसका स्थान नहीं दिया — तो वे कहते हैं कि हर सनातनी के घर में भगवान हनुमान जी का ध्वज ज़रूर होना चाहिए। वे लखबीर सिंह लक्खा के गीत युग युग तेरे नाम का झंडा जग में लहराएगा का ज़िक्र करते हैं, जिसे वे बहुत अच्छा और बहुत प्रिय भजन कहते हैं, और उस पंक्ति का भी जिसमें लक्ष्मण जी को बाण लगने पर श्री राम रोते हैं।
अगर ध्वज गाड़ने के लिए ज़मीन न हो, तो उसे किस पर लगाना चाहिए?
बाँस और आम का पल्लव, स्टील की छड़ नहीं
वक्ता कहते हैं कि अगर आपकी ज़मीन झंडा गाड़ने लायक बड़ी नहीं है, तो उसे कहीं बाँध दीजिए — और बाँस ज़रूर लगाइए। लोग इसे छड़ में, स्टील में, लोहे में, छड़ में घुसा देते हैं; छड़ लगानी हो तो लगाइए, पर बाँस को उसी छड़ से बाँधिए। अगर बाँस बाज़ार से मिल सके या कहीं से कटवाया जा सके, तो झंडा कितना भी बड़ा हो, झंडा बाँस पर ही शुद्ध होगा। बाँस और आम का पल्लव ज़रूर होना चाहिए — आम का पल्लव ऊपर बाँधा जाए, नीचे बाँस, झंडा बाँस पर लगे और बाँस पर ही वहाँ खड़ा किया जाए।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप अपने घर पर ध्वज नहीं लगा रहे, अगर आपकी ज़मीन इतनी बड़ी नहीं कि झंडा गाड़ सकें, तो उसे कहीं बाँध दीजिए — और बाँस का उपयोग ज़रूर कीजिए। लोग इसे छड़ में, स्टील में, लोहे में, छड़ में घुसा देते हैं। वे कहते हैं, छड़ लगाइए, ठीक है, पर बाँस को उसी छड़ से बाँध दीजिए। अगर बाँस मिल सके, अगर बाज़ार से मिल सके, अगर कहीं से कटवाया जा सके, तो झंडा कितना भी बड़ा हो, झंडा बाँस पर ही शुद्ध होगा। बाँस और आम का पल्लव ज़रूर होना चाहिए। आम का पल्लव ऊपर बाँधिए और नीचे बाँस — यानी झंडा बाँस पर लगे, और उसे वहाँ बाँस पर ही खड़ा कीजिए।
बाँस पर जल चढ़ाने का क्या प्रभाव है?
गाय का खूँटा बाँस का, और उस पर जल से प्रसन्न होने वाले उपदेवता
वक्ता कहते हैं कि बाँस पर जल देने का बहुत दिव्य प्रभाव है, जो तंत्र क्षेत्र के लोग जानते होंगे। अगर गाय का खूँटा बाँस का हो, अगर हनुमान जी का ध्वज बाँस का हो — अगर गौवंश का, या भैंस का खूँटा बाँस का हो और वे उससे बँधे हों — तो तंत्र में, खासकर ग्रामीण भगत साधकों में, कई प्रयोग हैं जो इन्हीं पर पूरे होते हैं; और उपदेव श्रेणी की कुछ शक्तियाँ हैं, देव नहीं, उपदेव, जो बस इन पर जल चढ़ाने से ही प्रसन्न हो जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि बाँस पर जल देने का बहुत दिव्य प्रभाव है, जो तंत्र क्षेत्र के लोग जानते होंगे; और अगर नहीं जानते, तो अब जान लें। अगर गाय का खूँटा बाँस का हो, अगर हनुमान जी का ध्वज बाँस का हो; अगर गौ वंश का खूँटा बाँस का हो, और अगर भैंसें हों और उनका खूँटा बाँस का हो और वे उससे बँधी हों — तो तंत्र में कई प्रयोग हैं, खासकर ग्रामीण भगत वाले बहुत से, जो इन्हीं पर पूरे होते हैं। और उपदेवता श्रेणी की कुछ शक्तियाँ हैं — देव नहीं, उपदेव — जो बस इन पर जल चढ़ाने से ही प्रसन्न हो जाती हैं।
वंश वृद्धि की समस्या के लिए क्या बताया गया है?
पूजे जाने वाले बाँस पर रोज़ जल, पर भूत-प्रेत वाली जगह पर नहीं
वक्ता कहते हैं कि जिन्हें वंश वृद्धि की समस्या है, जिनका वंश नहीं बढ़ रहा, वे किसी पूजे जाने वाले बाँस के पेड़ पर जल चढ़ाएँ — भूत-प्रेत से जुड़ी किसी नई जगह पर जाकर नहीं, क्योंकि ऐसी जगहों पर बहुत सी ऐसी शक्तियाँ बैठी होती हैं जो कहीं और नहीं बैठतीं। अगर वह ऐसी पूज्य जगह है, या आपने हनुमान जी के ध्वज में बाँस लगाया है, तो वहाँ रोज़ जल चढ़ाने का बहुत सकारात्मक प्रभाव होता है; इसमें उस शाप को नष्ट करने का सामर्थ्य भी है, और यह वंश वृद्धि का प्रतीक है।
वक्ता कहते हैं कि खासकर एक बात और जान लीजिए। जिन्हें वंश वृद्धि की समस्या है, जिनका वंश नहीं बढ़ रहा — वे किसी ऐसे बाँस के पेड़ पर जल चढ़ाएँ जिसकी पूजा होती हो। भूत-प्रेत से जुड़ी किसी नई जगह पर जाकर नहीं, वे कहते हैं, क्योंकि उन जगहों पर ऐसी बहुत सी शक्तियाँ बैठी होती हैं, जो कहीं और नहीं बैठतीं। तो अगर वह ऐसी पूज्य जगह है, या आपने हनुमान जी के ध्वज में बाँस लगाया है, तो अगर आप वहाँ रोज़, हर दिन जल दें, तो इसका बहुत सकारात्मक प्रभाव होता है। वे कहते हैं कि कहीं न कहीं इसमें उस शाप को नष्ट करने का सामर्थ्य भी है; यह वंश वृद्धि का प्रतीक है। वे कहते हैं, इनका उपयोग कीजिए — और अगर आपने राम नवमी पर हनुमान जी का झंडा नहीं लगाया, तो पूर्णिमा के दिन ज़रूर लगाइए।
पूर्णिमा से एक दिन पहले क्या पड़ता है?
महाभैरव, श्मशान भैरव का दिन
वक्ता कहते हैं कि उससे एक दिन पहले उन भगवान महाभैरव, श्मशान भैरव का दिन है, जिनके अवतरण और रूप पर वे कालिका पुराण के संदर्भ में चर्चा कर रहे थे।
वक्ता कहते हैं कि उससे एक दिन पहले उनका दिन है जिनके बारे में कालिका पुराण के संदर्भ में सब चर्चा कर रहे थे — भगवान महाभैरव, श्मशान भैरव का अवतरण, और वह रूप। वह उनका दिन है। वे कहते हैं कि उसमें कालिका पुराण के अनुसार विषय है।
भगवान शरभ ने अवतार कब लिया?
नृसिंह अवतार के समय शरभ, और फिर वराह के सामने
वक्ता कहते हैं कि जब श्री हरि नारायण का वराह अवतार हुआ, तब भगवान शरभ ने वराह से युद्ध किया। कल्प भेद से शरभ के अवतार का एक अवसर नृसिंह रूप के समय था: जब नारायण नृसिंह रूप में उतरे, तो उनका क्रोध शांत करने के लिए भगवान सदाशिव को शरभ अवतार लेना पड़ा, और आकाश भैरव का रूप धारण करना पड़ा।
वक्ता कहते हैं कि वीडियो उस समय के बारे में है जब वराह अवतार हुआ, जब भगवान श्री हरि नारायण ने वराह अवतार लिया — क्योंकि वराह अवतार के साथ भगवान शरभ से युद्ध हुआ था। वे पूछते हैं, भगवान शरभ का अवतार कब हुआ; कल्प भेद के अनुसार उन्होंने ये कब लिए? एक नृसिंह रूप के समय था। जब भगवान नारायण नरसिंह रूप में उतरे, तब उनका क्रोध शांत करने के लिए भगवान सदाशिव को शरभ अवतार लेना पड़ा, और आकाश भैरव का रूप धारण करना पड़ा।
वैशाख की एक ही तिथि पर कौन सी चार जयंतियाँ पड़ती हैं?
एक ही तिथि पर नृसिंह, सर्वेश्वर, छिन्नमस्तिका और प्रत्यंगिरा
वक्ता कहते हैं कि वह कथा सबसे ज़्यादा प्रचलित है, और वह वैशाख महीने में पड़ती है — आने वाली तिथि पर, एक ही तिथि जिस पर नृसिंह जयंती, सर्वेश्वर जयंती, छिन्नमस्तिका जयंती और साथ में भगवान सर्वेश्वर की जयंती भी होगी, भगवती प्रत्यंगिरा के साथ। वे कहते हैं कि चार जयंतियाँ एक ही तिथि पर पड़ती हैं। वह तंत्र क्षेत्र में कुछ प्रचलित है।
वक्ता कहते हैं कि यह कथा सबसे ज़्यादा प्रचलित है — यह वैशाख मास में, उस तिथि पर पड़ती है जो अब आ रही है। एक ही तिथि पर नृसिंह जयंती होगी, सर्वेश्वर जयंती होगी, छिन्नमस्तिका जयंती होगी, और इनके साथ भगवान सर्वेश्वर की जयंती भी। वे कहते हैं कि भगवती महाप्रत्यंगिरा के साथ, चार जयंतियाँ एक ही तिथि पर पड़ती हैं। वे कहते हैं कि वह तंत्र क्षेत्र में कुछ प्रचलित है।
वराह, शरभ और कृष्ण को क्या जोड़ता है?
तीनों कामाख्या, सीता और जनक से जुड़े हैं
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात उस समय की है जब भगवान ने वराह रूप लिया। यह देखिए: भगवान वराह का रूप, भगवान शरभ का रूप और भगवान कृष्ण का रूप — ये तीनों भगवती कामाख्या से जुड़े हैं, भगवती सीता से जुड़े हैं, जनक राज से और राम जी और उन सब से जुड़े हैं।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात उस समय की है जब भगवान ने वराह रूप में अवतार लिया। और यह देखिए: भगवान वराह का रूप, भगवान शरभ का रूप, भगवान कृष्ण का रूप — ये तीनों बातें भगवती कामाख्या से जुड़ी हैं, भगवती सीता से जुड़ी हैं, जनक राज से और राम जी और उन सब से जुड़ी हैं।
कालिका पुराण से साफ़ होता है कि वराह, शरभ, भगवती जानकी और श्री कृष्ण सब कामाख्या क्षेत्र से कैसे जुड़े हैं
कालिका पुराण, और सही कुल में दीक्षा
वक्ता कहते हैं कि अगर आप इसे बेहतर जानना चाहते हैं, तो अपने ऊपर कृपा कीजिए और एक बार कालिका पुराण पढ़िए; सब साफ़ हो जाएगा कि वराह, शरभ, भगवती जानकी और श्री कृष्ण सब कामाख्या क्षेत्र से कैसे जुड़े हैं। और यह केवल कथन है — सब कुछ तब पता चलेगा जब भगवती कृपा करेंगी और आपकी दीक्षा किसी सही कुल में होगी। फिर जब आप कोई मंत्र सिद्ध करने जाएँगे, खासकर अपनी कुल परंपरा का, तब पता चलेगा; जैसे जब आप भगवती बगलामुखी के बारे में पढ़ते हैं और पाते हैं कि उनके कई मंत्रों के ऋषि नारद हैं।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप इसे बेहतर जानना चाहते हैं, तो अपने ऊपर कृपा कीजिए और एक बार कालिका पुराण पढ़िए। आपको सब पूरी तरह साफ़ हो जाएगा। कि भगवान वराह, शरभ, भगवती जानकी और भगवान श्री कृष्ण सब कामाख्या क्षेत्र से कैसे जुड़े हैं। और वे कहते हैं कि यह केवल एक कथन है। सब कुछ तब पता चलेगा जब भगवती कृपा करेंगी, और जब आपकी दीक्षा किसी सही कुल में होगी — तब यह पूरा विषय आपको और ज़्यादा स्पष्टता से पता चलेगा। जब आप कोई मंत्र सिद्ध करने जा रहे हों, खासकर अपनी कुल परंपरा का, या जब आप अध्ययन करें — जैसे जब आप भगवती बगलामुखी के बारे में पढ़ते हैं, और पाते हैं कि भगवती बगलामुखी के कई मंत्र ऐसे हैं जिनके ऋषि नारदएक देव-ऋषि, पौराणिक साहित्य में प्रायः प्रश्नकर्ता या श्रोता के रूप में उपस्थित। हैं। तो भगवान नारद जी ऋषि कैसे बने, वे पूछते हैं।
क्या हनुमान जी का विवाह उत्सव भी मनाया जाता है?
हनुमान जी का विवाहोत्सव और उससे जुड़े प्रयोग
हाँ — जैसा वक्ता ने भगवान हनुमान जी के बारे में अभी कहा, उनका विवाहोत्सव भी मनाया जाता है। और वे कहते हैं कि विवाहोत्सव से जुड़े बहुत सारे खास प्रयोग और विधि-विधान हैं।
वक्ता कहते हैं कि जैसे वे अभी भगवान हनुमान जी के बारे में चर्चा कर रहे थे, उन्होंने बताया था कि उनका विवाहोत्सव भी मनाया जाता है। और वे कहते हैं कि विवाहोत्सव के बहुत सारे खास प्रयोग और विधि-विधान भी हैं, जो होते हैं।
तंत्र क्षेत्र में महाकौल किसे कहा जाता है?
कृष्ण और हनुमान महाकौल, जैसे इंद्र आदि नित्य श्री विद्या उपासक
वक्ता कहते हैं कि अगर आप कौल मार्ग के बारे में कुछ भी जानते हैं, तो जानेंगे कि भगवान श्री कृष्ण को महाकौल कहा गया है, और भगवान श्री हनुमान जी भी महाकौलों में आते हैं। जैसे भगवती श्री विद्या के नित्य उपासकों में आप इंद्र देव, वरुण देव, कुबेर देव, महर्षि अगस्त्य मुनि और भगवती लोपामुद्रा को जानते होंगे, वैसे ही महाकौलों में, जो रोज़ भगवती के महा रूपों की उपासना करते हैं, वे भगवान श्री कृष्ण चंद्र जी महाराज और भगवान श्री हनुमान जी हैं।
वक्ता कहते हैं कि तंत्र के क्षेत्र में, अगर आप कौल मार्ग (कौल संप्रदाय) के बारे में थोड़ा भी जानते हैं, तो आप जानेंगे कि भगवान श्री कृष्ण को महाकौल कहा गया है। भगवान श्री हनुमान जी भी महाकौलों में आते हैं। जो भगवती श्री विद्या की उपासना करते हैं, जो नित्य उपासना करते हैं, उनमें आप इंद्र देव, वरुण देव देव, कुबेर देव, महर्षि अगस्त्य मुनि और भगवती लोपामुद्रा को जानते होंगे — कि ये वे हैं जो नित्य श्री विद्या उपासना करते हैं। इसी तरह महाकौलों में, जो रोज़ भगवती के महा रूपों की उपासना करते हैं, वे भगवान श्री कृष्ण चंद्र जी महाराज और भगवान श्री हनुमान जी हैं।
हनुमान जी ने किन रूपों की उपासना की, और अष्ट सिद्धि कैसे उत्पन्न होती है?
