गंगा दशहरा और बटुक भैरव जयंती — गंगा महात्म्य, कुल भैरव की स्थापना, और तंत्र के अनेक भैरव
गंगा दशहरा और बटुक भैरव जयंती पर प्रवचन।
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आगम अनुभव का विषय है, पाठ का नहीं
तंत्र शब्द-दर-शब्द लिखा हुआ क्यों नहीं मिलता?
क्योंकि तंत्र अनुभव का विषय है। आगम में प्रत्येक चीज़ वर्ड टू वर्ड नहीं लिखी रहती और एक-एक शब्द लिखा हुआ आपको नहीं मिलेगा। यह वह अनुभव है जो गुरु अपने शिष्य को देता है, शिष्य अपने शिष्य को देता है, और इस प्रकार विद्याएँ क्रम से चलती रहती हैं।
वक्ता कहते हैं कि आगमतांत्रिक शास्त्रोक्त विधि-विधानों का समूह (जैसे शिवागम), जो पूजा के नियम निर्धारित करता है, यह भी कि बलि कहाँ व कैसे विहित है — मात्र स्वाद या भोग हेतु इसके नियमों का उल्लंघन किसी भी उच्च आध्यात्मिक प्राप्ति को असंभव बना देता है।-निगम सनातन संस्कृति का अभिन्न अंग हैं और आगम का विषय तंत्र है। वे पहले भी बोल चुके हैं कि तंत्र में प्रत्येक चीज़ शब्द-दर-शब्द नहीं लिखी रहती; एक-एक शब्द वर्ड टू वर्ड लिखा हुआ आपको नहीं मिलेगा। यह अनुभव का विषय है, जो गुरु अपने शिष्य को देता है और शिष्य अपने शिष्य को — इसी प्रकार विद्याएँ क्रम से चलती रहती हैं। कालांतर में कुछ लोग उसे प्रसारित करना चाहते हैं तो उसके विषय में लिखते हैं — और वे भी पूर्ण विषय शायद ही लिखें, क्योंकि वह संभव ही नहीं है। यह अनुभव की बात है: मेरे साथ कुछ और होगा, आपके साथ कुछ और, आपके शिष्य के साथ कुछ और। इसलिए कोई वर्ड टू वर्ड लिख भी नहीं सकता, और लिखा हुआ ठीक वैसा ही घट जाए, यह भी संभव नहीं। ऐसा नहीं है, वे कहते हैं, कि दे दिया गया कि यह मंत्र है, इस विधि से जप करोगे तो ऐसा-ऐसा होगा। नहीं। हमारे कर्म के अनुसार हमारे प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। अलग हैं, उसी अनुसार हमारे अनुभव भी अलग होंगे — और उसी अनुसार फल हमें जल्दी मिल सकता है, बहुत देर से मिल सकता है, या नहीं भी मिल सकता है।
प्रत्यक्षं किं प्रमाणम्
आलोचकों से पूछा गया कि गलती आखिर क्या है, और अपने साधकों के प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर वे मानते हैं कि सिद्धियाँ हैं
वे आलोचकों से पूछते हैं कि जिस विषय पर वे बोलते हैं, उस विषय से संबंधित दिक्कत क्या है, कौन सा नुक्स आप निकालते हो। फिर कहते हैं कि अपने ही गृहस्थ तंत्र परिवार के कुछ साधक वहाँ गए हैं, पहले के भी और बाद के भी, उनके वीडियो उपलब्ध हैं; जितनी लिमिट तक हो सका, उन्होंने बताया है कि क्या पाया। तो इस बात को वे मानेंगे: प्रत्यक्षं किं प्रमाणम् — हम तो देखे हैं, उनके पास सिद्धियाँ हैं।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहली चीज़ यही है कि उनके पास कौन सी सिद्धि है, जिसे लेकर इतना बवाल मच जाता है कि वे पाखंडी हैं, अंधविश्वासी हैं, अंधविश्वास और अंधश्रद्धा फैलाने का काम कर रहे हैं। भाई, अगर अंधश्रद्धा फैला रहे हैं तो कोई यह बता दे कि जिस विषय को लेकर वे बोलते हैं, उस विषय से संबंधित क्या दिक्कत है? क्या गलती, क्या नुक्स आप निकालते हो? वे पूछते हैं कि क्या किसी के विषय में कोई परफेक्ट नुक्स निकालते हैं। अपने ही गृहस्थ तंत्र परिवार के कुछ साधक वहाँ गए हुए हैं — कोई पहले के, कोई बाद के — और उनके वीडियो भी उपलब्ध हैं। वे अपने चैनल के व्यक्ति हैं, गए हैं। उनकी बातों को वे पूरी तरह से तो नहीं कहेंगे, लेकिन जितनी लिमिट तक हो सका, उन्होंने बताया है कि यह परेशानी है, यह बात लेकर आए हैं। तो इस बात को वे मानेंगे: हाँ, प्रत्यक्षं किं प्रमाणम् — हम तो देखे हैं, उनके पास सिद्धियाँ हैं।
दर्शन और जल का स्पर्श
देवी भागवत के अनुसार गंगा जी के दर्शन और स्नान का महात्म्य क्या है?
गंगा जी में स्नान का महात्म्य हर पुराण में मिल जाएगा, वे कहते हैं। श्रीमद् देवी भागवत में महादेव जी गंगा जी के स्मरण, दर्शन और स्नान का महात्म्य बताते हैं: गंगा जी के दर्शन और अपने जल के स्पर्श मात्र से वे प्राणियों के महापाप का नाश कर देती हैं और मोक्ष प्रदान करती हैं। और जो मनुष्य सुबह उठकर अनिच्छा से भी गंगा का स्मरण कर लेता है, उसके लिए तीनों लोकों में अमंगल का कोई भय नहीं रहता।
गंगा जी में स्नान करने के लिए हर पुराण में महात्म्य मिल जाएगा, वक्ता कहते हैं — कि गंगा जी में स्नान करने से क्या-क्या फल मिलता है। बोला गया है कि श्री महादेव जी गंगा जी के स्मरण, दर्शन और स्नान का महात्म्य बताते हैं — यह महिमा श्रीमद्देवीभागवतम् में बताई गई है। वहाँ महादेव जी कहते हैं कि गंगा जी के दर्शन और अपने जल के स्पर्श मात्र से वे प्राणियों के महापाप का नाश कर देती हैं और मोक्ष प्रदान करती हैं। और जो मनुष्य सुबह उठकर अनिच्छा से भी गंगा का स्मरण कर लेता है — स्मरण करने की इच्छा नहीं है, फिर भी कर लेता है — उसके तीनों लोकों में अमंगल का कोई भय नहीं होता।
संपदा, विपत्तियों का नाश और अक्षय पुण्य
बिना इच्छा के भी किया गया गंगा स्मरण घर में संपदा लाता है, विपत्तियाँ दूर करता है और पुण्य को अक्षय कर देता है
वे कहते हैं कि बिना इच्छा से भी स्मरण कर लिया तो उसके घर में संपदा आती है; क्षण भर में उसकी सभी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं; जन्म-जन्मांतर के किए पाप नष्ट हो जाते हैं और उसके पुण्य अक्षय हो जाते हैं। दुःस्वप्न देखने पर, विपत्ति काल में, दुर्गम स्थान पर एक बार भी गंगा का स्मरण कर लेने पर मनुष्य कष्टों से छुटकारा पा जाता है — इसमें संदेह नहीं है।
बिना इच्छा से भी अगर स्मरण कर लिया, वक्ता आगे कहते हैं, तो उसके घर में संपदा आती है। क्षण भर में उसकी सभी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं। जन्म-जन्मांतर से किए गए पाप भी नष्ट हो जाते हैं, तथा उसके पुण्य अक्षय हो जाते हैं। दुःस्वप्न देखने पर, विपत्ति काल में, दुर्गम स्थान पर — एक बार भी गंगा का स्मरण कर लेने पर मनुष्य कष्टों से छुटकारा पा जाता है। इसमें संदेह नहीं है।
अविधिपूर्वक हुई क्रिया का सफल हो जाना
क्रिया के आरंभ में गंगा स्मरण अविधिपूर्वक हुई क्रिया को भी सफल कर देता है, और जप-होम में निकले अपशब्द का उपाय भी यही है
वे कहते हैं कि किसी क्रिया के आरंभ में यदि गंगा जी का स्मरण कर लिया जाए और वह क्रिया अविधिपूर्वक भी हो गई हो, तो क्रिया सफल हो जाती है। और जप, होम, अनुष्ठान में लगा प्राणी यदि अप्रासंगिक वचन का उच्चारण कर लेता है, तो उस समय उसे बार-बार गंगा जी का स्मरण कर लेना चाहिए।
किसी क्रिया के आरंभ में यदि गंगा जी का स्मरण कर लिया जाए, वक्ता कहते हैं, और वह क्रिया अविधिपूर्वक भी हो गई हो, तो क्रिया सफल हो जाती है। जप, होम, अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। में लगा हुआ प्राणी यदि अप्रासंगिक वचन का उच्चारण कर लेता है — जप-होम में लगे हुए क्रोध आ गया, किसी को गलत वचन बोल दिए — इस प्रकार अगर कोई अपशब्द मुख से निकल गया है, तो उस समय भी हमें बार-बार गंगा जी का स्मरण कर लेना चाहिए। यहाँ तो लिखा है, वे बताते हैं, कि एक बार भी गंगा स्मरण करके उनको अपने काम में लगा देना चाहिए।
गंगा का उसकी सन्निधि में निवास
मोक्ष की इच्छा रखने वाला जहाँ भी गंगा जी का स्मरण करे, गंगा स्वयं उसकी सन्निधि में निवास करती हैं
वे कहते हैं कि मोक्ष की इच्छा रखने वाला मनुष्य जहाँ भी गंगा जी का स्मरण कर ले, गंगा उसकी मुक्ति के लिए स्वयं उसकी सन्निधि में निवास करती हैं। गंगा समस्त कामनाओं को शुद्ध करने वाली और सभी अमंगलों को मिटाने वाली हैं — इसलिए पुराणोक्त वचन के अनुसार अगर हमें तिथि इत्यादि प्राप्त हो रही है, तो प्रयास करके गंगा जी तक अवश्य पहुँचना चाहिए।
मोक्ष की इच्छा रखने वाला मनुष्य जहाँ भी गंगा जी का स्मरण कर ले, वक्ता कहते हैं, तो गंगा उसकी मुक्तिजन्म-मरण के चक्र से छुटकारा; जिस प्रेत को यह प्राप्त नहीं होती वह अपनी अधूरी अवस्था में बँधा रहता है। के लिए स्वयं उसकी सन्निधि में निवास करती हैं। गंगा समस्त कामनाओं को शुद्ध करने वाली हैं और सभी अमंगलों को मिटाने वाली हैं। ऐसा महात्म्य में वर्णन है। और वैसे में, जो पुराणयुक्त वचन है उसके अनुसार अगर हमें तिथि इत्यादि प्राप्त हो रही है, तो हमें प्रयास करके गंगा जी तक अवश्य पहुँचना चाहिए।
गंगा के रूप में प्रकट परा प्रकृति
गंगा साक्षात परा प्रकृति यानी भगवती का प्रकट रूप हैं, और उनके स्मरण से वह मिल जाता है जो सब तीर्थों, तपों और यज्ञों से भी नहीं मिलता
कहते हैं, वे बताते हैं, कि साक्षात परा प्रकृति यानी भगवती ही गंगा जी के रूप में प्रकट होकर प्राणियों को स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करती हैं। कुछ लोगों का ऐसा दुर्भाग्य होता है कि गंगा जी के किनारे जाकर भी स्नान नहीं कर पाते; उनका जीवन ही व्यर्थ है। जो पुण्य सभी तीर्थों के स्नान, सभी देवताओं के पूजन, सभी प्रकार के तप-यज्ञ से प्राप्त नहीं हो पाता, वह गंगा जी के स्मरण और स्नान से प्राप्त हो जाता है।
कहते हैं, वक्ता बताते हैं, कि साक्षात परा प्रकृति — यानी भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। ही — गंगा जी के रूप में प्रकट होकर प्राणियों को स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करती हैं। जो उनका स्मरण नहीं करता — और कुछ लोगों का तो ऐसा दुर्भाग्य होता है कि गंगा जी के किनारे जाकर भी स्नान नहीं कर पाते — उनका जीवन ही व्यर्थ है। जो पुण्य सभी तीर्थों में किए गए स्नान, सभी देवताओं के पूजन, सभी प्रकार के तप-यज्ञ इत्यादि और सभी तीर्थों के दर्शन से भी प्राप्त नहीं हो पाता, वह भी गंगा जी के स्मरण और स्नान इत्यादि से प्राप्त हो जाता है। इसीलिए गंगा जी का अनंत वर्णन है।
गलत वचन, पर-गमन, सुरापान और अवैध हिंसा
गंगा स्मरण से कौन-कौन से पाप नष्ट होते हैं?
मुख से जितना भी गलत वचन बोल दें, पर-स्त्री गमन या पर-पुरुष गमन से जो पाप हो जाए, सुरापान यानी मदिरापान, और जो अवैध हिंसा लोग कर देते हैं — ये सब, वे कहते हैं, गंगा जी के स्मरण मात्र से ठीक हो जाते हैं।
मुख से जितना भी गलत वचन बोल दें, वक्ता कहते हैं, पर-स्त्री गमन से जो जन्य हो जाए, पर-पुरुष गमन इत्यादि जो पाप हो गया हो, सुरापान — जो मदिरापान करते हैं — और जो अवैध हिंसा लोग कर देते हैं। यहाँ वे हिंसा के दो भेद बताते हैं: एक होती है धर्म रक्षण हेतु, और एक होती है वैध हिंसा। तो अवैध हिंसा से उत्पन्न जो पाप होता है, उसके नाश हेतु — वह सब गंगा जी के स्मरण मात्र से सही हो जाता है, ठीक हो जाता है।
पग-पग पर अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय
गंगा स्नान के उद्देश्य से यात्रा करने का क्या फल है?
वे पढ़कर बताते हैं कि जो मनुष्य गंगा जी में स्नान के उद्देश्य से यात्रा करता है, उसे पग-पग पर अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय का फल प्राप्त होता है। गंगा स्नान को जानने वाले मनुष्य के पितृगण प्रसन्न होकर नाचने लगते हैं और उसके महानिंदनीय पाप भी दूर भाग जाते हैं। और जो आसन्न-मृत्यु मनुष्य गंगा यात्रा करता है, उसे देखकर यमदूत भयभीत होकर दूर चले जाते हैं।
और जो मनुष्य गंगा जी में स्नान के उद्देश्य से यात्रा करता है — देखिए, वे कहते हैं, लिखा हुआ है — उसे पग-पग पर अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय का फल प्राप्त होता है। गंगा जी के स्नान को जानने वाले मनुष्य के पितृ प्रसन्न होकर नाचने लगते हैं और उसके महानिंदनीय पाप भी दूर से भाग जाते हैं। और जो आसन्न-मृत्यु मनुष्य गंगा यात्रा करता है, उसे देखकर यमदूत भयभीत होकर दूर चले जाते हैं।
गंगा स्नान और जल में खड़े होकर इष्ट मंत्र का जप
जिनका मारकेश चल रहा है, उन्हें क्या करना चाहिए?
