माघ महाकुंभ — पैंतालीस दिन के नियम, और जाने से पहले गृहस्थ का कर्तव्य
माघ महाकुंभ के अनुशासन पर एक प्रवचन।
210 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
144 also answer a common question
Questions this answers
144 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
महाकुंभ सबसे विशाल पर्व-काल है, जिसकी प्रतीक्षा सिद्ध और चारण देवता भी करते हैं
ऐसा पर्व-काल जिसकी प्रतीक्षा सिद्ध और चारण देवता भी करते हैं
क्योंकि, वक्ता कहते हैं, आने वाला महाकुंभ सबसे विशाल पर्व काल है। सिद्ध और चारण देवता भी इसकी प्रतीक्षा करते हैं। जब पारलौकिक शक्तियाँ इस महा-दिव्य पर्व-काल की राह देखती हैं, तो वे श्रोताओं से कहते हैं — सोचिए, मनुष्य के लिए इसका लाभ कितना विशेष होगा।
वक्ता जय माँ विंध्यवासिनी, हर हर महादेव कहकर आरंभ करते हैं और श्रोताओं का स्वागत करते हैं। वे कहते हैं, आने वाला पर्व काल सबसे विशाल है — महाकुंभ का। इसकी प्रतीक्षा सिद्ध और चारण देवता भी करते हैं। वे कहते हैं, जब पारलौकिक शक्तियाँ इस महा-दिव्य पर्व-काल की प्रतीक्षा करती हैं, तो सोचिए, हम मनुष्यों के लिए इसका लाभ कितना विशेष होगा। वे बताते हैं कि इस विषय की चर्चा आज से शुरू हो रही है।
जय मां विंध्यवासिनी, हर हर महादेव। आप सभी का स्वागत है। आशा करते हैं कि आप सभी बहुत स्वस्थ और अच्छे प्रकार से होंगे। अब आगामी जो सबसे बृहत पर्व काल है, जिसकी प्रतीक्षा सिद्ध चारण देवता भी करते हैं, वह महाकुंभ का है। तो जो पारलौकिक शक्तियां हैं, जब वह इस महादिव्य पर्व काल की प्रतीक्षा करती हैं, तो हम मनुष्यों को सोचिए कितना विशेष लाभ होने वाला है।
क्या महाकुंभ मेला घूमने की बात है?
तीर्थ क्षेत्र बस पर्यटन स्थल बनकर रह गए
नहीं। वक्ता कहते हैं, यह मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक विषय है, मेला घूमने की बात नहीं। पर आज के समय में, वे कहते हैं, हर तीर्थ क्षेत्र बस पर्यटन स्थल बनकर रह गया है। लोग वहाँ केवल और केवल आनंद लेने जाते हैं। तीर्थ क्षेत्र आनंद का पर्याय बन गया है।
वक्ता कहते हैं, यह मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक विषय है। यह मेला घूमने की बात नहीं है। वे कहते हैं, हालाँकि आज के समय में जितने भी तीर्थ क्षेत्र हैं, वे बस पर्यटन स्थल बनकर रह गए हैं, और कुछ नहीं। लोग वहाँ केवल और केवल आनंद लेने जा रहे हैं। वे कहते हैं, तीर्थ क्षेत्र आनंद का पर्याय बन गया है।
इस विषय पर आज से हम लोग चर्चा आरंभ करेंगे। यह अति आवश्यक विषय है मनुष्य जीवन के निमित्त। केवल मेला घूमने का विषय नहीं होता है। हालांकि आज के समय में जितना भी तीर्थ क्षेत्र है, वह पर्यटन का स्थल, पर्यटन स्थल बनकर के ही रह गया है। और लोग वहां सिर्फ और सिर्फ आनंद लेने ही जा रहे हैं। तीर्थ क्षेत्र आनंद का पर्याय बन के रह गया है।
जिस कष्ट ने साधक को तीर्थ की ओर मोड़ा, उसके प्रति उसे क्या भाव रखना चाहिए?
उस कष्ट को धन्यवाद जिसने आपको दिव्य पुण्य का निमित्त बनाया
कृतज्ञता। जिस भी कष्ट से आप साधना, पूजन और पाठ के मार्ग पर आए, और जिस कष्ट से मन में तीर्थ क्षेत्रों के प्रति श्रद्धा जगी, उस कष्ट को अवश्य धन्यवाद देना चाहिए। क्योंकि वह आपको निमित्त बनाकर कोई दिव्य पुण्य दिलाने वाला है — थोड़ा नहीं, बहुत ही विशेष।
पर जो साधक वर्ग के हैं, वक्ता कहते हैं — जिस भी कारण से आप साधना, पूजन और पाठ के मार्ग पर आए, जितने भी कष्ट में आप हैं, जिस कष्ट के लिए आप सेवा-पूजा कर रहे थे — और जिस कष्ट से मन में तीर्थ क्षेत्रों के प्रति श्रद्धा जगी, या आप जाने लगे, या जाने वाले हैं — कहीं न कहीं उस कष्ट को भी अवश्य धन्यवाद देना चाहिए, कि वह आपको निमित्त बनाकर कोई दिव्य पुण्य दिलाने वाला है। कोई नहीं, वे अपनी बात सुधारते हैं — बहुत ही विशेष। यह सबसे विशेष प्रकार का है। इसका पूरा वर्णन, वे कहते हैं, आज से शुरू होता है।
लेकिन जो साधक वर्ग के लोग हैं, चाहे किसी भी कारण से आप साधना पूजन पाठ के मार्ग में आए हैं, आप चाहे कितने भी कष्ट में हो, किसी भी कष्ट के कारण आप सेवा पूजा कर रहे थे। और किसी भी कष्ट के कारण आपके मन में तीर्थ क्षेत्रों के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई या आप जाना आरंभ किए या जाने वाले हैं, तो कहीं ना कहीं उस कष्ट को भी धन्यवाद अवश्य देना चाहिए कि आपको निमित्त बना करके कुछ दिव्य पुण्य की प्राप्ति कराने वाले हैं। कुछ क्या बहुत ही विशेष। यह अति विशिष्ट होता है। इसका पूरा वर्णन आज से हम लोग आरंभ करेंगे।
माघ महीने में स्नान की चली आ रही परंपरा क्या है?
गंगा और देव-सरिताओं में माघ स्नान
हर साल माघ महीने में गंगा जी और बाकी सभी देव-सरिताओं और नदियों में स्नान की परंपरा है। वक्ता कहते हैं, यह पौराणिक मान्यता और शास्त्र-सम्मत विधान है कि माघ में स्नान से हमारे पाप जड़ से नष्ट होते हैं, दिव्य लोक मिलते हैं, और कई कष्टों से मुक्ति मिलती है — किसी भी तरह के रोग और हर तरह के दोष नष्ट होते हैं।
वक्ता कहते हैं, आपने एक विषय देखा होगा। अब तक ऐसा चलता आया है कि हर साल माघ महीने में गंगा जी में, या जो भी दूसरी देव-सरिताएँ और नदियाँ हैं, उनमें स्नान की परंपरा है। और यह मान्यता है, पौराणिक मान्यता है, शास्त्र में दिया गया विधान और शास्त्र-सम्मत बात है, कि माघ महीने में स्नान से हमारे पाप जड़ से नष्ट होते हैं और दिव्य लोक प्राप्त होते हैं। कई कष्टों से मुक्ति मिलती है। जिस भी तरह का रोग हो, वे सब भी नष्ट होते हैं; हर तरह के दोष भी नष्ट होते हैं। वे कहते हैं, माघ महीने का महत्व विशेष रूप से स्नान के लिए है।
आप एक विषय देखे होंगे, अभी तक का जो समय रहा है, ऐसे तो हर वर्ष माघ मास में गंगा जी या अन्य जितने भी देव सरिताएं हैं, नदियां हैं, सभी में स्नान करने की परंपरा है। और यह मान्यता है, पौराणिक मान्यता है, शास्त्रोक्त यह विधान है, शास्त्र सम्मत विषय है कि माघ मास में स्नान करने से हमारे पापों का समूल नाश हो जाता है और दिव्य लोकों की प्राप्ति होती है। अनेक कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है। चाहे किसी प्रकार का रोग हो, उनसे उन सभी का भी नाश होता है, हर प्रकार के दोषों का भी नाश होता है। माघ मास का महत्व है स्नान के लिए विशेष करके।
पौष में लगातार तीन दिन बहते जल में स्नान और उषा-काल में संध्या — यही चला आ रहा नियम है
लगातार तीन दिन बहते जल में स्नान, और उषा-काल में संध्या
कि पौष महीने में यदि कोई कम से कम लगातार तीन दिन गंगा जी में या किसी भी सरिता में — यानी बहते जल के किसी भी स्रोत, किसी नदी में — स्नान करे, और फिर सुबह उषा-काल में संध्या करे, तो केवल तीन दिन करने से ही देव-कृपा से हमारे पापों का शमन शुरू हो जाता है, और पाप बहुत ही जल्दी नष्ट होते हैं।
पौष के विषय पर — पौष और माघ — वक्ता शिव महापुराण में हुई पिछली कुछ चर्चाओं की बात करते हैं, जिनमें यह विषय भी रखा गया था। कि पौष महीने में यदि कम से कम लगातार तीन दिन कोई गंगा जी में या किसी भी सरिता में — यानी जो भी बहते जल का स्रोत हो, कोई नदी — स्नान करे, और फिर सुबह उषा-काल में संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। करे, तो केवल तीन दिन करने से ही देव-कृपा से हमारे पापों का शमन शुरू हो जाता है। वे कहते हैं, बहुत ही जल्दी पाप नष्ट हो जाते हैं।
पौष के विषय में, पौष और माघ, पौष के विषय में जो है शिव महापुराण में जो अभी अंतिम कुछ चर्चाएं हुई थी, उसमें भी इस विषय को रखा गया कि पौष के महीने में कम से कम तीन दिन भी लगातार अगर गंगा जी में स्नान करके या किसी भी सरिता में यानी बहते हुए जल का जो स्रोत हो, नदी उसमें स्नान करके अगर प्रातः काल उषा काल में संध्या किया जाए, तो तीन दिन करने मात्र से भी देव कृपा से हमारे पापों का शमन आरंभ हो जाता है। शीघ्र अति शीघ्र पाप नष्ट हो जाते हैं।
लोग पापों के नाश का क्या अर्थ समझते हैं?
अधीरता, और यह माँग कि हर कष्ट बस खत्म हो जाए
वक्ता कहते हैं, लोगों में धैर्य नहीं है। वे चाहते हैं कि पाप-नाश का एक ही अर्थ हो — जीवन के कष्टों से मुक्ति, कष्ट चाहे जो हो: शरीर का रोग, कोई आधि या व्याधि, शत्रु की बाधा, कुछ भी। यदि वह नष्ट नहीं हो रहा, तो उनकी नज़र में पाप नष्ट नहीं हो रहा।
वक्ता कहते हैं, यहाँ पहला प्रश्न बस यही है: पाप-नाश का अर्थ क्या है? क्योंकि लोगों में धैर्य नहीं है। वे बस यही चाहते हैं कि पाप-नाश का एक ही अर्थ हो — कि हमारे जीवन में कष्टों से मुक्ति हो, कष्ट चाहे जो हो, जैसा भी हो; भाई, कष्ट बस खत्म हो जाए। चाहे शरीर का रोग हो, कोई आधि या व्याधि हो, शत्रु की बाधा हो, कुछ भी हो। यदि वह नष्ट नहीं हो रहा, तो पाप-नाश का क्या अर्थ? तब पाप नष्ट नहीं हो रहा। वे कहते हैं, यही लोगों का लक्ष्य है, यही उनकी मान्यता है।
अब सबसे पहले तो यहां विषय यही हो जाता है कि पाप नष्ट होने का तात्पर्य क्या है? क्योंकि लोगों के पास धैर्य नहीं है। केवल यह चाहते हैं कि पाप नष्ट का एक ही अर्थ होना चाहिए कि हमारे जीवन में कष्टों से मुक्ति चाहे कोई भी कष्ट हो, किसी भी प्रकार का कष्ट हो, भैया कष्ट खत्म हो जाना चाहिए बस। चाहे शरीर का कोई रोग हो, कोई आधि व्याधि हो, कोई शत्रु की बाधा, कुछ भी हो। अगर वह नहीं नष्ट हो रहा है तो फिर पाप नष्ट होने का क्या तात्पर्य है? तो पाप नहीं नष्ट हो रहा है। यह ध्येय है लोगों का ऐसा मान्यता है। दूसरा है कि पाप नष्ट होने का मतलब है कि हम करोड़पति अरबपति बन जाएं, तभी हम मानेंगे। अगर हम करोड़पति नहीं बन रहे हैं, हमारे पास आय का स्रोत नहीं है अगर विशेष, केवल खाने-पीने से काम नहीं चलेगा तो इसका मतलब हमारे पाप अभी भी जीवित हैं। हमारे पापों का क्षय नहीं हुआ है।
क्या पुण्य को भौतिक समृद्धि से मापना ठीक है?
करोड़पति वाली कसौटी, और पुण्य की लालसा से होने वाले अपराध
वक्ता कहते हैं, पाप और पुण्य की तुलना भौतिकता से करना एक स्तर तक ठीक लगता है। पर जब आप उसी में पूरी तरह डूब जाते हैं — कि यदि हम पुण्य-आत्मा हैं तो हमें करोड़पति होना ही चाहिए — वहीं आप गलत हो जाते हैं। वे जोड़ते हैं कि जब तक पाप और पुण्य दोनों रहते हैं, देव-प्राप्ति कभी नहीं होती, और पुण्य के पीछे भागने में ही मनुष्य कई अपराध कर बैठता है।
वक्ता कहते हैं, दूसरी सोच यह है कि पाप-नाश का अर्थ है कि हम करोड़पति, अरबपति बन जाएँ, तभी हम मानेंगे। यदि हम करोड़पति नहीं बन रहे, हमारी कोई खास आमदनी नहीं है, बस खाने-पीने से काम नहीं चलेगा — तो हमारे पाप अभी जीवित हैं और हमारे पापों का क्षय नहीं हुआ। वे कहते हैं, पाप और पुण्य की तुलना भौतिकता से करना एक स्तर तक ठीक लगता है। पर जब आप उसी में पूरी तरह डूब जाते हैं — कि यदि हम पुण्य-आत्मा हैं तो हमें करोड़पति होना चाहिए — वहीं आप गलत हो जाते हैं। और दूसरी बात: जब तक पाप और पुण्य दोनों रहते हैं, देव-प्राप्ति कभी नहीं होती; यह भी ध्यान रखिए। यदि कोई पुण्य की भी लालसा कर रहा है — कि हमें बहुत पुण्य चाहिए, पुण्य बस आता रहे — तो उस पुण्य को पाने के प्रयास में ही मनुष्य से बहुत सारे अपराध हो जाते हैं। वे कहते हैं, इसके पीछे यही कारण है।
भौतिकता के साथ में पाप और पुण्य की तुलना करना एक स्तर तक सही भी लगता है। लेकिन जब आप एकदम उसमें रम जाते हैं कि पुण्य आत्मा अगर हम हैं तो हम करोड़पति ही होने चाहिए तो यहां आप गलत हो जाते हैं। पहला विषय तो यह। और दूसरा विषय, पाप और पुण्य दोनों के रहते हुए कभी भी देव प्राप्ति नहीं होती, यह भी ध्यान लीजिएगा। पुण्य का अर्थ अगर पुण्य की भी कोई कामना कर रहा है ना कि हमें पुण्य बहुत अधिक चाहिए, हमें पुण्य केवल प्राप्त होते रहे तो उस पुण्य को प्राप्त करने के चक्कर में भी व्यक्ति से बहुत सारे अपराध बन जाते हैं। यह कारण है इसके पीछे का।
कुंभ से जीवन-मुक्त और गृहस्थ का अंतर कैसे दिखता है?
वह गृहस्थ जो सुनता है कि कुंभ का एक दिन उसका टिकट पक्का कर देगा
वक्ता आने वाले महाकुंभ का उदाहरण लेते हैं। एक साधारण गृहस्थ किसी संत से, शास्त्र-पुराण से, पढ़कर या सत्संग से जान लेता है कि कुंभ में स्नान करना चाहिए — कि वहाँ एक दिन जाने से भी उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसके आराध्य के लोक का टिकट पक्का हो जाता है। तब वह जाने को उत्सुक होगा, और उसके मन में प्रयाग पहुँचकर संगम में स्नान की ललक जागेगी।
वक्ता कहते हैं, एक उदाहरण लीजिए: अब महाकुंभ पर्व आ रहा है, और कुंभ का बड़ा माहात्म्य है। अब कोई व्यक्ति चाहता है कि हम जाकर कुंभ में स्नान करें। वे कहते हैं, दोनों स्थितियों को अच्छी तरह समझिए: यहाँ जीवन-मुक्त व्यक्ति और साधारण गृहस्थ का अंतर साफ हो जाता है। जो व्यक्ति साधारण गृहस्थ है, उसे यदि किसी संत-महात्मा से, या शास्त्र-पुराण से, पढ़कर, सुनकर, सत्संग सुनकर — कहीं से भी पता चला है कि आने वाले कुंभ पर्व, महाकुंभ आदि में स्नान करना चाहिए; कि यदि एक दिन भी हम वहाँ जाकर पहुँच जाएँ, तो बस उस क्षेत्र में जाने से ही हमारे हर तरह के पाप नष्ट हो जाएँगे, हम पाप-मुक्त हो जाएँगे, और हमारे आराध्य के लोक में हमारा टिकट पक्का हो जाएगा। यह सुनकर और जानकर वह जाने को उत्सुक होगा। उसके मन में यह धड़कन रहेगी — कि हम भी तीर्थ क्षेत्र जाएँ, प्रयाग जाएँ, प्रयाग जी, तीर्थराज जाएँ, और संगम के तट पर स्नान करें।
जैसे उदाहरण के लिए मान लेते हैं, अभी महाकुंभ का पर्व आ रहा है। कुंभ का बहुत महात्म्य है। अब कोई व्यक्ति चाहता है कि हम कुंभ में जाकर के स्नान करें। दोनों विषय को समझिएगा अच्छे प्रकार से। जीवन मुक्त व्यक्ति और सामान्य गृहस्थ दोनों का अंतर यहां होना स्पष्ट है। जो व्यक्ति सामान्य गृहस्थ है, अगर किसी संत महात्मा से कहीं शास्त्र पुराण आदि से चाहे पठन पाठन करके, श्रवण करके, सत्संग आदि को सुनकर कहीं से भी उसे पता चला या उसे जानकारी में है कि भैया कुंभ का पर्व में जो महाकुंभ आदि आ रहे हैं, उसमें स्नान करना चाहिए। अगर एक दिन भी जाकर के हम वहां पहुंच गए और उस क्षेत्र में जाने मात्र से भी हमारे सभी प्रकार के पापों का नाश हो जाएगा, हम पाप मुक्त हो जाएंगे और हमारा टिकट कंफर्म हो जाएगा अपने आराध्य के लोक में। यह विषय अगर उसे सुना उस व्यक्ति ने।
यदि किसी को कुंभ जाने के लिए कर्ज़ लेना पड़े तो?
कर्ज़ देने वाला भी पुण्य में भागी — बशर्ते कर्ज़ लौटाया जाए
यदि उसके पास पैसा नहीं है और इस कारण वह नहीं जा पा रहा, तो वह कर्ज़ लेकर जा सकता है; और जिससे कर्ज़ मिला, उसे भी उस पुण्य का फल मिलता है। वक्ता कहते हैं, यदि वह समय पर पैसा लौटा दे, तो यह बहुत अच्छी बात है।
अब, वक्ता कहते हैं, यदि उसके पास पैसा नहीं है और पैसे के कारण वह नहीं जा पा रहा, तो वह कर्ज़ लेकर जा सकता है। पर वह कर्ज़ लेकर जाएगा, और यदि कर्ज़ नहीं लौटाता — या यदि लेकर जाता है — तो जिससे उसने यह कर्ज़ पाया, उसे भी इस पुण्य का फल मिलेगा। यदि वह समय पर पैसा लौटा दे, तो यह बहुत ही अच्छी बात है।
अब ऐसी अवस्था में जब वह जान गया है तो वह जाने के लिए लालायित होगा। उसके हृदय में यह स्पंदन होगा कि भाई हम भी तीर्थ क्षेत्र में जाएं, प्रयाग में जाएं, प्रयाग जी में जाकर के तीर्थराज में हम भी संगम के तट पर स्नानादि करें। अब उसके पास अगर धन नहीं है, वह जा नहीं सकता है अगर धन के कारण से, तो कर्ज लेकर के जा सकता है। लेकिन कर्ज लेकर के जाएगा और अगर कर्ज नहीं लौटाता है या कर्ज लेकर के जाता है, तो इस कर्ज को जिससे वह प्राप्त किया है, इसके पुण्य का फल उसे भी प्राप्त होगा। अगर वह पैसे वापस कर देता है समय से तब तो बहुत अच्छी बात है।
क्या परिवार को पीछे छोड़कर तीर्थ जाया जा सकता है?
परिवार की स्थिति देखे बिना जाना अपने आप में अपराध है
वक्ता कहते हैं, जब भी हम तीर्थ जाएँ, अपने परिवार की स्थिति देखनी चाहिए; बिना देखे जाना कहीं न कहीं अपराधी बनना है, तो फिर पुण्य क्या मिलेगा? यदि घर में बूढ़े माता-पिता हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं, और किसी संत या महापुरुष से प्रेरित होकर आप उन्हें छोड़कर स्नान करने चले जाएँ, और पीछे उन्हें कुछ हो जाए, तो वह तीर्थ आपको कभी फल नहीं देगा, बल्कि दंड और कष्ट देगा।
वक्ता कहते हैं, दूसरी बात यह है कि जब भी हम तीर्थ जाएँ, यदि अपने परिवार की स्थिति देखे बिना जाते हैं, तो वह भी कहीं न कहीं अपराधी बनना है। तो उससे पुण्य क्या मिलेगा? वे कहते हैं, इस विषय पर ध्यान दीजिए। यदि अब घर में बूढ़े माता-पिता हैं, और उनकी देखभाल करने वाला कोई व्यक्ति नहीं है, और किसी संत की, किसी महापुरुष की वाणी से प्रेरित होकर आप उन्हें छोड़कर किसी तरह स्नान करके लौट आते हैं — और यदि आपके पीछे माता-पिता को कुछ हो जाए, तो आपकी वह तीर्थ यात्रा कभी फल नहीं देगी; बल्कि वह आपको दंड और कष्ट देने वाली होगी। वे कहते हैं, यह ध्यान रखिए। ये साधारण बातें हैं, और ये गृहस्थ के लिए हैं।
दूसरा एक बात है कि जब कभी भी हम तीर्थ पर जाते हैं, अपने परिवार की परिस्थितियों को देखने के उसको अगर बिना देखे चले जाएं तो यह भी कहीं ना कहीं अपराधी होता है। उससे फिर पुण्य की प्राप्ति क्या ही होगी? ध्यान दीजिएगा इस विषय को। अगर अब घर में बुजुर्ग माता-पिता हैं, उनकी देखभाल करने वाला कोई व्यक्ति नहीं है और आप किसी भी संत से, किसी भी महापुरुष के वाणी से प्रेरित होकर के उन्हें छोड़कर के जैसे-तैसे आप जाते हैं और स्नान करके आते हैं और अगर आपके पीछे आपके माता-पिता को कुछ हो जाएगा तो फिर वह आपका तीर्थ कभी फलभूत नहीं होगा, वरन और दंड और कष्ट ही देने वाला आपको होगा।
जीवन-मुक्त दूसरे नियम में आता है, जैसे तपस्या को निकलते समय शुकदेव
जीवन-मुक्त, और तपस्या के लिए निकलते शुकदेव
जो जीवन-मुक्त हैं — जिन्होंने मन से हर तरह का संबंध पूरी तरह छोड़ दिया है, जिनके मन में किसी तरह का विकार नहीं, कोई संबंध ही नहीं। वक्ता कहते हैं, यदि वे ऐसी अवस्था में जाते हैं, तो उनकी बात अलग है। उदाहरण में वे पुराणों में वर्णित शुकदेव जी को रखते हैं — तपस्या को निकलते समय माँ से उनकी बातचीत, जब माँ उन्हें रोकती हैं और वे कहते हैं, ऐसा नहीं हो सकता, हम नहीं रुकेंगे।
पर यहाँ दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, उनकी है जो जीवन-मुक्त हैं। जिन्होंने पूरी तरह मन से अपने हर तरह के संबंध छोड़ दिए हैं; जिनके मन में किसी तरह का विकार नहीं, कोई भी संबंध नहीं। यदि वे ऐसी अवस्था में जाते हैं, तो उनकी बात अलग है। जैसे पुराणों में शुकदेव जी का वर्णन आता है — जब वे तपस्या के लिए जा रहे होते हैं, तब माँ से उनकी पूरी बातचीत, जब माँ उन्हें रोकती हैं और वे कहते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता, हम नहीं रुकेंगे।
यह सामान्य जो विषय हो गए एक गृहस्थ व्यक्ति के लिए हो गया। लेकिन दूसरा विषय यहां पर कि जो जीवन मुक्त हैं। जो पूरे तरीके से अपने हर प्रकार के जो संबंध हैं, वह हृदय से उन्हें छोड़ चुके हैं। उन्हें नहीं किसी प्रकार का कोई मन में किसी प्रकार का कोई विकार ही नहीं है, किसी प्रकार का कोई संबंध ही नहीं है। अगर वो ऐसी अवस्था में जाते हैं तो उनका विषय अलग है। जिस प्रकार से सुखदेव जी का वर्णन जो पुराणों में किया गया है जैसा अपने माता के साथ वो पूरा विषय बोल रहे हैं जब वो तपस्या के लिए जा रहे होते हैं मां रोकती हैं और वो बोलते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता हम नहीं रुकेंगे।
जब माँ ने वंश बढ़ाने को कहा, तब शुकदेव ने क्या उत्तर दिया?
कुतिया और उसके कई पिल्लों वाला तर्क
माँ ने उनसे कहा कि रुको, वंश बढ़ाओ, तुम्हारा विवाह हो, और पुत्र उत्पन्न किए बिना कभी सद्गति नहीं होती। शुकदेव मुनि उत्तर देते हैं कि यदि केवल संतान उत्पन्न करने से सद्गति मिलती, तो कुतिया एक बार में कई पिल्ले जनती है — उसकी सद्गति क्यों नहीं होती? वक्ता ज़ोर देकर कहते हैं, यह तर्क जीवन-मुक्तों के लिए है।
जब माँ उनसे कहती हैं, नहीं, तुम रुको, वंश बढ़ाओ, तुम्हारा विवाह हो, पुत्र उत्पन्न किए बिना कभी सद्गति नहीं होती — तब शुकदेव मुनि कहते हैं कि यदि ऐसा होता, कि केवल संतान उत्पन्न करने से सद्गति मिलती, तो कुतिया एक बार में कई बच्चे जनती है; उसकी सद्गति क्यों नहीं होती? वक्ता कहते हैं, यह तर्क, यह विषय जो उन्होंने रखने का प्रयास किया, किसके लिए है? यह उनके लिए है जो जीवन में जीवन-मुक्त हैं।
और मां जब उनको कहती हैं कि नहीं आप रुको आप वंश की वृद्धि करो आपका विवाह आदि हो पुत्र उत्पन्न किए बिना कभी भी सद्गति नहीं होती है तो यहां पर सुखदेव मुनि जो कह रहे हैं कि अगर ऐसा होता कि संतान उत्पन्न करने मात्र से ही सद्गति होती तो फिर एक बार में श्वान जो है कई सारे बच्चों को जन्म देती हैं जो कुतिया होती हैं कई सारे बच्चों को जन्म देती हैं उसकी सद्गति क्यों नहीं होती है तो ये जो तर्क है ना ये जो विषय है रखने का प्रयास किया ये किसके लिए है जीवन में जीवन मुक्त जो है उनके लिए है।
शुकदेव बारह वर्ष गर्भ में क्यों रहे?
नारायण का वचन कि वैष्णवी माया उन्हें नहीं छुएगी
वे बारह वर्ष अपनी माँ के गर्भ में रहे, और तभी बाहर आए जब भगवान नारायण ने वचन दिया कि उनकी वैष्णवी माया उन्हें नहीं छुएगी, और गर्भ में उन्हें जो भी याद है, उस सबकी स्मृति बनी रहेगी।
वक्ता कहते हैं, वे बारह वर्ष अपनी माँ के गर्भ में रहे, और उसके बाद भगवान नारायण ने यह वचन दिया — कि हाँ, मेरी वैष्णवी माया तुम्हें नहीं छुएगी; माँ के गर्भ में तुम्हें जो भी याद है, उस सबकी स्मृति तुम्हें बनी रहेगी।
वो तो 12 वर्ष तक मां के गर्भ में रह कर के उसके बाद भगवान नारायण जब ये वचन दिए कि हां मेरी वैष्णवी माया आपको स्पर्श नहीं करेंगी आपको सब कुछ स्मरण रहेगा जो भी आपको मां के गर्भ में स्मृत है।
पार्वती गीता गर्भ में जीव के बारे में क्या कहती है?
छठे और सातवें महीने में सारे पिछले जन्मों की स्मृति
वक्ता कहते हैं, गर्भ गीता — श्री पार्वती गीता — में बताया गया है कि जब जीवात्मा माँ के गर्भ में होती है, तो छठे और सातवें महीने में उसे अपने सारे पिछले जन्मों का ज्ञान हो जाता है। वहाँ कष्ट सहते हुए वह भगवती की, अपने आराध्य की स्तुति करती है — कि इस बार जन्म लेकर वह उनकी उपासना अवश्य करेगी, जन्म व्यर्थ नहीं जाने देगी, बस इस कष्ट से मुक्त कर दें। क्योंकि, वे कहते हैं, संसार का सबसे बड़ा कष्ट माँ के गर्भ का कष्ट है, जहाँ जीव उल्टा लटककर उसे सहता है।
वक्ता कहते हैं, ध्यान रखिए, गर्भ गीता में — इस श्री पार्वती गीता में — यह विषय बताया गया है: कि जब जीवात्मा अपनी माँ के गर्भ में रहती है, तो छठे और सातवें महीने में उसे अपने सारे पिछले जन्मों का ज्ञान हो जाता है। और वहाँ कष्ट सहते हुए वह भगवती की, अपने आराध्य की स्तुति करती है। गीता में उन आराध्यों के बारे में लिखा है, और अंत में सारे आराध्य एक ही स्वरूप हो जाते हैं। तो जीव भगवती से प्रार्थना करता है कि इस बार जब हम जन्म लेंगे, तो आपकी उपासना अवश्य करेंगे; इस जन्म को व्यर्थ नहीं जाने देंगे; बस इस बार हमें कष्ट से मुक्त कर दीजिए — क्योंकि संसार का सबसे बड़ा कष्ट माँ के गर्भ का कष्ट है, जहाँ जीव उल्टा लटककर कष्ट भोगता है।
ध्यान रहे कि गर्भ गीता में इस श्री पार्वती गीता में इस विषय का वर्णन किया गया है कि जब जीवात्मा अपने मां के गर्भ में रहता है तो छठे सातवें मास में उसे अपने पूर्व के सभी जन्मों का बोध हो जाता है। और वहीं कष्ट सहते हुए वो स्तुति करता है भगवती से अपने आराध्य से जिस गीता को पढ़िएगा उसमें उन आराध्य के विषय में लिखा गया है और अंततः सभी आराध्य एक ही स्वरूप में हो जाते हैं। तो अब भगवती से वो प्रार्थना करता है कि इस बार जब जन्म लेंगे तो हम भगवती आपकी उपासना अवश्य करेंगे। इस जन्म को हम व्यर्थ नहीं जाने देंगे।
क्या देवी गीता पढ़ लेना काफ़ी है?
पाठ से बढ़कर मनन, और एक वर्ष में दर्शन की फलश्रुति
नहीं। वक्ता कहते हैं, इस पर मनन कीजिए — बस पढ़ने से, पाठ करने से कुछ नहीं होगा। वहाँ जो संदेश देने का प्रयास किया गया है, उसे आत्मसात कीजिए, तब कुछ लाभ होगा। उसकी फलश्रुति, कि भगवती दुर्गा एक वर्ष में दर्शन देती हैं, तभी पूरी होती है; तब नहीं जब आप बस पढ़ते रहें, उस पर मनन-चिंतन न करें और उस पर चलने का प्रयास न करें।
वक्ता कहते हैं, इसे आप श्री पार्वती गीता में, देवी गीता में पढ़ और अध्ययन कर सकते हैं। इस पर मनन कीजिए। बस पढ़िए मत; पाठ करने से कुछ नहीं होगा। वहाँ आपके लिए जो संदेश देने का प्रयास किया गया है, उसे आत्मसात कीजिए, तब कुछ लाभ होगा। तब उसकी फलश्रुति — कि भगवती दुर्गा एक वर्ष में दर्शन देती हैं — पूरी होती है। ऐसा नहीं कि आप बस पढ़ते रहेंगे, उस पर मनन-चिंतन नहीं करेंगे, उस पर चलने का प्रयास नहीं करेंगे; तब कोई लाभ नहीं।
गर्भ में जब जीव जो उल्टा लटक कर के और कष्ट को भुगतता है। श्री पार्वती गीता देवी गीता में आप इसका पठन पाठन कर सकते हैं। इसका मनन कीजिए केवल पढ़िए मत पाठ करने से कुछ नहीं होगा। उसमें जो आपको संदेश देने का प्रयास किया गया है उसे आत्मसात करिएगा तब कुछ लाभ होगा। तब उसकी जो फलसूति है कि भगवती दुर्गा एक वर्ष में दर्शन देती हैं वो तब होता है ऐसे नहीं कि केवल पढ़ते रहोगे कुछ उस पर मनन चिंतन नहीं करोगे वो चलने का कुछ प्रयास नहीं करोगे तो कोई लाभ नहीं है।
साधारण जीवों को अपने पिछले जन्म याद क्यों नहीं रहते?
जन्म के क्षण वैष्णवी माया का जीव को छूना
क्योंकि, जैसा वहाँ बताया गया है, जब भी जीव जन्म लेता है, जन्म के क्षण ही वैष्णवी माया उसे छू लेती है — यानी भगवती की माया उसे छू लेती है — जिससे जीवात्मा अपने पिछले जन्मों की सारी बातें भूल जाती है, जो उसे गर्भ में याद थीं।
तो वहाँ बताया गया विषय यह है कि गर्भ में आपको सब याद आ जाता है, वक्ता कहते हैं; और इसलिए शुकदेव मुनि को भी सब याद था, और वे बस बाहर नहीं आ रहे थे — उनमें वह सामर्थ्य था, वह योग-बल था। बताया गया है कि वे बारह वर्ष गर्भ में रहे। वहाँ कहा गया है कि जब भी जीव जन्म लेता है, जन्म के क्षण ही वैष्णवी माया उसे छू लेती है, यानी भगवती की माया उसे छू लेती है, जिससे जीवात्मा अपने पिछले जन्मों की सारी बातें भूल जाती है, जो उसे गर्भ में याद थीं।
तो वहां जो विषय बताया गया है कि भैया ऐसा है कि गर्भ में आपको सब कुछ स्मरण हो जाता है तो यहां पर सुखदेव मुनि को भी सब कुछ स्मरण था तो वो निकल ही नहीं रहे थे उनके पास वो सामर्थ्य योग बल था। 12 वर्ष तक गर्भ में रहे ऐसा वर्णन है तो जब यहां पर भगवान नारायण कहें कि ठीक है आप इसमें ये बताया गया है कि जब भी जीव जन्म लेता है तो जन्म लेते ही वैष्णवी माया स्पर्श करती हैं यानी भगवती की माया स्पर्श करती हैं और जिससे कि वो जीवात्मा जो है अपने सभी पूर्व जन्म के विषयों को भूल जाता है जो उसे गर्भ में जबकि याद था।
परिवार में रहते हुए भी कौन-सा व्यक्ति दूसरे नियम में आता है?
जिन्होंने घर में रहते हुए मुक्ति का बोध पा लिया है
जिन्होंने उस तरह का मुक्ति का बोध पा लिया है — वे परिवार के भीतर रह रहे हों, पर उनकी अवस्था ऐसी हो कि उनमें किसी तरह का लोभ न हो, और मान-अपमान का उन पर खास असर न पड़े। वक्ता बताते हैं, यदि शुकदेव भूल जाते, तो उन्हें साधारण जीवात्मा की तरह नए सिरे से शुरू करना पड़ता, जैसे आप और हम करते हैं; वरदान मिला, फिर उन्होंने जन्म लिया।
जब भगवान उन्हें वचन देते हैं कि माया नहीं छुएगी, कि तुम नहीं भूलोगे — वक्ता कहते हैं, यदि वे भूल जाते, तो साधारण जीवात्मा की तरह उन्हें नए सिरे से शुरू करना पड़ता, जैसे आप और हम करते हैं। तो वह वचन पाकर उन्होंने जन्म लिया। यहाँ बात ठीक उसी तरह की है: जिन लोगों ने उस तरह का मुक्ति का बोध पा लिया है, वे परिवार के भीतर भी रह रहे हो सकते हैं, पर उनकी अवस्था ऐसी है कि उनमें किसी तरह का लोभ नहीं, और मान-अपमान का उन पर कोई खास असर नहीं होता।
तो वहां जब भगवान उन्हें वचन दे देते हैं कि नहीं स्पर्श होएगा आप नहीं भूलोगे। अगर वो भूल जाते तो फिर सामान्य जीवात्मा के भांति ही फिर से उन्हें नया से शुरू करना पड़ता जैसा हम और आप करते हैं। तो ये वचन मिलने के बाद वो जन्म लिए। तो यहां पर विषय ठीक इसी प्रकार से है कि जो लोग उस प्रकार से मुक्ति की बोध को प्राप्त कर चुके हैं वो परिवार में रह भी रहे हो लेकिन उनकी अवस्था ऐसी है कि उन्हें कोई किसी भी प्रकार का कोई लोभ नहीं है उन्हें मान सम्मान अपमान का कोई विशेष उनके ऊपर प्रभाव नहीं पड़ता है।
क्या ऐसा व्यक्ति भी अपनी ज़िम्मेदारियाँ छोड़कर जा सकता है?
व्यवस्था नहीं, तो जाना नहीं — मुक्त के लिए भी
यदि वे जीवन-मुक्त हो गए हैं, तो ऐसी अवस्था में जाएँ भी तो चलेगा। पर अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हुए बिना, या कोई विकल्प रखे बिना, परिवार के लोगों को — वे जो भी हों — पीछे छोड़कर जाना अनुचित होगा। वक्ता कहते हैं, उनकी व्यवस्था करनी ही चाहिए।
वक्ता कहते हैं, वे जीवन-मुक्त हो गए हैं, तो यदि वे ऐसी अवस्था में जाते हैं, तो चलेगा। पर अपनी किसी भी तरह की ज़िम्मेदारियों से मुक्त हुए बिना, या उसके लिए कोई विकल्प रखे बिना — वे जो भी हों, परिवार के लोग — उन्हें पीछे छोड़कर जाना अनुचित होगा। उनकी व्यवस्था करनी चाहिए।
जीवन मुक्त हो चुके हैं तो वो अगर ऐसी अवस्था में जाएं भी तो चलेगा। लेकिन अपने किसी प्रकार के जो जिम्मेदारी है उनसे विमुक्त हुए बिना या उसका कोई विकल्प रखे बिना चाहे वो कोई भी हो परिवार के सदस्य उनको छोड़कर के जाना अनुचित ही होगा।
कुंभ को मनोरंजन की तरह बेचा जा रहा है, इक्यावन तरह की पान की दुकानों तक
मनोरंजन बना कुंभ — इक्यावन तरह की पान की दुकानें
क्योंकि, वक्ता कहते हैं, पुण्य मिले या न मिले, कुंभ का आनंद लेना है। यूट्यूब, फेसबुक और सारे सोशल मीडिया पर दिखाया जा रहा है कि इक्यावन तरह की पान की दुकानें लग रही हैं, ऐसी मिठाइयाँ आ रही हैं, हिमालय से कोई गोला आ रहा है, कई तरह की चीज़ें आ रही हैं — और लोग खास तौर पर वही आनंद लेने जा रहे हैं। वे सोचते हैं, नहा तो लेंगे ही, उसमें कितना समय लगता है, पर मेला देखना है और एडवेंचर ट्रिप करनी है।
वक्ता कहते हैं, यह विषय ध्यान रखिए, क्योंकि कारण यह है: पुण्य मिले या न मिले, कुंभ का आनंद लेना है, उसका मज़ा लेना है। चैनलों पर, यूट्यूब, फेसबुक पर, सोशल मीडिया पर हर जगह दिखाया जा रहा है कि इस-इस तरह की इक्यावन तरह की पान की दुकानें लग रही हैं, इस तरह की मिठाइयाँ आ रही हैं, हिमालय से कोई गोला आ रहा है, बहुत-बहुत तरह की चीज़ें आ रही हैं। तो लोग खास तौर पर वही आनंद लेने जा रहे हैं — अरे, नहाएँगे, नहाएँगे ही, नहाने में कितना समय लगेगा, नहा लेंगे; पर घूमना है, मेला देखना है, एडवेंचर ट्रिप करनी है।
इस विषय का इसलिए ध्यान रखें कारण ऐसा है ये इसलिए कह रहे हैं क्योंकि कुछ पुण्य लाभ हो या ना हो कुंभ का मजा लिया जाए आनंद लिया जाए चैनल्स में YouTube Facebook सोशल मीडिया पे सब जगह दिखाया जा रहा है कि 51 प्रकार के ऐसे-ऐसे पान के दुकान लग रहे हैं तो इस इस प्रकार की मिठाइयां आ रही हैं तो हिमालय से क्या गोला आ रहा है तो अनेक-अनेक प्रकार की चीजें आ रही हैं तो लोग उनके आनंद को लेने के लिए विशेष करके जाने वाले हैं कि अरे नहाएंगे तो नहाएंगे वो तो नहिए ना करेंगे ठीक है वो नहाने में कितने देर लगेगा नहा लिया जाएगा लेकिन घुमा जाएगा मेला घूमना है एडवेंचर ट्रिप करना है।
पहले परिवार को देखिए, नहीं तो पूरी यात्रा पुण्य नहीं, पाप बन जाती है
पहले परिवार को देखिए, नहीं तो सब पाप बन जाता है
यदि आप एडवेंचर ट्रिप के लिए जा रहे हैं और साथ में थोड़ा पुण्य भी चाहते हैं, तो पहले अपने परिवार को अवश्य देखिए। वक्ता कहते हैं, यदि आप परिवार को दुखी करके जाते हैं, तो हर तरह से आपको केवल पाप ही लगेगा।
तो भाई, वक्ता कहते हैं, यदि आप एडवेंचर ट्रिप के लिए जा रहे हैं, और यदि आप यह भी चाहते हैं कि साथ में थोड़ा पुण्य मिल जाए, तो पहले अपने परिवार को अवश्य देखिए। यदि आप परिवार को दुख देकर जाते हैं, तो हर तरह से आपको केवल पाप ही लगेगा। वे कहते हैं, अब इस विषय को और अच्छी तरह समझते हैं।
तो भैया एडवेंचर ट्रिप करने अगर आप जा भी रहे हो और अगर साथ में ये भी चाह रहे हो कि हम पुण्य भी थोड़ा प्राप्त हो जाए तो पहले परिवार अवश्य देख लीजिएगा। परिवार को दुखी करके अगर आप जाएंगे तो हर प्रकार से आपको पाप ही लगेगा। अब इस विषय को और अच्छे प्रकार से समझ लेते हैं।
मंदिर या सरोवर के तट पर जप कितना अधिक फल देता है?
शिव महापुराण से स्थान का गुणक
श्री शिव महापुराण से वक्ता याद दिलाते हैं कि घर में किया जप यदि मंदिर में किया जाए, तो सौ गुना अधिक फल देता है; और यदि सरोवर के तट पर, सरोवर के तट पर बने शिव मंदिर में किया जाए, तो उससे भी सौ गुना अधिक — यानी घर में किए पूजन-पाठ से हज़ार गुना अधिक।
वक्ता कहते हैं, पिछले विषयों में हम सबने श्री शिव महापुराण के अंतर्गत चर्चा की थी कि अलग-अलग बहुत-सी जगहों पर जाकर पूजन-पाठ करने से कई गुना फल मिलता है। जैसा उदाहरण में दिया गया: यदि आप घर में किसी भी तरह का जप करते हैं, तो जो फल मिलेगा — मंदिर में करने से सौ गुना अधिक फल मिलता है। और फिर यदि आप सरोवर के तट पर, सरोवर के तट पर बने शिव मंदिर में करते हैं, तो उससे भी सौ गुना अधिक — यानी घर में किए पूजन-पाठ से हज़ार गुना अधिक फल।
पूर्व के ही विषयों में हम सभी ने चर्चा किया था श्री शिव महापुराण के अंतर्गत कि अनेक अनेक स्थानों पर जाने का वहां पूजन पाठ करने का बहुत ही कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है। जैसे उदाहरण में बताया गया है कि अगर आप किसी प्रकार का जप घर में करते हैं तो उसका जो फल मिलेगा मंदिर में करने से 100 गुना अधिक फल मिलता है। और फिर आप किसी सरोवर के तट पर करते हैं सरोवर के तट पर स्थित अगर शिव मंदिर में करते हैं तो उससे भी 100 गुना अधिक यानी घर में किए गए पूजन पाठ से हजार गुना अधिक फल हो गया। उसके पश्चात आया है तीर्थ क्षेत्र में।
किन तीन स्थानों को परम दिव्य कहा गया है?
त्रिवेणी, गंगा और सागर का मिलन, और गंगा सागर
मंदिर और सरोवर के बाद आता है तीर्थ क्षेत्र — पर्वत का शिखर, त्रिवेणी संगम का क्षेत्र, प्रयाग का क्षेत्र; वह स्थान जहाँ गंगा जी सागर से मिलती हैं, और गंगा जी का उद्गम; और वह स्थान जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों महानदियाँ मिली हैं, यानी त्रिवेणी जी; और तीसरा, गंगा सागर। वक्ता कहते हैं, ये तीन स्थान अत्यंत, अत्यंत, अत्यंत दिव्य कहे गए हैं।
वक्ता कहते हैं, उसके बाद आता है तीर्थ क्षेत्र: चाहे पर्वत का शिखर हो, या त्रिवेणी जी संगम आदि का क्षेत्र, प्रयाग आदि का क्षेत्र — वह स्थान जहाँ गंगा जी सागर में मिलती हैं, गंगा जी के उद्गम का स्थान, और वह स्थान जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों महानदियाँ मिली हैं, यानी त्रिवेणी जी; और तीसरा, गंगा सागर। वे कहते हैं, ये तीन स्थान अपने आप में अत्यंत, अत्यंत, अत्यंत दिव्य कहे गए हैं। इन स्थानों पर किया जप-तप अनगिनत फल देने वाला है; यह साधारण फल नहीं देता, और इसकी कोई तुलना ही नहीं की जा सकती। यदि आप वहाँ दस माला भी करें, तो उसका कोटि-गुना फल मिलने वाला है।
तो तीर्थ क्षेत्र हुआ पर्वत की शिखर पर हुआ त्रिवेणी जी संगम आदि के क्षेत्र में हो प्रयाग का क्षेत्र आदि का जो विषय है जिस जगह में गंगा जी मिलती हैं सागर में जा के गंगा जी का उद्गम स्थान और जिस जगह में तीनों महानदियां मिली हैं गंगा यमुना सरस्वती वो स्थान यानी कि त्रिवेणी जी और तीसरा है गंगा सागर। ये तीन स्थान अपने आप में अति अति अति दिव्य कहे गए हैं। इन स्थानों पर किया गया जप तप असंख्य फल को देने वाला होता है सामान्य फल को देने वाला नहीं होता उसकी कोई तुलना ही नहीं की जा सकती है।
क्या यह गुणक पाप पर भी लागू होता है?
प्रयाग में किए अपराध भी उसी माप में कई गुना
हाँ — इसी कारण इसका माहात्म्य इतना बड़ा है। वक्ता कहते हैं, यदि आप ऐसे क्षेत्र में जाकर वहाँ पाप करते हैं, तो सोचिए, फल कितने गुना होगा। वे कहते हैं, अभी प्रयाग जी जाकर देखिए: सरकार वहाँ बहुत खर्च कर रही है, पर लोगों ने हर जगह गंदगी फैला रखी है, पान और गुटखे की आदत नहीं छूट रही, और सरकार इस पर कोई लगाम नहीं लगा पाती, क्योंकि आपके भीतर कोई भय नहीं है।
वक्ता कहते हैं, इसी कारण इसका माहात्म्य बहुत बड़ा है। तो यदि आप ऐसे क्षेत्र में जा रहे हैं, और ऐसे क्षेत्र में जाकर पाप करते हैं, तो सोचिए, कितने गुना फल मिलेगा। वे कौन-से पाप करेंगे? अभी प्रयाग जी जाकर देखिए — यदि आप अभी त्रिवेणी जी तक पहुँच भी पाएँ, या कहीं भी जाएँ। सरकार वहाँ बहुत खर्च कर रही है, पर लोगों ने हर जगह गंदगी फैला रखी है। पान और गुटखा खाने की आदत उनसे नहीं छूट रही। सरकार इस पर किसी तरह की लगाम नहीं लगा पाती, क्योंकि रोकेगा कौन — आपके भीतर कोई भय ही नहीं है।
अगर वहां आप 10 माला भी कर रहे हैं तो कोटि गुना फल उसका प्राप्त होने वाला है। इस कारण से इसका महात्म्य बहुत अधिक है तो आप अगर ऐसे क्षेत्र में जा रहे हैं और ऐसे क्षेत्र में जाकर के अगर आप पाप करते हैं तो सोचिए कई गुना अधिक फल प्राप्त होगा। पाप क्या-क्या करेंगे? पाप ऐसे करेंगे कि आप अभी चले जाइए प्रयाग जी अभी जाकर के देखिए वहां आप त्रिवेणी जी तक अगर अभी पहुंच पाए तो या आप कहीं भी चले जाइए। सरकार बहुत खर्च कर रहा है वहां पर लेकिन लोग जो हैं हर जगह उपद्रव मचा कर के रखे हुए हैं।
लोग क्यों कहते हैं कि अनुष्ठान से उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ?
जप से कमाया पुण्य, प्रयाग में एक बार थूकने से खत्म
आप कहते हैं कि जीवन में कष्ट है, आप अनुष्ठान करते और करवाते हैं, ब्राह्मण घर आकर अनुष्ठान कर गए पर कोई लाभ नहीं हुआ। वक्ता पूछते हैं, लाभ कैसे होगा? जो भी पुण्य आपने खुद किए अनुष्ठान से, माला जप से, या ब्राह्मण से करवाकर पाया, आपको बस एक रजनीगंधा या तुलसी खाकर प्रयाग जी के पास थूकना है, और वह सब कई गुना होकर आप पर लद जाता है। फिर वह पुण्य कहाँ से मिलेगा?
वक्ता कहते हैं, आप कहते हैं कि हमारे जीवन में कष्ट है, हम अनुष्ठान करते और करवाते हैं, ब्राह्मण हमारे घर आए, यह अनुष्ठान करके चले गए, पर हमें उससे कोई लाभ नहीं हुआ। तो भाई, लाभ कैसे होगा? जो भी पुण्य आपको अपने किए अनुष्ठान से मिला हो — खुद करके, माला जप करके, या ब्राह्मण से करवाकर — आपको बस एक बार एक रजनीगंधा या तुलसी खाकर प्रयाग जी के पास सब थूक देना है, और वहाँ वह कई गुना होकर आप पर लद जाता है। वह कहाँ से मिलेगा? वे कहते हैं, वह मिलने वाला नहीं है।
पान का गुटका खाना छूट नहीं रहा है। सरकार किसी प्रकार का लगाम लगा नहीं सकता है क्योंकि भैया कौन मना करे। आपके भीतर भय ही नहीं है। आप कहते हो कि भैया हमारे जीवन में कष्ट है हम अनुष्ठान करते हैं करवाते हैं ब्राह्मण हमारे घर आकर के ये अनुष्ठान करके गए लेकिन हमें उसका कोई लाभ नहीं हुआ। तो भाई लाभ कैसे होगा? आप जो अनुष्ठान किए खुद से स्वयं से भी आप कर रहे हो माला जप कर रहे हो या आप किसी ब्राह्मण से करवा रहे हो उसके करने से जितना पुण्य मिला होगा आप एक बार रजनीगंधा तुलसी खाकर प्रयाग जी के पास थूक दीजिए ना सारा तो वहां कई गुना अधिक आपके ऊपर लोड हो गया लद गया कहां से आपको मिलेगा?
बहुत-से लोग तो दूसरे कारणों से जा ही रहे हैं, इसलिए कम से कम इतना — वहाँ कोई अपराध न करें
कम से कम, अपराध तो न करें
क्योंकि, वक्ता कहते हैं, बहुतों का लक्ष्य जाकर पुण्य कमाना नहीं है, लक्ष्य कुछ और ही है। वे जानते हैं कि लोग जाएँगे और खाएँगे-पिएँगे; तो कम से कम अपराध न करें, यदि तीर्थ का पुण्य कमाना है। फिर तीर्थ से लौटकर यदि घर में कष्ट आए या आप पर संकट आए, तो कम से कम मन में यह निश्चय रहे कि हमसे जान-बूझकर कोई अपराध नहीं हुआ — अनजाने में कुछ हुआ हो, तो वह अलग बात है।
वक्ता कहते हैं, यह विषय कई बार बताया गया है, क्योंकि लक्ष्य यह नहीं कि हमें जाकर पुण्य पाना है; लक्ष्य अपना कुछ और है। वे कहते हैं, इस कारण भी वे यह विषय रखते हैं: क्योंकि आप लोग जाएँगे, और मैं जानता हूँ कि लोग खाते-पीते रहेंगे; तो कम से कम अपराध न करें, यदि तीर्थ का पुण्य कमाना है। और फिर यदि तीर्थ जाकर घर लौटने के बाद कष्ट आए या आप पर संकट आए, तो कम से कम आपके भीतर इतना निश्चय रहे — कि हमसे कोई अपराध नहीं हुआ, हमसे जान-बूझकर कोई अपराध नहीं हुआ; अनजाने में कुछ हुआ हो, तो वह अलग बात है।
नहीं मिलने वाला है ना। कई बार इस विषय का वर्णन किया गया है अगर आप केवल क्योंकि उद्देश्य ऐसा नहीं है कि हमें जाकर के पुण्य लाभ करना है उद्देश्य ही कुछ और है अपना। इस कारण से भी हम इसलिए ये विषय रख रहे हैं क्योंकि आप लोग जाइएगा और मुझे पता तो है ना कि भाई लोग तो खाते ही पीते होंगे तो कम से कम आप अपराध ना करें अगर आप तीर्थ का पुण्य कमाना चाहते हैं तो और उसके बाद अगर तीर्थ जा के वापस आ के घर में कष्ट पड़ता है या आपको परेशानी होती है तो कम से कम आप इतना निश्चिंतता तो आपके भीतर हो कि हां हमसे अपराध नहीं हुआ हमसे अपराध नहीं बना जानबूझ कर के अनजाने में कुछ बना हो तो बात अलग है।
तीर्थ से क्या लेकर लौटना चाहिए?