काली के श्मशान से जुड़े रूप, और विवाह क्यों ज़रूरी था
वक्ता कहते हैं कि भगवती काली के कुछ खास रूप हैं जो श्मशान से जुड़े हैं, और जब भगवान श्री हनुमान जी ने उन रूपों की उपासना की, तो उसी के लिए वह उत्पन्न हुआ जिसे अष्ट सिद्धि नव निधि कहा जाता है। वे कहते हैं कि सिद्धि का विषय इतना सरल नहीं है: जब आप भीतर और भीतर जाएँगे, तब पता चलेगा कि यहाँ हनुमान जी के लिए विवाह को ज़रूरी क्यों कहा गया।
वक्ता कहते हैं कि भगवती काली के कुछ खास रूप हैं, जो श्मशान से जुड़े हैं। जब भगवान श्री हनुमान जी ने उन रूपों की उपासना की, तब उसी के लिए वह उत्पन्न हुआ जिसे अष्ट सिद्धि नव निधि कहा जाता है। वे कहते हैं कि सिद्धि का विषय इतना सरल नहीं है। जब आप और आगे, और आगे जाकर खोजेंगे, तब आपको पता चलेगा कि यहाँ हनुमान जी के लिए विवाह को ज़रूरी क्यों कहा गया है।
वामांगी के रूप में शक्ति क्यों ज़रूरी है?
सुवर्चला, पुरुष तत्व और शक्ति तत्व, और एक पूरे के दो आधे
वक्ता पूछते हैं कि भगवान सूर्य देव ने उनका विवाह भगवती सुवर्चला से क्यों करवाया, और इससे दोनों ने कौन सी सिद्धि पाई; यह पाणिग्रहण संस्कार के बाद ही क्यों मिलना था; शक्ति उपासना में शक्ति का महत्व कैसे आता है; यहाँ शक्ति वामांगी के रूप में क्यों ज़रूरी होती है, और स्त्री के लिए पुरुष तत्व, एक पुरुष, क्यों ज़रूरी होता है। वे कहते हैं कि आत्मा का कोई लिंग नहीं — पुरुष और स्त्री रूप आत्मा द्वारा धारण किए शरीर के हैं, और कर्म करके सिद्धियाँ पाने की कोशिश करने वाले की पूर्णता के लिए, हर एक केवल आधा होने के कारण, यह अनिवार्य हो जाता है।
वक्ता पूछते हैं कि भगवान सूर्य देव ने उनका विवाह भगवती सुवर्चलाकुछ पारंपरिक कथाओं में भगवान हनुमान की सहचरी — कुछ गुह्य नित्या साधनाओं हेतु विवाहित गृहस्थ स्थिति की अनिवार्यता के आधार के रूप में उद्धृत। से क्यों करवाया, और इससे दोनों ने कौन सी सिद्धि पाई? उन्हें पाणिग्रहण संस्कार के बाद ही क्यों मिलना पड़ा? शक्ति उपासना में शक्ति का महत्व कैसे आता है? यहाँ शक्ति वामांगी के रूप में क्यों ज़रूरी होती है, और स्त्री के लिए पुरुष तत्व, एक पुरुष, क्यों ज़रूरी होता है? वे कहते हैं कि यह एक तत्व है न। आत्मा का कोई लिंग नहीं है। पुरुष और स्त्री उस शरीर के रूप हैं जिसे आत्मा ने धारण किया है, और जिसके कर्म से वह सिद्धियाँ पाने की कोशिश कर रही है। उसकी पूर्णता के लिए, हर एक केवल आधा होने के कारण, यह एक तरह से अनिवार्य हो जाता है। वे कहते हैं, इसे इस तरह भी समझिए। वहाँ यह क्यों ज़रूरी हुआ? यही इसका विषय है।
साधक इन रहस्यों को वास्तव में कब समझेगा?
बिना मेहनत मिला ज्ञान कचरा बन जाता है
वक्ता कहते हैं कि इस क्षेत्र में आगे बढ़िए और साधना कीजिए, तो यह सब आपको मिलेगा, सब पता चलेगा। ये रहस्य हैं: जब आप इन्हें साधना से पाएँगे, तभी आपकी बुद्धि इन्हें पचा और जान पाएगी, और फिर आप सही मार्ग पर चल पाएँगे। बिना मेहनत के, इधर-उधर से पाया गया यह आपके लिए कचरा बन जाएगा, और आप बस हँसी का पात्र बनेंगे — जैसे उल्टी-सीधी किताबें लिखने वाले लोग।
वक्ता कहते हैं, आगे बढ़िए। जब आप इस क्षेत्र में साधना करेंगे, तो यह सब आपको मिलेगा; यह सब आपको पता चलेगा, कि क्या और कैसे होता है। ये सब रहस्य हैं। जब आप इन्हें साधना करके पाएँगे, तभी आपकी बुद्धि इन्हें पचा और जान पाएगी, और तब आप फिर से सही मार्ग पर चल पाएँगे। बिना कोई मेहनत किए इधर-उधर से पाया गया यह आपके लिए कचरा बन जाएगा। वे कहते हैं कि तब आप खुद को बस हँसी का पात्र बनाएँगे, उल्टी-सीधी किताबें लिखने वाले लोगों की तरह। ऐसी किताबें पहले से बाज़ार में हैं और अब बहुत चल रही हैं — खंडन-मंडन वाली, जिनमें लोग भगवती के, भगवान शिव के, नारायण के, सबके विधि-विधानों का खंडन करते जाते हैं, कहते हैं कि इन्होंने उनसे विवाह किया तो यह हुआ। वे कहते हैं कि अगस्त्य मुनि की उत्पत्ति के बारे में लोग जो लिखते हैं उसे पढ़कर हँसी आती है कि ऐसी दुर्बुद्धि कैसे हो सकती है।
ट्रेन में एक महात्मा ने अष्टपद का अर्थ आठ तरह से अपान वायु छोड़ना बताया, जबकि असली भाव देवता के अनेक पैरों का है
अष्टपद का गलत अर्थ, और देवता के अनेक पैर
वक्ता कहते हैं कि ट्रेन में, जनरल बोगी में, कुछ लोग — जिनमें एक महात्मा थे जो सनातन के बड़े विरोधी रहे होंगे — अष्टपद पर चर्चा कर रहे थे, और उन्होंने इसका अर्थ आठ तरह से अपान वायु छोड़ना बताया, और इसे भी एक तरह की सिद्धि कहा। वे हँस पड़े। जब पूछा कि इसका वर्णन कहाँ है, तो उस आदमी ने कहा कहीं भी मिल जाएगा। वे कहते हैं कि लोग सोचते हैं, आठ पैर कैसे हो सकते हैं, और ऐसा प्राणी मनुष्य या देवता में कैसे गिना जाए — जिस पर उन्होंने उत्तर दिया कि देवताओं के हज़ारों हाथ और हज़ारों पैर होते हैं; सप्तशती में जब हम पहले चरित्र का ध्यान करते हैं तो भगवती के दस पैर हैं, और इससे ज़्यादा वाले विषय भी हैं।
वक्ता एक और बात बताते हैं, उस समय की जब वे ट्रेन में थे और वे पढ़ रहे थे, या कहिए लोग अष्टपद पर चर्चा कर रहे थे। वे कहते हैं कि कुछ महात्मा थे, जैसे सनातन के बड़े विरोधी रहे होंगे, जो जनरल बोगी में बैठकर इस पर चर्चा कर रहे थे। उसमें उन्होंने अष्टपद का जो अर्थ बताया वह था: अधो वायु को आठ तरह से छोड़ना। वे कहते हैं कि यह सुनकर वे हँस पड़े। उन्होंने कहा, साहब, हँसिए मत, हम आपको सच बता रहे हैं पंडित जी — अगर आदमी में अपान वायु को आठ तरह से निकालने की क्षमता आ जाए, तो वह भी एक तरह की सिद्धि है। उन्होंने पूछा कि इसका वर्णन कहाँ है; उन्होंने कहा, नहीं, इसकी चर्चा आपको कहीं भी मिल जाएगी। तो वे कहते हैं कि लोग सोचते हैं कि आठ तरह, आठ, जिसके आठ पैर हों — आठ पैर कैसे हो सकते हैं, और फिर ऐसा कोई मनुष्य या देवता की श्रेणी में कैसे हो सकता है? उन्होंने उत्तर दिया कि देवताओं के हज़ारों हाथ और हज़ारों पैर होते हैं। भगवती महाकाली का उदाहरण देते हुए: सप्तशती में जब हम पहले चरित्र का चिंतन और ध्यान करते हैं, तो भगवती के दस पैर हैं, और वहाँ इससे ज़्यादा वाले विषय भी हैं। उन्होंने कहा, नहीं, ऐसा नहीं है, और कहा कि संधि विच्छेद करके पूरी बात रखिए; वे ऑनलाइन देखकर बताएँगे कि असल में यह क्या है, और कि वे भ्रमित आदमी हैं। उन्होंने कहा, भैया, मुझे भ्रमित ही रहने दीजिए; आप आठ तरह से अपान वायु छोड़ते रहिए, और मुझे छोड़ दीजिए।
शास्त्र क्या कहता है
Mahākālī, deity of the first carita, is described as ten-faced, ten-armed and ten-footed.
The speaker places this in the Saptaśatī's first carita; the verse is in the Vaikṛtika Rahasya appended to it.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
दशवक्त्रा दशभुजा दशपादाञ्जनप्रभा । विशालया राजमाना त्रिंशल्लोचनमालया ॥ ३ ॥
उनके दस मुख, दस भुजाएँ और दस पैर हैं, और वे काजल जैसी काली हैं। वे तीस नेत्रों की विशाल पंक्ति से सुशोभित हैं।
यह अध्याय अभी प्रकाशित नहीं हुआ है; लिंक आपके लिए इसे अभी खोल देता है।
पंचाक्षरी के पाँच लाख जप से क्या मिलता है?
मज़ाक उड़ाने वाले को चुप कराने का सामर्थ्य
वक्ता कहते हैं कि वे यह श्रोताओं के सामने इसलिए रखते हैं क्योंकि जब आप ऐसे विषयों से प्रभावित होते हैं, तो अपने आराध्य के रूपों से दूर होने लगते हैं, उन्हें हँसी का विषय बना देते हैं, और मन में शंका शुरू हो जाती है। पर अगर आप साधना करते हैं — अगर आपने पंचाक्षरी के पाँच लाख जप किए हैं — तो उस जप में यह सामर्थ्य है कि जब कोई ऐसी अपमानजनक बात कहेगा तो उसका आप पर असर नहीं होगा, और आप उसे वहीं ठीक से पीछे धकेल देंगे। बुद्धि कहाँ से आएगी, प्रमाण कहाँ से आएगा, आपने कहाँ सुना था — सब वहाँ काम करेगा, और वह पंचाक्षरी साधना आपको उसकी वाणी वहीं बंद करने का सामर्थ्य देगी। साधना के बिना, आप कितने भी बड़े बोलने वाले हों, कितनी भी तेज़ वाणी हो, आप वहाँ बोल नहीं पाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि वे यह विषय श्रोताओं के सामने इसलिए रखते हैं क्योंकि जब आप इस तरह के विषयों से प्रभावित हो जाते हैं, तो कहीं न कहीं आप अपने आराध्य के रूपों से दूर होने लगते हैं। फिर आप उसे हँसी का विषय बना देते हैं, और आपके मन में शंका उठने लगती है। पर अगर आप साधना करते हैं — अगर आपने पंचाक्षरी मंत्र के पाँच लाख जप किए हैं — तो उस जप में यह सामर्थ्य है कि जब कोई व्यक्ति ऐसा अपमानजनक शब्द बोलेगा तो उसका आप पर असर नहीं होगा। आप उसे वहीं, और ठीक से, पीछे धकेल देंगे। उस पल आपके मन में बुद्धि कहाँ से आएगी, प्रमाण कहाँ से आएगा, आपने कहाँ सुना था, वहाँ यह कैसे काम करेगा — वाणी वहीं रुक जाएगी, और यह सामर्थ्य आपको पंचाक्षरी साधना देगी। पर अगर आपने साधना नहीं की है, वे कहते हैं, तो आप कितने भी बड़े बोलने वाले हों, लोगों के सामने अपने विषय रखते हुए आपकी वाणी कितनी भी तेज़ और धारदार हो, आप वहाँ बोल नहीं पाएँगे। इसीलिए साधना का सामर्थ्य ज़रूरी है।
कालिका पुराण के अनुसार श्मशान भैरव का जन्म कैसे हुआ?
आठ मूर्तियों का लौटना, और जो मूल स्वरूप बचा
वक्ता कहते हैं कि जब दोनों का युद्ध खत्म हुआ और भगवान वराह अपने मूल स्वरूप में लौट गए, तब भगवान शरभ अपने सब रूपों को उनके मूल स्वरूप में वापस भेजने लगे — वे आठ अष्टमूर्ति जिनका उन्होंने आश्रय लिया था, शरभ रूप धारण करने के लिए आठ अलग मूर्तियाँ इकट्ठी करके। जब सब रूप अपनी जगह लौट गए, तो जो मूल स्वरूप बचा, उससे भगवान श्मशान भैरव का जन्म हुआ; उन्होंने श्मशान भैरव का रूप धारण किया। वे कहते हैं कि इसका वर्णन आपको 53वें अध्याय में मिलेगा, और उन्होंने इसे वीडियो के विवरण में भी लिखा है।
वक्ता कहते हैं कि यहाँ भगवान शरभ का विषय यह है: जब दोनों ने युद्ध किया और भगवान वराह अपने मूल स्वरूप में चले गए, तब भगवान शरभ अपने सब रूपों को उनके मूल स्वरूप में वापस भेजने लगे। उन्होंने आठ अलग अष्टमूर्ति का आश्रय लिया था, शरभ रूप धारण करने के लिए आठ अलग मूर्तियों को एक साथ इकट्ठा करके। जब सब रूप अपनी-अपनी जगह लौट गए, तब जो मूल स्वरूप बचा, उससे भगवान श्मशान भैरव का जन्म हुआ। उन्होंने श्मशान भैरव का रूप धारण किया। वे कहते हैं कि इसका वर्णन आपको 53वें अध्याय में मिलेगा। उन्होंने इसे इस वीडियो के विवरण में भी लिखा है।
श्मशान भैरव रूप की कितनी भुजाएँ हैं?
