लात खाकर भी मुस्कान

Kicked, and still smiling — Bhṛgu kicks the sleeping Viṣṇu, who rises and presses the sage’s feet

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अतीव कोमलौ तात चरणौ ते महामुने ।
भागवत 10.89.10

जय श्री कृष्ण।

आज एक ऐसे पल की बात, जो लगभग हर किसी के साथ हुआ है।

भरी मीटिंग। सबके सामने। और किसी ने आपको ऐसी बात कह दी… जो सीधे छाती पर लगी। बॉस ने। किसी रिश्तेदार ने शादी में। या किसी ने सोशल मीडिया पर, जहाँ सारा मोहल्ला पढ़ रहा है।

और उस रात नींद नहीं आती। दिमाग़ में वही बात घूमती है। "मैंने ये जवाब क्यों नहीं दिया? वो क्यों नहीं कहा?" अपमान का घाव शरीर पर नहीं होता। पर सबसे देर से भरता है।

और फिर हम क्या करते हैं? या तो उसी समय पलटकर दो बातें सुना देते हैं… और फिर बरसों की दुश्मनी। या चुप रह जाते हैं, और वो चुप्पी अंदर ही अंदर ज़हर बन जाती है।

तीसरा रास्ता भी है क्या? है। और वो रास्ता भगवान ने ख़ुद चलकर दिखाया है।

आज भागवत की एक कथा, जिसमें किसी ने सचमुच छाती पर लात मारी। और जिसे मारी गई… वो स्वयं भगवान थे।

सरस्वती नदी का किनारा। बहुत से ऋषि मिलकर एक बड़ा यज्ञ कर रहे हैं। और बीच में बहस छिड़ गई।

वितर्कः समभूत् तेषां त्रिष्वधीशेषु को महान् ॥
10.89.1

"तीनों बड़े देवताओं में सबसे बड़ा कौन?" यानी ऋषियों में भी वही बहस, जो हमारे घरों में होती है — "किसका भगवान बड़ा?"

तय हुआ — परीक्षा ली जाए। और भेजा किसे? ब्रह्मा के पुत्र, महर्षि भृगु को।

भृगु पहले अपने ही पिता ब्रह्मा की सभा में गए। और जानबूझकर न प्रणाम किया, न स्तुति। ब्रह्मा को क्रोध आया, तेज से जलने लगे।

पर भागवत कहता है — ब्रह्मा ने अपना क्रोध अपने भीतर ही शांत कर लिया। जैसे आग अपने ही जल से बुझ जाए। बेटा था न। पिता ने सह लिया।

फिर भृगु कैलास गए। महादेव उन्हें देखकर ख़ुशी से उठे, भाई की तरह गले लगाने आए। भृगु ने गले लगने से मना कर दिया। "आप मर्यादा तोड़ने वाले हैं।"

महादेव की आँखें लाल! त्रिशूल उठ गया! तब देवी पार्वती उनके चरणों में गिरीं, मीठी वाणी से शांत किया।

और यहाँ एक बात समझ लीजिए। भृगु कोई दुष्ट नहीं थे। भागवत ख़ुद कहता है — ये सब "सत्त्व-परीक्षा" थी। ऋषियों ने ये परीक्षा लोगों का संदेह मिटाने के लिए करवाई थी। भृगु एक कठिन काम पर निकले थे, जिसमें उन्हें ख़ुद बुरा बनना था।

और ज़रा भृगु की हिम्मत तो देखिए! अपने पिता का अपमान। महादेव का अपमान। त्रिशूल उठते-उठते बचे। और फिर भी अगले दरवाज़े की ओर चल दिए।

दो परीक्षाएँ हो गईं। अब तीसरी। भृगु वैकुण्ठ पहुँचे।

भगवान विष्णु लेटे थे। लक्ष्मी जी की गोद में सिर रखे। शांत। विश्राम में।

और भृगु ने क्या किया?

शयानं श्रिय उत्सङ्गे पदा वक्षस्यताडयत् ।
10.89.8

सोते हुए भगवान की छाती पर… लात मार दी।

अब सोचिए। लक्ष्मी जी सामने बैठी हैं। अपनी पत्नी के सामने। बिना किसी ग़लती के। सोते हुए आदमी पर।

आप-हम होते, तो क्या होता? अजी, किसी ने ग़लती से पैर छू जाए, तो हम पलटकर देखते हैं, "देख के नहीं चल सकते?"