मन का संतोष, और मर्यादा में रहना
यह कि आप पुण्य कमाकर आए हैं, और मन में संतोष होना चाहिए। वक्ता कहते हैं, शायद उनमें उपदेश देने की क्षमता न हो, फिर भी वे जितना हो सके अपने शब्दों में कह रहे हैं: तीर्थ क्षेत्र जाइए, पर मर्यादा में रहिए, अपनी मर्यादाएँ मत लाँघिए, ताकि वहाँ जो पुण्य मिलना है, वह अच्छी तरह मिले।
वक्ता कहते हैं, आप पुण्य कमाकर आए हैं; मन में संतोष होना चाहिए। जब आप इन विषयों से अनजान रहते हैं, तो जो जैसा है, वही उपदेश देने वाला बन जाएगा। वे कहते हैं, मान लीजिए हम इस विषय पर उपदेश दे रहे हैं — मान लेते हैं कि हममें उपदेश देने की क्षमता नहीं है, फिर भी यदि हम इस विषय पर बोल रहे हैं, तो जितना हो सके प्रयास करके अपने शब्दों में कहते हैं: भाई, तीर्थ क्षेत्र जाइए, और मर्यादा में रहिए। अपनी मर्यादाएँ मत लाँघिए, ताकि वहाँ जो पुण्य मिलना है, वह अच्छी तरह मिले। जो मर्यादा में नहीं रहेंगे, जो पान और गुटखा खाएँगे, जो शराब पिएँगे, जिनका नीति-नियम से कोई लेना-देना नहीं, जिन्हें किसी चीज़ का भय नहीं।
पुण्य लाभ करके आए हैं आपके हृदय में संतुष्टि होनी चाहिए। आप जब इन विषयों से अनभिज्ञ रहेंगे अब जो जैसा होता है वैसा ही उपदेश देने वाला होगा। जैसे मान लीजिए कि हम इस विषय का उपदेश कर रहे हैं यह मान लेते हैं हम उपदेश देने का सामर्थ्य हमारे भीतर नहीं है लेकिन फिर भी हम अगर इस विषय को बोल रहे हैं अपने शब्दों को यथासंभव प्रयास करके कि भाई तीर्थ क्षेत्र में जाइए तो मर्यादा में रहिए। अपने मर्यादाओं का उल्लंघन मत कीजिए ताकि वहां का जो पुण्य लाभ होना है वो अच्छे प्रकार से हो। जो लोग मर्यादा में नहीं रहने वाले होंगे जो पान तुरंगा गुटका खाने वाले होंगे जो मदिरा पान करने वाले होंगे जिनको नीति नियम से कोई लेना देना नहीं है जिनको भय नहीं है किसी चीज का।
भय कष्ट से आता है, और धन का बल उसे फ़िलहाल दूर रखता है
धन का बल, और «दिखाओ कहाँ लिखा है»
वक्ता कहते हैं, भय कष्ट से आता है; पर अभी धन का बल और सामर्थ्य है, इसलिए उन्हें भय नहीं। ऐसे लोग जब उनके जैसे विचार सुनते हैं, तो कहेंगे कि उनके कहने से कुछ नहीं होता, यह कहीं लिखा नहीं है — बताओ, कहाँ लिखा है कि रजनीगंधा और तुलसी खाकर थूक नहीं सकते; हमारे शरीर में भी थूक है, मल-मूत्र है, तो वहाँ जाकर हमें कोई दोष लगेगा, इसका क्या मतलब? वे कहते हैं, ऐसा कुछ नहीं होता — गंगा जी के अंदर मत थूको, पर किनारे पर तो थूक ही सकते हैं।
भय क्यों नहीं होगा? वक्ता कहते हैं, भय कष्ट से पैदा होता है। पर अभी धन का बल और सामर्थ्य है, इसलिए अभी उन्हें भय नहीं है। ऐसे लोग जब हमारे जैसे विचार सुनते हैं, तो देखेंगे: अच्छा, ऐसा है, इनके कहने से ऐसा कुछ नहीं होता, यह कहीं लिखा नहीं है। बताओ, कहाँ लिखा है कि रजनीगंधा और तुलसी खाकर थूक नहीं सकते? अरे भाई, वे कहते हैं, ज़िंदगी जर्दा है, इसमें क्या है; हमारे शरीर में भी थूक है, हमारे शरीर में भी मल-मूत्र है — तो इसका क्या मतलब कि हम वहाँ जाएँगे और हमें कोई दोष लगेगा? ऐसा कुछ नहीं होता। गंगा जी के अंदर मत थूको; किनारे पर तो थूक ही सकते हैं।
भय क्यों नहीं होगा कष्ट होने से सब भय होता है। लेकिन अभी क्योंकि धन का बल का सामर्थ्य है तो अभी कोई उनको भय नहीं है। ऐसे लोग जब हम हमारे जैसे विचारों को सुनेंगे तो वो फिर देखेंगे कि अच्छा ऐसा है कि भैया इनके बोलने से ऐसा कुछ नहीं होता ऐसा कहीं नहीं लिखा है। बताओ तो कहां लिखा है कि रजनीगंधा तुलसी खा कर के नहीं थूका जा सकता है। अरे भाई जीवन जरदा है उसमें क्या है हमारे शरीर में भी तो थूक है। हमारे शरीर में भी तो मल मूत्र है तो इसका क्या मतलब है कि हम वहां जाएंगे तो हमें कुछ दोष लग जाएगा। ऐसा कुछ नहीं होता है। आप गंगा जी के अंदर मत थूकिए किनारे पर तो थूक ही सकते हैं।
उन्होंने लोगों को रजरप्पा में कुल्ला करते और गंगा में सुबह का षट्कर्म करते रिकॉर्ड किया है
रजरप्पा में कुल्ला, और गंगा में सुबह का षट्कर्म
वक्ता कहते हैं, उन्होंने नदी में लोगों के कुल्ला करने का वीडियो भी डाला था — वह रजरप्पा का था, दामोदर नदी में। और वे कहते हैं, प्रयाग जी जाइए, वहाँ यह भरपूर मिलेगा। कुल्ला तो छोड़िए, लोग वहाँ सुबह का पूरा षट्कर्म करते हैं, गले में उँगली डालकर सब कुछ गंगा जी में करते हैं, और वही भाई दूसरी तरफ़ नहा रहे होते हैं। वे कहते हैं, यह दुर्दशा है।
और सच में देखिए, वक्ता कहते हैं: हमने नदी में कुल्ला करने का एक वीडियो भी डाला था — वह रजरप्पा का था, दामोदर नदी में। और प्रयाग जी जाइए, वहाँ आपको यह भरपूर मिलेगा। कुल्ला करने की बात तो छोड़िए; वहाँ लोग सुबह का अपना पूरा षट्कर्म वहीं करते हैं। गले में उँगली डालकर सब कुछ गंगा जी में करते हैं, और वही भाई उधर नहा रहे होते हैं। यह इसकी दुर्दशा है।
और आप यथार्थ रूप से देखिए हम तो एक वीडियो भी अपलोड किए थे कुल्ला करने का नदी में रजरप्पा का था दामोदर नदी में कुल्ला करते हुए। और आप जाइए प्रयाग जी में भरमार आपको मिलेगा। कुल्ला का तो विषय छोड़ दीजिए उसमें लोग इस प्रकार से अपना मतलब कि पूरा सुबह का वो षट्कर्म ही कर देते हैं पूरा वहां। पूरा गला में अपना उंगली उंगली डाल वाल के सब गंगा जी में कर रहे हैं वही भाई लोग उधर नहा रहे हैं।
लोग क्यों कहते हैं कि त्रिवेणी और प्रयाग से उन्हें पुण्य नहीं मिला?
आप केवल पुण्य की बात करते हैं, उसी स्थान के पाप की कभी नहीं
तो भाई, पुण्य कैसे मिलेगा, वक्ता पूछते हैं — आप गंगा जी को क्यों बदनाम कर रहे हैं, क्यों कहते हैं कि त्रिवेणी जी पुण्य नहीं देतीं या प्रयाग हमें पुण्य नहीं देता? आप केवल पुण्य की बात करते हैं, कि गंगा में नहाने से पुण्य है; पर यह नहीं कहते कि उसी स्थान पर अपराध करने का पाप भी ठीक उतना ही है। अपराध होगा, और वह अवश्य गिना जाएगा।
तो भाई, पुण्य कैसे मिलेगा, वक्ता पूछते हैं। आप गंगा जी को क्यों बदनाम करते हैं? क्यों कहते हैं कि त्रिवेणी जी पुण्य नहीं देतीं, या प्रयाग हमें पुण्य नहीं देता? आप केवल पुण्य की बात करते हैं, कि गंगा में नहाने से पुण्य है। पर यह नहीं कहते कि उसी स्थान पर अपराध करने का पाप भी ठीक वैसा ही है। वह अपराध होगा, अवश्य होगा। यदि आप अच्छा कर्म करते हैं, तो वह कई गुना हो जाएगा और आपको अनंत गुना अच्छा मिलेगा; यदि आप गलत कर्म कर रहे हैं, अपराध कर रहे हैं, तो ठीक वैसा ही दंड मिलेगा।
ये दुर्दशा है। तो भाई कैसे पुण्य मिलेगा? क्यों गंगा जी को तुम बदनाम कर रहे हो? क्यों त्रिवेणी जी को तुम बोल रहे हो कि त्रिवेणी जी पुण्य नहीं देती हैं या प्रयाग हमारे हमें पुण्य नहीं देते हैं। आप केवल पुण्य की चर्चा करते हो कि गंगा स्नान करने का पुण्य है। लेकिन आप ये नहीं बोलते हो कि उसी जगह में अपराध करने का भी वो वैसा ही पाप है। गुनाह होगा जरूर होगा। आप अच्छा कर्म करोगे वो गुनाह होकर अनंत गुना आपको अच्छा मिल जाएगा। अगर आप गलत काम कर रहे हो, अपराध कर रहे हो तो वैसा ही दंड मिलेगा। अब आप दो दिन ट्रेन में ट्रेवल किए हो दो दिन से आप नहाए नहीं हो शरीर पूरी तरीके से गंदा है।
क्या गंगा में अपने कपड़े धोना ठीक है?
नहाना स्वीकार है; पहने कपड़े धारा में धोना नहीं
यदि आपने दो दिन ट्रेन में सफ़र किया और नहाए नहीं, और वहाँ जाकर कपड़े उतारकर नहाए — इतना स्वीकार है, चलेगा। पर अपने गंदे कपड़े, अंदर के कपड़े तक, गंगा जी में ले जाकर साबुन से अच्छी तरह धोना नहीं। संतों ने भी सत्संगों में कहा है कि पहने हुए कपड़े, कोई भी मैला कपड़ा, गंगा जी में या किसी तीर्थ नदी में डुबोकर कभी नहीं धोना चाहिए। धोना ही हो, तो किसी बर्तन में पानी लेकर किनारे से थोड़ा दूर धोइए — पर उस बहते जल में नहीं।
अब आपने दो दिन ट्रेन में सफ़र किया, वक्ता कहते हैं; दो दिन से नहाए नहीं, शरीर पूरी तरह गंदा है। आप वहाँ गए — ठीक है, कपड़े उतारकर नहा लिए; इतना स्वीकार है, चलेगा। पर गंदे कपड़े, अंदर के कपड़े तक, आप गंगा जी में ले जाते हैं और साबुन से अच्छी तरह धोते हैं। यह विषय कई बार उठाया गया है। संतों ने भी कहा है, और कई जगह लोग सत्संग में यह विषय बताते हैं: पहना हुआ कोई कपड़ा, कोई भी मैला कपड़ा, गंगा जी में या किसी तीर्थ नदी में डुबोकर कभी नहीं धोना चाहिए। धोना ही हो, तो बर्तन में पानी लीजिए, किनारे से थोड़ा दूर आकर धोइए — कोई दिक्कत नहीं; पर उस बहते जल में नहीं धोना है। और आप उसी में धोते हैं।
आप वहां पर गए चलिए आप अपने वस्त्र को हटाए स्नान किए उतना तक स्वीकार है चलेगा। लेकिन जो गंदे वस्त्र हैं यहां तक कि अंतः वस्त्र जो है वो भी आप गंगा जी में ले जाकर के पूरे अच्छे से साबुन लगा लगा के धुल रहे हो।0 कई बार इस विषय को रखा गया है। अब आप नहीं आप आप उपदेशों को लेते नहीं होंगे। संतों ने भी कहा है कई जगह लोग सत्संग में विषय को बोलते हैं कि कभी भी अपने पहने हुए वस्त्र को कभी भी जो जो जूठन वस्त्र हो उसे गंगा जी में डूबा करके या किसी भी तीर्थ नदी में डूबा करके नहीं धोना चाहिए।
पहने कपड़े नदी में धोने से पहला दोष कौन-सा लगता है?
पितरों का एक वर्ग जो जल केवल भूमि पर ग्रहण करता है
सबसे पहले पितरों का दोष आता है। वक्ता कहते हैं, एक योनि है, पितरों का एक प्रकार, जो ऐसे कपड़े से गिरे जल को भूमि से ग्रहण करता है। वे पितर उस जल को गंगा जी के भीतर स्वीकार नहीं कर सकते; वे उसे तभी स्वीकार करेंगे जब आप ज़मीन पर आएँ और जल वहाँ गिरे। तो सबसे पहला दोष अतृप्ति का लगता है — पितरों को तृप्त न करने का दोष वहाँ सबसे पहले लगता है।
वक्ता कहते हैं, यहाँ सबसे पहला दोष पितरों का लगता है। जब भी आप पहना हुआ कपड़ा तुरंत उसमें साफ़ करते हैं — जान लीजिए कि पितृ में एक योनि है, एक प्रकार है, जो उस कपड़े से गिरे जल को भूमि से ग्रहण करता है। तो वे पितर गंगा जी के भीतर जाकर वह जल स्वीकार नहीं कर सकते। वे उसे तभी स्वीकार करेंगे जब आप ज़मीन पर आएँ और जल वहाँ गिरे। तो सबसे पहला दोष अतृप्ति का लगता है — पितरों की तृप्ति का दोष वहाँ सबसे पहले लगता है।
अगर आपको धोना ही है तो किसी पात्र में पानी को लीजिए थोड़े किनारे से दूर आकर के धो लीजिए कोई समस्या नहीं है लेकिन उस बहते हुए जल में नहीं धोना है। और आप उसी में धुलते हो। सबसे पहला दोष लगता है पितरों का यहां पर। जब भी पहने हुए वस्त्र को आप तुरंत जो है उसमें साफ करते हो तो पता है कि पितरों के एक योनि एक प्रकार ऐसा होता है जो कि उस वस्त्र से गिरे हुए जल को भूमि पर से ग्रहण करती है। तो वो पितृ जाकर के गंगा जी के भीतर उस जल को स्वीकार नहीं कर सकते हैं। वो धरती पर ही जब आप स्थल पर आइएगा वहां जब वो जल गिरेगा तो ही वो स्वीकार करेंगे तो सबसे पहला दोष यही लगता है अतृप्ति का।
गंगा के तटों की रक्षा कौन करता है?
तट के हर तय हिस्से पर तैनात हज़ारों रक्षक
वक्ता कहते हैं, पुराणों का अध्ययन करेंगे तो कई पुराणों में गंगा माहात्म्य का वर्णन मिलेगा — नारद आदि से, शिव महापुराण से श्रीमद् देवी भागवत तक, हर जगह। और यह भी जानेंगे कि कहा गया है, गंगा जी के हर तट पर, हर तय सीमा में, कई हज़ार रक्षकों की चौकी है, जो उस तट की रखवाली करते हैं।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, जब आप पुराणों का अध्ययन करेंगे, तो कई पुराणों में गंगा माहात्म्य आदि का वर्णन पाएँगे। नारद आदि से, शिव महापुराण से श्रीमद् देवी भागवत तक — हर जगह पाएँगे। आपको यह जानकारी भी मिलेगी: कि कहा गया है, गंगा जी के हर तट पर, जो भी सीमा तय की गई है, उसमें कई हज़ार रक्षकों की चौकी है। वे तट की रखवाली करते हैं।
पितरों को तृप्त करने का दोष सबसे पहला वहां लग गया। दूसरा आप जब पुराणों का पठन पाठन कीजिएगा जब गंगा महात्म्य आदि का वर्णन अनेक पुराणों में आपको मिलेगा। नारद बिरंडल आदि से लेकर के शिव महापुराण से लेकर के श्रीमद् देवी भागवत हर जगह मिलेगा। आपको यह भी जानकारी प्राप्त होगी कि कहा गया है कि गंगा जी के प्रत्येक तट पे प्रत्येक जो एक सीमा निर्धारित की गई है उसमें कई हजार रक्षकों का स्थान होता है।
प्रयाग के सात-आठ निवासियों ने वेणी माधव की कथा कभी नहीं सुनी थी
प्रयाग के निवासी जिन्होंने वेणी माधव की कथा कभी नहीं सुनी थी
उन्होंने हाल ही में श्री वेणी माधव जी का एक वीडियो डाला था और उसमें यह विषय स्पष्ट किया था। वक्ता कहते हैं, उन्हें आश्चर्य हुआ कि एक-दो नहीं, कम से कम सात-आठ लोग, जो प्रयाग में रहते हैं, उन्हें संदेश भेजकर बोले: हम प्रयाग में रहते हैं, हमारा पूरा जीवन प्रयाग में बीता, पर वेणी माधव जी की ऐसी कथा के बारे में हमें कुछ खास पता नहीं था। वे कहते हैं, यह तो उस कहावत जैसा हो गया — घर की मुर्गी दाल बराबर।
जब आप प्रयाग जी के क्षेत्र में जाते हैं, वक्ता कहते हैं — उन्होंने हाल ही में श्री वेणी माधव जी का एक वीडियो डाला था, और उस वीडियो में यह विषय स्पष्ट किया था। और यह बहुत अद्भुत बात है, यह जानकर उन्हें आश्चर्य हुआ: एक-दो नहीं, कम से कम सात-आठ लोग, प्रयाग के निवासी, सबने संदेश भेजा कि भाई, हम प्रयाग में रहते हैं। हमारा जीवन प्रयाग में बीता, पर वेणी माधव जी की ऐसी कथा के बारे में हमें कुछ खास पता नहीं था। यह उस कहावत जैसा हो गया — घर की मुर्गी दाल बराबर। वहीं रहते हैं, और वेणी माधव जी के बारे में नहीं जानते। वे कहते हैं, उन्हें भी थोड़ा अजीब लगा, पर यही सच है।
जैसे आप प्रयाग जी के क्षेत्र में जाते हैं तो प्रयाग जी में अभी एक वीडियो डाले थे श्री वेणी माधव जी का। तो वेणी माधव जी के वीडियो में इस विषय को स्पष्ट किए हैं और बड़ा अद्भुत भी विषय है कि ये जान कर के मुझे आश्चर्य हुआ एक दो नहीं लगभग कम से कम सात से आठ लोगों ने जो प्रयाग के रहने वाले हैं उन सभी का मैसेज आया कि भैया हम प्रयाग में रहते हैं। हमारा जीवन प्रयाग में बीत गया लेकिन ऐसा कुछ विशेष पता नहीं था कि वेणी माधव जी का ऐसा कथा है। ये अब मतलब वैसा हो गया ना घर का मुर्गी दाल बराबर मतलब वही रहते हैं और वेणी माधव जी के विषय में पता नहीं है।
वेणी माधव जी को क्या माना जाता है?
प्रयाग और त्रिवेणी के नगर देवता और रक्षक
वेणी माधव जी का स्थान प्रयाग में है; वे प्रयाग के रक्षक हैं, वहाँ के नगर देवता, त्रिवेणी जी के रक्षक। उस स्थान की रक्षा की ज़िम्मेदारी, वहाँ लगने वाले माघ मेले की ज़िम्मेदारी और कुंभ की ज़िम्मेदारी वेणी माधव सरकार पर बताई जाती है — यानी वही उस क्षेत्र की रक्षा करते हैं।
वक्ता पहले भी कई बार कह चुके हैं कि ऐसे तीर्थ क्षेत्र हैं जहाँ उसी स्थान का व्यक्ति कभी नहीं गया। वे कहते हैं, यह भी सोचने वाली अजीब बात है; महत्व समझ में नहीं आता। तो वेणी माधव जी का स्थान प्रयाग में है। वे प्रयाग के रक्षक हैं, वहाँ के नगर देवता हैं, त्रिवेणी जी के रक्षक हैं। उस स्थान की रक्षा की ज़िम्मेदारी, वहाँ लगने वाले माघ मेले की ज़िम्मेदारी भी, और कुंभ की ज़िम्मेदारी — कहा जाता है कि यह वेणी माधव सरकार पर है; यानी वही उस क्षेत्र की रक्षा करते हैं।
अब एक बार पहले भी बोले कई बार ऐसा तीर्थ क्षेत्र होता है जहां जाते हैं वहां का व्यक्ति वहीं नहीं गया है। ये भी बड़ा सोचने वाला अजीब सा विषय है ये। महत्व नहीं है। तो वेणी माधव जी का जो स्थान है प्रयाग में प्रयाग के रक्षक हैं वहां के नगर देवता हैं त्रिवेणी जी के रक्षक हैं उस स्थान के रक्षा का दायित्व वहां पर जो माघ का मेला लगता है उस मेला का भी दायित्व जो है कुंभ का जो दायित्व है वो कहा जाता है कि वेणी माधव सरकार के ऊपर है यानी कि वही जो है रक्षा करते हैं उस क्षेत्र की।
वेणी माधव का परिकर कितना बड़ा बताया जाता है?
साठ हज़ार का परिकर और बारह द्वादश माधव सेनापति
उनके साथ पूरे परिकर की संख्या साठ हज़ार बताई गई है, जिनमें बारह उनके सेनापति हैं। उन बारह सेनापतियों को हम द्वादश माधव के नाम से जानते हैं; वे अलग-अलग क्षेत्रों के अधिपति बनते हैं, और उनके साथ साठ हज़ार की सेना चलती है जो उस पूरे इलाके की रखवाली करती है।
तो उनके साथ उनका पूरा परिकर है, वक्ता कहते हैं, और उनकी संख्या साठ हज़ार बताई गई है, जिनमें बारह उनके सेनापति हैं। उन बारह सेनापतियों को हम द्वादश माधव के नाम से जानते हैं; वे अलग-अलग क्षेत्रों के अधिपति बनते हैं। और उनके साथ साठ हज़ार की सेना चलती है, जो उस पूरे क्षेत्र की रखवाली करती है। अब जब आप उस क्षेत्र में जाकर ऐसी गंदगी फैलाते हैं, वे पूछते हैं, तो आप क्या सोचते हैं — कि आपको कोई देख नहीं रहा? इतनी शक्तियाँ, जिनका वर्णन है, वहाँ देखने के लिए मौजूद हैं, और वे हमेशा उसी क्षेत्र में रहती हैं। तो भाई, वे आपका पुण्य भी देख रही हैं और आपका पाप भी, और आपको उसी के अनुसार फल मिलेगा। यह विषय ध्यान रखिए।
तो वो उनके साथ जो पूरे उनके परिकर हैं उनकी संख्या 60000 बताई गई है जिसमें 12 उनके जो हैं सेनापति हैं। 12 सेनापति में जिनको हम लोग द्वादश माधव के नाम से जानते हैं वो अलग-अलग क्षेत्र के अधिपति हो जाते हैं। और उनके साथ में 60000 की सेना चलती है जो कि उस पूरे क्षेत्र की रखवाली करने वाली होती है। अब आप जब उस क्षेत्र में जाकर के इस प्रकार का उपद्रव मचाओगे आपको क्या लग रहा है कि आपको कोई देखने वाला नहीं है? तो देखने वाले इतने सारी शक्तियां वहां पर जिनका वर्णन है वो उपलब्ध हैं जो कि हमेशा उस क्षेत्र में ही उपस्थित रहती हैं।
क्या कुंभ में सच में दिव्य संत होते हैं?
हाँ — पर प्रयाग क्षेत्र में एक चलन शुरू हो गया है
आपने हमेशा सुना होगा कि कुंभ के समय वहाँ कई दिव्य साधु-संत उपस्थित रहते हैं, और वक्ता कहते हैं, यह सच्ची बात है। पर एक और सच जान लीजिए: कुंभ क्षेत्र में, प्रयाग क्षेत्र में एक चलन दिखने लगा है। जो त्रिवेणी जी में रोज़ स्नान करते हैं, वे जब भी समय मिले, यह विषय अच्छी तरह देख सकते हैं।
आप सबने हमेशा सुना होगा, वक्ता कहते हैं, कि कुंभ के समय बहुत सारे दिव्य साधु-संत होते हैं जो वहाँ उपस्थित रहते हैं। यह सच्ची बात है। पर एक और सच जान लीजिए। इसका चलन आने लगा है। कुंभ के क्षेत्र में, प्रयाग के क्षेत्र में, इसका चलन आ रहा है। जो त्रिवेणी जी में नित्य स्नान आदि करते हैं, वे जब भी समय मिले, यह विषय बहुत अच्छी तरह देख सकते हैं।
क्योंकि गंगा जी प्रयाग जी और त्रिवेणी आदि जो विषय रखे जा रहे हैं इनके ऊपर भी आपको हास्य का विषय लग रहा है तो ये बड़ा विचारणीय है। आपके रक्त में कहीं ना कहीं अशुद्धता अवश्य होगी ये हम पूरे दावे के साथ कह सकते हैं। आप सभी सदैव से सुनते आए होंगे कि कुंभ के समय में बहुत सारे ऐसे दिव्य साधु संत होते हैं जो वहां उपस्थित होते हैं सत्य बात है। लेकिन आप एक सत्य और जान लीजिए। उसका रुझान आना शुरू हो गया है। कुंभ के क्षेत्र में है प्रयाग क्षेत्र में उसका रुझान आ रहा है।
सबसे विलक्षण संत कब आते हैं?
महाकुंभ, माघ, गंगा दशहरा और ग्रहण के समय
दिव्य संत-महात्मा वहाँ हैं, बिल्कुल — वे हैं, वे आते हैं। बात केवल इतनी नहीं है; पर इतना निश्चित है, वक्ता कहते हैं, कि जो अत्यंत विलक्षण हैं, वे खास तौर पर महाकुंभ के समय, माघ के समय, गंगा दशहरा और दूसरे तीर्थ पर्व-कालों में, और ग्रहण के समय आएँगे। पर उन सबका आना-जाना वहाँ रोज़ भी चलता रहता है।
कि दिव्य संत-महात्मा वहाँ हैं — बिल्कुल, वे हैं, वे होते हैं, वे आते हैं, वक्ता कहते हैं। और बात केवल इतनी नहीं है। हाँ, इतना निश्चित है: जो अत्यंत विलक्षण होंगे, वे खास तौर पर महाकुंभ के समय, माघ के समय, गंगा दशहरा आदि के समय, तीर्थ के समयों में, पर्व-कालों में, विशेषकर ग्रहण के समय आएँगे। पर उन सबका आना-जाना वहाँ रोज़ भी चलता रहता है।
कि दिव्य संत महात्मा तो हैं बिल्कुल हैं होते हैं आते हैं और ऐसा नहीं है कि केवल और केवल हां ये जरूर है कि जो बहुत अति विशिष्ट होंगे वो महाकुंभ के समय में माघ के समय में गंगा दशहरा आदि का जो समय है जो तीर्थ जो पर्व काल है उसमें ग्रहण आदि के समय में विशेष करके आएंगे। लेकिन ऐसे भी सभी का नित्य वहां पर आना जाना रहता है।
वहाँ के संतों के बीच सबसे विशेष रूप से किस बात से सावधान रहना चाहिए?
सिद्धों के नाम की आड़ लेने वाले दूसरे-तीसरे तरह के लोग
वक्ता कहते हैं, सबसे विशेष बात यह है कि ऐसे दूसरे-तीसरे तरह के लोग भी भरपूर हैं जो कहीं न कहीं दिव्य संतों और सिद्धों की आड़ लेते हैं। इनसे बचना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोगों की बातें सुनकर आप अनजाने में कोई अपराध कर बैठते हैं। वे कहते हैं, इस बार प्रशासन बहुत सख़्त है, और उन्होंने देखा कि काम अच्छा हो रहा है, ताकि कोई अव्यवस्था न हो; फिर भी ध्यान रखना चाहिए कि इसमें क्या-क्या होता है।
पर सबसे विशेष बात, वक्ता कहते हैं, यह है: कि जो कहीं न कहीं दिव्य संतों और सिद्धों की आड़ लेकर दूसरे और तीसरे तरह के लोग हैं — उनकी भी भरमार है। इन विषयों से भी बचना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोगों की बातें सुनकर आप अनजाने में, कहीं न कहीं, कोई अपराध कर बैठते हैं। हालाँकि इस बार प्रशासन बहुत सख़्त है, और उन्होंने देखा कि काम अच्छा हो रहा है, ताकि किसी तरह की अव्यवस्था न हो — फिर भी ध्यान रखिए कि इसमें क्या-क्या होता है। पहला विषय उन लोगों का है जिन्हें आप नहीं जानते।
लेकिन सबसे विशेष बात यह है कि दिव्य संतों सिद्धों का कहीं ना कहीं अवलंबन लेकर के जो दूसरे तीसरे प्रकार के लोग होते हैं उनकी भी भरमार है। इन विषयों से भी बचा जाए क्योंकि आप अनजाने में ही कहीं ना कहीं कुछ अपराध कर बैठते हैं इस प्रकार के लोगों की बातों को सुनकर के। हालांकि इस बार प्रशासन बहुत सख्त है और देखा था कि अच्छा से हो रहा है कि भाई किसी प्रकार की गड़बड़ी ना हो लेकिन फिर भी अब इसमें क्या-क्या विषय होता है इस बात का ध्यान रखें।
कामाख्या में प्रसाद लेने का नियम क्या है, और क्या वह प्रयाग में भी लागू होता है?
भगवती का प्रसाद किसी के भी हाथ से लेना — और अब उसका दुरुपयोग कैसे हो सकता है
वक्ता कहते हैं, कामाख्या क्षेत्र में नियम है कि भगवती का प्रसाद जो भी दे, उसे स्वीकार करना चाहिए: वहाँ ऊँच-नीच नहीं, धर्म-विधर्म का प्रश्न नहीं, पर जाति का प्रश्न उठता है — यदि सबसे निंदित जाति की कोई कन्या भी आपको भगवती कामाख्या का प्रसाद दे रही है, तो साधक हों तो मना नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह दिव्य विषय है और भगवती परीक्षा भी लेती हैं। प्रयाग क्षेत्र में भी, कुंभ और माघ के समय, कोई वेणी माधव जी का या दूसरी शक्तियों का प्रसाद दे रहा हो, तो मना नहीं करना चाहिए — पर आज के समय में इसी नियम का दुरुपयोग भी होगा।
पहली बात उन लोगों की है जिन्हें आप नहीं जानते, वक्ता कहते हैं। हालाँकि, जैसे कामाख्या के क्षेत्र में, हम यह विषय कहते हैं — कि वहाँ भगवती का प्रसाद जो भी दे, उसे स्वीकार कीजिए; उसमें ऊँच-नीच नहीं, धर्म-विधर्म नहीं, पर जाति का प्रश्न आता है। कि यदि विशेषकर सबसे निंदित जाति की कोई कन्या भी आपको भगवती कामाख्या का प्रसाद दे रही है, तो साधक हों तो मना नहीं करना चाहिए — उसके आगे वह आपका निजी विषय हो सकता है — क्योंकि यह दिव्य विषय है, और भगवती परीक्षा भी लेती हैं। प्रयाग के क्षेत्र में भी यह विषय लागू होता है: कि कुंभ, माघ आदि के समय यदि कोई वेणी माधव जी का या दूसरी शक्तियों का प्रसाद आदि दे रहा हो, तो मना नहीं करना चाहिए। पर आज के समय में इसी बात का दुरुपयोग भी होगा; यह विषय ध्यान रखिए। पता नहीं कौन-सा विधर्मी आपसे ईर्ष्या में जल रहा हो, और आप जितना पूजन, पाठ और सेवा करते दिखें, वह उतना ही आपको कुछ खिलाने का प्रयास कर सकता है।
सबसे पहला विषय जिन्हें आप नहीं जान रहे हैं। हालांकि जैसे कामाख्या के क्षेत्र में हम लोग इस विषय को कहते हैं कि वहां कोई भी प्रसाद दे भगवती का तो स्वीकार कर लेना उसमें ऊंचा नीचा धर्म विधर्म धर्म विधर्म तो नहीं लेकिन जाति का विषय आता है कि चाहे सबसे निकृष्टतम जाति का भी विशेष करके कोई कन्या अगर आपको प्रसाद दे रही हो भगवती कामाख्या का तो अगर आप साधक हैं अगर तो बाकी आपका अपना निजी विषय हो सकता है तो आपको ना नहीं कहना चाहिए वो दिव्य विषय होता है परीक्षा भी भगवती लेती हैं। प्रयाग के क्षेत्र में भी ये विषय है कि कुंभ माघ आदि के समय में अगर कोई दे रहा हो प्रसाद आदि वेणी माधव जी का अन्य शक्तियों का तो उसे ना नहीं करना चाहिए लेकिन अभी के समय में इसका ही दुरुपयोग भी होगा इस विषय का ध्यान रखें।
क्या कुंभ क्षेत्र में किसी अनजान व्यक्ति से भोजन लेना चाहिए?
अनजान व्यक्ति द्वारा प्रसाद के नाम पर बाँटी जाने वाली कोई भी चीज़
नहीं। खास तौर पर अनजान व्यक्ति से, यदि आप कुंभ क्षेत्र में जा रहे हैं, तो किसी भी तरह की वस्तु, किसी भी तरह का खाद्य पदार्थ, या प्रसाद के नाम पर बाँटी जा रही कोई भी चीज़ मत लीजिए, यदि आप उसके बारे में नहीं जानते।
खास तौर पर अनजान व्यक्ति से, वक्ता कहते हैं, यदि आप कुंभ क्षेत्र में जा रहे हैं — किसी भी तरह की वस्तु, किसी भी तरह का खाद्य पदार्थ, और प्रसाद के नाम पर जो भी बाँटा जा रहा हो — यदि आप उसके बारे में नहीं जानते, तो मत लीजिए।
पता नहीं कौन सा विधर्मी आपसे जला भुना पड़ा और जितना आप ज्यादा पूजन पाठ सेवा करते हुए दिखाएं दे वो क्या आपको खिलाने पिलाने का प्रयास करें तो अनजान व्यक्ति से विशेष करके अगर आप कुंभ क्षेत्र में जा रहे हैं किसी भी प्रकार की कोई वस्तु किसी भी प्रकार का कोई खाद्य पदार्थ और यह प्रसाद के नाम पर कुछ भी जो बांटा जा रहा हो अगर आपको ना पता हो तो ना लें।
क्या गृहस्थ अन्न क्षेत्रों और शिविरों में भोजन कर सकता है?
खाना गलत नहीं, पर गृहस्थ को किसी का अन्न मुफ़्त में नहीं लेना चाहिए
यदि आप शिविरों और दूसरे क्षेत्रों में जाकर वहाँ अन्न ग्रहण कर रहे हैं, तो गृहस्थ होने के नाते ध्यान रखिए कि आपकी मर्यादा है। आप खा सकते हैं, खाने में कोई हर्ज नहीं — अन्न क्षेत्रों में महाप्रसाद का समय चलेगा और 8 या 10 तारीख से शुरू होगा। यदि आप वहाँ कल्पवास करने जा रहे हैं, या एक-दो दिन के लिए भी, तो बिल्कुल अन्न खा सकते हैं; पर गृहस्थ के नाते आपका कर्तव्य-धर्म है कि किसी का अन्न कभी उस तरह न लें। उसका कुछ मूल्य देना चाहिए।
यदि आप शिविरों आदि के क्षेत्र में जा रहे हैं, वक्ता कहते हैं, और दूसरे क्षेत्रों में जाकर अन्न ग्रहण कर रहे हैं, तो गृहस्थ होने के नाते यह ध्यान रखिए: आपकी मर्यादा है। आप खा सकते हैं; खाने में कोई हर्ज नहीं, क्योंकि अन्न क्षेत्रों में महाप्रसाद का समय चलेगा और अब 8 या 10 तारीख से शुरू होगा। यदि आप वहाँ कल्पवास करने जा रहे हैं, या किसी और कारण से एक-दो दिन के लिए भी जाते हैं, तो बिल्कुल अन्न खा सकते हैं। पर गृहस्थ होने के नाते आपका कर्तव्य और धर्म बनता है कि जिसका भी अन्न हो — जो हम वहाँ बैठकर लेते हैं, जो अन्न क्षेत्र में लेते हैं — उसे कभी उस तरह नहीं लेना चाहिए। उसका कुछ मूल्य देना चाहिए।
अगर आप शिविर आदि के क्षेत्र में जा रहे हैं अन्य क्षेत्र में जाकर के आप अन्न स्वीकार कर रहे हैं आप गृहस्थ हैं तो इस बात का ध्यान रखना चाहिए आपको आपकी मर्यादा है आप खा सकते हैं खाने में बुराई नहीं है क्योंकि अन्य क्षेत्र में महाप्रसाद का समय चलेगा शुरू भी हो जाएगा अभी 8-10 तारीख से शुरू हो जाएगा अन्य क्षेत्र। अगर आप वहां पर कल्पवास करने वाले हैं या अन्य कोई विषय आप एक-दो दिन के लिए भी जाते हैं आप बिल्कुल अन्न खा सकते हैं लेकिन गृहस्थ होने के नाते आपका यह कर्तव्य धर्म बनता है कि कभी भी किसी का अन्न जो चाहे हम वहां बैठकर के भी ले रहे हैं अन्य क्षेत्र में भी ले रहे हैं तो ऐसे नहीं लेना चाहिए।
क्या महाकुंभ में कोई आपकी जाति पूछेगा?
कोई पैसा नहीं लेता, कोई जाति नहीं पूछता, और प्रसाद दिन में तीन बार चलता है
वक्ता कहते हैं, वहाँ कुछ लेने वाले बहुत कम मिलेंगे; ऐसी जगहें भी होंगी जहाँ कुछ नहीं लिया जाएगा, या ऐसी जगह बनाई जाएगी जहाँ जो चाहे दे या न दे, और कोई कुछ नहीं कहेगा। वहाँ आपकी जाति भी नहीं पूछी जाएगी — कि आप ऊँचे हैं तो बैठिए, नीचे हैं तो मत बैठिए; कुंभ में, महाकुंभ में ऐसा कुछ नहीं होने वाला। और प्रसाद चलेगा, दिन में तीन बार; कुछ चौबीस घंटे भी चलाएँगे, और बारह घंटे तो अवश्य चलाएँगे।
अब वहाँ कुछ लेने वाले लोग बहुत कम मिलेंगे, वक्ता कहते हैं; ऐसा भी होगा कि कुछ जगहों पर कुछ नहीं लिया जाएगा, या ऐसी जगह बनाई जाएगी कि भाई, जो चाहे दे या न दे, और वहाँ कुछ कहने वाला कोई नहीं। वहाँ आपकी जाति भी नहीं पूछी जाएगी — कि आप ऊँचे हैं तो बैठिए, आप नीचे हैं तो मत बैठिए; कुंभ में, महाकुंभ में ऐसा कुछ नहीं होने वाला। और प्रसाद चलेगा; दिन में तीन बार चलेगा। या अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार कुछ चौबीस घंटे भी चलाएँगे; बारह घंटे तो अवश्य चलाएँगे।
उसका कुछ मूल्य दे देना चाहिए। अब वहां लेने वाले बहुत कम भी लोग मिलेंगे ऐसा भी होगा जहां पर नहीं लिया जाएगा या कहीं स्थान बना हुआ कि हां भाई जिसकी इच्छा है दे ना दे वहां कोई बोलने वाला नहीं है। ना ही वहां कोई आपसे जाति पूछी जाएगी कि आप ऊंचे हो तो बैठो नीचे हो तो मत बैठो ऐसा वैसा कुंभ में तो ऐसा महाकुंभ में कुछ नहीं होने वाला है और प्रसाद के प्रसाद चलेगा तीन-तीन समय का चलेगा।
अन्न क्षेत्र में महाप्रसाद लेने के बाद क्या करना चाहिए?
सामर्थ्य के अनुसार दान दें, नहीं तो पुण्य कटता है
जब भी आप प्रसाद या महाप्रसाद लें, या अन्न क्षेत्र में जाएँ, तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार वहाँ जितना उचित लगे उतना दान दें। कहें कि प्रभु, आज हमने प्रसाद पाया है, यह हमारी ओर से है। इसे किसी व्यक्ति को दें, या वहाँ जो मुख्य स्थान बना है उसमें अर्पित करें, ताकि यह फिर अन्न की सेवा में लगे। वक्ता कहते हैं, इसे ऐसे ही नहीं खाना है, नहीं तो आपका जो भी तीर्थ-फल है, उसमें से कट जाएगा, माइनस हो जाएगा, 28% जीएसटी के साथ।
वक्ता कहते हैं, जब भी आप प्रसाद या महाप्रसाद लें, या अन्न क्षेत्र में जाएँ, तो भाई, अपनी सामर्थ्य के अनुसार वहाँ जितना उचित लगे उतना दान दें। कहें कि प्रभु, आज हमने प्रसाद पाया है; यह हमारी ओर से है। चाहे किसी व्यक्ति को दें, या वहाँ जो मुख्य स्थान बना है उसमें अर्पित करें, ताकि यह फिर अन्न की सेवा में लगे। इसे ऐसे ही नहीं खाना है। नहीं तो जिसका भी पैसा उसमें लगा, जिसका भी वह अन्न था — आपका जो भी तीर्थ का फल है, भाई, उसमें से कट जाएगा, माइनस हो जाएगा, 28% जीएसटी के साथ। तो ध्यान रखें, वे कहते हैं: जब आप इतनी मेहनत से जा रहे हैं, तो अपने पुण्य को कटने से बचाना है।
तब या जिनकी जैसी अवस्था कुछ लोग 24 घंटे भी चला सकते हैं 12 घंटे तो चलाएंगे ही। तो आप जब भी प्रसाद महाप्रसाद स्वीकार करें अन्य क्षेत्र में जाएं तो भाई यथा सामर्थ्य वहां पर आपको जितना उचित लगे उतना वहां पर यथा सामर्थ्य दान कर दीजिए। कि आज का प्रसाद प्रभु हम प्राप्ति किए हैं ये हमारे ओर से। चाहे आप किसी व्यक्ति को दीजिए या वहां जो भी मुख्य स्थान बना हो वहां पर आप चढ़ा दीजिए ताकि वो अन्न में पुनः सेवा में ले ली जाए। ऐसे नहीं खाना है नहीं तो अब जो जिनका भी पैसा उसमें खर्च हुआ होगा जिनका भी पैसा का वो अन्न होगा आपका जो भी तीर्थ का फल होगा उससे डिडक्ट हो जाएगा भैया माइनस हो जाएगा 28% जीएसटी के साथ में तो ध्यान रखें अपने पुण्य का डिडक्शन हमें करने से बचना है इतना मेहनत करके आप जा रहे हैं तो।
कुंभ का समय खास क्यों है, खासकर घर पर रहने वालों के लिए?
दिव्य तिथियाँ — महाशिवरात्रि, होलिका की महानिशा, महाविद्याओं की तिथियाँ
वक्ता उन लोगों के लिए मुख्य विषय उठाते हैं जो नहीं जा रहे और घर पर हैं। वे कहते हैं, पहली बात महाशिवरात्रि के पर्व जैसी है: जैसा हम महाशिवरात्रि पर देखते हैं, जैसा होलिका की महानिशा में देखते हैं, अष्टमी तिथि पर, चैत्र अष्टमी, चैत्र नवमी, चैत्र पूर्णिमा पर, और दस महाविद्याओं की जो भी तिथियाँ आती हैं, जो महानिशा के समय हैं, और महाशक्तियों के नवरात्रि का समय।
अब इसका अगला विषय, वक्ता कहते हैं: ध्यान रखें कि क्यों कहा जाता है कि कुंभ के समय यह बहुत ही असाधारण विषय बन जाता है, और सामान्य रूप से भी बहुत खास है — और जो नहीं जा रहे, घर पर हैं, उनके लिए मुख्य विषय है। सबसे पहली बात महाशिवरात्रि के पर्व जैसी है। महाशिवरात्रि पर हम सब यह देखते हैं, होलिका की महानिशा में देखते हैं, अष्टमी तिथि पर, जो चैत्र अष्टमी होगी, चैत्र नवमी, चैत्र पूर्णिमा, और दस महाविद्याओं की जो भी तिथियाँ आती हैं, जो महानिशा का काल हैं, और महाशक्तियों के नवरात्रि का समय।
अब इसका अगला विषय यह ध्यान रखें कि कुंभ के समय में क्यों कहा गया है कि अति विशिष्ट और विषय हो रहा है अति विशेष होता है सामान्य रूप से और घर पे जो लोग नहीं जा रहे हैं उनके लिए प्रमुख विषय। सबसे पहला चीज तो ये जैसे महाशिवरात्रि का पर्व। महाशिवरात्रि में हम सभी यह देखते हैं होलिका की महानिशा में देखते हैं अष्टमी तिथि जो होती है चैत्र की अष्टमी होगी चैत्र की नवमी हो जाती है चैत्र का पूर्णिमा हो जाता है अन्य जो भी 10 महाविद्याओं की तिथियां आती हैं जो महानिशा का काल होता है और जो महाशक्तियों का नवरात्र का समय होता है।
इस समय सबसे पहले कौन-सी नवरात्रि पड़ रही है?
शाकंभरी नवरात्रि, पौष पूर्णिमा तक
वक्ता कहते हैं, अभी चल रहे अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार सबसे पहली नवरात्रि इसी अष्टमी से पड़ेगी। इसमें भगवती महादुर्गा, भगवती शाकंभरी की नवरात्रि शुरू होगी, और यह पौष पूर्णिमा तक चलेगी। वे श्रोताओं से कहते हैं, तो आपकी अब पड़ने वाली है।
सबसे पहली नवरात्रि, अभी चल रहे अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार, वक्ता कहते हैं — इसमें भी पहली नवरात्रि कब से है? इसी अष्टमी से पड़ेगी, जिसमें भगवती महादुर्गा, भगवती शाकंभरी की नवरात्रि शुरू होगी, और जो पौष पूर्णिमा तक चलेगी। तो अब उनकी पड़ने वाली है, वे कहते हैं।
तो आपका अभी उनका पड़ने वाला है।
दिव्य तिथियों पर शक्तियाँ कहाँ जाती हैं, और महाशिवरात्रि पर दत्त के सेवक कहाँ जाते हैं?
महासिद्ध अपने स्थान से तीर्थ क्षेत्रों की ओर जाते हैं
वक्ता कहते हैं, पहली बात यह है कि जो भी दिव्य तिथियाँ हैं, या दिव्य पर्व का समय है, उस समय महाशक्तियाँ और उस शक्ति से जुड़े महासिद्ध, जो उनकी सेवा में रहते हैं, उनका स्थान जहाँ भी हो, वे अपने स्थान से दिव्य क्षेत्रों की ओर, तीर्थ क्षेत्रों की ओर ज़रूर आते हैं। उदाहरण के लिए: महाशिवरात्रि के समय भगवान महागुरु दत्तात्रेय के जो भी सेवक और साधक हैं, वे सब परिक्रमा के लिए गिरनार क्षेत्र जाएँगे, गिरनार जी जाएँगे, विंध्य क्षेत्र में जहाँ स्थान है वहाँ जाएँगे, काशी क्षेत्र के स्थान पर, चक्र पुष्करणी तीर्थ आदि पर जाएँगे।
तो सबसे पहला विषय यह है, वक्ता कहते हैं: कि जो भी दिव्य तिथियाँ हैं, या जो भी दिव्य पर्व का समय है, इस समय खासकर, उस शक्ति से जुड़ी जो भी महाशक्तियाँ और महासिद्ध हैं, जो उनकी सेवा में रहते हैं — उनका स्थान जहाँ भी हो, वे अपने स्थान से दिव्य क्षेत्रों की ओर, तीर्थ क्षेत्रों की ओर ज़रूर आते हैं। जैसे महाशिवरात्रि के समय भगवान महागुरु दत्तात्रेय के जो भी सेवक और साधक होंगे, वे सब परिक्रमा के लिए गिरनार क्षेत्र जाएँगे; गिरनार जी जाएँगे, वही उनके जाने का स्थान होगा; विंध्य क्षेत्र में जाएँगे, वहाँ जहाँ स्थान है; काशी के क्षेत्र के स्थान पर, चक्र पुष्करणी तीर्थ आदि पर — उन स्थानों पर वे जाएँगे।
तो सबसे पहला विषय यह है कि जितनी भी दिव्य तिथियां होती हैं ये या दिव्य पर्व का समय होता है इस समय में विशेष करके उस शक्ति से संबंधित जितने भी महाशक्तियां महासिद्ध जो उनकी सेवा में रहने वाले होते हैं चाहे उनका स्थान कहीं पर भी हो वो अपने स्थान से दिव्य क्षेत्रों की ओर तीर्थ क्षेत्रों की ओर अवश्य आते हैं। जैसे महाशिवरात्रि के समय में जितने भी भगवान महागुरु दत्तात्रेय के सेवक साधक होंगे वे सभी गिरनार क्षेत्र में परिक्रमा के लिए जाएंगे गिरनार जी में जाएंगे उस जगह में उनका जाने का स्थान रहेगा विंध्य क्षेत्र में जाएंगे विंध्य में वहां जहां स्थान है काशी के क्षेत्र में जहां स्थान है चक्र पुष्करणी तीर्थ आदि में उन जगहों पर वो जाएंगे।
ऐसे स्थान और ऐसे समय पर वही मंत्र सामान्य से कई गुना असर देता है, और दूर बैठे भी लाभ मिलता है
वही मंत्र कई गुना असर देता है, दूर बैठे भी लाभ
यदि उस समय उस स्थान पर बैठकर आप भगवान दत्त की सेवा कर रहे हैं, तो जिस मंत्र का आप सामान्य दिनों में जप करते थे, और जो फल और सामर्थ्य मिलती थी — वक्ता कहते हैं, उन स्थानों पर बैठकर आप खुद देख लें: वह कई गुना ज़्यादा असर देगा। पर उस स्थान से दूर बैठकर भी, दूर से जप करें, अपने घर बैठकर भी, तो सामान्य दिनों से कई गुना ज़्यादा फल मिलता है।
तो यदि उस समय उस स्थान पर बैठकर आप भगवान दत्त की सेवा कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं, तो जिस मंत्र का आप सामान्य दिनों में जप करते थे, और जो फल मिलता था, जो सामर्थ्य मिलती थी — उन स्थानों पर बैठकर आप खुद देख लें: वह कई गुना ज़्यादा असर देने वाला होगा। पर उस स्थान से दूर बैठकर भी, दूर बैठकर जप करें, अपने घर बैठकर भी जप करें, तब भी सामान्य दिनों से बहुत-बहुत ज़्यादा फल मिलता है।
तो अगर उस समय में उस स्थान पर बैठकर के आप भगवान दत्त की सेवा कर रहे हैं तो वो मंत्र जो कि आप सामान्य दिनों में जप्त जपा करते थे और जो फल की प्राप्ति होती थी जो सामर्थ्यता की प्राप्ति होती थी आप उन स्थानों पर बैठकर के देख लीजिएगा कई गुना अधिक प्रभाव को देने वाला होगा। लेकिन अगर आप उस स्थान से दूर भी बैठे हुए हैं और आप दूर भी बैठकर के जप करें आप अपने घर पर बैठकर के भी जप कर रहे हैं तो भी उसका अनेक अनेक अधिक सामान्य दिनों से अधिक आपको फल प्राप्त होता है।
कुंभ के पैंतालीस दिनों में अशरीरी शक्तियाँ सूक्ष्म शरीर में आती हैं
सूक्ष्म शरीर में पैंतालीस दिनों तक आने वाली अशरीरी शक्तियाँ
वक्ता कहते हैं, ठीक इसी तरह कुंभ के समय कई प्रकार की दिव्य शक्तियाँ, जिन्हें अशरीरी शक्तियाँ कहा जा सकता है — जो भौतिक शरीर से नहीं, सूक्ष्म शरीर से आती हैं — माघ के समय भी आती हैं; और अब तो कुंभ है, महाकुंभ है, तो उनका आना-जाना ज़रूर होगा। और महाकुंभ सवा महीने का है: पैंतालीस दिनों का बहुत अच्छा लंबा समय, चौबीसों घंटे दिव्यता से भरा।
ठीक इसी तरह, वक्ता कहते हैं, कुंभ के समय भी कई प्रकार की दिव्य शक्तियाँ, जिन्हें अशरीरी शक्तियाँ कहा जा सकता है — जो भौतिक शरीर से नहीं, सूक्ष्म शरीर से आती हैं — माघ के समय भी आती हैं; और अब तो कुंभ है, महाकुंभ है, तो उनका आना-जाना ज़रूर, ज़रूर होगा। और यह सवा महीने का महाकुंभ है: तो सवा महीना बहुत अच्छा लंबा समय है, चौबीसों घंटे, पैंतालीस दिन, दिव्यता से भरा।
ठीक उसी प्रकार से कुंभ के समय में भी अनेक प्रकार की दिव्य शक्तियां अशरीरी शक्तियां जो कहा जाए जिन जो कि भौतिक शरीर से नहीं सूक्ष्म शरीर से भी आकर के वो माघ के समय में भी और अब तो कुंभ है महाकुंभ है तो उनका आवागमन होगा ही होगा और सवा महीने का महाकुंभ है तो एक सवा महीने के बहुत अच्छा लंबा समय जो कि 24 घंटा 45 दिन जो है दिव्यता से परिपूर्ण है।
नवरात्रि के नौ दिनों का नियम दिखाता है कि ऐसे समय का फल कितना बढ़ जाता है
नौ दिन का नियम और उसके फल का गुणा
वक्ता कहते हैं, नवरात्रि में आप नौ दिन नियम रखते हैं, और देखते हैं कि उसका फल कितने गुना होता है। वे कहते हैं, यह ऐसा समय है जिसमें — एक तरह से कहें तो — यहाँ विस्फोटक ऊर्जाओं का आना-जाना शुरू हो जाता है।
नवरात्रि में आप नौ दिन नियम रखते हैं, वक्ता कहते हैं, और देखते हैं कि उसका फल कितने गुना ज़्यादा हो जाता है। यह, वे कहते हैं, वह समय है जिसमें, एक तरह से कहें तो, यहाँ विस्फोटक ऊर्जाओं का आना-जाना शुरू हो जाता है।
नवरात्र में 9 दिन का आप पालन करते हैं नियम का और देखते हैं उसका फल कितना गुना अधिक होता है। यह वो समय है जिसमें कि एक तरीके से कहा जाए तो विस्फोटक ऊर्जाओं का आवागमन यहां पर आरंभ होता है।
पुरी के पास का एक पूर्वज लें, जिसने भगवती विमला की विशेष कृपा पाई
पुरी के पास का पूर्वज जिसने भगवती विमला की विशेष कृपा पाई
वक्ता कहते हैं, मान लीजिए कोई व्यक्ति ओडिशा क्षेत्र में, पुरी जी के पास रहता है — ठीक पुरी जी के पास नहीं, पर उस क्षेत्र का निवासी है — और उसके पूर्वज उस स्थान पर रहे, और उन पूर्वजों में किसी व्यक्ति ने भगवती विमला की उपासना और सेवा करके उनकी विशेष कृपा पाई।
और किसी भी स्थान पर — उदाहरण के लिए लीजिए, वक्ता कहते हैं — मान लीजिए कोई व्यक्ति ओडिशा के क्षेत्र में रहता है; मान लीजिए कोई व्यक्ति पुरी जी के पास रहता है। अब पुरी जी के पास, ठीक पुरी जी के बगल में नहीं, पर उस क्षेत्र का निवासी व्यक्ति: उसके पूर्वज उस स्थान पर रहे, और उसके पूर्वजों में किसी व्यक्ति ने भगवती विमला की उपासना और सेवा करके उनकी विशेष कृपा पाई।
और जिस जगह भी जिस स्थान पर उदाहरण के लिए मान लेते हैं कि कोई व्यक्ति अगर उड़ीसा के क्षेत्र में रहते हैं उड़ीसा के क्षेत्र में मान लेते हैं कोई पूरी जी के पास रहने वाले व्यक्ति हैं अब पूरी जी के पास में एकदम बिल्कुल पूरी जी के पास नहीं लेकिन उस क्षेत्र के रहने वाले व्यक्ति हैं उनके पूर्वज उस स्थान पर रहे और उनके पूर्वजों में कोई व्यक्ति जो है भगवती विमला का उपासना सेवा करके उनकी विशेष कृपा को प्राप्त कर लिए।
विशेष कृपा पाने का अर्थ है कि दिव्य शक्तियाँ और सिद्धियाँ कुल में स्थापित हो गईं
कुल में स्थापित दिव्य शक्तियाँ और सिद्धियाँ
वक्ता कहते हैं, विशेष कृपा पाने का अर्थ है कि उन्हें दिव्य शक्तियाँ और सिद्धियाँ मिलीं; वे कुल में स्थापित हो गए, और कभी न कभी उन शक्तियों की मदद से अपनी वंश-परंपरा में कोई कृपा करते हैं।
विशेष कृपा पाने का अर्थ, वक्ता कहते हैं, यह है कि उन्हें दिव्य शक्तियाँ और सिद्धि मिलीं। वे कुल में स्थापित हो गए, और कभी न कभी, उन शक्तियों के सहयोग से, वे अपनी वंश-परंपरा में कोई कृपा करते हैं।
विशेष कृपा को प्राप्त करने का तात्पर्य है कि उनके दिव्य शक्तियां सिद्धियां इन्हें प्राप्त हुई कुल में वो स्थापित हो गए और कभी ना कभी उन शक्तियों की सहयोग से अपने वंश में कुछ कृपा वो करते हैं।
कुंभ कितने होते हैं, और उनमें कौन आता है?
बारह कुंभ, चार पृथ्वी पर, दो अर्धकुंभ, और देवलोक की शक्तियाँ
वक्ता कहते हैं, यह जान लीजिए: भले वे देवी लोक पा चुके हों और देवी लोक चले गए हों, तो जो बारह कुंभ होते हैं, उनमें ये चार मुख्य पृथ्वी पर होते बताए गए हैं, और दो अर्धकुंभ। इस कुंभ में देवलोक की शक्तियाँ भी कुंभ में आती हैं; और सबसे पहले वे उस स्थान पर ज़रूर जाएँगी जहाँ से वे निकली थीं, जहाँ उनका अंतिम जन्म हुआ था और जहाँ से सिद्धि पाकर उन्होंने दिव्य लोक पाया।
तो यह जान लीजिए, वक्ता कहते हैं: यदि उन्होंने देवी लोक भी पा लिए हों, यदि वे देवी लोक चले गए होंगे, तो जो बारह कुंभ होते हैं, उनमें जो ये चार मुख्य बताए जाते हैं, वे पृथ्वी पर होते हैं, और दो अर्धकुंभ — तो इस कुंभ में, जो होता है, देवलोक की शक्तियाँ भी कुंभ में आती हैं। और सबसे पहले, जिस भी स्थान से वे निकले होंगे — जहाँ उनका अंतिम जन्म हुआ था, और जहाँ से सिद्धि पाकर उन्होंने दिव्य लोक पाया होगा — वहाँ वे ज़रूर जाएँगे।
तो यह जान लीजिए कि अगर वो देवी लोकों को प्राप्त हुए भी हैं देवी लोकों को गए भी होंगे तो जो 12 कुंभ लगता है उसमें से जो प्रमुख ये चार कुंभ बोला गया है कि पृथ्वी पर जो लगता है और दो अर्ध कुंभ तो ये जो कुंभ लगता है इसमें देवलोक की शक्तियां भी जो हैं वह कुंभ में आती हैं तो सबसे प्रथम उनका कहां जिस स्थान से वो निर्गत की होंगी जहां उनका अंतिम जन्म और वहां से सिद्धि को प्राप्त करके दिव्य लोक को प्राप्त की होंगी वहां वो अवश्य जाएंगी।
क्या हर परिवार की परंपरा में ऐसा कोई सिद्ध हुआ है?