जो लोग कहते हैं कि मारकेश चल रहा है — पंडित जी बोले हैं, ज्योतिष महाराज बोले हैं कि मारकेश में गड़बड़ हो सकती है — उन्हें गंगा स्नान इत्यादि करना चाहिए, और गंगा जी में खड़े होकर इष्ट मंत्र इत्यादि का जप करना चाहिए जो-जो बताया गया है। उससे उनका मारकेश का दोष भी शांत होता है, और सभी नक्षत्रों और सभी ग्रहों की शांति होती है।
जो लोग कहते हैं कि मारकेश चल रहा है, वक्ता कहते हैं — पंडित जी बोले हैं, ज्योतिष महाराज बोले हैं कि मारकेश में भी गड़बड़ हो सकती है — उनको गंगा स्नान इत्यादि करना चाहिए। गंगा जी में खड़े होकर इष्ट देवता के मंत्र इत्यादि का जप करना चाहिए, जो-जो बचाव के लिए बताया गया है। उससे उनके मारकेश इत्यादि का दोष भी शांत होता है। सभी नक्षत्रों की शांति होती है, सभी ग्रहों की शांति होती है।
प्राकृतिक मृत्यु से मुक्ति; आत्महत्या से नहीं
क्या गंगा यात्रा में या गंगा जी में मृत्यु होने से मुक्ति मिलती है?
वे कहते हैं कि जो गंगा जी की यात्रा में निकल जाए और मार्ग में किसी कारणवश उसका देह छूट जाए, तो भी उसकी मुक्ति समझ लेनी चाहिए; और गंगा जी में मृत्यु हो जाने पर तो मुक्ति अवश्य होती है। लेकिन मृत्यु वह जो प्राकृतिक हो। कोई जाकर आत्महत्या कर ले तो उसकी मुक्ति नहीं होती। जो जानबूझकर अपनी हत्या कर रहा है, उसे गंगा जी में जाने से भी मुक्ति नहीं मिलती।
जो गंगा जी की यात्रा में निकल जाएँ और जाते समय मार्ग में किसी कारणवश उनका देह छूट जाए, वक्ता कहते हैं, तो भी उनकी मुक्ति समझ लेनी चाहिए। और गंगा जी में मृत्यु हो जाने पर तो मुक्ति अवश्य होती है, ऐसा वर्णन है। लेकिन कैसी मृत्यु? जो प्राकृतिक है। कोई जाकर आत्महत्याआत्मघात, जिसके पश्चात प्राणी को अपनी नियत आयु पूर्ण होने तक सामान्य गति नहीं मिलती। कर ले तो उसकी मुक्ति नहीं होती। ऐसा न सोचें, वे कहते हैं: जो लोग सोचते हैं कि यहाँ गंगा जी में प्राण दे देंगे, वे अपने प्रारब्ध को छोड़कर भाग रहे हैं। एक होता है कि विधि-निर्मित है कि हमारी अब मृत्यु होने वाली है, या हमारी मृत्यु वहाँ प्राकृतिक रूप से हो जाएगी — उसमें हमारा कोई दोष नहीं था, हमने जानबूझकर मृत्यु को हाथ नहीं लगाया — वहाँ अलग बात है। लेकिन कोई जानबूझकर अपनी हत्या कर रहा है, तो उसे गंगा जी में भी जाने से मुक्ति नहीं मिलती। यह बात ध्यान रखनी चाहिए।
आतिथ्य से गंगा स्मरण का पूरा फल
गंगा जी की ओर जा रहे यात्री का आतिथ्य करने वाले को भी गंगा स्मरण का पूरा फल मिलता है, और कई तीर्थों से पहले गंगा या नर्मदा स्नान की बात आती है
वे कहते हैं कि जो लोग गंगा जी को उद्देश्य करके जा रहे होते हैं और मार्ग में कोई उनका आतिथ्य करता है, तो उसको भी गंगा जी के स्मरण इत्यादि का पूरा फल मिल जाता है। वे यह भी जोड़ते हैं कि गंगा जी का स्नान किए बिना ब्रह्महत्या इत्यादि से कभी छुटकारा नहीं मिलता, और कई तीर्थ ऐसे हैं जहाँ जाने से पहले गंगा जी या नर्मदा जी में स्नान करने की बात आती है।
और जो लोग गंगा जी को उद्देश्य करके जा रहे होते हैं, वक्ता कहते हैं, और मार्ग में कोई उनका आतिथ्य करता है, तो उसको भी गंगा जी के स्मरण इत्यादि का पूरा फल मिल जाता है। इस प्रकार अनेक-अनेक प्रकार की बातें कही गई हैं: पितरों को किस प्रकार शांति प्राप्त होती है, इन सभी के विषय में — और यह कि गंगा जी का स्नान किए बिना ब्रह्महत्या इत्यादि से कभी छुटकारा नहीं मिलता। ये सभी विषय बताए गए हैं। कई ऐसे तीर्थ हैं, वे कहते हैं, जहाँ जाने से पहले गंगा जी, नर्मदा जी इत्यादि में स्नान करने की भी बात आती है।
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, मंगलवार और हस्त नक्षत्र
गंगा दशहरा को दशहरा क्यों कहा गया है, और उसका योग क्या है?
जैसा देवी भागवत महापुराण में महादेव जी द्वारा वर्णन है, गंगा जी जब पृथ्वी पर आईं तो वह समय ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी तिथि, मंगलवार और हस्त नक्षत्र से युक्त था। वही तिथि, पूरा का पूरा वही योग इस बार मंगलवार के दिन प्राप्त हो रहा है। जो दस जन्मों के पाप हर ले, इसलिए इन्हें दशहरा कहा गया है।
इस बात को पुनः दोहराते हुए वक्ता कहते हैं कि जैसा श्रीमद्देवीभागवतम् में महादेव जी के द्वारा वर्णन है, गंगा जी जब पृथ्वी पर आईं तो उस समय ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी तिथि, मंगलवार और हस्त नक्षत्र से युक्त समय था। वही तिथि, पूरा का पूरा वही योग इस बार मंगलवार के दिन प्राप्त हो रहा है। दशहरा — जो दस जन्मों के पाप को हर ले, इसलिए इन्हें दशहरा कहा गया है। तो जो भी सुन रहे हैं, प्रयत्नपूर्वक प्रयास कीजिएगा कि किसी भी तरीके से इस बार गंगा जी जाकर मंगलवार के दिन दशमी तिथि को स्नान इत्यादि कर लें।
बटुक भैरव जयंती, और भैरव-रहित घर
उसी दिन बटुक भैरव जयंती भी है, और बिना बटुक भैरव के घर पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं होता
उसी दिन, वे कहते हैं, बटुक भैरव बाबा की जयंती भी है। लगभग दो वर्षों से वे प्रयास कर रहे हैं कि जितने भी लोग सुन रहे हों, घर में भैरव जी को स्थान दें और बटुक भैरव जी की पूजा-पाठ करें, क्योंकि बिना बटुक भैरव के घर पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं होता।
यह तो गंगा जी के महात्म्य और उनसे संबंधित विषय थे, जिन्हें बताना अत्यंत आवश्यक था, वक्ता कहते हैं। अब हम लोग आते हैं कि उसी दिन बटुक भैरव बाबा की जयंती भी है। अब जो लोग भगवती गंगा के निमित्त गंगा जी में जाकर स्नान-दान इत्यादि करेंगे, उसके पश्चात अगर उनके कुल में रक्षण के देवता स्थापित नहीं हैं, तो भैरव जी को लेकर बड़ी बात है। लगभग दो वर्षों से, वे कहते हैं, हम प्रयास कर रहे हैं कि घर में जितने भी लोग सुन रहे हों, भैरव जी को स्थान दें। बटुक भैरव जी की पूजा-पाठ करें। बिना बटुक भैरव के घर पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं होता।
वैष्णव और हर मंडल में भैरव पूजन
क्या शैव परंपरा के बाहर भी भैरव जी की पूजा होती है?
वे कहते हैं कि चाहे आप किन्हीं भी देवी-देवता की पूजा करते हों, भैरव जी की पूजा होती ही है। नारायण की पूजा करते हों, वैष्णव हों, या किसी अन्य शैव संप्रदाय में हों — भैरव जी की पूजा होती है। भगवान नारायण से संबंधित जितनी शक्तियाँ और अवतार हैं, उनमें भी भैरव जी का वर्णन है और उनके मंडल पूजन में भैरवों का पूजन होता है। और जहाँ भी अष्टमातृकाएँ पूजी जाती हैं, वहाँ अष्ट भैरवों का पूजन होता ही होता है।
फिर भी, वक्ता कहते हैं, भैरव जी को लेकर मन में बहुत सारी शंकाएँ रहती हैं। भैरव जी के अनेकों-अनेक स्वरूप हैं — जानकर बड़ा आश्चर्य होगा, और वे इस विषय को पूरे विस्तार से बताएँगे। दूसरी बात यह है कि चाहे आप किन्हीं भी देवी-देवता का पूजन करते हों, भैरव जी की पूजा होती है। नारायण की पूजा भी करते हैं, वैष्णव हैं, या किसी भी अन्य शैव संप्रदाय में हैं, तो भैरव जी की पूजा होती ही है। भगवान नारायण से संबंधित भी जितनी शक्तियाँ, जितने अवतार इत्यादि हैं, उनमें भी भैरव जी का वर्णन है और उनके भी मंडल पूजन में भैरवों का पूजन होता है। जहाँ भी अष्टमातृका पूजी जाती हैं, वहाँ अष्ट भैरवों का पूजन होता ही होता है। यह जान लीजिए, वे कहते हैं।
साक्षात शिव और रक्षा-प्रधान देवता के रूप में भैरव
भैरव कौन हैं?
इसलिए भैरव जी प्रमुख देवता के रूप में, रक्षा-प्रधान देवता के रूप में साक्षात महादेव हैं। भैरव साक्षात शिव हैं और वे अनादि काल से हैं। काल भैरव और बटुक भैरव उनके प्रमुख स्वरूप माने गए हैं, जिनमें भगवान महादेव प्रकट हुए हैं, अवतार लिए हैं; और उनके सिवाय भी अनेक भैरव हैं जो शक्तिपीठों इत्यादि में रक्षण करते हैं।
इसलिए भैरव जी प्रमुख देवता के रूप में, रक्षा-प्रधान देवता के रूप में साक्षात महादेव हैं, वक्ता कहते हैं। भैरव साक्षात शिव हैं और वे अनादि काल से हैं। उनके जो प्रमुख स्वरूप माने गए हैं — काल भैरव, बटुक भैरव — अलग-अलग स्वरूप में भगवान महादेव प्रकट हुए हैं, अवतार लिए हैं। उसी प्रकार उनके सिवाय भी अनेक भैरव हैं जो शक्ति पीठ इत्यादि में रक्षण करते हैं। तंत्र के ग्रंथों के अनुसार भी आपको विभिन्न प्रकार के मत-मतांतर मिल जाएँगे जिनमें अनेकों-अनेक भैरव मिल जाते हैं — कि हमारे घर में, हमारे पूरे शास्त्र-पुराण इत्यादि में, सनातन धर्म में इतने सारे भैरव हैं।
कुलदेवी के भैरव, या भगवती के सेवक को मिला पद
कुल भैरव कौन होते हैं, और यह पद कैसे मिलता है?
हमारे घर के रक्षण-प्रधान प्रमुख देवता कुल के भैरव होते हैं। यह पद एक तो साक्षात इस प्रकार होता है कि जो महाशक्ति हमारे घर की कुलदेवी हैं, उनके भैरव ही कुल भैरव होते हैं। दूसरे, जो लोग हमारी कुल परंपरा में पहले के समय में माँ भगवती की सेवा करते रहे हों, उनकी जब गति होती है और उस प्रकार की इच्छा हो, तो उन्हें ऐसा पद दे दिया जाता है। लेकिन वे ज़ोर देकर कहते हैं कि इसका अर्थ कहीं भी यह नहीं है कि कोई भूत-प्रेत-पिशाच हो और उसे भैरव का स्थान मिला हो।
उसी प्रकार, वक्ता कहते हैं, हमारे घर के जो प्रमुख देवता, रक्षण-प्रधान देवता होते हैं, वे होते हैं कुल के भैरव। अब कुल भैरव का पद एक तो साक्षात इस प्रकार होता है: अगर कोई महाशक्ति हमारे घर की कुलदेवी हैं, तो उनके जो भैरव होंगे, वही भैरव होते हैं। दूसरे, जो लोग कभी हमारी कुल परंपरा में पहले के समय में माँ भगवती की सेवा करते रहे होंगे — उनकी भी जब गति होती है और अगर उस प्रकार की इच्छा हो, तो उनको ऐसा पद दे दिया जाता है। लेकिन इसका अर्थ कहीं भी यह नहीं है कि वह कोई भूत, प्रेत या पिशाच हो और उसे भैरव का स्थान मिला हो। बल्कि जो सेवक होते हैं, उनकी आगे गति होती है — जैसा हम कवच इत्यादि, शतनाम इत्यादि की फलश्रुति में पढ़ते हैं कि उनको साक्षात शिव का पद मिला, इनको साक्षात भैरव का पद मिलेगा। उसी प्रकार अपने पुण्य के अनुसार भैरव का पद हो सकता है; स्वर्ग में न मिले तो हमें पृथ्वी, मृत्यु लोक में ही प्राप्त हो जाए। इस प्रकार अपने परिवार के रक्षण हेतु वह स्वरूप प्राप्त होता है।
गंगा में स्नान कराया त्रिशूल या श्री विग्रह, और हवन के साथ स्थापना
जिनके घर में भैरव जी नहीं हैं, वे गंगा जी से कुल भैरव की स्थापना कैसे करें?
जिनके घर में बटुक भैरव जी की स्थापना नहीं है, वे अगर उस दिन गंगा जी जा रहे हैं तो वहीं से स्मरण करें — गंगा जी में खड़े होकर बटुक भैरव जी का, अपने कुल के भैरव का स्मरण कीजिए। एक त्रिशूल लेते जाइए, या बटुक भैरव जी का फोटो भी रख सकते हैं, या श्री विग्रह; उनके अनुसार श्री विग्रह मिल जाए तो उचित है, न मिले तो त्रिशूल ले जाना चाहिए।
जिनके भी घर में भैरव जी की, बटुक भैरव जी की स्थापना नहीं है — वे अगर उस दिन गंगा जी जा रहे हैं तो वहीं से स्मरण करते हुए अपने कुल के देवता का स्मरण करें; क्योंकि गंगा जी में खड़े होकर आप बटुक भैरव जी का, अपने कुल के भैरव का स्मरण कीजिएगा तो अवश्य ही वे कृपा करेंगे। तो वहीं स्मरण करके एक त्रिशूलशिव और देवी का त्रिशूल, जो शक्ति स्थल पर भी स्थापित किया जाता है। लेते जाइए, या बटुक भैरव जी का फोटो भी रख सकते हैं, या श्री विग्रह भी। उनके अनुसार श्री विग्रह मिल जाए तो उचित है; न मिले तो फिर त्रिशूल ले जाना चाहिए। उसी को स्नान कराकर, वहीं बटुक भैरव जी के मंत्र इत्यादि का स्मरण करते हुए, कुल भैरव के रूप में उनका आवाहन करके, फिर वापस आकर अपने घर में स्थापना करनी चाहिए। अगर गंगा जी आपके घर के नज़दीक हैं तो बहुत बढ़िया — उसी दिन स्थापना हो जाएगी। लेकिन गंगा जी से दूर हैं और एक-आध, दो दिन बाद घर पहुँचते हैं, तो घर आकर त्रिशूल की स्थापना करके हवन इत्यादि अवश्य करें — क्योंकि हवन करने से वह चीज़ तुरंत चैतन्य हो जाएगी, वह ऊर्जा तुरंत चैतन्य हो जाएगी। तो बटुक भैरव जयंती का भी पूर्ण रूप से लाभ उठाइए।
अष्टदल कमल में अष्टमातृकाएँ, और अग्र भाग में भैरव
मंडल में अष्ट भैरवों का पूजन कहाँ होता है?