और भगवान ने क्या किया? सुनिए।

तत उत्थाय भगवान् सह लक्ष्म्या सतां गतिः ।
10.89.8
स्वतल्पादवरुह्याथ ननाम शिरसा मुनिम् ॥
10.89.9

लक्ष्मी जी के साथ उठे। अपने पलंग से नीचे उतरे। और मुनि के सामने सिर झुकाकर प्रणाम किया।

"आइए ब्रह्मन्, आपका स्वागत है! एक पल इस आसन पर बैठिए। हमें पता नहीं था आप आए हैं, क्षमा कीजिए।"

लात खाने वाला माफ़ी माँग रहा है। क्योंकि उसने स्वागत नहीं किया।

और एक छोटा-सा शब्द ध्यान दीजिए — "सह लक्ष्म्या", लक्ष्मी के साथ। लक्ष्मी जी भी साथ उठीं। जिनके सामने उनके पति का अपमान हुआ… भागवत उनके ग़ुस्से का एक शब्द नहीं लिखता। वो पति के साथ उठकर खड़ी हो गईं।

घर में एक भड़के, तो दूसरा आग में घी डाल देता है — "तुमने सुना, उसने क्या कहा?" यहाँ दोनों ने मिलकर आग बुझा दी।

और फिर… वो पंक्ति, जिसके लिए ये सत्संग है।

अतीव कोमलौ तात चरणौ ते महामुने । इत्युक्त्वा विप्रचरणौ मर्दयन् स्वेन पाणिना ॥
10.89.10

"महामुने… आपके चरण तो बहुत कोमल हैं।" और अपने हाथों से मुनि के पैर सहलाने लगे।

"चोट तो नहीं लगी आपको?"

छाती पर लात पड़ी। और भगवान को चिंता है… मारने वाले के पैर की।

और आगे कहा — "आपके चरण का जल तीर्थों को भी पवित्र करता है। मुझे भी, मेरे लोक को भी पवित्र कीजिए।"

वत्स्यत्युरसि मे भूतिर्भवत्पादहतांहसः ॥
10.89.12

"और आज से, आपके चरण से मेरे पाप धुल गए। अब लक्ष्मी मेरी इसी छाती पर हमेशा रहेंगी।"

अब एक बात। लोग कहते हैं कि भगवान ने भृगु के पैर का निशान अपनी छाती पर हमेशा के लिए रख लिया। हमारा पाठ ये कहता है — भगवान ने कहा, जिस छाती पर लात पड़ी, वहीं लक्ष्मी बसेंगी। अपमान की जगह को… उन्होंने वैभव की जगह बना दिया।

और भृगु का क्या हुआ?

निर्वृतस्तर्पितस्तूष्णीं भक्त्युत्कण्ठोऽश्रुलोचनः ॥
10.89.13

भृगु कुछ बोल नहीं पाए। गला भर आया। आँखों से आँसू बहने लगे।

जो परीक्षा लेने आया था… वो भक्त बनकर लौटा। लात का जवाब लात से दिया जाता, तो एक झगड़ा होता। प्रेम से दिया गया, तो एक भक्त पैदा हुआ।

भृगु सत्र में लौटे, सब सुनाया। ऋषि चकित रह गए। उनका संदेह मिट गया। और भागवत कहता है, उन्होंने विष्णु को सबसे बड़ा माना —

भूयांसं श्रद्दधुर्विष्णुं यतः शान्तिर्यतोऽभयम् ॥
10.89.15

"जिनसे शांति मिलती है। जिनसे अभय मिलता है।"

ध्यान दीजिए, कसौटी क्या थी? ताक़त नहीं। चमत्कार नहीं। कसौटी थी — अपमान के सामने कौन कितना शांत रहा।

अब कोई कहेगा, "वो तो भगवान थे। हम इंसान हैं।" तो एक इंसान की बात भी सुन लीजिए, उसी भागवत से।

अवन्ती देश का एक ब्राह्मण। धन गया, अपनों ने छोड़ दिया, तो वैराग्य हो गया। भिक्षु बनकर घूमने लगा।

और लोगों ने उसके साथ क्या नहीं किया। डंडा छीन लेते, कमंडल छीन लेते, फिर लौटाकर दिखा-दिखाकर छीनते। नदी किनारे खाना खाता, तो सिर पर थूकते। "ये चोर है" कहकर रस्सी से बाँध देते। हँसी उड़ाते — "पैसा गया, घरवालों ने निकाला, तो बाबा बन गया!"