लगभग हर कुल में कोई हुआ है, ज्ञात या अज्ञात, और उनके आने भर से चीज़ें बदलती हैं
यदि आपकी कुल परंपरा में कभी कोई सिद्ध हुआ हो — और लगभग हर कुल में अतीत में कोई न कोई ऐसा साधक व्यक्ति हुआ है जो कृपा करता है, चाहे हम उन्हें जानते हों या नहीं — तो वे उस कुल में ज़रूर आएँगे। रास्ता सबसे पहले वहीं से खुलेगा; और क्योंकि वे देवी लोक की, परलोक की शक्तियाँ हैं, इस लोक की नहीं, उनके आने भर से बहुत-सी चीज़ें बदलने लगती हैं।
तो यदि आपकी कुल परंपरा में कभी कोई सिद्ध हुए हों, वक्ता कहते हैं — और लगभग हर कुल में अतीत में कोई न कोई ऐसा साधक व्यक्ति हुआ है जो कृपा करता है, चाहे हम उन्हें जानते हों या नहीं — वे उस कुल में ज़रूर आएँगे। रास्ता सबसे पहले वहीं से खुलेगा। उनके आने भर से — क्योंकि वे देवी लोक की, परलोक की शक्तियाँ हैं, इस लोक की नहीं — उनके आने भर से बहुत सारी चीज़ें बदलने लगती हैं।
तो अगर आपके कुल परंपरा में कोई सिद्ध रहे हैं कभी और लगभग हर कुल में कोई ना कोई ऐसा साधक व्यक्ति रहा ही होता है पूर्व में जो कि कृपा करता है चाहे हम उनके बारे में जान रहे हो या ना जान रहे हो वो अवश्य उस कुल में आएंगे। सबसे पहला तो मार्ग वहीं से खुलेगा। उनके आगमन मात्र से क्योंकि वो देवी लोक की वो परलोक की शक्तियां हैं इस लोक की नहीं उनके आगमन मात्र से कई सारी चीजें जो हैं वो बदलना आरंभ हो जाती हैं।
ऐसी आने वाली शक्ति घर को नियम में पाए तो क्या करेगी?
घर पर पूरे नीति-नियम से पूजन करने वाले परिवार पर उनकी कृपा होती है
मान लीजिए वे अपने कुल में आते हैं और देखते हैं कि हमारे कुल के लोग घर पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूरे नीति-नियम और विधि-विधान से पूजन और सेवा कर रहे हैं, संध्या पूजा समय पर हो रही है — तो वक्ता कहते हैं, वे ज़रूर कृपा करेंगे। उनके लिए यह बहुत आसान हो जाता है; यदि कोई काम बिगड़ा पड़ा है, तो वे बहुत आसानी से कृपा करके, आशीर्वाद देकर, उसे ठीक करके चले जाएँगे — चाहे वे पितृ वर्ग के हों, देव वर्ग के हों, या किसी और योनि के, इससे हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता; फल शुभ ही होगा।
अब मान लीजिए, वक्ता कहते हैं, कि वे अपने कुल में आएँगे, और देखेंगे कि हमारे कुल के लोग घर पर ही, अपनी सामर्थ्य के अनुसार, पूरे नीति-नियम और विधि-विधान से पूजन और सेवा कर रहे हैं, संध्या पूजा समय पर हो रही है — तो भाई, वे ज़रूर कृपा करेंगे; उनके लिए यह बहुत आसान हो जाएगा। यदि कोई काम बिगड़ा पड़ा है, तो वे बहुत आसानी से कृपा करके और आशीर्वाद देकर उसे ठीक कर देंगे, और चले जाएँगे। चाहे वे पितृ वर्ग के हों, देव वर्ग के हों, या किसी और योनि के — इससे हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता; जो भी फल होगा, शुभ ही होगा।
अब अगर मान लीजिए वो आएंगे अपने कुल में और वो देखेंगे कि हमारे कुल के लोग जो हैं पूरे नीति नियम से विधि विधान से कुंभ में अपना घर पर ही यथा सामर्थ्य पूजन सेवा कर रहे हैं समय से संध्या पूजा हो रहा है तो भैया वो कृपा ही करेंगे उनके लिए बहुत सुगम हो जाएगा अगर कोई काम बिगड़ा पड़ा हुआ है तो बहुत सुगमता से वो चीजों को कृपा करके आशीर्वाद देकर के चले जाएंगे चाहे वो पितृ कोटि के हो देव कोटि के हो या किसी अन्य योनि के भी हो उससे कोई अपने को प्रभाव नहीं पड़ने वाला है जो फल है वो शुभ ही होगा।
दस बजे तक सोया घर जल्दी से जल्दी स्नान के रोज़ के नियम में चूकता है
जितना जल्दी हो सके स्नान करने का रोज़ का नियम
पर यदि कोई आकर देखे कि ये तो 10 बजे सोकर उठ रहे हैं — जबकि यहाँ रोज़ का नियम है कि जितना जल्दी हो सके स्नान करें — तो वे क्या कृपा करेंगे? वक्ता कहते हैं, तीर्थ क्षेत्र में आप जब भी कर लें, वहाँ हमेशा भीड़ रहती है, जब समय मिले; पर रोज़ घर पर, सुबह, ज़्यादा से ज़्यादा मान लें 7 या 8 बजे तक नहा लिया, 9 बजे तक भी — और यहाँ 10 बज रहे हैं और व्यक्ति आराम से सो रहा है।
पर यदि कोई आकर देखे कि भाई, ये तो 10 बजे सोकर उठ रहे हैं, वक्ता कहते हैं। यहाँ नित्य नियम यह है कि भाई, जितना जल्दी हो सके स्नान करें। हालाँकि तीर्थ क्षेत्र में आप जब भी कर लें — वहाँ भीड़ रहती है, जब समय मिले। पर रोज़ घर पर, सुबह, ज़्यादा से ज़्यादा, चलिए, 7 बजे तक, 8 बजे तक नहा लिया, 9 बजे तक भी कर लिया; और यहाँ 10 बज रहे हैं और व्यक्ति आराम से सो रहा है। तो वे क्या कृपा करेंगे?
लेकिन अगर कोई आए और वो देखे कि भाई अभी तो 10:00 बजे तो सो कर के ही उठ रहे हैं। यहां पर नित्य नियम है कि भाई जितना जल्दी हो सके स्नान कर लें हालांकि तीर्थ क्षेत्र में आप कभी भी करिए वहां तो भीड़ रहती है जब भी आपको समय मिल जाए लेकिन नित्य घर पर हैं तो सुबह-सुबह में बहुत हुआ तो चलिए 7:00 बजे 8:00 बजे तक स्नान कर लिए 9:00 बजे तक भी कर लिए यहां तो 10:00 बज रहा है आराम से व्यक्ति सोया हुआ है तो वो क्या ही कृपा करेंगे।
कृपा पाने का अवसर आता है; उसे धारण करने की पात्रता नहीं होती
अवसर आता है; उसे धारण करने की पात्रता नहीं
वक्ता कहते हैं, कृपा पाने का अवसर तो ज़रूर मिलेगा, पर आप उसे ले नहीं पाएँगे। कारण यह है कि आपमें क्षमता नहीं है। वे आपको देने को तैयार हैं, पर उसे धारण करने की पात्रता ही आपमें नहीं है।
कृपा पाने का अवसर आपको ज़रूर मिलेगा, वक्ता कहते हैं, पर आप उसे ले नहीं पाएँगे। कारण यह है कि आपमें क्षमता नहीं है। वे आपको देने को तैयार हैं, पर उसे धारण करने के लिए आपमें पात्रता ही नहीं है। यह विषय ज़रूर ध्यान में रखें।
आपको अवसर अवश्य प्राप्त होगा कृपा प्राप्त करने का लेकिन आप कर नहीं पाइएगा। कारण है कि आपके पास कैपेबिलिटी नहीं है वो आपको देने के लिए तो तैयार हैं लेकिन रखने के लिए आपके पास में पात्रता ही नहीं है इस विषय का अवश्य ध्यान रखें।
पैंतालीस दिन तक, चौबीसों घंटे, एक शिवरात्रि जैसी अवस्था रहती है
पैंतालीस दिन, चौबीसों घंटे, एक शिवरात्रि जैसी तीव्रता
वक्ता कहते हैं, यह एक दिन की बात नहीं, पूरे पैंतालीस दिनों की बात है। यानी जो सामर्थ्य हम एक शिवरात्रि में पाते हैं — जो शिवरात्रि के समय रात भर चारों प्रहर की पूजा करके पाते हैं — कुंभ के समय, इस चल रहे महापर्व में, वही दिव्यता चौबीसों घंटे बनी रहेगी। क्योंकि महाशिवरात्रि पर दूसरे लोक से शक्तियाँ एक ही रात के लिए आती हैं; यहाँ तिथि के अनुसार आना-जाना हमेशा चलता रहेगा।
यह एक दिन की बात नहीं है, वक्ता कहते हैं; यह पूरे पैंतालीस दिनों की बात है। यानी जो सामर्थ्य हम एक शिवरात्रि में पाते हैं — जो शिवरात्रि के समय रात भर चारों प्रहर की पूजा करके पाते हैं — कुंभ आदि के समय, इस चल रहे महापर्व में, वही दिव्यता चौबीसों घंटे बनी रहेगी। क्योंकि महाशिवरात्रि पर शक्तियाँ दूसरे लोक से एक ही रात के लिए आएँगी; यहाँ तिथि के अनुसार आना-जाना हमेशा चलता रहेगा। वे कहते हैं, यह सब आपका-हमारा विषय नहीं है; हम चर्चा का बस कुछ अंश रख रहे हैं।
ये एक दिन का विषय नहीं होता है ये पूरे 45 दिन का जो विषय है। यानी कि जो सामर्थ्यता हम एक शिवरात्रि में प्राप्त करते हैं महानिशा में हम लोग शिवरात्रि के समय में रात भर चारों पहर की पूजा करके प्राप्त करते हैं अगर कुंभ आदि के समय में जो ये महापर्व चल रहा है ये 24 घंटा उसी दिव्यता से युक्त रहेगा। क्योंकि महाशिवरात्रि में तो एक रात केवल अन्य लोक से शक्तियां आएंगी यहां पर सदैव आवागमन होता रहेगा तिथि के अनुसार ये सब आप आपका और हमारा विषय नहीं है ये तो केवल चर्चा का एक कुछ अंश मात्र रख रहे हैं।
नियम पौष पूर्णिमा से, यानी 13 जनवरी से शुरू होता है
पौष पूर्णिमा से, यानी 13 जनवरी से
वक्ता कहते हैं, कुछ खास करना नहीं है, पर इस समय नियम ज़रूर रखें। जब माघ का महीना शुरू हो, खासकर पौष पूर्णिमा से, यानी 13 जनवरी से।
कि किसी क्षण उनकी कृपा हम पर पड़ जाए; कि उनकी कृपा से हमारा बहुत-सा प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। बन जाए; कि कोई बिगड़ा काम बन जाए — क्योंकि भौतिकता का विषय सबसे ऊपर रखा गया है। इसलिए, वक्ता कहते हैं, तैयार रहें। कुछ खास करना नहीं है, पर इस समय नियम ज़रूर रखें। जब माघ का महीना शुरू हो — खासकर पौष की पूर्णिमा से, यानी 13 जनवरी से।
तो कब की कृपा अपने ऊपर हो जाए। कब इनके कृपा से हमारा बहुत सारा प्रारब्ध जो है वो बन जाए। बिगड़ा हुआ काम बन जाए। क्योंकि भौतिकता का विषय तो सबसे सर्वोपरि रखा जाता है। इसलिए तैयार रहिए। करना कुछ ऐसा नहीं विशेष लेकिन नियम जरूर पालन करें इस समय में। जब माघ का महीना आरंभ हो पौष की पूर्णिमा से विशेष करके यानी 13 जनवरी से।
नियम कब तक चले, और पहला नियम क्या है?
26 या 27 फ़रवरी तक, और पात्रता का पहला नियम अनुशासन
तब से 26 फ़रवरी तक, या कहें अगले दिन 27 फ़रवरी तक, अपनी सामर्थ्य के अनुसार नियम रखें। वक्ता कहते हैं, यदि आप नियम नहीं रखेंगे, तो सब व्यर्थ है। नियम में क्या रखना है: पहला है पात्रता लाने का नियम, यानी देश, काल और परिस्थिति के अनुसार अनुशासन में रहना।
तब से 26 फ़रवरी तक, और उसके अगले दिन तक, मान लें 27 फ़रवरी तक, नियम रखें, वक्ता कहते हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार। यदि आप नियम नहीं रखेंगे, तो सब व्यर्थ है। नियम में क्या-क्या रखना है? सबसे पहला है पात्रता लाने का नियम: कि अनुशासन में रहें। देश, काल और परिस्थिति के अनुसार।
तब से लेकर के 26 फरवरी उसके अगले दिन तक मान लीजिए 27 फरवरी तक का नियम रखिए। यथा सामर्थ्य। नियम पालन नहीं करेंगे अगर तो फिर सारा व्यर्थ है। नियम में क्या-क्या रखना चाहिए नियम? तो सबसे पहले पात्रता लाने का नियम है कि अनुशासन में रहें। देश काल परिस्थिति के अनुसार।
रात की शिफ़्ट में काम करने वाले के बारे में क्या?
लौटकर स्नान करें, और दस मिनट ही सही, संध्या करें
वक्ता साफ़ करते हैं कि वे यह नहीं कह रहे कि यदि आप किसी कंपनी में काम करते हैं और रात की ड्यूटी पर जाना है, तो सुबह 4 बजे आएँ, सब छोड़ दें और न नहाएँ। आकर नहाएँ आदि, और संध्या ज़रूर करें। एक घंटा न कर सकें तो दस मिनट ही करें, पर संध्या करें — सुबह और शाम दोनों, देश, काल और परिस्थिति के अनुसार जितना हो सके। वे कहते हैं, पहला काम यह है: पात्रता ज़रूर रखें।
अब हम यह नहीं कह रहे, वक्ता कहते हैं, कि यदि आप किसी कंपनी में काम करते हैं और रात की ड्यूटी पर जाना है, तो सुबह 4 बजे आएँ, सब छोड़ दें, और न नहाएँ। आकर नहाएँ आदि; संध्या ज़रूर करें। एक घंटा न कर सकें, तो दस मिनट ही करें, पर संध्या करें। सुबह और शाम दोनों संध्या करें, जितना हो सके, जैसा भी देश, काल और परिस्थिति हो। तो पहला काम यह होना चाहिए: पात्रता ज़रूर रखें।
अब हम ऐसा नहीं कह रहे हैं कि अगर आपका आप किसी कंपनी में जॉब करते हैं और आपको रात ड्यूटी जाना हो तो सुबह-सुबह भोर में 4:00 बजे आप आ जाइए छोड़ कर के और नहाइए नहीं। आप आकर के स्नान आदि कर लीजिए संध्या अवश्य कीजिए। नहीं आप एक घंटा कर सकते हैं आप 10 मिनट ही कीजिए लेकिन संध्या करें। संध्या करते सुबह और शाम दोनों समय जो जितना हो सके जो देश काल परिस्थिति है उस अनुसार।
इन दिनों भोजन का नियम क्या है?
कोई असात्त्विक भोजन नहीं, और हो सके तो लहसुन-प्याज़ छोड़ें
वक्ता कहते हैं, अपने भोजन की व्यवस्था अच्छी रखें, ताकि किसी तरह का निरामिष भोजन न करना पड़े — यानी कोई असात्त्विक भोजन न करना पड़े। हो सके तो इतने दिनों के लिए लहसुन और प्याज़ भी छोड़ दें।
अपने भोजन की व्यवस्था अच्छी रखें, वक्ता कहते हैं, ताकि किसी तरह का निरामिष भोजन न करना पड़े। यानी कोई असात्त्विक भोजन न करना पड़े। यदि हो सके, तो इतने दिनों के लिए लहसुन और प्याज़ आदि ज़रूर छोड़ दें।
भोजन का व्यवस्था अपना अच्छी तरीके से रखिए कि किसी प्रकार का कोई निरामिश भोजन ना खाना पड़े। अर्थात कोई अशात्विक भोजन ना खाना पड़े। संभव हो तो लहसुन प्याज आदि का भी त्याग इतने दिन तक करें। तीसरा चीज जो सबसे विशेष है अपना जो तेज है उसकी रक्षा करना।
तीसरा और सबसे खास नियम है तेज की रक्षा, जो सप्त धातुओं में अंतिम है
तेज की रक्षा — सप्त धातुओं में अंतिम
तीसरी बात, जो सबसे खास है, अपने तेज की रक्षा करना है — क्योंकि सप्त धातुओं में यह अंतिम धातु है, और उसी तेज में आपका सारा अर्क, सारा मंत्र, जप और तप समाया रहेगा। वक्ता पूछते हैं, यदि वही नष्ट हो गया, तो क्या लाभ मिलेगा? इसलिए ब्रह्मचर्य का पालन बिल्कुल अनिवार्य है: इस समय सख़्ती से ब्रह्मचर्य का पालन करें।
तीसरी बात, जो सबसे खास है, वक्ता कहते हैं, अपने तेज की रक्षा करना है। क्योंकि सप्त धातुओं में यह अंतिम धातु है, और वही तेज है जहाँ आपका सारा अर्क, सारा मंत्र, जप, तप आदि इकट्ठा होगा। यदि वही नष्ट हो गया, तो क्या लाभ मिलेगा? इसलिए ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन बिल्कुल अनिवार्य है। इस समय सख़्ती से ब्रह्मचर्य का पालन करें।
क्योंकि सप्त धातुओं में सबसे अंतिम धातु और वो तेज जिसमें ही सारा अपना अर्क सारे मंत्र जप तप आदि की समाहित होंगी अगर वो क्षय होगा तो फिर क्या ही लाभ प्राप्त होगा। तो ब्रह्मचर्य पालन अति अनिवार्य। इस समय ब्रह्मचर्य का कठोरता से पालन करें।
ये पैंतालीस दिन क्यों नहीं जाने देने चाहिए?
अगला कुंभ बारह साल बाद ही, और तब आप हों या न हों
वक्ता कहते हैं, ध्यान रखें कि एक बार ये पैंतालीस दिन बीत गए, तो महाकुंभ, कुंभ, बारह साल बाद ही आएगा; उससे पहले नहीं आने वाला। अर्धकुंभ आएगा, पर कुंभ बारह साल बाद ही आएगा। और अगले बारह साल बाद आप हों या न हों — कोई नहीं जानता। तो इस दिव्य काल का लाभ घर पर ही ज़रूर लें।
और यह ध्यान रखें, वक्ता कहते हैं: कि एक बार ये पैंतालीस दिन बीत गए, तो महाकुंभ बारह साल बाद ही आएगा, कुंभ आएगा। उससे पहले नहीं आने वाला। अर्धकुंभ आएगा, पर कुंभ तो बारह साल बाद ही आएगा, है न। और अगले बारह साल बाद आप हों या न हों — कोई नहीं जानता। तो इस दिव्य काल का लाभ ज़रूर लें। यह विषय ध्यान में रखें, घर पर ही।
और इस बात का ध्यान रखिएगा कि यह जो 45 दिन बीत गया उसके बाद फिर 12 वर्ष के बाद ही महाकुंभ आएगा कुंभ आएगा। उससे पहले नहीं आने वाला है। अर्ध कुंभ आएगा लेकिन कुंभ तो 12 वर्ष के बाद ही आएगा ना। और अगला 12 वर्ष के बाद आप रहें ना रहें। कोई नहीं जानता है। तो इस दिव्य काल का लाभ अवश्य उठाइए इस विषय का ध्यान रखिएगा घर पे ही।
जो कुंभ नहीं पहुँच सकता, वह घर पर क्या कर सकता है?
नहाने से पहले स्नान के जल में भगवती का आवाहन
वक्ता कहते हैं, अब स्नान का विषय आता है, और स्नान में एक बहुत गहरा विषय है, जिसे वे चैनल पर अलग से भी डालेंगे: कि यदि हम किसी भी तरह कुंभ के क्षेत्र में जाने में सक्षम नहीं हैं, तो उस अवस्था में घर पर ही, आप जहाँ भी हों और जिस भी अवस्था में हों, नहाने से पहले स्नान के जल में भगवती का आवाहन करें, और आवाहन करके नहाएँ।
अब स्नान का विषय आता है, वक्ता कहते हैं, और स्नान में एक बहुत गहरा विषय है। वे इसे चैनल पर अलग से भी डालेंगे: कि यदि हम कुंभ आदि के क्षेत्र में जाने में किसी भी तरह सक्षम नहीं हैं, तो ऐसी अवस्था में घर पर ही — आप जहाँ भी हों, जिस भी अवस्था में हों, नहाने से पहले स्नान के जल में भगवती का आवाहन करें, और वह आवाहन करके नहाएँ।
अब स्नान का विषय आता है तो स्नान का एक बहुत तीव्रतम विषय है। उसको चैनल पर अलग से भी डाल देंगे कि अगर हम किसी भी प्रकार से कुंभ आदि के क्षेत्र में जाने में सामर्थ्यशाली नहीं होते हैं तब ऐसी अवस्था में घर पर ही जहां पर भी आप हैं जिस अवस्था में है स्नान करने से पूर्व स्नान के जल में भगवती का आवाहन करें और आवाहन करने के पश्चात स्नान करें।
स्नान के जल को अभिमंत्रित करने की कितनी विधियाँ हैं?
मंत्र विधि, यंत्रोक्त विधि, और नहाने से पहले स्मरण
वक्ता कहते हैं, इसमें दो-तीन विधियाँ हैं: एक मंत्र विधि है, एक यंत्रोक्त विधि भी है, और स्मरण आदि करके नहाने का विधि-विधान भी है। इनमें जो सबसे सरल विधि-विधान है, वह वे आप सबके सामने ज़रूर रखेंगे।
अब उसमें दो-तीन विधियाँ हैं, वक्ता कहते हैं: एक मंत्र विधि है, एक यंत्रोक्त विधि भी है, और स्मरण आदि करके नहाने का विधि-विधान भी है। इनमें जो सबसे सरल विधि-विधान है, वह वे आप सबके सामने ज़रूर रखेंगे।
अब उसमें दो-तीन विधि है मंत्र विधि भी है यंत्रोक्त विधि भी है और स्मरण आदि करने के पश्चात भी स्नान करने का भी विधि विधान है। तो उसमें से जो जो सबसे सरलतम विधि विधान होगा वो अवश्य आप सभी के समक्ष रख देंगे।
पहले से क्या व्यवस्था करना सबसे अच्छा है?
तीन स्तोत्रों और सतनामों से अभिमंत्रित एक लीटर शुद्ध गंगाजल
वक्ता कहते हैं, सबसे अच्छा यह है, चाहे आप और कुछ करें या न करें: यदि घर के पास मिल सके तो पहले से शुद्ध गंगाजल ले आएँ। कम से कम एक लीटर, धुले, साफ़ बर्तन में रखा हुआ; और पौष पूर्णिमा से पहले, या यदि रोज़ करना संभव हो तो रोज़ सुबह नहाने के बाद — यानी एक दिन पहले करके — उस जल को भगवती गंगा जी के स्तोत्र और सतनाम, भगवती कालिंदी के स्तोत्र और सतनाम, और भगवती सरस्वती के स्तोत्र और सतनाम से अभिमंत्रित करें। वे बताते हैं, कालिंदी यानी यमुना जी।
सबसे अच्छा यह होगा, वक्ता कहते हैं, कि चाहे आप और कुछ करें या न करें, यदि घर के पास मिल सके, तो पहले से शुद्ध गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। ले आएँ। कम से कम एक लीटर, और एक बर्तन में रखा हुआ, धुला, अच्छा, साफ़ बर्तन — पौष पूर्णिमा से पहले; या यदि रोज़ करना संभव हो, तो रोज़ सुबह नहाने आदि के बाद, यानी एक दिन पहले करके। भगवती गंगा जी के स्तोत्र और सतनाम से, भगवती कालिंदी के स्तोत्र और सतनाम से, और भगवती सरस्वती के स्तोत्र और सतनाम से — यानी कालिंदी का अर्थ है यमुना जी। तो उस जल को इन तीनों से, स्तोत्र और सतनाम से, अभिमंत्रित करें।
सबसे अच्छा रहेगा कि और कुछ करें चाहे ना करें आप अपने घर के आसपास में अगर आपको प्राप्त हो जाए तो शुद्ध गंगाजल की प्राप्ति कर लें पहले से ही। कम से कम 1 लीटर और एक पात्र में धुला हुआ अच्छा स्वच्छ पात्र में रख कर के पौष पूर्णिमा से पहले या अगर संभव रोज करना तो रोज सुबह के समय में स्नान आदि करके यानी एक दिन का एडवांस में करके रखना होगा। भगवती गंगा जी के स्तोत्र सतनाम से भगवती कालिंदी के स्तोत्र सतनाम से और भगवती सरस्वती के स्तोत्र सतनाम से।
उस अभिमंत्रित जल का उपयोग कैसे करें, और इस पर क्या आपत्ति उठती है?
थोड़ा-सा स्नान के जल में मिलाना, और यह दावा कि गंगाजल नहीं मिलाना चाहिए
जिस जल से आप नहाते हैं, उसमें इस जल की कुछ मात्रा मिलाएँ, और उससे नहाएँ। वक्ता कहते हैं, अब कोई इसमें शास्त्रोक्त मत और विधान ढूँढने जाएगा, और आपको कोई यह कहता मिल सकता है कि शास्त्र में लिखा है कि यदि गंगाजल किसी और जल में मिला दिया जाए, तो वह जल छूने लायक भी नहीं रहता।
और जिस जल से आप नहाते हैं, उस स्नान के जल में इस जल की कुछ मात्रा मिलाएँ, और उससे नहाएँ, वक्ता कहते हैं। अब कोई इसमें शास्त्रोक्त मत और विधान ढूँढने जाएगा, और यदि आपको कोई यह कहता मिल जाए कि शास्त्र में लिखा है — कि यदि गंगा जी का जल किसी और जल में मिला दिया जाए, तो वह जल छूने लायक भी नहीं रहता।
तो इन तीनों को एक स्तोत्र सतनाम से उस जल को आप जो है अभिमंत्रित करके रख लीजिए। और स्नान करने वाले जल में इसी जल का कुछ मात्रा जो है मिला दिया कीजिए स्नान वाले जल में और उससे स्नान कर लीजिए। [0:430] अब इसमें शास्त्रोक्त मत और विधान देखने के लिए जाएगा और कोई अगर आपको यह कहते हुए पाया जाए कि शास्त्र में तो लिखा हुआ है कि गंगा जी का जल अगर किसी अन्य जल में मिला दिया जाए तो वो जल जो है स्पर्श करने योग्य नहीं रह जाता है।
जो वेदोक्त आधार पर मिलाने से मना करे, उससे पूरी शर्तें पूछें
उनसे पूरी शर्तें पूछें
वक्ता कहते हैं, ध्यान रखें कि ऐसा कथन देने वाला व्यक्ति, यदि खुद को वेदोक्त कहता है, तो उससे भी पूछें: ठीक है, यदि ऐसा है, तो शर्तें क्या हैं? पूरी बात बताइए — किन अवस्थाओं में कहा गया है कि गंगाजल दूसरे जल में न मिलाएँ? जब आप वह शर्त पूछेंगे, उसमें उसके क्या-क्या नियम हैं, तब आपको ज़्यादा स्पष्टता मिलेगी, और दिखेगा कि वह जो बता रहा है, आधा बता रहा है। वे कहते हैं, यह विषय वे उन महानुभावों पर छोड़ते हैं जो यह कहकर आपको इससे हटाने की कोशिश करेंगे कि गंगाजल दूसरे जल में बिल्कुल न मिलाएँ।
तो यह विषय ध्यान में रखें, वक्ता कहते हैं: कि ऐसा कथन देने वाले व्यक्ति, जो खुद को वेदोक्त कहता है, उसके मत की भी जाँच हो — ठीक है, यदि यह बात है, तो शर्तें क्या-क्या हैं? पूरा विषय बताइए। किन अवस्थाओं में कहा गया है कि गंगाजल किसी और जल में नहीं मिलाना है? जब आप वह शर्त पूछेंगे, उसके क्या-क्या नियम हैं, तब आपको ज़्यादा स्पष्टता मिलेगी: कि वह जो आपको बता रहा है, आधा बता रहा है। यह विषय हम छोड़ते हैं, वे कहते हैं, उन महानुभावों पर जो यह कहकर आपको इससे हटाने की कोशिश करेंगे कि गंगाजल किसी और जल में बिल्कुल नहीं मिलाना चाहिए। यह विषय भी आएगा; यह अद्भुत विषय है। वे खुद नहीं करेंगे और दूसरे को करने नहीं देंगे।
तो इस विषय का ध्यान रखें कि इस प्रकार का वक्तव्य देने वाले व्यक्ति जो कि वेदोक्त अपने आप को अगर कहते हो तो उनका यह मत भी देख लीजिएगा कि चलिए ठीक है अगर ऐसा विषय है तो भी कंडीशन क्या-क्या है? पूरा विषय बताइए। किस-किस अवस्था में बोला गया है कि गंगाजल जो है किसी अन्य जल में नहीं मिलाना चाहिए। तो जब आप उस कंडीशन को पूछिएगा कि क्या-क्या उसमें आपका नियम है तब आपको और स्पष्टता मिल जाएगा कि वो जो बता रहे हैं आपको आधा अधूरा बता रहे हैं।
गंगाजल तो पहले से सिद्ध है, फिर उस पर स्तोत्र क्यों पढ़ें?
सामर्थ्य की कमी हममें है, जल में नहीं
आपत्ति यह है: स्तोत्र और सतनाम का जप कौन करे — गंगाजल तो अपने आप में सिद्ध है, उसे सिद्ध करने की क्या ज़रूरत? वक्ता जवाब देते हैं, सिद्ध करने को कौन कह रहा है; हमारी भावना ही उस स्तर तक नहीं पहुँच रही। हम यह नहीं कह रहे कि गंगाजल में सामर्थ्य की कोई कमी है — बिल्कुल कोई कमी नहीं है; सामर्थ्य की कमी हमारे भीतर है।
अब स्तोत्र और सतनाम का जप कौन करे — अरे, गंगाजल तो अपने आप में सिद्ध है, उसे सिद्ध करने की क्या ज़रूरत है, वक्ता यह बात उद्धृत करते हैं। सिद्ध करने को कौन कह रहा है, वे पूछते हैं। हमारी भावना ही उस स्तर तक नहीं पहुँच रही। विषय को समझने की कोशिश करें। हम यह नहीं कह रहे कि गंगाजल की सामर्थ्य में कोई कमी है; बिल्कुल कोई कमी नहीं है — पर सामर्थ्य की कमी हमारे भीतर है।
ये विषय हम उन महानुभावों पर छोड़ते हैं जो कि आपको ये बोलने के बोल कर के हटाने का प्रयास करेंगे कि आप गंगाजल को किसी अन्य जल में मिलाओ ही मत। ये भी विषय भी आएगा। ये बड़ा अद्भुत विषय है। स्वयं करेंगे नहीं दूसरे को करने नहीं देंगे। अब स्तोत्र सतनाम कौन जप जप करके अरे गंगाजल तो स्वयं में सिद्ध है। क्या जरूरत है उसको सिद्ध करने का? कौन बोल रहा है सिद्ध करने के लिए? ये हमारी भावना उस स्तर तक नहीं पहुंच रही है।
जल पर गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती पढ़ने से ही श्रद्धा ज़रूरी स्तर तक आती है
गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती — पहले माहात्म्य, फिर सामर्थ्य
उस जल के प्रति हमारी श्रद्धा, भाव और समर्पण उस स्तर का तब तक नहीं होगा, जब तक हम उस पर गंगा, जमुना, गोदावरी, सरस्वती का मंत्र न पढ़ें। वक्ता कहते हैं, सामर्थ्य तभी आती है जब हम उसका माहात्म्य जानते हैं; माहात्म्य न जानें तो उसमें सामर्थ्य कहाँ से आएगी? और अनजाने में किया पुण्य, और उससे मिला फल, ज़रूरी नहीं कि शरीर रहते आपको दिखाई दे।
उस जल के प्रति हमारी श्रद्धा, भाव और समर्पण उस स्तर का नहीं हो पाएगा, वक्ता कहते हैं, जब तक हम उस पर गंगा, जमुना, गोदावरी, सरस्वती का मंत्र न पढ़ें। सामर्थ्य तभी आएगी जब हम उसका माहात्म्य जानेंगे; माहात्म्य न जानें, तो उसमें सामर्थ्य कहाँ से आएगी? सीधी-सी बात है। और अनजाने में किया पुण्य, और उससे मिलने वाला फल — ज़रूरी नहीं कि वह शरीर रहते आपको दिखाई दे।
विषय को समझने का प्रयास कीजिए। हम ये नहीं कह रहे हैं कि गंगाजल में सामर्थ्यता में कमी बिल्कुल कमी नहीं है लेकिन सामर्थ्यता में कमी हमारे भीतर है। हमारा श्रद्धा भाव समर्पण उस जल के प्रति उस स्तर का नहीं हो पाएगा जब तक कि हम उसमें गंगा जमुना गोदावरी सरस्वती ये मंत्र ना पढ़ दें। सामर्थ्यता तो तब आएगा जब हम उसके महात्मय को जानेंगे महात्मय जानते नहीं तो सामर्थ्यता कहां से आएगी उसमें? सीधी सी बात है ना। अनजाने में किया गया पुण्य और उससे प्राप्त होने वाला फल सदेह रहते हुए आपको दिख जाए ये आवश्यक नहीं।
बाणासुर का प्रसंग लौकिक और पारलौकिक फल के बारे में क्या दिखाता है?
अंतिम क्षण में तीन बार महादेव पुकारने से त्रिशूल नहीं रुकता
वक्ता कहते हैं, शिव महापुराण में बाणासुर के प्रसंग में कहा गया है कि उसका फल पारलौकिक है, लौकिक नहीं — और आप लौकिक फल चाहते हैं। यदि आप अनजाने में कोई पुण्य करें, या अंतिम समय में बहुत पाप कर रहे हों, और जब आप मारे जाने वाले हों और शिव जी त्रिशूल लेकर आपका धड़ तोड़ने को खड़े हों, तब आप कहें त्राहिमाम् महादेव महादेव महादेव, हमने तीन बार महादेव कहा, हमारी रक्षा करो — रक्षा नहीं होगी। महादेव रक्षा नहीं करने वाले। वहाँ साफ़ किया गया है: अंतिम क्षण में आपने उन्हें याद किया, ठीक है, आपको शिव लोक मिलेगा; पर अब आपको कटना होगा, अब आपकी रक्षा नहीं हो सकती। वे कहते हैं, यह भाव पहले आना चाहिए था।
शिव महापुराण में बाणासुर के प्रसंग में भी कहा गया है, वक्ता कहते हैं, कि उसका फल पारलौकिक है। यह लौकिक फल नहीं है — और आप लौकिक फल चाहते हैं। यदि आप अनजाने में किसी तरह का पुण्य करें, या अंतिम समय में बहुत पाप कर रहे हों, पर जब आप मारे जाने वाले हों, जब शिव जी त्रिशूल लेकर खड़े हों कि अब आपका धड़ तोड़ेंगे — उस समय आप कहें त्राहिमाम् महादेव, महादेव, महादेव, हमने तीन बार महादेव कहा, हमारी रक्षा करो। रक्षा नहीं होगी; महादेव रक्षा नहीं करने वाले। वहाँ साफ़ किया गया है: अंतिम क्षण में आपने याद किया, ठीक है, आपको शिव लोक मिलेगा। पर अभी आपको कटना होगा; अभी आपकी रक्षा नहीं हो सकती। यह भाव पहले आना चाहिए था। यानी आपको पारलौकिक फल मिलेगा।
कहा भी गया है वाणासुर वाला प्रसंग शिव महापुराण में है ना कि उसका पारलौकिक फल है। लौकिक फल नहीं है और आपको चाहिए लौकिक फल। अगर आप अनजाने में किसी प्रकार का पुण्य करते हैं तो या अंतिम समय में आप बहुत पाप कर रहे हैं तो लेकिन जब आपका वध होने वाला हो शिव जी त्रिशूल लेकर खड़े हो कि अब तुम्हारा तुम्हारा धड़ तोड़ ही देंगे। उस समय आप बोल रहे हैं त्राहिमाम महादेव महादेव महादेव हम तीन बार महादेव बोल दिए हमें रक्षा कीजिए। नहीं होगा रक्षा। महादेव नहीं करने वाले रक्षा। वहां इस बात को स्पष्टता दी गई है।
शास्त्र क्या कहता है
At the climax of the Bāṇāsura episode, Mahādev does not protect his devotee when called on at the last moment — the fruit of devotion there is only paralaukik (otherworldly), not laukik (worldly).
Kṛṣṇa, about to sever the unconscious Bāṇa's head with the Sudarśana, is stopped by Śiva himself, who reveals he had already granted Bāṇa a boon of protection (55:38) — Bāṇa is saved by protection arranged in advance, not left unanswered. The passage shows the opposite of the chunk's moral.
मूल पाठ पढ़ें → मूल पाठ छिपाएँ
कृष्णोऽथ कृत्वा समरं चिरं बाणेन वीर्यवान् । शिवाऽऽज्ञया प्राप्तबलश्चुकोपाति मुनीश्वर ॥ २९॥
हे मुनीश्वर! तब पराक्रमी कृष्ण बाणके साथ दीर्घकालतक युद्ध करके, शिवकी आज्ञासे प्राप्त बलके सहारे अत्यन्त क्रुद्ध हो गये।
ततःसुदर्शनेनाशु कृष्णो बाणभुजान्बहून् । चिच्छेद भगवान् शम्भुः शासनात्परवीरहा ॥ ३०॥
तब कृष्णने सुदर्शनचक्रसे तुरन्त, भगवान् शम्भुकी आज्ञासे शत्रुवीरोंका नाश करते हुए, बाणकी अनेक भुजाओंको काट डाला।
अवशिष्टा भुजास्तस्य चत्वारोऽतीव सुन्दराः । गतव्यथो बभूवाशु शङ्करस्य प्रसादतः ॥ ३१॥
उसकी चार अत्यन्त सुन्दर भुजाएँ शेष रह गयीं, और शङ्करकी कृपासे वह तुरन्त पीड़ारहित हो गया।
गतस्मृतिर्यदा बाणः शिरश्छेत्तुं समुद्यतः । कृष्णो वीरत्वमापन्नस्तदा रुद्रः समुत्थितः ॥ ३२॥
जब संज्ञाशून्य हुए बाणका सिर काटनेके लिये वीरभावको प्राप्त कृष्ण उद्यत हुए, तभी रुद्र वहाँ उठ खड़े हुए।
भगवन्देवकीपुत्र यदाज्ञप्तं मया पुरा । तत्कृतं च त्वया विष्णो मदाज्ञाकारिणा सदा ॥ ३३॥
हे भगवन् देवकीपुत्र! मैंने पहले जो आज्ञा दी थी, हे विष्णो! सदा मेरी आज्ञाका पालन करनेवाले आपने वह कर दिया है।
मा बाणस्य शिरश्छिन्धि संहरस्व सुदर्शनम् । मदाज्ञया चक्रमिमममोघं मज्जने सदा ॥ ३४॥
बाणका सिर मत काटो, सुदर्शनको समेट लो; मेरी आज्ञासे यह अमोघ चक्र सदा वापस लिया जा सकता है।
दत्तं मया पुरा तुभ्यमनिवार्यं रणे तव । चक्रं जयं च गोविन्द निवर्तस्व रणात्ततः ॥ ३५॥
हे गोविन्द! मैंने पहले तुम्हें युद्धमें अजेय चक्र तथा विजय प्रदान की थी; अतः अब युद्धसे निवृत्त हो जाओ।
दधीचे रावणे वीरे तारकादिपुरेष्वपि । विना मदाज्ञां लक्ष्मीश रथाङ्गं नामुचः पुरा ॥ ३६॥
हे लक्ष्मीश! दधीचि, वीर रावण और तारकासुर आदि पुरोंके विरुद्ध भी मेरी आज्ञाके बिना यह चक्र पहले कभी नहीं छोड़ा गया।
त्वं तु योगीश्वरः साक्षात्परमात्मा जनार्दन । विचार्यतां स्वमनसा सर्वभूतहिते रतः ॥ ३७॥
हे जनार्दन! तुम तो साक्षात् योगीश्वर और परमात्मा हो; सब भूतोंके हितमें रत होकर अपने मनमें इस पर विचार करो।
वरमस्य मया दत्तं न मृत्युर्भयमस्ति वै । तन्मे वचः सदा सत्यं परितुष्टोऽस्म्यहं तव ॥ ३८॥
मैंने इसे वरदान दिया है कि इसे मृत्युका भय नहीं है; मेरा वह वचन सदा सत्य है। मैं तुमसे बहुत सन्तुष्ट हूँ।
प्रयागराज स्वयं नारायण हैं, इसलिए स्नान के बाद विष्णु सहस्रनाम या गीता का ग्यारहवाँ अध्याय
प्रयागराज नारायण रूप — विष्णु सहस्रनाम या ग्यारहवाँ अध्याय
तीसरी बात प्रयाग जी है। प्रयागराज को स्वयं नारायण कहा गया है, भगवान श्री हरि नारायण। तो नहाने के बाद भगवान नारायण का स्तोत्र और सतनाम करें, या श्री विष्णु सहस्रनाम, या जो भी आपके लिए संभव हो, श्रीमद्भगवद्गीता का। यदि आप भगवद्गीता का पाठ करते हैं, तो ग्यारहवाँ अध्याय पढ़ें; अनंत फल मिलने वाला है। गंगा स्नान का पुण्य तो मिल ही चुका, और प्रयाग जी का पुण्य यहाँ से मिलेगा, क्योंकि वे महाविष्णु के रूप हैं।
तीसरी बात, वक्ता कहते हैं, प्रयाग, प्रयाग जी है। प्रयागराज को स्वयं नारायण कहा गया है, भगवान श्री हरि नारायण। तो अब जब आप नहा लें, उसके बाद भगवान नारायण का स्तोत्र और सतनाम करें, या श्री विष्णु सहस्रनाम, या जो भी आपके लिए संभव हो, श्रीमद्भगवद्गीता का। यदि आप भगवद्गीता जी का पाठ करने वाले हैं, तो ग्यारहवाँ अध्याय पढ़ें; अनंत फल मिलने वाला है। गंगा स्नान का पुण्य तो मिल ही चुका। प्रयाग जी का पुण्य यहाँ से मिलेगा, क्योंकि वे महाविष्णु के रूप हैं।
कम से कम इतना फल तो प्राप्त हो। गंगाजल के स्पर्श का भी अनंत महात्मय है। तो वह भी हो स्मरण भी हो जाएगा और स्पर्श भी हो जाएगा दो चीज तो हो ही गया। तीसरा चीज है प्रयाग प्रयाग जी। तो प्रयागराज साक्षात नारायण के स्वरूप कहे गए हैं भगवान श्री हरि नारायण। तो अब है कि जब स्नान कर लेंगे उसके पश्चात आप भगवान नारायण के स्तोत्र सतनाम से या श्री विष्णु सहस्त्रनाम का या आप जो आपसे संभव हो पाए श्रीमल भगवत गीता जी का। अगर भगवत गीता जी का पाठ करने वाले हैं तो एकादश अध्याय का पाठ कीजिएगा। अनंत फल प्राप्त होने वाला है। गंगा स्नान का पुण्य मिल ही गया।
खास तौर पर ग्यारहवाँ अध्याय ही क्यों?
विराट स्वरूप, जिसमें सारी शक्तियाँ समाई हैं
वक्ता कहते हैं, ग्यारहवाँ अध्याय वह है जिसमें भगवान नारायण अपना सबसे विशाल स्वरूप दिखाते हैं; और उस स्वरूप में सारी शक्तियाँ समाई हैं। इसलिए उसका पाठ करें। वे जोड़ते हैं, यह केवल सामान्य विषय की चर्चा है — आराध्यों का विषय, तंत्रोक्त विषय, मंत्र सिद्धि का विषय, जप आदि का विषय, वह सब अलग है।
ग्यारहवाँ अध्याय, वक्ता कहते हैं, वह है जिसमें भगवान नारायण अपना सबसे विशाल स्वरूप दिखाते हैं। उस स्वरूप में सारी शक्तियाँ समा जाती हैं, इसलिए उसका पाठ करें। यह, वे कहते हैं, अभी सामान्य विषय की चर्चा है। आराध्यों का विषय, तंत्रोक्त विषय, मंत्र सिद्धि का विषय, जप आदि का विषय — वह सारा विषय अलग है।
प्रयाग जी का पुण्य यहां से मिल जाएगा क्योंकि भगवान वो महाविष्णु स्वरूप का है। 11वां अध्याय जिसमें भगवान नारायण जो हैं अपने विराटतम स्वरूप का प्रदर्शन करते हैं। तो उस स्वरूप में समस्त शक्तियां समाहित हो जाती हैं तो उनका पाठ आप कर लें। ये अभी सामान्य विषय की चर्चा हो रही है। अभी आराध्यों का विषय, तंत्रोक्त विषय, मंत्र सिद्धि का विषय, जप आदि का विषय वो सारा विषय अलग है।
जो कोई साधना नहीं करेगा, उसके लिए कम से कम क्या है?
अष्टोत्तर शतनामावली, और कुंभ का पूरा प्रभाव
वक्ता कहते हैं, जो लोग कोई साधना नहीं करने वाले, वे कम से कम इतना करें: अष्टोत्तर शतनामावली आदि का पाठ करें। इतना करें, क्योंकि इतना करने से भी आप पूरी तरह शुद्ध हो जाएँगे, और कुंभ का पूरा प्रभाव मिलेगा।
जो लोग कोई साधना नहीं करने वाले हैं, वक्ता कहते हैं, वे कम से कम इतना करें। अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त।वली आदि का पाठ करें। इतना करें, क्योंकि इतना करने से भी आप पूरी तरह शुद्ध हो जाएँगे; कुंभ का पूरा प्रभाव मिलेगा।
विकल्प क्या-क्या हो सकता है कम से कम में। जो लोग कोई साधना नहीं करने वाले कम से कम इतना तो करें। अष्टोत्तर सतनामावली आदि का पाठ करें। इतना करें क्योंकि इतना करने से भी आप पूरा साफ हो जाइएगा। कुंभ का पूर्ण प्रभाव मिलेगा। क्योंकि दिव्य शक्तियां भैया सभी के कुल में अवश्य रही हैं और ये वो समय है जिसमें कि उनका आवागमन होना ही होना है।
हर कुल में दिव्य शक्तियाँ रही हैं, और यह उनके आने-जाने का समय है
वे हर कुल में रही हैं, और यह उनके आने-जाने का समय है
वक्ता कहते हैं, क्योंकि दिव्य शक्तियाँ सबके कुल में ज़रूर रही हैं, और यह वह समय है जिसमें उनका आना-जाना होना ही है। और जब ऐसा हो, और आप यहाँ तैयार हों, कम से कम अपने पापों के नाश के लिए कुछ व्यवस्था कर रहे हों, तो उस दिव्यता के प्रभाव से उनकी कृपा भी आप पर ज़रूर पड़ेगी।
क्योंकि भाई, दिव्य शक्तियाँ सबके कुल में ज़रूर रही हैं, वक्ता कहते हैं, और यह वह समय है जिसमें उनका आना-जाना होना ही है। और जब ऐसा हो, और आप यहाँ तैयार हों — कम से कम अपने पापों के नाश के लिए कुछ व्यवस्था कर रहे हों — तो उस दिव्यता के प्रभाव से उनकी कृपा भी आप पर ज़रूर पड़ेगी। तो यह एक विषय है, वे कहते हैं।
और जब होगा और आप यहां पे तैयार रहेंगे कम से कम अपने पापों का क्षय करने के निमित्त कुछ प्रबंध कर रहे होंगे तो उन दिव्यता के प्रभाव से उनकी कृपा भी आपके ऊपर अवश्य हो ही जाएगी। तो एक यह विषय हो गया। अब अगला विषय है कि हम सबसे पहला शुभारंभ किस समय से कर सकते हैं।
कुंभ का नियम कब से शुरू कर सकते हैं — और कब से ज़रूर करना है?
विकल्प के रूप में शाकंभरी नवरात्रि; नियम के रूप में पौष पूर्णिमा
जिनकी कुलदेवी भगवती शाकंभरी हैं, वे चाहें तो आने वाली शाकंभरी नवरात्रि की अष्टमी तिथि के दिन से अपनी सेवा और पूजा शुरू कर सकते हैं। पर वक्ता कहते हैं, कुंभ की मुख्य बात आप पौष पूर्णिमा से ज़रूर शुरू करें। यह विषय भी ध्यान में रखें।
अब अगला विषय, वक्ता कहते हैं, यह है कि हम सबसे पहली शुभ शुरुआत किस समय से कर सकते हैं। तो सबसे पहले, जिनकी कुलदेवी भगवती शाकंभरी हैं: इस आने वाली शाकंभरी नवरात्रि की अष्टमी तिथि के दिन से, आप चाहें तो अपनी सेवा और पूजा शुरू कर सकते हैं। पर कुंभ की मुख्य बात यह रहे कि आप पौष पूर्णिमा से ज़रूर शुरू करें। यह विषय भी ध्यान में रखें।
तो सबसे पहले तो जिनकी कुलदेवी भगवती शाकंभरी हैं। ये शाकंभरी नवरात्र जो अष्टमी तिथि अभी पड़ने वाली है उस दिन से आप अपने सेवा पूजा आरंभ चाहे तो कर सकते हैं। लेकिन कुंभ का जो विषय रहे मुख्य वह पौष पूर्णिमा से आप अवश्य आरंभ कर दें। इस विषय का भी ध्यान रखें।
स्नान का नियम पहला है — रोज़, और सुबह जितना जल्दी हो सके
स्नान का नियम — रोज़, और सुबह जितना जल्दी हो सके
वक्ता कहते हैं, नियमों को एक-एक करके लें, तो पहला नियम स्नान का है; यह सबसे खास है, ध्यान रखें। यदि बहुत संक्षेप में कहें — क्या-क्या करना है — तो पहली बात है अनुशासन में रहकर रोज़ नहाना। स्नान छूटना नहीं चाहिए; सुबह जितना जल्दी हो सके करें।
अब जब हम नियमों को एक-एक करके लेते हैं, वक्ता कहते हैं, तो जो पहला नियम है, वह स्नान का नियम है। यह सबसे खास है; ध्यान रखें। यदि बहुत संक्षेप में कहें — भाई, क्या-क्या करना है — तो पहली बात है अनुशासन में रहकर रोज़ नहाना। स्नान छूटना नहीं चाहिए, और सुबह जितना जल्दी हो सके।
अब है कि जब हम एक-एक नियम को सबसे पहला नियम जो होता है स्नान का नियम है। सो सबसे विशेष है ध्यान रखें। बहुत अगर शॉर्ट में इसको अगर समराइज किया जाए कि भैया क्या-क्या करना है। सबसे पहला चीज तो अनुशासन में रहते हुए स्नान करना है नित्य। स्नान छूटना नहीं चाहिए जितना सुबह हो सके।
इसके बाद संध्या, जिसमें कम से कम अपने आराध्य का अष्टोत्तर सतनाम हो
संध्या, कम से कम अपने आराध्य के अष्टोत्तर सतनाम के साथ
दूसरी बात संध्या है। यदि आप पूरे पैंतालीस दिन स्नान और संध्या करें, तो केवल नहाने से, और संध्या में और कुछ न करके केवल अपने आराध्य का अष्टोत्तर सतनाम पढ़ने से — वक्ता कहते हैं, इतना करना भी इस समय आपको कई करोड़ गुना पुण्य देने वाला है।
और दूसरी बात संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। है, वक्ता कहते हैं। यदि आप पूरे पैंतालीस दिन स्नान और संध्या करें, तो केवल नहाने से, और संध्या में, और कुछ नहीं तो, अपने आराध्य का अष्टोत्तर सतनाम पढ़ने से — इतना करना भी इस समय आपको कई करोड़ गुना पुण्य देने वाला है।
और दूसरा चीज है संध्या। स्नान और संध्या अगर आप पूरा 45 दिन करते हैं तो स्नान करने मात्र से और संध्या में आप और कुछ नहीं तो अष्टोत्तर सतनाम अपने आराध्य का पाठ आप कर लीजिए। इतना करना भी आपके लिए कई करोड़ गुना पुण्य को देने वाला है इस समय में। और इस बीच में अगर आप प्रयाग क्षेत्र चले गए या गंगा जी में कहीं भी स्नान कर लिए या माघ के क्षेत्र के नियम के अनुसार माघ नियम के अनुसार जो है आप किसी भी नदी में सरोवर में स्नान कर लेते हैं, तीर्थ क्षेत्र में चले जाते हैं, कोई हवन आदि कर लिए क्योंकि बीच में अभी बहुत कुछ पड़ेगा।
इन पैंतालीस दिनों में कौन-कौन से पर्व पड़ते हैं?
शाकंभरी पूर्णिमा, मौनी अमावस्या, माघ गुप्त नवरात्रि, माघी पूर्णिमा, महाशिवरात्रि
वक्ता कहते हैं, और इस बीच यदि आप प्रयाग क्षेत्र जाएँ, या कहीं भी गंगा जी में नहाएँ, या माघ क्षेत्र के नियम से किसी नदी या तालाब में नहाएँ, किसी तीर्थ क्षेत्र जाएँ, हवन आदि करें — क्योंकि बीच में बहुत कुछ पड़ने वाला है। शाकंभरी पूर्णिमा है; उसके बाद मौनी अमावस्या; फिर माघ की गुप्त नवरात्रि; उसके बाद माघी पूर्णिमा, जिस दिन ललिता अंबा की जयंती है, माँ भगवती महा त्रिपुर सुंदरी की जयंती; इधर भगवती शाकंभरी की जयंती पड़ रही है; और उसके बाद फिर शिव जी की नवरात्रि शुरू होती है, और महाशिवरात्रि पड़ेगी।
और इस बीच, वक्ता कहते हैं, यदि आप प्रयाग क्षेत्र जाएँ, या कहीं भी गंगा जी में नहाएँ, या माघ क्षेत्र के नियम के अनुसार, माघ के नियम के अनुसार, किसी नदी में या तालाब में नहाएँ, या किसी तीर्थ क्षेत्र जाएँ, या हवन आदि करें — क्योंकि बीच में बहुत कुछ पड़ने वाला है। शाकंभरी पूर्णिमा है; उसके बाद मौनी अमावस्या है; फिर माघ की गुप्त नवरात्रि; उसके बाद माघी पूर्णिमा है, जिस दिन ललिता अंबा की जयंती पड़ती है। माँ भगवती महा त्रिपुर सुंदरी की जयंती पड़ेगी। इधर भगवती शाकंभरी की जयंती पड़ रही है। उसके बाद फिर शिव जी की नवरात्रि शुरू होगी, और महाशिवरात्रि पड़ेगी। तो बीच में इतने सारे दिव्य पर्व पड़ रहे हैं, वे कहते हैं।
शाकंभरी पूर्णिमा है, उसके बाद मौनी अमावस्या है, फिर माघ का गुप्त नवरात्र है, उसके बाद माघी पूर्णिमा है जिस दिन ललिता अंबा की जयंती है। मां भगवती महा त्रिपुर सुंदरी का जयंती पड़ेगा। इधर भगवती शाकंभरी का जयंती पड़ रहा है। उसके पश्चात फिर पुनः जो है शिव जी का नवरात्र शुरू होगा और महाशिवरात्रि पड़ेगी।
प्रयाग में रहकर रोज़ नहाने वाले के बारे में क्या कहा गया है?
विष्णु रूप होकर विष्णु लोक पाना, और पीढ़ियों का उद्धार
वक्ता कहते हैं, कहा गया है कि स्नान का पुण्य अनंत है, और यदि कोई व्यक्ति केवल लगातार नहाता है, तो यह पुण्य है। अब यदि प्रयाग क्षेत्र में रहने वाला व्यक्ति रोज़ नहाए, तो भाई, महिमा अनंत ही हो गई — वह विष्णु का ही रूप धरकर विष्णु लोक जाएगा; और केवल वही नहीं, उसकी कई पीढ़ियों के पूर्वज भी जाएँगे; आप उन सबका उद्धार करेंगे।
यह सब इसी बीच में है, वक्ता कहते हैं, और यदि इस बीच आप एक भी चीज़ पकड़ लें और केवल इतना करें — यह भी कहा गया है कि स्नान का पुण्य अनंत है। यदि कोई व्यक्ति केवल लगातार नहाता है, तो यह पुण्य है। अब यदि प्रयाग क्षेत्र में रहने वाला व्यक्ति रोज़ नहाए, तो भाई, महिमा अनंत हो गई। वह विष्णु का ही रूप धरकर विष्णु लोक जाएगा; अकेला वह नहीं, उसकी कई-कई पीढ़ियों के पूर्वज भी — आप उन सबका उद्धार करेंगे।
तो इतना दिव्य-दिव्य पर्व पड़ जा रहा है बीच में। ये सब इसी बीच में है और इस बीच में अगर आप और कुछ नहीं अगर एक चीज भी पकड़ कर के इतना भी कर लिए हैं उसमें कहा भी गया है कि स्नान का या अनंत पुण्य है। लगातार स्नान भी कर लेता है कोई व्यक्ति तो ये पुण्य। अब अगर प्रयाग क्षेत्र में रहने वाला व्यक्ति नित्य स्नान कर ले तो भाई महिमा ही अनंत हो गई तब। वो तो साक्षात विष्णु स्वरूप धारण करके विष्णु लोक को जाएंगे।
जहाँ यह भी संभव न हो, वहाँ पूरे पैंतालीस दिन रखा गया विकल्प भी गिना जाता है
पूरे पैंतालीस दिन रखा गया विकल्प
वक्ता कहते हैं, यदि इतना भी संभव न हो, तो जिस विकल्प की चर्चा हुई वह है; और यदि आप वह भी पूरे पैंतालीस दिन करें, तो सोचिए उस समय में कितने दिव्य पर्व-काल पड़ रहे हैं। इन सबमें आप कौन-से अनुष्ठान और साधनाएँ करेंगे, और जप आदि कैसे होगा, यह विषय अभी पूरी तरह अलग है।
पर यदि इतना भी न हो सके, वक्ता कहते हैं, तो जो विकल्प है, जिस विकल्प की चर्चा हुई, उसके अनुसार — यदि आप वह भी पूरे पैंतालीस दिन करें, तो सोचिए कितने दिव्य पर्व-काल पड़ रहे हैं। इन सबका विषय अभी अलग है: आप क्या-क्या अनुष्ठान और साधना करेंगे, जप आदि कैसे होगा, उसमें क्या विषय होगा — वह सब अभी अलग है। और यदि बहुत कष्ट और परेशानी दूर नहीं हो रही, तो कुंभ के समय क्या-क्या करना है — वह सारा विषय भी अभी अलग है। अभी केवल सबसे सामान्य विषय की चर्चा हो रही थी।
वो नहीं उनके कई-कई पीढ़ियों के पूर्वज तक भी जाएंगे सभी को तार दीजिएगा। लेकिन अगर उतना नहीं भी हो सकता है तो जो विकल्प है उस विकल्प के अनुसार जिस पर भी चर्चा की गई उस वो भी अगर आप करते हैं पूरे 45 दिन तक तो भी सोचिए कितने सारे दिव्य पर्व काल पड़ रहे हैं। अभी इन सभी में का विषय अभी अलग है कि क्या-क्या अनुष्ठान साधना आप करेंगे, जप आदि कैसे क्या होगा उसमें क्या विषय रहेगा वो सब अभी अलग है। आप नाश के लिए किस-किस प्रकार का अगर बहुत कुछ कष्ट क्लेश से नहीं मिट रहा है तो कुंभ के समय में क्या करना है वो सारा विषय अभी अलग है।
मूल बात है स्नान, संध्या, और पैंतालीस दिन भोजन और ब्रह्मचर्य का अनुशासन
स्नान, संध्या, और पैंतालीस दिन भोजन और ब्रह्मचर्य का अनुशासन
वक्ता कहते हैं, तो यह ज़रूर करें: सबसे बुनियादी चीज़ आप क्या चाहते हैं? स्नान, संध्या, और पूरे पैंतालीस दिन नियम और अनुशासन का पालन। अनुशासन में दो चीज़ों पर ध्यान देना है — भोजन और ब्रह्मचर्य। इतना ज़रूर करें, फिर परिणाम देखें। करेंगे तो परिणाम ज़रूर मिलेगा; नहीं करेंगे और कहेंगे कि ऐसा कुछ नहीं होता, तो वैसा ही होगा — ऐसा कुछ नहीं होगा।
तो यह ज़रूर करें, वक्ता कहते हैं। सबसे बुनियादी रूप में आप क्या चाहते हैं? स्नान, और संध्या, और पूरे पैंतालीस दिन नियम और अनुशासन का पालन। अनुशासन में दो चीज़ों पर ध्यान देना है: भोजन और ब्रह्मचर्य। कम से कम इतना करें और फिर परिणाम देखें। यदि आप करेंगे, तो परिणाम ज़रूर मिलेगा। यदि नहीं करेंगे और कहेंगे कि ऐसा कुछ नहीं होता — तो ठीक वैसा ही होगा; ऐसा कुछ नहीं होगा।
अभी केवल सबसे सामान्य विषय पर चर्चा हो रही थी। तो ये तो जरूर कीजिए। जो सबसे आप मूल चाहते हैं क्या तो स्नान और संध्या और पूरा का पूरा 45 दिन तक जो है नियम अनुशासन का पालन। अनुशासन में भोजन और ब्रह्मचर्य इन दो पर ध्यान देना है। इतना अवश्य करें तो फिर आप देखिए परिणाम। अगर आप करिएगा तो परिणाम अवश्य मिलेगा। नहीं कीजिएगा बोले कि थोड़ी होता है ऐसा थोड़ी होता है तो फिर वैसा ही होगा ऐसा थोड़ी होगा। ठीक है।
क्या शिवलिंग और अरघी को जोड़कर रखना चाहिए?