अठारह भुजाएँ, और अठारह और सोलह भुजाओं वाली दुर्गा
वक्ता कहते हैं कि उनके रूप का पूरा वर्णन है: उनकी अठारह भुजाएँ हैं। सोचिए — भुजाएँ शक्ति से कैसे जुड़ी हैं, इसके बारे में क्या कहा गया है, वे किस पर विराजमान हैं; अठारह भुजाओं वाली दुर्गा, सोलह भुजाओं वाली दुर्गा जिन्हें भद्रकाली कहा गया है, क्या संबंध हैं। वे कहते हैं कि इससे पूरा विषय आपको साफ़ होता जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि उनके रूप का पूरा वर्णन है: कि उनकी अठारह भुजाएँ हैं — इस पर विचार कीजिए। तो भगवती — ये कैसे और कहाँ से जुड़ती हैं? भुजाएँ शक्ति से किस तरह जुड़ी हैं, इसके बारे में क्या कहा गया है, वे किस पर विराजमान हैं? अठारह भुजाओं वाली दुर्गा, सोलह भुजाओं वाली दुर्गा जिन्हें भद्रकाली कहा गया है, संबंध क्या और कैसे हैं — वे कहते हैं कि इससे पूरा विषय आपको साफ़ होता जाएगा।
महाभैरव की पूजा किस तिथि पर करनी चाहिए?
चैत्र शुक्ल चतुर्दशी
वक्ता कहते हैं कि वहाँ वर्णन यह है कि भगवान श्मशान भैरव, महाभैरव उपस्थित हुए, और भगवान महाभैरव के पूजन का वर्णन है — कि चैत्र शुक्ल चतुर्दशी की तिथि पर भगवान महाभैरव का पूजन करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि तो यहाँ वर्णन यह है कि भगवान श्मशान भैरव, महाभैरव उपस्थित हुए हैं। और भगवान महाभैरव के पूजन का वर्णन है: कि चैत्र शुक्ल चतुर्दशी की तिथि पर भगवान महाभैरव का पूजन करना चाहिए।
श्मशान में महाभैरव की पूजा कैसे होती है, और इसे कौन कर सकता है?
वामाचार से मांस बलि वाली उग्र पूजा, केवल दीक्षितों के लिए
वक्ता कहते हैं कि महाभैरव का मुख्य रूप उग्र रूप है, और उसकी पूजा मुख्य रूप से श्मशान में वामाचार विधि-विधान से होती है, जिसमें मांस बलि आदि पूरी तरह होती है। वे कहते हैं कि यह लिखी हुई बात भी है, पर यह साधकों के लिए है — दीक्षितों के लिए, और जो विधि-विधान जानते हैं। जिनके पास वह ज्ञान नहीं है, वे कम से कम किसी शिव मंदिर में उस रूप की शरण लेकर अपनी और अपने कुल और वंश की रक्षा करें।
वक्ता कहते हैं कि महाभैरव का मुख्य रूप उग्र रूप है। और उसकी पूजा मुख्य रूप से श्मशान में, वामाचार विधि-विधान से होती है, जिसमें मांस बलि आदि पूरी तरह, जैसा निर्देश है वैसे होती है। वे कहते हैं कि यह लिखी हुई बात भी है। पर यह साधकों के लिए है — दीक्षितों के लिए, और जो विधि-विधान जानते हैं उनके लिए। जिनके पास ज्ञान नहीं है, वे कम से कम किसी शिव जी के मंदिर में उस रूप की शरण लें और अपनी और अपने कुल और वंश की रक्षा करें।
सिखाना और करना, दोनों क्यों ज़रूरी हैं?
न केवल प्रवचन काफ़ी है, न केवल विधि
वक्ता कहते हैं कि केवल बोलना, या केवल करना, दोनों में से हर एक कमी छोड़ेगा। अगर वे आपको केवल प्रवचन देते और प्रेरित करते और खुद कुछ न करते — कोई अनुष्ठान नहीं, कोई करवाया नहीं, कोई उदाहरण आपके सामने नहीं रखा, अभ्यास के लिए कोई व्यावहारिक प्रदर्शन नहीं — तो इसका कोई उपयोग नहीं होता। और अगर वे केवल विधि-विधान बताते रहते, कि यह विधि यह देती है और यह मार्ग वह देता है, बिना आपको दूसरे विधि-विधानों और कथाओं से अवगत कराने की कोशिश किए, तब भी आप इसे नहीं कर पाते। वे कहते हैं कि आपके लिए दोनों ज़रूरी हैं।
वक्ता कहते हैं कि केवल बोलना, और केवल करना — इनमें से हर एक अपनी जगह आपको अधूरा छोड़ेगा। अगर हम आपको केवल प्रवचन दें, प्रेरित करें, और खुद कुछ न करें; अगर हम कोई अनुष्ठान न करें, न करवाएँ, आपके सामने कोई उदाहरण न रखें, आपसे करके और देखकर व्यावहारिक रूप से कुछ अभ्यास न करवाएँ — तो इसका कोई उपयोग नहीं। और अगर हम केवल और केवल विधि-विधान बताते रहें — कि इस विधि से यह होगा, उस विधि से वह होगा, इस मार्ग से यह होगा — और जितनी उनकी क्षमता है उतना आपको दूसरे तरह के विधि-विधानों और कथाओं की जानकारी देने की कोशिश न करें, तब भी आप इसे नहीं कर पाएँगे। वे कहते हैं कि ये दोनों बातें आपके लिए ज़रूरी हैं। आपको विधि-विधान का ज्ञान होना चाहिए — कि हाँ, यह रूप है, यह विधि है, इतना इस तरह करना है — और इसे कैसे करना है यह पूरी बात भी रखी जानी चाहिए; और दोनों के साथ, खुद करना भी चाहिए। वे कहते हैं कि जो आप करेंगे, हम भी करेंगे। ऐसा नहीं कि हम आपको बताकर चादर ओढ़कर सो जाएँ। आप यह मेरे लिए नहीं करेंगे; अपने लिए करेंगे, और हम अपने लिए करेंगे। फ़र्क बस इतना है कि हम पहले से कर रहे थे, और अब आपसे भी करवा रहे हैं।
महाभैरव चतुर्दशी पर तीन अनुष्ठान होते हैं, जिनमें एक श्मशान में होता है और केवल दीक्षित श्मशान साधकों के लिए है
एक श्मशान में, केवल दीक्षित श्मशान साधकों के लिए
वक्ता कहते हैं कि महाभैरव पूजन आप सब लंबे समय से कर रहे हैं, पर खास तिथि चतुर्दशी है। उनके माध्यम से जो भी अनुष्ठान होता है वह अलग बात है — उसमें तीन अनुष्ठान होंगे। एक श्मशान में होगा, जिसमें किसी का प्रवेश नहीं होगा; केवल वे दीक्षित श्मशान साधक इसे करेंगे, और वे कहते हैं कि यह पूरी तरह साफ़ रहे कि इसमें बलि विधान और सब कुछ ठीक वैसे ही होता है जैसा शास्त्रों में निर्देश है।
वक्ता कहते हैं कि आप सब अब लंबे समय से महाभैरव पूजन कर रहे हैं, पर खास तिथि चतुर्दशी की है। उस दिन क्या करना है? उनके माध्यम से जो भी अनुष्ठान होता है वह अलग बात है — उसमें तीन अनुष्ठान होंगे। एक श्मशान में होगा, जिसमें किसी का प्रवेश नहीं होगा, और केवल वे दीक्षित श्मशान साधक इसे करेंगे। वे कहते हैं कि इसमें, भैया, पूरी तरह साफ़ रहिए कि इसमें बलि विधान और सब कुछ होता है, ठीक वैसे ही जैसा शास्त्रों में निर्देश है।
जो इन प्रथाओं को रोकने की कोशिश करते हैं, उनका क्या होता है?
शक्तियाँ रक्षा के लिए हैं; उन्हें रोकना विनाश बुलाना है
वक्ता कहते हैं कि शायद लोगों के इन चीज़ों को रोकने के कारण ही ऐसा विनाश आ रहा है। शक्तियाँ रक्षा के लिए हैं; हर एक के पीछे कारण है। उन्हें रोकना अपना ही विनाश बुलाना है। बातों की चतुराई से लोग सब कुछ रोक देते हैं, और जवाब देने का सामर्थ्य रखने वाला कुछ नहीं बचता।
वक्ता कहते हैं कि शायद कहीं न कहीं जो लोग इन चीज़ों को रोक रहे हैं, उनके रोकने के कारण ही ऐसा विनाश भी आ रहा है। शक्तियाँ रक्षा के लिए हैं। उनमें से हर एक के पीछे कारण है। उन्हें रोकना अपना ही विनाश बुलाना है। वे कहते हैं कि अपनी बुद्धि लगाकर, बातों की जो भी चतुराई उन्हें आती है उससे, लोग हर चीज़ रोक देते हैं, और उसमें जवाब देने का सामर्थ्य रखने वाला कुछ नहीं बचता। और उन्होंने देखा है कि ऐसे असाधारण लोग हैं जिनके पास बोलने की क्षमता का पूरा भंडार है — पर वे भी इस बिंदु पर हार जाते हैं; यहाँ सब हार जाएँगे, और फिर, इसे जैसा है वैसा स्वीकार करने की क्षमता न होने से, वे अपनी बुद्धि लगाकर किसी तरह विषय को अपने हिसाब से ढाल लेते हैं। जहाँ बलि की बात साफ़ निर्देशित है और परंपरा में भी मौजूद है, वहाँ वे उसे घुमाकर कहेंगे कि कोई बलि नहीं है।
गृहस्थ की चौखट के भीतर बलि के बारे में क्या नियम है?
चौखट के भीतर ऐसा कुछ नहीं; बलि केवल जहाँ विधान है
वक्ता कहते हैं कि जहाँ वैष्णव मत लागू है वहाँ वे पूरी तरह वैष्णव मत के अनुसार बोलते हैं। जहाँ वैष्णव विधि लागू है, जहाँ गृहस्थ की विधि लागू है — भैया, चौखट के भीतर ऐसी कोई बात नहीं होनी चाहिए। अगर वहाँ बलि नहीं दी जाती तो नहीं देनी चाहिए, ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए। जहाँ ब्रह्मचर्य रखना है, वहाँ रखना है, और वे उसी के अनुसार बोलेंगे। और जहाँ बलि की विधि लागू है, वहाँ वे बलि के लिए ही बोलेंगे, और वहाँ यह नहीं कहेंगे कि जाकर एक नींबू और एक जायफल चढ़ाकर आ जाओ।
वक्ता कहते हैं, भाई, वैष्णव का पूरा विषय — हम पूरी तरह वैष्णव के अनुसार बोलते हैं; यह सीधी और साफ़ बात है। जहाँ वैष्णव की विधि लागू है, जहाँ गृहस्थ की विधि लागू है — भैया, चौखट के भीतर ऐसा कोई विषय नहीं होना चाहिए। अगर यहाँ बलि नहीं दी जाती, तो नहीं देनी चाहिए; ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए। जहाँ आपको ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन करना है, वहाँ करना है, और हम उसी के अनुसार बोलेंगे। और जहाँ बलि की विधि लागू है, वहाँ हम बलि के लिए ही बोलेंगे; वहाँ हम यह नहीं कहेंगे कि नहीं, जाकर एक नींबू और एक जायफल चढ़ाकर चले आओ। वे कहते हैं कि आप यह नहीं करते, और हम आपसे करने को नहीं कह रहे। हम बस अपना विषय बता रहे हैं: वहाँ वह चीज़ होती है।
श्मशान भैरव के रूप का वर्णन कैसा है?
हाथों की माला, आसन, और रक्त से लेपन
वक्ता कहते हैं कि अगर तारा नवमी या अष्टमी की रात में श्मशान पूजन चल रहा है, तो वहाँ पूजन श्मशान के विधि-विधान से ही होगा। और श्मशान भैरव का रूप ऐसा है जो मरे हुए मनुष्यों के हाथों की माला पहनते हैं, उन सब पर बैठते हैं, और जिनका पूरा लेपन रक्त चंदन और रक्त आदि से होता है।
वक्ता कहते हैं कि अब अगर तारा नवमी या अष्टमी की रात में श्मशान पूजन चल रहा है, तो वहाँ पूजन श्मशान के विधि-विधान से ही होगा। और श्मशान भैरव का रूप ऐसा है कि वे मरे हुए मनुष्यों के हाथों की माला पहनते हैं। वे उन सब पर बैठते हैं। और उनका पूरा लेपन रक्त चंदन और रक्त आदि से होता है।
श्मशान भैरव के रूप के पीछे क्या उद्देश्य है?
मृत्यु के बाद गति और मुक्ति देना, और आत्माओं की सद्गति
वक्ता कहते हैं कि वह रूप बिना कारण वैसा नहीं है। मृत्यु के बाद गति देना, मुक्ति देना, उन रूपों की रक्षा करना, और आत्माओं की सद्गति की पूरी बात — यह सब उस रूप के अंतर्गत आता है।
वक्ता कहते हैं कि यह रूप बेवजह वैसा नहीं है। मृत्यु के बाद जो गति देनी है, जो मुक्ति देनी है, उन रूपों को जो रक्षा देनी है, और आत्माओं की सद्गति — वह पूरी बात उस रूप के अंतर्गत आती है।
जीवन में हर कोई सबसे पहले किस शक्ति से मिलता है?
अस्तित्व में आने के पल भगवती कामाख्या
वक्ता कहते हैं कि जीवन में एक बात याद रखिए: आप अच्छे काम करें या बुरे, कुछ शक्तियाँ हैं जिनसे आपको मिलना ही होगा। पहली भगवती माँ कामाख्या हैं। जिस दिन आप जन्मे — और आप जन्म ले चुके हैं — भगवती कामाख्या की कृपा से ही आपकी माँ के गर्भ से आपका अस्तित्व में आना हुआ। वे कहते हैं, उन्हें याद मत कीजिए, मत कहिए, चाहें तो कामाख्या को मत मानिए; यह आपकी इच्छा है, पर आप उनसे मिले और उनकी कृपा आप पर पड़ी।
वक्ता कहते हैं कि जीवन में एक बात याद रखिए: आप अच्छे काम कर सकते हैं, बुरे काम कर सकते हैं। कुछ शक्तियाँ हैं जिनसे आपको जीवन में मिलना ही होगा। पहली भगवती माँ कामाख्या हैं। जिस दिन आप जन्मे — और आप जन्म ले ही चुके हैं न — उस समय भगवती कामाख्या की कृपा से ही आपकी माँ के गर्भ से आपका अस्तित्व में आना हुआ। इसे याद रखिए। आप इसे याद न करें, न कहें, कहें कि हम कामाख्या को नहीं मानते — यह आपकी इच्छा है, वे कहते हैं। पर आप उनसे मिले; उनकी कृपा आप पर पड़ी।
छठे दिन का मुँह देखने तक जीवित रहना भी भगवती षष्ठी परमेश्वरी की कृपा है
छठे दिन तक जीवित रहना, और पुराण की व्रत कथा
वक्ता कहते हैं कि भगवती षष्ठी परमेश्वरी की कृपा आप पर है, और इसीलिए आप आज जीवित हैं और सुन रहे हैं। अगर उनकी कृपा न होती, अगर आपने कोई दुष्ट कर्म किया होता, तो आप छठे दिन का मुँह नहीं देख पाते; आपसे पहले ही आगे बढ़ने को कह दिया जाता। जैसे सदोष व्रत के नियम में — श्री महापुराण में भद्रायु का प्रसंग है, वे कहते हैं, हालाँकि नाम उन्हें ठीक से याद नहीं आ रहा, जिसमें उनकी माँ ने व्रत ठीक से नहीं किया, और वर्णन है कि किस तरह मौतें हुईं।
वक्ता कहते हैं कि भगवती षष्ठी परमेश्वरी की कृपा आप पर है, और इसीलिए आप आज जीवित हैं और सुन रहे हैं। अगर उनकी कृपा न होती — अगर आपने कोई दुष्ट कर्म किया है — तो आप छठे दिन का मुँह नहीं देख पाते। आपसे पहले ही कह दिया जाता: भैया, आगे बढ़ो। जैसे सदोष व्रत का नियम, अगर आपने उसका पालन नहीं किया। इसके बारे में, वे कहते हैं, श्री महापुराण में भद्रायु का प्रसंग है, हालाँकि नाम उन्हें ठीक से याद नहीं आ रहा। उसमें उनकी माँ ने व्रत ठीक से नहीं किया, और उसके कारण किस तरह और किन मौतों से वह आगे बढ़ा, इसका वर्णन है। वे कहते हैं कि यह पूरा वर्णन आपको शास्त्रों में मिलेगा।
व्यक्ति का सामना और किन शक्तियों से ज़रूर होता है?
