माघ महाकुंभ — पैंतालीस दिन के नियम, और जाने से पहले गृहस्थ का कर्तव्य

माघ महाकुंभ के अनुशासन पर एक प्रवचन।

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01

महाकुंभ सबसे विशाल पर्व-काल है, जिसकी प्रतीक्षा सिद्ध और चारण देवता भी करते हैं

ऐसा पर्व-काल जिसकी प्रतीक्षा सिद्ध और चारण देवता भी करते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:17–00:51

क्योंकि, वक्ता कहते हैं, आने वाला महाकुंभ सबसे विशाल पर्व काल है। सिद्ध और चारण देवता भी इसकी प्रतीक्षा करते हैं। जब पारलौकिक शक्तियाँ इस महा-दिव्य पर्व-काल की राह देखती हैं, तो वे श्रोताओं से कहते हैं — सोचिए, मनुष्य के लिए इसका लाभ कितना विशेष होगा।

02

क्या महाकुंभ मेला घूमने की बात है?

तीर्थ क्षेत्र बस पर्यटन स्थल बनकर रह गए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:52–01:16 · Also a question

नहीं। वक्ता कहते हैं, यह मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक विषय है, मेला घूमने की बात नहीं। पर आज के समय में, वे कहते हैं, हर तीर्थ क्षेत्र बस पर्यटन स्थल बनकर रह गया है। लोग वहाँ केवल और केवल आनंद लेने जाते हैं। तीर्थ क्षेत्र आनंद का पर्याय बन गया है।

वक्ता कहते हैं, यह मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक विषय है। यह मेला घूमने की बात नहीं है। वे कहते हैं, हालाँकि आज के समय में जितने भी तीर्थ क्षेत्र हैं, वे बस पर्यटन स्थल बनकर रह गए हैं, और कुछ नहीं। लोग वहाँ केवल और केवल आनंद लेने जा रहे हैं। वे कहते हैं, तीर्थ क्षेत्र आनंद का पर्याय बन गया है।

मूल प्रतिलेख
इस विषय पर आज से हम लोग चर्चा आरंभ करेंगे। यह अति आवश्यक विषय है मनुष्य जीवन के निमित्त। केवल मेला घूमने का विषय नहीं होता है। हालांकि आज के समय में जितना भी तीर्थ क्षेत्र है, वह पर्यटन का स्थल, पर्यटन स्थल बनकर के ही रह गया है। और लोग वहां सिर्फ और सिर्फ आनंद लेने ही जा रहे हैं। तीर्थ क्षेत्र आनंद का पर्याय बन के रह गया है।
03

जिस कष्ट ने साधक को तीर्थ की ओर मोड़ा, उसके प्रति उसे क्या भाव रखना चाहिए?

उस कष्ट को धन्यवाद जिसने आपको दिव्य पुण्य का निमित्त बनाया

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:17–01:53 · Also a question

कृतज्ञता। जिस भी कष्ट से आप साधना, पूजन और पाठ के मार्ग पर आए, और जिस कष्ट से मन में तीर्थ क्षेत्रों के प्रति श्रद्धा जगी, उस कष्ट को अवश्य धन्यवाद देना चाहिए। क्योंकि वह आपको निमित्त बनाकर कोई दिव्य पुण्य दिलाने वाला है — थोड़ा नहीं, बहुत ही विशेष।

04

माघ महीने में स्नान की चली आ रही परंपरा क्या है?

गंगा और देव-सरिताओं में माघ स्नान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:49–03:26 · Also a question

हर साल माघ महीने में गंगा जी और बाकी सभी देव-सरिताओं और नदियों में स्नान की परंपरा है। वक्ता कहते हैं, यह पौराणिक मान्यता और शास्त्र-सम्मत विधान है कि माघ में स्नान से हमारे पाप जड़ से नष्ट होते हैं, दिव्य लोक मिलते हैं, और कई कष्टों से मुक्ति मिलती है — किसी भी तरह के रोग और हर तरह के दोष नष्ट होते हैं।

05

पौष में लगातार तीन दिन बहते जल में स्नान और उषा-काल में संध्या — यही चला आ रहा नियम है

लगातार तीन दिन बहते जल में स्नान, और उषा-काल में संध्या

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:27–03:58

कि पौष महीने में यदि कोई कम से कम लगातार तीन दिन गंगा जी में या किसी भी सरिता में — यानी बहते जल के किसी भी स्रोत, किसी नदी में — स्नान करे, और फिर सुबह उषा-काल में संध्या करे, तो केवल तीन दिन करने से ही देव-कृपा से हमारे पापों का शमन शुरू हो जाता है, और पाप बहुत ही जल्दी नष्ट होते हैं।

06

लोग पापों के नाश का क्या अर्थ समझते हैं?

अधीरता, और यह माँग कि हर कष्ट बस खत्म हो जाए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:59–04:46 · Also a question

वक्ता कहते हैं, लोगों में धैर्य नहीं है। वे चाहते हैं कि पाप-नाश का एक ही अर्थ हो — जीवन के कष्टों से मुक्ति, कष्ट चाहे जो हो: शरीर का रोग, कोई आधि या व्याधि, शत्रु की बाधा, कुछ भी। यदि वह नष्ट नहीं हो रहा, तो उनकी नज़र में पाप नष्ट नहीं हो रहा।

07

क्या पुण्य को भौतिक समृद्धि से मापना ठीक है?

करोड़पति वाली कसौटी, और पुण्य की लालसा से होने वाले अपराध

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:47–05:21 · Also a question

वक्ता कहते हैं, पाप और पुण्य की तुलना भौतिकता से करना एक स्तर तक ठीक लगता है। पर जब आप उसी में पूरी तरह डूब जाते हैं — कि यदि हम पुण्य-आत्मा हैं तो हमें करोड़पति होना ही चाहिए — वहीं आप गलत हो जाते हैं। वे जोड़ते हैं कि जब तक पाप और पुण्य दोनों रहते हैं, देव-प्राप्ति कभी नहीं होती, और पुण्य के पीछे भागने में ही मनुष्य कई अपराध कर बैठता है।

08

कुंभ से जीवन-मुक्त और गृहस्थ का अंतर कैसे दिखता है?

वह गृहस्थ जो सुनता है कि कुंभ का एक दिन उसका टिकट पक्का कर देगा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:22–06:12 · Also a question

वक्ता आने वाले महाकुंभ का उदाहरण लेते हैं। एक साधारण गृहस्थ किसी संत से, शास्त्र-पुराण से, पढ़कर या सत्संग से जान लेता है कि कुंभ में स्नान करना चाहिए — कि वहाँ एक दिन जाने से भी उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसके आराध्य के लोक का टिकट पक्का हो जाता है। तब वह जाने को उत्सुक होगा, और उसके मन में प्रयाग पहुँचकर संगम में स्नान की ललक जागेगी।

09

यदि किसी को कुंभ जाने के लिए कर्ज़ लेना पड़े तो?

कर्ज़ देने वाला भी पुण्य में भागी — बशर्ते कर्ज़ लौटाया जाए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:13–06:52 · Also a question

यदि उसके पास पैसा नहीं है और इस कारण वह नहीं जा पा रहा, तो वह कर्ज़ लेकर जा सकता है; और जिससे कर्ज़ मिला, उसे भी उस पुण्य का फल मिलता है। वक्ता कहते हैं, यदि वह समय पर पैसा लौटा दे, तो यह बहुत अच्छी बात है।

अब, वक्ता कहते हैं, यदि उसके पास पैसा नहीं है और पैसे के कारण वह नहीं जा पा रहा, तो वह कर्ज़ लेकर जा सकता है। पर वह कर्ज़ लेकर जाएगा, और यदि कर्ज़ नहीं लौटाता — या यदि लेकर जाता है — तो जिससे उसने यह कर्ज़ पाया, उसे भी इस पुण्य का फल मिलेगा। यदि वह समय पर पैसा लौटा दे, तो यह बहुत ही अच्छी बात है।

मूल प्रतिलेख
अब ऐसी अवस्था में जब वह जान गया है तो वह जाने के लिए लालायित होगा। उसके हृदय में यह स्पंदन होगा कि भाई हम भी तीर्थ क्षेत्र में जाएं, प्रयाग में जाएं, प्रयाग जी में जाकर के तीर्थराज में हम भी संगम के तट पर स्नानादि करें। अब उसके पास अगर धन नहीं है, वह जा नहीं सकता है अगर धन के कारण से, तो कर्ज लेकर के जा सकता है। लेकिन कर्ज लेकर के जाएगा और अगर कर्ज नहीं लौटाता है या कर्ज लेकर के जाता है, तो इस कर्ज को जिससे वह प्राप्त किया है, इसके पुण्य का फल उसे भी प्राप्त होगा। अगर वह पैसे वापस कर देता है समय से तब तो बहुत अच्छी बात है।
10

क्या परिवार को पीछे छोड़कर तीर्थ जाया जा सकता है?

परिवार की स्थिति देखे बिना जाना अपने आप में अपराध है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:53–07:35 · Also a question

वक्ता कहते हैं, जब भी हम तीर्थ जाएँ, अपने परिवार की स्थिति देखनी चाहिए; बिना देखे जाना कहीं न कहीं अपराधी बनना है, तो फिर पुण्य क्या मिलेगा? यदि घर में बूढ़े माता-पिता हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं, और किसी संत या महापुरुष से प्रेरित होकर आप उन्हें छोड़कर स्नान करने चले जाएँ, और पीछे उन्हें कुछ हो जाए, तो वह तीर्थ आपको कभी फल नहीं देगा, बल्कि दंड और कष्ट देगा।

11

जीवन-मुक्त दूसरे नियम में आता है, जैसे तपस्या को निकलते समय शुकदेव

जीवन-मुक्त, और तपस्या के लिए निकलते शुकदेव

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:36–08:15

जो जीवन-मुक्त हैं — जिन्होंने मन से हर तरह का संबंध पूरी तरह छोड़ दिया है, जिनके मन में किसी तरह का विकार नहीं, कोई संबंध ही नहीं। वक्ता कहते हैं, यदि वे ऐसी अवस्था में जाते हैं, तो उनकी बात अलग है। उदाहरण में वे पुराणों में वर्णित शुकदेव जी को रखते हैं — तपस्या को निकलते समय माँ से उनकी बातचीत, जब माँ उन्हें रोकती हैं और वे कहते हैं, ऐसा नहीं हो सकता, हम नहीं रुकेंगे।

12

जब माँ ने वंश बढ़ाने को कहा, तब शुकदेव ने क्या उत्तर दिया?

कुतिया और उसके कई पिल्लों वाला तर्क

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:16–08:46 · Also a question

माँ ने उनसे कहा कि रुको, वंश बढ़ाओ, तुम्हारा विवाह हो, और पुत्र उत्पन्न किए बिना कभी सद्गति नहीं होती। शुकदेव मुनि उत्तर देते हैं कि यदि केवल संतान उत्पन्न करने से सद्गति मिलती, तो कुतिया एक बार में कई पिल्ले जनती है — उसकी सद्गति क्यों नहीं होती? वक्ता ज़ोर देकर कहते हैं, यह तर्क जीवन-मुक्तों के लिए है।

13

शुकदेव बारह वर्ष गर्भ में क्यों रहे?

नारायण का वचन कि वैष्णवी माया उन्हें नहीं छुएगी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:47–08:57 · Also a question

वे बारह वर्ष अपनी माँ के गर्भ में रहे, और तभी बाहर आए जब भगवान नारायण ने वचन दिया कि उनकी वैष्णवी माया उन्हें नहीं छुएगी, और गर्भ में उन्हें जो भी याद है, उस सबकी स्मृति बनी रहेगी।

वक्ता कहते हैं, वे बारह वर्ष अपनी माँ के गर्भ में रहे, और उसके बाद भगवान नारायण ने यह वचन दिया — कि हाँ, मेरी वैष्णवी माया तुम्हें नहीं छुएगी; माँ के गर्भ में तुम्हें जो भी याद है, उस सबकी स्मृति तुम्हें बनी रहेगी।

मूल प्रतिलेख
वो तो 12 वर्ष तक मां के गर्भ में रह कर के उसके बाद भगवान नारायण जब ये वचन दिए कि हां मेरी वैष्णवी माया आपको स्पर्श नहीं करेंगी आपको सब कुछ स्मरण रहेगा जो भी आपको मां के गर्भ में स्मृत है।
14

पार्वती गीता गर्भ में जीव के बारे में क्या कहती है?

छठे और सातवें महीने में सारे पिछले जन्मों की स्मृति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:58–09:30 · Also a question

वक्ता कहते हैं, गर्भ गीता — श्री पार्वती गीता — में बताया गया है कि जब जीवात्मा माँ के गर्भ में होती है, तो छठे और सातवें महीने में उसे अपने सारे पिछले जन्मों का ज्ञान हो जाता है। वहाँ कष्ट सहते हुए वह भगवती की, अपने आराध्य की स्तुति करती है — कि इस बार जन्म लेकर वह उनकी उपासना अवश्य करेगी, जन्म व्यर्थ नहीं जाने देगी, बस इस कष्ट से मुक्त कर दें। क्योंकि, वे कहते हैं, संसार का सबसे बड़ा कष्ट माँ के गर्भ का कष्ट है, जहाँ जीव उल्टा लटककर उसे सहता है।

15

क्या देवी गीता पढ़ लेना काफ़ी है?

पाठ से बढ़कर मनन, और एक वर्ष में दर्शन की फलश्रुति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:31–10:06 · Also a question

नहीं। वक्ता कहते हैं, इस पर मनन कीजिए — बस पढ़ने से, पाठ करने से कुछ नहीं होगा। वहाँ जो संदेश देने का प्रयास किया गया है, उसे आत्मसात कीजिए, तब कुछ लाभ होगा। उसकी फलश्रुति, कि भगवती दुर्गा एक वर्ष में दर्शन देती हैं, तभी पूरी होती है; तब नहीं जब आप बस पढ़ते रहें, उस पर मनन-चिंतन न करें और उस पर चलने का प्रयास न करें।

16

साधारण जीवों को अपने पिछले जन्म याद क्यों नहीं रहते?

जन्म के क्षण वैष्णवी माया का जीव को छूना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:07–10:44 · Also a question

क्योंकि, जैसा वहाँ बताया गया है, जब भी जीव जन्म लेता है, जन्म के क्षण ही वैष्णवी माया उसे छू लेती है — यानी भगवती की माया उसे छू लेती है — जिससे जीवात्मा अपने पिछले जन्मों की सारी बातें भूल जाती है, जो उसे गर्भ में याद थीं।

17

परिवार में रहते हुए भी कौन-सा व्यक्ति दूसरे नियम में आता है?

जिन्होंने घर में रहते हुए मुक्ति का बोध पा लिया है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:45–11:15 · Also a question

जिन्होंने उस तरह का मुक्ति का बोध पा लिया है — वे परिवार के भीतर रह रहे हों, पर उनकी अवस्था ऐसी हो कि उनमें किसी तरह का लोभ न हो, और मान-अपमान का उन पर खास असर न पड़े। वक्ता बताते हैं, यदि शुकदेव भूल जाते, तो उन्हें साधारण जीवात्मा की तरह नए सिरे से शुरू करना पड़ता, जैसे आप और हम करते हैं; वरदान मिला, फिर उन्होंने जन्म लिया।

18

क्या ऐसा व्यक्ति भी अपनी ज़िम्मेदारियाँ छोड़कर जा सकता है?

व्यवस्था नहीं, तो जाना नहीं — मुक्त के लिए भी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:16–11:33 · Also a question

यदि वे जीवन-मुक्त हो गए हैं, तो ऐसी अवस्था में जाएँ भी तो चलेगा। पर अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हुए बिना, या कोई विकल्प रखे बिना, परिवार के लोगों को — वे जो भी हों — पीछे छोड़कर जाना अनुचित होगा। वक्ता कहते हैं, उनकी व्यवस्था करनी ही चाहिए।

वक्ता कहते हैं, वे जीवन-मुक्त हो गए हैं, तो यदि वे ऐसी अवस्था में जाते हैं, तो चलेगा। पर अपनी किसी भी तरह की ज़िम्मेदारियों से मुक्त हुए बिना, या उसके लिए कोई विकल्प रखे बिना — वे जो भी हों, परिवार के लोग — उन्हें पीछे छोड़कर जाना अनुचित होगा। उनकी व्यवस्था करनी चाहिए।

मूल प्रतिलेख
जीवन मुक्त हो चुके हैं तो वो अगर ऐसी अवस्था में जाएं भी तो चलेगा। लेकिन अपने किसी प्रकार के जो जिम्मेदारी है उनसे विमुक्त हुए बिना या उसका कोई विकल्प रखे बिना चाहे वो कोई भी हो परिवार के सदस्य उनको छोड़कर के जाना अनुचित ही होगा।
19

कुंभ को मनोरंजन की तरह बेचा जा रहा है, इक्यावन तरह की पान की दुकानों तक

मनोरंजन बना कुंभ — इक्यावन तरह की पान की दुकानें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:34–12:08

क्योंकि, वक्ता कहते हैं, पुण्य मिले या न मिले, कुंभ का आनंद लेना है। यूट्यूब, फेसबुक और सारे सोशल मीडिया पर दिखाया जा रहा है कि इक्यावन तरह की पान की दुकानें लग रही हैं, ऐसी मिठाइयाँ आ रही हैं, हिमालय से कोई गोला आ रहा है, कई तरह की चीज़ें आ रही हैं — और लोग खास तौर पर वही आनंद लेने जा रहे हैं। वे सोचते हैं, नहा तो लेंगे ही, उसमें कितना समय लगता है, पर मेला देखना है और एडवेंचर ट्रिप करनी है।

20

पहले परिवार को देखिए, नहीं तो पूरी यात्रा पुण्य नहीं, पाप बन जाती है

पहले परिवार को देखिए, नहीं तो सब पाप बन जाता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 12:09–12:24

यदि आप एडवेंचर ट्रिप के लिए जा रहे हैं और साथ में थोड़ा पुण्य भी चाहते हैं, तो पहले अपने परिवार को अवश्य देखिए। वक्ता कहते हैं, यदि आप परिवार को दुखी करके जाते हैं, तो हर तरह से आपको केवल पाप ही लगेगा।

तो भाई, वक्ता कहते हैं, यदि आप एडवेंचर ट्रिप के लिए जा रहे हैं, और यदि आप यह भी चाहते हैं कि साथ में थोड़ा पुण्य मिल जाए, तो पहले अपने परिवार को अवश्य देखिए। यदि आप परिवार को दुख देकर जाते हैं, तो हर तरह से आपको केवल पाप ही लगेगा। वे कहते हैं, अब इस विषय को और अच्छी तरह समझते हैं।

मूल प्रतिलेख
तो भैया एडवेंचर ट्रिप करने अगर आप जा भी रहे हो और अगर साथ में ये भी चाह रहे हो कि हम पुण्य भी थोड़ा प्राप्त हो जाए तो पहले परिवार अवश्य देख लीजिएगा। परिवार को दुखी करके अगर आप जाएंगे तो हर प्रकार से आपको पाप ही लगेगा। अब इस विषय को और अच्छे प्रकार से समझ लेते हैं।
21

मंदिर या सरोवर के तट पर जप कितना अधिक फल देता है?

शिव महापुराण से स्थान का गुणक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 12:25–12:56 · Also a question

श्री शिव महापुराण से वक्ता याद दिलाते हैं कि घर में किया जप यदि मंदिर में किया जाए, तो सौ गुना अधिक फल देता है; और यदि सरोवर के तट पर, सरोवर के तट पर बने शिव मंदिर में किया जाए, तो उससे भी सौ गुना अधिक — यानी घर में किए पूजन-पाठ से हज़ार गुना अधिक।

22

किन तीन स्थानों को परम दिव्य कहा गया है?

त्रिवेणी, गंगा और सागर का मिलन, और गंगा सागर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 12:57–13:28 · Also a question

मंदिर और सरोवर के बाद आता है तीर्थ क्षेत्र — पर्वत का शिखर, त्रिवेणी संगम का क्षेत्र, प्रयाग का क्षेत्र; वह स्थान जहाँ गंगा जी सागर से मिलती हैं, और गंगा जी का उद्गम; और वह स्थान जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों महानदियाँ मिली हैं, यानी त्रिवेणी जी; और तीसरा, गंगा सागर। वक्ता कहते हैं, ये तीन स्थान अत्यंत, अत्यंत, अत्यंत दिव्य कहे गए हैं।

23

क्या यह गुणक पाप पर भी लागू होता है?

प्रयाग में किए अपराध भी उसी माप में कई गुना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 13:29–13:58 · Also a question

हाँ — इसी कारण इसका माहात्म्य इतना बड़ा है। वक्ता कहते हैं, यदि आप ऐसे क्षेत्र में जाकर वहाँ पाप करते हैं, तो सोचिए, फल कितने गुना होगा। वे कहते हैं, अभी प्रयाग जी जाकर देखिए: सरकार वहाँ बहुत खर्च कर रही है, पर लोगों ने हर जगह गंदगी फैला रखी है, पान और गुटखे की आदत नहीं छूट रही, और सरकार इस पर कोई लगाम नहीं लगा पाती, क्योंकि आपके भीतर कोई भय नहीं है।

24

लोग क्यों कहते हैं कि अनुष्ठान से उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ?

जप से कमाया पुण्य, प्रयाग में एक बार थूकने से खत्म

· Reviewed Sep 14, 2026 · 13:59–14:39 · Also a question

आप कहते हैं कि जीवन में कष्ट है, आप अनुष्ठान करते और करवाते हैं, ब्राह्मण घर आकर अनुष्ठान कर गए पर कोई लाभ नहीं हुआ। वक्ता पूछते हैं, लाभ कैसे होगा? जो भी पुण्य आपने खुद किए अनुष्ठान से, माला जप से, या ब्राह्मण से करवाकर पाया, आपको बस एक रजनीगंधा या तुलसी खाकर प्रयाग जी के पास थूकना है, और वह सब कई गुना होकर आप पर लद जाता है। फिर वह पुण्य कहाँ से मिलेगा?

25

बहुत-से लोग तो दूसरे कारणों से जा ही रहे हैं, इसलिए कम से कम इतना — वहाँ कोई अपराध न करें

कम से कम, अपराध तो न करें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 14:40–15:11

क्योंकि, वक्ता कहते हैं, बहुतों का लक्ष्य जाकर पुण्य कमाना नहीं है, लक्ष्य कुछ और ही है। वे जानते हैं कि लोग जाएँगे और खाएँगे-पिएँगे; तो कम से कम अपराध न करें, यदि तीर्थ का पुण्य कमाना है। फिर तीर्थ से लौटकर यदि घर में कष्ट आए या आप पर संकट आए, तो कम से कम मन में यह निश्चय रहे कि हमसे जान-बूझकर कोई अपराध नहीं हुआ — अनजाने में कुछ हुआ हो, तो वह अलग बात है।

26

तीर्थ से क्या लेकर लौटना चाहिए?

मन का संतोष, और मर्यादा में रहना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 15:12–15:53 · Also a question

यह कि आप पुण्य कमाकर आए हैं, और मन में संतोष होना चाहिए। वक्ता कहते हैं, शायद उनमें उपदेश देने की क्षमता न हो, फिर भी वे जितना हो सके अपने शब्दों में कह रहे हैं: तीर्थ क्षेत्र जाइए, पर मर्यादा में रहिए, अपनी मर्यादाएँ मत लाँघिए, ताकि वहाँ जो पुण्य मिलना है, वह अच्छी तरह मिले।

27

भय कष्ट से आता है, और धन का बल उसे फ़िलहाल दूर रखता है

धन का बल, और «दिखाओ कहाँ लिखा है»

· Reviewed Sep 14, 2026 · 15:54–16:29

वक्ता कहते हैं, भय कष्ट से आता है; पर अभी धन का बल और सामर्थ्य है, इसलिए उन्हें भय नहीं। ऐसे लोग जब उनके जैसे विचार सुनते हैं, तो कहेंगे कि उनके कहने से कुछ नहीं होता, यह कहीं लिखा नहीं है — बताओ, कहाँ लिखा है कि रजनीगंधा और तुलसी खाकर थूक नहीं सकते; हमारे शरीर में भी थूक है, मल-मूत्र है, तो वहाँ जाकर हमें कोई दोष लगेगा, इसका क्या मतलब? वे कहते हैं, ऐसा कुछ नहीं होता — गंगा जी के अंदर मत थूको, पर किनारे पर तो थूक ही सकते हैं।

28

उन्होंने लोगों को रजरप्पा में कुल्ला करते और गंगा में सुबह का षट्कर्म करते रिकॉर्ड किया है

रजरप्पा में कुल्ला, और गंगा में सुबह का षट्कर्म

· Reviewed Sep 14, 2026 · 16:30–16:53

वक्ता कहते हैं, उन्होंने नदी में लोगों के कुल्ला करने का वीडियो भी डाला था — वह रजरप्पा का था, दामोदर नदी में। और वे कहते हैं, प्रयाग जी जाइए, वहाँ यह भरपूर मिलेगा। कुल्ला तो छोड़िए, लोग वहाँ सुबह का पूरा षट्कर्म करते हैं, गले में उँगली डालकर सब कुछ गंगा जी में करते हैं, और वही भाई दूसरी तरफ़ नहा रहे होते हैं। वे कहते हैं, यह दुर्दशा है।

29

लोग क्यों कहते हैं कि त्रिवेणी और प्रयाग से उन्हें पुण्य नहीं मिला?

आप केवल पुण्य की बात करते हैं, उसी स्थान के पाप की कभी नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 16:54–17:24 · Also a question

तो भाई, पुण्य कैसे मिलेगा, वक्ता पूछते हैं — आप गंगा जी को क्यों बदनाम कर रहे हैं, क्यों कहते हैं कि त्रिवेणी जी पुण्य नहीं देतीं या प्रयाग हमें पुण्य नहीं देता? आप केवल पुण्य की बात करते हैं, कि गंगा में नहाने से पुण्य है; पर यह नहीं कहते कि उसी स्थान पर अपराध करने का पाप भी ठीक उतना ही है। अपराध होगा, और वह अवश्य गिना जाएगा।

30

क्या गंगा में अपने कपड़े धोना ठीक है?

नहाना स्वीकार है; पहने कपड़े धारा में धोना नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 17:25–17:58 · Also a question

यदि आपने दो दिन ट्रेन में सफ़र किया और नहाए नहीं, और वहाँ जाकर कपड़े उतारकर नहाए — इतना स्वीकार है, चलेगा। पर अपने गंदे कपड़े, अंदर के कपड़े तक, गंगा जी में ले जाकर साबुन से अच्छी तरह धोना नहीं। संतों ने भी सत्संगों में कहा है कि पहने हुए कपड़े, कोई भी मैला कपड़ा, गंगा जी में या किसी तीर्थ नदी में डुबोकर कभी नहीं धोना चाहिए। धोना ही हो, तो किसी बर्तन में पानी लेकर किनारे से थोड़ा दूर धोइए — पर उस बहते जल में नहीं।

31

पहने कपड़े नदी में धोने से पहला दोष कौन-सा लगता है?