घर में स्थापित शिवलिंग पर शिव महापुराण विद्येश्वर संहिता
वक्ता जवाब देते हैं, शिवलिंग और अरघी को जोड़कर नहीं रखना चाहिए। इसका शास्त्रोक्त मत है: जब आप शिव महापुराण में, विश्व संहिता में, शिवलिंग के माहात्म्य के विषय में पढ़ेंगे, तो प्रमाण मिलेगा कि जो शिवलिंग हमें घर में पूजन के लिए रखना है, जिसे घर में स्थापित करना है, उसमें अरघी और शिवलिंग अलग-अलग रखने चाहिए।
शिवलिंग और अरघी को जोड़कर नहीं रखना चाहिए, वक्ता जवाब देते हैं। इसका कारण देखिए; यह विषय रखा गया है। यह शास्त्रोक्त मत है, विषय है — जब आप शिव महापुराण में, विश्व संहिता में, शिवलिंग के माहात्म्य के विषय में पढ़ेंगे, तो उसमें आपको यह प्रमाण मिलेगा: कि जो शिवलिंग हमें घर में पूजन के लिए रखना है, जिसे घर में स्थापित करना है, उसमें अरघी और शिवलिंग एक-दूसरे से अलग रखने चाहिए।
शिवलिंग अर्घी को जोड़ करके नहीं रखना चाहिए। इसका कारण देखिए ये विषय रखा गया है। शास्त्रोक्त मत है विषय है शिव महापुराण विश्व संहिता में जब आप पढ़िएगा शिवलिंग के विषय महात्मय में तो उसमें यह आपको प्रमाण मिलेगा कि शिवलिंग जो घर में हमें रखना है पूजन के निमित्त गृह स्थापित जो करना है उसमें अर्घी और शिवलिंग को अलग-अलग रखना चाहिए।
दिवाली की स्वर्णाकर्षण भैरव पोटली कहाँ रखनी चाहिए?
मुख्य द्वार या पूजा स्थान, और उसकी माला पर जप
दिवाली पर बनी स्वर्णाकर्षण भैरव जी की पोटली या तो घर के मुख्य द्वार के पास टाँग सकते हैं या पूजा स्थान में रख सकते हैं; इन दोनों में से किसी भी स्थान पर स्थापित कर सकते हैं। और उसकी माला पर जप करके आप उसे रोज़ पहन सकते हैं। जिन्हें महाभैरव के मंत्र के लिए तंत्रोक्त माला नहीं मिली, या जो ले नहीं पाए, या जिनके पास कुछ भी नहीं है — उनके लिए भी उस माला पर जप करके उसे पहनना सबसे उत्तम है।
दिवाली पर बनी स्वर्णाकर्षण भैरव जी की पोटली, वक्ता कहते हैं, या तो घर के मुख्य द्वार के पास टाँग सकते हैं, या पूजा स्थान में रख सकते हैं; दोनों में से किसी भी स्थान पर आप उन्हें स्थापित कर सकते हैं। दोनों स्थान बराबर हैं — और उसकी माला पर जप करके आप उसे रोज़ पहन सकते हैं। जिन्हें महाभैरव के मंत्र के लिए तंत्रोक्त माला आदि नहीं मिली, या जो ले नहीं पाए, या जिनके पास कुछ भी नहीं है — उनके लिए भी उस माला पर जप करके उसे पहनना सबसे उत्तम है।
दीपावली में जो स्वर्णाकर्षण भैरव जी का पोटली है वो या तो घर के मुख्य द्वार के पास टांग सकते हैं या पूजन स्थान में रख दोनों में से किसी भी स्थान पर उनको स्थापित कर सकते हैं। दोनों ही स्थान उनका माला जो है वो आप जप करके नित्य पहन सकते हैं। जिनको महाभैरव का मंत्र आदि के निमित्त तंत्रोक्त माला आदि की प्राप्ति नहीं है या वो नहीं ले पाए हैं या कुछ भी नहीं है उस माला पर भी जप करके आप पहने तो अति उत्तम है।
हिंगलाज, पूर्णागिरि और ज्वालामुखी की विधियाँ गुप्त क्यों रखी गई हैं?
अत्यंत दिव्य स्वरूप, जानबूझकर गुप्त रखे गए
वक्ता कहते हैं — हिंगलाज माता, पूर्णागिरि माता, ज्वालामुखी माता, ऐसे जितने भी स्वरूप हैं, इन्हें अत्यंत दिव्य स्वरूप जानिए। और अच्छा है कि भगवती कैला देवी समेत ऐसे सब स्वरूपों का विषय यथाशक्ति गुप्त रखा गया है। मंत्र, विधि-विधान आदि ऐसे ही ठीक हैं।
वक्ता कहते हैं — हिंगलाज माता, पूर्णागिरि माता, ज्वालामुखी माता, ये जितने भी स्वरूप हैं, इन सबको अत्यंत दिव्य स्वरूप जानिए। और अच्छा है कि इन सब स्वरूपों का विषय — चाहे भगवती कैला देवी आदि हों, ऐसे जितने भी स्वरूप हैं — यथासंभव गुप्त ही रखा गया है। मंत्र, विधि और विधान ऐसे ही ठीक हैं। क्योंकि ये अपने आप में अत्यंत विशेष हैं।
हिंगलाज माता, पूर्णगिरी माता, ज्वालामुखी माता ये जितना भी ये सभी स्वरूप है ना इन सभी स्वरूपों का जो आप जान लीजिए कि अति दिव्यतम स्वरूप है और अच्छा है कि इन सभी स्वरूपों का विषय जो है चाहे वो भगवती कैला देवी आदि ये जितने भी स्वरूप है इन सभी को यथा सामर्थ्य गुप्त रखा गया है मंत्र विधि विधान आदि उचित है।
भगवान की लीला में जो नकारात्मक पात्र बनता है, वह उन्हें अत्यंत प्रिय होता है
जो नकारात्मक भूमिका निभाता है, वह भगवान को अत्यंत प्रिय है
वक्ता उस दिन लिखी अपनी एक पोस्ट की बात करते हैं। उसमें उन्होंने लिखा कि भगवान की हर लीला में जो नकारात्मक पात्र निभाता है, जो खलनायक बनता है, वह भगवान को अत्यंत प्रिय है — और भगवान उसे अत्यंत प्रिय हैं। वे कहते हैं, इसी कारण उन्होंने यह स्पष्टता दी।
वक्ता कहते हैं — जानिए, आज हमने एक पोस्ट लिखी, जिसमें यह विषय लिखा: कि भगवान की हर लीला में जो नकारात्मक पात्र की भूमिका निभाता है, जो उसमें खलनायक बनता है, वह भगवान को अत्यंत प्रिय है। भगवान उसे अत्यंत प्रिय हैं। इसी कारण हमने इस विषय पर स्पष्टता दी।
भगवान उसको अति प्रिय होते हैं।
हिंगलाज, विंध्यवासिनी या ज्वालामुखी स्वरूप का पूरा विधान साधारण व्यक्ति पचा नहीं सकता
हिंगलाज, विंध्यवासिनी या ज्वालामुखी का पूरा विधान देखना
वक्ता कहते हैं — जब आप भगवती के हिंगलाज स्वरूप, विंध्यवासिनी स्वरूप, ज्वालामुखी स्वरूप का पूरा विधान पाकर देखेंगे, तो उसे जानकर, देख-सुनकर आप उसे पचा नहीं पाएँगे। साधारण लोग वे बातें जल्दी नहीं पचा सकते। वे कहते हैं, यही सीधा सत्य है।
वक्ता कहते हैं — उसमें होता यह है कि जब आप भगवती के हिंगलाज स्वरूप, भगवती के विंध्यवासिनी स्वरूप, भगवती के ज्वालामुखी स्वरूप आदि का पूरा विधान पाते हैं, देखते हैं, तो उस विधान को जानकर, देख-सुनकर आप उसे पचा नहीं पाएँगे। साधारण लोग वे बातें जल्दी नहीं पचा सकते। यही सीधा सत्य है।
उसमें क्या है जब आप भगवती के हिंगलाज स्वरूप, भगवती के विंध्यवासिनी स्वरूप, भगवती के ज्वालामुखी स्वरूप आधे का पूर्ण विधान अगर प्राप्त करते हैं देखते हैं तो उस विधान को जानने के पश्चात देखने सुनने के पश्चात आप पचा नहीं पाइएगा। सामान्य जन उन चीजों को जल्दी नहीं पचा सकते हैं। ये यथार्थ बात है।
नाम महिमा के स्तर पर अटकी बुद्धि के लिए राधा के तंत्रोक्त विषय बंद रहते हैं
राधा के तंत्रोक्त विषय, और दूसरे स्तर पर अटकी बुद्धि
वक्ता कहते हैं — आज भगवती राधा जी से जुड़े तंत्रोक्त विषय देखिए। नाम जप आदि की महिमा अनंत है, और उस हद तक सब ठीक चल रहा है। पर अगर आप उनके तंत्रोक्त विषयों में जाएँ, भगवती के अनन्य स्वरूपों के बारे में जानें — कि हाँ, यही मूल रूप है, उसमें क्या और कैसे है — तो कहीं न कहीं उस बात को पचाने की क्षमता नहीं होगी। कारण यह है कि हमारी बुद्धि किसी दूसरे स्तर पर जाकर अटक गई है।
वक्ता कहते हैं — आज देखिए, भगवती राधा जी से जुड़े तंत्रोक्त विषय। नाम जप आदि की महिमा अनंत है, और उस हद तक यह अच्छा चल रहा है, उस हद तक। पर अगर आप उनके तंत्रोक्त विषयों में जाएँ, भगवती के अनन्य स्वरूपों के बारे में जानें — कि हाँ, यही मूल स्वरूप है, उसमें क्या और कैसे है — तो कहीं न कहीं उस बात को पचाने की क्षमता नहीं होगी। कारण क्या है? कि हमारी बुद्धि किसी दूसरे स्तर पर जाकर अटक गई है।
लेकिन अगर उनके तंत्रोक्त विषयों पर जब आप जाइएगा जब भगवती के अनन्य स्वरूपों के विषय में जानिएगा कि हां ये मूल स्वरूप है इसमें कैसे क्या है तो फिर वहां पर कहीं ना कहीं उस चीज को पचाने की क्षमता नहीं होगी। कारण क्या है कि हमारी बुद्धि एक अलग लेवल में जाकर के अटकी पड़ी हुई है। तो ये अच्छा है कि ये सभी स्वरूप जो है कहीं ना कहीं गुप्तता का अपना निर्वहन कर रहे हैं।
ऐसे स्वरूप ठीक ही गुप्त रखे गए हैं; आपकी परंपरा में कुलदेवी का स्थान कुल गुरु से पूछिए
कुल गुरु, और अपनी परंपरा में कुलदेवी का स्थान
वक्ता कहते हैं — अच्छा है कि ये सब स्वरूप कहीं न कहीं अपनी गोपनीयता निभा रहे हैं। वे उस स्तर पर समाज के बीच नहीं हैं, और जो उन्हें रखता है या रखेगा, उसकी क्या दशा होती है, यह समाज देख ही रहा है। जिनके कुल में ये हैं, जिनकी वे कुलदेवी हैं, वे इन स्वरूपों की आगे की जानकारी अपने कुल गुरु से लें। अगर वे कुल में हैं, तो कुल परंपरा में उनकी पूजा और सेवा चली होगी, और लोगों ने बाद में उसे अपने तक सीमित कर लिया होगा, जिससे बाकी सबको उसका ज्ञान नहीं रहेगा।
वक्ता कहते हैं — तो अच्छा है कि ये सब स्वरूप कहीं न कहीं अपनी गोपनीयता निभा रहे हैं। वे उस स्तर पर समाज के बीच नहीं हैं; और जो उन्हें रखता है या रखेगा, उसकी क्या दशा होती है, यह भी समाज देख रहा है और चल रहा है। जिनके कुल में वे हैं, जिनकी वे कुलदेवी हैं, वे इन स्वरूपों की आगे की जानकारी अपने कुल गुरु से लें। अगर कहीं वे कुल में हैं, तो कुल परंपरा में उनकी पूजा और सेवा चली होगी; लोगों ने बाद में उसे अपने तक सीमित कर लिया होगा, और फिर बाकी सबको वह ज्ञान नहीं रहेगा।
समाज के बीच में नहीं है उस स्तर में और जो रखता है या जो रखेगा उसकी क्या अवस्था होती है फिर वो भी आप समाज देख ही रहा है चल ही रहा है। जो कुल में है जिनकी कुलदेवी हैं उनको अपने कुल गुरु से इन स्वरूपों के विषय में आगे की जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। अगर कहीं ना कहीं अगर कुल में है तो कुल परंपरा में इनका पूजा सेवा होता रहा होगा। लोग अपने तक फिर बाद में सीमित कर दिए होंगे सभी को उनकी जानकारी फिर नहीं होगी।
क्या स्त्रियाँ तर्पण कर सकती हैं?
तर्पण के लिए पुरुष अधिक उपयुक्त; विशेष परिस्थिति में स्त्रियों को अधिकार
वक्ता उत्तर देते हैं — ठीक से कहा जाए तो तर्पण पुरुष करें, यही सर्वोत्तम है। विशेष परिस्थितियों में स्त्रियों को अधिकार है, पर तब पूरा नियम लागू होता है — किस अवस्था में और कब करना है। दूसरी बात, गणपति जी का तर्पण: भगवान गणपति के बारह स्वरूपों, विनायकों का तर्पण आप कर सकते हैं। पर जिस विशेष तंत्रोक्त तर्पण में मंत्रों का प्रयोग हुआ है, उसके लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है।
वक्ता कहते हैं — स्त्रियों के तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। के विषय में, सही ढंग से कहा जाए, तो भाई, तर्पण जो पुरुष हैं वे करें, यही सर्वोत्तम है। विशेष परिस्थितियों में स्त्रियों को इसका अधिकार है, पर तब पूरा नियम लागू होता है — किस अवस्था में और कब करना है। दूसरी बात गणपति जी के तर्पण का विषय है: भगवान गणपति के, विनायक के बारह स्वरूपों का तर्पण आदि आप कर सकते हैं। जिस विशेष तंत्रोक्त तर्पण में मंत्र आदि का प्रयोग हुआ है, उसके लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है।
कर सकती हैं इसका विषय महिलाओं का की तर्पण का विषय वो अगर सही तरीके से बोला जाए तो भाई तर्पण तो जो पुरुष हैं वो करें तो अति उत्तम है। विशेष परिस्थितियों में स्त्रियों को अधिकार है करने का लेकिन फिर वो पूरा नियम लागू होता है कि किस अवस्था में कब करना है। दूसरा चीज है गणपति जी का तर्पण का जो विषय है तो भगवान गणपति के विनायक के 12 स्वरूपों का आप तर्पण आदि कर सकते हैं जो विशेष तंत्रोक्त तर्पण है उसके निमित्त गुरु दीक्षा अनिवार्य है जिसमें कि मंत्र आदि का प्रयोग किया गया है।
नाम जप में किन दस नाम-अपराधों से बचना है?
नाम जप किसी भी अवस्था में, पर निंदा कभी नहीं
वक्ता कहते हैं — पितरों का तर्पण पुरुष करें, यही अधिक उचित है। नाम जप आप हर अवस्था में कर सकते हैं। पर दस नाम-अपराध हैं, उनसे बचना चाहिए। नाम जप करते हुए किसी की निंदा न करना — यह सब दस नाम-अपराधों में आता है। नाम जप का पूरा फल तभी मिलेगा जब आप अपराधों से बचकर नाम जप करेंगे।
वक्ता कहते हैं — और जहाँ तक पितरों के तर्पण की बात है, वह पुरुष करें, यही अधिक उचित रहता है। नाम जप आप हर अवस्था में कर सकते हैं। दस नाम-अपराध हैं, उनसे बचना चाहिए। नाम जप करते हुए किसी की निंदा न करना — यह सब उन दस नाम-अपराधों में आता है। तो नाम जप का पूरा फल तभी मिलेगा जब आप अपराधों से बचकर नाम जप करेंगे।
और पितरों का तर्पण का जहां तक विषय है वो पुरुष करें तो ज्यादा उचित रहता है। अक्षय तो और जी नाम जप तो आप हर अवस्था में नाम जप कर सकते हैं। दश नाम अपराध हैं उनसे बचना चाहिए। नाम जप करते हुए किसी की निंदा नहीं करना ये सब नाम जप के अंतर्गत दश नाम अपराध जो होते हैं उसके अंतर्गत आते हैं तो बस नाम जप का पूरा फल तभी मिलेगा जब आप अपराधों से बच कर के नाम जप करें।
नाम जप की साधना चलते समय ठीक-ठीक किन बातों से बचना है?
न निंदा, न शाप, न कठोर वाणी, न वर्जित भोजन या स्पर्श
किसी की निंदा नहीं करनी, किसी को शाप नहीं देना, कठोर वचन नहीं बोलने — क्योंकि उसी मन से, उसी मन में मंथन करते हुए आप नाम जप कर रहे हैं। जब उसी मन से आप बिना अधिकार का कोई चिंतन करते हैं, किसी को बुरे वचन कहते हैं, अभक्ष्य पदार्थ खाते हैं, या अस्पृश्यता से वे चीज़ें छूते हैं जिन्हें छूना मन के लिए वर्जित है, तो वह सब आपको दोष बनकर लगेगा। वक्ता कहते हैं, नाम जप से आपके सूक्ष्म शरीर, सूक्ष्म आवरण और कारण शरीर में जो ऊर्जा आती है, वह आपकी पवित्रता और क्षमता बढ़ाने वाली होती है।
वक्ता कहते हैं — किसी की निंदा नहीं करनी; किसी को शाप नहीं देना; कठोर वचन नहीं बोलने। क्योंकि उसी मन से, उसी मन में मंथन करते हुए आप नाम जप कर रहे हैं। अब जब उसी मन से आप बिना अधिकार का कोई चिंतन करें, किसी को बुरे वचन कहें, अभक्ष्य पदार्थ खाएँ, या अस्पृश्यता से वे चीज़ें छुएँ जिन्हें छूना मन के लिए वर्जित है — तो वह सब आपको दोष बनकर लगेगा। नाम जप के कारण आपके सूक्ष्म शरीर में, आपके सूक्ष्म आवरण में, आपके कारण शरीर में जो ऊर्जा उपस्थित होगी, वह कहीं न कहीं आपकी पवित्रता बढ़ाएगी और आपकी क्षमता बढ़ाएगी।
निंदा नहीं करना है किसी को श्राप नहीं देना है कटु वचन नहीं बोलना है क्योंकि उसी मन से उसी मन में मंथन करते हुए नाम जप कर रहे हैं अब उसी से जब आप अनाधिकार युक्त होकर के किसी प्रकार का चिंतन करेंगे किसी को दुर्वचन बोलेंगे अभक्ष पदार्थ का भक्षण करेंगे अस्पृश्यता के साथ जिन चीजों का मन निषेध है कि इन्हें स्पर्श नहीं करना इन चीजों को उसको आप स्पर्श करेंगे तो फिर वो सब आपको दोषी ही लगेगा। नाम जप के कारण जो ऊर्जा आपके सूक्ष्म शरीर में सूक्ष्म आवरण में आपके कारण शरीर में उपस्थित होती जाएगी वो कहीं ना कहीं आपके पवित्रता को बढ़ाने वाली होगी आपके सामर्थ्यता को बढ़ाने वाली होगी।
जप के समय अपवित्रता देवता का अपमान क्यों बन जाती है?
जिस देवता का नाम जपा जाता है, शरीर उसी का रूप लेने लगता है
वक्ता कहते हैं — आप यह भी जानते हैं कि जिस देवता का मंत्र और नाम रोज़ स्मरण किया जाता है, जिसका जप-तप होता है, हमारा शरीर उसी का स्वरूप लेने लगता है। तो जब आप ऐसी अवस्था पा रहे हों, और उसी अवस्था में दूसरे विकारों से युक्त होकर चिंतन, स्पर्श और भोग करें, तो यह उस देवता का सीधा अपमान हो जाता है। और जब अपमान होता है, तो फल मिलने के बजाय कहीं न कहीं उनका शाप आपको मिलेगा।
वक्ता कहते हैं — और आप यह भी जानते हैं कि जिस देवता का मंत्र और जिस देवता का नाम रोज़ स्मरण किया जाता है, जिसका जप-तप आदि होता है, हमारा शरीर उन्हीं का स्वरूप लेने लगता है। तो जब आप ऐसी अवस्था पा रहे होंगे, और उसी अवस्था में दूसरे विकारों से युक्त होकर चिंतन करें, स्पर्श करें, भोग करें — तो यह उस देवता का सीधा अपमान हो जाता है। और जब अपमान होता है, तो फल मिलने के बजाय कहीं न कहीं उनका शाप आदि आपको मिलेगा।
और आप यह भी जान रहे हैं कि जिस देवता के मंत्र का और जिस देवता के नाम का नित्य स्मरण जप तप आदि किया जाता है हमारा शरीर उन्हीं के स्वरूप को धारण करने लगता है। तो जब ऐसी अवस्था को आप प्राप्त कर रहे होंगे और उसी अवस्था में आप अन्य प्रकार के विकारों से युक्त होकर के अगर चिंतन करेंगे स्पर्श करेंगे भक्षण करेंगे तो उस देवता का सीधे-सीधे अपमान होगा। और फिर अपमान होगा तो फल आपको ना मिलकर के उसका कहीं ना कहीं श्राप आदि आपको प्राप्त होगा।
नाम जप आदत बन जाए तो क्या खतरा है?
जप चलता रहता है, चिंतन भटकता रहता है
वक्ता कहते हैं — यहीं नाम जप कहीं न कहीं बिगड़ जाता है, और एक तरह से दुष्प्रभाव वाला फल देने लगता है। तो पहली बात, अगर आप नाम जप कर रहे हैं तो सावधानी ज़रूर रखिए — क्योंकि जब यह अभ्यास बन जाता है, तो चिंतन छूट जाता है; यह भी सच्ची बात है। यह बिल्कुल ठीक है कि हमेशा, हर अवस्था में नाम जप करते रहना चाहिए, ताकि मन दूसरी बातों पर न टिके, एक अच्छी बात पर केंद्रित रहे, विकारों पर नहीं। जैसे कोई व्यक्ति बैठकर किसी सुंदर स्त्री को देखकर सोचने लगे कि यह स्त्री हमारी होती — ऐसी अवस्था में अगर उसका मन नाम जप कर रहा है, तो वह ऐसा विचार नहीं करेगा, नाम जप पर केंद्रित रहेगा, कि अरे, हम भगवान का नाम ले रहे हैं। यह अच्छी बात है।
वक्ता कहते हैं — तो नाम जप ठीक इसी जगह कहीं न कहीं बिगड़ जाता है — एक तरह से कहें तो दुष्प्रभाव वाला फल देने लगता है। तो पहली बात यह है: अगर आप नाम जप कर रहे हैं, तो सावधानी ज़रूर रखिए, क्योंकि जब यह अभ्यास बन जाता है, तो चिंतन छूट जाता है; यह भी सच्ची बात है। जो नाम जप करते हैं, वे इससे जुड़ पाएँगे। यह बिल्कुल ठीक है कि हमेशा, हर अवस्था में नाम जप करते रहना चाहिए, ताकि मन दूसरी तरह की बातों पर न टिके, बल्कि एक अच्छी बात पर टिका और केंद्रित रहे, विकारों पर केंद्रित न हो। जैसे, कोई बैठकर किसी सुंदर स्त्री को देखकर सोचने लगे कि यह स्त्री हमारी होती — ऐसी अवस्था में अगर व्यक्ति का मन नाम जप कर रहा है, तो वह ऐसा विचार नहीं करेगा; वह नाम जप पर केंद्रित रहेगा, कि अरे, हम भगवान का नाम ले रहे हैं। यह अच्छी बात है।
तो नाम जप इसी जगह में आपको कहीं ना कहीं गड़बड़ एक तरीके से बोला जाए तो दुष्प्रभाव के युक्त होकर के फल देने लगता है तो सबसे पहला चीज तो ये है कि नाम जप अगर कर रहे हैं तो सावधानी अवश्य रखें क्योंकि अभ्यास जब हो जाता है तो चिंतन छूट जाता है ये भी सत्य बात है। जो नाम जप करते होंगे ना उसको रिलेट कर पाएंगे कैसे ये तो बहुत सही बात है कि नाम जप करते रहो हमेशा नाम जप करो हर अवस्था में नाम जप करो ताकि मन जो है वो एक जगह स्थिर ना हो पाए किसी अन्य प्रकार की चीजों एक केवल अच्छी चीज पर स्थिर रहे केंद्रित रहे विकारों के ऊपर केंद्रित ना हो जैसे उदाहरण के लिए कि अगर कोई बैठ कर के किसी सुंदर स्त्री को देख कर के चिंतन करने लगे कि अगर ये स्त्री हमें मिल जाती तो ऐसी अवस्था में अगर व्यक्ति मन नाम जप कर रहा है तो वो फिर ऐसा अचिंतन नहीं करेगा वो नाम जप के ऊपर केंद्रित रहेगा कि अरे हम भगवान का नाम ले रहे हैं।
केवल नाम जप काफ़ी क्यों नहीं है?
जप के साथ सत्संग, स्वाध्याय और स्तुति
पर अगर नाम जप का अभ्यास बन गया है और आपका चिंतन आपको नहीं छोड़ रहा — आप चौबीस घंटे चिंतन करते थे और अब भी करते हैं, और जप का अभ्यास भी बन गया — तो इसके लिए भी सत्संग ज़रूरी है; केवल नाम जप से यह नहीं होगा। नाम जप के साथ जब आप सत्संग करें, जब अपने इष्ट और आराध्य के शास्त्र और पुराण पढ़ें, उनमें दिए उपदेश को जीवन में उतारने की कोशिश करें, और इसके आगे स्तुति करें।
वक्ता कहते हैं — पर अगर नाम जप का अभ्यास बन गया है, और आपका चिंतन आपको नहीं छोड़ रहा — आप चौबीस घंटे चिंतन करते थे और अब भी कर रहे हैं, और नाम जप का अभ्यास भी आ गया है — तो इसके लिए भी सत्संग ज़रूरी है; केवल नाम जप से यह नहीं होगा। नाम जप के साथ जब आप सत्संग करें, जब शास्त्रों का, अपने इष्ट और आराध्य के पुराणों का अध्ययन करें, और उनमें दिए उपदेश को अपने जीवन में उतारने की कोशिश करें, और इसके आगे जब आप स्तुति करें।
ये अच्छी बात है। लेकिन अगर नाम जप का अभ्यास हो गया है और चिंतन करना आपका छूटा नहीं है 24 चिंतन कर रहे थे अभी भी और नाम जप का जब अभ्यास भी हो गया और अंदर से सत्संग इसलिए भी जरूरी है केवल नाम जप से ये नहीं होगा। नाम जप के साथ-साथ में जब आप सत्संग करेंगे आप शास्त्रों का अपने इष्ट आराध्य के जो पुराण हैं उनका जब आप पठन-पाठन करेंगे और उनमें जो उपदेश दिया गया है उसको आप अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे और उससे भी बढ़ कर के स्तुति करेंगे।
स्तुति मन के विकारों के साथ क्या करती है?
शास्त्र-नाम या सूक्त का पाठ, और स्तुति गाना
जब आप शास्त्र-नाम का पाठ करते हैं, किसी सूक्त का पाठ करते हैं, अपने इष्ट और आराध्य की स्तुति गाकर करते हैं, तो मन में बैठे विकारों पर ऐसी चोट पड़ती है कि वे अपने आप टूट जाते हैं। वक्ता कहते हैं, आप देखेंगे — यह व्यावहारिक विषय है, आप भी कर सकते हैं; करेंगे तभी इसका ज्ञान मिलेगा, और आप इसका अनुभव कर पाएँगे।
वक्ता कहते हैं — जब आप शास्त्र-नाम का पाठ करते हैं, जब किसी सूक्त का पाठ करते हैं, जब अपने इष्ट और आराध्य की स्तुति गाते हुए करते हैं, तो मन में उपस्थित विकारों पर ऐसी चोट पड़ती है कि वे अपने आप टूट जाते हैं। आप देखेंगे — यह व्यावहारिक विषय है; आप भी कर सकते हैं। करेंगे तभी इसका ज्ञान मिलेगा। आप इसका अनुभव कर पाएँगे।
जब आप शस्त्र नाम का पाठ करते हैं किसी प्रकार के सूक्त का पाठ करते हैं गाते हुए स्तुति करते हैं अपने इष्ट आराध्य का तो उससे मन में जो विकार उपस्थित होते हैं जो दत्ते विकार का वो उसके ऊपर ऐसा चोट पड़ता है कि वो अपने आप खंडित हो जाता है। आप देखिएगा ये प्रैक्टिकल विषय है आप भी कर सकते हैं करेंगे तो ही आपको जानकारी प्राप्त होगी।
पीछे शिव का नाम चलता रहता है, जबकि चिंतन खुद ईर्ष्या होता है
पीछे शिव का नाम चलता है, जबकि चिंतन ईर्ष्या का है
वक्ता कहते हैं — यह तब होगा जब आप यह सब न करें, और बस कहें, हाँ ठीक है, नाम जप करो। नाम जप का अभ्यास बन जाने पर आपका चिंतन कुछ और होगा, और पीछे नाम जप चलता रहेगा। आप शिव जी का नाम जप कर रहे हैं, भगवती राधा रानी का नाम जप कर रहे हैं, पर चिंतन वही चल रहा है जो नहीं होना चाहिए — कि इसके पास इतनी संपत्ति क्यों है, यह ज़रूर गलत काम करता होगा; कि यह लड़की बहुत सुंदर है, इसके पास कैसे आ गई, यह तो लंगूर जैसा दिखता है, इसे यह अंगूर कैसे मिल गया — और पीछे शिव जी का नाम चल रहा है।
वक्ता कहते हैं — यह तब होगा जब आप यह सब नहीं करेंगे, और बस कह रहे हैं, हाँ ठीक है, नाम जप करो। पर नाम जप का अभ्यास बन जाने के बाद आपका चिंतन कुछ और होगा, और उसके पीछे नाम जप चलता रहेगा। आप शिव जी का नाम जप कर रहे हैं, भगवती राधा रानी का नाम जप कर रहे हैं, पर चिंतन वही हो रहा है जो नहीं होना चाहिए। चिंतन यह हो रहा है: अरे, इसके पास इतनी संपत्ति क्यों है, यह ज़रूर गलत काम करता होगा; अहा, यह लड़की बहुत सुंदर है, इसके पास कैसे आ गई, यह तो लंगूर जैसा दिखता है, इसे यह अंगूर कैसे मिल गया — और इधर पीछे शिव जी का नाम चल रहा है।
ये तब होगा अगर आप ये सब नहीं करते हैं केवल आप बोल रहे हैं हां ठीक है ना नाम जप करो लेकिन वो जब अभ्यास हो जाएगा ना नाम जप का उसके बाद आपका चिंतन कुछ और रहेगा और पीछे में नाम जप चलते रहेगा। नाम जप आप शिव जी का कर रहे हैं नाम जप भगवती राधा रानी का कर रहे हैं लेकिन चिंतन फिर वही हो रहा है जो नहीं होना चाहिए। चिंतन हो रहा है कि अरे इसके पास इतना प्रॉपर्टी क्यों है ये साला दो नंबर का काम करता होगा अच्छा ये लड़की बहुत सुंदर है उसको कैसे मिल गई ये तो लंगूर जैसा दिखता है ये अंगूर कैसे इसको मिल गया इधर पीछे चल रहा है शिव जी का नाम। क्यों ऐसा हो रहा है क्योंकि जो पूरा एक अभिषेक करना है अपना मन का ना वो अभिषेक आप नहीं किए हैं।
भीतर के घड़े का ढक्कन कभी खुला ही नहीं, इसलिए अमृत बाहर से बह जाता है
भीतर के घड़े का ढक्कन बंद है, इसलिए अमृत बाहर से बह जाता है
वक्ता कहते हैं — क्योंकि मन का जो पूरा अभिषेक करना है, वह अभिषेक आपने नहीं किया। आप उस पर अमृत डालने की कोशिश कर रहे हैं, पर अमृत बाहर से बहकर जा रहा है; भीतर नहीं जा पा रहा। भीतर के घड़े का ढक्कन खोलने के लिए, ताकि अमृत भीतर जाए और सारा भीतरी विकार बाहर निकले — उसके लिए स्तुति, जप, तप, सत्संग और स्वाध्याय सब साथ चलने चाहिए; तभी यह हो पाएगा, नहीं तो कोई लाभ नहीं। वे कहते हैं, यह सच्ची और अनुभव की बात है; करेंगे तभी अनुभव होगा, केवल बातों से नहीं होता।
यह क्यों हो रहा है? वक्ता कहते हैं — क्योंकि अपने मन का जो पूरा अभिषेक करना है, वह अभिषेक आपने नहीं किया। आप उस पर अमृत डालने की कोशिश कर रहे हैं, पर अमृत बाहर से बहकर जा रहा है; भीतर नहीं जा पा रहा। भीतर के घड़े का ढक्कन खोलने के लिए, ताकि उसमें अमृत जाए और जितना भी भीतरी विकार है वह बाहर निकले — उसके लिए स्तुति, जप, तप, सत्संग और स्वाध्याय सब साथ चलने चाहिए; तभी यह हो पाएगा, नहीं तो कोई लाभ नहीं। यह सच्ची बात है, अनुभव की बात है; करेंगे तो अनुभव करेंगे, केवल बोलने से नहीं होता।
जो भीतर का घड़ा है उसका ढक्कन खोलने के लिए कि उसके अंदर अमृत जाए और ये जितना अंदर का विकार है वो बाहर निकल जाए उसके लिए कि स्तुति जप तप सत्संग स्वाध्याय ये सब भी साथ-साथ चले तभी हो पाएगा अन्यथा फिर लाभ नहीं है। ये सत्य बात है अनुभवगत बात है आप अगर करेंगे तो अनुभव होगा आपको ये केवल बोलने मात्र से नहीं होता है।
क्या नीच ग्रह के रत्न वाला नियम उसके नाम के जप पर भी लागू होता है?
नीच और उच्च ग्रहों पर एक श्रोता का प्रश्न
प्रश्नकर्ता पूछते हैं: ज्योतिष में जो भाव या ग्रह नीच होता है, उसका रत्न नहीं दिया जाता, बल्कि उल्टा — जो ग्रह बलवान है, उसे और बलवान किया जाता है। क्या ग्रहों के नाम के जप में भी ऐसा ही होता है?
वक्ता श्रोता का प्रश्न पढ़ते हैं: ज्योतिष में जो भाव या ग्रह नीच होता है, उसका रत्न नहीं दिया जाता; उल्टा किया जाता है — जो ग्रह बलवान है, उसे बलवान किया जाता है। क्या ग्रहों के नाम के जप में भी ऐसी बात होती है? वे प्रश्नकर्ता को अनुराग जी कहकर संबोधित करते हैं और कहते हैं कि वे एक बहुत सरल उदाहरण देने की कोशिश करेंगे।
ज्योतिष में जो घर नीच का होता है घर या ग्रह उसके लिए रत्न नहीं उसका उलट तो जो ग्रह बलवान है उसके लिए बलवान बनाया जाता है क्या ग्रहों के नाम के जप में भी ऐसा होता है क्या? अनुराग जी इसका एक हम बहुत सिंपल सा आपको उदाहरण देने का प्रयास करेंगे हालांकि आपका जो प्रश्न है वो ग्रहों को लेकर के है घर आप लिखे हैं शायद ग्रह को ही लिखे होंगे कि ग्रह जो उच्च का है उच्च का और नीच का है ठीक है वो चलिए कुंडली का एक अलग विषय ज्योतिष का हो गया लग्न कुंडली के अनुसार कौन सा ग्रह उच्च की अवस्था में है किस राशि में स्थित है तो उच्च का होगा नीच का होगा और उनके रत्नों को धारण करना ना करना भी एक अलग विषय है वो पूरा का पूरा साइंस ही अलग है।
प्रश्न दोबारा: क्या नीच ग्रह का जप नीच फल दे सकता है
क्या नीच ग्रह का जप नीच फल दे सकता है
वक्ता कहते हैं कि प्रश्नकर्ता ने "भाव" लिखा, पर शायद ग्रह का मतलब था — कौन-सा ग्रह उच्च अवस्था में है, किस राशि में बैठा है, जिससे वह उच्च या नीच होगा; और उनके रत्न पहनें या नहीं, यह बिल्कुल अलग विषय है, वह पूरा विज्ञान अलग है। अब जो पूछा गया उसकी जड़ नाम जप से जुड़ी है: अगर हम ग्रहों के नामों का स्मरण करें, तो क्या वे भी किसी तरह का बुरा फल देने वाले हैं? क्या वे आपको कोई बुरा प्रभाव देंगे? क्या ऐसा हो सकता है कि कोई ग्रह नीच हो और हम उसका जप करें, तो वह हमें नीच फल दे?
वक्ता कहते हैं — आपका प्रश्न ग्रहों के बारे में है; आपने भाव लिखा है, पर शायद ग्रह लिखा होगा — कि जो ग्रह उच्च है, उच्च और नीच, ठीक है, वह कुंडली का, ज्योतिष का अलग विषय है। लग्न कुंडली के अनुसार कौन-सा ग्रह उच्च अवस्था में है, किस राशि में बैठा है, जिससे वह उच्च या नीच होगा; और उनके रत्न पहनें या न पहनें, यह फिर अलग विषय है, वह पूरा विज्ञान अलग है। अब यहाँ आपने जो मूल विषय पूछा है, वह नाम जप के संबंध में है: कि अगर हम ग्रहों के नामों का स्मरण करें, तो क्या वे भी किसी तरह का बुरा फल देने वाले हैं? क्या वे आपको कोई बुरा प्रभाव देंगे? क्या ऐसा हो सकता है कि कोई ग्रह नीच हो और हम उसका जप करें, तो वह हमें नीच फल दे?
कोई आपको खराब प्रभाव देने वाले हैं क्या? ऐसा हो सकता है क्या कि अगर कोई ग्रह नीच का है और उसका हम जप कर रहे हैं तो हमें नीच फल दे दे। तो इस बात का सदैव ध्यान रखिए अब मान लीजिए आप अनुराग जी हमारे शत्रु हैं आप चाहते हैं हृदय से कि रुद्रांश जी का जो है किसी दिन हम बंटाधार कर दें।
चेहरे पर सच्ची श्रद्धा के साथ शत्रु को प्रणाम — यही तुलना वे करते हैं
चेहरे पर सच्ची श्रद्धा के साथ शत्रु को प्रणाम
वक्ता कहते हैं — यह हमेशा ध्यान रखिए। मान लीजिए अनुराग जी, आप हमारे शत्रु हैं और दिल से चाहते हैं कि किसी दिन हम बर्बाद हो जाएँ। पर जब भी हम अनुराग जी के सामने जाते हैं या उनसे मिलते हैं, बहुत शांति और नम्रता से उन्हें प्रणाम करते हैं; हमारे चेहरे पर, पूरे हाव-भाव में आपके प्रति श्रद्धा दिखती है, चालाकी और छल का कोई भाव नहीं आता। आप आँखों से, हमारे चेहरे और मुँह पर आए भाव से देख सकते हैं कि यह व्यक्ति साफ़ दिल से मुझे प्रणाम कर रहा है।
वक्ता कहते हैं — तो यह हमेशा ध्यान रखिए। अब मान लीजिए अनुराग जी, आप हमारे शत्रु हैं; आप दिल से चाहते हैं कि किसी दिन हम, रुद्रांश जी, बर्बाद हो जाएँ। पर जब भी हम अनुराग जी के सामने जाते हैं, या वे हमसे मिलते हैं, हम अनुराग जी को बहुत शांति से, बहुत नम्रता से प्रणाम करते हैं; हमारे चेहरे पर, पूरे हाव-भाव में आपके प्रति श्रद्धा दिखती है, और चालाकी और छल का कोई भाव नहीं आता। आप आँखों से, और हमारे चेहरे और मुँह पर आए भाव से देख सकते हैं कि यह व्यक्ति साफ़ दिल से मुझे प्रणाम कर रहा है।
लेकिन हम जब भी अनुराग जी के सामने जा रहे हैं या हमें मिल रहे हैं तो हम अनुराग जी को बहुत शांति से सौम्यता से प्रणाम कर रहे हैं हमारे चेहरे पर हमारे पूरे जो मुखमंडल है उस पर आपके प्रति श्रद्धा दिख रही है किसी प्रकार का मक्कारी और धूर्तता का भाव नहीं आ रहा है। आप देख सकते हैं नेत्र से और हमारे चेहरे पर आए हुए भाव से मुख पर आए हुए भाव से आप यह जान सकते हैं कि यह व्यक्ति साफ हृदय से मुझे प्रणाम कर रहा है। और अगर उसी के साथ में हम आपके बारे में अच्छा चर्चा करते हो किसी आपके पीछे आपके समक्ष नहीं आपके पीछे तो कोई ना कोई बताएगा ना तुम्हारे बारे में तो बड़ा अच्छा-अच्छा बोल रहा था भाई।
जब शत्रु को पता चले कि आप पीठ पीछे उसकी तारीफ़ करते हैं, तब क्या होता है?
जब कोई तीसरा व्यक्ति बताता है, तो विचार झटके से बदलते हैं
और अगर साथ में हम पीठ पीछे आपकी अच्छी बात करें — सामने नहीं, पीछे, और कोई न कोई आपको बताएगा कि वह आपके बारे में बहुत अच्छा बोल रहा था, और लगा नहीं कि दिखावे के लिए कर रहा है — अगर आपने कोई अच्छा काम किया और हम उसकी चर्चा करें, कि अनुराग चौबे जी बहुत मेहनती व्यक्ति हैं, बहुत मेहनत करते हैं; किसी कारण शत्रुता है और वे हमें पसंद नहीं करते, ठीक है, यह उनकी भावना और उनकी इच्छा है, पर हम उनसे सीख सकते हैं — तो जब आपको यह पता चलेगा, मेरे बारे में आपके विचार भी बदलने लगेंगे। वे बड़े झटके से बदलेंगे, उस दिन जब किसी तीसरे व्यक्ति से पता चलेगा कि यह हमारे गुणों की बात करता है और कहता है कि हमसे प्रेरणा लेता है। वक्ता कहते हैं, हम आपको बताने नहीं आए कि हम आपके बारे में अच्छा सोचते हैं; आपको पता चल रहा है।
वक्ता कहते हैं — और अगर साथ में हम पीठ पीछे आपके बारे में अच्छा बोलें — सामने नहीं, पीछे; कोई न कोई आपको बताएगा, भाई, वह आपके बारे में बहुत अच्छा बोल रहा था। और लगा नहीं कि वह दिखावे के लिए कर रहा है; वह पीठ पीछे अच्छा बोल रहा था। अगर आपने कोई अच्छा काम किया हो और हम उसकी चर्चा करें — कि अरे, अनुराग, अनुराग चौबे जी बहुत मेहनती व्यक्ति हैं, बहुत मेहनत करते हैं। किसी कारण शत्रुता है, वे हमें पसंद नहीं करते; ठीक है, कोई बात नहीं, यह उनकी भावना है, यह उनकी इच्छा है, पर हम उनसे सीख सकते हैं। तब जब आपको यह बात पता चलेगी, मेरे बारे में आपके विचार भी बदलने लगेंगे। वे बड़े झटके से बदलेंगे, उस दिन जब किसी तीसरे व्यक्ति से आपको पता चलेगा कि यह हमारे गुणों की बात करता है और कहता है कि हम उनसे प्रेरणा लेते हैं। किसी कारण हमारे बारे में आपके विचार कितने भी नीच हों, जब आपको पता चलने लगेगा, तो धीरे-धीरे आपके विचार बदल जाएँगे। हम आपको बताने नहीं आए कि हम आपके बारे में अच्छा सोचते हैं — आपको पता चल रहा है।
और वो ऐसा लग रहा नहीं था कि वो कोई ये ऐसा कर रहा है ये पीछे अच्छा बात कर रहा था। आपका आपने कुछ अच्छा काम किया हो हम उसके बारे में चर्चा कर रहे हो कि अरे अनुराग जो है अनुराग चौबे जी जो हैं बहुत मेहनती व्यक्ति हैं बहुत मेहनत करते हैं। किसी कारणवश है शत्रुता वो हमें पसंद नहीं करते हैं लेकिन ठीक है कोई बात नहीं वो उनका भाव है वो उनकी इच्छा लेकिन है उनसे हम सीख सकते हैं। तो आपको जब ये विषय पता चलेगा ना तो मेरे प्रति आपके जो विचार हैं वो भी परिवर्तित होने लगेंगे। बहुत झटके से परिवर्तित होंगे जिस दिन आपको कोई तीसरे व्यक्ति के माध्यम से पता चला कि अच्छा ये तो हमारे बारे में हमारी अच्छाइयों के बारे में चर्चा करता और बोलता भी है कि हम इनसे प्रेरणा लेते हैं तो भले आप किसी कारण से हमारे प्रति नीच विचार को रखते होंगे जब आपको पता चलना शुरू होगा तो धीरे-धीरे आपके विचार बदल जाएंगे।
ग्रह कितना भी नीच हो, उसे प्रणाम और उसके नाम का जप कभी बुरा फल नहीं देते
ग्रह कितना भी नीच हो, उसे प्रणाम और नाम जप कभी बुरा फल नहीं देते
वक्ता कहते हैं — ठीक इसी तरह, भाई, ग्रह कितने भी नीच हों, उन्हें प्रणाम करना, नमस्कार करना और उनके नाम का जप करना आपको कभी बुरा फल नहीं देगा।
वक्ता कहते हैं — ठीक इसी तरह, ग्रह कितने भी नीच हों — भाई, उन्हें प्रणाम करना, उन्हें नमस्कार करना, और उनके नाम का जप करना, आपको कभी बुरा फल नहीं देगा।
आपको पता चल रहा है। ठीक उसी प्रकार से ग्रह कितने भी नीच हो भाई उनको प्रणाम करना नमस्कार करना और उनका नाम जप करना वो कभी भी आपको खराब फल को नहीं देंगे। आप अगर दिन भर बुध ग्रह आपके लिए बहुत खराब है मान लिए बुध ग्रह हालांकि किसी को खराब फल बहुत कम ही देते हैं वैसा जो आप चर्चा कर रहे हैं उस विषय पर बोल रहे हैं। ऐसे तो मार्केश भी हो जाते हैं बुध ऐसा नहीं है लेकिन बहुत सारा ऐसा नियम है जिसमें कि उनको अच्छा फल ही देने वाला माना गया है सौम्य ग्रह में माना गया है। तो मान लेते हैं कि अगर आपको कोई बोल दे कि अरे बुध के प्रभाव से दुष्प्रभाव से आपको जो है स्किन में ये एलर्जी हो रही है प्रॉब्लम हो रहा है आपको चर्म रोग हो गया है ये बुध के कारण हो रहा है या आपकी बुद्धि भ्रमित हो रही है तो इसमें बुध कारण है बुध नीच के हैं।
बुध सौम्य ग्रह हैं, जप से प्रसन्न होते हैं; केवल पदार्थ छोड़ने हैं
सौम्य ग्रह; जप से प्रसन्न, केवल पदार्थ छोड़ने हैं
वक्ता कहते हैं — मान लीजिए बुध ग्रह आपके लिए बहुत खराब है — हालाँकि जिस तरह की चर्चा है, बुध बहुत कम किसी को बुरा फल देते हैं; फिर भी वे मारकेश बन सकते हैं, ऐसा नहीं कि नहीं बन सकते, पर बहुत से नियम हैं जिनके अनुसार वे शुभ फल ही देने वाले माने जाते हैं और सौम्य ग्रहों में गिने जाते हैं। अब मान लीजिए कोई आपसे कहे कि बुध के दुष्प्रभाव से आपको त्वचा में एलर्जी, समस्या, त्वचा रोग हो रहा है, या आपकी बुद्धि भ्रमित हो रही है, और इसका कारण बुध है और बुध नीच है। तब अगर आप उनके नाम का जप और स्मरण करेंगे, तो वे प्रसन्न होकर कृपा ही करेंगे; अपना दुष्प्रभाव नहीं बढ़ाएँगे।
वक्ता कहते हैं — मान लीजिए बुध ग्रह आपके लिए बहुत खराब है — हालाँकि जिस तरह आप चर्चा कर रहे हैं, बुध बहुत कम किसी को बुरा फल देते हैं; उस विषय पर वे बोलते हैं। फिर भी वे मारकेश बन सकते हैं; ऐसा नहीं कि नहीं बन सकते। पर बहुत से नियम हैं जिनके अनुसार वे शुभ फल ही देने वाले माने जाते हैं, और सौम्य ग्रहों में गिने जाते हैं। अब मान लीजिए कोई आपसे कहे कि बुध के दुष्प्रभाव से आपको त्वचा में एलर्जी हो रही है, कोई समस्या है, आपको त्वचा रोग हो गया है, यह बुध के कारण हो रहा है, या आपकी बुद्धि भ्रमित हो रही है, और इसका कारण बुध है, और बुध नीच है। तब इसमें अगर आप उनके नाम का जप और स्मरण करेंगे, तो वे प्रसन्न होकर कृपा ही करेंगे। वे अपना दुष्प्रभाव नहीं बढ़ाएँगे।
तो इसमें आप उनका नाम जप स्मरण कीजिएगा तो वो प्रसन्न होकर के कृपा ही करेंगे। वो अपने दुष्प्रभाव को बढ़ाएंगे नहीं। दुष्प्रभाव को कब बढ़ाएंगे जब उनकी ऊर्जाओं को शोषित करने वाले पदार्थों को आप अपने शरीर पर धारण कर लेंगे। अब हमें पता है कि बुध देव हमारे लिए नीच हैं और हमारे लिए दुष्प्रभाव को देने वाले हैं तो उनकी ग्रह की रश्मियों को ग्रहण करने वाली चीजों को हम अपने शरीर में कम से कम उपयोग करें।
ग्रह अपना दुष्प्रभाव कब बढ़ाता है?
जब आप शरीर पर वे पदार्थ धारण करते हैं जो उसकी किरणें सोखते हैं
वक्ता उत्तर देते हैं — जब आप शरीर पर वे पदार्थ धारण करते हैं जो उनकी ऊर्जा सोखते हैं। अब हमें पता है कि बुध देव हमारे लिए नीच हैं और हमें दुष्प्रभाव देते हैं; तो उस ग्रह की किरणें ग्रहण करने वाली चीज़ें शरीर पर कम से कम इस्तेमाल करें। हरे पदार्थ कम खाने हैं; हरे कपड़े कम पहनने हैं — बुध देव हरे रंग के माने जाते हैं; और उनसे जुड़े रत्न हम नहीं पहनेंगे। वे कहते हैं, इतना ही बस पहनने में छोड़ना है।
वे दुष्प्रभाव कब बढ़ाएँगे? वक्ता कहते हैं — जब आप शरीर पर वे पदार्थ धारण करेंगे जो उनकी ऊर्जा सोखते हैं। अब हमें पता है कि बुध देव हमारे लिए नीच हैं और हमें दुष्प्रभाव देने वाले हैं; तो उस ग्रह की किरणें ग्रहण करने वाली चीज़ें अपने शरीर पर कम से कम इस्तेमाल करें। जैसे अब, हरे पदार्थ हमें कम खाने हैं। हरे कपड़े कम पहनने हैं — बुध देव हरे रंग के माने जाते हैं, है न। तो कम से कम इस्तेमाल करना है। उनसे जुड़े रत्न हम नहीं पहनेंगे। इतनी बात बस पहनना छोड़ने की हो गई, जो आपने लिखी है।
जैसे कि अब हरा पदार्थ हमको कम खाना है। हरा वस्त्र हमें कम पहनना है हरित माने गए हैं ना बुध देव हरे वर्ण के माने गए हैं। तो हमें कम से कम प्रयोग करना है इसमें। उनसे संबंधित रत्नों को हम धारण नहीं करेंगे। ये हो गया केवल धारण छोड़ना है। जो आप लिखे हैं। नाम जप स्मरण पूजन पाठ उसमें कभी भी वो दुष्प्रभाव नहीं देता कोई भी ग्रह दुष्प्रभाव पूजन पाठ का दुष्प्रभाव कभी नहीं होता ध्यान रखिएगा। जो भी लोग लाल किताब पीला किताब से या अन्य किताब से ये विषय बोलते हैं वो फिर अलग विषय हो जाता है ऐसा नहीं होगा। हां अगर आप कुछ गलती कर रहे हैं पूजन पाठ में वो एक अलग बात है वो टॉपिक ही फिर अलग है।
क्या पूजन और पाठ कभी दुष्प्रभाव दे सकते हैं?
पूजन से कोई ग्रह कभी दुष्प्रभाव नहीं देता — पर पूजन की गलतियाँ अलग बात हैं
वक्ता कहते हैं — नाम जप, स्मरण, पूजन और पाठ में कोई भी ग्रह कभी दुष्प्रभाव नहीं देता; पूजन-पाठ का कभी दुष्प्रभाव नहीं होता, यह ध्यान रखिए। लाल किताब, पीली किताब या किसी और किताब से जो इस विषय पर बोलता है — वह फिर अलग विषय हो जाता है; ऐसा नहीं होगा। हाँ, अगर पूजन-पाठ में आप कोई गलती कर रहे हैं, तो वह अलग बात है, वह प्रसंग फिर अलग है।
वक्ता कहते हैं — नाम जप, स्मरण, पूजन और पाठ में कोई भी ग्रह कभी भी दुष्प्रभाव नहीं देता। पूजन-पाठ का कभी दुष्प्रभाव नहीं होता; यह ध्यान रखिए। लाल किताब, पीली किताब या किसी और किताब से लोग इस विषय पर जो बोलते हैं — वह फिर अलग विषय हो जाता है; ऐसा नहीं होगा। हाँ, अगर आप पूजन-पाठ में कोई गलती कर रहे हैं, तो वह अलग बात है; वह प्रसंग फिर अलग हो जाता है।
उदाहरण के लिए ये बात हर जगह किसी भी कर्मकांड का हो चाहे वो तंत्र कांड का हो सब जगह लिखा रहता है कि जब आप पूजन के लिए बैठे हैं तो उसका पूरा फल शुरू से लास्ट तक पहला क्या होता है भाई स्नान का नियम। दूसरा होता है वस्त्र का नियम। अब स्नान हम मनमानी ढंग से कर लें चलो स्नान का भी विषय उठा तो उसे इसे भी और क्लियर कर देते हैं। यगोपवित पहनने वाले लोगों को से ही हम लेते हैं यगोपवित पहनते होंगे बहुत सारे लोग। अब आप बताइए आप में से कितने सारे लोग डब साबुन से नहाते हैं हम नाम लेकर के पूछ रहे हैं।
किसी भी कर्मकांड के पहले नियम क्या हैं?
