सुई की नोक भर ज़मीन

Not even a needle’s point of land — Kṛṣṇa as peace envoy, and Duryodhana’s refusal

The recording opens here soon — the whole satsang is below to read.

प्रपद्यस्व महाबाहुं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् । प्रसन्नो हि सुखाय स्यादुभयोरेव केशवः ॥
उद्योग 129.38 →

जय श्री कृष्ण।

एक बात पूछूँ? आख़िरी बार आपने किसी बहस में ये कब कहा था — "ठीक है, आप सही हैं"?

सोचिए। घर में, दफ़्तर में, रिश्तेदारों के ग्रुप में…

पुश्तैनी मकान का बँटवारा चल रहा है। दो भाई। वकील बीच में। बात बस एक दीवार की है… तीन फ़ुट की। और दोनों भाई दस साल से एक-दूसरे की शादी-ब्याह में नहीं गए।

या दफ़्तर की मीटिंग। सबको पता है कि बात ठीक कौन कह रहा है। पर कोई झुकेगा नहीं। क्योंकि झुकना… हार लगता है।

आज की कथा ऐसे ही एक "नहीं" की है। एक ऐसा "नहीं", जिसके पीछे पूरा कुरुक्षेत्र खड़ा था। और उस "नहीं" के सामने… स्वयं भगवान खड़े थे।

हस्तिनापुर। पाण्डव तेरह बरस का वनवास काटकर लौट आए हैं। अब बस अपना हिस्सा चाहिए। दोनों तरफ़ सेनाएँ जुट रही हैं।

और ऐसे समय में, श्रीकृष्ण ख़ुद शांतिदूत बनकर कौरवों की सभा में जाते हैं।

विदुर ने रात को उन्हें रोका भी — "वहाँ मत जाइए। वो आपकी बात नहीं मानेगा।" श्रीकृष्ण ने कहा — "विदुर, मैं सब जानता हूँ। उसकी दुष्टता भी, राजाओं की शत्रुता भी। फिर भी आया हूँ।" और फिर एक बहुत सुंदर बात कही —

धर्मकार्यं यतञ्शक्त्या नो चेत्प्राप्नोति मानवः । प्राप्तो भवति तत्पुण्यमत्र मे नास्ति संशयः ॥
उद्योग 93.7

"अगर कोई पूरी ताक़त से भले काम में लगे, और फिर भी काम पूरा न हो… तो भी उसका पुण्य उसे मिल जाता है।"

और आगे —

आकेशग्रहणान्मित्रमकार्यात्संनिवर्तयन् ।
उद्योग 93.12

"दोस्त ग़लत रास्ते पर जा रहा हो, तो उसे लौटाओ। ज़रूरत पड़े तो बाल पकड़कर भी।" और ये भी कहा — "भलाई करते हुए वो मुझ पर शक करे, तब भी मेरे मन को संतोष रहेगा।"

सोचिए। जीत की कोई गारंटी नहीं। फिर भी जाना। यही है भगवान का स्वभाव।

अगली सुबह सभा भरी है। भीष्म, द्रोण, विदुर, धृतराष्ट्र, सारे राजा। और श्रीकृष्ण दुर्योधन की ओर मुड़ते हैं। पाठ कहता है — मीठी वाणी में।

कोई धमकी नहीं। समझाते हैं — "तुम बड़े कुल के हो, पढ़े-लिखे हो। पाण्डवों से जन्म से छल हुआ, फिर भी उन्होंने कभी क्रोध नहीं किया।" और फिर वो बात, जो हर घर की दीवार पर लिखी होनी चाहिए —

यस्तु निःश्रेयसं श्रुत्वा प्राक्तदेवाभिपद्यते । आत्मनो मतमुत्सृज्य स लोके सुखमेधते ॥
उद्योग 124.24 →

"जो भली बात सुनकर, अपनी राय छोड़कर, उसे तुरंत अपना ले… वो संसार में सुख से बढ़ता है।"

और अब पहली चौंकाने वाली बात। श्रीकृष्ण ने सभा में माँगा क्या?

मा तात श्रियमायान्तीमवमंस्थाः समुद्यताम् । अर्धं प्रदाय पार्थेभ्यो महतीं श्रियमाप्नुहि ॥
उद्योग 124.61 →

"बेटा, सामने आती लक्ष्मी का अपमान मत करो। आधा पाण्डवों को दे दो… और बड़ी लक्ष्मी पाओ।"

आधा। बस आधा। और बदले में? पाण्डव उसे युवराज बनाते, धृतराष्ट्र महाराज रहते, कुल बचा रहता।

अब दुर्योधन बोला। और ध्यान से सुनिए, क्योंकि उसका उत्तर हम सबके अंदर कहीं न कहीं बैठा है।

"मैंने क्या ग़लत किया? जुआ उन्होंने ख़ुद माना था। बहुत सोचने पर भी मुझे अपना छोटे से छोटा अपराध नहीं दिखता।"