सरस्वती, और विवाह में उपस्थित होने वाले कुल पितृ
वक्ता कहते हैं कि तो भगवती कामाख्या हैं, भगवती षष्ठी हैं, और भगवती सरस्वती की शरण आपको ज़रूर लेनी होगी। उसके बाद जन्म आता है, और फिर विवाह के समय — जिस विधि-विधान से चाहें, राक्षस विवाह भी — जिस दिन आप विवाह करते हैं, आप मानें या न मानें, वहाँ आपके कुल पितृ की उपस्थिति स्थापित होगी। और एक बार स्थापित होने पर आपने उन्हें क्या सम्मान दिया या नहीं दिया, और बाद में आप क्या भुगतेंगे, यह बिल्कुल अलग बात है।
वक्ता कहते हैं कि तो भगवती कामाख्या हैं, और भगवती षष्ठी हैं। भगवती सरस्वती के लिए आपको उनका शरणागत ज़रूर होना होगा। उसके बाद जन्म आता है। फिर विवाह के समय, जिस भी विधि-विधान से आप चाहें — चाहे राक्षस विवाह करें, जो चाहें करें — जिस दिन आप विवाह करते हैं, मानें या न मानें, आपने विवाह किया। चाहे आप पाणिग्रहण से कर रहे हों या किसी भी विधान से, वहाँ आपके कुल पितृ की उपस्थिति स्थापित होगी। और एक बार स्थापित होने पर, आपने वहाँ उन्हें क्या सम्मान दिया या नहीं दिया, आपने क्या किया या नहीं किया, और उसके लिए आप बाद में क्या भुगतेंगे, यह बिल्कुल अलग बात है। वह स्थापित होगी; आपको उनसे निपटना ही है।
पितृ और कब उपस्थित होते हैं, और मृत्यु पर क्या होता है?
पितृ पक्ष, भूत या पितृ बनना, और श्मशान भैरव से मिलना
वक्ता कहते हैं कि हर साल पितृ पक्ष में पितरों की उपस्थिति स्थापित होगी; मानें या न मानें, होगी। और जिस दिन आप मरेंगे, आप भी वैसे ही बनेंगे — भूत रहेंगे और भूत बनकर जाएँगे, या पितृ श्रेणी में रहेंगे और पितृ बनकर जाएँगे। और मृत्यु के समय श्मशान भैरव से हेलो, कैसे हैं होगी; वहाँ से भी, वे कहते हैं, आप बच नहीं सकते।
वक्ता कहते हैं कि हर साल पितृ पक्ष में पितरों की उपस्थिति स्थापित होगी। आप मानें या न मानें, यह अलग बात है; वह स्थापित होगी। और जिस दिन आप मरेंगे, आप भी वैसे ही बनेंगे। आप भूत रहेंगे और भूत बनकर जाएँगे; आप पितृ की श्रेणी में रहेंगे और पितृ बनकर जाएँगे। और मृत्यु के समय, श्मशान भैरव से हेलो, कैसे हैं। वह होना ही है। वे कहते हैं कि वहाँ से भी आप हट नहीं सकते।
व्यक्ति को जीवनसाथी का सुख किसकी कृपा से मिलता है?
पत्नी के लिए भगवती ललिता, पति के लिए श्री हरि नारायण
वक्ता कहते हैं कि अगर जीवन में कभी सौभाग्यवती पत्नी का सुख मिलता है, तो वह भगवती ललिता की कृपा से है। अगर आपकी धर्मपत्नी या प्रेमिका है जो आपको प्रेम और अपनी कृपा का सुख देती है, तो वह भगवती ललिता की कृपा से है — इसका सम्मान करना सीखिए। और अगर पति का सुख मिल रहा है — पौरुष से संपन्न, बलवान, धर्म के मार्ग पर चलने वाला, घर चलाने की ज़िम्मेदारी उठाने की क्षमता वाला, जिसे आम बोलचाल में मर्द कहते हैं — तो वह भगवान श्री हरि नारायण की कृपा से ऐसा है; यह उनकी कृपा है, उन्होंने भुजाओं का बल दिया है, और केवल इसी कारण ऐसा है।
वक्ता कहते हैं कि अगर जीवन में कभी आपको सौभाग्यवती पत्नी का सुख मिलता है, तो वह भगवती ललिता की कृपा से मिलता है। अगर आपकी धर्मपत्नी है, या प्रेमिका है, जो आपको प्रेम दे रही है और अपनी कृपा का सुख दे रही है, तो यह भगवती ललिता की कृपा से है। इसका सम्मान करना सीखिए। और अगर पति का सुख मिल रहा है — जो पौरुष से संपन्न है, जो बलवान है, जो धर्म के मार्ग पर चलता है, जो पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी उठाने की क्षमता रखता है; ऐसा आदमी जिसे आम बोलचाल में मर्द कहते हैं, पौरुष के गुणों से संपन्न पुरुष — तो वह भगवान श्री हरि नारायण की कृपा से संपन्न होकर ऐसा है। यह उनकी कृपा है और तभी ऐसा है। उन्होंने भुजाओं का बल दिया है, और तभी यह हो रहा है।
अंत में आपके साथ क्या जाता है?
न कार, न हवेली, केवल जप
वक्ता कहते हैं कि गृहस्थ नारायण की कृपा के बिना कभी सफल नहीं होता। भगवती कामाख्या, भगवती षष्ठी, भगवान नारायण और भगवती सरस्वती से निपटकर, सबसे आखिर में आप भगवती श्मशान काली और भगवान श्मशान भैरव से मिलेंगे। और वहाँ न आपकी मारुति कार जाएगी, न रेंज रोवर, न करोड़ों की हवेली। जो जाएगा वह है जिसकी हम इस चैनल पर चर्चा करते हैं — पंचाक्षरी का जप कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि गृहस्थ नारायण की कृपा के बिना कभी सफल नहीं होता। भगवती कामाख्या, भगवती षष्ठी, भगवान नारायण और भगवती सरस्वती से निपटकर, सबसे आखिर में आप भगवती श्मशान काली और भगवान श्मशान भैरव से मिलेंगे। और वहाँ, वे कहते हैं, न आपकी मारुति कार जाएगी, न आपकी रेंज रोवर, न आपकी करोड़ों की हवेली। जो जाएगा वह बस वही है जिसकी हम इस चैनल पर चर्चा करते हैं: पंचाक्षरी का जप कीजिए।
क्या बिना दीक्षा वाले व्यक्ति को पंचाक्षरी जप में प्रणव लगाना चाहिए?
दीक्षा के बिना प्रणव नहीं, या फिर तांत्रिक प्रणव
वक्ता कहते हैं कि अगर आप दीक्षित नहीं हैं, तो प्रणव मत लगाइए; और अगर लगाना ही है, तो तांत्रिक प्रणव लगाइए। लगाइए या मत लगाइए, पर विधि से ज़रूर कीजिए। अनुशासन का पालन कीजिए। वहाँ बस वही जाएगा — श्मशान भैरव बस वही आपके साथ भेजेंगे।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप दीक्षित नहीं हैं, तो प्रणव मत लगाइए। और अगर लगाना ही है, तो तांत्रिक प्रणव लगाइए। लगाइए या मत लगाइए, पर विधि से ज़रूर कीजिए। आप इसका पालन कीजिए और अनुशासन से चलिए। वहाँ बस वही जाएगा; श्मशान भैरव बस वही आपके साथ भेजेंगे। अपने विषयों को याद रखिए।
चतुर्दशी शुक्रवार की रात पड़ रही है, जब शिव मंदिर में या घर पर भैरव जी की दीप दान विधि करनी चाहिए
शुक्रवार की चतुर्दशी, और भैरव का दीप दान
वक्ता कहते हैं कि इस बार चतुर्दशी शुक्रवार को पड़ रही है। उस शुक्रवार को, जो भी सुन रहे हैं वे सब भैरव जी की दीप दान विधि करें — शिव मंदिर में या घर पर, पर ज़रूर करें। चतुर्दशी शुक्रवार की रात को है। रात में करें तो सबसे अच्छा; आधी रात को करें तो अत्यंत दिव्य; वरना शाम को ज़रूर करें।
वक्ता कहते हैं कि इस बार चतुर्दशी शुक्रवार को पड़ रही है। शुक्रवार को आपको क्या करना है? शुक्रवार को, आप में से जो भी सुन रहा है — वे कहते हैं कि वे इसे फिर से भेजेंगे — भैरव जी की दीपदान विधि: शिव मंदिर में कीजिए, या घर पर कीजिए, पर ज़रूर कीजिए। चतुर्दशी शुक्रवार की रात को है। रात्रि काल में करें तो सबसे अच्छा होगा; आधी रात को करें तो अत्यंत दिव्य है; वरना शाम को ज़रूर कीजिए।
अगर व्यक्ति पूरा दीप दान न कर सके तो?
पाँच दीपक भी चलेंगे
लोग कहते हैं कि जलेबी के पैसे नहीं, बड़े के पैसे नहीं, बड़ा नहीं बना पाएँगे, इतने दीपक नहीं जुटा पाएँगे, हज़ार-दो हज़ार का खर्च है। वक्ता कहते हैं कि अगर हज़ार रुपये संभव नहीं, तो कोई परेशानी नहीं। जितना कम से कम आप कर सकें उतने में कीजिए — अगर आपके पास केवल पाँच दीपक हैं, तो पाँच दीपक भी चलेंगे। पर कीजिए; ज़रूर कीजिए, क्योंकि यह लिखी हुई बात है।
भैया, जलेबी के पैसे नहीं हैं, बड़े के नहीं हैं, हम बड़ा नहीं बना पाएँगे, संभव नहीं होगा; भैया, हम इतने दीपक नहीं जुटा सकते; यह चीज़ संभव नहीं होगी; हज़ार-दो हज़ार का खर्च है — वक्ता ये आपत्तियाँ दोहराते हैं। वे कहते हैं कि जो भी बनाया गया था, वह उन्होंने साझा भी किया था। अगर हज़ार रुपये का प्रबंध नहीं हो रहा, तो कोई परेशानी नहीं। जितना कम से कम आपके लिए संभव हो उतने में कीजिए। अगर आपके पास केवल पाँच दीपक हैं, तो पाँच दीपक भी चलेंगे। पर कीजिए, वे कहते हैं। ज़रूर कीजिए, क्योंकि यह लिखी हुई बात है।
क्या श्रोता को 53वाँ अध्याय खुद पढ़ना चाहिए?
पुराण गुरु के मार्गदर्शन में पढ़ने चाहिए
वक्ता कहते हैं कि आप श्री कालिका पुराण में 53वाँ अध्याय पढ़ सकते हैं, पर उसमें बहुत कुछ है और वे आपसे इतना पढ़ने को नहीं कहेंगे, क्योंकि पढ़कर आप विचलित हो सकते हैं। वे कहते हैं कि पुराण कहीं न कहीं किसी गुरु के मार्गदर्शन में ही पढ़े, सुने और समझे जाने चाहिए; वरना लोग विचलित हो जाते हैं, और फिर बात कुछ और हो जाती है — आप समझेंगे नहीं, और परेशानी होगी।
वक्ता कहते हैं कि आप श्री कालिका पुराण में 53वाँ अध्याय पढ़ सकते हैं। उसमें बहुत कुछ है, और वे कहते हैं कि वे आपसे इतना पढ़ने को नहीं कहेंगे, क्योंकि पढ़कर आप विचलित हो सकते हैं। वे कहते हैं कि पुराण कहीं न कहीं किसी गुरु के मार्गदर्शन में ही पढ़े, सुने और समझे जाने चाहिए। वरना लोग विचलित हो जाते हैं, और फिर वह बात कुछ और ही हो जाती है। वे कहते हैं कि आप सब समझ नहीं पाएँगे; परेशानी होगी। तो एक बार इतना समझ लीजिए — कि यह लिखी हुई बात है — और इसलिए उस दिन इसे ज़रूर कीजिए।
चतुर्दशी को क्या किस क्रम में करना चाहिए?
पहले दीप दान, फिर पूरा दिन भैरवमय
वक्ता कहते हैं कि पहले दीप दान कीजिए — भगवान भैरव जी के लिए यही सबसे पहली चीज़ है। जिनके पास भैरव जी का श्री विग्रह, मंदिर आदि है, और जो सब घर पर भगवान बटुक भैरव जी का विग्रह रखते हैं, वे उनका स्नान, श्रृंगार, पूजन, दीप दान, आरती और हवन करें। पूरा दिन भैरवमय बना दीजिए।
वक्ता कहते हैं कि पहले दीपदान कीजिए। भगवान भैरव जी के लिए यही सबसे पहली चीज़ है। जिनके पास भैरव जी का श्री विग्रह, मंदिर आदि है, और जितने भी लोग घर पर भगवान बटुक भैरव जी का विग्रह रखते हैं — उनका स्नान, उनका श्रृंगार, उनका पूजन, उनका दीप दान, उनकी आरती, हवन करना। वे कहते हैं कि उस दिन पूरा दिन भैरवमय बना दीजिए।
क्या नींबू काटकर बलि दी जा सकती है?