पितरों का एक वर्ग जो जल केवल भूमि पर ग्रहण करता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 17:59–18:35 · Also a question

सबसे पहले पितरों का दोष आता है। वक्ता कहते हैं, एक योनि है, पितरों का एक प्रकार, जो ऐसे कपड़े से गिरे जल को भूमि से ग्रहण करता है। वे पितर उस जल को गंगा जी के भीतर स्वीकार नहीं कर सकते; वे उसे तभी स्वीकार करेंगे जब आप ज़मीन पर आएँ और जल वहाँ गिरे। तो सबसे पहला दोष अतृप्ति का लगता है — पितरों को तृप्त न करने का दोष वहाँ सबसे पहले लगता है।

32

गंगा के तटों की रक्षा कौन करता है?

तट के हर तय हिस्से पर तैनात हज़ारों रक्षक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 18:36–19:06 · Also a question

वक्ता कहते हैं, पुराणों का अध्ययन करेंगे तो कई पुराणों में गंगा माहात्म्य का वर्णन मिलेगा — नारद आदि से, शिव महापुराण से श्रीमद् देवी भागवत तक, हर जगह। और यह भी जानेंगे कि कहा गया है, गंगा जी के हर तट पर, हर तय सीमा में, कई हज़ार रक्षकों की चौकी है, जो उस तट की रखवाली करते हैं।

33

प्रयाग के सात-आठ निवासियों ने वेणी माधव की कथा कभी नहीं सुनी थी

प्रयाग के निवासी जिन्होंने वेणी माधव की कथा कभी नहीं सुनी थी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 19:07–19:37

उन्होंने हाल ही में श्री वेणी माधव जी का एक वीडियो डाला था और उसमें यह विषय स्पष्ट किया था। वक्ता कहते हैं, उन्हें आश्चर्य हुआ कि एक-दो नहीं, कम से कम सात-आठ लोग, जो प्रयाग में रहते हैं, उन्हें संदेश भेजकर बोले: हम प्रयाग में रहते हैं, हमारा पूरा जीवन प्रयाग में बीता, पर वेणी माधव जी की ऐसी कथा के बारे में हमें कुछ खास पता नहीं था। वे कहते हैं, यह तो उस कहावत जैसा हो गया — घर की मुर्गी दाल बराबर।

34

वेणी माधव जी को क्या माना जाता है?

प्रयाग और त्रिवेणी के नगर देवता और रक्षक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 19:38–20:10 · Also a question

वेणी माधव जी का स्थान प्रयाग में है; वे प्रयाग के रक्षक हैं, वहाँ के नगर देवता, त्रिवेणी जी के रक्षक। उस स्थान की रक्षा की ज़िम्मेदारी, वहाँ लगने वाले माघ मेले की ज़िम्मेदारी और कुंभ की ज़िम्मेदारी वेणी माधव सरकार पर बताई जाती है — यानी वही उस क्षेत्र की रक्षा करते हैं।

35

वेणी माधव का परिकर कितना बड़ा बताया जाता है?

साठ हज़ार का परिकर और बारह द्वादश माधव सेनापति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 20:11–20:46 · Also a question

उनके साथ पूरे परिकर की संख्या साठ हज़ार बताई गई है, जिनमें बारह उनके सेनापति हैं। उन बारह सेनापतियों को हम द्वादश माधव के नाम से जानते हैं; वे अलग-अलग क्षेत्रों के अधिपति बनते हैं, और उनके साथ साठ हज़ार की सेना चलती है जो उस पूरे इलाके की रखवाली करती है।

36

क्या कुंभ में सच में दिव्य संत होते हैं?

हाँ — पर प्रयाग क्षेत्र में एक चलन शुरू हो गया है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 21:35–22:09 · Also a question

आपने हमेशा सुना होगा कि कुंभ के समय वहाँ कई दिव्य साधु-संत उपस्थित रहते हैं, और वक्ता कहते हैं, यह सच्ची बात है। पर एक और सच जान लीजिए: कुंभ क्षेत्र में, प्रयाग क्षेत्र में एक चलन दिखने लगा है। जो त्रिवेणी जी में रोज़ स्नान करते हैं, वे जब भी समय मिले, यह विषय अच्छी तरह देख सकते हैं।

37

सबसे विलक्षण संत कब आते हैं?

महाकुंभ, माघ, गंगा दशहरा और ग्रहण के समय

· Reviewed Sep 14, 2026 · 22:10–22:41 · Also a question

दिव्य संत-महात्मा वहाँ हैं, बिल्कुल — वे हैं, वे आते हैं। बात केवल इतनी नहीं है; पर इतना निश्चित है, वक्ता कहते हैं, कि जो अत्यंत विलक्षण हैं, वे खास तौर पर महाकुंभ के समय, माघ के समय, गंगा दशहरा और दूसरे तीर्थ पर्व-कालों में, और ग्रहण के समय आएँगे। पर उन सबका आना-जाना वहाँ रोज़ भी चलता रहता है।

38

वहाँ के संतों के बीच सबसे विशेष रूप से किस बात से सावधान रहना चाहिए?

सिद्धों के नाम की आड़ लेने वाले दूसरे-तीसरे तरह के लोग

· Reviewed Sep 14, 2026 · 22:42–23:11 · Also a question

वक्ता कहते हैं, सबसे विशेष बात यह है कि ऐसे दूसरे-तीसरे तरह के लोग भी भरपूर हैं जो कहीं न कहीं दिव्य संतों और सिद्धों की आड़ लेते हैं। इनसे बचना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोगों की बातें सुनकर आप अनजाने में कोई अपराध कर बैठते हैं। वे कहते हैं, इस बार प्रशासन बहुत सख़्त है, और उन्होंने देखा कि काम अच्छा हो रहा है, ताकि कोई अव्यवस्था न हो; फिर भी ध्यान रखना चाहिए कि इसमें क्या-क्या होता है।

39

कामाख्या में प्रसाद लेने का नियम क्या है, और क्या वह प्रयाग में भी लागू होता है?

भगवती का प्रसाद किसी के भी हाथ से लेना — और अब उसका दुरुपयोग कैसे हो सकता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 23:12–23:51 · Also a question

वक्ता कहते हैं, कामाख्या क्षेत्र में नियम है कि भगवती का प्रसाद जो भी दे, उसे स्वीकार करना चाहिए: वहाँ ऊँच-नीच नहीं, धर्म-विधर्म का प्रश्न नहीं, पर जाति का प्रश्न उठता है — यदि सबसे निंदित जाति की कोई कन्या भी आपको भगवती कामाख्या का प्रसाद दे रही है, तो साधक हों तो मना नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह दिव्य विषय है और भगवती परीक्षा भी लेती हैं। प्रयाग क्षेत्र में भी, कुंभ और माघ के समय, कोई वेणी माधव जी का या दूसरी शक्तियों का प्रसाद दे रहा हो, तो मना नहीं करना चाहिए — पर आज के समय में इसी नियम का दुरुपयोग भी होगा।

40

क्या कुंभ क्षेत्र में किसी अनजान व्यक्ति से भोजन लेना चाहिए?

अनजान व्यक्ति द्वारा प्रसाद के नाम पर बाँटी जाने वाली कोई भी चीज़

· Reviewed Sep 14, 2026 · 23:52–24:10 · Also a question

नहीं। खास तौर पर अनजान व्यक्ति से, यदि आप कुंभ क्षेत्र में जा रहे हैं, तो किसी भी तरह की वस्तु, किसी भी तरह का खाद्य पदार्थ, या प्रसाद के नाम पर बाँटी जा रही कोई भी चीज़ मत लीजिए, यदि आप उसके बारे में नहीं जानते।

खास तौर पर अनजान व्यक्ति से, वक्ता कहते हैं, यदि आप कुंभ क्षेत्र में जा रहे हैं — किसी भी तरह की वस्तु, किसी भी तरह का खाद्य पदार्थ, और प्रसाद के नाम पर जो भी बाँटा जा रहा हो — यदि आप उसके बारे में नहीं जानते, तो मत लीजिए।

मूल प्रतिलेख
पता नहीं कौन सा विधर्मी आपसे जला भुना पड़ा और जितना आप ज्यादा पूजन पाठ सेवा करते हुए दिखाएं दे वो क्या आपको खिलाने पिलाने का प्रयास करें तो अनजान व्यक्ति से विशेष करके अगर आप कुंभ क्षेत्र में जा रहे हैं किसी भी प्रकार की कोई वस्तु किसी भी प्रकार का कोई खाद्य पदार्थ और यह प्रसाद के नाम पर कुछ भी जो बांटा जा रहा हो अगर आपको ना पता हो तो ना लें।
41

क्या गृहस्थ अन्न क्षेत्रों और शिविरों में भोजन कर सकता है?

खाना गलत नहीं, पर गृहस्थ को किसी का अन्न मुफ़्त में नहीं लेना चाहिए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 24:11–24:45 · Also a question

यदि आप शिविरों और दूसरे क्षेत्रों में जाकर वहाँ अन्न ग्रहण कर रहे हैं, तो गृहस्थ होने के नाते ध्यान रखिए कि आपकी मर्यादा है। आप खा सकते हैं, खाने में कोई हर्ज नहीं — अन्न क्षेत्रों में महाप्रसाद का समय चलेगा और 8 या 10 तारीख से शुरू होगा। यदि आप वहाँ कल्पवास करने जा रहे हैं, या एक-दो दिन के लिए भी, तो बिल्कुल अन्न खा सकते हैं; पर गृहस्थ के नाते आपका कर्तव्य-धर्म है कि किसी का अन्न कभी उस तरह न लें। उसका कुछ मूल्य देना चाहिए।

42

क्या महाकुंभ में कोई आपकी जाति पूछेगा?

कोई पैसा नहीं लेता, कोई जाति नहीं पूछता, और प्रसाद दिन में तीन बार चलता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 24:46–25:08 · Also a question

वक्ता कहते हैं, वहाँ कुछ लेने वाले बहुत कम मिलेंगे; ऐसी जगहें भी होंगी जहाँ कुछ नहीं लिया जाएगा, या ऐसी जगह बनाई जाएगी जहाँ जो चाहे दे या न दे, और कोई कुछ नहीं कहेगा। वहाँ आपकी जाति भी नहीं पूछी जाएगी — कि आप ऊँचे हैं तो बैठिए, नीचे हैं तो मत बैठिए; कुंभ में, महाकुंभ में ऐसा कुछ नहीं होने वाला। और प्रसाद चलेगा, दिन में तीन बार; कुछ चौबीस घंटे भी चलाएँगे, और बारह घंटे तो अवश्य चलाएँगे।

43

अन्न क्षेत्र में महाप्रसाद लेने के बाद क्या करना चाहिए?

सामर्थ्य के अनुसार दान दें, नहीं तो पुण्य कटता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 25:09–26:00 · Also a question

जब भी आप प्रसाद या महाप्रसाद लें, या अन्न क्षेत्र में जाएँ, तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार वहाँ जितना उचित लगे उतना दान दें। कहें कि प्रभु, आज हमने प्रसाद पाया है, यह हमारी ओर से है। इसे किसी व्यक्ति को दें, या वहाँ जो मुख्य स्थान बना है उसमें अर्पित करें, ताकि यह फिर अन्न की सेवा में लगे। वक्ता कहते हैं, इसे ऐसे ही नहीं खाना है, नहीं तो आपका जो भी तीर्थ-फल है, उसमें से कट जाएगा, माइनस हो जाएगा, 28% जीएसटी के साथ।

44

कुंभ का समय खास क्यों है, खासकर घर पर रहने वालों के लिए?

दिव्य तिथियाँ — महाशिवरात्रि, होलिका की महानिशा, महाविद्याओं की तिथियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 26:01–26:40 · Also a question

वक्ता उन लोगों के लिए मुख्य विषय उठाते हैं जो नहीं जा रहे और घर पर हैं। वे कहते हैं, पहली बात महाशिवरात्रि के पर्व जैसी है: जैसा हम महाशिवरात्रि पर देखते हैं, जैसा होलिका की महानिशा में देखते हैं, अष्टमी तिथि पर, चैत्र अष्टमी, चैत्र नवमी, चैत्र पूर्णिमा पर, और दस महाविद्याओं की जो भी तिथियाँ आती हैं, जो महानिशा के समय हैं, और महाशक्तियों के नवरात्रि का समय।

45

इस समय सबसे पहले कौन-सी नवरात्रि पड़ रही है?

शाकंभरी नवरात्रि, पौष पूर्णिमा तक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 26:41–26:59 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अभी चल रहे अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार सबसे पहली नवरात्रि इसी अष्टमी से पड़ेगी। इसमें भगवती महादुर्गा, भगवती शाकंभरी की नवरात्रि शुरू होगी, और यह पौष पूर्णिमा तक चलेगी। वे श्रोताओं से कहते हैं, तो आपकी अब पड़ने वाली है।

सबसे पहली नवरात्रि, अभी चल रहे अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार, वक्ता कहते हैं — इसमें भी पहली नवरात्रि कब से है? इसी अष्टमी से पड़ेगी, जिसमें भगवती महादुर्गा, भगवती शाकंभरी की नवरात्रि शुरू होगी, और जो पौष पूर्णिमा तक चलेगी। तो अब उनकी पड़ने वाली है, वे कहते हैं।

मूल प्रतिलेख
तो आपका अभी उनका पड़ने वाला है।
46

दिव्य तिथियों पर शक्तियाँ कहाँ जाती हैं, और महाशिवरात्रि पर दत्त के सेवक कहाँ जाते हैं?

महासिद्ध अपने स्थान से तीर्थ क्षेत्रों की ओर जाते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 27:00–27:40 · Also a question

वक्ता कहते हैं, पहली बात यह है कि जो भी दिव्य तिथियाँ हैं, या दिव्य पर्व का समय है, उस समय महाशक्तियाँ और उस शक्ति से जुड़े महासिद्ध, जो उनकी सेवा में रहते हैं, उनका स्थान जहाँ भी हो, वे अपने स्थान से दिव्य क्षेत्रों की ओर, तीर्थ क्षेत्रों की ओर ज़रूर आते हैं। उदाहरण के लिए: महाशिवरात्रि के समय भगवान महागुरु दत्तात्रेय के जो भी सेवक और साधक हैं, वे सब परिक्रमा के लिए गिरनार क्षेत्र जाएँगे, गिरनार जी जाएँगे, विंध्य क्षेत्र में जहाँ स्थान है वहाँ जाएँगे, काशी क्षेत्र के स्थान पर, चक्र पुष्करणी तीर्थ आदि पर जाएँगे।

47

ऐसे स्थान और ऐसे समय पर वही मंत्र सामान्य से कई गुना असर देता है, और दूर बैठे भी लाभ मिलता है

वही मंत्र कई गुना असर देता है, दूर बैठे भी लाभ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 27:41–28:11

यदि उस समय उस स्थान पर बैठकर आप भगवान दत्त की सेवा कर रहे हैं, तो जिस मंत्र का आप सामान्य दिनों में जप करते थे, और जो फल और सामर्थ्य मिलती थी — वक्ता कहते हैं, उन स्थानों पर बैठकर आप खुद देख लें: वह कई गुना ज़्यादा असर देगा। पर उस स्थान से दूर बैठकर भी, दूर से जप करें, अपने घर बैठकर भी, तो सामान्य दिनों से कई गुना ज़्यादा फल मिलता है।

48

कुंभ के पैंतालीस दिनों में अशरीरी शक्तियाँ सूक्ष्म शरीर में आती हैं

सूक्ष्म शरीर में पैंतालीस दिनों तक आने वाली अशरीरी शक्तियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 28:12–28:35

वक्ता कहते हैं, ठीक इसी तरह कुंभ के समय कई प्रकार की दिव्य शक्तियाँ, जिन्हें अशरीरी शक्तियाँ कहा जा सकता है — जो भौतिक शरीर से नहीं, सूक्ष्म शरीर से आती हैं — माघ के समय भी आती हैं; और अब तो कुंभ है, महाकुंभ है, तो उनका आना-जाना ज़रूर होगा। और महाकुंभ सवा महीने का है: पैंतालीस दिनों का बहुत अच्छा लंबा समय, चौबीसों घंटे दिव्यता से भरा।

49

नवरात्रि के नौ दिनों का नियम दिखाता है कि ऐसे समय का फल कितना बढ़ जाता है

नौ दिन का नियम और उसके फल का गुणा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 28:36–28:50

वक्ता कहते हैं, नवरात्रि में आप नौ दिन नियम रखते हैं, और देखते हैं कि उसका फल कितने गुना होता है। वे कहते हैं, यह ऐसा समय है जिसमें — एक तरह से कहें तो — यहाँ विस्फोटक ऊर्जाओं का आना-जाना शुरू हो जाता है।

नवरात्रि में आप नौ दिन नियम रखते हैं, वक्ता कहते हैं, और देखते हैं कि उसका फल कितने गुना ज़्यादा हो जाता है। यह, वे कहते हैं, वह समय है जिसमें, एक तरह से कहें तो, यहाँ विस्फोटक ऊर्जाओं का आना-जाना शुरू हो जाता है।

मूल प्रतिलेख
नवरात्र में 9 दिन का आप पालन करते हैं नियम का और देखते हैं उसका फल कितना गुना अधिक होता है। यह वो समय है जिसमें कि एक तरीके से कहा जाए तो विस्फोटक ऊर्जाओं का आवागमन यहां पर आरंभ होता है।
50

पुरी के पास का एक पूर्वज लें, जिसने भगवती विमला की विशेष कृपा पाई

पुरी के पास का पूर्वज जिसने भगवती विमला की विशेष कृपा पाई

· Reviewed Sep 14, 2026 · 28:51–29:14

वक्ता कहते हैं, मान लीजिए कोई व्यक्ति ओडिशा क्षेत्र में, पुरी जी के पास रहता है — ठीक पुरी जी के पास नहीं, पर उस क्षेत्र का निवासी है — और उसके पूर्वज उस स्थान पर रहे, और उन पूर्वजों में किसी व्यक्ति ने भगवती विमला की उपासना और सेवा करके उनकी विशेष कृपा पाई।

51

विशेष कृपा पाने का अर्थ है कि दिव्य शक्तियाँ और सिद्धियाँ कुल में स्थापित हो गईं

कुल में स्थापित दिव्य शक्तियाँ और सिद्धियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 29:15–29:27

वक्ता कहते हैं, विशेष कृपा पाने का अर्थ है कि उन्हें दिव्य शक्तियाँ और सिद्धियाँ मिलीं; वे कुल में स्थापित हो गए, और कभी न कभी उन शक्तियों की मदद से अपनी वंश-परंपरा में कोई कृपा करते हैं।

विशेष कृपा पाने का अर्थ, वक्ता कहते हैं, यह है कि उन्हें दिव्य शक्तियाँ और सिद्धि मिलीं। वे कुल में स्थापित हो गए, और कभी न कभी, उन शक्तियों के सहयोग से, वे अपनी वंश-परंपरा में कोई कृपा करते हैं।

मूल प्रतिलेख
विशेष कृपा को प्राप्त करने का तात्पर्य है कि उनके दिव्य शक्तियां सिद्धियां इन्हें प्राप्त हुई कुल में वो स्थापित हो गए और कभी ना कभी उन शक्तियों की सहयोग से अपने वंश में कुछ कृपा वो करते हैं।
52

कुंभ कितने होते हैं, और उनमें कौन आता है?

बारह कुंभ, चार पृथ्वी पर, दो अर्धकुंभ, और देवलोक की शक्तियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 29:28–29:53 · Also a question

वक्ता कहते हैं, यह जान लीजिए: भले वे देवी लोक पा चुके हों और देवी लोक चले गए हों, तो जो बारह कुंभ होते हैं, उनमें ये चार मुख्य पृथ्वी पर होते बताए गए हैं, और दो अर्धकुंभ। इस कुंभ में देवलोक की शक्तियाँ भी कुंभ में आती हैं; और सबसे पहले वे उस स्थान पर ज़रूर जाएँगी जहाँ से वे निकली थीं, जहाँ उनका अंतिम जन्म हुआ था और जहाँ से सिद्धि पाकर उन्होंने दिव्य लोक पाया।

53

क्या हर परिवार की परंपरा में ऐसा कोई सिद्ध हुआ है?

लगभग हर कुल में कोई हुआ है, ज्ञात या अज्ञात, और उनके आने भर से चीज़ें बदलती हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 29:54–30:19 · Also a question

यदि आपकी कुल परंपरा में कभी कोई सिद्ध हुआ हो — और लगभग हर कुल में अतीत में कोई न कोई ऐसा साधक व्यक्ति हुआ है जो कृपा करता है, चाहे हम उन्हें जानते हों या नहीं — तो वे उस कुल में ज़रूर आएँगे। रास्ता सबसे पहले वहीं से खुलेगा; और क्योंकि वे देवी लोक की, परलोक की शक्तियाँ हैं, इस लोक की नहीं, उनके आने भर से बहुत-सी चीज़ें बदलने लगती हैं।

54

ऐसी आने वाली शक्ति घर को नियम में पाए तो क्या करेगी?

घर पर पूरे नीति-नियम से पूजन करने वाले परिवार पर उनकी कृपा होती है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 30:20–30:49 · Also a question

मान लीजिए वे अपने कुल में आते हैं और देखते हैं कि हमारे कुल के लोग घर पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूरे नीति-नियम और विधि-विधान से पूजन और सेवा कर रहे हैं, संध्या पूजा समय पर हो रही है — तो वक्ता कहते हैं, वे ज़रूर कृपा करेंगे। उनके लिए यह बहुत आसान हो जाता है; यदि कोई काम बिगड़ा पड़ा है, तो वे बहुत आसानी से कृपा करके, आशीर्वाद देकर, उसे ठीक करके चले जाएँगे — चाहे वे पितृ वर्ग के हों, देव वर्ग के हों, या किसी और योनि के, इससे हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता; फल शुभ ही होगा।

55

दस बजे तक सोया घर जल्दी से जल्दी स्नान के रोज़ के नियम में चूकता है

जितना जल्दी हो सके स्नान करने का रोज़ का नियम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 30:50–31:12

पर यदि कोई आकर देखे कि ये तो 10 बजे सोकर उठ रहे हैं — जबकि यहाँ रोज़ का नियम है कि जितना जल्दी हो सके स्नान करें — तो वे क्या कृपा करेंगे? वक्ता कहते हैं, तीर्थ क्षेत्र में आप जब भी कर लें, वहाँ हमेशा भीड़ रहती है, जब समय मिले; पर रोज़ घर पर, सुबह, ज़्यादा से ज़्यादा मान लें 7 या 8 बजे तक नहा लिया, 9 बजे तक भी — और यहाँ 10 बज रहे हैं और व्यक्ति आराम से सो रहा है।

56

कृपा पाने का अवसर आता है; उसे धारण करने की पात्रता नहीं होती

अवसर आता है; उसे धारण करने की पात्रता नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 31:13–31:26

वक्ता कहते हैं, कृपा पाने का अवसर तो ज़रूर मिलेगा, पर आप उसे ले नहीं पाएँगे। कारण यह है कि आपमें क्षमता नहीं है। वे आपको देने को तैयार हैं, पर उसे धारण करने की पात्रता ही आपमें नहीं है।

कृपा पाने का अवसर आपको ज़रूर मिलेगा, वक्ता कहते हैं, पर आप उसे ले नहीं पाएँगे। कारण यह है कि आपमें क्षमता नहीं है। वे आपको देने को तैयार हैं, पर उसे धारण करने के लिए आपमें पात्रता ही नहीं है। यह विषय ज़रूर ध्यान में रखें।

मूल प्रतिलेख
आपको अवसर अवश्य प्राप्त होगा कृपा प्राप्त करने का लेकिन आप कर नहीं पाइएगा। कारण है कि आपके पास कैपेबिलिटी नहीं है वो आपको देने के लिए तो तैयार हैं लेकिन रखने के लिए आपके पास में पात्रता ही नहीं है इस विषय का अवश्य ध्यान रखें।
57

पैंतालीस दिन तक, चौबीसों घंटे, एक शिवरात्रि जैसी अवस्था रहती है

पैंतालीस दिन, चौबीसों घंटे, एक शिवरात्रि जैसी तीव्रता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 31:27–31:58

वक्ता कहते हैं, यह एक दिन की बात नहीं, पूरे पैंतालीस दिनों की बात है। यानी जो सामर्थ्य हम एक शिवरात्रि में पाते हैं — जो शिवरात्रि के समय रात भर चारों प्रहर की पूजा करके पाते हैं — कुंभ के समय, इस चल रहे महापर्व में, वही दिव्यता चौबीसों घंटे बनी रहेगी। क्योंकि महाशिवरात्रि पर दूसरे लोक से शक्तियाँ एक ही रात के लिए आती हैं; यहाँ तिथि के अनुसार आना-जाना हमेशा चलता रहेगा।

58

नियम पौष पूर्णिमा से, यानी 13 जनवरी से शुरू होता है

पौष पूर्णिमा से, यानी 13 जनवरी से

· Reviewed Sep 14, 2026 · 31:59–32:19

वक्ता कहते हैं, कुछ खास करना नहीं है, पर इस समय नियम ज़रूर रखें। जब माघ का महीना शुरू हो, खासकर पौष पूर्णिमा से, यानी 13 जनवरी से।

59

नियम कब तक चले, और पहला नियम क्या है?

26 या 27 फ़रवरी तक, और पात्रता का पहला नियम अनुशासन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 32:20–32:38 · Also a question

तब से 26 फ़रवरी तक, या कहें अगले दिन 27 फ़रवरी तक, अपनी सामर्थ्य के अनुसार नियम रखें। वक्ता कहते हैं, यदि आप नियम नहीं रखेंगे, तो सब व्यर्थ है। नियम में क्या रखना है: पहला है पात्रता लाने का नियम, यानी देश, काल और परिस्थिति के अनुसार अनुशासन में रहना।

तब से 26 फ़रवरी तक, और उसके अगले दिन तक, मान लें 27 फ़रवरी तक, नियम रखें, वक्ता कहते हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार। यदि आप नियम नहीं रखेंगे, तो सब व्यर्थ है। नियम में क्या-क्या रखना है? सबसे पहला है पात्रता लाने का नियम: कि अनुशासन में रहें। देश, काल और परिस्थिति के अनुसार।

मूल प्रतिलेख
तब से लेकर के 26 फरवरी उसके अगले दिन तक मान लीजिए 27 फरवरी तक का नियम रखिए। यथा सामर्थ्य। नियम पालन नहीं करेंगे अगर तो फिर सारा व्यर्थ है। नियम में क्या-क्या रखना चाहिए नियम? तो सबसे पहले पात्रता लाने का नियम है कि अनुशासन में रहें। देश काल परिस्थिति के अनुसार।
60

रात की शिफ़्ट में काम करने वाले के बारे में क्या?