और दूसरी चौंकाने वाली बात। दुर्योधन ने अपने हठ के लिए एक मुनि का वचन सुनाया — मातङ्ग मुनि का —

उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम् । अप्यपर्वणि भज्येत न नमेदिह कर्हिचित् ॥
उद्योग 127.19 →

"खड़े रहो, झुको मत। भले टूट जाओ… पर कभी झुको मत।"

देखिए, अड़ियलपन के पास भी अपना एक दर्शन होता है। वो ख़ुद को अड़ियल नहीं कहता। वो कहता है — "मैं स्वाभिमानी हूँ।"

और फिर वो पंक्ति, जो इतिहास बन गई —

यावद्धि तीक्ष्णया सूच्या विद्ध्येदग्रेण केशव । तावदप्यपरित्याज्यं भूमेर्नः पाण्डवान्प्रति ॥
उद्योग 127.25 →

"केशव… एक तेज़ सुई की नोक जितनी ज़मीन छेदती है… मेरे जीते जी उतनी भी पाण्डवों को नहीं मिलेगी।"

सुई की नोक भर।

सोचिए। माँगा गया आधा राज्य। और उत्तर मिला — सुई की नोक भी नहीं। जब मन अड़ जाता है, तो बात ज़मीन की नहीं रहती। बात "मैं" की हो जाती है।

ततः प्रहस्य दाशार्हः क्रोधपर्याकुलेक्षणः ।
उद्योग 128.1 →

श्रीकृष्ण हँसे। पर आँखों में क्रोध था। और एक-एक करके सब गिनाया — लाख का घर, विष, द्रौपदी का अपमान। "माता-पिता, भीष्म, द्रोण, विदुर — सबने बार-बार कहा, शान्ति करो। पर तुम शान्त नहीं होते।"

दुःशासन ने कहा, "भैया, सन्धि नहीं की तो ये लोग तुम्हें बाँधकर पाण्डवों को सौंप देंगे।" बस, इतना सुनना था —

भ्रातुरेतद्वचः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रः सुयोधनः । क्रुद्धः प्रातिष्ठतोत्थाय महानाग इव श्वसन् ॥
उद्योग 128.26 →

वो उठा। बड़े साँप की तरह फुफकारता हुआ। और भीष्म, द्रोण, पिता, श्रीकृष्ण… सबको अनदेखा करके सभा से बाहर निकल गया।

तब धृतराष्ट्र ने गान्धारी को बुलवाया। माँ का बुलावा था, तो बेटा लौटा। आँखें लाल, साँसें तेज़।

और गान्धारी ने जो कहा, वो किसी राजनीति की किताब से नहीं… एक माँ के दिल से निकला —

क्षुद्राक्षेणेव जालेन झषावपिहितावुभौ । कामक्रोधौ शरीरस्थौ प्रज्ञानं तौ विलुम्पतः ॥
उद्योग 129.31 →

"बेटा, बारीक जाल में फँसी दो मछलियों की तरह, काम और क्रोध इस शरीर में बैठे हैं। और ये दोनों बुद्धि को कुतर डालते हैं।"

"आधी पृथ्वी तुम्हारे लिए बहुत है। तेरह बरस का अन्याय बस हुआ।" और आख़िर में —

न लोभादर्थसंपत्तिर्नराणामिह दृश्यते । तदलं तात लोभेन प्रशाम्य भरतर्षभ ॥
उद्योग 129.54 →

"लोभ से आज तक किसी को धन मिलते नहीं देखा। बस कर, बेटा। शान्त हो जा।"

वो फिर भी नहीं माना।

अब बात और आगे बढ़ी। बाहर जाकर चार लोगों ने योजना बनाई — "कृष्ण को यहीं पकड़ लो। बाँध लो। पाण्डवों का सहारा टूट जाएगा।"

पर सात्यकि इशारे पढ़ना जानते थे। फ़ौरन भाँप लिया। कृतवर्मा से कहा, "सेना तैयार रखो, द्वार पर खड़े रहो।" और अंदर आकर श्रीकृष्ण को बता दिया।

अब देखिए भगवान का उत्तर। धृतराष्ट्र से कहते हैं — "मैं इन सबको रोक सकता हूँ।" पर फिर —

न त्वहं निन्दितं कर्म कुर्यां पापं कथंचन ॥
उद्योग 130.37 →

"पर मैं कोई निन्दा वाला, पाप का काम नहीं करूँगा।" "दुर्योधन जैसा चाहे, वैसा हो। मैं तुम्हारे सब पुत्रों को छूट देता हूँ।"

सामर्थ्य पूरा है। फिर भी संयम। जिसे पकड़ने की योजना बन रही है, वही छूट दे रहा है।

दुर्ग्राह्यः पाणिना वायुर्दुःस्पर्शः पाणिना शशी । दुर्धरा पृथिवी मूर्ध्ना दुर्ग्राह्यः केशवो बलात् ॥
उद्योग 130.53 →