पहले स्नान का नियम, फिर वस्त्र का नियम
वक्ता कहते हैं — उदाहरण के लिए, यह बात हर जगह लिखी है, कोई भी कर्मकांड हो, चाहे तंत्र कांड का हो: कि जब आप पूजन के लिए बैठें, तो शुरू से अंत तक उसका पूरा फल — पहली बात क्या है? भाई, स्नान का नियम। दूसरा है वस्त्र का नियम।
वक्ता कहते हैं — उदाहरण के लिए, यह बात हर जगह है; कोई भी कर्मकांड हो, चाहे तंत्र कांड का हो, हर जगह लिखा है: कि जब आप पूजन के लिए बैठे, तो उसका पूरा फल, शुरू से अंत तक — पहला क्या है? भाई, स्नान का नियम। दूसरा है वस्त्र का नियम।
तो उसमें मांसाहारी पदार्थों को मिलाया गया है ऐसा आपको पूरा अच्छे-अच्छे वेबसाइटों पे अच्छे-अच्छे ये पे मिल जाएगा। पूरा कि हां भाई ये इसमें मांस का तेल का प्रयोग किया गया है। अब बताइए यगोपवित आप पहनते हैं और डब साबुन से डब शैंपू से नहा रहे हो या डिटॉल से नहा रहे हो डिटॉल में भी है।
यज्ञोपवीत पहनने वालों से पूछा जाता है कि उनके नहाने के साबुन और शैम्पू में क्या-क्या मिला है
नहाने के साबुन और शैम्पू में क्या-क्या मिला है, यह खोजना
वक्ता कहते हैं कि स्नान का विषय आया है तो इसे भी स्पष्ट कर दें, और यज्ञोपवीत पहनने वालों का उदाहरण लेते हैं। वे नाम लेकर पूछते हैं: आप में से कितने डव साबुन से नहाते हैं? अगर डव साबुन से नहाते हैं, तो बस गूगल पर खोजिए कि डव साबुन वेज है या नॉन-वेज, और उसमें क्या-क्या मिलाया गया है — अच्छी वेबसाइटों पर मिलेगा कि उसमें मांसाहारी पदार्थ मिलाए गए हैं, कि हाँ भाई, इसमें मांस का तेल इस्तेमाल हुआ है। अब बताइए, वे कहते हैं: आप यज्ञोपवीत पहनते हैं और डव साबुन, डव शैम्पू या डेटॉल से नहा रहे हैं — डेटॉल में भी यही है।
वक्ता कहते हैं — अब हम जैसे चाहें नहाएँ — खैर, स्नान का विषय आया है, तो इसे भी स्पष्ट कर दें। उन लोगों को लेते हैं जो यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। पहनते हैं; बहुत से लोग पहनते होंगे। अब बताइए, आप में से कितने डव साबुन से नहाते हैं? हम नाम लेकर पूछ रहे हैं। अगर आप डव साबुन से नहाते हैं, तो बस गूगल पर खोजकर देखिए कि डव साबुन वेज है या नॉन-वेज, और उसमें क्या-क्या सामग्री मिलाई गई है, कौन-से पदार्थ मिलाए गए हैं। तो उसमें मांसाहारी पदार्थ मिलाए गए हैं; अच्छी वेबसाइटों पर यह सब मिल जाएगा, कि हाँ भाई, इसमें मांस का तेल इस्तेमाल हुआ है। अब बताइए: आप यज्ञोपवीत पहनते हैं, और डव साबुन से, डव शैम्पू से नहा रहे हैं, या डेटॉल से नहा रहे हैं — डेटॉल में भी यही है। वे कहते हैं, हम यहाँ किसी उत्पाद की प्रशंसा या निंदा नहीं कर रहे; बस आपको एक संकेत दे रहे हैं।
हम किसी प्रोडक्ट का यहां पर बुराई अच्छा नहीं कर रहे हैं आपको बस एक संकेत कर रहे हैं ये पूरा विषय पर एक वीडियो हम अलग से भी बनाएंगे अवश्य ये बहुत सोचने वाला विषय है आप बोलते हो फल क्यों नहीं मिलता है। ये कारण है और यही कारण है कि साबुन से नहाने के लिए कई सारे विद्वान जन मना करते हैं। हालांकि आप मानना ना मानना आपकी अपनी इच्छा है वो आप समझो हमारा क्या हमारा विषय है कि हम यथार्थ को आपके सामने रखें ताकि जो हानि हो रही है उससे हम और आप बच सकें। कहीं ना कहीं प्रोपेगेंडा सेट है ना भाई कि हिंदुओं का क्षय किस प्रकार से हो ये देखिए बहुत बड़ी चोट है। जहां हम लोग किसी प्रकार के मांस आदि के स्पर्श से बचने का प्रयास है कि भाई आप नहीं कर सकते उस जगह में सीधे-सीधे आपके सिर पर रोज घसा जा रहा है।
हिंदुओं के पतन के लिए बना एक प्रोपेगेंडा रोज़ सिर पर मला जा रहा है
हिंदुओं के पतन का प्रोपेगेंडा, रोज़ आपके सिर पर मला जाता
वक्ता कहते हैं कि इस पूरे विषय पर वे अलग से वीडियो ज़रूर बनाएँगे; यह बहुत सोचने वाली बात है। आप कहते हैं, फल क्यों नहीं मिलता — यही कारण है, और यही कारण है कि बहुत से विद्वान साबुन से नहाने को मना करते हैं। मानें या न मानें, आपकी इच्छा; उनका विषय बस सच्चाई आपके सामने रखना है, ताकि वे और आप हो रहे नुकसान से बच सकें। जहाँ हम मांस आदि के स्पर्श से बचने की कोशिश करते हैं, कि आप ऐसा नहीं कर सकते, वहीं वह रोज़ आपके सिर पर मला जा रहा है। वह यज्ञोपवीत आपको क्या फल देगा, वह रुद्राक्ष आपको क्या फल देगा?
वक्ता कहते हैं — इस पूरे विषय पर हम अलग से वीडियो ज़रूर बनाएँगे; यह बहुत सोचने वाली बात है। आप कहते हैं, फल क्यों नहीं मिलता। यही कारण है। और यही कारण है कि बहुत से विद्वान साबुन से नहाने को मना करते हैं। हालाँकि मानना या न मानना आपकी अपनी इच्छा है, यह आप समझिए; हमारा विषय यह है कि हम सच्चाई आपके सामने रखें, ताकि हम और आप हो रहे नुकसान से बच सकें। जहाँ हम मांस आदि के स्पर्श से बचने की कोशिश करते हैं, यह कहकर कि आप ऐसा नहीं कर सकते, वहीं वह रोज़ आपके सिर पर मला जा रहा है। वह यज्ञोपवीत आपको क्या फल देगा, वह रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । आपको क्या फल देगा?
वो यगोपवित कौन सा फल आपको देने वाला है वो रुद्राक्ष कौन सा फल आपको देने वाला है। जिसमें कि इस प्रकार की चीजें आप जो भी साबुन शैंपू यूज करने वाले हैं उसको आप सर्च कर लीजिए एक बार YouTube इस पे Google पे वेगन और नॉट वेगन। डिटॉल वेगन और नॉट वेगन उसमें स्पष्टता से आपको लिखा हुआ आएगा Google आपको गलत नहीं बताएगा वहां पे कि हां भाई ये प्रूव्ड है इसमें ऑलरेडी लिखा है। और देखिएगा कहीं पर भी वो ग्रीन जो मार्क होता है वो लगा हुआ इन सभी साबुनों पर आपको नहीं मिलेगा। जबकि हम लोग ये जानते हैं कि हिमालय कंपनी जो है वो किसी मुस्लिम टाइप कोई बार इस चीज को रखा गया है।0 आप देखिए उसमें अब उसमें अंदर की क्या विषय है कुछ तो मानक नियम होगा ना लेकिन उसमें मैक्सिमम शैंपू पर ये सब पर जो है ग्रीन मार्क लगा होता है यानी कि उसमें किसी प्रकार का कोई जानवर के या किसी भी प्रकार का कोई मांस आदि का प्रयोग नहीं किया गया है।
उत्पाद के लिए वीगन और नॉट वीगन खोजिए, और हरा निशान देखिए
वीगन और नॉट वीगन खोजना, और हरा निशान देखना
जो भी साबुन या शैम्पू आप इस्तेमाल करने वाले हैं, उसे एक बार यूट्यूब और गूगल पर खोजिए — वीगन और नॉट वीगन, डेटॉल वीगन और नॉट वीगन; वहाँ साफ़ लिखा आ जाएगा, गूगल आपको गलत नहीं बताएगा, कि हाँ भाई, यह सिद्ध है, पहले से लिखा है। और देखिए, इन सब साबुनों पर कहीं भी वह हरा निशान लगा नहीं मिलेगा। वक्ता कहते हैं, जबकि हमें पता है कि हिमालया कंपनी ने किसी समय यह बात रखी है; उसकी भीतरी बात जो भी हो, कोई मानक नियम होगा — पर उनके ज़्यादातर शैम्पू आदि पर हरा निशान लगा है, यानी उसमें किसी तरह का पशु या मांस इस्तेमाल नहीं हुआ।
वक्ता कहते हैं — जो भी साबुन या शैम्पू आप इस्तेमाल करने वाले हैं, उसे एक बार यूट्यूब पर, गूगल पर खोजिए: वीगन और नॉट वीगन। डेटॉल वीगन और नॉट वीगन — वहाँ आपको स्पष्टता से लिखा आ जाएगा, गूगल आपको गलत नहीं बताएगा, कि हाँ भाई, यह सिद्ध है, इसमें पहले से लिखा है। और देखिए: इन सब साबुनों पर कहीं भी आपको वह हरा निशान लगा नहीं मिलेगा। जबकि हमें पता है कि हिमालया कंपनी ने किसी समय यह बात रखी है; देखिए इसमें भीतरी बात क्या है, कोई मानक नियम होगा। पर ज़्यादातर शैम्पू और इन सब पर हरा निशान लगा है — यानी उसमें किसी तरह का पशु या मांस इस्तेमाल नहीं हुआ।
अब विचारणीय विषय हो जाता है यहां पे आप क्या करो। तो अब आप यह जान लीजिए कि अगर आप इस प्रकार की चीजों का प्रयोग कर रहे हैं स्नान कर रहे हैं अब उसके बाद आप बैठ कर के जप कीजिएगा तो कहीं ना कहीं भले हम अनजाने में किए हैं दुष्प्रभाव तो है ना भाई मांस का स्पर्श नहीं होना चाहिए हम उससे नहा कर के मांस से बैठे हुए हैं। आंख खोलने वाला विषय है भाई। ब्लास्ट हो जाएगा दिमाग में लेकिन आप नहीं मानोगे वो आपकी इच्छा है वो हमारा कर्तव्य था कि आपके समक्ष रखें और इस विषय को बहुत समय से कि भाई रखी कैसे रखें कैसे तो चलो रख दे रहे हैं।
ऐसी चीज़ों से नहाकर फिर जप के लिए बैठने का क्या परिणाम है?
मांस से नहाकर जप के लिए बैठना
वक्ता कहते हैं — अब यह जानिए: अगर आप ऐसी चीज़ें इस्तेमाल करके नहा रहे हैं, और उसके बाद बैठकर जप करेंगे, तो कहीं न कहीं, भले अनजाने में किया हो, दुष्प्रभाव तो है न — मांस को छूना नहीं चाहिए, और हम उससे नहाकर मांस के साथ बैठे हैं। वे कहते हैं, यह आँखें खोलने वाला विषय है; मन में धमाका करेगा, पर आप मानेंगे नहीं, यह आपकी इच्छा; इसे आपके सामने रखना हमारा कर्तव्य था, और हम बहुत समय से सोच रहे थे कि इसे कैसे रखें, तो रख रहे हैं। इस पर अलग से भी चर्चा होगी।
वक्ता कहते हैं — अब बात सोचने वाली हो जाती है — आपको क्या करना चाहिए। अब यह जानिए कि अगर आप ऐसी चीज़ें इस्तेमाल कर रहे हैं, नहा रहे हैं, और उसके बाद बैठकर जप करेंगे, तो कहीं न कहीं, भले हमने अनजाने में किया हो, दुष्प्रभाव तो है न, भाई — मांस का स्पर्श नहीं होना चाहिए, और हम उससे नहाकर मांस के साथ बैठे हैं। यह आँखें खोलने वाला विषय है, भाई। मन में धमाका करेगा, पर आप मानेंगे नहीं; यह आपकी इच्छा है। इसे आपके सामने रखना हमारा कर्तव्य था, और बहुत समय से हम सोच रहे थे कि इसे कैसे रखें; तो ठीक है, रख रहे हैं। इस पर अलग से भी चर्चा होगी।
अलग से भी इस विषय पर चर्चा होगा। तो पहला चीज ये हो गया स्नान का। इसीलिए उबटन से स्नान करने के लिए कहा गया है कि सात दिन में सात प्रकार के उबटनों का प्रयोग करें। बेसन से हल्दी से मधु से शक्कर से जिस प्रकार से हम भगवान का शोडोपचार पूजन आदि करते हैं उस प्रकार का नियम विधि। अब उसमें तर्क का विषय हमारे पास नहीं है कि भैया ये नहीं मिलता वो नहीं मिलता ऐसा क्या करें हमेशा करें वो आपका विषय है आप सर्च करिए इतना तो बुद्धि आपके पास होनी चाहिए कि हमें कैसे क्या करना है।
साबुन की जगह क्या बताया गया है?
सात दिनों में सात तरह के उबटन — बेसन, हल्दी, शहद, शक्कर
वक्ता कहते हैं — इसीलिए उबटन से नहाने को कहा गया है: कि सात दिनों में सात तरह के उबटन इस्तेमाल करें — बेसन से, हल्दी से, शहद से, शक्कर से; उसी तरह का नियम और विधि जैसे हम भगवान का षोडशोपचार पूजन करते हैं।
वक्ता कहते हैं — तो पहली बात स्नान की हो गई। इसीलिए उबटन से नहाने को कहा गया है: कि सात दिनों में सात तरह के उबटन इस्तेमाल करें। बेसन से, हल्दी से, शहद से, शक्कर से — उसी तरह का नियम और विधि जैसे हम भगवान का षोडशोपचारदेवता हेतु सोलह अंगों वाला पूर्ण पूजा-क्रम, मूल पंचोपचार से अधिक विस्तृत। पूजन आदि करते हैं।
हम तो विषयों को आपके समक्ष रख देंगे। चुनना आपको है ना। उसके लिए आपको अपने बुद्धि का प्रयोग करना होगा। चुनाव कभी भी भगवान जो है वो छोड़ देते हैं भक्त के ऊपर में। हम भी भक्त हैं आप भी भक्त हैं आप भी सेवक हम भी सेवक। हो सकता है कि किसी विषय में आप हमसे ज्यादा जानते हो किसी विषय में हम ज्यादा जानते हो।
विषय आपके सामने रखे जाते हैं; चुनना आपका काम है
हम विषय रखते हैं; चुनना आपका है
वक्ता कहते हैं — इसमें हमारे पास बहस की कोई गुंजाइश नहीं — कि भाई, यह नहीं मिलता, वह नहीं मिलता, क्या करें, क्या हमेशा करना ही है; यह आपका विषय है, खोजिए, आपमें इतनी बुद्धि होनी चाहिए कि हमें कैसे और क्या करना है। हम विषय आपके सामने रखेंगे; चुनना आपका है। इसके लिए आपको अपनी बुद्धि लगानी होगी। वे कहते हैं, भगवान हमेशा चुनाव भक्त पर छोड़ते हैं। हम भी भक्त हैं और आप भी भक्त हैं; आप भी सेवक हैं और हम भी सेवक हैं। हो सकता है किसी बात में आप हमसे ज़्यादा जानते हों और किसी बात में हम ज़्यादा जानते हों।
वक्ता कहते हैं — अब इसमें हमारे पास बहस की कोई गुंजाइश नहीं — कि भाई, यह नहीं मिलता, वह नहीं मिलता, हम क्या करें, क्या हमेशा करना ही है; यह आपका विषय है, आप खोजिए। आपमें कम से कम इतनी बुद्धि होनी चाहिए कि हमें कैसे और क्या करना है। हम विषय आपके सामने रखेंगे। चुनना आपका है, है न। इसके लिए आपको अपनी बुद्धि लगानी होगी। भगवान हमेशा चुनाव भक्त पर छोड़ते हैं। हम भी भक्त हैं और आप भी भक्त हैं; आप भी सेवक हैं और हम भी सेवक हैं। हो सकता है किसी बात में आप हमसे ज़्यादा जानते हों, और किसी बात में हम ज़्यादा जानते हों।
जो हम अधिक जान रहे हैं या किसी की जानकारी प्राप्त हो रही है कि यहां अपने सनातनियों से गलती हो रही है इसके कारण से हम फल नहीं मिल रहा है। तो हम वो आपके समक्ष रख दिए हैं कि भाई इससे बचा जाए। अब उसको मानना है कि नहीं मानना है आपकी इच्छा। तो अगर आप मान लेते हैं कि बृहस्पति देव की पूजा करने बैठे हैं कि हमको बृहस्पति ग्रह जो हैं उनकी सेवा पूजा करनी है क्योंकि हमारे बृहस्पति देव जो हैं पंचम भाव में बैठे हैं और हमारे भाग्य भाव के स्वामी हैं अगर बृहस्पति देव प्रसन्न हो जाते हैं तो हमें धन धान्य से और भाग्य से बहुत वृद्धि होगी बहुत कृपा प्राप्त होगी।
उदाहरण के लिए पाँचवें भाव में बैठे, भाग्य भाव के स्वामी बृहस्पति को लीजिए
पाँचवें भाव में बृहस्पति, भाग्य भाव के स्वामी
वक्ता कहते हैं — जो हम ज़्यादा जानते हैं, या जो जानकारी मिलती है कि हमारे सनातनी भाई यहाँ गलती कर रहे हैं और इसी कारण फल नहीं मिलता, वह हमने आपके सामने रखा है: भाई, इससे बचा जाए। अब मानना या न मानना आपकी इच्छा। तो मान लीजिए आप बृहस्पति देव की पूजा करने बैठे — कि हमें बृहस्पति ग्रह की सेवा-पूजा करनी है, क्योंकि हमारे बृहस्पति देव पाँचवें भाव में बैठे हैं और हमारे भाग्य भाव के स्वामी हैं, और अगर बृहस्पति देव प्रसन्न हो जाएँ तो हमारे धन, धान्य और भाग्य में बड़ी वृद्धि होगी, और बहुत कृपा मिलेगी।
वक्ता कहते हैं — जो हम ज़्यादा जानते हैं, या जो जानकारी मिलती है — कि यहाँ हमारे सनातनी भाइयों से गलती हो रही है, और इसी कारण फल नहीं मिलता — वह हमने आपके सामने रखा है: भाई, इससे बचा जाए। अब मानना या न मानना आपकी इच्छा है। तो मान लीजिए आप बृहस्पति देव की पूजा करने बैठे: कि हमें बृहस्पति ग्रह की सेवा-पूजा करनी है, क्योंकि हमारे बृहस्पति देव पाँचवें भाव में बैठे हैं और हमारे भाग्य भाव के स्वामी हैं; अगर बृहस्पति देव प्रसन्न हो गए तो हमारे धन-धान्य और भाग्य में बहुत बड़ी वृद्धि होगी, और बहुत कृपा मिलेगी।
अब ऐसे में आप बृहस्पतिवार के दिन ऐसे ही लोग एक बहुत अच्छा मीम बना था विषयांतर हो रहा है लेकिन ये जरूर बोलना चाहेंगे यमराज का बहुत सही चीज लेकिन उसमें बताया है क्या कि भाई हम मांसाहारी हो कि शाकाहारी हो।
बृहस्पति पूजा के पहले ही कदम पर क्या गलत होता है?
मंगलवार, गुरुवार और शनिवार को साबुन और तेल वर्जित हैं
तो मान लीजिए आप बृहस्पति देव की पूजा करने गए, और उस दिन सबसे पहले नहाने गए, और वहाँ ऐसा साबुन इस्तेमाल किया — हालाँकि उस दिन, बृहस्पतिवार को, साबुन और तेल का प्रयोग भी वर्जित है, कि मंगलवार, गुरुवार और शनिवार को इन्हें नहीं लगाना चाहिए। पर वक्ता कहते हैं, इसे कितना माना जाए; यह सब अंधविश्वास की बात मानी जाती है।
वक्ता कहते हैं — तो मान लीजिए आप बृहस्पति देव की पूजा करने गए, और उस दिन सबसे पहला काम यह किया कि नहाने गए, और उसमें ऐसा साबुन इस्तेमाल किया। हालाँकि उस दिन, बृहस्पतिवार के दिन, साबुन और तेल का प्रयोग भी वर्जित है — कि मंगलवार, बृहस्पतिवार और शनिवार को इन्हें नहीं लगाना चाहिए। पर कितना माना जाए; वे कहते हैं, यह सब अंधविश्वास की बात है।
तो अगर आप मान लेते हैं कि बृहस्पति देव की पूजा करने गए और उस दिन जो है आप सबसे पहला काम यही किए कि आप स्नान करने गए उसमें आप ऐसे साबुन का प्रयोग कर लिए हालांकि उस दिन बृहस्पतिवार के दिन साबुन और तेल का प्रयोग भी वर्जित है कि मंगलवार बृहस्पतिवार शनिवार के दिन ना लगाएं लेकिन कितना माना जाए ये सब अंधविश्वास का विषय है। अंधविश्वास आपको तब तक लगेगा जब तक आपके पास में विपुलता के साथ हर साधन उपलब्ध है सुख का ये ध्यान रखिएगा और इसे आप देख लीजिएगा अपने जीवन में। आपके पास जब तक आप रगड़ नहीं जाओगे ना जब आप पूरा रगड़ा जाओगे तब सब नियम मानोगे।
कोई बात अंधविश्वास लगना कब बंद होती है?
अंधविश्वास तभी तक लगता है जब तक हर सुख-साधन भरपूर है
वक्ता कहते हैं — यह आपको अंधविश्वास तभी तक लगेगा जब तक आपके पास हर सुख-साधन भरपूर है; यह ध्यान रखिए और अपने जीवन में देखिए। जब तक आप पिस नहीं जाते — जब अच्छी तरह पिस जाएँगे, तब हर नियम मानेंगे। तब आप वह भी मानेंगे जो नहीं मानना चाहिए; पर जो मानने योग्य है, जिसके पीछे कोई वचन है, वह ज़रूर मानना चाहिए, उसमें कोई हानि नहीं। पर आपकी इच्छा; आप ऐसे नहीं मानेंगे।
वक्ता कहते हैं — यह आपको अंधविश्वास तभी तक लगेगा जब तक आपके पास हर सुख-साधन भरपूर उपलब्ध है। यह ध्यान रखिए और अपने जीवन में देखिए। जब तक आप पिस नहीं जाते — जब अच्छी तरह पिस जाएँगे, तब हर नियम मानेंगे। तब आप वह भी मानेंगे जो नहीं मानना चाहिए। पर जो मानने लायक है, जिसके पीछे कोई वचन है, वह ज़रूर मानना चाहिए; उसमें कोई हानि नहीं। पर आपकी इच्छा है; आप ऐसे नहीं मानेंगे।
तब तो वो भी मानोगे जो नहीं मानना चाहिए। लेकिन जो मानने योग्य है जिसके पीछे कुछ कथन है उसे जरूर मान लेना चाहिए। ठीक है उसमें कुछ बुराई नहीं है। लेकिन आपकी इच्छा आप ऐसे नहीं मानेंगे। तो अब आप नहाए सबसे पहले तो वही हुआ कि आप मांस युक्त चीज का उपयोग करके नहा लिए। दूसरा चीज है वस्त्र पहनने के लिए आरंभिक नियम है। अब बृहस्पति देव के पूजन के लिए पीत वस्त्र धारण करना है।
पीले वस्त्र और आसन में क्या गलत है?
सिला हुआ वस्त्र पहना, और स्टाइलिश नायलॉन आसन पर बैठे
वक्ता कहते हैं — तो सबसे पहले आपने मांस वाली चीज़ से स्नान किया। दूसरी बात वस्त्र पहनने का आरंभिक नियम है। अब बृहस्पति देव के पूजन में पीला वस्त्र पहनना है; आपने सिला हुआ पीला पहन लिया। सिला हुआ वस्त्र नहीं पहनना था; पीला आसन रखना था, कंबल आदि का, या वही आसन रखने थे। उनकी जगह आजकल सब स्टाइलिश तरह के आ गए हैं — नायलॉन वगैरह; और आप उसी आसन पर बैठ गए। वे कहते हैं, तो देखिए, आप समझौता तो कर ही रहे हैं।
वक्ता कहते हैं — तो अब आपने स्नान किया — पहली बात यह हुई कि आपने मांस वाली चीज़ इस्तेमाल करके स्नान किया। दूसरी बात वस्त्र पहनने का आरंभिक नियम है। अब बृहस्पति देव के पूजन में पीला वस्त्र पहनना है। आपने सिला हुआ पीला पहन लिया। सिला हुआ वस्त्र नहीं पहनना था; पीला आसन रखना था, कंबल आदि का, या वही आसन रखने थे। उनकी जगह आजकल स्टाइलिश तरह के आ गए हैं, नायलॉन वगैरह, और आप उसी आसन पर बैठ गए। वे कहते हैं, तो देखिए, आप समझौता ज़रूर कर रहे हैं।
पीला वस्त्र सिला हुआ पहन लिए। सिला हुआ वस्त्र नहीं पहनना था पीला आसन रखना था कंबल आदि का या उन्हीं आसन रखना था। अब उसके जगह में आजकल स्टाइलिश वाला सब चला है नायलॉन और उनका वो सब आसन पर बैठ गए। तो आप देखिए कंप्रोमाइज तो आप कर ही हैं। अब वहां पर समय बताया गया है कि सुबह के समय सूर्योदय होने के सवा घंटे के भीतर बृहस्पति देव का पूजन आरंभ हो जाना चाहिए।
बृहस्पति का पूजन कब तक शुरू हो जाना चाहिए?
सूर्योदय के सवा घंटे के भीतर
वक्ता कहते हैं — वहाँ समय बताया गया है कि सुबह सूर्योदय के सवा घंटे के भीतर बृहस्पति देव का पूजन शुरू हो जाना चाहिए। अब आप 9 बजे, 10 बजे बृहस्पति देव का पूजन करने बैठ रहे हैं; उनका समय निकल गया। वे दोपहर में आएँगे, या कब आएँगे, या नहीं आएँगे, क्या बात होगी — अब उनका इससे कोई लेना-देना नहीं। तब आपका काम खत्म।
वक्ता कहते हैं — अब वहाँ समय बताया गया है: कि सुबह सूर्योदय के सवा घंटे के भीतर बृहस्पति देव का पूजन शुरू हो जाना चाहिए। अब आप 9 बजे, 10 बजे बृहस्पति देव का पूजन करने बैठ रहे हैं; उनका समय बीत गया। वे दोपहर में आएँगे, या कब आएँगे, या नहीं आएँगे, क्या बात होगी — अब उनका इससे कोई लेना-देना नहीं। तब आपका काम खत्म।
अब आप बैठ रहे हो 9:00 बजे 10:00 बजे बृहस्पति देव का पूजन करने के लिए उनका घटी बीत चुका है आएगा दोपहर में या कब आएगा नहीं आएगा क्या विषय रहेगा अब उससे कोई लेना देना नहीं है। तो फिर काम खत्म हो गया आपका। आधा तो आप खुद जब नियम के साथ में कंप्रोमाइज कर लिए हैं उसके बाद आप चाहते हो कि फल हमें पूर्ण मिले तो कैसे मिलेगा? यह इसके ऊपर भी विचार करना चाहिए ना।
मनुष्य के अपने सामर्थ्य में कितना है?
सुबह उठना, ठीक से नहाना, शुद्ध वस्त्र, और समय पर पूजा
वक्ता पूछते हैं — आधा आपने खुद नियमों से समझौता कर लिया, फिर चाहते हैं कि फल पूरा मिले — कैसे मिलेगा? इस पर भी विचार करना चाहिए। जो मनुष्य के सामर्थ्य में है, उसमें अपनी ओर से 100% दें। सुबह उठना आपके सामर्थ्य की बात है; ठीक से नहाना आपके सामर्थ्य की बात है; शुद्ध वस्त्र पहनना पूरी तरह आपके सामर्थ्य में है; और समय पर पूजन करना, जप करना भी आपके सामर्थ्य की बात है।
वक्ता पूछते हैं — जब आधा आपने खुद नियमों से समझौता कर लिया, और उसके बाद आप चाहते हैं कि फल पूरा मिले — तो कैसे मिलेगा? इस पर भी विचार करना चाहिए। जो मनुष्य के सामर्थ्य में है, उसमें अपनी ओर से 100% दें। सुबह उठना आपके सामर्थ्य की बात है। ठीक से नहाना आपके सामर्थ्य की बात है। शुद्ध वस्त्र पहनना पूरी तरह आपके सामर्थ्य की बात है। और समय पर पूजन करना, जप करना भी आपके सामर्थ्य की बात है।
हम अपने तरफ से 100% दें जो मनुष्य के सामर्थ्यता के भीतर है। सुबह उठना आपके सामर्थ्य के भीतर का विषय है। स्नान सही प्रकार से करना आपके सामर्थ्यता के भीतर का विषय है। शुद्ध वस्त्र पहनना है बिल्कुल आपके सामर्थ्यता के भीतर का बात है। और समय से पूजन कर लेना जप कर लेना वह भी आपके सामर्थ्य का भीतर का बात है। इतने चीजों को आप कर ले नियम से एक मास का बताया गया ना कम से कम एक महीने के बाद बृहस्पति देव का फल प्राप्त होता है।
बृहस्पति का जप कितने समय तक करना चाहिए?
फल मिलने से पहले कम से कम एक महीना
कहा गया है कि कम से कम एक महीना — कम से कम एक महीने बाद बृहस्पति देव का फल मिलता है। बृहस्पति देव के लिए एक महीना होना चाहिए; कम से कम एक महीना उनका जप-तप करना चाहिए। अब अगर आप महीना नहीं कर रहे, केवल पाँच दिन, केवल सात दिन किया, या किया ही नहीं, तो बस बैठकर दोष देंगे। वक्ता कहते हैं, तब आपके बृहस्पति बहुत मज़बूत हो जाएँगे, और इतने मज़बूत कि जीवन में आपको आनंद ही आनंद देंगे; और फिर आप बैठकर कहेंगे, फल क्यों नहीं मिल रहा।
वक्ता कहते हैं — इतनी बातें नियम से कीजिए: एक महीना बताया गया है न — कम से कम एक महीने बाद बृहस्पति देव का फल मिलता है। बृहस्पति देव के लिए एक महीना होना चाहिए; कम से कम एक महीना उनका जप-तप करना चाहिए। अब अगर आप महीना नहीं कर रहे, केवल पाँच दिन किया, केवल सात दिन किया, नहीं किया — तो वहाँ आप बस बैठकर दोष देंगे। तब आपके बृहस्पति बहुत मज़बूत हो जाएँगे। और फिर वे इतने मज़बूत होंगे कि जीवन में आपको आनंद ही आनंद देंगे। और उसके बाद आप बैठकर कहेंगे, भाई, हमें फल कैसे नहीं आ रहा, फल क्यों नहीं आ रहा।
बृहस्पति देव के लिए एक मास होना चाहिए एक महीना कम से कम आप उनका जप तप आदि करें। अब आप एक महीना अगर नहीं कर रहे हैं आप अगर पांच ही दिन किए सात ही दिन किए नहीं किए वहां आप केवल बैठ कर के दोषारोपण ही करेंगे। तो फिर आपकी बृहस्पति बहुत मजबूत हो जाएंगे। और फिर इतना मजबूत होंगे कि फिर आपको आनंद ही आनंद देंगे जीवन में। और उसके बाद आप बैठ के बोलेंगे कि भैया हमें फल कैसे नहीं मिल रहा है फल क्यों नहीं मिल रहा है।
दूसरा चरण है अपनी ही वाहवाही, और पंडितों का मज़ाक
अपनी वाहवाही, और पंडितों का मज़ाक उड़ाना
वक्ता कहते हैं — इसके आगे एक और बात है। ठीक है, आपने नियम से किया, आप दूसरे चरण पर आ गए: सुबह उठे, भोर में अच्छे से नहाए, कोई खराब पदार्थ इस्तेमाल नहीं किया, नियम से उनका पूजन किया, सब किया। और पूजन करके उठे, और प्रसाद लेते ही, या लेने से पहले ही, कितना बैठकर कहते हैं — अरे, कितनी बढ़िया पूजा की हमने, क्या बढ़िया पूजा हुई, पूजा करके मज़ा आ गया; ये पंडित लोग पूजा करना नहीं जानते, ये लोग किसी तरह पूजा करवा देते हैं, देखो हमने कितनी बढ़िया की, हमने मंत्र पढ़े, अरे, बृहस्पति देव का मंत्र पढ़ने में आनंद आ गया; ऐसी पूजा ब्राह्मण नहीं करेंगे, ये ब्राह्मण आज लुटेरे हैं — और तुरंत शुरू हो जाता है।
वक्ता कहते हैं — और इसके आगे एक और बात है। ठीक है, आपने नियम से किया; चलिए, आप दूसरे चरण पर आ गए। आप सुबह उठे, भोर में अच्छे से नहाए, कोई खराब पदार्थ इस्तेमाल नहीं किया। आपने उनका पूजन भी नियम से किया, सब किया। और पूजन करके उठे, और प्रसाद लेते ही, या लेने से पहले ही, कितना बैठकर कहते हैं — अरे, कितनी बढ़िया पूजा की हमने। बढ़िया पूजा हुई न, पूजा करके मज़ा आ गया। ये पंडित लोग पूजा करना नहीं जानते, ये लोग किसी तरह पूजा करवा देते हैं; देखो हमने कितनी बढ़िया की, हमने मंत्र पढ़े। अरे, बृहस्पति देव का मंत्र पढ़ने में आनंद आ गया। ऐसी पूजा ब्राह्मण नहीं करेंगे; ये ब्राह्मण आज लुटेरे हैं — और तुरंत शुरू हो जाता है।
और उसके सिवाय और भी बात है। कि आप ठीक है आप नियम से कर लिए चलिए सेकंड स्टेज में आ गए आप सुबह उठ गए भोर में स्नान भी अच्छे से किए कोई प्रकार का कोई खराब पदार्थ का प्रयोग नहीं किए। आप नियम से उनका पूजन भी कर लिए सब कर लिए। और पूजन करके उठे जैसे ही प्रसाद लेने के बाद या लेने के पूर्व ही कितना आप बैठ कर के बोले अरे क्या गजब का हम पूजन किए। मस्त पूजा हुआ ना मजा आ गया पूजा करके। ये पंडित लोग को पूजा करने थोड़ी आता है ये लोग जैसे तैसे करके पूजा कर देता है हम देखे कितना मस्त पूजा किए हम मंत्र पढ़े।
ब्राह्मण केवल जन्म से ब्राह्मण नहीं; पूजा करते हुए अपने पिता का मज़ाक उड़ाना पूजा को बेकार कर देता है
जन्म से ही ब्राह्मण नहीं; और पूजा करते हुए अपने पिता का मज़ाक
वक्ता कहते हैं — जहाँ आपको पूजा का यह अहंकार का नशा हुआ — यही पूजा की माया है। बृहस्पति देव ने तुरंत अपना खेल कर दिया। ब्राह्मण और विद्वान का अर्थ केवल जन्म से ब्राह्मण नहीं: हो सकता है आप खुद ब्राह्मण हों और वहाँ बैठे हों, और अपने ही पिता का मज़ाक उड़ाएँ, कि पापा ठीक से नहीं जानते, किसी तरह काम चला लेते हैं, देखो हमने कितनी बढ़िया पूजा की — और कहानी खत्म। आपको लगता है गुरु जी मंत्र ठीक से नहीं पढ़ते, बड़ी जल्दी में पढ़ते हैं, उनकी पूजा में मज़ा नहीं, वे काट-छाँट करते हैं; देखो हमने कितनी बढ़िया की — और कहानी खत्म, भाई।
वक्ता कहते हैं — अब जहाँ आपको पूजा का यह अहंकार का नशा चढ़ गया — यही पूजा की माया है। तुरंत बृहस्पति देव ने अपना खेल कर दिया। जहाँ आपने ब्राह्मण और विद्वान को लिया — और ब्राह्मण का अर्थ केवल जन्म से ब्राह्मण नहीं होगा। आप अपने ही पिता का भी मज़ाक उड़ाते हैं: बाबा जी कहाँ, पिता कहाँ आते हैं; ठीक से कहें तो आप खुद ब्राह्मण हो सकते हैं, हो सकता है आप ब्राह्मण हों और वहाँ बैठे हों, और अपने ही पिता का उपहास करें — पापा ठीक से नहीं जानते, किसी तरह काम चला लेते हैं। देखो हमने कितनी बढ़िया पूजा की — कहानी खत्म। आपको लगता है गुरु जी मंत्र ठीक से नहीं पढ़ते, मंत्र बड़ी जल्दी में पढ़ते हैं, उनकी पूजा में मज़ा नहीं, उसमें काट-छाँट करते हैं। देखो हमने कितनी बढ़िया की — कहानी खत्म, भाई।
अरे बृहस्पति देव का मंत्र पढ़ने में आनंद आ गया। ऐसा तो ब्राह्मणों लोग पूजा ना करें ना ये तो ब्राह्मण आजकल के लुटेरा तुरंत शुरू। अब जहां आप अपने ये जो आपको आत्ममुग्धता हुआ है ना पूजा का यही माया है। तुरंत बृहस्पति देव खेल कर दिए। जहां आप ब्राह्मण विद्वान केवल ब्राह्मण का अर्थ यह नहीं होगा कि कोई जन्म से ब्राह्मण है। आप अपने पिता का भी अरे ये बाबूजी का कहां है पिताजी का कहां आता है ठीक से आप ब्राह्मण ही होंगे हो सकता है आप ब्राह्मण ही हो बैठे हो और अपने पिताजी का उपहास करें पापा को तो ठीक से आता नहीं है। जैसे तैसे कर लेते हैं। देखिए क्या मस्त पूजा किए हैं बस कहानी खत्म। आपको लग रहा है गुरु जी जो है ठीक से ना मंत्र नहीं पढ़ते हैं बहुत हड़बड़िया मंत्र पढ़ते हैं मजा नहीं आता है उनका पूजा में डंडी मार देते हैं।
जहाँ विद्वान या पिता का अपमान हुआ, बृहस्पति देव का पूजन वहीं निष्फल हो जाता है
बृहस्पति देव का पूजन उसी जगह निष्फल हो जाता है
वक्ता कहते हैं — ध्यान रखिए: जहाँ आपने उठकर विद्वान, ब्राह्मण, गुरु, पिता का अपमान किया — वहीं आपका बृहस्पति देव का पूजन करना व्यर्थ हो गया। यह भी ध्यान रखिए।
वक्ता कहते हैं — तो ध्यान रखिए: जहाँ आपने उठकर विद्वान का, ब्राह्मण का, गुरु का, पिता का अपमान किया — वहीं आपका बृहस्पति देव का पूजन निष्फल हो गया। यह भी ध्यान रखिए।
हम देखे कितना मस्त पूजा किए बस खत्म कहानी भाई। तो ध्यान रखें जहां आप विद्वान ब्राह्मण गुरु पिता इनका अपमान किए उठ कर के तो बृहस्पति देव का पूजन करना वहीं पर आपका व्यर्थ हो गया। यह भी ध्यान रखें।
क्या कुंभ का स्नान पर्व के दिन ही करना चाहिए?
जब भी समय और अवसर मिले, स्नान कीजिए
प्रश्न है कि कुंभ में पर्व पर ही नहाना चाहिए, या मकर संक्रांति पर हरिद्वार में नहा सकते हैं, या प्रयागराज में किसी भी तिथि को। वक्ता उत्तर देते हैं: तीर्थ क्षेत्र में जब भी आपको समय मिले और अवसर आए, स्नान करना चाहिए। उसमें पास रहने वालों के पास पर्व-काल के मामले में ज़्यादा विकल्प हैं — कि भाई, हमने मकर संक्रांति पर नहा लिया; पर दूर रहने वाले, जैसे ही मौका मिले, कूद पड़ें।
वक्ता प्रश्न पढ़ते हैं — प्रश्नकर्ता पूछते हैं कि कुंभ में पर्व पर नहाना चाहिए, या मकर संक्रांति पर हरिद्वार में भी नहा सकते हैं, या प्रयागराज माँ में किसी भी तिथि को नहा सकते हैं। वे कहते हैं, देखिए, तीर्थ क्षेत्र में जब भी आपको नहाने का समय मिले और अवसर प्राप्त हो, कर लेना चाहिए। उसमें पर्व-काल भी — पास रहने वालों के पास ज़्यादा विकल्प हैं; क्या, भाई, हमने मकर संक्रांति पर नहा लिया। पर दूर रहने वाले, जैसे ही मिले, तुरंत कूद पड़ें।
कुंभ में स्नान करना पर्व पर करना चाहिए या फिर हरिद्वार में भी मकर संक्रांति में स्नान कर सकते हैं यह फिर प्रयागराज मां की किसी भी तारीख में स्नान कर सकते हैं। देखिए तीर्थ क्षेत्र में तो जब भी स्नान करने का आपको समय मिल जाए और अवसर प्राप्त हो जाए कर लेना चाहिए। उसमें तो पर्व काल भी जो वहां नजदीक रहते हैं उनके पास ज्यादा ऑप्शन है। क्या रे भैया मकर संक्रांति के नहाए लेकिन जो दूर रहते हैं उनके लिए तो जब मिल जाए तुरंत कूद जाओ। दूसरा चीज है कि जो आप पूछ रहे हैं कि मकर संक्रांति में तो मकर संक्रांति में आप हरिद्वार में भी कीजिए कोई दिक्कत नहीं है प्रयाग जी में कीजिएगा तो भी कोई दिक्कत नहीं है।
क्या शाही स्नान या अमृत स्नान ही एकमात्र सिद्ध काल है?
केवल अमृत स्नान के घंटे नहीं, पूरे पैंतालीस दिन
दूसरी बात, मकर संक्रांति के बारे में जो पूछा: मकर संक्रांति पर हरिद्वार में भी कीजिए, कोई कठिनाई नहीं; प्रयाग जी में कीजिए, उसमें भी कोई कठिनाई नहीं। और कुंभ के पैंतालीस दिनों में किसी भी समय आकर प्रयाग जी में नहाइए; सर्वोत्तम होगा, किसी भी तिथि को। जो चल रहा है — शाही स्नान, और जिसे अब अमृत स्नान कहा जा रहा है, कि उस समय सिद्ध काल है और उसी समय दिव्य सिद्धियाँ मिलती हैं — वक्ता कहते हैं, देखिए, यह केवल उस समय की बात नहीं। ध्यान रखिए, यह पूरे पैंतालीस दिनों की बात है, जैसा पहले चर्चा हो चुकी है; इसलिए निश्चिंत मन से किसी भी दिन नहा सकते हैं।
वक्ता कहते हैं — दूसरी बात, जो आप मकर संक्रांति के बारे में पूछ रहे हैं: मकर संक्रांति पर हरिद्वार में भी कीजिए, कोई कठिनाई नहीं; प्रयाग जी में कीजिए, उसमें भी कोई कठिनाई नहीं। दूसरी बात, कुंभ के पैंतालीस दिन के समय में, उसमें किसी भी समय आकर प्रयाग जी में नहाइए; सर्वोत्तम होगा। किसी भी तिथि को। उसमें जो चल रहा है — शाही स्नान, और जिसे अब अमृत स्नान कहा जा रहा है, कि उस समय सिद्ध काल है और उसी समय दिव्य सिद्धियाँ मिलती हैं — देखिए, यह केवल उस समय की बात नहीं है। ध्यान रखिए, यह पूरे पैंतालीस दिनों की बात है; इस पर पहले ही चर्चा हो चुकी है। इसलिए निश्चिंत मन से आप किसी भी दिन नहा सकते हैं।
दूसरा जो कुंभ का 45 दिन का समय है इसमें आप कभी भी आकर के प्रयाग जी में स्नान कर लीजिए अति उत्तम रहेगा। किसी भी तारीख में उसमें ऐसा कि अब देखिए जो चला है शाही स्नान और अभी जिसको अमृत स्नान कहा जा रहा है कि उस समय सिद्ध काल होता है और उसी समय दिव्य सिद्धियां जो है वो प्राप्त होती हैं तो देखिए वो केवल उस समय का विषय नहीं है। ध्यान रखें ये पूरे 45 दिन का विषय है अभी पहले ही चर्चा किया जा चुका है इसके ऊपर तो निश्चिंत होकर के आप किसी भी दिन स्नान कर सकते हैं।
विग्रह या यंत्र की प्रतिष्ठा कब पूरी मानी जाती है?
एक मत से तीन दिन, और कुल पूजा के लिए एक वर्ष की नियमित पूजा
राहुल शर्मा जी को प्रतिष्ठा पर उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं: जब हम श्री विग्रह में, यंत्र में, दंड में, या किसी और भौतिक पदार्थ में प्राण प्रतिष्ठा करते हैं, तो रोज़ के नियम से उनकी सेवा, पूजा और आरती चलते हुए — जब तक पूजन-पाठ अच्छे से हो रहा है — अगर वर्ष के भीतर एक वार्षिक पूजा हो जाए, तो उनकी प्रतिष्ठा पूरी मानी जाती है। फिर भी, अगर आपने तीन दिन नियम से पूजा की है, तो उनकी प्रतिष्ठा हो गई; यह भी एक मान्यता है। पर अगर आपने पूरे वर्ष नियम से पूजन किया है, तो वे कुल में पूजा के योग्य हो जाते हैं और उनमें प्रतिष्ठा की कोई कमी नहीं रहती। तांत्रिक प्रतिष्ठा में विषय अलग तरह से आता है।
वक्ता कहते हैं — राहुल शर्मा जी, प्रतिष्ठा के विषय में: जब हम श्री विग्रह में, यंत्र में, दंड में, या किसी और भौतिक पदार्थ में प्राण प्रतिष्ठा करते हैं, तो रोज़ के नियम से उनकी सेवा, पूजा, आरती आदि चलते हुए — जब तक पूजन-पाठ अच्छे से हो रहा है — अगर वर्ष के भीतर एक वार्षिक पूजा हो जाए, तो उनकी प्रतिष्ठा तीन दिन में ही पूरी तरह पूर्ण मानी जाती है। फिर भी, अगर आपने तीन दिन नियम से पूजा की है, तो उनकी प्रतिष्ठा हो गई; यह भी एक मान्यता है। पर अगर आपने पूरे वर्ष नियम से पूजन किया है, तो वे कुल में पूजन के योग्य हो जाते हैं, और उनमें प्रतिष्ठा की कोई कमी नहीं रहती। पर तांत्रिक प्रतिष्ठा में विषय फिर अलग तरह से आता है।
राहुल शर्मा जी जो प्रतिष्ठा का विषय है श्री विग्रह में यंत्र में दंड में या किसी भी अन्य पदार्थ में भौतिक पदार्थ में जब हम प्राण प्रतिष्ठा करते हैं तो नित्य नियम से उनका सेवा पूजा आरती आदि होते रहने से जब तक पूजन पाठ अच्छे से हो रहा है वर्ष भर अगर एक वार्षिकी पूजा हो जाती है तो उनकी प्रतिष्ठा जो है वह पूर्ण तीन दिन में ही पूरा माना गया है ऐसे तो अगर आप नियम से तीन दिन पूजा कर दिए हैं तो उनकी प्रतिष्ठा हो गई यह भी मान्यता है लेकिन अगर आप नियम से वर्ष भर का पूजन कर दिए हैं तो फिर वह कुल में पूजन करने के योग्य हो जाती हैं उनमें प्रतिष्ठा का अभाव नहीं रहता लेकिन तांत्रिकी प्रतिष्ठा में फिर विषय आता है।
तांत्रिक प्रतिष्ठा फिर से कब करनी चाहिए?
गुरु मंडल की किसी जयंती तिथि पर
वक्ता कहते हैं कि तांत्रिक प्रतिष्ठा का, चाहे वह माला की हो, एक नियम है। यहाँ इसका अर्थ उन लोगों से है जो तंत्रगत परंपरा से पूजन करते हैं। यह विषय आम लोगों के लिए नहीं, उन्हीं के लिए है। गुरु उपदेश देते हैं कि गुरु मंडल में, यानी गुरु के दादा गुरु, परदादा गुरु, तीसरे परमेष्ठी गुरु, मान लीजिए परात्पर गुरु तक, जिनकी भी जन्म तिथि आदि आती हो, जिनका भी जन्मोत्सव मनाया जाता हो, साल में उनमें से किसी भी तिथि पर माला की प्रतिष्ठा फिर से करनी चाहिए।
तांत्रिक प्रतिष्ठा में, चाहे वह माला की हो — यहाँ तांत्रिक प्रतिष्ठा का अर्थ उन लोगों से है जो तंत्रगत परंपरा से पूजन कर रहे हैं। वक्ता कहते हैं कि यह विषय आम लोगों के लिए नहीं है। वह विषय उन्हीं के लिए है। आप पूछ रहे हैं, इसलिए हम समझते हैं कि आपके गुरु अत्यंत दिव्य रहे हैं, जहाँ तक हम जानते हैं, अगर आप वही राहुल जी हैं। तो यहाँ यह विषय भी लागू होता है, इसे ध्यान रखें। तांत्रिक प्रतिष्ठा में गुरु का उपदेश होता है कि गुरु मंडल में — गुरु मंडल यानी गुरु के दादा गुरु, परदादा गुरु, तीसरे परमेष्ठी गुरु, मान लीजिए परात्पर गुरु तक — जिनकी भी जन्म तिथि आदि आती हो, जिनका भी जन्मोत्सव मनाया जाता हो, साल में उनमें से किसी भी तिथि पर माला की तांत्रिक प्रतिष्ठा फिर से करनी चाहिए।
तांत्रिकी प्रतिष्ठा में चाहे वह माला का हो तांत्रिकी प्रतिष्ठा का अर्थ हो गया यहां पर जो तंत्रागत परंपरा के अनुसार पूजन कर रहे हैं उनके लिए सामान्य जनों के लिए यह विषय नहीं है। वह विषय उनके लिए है क्योंकि आप पूछ रहे हैं तो हम समझ रहे हैं कि आपके गुरु चूंकि बहुत ही दिव्य रहे हैं जहां तक हमें पता है शायद अगर आप वही राहुल जी हैं तो। तो यहां पर यह विषय भी है इसका ध्यान रखें कि जो तांत्रिकी प्रतिष्ठा होती है उसमें गुरु द्वारा यह उपदेश होता है कि गुरु मंडल में से गुरु मंडल मतलब गुरु के जो दादा गुरु हुए परदादा गुरु हुए तीसरे परमेष्ठी गुरु तक मान लीजिए परात पर गुरु हुए उन तक में जिनकी भी जन्मतिथि आदि आती है जिसका जिनका जन्मोत्सव आदि मनाया जाता है उन तिथियों में किसी भी तिथि में वर्ष में प्रतिष्ठा पुनः कर लेनी चाहिए माला की तांत्रिकी प्रतिष्ठा।
प्रतिष्ठा दोहराने के लिए और कौन-सा दिन लिया जा सकता है?
कुल परंपरा के प्रधान देवता की जयंती, और विग्रह का शोधन
या अपनी कुल परंपरा के प्रधान देवता की जयंती के दिन प्रतिष्ठा दोहरानी चाहिए। यंत्र मंडल में भी ऐसे ही होगा, और गुरु जी ने जो तांत्रिक माला दी है, उसमें भी ऐसे ही। इसके अलावा शोधन की प्रक्रिया आती है, चाहे विग्रह शोधन हो। पर उसमें तीन-चार बातें ध्यान रखनी पड़ती हैं। धातु का ध्यान रखना पड़ता है। सोने का विषय अलग होता है, चाँदी का अलग, ताँबे और काँसे का फिर अलग।
या, वक्ता कहते हैं, आपकी कुल परंपरा के जो प्रधान देवता हैं, उनकी जयंती के दिन प्रतिष्ठा दोहरानी चाहिए। यंत्र मंडल में भी ऐसे ही होगा, और गुरु जी ने जो तांत्रिक माला दी है, उसमें भी ऐसे ही होगा। इसके अलावा शोधन की प्रक्रिया आती है, चाहे विग्रह शोधन हो। पर उसमें तीन-चार बातें ध्यान रखनी पड़ती हैं। कौन-सी तीन-चार बातें? धातु का ध्यान रखना पड़ता है। अब उसमें सोने का विषय अलग हो जाएगा, चाँदी का अलग, ताँबे और काँसे का अलग हो जाएगा।
या जो आपके कुल परंपरा के मुख्य देवता हैं उनकी जयंती के दिन उस दिन प्रतिष्ठा को पुनः दोहरा लेनी चाहिए। यंत्र मंडल में भी उसी प्रकार से होगा और जो तांत्रिकी आपको माला आपके गुरु जी ने दिया है उनमें भी उसी प्रकार से होगा। उसके सिवाय शोधन की प्रक्रिया आती है चाहे वह विग्रह शोधन का हो हां लेकिन उसमें तीन चार बातों का ध्यान रखना होता है। तीन चार बात क्या धातु का ध्यान रखना होता है। अब उसमें है स्वर्ण का तो उसमें विषय अलग हो जाएगा रजत का अलग हो जाएगा ताम्र काशिका जो है वह अलग हो जाएगा।
अलग से प्रतिष्ठा की ज़रूरत कब बिल्कुल नहीं होती?
रोज़ सेवा, जप और आरती, और महीने या साल में एक बार हवन
माला में भी ऐसा ही है। माणिक्य का अलग, मूँगे का अलग, रुद्राक्ष आदि का अलग। पर फिर भी अगर आप रोज़ पूजा कर रहे हैं — यह पारंपरिक बात है — अगर रोज़ सेवा-पूजा, रोज़ जप, रोज़ आरती कर रहे हैं, और साल में कम से कम एक बार, बल्कि अब महीने में एक बार भी हवन आदि की प्रक्रिया कर रहे हैं, तो आपको अलग से प्रतिष्ठा की खास ज़रूरत नहीं है।
वक्ता कहते हैं कि माला में भी ठीक ऐसा ही है। माणिक्य हो तो अलग, मूँगा हो तो अलग, रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । आदि हों तो उनका अलग। पर फिर भी अगर आप रोज़ पूजा कर रहे हैं — यह पारंपरिक बात हो गई — पर अगर आप रोज़ सेवा-पूजा कर रहे हैं, रोज़ जप करते हैं, रोज़ आरती आदि करते हैं, और साल में कम से कम एक बार तो ज़रूर होना चाहिए, पर अब अगर महीने में एक बार भी आप हवन आदि की प्रक्रिया कर रहे हैं, तो आपको अलग से प्रतिष्ठा की खास ज़रूरत नहीं है।
माला में भी ठीक उसी प्रकार से है माणिक्य है तो अलग है मूंगा है तो अलग है रुद्राक्ष आदि है तो उनका अलग है। लेकिन फिर भी अगर आप नित्य पूजा कर रहे हैं यह तो परंपरागत बात हो गई लेकिन अगर आप नित्य सेवा पूजा कर रहे हैं नित्य जप करते हैं नित्य आरती आदि करते हैं और कम से कम वर्ष में एक बार तो होना ही चाहिए लेकिन अब मास में भी एक बार अगर आप हवन आदि की प्रक्रिया कर रहे हैं तो अलग से प्रतिष्ठा की आवश्यकता विशेष आपको नहीं होती है।
चाँदी के विग्रह के बारे में कुलार्णव क्या कहता है?
पच्चीसवें वर्ष में महोत्सव के साथ फिर से प्रतिष्ठा
वक्ता कहते हैं कि बाद के समय में कुलार्णव आदि के अनुसार यह मत भी आता है। अगर आप चाहें तो नियम है कि अगर आपने चाँदी का विग्रह रखा है, तो पच्चीस साल में एक बार, पच्चीसवाँ साल पूरा होने पर, उनकी प्रतिष्ठा विधि फिर से करनी चाहिए। महोत्सव आदि होना चाहिए, और प्रतिष्ठा की पूरी विधि, विग्रह स्नान आदि की पूरी प्रक्रिया, सब करनी चाहिए। पर यह सब बहुत अलग विषय हो जाता है। हर देवता का फिर अलग, और धातु के हिसाब से अलग।
वक्ता कहते हैं कि बाद के समय में कुलार्णव आदि के अनुसार यह मत भी आता है कि अगर आप चाहें, तो यह नियम है — कि अगर आपने चाँदी का विग्रह रखा है, तो पच्चीस साल में एक बार, पच्चीसवाँ साल पूरा होने पर, पच्चीसवें साल में उनकी प्रतिष्ठा विधि फिर से करनी चाहिए। महोत्सव आदि होना चाहिए, और प्रतिष्ठा की पूरी विधि, विग्रह स्नान आदि की पूरी प्रक्रिया, सब करनी चाहिए। पर यह सब बहुत अलग विषय हो जाता है। हर देवता का फिर अलग, और धातु के हिसाब से अलग। वह सब भी अलग विषय हो जाता है।
कालांतर में कुलाणव आदि के अनुसार यह भी मत आता है कि अगर आप चाहे तो जो यह नियम है कि अगर रजत का विग्रह अगर आप रखे हैं तो 25 वर्ष में एक बार पुनः उनकी प्रतिष्ठा विधि को 25वें साल में जब 25 वर्ष पूरा होता है तो पुनः महोत्सव आदि कराना चाहिए और प्रतिष्ठा आदि की पूरी विधि विग्रह स्नान आदि का पूरा प्रक्रिया और उनका जो है सब यह करना चाहिए लेकिन वह सब विषय बहुत अलग हो जाता है हर देवता के लिए फिर अलग है और कौन सा धातु है उसके अनुसार अलग है वह सब भी अलग-अलग विषय हो जाता है।
इस कुंभ की मुख्य साधना भैरव की क्यों हो?