अष्ट भैरव अति प्रसिद्ध हैं, और उनका सामर्थ्य और स्वरूप हर प्रकार के तंत्र में देखने को मिलता है। जिस भी तंत्र में — दैवी शक्ति से संबंधित, शाक्त, शैव, और वैष्णव में भी परम वैष्णव, महा वैष्णव शक्तियाँ — जब भी उनका पूजन अष्टदल कमल में होता है, तो अष्टदल कमल में अष्टमातृकाएँ ही अलग-अलग रूप में पूजित होती हैं; मध्य में अष्टमातृकाएँ और बिल्कुल आगे अग्र भाग की ओर उनकी आठ शक्तियों के रूप में भैरव पूजित होते हैं।
अब भैरव जी के जो विविध रूप हैं, विशेष करके तंत्र में, उन पर थोड़ी चर्चा कर लेते हैं, वक्ता कहते हैं। अष्ट भैरव अति प्रसिद्ध हैं — अष्ट भैरवों का सामर्थ्य, स्वरूप हर प्रकार के तंत्र में आपको देखने को मिलता है। जिस भी तंत्र में, विशेष करके दैवी शक्ति से संबंधित, शाक्त से संबंधित, शैव से संबंधित, और वैष्णव में भी परम वैष्णव, महा वैष्णव शक्तियाँ — जब भी उनका अष्टदल कमल इत्यादि में पूजन होता है, तो अष्टदल कमल में अष्टमातृका ही अलग-अलग रूप में पूजित होती हैं। तो मध्य में अष्टमातृकाएँ, और बिल्कुल आगे अग्र भाग की ओर उनकी आठ शक्तियों के रूप में भैरव ही पूजित होते हैं।
ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी, चामुंडा, महालक्ष्मी
अष्टमातृकाएँ कौन-कौन सी हैं?
आठ भैरव प्रमुख रूप से वे हैं जिन्हें हम सभी जानते हैं, और वे उन अष्टमातृकाओं के अनुरूप हैं जिन्हें हम पूजते हैं: ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी, चामुंडा और महालक्ष्मी।
और आठ भैरव जो प्रमुख रूप से हम सभी जानते हैं, वक्ता कहते हैं, वे उन अष्टमातृका के अनुरूप हैं जिन्हें हम पूजते हैं: ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी, चामुंडा और महालक्ष्मी। इन सभी को हम लोग पूजते हैं। अब उसी प्रकार इनके भैरव कौन-कौन हो जाएँगे?
असितांग, रुरु, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाल, भीषण और संहार
अष्टमातृकाओं में से प्रत्येक के साथ कौन सा भैरव पूजित होता है?
ब्राह्मी के भैरव असितांग हैं; माहेश्वरी के भैरव रुरु; कौमारी के चंड भैरव; भगवती वैष्णवी के क्रोध भैरव — यही क्रोध भैरव माँ भगवती छिन्नमस्तिका के साथ भी पूजित होते हैं। उन्मत्त भैरव देवी वाराही के साथ, और इंद्राणी यानी इंद्राक्षी के साथ कपाल भैरव पूजित होते हैं। जिनकी कुलदेवी चामुंडा हैं, वे पूछते हैं कि चामुंडा के साथ कौन — प्रमुख रूप से बटुक भैरव तो सभी शक्तियों के साथ हैं, लेकिन ऐसे देखा जाए तो चामुंडा के साथ भीषण भैरव और लक्ष्मी के साथ संहार भैरव की पूजा होती है।
असितांग — ब्राह्मी के जो भैरव हैं, उनका यह नाम हो जाएगा, वक्ता कहते हैं। माहेश्वरी के भैरव रुरु हो जाएँगे। कौमारी, जो भगवती का स्वरूप हैं, उनके भैरव चंड भैरव; और भगवती वैष्णवी के भैरव क्रोध भैरव हो जाते हैं। यही क्रोध भैरव माँ भगवती छिन्नमस्तिका के साथ भी क्रोध भैरव के रूप में पूजित होते हैं। उन्मत्त भैरव देवी वाराही के साथ पूजित होते हैं, और माँ जगदंबा का जो स्वरूप इंद्राणी हैं, इंद्राक्षी हैं, इनके साथ कपाल भैरव पूजित होते हैं। और भगवती चामुंडा — जिनकी भी कुलदेवी हैं, वे लोग पूछते हैं कि चामुंडा के साथ कौन? देखिए, प्रमुख रूप से बटुक भैरव तो सभी शक्तियों के साथ हैं। लेकिन ऐसे देखा जाए तो चामुंडा के साथ भीषण भैरव की पूजा होती है, और लक्ष्मी के साथ संहार भैरव की पूजा होती है।
आवरण वर्णनों से छूटा भैरव पूजन
बहुत सारे आवरण पूजन ग्रंथों में भैरवों का पूजन क्यों नहीं दिया गया है?
ये प्रमुख आठ भैरव और अष्टमातृकाएँ — इनका पूजन प्रत्येक यंत्र में होता है: जितने भी देवी-देवता हैं, सभी के यंत्र मंडल में अष्टमातृकाओं की पूजा होती ही होती है और उनके साथ अष्ट भैरव होते ही होते हैं। हाँ, आवरण पूजन इत्यादि में विभिन्न प्रकार के भेद मिल जाएँगे, और बहुत सारी जगहों पर भैरवों के पूजन का वर्णन ही नहीं दिया जाता। कारण उन्हें पता नहीं; सबका अपना कोई कारण रहा होगा।
ये प्रमुख आठ भैरव और अष्टमातृकाएँ, वक्ता कहते हैं — इनका पूजन प्रत्येक यंत्र में होता है। जितने भी देवी-देवता हैं, सभी के यंत्र मंडल में अष्टमातृकाओं की पूजा होती ही होती है, और उनके साथ ही अष्ट भैरव होते ही होते हैं। हाँ, यह ज़रूर है कि आवरण पूजा इत्यादि में विभिन्न प्रकार के भेद आपको मिल जाएँगे; बहुत सारी जगहों पर भैरवों के पूजन का वर्णन ही नहीं दिया जाता। अब यह पता नहीं, वे कहते हैं — सबका अपना कोई विविध कारण रहा होगा, ऐसा कोई कारण रहा होगा कि वे भैरव पूजन के लिए नहीं बताते।
महामृत्युंजय और अमृतेश्वरी को जोड़ने वाला दशांश जप
क्या जप में देव शक्ति और देवी शक्ति दोनों का पूजन आवश्यक है?
वे कहते हैं कि भैरवों को छोड़ देना संभव ही नहीं है। जैसे महामृत्युंजय का जप कर रहे होते हैं तो बार-बार बोलते हैं कि देव शक्ति और देवी शक्ति दोनों का पूजन होना चाहिए। अगर महामृत्युंजय सवा लाख कर रहे हैं तो — ट्रांसक्रिप्ट के शब्दों में — 1250000 मंत्र भगवती अमृतेश्वरी का जप करना ही पड़ेगा, उनका दशांश जप; और अगर भगवती पीतांबरा जैसे स्वरूप का सवा लाख जप कर रहे हैं तो 12500 यानी दशांश जप महामृत्युंजय का करना ही पड़ेगा।
लेकिन यह संभव ही नहीं है, वक्ता कहते हैं। जैसे अगर हम महामृत्युंजय मंत्र का जप कर रहे होते हैं, तो बार-बार बोलते हैं कि देव शक्ति और देवी शक्ति दोनों का पूजन होना चाहिए। अगर महामृत्युंजय सवा लाख कर रहे हैं, तो — ट्रांसक्रिप्ट में जो शब्द हैं — 1250000 मंत्र भगवती अमृतेश्वरी का जप करना ही पड़ेगा, उनका दशांशसाधना के चरणों को जोड़ने वाला दशमांश (एक-दसवां) अनुपात नियम — कुल जप संख्या के दसवें भाग जितना हवन, हवन के दसवें भाग जितना तर्पण, और तर्पण के दसवें भाग जितना मार्जन किया जाता है। जप। और अगर भगवती के ऐसे स्वरूप जैसे भगवती पीताम्बरा"पीत वस्त्रधारिणी" — भगवती बगलामुखी का एक नाम। का सवा लाख जप कर रहे हैं, तो 12500 यानी दशांश जप महामृत्युंजय का करना ही पड़ेगा। ठीक उसी प्रकार, अगर हम अष्टमातृकाओं का विविध प्रकार से पूजन कर रहे हैं, तो वहाँ अष्ट भैरवों की भी पूजा करनी ही चाहिए — तभी पूर्ण फल प्राप्त होगा। आधे-अधूरे से नहीं प्राप्त होगा।
आदि शंकराचार्य का प्रपंचसार और उसके भिन्न नाम
प्रपंचसार में अष्ट भैरवों के विषय में क्या कहा गया है?
उसी प्रकार भगवान आदि गुरु शंकराचार्य महाराज के प्रसिद्ध तंत्र ग्रंथ प्रपंचसार में भी अष्ट भैरवों का वर्णन है। बस उसमें नाम थोड़ा सा बदल गया है, लेकिन भैरवों का स्वरूप लगभग वैसा ही माना गया है। उसमें भीषण भैरव तो हैं, लेकिन कालराज, रुरु भैरव इत्यादि का नाम अलग से आया है, और क्रोध, चंड, कपाल भैरव और भूतनाथ भैरव — इन चारों का नाम अलग से आया है।
उसी प्रकार, वक्ता कहते हैं, भगवान आदि गुरु शंकराचार्य महाराज का जो प्रसिद्ध तंत्र ग्रंथ है प्रपंचसार — उसमें भी अष्ट भैरवों के बारे में वर्णन है। बस उसमें नाम थोड़ा सा बदल गया है। लेकिन भैरवों का स्वरूप लगभग वैसा ही माना गया है। उसमें भीषण भैरव तो हैं, लेकिन कालराज, रुरु भैरव इत्यादि का नाम अलग से आया है। क्रोध, चंड, कपाल भैरव और भूतनाथ भैरव — इन चारों का नाम अलग से आया हुआ है।
मंथान, फटकार, षटचक्र, हविर्भक्ष और भ्रमर भास्कर
आठ के सिवाय भी ग्रंथों में बहुत सारे भैरवों के नाम आते हैं — मंथान, फटकार, षटचक्र आदि
इनके सिवाय भी बहुत सारे भैरव हैं — मंथान भैरव, फटकार भैरव, षटचक्र भैरव, हविर्भक्ष भैरव, भ्रमर भास्कर भैरव: ऐसे भैरवों का उल्लेख आपको प्राप्त होता है।
इनके सिवाय भी बहुत सारे भैरव हैं, वक्ता कहते हैं। मंथान भैरव, फटकार भैरव, षटचक्र भैरव, हविर्भक्ष भैरव, भ्रमर भास्कर भैरव — ऐसे आपको भैरवों का उल्लेख प्राप्त होता है।
बिना भैरव के 52 वीरों का संतुलन नहीं
52 वीरों का भैरव पूजन से क्या संबंध है?
जो 52 वीर हैं, जिनके विषय में हम सभी जानते हैं — वे प्रमुख रूप से जिस क्षेत्र में पूजित होते हैं, वहाँ भी बिना भैरव जी के पूजन के उन वीरों की पूजा या उनकी सही प्रकार से स्थिति नहीं हो सकती — उनका संतुलन नहीं हो सकता।
जो 52 वीर हैं, जिनके विषय में हम सभी जानते हैं, वक्ता कहते हैं: वे 52 वीर प्रमुख रूप से जिस क्षेत्र में पूजित होते हैं, वहाँ भी बिना भैरव जी के पूजन के उन वीरों की पूजा नहीं हो सकती, या उन वीरों की सही प्रकार से स्थिति नहीं हो सकती। उनका संतुलन नहीं हो सकता।
दसभुजी महादुर्गा के पूजन में सृष्टि, स्थिति, संहार, रक्त, यम, मृत्यु, भद्र आदि वीर भैरव
दस वीर भैरव कौन हैं, और उनका पूजन कहाँ होता है?
प्रमुख जो दस वीर भैरव आते हैं, उनका पूजन दसभुजी महादुर्गा — जो महिषासुर मर्दिनी हैं — के पूजन में होता है, जिनका विशिष्ट पूजन बंगाल इत्यादि के क्षेत्र में शारदीय नवरात्रि में होता है; वहाँ जो लोग तंत्रोक्त अनुष्ठान करते हैं, वे विशेष करके इन दस भैरवों का पूजन करते हैं। इनमें सृष्टि वीर भैरव, स्थिति वीर भैरव, संहार वीर भैरव, रक्त वीर भैरव, यम वीर भैरव, मृत्यु वीर भैरव, भद्र वीर भैरव नाम लिए गए हैं; अधिकांश श्मशान इत्यादि के क्षेत्र में वीर के लिए पूजित किए जाते हैं। इनका स्वतंत्र पूजन बहुत कम लोग करते हैं — या तो आवरण में दस भुजा में पूजन कर देते हैं, या किसी को जगाना, सिद्ध करना हो तब प्रयोग करते हैं।
प्रमुख जो दस वीर भैरव आते हैं, वक्ता कहते हैं — वीर भैरव ऐसे पूजन के लिए, जब दसभुजी महादुर्गा का पूजन होता है। दसभुजी दुर्गा जो महिषासुरमर्दिनी हैं — बंगाल इत्यादि के क्षेत्र में शारदीय नवरात्रि में जब उनका विशिष्ट पूजन होता है, वहाँ जो लोग तंत्रोक्त अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। इत्यादि करते हैं, तंत्र के विविध प्रकार से अनुष्ठान करते हैं, उनमें इन दस भैरवों का विशेष करके पूजन होता है। उनमें जो दस भैरव पूजित होते हैं, उनमें सृष्टि वीर भैरव, स्थिति वीर भैरव, संहार वीर भैरव, रक्त वीर भैरव, यम वीर भैरव, मृत्यु वीर भैरव, भद्र वीर भैरव — इन सभी भैरवों की पूजा होती है। और इनमें से अधिकांश भैरव विशेष करके श्मशान इत्यादि के क्षेत्र में ही वीर इत्यादि के लिए पूजित किए जाते हैं। इनका स्वतंत्र रूप से पूजन बहुत कम ही लोग करते हैं। स्वतंत्र रूप से न करके, या तो जो आवरण इत्यादि होगा उसमें दस भुजा में उनका पूजन कर देंगे; और अगर किसी को जगाना हो, सिद्ध करना हो, तब उस समय भी ये लोग इनका प्रयोग करते हैं।
स्कंद बटुक, चित्र बटुक और विरंचि बटुक
स्वयं बटुक भैरव के कितने स्वरूप हैं?