धृतराष्ट्र ने ख़ुद बेटे से कहा — "हवा को मुट्ठी में पकड़ना कठिन, चाँद को हाथ से छूना कठिन, धरती सिर पर उठाना कठिन… और केशव को बल से पकड़ना कठिन।"

फिर श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से कहा —

एकोऽहमिति यन्मोहान्मन्यसे मां सुयोधन ।
उद्योग 131.2 →

"सुयोधन, तुम मुझे अकेला समझते हो?" और वो ज़ोर से हँसे।

और उस हँसी के साथ… उनके शरीर से बिजली जैसे सब देवता निकल पड़े। माथे पर ब्रह्मा, छाती पर रुद्र, भुजाओं पर लोकपाल। दाहिने अर्जुन, बाएँ बलराम। चाँद-सूरज आँखें, नदियाँ-समुद्र पसीना, रात-दिन पलकों का झपकना।

डर से राजाओं ने आँखें बंद कर लीं। केवल भीष्म, द्रोण, विदुर, संजय और ऋषि देख पाए। और तीसरी चौंकाने वाली बात — भगवान ने अंधे धृतराष्ट्र को उस घड़ी दिव्य आँखें दीं। और धृतराष्ट्र ने क्या माँगा?

भगवन्मम नेत्राभ्यामन्तर्धानं वृणे पुनः । भवन्तं दृष्टवानस्मि नान्यं द्रष्टुमिहोत्सहे ॥
उद्योग 131.27 →

"भगवन्, मेरी आँखें फिर से बंद कर दीजिए। आपको देख लिया… अब इस संसार में कुछ और देखना नहीं चाहता।"

जिसने भगवान को देख लिया… उसे ज़मीन का टुकड़ा क्या दिखेगा।

और श्रीकृष्ण ने वो रूप समेटा, सात्यकि और विदुर का हाथ पकड़ा, और बाहर निकल गए। सबसे पहले बुआ कुन्ती से मिलने।

अब ज़रा रुककर देखिए। भगवान ख़ुद चलकर उस आदमी के दरवाज़े गए, जिसके बारे में वो जानते थे कि नहीं मानेगा। समझाया। सुना। अपमान सहा। पकड़ने की योजना पर भी हाथ नहीं उठाया।

क्यों? क्योंकि भगवान हमें भी ऐसे ही समझाते हैं। किसी माँ की आवाज़ में, किसी दोस्त की सलाह में, किसी रात की बेचैनी में। बार-बार। हम सुई की नोक भर भी नहीं छोड़ते… और वो फिर भी आते हैं।

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली। जीतना और सही होना, दो अलग बातें हैं। भली बात सुनें, तो अपनी राय छोड़ने में देर मत कीजिए। भाई से तीन फ़ुट की दीवार जीत ली… और भाई हार गए, तो क्या जीता?

दूसरी। शान्ति की पूरी कोशिश कीजिए। फ़ोन आप पहले कर लीजिए। और सामने वाला न माने, तो अपराधबोध मत ढोइए। श्रीकृष्ण ने कहा था — पूरी ताक़त से की गई कोशिश का पुण्य मिल ही जाता है।

और तीसरी। "टूट जाऊँगा, पर झुकूँगा नहीं" — ये संसार के आगे ठीक हो सकता है। पर भगवान के आगे झुकना हार नहीं है। गान्धारी ने बेटे से यही कहा था — श्रीकृष्ण की शरण लो। वो प्रसन्न हुए, तो दोनों पक्षों का भला करेंगे।

तो अगली बार, जब किसी बहस में मन अड़ जाए… जब ज़बान पर आए, "एक इंच भी नहीं"…

तो एक पल रुकिए। और अपने आप से धीरे से पूछिए —

"सुई की नोक भर ज़मीन… किसके लिए?"

जय श्री कृष्ण।

प्रपद्यस्व महाबाहुं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् । प्रसन्नो हि सुखाय स्यादुभयोरेव केशवः ॥
उद्योग 129.38 →

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.जीतना और सही होना, दो अलग बातें हैं। भली बात सुनें, तो अपनी राय छोड़ने में देर मत कीजिए। भाई से तीन फ़ुट की दीवार जीत ली… और भाई हार गए, तो क्या जीता?
  2. 2.शान्ति की पूरी कोशिश कीजिए। फ़ोन आप पहले कर लीजिए। और सामने वाला न माने, तो अपराधबोध मत ढोइए। श्रीकृष्ण ने कहा था — पूरी ताक़त से की गई कोशिश का पुण्य मिल ही जाता है।
  3. 3."टूट जाऊँगा, पर झुकूँगा नहीं" — ये संसार के आगे ठीक हो सकता है। पर भगवान के आगे झुकना हार नहीं है। गान्धारी ने बेटे से यही कहा था — श्रीकृष्ण की शरण लो। वो प्रसन्न हुए, तो दोनों पक्षों का भला करेंगे।

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