लौटकर स्नान करें, और दस मिनट ही सही, संध्या करें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 32:39–32:58 · Also a question

वक्ता साफ़ करते हैं कि वे यह नहीं कह रहे कि यदि आप किसी कंपनी में काम करते हैं और रात की ड्यूटी पर जाना है, तो सुबह 4 बजे आएँ, सब छोड़ दें और न नहाएँ। आकर नहाएँ आदि, और संध्या ज़रूर करें। एक घंटा न कर सकें तो दस मिनट ही करें, पर संध्या करें — सुबह और शाम दोनों, देश, काल और परिस्थिति के अनुसार जितना हो सके। वे कहते हैं, पहला काम यह है: पात्रता ज़रूर रखें।

61

इन दिनों भोजन का नियम क्या है?

कोई असात्त्विक भोजन नहीं, और हो सके तो लहसुन-प्याज़ छोड़ें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 34:01–34:22 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अपने भोजन की व्यवस्था अच्छी रखें, ताकि किसी तरह का निरामिष भोजन न करना पड़े — यानी कोई असात्त्विक भोजन न करना पड़े। हो सके तो इतने दिनों के लिए लहसुन और प्याज़ भी छोड़ दें।

अपने भोजन की व्यवस्था अच्छी रखें, वक्ता कहते हैं, ताकि किसी तरह का निरामिष भोजन न करना पड़े। यानी कोई असात्त्विक भोजन न करना पड़े। यदि हो सके, तो इतने दिनों के लिए लहसुन और प्याज़ आदि ज़रूर छोड़ दें।

मूल प्रतिलेख
भोजन का व्यवस्था अपना अच्छी तरीके से रखिए कि किसी प्रकार का कोई निरामिश भोजन ना खाना पड़े। अर्थात कोई अशात्विक भोजन ना खाना पड़े। संभव हो तो लहसुन प्याज आदि का भी त्याग इतने दिन तक करें। तीसरा चीज जो सबसे विशेष है अपना जो तेज है उसकी रक्षा करना।
62

तीसरा और सबसे खास नियम है तेज की रक्षा, जो सप्त धातुओं में अंतिम है

तेज की रक्षा — सप्त धातुओं में अंतिम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 34:23–34:40

तीसरी बात, जो सबसे खास है, अपने तेज की रक्षा करना है — क्योंकि सप्त धातुओं में यह अंतिम धातु है, और उसी तेज में आपका सारा अर्क, सारा मंत्र, जप और तप समाया रहेगा। वक्ता पूछते हैं, यदि वही नष्ट हो गया, तो क्या लाभ मिलेगा? इसलिए ब्रह्मचर्य का पालन बिल्कुल अनिवार्य है: इस समय सख़्ती से ब्रह्मचर्य का पालन करें।

63

ये पैंतालीस दिन क्यों नहीं जाने देने चाहिए?

अगला कुंभ बारह साल बाद ही, और तब आप हों या न हों

· Reviewed Sep 14, 2026 · 34:41–35:01 · Also a question

वक्ता कहते हैं, ध्यान रखें कि एक बार ये पैंतालीस दिन बीत गए, तो महाकुंभ, कुंभ, बारह साल बाद ही आएगा; उससे पहले नहीं आने वाला। अर्धकुंभ आएगा, पर कुंभ बारह साल बाद ही आएगा। और अगले बारह साल बाद आप हों या न हों — कोई नहीं जानता। तो इस दिव्य काल का लाभ घर पर ही ज़रूर लें।

64

जो कुंभ नहीं पहुँच सकता, वह घर पर क्या कर सकता है?

नहाने से पहले स्नान के जल में भगवती का आवाहन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 35:02–35:29 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अब स्नान का विषय आता है, और स्नान में एक बहुत गहरा विषय है, जिसे वे चैनल पर अलग से भी डालेंगे: कि यदि हम किसी भी तरह कुंभ के क्षेत्र में जाने में सक्षम नहीं हैं, तो उस अवस्था में घर पर ही, आप जहाँ भी हों और जिस भी अवस्था में हों, नहाने से पहले स्नान के जल में भगवती का आवाहन करें, और आवाहन करके नहाएँ।

65

स्नान के जल को अभिमंत्रित करने की कितनी विधियाँ हैं?

मंत्र विधि, यंत्रोक्त विधि, और नहाने से पहले स्मरण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 35:30–35:43 · Also a question

वक्ता कहते हैं, इसमें दो-तीन विधियाँ हैं: एक मंत्र विधि है, एक यंत्रोक्त विधि भी है, और स्मरण आदि करके नहाने का विधि-विधान भी है। इनमें जो सबसे सरल विधि-विधान है, वह वे आप सबके सामने ज़रूर रखेंगे।

अब उसमें दो-तीन विधियाँ हैं, वक्ता कहते हैं: एक मंत्र विधि है, एक यंत्रोक्त विधि भी है, और स्मरण आदि करके नहाने का विधि-विधान भी है। इनमें जो सबसे सरल विधि-विधान है, वह वे आप सबके सामने ज़रूर रखेंगे।

मूल प्रतिलेख
अब उसमें दो-तीन विधि है मंत्र विधि भी है यंत्रोक्त विधि भी है और स्मरण आदि करने के पश्चात भी स्नान करने का भी विधि विधान है। तो उसमें से जो जो सबसे सरलतम विधि विधान होगा वो अवश्य आप सभी के समक्ष रख देंगे।
66

पहले से क्या व्यवस्था करना सबसे अच्छा है?

तीन स्तोत्रों और सतनामों से अभिमंत्रित एक लीटर शुद्ध गंगाजल

· Reviewed Sep 14, 2026 · 35:44–36:15 · Also a question

वक्ता कहते हैं, सबसे अच्छा यह है, चाहे आप और कुछ करें या न करें: यदि घर के पास मिल सके तो पहले से शुद्ध गंगाजल ले आएँ। कम से कम एक लीटर, धुले, साफ़ बर्तन में रखा हुआ; और पौष पूर्णिमा से पहले, या यदि रोज़ करना संभव हो तो रोज़ सुबह नहाने के बाद — यानी एक दिन पहले करके — उस जल को भगवती गंगा जी के स्तोत्र और सतनाम, भगवती कालिंदी के स्तोत्र और सतनाम, और भगवती सरस्वती के स्तोत्र और सतनाम से अभिमंत्रित करें। वे बताते हैं, कालिंदी यानी यमुना जी।

67

उस अभिमंत्रित जल का उपयोग कैसे करें, और इस पर क्या आपत्ति उठती है?

थोड़ा-सा स्नान के जल में मिलाना, और यह दावा कि गंगाजल नहीं मिलाना चाहिए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 36:16–36:40 · Also a question

जिस जल से आप नहाते हैं, उसमें इस जल की कुछ मात्रा मिलाएँ, और उससे नहाएँ। वक्ता कहते हैं, अब कोई इसमें शास्त्रोक्त मत और विधान ढूँढने जाएगा, और आपको कोई यह कहता मिल सकता है कि शास्त्र में लिखा है कि यदि गंगाजल किसी और जल में मिला दिया जाए, तो वह जल छूने लायक भी नहीं रहता।

और जिस जल से आप नहाते हैं, उस स्नान के जल में इस जल की कुछ मात्रा मिलाएँ, और उससे नहाएँ, वक्ता कहते हैं। अब कोई इसमें शास्त्रोक्त मत और विधान ढूँढने जाएगा, और यदि आपको कोई यह कहता मिल जाए कि शास्त्र में लिखा है — कि यदि गंगा जी का जल किसी और जल में मिला दिया जाए, तो वह जल छूने लायक भी नहीं रहता।

मूल प्रतिलेख
तो इन तीनों को एक स्तोत्र सतनाम से उस जल को आप जो है अभिमंत्रित करके रख लीजिए। और स्नान करने वाले जल में इसी जल का कुछ मात्रा जो है मिला दिया कीजिए स्नान वाले जल में और उससे स्नान कर लीजिए। [0:430] अब इसमें शास्त्रोक्त मत और विधान देखने के लिए जाएगा और कोई अगर आपको यह कहते हुए पाया जाए कि शास्त्र में तो लिखा हुआ है कि गंगा जी का जल अगर किसी अन्य जल में मिला दिया जाए तो वो जल जो है स्पर्श करने योग्य नहीं रह जाता है।
68

जो वेदोक्त आधार पर मिलाने से मना करे, उससे पूरी शर्तें पूछें

उनसे पूरी शर्तें पूछें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 36:41–37:11

वक्ता कहते हैं, ध्यान रखें कि ऐसा कथन देने वाला व्यक्ति, यदि खुद को वेदोक्त कहता है, तो उससे भी पूछें: ठीक है, यदि ऐसा है, तो शर्तें क्या हैं? पूरी बात बताइए — किन अवस्थाओं में कहा गया है कि गंगाजल दूसरे जल में न मिलाएँ? जब आप वह शर्त पूछेंगे, उसमें उसके क्या-क्या नियम हैं, तब आपको ज़्यादा स्पष्टता मिलेगी, और दिखेगा कि वह जो बता रहा है, आधा बता रहा है। वे कहते हैं, यह विषय वे उन महानुभावों पर छोड़ते हैं जो यह कहकर आपको इससे हटाने की कोशिश करेंगे कि गंगाजल दूसरे जल में बिल्कुल न मिलाएँ।

69

गंगाजल तो पहले से सिद्ध है, फिर उस पर स्तोत्र क्यों पढ़ें?

सामर्थ्य की कमी हममें है, जल में नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 37:12–37:35 · Also a question

आपत्ति यह है: स्तोत्र और सतनाम का जप कौन करे — गंगाजल तो अपने आप में सिद्ध है, उसे सिद्ध करने की क्या ज़रूरत? वक्ता जवाब देते हैं, सिद्ध करने को कौन कह रहा है; हमारी भावना ही उस स्तर तक नहीं पहुँच रही। हम यह नहीं कह रहे कि गंगाजल में सामर्थ्य की कोई कमी है — बिल्कुल कोई कमी नहीं है; सामर्थ्य की कमी हमारे भीतर है।

70

जल पर गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती पढ़ने से ही श्रद्धा ज़रूरी स्तर तक आती है

गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती — पहले माहात्म्य, फिर सामर्थ्य

· Reviewed Sep 14, 2026 · 37:36–38:08

उस जल के प्रति हमारी श्रद्धा, भाव और समर्पण उस स्तर का तब तक नहीं होगा, जब तक हम उस पर गंगा, जमुना, गोदावरी, सरस्वती का मंत्र न पढ़ें। वक्ता कहते हैं, सामर्थ्य तभी आती है जब हम उसका माहात्म्य जानते हैं; माहात्म्य न जानें तो उसमें सामर्थ्य कहाँ से आएगी? और अनजाने में किया पुण्य, और उससे मिला फल, ज़रूरी नहीं कि शरीर रहते आपको दिखाई दे।

71

बाणासुर का प्रसंग लौकिक और पारलौकिक फल के बारे में क्या दिखाता है?

अंतिम क्षण में तीन बार महादेव पुकारने से त्रिशूल नहीं रुकता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 38:09–38:40 · Also a question

वक्ता कहते हैं, शिव महापुराण में बाणासुर के प्रसंग में कहा गया है कि उसका फल पारलौकिक है, लौकिक नहीं — और आप लौकिक फल चाहते हैं। यदि आप अनजाने में कोई पुण्य करें, या अंतिम समय में बहुत पाप कर रहे हों, और जब आप मारे जाने वाले हों और शिव जी त्रिशूल लेकर आपका धड़ तोड़ने को खड़े हों, तब आप कहें त्राहिमाम् महादेव महादेव महादेव, हमने तीन बार महादेव कहा, हमारी रक्षा करो — रक्षा नहीं होगी। महादेव रक्षा नहीं करने वाले। वहाँ साफ़ किया गया है: अंतिम क्षण में आपने उन्हें याद किया, ठीक है, आपको शिव लोक मिलेगा; पर अब आपको कटना होगा, अब आपकी रक्षा नहीं हो सकती। वे कहते हैं, यह भाव पहले आना चाहिए था।

शास्त्र क्या कहता है

At the climax of the Bāṇāsura episode, Mahādev does not protect his devotee when called on at the last moment — the fruit of devotion there is only paralaukik (otherworldly), not laukik (worldly).

Kṛṣṇa, about to sever the unconscious Bāṇa's head with the Sudarśana, is stopped by Śiva himself, who reveals he had already granted Bāṇa a boon of protection (55:38) — Bāṇa is saved by protection arranged in advance, not left unanswered. The passage shows the opposite of the chunk's moral.

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29

कृष्णोऽथ कृत्वा समरं चिरं बाणेन वीर्यवान् । शिवाऽऽज्ञया प्राप्तबलश्चुकोपाति मुनीश्वर ॥ २९॥

हे मुनीश्वर! तब पराक्रमी कृष्ण बाणके साथ दीर्घकालतक युद्ध करके, शिवकी आज्ञासे प्राप्त बलके सहारे अत्यन्त क्रुद्ध हो गये।

30

ततःसुदर्शनेनाशु कृष्णो बाणभुजान्बहून् । चिच्छेद भगवान् शम्भुः शासनात्परवीरहा ॥ ३०॥

तब कृष्णने सुदर्शनचक्रसे तुरन्त, भगवान् शम्भुकी आज्ञासे शत्रुवीरोंका नाश करते हुए, बाणकी अनेक भुजाओंको काट डाला।

31

अवशिष्टा भुजास्तस्य चत्वारोऽतीव सुन्दराः । गतव्यथो बभूवाशु शङ्करस्य प्रसादतः ॥ ३१॥

उसकी चार अत्यन्त सुन्दर भुजाएँ शेष रह गयीं, और शङ्करकी कृपासे वह तुरन्त पीड़ारहित हो गया।

32

गतस्मृतिर्यदा बाणः शिरश्छेत्तुं समुद्यतः । कृष्णो वीरत्वमापन्नस्तदा रुद्रः समुत्थितः ॥ ३२॥

जब संज्ञाशून्य हुए बाणका सिर काटनेके लिये वीरभावको प्राप्त कृष्ण उद्यत हुए, तभी रुद्र वहाँ उठ खड़े हुए।

33

भगवन्देवकीपुत्र यदाज्ञप्तं मया पुरा । तत्कृतं च त्वया विष्णो मदाज्ञाकारिणा सदा ॥ ३३॥

हे भगवन् देवकीपुत्र! मैंने पहले जो आज्ञा दी थी, हे विष्णो! सदा मेरी आज्ञाका पालन करनेवाले आपने वह कर दिया है।

34

मा बाणस्य शिरश्छिन्धि संहरस्व सुदर्शनम् । मदाज्ञया चक्रमिमममोघं मज्जने सदा ॥ ३४॥

बाणका सिर मत काटो, सुदर्शनको समेट लो; मेरी आज्ञासे यह अमोघ चक्र सदा वापस लिया जा सकता है।

35

दत्तं मया पुरा तुभ्यमनिवार्यं रणे तव । चक्रं जयं च गोविन्द निवर्तस्व रणात्ततः ॥ ३५॥

हे गोविन्द! मैंने पहले तुम्हें युद्धमें अजेय चक्र तथा विजय प्रदान की थी; अतः अब युद्धसे निवृत्त हो जाओ।

36

दधीचे रावणे वीरे तारकादिपुरेष्वपि । विना मदाज्ञां लक्ष्मीश रथाङ्गं नामुचः पुरा ॥ ३६॥

हे लक्ष्मीश! दधीचि, वीर रावण और तारकासुर आदि पुरोंके विरुद्ध भी मेरी आज्ञाके बिना यह चक्र पहले कभी नहीं छोड़ा गया।

37

त्वं तु योगीश्वरः साक्षात्परमात्मा जनार्दन । विचार्यतां स्वमनसा सर्वभूतहिते रतः ॥ ३७॥

हे जनार्दन! तुम तो साक्षात् योगीश्वर और परमात्मा हो; सब भूतोंके हितमें रत होकर अपने मनमें इस पर विचार करो।

38

वरमस्य मया दत्तं न मृत्युर्भयमस्ति वै । तन्मे वचः सदा सत्यं परितुष्टोऽस्म्यहं तव ॥ ३८॥

मैंने इसे वरदान दिया है कि इसे मृत्युका भय नहीं है; मेरा वह वचन सदा सत्य है। मैं तुमसे बहुत सन्तुष्ट हूँ।

72

प्रयागराज स्वयं नारायण हैं, इसलिए स्नान के बाद विष्णु सहस्रनाम या गीता का ग्यारहवाँ अध्याय

प्रयागराज नारायण रूप — विष्णु सहस्रनाम या ग्यारहवाँ अध्याय

· Reviewed Sep 14, 2026 · 39:16–39:53

तीसरी बात प्रयाग जी है। प्रयागराज को स्वयं नारायण कहा गया है, भगवान श्री हरि नारायण। तो नहाने के बाद भगवान नारायण का स्तोत्र और सतनाम करें, या श्री विष्णु सहस्रनाम, या जो भी आपके लिए संभव हो, श्रीमद्भगवद्गीता का। यदि आप भगवद्गीता का पाठ करते हैं, तो ग्यारहवाँ अध्याय पढ़ें; अनंत फल मिलने वाला है। गंगा स्नान का पुण्य तो मिल ही चुका, और प्रयाग जी का पुण्य यहाँ से मिलेगा, क्योंकि वे महाविष्णु के रूप हैं।

73

खास तौर पर ग्यारहवाँ अध्याय ही क्यों?

विराट स्वरूप, जिसमें सारी शक्तियाँ समाई हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 39:54–40:16 · Also a question

वक्ता कहते हैं, ग्यारहवाँ अध्याय वह है जिसमें भगवान नारायण अपना सबसे विशाल स्वरूप दिखाते हैं; और उस स्वरूप में सारी शक्तियाँ समाई हैं। इसलिए उसका पाठ करें। वे जोड़ते हैं, यह केवल सामान्य विषय की चर्चा है — आराध्यों का विषय, तंत्रोक्त विषय, मंत्र सिद्धि का विषय, जप आदि का विषय, वह सब अलग है।

74

जो कोई साधना नहीं करेगा, उसके लिए कम से कम क्या है?

अष्टोत्तर शतनामावली, और कुंभ का पूरा प्रभाव

· Reviewed Sep 14, 2026 · 40:33–40:51 · Also a question

वक्ता कहते हैं, जो लोग कोई साधना नहीं करने वाले, वे कम से कम इतना करें: अष्टोत्तर शतनामावली आदि का पाठ करें। इतना करें, क्योंकि इतना करने से भी आप पूरी तरह शुद्ध हो जाएँगे, और कुंभ का पूरा प्रभाव मिलेगा।

जो लोग कोई साधना नहीं करने वाले हैं, वक्ता कहते हैं, वे कम से कम इतना करें। अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त।वली आदि का पाठ करें। इतना करें, क्योंकि इतना करने से भी आप पूरी तरह शुद्ध हो जाएँगे; कुंभ का पूरा प्रभाव मिलेगा।

मूल प्रतिलेख
विकल्प क्या-क्या हो सकता है कम से कम में। जो लोग कोई साधना नहीं करने वाले कम से कम इतना तो करें। अष्टोत्तर सतनामावली आदि का पाठ करें। इतना करें क्योंकि इतना करने से भी आप पूरा साफ हो जाइएगा। कुंभ का पूर्ण प्रभाव मिलेगा। क्योंकि दिव्य शक्तियां भैया सभी के कुल में अवश्य रही हैं और ये वो समय है जिसमें कि उनका आवागमन होना ही होना है।
75

हर कुल में दिव्य शक्तियाँ रही हैं, और यह उनके आने-जाने का समय है

वे हर कुल में रही हैं, और यह उनके आने-जाने का समय है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 40:52–41:12

वक्ता कहते हैं, क्योंकि दिव्य शक्तियाँ सबके कुल में ज़रूर रही हैं, और यह वह समय है जिसमें उनका आना-जाना होना ही है। और जब ऐसा हो, और आप यहाँ तैयार हों, कम से कम अपने पापों के नाश के लिए कुछ व्यवस्था कर रहे हों, तो उस दिव्यता के प्रभाव से उनकी कृपा भी आप पर ज़रूर पड़ेगी।

76

कुंभ का नियम कब से शुरू कर सकते हैं — और कब से ज़रूर करना है?

विकल्प के रूप में शाकंभरी नवरात्रि; नियम के रूप में पौष पूर्णिमा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 41:13–41:38 · Also a question

जिनकी कुलदेवी भगवती शाकंभरी हैं, वे चाहें तो आने वाली शाकंभरी नवरात्रि की अष्टमी तिथि के दिन से अपनी सेवा और पूजा शुरू कर सकते हैं। पर वक्ता कहते हैं, कुंभ की मुख्य बात आप पौष पूर्णिमा से ज़रूर शुरू करें। यह विषय भी ध्यान में रखें।

77

स्नान का नियम पहला है — रोज़, और सुबह जितना जल्दी हो सके

स्नान का नियम — रोज़, और सुबह जितना जल्दी हो सके

· Reviewed Sep 14, 2026 · 41:39–41:59

वक्ता कहते हैं, नियमों को एक-एक करके लें, तो पहला नियम स्नान का है; यह सबसे खास है, ध्यान रखें। यदि बहुत संक्षेप में कहें — क्या-क्या करना है — तो पहली बात है अनुशासन में रहकर रोज़ नहाना। स्नान छूटना नहीं चाहिए; सुबह जितना जल्दी हो सके करें।

अब जब हम नियमों को एक-एक करके लेते हैं, वक्ता कहते हैं, तो जो पहला नियम है, वह स्नान का नियम है। यह सबसे खास है; ध्यान रखें। यदि बहुत संक्षेप में कहें — भाई, क्या-क्या करना है — तो पहली बात है अनुशासन में रहकर रोज़ नहाना। स्नान छूटना नहीं चाहिए, और सुबह जितना जल्दी हो सके।

मूल प्रतिलेख
अब है कि जब हम एक-एक नियम को सबसे पहला नियम जो होता है स्नान का नियम है। सो सबसे विशेष है ध्यान रखें। बहुत अगर शॉर्ट में इसको अगर समराइज किया जाए कि भैया क्या-क्या करना है। सबसे पहला चीज तो अनुशासन में रहते हुए स्नान करना है नित्य। स्नान छूटना नहीं चाहिए जितना सुबह हो सके।
78

इसके बाद संध्या, जिसमें कम से कम अपने आराध्य का अष्टोत्तर सतनाम हो

संध्या, कम से कम अपने आराध्य के अष्टोत्तर सतनाम के साथ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 42:00–42:29

दूसरी बात संध्या है। यदि आप पूरे पैंतालीस दिन स्नान और संध्या करें, तो केवल नहाने से, और संध्या में और कुछ न करके केवल अपने आराध्य का अष्टोत्तर सतनाम पढ़ने से — वक्ता कहते हैं, इतना करना भी इस समय आपको कई करोड़ गुना पुण्य देने वाला है।

और दूसरी बात संध्याप्रातः व सायं संध्या-काल में की जाने वाली नित्य उपासना — वैदिक संध्या हेतु वर्णाश्रम के अंतर्गत अधिकारिता आवश्यक है, जबकि इसके अभाव में तांत्रिक दीक्षा लेकर तांत्रिक संध्या की जा सकती है। है, वक्ता कहते हैं। यदि आप पूरे पैंतालीस दिन स्नान और संध्या करें, तो केवल नहाने से, और संध्या में, और कुछ नहीं तो, अपने आराध्य का अष्टोत्तर सतनाम पढ़ने से — इतना करना भी इस समय आपको कई करोड़ गुना पुण्य देने वाला है।

मूल प्रतिलेख
और दूसरा चीज है संध्या। स्नान और संध्या अगर आप पूरा 45 दिन करते हैं तो स्नान करने मात्र से और संध्या में आप और कुछ नहीं तो अष्टोत्तर सतनाम अपने आराध्य का पाठ आप कर लीजिए। इतना करना भी आपके लिए कई करोड़ गुना पुण्य को देने वाला है इस समय में। और इस बीच में अगर आप प्रयाग क्षेत्र चले गए या गंगा जी में कहीं भी स्नान कर लिए या माघ के क्षेत्र के नियम के अनुसार माघ नियम के अनुसार जो है आप किसी भी नदी में सरोवर में स्नान कर लेते हैं, तीर्थ क्षेत्र में चले जाते हैं, कोई हवन आदि कर लिए क्योंकि बीच में अभी बहुत कुछ पड़ेगा।
79

इन पैंतालीस दिनों में कौन-कौन से पर्व पड़ते हैं?

शाकंभरी पूर्णिमा, मौनी अमावस्या, माघ गुप्त नवरात्रि, माघी पूर्णिमा, महाशिवरात्रि

· Reviewed Sep 14, 2026 · 42:30–42:48 · Also a question

वक्ता कहते हैं, और इस बीच यदि आप प्रयाग क्षेत्र जाएँ, या कहीं भी गंगा जी में नहाएँ, या माघ क्षेत्र के नियम से किसी नदी या तालाब में नहाएँ, किसी तीर्थ क्षेत्र जाएँ, हवन आदि करें — क्योंकि बीच में बहुत कुछ पड़ने वाला है। शाकंभरी पूर्णिमा है; उसके बाद मौनी अमावस्या; फिर माघ की गुप्त नवरात्रि; उसके बाद माघी पूर्णिमा, जिस दिन ललिता अंबा की जयंती है, माँ भगवती महा त्रिपुर सुंदरी की जयंती; इधर भगवती शाकंभरी की जयंती पड़ रही है; और उसके बाद फिर शिव जी की नवरात्रि शुरू होती है, और महाशिवरात्रि पड़ेगी।

80

प्रयाग में रहकर रोज़ नहाने वाले के बारे में क्या कहा गया है?

विष्णु रूप होकर विष्णु लोक पाना, और पीढ़ियों का उद्धार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 42:49–43:10 · Also a question

वक्ता कहते हैं, कहा गया है कि स्नान का पुण्य अनंत है, और यदि कोई व्यक्ति केवल लगातार नहाता है, तो यह पुण्य है। अब यदि प्रयाग क्षेत्र में रहने वाला व्यक्ति रोज़ नहाए, तो भाई, महिमा अनंत ही हो गई — वह विष्णु का ही रूप धरकर विष्णु लोक जाएगा; और केवल वही नहीं, उसकी कई पीढ़ियों के पूर्वज भी जाएँगे; आप उन सबका उद्धार करेंगे।

81

जहाँ यह भी संभव न हो, वहाँ पूरे पैंतालीस दिन रखा गया विकल्प भी गिना जाता है

पूरे पैंतालीस दिन रखा गया विकल्प

· Reviewed Sep 14, 2026 · 43:11–43:44

वक्ता कहते हैं, यदि इतना भी संभव न हो, तो जिस विकल्प की चर्चा हुई वह है; और यदि आप वह भी पूरे पैंतालीस दिन करें, तो सोचिए उस समय में कितने दिव्य पर्व-काल पड़ रहे हैं। इन सबमें आप कौन-से अनुष्ठान और साधनाएँ करेंगे, और जप आदि कैसे होगा, यह विषय अभी पूरी तरह अलग है।

82

मूल बात है स्नान, संध्या, और पैंतालीस दिन भोजन और ब्रह्मचर्य का अनुशासन

स्नान, संध्या, और पैंतालीस दिन भोजन और ब्रह्मचर्य का अनुशासन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 43:45–44:22

वक्ता कहते हैं, तो यह ज़रूर करें: सबसे बुनियादी चीज़ आप क्या चाहते हैं? स्नान, संध्या, और पूरे पैंतालीस दिन नियम और अनुशासन का पालन। अनुशासन में दो चीज़ों पर ध्यान देना है — भोजन और ब्रह्मचर्य। इतना ज़रूर करें, फिर परिणाम देखें। करेंगे तो परिणाम ज़रूर मिलेगा; नहीं करेंगे और कहेंगे कि ऐसा कुछ नहीं होता, तो वैसा ही होगा — ऐसा कुछ नहीं होगा।

83

क्या शिवलिंग और अरघी को जोड़कर रखना चाहिए?