हम लोग केवल बटुक भैरव के विषय में जानते हैं कि भगवान बटुक भैरव हैं; लेकिन, वे कहते हैं, आपको शायद ही यह जानकारी होगी कि भगवान बटुक भैरव का स्वरूप भी तीन रूप में है। तीन बटुक भैरव हैं, और इसी तंत्र के विविध प्रकार में इन तीन भैरवों का उल्लेख मिलता है: स्कंद बटुक, चित्र बटुक और विरंचि बटुक।
अब हम लोग केवल बटुक भैरव के विषय में जानते हैं, वक्ता कहते हैं — कि भगवान बटुक भैरव हैं। लेकिन आप सभी को शायद ही यह जानकारी होगी कि भगवान बटुक भैरव का स्वरूप भी तीन रूप में है। तीन बटुक भैरव हैं। और इसी तंत्र के विविध प्रकार में इन तीन भैरवों का उल्लेख मिलता है, जिसमें स्कंद बटुक हैं, चित्र बटुक हैं और विरंचि बटुक हैं। इसी तरीके से भगवान बटुक भैरव भी इन तीन स्वरूपों में धारण होते हैं।
देवी महालसा, मल्ल-मणि, और शंकर के दो रूप
देवी महालसा, मल्ल और मणि के साथ मार्तंड भैरव की कथा महाकाली टीवी सीरियल में पूरी दिखाई गई थी
दक्षिण की ओर, वे कहते हैं, हम भगवान मार्तंड भैरव इत्यादि की कथा सुनते हैं, देवी महालसा की, मल्ल और मणि की कथा — जो महाकाली टीवी सीरियल में दिखाई गई थी, जिसमें मार्तंड भैरव और भगवती का पूरा वर्णन था। उसमें भगवान शंकर ने जो रूप धारण किए, दो रूप धारण करने का बताया गया है; और मार्तंड भैरव के सिवाय तंत्र प्रपंचसार, तंत्र चिंतामणि इत्यादि में भी विभिन्न स्वरूप माने गए हैं, जिनमें बटुक भैरव का भी एक स्थान माना गया है।
अब दक्षिण की ओर, वक्ता कहते हैं, हम भगवान मार्तंड भैरव इत्यादि की कथा सुनते हैं; देवी महालसा की, मल्ल और मणि की कथा सुनते होंगे। मल्ल-मणि की कथा — यह महाकाली टीवी सीरियल में आती थी, उसमें मल्ल-मणि की कहानी दिखाई जाती थी, जिसमें मार्तंड भैरव और भगवती का पूरा वर्णन था, पूरा उसमें दिखाया गया था। अब उसमें भगवान शंकर ने जो रूप धारण किए, उनमें भी दो रूप धारण करने का बताया गया है। एक तो मार्तंड भैरव के नाम से हम सभी जानते हैं। इसके सिवाय जो तंत्र प्रपंचसार इत्यादि हैं, तंत्र चिंतामणि इत्यादि हैं — उनमें भी विभिन्न प्रकार के स्वरूप माने गए हैं, जिनमें बटुक भैरव का भी एक स्थान माना गया है।
64 योगिनियों के साथ चलने वाले 64 भैरव
रुद्रयामल के अनुसार भैरव कितने हैं?
सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ रुद्रयामल के अनुसार, वे कहते हैं, हम लोग ऐसे तो 52 भैरव सुनते हैं, 51 भैरव सुनते हैं, लेकिन उसके अनुसार 64 योगिनियों के साथ 64 भैरव चलते हैं। जिनका हम 64 योगिनियों के रूप में पूजन करते हैं — जया, विजया, अजिता, अपराजिता, जयंती — उन सभी योगिनियों के भैरव होते हैं।
और सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ जो है रुद्रयामल तंत्र — उसके अनुसार, वक्ता कहते हैं, हम लोग ऐसे तो 52 भैरव सुनते हैं, 51 भैरव सुनते हैं; लेकिन उसके अनुसार 64 योगिनी के साथ 64 भैरव चलते हैं। जो हम लोग जया, विजया, अजिता, अपराजिता, जयंती — इन सभी का 64 योगिनियों के रूप में पूजन करते हैं, उन सभी योगिनियों के भैरव होते हैं।
आवरण पूजन में जो नहीं बताया जाता, और क्यों बताना चाहिए
64 योगिनियों के साथ 64 भैरवों का पूजन शायद ही कोई बताता है, जबकि एक समय के बाद उसका आदेश कर देना चाहिए
आपको आश्चर्य होगा, वे कहते हैं, कि कोई भी व्यक्ति सामने से यह नहीं बताता — यही सब विषय हैं जो लोग नहीं बताते — कि 64 योगिनियों के साथ आवरण पूजन में 64 भैरवों का भी पूजन करना है, जबकि एक समय के पश्चात इसके लिए आदेश कर देना चाहिए।
और आपको जानकर आश्चर्य होगा, वक्ता कहते हैं, कि कोई भी व्यक्ति सामने से यह नहीं बताता। यही सब विषय हैं जो लोग नहीं बताते: कि 64 योगिनियों के साथ आवरण पूजन में 64 भैरवों का भी पूजन करना है। जबकि एक समय के पश्चात इसके लिए आदेश कर देना चाहिए। ज़बरदस्ती से ये सब चीज़ें नहीं होतीं, यह वे भी मानते हैं। ऐसा नहीं है कि पहली बार में आप अपने गुरु जी के पास जाइएगा और वे दे देंगे। लेकिन जब आप गुरु जी के सान्निध्य में रहकर साधनाओं को पूर्णता की ओर ले जाते हैं — सुनने को मिलता है कि हम 15 साल तक साधना किए, और जब उनसे पूछा जाता है कि भैया ऐसी-ऐसी चीज़ है, ऐसे करना चाहिए, तो बोलते हैं कि कभी बताया ही नहीं गया। तो देखिए, वे कहते हैं, ये सब चीज़ें इसलिए नहीं हैं कि केवल आपकी जानकारी में वृद्धि हो। आपका समर्पण बढ़ जाएगा।
यंत्र के भीतर का विज्ञान, और वह क्यों कीमती है
दुर्गा सप्तशती के यंत्र के भीतर क्या है, जो लोग देख नहीं पाते?
आपको कोई छोटा सा यंत्र, चलिए दुर्गा सप्तशती का यंत्र दे दिया गया — क्या पता है आपको कि उसमें क्या है? लोग बोलेंगे हाँ ठीक है, फूल-पत्ती बनी हुई है, दुर्गा जी की पूजा होती है, कुछ नहीं होता, अक्षत-पुष्प-गंध। लेकिन जब आप उसके पूरे विज्ञान को भीतर से समझेंगे तब पता चलेगा कि वह आपके लिए कितना कीमती है — और तब पता चलेगा कि उसमें अष्टमातृकाओं के साथ आठ भैरव और 64 योगिनियों के साथ 64 भैरवों का पूजन होता है।
मान लीजिए आपको कोई छोटा सा यंत्र दे दिया गया, वक्ता कहते हैं — चलिए दुर्गा सप्तशती का यंत्र। क्या पता है आपको कि उसमें क्या है? वे बोलेंगे हाँ ठीक है, फूल-पत्ती बनी हुई है, दुर्गा जी की पूजा होती है। कुछ नहीं होता। अक्षत, पुष्प, गंध। जब आप उसके पूरे विज्ञान को भीतर से समझेंगे, तब पता चलेगा कि वह आपके लिए कितना प्रीशियस है, कितना कीमती है। तब आपको पता चलेगा कि इसमें जो अष्टमातृकाएँ हैं उनके साथ आठ भैरव, और 64 योगिनियों के साथ 64 भैरवों का पूजन होता है।
64 भैरवों में एक का नाम ही ब्रह्म राक्षस है
महादुर्गा के पूजन से ब्रह्म राक्षस का दोष क्यों शांत होता है?
कहा जाता है कि बड़ी दुर्गा यानी महादुर्गा का पूजन 64 योगिनियों के पूजन के बिना होगा ही नहीं; और कहा जाता है कि माँ भगवती महादुर्गा का पूजन किया जाए तो ब्रह्म राक्षस इत्यादि का दोष तुरंत शांत होता है। उसके पीछे कारण, वे कहते हैं, यह है कि 64 योगिनियों के पूजन में जो 64 भैरव होते हैं, उनमें एक भैरव का नाम ही ब्रह्म राक्षस है — भगवान भैरव को ब्रह्म राक्षस के रूप में भी माना गया है, और 64 भैरवों में एक यह भी आते हैं।
क्यों कहा जाता है, वक्ता पूछते हैं, कि बड़ी दुर्गा यानी महादुर्गा का पूजन किया जाए तो 64 योगिनियों के पूजन के बिना उनका पूजन होगा ही नहीं? क्यों कहा जाता है कि माँ भगवती महादुर्गा का पूजन किया जाए तो ब्रह्मराक्षस इत्यादि का दोष तुरंत शांत होता है? उसके पीछे कारण है। विभिन्न प्रकार की विधियों में जब 64 योगिनियों का पूजन होता है, तो उसमें जो 64 भैरव होते हैं, उनमें एक भैरव का नाम ही है ब्रह्म राक्षस। भगवान भैरव को ब्रह्म राक्षस के रूप में भी माना गया है। 64 भैरवों में से एक भैरव ये भी आते हैं।
भक्षण का अर्थ दुष्टों का नाश है, मनुष्यों को खाना नहीं
प्रेत भक्षणी और नर भोजिका नामों का क्या अर्थ है?
प्रमुख 64 योगिनियों में एक का नाम प्रेत भक्षणी है और एक का नर भोजिका। नाम सुनकर ही लोग भागने लगेंगे कि अरे बाप रे, कितना खतरनाक नाम है। लेकिन इसका अर्थ कहीं भी यह नहीं है, वे कहते हैं, कि नर भोजिका अब नरों का भोजन कर रही है। जो दुष्ट हैं, उनका भक्षण तो भगवती करती ही हैं — लेकिन भक्षण का अर्थ यह नहीं कि उठाकर खा जाएँगी। ये सभी स्वरूप हैं; इनसे घबराना या भागना नहीं है।
अब प्रमुख 64 योगिनियों में, वक्ता कहते हैं, एक का नाम है प्रेत भक्षणी भगवती योगिनी, और एक का नाम है नर भोजिका। नर भोजिका, प्रेत भक्षणी — इनके विषय में तो लोग नाम सुनकर ही भागने लगेंगे कि अरे बाप रे बाप, यह कितना खतरनाक नाम है। लेकिन इसका अर्थ कहीं भी यह नहीं है कि नर भोजिका अब नरों का भोजन कर रही हैं। अरे भाई, जो दुष्ट हैं, उनके भक्षण के लिए तो भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। भक्षण करती ही हैं। भक्षण का अर्थ थोड़ी है कि उठाकर खा जाएँगी। भक्षण का अर्थ यह है कि विभिन्न प्रकार के रोग शरीर में उत्पन्न करके महामारी के स्वरूप में — जैसा हम श्री दुर्गा सप्तशती के तेरहवें, बारहवें अध्याय में, ग्यारहवें अध्याय इत्यादि के मंत्र में पढ़ते हैं कि जब भगवती कुपित होती हैं तो महामारी का रूप धारण कर लेती हैं और कुपित होने के पश्चात अनेक-अनेक लोगों का विनाश कर देती हैं। या जो मंत्र हम पढ़ते हैं — ट्रांसक्रिप्ट में यह "या श्री स्वयं सुकृति नाम भविष्य ना लक्ष्मी" के रूप में आया है। उसी प्रकार ये सभी स्वरूप हैं; इनसे घबराना नहीं है, इनसे भागना नहीं है, इस प्रकार डरकर कि अरे ऐसा हो जाएगा। हम उस चीज़ को जानते नहीं हैं, वे कहते हैं।
यंत्र कौन बनाता है, यह पूछना
यंत्र बनवाने से पहले यह पूछना चाहिए कि कौन बनाएगा और कैसे, क्योंकि जिन कारीगरों को यह काम सौंपा जाता है उनसे फर्क पड़ता है
यंत्र को लेकर इतनी दुविधा फैली है कि क्या बोला जाए, वे कहते हैं। कुछ दिन पहले किसी ने चाँदी के यंत्र का पोस्ट डाला कि ऐसा यंत्र बनवाना हो तो बताइएगा। एक महाराज जी ने पता किया कि भाई, आप यंत्र कैसे बनाएँगे, क्या पैसा लगेगा — क्योंकि यंत्र को लेकर वे बहुत सचेत रहते हैं कि साधक के पास सही तरीके का हो। चर्चा में पता चला कि यंत्र बाहर के ऐसे कारीगर बना रहे थे जिन्हें बेचने वाला जानता तक नहीं था; कहा गया कि अपने पास वैसे कारीगर बचे ही नहीं जो पत्ता बनाने और तार मोड़ने का महीन काम करें, और कोई सीखना ही नहीं चाहता।
यंत्र को लेकर तो इतनी दुविधा फैली हुई है कि क्या बोला जाए, वक्ता कहते हैं। अभी कुछ दिन पहले किसी का कोई पोस्ट था, जिसमें वे चाँदी के यंत्र को डाले थे कि ऐसा यंत्र किसी को बनवाना है तो बताइएगा। तो एक महाराज जी ने कहा कि पता करते हैं, और उन्होंने पता किया — भाई, आप यंत्र कैसे बनाएँगे? यंत्र को लेकर वे बहुत सचेत रहते हैं कि जो साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। हैं, उनके पास वह सही तरीके का हो। तो उनसे पूछा गया कि क्या पैसा लगेगा, कैसे बनाइएगा। जब चर्चा चली तो उन्होंने बताया कि यंत्र जो बनाएँगे, वे बाहर के कारीगर हैं जिन्हें बेचने वाला स्वयं नहीं जानता — बहुत अच्छे कारीगर हैं, यह स्पष्ट बताया। पूछा गया कि किसी जान-पहचान वाले से क्यों नहीं बनवाते, तो बोले कि वैसे कारीगर ही नहीं हैं। अपने पास वैसे कारीगर बचे ही नहीं जो वैसा करें — यंत्र में बड़ा छोटा और महीन काम रहता है, पत्ता बनाना, तारों को मोड़-मोड़कर — यह काम तो वही लोग करेंगे। कोई सीखना ही नहीं चाहता। यही कारण है, वे कहते हैं, कि वे बार-बार हल्ला करते हैं कि भाई, या तो कहीं से कुछ मत लीजिए।
बिना श्री विद्या दीक्षा के श्री यंत्र की मार्केटिंग
क्या बिना श्री विद्या दीक्षा के घर में श्री यंत्र रखना चाहिए?