रक्षा-प्रधान महादेव, जिनकी उग्रता की अभी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है
प्रयास है कि इस कुंभ में हम सब मिलकर उनकी विशेष साधना करें। क्योंकि जो महादेव रक्षा में सबसे आगे हैं, जो सबसे बड़े देवता हैं, जिनकी उग्रता अब ज़रूरी है, जिनके तत्वों की रक्षा के लिए आपके और हमारे जीवन में सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, वे भगवान भैरव हैं। इसलिए उनका विशेष अनुष्ठान आदि बहुत ज़रूरी है। वक्ता कहते हैं कि इन सब पर अलग से चर्चा होगी। तैयारी के लिए साथ बने रहें।
वक्ता कहते हैं कि यह भगवान बटुक जी की होगी, और प्रयास है कि इस कुंभ में हम सब मिलकर उनकी विशेष साधना करें। क्योंकि जो महादेव सुरक्षा में सबसे आगे हैं, जो सबसे बड़े देवता हैं, जिनकी उग्रता अब ज़रूरी है, जिनके तत्वों की रक्षा के लिए आपके और हमारे जीवन में सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, वे भगवान भैरव हैं। इसलिए उनका विशेष अनुष्ठान आदि बहुत ज़रूरी है। इन सब पर अलग से चर्चा होगी। तैयारी के लिए साथ बने रहें। इस पर अब अलग से पूरी चर्चा होगी।
तो उनका विशेष अनुष्ठान आदि बहुत आवश्यक है। तो इन सभी के ऊपर में अलग से चर्चा होगी तैयारी के लिए आप सभी साथ बने रहिए अभी इस पर अलग से पूरा चर्चा होगा।
तीन-चार साल पुराने फोड़े बिना दवा के ठीक हुए, एक बताए गए मामले में
पीठ के तीन-चार साल पुराने फोड़े बिना दवा ठीक होना
दीपेश शर्मा जी लिखते हैं कि उन्होंने मैसेज किया था कि साधना से कोई लाभ नहीं आ रहा। पर जो हुआ है वह लगभग असंभव है। बिना दवा के उनकी पीठ के फोड़े, जो तीन-चार साल से थे, अपने आप ठीक हो गए। वक्ता सब सुनने वालों से यह विषय पढ़ने को कहते हैं। यह साधना करने वालों का मनोबल बढ़ाने वाला विषय है। भाई, जो रोग ठीक न हो, वह इसी तरह — मंत्र में बड़ी सामर्थ्य है, साधना में बड़ी सामर्थ्य है। हमें अपने आराध्य से बस वह साधना करने की योग्यता और सामर्थ्य माँगनी चाहिए।
वक्ता पढ़ते हैं — दीपेश शर्मा जी, आपने लिखा है कि भैया, मैंने आपको मैसेज से बताया था कि साधना से कोई लाभ नहीं आ रहा — पर जो हुआ है वह लगभग असंभव है। बिना दवा के पीठ के फोड़े, जो तीन-चार साल से थे, अपने आप ठीक हो गए। ठीक है, वे कहते हैं, आप सब यह विषय पढ़िए। यह साधना करने वाले लोगों का मनोबल बढ़ाने वाला विषय है। भाई, जो रोग ठीक नहीं होता, वह इसी तरह — मंत्र में बहुत बड़ी सामर्थ्य है। साधना में बहुत बड़ी सामर्थ्य है। वह साधना करने की योग्यता और सामर्थ्य हमें बस अपने आराध्य से माँगनी चाहिए।
दीपेश शर्मा जी आप लिखे हैं कि भैया मैंने आपको मैसेज करके बताया था ना कि साधना से लाभ नहीं हो रहा लेकिन जो हुआ है बहुत असंभव सा है। बिना दवाई के पीठ की फुंसियां जो तीन-चार साल से थी स्वतः ठीक हो गई। ठीक है इस विषय को आप सभी पढ़ लें। ये जो भी लोग साधना करने वाले हैं उनके मनोबल को बढ़ाने वाला विषय है। रोग जो नहीं ठीक हो भैया वो इसी प्रकार मंत्र में सामर्थ्य बहुत है। साधना में सामर्थ्य बहुत है।
कुंभ में किस तरह का जप-लक्ष्य लिया जा सकता है?
रोज़ सौ माला, या दो सौ, या चार सौ
वक्ता कहते हैं, अब अगर कुंभ में कोई यह लक्ष्य ले कि रोज़ कम से कम सौ माला जप करेगा — कम से कम। और अगर उसमें कोई कहे कि हम दो सौ करेंगे, सौ सुबह और सौ शाम। और अगर उसमें कोई शेर आ जाए और कहे, भैया, सुबह, दोपहर और शाम। और अगर कोई बड़ा सवा सेर कहे कि चारों समय सौ-सौ माला।
वक्ता कहते हैं, अब अगर कुंभ में कोई यह लक्ष्य ले कि हम रोज़ कम से कम सौ माला जप करेंगे। कम से कम — और अगर उसमें कोई कहे, हम दो सौ करेंगे: सौ सुबह, सौ शाम। और अगर उसमें कोई शेर आ जाए और कहे, भैया, सुबह, दोपहर और शाम। अगर कोई बड़ा सवा सेर आए और कहे कि चारों समय सौ-सौ माला।
उस साधना को करने की योग्यता और सामर्थ्यता हमें अपने आराध्य से बस मांगनी चाहिए। अब कुंभ में अगर कोई लक्ष्य ले ले कि हम प्रतिदिन जो है कम से कम 100 माला जप करेंगे। कम से कम और अगर उसी में कोई बोल दे कि हम 200 करेंगे सुबह 100 शाम को 100। उसी में कोई शेर आ जाए बोले कि भैया सुबह दोपहर शाम कोई आ जाए बड़ा सवा सेरो बोले चारों टाइम 100-100 माला।
बताया गया सबसे बड़ा लक्ष्य है रोज़ पाँच सौ एक माला, एक आसन पर, पैंतालीस दिन
रोज़ पाँच सौ एक माला, एक आसन पर, पैंतालीस दिन
और अगर उसमें भगवती का कोई पक्का शेर कहे, नहीं भैया, हम पाँच सौ माला करेंगे — सुबह, दोपहर, शाम और रात, और फिर सब मिलाकर सवा सौ जोड़कर पूरी पाँच सौ एक माला पूरी करेंगे। और पैंतालीस दिन एक जगह, एक आसन पर बैठकर पाँच सौ माला करें। वक्ता कहते हैं कि प्रयाग क्षेत्र की बात हो तो वह अलग है, पर यह अपने घर पर भी किया जा सकता है। हम घर की ही बात कर रहे हैं।
वक्ता कहते हैं, और अगर उसमें भगवती का कोई पक्का शेर कहे, नहीं भैया, हम पाँच सौ माला करेंगे। वह सुबह, दोपहर, शाम और रात, और फिर सब मिलाकर सवा सौ करके पूरी पाँच सौ एक माला पूरी करेंगे। और पैंतालीस दिन एक जगह, एक आसन पर बैठकर पाँच सौ माला करें। प्रयाग क्षेत्र की बात हो तो अलग है, पर यह अपने घर पर भी किया जा सकता है — हम घर की ही बात कर रहे हैं।
और उसी में कोई आ जाए एकदम भगवती का शेर ही बोल दे कि ना भैया हम तो 500 माला करेंगे। कि सुबह दोपहर शाम रात और फिर पूरा मिलाकर 125 माला करके 501 माला हम पूरा ही करेंगे। और 45 दिनों 500 माला एक स्थान एक स्थान पर बैठ के करें। अगर प्रयाग क्षेत्र का विषय है तो अलग है लेकिन वो अपने घर पे भी हम तो घर का केवल विषय बोल रहे हैं। प्रयाग के लिए मैं बहुत अधिक इंसिस्ट नहीं कर रहे हैं क्योंकि उससे क्या होगा ना कि जो साधक हैं उनके मनोबल में कहीं ना कहीं कमी आएगी कुंठित होंगे कि अरे हम नहीं जा पा रहे हैं हमें फल नहीं मिलेगा।
प्रयाग जाने पर ज़ोर नहीं दिया जाता, ताकि जो साधक नहीं जा सकते वे निराश न हों
ताकि जो साधक नहीं जा सकते वे निराश न हों
वक्ता कहते हैं कि वे प्रयाग पर बहुत ज़ोर नहीं दे रहे, क्योंकि इससे साधकों का मनोबल कहीं कम पड़ जाएगा और वे निराश होंगे कि अरे, हम नहीं जा पा रहे, हमें फल नहीं मिलेगा। भाई, ऐसा बिल्कुल नहीं है। इस पर वे पहले लिख चुके हैं। हम प्रयाग नहीं जा सकते। हममें सामर्थ्य नहीं है — और वे जानबूझकर "हम" कहते हैं, नहीं तो लोग कहेंगे, आप तो खुद चले गए और हमसे कह रहे हैं कि नहीं, आप नहीं जा पाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि वे प्रयाग के लिए बहुत ज़ोर नहीं दे रहे, क्योंकि इससे साधकों का मनोबल कहीं कम पड़ जाएगा। वे निराश होंगे कि अरे, हम नहीं जा पा रहे, हमें फल नहीं मिलेगा। भाई, ऐसा बिल्कुल नहीं है, आप जहाँ भी हों — इस विषय पर वे पहले ही लिख चुके हैं। हम प्रयाग नहीं जा सकते। हममें सामर्थ्य नहीं है। अगर किसी कारण हम नहीं जा पा रहे, आप नहीं जा पा रहे — और वे बताते हैं कि यह हम "हम" कहकर कह रहे हैं, नहीं तो लोग कहेंगे, आप तो खुद चले गए और हमसे कह रहे हैं कि नहीं, आप नहीं जा पाएँगे।
ऐसा बिल्कुल नहीं है भाई जहां हो पहले ही इस विषय को लिखे हैं। हम नहीं प्रयाग जा सकते। हमारे भीतर सामर्थ्य नहीं किसी भी कारण से अगर आप हम नहीं जा पा रहे हो आप नहीं जा पा रहे हम हम ही बोल कर के बोल रहे हैं। नहीं तो फिर बोलेंगे अच्छा अपने तो चल गए हैं हम लोग को बोल रहे हैं कि नहीं तुम नहीं जा पाओगे। तो मान लेते हैं कि हम नहीं जा पाएंगे। तो हमारे भीतर नहीं है सामर्थ्य जाने का लेकिन भगवती त्रिवेणी जो और जो महाशक्तियां उनमें सामर्थ्य है ना आने का। अरे यहां बैठ के जब आप 100 माला करिएगा जब तो क्यों नहीं आएंगे वो।
अगर हम नहीं जा सकते, तो क्या भगवती आ सकती हैं?
उनमें आने की सामर्थ्य है — उन्हें कितना समय लगेगा?
वक्ता कहते हैं, तो मान लीजिए हम नहीं जा पाएँगे। हममें जाने की सामर्थ्य नहीं है — पर भगवती त्रिवेणी और महाशक्तियों में आने की सामर्थ्य है न। अरे, जब आप यहाँ बैठकर सौ माला करेंगे, तो वे क्यों नहीं आएँगी? उन्हें आने में कितने पल लगेंगे? क्या वे दो मिनट के लिए वहाँ से नहीं आ सकतीं? यहाँ जप शुरू कीजिए, पहले ही दिन वे कहेंगी, अरे, अरे, कोई बच्चा बुला रहा है। दिल से बुलाएँगे तो आभास ज़रूर मिलेगा।
वक्ता कहते हैं, तो मान लेते हैं कि हम नहीं जा पाएँगे। हममें जाने की सामर्थ्य नहीं है। पर भगवती त्रिवेणी और महाशक्तियाँ — उनमें आने की सामर्थ्य है न। अरे, जब आप यहाँ बैठकर सौ माला करेंगे, तो वे क्यों नहीं आएँगी? उन्हें आने में कितने पल लगेंगे? क्या वे दो मिनट के लिए वहाँ से नहीं आ सकतीं? यहाँ जप करना शुरू कीजिए, पहले ही दिन वे कहेंगी, अरे, अरे, कोई बच्चा बुला रहा है। दिल से बुलाएँगे तो आभास ज़रूर मिलेगा।
कितना क्षण लगेगा उनको आने में दो मिनट के लिए आ नहीं सकते हैं क्या वहां से। यहां आप जप करना शुरू कीजिए पहला दिन ही बोलेंगे अच्छा अच्छा बालक बुला रहा है। आप हृदय से पुकारी आपको आभास अवश्य होगा। स्वप्न में दिव्यता ये बड़ा अद्भुत विषय हम देखे हैं सदैव से क्षेत्र में जाने के बाद अपने आप दिव्यताओं में वृद्धि अनेक प्रकार के आवागमन सब दृश्यमान होने लगते हैं इसमें कोई दिव्य दृष्टि आदि की आवश्यकता नहीं पड़ती है। बस हृदय से आप रखिए लोग क्या कह रहे हैं आपके आस पड़ोस के लोग क्या कर रहे हैं कौन आपको गाली दे रहा है। कौन आप जैसे विशेष करके साधक वर्ग के जो लोग हैं उनको सदैव से कि ये पाखंडी है।
आसपास के लोग मज़ाक उड़ाएँ तो साधक क्या करे?
अपने अनुभव अपने तक रखें; मज़ाक उड़ाने वाले आपका प्रारब्ध काटते हैं
वक्ता कहते हैं कि स्वप्न में दिव्यता एक अद्भुत विषय है, जो उन्होंने हमेशा देखा है। क्षेत्र में जाने के बाद अपने आप दिव्यताएँ बढ़ती हैं, कई तरह का आना-जाना सब दिखने लगता है, और इसके लिए किसी दिव्य दृष्टि की ज़रूरत नहीं। बस इसे दिल से रखिए। लोग क्या कह रहे हैं, आपके पड़ोस के लोग क्या कर रहे हैं, कौन आपको गाली दे रहा है — साधक वर्ग के लोगों को खास तौर पर हमेशा ढोंगी कहा जाता है। वक्ता कहते हैं, उन्हें कहने दीजिए। आप जो अनुभव कर रहे हैं, और वे दिव्य शक्तियाँ आपके जीवन में जो दे रही हैं, उसे अपने तक रखिए और आनंद लीजिए। जो लोग आपका मज़ाक और अपमान करते हैं, वे आपका प्रारब्ध काट रहे हैं। बस इतना लीजिए।
वक्ता कहते हैं कि स्वप्न में दिव्यता एक अद्भुत विषय है, जो हमने हमेशा देखा है। क्षेत्र में जाने के बाद अपने आप दिव्यताएँ बढ़ती हैं। कई तरह का आना-जाना सब दिखने लगता है, और इसके लिए किसी भी तरह की दिव्य दृष्टि की ज़रूरत नहीं। बस इसे दिल से रखिए। लोग क्या कह रहे हैं, आपके पड़ोस के लोग क्या कर रहे हैं, कौन आपको गाली दे रहा है — साधक वर्ग के लोगों को खास तौर पर हमेशा कहा जाता है कि यह ढोंगी है। कोई भी साधक हो — अपने परिवार में भी देखिए — तुम ढोंग करते हो, दिखावा करते हो। उन्हें कहने दीजिए। आप जो अनुभव ले रहे हैं, और वे दिव्य शक्तियाँ आपके जीवन में जो दे रही हैं, उसे अपने तक सीमित रखिए और उसका आनंद लीजिए। ये सब लोग जो आपका मज़ाक उड़ाते हैं, आपका अपमान करते हैं — वे आपका प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। काट रहे हैं। वे कहते हैं, बस इतना लीजिए।
साधक जो भी आप भी अपने परिवार में देखिए पाखंड करते हो दिखाते हो उन्हें बोलने दीजिए। आप जो अनुभव ले रहे हैं आपको आपकी जीवन में वो दिव्य शक्तियां क्या प्रदान कर रही हैं अपने तक सीमित रखिए और आनंद लीजिए। ये जितने भी लोग आपका उपहास करने वाले आपका अपमान करने वाले हैं ना आपके प्रारब्ध को काट रहे हैं। इतना ही मान लीजिए।
जो पूरे समय पाँच सौ माला निभाए, उसे क्या निश्चित मिलता है?
मंत्र सिद्धि और देवता की कृपा को टाला नहीं जा सकता
वक्ता कहते हैं, तो हम नहीं जा सकते, पर भगवती आ सकती हैं। तो अगर कोई बैठकर इतना करे कि हम करेंगे, घर पर ही पाँच सौ माला जप करेंगे — अगर कोई पाँच सौ का कहकर पूरे पैंतालीस दिन, सवा महीने लगातार करे, तो भाई, यह नहीं हो सकता कि यहाँ मंत्र की सिद्धि न हो, देवता कृपा न करें, भगवती कृपा न करें। यह होना ही है। और फिर कुंभ की छब्बीस तारीख को, जो महाशिवरात्रि है, जिस दिन कुंभ पूरा होना है — महाशिवरात्रि पर क्या कृपा आएगी, यह करने वाले ही समझेंगे।
वक्ता कहते हैं, तो हम नहीं जा सकते, पर भगवती आ सकती हैं। तो अगर कोई अपने आप बैठकर इतना करे कि भैया, हम करेंगे; अपने घर पर ही पाँच सौ माला जप करें; अगर कोई कहे, भैया, हम पाँच सौ करेंगे, और पूरे पैंतालीस दिन, सवा महीने लगातार करे — तो भाई, यहाँ यह नहीं हो सकता कि मंत्र की सिद्धि न हो, देवता कृपा न करें, भगवती कृपा न करें। यह होना ही है। फिर कुंभ की छब्बीस तारीख को, जो महाशिवरात्रि है, जिस दिन कुंभ पूरा होना है — महाशिवरात्रि पर क्या कृपा आएगी, यह करने वाले ही समझेंगे।
तो हम नहीं जा सकते लेकिन भगवती आ सकती हैं। तो अपने अगर कोई बैठ कर के कर ले इतना कि भैया करेंगे आप घर पे ही करें 500 माला जप का अगर कोई कर ले कि भैया 500 करेंगे 45 दिन पूरा कंटिन्यू सवा महीने। तो भाई यहां पर मंत्र की सिद्धि ना हो देवता की कृपा ना हो भगवती कृपा ना करें संभव ही नहीं है होना ही होना है। फिर कुंभ के 26 तारीख जो महाशिवरात्रि है जिस दिन कुंभ पूर्ण होने वाला है महाशिवरात्रि में फिर कौन-कौन सा कृपा होगा वो तो समझ में आ जाएगा जो करेंगे वो।
साधना चुनने और उस पर पक्का होने के लिए दस दिन बचे हैं
दस दिन हाथ में हैं; साधना चुनें और उस पर पक्के हो जाएँ
वक्ता कहते हैं, तो भैया, दस दिन बचे हैं — तेरह तारीख ली गई है, और आज दो तारीख है। तो कम से कम दस दिन हाथ में हैं। मन से तैयार हो जाइए कि पैंतालीस दिन बेकार नहीं जाने देने। आप जहाँ भी हों, जिस भी स्थिति में हों, देश, काल और परिस्थिति के अनुसार हम साधना ज़रूर करेंगे। कौन-सी साधना करेंगे, इसे चुनने में समय ले सकते हैं। और चर्चाएँ होंगी, उनसे आप तय करेंगे कि हाँ, यह करना है। खुद चुनिए, और एक बार चुन लें तो पक्के हो जाइए कि यही करना है, और तैयारी शुरू कीजिए।
वक्ता कहते हैं, तो भैया, दस दिन बचे हैं। तेरह तारीख ली गई है, और आज दो तारीख है। तो कम से कम दस दिन हाथ में हैं। मन से तैयार हो जाइए कि पैंतालीस दिन बेकार नहीं जाने देने। आप जहाँ हैं, जिस भी स्थिति में हैं, देश, काल और परिस्थिति के अनुसार, उस तरह हम साधना ज़रूर करेंगे। कौन-सी साधना करेंगे — इसके चुनाव के लिए आप समय ले सकते हैं। और चर्चाएँ होंगी, उनसे आप इस पर आएँगे कि हाँ, यही करना है। खुद चुनिए, और एक बार चुन लें तो पक्के हो जाइए कि यही करना है, और तैयारी शुरू कीजिए।
तो भैया अभी 10 दिन बाकी है ना 13 तारीख से माना गया है तो आज अभी 2 तारीख है। तो अभी भी कम से कम 10 दिन हाथ में है अपने आप को आप मानसिक रूप से तैयार कीजिए कि 45 दिन व्यर्थ नहीं जाने देना है। जहां है जैसी अवस्था में है देश काल परिस्थिति अनुसार उस अनुसार साधना करेंगे ही करेंगे। कौन सी साधना करेंगे इसका चयन भले आप अभी समय लेके कीजिए अन्य अभी और चर्चाएं होंगी तो उसमें आपको लेकर अच्छा हमको ये करना है आप खुद सेलेक्ट कीजिए और एक बार सेलेक्ट कर लीजिए तो फिक्स हो जाइए कि यही करना है तैयारी शुरू कर दीजिए।
क्या इसके लिए नई माला या आसन खरीदना चाहिए?
जिस माला और आसन पर पहले से जप करते आए हैं, वही लें
वक्ता कहते हैं, पर सामग्री और समय वही रहेंगे। जप के लिए आपकी अपनी माला होनी चाहिए, जिस पर आप पहले से जप करते आए हैं। ऐसा नहीं कि नई माला लेकर उस पर जप करेंगे। ऐसा नहीं कि अब नया आसन लाएँगे। जो आसन पहले था, जो माला पहले थी, जिस पर आप जप करते आए हैं — यह ध्यान रखिए।
वक्ता कहते हैं, पर सामग्री और समय बिल्कुल वही रहेंगे। जप के लिए आपकी अपनी माला होनी चाहिए, जिस पर आप पहले से जप करते आए हैं। ऐसा नहीं कि हम नई माला लेकर जप करेंगे। ऐसा नहीं कि हम अब नया आसन लाएँगे। जो आसन पहले था, जो माला पहले थी, वही जिस पर आप जप करते आए हैं। यह ध्यान रखिए।
लेकिन सामग्री और समय तो वही लगेगा ना आपके पास अपना माला जप का होना चाहिए जिस पर आप पहले से जप कर रहे हैं ये भी नहीं कि नया माला लेकर जप करेंगे। ये नहीं कि अब नया आसन लाएंगे। जो आसन पहले का है जो माला आपके पास पहले उसी पे जिस पर जप आप करते आ रहे थे। इसका ध्यान रखें।
सुमेरु का धागा उधड़ने लगे तो क्या करें?
जप शुरू होने के बाद उसे काटें नहीं
वक्ता जवाब देते हैं कि उसे काटना नहीं है। एक बार जप आदि शुरू हो गया तो काटना नहीं है। जो करना है वह प्रतिष्ठा से पहले किया जा सकता है। प्रतिष्ठा के बाद कोई काट-छाँट नहीं चलनी चाहिए।
वक्ता जवाब देते हैं कि अगर सुमेरु का धागा उधड़ने लगे, तो उसे काटना नहीं है। एक बार जप आदि शुरू हो गया, तो उसे काटना नहीं है। जो करना है वह प्रतिष्ठा से पहले किया जा सकता है। प्रतिष्ठा के बाद कोई काट-छाँट नहीं चलनी चाहिए।
सुमेरु का धागा उधरने लगा तो मैं काटना नहीं है। जप आदि आरंभ हो गया है तब काटना नहीं है। प्रतिष्ठा के पहले जो करना होता है कर सकते हैं। प्रतिष्ठा के बाद काटा कुटी ना चले। भविष्य मालिका को लेकर के विषय की यथार्थ जो जो रियल ग्रंथ है भविष्य मालिका का वो प्रकट रूप से नहीं है।
असली भविष्य मालिका सामने नहीं है, और उसमें बताई संभावनाएँ अनुष्ठान से टाली जा सकती हैं
असली ग्रंथ सामने नहीं है, और संभावनाएँ अनुष्ठान से टल सकती हैं
भविष्य मालिका के विषय में वक्ता कहते हैं कि भविष्य मालिका का असली, वास्तविक ग्रंथ प्रकट रूप में नहीं है। भविष्य मालिका को आधार बनाकर जो दूसरी बात फैलाई जा रही है, वह नहीं। पर इसके अलावा कई और विषय हैं, जिनसे इतना है कि कुछ संभावनाएँ हो सकती हैं। पर जब संभावनाएँ दिख रही हैं, तो अगर आप और हम मिलकर अपने-अपने घरों में साधना, अनुष्ठान आदि करें, तो वे चीज़ें ज़रूर टल जाएँगी। वे कहते हैं, न जानकर कुछ हो जाए, इससे अच्छा है कि जानकर उसे होने न दें।
भविष्य मालिका के विषय में वक्ता कहते हैं कि भविष्य मालिका का असली, वास्तविक ग्रंथ प्रकट रूप में नहीं है। भविष्य मालिका को आधार बनाकर बाकी जो बात फैलाई जा रही है — वह नहीं। पर इसके अलावा बहुत से और विषय हैं, जिनसे इतना है कि कुछ संभावनाएँ हो सकती हैं। पर जब संभावनाएँ दिख रही हैं, तो अगर आप और हम मिलकर अपने-अपने घरों में साधना, अनुष्ठान आदि करें, तो उससे वे चीज़ें ज़रूर टल जाएँगी। न जानकर कुछ हो जाए, इससे अच्छा है कि जानकर उसे होने न दें।
बाकी जो विषय स्प्रेड किया जा रहा है भविष्य मालिका को आधार में लेकर के वो तो नहीं लेकिन उसके सिवाय अन्य विषय बहुत सारे हैं जिससे ये बात है कि कुछ ना कुछ संभावनाएं हो सकती है लेकिन संभावनाएं जब दिखाई दे रही हैं तो आप हम अगर मिलकर के अपने-अपने निज घर में भी साधन अनुष्ठान आदि करेंगे तो उससे वो चीजें जो है अवश्य टल जाएंगी। पता ना चले और कुछ हो जाए उससे अच्छा है कि पता चल रहा है तो उसको ना होने दिया जाए।
ऐसा स्वप्न कवच का सचेत करना है; गलती है फिर हाथ पर हाथ धरकर बैठना
कवच का सचेत करना, और फिर बैठे रहने की गलती
वक्ता जवाब देते हैं, खुशी जी, अगर कोई तांत्रिक आप पर कुछ कर रहा है और यह स्वप्न आ रहा है, तो कहीं न कहीं आप जो पाठ कर रही थीं और जो कवच पहना, उसके प्रभाव से आपको सचेत किया जा रहा है। अब जानने के बाद अगर आप सोच रही हैं कि नहीं, हम कुछ न भी करें, तब भी कुछ नहीं होगा — यह संभव नहीं है न। आपका जप, तप और सामर्थ्य एक सीमा तक है। अगर कोई तांत्रिक है जिसने कोई सिद्धि की है, तो उसमें भी सामर्थ्य होगी, उसने भी किसी शक्ति की सेवा की होगी। तो उसका असर ज़रूर पड़ेगा।
वक्ता कहते हैं, खुशी जी, देखिए, अगर कोई तांत्रिक आप पर कुछ कर रहा है और यह स्वप्न आ रहा है, तो कहीं न कहीं आप जो पाठ कर रही थीं और जो कवच पहना, उसके प्रभाव से आपको सचेत किया जा रहा है। अब पता चलने के बाद अगर आप सोच रही हैं कि नहीं, हम कुछ भी न करें, तब भी कुछ नहीं होगा — यह संभव नहीं है न। आपका जप-तप और आपकी सामर्थ्य एक सीमा तक है। अगर कोई तांत्रिक है और उसने कोई सिद्धि की है, तो उसमें भी सामर्थ्य होगी। उसने भी किसी शक्ति की सेवा की होगी। तो उसका असर ज़रूर पड़ेगा।
खुशी जी देखिए अगर कोई तांत्रिक आपके ऊपर कुछ कर रहा है ये स्वप्न आ रहा है तो कहीं ना कहीं जो आप पाठ कर रही थी जो कवच धारण की उसके प्रभाव से ही आपको आभास करवाया जा रहा है। अब आप जानने के बाद से अगर आप अब सोच रही हैं कि नहीं हम कुछ ना भी करें तो भी कुछ नहीं होगा तो ये तो संभव नहीं है ना। आपका जप तप और आपका सामर्थ्य एक सीमा तक है। अगर कोई तांत्रिक है और कोई सिद्धि किया हुआ है तो उसका सामर्थ्य तो होगा वो भी तो सेवा किया होगा किसी शक्ति का। तो उसका प्रभाव पड़ेगा ही और आप उसको पढ़ने दीजिएगा अकर्मण्यता के साथ अगर आप बैठ जाइएगा कि हम कर्म ही नहीं करेंगे कुछ अपने आप हो जाएगा ना ऑटो मोड में नहीं चलने वाला है कोई भी चीज।
पर्याप्त मूलधन के बिना कुछ भी ऑटो मोड में नहीं चलता, जैसे एफडी में
ऑटो मोड तभी जब मूलधन पर्याप्त हो — एफडी का उदाहरण
वक्ता कहते हैं, उसे अपना पाठ करने दीजिए। पर अगर आप अकर्मण्य होकर बैठ जाएँ कि हम कोई कर्म नहीं करेंगे और अपने आप कुछ हो जाएगा — कुछ भी ऑटो मोड में नहीं चलने वाला। यह हम हमेशा साफ़ करते हैं। ऑटो मोड में तभी चलता है जब आपके पास पर्याप्त मूलधन हो। अगर हर महीने आपके खाते में पाँच-दस करोड़ रुपये पड़े हैं, और आपने उसकी एफडी बना रखी है, और उसका ब्याज आपको आ रहा है, तो ऑटो मोड में बैठकर खा सकते हैं। और बैठकर खाते हुए भी अगर कोई कर्म नहीं करेंगे, तो वह खाना भी नहीं चलेगा। बैठे-बैठे शुगर हो जाएगी, कोई परेशानी आ जाएगी, क्योंकि आप कोई कर्म नहीं कर रहे, शरीर नहीं हिला रहे। और मानसिक क्षमता अपाहिज हो जाएगी, क्योंकि आप कोई सोच-विचार नहीं कर रहे।
वक्ता कहते हैं, और उसे अपना पाठ करने दीजिए। पर अगर आप अकर्मण्यता के साथ बैठ जाएँ कि हम कोई कर्म नहीं करेंगे और अपने आप कुछ हो जाएगा — कुछ भी ऑटो मोड में नहीं चलने वाला। यह हम हमेशा साफ़ करते हैं। ऑटो मोड में तभी चलता है जब आपके पास पर्याप्त मूलधन हो, बस इतना। यह विषय ध्यान रखिए। अगर हर महीने आपके खाते में पाँच-दस करोड़ रुपये पड़े हैं, और आपने उसकी एफडी बना रखी है, और वह आपको आ रहा है, उसका ब्याज, तो ऑटो मोड में बैठकर खा सकते हैं। और बैठकर खाते हुए अगर कोई कर्म नहीं करेंगे, तो वह खाना भी नहीं चलेगा। बैठे-बैठे शुगर हो जाएगी, कोई परेशानी आ जाएगी, क्योंकि आप कोई कर्म नहीं कर रहे, शरीर नहीं हिला रहे। और मानसिक क्षमता अपाहिज हो जाएगी, क्योंकि आप कुछ भी सोच-विचार नहीं कर रहे, यह नहीं सोच रहे कि यहाँ कुछ पाने के लिए हमें शरीर हिलाना है।
ये हम हमेशा स्पष्ट करते हैं। ऑटो मोड में तभी चलता है जब आपके पास पर्याप्त राशि हो उतनी। ध्यान रखें इस विषय का। हर महीना अगर आपके पास 5-10 करोड़ रुपया अकाउंट में पड़ा हुआ है तो उसका एफडी आप कर दिए हैं और वो आपको आ रहा है उसका ब्याज आपके पास ऑटो मोड में आप बैठ के खाइए। और बैठ कर के खाएंगे जब कुछ कर्म नहीं करेंगे तो वो खाना भी नहीं चलेगा। बैठे-बैठे शुगर हो जाएगा कुछ परेशानी हो जाएगा क्योंकि आप कर्म ही नहीं कर रहे हैं शरीर हिला डुला ही नहीं रहे हैं मानसिक बुद्धि जो है अपंग हो जाएगी क्योंकि कुछ विचार ही नहीं कर रहे हैं सोच ही नहीं रहे हैं कि यहां कुछ हमें प्राप्त करने के लिए हिलना डुलना है शरीर से।
क्या तांत्रिक के विरुद्ध अकेला कवच काफ़ी है?
ऑटो मोड बहुत जप के बाद ही चलता है; वरना कवच असर घटाता है, मिटाता नहीं
वक्ता कहते हैं, यहाँ भी ऐसा ही है। अगर आपने बहुत जप-तप किया है और शुद्धि पाई है, तो बैठिए, ऑटो मोड में चलेगा। वे शक्तियाँ आपकी रक्षा और सुरक्षा करेंगी। अगर ऐसा नहीं है, तो सिर्फ़ कवच पहनकर यह सोचना कि तांत्रिक कुछ कर रहा है और कुछ नहीं होगा, बस मूर्खता की बात है। हाँ, वह रुकेगा, असर कम पड़ेगा — यह ज़रूर होगा। पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा, ऐसा कभी नहीं हो सकता। किस स्तर तक पड़ेगा, यह निर्भर करता है। कई बार नहीं पड़ेगा, क्योंकि अगर वह छोटा प्रयोग करे, एक स्तर तक का प्रयोग करे, तो ऐसा नहीं कि असर तुरंत पड़ जाएगा। यह इतना आसान भी नहीं है।
वक्ता कहते हैं, तो यहाँ भी ऐसा ही है। अगर आपने बहुत जप किया है, तप किया है, शुद्धि पाई है, तो बैठिए, ऑटो मोड में चलेगा। वे शक्तियाँ आपकी रक्षा और सुरक्षा करेंगी। अगर ऐसा नहीं है, तो सिर्फ़ कवच पहनकर यह सोचना कि तांत्रिक कुछ कर रहा है और कुछ नहीं होगा, बस मूर्खता की बात है। हाँ, वह रुकेगा, असर कम पड़ेगा — यह ज़रूर होगा। बिल्कुल नहीं पड़ेगा, ऐसा कभी नहीं हो सकता। किस स्तर तक पड़ेगा, यह निर्भर करता है। कई बार नहीं पड़ेगा, क्योंकि अगर वह छोटा प्रयोग करे, एक स्तर तक का प्रयोग करे, तो ऐसा नहीं कि असर तुरंत पड़ जाएगा। यह इतना आसान भी नहीं है।
तो यहां पर भी यही है। अगर आपने बहुत अधिक जप कर लिया है तप कर लिया है शुद्धि प्राप्त कर ली है तो आप बैठिए ऑटो मोड में चलेगा वो शक्तियां आपकी रक्षा सुरक्षा करेंगी। अगर ऐसा नहीं है तो कवच मात्र धारण करके ये सोचना है कि तांत्रिक कर रहा है कुछ नहीं होगा ये तो बेवकूफी भरा बात ही है। हां मान रखा जाएगा प्रभाव कम पड़ेगा ये जरूर होगा नहीं पड़ेगा ये कभी नहीं हो सकता है। किस स्तर तक का पड़ेगा ये डिपेंड करता है ना बहुत बार नहीं पड़ेगा क्योंकि अगर वो छोटा-मोटा प्रयोग करेगा एक स्तर तक प्रयोग करेगा तो ऐसा थोड़ी है कि तुरंत प्रभाव पड़ जाएगा इतना आसान भी नहीं होता है।
अगर प्रयोग महीनों तक दोहराया जाए तो क्या होता है?
बुद्धि में भ्रम, उच्चाटन का प्रयास, और कुछ खिला देना
पर अगर वह बार-बार कर रहा है — एक बार किया, दो बार किया, एक महीना, दो महीने, तीन महीने किया — तो आपके मन पर कोई घटना पड़ेगी। इसमें तकनीकें हैं। तंत्र एक तकनीक है कि अच्छा, इसने कवच पहन रखा है, ऐसे नहीं चलेगा। आपकी बुद्धि में कोई भ्रम होगा, उच्चाटन कराने का प्रयास होगा, किसी से आपको कुछ खिलवाने या दिलवाने का प्रयास होगा।
वक्ता कहते हैं, पर अगर वह बार-बार कर रहा है — एक बार किया, दो बार किया, एक महीना किया, दो महीने किया, तीन महीने किया — तो आपके मन पर कोई घटना पड़ेगी। इसमें तकनीकें हैं। तंत्र एक तकनीक है — कि अच्छा, इसने कवच पहन रखा है, ऐसे नहीं चलेगा। आपकी बुद्धि में कोई भ्रम होगा, उच्चाटन का प्रयास होगा, किसी से आपको कुछ खिलवाने या दिलवाने का प्रयास होगा।
लेकिन वो बार-बार कर रहा है एक बार किया दो बार किया महीना किया दो महीना किया तीन महीना किया तो कुछ इंसिडेंट आपके दिमाग के ऊपर पड़ेगा टेक्निक्स होते हैं उसमें तंत्र एक टेक्निक है कि वो अच्छा ठीक है ये कवच धारण की है ऐसे नहीं ये ऐसे नहीं चलेगा। कुछ आपका बुद्धि भ्रमित होगा कुछ उच्चाटन करवाने का प्रयास रहेगा किसी से खिलाने पिलाने का प्रयास रहेगा। आप कितना भी सेफ्टी बंकर करके तैयार करके रखिए कोई आपके घर के अंदर लाके बम फोड़ेगा तो बम तो
सुरक्षा बंकर तब बेकार है जब आपके घर आने-जाने वाला शत्रु बम अंदर ले आए
अंदर लाया गया बम, और घर में आने-जाने वाला शत्रु
वक्ता कहते हैं, आप कितना भी सुरक्षा बंकर तैयार कर लें, अगर कोई आपके घर के अंदर बम लाकर फोड़ दे, तो बम फटेगा, धमाका होगा, आप पर असर पड़ेगा और आपको चोट लगेगी। कुछ भी हो सकता है। ठीक इसी तरह आपने घर का बंधन किया, कवच पहना, पर शत्रु आपके घर में ही आता-जाता है। आपको पता नहीं। उसने आपके खाने में कुछ मिलाकर खिला दिया, प्रसाद के नाम पर खिला दिया — खत्म। कवच जैसा है वैसा पहना रह जाएगा। वहाँ आपका जप-तप काम करेगा।
वक्ता कहते हैं, आप कितना भी सुरक्षा बंकर तैयार करके रखें, अगर कोई आपके घर के अंदर बम लाकर फोड़ दे, तो बम फटेगा। धमाका होगा, आप पर असर पड़ेगा, और चोट लगेगी। कुछ भी हो सकता है। ठीक इसी तरह आपने घर का बंधन किया, कवच पहना, पर शत्रु आपके घर में ही आता-जाता है। आपको पता नहीं। उसने आपके खाने में कुछ मिलाकर खिला दिया, प्रसाद के नाम पर खिला दिया — खत्म। कवच जैसा है वैसा ही पहना रह जाएगा। वहाँ आपका जप-तप काम करेगा।
फूटेगा एक्सप्लोजन तो होगा और आपको फर्क भी पड़ेगा, चोट भी लगेगा। कुछ भी हो सकता है। ठीक उसी प्रकार से आप अपने घर का बंधन कर लिए, कवच धारण कर लिए लेकिन शत्रु आपके घर ही आता जाता हो। आपको पता नहीं है। आपके खाने में कुछ मिलाकर आपको खिला दिया, प्रसाद के नाम पर खिला दिया। खत्म, कवच धरे के धरे रह जाएंगे। वहां पर आपका जप तप काम करेगा। अगर बहुत उच्च स्तर का ये खिलाया होगा ना तो आपको थोड़ा बहुत प्रभाव पड़ जाएगा। ज्यादा नहीं वो एक दिन दो दिन पड़ा, 10 दिन पड़ा वो ठीक हो जाएंगे और उसका डंडा भी उसे प्राप्त हो जाएगा। लेकिन अगर आप कुछ करते ही नहीं है। एकदम नॉर्मल रिलैक्स होकर बैठे हुए हैं कि कुछ नहीं होगा हमें तब वहां समस्या होगी।
दुर्गा कवच विष के बारे में क्या कहता है, और इसके लिए क्या चाहिए?
कृत्रिम और प्राकृतिक विष असर नहीं करते — जिसका पुरश्चरण हुआ हो
वक्ता कहते हैं, अगर बहुत ऊँचे स्तर पर खिलाया गया है तो आप पर थोड़ा असर पड़ेगा — ज़्यादा नहीं। एक-दो दिन पड़ा, दस दिन पड़ा, ठीक हो जाएँगे, और इसकी सज़ा उसे भी मिलेगी। पर अगर आप कुछ भी न करें और बिल्कुल सामान्य और निश्चिंत बैठे रहें कि हमें कुछ नहीं होगा, तो परेशानी होगी। क्योंकि अगर कोई विष दे रहा है — अगर आप श्री दुर्गा कवच, चंडी कवच का पाठ करते हैं, तो उसमें लिखा है कि जो इस कवच का पाठ करते हैं और इसे धारण करते हैं, उन पर कृत्रिम विष और प्राकृतिक विष असर नहीं करेंगे। अब अगर किसी ने दिन में एक बार पढ़ा और दस दिन से पढ़ रहा है और कहे कि मुझ पर न पड़े, तो यह संभव नहीं। कम से कम उसका जप हज़ारों-हज़ारों में हुआ हो, चालीस हज़ार तक माना जाता है। कम से कम चालीस हज़ार का पुरश्चरण, भगवती की कृपा के नियम और नीति से रहते हुए — तभी ऐसा होगा कि उस पर असर न पड़े।
वक्ता कहते हैं, अगर बहुत ऊँचे स्तर पर खिलाया गया है तो आप पर थोड़ा असर पड़ेगा। ज़्यादा नहीं — एक-दो दिन पड़ा, दस दिन पड़ा, ठीक हो जाएँगे, और इसकी सज़ा उसे भी मिलेगी। पर अगर आप कुछ भी न करें, और बिल्कुल सामान्य और निश्चिंत बैठे हों कि हमें कुछ नहीं होगा, तो वहाँ परेशानी होगी। क्योंकि अगर कोई विष दे रहा है — अगर आप श्री दुर्गा कवच, चंडी कवच का पाठ करते हैं, तो उसमें लिखा है कि जो इस कवच का पाठ करते हैं और इसे धारण करते हैं, उन पर कृत्रिम विष और प्राकृतिक विष असर नहीं करेंगे। अब अगर किसी ने बस दिन में एक बार पढ़ा है और दस दिन से पढ़ रहा है, और कहे कि मुझ पर न पड़े, तो यह संभव नहीं। कम से कम उसका जप हज़ारों-हज़ारों में हुआ हो — चालीस हज़ार तक माना जाता है। कम से कम चालीस हज़ार का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक।, भगवती की कृपा के नियम और नीति से रहते हुए। तभी ऐसा होगा कि उस पर असर न पड़े।
क्योंकि अगर कोई विष दे रहा है अगर आप श्री दुर्गा कवच का चंडी कवच का पाठ करती हैं तो उसमें लिखा है कि कृत्रिम और जो आपका प्राकृतिक विष है वो काम नहीं करेगा जो इस कवच का पाठ करते हैं और धारण करते हैं। अब कोई रोज एक बार बस पढ़ लिया है अभी 10 दिन से पढ़ रहा है और बोले कि हमें ना पड़े वो संभव नहीं है। उसका कम से कम अधिकाधिक जप किया हो हजारों हजार में 40000 तक का माना गया है कम से कम 40000 का पुरश्चरण हो भगवती कृपा नियम नीति से रह रहा हो।
जो कवच की परीक्षा लेना चाहे, उसका क्या?
परीक्षा के लिए फिनाइल पीना — और देवी लोक की फलश्रुति
वक्ता कहते हैं, सिर्फ़ सोचने-विचारने से नहीं होगा। और अगर किसी ने सच में बहुत किया है पर उसे बिल्कुल विश्वास या श्रद्धा नहीं है, और वह परीक्षा लेना चाहे — कि हमने सुना है कवच के जप से विष असर नहीं करता, अब हमने पचास हज़ार जप कर लिया, तो चलो परीक्षा करें, फिनाइल पीकर देखें कि विष का असर हम पर पड़ता है या नहीं — तो ज़्यादा कुछ नहीं होगा। वह फिनाइल पिएगा और उसके बाद देवी लोक को प्राप्त होगा। फलश्रुति में है न कि मृत्यु के बाद वे देवी लोक को प्राप्त होते हैं। बस वही होगा, और कोई लौटना नहीं, कोई फिर आना नहीं।
वक्ता कहते हैं, सिर्फ़ सोचने-विचारने से नहीं होगा। और अगर किसी ने सच में बहुत किया है, पर उसे बिल्कुल विश्वास नहीं, कोई श्रद्धा नहीं। वह परीक्षा लेना चाहता है — कि अच्छा, हमने सुना है कवच के जप से उसका विष असर नहीं करता। अब हमने पचास हज़ार जप कर लिया है; अब चलो, परीक्षा करके देखें। फिनाइल पीकर देखें कि विष का असर हम पर पड़ता है या नहीं। तो ज़्यादा कुछ नहीं होगा। वह फिनाइल पिएगा और उसके बाद देवी लोक को प्राप्त होगा। फलश्रुति में है न कि मृत्यु के बाद वे देवी लोक को प्राप्त होते हैं। बस वही होगा, और उसके बाद कोई लौटना नहीं, कोई फिर आना नहीं।
तब जाकर के ना ऐसा होगा कि उसके ऊपर प्रभाव नहीं पड़ेगा। केवल सोचने विचारने मात्र से नहीं होगा और कोई बहुत अगर कर ही लिया है और उसको विश्वास ही श्रद्धा ही नहीं है। वो टेस्ट करना चाहता है कि अच्छा हम सुने हैं कि भैया कवच का जप करने से इसके विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अब हम जो है 50000 जप कर लिए हैं अब आओ टेस्ट करके देखते हैं। फिनाइल पी लेते हैं देखते हैं हमारे ऊपर विष का प्रभाव पड़ेगा कि नहीं। तो फिर ज्यादा कुछ नहीं होगा फिनाइल पिएंगे उसके बाद देवी लोग को प्राप्त हो जाएंगे। फल श्रुति में है ना मृत्यु के उपरांत देवी लोग को प्राप्त होते हैं। वही होगा और पुनरागमन नहीं पुनरागमन फिर आगमन नहीं होगा।
सिर्फ़ रक्षा के भरोसे कर्म नहीं छोड़ना — भगवती का दिया विवेक लगाइए
कर्म न छोड़ें; भगवती का दिया विवेक लगाएँ
वक्ता कहते हैं, तो हमें मूर्खता नहीं करनी। यह सोचकर कर्म करना मत छोड़िए कि सब ऑटो मोड में हो जाएगा। यह संभव नहीं। अपना थोड़ा विवेक लगाइए, जो भगवती ने दिया है। पूछा गया कि अगर सरस्वती के मंत्र कंठस्थ हो गए हों, तो क्या सरस्वती खोले बिना पाठ कर सकते हैं। वे जवाब देते हैं, निःसंदेह हाँ, यह किया जा सकता है, इसमें कोई समस्या नहीं।
वक्ता कहते हैं, तो हमें मूर्खता नहीं करनी। यह सोचकर कर्म करना मत छोड़िए कि सब ऑटो मोड में हो जाएगा। यह संभव नहीं। अपना थोड़ा विवेक लगाइए, जो भगवती ने दिया है। पूछा गया कि सरस्वती के मंत्र कंठस्थ हो जाने पर क्या सरस्वती खोले बिना पाठ कर सकते हैं। वे जवाब देते हैं, निःसंदेह, हाँ, यह किया जा सकता है। इसमें कोई समस्या नहीं।
यही होगा। तो बेवकूफी वाला काम नहीं करना है हमें। कर्म करना छोड़ दीजिएगा ये सोच करके कि सब कुछ ऑटो मोड में होगा वो संभव नहीं है। थोड़ा अपना विवेक का प्रयोग करें जो भगवती दी हैं। सरस्वती के मंत्र कंठस्थ हो जाएं तो बिना सरस्वती को खोले पाठ किया जा सकता है निसंदेह में हां ये कर सकते हैं इसमें कोई समस्या नहीं है।
महाकुंभ जाने वाला साधक क्या ध्यान रखे?
प्रयागराज यात्रा पर अलग वीडियो और लाइव
पूछा गया कि महाकुंभ जाने में साधक को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, और प्रयागराज की यात्रा कैसे करनी चाहिए। वक्ता राजीव जी से कहते हैं कि इस विषय पर अलग पूरा वीडियो और पूरा लाइव होगा, जिसमें अच्छी चर्चा होगी। बलराम जी ने पूछा कि क्या भैरव जी और पंचमुखी हनुमान जी का जप अर्पित किया जा सकता है। वे कहते हैं, हाँ, बिल्कुल, आप अर्पित कर सकते हैं।
महाकुंभ जाने में साधक को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, प्रयागराज की यात्रा कैसे करनी चाहिए — इस विषय पर, वक्ता कहते हैं, अलग पूरा वीडियो, पूरा लाइव होगा, और हम इस पर अच्छे से चर्चा करेंगे, राजीव जी। बलराम जी, वे पढ़ते हैं। क्या भैरव जी का, पंचमुखी हनुमान जी का जप — हाँ, बिल्कुल, आप अर्पित कर सकते हैं, वे कहते हैं।
महाकुंभ जाने से जाने में साधक कौन सी चीजों का ध्यान रखें प्रयागराज की यात्रा कैसी करनी चाहिए इसका विषय अलग से पूरा वीडियो पूरा लाइव अच्छे से डिस्कशन करेंगे राजीव जी। बलराम जी। क्या भैरव जी हनुमान जी का जाप पांच मुखी हां बिल्कुल कर सर अर्पण कर सकते हैं। सहस्त्रनाम में देर लगती है 12 नाम का स्त्रोत कर लूं कर लीजिए। हमें क्या समस्या होगी? अगर 500 के नोट के जगह पांच के नोट से आपका काम चल जा रहा है तो आप चला लीजिए उसमें हमें क्या समस्या है।
क्या सहस्रनाम की जगह बारह नाम वाला स्तोत्र किया जा सकता है?
जहाँ पाँच सौ का नोट ज़रूरी नहीं, वहाँ पाँच रुपये का नोट
पूछा गया कि सहस्रनाम में समय लगता है, तो क्या बारह नामों का स्तोत्र कर सकते हैं। वक्ता जवाब देते हैं, कीजिए, हमें क्या समस्या होगी? अगर पाँच सौ रुपये के नोट की जगह पाँच रुपये के नोट से आपका काम हो रहा है, तो उसी से चलाइए — हमें क्या समस्या है?
वक्ता पढ़ते हैं, प्रश्नकर्ता पूछते हैं कि सहस्रनाम में समय लगता है, क्या मैं बारह नामों का स्तोत्र कर सकता हूँ। वे जवाब देते हैं, कीजिए। हमें क्या समस्या होगी? अगर पाँच सौ के नोट की जगह पाँच रुपये के नोट से आपका काम हो रहा है, तो उसी से चलाइए। हमें क्या समस्या है?
काल भैरव अष्टक का 1100 पाठ होने के बाद कैसे यूज कर सकते हैं उसके किस लिए यूज करें? तो आप क्यों यूज करना चाहते हैं इसका उत्तर तो आपके पास होगा ना किस लिए करें क्या करें? मतलब कि हमारे पास भैया ऐसा है कि ₹10000 आ गया है अब हम क्या करें इसका? और क्यों करें इसका तो इसका जवाब हम कैसे दे सकते हैं? ₹10000 अब आपकी आवश्यकता आप जानिएगा ना भाई कि ₹10000 आया है तो हमको खाना खाना है कि घूमने जाना है कि उसको सेविंग में एफडी में डाल देना है।
कड़े धाम में एक महिला पर सवारी आई और उसके अपने भाई ने उसे मारा
माँ पर सवारी, और उनके अपने भाई का मारना
प्रश्नकर्ता लिखते हैं कि वे उत्तर प्रदेश में शीतला माँ के कड़े धाम गए थे। उस समय उनकी माँ पर सवारी आ रही थी, और उनकी माँ के भाई, यानी मामा ने उनकी माँ को मारा। वक्ता कहते हैं, ऐसा होता है। आप सबने देखा होगा कि किसी पर सवारी आ रही है और घर या परिवार का कोई सदस्य गुस्से में डाँटेगा, गाली देगा, इसे नाटक कहेगा — चप्पल से मारना, हाथ से मारना। बाबा जी लोग भी ऐसा करते हैं, वे कहते हैं। वे एक ऐसे ज्योतिषी का ज़िक्र करते हैं जिनका वीडियो बहुत वायरल हुआ था — बहुत बड़े ज्योतिषाचार्य, जिनका लोग बहुत सम्मान करते थे, और वे खुद भी। पर जिस दिन उन्होंने वह बात सुनी, भाई, यह भी वैसा ही निकला।
वक्ता पढ़ते हैं कि उन्होंने कहा है, वे उत्तर प्रदेश में शीतला माँ के कड़े धाम गए थे, और उस समय मेरी माँ पर सवारी आ रही थी। ठीक है। उनकी मम्मी पर सवारी आई, और उनकी मम्मी के भाई, मामा ने उनकी मम्मी को मारा। ऐसा होता है न — आप लोगों ने देखा होगा, किसी पर सवारी आ रही है, और घर या परिवार का कोई सदस्य गुस्से में डाँटेगा, गाली देगा, कहेगा कि नाटक है; जूता निकालकर मारना, हाथ से मारना। और बाबा जी लोग भी हैं, वे कहते हैं, और एक ऐसे ज्योतिषी का नाम लेते हैं जिनका वीडियो बहुत वायरल हुआ था — अपनी नज़र में बहुत बड़े ज्योतिषाचार्य, बड़ा अद्भुत विषय, जिनका लोग बहुत सम्मान करते थे, और हम भी, कि नहीं, इनकी जानकारी बहुत अच्छी है। पर जिस दिन हमने यह बात सुनी — भाई, यह भी वैसा ही निकला।
ठीक है। सवारी इनकी मम्मी के ऊपर आया और मम्मी के भाई ने मामा ने इनकी मम्मी को मार दिया। होता है ना आप लोग देखे होंगे किसी के ऊपर सवारी आ रही हो घर परिवार को कोई सदस्य क्रोधित होकर डांट देगा गाली दे देगा नौटंकी करबू बोलता है नौटंकी तारा देवी आवत जोता निकाल के मारना चप्पल मार देना हाथ से मार देना बाबा जी लोग भी है पवन सिन्हा लतखोर जी उनका वीडियो बहुत वायरल हुआ था। बहुत बड़े ज्योतिषाचार्य हैं अपने आप को बहुत बड़ा अद्भुत विषय बिल्कुल जो लोग इनका बहुत सम्मान करते थे हम भी कि नहीं बहुत अच्छे इनकी जानकारियां होती हैं लेकिन जब यह विषय सुने उस दिन से कि भाई ये भी वही निकले।
सवारी को मारना ऐसा अपराध है जो कभी नहीं करना चाहिए, चाहे सवारी का ढोंग हो
ऐसा अपराध जो कभी नहीं करना, ढोंगी के साथ भी
वक्ता कहते हैं, यह अपराध कभी नहीं करना चाहिए। चाहे कोई ढोंग कर रहा हो — जहाँ सच में ढोंग चल रहा होता है, वहाँ आपके मुँह से आवाज़ नहीं निकलती, वहाँ आप जाकर पैर पकड़ते हैं। जहाँ साफ़ दिख रहा हो कि नाटक और धोखा चल रहा है, पर जहाँ थोड़ा भी असली विषय आ रहा हो — ऐसा न भी हो, तब भी उसका सम्मान करना सीखिए, वे कहते हैं। आखिर वह एक जीवात्मा है। अगर आप ऐसा कुकर्म करते हैं — और इस पर पूरा समर्पित वीडियो है कि सवारी का अपमान हो तो क्या-क्या होता है — तो वह इसे यूँ ही स्वीकार नहीं करने वाली। यह तय बात है।
वक्ता कहते हैं, यह अपराध कभी नहीं करना चाहिए। चाहे कोई ढोंग कर रहा हो — जहाँ ढोंग किया जा रहा होता है, वहाँ आपके मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकलती; वहाँ आप जाकर पैर पकड़ते हैं। जहाँ साफ़ पता है कि नाटक और धोखेबाज़ी चल रही है — पर जहाँ थोड़ा भी असली विषय आ रहा हो, तो ऐसा न भी हो, तब भी उसका सम्मान करना सीखिए। वह एक जीवात्मा है न। अगर आप ऐसा कुकर्म करते हैं — इस पर हमारा पूरा समर्पित वीडियो है कि सवारी का अपमान हो तो क्या-क्या होता है — तो वह इसे यूँ ही स्वीकार नहीं करने वाली। यह तय बात है।
ये अपराध कभी नहीं करना चाहिए। अगर कोई पाखंड कर भी रहा है पाखंड जो कर रहा है वहां तो साले तुम लोगों की मुंह से कुछ आवाज नहीं निकलती है। वहां तो जाकर पैर पकड़ते हो। जहां साफ पता चल रहा है कि नौटंकी और पाखंडीता चल रही है लेकिन जहां यथार्थ का जरा सा भी विषय आ रहा है अगर नहीं भी उसके ऊपर है सम्मान करना सीखो। जीवात्मा तो है ही ना। इस प्रकार का दुष्कृत्य अगर आप कर देते हैं हम इस पर पूरा डेडिकेटेड वीडियो है कि अगर सवारी का अपमान होता है तो क्या-क्या होता है तो फिर वो वो नहीं मानने वाली है ऐसे ये तो कहा हुआ चीज है।
ऐसे अपराध के बाद परेशानी कितने समय चलती है?
कम से कम बारह साल, और किसी के लिए चालीस साल
वक्ता कहते हैं, अब वे जो परेशानी देंगी, वह कम से कम बारह साल चलेगी — कम से कम। और फिर बारह साल में हटेगी। हालाँकि वे कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि वह किसकी सवारी रही होगी या बात क्या थी। वे बहुत परेशान करती हैं। कई लोगों के लिए यह चालीस साल तक चलता है। पूरी पीढ़ी परेशानियों में निकल जाती है। वे कहते हैं, ये घर-गृहस्थी की बातें हैं।
वक्ता कहते हैं, अब वे जो परेशानी देंगी, वह कम से कम बारह साल चलेगी। कम से कम; और फिर बारह साल में उसे हटना है। हालाँकि हमें नहीं पता कि वह किसकी सवारी रही होगी, बात क्या रही होगी। वे बहुत परेशान करती हैं। कई लोगों के लिए यह चालीस साल तक चलता है। पूरी पीढ़ी परेशानियों में निकल जाती है। ये घर-गृहस्थी की बातें हैं।
अब वो जो परेशान करेंगी उनकी परेशानी 12 वर्ष कम से कम चलेंगी। कम से कम और तब वो 12 वर्ष में हटने वाली है अभी हालांकि हमें नहीं पता क्यों किनकी सवारी होगी क्या विषय रहा होगा। परेशान तो बहुत करती हैं। कई लोगों का तो 40-40 साल तक चलता है एक वंशी पूरा बीत जाता है परेशानियों में। ये होती है घर की चीजें। अगर भूत प्रेत भी शरीर पर आया है और आपके पास उसका भी तरीका होता है अगर भूत प्रेत को भी भगा रहे हो शरीर पर से मारपीट करके तो उसकी तरीके होते हैं। ऐसा नहीं होता है किसी को देखा सुनी में कि अरे इसके ऊपर भूत आया है तो चप्पल चप्पल मार दिए जूता से मार दिए और फिर भगा दिए।
क्या शरीर से भूत-प्रेत भगाने की भी कोई विधि है?