घर में स्थापित शिवलिंग पर शिव महापुराण विद्येश्वर संहिता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 44:23–44:57 · Also a question

वक्ता जवाब देते हैं, शिवलिंग और अरघी को जोड़कर नहीं रखना चाहिए। इसका शास्त्रोक्त मत है: जब आप शिव महापुराण में, विश्व संहिता में, शिवलिंग के माहात्म्य के विषय में पढ़ेंगे, तो प्रमाण मिलेगा कि जो शिवलिंग हमें घर में पूजन के लिए रखना है, जिसे घर में स्थापित करना है, उसमें अरघी और शिवलिंग अलग-अलग रखने चाहिए।

84

दिवाली की स्वर्णाकर्षण भैरव पोटली कहाँ रखनी चाहिए?

मुख्य द्वार या पूजा स्थान, और उसकी माला पर जप

· Reviewed Sep 14, 2026 · 45:21–45:48 · Also a question

दिवाली पर बनी स्वर्णाकर्षण भैरव जी की पोटली या तो घर के मुख्य द्वार के पास टाँग सकते हैं या पूजा स्थान में रख सकते हैं; इन दोनों में से किसी भी स्थान पर स्थापित कर सकते हैं। और उसकी माला पर जप करके आप उसे रोज़ पहन सकते हैं। जिन्हें महाभैरव के मंत्र के लिए तंत्रोक्त माला नहीं मिली, या जो ले नहीं पाए, या जिनके पास कुछ भी नहीं है — उनके लिए भी उस माला पर जप करके उसे पहनना सबसे उत्तम है।

85

हिंगलाज, पूर्णागिरि और ज्वालामुखी की विधियाँ गुप्त क्यों रखी गई हैं?

अत्यंत दिव्य स्वरूप, जानबूझकर गुप्त रखे गए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 45:49–46:10 · Also a question

वक्ता कहते हैं — हिंगलाज माता, पूर्णागिरि माता, ज्वालामुखी माता, ऐसे जितने भी स्वरूप हैं, इन्हें अत्यंत दिव्य स्वरूप जानिए। और अच्छा है कि भगवती कैला देवी समेत ऐसे सब स्वरूपों का विषय यथाशक्ति गुप्त रखा गया है। मंत्र, विधि-विधान आदि ऐसे ही ठीक हैं।

86

भगवान की लीला में जो नकारात्मक पात्र बनता है, वह उन्हें अत्यंत प्रिय होता है

जो नकारात्मक भूमिका निभाता है, वह भगवान को अत्यंत प्रिय है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 46:11–46:30

वक्ता उस दिन लिखी अपनी एक पोस्ट की बात करते हैं। उसमें उन्होंने लिखा कि भगवान की हर लीला में जो नकारात्मक पात्र निभाता है, जो खलनायक बनता है, वह भगवान को अत्यंत प्रिय है — और भगवान उसे अत्यंत प्रिय हैं। वे कहते हैं, इसी कारण उन्होंने यह स्पष्टता दी।

वक्ता कहते हैं — जानिए, आज हमने एक पोस्ट लिखी, जिसमें यह विषय लिखा: कि भगवान की हर लीला में जो नकारात्मक पात्र की भूमिका निभाता है, जो उसमें खलनायक बनता है, वह भगवान को अत्यंत प्रिय है। भगवान उसे अत्यंत प्रिय हैं। इसी कारण हमने इस विषय पर स्पष्टता दी।

मूल प्रतिलेख
भगवान उसको अति प्रिय होते हैं।
87

हिंगलाज, विंध्यवासिनी या ज्वालामुखी स्वरूप का पूरा विधान साधारण व्यक्ति पचा नहीं सकता

हिंगलाज, विंध्यवासिनी या ज्वालामुखी का पूरा विधान देखना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 46:31–46:54

वक्ता कहते हैं — जब आप भगवती के हिंगलाज स्वरूप, विंध्यवासिनी स्वरूप, ज्वालामुखी स्वरूप का पूरा विधान पाकर देखेंगे, तो उसे जानकर, देख-सुनकर आप उसे पचा नहीं पाएँगे। साधारण लोग वे बातें जल्दी नहीं पचा सकते। वे कहते हैं, यही सीधा सत्य है।

वक्ता कहते हैं — उसमें होता यह है कि जब आप भगवती के हिंगलाज स्वरूप, भगवती के विंध्यवासिनी स्वरूप, भगवती के ज्वालामुखी स्वरूप आदि का पूरा विधान पाते हैं, देखते हैं, तो उस विधान को जानकर, देख-सुनकर आप उसे पचा नहीं पाएँगे। साधारण लोग वे बातें जल्दी नहीं पचा सकते। यही सीधा सत्य है।

मूल प्रतिलेख
उसमें क्या है जब आप भगवती के हिंगलाज स्वरूप, भगवती के विंध्यवासिनी स्वरूप, भगवती के ज्वालामुखी स्वरूप आधे का पूर्ण विधान अगर प्राप्त करते हैं देखते हैं तो उस विधान को जानने के पश्चात देखने सुनने के पश्चात आप पचा नहीं पाइएगा। सामान्य जन उन चीजों को जल्दी नहीं पचा सकते हैं। ये यथार्थ बात है।
88

नाम महिमा के स्तर पर अटकी बुद्धि के लिए राधा के तंत्रोक्त विषय बंद रहते हैं

राधा के तंत्रोक्त विषय, और दूसरे स्तर पर अटकी बुद्धि

· Reviewed Sep 14, 2026 · 46:55–47:23

वक्ता कहते हैं — आज भगवती राधा जी से जुड़े तंत्रोक्त विषय देखिए। नाम जप आदि की महिमा अनंत है, और उस हद तक सब ठीक चल रहा है। पर अगर आप उनके तंत्रोक्त विषयों में जाएँ, भगवती के अनन्य स्वरूपों के बारे में जानें — कि हाँ, यही मूल रूप है, उसमें क्या और कैसे है — तो कहीं न कहीं उस बात को पचाने की क्षमता नहीं होगी। कारण यह है कि हमारी बुद्धि किसी दूसरे स्तर पर जाकर अटक गई है।

89

ऐसे स्वरूप ठीक ही गुप्त रखे गए हैं; आपकी परंपरा में कुलदेवी का स्थान कुल गुरु से पूछिए

कुल गुरु, और अपनी परंपरा में कुलदेवी का स्थान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 47:24–47:59

वक्ता कहते हैं — अच्छा है कि ये सब स्वरूप कहीं न कहीं अपनी गोपनीयता निभा रहे हैं। वे उस स्तर पर समाज के बीच नहीं हैं, और जो उन्हें रखता है या रखेगा, उसकी क्या दशा होती है, यह समाज देख ही रहा है। जिनके कुल में ये हैं, जिनकी वे कुलदेवी हैं, वे इन स्वरूपों की आगे की जानकारी अपने कुल गुरु से लें। अगर वे कुल में हैं, तो कुल परंपरा में उनकी पूजा और सेवा चली होगी, और लोगों ने बाद में उसे अपने तक सीमित कर लिया होगा, जिससे बाकी सबको उसका ज्ञान नहीं रहेगा।

90

क्या स्त्रियाँ तर्पण कर सकती हैं?

तर्पण के लिए पुरुष अधिक उपयुक्त; विशेष परिस्थिति में स्त्रियों को अधिकार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 48:00–48:30 · Also a question

वक्ता उत्तर देते हैं — ठीक से कहा जाए तो तर्पण पुरुष करें, यही सर्वोत्तम है। विशेष परिस्थितियों में स्त्रियों को अधिकार है, पर तब पूरा नियम लागू होता है — किस अवस्था में और कब करना है। दूसरी बात, गणपति जी का तर्पण: भगवान गणपति के बारह स्वरूपों, विनायकों का तर्पण आप कर सकते हैं। पर जिस विशेष तंत्रोक्त तर्पण में मंत्रों का प्रयोग हुआ है, उसके लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है।

91

नाम जप में किन दस नाम-अपराधों से बचना है?

नाम जप किसी भी अवस्था में, पर निंदा कभी नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 48:31–49:00 · Also a question

वक्ता कहते हैं — पितरों का तर्पण पुरुष करें, यही अधिक उचित है। नाम जप आप हर अवस्था में कर सकते हैं। पर दस नाम-अपराध हैं, उनसे बचना चाहिए। नाम जप करते हुए किसी की निंदा न करना — यह सब दस नाम-अपराधों में आता है। नाम जप का पूरा फल तभी मिलेगा जब आप अपराधों से बचकर नाम जप करेंगे।

92

नाम जप की साधना चलते समय ठीक-ठीक किन बातों से बचना है?

न निंदा, न शाप, न कठोर वाणी, न वर्जित भोजन या स्पर्श

· Reviewed Sep 14, 2026 · 49:01–49:35 · Also a question

किसी की निंदा नहीं करनी, किसी को शाप नहीं देना, कठोर वचन नहीं बोलने — क्योंकि उसी मन से, उसी मन में मंथन करते हुए आप नाम जप कर रहे हैं। जब उसी मन से आप बिना अधिकार का कोई चिंतन करते हैं, किसी को बुरे वचन कहते हैं, अभक्ष्य पदार्थ खाते हैं, या अस्पृश्यता से वे चीज़ें छूते हैं जिन्हें छूना मन के लिए वर्जित है, तो वह सब आपको दोष बनकर लगेगा। वक्ता कहते हैं, नाम जप से आपके सूक्ष्म शरीर, सूक्ष्म आवरण और कारण शरीर में जो ऊर्जा आती है, वह आपकी पवित्रता और क्षमता बढ़ाने वाली होती है।

93

जप के समय अपवित्रता देवता का अपमान क्यों बन जाती है?

जिस देवता का नाम जपा जाता है, शरीर उसी का रूप लेने लगता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 49:36–50:04 · Also a question

वक्ता कहते हैं — आप यह भी जानते हैं कि जिस देवता का मंत्र और नाम रोज़ स्मरण किया जाता है, जिसका जप-तप होता है, हमारा शरीर उसी का स्वरूप लेने लगता है। तो जब आप ऐसी अवस्था पा रहे हों, और उसी अवस्था में दूसरे विकारों से युक्त होकर चिंतन, स्पर्श और भोग करें, तो यह उस देवता का सीधा अपमान हो जाता है। और जब अपमान होता है, तो फल मिलने के बजाय कहीं न कहीं उनका शाप आपको मिलेगा।

94

नाम जप आदत बन जाए तो क्या खतरा है?

जप चलता रहता है, चिंतन भटकता रहता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 50:05–50:40 · Also a question

वक्ता कहते हैं — यहीं नाम जप कहीं न कहीं बिगड़ जाता है, और एक तरह से दुष्प्रभाव वाला फल देने लगता है। तो पहली बात, अगर आप नाम जप कर रहे हैं तो सावधानी ज़रूर रखिए — क्योंकि जब यह अभ्यास बन जाता है, तो चिंतन छूट जाता है; यह भी सच्ची बात है। यह बिल्कुल ठीक है कि हमेशा, हर अवस्था में नाम जप करते रहना चाहिए, ताकि मन दूसरी बातों पर न टिके, एक अच्छी बात पर केंद्रित रहे, विकारों पर नहीं। जैसे कोई व्यक्ति बैठकर किसी सुंदर स्त्री को देखकर सोचने लगे कि यह स्त्री हमारी होती — ऐसी अवस्था में अगर उसका मन नाम जप कर रहा है, तो वह ऐसा विचार नहीं करेगा, नाम जप पर केंद्रित रहेगा, कि अरे, हम भगवान का नाम ले रहे हैं। यह अच्छी बात है।

95

केवल नाम जप काफ़ी क्यों नहीं है?

जप के साथ सत्संग, स्वाध्याय और स्तुति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 50:41–51:12 · Also a question

पर अगर नाम जप का अभ्यास बन गया है और आपका चिंतन आपको नहीं छोड़ रहा — आप चौबीस घंटे चिंतन करते थे और अब भी करते हैं, और जप का अभ्यास भी बन गया — तो इसके लिए भी सत्संग ज़रूरी है; केवल नाम जप से यह नहीं होगा। नाम जप के साथ जब आप सत्संग करें, जब अपने इष्ट और आराध्य के शास्त्र और पुराण पढ़ें, उनमें दिए उपदेश को जीवन में उतारने की कोशिश करें, और इसके आगे स्तुति करें।

96

स्तुति मन के विकारों के साथ क्या करती है?

शास्त्र-नाम या सूक्त का पाठ, और स्तुति गाना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 51:13–51:44 · Also a question

जब आप शास्त्र-नाम का पाठ करते हैं, किसी सूक्त का पाठ करते हैं, अपने इष्ट और आराध्य की स्तुति गाकर करते हैं, तो मन में बैठे विकारों पर ऐसी चोट पड़ती है कि वे अपने आप टूट जाते हैं। वक्ता कहते हैं, आप देखेंगे — यह व्यावहारिक विषय है, आप भी कर सकते हैं; करेंगे तभी इसका ज्ञान मिलेगा, और आप इसका अनुभव कर पाएँगे।

97

पीछे शिव का नाम चलता रहता है, जबकि चिंतन खुद ईर्ष्या होता है

पीछे शिव का नाम चलता है, जबकि चिंतन ईर्ष्या का है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 51:45–52:25

वक्ता कहते हैं — यह तब होगा जब आप यह सब न करें, और बस कहें, हाँ ठीक है, नाम जप करो। नाम जप का अभ्यास बन जाने पर आपका चिंतन कुछ और होगा, और पीछे नाम जप चलता रहेगा। आप शिव जी का नाम जप कर रहे हैं, भगवती राधा रानी का नाम जप कर रहे हैं, पर चिंतन वही चल रहा है जो नहीं होना चाहिए — कि इसके पास इतनी संपत्ति क्यों है, यह ज़रूर गलत काम करता होगा; कि यह लड़की बहुत सुंदर है, इसके पास कैसे आ गई, यह तो लंगूर जैसा दिखता है, इसे यह अंगूर कैसे मिल गया — और पीछे शिव जी का नाम चल रहा है।

98

भीतर के घड़े का ढक्कन कभी खुला ही नहीं, इसलिए अमृत बाहर से बह जाता है

भीतर के घड़े का ढक्कन बंद है, इसलिए अमृत बाहर से बह जाता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 52:26–53:10

वक्ता कहते हैं — क्योंकि मन का जो पूरा अभिषेक करना है, वह अभिषेक आपने नहीं किया। आप उस पर अमृत डालने की कोशिश कर रहे हैं, पर अमृत बाहर से बहकर जा रहा है; भीतर नहीं जा पा रहा। भीतर के घड़े का ढक्कन खोलने के लिए, ताकि अमृत भीतर जाए और सारा भीतरी विकार बाहर निकले — उसके लिए स्तुति, जप, तप, सत्संग और स्वाध्याय सब साथ चलने चाहिए; तभी यह हो पाएगा, नहीं तो कोई लाभ नहीं। वे कहते हैं, यह सच्ची और अनुभव की बात है; करेंगे तभी अनुभव होगा, केवल बातों से नहीं होता।

99

क्या नीच ग्रह के रत्न वाला नियम उसके नाम के जप पर भी लागू होता है?

नीच और उच्च ग्रहों पर एक श्रोता का प्रश्न

· Reviewed Sep 14, 2026 · 53:11–53:52 · Also a question

प्रश्नकर्ता पूछते हैं: ज्योतिष में जो भाव या ग्रह नीच होता है, उसका रत्न नहीं दिया जाता, बल्कि उल्टा — जो ग्रह बलवान है, उसे और बलवान किया जाता है। क्या ग्रहों के नाम के जप में भी ऐसा ही होता है?

100

प्रश्न दोबारा: क्या नीच ग्रह का जप नीच फल दे सकता है

क्या नीच ग्रह का जप नीच फल दे सकता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 53:53–54:22

वक्ता कहते हैं कि प्रश्नकर्ता ने "भाव" लिखा, पर शायद ग्रह का मतलब था — कौन-सा ग्रह उच्च अवस्था में है, किस राशि में बैठा है, जिससे वह उच्च या नीच होगा; और उनके रत्न पहनें या नहीं, यह बिल्कुल अलग विषय है, वह पूरा विज्ञान अलग है। अब जो पूछा गया उसकी जड़ नाम जप से जुड़ी है: अगर हम ग्रहों के नामों का स्मरण करें, तो क्या वे भी किसी तरह का बुरा फल देने वाले हैं? क्या वे आपको कोई बुरा प्रभाव देंगे? क्या ऐसा हो सकता है कि कोई ग्रह नीच हो और हम उसका जप करें, तो वह हमें नीच फल दे?

101

चेहरे पर सच्ची श्रद्धा के साथ शत्रु को प्रणाम — यही तुलना वे करते हैं

चेहरे पर सच्ची श्रद्धा के साथ शत्रु को प्रणाम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 54:23–55:00

वक्ता कहते हैं — यह हमेशा ध्यान रखिए। मान लीजिए अनुराग जी, आप हमारे शत्रु हैं और दिल से चाहते हैं कि किसी दिन हम बर्बाद हो जाएँ। पर जब भी हम अनुराग जी के सामने जाते हैं या उनसे मिलते हैं, बहुत शांति और नम्रता से उन्हें प्रणाम करते हैं; हमारे चेहरे पर, पूरे हाव-भाव में आपके प्रति श्रद्धा दिखती है, चालाकी और छल का कोई भाव नहीं आता। आप आँखों से, हमारे चेहरे और मुँह पर आए भाव से देख सकते हैं कि यह व्यक्ति साफ़ दिल से मुझे प्रणाम कर रहा है।

102

जब शत्रु को पता चले कि आप पीठ पीछे उसकी तारीफ़ करते हैं, तब क्या होता है?

जब कोई तीसरा व्यक्ति बताता है, तो विचार झटके से बदलते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 55:01–55:52 · Also a question

और अगर साथ में हम पीठ पीछे आपकी अच्छी बात करें — सामने नहीं, पीछे, और कोई न कोई आपको बताएगा कि वह आपके बारे में बहुत अच्छा बोल रहा था, और लगा नहीं कि दिखावे के लिए कर रहा है — अगर आपने कोई अच्छा काम किया और हम उसकी चर्चा करें, कि अनुराग चौबे जी बहुत मेहनती व्यक्ति हैं, बहुत मेहनत करते हैं; किसी कारण शत्रुता है और वे हमें पसंद नहीं करते, ठीक है, यह उनकी भावना और उनकी इच्छा है, पर हम उनसे सीख सकते हैं — तो जब आपको यह पता चलेगा, मेरे बारे में आपके विचार भी बदलने लगेंगे। वे बड़े झटके से बदलेंगे, उस दिन जब किसी तीसरे व्यक्ति से पता चलेगा कि यह हमारे गुणों की बात करता है और कहता है कि हमसे प्रेरणा लेता है। वक्ता कहते हैं, हम आपको बताने नहीं आए कि हम आपके बारे में अच्छा सोचते हैं; आपको पता चल रहा है।

103

ग्रह कितना भी नीच हो, उसे प्रणाम और उसके नाम का जप कभी बुरा फल नहीं देते

ग्रह कितना भी नीच हो, उसे प्रणाम और नाम जप कभी बुरा फल नहीं देते

· Reviewed Sep 14, 2026 · 55:53–56:30

वक्ता कहते हैं — ठीक इसी तरह, भाई, ग्रह कितने भी नीच हों, उन्हें प्रणाम करना, नमस्कार करना और उनके नाम का जप करना आपको कभी बुरा फल नहीं देगा।

वक्ता कहते हैं — ठीक इसी तरह, ग्रह कितने भी नीच हों — भाई, उन्हें प्रणाम करना, उन्हें नमस्कार करना, और उनके नाम का जप करना, आपको कभी बुरा फल नहीं देगा।

मूल प्रतिलेख
आपको पता चल रहा है। ठीक उसी प्रकार से ग्रह कितने भी नीच हो भाई उनको प्रणाम करना नमस्कार करना और उनका नाम जप करना वो कभी भी आपको खराब फल को नहीं देंगे। आप अगर दिन भर बुध ग्रह आपके लिए बहुत खराब है मान लिए बुध ग्रह हालांकि किसी को खराब फल बहुत कम ही देते हैं वैसा जो आप चर्चा कर रहे हैं उस विषय पर बोल रहे हैं। ऐसे तो मार्केश भी हो जाते हैं बुध ऐसा नहीं है लेकिन बहुत सारा ऐसा नियम है जिसमें कि उनको अच्छा फल ही देने वाला माना गया है सौम्य ग्रह में माना गया है। तो मान लेते हैं कि अगर आपको कोई बोल दे कि अरे बुध के प्रभाव से दुष्प्रभाव से आपको जो है स्किन में ये एलर्जी हो रही है प्रॉब्लम हो रहा है आपको चर्म रोग हो गया है ये बुध के कारण हो रहा है या आपकी बुद्धि भ्रमित हो रही है तो इसमें बुध कारण है बुध नीच के हैं।
104

बुध सौम्य ग्रह हैं, जप से प्रसन्न होते हैं; केवल पदार्थ छोड़ने हैं

सौम्य ग्रह; जप से प्रसन्न, केवल पदार्थ छोड़ने हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 56:31–57:00

वक्ता कहते हैं — मान लीजिए बुध ग्रह आपके लिए बहुत खराब है — हालाँकि जिस तरह की चर्चा है, बुध बहुत कम किसी को बुरा फल देते हैं; फिर भी वे मारकेश बन सकते हैं, ऐसा नहीं कि नहीं बन सकते, पर बहुत से नियम हैं जिनके अनुसार वे शुभ फल ही देने वाले माने जाते हैं और सौम्य ग्रहों में गिने जाते हैं। अब मान लीजिए कोई आपसे कहे कि बुध के दुष्प्रभाव से आपको त्वचा में एलर्जी, समस्या, त्वचा रोग हो रहा है, या आपकी बुद्धि भ्रमित हो रही है, और इसका कारण बुध है और बुध नीच है। तब अगर आप उनके नाम का जप और स्मरण करेंगे, तो वे प्रसन्न होकर कृपा ही करेंगे; अपना दुष्प्रभाव नहीं बढ़ाएँगे।

105

ग्रह अपना दुष्प्रभाव कब बढ़ाता है?

जब आप शरीर पर वे पदार्थ धारण करते हैं जो उसकी किरणें सोखते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 57:01–57:42 · Also a question

वक्ता उत्तर देते हैं — जब आप शरीर पर वे पदार्थ धारण करते हैं जो उनकी ऊर्जा सोखते हैं। अब हमें पता है कि बुध देव हमारे लिए नीच हैं और हमें दुष्प्रभाव देते हैं; तो उस ग्रह की किरणें ग्रहण करने वाली चीज़ें शरीर पर कम से कम इस्तेमाल करें। हरे पदार्थ कम खाने हैं; हरे कपड़े कम पहनने हैं — बुध देव हरे रंग के माने जाते हैं; और उनसे जुड़े रत्न हम नहीं पहनेंगे। वे कहते हैं, इतना ही बस पहनने में छोड़ना है।

106

क्या पूजन और पाठ कभी दुष्प्रभाव दे सकते हैं?

पूजन से कोई ग्रह कभी दुष्प्रभाव नहीं देता — पर पूजन की गलतियाँ अलग बात हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 57:43–58:14 · Also a question

वक्ता कहते हैं — नाम जप, स्मरण, पूजन और पाठ में कोई भी ग्रह कभी दुष्प्रभाव नहीं देता; पूजन-पाठ का कभी दुष्प्रभाव नहीं होता, यह ध्यान रखिए। लाल किताब, पीली किताब या किसी और किताब से जो इस विषय पर बोलता है — वह फिर अलग विषय हो जाता है; ऐसा नहीं होगा। हाँ, अगर पूजन-पाठ में आप कोई गलती कर रहे हैं, तो वह अलग बात है, वह प्रसंग फिर अलग है।

107

किसी भी कर्मकांड के पहले नियम क्या हैं?

पहले स्नान का नियम, फिर वस्त्र का नियम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 58:15–58:41 · Also a question

वक्ता कहते हैं — उदाहरण के लिए, यह बात हर जगह लिखी है, कोई भी कर्मकांड हो, चाहे तंत्र कांड का हो: कि जब आप पूजन के लिए बैठें, तो शुरू से अंत तक उसका पूरा फल — पहली बात क्या है? भाई, स्नान का नियम। दूसरा है वस्त्र का नियम।

वक्ता कहते हैं — उदाहरण के लिए, यह बात हर जगह है; कोई भी कर्मकांड हो, चाहे तंत्र कांड का हो, हर जगह लिखा है: कि जब आप पूजन के लिए बैठे, तो उसका पूरा फल, शुरू से अंत तक — पहला क्या है? भाई, स्नान का नियम। दूसरा है वस्त्र का नियम।

मूल प्रतिलेख
तो उसमें मांसाहारी पदार्थों को मिलाया गया है ऐसा आपको पूरा अच्छे-अच्छे वेबसाइटों पे अच्छे-अच्छे ये पे मिल जाएगा। पूरा कि हां भाई ये इसमें मांस का तेल का प्रयोग किया गया है। अब बताइए यगोपवित आप पहनते हैं और डब साबुन से डब शैंपू से नहा रहे हो या डिटॉल से नहा रहे हो डिटॉल में भी है।
108

यज्ञोपवीत पहनने वालों से पूछा जाता है कि उनके नहाने के साबुन और शैम्पू में क्या-क्या मिला है

नहाने के साबुन और शैम्पू में क्या-क्या मिला है, यह खोजना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 58:42–59:20

वक्ता कहते हैं कि स्नान का विषय आया है तो इसे भी स्पष्ट कर दें, और यज्ञोपवीत पहनने वालों का उदाहरण लेते हैं। वे नाम लेकर पूछते हैं: आप में से कितने डव साबुन से नहाते हैं? अगर डव साबुन से नहाते हैं, तो बस गूगल पर खोजिए कि डव साबुन वेज है या नॉन-वेज, और उसमें क्या-क्या मिलाया गया है — अच्छी वेबसाइटों पर मिलेगा कि उसमें मांसाहारी पदार्थ मिलाए गए हैं, कि हाँ भाई, इसमें मांस का तेल इस्तेमाल हुआ है। अब बताइए, वे कहते हैं: आप यज्ञोपवीत पहनते हैं और डव साबुन, डव शैम्पू या डेटॉल से नहा रहे हैं — डेटॉल में भी यही है।

109

हिंदुओं के पतन के लिए बना एक प्रोपेगेंडा रोज़ सिर पर मला जा रहा है

हिंदुओं के पतन का प्रोपेगेंडा, रोज़ आपके सिर पर मला जाता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 59:21–1:00:00

वक्ता कहते हैं कि इस पूरे विषय पर वे अलग से वीडियो ज़रूर बनाएँगे; यह बहुत सोचने वाली बात है। आप कहते हैं, फल क्यों नहीं मिलता — यही कारण है, और यही कारण है कि बहुत से विद्वान साबुन से नहाने को मना करते हैं। मानें या न मानें, आपकी इच्छा; उनका विषय बस सच्चाई आपके सामने रखना है, ताकि वे और आप हो रहे नुकसान से बच सकें। जहाँ हम मांस आदि के स्पर्श से बचने की कोशिश करते हैं, कि आप ऐसा नहीं कर सकते, वहीं वह रोज़ आपके सिर पर मला जा रहा है। वह यज्ञोपवीत आपको क्या फल देगा, वह रुद्राक्ष आपको क्या फल देगा?