वे कहते हैं कि श्री यंत्र अब घर-घर में मिल जाएगा — इतनी गूढ़ चीज़, जिसका यंत्रार्चन इत्यादि बिना श्री विद्या दीक्षा के बड़ा क्लिष्ट होता है। लेकिन कितने घर मिल जाएँगे जिनमें श्री यंत्र रखा हो? श्री यंत्र की सबसे ज़्यादा मार्केटिंग हुई है। पूछ दीजिए कि श्री यंत्र में मध्य में किस-किसकी पूजा होगी — पता नहीं। श्री यंत्र कितने प्रकार के होते हैं — पता नहीं। बस इतना पता है कि लक्ष्मी जी का यंत्र है।
यही कारण है कि हम बार-बार हल्ला करते हैं, वक्ता कहते हैं: भाई, या तो मत लीजिए, कहीं से कुछ लेना नहीं। अब श्री यंत्र घर-घर में आपको मिल जाएगा। सोचिए — श्री यंत्र इतनी गूढ़ चीज़ है, और बिना श्री विद्या दीक्षा के उसका यंत्रार्चन इत्यादि बड़ा क्लिष्ट होता है। लेकिन आपको ऐसे कितने घर मिल जाएँगे जिनमें श्री यंत्र रखा हो? श्री यंत्र की सबसे ज़्यादा मार्केटिंग हुई है; सब जगह श्री यंत्र। पूछ दीजिए कि श्री यंत्र में मध्य में किस-किसकी पूजा होगी — पता नहीं। श्री यंत्र कितने प्रकार के होते हैं — पता नहीं। यह पता है कि लक्ष्मी जी का यंत्र है, बस इतना ही पता है। हाँ, इसमें लक्ष्मी जी का मंत्र लिखा हुआ है, यह मंत्र लिखा हुआ है — बस इतना ही पता है कि इससे लक्ष्मी आती है, इसलिए हम पूज रहे हैं।
बनाने वाले का समय, उसका मंत्र, और आवरण का क्रम
यंत्र किसे बनाना चाहिए, और किन शर्तों पर?
यंत्र का पूरा विज्ञान है, वे कहते हैं, और वह बनाने वाले व्यक्ति के मुख्य समय पर निर्भर होता है। अभी पुष्य नक्षत्र गया — पुष्य नक्षत्र में कितने यंत्र बने होंगे? कौन बनाएगा? जो विधियुक्त बनाते हैं। लेकिन बनाने वाला व्यक्ति कैसा हो? जब यंत्र बनाए तो भगवती के नाम स्मरण इत्यादि करते हुए, या गुरु-प्रदत्त मंत्र का जप करते हुए, और जिस प्रकार आवरण बनता है उस क्रम के अनुसार बनाना शुरू करे। जो अनजान कारीगर से बनवाकर घर में पूज रहे हैं — वह क्या खाकर, क्या पीकर आया, यह भी पता नहीं — उससे बड़ा दोष लगता है।
भैया, यंत्र का पूरा विज्ञान है, वक्ता कहते हैं। और बनाने वाले व्यक्ति के जो मुख्य समय होते हैं, उसी के ऊपर निर्भर होता है। अभी पुष्य नक्षत्र गया — पुष्य नक्षत्र में कितने यंत्र बने होंगे? कौन बनाएगा? जो विधियुक्त बनाते हैं। लेकिन बनाने वाला व्यक्ति कैसा हो? जब यंत्र बनाए तो भगवती के नाम स्मरण इत्यादि करते हुए, या गुरु-प्रदत्त मंत्र है उसका जप करते हुए, और जिस प्रकार आवरण बनता है, आवरण के अनुसार, क्रम के अनुसार बनाना शुरू करे। तो वह जाकर फलीभूत होगा, जिसको मिलेगा। अभी के समय में आप ऑर्डर दे देते हैं, बनाने वाला क्या खाकर आया, क्या पीकर आया — बनाकर दे दिया और आप घर में रखकर पूज रहे हैं। लाभ-हानि तो अलग बात है, व्यवस्था ही गड़बड़ हो गई। सुनार को, या जिनसे भी आप बनवा रहे हैं, उन्हें पैसा कमाना है — वे किससे बनवा रहे हैं, क्या बनवा रहे हैं, कब बनवा रहे हैं, आप वह देख नहीं रहे हैं। इसलिए यह बड़ा दोष लगता है। और लोग इसी बेसिक चीज़ को छोड़ देते हैं कि इससे कोई मतलब नहीं, कम पैसे में हो जाए, मामला सेटल हो जाए।
आवरण से पहले छह महीने से साल भर का अर्चन
आवरण विधि सीखने से पहले कितने समय तक अर्चन करना चाहिए?
आरंभिक पूजन, वे कहते हैं, कम से कम सवा महीने का होता है; कुछ लोगों का तो साल-साल भर तक। पहले सूक्त इत्यादि कंठस्थ हों, नहीं तो शतनाम इत्यादि के द्वारा अर्चन छह-छह महीने, साल-साल भर तक पहले करना चाहिए। तब जाकर उसकी आवरण विधि भी सीख लेनी चाहिए।
उसके बावजूद भी, वक्ता कहते हैं, अंदर की बातें रहती हैं — कि कैसे क्या पूजन होना है, किस-किस प्रकार से होना चाहिए। और होना चाहिए, उसको लेकर भी ज़िद है कि अभी बता दीजिए। तो अभी आपको कैसे समझ में आएगा? आरंभिक जो पूजन होता है, कम से कम सवा महीने का; कुछ लोगों का तो साल-साल भर तक। पहले सूक्त इत्यादि कंठस्थ हों, अगर नहीं तो शतनाम इत्यादि के द्वारा अर्चन इतना पहले करना चाहिए — छह-छह महीना, साल-साल भर तक। तब जाकर उसकी आवरण पूजा विधि भी सीख लेनी चाहिए।
आधे घंटे से सवा घंटे के अर्चन का बना हुआ नियम
आवरण पूजन तभी सीखें जब अर्चन का नित्य नियम बन जाए, और उसे धीरे-धीरे कई बार में सीखें; बीज मंत्र उसके बाद
जब आपको कंठस्थ हो जाए और एक नियम बन जाए — कि हम लगभग आधा घंटा, सवा घंटा बैठकर बढ़िया से अर्चन कर ले रहे हैं, सहस्र अर्चन, शत अर्चन कर ले रहे हैं, नियम में आ गया है, अपने देवी-देवता का कर ले रहे हैं — तब बैठकर आवरण पूजन सीखिए। एक बार में नहीं सीख पाइएगा; दस बार में, धीरे-धीरे सीखिए।
जब आपको कंठस्थ हो जाए, वक्ता कहते हैं, और आपका एक नियम बन जाए — कि हम लगभग आधा घंटा, सवा घंटा बैठकर बढ़िया से अर्चन कर ले रहे हैं। सहस्र अर्चन कर ले रहे हैं, शतार्चनशतार्चन — यंत्र पर पाठ दर पाठ अर्पित किया जाने वाला सौ बार का अर्चन। कर ले रहे हैं; नियम में आ गया है; अपने देवी-देवता का कर ले रहे हैं। तब आप बैठकर आवरण पूजन सीखिए। एक बार में नहीं सीख पाइएगा; दस बार में सीखिएगा, धीरे-धीरे करके सीखिए। जब आवरण सीख जाएँ और आगे साधना में बढ़ रहे हैं, बुद्धि शांत हो रही है, तब उसमें बीज मंत्रों का प्रयोग भी सीख लीजिए — अपने मार्गदर्शक से, गुरु से।
मुद्राएँ, फिर आवरण विस्तार और पीठ पूजन
बीज मंत्रों के बाद मुद्राएँ, फिर आवरण विस्तार और पीठ पूजन सीखा जाता है
जब वह सीख लेते हैं, तब मुद्राओं के साथ सीख लीजिए — एक-एक आवरण में कब कौन सी मुद्रा दिखानी है, कितने मंत्रों के बाद दिखानी है, सबकी अलग-अलग किस प्रकार से है, कहाँ ध्यान कैसे करना है। इन तीन-चार चीज़ों के बाद आवरण विस्तार सीख लीजिए — कि अभी हम नवम आवरण तक हैं, दशम और एकादश कैसे करेंगे, द्वादश-त्रयोदश कैसे करेंगे। वह सीख लीजिए, पीठ पूजन सीख लीजिए।
जब वह सीख लेते हैं, वक्ता कहते हैं, तब मुद्रापूजा या प्रतिमा-विज्ञान में प्रयुक्त एक प्रतीकात्मक हस्त-मुद्रा — जैसे वरद (वरदान देने वाली) या अभय (निर्भयता प्रदान करने वाली) — प्रत्येक का अपना विशिष्ट अर्थ होता है। के साथ सीख लीजिए: एक-एक आवरण में कब कौन सी मुद्रा दिखानी है, कितने-कितने मंत्रों के बाद दिखानी है, सबकी अलग-अलग किस-किस प्रकार से है, कहाँ ध्यान कैसे क्या करना है। वह सीख लीजिए। जब वह सीख जाते हैं, इन तीन-चार चीज़ों के बाद, तब आवरण विस्तार सीख लीजिए — कि हाँ, अभी हम नवम आवरण तक हैं; दशम और एकादश कैसे करेंगे, द्वादश-त्रयोदश कैसे करेंगे। उसे सीख लीजिए; पीठ पूजन सीख लीजिए। एक यंत्र में इतनी सारी चीज़ें हैं, और इन सभी चीज़ों को सीखने के बाद आपको परम संतुष्टि मिल जाएगी। सोचिए — पहले सामान्य कर रहे थे, अभी आप विस्तृत रूप से कर रहे हैं।
घंटी-अगरबत्ती वाली विधि
केवल घंटी बजाकर अगरबत्ती दिखाने वाली विधि माँगना, कि उतने से सारा काम हो जाए, बेवकूफी कही गई है
लोग इतने बेवकूफ हैं, वे कहते हैं: अरे ये बड़ा पूजन कराते हैं, बड़ा बताते हैं, इनसे नहीं होगा। घंटी बजाकर अगरबत्ती दिखाने वाली विधि कोई बता दीजिए, उतने से मेरा सारा काम हो जाए। इतने में ही सबका जीवन बना हुआ है — इससे ज़्यादा का मत बताइए। पंडित जी, इतना लंबा मत बताइए। उतना नहीं होगा।
और लोग इतने बेवकूफ हैं, वक्ता कहते हैं: अरे ये बड़ा पूजन कराते हैं, बड़ा बताते हैं। इनसे नहीं होगा। घंटी बजाकर अगरबत्ती दिखाने वाली विधि कोई बता दीजिए, उतने से मेरा सारा काम हो जाए। और इतने में ही सबका जीवन बना हुआ है — इससे ज़्यादा का मत बताइए। पंडित जी, इतना लंबा मत बताइए। उतना नहीं होगा। कितने लोग, वे कहते हैं, फोन पर बात करते हैं, पैसे खर्च कर रहे हैं, बात कर रहे हैं — लेकिन बोलेंगे कि नहीं, बड़ी विधि मत बताइए। यह तो नहीं हो पाएगा।
उस स्थान की हर चीज़ उनके आसन के नीचे
क्षेत्रपाल पूजन के पीछे का विज्ञान क्या है?
मन में यह गलतफहमी भरने के खिलाफ कि क्षेत्रपाल के पूजन से अनिष्ट हो जाएगा, क्षेत्रपाल आपके घर प्रेत-पिशाच भेज देंगे, वे कहते हैं: इसके पीछे का विज्ञान समझिए, इधर भी परा विज्ञान क्या है। जब भी कहीं क्षेत्रपाल की स्थापना होती है — क्षेत्रपाल के रूप में, डेही के रूप में, ग्राम देवता के रूप में किसी शक्ति को बैठाया जाता है — तो जब वे उस क्षेत्र के अधिपति बनते हैं, उनके ही आसन के नीचे उस स्थान के जितने भी प्रेत-पिशाच होते हैं, वे सभी रहते हैं।
क्षेत्रपाल पूजन के लिए आप जान लीजिए, वक्ता कहते हैं: जितनी भी जगह में मन में गलतफहमियों का भरना, आपके दिमाग में कचड़ों का भरना — कि क्षेत्रपाल के पूजन से अनिष्ट हो जाएगा, क्षेत्रपाल आपके घर पर प्रेत-पिशाच भेज देंगे — इसके पीछे का विज्ञान क्या है, यह समझिए; इधर भी परा विज्ञान क्या है। जब भी कहीं क्षेत्रपाल की स्थापना होती है — क्षेत्रपाल के रूप में, डेही के रूप में, ग्राम देवता के रूप में किसी शक्ति को बैठाया जाता है — तो जब वे उस क्षेत्र के अधिपति बनते हैं, उनके ही आसन के नीचे उस स्थान के जितने भी प्रेत-पिशाच होते हैं, वे रहते हैं। वैसी विद्या होती है, वैसे मंत्र विधान इत्यादि होते हैं क्षेत्रपाल स्थापना के, ग्राम देवता की स्थापना के: कि जितने भी डाकिनी-शाकिनी, प्रेत-पिशाच, कोई भी मरा हो, जिसकी भी अपमृत्यु हुई हो, कोई आत्महत्या किया हो — वे सभी उनके आसन के नीचे रहते हैं।
वे आपके क्षेत्र की नकारात्मकता रोके हुए हैं, इसलिए श्रद्धा देनी है
क्षेत्रपाल पूजन को अनिवार्य क्यों बताया गया है?
यही कारण है, वे कहते हैं, कि क्षेत्रपाल का पूजन अनिवार्य बताया गया है। कहा जाता है कि अगर क्षेत्रपाल का पूजन नहीं दीजिएगा तो आपके घर में — लोग बोलते हैं न — क्षेत्रपाल भूत भेज देंगे, साँप भेज देंगे, बिच्छू भेज देंगे। यह ऐसे ही नहीं कहा जा रहा, क्योंकि वे क्षेत्रपाल हैं और आपके घर की नकारात्मक शक्तियों को वहाँ रोके हुए हैं।
और यही कारण है कि क्षेत्रपाल का पूजन अनिवार्य बताया गया है, वक्ता कहते हैं: भैया, क्षेत्रपाल का पूजन दीजिए। कहा जाता है कि अगर क्षेत्रपाल का पूजन नहीं दीजिएगा तो आपके घर में — वो बोलते हैं न — क्षेत्रपाल भूत भेज देंगे, साँप भेज देंगे, बिच्छू भेज देंगे। यह ऐसे ही नहीं कहा जा रहा है, क्योंकि वे क्षेत्रपाल हैं, आपके भी घर की नकारात्मक शक्तियों को वहाँ रोके हुए हैं। आपकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वहाँ जाएँ — भैरव जी के पास कमी नहीं है, वे तो संसार का भरण-पोषण कर रहे हैं। लेकिन आप जो कमा रहे हैं, तो आपके घर की जो नकारात्मक ऊर्जा उन्होंने वहाँ बैठा रखी है, उसके निमित्त आपको श्रद्धा प्रकट करने के लिए, वहाँ प्रदान देने के लिए, या वहाँ पूजन करने के लिए, या भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। लगाने के लिए कहा जाता है। यह प्रायोगिक बात है।
तेरा तुझको अर्पण — अन्न भी उन्होंने दिया और अर्पण की बुद्धि भी
जब भगवान ही सब कुछ हैं, तो उन्हें कुछ अर्पण क्यों करें?
वे कहते हैं कि रामपाल का कोई चेला झूठी बात लेकर आया है कि भगवान को कुछ क्यों दें, भगवान ही तो सब कुछ हैं। बिल्कुल हैं भगवान — तो सामर्थ्य है, तभी तो वे अन्न प्रकट भी कर रहे हैं और हमारे भीतर वह बुद्धि भी दे रहे हैं कि "तेरा तुझको अर्पण" हम कर सकें।
यहाँ रामपाल का चेला चला आया है, वक्ता कहते हैं, झूठी बात लेकर — उल्टी-सीधी बात बोलते हैं कि भगवान ऐसे हैं, वो क्यों नहीं। अरे भाई, भगवान ही सब कुछ हैं। बिल्कुल हैं भगवान। तो सामर्थ्य है, तभी तो वे अन्न प्रकट भी कर रहे हैं और हमारे भीतर वह बुद्धि भी दे रहे हैं कि "तेरा तुझको अर्पण" हम कर सकें। तो ये सब मन में मत लाइए, वे कहते हैं, कि भगवान जब इतने सामर्थ्यवान हैं तो उनको हम क्यों अन्न दें, क्यों जल दें। अरे भाई, वही दिए हैं। हमारे भीतर, हमारी गति, हमारी बुद्धि के लिए, हमारे समर्पण के लिए, हमारे भीतर वैसी भावनाओं का अत्यधिक विकास हो और अध्यात्म में हमारी गति हो पाए — इसलिए वे सारे विधि-विधान बताए गए हैं।
पूजन से अनिष्ट नहीं, पर गलत नीयत पर चेतावनी
क्या क्षेत्रपाल पूजन से स्वयं कोई अनिष्ट होता है?
