पानी में गिरा राजकुमार
The prince who fell in the water — Duryodhana falls in Maya’s hall; the laughter grows into a war
The recording opens here soon — the whole satsang is below to read.
अमर्षेण तु संपूर्णो दह्यमानो दिवानिशम् ।
जय श्री कृष्ण।
रात के ग्यारह बजे। बिस्तर पर लेटे हैं। नींद आनी चाहिए। पर अँगूठा फ़ोन पर ऊपर-नीचे चल रहा है।
किसी पुराने साथी की नई गाड़ी। किसी रिश्तेदार की विदेश यात्रा की तस्वीरें। किसी का प्रमोशन, किसी का नया घर, किसी के बच्चे का बड़े कॉलेज में दाख़िला। और हर तस्वीर के साथ अंदर कुछ थोड़ा-सा जलता है।
"मेरी ज़िंदगी में ऐसा क्यों नहीं?" और फिर वो सवाल, जो हम ज़ोर से नहीं पूछते — "उसके पास ये सब क्यों है?"
इस आग का नाम है जलन। ईर्ष्या। और आज की कथा उस राजकुमार की है, जिसे इस आग ने इतना जलाया… कि उसकी लपटों में पूरा महाभारत जल गया।
इन्द्रप्रस्थ। युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ अभी-अभी पूरा हुआ है। और पाण्डवों के पास है एक ऐसी सभा, जैसी धरती पर किसी के पास नहीं। मय दानव की बनाई हुई। अर्जुन ने कभी आग में जलते मय को बचाया था, और उसी के बदले मय ने ये सभा बनाई थी।
और उस सभा की ख़ासियत क्या थी? उसमें आँखें धोखा खा जाती थीं। जहाँ फ़र्श था, वहाँ पानी दिखता। जहाँ पानी था, वहाँ फ़र्श। जहाँ दीवार थी, वहाँ दरवाज़ा। जहाँ दरवाज़ा था, वहाँ दीवार।
दुर्योधन अपने मामा शकुनि के साथ उस सभा को घूम-घूमकर देख रहा था। और ऐसी चीज़ें देख रहा था, जो उसने अपने हस्तिनापुर में कभी नहीं देखी थीं।
एक जगह उसे लगा, आगे पानी है। उसने अपने कपड़े ऊपर उठाए… वो सूखा स्फटिक का फ़र्श था।
अगली जगह लगा, सूखा फ़र्श है। आराम से क़दम रखा…
ततः स्फाटिकतोयां वै स्फाटिकाम्बुजशोभिताम् ।
वापीं मत्वा स्थलमिव सवासाः प्रापतज्जले ॥
और छपाक! कपड़ों समेत सीधा पानी में! वो एक बावड़ी थी, स्फटिक जैसे साफ़ पानी वाली, स्फटिक के कमलों से सजी।
जले निपतितं दृष्ट्वा भीमसेनो महाबलः ।
जहास जहसुश्चैव किङ्कराश्च सुयोधनम् ॥
और महाभारत कहता है — उसे पानी में गिरा देखकर भीमसेन हँस पड़े। और सेवक भी हँसे। फिर अर्जुन और दोनों जुड़वाँ भाई भी ठहाका मारकर हँसे।
युधिष्ठिर ने सेवकों से उसे सूखे, सुंदर कपड़े दिलवाए। पर दुर्योधन वो हँसी नहीं सह सका। चेहरा फेर लिया। किसी की ओर देखा नहीं।
और फिर भी मुसीबत ख़त्म नहीं हुई। एक बंद दिखते दरवाज़े से निकलने गया, माथा स्फटिक से टकराया। एक और दरवाज़े को धक्का दिया, तो आगे गिर पड़ा। और जो दरवाज़ा सचमुच खुला था, उससे डरकर पीछे हट गया — "कहीं फिर धोखा न हो।"
और अब पहली बात, जो बहुत लोग ग़लत सुनाते हैं।