बलि के रूप में नींबू काटना, और किसी भी तरह भैरव की शरण लेना
वक्ता कहते हैं कि बलि दीजिए — नींबू काटकर बलि दीजिए। घर के लोग नींबू काटने से डरते हैं। वे कहते हैं कि अगर कोई केमिस्ट्री का प्रोफ़ेसर हो, तो बताए कि चाकू पर कौन सा पोटैशियम या जो भी लगाते हैं; वह लगाइए, काटिए, और सबको डराइए — देखो, लाल खून निकल रहा है, तुम लोग पूजा नहीं करते, तुम पर तंत्र हुआ है। जो सबसे ज़्यादा बकबक करता है उसके लिए खासकर वैसा चाकू इस्तेमाल कीजिए, ताकि नींबू से खून निकले। वे कहते हैं, साम, दाम, दंड और भेद से भैरव की शरणागति लीजिए ताकि रक्षा हो।
वक्ता कहते हैं, बलि दीजिए। नींबू काटकर बलि दीजिए। घर के लोग नींबू काटने से डरते हैं। वे कहते हैं कि अगर कोई केमिस्ट्री का प्रोफ़ेसर हो, तो बताए — वे चाकू पर कोई पोटैशियम या कुछ लगाते हैं; वह लगाइए, काटिए, और सबको डराइए। देखो, लाल खून निकल रहा है; तुम लोग पूजा नहीं करते, तुम पर तंत्र हुआ है। वे कहते हैं कि जो सबसे ज़्यादा बकबक करता है, उसके लिए खासकर वैसा चाकू इस्तेमाल कीजिए, ताकि नींबू से खून निकले। किसी भी तरह, साम, दाम, दंड और भेद से, भैरव की शरणागति लीजिए ताकि रक्षा हो। वे कहते हैं कि अपने परिवार की रक्षा के लिए आपको यह करना चाहिए। भेद लगाइए, भैरव की शरण लीजिए। बाद में वे बुद्धि देंगे और ठीक कर देंगे, पर उन्हें शामिल कीजिए और अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कीजिए। उस दिन भैरवमय हो जाइए।
महाभैरव मंत्र का जप कहाँ करना चाहिए?
शिव मंदिर में जप, आपके कुल देवता जो भी हों
वक्ता कहते हैं कि अगर संभव हो तो उस दिन दिन में पूजन कीजिए और रात में भी ज़रूर कीजिए, और महाभैरव जी के मंत्र के जप के लिए शिव जी के मंदिर जाइए। अगर आपने अब तक महाभैरव नहीं किया है, तो आपके कुल देवता जो भी हों, आप शिव जी के मंदिर जाकर जप ज़रूर कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि अगर उस दिन संभव हो, तो दिन में पूजन कीजिए, और रात में भी ज़रूर कीजिए। और महाभैरव जी के मंत्र के जप के लिए शिव जी के मंदिर जाइए। अगर आपने अब तक महाभैरव नहीं किया है, तो आपके कुल के देवता जो भी हों, आप शिव जी के मंदिर जाकर जप ज़रूर कर सकते हैं।
कुछ घरों में उग्र पूजन घर पर क्यों नहीं करना चाहिए?
जहाँ घर में कोई ब्रह्म या भूत-प्रेत योनि के देवता पूजे जाते हैं
जैसा वक्ता अक्सर कहते हैं, अगर घर के देवताओं में कोई ब्रह्म हैं जिनकी पूजा होती है, या भूत-प्रेत योनि के कोई देवता हैं जो पूजे जाने लगे हैं और जिन्हें आप देव रूप में पूजते हैं, तो बगलामुखी माई का पूजन, सर्वेश्वर का पूजन, बटुक भैरव जी का उग्र पूजन, महाभैरव जी का पूजन और हनुमान जी के बड़वानल का जप — ये सब उन्हें कष्ट देंगे। तो अगर ऐसा है, तो वह चीज़ घर पर मत कीजिए — इसकी एक विधि है जिससे उन्हें कष्ट न हो, पर कम से कम शिव मंदिर जाकर कीजिए। वे कहते हैं कि इसे पाँच माला तक रखिए, और यह बहुत काम आएगा।
जैसा हम अक्सर कहते हैं, वक्ता बताते हैं, अगर घर के देवताओं में, उदाहरण के लिए, कोई ब्रह्म हैं जिनकी पूजा होती है, या भूत-प्रेत योनि के कोई देवता हैं जो पूजे जाने लगे हैं और जिन्हें आप देव रूप में पूज रहे हैं — तो बगलामुखी माई का पूजन, सर्वेश्वर का पूजन, बटुक भैरव जी का उग्र पूजन, महाभैरव जी का पूजन, और हनुमान जी के बड़वानल का जप उन्हें कष्ट देगा। तो वे कहते हैं कि वह चीज़ घर पर मत कीजिए — अगर ऐसा है, तो। पर इसकी एक विधि है जिसमें उन्हें कष्ट नहीं होता। कम से कम, शिव मंदिर जाकर कीजिए। पर वे कहते हैं कि इसे पाँच माला तक रखिए; यह बहुत काम आएगा।
जो पहले से महाभैरव के उपासक हैं, वे चतुर्दशी को क्या करें?
सात या ग्यारह दिन की साधना, या कम से कम एक दिन
जो पहले से महाभैरव की उपासना कर रहे हैं, उनके मंत्रों का जप और उनकी साधना कर रहे हैं, वे या तो उस दिन से शुरू करके सात दिन या ग्यारह दिन की साधना करें, और वह न हो सके तो कम से कम एक दिन की ज़रूर करें। वक्ता कहते हैं कि केवल मंत्र जप की ग्यारह माला भी — वे स्तोत्र की बात नहीं कर रहे; दतिया पीठ के स्वामी जी द्वारा दिया गया महाभैरव स्तोत्र यहाँ विषय नहीं है, और उसके समर्पित वीडियो में पूरा विधि-विधान है।
वक्ता कहते हैं कि जो पहले से महाभैरव की उपासना कर रहे हैं, जो उनके मंत्रों का जप कर रहे हैं और उनकी साधना कर रहे हैं, वे या तो उस दिन से शुरू करके सात दिन या ग्यारह दिन की साधना करें; और वह न हो सके तो कम से कम एक दिन की ज़रूर करें। केवल मंत्र जप की ग्यारह माला भी — वे स्तोत्र की बात नहीं कर रहे। महाभैरव स्तोत्र, जो स्वामी जी ने, दतिया पीठ के महाराज जी ने दिया था, अभी विषय नहीं है; उस पर चर्चा नहीं हो रही। वे कहते हैं, केवल उसके भीतर का मंत्र, जिस पर चैनल पर कई बार चर्चा हुई है, और जिसके लिए पूरे विधि-विधान वाला एक अलग समर्पित वीडियो है।
महाभैरव के लिए कितनी माला और कितना हवन बताया गया है?
पाँच से ग्यारह से इक्कीस माला, और एक हवन
वक्ता कहते हैं कि वे विधि-विधान पर भी चर्चा नहीं कर रहे — केवल मंत्र का साधारण जप। पाँच माला से लेकर ग्यारह या इक्कीस माला तक, जितना संभव हो। और जितना संभव हो उतना हवन: एक माला का कीजिए, या ग्यारह माला का कीजिए।
विंध्याचल से आए एक मेल में श्मशान हवन में शामिल होने की पेशकश की गई और पूछा गया कि क्या लाएँ, 108 अंडे लाने की सोचकर
श्मशान हवन में 108 अंडे लाने की पेशकश वाला मेल
वक्ता कहते हैं कि एक अनोखा मेल आया: कि आप लोग श्मशान में तारा माई का हवन करवाएँगे, और मैं विंध्याचल में हूँ, तो मैं भी आकर श्मशान हवन में बैठूँगा; बताइए क्या लाऊँ, मैं 108 अंडे लाकर अंडे की आहुति देने की सोच रहा हूँ। वे कहते हैं, अब सोचिए, एक व्यक्ति जो दीक्षित नहीं है। ऐसे अति-उत्साही नहीं होना है — कि श्मशान भैरव पर चर्चा हुई है तो अब सीधे श्मशान की चिता पर आहुति होगी। नहीं, नहीं, नहीं, नहीं।
वक्ता कहते हैं कि अति-उत्साही लोग कभी-कभी एक सवाल पूछते हैं। भैया, एक मेल आया, और वह अनोखा मेल था। भैया, बात यह है: आप लोग श्मशान में तारा माई का हवन करवाएँगे। तो मैं सोच रहा हूँ कि मैं अभी यहाँ विंध्याचल में हूँ, तो मैं भी आ जाऊँगा; मैं भी श्मशान हवन में बैठूँगा। उन्होंने पूछा, श्मशान हवन में बैठकर आप क्या करेंगे? पर बताइए क्या करना है और मैं कुछ साथ ले आऊँगा। क्या लाएँगे? तो मैं सोच रहा हूँ कि 108 अंडे लाऊँ और अंडे की आहुति दूँ। वे कहते हैं, अब बताइए: एक व्यक्ति जो दीक्षित नहीं है। इस तरह अति-उत्साही नहीं होना है, कि अब श्मशान भैरव पर चर्चा हो गई तो चल पड़े, अब आहुति सीधे श्मशान की चिता पर ही होगी। नहीं, नहीं, नहीं, नहीं।
जब तक गुरु न मिलें, अपनी स्थिति और हैसियत के अनुसार साधना कीजिए; किसी को इससे ज़्यादा के लिए बाँधा नहीं गया
आप जहाँ हैं और आपकी जितनी क्षमता है, उसके अनुसार कीजिए
वक्ता कहते हैं कि आप जहाँ भी हैं, जिस भी स्थिति में हैं, अपनी जो भी हैसियत है उसके अनुसार — अभी उसी तरह कीजिए। जब उस तरह गुरु मिलेंगे, तब वहाँ से उसी के अनुसार आगे बढ़ेगा। वे कहते हैं कि उन्होंने किसी को बाँधा नहीं है: कि आप हमसे दीक्षित हैं, या आप हमें गुरु मानते हैं इसलिए कहीं नहीं जा सकते। जैसे चाहें जाइए। संसार में विद्वानों की कमी नहीं है; जो आपकी जिज्ञासाएँ शांत करे और आपके सब विषयों पर आपको संतुष्ट करे, उसकी शरण लीजिए।
वक्ता कहते हैं कि आप जहाँ भी हैं, जिस भी स्थिति में हैं, अपनी जो भी हैसियत है उसके अनुसार — अभी उसी तरह कीजिए। जब उस तरह गुरु मिलेंगे, तब वहाँ से उसी के अनुसार आगे बढ़ेगा। वे कहते हैं कि उनकी अपनी स्थिति यह है कि उन्होंने किसी को बाँधा नहीं है: भैया, कि आप हमसे दीक्षित हैं, या आप हमें अपना गुरु मानते हैं इसलिए कहीं नहीं जा सकते। जैसे चाहें जाइए। वे कहते हैं कि संसार में विद्वानों की कमी नहीं है। जो आपकी जिज्ञासाओं को शांत करे और संतुष्ट करे, और जिसकी आप शरण लें, वह आपको आपके सब विषयों पर संतुष्ट करे — उसकी शरणागति लीजिए।
अगर आपके गुरु आपको समय न दें तो?
गुरु का समय सीमित है, और इस कारण छोड़ना गलती है
वक्ता कहते हैं कि आप किसी के विचारों और विद्या से प्रभावित होकर उनके पास जाते हैं, और वे आपको समय नहीं दे पाते — और फिर आप कमेंट करते हैं, भैया, मैं गया, वे इतने विद्वान थे, पर हमें समय नहीं देते। भाई, हर आदमी का समय सीमित है। उनकी अपनी निजी साधना, निजी जीवन, अपना विषय हो सकता है। आपको निराश नहीं होना चाहिए। अगर आप सीधे उनसे दीक्षित हैं, तो ऐसा नहीं कि वे समय नहीं दे रहे तो हम छोड़ दें; परेशानी होगी, और वह भी एक तरह की परीक्षा है — उससे गुज़रिए।
वक्ता कहते हैं कि आपको परेशानी कहाँ होती है, और फिर जब आप लौटकर आते हैं, और तब हम क्या कहते हैं — इसे भी समझिए। आप किसी के विचारों और उनकी विद्या से प्रभावित होकर उनके पास जाते हैं, और वे आपको समय नहीं दे पाते। तो भैया, हर मनुष्य का समय सीमित है। आपके गुरु आपको समय नहीं दे रहे और आप कमेंट करते हैं: भैया, हम गए, वे इतने विद्वान थे, पर हमें समय नहीं देते। भाई, उनकी अपनी निजी साधना हो सकती है; उनका अपना निजी जीवन है, अपना विषय है। आपको निराश नहीं होना चाहिए। अगर आप सीधे उनसे दीक्षित हैं, तो ऐसा नहीं होना चाहिए कि वे समय नहीं दे रहे इसलिए हम इतनी जल्दी छोड़ दें। परेशानी होगी; वह भी एक तरह से परीक्षा है — उससे गुज़रिए।
अगर आपके गुरु आपके सामने किसी की आलोचना करें तो?
आलोचना आपके अपने मन की परीक्षा हो सकती है
वक्ता कहते हैं कि दूसरा विषय यह है कि वे किसी की बुराई करते हैं, और आप यह उन्हें बताते हैं। वे किस संदर्भ में आलोचना कर रहे हैं, यह न आप जान सकते हैं न हम — वे विद्वान लोग हैं। कौन जाने वे आपके मन को परखने के लिए, यह देखने के लिए कि उसमें क्या है, आलोचना करते हों; कौन जाने वे हमें जानते हों और आपके सामने हमारी आलोचना कर रहे हों ताकि आप चार बातें कहें और वे समझ जाएँ कि क्या गड़बड़ है। अगर सच में आपके मन में उस व्यक्ति के लिए बुरा भाव है जिसकी आलोचना हो रही है, तो वहाँ व्यक्त कीजिए — छिपाने की ज़रूरत नहीं; कहिए कि हाँ, उसमें इतनी दुष्टता है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरा विषय यह है कि वे किसी की आलोचना करते हैं। आप हमें यह बताते हैं — कि वे आलोचना करते हैं। वे किस संदर्भ में आलोचना कर रहे हैं, यह न आप जान सकते हैं न हम। वे विद्वान लोग हैं। वे कहते हैं, कौन जाने वे आपके मन को परखने के लिए, यह देखने के लिए कि उसके भीतर क्या है, आलोचना करते हों। कौन जाने वे हमें जानते हों और आपके सामने हमारी आलोचना कर रहे हों ताकि, जब हम उनके सामने आलोचना करें, तो वह चार बातें कहे और हम समझ जाएँ कि वह क्या शरारत कर रहा है। जिसकी वे आलोचना कर रहे हैं, उसे वे अच्छी तरह जानते हों, और वे आपके मन की गहराई नापना चाहते हों। अगर सच में आपके मन में उस व्यक्ति के लिए बुरा भाव है जिसकी वे आलोचना कर रहे हैं, तो वहाँ व्यक्त कीजिए; छिपाने की ज़रूरत नहीं। कहिए कि हाँ, उसमें इतनी दुष्टता है, वह ऐसा है, वैसा है, और बताइए।
गुरु में असली परीक्षा और असली ईर्ष्या में फ़र्क कैसे पहचानें?