इन बकवास बातों से निकलिए, वे कहते हैं — क्षेत्रपाल पूजन कीजिए, उनसे डरिए मत। क्षेत्रपाल पूजन करने से कोई अनिष्ट नहीं होता, बल्कि अनिष्टों का नाश होता है। हाँ, गलत विधि से करिएगा — और गलत विधि का अर्थ केवल विधि नहीं: अगर आप कोई उल्टा-सीधा काम करने के लिए, किसी को हानि पहुँचाने के लिए, किसी के कहने में आकर कोई मंत्र-वंत्र का प्रयोग करके कर रहे हैं, तो आपका भगवान मालिक है; वहाँ फिर कुछ नहीं कहा जा सकता।
इन बकवास बातों से निकलिए, वक्ता कहते हैं। क्षेत्रपाल पूजन कीजिए, उनसे डरिए मत। क्षेत्रपाल पूजन करने से कोई अनिष्ट नहीं होता, बल्कि अनिष्टों का नाश होता है। हाँ — गलत विधि से आप करिएगा। और गलत विधि का अर्थ केवल यह नहीं: गलत मतलब कि आप कोई उल्टा-सीधा काम करने के लिए कर रहे हैं, किसी को हानि पहुँचाने के लिए कर रहे हैं, किसी के कहने में आकर कोई मंत्र-वंत्र का प्रयोग करके कर रहे हैं — तो आपका भगवान मालिक है। वहाँ फिर कुछ नहीं कहा जा सकता।
जहाँ ब्रह्म बैठाया गया हो, वहाँ के नियम जानना
अगर ग्राम देवता के रूप में भैरव की जगह किसी मृत व्यक्ति या ब्रह्म की स्थापना हुई हो तो क्या करें?
नए समय में, वे कहते हैं, भैरव जी के सिवाय जिस प्रकार की शक्तियों की स्थापना की गई है — जहाँ क्षेत्रपाल, ग्राम देवता के रूप में भैरव बाबा की स्थापना न करके किसी मृत व्यक्ति को, ब्रह्म इत्यादि को स्थापित किया गया है — वहाँ का क्या नियम-कानून है, वह आपको जान लेना चाहिए, अगर वैसा स्थान दिया गया है तो। उनको क्या चढ़ता है, क्या नहीं चढ़ता — क्षेत्र के अनुसार जानकर तब देना चाहिए।
और नए समय में, वक्ता कहते हैं, भैरव जी के सिवाय जिस प्रकार की शक्तियों की स्थापना की गई है। जहाँ क्षेत्रपाल, ग्राम देवता के रूप में भैरव बाबा की स्थापना न करके किसी मृत हुए व्यक्ति को स्थापित किया गया है, ब्रह्मब्रह्म रूप में स्थापित कुल की शक्ति — कुलदेवी से भिन्न एक कुल देवता वर्ग। इत्यादि को स्थापित किया गया है — वहाँ का क्या नियम-कानून है, वह आपको जान लेना चाहिए, अगर वैसा स्थान दिया गया है तो। कि भाई, उनको क्या चढ़ता है, क्या नहीं चढ़ता — वह क्षेत्र के अनुसार जानकर तब आपको देना चाहिए। ये बाद के विषय हैं, कि क्षेत्र-क्षेत्र में अलग-अलग प्रकार के देवता हो गए हैं। उनका दायित्व वही होता है।
पद की गरिमा, चाहे उस पर कोई भी हो
प्रधानमंत्री के पद की तरह, क्षेत्रपाल का पद अपनी गरिमा बनाए रखता है — चाहे उस पर कोई भी बैठे और उसकी विधि कैसी भी हो
वे कहते हैं कि अभी प्रधानमंत्री मोदी जी हैं, उससे पहले जो भी थे — सब जब उस पद पर गए तो उस अनुसार अपने विधि-नियम में फेरबदल किए, लेकिन उनका सम्मान, वह पद सर्वश्रेष्ठ रहा, सर्वोच्च पद रहा। उस पद की गरिमा बनी रहती है। उसी प्रकार जिसको भी क्षेत्रपाल के पद पर बैठाया जाता है, वह अपना जो दायित्व है, उसका पालन करेगा — जो दायित्व दिया गया है, जो सामर्थ्य प्राप्त है, उसी अनुसार करेगा।
लेकिन लोग — और ऐसी कई बार स्थिति बन जाती है। अब एक बात बताइए, वक्ता कहते हैं: अभी प्रधानमंत्री मोदी जी हैं, उससे पहले आपके जो भी थे; सब जब उस पद पर गए तो उस अनुसार अपने विधि-नियम में फेरबदल किए। लेकिन उनका सम्मान, या वह पद सर्वश्रेष्ठ रहा, सर्वोच्च पद रहा। उस पद की गरिमा बनी रहती है। कोई गलत कार्य करना या जो भी — यह राजनीतिक विचार की बात नहीं हो रही, वे कहते हैं; पद की बात हो रही है। उसी प्रकार जिसको भी क्षेत्रपाल के पद पर बैठाया जाता है, वह अपना जो दायित्व है उसका पालन करेगा। जो उनको दायित्व दिया गया है, जो उनको सामर्थ्य प्राप्त है — उस अनुसार ही वे करेंगे।
दोष आपकी अपनी गलती से लगता है
ग्राम देवता का दोष क्यों लगता है?
तो ये जो उल्टे-सीधे विचार लोग बोलते हैं — क्षेत्रपाल पूजन करने से ऐसा हो जाएगा, गलत करेंगे तो आपके ऊपर आ जाएँगे, ग्राम देवता आने लगे, ग्राम देवताओं का दोष लग गया — यह आपकी गलती के कारण लगता है, सबसे पहली बात। और जो लोग तंत्र विचार में इनको चला देते हैं, वहाँ उनके साथ भी अनिष्ट होता है; लेकिन यह एक अलग तंत्र का विषय हो गया।
तो ये जो उल्टे-सीधे विचार लोग बोलते हैं, वक्ता कहते हैं — कि क्षेत्रपाल पूजन करने से ऐसा हो जाएगा, आप करेंगे गलत तो आपके ऊपर आ जाएँगे, ग्राम देवता आने लगे, ग्राम देवताओं का दोष लग गया — यह आपकी गलती के कारण लगता है। सबसे पहली बात। और जो लोग तंत्र विचार में इनको चला देते हैं — वहाँ उनके साथ भी अनिष्ट होता है। लेकिन यह एक अलग तंत्र का विषय हो गया।
होली, दीपावली का दीपक, और विवाह से पहले निमंत्रण
ग्राम देवता के प्रति सामान्य रूप से क्या करना चाहिए?
सामान्य पूजन में जाना चाहिए: होली के समय जाना चाहिए, दीपावली के समय दीपक वहाँ रखकर आना चाहिए, और घर में विवाह इत्यादि शुभ मांगलिक कार्य हो तो वहाँ निमंत्रण ज़रूर देना चाहिए। यहाँ लोग यह गलती कर देते हैं कि नहीं देंगे। नहीं देंगे तो क्या होगा? वहाँ दिक्कत हो जाती है, आगे बहुत परेशानी होती है; इसलिए यह गलती नहीं करनी चाहिए। भैरव जी का कोई भी स्वरूप हो, उनकी सेवा-पूजा कभी छोड़नी नहीं चाहिए।
लेकिन जो सामान्य पूजन है, वक्ता कहते हैं: होली के समय जाना चाहिए, दीपावली के समय दीपक वहाँ रखकर आना चाहिए, और घर में जब विवाह इत्यादि शुभ मांगलिक कार्य हो तो वहाँ निमंत्रण ज़रूर देना चाहिए। यहाँ आप लोग जो गलती कर देते हैं कि नहीं देंगे। क्या होगा, नहीं देंगे? वहाँ दिक्कत हो जाती है; फिर आगे बहुत परेशानी होती है। इसलिए यह गलती आपको नहीं करनी चाहिए। भैरव जी का कोई स्वरूप है। उनकी सेवा-पूजा कभी भी छोड़नी नहीं चाहिए। तो इस प्रकार इतनी सारी शक्तियाँ हैं।
त्रिपुर भैरव के भीतर बटुक भैरव
दस महाविद्याओं में त्रिपुर भैरवी के भैरव कौन हैं?
दस महाविद्याओं की बात करते हुए वे कहते हैं कि जानना चाहिए कि दस महाविद्याओं में जो भगवती त्रिपुर भैरवी हैं, उनके जो भैरव हैं — त्रिपुर भैरव जो स्वरूप कहा गया है — उनमें भी बटुक भैरव हैं। यानी महाविद्याओं में अगर हम बटुक भैरव का पूजन कर रहे हैं तो कहीं न कहीं उनके साथ भगवती त्रिपुर भैरवी भी पूजित होती हैं। इसलिए अपने घर में बटुक भैरव जी की पूजा ज़रूर करनी चाहिए।
अब हम लोग जब दस महाविद्या की बात करते हैं, वक्ता कहते हैं, तो आपको जानना चाहिए कि दस महाविद्याओं में भगवती त्रिपुर भैरवी हैं। तो त्रिपुर भैरवी के जो भैरव हैं — त्रिपुर भैरव जो स्वरूप कहा गया है — उनमें भी बटुक भैरव हैं। यानी कि महाविद्याओं में अगर हम बटुक भैरव का पूजन कर रहे हैं, तो कहीं न कहीं उनके साथ भगवती त्रिपुर भैरवी भी पूजित होती हैं। इसलिए अपने घर में बटुक भैरव जी की पूजा तो ज़रूर करनी चाहिए।
महाकाल, और महामृत्युंजय अमृतेश्वर महादेव
काली, अमृतेश्वरी और बगलामुखी के भैरव कौन हैं?
उसके सिवाय काली जी के विषय में हम जानते हैं कि महाकाल उनके भैरव हैं, और पुष्पांजलि इत्यादि देते समय "महाकाल भैरव सहित" इत्यादि मंत्रों का उच्चारण भी करते हैं। भगवती अमृतेश्वरी या भगवती बगलामुखी — जिन्हें भगवती सुमुखी भी कहा जाता है — उनके भैरव महामृत्युंजय अमृतेश्वर महादेव होते हैं, जिनके विषय में वे दशांश तर्पण, मार्जन और जप के लिए बता रहे थे।
उसके सिवाय काली जी के विषय में हम जानते हैं कि महाकाल उनके भैरव हैं, वक्ता कहते हैं। और हम लोग जब पुष्पांजलि इत्यादि देते हैं तो "महाकाल भैरव सहित" इत्यादि मंत्रों का उच्चारण भी करते हैं। भगवती अमृतेश्वरी या भगवती बगलामुखी — उनको भगवती सुमुखी भी कहा जाता है — उनके भैरव महामृत्युंजय अमृतेश्वर महादेव होते हैं, जिनके विषय में वे दशांश तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण।, मार्जन और जप के लिए भी बता रहे थे।
कुंजिका मंत्रों के भीतर त्रिखंडी और त्रिकुटी विद्या
सिद्ध कुंजिका सबके लिए क्यों नहीं है?
भगवती के अनेक मंत्र हैं, जिनमें सिद्ध कुंजिका के बहुत सारे प्रसिद्ध मंत्र हैं, जिन्हें अब वायरल कर दिया गया है — गुप्त कुछ रहा नहीं। उनमें त्रिखंडी विद्या, त्रिकुटी विद्या का प्रयोग होता है। इसीलिए कहा गया है कि भाई, सब कोई मत करिए — ये महाविद्याओं में आती हैं, परा विद्याओं में आती हैं। इसका प्रयोग करेंगे और विधि-निषेध का पालन नहीं करेंगे तो दिक्कत हो जाएगी — इसीलिए मना किया गया है।
भगवती के अनेक मंत्र हैं, वक्ता कहते हैं, जिनमें सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् के बहुत सारे प्रसिद्ध मंत्र हैं, जिन्हें अब वायरल कर दिया गया है। गुप्त तो कुछ रहा नहीं। उसमें त्रिखंडी विद्या, त्रिकुटी विद्या का प्रयोग होता है। तो ये जो त्रिकुटा इत्यादि का प्रयोग किया गया है — इसीलिए कहा गया है कि भाई, सब कोई मत करिए। ये महाविद्याओं में आती हैं, परा विद्याओं में आती हैं। इसका जब प्रयोग करेंगे और विधि-निषेध का पालन नहीं करेंगे तो दिक्कत हो जाएगी। इसीलिए मना किया गया है।
त्रिकुटा के साथ कामेश्वर भैरव
त्रिकुटा मंत्र के साथ किस भैरव का जप करना चाहिए?
त्रिकुटा भैरव — जब हम त्रिकुटा मंत्र का प्रयोग करते हैं तो कामेश्वर भैरव का जप करना चाहिए। जो लोग सिद्ध कुंजिका, जितनी बड़ी-बड़ी गुप्त कुंजिकाएँ हैं — डामर वाली कुंजिका, डामर कुंजिका स्तोत्र, कुब्जिका का कुंजिका स्तोत्र, त्रिपुरा कुंजिका — का पाठ करने लगते हैं कि हमको प्राप्त हो गया, करेंगे, तुरंत सिद्धि मिलेगी — उन्हें पता ही नहीं कि जहाँ भूकुट विद्याओं, त्रिकुटा विद्याओं का प्रयोग हुआ है, वहाँ उनके भैरवों का जप भी करना है।
त्रिकुटा भैरव — जब हम त्रिकुटा मंत्र का प्रयोग करते हैं, वक्ता कहते हैं, तो कामेश्वर भैरव का जप करना चाहिए। जो लोग सिद्ध कुंजिका, जितनी बड़ी-बड़ी गुप्त कुंजिकाएँ हैं — डामर वाली कुंजिका, डामर कुंजिका स्तोत्र, कुब्जिका का कुंजिका स्तोत्र इत्यादि — का पाठ करने लगते हैं, त्रिपुरा कुंजिका का पाठ करने लगते हैं कि अरे हमको तो प्राप्त हो गया, हम करेंगे, इससे तुरंत सिद्धि मिलेगी। उनको पता ही नहीं है कि जिस जगह भूकुट विद्याओं का प्रयोग किया गया है, त्रिकुटा विद्याओं का प्रयोग किया गया है, वहाँ उनके भैरवों का जप भी करना है।
गर्भस्थ मंत्र के बाद भी अलग दशांश जप
कुंजिका के मंत्र में भैरवों के मंत्र गर्भस्थ होने पर भी उनका अलग से दशांश जप करना पड़ता है
कुंजिका के मंत्र में भैरवों के मंत्र को गर्भस्थ किया गया है — भीतर समाहित। लेकिन पुनः-पुनः यह बात जान लीजिए, वे कहते हैं, कि उनके भैरवों का अलग से दशांश जप करना पड़ता है।
कुंजिका के मंत्र में भैरवों के मंत्र को गर्भस्थ किया गया है, वक्ता कहते हैं। लेकिन पुनः-पुनः यह बात जान लीजिए कि उनके भैरवों का अलग से दशांशसाधना के चरणों को जोड़ने वाला दशमांश (एक-दसवां) अनुपात नियम — कुल जप संख्या के दसवें भाग जितना हवन, हवन के दसवें भाग जितना तर्पण, और तर्पण के दसवें भाग जितना मार्जन किया जाता है। जप करना पड़ता है।
शारदा के भैरव के रूप में साक्षात शिव
भगवती शारदा के भैरव कौन हैं?