लोग कहते हैं, द्रौपदी हँसी थीं। और ऐसा भी कहते हैं कि उन्होंने ताना मारा। हमारा पाठ ध्यान से सुनिए। जब महाभारत ख़ुद घटना बताता है, तो हँसने वालों में नाम हैं — भीम, सेवक, अर्जुन, नकुल, सहदेव। द्रौपदी का नाम वहाँ नहीं है। और कोई ताना नहीं।
पर बाद में, जब दुर्योधन अपने पिता को ये घटना सुनाता है, तो कहता है —
तत्र मामहसद्भीमः सह पार्थेन सस्वरम् ।
द्रौपदी च सह स्त्रीभिः पातयन्ती मनो मम ॥
"वहाँ भीम अर्जुन के साथ ज़ोर से हँसा। और द्रौपदी भी, स्त्रियों के साथ, जिसने मेरा मन तोड़ दिया।"
देखिए कितनी गहरी बात है। घटना एक है। पर जलन के चश्मे से जब वो दोबारा सुनाई जाती है… तो हँसने वालों की लिस्ट लंबी हो जाती है। हर कोई दुश्मन लगने लगता है।
हम भी यही करते हैं। किसी ने एक बात कही, और रात भर में हम उसे दस गुना बड़ा बना लेते हैं।
दुर्योधन हस्तिनापुर लौटा। पर शरीर लौटा, मन वहीं अटका रहा।
पाण्डवश्रीप्रतप्तस्य ध्यायमानस्य गच्छतः ।
दुर्योधनस्य नृपतेः पापा मतिरजायत ॥
"पाण्डवों की लक्ष्मी से जलते हुए, उसी के बारे में सोचते-सोचते… रास्ते में दुर्योधन के मन में एक पाप भरा विचार पैदा हुआ।"
"सोचते-सोचते" — ध्यान दीजिए इस शब्द पर। विचार अचानक नहीं आया। बार-बार सोचने से पैदा हुआ।
शकुनि बार-बार पूछता रहा, "क्या हुआ?" दुर्योधन जवाब तक नहीं दे रहा था। फिर फूट पड़ा —
अमर्षेण तु संपूर्णो दह्यमानो दिवानिशम् ।
शुचिशुक्रागमे काले शुष्ये तोयमिवाल्पकम् ॥
"मामा, मैं जलन से भरा हूँ। दिन-रात जल रहा हूँ। जैसे गर्मी के महीनों में थोड़ा-सा पानी सूख जाता है, वैसे मैं सूख रहा हूँ।"
और फिर कहा — "मैं आग में कूद जाऊँगा, ज़हर खा लूँगा, पानी में डूब जाऊँगा। शत्रु को फलते-फूलते और ख़ुद को गिरते देखकर कौन जी सकता है?"
और फिर उसने एक ऐसी बात मानी, जो अपने आप में बहुत कुछ कहती है —
कृतो यत्नो मया पूर्वं विनाशे तस्य सौबल ।
तच्च सर्वमतिक्रम्य संवृद्धोऽप्स्विव पङ्कजम् ॥
"मामा, मैंने पहले भी उसे मिटाने की कोशिश की थी। पर वो सब पार करके ऐसे बढ़ता गया… जैसे पानी में कमल।"
सोचिए। जिसे गिराने की कोशिश की, वो कमल बनकर खिल गया। और जो गिराने चला था, वो ख़ुद पानी में गिरा। जलन का पानी ऐसा ही होता है — जिसके लिए खोदो, उसमें पहले ख़ुद गिरते हो।
और फिर दुर्योधन ने कहा, "मानता हूँ, भाग्य ही सब कुछ है, मेहनत बेकार है।" देखिए, जलन आदमी से उसकी मेहनत पर भरोसा भी छीन लेती है।
और अब दूसरी बात, जो इस कथा का सबसे सच्चा हिस्सा है।
धृतराष्ट्र ने बेटे से पूछा — "बेटा, तुम्हारे पास क्या कमी है? अच्छे कपड़े, अच्छा खाना, अच्छे घोड़े, महल, नौकर-चाकर। गुरुओं से विद्या सीखी। फिर तुम दुबले और पीले क्यों हो?"