यह चैनल नींव देता है, कुल परंपरा नहीं
वक्ता कहते हैं कि दूसरी सच्चाई यह है कि जो सच में ईर्ष्यालु हैं, वे आपको साफ़ दिख जाएँगे। आप स्थिर साधक हैं। हम यहाँ आपको क्या दे रहे हैं? वे कहते हैं कि हम आपको कोई कुल परंपरा नहीं दे रहे, पर आपको इतना मज़बूत बना रहे हैं कि आप जिस भी परंपरा में जाएँ, आपके गुरु धन्य हों कि उन्हें एक शिष्य मिला। उन्हें वहाँ कोई सम्मान नहीं चाहिए और कोई उनके बारे में नहीं पूछेगा; न आप उन्हें जानेंगे न आपके गुरु। पर क्योंकि आपकी नींव इतनी पक्की होगी, आप उस परंपरा के विषय तुरंत सीख-समझकर आगे बढ़ेंगे। वे कहते हैं कि अगर वे इससे चिढ़ने लगें, तो समझिए कुछ गलत है।
वक्ता कहते हैं कि फिर उसके अनुसार वे आपसे जप करने को कहेंगे, या आपसे नहीं मिलेंगे, या आपको परेशान करेंगे — पर वे असल में आपको परेशान नहीं कर रहे; कहीं न कहीं वे आपको परख रहे हैं और साफ़ कर रहे हैं। और वे कहते हैं कि यह तब है जब गुरु योग्य और सामर्थ्यवान हों। दूसरी सच्चाई यह है कि जो सच में ईर्ष्यालु हैं, वे आपको साफ़ दिख जाएँगे। आप स्थिर साधक हैं। हम यहाँ आपको क्या दे रहे हैं? वे कहते हैं कि हम आपको कोई कुल परंपरा नहीं दे रहे, पर आपको इतना मज़बूत बना रहे हैं कि आप जिस भी परंपरा में जाएँ, आपके गुरु धन्य हों — हाँ, मुझे एक शिष्य मिला है। वे कहते हैं कि मुझे वहाँ कोई सम्मान नहीं चाहिए; कोई मेरे बारे में नहीं पूछेगा, न आप मुझे जानते हैं न आपके गुरु मुझे जानेंगे। पर आपकी दृढ़ता बनी रहेगी, आपकी नींव इतनी मज़बूत होगी, कि आप उस परंपरा के विषय तुरंत सीख-समझकर आगे बढ़ेंगे। वे कहते हैं कि अगर वे इस विषय से चिढ़ने लगें, तो समझिए कुछ गलत है। व्यक्ति कितना भी विद्वान हो, अगर आप कुछ बहुत जल्दी पकड़ रहे हैं — परीक्षा की बात और ईर्ष्या की बात ऐसी है कि कोई भी बता सकता है कि क्या चल रहा है। अगर फिर आपको लगे कि यहाँ बिल्कुल अलग ही बात चल रही है, और आपका स्थिर मन अस्थिर हो गया है और आप इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे, तो वहाँ शांति से आप कोई और निर्णय ले सकते हैं। इसलिए किसी को स्वीकार करने से पहले हज़ार बार सोचिए और फिर निर्णय लेकर आगे बढ़िए।
दीक्षा के बाद गुरु शिष्य को क्यों डाँटते हैं?
दीक्षा देते ही ज़िम्मेदारी उनकी हो जाती है
वक्ता कहते हैं कि जब तक आप पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं, आप व्यक्ति को आज़ाद छोड़ देंगे। जिस दिन आप दीक्षा देते हैं, ज़िम्मेदारी आपकी हो जाती है, और फिर आप उस पर ज़रूर चिल्लाएँगे। अगर हमने किसी को दीक्षा दी और कहा जाओ, जप करो, और फिर देखा कि पूरा साल बीत गया और उसने एक लाख जप भी नहीं किया, तो चिढ़ ज़रूर बढ़ेगी। हम दो-चार थप्पड़ लगाते — जब तुम्हें बस घूमना था तो दीक्षा के लिए मेरे पास क्यों आए: गुरु जी, अभी मनाली है, गुरु जी, अभी स्विट्ज़रलैंड है, गुरु जी, अभी अंडमान-निकोबार में मछलियाँ देखने आए हैं। वे कहते हैं, अच्छा है कि हम दीक्षा नहीं देते।
वक्ता कहते हैं कि कारण यही है: जब तक आप पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं, आप व्यक्ति को आज़ाद छोड़ देंगे। जिस दिन आप दीक्षा देते हैं, ज़िम्मेदारी आपकी हो जाती है, और फिर आप उस पर ज़रूर चिल्लाएँगे। अगर हमने किसी को दीक्षा दी — हाँ, जाओ, जप करो — और फिर देखा कि पूरा साल बीत गया और उसने एक लाख जप भी नहीं किया, तो चिढ़ ज़रूर बढ़ेगी। हम दो-चार थप्पड़ लगाते: जब तुम्हें बस घूमना था तो दीक्षा के लिए मेरे पास क्यों आए — गुरु जी, अभी मनाली है; गुरु जी, अभी स्विट्ज़रलैंड है; गुरु जी, अभी अंडमान-निकोबार में मछलियाँ देखने आए हैं। हम जूता ढूँढकर उसे पीटते। वे कहते हैं, अच्छा है कि हम दीक्षा नहीं देते; वरना सब यहाँ से पिटकर भागते।
गुरु जो पुरश्चरण बताएँ, शिष्य उसके बारे में क्या करे?
जल्दी पूरा कीजिए, और अपने जप की गिनती का दिखावा मत कीजिए
वक्ता कहते हैं कि मेहनती बनिए: जब आप ऐसे गुरु के पास जाएँ, तो उनसे पूरा विधि-विधान समझिए, और दीक्षित होने पर कीजिए। अगर गुरु ने आपको कोई पुरश्चरण करने का आदेश दिया है और सौ दिन दिए हैं, तो चाहें तो पचास में कीजिए, पर पहले कीजिए। जब करके आप अपनी क्षमता के अनुसार अपनी योग्यता दिखाएँगे — प्रभु, हम कर सकते हैं — तब वे आपको अपने विषय देंगे। आप आकर यह नहीं कह सकते कि भैया, हम इतनी साधना करके आए हैं, पंचाक्षरी के पाँच करोड़ जप करके आए हैं; उनके लिए आप नगण्य हैं। वे कहते हैं, ऐसे मानिए कि पाँच करोड़ जप के कारण ही आपको वह परंपरा मिली — यह नहीं कि पाँच करोड़ करके आपको सब तुरंत मिल जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि मेहनती बनिए। जब आप ऐसे गुरु के पास जाएँ, तो गुरु जी से पूरा विधि-विधान समझिए, और जब दीक्षित हो जाएँ, तब कीजिए। अगर गुरु ने आपको किसी पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। का आदेश दिया है, और अगर सौ दिन दिए हैं, तो चाहें तो पचास दिन में कीजिए, पर पहले कीजिए। जब करते-करते आप अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें अपनी योग्यता दिखाएँगे — प्रभु, हम कर सकते हैं — तब वे आपको अपने विषय देंगे। आप सीधे कहना चाहते हैं: भैया, हम इतनी साधना करके आए हैं, हम पंचाक्षरी के पाँच करोड़ जप करके आए हैं। वे कहते हैं कि उनके लिए आप नगण्य हैं। ऐसे मानिए कि पाँच करोड़ जप के कारण ही आपको वह परंपरा मिली। यह मत सोचिए कि पाँच करोड़ करके आप वहाँ जाएँगे और सब तुरंत दे दिया जाएगा। नहीं दिया जाएगा; ऐसा नहीं हो सकता। जो आपको मिलना है, वह तब मिलेगा जब आपके गुरु कृपा करेंगे।
मंत्र, गुरु और आराध्य में कोई भेद नहीं होना चाहिए, और वे खुद अपने गुरु को साक्षात भगवती के रूप में देखते हैं
मंत्र, गुरु और आराध्य में कोई भेद नहीं
वक्ता कहते हैं कि गुरु जो भी हों, वे खुद अपने गुरु को साक्षात भगवती के रूप में देखते हैं; कहा गया है कि मंत्र, गुरु और आराध्य में कोई भेद नहीं होना चाहिए। इसे उनका गुरु मंत्र मानिए: चाहे आप उन्हें बड़ा भाई, बेटा, गुरु, मित्र या शत्रु मानें, और चाहे उनसे बुरा भाव रखें, अगर आप साधना के मार्ग पर हैं तो आप उन्हें प्रिय हैं — जब तक आप विधर्मी नहीं बनते। वे कहते हैं, चाहें तो बुरा भाव रखिए; यह असहमति का निजी मामला है। पर अगर आप साधना कर रहे हैं, तो कहीं न कहीं कुछ रक्षा होगी, कभी भगवती बुद्धि देंगी, कभी आप किसी के काम आएँगे और सनातन को मज़बूत करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि गुरु जो भी हों, उनका अपना मन यह है: वे अपने गुरु को साक्षात भगवती के रूप में देखते हैं। कहा गया है न, कि मंत्र, गुरु और आराध्य में कोई भेद नहीं होना चाहिए। तो इसे उनका गुरु मंत्र समझिए: अगर आप उन्हें बड़ा भाई मानें, बेटा मानें, गुरु मानें, मित्र मानें, शत्रु मानें, उनसे बुरा भाव रखें — पर अगर आप साधना के मार्ग पर हैं, तो क्योंकि अगर आप सनातनी हैं तो कहीं न कहीं आप उन्हें प्रिय हैं, जब तक आप विधर्मी नहीं बनते। जो भी हो, बुरा भाव रखिए, कोई परेशानी नहीं; किसी के प्रति बुरा भाव, विचारों की असहमति, एक निजी मामला है, वे कहते हैं। पर अगर आप साधना कर रहे हैं, तो कहीं न कहीं कुछ रक्षा होगी; कभी भगवती बुद्धि देंगी; कभी आप किसी के काम आएँगे और सनातन को मज़बूत करेंगे। तो वे कहते हैं, यह गुरु मंत्र हमेशा याद रखिए: अपने गुरु, अपने आराध्य, और जीवन भर के लिए लिए गए मंत्र में कभी भेद मत कीजिए।
क्या शिष्य को गुरु के सांसारिक दोष देखने चाहिए?
खैनी, शराब, सिगरेट — दुर्गुण देखना बंद कीजिए
वक्ता कहते हैं कि जो गुरु मूर्त स्वरूप में, भगवान के रूप में आपके सामने बैठे हैं, उनमें क्या दोष हैं यह देखना बंद कीजिए — कि वे खैनी खाते हैं, या शराब पीते हैं, या सिगरेट पीते हैं, या गाँजा पीते हैं। भाई, आपने कुछ सोचकर उनसे दीक्षा ली; आपने कोई गुण देखकर गुरु स्वीकार किया। अगर वे सच में ऐसे ही हैं तो वह अलग बात है। वरना, वे कहते हैं, ऐसे बहुत से सिद्ध पुरुष हैं जिनके लिए इस सबका एक कारण है, और लौकिक और पारलौकिक जगत दो बिल्कुल अलग रूप हैं।
वक्ता कहते हैं कि मूर्त स्वरूप में, साक्षात स्वरूप में, भगवान के जिस रूप में आपके गुरु बैठे हैं, उनमें क्या दोष हैं यह देखना बंद कीजिए। कि वे खैनी खाते हैं, या शराब पीते हैं, या सिगरेट पीते हैं, या गाँजा पीते हैं। अरे भाई, वे कहते हैं, आपने कुछ सोचकर उनसे दीक्षा ली। आपने उनमें कोई गुण देखकर गुरु बनाया। उस समय — अब यह अलग बात है, अगर वे सच में ऐसे ही हैं। वरना, वे कहते हैं, ऐसे बहुत से सिद्ध पुरुष हैं जिनके लिए इस सबका एक कारण है: लौकिक जगत और पारलौकिक जगत दो बिल्कुल अलग रूप हैं।
क्या साधक संसार में अपना असली रूप दिखाता है?
लौकिक जगत में छिपाकर रखा गया मूल स्वरूप
वक्ता कहते हैं कि लौकिक जगत में कोई साधक कभी अपना मूल स्वरूप नहीं दिखाने वाला — यह याद रखिए। ज़्यादा से ज़्यादा, जो साधक समाज के कल्याण के लिए समाज के सामने हैं उन्हें दिखाना पड़ता है, और वह ज़रूरी भी है; सब नहीं छिपाएँगे। पर ज़्यादातर साधक, जो समाज के पीछे काम करते हैं या जिनका समाज से कोई लेना-देना नहीं — केवल उनके शिष्यों का उनसे संबंध है — कभी अपना मूल स्वरूप नहीं दिखाने वाले। पारलौकिक गतिविधियों में, या साधना और अनुष्ठान के समय, आपको उनके दिव्य रूपों के दर्शन हो सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि लौकिक जगत में कोई साधक कभी अपना मूल स्वरूप नहीं दिखाने वाला। यह याद रखिए। ज़्यादा से ज़्यादा — हाँ, जो समाज के कल्याण के लिए समाज के सामने हैं उन्हें दिखाना पड़ता है, और वह ज़रूरी भी है। सब इसे नहीं छिपाएँगे। पर ज़्यादातर साधक, जो समाज के पीछे काम कर रहे हैं, या जिनका समाज से कोई लेना-देना नहीं और जिनसे केवल उनके शिष्यों का संबंध है, कभी अपना मूल स्वरूप नहीं दिखाने वाले। पारलौकिक स्वरूप में, पारलौकिक गतिविधियों में, या साधना और अनुष्ठान के समय, आपको उनके दिव्य रूपों के दर्शन हो सकते हैं।
सच में कपटी गुरु को कैसे पहचाना जा सकता है?
एकोऽहं द्वितीयो नास्ति, और साधक का मनोबल टूटना
वक्ता कहते हैं कि जो सच में कपटी हैं, वे ऐसा कुछ करेंगे कि आप समझ जाएँगे कि आप बातों की चतुराई में फँस गए और यहाँ आपकी कहानी खत्म हो गई। ऐसे लोगों के बारे में एक बात समझिए: उनके अनुसार संसार में केवल वे ही सही हैं और बाकी सब गलत। एकोऽहं द्वितीयो नास्ति — जगदंबा ने जो कहा, कि मैं ही हूँ और दूसरा कोई नहीं, ये लोग अपने बारे में कहते हैं: भैया, बस हम हैं और कोई नहीं, बाकी सब धोखेबाज़ और पाखंडी हैं, कुछ नहीं होता, कुछ नहीं होता। वे कहते हैं कि जब यह शुरू होता है, तो साधक का मनोबल टूटने लगता है।
वक्ता कहते हैं कि जो सच में कपटी हैं, वे आपके साथ ऐसा कुछ करेंगे कि आप समझ जाएँगे कि यहाँ बोलने की कला और बातों की चतुराई में फँसकर हमारी कहानी खत्म हो गई। ऐसे लोगों के बारे में एक विषय समझिए: उनके अनुसार संसार में केवल वे ही सही हैं और बाकी सब लोग गलत हैं। वाक्य है: एकोऽहं द्वितीयो नास्ति। जगदंबा ने जो कहा — कि मैं ही हूँ, दूसरा कोई नहीं — ये लोग ठीक वही अपने बारे में कहते हैं, वे बताते हैं: भैया, बस हम हैं, और कोई नहीं; बाकी सब धोखेबाज़ हैं, बाकी सब पाखंडी हैं; कुछ नहीं होता, कुछ नहीं होता, संसार में कुछ नहीं है। वे कहते हैं कि अगर यहाँ यह होने लगे, तो होता यह है कि साधक का मनोबल टूटने लगता है। अगर आप सुनना भी नहीं चाहते, तो साधक का मनोबल टूट जाएगा।
किसी वीडियो में अनुष्ठान का वास्तव में कितना भाग दिखाया जाता है?