विधि प्रेम से शुरू होती है; बल आखिरी उपाय है
वक्ता कहते हैं, अगर किसी शरीर पर भूत या प्रेत भी आया हो, तो उसकी भी आपके पास विधि है। अगर आप मारकर शरीर से भूत-प्रेत भगा रहे हैं, तो उसकी विधियाँ हैं। ऐसा नहीं होता कि सुनी-सुनाई पर — अरे, इस पर भूत आया है — चप्पल से मारो, जूते से मारो और भगा दो। विधि है: सब कुछ पहले प्रेम से होता है। आखिरी उपाय यह है कि हाँ, हम मारपीट पर आते हैं। या हमें पता चल रहा है कि वह नाटक कर रहा है, झूठ बोल रहा है — तब आप हाथ-पैर चलाएँ, वह अलग बात है।
वक्ता कहते हैं, अगर किसी शरीर पर भूत या प्रेत भी आया हो, तो उसकी भी आपके पास विधि है। अगर आप मारकर शरीर से भूत-प्रेत भगा रहे हैं, तो उसकी विधियाँ हैं। ऐसा नहीं होता कि सुनी-सुनाई पर — अरे, इस पर भूत आया है — चप्पल से मारो, जूते से मारो और भगा दो। विधि है: सब पहले प्रेम से होता है। आखिरी बात यह है कि हाँ, हम मारपीट पर आते हैं, या हमें पता चल रहा है कि वह नाटक कर रहा है, झूठ बोल रहा है; तब आप हाथ-पैर चलाइए, वह अलग बात है।
तरीका है पहले प्रेम से ही होता है सारा चीज। अंतिम विषय होता है कि हां हम हाथापाई करें या फिर हमको पता चल रहा है कि नौटंकी कर रहा है झूठ बोल रहा है तब आप हाथ पैर छोड़े वो अलग बात होता है। यथार्थ में जब देख रहे हैं किसी के ऊपर कुछ आ रहा है या उस स्थान पर जाने के बाद अगर वो भावनात्मक रूप से ही उनके ऊपर देवी का आवेश आया हो। भावना में ही हो जाता है कई बार होता है। आप भक्त होंगे आपके साथ भी हो सकता है। शरीर रोमांचित हो जाएगा, रोआं-रोआं खड़ा हो जाएगा, आंख से अश्रुधारा बहने लगेगी।
धाम पर आँसू बहें और रोंगटे खड़े हों तो इसका क्या अर्थ है?
भाव-आवेश और देवी की कृपा — इसे अपने तक रखें
जब आप सच में देखते हैं कि किसी पर कुछ आ रहा है, या उस जगह जाकर सिर्फ़ भाव से उन पर देवी का आवेश आया है — यह भाव में ही होता है, कई बार होता है। आप भक्त हों तो आपके साथ भी हो सकता है: शरीर रोमांचित होगा, रोम-रोम खड़ा होगा, आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगेगी। वक्ता कहते हैं, लोग पूछते हैं इसका क्या अर्थ है। इसका क्या अर्थ — आप भाव के आवेग में आँखों से आँसुओं की धारा का अर्थ पूछ रहे हैं, क्या सुनना चाहते हैं? आप पर देवी की कृपा है। यह बात अपने अंदर रखने की है। आपका भाव ऊँचे स्तर पर पहुँचा, आप कहीं उस परम शक्ति से जुड़े, और उस जुड़ाव से आपके भीतर रोमांच, भाव और अनुभव आया। इसे सीमित रखिए, दिखावा मत कीजिए।
जब आप सच में देख रहे हैं कि किसी पर कुछ आ रहा है, या उस जगह जाकर अगर उन पर सिर्फ़ भावनात्मक रूप से देवी का आवेश आया है — वक्ता कहते हैं, यह भाव में ही होता है। कई बार होता है। आप भक्त हों तो आपके साथ भी हो सकता है: शरीर रोमांचित होगा, रोम-रोम खड़ा होगा, आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगेगी। इसमें लोग पूछते हैं, भैया, इसका क्या अर्थ है? क्या इसका कोई अर्थ है? आप भाव के आवेग में आँखों से आँसुओं की धारा का अर्थ पूछ रहे हैं — क्या सुनना चाहते हैं? आप पर देवी की कृपा है। यह बात अपने तक सीमित रखने की है। वहाँ आपका भाव ऊँचे स्तर पर पहुँचा। कहीं न कहीं आप उस परम शक्ति से जुड़े, और जुड़ने से आपके भीतर रोमांच आया, भाव आया, अनुभव आया। इसे सीमित रखिए; इसका दिखावा मत कीजिए।
इसमें लोग पूछते हैं इसका क्या मतलब है भैया? इसका कोई मतलब होता है? भावावेश में आकर के आपकी आंख से अश्रुधारा इसका मतलब पूछ रहे हो मतलब क्या आप सुनना क्या चाहते हो आपके ऊपर देवी की कृपा है। ये अपने तक सीमित रखने का विषय है। आपके भाव वहां उच्च स्तर के पहुंच गए हैं उस परम सत्ता के साथ आप कहीं ना कहीं कनेक्ट कर गए और कनेक्ट करने के कारण आपके भीतर रोमांच आया भाव आया अनुभव आया। इसे सीमित रखिए इसका प्रदर्शन मत कीजिए।
क्या पहले से बताया जा सकता है कि धाम पर किस पर शक्ति आएगी?
यह कहीं लिखा नहीं; हर व्यक्ति में अलग होता है
पर जब यह बात असीमित हो जाती है — कभी ऐसी स्थिति होती है कि कोई मन से थोड़ा ज़्यादा समर्पित है, उसने ये बातें देखी-सुनी हैं, तो उसके मन में ऐसा भाव आया और किसी शक्ति का आवेश आया, प्रेम से किसी भी समय, और खास तौर पर धाम पर। वक्ता कहते हैं, धाम पर किसके शरीर पर कब आएगा, खास तौर पर जब आप किसी तांत्रिक स्थान या किसी देवी तीर्थ स्थान पर जा रहे हों, यह कहीं लिखा नहीं है। ऐसा ज़रूरी नहीं कि इन पर तो कुछ नहीं आता था, कैसे आया; या किसी पर आता था तो वहाँ ज़रूर आएगा। यह सब हर व्यक्ति में अलग है। आपके साथ कुछ और हो सकता है और हमारे साथ कुछ और।
पर जब भी यह बात असीमित हो जाती है, वक्ता कहते हैं — कभी ऐसी स्थिति होती है कि कोई मन से थोड़ा ज़्यादा समर्पित है और उसने ये बातें देखी-सुनी हैं, तो उसके मन में ऐसा भाव आया, और किसी शक्ति का आवेश आया, प्रेम से किसी भी समय, और खास तौर पर धाम पर। धाम पर किसके शरीर पर कब आएगा — खास तौर पर जब आप किसी तांत्रिक स्थान पर जा रहे हों, किसी देवी तीर्थ स्थान पर जा रहे हों — यह कहीं लिखा नहीं है। ऐसा ज़रूरी नहीं कि इस पर तो कुछ नहीं आता था, कैसे आया; या किसी पर आता था तो वहाँ ज़रूर आएगा। यह सब हर व्यक्ति में अलग है। आपके साथ कुछ और हो सकता है और हमारे साथ कुछ और। यह ध्यान रखिए।
लेकिन जब कभी भी ये चीज असीमित हो जाता है कभी ऐसी अवस्था होती है कोई मानसिक रूप से थोड़ा बहुत अधिक डेडिकेटेड है इन चीजों को देखा सुना है तो उनके मन में वैसा भाव आया और कोई शक्ति का आवेश अगर आ गया प्रेम से कभी भी और विशेष करके धाम में धाम में कौन किसके शरीर पर कब आएगा ये कभी विशेष करके किसी तांत्रिक स्थान पर आप जा रहे हो किसी देवी तीर्थ स्थान पर जा रहे हो ये कहीं लिखा हुआ नहीं है। ऐसा नहीं है कि वो जरूरी कि इनके ऊपर कुछ नहीं आता था कैसे आ गया या किन्हीं के ऊपर आता था और वहां आ ही जाएगा।
पहले क्षमा याचना, फिर उपाय इस पर निर्भर है कि अपमान किसका हुआ
पहले क्षमा याचना, और उसके बाद के विकल्प
वक्ता कहते हैं, अगर ऐसा हुआ है तो सबसे पहले यह अत्यंत अनुचित बात हुई है। फिर दूसरी बात यह कि अपमान किसका हुआ और बात कैसे हुई। आप लोग तो वैसे भी परेशान हैं, तो क्षमा याचना आदि कीजिए, जहाँ तक संभव हो। वे कुछ विकल्प बताते हैं, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि प्रश्नकर्ता से कब या बात हो पाएगी या नहीं। पहली बात ध्यान रखिए: अगर वे घर की कोई देवी हैं।
वक्ता कहते हैं, तो अगर ऐसा विषय होता है, तो सबसे पहले यह अत्यंत अनुचित बात हुई है। अब दूसरी बात है: अपमान किसका हुआ है, बात कैसे और क्या रही है। आप लोग तो वैसे भी परेशान हैं, तो क्षमा याचना आदि कीजिए, और जहाँ तक संभव हो। वे कहते हैं कि इसमें कुछ विकल्प बताएँगे, क्योंकि पता नहीं प्रश्नकर्ता से कब या बात हो पाएगी या नहीं। पर ध्यान रखिए, पहली बात: अगर वे घर की कोई देवी हैं।
ये सब पर्सन टू पर्सन वैरी करता है। आपके साथ कुछ और हो सकता है हमारे साथ कुछ और हो सकता है। इस बात का ध्यान रखिएगा। तो अगर इस प्रकार का विषय हो जाए ना सबसे पहले तो ये अति अनुचित बात हुआ है। अरविंद यादव जी। अब दूसरा बात है कि किनका अपमान हुआ है कैसे क्या विषय हुआ है आप परेशान तो आप लोग हैं ही तो क्षमा याचना आदि करें और संभव हो सके पहले तो आप आपको कुछ ऑप्शंस इसमें जो है बता देते हैं क्योंकि हमसे तो बात पता नहीं कब आपसे होगा नहीं होगा लेकिन ध्यान रखिए सबसे पहला चीज अगर वो घर की कोई देवी हो।
घर की देवी और कड़े धाम की शीतला के नाम रोज़ एक ज्योत जलाई जाती है
घर की देवी और कड़े धाम की शीतला के नाम एक-एक ज्योत
अगर यह जानकारी है कि हाँ, हमारे घर में किसी पर वे आती थीं, या ऐसी कोई बात है, तो सबसे पहले घर में रोज़, जिस माँ के स्वरूप की आप पूजा करते हैं उनके नाम; और क्योंकि अपमान भगवती शीतला के कड़े धाम पर हुआ, तो उनके नाम — दोनों के नाम कम से कम एक-एक ज्योत जलाइए। और तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ कीजिए।
अगर इसकी जानकारी है — कि हाँ, हमारे घर में किसी पर वे आती थीं, या ऐसी कोई बात है — तो सबसे पहले घर में रोज़, वक्ता कहते हैं, जिस माँ के स्वरूप की आप पूजा करते हैं उनके नाम; और क्योंकि आपने भगवती शीतला माता के कड़े धाम पर अपमान किया है, तो उनके नाम — दोनों के नाम कम से कम एक-एक ज्योत जलाइए। और तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ कीजिए।
इसके विषय में जानकारी हो कि हां हमारे घर में किसी के ऊपर आती थी या कुछ वैसा विषय हो तो सबसे पहले घर में प्रतिदिन जो है मां जिनका भी आप स्वरूप की पूजा करते हो उनके नाम से। और चूंकि भगवती शीतला के कड़े धाम पे आप पे अपमान किया है तो उनके नाम से। दोनों कोई के नाम से एक-एक ज्योत प्रज्वलित करें कम से कम। और तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ करें। भगवती कितनी भी कुपित हो दो-तीन ऐसे सूक्त हैं जिससे अवश्य प्रसन्न होती हैं। पहला तो तंत्रोक्त रात्रि सूक्त, दूसरा देवी सूक्त और तीसरा जो है सक्रादि स्तुति।
भगवती कितनी भी रुष्ट हों, कौन-से सूक्त उन्हें प्रसन्न करते हैं?
तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम, देवी सूक्तम और शक्रादि स्तुति — और एक पचरा
वक्ता कहते हैं, भगवती कितनी भी रुष्ट हों, दो-तीन सूक्त हैं जिनसे वे ज़रूर प्रसन्न होती हैं। पहला तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम, दूसरा देवी सूक्तम, और तीसरा शक्रादि स्तुति। इन्हें संस्कृत में पढ़ना सीखिए। यह आसान है, बहुत कठिन नहीं। और घर का कोई सदस्य पाठ करे और माँ को मनाए। अगर पचरा गाना आता हो, तो अष्टमी या नवमी को, या शाम को संध्या के समय, कम से कम एक पचरा गाकर माँ को मनाइए, और क्षमा माँगिए कि माँ, हमसे अपराध हुआ है।
वक्ता कहते हैं, भगवती कितनी भी रुष्ट हों, दो-तीन सूक्त हैं जिनसे वे ज़रूर प्रसन्न होती हैं। पहला तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम्; दूसरा देवी सूक्तम; और तीसरा शक्रादि स्तुति। इन्हें संस्कृत में पढ़ना सीखिए — यह आसान है, बहुत कठिन नहीं। और घर का कोई सदस्य पाठ करे और माँ को मनाए। अगर पचरा गाना आता हो, तो अष्टमी या नवमी को, या शाम को संध्या के समय, कम से कम एक पचरा गाइए; पचरा गाकर माँ को मनाइए, और क्षमा याचना कीजिए — कि माँ, हमसे अपराध हुआ है।
इसका आप पाठ करना सीख लीजिए संस्कृत में। आसान है बहुत ज्यादा हार्ड नहीं है। और घर का सदस्य पाठ करे माई को मनाए। अगर आप नाम से तो यूपी बिहार के ही लग रहे हैं कड़े धाम तो यूपी बिहार में ही होंगे आप लोग। तो पचरा गाने अगर आता है तो अष्टमी का या नवमी का या शाम के समय संध्या का समय पचरा एक गाइए कम से कम पचरा गा के मां को मनाइए क्षमा याचना कीजिए कि मां अपराध हुआ हमसे।
कैसे पता चलेगा कि उन्होंने क्षमा कर दिया?
ज़रूरी नहीं कि सिर पर आकर बताएँ — पर जीवन में दिखेगा
वक्ता कहते हैं, अगर वे प्रसन्न होकर क्षमा करें, तो ज़रूरी नहीं कि सिर पर आकर कहें — पर उसका असर आपके जीवन में दिखने लगेगा। और जब वे क्षमा करती हैं — और अगर आप दिल से मनाएँ तो भगवती ज़रूर क्षमा करेंगी — तो परेशानी कितनी भी बड़ी हो, वे खुद रास्ता निकालने लगेंगी और आपको उससे बाहर निकालेंगी। यह सच्ची बात है। जब वे नाराज़ होकर रूठ जाएँ, तो मनाना भी आना चाहिए।
वक्ता कहते हैं, अगर वे प्रसन्न होकर क्षमा कर दें, तो ज़रूरी नहीं कि सिर पर आकर कहें — पर उसका असर आपके जीवन में दिखने लगेगा। और जब वे क्षमा करती हैं — और अगर आप दिल से मनाएँ, तो भगवती ज़रूर क्षमा करेंगी — तो जो भी परेशानी हो, परेशानी कितनी भी बड़ी हो, वे खुद रास्ता निकालने लगेंगी और आपको उससे बाहर निकालेंगी। यह सच्ची बात है। मनाना आना चाहिए। जब वे नाराज़ होकर रूठ जाएँ, तो मनाना भी आना चाहिए।
अगर वो प्रसन्न होकर के क्षमा कर देती हैं वो जरूरी नहीं सिर पे आ करके ही बोलेंगे लेकिन उसका प्रभाव आपको जीवन में दिखने लगेगा। वो जब क्षमा करेंगी और भगवती क्षमा करेंगी अवश्य करेंगी अगर आप हृदय से मनाएंगे तो। तो जो भी परेशानी कितनी भी बड़ी से बड़ी परेशानी हो ना मार्ग वो खुद निकालना भी शुरू कर देंगी। और आपको उससे निकाल लेंगी ये सत्य बात है। मनावन आना चाहिए। जब नाराज हो जाती हैं रूठ जाती हैं तो मनाने भी आना चाहिए। अपमान तो हुआ और बाकी आपके मामा जी तो जो किए हैं।
क्या एकादशी को भगवती को भोग लगाना चाहिए, और कौन-सा भोग?
एकादशी का चावल न खाने का नियम, और कौन इस नियम से बाहर है
वक्ता जवाब देते हैं, क्यों नहीं लगाना चाहिए? यहाँ तो परम वैष्णव भी, जो खुद को साक्षात नारायण का अवतार कहते हैं, उस दिन बैठकर खा रहे हैं। एकादशी के नियम से कम से कम चावल नहीं खाना चाहिए। इतना तो है ही कि एकादशी के दिन चावल मत खाइए। इतना नियम हर किसी को मानना चाहिए, आप कोई भी हों — सिवाय इसके कि आप किसी खास तंत्र मार्ग में दीक्षित हों, जहाँ एकादशी तिथि के व्रत का नियम लागू नहीं होता। वह विषय अलग है।
वक्ता पढ़ते हैं, प्रश्नकर्ता पूछते हैं कि क्या एकादशी के दिन भगवती को भोग लगाना चाहिए, और अगर हाँ, तो कौन-सा भोग। क्यों नहीं लगाना चाहिए? यहाँ तो वे परम वैष्णव भी, जो खुद को साक्षात नारायण का अवतार कहते हैं, उस दिन बैठकर खा रहे हैं। एकादशी के नियम से कम से कम चावल नहीं खाना चाहिए। इतना तो है ही: एकादशी के दिन चावल मत खाइए। इतना नियम हर किसी को मानना चाहिए, आप कोई भी हों — सिवाय इसके कि अगर आप किसी खास तंत्र मार्ग में दीक्षित हैं, तो वहाँ एकादशी तिथि के व्रत का नियम लागू नहीं होता। वह विषय अलग है।
एकादशी के दिन क्या भगवती को भोग लगाना चाहिए और हां तो कौन सा भोग लगाएं? क्यों नहीं लगाना चाहिए? यहां तो जो परम वैष्णव लोग हैं स्वयं को एकदम साक्षात नारायण के अवतार बोलने वाले वो लोग उस दिन बैठ के खा रहे हैं। एकादशी के नियम के अनुसार कम से कम चावल नहीं खाना चाहिए। इतना तो है कि एकादशी के दिन चावल मत खाओ। इतना नियम तो सबको पालन करना चाहिए आप कोई भी हो मत कि हां आप विशिष्ट तंत्र मार्ग में दीक्षित हैं तो वहां उसका नियम एकादशी तिथि का व्रत आदि का नियम नहीं वो विषय अलग है।
किसके लिए तुलसी का स्पर्श भी वर्जित है?
तारा कुल और वामाचार विधि में दीक्षित लोग
वक्ता कहते हैं, तुलसी धारण करने की बात लीजिए: कोई भगवती तारा के कुल में दीक्षित है — अगर कोई उस परंपरा में दीक्षित है, तो उसके लिए क्या एकादशी और क्या तुलसी जी। तुलसी जी की बात यह है कि अगर कोई वामाचार विधि में दीक्षित है, तो उसके लिए तुलसी जी का स्पर्श भी वर्जित है। उसे तुलसी की लकड़ी नहीं छूनी, खास तौर पर अगर वह महामारी माला आदि पहनता है। वहाँ नियम अलग हो जाता है।
वक्ता कहते हैं, तुलसी धारण करने की बात लीजिए — जैसे कोई भगवती तारा के कुल में दीक्षित हो। अगर कोई उस परंपरा में दीक्षित है, तो उसके लिए क्या एकादशी और क्या तुलसी जी। तुलसी जी की बात: अगर कोई वामाचार विधि में दीक्षित है, तो उसके लिए तुलसी जी का स्पर्श भी वर्जित है। उसे तुलसी की लकड़ी नहीं छूनी, खास तौर पर अगर वह महामारी माला आदि पहनता है। वहाँ नियम अलग हो जाता है।
तुलसी धारण जैसे भगवती तारा के कुल में कोई दीक्षित हो। उस परंपरा में अगर कोई दीक्षित हो तो उनके लिए क्या एकादशी और क्या तुलसी जी। तुलसी जी का तो अगर कोई वामाचार विधि में दीक्षित है तो यहां तक तुलसी जी का स्पर्श आदि की भी मनाई होती है। तुलसी के काष्ठ का स्पर्श आदि उन्हें नहीं करना होता है। विशेष करके अगर महामरी माला आदि धारण करते हैं तो। तो वहां नियम अलग हो जाता है। अब अगर यहां पर विषय है कि अगर आप भगवती की सेवा पूजा करते हैं तो भाई एकादशी का व्रत आप किए हैं।
एकादशी व्रत रखा हो तो कौन-सा नैवेद्य लगाया जा सकता है?
नैवेद्य में फल; अन्न बन रहा हो तो अन्न, पर चावल नहीं
अगर आप भगवती की सेवा-पूजा करते हैं, तो भाई, आपने एकादशी का व्रत रखा है — तो आप नैवेद्य में सिर्फ़ फल आदि लगाएँगे। अगर अन्न बन रहा है, तो अन्न लगेगा, पर चावल नहीं लगेगा। उस दिन चावल खाना ही नहीं है, यह ध्यान रखिए। चावल का भोग नहीं लगेगा।
वक्ता कहते हैं, अब अगर यहाँ विषय यह है कि आप भगवती की सेवा-पूजा करते हैं, तो भाई, आपने एकादशी का व्रत रखा है। तो आप नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। में सिर्फ़ फल आदि लगाएँगे। अगर अन्न बन रहा है, तो अन्न लगेगा, पर चावल नहीं लगेगा। उस दिन चावल खाना ही नहीं है, यह ध्यान रखिए। चावल का भोग नहीं लगेगा।
तो फल आदि का ही नैवेद्य पर अर्पण करेंगे। अन्न अगर बन रहा है तो अन्न लगेगा लेकिन चावल नहीं लगेगा। चावल उस दिन बस नहीं खाना है इसका ध्यान रखें। चावल का भोग नहीं लगेगा।
अभिषेक के लिए शृंगी किस पशु से बनाई जा सकती है?
पूरी आयु पाकर मरे नीलगाय, गौवंश या नंदी से, सही विधि से
चाहे नीलगाय हो, गौवंश हो, या नंदी जी — यानी जिन्हें बैल कहते हैं — जिनकी मृत्यु पूरी आयु पाकर अपने आप हुई हो: उनकी मृत्यु के समय, उन्हें ज़मीन में जगह देने से पहले, सही विधि-विधान से सींग लेना चाहिए, और तभी उससे अभिषेक के लिए शृंगी बनानी चाहिए। वक्ता कहते हैं, जैसे-तैसे बनी हुई नहीं चलती।
वक्ता कहते हैं, चाहे नीलगाय हो, गौवंश हो, या नंदी जी — यानी जिन्हें बैल कहते हैं। जिनकी मृत्यु अपनी पूरी आयु पूरी करके अपने आप हुई हो: उनकी मृत्यु के समय, उन्हें ज़मीन में जगह देने से पहले, सही विधि-विधान से सींग लेना चाहिए, और तभी उससे शृंगी बनानी चाहिए, अभिषेक के लिए। जैसे-तैसे बनी हुई नहीं चलती।
नील गाय हो, गोवंश हो, नंदी जी हो मतलब जो सांड कहे जाते हैं। जिनका स्वतः मृत्यु हुआ है पूर्ण आयु हो करके। उनके मृत्यु के समय में जब उनको भूमिगत स्थान दिया जाता है उससे पहले उचित विधि विधान से जो सिंह होता है उसे प्राप्त करके तब उसका श्रृंगी बनाने बनाना चाहिए अभिषेक के लिए। जैसे तैसे वाला नहीं चलता है।
क्या सभी देवताओं के लिए पंचमुखी रुद्राक्ष स्थापित किया जा सकता है?
हर देवता के नाम स्थापित पंचांग रुद्राक्ष
वक्ता कहते हैं, सभी देवताओं के लिए आप पंचांग रुद्राक्ष स्थापित कर सकते हैं — सभी देवताओं के निमित्त। वे बताते हैं कि उन्होंने पहले पूरे तीस मिनट का एक वीडियो बनाया था, जो प्रकाशित नहीं किया, जिसमें नवग्रह रुद्राक्ष, शिव-शक्ति रुद्राक्ष, गणपति जी, सब आ गए थे।
वक्ता कहते हैं, सभी देवताओं के लिए आप पंचांग रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । स्थापित कर सकते हैं — सभी देवताओं के निमित्त। उन्होंने इस पर पहले एक वीडियो बनाया था, पूरे तीस मिनट का, जिसमें नवग्रह रुद्राक्ष भी था, शिव-शक्ति रुद्राक्ष भी, गणपति जी, सब कुछ। वह वीडियो उन्होंने प्रकाशित नहीं किया, वे कहते हैं; वे उसे प्रकाशित करना देखेंगे।
सभी देवताओं के लिए आप पंचांग रुद्राक्ष जो है स्थापित कर सकते हैं सभी देवताओं के निमित्त। पहले एक वीडियो डाले थे उसको पब्लिश नहीं किए हैं। पूरा 30 मिनट का वीडियो था जिसमें कि नवग्रह रुद्राक्ष के ही नवग्रह रुद्राक्ष के ही शिव शक्ति रुद्राक्ष के ही गणपति जी सबका है। वो वीडियो के बारे में हम देखते हैं पब्लिश करते हैं। दो साल पहले का वीडियो होगा हम किए ही नहीं उसको।
साधक अपने पुराने फटे कपड़ों का क्या करे?
जलाएँ नहीं — धोकर दान करें
पूछा गया कि साधक पुराने फटे कपड़ों का क्या करे, जब इतनी मात्रा में आसन या बिछौना बनाना संभव नहीं। वक्ता कहते हैं, उन्हें जलाया नहीं जा सकता, जलाना भी नहीं चाहिए। साधक पुराने कपड़े धोए, और अगर देने हैं, तो उनका दान आदि करे।
वक्ता पढ़ते हैं, प्रश्नकर्ता पूछते हैं कि साधक पुराने फटे कपड़ों का क्या करे; इतनी मात्रा में आसन या बिस्तर बनाना संभव नहीं। उन्हें जलाया नहीं जा सकता; जलाना भी नहीं चाहिए। साधक पुराने कपड़े धोए, और अगर देने हैं, तो उनका दान आदि करे।
खुशी जी बिल्कुल बांध सकती हैं। पुराने फटे हुए साधक को क्या करना चाहिए? अधिक मात्रा में आसन अथवा सैया बनाना संभव नहीं जला सकते हैं नहीं जला भी नहीं सकते हैं। पुराने वस्त्र साधक को धुल करके और दान करना हो तो अपना दान आदि कर दीजिए। संजय जी जय माई।
क्या रत्न माला रात में उतार सकते हैं?
रात में उतारना और सुबह पहनना
बिल्कुल, वक्ता कहते हैं: रत्न माला रात में उतार सकते हैं और सुबह पहन सकते हैं; इसमें कोई दिक्कत नहीं।
बिल्कुल, वक्ता जवाब देते हैं: रत्न माला रात में उतार सकते हैं और सुबह पहन सकते हैं। इसमें कोई दिक्कत नहीं।
अल्फाबेट जी बिल्कुल आप रत्नमाला रात को निकाल सकते हैं सुबह पहन सकते हैं उसमें कोई दिक्कत नहीं है।
गाँव में काली विग्रह स्थापित हुआ, पर रोज़ पूजा नहीं होती — अब क्या करें?
कोई विकल्प नहीं; करना ही पड़ेगा
प्रश्नकर्ता लिखते हैं कि गाँव में पहले चबूतरे पर काली मैया का थान था। आठ साल पहले उनके बड़े पिताजी ने माँ काली की प्राण प्रतिष्ठा कराई और प्रतिमा बनवाई। पर रोज़ पूजा-आरती नहीं हो पाती — क्या करें? वक्ता कहते हैं, इसका कोई विकल्प ही नहीं; करना ही पड़ेगा। या आप करें, या जिसने बनवाया — फिर यह उसकी जीवन भर की ज़िम्मेदारी है। कम से कम जब तक शरीर में सामर्थ्य है, व्यवस्था करना उसकी ज़िम्मेदारी है। सिर्फ़ प्राण प्रतिष्ठा कर देने से सब कुछ नहीं हो जाता, ख़ासकर मंदिर में।
गाँव में पहले चबूतरे पर काली मैया का थान था, प्रश्नकर्ता लिखते हैं, वक्ता पढ़ते हैं। आठ साल पहले मेरे बड़े पिताजी ने वहाँ माँ काली की प्राण प्रतिष्ठा कराई और प्रतिमा बनवाई, पर रोज़ पूजा-आरती नहीं हो पाती; हम क्या करें? इसका कोई विकल्प ही नहीं, वक्ता कहते हैं। करना ही पड़ेगा। या आप करें, या जिसने बनवाया — फिर यह उसकी पूरी जीवन भर की ज़िम्मेदारी है। कम से कम जब तक शरीर में सामर्थ्य है, उसकी व्यवस्था करना उसकी ज़िम्मेदारी है। सिर्फ़ प्राण प्रतिष्ठा कर देने से सब कुछ नहीं हो जाता। ख़ासकर मंदिर में।
त्रिपुर सुंदरी मां विंध्यवासनी आपने लिखा है कि गांव में पहले काली मैया का थान था चबूतरे पे। आठ साल पहले मेरे बड़े पिताजी ने वहां मां काली की प्राण प्रतिष्ठा करवाकर प्रतिमा बनवाई थी लेकिन नित्य पूजा आरती नहीं हो पाती क्या करें? इसका कोई विकल्प ही नहीं है। करना पड़ेगा। आपको या तो बनवाना जो बनवाए उसकी जिम्मेदारी है फिर जीवन पर्यंत। एटलीस्ट जब तक वो जिनका जब तक उनका सामर्थ्य है शरीर में तब तक तो उनकी जिम्मेदारी है कि उसकी व्यवस्था करें। केवल प्राण प्रतिष्ठा कर देना मात्र से ही सब कुछ नहीं हो जाता है। मंदिर में विशेष करके। घर का तो अनेक विकल्प आपको मिल भी जाएगा कि करो तो ना करो तो चलेगा चलो। लेकिन अगर आप अचल प्रतिष्ठा कर रहे हैं। घर में चल प्रतिष्ठा होती है मंदिर में अचल होती है।
चल और अचल प्रतिष्ठा में क्या अंतर है?
घर में चल, मंदिर में अचल — और सुबह-शाम आरती
घर में चल प्रतिष्ठा होती है; मंदिर में अचल, वक्ता कहते हैं। घर के लिए कई विकल्प मिलेंगे — कि करो तो अच्छा, न करो तो भी चलेगा। पर अगर अचल प्रतिष्ठा कराई है, तो भैया, वहाँ नियम है कि सुबह-शाम उनकी आरती हो। जहाँ तक हो सके पूजन जितना हो सके हो — नियम षोडशोपचार पूजन का है; पर कम से कम सुबह-शाम आरती ज़रूर हो।
घर में चल प्रतिष्ठा होती है; मंदिर में अचल, वक्ता कहते हैं। घर के लिए कई विकल्प मिलेंगे — कि करो, या न करो तो भी चलेगा, आओ। पर अगर अचल प्रतिष्ठा कराई है, तो भैया, वहाँ नियम है कि सुबह-शाम उनकी आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। हो। जहाँ तक हो सके पूजन जितना हो सके हो — नियम षोडशोपचारदेवता हेतु सोलह अंगों वाला पूर्ण पूजा-क्रम, मूल पंचोपचार से अधिक विस्तृत। पूजन का है; पर कम से कम सुबह-शाम आरती ज़रूर हो।
अचल प्रतिष्ठा अगर आप करवा दिए हैं तो भाई वहां तो नियम है कि सुबह शाम उनकी आरती होनी चाहिए। यथासंभव पूजन जितना हो शोडशोपचार पूजन का नियम है लेकिन कम से कम आरती तो अवश्य होनी चाहिए सुबह शाम। नहीं हो रहा है नित्य तो वही तो दोष लगेगा। उसका कोई निराकरण नहीं होगा कोई काल सर्प दोष उसमें कुंडली में दिखा काल सर्प दोष है देव दोष है पितृ दोष है पितृ श्राप है मातृ श्राप है वो ख्याल उतने में सिमट जाएगा।
स्थापित विग्रह को बिना पूजे छोड़ दें तो कौन-सा दोष लगता है?
देव-श्राप, और भैरवों का जटा खोलना
अगर रोज़ नहीं हो रहा, तो वही दोष लगेगा, वक्ता कहते हैं, और उसका कोई उपाय नहीं होगा। कुंडली में कोई काल सर्प दोष दिखेगा — कि काल सर्प दोष है, देव दोष, पितृ दोष, पितृ श्राप, मातृ श्राप — बात बस इतनी रह जाएगी। पर असलियत यहीं से निकलेगी: कि हाँ, आपने विग्रह की प्रतिष्ठा कराई और उनकी सेवा नहीं की, तो यह देव-श्राप है। कहा गया है कि शिव मंदिर की, देवी मंदिर की — यानी विग्रह की — प्रतिष्ठा करके उसे बिना पूजे रखा जाए, तो उनके भैरव क्रोधित होकर जटा खोल देते हैं; यानी वे उग्र रूप में आ जाते हैं, और वहाँ बाल रूप में हों तो भी उन क्षेत्रों में उग्रता पा लेते हैं।
अगर रोज़ नहीं हो रहा, तो वही दोष लगेगा, वक्ता कहते हैं, और उसका कोई उपाय नहीं होगा। कुंडली में कोई काल सर्प दोष दिखेगा — कि काल सर्प दोष है, कि देव दोष है, पितृ दोष, पितृ श्राप, मातृ श्राप है — पूरी बात बस इतनी रह जाएगी। पर असलियत यहीं से निकलेगी: कि हाँ, आपने विग्रह की प्रतिष्ठा कराई और उनकी सेवा नहीं की; तो यह देव-श्राप है। कहा गया है कि शिव मंदिर की, देवी मंदिर की प्रतिष्ठा — यानी विग्रह की प्रतिष्ठा — करके उसे बिना पूजे रखा जाए, तो उनके भैरव क्रोधित होकर जटा खोल देते हैं। जटा खोलने का मतलब आप समझते हैं: जटा यानी वे उग्र रूप में आ गए; वहाँ बाल रूप में हों तो भी उन क्षेत्रों में उग्रता पा लेते हैं।
यथार्थ तो विषय यहां से निकलेगा कि हां आप जो विग्रह का प्रतिष्ठा कराए उनकी सेवा नहीं किए हैं तो ये देव श्राप है। कहा गया है कि शिव मंदिर की प्रतिष्ठा देवी मंदिर की प्रतिष्ठा मतलब विग्रह की प्रतिष्ठा करके अपूज्य रखा जाए तो उनके जो भैरव होते हैं कुपित होकर के जटा खोल देते हैं। जटा खोल देने का अर्थ समझ रहे हैं जटा मतलब कि उग्र रूप में आ गए अगर वहां पर बाल रूप में भी है तो उग्रता को प्राप्त हो जाते हैं उन क्षेत्रों में। अब वो फिर विषय अलग हो जाएगा चलिए लेकिन अगर आप पूजन सेवी की व्यवस्था नहीं कराइए डरने डराने वाला विषय हम नहीं कह रहे हैं यथार्थ विषय बोल रहे हैं भाई अगर आप प्रतिष्ठा कर रहे हैं तो आपकी जिम्मेदारी है ना।
एक बार शक्ति का आवाहन हो जाए, तो ज़िम्मेदारी किसकी है?
आपने बुलाया — अब नियम से निभाना होगा
वक्ता कहते हैं कि वे किसी को डराने के लिए नहीं, असली बात कह रहे हैं: अगर आप प्रतिष्ठा कर रहे हैं, तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है। आपने देव शक्ति का आवाहन किया, प्रतिष्ठा की — और प्रतिष्ठा की ही क्यों, जब उनकी पूजा-सेवा करनी ही नहीं थी; बुलाया क्यों? बुलाया है, तो नियम से चलाना पड़ेगा। एक अलग प्रश्न पर वे कहते हैं कि यज्ञोपवीत धारण करने वाला अथर्वशीर्ष का अभ्यास और पुरश्चरण बिल्कुल कर सकता है।
पर अगर पूजन-सेवा करने वाले की व्यवस्था नहीं करते — हम डराने या भय दिखाने को कुछ नहीं कह रहे, असली विषय कह रहे हैं, वक्ता कहते हैं: भैया, अगर आप प्रतिष्ठा कर रहे हैं, तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है न। आपने देव शक्ति का आवाहन किया, प्रतिष्ठा की; और प्रतिष्ठा की ही क्यों, जब उनकी पूजा-सेवा करनी ही नहीं थी? बुलाया क्यों? बुलाया है, तो नियम से चलाना पड़ेगा। और एक दूसरे प्रश्न पर वे जोड़ते हैं कि यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करने वाला अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है। का अभ्यास और पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। बिल्कुल कर सकता है।
आप एक देव शक्ति को आवाह्न किए प्रतिष्ठा किए और प्रतिष्ठा आप क्यों किए जब उनकी पूजा सेवा ही नहीं करनी थी आप उनको बुलाए ही क्यों? बुलाए हैं तो नियम से लेकर के चलना पड़ेगा। यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति अथर्व शीर्षम का अभ्यास पुरश्चरण बिल्कुल कर सकते हैं।
रोज़ के संकल्प में कितना जल लगता है, और वह कहाँ जाता है?
थोड़ा-सा जल, शिवलिंग के पास या तुलसी में
उच्चारण साफ़ रखिए, वक्ता कहते हैं। दीपेश शर्मा जी पूछते हैं कि रोज़ के संकल्प का जल कितना होता है; वे जवाब देते हैं कि जल थोड़ा-सा ही होता है। शिव जी के पास, शिवलिंग के पास थाली में रख दें, तो भी जल सूख जाएगा। लोग तुलसी में भी डाल देते हैं; उसमें भी कोई दिक्कत नहीं।
उच्चारण साफ़ रखिए, वक्ता कहते हैं। दीपेश शर्मा जी, रोज़ के संकल्प का जल कितना होता है? थोड़ा-सा ही जल होता है। उसे भी शिव जी के पास, शिवलिंग के पास थाली वगैरह में रख दें, तो जल सूख जाएगा। लोग तुलसी जी में डाल देते हैं; उसमें भी कोई दिक्कत नहीं।
उच्चारण स्पष्ट रखिएगा। दीपेश शर्मा जी डेली संकल्प का जल कितना होता है? थोड़ा सा तो जल रहता है। वो तो शिव जी के शिवलिंग के पास भी अगर आप प्लेट आदि में डालिएगा तो सूख जाएगा जल। तुलसी जी में डाल देते हैं उसमें भी कोई समस्या नहीं है।
क्या तीर्थ तक अपने पुण्य से ही पहुँचा जाता है?
वहाँ की महाशक्तियाँ, कुल शक्तियाँ और पितर — सबकी सहमति चाहिए
किसी भी तीर्थ क्षेत्र में जाना अपने पुण्य के उदय से ही संभव होता है; यह सच्ची बात है, वक्ता कहते हैं। जब तक उस स्थान की महाशक्तियाँ न चाहें, और आपकी घर की महाशक्तियाँ, घर की कुल शक्तियाँ, पितर, और आपका पुण्य प्रबल न हो, आप नहीं जा पाएँगे।
किसी भी तीर्थ क्षेत्र में जाना अपने पुण्य के उदय से ही संभव होता है; यह सच्ची बात है, वक्ता कहते हैं। जब तक उस स्थान की महाशक्तियाँ न चाहें, और आपकी घर की महाशक्तियाँ, घर की कुल शक्तियाँ, पितर, और आपका पुण्य प्रबल न हो, आप नहीं जा पाएँगे।
इंग्लिश लैंग्वेज एफसी डॉक्टर अभिषेक। किसी भी तीर्थ क्षेत्र में जाना बिल्कुल अपने पुण्य उदय के कारण ही हो पाता है ये सत्य बात है। वहां की महाशक्तियां जब तक नहीं चाहेंगी आपकी घर की महाशक्तियां आपके घर की जो कुल शक्तियां हैं पितृ हैं और आपके जो पुण्य है वो प्रबल नहीं होंगे तो आप नहीं जा पाएंगे। कई बार आप देखिएगा करोड़पति लोग हम तो अपने आंख के सामने का देखा हुआ विषय है कि विंध्य क्षेत्र में पहले सीढ़ी पर पैर नहीं रख पाए।
एक आदमी डिफ़ेंडर में विंध्य पहुँचा और पहली सीढ़ी पर पैर नहीं रख पाया
वह आदमी जो डिफ़ेंडर में आया और पहली सीढ़ी पर पैर नहीं रख पाया
कई बार आप देखेंगे, वक्ता कहते हैं, कि करोड़पति लोग — और यह उन्होंने अपनी आँखों के सामने देखा है — विंध्य क्षेत्र में पहली सीढ़ी पर पैर नहीं रख पाए। एक व्यक्ति डिफ़ेंडर गाड़ी से आया था, सीढ़ी पर पैर नहीं रखा, उतरा, वहीं से प्रणाम किया, बोला, चलो-चलो, भगवती तो मन में होनी चाहिए, और बैठकर आगे चला गया। सोचिए, वे कहते हैं: उसमें इतना घमंड और अहंकार था कि भगवती ने उसे पहली सीढ़ी पर पैर नहीं रखने दिया। पुरानी वीआईपी रोड की बात है; डिफ़ेंडर आई तो उसके लिए पूरा बैरिकेड हटा दिया गया था; सामने देखी हुई बात है। तो अपना पुण्य कर्म, प्रारब्ध और देव-कृपा सब इसमें काम करते हैं, तभी यह होता है।
कई बार आप देखेंगे, वक्ता कहते हैं — करोड़पति लोग; और यह हमारी आँखों के सामने देखा हुआ विषय है — कि विंध्याचल क्षेत्र में वे पहली सीढ़ी पर पैर नहीं रख पाए। एक व्यक्ति डिफ़ेंडर गाड़ी से आया था, उसने सीढ़ी पर पैर नहीं रखा; उतरा और वहीं से प्रणाम किया — चलो-चलो, भगवती तो मन में होनी चाहिए, उसने कहा, और बैठकर आगे चला गया। सोचिए, वे कहते हैं: उसमें इतना घमंड और अहंकार था कि भगवती ने उसे पहली सीढ़ी पर पैर नहीं रखने दिया। पुरानी वीआईपी रोड की बात है; डिफ़ेंडर आई तो उसके लिए पूरा बैरिकेड हटा दिया गया था; सामने देखी हुई बात है। तो बिल्कुल, अपना पुण्य कर्म, प्रारब्ध, देव-कृपा — सब इसमें काम करता है, तभी यह होता है।
लगभग शायद डिफेंडर गाड़ी कितने करोड़ का होता है? डिफेंडर गाड़ी से आया हुआ व्यक्ति सीढ़ी पर पैर नहीं रखा उतरा वहीं से प्रणाम करके ठीक है चलो चलो मन मन में भगवती होनी चाहिए ऐसा बोल करके बैठ करके सामने से निकल गया। सोचिए माई उसको इतना अभिमान और अहंकार था कि भगवती पहले सीढ़ी पर पैर नहीं रखने दी। ओल्ड वीआईपी रोड का विषय है। अब पूरा बैरिकेड हट गया था उसके लिए जब डिफेंडर आया था तो सामने का विषय है। तो बिल्कुल अपने पुण्य कर्म प्रारब्ध देव कृपा सब कुछ उसमें कार्य करता है तब जाकर के।
त्रिवेणी में एक दिन के स्नान का भी क्या मूल्य है?
सिर्फ़ कुंभ में नहीं — जीवन में कभी भी, और यह भी पुण्य की बात है
तीर्थ क्षेत्र में एक दिन का स्नान भी मिल जाए, त्रिवेणी जी में एक दिन भी, कभी भी — यह सिर्फ़ कुंभ की बात नहीं, जीवन में कभी भी। बहुत लोगों का जीवन बीत जाता है, वक्ता कहते हैं: प्रयाग में जन्मे और प्रयाग में ही मरेंगे, पर गंगा जी में स्नान नहीं किया। अद्भुत बात है — जो लोग ख़ुद को इलाहाबाद का कहते हैं, उन्हें पता नहीं कि त्रिवेणी जी का रास्ता कौन-सा है, त्रिवेणी जी कहाँ हैं; गंगा स्नान की तो बात ही छोड़िए। तो यह अद्भुत बात हो जाती है कि जिसने प्रयाग में जन्म लिया, उसने त्रिवेणी जी में स्नान नहीं किया। यह भी, वे कहते हैं, पुण्य की बात है।
तीर्थ क्षेत्र में एक दिन का स्नान भी मिल जाए, त्रिवेणी जी में एक दिन भी, कभी भी — यह सिर्फ़ कुंभ की बात नहीं; जीवन में कभी भी, वक्ता कहते हैं। बहुत लोगों का जीवन बीत जाता है: प्रयाग में जन्म लिया और प्रयाग में ही मृत्यु पाएँगे, पर गंगा जी में स्नान नहीं किया। अद्भुत विषय है — जो लोग ख़ुद को इलाहाबाद का कहते हैं, उन्हें पता नहीं कि त्रिवेणी जी का रास्ता कौन-सा है, त्रिवेणी जी कहाँ हैं। गंगा स्नान की बात तो छोड़िए। तो यह सचमुच अद्भुत विषय हो जाता है कि जिसने प्रयाग में जन्म लिया, उसने त्रिवेणी जी में स्नान नहीं किया। यह भी पुण्य की ही बात है।
एक दिन का भी अगर तीर्थ क्षेत्र में स्नान मिल जाए, एक दिन के लिए भी त्रिवेणी जी में कभी भी, ये केवल कुंभ का ही विषय नहीं है, कभी भी जीवन में। कई लोगों का जीवन पार हो जाता है, प्रयाग में जन्म लिए हैं, प्रयाग में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे लेकिन गंगा जी नहीं नहाए। अद्भुत विषय है, इलाहाबाद ये स्वयं को कहने वाले व्यक्ति त्रिवेणी जी में ही पता है मतलब कि जाने का मार्ग कौन सा है, त्रिवेणी जी किधर हैं। गंगा स्नान की तो बात छोड़ दीजिए। तो अद्भुत विषय हो ही जाता है कि जो प्रयाग में जन्म लिया वो त्रिवेणी जी में नहीं नहाया है। ये भी पुण्य का ही विषय है।
भगवान दत्तात्रेय का दंड कहाँ रखना चाहिए?
मुख्य द्वार पर, इतना ऊँचा कि कोई ले न जाए
भगवान दत्तात्रेय का दंड घर के प्रवेश पर, मुख्य द्वार पर, अंदर की ओर या बाहर की ओर रखा जा सकता है — ऐसी जगह जहाँ दिखने में कोई दिक्कत न हो, कि जो देखे वह उठा न ले जाए; इतना ऊँचा लगा सकते हैं। रोज़ धूप, दीप, कपूर वगैरह। और इसके उपयोग का विधान — कैसे क्या करना है — वक्ता कहते हैं कि उन्होंने पिछले लाइव में भी विस्तार से बताया है, उसे एक बार सुन लें — कि भगवान दत्तात्रेय के दंड के विशेष नियम कैसे उपयोग किए जाएँ।
भगवान दत्तात्रेय का दंड — घर का प्रवेश, मुख्य द्वार, अंदर की ओर या बाहर की ओर, ऐसी जगह जहाँ देखने में कोई दिक्कत न हो, कि जो देखे वह उठा न ले जाए; इतना ऊँचा लगा सकते हैं, वक्ता कहते हैं। रोज़ धूप, दीप, कपूर वगैरह। और इसके उपयोग का विधान — कैसे क्या करना है — उन्होंने पिछले लाइव में भी बताया है; उसे एक बार सुन लें। विस्तार से बताया गया है कि भगवान दत्तात्रेय के दंड के विशेष नियम वगैरह कैसे उपयोग किए जाएँ।
भगवान दत्तात्रेय का दंड जो घर का प्रवेश द्वार है, मुख्य द्वार, भीतर की ओर या बाहर की ओर ऐसे जगह जहां से देखने से कोई दिक्कत नहीं है, कोई भी देखे उसको कोई लेकर के ना जाए, इतना ऊपर उसे लगा सकते हैं। नित्य धूप दीप कपूर आदि और उसका जो प्रयोग विधान है कि कैसे क्या करना है, पहले के लाइव में भी बताए हैं उसे एक बार सुनिएगा, बृहद रूप से बताए हैं कि दत्तात्रेय भगवान के दंड का किस प्रकार से विशेष नियम आदि का उपयोग कर सकते हैं। कल इंटर में अलग से वीडियो भी बना देंगे।
कुंभ का स्नान माघ के स्नान से कितना बड़ा है?
हज़ार या लाख गुना, जिसकी गणना अभी दी जानी है
कुंभ में स्नान का महत्व माघ मास से हज़ार गुना, लाख गुना अधिक माना गया है, वक्ता कहते हैं; इसकी पूरी गणना भी है, जो वे अलग से डालेंगे। पर ऐसा नहीं कि अभी जाकर नहाएँ तो पुण्य नहीं मिलेगा। कभी भी नहाइए; उस समय न जा सकें तो कोई दिक्कत नहीं, अभी कीजिए, बाद में कीजिए। पर जीवन में जितनी बार हो सके, जाकर नहाइए।
कुंभ में स्नान का महत्व माघ मास से हज़ार गुना, लाख गुना अधिक माना गया है, वक्ता कहते हैं। इसकी पूरी गणना भी है, जो हम अब अलग से डालेंगे। पर ऐसा नहीं कि अभी जाकर नहाएँ तो पुण्य नहीं मिलेगा। कभी भी नहाइए; उस समय न जा सकें तो कोई दिक्कत नहीं, अभी जाकर कीजिए, बाद में जाकर कीजिए। पर जीवन में जितनी बार हो सके, जाकर नहाइए।
श्रुति शाह जी 15 तक भीड़ हो जाएगा मतलब आप जनवरी में बोल रहे हैं ना, कभी भी आप जा के स्नान कर लीजिए। कुंभ में स्नान करने का महत्व माघ मास से हजार गुना लाख गुना अधिक माना गया है, उसका भी पूरा एक कैलकुलेशन है वो हम अभी डालेंगे अलग से। लेकिन ऐसा नहीं है कि आप अगर अभी जा के नहा लीजिएगा तो आपका पुण्य नहीं मिलने वाला है। कभी भी आप जाकर स्नान करें, अगर उस समय नहीं जा सकते हैं तो कोई दिक्कत नहीं है आप अभी जा के कर लीजिए, बाद में जा के कर लीजिए। लेकिन जीवन में जितना ज्यादा हो सके उतने बार जाकर के स्नान कीजिए और रात्रि पर्यंत वहां एक रात बिताना चाहिए हम सदैव कहते हैं, तीर्थ क्षेत्र में जाइए तो ऐसा नहीं कि अभी भैया सुबह 8:00 बजे ट्रेन पहुंचा, 10:00 बजे तक हम वहां नहाए, 12:00 बजे ट्रेन पकड़ के चले गए।
तीर्थ में कितना समय देना चाहिए, और जल में क्या करना चाहिए?
वहाँ एक रात बिताना, और जल में खड़े या बैठे जप
हम हमेशा कहते हैं, वक्ता कहते हैं, कि वहाँ एक रात बितानी चाहिए। तीर्थ क्षेत्र ऐसे मत जाइए कि सुबह 8 बजे ट्रेन पहुँची, 10 बजे तक नहाए, 12 बजे ट्रेन पकड़ी और चले गए। अगर सिर्फ़ नहाने जाते हैं, तो वह विशेष परिस्थिति है, अलग बात है; पर समय लेकर जाइए। कम से कम पहुँचकर नहाइए, और शरीर की सामर्थ्य के हिसाब से जल में बैठकर या खड़े होकर अपने आराध्य के मंत्रों का पूरी शक्ति से जप कीजिए — आधा घंटा, एक घंटा, पंद्रह मिनट, जितना हो सके। उसमें एक लघु पुरश्चरण हो जाए, क्योंकि फल कोटि-गुना माना गया है: हज़ार जप करें तो वह जप करोड़ के बराबर हो गया।
पर जीवन में जितनी बार हो सके, जाकर नहाइए, और वहाँ एक रात बितानी चाहिए — यह हम हमेशा कहते हैं, वक्ता कहते हैं। तीर्थ क्षेत्र जाइए, पर ऐसे नहीं कि भैया, सुबह 8 बजे ट्रेन पहुँची, 10 बजे तक नहाए, 12 बजे ट्रेन पकड़ी और चले गए। अगर सिर्फ़ नहाने जाते हैं, तो ठीक है, वह विशेष परिस्थिति की बात है; पर इतना समय लेकर जाइए। कम से कम: आज आप जा रहे हैं, पहुँच रहे हैं, तो नहाए, और शरीर की सामर्थ्य के हिसाब से वहाँ जल में बैठकर या खड़े होकर अपने आराध्य के मंत्रों का पूरी शक्ति से जप किया — आधा घंटा, एक घंटा, पंद्रह मिनट, जितना आपसे हो सके। उसमें एक लघु पुरश्चरण हो जाए, क्योंकि फल कोटि-गुना माना गया है। हज़ार जप करें, तो वह जप करोड़ के बराबर हो गया।
वो केवल नहाने के लिए जाइएगा तो ठीक है वो विशेष परिस्थिति का बात अलग है लेकिन इतना समय लेकर के जाइए क्या-क्या करना चाहिए, कम से कम आप आज जा रहे हैं, पहुंच रहे हैं तो स्नानादि किए हैं और अपने शरीर के सामर्थ्य के अनुसार वहां जल में बैठ कर के या खड़ा हो कर के यथाशक्ति अपने आराध्य के मंत्रों का जप किए हैं, आधा घंटा, एक घंटा, 15 मिनट जितना भी आपसे हो पाए। पुरश्चरण उसमें एक हो जाए लघु पुरश्चरण क्योंकि कोटि गुना फल माना गया है। अगर आप 1000 जप कर लेते हैं तो 1 करोड़ के बराबर वो जप हो गया। वो तो चलिए कैलकुलेशन का बात अलग है कितना पुण्य मिलता है लेकिन वो दिव्यतम कृपा होता है जिस समय आप त्रिवेणी जी में स्नान कर रहे होते हैं आपके पितृ पूर्वज अति प्रसन्न होते हैं।
त्रिवेणी में नहाने पर पितरों का क्या होता है?
पितर प्रसन्न, प्रेत-पिशाच शांत, कुल शक्ति की कृपा
कितना पुण्य मिलता है, इसकी गणना अलग बात है, वक्ता कहते हैं, पर यह सबसे दिव्य कृपा है: जिस समय आप त्रिवेणी जी में नहा रहे होते हैं, आपके पितर और पूर्वज बहुत प्रसन्न होते हैं। आपके नहाने से उनकी सद्गति होती है। कई पितर शांत हो जाते हैं। जिस भी रूप में मौजूद प्रेत-पिशाच शांत हो जाते हैं। घर के देव-पुत्र और देवी-पुत्र शांत हो जाते हैं। कुल शक्ति की कृपा मिलती है — और यह उसी समय होता है, जब आप वहाँ जाकर नहाते हैं।
कितना पुण्य मिलता है, यह गणना की बात है — पर यह सबसे दिव्य कृपा है, वक्ता कहते हैं, जिस समय आप त्रिवेणी जी में नहा रहे होते हैं: आपके पितृ और पूर्वज बहुत प्रसन्न होते हैं। आपके नहाने से उनकी सद्गति होती है। कई पितर हैं जो शांत हो जाते हैं। जिस भी तरह मौजूद प्रेत-पिशाच शांत हो जाते हैं। घर के देव-पुत्र और देवी-पुत्र शांत हो जाते हैं। कुल शक्ति की कृपा मिलती है; और यह उसी समय होता है, जब आप वहाँ जाकर नहाते हैं।
आपके स्नान करने से उनकी सद्गति होती है। कई सारे पितृ ऐसे जो हैं जो शांत हो जाते हैं। प्रेत पिशाच जो जो किसी प्रकार से उपस्थित हो अगर उनकी शांति हो जाती है। घर के देव पुत्र देवी पुत्र जो होते हैं वो शांत हो जाते हैं। कुल शक्ति कृपा प्राप्त होती है और वो उसी समय होता है जब आप वहां जाकर स्नान करते हैं। अब आप फट से गए तीनों डुबकी मार के फट से भाग गए तो वो तो आते-आते बोलेंगे अरे अरे अब पता चला कि आपके पितृ देव एक चले थे दूसरे वाले बोले रुको रुको हम एक काम करके आते हैं, बच्चा बाहर है उसको हम घर पहुंचा के आते हैं, इसका रक्षा करना है। आप उधर गए तीन डुबकी मारे और फट से निकल गए।
तीन डुबकी लगाकर तुरंत चल दें तो क्या होता है?