और उस बूढ़े ने उस सब के बीच एक गीत गाया —

नायं जनो मे सुखदुःखहेतुर्न देवताऽऽत्मा ग्रहकर्मकालाः ।
भागवत 11.23.43

"मेरे सुख-दुख का कारण ये लोग नहीं हैं। न देवता, न ग्रह, न समय।" मन ही है, जो सब घुमाता है।

और फिर उसने एक ऐसी मिसाल दी, जो कभी नहीं भूलती —

जिह्वां क्वचित् सन्दशति स्वदद्भिस्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् ॥
11.23.51

"कभी अपने ही दाँतों से अपनी जीभ कट जाए… तो ग़ुस्सा किस पर करोगे?" दाँत तोड़ दोगे?

जो हमें चोट पहुँचाते हैं, वो भी उसी एक के बनाए हैं। उसी शरीर के दाँत, उसी शरीर की जीभ।

और वो बूढ़ा भिक्षु अपनी गाथा किस बात पर ख़त्म करता है? "मैं इस अपार अँधेरे को कैसे पार करूँगा? मुकुन्द के चरणों की सेवा से।"

अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव ॥
11.23.58

यानी अपमान सहने की ताक़त कहाँ से आई? दाँत भींचने से नहीं। भगवान के चरण पकड़ने से।

और ये गीत किसने सुनाया, जानते हैं? भागवत में ये कथा ख़ुद श्रीकृष्ण उद्धव को सुनाते हैं। यानी भगवान अपने सबसे प्यारे मित्र से कह रहे हैं — "उद्धव, अपमान सहना सीखना हो, तो इस बूढ़े भिक्षु से सीखो।"

तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।

पहली। अपमान के बदले अपमान मत लौटाइए। भगवान ने लात का जवाब पैर सहलाकर दिया, और भृगु रो पड़े। कड़वा जवाब एक झगड़ा जीतता है। शांत जवाब एक इंसान जीत लेता है।

दूसरी। जहाँ चोट लगी है, उस जगह को वैभव बना दीजिए। जिस अपमान ने आपको तोड़ा, उसी से सीखिए, उसी से मज़बूत बनिए। भगवान ने जहाँ लात पड़ी, वहीं लक्ष्मी बसा दीं।

और तीसरी। भगवान ने गीता में अपने प्यारे भक्त की पहचान बताई है —

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
गीता 12.18
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित् ।
12.19

"जो मान और अपमान में एक-सा रहे, निंदा और तारीफ़ को बराबर तौले… वो मुझे प्यारा है।" अपमान सहना कमज़ोरी नहीं। भगवान को प्यारे होने का रास्ता है।

तो अगली बार, जब किसी की बात छाती पर लगे… जब रात भर वो वाक्य दिमाग़ में घूमे…

तो वैकुण्ठ के उस पल को याद कीजिए। छाती पर लात। और भगवान, ज़मीन पर उतरकर, मारने वाले के पैर सहलाते हुए।

लात खाकर भी मुस्कान… "आपके चरण तो बहुत कोमल हैं।"

जय श्री कृष्ण।

अतीव कोमलौ तात चरणौ ते महामुने । इत्युक्त्वा विप्रचरणौ मर्दयन् स्वेन पाणिना ॥
भागवत 10.89.10

तीन बातें याद रखिए

  1. 1.अपमान के बदले अपमान मत लौटाइए। भगवान ने लात का जवाब पैर सहलाकर दिया, और भृगु रो पड़े। कड़वा जवाब एक झगड़ा जीतता है। शांत जवाब एक इंसान जीत लेता है।
  2. 2.जहाँ चोट लगी है, उस जगह को वैभव बना दीजिए। जिस अपमान ने आपको तोड़ा, उसी से सीखिए, उसी से मज़बूत बनिए। भगवान ने जहाँ लात पड़ी, वहीं लक्ष्मी बसा दीं।
  3. 3.भगवान ने गीता में अपने प्यारे भक्त की पहचान बताई है —

इस सत्संग के श्लोक

भागवत 10.89.10 10.89.1 10.89.8 10.89.9 10.89.10 10.89.12 10.89.13 10.89.15 भागवत 11.23.43 11.23.51 11.23.58 गीता 12.18 12.19