पंद्रह प्रतिशत भी अपलोड नहीं, और मुद्रा ही गायब है
वक्ता कहते हैं कि पूरे अनुष्ठान का उनका अपना अपलोड किया पंद्रह मिनट का वीडियो लीजिए। उन्हें लगता है कि उस अनुष्ठान में कम से कम पचास लोग जुड़े थे, फिर भी उन पचास ने भी पूरे पंद्रह मिनट नहीं देखे — एल्गोरिदम पाँच-छह मिनट दिखाता है, सात पर खत्म; शायद एक प्रतिशत ने पंद्रह मिनट देखे, और कुछ ने अंत तक। तो वे कहते हैं, जान लीजिए कि आपको पंद्रह प्रतिशत भी अपलोड नहीं हुआ है। जो किसी परंपरा में दीक्षित हैं वे समझ रहे होंगे कि उसमें क्या छूट रहा है। वे कहते हैं, हम वह नहीं कर सकते। मुद्रा का विषय आप जीवन में कभी नहीं देख पाएँगे, और जान लीजिए कि सबसे ज़्यादा मुद्रा ही होती है।
वक्ता कहते हैं कि एक विषय और। उनकी अपनी चीज़ें लीजिए: सर्च इंजन अनुष्ठान और सबका पंद्रह मिनट का वीडियो अपलोड किया गया, पूरी बात पंद्रह मिनट में। उन पंद्रह मिनटों को देखते हुए आपको लगता है कि बहुत लंबा है, कि इतना कुछ हुआ है, और आप उसे नहीं देखते; छोड़ देते हैं। उन्हें लगता है कि उस अनुष्ठान में कम से कम पचास लोग जुड़े थे, कम से कम पचास। पर उन पचास ने भी पूरे पंद्रह मिनट नहीं देखे — एल्गोरिदम पाँच-छह मिनट दिखाता है, सात मिनट पर खत्म। शायद एक प्रतिशत ने पंद्रह मिनट देखे; कुछ ने अंत तक देखा। तो वे कहते हैं, जान लीजिए कि आपको अभी पंद्रह प्रतिशत भी अपलोड नहीं हुआ है। अगर उसके पूरे मूल सार को देखें, तो उस वीडियो का पंद्रह प्रतिशत भी अपलोड नहीं है। जो किसी परंपरा में दीक्षित हैं, वे समझ रहे होंगे कि यह कैसे काम करता है और अब उसमें कौन सी चीज़ें छूट रही हैं। वे कहते हैं, वह हम नहीं कर सकते। मुद्रापूजा या प्रतिमा-विज्ञान में प्रयुक्त एक प्रतीकात्मक हस्त-मुद्रा — जैसे वरद (वरदान देने वाली) या अभय (निर्भयता प्रदान करने वाली) — प्रत्येक का अपना विशिष्ट अर्थ होता है। के बहुत सारे विषय आप जीवन में कभी नहीं देखने वाले। और मुद्रा के विषय के बारे में यह जान लीजिए: कि सबसे ज़्यादा, सबसे ज़्यादा वही होती है।
जो चैनल कुल परंपरा की सामग्री खुलेआम डालते हैं, उनमें क्या गलत है?
भूतनी मुद्रा और महायोनि मुद्रा में बाल भर का फ़र्क
वक्ता कहते हैं कि ज़रूरी नहीं कि गुरु आपको सब एक साथ दिखा दें; जो एक साथ बहुत कुछ दिखाता है वह आपको प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। यूट्यूब पर बहुत से चैनल हैं जो कुल परंपरा के भीतर रहने वाली छिपी बातें सार्वजनिक रूप से, बहुत विस्तार से डाल रहे हैं। और फिर जनता वह करती है जिसका उसे अधिकार नहीं; करते हुए परेशानी में पड़ती है, और फिर गाली देती है — आपने कहा था यह होगा और हमारे साथ यह हो गया। वे कहते हैं कि उसे पता नहीं कि भूतनी मुद्रा और महायोनि मुद्रा में बाल भर का फ़र्क है, और जहाँ गलती होती है वहाँ कहानी बदल जाती है: भगवती की जगह भूतनी — कांड हो जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि यह ज़रूरी नहीं कि आपके गुरु सब कुछ एक साथ आपके सामने दिखा दें। समझिए कि जो एक साथ बहुत कुछ दिखाता है, वह प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। क्योंकि यह चल रहा है, वे कहते हैं: यूट्यूब देखिए, कितने चैनल हैं जो सारी छिपी बातें, जो कुल परंपरा के भीतर रहनी चाहिए, सार्वजनिक रूप से, बहुत विस्तार से डाल रहे हैं। और जनता उसके साथ क्या कर रही है? जिसके पास कोई अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। नहीं, वह उसे करने लगता है। करते हुए वह परेशानी में पड़ता है। परेशानी में पड़कर वह गाली देने लगता है — कमेंट पढ़िए: आपने कहा था यह करने से यह होगा, और हमारे साथ यह हो गया। अब उसे पता नहीं, वे कहते हैं, कि भूतनी मुद्रापूजा या प्रतिमा-विज्ञान में प्रयुक्त एक प्रतीकात्मक हस्त-मुद्रा — जैसे वरद (वरदान देने वाली) या अभय (निर्भयता प्रदान करने वाली) — प्रत्येक का अपना विशिष्ट अर्थ होता है। और महायोनि मुद्रा में बाल भर का फ़र्क है, और जहाँ गलती होती है वहाँ कहानी बदल जाती है। वह बस करता जाता है। भगवती की जगह, एक भूतनी। कांड हो जाएगा।
कुल परंपरा की सामग्री की जगह चैनल को सार्वजनिक रूप से क्या दिखाना चाहिए?
जो प्रेरित करे वह दिखाइए — सप्तशती पाठ, संस्कृत और हवन
वक्ता कहते हैं कि इसी कारण कहा गया कि विद्या चोरी से नहीं लेनी चाहिए। ऐसी चीज़ें मत दिखाइए जिनसे लोग कुछ गलत सीखें, या चोरी की कोशिश करें, या परेशानी में पड़ें। केवल वही दिखाइए जिससे लोग प्रेरित हों: सप्तशती का पाठ दिखाइए, ताकि वे पढ़ें और बार-बार पढ़ें, ताकि उनकी संस्कृत शुद्ध हो, ताकि वे संस्कृत में सप्तशती का पाठ करना सीखें, ज़ोर से पाठ करना सीखें, उसके लिए हवन करना सीखें।
वक्ता कहते हैं कि सारी परेशानी यही है। इसी कारण कहा गया कि विद्या चोरी से नहीं लेनी चाहिए। ऐसी चीज़ें मत दिखाइए जिनसे लोग कुछ गलत सीखें, या चोरी की कोशिश करें, या परेशानी में पड़ें। केवल वही दिखाइए जिससे लोग प्रेरित हों। वे कहते हैं, सप्तशती का पाठ दिखाइए, ताकि वे पढ़ें और पढ़ते रहें; ताकि उनकी संस्कृत अच्छी तरह शुद्ध हो; ताकि वे संस्कृत में सप्तशती पाठ करना सीखें; ताकि वे ज़ोर से पाठ करना सीखें; ताकि वे उसके लिए हवन करना सीखें।
गुरु वास्तव में किस रूप में आ सकते हैं?
बीड़ी पीता एक आदमी जो आपका हाथ पकड़ ले
वक्ता कहते हैं कि जिस दिन भगवती लंबी कृपा करेंगी, हो सकता है कि बीड़ी पीता और धुआँ उड़ाता एक आदमी, जिसे आप साधारण व्यक्ति समझते हैं, खुद आपके पास आए, आपका हाथ पकड़े और कहे, आओ, मैं दिखाता हूँ कि यह क्या है। कहानियों में नहीं, वे कहते हैं — असली जीवन में ऐसा ही होगा। फिर वे अपने मूल स्वरूप के दर्शन देंगे: देखो, हमारे यहाँ ऐसा है, अब तुम दीक्षित हो जाओ। वे कहते हैं, कौन जाने वे वहाँ बैठकर वह बीड़ी केवल आपके लिए ही पी रहे हों, उस समय की प्रतीक्षा में जब आप आएँगे।
वक्ता कहते हैं कि जो बातें पारंपरिक हैं, जिस दिन भगवती कृपा करेंगी, जिस दिन वे लंबी कृपा करेंगी, हो सकता है कि बीड़ी पीता और धुआँ उड़ाता एक आदमी, जिसे आप साधारण व्यक्ति समझते हैं, खुद आपके पास आए, आपका हाथ पकड़े और कहे, आओ, मैं दिखाता हूँ कि यह क्या है। वे कहते हैं, कहानियों और कथाओं में नहीं — असली जीवन में, वास्तविक जीवन में, ठीक ऐसा ही होगा। फिर वे अपने मूल स्वरूप के दर्शन देंगे: देखो, हमारे यहाँ ऐसा है; अब तुम दीक्षित हो जाओ। वे कहते हैं, कौन जाने वे वहाँ बैठकर वह बीड़ी केवल आपके लिए ही पी रहे हों, इंतज़ार में कि वह आएगा और उसका समय आएगा। वे कहते हैं कि गुरु ठीक ऐसे ही होते हैं।
अगर आपको लगे कि आप इतने छोटे हैं कि आपके लिए गुरु नहीं आएँगे तो?
एक समर्थ आत्मा के लिए भगवान दत्त देह रूप में आएँगे
वक्ता कहते हैं कि आप सोचते हैं कि हम जैसे एक छोटे से व्यक्ति के लिए गुरु शायद ही आएँगे; इतना करके भी यहाँ कोई गुरु कभी नहीं आ सकता, हमें कभी गुरु नहीं मिलेंगे। नहीं बाबू, वे कहते हैं, आप बहुत गलत हैं। एक आत्मा कई करोड़ आत्माओं का कल्याण कर सकती है। अगर आप खुद को उस क्षमता से संपन्न बना रहे हैं, तो केवल आपके लिए भगवान दत्त ज़रूर देह रूप में आएँगे; वे शुद्ध पुरुष खुद आकर आपको दीक्षा देंगे। और यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि जो आपको मिलना चाहिए, आप घर में बंद होकर बैठे रहें और बाहर न जाएँ, तो भी वे आपके घर आकर दे जाएँगे। वे कहते हैं कि यह उनका विश्वास और अनुभव है।
वक्ता कहते हैं कि एक विषय और। आप सोचते हैं कि हम जैसे एक छोटे से व्यक्ति के लिए गुरु शायद ही आएँगे; कि इतना करके भी यहाँ कोई गुरु कभी नहीं आ सकता; कि हमें कभी गुरु नहीं मिलेंगे। नहीं बाबू, वे कहते हैं, आप बहुत गलत हैं। एक आत्मा कई करोड़ आत्माओं का कल्याण कर सकती है। अगर आप खुद को उस क्षमता से संपन्न बना रहे हैं, तो केवल आपके लिए भगवान दत्तात्रेय, देह रूप में, ज़रूर आपके पास आएँगे। वे शुद्ध पुरुष खुद आकर आपको दीक्षा देंगे। और अगर हम यह कहें, वे जोड़ते हैं, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं: जो आपको मिलना चाहिए — आप घर में बंद होकर बैठे रहें और बाहर न जाएँ, तो भी वे आपके घर आकर आपको दे जाएँगे। वे कहते हैं कि यह उनका विश्वास और उनका अनुभव है।
गुरु का विषय इसलिए उठाया गया क्योंकि कुंभ के बाद से बहुत से लोग विचलित हुए हैं और कई जगह दीक्षा ले चुके हैं
कुंभ के बाद से बहुत से विचलित, और कई जगह दीक्षित
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने इस पर चर्चा की कि क्या नहीं करना है, क्या करना है और कैसे निर्णय लेना है, क्योंकि उन्हें लगता है कि कुंभ से अब तक बहुत से लोग विचलित हुए हैं। कई लोगों ने कई जगह दीक्षा ली है और तरह-तरह की बातें हुई हैं। वे इसे सार्वजनिक रूप से नहीं कह सकते, क्योंकि उनके गुरु बड़े और अच्छे स्तर के हैं; तो लोग कहीं न कहीं नकारात्मक हो रहे हैं — हमने यह सुना, वह देखा, वे कहते हैं कि वे इतना कर रहे हैं। वे कहते हैं, धैर्य रखिए।
क्या नहीं करना है, क्या करना है, निर्णय कैसे लेना है — वक्ता कहते हैं कि उन्होंने इस सब पर चर्चा की, क्योंकि उन्हें लगता है कि कुंभ से अब तक बहुत से लोग विचलित हुए हैं। कई लोगों ने कई जगह दीक्षा ली है, और तरह-तरह की बातें हुई हैं। वे कहते हैं कि अब यह सार्वजनिक रूप से नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उनके गुरु बड़े हैं, अच्छे स्तर के हैं। तो कहीं न कहीं लोग नकारात्मक हो रहे हैं — अरे भैया, हमने यह सुना था, वह देखा था, वे कहते हैं कि वे इतना कर रहे हैं। वे कहते हैं, धैर्य रखिए। पर ठीक है।
अगर गुरु नाराज़ हो जाएँ तो कैसे व्यवहार करें?
अहंकार अलग रखिए; गुरु पिता हैं
वक्ता कहते हैं कि हर किसी में कमी और अधिकता होती है; सब मनुष्य हैं। खीझना नहीं चाहिए, और ऐसे भाग नहीं जाना चाहिए — धैर्य रखना सीखिए। और अगर गुरु गुस्से में कुछ कहें और हम भाग जाएँ, तो वह भी अनुचित है। अपना अहंकार अलग रखकर गुरु के पास जाइए। आपके गुरु जो भी हों, जिन्होंने भी आपको दीक्षा दी, जब आप गुरु के पास जाते हैं, तो गुरु पिता हैं और आप बेटे हैं, या आप उनकी बेटी हैं। तो अपना अभिमान अलग रखकर गुरु के पास जाइए, ताकि अगर वे कुछ कहें तो आपको बुरा न लगे।
वक्ता कहते हैं कि हर किसी के भीतर, सब मनुष्य होने के कारण, कमी और अधिकता होती है। खीझना नहीं चाहिए, और ऐसे भाग नहीं जाना चाहिए। धैर्य रखना सीखिए। और अगर गुरु नाराज़ होकर कुछ कहें, और हम भाग जाएँ, तो वह भी अनुचित है। अपना अहंकार अलग रखकर गुरु के पास जाइए। आपके गुरु जो भी हों, जिनसे भी आप दीक्षित हुए — जब आप गुरु के पास जाते हैं, तो गुरु पिता हैं, और आप बेटे हैं, या आप उनकी बेटी हैं। तो अपने अहंकार को एक तरफ़ रखकर गुरु के पास जाइए, ताकि अगर वे कुछ कहें तो आपको बुरा न लगे।
अगर गुरु चरण स्पर्श से मना करें तो?