110

उत्पाद के लिए वीगन और नॉट वीगन खोजिए, और हरा निशान देखिए

वीगन और नॉट वीगन खोजना, और हरा निशान देखना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:00:01–1:00:40

जो भी साबुन या शैम्पू आप इस्तेमाल करने वाले हैं, उसे एक बार यूट्यूब और गूगल पर खोजिए — वीगन और नॉट वीगन, डेटॉल वीगन और नॉट वीगन; वहाँ साफ़ लिखा आ जाएगा, गूगल आपको गलत नहीं बताएगा, कि हाँ भाई, यह सिद्ध है, पहले से लिखा है। और देखिए, इन सब साबुनों पर कहीं भी वह हरा निशान लगा नहीं मिलेगा। वक्ता कहते हैं, जबकि हमें पता है कि हिमालया कंपनी ने किसी समय यह बात रखी है; उसकी भीतरी बात जो भी हो, कोई मानक नियम होगा — पर उनके ज़्यादातर शैम्पू आदि पर हरा निशान लगा है, यानी उसमें किसी तरह का पशु या मांस इस्तेमाल नहीं हुआ।

111

ऐसी चीज़ों से नहाकर फिर जप के लिए बैठने का क्या परिणाम है?

मांस से नहाकर जप के लिए बैठना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:00:41–1:01:10 · Also a question

वक्ता कहते हैं — अब यह जानिए: अगर आप ऐसी चीज़ें इस्तेमाल करके नहा रहे हैं, और उसके बाद बैठकर जप करेंगे, तो कहीं न कहीं, भले अनजाने में किया हो, दुष्प्रभाव तो है न — मांस को छूना नहीं चाहिए, और हम उससे नहाकर मांस के साथ बैठे हैं। वे कहते हैं, यह आँखें खोलने वाला विषय है; मन में धमाका करेगा, पर आप मानेंगे नहीं, यह आपकी इच्छा; इसे आपके सामने रखना हमारा कर्तव्य था, और हम बहुत समय से सोच रहे थे कि इसे कैसे रखें, तो रख रहे हैं। इस पर अलग से भी चर्चा होगी।

112

साबुन की जगह क्या बताया गया है?

सात दिनों में सात तरह के उबटन — बेसन, हल्दी, शहद, शक्कर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:01:11–1:01:31 · Also a question

वक्ता कहते हैं — इसीलिए उबटन से नहाने को कहा गया है: कि सात दिनों में सात तरह के उबटन इस्तेमाल करें — बेसन से, हल्दी से, शहद से, शक्कर से; उसी तरह का नियम और विधि जैसे हम भगवान का षोडशोपचार पूजन करते हैं।

वक्ता कहते हैं — तो पहली बात स्नान की हो गई। इसीलिए उबटन से नहाने को कहा गया है: कि सात दिनों में सात तरह के उबटन इस्तेमाल करें। बेसन से, हल्दी से, शहद से, शक्कर से — उसी तरह का नियम और विधि जैसे हम भगवान का षोडशोपचारदेवता हेतु सोलह अंगों वाला पूर्ण पूजा-क्रम, मूल पंचोपचार से अधिक विस्तृत। पूजन आदि करते हैं।

मूल प्रतिलेख
हम तो विषयों को आपके समक्ष रख देंगे। चुनना आपको है ना। उसके लिए आपको अपने बुद्धि का प्रयोग करना होगा। चुनाव कभी भी भगवान जो है वो छोड़ देते हैं भक्त के ऊपर में। हम भी भक्त हैं आप भी भक्त हैं आप भी सेवक हम भी सेवक। हो सकता है कि किसी विषय में आप हमसे ज्यादा जानते हो किसी विषय में हम ज्यादा जानते हो।
113

विषय आपके सामने रखे जाते हैं; चुनना आपका काम है

हम विषय रखते हैं; चुनना आपका है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:01:32–1:02:05

वक्ता कहते हैं — इसमें हमारे पास बहस की कोई गुंजाइश नहीं — कि भाई, यह नहीं मिलता, वह नहीं मिलता, क्या करें, क्या हमेशा करना ही है; यह आपका विषय है, खोजिए, आपमें इतनी बुद्धि होनी चाहिए कि हमें कैसे और क्या करना है। हम विषय आपके सामने रखेंगे; चुनना आपका है। इसके लिए आपको अपनी बुद्धि लगानी होगी। वे कहते हैं, भगवान हमेशा चुनाव भक्त पर छोड़ते हैं। हम भी भक्त हैं और आप भी भक्त हैं; आप भी सेवक हैं और हम भी सेवक हैं। हो सकता है किसी बात में आप हमसे ज़्यादा जानते हों और किसी बात में हम ज़्यादा जानते हों।

114

उदाहरण के लिए पाँचवें भाव में बैठे, भाग्य भाव के स्वामी बृहस्पति को लीजिए

पाँचवें भाव में बृहस्पति, भाग्य भाव के स्वामी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:02:06–1:02:19

वक्ता कहते हैं — जो हम ज़्यादा जानते हैं, या जो जानकारी मिलती है कि हमारे सनातनी भाई यहाँ गलती कर रहे हैं और इसी कारण फल नहीं मिलता, वह हमने आपके सामने रखा है: भाई, इससे बचा जाए। अब मानना या न मानना आपकी इच्छा। तो मान लीजिए आप बृहस्पति देव की पूजा करने बैठे — कि हमें बृहस्पति ग्रह की सेवा-पूजा करनी है, क्योंकि हमारे बृहस्पति देव पाँचवें भाव में बैठे हैं और हमारे भाग्य भाव के स्वामी हैं, और अगर बृहस्पति देव प्रसन्न हो जाएँ तो हमारे धन, धान्य और भाग्य में बड़ी वृद्धि होगी, और बहुत कृपा मिलेगी।

115

बृहस्पति पूजा के पहले ही कदम पर क्या गलत होता है?

मंगलवार, गुरुवार और शनिवार को साबुन और तेल वर्जित हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:02:45–1:03:18 · Also a question

तो मान लीजिए आप बृहस्पति देव की पूजा करने गए, और उस दिन सबसे पहले नहाने गए, और वहाँ ऐसा साबुन इस्तेमाल किया — हालाँकि उस दिन, बृहस्पतिवार को, साबुन और तेल का प्रयोग भी वर्जित है, कि मंगलवार, गुरुवार और शनिवार को इन्हें नहीं लगाना चाहिए। पर वक्ता कहते हैं, इसे कितना माना जाए; यह सब अंधविश्वास की बात मानी जाती है।

116

कोई बात अंधविश्वास लगना कब बंद होती है?

अंधविश्वास तभी तक लगता है जब तक हर सुख-साधन भरपूर है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:03:19–1:03:43 · Also a question

वक्ता कहते हैं — यह आपको अंधविश्वास तभी तक लगेगा जब तक आपके पास हर सुख-साधन भरपूर है; यह ध्यान रखिए और अपने जीवन में देखिए। जब तक आप पिस नहीं जाते — जब अच्छी तरह पिस जाएँगे, तब हर नियम मानेंगे। तब आप वह भी मानेंगे जो नहीं मानना चाहिए; पर जो मानने योग्य है, जिसके पीछे कोई वचन है, वह ज़रूर मानना चाहिए, उसमें कोई हानि नहीं। पर आपकी इच्छा; आप ऐसे नहीं मानेंगे।

117

पीले वस्त्र और आसन में क्या गलत है?

सिला हुआ वस्त्र पहना, और स्टाइलिश नायलॉन आसन पर बैठे

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:03:44–1:04:08 · Also a question

वक्ता कहते हैं — तो सबसे पहले आपने मांस वाली चीज़ से स्नान किया। दूसरी बात वस्त्र पहनने का आरंभिक नियम है। अब बृहस्पति देव के पूजन में पीला वस्त्र पहनना है; आपने सिला हुआ पीला पहन लिया। सिला हुआ वस्त्र नहीं पहनना था; पीला आसन रखना था, कंबल आदि का, या वही आसन रखने थे। उनकी जगह आजकल सब स्टाइलिश तरह के आ गए हैं — नायलॉन वगैरह; और आप उसी आसन पर बैठ गए। वे कहते हैं, तो देखिए, आप समझौता तो कर ही रहे हैं।

118

बृहस्पति का पूजन कब तक शुरू हो जाना चाहिए?

सूर्योदय के सवा घंटे के भीतर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:04:09–1:04:32 · Also a question

वक्ता कहते हैं — वहाँ समय बताया गया है कि सुबह सूर्योदय के सवा घंटे के भीतर बृहस्पति देव का पूजन शुरू हो जाना चाहिए। अब आप 9 बजे, 10 बजे बृहस्पति देव का पूजन करने बैठ रहे हैं; उनका समय निकल गया। वे दोपहर में आएँगे, या कब आएँगे, या नहीं आएँगे, क्या बात होगी — अब उनका इससे कोई लेना-देना नहीं। तब आपका काम खत्म।

119

मनुष्य के अपने सामर्थ्य में कितना है?

सुबह उठना, ठीक से नहाना, शुद्ध वस्त्र, और समय पर पूजा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:04:33–1:04:58 · Also a question

वक्ता पूछते हैं — आधा आपने खुद नियमों से समझौता कर लिया, फिर चाहते हैं कि फल पूरा मिले — कैसे मिलेगा? इस पर भी विचार करना चाहिए। जो मनुष्य के सामर्थ्य में है, उसमें अपनी ओर से 100% दें। सुबह उठना आपके सामर्थ्य की बात है; ठीक से नहाना आपके सामर्थ्य की बात है; शुद्ध वस्त्र पहनना पूरी तरह आपके सामर्थ्य में है; और समय पर पूजन करना, जप करना भी आपके सामर्थ्य की बात है।

120

बृहस्पति का जप कितने समय तक करना चाहिए?

फल मिलने से पहले कम से कम एक महीना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:04:59–1:05:22 · Also a question

कहा गया है कि कम से कम एक महीना — कम से कम एक महीने बाद बृहस्पति देव का फल मिलता है। बृहस्पति देव के लिए एक महीना होना चाहिए; कम से कम एक महीना उनका जप-तप करना चाहिए। अब अगर आप महीना नहीं कर रहे, केवल पाँच दिन, केवल सात दिन किया, या किया ही नहीं, तो बस बैठकर दोष देंगे। वक्ता कहते हैं, तब आपके बृहस्पति बहुत मज़बूत हो जाएँगे, और इतने मज़बूत कि जीवन में आपको आनंद ही आनंद देंगे; और फिर आप बैठकर कहेंगे, फल क्यों नहीं मिल रहा।

121

दूसरा चरण है अपनी ही वाहवाही, और पंडितों का मज़ाक

अपनी वाहवाही, और पंडितों का मज़ाक उड़ाना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:05:23–1:05:58

वक्ता कहते हैं — इसके आगे एक और बात है। ठीक है, आपने नियम से किया, आप दूसरे चरण पर आ गए: सुबह उठे, भोर में अच्छे से नहाए, कोई खराब पदार्थ इस्तेमाल नहीं किया, नियम से उनका पूजन किया, सब किया। और पूजन करके उठे, और प्रसाद लेते ही, या लेने से पहले ही, कितना बैठकर कहते हैं — अरे, कितनी बढ़िया पूजा की हमने, क्या बढ़िया पूजा हुई, पूजा करके मज़ा आ गया; ये पंडित लोग पूजा करना नहीं जानते, ये लोग किसी तरह पूजा करवा देते हैं, देखो हमने कितनी बढ़िया की, हमने मंत्र पढ़े, अरे, बृहस्पति देव का मंत्र पढ़ने में आनंद आ गया; ऐसी पूजा ब्राह्मण नहीं करेंगे, ये ब्राह्मण आज लुटेरे हैं — और तुरंत शुरू हो जाता है।

122

ब्राह्मण केवल जन्म से ब्राह्मण नहीं; पूजा करते हुए अपने पिता का मज़ाक उड़ाना पूजा को बेकार कर देता है

जन्म से ही ब्राह्मण नहीं; और पूजा करते हुए अपने पिता का मज़ाक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:05:59–1:06:40

वक्ता कहते हैं — जहाँ आपको पूजा का यह अहंकार का नशा हुआ — यही पूजा की माया है। बृहस्पति देव ने तुरंत अपना खेल कर दिया। ब्राह्मण और विद्वान का अर्थ केवल जन्म से ब्राह्मण नहीं: हो सकता है आप खुद ब्राह्मण हों और वहाँ बैठे हों, और अपने ही पिता का मज़ाक उड़ाएँ, कि पापा ठीक से नहीं जानते, किसी तरह काम चला लेते हैं, देखो हमने कितनी बढ़िया पूजा की — और कहानी खत्म। आपको लगता है गुरु जी मंत्र ठीक से नहीं पढ़ते, बड़ी जल्दी में पढ़ते हैं, उनकी पूजा में मज़ा नहीं, वे काट-छाँट करते हैं; देखो हमने कितनी बढ़िया की — और कहानी खत्म, भाई।

123

जहाँ विद्वान या पिता का अपमान हुआ, बृहस्पति देव का पूजन वहीं निष्फल हो जाता है

बृहस्पति देव का पूजन उसी जगह निष्फल हो जाता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:06:41–1:07:23

वक्ता कहते हैं — ध्यान रखिए: जहाँ आपने उठकर विद्वान, ब्राह्मण, गुरु, पिता का अपमान किया — वहीं आपका बृहस्पति देव का पूजन करना व्यर्थ हो गया। यह भी ध्यान रखिए।

वक्ता कहते हैं — तो ध्यान रखिए: जहाँ आपने उठकर विद्वान का, ब्राह्मण का, गुरु का, पिता का अपमान किया — वहीं आपका बृहस्पति देव का पूजन निष्फल हो गया। यह भी ध्यान रखिए।

मूल प्रतिलेख
हम देखे कितना मस्त पूजा किए बस खत्म कहानी भाई। तो ध्यान रखें जहां आप विद्वान ब्राह्मण गुरु पिता इनका अपमान किए उठ कर के तो बृहस्पति देव का पूजन करना वहीं पर आपका व्यर्थ हो गया। यह भी ध्यान रखें।
124

क्या कुंभ का स्नान पर्व के दिन ही करना चाहिए?

जब भी समय और अवसर मिले, स्नान कीजिए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:07:24–1:08:02 · Also a question

प्रश्न है कि कुंभ में पर्व पर ही नहाना चाहिए, या मकर संक्रांति पर हरिद्वार में नहा सकते हैं, या प्रयागराज में किसी भी तिथि को। वक्ता उत्तर देते हैं: तीर्थ क्षेत्र में जब भी आपको समय मिले और अवसर आए, स्नान करना चाहिए। उसमें पास रहने वालों के पास पर्व-काल के मामले में ज़्यादा विकल्प हैं — कि भाई, हमने मकर संक्रांति पर नहा लिया; पर दूर रहने वाले, जैसे ही मौका मिले, कूद पड़ें।

125

क्या शाही स्नान या अमृत स्नान ही एकमात्र सिद्ध काल है?

केवल अमृत स्नान के घंटे नहीं, पूरे पैंतालीस दिन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:08:03–1:08:39 · Also a question

दूसरी बात, मकर संक्रांति के बारे में जो पूछा: मकर संक्रांति पर हरिद्वार में भी कीजिए, कोई कठिनाई नहीं; प्रयाग जी में कीजिए, उसमें भी कोई कठिनाई नहीं। और कुंभ के पैंतालीस दिनों में किसी भी समय आकर प्रयाग जी में नहाइए; सर्वोत्तम होगा, किसी भी तिथि को। जो चल रहा है — शाही स्नान, और जिसे अब अमृत स्नान कहा जा रहा है, कि उस समय सिद्ध काल है और उसी समय दिव्य सिद्धियाँ मिलती हैं — वक्ता कहते हैं, देखिए, यह केवल उस समय की बात नहीं। ध्यान रखिए, यह पूरे पैंतालीस दिनों की बात है, जैसा पहले चर्चा हो चुकी है; इसलिए निश्चिंत मन से किसी भी दिन नहा सकते हैं।

126

विग्रह या यंत्र की प्रतिष्ठा कब पूरी मानी जाती है?

एक मत से तीन दिन, और कुल पूजा के लिए एक वर्ष की नियमित पूजा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:08:40–1:09:16 · Also a question

राहुल शर्मा जी को प्रतिष्ठा पर उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं: जब हम श्री विग्रह में, यंत्र में, दंड में, या किसी और भौतिक पदार्थ में प्राण प्रतिष्ठा करते हैं, तो रोज़ के नियम से उनकी सेवा, पूजा और आरती चलते हुए — जब तक पूजन-पाठ अच्छे से हो रहा है — अगर वर्ष के भीतर एक वार्षिक पूजा हो जाए, तो उनकी प्रतिष्ठा पूरी मानी जाती है। फिर भी, अगर आपने तीन दिन नियम से पूजा की है, तो उनकी प्रतिष्ठा हो गई; यह भी एक मान्यता है। पर अगर आपने पूरे वर्ष नियम से पूजन किया है, तो वे कुल में पूजा के योग्य हो जाते हैं और उनमें प्रतिष्ठा की कोई कमी नहीं रहती। तांत्रिक प्रतिष्ठा में विषय अलग तरह से आता है।

127

तांत्रिक प्रतिष्ठा फिर से कब करनी चाहिए?

गुरु मंडल की किसी जयंती तिथि पर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:09:17–1:10:03 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि तांत्रिक प्रतिष्ठा का, चाहे वह माला की हो, एक नियम है। यहाँ इसका अर्थ उन लोगों से है जो तंत्रगत परंपरा से पूजन करते हैं। यह विषय आम लोगों के लिए नहीं, उन्हीं के लिए है। गुरु उपदेश देते हैं कि गुरु मंडल में, यानी गुरु के दादा गुरु, परदादा गुरु, तीसरे परमेष्ठी गुरु, मान लीजिए परात्पर गुरु तक, जिनकी भी जन्म तिथि आदि आती हो, जिनका भी जन्मोत्सव मनाया जाता हो, साल में उनमें से किसी भी तिथि पर माला की प्रतिष्ठा फिर से करनी चाहिए।

128

प्रतिष्ठा दोहराने के लिए और कौन-सा दिन लिया जा सकता है?

कुल परंपरा के प्रधान देवता की जयंती, और विग्रह का शोधन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:10:04–1:10:33 · Also a question

या अपनी कुल परंपरा के प्रधान देवता की जयंती के दिन प्रतिष्ठा दोहरानी चाहिए। यंत्र मंडल में भी ऐसे ही होगा, और गुरु जी ने जो तांत्रिक माला दी है, उसमें भी ऐसे ही। इसके अलावा शोधन की प्रक्रिया आती है, चाहे विग्रह शोधन हो। पर उसमें तीन-चार बातें ध्यान रखनी पड़ती हैं। धातु का ध्यान रखना पड़ता है। सोने का विषय अलग होता है, चाँदी का अलग, ताँबे और काँसे का फिर अलग।

129

अलग से प्रतिष्ठा की ज़रूरत कब बिल्कुल नहीं होती?

रोज़ सेवा, जप और आरती, और महीने या साल में एक बार हवन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:10:34–1:10:59 · Also a question

माला में भी ऐसा ही है। माणिक्य का अलग, मूँगे का अलग, रुद्राक्ष आदि का अलग। पर फिर भी अगर आप रोज़ पूजा कर रहे हैं — यह पारंपरिक बात है — अगर रोज़ सेवा-पूजा, रोज़ जप, रोज़ आरती कर रहे हैं, और साल में कम से कम एक बार, बल्कि अब महीने में एक बार भी हवन आदि की प्रक्रिया कर रहे हैं, तो आपको अलग से प्रतिष्ठा की खास ज़रूरत नहीं है।

130

चाँदी के विग्रह के बारे में कुलार्णव क्या कहता है?

पच्चीसवें वर्ष में महोत्सव के साथ फिर से प्रतिष्ठा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:11:00–1:11:37 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि बाद के समय में कुलार्णव आदि के अनुसार यह मत भी आता है। अगर आप चाहें तो नियम है कि अगर आपने चाँदी का विग्रह रखा है, तो पच्चीस साल में एक बार, पच्चीसवाँ साल पूरा होने पर, उनकी प्रतिष्ठा विधि फिर से करनी चाहिए। महोत्सव आदि होना चाहिए, और प्रतिष्ठा की पूरी विधि, विग्रह स्नान आदि की पूरी प्रक्रिया, सब करनी चाहिए। पर यह सब बहुत अलग विषय हो जाता है। हर देवता का फिर अलग, और धातु के हिसाब से अलग।

131

इस कुंभ की मुख्य साधना भैरव की क्यों हो?

रक्षा-प्रधान महादेव, जिनकी उग्रता की अभी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:12:18–1:12:33 · Also a question

प्रयास है कि इस कुंभ में हम सब मिलकर उनकी विशेष साधना करें। क्योंकि जो महादेव रक्षा में सबसे आगे हैं, जो सबसे बड़े देवता हैं, जिनकी उग्रता अब ज़रूरी है, जिनके तत्वों की रक्षा के लिए आपके और हमारे जीवन में सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, वे भगवान भैरव हैं। इसलिए उनका विशेष अनुष्ठान आदि बहुत ज़रूरी है। वक्ता कहते हैं कि इन सब पर अलग से चर्चा होगी। तैयारी के लिए साथ बने रहें।

132

तीन-चार साल पुराने फोड़े बिना दवा के ठीक हुए, एक बताए गए मामले में

पीठ के तीन-चार साल पुराने फोड़े बिना दवा ठीक होना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:12:34–1:13:06

दीपेश शर्मा जी लिखते हैं कि उन्होंने मैसेज किया था कि साधना से कोई लाभ नहीं आ रहा। पर जो हुआ है वह लगभग असंभव है। बिना दवा के उनकी पीठ के फोड़े, जो तीन-चार साल से थे, अपने आप ठीक हो गए। वक्ता सब सुनने वालों से यह विषय पढ़ने को कहते हैं। यह साधना करने वालों का मनोबल बढ़ाने वाला विषय है। भाई, जो रोग ठीक न हो, वह इसी तरह — मंत्र में बड़ी सामर्थ्य है, साधना में बड़ी सामर्थ्य है। हमें अपने आराध्य से बस वह साधना करने की योग्यता और सामर्थ्य माँगनी चाहिए।

133

कुंभ में किस तरह का जप-लक्ष्य लिया जा सकता है?

रोज़ सौ माला, या दो सौ, या चार सौ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:13:07–1:13:28 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अब अगर कुंभ में कोई यह लक्ष्य ले कि रोज़ कम से कम सौ माला जप करेगा — कम से कम। और अगर उसमें कोई कहे कि हम दो सौ करेंगे, सौ सुबह और सौ शाम। और अगर उसमें कोई शेर आ जाए और कहे, भैया, सुबह, दोपहर और शाम। और अगर कोई बड़ा सवा सेर कहे कि चारों समय सौ-सौ माला।

वक्ता कहते हैं, अब अगर कुंभ में कोई यह लक्ष्य ले कि हम रोज़ कम से कम सौ माला जप करेंगे। कम से कम — और अगर उसमें कोई कहे, हम दो सौ करेंगे: सौ सुबह, सौ शाम। और अगर उसमें कोई शेर आ जाए और कहे, भैया, सुबह, दोपहर और शाम। अगर कोई बड़ा सवा सेर आए और कहे कि चारों समय सौ-सौ माला।

मूल प्रतिलेख
उस साधना को करने की योग्यता और सामर्थ्यता हमें अपने आराध्य से बस मांगनी चाहिए। अब कुंभ में अगर कोई लक्ष्य ले ले कि हम प्रतिदिन जो है कम से कम 100 माला जप करेंगे। कम से कम और अगर उसी में कोई बोल दे कि हम 200 करेंगे सुबह 100 शाम को 100। उसी में कोई शेर आ जाए बोले कि भैया सुबह दोपहर शाम कोई आ जाए बड़ा सवा सेरो बोले चारों टाइम 100-100 माला।
134

बताया गया सबसे बड़ा लक्ष्य है रोज़ पाँच सौ एक माला, एक आसन पर, पैंतालीस दिन

रोज़ पाँच सौ एक माला, एक आसन पर, पैंतालीस दिन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:13:29–1:13:58

और अगर उसमें भगवती का कोई पक्का शेर कहे, नहीं भैया, हम पाँच सौ माला करेंगे — सुबह, दोपहर, शाम और रात, और फिर सब मिलाकर सवा सौ जोड़कर पूरी पाँच सौ एक माला पूरी करेंगे। और पैंतालीस दिन एक जगह, एक आसन पर बैठकर पाँच सौ माला करें। वक्ता कहते हैं कि प्रयाग क्षेत्र की बात हो तो वह अलग है, पर यह अपने घर पर भी किया जा सकता है। हम घर की ही बात कर रहे हैं।

135

प्रयाग जाने पर ज़ोर नहीं दिया जाता, ताकि जो साधक नहीं जा सकते वे निराश न हों

ताकि जो साधक नहीं जा सकते वे निराश न हों

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:13:59–1:14:27

वक्ता कहते हैं कि वे प्रयाग पर बहुत ज़ोर नहीं दे रहे, क्योंकि इससे साधकों का मनोबल कहीं कम पड़ जाएगा और वे निराश होंगे कि अरे, हम नहीं जा पा रहे, हमें फल नहीं मिलेगा। भाई, ऐसा बिल्कुल नहीं है। इस पर वे पहले लिख चुके हैं। हम प्रयाग नहीं जा सकते। हममें सामर्थ्य नहीं है — और वे जानबूझकर "हम" कहते हैं, नहीं तो लोग कहेंगे, आप तो खुद चले गए और हमसे कह रहे हैं कि नहीं, आप नहीं जा पाएँगे।

136

अगर हम नहीं जा सकते, तो क्या भगवती आ सकती हैं?

उनमें आने की सामर्थ्य है — उन्हें कितना समय लगेगा?