और दुर्योधन का जवाब, ज़रा ध्यान से सुनिए —
अदृश्यामपि कौन्तेय श्रियं पश्यन्निवोद्यताम् ॥
"पिताजी, युधिष्ठिर की वो लक्ष्मी… आँखों के सामने न हो, तब भी मुझे दिखती रहती है।"
यही है जलन। जो चीज़ सामने नहीं है, वो भी दिखती रहती है। फ़ोन बंद कर दिया, फिर भी वो तस्वीर आँखों के सामने है। अपने घर में सब है… पर अपना कुछ दिखता ही नहीं।
और सुनिए, दुर्योधन को सबसे ज़्यादा क्या चुभा? वो बताता है — युधिष्ठिर के यज्ञ में जब भी एक लाख ब्राह्मण भोजन कर लेते, तो एक शंख बजाया जाता। "पिताजी, वो शंख बार-बार बजता रहा… और हर बार मेरे रोंगटे खड़े हो गए।"
दूसरे के घर का शंख। और जलन किसी और के कानों में।
और यहाँ धृतराष्ट्र ने, एक बार, बेटे को बहुत सही बात कही थी —
त्वं वै ज्येष्ठो ज्यैष्ठिनेयः पुत्र मा पाण्डवान्द्विषः ।
द्वेष्टा ह्यसुखमादत्ते यथैव निधनं तथा ॥
"बेटा, पाण्डवों से द्वेष मत करो। द्वेष करने वाला ख़ुद ही दुख उठाता है। जैसे मौत को गले लगाता है।"
अव्यापारः परार्थेषु नित्योद्योगः स्वकर्मसु ।
रक्षणं समुपात्तानामेतद्वैभवलक्षणम् ॥
"दूसरों के काम में दख़ल न देना। अपने काम में रोज़ मेहनत करना। जो मिला है, उसकी देखभाल करना। यही असली वैभव की पहचान है।"
बाहूनिवैतान्मा च्छेत्सीः पाण्डुपुत्रास्तथैव ते ।
"वो तुम्हारी अपनी बाँहों जैसे हैं, बेटा। अपनी बाँहें मत काटो।"
पर दुर्योधन नहीं माना। शकुनि ने जुए का रास्ता सुझाया था। और बाक़ी इतिहास है। एक बावड़ी का पानी… कुरुक्षेत्र का ख़ून बन गया।
और गीता में भगवान श्रीकृष्ण इस पूरी कथा को दो श्लोकों में समझा देते हैं —
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
"जिसके बारे में बार-बार सोचते हो, उससे लगाव होता है। लगाव से चाह। और चाह पूरी न हो, तो क्रोध।"
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
"क्रोध से मोह। मोह से याददाश्त गड़बड़। फिर बुद्धि का नाश। और फिर… आदमी का ही नाश।"
दुर्योधन की कहानी इसी सीढ़ी पर उतरती है। "ध्यायमानस्य" — सोचते-सोचते — से शुरू। और कुरुक्षेत्र पर ख़त्म।
तो आज घर ले जाने के लिए तीन बातें।
पहली। किसी के गिरने पर हँसिए मत। भीम की एक हँसी को दुर्योधन कभी भूल नहीं पाया। सोशल मीडिया पर किसी की ग़लती का मज़ाक़, ऑफ़िस में किसी की चूक पर ठहाका — वो हँसी किसी के मन में बरसों जलती रह सकती है।
दूसरी। जब जलन उठे, तो उसे सोचते मत रहिए। गीता की सीढ़ी पहले क़दम पर ही रोकी जा सकती है। फ़ोन रख दीजिए। और अपने घर की चीज़ें गिनिए। धृतराष्ट्र की बात याद रखिए — "जो मिला है, उसकी देखभाल।"
और तीसरी। भगवान से रोज़ एक बात माँगिए — "मुझे दूसरों की लक्ष्मी देखकर ख़ुश होना सिखाइए।" जिस दिन किसी और के घर का शंख सुनकर आपका मन भी मुस्कुराए… उस दिन समझिए, आप दुर्योधन की सभा से बाहर निकल आए।
तो आज रात, जब फ़ोन पर किसी की चमकती तस्वीर देखकर मन में कुछ जले…
तो उस सभा को याद कीजिए। स्फटिक का फ़र्श। धोखा देता पानी। और एक राजकुमार, जो गिरा तो पानी में था… पर डूबा जलन में।
पानी में गिरा राजकुमार। उसे कपड़े बदलने को मिल गए थे… मन बदलने को नहीं।
जय श्री कृष्ण।
अव्यापारः परार्थेषु नित्योद्योगः स्वकर्मसु ।
रक्षणं समुपात्तानामेतद्वैभवलक्षणम् ॥
तीन बातें याद रखिए
- 1.किसी के गिरने पर हँसिए मत। भीम की एक हँसी को दुर्योधन कभी भूल नहीं पाया। सोशल मीडिया पर किसी की ग़लती का मज़ाक़, ऑफ़िस में किसी की चूक पर ठहाका — वो हँसी किसी के मन में बरसों जलती रह सकती है।
- 2.जब जलन उठे, तो उसे सोचते मत रहिए। गीता की सीढ़ी पहले क़दम पर ही रोकी जा सकती है। फ़ोन रख दीजिए। और अपने घर की चीज़ें गिनिए। धृतराष्ट्र की बात याद रखिए — "जो मिला है, उसकी देखभाल।"
- 3.भगवान से रोज़ एक बात माँगिए — "मुझे दूसरों की लक्ष्मी देखकर ख़ुश होना सिखाइए।" जिस दिन किसी और के घर का शंख सुनकर आपका मन भी मुस्कुराए… उस दिन समझिए, आप दुर्योधन की सभा से बाहर निकल आए।