अब भगवती शारदा, माँ भगवती शारदा — उनके भैरव साक्षात शिव कहे गए हैं। यह आपको जानने को मिलेगा, वे कहते हैं, और आगे जब भगवती शारदा से संबंधित भैरव चर्चा अलग से करेंगे, तब उसमें भी यह विषय बताएँगे।
अब भगवती शारदाविद्या और वाणी की अधिष्ठात्री देवी।, माँ भगवती शारदा — उनके भैरव साक्षात शिव कहे गए हैं, वक्ता कहते हैं। यह आपको जानने को प्राप्त होगा। आगे भी जब भगवती शारदा से संबंधित भैरव चर्चा अलग से करेंगे, तब उसमें भी यह विषय बताएँगे।
जिसकी जयंती है, उसके नाम की ग्यारह-ग्यारह आहुति
पूजन के दिन किसी की जयंती पड़ जाए तो पूजन में क्या जोड़ना चाहिए?
हम जब कोई विशेष पूजन कर रहे होते हैं, नित्य पूजन कर रहे होते हैं, जयंती-पर्व इत्यादि में — विशेष रूप से इतना ही करना चाहिए कि जिनकी जयंती पड़ी है — जैसे अभी आप भगवती का कर रहे हैं, लेकिन बटुक भैरव और भगवती गंगा की जयंती पड़ी — तो उनके नाम की भी ग्यारह-ग्यारह आहुति साथ में दे देनी चाहिए।
हम जब कोई विशेष पूजन कर रहे होते हैं, नित्य पूजन कर रहे होते हैं, जयंती-पर्व इत्यादि में, वक्ता उत्तर देते हैं, तो विशेष रूप से इतना ही करना चाहिए। जिनकी जयंती पड़ी है — जैसे अभी आप भगवती का कर रहे हैं, लेकिन बटुक भैरव का और भगवती गंगा का पड़ा — तो उनके नाम की भी ग्यारह-ग्यारह आहुति साथ में दे देनी चाहिए।
बढ़ाते जाइए, और एक को पकड़कर लंबा चलिए
भैरव महामंत्र के 8000 जप के बाद संख्या बढ़ाते जाना चाहिए और उसी एक मंत्र को पकड़कर लंबा चलना चाहिए
भैरव महामंत्र के 8000 जप हो जाने पर पूछे जाने पर वे कहते हैं: और बढ़ाइए। 8000 जप से क्या होगा? नहीं लग रहे हैं तो बढ़ाते जाइए। एकदम इसी को करिए; एक ही को पकड़कर लंबा चलिए।
भैरव महामंत्र के 8000 जप हुए हैं, एक श्रोता बताते हैं। और बढ़ाइए, वक्ता उत्तर देते हैं। 8000 जप से क्या होगा? नहीं लग रहे हैं तो बढ़ाते जाइए। एकदम इसी को करिए। एक ही को पकड़कर लंबा चलिए।
23 तारीख को शक्तिपीठ, बाकी दिन घर
निर्धारित दिन शक्तिपीठ पर और बाकी दिन घर में साधना की जा सकती है
हाँ, बिल्कुल — 23 तारीख को शक्तिपीठ पर, और बाकी दिन घर में कर सकते हैं।
हाँ, बिल्कुल, वक्ता उत्तर देते हैं: 23 तारीख को शक्ति पीठ पर, और बाकी दिन घर में कर सकते हैं।
नमो भवाय, या जनेऊ धारण करने वालों के लिए रुद्र सूक्त
सरस्वती यंत्र पर किस मंत्र से अभिषेक किया जा सकता है?
हाँ, वे उत्तर देते हैं, सरस्वती यंत्र पर इस मंत्र से अभिषेक कर सकते हैं — "नमो भवाय सर्ववाय रुद्राय" — कोई दिक्कत नहीं है। जनेऊ धारण करते हैं तो रुद्र सूक्त से भी कर सकते हैं।
हाँ, वक्ता उत्तर देते हैं: सरस्वती यंत्र पर इस मंत्र से अभिषेक कर सकते हैं — ट्रांसक्रिप्ट में यह "नमो भवाय सर्ववाय रुद्राय" के रूप में आया है। कोई दिक्कत नहीं है। रुद्र सूक्त से भी कर सकते हैं, अगर जनेऊ धारण करते हैं तो।
नवग्रह कवच की अनुमति
क्या नवग्रह कवच का पाठ किया जा सकता है?
नवग्रह कवच बिल्कुल कर सकते हैं, वे उत्तर देते हैं।
नवग्रह कवच के विषय में पूछे जाने पर वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल कर सकते हैं।
शिव मंदिर में दिशा भेद नहीं
मंदिर में शिवलिंग की पूजा किस दिशा की ओर मुख करके करनी चाहिए?
मंदिर में शिवलिंग की पूजा किस दिशा की ओर मुख करके करनी चाहिए, इस पर वे कहते हैं कि उनका मुख तो हर दिशा में है। प्रश्नकर्ता कहते हैं कि उनका प्रश्न विशेषतः दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पूजा करने से है। मंदिर में, और वह भी भगवान शिव के मंदिर में, वे उत्तर देते हैं, दिशा भेद करने की आवश्यकता ही नहीं है।
मंदिर में शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। की पूजा किस दिशा की तरफ मुख करके करनी चाहिए, एक श्रोता पूछते हैं। उनका मुख तो हर दिशा में है, वक्ता उत्तर देते हैं। प्रश्नकर्ता कहते हैं कि उनका प्रश्न विशेषतः दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके पूजा करने से है। मंदिर में — और वह भी भगवान शिव के मंदिर में — दिशा भेद करने की आवश्यकता ही नहीं है, वे उत्तर देते हैं।
स्मरण के साथ स्नान के जल में गंगाजल
घर में गंगा स्नान का फल कैसे मिल सकता है?
घर में गंगा स्नान के फल के लिए — गंगा जी को पानी में मिलाकर, गंगा जी का स्मरण करते हुए स्नान कर लीजिए।
घर में गंगा स्नान के फल के विषय में वक्ता उत्तर देते हैं: गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। को पानी में मिलाकर, गंगा जी का स्मरण करते हुए स्नान कर लीजिए।
मूर्तियाँ बनाने की अनुमति
क्या देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाई जा सकती हैं?
बिल्कुल, देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बना सकते हैं, वे उत्तर देते हैं।
बिल्कुल, वक्ता उत्तर देते हैं: देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बना सकते हैं।
जहाँ भी हों, पानी में गंगाजल
जो भारत से बाहर रहते हैं, वे गंगा स्नान के लिए क्या करें?
जो लोग भारत में नहीं हैं, उन्हें गंगा स्नान के लिए अपने स्थान पर ही गंगा जी को पानी में मिलाकर स्नान करना चाहिए और गंगा जी का स्मरण करना चाहिए।
जो लोग भारत में नहीं हैं, वक्ता कहते हैं, उन्हें गंगा स्नान के लिए अपने स्थान पर ही गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। को पानी में मिलाकर स्नान करना चाहिए, और गंगा जी का स्मरण करना चाहिए।
गंगा जी का 108 नाम स्तोत्र
गंगा दशहरा पर गंगा जी के लिए क्या पाठ करना चाहिए?
गंगा जी के 108 नाम स्तोत्र, शतनाम इत्यादि का पाठ करना चाहिए।
गंगा जी के 108 नाम स्तोत्र, शतनाम इत्यादि का पाठ करना चाहिए, वक्ता कहते हैं।
हनुमान चालीसा से संपुट
हनुमान चालीसा की एक पंक्ति मंत्र के संपुट के रूप में दी गई
भरत प्रजापति जी को वे इस मंत्र का संपुट करने को कहते हैं: "सब सुख लहे ही तुम्हारी शरणा तुम रक्षा काहू को डरना"।
भरत प्रजापति जी को वक्ता इस मंत्र का संपुट करने को कहते हैं — ट्रांसक्रिप्ट में यह "सब सुख लहे ही तुम्हारी शरणा तुम रक्षा काहू को डरना" के रूप में आया है।
अनार रस और घी का सकारात्मक प्रभाव
क्या अनार के रस और घी से अभिषेक प्रभावी है?
बिल्कुल — अनार के रस, घी, इन सभी से अभिषेक का सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
बिल्कुल, वक्ता उत्तर देते हैं: अनार के रस, घी, इन सभी से अभिषेक का सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
आरंभिक क्रियाएँ, जिन्हें सामान्य मानना चाहिए
जप के समय स्पंदन और चींटियाँ चलने जैसी अनुभूति का क्या अर्थ है?
अनिल मौर्य जी को वे कहते हैं कि यह सामान्य चीज़ है: मंत्र जप जब करते हैं तो स्पंदन इत्यादि क्रियाएँ होती हैं। इसमें इतना परेशान नहीं होना चाहिए। आरंभिक चीज़ें — चींटियाँ चलना, स्पंदन होना — इसको सामान्य रखकर आगे बढ़ना चाहिए। यह आरंभिक है और सही है।
अनिल मौर्य जी, यह सामान्य चीज़ है, वक्ता उत्तर देते हैं: मंत्र जप जब करते हैं तो स्पंदन इत्यादि क्रियाएँ होती हैं। इसमें इतना परेशान नहीं होना चाहिए। आरंभिक चीज़ें — चींटियाँ चलना, स्पंदन होना — इसको सामान्य रखकर आगे बढ़ना चाहिए। यह तो आरंभिक है और सही है।
मिला देना, या विसर्जन कर देना
नवनाथ साधना में रखे गेहूँ का क्या करना चाहिए?
नवनाथ साधना में जो गेहूँ पात्र में रखे थे, उसे आप मिला सकते हैं, विसर्जन भी कर सकते हैं।
पुनः जाना, क्योंकि माँ मान जाएँगी
तारापीठ से अपमानित होकर लौटने के बाद क्या करना चाहिए?
अजय जी अपमानित होकर लौटे — गलती हुई। अब पुनः तारापीठ जाइए, वे कहते हैं। माँ हैं, मान जाएँगी।
अजय जी, अपमानित होकर लौटे — जो कि गलती हुई, वक्ता कहते हैं। अब पुनः तारापीठ जाइए। माँ हैं, मान जाएँगी।
एक बार स्थापित विग्रह को आगे नहीं सौंपना चाहिए
रिश्तेदार बड़े लड्डू गोपाल ला रहे हों तो उनके पुराने लड्डू गोपाल लेने चाहिए या नहीं?
एक श्रोता कहते हैं कि उनके रिश्तेदार अपने मंदिर के लड्डू गोपाल उन्हें दे रहे हैं क्योंकि वे बड़ी साइज़ के गोपाल ला रहे हैं, और पूछते हैं कि लेना चाहिए या नहीं। वक्ता इसे हाइपोथेटिकल प्रश्न कहते हैं जिसमें सबका अपना-अपना बुद्धि-विवेक और तर्क रहेगा — लेकिन कहते हैं कि यह ऐसा है जैसे किसी के घर में नया बच्चा जन्म लेने वाला हो तो पुराने बच्चे को किसी और को दे दो। उनके अनुसार यह उचित नहीं है: भगवान जी की स्थापना एक बार कर दी तो दूसरे के भरोसे क्यों देना?
हमारे रिश्तेदार अपने मंदिर के लड्डू गोपाल हमें दे रहे हैं क्योंकि वे बड़ी साइज़ के गोपाल ला रहे हैं — हमें लेना चाहिए या नहीं; हमारे मंदिर में शिवलिंग है और उनकी पूजा हो रही है, श्रोता पूछते हैं। यह प्रश्न ही उन्हें बड़ा हाइपोथेटिकल लगता है, वक्ता कहते हैं; इसमें क्या ही बोला जाए। इसमें सबका अपना-अपना बुद्धि-विवेक और तर्क-वितर्क रहेगा। मतलब, वे कहते हैं, किसी के घर में नया बच्चा जन्म लेने वाला हो तो पुराने बच्चे को किसी और को दे दो। और बड़ी साइज़ के ला रहे हैं। इसी से समझ में आता है कि मानसिकता क्या रही है। भगवान जी की स्थापना एक बार कर दी है तो दूसरे के भरोसे क्यों देना, जब इतना ही उन्हें प्रेम है, प्यार है — कि बड़ा साइज़ ला रहे हैं तो छोटा साइज़ किसी और को सेवा के लिए। उनके अनुसार तो यह उचित नहीं है। बाकी बहुत लोग बोलते हैं कि ठीक है, लेकर सेवा कीजिए; इसमें वे कुछ न बोलें तो ही बेहतर है।
जहाँ भी हों, गंगाजल से स्नान
कनाडा में, या जो जहाँ है वहीं, गंगाजल से स्नान करना गंगा स्नान के लिए पर्याप्त है
हाँ, कनाडा में आप गंगाजल से स्नान कीजिए, वे कहते हैं। जो जहाँ है, वहाँ भी कर सकते हैं।
हाँ, कनाडा में आप गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। से स्नान कीजिए, वक्ता उत्तर देते हैं। जो जहाँ है, वहाँ भी कर सकते हैं।
जो पास हैं और सक्षम हैं
जो गंगा जी के आसपास हैं और सामर्थ्य रखते हैं, उन्हें प्रयास करके स्वयं गंगा स्नान कर लेना चाहिए; दूर वालों को ज़रूरत से ज़्यादा खर्च नहीं करना
वे कहते हैं कि कुछ लोग ऐसी अवस्था में नहीं आ सकते; और ज़रूरत से ज़्यादा पैसा खर्च होगा, यह अलग विषय है। लेकिन अगर आप आसपास में हैं और आपके पास सामर्थ्य है, तो प्रयास करके सभी अपने पास के क्षेत्र में गंगा स्नान ज़रूर कर लीजिएगा।
देखिए, वह विशिष्ट है — अब ऐसी अवस्था में नहीं आ सकते, वक्ता कहते हैं। ज़रूरत से ज़्यादा पैसा खर्च होगा, यह अलग विषय है। लेकिन अगर आप आसपास में हैं और आपके पास सामर्थ्य है, तो प्रयास करके सभी अपने पास के क्षेत्र में गंगा स्नान ज़रूर कर लीजिएगा।
सामर्थ्य के अनुसार महाभैरव मंत्र
क्या महाभैरव मंत्र लिया जा सकता है?
महाभैरव मंत्र बिल्कुल कर सकते हैं, वे अनंत जी को कहते हैं — जितना आपका सामर्थ्य हो, जितना आप कर पाएँ।
महाभैरव मंत्र बिल्कुल कर सकते हैं, अनंत जी, वक्ता उत्तर देते हैं — जितना आपका सामर्थ्य हो, जितना आप कर पाएँ।
बड़े-बुज़ुर्गों से पूछे बिना नई परंपरा न शुरू करना
क्या माँ शीतला की पूजा नीम के पेड़ पर की जा सकती है?