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:14:28–1:15:00 · Also a question

वक्ता कहते हैं, तो मान लीजिए हम नहीं जा पाएँगे। हममें जाने की सामर्थ्य नहीं है — पर भगवती त्रिवेणी और महाशक्तियों में आने की सामर्थ्य है न। अरे, जब आप यहाँ बैठकर सौ माला करेंगे, तो वे क्यों नहीं आएँगी? उन्हें आने में कितने पल लगेंगे? क्या वे दो मिनट के लिए वहाँ से नहीं आ सकतीं? यहाँ जप शुरू कीजिए, पहले ही दिन वे कहेंगी, अरे, अरे, कोई बच्चा बुला रहा है। दिल से बुलाएँगे तो आभास ज़रूर मिलेगा।

137

आसपास के लोग मज़ाक उड़ाएँ तो साधक क्या करे?

अपने अनुभव अपने तक रखें; मज़ाक उड़ाने वाले आपका प्रारब्ध काटते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:15:01–1:15:27 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि स्वप्न में दिव्यता एक अद्भुत विषय है, जो उन्होंने हमेशा देखा है। क्षेत्र में जाने के बाद अपने आप दिव्यताएँ बढ़ती हैं, कई तरह का आना-जाना सब दिखने लगता है, और इसके लिए किसी दिव्य दृष्टि की ज़रूरत नहीं। बस इसे दिल से रखिए। लोग क्या कह रहे हैं, आपके पड़ोस के लोग क्या कर रहे हैं, कौन आपको गाली दे रहा है — साधक वर्ग के लोगों को खास तौर पर हमेशा ढोंगी कहा जाता है। वक्ता कहते हैं, उन्हें कहने दीजिए। आप जो अनुभव कर रहे हैं, और वे दिव्य शक्तियाँ आपके जीवन में जो दे रही हैं, उसे अपने तक रखिए और आनंद लीजिए। जो लोग आपका मज़ाक और अपमान करते हैं, वे आपका प्रारब्ध काट रहे हैं। बस इतना लीजिए।

138

जो पूरे समय पाँच सौ माला निभाए, उसे क्या निश्चित मिलता है?

मंत्र सिद्धि और देवता की कृपा को टाला नहीं जा सकता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:15:28–1:15:58 · Also a question

वक्ता कहते हैं, तो हम नहीं जा सकते, पर भगवती आ सकती हैं। तो अगर कोई बैठकर इतना करे कि हम करेंगे, घर पर ही पाँच सौ माला जप करेंगे — अगर कोई पाँच सौ का कहकर पूरे पैंतालीस दिन, सवा महीने लगातार करे, तो भाई, यह नहीं हो सकता कि यहाँ मंत्र की सिद्धि न हो, देवता कृपा न करें, भगवती कृपा न करें। यह होना ही है। और फिर कुंभ की छब्बीस तारीख को, जो महाशिवरात्रि है, जिस दिन कुंभ पूरा होना है — महाशिवरात्रि पर क्या कृपा आएगी, यह करने वाले ही समझेंगे।

139

साधना चुनने और उस पर पक्का होने के लिए दस दिन बचे हैं

दस दिन हाथ में हैं; साधना चुनें और उस पर पक्के हो जाएँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:15:59–1:16:27

वक्ता कहते हैं, तो भैया, दस दिन बचे हैं — तेरह तारीख ली गई है, और आज दो तारीख है। तो कम से कम दस दिन हाथ में हैं। मन से तैयार हो जाइए कि पैंतालीस दिन बेकार नहीं जाने देने। आप जहाँ भी हों, जिस भी स्थिति में हों, देश, काल और परिस्थिति के अनुसार हम साधना ज़रूर करेंगे। कौन-सी साधना करेंगे, इसे चुनने में समय ले सकते हैं। और चर्चाएँ होंगी, उनसे आप तय करेंगे कि हाँ, यह करना है। खुद चुनिए, और एक बार चुन लें तो पक्के हो जाइए कि यही करना है, और तैयारी शुरू कीजिए।

140

क्या इसके लिए नई माला या आसन खरीदना चाहिए?

जिस माला और आसन पर पहले से जप करते आए हैं, वही लें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:16:28–1:16:50 · Also a question

वक्ता कहते हैं, पर सामग्री और समय वही रहेंगे। जप के लिए आपकी अपनी माला होनी चाहिए, जिस पर आप पहले से जप करते आए हैं। ऐसा नहीं कि नई माला लेकर उस पर जप करेंगे। ऐसा नहीं कि अब नया आसन लाएँगे। जो आसन पहले था, जो माला पहले थी, जिस पर आप जप करते आए हैं — यह ध्यान रखिए।

वक्ता कहते हैं, पर सामग्री और समय बिल्कुल वही रहेंगे। जप के लिए आपकी अपनी माला होनी चाहिए, जिस पर आप पहले से जप करते आए हैं। ऐसा नहीं कि हम नई माला लेकर जप करेंगे। ऐसा नहीं कि हम अब नया आसन लाएँगे। जो आसन पहले था, जो माला पहले थी, वही जिस पर आप जप करते आए हैं। यह ध्यान रखिए।

मूल प्रतिलेख
लेकिन सामग्री और समय तो वही लगेगा ना आपके पास अपना माला जप का होना चाहिए जिस पर आप पहले से जप कर रहे हैं ये भी नहीं कि नया माला लेकर जप करेंगे। ये नहीं कि अब नया आसन लाएंगे। जो आसन पहले का है जो माला आपके पास पहले उसी पे जिस पर जप आप करते आ रहे थे। इसका ध्यान रखें।
141

सुमेरु का धागा उधड़ने लगे तो क्या करें?

जप शुरू होने के बाद उसे काटें नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:16:51–1:17:14 · Also a question

वक्ता जवाब देते हैं कि उसे काटना नहीं है। एक बार जप आदि शुरू हो गया तो काटना नहीं है। जो करना है वह प्रतिष्ठा से पहले किया जा सकता है। प्रतिष्ठा के बाद कोई काट-छाँट नहीं चलनी चाहिए।

वक्ता जवाब देते हैं कि अगर सुमेरु का धागा उधड़ने लगे, तो उसे काटना नहीं है। एक बार जप आदि शुरू हो गया, तो उसे काटना नहीं है। जो करना है वह प्रतिष्ठा से पहले किया जा सकता है। प्रतिष्ठा के बाद कोई काट-छाँट नहीं चलनी चाहिए।

मूल प्रतिलेख
सुमेरु का धागा उधरने लगा तो मैं काटना नहीं है। जप आदि आरंभ हो गया है तब काटना नहीं है। प्रतिष्ठा के पहले जो करना होता है कर सकते हैं। प्रतिष्ठा के बाद काटा कुटी ना चले। भविष्य मालिका को लेकर के विषय की यथार्थ जो जो रियल ग्रंथ है भविष्य मालिका का वो प्रकट रूप से नहीं है।
142

असली भविष्य मालिका सामने नहीं है, और उसमें बताई संभावनाएँ अनुष्ठान से टाली जा सकती हैं

असली ग्रंथ सामने नहीं है, और संभावनाएँ अनुष्ठान से टल सकती हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:17:15–1:17:53

भविष्य मालिका के विषय में वक्ता कहते हैं कि भविष्य मालिका का असली, वास्तविक ग्रंथ प्रकट रूप में नहीं है। भविष्य मालिका को आधार बनाकर जो दूसरी बात फैलाई जा रही है, वह नहीं। पर इसके अलावा कई और विषय हैं, जिनसे इतना है कि कुछ संभावनाएँ हो सकती हैं। पर जब संभावनाएँ दिख रही हैं, तो अगर आप और हम मिलकर अपने-अपने घरों में साधना, अनुष्ठान आदि करें, तो वे चीज़ें ज़रूर टल जाएँगी। वे कहते हैं, न जानकर कुछ हो जाए, इससे अच्छा है कि जानकर उसे होने न दें।

143

ऐसा स्वप्न कवच का सचेत करना है; गलती है फिर हाथ पर हाथ धरकर बैठना

कवच का सचेत करना, और फिर बैठे रहने की गलती

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:17:54–1:18:27

वक्ता जवाब देते हैं, खुशी जी, अगर कोई तांत्रिक आप पर कुछ कर रहा है और यह स्वप्न आ रहा है, तो कहीं न कहीं आप जो पाठ कर रही थीं और जो कवच पहना, उसके प्रभाव से आपको सचेत किया जा रहा है। अब जानने के बाद अगर आप सोच रही हैं कि नहीं, हम कुछ न भी करें, तब भी कुछ नहीं होगा — यह संभव नहीं है न। आपका जप, तप और सामर्थ्य एक सीमा तक है। अगर कोई तांत्रिक है जिसने कोई सिद्धि की है, तो उसमें भी सामर्थ्य होगी, उसने भी किसी शक्ति की सेवा की होगी। तो उसका असर ज़रूर पड़ेगा।

144

पर्याप्त मूलधन के बिना कुछ भी ऑटो मोड में नहीं चलता, जैसे एफडी में

ऑटो मोड तभी जब मूलधन पर्याप्त हो — एफडी का उदाहरण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:18:28–1:19:03

वक्ता कहते हैं, उसे अपना पाठ करने दीजिए। पर अगर आप अकर्मण्य होकर बैठ जाएँ कि हम कोई कर्म नहीं करेंगे और अपने आप कुछ हो जाएगा — कुछ भी ऑटो मोड में नहीं चलने वाला। यह हम हमेशा साफ़ करते हैं। ऑटो मोड में तभी चलता है जब आपके पास पर्याप्त मूलधन हो। अगर हर महीने आपके खाते में पाँच-दस करोड़ रुपये पड़े हैं, और आपने उसकी एफडी बना रखी है, और उसका ब्याज आपको आ रहा है, तो ऑटो मोड में बैठकर खा सकते हैं। और बैठकर खाते हुए भी अगर कोई कर्म नहीं करेंगे, तो वह खाना भी नहीं चलेगा। बैठे-बैठे शुगर हो जाएगी, कोई परेशानी आ जाएगी, क्योंकि आप कोई कर्म नहीं कर रहे, शरीर नहीं हिला रहे। और मानसिक क्षमता अपाहिज हो जाएगी, क्योंकि आप कोई सोच-विचार नहीं कर रहे।

145

क्या तांत्रिक के विरुद्ध अकेला कवच काफ़ी है?

ऑटो मोड बहुत जप के बाद ही चलता है; वरना कवच असर घटाता है, मिटाता नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:19:04–1:19:34 · Also a question

वक्ता कहते हैं, यहाँ भी ऐसा ही है। अगर आपने बहुत जप-तप किया है और शुद्धि पाई है, तो बैठिए, ऑटो मोड में चलेगा। वे शक्तियाँ आपकी रक्षा और सुरक्षा करेंगी। अगर ऐसा नहीं है, तो सिर्फ़ कवच पहनकर यह सोचना कि तांत्रिक कुछ कर रहा है और कुछ नहीं होगा, बस मूर्खता की बात है। हाँ, वह रुकेगा, असर कम पड़ेगा — यह ज़रूर होगा। पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा, ऐसा कभी नहीं हो सकता। किस स्तर तक पड़ेगा, यह निर्भर करता है। कई बार नहीं पड़ेगा, क्योंकि अगर वह छोटा प्रयोग करे, एक स्तर तक का प्रयोग करे, तो ऐसा नहीं कि असर तुरंत पड़ जाएगा। यह इतना आसान भी नहीं है।

146

अगर प्रयोग महीनों तक दोहराया जाए तो क्या होता है?

बुद्धि में भ्रम, उच्चाटन का प्रयास, और कुछ खिला देना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:19:35–1:19:59 · Also a question

पर अगर वह बार-बार कर रहा है — एक बार किया, दो बार किया, एक महीना, दो महीने, तीन महीने किया — तो आपके मन पर कोई घटना पड़ेगी। इसमें तकनीकें हैं। तंत्र एक तकनीक है कि अच्छा, इसने कवच पहन रखा है, ऐसे नहीं चलेगा। आपकी बुद्धि में कोई भ्रम होगा, उच्चाटन कराने का प्रयास होगा, किसी से आपको कुछ खिलवाने या दिलवाने का प्रयास होगा।

147

सुरक्षा बंकर तब बेकार है जब आपके घर आने-जाने वाला शत्रु बम अंदर ले आए

अंदर लाया गया बम, और घर में आने-जाने वाला शत्रु

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:20:00–1:20:34

वक्ता कहते हैं, आप कितना भी सुरक्षा बंकर तैयार कर लें, अगर कोई आपके घर के अंदर बम लाकर फोड़ दे, तो बम फटेगा, धमाका होगा, आप पर असर पड़ेगा और आपको चोट लगेगी। कुछ भी हो सकता है। ठीक इसी तरह आपने घर का बंधन किया, कवच पहना, पर शत्रु आपके घर में ही आता-जाता है। आपको पता नहीं। उसने आपके खाने में कुछ मिलाकर खिला दिया, प्रसाद के नाम पर खिला दिया — खत्म। कवच जैसा है वैसा पहना रह जाएगा। वहाँ आपका जप-तप काम करेगा।

148

दुर्गा कवच विष के बारे में क्या कहता है, और इसके लिए क्या चाहिए?

कृत्रिम और प्राकृतिक विष असर नहीं करते — जिसका पुरश्चरण हुआ हो

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:20:35–1:21:03 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अगर बहुत ऊँचे स्तर पर खिलाया गया है तो आप पर थोड़ा असर पड़ेगा — ज़्यादा नहीं। एक-दो दिन पड़ा, दस दिन पड़ा, ठीक हो जाएँगे, और इसकी सज़ा उसे भी मिलेगी। पर अगर आप कुछ भी न करें और बिल्कुल सामान्य और निश्चिंत बैठे रहें कि हमें कुछ नहीं होगा, तो परेशानी होगी। क्योंकि अगर कोई विष दे रहा है — अगर आप श्री दुर्गा कवच, चंडी कवच का पाठ करते हैं, तो उसमें लिखा है कि जो इस कवच का पाठ करते हैं और इसे धारण करते हैं, उन पर कृत्रिम विष और प्राकृतिक विष असर नहीं करेंगे। अब अगर किसी ने दिन में एक बार पढ़ा और दस दिन से पढ़ रहा है और कहे कि मुझ पर न पड़े, तो यह संभव नहीं। कम से कम उसका जप हज़ारों-हज़ारों में हुआ हो, चालीस हज़ार तक माना जाता है। कम से कम चालीस हज़ार का पुरश्चरण, भगवती की कृपा के नियम और नीति से रहते हुए — तभी ऐसा होगा कि उस पर असर न पड़े।

149

जो कवच की परीक्षा लेना चाहे, उसका क्या?

परीक्षा के लिए फिनाइल पीना — और देवी लोक की फलश्रुति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:21:04–1:21:39 · Also a question

वक्ता कहते हैं, सिर्फ़ सोचने-विचारने से नहीं होगा। और अगर किसी ने सच में बहुत किया है पर उसे बिल्कुल विश्वास या श्रद्धा नहीं है, और वह परीक्षा लेना चाहे — कि हमने सुना है कवच के जप से विष असर नहीं करता, अब हमने पचास हज़ार जप कर लिया, तो चलो परीक्षा करें, फिनाइल पीकर देखें कि विष का असर हम पर पड़ता है या नहीं — तो ज़्यादा कुछ नहीं होगा। वह फिनाइल पिएगा और उसके बाद देवी लोक को प्राप्त होगा। फलश्रुति में है न कि मृत्यु के बाद वे देवी लोक को प्राप्त होते हैं। बस वही होगा, और कोई लौटना नहीं, कोई फिर आना नहीं।

150

सिर्फ़ रक्षा के भरोसे कर्म नहीं छोड़ना — भगवती का दिया विवेक लगाइए

कर्म न छोड़ें; भगवती का दिया विवेक लगाएँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:21:40–1:22:07

वक्ता कहते हैं, तो हमें मूर्खता नहीं करनी। यह सोचकर कर्म करना मत छोड़िए कि सब ऑटो मोड में हो जाएगा। यह संभव नहीं। अपना थोड़ा विवेक लगाइए, जो भगवती ने दिया है। पूछा गया कि अगर सरस्वती के मंत्र कंठस्थ हो गए हों, तो क्या सरस्वती खोले बिना पाठ कर सकते हैं। वे जवाब देते हैं, निःसंदेह हाँ, यह किया जा सकता है, इसमें कोई समस्या नहीं।

151

महाकुंभ जाने वाला साधक क्या ध्यान रखे?

प्रयागराज यात्रा पर अलग वीडियो और लाइव

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:22:08–1:22:51 · Also a question

पूछा गया कि महाकुंभ जाने में साधक को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, और प्रयागराज की यात्रा कैसे करनी चाहिए। वक्ता राजीव जी से कहते हैं कि इस विषय पर अलग पूरा वीडियो और पूरा लाइव होगा, जिसमें अच्छी चर्चा होगी। बलराम जी ने पूछा कि क्या भैरव जी और पंचमुखी हनुमान जी का जप अर्पित किया जा सकता है। वे कहते हैं, हाँ, बिल्कुल, आप अर्पित कर सकते हैं।

152

क्या सहस्रनाम की जगह बारह नाम वाला स्तोत्र किया जा सकता है?

जहाँ पाँच सौ का नोट ज़रूरी नहीं, वहाँ पाँच रुपये का नोट

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:22:52–1:23:15 · Also a question

पूछा गया कि सहस्रनाम में समय लगता है, तो क्या बारह नामों का स्तोत्र कर सकते हैं। वक्ता जवाब देते हैं, कीजिए, हमें क्या समस्या होगी? अगर पाँच सौ रुपये के नोट की जगह पाँच रुपये के नोट से आपका काम हो रहा है, तो उसी से चलाइए — हमें क्या समस्या है?

वक्ता पढ़ते हैं, प्रश्नकर्ता पूछते हैं कि सहस्रनाम में समय लगता है, क्या मैं बारह नामों का स्तोत्र कर सकता हूँ। वे जवाब देते हैं, कीजिए। हमें क्या समस्या होगी? अगर पाँच सौ के नोट की जगह पाँच रुपये के नोट से आपका काम हो रहा है, तो उसी से चलाइए। हमें क्या समस्या है?

मूल प्रतिलेख
काल भैरव अष्टक का 1100 पाठ होने के बाद कैसे यूज कर सकते हैं उसके किस लिए यूज करें? तो आप क्यों यूज करना चाहते हैं इसका उत्तर तो आपके पास होगा ना किस लिए करें क्या करें? मतलब कि हमारे पास भैया ऐसा है कि ₹10000 आ गया है अब हम क्या करें इसका? और क्यों करें इसका तो इसका जवाब हम कैसे दे सकते हैं? ₹10000 अब आपकी आवश्यकता आप जानिएगा ना भाई कि ₹10000 आया है तो हमको खाना खाना है कि घूमने जाना है कि उसको सेविंग में एफडी में डाल देना है।
153

कड़े धाम में एक महिला पर सवारी आई और उसके अपने भाई ने उसे मारा

माँ पर सवारी, और उनके अपने भाई का मारना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:24:11–1:24:50

प्रश्नकर्ता लिखते हैं कि वे उत्तर प्रदेश में शीतला माँ के कड़े धाम गए थे। उस समय उनकी माँ पर सवारी आ रही थी, और उनकी माँ के भाई, यानी मामा ने उनकी माँ को मारा। वक्ता कहते हैं, ऐसा होता है। आप सबने देखा होगा कि किसी पर सवारी आ रही है और घर या परिवार का कोई सदस्य गुस्से में डाँटेगा, गाली देगा, इसे नाटक कहेगा — चप्पल से मारना, हाथ से मारना। बाबा जी लोग भी ऐसा करते हैं, वे कहते हैं। वे एक ऐसे ज्योतिषी का ज़िक्र करते हैं जिनका वीडियो बहुत वायरल हुआ था — बहुत बड़े ज्योतिषाचार्य, जिनका लोग बहुत सम्मान करते थे, और वे खुद भी। पर जिस दिन उन्होंने वह बात सुनी, भाई, यह भी वैसा ही निकला।

154

सवारी को मारना ऐसा अपराध है जो कभी नहीं करना चाहिए, चाहे सवारी का ढोंग हो

ऐसा अपराध जो कभी नहीं करना, ढोंगी के साथ भी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:24:51–1:25:23

वक्ता कहते हैं, यह अपराध कभी नहीं करना चाहिए। चाहे कोई ढोंग कर रहा हो — जहाँ सच में ढोंग चल रहा होता है, वहाँ आपके मुँह से आवाज़ नहीं निकलती, वहाँ आप जाकर पैर पकड़ते हैं। जहाँ साफ़ दिख रहा हो कि नाटक और धोखा चल रहा है, पर जहाँ थोड़ा भी असली विषय आ रहा हो — ऐसा न भी हो, तब भी उसका सम्मान करना सीखिए, वे कहते हैं। आखिर वह एक जीवात्मा है। अगर आप ऐसा कुकर्म करते हैं — और इस पर पूरा समर्पित वीडियो है कि सवारी का अपमान हो तो क्या-क्या होता है — तो वह इसे यूँ ही स्वीकार नहीं करने वाली। यह तय बात है।

155

ऐसे अपराध के बाद परेशानी कितने समय चलती है?

कम से कम बारह साल, और किसी के लिए चालीस साल

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:25:24–1:25:57 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अब वे जो परेशानी देंगी, वह कम से कम बारह साल चलेगी — कम से कम। और फिर बारह साल में हटेगी। हालाँकि वे कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि वह किसकी सवारी रही होगी या बात क्या थी। वे बहुत परेशान करती हैं। कई लोगों के लिए यह चालीस साल तक चलता है। पूरी पीढ़ी परेशानियों में निकल जाती है। वे कहते हैं, ये घर-गृहस्थी की बातें हैं।

156

क्या शरीर से भूत-प्रेत भगाने की भी कोई विधि है?

विधि प्रेम से शुरू होती है; बल आखिरी उपाय है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:25:58–1:26:26 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अगर किसी शरीर पर भूत या प्रेत भी आया हो, तो उसकी भी आपके पास विधि है। अगर आप मारकर शरीर से भूत-प्रेत भगा रहे हैं, तो उसकी विधियाँ हैं। ऐसा नहीं होता कि सुनी-सुनाई पर — अरे, इस पर भूत आया है — चप्पल से मारो, जूते से मारो और भगा दो। विधि है: सब कुछ पहले प्रेम से होता है। आखिरी उपाय यह है कि हाँ, हम मारपीट पर आते हैं। या हमें पता चल रहा है कि वह नाटक कर रहा है, झूठ बोल रहा है — तब आप हाथ-पैर चलाएँ, वह अलग बात है।

157

धाम पर आँसू बहें और रोंगटे खड़े हों तो इसका क्या अर्थ है?

भाव-आवेश और देवी की कृपा — इसे अपने तक रखें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:26:27–1:26:50 · Also a question

जब आप सच में देखते हैं कि किसी पर कुछ आ रहा है, या उस जगह जाकर सिर्फ़ भाव से उन पर देवी का आवेश आया है — यह भाव में ही होता है, कई बार होता है। आप भक्त हों तो आपके साथ भी हो सकता है: शरीर रोमांचित होगा, रोम-रोम खड़ा होगा, आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगेगी। वक्ता कहते हैं, लोग पूछते हैं इसका क्या अर्थ है। इसका क्या अर्थ — आप भाव के आवेग में आँखों से आँसुओं की धारा का अर्थ पूछ रहे हैं, क्या सुनना चाहते हैं? आप पर देवी की कृपा है। यह बात अपने अंदर रखने की है। आपका भाव ऊँचे स्तर पर पहुँचा, आप कहीं उस परम शक्ति से जुड़े, और उस जुड़ाव से आपके भीतर रोमांच, भाव और अनुभव आया। इसे सीमित रखिए, दिखावा मत कीजिए।

158

क्या पहले से बताया जा सकता है कि धाम पर किस पर शक्ति आएगी?

यह कहीं लिखा नहीं; हर व्यक्ति में अलग होता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:26:51–1:27:23 · Also a question

पर जब यह बात असीमित हो जाती है — कभी ऐसी स्थिति होती है कि कोई मन से थोड़ा ज़्यादा समर्पित है, उसने ये बातें देखी-सुनी हैं, तो उसके मन में ऐसा भाव आया और किसी शक्ति का आवेश आया, प्रेम से किसी भी समय, और खास तौर पर धाम पर। वक्ता कहते हैं, धाम पर किसके शरीर पर कब आएगा, खास तौर पर जब आप किसी तांत्रिक स्थान या किसी देवी तीर्थ स्थान पर जा रहे हों, यह कहीं लिखा नहीं है। ऐसा ज़रूरी नहीं कि इन पर तो कुछ नहीं आता था, कैसे आया; या किसी पर आता था तो वहाँ ज़रूर आएगा। यह सब हर व्यक्ति में अलग है। आपके साथ कुछ और हो सकता है और हमारे साथ कुछ और।

159

पहले क्षमा याचना, फिर उपाय इस पर निर्भर है कि अपमान किसका हुआ

पहले क्षमा याचना, और उसके बाद के विकल्प

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:27:24–1:27:59

वक्ता कहते हैं, अगर ऐसा हुआ है तो सबसे पहले यह अत्यंत अनुचित बात हुई है। फिर दूसरी बात यह कि अपमान किसका हुआ और बात कैसे हुई। आप लोग तो वैसे भी परेशान हैं, तो क्षमा याचना आदि कीजिए, जहाँ तक संभव हो। वे कुछ विकल्प बताते हैं, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि प्रश्नकर्ता से कब या बात हो पाएगी या नहीं। पहली बात ध्यान रखिए: अगर वे घर की कोई देवी हैं।

160

घर की देवी और कड़े धाम की शीतला के नाम रोज़ एक ज्योत जलाई जाती है

घर की देवी और कड़े धाम की शीतला के नाम एक-एक ज्योत

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:28:00–1:28:30

अगर यह जानकारी है कि हाँ, हमारे घर में किसी पर वे आती थीं, या ऐसी कोई बात है, तो सबसे पहले घर में रोज़, जिस माँ के स्वरूप की आप पूजा करते हैं उनके नाम; और क्योंकि अपमान भगवती शीतला के कड़े धाम पर हुआ, तो उनके नाम — दोनों के नाम कम से कम एक-एक ज्योत जलाइए। और तंत्रोक्त देवी सूक्तम का पाठ कीजिए।

161

भगवती कितनी भी रुष्ट हों, कौन-से सूक्त उन्हें प्रसन्न करते हैं?

तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम, देवी सूक्तम और शक्रादि स्तुति — और एक पचरा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:28:31–1:28:56 · Also a question

वक्ता कहते हैं, भगवती कितनी भी रुष्ट हों, दो-तीन सूक्त हैं जिनसे वे ज़रूर प्रसन्न होती हैं। पहला तंत्रोक्त रात्रि सूक्तम, दूसरा देवी सूक्तम, और तीसरा शक्रादि स्तुति। इन्हें संस्कृत में पढ़ना सीखिए। यह आसान है, बहुत कठिन नहीं। और घर का कोई सदस्य पाठ करे और माँ को मनाए। अगर पचरा गाना आता हो, तो अष्टमी या नवमी को, या शाम को संध्या के समय, कम से कम एक पचरा गाकर माँ को मनाइए, और क्षमा माँगिए कि माँ, हमसे अपराध हुआ है।

162

कैसे पता चलेगा कि उन्होंने क्षमा कर दिया?