गुरु का अनादर करके भगवती प्रसन्न नहीं होंगी
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि गुरु जी ने कहा चरण स्पर्श बंद है, तो हम उन्हें प्रणाम ही न करें। अगर हम माई का चरण स्पर्श करें और गुरु जी का चरण स्पर्श न करें, तो क्या वहाँ माई प्रसन्न होंगी? अगर गुरु का अनादर हुआ तो माई आपको चौखट पर ही पटक देंगी। अगर वे गुरु बन गए हैं, तो गुरु गुरु हैं; तब वे स्वयं जगदंबा हैं। वे क्या करते हैं और कैसे करते हैं, यह उनकी लीला है।
वक्ता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि गुरु जी ने कहा चरण स्पर्श बंद है, तो क्या हम फिर उन्हें प्रणाम ही न करें? अगर हम माई का, माई की हर चीज़ का चरण स्पर्श करें, और गुरु जी का चरण स्पर्श न करें, तो क्या वहाँ माई प्रसन्न होंगी? वे कहते हैं कि अगर वहाँ गुरु का अनादर हुआ, तो माई आपको चौखट पर ही पटक देंगी। अगर वे गुरु बन गए हैं, तो गुरु गुरु हैं। तब वे स्वयं जगदंबा हैं। वे क्या करते हैं और कैसे करते हैं, यह उनकी लीला है।
कम उम्र में मरे बच्चे के बारे में वक्ता क्या कहते हैं?
संसार के लिए मसान, घर के लिए देव मनुष्य
वक्ता कहते हैं कि आपके घर का मरा हुआ बच्चा संसार के लिए मसान होगा; आपके लिए वह देव मनुष्य है। याद रखिए कि जब तक वह उस योनि में है और उसने सद्गति स्वीकार नहीं की — इस पर एक समर्पित वीडियो है — तेरह साल से कम, सात साल से कम उम्र में मरे बच्चे को संसार मसान रूप में सिद्ध कर सकता है, और उससे यह-वह करवा सकता है। आपके लिए वह मसान नहीं; आपके लिए वह मसान के देवता नहीं; आपके लिए वह घर के देवता है। अगर आपकी कुलदेवी हैं, कुल देवता हैं, तो वे उसका पालन-पोषण करेंगे, और शक्ति और सामर्थ्य के साथ वह आपका गण, सेवक, पार्षद बन जाता है — आपकी निजी संपत्ति बन जाता है। पर वे कहते हैं कि इस पर और चर्चा करना अशास्त्रीय हो जाएगा।
जैसा हम कहते हैं, वक्ता बताते हैं: जो संसार के लिए मसान है, वह आपके लिए देव मनुष्य होगा — आपके घर का मरा हुआ बच्चा। इसे तब तक याद रखिए जब तक उसकी योनि रहे, जब तक उसने सद्गति स्वीकार नहीं की; इस पर एक समर्पित वीडियो है। तेरह साल से कम, सात साल से कम उम्र में मरे बच्चे को संसार मसान रूप में सिद्ध कर सकता है; संसार उससे माँग सकता है, कह सकता है कि वह यह करेगा और वह करेगा। आपके लिए वह मसान नहीं है। आपके लिए वह मसान के देवता नहीं है। आपके लिए वह घर के देवता है। अगर आपकी कुलदेवी हैं, अगर आपके कुल देवता हैं, तो वे उसका पालन-पोषण करेंगे; शक्ति और सामर्थ्य के साथ, गण के रूप में, सेवक के रूप में, पार्षद के रूप में, वह आपकी निजी संपत्ति बन जाता है। पर वे कहते हैं कि अगर हम इस पर और चर्चा करें, तो यह अशास्त्रीय हो जाएगा।
वक्ता के अनुसार किन चीज़ों को साथ लेकर चलना है?
लोक व्यवहार, शास्त्रोक्त और दर्शन, सही जगह पर लगाए हुए
वक्ता कहते हैं कि सब कुछ साथ लेकर चलना है: तंत्र का लोक व्यवहार भी साथ लेकर चलना है; जो शास्त्रोक्त है वह भी; दर्शन भी। पर यह भी समझना है कि कौन सा कहाँ लगाना है, और कैसे साथ लेकर चलना है। सबको साथ लीजिए; कुछ भी छोड़ना नहीं है। आपको दिन भर दीपक में फूल नहीं बनाने हैं; और ऐसा भी नहीं कि हम अखंड ज्योत या दीपक नहीं जलाएँगे — हम सब करेंगे, पर विधि से, सबको साथ लेकर। कुछ छोटा नहीं, कुछ बड़ा नहीं; सबको साथ लेकर चलना है।
वक्ता कहते हैं कि ये सब चीज़ें साथ लेकर चलनी हैं। तंत्र का लोक व्यवहार भी साथ लेकर चलना है। जो शास्त्रोक्त है वह भी साथ लेकर चलना है। दर्शन भी साथ लेकर चलना है। पर कौन सा कहाँ लगाना है, और उसे कैसे साथ लेकर चलना है — यह भी समझना होगा। सबको साथ लेकर चलना है; कुछ भी पीछे नहीं छोड़ना। वे कहते हैं कि आपको दिन भर दीपक में फूल नहीं बनाते रहना है। और ऐसा नहीं कि हम अखंड ज्योति नहीं जलाएँगे और दीपक नहीं जलाएँगे — हम सब करेंगे, पर विधि से करेंगे, और सबको साथ लेकर चलेंगे। कुछ छोटा नहीं, कुछ बड़ा नहीं। सबको साथ लेकर चलना है। वे कहते हैं कि हम यह विषय ध्यान में रखते हैं।
महाभैरव के तीन अनुष्ठानों में से केवल राजसिक का वीडियो डाला जाता है; श्मशान की सामग्री कभी दिखाई ही नहीं जाती
श्मशान, राजसिक, और मर्कटेश्वर हनुमान अनुष्ठान
वक्ता कहते हैं कि महाभैरव का एक अनुष्ठान श्मशान का है, और दूसरा राजसिक अनुष्ठान है। राजसिक वाले का वीडियो डाला जाएगा; श्मशान वाले की वे कभी कोई सामग्री नहीं डालते, और उसे कभी दिखाना भी नहीं चाहिए। और तीसरा, क्योंकि हनुमान जयंती है, पंचमुखी हनुमान जी का, मर्कटेश्वर हनुमान जी का — जिन्हें श्मशानी, मसानी हनुमान जी भी कहा जाता है — और खासकर बाल हनुमान जी का, रात्रि काल में।
वक्ता कहते हैं कि महाभैरव का अनुष्ठान, एक श्मशान का है; दूसरा राजसिक अनुष्ठान है। राजसिक अनुष्ठान वह है जिसका वीडियो डाला जाएगा। वे कहते हैं कि श्मशान वाले की हम कभी कोई सामग्री नहीं डालते; उसे कभी दिखाना नहीं चाहिए। और तीसरा, क्योंकि हनुमान जयंती है, पंचमुखी हनुमान जी का, मर्कटेश्वर हनुमान जी का, जिन्हें श्मशानी, मसानी हनुमान जी भी कहा जाता है। खासकर उनका, बाल हनुमान जी का, रात्रि काल में — वह उनका है।
हनुमान जयंती के दिन घर पर क्या करना चाहिए?
पूरे परिवार के साथ हनुमान चालीसा हवन, शनि के विरुद्ध
वक्ता कहते हैं कि हम यह सब करेंगे, पर आप घर पर आराम से जलेबी खाते मत बैठिए। श्मशान वाले दिन, जब महाभैरव हैं, महाभैरव का दीप दान कीजिए; और हनुमान जयंती के दिन अपने परिवार के साथ हनुमान चालीसा से हवन कीजिए — कम से कम परिवार के साथ कीजिए। शनिवार है, और शनिवार भी हनुमान जी का दिन है। वे कहते हैं कि शनि देव का समय चल रहा है; शनि देव बहुत खतरनाक हैं, और अगर आप उनसे बचना चाहते हैं, तो परिवार के साथ हनुमान चालीसा का हवन कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि तो हम यह सब करेंगे, पर आपको घर पर आराम से जलेबी खाते नहीं बैठना चाहिए। श्मशान वाले दिन, जिस दिन महाभैरव हैं, महाभैरव का दीपदान कीजिए। और हनुमान जयंती के दिन, अपने पूरे परिवार के साथ हनुमान चालीसा से हवन कीजिए। कम से कम, परिवार के साथ कीजिए। वे कहते हैं कि शनिवार है। हनुमान जी का दिन है; आज मंगलवार है, वह दिन शनिवार है, और शनिवार भी हनुमान जी का दिन है। और शनि देव का समय चल रहा है। आप सबको शनि देव से बचना है न। शनि देव बहुत खतरनाक हैं। अगर आप बचना चाहते हैं, तो परिवार के साथ हनुमान चालीसा का हवन कीजिए।
उस सुबह हनुमान जी की पूजा कैसे करनी चाहिए?
पान, पीपल और तुलसी के पत्तों से श्रृंगार, और लाल फूल
वक्ता कहते हैं कि शनिवार को पूर्णिमा है, हनुमान जी की जयंती। सुबह, दोपहर या शाम, जब भी आपको ठीक लगे; अगर सुबह जल्दी हो सके तो बहुत अच्छा। अगर घर पर हनुमान जी का श्री विग्रह या तस्वीर है, तो उनका श्रृंगार कीजिए। पान के पत्ते से, राम जी का बीज मंत्र लिखे पीपल के पत्ते से, तुलसी जी के पत्ते से अर्चन कीजिए; लाल फूलों से अर्चन कीजिए, सहस्रार्चन आदि कीजिए, बहुत सुंदर तरीके से — और उसके बाद परिवार के साथ हनुमान चालीसा का हवन कीजिए।
वक्ता कहते हैं कि शनिवार को पूर्णिमा है; हनुमान जी की जयंती है। सुबह, दोपहर या शाम, जब भी आपका समय हो; अगर सुबह जल्दी हो सके, तो बहुत अच्छा। अगर घर पर हनुमान जी का श्री विग्रह या तस्वीर है, तो उनका श्रृंगार कीजिए। पान के पत्ते से, राम जी का बीज मंत्र लिखे पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के पत्ते से, तुलसी जी के पत्ते से अर्चन कीजिए। लाल फूलों से अर्चन कीजिए; उनका सहस्रार्चन आदि कीजिए, बहुत सुंदर तरीके से। और उसके बाद, परिवार के साथ हनुमान चालीसा का हवन कीजिए।
संकल्प है कि इस संवत में कम से कम 108 त्रिकोण परिक्रमाएँ हों, चाहे 108 लोगों की हों या 108 पूरी परिक्रमाएँ
इस संवत में एक सौ आठ परिक्रमाएँ
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने जो संकल्प लिया है वह यह है कि इस सनातनी वर्ष में, इस पूरे संवत में, कम से कम 108 परिक्रमाएँ हों — 108 लोगों की, या 108 पूरी परिक्रमाएँ — त्रिकोण की।
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने जो संकल्प सोचा है, या कहिए लिया है, वह यह है कि इस सनातनी वर्ष में, इस पूरे संवत में, 108 परिक्रमाएँ हों — 108 लोगों की, या कम से कम त्रिकोण परिक्रमा की 108 पूरी परिक्रमाएँ।
वक्ता त्रिकोण परिक्रमा को ज़रूरी क्यों कहते हैं?
कर्म और प्रारब्ध के ऋण से मुक्ति
वक्ता कहते हैं कि त्रिकोण की परिक्रमा बहुत ज़रूरी है; जब आप त्रिकोण परिक्रमा करेंगे, तभी हम अपने ऊपर के ऋण से मुक्त होंगे। वे स्पष्ट करते हैं कि वे आर्थिक कर्ज़ की बात नहीं कर रहे, बल्कि कर्म के, प्रारब्ध के ऋण की, जिसके कारण लोग कष्ट भोग रहे हैं — वहाँ जाकर, वे कहते हैं, उससे मुक्ति मिलेगी।
वक्ता कहते हैं कि क्योंकि त्रिकोण की परिक्रमा बहुत ज़रूरी है। जब आप सब त्रिकोण परिक्रमा करेंगे, तभी हम उस ऋण से मुक्त होंगे जो हमारा है। जब हम ऋण से मुक्त होंगे, कर्ज़ से मुक्त होंगे — वे कहते हैं कि वे आर्थिक कर्ज़ की बात नहीं कर रहे। कर्मों का, प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। का कर्ज़, जिसके कारण लोग कष्ट भोग रहे हैं — वहाँ जाकर, भाई, उससे मुक्ति मिलेगी।
किनाराम बाबा के एक शिष्य के प्रसंग में, बारह साल पुराना डकैती का मुकदमा एक त्रिकोण के बाद खत्म हो गया
एक त्रिकोण से खत्म हुआ बारह साल का मुकदमा
वक्ता एक कहानी याद करते हैं जिस पर वे पोस्ट डालेंगे, जो उन्हें ठीक से याद नहीं — वह किनाराम बाबा के शिष्य की थी, भगवान राम की, या शायद विशाल बाबा की, दोनों में से एक — जिसमें किसी पर बारह साल से डकैती या ऐसा ही कोई मुकदमा चल रहा था, और केवल एक त्रिकोण किया गया, और उस एक त्रिकोण में सब हो गया। वे कहते हैं कि यह बारह साल और चल सकता था, पर त्रिकोण करने से प्रारब्ध तुरंत नष्ट हो गया, क्योंकि इसका फल तुरंत मिलता है।
वक्ता कहते हैं कि वे इस पर एक पोस्ट डालेंगे। उन्हें लगता है कि यह किनाराम बाबा के शिष्य की थी — भगवान राम की, या शायद बात विशाल बाबा की थी; दोनों में से एक की, वे कहते हैं, कथा उन्हें ठीक से याद नहीं आ रही। किसी पर डकैती का या ऐसी ही किसी चीज़ का मुकदमा चल रहा था; बारह साल बीत चुके थे। केवल एक त्रिकोण किया गया, और उस एक त्रिकोण में सब कुछ हो गया। वे कहते हैं कि यह और बारह साल चल सकता था, पर त्रिकोण परिक्रमा करने से प्रारब्ध तुरंत नष्ट हो गया, क्योंकि इसका फल तुरंत मिलता है। तो वे कहते हैं, त्रिकोण कीजिए।
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