माँ शीतला की पूजा नीम के पेड़ में हो सकती है या नहीं, इस पर वे कहते हैं कि नया-नया शुरू करने को तो वे नहीं बोलेंगे। अगर पहले से नहीं होता है तो घर के बड़े-बुज़ुर्गों से पूछकर करें।
माँ शीतला माता की पूजा नीम के पेड़ में कर सकते हैं क्या, एक श्रोता पूछते हैं। नया-नया तो हम शुरू करने को नहीं बोलेंगे, वक्ता उत्तर देते हैं। अगर पहले से नहीं होता है तो घर के बड़े-बुज़ुर्गों से पूछकर करें।
लगा हुआ सूतक
छठी से पहले नवजात शिशु को स्पर्श क्यों नहीं किया जाता?
सूतक लगा होता है, वे कहते हैं; इसलिए छठी होने से पहले बच्चे को स्पर्श की मनाही होती है।
चैनल पर दी गई विधि, और महाविद्या क्रम
प्रतिदिन सरस्वती पाठ कैसे करना चाहिए?
प्रतिदिन सरस्वती पाठ की विधि चैनल पर दी गई है, वे कहते हैं; महाविद्या क्रम से कर सकते हैं।
प्रतिदिन सरस्वती पाठ की विधि चैनल पर दी गई है, वक्ता उत्तर देते हैं। महाविद्या क्रम से कर सकते हैं।
खेत में छोड़ देना, प्राण न जाए इतना ध्यान रखना
घर के भीतर पकड़े गए जीव का क्या करना चाहिए?
हित हरी बंसी जी को वे कहते हैं कि कोई दिक्कत नहीं होगी: पकड़कर खेत में छोड़ दीजिए। बस इतना ध्यान रखिएगा कि प्राण न जाए।
हित हरी बंसी जी, नहीं, कोई दिक्कत नहीं होगी, वक्ता उत्तर देते हैं। पकड़कर खेत में छोड़ दीजिए। प्राण न जाए, इतना ध्यान रखिएगा।
लिखा हुआ केवल भगवान त्रिपुरारी मिटा सकते हैं
क्या पाँच उँगलियों से देखा गया भाग्य बदला जा सकता है?
पाँच उँगली से देखा गया भाग्य भी बदला जा सकता है या नहीं, इस पर वे कहते हैं कि भाग्य में जो लिखा हुआ है, वह केवल भगवान त्रिपुरारी ही मिटा सकते हैं। आप-हम नहीं मिटा सकते। लिखा हुआ जो है, वह सब केवल भगवान शिव ही मिटा सकते हैं।
पाँच उँगली से देखा गया भाग्य भी बदला जा सकता है क्या, एक श्रोता पूछते हैं। भाग्य तो जो लिखा हुआ है, वक्ता उत्तर देते हैं, वह केवल भगवान त्रिपुरारी ही मिटा सकते हैं। आप-हम तो नहीं मिटा सकते। लिखा हुआ जो है, वह सब केवल भगवान शिव ही मिटा सकते हैं।
जयंती पर महाभैरव मंत्र
बटुक भैरव जयंती पर महाभैरव मंत्र किया जा सकता है
हाँ, अनंत जी, जयंती को महाभैरव मंत्र कर सकते हैं।
जयंती को महाभैरव मंत्र कर सकते हैं, अनंत जी, वक्ता उत्तर देते हैं।
जल जो मुख में ही रहे, कंठ तक न जाए
निर्जला एकादशी में आचमन कैसे करना चाहिए?
ज्योतिष पीठ के वर्तमान शंकराचार्य महाराज द्वारा बताई बात दोहराते हुए वे कहते हैं कि निर्जला एकादशी में जब आचमन किया जाए तो आचमन का जल इतना कम हो कि वह केवल मुख में ही रहे, कंठ में न जाए। क्योंकि आचमन की मुख्य विधि में जल पीते हैं तो कंठ तक जाना चाहिए, तभी एक तरह से उसे आचमन मानते हैं; और जल पीते समय सुरसुर की आवाज़ नहीं होनी चाहिए।
निर्जला व्रत में आचमन की विधि — निर्जला एकादशी में जो वर्तमान शंकराचार्य महाराज हैं ज्योतिष पीठ के, उनके द्वारा बताया गया था; हम पुनः इसे बता दे रहे हैं, वक्ता कहते हैं। उन्होंने बताया था कि निर्जला एकादशी में जब आचमन किया जाए तो आचमन का जल इतना कम हो कि वह जल केवल मुख में ही रहे, कंठ में न जाए। क्योंकि आचमनपूजा से पूर्व आत्मशुद्धि हेतु जल का अनुष्ठानिक आचमन, प्रारंभिक शुद्धिकरण क्रियाओं में से एक। की जो मुख्य विधि है, उसमें जल जब पीते हैं तो कंठ तक जाना चाहिए, तभी एक तरीके से उसे आचमन मानते हैं। और जल पीने के समय आवाज़ नहीं होनी चाहिए, सुरसुर की आवाज़ नहीं होनी चाहिए। तो निर्जला एकादशी में आचमन तो करें, बिल्कुल — नाम मात्र के लिए, बूँद भर जल से आचमन हो, कि वह जल केवल होंठ में ही रह जाए, मुख में ही रह जाए, कंठ तक न जाए। यही उनके द्वारा बताया गया है।
भैरव को स्थान देना और भय छोड़ना
जिनके घर में बटुक भैरव का स्थान नहीं है, वे सभी उनकी स्थापना-पूजन करें और भगवान भैरव को स्थान दें
समापन में वे कहते हैं: आप लोग ज़रूर गंगा जी स्नान कीजिए; और जिन-जिनके घर में बटुक भैरव का स्थान नहीं है, अपने घर में बटुक भैरव जी की स्थापना-पूजन कीजिए। आप सभी भगवान भैरव को, कुल भैरव को स्थान दीजिए। उनसे भयभीत होना छोड़िए; लोगों के प्रपंच को छोड़िए।
आज के लिए इतना ही, वक्ता कहते हैं; पुनः आप सभी से शीघ्र ही बातचीत होगी। और आप लोग ज़रूर गंगा जी स्नान कीजिए। जिन-जिनके घर में बटुक भैरव का स्थान नहीं है, अपने घर में बटुक भैरव जी की स्थापना-पूजन कीजिए। आप सभी भगवान भैरव को, कुल भैरव को स्थान दीजिए। उनसे भयभीत होना छोड़िए। लोगों के प्रपंच को छोड़िए।
गया में मसानी के रूप में स्वयं नारायण
क्या भूत-प्रेत-पिशाच केवल भैरव के साथ रहते हैं?
इस आपत्ति पर कि भैरव के साथ भूत-प्रेत-पिशाच हैं, वे पूछते हैं कि कौन ऐसे देवता हैं जो भूत-प्रेत-पिशाच के साथ न रहते हों। आप भगवान नारायण को बोलते हैं — तो कभी गया चले जाइए। गया जाकर भगवान गदाधर को देखिए, जहाँ गया धाम को मुक्ति धाम कहा गया है; वहीं बगल में श्मशान है, और मसानी के रूप में वहाँ साक्षात नारायण विराजते हैं। दुनिया में हर जगह जहाँ भगवान शिव को देखते हैं, वहाँ भगवान नारायण स्वयं मसानी के रूप में उपस्थित हैं।
ऐसा है कि भूत-प्रेत-पिशाच, वक्ता कहते हैं — तो कौन ऐसे देवता हैं जो भूत-प्रेत-पिशाच के साथ न रहते हों, उनके साथ में? आप लोग भगवान नारायण को बोलते हैं, तो कभी गया चले जाइए। गया जाकर देखिए भगवान गदाधर, जहाँ गया धाम को मुक्ति धाम कहा गया है। वहीं बगल में ही श्मशान है। मसानी के रूप में वहाँ साक्षात नारायण विराजते हैं। दुनिया में हर जगह जहाँ भगवान शिव को देखते हैं, वहाँ भगवान नारायण स्वयं मसानी के रूप में उपस्थित हैं। तो आप कैसे बोल सकते हैं कि उनके साथ प्रेत-पिशाच नहीं होंगे? गया धाम जो मुक्ति का धाम है, वहाँ तो भगवान नारायण ही हैं, तो प्रेत-पिशाच उनके साथ भी विराजमान हैं। तो कैसे आप परम वैष्णव, परम भक्त होकर यह बोलते हैं कि नहीं, नहीं हैं? ये सब विषय अपने मन से हटाइए। अपने इष्ट-आराध्य को समझिए, अपने देवताओं-देवियों को समझिए।
अहितों का नाश और अरिष्टों का शमन
घर पर बटुक भैरव पूजन करने से क्या होता है?
बटुक भैरव जी की पूजन घर पर करने से किसी प्रकार की कोई अहित नहीं होती, बल्कि अहितों का नाश होता है, अरिष्टों का नाश होता है, अरिष्टों का शमन होता है। बहुत सारी ऐसी विपत्तियाँ होती हैं जो भगवान भैरव के स्मरण मात्र से खत्म हो जाती हैं; इसलिए बटुक भैरव की पूजन ज़रूर करनी चाहिए।
बटुक भैरव जी की पूजन घर पर करने से किसी प्रकार की कोई अहित नहीं होती, वक्ता कहते हैं, बल्कि अहितों का नाश होता है। अरिष्टों का नाश होता है, अरिष्टों का शमन होता है। बहुत सारी ऐसी विपत्तियाँ होती हैं जो भगवान भैरव के स्मरण मात्र से खत्म हो जाती हैं। इसलिए बटुक भैरव की पूजन ज़रूर करनी चाहिए।
जो आपको घर के देवताओं से अलग करते हैं
जो दुष्ट चित्त के लोग आपको आपके इष्ट और घर के देवताओं से अलग करते हैं, उनकी न सुनें और अपने शास्त्र स्वयं पढ़ें
इन पोंगा लोगों से बचिए, वे कहते हैं। ये दुर्बुद्धि, कुबुद्धि, दुष्ट चित्त के व्यक्ति जो आपको अपने इष्ट-आराध्य और अपने घर के मुख्य देवताओं से अलग करते हैं, उनकी बातों को मत सुनिए। अपने शास्त्रों को पढ़िए, अपने पुराणों को पढ़िए — समझ में आएगा कि कैसे उत्पत्ति हुई, क्या उनका महत्व है। आप-हम गलत बोल सकते हैं, लेकिन जो पुराण में लिखा है, जो शास्त्रों और तंत्र शास्त्र में उनके विषय में चर्चा है, वह गलत नहीं हो सकता।
इन पोंगा लोगों से बचिए, वक्ता कहते हैं। ये दुर्बुद्धि, कुबुद्धि, दुष्ट चित्त के व्यक्ति जो आपको अपने इष्ट-आराध्य और अपने घर के मुख्य देवताओं से अलग करते हैं — उनकी बातों को मत सुनिए। अपने शास्त्रों को पढ़िए, अपने पुराणों को पढ़िए। समझ में आएगा कि कैसे उत्पत्ति हुई, क्या उनका महत्व है। आप-हम गलत बोल सकते हैं। लेकिन जो पुराण में लिखा हुआ है, जो शास्त्रों में, तंत्र शास्त्र इत्यादि में उनके विषय में चर्चा की गई है — वह तो गलत नहीं हो सकता। उसे रिलेट कीजिए।
साक्षात शिव के अंश से प्रकट, जो अनेक भी हैं और एक भी
भैरव के साथ प्रेत-पिशाच की बात क्यों जोड़ी जाती है?
जो साक्षात शिव के अंश से प्रकट हुए हैं, वे पूछते हैं, उनके साथ प्रेत-पिशाच वाली बात कहाँ से आ जाती है? उनका स्वरूप वैसा है तो यह कहा जाए कि उस जगह में भी वे वास करते हैं। और भैरव जी केवल एक तो नहीं हैं — उनके भेद को समझिए: वे अनेक होते हैं, एक भी होते हैं।
जो साक्षात शिव के अंश से प्रकट हुए हैं, वक्ता पूछते हैं, उनके साथ वह प्रेत-पिशाच वाली बात कहाँ से आ जाती है? उनका स्वरूप वैसा है, तो यह कहा जाए कि उस जगह में भी वे वास करते हैं। केवल भैरव जी एक तो नहीं हैं न? उनके भेद को समझिए। वे अनेक होते हैं, एक भी होते हैं।
जो भगवान रूप न ले सके, खा न सके, नाच न सके
भगवान में इच्छानुसार अनेक रूप धारण करने का सामर्थ्य है, और जो ऐसा न कर सके वह भगवान ही नहीं
यह उनका सामर्थ्य है और यह भगवान ही कर सकते हैं, वे कहते हैं; जो भगवान हैं उनके पास कुछ भी करने का सामर्थ्य है, वे अनेकों रूप धारण कर सकते हैं। और जिनके भगवान ऐसा नहीं कर सकते, वे फिर भगवान ही नहीं हैं। तुम्हारे भगवान कितने सक्षम हैं कि साकार रूप धारण नहीं कर सकते; कितने असक्षम हैं कि एक से अधिक रूप धारण नहीं कर सकते; कि किसी चीज़ को खा नहीं सकते, नाच नहीं सकते। हमारे भगवान तो हर कुछ करने में सक्षम हैं।
यह उनका सामर्थ्य है और यह भगवान ही कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं। जो भगवान हैं, उनके पास तो कुछ भी करने का सामर्थ्य है। वे अनेकों रूप धारण कर सकते हैं। और जिनके भगवान ऐसा नहीं कर सकते, वे फिर भगवान ही नहीं हैं। तुम्हारे भगवान कितने सक्षम हैं कि साकार रूप धारण नहीं कर सकते। तुम्हारे भगवान कितने असक्षम हैं कि एक से अधिक रूप धारण नहीं कर सकते। तुम्हारे भगवान कितने सक्षम हैं कि किसी चीज़ को खा नहीं सकते, नाच नहीं सकते। हमारे भगवान तो हर कुछ करने में सक्षम हैं। वही हमें प्रेरणा देते हैं। हमारे सामने लीला रचकर वही हमें मार्ग दिखाते हैं कि विपत्ति के समय हमें कैसा धैर्य रखना चाहिए, क्या करना चाहिए; और गलत करने से हमारे साथ क्या होगा, अगर हम गलत आचरण करें या धर्मयुक्त कार्य करें तो हमारे साथ क्या-क्या हो सकता है। वे ये चीज़ें अपने आचरण से सिखाते हैं — तभी तो वे भगवान हैं।
दया, और हमारे भगवान की शरणागति
जिनके भगवान असक्षम हैं उन पर दया करनी चाहिए, और उनके भगवान को शरणागति लेकर शक्ति-सिद्धि प्राप्त करनी चाहिए
जिनके भगवान ये सब करने में समर्थ नहीं हैं — उन पर दया करनी चाहिए, वे कहते हैं। उनके भगवान असक्षम हैं, और उनके भगवान को हमारे भगवान की शरणागति लेकर शक्ति-सिद्धि हासिल करनी चाहिए।
तो जिनके भगवान ये सब करने में समर्थ नहीं हैं, वक्ता कहते हैं, उन पर दया करनी चाहिए। उनके भगवान असक्षम हैं, और उनके भगवान को हमारे भगवान की शरणागति लेकर शक्ति-सिद्धि हासिल करनी चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।