ज़रूरी नहीं कि सिर पर आकर बताएँ — पर जीवन में दिखेगा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:28:57–1:29:36 · Also a question

वक्ता कहते हैं, अगर वे प्रसन्न होकर क्षमा करें, तो ज़रूरी नहीं कि सिर पर आकर कहें — पर उसका असर आपके जीवन में दिखने लगेगा। और जब वे क्षमा करती हैं — और अगर आप दिल से मनाएँ तो भगवती ज़रूर क्षमा करेंगी — तो परेशानी कितनी भी बड़ी हो, वे खुद रास्ता निकालने लगेंगी और आपको उससे बाहर निकालेंगी। यह सच्ची बात है। जब वे नाराज़ होकर रूठ जाएँ, तो मनाना भी आना चाहिए।

163

क्या एकादशी को भगवती को भोग लगाना चाहिए, और कौन-सा भोग?

एकादशी का चावल न खाने का नियम, और कौन इस नियम से बाहर है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:29:37–1:30:03 · Also a question

वक्ता जवाब देते हैं, क्यों नहीं लगाना चाहिए? यहाँ तो परम वैष्णव भी, जो खुद को साक्षात नारायण का अवतार कहते हैं, उस दिन बैठकर खा रहे हैं। एकादशी के नियम से कम से कम चावल नहीं खाना चाहिए। इतना तो है ही कि एकादशी के दिन चावल मत खाइए। इतना नियम हर किसी को मानना चाहिए, आप कोई भी हों — सिवाय इसके कि आप किसी खास तंत्र मार्ग में दीक्षित हों, जहाँ एकादशी तिथि के व्रत का नियम लागू नहीं होता। वह विषय अलग है।

164

किसके लिए तुलसी का स्पर्श भी वर्जित है?

तारा कुल और वामाचार विधि में दीक्षित लोग

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:30:04–1:30:33 · Also a question

वक्ता कहते हैं, तुलसी धारण करने की बात लीजिए: कोई भगवती तारा के कुल में दीक्षित है — अगर कोई उस परंपरा में दीक्षित है, तो उसके लिए क्या एकादशी और क्या तुलसी जी। तुलसी जी की बात यह है कि अगर कोई वामाचार विधि में दीक्षित है, तो उसके लिए तुलसी जी का स्पर्श भी वर्जित है। उसे तुलसी की लकड़ी नहीं छूनी, खास तौर पर अगर वह महामारी माला आदि पहनता है। वहाँ नियम अलग हो जाता है।

165

एकादशी व्रत रखा हो तो कौन-सा नैवेद्य लगाया जा सकता है?

नैवेद्य में फल; अन्न बन रहा हो तो अन्न, पर चावल नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:30:34–1:30:48 · Also a question

अगर आप भगवती की सेवा-पूजा करते हैं, तो भाई, आपने एकादशी का व्रत रखा है — तो आप नैवेद्य में सिर्फ़ फल आदि लगाएँगे। अगर अन्न बन रहा है, तो अन्न लगेगा, पर चावल नहीं लगेगा। उस दिन चावल खाना ही नहीं है, यह ध्यान रखिए। चावल का भोग नहीं लगेगा।

वक्ता कहते हैं, अब अगर यहाँ विषय यह है कि आप भगवती की सेवा-पूजा करते हैं, तो भाई, आपने एकादशी का व्रत रखा है। तो आप नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। में सिर्फ़ फल आदि लगाएँगे। अगर अन्न बन रहा है, तो अन्न लगेगा, पर चावल नहीं लगेगा। उस दिन चावल खाना ही नहीं है, यह ध्यान रखिए। चावल का भोग नहीं लगेगा।

मूल प्रतिलेख
तो फल आदि का ही नैवेद्य पर अर्पण करेंगे। अन्न अगर बन रहा है तो अन्न लगेगा लेकिन चावल नहीं लगेगा। चावल उस दिन बस नहीं खाना है इसका ध्यान रखें। चावल का भोग नहीं लगेगा।
166

अभिषेक के लिए शृंगी किस पशु से बनाई जा सकती है?

पूरी आयु पाकर मरे नीलगाय, गौवंश या नंदी से, सही विधि से

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:30:49–1:31:33 · Also a question

चाहे नीलगाय हो, गौवंश हो, या नंदी जी — यानी जिन्हें बैल कहते हैं — जिनकी मृत्यु पूरी आयु पाकर अपने आप हुई हो: उनकी मृत्यु के समय, उन्हें ज़मीन में जगह देने से पहले, सही विधि-विधान से सींग लेना चाहिए, और तभी उससे अभिषेक के लिए शृंगी बनानी चाहिए। वक्ता कहते हैं, जैसे-तैसे बनी हुई नहीं चलती।

167

क्या सभी देवताओं के लिए पंचमुखी रुद्राक्ष स्थापित किया जा सकता है?

हर देवता के नाम स्थापित पंचांग रुद्राक्ष

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:31:34–1:31:57 · Also a question

वक्ता कहते हैं, सभी देवताओं के लिए आप पंचांग रुद्राक्ष स्थापित कर सकते हैं — सभी देवताओं के निमित्त। वे बताते हैं कि उन्होंने पहले पूरे तीस मिनट का एक वीडियो बनाया था, जो प्रकाशित नहीं किया, जिसमें नवग्रह रुद्राक्ष, शिव-शक्ति रुद्राक्ष, गणपति जी, सब आ गए थे।

168

साधक अपने पुराने फटे कपड़ों का क्या करे?

जलाएँ नहीं — धोकर दान करें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:31:58–1:32:23 · Also a question

पूछा गया कि साधक पुराने फटे कपड़ों का क्या करे, जब इतनी मात्रा में आसन या बिछौना बनाना संभव नहीं। वक्ता कहते हैं, उन्हें जलाया नहीं जा सकता, जलाना भी नहीं चाहिए। साधक पुराने कपड़े धोए, और अगर देने हैं, तो उनका दान आदि करे।

वक्ता पढ़ते हैं, प्रश्नकर्ता पूछते हैं कि साधक पुराने फटे कपड़ों का क्या करे; इतनी मात्रा में आसन या बिस्तर बनाना संभव नहीं। उन्हें जलाया नहीं जा सकता; जलाना भी नहीं चाहिए। साधक पुराने कपड़े धोए, और अगर देने हैं, तो उनका दान आदि करे।

मूल प्रतिलेख
खुशी जी बिल्कुल बांध सकती हैं। पुराने फटे हुए साधक को क्या करना चाहिए? अधिक मात्रा में आसन अथवा सैया बनाना संभव नहीं जला सकते हैं नहीं जला भी नहीं सकते हैं। पुराने वस्त्र साधक को धुल करके और दान करना हो तो अपना दान आदि कर दीजिए। संजय जी जय माई।
169

क्या रत्न माला रात में उतार सकते हैं?

रात में उतारना और सुबह पहनना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:32:24–1:32:33 · Also a question

बिल्कुल, वक्ता कहते हैं: रत्न माला रात में उतार सकते हैं और सुबह पहन सकते हैं; इसमें कोई दिक्कत नहीं।

बिल्कुल, वक्ता जवाब देते हैं: रत्न माला रात में उतार सकते हैं और सुबह पहन सकते हैं। इसमें कोई दिक्कत नहीं।

मूल प्रतिलेख
अल्फाबेट जी बिल्कुल आप रत्नमाला रात को निकाल सकते हैं सुबह पहन सकते हैं उसमें कोई दिक्कत नहीं है।
170

गाँव में काली विग्रह स्थापित हुआ, पर रोज़ पूजा नहीं होती — अब क्या करें?

कोई विकल्प नहीं; करना ही पड़ेगा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:32:34–1:33:15 · Also a question

प्रश्नकर्ता लिखते हैं कि गाँव में पहले चबूतरे पर काली मैया का थान था। आठ साल पहले उनके बड़े पिताजी ने माँ काली की प्राण प्रतिष्ठा कराई और प्रतिमा बनवाई। पर रोज़ पूजा-आरती नहीं हो पाती — क्या करें? वक्ता कहते हैं, इसका कोई विकल्प ही नहीं; करना ही पड़ेगा। या आप करें, या जिसने बनवाया — फिर यह उसकी जीवन भर की ज़िम्मेदारी है। कम से कम जब तक शरीर में सामर्थ्य है, व्यवस्था करना उसकी ज़िम्मेदारी है। सिर्फ़ प्राण प्रतिष्ठा कर देने से सब कुछ नहीं हो जाता, ख़ासकर मंदिर में।

171

चल और अचल प्रतिष्ठा में क्या अंतर है?

घर में चल, मंदिर में अचल — और सुबह-शाम आरती

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:33:16–1:33:42 · Also a question

घर में चल प्रतिष्ठा होती है; मंदिर में अचल, वक्ता कहते हैं। घर के लिए कई विकल्प मिलेंगे — कि करो तो अच्छा, न करो तो भी चलेगा। पर अगर अचल प्रतिष्ठा कराई है, तो भैया, वहाँ नियम है कि सुबह-शाम उनकी आरती हो। जहाँ तक हो सके पूजन जितना हो सके हो — नियम षोडशोपचार पूजन का है; पर कम से कम सुबह-शाम आरती ज़रूर हो।

172

स्थापित विग्रह को बिना पूजे छोड़ दें तो कौन-सा दोष लगता है?

देव-श्राप, और भैरवों का जटा खोलना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:33:43–1:34:21 · Also a question

अगर रोज़ नहीं हो रहा, तो वही दोष लगेगा, वक्ता कहते हैं, और उसका कोई उपाय नहीं होगा। कुंडली में कोई काल सर्प दोष दिखेगा — कि काल सर्प दोष है, देव दोष, पितृ दोष, पितृ श्राप, मातृ श्राप — बात बस इतनी रह जाएगी। पर असलियत यहीं से निकलेगी: कि हाँ, आपने विग्रह की प्रतिष्ठा कराई और उनकी सेवा नहीं की, तो यह देव-श्राप है। कहा गया है कि शिव मंदिर की, देवी मंदिर की — यानी विग्रह की — प्रतिष्ठा करके उसे बिना पूजे रखा जाए, तो उनके भैरव क्रोधित होकर जटा खोल देते हैं; यानी वे उग्र रूप में आ जाते हैं, और वहाँ बाल रूप में हों तो भी उन क्षेत्रों में उग्रता पा लेते हैं।

173

एक बार शक्ति का आवाहन हो जाए, तो ज़िम्मेदारी किसकी है?

आपने बुलाया — अब नियम से निभाना होगा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:34:22–1:34:44 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि वे किसी को डराने के लिए नहीं, असली बात कह रहे हैं: अगर आप प्रतिष्ठा कर रहे हैं, तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है। आपने देव शक्ति का आवाहन किया, प्रतिष्ठा की — और प्रतिष्ठा की ही क्यों, जब उनकी पूजा-सेवा करनी ही नहीं थी; बुलाया क्यों? बुलाया है, तो नियम से चलाना पड़ेगा। एक अलग प्रश्न पर वे कहते हैं कि यज्ञोपवीत धारण करने वाला अथर्वशीर्ष का अभ्यास और पुरश्चरण बिल्कुल कर सकता है।

174

रोज़ के संकल्प में कितना जल लगता है, और वह कहाँ जाता है?

थोड़ा-सा जल, शिवलिंग के पास या तुलसी में

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:34:45–1:35:08 · Also a question

उच्चारण साफ़ रखिए, वक्ता कहते हैं। दीपेश शर्मा जी पूछते हैं कि रोज़ के संकल्प का जल कितना होता है; वे जवाब देते हैं कि जल थोड़ा-सा ही होता है। शिव जी के पास, शिवलिंग के पास थाली में रख दें, तो भी जल सूख जाएगा। लोग तुलसी में भी डाल देते हैं; उसमें भी कोई दिक्कत नहीं।

उच्चारण साफ़ रखिए, वक्ता कहते हैं। दीपेश शर्मा जी, रोज़ के संकल्प का जल कितना होता है? थोड़ा-सा ही जल होता है। उसे भी शिव जी के पास, शिवलिंग के पास थाली वगैरह में रख दें, तो जल सूख जाएगा। लोग तुलसी जी में डाल देते हैं; उसमें भी कोई दिक्कत नहीं।

मूल प्रतिलेख
उच्चारण स्पष्ट रखिएगा। दीपेश शर्मा जी डेली संकल्प का जल कितना होता है? थोड़ा सा तो जल रहता है। वो तो शिव जी के शिवलिंग के पास भी अगर आप प्लेट आदि में डालिएगा तो सूख जाएगा जल। तुलसी जी में डाल देते हैं उसमें भी कोई समस्या नहीं है।
175

क्या तीर्थ तक अपने पुण्य से ही पहुँचा जाता है?

वहाँ की महाशक्तियाँ, कुल शक्तियाँ और पितर — सबकी सहमति चाहिए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:35:09–1:35:43 · Also a question

किसी भी तीर्थ क्षेत्र में जाना अपने पुण्य के उदय से ही संभव होता है; यह सच्ची बात है, वक्ता कहते हैं। जब तक उस स्थान की महाशक्तियाँ न चाहें, और आपकी घर की महाशक्तियाँ, घर की कुल शक्तियाँ, पितर, और आपका पुण्य प्रबल न हो, आप नहीं जा पाएँगे।

किसी भी तीर्थ क्षेत्र में जाना अपने पुण्य के उदय से ही संभव होता है; यह सच्ची बात है, वक्ता कहते हैं। जब तक उस स्थान की महाशक्तियाँ न चाहें, और आपकी घर की महाशक्तियाँ, घर की कुल शक्तियाँ, पितर, और आपका पुण्य प्रबल न हो, आप नहीं जा पाएँगे।

मूल प्रतिलेख
इंग्लिश लैंग्वेज एफसी डॉक्टर अभिषेक। किसी भी तीर्थ क्षेत्र में जाना बिल्कुल अपने पुण्य उदय के कारण ही हो पाता है ये सत्य बात है। वहां की महाशक्तियां जब तक नहीं चाहेंगी आपकी घर की महाशक्तियां आपके घर की जो कुल शक्तियां हैं पितृ हैं और आपके जो पुण्य है वो प्रबल नहीं होंगे तो आप नहीं जा पाएंगे। कई बार आप देखिएगा करोड़पति लोग हम तो अपने आंख के सामने का देखा हुआ विषय है कि विंध्य क्षेत्र में पहले सीढ़ी पर पैर नहीं रख पाए।
176

एक आदमी डिफ़ेंडर में विंध्य पहुँचा और पहली सीढ़ी पर पैर नहीं रख पाया

वह आदमी जो डिफ़ेंडर में आया और पहली सीढ़ी पर पैर नहीं रख पाया

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:35:44–1:36:18

कई बार आप देखेंगे, वक्ता कहते हैं, कि करोड़पति लोग — और यह उन्होंने अपनी आँखों के सामने देखा है — विंध्य क्षेत्र में पहली सीढ़ी पर पैर नहीं रख पाए। एक व्यक्ति डिफ़ेंडर गाड़ी से आया था, सीढ़ी पर पैर नहीं रखा, उतरा, वहीं से प्रणाम किया, बोला, चलो-चलो, भगवती तो मन में होनी चाहिए, और बैठकर आगे चला गया। सोचिए, वे कहते हैं: उसमें इतना घमंड और अहंकार था कि भगवती ने उसे पहली सीढ़ी पर पैर नहीं रखने दिया। पुरानी वीआईपी रोड की बात है; डिफ़ेंडर आई तो उसके लिए पूरा बैरिकेड हटा दिया गया था; सामने देखी हुई बात है। तो अपना पुण्य कर्म, प्रारब्ध और देव-कृपा सब इसमें काम करते हैं, तभी यह होता है।

177

त्रिवेणी में एक दिन के स्नान का भी क्या मूल्य है?

सिर्फ़ कुंभ में नहीं — जीवन में कभी भी, और यह भी पुण्य की बात है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:36:19–1:37:02 · Also a question

तीर्थ क्षेत्र में एक दिन का स्नान भी मिल जाए, त्रिवेणी जी में एक दिन भी, कभी भी — यह सिर्फ़ कुंभ की बात नहीं, जीवन में कभी भी। बहुत लोगों का जीवन बीत जाता है, वक्ता कहते हैं: प्रयाग में जन्मे और प्रयाग में ही मरेंगे, पर गंगा जी में स्नान नहीं किया। अद्भुत बात है — जो लोग ख़ुद को इलाहाबाद का कहते हैं, उन्हें पता नहीं कि त्रिवेणी जी का रास्ता कौन-सा है, त्रिवेणी जी कहाँ हैं; गंगा स्नान की तो बात ही छोड़िए। तो यह अद्भुत बात हो जाती है कि जिसने प्रयाग में जन्म लिया, उसने त्रिवेणी जी में स्नान नहीं किया। यह भी, वे कहते हैं, पुण्य की बात है।

178

भगवान दत्तात्रेय का दंड कहाँ रखना चाहिए?

मुख्य द्वार पर, इतना ऊँचा कि कोई ले न जाए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:37:03–1:37:40 · Also a question

भगवान दत्तात्रेय का दंड घर के प्रवेश पर, मुख्य द्वार पर, अंदर की ओर या बाहर की ओर रखा जा सकता है — ऐसी जगह जहाँ दिखने में कोई दिक्कत न हो, कि जो देखे वह उठा न ले जाए; इतना ऊँचा लगा सकते हैं। रोज़ धूप, दीप, कपूर वगैरह। और इसके उपयोग का विधान — कैसे क्या करना है — वक्ता कहते हैं कि उन्होंने पिछले लाइव में भी विस्तार से बताया है, उसे एक बार सुन लें — कि भगवान दत्तात्रेय के दंड के विशेष नियम कैसे उपयोग किए जाएँ।

179

कुंभ का स्नान माघ के स्नान से कितना बड़ा है?

हज़ार या लाख गुना, जिसकी गणना अभी दी जानी है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:37:41–1:38:23 · Also a question

कुंभ में स्नान का महत्व माघ मास से हज़ार गुना, लाख गुना अधिक माना गया है, वक्ता कहते हैं; इसकी पूरी गणना भी है, जो वे अलग से डालेंगे। पर ऐसा नहीं कि अभी जाकर नहाएँ तो पुण्य नहीं मिलेगा। कभी भी नहाइए; उस समय न जा सकें तो कोई दिक्कत नहीं, अभी कीजिए, बाद में कीजिए। पर जीवन में जितनी बार हो सके, जाकर नहाइए।

180

तीर्थ में कितना समय देना चाहिए, और जल में क्या करना चाहिए?

वहाँ एक रात बिताना, और जल में खड़े या बैठे जप

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:38:24–1:39:02 · Also a question

हम हमेशा कहते हैं, वक्ता कहते हैं, कि वहाँ एक रात बितानी चाहिए। तीर्थ क्षेत्र ऐसे मत जाइए कि सुबह 8 बजे ट्रेन पहुँची, 10 बजे तक नहाए, 12 बजे ट्रेन पकड़ी और चले गए। अगर सिर्फ़ नहाने जाते हैं, तो वह विशेष परिस्थिति है, अलग बात है; पर समय लेकर जाइए। कम से कम पहुँचकर नहाइए, और शरीर की सामर्थ्य के हिसाब से जल में बैठकर या खड़े होकर अपने आराध्य के मंत्रों का पूरी शक्ति से जप कीजिए — आधा घंटा, एक घंटा, पंद्रह मिनट, जितना हो सके। उसमें एक लघु पुरश्चरण हो जाए, क्योंकि फल कोटि-गुना माना गया है: हज़ार जप करें तो वह जप करोड़ के बराबर हो गया।

181

त्रिवेणी में नहाने पर पितरों का क्या होता है?

पितर प्रसन्न, प्रेत-पिशाच शांत, कुल शक्ति की कृपा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:39:03–1:39:37 · Also a question

कितना पुण्य मिलता है, इसकी गणना अलग बात है, वक्ता कहते हैं, पर यह सबसे दिव्य कृपा है: जिस समय आप त्रिवेणी जी में नहा रहे होते हैं, आपके पितर और पूर्वज बहुत प्रसन्न होते हैं। आपके नहाने से उनकी सद्गति होती है। कई पितर शांत हो जाते हैं। जिस भी रूप में मौजूद प्रेत-पिशाच शांत हो जाते हैं। घर के देव-पुत्र और देवी-पुत्र शांत हो जाते हैं। कुल शक्ति की कृपा मिलती है — और यह उसी समय होता है, जब आप वहाँ जाकर नहाते हैं।

182

तीन डुबकी लगाकर तुरंत चल दें तो क्या होता है?

पितर जो पहुँचते हैं तो पाते हैं कि आप जा चुके

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:39:38–1:39:56 · Also a question

अब अगर आप जल्दी में गए, तीन डुबकी लगाई और तुरंत भाग गए, वक्ता कहते हैं, तो जो आ रहे हैं वे कहेंगे, अरे, अरे, अब पता चला — आपके पितृ देव; एक आगे चला गया था और दूसरे ने कहा, रुको, रुको, एक काम करके आते हैं, बच्चा बाहर है, उसे घर तक देख लें, उसकी रक्षा करनी है। आप वहाँ गए, तीन डुबकी लगाई और तुरंत निकल आए। अब यह देर से पहुँचता है; जो पहले पहुँचा वह कहता है, भाई, तुम देर से आए — क्यों देर हुई भाई? अरे, इसने डुबकी लगाई और तुरंत निकल गया; न जप किया, न तर्पण किया। तो वहाँ थोड़ा समय देना पड़ता है।

183

तीर्थ में कम से कम कितना रुकने को वे कहते हैं?

कम से कम एक रात — नहीं तो भूतों का लाभ, पितर चूक जाते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:39:57–1:40:26 · Also a question

कम से कम इतना होना चाहिए, वक्ता कहते हैं, कि वहाँ एक रात बीते। नहीं तो भूत-प्रेत तर जाएँगे, और पितर पहुँचते ही रह जाएँगे; और भूत उनसे कहेगा कि यहाँ ऐसा ही होता है — तुरंत तीन डुबकी लगाओ और निकल जाओ। इसमें जो मिलना है, अरे, यह ठीक है कि गंगा जी को याद करने से यह पुण्य मिलता है; पर जब तक वहाँ थोड़ा भी नहीं करेंगे, तो क्या लाभ होगा?

184

चंड-मुंड के वध का दावा करने वाले तीन स्थान क्यों हैं?

कल्प-भेद — अलग कल्पों में अलग स्थानों पर अलग स्वरूप

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:40:27–1:41:00 · Also a question

भगवती ने, वक्ता कहते हैं, अलग-अलग कल्पों में अलग-अलग स्वरूप धारण करके अलग-अलग स्थानों पर महिषासुर, रक्तबीज, चंड-मुंड और शुंभ-निशुंभ का वध किया। चंड और मुंड का वध करने वाली भगवती चामुंडा का स्थान आपको तीन जगह मिलेगा; तीनों जगह वे भगवती चामुंडेश्वरी, चामुंडा के नाम से प्रसिद्ध हैं। कहीं कहा जाता है कि इस टीले पर चंड-मुंड मारे गए, कहीं कि इस स्थान पर मारे गए। ऐसा नहीं कि यहाँ नहीं हुआ — यह कल्प-भेद के हिसाब से बात हो गई: कि इस कल्प में यहाँ हुआ।

185

भगवती का कौन-सा विग्रह आज भी खप्पर मुद्रा में है?

विंध्य पर्वत पर विराजमान रक्तबीज-वध वाला स्वरूप

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:41:01–1:41:44 · Also a question

जैसा आप देखते हैं, वक्ता कहते हैं: रक्तबीज का वध करने वाली भगवती — उनका एक स्वरूप विंध्य पर्वत पर भी विराजमान है, जो आज भी पूरे विश्व में — भारतवर्ष छोड़िए — पूरे विश्व में अकेला विग्रह है जिसमें भगवती आज भी खिचड़ी मुद्रा में हैं। रक्त पीते हुए मुद्रा कैसी होगी, मुँह कैसा होगा: जब भी भगवती काली रक्त पीने को खप्पर उठाती हैं, मुँह ऊपर की ओर रहता है, यानी वे खिचड़ी मुद्रा में चली जाती हैं। तो वह मूल स्वरूप वहाँ मौजूद है। ऐसा नहीं कि आप महाराष्ट्र का जो बता रहे हैं वह ग़लत है — दोनों अपनी जगह हैं; बस कल्प अलग हो गया है।

186

क्या अर्गला का पहला मंत्र कुलदेवी को समर्पित कर सकते हैं, और अभिषेक में कौन-सा जल लें?

अर्गला कुलदेवी के लिए, और हैंडपंप न हो तो आरओ का जल

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:41:45–1:42:25 · Also a question

बिल्कुल, वक्ता कहते हैं: अर्गला के पहले मंत्र का जप अपनी कुलदेवी के लिए समर्पित कर सकते हैं। विद्यासागर जी लिखते हैं कि वे दिल्ली में रहते हैं, जहाँ सप्लाई का पानी आता है और आरओ लगा है, और पूछते हैं कि अभिषेक में कौन-सा जल लें, क्योंकि हैंडपाइप नहीं है, सबमर्सिबल लगा है — वक्ता कहते हैं कि आरओ का जल लें तो ज़्यादा उत्तम होगा।

187

क्या साधक को कुंभ में त्रिवेणी के पास ठहरने की जगह ढूँढ़नी चाहिए?

उस भीड़ में साधना नहीं हो पाएगी — अपना आश्रय ख़ुद देखें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:42:26–1:43:11 · Also a question

त्रिवेणी के पास निवास और साधना के लिए, वक्ता प्रश्नकर्ता से कहते हैं, आश्रय का विकल्प आप ख़ुद देखें तो ज़्यादा उत्तम होगा — क्योंकि इस भीड़ के मामले में साधना हो ही नहीं पाएगी। बहुत लोगों ने अपनी पूरी बात डाल दी है कि आइए, बिल्कुल रुकिए, कोई दिक्कत नहीं; पर वहाँ इतने लोग पहुँचेंगे कि जगह कहाँ होगी? हम किसी को बुला लें और फिर कुछ हो ही न पाए।

188

तेरह वर्ष से कम उम्र में हुए अपराध का क्या दोष लगता है?