पितर जो पहुँचते हैं तो पाते हैं कि आप जा चुके
अब अगर आप जल्दी में गए, तीन डुबकी लगाई और तुरंत भाग गए, वक्ता कहते हैं, तो जो आ रहे हैं वे कहेंगे, अरे, अरे, अब पता चला — आपके पितृ देव; एक आगे चला गया था और दूसरे ने कहा, रुको, रुको, एक काम करके आते हैं, बच्चा बाहर है, उसे घर तक देख लें, उसकी रक्षा करनी है। आप वहाँ गए, तीन डुबकी लगाई और तुरंत निकल आए। अब यह देर से पहुँचता है; जो पहले पहुँचा वह कहता है, भाई, तुम देर से आए — क्यों देर हुई भाई? अरे, इसने डुबकी लगाई और तुरंत निकल गया; न जप किया, न तर्पण किया। तो वहाँ थोड़ा समय देना पड़ता है।
अब अगर आप जल्दी में गए, तीन डुबकी लगाई और तुरंत भाग गए, तो वे आते हुए कहेंगे, अरे, अरे, अब पता चला, वक्ता कहते हैं। आपके पितृ देव — एक आगे चला गया था, और दूसरे ने कहा, रुको, रुको, एक काम करके आते हैं; बच्चा बाहर है, उसे घर तक देख लें, उसकी रक्षा करनी है। आप वहाँ गए, तीन डुबकी लगाई और तुरंत निकल आए। अब यह देर से पहुँच रहा है। जो पहले पहुँचा वह कहता है, भाई साहब, आप देर से आए। क्यों देर हुई भाई? अरे, इसने तुरंत डुबकी लगाई और निकल गया; न जप किया, न तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। किया। तो वहाँ थोड़ा समय देना पड़ता है।
जो पहले पहुंचे होंगे भाई साहब आप लेट हैं। काहे लेट हैं भाई? अरे ये तो तुरंत डुबकी लगा के निकल गया थोड़ा जब तक भी नहीं किया, तर्पण भी नहीं किया। हो ना? तो थोड़ा समय देना है वहां पे। एटलीस्ट इतना होना चाहिए कि एक रात्रि वहां बीते।
तीर्थ में कम से कम कितना रुकने को वे कहते हैं?
कम से कम एक रात — नहीं तो भूतों का लाभ, पितर चूक जाते हैं
कम से कम इतना होना चाहिए, वक्ता कहते हैं, कि वहाँ एक रात बीते। नहीं तो भूत-प्रेत तर जाएँगे, और पितर पहुँचते ही रह जाएँगे; और भूत उनसे कहेगा कि यहाँ ऐसा ही होता है — तुरंत तीन डुबकी लगाओ और निकल जाओ। इसमें जो मिलना है, अरे, यह ठीक है कि गंगा जी को याद करने से यह पुण्य मिलता है; पर जब तक वहाँ थोड़ा भी नहीं करेंगे, तो क्या लाभ होगा?
कम से कम इतना होना चाहिए कि वहाँ एक रात बीते, वक्ता कहते हैं। नहीं तो जो भूत-प्रेत हैं वे तर जाएँगे, और पितर लोग पहुँचते ही रह जाएँगे; भूत उनसे कहेगा कि हमारे यहाँ ऐसा ही होता है। तुरंत तीन डुबकी लगाओ और निकल जाओ। इसमें जो मिलना है, अरे, यह ठीक है कि गंगा जी को याद करने से यह पुण्य मिलता है। पर जब तक वहाँ थोड़ा भी नहीं करेंगे, तो क्या लाभ होगा?
नहीं तो जो भूत प्रेत होंगे वो तर जाएंगे, पितृ लोग जो है आते रह जाएंगे, भूत उनको आने से बोलेगा हमारे यहां ऐसा ही होता है। तुरंत तीन डुबकी मारो निकलो जो मिलना है उसमें पुण्य अरे सही है कि गंगा जी का स्मरण करने से ये पुण्य मिलता है लेकिन जब तक वहां आप जब तक नहीं करते हैं थोड़ा सा भी तो फिर क्या ही लाभ होगा।
चंड-मुंड के वध का दावा करने वाले तीन स्थान क्यों हैं?
कल्प-भेद — अलग कल्पों में अलग स्थानों पर अलग स्वरूप
भगवती ने, वक्ता कहते हैं, अलग-अलग कल्पों में अलग-अलग स्वरूप धारण करके अलग-अलग स्थानों पर महिषासुर, रक्तबीज, चंड-मुंड और शुंभ-निशुंभ का वध किया। चंड और मुंड का वध करने वाली भगवती चामुंडा का स्थान आपको तीन जगह मिलेगा; तीनों जगह वे भगवती चामुंडेश्वरी, चामुंडा के नाम से प्रसिद्ध हैं। कहीं कहा जाता है कि इस टीले पर चंड-मुंड मारे गए, कहीं कि इस स्थान पर मारे गए। ऐसा नहीं कि यहाँ नहीं हुआ — यह कल्प-भेद के हिसाब से बात हो गई: कि इस कल्प में यहाँ हुआ।
भगवती ने अलग-अलग कल्पों में अलग-अलग स्वरूप धारण करके अलग-अलग स्थानों पर महिषासुर, रक्तबीज, चंड-मुंड और शुंभ-निशुंभ का वध किया, वक्ता कहते हैं। चंड और मुंड का वध करने वाली भगवती चामुंडा का स्थान आपको तीन जगह मिलेगा। तीनों जगह वे भगवती चामुंडेश्वरी, चामुंडा के नाम से प्रसिद्ध हैं। पर कहीं कहा जाता है कि इस टीले पर चंड-मुंड मारे गए, कहीं कि इस स्थान पर चंड-मुंड मारे गए। तो ऐसा नहीं कि यहाँ नहीं हुआ; यह कल्प-भेद के हिसाब से बात हो गई — कि इस कल्प में यहाँ हुआ।
शनेथनी सार्थक जी भगवती ने अलग-अलग कल्प में अलग-अलग स्वरूप को धारण करके अलग-अलग स्थानों पे महिषासुर, रक्तबीज, चंडमुंड, शुंभनिशुंभ सबका वध किया है। चंडमुंड का वध करने वाली भगवती चामुंडा उनका तीन जगह आपको स्थान प्राप्त होगा। तीनों जगह भगवती चामुंडेश्वरी चामुंडा के नाम से प्रख्यात हैं। लेकिन कि इस टीले पे चंडमुंड का वध हुआ था, कहीं पर है कि इस स्थान पे चंडमुंड का वध हुआ था। तो ऐसा नहीं है कि यहां नहीं हुआ ये कल्प भेद के अनुसार विषय हो गया। कि इस कल्प में यहां पर।
भगवती का कौन-सा विग्रह आज भी खप्पर मुद्रा में है?
विंध्य पर्वत पर विराजमान रक्तबीज-वध वाला स्वरूप
जैसा आप देखते हैं, वक्ता कहते हैं: रक्तबीज का वध करने वाली भगवती — उनका एक स्वरूप विंध्य पर्वत पर भी विराजमान है, जो आज भी पूरे विश्व में — भारतवर्ष छोड़िए — पूरे विश्व में अकेला विग्रह है जिसमें भगवती आज भी खिचड़ी मुद्रा में हैं। रक्त पीते हुए मुद्रा कैसी होगी, मुँह कैसा होगा: जब भी भगवती काली रक्त पीने को खप्पर उठाती हैं, मुँह ऊपर की ओर रहता है, यानी वे खिचड़ी मुद्रा में चली जाती हैं। तो वह मूल स्वरूप वहाँ मौजूद है। ऐसा नहीं कि आप महाराष्ट्र का जो बता रहे हैं वह ग़लत है — दोनों अपनी जगह हैं; बस कल्प अलग हो गया है।
जैसा आप देखते हैं, वक्ता कहते हैं: रक्तबीज का वध करने वाली भगवती — उनका एक स्वरूप विंध्य पर्वत पर भी विराजमान है। जो आज भी पूरे विश्व में — भारतवर्ष छोड़िए, पूरे विश्व में — अकेला विग्रह है जिसमें भगवती आज भी खिचड़ी मुद्रा में हैं। रक्त पीते हुए मुद्रा कैसी होगी, मुँह कैसा होगा: जब भी भगवती काली रक्त पीने को खप्पर उठाती हैं, मुँह ऊपर रहता है, यानी वे खिचड़ी मुद्रा में चली जाती हैं। तो वह मूल स्वरूप वहाँ मौजूद है। तो ऐसा नहीं कि आप महाराष्ट्र का जो बता रहे हैं वह ग़लत होगा; दोनों अपनी-अपनी जगह हैं। बस कल्प अलग हो गया है।
जैसे कि आप देखिए भगवती जो है रक्तबीज का वध किए हैं तो एक स्वरूप विंध्य पर्वत पे भी विराजमान है। जो कि आज भी पूरे संसार में भारतवर्ष में छोड़िए पूरे संसार में एकमात्र वही विग्रह है जिसमें भगवती आज भी खिचड़ी मुद्रा में है। तो रक्त रक्त का पान करते हुए विषय कैसा रहेगा, मुख कैसा रहेगा कभी भी रक्तपान करने के लिए खप्पर जो उठाती हैं भगवती काली तो मुख ऊपर की ओर रहता है यानी खिंचड़ा मुद्रा में चली जाती हैं। तो एकदम मूल वो स्वरूप वहां विद्यमान है। तो ऐसा थोड़ी है कि आप महाराष्ट्र का जो विषय बता रहे हैं वो गलत होगा या ये दोनों अपने जगह में है। बस कल्प अलग-अलग हो गया है।
क्या अर्गला का पहला मंत्र कुलदेवी को समर्पित कर सकते हैं, और अभिषेक में कौन-सा जल लें?
अर्गला कुलदेवी के लिए, और हैंडपंप न हो तो आरओ का जल
बिल्कुल, वक्ता कहते हैं: अर्गला के पहले मंत्र का जप अपनी कुलदेवी के लिए समर्पित कर सकते हैं। विद्यासागर जी लिखते हैं कि वे दिल्ली में रहते हैं, जहाँ सप्लाई का पानी आता है और आरओ लगा है, और पूछते हैं कि अभिषेक में कौन-सा जल लें, क्योंकि हैंडपाइप नहीं है, सबमर्सिबल लगा है — वक्ता कहते हैं कि आरओ का जल लें तो ज़्यादा उत्तम होगा।
बिल्कुल, वक्ता कहते हैं: अर्गला के पहले मंत्र का जप अपनी कुलदेवी के लिए समर्पित कर सकते हैं। विद्यासागर जी, आपने लिखा है कि आप दिल्ली में रहते हैं, सप्लाई का पानी आता है और आरओ भी लगा है, और पूछा है कि अभिषेक में कौन-सा जल लें; कि हैंडपाइप नहीं है, पर सबमर्सिबल लगा है। ऐसा है, वे कहते हैं: आरओ का जल लें, तो ज़्यादा उत्तम होगा।
बिल्कुल अर्गला का प्रथम मंत्र का जाप अपने कुल देवी के निमित्त समर्पित कर सकते हैं। विद्यासागर जी आपने लिखा है दिल्ली में रहते हैं सप्लाई का पानी आता है, आरओ भी लगा है, अभिषेक के लिए कौन सा जल प्रयोग करें, हैंड पाइप नहीं लगा है। लेकिन समर सेबल लगा है। ऐसा है कि आरओ का पानी अगर आप यूज करें तो ज्यादा उत्तम रहेगा।
क्या साधक को कुंभ में त्रिवेणी के पास ठहरने की जगह ढूँढ़नी चाहिए?
उस भीड़ में साधना नहीं हो पाएगी — अपना आश्रय ख़ुद देखें
त्रिवेणी के पास निवास और साधना के लिए, वक्ता प्रश्नकर्ता से कहते हैं, आश्रय का विकल्प आप ख़ुद देखें तो ज़्यादा उत्तम होगा — क्योंकि इस भीड़ के मामले में साधना हो ही नहीं पाएगी। बहुत लोगों ने अपनी पूरी बात डाल दी है कि आइए, बिल्कुल रुकिए, कोई दिक्कत नहीं; पर वहाँ इतने लोग पहुँचेंगे कि जगह कहाँ होगी? हम किसी को बुला लें और फिर कुछ हो ही न पाए।
अब तक, त्रिवेणी के पास निवास और साधना के लिए, आश्रय का विकल्प आप ख़ुद देखें; ज़्यादा उत्तम होगा, वक्ता कहते हैं। क्योंकि इस भीड़ के मामले में साधना हो ही नहीं पाएगी। बहुत सारे लोगों ने अपनी पूरी बात डाल दी है — आइए, बिल्कुल रुकिए, कोई दिक्कत नहीं। पर वहाँ इतने लोग पहुँचेंगे कि जगह कहाँ होगी? हम किसी को बुला लें और फिर कुछ हो ही न पाए।
आदेश कारवी जी अभी तक तो त्रिवेणी के समीप निवास के हेतु और साधना के हेतु आश्रय का आप देखिए विकल्प स्वयं से तो ज्यादा उत्तम रहेगा। क्योंकि जो ये भीड़ वाला विषय है उसमें साधना हो नहीं पाएगा। बहुत सारे लोग अपना पूरा विषय डाले हैं कि आइए बिल्कुल रहिए कोई समस्या नहीं लेकिन इतने सारे लोग वहां पहुंचेंगे कि वहां हो कहां से पाएगा। हम बुला ले और फिर कुछ हो ना पाए। क्योंकि हम पहले भी बोले कि इतना महंगा इस बार है। सरकारी क्षमा जो है वो देखिए ना 18-18 और 20-20 हजार रुपए एक-एक दिन का ले रहा है। मतलब पहले का दस गुना अधिक जो है दाम रखा गया है। आप वीआईपी हैं किसी आप वीआईपी से जान पहचान है तब तो चलिए चल जाएगा आपका काम फ्री में भी लोग दे ही देंगे।
तेरह वर्ष से कम उम्र में हुए अपराध का क्या दोष लगता है?
तेरह से कम में दोष नहीं, और हुआ हो तो प्रायश्चित्त
अगर यह अपराध तेरह वर्ष से कम उम्र में हुआ है, तो इसका कोई दोष नहीं, वक्ता कहते हैं; इसकी चिंता मत कीजिए। और अगर अपराध हुआ है, तो प्रायश्चित्त के लिए फिर से स्नान कीजिए और परिक्रमा कीजिए; उससे, और उनसे क्षमा याचना करने से, क्षमा ज़रूर मिलेगी।
अगर यह अपराध तेरह वर्ष से कम उम्र में हुआ है, तो इसका कोई दोष नहीं, वक्ता कहते हैं। उसकी चिंता मत कीजिए। और अगर अपराध हुआ है, तो प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। के लिए फिर से स्नान कीजिए और परिक्रमा कीजिए; और उससे, और उनसे क्षमा याचना करने से, क्षमा ज़रूर मिलेगी।
नहीं तो हमारे आपके जैसे सामान्य लोग रहे तो भाई पैसा का खेल है फिर। ये टूरिस्ट प्लेस बनाया है ना, डूम सिटी बनाया देख रहे थे ना वीडियो शेयर किए हैं फेसबुक पे। डूम सिटी के नाम से एक नया प्रयाग जी में अपने त्रिवेणी क्षेत्र में बनाया गया है। कितने आप फुट हाइट के ऊपर में शीशा का पूरा आपका लॉबी जैसा रहेगा उसमें से बैठ के आप मेला देखेंगे। एक दिन का 80000 से लेकर 1.5 लाख रुपए तक का उसका फीस है, एक दिन का। तो आप इससे समझ सकते हैं कि ये कोई आध्यात्मिक विषय नहीं रह गया है, आध्यात्मिक विषय आपके और हमारे जैसे लोगों के लिए है कि हम लोग चाह रहे हैं कि भाई कैसे भी रहने मिल जाए। अब इसके लिए स्ट्रगल चल रहा है। वो रहना भी पॉसिबल सही से नहीं हो पा रहा है। भागाभागी चल रहा है कि अरे रहेंगे कि साधना का क्षेत्र रहेगा कि अनुष्ठान कैसे किया जाएगा वो अभी। आज सब क्लियर हो गया है हालांकि। तो अभी उतना। लेकिन जिनके पास पैसा है वो क्या कर रहे हैं? वो जा रहे हैं एंजॉय करने के लिए ट्रिप। कुंभ ट्रिप चल रहा है अभी डोम सिटी से। तो किसी से आप अगर संपर्क कर सकें तो अति उत्तम रहेगा। फ्लैट लेने के लिए कि भाई कितना फ्लैट-व्लैट अगर लिया जाए आसपास में तो नॉर्मली कितना होना चाहिए 2 बीएचके का 10000, 15000 जिस स्तर का बना हुआ है अगर। भाई ₹40000 अभी जनवरी-फरवरी मार्च तक। यानी कि ₹120000 2 बीएचके का अगर आप त्रिवेणी जी के पास में ले रहे हैं तो। बहुत कम में जाएगा तो 30000 से 32000 से कम नहीं है। मतलब एक दिन का ₹1000 होटल के अनुसार और होटल में जाए तो एक दिन का 5000। अभी आग लगा पड़ा हुआ है। कमाने का सीजन है भाई, कमाएंगे नहीं क्या? बाकी लूटने वाले तो केवल पंडित जी लोग हैं। पंडित जी लोग लूट लेते हैं, ब्राह्मण लूट लेते हैं। ये फ्लैट वाले और ये जितने सरकार जो खेमे बनाई हैं कुंभ जी में जा के जो टेंट में रहना है। ये तो पुण्य का काम कर रहे हैं कि एक दिन का 18-18, 20-20 हजार रुपया लेकर के। लूटने का काम तो हम लोग करते हैं जिसमें एक-एक दिन का ₹100-100, ₹1000-1000 अनुष्ठान का ले लेते हैं। कि भैया अनुष्ठान में ये होगा वो होगा। बाकी ये लोग पुण्य का काम करते हैं इसमें थोड़ी कुछ होगा। 13 वर्ष से कम आयु में अगर ये अपराध हुआ है तो उसका कोई दोष नहीं है। उसके लिए निश्चिंत रहें। और अपराध हो गया प्रायश्चित के निमित्त पुनः स्नान आदि करके आप परिक्रमा कर लें। उससे उनको और क्षमा याचना कर लें तो अवश्य क्षमा मिल जाएगा।
घर में नर्मदेश्वर की सेवा कैसे करें?
रोज़ स्नान और श्रृंगार, सिर पर मुकुट
नर्मदेश्वर जी, वक्ता उस प्रश्नकर्ता से कहते हैं जो उन्हें लाना चाहते हैं: बिल्कुल लाइए और सेवा कीजिए। उनका रोज़ स्नान और श्रृंगार हो, और सिर पर, शीश पर मुकुट ज़रूर हो।
नर्मदेश्वर जी, आप लाना चाहते हैं, वक्ता कहते हैं — बिल्कुल लाइए और सेवा कीजिए। उनका रोज़ स्नान और श्रृंगार हो, और सिर पर, शीश पर मुकुट ज़रूर हो।
मां विंध्यवासिनी का तो बनाया हुआ है। मां विंध्यवासिनी का मंत्र का भी एक वीडियो डाल चुके हैं इस नवरात्रि में। आप देख सकते हैं आप तो ऑलरेडी मेंबर मेंबरशिप आप लिए हुए हैं आपको मिल जाएगा वीडियो चैनल पे भगवती का। पूरा बृहद विधि दिए हैं पूरा विनियोग न्यास देव विधान आदि के साथ। नर्मदेश्वर जी आप लाना चाह रहे हैं बिल्कुल ला के सेवा कीजिए नित्य स्नान और श्रृंगार होना चाहिए उनका और सर पे शीश पे मुकुट अवश्य होना चाहिए। ग्रेस ऑफ पीतांबरा कोई भी माला कवच आदि जिसमें केवल कामाख्या जी, प्रतिंगरा जी, अघोर काली आदि जो कवच आदि हैं। जो कि स्त्री तत्व और जिस मतलब कि उग्र शक्तियों से युक्त हैं जो।
महिलाएँ कौन-से कवच हर समय पहन सकती हैं?
कामाख्या, प्रत्यंगिरा और अघोर काली — स्त्री तत्व वाली उग्र शक्तियाँ
कोई भी माला या कवच जिसमें सिर्फ़ कामाख्या जी, प्रत्यंगिरा जी, अघोर काली जैसी हों — जो स्त्री तत्व से, यानी उग्र शक्तियों से युक्त हैं — वे आप हमेशा पहन सकती हैं, वक्ता कहते हैं। पुरुष तत्व से जुड़े, अघोर स्वरूप वाले पहने जा सकते हैं, पर बाद में उनका शुद्धिकरण वगैरह करना चाहिए। और उचित होगा कि महिलाएँ, जितनी माताएँ-बहनें हैं, भगवती कामाख्या के ही कवच का जप करें और उसे धारण करें।
कोई भी माला, कवच वगैरह जिसमें सिर्फ़ कामाख्या जी, महाप्रत्यंगिरा जी, अघोर काली जैसी हों — वे कवच, वक्ता कहते हैं। जो स्त्री तत्व से, यानी उग्र शक्तियों से युक्त हैं — वे आप हमेशा पहन सकती हैं। पुरुष तत्व से जुड़े, अघोर स्वरूप वाले पहने जा सकते हैं, पर बाद में उनका शुद्धिकरण वगैरह करना चाहिए। और उचित होगा कि महिलाएँ, जितनी माताएँ-बहनें हैं, भगवती कामाख्या के ही कवच का जप करें और उसे धारण करें।
उनको आप हमेशा धारण कर सकती हैं। पुरुष तत्व से संबंधित हैं अघोर स्वरूप से तो धारण करें लेकिन बाद में फिर उनका शुद्धिकरण आदि कर लें। और उचित होगा कि स्त्री जो हैं जितनी भी माताएं बहने हैं वो भगवती कामाख्या के कवच को ही जप करें और धारण करें। दस महाविद्या से युक्त हैं उनमें फिर रजस्वला आदि का कोई दोष नहीं। और रजस्वला की स्थिति में अगर आप कामाख्या कवच का जप बिना पूजन स्थान पर बैठे हुए, पूजन स्थान पर नहीं जाना है, पूजन स्थान को छूना नहीं है, कोई दीपक आदि नहीं।
रजस्वला में कामाख्या कवच के जप के क्या नियम हैं?
अलग बैठें, पूजा स्थान नहीं, दीपक नहीं, बाकी मालाएँ उतारें
जो दस महाविद्या से युक्त हैं, वक्ता कहते हैं, उन्हें फिर रजस्वला वगैरह का दोष नहीं। और रजस्वला अवस्था में, अगर पूजा स्थान पर बैठे बिना कामाख्या कवच का जप करें — पूजा स्थान पर नहीं जाना, पूजा स्थान को नहीं छूना, दीपक वगैरह नहीं — अपना दूसरा पूरा आसन वगैरह रखें, जहाँ दिक्कत न हो वहाँ सुखासन में आराम से बैठें, और कामाख्या कवच का जप कर सकती हैं। यह सबसे दिव्य प्रभाव देगा। पर पूजा स्थान पर जाकर, या विग्रह छूकर और दीपक जलाकर नहीं करना है। रक्षा माला के बारे में: कोई दूसरी माला उस समय उतार दें और बाद में शुद्ध होकर फिर पहनें; और पहनी भी रहे, तो उस समय उसे दुग्ध स्नान कराना पड़ेगा।
जो दस महाविद्या से युक्त हैं, उन्हें फिर रजस्वला वगैरह का दोष नहीं, वक्ता कहते हैं। और रजस्वला अवस्था में, अगर पूजा स्थान पर बैठे बिना कामाख्या कवच का जप करें — पूजा स्थान पर नहीं जाना, पूजा स्थान को नहीं छूना, दीपक वगैरह नहीं — अपना दूसरा पूरा आसन वगैरह रखें; जहाँ दिक्कत न हो वहाँ सुखासन में आराम से बैठें, और कामाख्या कवच का जप कर सकती हैं। यह सबसे दिव्य प्रभाव देगा। पर पूजा स्थान पर जाकर, या विग्रह छूकर और दीपक जलाकर नहीं करना है। और जहाँ तक रक्षा माला की बात है, कोई दूसरी माला उस समय उतार दें और बाद में शुद्ध होकर फिर पहनें; पहनी भी रहे, तो उस समय उसे दुग्ध स्नान कराना पड़ेगा।
आप अपने अन्य एक पूरा रखिए आसन आदि। आराम से सुखासन में बैठ कर के जहां आपको कोई दिक्कत ना हो और आप कामाख्या कवच का जप कर सकते हैं। वो दिव्यतम प्रभाव देगा लेकिन पूजन स्थान पर जाकर के या विग्रह आदि को स्पर्श करके दीपक जला के नहीं करना है। और रक्षा माला का जहां तक विषय रहा कोई भी अन्य माला आदि हो तो वो उस समय उतार दें बाद में पुनः शुद्ध होने के बाद पहन लें। ऐसे भी अगर पहनते हैं तो फिर उस समय आपको दुग्ध स्नान आदि कराना पड़ेगा।
पार्वती रूप में पूजे जा रहे पंचमुखी रुद्राक्ष का विसर्जन करें?
विसर्जन तभी, जब वह टूट जाए
जब आप पंचमुखी रुद्राक्ष की पूजा भगवती पार्वती के स्वरूप में कर ही रहे हैं, तो उनका विसर्जन क्यों करना चाहते हैं, वक्ता पूछते हैं। अगर वे टूट गए हों, तो विसर्जन कीजिए। नहीं टूटे, तो पूजन में रहने दीजिए; विसर्जन क्यों करना? दो साल की मेहनत, और आप उसका विसर्जन करना चाहते हैं।
अभिषेक कुमार झा जी, जब आप पंचमुखी रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की पूजा भगवती पार्वती के स्वरूप में कर ही रहे हैं, वक्ता कहते हैं — तो उनका विसर्जन क्यों करना चाहते हैं? अगर वे टूट गए हों, तो विसर्जन कीजिए। नहीं टूटे, तो पूजन में रहने दीजिए; विसर्जन क्यों करना? दो साल की मेहनत, और आप उसका विसर्जन करना चाहते हैं।
वाइफ द्वारा कोर्ट केस से पीड़ित हो। उपाय साधना तो चैनल पर बहुत सारा है आप कौन सा करेंगे वो देखिए। बड़ा अजीब सा विषय चल रहा है लेकिन ये पूरे भारत में सनातनीयों के साथ में। हर तीसरा चौथा व्यक्ति इसी प्रकार से पीड़ित है। अभिषेक कुमार झा जी जब आप पांच मुखी रुद्राक्ष को भगवती पार्वती के स्वरूप में पूजा कर ही रहे हैं। तो क्यों उनको विसर्जन करना चाहते हैं? अगर वो खंडित हुए हैं तो विसर्जन करिए। नहीं खंडित हैं तो पूजन में रहने दीजिए क्यों विसर्जन करना है? दो साल का मेहनत आपको विसर्जन करना है। जालेश्वर जी नवाल जी हर हर महादेव।
कुंभ में यात्रा करनी पड़े और भोजन की शुद्धता न रह पाए तो क्या करें?
शुद्धता की कोशिश करें; जहाँ शुद्ध शाकाहारी भोजन मिले वहाँ खाएँ
हाँ, वक्ता कहते हैं: अगर देश, काल और परिस्थिति के हिसाब से कुंभ के समय या किसी पर्व-काल में यात्रा करनी पड़े, अगर आपकी नौकरी ऐसी है, तो खान-पान की शुद्धता नहीं रह पाती। कोशिश ज़रूर कीजिए कि शुद्धता रहे। अच्छी जगह खाइए जहाँ शुद्ध शाकाहारी भोजन मिले। यह कोशिश ज़रूर कीजिए। कोई विकल्प न हो तो अलग बात है; पर विकल्प मिले, तो जितना शुद्ध हो सके उतना भोजन कीजिए।
हाँ — अगर देश, काल और परिस्थिति के हिसाब से कुंभ के समय, या किसी पर्व-काल में यात्रा करनी पड़े, अगर आपकी नौकरी ऐसी है, वक्ता कहते हैं, तो खान-पान की शुद्धता नहीं रह पाती। कोशिश ज़रूर कीजिए कि शुद्धता रहे। अच्छी जगहों पर खाइए जहाँ शुद्ध शाकाहारी भोजन मिले। यह कोशिश ज़रूर कीजिए। कोई विकल्प न हो, तो अलग बात है; पर विकल्प मिले, तो जितना शुद्ध हो सके उतना भोजन कीजिए।
हां अगर देश काल परिस्थिति के अनुसार आप कुंभ के समय या कोई भी पर्व काल में आपको ट्रेवल करना है आपकी नौकरी वैसी है। तो खानपान की शुद्धता नहीं रह पाती है। कोशिश कीजिएगा कि शुद्धता रहे। अच्छे जगह में खाएं जहां शुद्ध शाकाहारी भोजन मिलता हो। ये प्रयास कीजिएगा। विकल्प नहीं है तब तो बात अलग है लेकिन विकल्प अगर मिल जाए तो जितना शुद्ध हो सके उतना शुद्ध खाना खाइए।
मज़ार जाने के अगले दिन कुलदेवी ने आवेशित होकर सामूहिक पिटाई की
अगले दिन कुलदेवी का आवेशित होकर सामूहिक पिटाई करना
एक श्रोता लिखते हैं कि कोई मज़ार पर गया था और अगले दिन कुलदेवी ने आवेशित होकर उसकी सामूहिक पिटाई की। बहुत अच्छा, वक्ता कहते हैं; ऐसी प्रसादी मिलना चाहिए।
लिखा है, वक्ता पढ़ते हैं, कि कोई मज़ार पर गया था, और अगले दिन कुलदेवी ने आवेशित होकर सामूहिक पिटाई की। बहुत अच्छा, वे कहते हैं; ऐसी प्रसादी मिलना चाहिए।
अभिनव चंदन जी देखिए अभिनव चंदन जी जो हैं वो एक बहुत ही अच्छे साधक हैं भगवती के और बहुत उग्र पीठ पर जाकर साधना करते हैं। ऊपर से हिमाचल क्षेत्र के हैं पहाड़ी इलाके की तंत्रों के विषय में बहुत अच्छा जानकारी रखते हैं। अब अभिनव चंदन जी के पास मैसेज आना शुरू होगा। भैया झाड़ फूंक मत करिएगा बस। लिखे हैं कि मजार में कोई गया था और अगले दिन कुलदेवी आवेशित होकर के सामूहिक रूप से कुटाई कर दी। बहुत अच्छा ऐसा प्रसादी मिलना चाहिए। वैसे भी जो पहाड़ी क्षेत्र की शक्तियां अधिकतम कुल शक्ति के रूप में पूजित हैं अधिकतर जो है सिद्धि योगिनियां हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों की शक्तियाँ कैसी होती हैं?
ज़्यादातर कुल शक्ति रूप में पूजी जाने वाली सिद्ध योगिनियाँ — जल्दी क्रोध, शत्रु-नाश में तेज़
वैसे भी, वक्ता कहते हैं, पहाड़ी क्षेत्र की शक्तियाँ, जो ज़्यादातर कुल शक्ति के रूप में पूजी जाती हैं, ज़्यादातर सिद्ध योगिनियाँ हैं। बहुत सामर्थ्यवान, और — क्रूर कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वे तुरंत क्रोधित होती हैं, यह सच्ची बात है। प्रसन्न भी होंगी; और शत्रुओं के नाश में उनका प्रभाव सबसे आगे है। यह भी सच्ची बात है। पर अगर ग़लती हो गई, तो फिर तो।
वैसे भी, पहाड़ी क्षेत्र की शक्तियाँ, जो ज़्यादातर कुल शक्ति के रूप में पूजी जाती हैं, ज़्यादातर सिद्ध योगिनी हैं, वक्ता कहते हैं। बहुत सामर्थ्यवान, और — क्रूर कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वे तुरंत क्रोधित होती हैं, यह सच्ची बात है। प्रसन्न भी होंगी; और शत्रुओं के नाश में उनका प्रभाव सबसे आगे है। यह भी सच्ची बात है। पर अगर ग़लती हो गई, तो फिर तो।
बहुत सामर्थ्यवान और बहुत अति मतलब अगर क्रूर बोला जाए तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्रोधित तो तुरंत होती हैं ये बात तो सत्य है। प्रसन्न भी होंगी वैसी प्रभाव शत्रु नाश में तो आदित्य। ये भी सत्य बात है। लेकिन अगर गलती रहा तब तो बड़ी दुर्गा का बहुत सुंदर मूर्ति बनती क्या कुछ बता सकते हैं उनकी दिव्यता आपको मालूम है क्या ऐसे मेरी दादी जी पूछ रही हैं।
मुंगेर में भगवती कितने रूपों में विराजमान हैं?
बड़ी दुर्गा महारानी और भगवती चंडिका
भगवती मुंगेर की भवानी, बड़ी दुर्गा महारानी — उनकी सेवा हम भी रोज़ करते हैं, वक्ता कहते हैं; मुंगेर वाली माई की महिमा बहुत बड़ी है। मुंगेर में भगवती के स्थान पर माँ दो स्वरूपों में विराजमान हैं: एक में भगवती बड़ी दुर्गा महारानी का स्वरूप जो आप देखते हैं, और दूसरा भगवती चंडिका। वहाँ दोनों स्वरूपों का पूजन होता है। चंडिका का स्वरूप साल भर पूजित रहता है, और मुंगेर की भवानी का श्रृंगार स्वरूप हम ख़ासकर नवरात्रि के समय देखते हैं।
बिल्कुल, वक्ता कहते हैं: भगवती मुंगेर की भवानी, बड़ी दुर्गा महारानी — उनकी सेवा हम भी रोज़ करते हैं। मुंगेर वाली माई की महिमा बहुत बड़ी है। मुंगेर में भगवती के स्थान पर माँ वहाँ दो स्वरूपों में विराजमान हैं। एक में आप भगवती बड़ी दुर्गा महारानी का स्वरूप देखते हैं, और दूसरा भगवती चंडिका है। वहाँ दोनों स्वरूपों का पूजन होता है। चंडिका का स्वरूप पूरे साल पूजित रहता है, और मुंगेर की भवानी का श्रृंगार स्वरूप हम ख़ासकर नवरात्रि के समय देखते हैं।
बिल्कुल सुखी सहाय जी भगवती मुंगेर की भवानी बड़ी दुर्गा महारानी बहुत उनकी सेवा नित्य हम भी करते हैं। माई की अत्यंत महिमा है मुंगेर में। मुंगेर में जो भगवती का वो स्थान है दो स्वरूप में मां वहां विद्यमान है। एक में भगवती जो बड़ी दुर्गा महारानी का स्वरूप आप देखते हैं और दूसरी है भगवती चंडिका। दोनों स्वरूप का वहां पर पूजन होता है। चंडिका का स्वरूप पूरे वर्ष भर पूजित रहती हैं और मुंगेर की भवानी का जो श्रृंगारिय स्वरूप होता है वो केवल हम लोग नवरात्रि के समय विशेष करके देखते हैं। तंत्रोक्त विधि विधान में मुंगेर में जो बड़ी दुर्गा महारानी हैं अगर उनका पूजन किया जाए तो
मुंगेर में उनका तंत्रोक्त स्वरूप क्या है?
अठारह भुजाओं वाली माई, और वह नियम जिसका उल्लंघन वे नहीं होने देतीं
अगर तंत्रोक्त विधि-विधान में मुंगेर की बड़ी दुर्गा महारानी की पूजा हो — तंत्रोक्त स्वरूप में जाएँ — तो वे अठारह भुजाओं वाली माई हैं। बाकी जो स्वरूप आप सार्वजनिक रूप से देखते हैं, वह देख ही रहे हैं। और वहाँ विसर्जन को लेकर एक बात प्रसिद्ध है, वक्ता कहते हैं, जिसके वीडियो यूट्यूब पर मिलते हैं: जिसमें नियम की अवहेलना वे स्वीकार नहीं करतीं। ऐसा है, और उनकी महिमा सचमुच अनंत है।
तंत्रोक्त विधि-विधान में, अगर मुंगेर की बड़ी दुर्गा महारानी की पूजा हो, वक्ता कहते हैं — तंत्रोक्त स्वरूप में जाएँ, तो वे अठारह भुजाओं वाली माई हैं। और बाकी, जो स्वरूप आप सार्वजनिक रूप से देखते हैं, वह आप देख ही रहे हैं। वहाँ विसर्जन को लेकर एक विषय प्रसिद्ध है — उसके वीडियो आपको यूट्यूब पर भी मिलेंगे — जिसमें नियम की अवहेलना वे स्वीकार नहीं करतीं। ऐसा है, और उनकी महिमा सचमुच अनंत है।
तंत्रोक्त स्वरूप में अगर जाया जाए तब वो 18 भुजा वाली माई। और बाकी तो जो स्वरूप आप सार्वजनिक रूप से देख वो देख ही रहे हैं। वहां का जो एक विषय प्रसिद्ध है विसर्जन को लेकर के। हालांकि आपको YouTube पर भी वो वीडियो सब मिल जाएगा। जिसमें नियम का अवहेलना वो नहीं मानती हैं। यह बात तो है और उनकी महिमा सत्य में अनंत है। बहुत ही विकटतम परिस्थिति में यह मेरा अपने जीवन का अनुभव है। सबसे निकृष्ट समय में जो सबसे कठिन समय का निकृष्ट समय नहीं होता है कुछ भी कठिन समय जिसमें बहुत अधिक विषय आदमी दिक्कत में हो।
उनके अपने जीवन के सबसे कठिन समय में उन्होंने प्रत्यक्ष चमत्कार दिया
सबसे कठिन समय में साधकों के लिए प्रत्यक्ष चमत्कार
सबसे कठिन परिस्थितियों में — यह, वक्ता कहते हैं, उनके अपने जीवन का अनुभव है। सबसे बुरे समय में, सबसे कठिन समय में, जिसमें आदमी बहुत बड़ी परेशानी में होता है: उस समय, कहा जाए तो, भगवती मुंगेर की भवानी हम जैसे साधकों के लिए प्रत्यक्ष चमत्कार हैं; हमने देखा है। कैसे माई एक पुकार पर सुनती हैं। उनका नाम बड़ी दुर्गा महारानी यूँ ही नहीं है, वे कहते हैं; वे सचमुच बड़ी दुर्गा हैं।
सबसे कठिन परिस्थितियों में — यह हमारे अपने जीवन का अनुभव है, वक्ता कहते हैं। सबसे बुरे समय में, सबसे कठिन समय में, जिसमें आदमी बहुत बड़ी परेशानी में होता है: उस समय, कहा जाए तो, भगवती मुंगेर की भवानी हम जैसे साधकों के लिए प्रत्यक्ष चमत्कार हैं; हमने देखा है। कैसे माई एक पुकार पर सुनती हैं। उनका नाम यूँ ही नहीं दिया गया — बड़ी दुर्गा महारानी। वे सचमुच बड़ी दुर्गा हैं।
उस समय में भगवती मुंगेर की भवानी का अगर कहा जाए तो साक्षात चमत्कार हम जैसे साधकों के लिए वो हमने देखा है। माई एक पुकार पर कैसे सुनती हैं। उनका नाम ऐसे ही नहीं पड़ा है बड़ी दुर्गा महारानी। वो है ही बड़ी दुर्गा। और तंत्र का एक और विषय बता दें। स्पष्टता के साथ में कि पूरे तंत्र के जो नियम होते हैं नियमावली नियमावली है। जिसमें कि कहा गया है कि हर शक्ति हर उपशक्ति जो होती हैं उपदेवता जो होते हैं किसी ना किसी बड़ी शक्ति के नीचे होते हैं।
शक्तियों के क्रम के बारे में तंत्र का नियम क्या है?
हर उपशक्ति किसी बड़ी शक्ति के अधीन — और छप्पन ब्रह्मराक्षस
तंत्र की एक और बात साफ़-साफ़ बताते हैं, वक्ता कहते हैं: तंत्र की पूरी नियमावली में कहा गया है कि हर शक्ति, हर उपशक्ति, और जो उपदेवता हैं, वे किसी बड़ी शक्ति के अधीन हैं; उन पर किसी का स्वामित्व है। इनमें जो छप्पन तरह के ब्रह्मराक्षस बताए गए हैं — उन छप्पन तरह के ब्रह्मराक्षसों का आधिपत्य मुख्य रूप से एक स्वरूप का माना गया है, और वह है मुंगेर वाली बड़ी दुर्गा महारानी। पर वहाँ उनका पूजन उस स्वरूप में साक्षात हो रहा है; बाकी क्षेत्रों में उनका स्वरूप मौजूद है।
तंत्र का एक और विषय साफ़-साफ़ बताते हैं, वक्ता कहते हैं: कि तंत्र की पूरी नियमावली में, तंत्र के नियमों में, कहा गया है कि हर शक्ति, हर उपशक्ति जो है, और जो उपदेवता हैं, वे किसी बड़ी शक्ति के अधीन हैं; उन पर कोई स्वामित्व रखने वाला है। इनमें जो छप्पन तरह के ब्रह्मराक्षस बताए गए हैं — उन छप्पन तरह के ब्रह्मराक्षसों पर जो आधिपत्य माना गया है — उसका एक मुख्य स्वरूप मुंगेर वाली बड़ी दुर्गा महारानी हैं। पर वहाँ उनका पूजन उस स्वरूप में साक्षात हो रहा है; बाकी क्षेत्रों में उनका स्वरूप मौजूद है।
कोई उनका एक स्वामित्व को धारण करने वाला होता है। उसमें 56 प्रकार के जो ब्रह्म राक्षस बताए गए हैं। उन 56 प्रकार के ब्रह्म राक्षसों का जो आधिपत्य है जो माना गया है। उसका एक प्रमुख स्वरूप है बड़ी दुर्गा महारानी जो मुंगेर वाली हैं। लेकिन वहां पर उनका भौतिक रूप से उस स्वरूप में पूजन हो रहा है। बाकी के क्षेत्र में उनका स्वरूप उपस्थित होता है। कोई भी अगर भगवत का या तांत्रिक क्षेत्र में इस प्रकार के स्वरूपों का पूजन करता है तो। इनके स्वरूप की प्रचंडता इतनी है कि चाहे कोई भी ब्रह्म हो, कितनी भी बड़ी ब्रह्म शक्ति हो। चाहे वो खूनी ब्रह्म हो सामान्य हो। यानी सबसे उग्रतम शक्ति की बात की जा रही है। इनके नाम पर तुरंत मानता है। इनका स्वरूप ही इतना भव्य है कि उसे मानना पड़ता है।
कितना भी बड़ा ब्रह्म हो, उस स्वरूप के नाम पर झुक जाता है
सबसे उग्र ब्रह्म भी उनके नाम पर झुक जाता है
अगर कोई दिव्य या तांत्रिक क्षेत्र में ऐसे स्वरूपों की उपासना करे, तो उनके स्वरूप की उग्रता इतनी है कि कोई भी ब्रह्म हो, कितनी भी बड़ी ब्रह्म शक्ति — चाहे खूनी ब्रह्म हो या साधारण, यानी सबसे उग्र शक्ति की बात हो रही है — वह उनके नाम पर तुरंत मान जाता है। उनका स्वरूप ही इतना प्रतापी है कि मानना ही पड़ता है। उनकी बात कोई नहीं टालता। बिंदु क्षेत्र में भी, वक्ता कहते हैं, लोग इन कामों के लिए इस स्वरूप का स्मरण और पूजन करते हैं।
अगर कोई दिव्य में या तांत्रिक क्षेत्र में ऐसे स्वरूपों की उपासना करे, तो, वक्ता कहते हैं — उनके स्वरूप की उग्रता इतनी है कि कोई भी ब्रह्म हो, कितनी भी बड़ी ब्रह्म शक्ति; चाहे खूनी ब्रह्म हो या साधारण — यानी सबसे उग्र शक्ति की बात हो रही है — वह उनके नाम पर तुरंत मान जाता है। उनका स्वरूप ही इतना प्रतापी है कि मानना ही पड़ता है। उनकी बात कोई नहीं टालता। बिंदु क्षेत्र में भी लोग इन कामों के लिए इस स्वरूप का स्मरण, पूजन वगैरह करते हैं। और स्वरूप प्रतापी है ही।
उनकी बात की अवहेलना नहीं कोई करता है। यहां तक कि बिंदु क्षेत्र में भी इस स्वरूप का इन चीजों के लिए लोग स्मरण पूजन आदि करते हैं। और स्वरूप तो भव्य है ही। साक्षात रूप से अगर देखा जाए तो आप उनका अगर फोटो भी रखे हैं श्रृंगारिया वाला जो पूरा मां अपना श्रृंगार की हैं। उनका श्रृंगार जो गहने जेवर से हुआ जो दिखती हैं। तो आप देखिएगा अगर आपसे कुछ अपराध होगा ना तो उनके नेत्र में देखने मात्र से समझ में आ जाएगा कि भगवती जो है कुपित हैं। चल रहा होगा तो मुखमंडल का आभा ही बदला रहता है।
क्या उनकी प्रतिमा से उनकी नाराज़गी पढ़ी जा सकती है?
श्रृंगार स्वरूप की आँखें और मुखमंडल
अगर साक्षात देखें — भले आपने उनकी फ़ोटो रखी हो, श्रृंगार वाली, जिसमें माँ पूरे श्रृंगार में हैं, गहनों और आभूषणों के साथ जैसी दिखती हैं — तो आप देखेंगे कि अगर आपसे कोई अपराध हुआ है, तो सिर्फ़ उनकी आँखों में देखकर समझ आ जाएगा कि भगवती नाराज़ हैं। अगर चल रहा है, तो मुखमंडल की आभा ही बदली रहती है।
अगर साक्षात देखा जाए, वक्ता कहते हैं, तो भले आपने उनकी फ़ोटो रखी हो — श्रृंगार वाली, पूरी वाली जिसमें माँ अपने श्रृंगार में हैं, जैसा उनका श्रृंगार दिखता है, गहनों और आभूषणों से किया हुआ — तो आप देखेंगे: अगर आपसे कोई अपराध होता है, तो सिर्फ़ उनकी आँखों में देखकर समझ आ जाएगा कि भगवती नाराज़ हैं। अगर चल रहा है, तो मुखमंडल की आभा ही बदली रहती है।
हमारे पूजन स्थान पर जो माई का फोटो रखा हुआ है कम से कम हमको लगता है लगभग अगर बोला जाए तो 20 से 21 साल होने जा रहा है।
वही फ़ोटो उनके पूजा स्थान पर लगभग इक्कीस साल से है, उसकी आभा अब भी बढ़ रही है
लगभग इक्कीस साल, और आभा अब भी बढ़ती हुई
उनके पूजा स्थान पर रखी माई की फ़ोटो, वक्ता कहते हैं, लगभग बीस-इक्कीस साल से चल रही है — लगभग इक्कीस साल; वही पुरानी फ़ोटो आज तक रखी है, और मुखमंडल की आभा ठीक वैसे ही बढ़ती हुई है। तो माई का यह स्वरूप बहुत दिव्य है, और कभी जाने का अवसर मिले, तो एक बार मुंगेर जाकर उनके दर्शन ज़रूर करने चाहिए।
हमारे पूजा स्थान पर, जहाँ माई की फ़ोटो रखी है — हमें कम से कम लगता है कि लगभग बीस-इक्कीस साल से चल रही है, वक्ता कहते हैं। लगभग इक्कीस साल से चल रही है। वही पुरानी फ़ोटो आज तक रखी है। मुखमंडल की ठीक वही बढ़ती हुई आभा। तो माई का यह स्वरूप बहुत दिव्य है, और कभी जाने का अवसर मिले, तो एक बार मुंगेर जाकर उनके दर्शन ज़रूर करने चाहिए।
21 साल लगभग होने जा रहा है। वही पुराना फोटो ही रखे हुए हैं आज तक। एकदम वही लालिमा बढ़ती हुई मुखमंडल। तो है माई का ये स्वरूप अति दिव्य है। अगर कभी जो जाने का अवसर प्राप्त हो तो एक बार मुंगेर में जाकर के उनका दर्शन अवश्य करना चाहिए। भगवान दत्त के देव दीक्षा विधान एक बार और फिर से करवाने की कृपा करें।
भगवान दत्त का देव दीक्षा विधान कब किया जा सकता है?
मकर संक्रांति, बसंत पंचमी, या माघ की गुप्त नवरात्रि
अगर उस तरह से करना है, तो कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं। मान लीजिए अभी मकर संक्रांति पर कर सकते हैं। बसंत पंचमी पर, माँ की गुप्त नवरात्रि में कर सकते हैं। अभी गुप्त नवरात्रि नहीं चल रही; गुप्त नवरात्रि अब माघ में आएगी।
अगर उस तरह से करना है, तो कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं। मान लीजिए अभी मकर संक्रांति पर कर सकते हैं। बसंत पंचमी पर, माँ की गुप्त नवरात्रि में कर सकते हैं। अभी गुप्त नवरात्रि नहीं चल रही। गुप्त नवरात्रि अब माघ में आएगी।
मतलब ऐसे करना है तो आप कर सकते हैं। मान के चलिए कि अभी आप मकर संक्रांति में कर सकते हैं। बसंत पंचमी में मां की गुप्त नवरात्रि में कर सकते हैं। अभी गुप्त नवरात्रि नहीं चल रही है। अभी माघ में गुप्त नवरात्रि आएगी। ऐसे अगर देखा जाए ना तो नवरात्रि हर मास रहती है।
साल में कितनी नवरात्रियाँ होती हैं?
हर महीने एक नवरात्रि, चार पीठों के हिसाब से अलग
ऐसे देखें, वक्ता कहते हैं, तो हर महीने नवरात्रि पड़ती है; किसी न किसी तरह हर महीने एक नवरात्रि हो रही है। जो आठ मुख्य और चार मुख्य पीठ बताए गए हैं: कामगिरि पीठ के हिसाब से नवरात्रियाँ अलग हैं, पूर्णगिरि पीठ के हिसाब से नवरात्रि अलग है, उड्डियान पीठ के हिसाब से अलग, और शारदा पीठ के हिसाब से अलग। चारों पीठों के हिसाब से तंत्र पीठ में, तंत्रोक्त विषय में, आगम और मुक्त ग्रंथों के अनुसार अलग-अलग नवरात्रियाँ मानी गई हैं। कुछ संक्रांति के हिसाब से चलती हैं; कुछ संक्रांति के शुक्ल पक्ष के हिसाब से; और कुछ जयंती तिथियों के हिसाब से।
शाकंभरी सप्तमी की रात से, और माघ गुप्त नवरात्रि मौनी अमावस्या से चलती है
शाकंभरी सप्तमी की रात से; माघ गुप्त नवरात्रि मौनी अमावस्या से
यह कुल परंपरा पर निर्भर है, वक्ता कहते हैं: अगर हम कहें कि अभी नहीं चल रही, और आपको पता चले कि कामगिरि पीठ के हिसाब से अभी चल रही है, और आप कहें कि हम ग़लत बोल रहे हैं — नहीं, वह भी सही है। पर आप जैसे लोग जिनकी कुलदेवी भगवती शाकंभरी हैं, और जहाँ भगवती शाकंभरी का मुख्य पूजन होगा, मान लीजिए अष्टमी तिथि से, सप्तमी की रात से उनकी नवरात्रि शुरू होगी — गुप्त नवरात्रि। तो वह शाकंभरी नवरात्रि है। और माघ गुप्त नवरात्रि, वासंतिक नवरात्रि, माघ गुप्त नवरात्रि भगवती शारदा को समर्पित मुख्य नवरात्रि होगी; यह मौनी अमावस्या से शुरू होगी।
अमृतेश्वरी को लक्ष्मी बीज जोड़कर करना है
उसके साथ लक्ष्मी बीज जोड़कर
अमृतेश्वरी — उसके साथ लक्ष्मी बीज जोड़कर कीजिए, वक्ता जवाब देते हैं, लक्ष्मी बीज के साथ।
अमृतेश्वरी, वक्ता जवाब देते हैं। लक्ष्मी बीज के साथ — उसमें लक्ष्मी बीज जोड़कर कीजिए।
अमृतेश्वरी लक्ष्मी बीज के साथ लक्ष्मी बीज जो है उसको जोड़ के कीजिए। चलिए आप सभी से पुनः मिलेंगे। हमारे द्वारा देव दीक्षा की इच्छा है तो देव दीक्षा तो आप पर्सनली मैसेज कर दीजिएगा कभी अपने लोग जब करेंगे दीक्षा विधान तो आपको भी सूचित कर दिया जाएगा।
बहुत ज़िद्दी सात साल के बच्चे के लिए क्या करें?
सात में प्यार, और कोई विशेष स्थिति दिखे तो कुंडली विश्लेषण
बच्चा अभी सात साल का है, वक्ता कहते हैं — प्यार से समझाइए। जब आठ-नौ साल का हो जाए, तब मारकर समझाइए। और एक बात ध्यान रखिए: तेरह साल की उम्र तक वैसे तो कोई ख़ास बात नहीं, फिर भी अगर बच्चों के साथ कोई विशेष स्थिति बने, तो किसी जानकार, विद्वान ज्योतिषी से उनकी जन्म कुंडली का विश्लेषण कराकर, जो भी विषय उठ रहा हो, उसका उपाय कीजिए।
प्रश्नकर्ता लिखते हैं कि छोटा बच्चा बहुत ज़िद्दी और उत्तेजित है, बात नहीं सुनता और पलटकर जवाब देता है, दोस्तों को ज़्यादा महत्व देता है — क्या करें, समझ नहीं आता; सात साल का है, वक्ता पढ़ते हैं। वह अभी सात साल का बच्चा है; प्यार से समझाइए। जब आठ-नौ साल का हो जाए, तब मारकर समझाइए। और एक बात ध्यान रखिए: तेरह साल की उम्र तक वैसे तो कोई ख़ास बात नहीं, फिर भी अगर बच्चों के साथ कोई विशेष स्थिति बने, तो किसी जानकार ज्योतिषी से, किसी विद्वान से, उनकी जन्म कुंडली का विश्लेषण कराकर, जो विषय उठ रहा हो उसका उपाय कीजिए।
छोटा बच्चा बहुत ही अधिक जिद्दी, व्याकुल भी बात ना मानने और उल्टे जवाब देने लगे। दोस्तों को ज्यादा इंपॉर्टेंट दे रहा है तो क्या करें समझ नहीं आ रहा है सात साल। अभी सात साल का बच्चा है प्रेम से समझाइए। आठ साल नौ साल का जब हो जाएगा तब कुटाई से समझाइए। एक बात का ध्यान रखिएगा हालांकि 13 वर्ष की अवस्था होने तक विशेष तो नहीं लेकिन फिर भी अगर किसी प्रकार का विशेष अवस्था बन जाए बच्चों के साथ में तब उनके जन्म कुंडली का विश्लेषण आदि करके करवा करके किसी प्रबुद्ध ज्योतिष से विद्वान से और जो विषय उपस्थित हो रहा हो उसका निराकरण कर लेना चाहिए।
बच्चे की परेशानी बनी रहे तो कौन-सा मंत्र और विधान बताया गया है?
सप्तशती के बारहवें अध्याय का संपुट और बटुक भैरव के साथ नवचंडी
अगर कुछ भी न मिले और फिर भी लगे कि यहाँ कोई विषय है, तो, वक्ता कहते हैं, श्री दुर्गा सप्तशती के बारहवें अध्याय में, भगवती के कहे माहात्म्य में, यह मंत्र है — बाल ग्रहाभिभूतानां बालानां रक्षणकरं परम्, मंत्र रक्षोभूत पिशाचानां। इस मंत्र का संपुट लगाकर किसी दुर्गा जी के मंदिर में कम से कम सप्तशती जी के नौ पाठ कराने चाहिए, जो नवचंडी हो जाती है; साथ में भैरव जी का, बटुक भैरव जी का पाठ। यानी बटुक भैरव जी के अष्टोत्तर शतनाम का संपुट होगा, और सप्तशती का पूरा विधान; सप्तशती बाल ग्रहाभि मंत्र से संपुटित होगी।
यह विधान बच्चे के साथ उठने वाली ग्रह-जनित, भौतिक और मानसिक स्थितियों का उत्तर है
बच्चे के साथ उठने वाली ग्रह-जनित, भौतिक या मानसिक स्थितियाँ
इससे कराइए, वक्ता कहते हैं, फिर बच्चे के साथ जो भी हो रहा है — अगर कोई ग्रह-जनित विषय, कोई भौतिक विषय, कोई मानसिक विषय उठ रहा है — उसमें लाभ ज़रूर मिलेगा।
इससे कराइए, वक्ता कहते हैं, फिर बच्चे के साथ जो भी हो — अगर कोई ग्रह-जनित विषय, कोई भौतिक विषय, कोई मानसिक विषय उठ रहा है — तो उसमें लाभ ज़रूर मिलेगा।
इससे कराइए तो बच्चे के साथ जो भी अगर किसी प्रकार की ग्रह जनित विषय, भौतिक विषय, कोई मानसिक विषय उपस्थित हो रहा हो तो उसमें जरूर लाभ प्राप्त होगा। पूजा जी आशीर्वाद कर दो कि हमारे टेंडर हमें वापस मिल जाए। भाई हम आशीर्वाद कहां से करें? हम भगवती से प्रार्थना करें कि आप जो चाहते हैं माई अगर उचित समझे तो वो कर दें।
कुंभ की भीड़ में गुरुदत्त की सेवा में क्या करें?
ऐसी भीड़ में सिर्फ़ दर्शन और पूजन ही काफ़ी है
एक श्रोता कहते हैं कि वे त्रिवेणी संगम में स्नान के बाद काशी जा रहे हैं; वक्ता कहते हैं: बहुत अच्छा। गुरुदत्त जी की सेवा में इस समय इतनी भीड़ होगी कि सिर्फ़ दर्शन और पूजन कर लें, वही काफ़ी है; वही बहुत है।
त्रिवेणी संगम में स्नान के बाद हम काशी जा रहे हैं, श्रोता लिखते हैं, वक्ता पढ़ते हैं। बहुत अच्छा, वे कहते हैं। गुरुदत्त जी की सेवा में इस समय इतनी भीड़ होगी कि सिर्फ़ दर्शन और पूजन कर लें, वही काफ़ी है; वही बहुत है।
सीमा जी आपको भी मेरा प्रणाम। त्रिवेणी संगम में स्नान के पश्चात काशी जा रहे हैं। बहुत अच्छा। गुरुदत्ता जी की सेवा में आप अभी के समय में तो इतना भिड़े रहेगा कि केवल आप दर्शन पूजन कर लें वही बहुत है। चलिए पुनः आप सभी से मिलेंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।