तेरह से कम में दोष नहीं, और हुआ हो तो प्रायश्चित्त

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:43:12–1:46:05 · Also a question

अगर यह अपराध तेरह वर्ष से कम उम्र में हुआ है, तो इसका कोई दोष नहीं, वक्ता कहते हैं; इसकी चिंता मत कीजिए। और अगर अपराध हुआ है, तो प्रायश्चित्त के लिए फिर से स्नान कीजिए और परिक्रमा कीजिए; उससे, और उनसे क्षमा याचना करने से, क्षमा ज़रूर मिलेगी।

अगर यह अपराध तेरह वर्ष से कम उम्र में हुआ है, तो इसका कोई दोष नहीं, वक्ता कहते हैं। उसकी चिंता मत कीजिए। और अगर अपराध हुआ है, तो प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। के लिए फिर से स्नान कीजिए और परिक्रमा कीजिए; और उससे, और उनसे क्षमा याचना करने से, क्षमा ज़रूर मिलेगी।

मूल प्रतिलेख
नहीं तो हमारे आपके जैसे सामान्य लोग रहे तो भाई पैसा का खेल है फिर। ये टूरिस्ट प्लेस बनाया है ना, डूम सिटी बनाया देख रहे थे ना वीडियो शेयर किए हैं फेसबुक पे। डूम सिटी के नाम से एक नया प्रयाग जी में अपने त्रिवेणी क्षेत्र में बनाया गया है। कितने आप फुट हाइट के ऊपर में शीशा का पूरा आपका लॉबी जैसा रहेगा उसमें से बैठ के आप मेला देखेंगे। एक दिन का 80000 से लेकर 1.5 लाख रुपए तक का उसका फीस है, एक दिन का। तो आप इससे समझ सकते हैं कि ये कोई आध्यात्मिक विषय नहीं रह गया है, आध्यात्मिक विषय आपके और हमारे जैसे लोगों के लिए है कि हम लोग चाह रहे हैं कि भाई कैसे भी रहने मिल जाए। अब इसके लिए स्ट्रगल चल रहा है। वो रहना भी पॉसिबल सही से नहीं हो पा रहा है। भागाभागी चल रहा है कि अरे रहेंगे कि साधना का क्षेत्र रहेगा कि अनुष्ठान कैसे किया जाएगा वो अभी। आज सब क्लियर हो गया है हालांकि। तो अभी उतना। लेकिन जिनके पास पैसा है वो क्या कर रहे हैं? वो जा रहे हैं एंजॉय करने के लिए ट्रिप। कुंभ ट्रिप चल रहा है अभी डोम सिटी से। तो किसी से आप अगर संपर्क कर सकें तो अति उत्तम रहेगा। फ्लैट लेने के लिए कि भाई कितना फ्लैट-व्लैट अगर लिया जाए आसपास में तो नॉर्मली कितना होना चाहिए 2 बीएचके का 10000, 15000 जिस स्तर का बना हुआ है अगर। भाई ₹40000 अभी जनवरी-फरवरी मार्च तक। यानी कि ₹120000 2 बीएचके का अगर आप त्रिवेणी जी के पास में ले रहे हैं तो। बहुत कम में जाएगा तो 30000 से 32000 से कम नहीं है। मतलब एक दिन का ₹1000 होटल के अनुसार और होटल में जाए तो एक दिन का 5000। अभी आग लगा पड़ा हुआ है। कमाने का सीजन है भाई, कमाएंगे नहीं क्या? बाकी लूटने वाले तो केवल पंडित जी लोग हैं। पंडित जी लोग लूट लेते हैं, ब्राह्मण लूट लेते हैं। ये फ्लैट वाले और ये जितने सरकार जो खेमे बनाई हैं कुंभ जी में जा के जो टेंट में रहना है। ये तो पुण्य का काम कर रहे हैं कि एक दिन का 18-18, 20-20 हजार रुपया लेकर के। लूटने का काम तो हम लोग करते हैं जिसमें एक-एक दिन का ₹100-100, ₹1000-1000 अनुष्ठान का ले लेते हैं। कि भैया अनुष्ठान में ये होगा वो होगा। बाकी ये लोग पुण्य का काम करते हैं इसमें थोड़ी कुछ होगा। 13 वर्ष से कम आयु में अगर ये अपराध हुआ है तो उसका कोई दोष नहीं है। उसके लिए निश्चिंत रहें। और अपराध हो गया प्रायश्चित के निमित्त पुनः स्नान आदि करके आप परिक्रमा कर लें। उससे उनको और क्षमा याचना कर लें तो अवश्य क्षमा मिल जाएगा।
189

घर में नर्मदेश्वर की सेवा कैसे करें?

रोज़ स्नान और श्रृंगार, सिर पर मुकुट

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:46:06–1:47:00 · Also a question

नर्मदेश्वर जी, वक्ता उस प्रश्नकर्ता से कहते हैं जो उन्हें लाना चाहते हैं: बिल्कुल लाइए और सेवा कीजिए। उनका रोज़ स्नान और श्रृंगार हो, और सिर पर, शीश पर मुकुट ज़रूर हो।

नर्मदेश्वर जी, आप लाना चाहते हैं, वक्ता कहते हैं — बिल्कुल लाइए और सेवा कीजिए। उनका रोज़ स्नान और श्रृंगार हो, और सिर पर, शीश पर मुकुट ज़रूर हो।

मूल प्रतिलेख
मां विंध्यवासिनी का तो बनाया हुआ है। मां विंध्यवासिनी का मंत्र का भी एक वीडियो डाल चुके हैं इस नवरात्रि में। आप देख सकते हैं आप तो ऑलरेडी मेंबर मेंबरशिप आप लिए हुए हैं आपको मिल जाएगा वीडियो चैनल पे भगवती का। पूरा बृहद विधि दिए हैं पूरा विनियोग न्यास देव विधान आदि के साथ। नर्मदेश्वर जी आप लाना चाह रहे हैं बिल्कुल ला के सेवा कीजिए नित्य स्नान और श्रृंगार होना चाहिए उनका और सर पे शीश पे मुकुट अवश्य होना चाहिए। ग्रेस ऑफ पीतांबरा कोई भी माला कवच आदि जिसमें केवल कामाख्या जी, प्रतिंगरा जी, अघोर काली आदि जो कवच आदि हैं। जो कि स्त्री तत्व और जिस मतलब कि उग्र शक्तियों से युक्त हैं जो।
190

महिलाएँ कौन-से कवच हर समय पहन सकती हैं?

कामाख्या, प्रत्यंगिरा और अघोर काली — स्त्री तत्व वाली उग्र शक्तियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:47:01–1:47:28 · Also a question

कोई भी माला या कवच जिसमें सिर्फ़ कामाख्या जी, प्रत्यंगिरा जी, अघोर काली जैसी हों — जो स्त्री तत्व से, यानी उग्र शक्तियों से युक्त हैं — वे आप हमेशा पहन सकती हैं, वक्ता कहते हैं। पुरुष तत्व से जुड़े, अघोर स्वरूप वाले पहने जा सकते हैं, पर बाद में उनका शुद्धिकरण वगैरह करना चाहिए। और उचित होगा कि महिलाएँ, जितनी माताएँ-बहनें हैं, भगवती कामाख्या के ही कवच का जप करें और उसे धारण करें।

191

रजस्वला में कामाख्या कवच के जप के क्या नियम हैं?

अलग बैठें, पूजा स्थान नहीं, दीपक नहीं, बाकी मालाएँ उतारें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:47:29–1:48:05 · Also a question

जो दस महाविद्या से युक्त हैं, वक्ता कहते हैं, उन्हें फिर रजस्वला वगैरह का दोष नहीं। और रजस्वला अवस्था में, अगर पूजा स्थान पर बैठे बिना कामाख्या कवच का जप करें — पूजा स्थान पर नहीं जाना, पूजा स्थान को नहीं छूना, दीपक वगैरह नहीं — अपना दूसरा पूरा आसन वगैरह रखें, जहाँ दिक्कत न हो वहाँ सुखासन में आराम से बैठें, और कामाख्या कवच का जप कर सकती हैं। यह सबसे दिव्य प्रभाव देगा। पर पूजा स्थान पर जाकर, या विग्रह छूकर और दीपक जलाकर नहीं करना है। रक्षा माला के बारे में: कोई दूसरी माला उस समय उतार दें और बाद में शुद्ध होकर फिर पहनें; और पहनी भी रहे, तो उस समय उसे दुग्ध स्नान कराना पड़ेगा।

192

पार्वती रूप में पूजे जा रहे पंचमुखी रुद्राक्ष का विसर्जन करें?

विसर्जन तभी, जब वह टूट जाए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:48:06–1:49:01 · Also a question

जब आप पंचमुखी रुद्राक्ष की पूजा भगवती पार्वती के स्वरूप में कर ही रहे हैं, तो उनका विसर्जन क्यों करना चाहते हैं, वक्ता पूछते हैं। अगर वे टूट गए हों, तो विसर्जन कीजिए। नहीं टूटे, तो पूजन में रहने दीजिए; विसर्जन क्यों करना? दो साल की मेहनत, और आप उसका विसर्जन करना चाहते हैं।

193

कुंभ में यात्रा करनी पड़े और भोजन की शुद्धता न रह पाए तो क्या करें?

शुद्धता की कोशिश करें; जहाँ शुद्ध शाकाहारी भोजन मिले वहाँ खाएँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:49:02–1:50:06 · Also a question

हाँ, वक्ता कहते हैं: अगर देश, काल और परिस्थिति के हिसाब से कुंभ के समय या किसी पर्व-काल में यात्रा करनी पड़े, अगर आपकी नौकरी ऐसी है, तो खान-पान की शुद्धता नहीं रह पाती। कोशिश ज़रूर कीजिए कि शुद्धता रहे। अच्छी जगह खाइए जहाँ शुद्ध शाकाहारी भोजन मिले। यह कोशिश ज़रूर कीजिए। कोई विकल्प न हो तो अलग बात है; पर विकल्प मिले, तो जितना शुद्ध हो सके उतना भोजन कीजिए।

194

मज़ार जाने के अगले दिन कुलदेवी ने आवेशित होकर सामूहिक पिटाई की

अगले दिन कुलदेवी का आवेशित होकर सामूहिक पिटाई करना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:50:07–1:50:50

एक श्रोता लिखते हैं कि कोई मज़ार पर गया था और अगले दिन कुलदेवी ने आवेशित होकर उसकी सामूहिक पिटाई की। बहुत अच्छा, वक्ता कहते हैं; ऐसी प्रसादी मिलना चाहिए।

लिखा है, वक्ता पढ़ते हैं, कि कोई मज़ार पर गया था, और अगले दिन कुलदेवी ने आवेशित होकर सामूहिक पिटाई की। बहुत अच्छा, वे कहते हैं; ऐसी प्रसादी मिलना चाहिए।

मूल प्रतिलेख
अभिनव चंदन जी देखिए अभिनव चंदन जी जो हैं वो एक बहुत ही अच्छे साधक हैं भगवती के और बहुत उग्र पीठ पर जाकर साधना करते हैं। ऊपर से हिमाचल क्षेत्र के हैं पहाड़ी इलाके की तंत्रों के विषय में बहुत अच्छा जानकारी रखते हैं। अब अभिनव चंदन जी के पास मैसेज आना शुरू होगा। भैया झाड़ फूंक मत करिएगा बस। लिखे हैं कि मजार में कोई गया था और अगले दिन कुलदेवी आवेशित होकर के सामूहिक रूप से कुटाई कर दी। बहुत अच्छा ऐसा प्रसादी मिलना चाहिए। वैसे भी जो पहाड़ी क्षेत्र की शक्तियां अधिकतम कुल शक्ति के रूप में पूजित हैं अधिकतर जो है सिद्धि योगिनियां हैं।
195

पहाड़ी क्षेत्रों की शक्तियाँ कैसी होती हैं?

ज़्यादातर कुल शक्ति रूप में पूजी जाने वाली सिद्ध योगिनियाँ — जल्दी क्रोध, शत्रु-नाश में तेज़

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:50:51–1:51:16 · Also a question

वैसे भी, वक्ता कहते हैं, पहाड़ी क्षेत्र की शक्तियाँ, जो ज़्यादातर कुल शक्ति के रूप में पूजी जाती हैं, ज़्यादातर सिद्ध योगिनियाँ हैं। बहुत सामर्थ्यवान, और — क्रूर कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वे तुरंत क्रोधित होती हैं, यह सच्ची बात है। प्रसन्न भी होंगी; और शत्रुओं के नाश में उनका प्रभाव सबसे आगे है। यह भी सच्ची बात है। पर अगर ग़लती हो गई, तो फिर तो।

196

मुंगेर में भगवती कितने रूपों में विराजमान हैं?

बड़ी दुर्गा महारानी और भगवती चंडिका

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:51:17–1:51:52 · Also a question

भगवती मुंगेर की भवानी, बड़ी दुर्गा महारानी — उनकी सेवा हम भी रोज़ करते हैं, वक्ता कहते हैं; मुंगेर वाली माई की महिमा बहुत बड़ी है। मुंगेर में भगवती के स्थान पर माँ दो स्वरूपों में विराजमान हैं: एक में भगवती बड़ी दुर्गा महारानी का स्वरूप जो आप देखते हैं, और दूसरा भगवती चंडिका। वहाँ दोनों स्वरूपों का पूजन होता है। चंडिका का स्वरूप साल भर पूजित रहता है, और मुंगेर की भवानी का श्रृंगार स्वरूप हम ख़ासकर नवरात्रि के समय देखते हैं।

197

मुंगेर में उनका तंत्रोक्त स्वरूप क्या है?

अठारह भुजाओं वाली माई, और वह नियम जिसका उल्लंघन वे नहीं होने देतीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:51:53–1:52:29 · Also a question

अगर तंत्रोक्त विधि-विधान में मुंगेर की बड़ी दुर्गा महारानी की पूजा हो — तंत्रोक्त स्वरूप में जाएँ — तो वे अठारह भुजाओं वाली माई हैं। बाकी जो स्वरूप आप सार्वजनिक रूप से देखते हैं, वह देख ही रहे हैं। और वहाँ विसर्जन को लेकर एक बात प्रसिद्ध है, वक्ता कहते हैं, जिसके वीडियो यूट्यूब पर मिलते हैं: जिसमें नियम की अवहेलना वे स्वीकार नहीं करतीं। ऐसा है, और उनकी महिमा सचमुच अनंत है।

198

उनके अपने जीवन के सबसे कठिन समय में उन्होंने प्रत्यक्ष चमत्कार दिया

सबसे कठिन समय में साधकों के लिए प्रत्यक्ष चमत्कार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:52:30–1:53:00

सबसे कठिन परिस्थितियों में — यह, वक्ता कहते हैं, उनके अपने जीवन का अनुभव है। सबसे बुरे समय में, सबसे कठिन समय में, जिसमें आदमी बहुत बड़ी परेशानी में होता है: उस समय, कहा जाए तो, भगवती मुंगेर की भवानी हम जैसे साधकों के लिए प्रत्यक्ष चमत्कार हैं; हमने देखा है। कैसे माई एक पुकार पर सुनती हैं। उनका नाम बड़ी दुर्गा महारानी यूँ ही नहीं है, वे कहते हैं; वे सचमुच बड़ी दुर्गा हैं।

199

शक्तियों के क्रम के बारे में तंत्र का नियम क्या है?

हर उपशक्ति किसी बड़ी शक्ति के अधीन — और छप्पन ब्रह्मराक्षस

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:53:01–1:53:45 · Also a question

तंत्र की एक और बात साफ़-साफ़ बताते हैं, वक्ता कहते हैं: तंत्र की पूरी नियमावली में कहा गया है कि हर शक्ति, हर उपशक्ति, और जो उपदेवता हैं, वे किसी बड़ी शक्ति के अधीन हैं; उन पर किसी का स्वामित्व है। इनमें जो छप्पन तरह के ब्रह्मराक्षस बताए गए हैं — उन छप्पन तरह के ब्रह्मराक्षसों का आधिपत्य मुख्य रूप से एक स्वरूप का माना गया है, और वह है मुंगेर वाली बड़ी दुर्गा महारानी। पर वहाँ उनका पूजन उस स्वरूप में साक्षात हो रहा है; बाकी क्षेत्रों में उनका स्वरूप मौजूद है।

200

कितना भी बड़ा ब्रह्म हो, उस स्वरूप के नाम पर झुक जाता है

सबसे उग्र ब्रह्म भी उनके नाम पर झुक जाता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:53:46–1:54:15

अगर कोई दिव्य या तांत्रिक क्षेत्र में ऐसे स्वरूपों की उपासना करे, तो उनके स्वरूप की उग्रता इतनी है कि कोई भी ब्रह्म हो, कितनी भी बड़ी ब्रह्म शक्ति — चाहे खूनी ब्रह्म हो या साधारण, यानी सबसे उग्र शक्ति की बात हो रही है — वह उनके नाम पर तुरंत मान जाता है। उनका स्वरूप ही इतना प्रतापी है कि मानना ही पड़ता है। उनकी बात कोई नहीं टालता। बिंदु क्षेत्र में भी, वक्ता कहते हैं, लोग इन कामों के लिए इस स्वरूप का स्मरण और पूजन करते हैं।

201

क्या उनकी प्रतिमा से उनकी नाराज़गी पढ़ी जा सकती है?

श्रृंगार स्वरूप की आँखें और मुखमंडल

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:54:16–1:54:27 · Also a question

अगर साक्षात देखें — भले आपने उनकी फ़ोटो रखी हो, श्रृंगार वाली, जिसमें माँ पूरे श्रृंगार में हैं, गहनों और आभूषणों के साथ जैसी दिखती हैं — तो आप देखेंगे कि अगर आपसे कोई अपराध हुआ है, तो सिर्फ़ उनकी आँखों में देखकर समझ आ जाएगा कि भगवती नाराज़ हैं। अगर चल रहा है, तो मुखमंडल की आभा ही बदली रहती है।

202

वही फ़ोटो उनके पूजा स्थान पर लगभग इक्कीस साल से है, उसकी आभा अब भी बढ़ रही है

लगभग इक्कीस साल, और आभा अब भी बढ़ती हुई

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:54:28–1:54:53

उनके पूजा स्थान पर रखी माई की फ़ोटो, वक्ता कहते हैं, लगभग बीस-इक्कीस साल से चल रही है — लगभग इक्कीस साल; वही पुरानी फ़ोटो आज तक रखी है, और मुखमंडल की आभा ठीक वैसे ही बढ़ती हुई है। तो माई का यह स्वरूप बहुत दिव्य है, और कभी जाने का अवसर मिले, तो एक बार मुंगेर जाकर उनके दर्शन ज़रूर करने चाहिए।

203

भगवान दत्त का देव दीक्षा विधान कब किया जा सकता है?

मकर संक्रांति, बसंत पंचमी, या माघ की गुप्त नवरात्रि

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:54:54–1:55:16 · Also a question

अगर उस तरह से करना है, तो कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं। मान लीजिए अभी मकर संक्रांति पर कर सकते हैं। बसंत पंचमी पर, माँ की गुप्त नवरात्रि में कर सकते हैं। अभी गुप्त नवरात्रि नहीं चल रही; गुप्त नवरात्रि अब माघ में आएगी।

अगर उस तरह से करना है, तो कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं। मान लीजिए अभी मकर संक्रांति पर कर सकते हैं। बसंत पंचमी पर, माँ की गुप्त नवरात्रि में कर सकते हैं। अभी गुप्त नवरात्रि नहीं चल रही। गुप्त नवरात्रि अब माघ में आएगी।

मूल प्रतिलेख
मतलब ऐसे करना है तो आप कर सकते हैं। मान के चलिए कि अभी आप मकर संक्रांति में कर सकते हैं। बसंत पंचमी में मां की गुप्त नवरात्रि में कर सकते हैं। अभी गुप्त नवरात्रि नहीं चल रही है। अभी माघ में गुप्त नवरात्रि आएगी। ऐसे अगर देखा जाए ना तो नवरात्रि हर मास रहती है।
204

साल में कितनी नवरात्रियाँ होती हैं?

हर महीने एक नवरात्रि, चार पीठों के हिसाब से अलग

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:55:17–1:56:01 · Also a question

ऐसे देखें, वक्ता कहते हैं, तो हर महीने नवरात्रि पड़ती है; किसी न किसी तरह हर महीने एक नवरात्रि हो रही है। जो आठ मुख्य और चार मुख्य पीठ बताए गए हैं: कामगिरि पीठ के हिसाब से नवरात्रियाँ अलग हैं, पूर्णगिरि पीठ के हिसाब से नवरात्रि अलग है, उड्डियान पीठ के हिसाब से अलग, और शारदा पीठ के हिसाब से अलग। चारों पीठों के हिसाब से तंत्र पीठ में, तंत्रोक्त विषय में, आगम और मुक्त ग्रंथों के अनुसार अलग-अलग नवरात्रियाँ मानी गई हैं। कुछ संक्रांति के हिसाब से चलती हैं; कुछ संक्रांति के शुक्ल पक्ष के हिसाब से; और कुछ जयंती तिथियों के हिसाब से।

205

शाकंभरी सप्तमी की रात से, और माघ गुप्त नवरात्रि मौनी अमावस्या से चलती है

शाकंभरी सप्तमी की रात से; माघ गुप्त नवरात्रि मौनी अमावस्या से

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:56:02–1:56:48

यह कुल परंपरा पर निर्भर है, वक्ता कहते हैं: अगर हम कहें कि अभी नहीं चल रही, और आपको पता चले कि कामगिरि पीठ के हिसाब से अभी चल रही है, और आप कहें कि हम ग़लत बोल रहे हैं — नहीं, वह भी सही है। पर आप जैसे लोग जिनकी कुलदेवी भगवती शाकंभरी हैं, और जहाँ भगवती शाकंभरी का मुख्य पूजन होगा, मान लीजिए अष्टमी तिथि से, सप्तमी की रात से उनकी नवरात्रि शुरू होगी — गुप्त नवरात्रि। तो वह शाकंभरी नवरात्रि है। और माघ गुप्त नवरात्रि, वासंतिक नवरात्रि, माघ गुप्त नवरात्रि भगवती शारदा को समर्पित मुख्य नवरात्रि होगी; यह मौनी अमावस्या से शुरू होगी।

206

अमृतेश्वरी को लक्ष्मी बीज जोड़कर करना है

उसके साथ लक्ष्मी बीज जोड़कर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:56:49–1:57:16

अमृतेश्वरी — उसके साथ लक्ष्मी बीज जोड़कर कीजिए, वक्ता जवाब देते हैं, लक्ष्मी बीज के साथ।

अमृतेश्वरी, वक्ता जवाब देते हैं। लक्ष्मी बीज के साथ — उसमें लक्ष्मी बीज जोड़कर कीजिए।

मूल प्रतिलेख
अमृतेश्वरी लक्ष्मी बीज के साथ लक्ष्मी बीज जो है उसको जोड़ के कीजिए। चलिए आप सभी से पुनः मिलेंगे। हमारे द्वारा देव दीक्षा की इच्छा है तो देव दीक्षा तो आप पर्सनली मैसेज कर दीजिएगा कभी अपने लोग जब करेंगे दीक्षा विधान तो आपको भी सूचित कर दिया जाएगा।
207

बहुत ज़िद्दी सात साल के बच्चे के लिए क्या करें?

सात में प्यार, और कोई विशेष स्थिति दिखे तो कुंडली विश्लेषण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:57:17–1:58:05 · Also a question

बच्चा अभी सात साल का है, वक्ता कहते हैं — प्यार से समझाइए। जब आठ-नौ साल का हो जाए, तब मारकर समझाइए। और एक बात ध्यान रखिए: तेरह साल की उम्र तक वैसे तो कोई ख़ास बात नहीं, फिर भी अगर बच्चों के साथ कोई विशेष स्थिति बने, तो किसी जानकार, विद्वान ज्योतिषी से उनकी जन्म कुंडली का विश्लेषण कराकर, जो भी विषय उठ रहा हो, उसका उपाय कीजिए।

208

बच्चे की परेशानी बनी रहे तो कौन-सा मंत्र और विधान बताया गया है?

सप्तशती के बारहवें अध्याय का संपुट और बटुक भैरव के साथ नवचंडी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:58:06–1:58:50 · Also a question

अगर कुछ भी न मिले और फिर भी लगे कि यहाँ कोई विषय है, तो, वक्ता कहते हैं, श्री दुर्गा सप्तशती के बारहवें अध्याय में, भगवती के कहे माहात्म्य में, यह मंत्र है — बाल ग्रहाभिभूतानां बालानां रक्षणकरं परम्, मंत्र रक्षोभूत पिशाचानां। इस मंत्र का संपुट लगाकर किसी दुर्गा जी के मंदिर में कम से कम सप्तशती जी के नौ पाठ कराने चाहिए, जो नवचंडी हो जाती है; साथ में भैरव जी का, बटुक भैरव जी का पाठ। यानी बटुक भैरव जी के अष्टोत्तर शतनाम का संपुट होगा, और सप्तशती का पूरा विधान; सप्तशती बाल ग्रहाभि मंत्र से संपुटित होगी।

209

यह विधान बच्चे के साथ उठने वाली ग्रह-जनित, भौतिक और मानसिक स्थितियों का उत्तर है

बच्चे के साथ उठने वाली ग्रह-जनित, भौतिक या मानसिक स्थितियाँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:58:51–1:59:46

इससे कराइए, वक्ता कहते हैं, फिर बच्चे के साथ जो भी हो रहा है — अगर कोई ग्रह-जनित विषय, कोई भौतिक विषय, कोई मानसिक विषय उठ रहा है — उसमें लाभ ज़रूर मिलेगा।

इससे कराइए, वक्ता कहते हैं, फिर बच्चे के साथ जो भी हो — अगर कोई ग्रह-जनित विषय, कोई भौतिक विषय, कोई मानसिक विषय उठ रहा है — तो उसमें लाभ ज़रूर मिलेगा।

मूल प्रतिलेख
इससे कराइए तो बच्चे के साथ जो भी अगर किसी प्रकार की ग्रह जनित विषय, भौतिक विषय, कोई मानसिक विषय उपस्थित हो रहा हो तो उसमें जरूर लाभ प्राप्त होगा। पूजा जी आशीर्वाद कर दो कि हमारे टेंडर हमें वापस मिल जाए। भाई हम आशीर्वाद कहां से करें? हम भगवती से प्रार्थना करें कि आप जो चाहते हैं माई अगर उचित समझे तो वो कर दें।
210

कुंभ की भीड़ में गुरुदत्त की सेवा में क्या करें?

ऐसी भीड़ में सिर्फ़ दर्शन और पूजन ही काफ़ी है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 1:59:47–2:00:20 · Also a question

एक श्रोता कहते हैं कि वे त्रिवेणी संगम में स्नान के बाद काशी जा रहे हैं; वक्ता कहते हैं: बहुत अच्छा। गुरुदत्त जी की सेवा में इस समय इतनी भीड़ होगी कि सिर्फ़ दर्शन और पूजन कर लें, वही काफ़ी है; वही बहुत है।

त्रिवेणी संगम में स्नान के बाद हम काशी जा रहे हैं, श्रोता लिखते हैं, वक्ता पढ़ते हैं। बहुत अच्छा, वे कहते हैं। गुरुदत्त जी की सेवा में इस समय इतनी भीड़ होगी कि सिर्फ़ दर्शन और पूजन कर लें, वही काफ़ी है; वही बहुत है।

मूल प्रतिलेख
सीमा जी आपको भी मेरा प्रणाम। त्रिवेणी संगम में स्नान के पश्चात काशी जा रहे हैं। बहुत अच्छा। गुरुदत्ता जी की सेवा में आप अभी के समय में तो इतना भिड़े रहेगा कि केवल आप दर्शन पूजन कर लें वही बहुत है। चलिए पुनः आप सभी से मिलेंगे।
Indexed, not endorsed as instruction

यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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